Author name: Prasanna

HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मेसोपोटामिया से आपका क्या अभिप्राय है? इसकी प्रमुख भौगोलिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

I. मेसोपोटामिया से अभिप्राय

मेसोपोटामिया जिसे आजकल इराक कहा जाता है भौगोलिक विविधता का देश है। मेसोपोटामिया नाम यूनानी भाषा के दो शब्दों मेसोस (Mesos) भाव मध्य तथा पोटैमोस (Potamos) भाव नदी से मिलकर बना है। इस प्रकार मेसोपोटामिया का अर्थ है दो नदियों के बीच का प्रदेश। ये नदियाँ हैं दजला (Tigris) एवं फ़रात (Euphrates) । इन नदियों को यदि मेसोपोटामिया सभ्यता की जीका रेखा कह दिया जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

II. मेसोपोटामिया की भौगोलिक विशेषताएँ

1. दजला एवं फ़रात नदियाँ :
दजला एवं फ़रात नदियों का उद्गम आर्मीनिया के उत्तरी पर्वतों तोरुस (Torus) से होता है। इन पर्वतों की ऊँचाई लगभग 10,000 फुट है। यहाँ लगभग सारा वर्ष बर्फ जमी रहती है। इस क्षेत्र में वर्षा भी भरपूर होती है। दजला 1850 किलोमीटर लंबी है। इसका प्रवाह तीव्र है तथा इसके तट ऊँचे एवं अधिक कटे-फटे हैं।

इसलिए प्राचीनकाल में इस नदी के तटों पर बहुत कम नगरों की स्थापना हुई थी। दूसरी ओर फ़रात नदी ने मेसोपोटामिया के इतिहास में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। यह नदी 2350 किलोमीटर लंबी है। इसका प्रवाह कम तीव्र है। इसके तट कम ऊँचे एवं कम कटे-फटे हैं। इस कारण प्राचीनकाल में मेसोपोटामिया के प्रसिद्ध नगरों की स्थापना इस नदी के तटों पर हई।

2. मैदान :
मेसोपोटामिया के पूर्वोत्तर भाग में ऊँचे-नीचे मैदान हैं। ये मैदान बहुत हरे-भरे हैं। यहाँ अनेक प्रकार के जंगली फल पाए जाते हैं। यहाँ के झरने (streams) बहत स्वच्छ हैं। इन मैदानों में कषि के लिए आवश्यक वर्षा हो जाती है। यहाँ 7000 ई० पू० से 6000 ई० पू० के मध्य खेती आरंभ हो गई थी। मेसोपोटामिया के उत्तर में ऊँची भूमि (upland) है जिसे स्टेपी (steppe) के मैदान कहा जाता है। इन मैदानों में घास बहुत होती है। अतः यह पशुपालन के लिए अच्छा क्षेत्र है।

पूर्व में मेसोपोटामिया की सीमाएँ ईरान से मिली हुई थीं। दज़ला की सहायक नदियाँ (tributaries) ईरान के पहाड़ी क्षेत्रों में जाने का उत्तम साधन हैं। मेसोपोटामिया का दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है। यहाँ सबसे पहले मेसोपोटामिया के नगरों एवं लेखन कला का विकास हुआ। इन रेगिस्तानों में नगरों के विकास का कारण यह था कि दजला एवं फ़रात नदियाँ उत्तरी पर्वतों से निकल कर अपने साथ उपजाऊ मिट्टी लाती थीं।

इस उपजाऊ मिट्टी के कारण एवं नदियों से सिंचाई के लिए निकाली गई नहरों के कारण यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता था। यद्यपि यहाँ फ़सल उपजाने के लिए आवश्यक वर्षा की कुछ कमी रहती थी इसके बावजूद दक्षिणी मेसोपोटामिया में रोमन साम्राज्य सहित सभी प्राचीन सभ्यताओं में से सर्वाधिक फ़सलों का उत्पादन होता था। यहाँ की प्रमुख फ़सलें गेहूँ, जौ, मटर (peas) एवं मसूर (lintel) थीं।

3. कृषि संकट :
मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि अनेक बार संकटों से घिर जाती थी। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। प्रथम, दजला एवं फ़रात नदियों में कभी-कभी भयंकर बाढ़ आ जाती थी। इस कारण फ़सलें नष्ट हो जाती थीं। दूसरा, कई बार पानी की तीव्र गति के कारण ये नदियाँ अपना रास्ता बदल लेती थीं। इससे सिंचाई व्यवस्था चरमरा जाती थी।

मेसोपोटामिया में वर्षा की कमी होती थी। अतः फ़सलें सूख जाती थीं। तीसरा, नदी के ऊपरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग नहरों का प्रवाह अपने खेतों की ओर मोड़ लेते थे। इस कारण निचले क्षेत्रों में बसे हुए गाँवों को खेतों के लिए पानी नहीं मिलता था। चौथा, ऊपरी क्षेत्रों के लोग अपने हिस्से की सरणी में से मिट्टी (silt from their stretch of the channel) नहीं निकालते थे। इस कारण निचले क्षेत्रों में पानी का बहाव रुक जाता था। अत: पानी के लिए गाँववासियों में अनेक बार झगड़े हुआ करते थे।

4. समृद्धि के कारण :
मेसोपोटामिया में पशुपालन का धन्धा काफ़ी विकसित था। मेसोपोटामिया के लोग स्टेपी घास के मैदानों, पूर्वोत्तरी मैदानों एवं पहाड़ों की ढालों पर भेड़-बकरियाँ एवं गाएँ पालते थे। इनसे वे दूध एवं माँस प्राप्त करते थे। नदियों से बड़ी संख्या में मछलियाँ प्राप्त की जाती थीं। मेसोपोटामिया में खजूर (date palm) का भी उत्पादन होता था। इन सबके कारण मेसोपोटामिया के लोग समृद्ध हुए। मेसोपोटामिया की समृद्धि के कारण इसे प्राचीन काल में अनेक विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा।

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प्रश्न 2.
नगरीकरण से आपका क्या अभिप्राय है? मेसोपोटामिया में नगरीकरण के प्रमुख कारण क्या थे?
अथवा
मेसोपोटामिया में नगरीकरण के कारणों तथा महत्त्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
मेसोपोटामिया नगर की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
I. नगरीकरण से अभिप्राय

नगर किसे कहते हैं इसकी कोई एक परिभाषा देना अत्यंत कठिन है। साधारणतया नगर उसे कहते हैं जिसके अधीन एक विशाल क्षेत्र हो, जहाँ काफी जनसंख्या हो, जहाँ के लोग पक्के मकानों में रहते हों, जहाँ की सड़कें पक्की हों, जहाँ यातायात एवं संचार के साधन विकसित हों, जहाँ लोगों को प्रत्येक प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त हों तथा जहाँ लोगों को पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो। विश्व में नगरों का सर्वप्रथम विकास मेसोपोटामिया में हुआ।

यहाँ नगरों का निर्माण 3000 ई० पू० में कांस्य युग में आरंभ हुआ। यहाँ तीन प्रकार के नगरों का निर्माण हुआ। प्रथम, धार्मिक नगर थे जो मंदिरों के चारों ओर विकसित हुए। दूसरा, व्यापारिक नगर थे जो प्रसिद्ध व्यापारिक मार्गों एवं बंदरगाहों के निकट स्थापित हुए। तीसरा, शाही नगर थे जहाँ राजा, राज परिवार एवं प्रशासनिक अधिकारी रहते थे। ये नगर ऐसे स्थान पर होते थे जहाँ से संपूर्ण साम्राज्य पर नियंत्रण रखा जा सकता था। इन नगरों का विशेष महत्त्व होता था।

II. नगरीकरण के कारण

मेसोपोटामिया में नगरीकरण के विकास के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. अत्यंत उत्पादक खेती:
मेसोपोटामिया में नगरीकरण के विकास में सर्वाधिक उल्लेखनीय योगदान अत्यंत उत्पादक खेती ने दिया। यहाँ की भूमि में प्राकृतिक उर्वरता थी। इससे खेती को बहुत प्रोत्साहन मिला। प्राकृतिक उर्वरता के कारण पशुओं को चारे के लिए कोई कमी नहीं थी। अत: पशुपालन को भी बल मिला। खेती एवं पशुपालन के कारण मानव जीवन स्थायी बन गया क्योंकि उसे भोजन की तलाश में स्थान-स्थान पर घूमने की ज़रूरत नहीं थी। इससे नए-नए व्यवसाय आरंभ हो गए। इससे नगरीकरण की प्रक्रिया को बहुत प्रोत्साहन मिला।

2. जल-परिवहन :
नगरीकरण के विकास के लिए कुशल जल-परिवहन का होना अत्यंत आवश्यक है। भारवाही पशुओं तथा बैलगाड़ियों के द्वारा नगरों में अनाज एवं अन्य वस्तुएँ लाना तथा ले जाना बहुत कठिन होता था। इसके तीन कारण थे। प्रथम, इसमें बहुत समय लग जाता था। दूसरा, इस प्रक्रिया में खर्चा बहुत आता था। तीसरा, रास्ते में पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी करनी पड़ती थी। नगरीय अर्थव्यवस्था इतना खर्च उठाने के योग्य नहीं होती। दूसरी ओर जल-परिवहन सबसे सस्ता साधन होता था।

3. धातु एवं पत्थर की कमी :
किसी भी नगर के विकास में धातुओं एवं पत्थर की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। धातुओं का प्रयोग विभिन्न प्रकार के औजार, बर्तन एवं आभूषण बनाने के लिए किया जाता है। औज़ारों से पत्थर को तराशा जाता है। बर्तन सभ्य समाज की निशानी हैं। इनका प्रयोग खाद्य वस्तुएँ बनाने, उन्हें खाने एवं संभालने के लिए किया जाता है।

नगरों की स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के आभूषण पहनने की शौकीन होती हैं। पत्थरों का प्रयोग भवनों, मंदिरों, मूर्तियों एवं पुलों आदि के निर्माण के लिए किया जाता है। मेसोपोटामिया में धातओं एवं पत्थरों की कमी थी। इसके चलते मेसोपोटामिया ने तर्की, ईरान एवं खाडी पार के देशों से ताँबा, टिन. सोना, चाँदी. सीपी एवं विभिन्न प्रकार के पत्थरों का आयात करके इनकी कमी को दर किया।

4. श्रम विभाजन :
श्रम विभाजन को नगरीय विकास का एक प्रमुख कारक माना जाता है। नगरों के लोग आत्मनिर्भर नहीं होते। उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के लिए एक पत्थर की मुद्रा (stone seal) बनाने वाले को पत्थर पर उकेरने के । औजारों (bronze tools) की आवश्यकता होती है। ऐसे औजारों का वह स्वयं निर्माण नहीं करता।

इस प्रकार नगर के लोग अन्य लोगों पर उनकी सेवाओं के लिए अथवा उनके द्वारा उत्पन्न की गई वस्तुओं पर निर्भर करते हैं। संक्षेप में श्रम विभाजन को शहरी जीवन का एक प्रमुख आधार माना जाता है।
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5. मुद्राओं का प्रयोग:
मेसोपोटामिया के नगरों से हमें बड़ी संख्या में मुद्राएँ मिली हैं। ये मुद्राएँ पत्थर की होती थीं तथा इनका आकार बेलनाकार (cylinderical) था। इन्हें अत्यंत कुशल कारीगरों द्वारा उकेरा जाता था। इन मुद्राओं पर कभी-कभी इसके स्वामी का नाम, उसके देवता का नाम तथा उसके रैंक आदि का वर्णन भी किया जाता था।

इन मुद्राओं का प्रयोग व्यापारियों द्वारा अपना सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित भेजने के लिए किया जाता था। इस प्रकार यह मुद्रा उस सामान की प्रामाणिकता का प्रतीक बन जाती थी। यदि यह मुद्रा टूटी हुई पाई जाती तो पता लग जाता कि रास्ते में सामान के साथ छेड़छाड़ की गई है अन्यथा भेजा गया सामान सुरक्षित है। निस्संदेह मुद्राओं के प्रयोग ने नगरीकरण के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

III. नगरीकरण का महत्त्व

मेसोपोटामिया में नगरों के निर्माण ने समाज के विकास में उल्लेखीय भूमिका निभाई। नगरों के निर्माण के कारण लोगों को सुविधाएँ देने के लिए अनेक संस्थाएँ अस्तित्व में आईं। नगरों में सुविधाओं के कारण लोग गाँवों को छोड़कर नगरों में बसने लगे। नगरों में कुशल परिवहन व्यवस्था, शिक्षण संस्थाएँ एवं स्वास्थ्य संबंधी देखभाल केंद्र स्थित थे। नगरों के कारण उद्योगों एवं व्यापार को प्रोत्साहन मिला। नगरों के लोग पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं थे।

उन्हें खाद्यान्न के लिए गाँवों पर निर्भर रहना पड़ता था। इसलिए उनमें आपसी लेन-देन होता रहता था। नगरों में भव्य मदिरों का निर्माण हुआ। मंदिरों के निर्माण के कारण बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ। नगरों के निर्माण ने श्रम विभाजन को प्रोत्साहित किया। नगरों के लोग अधिक सुरक्षित महसूस करते थे। नगरों में विभिन्न समुदायों के लोग रहते थे। इससे आपसी एकता एवं विभिन्न संस्कृतियों के विकास को बल मिला।

प्रश्न 3.
मेसोपोटामिया के प्रसिद्ध नगरों एवं उनके महत्त्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
मेसोपोटामिया सभ्यता में विभिन्न प्रकार के शहरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन काल मेसोपोटामिया में नगरीकरण की प्रक्रिया 3000 ई० पू० में आरंभ हुई थी। इस काल के कुछ प्रसिद्ध नगरों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. उरुक :
उरुक मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर था। यह नगर आधुनिक इराक की राजधानी बग़दाद से 250 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व की ओर फ़रात (Euphrates) नदी के तट पर स्थित था। इसका उत्थान 3000 ई० पू० में हुआ था। इसकी गणना उस समय विश्व के सबसे विशाल नगरों में की जाती थी। यह उस समय 250 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था। 2800 ई० पू० के आस-पास इसका आकार बढ़ कर 400 हैक्टेयर हो गया था।

इस नगर की स्थापना सुमेरिया के प्रसिद्ध शासक एनमर्कर (Enmerkar) ने की थी। उसने इस नगर में प्रसिद्ध इन्नाना देवी (Goddess Inanna) के मंदिर का निर्माण किया था। उरुक के एक अन्य प्रसिद्ध शासक गिल्गेमिश (Gilgamesh) ने इसे अपने साम्राज्य की राजधानी घोषित किया था।

उसने इस नगर की सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर एक विशाल दीवार का निर्माण किया था। इस नगर के उत्खनन (excavation) का वास्तविक कार्य जर्मनी के जूलीयस जोर्डन (Julius Jordan) ने 1913 ई० में आरंभ किया। 3000 ई० पू० के आस-पास उरुक नगर ने तकनीकी क्षेत्र में अद्वितीय विकास किया। इसका अनुमान इस बात से लगाया जाता है कि उस समय के लोगों ने अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औज़ारों का प्रयोग आरंभ कर दिया था।

इसके अतिरिक्त वास्तुविदों (architects) ने ईंटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया था। इससे भवन निर्माण कला के क्षेत्र में एक नयी क्राँति आई। उस समय बड़ी संख्या में लोग चिकनी मिट्टी के शंकु (clay cones) बनाने एवं पकाने का कार्य करते थे। इन शंकुओं को भिन्न-भिन्न रंगों से रंगा जाता था। इसके पश्चात् इन्हें मंदिरों की दीवारों पर लगाया जाता था।

इससे मंदिरों की सुंदरता बहुत बढ़ जाती थी। उरुक नगर के लोगों ने मूर्तिकला के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति की। इसका अनुमान 3000 ई० पू० में उरुक नगर से प्राप्त वार्का शीर्ष (Warka Head) से लगाया जा सकता है। यह एक स्त्री का सिर था। इसे सफ़ेद संगमरमर को तराश कर बनाया गया था। कम्हार के चाक (potter’s wheel) के निर्माण से प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया। इस कारण बड़ी संख्या में एक जैसे बर्तन बनाना सुगम हो गया।

2. उर:
उर मेसोपोटामिया का एक अन्य प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण नगर था। यह बग़दाद से 300 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व की ओर स्थित था। यह फ़रात नदी से केवल 15 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित था। इस नगर की सबसे पहले खुदाई एक अंग्रेज़ जे० ई० टेलर (J. E. Taylor) द्वारा 1854-55 ई० में की गई। इस नगर की व्यापक स्तर पर खुदाई का कार्य 1920 एवं 1930 के दशक में की गई।

उर नगर की खुदाई से जो निष्कर्ष सामने आता है उससे यह पता चलता है कि इसमें नगर योजना का पालन नहीं किया गया था। इसका कारण यह था कि इस नगर की गलियाँ संकरी एवं टेढ़ी-मेढ़ी थीं। अतः पहिए वाली गाड़ियों का घरों तक पहुँचना संभव न था। अतः अनाज के बोरों तथा ईंधन के गट्ठों को संभवतः गधों पर लाद कर पहुँचाया जाता था। उर नगर में मोहनजोदड़ो की तरह जल निकासी के लिए गलियों के किनारे नालियाँ नहीं थीं।

ये नालियाँ घरों के भीतरी आँगन में पाई गई हैं। इससे यह सहज अनुमान लगाया जाता है कि घरों की छतों का ढलान भीतर की ओर होता था। अत: वर्षा के पानी का निकास नालियों के माध्यम से आँगन के भीतर बनी हुई हौजों (sumps) में ले जाया जाता था।

ऐसा इसलिए किया गया था ताकि तीव्र वर्षा के कारण घरों के बाहर बनी कच्ची गलियों में कीचड़ न एकत्र हो जाए। नगर की खुदाई से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उस समय के लोग अपने घर का सारा कूड़ा-कचरा बाहर गलियों में फैंक देते थे। इस कारण गलियों की सतहें ऊँची उठ जाती थीं। इस कारण कुछ समय बाद घरों के बरामदों को भी ऊँचा करना पड़ता था ताकि वर्षा के दिनों में बाहर से पानी एवं कूड़ा बह कर घरों के अंदर न आ जाए। उर नगर के घरों की एक अन्य विशेषता यह थी कि कमरों के अंदर रोशनी खिड़कियों से नहीं अपितु दरवाज़ों से होकर आती थी।

ये दरवाज़े आँगन में खुला करते थे। इससे घरों में परिवारों की गोपनीयता (privacy) बनी रहती थी। उस समय घरों के बारे में उर के लोगों में अनेक प्रकार के अंध-विश्वास प्रचलित थे। जैसे यदि घर की दहलीज़ (threshold) ऊँची उठी हुई हो तो धन-दौलत प्राप्त होता है। यदि सामने का दरवाजा किसी दूसरे के घर की ओर न खुले तो वह सौभाग्य प्रदान करता है। किंतु यदि घर का मुख्य दरवाजा बाहर की ओर खुले तो पत्नी अपने पति के लिए एक सिरदर्द बनेगी।

उर नगर की खुदाई से जो हमें सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु मिली है वह थी शाही कब्रिस्तान । यहाँ से 16 राजाओं एवं रानियों की कब्र प्राप्त हुई हैं। इन कब्रों में शवों के साथ सोना, चाँदी एवं बहुमूल्य पत्थरों को दफनाया गया है। इसके अतिरिक्त उनके प्रसिद्ध राजदरबारियों, सैनिकों, संगीतकारों, सेवकों एवं खाने-पीने की वस्तुओं को भी उनके शवों के साथ दफनाया गया था।

इससे अनुमान लगाया जाता है कि उर के लोग मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे। साधारण लोगों के शवों को वैसे ही दफ़न कर दिया जाता था। कुछ लोगों के शव घरों के फ़र्शों के नीचे भी दफ़न पाए गए थे।

3. मारी:
मारी प्राचीन मेसोपोटामिया का एक अन्य महत्त्वपूर्ण नगर था। यह नगर 2000 ई० पू० के पश्चात् खूब फला-फूला। मारी में लोग खेती एवं पशुपालन का धंधा करते थे। पशुचारकों को जब अनाज एवं धातु 431 के औज़ारों आदि की आवश्यकता पड़ती थी तो वे अपने पशुओं, माँस एवं चमड़े के बदले इन्हें प्राप्त करते थे। पशुओं के गोबर की खाद फ़सलों के अधिक उत्पादन के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होती थी। यद्यपि किसान एवं गड़रिये एक-दूसरे पर निर्भर थे फिर भी उनमें आपसी लड़ाइयाँ होती रहती थीं।

इन लड़ाइयों के मुख्य कारण ये थे-प्रथम. गडरिये अक्सर अपनी भेड-बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए हए खेतों में से गज़ार कर ले जाते थे। इससे फ़सलों को बहुत नुकसान पहुँचता था। दूसरा, कई बार ये गड़रिये जो खानाबदोश होते थे, किसानों के गाँवों पर आक्रमण कर उनके माल को लूट ले जाते थे। तीसरा, अनेक बार किसान इन पशुचारकों का रास्ता रोक लेते थे तथा उन्हें अपने पशुओं को जल स्रोतों तक नहीं ले जाने देते थे। गड़रियों के कुछ समूह फ़सल काटने वाले मज़दूरों अथवा भाड़े के सैनिकों के रूप में आते थे। समृद्ध होने पर वे यहीं बस जाते थे।

मारी में अक्कदी, एमोराइट, असीरियाई तथा आर्मीनियन जाति के लोग रहते थे। मारी के राजा एमोराइट समुदाय से संबंधित थे। उनकी पोशाक वहाँ के मूल निवासियों से भिन्न होती थी। मारी के राजा मेसोपोटामिया के विभिन्न देवी-देवताओं का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने डैगन (Dagan) देवता की स्मृति में मारी में एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था। इस प्रकार मारी में विभिन्न जातियों एवं समुदायों के मिश्रण से वहाँ एक नई संस्कृति का जन्म हआ।

मारी में क्योंकि विभिन्न जन-जातियों के लोग रहते थे इसलिए वहाँ के राजाओं को सदैव सतर्क रहना पड़ता था। खानाबदोश पशुचारकों की गतिविधियों पर विशेष नज़र रखी जाती थी। मारी के प्रसिद्ध शासक ज़िमरीलिम (Zimrilim) ने वहाँ एक विशाल राजमहल का निर्माण (1810 1760 ई० पू०) करवाया था। यह 2.4 हैक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ था। इसके 260 कमरे थे। यह अपने समय में न केवल अन्य राजमहलों में सबसे विशाल था अपितु यह अत्यंत सुंदर भी था।

इसका निर्माण विभिन्न रंगों के सुंदर पत्थरों से किया गया था। इस राजमहल में लगे भित्ति चित्र (wall paintings) इतने आकर्षक थे कि इसे देखने वाला व्यक्ति चकित रह जाता था। इस राजमहल की भव्यता को अपनी आँखों से देखने सीरिया एवं अलेप्पो (Aleppo) के शासक स्वयं आए थे। मारी नगर व्यापार का एक प्रसिद्ध केंद्र भी था। इसके न केवल मेसोपोटामिया के अन्य नगरों अपितु विदेशों, ती. सीरिया. लेबनान.ईरान आदि देशों के साथ व्यापारिक संबंध थे।

मारी में आने-जाने वाले जहाजों के सामान की अधिकारियों द्वारा जाँच की जाती थी। वे जहाजों में लदे हुए माल की कीमत का लगभग 10% प्रभार (charge) वसूल करते थे। मारी की कुछ पट्टिकाओं (tablets) में साइप्रस के द्वीप अलाशिया (Alashiya) से आने वाले ताँबे का उल्लेख मिला है। यह द्वीप उन दिनों ताँबे तथा टिन के व्यापार के लिए विशेष रूप से जाना जाता था। मारी के व्यापार ने निस्संदेह इस नगर की समृद्धि में उल्लेखनीय योगदान दिया था।

4. निनवै :
निनवै प्राचीन मेसोपोटामिया के महत्त्वपूर्ण नगरों में से एक था। यह दज़ला नदी के पूर्वी तट पर स्थित था। यह 1800 एकड़ भूमि में फैला हुआ था। इसकी स्थापना 1800 ई० पू० में नीनस (Ninus) ने की थी। असीरियाई शासकों ने निनवै को अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया था। सेनाचारिब (Sennacharib) ने अपने शासनकाल (705 ई० पू० से 681 ई० पू०) में निनवै का अद्वितीय विकास किया। उसने यहाँ एक विशाल राजमहल का निर्माण करवाया। यह 210 मीटर लंबा एवं 200 मीटर चौड़ा था। इसमें 80 कमरे थे। इसे अत्यंत सुंदर मूर्तियों एवं चित्रकारी से सुसज्जित किया गया था। इस राजमहल में अनेक फव्वारे एवं उद्यान लगाए गए थे।

इसके अतिरिक्त उसने निनवै में अनेक भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया। उसने यातायात के साधनों का विकास किया। उसने कृषि के विकास के लिए अनेक नहरें खुदवाईं। उसने निनवै की सुरक्षा के लिए चारों ओर एक विशाल दीवार का निर्माण करवाया। निनवै के विकास में दूसरा महत्त्वपूर्ण योगदान असुरबनिपाल (Assurbanipal) ने दिया। उसने 668 ई० पू० से 627 ई० पू० तक शासन किया था। उसे भवन निर्माण कला से विशेष प्यार था।

अतः उसने अपने साम्राज्य से अच्छे कारीगरों एवं कलाकारों को निनवै में एकत्र किया। उन्होंने अनेक भव्य भवनों एवं मंदिरों का निर्माण किया। पुराने भवनों एवं मंदिरों की मुरम्मत भी की गई। अनेक उद्यान स्थापित किए गए। इससे निनवै की सुंदरता में एक नया निखार आ गया। उसे साहित्य से विशेष लगाव था। अतः उसकी साहित्य के विकास में बहुत दिलचस्पी थी। उसने निनवै में नाबू (Nabu) के मंदिर में एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की थी। इस पुस्तकालय में उसने अनेक प्रसिद्ध लेखकों को बुला कर उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों को रखवाया था।

इस पुस्तकालय में लगभग 1000 मूल ग्रंथ एवं 30,000 पट्टिकाएँ (tablets) थीं। इन्हें विषयानुसार वर्गीकृत किया गया था। इनमें प्रमुख विषय ये थे इतिहास, महाकाव्य, ज्योतिष, दर्शन, विज्ञान एवं कविताएँ। असुरबनिपाल ने स्वयं भी अनेक पट्टिकाएँ लिखीं। असुरबनिपाल के पश्चात् निनवै ने अपना गौरव खो दिया।

5. बेबीलोन :
बेबीलोन दज़ला नदी के उत्तर-पश्चिम में स्थित था। इसकी राजधानी का नाम बेबीलोनिया था। इस नगर ने प्राचीन काल मेसोपोटामिया के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस नगर की स्थापना अक्कद (Akkad) के शासक सारगोन (Sargon) ने अपने शासनकाल (2370 ई० पू०-2315 ई० पू०) के दौरान की थी। उसने यहाँ अनेक भवनों का निर्माण करवाया। उसने देवता मर्दुक (Marduk) की स्मृति में एक विशाल मंदिर का निर्माण भी करवाया। हामूराबी के शासनकाल (1780 ई० पू०-1750 ई० पू०) में बेबीलोन ने उल्लेखनीय विकास किया।

बाद में असीरिया के शासक तुकुती निर्ता (Tukuti Ninarta) ने बेबीलोन पर अधिकार कर लिया था। 625 ई० पू० में नैबोपोलास्सर (Nabopolassar) ने बेबीलोनिया को असीरियाई शासन से स्वतंत्र करवा लिया था। इस प्रकार नैबोपोलास्सर ने बेबीलोन में कैल्डियन वंश की स्थापना की। उसके एवं उसके उत्तराधिकारियों के अधीन बेबीलोन में एक गौरवपूर्ण युग का आरंभ हुआ। इसकी गणना विश्व के प्रमुख नगरों में की जाने लगी।

उस समय इसका क्षेत्रफल 850 हैक्टेयर से अधिक था। इसके चारों ओर एक तिहरी दीवार (triple wall) बनाई गई थी। इसमें अनेक विशाल एवं भव्य राजमहलों एवं मंदिरों का निर्माण किया गया था। एक विशाल ज़िगुरात (Ziggurat) भाव सीढ़ीदार मीनार (stepped tower) बेबीलोन के आकर्षण का मुख्य केंद्र था।

बेबीलोन एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र भी था। इस नगर ने भाषा, साहित्य, विज्ञान एवं चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। 331 ई० पू० में सिकंदर ने बेबीलोन पर अधिकार कर लिया था। नैबोनिडस (Nabonidus) स्वतंत्र बेबीलोन का अंतिम शासक था।

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प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया सभ्यता के ‘मारी नगर’ का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया करके प्रश्न नं० 3 के भाग 3 का उत्तर देखें।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों के स्वरूप की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
मेसोपोटामिया के शहरी जीवन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शहरी जीवन की शुरुआत 3000 ई० पू० में मेसोपोटामिया में हुई थी। उर, उरुक, मारी, निनवै एवं बेबीलोन आदि मेसोपोटामिया के प्रमुख शहर थे। प्रारंभिक शहरी समाजों के स्वरूप के बारे में हम अग्रलिखित तथ्यों से अनुमान लगा सकते हैं

1. नगर योजना:
मेसोपोटामिया के नगर एक वैज्ञानिक योजना के अनुसार बनाए गए थे। नगरों में मज़बूत भवनों का निर्माण किया जाता था। अत: मकानों की नींव में पकाई हुई ईंटों का प्रयोग किया जाता था। उस समय अधिकतर घर एक मंजिला होते थे। इन घरों में एक खुला आँगन होता था। इस आँगन के चारों ओर कमरे बनाए जाते थे। गर्मी से बचने के लिए धनी लोग अपने घरों के नीचे तहखाने बनाते थे।

मकानों में प्रकाश के लिए खिड़कियों का प्रबंध होता था। उर नगर के लोग परिवारों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए खिड़कियाँ नहीं बनाते थे। पानी की निकासी के लिए नालियों का प्रबंध किया जाता था। नगरों में यातायात की आवाजाही के लिए सड़कों का उचित प्रबंध किया जाता था। प्रशासन सड़कों की सफाई की ओर विशेष ध्यान देता था। सड़कों पर रोशनी का भी प्रबंध किया जाता था।

2. प्रमुख वर्ग :
उस समय प्रारंभिक शहरी समाजों में सामाजिक असमानता के भेद का प्रचलन हो चुका था। उस समय समाज में तीन प्रमुख वर्ग प्रचलित थे। प्रथम वर्ग कुलीन लोगों का था। इसमें राजा, राज्य के अधिकारी, उच्च सैनिक अधिकारी, धनी व्यापारी एवं पुरोहित सम्मिलित थे। इस वर्ग को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। इस वर्ग के लोग बहुत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। वे भव्य महलों एवं भवनों में रहते थे। वे बहुमूल्य वस्त्रों को पहनते थे।

वे अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाते थे। उनकी सेवा में अनेक दास-दासियाँ रहती थीं। दूसरा वर्ग मध्य वर्ग था। इस वर्ग में छोटे व्यापारी, शिल्पी, राज्य के अधिकारी एवं बुद्धिजीवी सम्मिलित थे। इनका जीवन स्तर भी काफी अच्छा था। तीसरा वर्ग समाज का सबसे निम्न वर्ग था। इसमें किसान, मजदूर एवं दास सम्मिलित थे। यह समाज का बहुसंख्यक वर्ग था।

इस वर्ग की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। उर में मिली शाही कब्रों में राजाओं एवं रानियों के शवों के साथ अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ विशाल मात्रा में मिली हैं। दूसरी ओर साधारण लोगों के शवों के साथ केवल मामूली वस्तुओं को दफनाया जाता था। इससे स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय धन-दौलत का अधिकाँश हिस्सा एक छोटे-से वर्ग में केंद्रित था।

3. परिवार :
परिवार को समाज की आधारशिला माना जाता था। प्राचीन काल में मेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार (nuclear family) का प्रचलन अधिक था। इस परिवार में पुरुष, उसकी पत्नी एवं उनके बच्चे सम्मिलित होते थे। पिता परिवार का मुखिया होता था। परिवार के अन्य सदस्यों पर उसका पूर्ण नियंत्रण होता था। अतः परिवार के सभी सदस्य उसके आदेशों का पालन करते थे। उस समय परिवार में पुत्र का होना आवश्यक माना जाता था। माता-पिता अपने बच्चों को बेच सकते थे। बच्चों का विवाह माता-पिता की सहमति से होता था। उस समय विवाह बहुत हर्षोल्लास के साथ किए जाते थे।

4. स्त्रियों की स्थिति:
प्रारंभिक शहरी समाज में स्त्रियों की स्थिति काफी अच्छी थी। उन्हें अनेक अधिकार प्राप्त थे। वे पुरुषों के साथ धार्मिक एवं सामाजिक उत्सवों में समान रूप से भाग लेती थीं। पति की मृत्यु होने पर वह पति की संपत्ति की संरक्षिका मानी जाती थीं। पत्नी को पती से तलाक लेने एवं पुनः विवाह करने का अधिकार प्राप्त था। वे अपना स्वतंत्र व्यापार कर सकती थीं।

वे अपने पथक दास-दासियाँ रख सकती थीं। वे पुरोहित एवं समाज के अन्य उच्च पदों पर नियुक्त हो सकती थी। उस समय समाज में देवदासी प्रथा प्रचलित थी। उस समय पुरुष एक स्त्री से विवाह करता था किंतु उसे अपनी हैसियत के अनुसार कुछ उप-पत्नियाँ रखने का भी अधिकार प्राप्त था।

5. दासों की स्थिति :
प्रारंभिक शहरी समाजों में दासों की स्थिति सबसे निम्न थी। उस समय दास तीन प्रकार के थे-(i) युद्धबंदी (ii) माता-पिता द्वारा बेचे गये बच्चे एवं (iii) कर्ज न चुका सकने वाले व्यक्ति । दास बनाए गए व्यक्तियों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था। इन दासों को किसी प्रकार का कोई अधिकार प्राप्त न था। उन्हें अपने स्वामी के आदेशों का पालन करना पड़ता था। ऐसा न करने वाले दास अथवा दासी को कठोर दंड दिए जाते थे। यदि कोई दास भागने का प्रयास करते हुए पकड़ा जाता तो उसे मृत्यु दंड दिया जाता था।

स्वामी जब चाहे किसी दास की सेवा से प्रसन्न होकर उसे मुक्त कर सकता था। कोई भी दास अपने स्वामी को धन देकर अपनी मुक्ति प्राप्त कर सकता था। कोई भी स्वतंत्र नागरिक अपनी दासी को उप-पत्नी बना सकता था। दासी से उत्पन्न संतान को स्वतंत्र मान लिया जाता था।

6. मनोरंजन :
प्रारंभिक शहरी समाजों के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। नृत्य गान उनके जीवन का एक अभिन्न अंग था। मंदिरों में भी संगीत एवं नृत्य-गान के विशेष सम्मेलन होते रहते थे। वे शिकार खेलने, पशु-पक्षियों की लड़ाइयाँ देखने एवं कुश्तियाँ देखने के भी बहुत शौकीन थे। वे शतरंज खेलने में भी बहुत रुचि लेते थे। खिलौने बच्चों के मनोरंजन का मुख्य साधन थे।

प्रश्न 6.
दक्षिणी मेसोपोटामिया के मंदिरों तथा उनके महत्त्व के बारे में आप क्या जानते हैं ?
अथवा
दक्षिणी मेसोपोटामिया के मंदिरों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
दक्षिणी मेसोपोटामिया के मंदिरों ने यहाँ के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मेसोपोटामिया के लोग अपने देवी-देवताओं की स्मृति में अनेक मंदिरों का निर्माण करते थे। इनमें प्रमुख मंदिर नन्ना (Nanna) जो चंद्र देव था, अनु (Anu) जो सूर्य देव था, एनकी (Enki) जो वायु एवं जल देव था तथा इन्नाना (Inanna) जो प्रेम एवं युद्ध की देवी थी, के लिए बनाए गए थे। इनके अतिरिक्त प्रत्येक नगर का अपना देवी-देवता होता था जो अपने नगर की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहते थे।

1. आरंभिक मंदिर :
दक्षिणी मेसोपोटामिया में आरंभिक मंदिर छोटे आकार के थे तथा ये कच्ची ईंटों के बने हुए थे। समय के साथ-साथ जैसे-जैसे इन मंदिरों का महत्त्व बढ़ता गया वैसे-वैसे ये मंदिर विशाल एवं भव्य होते चले गए। इन मंदिरों को पर्वतों के ऊपर बनाया जाता था। उस समय मेसोपोटामिया के लोगों की यह धारणा थी कि देवता पर्वतों में निवास करते हैं। ये मंदिर पक्की ईंटों से बनाए जाते थे।

इन मंदिरों की विशेषता यह थी कि मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ खास अंतरालों के पश्चात् भीतर और बाहर की ओर मुड़ी होती थीं। साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं। इन मंदिरों के आँगन खुले होते थे तथा इनके चारों ओर अनेक कमरे बने होते थे। प्रमुख कमरों में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं। कुछ कमरों में मंदिरों के परोहित निवास करते थे। अन्य कमरे मंदिर में आने वाले यात्रियों के लिए थे।

2. मंदिरों के क्रियाकलाप :
दक्षिणी मेसोपोटामिया के समाज में मंदिरों की उल्लेखनीय भूमिका थी। उस समय मंदिरों को बहुत-सी भूमि दान में दी जाती थी। इस भूमि पर खेती की जाती थी एवं पशु पालन किया जाता था। इनके अतिरिक्त इस भूमि पर उद्योगों की स्थापना की जाती थी एवं बाजार स्थापित किए जाते थे। इस कारण मंदिर बहुत धनी हो गए थे।

मेसोपोटामिया के मंदिरों में प्राय: विद्यार्थियों को शिक्षा भी दी जाती थी। शिक्षा का कार्य पुरोहितों द्वारा किया जाता था। अनेक मंदिरों में बड़े-बड़े पुस्तकालय भी स्थापित किए गए थे। मंदिरों द्वारा सामान की खरीद एवं बिक्री भी की जाती थी। मंदिरों द्वारा व्यापारियों को धन सूद पर दिया जाता था। इस कारण मंदिरों ने एक मुख्य शहरी संस्था का रूप धारण कर लिया था।

3. उपासना विधि:
दक्षिणी मेसोपोटामिया के लोग परलोक की अपेक्षा इहलोक की अधिक चिंता करते थे। वे अपने देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए अन्न, दही, खजूर एवं मछली आदि भेंट करते थे। इनके अतिरिक्त वे बैलों, भेड़ों एवं बकरियों आदि की बलियाँ भी देते थे। इन्हें विधिपूर्ण पुरोहितों के सहयोग से देवी-देवताओं को भेंट किया जाता था। उस समय मेसोपोटामिया के लोगों के कर्मकांड न तो अधिक जटिल थे एवं न ही अधिक खर्चीले। इसके बदले उपासक यह आशा करते थे कि उनके जीवन में कभी कष्ट न आएँ।

4. मनोरंजन के केंद्र :
दक्षिणी मेसोपोटामिया के मंदिर केवल उपासना के केंद्र ही नहीं थे अपितु वे मनोरंजन के केंद्र भी थे। इन मंदिरों में स्थानीय गायक अपनी कला से लोगों का मनोरंज करते थे। इन मंदिरों में समूहगान एवं लोक नृत्य भी हुआ करते थे। यहाँ नगाड़े एवं अन्य संगीत यंत्रों को बजाया जाता था। त्योहारों के अवसरों पर यहाँ बड़ी संख्या में लोग आते थे। वे एक-दूसरे के संपर्क में आते थे तथा उनमें एक नया प्रोत्साहन उत्पन्न होता था।

5. लेखन कला के विकास में योगदान :
दक्षिणी मेसोपोटामिया में लेखन कला के विकास में मंदिरों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। लेखन कला के अध्ययन एवं अभ्यास के लिए अनेक मंदिरों में पाठशालाएँ स्थापित की गई थीं। यहाँ विद्यार्थियों को सर्वप्रथम संकेतों की नकल करना सिखाया जाता था। धीरे-धीरे वे कठिन शब्दों को लिखने में समर्थ हो जाते थे। क्योंकि उस समय बहत कम लोग लिपिक का कार्य कर सकते थे इसलिए समाज में इस वर्ग की काफी प्रतिष्ठा थी।

प्रश्न 7.
लेखन पद्धति के विकास के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
लेखन पद्धति के विकास के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानव इतिहास पर लेखन कला का क्या प्रभाव पड़ा ?
अथवा
लेखन कला की दुनिया को सबसे बड़ी देन क्या है ?
उत्तर:
I. लेखन कला का विकास

किसी भी देश की सभ्यता के बारे में जानने के लिए हमें उस देश की लिपि एवं भाषा का ज्ञात होना अत्यंत आवश्यक है। प्रारंभिक नगरों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि लेखन कला का विकास था। इसे सभ्यता के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पग माना जाता है। मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम लिपि की खोज सुमेर में 3200 ई० पू० में हुई। इस लिपि का आरंभ वहाँ के मंदिरों के पुरोहितों ने किया। उस समय मंदिर विभिन्न क्रियाकलापों और व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे। इन मंदिरों की देखभाल पुरोहितों द्वारा स्वतंत्र रूप से की जाती थी।

पुरोहित मंदिरों की आय-व्यय तथा व्यापार का पूर्ण विवरण एक निराले ढंग से रखते थे। वे मिट्टी की पट्टिकाओं पर मंदिरों को मिलने वाले सामानों एवं जानवरों के चित्रों जैसे चिह्न बनाकर उनकी संख्या भी लिखते थे। हमें मेसोपोटामिया के दक्षिणी नगर उरुक के मंदिरों से संबंधित लगभग 5000 सूचियाँ मिली हैं। इनमें बैलों, मछलियों एवं रोटियाँ आदि के चित्र एवं संख्याएँ दी गई हैं। इससे वस्तुओं को स्मरण रखना सुगम हो जाता था। इस प्रकार मेसोपोटामिया में चित्रलिपि (pictographic script) का जन्म हुआ।

मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं (tablets of clay) पर लिखा करते थे। लिपिक चिकनी मिट्टी को गीला करता था। इसके पश्चात् उसे गूंध कर एक ऐसे आकार की पट्टी का रूप दे देता था जिसे वह सुगमता से अपने हाथ में पकड़ सके। इसके बाद वह सरकंडे की तीली की तीखी नोक से उसकी नम चिकनी सतह पर कीलाकार चिह्न (cuneiform) बना देता था। इसे बाएं से दाएँ लिखा जाता था। इस लिपि का प्रचलन 2600 ई० पू० में हुआ था। 1850 ई० पू० में कीलाकार लिपि के अक्षरों को पहचाना एवं पढ़ा गया। ये पट्टिकाएँ विभिन्न आकारों की होती थीं। जब इन पट्टिकाओं पर लिखने का कार्य पूर्ण हो जाता था तो इन्हें पहले धूप में सुखाया जाता था तथा फिर आग में पका लिया जाता था।

इस कारण वे पत्थर की तरह कठोर हो जाया करती थीं। इसके तीन लाभ थे। प्रथम, वे पेपिरस (pepirus) की तरह जल्दी नष्ट नहीं होती थीं। दूसरा, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित ले जाया जा सकता था। तीसरा, एक बार लिखे जाने पर इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करना संभव नहीं था। इस लिपि का प्रयोग अब मंदिरों को दान में प्राप्त वस्तुओं का ब्योरा रखने के लिए नहीं अपितु शब्द कोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता देने तथा राजाओं के कार्यों का वर्णन करने के लिए किया जाने लगा।

मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन (Sumerian) थी। 2400 ई० पू० के आस-पास सुमेरियन भाषा का स्थान अक्कदी (Akkadi) भाषा ने ले लिया। 1400 ई० पू० से धीरे-धीरे अरामाइक (Aramaic) भाषा का प्रचलन आरंभ हुआ। 1000 ई० पू० के पश्चात् अरामाइक भाषा का प्रचलन व्यापक रूप से होने लगा। यद्यपि मेसोपोटामिया में लिपि का प्रचलन हो चुका था किंतु इसके बावजूद यहाँ साक्षरता (literacy) की दर बहुत कम थी।

इसका कारण यह था कि केवल चिह्नों की संख्या 2000 से अधिक थी। इसके अतिरिक्त यह भाषा बहुत पेचीदा थी। अतः इस भाषा को केवल विशेष प्रशिक्षण प्राप्त लोग ही सीख सकते थे। मेसोपोटामिया की लिपि के कारण ही इतिहासकार इस सभ्यता पर विस्तृत प्रकाश डाल सके हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार रिचर्ड एल० ग्रीवस का यह कथन ठीक है कि, “सुमेरियनों की सबसे महत्त्वपूर्ण एवं दीर्घकालीन सफलता उनकी लेखन कला का विकास था।”1

II. लेखन कला की देन

मेसोपोटामिया में लेखन कला के आविष्कार को मानव इतिहास की एक अति महत्त्वपूर्ण घटना माना जाता था। यह मानव सभ्यता के विकास में एक मील का पत्थर सिद्ध हुई। लेखन कला के कारण सम्राट के आदेशों, उनके समझौतों तथा कानूनों को दस्तावेज़ों का रूप देना संभव हुआ। मेसोपोटामिया ने विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों-गणित, खगोल विद्या तथा औषधि विज्ञान में आश्चर्यजनक उन्नति की थी। उनके लिखित दस्तावेजों के कारण विश्व को उनके अमूल्य ज्ञान का पता चला।

उनके द्वारा दी गई वर्ग, वर्गमूल, चक्रवृद्धि ब्याज, गुणा तथा भाग, वर्ष का 12 महीनों में विभाजन, 1 महीने का 4 हफ्तों में विभाजन, 1 दिन का 24 घंटों में तथा 1 घंटे का 60 मिनटों में विभाजन, सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण, आकाश में तारों तथा तारामंडल की स्थिति को आज पूरे विश्व में मान्यता दी गई है। लेखन कला के विकास के कारण मेसोपोटामिया में शिक्षा एवं साहित्य के विकास में आशातीत विकास हुआ। निनवै से प्राप्त हुआ एक विशाल पुस्तकालय इसकी पुष्टि करता है। इस कारण लोगों में नव-चेतना का संचार हुआ। संक्षेप में इसने मेसोपोटामिया के समाज पर दूरगामी प्रभाव डाले।

क्रम संख्या

क्रम संख्याकालघटना
1.7000-6000 ई० पू०मेसोपोटामिया में कृषि का आरंभ।
2.3200 ई० पू०मेसोपोटामिया में लेखन कला का विकास।
3.3050 ई० पू०लगश के प्रथम शासक उरनिना का सिंहासन पर बैठना।
4.3000 ई० पू०मेसोपोटामिया में नगरों का उत्थान, उरुक नगर का आरंभ, वार्का शीर्ष का प्राप्त होना।
5.2000-1759 ई० पू०मारी नगर का उत्थान।
6.2800-2370 ई० पू०किश नगर का विकास।
7.2670 ई० पू०मेसनीपद का उर के सिंहासन पर बैठना।
8.2600 ई० पू०कीलाकार लिपि का प्रचलन।
9.2400 ई० पू०सुमेरियन के स्थान पर अक्कदी भाषा का प्रयोग।
10.2200 ई० पू०एलमाइटों द्वारा उर नगर का विनाश।
11.2000 ई० पू०गिल्गेमिश महाकाव्य को 12 पट्टिकाओं पर लिखवाना।
12.1810-1760 ई० पू०ज़िमरीलिम के मारी स्थित राजमहल का निर्माण।
13.2400 ई० पू०सुमेरियन भाषा का प्रचलन बंद होना।
14.1800 ई० पू०नीनस द्वारा निनवै की स्थापना।
15.1780-1750 ई० पू०हामूराबी का शासनकाल।
16.1759 ई० पू०हामूराबी द्वारा मारी नगर का विनाश।
17.1400 ई० पू०अरामाइक भाषा का प्रचलन।
18.705-681 ई० पू०निनवै में सेनाचारिब का शासनकाल।
19.668-627 ई० पू०असुरबनिपाल का शासनकाल।
20.625 ई० पू०नैबोपोलास्सर द्वारा बेबीलोनिया को असीरियाई शासन से स्वतंत्र करवाना।
21.612 ई० पू०नैबोपोलास्सर द्वारा निमरुद नगर का विनाश।
22.1840 ईमेसोपोटामिया में पुरातत्त्वीय खोजों का आरंभ।
23.1845-1851 ई०हेनरी अस्टेन लैयार्ड द्वारा निमरुद नगर का उत्खनन।
24.1850 ईकीलाकार लिपि के अक्षरों को पहचाना एवं पढ़ा गया। जुलीयस जोर्डन द्वारा उरुक नगर की खुदाई।
25.1913 ई०सर लियोनार्ड वूले द्वारा उर नगर की खुदाई।
261920-1930 ई。फ्रांसीसियों द्वारा मारी नगर का उत्खनन।
27.1933 ई०नैबोपोलास्सर द्वारा निमरुद नगर का विनाश।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
दजला एवं फ़रात नदियों ने मेसोपोटामिया के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कैसे ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया से अभिप्राय है दो नदियों के मध्य का प्रदेश। ये नदियाँ हैं दजला एवं फ़रात । इन नदियों को मेसोपोटामिया सभ्यता की जीवन रेखा कहा जाता है। दजला एवं फ़रात नदियों का उद्गम आर्मीनिया के उत्तरी पर्वतों तोरुस से होता है। इन पर्वतों की ऊँचाई लगभग 10,000 फुट है। यहाँ लगभग सारा वर्ष बर्फ जमी रहती है। इस क्षेत्र में वर्षा भी पर्याप्त होती है। दजला 1850 किलोमीटर लंबी है।

इसका प्रवाह तीव्र है तथा इसके तट ऊँचे एवं अधिक कटे-फटे हैं। इसलिए प्राचीनकाल में इस नदी के तटों पर बहुत कम नगरों की स्थापना हुई थी। दूसरी ओर फ़रात नदी ने मेसोपोटामिया के इतिहास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

यह नदी 2350 किलोमीटर लंबी है। इसका प्रवाह कम तीव्र है। इसके तट कम ऊँचे एवं कम कटे-फटे हैं। इस कारण प्राचीनकाल के प्रसिद्ध नगरों की स्थापना इस नदी के तटों पर हुई। दजला एवं फ़रात नदियाँ उत्तरी पर्वतों से निकल कर अपने साथ उपजाऊ मिट्टी लाती थीं। इस उपजाऊ मिट्टी के कारण एवं नहरों के कारण यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता था।

प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन के बावजूद कृषि अनेक बार संकट से घिर जाती थी। क्यों ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि अनेक बार संकटों से घिर जाती थी। इसके अनेक कारण थे। प्रथम, दजला एवं फ़रात नदियों में कभी-कभी भयंकर बाढ़ आ जाती थी। इस कारण फ़सलें नष्ट हो जाती थीं। दूसरा, कई बार पानी की तीव्र गति के कारण ये नदियाँ अपना रास्ता बदल लेती थीं। इससे सिंचाई व्यवस्था चरमरा जाती थी। मेसोपोटामिया में वर्षा की कमी होती थी।

अतः फ़सलें सूख जाती थीं। तीसरा, नदी के ऊपरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग नहरों का प्रवाह अपने खेतों की ओर मोड़ लेते थे। इस कारण निचले क्षेत्रों में बसे हुए गाँवों को खेतों के लिए पानी नहीं मिलता था। चौथा, ऊपरी क्षेत्रों के लोग अपने हिस्से की सरणी में से मिट्टी नहीं निकालते थे। इस कारण निचले क्षेत्रों में पानी का बहाव रुक जाता था। इस कारण पानी के लिए गाँववासियों में अनेक बार झगड़े हुआ करते थे।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

प्रश्न 3.
आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया में शहरीकरण के विकास में प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर का बहुमूल्य योगदान था। यहाँ की भूमि में प्राकृतिक उर्वरता थी। इससे खेती को बहुत प्रोत्साहन मिला। प्राकृतिक उर्वरता के कारण पशुओं को चारे के लिए कोई कमी नहीं थी। अत: पशुपालन को भी प्रोत्साहन मिला। पशुओं से न केवल दूध, माँस एवं ऊन प्राप्त किया जाता था अपितु उनसे खेती एवं यातायात का कार्य भी लिया जाता था। खेती एवं पशुपालन के कारण मानव जीवन स्थायी बन गया।

अत: उसे भोजन की तलाश में स्थान-स्थान पर घूमने की आवश्यकता नहीं रही। स्थायी जीवन होने के कारण मानव झोंपड़ियाँ बना कर साथ-साथ रहने लगा। इस प्रकार गाँव अस्तित्व में आए। खाद्य उत्पादन के बढ़ने से वस्तु विनिमय की प्रक्रिया आरंभ हो गई। इस कारण नये-नये व्यवसाय आरंभ हो गए। इससे नगरीकरण की प्रक्रिया को बहुत बल मिला।

प्रश्न 4.
नगरीय विकास में श्रम विभाजन का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
श्रम विभाजन को नगरीय विकास का एक महत्त्वपूर्ण कारक माना जाता है। नगरों के लोग आत्मनिर्भर नहीं होते। उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के लिए एक पत्थर की मुद्रा बनाने वाले को पत्थर पर उकेरने के लिए काँसे के औज़ारों की आवश्यकता होती है। ऐसे औजारों का वह स्वयं निर्माण नहीं करता। इसके अतिरिक्त वह मुद्रा बनाने के लिए आवश्यक रंगीन पत्थर के लिए भी अन्य व्यक्तियों पर निर्भर करता है।

वह व्यापार करना भी नहीं जानता। उसकी विशेषज्ञता तो केवल पत्थर उकेरने तक ही सीमित होती है। इस प्रकार नगर के लोग अन्य लोगों पर उनकी सेवाओं के लिए अथवा उनके द्वारा उत्पन्न की गई वस्तुओं पर निर्भर करते हैं। संक्षेप में श्रम विभाजन को शहरी जीवन का एक महत्त्वपूर्ण आधार माना जाता है।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया में मुद्राएँ किस प्रकार बनाई जाती थीं तथा इनका क्या महत्त्व था ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के नगरों से हमें बड़ी संख्या में मुद्राएँ मिली हैं। ये मुद्राएँ पत्थर की होती थीं तथा इनका आकार बेलनाकार था। ये बीच में आर-पार छिदी होती थीं। इसमें एक तीली लगायी जाती थी। इसे फिर गीली मिट्टी के ऊपर घुमा कर चित्र बनाए जाते थे। इन्हें अत्यंत कुशल कारीगरों द्वारा उकेरा जाता था। इन मुद्राओं पर कभी-कभी इसके स्वामी का नाम, उसके देवता का नाम तथा उसके रैंक आदि का वर्णन भी किया जाता था।

इन मुद्राओं का प्रयोग व्यापारियों द्वारा अपना सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित भेजने के लिए किया जाता था। ये व्यापारी अपने सामान को एक गठरी में बाँध कर ऊपर गाँठ लगा लेते थे। इस गाँठ पर वह मुद्रा का ठप्पा लगा देते थे। इस प्रकार यह मुद्रा उस सामान की प्रामाणिकता का प्रतीक बन जाती थी। यदि यह मुद्रा टूटी हुई पाई जाती तो पता लग जाता कि रास्ते में सामान के साथ छेड़छाड़ की गई है अन्यथा भेजा गया सामान सुरक्षित है। निस्संदेह मुद्राओं के प्रयोग ने नगरीकरण के विकास में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

प्रश्न 6.
3000 ई० पू० में उरुक नगर ने तकनीकी क्षेत्र में अद्वितीय विकास किया गया। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ?
उत्तर:
3000 ई० पू० के आस-पास उरुक नगर ने तकनीकी क्षेत्र में अद्वितीय विकास किया। इसका अनुमान इस बात से लगाया जाता है कि उस समय के लोगों ने अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औज़ारों का प्रयोग आरंभ कर दिया था। इसके अतिरिक्त वास्तुविदों ने ईंटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया था। इससे भवन निर्माण कला के क्षेत्र में एक नयी क्राँति आई।

इसका कारण यह था कि उस समय बड़े-बड़े कमरों की छतों के बोझ को संभालने के लिए शहतीर बनाने के लिए उपयुक्त लकड़ी उपलब्ध नहीं थी। बड़ी संख्या में लोग चिकनी मिट्टी के शंकु बनाने एवं पकाने का कार्य करते थे। इन शंकुओं को भिन्न-भिन्न रंगों से रंगा जाता था। इसके पश्चात् इन्हें मंदिरों की दीवारों पर लगाया जाता था।

इससे मंदिरों की सुंदरता बहुत बढ़ जाती थी। उरुक नगर के लोगों ने मूर्तिकला के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति की। इसका अनुमान 3000 ई० पू० में उरुक नगर से प्राप्त वार्का शीर्ष से लगाया जा सकता है। यह एक स्त्री का सिर था। इसे सफ़ेद संगमरमर को तराश कर बनाया गया था। इसके सिर के ऊपर एक खाँचा बनाया गया था जिसे शायद आभूषण पहनने के लिए बनाया गया था। कुम्हार के चाक के निर्माण से प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया। इस कारण बड़ी संख्या में एक जैसे बर्तन बनाना सुगम हो गया।

प्रश्न 7.
उर नगर में नगर योजना का पालन नहीं किया गया था। उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
उर नगर के उत्खनन से जो निष्कर्ष सामने आता है उससे यह ज्ञात होता है कि इसमें नगर योजना का पालन नहीं किया गया था। इस नगर की गलियाँ संकरी एवं टेढ़ी-मेढ़ी थीं। अतः पहिए वाली गाड़ियों का घरों तक पहुँचना संभव न था। अतः अनाज के बोरों तथा ईंधन के गट्ठों को संभवतः गधों पर लाद कर पहुँचाया जाता था।

उर नगर में मोहनजोदड़ो की तरह जल निकासी के लिए गलियों के किनारे नालियाँ नहीं थीं। ये नालियाँ घरों के भीतरी आँगन में पाई गई हैं। इससे यह सहज अनुमान लगाया जाता है कि घरों की छतों का ढलान भीतर की ओर होता था। अत: वर्षा के पानी का निकास नालियों के माध्यम से आँगन के भीतर बनी हुई हौजों में ले जाया जाता था। ऐसा इसलिए किया गया था ताकि तीव्र वर्षा के कारण घरों के बाहर बनी कच्ची गलियों में कीचड़ न एकत्र हो जाए।

उर नगर की खुदाई से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उस समय के लोग अपने घर का सारा कूड़ा कचरा बाहर गलियों में फेंक देते थे। इस कारण गलियों की सतहें ऊँची उठ जाती थीं। इस कारण कुछ समय बाद घरों के बरामदों को भी ऊँचा करना पड़ता था ताकि वर्षा के दिनों में बाहर से पानी एवं कूड़ा बह कर घरों के अंदर न आ जाए।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

प्रश्न 8.
मारी नगर क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
1) मारी में अक्कदी, एमोराइट, असीरियाई तथा आर्मीनियन जाति के लोग रहते थे। मारी के राजा एमोराइट समुदाय से संबंधित थे। उनकी पोशाक वहाँ के मूल निवासियों से भिन्न होती थी। मारी के राजा मेसोपोटामिया के विभिन्न देवी-देवताओं का बहुत सम्मान करते थे। इस प्रकार मारी में विभिन्न जातियों एवं समुदायों के मिश्रण से वहाँ एक नई संस्कृति का जन्म हुआ।

2) मारी के प्रसिद्ध शासक ज़िमरीलिम ने वहाँ एक विशाल राजमहल का निर्माण करवाया था। यह 2.4 हैक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ था। इसके 260 कमरे थे। यह अपने समय में न केवल अन्य राजमहलों में सबसे विशाल था अपितु यह अत्यंत सुंदर भी था। इसका निर्माण विभिन्न रंगों के सुंदर पत्थरों से किया गया था।

3) मारी नगर व्यापार का एक प्रसिद्ध केंद्र भी था। इसके न केवल मेसोपोटामिया के अन्य नगरों अपितु विदेशों, तुर्की, सीरिया, लेबनान, ईरान आदि देशों के साथ व्यापारिक संबंध थे। मारी में आने-जाने वाले जहाजों के सामान की अधिकारियों द्वारा जाँच की जाती थी। वे जहाजों में लदे हुए माल की कीमत का लगभग 10% प्रभार वसूल करते थे।

प्रश्न 9.
यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए ख़तरा थे ?
उत्तर:
खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए एक ख़तरा थे। इसके निम्नलिखित कारण थे।

  • गड़रिये आमतौर पर अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए हुए खेतों में से गुज़ार ले जाते थे। इससे फ़सलों को भारी क्षति पहुँचती थी।
  • कई बार ये गड़रिये जो खानाबदोश होते थे, किसानों के गाँवों पर आक्रमण कर उनके माल को लूट लेते थे। इससे शहरी अर्थव्यवस्था को आघात पहुँचता था।
  • अनेक बार किसान इन पशुचारकों का रास्ता रोक लेते थे तथा उन्हें पशुओं को जल स्रोतों तक नहीं ले जाने देते थे। इस कारण उनमें आपसी झगड़े होते थे।
  • कुछ गड़रिये फ़सल काटने वाले मजदूरों अथवा भाड़े के सैनिकों के रूप में शहर आते थे। समृद्ध होने पर वे वहीं बस जाते थे।
  • खानाबदोश समुदायों के पशुओं के अतिचारण से बहुत-ही उपजाऊ जमीन बंजर हो जाती थी।

प्रश्न 10.
मारी स्थित ज़िमरीलिम के राजमहल के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
मारी के प्रसिद्ध शासक ज़िमरीलिम ने मारी में एक भव्य राजमहल का निर्माण (1810-1760 ई० पू०) करवाया था। यह 2.4 हैक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ था। इसके 260 कमरे थे। यह अपने समय में न केवल अन्य राजमहलों में सबसे विशाल था अपितु यह अत्यंत सुंदर भी था। इसका निर्माण विभिन्न रंगों के सुंदर पत्थरों से किया गया था। इस राजमहल में लगे भित्ति चित्र बहुत सुंदर एवं सजीव थे।

इस राजमहल की भव्यता को अपनी आँखों से देखने सीरिया एवं अलेप्पो के शासक स्वयं आए थे। यह राजमहल वहाँ के शाही परिवार का निवास स्थान था। यह प्रशासन का मुख्य केंद्र था। यहाँ कीमती धातुओं के आभूषणों का निर्माण भी किया जाता था। इस राजमहल का केवल एक ही द्वार था जो उत्तर की ओर बना हुआ था।

प्रश्न 11.
असुरबनिपाल पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
असुरबनिपाल की गणना निनवै के महान् शासकों में की जाती है। उसने 668 ई० पू० से 627 ई० पू० तक शासन किया था। वह महान् भवन निर्माता था। अतः उसने अपने साम्राज्य में अनेक भव्य भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया। उसने पुराने भवनों एवं मंदिरों की मुरम्मत भी करवाई। उसने अनेक उद्यान स्थापित किए। इससे निनवै की सुंदरता को चार चाँद लग गए। वह महान् साहित्य प्रेमी भी था।

उसने निनवै में नाबू मंदिर में एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की थी। इस पुस्तकालय में उसने अनेक प्रसिद्ध लेखकों को बुला कर उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों को रखवाया था। इस पुस्तकालय में लगभग 1000 मूल ग्रंथ एवं 30,000 पट्टिकाएँ थीं। इन्हें विषयानुसार वर्गीकृत किया गया था। इनमें प्रमुख विषय ये थे-इतिहास, महाकाव्य, ज्योतिष, दर्शन, विज्ञान एवं कविताएँ। असुरबनिपाल ने स्वयं भी अनेक पट्टिकाएँ लिखीं।

प्रश्न 12.
मेसोपोटामिया के नगर बेबीलोन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
बेबीलोन दजला नदी के उत्तर-पश्चिम में स्थित था। इसकी राजधानी का नाम बेबीलोनिया था। इस नगर ने प्राचीन काल मेसोपोटामिया के इतिहास में अत्यंत उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। इस नगर की स्थापना अक्कद के शासक सारगोन ने की थी। उसने यहाँ अनेक भवनों का निर्माण करवाया। हामूराबी के शासनकाल में बेबीलोन ने अद्वितीय विकास किया। बाद में असीरिया ने बेबीलोन पर अधिकार कर लिया था। 625 ई० पू० में नैबोपोलास्सर ने बेबीलोनिया को असीरियाई शासन से स्वतंत्र करवा लिया था। उसके एवं उसके उत्तराधिकारियों के अधीन बेबीलोन में एक गौरवपूर्ण युग का आरंभ हुआ।

इसकी गणना विश्व के प्रमुख नगरों में की जाने लगी। इसका क्षेत्रफल 850 हैक्टेयर से अधिक था। इसके चारों ओर एक तिहरी दीवार बनाई गई थी। इसमें अनेक विशाल एवं भव्य राजमहलों एवं मंदिरों का निर्माण किया गया था। बेबीलोन एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र भी था। इस नगर ने भाषा, साहित्य, विज्ञान एवं चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। नगर में एक ज़िगुरात यानी सीढ़ीदार मीनार थी एवं नगर के मुख्य अनुष्ठान केंद्र तक शोभायात्रा के लिए एक विस्तृत मार्ग बना हुआ था।

प्रश्न 13.
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में सामाजिक असमानता का भेद आरंभ हो चुका था। कैसे ?
उत्तर:
उस समय प्रारंभिक शहरी समाजों में सामाजिक असमानता का भेद आरंभ हो चुका था। उस समय समाज में तीन प्रमुख वर्ग प्रचलित थे। प्रथम वर्ग कुलीन लोगों का था। इसमें राजा, राज्य के अधिकारी, उच्च सैनिक अधिकारी, धनी व्यापारी एवं पुरोहित सम्मिलित थे। इस वर्ग को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। इस वर्ग के लोग बहुत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। वे सुंदर महलों एवं भवनों में रहते थे।

