Author name: Prasanna

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. दहन के लिए आवश्यक वह कौन-सी गैस है जिसे औद्योगिक सभ्यता का आधार कहा जाता है?
(A) ओज़ोन
(B) नाइट्रोजन
(C) ऑक्सीजन
(D) आर्गन
उत्तर:
(C) ऑक्सीजन

2. रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन ऐसी कौन-सी गैस है जिसके अभाव में मनुष्य व जीव-जंतुओं के ऊतक जलकर नष्ट हो जाते हैं?
(A) हीलियम
(B) क्रिप्टान
(C) हाइड्रोजन
(D) नाइट्रोजन
उत्तर:
(D) नाइट्रोजन

3. वह कौन-सी गैस है जिससे मिलकर पौधे स्टार्च व शर्कराओं का निर्माण करते हैं?
(A) जीनोन
(B) नियोन
(C) कार्बन-डाईऑक्साइड
(D) ओज़ोन
उत्तर:
(C) कार्बन-डाईऑक्साइड

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

4. उस गैस का नाम बताइए जो चूने की चट्टानों पर कार्ट स्थलाकृति की रचना करती है और ग्रीन हाऊस प्रभाव उत्पन्न करती है।
(A) ऑक्सीजन
(B) कार्बन-डाईऑक्साइड
(C) नाइट्रोजन
(D) हाइड्रोजन
उत्तर:
(B) कार्बन-डाईऑक्साइड

5. पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेने वाली ओजोन गैस वायुमंडल में किस ऊंचाई पर मिलती है?
(A) 80 कि०मी० पर
(B) 50 से 100 कि०मी० तक
(C) 10 से 50 कि०मी० तक
(D) 8 से 16 कि०मी० तक
उत्तर:
(C) 10 से 50 कि०मी० तक

6. वायुमंडल में कार्बन-डाईऑक्साइड किस ऊंचाई तक पाई जाती है?
(A) 50 कि०मी०
(B) 90 कि०मी०
(C) 120 कि०मी०
(D) 30 कि०मी०
उत्तर:
(B) 90 कि०मी०

7. वायुमंडल का कौन-सा घटक इंद्रधनुष और प्रभामण्डल जैसे मनभावन दृश्य विकसित करने में भूमिका निभाता है?
(A) कण
(B) गैस
(C) उल्कापात
(D) जलवाष्प
उत्तर:
(D) जलवाष्प

8. अधिकांश मौसमी घटनाएँ किस मण्डल में घटित होती हैं?
(A) क्षोभमण्डल
(B) समतापमण्डल
(C) आयनमण्डल
(D) ओज़ोन मण्डल
उत्तर:
(A) क्षोभमण्डल

9. वायुमंडल की किस परत को “मौसमी परिवर्तनों की छत” कहा जाता है?
(A) समतापमण्डल
(B) समताप सीमा
(C) मध्यमण्डल सीमा
(D) क्षोभसीमा
उत्तर:
(D) क्षोभसीमा

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

10. वायुमंडल की कौन-सी परत पृथ्वी की ओर से भेजी गई रेडियो तरंगों को परावर्तित करके पुनः पृथ्वी पर भेज देती है?
(A) तापमण्डल
(B) समतापमण्डल
(C) मध्यमण्डल
(D) क्षोभमण्डल
उत्तर:
(A) तापमण्डल

11. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?
(A) पृथ्वी की ओर आ रहे उल्कापिंड समतापमण्डल में जलकर नष्ट हो जाते हैं।
(B) मध्यमण्डल सीमा को ‘मुक्त मेघों की जननी’ कहा जाता है।
(C) समतापमण्डल में उड़ते जेट विमान से छूटती सफेद पूंछ वास्तव में इंजन से निकली नमी होती है।
(D) वायुमंडल गतिशील, लचीला, संपीड्य और प्रसारणीय है।
उत्तर:
(B) मध्यमण्डल सीमा को ‘मुक्त मेघों की जननी’ कहा जाता है।

12. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे कम मात्रा में मौजूद है?
(A) ऑक्सीजन
(B) कार्बन-डाइऑक्साइड
(C) नाइट्रोजन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कार्बन-डाइऑक्साइड

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
वायुमंडल की सबसे निचली परत में कौन सी गैस पाई जाती है?
उत्तर:
कार्बन-डाइऑक्साइड।

प्रश्न 2.
वह कौन-सी गैस है जिसके बिना आग नहीं जलाई जा सकती?
उत्तर:
ऑक्सीजन।

प्रश्न 3.
कौन-सी गैस पौधों व वनस्पति का भोजन बनाने में काम आती है?
उत्तर:
नाइट्रोजन।

प्रश्न 4.
वायुमंडल की कौन-सी गैस पराबैंगनी विकिरण को सोख लेती है?
उत्तर:
ओज़ोन।

प्रश्न 5.
मानव तथा धरातलीय जीवों के लिए कौन-सी परत सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
क्षोभमण्डल।

प्रश्न 6.
क्षोभमण्डल की ध्रुवों तथा भूमध्यरेखा पर ऊँचाई क्रमशः कितनी है?
उत्तर:
8 कि०मी० व 18 कि०मी०।

प्रश्न 7.
वायुमंडल की कौन-सी परत द्वारा रेडियो तरंगों का पृथ्वी की ओर परावर्तन होता है?
उत्तर:
आयनमण्डल द्वारा।

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प्रश्न 8.
जेट विमानों के उड़ान की आदर्श स्थिति किस मण्डल में है?
उत्तर:
समतापमण्डल में।

प्रश्न 9.
ऊँचाई के साथ तापमान किस मण्डल में बढ़ता है?
उत्तर:
समतापमण्डल में।

प्रश्न 10.
क्षोभमण्डल को समतापमण्डल से अलग करने वाली पतली परत का नाम बताइए।
उत्तर:
क्षोभ सीमा।

प्रश्न 11.
ध्रुवीय प्रकाश के दर्शन वायुमंडल की किस परत में होते हैं?
उत्तर:
आयनमण्डल में।

प्रश्न 12.
वायुमंडल की सबसे निचली परत का नाम बताएँ।
उत्तर:
क्षोभमण्डल।

प्रश्न 13.
वायुमंडल की किस परत में मौसमी दशाएँ अथवा वायुमंडलीय विघ्न पाए जाते हैं?
उत्तर:
क्षोभमण्डल में।

प्रश्न 14.
वायुमंडल की किस परत में तापमान स्थिर रहता है?
उत्तर:
समतापमण्डल में।

प्रश्न 15.
कौन-सी गैस ‘काँच घर का प्रभाव’ उत्पन्न करती है?
उत्तर:
कार्बन-डाइऑक्साइड।

प्रश्न 16.
वायुमंडल पृथ्वी के साथ किस शक्ति के कारण से टिका हुआ है?
उत्तर:
पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण।

प्रश्न 17.
आधुनिक खोजों के अनुसार वायुमंडल की ऊँचाई कितनी है?
उत्तर:
32,000 कि०मी० से अधिक।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में से प्रत्येक के लिए पारिभाषिक शब्द लिखिए-

  1. समतापमण्डल को क्षोभमण्डल से अलग करने वाली परत।
  2. वायुमंडल का वह संस्तर जिसमें वायुयानों को उड़ाने के लिए आदर्श दशाएँ मौजूद हैं।
  3. वायुमंडल का वह संस्तर जो पृथ्वी से प्रेषित रेडियो तरंगों को परावर्तित करके पुनः पृथ्वी के धरातल पर वापस भेज देता है।
  4. हवा का वह विस्तृत आवरण जो पृथ्वी को चारों ओर से पूर्णतः ढके हुए हैं।
  5. वायुमंडल का वह संस्तर जो समतापमण्डल और आयनमण्डल के बीच स्थित है।
  6. वायुमंडल का सबसे ऊपरी संस्तर।

उत्तर:

  1. क्षोभ सीमा
  2. समतापमण्डल
  3. आयनमण्डल
  4. वायुमंडल
  5. मध्यमण्डल
  6. बाह्यमण्डल।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायुमंडल किन तत्त्वों से बना हुआ है?
उत्तर:
अनेक गैसों, जलवाष्प तथा कुछ सूक्ष्म ठोस कणों से।

प्रश्न 2.
जीवन के लिए कौन-सी गैसें महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
मनुष्य और जानवरों के लिए ऑक्सीजन तथा पेड़-पौधों के लिए कार्बन-डाइऑक्साइड।

प्रश्न 3.
वायुमंडल की प्रमुख परतों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. क्षोभमण्डल
  2. समतापमण्डल
  3. मध्यमण्डल
  4. आयनमण्डल तथा
  5. बाह्यमण्डल।

प्रश्न 4.
क्षोभमण्डल में तापमान की सामान्य ह्रास दर कितनी है?
उत्तर:
165 मीटर के लिए 1° सेल्सियस या 1 कि०मी० के लिए 6.4° सेल्सियस।

प्रश्न 5.
वायुमंडल में नाइट्रोजन व ऑक्सीजन गैसों का कितना-कितना प्रतिशत है?
उत्तर:
क्रमशः 78 प्रतिशत व 21 प्रतिशत।

प्रश्न 6.
वायुमंडल का हमारे लिए क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमंडल के कारण ही पृथ्वी पर जीवन सम्भव हुआ है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 7.
ओज़ोन गैस का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
यह गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है।

प्रश्न 8.
ओजोन परत के छिलने या कम होने के दो कारण बताओ।
उत्तर:

  1. कार्बन-डाइऑक्साइड गैस का अधिक औद्योगिक उपयोग।
  2. वनों की अत्यधिक कटाई।

प्रश्न 9.
ओज़ोन परत धरातल से कितनी ऊँचाई पर स्थित है?
उत्तर:
10 से 50 कि०मी० की ऊँचाई पर।

प्रश्न 10.
आयतन के हिसाब से वायुमंडल में वाष्प की कितनी मात्रा पाई जाती है?
उत्तर:
अति ठण्डे व अति शुष्क क्षेत्रों में हवा के आयतन के एक प्रतिशत तक तथा भूमध्य रेखा के पास उष्ण व आर्द्र क्षेत्रों में हवा के आयतन के 4 प्रतिशत तक।

प्रश्न 11.
मौसम के प्रमुख तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
तापमान, वर्षा, पवनों की दिशा, पवनों की गति, आर्द्रता व मेघ इत्यादि।

प्रश्न 12.
जलवाष्प के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वाष्पीकरण तथा पेड़-पौधों व मिट्टी से वाष्पोत्सर्जन।

प्रश्न 13.
जलवाष्पों के मुख्य कार्य कौन-से होते हैं?
उत्तर:
वाष्प ही संघनित होकर ओस, कुहासा, कोहरा तथा बादल बनाते हैं।

प्रश्न 14.
धूलकणों का वायुमंडल में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
ये ताप का अवशोषण करते हैं तथा धुंध, धूम कोहरा व बादल बनाते हैं।

प्रश्न 15.
ऐरोसोल क्या होता है?
उत्तर:
वायुमंडल में धूल, पराग व नमक आदि के ठोस कणों को ऐरोसोल कहा जाता है।

प्रश्न 16.
क्षोभमण्डल की ऊँचाई भूमध्य रेखा पर अधिक क्यों होती है?
उत्तर:
ध्रुवों पर क्षोभमण्डल की ऊँचाई 8 किलोमीटर और भूमध्य रेखा पर 18 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा पर क्षोभमण्डल की अधिक ऊँचाई का कारण यह है कि वहाँ पर चलने वाली तेज़ संवहन धाराएँ ऊष्मा को धरातल से अधिक ऊँचाई पर ले जाती हैं। यही कारण है कि जाड़े की अपेक्षा गर्मी में क्षोभमण्डल की ऊँचाई बढ़ जाती है।

प्रश्न 17.
विषममण्डल (Heterosphere) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विषममण्डल एक परतदार उष्ण मण्डल है जो मध्यमण्डल से ऊपर स्थित है। इस मण्डल में तापमान तेज़ी से बढ़ता है। यहाँ 350 कि०मी० की ऊँचाई पर तापमान 900° सेल्सियस तक पहुँच जाता है।

प्रश्न 18.
पृथ्वी का अंग न होते हुए भी वायुमंडल पृथ्वी से क्यों जुड़ा हुआ है?
उत्तर:
वायुमंडल का अधिकतर भाग भू-पृष्ठ से केवल 32 कि०मी० की ऊँचाई तक सीमित है। पृथ्वी का अंग न होते हुए भी वायुमंडल- पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी से जुड़ा हुआ है।

प्रश्न 19.
वायुमंडल की सक्रिय व निष्क्रिय गैसें कौन-सी हैं?
उत्तर:
वायुमंडल में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन-डाइऑक्साइड तथा ओज़ोन गैसें सक्रिय गैसें हैं, परन्तु कुछ गैसें अत्यन्त कम मात्रा में मिलती हैं और रासायनिक प्रतिक्रियाओं में शामिल नहीं होतीं। ऐसी निष्क्रिय गैसों में जेलोन, क्रिप्टॉन, नियॉन तथा आर्गन इत्यादि आती हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायुमंडल की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वायुमंडल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. वायुमंडल की वायु एक रंगहीन, गंधहीन तथा स्वादहीन पदार्थ है।
  2. वायुमंडल को हम देख नहीं सकते। वर्षा, ओले, तूफ़ान, बादल, तड़ित व धुंध जैसी घटनाओं से हम इसकी उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं।
  3. नवीनतम खोजों के अनुसार वायुमंडल 32,000 कि०मी० से भी अधिक ऊँचाई तक फैला हुआ है। कभी इसकी ऊँचाई केवल 800 कि०मी० मानी जाती थी।
  4. वास्तव में वायुमंडल की कोई ऐसी ऊपरी सीमा तय नहीं हो सकी जो इसे अन्तरिक्ष (Universe) से अलग करती हो।
  5. भू-तल के निकट वायु सघन (Dense) होती है जो ऊँचाई बढ़ने के साथ उत्तरोत्तर विरल (Rare) और हल्की होती जाती है।
  6. यह पता ही नहीं चल पाता कि कहाँ वायुमंडल समाप्त होकर अन्तरिक्ष में विलीन हो गया।

प्रश्न 2.
वायुमंडल किन-किन तत्त्वों से मिलकर बना है? उन तत्त्वों की प्रतिशत मात्रा लिखिए।
उत्तर:
वायुमंडल विभिन्न गैसों का एक मिश्रण है जिसमें ठोस तथा तरल पदार्थों के कण असमान मात्रा में तैरते रहते हैं। शुद्ध शुष्क वायु में नाइट्रोजन 78.08%, ऑक्सीजन 20.95%, कार्बन-डाइऑक्साइड 0.036% और हाइड्रोजन 0.01% तथा ओज़ोन इत्यादि गैसें होती हैं। वायुमंडल में गैसों के अतिरिक्त जलकण तथा धूलकण होते हैं। वायु का संघटन विभिन्न स्थानों तथा विभिन्न समयों में भिन्न होता है। विश्व की जलवायु तथा मौसमी दशाएँ इसी पर आधारित होती हैं।

शुद्ध शुष्क वायु निम्नलिखित तत्त्वों से बनी होती है:

वायु में विभिन्न गैसों की प्रतिशत मात्रा (आयतन)
नाइट्रोजन (N2)78%
ऑक्सीजन (O2)21%
आर्गन (Ar)0.93%
कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2)0.03%
अन्य0.04%

प्रश्न 3.
वायुमंडल में ऑक्सीजन व कार्बन-डाइऑक्साइड के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ऑक्सीजन का महत्त्व-

  • यह एक जीवनदायिनी गैस है। मनुष्य और जानवर श्वसन में ऑक्सीजन को ही ग्रहण करते हैं।
  • ऑक्सीजन दहन के लिए आवश्यक है। इसके बिना आग नहीं जलाई जा सकती। इस प्रकार ऑक्सीजन ऊर्जा का प्रमुख साधन व औद्योगिक सभ्यता का आधार है।
  • शैलों के रासायनिक अपक्षय में सहयोग देकर ऑक्सीजन अनेक भू-आकारों की उत्पत्ति का कारण बनती है।

कार्बन-डाइऑक्साइड का महत्त्व-

  • जीवित रहने के लिए पौधे कार्बन-डाइऑक्साइड पर निर्भर करते हैं।
  • हरे पौधे वायुमंडल की कार्बन-डाइऑक्साइड से मिलकर स्टार्च व शर्कराओं का निर्माण करते हैं।
  • यह गैस प्रवेशी सौर विकिरण को तो पथ्वी तल तक आने देती है किन्त पथ्वी से विकिरित होने वाली लम्बी तरंगों को बाहर जाने से रोकती है। इससे पृथ्वी के निकट वायुमंडल का निचला भाग गर्म रहता है। इस प्रकार कार्बन-डाइऑक्साइड ‘काँच घर का प्रभाव’ उत्पन्न करती है।
  • औद्योगिक क्रान्ति के बाद जैव ईंधन (लकड़ी, कोयला, पेट्रोल व गैस) के अधिक जलने से वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा 10 प्रतिशत बढ़ी है जिससे भू-मण्डलीय ऊष्मा में वृद्धि हुई है।
  • वर्षा जल में घुलकर कार्बन-डाइऑक्साइड तनु अम्ल बनाती है और चूने की चट्टानों पर ‘कार्ट स्थलाकृति’ की रचना करती है।

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प्रश्न 4.
वायुमंडल में धूलकणों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमंडल में उपस्थित धूल के कण निम्नलिखित रूप से महत्त्वपूर्ण हैं-

  1. धूलकण सौर ताप के कुछ भाग को सोख लेते हैं तथा कुछ भाग को परावर्तित कर देते हैं जिससे वायुमंडल का तापमान अधिक नहीं बढ़ता।
  2. वायुमंडल में उपस्थित धूलकण आर्द्रताग्राही केन्द्र का कार्य करते हैं। इनके चारों ओर ही जलवाष्प केन्द्रित होते हैं जिससे कोहरा तथा बादल आदि का निर्माण होता है और वर्षा होती है।
  3. धूलकणों के कारण वायुमंडल की दर्शन क्षमता कम होती है।
  4. धूलकणों के कारण ही सूर्योदय, सूर्यास्त तथा इन्द्रधनुष आदि रंग-बिरंगे दृश्यों का निर्माण होता है।

प्रश्न 5.
वायुमंडल में नाइट्रोजन व ओज़ोन गैस का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
नाइट्रोजन का महत्त्व-

  • नाइट्रोजन वायु में उपस्थित ऑक्सीजन के प्रभाव को कम करती है। यदि वायुमंडल में नाइट्रोजन न होती तो वस्तुएँ इतनी तेज़ी से जलती कि उस पर नियन्त्रण करना कठिन होता।
  • नाइट्रोजन के अभाव में मनुष्य तथा जीव-जन्तुओं के शरीर के ऊतक भी जलकर नष्ट हो जाते हैं।
  • मिट्टी में नाइट्रोजन की उपस्थिति प्रोटीनों का निर्माण करती है जो पौधों और वनस्पति का भोजन बनते हैं।
  • नाइट्रोजन की उपस्थिति के कारण ही वायुदाब, पवनों की गति तथा प्रकाश के परावर्तन का आभास होता है।

ओज़ोन गैस का महत्त्व ओजोन गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है जिससे स्थलमण्डल एक उपयुक्त सीमा से अधिक गर्म नहीं हो पाता। इस प्रकार यह गैस एक छलनी (Filter) का कार्य करती है जिसकी अनुपस्थिति में सब कुछ जलकर समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 6.
वायुमंडल में जलवाष्प के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वाष्प ही संघनित होकर ओस, कुहासा, कोहरा तथा बादलों का सृजन करते हैं। धरती पर वर्षा और हिमपात भी इन्हीं के कारण होता है। वायुमंडल में जलवाष्प की उपस्थिति के कारण ही इन्द्रधनुष तथा प्रभा-मण्डल जैसे मनभावन दृश्य विकसित होते हैं।

वाष्प की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्रिया उसकी पारदर्शिता पर आधारित होती है। इसी पारदर्शिता के कारण लघु तरंगों के रूप में सूर्य की ऊष्मा धरती पर पहुँच सकती है किन्तु लम्बी तरंगों के रूप में विकिरित ऊष्मा वायुमंडल को चीरकर बाहर नहीं जा पाती। अतः वायुमंडल में वाष्पों की उपस्थिति के कारण पृथ्वी गर्म रह पाती है। इस प्रकार वाष्प विशाल कम्बल की भाँति कार्य करते हैं। वाष्प या जल के अन्य रूपों द्वारा छोड़ी गई गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) अनेक मौसमी दशाओं को जन्म देती है।

प्रश्न 7.
वायुमंडल में पाए जाने वाले ठोस कण और आकस्मिक रचक कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:
गैस तथा वाष्प के अतिरिक्त वायु में कुछ सूक्ष्म ठोस कण भी पाए जाते हैं जिनमें धूलकण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। ये कण सौर विकिरण का कुछ अंश अवशोषित कर लेते हैं साथ ही सूर्य की किरणों का परावर्तन (Reflection) और प्रकीर्णन (Scattering) भी करते हैं। इसी के परिणामस्वरूप हमें आकाश नीला दिखाई पड़ता है। किरणों के प्रकीर्णन के कारण ही सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आकाश में लाल और नारंगी रंग की छटाएँ बनती हैं। इन्हीं धूल कणों के कारण ही धुंध (Haze) व धूमकोहरा (Smog = Smoke + Fog) बनता है।

वायुमंडल में कुछ आकस्मिक रचक (Accidental Component) और अपद्रव्य (Impurities) भी शामिल होती हैं। इनमें धुएँ की कालिख (soot), ज्वालामुखी राख, उल्कापात के कण, समुद्री झाग के बुलबुलों के टूटने से मुक्त हुए ठोस लवण, जीवाणु, बीजाणु तथा पशुशालाओं के पास की वायु में अमोनिया के अंश इत्यादि पदार्थ आते हैं।

प्रश्न 8.
गुप्त ऊष्मा क्या होती है तथा मौसम पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
अथवा
“गुप्त ऊष्मा प्रचण्ड मौसमी दशाओं का इंजन कहलाती है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
केवल जल में निराली विशेषता होती है कि वह तापमान के अनुसार गैस, तरल व ठोस अवस्था में बदल सकता है। जल जब एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलता है तो यह या तो ऊष्मा छोड़ता है या ग्रहण करता है। इसके बिना जल की अवस्था बदल नहीं सकती। इस ऊष्मा को गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) कहते हैं। वाष्पन (Evaporation) की प्रक्रिया में जलवाष्प ऊष्मा को ग्रहण करते हैं जबकि संघनन की प्रक्रिया में ऊष्मा का त्याग होता है। प्रायः त्यागी गई ऊष्मा, ग्रहण की गई ऊष्मा के लगभग समान होती है। पवनें गुप्त ऊष्मा का स्थानान्तरण करती हैं। जब गुप्त ऊष्मा अत्यधिक मात्रा में निकलती है तो वायु में असन्तुलन की दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। फलस्वरूप बिजली की कड़क, बादलों का गरजना, उष्ण-कटिबन्धीय चक्रवात और तड़ित-झंझावात जैसी प्रचण्ड घटनाएँ घटित होती हैं।

प्रश्न 9.
मनुष्य के लिए वायुमंडल का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमंडल मनुष्य के लिए निम्नलिखित प्रकार से महत्त्वपूर्ण है-

  1. वायुमंडल में उपस्थित ऑक्सीजन गैस मानव-जीवन का आधार है।
  2. पेड़-पौधों का जीवन वायुमंडल की कार्बन-डाइऑक्साइड पर निर्भर करता है।
  3. वायुमंडल सूर्यातप को अवशोषित करके एक काँच घर (Glass House) का कार्य करता है।
  4. वायुमंडल में उपस्थित धूलकण वर्षा का आधार बनते हैं।
  5. वायुमंडल का विभिन्न खाद्यान्नों, मौसम, जलवायु तथा वायुमार्गों पर भी प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 10.
क्षोभमण्डल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भू-तल के सम्पर्क में क्षोभमण्डल वायुमंडल की सबसे निचली परत है जिसका घनत्व सर्वाधिक है। ध्रुवों पर इस परत की ऊँचाई 8 किलोमीटर और भूमध्य रेखा पर 18 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा पर क्षोभमण्डल की अधिक ऊँचाई का कारण यह है कि वहाँ पर चलने वाली तेज़ संवहन धाराएँ ऊष्मा को धरातल से अधिक ऊँचाई पर ले जाती हैं। यही कारण है कि जाड़े की अपेक्षा गर्मी में क्षोभमण्डल की ऊँचाई बढ़ जाती है। संवहन धाराओं की अधिक सक्रियता के कारण इस परत को प्रायः संवहन क्षेत्र भी कहते हैं। इस मण्डल में प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेल्सियस तापमान गिर जाता है। ऊँचाई बढ़ने पर तापमान गिरने की इस दर को सामान्य हास दर कहा जाता है। मानव व अन्य धरातलीय जीवों के लिए यह परत सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। ऋतु व मौसम सम्बन्धी लगभग सभी घटनाएँ; जैसे बादल, वर्षा, भूकम्प आदि जो मानव-जीवन को प्रभावित करती हैं, इसी परत में घटित होती हैं। क्षोभमण्डल में ही भारी गैसों, जलवाष्प, धूलकणों, अशुद्धियों व आकस्मिक रचकों की अधिकतम मात्रा पाई जाती है।

क्षोभमण्डल की ऊपरी सीमा को क्षोभ सीमा (Tropopause) कहते हैं। यह क्षोभमण्डल व समतापमण्डल को अलग करती है। लगभग 11/2 से 2 किलोमीटर मोटी इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान गिरना बन्द हो जाता है। इस भाग में हवाएँ व संवहनी धाराएँ भी चलना बन्द हो जाती हैं।

प्रश्न 11.
क्षोभ सीमा क्या है?
उत्तर:
भू-तल से ऊपर की ओर जाते हुए तापमान असमान दर से परिवर्तित होता है। 15 कि०मी० की ऊँचाई तक तापमान के घटने की दर धीमी होती है। 80 कि०मी० तक तापमान में परिवर्तन नहीं होता, परन्तु 80 कि०मी० के पश्चात् तापमान में तेज़ी से वृद्धि होती है। क्षोभमण्डल से ऊपर समतापमण्डल आरम्भ हो जाता है। समतापमण्डल तथा क्षोभमण्डल को अलग करने वाला संक्रमण क्षेत्र क्षोभ सीमा कहलाता है।

प्रश्न 12.
क्षोभ सीमा पर ध्रुवों की अपेक्षा विषुवत् रेखा के ऊपर न्यूनतम तापमान क्यों पाया जाता है?
उत्तर:
पृथ्वी पर न्यूनतम तापमान ध्रुवीय क्षेत्रों में मिलता है, परन्तु वायुमंडल में क्षोभ सीमा पर न्यूनतम तापमान विषुवत् रेखा पर मिलता है। विषुवत् रेखा पर क्षोभ सीमा में न्यूनतम तापमान -80° सेल्सियस तथा ध्रुवों पर -45° सेल्सियस पाया जाता है। इसका प्रमुख कारण क्षोभ सीमा की ऊँचाई है। विषुवत रेखा पर इसकी ऊँचाई 18 कि०मी० तथा ध्रुवों पर केवल 8 कि०मी० होती है। वायुमंडल में भू-तल से ऊपर की ओर जाते हुए प्रति 165 मी० पर तापमान 1° सेल्सियस कम होता है। भूमध्य रेखा से क्षोभ सीमा की ऊँचाई अधिक होने के कारण वहाँ तापमान न्यूनतम होता है।

प्रश्न 13.
वायुमंडलीय प्रक्रम क्या होते हैं तथा उनका जलवायु के तत्त्वों से क्या सम्बन्ध होता है?
उत्तर:
वायुमंडलीय प्रक्रमों का अर्थ वायुमंडल में होने वाली उन घटनाओं से है जो दीर्घकाल तक वायुमंडल और पृथ्वी के बीच ताप और आर्द्रता के विनिमय होने के फलस्वरूप घटित होती हैं। भूमण्डलीय पवन-प्रवाह, वाष्पन, द्रवण, ऊष्मा का संचरण एवं विकिरण, जलीय चक्र इत्यादि वायुमंडलीय प्रक्रम हैं जो जैवमण्डल को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। वायुमंडल के सभी प्रक्रम कुछ जलवायवीय तत्त्वों पर निर्भर करते हैं; जैसे तापमान, वायुदाब, आर्द्रता, वायु की दिशा एवं गति तथा जलवायु परिवर्तन आदि।

प्रश्न 14.
आयनमण्डल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
आयनमण्डल-मध्यमण्डल सीमा से परे स्थित आयनमण्डल 80 से 400 किलोमीटर की ऊँचाई तक विस्तृत है। इस परत में विद्यमान गैस के कण विद्युत् आवेशित होते हैं। इन विद्युत् आवेशित कणों को आयन कहा जाता है। ये आयन विस्मयकारी विद्युतीय और चुम्बकीय घटनाओं का कारण बनते हैं। इसी परत में ब्रह्माण्ड किरणों का परिलक्षण होता है। आयनमण्डल पृथ्वी की ओर से भेजी गई रेडियो-तरंगों को परावर्तित करके पुनः पृथ्वी पर भेज देता है। इसी मण्डल से उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Borealis) तथा दक्षिणी ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Australis) के दर्शन होते हैं।

प्रश्न 15.
जलवायु के मुख्य नियन्त्रक कौन-कौन से हैं?
अथवा
किसी स्थान की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
किसी स्थान की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक हैं-

  1. अक्षांश
  2. समुद्र तल से ऊँचाई
  3. जल व स्थल का वितरण
  4. वायुदाब
  5. प्रचलित पवनें
  6. सागरीय धाराएँ
  7. स्थलीय अवरोध।