वे मूल्यवान वस्त्रों को पहनते थे। वे अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाते थे। उनकी सेवा में अनेक दास-दासियाँ रहती थीं। दूसरा वर्ग मध्य वर्ग था। इस वर्ग में छोटे व्यापारी, शिल्पी, राज्य के अधिकारी एवं बुद्धिजीवी सम्मिलित थे। इनका जीवन स्तर भी काफी अच्छा था। तीसरा वर्ग समाज का सबसे निम्न वर्ग था। इसमें किसान, मजदूर एवं दास सम्मिलित थे।

यह समाज का बहुसंख्यक वर्ग था। इस वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उर में मिली शाही कब्रों में राजाओं एवं रानियों के शवों के साथ अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ जैसे आभूषण, सोने के पात्र, सफेद सीपियाँ और लाजवर्द जड़े हुए लकड़ी के वाद्य यंत्र, सोने के सजावटी खंजर आदि विशाल मात्रा में मिले हैं। दूसरी ओर साधारण लोगों के शवों के साथ केवल मामूली से बर्तनों को दफनाया जाता था। इससे स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय धन-दौलत का अधिकांश हिस्सा एक छोटे-से वर्ग में केंद्रित था।

प्रश्न 14.
शहरी अर्थव्यवस्था में एक सामाजिक संगठन का होना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर:
शहरी अर्थव्यवस्था में एक सामाजिक संगठन का होना निम्नलिखित कारणों से ज़रूरी है
1) शहरी विनिर्माताओं के लिए ईंधन, धातु, विभिन्न प्रकार के पत्थर तथा लकड़ी इत्यादि आवश्यक वस्तुएँ विभिन्न स्थानों से आती हैं। इसके लिए संगठित व्यापार और भंडारण की आवश्यकता होती है।

2) शहरों में अनाज एवं अन्य खाद्य पदार्थ गाँवों से आते हैं। अतः उनके संग्रहण एवं वितरण के लिए व्यवस्था की आवश्यकता होती है।

3) अनेक प्रकार के क्रियाकलापों में तालमेल की ज़रूरत होती है। उदाहरण के लिए मोहरों को बनाने वालों को केवल पत्थर ही नहीं, अपितु उन्हें तराश्ने के लिए औज़ार भी चाहिए।

4) शहरी अर्थव्यवस्था में अपना हिसाब-किताब भी लिखित रूप में रखना होता है।

5) ऐसी प्रणाली में कुछ लोग आदेश देते हैं एवं दूसरे उनका पालन करते हैं।

प्रश्न 15.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे।
उत्तर:
इसमें कोई संदेह नहीं कि मेसोपोटामिया के कुछ मंदिर घर जैसे ही थे। ये मंदिर छोटे आकार के थे तथा ये कच्ची ईंटों के बने हुए थे। समय के साथ-साथ जैसे-जैसे इन मंदिरों का महत्त्व बढ़ता गया वैसे-वैसे ये मंदिर विशाल एवं भव्य होते चले गए। इन मंदिरों को पर्वतों के ऊपर बनाया जाता था। उस समय मेसोपोटामिया के लोगों की यह धारणा थी कि देवता पर्वतों में निवास करते हैं। ये मंदिर पक्की ईंटों से बनाए जाते थे।

इन मंदिरों की विशेषता यह थी कि मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ खास अंतरालों के पश्चात् भीतर और बाहर की ओर मुड़ी होती थीं। साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं। इन मंदिरों के आँगन खुले होते थे तथा इनके चारों ओर अनेक कमरे बने होते थे। प्रमुख कमरों में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं। कुछ कमरों में मंदिरों के पुरोहित निवास करते थे। अन्य कमरे मंदिर में आने वाले यात्रियों के लिए थे।

प्रश्न 16.
गिल्गेमिश के महाकाव्य के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
गिल्गेमिश के महाकाव्य को विश्व साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है। गिलोमिश रुक का एक प्रसिद्ध शासक था जिसने लगभग 2700 ई० पू० वहाँ शासन किया था। उसके महाकाव्य को 2000 ई० पू० में 12 पट्टिकाओं पर लिखा गया था। इस महाकाव्य में गिल्गेमिश के बहादुरी भरे कारनामों एवं मृत्यु की मानव पर विजय का बहुत मर्मस्पर्शी वर्णन किया गया है। गिल्गेमिश उरुक का एक प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली शासक था।

वह एक महान् योद्धा था। उसने अनेक प्रदेशों को अपने अधीन कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। जहाँ एक ओर गिल्गेमिश बहुत बहादुर था वहीं दूसरी ओर वह बहुत अत्याचारी भी था। उसके अत्याचारों से देवताओं ने उसके अत्याचारों से प्रजा को मुक्त करवाने के उद्देश्य से एनकीडू को भेजा। दोनों के मध्य एक लंबा युद्ध हुआ।

इस युद्ध में दोनों अविजित रहे। इस कारण दोनों में मित्रता स्थापित हो गई। इसके पश्चात् गिल्गेमिश एवं एनकीडू ने अपना शेष जीवन मानवता की सेवा करने में व्यतीत किया। कुछ समय के पश्चात् एनकोडू एक सुंदर नर्तकी के प्रेम जाल में फंस गया। इस कारण देवता उससे नाराज़ हो गए एवं दंडस्वरूप उसके प्राण ले लिए। एनकीडू की मृत्यु से गिल्गेमिश को गहरा सदमा लगा। वह स्वयं मृत्यु से भयभीत रहने लगा।

इसलिए उसने अमृत्तव की खोज आरंभ की। वह अनेक कठिनाइयों को झेलता हुआ उतनापिष्टिम से मिला। अंतत: गिल्गेमिश के हाथ निराशा लगी। उसे यह स्पष्ट हो गया कि पृथ्वी पर आने वाले प्रत्येक जीव की मृत्यु निश्चित है। अत: वह इस बात से संतोष कर लेता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र एवं उरुक निवासी जीवित रहेंगे।

प्रश्न 17.
मेसोपोटामिया की लेखन प्रणाली के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा करते थे। लिपिक चिकनी मिट्टी को गीला करता था। इसके पश्चात् उसे गूंध कर एक ऐसे आकार की पट्टी का रूप दे देता था जिसे वह सुगमता से अपने हाथ में पकड़ सके। इसके बाद वह सरकंडे की तीली की तीखी नोक से उसकी नम चिकनी सतह पर कीलाकार चिह्न बना देता था। इसे बाएँ से दाएँ लिखा जाता था।

इस लिपि का प्रचलन 2600 ई० पू० में हुआ था। 1850 ई० पू० में कीलाकार लिपि के अक्षरों को पहचाना एवं पढ़ा गया। ये पट्टिकाएँ विभिन्न आकारों की होती थीं। जब इन पट्टिकाओं पर लिखने का कार्य पूर्ण हो जाता था तो इन्हें पहले धूप में सुखाया जाता था तथा फिर आग में पका लिया जाता था। इस कारण वे पत्थर की तरह कठोर हो जाया करती थीं। इसके तीन लाभ थे।

प्रथम, वे पेपिरस की तरह जल्दी नष्ट नहीं होती थीं। दूसरा, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित ले जाया जा सकता था। तीसरा, एक बार लिखे जाने पर इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करना संभव नहीं था। इस लिपि का प्रयोग अब मंदिरों को दान में प्राप्त वस्तुओं का ब्योरा रखने के लिए नहीं अपितु शब्द कोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता देने तथा राजाओं के कार्यों का वर्णन करने के लिए किया जाने लगा।

प्रश्न 18.
विश्व को मेसोपोटामिया की क्या देन है?
उत्तर:
विश्व को मेसोपोटामिया ने निम्नलिखित क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान दिया

  • उसकी कालगणना तथा गणित की विद्वत्तापूर्ण परंपरा को आज तार्किक माना जाता है।
  • उसने गुणा और भाग की जो तालिकाएँ, वर्ग तथा वर्ममूल और चक्रवृद्धि ब्याज की जो सारणियाँ दी हैं उन्हें आज सही माना जाता है।
  • उन्होंने 2 के वर्गमूल का जो मान दिया है वह आज के वर्गमूल के मान के बहुत निकट है।
  • उन्होंने एक वर्ष को 12 महीनों, एक महीने को 4 हफ्तों, एक दिन को 24 घंटों तथा एक घंटे को 60 मिनटों में विभाजित किया है। इसे आज पूर्ण विश्व द्वारा अपनाया गया है।
  • उनके द्वारा सूर्य एवं चंद्र ग्रहण, तारों और तारामंडल की स्थिति को आज तार्किक माना जाता है।
  • उन्होंने आधुनिक विश्व को लेखन कला के अवगत करवाया।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मेसोपोटामिया से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया यूनानी भाषा के दो शब्दों ‘मेसोस’ तथा ‘पोटैमोस’ से बना है। मेसोस से भाव है मध्य तथा पोटैमोस का अर्थ है नदी। इस प्रकार मेसोपोटामिया से अभिप्राय है दो नदियों के मध्य स्थित प्रदेश।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया का आधुनिक नाम क्या है ? यह किन दो नदियों के मध्य स्थित है ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया का आधुनिक नाम इराक है।
  • यह दजला एवं फ़रात नदियों के मध्य स्थित है।

प्रश्न 3.
मेसोपोटामिया के बारे में ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में क्या लिखा हुआ है ?
उत्तर:
यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया इसलिए महत्त्वपूर्ण था क्योंकि बाईबल के प्रथम भाग ओल्ड टेस्टामेंट में मेसोपोटामिया का उल्लेख अनेक संदर्भो में किया गया है। ओल्ड टेस्टामेंट की ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ में ‘शिमार’ का उल्लेख हैं जिसका अर्थ सुमेर ईंटों से बने शहरों की भूमि से हैं।

प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया के पूर्वोत्तर भाग में हरे-भरे, ऊँचे-नीचे मैदान हैं। यहाँ 7000 ई० पू० से 6000 ई० पू० के मध्य खेती शुरू हो गई थी।
  • मेसोपोटामिया के उत्तर में स्टेपी घास के मैदान हैं। यहाँ पशुपालन का व्यवसाय काफी विकसित हैं।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया का दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है। इसके बावजूद यहाँ नगरों का विकास क्यों हुआ ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के दक्षिणी भाग में नगरों का विकास इसलिए हुआ क्योंकि यहाँ दजला एवं फ़रात नदियाँ पहाड़ों से निकल कर अपने साथ उपजाऊ मिट्टी लाती हैं। अतः यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता है। इसे नगरों के विकास के लिए रीढ़ की हड्डी माना जाता है।

प्रश्न 6.
मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि अनेक बार संकटों से क्यों घिर जाती थी ? कोई दो कारण बताएँ।
अथवा
मेसोपोटामिया में कृषि संकट के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • दजला एवं फ़रात नदियों में बाढ़ के कारण फ़सलें नष्ट हो जाती थीं।
  • कई बार वर्षा की कमी के कारण फ़सलें सूख जाती थीं।

प्रश्न 7.
मेसोपोटामिया में नगरों का विकास कब आरंभ हुआ ? किन्हीं दो प्रसिद्ध नगरों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया में नगरों का विकास 3000 ई०पू० में आरंभ हुआ।
  • मेसोपोटामिया के दो प्रसिद्ध नगरों के नाम उरुक एवं मारी थे।

प्रश्न 8.
मेसोपोटामिया में कितने प्रकार के नगरों का निर्माण हुआ ? इनके नाम क्या थे ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया में तीन प्रकार के नगरों का निर्माण हुआ।
  • इनके नाम थे-धार्मिक नगर, व्यापारिक नगर एवं शाही नगर।

प्रश्न 9.
मेसोपोटामिया में नगरीकरण के उत्थान के कोई दो कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • अत्यंत उत्पादक खेती।।
  • जल-परिवहन की कुशल व्यवस्था।

प्रश्न 10.
आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे ?
उत्तर:

  • प्राकृतिक उर्वरता के कारण कृषि एवं पशुपालन को प्रोत्साहन मिला।
  • खाद्य उत्पादक बन जाने के कारण मनुष्य का जीवन स्थायी बन गया।
  • प्राकृतिक उर्वरता एवं खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ने नए व्यवसायों को आरंभ किया। ]

प्रश्न 11.
श्रम विभाजन से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
श्रम विभाजन से अभिप्राय उस व्यवस्था से है जब व्यक्ति आत्मनिर्भर नहीं रहता। इसे विभिन्न सेवाओं के लिए विभिन्न व्यक्तियों पर आश्रित होना पड़ता है।

प्रश्न 12.
मेसोपोटामिया के लोग किन देशों से कौन-सी वस्तुएँ मंगवाते थे ? इन वस्तुओं के बदले वे क्या निर्यात करते थे ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया के लोग तुर्की, ईरान एवं खाड़ी पार के देशों से लकड़ी, ताँबा, सोना, चाँदी, टिन एवं पत्थर मँगवाते थे।
  • इन वस्तुओं के बदले वे कपड़ा एवं कृषि उत्पादों का निर्यात करते थे।

प्रश्न 13.
मेसोपोटामिया की मुद्राओं की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • ये मुद्राएँ पत्थर की बनी होती थीं।
  • इनका आकार बेलनाकार होता था।

प्रश्न 14.
मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर कौन-सा था ? इसका उत्थान कब हुआ ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर उरुक था।
  • इसका उत्थान 3000 ई० पू० में हुआ था।

प्रश्न 15.
उरुक नगर का संस्थापक कौन था ? इसे किस शासक ने अपनी राजधानी घोषित किया था ?
उत्तर:

  • उरुक नगर का संस्थापक एनमर्कर था।
  • इसे गिल्गेमिश ने अपने साम्राज्य की राजधानी घोषित किया था।

प्रश्न 16.
3000 ई० पू० के आसपास उरुक नगर ने तकनीकी क्षेत्र में अद्वितीय विकास किया। कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • उरुक में अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औज़ारों का प्रयोग आरंभ हो गया था।
  • यहाँ के वास्तुविदों ने ईंटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया था।

प्रश्न 17.
वार्का शीर्ष की मूर्ति कहाँ से प्राप्त हुई है ? इसकी कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • वार्का शीर्ष की मूर्ति उरुक नगर से प्राप्त हुई है।
  • इसे सफेद संगमरमर को तराश कर बनाया गया था।
  • इसके सिर के ऊपर एक खाँचा बनाया गया था।

प्रश्न 18.
उर नगर का संस्थापक कौन था ? इस नगर ने किस राजवंश के अधीन उल्लेखनीय विकास किया ?
उत्तर:

  • उर नगर का संस्थापक मेसनीपद था।
  • इस नगर ने चालदी राजवंश के अधीन उल्लेखनीय विकास किया।

प्रश्न 19.
उर नगर में नियोजन पद्धति का अभाव था। कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • इस नगर की गलियाँ संकरी एवं टेढ़ी-मेढ़ी थीं।
  • जल निकासी के लिए घरों के बाहर नालियों का प्रबंध नहीं था।

प्रश्न 20.
उर नगर की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उर नगर में नियोजन पद्धति का अभाव था।
  • उर नगर के लोगों में कई प्रकार के अंध-विश्वास प्रचलित थे।

प्रश्न 21.
उर नगर में घरों के बारे में प्रचलित कोई दो अंध-विश्वास लिखें।
उत्तर:

  • यदि घर की दहलीज ऊँची उठी हुई हो तो वह धन-दौलत लाती है।
  • यदि घर के सामने का दरवाज़ा किसी दूसरे के घर की ओर न खुले तो वह सौभाग्य प्रदान करता

प्रश्न 22.
उरुक एवं उर नगरों के प्रमुख देवी-देवता का नाम बताएँ।
उत्तर:

  • उरुक नगर की प्रमुख देवी इन्नाना थी।
  • उर नगर का प्रमुख देवता नन्ना था।

प्रश्न 23.
मेसोपोटामिया के किस नगर से हमें एक कब्रिस्तान मिला है ? यहाँ किनकी समाधियाँ पाई गई
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया के उर नगर से हमें एक कब्रिस्तान मिला है।
  • यहाँ शाही लोगों एवं साधारण लोगों की समाधियाँ पाई गई हैं।

प्रश्न 24.
मारी नगर की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • मारी शासक एमोराइट वंश से संबंधित थे।
  • मारी लोगों के दो प्रमुख व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन थे।

प्रश्न 25.
यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए ख़तरा थे ? कोई दो कारण लिखें।
अथवा
क्या खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए ख़तरा थे ?
उत्तर:

  • खानाबदोश पशुचारक अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए गए खेतों से गुज़ार कर ले जाते थे। इससे फ़सलों को क्षति पहुँचती थी।
  • खानाबदोश पशुचारक कई बार आक्रमण कर लोगों का माल लूट लेते थे।

प्रश्न 26.
मारी स्थित ज़िमरीलिम के राजमहल की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • यह 2.4 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था।
  • यह बहत विशाल था तथा इसके 260 कमरे थे।

प्रश्न 27.
लगश की राजधानी का नाम क्या था ? इसके दो प्रसिद्ध शासक कौन-से थे ?
उत्तर:

  • लगश की राजधानी का नाम गिरसू था।
  • इसके दो प्रसिद्ध शासक इनन्नातुम द्वितीय एवं उरुकगिना थे।

प्रश्न 28.
मेसोपोटामिया में जलप्लावन के पश्चात् स्थापित होने वाला प्रथम नगर कौन-सा था ? इसके प्रथम शासक का नाम बताएँ।
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया में जलप्लावन के पश्चात् स्थापित होने वाला प्रथम नगर किश था।
  • इसके प्रथम शासक का नाम उर्तुंग था।

प्रश्न 29.
असुरबनिपाल क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • उसने अपने साम्राज्य में भव्य भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया।
  • उसने नाबू के मंदिर में एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की।

प्रश्न 30.
बेबीलोन नगर की कोई दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • यह नगर 850 हैक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला था।
  • इसमें अनेक विशाल राजमहल एवं मंदिर बने हुए थे।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

प्रश्न 31.
मेसोपोटामिया की नगर योजना की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • उस समय घरों में एक खुला आँगन होता था जिसके चारों ओर कमरे होते थे।
  • नगरों में यातायात की आवाजाही के लिए सड़कों का उचित प्रबंध किया गया था।

प्रश्न 32.
मेसोपोटामिया में धन-दौलत का ज्यादातर हिस्सा समाज के एक छोटे से वर्ग में केंद्रित था। इस बात की पुष्टि किस तथ्य से होती है ?
उत्तर:
उर में राजाओं एवं रानियों की कुछ कब्रों में शवों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ दफ़नाई गई थीं जबकि जनसाधारण लोगों के शवों के साथ मामूली सी वस्तुओं को दफनाया गया था। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि मेसोपोटामिया में धन-दौलत का ज्यादातर हिस्सा समाज के एक छोटे से वर्ग में केंद्रित था।

प्रश्न 33.
एकल परिवार से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
एकल परिवार से हमारा अभिप्राय ऐसे परिवार से है जिसमें पति, पत्नी एवं उनके बच्चे रहते हैं।

प्रश्न 34.
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी अच्छी थी। कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • वे पुरुषों के साथ सामाजिक एवं धार्मिक उत्सवों में समान रूप से भाग लेती थीं।
  • उन्हें पति से तलाक लेने तथा पुनः विवाह करने का अधिकार प्राप्त था।

प्रश्न 35.
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में दासों की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में दासों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उन्हें पशुओं की तरह खरीदा एवं बेचा जा सकता था। उन्हें किसी प्रकार का कोई अधिकार प्राप्त न था।

प्रश्न 36.
शहरी जीवन शुरू होने पर कौन-कौन सी नयी संस्थाएँ अस्तित्व में आईं ? आपके विचार में कौन सी संस्थाएँ राजा के पहल पर निर्भर थीं ?
उत्तर:

  • शहरी जीवन शुरू होने पर व्यापार, मंदिर, लेखन कला, मूर्ति कला एवं मुद्रा कला नामक संस्थाएँ अस्तित्व में आईं।
  • इनमें व्यापार, मंदिर एवं लेखन कला राजा के पहल पर निर्भर थीं।

प्रश्न 37.
मेसोपोटामिया में युद्ध एवं प्रेम की देवी तथा चंद्र देव कौन था ?
उत्तर:

  • प्राचीनकाल मेसोपोटामिया में युद्ध एवं प्रेम की देवी इन्नाना थी।
  • प्राचीन काल मेसोपोटामिया में चंद्र देव नन्ना था।

प्रश्न 38.
मेसोपोटामिया के लोगों के कोई दो धार्मिक विश्वास बताएँ।
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया के लोग अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे।
  • वे मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 39.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे?
उत्तर:

  • पुराने मंदिर घरों की तरह छोटे आकार के थे।
  • ये कच्ची ईंटों के बने होते थे।
  • इन मंदिरों के आँगन घरों की तरह खुले होते थे तथा इनके चारों ओर कमरे बने होते थे।

प्रश्न 40.
प्राचीन काल मेसोपोटामिया के मंदिरों के कोई दो कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • मंदिरों द्वारा विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती थी।
  • मंदिरों की भूमि पर खेती की जाती थी।

प्रश्न 41.
प्राचीन काल मेसोपोटामिया में पुरोहितों के शक्तिशाली होने के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • इस काल में मेसोपोटामिया के मंदिर बहुत धनी थे।
  • पुरोहितों ने लोगों से विभिन्न करों को वसलना आरंभ कर दिया था।

प्रश्न 42.
गिल्गेमिश कौन था ?
उत्तर:
गिल्गेमिश उरुक का एक प्रसिद्ध शासक था। वह 2700 ई० पू० में सिंहासन पर बैठा था। वह एक महान् योद्धा था तथा उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। उसके महाकाव्य को विश्व साहित्य में एक प्रमुख स्थान प्राप्त है।

प्रश्न 43.
मेसोपोटामिया की लिपि की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • यह लिपि मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखी जाती थी।
  • इस लिपि को बाएँ से दाएँ लिखा जाता था।

प्रश्न 44.
मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा कौन-सी थी ? 2400 ई० पू० में इसका स्थान किस भाषा ने लिया ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन थी।
  • 2400 ई० पू० में इसका स्थान अक्कदी भाषा ने ले लिया।

प्रश्न 45.
लेखन कला का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:

  • इससे शिक्षा के प्रसार को बल मिला।
  • इससे व्यापार को प्रोत्साहन मिला।
  • इस कारण मंदिरों को दान में प्राप्त वस्तुओं का ब्योरा रखा जाने लगा।

प्रश्न 46.
विश्व को मेसोपोटामिया की क्या देन है?
अथवा
मेसोपोटामिया सभ्यता की विश्व को क्या देन है ?
उत्तर:

  • इसने विश्व को सर्वप्रथम शहर दिए।
  • इसने विश्व को सर्वप्रथम लेखन कला की जानकारी दी।
  • इसने विश्व को सर्वप्रथम कानून संहिता प्रदान की।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन काल में ईराक को किस नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया।

प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया यूनानी भाषा के किन शब्दों से मिलकर बना है ?
उत्तर:
मेसोस व पोटैमोस।

प्रश्न 3.
मेसोपोटामिया में नगरों का विकास कब आरंभ हुआ ?
उत्तर:
3000 ई० पू०।

प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया की दो प्रमुख नदियाँ कौन-सी हैं ?
उत्तर:
दज़ला एवं फ़रात।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया में पुरातत्वीय खोजों का आरंभ कब किया गया था ?
उत्तर:
1840 ई०।

प्रश्न 6.
मेसोपोटामिया का प्रसिद्ध फल कौन-सा है ?
उत्तर:
खजूर।

प्रश्न 7.
मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर कौन-सा था ?
उत्तर:
उरुक।

प्रश्न 8.
बाईबल के किस भाग में मेसोपोटामिया के बारे में उल्लेख किया गया है ?
उत्तर:
ओल्ड टेस्टामेंट।

प्रश्न 9.
मेसोपोटामिया के उत्तरी भाग में किस प्रकार की घास के मैदान पाए जाते थे ?
उत्तर:
स्टैपी घास।

प्रश्न 10.
मेसोपोटामिया के प्राचीनतम नगरों का तथा कांस्य युग के निर्माण का आरंभ कब हुआ था ?
उत्तर:
3000 ई० पू०

प्रश्न 11.
वार्का शीर्ष क्या था ?
उत्तर:
3000 ई० पू० उरुक नगर में जिस स्त्री का सिर संगमरमर को तराशकर बनाया गया था उसे वार्का शीर्ष कहा जाता था।

प्रश्न 12.
मेसोपोटामिया में लेखन कार्य पद्धति का आरंभ कब हुआ था ?
उत्तर:
3200 ई० पू०।

प्रश्न 13.
मेसोपोटामिया में कीलाकार लिपि का विकास कब हुआ था ?
उत्तर:
2600 ई० पू०।

प्रश्न 14.
दक्षिणी मेसोपोटामिया में सबसे प्राचीन मंदिरों का निर्माण कब किया गया था ?
उत्तर:
5000 ई० पू०।

प्रश्न 15.
चालदी कहाँ का प्रसिद्ध राजवंश था ?
उत्तर:
उर का।

प्रश्न 16.
मारी किस समुदाय के थे ?
उत्तर:
एमोराइट।

प्रश्न 17.
ज़िमरीलियम का राजमहल कहाँ स्थित था ?
उत्तर:
मारी में।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

प्रश्न 18.
किश नगर पर शासन करने वाली प्रथम रानी कौन थी ?
उत्तर:
कू-बबा।

प्रश्न 19.
असुरबनिपाल कहाँ का शासक था ?
उत्तर:
निनवै का।

प्रश्न 20.
बेबीलोन की राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर:
बेबीलोनिया।

प्रश्न 21.
बेबीलोनिया का अंतिम राजा कौन था ?
उत्तर:
असुरबनिपाल।

प्रश्न 22.
गिल्गेमिश कौन था ?
उत्तर:
उरुक का एक प्रसिद्ध शासक।

प्रश्न 23.
मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम लिपि की खोज कब हुई थी ?
उत्तर:
3200 ई० पू० में।

प्रश्न 24.
मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा कौन-सी थी ?
उत्तर:
सुमेरियन।

प्रश्न 25.
मेसोपोटामिया में अक्कदी भाषा का प्रचलन कब आरंभ हुआ ?
उत्तर:
2400 ई० पू० में।

प्रश्न 26.
सिकंदर ने बेबीलोन को कब विजित किया था ?
उत्तर:
331 ई० पू०।

प्रश्न 27.
मेसोपोटामिया नगर में हौज़ क्या था ?
उत्तर:
घरों के बरामदे में बना छोटा गड्डा जहाँ गंदा पानी एकत्र होता था।

प्रश्न 28.
स्टेल क्या होते हैं ?
उत्तर:
पट्टलेख।

प्रश्न 29.
मेसोपोटामिया समाज में किस प्रकार के परिवार को आदर्श परिवार माना जाता था ?
उत्तर:
एकल परिवार।

प्रश्न 30.
मारी में स्थित जिमरीलिम के राजमहल की क्या मुख्य विशेषता थी ?
उत्तर:
यह प्रशासन व उत्पादन तथा कीमती धातुओं के आभूषणों के निर्माण का मुख्य केंद्र था।

प्रश्न 31.
मेसोपिटामिया की संस्कृति का वर्णन किस महाकाव्य से प्राप्त होता है ?
उत्तर:
गिल्गेमिश।

प्रश्न 32.
मेसोपोटामिया की खुदाई के समय अलाशिया द्वीप किन वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
ताँबे व टिन।

रिक्त स्थान भरिए

1. मेसोपोटामिया यूनानी भाषा के दो शब्दों ……………. तथा ……………. से मिलकर बना है।
उत्तर:
मेसोस, पोटैमोस

2. मेसोपोटामिया …………….. तथा …………….. नामक दो नदियों के मध्य स्थित है।
उत्तर:
फ़रात, दजला

3. मेसोपोटामिया में पुरातत्वीय खोजों का आरंभ ……………. ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
1840

4. मेसोपोटामिया में …………….. तथा …………….. की खेती की जाती थी।
उत्तर:
जौ, गेहूँ

5. मेसोपोटामिया के प्राचीनतम नगरों का तथा कांस्य युग के निर्माण का आरंभ …………… में हुआ था।
उत्तर:
3000 ई० पू०

6. मेसोपोटामिया में लेखन कार्य का आरंभ ……………. ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
3200

7. मेसोपोटामिया में कीलाकार लिपि का विकास …………… ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
2600

8. मेसोपोटामिया की सबसे प्राचीन भाषा सुमेरियन का स्थान …………….. ई० पू० के पश्चात् अक्कदी भाषा ने ले लिया था।
उत्तर:
2400

9. दक्षिणी मेसोपोटामिया में सबसे पुराने मंदिरों का निर्माण ……………. ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
5000

10. उरुक नामक नगर का एक विशाल नगर के रूप में विकास …………….. ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
3000

11. मारी नगर ……………. तथा ……………. के निर्माण का मुख्य केंद्र था।
उत्तर:
कीमती धातुओं, आभूषणों

12. गणितीय मूलपाठों की रचना ……….. ई० पू० में की गई थी।
उत्तर:
1800

13. मेसोपोटामिया में असीरियाई राज्य की स्थापना ……………. में हुई थी।
उत्तर:
1100 ई० पू०

14. मेसोपोटामिया में लोहे का प्रयोग ……………. पू० में हुआ था।
उत्तर:
1000 ई०

15. सिकंदर ने बेबीलोन पर ……………. में अधिकार कर लिया था।
उत्तर:
331 ई० पू०

16. बेबीलोनिया का अंतिम राजा …………….. था।
उत्तर:
असुरबनिपाल

17. असुरबनिपाल ने अपनी राजधानी ……………. में एक पुस्तकालय की स्थापना की थी।
उत्तर:
निनवै

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. आधुनिक काल में मेसोपोटामिया को किस नाम से जाना जाता है?
(क) ईरान
(ख) इराक
(ग) कराकोरम
(घ) पीकिंग।
उत्तर:
(ख) इराक

2. मेसोपोटामिया निम्नलिखित में से किन दो नदियों के मध्य स्थित है?
(क) गंगा एवं यमुना
(ख) दजला एवं फ़रात
(ग) ओनोन एवं सेलेंगा
(घ) हवांग हो एवं दज़ला।
उत्तर:
(ख) दजला एवं फ़रात

3. मेसोपोटामिया की सभ्यता क्यों प्रसिद्ध थी?
(क) अपनी समृद्धि के लिए
(ख) अपने शहरी जीवन के लिए
(ग) अपने साहित्य, गणित एवं खगोलविद्या के लिए
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

4. मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि अनेक बार संकटों से क्यों घिर जाती थी?
(क) दजला एवं फ़रात नदियों में आने वाली बाढ़ के कारण
(ख) वर्षा की कमी हो जाने के कारण
(ग) निचले क्षेत्रों में पानी का अभाव होने के कारण
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

5. मेसोपोटामिया का दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है। इसके बावजूद यहाँ नगरों का विकास क्यों हुआ?
(क) क्योंकि यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता था
(ख) क्योंकि यहाँ के दृश्य बहुत सुंदर थे
(ग) क्योंकि यहाँ बहुत मज़दूर उपलब्ध थे
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) क्योंकि यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता था

6. मेसोपोटामिया में नगरों का निर्माण कब आरंभ हुआ?
(क) 3000 ई० पू० में
(ख) 3200 ई० पू० में
(ग) 4000 ई० पू० में
(घ) 5000 ई० पू० में।
उत्तर:
(क) 3000 ई० पू० में

7. मेसोपोटामिया सभ्यता थी?
(क) काँस्य युगीन
(ख) ताम्र युगीन
(ग) लौह युगीन
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) काँस्य युगीन

8. निम्नलिखित में से कौन-सा मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर था?
(क) उर
(ख) मारी
(ग) उरुक
(घ) लगश।
उत्तर:
(ग) उरुक

9. उरुक नगर का संस्थापक कौन था ?
(क) असुरबनिपाल
(ख) एनमर्कर
(ग) गिल्गेमिश
(घ) सारगोन।
उत्तर:
(ख) एनमर्कर

10. हमें वार्का शीर्ष की मूर्ति मेसोपोटामिया के किस नगर से प्राप्त हुई है?
(क) मारी
(ख) उरुक
(ग) किश
(घ) निनवै।
उत्तर:
(ख) उरुक

11. मारी के राजा किस समुदाय के थे?
(क) अक्कदी
(ख) एमोराइट
(ग) असीरियाई
(घ) आर्मीनियन।
उत्तर:
(ख) एमोराइट

12. मारी नगर के शासकों ने किस देवता की स्मृति में एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था?
(क) डैगन
(ख) नन्ना
(ग) इन्नना
(घ) अनु।
उत्तर:
(क) डैगन

13. मारी नगर के किसानों एवं पशुचारकों में लड़ाई का प्रमुख कारण क्या था?
(क) पशुचारक किसानों की फ़सलों को नष्ट कर देते थे
(ख) पशुचारक किसानों के गाँवों पर आक्रमण कर उन्हें लूट लेते थे
(ग) अनेक बार किसान पशुचारकों को जल स्रोतों तक जाने नहीं देते थे
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

14. साइप्रस का द्वीप अलाशिया (Alashiya) निम्नलिखित में से किस वस्तु के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था?
(क) ताँबा
(ख) लोहा
(ग) सोना
(घ) चाँदी।
उत्तर:
(क) ताँबा

15. जलप्लावन (flood) के पश्चात् स्थापित होने वाला प्रथम नगर कौन-सा था?
(क) लगश
(ख) मारी
(ग) किश
(घ) निनवै।
उत्तर:
(ग) किश

16. लगश का सबसे महान् शासक कौन था?
(क) गुडिया
(ख) उरनिना
(ग) उरुकगिना
(घ) इनन्नातुम द्वितीय।
उत्तर:
(क) गुडिया

17. असुरबनिपाल क्यों प्रसिद्ध था?
(क) उसने एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की थी
(ख) उसने अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया
(ग) उसने अपनी राजधानी निनवै को अनेक भव्य भवनों से सुसज्जित किया
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

18. मेसोपोटामिया के समाज में कितने प्रमुख वर्ग थे?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर:
(ख) तीन

19. उर में मिली शाही कब्रों में निम्नलिखित में से कौन-सी वस्तु प्राप्त हुई है?
(क) आभूषण
(ख) सोने के सजावटी खंजर
(ग) लाजवर्द
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

20. मेसोपोटामिया में धन-दौलत का ज्यादातर हिस्सा समाज के एक छोटे-से वर्ग में केंद्रित था। इस बात की पुष्टि किस तथ्य से होती है?
(क) उर में मिली शाही कब्रों से
(ख) ज़िमरीलिम के राजमहल से
(ग) व्यापारी वर्ग से
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(क) उर में मिली शाही कब्रों से

21. निम्नलिखित में से कौन मेसोपोटामिया की प्रेम एवं युद्ध की देवी थी?
(क) इन्नाना
(ख) नन्ना
(ग) एनकी
(घ) अनु।
उत्तर:
(क) इन्नाना

22. मेसोपोटामिया में चंद्र देवता को किस नाम से पुकारा जाता था?
(क) नन्ना
(ख) अनु
(ग) गिल्गेमिश
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) नन्ना

23.. गिल्गेमिश कौन था?
(क) उर का प्रसिद्ध लेखक
(ख) उरुक का प्रसिद्ध शासक
(ग) अक्कद का प्रमुख अधिकारी
(घ) लगश का महान् शासक।
उत्तर:
(ख) उरुक का प्रसिद्ध शासक

24. मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम लिपि की खोज कब हुई?
(क) 3200 ई० पू० में
(ख) 3000 ई० पू० में
(ग) 2800 ई० पू० में
(घ) 2500 ई० पू० में
उत्तर:
(क) 3200 ई० पू० में

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

25. मेसोपोटामिया की ज्ञात सबसे प्राचीन भाषा कौन-सी थी ?
(क) हिब्रू
(ख) अक्कदी
(ग) सुमेरियन
(घ) अरामाइक
उत्तर:
(ग) सुमेरियन

26. 2400 ई० पू० में मेसोपोटामिया में किस भाषा का प्रचलन आरंभ हुआ?
(क) अक्कदी
(ख) अरामाइक
(ग) अंग्रेजी
(घ) फ्रांसीसी।
उत्तर:
(क) अक्कदी

लेखन कला और शहरी जीवन HBSE 11th Class History Notes

→ आधुनिक इराक को प्राचीन काल में मेसोपोटामिया के नाम से जाना जाता था। यहाँ की विविध भौगोलिक विशेषताओं ने यहाँ के इतिहास पर गहन प्रभाव डाला है। मेसोपोटामिया की सभ्यता के विकास में यहाँ की दो नदियों दजला एवं फ़रात ने उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ 3000 ई० प० में मेसोपोटामिया में नगरों का विकास आरंभ हुआ। यहाँ 1840 ई० के दशक में पुरातत्त्वीय खोजों की शुरुआत हुई थी। मेसोपोटामिया में तीन प्रकार के नगर धार्मिक नगर, व्यापारिक नगर एवं शाही नगर अस्तित्व में आए थे। इन नगरों के उत्थान के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।

→ मेसोपोटामिया में जिन नगरों का उत्थान हुआ उनमें उरुक, उर, मारी, किश, लगश, निनवै, निमरुद एवं बेबीलोन बहुत प्रसिद्ध थे। इन नगरों ने मेसोपोटामिया के इतिहास को एक नई दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में सामाजिक असमानता का भेद आरंभ हो गया था।

→  उस समय समाज में तीन प्रमुख वर्ग प्रचलित थे। प्रथम वर्ग जो अभिजात वर्ग कहलाता था बहुत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता था। दूसरा वर्ग जो मध्य वर्ग कहलाता था का भी जीवन सुगम था।

→ तीसरा वर्ग जो निम्न वर्ग कहलाता था में समाज का बहुसंख्यक वर्ग सम्मिलित था। इनकी दशा बहुत दयनीय थी। उस समय मेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार प्रचलित थे। परिवार में पुत्र का होना आवश्यक माना जाता था। उस समय समाज में स्त्रियों का सम्मान किया जाता था। उन्हें अनेक प्रकार के अधिकार प्राप्त थे। निस्संदेह ऐसे अधिकार आज के देशों के अनेक समाजों में स्त्रियों को प्राप्त नहीं हैं। मेसोपोटामिया के समाज के माथे पर दास प्रथा एक कलंक समान थी। दासों की स्थिति पशुओं से भी बदतर थी।

→ उन्हें अपने स्वामी की आज्ञानुसार काम करना पड़ता था। उस समय के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। मेसोपोटामिया के समाज में मंदिरों की उल्लेखनीय भूमिका थी। ये मंदिर आरंभ में घरों जैसे छोटे आकार एवं कच्ची ईंटों के थे।

→ किंतु धीरे-धीरे ये मंदिर बहुत विशाल एवं भव्य बन गए। ये मंदिर धनी थे तथा उनके क्रियाकलाप बहुत व्यापक थे। अत: इन मंदिरों की देखभाल करने वाले पुरोहित भी बहुत शक्तिशाली हो गए थे। इन मंदिरों ने व्यापार एवं लेखन कला के विकास में प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

→ विश्व साहित्य में गिल्गेमिश के महाकाव्य को विशेष स्थान प्राप्त है। इसे 2000 ई० पू० में 12 पट्टिकाओं पर लिखा गया था। गिल्गेमिश उरुक का सबसे प्रसिद्ध शासक था। वह एक महान् एवं बहादुर योद्धा था। दूसरी ओर वह बहुत अत्याचारी था।

→  उसके अत्याचारों से प्रजा को मुक्त करवाने के उद्देश्य से देवताओं ने एनकीडू को भेजा। दोनों के मध्य एक लंबा युद्ध हुआ जिसके अंत में दोनों मित्र बन गए। इसके पश्चात् गिल्गेमिश एवं एनकीडू ने अपना शेष जीवन लोक भलाई कार्यों में लगा दिया। कुछ समय के पश्चात् एनकीडू एक नर्तकी के प्रेम जाल में फंस गया।

→ इस कारण देवताओं ने रुष्ट होकर उसके प्राण ले लिए। एनकीडू जैसे शक्तिशाली वीर की मृत्यु के बारे में सुन कर गिल्गेमिश स्तब्ध रह गया। अत: उसे अपनी मृत्यु का भय सताने लगा। इसलिए उसने अमरत्व की खोज आरंभ की। वह अनेक कठिनाइयों को झेलता हुआ उतनापिष्टिम से मिला।

→ अंततः गिल्गेमिश के हाथ निराशा लगी। उसने यह निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी पर आने वाला प्रत्येक जीव मृत्यु के चक्कर से नहीं बच सकता। वह केवल इस बात से संतोष कर लेता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र एवं उरुक निवासी जीवित रहेंगे।

→ मेसोपोटामिया में 3200 ई० पू० में लेखन कला का विकास आरंभ हुआ। इसके विकास का श्रेय मेसोपोटामिया के मंदिरों को दिया जाता है। इन मंदिरों के पुरोहितों को मंदिर की आय-व्यय का ब्यौरा रखने के लिए लेखन कला की आवश्यकता महसूस हुई। आरंभ में मेसोपोटामिया में चित्रलिपि का उदय हुआ।

→ यह लिपि बहुत कठिन थी। इस लिपि को मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा जाता था। इस पर कोलाकार चिह्न बनाए जाते थे जिसे क्यूनीफार्म कहा जाता था। जब इन पट्टिकाओं पर लेखन कार्य पूरा हो जाता था तो उन्हें धूप में सुखा लिया जाता था। मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन थी। 2400 ई० पू० में अक्कदी ने इस भाषा का स्थान ले लिया। 1400 ई० पू० में अरामाइक भाषा का भी प्रचलन आरंभ हो गया।

→ मेसोपोटामिया लिपि की जटिलता के कारण मेसोपोटामिया में साक्षरता की दर बहुत कम रही। यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया का विशेष महत्त्व रहा है। इसका कारण यह था कि बाईबल के प्रथम भाग ओल्ड टेस्टामेंट में मेसोपोटामिया का उल्लेख अनेक संदर्भो में किया गया है। मेसोपोटामिया सभ्यता की जानकारी हमें अनेक स्रोतों से प्राप्त होती है। इनमें से प्रमुख हैं-भवन, मंदिर, मूर्तियाँ, आभूषण, औज़ार, मुद्राएँ, कब्र एवं लिखित दस्तावेज़।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए.

1. वास्कोडिगामा भारत पहुँचा-
(A) 1857 ई० में
(B) 1498 ई० में
(C) 1492 ई० में
(D) 1600 ई० में
उत्तर:
(B) 1498 ई० में

2. प्लासी की लड़ाई हुई
(A) 1757 ई० में
(B) 1857 ई० में
(C) 1850 ई० में
(D) 1764 ई० में
उत्तर:
(A) 1757 ई० में

3. प्लासी की लड़ाई में हार हुई
(A) नवाब सिराजुद्दौला
(B) नवाब वाजिद अली शाह
(C) अलीवर्दी खाँ
(D) लॉर्ड क्लाइव
उत्तर:
(A) नवाब सिराजद्दौला

4. बक्सर की लड़ाई हुई
(A) 1757 ई० में
(B) 1764 ई० में
(C) 1773 ई० में
(D) 1784 ई० में
उत्तर:
(B) 1764 ई० में

5. इलाहाबाद की संधि कब हुई?
(A) 1757 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1765 ई० में
(D) 1764 ई० में
उत्तर:
(C) 1765 ई० में

6. ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी का अधिकार कब प्राप्त हुए?
(A) 1765 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1784 ई० में
(D) 1800 ई० में
उत्तर:
(A) 1765 ई० में

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

7. भारत में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की शुरुआत हुई
(A) गोवा से
(B) बंगाल प्रांत से
(C) मद्रास से
(D) बंबई से
उत्तर:
(B) बंगाल प्रांत से

8. बंगाल में ठेकेदारी प्रणाली की शुरुआत की
(A) लॉर्ड क्लाइव ने
(B) वारेन हेस्टिंग्ज़ ने
(C) लॉर्ड कॉनवालिस ने
(D) लॉर्ड डलहौजी ने
उत्तर:
(B) वारेन हेस्टिंग्ज़ ने

9. ब्रिटिश काल में लागू की जाने वाली भू-राजस्व प्रणालियाँ कौन-सी थीं ?
(A) स्थाई बन्दोबस्त
(B) रैयतवाड़ी व्यवस्था
(C) महालवाड़ी प्रणाली
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी

10. कलेक्टर का मुख्य काम था
(A) दंड देना
(B) चुनाव करवाना
(C) कर एकत्र करवाना
(D) धन बाँटना
उत्तर:
(C) कर एकत्र करवाना

11. बंगाल में स्थायी बन्दोबस्त किसने लागू किया?
(A) लॉर्ड कॉर्नवालिस ने
(B) लॉर्ड डलहौजी ने
(C) लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने
(D) लॉर्ड वेलेज्ली ने
उत्तर:
(A) लॉर्ड कॉर्नवालिस ने

12. बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब लागू किया गया?
(A) 1765 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1793 ई० में
(D) 1820 ई० में
उत्तर:
(C) 1793 ई० में

13. स्थायी बन्दोबस्त किसके साथ किया गया?
(A) जमींदारों के साथ
(B) मुजारों के साथ
(C) किसानों के साथ
(D) गाँवों के साथ
उत्तर:
(A) जमींदारों के साथ

14. वसूल किए गए लगान में से ज़र्मींदार को मिलता था-
(A) \(\frac{1}{2}\) भाग
(B) \(\frac{1}{11}\) भाग
(C) \(\frac{10}{11}\) भाग
(D) बिल्कुल भी नहीं
उत्तर:
(B) \(\frac{1}{11}\) भाग

15. वसूल किए गए लगान में से ज़र्मींदार को सरकारी खजाने में जमा करवाना होता था
(A) \(\frac{1}{5}\) भाग
(B) \(\frac{10}{11}\) भाग
(C) \(\frac{1}{11}\) भाग
(D) \(\frac{1}{2}\) भाग
उत्तर:
(B) \(\frac{10}{11}\) भाग

16. बंगाल में जोतदार थे
(A) गाँव के मुखिया
(B) प्रांत के नवाब
(C) भूमि पर काम करने वाले
(D) कर एकत्र करने वाले
उत्तर:
(A) गाँव के मुखिया

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

17. जमींदार का वह अधिकारी जो गाँव से भू-राजस्व इकट्ठा करता था, क्या कहलाता था?
(A) मंडल
(B) अमला
(C) लठियात
(D) साहूकार
उत्तर:
(B) अमला

18. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक्ट पास किया गया
(A) रेग्यूलेटिंग एक्ट
(B) पिट्स इंडिया एक्ट
(C) 1858 ई० का एक्ट
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) रेग्यूलेटिंग एक्ट

19. रेग्यूलेटिंग एक्ट पास किया गया
(A) 1858 ई० में
(B) 1784 ई० में
(C) 1773 ई० में
(D) 1757 ई० में
उत्तर:
(C) 1773 ई० में

20. रेग्यूलेटिंग के दोषों को दूर करने के लिए एक्ट पास किया गया
(A) पिट्स इंडिया एक्ट
(B) रेग्यूलेटिंग एक्ट
(C) चार्टर एक्ट
(D) रोलेट एक्ट
उत्तर:
(A) पिट्स इंडिया एक्ट

21. पिट्स इंडिया एक्ट पास किया गया
(A) 1773 ई० में
(B) 1784 ई० में
(C) 1813 ई० में
(D) 1850 ई० में
उत्तर:
(B) 1784 ई० में

22. मद्रास प्रेसीडेंसी में मुख्यतः कौन-सी भू-राजस्व प्रणाली लागू की गई?
(A) स्थायी बंदोबस्त
(B) ठेकेदारी प्रणाली
(C) महालवाड़ी प्रणाली
(D) रैयतवाड़ी प्रणाली
उत्तर:
(D) रैयतवाड़ी प्रणाली

23. दक्कन में किसान विद्रोह कब हुआ?
(A) 1818 ई० में
(B) 1820 ई० में
(C) 1875 ई० में
(D) 1855 ई० में
उत्तर:
(C) 1875 ई० में

24. मद्रास में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त किसने लागू किया?
(A) लॉर्ड कॉर्नवालिस
(B) थॉमस मुनरो
(C) लॉर्ड विलियम बैंटिंक
(D) लॉर्ड वेलेजली
उत्तर:
(B) थॉमस मुनरो

25. रैयत कौन थे?
(A) किसान
(B) ज़मींदार
(C) साहूकार
(D) जोतदार
उत्तर:
(A) किसान

26. औपनिवेशिक काल में लागू किए जाने वाले भू-राजस्व थे
(A) इस्तमरारी बंदोबस्त
(B) रैयतवाड़ी बंदोबस्त
(C) महालवाड़ी बंदोबस्त
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

27. रैयतवाड़ी बन्दोबस्त को कहाँ लागू किया गया?
(A) बंगाल में
(B) पंजाब में
(C) असम में
(D) मद्रास में
उत्तर:
(D) मद्रास में

28. रैयतवाड़ी बन्दोबस्त कब लागू किया गया?
(A) 1820 ई० में
(B) 1793 ई० में
(C) 1795 ई० में
(D) 1850 ई० में
उत्तर:
(A) 1820 ई० में

29. ब्रिटिश संसद में पाँचवीं रिपोर्ट कब प्रस्तुत की गई?
(A) 1813 ई० में
(B) 1713 ई० में
(C) 1613 ई० में
(D) 1913 ई० में
उत्तर:
(A) 1813 ई० में

30. पहाड़िया लोग कहाँ रहते थे?
(A) कश्मीर की पहाड़ियों में
(B) राजमहल की पहाड़ियों में
(C) मनाली की पहाड़ियों में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) राजमहल की पहाड़ियों में

31. पहाड़िया लोग खेती के लिए क्या प्रयोग करते थे?
(A) हल
(B) कुदाल
(C) नहर
(D) ट्रैक्टर
उत्तर:
(B) कुदाल

32. संथालों ने दामिन-इ-कोह की स्थापना कब की?
(A) 1812 ई० में
(B) 1832 ई० में
(C) 1822 ई० में
(D) 1932 ई० में
उत्तर:
(B) 1832 ई० में

33. संथार्लों का अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह कब हुआ?
(A) 1845 ई० में
(B) 1855 ई० में
(C) 1865 ई० में
(D) 1875 ई० में
उत्तर:
(B) 1855 ई० में

34. संथाल किन लोगों को घृणा से ‘दिकू’ कहते थे?
(A) साहूकार
(B) जमींदार
(C) जोतदार
(D) सभी बाहरी लोगों को
उत्तर:
(D) सभी बाहरी लोगों को

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

35. डेविड रिकॉर्डो कौन था?
(A) इंग्लैण्ड का चिकिस्सक
(B) कम्पनी का इंजीनियर
(C) इंग्लैण्ड का अर्थशास्त्री
(D) फ्रांस का समाजशास्त्री
उत्तर:
(C) इंग्लैण्ड का अर्थशास्त्री

36. परितीमन कानून कब पारित किया गया?
(A) 1858 ई० में
(B) 1875 ई० में
(C) 1850 ई० में
(D) 1859 ई० में
उत्तर:
(D) 1859 ई० में

37. अमेरिका में गृह युद्ध कब आरंभ हुआ था?
(A) 1857 ई० में
(B) 1864 ई० में
(C) 1861 ई० में
(D) 1865 ई० में
उत्तर:
(C) 1861 ई० में

38. 1875 ई० का दक्कन विद्योह कहाँ से प्रारंभ हुआ?
(A) सूपा से
(B) हम्पी से
(C) अहमदनगर से
(D) बम्बई से
उत्तर:
(A) सूपा से

39. रैयतवाड़ी प्रणाली में भूमि का मालिक माना गया-
(A) ज़मींदार को
(B) रैयत को
(C) नवाब को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) रैयत को

40. रैयतवाड़ी बंदोबस्त कितने समय के लिए किया?
(A) 30 वर्षों के लिए
(B) 50 वर्षों के लिए
(C) 20 वर्षों के लिए
(D) हमेशा के लिए
उत्तर:
(A) 30 वर्षों के लिए

41. बंबई दक्कन में रैयतवाड़ी बंदोबस्त शुरू किया-
(A) 1793 ई० में
(B) 1818 ई० में
(C) 1773 ई० में
(D) 1784 ई० में
उत्तर:
(B) 1818 ई० में

42. ब्रिटेन में ‘कपास आपूर्ति संघ’ की स्थापना की गई-
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1858 ‘ई० में
उत्तर:
(C) 1857 ई० में

43. मैनचेस्टर कॉटन कंपनी बनी-
(A) 1853 ई० में
(B) 1857 ई० में
(C) 1858 ई० में
(D) 1859 ई० में
उत्तर:
(D) 1859 ई० में

44. अमेरिका का गृह युद्ध समाप्त हुआ-
(A) 1861 ई० में
(B) 1865 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1850 ई० में
उत्तर:
(B) 1865 ई० में

45. पहाड़िया लोग खेती करते थे-
(A) स्थायी खेती
(B) झूम खेती
(C) बागों की खेती
(D) मिश्रित खेती
उत्तर:
(B) झूम खेती

46. दामिन-इ-कोह नामक भू-भाग पर बसाया गया-
(A) संथालों को
(B) ज़मींदारों को
(C) पहाड़ियों को
(D) अंग्रेज़ों को
उत्तर:
(A) संथालों को

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
वास्कोडिगामा भारत कब आया?
उत्तर:
वास्कोडिगामा 1498 ई० में भारत पहुंचा।

प्रश्न 2.
प्लासी की लड़ाई कब हुई?
उत्तर:
प्लासी की लड़ाई 1757 ई० में हुई।

प्रश्न 3.
प्लासी की लड़ाई किस-किसके मध्य हुई?
उत्तर:
प्लासी की लड़ाई बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला व अंग्रेजों के बीच लड़ी गई।

प्रश्न 4.
बक्सर का युद्ध कब हुआ?
उत्तर:
बक्सर का युद्ध 1764 ई० में हुआ।

प्रश्न 5.
भारत में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की शुरुआत किस प्रांत में हुई?
उत्तर:
भारत में बंगाल प्रांत में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की शुरुआत हुई।

प्रश्न 6.
अंग्रेजों को दीवानी का अधिकार किस संधि से प्राप्त हुआ?
उत्तर:
1765 ई० में इलाहाबाद की संधि से अंग्रेज़ों को दीवानी का अधिकार प्राप्त हुआ।

प्रश्न 7.
दीवानी के अधिकार का क्या अर्थ था?
उत्तर:
दीवानी के अधिकार का अर्थ था-राजस्व वसूली का अधिकार।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 8.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब व किसने शुरू किया?
उत्तर:
बंगाल में 1793 ई० में गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त शुरू किया। इसे ज़मींदारी बंदोबस्त भी कहा जाता है।

प्रश्न 9.
बंगाल में भू-राजस्व की ठेकेदारी प्रणाली किसने लागू की?
उत्तर:
बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने भू-राजस्व की ठेकेदारी प्रणाली शुरू की।

प्रश्न 10.
ठेकेदारी (इजारेदारी) प्रणाली को और अन्य किस नाम से पुकारा गया?
उत्तर:
ठेकेदारी प्रणाली को फार्मिंग प्रणाली (Farming System) भी कहा गया।

प्रश्न 11.
ठेकेदारी प्रणाली का नियंत्रण किसे सौंपा गया?
उत्तर:
ठेकेदारी प्रणाली जिला कलेक्टरों के नियंत्रण में लागू की गई।

प्रश्न 12.
कलेक्टर का मुख्य काम क्या था?
उत्तर:
कलेक्टर का मुख्य काम कर ‘इकट्ठा’ करना था।

प्रश्न 13.
बंगाल में ग्राम-मुखिया को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
बंगाल में ग्राम-मुखिया को जोतदार या मंडल कहा जाता था।

प्रश्न 14.
बंगाल में सरकार ने स्थायी बंदोबस्त किसके साथ किया?
उत्तर:
बंगाल में सरकार ने स्थायी बंदोबस्त बंगाल के छोटे राजाओं एवं ताल्लुकेदारों के साथ किया।

प्रश्न 15. बंगाल में स्थायी बंदोबस्त किसने लागू किया?
उत्तर:
बंगाल के गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त लागू किया।

प्रश्न 16.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब लागू किया गया?
उत्तर:
1793 ई० में बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया।

प्रश्न 17.
स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी प्रथा) कहाँ-कहाँ लागू किया गया?
उत्तर:
बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस व उत्तरी कर्नाटक में स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया।

प्रश्न 18.
स्थायी बंदोबस्त में बंगाल के छोटे राजाओं और ताल्लुकेदारों को किस रूप में वर्गीकृत किया गया?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त में छोटे राजाओं व ताल्लुकेदारों को ‘ज़मींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया।

प्रश्न 19.
स्थायी बंदोबस्त की मुख्य विशेषता क्या थी?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त में ज़मींदारों द्वारा सरकार को दी जाने वाली वार्षिक भूमि कर राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई।

प्रश्न 20.
ज़मींदार को वसूल किए गए लगान में से कितना भाग अपने पास रखना होता था?
उत्तर:
ज़मींदार को किसानों से वसूल किए गए लगान में से \(\frac{1}{11}\) भाग अपने पास रखना होता था।

प्रश्न 21. जमींदार को वसूल किए लगान में से कितना भाग सरकारी खजाने में जमा करवाना पड़ता था?
उत्तर:
ज़मींदार को किसानों से वसूल किए गए लगान में से \(\frac{10}{11}\) भाग कंपनी सरकार को देना होता था।

प्रश्न 22.
ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई फरमिंगर रिपोर्ट किस नाम से जानी जाती है?
उत्तर:फरमिंगर रिपोर्ट पाँचवीं रिपोर्ट के नाम से जानी जाती है।

प्रश्न 23.
फरमिंगर रिपोर्ट का संबंध किससे था?
उत्तर:
फरमिंगर रिपोर्ट भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन व क्रियाकलापों के संदर्भ में एक विस्तृत रिपोर्ट थी।

प्रश्न 24.
सूर्यास्त विधि (Sunset Law) से क्या तात्पर्य था?
उत्तर:
सूर्यास्त विधि का तात्पर्य था कि निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि भुगतान न कर पाने पर ज़मींदारी नीलाम कर दी जाती थी।

प्रश्न 25.
जोतदार कौन थे?
उत्तर:
बंगाल में ग्राम के मुखियाओं को जोतदार (मंडल) कहा जाता था।

प्रश्न 26.
जमीदार का कर एकत्र करने वाला अधिकारी क्या कहलाता था?
उत्तर:
ज़मींदार का कर एकत्र करने वाला अधिकारी ‘अमला’ कहलाता था।

प्रश्न 27.
बंगाल में बटाईदार को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
बटाईदार को अधियार या बरगादार कहा जाता था।

प्रश्न 28.
शास्त्रीय (क्लासिकल) अर्थशास्त्री एडम स्मिथ की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम बताओ।
उत्तर:
शास्त्रीय अर्थशास्त्रीय एड्म स्मिथ की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘राष्ट्रों की सम्पत्ति’ (Wealth of Nations) थी।

प्रश्न 29.
‘राष्ट्रों की सम्पत्ति’ पुस्तक में किस प्रकार के व्यापार का विरोध किया गया?
उत्तर:
‘राष्ट्रों की सम्पत्ति’ पुस्तक में व्यापारिक एकाधिकार का विरोध किया गया।

प्रश्न 30.
ब्रिटेन से लौटे कंपनी के कर्मचारियों की क्या कहकर खिल्ली उड़ाई जाती थी?
उत्तर:
ब्रिटेन से लौटे कंपनी के कर्मचारियों को ‘नवाब’ कहकर उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी।

प्रश्न 31.
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए कौन-सा एक्ट पास किया गया?
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया पर नियंत्रण के लिए सन् 1773 में ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट’ पास किया गया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 32.
‘इलाहाबाद की संधि’ कब की गई थी?
उत्तर:
‘इलाहाबाद की संधि’ 12 अगस्त, 1765 को की गई थी।

प्रश्न 33.
रैयत’ शब्द से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘रैयत’ शब्द को किसान के लिए प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 34.
पहाड़िया लोगों के जीविकापार्जन के साधन क्या थे?
उत्तर:
झूम की खेती, जंगल के उत्पाद व शिकार पहाड़िया लोगों के जीविकापार्जन के साधन थे।

प्रश्न 35.
चार्टर एक्ट पास करने का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
चार्टर एक्ट के माध्यम से कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत में अपने राजस्व, प्रशासन इत्यादि के संबंध में नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार को सूचना प्रदान करे।

प्रश्न 36.
पहाडिया लोगों की खेती का तरीका क्या था?
उत्तर:
पहाड़िया लोग झूम खेती करते थे।

प्रश्न 37.
कुछ वर्षों के लिए खाली छोड़ी गई ज़मीन का पहाड़िया लोग किस रूप में प्रयोग करते थे?
उत्तर:
कुछ वर्षों के लिए खाली छोड़ी गई परती भूमि को पहाड़िया लोग पशु चराने के लिए प्रयोग करते थे।

प्रश्न 38.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहाड़िया क्षेत्रों में घुसपैठ क्यों शुरू की?
उत्तर:
संसाधनों का दोहन व प्रशासनिक दृष्टि से कंपनी ने पहाड़िया क्षेत्रों में घुसपैठ शुरू की।

प्रश्न 39. किस ब्रिटिश अधिकारी ने पहाड़िया लोगों से संधि के प्रयास शुरू किए?
उत्तर:
भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड (Augustus Cleveland) ने पहाड़िया लोगों से संधि के प्रयास शुरू किए।

प्रश्न 40.
रैयतवाड़ी व्यवस्था कब और कहाँ अपनाई गई ?
उत्तर:
रैयतवाड़ी व्यवस्था सन् 1820 में मद्रास प्रेसीडेंसी में अपनाई गई। इस व्यवस्था का जन्मदाता थॉमस मुनरो को माना जाता है। यह व्यवस्था 30 वर्षों के लिए लागू की गई।

प्रश्न 41.
फ्रांसिस बुकानन ने पहाड़िया क्षेत्र की यात्रा कब की?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन ने 1810-11 ई० की सर्दियों में पहाड़िया क्षेत्र की यात्रा की।

प्रश्न 42.
पहाड़िया लोगों की जीवन-शैली का प्रतीक क्या था?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों की जीवन-शैली का प्रतीक कुदाल था।

प्रश्न 43.
‘दामिन-इ-कोह’ किसे कहा गया?
उत्तर:
‘दामिन-इ-कोह’ उस विस्तृत भू-भाग को कहा गया जो कंपनी सरकार द्वारा संथालों को दिया गया।

प्रश्न 44.
कंपनी सरकार का संथालों के साथ क्या अनुबंध हुआ?
उत्तर:
कंपनी सरकार ने संथाल कृषकों के साथ यह अनुबंध किया कि उन्हें पहले दशक के अंदर प्राप्त भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को कृषि योग्य बनाकर खेती करनी थी।

प्रश्न 45.
संथाल लोग दिकू किसे कहते थे?
उत्तर:
सरकारी अधिकारियों, ज़मींदारों व साहूकारों को संथाल दिकू (बाहरी लोग) कहते थे।

प्रश्न 46.
संथाल विद्रोह का मुख्य नेता कौन था?
उत्तर:
संथाल विद्रोह का मुख्य नेता सिधू मांझी था।

प्रश्न 47.
सीदो (सिधू) ने स्वयं को क्या बताया?
उत्तर:
सीदो ने स्वयं को देवी पुरुष और संथालों के भगवान् ‘ठाकुर’ का अवतार घोषित किया।

प्रश्न 48.
सीदो की हत्या कब की गई?
उत्तर:
1855 ई० में सीदो को पकड़कर मार दिया गया।

प्रश्न 49.
दक्कन क्षेत्र किसे कहा गया?
उत्तर:
बंबई व महाराष्ट्र के क्षेत्र को दक्कन कहा गया।

प्रश्न 50.
साहूकार किसे कहा गया?
उत्तर:
साहूकार, उसे कहा गया जो महाजन और व्यापारी दोनों हो, यानी धन उधार भी देता हो तथा व्यापार भी करता हो।

प्रश्न 51.
दक्कन को अंग्रेज़ी राज क्षेत्र में कब मिलाया गया?
उत्तर:
1818 ई० में पेशवा को हराकर दक्कन को अंग्रेजी राज क्षेत्र में मिला लिया गया।

प्रश्न 52.
रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली का जन्मदाता किसे माना जाता है?
उत्तर:
थॉमस मुनरो को रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली का जन्मदाता माना जाता है।

प्रश्न 53.
रैयतवाड़ी प्रणाली किन प्रांतों में लागू की गई?
उत्तर:
रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली को मद्रास प्रेसीडेंसी में लागू किया गया।

प्रश्न 54.
रैयतवाड़ी प्रणाली में बंदोबस्त किसके साथ किया गया?
उत्तर:
रैयतवाड़ी प्रणाली में सीधा किसानों या रैयत से ही बंदोबस्त किया गया।

प्रश्न 55.
रैयतवाड़ी प्रणाली में भूमि का मालिक किसे माना गया?
उत्तर:
रैयतवाड़ी प्रणाली में किसान को कानूनी तौर पर भूमि का मालिक मान लिया गया। जिस पर वह खेती कर रहा था।

प्रश्न 56.
रैयतवाड़ी बंदोबस्त कितने समय के लिए किया गया?
उत्तर:
रैयतवाड़ी बंदोबस्त 30 वर्षों के लिए किया गया।

प्रश्न 57.
बंबई दक्कन में रैयतवाड़ी बंदोबस्त कब शुरु किया गया?
उत्तर:
बंबई दक्कन में 1818 ई० में रैयत बंदोबस्त शुरु किया गया।

प्रश्न 58.
दक्कन में भयंकर अकाल कब पड़ा?
उत्तर:
1832-34 में दक्कन में भयंकर अकाल पड़ा।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 59.
औद्योगिक युग में सबसे अधिक महत्त्व की वाणिज्यिक फसल कौन-सी थी?
उत्तर:
औद्योगिक युग में सबसे अधिक महत्त्व की वाणिज्यिक फसल कपास थी।

प्रश्न 60.
ब्रिटेन में ‘कपास आपूर्ति संघ’ की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
ब्रिटेन में 1857 ई० में ‘क़पास आपूर्ति संघ’ की स्थापना की गई।

प्रश्न 61.
‘मैनचेस्टर कॉटन कंपनी’ कब बनाई गई?
उत्तर:
मैनचेस्टर कॉटन कंपनी’ 1859 ई० में बनाई गई।