प्रश्न 16.
ओज़ोन पर टिप्पणी लिखिए। यह परत क्यों छिज रही है? परत के पतला होने के सम्भावित नुकसान बताइए।
उत्तर:
ओजोन परत-ओज़ोन गैस ऑक्सीजन का ही एक विशिष्ट रूप है जो समतापमण्डल में 20 से 50 कि०मी० की ऊँचाई , में पाई जाती है। ओज़ोन गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों (Ultra-Violet Rays) के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है जिससे स्थलमण्डल एक उपयुक्त सीमा से अधिक गर्म नहीं हो पाता। इस प्रकार यह गैस एक छलनी (Filter) का कार्य करती है जिसकी अनुपस्थिति में सब कुछ जलकर समाप्त हो जाता है। कार्बन-डाइऑक्साइड, अन्य रसायनों तथा अणु शक्ति के परीक्षणों से ओज़ोन की मात्रा घट रही है। सन् 1980 में अंटार्कटिका महाद्वीप के ऊपर ओजोन परत में एक सुराख देखा गया था। इस सुराख से पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुँच सकती हैं जिससे त्वचा का कैंसर व अन्धापन बढ़ सकता है।

प्रश्न 17.
कौन-सी गैस अल्प मात्रा में होते हुए भी वायुमंडलीय प्रतिक्रियाओं के लिए महत्त्वपूर्ण मानी जाती है?
उत्तर:
वायुमंडल में 0.03 प्रतिशत होते हुए भी कार्बन-डाइऑक्साइड अनेक वायुमंडलीय प्रतिक्रियाओं में शामिल होती है। यह गैस ऊष्मा का अवशोषण करती है जिससे निचला वायुमंडल प्रवेशी सौर विकिरण तथा पार्थिव विकिरण द्वारा गर्म हो पाता है। प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया के दौरान हरे पौधे वायुमंडल से कार्बन-डाइऑक्साइड का प्रयोग करते हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 18.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ स्पष्ट कीजिए-
(1) संघनन
(2) इन्द्रधनुष
(3) प्रभामण्डल
(4) धूम कोहरा
(5) प्रकीर्णन
(6) उल्काएँ
(7) मौसम और जलवायु में अंतर
(8) ध्रुवीय प्रकाश
(9) इंटरनेट।
उत्तर:
(1) संघनन-उस ताप को जिस पर वायु अपने में विद्यमान जलवाष्प से संतृप्त हो जाती है, ओसांक (dew point) कहते हैं। वायु का ताप ओसांक से नीचे गिरने पर उसमें विद्यमान जल-वाष्प द्रव जल में बदल जाता है जो ओस या कुहासे के रूप में प्रकट होता है। जलवाष्प के द्रव जल में परिणित होने की घटना संघनन कहलाती है।

(2) इन्द्रधनुष बहुरंजित प्रकाश की एक चाप, जो वर्षा की बूंदों द्वारा सूर्य की किरणों के आन्तरिक अपवर्तन तथा परावर्तन द्वारा निर्मित होती है।

(3) प्रभामण्डल-सूर्य अथवा चन्द्रमा के चारों ओर एक प्रकाश-वलय जो उस समय बनता है जब आकाश में पक्षाभ-स्तरी मेघ की एक महीन परत छायी रहती है। जब सौर प्रभामण्डल बन जाता है, तब वह सूर्य को चमक के कारण दिखाई नहीं देता, परन्तु गहरे रंग के शीशे से आसानी से देखा जा सकता है।

(4) धूम कोहरा अत्यधिक धुएँ से भरा कोहरा धूम कोहरा (Smog) कहलाता है, जो सामान्य रूप से औद्योगिक तथा घने बसे नगरीय क्षेत्रों में पाया जाता है। अंग्रेजी भाषा के इस शब्द की रचना दो शब्दों स्मोक व फॉग (Smoke + Fog) को मिलाकर की गई है।

(5) प्रकीर्णन-लघु तरंगी सौर विकिरण का वायुमंडल के धूलकण व जलवाष्पों से टकराकर टूटना।

(6) उल्काएँ उल्काएँ पत्थर व लोहे के पिण्ड हैं जो अन्तरिक्ष में तेज गति से घमते रहते हैं। कभी-कभी उल्काएँ वायमंडल में खिंच आती हैं और वायु के साथ घर्षण से उत्पन्न ऊष्मा से जल उठती हैं। ऐसी अवस्था में आकाश में प्रकाश की रेखा भी खिंचकर लुप्त हो उठती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे एक तारा टूटकर गिर रहा हो। इस घटना को उल्कापात कहते हैं। उल्काओं की उत्पत्ति का कुछ नहीं पता।

(7) मौसम और जलवायु में अन्तर-मौसम किसी स्थान की दिए हुए समय में वायुमंडलीय दशाओं; जैसे तापमान, आर्द्रता, वायु इत्यादि का वर्णन है। उदाहरण, आज सुबह ठण्ड थी, दोपहर को बादल छाए थे व शाम का मौसम सुहावना था इत्यादि। लेकिन 35 वर्षों तक पाई जाने वाली मौसमी दशाओं की औसत होती है। उदाहरणतः, राजस्थान की जलवायु शुष्क व पश्चिम बंगाल की आई है या इण्डोनेशिया की जलवायु उष्ण एवं आर्द्र है।

(8) ध्रुवीय प्रकाश-आयनमण्डल में विद्युत्-चुम्बकीय घटना (Electromagnetic Phenomenon) का एक प्रकाशमय प्रभाव, जो उच्च अक्षांशों में रात के समय पृथ्वी से 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर लाल, हरे व सफेद चापो के रूप में दिखाई पड़ता है, ध्रुवीय प्रकाश कहलाता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में यह प्रकाश दक्षिण ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Australis) व उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Borealis) के नाम से जाना जाता है।

(9) इंटरनेट (Internet)-एक ऐसी विद्युतीय व्यवस्था जिसमें सूचना के महामार्ग (Information Superhighway) पर बैठे लाखों, करोड़ों लोगों द्वारा आपस में जुड़े हुए कम्प्यूटरों द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर जीवन के लिए वायुमंडल के महत्त्व को स्पष्ट करें।
अथवा
“वायुमंडल की उपस्थिति ने ही पृथ्वी को सौरमण्डल में विलक्षणता प्रदान की है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण रूपी समग्र इकाई के चार प्रमुख अंगों यथा वायुमंडल, स्थलमण्डल, जलमण्डल और जैवमण्डल में वायुमंडल सबसे महत्त्वपूर्ण और गतिशील अंग है। सच तो यह है कि वायुमंडल की उपस्थिति ने ही पृथ्वी को सौरमण्डल में विलक्षणता प्रदान की है।

पृथ्वी पर जीवन के लिए वायुमंडल का महत्त्व-
1. जीवन का अनिवार्य तत्त्व-जल, थल और नभ में रहने वाला कोई भी प्राणी वायु के बिना जीवित नहीं रह सकता। वायु जीवन का मूलाधार है। मनुष्य और जानवरों के लिए ऑक्सीजन तथा पौधों के लिए कार्बन-डाइऑक्साइड वायुमंडल से ही प्राप्त होती है। पृथ्वी पर वायुमंडल की उपस्थिति ही इसे अन्य ग्रहों की अपेक्षा श्रेष्ठता प्रदान करती है।

2. ताप-सन्तुलन-गैसों का आवरण एक विशाल चंदोवे या कम्बल की भाँति कार्य करता हुआ सूर्य से आने वाली सम्पूर्ण ऊष्मा को पृथ्वी पर आने से रोकता है और रात्रि के समय पृथ्वी से विकिरित होने वाली ऊष्मा को अन्तरिक्ष में जाने से रोकता है। इस प्रकार वायुमंडल पृथ्वी पर 35° सेल्सियस का औसत तापमान बनाए रखता है। यदि वायुमंडल न होता तो पृथ्वी पर दिन का तापमान 100° सेल्सियस व रात का तापमान -200° सेल्सियस तक पहुँच जाता। ऐसी असहनीय दशाओं में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

3. मौसम तथा जलवायु-वायुमंडल के असमान गर्म होने की विशेषता के कारण ही वायु का क्षैतिज प्रवाह उच्च दाब से न्यून दाब की ओर होता है। इसी से वायुमंडल में मौसम सम्बन्धी सभी घटनाएँ घटती हैं; जैसे वाष्पीकरण, धुंध, कोहरा, बादल, वर्षा, हिमपात व आंधियाँ इत्यादि। इस प्रकार जल का ठोस, द्रव और गैस तीनों रूपों में, तीनों ही मण्डलों का संचरण होता है।

4. हानिकारक विकिरण से बचाव-वायुमंडल में उपस्थित ओज़ोन गैस सूर्य से आने वाली खतरनाक पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करके जीव-जगत को अनेक बीमारियों से बचाती है।

5. उल्काओं से रक्षा-अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर गिरती हुई उल्काएँ वायु के सम्पर्क में आकर घर्षण (Friction) पैदा करती हैं और इससे उत्पन्न हुई ऊष्मा में पूरी तरह से या कुछ भाग में जलकर राख बन जाती हैं। इससे उनकी पृथ्वी पर ‘मारक शक्ति’ कम हो जाती है।

6. रेडियो-तरंगें-रेडियो तरंगें आयनमण्डल से टकराकर वापस धरती पर लौट आती हैं। इससे दूर-संचार सम्भव हो पाता है। . आज दूरदर्शन, रेडियो, इंटरनेट, ई० मेल व ई० कॉमर्स जैसी सुविधाएँ इसी से सम्भव हो पाई हैं।

7. वायमार्ग-वायमंडल तीव्र वेग से चलने वाले वायुयानों व जेट विमानों को उड़ान सम्भव बनाता है।

8. जैविक विविधता-पृथ्वी पर जलवायु की क्षेत्रीय विभिन्नताओं को जन्म देने में वायुमंडलीय कारक ही प्रमुख हैं, जिनके कारण धरातल पर जैविक विविधता पाई जाती है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 2.
“वैज्ञानिक व तकनीकी विकास के साथ-साथ मानव की वायुमंडलीय प्रक्रमों के प्रेक्षण की क्षमता बढ़ती जाती है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जैसे-जैसे आधुनिक और विकसित यन्त्रों और विधियों द्वारा वायुमंडलीय घटनाओं का प्रेक्षण तथा अभिलेखन तीव्र और आसान होने लगा वैसे-वैसे प्राप्त आँकड़ों की सहायता से मौसम सूचक मानचित्र बनाए जाने लगे। इन मौसम सूचक मानचित्रों की सहायता से विभिन्न समय और स्थानों के मौसम की तुलना सम्भव होने लगी। विश्व का पहला अधिकृत मौसम सम्बन्धी मानचित्र सन् 1686 में बना जिसे ब्रिटेन के नक्षत्र-विज्ञानी एडमण्ड हैले ने बनाया था। इससे उत्साहित होकर अनेक विकसित देशों ने मौसम-सूचक मानचित्रों और मौसम का पूर्वानुमान प्रकाशित करना आरम्भ किया। भारत में मौसम विज्ञान सम्बन्धी सेवा सन् 1864 में आरम्भ हुई। वर्तमान में हमारे देश में 350 से अधिक मौसम-प्रेक्षणशालाएँ हैं जो मौसम सम्बन्धी तत्त्वों की जानकारी व आँकड़े पुणे स्थित मौसम विभाग के मुख्यालय को भेजती हैं। सन् 1951 में स्विट्ज़रलैण्ड के जेनेवा नगर में विश्व मौसम विज्ञान सस्थान की स्थापना की गई। यह संस्थान संयुक्त राष्ट्र संघ का एक विशिष्ट अभिकरण है जिसके माध्यम से विश्व के लगभग सभी देश मौसम-सम्बन्धी सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।

ऊपरी वायुमंडल की छानबीन-17वीं शताब्दी तक वायुमंडल के बारे में वैज्ञानिकों का ज्ञान केवल पृथ्वी के निकट स्थित वायु की परतों तक सीमित था। 18वीं शताब्दी के आरम्भ में वायुमंडल की ऊपरी परतों का तापमान ज्ञात करने के लिए अनेक उपकरणों से सुसज्जित मानव-सहित गुब्बारों को उड़ाया गया। सन् 1804 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुज़ाक एक गुब्बारे के माध्यम से आकाश में 7 किलोमीटर की ऊँचाई तक उड़ा और पाया कि ऊँचाई पर वायु का रासायनिक संघटन एक जैसा ही रहता है। सन् 1904 में मारकोनी द्वारा रेडियो के आविष्कार से वायुमंडल का और अधिक ऊँचाई पर अध्ययन सम्भव हुआ। इसके बाद क्षोभमण्डल और समतापमण्डल की निचली परतों की जानकारी के लिए मानव-रहित गुब्बारों की सहायता ली जाने लगी।

रेडियो संचरण का प्रयोग करने वाले गुब्बारों का प्रयोग 30 किलोमीटर से अधिक ऊँचाई पर नहीं किया जा सकता था। परिणामस्वरूप 1940 के दशक में वैज्ञानिकों ने वायुमंडल की और अधिक ऊपरी परतों का अध्ययन करने के लिए वायुयानों, जेट विमानों, रॉकेटों व राडारों का प्रयोग आरम्भ कर दिया। सन् 1950 के बाद स्वचालित मौसम केन्द्रों की संख्या में काफ़ी वृद्धि हुई।

1960 के दशक में वायुमंडलीय प्रक्रमों के प्रेक्षण हेतु कृत्रिम उपग्रहों व इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों का सहारा लिया गया। अनेक देशों ने अन्तरिक्ष में विशेष मौसम उपग्रह छोड़े। सन् 1960 में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा छोड़े गए मौसम उपग्रह ने 700 किलोमीटर की ऊँचाई से बादलों और वायुमंडलीय दशाओं के चित्र भेजे। आजकल मौसम उपग्रहों का उपयोग सभी देशों के लिए आसान हो गया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने मुम्बई में अपना एक केन्द्र स्थापित किया है जो रोज़ाना INSAT 2E के माध्यम से बादलों के चित्र व प्रक्रमित आँकड़े प्राप्त करता है। मौसम सम्बन्धी इन्हीं सूचनाओं और पूर्वानुमानों को हम दूरदर्शन और समाचार पत्रों में देखते हैं।

आधुनिक युग में सुपर कम्प्यूटर और संवेदनशील उपग्रहों के प्रयोग ने हमारी वायुमंडलीय प्रक्रमों के प्रेक्षण की क्षमता को पहल से बेहतर किया है। आज हम पर्याप्त शुद्धता तक मौसम का पूर्वानुमान लगा सकते हैं किन्तु फिर भी इस दिशा में काफी कुछ करना शेष है।

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

HBSE 12th Class History औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों ने नेतृत्व सँभालने के लिए पुराने शासकों से क्या आग्रह किया ?
उत्तर:
बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों (सैनिकों) ने नेतृत्व संभालने के लिए पुराने अपदस्थ शासकों से आग्रह किया कि वे विद्रोह को नेतृत्व प्रदान करें। क्योंकि वे जानते थे कि नेतृत्व व संगठन के बिना अंग्रेजों से लोहा नहीं लिया जा सकता। यह बात सही है कि सिपाही जानते थे कि सफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व जरूरी है। इसीलिए सिपाही मेरठ में विद्रोह के तुरंत बाद दिल्ली पहुंचे। वहाँ उन्होंने बहादुर शाह को अपना नेता बनाया।

वह वृद्ध था। बादशाह तो नाममात्र का ही था। स्वाभाविक तौर पर वह विद्रोह की खबर से बेचैन और भयभीत हुआ। यद्यपि अंग्रेजों की नीतियों से वह त्रस्त तो था ही फिर भी विद्रोह के लिए तैयार वह तभी हुआ जब कुछ सैनिक शाही शिष्टाचार की अवहेलना करते हुए दरबार तक आ चुके थे। सिपाहियों से घिरे बादशाह के पास उनकी बात मानने के लिए और कोई चारा नहीं था। अन्य स्थानों पर भी पहले सिपाहियों ने विद्रोह किया और फिर नवाबों और राजाओं को नेतृत्व करने के लिए विवश किया।

प्रश्न 2.
उन साक्ष्यों के बारे में चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि विद्रोही योजनाबद्ध और समन्वित ढंग से काम कर रहे थे?
उत्तर:
इस बात के कुछ प्रमाण मिलते हैं कि सिपाही विद्रोह को योजनाबद्ध एवं समन्वित तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। विभिन्न छावनियों में विद्रोही सिपाहियों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान था। ‘चर्बी वाले कारतूसों’ की बात सभी छावनियों में पहुँच गई थी। बहरमपुर से शुरू होकर बैरकपुर और फिर अंबाला और मेरठ में विद्रोह की चिंगारियाँ भड़कीं। इसका अर्थ है कि सूचनाएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच रही थीं।

सिपाही बगावत के मनसूबे गढ़ रहे थे। इसका एक और उदाहरण यह है कि जब मई की शुरुआत में सातवीं अवध इर्रेग्युलर कैवेलरी (7th Awadh Irregular Cavalry) ने नए कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया तो उन्होंने 48वीं नेटिव इन्फेंट्री को लिखा : “हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फैसला लिया है और 48वीं नेटिव इन्फेंट्री के आदेश की प्रतीक्षा है।”

सिपाहियों की बैठकों के भी कुछ सुराग मिलते हैं। हालांकि बैठक में वे कैसी योजनाएँ बनाते थे, उसके प्रमाण नहीं हैं। फिर भी कुछ अंदाजें लगाए जाते हैं कि इन सिपाहियों का दुःख-दर्द एक-जैसा था। अधिकांश उच्च-जाति के थे और उनकी जीवन-शैली भी मिलती-जुलती थी। स्वाभाविक है कि वे अपने भविष्य के बारे में ही निर्णय लेते होंगे। चार्ल्स बॉल (Charles Ball) उन शुरुआती इतिहासकारों में से है जिसने 1857 की घटना पर लिखा है।

इसने भी उन सैन्य पंचायतों का उल्लेख किया है जो कानपुर सिपाही लाइन में रात को होती थी। जिनमें मिलिट्री पुलिस के कप्तान ‘कैप्टेन हियर्से’ की हत्या के लिए 41वीं नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोही सैनिकों ने उन भारतीय सिपाहियों पर दबाव डाला, जो उस कप्तान की सुरक्षा के लिए तैनात थे।

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प्रश्न 3.
1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की किस हद तक भूमिका थी? [2017 (Set-A, D)]
उत्तर:
1857 के घटनाक्रम के निर्धारण में धार्मिक विश्वासों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी। विभिन्न तरीकों से सैनिकों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं। सामान्य लोग भी अंग्रेज़ी सरकार को संदेह की दृष्टि से देख रहे थे। उन्हें यह लग रहा था कि सरकार अंग्रेज़ी शिक्षा और पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार-प्रसार करके भारत में ईसाइयत को बढ़ावा दे रही है।

उनका संदेह गलत भी नहीं था क्योंकि अधिकारी वर्ग ईसाई पादरियों को धर्म प्रचार की छूट और प्रोत्साहन दे रहे थे। सैनिकों और स्कूलों में धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभन भी दिया जा रहा था। 1850 में बने उत्तराधिकार कानून से यह संदेह विश्वास में बदल गया। इसमें धर्म बदलने वाले को पैतृक सम्पत्ति प्राप्ति का अधिकार दिया गया था।

सैनिकों को विदेशों में जाकर लड़ने के लिए भी विवश किया जाता था, जिसे वे गलत मानते थे। इसमें वे अपना धर्म भ्रष्ट मानते थे। अन्ततः इन सभी परिस्थितियों के अन्तर्गत ‘चर्बी वाले कारतूस’ तथा कुछ अन्य अफवाहों, जैसे कि ‘आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट इत्यादि के चलते इस विद्रोह का घटनाक्रम निर्धारित हुआ। अफवाहें तभी विश्वासों में बदल रही थीं क्योंकि उनमें संदेह की अनुगूंज थी।

प्रश्न 4.
विद्रोहियों के बीच एकता स्थापित करने के लिए क्या तरीके अपनाए गए?
उत्तर:
विद्रोहियों की सोच में सभी भारतीय सामाजिक समुदायों में एकता आवश्यक थी। विशेषतौर पर हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया गया। उनकी घोषणाओं में निम्नलिखित बातों पर जोर दिया गया-

  1. जाति व धर्म का भेद किए बिना विदेशी राज के विरुद्ध समाज के सभी समुदायों का आह्वान किया गया।
  2. अंग्रेज़ी राज से पहले मुगल काल में हिंदू-मुसलमानों के बीच रही सहअस्तित्व की भावना का बखान भी किया गया।
  3. लाभ की दृष्टि से इस युद्ध को दोनों समुदायों के लिए एक-समान बताया।
  4. बादशाह बहादुर शाह की ओर से की गई घोषणा में मुहम्मद और महावीर दोनों की दुहाई देते हुए संघर्ष में शामिल होने की अपील की गई।
  5. विद्रोह के लिए समर्थन जुटाने के लिए तीन भाषाओं हिंदी, उर्दू और फारसी में अपीलें जारी की गईं।

प्रश्न 5.
अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कुचलने के लिए क्या कदम उठाए?
उत्तर:
विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों ने निम्नलिखित कदम उठाए
(1) गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग ने कम्पनी सरकार के समस्त ब्रिटिश साधनों को संगठित करके विद्रोह को कुचलने के लिए एक समुचित योजना बनाई।

(2) मई और जून (1857) में समस्त उत्तर भारत में मार्शल लॉ लगाया गया। साथ ही विद्रोह को कुचले जाने वाली सैनिक टुकड़ियों के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए।

(3) एक सामान्य अंग्रेज़ को भी उन भारतीयों पर मुकद्दमा चलाने व सजा देने का अधिकार था, जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था। सामान्य कानूनी प्रक्रिया के अभाव में केवल मृत्यु दंड ही सजा हो सकती थी।

(4) सबसे पहले दिल्ली पर पुनः अधिकार की रणनीति अपनाई गई। केनिंग जानता था कि दिल्ली के पतन से विद्रोहियों की कमर टूट जाएगी। साथ ही देशी शासकों और ज़मींदारों का समर्थन पाने के लिए उन्हें लालच दिया गया।

(5) हिंदू-मुसलमानों में सांप्रदायिक तनाव भड़काकर विद्रोह को कमजोर करने का प्रयास किया गया। लेकिन इसमें उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? किसान, ताल्लुकदार और ज़मींदार उसमें क्यों शामिल हुए?
उत्तर:
अवध में विद्रोह अपेक्षाकृत सबसे व्यापक था। इस प्रांत में आठ डिविजन थे उन सभी में विद्रोह हुआ। यहाँ किसान व दस्तकार से लेकर ताल्लुकदार और नवाबी परिवार के सदस्यों सहित सभी लोगों ने इसमें भाग लिया। हरेक गांव से लोग विद्रोह में शामिल हुए। यहाँ विदेशी शासन के विरुद्ध यह विद्रोह लोक-प्रतिरोध का रूप धारण कर चुका था। लोग फिरंगी राज के आने से अत्यधिक आहत थे। उन्हें लग रहा था कि उनकी दुनिया लुट गई है; वो सब कुछ बिखर गया है, जिन्हें वो प्यार करते थे। वस्तुतः इसमें विभिन्न प्रकार की पीड़ाओं (A chain of grievances) ने किसानों, सिपाहियों, ताल्लुकदारों और खजकुमारों को परस्पर जोड़ दिया था। संक्षेप में, विद्रोह की व्यापकता के निम्नलिखित कारण थे

1. अवध का विलय-अवध का विलय 1856 में विद्रोह फूटने से लगभग एक वर्ष पहले हुआ था। इसे ‘कुशासन’ का आरोप लगाते हुए ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया गया था। लेकिन अवधवासियों ने इसे न्यायसंगत नहीं माना। बल्कि वे इसे डलहौज़ी का विश्वासघात मान रहे थे। 1851 में ही लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध के बारे में कहा था कि “यह गिलास फल (cherry) एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” डलहौज़ी एक उग्र साम्राज्यवादी था।

वस्तुतः उसकी दिलचस्पी अवध की उपजाऊ जमीन को हड़पने में भी थी। अतः कुशासन तो एक बहाना था। अवधवासी यह जानते थे कि अपदस्थ नवाब वाजिद अली शाह बहुत लोकप्रिय था। लोगों की नवाब व उसके परिवार से गहरी सहानुभूति थी। जब उसे कलकत्ता से निष्कासित किया गया तो बहुत-से लोग उनके पीछे विलाप करते हुए गए।

2. ताल्लुकदारों का अपमान-ताल्लुकदारों ने विद्रोह में बढ़-चढ़कर भाग लिया। उनकी सत्ता व सम्मान को अंग्रेजी राज से जबरदस्त क्षति हुई थी। ताल्लुकदार अवध क्षेत्र में वैसे ही छोटे राजा थे जैसे बंगाल में ज़मींदार। वे छोटे महलनुमा घरों में रहते थे। अपनी-अपनी जागीर में सत्ता व जमीन पर उनका नियंत्रण था। 1856 में अवध का अधिग्रहण करते ही इन ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग भी ध्वस्त कर दिए गए।

3. भूमि छीनने की नीति-आर्थिक दृष्टि से अवध के ताल्लुकदारों की हैसियत व सत्ता को क्षति भूमि छीनने की नीति से पहुँची। 1856 ई० में अधिग्रहण के तुरंत बाद एक मुश्त बंदोबस्त (Summary Settlement of 1856) नाम से भू-राजस्व व्यवस्था लागू की गई, जो इस मान्यता पर आधारित थी कि ताल्लुकदार जमीन के वास्तविक मालिक नहीं हैं। उन्होंने जमीन पर कब्जा धोखाधड़ी व शक्ति के बल पर किया हुआ है। इस मान्यता के आधार पर ज़मीनों की जाँच की गई। ताल्लुकदारों की जमीनें उनसे लेकर किसानों को दी जाने लगीं। पहले अवध के 67% गाँव ताल्लुकदारों के पास थे और इस ब्रिटिश नीति से यह संख्या घटकर मात्र 38% रह गई।

4. किसानों में असंतोष-विद्रोह में बहुत बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। इससे अंग्रेज़ अधिकारी काफी परेशान हुए थे, क्योंकि किसानों ने अंग्रेज़ों का साथ देने की बजाय अपने पूर्व मालिकों (ताल्लुकदारों) का साथ दिया। जबकि अंग्रेजों ने उन्हें ज़मीनें भी दी थीं। इसके कई कारण थे जैसे कि अंग्रेजी राज से एक संपूर्ण ग्रामीण समाज व्यवस्था भंग हो गई थी। यदि कभी ज़मींदार किसानों से बेगार या धन वसूलता था तो बुरे वक्त में वह उनकी सहायता भी करता था। ताल्लुकदारों की छवि दयालु अभिभावकों की थी।

तीज-त्योहारों पर भी उन्हें कर्जा अथवा मदद मिल जाती थी, फसल खराब होने पर भी उनकी दया दृष्टि किसानों पर रहती थी। लेकिन अंग्रेज़ी राज की नई भू-राजस्व व्यवस्था में कोई लचीलापन नहीं था, न ही उसके निर्धारण में और न ही वसूली में। मुसीबत के समय यह नई सरकार कृषकों से कोई सहानुभूति की भावना नहीं रखती थी। संक्षेप में कहा जा सकता है कि अवध में विद्रोह विभिन्न सामाजिक समूहों का एक सामूहिक कृत्य था। किसान, ज़मींदार व ताल्लुकदारों ने इसमें बड़े स्तर पर सिपाहियों का साथ दिया क्योंकि अंग्रेजों के खिलाफ इन सबका दुःख-दर्द एक हो गया था।

प्रश्न 7.
विद्रोही क्या चाहते थे? विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में कितना फर्क था?
उत्तर:
विद्रोही नेताओं की घोषणाओं, सिपाहियों की कुछ अर्जियों तथा नेताओं के कुछ पत्रों से हमें विद्रोहियों की सोच के बारे में कुछ जानकारी मिलती है, जो इस प्रकार है

(1) वे अंग्रेज़ी सत्ता को उत्पीड़क, निरंकुश और षड्यंत्रकारी मान रहे थे। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध सभी भारतीय सामाजिक समूहों को एकजुट होने का आह्वान किया। वे इस राज से सम्बन्धित प्रत्येक चीज को खारिज कर रहे थे।

(2) विद्रोहियों की घोषणाओं से ऐसा लगता है कि वे भारत के सभी सामाजिक समूहों में एकता चाहते थे। विशेष तौर पर उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया। लाभ की दृष्टि से युद्ध को दोनों समुदायों के लिए एक-समान बताया। बहादुरशाह जफ़र की घोषणा में मुहम्मद और महावीर दोनों की दुहाई के साथ संघर्ष में भाग लेने की अपील की गई।

(3) वे वैकल्पिक सत्ता के रूप में अंग्रेज़ों का राज समाप्त करके 18वीं सदी से पहले की मुगलकालीन व्यवस्था की ओर ही वापिस लौटना चाहते थे।

विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में अंतर-उपरोक्त बातों से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि सभी विद्रोहियों की सोच बिल्कुल एक जैसी थी। वास्तव में अलग-अलग सामाजिक समूहों की दृष्टि में अंतर था, उदाहरण के लिए

(1) सैनिक चाहते थे कि उन्हें पर्याप्त वेतन, पदोन्नति तथा अन्य सुविधाएं यूरोपीय सिपाहियों की तरह ही प्राप्त हों। वे अपने आत्म-सम्मान व भावनाओं की भी रक्षा चाहते थे। वे अंग्रेजों की विदेशी सत्ता को खत्म करके अपने पुराने शासकों की सत्ता की पुनः स्थापना चाहते थे।

(2) अपदस्थ शासक विद्रोह के नेता थे। परन्तु इनमें से अधिकांश अपनी रजवाड़ा शाही को ही पुनः स्थापित करने के लिए लड़ रहे थे। इसलिए उन्होंने पुराने ढर्रे पर ही दरबार लगाए और दरबारी नियुक्तियाँ कीं।