प्रश्न 62.
अमेरिका में गृह युद्ध कब शुरु हुआ?
उत्तर:
अमेरिका में सन् 1861 में गृह युद्ध छिड़ गया जो उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के बीच था।

प्रश्न 63.
अमेरिका का गृह युद्ध कब समाप्त हुआ?
उत्तर:
सन् 1865 में अमेरिका का गृह युद्ध समाप्त हो गया।

प्रश्न 64.
ब्रिटिश सरकार ने परिसीमन कानून कब बनाया?
उत्तर:
1859 ई० में सरकार ने परिसीमन कानून पास किया।

प्रश्न 65.
परिसीमन कानून का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
परिसीमन कानून का मुख्य उद्देश्य ब्याज के संचित होने से रोकना था।

प्रश्न 66.
परिसीमन कानून के अनुसार ऋणपत्रों को कितने समय के लिए मान्य माना गया?
उत्तर:
परिसीमन कानून के अनुसार किसान व ऋणदाता के बीच हस्ताक्षरित ऋण पत्र तीन वर्ष के लिए मान्य माना गया।

प्रश्न 67.
‘दक्कन दंगा आयोग’ ने ब्रिटिश संसद में अपनी रिपोर्ट कब प्रस्तुत की?
उत्तर:
‘दक्कन दंगा आयोग’ ने 1878 ई० में अपनी रिपोर्ट ‘दक्कन दंगा रिपोर्ट’ के नाम से प्रस्तुत की।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ठेकेदारी प्रणाली के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बंगाल के नए गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स (1772-85) ने भूमि-कर वसूली की ठेकेदारी प्रणाली शुरू की। इसे ‘फार्मिंग प्रणाली’ (Farming System) भी कहा गया है। इसके अंतर्गत उच्चतम बोली लगाने वालों (Bidders) को कर वसूल करने का ठेका दे दिया जाता था। शुरू में ये ठेके पाँच वर्षों के लिए दिए गए, परंतु बाद में वार्षिक ठेके नीलाम किए जाने लगे।

प्रश्न 2.
‘दीवानी’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘दीवानी’ मुगल कालीन प्रशासन में एक महत्त्वपूर्ण पद था। इसका मुख्य कार्य आय-व्यय की व्यवस्था को सुनिश्चित करना था। भू-राजस्व प्रणाली निर्धारण भी दीवान ही करता था। अकबर काल में राजा टोडरमल एक बड़े चतुर, बुद्धिमान दीवान थे।

प्रश्न 3.
स्थायी बंदोबस्त के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
सन् 1793 में गवर्नर-जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल में भू-राजस्व की एक नई प्रणाली अपनाई जिसे ‘ज़मींदारी प्रथा’ ‘स्थायी बंदोबस्त’ अथवा ‘इस्तमरारी-प्रथा’ कहा गया। यह प्रणाली बंगाल, बिहार, उडीसा तथा बनारस व उत्तरी कर्नाटक में लाग की गई थी।

प्रश्न 4.
स्थायी बंदोबस्त लागू करने के दो कारण बताओ।
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त लागू करने के निम्नलिखित कारण थे

1. व्यापार व राजस्व संबंधी समस्याओं का समाधान (Solution of Problems Relating to Trade and Land Revenue)-कंपनी के अधिकारियों को यह आशा थी कि भू-राजस्व को स्थायी करने से व्यापार तथा राजस्व से संबंधित उन सभी समस्याओं का समाधान निकल आएगा जिनका सामना वे बंगाल विजय के समय से ही करते आ रहे थे।

2. बंगाल की अर्थव्यवस्था में संकट (Crisis in the Bengal Economy)-1770 के दशक से बंगाल की अर्थव्यवस्था अकालों की मार झेल रही थी। कृषि उत्पादन में निरंतर कमी आ रही थी। अर्थव्यवस्था संकट में फँसती जा रही थी और ठेकेदारी प्रणाली में इससे निकलने के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

प्रश्न 5.
स्थायी बंदोबस्त में भू-राजस्व की दर ऊँची रखने के क्या कारण थे?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त में भू-राजस्व की दर शुरू से ही अपेक्षाकृत काफी ऊँची तय की गई थी। इसके दो कारण थे : पहला भू-राजस्व किसानों के अधिशेष (surplus) को हड़पने का मुख्य स्रोत था। किसानों से प्राप्त यह धन प्रशासन चलाने के साथ-साथ व्यापार करने के लिए भी उपयोगी था। दूसरा, राजस्व की दर स्थायी तौर पर निर्धारित करते समय कंपनी के अधिकारियों ने इस तथ्य को ध्यान में रखा कि आगे चलकर खेती के विस्तार तथा कीमतों में बढ़ोतरी होने से आय में वृद्धि होगी, उसमें कंपनी सरकार अपना दावा कभी नहीं कर सकेगी। अतः भविष्य की भरपाई वे शुरू से ही करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अधिकतम स्तर तक भू-राजस्वों की माँग को निर्धारित किया।

प्रश्न 6.
सूर्यास्त विधि क्या थी?
उत्तर:
सूर्यास्त विधि से तात्पर्य था कि निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि का भुगतान न कर पाने पर ज़मींदारियों की नीलामी की जा सकती थी। इसमें राजस्वों की माँग निश्चित थी। फसल हो या न हो या फिर ज़मींदार रैयत से लगान एकत्र कर पाए या ना कर पाए उसे तो निश्चित तिथि तक सरकारी माँग पूरी करनी होती थी।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था से पहले बंगाल में ज़मींदारों के पास क्या-क्या अधिकार थे?
उत्तर:
बंगाल में ज़मींदार छोटे राजा थे। उनके पास न्यायिक अधिकार थे और सैन्य टुकड़ियाँ भी। साथ ही उनकी अपनी पुलिस व्यवस्था थी। कंपनी की सरकार ने उनकी यह शक्तियाँ उनसे छीन लीं। उनकी स्वायत्तता को सीमित कर दिया।

प्रश्न 8.
बंगाल में ज़मींदारों की शक्ति सीमित करने के लिए कंपनी सरकार ने क्या किया?
उत्तर:
ज़मींदारों के सैनिक दस्तों को भंग कर दिया गया। साथ ही उनके सीमा शुल्क के अधिकार को भी खत्म कर दिया गया। उनके न्यायालयों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के नियंत्रण में रख दिया गया। स्थानीय पुलिस प्रबंध भी कलेक्टर ने अपने हाथ में ले लिया। इस प्रकार ज़मींदार शक्तिहीन होकर पूर्णतः सरकार की दया पर निर्भर हो गया।

प्रश्न 9.
बंगाल के जोतदारों के शक्तिशाली होने के दो कारण बताओ।
उत्तर:
बंगाल के जोतदारों के शक्तिशाली होने के कारण निम्नलिखित थे

1. विशाल ज़मीनों के मालिक (Became Owner of VastAreas of Land)-जोतदार गाँव में ज़मीनों के वास्तविक मालिक थे। कईयों के पास तो हजारों एकड़ भूमि थी। वे बटाइदारों से खेती करवाते थे।

2. व्यापार व साहूकारी पर नियंत्रण (Control over Trade and Money Landing)-जोतदार केवल भू-स्वामी ही नहीं थे। उनका स्थानीय व्यापार व साहूकारी पर भी नियंत्रण था। वे एक व्यापारी, साहूकार तथा भूमिपति के रूप में अपने क्षेत्र के प्रभावशाली लोग थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 10.
बंगाल में बटाईदारों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
बंगाल में बटाइदारों को अधियार अथवा बरगादार कहा जाता था। वे जोतदार के खेतों में अपने हल और बैल के साथ काम करते थे। वे फसल का आधा भाग अपने पास और आधा जोतदार को दे देते थे।

प्रश्न 11.
बेनामी खरीददारी क्या थी?
उत्तर:
बंगाल में ज़मींदारों ने अपनी ज़मींदारी की भू-संपदा बचाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हथकंडा बेनामी खरीददारी का अपनाया। इसमें प्रायः जमींदार के अपने ही आदमी नीलाम की गई संपत्तियों को महँगी बोली देकर खरीद लेते थे और फिर देय राशि सरकार को नहीं देते थे।

प्रश्न 12.
इतिहासकार या एक विद्यार्थी को सरकारी रिपोर्ट या दस्तावेजों का अध्ययन करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
इतिहासकार या एक विद्यार्थी को सरकारी रिपोर्ट एवं दस्तावेजों को काफी ध्यान से और सावधानीपूर्वक पढ़ना चाहिए। विशेषतः यह सवाल मस्तिष्क में सदैव रहना चाहिए कि यह किसने एवं किस उद्देश्य के लिए लिखी है। बिना सवाल उठाए तथ्यों को वैसे-के वैसे स्वीकार नहीं कर लिया जाना चाहिए।

प्रश्न 13.
ईस्ट इंडिया कंपनी पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कौन-कौन से कदम उठाए?
उत्तर:
भारत में कंपनी शासन पर नियंत्रण एवं उसे रेग्युलेट’ करने के लिए सबसे पहले सन् 1773 में ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट’ पास किया गया। फिर 1784 ई० में ‘पिट्स इंडिया एक्ट’ तथा आगे हर बीस वर्ष के बाद ‘चार्टर एक्टस’ पास किए गए। इन अधिनियमों के माध्यम के कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत में अपने राजस्व, प्रशासन इत्यादि के संबंध में नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार को सूचना प्रदान करे।

प्रश्न 14.
पहाडिया लोगों द्वारा मैदानी क्षेत्रों पर आक्रमण के दो कारण बताओ।
उत्तर:
पहाड़िया जनजाति के लोग मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों विशेषतः ज़मींदारों, किसानों व व्यापारियों इत्यादि पर बराबर आक्रमण करते रहते थे। इन आक्रमणों के मुख्य कारण निम्नलिखित थे

1. अभाव अथवा अकाल (Famine)-प्रायः ये आक्रमण पहाड़िया लोगों द्वारा अभाव अथवा अकाल की परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए किए जाते थे। मैदानी भागों में, जहाँ सिंचाई से खेती होती थी, वहाँ यह लोग खाद्य-सामग्री की लूट-पाट करके ले जाते थे।

2.शक्ति-प्रदर्शन (To Show Power)-उनका एक लक्ष्य शक्ति-प्रदर्शन कर अपनी धाक जमाना भी रहता था। इस शक्ति-प्रदर्शन का लाभ उन्हें आक्रमणों के बाद भी मिलता रहता था।

प्रश्न 15.
पहाड़िया लोगों के प्रति कंपनी अधिकारियों का दृष्टिकोण कैसा था?
उत्तर:
कंपनी अधिकारी पहाड़िया लोगों को असभ्य, बर्बर और उपद्रवी समझते थे। अतः तब तक उनके इलाकों में शासन करना आसान नहीं था जब तक उन्हें सभ्यता की परिधि में न लाया जाए। ऐसे जनजाति लोगों को सुसभ्य बनाने के लिए वो समझते थे कि उनके क्षेत्रों में कृषि-विस्तार किया जाए।

प्रश्न 16.
संथालों और पहाड़िया लोगों के संघर्ष को क्या नाम दिया जाता है?
उत्तर:
संथालों और पहाड़िया जनजाति के इस संघर्ष को कुदाल और हल का संघर्ष का नाम दिया जाता है। कुदाल पहाड़िया जनजाति की जीवन-शैली का प्रतीक था तो हल संथालों के जीवन का प्रतीक था। पहाड़िया की तुलना में संथालों में स्थायी जीवन की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति अधिक थी।

प्रश्न 17.
दीवानी का अधिकार मिलने पर कंपनी को क्या लाभ हुआ?
उत्तर:
दीवानी का अधिकार मिलने पर कंपनी को निम्नलिखित लाभ हुए

  • दीवानी मिलने पर कंपनी बंगाल में सर्वोच्च शक्ति बन गई।
  • कंपनी की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। उसके व्यापार में भी वृद्धि हुई। सुदृढ़ आर्थिक स्थिति के कारण कंपनी के पास विशाल सेना हो गई।

प्रश्न 18.
विलियम होजेज कौन था?
उत्तर:
विलियम होजेज कैप्टन कुक के साथ प्रशांत महासागर की यात्रा करते हुए भारत आया था। वह भागलपुर के कलेक्टर आगस्टस क्लीवलैंड के जंगल के गाँवों पर भ्रमण पर गया था। इन गाँवों और प्राकृतिक सौंदर्य स्थलों के उसने कई एक्वाटिंट (Aquatint) तैयार किए थे। यह ऐसी तस्वीर होती है जो ताम्रपट्टी में अम्ल (Acid) की सहायता से चित्र के रूप में कटाई करके बनाई जाती है।

प्रश्न 19.
कंपनी अधिकारी ने संथाल जनजाति को राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसने का निमंत्रण क्यों दिया ?
उत्तर:
कंपनी अधिकारी कृषि क्षेत्र का विस्तार राजमहल की पहाड़ियों की घाटियों और निचली पहाड़ियों पर करना चाहते थे। पहाड़िया लोग हल को हाथ लगाना ही पाप समझते थे। वह बाज़ार के लिए खेती नहीं करना चाहते थे। ऐसी परिस्थितियों में ही अंग्रेज़ अधिकारियों का परिचय संथाल जनजाति के लोगों से हुआ जो पूरी ताकत के साथ ज़मीन में काम करते थे। उन्हें जंगल काटने में भी कोई हिचक नहीं थी। वे पहाड़िया लोगों की अपेक्षाकृत अग्रणी बाशिंदे थे। कंपनी अधिकारियों ने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसे महालों (गाँवों) में बसने का निमंत्रण दिया।

प्रश्न 20.
राजमहल की पहाड़ियों में संथालों की विजय के क्या कारण थे?
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों में संथालों के आगमन तथा बसाव का पहाड़िया जनजाति के लोगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। पहाड़िया लोगों ने संथालों का प्रबल प्रतिरोध किया। परन्तु उन्हें संथालों के मुकाबले पराजित होकर पहाड़ियों की तलहटी वाला उपजाऊ क्षेत्र छोड़कर जाना पड़ा। इस संघर्ष में संथालों की विजय हुई क्योंकि कंपनी सरकार के सैन्यबल उन्हें कब्जा दिलवा रहे थे। संथाल जनजाति के लोग शक्तिशाली लड़ाकू थे।

प्रश्न 21.
संथालों के आगमन का पहाड़िया लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
संथालों के आगमन से पहाड़िया लोगों के जीवन-निर्वाह का आधार ही उनसे छिन गया था। जंगल नहीं रहे तो वे शिकार पर्याप्त घास व वन-उत्पादों से वंचित हो गए। ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में झूम की खेती भी संभव नहीं थी। वें बंजर, चट्टानी और शुष्क क्षेत्रों में धकेले जा चुके थे। इस सबके परिणामस्वरूप पहाड़िया लोगों के रहन-सहन पर प्रभाव पड़ा। आगे चलकर वह निर्धनता तथा भुखमरी के शिकार रहे।

प्रश्न 22.
संथाल विद्रोह के दो कारण बताओ।
उत्तर:
संथाल विद्रोह के दो कारण निम्नलिखित थे

  • बंगाल में अपनाई गई स्थायी भू-राजस्व प्रणाली के कारण संथालों की जमीनें धीरे-धीरे उनके हाथों से निकलकर ज़मींदारों और साहूकारों के हाथों में जाने लगीं।
  • सरकारी अधिकारी, पुलिस, थानेदार सभी महाजनों का पक्ष लेते थे। वे स्वयं भी संथालों से बेगार लेते थे। यहाँ तक कि संथाल कृषकों की स्त्रियों की इज्जत भी सुरक्षित नहीं थी। अतः दीकुओं (बाहरी लोगों) के विरुद्ध संथालों का विद्रोह फूट पड़ा।

प्रश्न 23.
विद्रोह के दौरान संथालों ने महाजनों और साहूकारों को निशाना क्यों बनाया?
उत्तर:
संथालों ने महाजनों एवं ज़मींदारों के घरों को जला दिया, उन्होंने जमकर लूटपाट की तथा उन बही-खातों को भी बर्बाद कर दिया जिनके कारण वे गुलाम हो गए थे। चूंकि अंग्रेज़ सरकार महाजनों और ज़मींदारों का पक्ष ले रही थी। अतः संथालों ने सरकारी कार्यालयों, पुलिस कर्मचारियों पर भी हमले किए।

प्रश्न 24.
कंपनी सरकार ने संथाल विद्रोह का दमन कैसे किया?
उत्तर:
कंपनी सरकार ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए एक मेजर जनरल के नेतृत्व में 10 टुकड़ियाँ भेजीं। विद्रोही नेताओं को पकड़वाने पर 10 हजार का इनाम रखा गया। सेना ने कत्लेआम मचा दिया। गाँव-के-गाँव जलाकर राख कर दिए।

प्रश्न 25.
बुकानन विवरण की दो विशेषताएँ लिखिए। उत्तर:बुकानन विवरण की विशेषताएँ इस प्रकार हैं

(1) बुकानन ने अपने विवरण में उन स्थानों को रेखांकित किया जहाँ लोहा, ग्रेनाइट, साल्टपीटर व अबरक इत्यादि खनिजों के भंडार थे। यह सारी जानकारी कंपनी के लिए वाणिज्यिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण थी।

(2) बुकानन मात्र भू-खंडों का वर्णन ही नहीं करता अपितु वह सुझाव भी देता है कि इन्हें किस तरह कृषि-क्षेत्र में बदला जा सकता है। कौन-सी फसलें बोई जा सकती हैं।

प्रश्न 26.
दक्कन विद्रोह को दबाने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों ने क्या किया?
उत्तर:
इस विद्रोह के फैलने से ब्रिटिश अधिकारी घबरा गए। विद्रोही गाँवों में पुलिस चौकियाँ बनाई गईं। यहाँ तक कि इस इलाके को सेना के हवाले करना पड़ा। 95 किसानों को गिरफ्तार करके दंडित किया गया। विद्रोह पर नियंत्रण के बाद भी स्थिति पर नज़र रखी गई।

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प्रश्न 27.
दामिन-इ-कोह के निर्माण से संथालों के जीवन में आए दो परिवर्तनों को बताइए।
उत्तर:
दामिन-इ-कोह के निर्माण से संथालों के जीवन में आए दो परिवर्तन इस प्रकार थे

  • दामिन-इ-कोह में संथालों ने खानाबदोश जिंदगी छोड़ दी और स्थायी रूप से बस गए।
  • वे कई प्रकार की वाणिज्यिक फसलों का उत्पादन करने लगे और साहूकारों तथा व्यापारियों से लेन-देन करने लगे।

प्रश्न 28.
ब्रिटेन में ‘कपास आपूर्ति संघ’ व मैनचेस्टर कॉटन कंपनी की स्थापना के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
1857 ई० में ‘कपास आपूर्ति संघ’ तथा 1859 ई० में मैनचेस्टर कॉटन कंपनी (Menchester Cotton Company) बनाई गई जिसका उद्देश्य दुनिया के प्रत्येक भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना था।

प्रश्न 29.
रैयतवाड़ी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
रैयतवाड़ी भू-राजस्व व्यवस्था की वह प्रणाली थी जिसके अन्तर्गत रैयत (किसानों) का सरकार से सीधा सम्बन्ध होता था। इस व्यवस्था में बिचौलिये समाप्त कर दिए गए।

प्रश्न 30.
डेविड रिकार्डो कौन था?
उत्तर:
डेविड रिकार्डो 1820 के दशक में इंग्लैण्ड का अर्थशास्त्री था। उसके अनुसार भू-स्वामी को उस समय प्रचलित ‘औसत लगानों’ को प्राप्त करने का हक होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्त होने लगे तो वह भू-स्वामी की अधिशेष आय होगी। जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी।

प्रश्न 31.
पहाड़िया लोग मैदानी क्षेत्रों पर आक्रमण क्यों करते रहते थे?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों द्वारा मैदानी क्षेत्रों पर आक्रमण अभाव व अकाल से बचने के लिए, मैदानों में बसे समुदायों पर अपनी शक्ति दिखाने के लिए तथा बाहरी लोगों के साथ राजनीतिक संबंध स्थापित करने के लिए भी किए जाते थे।

प्रश्न 32.
जमींदारों पर नियन्त्रण के उद्देश्य से कम्पनी ने कौन-से कदम उठाए?
उत्तर:
ज़मींदारों की शक्ति पर नियंत्रण रखने के लिए उनकी सैन्य टुकड़ियों को भंग कर दिया गया। ज़मींदारों से पुलिस एवं न्याय व्यवस्था का अधिकार छीन लिया गया तथा उनके द्वारा लिया जाने वाला सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 33.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ महत्त्वपूर्ण क्यों थी?
उत्तर:
1813 में ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई फरमिंगर की एक रिपोर्ट है। यह ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के नाम से जानी गई, यह स्वयं में पहली चार रिपोर्टों से अधिक महत्त्वपूर्ण बन गई क्योंकि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन व क्रियाकलापों के संदर्भ में यह एक विस्तृत रिपोर्ट थी।

प्रश्न 34.
पहाड़िया लोग कौन थे?
उत्तर:
बंगाल में राजमहल की पहाड़ियों के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को ‘पहाड़िया’ के नाम से जाना जाता था। ये लोग सदियों से प्रकृति की गोद में निवास करते आ रहे थे। झूम की खेती, जंगल के उत्पाद तथा शिकार उनके जीविकोपार्जन के साधन थे।

प्रश्न 35.
स्थायी बन्दोबस्त की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
स्थायी बन्दोबस्त की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) यह समझौता बंगाल के राजाओं और ताल्लुकेदारों के साथ कर उन्हें ‘ज़मींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया।
(2) ज़मींदारों द्वारा सरकार को दी जाने वाली वार्षिक भूमि-कर राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई। इसीलिए इसे ‘स्थायी बंदोबस्त’ से भी पुकारा गया। .

प्रश्न 36.
स्थायी बन्दोबस्त की दो हानियाँ लिखो।
उत्तर:
स्थायी बन्दोबस्त की दो हानियाँ निम्नलिखित हैं
(1) इस व्यवस्था में, सरकार और रैयत के बीच कोई सीधा संबंध नहीं था। उन्हें ज़मींदारों की दया पर छोड़ दिया गया था। उनके हितों की पूरी तरह उपेक्षा की गई।

(2) इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमिकर में वृद्धि का अधिकार सरकार के पास नहीं था। इसलिए शुरू में तो यह व्यवस्था सरकार के लिए लाभकारी रही परंतु बाद में कृषि उत्पादों में हुई वृद्धि के बावजूद भी सरकार अपने भूमि-कर में वृद्धि नहीं कर सकी।

प्रश्न 37.
पहाड़िया लोगों द्वारा अपनाई गई झूम खेती क्या थी?
उत्तर:
पहाड़िया लोग जंगल में झाड़ियों को काटकर व घास-फूस को जलाकर ज़मीन का एक छोटा-सा टुकड़ा निकाल लेते थे। यह छोटा-सा खेत पर्याप्त उपजाऊ होता था। घास व झाड़ियों के जलने से बनी राख उसे और भी उपजाऊ बना देती थी। कुछ वर्षों तक उसमें खाने के लिए विभिन्न तरह की दालें और ज्वार-बाजरा उगाते और फिर कुछ वर्षों के लिए उसे खाली (परती) छोड़ देते। ताकि यह पुनः उर्वर हो जाए। ऐसी खेती को स्थानांतरित खेती (Shifting Cultivation) अथवा झूम की खेती कहा जाता है।

प्रश्न 38.
संथाल परगना क्यों बनाया गया?
उत्तर:
संथाल विद्रोह को दबाने के बाद अलग संथाल परगना बनाया गया ताकि आक्रोश कम हो सके। इस परगने में भागलपुर और वीरभूम जिलों का 5500 वर्गमील शामिल किया गया। संथाल परगना में कुछ विशेष कानून लागू किए गए जैसे कि यहाँ यूरोपीय मिशनरियों के अतिरिक्त अन्य बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई।

प्रश्न 39.
फ्रांसिस बुकानन कौन था?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था। इसने 1794 से 1815 तक एक चिकित्सक के रूप में बंगाल में कंपनी सरकार में नौकरी की। कुछ वर्ष वह लॉर्ड वेलजली (गवर्नर-जनरल) का शल्य चिकित्सक भी रहा। उसने कलकत्ता में अलीपुर चिड़ियाघर की स्थापना की।

प्रश्न 40.
जंगलों के विनाश के सम्बन्ध में स्थानीय लोगों व बुकानन के दृष्टिकोण में क्या अन्तर था?
उत्तर:
स्थानीय लोग जंगलों के विनाश में अपना हित नहीं देखते थे। उनका दृष्टिकोण जीवनयापन तक सीमित था। जबकि बुकानन का दृष्टिकोण आधुनिक पश्चिमी विचारधारा तथा कंपनी के वाणिज्यिक हितों से प्रेरित था।

प्रश्न 41.
महालवाड़ी प्रणाली के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
महालवाड़ी प्रणाली मुख्यतः संयुक्त प्रांत, आगरा, अवध, मध्य प्रांत तथा पंजाब के कुछ भागों में लागू की गई थी। ब्रिटिश भारत की कुल 30 प्रतिशत भूमि इसके अंतर्गत आती थी। इस बंदोबस्त में महाल अथवा गाँव को इकाई माना गया। भू-राजस्व देने के लिए यह इकाई उत्तरदायी थी। .

प्रश्न 42.
‘पूना सार्वजनिक सभा’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
सन् 1873 में मध्यजीवी बुद्धिजीवियों का एक नया संगठन ‘पूना सार्वजनिक सभा’ ने किसानों के मामले में हस्तक्षेप किया। भू-राजस्व दरों पर पुनः विचार करने के लिए एक याचिका दायर की गई। नई भू-राजस्व दरों के विरुद्ध कुनबी कृषकों को जागृत करने के लिए इस संगठन के कार्यकर्ता दक्कन देहात के गाँवों में भी गए।।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी) के दो लाभ बताएँ।।
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त (ज़मींदारी प्रथा) काफी विचार-विमर्श के बाद शुरू की गई थी। इसलिए इससे कुछ अपेक्षित लाभ हुए, जो इस प्रकार हैं
1. सरकार की आय का निश्चित होना-सरकार की वार्षिक आय निश्चित हो गई जिससे प्रशासन व व्यापार दोनों को नियमित करने में लाभ हुआ।

2. धन व समय की बचत-इससे कंपनी सरकार को धन व समय दोनों की बचत हुई। प्रतिवर्ष बंदोबस्त निश्चित करने में धन व समय दोनों ही बर्बाद होते. थे।

3. वफादार वर्ग-स्थायी बंदोबस्त से ज़मींदारों का वर्ग अंग्रेजों की नीतियों से धनी हुआ। अतः यह उनका एक वफादार सहयोगी बनता गया। लेकिन यह बात सभी ज़मींदारों पर लागू नहीं हुई।

4. कंपनी के व्यापार में वृद्धि-स्थायी बंदोबस्त से बंगाल में कंपनी की आय सुनिश्चित हो गई। अब वह अपना ध्यान व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ाने में लगा पाई। फलतः इससे उसे व्यापारिक लाभ मिला।

5. ज़मींदारों की समृद्धि-जो ज़मींदार सख्ती के साथ किसानों से लगान वसूलने में सफल हुए, वे समृद्ध होते गए।

प्रश्न 2.
स्थायी बंदोबस्त की हानियों का वर्णन करें।
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त के कुछ लाभ कंपनी को मिले। परन्तु यह बंगाल की अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं कर सकी। कालांतर में यह कंपनी के लिए भी आर्थिक तौर पर घाटे का सौदा सिद्ध हुई। अतः कुछ विद्वानों ने इस बंदोबस्त की कड़ी आलोचना की है। इसके कुछ निम्नलिखित दुष्परिणाम हुए

1. सरकार को हानि-निःसंदेह इससे सरकार को एक निश्चित वार्षिक आय तो होने लगी। परंतु इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमिकर में वृद्धि का अधिकार सरकार के पास नहीं था। इसलिए शुरू में तो यह व्यवस्था सरकार के लिए लाभकारी रही परंतु बाद में सरकार अपने भूमि-कर में वृद्धि नहीं कर सकी।

2. रैयत के हितों की अनदेखी-इस व्यवस्था में, सरकार और रैयत के बीच कोई सीधा संबंध नहीं था। उन्हें ज़मींदारों की दया पर छोड़ दिया गया था। उनके हितों की पूरी तरह उपेक्षा की गई। वे किसान की संपत्ति को बेचकर लगान की पूरी रकम वसूल कर सकते थे। तथापि यह तरीका आसान नहीं था क्योंकि कानूनी प्रक्रिया काफी लंबी थी।

3. कृषि में पिछड़ापन-ज़मींदारी प्रथा से कृषि अर्थव्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि उसका पिछड़ापन और भी बढ़ता गया। ज़मींदार वर्ग ने कृषि सुधारों में कोई रुचि नहीं दिखाई। दूसरी ओर किसान पर लगान का बोझ बढ़ता गया। उसे चुकाने के लिए वह साहूकारों के चंगुल में फँसता गया। किसान के पास कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ बच ही नहीं पाता था। फलतः कृषि का पिछड़ापन बढ़ता गया।

4. अनुपस्थित ज़मींदार-इस व्यवस्था में नए जमींदार वर्ग का उदय हुआ। यह पहले के ज़मींदारों से कई मायनों में अलग था। इन्होंने उन पुराने ज़मींदारों की ज़मींदारियां खरीद ली थीं जो समय पर लगान वसूल करके सरकार को जमा नहीं करवा सके थे। इन नए ज़मींदारों ने अपनी सहूलियत के लिए किसानों से लगान वसूली का काम आगे अन्य इच्छुक लोगों को ज्यादा धन लेकर पट्टे अथवा ठेके पर दे दिया। इस प्रकार खेतिहर किसान और वास्तविक ज़मींदार के मध्य परजीवी ज़मींदारों की एक लंबी श्रृंखला (चेन) पैदा हो गई। इस लगानजीवी वर्ग का सारा भार अन्ततः किसान पर ही पड़ता था।

5. जमींदारों को हानि-प्रारंभ में स्थायी बंदोबस्त ज़मींदारों के लिए भी काफी हानिप्रद सिद्ध हुआ। बहुत-से ज़मींदार सरकार को निर्धारित भूमि-कर का भुगतान समय पर नहीं कर सके। परिणामस्वरूप उन्हें उनकी ज़मींदारी से वंचित कर दिया गया। समकालीन स्रोतों से ज्ञात होता है कि बर्दवान के राजा (शक्तिशाली ज़मींदार) की ज़मींदारी के अनेक महाल (भू-संपदाएँ) सार्वजनिक तौर पर नीलाम किए गए थे। उस पर राजस्व की एक बड़ी राशि बकाया थी। लेकिन यह कहानी अकेले बर्दवान (अब बर्द्धमान) ” की नहीं थी। 18वीं सदी के अंतिम वर्षों में काफी बड़े स्तर पर ऐसी भू-संपदाओं की नीलामी हुई थी।

प्रश्न 3.
स्थायी बंदोबस्त में ज़मींदार राजस्व राशि के भुगतान में क्यों असमर्थ हुए?
उत्तर:
राजस्व राशि का भुगतान करने में ज़मींदार कई कारणों से असमर्थ रहे। ये कारण सरकार की नीतियों एवं ज़मींदारों की स्थिति से जुड़े हुए थे। संक्षेप में ये कारण इस प्रकार थे

1. राजस्व की ऊँची दर-भू-राजस्व की दर शुरू से ही अपेक्षाकृत काफी ऊँची तय की गई थी क्योंकि राजस्व की दर स्थायी तौर पर निर्धारित करते समय कंपनी के अधिकारियों ने इस तथ्य को ध्यान में रखा कि आगे चलकर खेती के विस्तार तथा कीमतों में बढ़ोत्तरी होने से ज़मींदारों की आय में वृद्धि होगी, लेकिन सरकार अपना दावा उसमें से कभी नहीं कर सकेगी। अतः भविष्य की भरपाई वे शुरू से ही करना चाहते थे। उनकी यह दलील थी कि शुरू-शुरू में यह माँग ज़मींदारों को कुछ अधिक लगेगी परन्तु आगे आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे यह सहज हो जाएगी।

2. मंदी में ऊँचा राजस्व-स्थायी बंदोबस्त के लिए राजस्व दर का निर्धारण 1790 के दशक में किया गया। यह मंदी का दशक था। कृषि उत्पादों की कीमतें अपेक्षाकृत कम थीं। ऐसे में रैयत (किसानों) के लिए ऊँची दर का राजस्व चुकाना कठिन था। इस प्रकार ज़मींदार किसानों से राजस्व इकट्ठा नहीं कर पाए और वह सरकार को देय राशि का भुगतान करने में भी असमर्थ रहे।

3. सूर्यास्त विधि-इस व्यवस्था में केवल राजस्वों की दर ही ऊँची नहीं थी वरन वसूली के तरीके भी अत्यंत सख्त थे। इसके लिए सूर्यास्त विधि का अनुसरण किया गया, जिसका तात्पर्य था कि निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि का भुगतान न कर पाने पर ज़मींदारियों को नीलाम कर दिया जाए। ध्यान रहे इसमें राजस्वों की माँग निश्चित थी। फसल हो या न हो जमींदार को तो निश्चित तिथि तक सरकारी माँग पूरी करनी होती थी। इसलिए लगान एकत्र न करने वाले बर्बाद हो गए।

4. ज़मींदारों की शक्तियों में कमी-बंगाल में ज़मींदार छोटे राजा थे। उनके पास न्यायिक अधिकार थे और सैन्य टुकड़ियाँ भी थीं। उनकी अपनी पुलिस व्यवस्था थी। कंपनी की सरकार ने उनकी यह शक्तियाँ उनसे छीन लीं। उनकी शक्तियाँ मात्र किसानों से लगान इकट्ठा करने और अपनी ज़मींदारी का प्रबंध करने तक ही सीमित कर दी गईं। उनके सैनिक दस्तों को भंग कर दिया गया।

उनके न्यायालयों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के नियंत्रण में रख दिया गया। स्थानीय पुलिस प्रबंध भी कलेक्टर ने अपने हाथ में ले लिया। इस प्रकार प्रशासन का केंद्र बिंदु ज़मींदार नहीं बल्कि कलेक्टर बनता गया। ज़मींदार शक्तिहीन होकर पूर्णतः सरकार की दया पर निर्भर हो गया। समकालीन सरकारी दस्तावेजों से पता चलता है कि किस प्रकार सरकारी माँग पूरी न कर पाने वाले ज़मींदारों को ज़मींदारी से वंचित कर दिया जाता था।

5. ग्राम मुखियाओं का व्यवहार-बंगाल में ग्राम के मुखियाओं को जोतदार अथवा मंडल कहा जाता था। यह काफी सम्पन्न किसान (रैयत) थे। कुछ गरीब किसान भी इनके प्रभाव में होते थे। इस सम्पन्न ग्रामीण वर्ग का ज़मींदारों के प्रति व्यवहार काफी नकारात्मक रहता था। जब ज़मींदार का अधिकारी गाँव में लगान एकत्र करने में असफल रहता और ज़मींदार सरकार को भुगतान न कर पाता तो जोतदारों को बड़ी खुशी होती थी।

अच्छी फसल न होने या फिर सम्पन्न रैयत जान-बूझकर समय पर ज़मींदार को लगान का भुगतान नहीं करते थे। दोनों ही अवसरों पर ज़मींदार मुसीबत में फंसता था। शक्तियाँ सीमित कर दिए जाने के कारण अब वे आसानी से बाकीदारों के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग भी नहीं कर सकते थे। वह बाकीदारों के विरुद्ध न्यायालय में तो जा सकता था। परन्तु न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी थी कि वर्षों चलती रहती थी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 4.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ क्या थी?
उत्तर:
कंपनी के प्रशासन और बंगाल की स्थिति पर सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई विशेष रिपोर्ट ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के नाम से जानी गई। क्योंकि इससे पूर्व चार रिपोर्ट इस संदर्भ में पहले भी प्रस्तुत हो चुकी थीं। लेकिन यह स्वयं में पहली चार रिपोर्टों से अधिक महत्त्वपूर्ण बन गई क्योंकि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन व क्रियाकलापों के बारे में यह एक विस्तृत रिपोर्ट थी। इसमें 1002 पृष्ठ थे जिनमें से 800 से अधिक पृष्ठों में परिशिष्ट लगाए गए थे। इन परिशिष्टों में भू-राजस्व से संबंधित आंकड़ों की तालिकाएँ, अधिकारियों की बंगाल व मद्रास में राजस्व व न्यायिक प्रशासन पर लिखी गई टिप्पणियाँ शामिल थीं।

साथ ही जिला कलेक्टरों की अपने अधीन भू-राजस्व व्यवस्था पर रिपोर्ट तथा ज़मींदारों एवं रैयतों के आवेदन पत्रों को सम्मिलित किया गया था। यह साक्ष्य इतिहास लेखन के लिए बहुमूल्य हैं। उल्लेखनीय है कि 1760 से 1800 ई० के बीच चार दशकों में बंगाल के देहात में हुए विभिन्न परिवर्तनों की जानकारी का आधार पाँचवीं रिपोर्ट में शामिल यह तथ्य ही रहे हैं। यह रिपोर्ट हमारे विचारों एवं अवधारणाओं का एक मुख्य आधार रही है।

प्रश्न 5.
ब्रिटिश संसद में ‘पाँचवीं रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के क्या कारण थे?
उत्तर:
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ भारत में कंपनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों पर एक विस्तृत रिपोर्ट थी। ब्रिटिश संसद में ‘पाँचवीं रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कारण थे

1. कंपनी का सत्ता बनना-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी। परन्तु वे बक्सर के युद्ध के पश्चात् भारत में एक राजनीतिक सत्ता बन गई। फलस्वरूप उसकी गतिविधियों पर सूक्ष्म नज़र रखी जाने लगी। इंग्लैंड में अनेक राजनीतिक समूहों का मत था कि बंगाल की विजय का लाभ केवल ईस्ट इंडिया कंपनी को नहीं मिलना चाहिए, बल्कि ब्रिटिश राष्ट्र को भी मिलना चाहिए।

2. अन्य व्यापारियों का दबाव-ब्रिटेन के अनेक व्यापारिक समूह कंपनी के व्यापार के एकाधिकार का विरोध कर रहे थे। निजी व्यापार करने वाले ऐसे व्यापारियों की संख्या बढ़ रही थी। वे भी भारत के साथ व्यापार में हिस्सेदारी के इच्छुक थे। वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को एकाधिकार प्रदान करने वाले शाही फरमान को रद्द करवाना चाहते थे। ब्रिटेन के उद्योगपति भी भारत में ब्रिटिश विनिर्माताओं के लिए अवसर देख रहे थे। अतः वे भी भारत के बाजार उनके लिए खुलवाने को उत्सुक थे।

3. कंपनी के भ्रष्टाचार व प्रशासन पर बहस कंपनी के कर्मचारी तथा अधिकारी निजी व्यापार तथा रिश्वतखोरी से बहुत-सा धन लेकर ब्रिटेन लौटते थे। उनकी यह धन संपत्ति अन्य निजी व्यापारियों के मन में ईर्ष्या उत्पन्न करती थी क्योंकि यह व्यापारी भी भारत से शुरू हुई लूट में हिस्सा पाने के इच्छुक थे। कई राजनीतिक समूह ब्रिटिश संसद में भी इस मुद्दे को उठा रहे थे। साथ ही ब्रिटेन के समाचार पत्रों में भी कंपनी अधिकारियों के लोभ व लालच का पर्दाफाश कर रहे थे। इंग्लैंड में कंपनी के बंगाल में अराजक व अव्यवस्थित शासन की सूचनाएँ भी पहुँच रही थी। अतः कंपनी के अधिकारियों में भ्रष्टाचार तथा कुशासन पर इंग्लैंड में बहस छिड़ चुकी थी।

4. कंपनी पर नियंत्रण-स्पष्ट है कि ब्रिटेन में आर्थिक एवं राजनीतिक दबावों के चलते भारत में कंपनी शासन पर नियंत्रण आवश्यक हो गया था। इसके लिए सबसे पहले सन् 1773 में ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट’ फिर 1784 में ‘पिट्स इंडिया एक्ट’ तथा आगे और कई एक्ट पास किए गए। इन अधिनियमों के माध्यम से कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत में अपने राजस्व, प्रशासन इत्यादि के संबंध में नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार को सूचना प्रदान करे। साथ ही कंपनी के काम-काज का निरीक्षण करने के लिए कई समितियों का गठन किया गया। ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ भी एक ऐसी ही रिपोर्ट थी जिसे एक प्रवर समिति (Select Committee) द्वारा तैयार किया गया था।

प्रश्न 6.
क्या ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ पूर्णतः निष्पक्ष थी?
अथवा
‘पाँचवी रिपोर्ट’ की आलोचना के कोई दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:
पाँचवीं रिपोर्ट साक्ष्यों की दृष्टि से काफी समृद्ध थी, लेकिन पूर्णतः निष्पक्ष नहीं थी। 8वीं सदी के अंतिम दशकों में यह बंगाल में कंपनी सत्ता के बारे में जानकारी का महत्त्वपूर्ण आधार भी रही। इस आधार पर यह समझा जाता रहा कि बड़े स्तर पर बंगाल के परंपरागत ज़मींदार बर्बाद हो गए थे। उनकी ज़मींदारियाँ नीलाम हो गई थीं। इन पर देय राशि का बकाया सदैव बना रहता था। परन्तु ऐसे सारे निष्कर्ष ठीक नहीं थे। शोधकर्ताओं ने ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के अतिरिक्त समकालीन बंगाल के ज़मींदारों के अभिलेखागारों तथा कलेक्टर कार्यालयों के अन्य अभिलेखों का गहन और सावधानीपूर्वक अध्ययन करके रिपोर्ट के बारे में निम्नलिखित नए निष्कर्ष निकाले

1. पहला–यह रिपोर्ट निष्पक्ष नहीं थी। जो प्रवर समिति के सदस्य इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले थे उनका प्रमुख उद्देश्य कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करना था। राजस्व प्रशासन की कमियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया।

2. दूसरा-परंपरागत ज़मींदारों की शक्ति का पतन काफी बढ़ा-चढ़ाकर और आंकड़ों के जोड़-तोड़ के साथ पेश किया गया।

3. तीसरा-इसमें ज़मींदारों द्वारा ज़मीनें गँवाने और उनकी बर्बादी का उल्लेख भी अतिशयोक्तिपूर्ण है। ऊपर बताया गया है ज़मींदार नीलामी में अपनी जमीन को बचाने के लिए भी कई तरह के हथकंडे अपनाता था।

प्रश्न 7.
पहाड़िया लोगों के मैदानी लोगों के साथ संबंधों की चर्चा करें।
उत्तर:
पहाड़िया जनजाति के लोग मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों विशेषतः ज़मींदारों, किसानों व व्यापारियों इत्यादि पर बराबर आक्रमण करते रहते थे। मुख्यतः यह संबंध निम्नलिखित तीन बातों पर आधारित थे

1. अभाव अथवा अकाल-प्रायः ये आक्रमण पहाड़िया लोगों द्वारा अभाव अथवा अकाल की परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए किए जाते थे। मैदानी भागों में, जहाँ सिंचाई से खेती होती थी, वहाँ यह लोग खाद्य-सामग्री की लूट-पाट करके ले जाते थे।

2. शक्ति-प्रदर्शन-पहाड़िया जनजाति के लोग जब बाहरी लोगों पर आक्रमण करते थे तो उनमें एक लक्ष्य शक्ति-प्रदर्शन कर अपनी धाक जमाना भी रहता था। इस शक्ति-प्रदर्शन का लाभ उन्हें आक्रमणों के बाद भी मिलता रहता था।

3. राजनीतिक संबंध-इन आक्रमणों का लाभ पहाड़िया मुखियाओं अथवा सरदारों को बाहरी लोगों के साथ राजनीतिक संबंध स्थापना में मिलता था। आक्रमणों से वे मैदानी ज़मींदारों व व्यापारियों में भय उत्पन्न करते थे। भयभीत हुए ज़मींदार बचाव के लिए मुखियाओं को नियमित खिराज़ का भुगतान करते थे। इसी प्रकार व्यापारियों से वह पथ-कर वसूल करते थे। जो व्यापारी उन्हें यह कर देते थे उनकी जान-माल की सुरक्षा का आश्वासन दिया जाता था। इस प्रकार पहाड़िया और मैदानी लोगों के बीच कुछ संघर्ष और कुछ अल्पकालीन शांति-संधियों से संबंध चलते आ रहे थे।

18वीं सदी के अंतिम दशकों से संबंध परिवर्तन-18वीं सदी के अंतिम दशकों में पहाड़िया और मैदानी लोगों के बीच संबंधों में बदलाव आने लगा। इसका मुख्य कारण ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आर्थिक हित थे। यह पूर्वी बंगाल में अधिक-से-अधिक कृषि क्षेत्र का विस्तार करना चाहती थी। इसके लिए जंगलों को साफ करके कृषि क्षेत्र के विस्तार को प्रोत्साहन दिया। परिणाम यह हुआ कि जमींदारों और जोतदारों ने उन क्षेत्रों पर अधिकार जमा लिया जो पहले पहाड़िया लोगों के पास थे। यह लोग उनके परती खेतों पर कब्जा करके उनमें धान की खेती करने लगे। इसके लिए उन्हें कंपनी सत्ता का समर्थन प्राप्त था।

प्रश्न 8.
कंपनी सरकार ने राजमहल के पहाड़ी क्षेत्र में स्थायी कृषि के विस्तार को प्रोत्साहन क्यों दिया ?
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार ने निम्नलिखित कारणों से राजमहल के पहाड़ी क्षेत्र में स्थायी कृषि के विस्तार को प्रोत्साहन दिया
1. राजस्व वृद्धि-उस काल में बंगाल की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी। इसलिए राजस्व का स्रोत भी कृषि उत्पादन ही था। अतः राजस्व में वृद्धि के लिए उन्होंने कृषि विस्तार पर जोर दिया।

2. कृषि उत्पादों का निर्यात-18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति हो रही थी। बड़े-बड़े उद्योग लग रहे थे। इनमें काम करने वाले लोगों के भोजन व अन्य जरूरतों के लिए कृषि उत्पादों की जरूरत थी। इसलिए कंपनी सरकार कृषि क्षेत्र के विस्तार में रुचि ले रही थी।

3. पहाड़िया के प्रति अधिकारियों का दृष्टिकोण-कंपनी के अधिकारी पहाड़िया लोगों को बर्बर और उपद्रवी समझते थे। ऐसे जनजाति लोगों को सभ्य बनाने के लिए वे समझते थे कि उनके क्षेत्रों में कृषि-विस्तार किया जाए। ताकि पहाड़िया लोग कृषि जीवन अपना सकें, जो उनकी दृष्टि में एक सभ्य सामाजिक जीवन था। वास्तविकता यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने आर्थिक (संसाधनों का दोहन) और प्रशासनिक दोनों उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए पहाड़िया के क्षेत्रों में घुसपैठ शुरू की।

प्रश्न 9.
अधिकारियों ने पहाड़िया क्षेत्र में संथालों को प्राथमिकता क्यों दी?
उत्तर:
कंपनी अधिकारी कृषि क्षेत्र का विस्तार राजमहल की पहाड़ियों के क्षेत्रों में करना चाहते थे। इसके लिए पहाड़ियों की तुलना में संथाल उन्हें अग्रणी बाशिंदे लगे। इसलिए उन्होंने संथालों को प्राथमिकता दी। उन्होंने पहले ज़मींदारों से इस क्षेत्र में खेती करवाना चाहा परन्तु पहाड़ियों के उपद्रव होने लगे। वे इसके लिए पहाड़िया लोगों को भी स्थायी किसान बनाना चाहते थे। परन्तु इसमें भी उन्हें सफलता नहीं मिली।

क्योंकि पहाड़िया लोग प्रकृति-प्रेमी थे। प्रकृति के प्रति उनका दृष्टिकोण आक्रामक नहीं था। वे जंगलों को बर्बाद करके उस क्षेत्र में हल नहीं चलाना चाहते थे। वे छोटे-छोटे खेतों में कुदाली से ही खुरच कर थोड़ी-बहुत फसल लगाने के अभ्यस्त थे। इस फसल से ही उनका जीवन निर्वाह हो जाता था। वह बाज़ार के लिए खेती नहीं करना चाहते थे। वे हल को हाथ लगाना ही पाप समझते थे।

अतः अंग्रेजों को पहाड़ियों को कृषक बनाने में सफलता नहीं मिली। ऐसी परिस्थितियों में अंग्रेज़ अधिकारियों का परिचय संथाल जनजाति के लोगों से हुआ। यह पूरी ताकत के साथ ज़मीन में काम करते थे। उन्हें जंगल काटने में भी कोई हिचक नहीं थी। वे अपेक्षाकृत अग्रणी बाशिदे थे। कंपनी अधिकारियों ने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसे महालों (गाँवों) में बसने का निमंत्रण दिया। संथालों के गीतों और मिथकों से पता चलता है कि वे तो खेती के लिए ज़मीन की तलाश में ही भटक रहे थे। अतः उन्होंने अधिकारियों के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में उन्हें बड़े स्तर पर जंगल क्षेत्र की ज़मीनें आबंटित की गईं।

प्रश्न 10.
‘दामिन-इ-कोह का सीमांकन’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
दामिन-इ-कोह नाम उस विस्तृत भू-भाग को दिया गया था जो संथालों को दिया गया था। सन् 1832 तक इस पूरे क्षेत्र का नक्शा बनाया गया। इसके चारों ओर खंबे गाड़कर इसकी परिसीमा निर्धारित की गई। इस परिसीमित क्षेत्र को संथाल भूमि घोषित किया गया। संथालों को इसी में रहते हुए हल से खेती करनी थी। उन्हें अपने जनजातीय जीवन को त्यागना था। कंपनी सरकार ने संथाल कृषकों से एक अनुबंध किया था। इसके अनुसार उन्हें पहले दशक के अंदर प्राप्त भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को कृषि योग्य बनाकर उसमें खेती करनी थी।

संथालों को यह अनुबंध पसंद आया। सीमांकन के बाद दामिन-इ-कोह में काफी तेजी से संथालों की बस्तियों में वृद्धि हुई। सन् 1851 में मात्र 13 वर्षों में उनके गाँवों की संख्या 40 से बढ़कर 1473 तक पहुँच चुकी थी। इसी अवधि में उनकी जनसंख्या 3000 से 82,000 तक पहुंच गई। इस प्रकार संथालों को मानो उनकी दुनिया ही मिल गई थी। वे अलग सीमांकित क्षेत्र में काफी परिश्रम से जमीन निकालकर कृषि करने लगे।

प्रश्न 11.
संथालों के आगमन का पहाड़िया लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों में संथालों के आगमन का पहाड़िया जनजाति के लोगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। जब उनके जंगल, खेतों तथा गाँवों पर कब्जा किया जा रहा था तो उन्होंने संथालों का तीव्र विरोध किया। परन्तु वे संथालों के मुकाबले पराजित हो गये। उन्हें पहाड़ियों की तलहटी वाला उपजाऊ क्षेत्र छोड़कर जाना पड़ा। इस संघर्ष में संथालों की विजय का कारण यह भी था कि कंपनी सरकार के सैन्यबल उन्हें कब्जा दिलवा रहे थे।

पहाड़िया लोगों के जीवन-निर्वाह का आधार ही उनसे छिन गया था। जंगल नहीं रहे तो उन्हें शिकार संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा। उनके पशुओं के लिए पर्याप्त घास नहीं रही। वे अन्य वन-उत्पादों से भी वंचित हो गए। ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में झूम की खेती भी संभव नहीं थी क्योंकि वहाँ ज़मीन गीली नहीं रहती थी। उपजाऊ जमीनें अब उनके लिए दुर्लभ हो गईं क्योंकि उन्हें संथाल क्षेत्र में शामिल कर दिया गया था। वे बंजर, चट्टानी और शुष्क क्षेत्रों में धकेले जा चुके थे। इस सबके परिणामस्वरूप पहाड़िया लोगों के रहन-सहन पर प्रभाव पड़ा। आगे चलकर वह निर्धनता तथा भुखमरी के शिकार रहे।

प्रश्न 12.
बुकानन के विवरण की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक कंपनी कर्मचारी था। उसने भारत में 1810-11 में कंपनी के भू-क्षेत्र का सर्वे करके विवरण तैयार किया था। इस विवरण में निम्नलिखित मुख्य विशेषताएँ झलकती हैं

1. खनिजों के बारे में-बुकानन ने अपने विवरण में उन स्थानों को रेखांकित किया. जहाँ लोहा, ग्रेनाइट, साल्टपीटर व अभ्ररक इत्यादि खनिजों के भंडार थे। लोहा व नमक बनाने की स्थानीय पद्धतियों का भी उसने अध्ययन किया। यह सारी जानकारी कंपनी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण थी।

2. कृषि विस्तार के बारे में-बुकानन ने सुझाव दिए कि किस तरह भू-खंडों को कृषि क्षेत्र में बदला जा सकता है। कौन-सी फसलें बोई जा सकती हैं। कीमती इमारती लकड़ी के पेड़ों का जंगल कहाँ है, उसे कैसे काटा जा सकता है। नए पेड़ कौन-से लगाए जा सकते हैं जिनसे कंपनी को लाभ होगा।

3. स्थानीय निवासियों से अलग दृष्टिकोण-इस विवरण में उसका दृष्टिकोण स्थानीय लोगों से भिन्न था। उदाहरण के लिए स्थानीय लोग जंगलों के विनाश में अपना हित नहीं देखते थे। जबकि बुकानन का दृष्टिकोण कंपनी के वाणिज्यिक हितों से प्रेरित था। इसलिए वह वनवासी लोगों की जीवन-शैली का आलोचक था। वह जंगल के भू-भागों को कृषि क्षेत्र में बदलने का पक्षधर था।

प्रश्न 13.
डेविड रिकार्डो का भू-राजस्व सिद्धांत क्या था?
उत्तर:
डेविड रिकार्डो (David Ricardo) एक प्रमुख अर्थशास्त्री थे। 19वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों से उनके आर्थिक सिद्धांत विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के नए अधिकारी इन सिद्धांतों से प्रभावित थे। अतः बंबई प्रांत (दक्कन) में नई राजस्व प्रणाली अपनाते समय उन्होंने रिकाडों के लगान सिद्धांत को भी ध्यान में रखा। इस सिद्धांत के अनुसार एक भू-स्वामी (चाहे किसान हो या फिर जमींदार) को किसी तत्कालिक अवधि में प्रचलित ‘औसत लगान’ (Average Rent) ही मिलना चाहिए। उसके अनुसार लगान एक भूमिपति की फसल पर हुए कुल खर्च को (श्रम तथा बीज, खाद, पानी सभी तरह का) अलग करने के बाद शुद्ध आय (Net Profit) था। इसलिए इस पर सरकार द्वारा कर लगाना वैध माना गया।

इस सिद्धांत के अनुसार ज़मींदारों को एक किरायाजीवी (Rentier) के रूप में देखा गया। ऐसा वर्ग जो अपनी संपत्ति पर मिलने वाले लगान से विलासी जीवन बिताता है। इसे प्रगति विरोधी प्रवृत्ति माना गया क्योंकि ज़मीन से होने वाले अधिशेष का यह उचित उपयोग नहीं था। रिकार्डो का विचार था कि इस आय पर कर लगाकर उस धन से सरकार स्वयं कृषि विकास को प्रोत्साहन दे। अर्थात् यह उपयोगितावादी विचारधारा (Utilitarianism) के अंतर्गत उत्पन्न एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत था। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन में हो रहे औद्योगिकीकरण के लिए भारत में कृषि विकास महत्त्वपूर्ण होता जा रहा था।

प्रश्न 14.
रैयतवाड़ी प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
रैयतवाड़ी बंदोबस्त सीधा रैयत (किसानों) से ही किया गया था। सरकार और किसान के बीच कोई बिचौलिया ज़मींदार नहीं था। किसान को कानूनी तौर पर उस भूमि का मालिक मान लिया गया था जिस पर वह खेती कर रहा था। ज़मीन की उपजाऊ शक्ति के अनुरूप सरकार का हिस्सा तय किया गया। यह बंदोबस्त 30 वर्षों के लिए किया गया था। इस अवधि के बाद सरकार पुनः ‘एसैसमेंट’ के द्वारा इसे बढ़ा सकती थी।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इसमें ज़मींदारों की भूमिका तो नहीं थी, फिर भी व्यवहार में किसानों को इससे कोई लाभ नहीं पहुँचा। क्योंकि इसमें ज़मींदार का स्थान स्वयं सरकार ने ले लिया था अर्थात् सरकार ही ज़मींदार बन गई थी। किसान को अपनी उपज का लगभग आधा भाग कर के रूप में सरकार को देना पड़ता था। इतना भूमिकर (Revenue) नहीं लगान (Rent) ही होता है। इस अर्थ में तो सरकार ही भूमि की वास्तविक स्वामी थी। जिसे बाद में सरकार ने स्वयं भी स्वीकार कर लिया था।

प्रश्न 15.
अमेरिकी गृह-युद्ध का भारत के कृषि उत्पादकों पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
अमेरिकी गृह-युद्ध का भारत के कपास उत्पादकों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
औद्योगिक युग में वाणिज्यिक फसलों में सबसे अधिक महत्त्व कपास का था। ब्रिटेन के वस्त्र उद्योगों के लिए इसे अधिकतर अमेरिका से मँगवाया जाता था। ब्रिटेन में आयात की जाने वाली कुल कपास का लगभग 3/4 भाग यहीं से आता था। वस्त्र निर्माताओं के लिए यह एक चिंता का विषय भी था। यदि कभी अमेरिका से आपूर्ति बंद हो गई तो क्या होगा। इसलिए 1857 ई० में कपास आपूर्ति संघ तथा 1859 ई० में मानचेस्टर कॉटन कंपनी बनाई गई। इनका उद्देश्य दुनिया के प्रत्येक भाग में कपास के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास करना था। इस उद्देश्य के लिए भारत को विशेषतौर पर रेखांकित किया गया।

अब तक भारत इंग्लैंड का उपनिवेश बन चुका था। इसके कुछ भागों में कपास के लिए उपयुक्त मिट्टी और जलवायु मौजूद थी। उदाहरण के लिए दक्कन की काली मिट्टी और पंजाब के कुछ भाग में कपास पैदा होती थी। इसके साथ-साथ यहाँ सस्ता श्रम भी था। अतः किसी भी स्थिति में अमेरिका से कपास आपूर्ति बंद होने पर भारत से आपूर्ति की जा सकती थी।

अमेरिका में गृह युद्ध-अमेरिका में सन् 1861 में गृह युद्ध छिड़ गया। इससे ब्रिटेन की कपास आपूर्ति को अचानक आघात पहुँचा। ब्रिटेन के वस्त्र उद्योगों में तहलका मच गया। 1862 ई० में अमेरिका से मात्र 55000 गाँठों का आयात हुआ। जबकि 1861 ई० में 20 लाख कपास की गाँठों का आयात हुआ था। इस स्थिति में भारत से ब्रिटेन को कपास निर्यात के लिए सरकारी आदेश दिया गया।

कपास सौदागरों की तो मानों चाँदी ही हो गई। बंबई दक्कन के जिलों में उन्होंने कपास उत्पादन का आँकलन किया। किसानों को अधिक कपास उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया। कपास निर्यातकों ने शहरी साहूकारों को पेशगी राशियाँ दी ताकि वे ये राशियाँ ग्रामीण ऋणदाताओं को उपलब्ध करवा सकें और वे आगे किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप उन्हें उधार दे सकें।

ऋण समस्या का समाधान-अब किसानों के लिए ऋण की समस्या नहीं थी। साहूकार भी अपनी उधर राशि की वापसी के लिए आश्वस्त था। दक्कन के ग्रामीण क्षेत्रों में इसका महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। किसानों को लंबी अवधि के ऋण प्राप्त हुए। कपास उगाई जाने वाली प्रत्येक एकड़ भूमि पर सौ रुपये तक की पेशगी राशि किसानों को दी गई। चार साल के अंदर ही कपास पैदा करने वाली ज़मीन दोगुणी हो गई। 1862 ई० तक स्थिति यह थी कि इंग्लैंड में आयात होने वाले कुल कपास आयात का 90% भाग भारत से जा रहा था। बंबई में दक्कन में कपास उत्पादक क्षेत्रों में इससे समृद्धि आई। यद्यपि इस समृद्धि का लाभ मुख्य तौर पर धनी किसानों को ही हुआ।

प्रश्न 16.
परिसीमन कानून (1859) क्या था?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार ने रैयत की शिकायतों पर विचार करते हुए 1859 ई० में एक परिसीमन कानून पास किया। जिसका उद्देश्य ब्याज के संचित होने से रोकना था। इसलिए इसमें प्रावधान किया गया कि किसान व ऋणदाता के बीच हस्ताक्षरित ऋणपत्र तीन वर्ष के लिए ही मान्य होगा। यह रैयत को साहूकार के शिकंजे से निकालने का प्रयास था। परन्तु इस कानून का व्यवहार में लाभ रैयत को नहीं, बल्कि साहूकार को होने लगा। क्योंकि ऋण लेना किसान की मजबूरी थी। इसलिए तीन साल के बाद जब वह साहूकार से आगे उधार की माँग करता था तो साहूकार किसान से नए ऋण अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाता था।

इसमें वह पिछले तीन साल का ब्याज जोड़कर मूलधन में शामिल कर देता था और फिर इस पर नए सिरे से ब्याज शुरू हो जाता था। इस प्रकार साहूकार ने बड़ी चालाकी से इस नए कानून का दुरुपयोग अपने हित के लिए करना शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया की जानकारी भी रैयत ने ‘दक्कन दंगा आयोग’ को दी। ‘दक्कन दंगा आयोग’ में किसानों ने दर्ज अपनी शिकायतों में जबरन वसूली से संबंधित अन्याय को भी दर्ज करवाया।

प्रश्न 17.
दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
1857 के जन-विद्रोह की यादें अभी पुरानी नहीं पड़ी थीं। इसलिए कोई भी कृषक-विद्रोह ब्रिटिश सरकार को खतरे की घंटी जान पड़ता था। दक्कन में हुए कृषक विद्रोह (1875) को बंबई सरकार ने सफलतापूर्वक कुचल दिया था। यद्यपि शांति स्थापित करने में उसे कई महीने लगे। बंबई सरकार में प्रारंभ में तो 1875 के इस कृषक विद्रोह को इतनी गंभीरता से नहीं लिया। परन्तु जब तत्कालिक भारत सरकार (ब्रिटिश) ने दबाव डाला तो इसके लिए एक जाँच आयोग बैठाया गया। इसे ‘दक्कन दंगा आयोग’ नाम दिया गया। 1878 में ब्रिटिश संसद से प्रस्तुत इसकी रिपोर्ट को ‘दक्कन दंगा रिपोर्ट’ कहा गया। यह रिपोर्ट काफी जाँच-पड़ताल के बाद तैयार की गई थी। इसमें मुख्यतः निम्नलिखित सूचनाएँ जुटाई गईं

  • दंगाग्रस्त जिलों में किसानों, साहूकारों तथा चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज किए गए;
  • फसल मूल्यों, मूलधन तथा ब्याज से संबंधित आँकड़े जुटाए गए;
  • भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की राजस्व दरों का अध्ययन किया गया;
  • प्रशासन की भूमिका तथा जिला कलेक्टरों द्वारा भेजी गई रिपोर्टों को संकलित किया गया।

अतः यह रिपोर्ट दक्कन विद्रोह को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

प्रश्न 18.
इतिहास-लेखन में इतिहासकार सरकारी अभिलेखों का उपयोग किस प्रकार करते हैं?
उत्तर:
इतिहास लेखन के लिए स्रोत आवश्यक हैं। कानून संबंधी रिपोर्ट, दंगा आयोगों की रिपोर्ट तथा अन्य सभी तरह की सरकारी रिपोर्ट इतिहासकार के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं। अंग्रेजी राज व्यवस्था के काल की ये रिपोर्ट इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इस काल में ‘फाइल कल्चर’ आ चुका था। संविदाओं और अनुबंधों का महत्त्व बढ़ गया था। सरकारी अभिलेखों के बारे में यह बात महत्त्वपूर्ण है कि ये स्वयं में इतिहास नहीं होते। ये इतिहास के पुनर्निर्माण के स्रोत होते हैं। इसलिए इनका उपयोग करते समय इतिहासकार अग्रलिखित बातों को ध्यान में रखते हैं

(1) वे सरकारी रिपोर्टों का अध्ययन अत्यधिक सावधानीपूर्वक करते हैं। विशेषतः इस बात को देखते हैं कि कोई रिपोर्ट किन परिस्थितियों में और क्यों तैयार की गई है। तैयार करने वाले की सोच क्या रही होगी।

(2) सरकारी रिपोर्टों का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी होता है अर्थात् किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इन रिपोर्टों से प्राप्त साक्ष्यों को गैर-सरकारी विवरणों, समाचार-पत्रों, संबंधित मामले की ‘कोर्ट’ में दर्ज याचिकाओं व न्यायाधीशों के निर्णयों इत्यादि के ‘साथ मिलान कर लेना चाहिए।

प्रश्न 19.
बेनामी खरीददारी पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
ज़मींदारों ने अपनी ज़मींदारी की भू-संपदा बचाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हथकंडा बेनामी खरीददारी को अपनाया। इसमें प्रायः ज़मींदार के अपने ही आदमी नीलाम की गई संपत्तियों को महँगी बोली देकर खरीद लेते थे और फिर देय राशि सरकार को नहीं देते थे। ऐसे बेनामी सौदों का विस्तृत विवरण बर्दवान के राजा की ज़मींदारी के मिलते हैं। इस राजा ने सबसे पहले तो अपनी ज़मींदारी का कुछ भाग अपनी माता के नाम कर दिया था क्योंकि कंपनी ने यह घोषित कर रखा था कि स्त्रियों की संपत्ति । नहीं छीनी जाएगी। दूसरा जान-बूझकर भू-राजस्व सरकार के खजाने में जमा नहीं करवाया। फलतः बकाया राशि में वृद्धि होती रही।