(3) ताल्लुकदार अथवा ज़मींदार अपनी जमींदारियों और सामाजिक हैसियत के लिए संघर्ष में कूदे थे। वे अपनी जमीनों को पुनः प्राप्त करना चाहते थे जो अंग्रेज़ों ने उनसे छीनकर किसानों को दे दी थीं।

(4) किसान अंग्रेज़ों की भू-राजस्व व्यवस्था से परेशान था। इसमें कोई लचीलापन नहीं था। राजस्व का निर्धारण बहुत ऊँची दर पर किया जाता था और उसकी वसूली ‘डण्डे’ के साथ की जाती थी। फसल खराब होने पर भी सरकार की ओर से कोई दयाभाव नहीं था। इसी कारण वह साहकारी के चंगल में फँसता था। यही कारण था कि अंग्रेजी राज के साथ-साथ वह अन्य उत्पीडकों को भी खत्म करना चाहता था। उदाहरण के लिए उन्होंने कई स्थानों पर सूदखोरों के बहीखाते जला दिए और उनके घरों में तोड़-फोड़ की।

उपरोक्त समूहों के अतिरिक्त दस्तकार भी अंग्रेज़ों की नीतियों से बर्बाद हुए। वे भी विद्रोहियों के साथ आ गए थे। बहुत-से रूढ़िवादी विचारों के लोग सामाजिक व धार्मिक कारणों से भी अंग्रेज़ी व्यवस्था को खत्म करना चाहते थे।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 8.
1857 के विद्रोह के बारे में चित्रों से क्या पता चलता है? इतिहासकार इन चित्रों का किस तरह विश्लेषण करते हैं?
उत्तर:
चित्र भी इतिहास लिखने के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं। 1857 के विद्रोह से सम्बन्धित कुछ चित्र, पेंसिल से बने रेखाचित्र, उत्कीर्ण चित्र (Etchings), पोस्टर, कार्टून इत्यादि उपलब्ध हैं। कुछ चित्रों और कार्टूनों के बाजार-प्रिंट भी मिलते हैं। किसी घटना की छवि बनाने में ऐसे चित्रों की विशेष भूमिका होती है। चित्र विचारों और भावनाओं के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं को भी व्यक्त करते हैं। 1857 के चित्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि जो चित्र इंग्लैण्ड में बने उन्होंने ब्रिटिश जनता में अलग छवि बनाई।

इनसे वहाँ के लोग उत्तेजित हुए और उन्होंने विद्रोहियों को निर्दयतापूर्वक कुचल डालने की मांग की। दूसरी ओर भारत में छपने वाले चित्रों, संबंधित फिल्मों तथा कला व साहित्य के अन्य रूपों में उन्हीं विद्रोहियों की अलग छवि को जन्म दिया। इस छवि ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन को पोषित किया। इंग्लैण्ड और भारत में चित्रों से बनने वाली छवियों को हम निम्नलिखित कुछ उदाहरणों से समझ सकते हैं

A. अंग्रेज़ों द्वारा बनाए गए चित्र-इन चित्रों को देखकर विविध भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ पैदा होती हैं।

(1) टॉमस जोन्स बार्कर द्वारा 1859 में बनाए गए चित्र ‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ में अंग्रेज़ नायकों (कैम्पबेल, औट्रम व हैवलॉक) की छवि उभरती है। इन नायकों ने लखनऊ में विद्रोहियों को खदेड़कर अंग्रेज़ों को सुरक्षित बचा लिया था।
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(2) बहुत-से समकालीन चित्रों ने ब्रिटिश नागरिकों में प्रतिशोध की भावना को बढ़ावा मिला। उदाहरण के लिए जोसेफ़ नोएल पेटन का चित्र ‘इन मेमोरियम’ (स्मृति में) को देखने से दर्शक के मन में बेचैनी और क्रोध की भावना सहज रूप से उभरती है। दूसरी ओर ‘मिस व्हीलर’ का तमंचा वाले चित्र से ‘सम्मान की रक्षा का संघर्ष’ नज़र आता है।
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(3) दमन और प्रतिशोध की भावना को बढ़ावा देने वाले बहुत-से चित्र मिलते हैं। 1857 के पन्च नामक पत्र में ‘जस्टिस’ नामक चित्र में एक गौरी महिला को बदले की भावना से तड़पते हुए दिखाया गया है। विद्रोहियों को तोप से उड़ाते हुए बहुत-से चित्र बनाए गए हैं। इन चित्रों को देखकर ब्रिटेन के आम नागरिक प्रतिशोध को उचित ठहराने लगे। केनिंग की ‘दयाभाव’ का मजाक उड़ाने लगे। ‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ ऐसा ही एक कार्टून है।
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B. भारतीयों द्वारा बनाए गए चित्र-यदि हम भारत में 1857 में जुड़ी फिल्मों और चित्रों को देखते हैं तो हमारे मन में अलग प्रतिक्रिया होती है। रानी लक्ष्मीबाई का नाम लेते ही मन में वीरता, अन्याय और विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष की साकार प्रतिमा की छवि बनती है। ऐसी छवि बनाने में गीतों, कविताओं, फिल्मों एवं चित्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। लक्ष्मीबाई के चित्र प्रायः घोड़े पर सवार हाथ में तलवार लिए वीरांगना के बनाए गए।

प्रश्न 9.
एक चित्र और एक लिखित पाठ को चुनकर किन्हीं दो स्रोतों की पड़ताल कीजिए और इस बारे में चर्चा कीजिए कि उनसे विजेताओं और पराजितों के दृष्टिकोण के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर:
हम पाठ्यपुस्तक में दिए गए चित्रों में से चित्र को लेते हैं। इस चित्र में विजेताओं का दृष्टिकोण झलकता है। इसमें विद्रोहियों को दानवों तथा अंग्रेज़ औरत को वीरांगना के रूप में दर्शाया गया है। चित्र का शीर्षक ‘मिस व्हीलर’ है। उसे कानपुर में हाथ में तमंचा लिए हुए अपनी इज्जत की रक्षा करती हुई दृढ़तापूर्वक खड़ी दिखाया गया है। अकेली औरत पर किस तरह से विद्रोही तलवारों और बंदूकों से आक्रमण कर रहे हैं; जैसे वे मानव नहीं दानव हों।

चित्र में धरती पर बाइबल पड़ी है जो इस संघर्ष को ‘ईसाइयत की रक्षा के संघर्ष के रूप में व्यक्त करती है। यह चित्र उस हत्याकांड पर आधारित है जब विद्रोहियों ने नाना साहिब के न चाहते हुए भी अंग्रेज़ औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया था, लेकिन यह हत्याकांड तब हुआ जब विद्रोहियों ने बनारस में अंग्रेजों द्वारा किए गए हत्याकाण्डों का समाचार सुना। वे अपने प्रतिशोध को रोक नहीं पाए।

(अन्तिम भेंट में हनवंत सिंह ने उस अंग्रेज़ अफसर से कहा था, “साहिब, आपके मुल्क के लोग हमारे देश में आए और उन्होंने हमारे राजाओं को खदेड़ दिया। आप अधिकारियों को भेजकर जिले-जिले में जागीरों के स्वामित्व की जाँच करवाते हैं। एक ही झटके में आपने मेरे पूर्वजों की जमीन मुझसे छीन ली।

मैं चुप रहा। फिर अचानक आपका बुरा समय प्रारंभ हो गया। यहाँ के लोग आपके विरुद्ध उठ खड़े हुए। तब आप मेरे पास आए, जिसे आपने बरबाद कर दिया था। मैंने आपकी जान बचाई है। किंतु, अब मैं अपने सिपाहियों को लेकर लखनऊ जा रहा हूँ ताकि आपको देश से खदेड़ सऊँ।” पाठयपस्तक में स्रोत नं0 4) स्पष्ट है कि विजेताओं के दृष्टिकोण से बने चित्र में पराजितों के दृष्टिकोण के लिए कोई स्थान नहीं था।

अब हम Box में दिए गए स्रोत को लेंगे। यह एक लिखित रिपोर्ट का भाग है। इसमें ताल्लुकदारों यानी पराजितों के दृष्टिकोण का पता चलता है। विवरण में काला कांकर के राजा हनवंत सिंह की उस अंग्रेज़ अधिकारी से बातचीत के अंश हैं जो 1857 में जान बचाने के लिए हनवंत सिंह के पास शरण लेता है। हनवंत सिंह उसकी जान बचाता है और साथ ही अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए लखनऊ जाकर लड़ने का निश्चय भी दोहराता है। इस विवरण को पढ़कर हमारे मन में विद्रोहियों की छवि वह नहीं उभरती जो

‘मिस व्हीलर’ नामक चित्र में उभरती है। यहाँ ताल्लुकदार हनवंत सिंह एक विद्रोही नेता है जो एक ओर शरण में आए एक अंग्रेज़ की जान बचाता है तो दूसरी ओर अपने सिपाहियों को लेकर युद्ध क्षेत्र में उतरता है। यहाँ विद्रोही बर्बर, नृशंस और दानव नहीं हैं। वे एक ‘वीर इंसान’ हैं।

परियोजना कार्य

प्रश्न 10.
1857 के विद्रोही नेताओं में से किसी एक की जीवनी पढ़ें। देखिए कि उसे लिखने के लिए जीवनीकार ने किन स्रोतों का उपयोग किया है? क्या उनमें सरकारी रिपोर्टों, अखबारी खबरों, क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों, चित्रों और किसी अन्य चीज़ का इस्तेमाल किया गया है? क्या सभी स्रोत एक ही बात कहते हैं या उनके बीच फर्क दिखाई देते हैं? अपने निष्कर्षों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी पुस्तकालय से या इंटरनेट पर विद्रोही नेताओं जैसे कि बहादुरशाह जफर, महारानी लक्ष्मीबाई, तांत्या तोपे, कुंवर सिंह, राव तुलाराम इत्यादि प्रमुख नेताओं की जीवनी पढ़ें। पढ़ते समय विद्यार्थी यह विवरण तैयार करें कि लेखक ने किन स्रोतों के आधार पर पुस्तक लिखी है। सरकारी रिपोर्टों का उपयोग कितना है, देशी भाषा, स्थानीय कोई भी भाषा या अंग्रेज़ी समाचार-पत्र, पत्रिकाओं से कितने और कैसे तथ्य लिए गए हैं। पेंटिंग, मूर्ति, कार्टून, गीत, रागनी इत्यादि का कितना प्रयोग है। लेखक किस दृष्टि से लिख रहा है। वह कितना निष्पक्ष है। इसमें यह भी नोट करें कि इन सम्बन्धित साक्ष्यों में आपस में कितना अंतर है। सारी सूचनाओं के आधार पर अपने प्राध्यापक के निर्देशन में एक रिपोर्ट तैयार करें।

प्रश्न 11.
1857 पर बनी कोई फिल्म देखिए और लिखिए कि उसमें विद्रोह को किस तरह दर्शाया गया है। उसमें अंग्रेज़ों, विद्रोहियों और अंग्रेज़ों के भारतीय वफादारों को किस तरह दिखाया गया है? फिल्म किसानों, नगरवासियों, आदिवासियों, जमीदारों और ताल्लकदारों के बारे में क्या कहती है? फिल्म किस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म देना चाहती है?
उत्तर:
1857 के विद्रोह पर कई फिल्में बनी हैं। परन्तु उनमें सर्वाधिक चर्चित ‘मंगल पांडे’ है जिसमें आमिर खान ने छाप छोड़ने वाली भूमिका निभाई है। इस फिल्म को देखा जा सकता है। इसमें भारतीय सिपाहियों की दिनचर्या, असंतोष, धर्म के प्रति उनमें संवेदनशीलता, जातीय सम्बन्धों की झलक, भारत के विभिन्न समूहों (किसान, आदिवासी, जमींदार, ताल्लुकदार) आदि की स्थिति इत्यादि को फिल्माया गया है।

फिल्म देखकर मन पर क्या प्रतिक्रिया होती है। इस पर विचार करें। उदाहरण के लिए फिल्म में जिस प्रकार ‘चर्बी वाले कारतूस’ बनाते दिखाया गया है, इस पर विचार करें कि क्या यह ‘ऐतिहासिक सत्य है या कल्पनात्मक अभिव्यक्ति। यदि यह कल्पनात्मक अभिव्यक्ति है तो दर्शक पर क्या प्रभाव डालती है। फिर हम जान पाएँगे कि छवियाँ कैसे निर्मित होती हैं।

औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य HBSE 12th Class History Notes

→ फिरंगी-फिरंगी फारसी भाषा का शब्द है जो सम्भवतः फ्रैंक (जिससे फ्रांस नाम पड़ा है) से निकला है। हिंदी और उर्दू में पश्चिमी लोगों का मजाक उड़ाने के लिए कभी-कभी इसका प्रयोग अपमानजनक दृष्टि से भी किया जाता था।

→ रेजीडेंट-ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि को रेजीडेंट कहा जाता था। उसे ऐसे राज्यों में नियुक्त किया जाता था जो अंग्रेजों के प्रत्यक्ष शासन में नहीं था, लेकिन आश्रित राज्य होता था।

→ सहरी-रोजे (रमजान महीने के व्रत) के दिनों में सूरज निकलने से पहले का भोजन।

→ गवर्नर-जनरल-भारत में ब्रिटिश सरकार का मुख्य प्रशासक’ गवर्नर-जनरल कहलाता था।

→ वायसराय-1858 के बाद गवर्नर-जनरल को भारतीय रियासतों के लिए वायसराय कहा जाने लगा। वायसराय का अर्थ था ‘प्रतिनिधि’ यानी इंग्लैण्ड के ‘ताज’ का प्रतिनिधि।

→ बादशाह-मुगल शासक बादशाह कहलाते थे। इसका मौलिक शब्द है ‘पादशाह’ जिसका अर्थ है-‘शाहों का शाह’ पादशाह चगती तुर्की का शब्द है। फारसी में यह बादशाह बन गया।

→ बैरक-सैनिकों का सैनिक छावनी में निवास स्थान।

→ छावनी सेना का स्टेशन जिसमें बड़ी संख्या में सैनिक टुकड़ियाँ रहती थीं।

→ इस अध्याय में हम 1857 के जन-विद्रोह का अध्ययन करेंगे। सबसे अधिक गहन विद्रोह अवध क्षेत्र में हुआ। इसलिए इस क्षेत्र में हुए विद्रोह की गहन छान-बीन करेंगे। साथ ही इसके सामान्य कारणों को भी पढ़ेंगे। विद्रोही क्या सोचते थे और कैसे वे अपनी योजनाएँ बनाते थे; उनके नेता कैसे थे इत्यादि पहलुओं पर भी चर्चा करेंगे। दमन और फिर अंततः इस विद्रोह की छवियाँ (चित्रों, रेखाचित्रों व कार्टून इत्यादि के माध्यम से) कैसे निर्मित हुई, इस पर भी विचार करेंगे।

→ 10 मई, 1857 को मेरठ छावनी में विद्रोह शुरू हुआ। सिपाहियों ने ‘चर्बी वाले कारतूसों’ का प्रयोग करने से इंकार कर दिया। 85 भारतीय सिपाहियों को 8 से लेकर 10 वर्ष तक की कठोर सज़ा दी गई। उसी दिन दोपहर तक अन्य सैनिकों ने भी बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। शीघ्र ही यह समाचार मेरठ शहर और आस-पास के देहात में भी फैल गया और कुछ लोग भी सिपाहियों से आ मिले।

→ 11 मई को सूर्योदय से पूर्व ही मेरठ के लगभग दो हजार जाँबाज़ सिपाही दिल्ली में प्रवेश कर चुके थे। उन्होंने कर्नल रिप्ले सहित कई अंग्रेज़ों की हत्या कर दी। फिर सिपाही लालकिले पहुँचे। उन्होंने बहादुर शाह जफ़र से नेतृत्व के लिए अनुरोध किया। वह कहने मात्र के लिए ही बादशाह था। वास्तव में वह एक बूढ़ा, शक्तिहीन, अंग्रेजों का पेंशनर था। उसने संकोच और अनिच्छा के साथ सिपाहियों के आग्रह को स्वीकार कर लिया। उसने स्वयं को विद्रोह का नेता घोषित कर दिया। इससे सिपाहियों के विद्रोह को राजनीतिक वैधता मिल गई।

→ सैनिकों के विद्रोह को देखकर जनसामान्य भी कुछ भयरहित हो गए। लोग अंग्रेज़ी शासन के प्रति नफरत से भरे हुए थे। वे लाठी, दरांती, तलवार, भाला तथा देशी बंदूकों जैसे अपने परंपरागत हथियारों के साथ विद्रोह में कूद पड़े। इनमें किसान, कारीगर, दुकानदार व नौकरी पेशा तथा धर्माचार्य इत्यादि सभी लोग शामिल थे। आम लोगों के आक्रोश की अभिव्यक्ति स्थानीय शासकों के खिलाफ भी हुई। बरेली, कानपुर व लखनऊ जैसे बड़े शहरों में अमीरों व साहूकारों पर भी हमले हुए।

→ लोगों ने इन्हें उत्पीड़क और अंग्रेज़ों का पिठू माना। इसके अतिरिक्त विद्रोह-क्षेत्रों में किसानों ने भू-राजस्व देने से मना कर दिया था। सिपाहियों का यह विद्रोह एक व्यापक ‘जन-विद्रोह’ बन गया। एक अनुमान के अनुसार, इसके दौरान अवध में डेढ़ लाख और बिहार में एक लाख नागरिक शहीद हुए थे।
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यह एक व्यापक विद्रोह था। जून के पहले सप्ताह तक बरेली, लखनऊ, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ, बनारस जैसे बड़े-बड़े नगर स्वतंत्र हो चुके थे। यह गाँवों और कस्बों में फैल चुका था। हरियाणा व मध्य भारत में भी यह जबरदस्त विद्रोह था।

→ विभिन्न छावनियों के बीच विद्रोही सिपाहियों में भी तालमेल के कुछ सुराग मिलते हैं। इनके बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान था। ‘चर्बी वाले कारतूसों’ की बात सभी छावनियों में पहुंच गई थी। ‘धर्म की रक्षा’ को लेकर चिंता और आक्रोश भी सभी जगह था। सिपाही बगावत के मनसूबे गढ़ रहे थे। इसका एक और उदाहरण यह है कि जब मई की शुरूआत में सातवीं अवध इरेग्युलर कैवेलरी (7th Awadh Irregular Cavalry) ने नए कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया तो उन्होंने 48वीं नेटिव इन्फेंट्री को लिखा : “हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फैसला लिया है और 48वीं नेटिव इन्फेंट्री के हुक्म का इंतजार कर

→ सिपाहियों की बैठकों के भी कुछ सुराग मिलते हैं। हालांकि बैठकों में वो कैसी योजनाएँ बनाते थे, उसके प्रमाण नहीं हैं। फिर भी कुछ अंदाजे लगाए जाते हैं कि इन सिपाहियों का दुःख-दर्द एक-जैसा था। अधिकांश उच्च-जाति से थे और उनकी जीवन-शैली भी मिलती-जुलती थी। स्वाभाविक है कि वे अपने भविष्य के बारे में ही निर्णय लेते होंगे। इनके नेता मुख्यतः अपदस्थ शासक और ज़मींदार थे। विभिन्न स्थानों पर इसके स्थानीय नेता भी उभर आए थे। इनमें से कुछ तो किसान नेता थे।

→ यह विद्रोह कुछ अफवाहों और भविष्यवाणियों से भड़का था। लेकिन अफवाहें तभी फैलती हैं जब उनमें लोगों के मन में गहरे बैठे भय और संदेह की अनुगूंज सुनाई देती है। इन अफ़वाहों में लोग विश्वास इसलिए कर रहे थे क्योंकि इनके पीछे बहुत-से ठोस कारण थे। ये कारण सैनिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक थे। लोग अंग्रेज़ों की नई व्यवस्था को भारतीय दमनकारी, परायी और हृदयहीन मान रहे थे। उनकी परंपरागत दुनिया उजड़ रही थी जिससे वे परेशान हुए। अतः इन बहुत-से कारणों के समायोजन से लोग विद्रोही बने।

→ अवध प्रांत में आठ डिविजन थे, उन सभी में विद्रोह हुआ। यहाँ किसान व दस्तकार से लेकर ताल्लुकदार और नवाबी परिवार के सदस्यों सहित सभी वर्गों के लोगों ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया। हरेक गाँव से लोग विद्रोह में शामिल हुए। ताल्लुकदारों ने उन सभी गाँवों पर पुनः अपना अधिकार कर लिया जो अवध विलय से पहले उनके पास थे। किसान अपने परंपरागत मालिकों (ताल्लुकदारों) के साथ मिलकर लड़ाई में शामिल हुए। अवध की राजधानी लखनऊ विद्रोह का केंद्र-बिंदु बनी। फिरंगी राज के चिहनों को मिटा दिया गया। टेलीग्राफ लाइनों को तहस-नहस कर दिया गया। यहाँ घटनाओं का क्रम कुछ इस तरह चला। 4 जून, 1857 को विद्रोह प्रारंभ हुआ। विद्रोहियों ने ब्रिटिश रैजीडेंसी को घेर लिया।

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1 जुलाई को अवध का चीफ कमीश्नर हैनरी लारेंस (Henery Lawrence) लड़ता हुआ मारा गया। 1858 के शुरू में विद्रोहियों की संख्या लखनऊ शहर में लगभग 2 लाख की थी। यहाँ संघर्ष सबसे लंबा चला। अन्य स्थानों की अपेक्षा विदेशी शासन के विरुद्ध लोक-प्रतिरोध (Popular Resistance) अवध में अधिक था। अवध के विलय से एक भावनात्मक उथल-पुथल शुरू हो गई। एक अन्य अखबार ने लिखा : “देह (शरीर) से जान जा चुकी थी। शहर की काया बेजान थी….। कोई सड़क, कोई बाज़ार और कोई घर ऐसा न था जहाँ से जान-ए आलम से बिछुड़ने पर विलाप का शोर न गूंज रहा हो।” लोगों के दुःख और असंतोष की अभिव्यक्ति लोकगीतों में भी हुई।

→ संक्षेप में कहा जा सकता है कि अवध में भारी विद्रोह देहात व शहरी लोगों, सिपाहियों तथा ताल्लुकदारों का एक सामूहिक कृत्य (Collective Act) था। बहुत-से सैनिक कारणों से तो सैनिक ग्रस्त थे ही वे अपने परिवार व गाँव के दुःख-दर्द से भी आहत थे।
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→ विद्रोहियों की घोषणाओं में ब्रिटिश राज के विरुद्ध सभी भारतीय सामाजिक समूहों को एकजुट होने का आह्वान किया गया। ब्रिटिश राज को एक विदेशी शासन के रूप में सर्वाधिक उत्पीड़क व शोषणकारी माना गया। इसलिए इससे संबंधित प्रत्येक चीज़ को पूर्ण तौर पर खारिज किया जा रहा था। अंग्रेजी सत्ता को उत्पीड़क एवं निरंकुश के साथ

→ साथ ही, धर्म, सम्मान व रोजगार के लिए लड़ने का आह्वान किया गया। इस लड़ाई को एक ‘व्यापक सार्वजनिक भलाई’ घोषित किया। विद्रोह के दौरान विद्रोहियों ने सूदखोरों के बही-खाते भी जला दिये थे और उनके घरों में तोड़-फोड़ व आगजनी की थी। शहरी संभ्रांत लोगों को जान बूझकर अपमानित भी किया। वे उन्हें अंग्रेज़ों के वफादार और उत्पीड़क मानते थे।

→ विद्रोही भारत के सभी सामाजिक समुदायों में एकता चाहते थे। विशेषतौर पर हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया गया। उनकी घोषणाओं में जाति व धर्म का भेद किए बिना विदेशी राज के विरुद्ध समाज के सभी समुदायों का आह्वान किया गया। अंग्रेज़ी राज से पहले मुगल काल में हिंदू-मुसलमानों के बीच रही सहअस्तित्व की भावना का उल्लेख भी किया गया। लाभ की दृष्टि से इस युद्ध को दोनों समुदायों के लिए एक समान बताया।

→ ध्यान रहे विद्रोह के चलते ब्रिटिश अधिकारियों ने हिंदू और मुसलमानों में धर्म के आधार पर फूट डलवाने का भरसक प्रयास किए थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी। उदाहरण के लिए बरेली में विद्रोह के नेता खानबहादुर के विरुद्ध हिंदू प्रजा को भड़काने के लिए अंग्रेज़ अधिकारी जेम्स औट्रम (James Outram) द्वारा दिया गया धन का लालच भी कोई काम नहीं आया था। अंततः हारकर उसे 50,000 रुपये वापस ख़जाने में जमा करवाने पड़े जो इस उद्देश्य के लिए निकाले गए थे।

→ विद्रोह का दमन करने के लिए मई और जून (1857) में समस्त उत्तर भारत में मार्शल लॉ लगाया गया। साथ ही विद्रोह को कुचले जाने वाली सैनिक टुकड़ियों के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए। एक सामान्य अंग्रेज़ को भी उन भारतीयों पर मुकद्दमा चलाने व सजा देने का अधिकार था, जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था। सामान्य कानूनी प्रक्रिया के अभाव में केवल मृत्यु दंड ही सजा हो सकती थी।

→ साथ ही सबसे पहले दिल्ली पर पुनः अधिकार की रणनीति अपनाई गई। केनिंग जानता जन-विद्रोह और राज (1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान) था कि दिल्ली के पतन से विद्रोहियों की कमर टूट जाएगी। हिंदू-मुसलमानों में सांप्रदायिक तनाव भड़काकर विद्रोह को कमजोर करने का प्रयास भी किया गया। लेकिन इसमें उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी।

→ इस अध्याय के अंतिम भाग में उन छवियों को समझने का प्रयास किया गया है जो अंग्रेज़ों व भारतीयों में निर्मित हुईं। इन छवियों में शामिल हैं-विद्रोह से संबंधित अनेक चित्र, पेंसिल निर्मित रेखाचित्र, उत्कीर्ण चित्र (Etchings), पोस्टर, के उपलब्ध बाजार-प्रिंट इत्यादि। साथ में हम जान पाएंगे कि इतिहासकार ऐसे स्रोतों का कैसे उपयोग करते हैं।

समय-रेखा

1.1801 ई०वेलेजली द्वारा अवध में सहायक संधि लागू की गई
2.13 फरवरी, 1856अवध का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय
3.10 मई, 1857मेरठ में सैनिकों द्वारा विद्रोह
4.11 मई, 1857विद्रोही सेना का मेरठ से दिल्ली पहुँचना
5.12 मई , 1857बहादुर शाह ज़फर द्वारा विद्रोहियों का नेतृत्व स्वीकार करना
6.30 मई, 1857लखनऊ में विद्रोह
7.4 जून, 1857अवध में सेना में विद्रोह
8.10 जून, 1857सतारा में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्रिदोह
9.30 जून, 1857चिनहाट के युद्ध में अंग्रेज़ों की हार
10.जुलाई, 1858युद्ध में शाह मल की मृत्यु
11.20 सितंबर, 1857ब्रिटिश सेना का विजयी होकर दिल्ली में प्रवेश
12.25 सितंबर, 1857ब्रिटिश सैन्य टुकड़ियाँ हैवलॉक व ऑट्रम के नेतृत्व में लखनऊ पहुँचीं रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुई
13.17 जून, 1858वेलेजली द्वारा अवध में सहायक संधि लागू की गई

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

HBSE 11th Class Geography भूगोल एक विषय के रूप में Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. मानव के लिए वायुमंडल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित में से कौन-सा है-
(A) जलवाष्प
(B) धूलकण
(C) नाइट्रोजन
(D) ऑक्सीजन
उत्तर:
(D) ऑक्सीजन

2. निम्नलिखित में से वह प्रक्रिया कौन-सी है जिसके द्वारा जल, द्रव से गैस में बदल जाता है-
(A) संघनन
(B) वाष्पीकरण
(C) वाष्पोत्सर्जन
(D) अवक्षेपण
उत्तर:
(B) वाष्पीकरण

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

3. निम्नलिखित में से कौन-सा वायु की उस दशा को दर्शाता है जिसमें नमी उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप होती है-
(A) सापेक्ष आर्द्रता
(B) निरपेक्ष आर्द्रता
(C) विशिष्ट आर्द्रता
(D) संतृप्त हवा
उत्तर:
(D) संतृप्त हवा

4. निम्नलिखित प्रकार के बादलों में से आकाश में सबसे ऊँचा बादल कौन सा है?
(A) पक्षाभ
(B) वर्षा मेघ
(C) स्तरी
(D) कपासी
उत्तर:
(A) पक्षाभ

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वर्षण के तीन प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. हिमपात-जब तापमान 0° सेंटीग्रेड से कम होता है, तब वर्षण हिमतूलों के रूप में होता है, जिसे हिमपात कहते हैं।
  2. सहिम वृष्टि-सहिम वृष्टि वर्षा की जमी हुई बूंदें हैं या पिघली हुई बर्फ के पानी की जमी हुई बूंदें हैं।
  3. ओला पत्थर कभी-कभी वर्षा की बूंदें बादल से मुक्त होने के बाद बर्फ के छोटे गोलाकार ठोस टुकड़ों में परिवर्तित होकर पृथ्वी पर पहुँचती हैं, जिसे ओला पत्थर (वृष्टि) कहते हैं।

प्रश्न 2.
सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
किसी निश्चित तापमान पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा तथा उसी तापमान पर उसी वायु को संतृप्त करने के लिए आवश्यक जलवाष्प की मात्रा के अनुपात को सापेक्ष (आपेक्षिक) आर्द्रता (Relative Humidity) कहते हैं।

प्रश्न 3.
ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा तेजी से क्यों घटती है?
उत्तर:
वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा वाष्पीकरण तथा संघनन से क्रमशः घटती-बढ़ती रहती है। हवा द्वारा जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता पूरी तरह से तापमान पर निर्भर होती है। ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता जाता है, इसलिए ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटने पर जलवाष्प की मात्रा घटती जाती है।