अन्ततः नीलामी की नौबत आ गई तो राजा ने अपने ही कुछ आदमियों को बोली के लिए खड़ा कर दिया। उन्होंने सबसे अधिक बोली देकर संपत्ति को खरीद लिया और फिर खरीद की राशि सरकार को देने से मना कर दिया। सरकार को पुनः उस ज़मीन की नीलामी करनी पड़ी और इस बार ज़मींदार के दूसरे एजेंटों ने वैसा ही किया और सरकार को फिर राशि जमा नहीं करवाई। यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती रही जब तक सरकार और बोली लगाने वाले दोनों ने हार नहीं मान ली।

बोली लगाने वाले नीलामी के समय आना ही छोड़ गए। अन्ततः सरकार को यह संपदा कम कीमत पर पुनः उसी राजा (बर्दवान के ज़मींदार) को ही देनी पड़ी। लेकिन यह तरीका केवल बर्दवान के ज़मींदार ने ही नहीं अपनाया था। बेनामी खरीददारों के सहारे अपनी भू-संपदा दचाने वाले और भी ज़मींदार थे। उल्लेखनीय है कि 1790 के दशक में बंगाल में 12 बड़ी ज़मींदारियाँ थीं। स्थायी बंदोबस्त लागू होने के पहले 8 वर्षों (1793-1801) में इनमें से उत्तरी बंगाल की बर्दवान सहित 4 ज़मींदारियों की बहुत-सी सम्पत्ति नीलाम हुई। लेकिन जितने सौदे हुए, उनमें से 85 प्रतिशत असली थे। सरकार को कुल मिलाकर इनसे 30 लाख की प्राप्ति हुई।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 20.
अनुपस्थित ज़मींदार व्यवस्था क्या थी?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत नए ज़मींदार वर्ग का उदय हुआ। यह पहले के ज़मींदारों से कई मायनों में अलग था। नए ज़मींदारों में बहुत से लोग शहरी धनिक वर्ग से थे। इन्होंने उन पुराने ज़मींदारों की ज़मींदारियाँ खरीद ली थीं जो समय पर लगान वसूल करके सरकार को जमा नहीं करवा सके थे। प्रो० बिपिन चन्द्र के अनुसार, “1815 ई० तक बंगाल की लगभग आधी भू-संपत्ति पुराने ज़मींदारों के हाथ से निकलकर सौदागरों तथा अन्य धनी वर्गों के पास जा चुकी थी।”

इन नए ज़मींदारों ने अपनी सहूलियत के लिए किसानों से लगान वसूली का काम आगे अन्य इच्छुक लोगों को ज्यादा धन लेकर पट्टे अथवा ठेके पर दे दिया। इस प्रकार खेतिहर किसान और वास्तविक जमींदार के मध्य परजीवी जमींदारों की एक लंबी श्रृंखला (चेन) पैदा हो गई। यह श्रृंखला बंगाल में कई बार तो 50 तक पहुँच गई थी। इस लगानजीवी वर्ग का सारा भार अन्ततः किसान पर ही पड़ता था।

प्रश्न 21.
‘स्थायी बंदोबस्त के कारण बंगाल के जोतदारों की शक्ति में वृद्धि हुई।’ स्पष्ट करें।
उत्तर:
जोतदार बंगाल के गाँवों में संपन्न किसानों के समूह थे। गाँव के मुखिया भी इन्हीं में से होते थे। 18वीं सदी के अंत में ज्यों-ज्यों परंपरागत ज़मींदार स्थायी बंदोबस्त के कारण संकटग्रस्त हुए, त्यों-त्यों इन संपन्न किसानों को शक्तिशाली होने का अवसर मिलता गया।

आर्थिक व सामाजिक दोनों स्तरों में यह गाँवों में प्रभावशाली वर्ग था। कुछ गरीब किसान भी इनके प्रभाव में होते थे। इस सम्पन्न ग्रामीण वर्ग का ज़मींदारों के प्रति व्यवहार काफी नकारात्मक रहता था। जब ज़मींदार का अधिकारी, जिसे सामान्यतः ‘अमला’ कहा जाता था, गाँव में लगान एकत्र करने में असफल रहता और ज़मींदार सरकार को भुगतान न कर पाता तो जोतदारों को बड़ी खुशी होती थी। सम्पन्न रैयत जान-बूझकर भी समय पर ज़मींदार को लगान का भुगतान नहीं करते थे।

ज़मींदार की इस स्थिति के लिए मुख्य तौर पर स्थायी बंदोबस्त उत्तरदायी था। इसमें राजस्व की ऊँची दर तय की गई थी। जमींदार को निश्चित समय पर राजस्व सरकारी खजाने में जमा करवाना होता था। इसके लिए सूर्यास्त विधि कानून लागू किया गया था।

साथ ही ज़मींदारों की शक्तियाँ उनसे छीन ली गईं। उनकी स्वायत्तता को सीमित कर दिया गया। उनकी शक्तियाँ मात्र किसानों से लगान इकट्ठा करने और अपनी ज़मींदारी का प्रबंध करने तक ही सीमित कर दी गईं। वास्तव में अंग्रेज़ सरकार ज़मींदारों को महत्त्व तो दे रही थी लेकिन साथ ही वह इन्हें अपने पूर्ण नियंत्रण में रखना चाहती थी। परिणामस्वरूप उनके सैनिक दस्तों को भंग कर दिया गया।

उनके न्यायालयों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के नियंत्रण में रख दिया गया। स्थानीय पुलिस प्रबंध भी कलेक्टर ने अपने हाथ में ले लिया। अब वे बाकीदारों के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग भी नहीं कर सकते थे। वह बाकीदारों के विरुद्ध न्यायालय में तो जा सकता था परन्तु न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी थी कि वर्षों चलती रहती थी। इसका अहसास इस तथ्य से किया जा सकता है कि अकेले बर्दवान जिले में ही सन् 1798 में 30,000 से अधिक मुकद्दमें बकायेदारों के विरुद्ध लंबित थे।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू करने के क्या कारण थे? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
लॉर्ड कॉर्नवालिस ने निम्नलिखित कारणों से स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी प्रणाली) को लागू किया

1. बंगाल की अर्थव्यवस्था में संकट-1770 के दशक से बंगाल की अर्थव्यवस्था अकालों की मार झेल रही थी। कृषि उत्पादन में निरंतर कमी आ रही थी। अर्थव्यवस्था संकट में फँसती जा रही थी और ठेकेदारी प्रणाली में इससे निकलने के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

2. कृषि में निवेश को प्रोत्साहन अधिकारी वर्ग यह सोच रहा था कि कृषि में निजी रुचि और निवेश के प्रोत्साहन से खेती, व्यापार और राज्य के राजस्व संसाधनों को विकसित किया जा सकता है।

3. कंपनी सरकार की नियमित आय-कंपनी सरकार अपनी वार्षिक आय को सुनिश्चित करना चाहती थी ताकि प्रशासन व व्यापार की व्यवस्था को वार्षिक बजट बनाकर व्यवस्थित किया जा सके।

4. उद्यमकर्ताओं को लाभ-इससे यह भी उम्मीद थी कि राज्य (कंपनी सरकार) के साथ-साथ उद्यमकर्ता (भूमि व साधनों का मालिक) को भी पर्याप्त लाभ होगा। राज्य की आय नियमित हो जाएगी और वह उद्यमकर्ता से और अधिक माँग नहीं करेगी तो उसका लाभ भी सुनिश्चित होगा।

5. वसूली सुविधाजनक-ज़मींदारी बंदोबस्त लागू करने के पीछे एक व्यावहारिक कारण यह भी था कि रैयत की बजाय ज़मींदारों से कर वसूलना सुविधाजनक था। इसके लिए कम अधिकारियों व कर्मचारियों से भी व्यवस्था की जा सकती थी।

6. वफादार वर्ग-अधिकारियों को यह कारियों को यह उम्मीद थी कि सरकार की नीतियों से पोषित और प्रोत्साहित छोटे (Yeomen Farmers) व बड़े शक्तिशाली ज़मींदारों का वर्ग, सरकार के प्रति वफादार रहेगा।

विशेषताएँ-स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी) की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

(1) यह समझौता बंगाल के राजाओं और ताल्लुकेदारों के साथ कर उन्हें ‘ज़मींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया।

(2) ज़मींदारों द्वारा सरकार को दी जाने वाली वार्षिक भूमि-कर राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई। इसीलिए इसे ‘स्थायी बंदोबस्त’ से भी पुकारा गया।

(3) ये ज़मींदार अपनी ज़मींदारी अथवा ‘इस्टेट’ के तब तक पूर्ण तौर पर मालिक थे जब तक वे सरकार को निर्धारित भूमि-कर नियमित रूप से अदा करते रहते थे। उनका यह अधिकार वंशानुगत तौर पर स्वीकार कर लिया गया।

(4) निर्धारित भूमि-कर राशि का समय पर भुगतान न किए जाने पर सरकार उनकी ज़मींदारी अथवा उसका कुछ भाग नीलाम कर सकती थी और इससे वह लगान की वसूली कर सकती थी।

(5) ज़मींदार अपनी ज़मींदारी का मालिक तो था परन्तु व्यवहार में वह गाँव में भू-स्वामी नहीं था बल्कि राजस्व-संग्राहक (समाहत्ता) मात्र था। उसे किसानों से वसूल किए गए लगान में से \(\frac { 1 }{ 11 }\) भाग अपने पास रखना होता था और शेष \(\frac { 10 }{ 11 }\) भाग कंपनी सरकार को देना होता था।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 Img 3

(6) एक ज़मींदारी में बहुत-से गाँव और कभी-कभी तो 400 गाँव तक होते थे। कुल मिलाकर यह ज़मींदारी की एक ‘राजस्व-संपदा’ (Revenue Estate) थी, जिस पर कंपनी सरकार कर निश्चित करती थी।

(7) अलग-अलग गाँवों पर कर निर्धारण व उसे एकत्र करने का कार्य ज़मींदार का था।

(8) इस व्यवस्था में सरकार का रैयत (किसानों) से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। उसका संबंध ज़मींदारों से था।

प्रश्न 2.
सन् 1875 के दक्कन विद्रोह का वर्णन करें। यहाँ के किसान साहूकार के कर्जदार क्यों होते जा रहे थे?
उत्तर:
यह विद्रोह 12 मई, 1875 को महाराष्ट्र के एक बड़े गाँव सूपा (Supe) से शुरू हुआ। यह गाँव जिला पूना (अब पुणे) में पड़ता था। दो महीनों के अंदर यह विद्रोह पूना और अहमदनगर के दूसरे बहुत-से गाँवों में फैल गया। उत्तर से दक्षिण के बीच लगभग 6500 वर्गकिलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया। हर जगह गुजराती और मारवाड़ी महाजनों और साहूकारों पर आक्रमण हुए। उन्हें ‘बाहरी’ और अधिक अत्याचारी समझा गया।

सूपा में व्यापारी और साहूकार रहते थे। यहीं सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्र के कुनबे किसान एकत्र हुए और उन्होंने साहूकारों से उनके ऋण-पत्र (debt bonds) और बही-खाते (Account books) छीन लिए और उन्हें जला दिया। जिन साहूकारों ने बही-खाते और ऋण-पत्र देने का विरोध किया, उन्हें मारा-पीटा गया। उनके घरों को भी जला दिया गया। इसके अलावा अनाज की दुकानें लूट ली गईं। आश्चर्य की बात यह थी कि सूपा के अतिरिक्त दूसरे गाँवों व कस्बों में भी किसानों की यही प्रतिक्रिया सामने आई। इससे साहूकार भयभीत हो गए। वे अपना गाँव छोड़कर भाग गए। यहाँ तक कि वे अपनी संपत्ति और धन भी पीछे छोड़ गए।

स्पष्ट है कि यह मात्र ‘अनाज के लिए दंगा’ (Grain Riots) नहीं था। किसानों का निशाना साफ तौर पर ‘कानूनी दस्तावेज’ अर्थात् बहीखाते और ऋण पत्र थे। इस विद्रोह के फैलने से ब्रिटिश अधिकारी भी घबराए। विशेषतः उन्हें 1857 की जनक्रांति की याद ताजा हो आई। विद्रोही गाँवों में पुलिस चौकियाँ बनाई गईं। यहाँ तक कि इस इलाके को सेना के हवाले करना पड़ा। 95 किसानों को गिरफ्तार करके दंडित किया गया।

विद्रोह पर नियंत्रण के बाद भी स्थिति पर नज़र रखी गई। उस समय के समाचार पत्रों की रिपोर्ट से पता चलता है कि किसान योजना बनाकर अपनी कार्यवाही करते थे ताकि अधिकारियों की पकड़ में न आए। क्योंकि किसान अवसर मिलते ही साहूकार के घरों पर हमला बोल देते थे। वास्तव में अंग्रेज़ों की नीतियों के चलते साहूकारों और कृषकों के मध्य परंपरागत संबंध समाप्त हो गए। बदली हुई परिस्थितियों में साहूकार ग्रामीण क्षेत्रों में एक शोषक तत्त्व बनकर उभरा।

ऋणग्रस्तता के कारण-दक्कन में किसान कर्ज के बोझ तले दबता चला गया। सन् 1840 तक स्थिति यह पैदा हो गई थी किसान फसल का खर्च पूरा करने तथा दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए भी साहूकार से ऊँची दर पर कर्ज़ के लिए विवश हो गया, जो वापिस करना आसान नहीं था। कर्ज़ बढ़ने के कारण किसान की स्थिति खराब होती गई। वह साहूकार पर निर्भर होता गया। संक्षेप में किसान के ऋणग्रस्त होने के निम्नलिखित कारण थे

1. ऊँची भू-राजस्व दर-सन् 1818 में बंबई दक्कन में पहला रैयत से बंदोबस्त किया गया। इसमें राजस्व की माँग इतनी अधिक थी कि लोग अनेक स्थानों पर अपने गाँव छोड़कर भाग गए। वे अपेक्षाकृत बंजर और कम उपजाऊ भूमि पर जाकर खेती करने लगे। वर्षा न होने पर अकाल पड़ जाता और बिना फसल के भूमिकर चुकाना संभव नहीं था। फसल हो या न हो यह कर तो सरकार को चुकाना ही होता था।

2. राजस्व वसूली में सख्ती-कर एकत्रित करवाने वाले जिला कलेक्टरों की किसानों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी। उनकी फसलें बेचकर राजस्व वसूल किया जाता था। यहाँ तक कि गाँव पर सामूहिक तौर पर जुर्माना भी कर दिया जाता था। प्रायः कलेक्टर अपने जिले का सारा भूमि-कर एकत्रित करके बड़े अधिकारियों के समक्ष अपनी कार्यकुशलता का परिचय देता था। इसके लिए उसकी नीति सदैव कठोर रहती थी। अतः मुसीबत के दिनों में भूमि-कर चुकाने के लिए किसानों को साहूकार की शरण में जाना पड़ा।

3. कृषि-उत्पाद मूल्यों में गिरावट-1830 के आस-पास तक रैयतवाड़ी प्रथा बंबई दक्कन में शुरू हुई जिसमें भूमि-कर की माँग काफी ऊँची थी। इसी दशक में ही मंदी का दौर आ गया जो लगभग 1845 तक चला। फसलों की कीमतों में भारी गिरावट आ गई। यह किसान के लिए बड़ी समस्या के रूप में आया। इसलिए वह कर्ज लेने के लिए विवश हुआ।

4. 1832-34 का अकाल-इस अकाल में लगभग एक-तिहाई पशु धन दक्कन में खत्म हो गया। यहाँ तक कि 50 प्रतिशत मानव जनसंख्या मौत का ग्रास बन गई। जो किसान इस अकाल से किसी तरह जीवित बच गए थे, उन्हें बीज खरीदने, बैल खरीदने, राजस्व चुकाने तथा जीविका चलाने के लिए ऋण लेना ही पड़ा।

सन् 1840 के बाद स्थिति में कुछ परिवर्तन आया। राजस्व की माँग में कुछ कमी की गई। मंदी का दौर भी खत्म हुआ। धीरे-धीरे कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ने लगी, तो किसानों ने नए खेत निकालकर खेती में अधिक रुचि ली। परन्तु इसके लिए भी किसानों को बीज व बैलों की जरूरत थी। अतः साहूकार से ऋण उसे इन परिस्थितियों में भी लेना पड़ा।

प्रश्न 3.
दक्कन में किसान विद्रोह के क्या कारण थे? इसमें किसानों ने साहूकारों के बहीखाते क्यों जला डाले?
उत्तर:
दक्कन मुख्यतः बंबई और महाराष्ट्र के क्षेत्र को कहा गया है। बंबई दक्कन में किसानों ने साहूकारों तथा अनाज के व्यापारियों के खिलाफ़ अनेक विद्रोह किए। इनमें से 1875 का विद्रोह सबसे भयंकर था। यह विद्रोह महाराष्ट्र के एक बड़े गाँव सूपा (Supe) से शुरु हुआ। दो महीनों के अंदर यह विद्रोह पूना और अहमदनगर के दूसरे बहुत-से गाँवों में फैल गया। 100 कि०मी० पूर्व से पश्चिम तथा 65 कि०मी० उत्तर से दक्षिण के बीच लगभग 6500 वर्गकिलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया। हर जगह गुजराती और मारवाड़ी महाजनों और साहूकारों पर आक्रमण हुए। दक्कन के इन किसान विद्रोहों के निम्नलिखित कारण थे

1. रैयतवाड़ी प्रणाली-इस प्रणाली में किसानों को उस भूमि का मालिक माना गया था जिन पर वे खेती करते आ रहे थे। इसमें ज़मींदार तो नहीं थे परंतु सरकार फसल का लगभग आधा भाग किसानों से वसूलती थी। इस प्रणाली में भू-राजस्व की दर भी बहुत ऊँची थी।

2. किसान का ऋणग्रस्त होना-सरकार का लगान किसान पूरा नहीं कर पाता था। इसलिए उसे साहूकार से उधार लेना पड़ता था। कई बार तो उसे दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए भी ऋण लेना पड़ता था जो उसके लिए वापिस करना आसान नहीं था।

अमेरिका के गृह-युद्ध (1861-65) के दिनों में कपास की माँग में अचानक उछाल आया। कपास के मूल्य में जबरदस्त वृद्धि हुई। इस स्थिति में साहूकार व्यापारियों ने किसानों को खूब अग्रिम धनराशि दी। लेकिन ज्योंहि युद्ध समाप्त हुआ ‘ऋण का यह स्रोत सूख गया’ । युद्ध के बाद कपास के निर्यात में गिरावट आ गई। कपास की माँग खत्म हो गई। किसानों को ऋण मिलना बन्द हो गया और पहले दिए हुए ऋण को लौटाने के लिए दबाव बढ़ गया। 1870 ई० के आस-पास यह स्थिति किसान विद्रोहों के लिए काफी हद तक उत्तरदायी कही जा सकती है।

3. अन्याय का अनुभव-जब साहूकारों ने उधार देने से मना किया तो किसानों को बहुत गुस्सा आया। क्योंकि परंपरागत ग्रामीण व्यवस्था में न तो अधिक ब्याज लिया जाता था और न ही मुसीबत के समय उधार से मनाही की जाती थी। किसान विशेषतः इस बात पर अधिक नाराज़ थे कि साहूकार वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह उनके हालात पर रहम नहीं खा रहा है। सन् 1874 में साहूकारों ने भू-राजस्व चुकाने के लिए किसानों को उधार देने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। वे सरकार के इस कानून को नहीं मान रहे थे कि चल-सम्पत्ति की नीलामी से यदि उधार की राशि पूरी न हो तभी साहूकार जमीन की नीलामी करवाएँ। अब उधार न मिलने से मामला और भी जटिल हो गया और किसान विद्रोही हो उठे।

बही-खातों का जलना-दक्कन विद्रोह तथा देश के अन्य भागों में भी किसानों ने विद्रोहों में बही-खातों को निशाना बनाया। वास्तव में ऋण-प्राप्ति और उसकी वापसी दोनों ही दक्कन के किसानों के लिए एक जटिल प्रक्रिया थी। परंपरागत साहूकारी कारोबार में कानूनी दस्तावेजों का इतना झंझट नहीं था। जुबान अथवा वायदा ही पर्याप्त था। क्योंकि किसी सौदे के लिए परस्पर सामाजिक दबाव रहता था। ब्रिटिश अधिकारी वर्ग बिना विधिसम्मत अनुबंधों के सौदों को संदेह की दृष्टि से देखते थे। विवाद छिड़ने की स्थिति में न्यायालयों में भी ऐसे बंधपत्रों, संविदाओं और दस्तावेजों का ही महत्त्व होता था, जिनमें शर्ते साफ-साफ हस्ताक्षरित होती थीं।

जुबानी लेन-देन कानून के दायरे में कोई महत्त्व नहीं रखता था जबकि परंपरागत प्रणाली में गाँव की पंचायत महत्त्व देती थी। कर्ज़ से डूबे किसान को जब और उधार की जरूरत पड़ती तो केवल एक ही तरीके से यह संभव हो पाता कि वह ज़मीन, गाड़ी, हल-बैल ऋण दाता को दे दे। फिर भी जीवन के लिए तो उसे कुछ-न-कुछ साधन चाहिए थे। अतः वह इन साधनों को साहूकार से किराए पर लेता था। जो वास्तव में उसके अपने ही होते थे। अब उसे अपने ही साधनों का किराया साहूकार को देना होता था। अपनी विवशता के कारण उसे भाडापत्र अथवा किराया नामा में स्पष्ट करना होता कि यह पशु, बैलगाड़ी उसके अपने नहीं हैं।

उसने इन्हें किराए पर लिया है और इसके लिए वह इनका निश्चित किराया प्रदान करेगा। स्पष्ट है कि यह दस्तावेज न्यायालय में साहूकार का पक्ष ही सुदृढ़ करता था। गगजिन अनुबंधों पर वह हस्ताक्षर करता था या अंगूठा लगाता था उनमें क्या लिखा है, वह नहीं जानता था। उधार लेने के लिए हस्ताक्षर जरूरी थे। इसके बिना उन्हें कहीं कर्ज नहीं मिल सकता था। हस्ताक्षरित दस्तावेज़ कोर्ट में प्रायः साहूकार के ही पक्ष में जाता था।

अतः इस नई व्यवस्था के कारण किसान बंधपत्रों और दस्तावेजों को अपनी दुःख-तकलीफों का मुख्य कारण मानने लगा। वह तो लिखे हुए शब्दों से डरने लगा। यही वह कारण था कि जब भी कृषक विद्रोह होता था तभी किसान दस्तावेजों को जलाते थे। बहीखाते व ऋण अनुबंध पत्र, उनका पहला निशाना होता था। उसने साहूकार का घर बाद में जलाया, पहले दस्तावेजों को फूंका।

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HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक

Haryana State Board HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक

HBSE 10th Class Science कार्बन एवं इसके यौगिक Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एथेन का आण्विक सूत्र-C2H2, है। इसमें
(a) 6 सहसंयोजक आबन्ध हैं
(b) 7 सहसंयोजक आबन्ध हैं
(c) 8 सहसंयोजक आबन्ध हैं
(d) 9 सहसंयोजक आबन्ध हैं।
उत्तर-
(b) 7 सहसंयोजक आबन्ध हैं।

प्रश्न 2.
ब्यूटेनॉन, चर्तु-कार्बन यौगिक है जिसका प्रकार्यात्मक समूह है
(a) कार्बोक्सिलिक अम्ल
(b) ऐल्डिहाइड
(c) कीटोन
(d) ऐल्कोहॉल।
उत्तर-
(c) कीटोन।

प्रश्न 3.
खाना बनाते समय यदि बर्तन की तली बाहर से काली हो रही है तो इसका मतलब है कि
(a) भोजन पूरी तरह नहीं पका है
(b) ईंधन पूरी तरह से नहीं जल रहा है
(c) ईंधन आई है
(d) ईंधन पूरी तरह से जल रहा है।
उत्तर-
(b) ईंधन पूरी तरह से नहीं जल रहा है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक

प्रश्न 4.
CH3Cl में आबन्ध निर्माण का उपयोग कर सहसंयोजक आबन्ध की प्रकृति समझाइए।
उत्तर-
CH3Cl,
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 1
CH3CI में आबन्ध संरचना-एकल सहसंयोजक आबन्ध है।

प्रश्न 5.
इलेक्ट्रॉन बिन्दु संरचना बनाइए
(a) एथेनॉइक अम्ल
(b)H2S
(c) प्रोपेनोन
(d) F2
उत्तर-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 2

प्रश्न 6.
समजातीय श्रेणी क्या है? उदाहरण के साथ समझाइए।
उत्तर-
समजातीय श्रेणी यौगिकों का एक समूह या परिवार होता है जिसमें एक समान क्रियात्मक समूह विद्यमान रहता है परन्तु श्रृंखला की लम्बाइयाँ अलग-अलग होती हैं। अतः इन यौगिकों के रासायनिक गुण एकसमान होते हैं। उदाहरण, ऐल्केन समजातीय श्रेणी का सामान्य सूत्र CnH2n+2 होता है। इस श्रेणी के सदस्य मेथेन CH4, एथेन C2H6 प्रोपेन C3H8 ब्यूटेन C4H10…. आदि हैं।

प्रश्न 7.
भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्मों के आधार पर एथेनॉल एवं एथेनोइक अम्ल में आप कैसे अन्तर करेंगे? [CBSE 2015]
उत्तर-
एथेनॉल तथा एथेनोइक अम्ल के बीच अन्तर निम्नलिखित हैं –

एथेनॉलएथेनोइक अम्ल
भौतिक गुण
1. इसका लिटमस पत्र पर . कोई प्रभाव नहीं होता।
1. यह अम्लीय होने के कारण नीले लिटमस को लाल कर देता है।
2. इसकी गन्ध अच्छी होती है।2. इसकी गन्ध तीक्ष्ण तथा यह स्वाद में खट्टा होता है।
3. इसका क्वथनांक 391 K है।3. इसका क्वथनांक 351 K है।
4. इसका गलनांक 156 K है।4. इसका गलनांक 290 K है।
रासायनिक गुण
5. इसमें सोडियम धातु डालने पर हाइड्रोजन गैस बुदबुदाहट के साथ निकलती है।
5. इसमें सोडियम धातु डालने पर हाइड्रोजन गैस बुदबुदाहट के साथ नहीं निकलती है।
6. इसमें सोडियम बाइ- कार्बोनेट मिलाने पर CO2, गैस नहीं निकलती है।6. इसमें सोडियम बाइकार्बोनेट मिलाने पर CO2 गैस निकलती है।

प्रश्न 8.
जब साबुन को जल में डाला जाता है तो मिसेल का निर्माण क्यों होता है ? क्या एथेनॉल जैसे दूसरे विलायकों में भी मिसेल का निर्माण होगा?
उत्तर-
जब साबुन को जल में डाला जाता है तो इसके अणु के दो सिरे दो भिन्न गुणधर्मों को प्रदर्शित करते हैं, जल में विलयशील हाइड्रोफिलिक और हाइड्रोकार्बन में विलयशील हाइड्रोफोबिक। यह जल में घुलनशील नहीं होते हैं। पानी में डालने पर साबुन का आयनिक सिरा जल के भीतर होता है, जबकि हाइड्रोकार्बन पूँछ (दूसरा सिरा) जल के बाहर होती है। जल के अन्दर इन अणुओं की विशेष व्यवस्था होती है जिससे इसका हाइड्रोकार्बन सिरा जल के बाहर बना होता है। ऐसा अणुओं का बड़ा समूह बनने के कारण होता है या जिसमें हाइड्रोफोबिक पूँछ बड़े समूह के भीतरी हिस्से में वन होती है, जबकि उसका आयनिक सिरा बड़े समूह की सतह पर होता है। इस संरचना को मिसेल कहते हैं। साबुन एथेनॉल जैसे दूसरे विलायकों में घुल जाता है त्र इसलिए मिसेल का निर्माण नहीं करता है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक

प्रश्न 9.
कार्बन एवं उसके यौगिकों का उपयोग अधिकतर अनुप्रयोगों में ईंधन के रूप में क्यों किया जाता
उत्तर-
कार्बन एवं उसके यौगिकों का उपयोग ईंधन के 5] रूप में करने के निम्नलिखित कारण हैं-
(i) ये स्वच्छ ईंधन तर होते हैं तथा धुआँ उत्पन्न नहीं करते हैं।
(ii) इनका उच्च कैलोरी मान होता है।
(iii) इनको जलाने पर हानिकारक गैसें उत्पन्न नहीं होती हैं।
(iv) इनका ज्वलन ताप मध्यम होता है।

प्रश्न 10.
कठोर जल को साबुन से उपचारित करने पर झोग के निर्माण को समझाइए।
उत्तर-
जल की कठोरता का कारण कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के लवण होते हैं। जब कठोर जल साबुन से अभिक्रिया करता है तो साबुन कैल्सियम तथा मैग्नीशियम यह लवणों के साथ अभिक्रिया करके अविलेय पदार्थ बना देता है। ये अविलेय पदार्थ जल में झाग की परत बनाते हैं।

प्रश्न 11.
यदि आप लिटमस पत्र (लाल एवं नीला) से साबुन की जाँच करें तो आपका प्रेक्षण क्या होगा?
उत्तर-
साबुन क्षारकीय प्रकृति का होता है इसलिए वह लाल लिटमस को नीला कर देगा। इसका नीले लिटमस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

प्रश्न 12.
हाइड्रोजनीकरण क्या है ? इसका औद्योगिक अनुप्रयोग क्या है ?
उत्तर-
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन का द्वि अथवा त्रिबन्ध के दोनों ओर हाइड्रोजन का योग हाइड्रोजनीकरण कहलाता है, जैसे
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औद्योगिक उपयोग-इस प्रक्रिया से वनस्पति तेलों को वनस्पति घी में बदला जाता है, वनस्पति तेलों में द्विआबन्ध (C = C) होता है। निकल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजनीकरण पर ये वनस्पति तेल को वनस्पति घी में बदल देते हैं।
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प्रश्न 13.
दिए गए हाइड़ाकान C2H6, C3H8 C3,H6.. C2H2, एवं CH4. में किसमें संकलन अभिक्रिया होती
उत्तर-
संकलन अभिक्रिया दशनि वाले हाइड्रोकार्बन C3,H6 तथा C2H2 हैं।

प्रश्न 14.
संतृप्त एवं असंतृप्त कार्बन के बीच रासायनिक अंतर समझने के लिए एक परीक्षण बताइए।
उत्तर-
ब्रोमीन परीक्षण-

  • थोड़े से यौगिक को गर्म करके उसमें कुछ बूंदें ब्रोमीन जल डालते हैं। ब्रोमीन जल का रंग नहीं उड़ता। इससे यह पता चलता है कि यह संतृप्त कार्बनिक यौगिक है।
  • दिए गए यौगिक में कुछ बूंदें ब्रोमीन जल की डालकर हिलाते हैं। कुछ समय बाद ब्रोमीन जल का रंग उड़ . जाता है। इससे यह पता चलता है कि यह असंतृप्त कार्बनिक यौगिक है।

प्रश्न 15.
साबुन की सफाई प्रक्रिया की क्रियाविधि समझाइए। [CBSE 2015]
उत्तर-
साबुन में ऐसे अणु होते हैं जिसके दोनों सिरों के विभिन्न गुणधर्म होते हैं। जल में घुलनशील एक सिरे को हाइड्रोफिलिक कहते हैं तथा हाइड्रोकार्बन में विलयशील दूसरे सिरे को हाइड्रोफोबिक कहते हैं। जब साबुन जल की सतह पर होता है तब इसके अणु अपने आपको इस प्रकार व्यवस्थित कर लेते हैं कि इसका आयनिक सिरा जल के भीतर होता है, जबकि हाइड्रोकार्बन पूँछ जल के बाहर होती है। जल के अन्दर इन अणुओं की विशेष व्यवस्था होती है जिससे इसका हाइड्रोकार्बन सिरा जल के बाहर बना होता है, ऐसा अणुओं का बड़ा समूह बनने के कारण होता है। यह हाइड्रोफोबिक पूँछ समूह के भीतरी हिस्से में होती है, जबकि उसका आयनिक सिरा समूह की सतह पर होता है। इस संरचना को मिसेल कहते हैं। मिसेल के रूप में साबुन सफाई करने में सक्षम होता है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 4

पाठ्यपुस्तक के अन्तर्गत दिये गये क्रियाकलाप पर आधारित प्रश्नोत्तर (Intext Activities Based Questions And Answers)

HBSE 10th Class Science कार्बन एवं इसके यौगिक  InText Questions and Answers

(पाठ्य-पुस्तक पृ. स. 68)

प्रश्न 1.
CO2, सूत्र वाले कार्बन डाइऑक्साइड की इलेक्ट्रॉन बिन्दु संरचना क्या होगी?
उत्तर-
CO2, की इलेक्ट्रॉन बिन्दु संरचना-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 8

प्रश्न 2.
सल्फर के आठ परमाणुओं से बने सल्फर के अणु की इलेक्ट्रॉन बिन्दु संरचना क्या होगी ?
उत्तर-
सल्फर के आठ परमाणु एक अंगूठी के रूप में आपस में जुड़े होते हैं। 16 S = 2, 8, 6
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 9

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 76)

प्रश्न 1.
पेन्टेन के लिए आप कितने संरचनात्मक समावयवों का चित्रण कर सकते हैं ?
उत्तर-
पेन्टेन के तीन संरचनात्मक समावयवों का चित्रण किया जा सकता है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 10

प्रश्न 2.
कार्बन के दो गुणधर्म कौन-से हैं, जिनके कारण हमारे चारों ओर कार्बन यौगिकों की विशाल संख्या दिखाई देती है?
उत्तर-
(i) श्रृंखलन (Catenation)-कार्बन में कार्बन के ही अन्य परमाणुओं के साथ बन्ध बनाने की क्षमता होती है। इस गुण को श्रंखलन कहते हैं। कार्बन के परमाण एकल, द्विबन्ध या त्रिबन्ध के द्वारा आपस में जुड़ सकते हैं।

(ii) चतुःसंयोजकता-कार्बन की संयोजकता चार होने के कारण इसकी अन्य संयोजक तत्वों के परमाणुओं के साथ बन्ध बनाने की क्षमता होती है। ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, क्लोरीन तथा अनेक तत्वों के साथ कार्बन के विभिन्न यौगिक बनते हैं।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक

प्रश्न 3.
साइक्लोपेन्टेन का सूत्र तथा इलेक्ट्रॉन बिन्दु संरचना क्या होंगे?
उत्तर-
C2H10
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 11

प्रश्न 4.
निम्न यौगिकों की संरचनाएँ चित्रित कीजिए
(i) एथेनॉइक अम्ल
(ii) ब्रोमोपेन्टेन
(iii) ब्यूटेनोन-2
(iv) हेक्सेनैल। क्या ब्रोमोपेन्टेन के संरचनात्मक समावयव सम्भव हैं?
उत्तर-
(i) एथेनॉइक अम्ल की संरचना (CH3COOH)
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(ii) ब्रोमोपेन्टेन की संरचना (C5H11Br)

(iii) ब्यूटेनोन-2 की संरचना (C2H5COCH3)
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(iv) हेक्सेनैल की संरचना (C5H11CHO) ।
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हाँ, ब्रोमोपेन्टेन के संरचनात्मक समावयवी सम्भव हैं। कार्बन के साथ ब्रोमीन का स्थान बदलने के साथ ब्रोमोपेन्टेन विभिन्न संरचनात्मक समावयवता प्रदर्शित करता ये निम्न प्रकार हैं –
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प्रश्न 5.
निम्नलिखित यौगिकों का नामकरण कैसे करेंगे?
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उत्तर-
(i) CH3 – CH2 – Br को एथेन से प्राप्त किया जाता है। इसका अनुलग्न ब्रोमीन है। इसका उपसर्ग ब्रोमो है।
∴ इसका नाम है
ब्रोमो + एथेन = ब्रोमोएथेन
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 18
∴ यह मेथेनैल है।

(iii) यौगिक में छ: कार्बन परमाणु हैं इसलिए यह हैक्सेन है। यौगिक असंतृप्त है और इसमें तीन बन्ध हैं और तीसरा बन्ध श्रृंखला में कार्बन परमाणु के पहले स्थान पर है।
इसलिए यौगिक 1 हेक्साइन है। इसे हेक्साइन भी कह सकते हैं। .

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 79)

प्रश्न 1.
एथेनॉल से एथेनॉइक अम्ल में परिवर्तन को ऑक्सीकरण अभिक्रिया क्यों कहते हैं ?
किया जाता है ?
उत्तर-
उत्तर-
एथेनॉइक अम्ल, एथेनॉल से ऑक्सीजन के योग द्वारा उत्पन्न होता है अतः यह एक ऑक्सीकरण अभिक्रिया है।

प्रश्न 2.
ऑक्सीजन तथा एथाइन के मिश्रण का दहन वेल्डिंग के लिए किया जाता है क्या आप बता सकते हैं कि एथाइन तथा वायु के मिश्रण का उपयोग क्यों नहीं किया जाता है ?
उत्तर-
वायु तथा एथाइन के मिश्रण को जलाने पर पूर्ण दहन करने हेतु ऑक्सीजन की उपलब्धता अपर्याप्त होगी जिससे ऊष्मा की कम मात्रा का उत्पादन होगा, परन्तु ऑक्सीजन व एथाइन के मिश्रण को जलाने पर पूर्ण दहन वेल्डिंग के लिए किया जाता है । क्या आप बता सकते हैं ही होता है तथा वेल्डिंग हेतु पर्याप्त ऊष्मा का उत्पादन होता है।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 83)

प्रश्न 1.
प्रयोग द्वारा आप ऐल्कोहॉल एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल में कैसे अन्तर कर सकते हैं ?
उत्तर-
ऐल्कोहॉल एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल में प्रयोग द्वारा विभेद निम्नलिखित रूप से कर सकते हैं-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 19

प्रश्न 2. ऑक्सीकारक क्या हैं ?
उत्तर-
ऑक्सीकारक वे पदार्थ हैं जो अन्य पदार्थों को ऑक्सीजन प्रदान करने की क्षमता रखते हैं तथा स्वयं अपचयित होकर दूसरे को ऑक्सीकृत करते हैं;
जैसे -KMnO4 , Cr2O7,ऑक्सीकारक पदार्थ हैं।

(पाठ्य पुस्तक पृ. सं.-85)

प्रश्न 1,
क्या आप डिटरजेंट का उपयोग करके बता सकते हैं कि कोई जल कठोर है अथवा नहीं ?
उत्तर-
नहीं डिटरजेंट कठोर जल के साथ झाग बनाता है। यह कठोर जल के साथ साबुन की तरह सफेद तलछट तैयार नहीं करता है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक

प्रश्न 2.
लोग विभिन्न प्रकार से कपड़े धोते हैं। सामान्यतः साबुन लगाने के बाद लोग कपड़े को पत्थर पर पटकते हैं, डण्डे से पीटते हैं, ब्रुश से रगड़ते हैं या वाशिंग मशीन में कपड़े रगड़े जाते हैं। कपड़ा साफ करने के लिए उसे रगड़ने की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर-
साबुन से कपड़ा साफ करने में रगड़ना इसलिए आवश्यक है ताकि साबुन के अणु तेल के धब्बों, मैल के कणों को हटाने के लिए मिसेल बना सकें। मिसेल गन्दे मैल या तेल के धब्बों को हटाने में सहायक होता है।

HBSE 10th Class Science कार्बन एवं इसके यौगिक InText Activity Questions and Answers

क्रियाकलाप 4.1 (पा.पु. पृ. सं. 64)

प्रश्न 1.
(i) सुबह से आपने जिन वस्तुओं का उपयोग अथवा उपभोग किया हो उनमें से दस वस्तुओं की सूची बनाइये।
(ii) इस सूची को अपने सहपाठियों द्वारा बनाई गयी सूची के साथ मिलाइये तथा सभी वस्तुओं को निम्न सारणी में वर्गीकृत करें।
(iii) एक से अधिक सामग्रियों से बनी वस्तुओं को दोनों उपयुक्त वर्गों में रखें।
उत्तर –
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प्रश्न 2.
कार्बन से युक्त यौगिक को जलाने पर क्या उत्पाद बनता है?
उत्तर-
कार्बन युक्त यौगिक को जलाने पर कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) बनती है।

क्रियाकलाप 4.2 (पा. पु. पृ. सं. 74)

प्रश्न 1.
सूत्रों तथा आणविक द्रव्यमानों में अन्तर की गणना करें-
(a) CH3OH एवं C2H5OH
(b) C2H5OH एवं C3H7OH तथा
(c) C3H7OH तथा C4H9OH.
इन तीनों में समानता देखिए तथा क्या इन्हें समजातीय श्रेणी का कहा जा सकता है?
उत्तर-
1.
(a) CH3OH एवं C2H5OH
(i) सूत्र में अन्तर
C2H5OH-CH3OH=CH2,

(ii) अणुभार में अन्तर
[2×12+5×1+16+ 1] – [12+3+16+1]
= [24+5+17]- [32]
=46- 32
=14

(b) C3H7OH एवं C2H5OH
(i) सूत्र में अन्तर
C3H7OH-C2H5OH= CH2

(ii) अणुभार में अन्तर
[3×12+7×1+16+1]-[2×12+5×1+16+1]
= [36+7+16+1]-[24+5+16+1]
=60-46=14

(c) C4H9OH एवं C3H7OH
(i) सूत्र में अन्तर
C4H9OH-C3H7OH = CH2|

(iii) अणुभार में अन्तर
(4×12+ 9.×1+16+ 1) – (3 x 12 +7×1+16+ 1)
= (48+9+ 16 + 1)-(36+7+16-1)
=74-60 = 4
चारों ऐल्कोहॉलों में कार्बन परमाणुओं की संख्या के बढ़ते क्रम में निम्न प्रकार हैं
CH3OH<C2H5OH<C3H7OH<C4H9OH
हाँ, ये चारों ऐल्कोहॉल एक समजात श्रेणी बनाते हैं।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रकार्यात्मक समूहों के लिए चार कार्बनों तक के यौगिकों वाली समजातीय श्रेणी तैयार करें
(i) हैलो (-CI और -Br)
(ii) ऐल्डिहाइड(-CHO)
(iii) कीटोन (-Co)
(iv) कार्बोक्सिलिक अम्ल (-COOH)
उत्तर-
दिये गये प्रकार्यात्मक समूहों की, समजात श्रेणी निम्न है
(a) हैलो (-CI और – Br)
CH3Cl, C2H5Cl, C3H7Cl, C4H9Cl एवं CH3Br, C2H5Br, C3H7Br, C4H9Br

(b) ऐल्डिहाइड (CHO)
HCHO, CH3CHO, C2H5CHO, C3H7CHO

(c) कीटोन (-CO)
CH3-CO-CH3, CH3CH2-CO-CH3
CH3CH2-CO-CH2CH3,
CH3CH2CH2 -CO- CH2CH3

(d) कार्बोक्सिलिक अम्ल (-COOH)
H-COOH, CH3COOH,
CH3CH2 -COOH, CH3CH2CH2-COOH

क्रियाकलाप 4.3 (पा. पु. पृ. सं.76)

प्रश्न 1.
ज्वाला की प्रकृति का प्रेक्षण कीजिए तथा लिखिए कि धुआँ हुआ या नहीं।
उत्तर-
वायु की प्रचुर उपस्थिति में संतृप्त हाइड्रोकार्बन नीली धुआँ रहित लौ के साथ जलते हैं। असंतृप्त हाइड्रोकार्बन वायु में पीली लौ की ज्वाला एवं अधिक धुएँ के साथ जलते हैं।

प्रश्न 2.
ज्वाला के ऊपर धातु की एक तश्तरी रखिए। इनमें से किसी भी यौगिक के कारण तश्तरी पर कोई निक्षेपण हुआ?
उत्तर-
नैफ्थलीन और कैम्फर को जलाने पर तश्तरी पर निक्षेपण हुआ।

क्रियाकलाप 4.4 (पा. पु. पृ. सं. 77)

प्रश्न 1.
पीली, कज्जली ज्वाला कब प्राप्त हुई?
उत्तर-
वायु की नियन्त्रित आपूर्ति से अपूर्ण दहन होता है जिसके कारण पीली चमकदार ज्वाला प्राप्त होती है।

प्रश्न 2.
नीली ज्वाला कब प्राप्त हुई?
उत्तर-
जब ऑक्सीजन की समुचित मात्रा उपलब्ध कराई जाती है तो पूर्ण दहन होता है तथा नीली ज्वाला प्राप्त होती है।

क्रियाकलाप 4.5 (पा. पु. पृ. सं. 78)

प्रश्न 1.
क्या परमैंगनेट का गुलाबी रंग प्रारम्भ में ऐल्कोहॉल में मिलाने पर लुप्त होता है। .
उत्तर-
परमैंगनेट का गुलाबी रंग प्रारम्भ में ऐल्कोहॉल में मिलाने पर तुरन्त लुप्त हो जाता है।

प्रश्न 2.
यदि परमैंगनेट को ऐल्कोहॉल में अधिकता में मिलाया जाता है तो इसका रंग लुप्त नहीं होता है ? क्यों ?
उत्तर-
यदि ऐल्कोहॉल में 5% क्षारीय KMnO4 का विलयन धीरे-धीरे मिलाया जाता है तो इसका रंग विलुप्त हो जाता है क्योंकि यह ऐथेनॉल को एथेनोइक अम्ल में ऑक्सीकृत कर देता है और स्वयं यह मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO2) में अपचयित हो जाता है। लेकिन यदि KMnO4 को अधिकता में मिला दिया जाये तो इसकी मात्रा एथेनॉल को एथेनोइक अम्ल में ऑक्सीकृत करने के लिए आवश्यक मात्रा से अत्यधिक है अतः इसका गुलाबी रंग अधिक मात्रा की उपस्थिति के कारण होता है।

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क्रियाकलाप 4.6 (पा. पु. पृ. सं. 80)

प्रश्न 1.
आप क्या प्रेक्षित करते हैं?
उत्तर-
हम यह प्रेक्षित करते हैं कि अभिक्रिया के दौरान कोई गैस मुक्त होती है।

प्रश्न 2.
उत्सर्जित गैस की आप कैसे जाँच करेंगे?
उत्तर-
उत्सर्जित गैस के पास एक जलती हुई तीली या मोमबत्ती ले जाने पर यह फट-फट की ध्वनि (pop sound) के साथ जलती है।

क्रियाकलाप 4.7 (पा. पु. पृ. सं. 81)

प्रश्न 1.
क्या लिटमस परीक्षण में दोनों अम्ल सूचित होते हैं?
उत्तर-
हाँ, क्योंकि ये नीले लिटमस पत्र को लाल कर देते हैं।

प्रश्न 2.
सार्वत्रिक सूचक से क्या दोनों अम्लों के प्रबल होने का पता चलता है?
उत्तर-
नहीं, ऐसीटिक अम्ल दुर्बल अम्ल जबकि हाइड्रोक्लोरिक अम्ल प्रबल अम्ल होता है। नोट-एथेनॉइक अम्ल (CH3COOH) को सामान्यतः ऐसीटिक अम्ल कहते हैं। इसका 34% विलयन सिरका कहलाता है जोकि अचार में परिरक्षक के रूप में इस्तेमाल होता है। शुद्ध एथेनॉइक अम्ल का गलनांक 290K होता है इसलिये ठंडी जलवायु में शीत के दिनों में यह जम जाता है इसलिये इसे ग्लैशल ऐसीटिक अम्ल (Glacial Acetic Acid) कहते हैं।

क्रियाकलाप 4.8 (पा. पु. पृ. सं. 81).

प्रश्न 1.
अभिक्रिया से क्या निष्कर्ष निकलता है?
उत्तर-
एथिल ऐल्कोहॉल एवं ऐसीटिक अम्ल, सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में क्रिया करके एस्टर बनाते हैं। अभिक्रिया का समीकरण निम्न है –
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक 7

प्रश्न 2.
एस्टर की सुगन्ध कैसी होती है?
उत्तर-
एस्टर की सुगन्ध मीठी होती है।

क्रियाकलाप 4.9 (पा. पु. पृ. सं. 82)

प्रश्न 1.
आप क्या प्रेक्षित करते हैं? .
उत्तर-
अभिक्रिया के दौरान बुदबुदाहट के साथ गैस उत्पन्न होती है, यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड है।

प्रश्न 2.
ताजे चूने के जल में इस गैस को प्रवाहित करने पर आप क्या देखते हैं?
उत्तर-
ताजे चूने के जल में CO2 गैस के प्रवाहित करने पर चूने का पानी दूधिया हो जाता है।

प्रश्न 3.
क्या इस परीक्षण से एथेनॉइक अम्ल एवं सोडियम कार्बोनेट की अभिक्रिया से उत्पन्न गैस का पता चल सकता है?
उत्तर-
हाँ।

क्रियाकलाप 4.10 (पा. पु. पृ. सं. 83)

प्रश्न 1.
क्या हिलाना बन्द करने के बाद दोनों परखनलियों में आप तेल व जल की परतों को अलग-अलग देख सकते हैं?
उत्तर-
नहीं, केवल परखनली B में एक परत ही दिखाई देती है। इससे सिद्ध होता है कि साबुन में तेल घुल गया है अतः कपड़े इसी प्रकार साफ होते हैं।

प्रश्न 2.
कुछ देर तक दोनों परखनलियों को स्थिर रखिए एवं फिर उस पर ध्यान दीजिए। क्या तेल की परत अलग हो जाती है? ऐसा किस परखनली में होता है?
उत्तर-
परखनली A में तल की परत अलग हो जाती  है|

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क्रियाकलाप 4.11 (पा. पु. पृ. सं. 85)

प्रश्न 1.
किस परखनली में अधिक झाग बनता है?
उत्तर-
आसुत जल वाली परखनली में अधिक झाग बनता है।

प्रश्न 2.
क्या दोनों में झाग की मात्रा समान है?
उत्तर-
नहीं।

प्रश्न 3.
किस परखनली में दही जैसा ठोस पदार्थ बनता है?
उत्तर-
कठोर जल वाली परखनली में दही जैसा ठोस पदार्थ बनता है।

क्रियाकलाप 4.12 (पा. पु. पृ. सं. 85)

प्रश्न 1.
दोनों परखनलियों में क्या झाग की मात्रा समान है?
उत्तर-
हाँ, दोनों परखनलियों में झाग की मात्रा समान होती है।

प्रश्न 2.
किस परखनली में दही जैसा ठोस पदार्थ बनता
उत्तर-
किसी भी परखनली में दही जैसा ठोस पदार्थ नहीं बनता है।

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HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

Haryana State Board HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव Textbook Exercise Questions, and Answers.

Haryana Board 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

HBSE 10th Class Science विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन किसी लम्बे विद्युत धारावाही तार के निकट चुम्बकीय क्षेत्र का सही वर्णन करता है?
(a) चुम्बकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ तार के लम्बवत् होती हैं।
(b) चुम्बकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ तार के समान्तर होती हैं।
(c) चुम्बकीय क्षेत्र की क्षेत्र रेखाएँ अरीय होती हैं जिनका उद्भव तार से होता है।
(d) चुम्बकीय क्षेत्र की संकेन्द्रीय क्षेत्र रेखाओं का केन्द्र तार होता है।
उत्तर-
(d) चुम्बकीय क्षेत्र की संकेन्द्रीय क्षेत्र रेखाओं का केन्द्र तार होता है।

प्रश्न 2.
वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण की परिघटना
(a) किसी वस्तु को आवेशित करने की प्रक्रिया है।
(b) किसी कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित होने के कारण चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करने की प्रक्रिया है।
(c) कुंडली तथा चुम्बक के बीच आपेक्षिक गति के कारण कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न करना है।
(d) किसी विद्युत मोटर की कुंडली को घूर्णन कराने की प्रक्रिया है।
उत्तर-
(c) कुंडली तथा चुम्बक के बीच आपेक्षिक गति के कारण कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न करना है।

प्रश्न 3.
विद्युत धारा उत्पन्न करने की युक्ति को कहते हैं-
(a) जनित्र
(b) गैल्वेनोमीटर
(c) ऐमीटर
(d) मोटर।
उत्तर-
(a) जनित्र।

प्रश्न 4.
किसी ac जनित्र तथा dc जनित्र में एक मूलभूत अन्तर यह है कि- .
(a) ac जनित्र में विद्युत चुम्बक होता है जबकि dc मोटर में स्थायी चुम्बक होता है।
(b) dc जनित्र उच्च वोल्टता का जनन करता है।
(c) ac जनित्र उच्च वोल्टता का जनन करता है।
(d) ac जनित्र में सी वलय होते हैं, जबकि dc जनित्र में दिक्परिवर्तक होता है।
उत्तर-
(d) ac जनित्र में सी वलय होते हैं, जबकि dc जनित्र में दिक्परिवर्तक होता है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

प्रश्न 5.
लघुपथन के समय, परिपथ में विद्युत धारा का मान
(a) बहुत कम हो जाता है
(b) परिवर्तित नहीं होता
(c) बहुत अधिक बढ़ जाता है
(d) निरन्तर परिवर्तित होता है।
उत्तर-
(c) बहुत अधिक बढ़ जाता है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित प्रकथनों में कौन-सा सही है तथा कौन-सा गलत है? इसे प्रकथन के सामने अंकित कीजिए
(a) विद्युत मोटर यान्त्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित करता है।
(b) विद्युत जनित्र विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है।
(c) किसी लम्बी वृत्ताकार विद्युत धारावाही कुंडली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र समान्तर सीधी क्षेत्र रेखाएँ होता है।
(d) हरे विद्युतरोधन वाला तार प्रायः विद्युन्मय तार होता है।
उत्तर-
(a) असत्य,
(b) सत्य,
(c) सत्य,
(d) असत्य।

प्रश्न 7.
चुम्बकीय क्षेत्र के तीन स्त्रोतों की सूची बनाइए।
उत्तर-
चुम्बकीय क्षेत्र के स्रोत हैं-
(1) स्थायी चुम्बक,
(2) विद्युत धारा तथा
(3) गतिमान आवेश।

प्रश्न 8.
परिनालिका चुम्बक की भाँति कैसे व्यवहार करती है? क्या आप किसी छड़ चुम्बक की सहायता से किसी विद्युत धारावाही परिनालिका के उत्तर ध्रुव तथा दक्षिण ध्रुव का निर्धारण कर सकते हैं।
उत्तर-
धारावाही परिनालिका एक छड़ चुम्बक की भाँति ही व्यवहार करती है। इनमें निम्नलिखित समानताएँ होती हैं-

  • धारावाही परिनालिका एवं छड़ चुम्बक दोनों को स्वतन्त्रतापूर्वक लटकाए जाने पर दोनों के अक्ष उत्तर एवं दक्षिण दिशा में ठहरते हैं।
  • धारावाही परिनालिका एवं छड़ चुम्बक दोनों के समान ध्रुवों में प्रतिकर्षण एवं असमान ध्रुवों में आकर्षण होता है।
  • दोनों ही लोहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं तथा दिक्सूचक सुई लाने पर सुई विक्षेपित हो जाती है।

दण्ड चुम्बक की सहायता से परिनालिका के ध्रुवों का निर्धारण-दण्ड चुम्बक द्वारा परिनालिका के ध्रुवों का निर्धारण निम्न प्रकार से किया जा सकता है-

  • परिनालिका को उसके केन्द्र पर धागा बाँधकर स्वतन्त्रतापूर्वक लटका देते हैं।
  • दण्ड चुम्बक के उत्तरी ध्रुव को परिनालिका के एक सिरे के पास लाते हैं। यदि परिनालिका का यह सिरा चुम्बक की ओर आकर्षित होता है तो परिनालिका का यह सिरा दक्षिणी ध्रुव होगा तथा विपरीत सिरा उत्तरी ध्रुव होगा।
  • यदि दण्ड चुम्बक का उत्तरी ध्रुव समीप लाने पर परिनालिका विक्षेपित हो जाती है तब दण्ड चुम्बक के उत्तरी ध्रुव के सामने वाला परिनालिका का सिरा उत्तरी ध्रुव होगा तथा विपरीत सिरा दक्षिणी ध्रुव होगा।

प्रश्न 9.
किसी चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित विद्युत धारावाही चालक पर आरोपित बल कब अधिकतम होता है?
उत्तर-
जब चालक चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् रखा गया हो तब आरोपित बल अधिकतम होता है।

प्रश्न 10.
मान लीजिए आप किसी चैम्बर में अपनी पीठको किसी एक दीवार से लगाकर बैठे हैं। कोई इलेक्ट्रॉन पुंज आपके पीछे की दीवार से सामने की ओर क्षैतिजतः गमन करते हुए किसी प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा आपके दाईं ओर विक्षेपित हो जाता है। चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा क्या है?
उत्तर-
फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम के अनुसार चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा ऊर्ध्वाधरतः नीचे की ओर होगी।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

प्रश्न 11.
विद्युत मोटर का नामांकित आरेख खींचिए। इसका सिद्धान्त तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। विद्युत मोटर में विभक्त वलय का क्या महत्त्व है? (CBSE 2018)
उत्तर-
विद्युत मोटर (Electric Motor) विद्युत मोटर द्वारा विद्युत ऊर्जा को यान्त्रिक ऊर्जा में बदला जाता है।
सिद्धान्त (Principle)-यदि किसी चुम्बकीय क्षेत्र में एक बन्द कुंडली रखकर उसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाए तो कुंडली विक्षेपित हो जाती है। यदि कुंडली में धारा का प्रवाह एक ही दिशा में होता रहे तो कुंडली भी एक दिशा में घूमती रहेगी। इस तथ्य का उपयोग विद्युत मोटर बनाने में किया जाता है। इसे विद्युत मोटर का सिद्धान्त कहा जाता है।

रचना-विद्युत मोटर के निम्नांकित मुख्य भाग होते हैं
(i) क्षेत्र चुम्बक,
(ii) आर्मेचर,
(iii) विभक्त वलय,
(iv) ब्रुश।

(i) क्षेत्र चुम्बक (Field magnet)-यह एक शक्तिशाली स्थायी चुम्बक होता है, जिसके ध्रुव खण्ड N व S हैं। इस चुम्बक के ध्रुवों के बीच उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र में आर्मेचर कुंडली घूमती है।

(ii) आर्मेचर (Armature) यह अनेक फेरों वाली एक आयताकार कुंडली ABCD होती है जो कच्चे लोहे के क्रोड पर ताँबे के पृथक्कित तार लपेटकर बनायी जाती है।

(iii) विभक्त वलय (Split rings) यह दो अर्द्ध-वृत्ताकार वलयों L व M के रूप में होता है। कुंडली के सिरे A व B इन भागों में अलग-अलग जुड़े रहते हैं। यह कुंडली में प्रवाहित होने वाली धारा की दिशा को इस प्रकार परिवर्तित करता है कि कुंडली सदैव एक ही दिशा में क्षैतिज अक्ष पर घूमती है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव 1

(iv) बुश (Brush) विभक्त वलय L व M धातु की बनी दो पत्तियों को स्पर्श करते हैं। इन्हें ब्रुश कहते हैं। इन ब्रुशों का सम्बन्ध दो संयोजक पेचों से कर दिया जाता है। बाह्य परिपथ से आने वाली धारा को इन्हीं पेचों से सम्बन्धित कर देते हैं।

कार्यविधि (Working)-जब बैटरी से कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तब फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियमानुसार, कुंडली की भुजाओं AB तथा CD पर बराबर, परन्तु विपरीत दिशा में दो बल कार्य करने लगते हैं। ये बल एक बलयुग्म का निर्माण करते हैं, जिसके कारण कुंडली दक्षिणावर्त दिशा में घूमने लगती है। आधे चक्कर के बाद कुंडली की भुजाएँ AB तथा CD अपना स्थान बदल देती हैं तथा साथ ही साथ विभक्त वलय L व M भी अपनी स्थितियाँ बदल देते हैं। इन विभक्त वलयों की सहायता से धारा की दिशा इस प्रकार रखी जाती है कि कुंडली पर बलयुग्म एक ही दिशा में कार्य करे अर्थात् कुंडली एक ही दिशा में घूमती रहे।

कुंडली के घूमने की दर निम्नलिखित उपायों से बढ़ाई जा सकती है-

  • कुंडली में प्रवाहित धारा को बढ़ाकर,
  • कुंडली में फेरों की संख्या बढ़ाकर,
  • कुंडली का क्षेत्रफल बढ़ाकर तथा
  • चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता बढ़ाकर।

प्रश्न 12.
ऐसी कुछ युक्तियों के नाम लिखिए जिनमें विद्युत मोटर उपयोग किए जाते हैं?
उत्तर-
विद्युत मोटर का उपयोग बिजली के पंखे, विद्युत मिश्रकों, वाशिंग मशीनों, कम्प्यूटरों आदि में किया जाता है।

प्रश्न 13.
कोई विद्युतरोधी ताँबे के तार की कुंडली किसी गैल्वेनोमीटर से संयोजित है। क्या होगा यदि कोई छड़ चुम्बक-
(i) कुंडली में धकेला जाता है।
(ii) कुंडली के भीतर से बाहर खींचा जाता है।
(iii) कुंडली के भीतर स्थिर रखा जाता है।
उत्तर-
(i) कुंडली में एक प्रेरित धारा उत्पन्न होगी तथा धारामापी विक्षेप प्रदर्शित करेगा।
(ii) प्रेरित धारा उत्पन्न होने से धारामापी में विक्षेप होगा, विक्षेप की दिशा पहले से विपरीत होगी।
(iii) कोई प्रेरित धारा उत्पन्न नहीं होगी, धारामापी में कोई विक्षेप नहीं आएगा।

प्रश्न 14.
दो वृत्ताकार कुंडली A तथा B एक-दूसरे के निकट स्थित हैं। यदि कुंडली A में विद्युत धारा में कोई परिवर्तन करें तो क्या कुंडली B में कोई विद्युत धारा प्रेरित होगी? कारण लिखिए।
उत्तर-
कुंडली B में धारा प्रेरित होगी। इसका कारण यह है कि जब कुंडली A में प्रवाहित धारा में बदलाव किया जाता है तो इसके चारों ओर स्थित चुम्बकीय क्षेत्र में भी परिवर्तन होता है। इस क्षेत्र की बल रेखाओं के कुंडली B से गुजरते समय बल रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होने के कारण कुंडली B में प्रेरित धारा उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित की दिशा को निर्धारित करने वाला नियम लिखिए
(i) किसी विद्युत धारावाही सीधे चालक के चारों ओर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र,
(ii) किसी चुम्बकीय क्षेत्र में, क्षेत्र के लम्बवत् स्थित, विद्युत धारावाही सीधे चालक पर आरोपित बल, तथा
(iii) किसी चुम्बकीय क्षेत्र में किसी कुंडली के घूर्णन करने पर उस कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत धारा।
उत्तर-
(i) किसी धारावाही चालक के चारों ओर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम द्वारा निर्धारित होती है, इस नियम के अनुसार, “यदि दाएँ हाथ की अंगुलियों को धारावाही चालक के चारों ओर मोड़कर, अंगूठे को धारावाही चालक में प्रवाहित धारा के अनुदिश रखें तो मुड़ी हुई अंगुलियाँ चुम्बकीय बल रेखाओं की दिशा को प्रदर्शित करेंगी।”

(ii) चुम्बकीय क्षेत्र में रखे गये धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम द्वारा निर्धारित की जाती है।
फ्लेमिंग का बाएँ हाथ का नियम-इस नियम के अनुसार, “यदि हम बाएँ हाथ के अंगूठे तथा पहली दो अंगुलियों को इस प्रकार फैलाएँ कि तीनों परस्पर लम्बवत् रहें तब यदि तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा, मध्यमा चालक में प्रवाहित धारा की दिशा को प्रदर्शित करे तो अँगूठा चालक पर लगने वाले बल की दिशा को प्रदर्शित करेगा।”

(iii) किसी चुम्बकीय क्षेत्र में किसी कुंडली की गति के कारण उसमें उत्पन्न प्रेरित धारा की दिशा फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियम से ज्ञात की जाती है- फ्लेमिंग का दाएँ हाथ का नियम-इस नियम के अनुसार, “यदि दाएँ हाथ का अंगूठा, उसके पास वाली तर्जनी अंगुली तथा मध्यमा अंगुली को परस्पर एक-दूसरे के लम्बवत् फैलाकर इस प्रकार रखें कि तर्जनी अंगुली चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में तथा अंगूठा चालक की गति की दिशा में हो तो मध्यमा अंगुली चालक में धारा की दिशा बताएगी।”

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

प्रश्न 16.
नामांकित आरेख खींचकर किसी विद्युत जनित्र का मूल सिद्धान्त तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। इसमें ब्रुशों का क्या कार्य है?
उत्तर-
विद्युत जनित्र अथवा प्रत्यावर्ती धारा डायनमो (Electric Generator or Alternating Current Dynamo)- विद्युत जनित्र (डायनमो) एक ऐसा यन्त्र है जो कि यान्त्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।

सिद्धान्त (Principle)-जब किसी शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में किसी बन्द कुंडली को घुमाया जाता है, तो उसमें से होकर गुजरने वाले चुम्बकीय फ्लक्स में लगातार परिवर्तन होता रहता है, जिसके कारण कुंडली में एक विद्युत वाहक बल तथा विद्युत धारा प्रेरित हो जाती है। कुंडली को घुमाने में जो कार्य किया जाता है वह विद्युत ऊर्जा के रूप में परिणित हो जाता है।

संरचना (Construction)-इसके मुख्य भाग निम्नलिखित हैं-
(i) क्षेत्र चुम्बक,
(ii) आर्मेचर,
(iii) सपी वलय,
(iv) ब्रुश।

(i) क्षेत्र चुम्बक (Field magnet)-यह एक अति शक्तिशाली नाल चुम्बक होता है जिसके ध्रुवों के मध्य शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में एक कुंडली को तीव्र गति से घुमाया जाता है।
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(ii) आर्मेचर या कुंडली (Armature)-यह मुलायम लोहे के एक क्रोड पर लिपटी अत्यधिक संख्या में पृथक्कृत तारों की कुंडली है जिसे चुम्बकीय क्षेत्र में तीव्र गति से घुमाया जाता है। यह सामान्य रूप से 50 चक्कर प्रति सेकण्ड की दर से चक्कर लगाती है जो प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति. कहलाती है।