प्रश्न 4.
बादल कैसे बनते हैं? बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
बादल पानी की छोटी बँदों या बर्फ के छोटे रवों की संहति होता है जो कि पर्याप्त ऊँचाई पर स्वतंत्र हवा में जलवाष्प के संघनन के कारण बनते हैं।

बादलों को चार रूपों में वर्गीकृत किया जाता है।

  • पक्षाभ मेघ (बादल)
  • कपासी मेघ
  • स्तरी मेघ
  • वर्षा मेघ

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षण-

  • भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर वर्षा की मात्रा कम होती जाती है।
  • उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में व्यापारिक पवनों के चलने के कारण महाद्वीपों के पूर्वी भागों में वर्षा अधिक तथा पश्चिमी भागों में वर्षा कम होती है।
  • शीतोष्ण कटिबन्ध में पछ्वा पवनों के कारण महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में वर्षा अधिक तथा पूर्वी भागों में वर्षा कम होती है।
  • महाद्वीपों के तटीय भागों की अपेक्षा आन्तरिक भागों में वर्षा कम होती है।
  • जहाँ समुद्र तटों के सहारे पर्वत श्रेणियाँ फैली होती हैं वहाँ पवनाभिमुखी ढालों तथा तटीय मैदानों में खूब वर्षा होती है, परन्तु पवनविमुखी ढालों पर वर्षा कम होती है।

विश्व में वर्षा के वितरण का निम्नलिखित ढाँचा प्रस्तुत होता है-
1. भूमध्य रेखीय प्रदेश यह संसार में सबसे अधिक वर्षा उपलब्ध क्षेत्र है। वर्षा की क्रिया संवहनिक है। वर्षा वर्ष भर नियमित रूप से होती रहती है। वर्षा का औसत लगभग 80 सें०मी० होता है। इस पेटी में अमेजन बेसिन (दक्षिण अमेरिका), कांगो बेसिन (अफ्रीका), मलाया तथा पूर्वी द्वीप मुख्य हैं।

2. उष्ण कटिबन्धीय प्रदेश-इन प्रदेशों का विस्तार अक्षांश तक है। इनमें सम्मिलित मुख्य देश भारत, दक्षिणी चीन, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, पूर्वी ब्राजील और पूर्वी अफ्रीका इत्यादि हैं। मध्यमान वार्षिक वर्षा 50 से 200 सें०मी० तक है। वर्षा व्यापारिक व मानसून हवाओं के द्वारा होती है।

3. शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेश-इन प्रदेशों का विस्तार 65° अक्षांश तक है। इनमें पश्चिमी यूरोप, पश्चिमी कनाडा, चिली व न्यूज़ीलैण्ड इत्यादि देश सम्मिलित हैं। यहाँ वर्षा पछुवा पवनों के प्रभाव से पश्चिमी किनारों पर होती है। औसत वार्षिक वर्षा 50 से 100 सें०मी० तक होती है।

4. शीत कटिबन्धीय प्रदेश इस पेटी में ऊँच अक्षांशों वाले प्रदेश सम्मिलित हैं। यह प्रदेश अधिक ठण्डे होने के कारण हिमाच्छादित रहते हैं। इसमें टुण्ड्रा और उत्तरी साइबेरिया सम्मिलित हैं। वार्षिक औसत वर्षा 25 सें०मी० से भी कम है।

औसत वार्षिक वर्षा के आधार पर विश्व के विभिन्न भागों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में बांटा जाता है-

  • 200 सें०मी० से अधिक वर्षा वाले प्रदेश ये भूमध्य रेखीय प्रदेश, शीतोष्ण कटिबन्ध के पश्चिमी तट पर पर्वतों के पवनाभिमुख ढाल तथा मानसूनी प्रदेशों के तटीय मैदान हैं।
  • 100 से 200 सें०मी० वर्षा वाले प्रदेश-इस वर्ग में 200 सें०मी० से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के निकटवर्ती भाग तथा उष्ण शीतोष्ण कटिबन्ध के तटीय प्रदेश सम्मिलित हैं।
  • 50 से 100 सें०मी० वर्षा वाले प्रदेश-ये उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों के भीतरी भागों में तथा शीतोष्ण क्षेत्रों के आन्तरिक भागों में स्थित हैं।
  • 20 से 50 सें०मी० वर्षा वाले प्रदेश इस वर्ग में पर्वत श्रेणियों के वृष्टि छाया प्रदेश, महाद्वीपों के अत्यधिक आन्तरिक भाग तथा उच्च अक्षांशीय प्रदेश सम्मिलित हैं।
  • 20 सें०मी० से कम वर्षा वाले प्रदेश-यह उष्ण एवं शीत मरुस्थलीय प्रदेश हैं।

प्रश्न 2.
संघनन के कौन-कौन से प्रकार हैं? ओस एवं तुषार के बनने की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संघनन के निम्नलिखित चार प्रकार हैं-

  • ओस
  • तुषार या पाला
  • कुहासा एवं कोहरा
  • बादल या मेघ।

1. ओस (Dew)-दिन के समय पृथ्वी सूर्य से गर्मी प्राप्त करती है और रात्रि के समय विकिरण द्वारा छोड़ देती है। रात को विकिरण द्वारा गर्मी निकल जाने से जब कभी धरातल का तापमान ओसांक से कम हो जाता है तो वायु में उपस्थित जलवाष्प पौधों की पत्तियों तथा अन्य तनों पर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में जमा हो जाते हैं, इसे ओस कहते हैं।

2. तुषार या पाला (Frost) यदि ओसांक 0° सेल्सियस अर्थात् हिमांक से नीचे हो तो वायु में उपस्थित जलवाष्प बिना द्रवावस्था में आए सीधे हिमकणों के रूप में परिवर्तित होकर धरातल पर जम जाते हैं। इन हिमकणों के विस्तार को पाला (Frost) कहते हैं।

3. कुहासा एवं कोहरा (Mist and Fog)-जब धरातल से कई मीटर की ऊँचाई तक वायु की परत का तापमान ओसांक से नीचे गिर जाए अर्थात् वायु की आपेक्षित आर्द्रता 100 प्रतिशत से अधिक हो जाए तो जलवाष्प जलकणों में परिवर्तित होकर वायुमण्डल के धूल-कणों पर एकत्रित हो जाते हैं और वायु में ही लटके रहते हैं। इससे धुन्धला-सा दिखाई देने लगता है और दृश्यता (Visibility) कम हो जाती है। इसे ही कुहासा या धुन्ध कहते हैं। जब दृश्यता एक किलोमीटर से भी कम हो जाती है तो इसे कोहरा (Fog) कहते हैं। 200 मीटर से कम दूरी तक ही वस्तुएँ दिखाई देने की स्थिति को सघन कोहरा (Thick Fog) कहते हैं।

4. बादल या मेघ (Clouds)-वायुमण्डल में ऊँचाई पर जलकणों या हिमकणों के जमाव एवं संघनन को बादल कहते हैं। मेघों का निर्माण वायु के ऊपर उठने वाली वायु के ठण्डा होने से होता है। मेघ कोहरे का बड़ा रूप है जो वायुमण्डल में वायु के रुद्धोष्म प्रक्रिया द्वारा उसका तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे आने से बनते हैं। बादलों की आकृति उनकी निर्माण प्रक्रिया पर आधारित है, लेकिन उनकी ऊँचाई, आकृति, रंग, घनत्व तथा प्रकाश के परावर्तन के आधार पर बादलों को निम्नलिखित चार रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है

ओस के बनने की प्रक्रिया-जाड़े की रातों में जब आकाश स्वच्छ होता है तो तीव्र भौमिक विकिरण से धरातल ठण्डा हो जाता है। ठण्डे धरातल पर ठहरी वायुमण्डल की आर्द्र निचली परतें भी ठण्डी होने लगती हैं। धीरे-धीरे यह वायु ओसांक तक ठण्डी हो जाती है। इससे वायु में विद्यमान जलवाष्प संघनित हो जाता है और नन्हीं-नन्हीं बूंदों के रूप में घास व पौधों की पत्तियों पर जमा हो जाता है। वाष्प से बनी जल की इन बूंदों को ओस कहते हैं।

तुषार के बनने की प्रक्रिया-पाला (तुषार) प्रायः तब बनाता है जब वायु का तापमान तीव्रता से हिमांक से नीचे गिर जाता है। पाला पड़ने के लिए भी उन्हीं परिस्थितियों की आवश्यकता होती है जिनकी ओस के लिए होती है, परन्तु पाला पड़ने के लिए ओसांक का हिमांक से नीचे होना आवश्यक है।

वायुमंडल में जल HBSE 11th Class Geography Notes

→ जलवाष्प (Water Vapours)-जलवाष्प वायुमण्डल की एक रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैस है।

→ निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity)-वायु के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प के वास्तविक भार को वायु की निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं।

→ विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity)–वायु के प्रति इकाई भार में जलवाष्प के भार को विशिष्ट आर्द्रता कहते हैं।

→ वाष्पीकरण (Evaporation)-जल की तरलावस्था अथवा ठोसावस्था का गैसीय अवस्था में परिवर्तन होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं।

→ संघनन या द्रवण (Condensation)-जल की गैसीय अवस्था का तरलावस्था या ठोसावस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन या द्रवण कहते हैं।

→ वृष्टि (Precipitation)-वायु में उपस्थित जलवाष्पों का संघनन द्वारा द्रवावस्था या ठोसावस्था में बदलकर पृथ्वी पर गिरने की घटना को वृष्टि कहते हैं।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. समुद्रतल पर वायुदाब कितना होता है?
(A) 1011 मिलीबार
(B) 34 मिलीबार/300 मीटर
(C) 1013 मिलीबार
(D) 36 मिलीबार/300 मीटर
उत्तर:
(B) 34 मिलीबार/300 मीटर

2. ऊँचाई के साथ वायुदाब किस दर से घटता है?
(A) 33 मिलीबार/300 मीटर
(B) 1012 मिलीबार मीटर
(C) 35 मिलीबार/300 मीटर
(D) 1014 मिलीबार मीटर
उत्तर:
(C) 35 मिलीबार/300 मीटर

3. भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब कटिबंध भूमध्य रेखा के उत्तर में कब खिसकता है?
(A) 21 जून
(B) 22 सितंबर
(C) 25 दिसम्बर
(D) 23 मार्च
उत्तर:
(A) 21 जून

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

4. समुद्रतल पर एक वर्ग इंच क्षेत्रफल पर वायु का कितना भार होता है?
(A) 5.68 कि०ग्रा०
(B) 6.68 किग्रा०
(C) 6.75 कि०ग्रा०
(D) 6.80 कि०ग्रा०
उत्तर:
(D) 6.80 कि०ग्रा०

5. वायुदाब मापने के स्वचालित यंत्र को कहते हैं-
(A) बैरोमीटर
(B) थर्मामीटर
(C) थर्मोग्राफ
(D) बैरोग्राफ
उत्तर:
(D) बैरोग्राफ

6. समुद्रतल के अनुसार समानीत समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा कहलाती है-
(A) समदाब रेखा
(B) समताप रेखा
(C) समोच्च रेखा
(D) समवर्षा रेखा
उत्तर:
(A) समदाब रेखा

7. कौन-सा बल वायुमंडल को भू-पृष्ठ से परे धकेलता है?
(A) अपकेंद्री बल
(B) अभिकेंद्री बल
(C) उत्पलावकता बल
(D) गुरुत्वाकर्षण बल
उत्तर:
(A) अपकेंद्री बल

8. किस वायुदाब पेटी को डोलड्रम या शांतपेटी कहते हैं?
(A) उपध्रुवीय निम्न-दाब कटिबंध
(B) उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंध
(C) भूमध्य-रेखीय निम्न-दाब कटिबंध
(D) ध्रुवीय उच्च-दाब कटिबंध
उत्तर:
(C) भूमध्य-रेखीय निम्न-दाब कटिबंध

9. भूमध्य रेखीय निम्न दाब कटिबंध तथा ध्रुवीय उच्च-दाब कटिबंध हैं-
(A) दाब प्रेरित
(B) ताप प्रेरित
(C) गति प्रेरित
(D) दिशा प्रेरित
उत्तर:
(B) ताप प्रेरित

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10. तापमान के बढ़ने पर वायुदाब-
(A) घटता है
(B) बढ़ता है
(C) वही रहता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) घटता है

11. लगभग ऊर्ध्वाधर दिशा में गतिमान वायु को कहा जाता है-
(A) जेट प्रवाह
(B) लंबवत् पवन
(C) चक्रवात
(D) वायु धारा
उत्तर:
(B) लंबवत् पवन

12. निम्नलिखित में से कौन-सी पवनें भूमंडलीय पवनें नहीं हैं?
(A) मानसून पवनें
(B) स्थायी पवनें
(C) पछुवा पवनें
(D) ध्रुवीय पवनें
उत्तर:
(A) मानसून पवनें

13. पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवनों का अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाना कहलाता है-
(A) आभासी प्रभाव
(B) फैरल का नियम
(C) कॉरिआलिस प्रभाव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

14. पछुवा (बहादुर) पवनें बहती हैं-
(A) उत्तरी अंध महासागर में
(B) उत्तरी प्रशांत महासागर में
(C) उत्तरी गोलार्द्ध में
(D) दक्षिणी गोलार्द्ध में
उत्तर:
(D) दक्षिणी गोलार्द्ध में

15. पश्चिमी यूरोप, पश्चिमी कनाडा व दक्षिणी-पश्चिमी चिली में कौन-सी पवनें वर्ष-भर वर्षा नहीं करती?
(A) पछुवा पवनें
(B) ध्रुवीय पवनें
(C) सन्मार्गी पवनें
(D) जल-समीरें
उत्तर:
(A) पछुवा पवनें

16. अपेक्षाकृत ठडे अक्षांशों से भूमध्य रेखा की ओर जाने वाली सन्मार्गी पवनें कहाँ वर्षा नहीं करती?
(A) पर्वतों पर
(B) महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर
(C) महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर
(D) महासागरों पर
उत्तर:
(C) महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर

17. गर्म व शुष्क शिनूक पवनें किस पर्वत के पूर्वी ढलानों से उतरती हैं?
(A) हिमालय
(B) रॉकीज
(C) एंडीज
(D) आल्प्स
उत्तर:
(B) रॉकीज

18. आल्प्स पर्वत को पार करके स्विट्ज़रलैंड की घाटियों में बहने वाली शुष्क, गर्म और तूफानी पवनों को कहते हैं-
(A) मिस्ट्रल
(B) फोएन
(C) बोरा
(D) खमसिन
उत्तर:
(B) फोएन

19. फ्राँस व स्पेन के तटों पर बहने वाली प्रचंड, शुष्क व ठंडी पवन कहलाती है
(A) हरमाट्टन
(B) बोरा
(C) मिस्ट्रल
(D) सिरोको
उत्तर:
(C) मिस्ट्रल

20. निम्नलिखित में से कौन-सी ठंडी स्थानीय पवन नहीं है?
(A) मिस्ट्रल
(B) बोरा
(C) खमसिन
(D) ब्लिजार्ड
उत्तर:
(C) खमसिन

21. भूमध्यरेखीय उष्ण एवं आर्द्र जलवायु की उमस से त्रस्त गिनी प्रदेश के निवासियों को कौन-सी सुखद और स्वास्थ्यप्रद पवन राहत पहुँचाती है?
(A) हरमाट्टन
(B) हिमहरिणी
(C) ब्रिकफील्डर
(D) लेवीची
उत्तर:
(A) हरमाट्टन

22. ब्यूफोर्ट स्केल पर ब्यूफोर्ट कोड-12 अधिसूचित करता है-
(A) शांत पवन को
(B) झंझावात को
(C) हरीकेन को
(D) तूफान को
उत्तर:
(C) हरीकेन को

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23. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा सुमेलित नहीं है?
(A) हरीकेन : यू०एस०ए०
(B) टाइफून : चीन
(C) सिरोक्को : ऑस्ट्रेलिया
(D) मिस्ट्रल : स्पेन
उत्तर:
(C) सिरोक्को : ऑस्ट्रेलिया

24. सन्मार्गी पवनें किन अक्षांशों के बीच चलती हैं?
(A) 23° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच
(B) 25° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच
(C) 30° से 5° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच
(D) 40° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच
उत्तर:
(C) 30° से 5° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
वर्तमान में वायुमंडलीय दाब मापने के लिए किस इकाई का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
हैक्टोपास्कल इकाई का।

प्रश्न 2.
समुद्र-तल पर वायुदाब कितना होता है?
उत्तर:
1013 मिलीबार।

प्रश्न 3.
ऊँचाई के साथ वायदाब किस दर से घटता है?
अथवा
क्षोभमंडल में ऊँचाई के साथ वायुमंडलीय दबाव कम होने की क्या दर है?
उत्तर:
34 मिलीबार प्रति 300 मीटर।

प्रश्न 4.
किस बल के प्रभाव से पवन अपनी दिशा बदल देती है?
उत्तर:
कॉरिआलिस प्रभाव।

प्रश्न 5.
पवनों के विक्षेपण सम्बंधी नियम का सूत्रधार कौन था?
उत्तर:
अमेरिकी विद्वान फैरल।

प्रश्न 6.
भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब कटिबंध भूमध्य रेखा के उत्तर में कब खिसकता है?
उत्तर:
21 जून को।

प्रश्न 7.
शिनूक (Chinook) का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
हिमभक्षी।

प्रश्न 8.
मिस्ट्रल पवन कौन-सी घाटी में बहती है?
उत्तर:
रोन घाटी में।

प्रश्न 9.
समुद्र-तल पर एक वर्ग सें०मी० क्षेत्रफल पर वायु का कितना भार होता है?
उत्तर:
1.03 किलोग्राम।

प्रश्न 10.
समुद्र-तल पर एक वर्ग इंच क्षेत्रफल पर वायु का कितना भार होता है?
उत्तर:
6.68 किलोग्राम।

प्रश्न 11.
हमारे शरीर पर कितना वायुमंडलीय दबाव पड़ता है?
उत्तर:
लगभग एक टन।

प्रश्न 12.
वायुदाब कटिबंध कितने हैं?
उत्तर:
सात।

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प्रश्न 13.
लगभग ऊर्ध्वाधर दिशा में गतिमान वायु को क्या कहते हैं?
उत्तर:
वायुधारा।

प्रश्न 14.
आल्पस से उतरकर स्विट्ज़रलैण्ड में चलने वाली हवाएँ क्या कहलाती हैं?
उत्तर:
फोएन हवाएँ।

प्रश्न 15.
दिन के समय समुद्र से तट की ओर चलने वाली आर्द्र व ठण्डी पवनों को क्या कहते हैं?
उत्तर:
जल-समीर।

प्रश्न 16.
रात के समय समुद्र से तट की ओर चलने वाली शुष्क पवन को क्या कहते हैं?
उत्तर:
स्थल समीर।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शान्त कटिबंध या डोलड्रम्स किसे कहा जाता है?
उत्तर:
भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब कटिबंध को।

प्रश्न 2.
कॉरिआलिस प्रभाव कौन-से नियम द्वारा जाना जाता है?
उत्तर:
बाइज़ बैलेट अथवा फैरल का नियम।

प्रश्न 3.
कॉरिआलिस प्रभाव के अधीन विक्षेप बल कहाँ अधिकतम व कहाँ न्यूनतम होता है?
उत्तर:
ध्रुवों पर अधिकतम व भूमध्य रेखा पर न्यूनतम।

प्रश्न 4.
तीन प्रकार की स्थायी पंवनों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. सन्मार्गी
  2. पछुवा
  3. ध्रुवीय।

प्रश्न 5.
सन्मार्गी पवनें किन अक्षांशों के बीच चलती हैं?
उत्तर:
30° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के बीच।

प्रश्न 6.
पछुवा पवनें किन अक्षांशों के बीच चलती हैं?
उत्तर:
30°-40° से 50°-60° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के बीच।

प्रश्न 7.
पवनें क्यों चलती हैं?
उत्तर:
वायुदाब में अन्तर आ जाने से।

प्रश्न 8.
‘डॉक्टर’ नामक पवन कहाँ चलती है? उसका असली नाम क्या है?
उत्तर:
‘डॉक्टर’ नामक पवन अफ्रीका के गिनी तट पर चलती है। इसका असली नाम हरमट्टन है।

प्रश्न 9.
गरजता चालीसा व प्रचण्ड पचासा कहाँ स्थित हैं?
उत्तर:
40° और 50° दक्षिणी अक्षांशों पर।

प्रश्न 10.
वायु में भार कैसे पैदा होता है?
उत्तर:
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण।

प्रश्न 11.
वायुदाब और तापमान में क्या सम्बंध है?
उत्तर:
तापमान बढ़ने पर वायुदाब घटता है।

प्रश्न 12.
किसी स्थान का वायुदाब किन कारकों पर निर्भर करता है?
उत्तर:

  1. तापमान
  2. समुद्र-तल से ऊँचाई
  3. जलवाष्प
  4. दैनिक गति।

प्रश्न 13.
वायुमंडल के दबाव को मापने वाले यन्त्र का नाम बताएँ।
उत्तर:
बैरोमीटर तथा बैरोग्राफ़।

प्रश्न 14.
वायुमंडलीय दाब को मापने की कौन-सी तीन इकाइयाँ हैं?
उत्तर:

  1. इंच
  2. सेंटीमीटर
  3. मिलीबार।

प्रश्न 15.
समुद्र-तल पर सामान्य वायुदाब को तीन इकाइयों में व्यक्त कीजिए।
उत्तर:

  1. 29.92 इंच
  2. 76 सेंटीमीटर या 760 मिलीमीटर
  3. 1013.2 मिलीबार।

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प्रश्न 16.
मिलीबार क्या होता है?
उत्तर:
1000 डाइन प्रति वर्ग से०मी० के बराबर शक्ति।

प्रश्न 17.
उच्च वायुदाब की दशा में आकाश स्वच्छ कैसे रहता है?
उत्तर:
उच्च वायुदाब में वायु नीचे बैठती है जिससे वाष्पों का संघनन नहीं हो पाता।

प्रश्न 18.
तेजी से गिरता हुआ वायुदाब किस मौसम की सूचना देता है?
उत्तर:
चक्रवात, वर्षा तथा आँधी का पूर्वानुमान बताता है।

प्रश्न 19.
ताप-प्रेरित वायुदाब कटिबंध कौन-से हैं?
उत्तर:
भूमध्य रेखा पर निम्न दाब कटिबंध और ध्रवों पर उच्च दाब कटिबंध।

प्रश्न 20.
गति-प्रेरित वायुदाब कटिबंध कौन-से हैं?
उत्तर:
दोनों गोलार्डों में उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंध तथा उप-ध्रुवीय निम्न-वायुदाब कटिबंध।

प्रश्न 21.
वायुदाब के सात कटिबंधों का निर्माण क्यों हुआ है?
उत्तर:
विभिन्न अक्षांशों पर सूर्यातप के अन्तर और पृथ्वी की दैनिक गति के प्रभाव के कारण।

प्रश्न 22.
भूमध्य रेखीय कटिबंध को शान्तमंडल या डोलड्रम क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि इस पेटी में वायु का क्षैतिज संचलन न होने के कारण पवनें नहीं चलतीं।

प्रश्न 23.
भूमध्य रेखीय निम्न-दाब कटिबंध का विस्तार लिखिए।
उत्तर:
भूमध्य रेखा से 10° उत्तरी व 10° दक्षिणी अक्षांशों के बीच।

प्रश्न 24.
उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंध का विस्तार बताएँ।
उत्तर:
उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्डों में कर्क और मकर रेखाओं से 35° अक्षांश के बीच।

प्रश्न 25.
उप-ध्रुवीय निम्न-दाब कटिबंध का विस्तार बताइए।
उत्तर:
45° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के आर्कटिक व अंटार्कटिक (66/2° उ० व द० वृत्तों) के बीच।

प्रश्न 26.
दो अलग-अलग ‘शान्त’ वायुदाब पेटियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. भूमध्य रेखीय निम्न-दाब कटिबंध शान्तमंडल अथवा डोलड्रम कहलाता है।
  2. उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंध शान्त कटिबंध (Belt of Calm) या अश्व अक्षांश कहलाता है।

प्रश्न 27.
स्थायी पवनें किन्हें कहा जाता है?
उत्तर:
वे पवनें जो सारा वर्ष एक ही दिशा में चलती हैं, स्थायी पवनें कहलाती हैं।

प्रश्न 28.
पूर्वी पवनें कौन-सी होती हैं?
उत्तर:
सन्मार्गी या व्यापारिक पवनें।

प्रश्न 29.
सन्मार्गी पवनों को उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में क्या कहते हैं?
उत्तर:
क्रमशः उत्तर-पूर्वी सन्मार्गी पवनें तथा दक्षिण-पूर्वी सन्मार्गी पवनें।

प्रश्न 30.
व्यापारिक (सन्मार्गी) पवनों के क्षेत्र में शुष्क प्रदेश अथवा मरुस्थल कहाँ पाए जाते हैं?
उत्तर:
महाद्वीपों के पश्चिमी भागों पर।

प्रश्न 31.
उत्तरी गोलार्द्ध में पछुवा पवनों की क्या दिशा होती है?
उत्तर:
दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व।

प्रश्न 32.
पछुवा पवनें कहाँ वर्षा करती हैं?
उत्तर:
शीतोष्ण कटिबंधों में स्थित महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में।

प्रश्न 33.
शीतोष्ण चक्रवात किन पवनों के साथ चलते हैं?
उत्तर:
पछुवा पवनों के साथ।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 34.
ध्रुवीय पवनें शुष्क क्यों होती हैं?
उत्तर:
क्योंकि इन ठण्डी पवनों में जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता नहीं होती।

प्रश्न 35.
आवर्ती पवनों की क्या विशेषता होती है?
उत्तर:
समय के एक निश्चित अन्तराल के बाद इन पवनों की प्रवाह-दिशा उलट जाती है।

प्रश्न 36.
मानसून पवनें क्या होती हैं?
उत्तर:
वे पवनें जिनकी मौसम के अनुसार प्रवाह दिशा बदल जाती है।

प्रश्न 37.
चक्रवाती परिसंचरण क्या है?
उत्तर:
निम्न दाब क्षेत्र के चारों ओर पवनों का परिक्रमण चक्रवाती परिसंचरण कहलाता है।

प्रश्न 38.
‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
उत्तर:
‘मानसन’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से हुई है।

प्रश्न 39.
चार ठण्डी स्थानीय पवनों के नाम बताएँ।
उत्तर:
यूरोप में मिस्ट्रल व बोरा, साइबोरिया में बुरान तथा अर्जेन्टाइना में पम्पेरो।

प्रश्न 40.
घाटी समीर क्या होती है?
उत्तर:
दिन के समय घाटी की गर्म वायु का पर्वतीय ढाल के साथ ऊपर उठना।

प्रश्न 41.
पर्वत समीर किसे कहते हैं?
उत्तर:
रात के समय पर्वतीय ढाल से घाटी की ओर बैठती वायु।

प्रश्न 42.
वातान किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब दो भिन्न प्रकार की वायुराशियाँ मिलती हैं तो उनके मध्य सीमा क्षेत्र को वाताग्र कहते हैं।

प्रश्न 43.
वाताग्र-जनन क्या है?
उत्तर:
वाताग्र-जनन (Frontogenesis) वातारों के बनने की प्रक्रिया को कहते हैं।

प्रश्न 44.
वाताग्र कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
वाताग्र चार प्रकार के होते हैं-

  1. उष्ण वाताग्र
  2. अचर वाताग्र
  3. शीत वाताग्र
  4. अधिविष्ट वाताग्र।

प्रश्न 45.
समदाब रेखाएँ किसे कहते हैं?
उत्तर:
समदाब रेखाएँ संमदाब रेखाओं को अंग्रेजी में ‘Isobar’ कहते हैं। “Iso’ का अभिप्राय समान तथा ‘bars’ का अभिप्राय दाब होता है अर्थात् समान दाब वाली रेखाएँ।

प्रश्न 46.
समुद्र-तल पर सामान्य औसत वायुदाब कितने मिलीबार होता है?
उत्तर:
समुद्र-तल पर वायु का दबाव 1.03 किग्रा० प्रति वर्ग सें०मी० होता है। वायुमंडल का सामान्य दाब 45° अक्षांश पर तथा समुद्र-तल पर 29.92 इंच अथवा 76 सें०मी० होता है। यह 1,013.25 मिलीबार के बराबर होता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायुमंडलीय दाब किसे कहते हैं?
उत्तर:
भू-पृष्ठ के ऊपर कई किलोमीटर की ऊँचाई में वायुमंडल पृथ्वी तल पर दबाव उत्पन्न करता है। वायुमंडल गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी पर टिका हुआ है। वायुदाब साधारण रूप से कई गैसों का मिश्रण है जो भार-युक्त है। अन्य वस्तुओं की भाँति वायु का भी भार अथवा दबाव होता है। वायु का जब पृथ्वी के ऊपर भार पड़ता है तो उसे वायुमंडलीय दाब कहते हैं। भूमि के ऊपर लगभग एक किलोग्राम वायुदाब होता है। समुद्र-तल पर सामान्य दशाओं में 76 सें०मी० वायुमंडलीय भार 1,013.25 मिलीबार के बराबर होता है।

प्रश्न 2.
दाब प्रवणता किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानचित्र पर वायुदाब समदाब रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। समदाब रेखाएँ वे कल्पित रेखाएँ हैं जो समुद्र-तल से समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती हैं। समदाब रेखाओं के बीच की दूरी वायुदाब के परिवर्तन की स्थिति दिखाती है। वायुदाब में परिवर्तन की दर को दाब प्रवणता कहते हैं। यदि समदाब रेखाएँ पास-पास हैं तो इसका तात्पर्य है कि धरातल पर थोड़ी दूर जाने पर दबाव अधिक बढ़ रहा है। इसलिए पास-पास वाली रेखाएँ तीव्र दाब को प्रदर्शित करती हैं, जबकि दूर वाली दाब रेखाएँ मन्द-दाब प्रवणता को दर्शाती हैं। तीव्र-दाब प्रवणता में पवनें तेज गति से चलती हैं तथा मन्द-दाब प्रवणता में पवनें धीमी गति से चलती हैं।