(iii) सी वलय (Slip rings)-कुंडली के सिरे A व D क्रमशः अलग-अलग पृथक्कृत धात्विक वलयों C, व C, से जोड़ दिए जाते हैं। ये कुंडली के साथ-साथ घूमते हैं।

(iv) बुश (Brushes)-ये कार्बन या किसी धातु की पत्तियों से बने दो ब्रुश होते हैं। इनका एक सिरा सी वलयों को स्पर्श करता है एवं शेष दूसरे सिरों को बाह्य परिपथ से सम्बन्धित कर दिया जाता है। ब्रुश कुंडली के साथ नहीं घूमते हैं।

कार्यविधि (Working)-माना कि कुंडली ABCD दक्षिणावर्त दिशा में घूम रही है, जिससे भुजा CD नीचे की ओर व भुजा AB ऊपर की ओर आ रही होती है तब फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियमानुसार, इन भुजाओं में प्रेरित धारा की दिशा चित्रानुसार होगी। अतः बाह्य परिपथ में धारा B2, से जाएगी तथा B1, से वापस आएगी। जब कुंडली अपनी
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ऊर्ध्वाधर स्थिति से गुजरेगी, तब भुजा AB नीचे की ओर तथा CD ऊपर की ऊपर की ओर जाने लगेगी। इस कारण AB तथा CD में धारा की दिशाएँ पहले से विपरीत हो जाएँगी। इस प्रकार की धारा को प्रत्यावर्ती धारा (alternating current) कहते हैं, क्योंकि प्रत्येक आधे चक्कर के बाद बाह्य परिपथ में धारा की दिशा बदल जाती है।

प्रश्न 17.
किसी विद्युत परिपथ में लघुपथन कब होता
उत्तर-
जब विद्युन्मय तार एवं उदासीन तार परस्पर सम्पर्कित हो जाते हैं तो परिपथ लघुपथित हो जाता है। इस स्थिति में परिपथ का प्रतिरोध अचानक शून्य हो जाता है तथा धारा का मान अचानक बहुत अधिक बढ़ जाता है।

प्रश्न 18.
भूसंपर्क तार का क्या कार्य है? धातु के आवरण वाले विद्युत साधित्रों को भूसंपर्कित करना क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
भूसंपर्क तार-घरेलू विद्युत परिपथ में विद्युन्मय एवं उदासीन तारों के साथ एक तीसरा तार भी लगा होता है, इस तार का सम्पर्क घर के निकट जमीन के नीचे दबी धातु के प्लेट के साथ होता है। इस तार को भूसंपर्क तार कहते हैं। धातु के साधित्रों जैसे बिजली की प्रेस, फ्रिज, टोस्टर आदि को भूसंपर्क तार से जोड़ देने पर साधित्र के आवरण से विद्युत धारा का क्षरण होने पर आवरण का विभव भूमि के बराबर हो जाता है। इससे साधित्र का उपयोग करने वाले व्यक्ति को तीव्र विद्युत आघात लगने का खतरा समाप्त हो जाता है।

HBSE 10th Class Science विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव InText Questions and Answers

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 250)

प्रश्न 1.
चुम्बक के निकट लाने पर दिक्सूचक की सुई विक्षेपित क्यों हो जाती है?
उत्तर-
चुम्बक के समीप लाए जाने पर, चुम्बक के चुम्बकीय क्षेत्र के कारण दिक्सूचक सुई पर एक बलयुग्म कार्य करने लगता है जो सुई को विक्षेपित कर देता है।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 255)

प्रश्न 1.
किसी छड़ चुम्बक के चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ खींचिए।
उत्तर-
किसी छड़ चुम्बक के चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ –
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प्रश्न 2.
चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के गुणों की सूची बनाइए।
उत्तर-
चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं के निम्नलिखित गुण हैं-

  • चुम्बक के बाहर इन बल रेखाओं की दिशा उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर तथा चुम्बक के अन्दर दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर होती है। ये बन्द वक्र के रूप में होती हैं।
  • चुम्बकीय बल रेखा के किसी बिन्दु पर खींची गयी स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है!
  • चुम्बकीय बल रेखाएँ एक-दूसरे को कभी नहीं काटती, क्योंकि एक बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दो दिशाएँ सम्भव नहीं हैं।
  • एक समान चुम्बकीय क्षेत्र की चुम्बकीय बल रेखाएँ, परस्पर समान्तर एवं बराबर दूरियों पर होती हैं।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

प्रश्न 3.
दो चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को प्रतिच्छेद क्यों नहीं करती?
उत्तर-
यदि दो चुम्बकीय बल रेखाएँ एक-दूसरे को परस्पर काटेंगी तो उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दो दिशाएँ होंगी जोकि असम्भव है।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 256)

प्रश्न 1.
मेज के तल में पड़े तार के वृत्ताकार पाश पर विचार कीजिए। मान लीजिए इस पाश में दक्षिणावर्त विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम को लागू करके पाश के भीतर तथा बाहर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात कीजिए। .
उत्तर-
चित्र के अनुसार, यदि दाहिने हाथ की अंगुलियाँ तार के ऊपर इस प्रकार लपेटी जाएँ कि अँगूठा तार में प्रवाहित धारा की दिशा में हों, तब अंगुलियों के मुड़ने की दिशा चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करेगी।
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अतः पाश के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा पाश के तल (मेज के तल) के लम्बवत् नीचे की ओर होगी, जबकि पाश के बाहर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा पाश (मेज) के तल के लम्बवत् ऊपर की ओर होगी।

प्रश्न 2.
किसी दिए गए क्षेत्र में चुम्बकीय क्षेत्र एक समान है। इसे निरूपित करने के लिए आरेख खींचिए।
उत्तर-
एक समान चम्बकीय क्षेत्र परस्पर समान्तर बल रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाएगा जैसा कि निम्न चित्र में प्रदर्शित किया गया है।
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प्रश्न 3.
सही विकल्प चुनिए
किसी विद्युत धारावाही सीधी लम्बी परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र
(a) शून्य होता है।
(b) इसके सिरे की ओर जाने पर घटता है।
(c) इसके सिरे की ओर जाने पर बढ़ता है।
(d) सभी बिन्दुओं पर समान होता है।
उत्तर-
(b) इसके सिरे की ओर जाने पर घटता है।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 259)

प्रश्न 1.
किसी प्रोटॉन का निम्नलिखित में से कौन-सा गुण चुम्बकीय क्षेत्र में मुक्त गति करते समय परिवर्तित हो जाता है?
(a) द्रव्यमान
(b) चाल
(c) वेग
(d) संवेग।
उत्तर-
(c) वेग तथा (d) संवेग।

प्रश्न 2.
क्रियाकलाप 13.7 में, हमारे विचार से छड़ AB का विस्थापन किस प्रकार प्रभावित होगा, यदि
(a) छड़ AB में प्रवाहित विद्युत धारा में वृद्धि हो जाए
(b) अधिक प्रबल नाल चुम्बक प्रयोग किया जाए और
(c) छड़ AB की लम्बाई में वृद्धि कर दी जाए?
उत्तर-
(a) छड़ का विस्थापन बढ़ जाएगा; क्योंकि इस पर कार्यरत बल प्रवाहित विद्युत धारा के अनुक्रमानुपाती होता है।
(b) छड़ का विस्थापन बढ़ जाएगा; क्योंकि इस पर कार्यरत बल चुम्बकीय क्षेत्र के अनुक्रमानुपाती होता है।
(c) छड़ का विस्थापन बढ़ जाएगा; क्योंकि इस पर कार्यरत बल छड़ की लम्बाई के अनुक्रमानुपाती होता है।

प्रश्न 3.
पश्चिम की ओर प्रक्षेपित कोई धनावेशित कण (अल्फा-कण) किसी चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा उत्तर की ओर विक्षेपित हो जाता है। चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा क्या
(a) दक्षिण की ओर
(b) पूर्व की ओर
(c) अधोमुखी
(d) उपरिमुखी।
उत्तर-
(d) उपरिमुखी।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 261)

प्रश्न 1.
फ्लेमिंग का वाम हस्त नियम लिखिए।
उत्तर-
फ्लेमिंग का वाम हस्त नियम-इस नियम के अनुसार, “यदि हम अपने बाएँ हाथ के अंगूठे तथा पहली दो चुम्बकीय क्षेत्र
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अंगुलियों को इस प्रकार फैलाएँ कि तीनों परस्पर लम्बवत् रहें, तब यदि तर्जनी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करे, मध्यमा चालक में प्रवाहित धारा की दिशा को प्रदर्शित करे तो अँगूठा चालक पर लगने वाले बल की दिशा को प्रदर्शित करेगा।

प्रश्न 2.
विद्युत मोटर का क्या सिद्धान्त है?
उत्तर-
विद्युत मोटर का सिद्धान्त-जब किसी कुंडली को चुम्बकीय क्षेत्र में रखकर उसमें धारा प्रवाहित की जाती है तो कुंडली पर एक बलयुग्म कार्य करता है जो कुंडली को उसकी अक्ष पर घुमाने का प्रयास करता है। यदि कुंडली अपनी अक्ष पर घूमने के लिए स्वतन्त्र हो तो वह घूमने लगती है। यही विद्युत मोटर का सिद्धान्त है।

प्रश्न 3.
विद्युत मोटर में विभक्त वलय की क्या भूमिका है?
उत्तर-
विद्युत मोटर में विभक्त वलय दिक्परिवर्तक का कार्य करता है। वह युक्ति जो परिपथ में विद्युत धारा के प्रवाह को उत्क्रमित कर देती है, उसे दिक्परिवर्तक कहते हैं।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 264)

प्रश्न 1.
किसी कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित करने के विभिन्न ढंग स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-

  • यदि कुंडली को स्थिर रखकर, दण्ड चुम्बक को कुण्डली की ओर लाएँ या कुण्डली से दूर ले जाएँ, तो कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न की जा सकती है।
  • चुम्बक को स्थिर रखकर कुंडली को चुम्बक के समीप या उससे दूर ले जाकर कुण्डली में विद्युत धारा प्रेरित की जा सकती है।
  • कुंडली को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाकर उसमें धारा प्रेरित की जा सकती है।
  • कुंडली के समीप रखी किसी अन्य कुण्डली में प्रवाहित धारा में परिवर्तन करके भी पहली कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित की जा सकती है।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 265)

प्रश्न 1.
विद्युत जनित्र का सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर-
विद्युत जनित्र का सिद्धान्त-जब किसी बन्द कुंडली को किसी शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में तेजी से घुमाया जाता है तब उसमें से होकर गुजरने वाले चुम्बकीय फ्लक्स में लगातार परिवर्तन होने के कारण कुंडली में एक विद्युत धारा प्रवाहित हो जाती है। कुंडली को घुमाने में किया गया कार्य ही कुंडली में विद्युत-ऊर्जा के रूप में परिणित हो जाता है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

प्रश्न 2.
दिष्ट धारा के कुछ स्रोतों के नाम लिखिए।
उत्तर-

  1. विद्युत सेल या बैटरी तथा
  2. दिष्ट धारा जनित्र।

प्रश्न 3.
प्रत्यावर्ती विद्युत धारा उत्पन्न करने वाले स्रोतों के नाम लिखिए।
उत्तर-
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र द्वारा प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न होती है।

प्रश्न 4.
सही विकल्प का चयन कीजिए-ताँबे के तार की एक आयताकार कुंडली किसी चुम्बकीय क्षेत्र में घूर्णी गति कर रही है। इस कुंडली में प्रेरित विद्युत् धारा की दिशा में कितने परिभ्रमण के पश्चात् परिवर्तन होता है।
(a) दो
(b) एक
(c) आधे
(d) चौथाई।
उत्तर-
(c) आधे।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 267)

प्रश्न 1.
विद्युत परिपथों तथा साधित्रों में सामान्यतया उपयोग होने वाले दो सुरक्षा उपायों के नाम लिखिए।
उत्तर-
(i) विद्युत फ्यूज,
(ii) भू सम्पर्क तार ।

प्रश्न 2.
2kW शक्ति अनुमतांक का एक विद्युत तन्दूर किसी घरेलू विद्युत परिपथ (220V) में प्रचालित किया जाता है जिसका विद्युत धारा अनुमतांक 5A है, इससे आप किस परिणाम की अपेक्षा करते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
विद्युत तन्दूर की शक्ति
P=2kW =2000w
V=220V
I = \(\frac{\mathrm{P}}{\mathrm{V}}=\frac{2000 \mathrm{~W}}{200 \mathrm{~V}}\)
=9.09A
विद्युत धारा का अनुमतांक 5A है, विद्युत तन्दूर इससे बहुत अधिक धारा ले रहा है जिससे अतिभारण हो जाएगा तथा फ्यूज गल जाएगा एवं विद्युत पथ अवरोधित हो जाएगा।

प्रश्न 3.
घरेलू विद्युत परिपथों में अतिभारण से बचाव के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
उत्तर-
घरेलू विद्युत परिपथों में अतिभारण से बचाव के लिए मेन स्विच के पास, विद्युन्मय तार में उचित सामर्थ्य का फ्यूज तार जोड़ना चाहिए।

HBSE 10th Class Science विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव InText Activity Questions and Answers

क्रियाकलाप 13.1. (पा. पु. पृ. सं. 249)

प्रेक्षण (Observation)-दिक्सूचक सुई विक्षेपित हो जाती है, इसका अर्थ है कि ताँबे के तार से प्रवाहित विद्युत धारा ने एक चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न किया है। इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि विद्युत तथा चुम्बकत्व एक दूसरे से सम्बन्धित

क्रियाकलाप 13.2. (पा. पु. पृ. सं. 250)

प्रश्न 1.
आप क्या प्रेक्षण करते हैं ?
उत्तर-
लौह-चूर्ण चित्र में दर्शाए गए पैटर्न के अनुसार व्यवस्थित हो जाते हैं।

प्रश्न 2.
यह पैटर्न क्या निर्देशित करता हैं ?
उत्तर-
लौह-चूर्ण एक बल का अनुभव करता है जो उस चुम्बक के चारों ओर होता है। इसे चुम्बकीय क्षेत्र कहते हैं।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव 8

प्रश्न 3.
लौह-चूर्ण किस स्थान पर अधिक आकर्षित होता है ?
उत्तर-
दोनों ध्रुवों पर।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

क्रियाकलाप 13.3. (पा. पु. पृ. सं. 251)
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प्रेक्षण (Observation) चुम्बकीय क्षेत्र में परिमाण एवं दिशा दोनों होते हैं, किसी चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा वह मानी जाती है जिसके अनुदिश दिक्सूची का उत्तरी ध्रुव उस क्षेत्र के भीतर गमन करता है। अतः चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से प्रकट होती हैं तथा दक्षिणी ध्रुव पर विलीन हो जाती हैं। चुम्बक के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा उसके दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर होती है अतः चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ एक बन्द वक्र के रूप में होती हैं।

क्रियाकलाप 13.4. (पा. पु. पृ. सं. 252)

प्रश्न 1.
दिक्-सूचक सुई के ऊपर यदि धारावाही चालक रखा जाए तो क्या होगा ?
उत्तर-
दिक्-सूचक सुई की भुजाओं में विचलन होगा। यह दिशा SNOW नियम की मदद से ज्ञात कर सकते हैं।

प्रश्न 2.
SNOW नियम क्या है ?
उत्तर-
यदि चालक में धारा की दिशा दक्षिण से उत्तर दिशा की तरफ हो तो दिक्सूचक सुई की दिशा के पश्चिम दिशा में विक्षेपण होगा।

प्रश्न 3.
क्या होगा यदि धारावाही चालक में धारा की दिशा को उल्टा कर दिया जाए ?
उत्तर-
दिक्सूचक सुई की भुजाओं में विक्षेपण की दिशा उल्टी हो जाएगी।

प्रश्न 4.
यदि सीधे तार में प्रवाहित विद्युत धारा की दिशा को उत्क्रमित कर दिया जाए, तो क्या चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा भी उत्क्रमित हो जाएगी?
उत्तर-
हाँ, चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा भी उत्क्रमित हो जाएगी।

क्रियाकलाप 13.5. (पा. पु. पृ. सं. 253)

प्रश्न 1.
लौह-चूर्ण किस प्रकार व्यवस्थित होते हैं? .
उत्तर-
लौह-चूर्ण संरेखित होकर तार के चारों ओर संकेन्द्री वृत्तों के रूप में व्यवस्थित होते हैं।

प्रश्न 2.
ये संकेन्द्री वृत्त क्या निरूपित करते हैं ? ।
उत्तर-
ये संकेन्द्री वृत्त, चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं को निरूपित करते हैं।

प्रश्न 3.
इस प्रकार उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा आप कैसे ज्ञात करेंगे?
उत्तर-
दिक्सूची द्वारा ज्ञात करेंगे। वृत्त के किसी बिंदु P पर दिक्सूची का उत्तर ध्रुव विद्युत धारा द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र रेखा की दिशा बताता है।

प्रश्न 4.
विद्युत धारा की दिशा उत्क्रमित करने पर क्या होता है ?
उत्तर-
चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा भी उत्क्रमित हो जाती है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

प्रश्न 5.
क्या दिक्सूची के विक्षेप पर धारा के परिमाप – में वृद्धि और तार से दूरी का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
हाँ, धारा के परिमाप में वृद्धि होने पर विक्षेप में भी वृद्धि होती है तथा तार के दूसरे किसी बिंदु Q पर दिक्सूची रखने पर इसका विक्षेप घट जाता है।

क्रियाकलाप 13.6. (पा. पु. पृ. सं. 256)

प्रश्न 1.
कार्ड बोर्ड को हल्के से कुछ बार थपथपाइए। कार्ड बोर्ड पर जो पैटर्न बनता दिखाई दे उसका प्रेक्षण कीजिए।
उत्तर-
दोनों छिद्रों के पास लौह-चूर्ण संकेन्द्रीय वृत्ताकार पैटर्न में व्यवस्थित हो जाते है। इसका अर्थ हुआ कि धारावाही वृत्ताकार चालक का प्रत्येक भाग चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है जो संकेन्द्रीय वृत्ताकार होते हैं।

प्रश्न 2.
क्या धारावाही वृत्ताकार चालक के आस-पास चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है ?
उत्तर-
हाँ, धारावाही वृत्ताकार चालक के आसपास चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।

प्रश्न 3.
धारावाही वृत्ताकार चालक के दो विपरीत बिन्दुओं पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की प्रकृति में अन्तर बताइए।
उत्तर-
दोनों ही बिन्दुओं पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा विपरीत होती है। इन दोनों बिन्दुओं पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ संकेन्द्रीय वृत्ताकार होती हैं।

प्रश्न 4.
धारावाही वृत्ताकार चालक द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का मान सबसे अधिक कहाँ पर होता है?
उत्तर-
धारावाही वृत्ताकार चालक के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान सबसे अधिक होता है।

क्रियाकलाप 13.7. (पा. पु. पृ. सं. 257)

प्रश्न 1.
आप क्या देखते हैं ?
उत्तर-
हम देखते हैं कि विद्युत धारा प्रवाहित होते ही छड़ बाईं दिशा में विस्थापित होती है।

प्रश्न 2.
अब छड़ में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा की दिशा उत्क्रमित कीजिए और छड़ के विस्थापन की दिशा नोट कीजिए। अब यह दाईं ओर विस्थापित होती है। छड़ क्यों विस्थापित होती है?
उत्तर-
फ्लेमिंग के अनुसार धारावाही चालक पर चुम्बकीय क्षेत्र में बल लगता है। इसलिए धारावाही चालक की चुम्बक के ध्रुवों के बीच स्थिर रखने पर अपनी स्थिति से विस्थापित हो जाता है। इस छड़ पर लगने वाला बल छड़ पर लम्बवत दिशा में होता है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

प्रश्न 3.
जब एक धारावाही चालक को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो क्या होता है ?
उत्तर-
ज़ब धारावाही चालक को चुम्बकीय क्षेत्र में रखते हैं तो उस पर एक बल आरोपित होता है।

प्रश्न 4.
उस नियम का मात्र नाम लिखो जिसकी मदद से धारावाही चालक पर चुम्बकीय क्षेत्र में लगने वाले बल की दिशा ज्ञात करते हैं ?
उत्तर-
फ्लेमिंग का वामहस्त का नियम।

प्रश्न 5.
किन कारकों पर चालक पर आरोपित बल का मान निर्भर करता है ?
उत्तर-

  • चुम्बकीय क्षेत्र के मान पर,
  • चालक की लम्बाई पर,
  • चालक में प्रवाहित धारा के मान पर।

प्रश्न 6.
क्या होगा यदि चुम्बकीय क्षेत्र में रखे चालक में प्रवाहित धारा की दिशा को विपरीत दिशा में प्रवाहित किया जाए ?
उत्तर-
चालक पर आरोपित बल की दिशा विपरीत दिशा में हो जाती है।

क्रियाकलाप 13.8. (पा. पु. पृ. सं. 261)

प्रश्न-इस क्रियाकलाप से आप क्या निष्कर्ष निकालते हैं ? ..
उत्तर-
इस क्रियाकलाप से यह स्पष्ट होता है कि कुंडली के सापेक्ष चुंबक की गति एक प्रेरित विभवान्तर उत्पन्न करती है, जिसके कारण परिपथ में प्रेरित विद्युत धारा प्रवाहित होती है। याद रखिए गैल्वेनोमीटर एक ऐसा उपकरण है, जो किसी परिपथ में विद्युत् धारा की उपस्थिति संसूचित करता है।

क्रियाकलाप 13.9. (पा. पु. पृ. सं. 263)

प्रश्न 1.
जब एक धारावाही कुण्डली को दूसरी कुण्डली के पास लाते है तो क्या होता है ?
उत्तर-
दूसरी कुण्डली में धारा प्रेरित होती है।

प्रश्न 2.
प्राथमिक कुंडली में स्थिर धारा प्रवाहित होने पर द्वितीय कुण्डली में धारा का मान क्या होगा ?
उत्तर-
शून्य।

प्रश्न 3.
धारावाही कुंडली एवं प्रेरित धारा कुण्डली का क्या नाम है ?
उत्तर-
धारावाही कुण्डली को प्राथमिक कुण्डली एवं प्रेरित धारा कुण्डली को द्वितीयक कुण्डली कहते हैं।

प्रश्न 4.
कौन-सी कुण्डली से चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है ?
उत्तर-
प्राथमिक कुण्डली से चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है क्योंकि यह धारावाही कुण्डली होती है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव

प्रश्न 5.
कुण्डली 2 में प्रेरित धारा की प्रबलता को कौन से कारक प्रभावित करते हैं ?
उत्तर-

  1. प्राथमिक कुण्डली में धारा की प्रबलता।
  2. प्राथमिक कुण्डली में तार के फेरों की संख्या।

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HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है

Haryana State Board HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Science Solutions Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है

HBSE 10th Class Science जीव जनन कैसे करते है Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अलैंगिक जनन मुकुलन द्वारा होता है –
(a) अमीबा में
(b) यीस्ट में
(c) प्लाज्मोडियम में
(d) लेस्मानिया में।
उत्तर-
(b) यीस्ट।

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन मानव में मादा जनन तन्त्र का भाग नहीं है
(a) अण्डाशय
(b) गर्भाशय
(c) शुक्रवाहिका
(d) डिम्बवाहिनी।
उत्तर-
(c) शुक्रवाहिका।

प्रश्न 3.
परागकोश में होते हैं-.
(a) बाह्यदल
(b) अण्डाशय
(c) अण्डप
(d) पराग कण।
उत्तर –
(d) पराग कण।

प्रश्न 4.
अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन के क्या लाभ हैं ?
उत्तर –
अलैंगिक जनन में केवल एक जीवधारी के लक्षण ही संतति जीव में आते हैं। इन संतति जीवों में आनुवंशिक ओज क्षीण होता है। इनके जननद्रव्य में विभिन्नताओं की सम्भावना कम होती है।

लैंगिक जनन निम्नलिखित कारणों से अलैंगिक जनन की अपेक्षा अधिक लाभकारी है-

  • लैंगिक जनन में नर एवं मादा के सम्मिलन से नये जीव की उत्पत्ति होती है जिससे दो प्रकार के जनन द्रव्यों का मिलन होता है। इन संतति जीवों में विभिन्नता की सम्भावनाएँ होती हैं।
  • लैंगिक जनन से गुणसूत्रों के नये जोड़े बनते हैं। – इससे विकासवाद की दिशा को नये आयाम प्राप्त होते हैं।
  • लैंगिक जनन से उत्पन्न जीवों में श्रेष्ठ गुणों का समावेश होता है तथा इनमें संकर ओज अधिक होता है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है

प्रश्न 5.
मानव में वृषण के क्या कार्य हैं ?
उत्तर-
मानव में वृषण के प्रमुख कार्य निम्न हैं-

  • ये शुक्राणुओं का निर्माण करते हैं।
  • ये टेस्टोस्टेरॉन नामक हॉर्मोन उत्पन्न करते हैं, जो शुक्राणुओं के उत्पादन को नियन्त्रित करता है।
  • यह हॉर्मोन बालकों में द्वितीय लक्षणों के विकास को प्रेरित करता है।

प्रश्न 6.
ऋतुस्राव क्यों होता है?
उत्तर-
स्त्रियों में अण्डाशय प्रत्येक माह एक अण्ड का निर्मोचन (Ovulation) करता है। निषेचित अण्डाणु द्वारा बने भ्रूण के रोपण के लिए गर्भाशय में कुछ परिवर्तन होते हैं। गर्भाशय की भित्ति में सूक्ष्मांकुर बन जाते हैं, चौड़ी वाहिकाओं का निर्माण हो जाता है तथा भ्रूण के पोषण के लिए परिवर्तन होते हैं। यदि अण्ड का निषेचन नहीं होता है तो गर्भाशय में हुए परिवर्तनों से पुन: सामान्य सी स्थिति बनती है जिसमें गर्भाशय भित्ति, सूक्ष्मांकुरों, म्यूकस तथा वाहिकाओं का विघटन होता है। ये सभी रचनाएँ एक स्राव के रूप में प्रत्येक 28 दिन पश्चात् योनि मार्ग से स्रावित होती हैं। इसे ऋतुस्राव (menstruation cycle) कहते हैं। यदि अण्ड का निषेचन हो जाता है तो ऋतुस्राव चक्र रुक जाता है और गर्भ धारण हो जाता है।

प्रश्न 7.
पुष्प की अनुदैर्ध्य काट का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर-
पुष्य की अनुदैर्ध्य काट-
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प्रश्न 8.
गर्भ निरोधन की विभिन्न विधियाँ कौन-सी
उत्तर-
मादा द्वारा गर्भधारण न होने देना गर्भ निरोधन (Contraception) कहलाता है। गर्भ निरोधन की विधियाँ , निम्नलिखित हैं:
1. रासायनिक विधियाँ-अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थ मादा में निषेचन क्रिया को रोक सकते हैं। ऐसी अनेक गोलियाँ (pills) बाजारों में उपलब्ध हैं जिन्हें खाने से गर्भधारण नहीं हो पाता है। झाग की गोली, जैली तथा विभिन्न क्रीमों के प्रयोग से भी गर्भधारण रोका जा सकता है।

2. शल्य विधियाँ-पुरुष नसबंदी (Vasectomy) तथा स्त्री नसबंदी (Tubectomy) द्वारा निषेचन क्रिया को बाधित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में कुशल चिकित्सकों द्वारा पुरुषों में शुक्रवाहिनी तथा स्त्रियों में अण्डवाहिनी को काटकर बाँध दिया जाता है जिससे शुक्राणुओं का अण्डाणुओं से मिलन नहीं हो पाता है।

3. भौतिक विधियाँ-इन विधियों में कुछ उपकरणों द्वारा शुक्राणु एवं अण्डाणु के मिलन को रोक दिया जाता है। पुरुष कण्डोम, स्त्री कण्डोम, कॉपर ‘टी’, गर्भ निरोधन लूप आदि भौतिक गर्भ निरोधन युक्तियाँ हैं।

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प्रश्न 9.
एककोशिक तथा बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
एककोशिक तथा बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति में अन्तर –

एककोशिक जीवों में जननबहुकोशिक जीवों में जनन
1. इनमें जनन विधि सरल होती है।इनमें जनन विधि जटिल होती है।
2. इनमें जनन प्रायः अलैं- गिक विधियों द्वारा होताइनमें जनन प्रायः लैंगिक विधियों द्वारा होता है।
3. इनमें जनन के लिए विशेष प्रकार की कोशिकाएँ नहीं होती हैं।इनमें जनन के लिए विशिष्ट प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं।
4. इनमें जनन के लिए कोई विशेष अंग भी नहीं होता हैं।इनमें जनन के लिए विशेष अंग होते हैं।
5. यह सामान्यतः सूत्री विभाजन द्वारा होता है।यह प्रायः अर्धसूत्री विभाजन द्वारा होता है।

प्रश्न 10.
जनन किसी स्पीशीज की समष्टि के स्थायित्व में किस प्रकार सहायक है ?
उत्तर-
जनन द्वारा पैतृक पीढ़ी से पुत्री पीढ़ी का निर्माण होता है। पुत्री पीढ़ी आगे चलकर पैतृक पीढ़ी का कार्य करती है और सन्तान उत्पन्न करती है। यह क्रम लगातार चलता रहता है और इस प्रकार स्पीशीज की समष्टि का स्थायित्व बना रहता है।

प्रश्न 11.
गर्भ-निरोधक युक्तियाँ अपनाने के क्या कारण हो सकते हैं ?
उत्तर-
गर्भ-निरोधक युक्तियों के अपनाने के निम्नलिखित कारण हैं

  • इनके द्वारा बढ़ती हुई जनसंख्या पर नियन्त्रण किया जा सकता है।
  • इसके द्वारा अवांछित सन्तान से बचा जा सकता है।
  • इनके द्वारा जल्दी-जल्दी गर्भधारण को रोका जा सकता है क्योंकि जल्दी-जल्दी गर्भधारण से स्त्री के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव होता है।
  • कुछ गर्भ निरोधन युक्तियाँ यौन-संचारित रोगों से बचने में सहायता करती हैं।
  • परिवार नियोजन अपना कर खुशहाल जीवनयापन किया जा सकता है। .

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(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 142)

प्रश्न 1.
डी.एन.ए. प्रतिकृति का प्रजनन में क्या महत्त्व
उत्तर-
डी.एन.ए. में आनुवंशिक सूचनाएँ निहित होती हैं। डी.एन.ए. गुणसूत्रों के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं। अतः डी.एन.ए. द्वारा अपने जैसे ही प्रतिरूप बनाने की क्षमता होती है। ऐसा डी.एन.ए. के प्रतिकृतिकरण द्वारा होता है। इसके द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी डी.एन.ए. की मात्रा सन्तुलित बनी रहती है।

प्रश्न 2.
जीवों में विभिन्नता स्पीशीज के लिए तो लाभदायक है परन्तु व्यष्टि के लिए आवश्यक नहीं है क्यों ?
उत्तर-
विभिन्नताएँ प्रजाति (Species) के लिए लाभदायक होती हैं, क्योंकि इनके कारण प्रजाति में कुछ ऐसे सदस्य उत्पन्न हो जाते हैं, जो अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए स्वयं को अनुकूलित कर लेते हैं या इनके प्रतिरोधी होते हैं। प्राकृतिक चयन के फलस्वरूप योग्यतम जीव जीवित रहते हैं। व्यक्तिगत सदस्य में उत्पन्न विभिन्नताएँ पर्यावरण से अनुकूलित न रहने के कारण सदस्य जीवित नहीं रह पाता है। अतः विभिन्नताएँ प्रजाति के लिए लाभदायक किन्तु व्यष्टि के लिए हानिकारक होती हैं। विभिन्नताएं प्रजाति की उत्तरजीविता बनाये रखने में उपयोगी हैं।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 146)

प्रश्न 1.
द्विखण्डन बहुखण्डन से किस प्रकार भिन्न
उत्तर-
द्विखण्डन तथा बहुखण्डन में अन्तर-

द्विखण्डन (Binary Fission)बहुखण्डन (Multiple Fission)
1. यह प्रायः अनुकूल परि स्थितियों में होता है।यह प्रायः प्रतिकूल परि स्थितियों में होता है।
2. इसमें केन्द्रक दो पुत्री केन्द्रकों में विभाजित होता है।इसमें केन्द्रक अनेक संतति केन्द्रकों में विभाजित होता है।
3. इसमें केन्द्रक विभाजन के साथ ही कोशिकाद्रव्य का विभाजन भी होता है।इसमें केन्द्रक का विभाजन होने के पश्चात् प्रत्येक संतति केन्द्रक के चारों ओर थोड़ा- थोड़ा जीवद्रव्य एकत्र हो जाता है।
4. इसमें एक मातृ जीव से दो संतति जीव बनते हैं।इसमें एक मातृ जीव से अनेक संतति जीव बनते हैं।

प्रश्न 2.
बीजाणु द्वारा जनन से जीव किस प्रकार लाभान्वित होता है ?
उत्तर-
बीजाणुजनन प्रायः पौधों में पाया जाता है। बीजाणुओं के ऊपर एक मोटा रक्षी आवरण होता है, जो इनकी प्रतिकूल पर्यावरण में रक्षा करता है। हल्के होने के कारण वायु द्वारा इनका प्रकीर्णन सरल होता है। अनुकूल परिस्थितियाँ (उचित ताप, नमी, भोज्य पदार्थ आदि) मिलने पर बीजाणु अंकुरण करके नये जीव को जन्म देते हैं। जैसे-राइजोपस, म्यूकर आदि।

प्रश्न 3.
क्या आप कुछ कारण सोच सकते हैं जिससे पता चलता हो कि जटिल संरचना वाले जीव पुनरुद्भवन द्वारा नयी संतति उत्पन्न नहीं कर सकते ?
उत्तर-
जटिल संरचना वाले जीवधारियों में कोशिकाएँ कार्यों के लिए विशिष्टीकृत होती हैं। ये कोशिकाएँ मिलकर, ऊतक, अंग, अंगतन्त्र तथा जीव शरीर का निर्माण करती हैं। इनमें केवल लैंगिक कोशिकाओं (नर तथा मादा युग्मक) के मिलने से ही नया जीव उत्पन्न होता है। इन जीवों की किसी अन्य कोशिका या ऊतक में नयी संतति उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती। इसके विपरीत कुछ सरल बहुकोशिकीय जीवों,जैसे-स्पंजों, हाइड्रा आदि में पुनरुद्भवन द्वारा नयी संतति बनाने की क्षमता होती है। इस प्रक्रिया में जीव का कोई कटा हुआ भाग नये जीव का निर्माण कर लेता है। जटिल संरचना वाले जीवों में पुनरुद्भवन की क्षमता केवल घाव भरने तक सीमित रह जाती है।

प्रश्न 4.
कुछ पौधों को उगाने के लिए कायिक प्रवर्धन का उपयोग क्यों किया जाता है ?
उत्तर-
कुछ पौधों को उगाने के लिए कायिक प्रवर्धन का उपयोग निम्नलिखित कारणों से किया जाता है –

  • कायिक प्रवर्धन से प्राप्त पौधे पूर्ण रूप से अपने जनकों के समान लक्षणों वाले होते हैं।
  • कुछ पौधे जिनके बीजों में जनन क्षमता नहीं होती उनका कायिक प्रवर्धन किया जा सकता है।
  • कायिक प्रजनन द्वारा कम समय में अधिक पौधे प्राप्त किये जा सकते हैं।
  • पौधों को बीज से उत्पन्न करने में लम्बा समय लगता है, जबकि कायिक प्रवर्धन से काफी बड़े पौधे कम समय में तैयार किये जा सकते हैं।
  • कायिक प्रवर्धन एक सस्ती विधि है।

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प्रश्न 5.
डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
डी. एन. ए. की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक है। यह जनन के लिए एक मूल घटना है। जनक कोशिका की दो कोशिकाएँ बनती है। ये दोनों प्रतिकृतियाँ अलग होना आवश्यक हैं तभी जनन हो सकता है। इसके लिए एक अलग से कोशिकीय संरचना आवश्यक है। एक प्रतिकृति नई संरचना में तथा एक मूल कोशिका में रह जाती है। इस प्रकार दो प्रतिकृतियाँ दो नई कोशिकाएँ बनाने में सहायता करती हैं और जनन होता है।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 154)

प्रश्न 1.
परागण क्रिया निषेचन से किस प्रकार भिन्न
उत्तर-
परागण तथा निषेचन में अन्तर-

परागण (Pollination)निषेचन  (Fertilization)
1. परागकोष (anther) से परागकणों का वर्तिकाग्र पर पहुँचना परागण कहलाती है।1. नर तथा मादा युग्मकों के मिलने की क्रिया निषेचन कहलाता है।
2. यह क्रिया किसी माध्यम (जैसे-वायु, जल, कीट, पक्षी आदि) द्वारा होती है।2. निषेचन में नर युग्मक परागण नलिका के माध यम से मादा युग्मक तक पहुँचते हैं। अत: किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है।
3. यह क्रिया निषेचन से पहले होती है।3. परागण क्रिया के सफलतापूर्वक सम्पन्न होने के पश्चात् निषेचन की क्रिया होती है।

प्रश्न 2.
शुक्राशय तथा प्रोस्टेट ग्रन्थि की क्या भूमिका
उत्तर-
शुक्राशय (Seminal Vesicle) तथा प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate gland) नर जनन तन्त्र के भाग होते हैं। शुक्राशय एक पोषक तरल पदार्थ स्रावित करता है जो शुक्राणुओं के साथ मिलकर वीर्य (Semen) बनाता है। यह तरल शुक्राणुओं का पोषण करता है, इनकी सुरक्षा करता है तथा इन्हें सक्रिय बनाये रखता है। यह तरल स्त्री की योनि के अम्लीय प्रभाव को कम करके शुक्राणुओं की रक्षा करता है।

प्रोस्टेट ग्रन्थि से हल्का अम्लीय तरल स्रावित होता है। यह वीर्य का लगभग 25 प्रतिशत भाग बनाता है। इसमें उपस्थित पदार्थ शुक्राणुओं के स्कन्दन को रोकते हैं तथा इन्हें सक्रिय रखते हैं।

प्रश्न 3.
यौवनारम्भ के समय लड़कियों में कौन-कौन से परिवर्तन दिखाई देते हैं ?
उत्तर-
लड़कों एवं लड़कियों में बाल्यावस्था में इनके जननांगों के अलावा अन्य शारीरिक लक्षणों तथा व्यवहार
आदि में विशेष अन्तर नहीं होता है। लड़कियों में लगभग 11 से 13 वर्ष की आयु से यौवनारम्भ था किशोरावस्था प्रारम्भ होती है।

इसमें निम्नलिखित परिवर्तन दिखाई देते हैं-

  • स्तनों की वृद्धि तथा दुग्धग्रन्थियों का विकास होने लगता है।
  • स्तनों के मध्य उभरे भाग पर स्थित चूचुक (nipples) के चारों ओर छोटा-सा रंगयुक्त क्षेत्र और अधिक गहरा हो जाता है।
  • श्रोणि भाग चौड़ा और नितम्ब भारी हो जाते हैं।
  • आवाज महीन एवं सुरीली हो जाती है।
  • त्वचा तैलीय हो जाती है।
  • बगल एवं जंघा प्रदेश में बाल उग आते हैं।
  • आर्तव चक्र (Menstrual cycle) प्रारम्भ हो जाता
  • व्यवहार में भी बदलाव होने लगते हैं।
  • अंडवाही नलियाँ (fallopian tube), गर्भाशय (uterus) और योनि (vagina) के आकार में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 4.
माँ के शरीर में गर्भस्थ भ्रूण को पोषण किस प्रकार प्राप्त होता है?
उत्तर-
मनुष्य एक स्तनधारी प्राणी है। निम्न श्रेणी के स्तनधारियों को छोड़कर अन्य सभी स्तनधारी जरायुजी (Viviparous) होते हैं अर्थात् शिशु को जन्म देते हैं। इनमें भ्रूण का विकास गर्भाशय में होता है और विकासशील भ्रूण का पोषण माता के गर्भाशय की दीवारों से अपरा (Placenta) द्वारा होता है। भ्रूणीय विकास के तीसरे सप्ताह में भ्रूण का रोपण गर्भाशय में प्राथमिक रसांकुरों (Primary Villi) द्वारा होता है और अन्त में अपरा नाल द्वारा गर्भाशय की दीवार से जुड़ जाता है। अपरा द्वारा पोषक पदार्थ तथा ऑक्सीजन भ्रूण को प्राप्त होती रहती है तथा भ्रूण के उत्सर्जी पदार्थ अपरा द्वारा ही माँ के रुधिर में छोड़ दिये जाते हैं, जहाँ से ये बाहर उत्सर्जित किये जाते हैं।

प्रश्न 5.
यदि कोई महिला कॉपर ‘टी’ का प्रर कर रही है तो क्या यह उसकी यौन-संचारित रोगों से रक्षा करेगी?
उत्तर-
नहीं। कॉपर ‘टी’ का प्रयोग गर्भ निरोधन के लिए किया जाता है। इसका यौन-संचारित रोगों से बचाव में कोई योगदान नहीं होता है।

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क्रियाकलाप 8.1 (पा. पु. पृ. सं. 142)

प्रेक्षण (Observation)-यीस्ट कोशिकाएँ रंगहीन तथा गोलाकार दिखाई देती हैं। इनका ऊपरी सिरा उभरा हुआ दिखाई देता है। यीस्ट कोशिकाएँ श्रृंखलाओं और झुण्डों के रूप में दिखाई देती हैं।

क्रियाकलाप 8.2  (पा. पु. पृ. सं. 142)

प्रेक्षण (Observation)-प्रारम्भ में डबलरोटी पर सफेद रंग के धागे बिखरे दिखाई देते हैं जो धीरे-धीरे घने होकर एक जाल जैसी रचना बना लेते हैं, जिसे कवक-जाल (Mycelium) कहते हैं। एक सप्ताह के अन्त तक ये अत्यधिक घने तथा धूसर रंग के हो जाते हैं। क्योंकि स्पोरेजियम तथा स्पोर (बीजाणु) बन जाते हैं।

क्रियाकलाप 8.3 (पा. पु. पृ. सं. 143)
प्रेक्षण (Observation)-अमीबा की स्थाई स्लाइड में अमीबा की कोशिका दिखाई देती है जिसमें कोशिका द्रव्य तथा केन्द्रक दिखाई देते हैं। जबकि द्विखण्डन की स्थायी स्लाइड में केन्द्रक दो भागों में विभाजित होता हुआ प्रतीत होता है। प्रारंभ में इसका आकार बढ़ता है तथा केन्द्रक और कोशिका द्रव्य दो भागों में विभक्त हो जाते हैं।
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क्रियाकलाप 8.4 (पा. पु. पृ. सं. 143)
प्रेक्षण (Observation)-स्लाइड में अशाखित तन्तु दिखाई देते हैं जो एक ही पंक्ति पर निरन्तर रखी कोशिकाओं से बने हैं। ये कोशिकाएँ बेलनाकार हैं। इनकी चौड़ाई की अपेक्षा लम्बाई अधिक है। इनका ऊपरी सिरा गुम्बद जैसा है।
प्रश्न-क्या आप स्पाइरोगाइरा तन्तुओं में विभिन्न ऊतक पहचान सकते हैं ?
उत्तर-
स्पाइरोगाइरा में ऊतक नहीं होते हैं। यह एक तन्तुवत् शैवाल है। इनके तन्तु अनेक कोशिकाओं के मिलने से बनते हैं।

क्रियाकलाप 8.5 (पा. पु. पृ. सं. 145)

प्रेक्षण (Observation) -आलू के कुछ टुकड़ों में गर्त दिखाई देते हैं। ये गर्त कलिकाएँ कहलाते हैं जिनसे नमी की उपस्थिति में प्ररोह तथा जड़ें विकसित होती हैं। गर्तरहित टुकड़ों से प्ररोह व जड़ों का निर्माण नहीं होता है।

प्रश्न-वे कौन-से टुकड़े हैं जिनसे हरे प्ररोह तथा जड़ विकसित हो रहे हैं?
उत्तर-
गर्तयुक्त टुकड़े।

क्रियाकलाप 8.6 (पा. पु. पृ. सं. 145)

प्रेक्षण (Observation)-कुछ टुकड़ों में कायिक जनन होता है तथा नई पत्तियाँ आदि निकलती हैं कुछ अन्य में ऐसी क्रिया नहीं होती है।

प्रश्न 1.
कौन-से टुकड़ो में वृद्धि होती है तथा नयी पत्तियाँ निकलती हैं?
उत्तर-
दो पत्तियों के मध्य वाले भाग में शीघ्र वृद्धि होती है और नई पत्तियाँ निकलती हैं।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 8 जीव जनन कैसे करते है

प्रश्न 2.
आप अपने प्रेक्षणों से क्या निष्कर्ष निकालते
उत्तर-
पत्तियों के निकट या टुकड़ों पर जहाँ कलिका थी वहाँ कायिक जनन के कारण पत्तियाँ निकलनी आरम्भ हुईं। इससे स्पष्ट है कि मनीप्लाण्ट कायिक जनन करता है।

क्रियाकलाप 8.7  (पा. पु. पृ. सं. 149)

प्रेक्षण (Observation)-हाँ, चित्र में दिए गए सभी भागों को पहचाना जा सकता है। ये भाग हैं- बीजपत्र, प्रांकुर तथा मूलांकुर।
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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

HBSE 11th Class Geography वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. यदि धरातल पर वायुदाब 1,000 मिलीबार है तो धरातल से 1 कि०मी० की ऊँचाई पर वायुदाब कितना होगा?
(A) 700 मिलीबार
(B) 900 मिलीबार
(C) 1,100 मिलीबार
(D) 1,300 मिलीबार
उत्तर:
(B) 900 मिलीबार

2. अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र प्रायः कहाँ होता है?
(A) विषुवत् वृत्त के निकट
(B) कर्क रेखा के निकट
(C) मकर रेखा के निकट
(D) आर्कटिक वृत्त के निकट
उत्तर:
(A) विषुवत् वृत्त के निकट

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

3. उत्तरी गोलार्ध में निम्नवायुदाब के चारों तरफ पवनों की दिशा क्या होगी?
(A) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के अनुरूप
(B) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत
(C) समदाब रेखाओं के समकोण पर
(D) समदाब रेखाओं के समानांतर
उत्तर:
(B) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत

4. वायुराशियों के निर्माण के उद्गम क्षेत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है-
(A) विषुवतीय वन
(B) साइबेरिया का मैदानी भाग
(C) हिमालय पर्वत
(D) दक्कन पठार
उत्तर:
(B) साइबेरिया का मैदानी भाग

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुदाब मापने की इकाई क्या है? मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक क्यों घटाया जाता है?
उत्तर:
वायदाब मापने की इकाई ‘मिलीबार’ है जिसे किलो पास्कल (hpa) लिखा जाता है। वायुदाब के क्षैतिज वितरण का अध्ययन समान अंतराल पर खींची समदाब रेखाओं द्वारा किया जाता है। समदाब रेखाएँ वे रेखाएँ है जो समुद्रतल से एक समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलती है। दाब पर ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने और तुलनात्मक बनाने के लिए, वायुदाब मापने के बाद इसे समुद्रतल के स्तर पर घटाया जाता है।

प्रश्न 2.
जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात् उपोष्ण उच्च दाब से विषुवत वृत्त की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्णकटिबंध में पवनें उत्तरी पूर्वी क्यों होती हैं?
उत्तर:
जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्ण कटिबंध में पवनें उत्तर-पूर्वी होती हैं क्योंकि पवनों की दिशा कॉरिआलिस बल से प्रभावित होती है।

प्रश्न 3.
भूविक्षेपी पवनें क्या हैं?
उत्तर:
जब समदाब रेखाएँ सीधी हों तथा घर्षण का प्रभाव न हो तो दाब प्रणवता बल कॉरिआलिस बल से सन्तुलित हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप पवनें समदाब रेखाओं के समानान्तर बहती हैं, जिन्हें ‘भू-विक्षेपी पवनें’ कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 4.
समुद्र व स्थल समीर का वर्णन करें।
उत्तर:
स्थलीय समीर-रात्रि को जब सूर्य का प्रभाव नहीं होता तो स्थल और समुद्र दोनों ही ठण्डे होने लगते हैं। परन्तु स्थल, समुद्र की अपेक्षा अधिक ठण्डा हो जाता है। इस प्रकार स्थल पर जल की अपेक्षा तापमान कम तथा वायुभार अधिक होता है। इसलिए रात्रि के समय स्थल से समुद्र की ओर ठण्डी वायु चलती है जिसे स्थलीय समीर (Land Breeze) कहते हैं।

समुद्री समीर-दिन के समय सूर्य से ऊष्मा प्राप्त करके स्थल तथा जल दोनों ही गरम होना शुरू कर देते हैं, परन्तु स्थल, जल की अपेक्षा शीघ्र एवं अधिक गरम हो जाता है। फलस्वरूप स्थलीय भाग का तापमान अधिक तथा जलीय भाग का तापमान कम होता है। अतः समुद्र पर स्थल की अपेक्षा वायु का भार अधिक है। इससे ठण्डी हवा समुद्र से स्थल की ओर चलना आरम्भ कर देती है जिसे जलीय या समुद्री समीर (Sea Breeze) कहते हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारण बताएँ।
उत्तर:
पवन की उत्पत्ति, दिशा और वेग को नियन्त्रित करने वाले कारक (Factors Affecting the Velocity, Direction and Origin of Wind)
1. दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force)-दो बिन्दुओं के बीच वायुदाब में परिवर्तन की दर को दाब प्रवणता कहा जाता है। अतः दो स्थानों के बीच दाब प्रवणता जितनी अधिक होगी, वायु की गति उतनी ही तीव्र होगी। दाब प्रवणता से प्रेरित होकर ही वायु उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है।

2. विक्षेपण बल (Deflection Force)-शुरू में तो पवनें दाब प्रवणता के अनुसार बहती हैं। लेकिन जैसे ही बहने लगती हैं उनकी दिशा पृथ्वी के घूर्णन तथा उसके साथ सापेक्ष वायुमंडल के घूर्णन के प्रभाव से विक्षेपित होने लगती हैं। इसे कॉरिआलिस प्रभाव (Coriolis Effect) कहते हैं जिसके प्रभावाधीन उत्तरी गोलार्द्ध में पवनें अपने दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बाईं ओर मुड़ जाती हैं। कॉरिआलिस प्रभाव भूमध्य रेखा पर शून्य होता है और ध्रुवों की ओर उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है।

3. भू-घर्षण (Land Friction)-महाद्वीपों पर पाई जाने वाली धरातलीय विषमताओं; जैसे पर्वत, पठार और मैदान के कारण पवनों के मार्ग में अवरोध और घर्षण पैदा हो जाते हैं जिससे पवनों की गति और दिशा दोनों प्रभावित होते हैं। महासागरों पर किसी प्रकार का अवरोध न होने के कारण वहाँ पवनें तेज़ी से बहती हैं और उनकी दिशा भी स्पष्ट होती है।

4. अपकेन्द्री बल (Centrifugal Force)-इस बल के प्रभावाधीन किसी भी वक्राकार पथ पर चलती हुई पवनें, धाराएँ या कोई भी गतिमान वस्तु वक्र के केन्द्र से बाहर की ओर छूटने या जाने की प्रवृत्ति रखती है। पवन मार्ग के वक्र के छोटा होने तथा पवन की गति बढ़ने पर अपकेन्द्री बल भी बढ़ने लगता है अर्थात् पवनें और अधिक तेजी से वक्र मार्ग से बाहर की ओर जाने का प्रयास करती हैं।

प्रश्न 2.
पृथ्वी पर वायुमंडलीय सामान्य परिसंचरण का वर्णन करते हुए चित्र बनाएँ। 30° उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब के संभव कारण बताएँ।
उत्तर:
वायुमंडल का सामान्य परिसंचरण-वायुमंडलीय पवनों के प्रवाह प्रारूप को ही वायुमंडलीय सामान्य परिसंचरण कहा जाता है। यह वायुमंडलीय परिसंचरण महासागरीय जल को गतिमान करता है जो पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करता है। भूमंडलीय पवनों का प्रारूप मुख्यतः निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है

  • वायुमंडलीय तापन में अक्षांशीय भिन्नता
  • वायुदाब पट्टियों की उपस्थिति
  • वायुदाब पट्टियों का सौर किरणों के साथ विस्थापन
  • महासागरों व महाद्वीपों का वितरण
  • पृथ्वी का घूर्णन।

उच्च सूर्यातप व निम्न वायुदाब के कारण भू-मंडलीय वायु संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती है। उष्ण कटिबंधों से आने वाली पवनें इस निम्न-दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं। यह वाय क्षोभमंडल के ऊपर 14 कि०मी० की ऊँचाई तक ऊपर चढ़ती है। फिर ध्रुवों की तरफ प्रवाहित होती है। इसके परिणामस्वरूप 30° उत्तर व 30° दक्षिण अक्षांश पर वायु एकत्रित हो जाती है। इस एकत्रित वायु का अवतलन होता है जिसके कारण उपोष्ण कटिबंधीय उच्च-दाब क्षेत्र बनता है।

वायुमंडल का सामान्य परिसंचरण महासागरों को भी प्रभावित करता है। वायुमंडल में वृहत पैमाने पर चलने वाली पवनें धीमी तथा अधिक गति की महासागरीय धाराओं को प्रवाहित करती हैं।

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर ही क्यों होती है? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के किस भाग में मूसलाधार वर्षा होती है और उच्च वेग की पवनें चलती हैं और क्यों?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आक्रामक तूफान हैं जिनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के महासागरों पर होती है। क्योंकि इनका जन्म प्रायः अधिक गर्मी पड़ने से ही होता है और ये तटीय क्षेत्रों की तरफ गतिमान होते हैं। ये चक्रवात आक्रामक पवनों के कारण विस्तृत विनाश, अत्यधिक वर्षा और तूफान लाते हैं।

हिन्द महासागर में ‘चक्रवात’ अटलांटिक महासागर में ‘हरीकेन’, पश्चिम प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में ‘टाइफन’ तथा पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ‘विली-विलीज’ के नाम से जाने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति व विकास के लिए अनुकूल स्थितियाँ हैं।

  • बृहत् समुद्री सतह; जहाँ तापमान 27° से० अधिक हो
  • कोरिऑलिस बल
  • ऊर्ध्वाधर पवनों की गति में अंतर कम होना
  • कमजोर निम्न दाब क्षेत्र या निम्न स्तर का चक्रवातीय परिसंचरण का होना
  • समुद्री तल तंत्र पर ऊपरी अपसरण।

वे चक्रवात जो प्रायः 20° उत्तरी अक्षांश से गुजरते हैं, उनकी दिशा अनिश्चित होती है और ये अधिक विध्वंसक होते हैं। एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की विशेषता इसके केंद्र के चारों तरफ प्रबल सर्पिल पवनों का परिसंचरण है, जिसे इसकी आँख कहा जाता है। इस परिसंचरण प्रणाली का व्यास 150 से 250 कि०मी० होता है। इसके केंद्र में वायु शान्त होती है। अक्षु के चारों तरफ अक्षुभिति होती है जहाँ वायु का प्रबल व वृत्ताकार रूप से आरोहण होता है, यह आरोहण क्षोभसीमा की ऊँचाई तक पहुँचता है। इसी क्षेत्र में पवनों का वेग अधिकतम होता है, जो 250 कि०मी० प्रति घंटा तक होता है। इन चक्रवातों से मूसलाधार वर्षा होती है।

वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ HBSE 11th Class Geography Notes

→ वायुदाब (Air Pressure)-किसी स्थान पर ऊपर स्थित वायु के सम्पूर्ण स्तंभ का भार वायुदाब कहलाता है।

→ पछुवा पवनें (Westerlies) उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंधों से उपध्रुवीय निम्न-दाब कटिबंधों की तरफ वर्ष-भर चलने वाली पवनें पछुवा पवनें कहलाती हैं।

→ ध्रुवीय पवनें (Polar Winds)-ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्रों से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंधों की ओर वर्ष भर चलने वाली पवनों को ध्रुवीय पवनें कहते हैं।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

→ मिस्ट्रल (Mistral)-शीत ऋतु में आल्प्स पर्वत से भूमध्य-सागर की तरफ फ्रांस और स्पेन के तटों पर बहने वाली तेज, शुष्क व ठण्डी पवन को मिस्ट्रल कहते हैं।

→ चक्रवात (Cyclones) चक्रवात वायु की वह राशि है जिसके मध्य में न्यून वायुदाब होता है तथा बाहर की तरफ वायुदाब बढ़ता जाता है।

→ वाताग्र जनन (Frontogenesis)-वातारों के बनने की प्रक्रिया को वाताग्र जनन कहा जाता है।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. सूर्य द्वारा ऊष्मा की प्रसारण क्रिया को कहा जाता है
(A) ऊष्मा प्रसार
(B) सौर विकिरण
(C) सूर्यातप
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) सौर विकिरण

2. पृथ्वी तक पहुँचने वाली सूर्य की ऊष्मा को क्या कहा जाता है?
(A) सौर विकिरण
(B) पार्थिव विकिरण
(C) सूर्यातप
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सूर्यातप

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

3. सूर्य से पृथ्वी की दूरी है
(A) 5 करोड़ कि०मी०
(B) 8 करोड़ कि०मी०
(C) 12 करोड़ कि०मी०
(D) 15 करोड़ कि०मी०
उत्तर:
(D) 15 करोड़ कि०मी०

4. पृथ्वी पर सौर विकिरण का कितना भाग पहुँचता है?
(A) 1 अरबवाँ भाग
(B) 2 अरबवाँ भाग
(C) 3 अरबवाँ भाग
(D) 4 अरबवाँ भाग
उत्तर:
(B) 2 अरबवाँ भाग

5. वायुमंडल की सबसे ऊपरी सतह पर प्राप्त ऊष्मा में से वायुमंडल और पृथ्वी द्वारा अवशोषित इकाइयों को क्या कहते हैं?
(A) भौमिक विकिरण
(B) पृथ्वी का एल्बिडो
(C) प्रभावी सौर विकिरण
(D) प्रवेशी सौर विकिरण
उत्तर:
(C) प्रभावी सौर विकिरण

6. सूर्य की किरणों की गति क्या है?
(A) 1 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
(B) 2 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
(C) 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
(D) 4 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
उत्तर:
(C) 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड

7. निम्नलिखित में से सर्वाधिक तापमान कब अंकित किया जाता है?
(A) दोपहर 12 बजे
(B) दोपहर बाद 1 बजे
(C) दोपहर बाद 2 बजे
(D) दोपहर बाद 3 बजे
उत्तर:
(C) दोपहर बाद 2 बजे

8. वायुमंडल की ऊपरी सतह पर पहुँचने वाले सूर्यातप का कितना भाग भूतल पर पहुँचता है?
(A) 21%
(B) 31%
(C) 41%
(D) 51%
उत्तर:
(D) 51%

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

9. किसी स्थान विशेष के औसत तापमान और उसके अक्षांशीय तापमान के औसत के बीच के अंतर को कहा जाता है-
(A) तापीय व्युत्क्रमण
(B) तापक्रमीय विसंगति
(C) अक्षांशीय विसंगति
(D) तापीय अनुकूलता
उत्तर:
(B) तापक्रमीय विसंगति

10. वह काल्पनिक रेखा जो समुद्रतल के समानीत समान तापमान वाले स्थानों को मिलाती है, उसे कहते हैं
(A) समताप रेखा
(B) समदाब रेखा
(C) समानीत रेखा
(D) सम समुद्रतल रेखा
उत्तर:
(A) समताप रेखा

11. किसी स्थान के मध्यमान या सामान्य तापमान का अर्थ है-
(A) दिन का औसत तापमान
(B) महीने का औसत तापमान
(C) वर्ष का औसत तापमान
(D) 35 वर्षों के वार्षिक औसत तापमानों का औसत
उत्तर:
(D) 35 वर्षों के वार्षिक औसत तापमानों का औसत

12. एल्बिडो है-
(A) संयुक्त राज्य अमेरिका एवं कनाडा की सीमा पर स्थित झील
(B) उच्च कपासी बादलों का उपनाम
(C) किसी सतह को प्राप्त होने वाली एवं उससे परावर्तित विकिरण ऊर्जा की मात्रा का अनुपात
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) किसी सतह को प्राप्त होने वाली एवं उससे परावर्तित विकिरण ऊर्जा की मात्रा का अनुपात

13. सुबह और शाम की तुलना में दोपहर में गर्मी अधिक क्यों होती है?
(A) क्योंकि सर्य की किरणें दोपहर में सीधी पडती हैं।
(B) क्योंकि पृथ्वी गर्मी को सोखकर उसे दोपहर को छोड़ती है
(C) दोपहर के वक्त समुद्र से गर्म पवनें चलती हैं
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) क्योंकि सर्य की किरणें दोपहर में सीधी पडती हैं।

14. विश्व में सर्वाधिक ठंडा स्थान कौन-सा है जिसका तापमान सर्दियों में -50°C तक गिर जाता है?
(A) कारगिल
(B) वोयान्सक
(C) द्रास
(D) बर्जन
उत्तर:
(B) वोयान्सक

15. हिमालय तथा आल्प्स की किन ढलानों पर अधिक तापमान के कारण मानव बस्तियाँ और कृषि कार्य केंद्रित हैं?
(A) उत्तरी ढाल
(B) दक्षिणी ढाल
(C) पूर्वी ढाल
(D) पश्चिमी ढाल
उत्तर:
(B) दक्षिणी ढाल

16. समुद्रतल से 900 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक शहर का जुलाई का औसत मासिक तापमान 22°C है। समुद्रतल पर इस शहर का समानीत तापमान कितना होगा?
(A) 27.5°C
(B) 16.5°C
(C) 22°C
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) 27.5°C

17. कौन-सी मिट्टी जल्दी गरम और जल्दी ठण्डी हो जाती है?
(A) जलोढ़ मिट्टी
(B) काली मिट्टी
(C) रेतीली मिट्टी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) रेतीली मिट्टी

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर सौर विकिरण का कितना भाग पहुँचता है?
उत्तर:
दो अरबवाँ भाग।

प्रश्न 2.
सूर्यातप को किस इकाई में मापते हैं?
उत्तर:
कैलोरी में।

प्रश्न 3.
मानचित्र पर तापमान का क्षैतिज वितरण किन रेखाओं द्वारा दर्शाया जाता है?
उत्तर:
समताप रेखाओं द्वारा।

प्रश्न 4.
पृथ्वी पर ऊष्मा का सबसे बड़ा स्रोत कौन-सा है?
उत्तर:
सूर्य।

प्रश्न 5.
उत्तरी गोलार्द्ध में पर्वतों के कौन-से ढाल सूर्य के सामने पड़ते हैं?
उत्तर:
दक्षिणी ढाल।

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प्रश्न 6.
दक्षिणी गोलार्द्ध में पर्वतों के कौन-से ढाल सूर्य के सामने पड़ते हैं?
उत्तर:
उत्तरी ढाल।

प्रश्न 7.
ऊँचाई के साथ तापमान घटने की जगह यदि बढ़ने लग जाए तो उसे क्या कहा जाता है?
उत्तर:
तापमान की विलोमता।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर पहुँचने वाले सूर्यातप का कितना भाग भूतल तक पहुँचता हैं?
उत्तर:
51 प्रतिशत भाग अथवा 100 में से 51 इकाइयाँ।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल के गरम होने की प्रक्रियाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
विकिरण, संचालन तथा संवहन।

प्रश्न 3.
सूर्य क्या है?
उत्तर:
धधकती हुई गैसों का गोला जो ऊष्मा को अन्तरिक्ष में चारों ओर प्रसारित करता रहता है।

प्रश्न 4.
सूर्य से पृथ्वी की दूरी कितनी है?
उत्तर:
लगभग 15 करोड़ कि०मी०।

प्रश्न 5.
सूर्य की किरणों की गति क्या है?
उत्तर:
3 लाख कि०मी० प्रति सैकिण्ड।

प्रश्न 6.
तापमान मापने की दो प्रमुख इकाइयाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
डिग्री सेल्सियस व डिग्री फारेनहाइट।

प्रश्न 7.
दैनिक अधिकतम तापमान कब रिकॉर्ड किया जाता है?
उत्तर:
दोपहर में 2.00 बजे के लगभग।

प्रश्न 8.
जब सूर्य की क्षैतिज से ऊँचाई केवल 4° होती है तो सूर्य की किरणों को कितने मोटे वायुमण्डल से गुजरना पड़ता है?
उत्तर:
12 गुणा मोटे वायुमण्डल से।

प्रश्न 9.
तापमान की सामान्य हास दर क्या है?
उत्तर:
1°C प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर।

प्रश्न 10.
सूर्यातप आधिक्य वाले क्षेत्र कौन-से होते हैं?
उत्तर:
जहाँ धूप की लम्बी अवधि और रातें छोटी होती हैं, सूर्यातप आधिक्य वाले क्षेत्र कहलाते हैं।

प्रश्न 11.
ऊष्मा-हानि वाले क्षेत्र कौन-से होते हैं?
उत्तर:
जहां दिन छोटे और रातें लम्बी हों अर्थात् सूर्यातप की मात्रा कम और विकिरित हुई ऊष्मा अधिक हो उन्हें ऊष्मा-हानि वाले क्षेत्र कहते हैं।

प्रश्न 12.
ऊँचा दैनिक तापान्तर किन क्षेत्रों में पाया जाता है?
उत्तर:
मरुस्थलों तथा महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में।

प्रश्न 13.
कम दैनिक तापान्तर किन क्षेत्रों में पाया जाता है?
उत्तर:

  1. तटों के पास
  2. मेघाच्छादित क्षेत्रों में।

प्रश्न 14.
कैलोरी क्या होती है?
उत्तर:
समुद्रतल पर उपस्थित वायुदाब की दशा में एक ग्राम जल का तापमान 1°C बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा को कैलोरी कहा जाता है।

प्रश्न 15.
दिन छोटे-बड़े क्यों होते रहते हैं? कारण बताओ।
उत्तर:

  1. पृथ्वी का 66/2° पर झुका अक्ष।
  2. पृथ्वी की दैनिक व वार्षिक गति।

प्रश्न 16.
सौर कलंक क्या होते हैं?
उत्तर:
सूर्य के तल पर काले रंग के गहरे व उथले बनते-बिगड़ते धब्बों को सौर कलंक कहा जाता है।

प्रश्न 17.
सौर कलंकों की संख्या व सौर विकिरण में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
इन कलंकों की संख्या बढ़ने और घटने पर सूर्यातप की मात्रा बढ़ती और घटती है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 18.
उपसौरिका (Perihelion) की स्थिति क्या होती है?
उत्तर:
3 जनवरी को जब पृथ्वी सूर्य से 14.70 करोड़ किलोमीटर की निकटतम दूरी पर होती है।

प्रश्न 19.
अपसौरिका (Aphelion) की स्थिति क्या होती है?
उत्तर:
4 जुलाई को जब पृथ्वी सूर्य से 15.20 करोड़ कि०मी० की अधिकतम दूरी पर होती है।

प्रश्न 20.
उष्ण कटिबन्ध का विस्तार बताइए।
उत्तर:
231/2° उत्तर से 231/2° दक्षिण अक्षांश।

प्रश्न 21.
शीतोष्ण कटिबन्ध का क्या विस्तार है?
उत्तर:
23/2° से 66/2° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांश।

प्रश्न 22.
शीत कटिबन्ध कहाँ से कहाँ तक विस्तृत है?
उत्तर:
661/2° से ध्रुवों तक दोनों गोलार्डों में।

प्रश्न 23.
पृथ्वी पर सूर्यातप के वितरण को कौन-से दो प्रमुख कारक नियन्त्रित करते हैं?
उत्तर:

  1. सूर्य की किरणों का सापेक्षिक झुकाव
  2. दिन की अवधि।

प्रश्न 24.
विश्व में औसत तापमान क्यों बढ़ रहे हैं?
उत्तर:
जैव-ईंधन के बढ़ते उपयोग तथा वनों की कटाई के कारण।

प्रश्न 25.
सूर्य के सामने पड़ी ढालों पर सूर्यातप व तापमान अधिक क्यों प्राप्त होता है?
उत्तर:
सूर्य की सीधी किरणों के कारण।

प्रश्न 26.
सूर्य से विपरीत दिशा में स्थित ढालों पर सूर्यातप व तापमान कम क्यों रहते हैं?
उत्तर:
सूर्य की तिरछी किरणों के कारण।

प्रश्न 27.
कौन-सी मिट्टियाँ सूर्यातप का अवशोषण करके अपने क्षेत्र के तापमान को बढ़ा देती हैं?
उत्तर:
काली अथवा गहरी मिट्टियाँ तथा रेत से ढके भू-पृष्ठ।

प्रश्न 28.
समताप रेखाएँ क्या होती हैं?
उत्तर:
जिन स्थानों पर सूर्यातप की मात्रा समान होती है, उन स्थानों का तापमान भी समान होता है। समुद्र तल से समान तापमान वाले स्थानों को आपस में मिलाने वाली रेखा को समताप रेखा कहते हैं।

प्रश्न 29.
भौमिक विकिरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सौर ऊर्जा भूतल से टकराकर दीर्घ तरंगों के रूप में वापस लौट जाती है जिसे भौमिक विकिरण कहते हैं। यही कारण है कि वायुमण्डल नीचे से ऊपर की ओर गरम होता है। वायुमण्डल के गरम होने का प्रमुख स्रोत भौमिक विकिरण है।

प्रश्न 30.
सौर स्थिरांक किसे कहते हैं?
उत्तर:
भू-वैज्ञानिकों के मतानुसार पृथ्वी प्रति मिनट 2 कैलोरी ऊर्जा प्रति वर्ग सें०मी० प्राप्त करती है जिसे सौर स्थिरांक कहते हैं। ऊर्जा की यह मात्रा बदलती नहीं है बल्कि स्थिर रहती है।

प्रश्न 31.
ऊष्मा तथा तापमान में क्या अन्तर होता है?
उत्तर:
ऊष्मा ऊर्जा का वह रूप है जो वस्तुओं को गरम करती है। तापमान ऊष्मा की मात्रा का माप है। ऊष्मा की मात्रा घटने या बढ़ने से तापमान घटता और बढ़ता है।

प्रश्न 32.
किसी स्थान के तापमान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी स्थान पर मानक अवस्था में मापी गई भूतल से लगभग चार फुट ऊँची वायु की गर्मी को उस स्थान का तापमान कहते हैं। प्रायः तापमान और सूर्यातप को पर्यायवाची के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। वास्तव में ये दो शब्द दो भिन्न अवधारणाएँ हैं।

प्रश्न 33.
तापीय भूमध्य रेखा क्या होती है?
उत्तर:
ग्लोब के निम्न आक्षांशों के चारों ओर प्रत्येक देशान्तर के मध्यमान उच्चतम तापमान वाले बिन्दुओं को मिलाने वाली कल्पित रेखा को तापीय भूमध्य रेखा कहते हैं। यह रेखा वास्तविक भूमध्य रेखा के उत्तर में रहती है क्योंकि उत्तरी गोलार्द्ध में स्थलखण्ड अधिक हैं जो समुद्रों की अपेक्षा अधिक ऊष्मा का अवशोषण करते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सौर विकिरण से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पृथ्वी पर ऊष्मा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। यह धधकती हुई गैसों का एक विशाल गोला है जो ऊष्मा को अन्तरिक्ष में चारों ओर निरन्तर प्रसारित करता रहता है। सूर्य द्वारा ऊष्मा की प्रसारण क्रिया को सौर विकिरण कहा जाता है।

प्रश्न 2.
सूर्यातप क्या है?
उत्तर:
प्रवेशी सौर विकिरण को सूर्यातप कहते हैं अर्थात् पृथ्वी पर पहुंचने वाली सूर्य की ऊष्मा को सूर्यातप कहा जाता है। सूर्य से लगभग 15 करोड़ कि०मी० दूर स्थित पृथ्वी सूर्य से विकिरित होने वाली समस्त ऊष्मा का केवल 2 अरबवाँ भाग ही प्राप्त कर पाती है। सौर ऊर्जा सूर्य से लघु तरंगों के रूप में 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिण्ड की गति से पृथ्वी पर पहुँचती है।

प्रश्न 3.
तापमान के ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समुद्र तल से ऊँचाई की ओर वितरण को तापमान का ऊर्ध्वाधर वितरण कहा जाता है। वायुमण्डल में ऊँचाई की ओर जाने पर तापमान कम होता है। यह तापमान 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेल्सियस की दर से कम होता है। इसे तापमान की सामान्य पतन दर कहते हैं। यह ह्रास (पतन) दर क्षोभमण्डल तक ही रहती है।

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प्रश्न 4.
तापमान के क्षैतिज वितरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
तापमान के क्षैतिज वितरण से अभिप्राय तापमान के अक्षांशीय वितरण से है। भूमध्य रेखा से दोनों गोलार्डों में ध्रुवों की ओर जाने पर तापमान में क्रमशः कमी होती जाती है जिसे तापमान का क्षैतिज वितरण कहते हैं। इसे समताप रेखाओं द्वारा ही प्रकट किया जाता है। तापमान के क्षैतिज वितरण के आधार पर ही पृथ्वी को उष्ण कटिबन्ध, शीतोष्ण कटिबन्ध तथा शीत कटिबन्ध नामक तीन ताप कटिबन्धों में बाँटा जाता है।

प्रश्न 5.
दैनिक तापान्तर किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी स्थान के 24 घण्टे या एक दिन के अधिकतम तापमान तथा न्यूनतम तापमान के अन्तर को दैनिक तापान्तर या दैनिक ताप परिसर कहते हैं। उदाहरणार्थ, किसी स्थान A पर किसी दिन विशेष का अधिकतम तापमान 35° सेल्सियस तथा न्यूनतम तापमान 22° सेल्सियस रहा हो तो स्थान A का दैनिक तापान्तर 35°-22° = 13° सेल्सियस होगा। दैनिक तापान्तर तटीय क्षेत्रों में कम होता है तथा आन्तरिक स्थलीय भागों और मरुस्थलीय क्षेत्रों में अधिक होता है।

प्रश्न 6.
वार्षिक तापान्तर किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी स्थान के सबसे ठण्डे मास के औसत तापमान और सबसे गरम मास के औसत तापमान के अन्तर को वार्षिक तापान्तर कहते हैं। दैनिक तापान्तर की भाँति वार्षिक तापान्तर भी स्थलीय भागों में अधिक तथा सागरीय भागों में कम रहता है। उत्तरी भारत के जिन भागों में शीतकाल में सबसे ठण्डे मास का तापमान 10° सेल्सियस रहता है, वहीं ग्रीष्मकाल में तापमान 40° सेल्सियस रहता है, परन्तु सागरीय तटीय भागों में तापमान कम रहता है। सबसे अधिक वार्षिक तापान्तर साइबेरिया में वोयान्सक में 38° सेल्सियस रहता है।

प्रश्न 7.
पृथ्वी के ऊष्मा बजट से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी सूर्य से जितनी ऊष्मा प्राप्त करती है, उतनी ऊष्मा का वह त्याग भी कर देती है। इसलिए पृथ्वी पर औसत तापमान सदा एक-जैसा बना रहता है। पृथ्वी द्वारा प्राप्त सूर्यातप और उस द्वारा छोड़े जाने वाले भौमिक विकिरण के खाते को पृथ्वी का ऊष्मा बजट कहा जाता है। पृथ्वी के इसी बजट को पृथ्वी का ऊष्मा सन्तुलन भी कहा जाता है।

प्रश्न 8.
अक्षांशीय ऊष्मा सन्तुलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
हमारी पृथ्वी का आकार गोलाकार है जिसके कारण पृथ्वी पर सूर्य की किरणों का झुकाव अलग-अलग है इसलिए प्रत्येक अक्षांश पर सूर्यातप तथा भौमिक विकिरण में विभिन्नता दिखाई देती है। भूमध्य रेखीय क्षेत्रों के आस-पास ऊष्मा अधिक तथा ध्रुवीय प्रदेशों में ऊष्मा कम होती है । वायुमण्डल तथा महासागरों में ऊष्मा का आदान-प्रदान होता रहता है। इसी प्रकार ऊष्मा निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर स्थानान्तरित होती रहती है, जिसे अक्षांशीय ऊष्मा संतुलन कहते हैं।

प्रश्न 9.
सूर्यातप की मात्रा सूर्य की किरणों के आपतन कोण से किस प्रकार सम्बन्धित है?
उत्तर:
भूतल पर पहुँचने वाले सौर विकिरण को सूर्यातप कहते हैं। इसकी मात्रा सूर्य की किरणों के आपतन कोण पर निर्भर करती है। आपतन किरणें दो प्रकार की होती हैं

  • लम्बवत् किरणें।
  • तिरछी अथवा आड़ी किरणें।

लम्बवत् किरणें तिरछी किरणों की तुलन में भूतल का कम क्षेत्र घेरती हैं जिससे प्रति इकाई क्षेत्र को अधिक ताप प्राप्त होता है तथा तापमान अधिक हो जाता है। इसी प्रकार लम्बवत् किरणों को तिरछी किरणों की अपेक्षा कम वायुमण्डल पार करना पड़ता है जिससे वायुमण्डल की गैसें तथा जलवाष्प द्वारा अवशोषण, परावर्तन और बिखराव द्वारा सूर्यातप की बहुत कम मात्रा नष्ट होती है जिससे उस स्थान का तापमान तिरछी किरणों की तुलना में अधिक होता है।

प्रश्न 10.
सूर्यातप को जलवायु का प्रमुख नियन्त्रक कारक क्यों कहते हैं?
उत्तर:
सूर्यातप जलवायु का प्रमुख नियन्त्रक है। इसके निम्नलिखित कारण हैं-

  1. सूर्यातप पर बहुत-सी भौतिक क्रियाएँ आधारित हैं।
  2. इसी के कारण पवनें तथा समुद्री धाराएँ चलती हैं।
  3. सूर्यातप की मात्रा के कारण ही ऋतु-परिवर्तन होता है।
  4. सूर्यातप पर वायुमण्डलीय गतियाँ और वायुराशियाँ आधारित हैं। इस प्रकार सूर्य जलवायु के सभी तत्त्वों एवं पक्षों पर नियन्त्रण करता है।

प्रश्न 11.
विभिन्न अक्षांशों पर प्राप्त सूर्यातप की मात्रा भिन्न क्यों होती है?
उत्तर:
सूर्यातप की मात्रा मुख्य रूप से सूर्य की किरणों के आपतन कोण तथा दिन की अवधि पर निर्भर करती है। विभिन्न अक्षांशों पर पृथ्वी की वार्षिक गति तथा पृथ्वी के अक्ष के 22/5° पर झुकाव के कारण सूर्य की किरणों का आपतन कोण तथा दिन की अवधि भिन्न-भिन्न होती है। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लगभग लम्बवत् रूप से चमकती हैं, परन्तु भूमध्य रेखा से ध्रुवों करणें तिरछी होती जाती हैं तथा दिन की अवधि भी अधिक हो जाती है इसलिए विभिन्न अक्षांशों पर सूर्यातप की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है, परन्तु एक ही अक्षांश के सभी स्थानों पर सूर्यातप की मात्रा समान होती है।

प्रश्न 12.
वायुमण्डल सूर्यातप की अपेक्षा भौमिक विकिरण से अधिक गरम क्यों होता है?
उत्तर:
सूर्य की किरणें प्रत्यक्ष रूप से वायुमण्डल को गरम नहीं करतीं। ये किरणे लघु तरंगों के रूप में वायुमण्डल में से गुज़रती हैं। वायुमण्डल इन तरंगों को अपने अंदर समाने में अर्थात् अवशोषित करने में असमर्थ होता है। पहले सौर ऊर्जा से पृथ्वी गरम होती है, इसे पार्थिव या भौमिक विकिरण कहते हैं। भूतल को उष्णता लम्बी तरंगों के रूप में प्राप्त होती है जिसका 90% भाग १ रातल अवशोषित कर लेता है। इससे वायुमण्डल गरम होता रहता है। पार्थिव विकिरण द्वारा वायुमण्डल की निचली परतें ही गरम होती हैं। अधिक ऊँचाई पर इसका प्रभाव बहुत कम होता है इसलिए वायुमण्डल नीचे से ऊपर गरम होता है।

प्रश्न 13.
समताप रेखाओं की दिशा अधिकतर पूर्व-पश्चिम क्यों रहती है?
उत्तर:
प्रत्येक अक्षांश रेखा पर स्थित सभी स्थानों पर सूर्य की किरणों का आपतन कोण तथा दिन की अवधि समान होती है इसलिए ये सभी स्थान समान मात्रा में सूर्यातप की मात्रा प्राप्त करते हैं जिससे इन सभी स्थानों का तापमान समान होता है। समान तापमान वाले स्थानों को एक रेखा से मिलाते हैं जिसे समताप रेखा कहते हैं। अक्षांश पूर्व-पश्चिम दिशा में फैले हुए हैं, इसलिए समताप रेखाओं तथा अक्षांश रेखाओं में अनुरूपता दिखाई पड़ती है। इसलिए ये रेखाएँ अक्षांश रेखाओं का अनुकरण करते हुए पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली हुई हैं।

प्रश्न 14.
समताप रेखाएँ मौसम के अनुसार उत्तर और दक्षिण की ओर क्यों खिसकती हैं?
उत्तर:
समताप रेखाओं की स्थिति मख्य रूप से सर्यातप की अधिकतम मात्रा पर आधारित होती है। मौसम के अनुसार इन किरणों में परिवर्तन होता रहता है। उदाहरण के लिए, जून मास में सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत् रूप से चमकता है जिससे ग्रीष्मकाल में सूर्यातप की अधिकतम मात्रा उत्तरी गोलार्द्ध में होती है, परन्तु दिसम्बर मास में सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत् रूप से चमकता है। जिससे शीतकाल में सूर्यातप की अधिकतम मात्रा दक्षिणी गोलार्द्ध में होती है, इसलिए ग्रीष्मकाल में समताप रेखाएँ उत्तर दिशा की ओर तथा शीतकाल में दक्षिण दिशा की ओर खिसक जाती हैं।

प्रश्न 15.
समताप रेखाएँ सबसे अधिक कहाँ खिसकती हैं? स्थल पर या जल पर? इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समताप रेखाएँ जल की अपेक्षा स्थल पर अधिक खिसकती हैं, क्योंकि स्थल तथा जल में गरम होने की क्षमता में विभिन्नता पाई जाती है। स्थल शीघ्र गरम हो जाते हैं तथा शीघ्र ही ठण्डे हो जाते हैं, परन्तु जल देर से गरम होता है और देर से ही ठण्डा होता है। इसलिए मौसम के अनुसार जलीय क्षेत्रों की तुलना में स्थलीय क्षेत्रों के तापमान में अधिक अन्तर पाया जाता है, परन्तु तापमान का यह अन्तर सागरों तथा महासागरों पर कम होता है। इसलिए स्थलीय क्षेत्रों पर मौसम के अनुसार समताप रेखाएँ अधिक खिसकती हैं।

प्रश्न 16.
दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ अधिक अनियमित क्यों होती हैं?
उत्तर:
स्थलीय क्षेत्रों तथा जलीय क्षेत्रों में गरम होने की क्षमता में विभिन्नता पाई जाती है इसलिए समताप रेखाएँ महासागरों से महाद्वीपों अथवा महाद्वीपों से महासागरों की ओर आते समय मुड़ जाती हैं। ये समताप रेखाएँ जुलाई मास में उत्तरी गोलार्द्ध में महाद्वीपों से गुजरते समय भूमध्य रेखा की ओर मुड़ जाती हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थिति इसके विपरीत होती है। मुख्य रूप से इसके दो निम्नलिखित कारण हैं

  • जल तथा स्थल क्षेत्रों का असमान वितरण।
  • स्थल तथा जल के गरम होने की क्षमता में विभिन्नता।

उत्तरी गोलार्द्ध में स्थलीय क्षेत्रों का विस्तार अधिक है, परन्तु दक्षिणी गोलार्द्ध में जलीय क्षेत्रों का विस्तार अधिक है। इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ अनियमित हैं, परन्तु दक्षिणी गोलार्द्ध में नियमित तथा सीधी हैं।

प्रश्न 17.
यद्यपि न्यूयार्क 40°N तथा बर्लिन 52°N पर स्थित है, परन्तु जनवरी मास का औसत तापमान लगभग समान क्यों रहता है?
उत्तर:
यद्यपि बर्लिन तथा न्यूयार्क में 52°- 40° = 12° अक्षांश का अन्तर है। बलिन न्यूयार्क से 12° उत्तर में स्थित है। उत्तर की ओर जाते समय तापमान में कमी आती है, परन्तु बर्लिन के निकट उत्तरी अन्ध-महासागर की गरम धारा बहती है जो इस स्थान के तापमान को बढ़ा देती है। इसलिए बर्लिन उच्च अक्षांशों में स्थित होते हा भी इसका तापमान जनवरी में न्यूयार्क के समान होता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 18.
मनुष्य एवं प्रकृति के लिए सौर्मिक ऊर्जा के महत्त्व का उल्लेख करें।
उत्तर:
इस पथ्वी पर सभी प्रकार के जीवन और हर प्रकार की गति और संचरण के पीछे एक ही शक्ति है- सौर्यिक ऊर्जा।

  1. पाला रहित दिनों की संख्या ही फसलों के पकने की अवधि तय करती है। फसलों के पकने की अवधि भूमध्य रेखा से दूर जाने पर घटती जाती है।
  2. सूर्यातप की मात्रा निर्धारित करती है कि उस क्षेत्र में किस प्रकार की फसलें, वनस्पति और जीव-जगत होगा।
  3. वायुमण्डल के सामान्य संचरण के लिए सूर्यातप ही जिम्मेदार है। आँधी, तूफान, चक्रवात, पवनें सभी सौर्यिक ऊर्जा के कारण होते हैं।
  4. समुद्री जल की गति भी सूर्यातप से जुड़ी हुई है। नदियों का होना भी सूर्य के कारण है।
  5. सूर्यातप चट्टानों के भौतिक अपक्षय में सहयोग देता है।
  6. पृथ्वी पर नित्य बदलता भू-दृश्य प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सौर्यिक ऊर्जा की ही उपज है।

प्रश्न 19.
विभिन्न अक्षांश सूर्यातप की भिन्न-भिन्न मात्रा क्यों प्राप्त करते हैं?
उत्तर:
किसी स्थान पर सूर्यातप की मात्रा सूर्य की किरणों के आपतन कोण तथा दिन की अवधि पर निर्भर करती है। पृथ्वी के अक्ष के झुकाव तथा पृथ्वी की वार्षिक गति के कारण भिन्न-भिन्न अक्षांशों पर सूर्य की किरणों का आपतन कोण भिन्न-भिन्न होता है तथा दिन की अवधि भी एक-समान नहीं होती। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन बढ़ता सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान जाता है और साथ ही दिन की अवधि भी बढ़ती जाती है। लेकिन किरणों के तिरछेपन के कारण सूर्यातप की मात्रा घटती जाती है। इसलिए भिन्न-भिन्न अक्षांशों पर सूर्यातप की मात्रा अलग-अलग पाई जाती है। हाँ, एक ही अक्षांश पर सूर्यातप की मात्रा सभी स्थानों पर एक-समान होती है।

प्रश्न 20.
दैनिक उच्चतम तापमान क्या होता है और यह कब होता है?
उत्तर:
किसी विशेष दिन के अधिकतम तापमान को उस दिन का उच्चतम तापमान कहा जाता है। दिन में दोपहर के समय सूर्य आकाश में सबसे ऊँचा होता है तथा सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं। इससे धरातल गरम होने लगता है। भूतल के सम्पर्क में आने वाला वायुमण्डल पार्थिव विकिरण अर्थात् पृथ्वी द्वारा छोड़ी गई ऊष्मा से गरम हो जाता है। इसलिए वायुमण्डल का उच्चतम तापमान दोपहर बाद दिन के 2.00 बजे होता है। यह सत्य भी है कि दोपहर की अपेक्षा ‘दोपहर बाद’ तापमान अधिक होता है।

प्रश्न 21.
दैनिक न्यूनतम तापमान क्या होता है? यह कब होता है?
उत्तर:
दिन भर में सबसे कम तापमान को दैनिक न्यूनतम तापमान कहते हैं। न्यूनतम तापमान रात के 12 बजे नहीं होता अपितु प्रातः 4 बजे होता है। धरातल द्वारा गर्मी छोड़ने की क्रिया ‘विकिरण’ (Radiation) सुबह तक होती रहती है। जब पृथ्वी पूर्ण रूप से ठण्डी हो जाती है तो वायुमण्डल में न्यूनतम ताप होता है।

प्रश्न 22.
मध्यमान दैनिक तापमान क्या होता है और यह कैसे निकलता है?
उत्तर:
किसी भी दिन के उच्चतम तथा न्यूनतम तापमान की औसत को मध्यमान दैनिक तापमान कहते हैं।
Mean, Daily Tempt. = \(\frac { Max. Temp. + Min. Temp. }{ 2 }\)
यदि किसी स्थान का किसी विशेष दिन का अधिकतम तापमान 38°C तथा न्यूनतम तापमान 28°C है तो उस स्थान का मध्यमान दैनिक तापमान = \(\frac{38^{\circ} \mathrm{C}+28^{\circ} \mathrm{C}}{2}\) = 33°C

प्रश्न 23.
किसी स्थान के मध्यमान तापमान से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
एक लम्बे समय (पिछले 35 वर्षों) के मध्यमान वार्षिक तापमान को जोड़कर 35 से भाग देने पर किसी स्थान का औसत तापमान निकल आता है। इसे किसी स्थान का सामान्य तापमान भी कहते हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि किसी स्थान की जलवायु गरम है या ठण्डी।

प्रश्न 24.
सूर्यातप और तापमान में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सूर्यातप और तापमान में निम्नलिखित अन्तर हैं-

सूर्यातपतापमान
1. सूर्यातप ऊर्जा का एक रूप है जो वस्तुओं को गरम करती है।1. तापमान किसी पदार्थ की गरमी या ठंडक की माप है।
2. सूर्यातप को जूल और कैलोरी में प्रकट किया जाता है।2. तापमान आवश्यकतानुसार कई पैमानों पर मापा जाता है लेकिन इसमें सेल्सियस और फारेनहाइट प्रमुख हैं।
3. सूर्यातप का संचार/स्थानांतरण चालन, संवहन और विकिरण द्वारा होता है।3. तापमान का संचरण नहीं होता।
4. सूर्यातप या ऊष्मा पदार्थों को गरम करती है। इससे ठोस पदार्थ तरल और गैस अवस्था में बदल जाते हैं।4. पदार्थों को ऊष्मा मिलने से उनका तापमान बढ़ता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सूर्यातप क्या है? भूतल पर सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
सूर्यातप का अर्थ पृथ्वी पर पहुँचने वाली सूर्य की ऊष्मा को सूर्यातप कहा जाता है। यह ऊर्जा सूर्य से लघु तरंगों के रूप में 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिण्ड की गति से पृथ्वी पर पहुँचती है।

सूर्यातप को प्रभावित करने वाले कारक:
भू-तल पर सभी जगह सूर्यातप की मात्रा एक समान नहीं होती। सूर्यातप के वितरण को अनेक कारक नियन्त्रित करते हैं जिनका वर्णन अग्रलिखित प्रकार से है-
1. सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य झुकाव-सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर इन किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है। सूर्य की किरणों का तिरछापन धरातल पर पहुँचने वाली सूर्यातप की मात्रा को दो प्रकार से प्रभावित करता है
(क) क्षेत्रफल-जब सूर्य लगभग मध्याह्न में होता है तो उसकी किरणें धरातल पर लम्बवत् पड़ती हैं। लम्बवत् किरणें भू-पृष्ठ की अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल पर फैलती हैं जिसके कारण उस स्थान का प्रति इकाई ताप भी अधिक हो जाता है। तिरछी किरणों का उतना ही समूह भू-पृष्ठ के अधिक क्षेत्रफल को घेरता है। अधिक क्षेत्रफल को गर्म करने के कारण वहाँ प्रति इकाई सूर्यातप की तीव्रता भी कम हो जाती है।

(ख) वायुमण्डल की मोटाई-सीधी किरणों की अपेक्षा तिरछी किरणों को वायुमण्डल की मोटी परत पार करनी पड़ती है। उदाहरणतः जब सूर्य की क्षैतिज से ऊँचाई केवल 4° होती है तो सूर्य की किरणों को 12 गुना मोटे वायुमण्डल से गुजरना पड़ता है। वायुमण्डल में सूर्य की किरणें जितनी अधिक दूरी तय करेंगी उनका बिखराव, परावर्तन और अवशोषण भी उतना ही अधिक होगा। परिणामस्वरूप पृथ्वी पर कम सूर्यातप पहुँचेगा।

2. दिन की अवधि-जिन स्थानों पर दिन लम्बे और रातें छोटी होती हैं वहाँ प्राप्त होने वाला सूर्यातप अधिक और रात को भू-पृष्ठ से विकरित होकर अन्तरिक्ष में जाने वाली ऊष्मा अपेक्षाकृत कम होती है। ऐसे क्षेत्र सूर्यातप-आधिक्य वाले क्षेत्र कहलाते हैं। इसके विपरीत जिन स्थानों पर दिन छोटे और रातें लम्बी होती हैं वहाँ सूर्यातप की मात्रा कम और विकरित होकर नष्ट हुई ऊष्मा। की मात्रा अधिक होती है। ऐसे क्षेत्रों को ऊष्मा-हानि वाले क्षेत्र कहा जाता है। दिन की अवधि ऋतु और अक्षांश द्वारा निर्धारित होती है। वास्तव में सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य झुकाव और दिन की अवधि दोनों मिलकर पृथ्वी पर सूर्यातप के वितरण को नियन्त्रित करते हैं। अकेले दिन की अवधि से बात नहीं बनती। उदाहरणतः उत्तरी गोलार्द्ध के उच्च अक्षांशों में दिन की अवधि 6 मास की होने के बावजूद सूर्यातप की मात्रा न्यूनतम होती है और वहाँ बर्फ जमी रहती है। इसके लिए सूर्य की किरणों का तिरछापन उत्तरदायी है।

3. वायमण्डल की पारगम्यता-जिन क्षेत्रों में वायमण्डल में आर्द्रता. बादल और धलकण जैसी परिवर्तनशील दशाएँ अधिक पाई जाती हैं वहाँ परावर्तन, अवशोषण व प्रकीर्णन द्वारा सूर्यातप का हास होता रहता है। इसके विपरीत जहाँ वायुमण्डल निर्मल होता है वहाँ अपेक्षाकृत अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है। यही कारण है कि अफ्रीका के सहारा मरुस्थल में मेघ-रहित आकाश होने के कारण अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है जबकि भूमध्य रेखा पर स्थित ज़ायरे बेसिन (अफ्रीका) में मेघाच्छन्न आकाश के कारण बहुत मात्रा में सूर्यातप परावर्तित हो जाता है।

सूर्यातप को प्रभावित करने वाले गौण कारक-
4. भूमि का ढाल-पर्वतों के जो ढाल सूर्य के सामने पड़ते हैं उन पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं और वहाँ अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है। जो ढाल सूर्य से विमुख होते हैं, वहाँ पड़ने वाली सूर्य की तिरछी किरणें कम सूर्यातप दे पाती हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में, पर्वतों के दक्षिणी ढाल सूर्य के सामने और उत्तरी ढाल से विमुख पड़ते हैं।

5. सौर कलंकों की संख्या-सूर्य के तल पर काले रंग के गहरे व उथले अनेक धब्बे बनते और बिगड़ते रहते हैं, उन्हें सौर कलंक हते हैं। सौर विकिरण और सौर कलंकों की संख्या में गहरा सम्बन्ध होता है। इन कलंकों की संख्या के बढ़ने और घटने पर पृथ्वी पर सूर्यातप की मात्रा बढ़ती और घटती है।

6. पृथ्वी की सूर्य से दूरी-सूर्य के चारों ओर अण्डाकार पथ पर परिक्रमण करती हुई पृथ्वी कभी सूर्य से दूर व कभी सूर्य के पास आ जाती है। 4 जुलाई को अपसौरिका की स्थिति में पृथ्वी सूर्य से 15.20 करोड़ किलोमीटर की अधिकतम दूरी पर होती है। 3 जनवरी को उपसौरिका की स्थिति में पृथ्वी सूर्य से 14.70 करोड़ किलोमीटर की निकटतम दूरी पर होती है। इस प्रकार 3 जनवरी को 4 जुलाई की अपेक्षा पृथ्वी को लगभग 7% अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है।

7. जल-स्थल का वितरण-धरातल का तीन-चौथाई भाग जल से तथा एक-चौथाई भाग स्थल से ढका हुआ है। जल और स्थल भिन्न-भिन्न तापमान पर गरम और ठण्डे होते हैं। जल की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होने के कारण वह देर से गरम और देर से ठण्डा होता है। इस प्रकार जल और स्थल का वितरण भी सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करता है।

8. धरातल की प्रकृति धरातल पर कुछ वस्तुएँ सूर्यातप का अधिक अवशोषण करती हैं व अन्य कुछ कम। जहाँ सूर्यातप का अवशोषण अधिक होता है वहाँ सूर्यातप की मात्रा अधिक पाई जाती है; जैसे काली व गहरे रंग की मिट्टियों के क्षेत्र । बर्फीले व पथरीले प्रदेश सूर्यातप की अधिकांश मात्रा का प्रतिबिम्बन कर देते हैं। अतः ऐसे क्षेत्रों में कम सूर्यातप प्राप्त होता है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी के ऊष्मा बजट का विस्तृत सचित्र विवरण दीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी सूर्य से जितनी ऊष्मा प्राप्त करती है, उतनी ऊष्मा का वह त्याग भी कर देती है। इसलिए पृथ्वी पर औसत तापमान सदा एक जैसा बना रहता है। पृथ्वी द्वारा प्राप्त सूर्यातप और उसके द्वारा छोड़े जाने वाले भौमिक विकिरण (Terrestrial Radiation) के खाते को पृथ्वी का ऊष्मा बजट कहा जाता है।
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान 1
मान लीजिए वायुमण्डल की सबसे ऊपरी सतह पर प्राप्त होने वाली ऊष्मा 100 इकाई है। इनमें से 35 इकाइयाँ धरातल पर पहुँचने से पहले ही अन्तरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं। इन 35 इकाइयों में से 6 इकाइयाँ धूलकणों से प्रकीर्णन (Scatterring) द्वारा, 27 इकाइयाँ मेघों द्वारा और शेष 2 इकाइयाँ बर्फ से ढके क्षेत्रों द्वारा परावर्तित होकर अन्तरिक्ष में लौट जाती हैं (6+27 + 2 = 35)। सौर विकिरण की यह परावर्तित मात्रा पृथ्वी की एल्बिडो (Albedo of the earth) कहलाती है।

बची हुई ऊष्मा की 65 इकाइयों में से 14 इकाइयाँ वायुमण्डल द्वारा और 51 इकाइयाँ पृथ्वी द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं (14+ 51 = 65)। ऊष्मा की इस मात्रा को प्रभावी सौर विकिरण कहा जाता है। इस प्रकार सूर्य से प्राप्त ऊष्मा के छोटे-से अंश का भी लगभग आधा भाग ही पृथ्वी पहुँच पाता है।

पृथ्वी द्वारा अवशोषित 51 इकाइयाँ पुनः भौमिक विकिरण के रूप में वापस शून्य में लौट जाती हैं। इन 51 इकाइयों में से 17 इकाइयाँ सीधे अन्तरिक्ष में चली जाती हैं और 34 इकाइयाँ वायुमण्डल द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं- (17+ 34 = 51)। इन 34 इकाइयों में से 6 इकाइयाँ स्वयं वायुमण्डल द्वारा, 9 इकाइयाँ संवहन द्वारा व 19 इकाइयाँ गुप्त ऊष्मा द्वारा अवशोषित हो जाती हैं।

इस प्रकार वायुमण्डल 48 इकाइयों का अवशोषण करके (34 भौमिक विकिरण की व 14 सौर विकिरण की) उन्हें अन्तरिक्ष में लौटा देता है। पृथ्वी और वायुमण्डल दोनों मिलकर 17 + 48 = 65 इकाइयों को अन्तरिक्ष में भेजते हैं। इससे पृथ्वी और वायुमण्डल द्वारा अवशोषित 51 + 14 = 65 इकाइयों का हिसाब बराबर हो जाता है। इसी को पृथ्वी का ऊष्मा बजट अथवा ऊष्मा सन्तुलन कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 3.
तापमान को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किसी स्थान के तापमान को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं-
1. अक्षांश अथवा भूमध्य रेखा से दूरी पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण सूर्य की किरणें सारा वर्ष भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं। भूमध्य रेखा से दूर ध्रुवों की ओर जाने पर सूर्य की किरणें अधिकाधिक तिरछी होती जाती हैं। लाम्बिक या सीधी किरणें तिरछी किरणों की अपेक्षा अधिक ऊष्मा प्रदान करती हैं, क्योंकि वे तिरछी किरणों की अपेक्षा कम क्षेत्रफल को गरम करती हैं और अपेक्षाकृत परतें वायुमण्डल से गुजरती हैं। अतः भूमध्य रेखा के निकट स्थित स्थानों का तापमान ऊँचा होता है जबकि भूमध्य रेखा से दूर स्थित स्थानों का तापमान कम होता है, यहाँ तक कि ध्रुवों पर तापमान हिमांक से नीचे गिर जाता है।

2. समुद्र तल से ऊँचाई-वायुमण्डल धूलकणों, गैस व अशुद्धियों द्वारा अवशोषित ऊष्मा से गरम होता है। ऊँचाई के साथ वायु विरल होती जाती है और उसका घनत्व भी घटता जाता है। परिणामस्वरूप ऊँचाई के साथ वायु में अवशोषित होने वाली ऊष्मा की मात्रा भी घटती जाती है। सामान्यतः वायु की निचली परतों में 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेल्सियस अथवा 1 किलोमीटर की ऊँचाई पर 6.4° सेल्सियस तापमान गिर जाता है। ऊँचाई के साथ तापमान का यह ह्रास विभिन्न स्थानों और विभिन्न ऋतुओं में अलग-अलग होता है। इसी कारण पर्वतीय प्रदेश मैदानों की अपेक्षा अधिक ठण्डे होते हैं।

3. समुद्र तट से दूरी-उच्चतर विशिष्ट ऊष्मा के कारण जल देर से गरम और देर से ठण्डा होता है जबकि स्थलीय भाग शीघ्र गरम और शीघ्र ठण्डे हो जाते हैं। इसी कारण समुद्र तटीय प्रदेशों का तापमान भीतरी प्रदेशों की अपेक्षा अधिक समान रहता है। तटीय स्थानों पर सर्दियों में कम सर्दी, गर्मियों में कम गर्मी और वार्षिक तापान्तर कम होता है जबकि समुद्र से दूर स्थित भीतरी प्रदेशों में सर्दियों में अधिक सर्दी, गर्मियों में अधिक गर्मी और वार्षिक तापान्तर भी अधिक रहता है।

4. समुद्री धाराएँ-समुद्री धाराएँ भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर ऊष्मा का और ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर ठण्ड का स्थानान्तरण करती रहती हैं। गरम या ठण्डी धाराएँ जिन तटीय क्षेत्रों के पास से गुजरती हैं वे वहाँ का तापमान उसी के अनुरूप अधिक या कम कर देती हैं। इसका कारण यह है कि इन धाराओं के ऊपर से बहने वाली पवनें अपने साथ गर्म या ठण्डी धाराएँ तटीय क्षेत्रों में ले आती हैं। उदाहरणतः उत्तर:पश्चिमी यूरोप के तट के साथ बहने वाली गरम गल्फ स्ट्रीम या उत्तर अटलाण्टिक ड्रिफ्ट वहाँ के तटीय भागों का तापमान ऊँचा रखती है जिससे वहाँ के बन्दरगाह साल भर खुले रहते हैं। इसके विपरीत उन्हीं अक्षांशों पर स्थित उत्तर:पूर्वी कनाडा के लैब्रेडोर तट पर लैब्रेडोर की ठण्डी धारा बहती है जिससे वहाँ का तापमान हिमांक से भी नीचे हो जाता है और वर्ष के 8-9 महीने बन्दरगाहें बर्फ से जमी रहने के कारण बन्द रहती हैं।

5. प्रचलित पवनें हवाओं की दिशा भी किसी स्थान के तापमान को प्रभावित करती है। उष्ण कटिबन्धों से आने वाली तप्त पवनें तापमान को बढ़ा देती हैं जबकि ध्रुवीय प्रदेशों से आने वाली ठण्डी पवनें तापमान को कम कर देती हैं। समुद्र से आने वाली पवनें आर्द्र होती हैं और वर्षा लाती हैं और तापमान की विषमता को कम करती हैं जबकि महाद्वीपों के आंतरिक भागों से आने वाली
शुष्क पवनें तापमान की विषमता को बढ़ा देती हैं।

6. भूमि का ढाल-उत्तरी गोलार्द्ध में पर्वतों के दक्षिणी ढाल और दक्षिणी गोलार्द्ध में पर्वतों के उत्तरी ढाल सूर्य के सामने पड़ते हैं। सूर्य के सामने पड़ी ढालों पर किरणें सीधी पड़ती हैं जो अधिक सूर्यातप प्रदान करती हैं जिससे तापमान बढ़ता है। सूर्य से विपरीत दिशा में स्थित ढालों पर किरणें तिरछी पड़ती हैं जिससे वहाँ कम सूर्यातप व कम तापमान रहता है। यही कारण है कि हिमालय और आल्पस की दक्षिणी ढलानों पर अधिक तापमान के कारण मानव बस्तियाँ व कृषि कार्य केन्द्रित हैं जबकि उत्तरी ठण्डे ढालों पर केवल सघन वन पाए जाते हैं।

7. भू-तल का स्वभाव-किसी स्थान का तापमान वहाँ प्राप्त सूर्यातप के अवशोषण और प्रतिबिम्बन की मात्रा पर निर्भर करता है। हिम तथा वनस्पति से ढके प्रदेश सूर्यातप की अधिकांश मात्रा को प्रतिबिम्बित करके वापस वायुमण्डल में लौटा देते हैं जिस कारण इन प्रदेशों का तापमान कम रहता है। इसके विपरीत काली अथवा गहरी मिट्टियों और रेत से ढके भू-पृष्ठ के भाग सूर्यातप की अधिकांश मात्रा को अवशोषित करके वहाँ के तापमान को ऊँचा कर देते हैं।

8. मेघ तथा वर्षा-जिन प्रदेशों में आकाश अधिकतर बादलों से ढका रहता है और वहाँ वर्षा भी अधिक होती है। वहाँ तापमान बहुत अधिक नहीं हो पाता क्योंकि बादल सूर्य की किरणों को पृथ्वी तल तक नहीं पहुँचने देते और उन्हें वापिस प्रतिबिम्बित कर देते हैं। यही कारण है कि भूमध्यरेखीय प्रदेश में सूर्य की किरणें सारा वर्ष सीधी पड़ने के बावजूद वहाँ तापमान इतना अधिक नहीं हो पाता जितना कि मेघ-रहित उष्ण मरुस्थलों में।

9. पर्वतों का अवरोध-पर्वत ठण्डी हवाओं को रोककर दूसरी ओर स्थित क्षेत्र को ठण्ड से बचाते हैं जिससे तापमान नीचे नहीं गिर पाता। उदाहरणतः कोलकाता और चीन का कैण्टन दोनों तटीय नगर हैं और एक ही अक्षांश पर स्थित हैं। कैण्टन कोलकाता की अपेक्षा ठण्डा है। इसका कारण यह है कि हिमालय कोलकाता को मध्य एशिया से आने वाली ठण्डी पवनों से बचा लेता है जबकि कैण्टन के पास पर्वतीय अवरोध न होने के कारण वहाँ भयंकर ठण्ड होती है। इसी प्रकार यूरोप में आल्पस पर्वत इटली को ध्रुवीय ठण्डी पवनों से बचाते हैं।

प्रश्न 4.
समताप रेखाएँ क्या हैं? इनकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
समताप रेखाएँ-समताप रेखाएँ वे काल्पनिक रेखाएँ हैं जो मानचित्र पर समान तापक्रम वाले स्थानों को मिलाती हैं। समताप रेखाओं की विशेषताएँ-समताप रेखाओं में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं-
(1) धरातल पर एक अक्षांश पर सूर्यातप की मात्रा लगभग समान पाई जाती है, इसलिए तापक्रम भी एक अक्षांश पर बराबर रहता है। यही वजह है कि समताप रेखाएँ पूर्व-पश्चिम दिशा में एक-दूसरे के लगभग समानान्तर तथा अक्षांशों के समानान्तर खींची जाती हैं।

(2) समताप रेखाओं के बीच की दूरी से ताप प्रवणता ज्ञात की जाती है। यदि समताप रेखाओं के बीच की दूरी कम है तो इसका तात्पर्य है कि दो स्थानों के तापक्रम में तीव्र वृद्धि हो रही है अर्थात् ताप प्रवणता अधिक है और यदि उनके बीच की दूरी अधिक है तो ताप प्रवणता कम होगी।

(3) जल तथा स्थल का तापक्रम भिन्न-भिन्न होता है, इसलिए जब समताप रेखाएँ तटीय भागों पर आती हैं तो एकदम मुड़ जाती हैं। इसका तात्पर्य है कि तापक्रम में अचानक परिवर्तन आ जाता है।

(4) दक्षिणी गोलार्द्ध जलीय गोलार्द्ध है जिसमें जल की प्रधानता है इसलिए समताप रेखाएँ कम मुड़ती हैं, जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता के कारण ये अधिक टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं।

(5) भूमध्य रेखीय एवं उष्ण कटिबन्धीय भागों में समताप रेखाओं का मान अधिक होता है, जबकि ध्रुवों की ओर जाने पर इनका मान क्रमशः घटता जाता है।

(6) स्थलीय भाग से समुद्र की ओर जाते समय समताप रेखाएँ शीतकाल में भूमध्य रेखा की ओर तथा ग्रीष्मकाल में ध्रुवों की ओर मुड़ जाती हैं, क्योंकि शीतकाल में स्थलीय भाग समुद्रों से अधिक ठण्डे (कम तापक्रम) होते हैं।

प्रश्न 5.
जनवरी तथा जुलाई के तापमान के वितरण के मुख्य लक्षण क्या हैं?
उत्तर:
संसार में जनवरी तथा जुलाई के महीने प्रायः न्यूनतम तथा अधिकतम तापक्रम वाले महीने होते हैं इसलिए इन दो महीनों के तापक्रम का विश्लेषण आवश्यक है।
1. जनवरी के तापमान का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Temperature of January) जनवरी के महीने में सूर्य की स्थिति दक्षिणायन होती है अर्थात् मकर रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं इसलिए दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय ग्रीष्म ऋतु होती है। इस समय ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी मध्य अफ्रीका तथा उत्तरी-पश्चिमी अर्जेन्टीना में तापमान लगभग 30° सेल्सियस के आस-पास रहता है, जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में तापमान की स्थिति इसके विपरीत होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में शीत ऋतु होती है, रातें बड़ी होती हैं और तापक्रम कम होता है। साइबेरिया में वोयान्सक विश्व का सबसे ठण्डा क्षेत्र है जहाँ पर जनवरी महीने का तापमान -50° सेल्सियस तक गिर जाता है।

उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता है और तापमान स्थलीय भागों में कम रहता है, इसलिए समताप रेखाएँ जैसे ही स्थलों से महासागरों में पहुँचती हैं तो भूमध्य रेखा की ओर मुड़ जाती हैं क्योंकि सागरीय भागों में तापक्रम अपेक्षाकृत अधिक रहता है। अतः उत्तरी गोलार्द्ध में ताप प्रवणता अधिक रहती है। (क्योंकि समताप रेखाओं के बीच की दूरी कम रहती है।) दक्षिणी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ महासागरीय प्रभाव के कारण दूर-दूर रहती हैं और महाद्वीपों से गुजरते समय दक्षिणी ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं। समताप रेखाएँ उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में अधिक नियमित होती हैं।

2. जुलाई के तापमान का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Temperature of July)-जुलाई के माह में उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर लम्बवत होती हैं, इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लम्बी तथा ग्रीष्म ऋतु होती है, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में शीत ऋतु होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में 10° से 40° अक्षांशों के मध्य अधिकतम तापक्रम रहता है। तापक्रम का औसत 30° सेल्सियस से अधिक रहता है। समताप रेखाएँ एक-दूसरे से दूर-दूर स्थित होती हैं।

जब ये रेखाएँ स्थलीय भागों से महासागरों की ओर जाती हैं तो महासागर की सीमा से दक्षिण की ओर भूमध्य रेखा की ओर स्थल की ओर गुजरते समय ध्रुवों की ओर मुड़ जाती हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी स्थिति अत्यधिक अनियमित होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिणी-पश्चिमी एशिया, उत्तरी-पश्चिमी भारत, अमेरिका का दक्षिणी-पूर्वी भाग तथा अफ्रीका में सहारा मरुस्थल का तापमान अत्यधिक अर्थात् 35° सेल्सियस से अधिक रहता है। न्यूनतम तापमान ध्रुवीय क्षेत्रों में पाया जाता है। पाकिस्तान तथा उत्तरी-पश्चिमी भारत ग्रीष्म ऋतु में ‘लू’ की चपेट में आ जाते हैं, लेकिन जुलाई के प्रथम सप्ताह में वर्षा के कारण तापक्रम में कुछ कमी आ जाती है।

प्रश्न 6.
तापमान के क्षैतिज वितरण का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
तापमान के क्षैतिज वितरण का आशय अंक्षाशीय वितरण से है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर (दोनों गोलार्डों में) जाने पर तापमान में क्रमशः कमी होती जाती है। इस क्षैतिज वितरण के आधार पर पृथ्वी को तीन कटिबन्धों या मण्डलों में विभक्त किया जाता है
1. उष्ण-कटिबन्ध (Torrid Zone) यह कटिबन्ध दोनों गोलार्डों में 237° उत्तरी तथा 237° दक्षिणी अक्षांशों के बीच का क्षेत्र है अर्थात् कर्क और मकर रेखा के बीच के क्षेत्र को उष्ण कटिबन्ध कहा जाता है। यहाँ साल भर सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं जिससे तापक्रम ऊँचा रहता है। भूमध्य रेखा के आस-पास तो शीत ऋतु होती ही नहीं, वहाँ औसत तापक्रम ऊँचा रहता है।

2. शीतोष्ण कटिबन्ध (Temperature Zone)-यह कटिबन्ध दोनों गोलार्डों में 23/2° से 66/2° अक्षांशों के मध्य स्थित है। इस प्रदेश में दिन-रात की अवधि मौसम के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। जब सूर्य की स्थिति उत्तरायण होती है तो उस समय उत्तरी गोलार्द्ध में दिन बड़े तथा रातें छोटी हैं और ग्रीष्म ऋतु होती है, लेकिन जब सूर्य की स्थिति दक्षिणायन होती है तो दक्षिणी . गोलार्द्ध में दिन बड़े तथा रातें छोटी होती हैं और उत्तरी गोलार्द्ध में इसके विपरीत स्थिति होती है।

3. शीत कटिबन्ध (Frigid Zone)-इस कटिबन्ध का विस्तार दोनों गोलार्डों में 66%° से ध्रुवों (90°) तक है। यहाँ सूर्य की किरणे अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं जिसके कारण दिन की अवधि छोटी होती है। जब सूर्य की किरणें दक्षिणायन होती हैं तो उत्तरी गोलार्द्ध के ध्रुवों पर 6 महीने की रात तथा जब सूर्य की स्थिति उत्तरायण होती है तो ऐसी दशा में दक्षिणी ध्रुव पर 6 महीने की रात होती है। 6 महीने की रात के कारण सूर्यातप बहुत कम प्राप्त होता है जिससे तापक्रम साल भर नीचा तथा हिमांक से कम रहता है अर्थात् तापक्रम दोनों ध्रुवों पर कम पाया जाता है।

प्रश्न 7.
वायुमंडल के तापन और शीतलन की विधियों का वर्णन कीजिए। अथवा वायुमंडल उष्मा संचरण की कौन-सी विधियों से गरम और ठण्डा होता है? इनका संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायुमंडल के गर्म तथा ठण्डा होने में पार्थिव या भौमिक शक्ति (Terrestrial Force) महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस पार्थिव शक्ति के कारण कुछ भौतिक क्रियाएं होती हैं जिनके कारण वायुमण्डल गर्म तथा ठण्डा होता रहता है। ये भौतिक विधियाँ निम्नलिखित हैं
1. विकिरण (Radiation) सूर्य से आने वाली तरंगों के द्वारा वायुमण्डल का गर्म होना विकिरण (Radiation) कहलाता है। सूर्य से प्राप्त सौर ऊर्जा द्वारा वायुमण्डल तथा पृथ्वी दोनों ही गर्म होते हैं। पृथ्वी पर प्राप्त सौर ऊर्जा से पृथ्वी गर्म होती है। इसे पार्थिव या भौमिक विकिरण (Terrestrial Radiation) कहते हैं। भू-तल को उष्णता लम्बी तरंगों के रूप में प्राप्त होती है जिसका 90% धरातल अवशोषित कर लेता है और वायुमण्डल गर्म होता रहता है। पार्थिव विकिरण द्वारा वायुमण्डल की निचली परतें ही गर्म होती हैं। अधिक ऊँचाई पर इसका प्रभाव बहुत कम होता है।

2. परिचालन (Conduction) जब दो असमान प्रकृति वाली वस्तुएँ एक-दूसरे के सम्पर्क में आती हैं तो जो अधिक तापमान वाली वस्तु है, वह कम तापमान वाली वस्तु की ओर प्रवाहित होती है अर्थात् अधिक तापमान वाली वस्तु से तापमान का संचालन कम तापमान वाली वस्तु की ओर होता है और यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक दोनों वस्तुओं का तापमान एक-जैसा या समान न हो जाए। इसे संचालन भी कहते हैं। वायु ऊष्मा की कुचालक है, अतः वायुमण्डल में ऊष्मा का संचालन आसानी से नहीं होता। केवल वायुमण्डल की निचली परत पर ही ऊष्मा का संचालन होता है अथवा वायुमण्डल की निम्न परत ही गर्म होती है। ऊपरी परतों पर इसका प्रभाव नगण्य होता है। प्रकृति का यह नियम है कि वह प्रत्येक वस्तु में समानता चाहती है, इसलिए गर्म एवं तप्त सूर्य पृथ्वी को लगातार अपनी किरणों द्वारा ताप प्रदान करता रहता है। यह ताप वायुमण्डल की विभिन्न परतों से धरातल पर आने का प्रयास करता है जिससे सूर्यातप में धरातल पर समानता बनी रहे।

3. संवहन (Convection) सूर्यातप के विकिरण द्वारा धरातल की वायु गर्म होती है। गर्म वायु हल्की होकर ऊपर उठती है तथा फैलती है लेकिन वायुमण्डल में ऊँचाई पर जाने पर तापमान की कमी के कारण यही वायु ठण्डी हो जाती है। ठण्डी होने के कारण यह भारी होकर पुनः धरातल पर नीचे उतर जाती है और पुनः धरातल से गर्म होकर ऊपर उठती है। इसी प्रक्रिया के कारण वायुमण्डल में संवहन (Convection) शुरू हो जाता है तथा लम्बवत् रूप में संवहनिक तरंगें चलने लगती हैं। इस प्रकार की क्रियाएँ उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांशों में अधिक होती हैं। इस प्रकार वायुमण्डल में या तरल पदार्थ में जो ऊष्मा का एक भाग से दूसरे भाग में स्थानान्तरण होता है, उसे संवहन कहा जाता है।

4. अभिवहन (Advection)अभिवहन वह क्रिया है जिसमें ऊष्मा का स्थानान्तरण क्षैतिज रूप में होता है। जब भूमध्य रेखीय या उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों की गर्म वायुराशियाँ मध्य महाद्वीपों या उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में पहुँचती हैं तो वहाँ की ठण्डी वायुराशियों को कम कर देती हैं। इसी प्रकार गर्म समुद्री धाराएँ, जो उष्ण प्रदेशों से उत्पन्न होती हैं और ठण्डे प्रदेशों में प्रवेश करती हैं तो वहाँ के तापमान में वृद्धि कर देती हैं। इस क्रिया को ही अभिवहन कहते हैं।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. वायुमंडल में जलवाष्प का अनुपात कितना होता है?
(A) 0 – 4%
(B) 4 – 8%
(C) 8 – 12%
(D) 12 – 16%
उत्तर:
(A) 0 – 4%

2. कोहरे में अधिकतम दृश्यता कितनी होती है?
(A) एक कि०मी० से कम
(B) 2 कि०मी० से अधिक
(C) 3 कि०मी० से अधिक
(D) 4 कि०मी० से अधिक
उत्तर:
(A) एक कि०मी० से कम

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3. ओसांक पर वायु की सापेक्ष आर्द्रता कितनी होती है?
(A) 25%
(B) 50%
(C) 75%
(D) 100%
उत्तर:
(D) 100%

4. सापेक्ष आर्द्रता को किस इकाई में मापा जाता है?
(A) मीटर में
(B) कि०मी० में
(C) प्रतिशत में
(D) सें०मी० में
उत्तर:
(C) प्रतिशत में

5. मौसमी घटनाओं के लिए वायुमंडल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक कौन-सा है?
(A) ऑक्सीजन
(B) धूलकण
(C) नाइट्रोजन
(D) जलवाष्प
उत्तर:
(D) जलवाष्प

6. शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में सामान्यतः किस प्रकार की वर्षा होती है?
(A) संवहनीय
(B) चक्रवातीय
(C) पर्वतीय
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) चक्रवातीय

7. निम्नलिखित में से कौन-से बादल अधिक वर्षा करते हैं?
(A) कपासी
(B) कपासी वर्षा
(C) वर्षा-स्तरी
(D) पक्षाभ-स्तरी
उत्तर:
(C) वर्षा-स्तरी

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8. प्रायः समुद्री किनारों और झीलों के तटों पर पाया जाने वाला कोहरा होता है
(A) वाताग्री कोहरा
(B) अभिवहन कोहरा
(C) विकिरण कोहरा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) अभिवहन कोहरा

9. ‘4 बजे वाली वर्षा’ किसे कहा जाता है?
(A) यूरोप में सायंकाल में होने वाली स्थानीय वर्षा को
(B) पवनाभिमुखी ढालों पर होने वाली पर्वतकृत वर्षा को
(C) वाताग्री वर्षा को
(D) भूमध्य रेखीय प्रदेशों में होने वाली संवहनीय वर्षा को
उत्तर:
(D) भूमध्य रेखीय प्रदेशों में होने वाली संवहनीय वर्षा को

10. जलवृष्टि व हिमवृष्टि के मिले-जुले रूप को कहते हैं-
(A) ओलावृष्टि
(B) हिमवृष्टि
(C) सहिम वृष्टि
(D) वर्षा
उत्तर:
(C) सहिम वृष्टि

11. बिना तरल अवस्था में आए वाष्प का हिम में बदलना कहलाता है-
(A) ऊर्ध्वपातन
(B) द्रवण
(C) संघनन
(D) परिवर्तन
उत्तर:
(A) ऊर्ध्वपातन

12. सांध्यकालीन सर्वाधिक रंगीन मेघ है-
(A) कपासी
(B) पक्षाभ
(C) स्तरी
(D) बर्फीले
उत्तर:
(A) कपासी

13. एलनीनो, के दौरान असामान्य रूप से बाढ़ की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं
(A) इक्वेडोर में
(B) उत्तरी पीरू में
(C) मध्य चिली में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

14. एलनीनो के दौरान असामान्य रूप से सूखे की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं-
(A) इंडोनेशिया में
(B) ऑस्ट्रेलिया में
(C) उत्तर:पूर्वी दक्षिण अमेरिका में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

15. निम्नलिखित में से किसे उच्च बादलों में शामिल नहीं किया जाता?
(A) पक्षाभ
(B) पक्षाभ स्तरी
(C) स्तरी कपासी
(D) पक्षाभ कपासी
उत्तर:
(C) स्तरी कपासी

16. किसी स्थान की वर्षा निर्भर करती है-
(A) पर्वतों की दिशा पर
(B) समुद्री जल के वाष्पीकरण पर
(C) ग्रीष्मकाल की अवधि पर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) पर्वतों की दिशा पर

17. वायुमंडल की कौन-सी प्रक्रिया ठोस पदार्थों के अभाव में नहीं हो सकती है?
(A) संतृप्तीकरण
(B) संघनन
(C) वाष्पीकरण
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(B) संघनन

18. यदि किसी स्थान के तापमान में अचानक वृद्धि हो जाए तो वहाँ की सापेक्षिक आर्द्रता-
(A) बढ़ेगी
(B) घटेगी
(C) समान रहेगी
(D) घटती-बढ़ती रहेगी
उत्तर:
(B) घटेगी

19. जलवाष्प की मात्रा समान रहने पर वायु के ताप में कमी होने पर सापेक्षिक आर्द्रता-
(A) बढ़ेगी
(B) घटेगी
(C) समान रहेगी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) बढ़ेगी

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20. ओस किस प्राकृतिक घटना का उदाहरण है?
(A) वाष्पीकरण
(B) सूर्य की तिरछी किरणें
(C) संघनन
(D) वाष्पोत्सर्जन
उत्तर:
(C) संघनन

21. भारत में अधिकतर वर्षा कौन-सी होती है?
(A) पर्वतकृत वर्षा
(B) चक्रवातीय वर्षा
(C) संवहनीय वर्षा
(D) वाताग्री वर्षा
उत्तर:
(A) पर्वतकृत वर्षा

22. सर्दियों में उत्तर:पश्चिमी भारत में होने वाली वर्षा किस प्रकार की होती है?
(A) पर्वतकृत
(B) चक्रवातीय
(C) संवहनीय
(D) वाताग्री
उत्तर:
(B) चक्रवातीय

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
जलवाष्प का प्रमुख स्रोत कौन-सा है?
उत्तर:
महासागर।

प्रश्न 2.
जलीय चक्र को ऊर्जा कहाँ से मिलती है?
उत्तर:
सूर्य से।

प्रश्न 3.
सापेक्ष आर्द्रता को किस इकाई में मापा जाता है?
उत्तर:
प्रतिशत में।

प्रश्न 4.
ओसांक पर वायु की सापेक्ष आर्द्रता कितनी होती है?
उत्तर:
100 प्रतिशत।

प्रश्न 5.
वायुमण्डलीय आर्द्रता को किस यन्त्र से मापते हैं?
उत्तर:
हाइग्रोमीटर से।

प्रश्न 6.
भारत में अधिकतर वर्षा कौन-सी होती है?
उत्तर:
पर्वतकृत वर्षा।

प्रश्न 7.
पवनविमुखी पर्वतीय ढाल पर स्थित शुष्क प्रदेश को क्या कहते हैं?
उत्तर:
वृष्टिछाया प्रदेश।

प्रश्न 8.
कोहरे में अधिकतम दृश्यता कितनी होती है?
उत्तर:
एक किलोमीटर से कम।

प्रश्न 9.
वायुमण्डल में जलवाष्प का अनुपात कितना होता है?
उत्तर:
शून्य से 4 प्रतिशत तक।

प्रश्न 10.
महासागर के अतिरिक्त जलवाष्प के अन्य स्रोत कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
सागर, झीलें, नदियाँ।

प्रश्न 11.
विकिरण कोहरा प्रायः कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
विस्तृत मैदानी भागों में।

प्रश्न 12.
वर्षा को मापने वाले यन्त्र का नाम बताएँ।
उत्तर:
रेन गेज या वर्षा-मापी यन्त्र।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्द्रता को व्यक्त करने की तीन विधियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. निरपेक्ष आर्द्रता
  2. विशिष्ट आर्द्रता और
  3. सापेक्ष आर्द्रता।

प्रश्न 2.
सापेक्ष आर्द्रता ज्ञात करने का सूत्र बताइए।
उत्तर:
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल 1

प्रश्न 3.
कोहरे के प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. विकिरण
  2. अभिवहन तथा
  3. वाताग्री।

प्रश्न 4.
संघनन के कौन-कौन-से रूप होते हैं?
उत्तर:
ओस, पाला, कोहरा, कुहासा और बादल।

प्रश्न 5.
वाष्पीकरण को नियन्त्रित करने वाले कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. तापमान
  2. स्वच्छ आकाश
  3. वायु की शुष्कता
  4. पवनों की गति
  5. जल के तल का विस्तार।

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प्रश्न 6.
वाष्पीकरण में क्या होता है?
उत्तर:
जल द्रव अवस्था से गैस (जलवाष्प) में बदल जाता है।

प्रश्न 7.
संघनन या द्रवीकरण क्या है?
उत्तर:
जल की गैसीय अवस्था से तरलावस्था या ठोसावस्था में बदलने की प्रक्रिया द्रवीकरण कहलाती है।

प्रश्न 8.
ओसांक क्या होता है?
उत्तर:
वह तापमान जिस पर वायु अपने में विद्यमान जलवाष्प से संतृप्त हो जाती है।

प्रश्न 9.
संघनन कितने तापमान पर होता है?
उत्तर:
संघनन तब होता है जब वायु का ताप ओसांक या ओसांक से नीचे गिर जाता है।

प्रश्न 10.
आर्द्रताग्राही कण या संघनन केन्द्र क्या होते हैं?
उत्तर:
वायु में विद्यमान ठोस कण जिनके चारों ओर संघनन की प्रक्रिया आरम्भ होती है।

प्रश्न 11.
आर्द्रताग्राही कण कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:
समुद्री नमक के कण, धूएँ की कालिख के कण व धूलकण इत्यादि।

प्रश्न 12.
तापमान ओसांक से नीचे किन दो कारणों से गिरता है?
उत्तर:

  1. वायु के ठण्डा होने से
  2. वायु की सापेक्ष आर्द्रता बढ़ने पर।

प्रश्न 13.
अभिवहन कोहरा कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
सागरीय किनारों व झीलों के तटों पर।

प्रश्न 14.
वाताग्री कोहरा कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
वायुराशियों को अलग करने वाले वातानों पर।

प्रश्न 15.
4 बजे वाली वर्षा कौन-सी होती है और कहाँ होती है?
उत्तर:
संवहनीय वर्षा; यह भूमध्य रेखीय प्रदेशों में होती है।

प्रश्न 16.
भारत में स्थित किसी एक वृष्टिछाया प्रदेश का नाम बताएँ।
उत्तर:
दक्कन पठार जो पश्चिमी घाट का वृष्टिछाया प्रदेश है।

प्रश्न 17.
सर्दियों में उत्तर-पश्चिमी भारत में होने वाली वर्षा किस प्रकार की वर्षा होती है?
उत्तर:
सर्दियों में उत्तर-पश्चिमी भारत में होने वाली चक्रवातीय वर्षा होती है।

प्रश्न 18.
कौन-सा प्राकृतिक प्रदेश अधिकतर सर्दियों में वर्षा प्राप्त करता है?
उत्तर:
भूमध्य सागरीय प्रदेश अधिकतर सर्दियों में वर्षा प्राप्त करता है।

प्रश्न 19.
ऊर्ध्वपातन क्या होता है?
उत्तर:
बिना तरलावस्था में आए वाष्प का हिम में बदलना या हिम का वाष्प में बदलना ऊर्ध्वपातन कहलाता है।

प्रश्न 20.
गुप्त ऊष्मा क्या होती है?
उत्तर:
वस्तु की अवस्था (State) बदलने पर ऊष्मा का खर्च होना या मुक्त होना गुप्त ऊष्मा कहलाता है, क्योंकि इस प्रक्रिया में वस्तु के तापमान में कोई अन्तर नहीं होता।

प्रश्न 21.
वाष्पोत्सर्जन क्या होता है?
उत्तर:
भूमि तथा वनस्पति से होने वाला वाष्पन। इसमें जलाशयों (नदी, झील, तालाब), मिट्टियों, शैलों के पृष्ठों और पौधों से वाष्प के रूप में नमी की क्षति भी सम्मिलित है।

प्रश्न 22.
ऊँचे बादलों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. पक्षाभ
  2. पक्षाभ कपासी।

प्रश्न 23.
मध्य बादलों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. स्तरी मध्य
  2. कपासी मध्य।

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प्रश्न 24.
कम ऊँचाई वाले बादलों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. स्तरी वर्षा मेघ
  2. कपासी वर्षा मेघ

प्रश्न 25.
वर्षण के कौन-कौन-से रूप होते हैं?
उत्तर:
हिमपात, सहिम वर्षा, ओला वृष्टि और वर्षा।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्द्रता किसे कहते हैं?
अथवा
वायुमण्डलीय आर्द्रता क्या होती है? यह कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
आर्द्रता का अर्थ-वायुमण्डल में गैस रूप में उपस्थित अदृश्य जलवाष्प की मात्रा को वायुमण्डल की आर्द्रता कहा जाता है। वायुमण्डल में जलवाष्प बहुत ही कम अनुपात में (शून्य से 4 प्रतिशत तक) होता है। जलवाष्प वाष्पीकरण क्रिया द्वारा महासागरों, सागरों, नदियों तथा झीलों आदि से प्राप्त होता है। स्थान और समय की दृष्टि से जलवाष्प की मात्रा सदा एक-जैसी नहीं रहती बल्कि बदलती रहती है।

वायुमण्डलीय आर्द्रता के प्रकार-वायुमण्डलीय आर्द्रता तीन प्रकार की होती है-

  • निरपेक्ष आर्द्रता
  • विशिष्ट आर्द्रता तथा
  • सापेक्ष आर्द्रता।

प्रश्न 2.
आर्द्रता अथवा जलवाष्प का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
1. वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा द्रवण और वर्षण के सभी रूपों का स्रोत है। वर्षा, हिमपात, कोहरा व बादल जैसी मौसमी घटनाएँ जलवाष्प के कारण ही सम्भव होती हैं।

2. जलवाष्प सूर्य से आने वाली ऊष्मा (Incoming Solar Radiation) व पृथ्वी के विकिरण द्वारा निकलने वाली ऊष्मा का कुछ अंश अवशोषित करके पृथ्वी पर ताप की दशाओं को नियन्त्रित करता है।

3. जलवाष्प का वायुमण्डल में लम्बवत् वितरण एवं मात्रा गुप्त ऊष्मा की मात्रा को निर्धारित करते हैं जो तूफानों और विक्षोभों के विकास में मदद करती है।

4. वायुमण्डल में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा मौसम के अनुसार मानव शरीर के ठण्डा होने की दर को प्रभावित करती है। जल का वाष्पन प्राकृतिक जलीय चक्र (Hydrologic Cycle) का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

प्रश्न 3.
प्राकृतिक जलीय चक्र में जलवाष्प की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी पर जल का प्राथमिक स्रोत महासागर हैं। वायुमण्डल को अपने जलवाष्प का अधिकांश भाग पृथ्वी के तीन-चौथाई भाग पर व्याप्त महासागरों, झीलों, नदियों, हिम क्षेत्रों व हिमनदों से प्राप्त होता है। इन स्रोतों के अतिरिक्त गिरती हुई वर्षा की बूंदों तथा नम भूमियों (Swamps and Wet Lands) से वाष्पीकरण द्वारा, पेड़-पौधों की पत्तियों से बाष्पोत्सर्जन द्वारा तथा जीव-जन्तुओं द्वारा साँस लेने की क्रिया से उत्पन्न जलवाष्प वायुमण्डल में जा मिलता है। जलवाष्प संघनित होकर बादलों का रूप धारण करते हैं। पवनों द्वारा बादलों के रूप में यह आर्द्रता एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानान्तरित होती है।

अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर संघनित जलवाष्प वर्षा और हिम के रूप में भू-पृष्ठ पर गिरता है जो वृष्टि संयोग से महासागरों पर होती है उसका तो एक चक्र तभी पूरा हो जाता है और दूसरा आरम्भ भी हो जाता है। जो वर्षा स्थलखण्डों पर होती है उसका चक्र कुछ देर से पूरा होता है। ऐसे जल का कुछ भाग मिट्टी सोख लेती है व कुछ भाग पौधे अवशोषित कर लेते हैं जिसे वे बाद में वाष्पोत्सर्जन क्रिया द्वारा वायुमण्डल में छोड़ देते हैं।

शेष जल भूमिगत जल और धरातलीय प्रवाह के रूप में अन्ततः महासागरों में पुनः पहुँच जाता है और जलीय चक्र का फिर से हिस्सा बन जाता है। इस प्रकार भूमण्डलीय ताप सन्तुलन की तरह जलीय चक्र के माध्यम से प्रकृति में भूमण्डलीय जल सन्तुलन बना रहता है।

प्रश्न 4.
वाष्पीकरण क्या है? वाष्पीकरण की मात्रा और दर किन कारकों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
वाष्पीकरण-जल के तरलावस्था अथवा ठोसावस्था से गैसीय अवस्था में परिवर्तन होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं। वाष्पीकरण की दर तथा मात्रा निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है

  • तापमान भूतल पर तापमान (Temperature) के बढ़ने से वाष्पीकरण की क्रिया तेजी से होती है तथा तापमान के घटने से इस क्रिया की दर में कमी आ जाती है।
  • शुष्कता-शुष्क (Aridity) वायु में जलवाष्प अधिक मात्रा में समा सकते हैं, परन्तु आर्द्र वायु की जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता कम होती है।
  • वायु परिसंचरण-चलती वायु में वाष्पीकरण अधिक मात्रा में होता है।
  • जल के स्रोत-महासागरों तथा सागरों पर महाद्वीपों की तुलना में बहुत अधिक वाष्पीकरण होता है।

प्रश्न 5.
संघनन क्या है और यह कब और कैसे होता है? अथवा संघनन का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा संघनन की प्रक्रिया को नियन्त्रित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संघनन-जल के गैसीय अवस्था से तरलावस्था या ठोसावस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन या द्रवीकरण कहते हैं। जैसे-जैसे आर्द्र हवा ठण्डी होने लगती है, वैसे-वैसे उसकी जलवाष्प धारण करने की क्षमता भी घटती जाती है। एक समय ऐसा आता है जिसमें एक विशेष ताप पर वह वायु संतृप्त हो जाती है, जिस तापमान पर वायु अपने में विद्यमान जलवाष्प से संतृप्त हो जाती है, उस तापमान को ओसांक (Dew Point) कहा जाता है। ओसांक पर वायु की सापेक्ष आर्द्रता 100 प्रतिशत होती है। संघनन तब होता है जब वायु का ताप ओसांक से भी नीचे गिर जाता है।

ऐसा दो कारणों से हो सकता है-

  • वायु के ठण्डा होने से
  • वायु की सापेक्ष आर्द्रता बढ़ने पर।

उपर्युक्त दोनों घटनाएँ नीचे दी गई चार परिस्थितियों में से किसी-न-किसी एक के साथ जुड़कर सम्भव होती हैं-

  • जब वायु का तापमान घटकर ओसांक तक पहुँच जाए किन्तु उसका आयतन वही रहे।
  • जब वायु का आयतन ऊष्मा की मात्रा बढ़ाए बिना ही बढ़ जाए।
  • जब वायु की आर्द्रता धारण करने की क्षमता, तापमान और वायु के आयतन के संयुक्त रूप से घटने के कारण घट जाए और वायु में उपस्थित आर्द्रता की मात्रा से भी कम हो जाए।
  • जब वाष्पीकरण द्वारा वायु में आर्द्रता की अतिरिक्त मात्रा मिल जाए। जलवाष्प के संघनन की सबसे अनुकूल स्थिति तापमान के घटने से उत्पन्न होती है।

प्रश्न 6.
ओस किसे कहते हैं?
अथवा
ओस कैसे बनती है?
उत्तर:
ओस-जाड़े की रातों में जब आकाश स्वच्छ होता है तो तीव्र भौमिक विकिरण से धरातल ठण्डा हो जाता है। ठण्डे धरातल पर ठहरी वायुमण्डल की आर्द्र निचली परतें भी ठण्डी होने लगती हैं। धीरे-धीरे यह वायु ओसांक तक ठण्डी हो जाती है। इससे वायु में विद्यमान जलवाष्प संघनित हो जाता है और नन्हीं-नन्हीं बूंदों के रूप में घास व पौधों की पत्तियों पर जमा हो जाता है। वाष्प से बनी जल की इन बूंदों को ओस कहते हैं।

प्रश्न 7.
ओस पड़ने के लिए किन-किन दशाओं का होना आवश्यक है?
उत्तर:
ओस पड़ने के लिए निम्नलिखित दशाओं का होना आवश्यक है-

  1. रातें ठण्डी और लम्बी हों, ताकि भूतल से देर तक विकिरण हो और भूतल पर ठहरी वायु ठण्डी होकर ओसांक तक पहुँचे।
  2. आकाश मेघ-विहीन हो, ताकि भू-तल से होने वाली ऊष्मा का विकिरण निर्बाध गति से सम्पन्न हो सके। तभी भूतल और उसके सम्पर्क में आई हवा ठण्डी हो पाएगी।
  3. वायु शान्त हो, ताकि वह ठण्डे भूतल पर अधिक देर तक ठहरकर स्वयं भी ठण्डी हो जाए। इससे ओसांक जल्दी प्राप्त होगा।
  4. वायु में सापेक्ष आर्द्रता का प्रतिशत ऊँचा हो, ताकि थोड़ा-सा तापमान गिरते ही वायु संतृप्त (Saturate) हो जाए।
  5. ओसांक हिमांक से ऊपर हो, ताकि जलवाष्प जल के बिन्दुओं में परिवर्तित हो जाएँ। यदि ओसांक हिमांक (0°C) से नीचे गिर जाएगा तो वाष्प के जम जाने से पाला पड़ेगा, ओस नहीं।

प्रश्न 8.
कोहरा और कुहासा (धुंध) कैसे बनते हैं?
उत्तर:
कोहरा और कुहासा (Fog and Mist) वास्तव में बादल होते हैं जो पृथ्वी के धरातल के पास बनते हैं। जब भू-तल के निकट वायु के ठण्डा होने से वायु की सापेक्ष आर्द्रता 100 प्रतिशत से बढ़ जाए तो वाष्प-कण संघनित होकर जल के अति सूक्ष्म कणों या हिमकणों में परिवर्तित होकर हवा की निचली परतों में लटके हुए ठोस कणों के चारों ओर एकत्रित हो जाते हैं। इससे जाता है और दृश्यता कम हो जाती है। कोहरे और कुहासे में केवल दृश्यता के विस्तार का अन्तर है। कोहरा घना होता है जिसमें एक किलोमीटर से परे दिखाई नहीं पड़ता। सघन कोहरे (Thick Fog) में तो 200 मीटर तक देख पाना कठिन होता है। कुहासा (धुन्ध) कुछ हल्का होता है जिसमें एक से दो किलोमीटर तक की चीजें दिखाई देती हैं।

प्रश्न 9.
मेघ कैसे बनते हैं? औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों के तीन प्रकार बताइए।
उत्तर:
मेघों का बनना-मेघ काफ़ी ऊँचाई पर वायु में लटके हुए ठोस कणों पर संघनित हुए जल बिन्दुकों या हिमकणों के विशाल समूह होते हैं। मेघ ऊपर उठती हुई गर्म व आर्द्र वायुराशियों के रुद्धोष्म प्रक्रिया द्वारा ठण्डे होने पर उसके तापमान के ओसांक से नीचे गिरने से बनते हैं। इस दृष्टि से मेघ वायुमण्डल की ऊँचाइयों पर बनने वाला कोहरा माना जा सकता है। अतः मेघों का निर्माण वायु में उपस्थित महीन धूलकणों के केन्द्रकों के चारों ओर जलवाष्प के संघनित होने से होता है।

औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों के प्रकार-औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों के तीन प्रकार निम्नलिखित हैं-
1. निचले मेघ इनकी ऊँचाई भूतल से 2,000 मीटर होती है। निचले मेघ निम्नलिखित तरह के होते हैं-

  • स्तरीय कपासी मेघ
  • स्तरी मेघ
  • कपासी मेघ
  • वर्षा स्तरी मेघ
  • वर्षा कपासी मेघ आदि।

2. मध्यम ऊँचाई वाले मेघ-इनकी ऊँचाई भू-तल से 2,000 मीटर से 6,000 मीटर तक होती है। मध्यम ऊँचाई वाले मेघ निम्नलिखित तरह के होते हैं-

  • मध्य स्तरी मेघ
  • मध्यम कपासी मेघ आदि।

3. ऊँचे मेघ–इनकी ऊँचाई भू-तल से 6,000 मीटर से 12,000 मीटर तक होती है। ऊँचे मेघ निम्नलिखित तरह के होते हैं-

  • पक्षाभ मेघ
  • पक्षाभ स्तरी मेघ
  • पक्षाभ कपासी मेघ आदि।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल

प्रश्न 10.
संवहनीय वर्षा कैसे होती है?
उत्तर:
भूतल के गर्म हो जाने पर उसके सम्पर्क में आने वाली वायु भी गर्म हो जाती है। वायु गर्म होकर फैलती है और हल्की हो जाती है। हल्की होकर वायु ऊपर की ओर उठती है। इससे संवहनी धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। ऊपर जाकर वायु ठण्डी हो जाती है और उसमें अधिक जलवाष्प का संघनन होने लगता है। बादलों की गर्जन व बिजली की चमक के साथ मूसलाधार वर्षा होती है। भूमध्य रेखीय प्रदेशों में होने वाली वर्षा इसी प्रकार की संवहनीय वर्षा होती है।

प्रश्न 11.
पर्वत-कृत वर्षा कैसे होती है?
उत्तर:
आर्द्रता से भरी हुई गर्म पवनें जब किसी पर्वत या पठार के सहारे ऊपर उठती हैं तो वे ठण्डी हो जाती हैं। वायु के संतृप्त होने पर जलवाष्प का संघनन व बाद में वर्षा होने लगती है। इस प्रकार की वर्षा को पर्वतकृत वर्षा कहते हैं। भारत में अधिकतर वर्षा इसी प्रकार की होती है।

प्रश्न 12.
चक्रवाती अथवा वाताग्री वर्षा कैसे होती है?
उत्तर:
ऐसी वर्षा चक्रवातों के कारण होती है। शीतोष्ण कटिबन्धों में जब भिन्न-भिन्न तापों व आर्द्रता वाली वायुराशियाँ टकराती हैं तो ठण्डी वायुराशि गर्म वायुराशि को ऊपर की ओर धकेल देती है। इसके परिणामस्वरूप वायु में भीषण उथल-पुथल और तूफानी दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और वातानों पर वर्षा होने लगती है। इस प्रकार की वर्षा को वाताग्री अथवा चक्रवाती वर्षा कहते हैं।

प्रश्न 13.
विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity) क्या होती है? इसका प्रयोग कब किया जाता है?
उत्तर:
विशिष्ट आर्द्रता वायु के प्रति इकाई भार में जलवाष्प के भार को विशिष्ट आर्द्रता कहते हैं। इसे ग्राम प्रति किलोग्राम द्वारा व्यक्त किया जाता है। आता को व्यक्त करने का यह कुछ बेहतर तरीका है क्योंकि इस पर तापमान और वायुदाब के परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। विशिष्ट आर्द्रता का प्रयोग किसी विशाल वायुराशि के आर्द्रता सम्बन्धी लक्षणों का वर्णन करने के लिए किया जाता है; जैसे

  • सर्दियों में आर्कटिक प्रदेशों में अत्यधिक ठण्डी, शुष्क वायु की विशिष्ट आर्द्रता 0.2 ग्राम प्रति किलोग्राम होती है।
  • भूमध्यरेखीय खण्ड में अत्यधिक उष्ण एवं आर्द्र वायु की विशिष्ट आर्द्रता 18 ग्राम प्रति किलोग्राम होती है।

प्रश्न 14.
विश्व में वर्षा के वार्षिक वितरण के बारे में संक्षेप में लिखें।
उत्तर:
सम्पूर्ण विश्व में वर्षा समान रूप से नहीं होती। विश्व के कई मरुस्थली क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ वर्षा बहुत कम होती है। दूसरी ओर भारत में मौसिनराम (चेरापूंजी के निकट), मेघालय में लगभग 1140 सें०मी० औसत वार्षिक वर्षा होती है। वर्षा की दृष्टि से विश्व को निम्नलिखित भागों में बाँट सकते हैं-
1. विषुवतीय अत्यधिक वर्षा वाली पेटियाँ यहाँ औसत वर्षा 200 सें०मी० से अधिक है। यह क्षेत्र भूमध्य रेखा से 1° अक्षांश उत्तर और दक्षिण के मध्य स्थित है। यहाँ प्रतिदिन दोपहर के बाद वर्षा होती है।

2. उष्ण कटिबन्धीय प्रदेश-इन प्रदेशों में महाद्वीपों के पूर्वी क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा होती है, परन्त पश्चिमी क्षेत्रों में वर्षा 25 सें०मी० से कम होती है। इसलिए उष्ण कटिबन्ध के पश्चिम में मरुस्थल पाए जाते हैं।

3. शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेश इन क्षेत्रों में चक्रवाती वर्षा होती है। यहाँ औसत वर्षा 100 सें०मी० से 125 सें०मी० तक होती है।

4. शीत कटिबन्धीय प्रदेश-यहाँ वर्षा हिमपात के रूप में होती है। यहाँ वर्षा 25 सें०मी० से कम होती है।

प्रश्न 15.
हिमपात तथा सहिम वृष्टि किसे कहते हैं?
उत्तर:
हिमपात-जब वायुमण्डल में जलवाष्प संघनन की प्रक्रिया द्वारा वायु का तापक्रम हिमांक बिन्दु से नीचे चला जाता है तो ऐसी स्थिति में वृष्टि ठोस रूप में होती है, जिसे हिमपात (Snowfall) कहते हैं। षट्कोण के आकार के बर्फ के टुकड़े रुई के समान धरातल पर गिरते हैं तो इन्हें हिमलव या हिमतूल (Snow Flakes) कहते हैं। इनका निर्माण हिम क्रिस्टलों के जुड़ने से होता है।

सहिम वृष्टि या कारकापात-जमाव बिन्दु के तापमान के साथ जब वायु की एक परत सतह के नजदीक आधी जमी हुई परत पर गिरती है तब सहिम वृष्टि (Sleet) होती है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार की वर्षा में जल की बूंदें और हिमकण साथ-साथ बरसती हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायु की आर्द्रता से क्या अभिप्राय है? निरपेक्ष और सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वायु की आर्द्रता (Humidity of Wind) वायु में उपस्थित जलवाष्प को वायु की आर्द्रता कहते हैं। वायु में आर्द्रता वाष्पीकरण द्वारा प्राप्त होती है। समुद्रों, झीलों, नदियों, तालाबों तथा अन्य जलाशयों से सदा जल का वाष्पीकरण होता रहता है। वाष्पीकरण द्वारा जितना भी जल वाष्पीय अवस्था में वायुमण्डल में प्रवेश करता है वह वायुमण्डल में आर्द्रता उत्पन्न करता है। वायुमण्डल में औसत आर्द्रता 2% होती है यद्यपि यह लगभग शून्य से 4% तक पायी जा सकती है।

वायु की जलवाष्प को शोषित करने की एक निश्चित सीमा होती है। यह सीमा तापमान के बढ़ने पर बढ़ जाती है। किसी निश्चित तापमान पर एक घन मीटर वायु कितने जलवाष्प की मात्रा का शोषण कर सकती है उसे वायु की वाष्प शोषण करने की क्षमता कहते हैं। जब वायु अपनी पूरी क्षमता जितना जलवाष्प अपने अन्दर शोषित कर ले तो वह संतृप्त वायु (Saturated Air) कहलाती है। इससे अधिक जलवाष्प की उपस्थिति में संघनन (Condensation) होना आरम्भ हो जाता है। एक घन मीटर वायु द्वारा विभिन्न तापमानों पर अधिकतम जलवाष्प को सम्भालने की क्षमता को निम्नलिखित तालिका से ज्ञात किया जा सकता है-

निरपेक्ष आर्द्रतातापमानसापेक्ष आर्द्रता
10 ग्रा० प्रति घन मीटर15°15%
10 ग्रा० प्रति घन मीटर10°62.5%
16. ग्रा० प्रति घन मीटर15°80%

1. निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity)-वायु के किसी आयतन में निश्चित समय पर उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे प्रायः ग्रेन प्रति घन फुट अथवा ग्राम प्रति घन मीटर में प्रकट किया जाता है। उदाहरणतः यदि किसी समय एक घन मीटर में 15 ग्राम जलवाष्प है तो निरपेक्ष आर्द्रता 15 ग्राम प्रति घन मीटर होगी। यह वाष्पीकरण की मात्रा पर निर्भर टर होगी। यह वाष्पीकरण की मात्रा पर निर्भर करती है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर निरपेक्ष आर्द्रता घटती जाती है। इसी प्रकार समुद्र से दूरी बढ़ने पर भी निरपेक्ष आर्द्रता घटती है।

2. सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity)-किसी निश्चित तापमान पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा तथा उसी तापमान पर उसी वायु को संतृप्त करने के लिए आवश्यक जलवाष्प की मात्रा के अनुपात को सापेक्ष (आपेक्षिक) आर्द्रता (Relative Humidity) कहते हैं। इसको प्रतिशत में प्रकट किया जाता है।

प्रश्न 2.
संघनन किसे कहते हैं? संघनन के विभिन्न रूपों के नाम बताते हुए किसी एक का वर्णन करें। अथवा बादल के विभिन्न रूपों का वर्णन करें।
उत्तर:
संघनन का अर्थ (Meaning of Condensation)-जिस क्रिया द्वारा वायु में उपस्थित जलवाष्प गैस अवस्था से द्रव अवस्था में परिवर्तित होता है, उसे संघनन कहते हैं। (Change of water vapour into water is called condensation)। वाय होने से जलवाष्प की शोषण करने की क्षमता कम हो जाती है। अतः तापमान कम हो जाने पर वायु में पहले से ही उपस्थित जलवाष्प की मात्रा से वायु संतृप्त हो जाती है। जिस तापमान पर वायु संतृप्त हो जाती है उसे ओसांक (Dew Point) कहते हैं। वायुमण्डल में सूक्ष्म धूल के कण, धुआँ तथा समुद्री नमक के महीन कण संघनन के केन्द्र होते हैं इन्हें संघनन केन्द्रक कहा जाता है। इन्हीं के द्वारा संघनन की प्रक्रिया होती है। संघनन की प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित तत्त्व उत्तरदायी हैं

  • जब तापमान में कमी आ जाती है तो वह ओसांक बिन्दु तक पहुँच जाता है।
  • जब वायु की आर्द्रता धारण करने की क्षमता घटकर विद्यमान आर्द्रता की मात्रा से कम हो जाए।
  • जब वाष्पीकरण द्वारा वायु में आता की मात्रा में अतिरिक्त वृद्धि हो जाए।

संघनन के रूप (Forms of Condensation)-संघनन द्वारा निम्नलिखित स्वरूप विकसित होते हैं-

  • ओस
  • तुषार या पाला
  • कुहासा एवं कोहरा
  • बादल या मेघ

बादल या मेघ (Clouds)-वायुमण्डल में ऊँचाई पर जलकणों या हिमकणों के जमाव एवं संघनन को बादल कहते हैं। मेघों का निर्माण वायु के ऊपर उठने वाली वायु के ठण्डा होने से होता है। मेघ कोहरे का बड़ा रूप है जो वायुमण्डल में वायु के रुद्धोष्म प्रक्रिया द्वारा उसका तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे आने से बनते हैं। बादलों की आकृति उनकी निर्माण प्रक्रिया पर आधारित है, लेकिन उनकी ऊँचाई, आकृति, रंग, घनत्व तथा प्रकाश के परावर्तन के आधार पर बादलों को निम्नलिखित चार रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है
1. पक्षाभ बादल (Cirrus Clouds) इस प्रकार के बादल आकाश में सबसे अधिक ऊँचाई पर रेशों की भाँति दिखाई देते हैं। ये सफेद रुई के समान बिखरे होते हैं। इनमें से सूर्य की किरणें आसानी से पार हो जाती हैं। जब ये बादल आकाश में झुण्ड के रूप में एकत्रित हो जाते हैं तो चक्रवात के आने की सम्भावना होती है।

2. कपासी बादल (Cumulus Clouds) कपास के ढेर के समान फैले हुए बादलों को कपासी बादल कहते हैं। कभी-कभी ये बादल लहरदार आकृति में भी देखने को मिलते हैं। इनकी ऊँचाई भी पक्षाभ बादलों के समान अधिक होती है। ये चपटे आधार वाले होते हैं।

3. स्तरी बादल (Startus Clouds)-दो विपरीत स्वभाव वाली पवनों के आपस में मिलने से इस प्रकार के बादलों का निर्माण होता है। ये आकाश में चादर की भाँति 2 कि०मी० की ऊँचाई तक फैले होते हैं। इनका निर्माण शीतोष्ण कटिबन्ध में शीत ऋतु में होता है।

4. वर्षा बादल (Nimbus Clouds) ये काले तथा घने रूप में कम ऊँचाई पर फैले होते हैं। इनसे पर्याप्त वर्षा होती है और वर्षा से पूर्व घने रूप में ये काली छटा के रूप में आकाश में फैल जाते हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल

प्रश्न 3.
वर्षा के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वर्षा के तीन प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

  • संवहनीय वर्षा
  • पर्वतीय वर्षा
  • चक्रवातीय वर्षा।

1. संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall) धरातल पर सूर्यातप के कारण वायु गर्म एवं हल्की होकर वायुमण्डल में उठती है और ऊपर जाकर फैलती है। फैलने से वायु के ठण्डी होने से उसका संघनन आरम्भ हो जाता है जिसके फलस्वरूप वर्षा होती है, इसे संवहनीय वर्षा कहते हैं। वायु के गर्म होकर ऊपर उठने से वायुमण्डल में संवहनीय धाराएँ चलने लगती हैं, इसलिए इसे संवहनीय वर्षा कहते हैं। विषुवतीय प्रदेशों में प्रतिदिन सुबह के समय धरातल गर्म होने से हवाएँ गर्म एवं हल्की होकर ऊपर उठती हैं, जिससे संवहनिक धाराएँ चला करती हैं और प्रतिदिन दोपहर बाद वर्षा होती है। भूमध्य रेखीय प्रदेशों में तापक्रम एवं आर्द्रता की अधिकता के कारण प्रत्येक दिन इस प्रकार की वर्षा होती है।

2 पर्वत-कृत वर्षा अथवा पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall) जब गर्म वायु किसी समुद्री भाग के ऊपर से गुजरती है तो उसकी आर्द्रता ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है और वह पर्याप्त आर्द्रता के साथ आगे बढ़ती है। जब उसके मार्ग में कोई पर्वत श्रेणी अथवा पर्वत चोटी आ जाती है, तो वह गर्म तथा आर्द्र हवा पर्वत के सहारे ऊपर चढ़ती है और ऊँचाई पर संघनन के कारण पर्वताभिमुखी ढाल पर (Windward Slope) पर्याप्त वर्षा करती है, लेकिन जैसे-जैसे ये हवाएँ पर्वत शिखर को पार करके पवनविमुखी ढाल की ओर उतरती हैं तो उनकी आर्द्रता समाप्त हो जाती है और ये शुष्क हो जाती हैं, इसलिए वर्षा नहीं करतीं। अतः दूसरी ओर का ढाल (पवनविमुखी) (Leeward Slope) वृष्टि छाया प्रदेश में आ जाता है। अरब सागर से वाष्प भरी हवाएँ मुम्बई में अधिक वर्षा करती हैं, लेकिन महाबलेश्वर पर्वत को पार करने के बाद उनकी आर्द्रता कम हो जाती है, इसलिए पुणे में मुम्बई की अपेक्षा बहुत कम वर्षा होती है।

3. चक्रवातीय वर्षा (Cyclonic Rainfall)-दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियों के अभिसरण (Convergence) के कारण चक्रवाती वर्षा होती है। मध्य अक्षांशों (शीतोष्ण कटिबन्धों) में जब उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों से गर्म एवं आर्द्र हवाएँ और ध्रुवीय क्षेत्रों की ठण्डी एवं भारी हवाएँ आती हैं तो गर्म तथा उष्ण हवाएँ हल्की होने के कारण शीतल एवं भारी हवाओं के ऊपर चली जाती हैं तथा वायुमण्डल में ऊँचाई पर जाने से संघनन द्वारा वर्षा करती हैं, उसे चक्रवातीय वर्षा कहते हैं। शीत ऋतु में उत्तरी-पश्चिमी भारत में इस प्रकार की वर्षा होती है।

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

HBSE 12th Class History औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
औपनिवेशिक शहरों में रिकॉर्ड्स सँभालकर क्यों रखे जाते थे?
उत्तर:
औपनिवेशिक शहरों में प्रत्येक कार्यालय के अपने ‘रिकॉर्डस रूम’ थे जिनमें रिकॉर्डस को सुरक्षित रखा जाता था। इसके निम्नलिखित कारण थे

(1) भारत में ब्रिटिश सत्ता मुख्यतया आँकड़ों और जानकारियों के संग्रह पर आधारित थी। उसका लक्ष्य भारत के संसाधनों को निरंतर दोहन करते हुए मुनाफा बटोरना था। इसके लिए वह अपने राजनीतिक नियंत्रण को सुदृढ़ रखना चाहती थी। ये दोनों काम बिना पर्याप्त जानकारियों के संभव नहीं थे।

(2) आंकड़ों का सर्वाधिक महत्त्व उनके लिए वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए था। कंपनी सरकार द्वारा वस्तुओं, संसाधनों व व्यापार की संभावनाओं संबंधी आकलन व ब्यौरे तैयार करवाए जाते थे। कंपनी कार्यालयों में आयात-निर्यात संबंधी विवरण रखे जाते थे।

(3) शहरों की प्रशासनिक व्यवस्था की दृष्टि से शहरी जनसंख्या के उतार-चढ़ाव की जानकारी महत्त्वपूर्ण थी। उदाहरण के लिए, सड़क निर्माण, यातायात तथा साफ-सफाई इत्यादि के बारे में निर्णय लेने के लिए विविध जानकारियाँ आवश्यक थीं। अतः सांख्यिकी आँकड़े एकत्रित कर उन्हें सरकारी रिपोर्टों में प्रकाशित किया जाता था।

प्रश्न 2.
औपनिवेशिक संदर्भ में शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए जनगणना संबंधी आंकड़े किस हद तक उपयोगी होते हैं?
उत्तर:
जनगणना के आँकड़े शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनमें लोगों के व्यवसायों की जानकारी तथा उनके लिंग, आयु व जाति संबंधी सूचनाएँ मिलती हैं। ये जानकारियाँ आर्थिक और सामाजिक स्थिति को समझने के लिए काफी उपयोगी हैं। ध्यान रहे कई बार आँकड़ों के इस भारी-भरकम भंडार से सटीकता का भ्रम हो सकता है।

यह जानकारी बिल्कुल सटीक नहीं होती। इन आँकड़ों के पीछे भी संभावित पूर्वाग्रह हो सकते हैं। जैसे कि बहुत-से लोग अपने परिवार की महिलाओं की जानकारी छुपा लेते थे। ऐसे लोगों को किसी श्रेणी विशेष में रखना मुश्किल हो जाता था। वे दो तरह के काम करते थे। उदाहरण के लिए जो खेती भी करता हो और व्यापारी भी हो। ऐसे लोगों को सुविधानुसार ही किसी श्रेणी में रख लिया जाता था।

अपनी इन सीमाओं के बावजूद भी शहरीकरण के रुझानों को समझने में पहले के शहरों की तुलना में ये आँकड़े अधिक महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं। उदाहरण के लिए 1900 से 1940 तक की जनगणनाओं से पता चलता है कि इस अवधि में कुल आबादी का 13 प्रतिशत से भी कम हिस्सा शहरों में रहता था। स्पष्ट है कि औपनिवेशिक काल में शहरीकरण अत्यधिक धीमा और लगभग स्थिर जैसा ही रहा।

प्रश्न 3.
“व्हाइट” और “ब्लैक” टाउन शब्दों का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
‘व्हाइट’ और ‘ब्लैक’ टाउन शब्द नगर संरचना में नस्ली भेदभाव का प्रतीक थे। अंग्रेज़ गोरे लोग दुर्गों के अंदर बनी बस्तियों में रहते थे, जबकि भारतीय व्यापारी, कारीगर और मज़दूर इन किलों से बाहर बनी अलग बस्तियों में रहते थे। दुर्ग के भीतर रहने का आधार रंग और धर्म था। अलग रहने की यह नीति शुरू से ही अपनाई गई थी। अंग्रेज़ों और भारतीयों के लिए अलग-अलग मकान (क्वार्टस) बनाए गए थे।

सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शुरू से ही दिखता है। यह उस समय और भी तीखा हो गया जब अंग्रेज़ों का राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो गया। ‘व्हाइट टाउन’ प्रशासकीय और न्यायिक व्यवस्था का केंद्र भी था।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 4.
प्रमुख भारतीय व्यापारियों ने औपनिवेशिक शहरों में खुद को किस तरह स्थापित किया?
उत्तर:
18वीं सदी से पहले ही बहुत-से भारतीय व्यापारी यूरोपीय कंपनियों के सहायक के तौर पर काम करते आ रहे थे। उनमें से बहुत सारे दुभाषिए थे, यानि अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा जानते थे। वे अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाते थे। साथ में ये एजेंट या व्यापारी का काम भी करते थे। वे निर्यात होने वाली वस्तुओं के संग्रह में सहायक थे। इन सहायक व्यापारिक गतिविधियों में काम करते हुए कुछ भारतीय व्यापारियों ने काफी धन एकत्रित कर लिया था। 19वीं सदी के मध्य से तो

इन धनी व्यापारियों में से कुछ उद्यमी बनने लगे थे, अर्थात् उन्होंने उद्योग लगाने शुरू किए। उदाहरण के लिए, 1853 ई० में बंबई के कावसजी नाना ने भारतीय पूँजी से पहली कपड़ा मिल लगाई, लेकिन इन उभरते हुए भारतीय उद्योगपतियों को सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति से काफी बाधा पहुँची। यह वर्ग अपनी हैसियत को ऊँचा दिखाने के लिए पश्चिमी जीवन-शैली का अनुसरण करने लगा। यह विभिन्न त्योहारों के अवसरों पर रंगीन दावतों का आयोजन करने लगा ताकि अपने स्वामी अंग्रेज़ों को प्रभावित कर सकें। यह अपने देशवासियों को भी अपनी हैसियत का परिचय करवाना चाहता था। इस उद्देश्य से इस वर्ग के लोगों ने बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण करवाया।

प्रश्न 5.
औपनिवेशिक मद्रास में शहरी और ग्रामीण तत्त्व किस हद तक घुल-मिल गए थे? [2017, 2019 (Set-D)]
उत्तर:
मद्रास शहर का विकास अंग्रेज़ शासकों की जरूरतों और सुविधाओं के अनुरूप किया गया था। ‘व्हाइट टाउन’ तो था ही गोरे लोगों के लिए। ‘ब्लैक टाउन’ में भारतीय रहते थे। शहर के इस भाग में बहुत-से लोग नौकरी, व्यवसाय और मजदूरी के लिए आकर बसते रहे। इस प्रकार लंबे समय तक शहर में रहते रहे और ग्रामीण और शहरी तत्त्वों का मिश्रण होता रहा। उदाहरण के लिए

  1. ‘वेल्लार’ एक स्थानीय ग्रामीण जाति थी। कंपनी की नौकरियाँ पाने वालों में ये लोग अग्रणी रहे। इन्होंने मद्रास में नए अवसरों का काफी लाभ उठाया।
  2. तेलुगू कोमाटी समुदाय ने मद्रास में व्यावसायिक सफलता प्राप्त की। धीरे-धीरे इन्होंने अनाज के व्यापार पर नियंत्रण कर लिया।
  3. पेरियार और वन्नियार समुदाय शहर में मजदूरी का कार्य करने लगे थे।

धीरे-धीरे ऐसे बहुत-से समुदायों की बस्तियाँ मद्रास शहर का भाग बन गईं। साथ ही बहुत-से गाँवों को मिलाने के कारण मद्रास शहर दूर-दूर तक फैल गया। आस-पास के गाँव नए उप-शहरों में बदल गए। इस प्रकार शहर फैलता चला गया और मद्रास एक अर्ध-ग्रामीण शहर जैसा हो गया।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
अठारहवीं सदी में शहरी केंद्रों का रूपांतरण किस तरह हुआ?
उत्तर:
18वीं सदी के शहर नए (New) थे। 16वीं व 17वीं सदी के शहरों की तुलना में इन शहरों की भौतिक संरचना और सामाजिक जीवन भिन्न था। ये अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रदर्शित कर रहे थे। नए शहरों में मद्रास, कलकत्ता और बम्बई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे। इनका विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के चलते बंदरगाहों और संग्रह केंद्रों के रूप में हुआ। 18वीं सदी के अंत तक पहुँचते-पहुँचते ये बड़े नगरों के तौर पर उभर चुके थे। इनमें आकर बसने वाले अधिकांश भारतीय अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक गतिविधियों में सहायक के तौर पर काम करने वाले थे। अंग्रेज़ों ने अपने ‘कारखाने’ यानी वाणिज्यिक कार्यालय इन शहरों में स्थापित किए हुए थे।

इनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इनकी किलेबंदी करवाई। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और इसी प्रकार बम्बई में भी दुर्ग बनवाया गया। इन किलों में वाणिज्यिक कार्यालय थे तथा ब्रिटिश लोगों के रहने के लिए निवास थे। सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शरू से ही दिखाई पडता है।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक शहर में सामने आने वाले नए तरह के सार्वजनिक स्थान कौन से थे? उनके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
नए शहर अंग्रेज़ शासकों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रतिबिंबित करते थे। कहने का अभिप्राय यह है कि जो नए सार्वजनिक स्थान विकसित हुए वो मुख्यतया नए शासकों की जरूरत के अनुरूप थे। मुख्य नए सार्वजनिक स्थान व उनके उद्देश्य इस प्रकार हैं

  1. नदी और समुद्र के किनारे गोदियों (Docks) व घाटों का विकास हुआ। इनका उद्देश्य ब्रिटिश व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार करना था।
  2. ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों के लिए वाणिज्यिक कार्यालय और गोदाम बनाए।
  3. व्यापार से जुड़ी अन्य संस्थाओं में यातायात डिपो व बैंकिंग संस्थानों का विकास हुआ। जहाजरानी उद्योग के लिए बीमा एजेंसियाँ बनीं।
  4. प्रशासकीय कार्यालयों की स्थापना हुई। कलकत्ता में ‘राइटर्स बिल्डिंग’ इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

पुस्तक के प्रश्न

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
औपनिवेशिक शहरों में रिकॉर्स सँभालकर क्यों रखे जाते थे?
उत्तर:
औपनिवेशिक शहरों में प्रत्येक कार्यालय के अपने रिकॉर्डस रूम’ थे जिनमें रिकॉर्डस को सुरक्षित रखा जाता था। इसके निम्नलिखित कारण थे

(1) भारत में ब्रिटिश सत्ता मुख्यतया आँकड़ों और जानकारियों के संग्रह पर आधारित थी। उसका लक्ष्य भारत के संसाधनों को निरंतर दोहन करते हुए मुनाफा बटोरना था। इसके लिए वह अपने राजनीतिक नियंत्रण को सुदृढ़ रखना चाहती थी। ये दोनों काम बिना पर्याप्त जानकारियों के संभव नहीं थे।

(2) आंकड़ों का सर्वाधिक महत्त्व उनके लिए वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए था। कंपनी सरकार द्वारा वस्तुओं, संसाधनों व व्यापार की संभावनाओं संबंधी आकलन व ब्यौरे तैयार करवाए जाते थे। कंपनी कार्यालयों में आयात-निर्यात संबंधी विवरण रखे जाते थे।

(3) शहरों की प्रशासनिक व्यवस्था की दृष्टि से शहरी जनसंख्या के उतार-चढ़ाव की जानकारी महत्त्वपूर्ण थी। उदाहरण के लिए, सड़क निर्माण, यातायात तथा साफ-सफाई इत्यादि के बारे में निर्णय लेने के लिए विविध जानकारियाँ आवश्यक थीं। अतः सांख्यिकी आँकड़े एकत्रित कर उन्हें सरकारी रिपोर्टों में प्रकाशित किया जाता था।

प्रश्न 2.
औपनिवेशिक संदर्भ में शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए जनगणना संबंधी आंकड़े किस हद तक उपयोगी होते हैं?
उत्तर:
जनगणना के आँकड़े शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनमें लोगों के व्यवसायों की जानकारी तथा उनके लिंग, आयु व जाति संबंधी सूचनाएँ मिलती हैं। ये जानकारियाँ आर्थिक और सामाजिक स्थिति को समझने के लिए काफी उपयोगी हैं। ध्यान रहे कई बार आँकड़ों के इस भारी-भरकम भंडार से सटीकता का भ्रम हो सकता है। यह जानकारी बिल्कुल सटीक नहीं होती।

इन आँकड़ों के पीछे भी संभावित पूर्वाग्रह हो सकते हैं। जैसे कि बहुत-से लोग अपने परिवार की महिलाओं की जानकारी छुपा लेते थे। ऐसे लोगों को किसी श्रेणी विशेष में रखना मुश्किल हो जाता था। वे दो तरह के काम करते थे। उदाहरण के लिए जो खेती भी करता हो और व्यापारी भी हो। ऐसे लोगों को सुविधानुसार ही किसी श्रेणी में रख लिया जाता था।

अपनी इन सीमाओं के बावजूद भी शहरीकरण के रुझानों को समझने में पहले के शहरों की तुलना में ये आँकड़े अधिक महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं। उदाहरण के लिए 1900 से 1940 तक की जनगणनाओं से पता चलता है कि इस अवधि में कुल आबादी का 13 प्रतिशत से भी कम हिस्सा शहरों में रहता था। स्पष्ट है कि औपनिवेशिक काल में शहरीकरण अत्यधिक धीमा और लगभग स्थिर जैसा ही रहा।

प्रश्न 3.
“व्हाइट” और “ब्लैक” टाउन शब्दों का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
‘व्हाइट’ और ‘ब्लैक’ टाउन शब्द नगर संरचना में नस्ली भेदभाव का प्रतीक थे। अंग्रेज़ गोरे लोग दुर्गों के अंदर बनी बस्तियों में रहते थे, जबकि भारतीय व्यापारी, कारीगर और मज़दूर इन किलों से बाहर बनी अलग बस्तियों में रहते थे। दुर्ग के भीतर रहने का आधार रंग और धर्म था। अलग रहने की यह नीति शुरू से ही अपनाई गई थी। अंग्रेज़ों और भारतीयों के लिए अलग-अलग मकान (क्वार्टस) बनाए गए थे। सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शुरू से ही दिखता है। यह उस समय और भी तीखा हो गया जब अंग्रेज़ों का राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो गया। ‘व्हाइट टाउन’ प्रशासकीय और न्यायिक व्यवस्था का केंद्र भी था।

प्रश्न 4.
प्रमुख भारतीय व्यापारियों ने औपनिवेशिक शहरों में खुद को किस तरह स्थापित किया?
उत्तर:
18वीं सदी से पहले ही बहुत-से भारतीय व्यापारी यूरोपीय कंपनियों के सहायक के तौर पर काम करते आ रहे थे। उनमें से बहुत सारे दुभाषिए थे, यानि अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा जानते थे। वे अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाते थे। साथ में ये एजेंट या व्यापारी का काम भी करते थे। वे निर्यात होने वाली वस्तुओं के संग्रह में सहायक थे। इन सहायक व्यापारिक गतिविधियों में काम करते हुए कुछ भारतीय व्यापारियों ने काफी धन एकत्रित कर लिया था।

19वीं सदी के मध्य से तो इन धनी व्यापारियों में से कुछ उद्यमी बनने लगे थे, अर्थात् उन्होंने उद्योग लगाने शुरू किए। उदाहरण के लिए, 1853 ई० में बंबई के कावसजी नाना ने भारतीय पूँजी से पहली कपड़ा मिल लगाई, लेकिन इन उभरते हुए भारतीय उद्योगपतियों को सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति से काफी बाधा पहुंची।

यह वर्ग अपनी हैसियत को ऊँचा दिखाने के लिए पश्चिमी जीवन-शैली का अनुसरण करने लगा। यह विभिन्न त्योहारों के अवसरों पर रंगीन दावतों का आयोजन करने लगा ताकि अपने स्वामी अंग्रेजों को प्रभावित कर सकें। यह अपने देशवासियों को भी अपनी हैसियत का परिचय करवाना चाहता था। इस उद्देश्य से इस वर्ग के लोगों ने बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण करवाया।

प्रश्न 5.
औपनिवेशिक मद्रास में शहरी और ग्रामीण तत्त्व किस हद तक घुल-मिल गए थे?
उत्तर:
मद्रास शहर का विकास अंग्रेज़ शासकों की जरूरतों और सुविधाओं के अनुरूप किया गया था। ‘व्हाइट टाउन’ तो था ही गोरे लोगों के लिए। ‘ब्लैक टाउन’ में भारतीय रहते थे। शहर के इस भाग में बहुत-से लोग नौकरी, व्यवसाय और मजदूरी के लिए आकर बसते रहे। इस प्रकार लंबे समय तक शहर में रहते रहे और ग्रामीण और शहरी तत्त्वों का मिश्रण होता रहा। उदाहरण के लिए
(1) ‘वेल्लार’ एक स्थानीय ग्रामीण जाति थी। कंपनी की नौकरियाँ पाने वालों में ये लोग अग्रणी रहे। इन्होंने मद्रास में नए अवसरों का काफी लाभ उठाया।

(2) तेलुगू कोमाटी समुदाय ने मद्रास में व्यावसायिक सफलता प्राप्त की। धीरे-धीरे इन्होंने अनाज के व्यापार पर नियंत्रण कर लिया।

(3) पेरियार और वन्नियार समुदाय शहर में मजदूरी का कार्य करने लगे थे। धीरे-धीरे ऐसे बहुत-से समुदायों की बस्तियाँ मद्रास शहर का भाग बन गईं। साथ ही बहुत-से गाँवों को मिलाने के कारण मद्रास शहर दूर-दूर तक फैल गया। आस-पास के गाँव नए उप-शहरों में बदल गए। इस प्रकार शहर फैलता चला गया और मद्रास एक अर्ध-ग्रामीण शहर जैसा हो गया।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
अठारहवीं सदी में शहरी केंद्रों का रूपांतरण किस तरह हुआ?
उत्तर:
18वीं सदी के शहर नए (New) थे। 16वीं व 17वीं सदी के शहरों की तुलना में इन शहरों की भौतिक संरचना और सामाजिक जीवन भिन्न था। ये अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रदर्शित कर रहे थे। नए शहरों में मद्रास, कलकत्ता और बम्बई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे। इनका विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के चलते बंदरगाहों और संग्रह केंद्रों के रूप में हुआ।

18वीं सदी के अंत तक पहुँचते-पहुँचते ये बड़े नगरों के तौर पर उभर चुके थे। इनमें आकर बसने वाले अधिकांश भारतीय अंग्रेजों की वाणिज्यिक गतिविधियों में सहायक के तौर पर काम करने वाले थे। अंग्रेज़ों ने अपने ‘कारखाने’ यानी वाणिज्यिक कार्यालय इन शहरों में स्थापित किए हुए थे।

इनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इनकी किलेबंदी करवाई। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और इसी प्रकार बम्बई में भी दुर्ग बनवाया गया। इन किलों में वाणिज्यिक कार्यालय थे तथा ब्रिटिश लोगों के रहने के लिए निवास थे। सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शुरू से ही दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक शहर में सामने आने वाले नए तरह के सार्वजनिक स्थान कौन से थे? उनके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
नए शहर अंग्रेज़ शासकों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रतिबिंबित करते थे। कहने का अभिप्राय यह है कि जो नए सार्वजनिक स्थान विकसित हुए वो मुख्यतया नए शासकों की जरूरत के अनुरूप थे।
मुख्य नए सार्वजनिक स्थान व उनके उद्देश्य इस प्रकार हैं

  • नदी और समुद्र के किनारे गोदियों (Docks) व घाटों का विकास हुआ। इनका उद्देश्य ब्रिटिश व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार करना था।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों के लिए वाणिज्यिक कार्यालय और गोदाम बनाए।
  • व्यापार से जुड़ी अन्य संस्थाओं में यातायात डिपो व बैंकिंग संस्थानों का विकास हुआ। जहाजरानी उद्योग के लिए बीमा एजेंसियाँ बनीं।
  • प्रशासकीय कार्यालयों की स्थापना हुई। कलकत्ता में ‘राइटर्स बिल्डिंग’ इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
  • पाश्चात्य शिक्षा के लिए अंग्रेज़ी-शिक्षण संस्थान खोले गए। ईसाई लोगों के लिए एंग्लिकन चर्च बनाए गए।
  • रेलवे के विस्तार के साथ बड़े-बड़े रेलवे-जंक्शन बनाए गए।
  • 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बड़े शहरों में नगर निगम तथा अन्य शहरों में नगरपालिकाओं का गठन किया गया। इनका उद्देश्य शहर में सफाई, जल-आपूर्ति तथा चिकित्सा इत्यादि का प्रबंध करना था।

प्रश्न 8.
उन्नीसवीं सदी में नगर-नियोजन को प्रभावित करने वाली चिंताएँ कौन सी थीं?
उत्तर:
19वीं सदी के प्रारंभ से ही नगर-नियोजन की चिंता अंग्रेज़ प्रशासकों को सताने लगी थी। 1857 ई० के विद्रोह के बाद यह चिंता और भी गहरा गई। हैजा और प्लेग जैसी महामारियों के फैलने से वे और भी चिंतित हो उठे थे। सबसे पहले इस ओर ध्यान लॉर्ड वेलेज्ली ने दिया। 1803 में उसका प्रशासकीय आदेश ‘जन-स्वास्थ्य’ व नगर नियोजन में एक प्रमुख विचार बन गया था। प्रश्न यह उठता है कि आखिर क्यों उन्होंने नगर को व्यवस्थित करने पर जोर दिया? जबकि काफी समय तक उन्होंने शहर में भारतीयों की बस्तियों में सुधार की ओर कोई ध्यान नहीं दिया था। अंग्रेज़ अधिकारियों की नगर को नियोजित करने के पीछे निम्नलिखित चिंताएँ थीं

1. प्रशासकीय नियंत्रण उन्होंने यह महसूस किया कि शहरी जीवन के सभी आयामों पर नियंत्रण के लिए स्थायी व सार्वजनिक नियम बनाना जरूरी है। साथ ही सड़कों व इमारतों के निर्माण के लिए मानक नियमों का होना भी जरूरी है।

2. सुरक्षा-किलों के बाहर उन्होंने विशेषतौर पर खुला मैदान रखा ताकि आक्रमण होने की स्थिति में सीधी गोलीबारी की जा सके। कलकत्ता के किले के बाहर ऐसे मैदान आज भी मौजूद हैं।

3. सुरक्षित आश्रयस्थल-सन् 1857 के विद्रोह के बाद औपनिवेशिक शहरों के नियोजन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। आतंकित अधिकारी वर्ग ने भविष्य में विद्रोह की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए ‘देशियों’ यानी भारतीयों से अलग ‘सिविल लाइंस’ में रहने की नीति अपनाई।

4. स्वास्थ्य की चिंता–प्लेग व हैजा जैसी महामारियों के प्रसार के डर से नगर-नियोजन की जरूरत और भी महत्त्वपूर्ण होती गई। वे इस बात से परेशान हो उठे कि भीड़-भाड़ वाली भारतीय बस्तियों में गंदगी व दूषित पानी से बीमारियाँ फैल रही हैं। इस विचार से इन बस्तियों में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ गया।

5. सत्ता की ताकत का प्रदर्शन-व्यवस्थित नगरों के माध्यम से अंग्रेज़ अपनी साम्राज्यवादी ताकत का प्रदर्शन करना चाहते थे। इसलिए विशेषतौर पर पहले उन्होंने कलकत्ता, बंबई और मद्रास को नियोजित राजधानियाँ बनाया। फिर दिल्ली को ‘नई दिल्ली’ के रूप में विकसित किया।

प्रश्न 9.
नए शहरों में सामाजिक संबंध किस हद तक बदल गए?
उत्तर:
नए शहरों का सामाजिक संबंध पहले के शहरों से बहुत कुछ अलग था। इसमें जिन्दगी की गति बहुत तेज़ थी। नए सामाजिक वर्ग व संबंध उभर चुके थे। मुख्य परिवर्तन इस प्रकार थे

(1) नए शहर मध्य वर्ग के केन्द्र बन चुके थे। इस वर्ग में शिक्षक, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, क्लर्क तथा अकाउंटेंट्स इत्यादि थे। यह वर्ग एक नया सामाजिक समूह था जिसके लिए पुरानी पहचान अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं रही थी। इन नए शहरों में पुराने शहरों वाला परस्पर मिलने-जुलने का अहसास खत्म हो चुका था, लेकिन साथ ही मिलने-जुलने के नए स्थल; जैसे कि सार्वजनिक पार्क, टाउन हॉल, रंगशाला और 20वीं सदी में सिनेमा हॉल इत्यादि बन चुके थे।

(2) नए शहरों में नए अर्थतंत्र के विकास से औरतों के लिए नए अवसर उत्पन्न हुए। फलतः सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी। वे घरों में नौकरानी, फैक्टरी में मजदूर, शिक्षिका, रंग-कर्मी तथा फिल्मों में कार्य करती हुई दिखाई देने लगीं। उल्लेखनीय है कि सार्वजनिक स्थानों पर कामकाज करने वाली महिलाओं को लंबे समय तक सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा गया, क्योंकि रूढ़िवादी विचारों के लोग पुरानी परम्पराओं और व्यवस्था को बनाए रखने का समर्थन कर रहे थे। वे परिवर्तन के विरोधी थे।

(3) कामगार लोगों के लिए शहरी जीवन एक संघर्ष था। ये लोग इन नए शहरों की तड़क-भड़क से आकर्षित होकर या रोजी-रोटी की तलाश में आए। शहर में इनकी नौकरी स्थायी नहीं थी। वेतन कम था और खर्चे ज्यादा थे। इसलिए इनके परिवार गाँवों में रहते थे।

इस प्रकार कामगार लोगों का जीवन गरीबी से पीड़ित था। वे गाँव की संस्कृति से वंचित हो गए थे। शहरों में इन्होंने भी एक हद तक ‘एक शहरी संस्कृति’ रच ली थी। वे धार्मिक त्योहारों, मेलों, स्वांगों तथा तमाशों इत्यादि में भाग लेते थे। ऐसे अवसरों पर वे अपने यूरोपीय और भारतीय स्वामियों का मज़ाक उड़ाते थे।

परियोजना कार्य

प्रश्न 10.
पता लगाइए कि आपके कस्बे या गाँव में स्थानीय प्रशासन कौन-सी सेवाएँ प्रदान करता है। क्या जलापूर्ति, आवास, यातायात और स्वास्थ्य एवं स्वच्छता आदि सेवाएँ भी उनके हिस्से में आती हैं? इन सेवाओं के लिए संसाधनों की व्यवस्था कैसे की जाती है? नीतियाँ कैसे बनाई जाती हैं? क्या शहरी मज़दूरों या ग्रामीण इलाकों के खेतिहर मजदूरों के पास नीति-निर्धारण में हस्तक्षेप का अधिकार होता है? क्या उनसे राय ली जाती है? अपने निष्कर्षों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर:
संकेत

1. कस्बे, शहर और गाँव के प्रशासन को स्थानीय प्रशासन कहा जाता है।

2. स्थानीय प्रशासन, जलापूर्ति, आवास, यातायात, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता आदि बहुत-सी सेवाओं के लिए उत्तरदायी होता है-अब आपने देखना है कि व्यवहार में स्थिति क्या है? क्या स्वच्छता, सड़क व जलापूर्ति संतोषजनक हैं, बहुत ही बेहतर है या फिर असंतोषजनक।

3. शहर व गाँव से निकलने वाले कचरे व कूड़ा-करकट के लिए क्या व्यवस्था की गई है? खुले में फैंका जाता है, दबाया जाता है, जलाया जाता है या फिर कोई ‘प्लाट’ लगाकर खाद व अन्य उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है। पता लगाएँ।

4. इन सभी सुविधाओं के लिए धन की व्यवस्था कहाँ से होती है, अर्थात् प्रत्यक्ष कर कितना लगाया जाता है और राज्य व केंद्रीय सरकार से कितना अनुदान प्राप्त होता है। क्या विश्व बैंक भी इसमें सहायता कर रहा है-पता लगाएँ। यदि कर रहा है तो क्यों?