प्रश्न 3.
एक मिलीबार किसे कहते हैं? वायुदाब की माप इकाइयों में क्या संबंध है?
उत्तर:
एक मिलीबार-एक वर्ग सें०मी० पर एक ग्राम के बल अथवा एक हजार डाइन प्रति वर्ग सें०मी० के वायुभार को एक मिलीबार कहते हैं।
विभिन्न माप इकाइयों में संबंध-
30 इंच वायुदाब = 76 सें०मी० = 1,013.25 मिलीबार
1 इंच वायुदाब = 34 मिलीबार।
1 सें०मी० वायुदाब = 13.3 मिलीबार।

प्रश्न 4.
वायुराशियाँ (Air Masses) क्या है?
उत्तर:
वायुमंडल में एक विस्तृत भाग पर तापक्रम, आर्द्रता आदि भौतिक गुणों की समानता रखने वाली पवनों को वायुराशियाँ कहते हैं। वायुराशियों की मुख्य रूप से दो विशेषताएँ होती हैं, जिनमें तापमान का लम्बवत् वितरण और आर्द्रता की उपस्थिति शामिल हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण तापमान के लम्बवत् वितरण पर ही उनकी ऊष्मा तथा शीतलता निर्भर करती है। जो वायुराशियाँ स्थिर होती हैं, वे प्रायः ठण्डी तथा शुष्क होती हैं। ये वर्षा नहीं करतीं, परन्तु गतिशील तथा गर्म वायुराशियाँ वर्षा करती हैं। वायुराशि वायु से भिन्न है। वायुराशि में वायु-धाराएँ ऊपर उठती हैं तथा एक विस्तृत क्षेत्र में तापमान तथा आर्द्रता में समानता होती है, परन्तु वायु भूतल के समानान्तर चलती है तथा इसकी विभिन्न परतों में तापमान तथा आर्द्रता में भिन्नता पाई जाती है।

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प्रश्न 5.
कॉरिआलिस बल की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि पृथ्वी स्थिर होती और उसका धरातल एक-समान होता तो पवनें सीधी उच्च वायुदाब की ओर चलतीं। किन्तु न ही उसका धरातल एक-समान है, इसलिए वायु सीधी न चलकर वक्राकार मार्ग पर चलती है। वायु की दिशा में परिवर्तन लाने में पृथ्वी की दैनिक गति का सबसे बड़ा हाथ है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण एक प्रभाव उत्पन्न होता है जिसे ‘कॉरिआलिस बल’ अथवा कॉरिआलिस प्रभाव (Coriolis Force or Coriolis Effect) कहते हैं। इसके कारण पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ जाती हैं। इस तथ्य को सबसे पहले 1844 ई० में फैरल महोदय ने बताया था इसलिए इसे फैरल का नियम कहते हैं। फैरल के नियम (Ferrel’s Law) के अनुसार, भूमध्य रेखा पर कोई विक्षेप नहीं होता। 30° अक्षांशों पर 50%, 60° अक्षांशों पर 86.7% तथा ध्रुवों पर 100% विक्षेप हो जाता है।

प्रश्न 6.
पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक बताइए।
उत्तर:
पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

  1. भूतल पर धरातलीय विषमताओं के कारण घर्षण पैदा होता है जो पवनों की गति को प्रभावित करता है।
  2. पृथ्वी के घूर्णन से भी पवनों का वेग प्रभावित होता है।
  3. कॉरिआलिस बल के कारण भी पवनों की दिशा प्रभावित होती है।

प्रश्न 7.
अश्व अक्षांश क्या हैं?
उत्तर:
231/2° से 35° के मध्य अक्षांशों को ‘अश्व अक्षांश’ कहते हैं, क्योंकि मध्य युग में पश्चिमी द्वीप समूहों से यूरोप को पालदार जलयानों के द्वारा घोड़े भेजे जाते थे। इन अक्षांशों पर आने पर अधिक वायुदाब के कारण ये जहाज आगे नहीं बढ़ पाते थे। इन जहाजों का भार कम करने के लिए कुछ घोड़े समुद्र में फेंक दिए जाते थे। कर्क रेखा तथा मकर रेखा के निकट का यह क्षेत्र शान्तमंडल कहलाता है। यहाँ पवनें भू-तल के समानान्तर नहीं चलतीं। यहाँ पवनें ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर की ओर चलती हैं। यहाँ वायुमंडल शान्त रहता है तथा मौसम साफ होता है। निरन्तर नीचे उतरती हुई वायु के कारण यहाँ अधिक वायुदाब होता है तथा इन अक्षांशों से पवनें ध्रुवों की ओर पछुवा पवनों के रूप में तथा विषुवत् रेखा की ओर व्यापारिक पवनों के रूप में चलती हैं।

प्रश्न 8.
बहिरूपण कटिबंधीय चक्रवात और उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में क्या अन्तर है?
उत्तर:
बहिरूपण कटिबंधीय चक्रवात और उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में निम्नलिखित अन्तर हैं-

बहिरूपण कंटिबंधीय चक्रवातउष्ण कटिबंधीय चक्रवात
1. बहिरूपण चक्रवात स्थल व सागर दोनों प्रदेशों पर ही उत्पन्न व विकसित होते हैं।1. उष्ण चक्रवात प्रायः महासागरों पर ही उत्पन्न व विकसित होते हैं और स्थल-खण्ड में प्रवेश करते ही इनका लोप होने लगता है।
2. ये प्रायः शीत ऋतु में उत्पन्न होते हैं।2. ये ग्रीष्म ऋतु में अधिक उत्पन्न होते हैं।
3. इनकी समदाब रेखाएँ प्रायः दीर्धवृत्ताकार होती हैं।3. इनकी समदाब रेखाएँ प्रायः वृत्ताकार होती हैं।
4. ये चक्रवात हजारों वर्ग किलोमीटर में फैले हुए होते हैं। इनका व्यास प्राय: 800 से 1600 किलोमीटर तक होता है।4. इन चक्रवातों का विस्तार बहुत कम होता है। इनका व्यास प्रायः 300 से 1000 किलोमीटर तक होता है।
5. अधिक विस्तार होने के कारण इन चक्रवातों में वायुदाब प्रवणता मन्द होती है।5. कम विस्तार होने के कारण इनमें वायुदाब प्रवणता तीव्र होती है।

प्रश्न 9.
डोलड्रम किसे कहते हैं?
उत्तर:
डोलड्रम एक शान्त क्षेत्र है जो भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5°N तथा 5°S के मध्य स्थित है। यह भूमध्य रेखा शान्त-खण्ड भी कहलाता है। यहाँ भू-तल पर चलने वाली पवनें नहीं होतीं। यहाँ धीमी तथा शान्त वायु बहती है। इसका प्रमुख कारण सूर्य का यहाँ लगभग लम्बवत् रूप से चमकना है। यहाँ तापमान अधिक होता है। वायु गर्म तथा हल्की होकर संवाहिक धाराओं के रूप में ऊपर उठती है जिससे इस क्षेत्र में वायुदाब कम हो जाता है।

प्रश्न 10.
पर्वत-समीर तथा घाटी-समीर क्या होती हैं?
उत्तर:
ये समीरें मुख्य रूप से दैनिक पवनें हैं जो दैनिक तापान्तर के प्रभाव से वायुदाब की भिन्नता के कारण चलती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में रात्रि के समय पर्वत शिखर से घाटी की ओर ठण्डी तथा भारी चलने वाली वायु को पर्वत-समीर कहते हैं। इन पवनों के कारण घाटियाँ ठण्डी वायु से भर जाती हैं जिससे घाटी के निचले क्षेत्र में पाला पड़ता है। दिन के समय घाटी की गर्म वायु पर्वतीय ढाल के साथ-साथ पर्वतीय शिखर की ओर चलती है जिसे घाटी-समीर कहते हैं। ज्यों-ज्यों ये पवनें ऊपर की ओर जाती हैं, त्यों-त्यों ये ठण्डी होकर भारी वर्षा करती हैं।

प्रश्न 11.
व्यापारिक या सन्मार्गी पवनें क्या हैं?
उत्तर:
व्यापारिक पवनें स्थायी पवनें हैं। ये पवनें उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंधों से (लगभग 30° उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांश) विषुवतीय निम्न-वायुदाब कटिबंध की ओर दोनों गोलार्डों में चलती हैं। ये पवनें महाद्वीपों के पूर्वी भागों में वर्षा करती हैं। पश्चिमी क्षेत्रों में पहुँचते-पहुँचते ये पवनें शुष्क हो जाती हैं, इसलिए महाद्वीपों के पश्चिम में मरुस्थल पाए जाते हैं। जब व्यापारिक पवनें दोनों गोलार्डों से विषुवत रेखा के निकट आपस में टकराती हैं तो ऊपर उठकर घनघोर वर्षा करती हैं। हिन्द महासागर में ये पवनें मानसून पवनों का रूप धारण करके दक्षिण-पूर्वी एशिया में मानसूनी वर्षा करती हैं।

प्रश्न 12.
फैरल का नियम क्या है?
उत्तर:
भू-तल पर पवनें कभी सीधे रूप से उत्तर से दक्षिण या दक्षिण से उत्तर की ओर नहीं चलतीं। सभी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दाईं ओर तथा दक्षिण गोलार्द्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ जाती हैं। इसे फैरल का नियम कहते हैं। वायु की दिशा में यह परिवर्तन पृथ्वी की दैनिक गति के कारण होता है। जब पवनें कम गति वाले क्षेत्रों से अधिक गति वाले क्षेत्रों की तरफ आती हैं तो पीछे रह जाती हैं। इस विक्षेप शक्ति को कॉरिआलिस बल कहते हैं।

प्रश्न 13.
“मानसूनी पवन सामान्य भूमंडलीय पवन तन्त्र का ही रूपान्तरण है।” इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
मानूसन पवनें मौसम में परिवर्तन के अनुसार अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती हैं। वैज्ञानिक इन्हें बड़े पैमाने की मानते हैं, क्योंकि मानसन पवनों की उत्पत्ति का प्रमुख कारण जल तथा स्थल में तापक्रम की भिन्नता है। मानसून की उत्पत्ति के विषय में उपलब्ध वर्तमान सिद्धान्तों में फ्लोन का सिद्धान्त सर्वमान्य है। इस सिद्धान्त के अनुसार, मानसूनी तन्त्र भू-मंडलीय पवन तन्त्र का ही रूपान्तरित रूप है। ग्रीष्मकाल में जब सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में चमकता है तो उपोष्ण उच्च वायुदाब तथा तापीय भूमध्य रेखा उत्तर की ओर खिसक जाते हैं।

एशिया में भू-खण्ड के प्रभाव के कारण यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर होती है जिससे उष्ण कटिबंधीय व्यापारिक पवन और विषुवतीय पछुवा पवन भी उत्तर की ओर खिसक जाती है। पवनें महासागर से महाद्वीपों की ओर चलने लगती हैं जिन्हें दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पवनें कहते हैं। शीत ऋतु में उपोष्ण उच्च-वायुदाब कटिबंध तथा तापीय भूमध्य रेखा दक्षिण की ओर वापस अपनी पुरानी स्थिति पर लौट आते हैं जिससे सामान्य व्यापारिक चक्र स्थापित हो जाता है जिसे उत्तरी-पूर्वी मानसून पवन कहते हैं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि भू-मंडलीय पवन तन्त्र में चलने वाली व्यापारिक पवनों के स्थान पर मानूसन पवनें चलने लगती हैं।

प्रश्न 14.
पृथ्वी के धरातल पर कुछ वायुदाब कटिबंध तापीय कारणों से नहीं, बल्कि गतिक कारणों से उत्पन्न हुए हैं। ये कटिबंध कौन से हैं? इनकी उत्पत्ति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी के धरातल पर विषुवत् रेखा तथा ध्रुवों के मध्य उपोष्ण उच्च-वायुदाब तथा उप-ध्रुवीय निम्न-वायुदाब की उत्पत्ति गतिक-कारणों से होती है। विषुवत् रेखा से सूर्य की गर्मी के कारण वायु गर्म होकर ऊपर उठती है तथा ठण्डी तथा भारी होकर 30° अक्षांशों के निकट नीचे उतरती है तथा पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ध्रुवों से आने वाली वायु भी इन्हीं अक्षांशों में नीचे उतरती है जिसके कारण इन अक्षांशों पर उच्च-वायुदाब की पेटी बन जाती है। उपध्रुवीय निम्न-वायुदाब की उत्पत्ति का मुख्य कारण भी यही है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ही 60° अक्षांशों के निकट की वायु के विषुवत् रेखा तथा ध्रुवों की ओर खिसकने के कारण ही यहाँ निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है।

प्रश्न 15.
“मानसून पवनें एक बड़े पैमाने पर जल-समीर तथा स्थल-समीर हैं।” व्याख्या करें।
उत्तर:
‘मानूसन’ शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से बना है, जिसका अर्थ है-मौसम। अतः मानसूनी पवनें वे पवनें हैं जो मौसमानुसार दिशा में चलती हैं। ये पवनें 6 मास तक ग्रीष्मकाल में दक्षिण दिशा से तथा 6 मास तक शीतकाल में उत्तर दिशा से चलती हैं। ग्रीष्मकाल में ये पवनें सागरों से स्थल की ओर तथा शीतकाल में स्थल से सागरों की ओर चलती हैं। इनकी उत्पत्ति जल तथा स्थल के गर्म तथा ठण्डा होने में पाई जाने वाली भिन्नता है। स्थलीय भाग जल की अपेक्षा शीघ्र गर्म होता है तथा शीघ्र ही ठण्डा होता है।

इसलिए दिन के समय सागर के निकट स्थल भाग पर कम वायुदाब होता है तथा सागर में कम तापमान के कारण वायुदाब अधिक होता है जिसके कारण सागर से स्थल की ओर जल-समीर चलने लगती है, परन्तु रात्रि के समय वह स्थिति विपरीत हो जाती है, जिससे स्थल से सागर की ओर स्थल-समीर चलने लगती है। इस प्रकार प्रतिदिन वायु की दिशा में परिवर्तन आता रहता है, परन्तु मानूसन पवनों की दिशा में परिवर्तन, मौसम में परिवर्तन के कारण होता है तथा पवनें सागरीय तट के निकट चलने के स्थान पर पूरे महाद्वीप पर चलती हैं। इसलिए मानूसन पवनों को विस्तृत स्तर पर जल-समीर तथा स्थल-समीर का रूप मानते हैं।

प्रश्न 16.
पवन की परिभाषा देते हुए स्पष्ट कीजिए कि पवनों की उत्पत्ति किस प्रकार की होती है?
उत्तर:
पवन (Wind) भू-पृष्ठ के सहारे क्षैतिज बहती हुई हवा (Air) को पवन (Wind) कहते हैं। पवनें पृथ्वी पर वायुदाब में क्षैतिज अन्तर के कारण चलती हैं। जिस प्रकार जल अपना तल बराबर रखने के लिए ऊँचे स्थानों से निचले स्थानों की ओर बहता है उसी प्रकार वायु भी अपने दबाव में सन्तुलन बनाए रखने के लिए उच्च-वायुदाब वाले क्षेत्रों से निम्न-वायुदाब वाले क्षेत्रों की ओर चलती है। यह प्रकृति का नियम है। पवनों के नाम उस दिशा के अनुसार रखे जाते हैं जिनसे वे बहकर आती हैं।

लगभग ऊर्ध्वाधर (Vertical) दिशा में गतिमान वायु को वायुधारा (Air Current) कहा जाता है। पवनें और वायुधाराएँ दोनों मिलकर वायुमंडल में एक संचार तन्त्र (Circulation System) स्थापित करती हैं। पवनों की उत्पत्ति (Origin of Winds)-पवन की उत्पत्ति अत्यन्त जटिल होती है। पवन की उत्पत्ति का प्रत्यक्ष कारण वायुदाब का अन्तर होता है लेकिन पवन का मूल प्रेरक बल सौर विकिरण होता है।

यदि पृथ्वी की दैनिक गति न होती अर्थात् पृथ्वी स्थिर होती और उसका धरातल भी एकदम समतल होता तब पवन उच्च-वायुदाब क्षेत्र से निम्न-वायुदाब क्षेत्र की ओर समदाब रेखाओं पर समकोण बनाते हुए बहती। इसका तात्पर्य यह है कि पवन या तो उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है या दक्षिण से उत्तर की ओर। वायुदाब समान होते ही पवनें भी चलना बन्द कर देतीं। परन्तु वास्तविकता यह है कि पृथ्वी न तो स्थिर है और न ही समतल। इस कारण पवन की गति और दिशा को अनेक कारक सम्मिलित रूप से प्रभावित करते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात क्या है? उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उष्ण-कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)-उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के महासागरों पर उत्पन्न व विकसित होने वाले चक्रवातों को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं। इनका विस्तृत वर्णन निम्नलिखित प्रकार से हैं-
1. उत्पत्ति (Origin)-ये चक्रवात उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्डों में लगभग 5° से 25° अक्षांशों के बीच उत्पन्न होते हैं। भूमध्य रेखा के निकट दोनों गोलार्डों की व्यापारिक पवनें आकर मिलती हैं। जिस तल पर ये पवनें आकर मिलती हैं उसे अन्तरा-उष्ण कटिबंधीय वाताग्र अथवा अन्तरा-उष्ण कटिबंधीय मिलन तल (Inter-tropical Front or Inter-tropical Convergence Zone) कहते हैं। ग्रीष्म ऋतु के उत्तरार्द्ध में अन्तरा-उष्ण कटिबंधीय वाताग्र भूमध्य रेखा से काफी दूर चला जाता है।

इस वाताग्र के किसी भाग में जलवायु काफी गरम होकर बड़े पैमाने पर ऊपर को उठती है तो कॉरिआलिस बल के कारण इस निम्न-वायुदाब क्षेत्र की ओर सभी दिशाओं में पवनें चलने लगती हैं और एक चक्रवात का जन्म होता है। इसके चारों ओर वायु-भार अधिक तथा बीच में वायु-भार कम होता है। कम वायु-भार वाले इस केन्द्र को चक्रवात की आँख (Eye of the Cyclone) कहते हैं। चक्रवात में पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों की विपरीत दिशा में तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के अनुकूल चलती हैं।

2. आकार तथा विस्तार (Shape and Size)-उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की समभार रेखाएँ लगभग वृत्ताकार अथवा दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) होती हैं। भीतरी न्यून तथा बाहरी अधिक वायु-भार में लगभग 55-60 मिलीबार का अन्तर होता है। इनका विस्तार शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के विस्तार में बहुत ही कम होता है, इनका व्यास साधारणतया 150 से 750 किलोमीटर तक होता है, परन्तु कुछ छोटे चक्रवातों का व्यास 40 से 50 किलोमीटर तक ही होता है।

3. मौसम (Weather)-शीतोष्ण चक्रवातों की भाँति उष्ण चक्रवातों के आने पर सबसे पहले आकाश में पक्षाभ-स्तरीय मेघ दृष्टिगोचर होते हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा के चारों ओर प्रभा-मंडल का विकास होता है। वायु उमस वाली हो जाती है और शान्त वातावरण उत्पन्न हो जाता है। वायुदाब एकदम से बढ़ जाता है। इसके पश्चात् मन्द समीर चलने लगती है, मेघ नीचे होने लगते हैं और वायुदाब धीरे-धीरे कम होने लगता है।

तत्पश्चात् वर्षादायनी मेघों (Nimbus Clouds) का विकास होता है जो सबसे पहले क्षैतिज पर दिखाई देते हैं और फिर धीरे-धीरे समस्त आकाश पर छा जाते हैं। वायुदाब तापमान की तीव्रता से कम होने लगता है और पवन का वेग बहुत बढ़ जाता है। दाहिने अग्र चतुर्थांश (Right Front Quadrant) में प्रायः तेज बौछारों के साथ वर्षा होती है। यदि गतियुक्त चक्रवात कुछ समय के लिए स्थिर हो जाएँ तो दाएँ पृष्ठ चतुर्थांश में भी काफी वर्षा होती है। चक्रवात के अन्तिम भाग में फिर से पक्षाभ तथा पक्षाभ-स्तरीय मेघ दृष्टिगोचर होते हैं, पवन का वेग मन्द पड़ जाता है और वायुदाब सामान्य हो जाता है।

4. मार्ग तथा प्रभाव क्षेत्र (Path and Affected Areas)-उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की दिशा विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न होती है। भूमध्य रेखा से 15° तक ये सन्मार्गी (व्यापारिक) पवनों से प्रभावित होकर पूर्व से पश्चिम की ओर चलते हैं। 15° से 30° अक्षांशों के बीच इनकी दिशा अनिश्चित रहती है, परन्त 30° को पार करने के बाद ये पछ्वा पवनों के प्रभावाधीन पश्चिम से पूर्व दिशा में मुड़ जाते हैं। स्थल पर पहुँचकर ये समाप्त हो जाते हैं क्योंकि वहाँ पर जलवाष्प की कमी तथा भू-घर्षण में वृद्धि हो जाती है। इनके प्रभाव-क्षेत्र निम्नलिखित हैं-
(i) कैरीबियन सागर (Caribbean Sea) यहाँ इन्हें हरीकेन (Hurricane) कहते हैं। ये मुख्यतः जून से अक्तूबर तक कैरीबियन सागर से उठते हैं और पश्चिमी द्वीप समूह, फ्लोरिडा तथा दक्षिणी-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के अन्य भागों को प्रभावित करते हैं।

(ii) चीन सागर (China Sea)-यहाँ इन्हें टाइफून (Typhoon) कहते हैं। यहाँ ये जुलाई से अक्तूबर तक चलते हैं और फिलीपींस, चीन तथा जापान को प्रभावित करते हैं।

(iii) हिन्द महासागर (Indian Ocean)-यहाँ इन्हें चक्रवात के नाम से पुकारा जाता है। ये भारत, बांग्लादेश, बर्मा, मेडागास्कर तथा ऑस्ट्रेलिया से उत्तरी तट के अतिरिक्त बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर को भी प्रभावित करते हैं। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के तट पर इन्हें विली-विलीज (Willy Wilies) कहते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा मैक्सिको में इन्हें टोरनेडो (Tormado) कहते हैं।

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प्रश्न 2.
‘वायुराशियाँ’ क्या हैं? ‘वातान’ कैसे बनते हैं?
उत्तर:
वायुराशियाँ-वायुमंडल में एक विस्तृत भाग पर तापक्रम, आर्द्रता आदि भौतिक गुणों की समानता रखने वाली पवनों को वायुराशियाँ कहते हैं। वायुराशियों की मुख्य रूप से दो विशेषताएँ होती हैं, जिनमें तापमान का लम्बवत वितरण और आर्द्रता की उपस्थिति शामिल हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण तापमान के लम्बवत् वितरण पर ही उनकी ऊष्मा तथा शीतलता निर्भर करती है। जो वायुराशियाँ स्थिर होती हैं, वे प्रायः ठण्डी तथा शुष्क होती हैं। ये वर्षा नहीं करतीं, परन्तु गतिशील तथा गर्म वायराशियाँ वर्षा करती हैं। वायराशि वाय से भिन्न है।वायराशि में वाय-धाराएँ ऊपर उठती हैं तथा मान तथा आर्द्रता में समानता होती है, परन्तु वायु भूतल के समानान्तर चलती है तथा इसकी विभिन्न परतों में तापमान तथा आर्द्रता में भिन्नता पाई जाती है।

‘वातान’ कैसे बनते हैं-दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियों के मिलन-स्थल को वाताग्र (Front) कहते हैं। यह न तो धरातलीय सतह के समानान्तर होता है और न ही उस पर लम्बवत् होता है बल्कि कुछ कोण पर झुका हुआ होता है।

टी० पीटरसन के अनुसार, “वाताग्री सतह एवं धरातलीय सतह को अलग करने वाली रेखा को वाताग्र कहते हैं तथा जिस प्रक्रिया द्वारा वाताग्र बनता है, उसे वाताग्र उत्पत्ति (Frontogenesis) कहते हैं”।

वातानों की उत्पत्ति निम्नलिखित दो बातों पर आधारित है-
1. भौगोलिक कारक-जब दो विभिन्न प्रकार की वायुराशियाँ एक-दूसरे के समीप आती हैं तो वाताग्र की उत्पत्ति होती है अर्थात् वाताग्र की उत्पत्ति के लिए दो विभिन्न वायुराशियों का तापमान तथा उनकी आर्द्रता का भिन्न होना अनिवार्य है।

2. गतिज कारक-वाताग्र की उत्पत्ति के लिए वायुराशियों में प्रवाह अर्थात् गति होना अत्यन्त आवश्यक है। पीटरसन तथा बर्गरॉन ने यह सिद्ध किया है कि वायुराशियों की गति वातारों को तीव्रता प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में अंतर बताइए।
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में अंतर निम्नलिखित हैं-

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones)
1. ये चक्रवात उष्ण कटिबंध में 5° से 30° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्द्धों में चलते हैं।1. ये चक्रवात शीतोष्ण कटिबंध में 35° से 65° अंक्षाशों के मध्य दोनों गोलार्द्धों में चलते हैं।
2. इन चक्रवातों का आकार छोटा होने के कारण दाब प्रवणता अधिक होती है।2. इन चक्रवातों का आकार बड़ा होने के क्रारण दाब प्रवणता कम होती है।
3. इन चक्रवातों का व्यास सामान्यतः 100 से 700 कि०मी० तक होता है। कुछ चक्रवात छोटे भी होते हैं।3. इन चक्रवातों का व्यास सामान्यतः 500 से 700 कि०मी० तक होता है। कुछ चक्रवात कई हजार कि०मी० व्यास के भी होते हैं।
4. इनमें अधिक दाब-प्रवणता के कारण पवनें तेजी से चलती हैं।4. इनमें कम दाब-प्रवणता के कारण पवनें मन्द गति से चलती हैं।
5. इनका जन्म संवहनीय धाराओं के कारण अंतर-उष्ण कटिबंधीय अभिसरण (ITCZ) तल पर होता है।5. इनका जन्म शीतल तथा उण्ण वायु-राशियों के मिलने पर होता है।
6. ये चक्रवात प्रायः उष्ण समुद्री भागों में उत्पन्न व विकसित होते हैं।6. ये चक्रवात समुद्री तथा स्थलीय दोनों ही भागों में समान रूप सं विकसित उ उत्पन्न होते हैं।
7. ये चक्रवात ग्रीष्मकाल में उत्पन्न होते हैं।7. ये चक्रवात शीतकाल में उत्पन्न होते हैं।
8. इन चक्रवातों में वाताग्र नहीं होते ।8. इन चक्रवातों में वाताग्र होते हैं।
9. इन चक्रवातों में समदाब रेखाएँ पास-पास होती हैं।9. इन चक्रवातों में समदाब रेखाएँ दूर-दूर होती हैं।
10. पवनें चक्राकार मार्ग में चलती हैं।10. पवनों की गति व दिशा वाताग्रों पर निर्भर करती है।
11. इनमें वर्षा तेजी से होती है।11. इनमें वर्षा धीरे-धीरे होती है।
12. इनमें वर्षा के साथ ओले नहीं गिरते।12. इनमें वर्षा के साथ ओले गिरते हैं।

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HBSE 10th Class Science Notes Haryana Board

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HBSE 10th Class Science Important Questions Haryana Board

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

HBSE 11th Class Geography पृथ्वी पर जीवन Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन जैवमंडल में सम्मिलित हैं।
(A) केवल पौधे
(B) केवल प्राणी
(C) सभी जैव व अजैव जीव
(D) सभी जीवित जीव
उत्तर:
(C) सभी जैव व अजैव जीव

2. उष्णकटिबंधीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं?
(A) प्रेयरी
(B) स्टैपी
(C) सवाना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सवाना

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

3. चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है?
(A) आयरन सल्फेट
(B) आयरन कार्बोनेट
(C) आयरन ऑक्साइड
(D) आयरन नाइट्राइट
उत्तर:
(C) आयरन ऑक्साइड

4. प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है?
(A) प्रोटीन
(B) कार्बोहाइड्रेट्स
(C) एमिनोएसिड
(D) विटामिन
उत्तर:
(B) कार्बोहाइड्रेट्स

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पारिस्थितिकी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पारिस्थितिकी का सीधा सम्बन्ध जैविक तथा अजैविक तत्त्वों के पारस्परिक सम्बन्धों से है। जैव समूहों तथा जीवों और वातावरण के बीच जो सम्बन्ध होते हैं, उनका अध्ययन पारिस्थितिकी कहलाता है अर्थात् वातावरण तथा जीवों के मध्य पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन को ही पारिस्थितिकी कहते हैं।

प्रश्न 2.
पारितत्र (Ecological system) क्या है? संसार के प्रमुख पारितंत्र प्रकारों को बताएं।
उत्तर:
पारितन्त्र का अर्थ-पारितन्त्र पर्यावरण के सभी जैव तथा अजैव घटकों के एकीकरण का परिणाम है। दूसरे शब्दों में, जीव तथा उसके पर्यावरण के बीच की स्वतन्त्र इकाई को पारितन्त्र (Ecosystem) कहा जाता है।
पारितन्त्र के प्रकार-पारितन्त्र दो प्रकार के होते हैं-

  • जलीय पारितन्त्र (Terrestrial Ecosystem)
  • स्थलीय पारितन्त्र (Aquatic Ecosystem)

संसार के कुछ प्रमुख पारितंत्र निम्नलिखित हैं- वन, घास-क्षेत्र, मरुस्थल, झील, नदी, समुद्र इत्यादि।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

प्रश्न 3.
खाद्य श्रृंखला क्या है? चराई खाद्य शृंखला का एक उदाहरण देते हुए इसके अनेक स्तर बताएं।
उत्तर:
खाद्य श्रृंखला का अर्थ-भोजन अथवा ऊर्जा के एक पोषण तल से अन्य पोषण तलों तक पहुँचने की प्रक्रिया को खाद्य श्रृंखला (Food Chain) कहा जाता है।

एक पारितन्त्र में अनेक खाद्य शृंखलाएँ बनती हैं जिनमें चराई खाद्य शृंखला भी एक प्रमुख श्रृंखला है। यह शृंखला हरे पौधों (उत्पादक) से आरम्भ होकर माँसाहारी तक जाती है। इस श्रृंखला के विभिन्न स्तर निम्नलिखित हैं
घास → हरा टिड्डा → मेंढ़क → साँप → बाज

प्रश्न 4.
खाद्य जाल (Food web) से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित बताएं।
उत्तर:
खाद्य जाल का अर्थ-पारितन्त्र में खाद्य शृंखलाएँ स्वतन्त्र इकाइयों के रूप में नहीं चलती हैं। ये आपस में अन्य खाद्य श्रृंखलाओं से अलग स्तर पर जुड़ी रहती हैं और एक जाल-सा बनाती हैं, जिसे खाद्य जाल (Food Web) कहा जाता है।

उदाहरण-किसी चरागाह पारितन्त्र में हिरण, खरगोश, चरने वाले पशु-चूहे और सुनसुनिया आदि घास को अपना भोजन बनाते हैं। चूहों को साँप या शिकारी पक्षी खा सकते हैं तथा शिकारी पक्षी साँपों को भी खा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि उपभोक्ताओं के पास कई विकल्प मौजूद हैं जिस कारण पारितन्त्र में सन्तुलन बना रहता है।

प्रश्न 5.
बायोम (Biome) क्या है?
उत्तर:
बायोम-विशेष परिस्थितियों में पादप व जन्तुओं के अन्तर्सम्बन्धों के कुल योग को बायोम (Biome) कहते हैं। यह पौधों और प्राणियों का एक समुदाय है जो बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पाया जाता है। संसार के प्रमुख बायोम हैं

  • वन बायोम
  • मरुस्थलीय बायोम
  • घास-भूमि बायोम
  • जलीय बायोम
  • उच्च प्रदेशीय बायोम।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
संसार के विभिन्न वन बायोम (Forest Biomes) की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
वन बायोम को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन 1
1. उष्ण कटिबन्धीय वन-ये दो प्रकार के होते हैं-

  • भूमध्य रेखीय वन
  • उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन।

भूमध्य रेखीय वन-

  • भूमध्य रेखीय वन भूमध्य रेखा से उत्तर व दक्षिण अक्षांश के बीच स्थित होते हैं।
  • इन वनों में तापमान 20° से 25°C के बीच रहता है।
  • इन क्षेत्रों की मिट्टी अम्लीय होती है जिसमें पोषक तत्त्वों की कमी होती है।
  • इन वनों में असंख्य वृक्षों के झुण्ड लम्बे व घने वृक्ष मिलते हैं।

उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन-

  • उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन 10° से 25° उत्तर व दक्षिण अक्षांशों के बीच पाए जाते हैं।
  • इन वनों का तापमान 25° से 30°C के बीच रहता है।
  • इन वनों में वार्षिक औसत वर्षा 1000 मि०मी० होती है।
  • इन वनों में कम घने तथा मध्यम ऊँचाई के वृक्ष मिलते हैं।
  • इन वनों में कीट, पतंगे, चमगादड़, पक्षी व स्तनधारी जीव पाए जाते हैं।

2. शीतोष्ण कटिबन्धीय वन-

  • इन वनों का तापमान 20° से 30° के बीच पाया जाता है।
  • इन वनों में वर्षा समान रूप से वितरित होती है तथा 750-1500 मि०मी० के बीच होती है।
  • इन वनों में पौधों की प्रजातियों में कम विविधता पाई जाती है। यहाँ ओक, बीच आदि वृक्ष पाए जाते हैं।
  • प्राणियों में गिलहरी, खरगोश, पक्षी तथा काले भालू आदि जन्तु पाए जाते हैं।

3. बोरियल वन-

  • इन वनों में छोटी आई ऋतु व मध्यम रूप से गर्म ग्रीष्म ऋतु तथा लम्बी शीत ऋतु पाई जाती है।
  • इन वनों में वर्षा मुख्यतः हिमपात के रूप में होती है जो 400-1000 मि०मी० होती है।
  • वनस्पति में पाइन, स्यूस आदि कोणधारी वृक्ष मिलते हैं।
  • प्राणियों में कठफोड़ा, चील, भालू, हिरण, खरगोश, भेड़िया व चमगादड़ आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 2.
जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) क्या है? वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Fixation) कैसे होता है? वर्णन करें।
उत्तर:
जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) पृथ्वी पर जीवन विविध प्रकार से जीवित जीवों के रूप में पाया जाता है। ये जीवधारी विविध प्रकार के पारिस्थितिक अन्तर्सम्बन्धों में जीवित हैं। जीवधारी बहुलता व विविधता में ही जीवित रह सकते हैं। जीवित रहने की प्रक्रिया में विविध प्रवाह; जैसे ऊर्जा, जल व पोषक तत्त्वों की उपस्थिति सम्मिलित है। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले 100 वर्षों में वायुमण्डल व जलमण्डल की संरचना में रासायनिक घटकों का सन्तुलन लगभग एक समान रहा है। रासायनिक तत्त्वों का यह सन्तुलन पौधों व प्राणी ऊत्तकों से होने वाले चक्रीय प्रवाह के द्वारा बना रहता है। जैवमण्डल में जीवधारी व पर्यावरण के बीच में रासायनिक तत्त्वों के चक्रीय प्रवाह को जैव भू-रासायनिक चक्र कहा जाता है।

वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण-(Fixation)वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाइट्रोजन को जीव-जन्तु प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करने में असमर्थ हैं परन्तु कुछ फलीदार पौधों की जड़ों में उपस्थित जीवाणु तथा नीली-हरी शैवाल (Blue green Algae) वायुमण्डल की नाइट्रोजन को सीधे ही ग्रहण कर सकते हैं और उसे नाइट्रोजन के यौगिकों में बदल देते हैं। इस प्रक्रिया को नाइट्रोजन यौगिकीकरण कहते हैं। शाकाहारी जन्तुओं द्वारा इन पौधों के खाने पर इसका कुछ भाग उनमें चला जाता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

प्रश्न 3.
पारिस्थितिक संतुलन (Ecological balance) क्या है? इसके असंतुलन को रोकने के महत्त्वपूर्ण उपायों की चर्चा करें।
उत्तर:
पारिस्थितिक सन्तुलन का अर्थ-किसी पारितन्त्र या आवास में जीवों के समुदाय में परस्पर गतिक साम्यता की अवस्था ही पारिस्थितिक सन्तुलन है। यह तभी सम्भव है जब जीवधारियों की विविधता अपेक्षाकृत स्थायी रहे। अतः पारितन्त्र में हर प्रजाति की संख्या में एक स्थायी सन्तुलन को भी पारिस्थितिक सन्तुलन (Ecological Balance) कहा जाता है।

पारिस्थितिक असन्तुलन को रोकने के उपाय-

  • जीव-जन्तुओं के आवास स्थानों को नष्ट नहीं करना चाहिए।
  • वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।
  • पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए।
  • वृक्षारोपण किया जाना चाहिए।
  • पर्यावरणीय कारकों का सही एवं उचित प्रयोग करना चाहिए।
  • जनसंख्या दबाव से भी पारिस्थितिकी बहुत प्रभावित हुई है अतः जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगानी चाहिए।
  • मानव के अधिक हस्तक्षेप से असंतुलन बढ़ता है, जिससे बाढ़ और कई जलवायु संबंधी परिवर्तन देखने को मिलते है। अतः मानव का पर्यावरण से छेड़छाड़ कम करना भी एक उपाय हो सकता है।

पृथ्वी पर जीवन HBSE 11th Class Geography Notes

→ जैवमण्डल (Biosphere)-जैवमण्डल पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी पौधों, जन्तुओं, प्राणियों और इनके चारों ओर के पर्यावरण के पारस्परिक अन्तर्संबंध से बनता है।

→ पारिस्थितिकी (Ecology)-भौतिक पर्यावरण और जीवों के बीच घटित होने वाली पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।

→ पारितंत्र (Ecosystem)-पारितंत्र पर्यावरण के सभी जैव तथा अजैव घटकों के समाकलन का परिणाम है।

→ स्वपोषित (Autotroph)- ऐसे पौधे जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं अकार्बनिक पदार्थों से तैयार करते हैं, स्वपोषित कहलाते हैं।

→ खाद्य शृंखला (Food Chain)-पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह क्रमबद्ध स्तरों की एक श्रृंखला होती है, जिसे खाद्य श्रृंखला कहते हैं।

→ जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle)-पारितंत्र में अजैव तत्त्वों का जैव तत्त्वों में बदलना तथा पुनः जैव तत्त्वों का अजैव तत्त्वों में बदल जाना, जैव भू-रासायनिक चक्र कहलाता है।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. महासागरों की सतह पर एक-साथ भिन्न-भिन्न लंबाई व दिशाओं वाली तरंगों के समूह को कहते हैं-
(A) स्वेल
(B) ‘सी’
(C) सर्फ
(D) बैकवाश
उत्तर:
(B) ‘सी’

2. किस महासागर में पवनों की दिशा बदलते ही धाराओं की दिशा बदल जाती है?
(A) हिंद महासागर में
(B) अंध महासागर में
(C) प्रशांत महासागर में
(D) आर्कटिक महासागर में
उत्तर:
(D) आर्कटिक महासागर में

3. तटीय भागों में टूटती हुई तरंगें कहलाती हैं-
(A) स्वेल
(B) ‘सी’
(C) सर्फ
(D) बैकवाश
उत्तर:
(C) सर्फ

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

4. क्यूरोशियो धारा उत्पन्न होती है-
(A) अटलांटिक महासागर में
(B) प्रशांत महासागर में
(C) हिंद महासागर में
(D) आर्कटिक महासागर में
उत्तर:
(B) प्रशांत महासागर में

5. सारगैसो सागर स्थित है-
(A) प्रशांत महासागर में
(B) दक्षिणी ध्रुव के पास
(C) भूमध्य सागर के पास
(D) अटलांटिक महासागर के मध्य में
उत्तर:
(D) अटलांटिक महासागर के मध्य में

6. निम्नलिखित में से कौन-सी धारा अटलांटिक महासागर में नहीं बहती?
(A) गल्फ स्ट्रीम
(B) लैब्रेडोर की धारा
(C) हंबोल्ट धारा
(D) फाकलैंड की धारा
उत्तर:
(C) हंबोल्ट धारा

7. निम्नलिखित में से कौन-सी गर्म धारा है?
(A) लैब्रेडोर की धारा
(B) फाकलैंड की धारा
(C) क्यूराइल की धारा
(D) फ्लोरिडा की धारा
उत्तर:
(D) फ्लोरिडा की धारा

8. दो लगातार शिखरों या गर्तों के बीच की दूरी कहलाती है-
(A) तरंग काल
(B) तरंग गति
(C) तरंग दैर्ध्य
(D) तरंग आवृत्ति
उत्तर:
(C) तरंग दैर्ध्य

9. निम्नलिखित में से कौन-सी समुद्री धारा ‘यूरोप का कंबल’ के उपनाम से जानी जाती है?
(A) कनारी
(B) बेंगुएला
(C) इरमिंजर
(D) गल्फ स्ट्रीम
उत्तर:
(D) गल्फ स्ट्रीम

10. कालाहारी मरुस्थल के पश्चिम में कौन-सी धारा बहती है? ।
(A) कनारी
(B) बेंगुएला
(C) इरमिंजर
(D) गल्फ स्ट्रीम
उत्तर:
(B) बेंगुएला

11. जापान व ताइवान के पूर्व में कौन-सी गर्म धारा बहती है?
(A) लैब्रेडोर की धारा
(B) क्यूरोशियो की धारा
(C) गल्फ स्ट्रीम
(D) फ्लोरिडा की धारा
उत्तर:
(B) क्यूरोशियो की धारा

12. ‘प्रणामी तरंग सिद्धांत’ निम्नलिखित में से किसकी उत्पत्ति की व्याख्या करता है?
(A) महासागरीय तरंग
(B) चक्रवात
(C) ज्वार-भाटा
(D) उपसागरीय भूकंप
उत्तर:
(C) ज्वार-भाटा

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

13. गर्म समुद्री धाराएँ
(A) ध्रुवों की ओर जाती हैं
(B) भूमध्य रेखा की ओर जाती हैं
(C) उष्ण कटिबंध की ओर जाती हैं
(D) कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच चलती हैं
उत्तर:
(A) ध्रुवों की ओर जाती हैं

14. अर्द्ध दैनिक ज्वार-भाटा प्रायः कितने समय बाद आता है?
(A) 24 घंटे बाद
(B) 12 घंटे 26 मिनट बाद
(C) 36 घंटे बाद
(D) 48 घंटे बाद
उत्तर:
(B) 12 घंटे 26 मिनट बाद

15. निम्नलिखित में से कौन-सी तीन गर्म समुद्री धाराएँ हैं?
(A) गल्फ स्ट्रीम – क्यूराइल – क्यूरोशियो
(B) क्यूरेशियो – क्यूराइल – कैलिफोर्निया
(C) क्यूरोशियो – गल्फ स्ट्रीम – मोजांबिक
(D) गल्फ स्ट्रीम – मोजांबिक – ब्राजील
उत्तर:
(D) गल्फ स्ट्रीम – मोजांबिक – ब्राजील

16. जिस द्वीप के द्वारा अगुलहास धारा दो भागों में विभक्त होती है, वह है
(A) जावा
(B) आइसलैंड
(C) क्यूबा
(D) मैडागास्कर
उत्तर:
(D) मैडागास्कर

17. गल्फ स्ट्रीम की धारा उत्पन्न होती है-
(A) बिस्के की खाड़ी में
(B) मैक्सिको की खाड़ी में
(C) हडसन की खाड़ी में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) मैक्सिको की खाड़ी में

18. निम्नलिखित में से कौन समुद्री धाराओं के प्रवाहित होने का वास्तविक कारण नहीं है?
(A) पानी की लवणता में परिवर्तन
(B) पानी के ताप में परिवर्तन
(C) पानी की गहराई में परिवर्तन
(D) पानी के घनत्व में परिवर्तन
उत्तर:
(C) पानी की गहराई में परिवर्तन

19. सुनामी की उत्पत्ति किस कारणवश होती है?
(A) भूकम्प
(B) ज्वालामुखी
(C) समुद्र गर्भ में भूस्खलन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

20. समुद्री धाराओं के बहने का कारण है
(A) वायुदाब और पवनें
(B) पृथ्वी का परिभ्रमण और गुरुत्वाकर्षण
(C) भूमध्यरेखीय व ध्रुवीय प्रदेशों के असमान तापमान के कारण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
तरंग की गति किस सूत्र से ज्ञात की जाती है?
उत्तर:
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन 1

प्रश्न 2.
सुनामी की उत्पत्ति किन कारणों से होती है?
उत्तर:
भूकम्प, ज्वालामुखी, समुद्र के गर्भ में भूस्खलन आदि से।

प्रश्न 3.
समुद्री धाराएँ कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर:
समुद्री धाराएँ दो प्रकार की होती हैं-

  1. गर्म धारा तथा
  2. ठण्डी धारा।

प्रश्न 4.
किस महासागर में पवनों की दिशा बदलते ही धाराओं की दिशा बदल जाती है?
उत्तर:
हिन्द महासागर में।

प्रश्न 5.
‘सी’ क्या होती है?
उत्तर:
अव्यवस्थित व अनियमित समुद्री तरंगों को ‘सी’ कहा जाता है।

प्रश्न 6.
जापान व ताइवान के पूर्व में कौन-सी गर्म धारा बहती है?
उत्तर:
क्यूरोशियो धारा।

प्रश्न 7.
अन्ध महासागर की सबसे महत्त्वपूर्ण गर्म धारा कौन-सी है?
उत्तर:
गल्फ स्ट्रीम धारा।

प्रश्न 8.
न्यू-फाऊंडलैण्ड के निकट कोहरा क्यों उत्पन्न हो जाता है?
उत्तर:
गल्फ स्ट्रीम गर्म धारा तथा लैब्रेडोर ठण्डी धारा के मिलने के कारण।

प्रश्न 9.
कालाहारी मरुस्थल के पश्चिम में कौन-सी धारा बहती है?
उत्तर:
बेंगुएला धारा।

प्रश्न 10.
दो ज्वारों के बीच में कितना समय रहता है?
उत्तर:
12 घण्टे, 26 मिनट।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 11.
उष्ण धाराएँ कहाँ-से-कहाँ चलती हैं?
उत्तर:
उष्ण क्षेत्रों से ठण्डे क्षेत्रों की ओर।

प्रश्न 12.
ठण्डी धाराएँ कहाँ-से-कहाँ चलती हैं?
उत्तर:
ठण्डे क्षेत्रों से उष्ण क्षेत्रों की ओर।

प्रश्न 13.
सागर की प्रमुख समुद्री धाराएँ किन पवनों का अनुगमन करती हैं?
उत्तर:
सनातनी अथवा प्रचलित पवनों का।

आल-लघलरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
महासागरीय जल के परिसंचरण के मुख्य रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. तरंगें
  2. धाराएँ और
  3. ज्वार-भाटा।

प्रश्न 2.
पवन द्वारा उत्पन्न तरंगें कौन-कौन सी होती हैं?
उत्तर:

  1. सी
  2. स्वेल तथा
  3. सर्फ।

प्रश्न 3.
बृहत् ज्वार कब आता है?
उत्तर:
अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन जब पृथ्वी, चन्द्रमा तथा सूर्य एक सीध में आ जाते हैं।

प्रश्न 4.
लघु ज्वार कब आता है?
उत्तर:
शुक्ल व कृष्णपक्ष की अष्टमी के दिन जब सूर्य तथा चन्द्रमा पृथ्वी के केन्द्र पर समकोण बनाते हैं।

प्रश्न 5.
जल तरंग के दो प्रमुख घटक अथवा भाग कौन-से होते हैं?
उत्तर:

  1. तरंग शीर्ष
  2. तरंग गर्त या द्रोणी।

प्रश्न 6.
‘सी’ क्या होती है?
उत्तर:
अव्यवस्थित व अनियमित समुद्री तरंगों को ‘सी’ कहा जाता है।

प्रश्न 7.
सर्फ किसे कहते हैं?
उत्तर:
तटीय भागों में टूटती हुई तरंगों को सर्फ कहते हैं।

प्रश्न 8.
तरंगों द्वारा कौन-कौन सी स्थलाकृतियों की रचना होती है?
उत्तर:
भृगु, वेदी, खाड़ियाँ, कन्दराएँ, पुलिन तथा लैगून इत्यादि।

प्रश्न 9.
गल्फ स्ट्रीम धारा तथा क्यूरोशियो धारा किन पवनों के प्रभाव से किस दिशा में बहती हैं?
उत्तर:
गल्फ स्ट्रीम धारा तथा क्यूरोशियो धारा पछुआ पवनों के प्रभाव से पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं।

प्रश्न 10.
न्यू-फाऊंडलैण्ड के निकट कोहरा क्यों उत्पन्न हो जाता है?
उत्तर:
गल्फ स्ट्रीम गर्म धारा तथा लैब्रेडोर ठण्डी धारा के मिलने के कारण।

प्रश्न 11.
हम्बोल्ट धारा कहाँ बहती है?
उत्तर:
दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर दक्षिण से उत्तर की ओर। इसे पीरुवियन ठण्डी धारा भी कहते हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 12.
प्रशान्त महासागर की दो ठण्डी धाराएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. पूरू की धारा
  2. कैलीफोर्निया की धारा।

प्रश्न 13.
ज्वार-भाटा की उत्पत्ति का कारण क्या है?
उत्तर:
चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी की पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति।

प्रश्न 14.
एक पिण्ड से दूसरे पिण्ड पर गुरुत्व बल की तीव्रता किन दो बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर:

  1. उस पिण्ड का भार तथा
  2. दोनों पिण्डों के बीच की दूरी।

प्रश्न 15.
तरंगों के आकार और बल को कौन-से कारक नियन्त्रित करते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
समुद्री तरंगें जल की सतह पर पवनों के दबाव या घर्षण से उत्पन्न होती हैं। तरंगों का आकार और बल तीन कारकों पर निर्भर करता है

  1. पवन की गति
  2. पवन के बहने की अवधि और
  3. पवन के निर्विघ्न बहने की दूरी अर्थात् समुद्र का विस्तार।

प्रश्न 16.
सागरीय तरंगों के भौगोलिक महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अनाच्छादन के अन्य साधनों की भाँति समुद्री तरंगें भी अपरदन और निक्षेपण कार्यों द्वारा नाना प्रकार की स्थलाकृतियाँ बनाती हैं। तरंगों द्वारा निर्मित मुख्य स्थलाकृतियाँ भृगु (Cliff), वेदी (Platform), खाड़ियाँ (Bays), कन्दराएँ (Caves), पुलिन (Beaches) तथा लैगून (Lagoons) हैं।

प्रश्न 17.
महासागरीय धाराएँ क्या होती हैं?
उत्तर:
महासागरों के एक भाग से दूसरे भाग की ओर निश्चित दिशा में बहुत दूरी तक जल के निरन्तर प्रवाह को महासागरीय धारा कहते हैं। धारा के दोनों किनारों पर तथा नीचे समुद्री जल स्थिर रहता है। वास्तव में समुद्री धाराएँ स्थल पर बहने वाली नदियों जैसी होती हैं लेकिन ये स्थलीय नदियों की अपेक्षा स्थिर और विशाल होती हैं।

प्रश्न 18.
किन-किन कारकों के सम्मिलित प्रयास से महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति होती है?
उत्तर:
महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति में निम्नलिखित कारक सम्मिलित होते हैं-

  1. प्रचलित पवनें
  2. तापमान में भिन्नता
  3. लवणता में अन्तर
  4. वाष्पीकरण
  5. भू-घूर्णन
  6. तटों की आकृति।

प्रश्न 19.
ज्वार-भाटा दिन में दो बार क्यों आता है?
उत्तर:
एक समय में पृथ्वी के दो स्थानों पर ज्वार व दो स्थानों पर भाटा उत्पन्न होते हैं। पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग 24 घण्टों में घूमकर एक चक्कर (Rotation) पूरा करती है। इससे पृथ्वी के प्रत्येक स्थान को दिन में दो बार ज्वार वाली स्थिति से व दो बार भाटा वाली स्थिति से गुज़रना पड़ता है। अतः पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ही पृथ्वी के प्रत्येक स्थान पर एक दिन में दो बार ज्वार व दो बार भाटा अवश्य आते हैं।

प्रश्न 20.
उदावन (Swash) क्या होता है?
उत्तर:
समुद्री तरंग के टूटने पर तट की ढाल के विरुद्ध ऊपर की ओर चढ़ता हुआ विक्षुब्ध (Turbulent) जल जो बड़े आकार की तटीय अपरदन से उत्पन्न सामग्री को बहा ले जा सकता है उदावन कहलाता हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
तरंगें क्या हैं? तरंगों की विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तरंगें तरंगे महासागरीय जल की दोलायमान गति है जिसमें जल स्थिर रहता है और अपने स्थान पर ही ऊपर-नीचे और आगे-पीछे होता रहता है। तरंग एक ऊर्जा है।

तरंग की विशेषताएँ-

  1. तरंग शिखर एवं गर्त तरंग के उच्चतम और निम्नतम बिन्दुओं को क्रमशः शिखर एवं गर्त कहा जाता है।
  2. तरंग की ऊँचाई-यह एक तरंग के गर्त के अधःस्थल से शिखर के ऊपरी भाग तक की उर्ध्वाधर दूरी है।
  3. तरंग आयाम-यह तरंग की ऊँचाई का आधा होता है।
  4. तरंग काल-तरंग काल एक निश्चित बिन्दु से गुजरने वाले दो लगातार तरंग शिखरों या गर्मों के बीच समयान्तराल है।
  5. तरंगदैर्ध्य यह दो लगातार शिखरों या गर्तों के बीच की दूरी है।
  6. तरंग गति जल के माध्यम से तरंग के गति करने की दर को तरंग गति कहते हैं।
  7. तरंग आवृत्ति-यह एक सैकिण्ड के समयान्तराल में दिए गए बिन्दु से गुजरने वाली तरंगों की संख्या है।

प्रश्न 2.
समुद्री तरंगें क्या हैं? समुद्री तरंग के प्रमुख घटकों (Components) की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समुद्री तरंगें महासागरों की सतह पर पवनों के घर्षण के प्रभाव से जल अपने ही स्थान पर एकान्तर क्रम से ऊपर-नीचे और आगे-पीछे होने लगता है, इसे समुद्री तरंगें कहते हैं।

समुद्री तरंग के प्रमुख घटक-पवन के प्रभाव से जब तरंग या लहर का जन्म होता है तो इसका कुछ भाग ऊपर उठा हुआ और कुछ भाग नीचे धंसा हुआ होता है। तरंग का ऊपर उठा हुआ भाग तरंग-श्रृंग (Crest of the wave) कहलाता है, जबकि दूसरा नीचे धंसा हुआ भाग तरंग-गर्त या द्रोणी (Trough of the wave) कहलाता है।

तरंग के एक शृंग से दूसरे शृंग तक या एक द्रोणी से दूसरी द्रोणी तक की दूरी को तरंग की लम्बाई (Wavelength) कहा जाता है। द्रोणी से शृंग तक की ऊँचाई को तरंग की ऊँचाई कहा जाता है। किसी भी निश्चित स्थान पर दो लगातार तरंगों के गुज़रने की अवधि को तरंग का आवर्त काल (Wave Period) कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 3.
लहरों (तरंगों) तथा धाराओं में क्या अन्तर है?
उत्तर:
लहरों (तरंगों) तथा धाराओं में निम्नलिखित अन्तर हैं-

लहरेंधाराएँ
1. इनका आकार जल की गहराई पर निर्भर करता है।1. ये जल की विशाल राशियाँ होती हैं।
2. ये अस्थायी होती हैं तथा बनती-बिगड़ती रहती हैं।2. ये स्थायी होती हैं तथा निरन्तर दिशा में चलती हैं।
3. लहरें महासागरीय जल की दोलायमान गति हैं जिसमें जल ऊपर-नीचे का स्थान छोड़कर आगे नहीं बढ़ता।3. धाराओं का जल नदी के समान है जिसमें जल अपना स्थान छोड़कर आगे बढ़ता है।
4. ये जल की ऊपरी सतह क्षेत्र तक ही सीमित हों।4. इनका प्रभाव काफी गहराई तक होता है।
5. लहरें पवनों के वेग पर निर्भर करती हैं।5. धाराएँ स्थायी पवनों के प्रभाव से निश्चित दिशा में चलती हैं।

प्रश्न 4.
ज्वार-भाटा के महत्त्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ज्वार-भाटा का महत्त्व निम्नलिखित प्रकार से है-
1. जब ज्वार-भाटा आता है तो उससे जल-विद्युत उत्पन्न की जा सकती है। कनाडा, फ्रांस, रूस तथा चीन में ज्वार का इस्तेमाल विद्युत शक्ति उत्पन्न करने में किया जा रहा है। एक 3 मैगावाट का विद्युत शक्ति संयंत्र
पश्चिम बंगाल में सुन्दरवन के दुर्गादुवानी में लगाया जा रहा है।

2. ज्वार-भाटा के समय समुद्रों से बहुत-सी बहुमूल्य वस्तुएँ; जैसे सीपियाँ, कोड़ियाँ आदि बाहर आ जाते हैं।

3. ज्वार-भाटा के समय लहरें बन्दरगाहों के तटीय भागों का कूड़ा-कर्कट बहाकर समुद्र में ले जाती हैं, जिससे नगर के समीपवर्ती भाग स्वच्छ हो जाते हैं।

4. ज्वार-भाटा के द्वारा नदियों के मुहाने का कीचड़ तथा तलछट साफ हो जाता है या बहाकर ले जाया जाता है, जिससे जहाज नदियों के मुहाने तक आसानी से आ और जा सकते हैं तथा व्यापार में सुविधा रहती है। माल को तट तक पहुँचाया जा सकता है तथा निर्यातक माल को आसानी से जहाजों में बाहर भेज सकते हैं।

5. समुद्रों के जल में ज्वार-भाटा की गति के कारण सागरीय जल, शुद्ध तथा स्वच्छ रहता है।

6. जब समुद्रों में ज्वार-भाटा आता है तो मछली पकड़ने वाले मछुआरे खुले सागर में मछली पकड़ने जाते हैं और ज्वार के समय आसानी से तट तक लौट आते हैं।

7. ज्वार-भाटा के कारण बन्दरगाह जम नहीं पाते तथा व्यापार के लिए खुले रहते हैं।

प्रश्न 5.
वृहत् ज्वार तथा निम्न ज्वार में क्या अन्तर है?
उत्तर:
वृहत् ज्वार तथा निम्न ज्वार में निम्नलिखित अन्तर हैं-

वृहत्त ज्वारनिम्न ज्यार
1. पूर्णमासी (Full Moon) तथा अमावस्या (New Moon) के दिन सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी के एक सीध में होने के कारण संयुक्त गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण समुद्र का जल अधिक ऊँचाई तक पहुँच जाता है, जिसे उच्च ज्वार या वृहत् ज्यार कहते हैं।1. कृष्ग तथा शुक्ल पक्ष की सप्तमी अथवा अष्टमी के दिन सूर्य तथा चन्द्रमा पृथ्वी के साथ समकोण पर स्थित होने के कारण महासागरों में ज्वार की ऊँचाई कम रह जाती है, जिसे निम्न ज्वार कहते हैं।
2. उच्च ज्वार प्रायः साधारण ज्यार की तुलना में 20% अधिक ऊँचा होता है।2. निम्न ज्वार प्रायः साधारण ज्वार की तुलना में 20% कम ऊँचा होता है।

प्रश्न 6.
महासागरीय धाराओं के जलवायु पर प्रभाव का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय धाराओं का मुख्य रूप से आसपास के क्षेत्रों की जलवायु पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है, जो निम्नलिखित है-
जलवायु पर प्रभाव – किसी भी क्षेत्र में बहने वाली धाराओं का उसके समीपवर्ती भागों पर अत्यधिक प्रभाव देखने को मिलता है। यदि गर्म जल धारा प्रवाहित होती है तो तापक्रम को बढ़ा देती है, जबकि ठण्डी धारा जिस क्षेत्र से गुजरती है वहाँ का तापमान गिर जाता है। उदाहरणार्थ, ब्रिटिश द्वीप समूह का अक्षांश न्यू-फाउण्डलैण्ड के अक्षांश से अधिक है, लेकिन गल्फ स्ट्रीम की गर्म धारा के प्रभाव से ब्रिटिश द्वीप समूहों की जलवायु सुहावनी रहती है और यह कड़ाके की ठण्ड से बचा रहता है, जबकि न्यू-फाउण्डलैण्ड के आसपास लैब्रेडोर की ठण्डी धारा के प्रभाव के कारण तापक्रम काफी गिर जाता है और यहाँ लगभग 9 माह तक बर्फ जमी रहती है।

वर्षा की मात्रा भी जल धाराओं से प्रभावित होती है। गर्म जल धाराओं के ऊपर बहने वाली हवाएँ गर्म होती है तथा अधिक जलवाष्प ग्रहण करती हैं, जबकि इसके विपरीत ठण्डी जल धाराओं के ऊपर की वायु शुष्क तथा शीतल होने से वर्षा नहीं करती। उदाहरणार्थ, पश्चिमी यूरोप के तटवर्ती भागों में गल्फ स्ट्रीम के प्रभाव से अधिक वर्षा होती है, जबकि पश्चिमी आस्ट्रेलिया के तटों के साथ ठण्डी धाराओं के प्रभाव के कारण वर्षा भी कम होती है।

प्रश्न 7.
पवनों द्वारा उत्पन्न तीन प्रकार की समुद्री तरंगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सागरीय जल की सतह पर पवनों की रगड़ द्वारा तरंगों का निर्माण होता है। पवनें तरंगों की गति में भी संचार करती हैं। तरंगों का आकार भी पवनों की गति तथा अवधि पर निर्भर करता है। पवनों द्वारा निर्मित तरंगें तीन प्रकार की हैं-
1. सी (Sea) लहरों के अनियमित तथा अव्यस्थित रूप को ‘सी’ कहते हैं। इनका निर्माण पवनों के महासागरों पर अनियमित रूप से चलने के कारण होता है।

2. स्वेल या महातरंग (Swell) जब समुद्रों में पवन के वेग के कारण तरंगें बनती हैं और तरंगें पवनों के प्रभाव-क्षेत्र से काफी दूर चली जाती हैं तो तरंगें समान ऊँचाई तथा अवधि से आगे बढ़ती हैं, जिसे स्वेल कहते हैं।

3. सर्फ (Surf)-जब तरंगें महासागरीय भागों से समुद्र के तटवर्ती भागों की ओर आती हैं और तटीय भाग पर खड़ी चट्टानों से टकराती हैं तो ऊँचाई की ओर बढ़ती हैं और फिर टकराकर उनका श्रृंग आगे की ओर झुककर और फिर टूटकर सागर में गिर जाता है तो उसे सर्फ या फेनिल तरंग कहते हैं।

प्रश्न 8.
पवनों के अतिरिक्त अन्य कारकों द्वारा उत्पन्न समुद्री तरंगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पवनों के अतिरिक्त अन्य कारकों द्वारा उत्पन्न समुद्री तरंगों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है-
1. प्रलयकारी तरंगें (Catastrophic Waves)-इन तरंगों की उत्पत्ति ज्वालामुखी, भूकम्प या महासागरों में हुए भूस्खलन के कारण होती है, इन्हें सुनामी (Tsunami) भी कहते हैं। सुनामी जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “agreat harbour wave”।

2. तूफानी तरंगें (Stormy Waves) इनकी ऊँचाई भी अधिक होती है और ये तटीय क्षेत्रों पर भारी विनाशलीला करती हैं।

3. अन्तःतरंगें (Internal Waves) अन्तःतरंगें दो भिन्न घनत्व वाली समुद्री परतों के सीमा तल पर उत्पन्न होती हैं।

प्रश्न 9.
तापमान के आधार पर महासागरीय धाराओं के दो मोटे वर्ग कौन-से हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तापमान के आधार पर महासागरीय धाराओं को दो मोटे वर्गों में रखा जाता है-
1. गर्म धाराएँ (Warm Currents) ये धाराएँ उष्ण क्षेत्रों से ठण्डे क्षेत्रों की ओर चलती हैं। ऐसी धाराएँ जो भूमध्य रेखा के निकट से ध्रुवों की ओर चलती हैं, गर्म धाराएँ कहलाती हैं।

2. ठण्डी धाराएँ (Cold Currents) ये धाराएँ ठण्डे क्षेत्रों से उष्ण क्षेत्रों की ओर चलती हैं। ऐसी धाराएँ जो उच्च अक्षांशों व ध्रुवों के निकट से भूमध्य रेखा की ओर चलती हैं, ठण्डी धाराएँ कहलाती हैं।

प्रश्न 10.
महासागरीय जलधाराओं की सामान्य विशेषताएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
महासागरीय जलधाराओं की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • जलधाराएँ हमेशा एक निश्चित दिशा में बहती हैं।
  • उच्च अक्षांशों में गर्म जल की धाराएँ महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर तथा ठण्डे जल की धाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर बहती हैं।
  • निम्न अक्षांशों में गर्म जल की धाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर तथा ठण्डे जल की धाराएँ महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर बहती हैं।
  • निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर बहने वाली धाराएँ गर्म जल की धाराएँ कहलाती हैं।
  • उच्च अक्षांशों से निम्न अक्षांशों की ओर बहने वाली धाराएँ ठण्डे जल की धाराएँ कहलाती हैं।

प्रश्न 11.
यदि महासागरीय धाराएँ न होतीं तो विश्व का क्या हुआ होता?
उत्तर:
यदि महासागरीय धाराएँ न होतीं तो विश्व की निम्नलिखित स्थिति होती-

  • तटीय प्रदेशों की वर्षा, तापमान व आर्द्रता पर किसी तरह का प्रभाव न पड़ता।
  • ऊँचे अक्षांशों में बन्दरगाहें जमीं रहतीं और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में बाधा पहुँचती।
  • ठण्डी धाराओं के अभाव में नाशवान वस्तुओं (Perishable Goods) का समुद्री परिवहन सम्भव नहीं हो पाता।
  • विश्व-प्रसिद्ध मत्स्य ग्रहण क्षेत्र विकसित न हो पाते।
  • धाराओं के अभाव में जलयान उनका अनुसरण न कर पाते। परिणामस्वरूप समय व ईंधन की बचत न हो पाती।
  • यूरोप की जलवायु सुहावनी न होती तथा शीतोष्ण कटिबन्ध में वर्षा कम होती।
  • महाद्वीपों के पश्चिमी किनारे मरुस्थलीय न होते।

प्रश्न 12.
समुद्री धाराओं के नकारात्मक प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए। अथवा धाराओं से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समुद्री धाराओं के नकारात्मक प्रभाव या हानियाँ निम्नलिखित हैं-
1. धाराओं के कुछ नकारात्मक प्रभाव भी होते हैं। भिन्न तापमान वाली धाराओं के मिलन-स्थल पर घना कुहासा उत्पन्न हो जाता है जो जलयानों के आवागमन को बाधित करता है।

2. ध्रवीय क्षेत्रों से आने वाली धाराएँ अपने साथ बड़ी-बड़ी हिमशैलें (Icebergs) बहा लाती हैं जिनके टकराने से बड़े-बड़े जलयान चकनाचूर हो जाते हैं। सन् 1912 में टाईटैनिक (Titanic) नामक विश्व प्रसिद्ध व उस समय का आधुनिक और सबसे बड़ा जहाज, न्यूफाऊंडलैण्ड के निकट एक हिमशैल से टकराकर 1517 सवारियों के साथ उत्तरी अन्ध महासागर की तली में जा टिका।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 13.
ज्वार-भाटा कैसे उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
ज्वार-भाटा सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी के पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न होते हैं। सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा से आकार में कई गुणा बड़ा है, परन्तु सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण का पृथ्वी पर अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि चन्द्रमा पृथ्वी के निकट है। परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी का जो धरातलीय भाग चन्द्रमा के सामने आ जाता है, उसकी दूरी सबसे कम तथा उसके विपरीत वाला धरातलीय भाग सबसे दूर होता है। सबसे नजदीक वाले भाग का ज्वारीय उभार ऊपर होगा, इसे उच्च ज्वार कहते हैं। जिस स्थान पर जल-राशि कम रह जाती है, वहाँ जल अपने तल से नीचे चला जाता है, उसे निम्न ज्वार कहते हैं। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण प्रत्येक स्थान पर 24 घण्टे में दो बार ज्वार-भाटा आता है।

प्रश्न 14.
ज्वार-भाटा कितने प्रकार का होता है? व्याख्या कीजिए।
अथवा
बृहत् ज्वार-भाटा और लघु ज्वार-भाटा में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ज्वार की ऊँचाई पृथ्वी के सन्दर्भ में सूर्य और चन्द्रमा की सापेक्षिक स्थितियों के बदलने से घटती-बढ़ती रहती है। इस आधार पर ज्वार-भाटा दो प्रकार के होते हैं-
1. बहत ज्वार-भाटा (Spring Tide)-पूर्णमासी (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) को सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी एक सीध में आ जाते हैं जिससे पृथ्वी पर चन्द्रमा तथा सूर्य के संयुक्त गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पड़ता है। परिणामस्वरूप इन दोनों दिनों में साधारण दिनों की अपेक्षा जल का उतार-चढ़ाव अधिकतम होता है। इसे उच्च या बृहत् ज्वार-भाटा कहते हैं।

2. लघु ज्वार-भाटा (Neap Tide) शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की सप्तमी या अष्टमी के दिन सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी के केन्द्र ओं में आ जाते हैं। ऐसी स्थितियों में सर्य और चन्द्रमा के गरुत्व बल पथ्वी पर एक-दूसरे के विरुद्ध काम करते हैं। परिणामस्वरूप इन दोनों दिनों में महासागरों में जल का उतार-चढ़ाव साधारण दिनों के उतार-चढ़ाव की अपेक्षा कम होता है। इसे लघु ज्वार-भाटा कहते हैं।

प्रश्न 15.
ज्वारीय धारा (Tidal Current) क्या होती है?
उत्तर:
जब कोई खाड़ी खुले सागरों और महासागरों के साथ एक संकीर्ण मार्ग के साथ जुड़ी हुई होती है तब ज्वार के समय महासागर का जल-तल खाड़ी के जल-तल से ऊँचा हो जाता है। परिणामस्वरूप खाड़ी के संकीर्ण प्रवेश मार्ग के द्वारा एक द्रव-प्रेरित धारा (Hydraulic Current) खाड़ी में प्रवेश करती है। जब भाटा के समय समुद्र तल नीचा हो जाता है तो खाड़ी का जल-तल महासागर के जल-तल से ऊँचा बना रहता है। ऐसी दशा में एक तीव्र द्रव-प्रेरित धारा खाड़ी से समुद्र की ओर बहने लग जाती है। खाड़ी के अन्दर तथा बाहर की ओर जल के इस प्रवाह को ज्वारीय धारा कहते हैं।

प्रश्न 16.
ज्वारीय भित्ति (Tidal Bore) किसे कहते हैं? इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जब कोई ज्वारीय धारा किसी नदी के छिछले और सँकरे नदमुख (Estuary) में प्रवेश करती है तो वह नदी के विपरीत दिशा में प्रवाह से टकराती है। नदी तल के घर्षण तथा दो विपरीत प्रवाहों के टकराने से जल एक तीव्र चोंच वाली ऊँची दीवार के रूप में नदी में प्रवेश करता है। इसे ज्वारीय भित्ति कहते हैं। भारत में हुगली नदी के मुहाने पर ज्वारीय भित्तियों की उत्पत्ति एक आम बात है। ज्वारीय भित्ति प्रायः दीर्घ ज्वार के समय आती है। इन भित्तियों की ऊँचाई 4 से 50 फुट तक आंकी गई है। ज्वारीय भित्तियों से छमेरी नावों को हानि उठानी पड़ती है।

प्रश्न 17.
प्रवाह (Drift), धारा (Current) तथा विशाल धारा (Stream) में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रवाह-जब पवन से प्रेरित होकर सागर की सतह का जल आगे की ओर बढ़ता है तो उसे प्रवाह (Drift) कहते हैं। इसकी गति और सीमा तय नहीं होती। प्रवाह की गति मन्द होती है और इसमें केवल ऊपरी सतह का जल ही गतिशील होता है; जैसे दक्षिणी अटलांटिक प्रवाह।

धारा-महासागरों के एक भाग से दूसरे भाग की ओर निश्चित दिशा में बहुत दूरी तक जल के निरन्तर प्रवाह को धारा (Current) कहते हैं। यह प्रवाह से तेज़ गति की होती है; जैसे लैब्रेडोर धारा।

विशाल धारा-जब महासागर का अत्यधिक जल स्थलीय नदियों की भाँति एक निश्चित दिशा में गतिशील होता है तो उसे विशाल धारा (Stream) कहते हैं। इसकी गति प्रवाह और धारा दोनों से अधिक होती है; जैसे गल्फ स्ट्रीम।

प्रश्न 18.
ज्वार-भाटा से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ज्वार-भाटे से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं-

  1. ज्वार-भाटा या ज्वारीय भित्ति के कारण कई बार छोटे जहाज़ों को हानि पहुँचती है और छोटी नावें तो डूब ही जाती हैं।
  2. ज्वार से बन्दरगाहों के समीप रेत जमना (Siltation) शुरू हो जाता है जिससे जहाजों की आवाजाई में रुकावट पैदा होती है।
  3. ज्वार-भाटा डेल्टा के निर्माण में बाधा उत्पन्न करता है।
  4. ज्वार के समय मछली पकड़ने का काम बाधित होता है।
  5. ज्वार का पानी तटीय प्रदेशों में दलदल जैसी हालत पैदा कर देता है।

प्रश्न 19.
उत्तरी हिन्द महासागर में शीत एवं ग्रीष्म ऋतुओं में समुद्री जलधाराएँ अपनी दिशा क्यों बदलती हैं?
उत्तर:
उत्तरी हिन्द महासागर में शीत एवं ग्रीष्म ऋतुओं में समुद्री जलधाराएँ मानसून पवनों के कारण अपनी दिशा में परिवर्तन करती हैं। शीत ऋतु में उत्तर:पूर्व मानसून पवनों के प्रभाव के कारण उत्तरी हिन्द महासागर की मानसूनी धारा उत्तर पूर्व से भूमध्य रेखा की ओर बहने लगती है जिसे उत्तर-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं। ग्रीष्म ऋतु में मानसून की दिशा दक्षिण-पश्चिम हो जाती है जिससे भूमध्य रेखीय धारा का कुछ जल उत्तरी हिन्द महासागर में उत्तर:पूर्वी अफ्रीका तट के सहारे सोमाली की धारा के रूप में बहने लगता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जल धाराओं की उत्पत्ति के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जल धाराओं की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारण हैं-

  • पृथ्वी की परिभ्रमण अथवा घूर्णन गति से सम्बन्धित कारक
  • अन्तः सागरीय या महासागरों से सम्बन्धित कारक
  • बाह्य सागरों से सम्बन्धित कारक

1. पृथ्वी की परिभ्रमण अथवा घूर्णन गति से सम्बन्धित कारक-पृथ्वी के घूर्णन या गुरुत्वाकर्षण बल की धाराओं की उत्पत्ति पर प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही है। सम्पूर्ण पृथ्वी जल तथा स्थल दो मण्डलों में विभक्त होने के कारण परिभ्रमण में जलीय भाग स्थल का साथ नहीं दे पाते। अतः जल तरल होने के कारण विपरीत दिशा में पूर्व से पश्चिम की ओर गति करना आरम्भ कर देता है और उत्तरी गोलार्द्ध में धाराएँ भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर तथा ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर चलने लगती हैं, अर्थात विक्षेपक बल के कारण धाराएँ दाईं ओर मुड़ जाती हैं। उदाहरणार्थ गल्फ स्ट्रीम और क्यूरोसियो की गरम जल धाराएँ भूमध्य रेखा के उत्तर में दाईं ओर (उत्तर:पूर्व) होती हैं।

2. महासागरों से सम्बन्धित कारक-अन्तः सागरीय कारकों से तात्पर्य है कि सागर से सम्बन्धित कारकों का धाराओं की उत्पत्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है। इनमें तापक्रम की विभिन्नता, सागरीय लवणता तथा घनत्व की विभिन्नता सम्मिलित है।

(क) तापक्रम की विभिन्नता-सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अलग-अलग अक्षांशों पर भिन्न-भिन्न कोण बनाती हैं। भूमध्य रेखा तथा कर्क और मकर रेखाओं के मध्य सूर्य की किरणें वर्ष-भर लगभग लम्बवत् चमकती हैं जिससे तापक्रम की मात्रा अधिक होती है। भूमध्य रेखा के निकटवर्ती समुद्र अधिक ताप ग्रहण करते हैं, जिससे समुद्री जल हल्का होकर ध्रुवों की ओर अधिक घनत्व वाले स्थानों की ओर अग्रसर हो जाता है। उसकी आपूर्ति के लिए ध्रुवीय क्षेत्रों से अधिक घनत्व वाला जल आ जाता है। इस प्रकार जल राशि का प्रवाह धाराओं के रूप में होने लगता है।

(ख) महासागरीय लवणता सभी समुद्रों में लवणता पाई जाती है, लेकिन लवणता की मात्रा सर्वत्र समान नहीं है। जो सागरीय भाग अधिक लवणता वाले होते हैं, उनके पानी का घनत्व भी कम होता है इसलिए अधिक खारा पानी अधिक घनत्व के कारण नीचे तथा कम खारा पानी सागर की ओर प्रवाहित होकर धाराओं को जन्म देता है। उदाहरणार्थ उत्तरी अटलांटिक महासागर का जल भूम य रेखीय समुद्रों के जल से कम खारा होता है जिसके फलस्वरूप उत्तरी अटलांटिक का जल जिब्राल्टर से होकर अधिक लवणता वाले भूमध्य सागर की ओर प्रवाहित होता है और भूमध्य सागर का जल खारा होने से नीचे बैठता है और अन्तःप्रवाह द्वारा अटलांटिक महासागर में प्रवेश करता है।

3. बाह्य सागरों से सम्बन्धित कारक महासागरों में वायुमण्डलीय बाह्य कारकों का धाराओं की उत्पत्ति पर प्रभाव पड़ता है। वायुमण्डलीय दाब, पवनें, वर्षा, वाष्पीकरण आदि का धाराओं के विकास पर प्रभाव दिखाई देता है।

(क) प्रचलित पवनें हवाओं की दिशा तथा उनके चलने से महासागरीय जल की सतह पर घर्षण (friction) से पवनें अपनी दिशा में जल का प्रवाह करती हैं अर्थात् पवनें जिस दिशा में चलती हैं समुद्री जल को उसी दिशा में धकेलती हैं। स्थायी पवनें (प्रचलित पवनें) सदैव एक ही दिशा में चलती हैं; जैसे कर्क और मकर रेखाओं के बीच व्यापारिक पवनों की दिशा पूर्व से पश्चिम होती है। इसलिए धाराएँ भी पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं और शीतोष्ण कटिबन्ध में इनकी दिशा पश्चिम से पूर्व (पछुवा पवनों के अनुरूप) भी होती हैं।

(ख) वाष्पीकरण और वर्षा (Evaporation and Rainfall) वाष्पीकरण और वर्षा का धाराओं पर काफी प्रभाव पड़ता है। जिन समुद्री भागों में वाष्पीकरण अधिक होता है वहाँ वर्षा भी अधिक होती है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में वर्षा अधिक तथा वाष्पीकरण कम होता है। ऐसे महासागरों में लवणता बहुत कम पाई जाती है। ऐसे क्षेत्रों में जल का तल ऊँचा होता है और जहाँ वाष्पीकरण अधिक तथा वर्षा कम होती है, वहाँ जल का घनत्व अधिक तथा पानी का तल निम्न होता है। जल का तल ऊँचा-नीचा होने के फलस्वरूप ऊँचे तल से धाराओं का प्रवाह निम्न तल की ओर होता है। धाराएँ भूमध्य रेखीय उच्च तल से मध्य अक्षांशीय निम्न तल की ओर चलती हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 2.
जल धाराओं का जलवायु तथा व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय धाराओं का मुख्य रूप से आसपास के क्षेत्रों की जलवायु तथा व्यापार पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। जिसका वर्णन निम्नलिखित है-
1. जलवायु पर प्रभाव (Effect on Climate) किसी भी क्षेत्र में बहने वाली धाराओं का उसके समीपवर्ती भागों पर अत्यधिक प्रभाव देखने को मिलता है। यदि गर्म जल धारा प्रवाहित होती है तो तापक्रम को बढ़ा देती है, जबकि ठण्डी धारा जिस क्षेत्र से गुजरती है वहाँ का तापमान गिर जाता है। उदाहरणार्थ, ब्रिटिश द्वीप समूह का अक्षांश न्यू-फाउण्डलैण्ड के अक्षांश से अधिक है, लेकिन गल्फ स्ट्रीम की गर्म धारा के प्रभाव से ब्रिटिश द्वीप समूहों की जलवायु सुहावनी रहती है और यह कड़ाके की ठण्ड से बचा रहता है, जबकि न्यू-फाउण्डलैण्ड के आसपास लैब्रेडोर की ठण्डी धारा के प्रभाव के कारण तापक्रम काफी गिर जाता है और यहाँ लगभग 9 माह तक बर्फ जमी रहती है।

वर्षा की मात्रा भी जल धाराओं से प्रभावित होती है। गर्म जल धाराओं के ऊपर बहने वाली हवाएँ गर्म होती हैं तथा अधिक जलवाष्प ग्रहण करती हैं, जबकि इसके विपरीत ठण्डी जल धाराओं के ऊपर की वायु शुष्क तथा शीतल होने से वर्षा नहीं करती। उदाहरणार्थ, पश्चिम यूरोप के तटवर्ती भागों में गल्फ स्ट्रीम के प्रभाव से अधिक वर्षा होती है, जबकि पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तटों के साथ ठण्डी धाराओं के प्रभाव के कारण वर्षा भी कम होती है।

2. व्यापार पर प्रभाव (Effect on Trade) गर्म धाराओं के प्रभाव-क्षेत्र में आने वाले बन्दरगाह शीत ऋतु में भी जमने नहीं पाते तथा साल भर व्यापार के लिए खुले रहते हैं। जैसे पश्चिमी यूरोप के बन्दरगाहों पर गल्फ स्ट्रीम का प्रभाव रहता है, जबकि लैब्रेडोर की ठण्डी धारा के प्रभाव के कारण बन्दरगाह जम जाते हैं तथा व्यापार नहीं हो पाता। – ठण्डी तथा गर्म धाराओं के मिलने से कोहरा उत्पन्न हो जाता है, जिससे व्यापार में कठिनाइयाँ आती हैं। साथ ही इन धाराओं के आपस में मिलने से चक्रवातों की भी उत्पत्ति होती है; जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट पर हरीकेन (Hurricane), जापान के समीप टाइफून तथा प्रशान्त महासागर में टारनैडो (Tarnado) तूफानी चक्रवातों के कारण ही जन्म लेते हैं।

प्रश्न 3.
जल धाराओं के प्रभावों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय धाराओं के प्रभावों का वर्णन निम्नलिखित है-
(1) समुद्री धाराएँ निकटवर्ती समुद्रतटीय प्रदेशों के तापमान, आर्द्रता और वर्षा की मात्रा को प्रभावित करके वहाँ की जलवायु का स्वरूप निर्धारित करती हैं।

(2) उच्च अक्षांशों में गर्म धाराएँ सारा साल बन्दरगाहों को जमने से बचाकर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में सहायक सिद्ध होती हैं। इसी प्रकार ठण्डी धाराएँ नाशवान वस्तुओं (Perishable goods) के समुद्री परिवहन को प्रोत्साहित करती हैं।

(3) ठण्डी धाराएँ ध्रुवीय तथा उपध्रुवीय क्षेत्रों में अपने साथ प्लवक (Plankton) नामक सूक्ष्म जीवों को बहाकर लाती है जो मछलियों का उत्तम आहार सिद्ध होता है। इसी कारण ठण्डी धाराओं के मार्ग में मछलियाँ खूब फलती-फूलती हैं।

(4) ठण्डी और गर्म धाराओं के मिलन स्थल विश्व प्रसिद्ध मत्स्य ग्रहण क्षेत्रों के रूप में विकसित हुए हैं।

(5) महासागरों के व्यावसायिक समुद्री जलमार्ग यथासम्भव समुद्री धाराओं का अनुसरण करते हैं। इससे जलयानों की गति में तीव्रता आती है और ईंधन व समय की बचत होती है।

(6) धाराओं के कुछ नकारात्मक प्रभाव भी होते हैं। भिन्न तापमान वाली धाराओं के मिलन-स्थल पर घना कुहासा उत्पन्न हो जाता है जो जलयानों के आवागमन को बाधित करता है। ध्रुवीय क्षेत्रों से आने वाली धाराएँ अपने साथ बड़ी-बड़ी हिमशैलें (Icebergs) बहा लाती हैं जिनके टकराने से बड़े-बड़े जलयान चकनाचूर हो जाते हैं। सन् 1912 में टाईटेनिक (Titanic) नामक विश्व प्रसिद्ध व उस समय का आधुनिक और सबसे बड़ा जहाज़, न्यू-फाऊंडलैण्ड के निकट एक हिमशैल से टकराकर 1517 सवारियों के साथ उत्तरी अन्ध महासागर की तली में जा टिका।

प्रश्न 4.
ज्वार-भाटा क्या है? इसकी उत्पत्ति के कारण व प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ज्वार-भाटा-“सूर्य और चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति समुद्री जल को प्रतिदिन क्रमशः ऊपर-नीचे करती रहती है, ज्वार-भाटा कहलाती है।” ज्वार-भाटा के कारण समुद्रों का जल एक दिन में दो बार ऊपर चढ़ता है तथा उतरता है। ज्वार-भाटा के समय नदियों के जल-तल में परिवर्तन हो जाते हैं। जब समुद्रों में ज्वार आता है, तो नदियों के जल-तल ऊँचे हो जाते हैं तथा इसके विपरीत भाटे के समय नीचे हो जाते हैं।

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति-ज्वार-भाटा सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी के पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न होते हैं। सूर्य तथा चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी का भाग उनकी ओर खिंचता है और स्थलीय भाग की अपेक्षा जलीय भाग पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव अधिक होता है। सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा से आकार में कई गुना अधिक बड़ा है, लेकिन सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण का पृथ्वी पर अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि चन्द्रमा पृथ्वी के निकट है।

परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी का जो धरातलीय भाग चन्द्रमा के सामने आ जाता है, उसकी दूरी सबसे कम तथा उसके विपरीत वाला धरातलीय भाग सबसे दूर होता है। सबसे नजदीक वाले भाग का ज्वारीय उभार ऊपर होगा, जबकि पीछे वाला भाग सबसे कम गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में होता है, लेकिन इस पीछे वाले भाग में भी उच्च ज्वार की स्थिति होती है। इस प्रकार पृथ्वी का चन्द्रमा के सामने तथा पीछे (विपरीत दिशा) वाला भाग जलीय (तरल पदाथ) होने के कारण पृथ्वी के साथ गति नहीं कर पाता। यह भाग पृथ्वी की गति से पीछे रह जाता है। आगे तथा पीछे के जलीय भाग उभरी हुई या खिंची हुई अवस्था में होते हैं। यह स्थिति एक दिन में दो बार ज्वार की तथा दो बार भाटे की होती है।

ज्वार-भाटा के प्रकार-विश्व के अनेक महासागरों तथा सागरों में जो ज्वार-भाटा आते हैं, उनकी आवृत्ति तथा ऊँचाई में अन्तर देखने को मिलता है। भूमध्य रेखीय भागों के आसपास दिन में दो बार उच्च ज्वार तथा दो बार निम्न ज्वार देखने को मिलते हैं, जबकि ध्रुवीय प्रदेशों में एक ही बार उच्च तथा निम्न ज्वार देखने को मिलते हैं, इंग्लैण्ड के दक्षिणी तट पर स्थित साऊथैप्टन (Southampton) में ज्वार प्रतिदिन चार बार आता है। इसके कारण यह है कि ज्वार दो बार तो इंग्लिश चैनल से होकर और दो बार उत्तरी सागर से होकर विभिन्न अन्तरालों पर वहाँ पहुँचते हैं। यह पृथ्वी तथा चन्द्रमा की गतियों के परिणामस्वरूप है। इस प्रकार ज्वार-भाटा दो प्रकार के होते हैं

1. उच्च या वृहत् ज्वार-भाटा जब सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी तीनों एक ही सीध में होते हैं तो उस समय उच्च या वृहत् ज्वार-भाटा आता है। ऐसी स्थिति पूर्णमासी (Full Moon) तथा अमावस्या (New Moon) के दिन होती है। इन दिनों दिन में पृथ्वी पर सूर्य तथा चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव अधिक होता है। जब सूर्य और पृथ्वी एक ही दिशा में स्थित होते हैं, तो बीच में चन्द्रमा के आ जाने से सूर्य ग्रहण होता है और जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच में पृथ्वी आ जाती है, तो चन्द्रग्रहण होता है।

2. लघु ज्वार-भाटा-कृष्ण तथा शुक्ल पक्ष की सप्तमी अथवा अष्टमी के दिन सूर्य तथा चन्द्रमा पृथ्वी के साथ समकोण पर स्थित होते हैं। इस समकोण स्थिति के कारण चन्द्रमा तथा सूर्य पृथ्वी को विभिन्न दिशाओं से आकर्षित करते हैं, जिसके कारण गुरुत्वाकर्षण बल अन्य तिथियों की अपेक्षा कम रहता है और महानगरों में ज्वार की ऊँचाई भी कम रहती है जिसे लघु ज्वार कहते हैं।

प्रश्न 5.
हिन्द महासागर की धाराओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हिन्द महासागर की धाराएँ-हिन्द महासागर में मानसूनी पवनें चला करती हैं जो छः महीने बाद अपनी दिशा बदल देती हैं। फलस्वरूप हिन्द महासागर में चलने वाली धाराएँ भी मानसून के साथ अपनी दिशा बदल देती हैं। हिन्द महासागर की धाराओं को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-
(क) स्थायी धाराएँ-हिन्द महासागर में विषुवत् रेखा के दक्षिण में चलने वाली धाराएँ वर्ष भर एक ही क्रम में चलती हैं, अतः इन्हें ‘स्थायी धाराएँ’ कहते हैं। इन धाराओं में दक्षिणी विषुवत रेखीय जलधारा, मोजम्बिक धारा, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की जलधारा और अगुलहास धारा मुख्य हैं।

(ख) परिवर्तनशील धाराएँ-विषुवत् रेखा के उत्तर की ओर हिन्द महासागर की समस्त धाराएँ मौसम के अनुसार अपनी दिशा और क्रम बदल देती हैं। इसलिए ये परिवर्तनशील धाराएँ कहलाती हैं। इन धाराओं की दिशा व क्रम मानसून हवाओं से प्रभावित होते हैं। अतः इन्हें मानसून प्रवाह भी कहा जाता है।
1. दक्षिणी विषुवरेखीय जलधारा-यह धारा दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक पवनों के प्रभाव से ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम से पूर्व की ओर चलती है। मलागसी तट के समीप यह दक्षिण की ओर मुड़ जाती है।

2. मोजम्बिक जलधारा-यह एक गरम जल की धारा है जो अफ्रीका के पूर्वी तट और मलागसी के बीच बहती है। यह उत्तर से आकर दक्षिणी विषुवत् रेखीय धारा की दक्षिणी शाखा से मिल जाती है।

3. अगुलहास जलधारा-अफ्रीका से दक्षिण में अगुलहास अन्तरीप में पछुआ पवनों के प्रभाव द्वारा पूर्व की ओर एक धारा चलने लगती है। इसी धारा को अगुलहास की गर्म धारा कहते हैं।

4. पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की धारा-अण्टार्कटिक प्रवाह की एक शाखा ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण-पश्चिमी भाग से मुड़कर उत्तर की ओर पूर्व को ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के साथ-साथ बहने लगती है। यही पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की ठण्डी जलधारा कहलाती है।

5. ग्रीष्मकालीन मानसून प्रवाह-ग्रीष्म ऋतु में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पवनों के प्रवाह से एशिया महाद्वीप के पश्चिमी तटों से एक उष्ण प्रवाहपूर्व की तरफ चलने लगता है। उत्तरी विषुवत् रेखीय धारा भी मानसून के प्रभाव से पूर्व की ओर बहकर मानसून प्रवाह के साथ ग्रीष्मकाल की समुद्री धाराओं का क्रम बनाती है।

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HBSE 10th Class Science Solutions Haryana Board

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HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

Haryana State Board HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

HBSE 10th Class Science मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
मानव नेत्र अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी को समायोजित करके विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को फोकसित कर सकता है। ऐसा हो पाने का कारण है
(a) जरा-दूरदृष्टिता
(b) समंजन
(c) निकट-दृष्टि
(d) दीर्घ-दृष्टि।
उत्तर-
(b) समंजन।

प्रश्न. 2.
मानव नेत्र जिस भाग पर किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब बनाते हैं, वह है-
(a) कॉर्निया
(b) परितारिका
(c) पुतली
(d) दृष्टि पटल।
उत्तर-
(d) दृष्टि पटल।

प्रश्न 3.
सामान्य दृष्टि के वयस्क के लिए सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी होती है, लगभग –
(a) 25 m
(b)2.5 cm
(c)25 cm
(d)2.5 m.
उत्तर-
(c)25 cm.

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प्रश्न 4.
अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी में परिवर्तन किया जाता है
(a) पुतली द्वारा
(b) दृष्टि पटल द्वारा
(c) पक्ष्माभी द्वारा
(d) पारितारिका द्वारा।
उत्तर-
(c) पक्ष्माभी द्वारा।

प्रश्न 5.
किसी व्यक्ति को अपनी दूर की दृष्टि को संशोधित करने के लिए -5.5 डाइऑप्टर क्षमता के लेंस की आवश्यकता है। अपनी निकट की दृष्टि को संशोधित करने के लिए उसे +1.5 डाइऑप्टर क्षमता के लेंस की आवश्यकता है। संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की फोकस दूरी क्या होगी-(i) दूर की दृष्टि के लिए, (ii) निकट की दृष्टि के लिए।
हल :
(i) दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देखने के लिए आवश्यक लेंस की क्षमता
∴ सूत्र P = \(\frac{1}{f \text { (मी० में })} \text { से }\)
f = \(\frac{1}{p}\)m
f = \(\frac{1}{-5.5}=-\frac{100}{5.5} \mathrm{~cm}=\frac{200}{11}\) cm

(ii) दिया है-निकट की वस्तुओं को स्पष्ट देखने के लिए अवश्यक लेंस की क्षमता P = +1.5 D
∴ f = \(\frac{100}{\mathrm{P}} \mathrm{cm} \text { में }=\frac{100}{1.5}=\frac{200}{3} \mathrm{~cm}\)

प्रश्न 6.
किसी निकट दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति का दूर बिन्दु नेत्र के सामने 80 cm दूरी पर है। इस दोष को संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की प्रकृति तथा क्षमता क्या होगी?
हल: व्यक्ति को ऐसे लेंस की आवश्यकता है जो कि अनन्त पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब आँख के सामने 80 cm दूरी पर बना सके।
अतः u= – 20, v=-80 cm,f = ?
सूत्र \(\frac{1}{v}-\frac{1}{u}=\frac{1}{f}\) \(\text { से } \frac{1}{-80}-\frac{1}{-\infty}=\frac{1}{f} \)
अतः f=80 cm = -0.8m
∴ लेंस की क्षमता P = \(\frac{1}{f}=\frac{1}{-0.8} \mathrm{D}\) =-1.25 D
अतः आवश्यक लेंस की प्रकृति अपसारी तथा क्षमता -1.25 D है।

प्रश्न 7.
चित्र बनाकर दर्शाइए कि दीर्घ-दृष्टि दोष कैसे संशोधित किया जाता है? एक दीर्घ-दृष्टि दोष युक्त नेत्र का निकट बिन्दु 1 m है। इस दोष को संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की क्षमता क्या होगी? यह मान लीजिए कि सामान्य नेत्र का निकट बिन्दु 25cm है।
उत्तर-
दूर दृष्टि दोष में व्यक्ति का निकट बिन्दु दूर खिसक जाता है तथा मनुष्य समीप की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता है। इस दोष को दूर करने के लिए उत्तल लेंस का प्रयोग किया जाता है। चित्र आरेख इस प्रकार है-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार 1
मनुष्य के नेत्र का निकट बिन्दु 25 cm से दूर खिसक कर 100 cm दूर पहुँच गया है।
अतः u=-25 cm,v=-100 cm
∴ लेंस के सूत्र से, \(\frac{1}{f}=\frac{1}{v}-\frac{1}{u}\)
= \(\frac{1}{-100}-\frac{1}{-25}=\frac{1}{25}-\frac{1}{100}\)
= \(\frac{1}{f}=\frac{4-1}{100}=\frac{3}{100}\)
∴ f= \(\frac{100}{3} \mathrm{~cm} \text { या } \frac{1}{3} \mathrm{~m} \)
∴ आवश्यक लेंस की क्षमता P = \(\frac{1}{f(\mathrm{~m} \text { में })}=\frac{1}{1 / 3} \)
P= + 3D.

प्रश्न 8.
सामान्य नेत्र 25 cm से निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट क्यों नहीं देख पाते ?
उत्तर-
25 cm की दूरी पर स्थित वस्तु का प्रतिबिम्ब बनाने के लिए नेत्र द्वारा अपनी सम्पूर्ण समंजन क्षमता का प्रयोग कर लिया जाता है तथा वस्तु स्पष्ट दिखायी पड़ने लगती है। यदि वस्तु को 25 cm से कम दूरी पर रख दिया जाए तो नेत्र लेंस वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर नहीं बना पाता तथा वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है।

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प्रश्न 9.
जब हम नेत्र से किसी वस्तु की दूरी को बढ़ा देते हैं तो नेत्र में प्रतिबिम्ब दूरी का क्या होता है?
उत्तर-
नेत्र से वस्तु की दूरी बढ़ा देने पर नेत्र के समंजन गुण के कारण रेटिना पर ही प्रतिबिम्ब बनता है अतः नेत्र में बने प्रतिबिम्ब की दूरी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

प्रश्न 10.
तारे क्यों टिमटिमाते हैं?
उत्तर-
तारों से आने वाला प्रकाश हमारी आँख तक पहुँचने से पहले वायुमण्डल से होकर गुजरता है, वायुमण्डल की विभिन्न परतों का घनत्व अनियमित रूप से परिवर्तित होता रहता है, इस कारण से उनका अपवर्तनांक भी परिवर्तित होता रहता है। अपवर्तनांक परिवर्तन के कारण तारे से आने वाली किरणें लगातार अपना मार्ग बदलती रहती हैं तथा हमारी आँख तक पहुँचने वाले प्रकाश की मात्रा भी बदलती रहती है। इस कारण से तारे टिमटिमाते दिखाई पड़ते हैं।

प्रश्न 11.
व्याख्या कीजिए कि ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते?
उत्तर-
तारों की अपेक्षा ग्रह हमारी पृथ्वी के बहुत निकट हैं, उन्हें विस्तृत स्रोत की भाँति माना जा सकता है। यदि ग्रह को बिन्दु आकार के अनेक प्रकाश स्रोतों का संग्रह मान लें तो उन सभी से हमारे नेत्रों में प्रवेश करने वाली प्रकाश की मात्रा में कुल परिवर्तन का औसत मान शून्य होगा, यही कारण है कि वे टिमटिमाते प्रतीत नहीं होते।

प्रश्न 12.
सूर्योदय के समय सूर्य रक्ताभ क्यों प्रतीत होता है?
उत्तर-
दिन के समय प्रात:काल सूर्य क्षितिज के निकट होता है, सूर्य की किरणों को हम तक पहुँचने के लिए वातावरणीय मोटी परतों से गुजर कर पहुँचना पड़ता है। नीले
और कम तरंगदैर्ध्य के प्रकाश का अधिकांश भाग वहाँ उपस्थित कणों के द्वारा प्रकीर्णित कर दिया जाता है। हमारी आँखों तक पहुँचने वाला प्रकाश अधिक तरंगदैर्ध्य का होता है। इसलिए सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य रक्ताभ प्रतीत होता है।

प्रश्न 13.
किसी अंतरिक्ष यात्री को आकाश नीले की अपेक्षा काला क्यों प्रतीत होता है ?
उत्तर-
अंतरिक्ष यात्री आकाश में उस ऊँचाई पर होते हैं जहाँ वह वायुमण्डल से बाहर हो जाते हैं तथा वहाँ प्रकाश का प्रकीर्णन होकर प्रकाश नहीं पहुँच पाता है। प्रकीर्णन की क्रिया न होने के कारण अंतरिक्ष यात्री को आकाश नीले की अपेक्षा काला प्रतीत होता है।

HBSE 10th Class Science मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार InText Questions and Answers

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 211)

प्रश्न 1.
नेत्र की समंजन क्षमता से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नेत्र के लेंस की वह क्षमता जिसके कारण वह अपनी फोकस दूरी को समायोजित कर लेता है, समंजन क्षमता कहलाती है।

प्रश्न 2.
निकट दृष्टि दोष का कोई व्यक्ति 1.2 m से अधिक दूरी पर रखी वस्तुओं को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता। इस दोष को दूर करने के लिए प्रयुक्त लेंस किस प्रकार का होना चाहिए ?
उत्तर-
अवतल लेंस।

प्रश्न 3.
मानव नेत्र की सामान्य दृष्टि के लिए दूर बिन्दु तथा निकट बिन्दु नेत्र से कितनी दूरी पर होते हैं ?
उत्तर-
सामान्य दृष्टि के लिए दूर बिन्दु अनन्त पर तथा निकट बिन्दु नेत्र से 25 cm की दूरी पर होता है।

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प्रश्न 4.
अन्तिम पंक्ति में बैठे किसी विद्यार्थी को श्यामपट पढ़ने में कठिनाई होती है। यह विद्यार्थी किस दृष्टि दोष से पीड़ित है ? इसे किस प्रकार संशोधित किया जा सकता है?
उत्तर-
छात्र श्यामपट को दूर से नही पढ़ पाता है, परन्तु निकट से पढ़ लेता है, अतः छात्र की आँखों में निकट दृष्टि दोष है। इस दोष को दूर करने के लिए अपसारी लेन्स का प्रयोग करना पड़ेगा।

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क्रियाकलाप 11.1 (पा. पु. पृ. सं. 213)

प्रश्न 1.
आपतित किरण, अपवर्तित किरण, निर्गत किरण तथा विचलन कोण को दर्शाने के लिए एक चित्र बनाइए।
उत्तर-
PE-आपतित किरण
Li- आपतन कोण
EF-अपवर्तित किरण
Lr- अपवर्तन कोण
FS-निर्गत किरण
Le – निर्गत कोण
LA-प्रिज्म कोण.
LD- विचलन कोण
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प्रश्न 2.
एक प्रकाश की किरण कितनी बार अपवर्तित होती है और प्रत्येक बार अपवर्तित किरण की दिशा क्या होगी?
उत्तर-
जब प्रकाश की किरण प्रिज्म से गुजरती हैं तो यह दो बार अपवर्तित होती हैं। एक बार तब, जब यह हवा से काँच में प्रवेश करती है तथा दूसरी बार तब, जब यह काँच से हवा में प्रवेश करती है। प्रत्येक बार यह प्रिज्म के आधार की तरफ मुड़ती है।

प्रश्न 3.
विचलन कोण क्या है?
उत्तर-
आपतित किरण की दिशा तथा निर्गत किरण की दिशा के बीच बनने वाले कोण को विचलन कोण कहते हैं।

क्रियाकलाप 11.2 (पा. पु. पृ. सं. 214)

प्रश्न-आप क्या देखते हैं? आप वर्णों की एक आकर्षक पट्टी देखेंगे। ऐसा क्यों होता है?
उत्तर-
ऐसा प्रकाश के विक्षेपण के कारण होता है। काँच में प्रकाश के अलग-अलग अवयवी वर्गों की चाल अलग-अलग होने से ये अलग-अलग कोणों पर विक्षेपित हो जाते हैं।

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क्रियाकलाप 11.3 (पा. पु. पृ. सं. 218)

प्रश्न-टैंक में लगभग 2 L स्वच्छ जल लेकर 200 g सोडियम थायोसल्फेट (हाइपो) घोलिए। जल में लगभग 1 से 2 mL सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल डालिए। आप क्या देखते हैं?
उत्तर-
2-3 मिनट के बाद सल्फर के कण बनते हैं तथा काँच के टैंक के तीनों पाश्वॉ (side) से नीला प्रकाश दिखाई देता है। इसका कारण सल्फर के सूक्ष्म कणों द्वारा कम तरंगदैर्ध्य के प्रकाश का प्रकीर्णन होना है। काँच के टैंक के चौथे पार्श्व से, वृत्ताकार छिद्र की ओर से पारगत प्रकाश का रंग पहले नारंगी लाल तथा बाद में किरमिजी लाल दिखाई देता है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

HBSE 11th Class Geography विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. कोपेन के A प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन-सी दशा अर्हक हैं?
(A) सभी महीनों में उच्च वर्षा
(B) सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिंदु से अधिक
(C) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक
(D) सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस के नीचे
उत्तर:
(C) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक

2. जलवायु के वर्गीकरण से संबंधित कोपेन की पद्धति को व्यक्त किया जा सकता है
(A) अनुप्रयुक्त
(B) व्यवस्थित
(C) जननिक
(D) आनुभविक
उत्तर:
(D) आनुभविक

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3. भारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भागों को कोपेन की पद्धति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा-
(A) “Af”
(B) “BSh”
(C) “Cfb”
(D) “Am”
उत्तर:
(D) “Am”

4. निम्नलिखित में से कौन सा साल विश्व का सबसे गर्म साल माना गया है?
(A) 1990
(B) 1998
(C) 1885
(D) 1950
उत्तर:
(B) 1998

5. नीचे लिखे गए चार जलवायु समूहों में से कौन आर्द्र दशाओं को प्रदर्शित करता हैं?
(A) A-B-C-E
(B) A-C-D-E
(C) B-C-D-E
(D) A-C-D-F
उत्तर:
(D) A-C-D-F

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलवायु के वर्गीकरण के लिए कोपेन के द्वारा किन दो जलवायविक चरों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
कोपेन ने जलवायु के वर्गीकरण के लिए निम्नलिखित जलवायविक चरों का प्रयोग किया है-

  • तापमान
  • वर्षण
  • तापमान और वर्षण का वनस्पति के वितरण से सम्बन्ध।

प्रश्न 2.
वर्गीकरण की जननिक प्रणाली आनुभविक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
जननिक प्रणाली में जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास किया जाता है, जबकि आनुभविक प्रणाली में जलवायु तापमान और वर्षण से सम्बन्धित आंकड़ों पर आधारित है।

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प्रश्न 3.
किस प्रकार की जलवायुओं में तापांतर बहुत कम होता है?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु में तापांतर बहुत कम होता है। यह जलवायु विषुवत् रेखा के निकट पाई जाती है। इन प्रदेशों में तापमान सामान्य रूप से ऊँचा और वार्षिक तापांतर नगण्य होता है। किसी भी दिन अधिकतम तापमान लगभग 30° से० और न्यूनतम तापमान लगभग 20° से होता है। लेकिन वार्षिक ताप में अंतर बहुत कम है।

प्रश्न 4.
सौर कलंकों में वृद्धि होने पर किस प्रकार की जलवायविक दशाएँ प्रचलित होंगी?
उत्तर:
सौर कलंक सूर्य पर काले धब्बे होते हैं, जो एक चक्रीय ढंग से घटते-बढ़ते रहते हैं। मौसम वैज्ञानियों के अनुसार सौर कलंकों की संख्या के बढ़ने से मौसम ठंडा और आर्द्र हो जाता है तथा तूफानों की संख्या बढ़ जाती है। सौर कलंकों के कम होने से उष्ण एवं शुष्क दशाएँ उत्पन्न होती हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तुलना करें।
उत्तर:
A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तुलना निम्नलिखित प्रकार से है-

‘A’ प्रकार की जलवायु‘B’ प्रकार की जलवायु.
(1) ये उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु वाले प्रदेश हैं।(1) ये शुष्क जलवायु वाले प्रदेश हैं।
(2) इस प्रकार की जलवायु में वर्षा अधिक होती है।(2) इस प्रकार की जलवायु में वर्षा बहुत कम होती है।
(3) इस प्रकार की जलवायु में वार्षिक तापान्तर कम होता है।(3) इस प्रकार की जलवायु में वार्षिक तापान्तर अधिक होता है।
(4) यह जलवायु 0° अक्षांश के आसपास के क्षेत्रों तथा कर्क रेखा और मकर रेखा के मध्य पाई जाती है।(4) यह जलवायु 15° से 60° उत्तर व दक्षिण अक्षांशों के मध्य विस्तृत है तथा 15° से 30° के निम्न अंक्षाशों में यह उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में पाई जाती है।
(5) इस प्रकार की जलवायु में जैव-विविधता वाले उष्ण कटिबंधीय सदाहरित वन पाए जाते हैं।(5) इस प्रकार की जलवायु में कंटीले बन पाए जाते हैं।

प्रश्न 2.
C तथा A प्रकार के जलवायु में आप किस प्रकार की वनस्पति पाएँगे?
उत्तर:
‘A’ उष्ण कटिबंधीय जलवायु को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है-
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(1) AF-उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु विषुवत् वृत्त के निकट पाई जाती है। इस जलवायु में सघन वितान तथा व्यापक जैव विविधता वाले सदाबहार वन पाए जाते हैं।

(2) Am-उष्ण कटिबंधीय मानसून जलवायु भारतीय उपमहाद्वीप दक्षिण अमेरिका के उत्तर:पूर्वी तथा उत्तरी आस्ट्रेलिया में पाई जाती है। इस जलवायु में पर्णपाती वन पाए जाते हैं जिसमें पेड़ अपनी पत्तियाँ वर्ष में एक बार गिरा देता है।

(3) Aw-उष्ण कटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु AF प्रकार के जलवायु प्रदेशों के उत्तर एवं दक्षिण में पाई जाती है। इस जलवायु में पर्णपाती वन और पेड़ों से ढकी घासभूमियाँ पाई जाती हैं।
‘B’ कोष्ण शीतोष्ण जलवायु को चार प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है-
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  • Cwa-आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु में पतझड़ वन पाए जाते हैं।
  • Cs-भूमध्य-सागरीय प्रदेशों में फलों के वृक्ष पाए जाते हैं।
  • Cfa-आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय (Cfa) में पर्णपाती वन पाए जाते हैं। इस क्षेत्र के कुछ क्षेत्रों में घासभूमियाँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 3.
ग्रीनहाऊस गैसों से आप क्या समझते हैं? ग्रीन हाऊस गैसों की एक सूची तैयार करें।
उत्तर:
ग्रीनहाऊस गैसें ऐसी गैसें जो धरती पर एक आवरण बनाकर कम्बल की भाँति काम करती हैं और धरती की ऊष्मा को बाहर जाने से रोकती हैं, ग्रीनहाऊस गैसें कहलाती हैं। ये पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में सहायक हैं।

ग्रीनहाऊस गैसें वर्तमान में प्रमुख ग्रीनहाऊस गैसें कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2), क्लोरो-फ्लोरोकार्बन्स (CFCs), मीथेन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) और ओज़ोन (O3) हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और कार्बन मोनोक्साइड (CO) कुछ ऐसी अन्य गैसें हैं जो ग्रीनहाऊस गैसों से आसानी से प्रतिक्रिया करती हैं और वायुमण्डल में उनके सान्द्रण को प्रभावित करती हैं।

1. कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2) वायुमण्डल में उपस्थित ग्रीनहाऊस गैसों में सबसे अधिक सान्द्रण CO2 का है। वैसे तो कार्बन-चक्र हजारों वर्षों की अवधि में वायुमण्डल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा सन्तुलित बनाए रखता है, लेकिन लघु-अवधि में यह सन्तुलन कई बार बिगड़ जाता है। विगत कुछ वर्षों में कोयला, पेट्रोल, डीजल तथा प्राकृतिक गैस; जैसे जीवश्मी ईंधनों के जलने से प्रतिवर्ष 6 अरब टन कार्बन-डाइऑक्साइड वायुमण्डल में मिल रही है। वन तथा महासागर CO2 के कुण्ड माने जाते हैं। वन अपनी वृद्धि के लिए CO2 का उपयोग करते हैं। अतः भूमि उपयोग में परिवर्तनों के कारण की गई जंगलों की कटाई भी CO2 की मात्रा बढ़ाती है।

CO2 लगभग 0.5 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है। सन् 1750 के बाद वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 30 प्रतिशत बढ़ी है, जिसने ग्रीनहाऊस प्रभाव में 65 प्रतिशत का योगदान दिया है। एक अन्य अनुमान के अनुसार 21वीं शताब्दी के मध्य तक वायुमण्डल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा औद्योगिक क्रांति से पूर्व की तुलना में दोगुनी हो जाएगी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी हो जाए तो वायुमण्डल का तापमान 3° सेल्सियस बढ़ सकता है। 21वीं सदी के अन्त तक वायुमण्डल का तापमान 1.4° से 5.8° सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

2. क्लोरो फ्लोरो कार्बन (CFCs)-यह गैस मनुष्य का अनुसंधान है, प्रकृति में यह नहीं मिलती। यह वास्तव में संश्लेषित (Synthetic) यौगिकों का समूह है जिसका प्रत्येक अणु कार्बन-डाइऑक्साइड की तुलना में 20 हजार गुना ताप प्रग्रहित करता है। ये यौगिक वातानुकूलन व प्रशीतन की मशीनों, आग बुझाने के उपकरणों में तथा छिड़काव यन्त्रों में प्रणोदक (Propelent) के रूप में प्रयोग होते हैं। वर्तमान में इसकी मात्रा 4 प्रतिशत की दर से वायुमण्डल में बढ़ रही है। CFCs वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर समताप मण्डल में क्लोरीन को मुक्त करती है जो ओज़ोन को तोड़ती है। ओज़ोन परत पैराबैंगनी किरणों (Ultraviolet rays) से पृथ्वी की रक्षा करती है। समताप मण्डल में ओज़ोन के सान्द्रण का ह्रास ओज़ोन छिद्र कहलाता है। यह छिद्र हानिकारक पराबैंगनी किरणों को क्षोभमण्डल से गुजरने देता है। ओज़ोन का सबसे अधिक हास अंटार्कटिका के ऊपर हुआ है।

3. नाइट्रस ऑक्साइड-इसका महत्त्वपूर्ण स्रोत उष्ण कटिबन्धीय मिट्टी है, जहाँ पर जीवाणु नाइट्रोजन के प्राकृतिक यौगिकों से क्रिया करके नाइट्रस ऑक्साइड पैदा करते हैं। कृषि में नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग, पेड़-पौधों को जलाने, नाइट्रोजन वाले ईंधन को जलाने तथा नाइलोन उद्योग द्वारा छोड़े जाने के कारण वायुमण्डल में इसकी मात्रा में वृद्धि हुई है। इस समय वायुमण्डल में इसकी मात्रा 0.31 भाग प्रति दस लाख भाग (PPM) है। नाइट्रस ऑक्साइड का प्रत्येक अणु कार्बन-डाइऑक्साइड की तुलना में 250 गुना अधिक ताप प्रग्रहित (Trap) करता है।

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4. मीथेन गैस-तापमान बढ़ाने में मीथेन गैस का प्रत्येक अणु कार्बन-डाइऑक्साइड की तुलना में 25 गुना अधिक प्रभावी है। मीथेन अपघटकों (Decomposers) की देन है। इसके अधिकांश स्रोत जैविक हैं। मीथेन गैस धान के खेतों, नम भूमि तथा दलदल से निकलती है, इसलिए इसे मार्श गैस (Marsh Gas) भी कहते हैं। यह सागरों, ताज़े जल, खनन कार्य, गैस ड्रिलिंग तथा जैविक पदार्थों के सड़ने से उत्पन्न होती है। पशु और लकड़ी खाने वाले कीड़े; जैसे दीमक को मीथेन छोड़ने का जिम्मेदार पाया गया है।

5. जलवाष्प-अन्य ग्रीनहाऊस गैसों के कारण तापमान बढ़ने से जल की वाष्पन दर भी बढ़ जाती है। वायुमण्डल में जमा हुए ज्यादा जलवाष्प तापमान को और ज्यादा बढ़ाते हैं, क्योंकि जलवाष्प स्वयं एक प्राकृतिक ग्रीनहाऊस गैस है।

6. ओज़ोन-यद्यपि निचले वायुमण्डल में यह गैस कम पाई जाती है पर फिर भी इसका जमाव गर्मी बढ़ाने का काम करता है। ग्रीनहाऊस गैसों के प्रभाव को नियन्त्रित करने वाले कारक-

  • गैस के सान्द्रण में वृद्धि के परिणाम।
  • वायुमण्डल में इसके जीवनकाल अर्थात् ग्रीनहाऊस गैसों के अणु जितने लंबे समय तक बने रहते हैं, इनके द्वारा लाए गए परिवर्तनों से वायुमण्डलीय तंत्र को उबरने में उतना अधिक समय लगता है।
  • इसके द्वारा अवशोषित विकिरण की तरंग लंबाई।

विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन HBSE 11th Class Geography Notes

→ समताप रेखाएँ (Isotherms)-ये काल्पनिक रेखाएँ समुद्र तल के अनुसार समान ताप वाले स्थानों को मिलाती हैं।

→ जलवायु प्रदेश (Climatic Region)-पृथ्वी के धरातल पर पाए जाने वाले ऐसे भू-भाग, चाहे वे पास-पास हों या दूर-दूर। जहाँ लगभग एक समान जलवायु पाई जाती है, जलवायु प्रदेश कहलाते हैं।

→ ध्रुवीय ज्योति (Aurora) आयनमण्डल में विद्युत चुम्बकीय घटना का एक प्रकाशमय प्रभाव, जो उच्च अक्षांशों में लाल, हरे तथा सफेद चापों के रूप में दिखाई देता है। रात को आकाश में भू-पृष्ठ से 100 कि०मी० की ऊँचाई पर ध्रुवीय ज्योति किरणों तथा चादरों की तरह दिखाई पड़ती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में यह ज्योति दक्षिणी ध्रुवीय ज्योति (Aurora Australis) तथा उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी ध्रुवीय ज्योति (Aurora Borealis) कहलाती है।

→ स्टैपी (Steppe) महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में स्थित शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदानों को विभिन्न महाद्वीपों में अलग-अलग नामों से जानते हैं; जैसे-यूरेशिया में स्टैपी, उत्तरी अमेरिका में प्रेयरी, दक्षिणी अमेरिका में पंपास, अफ्रीका में वेल्ड्स तथा ऑस्ट्रेलिया में डाउन्स आदि।

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