5. स्थानीय गरीब लोगों (मजदूर, खेत, मजदूर इत्यादि) का नीति निर्धारण में योगदान इस बात से पता लगाएँ कि गाँव या कस्बे के निकाय के लिए चुनाव होता है या नहीं। दूसरा अधिकारी वर्ग उनकी बात सुनता है या नहीं।

6. उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अपने प्राध्यापक के निर्देशन में रिपोर्ट तैयार करें।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 11.
अपने शहर या गाँव में पाँच तरह की इमारतों को चुनिए। प्रत्येक के बारे में पता लगाइए कि उन्हें कब बनाया गया, उनको बनाने का फैसला क्यों लिया गया, उनके लिए संसाधनों की व्यवस्था कैसे की गई, उनके निर्माण का जिम्मा किसने उठाया और उनके निर्माण में कितना समय लगा। उन इमारतों के स्थापत्य या वास्तु शैली संबंधी आयामों का वर्णन करिए और औपनिवेशिक स्थापत्य से उनकी समानताओं या भिन्नताओं को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
हर शहर व गाँव में सार्वजनिक भवन होते हैं जैसे कि, स्कूल, महाविद्यालय, पंचायतघर, शहर में टाउन हाल, नगरपालिका, अस्पताल, लाइब्रेरी इत्यादि।

  1. इनको बनाने में पंचायत, नगर निगम/पालिका यानी स्थानीय निकायों की भूमिका की जांच करें। सामान्य लोगों की राय किस प्रकार ऐसे निर्णयों का हिस्सा बनती है?
  2. धन के लिए क्या स्थानीय कर लगाया गया या राज्य व केंद्र में ‘ग्रांट’ मिली।
  3. इनमें ‘वास्तुशैली’ अथवा स्थापत्य शैली कौन-सी अपनाई गई है। सत्ता की झलक किस रूप में मिलती है-देखें। कौन-सी संस्कृति झलकती है।
  4. औपनिवेशिक स्थापत्य से यदि तुलना करोगे तो आप पाओगे कि नए स्थापत्य में स्वतंत्र भारत की झलक है।
  5. इन सब पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपने प्राध्यापक के निर्देशन में रिपोर्ट तैयार करें।

औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य HBSE 12th Class History Notes

→ शहरीकरण-शहर का भौतिक व सांस्कृतिक विकास अर्थात शहरी संस्थाओं (प्रशासनिक व शैक्षणिक) का विकास; मध्य वर्ग का विकास; भौतिक संरचना का विस्तार व विकास; नए शहरी तत्त्वों विशेषतः आधुनिक दृष्टिकोण का विकास।

→ कस्बा-मुगलकालीन भारत में एक छोटा ‘ग्रामीण शहर’ जो सामान्यतया किसी विशिष्ट व्यक्ति का केंद्र होता था।

→ गंज-मुगलकालीन कस्बों में एक स्थायी छोटे बाजार को गंज कहा जाता था।

→ पेठ व पुरम-पेठ एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है बस्ती, जबकि पुरम शब्द गाँव के लिए प्रयोग किया जाता है।

→ बस्ती बस्ती (बंगला व हिंदी) का अर्थ मूल रूप में मोहल्ला अथवा बसावट हुआ करता था। परंतु अंग्रेज़ों ने इसका अर्थ संकुचित कर दिया तथा इसे गरीबों की कच्ची झोंपड़ियों के लिए प्रयोग करने लगे। 19वीं सदी में गंदी-झोंपड़ पट्टी को बस्ती कहा जाने लगा।

→ बंगलो (Bunglow)-अंग्रेज़ी भाषा का यह शब्द बंगाल के ‘बंगला’ शब्द से निकला है जो एक परंपरागत फँस की झोंपड़ी होती थी। अंग्रेज़ अधिकारियों ने अपने रहने के बड़े-बड़े घरों को बंगलों नाम देकर इसका अर्थ ही बदल दिया।

→ ढलवाँ छतें -ढलवाँ छतें (Pitched Roofs) स्लोपदार छतों को कहा गया। 20वीं सदी के शुरु से ही बंगलों में ढलवाँ छतों का चलन कम होने लगा था तथापि मकानों की सामान्य योजना में कोई बदलाव नहीं आया था।

→ सिविल लाइंस -पुराने शहर के साथ लगते खेत एवं चरागाह को साफ करके विकसित किए गए शहरी क्षेत्र को ‘सिविल लाइंस’ का नाम दिया गया। इनमें सुनियोजित तरीके से बड़े-बड़े बगीचे, बंगले, चर्च, सैनिक बैरकें और परेड मैदान आदि होते थे।

→ औद्योगिकीकरण यह शब्द औद्योगिक क्रांति की उस प्रक्रिया के लिए उपयोग में लाया गया है जिसमें विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए, जिनमें लोहा, स्टील, कोयला एवं वस्त्र आदि सभी उद्योगों का स्वरूप बदल गया। वाष्प ऊर्जा – औद्योगिक क्रांति का मुख्य आधार थी। यह सबसे पहले इंग्लैंड (लगभग 1750 से 1850 के बीच) में हुई।

→ भारत में औपनिवेशिकरण के फलस्वरूप शहरों और उनके चरित्र में परिवर्तन हुए। नए शहरों का उदय हुआ। इनमें पश्चिम तट पर बम्बई व पूर्वी तट पर मद्रास और कलकत्ता तीन प्रमुख बन्दरगाह नगर विकसित हुए। ये तीनों कभी मछुआरों और दस्तकारों के गाँव मात्र थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के कारण धीरे-धीरे 18वीं सदी के अंत तक भारत के सबसे बड़े शहर बन गए।

यहाँ इन तीनों शहरों का गहन अध्ययन किया गया है। औपनिवेशिक और वाणिज्यिक संस्कृति का प्रभुत्व नगरों की बसावट और इनके स्थापत्य में स्पष्ट तौर पर दिखाई दिया। इस दौरान बनी इमारतों में कई तरह की स्थापत्य शैलियाँ अपनाई गईं। नगर नियोजन और स्थापत्य शैलियों का अध्ययन करके औपनिवेशिक शहरों को समझने का प्रयास किया गया है।

→औपनिवेशिक शहर मुगलकालीन शहरों से बहुत भिन्न थे। 16वीं-17वीं सदी के मुगलकालीन शहरों की श्रेणी में कस्बे सबसे छोटे थे। इन्हें ‘ग्रामीण शहर’ भी कहा जाता था। एक छोटे शहर के रूप में ही ये गाँव से अलग होते थे। मुगल काल में कस्बा सामान्यतया किसी स्थानीय विशिष्ट व्यक्ति का केंद्र होता था। इसमें एक छोटा स्थायी बाज़ार होता था, जिसे गंज कहते थे। यह बाजार विशिष्ट परिवारों एवं सेना के लिए कपड़ा, फल, सब्जी तथा दूध इत्यादि सामग्री उपलब्ध करवाता था।

→ कस्बे की मुख्य विशेषता जनसंख्या नहीं थी बल्कि उसकी विशिष्ट आर्थिक व सांस्कृतिक गतिविधियाँ थीं। ग्रामीण अंचलों में रहने वाले लोगों का जीवन-निर्वाह मुख्यतः कृषि, पशुपालन और वनोत्पादों पर निर्भर था। ग्रामीणों की आवश्यकताओं के अनुरूप गाँवों में साधारण स्तर की दस्तकारी थी।

→ दूसरी ओर, शहरी लोगों के आजीविका के साधन अलग थे। उनकी जीवन-शैली गाँव से अलग थी। शहरों में मुख्य तौर पर शासक, प्रशासक तथा शिल्पकार व व्यापारी रहते थे। शहरी शिल्पकार किसी विशिष्ट कला में निपुण होते थे, क्योंकि वे प्रायः अपनी शिल्पकला से संपन्न और सत्ताधारी वर्गों की जरूरतों को पूरा करते थे। शहर में रहने वाले सभी लोगों के लिए खाद्यान्न सदैव गाँव से ही आता था। अन्य कृषि-उत्पाद व जरूरत के लिए वन-उत्पाद भी उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों से ही प्राप्त होते थे। शहरों की एक अलग पहचान उनके भव्य भवन, स्थापत्य और उनकी किलेबंदी भी था।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 12 Img 1
18वीं सदी में भारत के बहुत-से पुराने शहरों का महत्त्व कम हो गया। साथ ही कई नए शहरों का भी उदय हुआ। राजनीतिक विकेंद्रीकरण के परिणामस्वरूप लखनऊ, हैदराबाद श्रीरंगापट्टम, पूना (आधुनिक पुणे), नागपुर, बड़ौदा और तंजौर (तंजावुर) जैसी क्षेत्रीय राजधानियों का महत्त्व बढ़ गया। अतः इस राजनीतिक विकेंद्रीकरण के कारण दिल्ली, लाहौर व आगरा इत्यादि मुगल सत्ता के प्रमुख नगर केंद्रों से व्यापारी, प्रशासक, शिल्पकार, साहित्यकार, कलाकार, इत्यादि काम और संरक्षण की तलाश में इन नए नगरों की ओर पलायन करने लगे।

→ यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों ने मुगल काल के दौरान ही भारत के विभिन्न स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कर ली थीं। उदाहरण के लिए 1510 में पुर्तगालियों ने पणजी में, 1605 में डचों ने मछलीपट्नम में, 1639 में अंग्रेज़ों ने मद्रास में तथा 1673 में फ्रांसीसियों ने पांडिचेरी (आजकल पुद्दचेरी) में शुरू में व्यापारिक कार्यालय (इन्हें कारखाने कहा जाता था) बनाए। इन ‘कारखानों’ के आस-पास धीरे-धीरे बस्तियों का आकार विस्तृत होने लगा। इस प्रकार शहर वाणिज्यवाद तथा पूँजीवाद परिभाषित होने लगे।

→ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक नियंत्रण स्थापित होने के उपरान्त इन शहरों का पतन शुरु हो गया। नई आर्थिक राजधानियों के रूप में मद्रास, कलकत्ता व बम्बई जैसे औपनिवेशिक बंदरगाह शहरों का उदय तेजी से होने लगा। सन् 1800 के आस-पास तक यह जनसंख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़े शहर बन गए। इसका कारण था कि ये औपनिवेशिक प्रशासन और सत्ता के केंद्र भी बन चुके थे। इनमें नए भवन नई स्थापत्य-कला के साथ स्थापित किए गए। बहुत-से नए संस्थानों का विकास हुआ। इस प्रकार ये शहर आजीविका की तलाश में आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गए।

→ सन् 1900 से लेकर 1940 तक भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 13 प्रतिशत लोग ही शहरों में रहते थे। औपनिवेशिक काल में शहरीकरण अत्यधिक धीमा और लगभग स्थिर जैसा ही रहा। यदि पूर्व-ब्रिटिशकाल से तुलना की जाए तो शहरों में आजीविका कमाने वाले लोगों की संख्या बढ़ने की बजाय कम हुई। अंग्रेज़ों के राजनीतिक नियंत्रण के फलस्वरूप और आर्थिक नीतियों के चलते कलकत्ता, बम्बई और मद्रास जैसे नए शहरों का उदय तो हुआ, लेकिन ये ऐसे शहर नहीं बन पाए जिससे भारत की समूची अर्थव्यवस्था में शहरीकरण को लाभ मिले। वस्तुतः अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों व गतिविधियों के कारण उन शहरों
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का भी पतन हो गया जो अपने किसी विशिष्ट उत्पादों के लिए प्रसिद्ध थे। उदाहरण के लिए ढाका, मुर्शिदाबाद, सोनारगांव इत्यादि वस्त्र उत्पादक केंद्र बर्बाद होते गए।

रेलवे नेटवर्क के इस विस्तार से भारत में बहुत-से शहरों की कायापलट हुई। खाद्यान्न तथा कपास व जूट इत्यादि रेलवे स्टेशन आयातित वस्तुओं के वितरण तथा कच्चे माल के संग्रह केंद्र बन गए। इसके परिणामस्वरूप नदियों के किनारे बसे तथा पुराने मार्गों पर पड़ने वाले उन शहरों का महत्त्व कम होता गया जो पहले कच्चे माल के संग्रह केंद्र थे। रेलवे विस्तार के साथ रेलवे कॉलोनियाँ बसाई गईं। लोको (रलवे वर्कशॉप) स्थापित हुए। इन गतिविधियों से भी कई नए रेलवे शहर; जैसे कि बरेली, जमालपुर, वाल्टेयर आदि अस्तित्व में आए।

→ औपनिवेशिक शहर अपने नाम और स्थान से ही नए (New) नहीं थे, अपितु अपने स्वरूप से भी नए थे। ये अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रतिबिम्बित कर रहे थे। ये आधुनिक औद्योगिक शहर नहीं बन पाए बल्कि औपनिवेशिक शहरों के तौर पर ही विकसित हुए। इनका विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के चलते उपयोगी बंदरगाहों और संग्रह केंद्रों के रूप में हुआ।

→ अंग्रेज़ों ने अपनी ‘व्यापारिक बस्तियों’ व ‘कारखानों’ की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इनकी किलेबंदी करवाई। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और इसी प्रकार बम्बई में भी दुर्ग बनवाया गया। इन किलों में वाणिज्यिक कार्यालय थे तथा ब्रिटिश लोगों के रहने के लिए निवास थे। अंग्रेज़ों और भारतीयों के लिए अलग-अलग मकान (क्वार्टस) बनाए गए थे।

→ सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शुरु से ही परिलक्षित हुआ। इन शहरों में आधुनिक औद्योगिक विकास के अंकुर तो फूटने लगे, लेकिन यह विकास बहुत ही धीमा और सीमित रहा। इसका कारण पक्षपातपूर्ण संरक्षणवादी नीतियाँ थीं। इन नीतियों ने औद्योगिक विकास को एक सीमा से आगे नहीं बढ़ने दिया। फैक्ट्री उत्पादन शहरी अर्थव्यवस्था का आधार नहीं बन सका। वास्तव में कलकत्ता, बम्बई व मद्रास जैसे विशाल शहर मैनचेस्टर या लंकाशायर ब्रिटिश औद्योगिक शहरों की तरह औद्योगिक नगर नहीं बन सके। ये औद्योगिक नगरों की अपेक्षा सेवा-क्षेत्र अधिक थे।

→ औपनिवेशिक वाणिज्यिक संस्कृति प्रतिबिम्बित हुई। राजनीतिक सत्ता और संरक्षण ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों के हाथों में आने से नई शहरी संस्कृति उत्पन्न हुई। नए संस्थानों का उदय हुआ। नदी अथवा समुद्र के किनारे गोदियों (Docks) व घाटों का विकास होने लगा। व्यापार से जुड़ी अन्य संस्थाओं का उदय हुआ जैसे कि जहाज़रानी उद्योग के लिए बीमा एजेंसियाँ बनीं तथा यातायात डिपो व बैंकिंग संस्थानों की स्थापना हुई।

→ कंपनी के प्रमुख प्रशासकीय कार्यालयों की स्थापना अपने आप में ब्रिटिश प्रशासन में नौकरशाही के बढ़ते हुए प्रभाव का सूचक था। औपनिवेशिक शहरों में शासक वर्ग तथा संपन्न यूरोपियन व्यापारी वर्ग के निजी महलनुमा मकान बने। उनके लिए पृथक क्लब, रेसकोर्स तथा रंगमंच इत्यादि भी स्थापित किए गए। ये जहाँ विदेशी अभिजात वर्ग की रुचियों को अभिव्यक्त कर रहे थे वहीं इनसे भेदभाव और प्रभुत्व भी स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

→ एक नया भारतीय संभ्रांत वर्ग भी इन शहरों में उत्पन्न हो चुका था। यह वर्ग अपनी हैसियत को ऊँचा दिखाने के लिए पाश्चात्य जीवन-शैली का अनुसरण करने लगा। दूसरी ओर, इन शहरों में काफी बड़ी संख्या में कामगार एवं गरीब लोग रहते थे। यह खानसामा, पालकीवाहक, गाड़ीवान तथा चौकीदारों के रूप में संभ्रांत भारतीय एवं यूरोपीय लोगों को अपनी सेवाएँ उपलब्ध करवाते थे। इसके अतिरिक्त ये औद्योगिक मजदूरों के रूप में या फिर पोर्टर, निर्माण एवं गोदी मजदूरों के तौर पर कार्य करते थे। इन लोगों की स्थिति अच्छी नहीं थी। ये लोग शहर के विभिन्न भागों में घास-फूस की कच्ची झोंपड़ियों में रहते थे।

→ लम्बे समय तक उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य और सफाई जैसे मुद्दों की ओर अंग्रेजों ने कभी ध्यान नहीं दिया। उन्होंने गोरी बस्तियों को ही साफ और सुंदर बनाने पर बल दिया था। लेकिन महामारियों के मंडराते खतरों से उनके इस दृष्टिकोण में बदलाव आने लगा। हैजा, प्लेग, चेचक जैसी महामारियों में लाखों लोग मर रहे थे। इससे प्रशासकों को यह खतरा सताने लगा कि ये बीमारियाँ उनके क्षेत्रों में भी फैल सकती हैं। इसलिए उनके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाई के लिए कुछ कदम उठाने जरूरी हो गए।

→ पर्वतीय शहर भी नए औपनिवेशिक विशेष शहरों के तौर पर विकसित हुए। शुरू में ये सैनिक छावनियाँ बनीं, फिर अधिकारियों के आवास-स्थल और अन्ततः पर्वतीय पर्यटन स्थलों के तौर पर विकसित हुए। इन शहरों में शिमला, माउंट आबू, दार्जीलिंग व नैनीताल इत्यादि थे।

→ धीरे-धीरे ये पर्वतीय शहर एक तरह से सेनिटोरियम (Sanitoriums) बन गए अर्थात् ऐसे स्थान बन गए जहाँ सैनिकों को आराम व चिकित्सा के लिए भेजा जाने लगा। पहाड़ी शहरों की जलवायु स्वास्थ्यवर्द्धक थी। पहाड़ों की मृदु और ठण्डी जलवायु अंग्रेज़ व यूरोपीय अधिकारियों को लुभाती थी। यही कारण था कि गर्मियों के दिनों में अंग्रेज़ अपनी राजधानी शिमला बनाते थे। इन्होंने अपने निजी और सार्वजनिक भवन यूरोपीय शैली में बनवाए।

→ इन घरों में रहते हुए उन्हें यूरोप में अपनी निवास बस्तियों की अनुभूति होती थी। पर्वतीय शहरों पर अंग्रेज़ी-शिक्षण संस्थान तथा एंग्लिकन चर्च स्थापित किए गए। स्पष्ट है कि पर्वतीय शहरों में गोरे लोगों को पश्चिमी सांस्कृतिक जीवन जीने का अवसर मिला।

→ धीरे-धीरे इन पर्वतीय शहरों को रेलवे नेटवर्क से जोड़ दिया गया और महाराजा, नवाब, व्यापारी तथा अन्य मध्यवर्गीय लोग भी इन पर्वतीय शहरों पर पर्यटन के लिए जाने लगे। इन संभ्रांत लोगों को ऐसे स्थलों पर काफी संतोष की अनुभूति होती थी। पर्वतीय स्थल केवल पर्यटन की दृष्टि से ही अंग्रेज़ों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं थे, बल्कि उनकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़े महत्त्वपूर्ण थे।

→ नए शहरों का सामाजिक जीवन पहले के शहरों से अलग था। ये मध्य वर्ग के केन्द्र थे। इस वर्ग में शिक्षक, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, क्लर्क तथा अकाउंटेंट्स इत्यादि थे। इन नए शहरों में मिलने-जुलने के नए स्थल; जैसे कि सार्वजनिक पार्क, टाउन हॉल, रंगशाला और 20वीं सदी में सिनेमा हॉल इत्यादि बन चुके थे। ये स्थल मध्यवर्गीय लोगों के जीवन का हिस्सा बनने लगे। यह मध्य वर्ग अपनी नई पहचान और नई भूमिकाओं के साथ अस्तित्व में आया। नए शहरों में औरतों के लिए नए अवसर उत्पन्न हुए। फलतः सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

→ परंतु सार्वजनिक स्थानों पर कामकाज करने वाली महिलाओं को सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा जाता था। स्पष्ट है कि सामाजिक बदलाव सहज रूप से नहीं हो रहे थे। रूढ़िवादी विचारों के लोग पुरानी परम्पराओं और व्यवस्था को बनाए रखने का पुरजोर समर्थन कर रहे थे। दूसरी ओर, कामगार लोगों के लिए शहरी जीवन एक संघर्ष था। फिर भी इन लोगों ने अपनी ‘एक अलग जीवंत शहरी संस्कृति’ रच ली थी। वे धार्मिक त्योहारों, मेलों, स्वांगों तथा तमाशों इत्यादि में भाग लेते थे। ऐसे अवसरों पर वे अपने यूरोपीय और भारतीय स्वामियों पर प्रायः कटाक्ष और व्यंग्य करते हुए उनका मज़ाक उड़ाते थे।

→ विकसित होते मद्रास शहर में अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच पृथक्करण (Segregation) स्पष्ट दिखाई देता है। यह पृथक्करण शहर की बनावट और दोनों समुदायों की हैसियत (Position) में साफ-साफ झलकता है। फोर्ट सेंट जॉर्ज में अधिकतर यूरोपीय लोग रहते थे। इसीलिए यह क्षेत्र व्हाइट किले के भीतर रहने का आधार रंग और धर्म था। भारतीयों को इस क्षेत्र में रहने की अनुमति नहीं थी। व्हाइट टाउन प्रशासकीय और न्यायिक व्यवस्था का केन्द्र भी था।

→ व्हाइट टाउन से बिल्कुल अलग ब्लैक टाउन बसाया गया। कलकत्ता-नगर नियोजन में ‘विकास’ सम्बन्धी विचारधारा झलक रही थी और साथ ही इसका अर्थ राज्य द्वारा लोगों के जीवन और शहरी क्षेत्र पर अपनी सत्ता को स्थापित करना था। इसमें फोर्ट विलियम का नया किला तथा सुरक्षा के लिए मैदान रखा गया। उल्लेखनीय है कि कलकत्ता कस्बे का विकास तीन गाँवों-(सुतानाती, कोलकाता व गोविन्दपुर) को मिलाकर हुआ था।

→ कलकत्ता की नगर योजना में लॉर्ड वेलेज़्ली ने उल्लेखनीय योगदान दिया। कलकत्ता अब ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी था। इस सन्दर्भ में, 1803 ई० का वेलेज़्ली का प्रशासकीय आदेश महत्त्वपूर्ण है। वेलेज़्ली के इस सरकारी आदेश के बाद ‘जन स्वास्थ्य’ नगर नियोजन में प्रमुख विचार बन गया। शहरों में सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा और भविष्य की नगर-नियोजन की परियोजनाओं में ‘जन स्वास्थ्य’ का विशेष ध्यान रखा गया।

→ ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के साथ ही अंग्रेज़ों का झुकाव इस ओर बढ़ता गया कि कलकत्ता, बम्बई और मद्रास को शानदार शाही राजधानियों के रूप में बनाया जाए। इन शहरों की भव्यता से ही साम्राज्यवादी ताकत सत्ता झलकती थी। नगर नियोजन में उन सभी खूबियों को प्रतिबिंबित होना था जिसका प्रतिनिधित्व होने का दावा अंग्रेज़ करते थे। ये मुख्य खूबियाँ थीं- तर्क-संगत क्रम व्यवस्था, (Rational Ordrain), सटीक क्रियान्वयन (Meticulous Execution) और पश्चिमी सौन्दर्यात्मक आदर्श (Western Aesthetic Ideas)। वस्तुतः साफ-सफाई नियोजन और सुन्दरता, औपनिवेशिक शहर के आवश्यक तत्त्व बन गए।

→ कलकत्ता, बम्बई और मद्रास जैसे बड़े शहरों में न्यूक्लासिकल तथा नव-गॉथिक शैलियों में अंग्रेज़ों ने भवन बनवाए। ये पाश्चात्य स्थापत्य शैलियाँ थीं। फिर बहुत-से धनी भारतीयों ने इन पश्चिमी शैलियों को भारतीय शैलियों में मिलाकर मिश्रित स्थापत्य शैली का विकास किया। इसे इण्डोसारासेनिक शैली कहा गया है। उल्लेखनीय है कि इन स्थापत्य शैलियों के माध्यम से भी राजनीतिक और सांस्कृतिक टकरावों को समझा जा सकता है।

काल-रेखा

1500-1700 ई०पणजी में पुर्तगाली (1510); मछलीपट्टनम में डच (1605); मद्रास (1639), बंबई (1661) और कलकत्ता (1690) में अंग्रेज़ तथा पांडिचेरी (1673) में फ्रांसीसी ठिकानों की स्थापना।
1600-1623 ई०ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी के सूरत, भड़ीच, अहमदाबाद, आगरा और मछलीपट्टनम में ‘कारखाने’ (कार्यालय व गोदाम) थे।
1622 ई०बंबई उस समय एक छोटा-सा द्वीप था। यह अनेक वर्षों तक पुर्तगालियों के अधिकार में रहा। 1622 ई० में ब्रिटेन के सम्राट चार्ल्स द्वितीय को पुर्तगाली राजकुमारी से विवाह के समय दहेज में दिया गया था।
1668 ई०बंबई (मुंबई) की किलाबंदी की गई।
1698 ई०अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ता (आधुनिक) की नींव रखी गई।
1772-1785 ईवारेन हेस्टिंग्स का शासनकाल।
1757 ई०प्लासी के युद्ध में अंग्रेज़ों की विजय।
1773 ई०कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना।
1798-1805 ई०लॉर्ड वेलेज़्ली का भारत में गवर्नर-जनरल के रूप में कार्यकाल।
1803 ई०कलकत्ता नगर सुधार पर वेलेज़्ली का मिनट्स लिखना।
1817 ई०कलकत्ता नगर नियोजन के लिए लॉटरी कमेटी का गठन।
1818 ई०दक्कन पर अंग्रेज़ों की विजय व बम्बई को नए प्रांत की राजधानी।
1853 ई०पहली रेलवे लाइन, बम्बई से ठाणे।
1857 ई०बम्बई, कलकत्ता व मद्रास में विश्वविद्यालयों की स्थापना।
1870 का दशकनगर-पालिकाओं में निर्वाचित भारतीयों को शामिल करना।
1881 ई०मद्रास हॉर्बर के निर्माण का काम पूरा होना।
1896 ई०बम्बई के वाटसंस होटल में पहली बार फिल्म दिखाना।
1896 ई०प्लेग महामारी का फैलना।
1911 ईoकलकत्ता के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाया जाना।
1911 ई०‘गेट वे ऑफ़ इण्डिया’ बनाया गया।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

HBSE 11th Class Geography सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्न में से किस अक्षांश पर 21 जून की दोपहर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं?
(A) विषुवत् वृत्त पर
(B) 23.5° उ०
(C) 66.5° द०
(D) 66.5° उ०
उत्तर:
(B) 23.5° उ०

2. निम्न में से किन शहरों में दिन ज्यादा लंबा होता है?
(A) तिरुवनंतपुरम
(B) हैदराबाद
(C) चंडीगढ़
(D) नागपुर
उत्तर:
(A) तिरुवनंतपुरम

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

3. निम्नलिखित में से किस प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल मुख्यतः गर्म होता है?
(A) लघु तरंगदैर्ध्य वाले सौर विकिरण से
(B) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से
(C) परावर्तित सौर विकिरण से
(D) प्रकीर्णित सौर विकिरण से
उत्तर:
(B) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से

4. निम्न पदों को उसके उचित विवरण के साथ मिलाएँ।

1. सूर्यातप(अ) सबसे कोष्ण और सबसे शीत महीनों के मध्य तापमान का अंतर
2. एल्बिडो(ब) समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा
3. समताप रेखा(स) आनेवाला सौर विकिरण
4. वार्षिक तापांतर(द) किसी वस्तु के द्वारा परावर्तित दृश्य प्रकाश का प्रतिशत

उत्तर:
1. (स)
2. (द)
3. (ब)
4. (अ)

5. पृथ्वी के विषुवत् वृत्तीय क्षेत्रों की अपेक्षा उत्तरी गोलार्ध के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान अधिकतम होता है, इसका मुख्य कारण है-
(A) विषवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कम बादल होते हैं।
(B) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लंबाई विषुवतीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।
(C) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ‘ग्रीन हाऊस प्रभाव’ विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा ज्यादा होता है।
(D) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा महासागरीय क्षेत्र के ज्यादा करीब है।
उत्तर:
(B) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लंबाई विषुवतीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण किस प्रकार जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है?
उत्तर:
तापमान जलवायु और मौसम का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। तापमान का वायुमण्डल के दाब से सीधा सम्बन्ध है। यदि तापमान कम होगा तो वायुदाब अधिक होगा और यदि तापमान अधिक होगा तो वायुदाब कम होगा। वायुदाब किसी स्थान के मौसम और जलवायु को प्रभावित करता है। अतः पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है।

प्रश्न 2.
वे कौन से कारक हैं, जो पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

  1. स्थल व जल-जलीय भागों की अपेक्षा स्थलीय भागों में सूर्य का ताप अधिक देखने को मिलता है।
  2. ऊँचाई-165 मी० की ऊँचाई पर 1° सेंटीग्रेड तापमान घटता है। इसलिए पर्वतीय भागों में मैदानी भागों से कम तापमान मिलता है।
  3. अक्षांश-अप्रैल से जून तक उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्यातप अधिक रहता है तथा सितंबर से मार्च में विषुवत् रेखा पर सूर्यातप क्रम होता है।

प्रश्न 3.
भारत में मई में तापमान सर्वाधिक होता है, लेकिन उत्तर अयनांत के बाद तापमान अधिकतम नहीं होता। क्यों?
उत्तर:
भारत में मई में दिन की लम्बाई अधिक होने से सूर्यातप अधिक प्राप्त होता है लेकिन उत्तर अयनान्त के बाद सूर्य की किरणें तिरछी होना आरम्भ करती है जिससे तापमान अधिकतम नहीं हो पाता।

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प्रश्न 4.
साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापांतर सर्वाधिक होता है। क्यों?
उत्तर:
साइबेरिया उत्तरी गोलार्द्ध के स्थलीय भाग का अत्यधिक ठण्डा प्रदेश है। सर्दियों में वहाँ सबसे ठण्डे महीने का तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है जबकि गर्मियों में कोष्ण महासागरीय धाराएँ बहती हैं, इससे सबसे गर्म महीने का औसत तापमान काफी बढ़ जाता है। इसलिए साइबेरिया में वार्षिक तापान्तर सर्वाधिक होता है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष का झुकाव किस प्रकार पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली विकिरण की मात्रा को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
सूर्य की किरणें 0° अक्षांश या विषुवत् रेखा पर सालों भर लंबवत् पड़ती हैं। 0° अक्षांश से 2372° उत्तरी और 23% दक्षिणी अक्षांशों के बीच सूर्य ऊपर-नीचे होता रहता है। 21 मार्च से 21 जून तक सूर्य उत्तरायन होता है, कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें लंबवत् होती हैं तथा उस वक्त ग्रीष्म ऋतु होती है तथा मकर रेखा पर शीत ऋतु होती है। 23 सितंबर से 22 दिसंबर तक सूर्य दक्षिणायन होता है तथा मकर पर सूर्य की किरणें लंबवत् पड़ती हैं तथा उस वक्त कर्क रेखा पर शीत ऋतु होती है।

कर्क रेखा के उत्तर में तथा मकर रेखा के दक्षिण में जैसे-जैसे हम बढ़ते हैं, वहाँ का तापमान घटता जाता है। इसी कारण 66° उत्तरी अक्षांश तथा 66° दक्षिण अक्षांश के ऊपरी भाग में शीत कटिबंध पाया जाता है जहाँ वर्ष-भर निम्न ता है तथा बर्फ जमी रहती है। इसका मख्य कारण है कि यहाँ सर्य की किरणें तिरछी पडती हैं जो विकिरण की मात्रा को प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 2.
उन प्रक्रियाओं की व्याख्या करें जिनके द्वारा पृथ्वी तथा इसका वायुमंडल ऊष्मा संतुलन बनाए रखते हैं।
उत्तर:
पृथ्वी पर सूर्यातप का असमान वितरण है। सूर्य पृथ्वी को गर्म करता है और पृथ्वी वायुमंडल को गर्म करती है। परिणामस्वरूप पृथ्वी न तो अधिक समय के लिए गर्म होती है और न ही अधिक ठंडी। अतः हम यह पाते हैं कि पृथ्वी के अलग-अलग भागों में प्राप्त ताप की मात्रा समान नहीं होती।

इसी भिन्नता के कारण वायुमंडल के दाब में भिन्नता होती है एवं इसी कारण पवनों के द्वारा ताप का स्थानांतरण एक स्थान से दूसरे स्थान पर होता है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में अधिक गर्मी पड़ने के कारण वहाँ की वायु गर्म होकर ऊपर उठ जाती है और उस स्थान को भरने के लिए उपोष्ण कटिबंध से हवाएँ उष्ण कटिबंध की ओर चलती हैं, जिससे उष्ण कटिबंध के तापमान में ज्यादा वृद्धि नहीं हो पाती।

इसी तरह से उपोष्ण कटिबंध क्षेत्र में शीतोष्ण कटिबंध से हवाएँ चलकर इन क्षेत्रों के तापमान में संतुलन बनाती हैं। इसी तरह वायुमंडल एक क्षेत्र के तापमान को ज्यादा बढ़ने नहीं देता तथा शीत कटिबंधीय और शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्म महासागरीय धाराएँ चलती हैं। ये धाराएँ इन क्षेत्रों के तापमान को बढ़ा देती हैं। उष्ण कटिबंध क्षेत्रों में ठंडी धाराएँ चलती हैं और उन क्षेत्रों के तापमान को कम कर देती हैं। इसी तरह पृथ्वी की महासागरीय धाराएँ और वायुमंडल संतुलन में बने रहते हैं।

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प्रश्न 3.
जनवरी में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के बीच तापमान के विश्वव्यापी वितरण की तुलना करें।
उत्तर:
उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता है और तापमान स्थलीय भागों में कम रहता है। इसलिए समताप रेखाएँ जैसे ही स्थलों से महासागरों में पहुँचती हैं तो भूमध्य रेखा की ओर मुड़ जाती हैं क्योंकि सागरीय भागों में तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहता है। अतः उत्तरी गोलार्द्ध में ताप प्रवणता अधिक रहती है (समताप रेखाओं के बीच की दूरी कम रहती है) दक्षिणी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ महासागरीय प्रभाव के कारण दूर-दूर रहती हैं और महाद्वीपों से गुजरते समय दक्षिणी ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं। समताप रेखाएँ उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में अधिक नियमित होती हैं।

जनवरी में उत्तरी गोलार्द्ध में सर्दी और दक्षिणी गोलार्द्ध ग्रीष्म ऋतु होती है जिसका मुख्य कारण सूर्य का दक्षिणायन में होता है। जिस कारण सूर्य की किरणें दक्षिणी गोलार्द्ध में लंबवत् पड़ती है। जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं।

विषुवत रेखा के समीपवर्ती क्षेत्रों में तापमान 27° सेंटीग्रेड तथा कर्क रेखा पर 15° सेंटीग्रेड और शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में तापमान 10° सेंटीग्रेड होता है। उदाहरण के लिए साइबेरिया के वोयान्सक में -32 सेंटीग्रेड, दक्षिणी गोलार्द्ध में आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ्रीकी देशों और दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के अर्जेन्टाइना में जनवरी में तापमान औसतन 30° सेंटीग्रेड होता है।

दक्षिणी भाग जैसे चिली और अर्जेन्टाइना में तापमान 15 से 20° सेंटीग्रेड होता है। इस तरह से जनवरी में उत्तरी गोलार्द्ध में कम तापमान और दक्षिणी गोलार्द्ध में अधिक तापमान देखने को मिलता है।

सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान HBSE 11th Class Geography Notes

→ सौर विकिरण (Solar Radiation)-सूर्य ऊष्मा को अंतरिक्ष में चारों तरफ निरन्तर प्रसारित करता रहता है। सूर्य द्वारा ऊष्मा की प्रसारण क्रिया को सौर विकिरण कहा जाता है।

→ कैलोरी (Calorie)-समुद्रतल पर उपस्थित वायुदाब की दशा में एक ग्राम जल का तापमान 1° सेल्सियस बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा को कैलोरी कहा जाता है।

→ एल्बिडो (Albedo)-किसी पदार्थ की परिवर्तनशीलता या परावर्तन गुणांक। इसे दशमलव या प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।

→ संचालन (Conduction) आण्विक सक्रियता के द्वारा पदार्थ के माध्यम से ऊष्मा का संचार संचालन कहलाता है।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. अन्तिम मुगल बादशाह था
(A) औरंगजेब
(B) शाहजहाँ
(C) बहादुरशाह जफर
(D) जहांगीर
उत्तर:
(C) बहादुरशाह जफ़र

2. कानपुर में विद्रोहियों का नेता था
(A) शाहमल
(B) बिरजिस कद्र
(C) नाना साहिब
(D) बहादुरशाह जफ़र
उत्तर:
(C) नाना साहिब

3. वाजिद अलीशाह नवाब था
(A) दिल्ली का
(B) अवध का
(C) हैदराबाद का
(D) बंगाल का
उत्तर:
(B) अवध का

4. पेशवा बाजीराव द्वितीय का दत्तक पुत्र था
(A) नाना साहिब
(B) तात्या टोपे
(C) कुंवर सिंह
(D) रावतुला राम
उत्तर:
(A) नाना साहिब

5. बिहार में विद्रोहियों का नेता था
(A) कुंवर सिंह
(B) बख्त खाँ
(C) नाना साहिब
(D) तात्या टोपे
उत्तर:
(A) कुंवर सिंह

6. लॉर्ड डलहौजी ने धार्मिक अयोग्यता अधिनियम पारित किया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1861 ई० में
उत्तर:
(A) 1850 ई० में

7. लॉर्ड केनिंग ने सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम पारित किया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1856 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(C) 1856 ई० में

8. ‘ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा। ये शब्द लॉर्ड डलहौजी ने किस रियासत के बारे में कहे?
(A) दिल्ली
(B) अवध
(C) बंगाल
(D) मद्रास
उत्तर:
(B) अवध

9. अवध का अन्तिम नवाब था
(A) शुजाउद्दौला
(B) सिराजुद्दौला
(C) वाजिद अली शाह
(D) बख्त खां
उत्तर:
(C) वाजिद अली शाह

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

10. अवध का अधिग्रहण किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1856 ई० में
(D) 1861 ई० में
उत्तर:
(C) 1856 ई० में

11. अवध में विद्रोह की शुरूआत हुई
(A) 10 मई, 1857 को
(B) 4 जून, 1857 को
(C) 8 अप्रैल, 1857 को
(D) 17 जून, 1857 को
उत्तर:
(B) 4 जून, 1857 को

12. अवध का औपचारिक अधिग्रहण के बाद वहाँ भू-राजस्व बन्दोबस्त लागू किया गया
(A) स्थायी बन्दोबस्त
(B) एकमुश्त बन्दोबस्त
(C) ठेकेदारी बन्दोबस्त
(D) महालवाड़ी बन्दोबस्त
उत्तर:
(B) एकमुश्त बन्दोबस्त

13. सिंहभूम में कोल आदिवासियों का नेता था
(A) गोनू
(B) बिरसा मुंडा
(C) सिधू मांझी
(D) बिरजिस कद्र
उत्तर:
(A) गोनू

14. मंगल पाण्डे को फाँसी हुई
(A) 8 अप्रैल, 1857 को
(B) 10 मई, 1857 को
(C) 31 मई, 1857 को
(D) 30 जून, 1858 को
उत्तर:
(A) 8 अप्रैल, 1857 को

15. मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाकर भेजा गया
(A) कलकत्ता
(B) रंगून
(C) बम्बई
(D) लंदन
उत्तर:
(B) रंगून

16. अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके भेजा गया
(A) रंगून
(B) लंदन
(C) मद्रास
(D) कलकत्ता
उत्तर:
(D) कलकत्ता

17. लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया था?
(A) तात्या टोपे
(B) लक्ष्मीबाई
(C) बेगम हजरत महल
(D) नाना साहिब
उत्तर:
(C) बेगम हजरत महल

18. 1857 ई० के विद्रोह का सबसे अधिक व्यापक रूप था
(A) पंजाब में
(B) दिल्ली में
(C) बंगाल में
(D) अवध में
उत्तर:
(D) अवध में

19. विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने अवध पर पुनः अधिकार किया
(A) जून, 1857 में
(B) मार्च, 1858 में
(C) सितम्बर, 1858 में
(D) जनवरी, 1858 में
उत्तर:
(B) मार्च, 1858 में

20. विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर नियन्त्रण स्थापित किया
(A) 4 जून, 1857 को
(B) 17 जून, 1857 को
(C) 20 सितम्बर, 1857 को
(D) 8 अप्रैल, 1858 को
उत्तर:
(C) 20 सितम्बर, 1857 को

21. तात्या टोपे को फांसी हुई
(A) 4 जून, 1857 को
(B) 18 अप्रैल, 1859 को
(C) 10 मई, 1859 को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) 18 अप्रैल, 1859 को

22. आज़मगढ़ घोषणा की गई
(A) 15 मई, 1857 को
(B) 15 जून, 1857 को
(C) 15 जुलाई, 1857 को
(D) 25 अगस्त, 1857 को
उत्तर:
(D) 25 अगस्त, 1857 को.

23. विद्रोही क्या चाहते थे?
(A) अंग्रेजी राज का अन्त
(B) हिन्दू व मुसलमानों में एकता
(C) वैकल्पिक सत्ता की तलाश
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. विद्रोह के दमन के लिए अंग्रेज़ों ने क्या कदम उठाए?
(A) विद्रोहियों पर अमानवीय अत्याचार किए
(B) वफादार शासकों व जमींदारों को भारी इनाम दिए
(C) सारे उत्तरी भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

25. ‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ चित्र ब्रिटेन की पंच नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ
(A) 1854 ई० में
(B) 1856 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1858 ई० में
उत्तर:
(D) 1858 ई० में

26. ‘इन मेमोरियम’ चित्र जोजेफ नोएल पेटन ने बनाया
(A) 1857 ई० में
(B) 1858 ई० में
(C) 1859 ई० में
(D) 1860 ई० में
उत्तर:
(C) 1859 ई० में 27. सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया
(A) 1820 ई० में
(B) 1824 ई० में
(C) 1825 ई० में
(D) 1829 ई० में
उत्तर:
(D) 1829 ई० में

28. ‘उत्तराधिकार कानून पास किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1859 ई० में
उत्तर:
(A) 1850 ई० में

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

29. 1857 ई० के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल था
(A) लॉर्ड रिपन
(B) लॉर्ड केनिंग
(C) लॉर्ड डलहौजी
(D) लॉर्ड वेलेजली
उत्तर:
(B) लॉर्ड केनिंग

30. 1857 ई० के विद्रोह का तत्कालीन कारण था
(A) अवध का विलय
(B) झांसी का विलय
(C) चर्बी वाले कारतूस
(D) उत्तराधिकार कानून
उत्तर:
(C) चर्बी वाले कारतूस

31. झांसी का अंग्रेजी राज्य में विलय किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1854 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(C) 1854 ई० में

32. अवध का विलय किस गवर्नर जनरल ने किया?
(A) लॉर्ड डलहौजी
(B) लॉर्ड वेलेजली
(C) लॉर्ड केनिंग
(D) लॉर्ड रिपन
उत्तर:
(A) लॉर्ड डलहौजी

33. अवध में एकमुश्त बन्दोबस्त लागू किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1856 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(C) 1856 ई० में

34. लखनऊ में विद्रोहियों ने अवध के किस चीफ कमीश्नर को मौत के घाट उतार दिया?
(A) जनरल नील
(B) हैनरी लॉरेंस
(C) कोलिन कैम्पबेल
(D) जनरल हैवलॉक
उत्तर:
(B) हैनरी लॉरेंस

35. ‘बाग डंका शाह’ के नाम से प्रसिद्ध था
(A) शाहमल
(B) नाना साहिब
(C) कुंवर सिंह
(D) मौलवी अहमदुल्ला शाह
उत्तर:
(D) मौलवी अहमदुल्ला शाह

36. विद्रोह को कुचलने में देशी रियासतों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया
(A) पटियाला
(B) ग्वालियर
(C) हैदराबाद
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

37. भारत का प्रथम शहीद कौन था?
(A) नाना साहिब
(B) मंगल पांडे
(C) बहादुरशाह
(D) रानी लक्ष्मीबाई
उत्तर:
(B) मंगल पांडे

38. अंग्रेज़ों ने कुशासन की आड़ में किस राज्य को अधिकार में लिया था?
(A) झांसी
(B) सतारा
(C) अवध
(D) हैदराबाद
उत्तर:
(C) अवध

39. ‘फिरंगी’ शब्द किस भाषा का है?
(A) फारसी
(B) अरबी
(C) उर्दू
(D) संस्कृत
उत्तर:
(A) फारसी

40. ब्रिटिश ईस्ट-इण्डिया कंपनी के अधीन सेवारत भारतीय सैनिकों का पहला सैनिक विद्रोह कहाँ हुआ?
(A) मेरठ
(B) बैरकपुर
(C) पटना
(D) वेल्लोर
उत्तर:
(D) वेल्लोर

41. 1857 ई० के विद्रोह के लिए लॉर्ड डलहौजी का वह कौन-सा प्रशासकीय कदम था जो सर्वाधिक उत्तरदायी सिद्ध हुआ ?
(A) भारत में रेलवे. डाक और तार व्यवस्था का प्रचलन
(B) कुशासन के नाम पर देशी राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय
(C) लैप्स की नीति का अंधाधुंध क्रियान्वयन
(D) भारतीय शासकों की पेंशन को बन्द या कम कर देना।
उत्तर:
(C) लैप्स की नीति का अंधाधुंध क्रियान्वयन

42. 1857 ई० का विद्रोह ‘एक राष्ट्रीय विद्रोह’ था न कि ‘एक सैनिक विद्रोह’ यह शब्द किस अंग्रेज़ सांसद और राजनीतिज्ञ “के हैं?
(A) लॉर्ड केनिंग
(B) लॉर्ड डलहौजी
(C) लॉर्ड डिजरायली
(D) लॉर्ड एलनबरो
उत्तर:
(C) लॉर्ड डिजरायली

43.1857 ई० के विद्रोह का आरम्भ कब हुआ?
(A) लखनऊ
(B) मेरठ
(C) बैरकपुर
(D) कानपुर
उत्तर:
(B) मेरठ

44. अंग्रेज़ों ने विद्रोह के किस मुख्य केंद्र पर सबसे पहले पुनर्धिकार किया?
(A) कानपुर
(B) दिल्ली
(C) लखनऊ
(D) झाँसी
उत्तर:
(B) दिल्ली

45. दिल्ली में विद्रोही सेना का सेनानायक कौन था?
(A) अजीमुल्ला
(B) खान बहादुर खाँ
(C) बाबा कुँवर सिंह
(D) जनरल बख्त खाँ
उत्तर:
(A) अजीमुल्ला

46. 1857 ई० के विद्रोह का कौन-सा नेता बचकर नेपाल भाग गया और बाद में उसकी गतिविधियों का कभी पता नहीं चल पाया?
(A) नाना साहिब
(B) खान बहादुर खाँ
(C) बेगम हज़रत अली
(D) तात्या टोपे
उत्तर:
(A) नाना साहिब

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
दिल्ली में विद्रोहियों को किसने रोकने का प्रयास किया?
उत्तर:
कर्नल रिप्ले ने विद्रोहियों को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया।

प्रश्न 2.
सिपाही जब लाल किले पर पहुंचे तो बहादुरशाह जफर क्या कर रहे थे?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर प्रातःकालीन नमाज पढ़कर और सहरी खाकर उठे थे।

प्रश्न 3.
सिपाहियों ने बहादुरशाह जफर से क्या अनुरोध किया?
उत्तर:
सिपाहियों ने बहादुरशाह जफ़र से नेतृत्व के लिए अनुरोध किया।

प्रश्न 4.
सिपाहियों के अनुरोध पर बहादुरशाह जफर ने क्या किया?
उत्तर:
सिपाहियों के अनुरोध पर बहादुरशाह जफ़र ने स्वयं को भारत का बादशाह घोषित करके विद्रोह का नेता घोषित कर दिया।

प्रश्न 5.
बहादुरशाह जफर द्वारा नेतृत्व स्वीकार करने पर विद्रोह का स्वरूप कैसा हो गया?
उत्तर:
बहादुरशाह के नेतृत्व स्वीकार करने पर यह विद्रोह केवल सिपाहियों का विद्रोह नहीं रहा, बल्कि विदेशी सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक विद्रोह बन गया।

प्रश्न 6.
बहादुरशाह जफर ने देश के हिन्दुओं व मुसलमानों से क्या अपील की?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर ने सारे देश के हिन्दुओं व मुसलमानों को देश व धर्म के लिए लड़ने का आह्वान किया।

प्रश्न 7.
कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व नाना साहिब ने किया।

प्रश्न 8.
नाना साहिब को अन्य किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर:
नाना साहिब को धोंधू पंत के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 9.
इलाहाबाद में विद्रोहियों का नेता कौन था?
उत्तर:
मौलवी लियाकत खाँ, जो पेशे से एक अध्यापक व वहाबी नेता थे, ने विद्रोह का नेतृत्व व प्रशासन की कमान संभाली।

प्रश्न 10.
बिहार में विद्रोह का नेतृत्व किसके हाथ में था?
उत्तर:
जगदीशपुर के ज़मींदार कुंवरसिंह व कुछ अन्य स्थानीय ज़मींदारों ने बिहार में विद्रोह का नेतृत्व सँभाला।

प्रश्न 11.
ग्वालियर व झाँसी में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
ग्वालियर व झाँसी में विद्रोह का नेतृत्व झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तांत्या टोपे ने किया।

प्रश्न 12.
विद्रोह में सिंधिया राजा की क्या भूमिका थी?
उत्तर:
सिंधिया राजा ने विद्रोहियों को कुचलने में अंग्रेज़ों का साथ दिया।

प्रश्न 13.
बंगाल की बैरकपुर छावनी में बगावत का आह्वान किसने किया?
उत्तर:
29 मार्च, 1857 को परेड के समय बंगाल की बैरकपुर छावनी में मंगल पाण्डे ने बगावत का आह्वान किया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 14.
मंगल पाण्डे को फांसी पर कब लटकाया गया?
उत्तर:
8 अप्रैल, 1857 को मंगल पाण्डे को फांसी पर लटकाया गया।

प्रश्न 15.
लैप्स का सिद्धान्त किस गवर्नर जनरल ने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
लॉर्ड डलहौजी ने लैप्स के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

प्रश्न 16.
लैप्स के सिद्धान्त द्वारा कौन-कौन से राज्यों का विलय किया गया?
उत्तर:
सतारा, नागपुर, झाँसी तथा उदयपुर राज्यों का लैप्स के सिद्धान्त से अंग्रेज़ी राज्य में विलय किया गया।

प्रश्न 17.
मंगल पाण्डे कौन था?
उत्तर:
मंगल पाण्डे 34वीं नेटिव इन्फ्रेंट्री में एक सैनिक था।

प्रश्न 18.
अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाकर कहाँ भेजा?
उत्तर:
बहादुरशाह जफ़र को बन्दी बनाकर रंगून भेजा गया।

प्रश्न 19.
बहादुरशाह जफर की मृत्यु कब हुई?
उत्तर:
रंगून में 1862 में बहादुरशाह जफर की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 20.
रानी लक्ष्मीबाई को वीरगति कब व कहाँ प्राप्त हुई?
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई को 17 जून, 1858 को ग्वालियर में वीरगति प्राप्त हुई।

प्रश्न 21.
नाना साहिब ने कानपुर पर अधिकार कब किया?
उत्तर:
नाना साहिब ने कानपुर पर 26 जून, 1857 को अधिकार किया।

प्रश्न 22.
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ नामक चित्र कब तथा किसने बनाया?
उत्तर:
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ नामक चित्र टॉमस जोन्स बार्कर द्वारा 1859 में बनाया गया।

प्रश्न 23.
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ चित्र में क्या दर्शाया गया है?
उत्तर:
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ चित्र में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि संकट की घड़ी का अन्त हो चुका है।

प्रश्न 24.
‘इन मेमोरियम’ चित्र कब व किसने बनाया?
उत्तर:
‘इन मेमोरियम’ चित्र जोजेफ नोएल पेटन द्वारा 1859 ई० में बनाया गया।

प्रश्न 25.
‘इन मेमोरियम’ चित्र में क्या दिखाया गया है?
उत्तर:
‘इन मेमोरियम’ चित्र में अंग्रेज़ औरतें व बच्चे एक-दूसरे से लिपटे दिखाई दे रहे हैं। वे असहाय प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 26.
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ नामक चित्र कब प्रकाशित हुआ?
उत्तर:
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ नामक चित्र 24 अक्तूबर, 1857 को ब्रिटिश पत्रिका ‘पंच’ में प्रकाशित हुआ।

प्रश्न 27.
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ में क्या दिखाने का प्रयास किया गया है?
उत्तर:
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ चित्र में केनिंग को दयालु दिखाने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 28.
शाह मल कहाँ का रहने वाला था?
उत्तर:
शाह मल उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगना का रहने वाला था।

प्रश्न 29.
1857 के विद्रोह के समय अवध का चीफ कमिश्नर कौन था?
उत्तर:
1857 के विद्रोह के समय अवध का चीफ कमिश्नर हैनरी लॉरैस था।

प्रश्न 30.
बंगाल आर्मी की पौधशाला किसे कहा गया?
उत्तर:
अवध को बंगाल आर्मी की पौधशाला कहा गया।

प्रश्न 31.
धार्मिक अयोग्यता अधिनियम कब पारित किया गया?
उत्तर:
धार्मिक अयोग्यता अधिनियम 1850 में पारित किया गया।

प्रश्न 32.
1857 ई० के विद्रोह के समय वहाँ का नवाब कौन था?
उत्तर:
अवध विलय के समय नवाब वाजिद अली शाह वहाँ का नवाब था।

प्रश्न 33.
आज़मगढ़ घोषणा कब की गई?
उत्तर:
25 अगस्त, 1857 को आज़मगढ़ घोषणा की गई।

प्रश्न 34.
झाँसी को अंग्रेज़ी साम्राज्य में कब मिलाया गया?
उत्तर:
लैप्स के सिद्धान्त के अनुसार 1854 में झाँसी को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाया गया।

प्रश्न 35.
1857 ई० के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल कौन था?
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के समय केनिंग भारत का गवर्नर जनरल था।

प्रश्न 36.
अवध में लोगों ने अपना नेता किसे घोषित किया?
उत्तर:
अवध के अपदस्थ नवाब के बेटे बिरजिस कद्र को लोगों ने अपना नेता घोषित किया।

प्रश्न 37.
कारतूस वाली अफवाह के अतिरिक्त और कौन-सी अफवाह उड़ रही थी?
उत्तर:
कारतूस वाली अफवाह के अतिरिक्त आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट एक अन्य अफवाह थी।

प्रश्न 38.
अवध में विद्रोह कब प्रारम्भ हुआ?
उत्तर:
4 जून, 1857 को अवध में विद्रोह प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 39.
अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके कहाँ भेजा गया?
उत्तर:
अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके कलकत्ता भेज दिया गया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 40.
दिल्ली में विद्रोहियों का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
दिल्ली में विद्रोहियों का नेतृत्व बख्त खाँ ने किया।

प्रश्न 41.
विद्रोहियों ने विद्रोह को शुरू करने का क्या तरीका अपनाया?
उत्तर:
सिपाहियों ने विद्रोह शुरू करने का संकेत प्रायः शाम को तोप का गोला दाग कर या बिगुल बजाकर किया।

प्रश्न 42.
बरेली में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
बरेली में रूहेला सरदार खान बहादुर खाँ ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया।

प्रश्न 43.
दिल्ली में प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए विद्रोहियों ने क्या किया?
उत्तर:
दिल्ली में प्रशासन चलाने के लिए एक प्रशासनिक कौंसिल बनाई गई। इसके कुल 10 सदस्य थे।

प्रश्न 44.
पानीपत में विद्रोहियों का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
बु-अली शाह कलंदर मस्जिद के मौलवी ने पानीपत में विद्रोहियों का नेतृत्व किया।

प्रश्न 45.
विद्रोह की शुरूआत किस अफवाह से हुई?
उत्तर:
विद्रोह की शुरूआत चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह से हुई।

प्रश्न 46.
सामान्य सेवा अधिनियम किस गवर्नर-जनरल के काल में पारित हुआ?
उत्तर:
सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम 1856 ई० में गवर्नर-जनरल लॉर्ड केनिंग के काल में पास किया गया।

प्रश्न 47.
लॉर्ड डलहौजी ने लैप्स की नीति के तहत कौन-कौन से राज्य हड़पे?
उत्तर:
सतारा, संभलपुर, जैतपुर, उदयपुर, नागपुर तथा झांसी राज्य डलहौजी ने ‘राज्य हड़पने की नीति’ के तहत हड़पे।

प्रश्न 48.
अवध का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में कैसे किया गया?
उत्तर:
अवध पर ‘कुशासन’ का आरोप लगाकर उसे ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया गया।

प्रश्न 49.
“यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” लॉर्ड डलहौजी ने यह शब्द किस राज्य के बारे में कहे?
उत्तर:
यह शब्द अवध राज्य के बारे में कहे गए।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मेरठ छावनी में विद्रोह कब शुरू हुआ?
उत्तर:
10 मई, 1857 को मेरठ छावनी में विद्रोह शुरू हुआ। भारतीय पैदल सेना के सिपाहियों ने चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार कर दिया। कोर्ट मार्शल हुआ और 85 भारतीय सिपाहियों को 8 से लेकर 10 वर्ष तक की कठोर सज़ा दी गई।

प्रश्न 2.
देशी नरेशों के नाम पत्र में बहादुरशाह जफर ने क्या इच्छा प्रकट की?
उत्तर:
देशी नरेशों के नाम पत्र लिखते हुए बहादुरशाह जफ़र ने कहा मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि जिस तरीके से भी हो और जिस कीमत पर हो सके फिरंगियों को हिन्दुस्तान से बाहर निकाल दिया जाए। मेरी यह तीव्र इच्छा है कि तमाम हिन्दुस्तान आज़ाद हो जाए। अंग्रेज़ों को निकाल दिए जाने के बाद अपने निजी लाभ के लिए हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने की मुझ में जरा भी ख्वाहिश नहीं है। यदि आप सब देशी नरेश दुश्मन को निकालने की गरज से अपनी-अपनी तलवार खींचने के लिए तैयार हों तो मैं अपनी तमाम राजसी शक्तियाँ (Royal Powers) और अधिकार देशी नरेशों के किसी चुने हुए संघ को सौंपने के लिए राजी हूँ।

प्रश्न 3.
बहादुरशाह जफर ने देश के हिंदुओं और मुसलमानों से क्या अपील की?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर ने सारे देश के हिंदुओं और मुसलमानों के नाम एक अपील जारी की। इसमें सभी से देश व धर्म के लिए लड़ने का आह्वान किया गया। बहादुर शाह ने राजपूताना व दिल्ली के आस-पास के देशी शासकों को भी विद्रोह में शामिल होने के लिए पत्र लिखे। विद्रोहियों ने सभी जगह बहादुर शाह को अपना नेता मान लिया। कानपुर में मराठा सरदार नाना साहिब स्वयं को बहादुरशाह का पेशवा घोषित करके उसका प्रशासन चलाने लगा।

प्रश्न 4.
मध्य भारत में विद्रोह के प्रसार के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मध्य भारत के झाँसी, ग्वालियर, इंदौर, सागर तथा भरतपुर आदि क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव रहा। मुख्यतः यहाँ विद्रोह का नेतृत्व झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने किया। राजस्थान और मध्य प्रदेश के अधिकतर देशी राजा अंग्रेज़ों की वफादारी निभाते रहे। उदाहरण के लिए ग्वालियर के अधिकांश सैनिकों और लोगों ने विद्रोह में भाग लिया, परंतु सिंधिया राजा ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया।

प्रश्न 5.
विद्रोही सिपाही मेरठ से दिल्ली क्यों पहुँचे?
उत्तर:
विद्रोही जानते थे कि नेतृत्व व संगठन के बिना अंग्रेजों से लोहा नहीं लिया जा सकता था। यह बात सही है कि विद्रोह के दौरान छावनियों में सैनिकों ने अपने स्तर पर भी कुछ निर्णय लिए थे। फिर भी सिपाही जानते थे कि सफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व जरूरी है। इसीलिए सिपाही मेरठ में विद्रोह के तुरंत बाद दिल्ली पहुंचे। वहाँ उन्होंने बहादुर शाह को अपना नेता बनाया।

प्रश्न 6.
कानपुर में नाना साहिब की अंग्रेज़ों से नाराजगी का क्या कारण था?
उत्तर:
कानपुर में नाना साहिब अपने अपमान से सख्त नाराज थे। क्योंकि उनसे ‘पेशवा’ की पदवी छीन ली गई थी, साथ ही 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन भी अंग्रेज़ों ने बंद कर दी थी।

प्रश्न 7.
शासक व ज़मींदार विद्रोह में भाग क्यों ले रहे थे?
उत्तर:
मुख्यतः अपदस्थ शासक और उजड़े हुए ज़मींदार विद्रोह में भाग ले रहे थे, क्योंकि शासक तो पुनः अपनी राजशाही स्थापित करना चाहते थे और ज़मींदार अपनी जमीनों के लिए लड़ रहे थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 8.
1857 ई० के विद्रोह के कोई दो प्रशासनिक कारण बताओ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के प्रशासनिक कारण निम्नलिखित थे

  1. लैप्स के सिद्धान्त के द्वारा झांसी, सतारा, नागपुर आदि रियासतों को अंग्रेजी राज में मिलाना तथा कुशासन का आरोप लगाकर अवध जैसे राज्य को हड़पना।
  2. देशी राजाओं पर सहायक सन्धि थोपना तथा नई भू-राजस्व प्रणालियाँ लागू करना व जटिल कानून व्यवस्था बनाना।

प्रश्न 9.
अवध का विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? दो कारण बताओ।
उत्तर:

  1. अवध के नवाब को हटाए जाने पर लोगों में असन्तोष था।
  2. अंग्रेज़ों की भारतीय सेना में अवध के सैनिकों की संख्या अधिक थी। वे अवध की घटनाओं से दुःखी थे।
  3. अवध को अंग्रेज़ी राज्य में मिलाए जाने के कारण वहाँ के दरबारी व कर्मचारी वर्ग बेरोज़गार हो गए। उनमें अंग्रेजों के विरुद्ध भारी रोष था।

प्रश्न 10.
सहायक सन्धि ने देशी राजाओं को किस प्रकार पंगु बना दिया? ।
उत्तर:
सहायक सन्धि की शर्तों के अनुसार देशी राजाओं को सैनिक शक्ति से वंचित कर दिया गया। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए देशी राजा को अंग्रेज़ों पर निर्भर रहना पड़ता था। अंग्रेजों के परामर्श के बिना वह शासक किसी दूसरे शासक के साथ युद्ध या सन्धि नहीं कर सकता था।

प्रश्न 11.
अवध में अंग्रेज़ों की रुचि बढ़ने के क्या कारण थे?
उत्तर:
अवध की उपजाऊ जमीन को अंग्रेज़ नील व कपास की खेती के लिए प्रयोग करना चाहते थे तथा अवध को उत्तरी भारत का एक बड़े बाजार के रूप में विकसित करना चाहते थे।

प्रश्न 12.
1857 ई० के विद्रोह के कोई दो सैनिक कारण बताओ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के दो सैनिक कारण निम्नलिखित हैं

  1. सिपाहियों के वेतन और भत्ते बहुत कम थे। एक घुड़सवार सेना के सिपाही को 27 रुपए और पैदल सेना के सिपाही को मात्र 7 रुपए मिलते थे। वर्दी और भोजन का खर्च निकालकर मुश्किल से उसके पास एक या दो रुपए बच पाते थे।
  2. सेना में गोरे व काले के आधार पर भेदभाव आम बात थी। गोरे सैनिकों के अधिकार व सुविधाएँ भारतीय सैनिकों की तुलना में कहीं अधिक थीं। वेतन और भत्तों में भी भेदभाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों की पदोन्नति के अवसर लगभग न के बराबर थे।

प्रश्न 13.
1857 ई० के विद्रोह के कोई दो सामाजिक कारण बताओ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के सामाजिक कारण निम्नलिखित हैं

1. सामाजिक सुधार कानून-गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक (1828-35) ने समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए कानून बनाने की दिशा में पहलकदमी की। सती प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-वध इत्यादि को रोकने के लिए कानून बनाए गए। 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पास करके विधवाओं के विवाह को कानूनी मान्यता दी गई।
निःसंदेह ये कदम प्रगतिशील तथा भारतीयों के हित में थे। परंतु रूढ़िवादी भारतीयों ने इन सुधारों को सामाजिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप समझा।

2. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार-1835 ई० में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को भारत में लाग किया। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नवयुवकों में पाश्चात्य संस्कृति की ओर झुकाव बढ़ रहा था। नव-शिक्षित वर्ग पश्चिमी रहन-सहन और भाषा को अपनाकर गर्व अनुभव करने लगा था। वह अन्य भारतीयों से स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगा। इससे स्वाभाविक रूप से यह विश्वास होने लगा कि अंग्रेज़ हमारे धर्म को नष्ट करना चाहते हैं, हमारे बच्चों को ईसाई बनाना चाहते हैं।

प्रश्न 14.
बहादुरशाह जफर के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बहादुरशाह जफ़र मुगलों का अन्तिम शासक था। वह 1837 ई० में सिंहासन पर बैठा। 1857 ई० के विद्रोह के समय विद्रोहियों ने उसे सम्राट घोषित करके अपना नेता घोषित किया। विद्रोहियों का साथ देने के कारण उसे कैद करके रंगून भेज दिया गया। 1862 ई० में वहीं उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 15.
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन का चरित्र विदेशी था।’ स्पष्ट करें।
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का चरित्र विदेशी था। इसे तलवार के बल पर स्थापित किया गया था। इस सत्ता के संचालक हज़ारों मील दूर लंदन में बैठे थे। वहीं भारत के लिए शासन संबंधी नीतियाँ व कानून बनाए जाते थे, जिन्हें लागू करने वाले अंग्रेज़ प्रशासनिक अधिकारी अपने जातीय अभिमान से ग्रस्त थे। वे भारतीयों को हीन समझते थे और उनसे मिलने-जुलने में अपनी तौहीन समझते थे।

प्रश्न 16.
कम्पनी की न्याय व्यवस्था भी असंतोष का कारण थी, कैसे?
उत्तर:
कंपनी द्वारा स्थापित नई न्याय-व्यवस्था भी भारतीयों में असंतोष का एक कारण रही। ‘कानून के सम्मुख समानता’ के सिद्धांत पर आधारित बताई गई इस व्यवस्था में तीन मुख्य दोष थे-अनुचित देरी, न्याय मिलने में अनिश्चितता और अत्यधिक व्यय। इन दोषों के कारण यह नया कानूनी तंत्र अमीर वर्ग के हाथ में गरीब आदमी के शोषण का एक हथियार बन गया था।

प्रश्न 17.
मौलवी अहमदुल्ला शाह कौन था?
उत्तर:
फैज़ाबाद के मौलवी अहमदुल्ला शाह ने 1857 ई० के विद्रोह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लोगों को अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया। अनेक मुसलमान उन्हें पैगम्बर मानते थे। उनके साथ हजारों लोग जुड़ गए थे। 1857 ई० में उन्हें अंग्रेज़ विरोधी प्रचार के कारण जेल में बन्द कर दिया गया। चिनहाट के संघर्ष में उन्होंने हैनरी लॉरेंस को पराजित किया।

प्रश्न 18.
अवध अधिग्रहण से ताल्लुकदारों के सम्मान व सत्ता को क्षति पहुँची, कैसे?
उत्तर:
अंग्रेजी राज से ताल्लुकदारों की सत्ता व सम्मान को भी जबरदस्त क्षति हुई। ताल्लुकदार अवध क्षेत्र में वैसे ही छोटे राजा थे जैसे बंगाल में ज़मींदार थे। वे छोटे महलनुमा घरों में रहते थे। अपनी-अपनी जागीर में सत्ता व जमीन पर उनका पिछली कई सदियों से नियंत्रण था। ताल्लुकदार नवाब की संप्रभुत्ता (Sovereignty) को स्वीकार करते हुए पर्याप्त स्वायत्तता (Autonomy) रखते थे। इनके अपने दुर्ग व सेना थी। 1856 में अवध का अधिग्रहण करते ही इन ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग भी ध्वस्त कर दिए गए।

प्रश्न 19.
किसानों में असंतोष के क्या कारण थे?
उत्तर:
अंग्रेज़ी राज से संपूर्ण ग्रामीण समाज व्यवस्था भंग हो गई। अंग्रेज़ों की भू-राजस्व व्यवस्था में कोई लचीलापन नहीं था। न तो लगान तय करते वक्त और न ही वसूली में। मुसीबत के समय भी सरकार किसानों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रखती थी।

प्रश्न 20.
1857 ई० के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की भूमिका किस हद तक उत्तरदायी थी?
उत्तर:
1857 ई० के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की भूमिका निम्नलिखित कारणों से उत्तरदायी थी

  1. भारत में बढ़ते हुए ईसाई धर्म के प्रसार को खतरा माना जा रहा था।
  2. सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम (1856) के अनुसार किसी भी भारतीय सैनिक को समुद्र पार भेजा जा सकता था। हिन्दू लोग इसे धर्म भ्रष्ट होना समझते थे।
  3. 1856 ई० में सैनिकों को नई एनफील्ड राइफल दी गई। इसमें डालने वाले कारतूसों की सील को मुँह से खोलना पड़ता था। सैनिकों ने इसमें चर्बी लगी समझा और इसे धर्म भ्रष्ट करने का षड्यन्त्र बताया।

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प्रश्न 21.
किसान व सैनिकों में क्या संबंध थे?
उत्तर:
किसान और सैनिक परस्पर गहन रूप से जुड़े हुए थे। सेना का गठन गाँवों के किसानों तथा ज़मींदारों में से ही किया गया था। बल्कि अवध को तो “बंगाल आर्मी की पौधशाला” (“Nursery of the Bengal Army”) कहा जाता था। यह सैनिक अपने गांव-परिवार से जुड़े हुए थे। हर सैनिक किसी किसान का बेटा, भाई या पिता था। एक भाई खेत में हल जोत रहा था तो दूसरे ने वर्दी पहन ली थी अर्थात वह भी वर्दीधारी ‘किसान’ ही था। वह भी गाँव में किए जा रहे अंग्रेज़ अधिकारियों के जुल्म से दुखी होता था।

प्रश्न 22.
यूरोपीय अधिकारी सैनिकों के साथ कैसा व्यवहार करते थे?
उत्तर:
यूरोपीय अधिकारियों में नस्ली भेदभाव अधिक था। भारतीय सिपाहियों को वे गाली-गलौच व शारीरिक हिंसा पहुँचाने में कोई परहेज नहीं करते थे। उनके लिए सैनिकों की भावनाओं की कोई कद्र नहीं थी। ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ जाने से संदेह की भावना पैदा होना स्वाभाविक था। डर एवं संदेह बढ जाने से अफवाहों की भमिका बढ़ जाती है।

प्रश्न 23.
आजमगढ़ घोषणा में व्यापारियों के विषय में क्या कहा गया?
उत्तर:
षड्यंत्रकारी ब्रिटिश सरकार ने नील, कपड़े, जहाज व्यवसाय जैसी सभी बेहतरीन एवं मूल्यवान वस्तुओं के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया है। व्यापारियों को दो कौड़ी के आदमी की शिकायत पर गिरफ्तार किया जा सकता है। बादशाही सरकार स्थापित होने पर इन सभी फरेबी तौर-तरीकों को समाप्त कर दिया जाएगा। जल व थल दोनों मार्गों से होने वाला सारा व्यापार भारतीय व्यापारियों के लिए खोल दिया जाएगा। इसलिए प्रत्येक व्यापारी का यह उत्तरदायित्व है कि वह इस संघर्ष में भाग ले।

प्रश्न 24.
आजमगढ़ घोषणा में सरकारी कर्मचारियों के बारे में क्या कहा गया?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत प्रशासनिक एवं सैनिक सेवाओं में भर्ती होने वाले भारतीय लोगों को सम्मान नहीं मिलता। उनका वेतन कम होता है और उनके पास कोई शक्ति नहीं होती। प्रशासनिक और सैनिक में प्रतिष्ठा और धन वाले सारे पद केवल गोरों को ही दिए जाते हैं। इसलिए ब्रिटिश सेवा में कार्यरत सभी भारतीयों को अपने धर्म और हितों की ओर ध्यान देना चाहिए तथा अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी को त्यागकर बादशाही सरकार का साथ देना चाहिए।

प्रश्न 25.
आजमगढ़ घोषणा में पंडितों, फकीरों एवं अन्य ज्ञानी व्यक्तियों के विषय में क्या कहा गया?
उत्तर:
पंडित और फ़कीर क्रमशः हिंदू और मुस्लिम धर्मों के संरक्षक हैं। यूरोपीय इन दोनों धर्मों के शत्रु हैं। जैसाकि सब जानते हैं अब धर्म के कारण ही अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष छिड़ा हुआ है, इसलिए फ़कीरों और पंडितों का कर्त्तव्य है कि “वो मेरे पास आएँ और इस पवित्र संघर्ष में अपना योगदान दें।”

प्रश्न 26.
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ चित्र में क्या दिखाया गया है?
उत्तर:
टॉमस जोन्स बार्कर के चित्र ‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ में कोलिन कैम्पबैल के पहुंचने पर खुशी झलक रही है। मध्य में कैम्पबैल के साथ अभिनन्दन की मुद्रा में औट्रम व हैवलॉक दिखाई दे रहे हैं। घटना-क्षण लखनऊ का है। उनके सामने थोड़ी दूरी पर शव और घायल पड़े हैं जो विद्रोहियों की पराजय और मार-काट के साक्षी हैं। नायकों के पास ही घोड़े काफी शांत मुद्रा में दिखाई दे रहे हैं जो इस बात का प्रतीक हैं कि संकट समाप्त हो चुका है।

प्रश्न 27.
हेनरी हार्डिंग के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हेनरी हार्डिंग ने सेना के साजो-सामान के आधुनिकीकरण का प्रयास किया। उसने सेना में एनफील्ड राइफल का इस्तेमाल शुरू किया जिनमें चिकने कारतूस प्रयोग होते थे और सिपाही उनमें चर्बी लगी होने की अफवाह के कारण विद्रोही हो गए।

प्रश्न 28.
कुँवर सिंह कौन था? संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
कुँवर सिंह बिहार में जगदीशपुर की आरा रियासत का ज़मींदार था। वह लोगों में राजा के नाम से विख्यात था। कुँवर सिंह ने आजमगढ़ व बनारस में अंग्रेज़ी फौज को पराजित किया। उसने छापामार युद्ध पद्धति से अंग्रेज़ों से लोहा लिया। अप्रैल, 1858 में उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 29.
नाना साहिब कौन थे? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
नाना साहिब अन्तिम पेशवा बाजीराव द्वितीय का दत्तक पुत्र था। पेशवा की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने नाना साहिब को पेशवा नहीं माना और न ही उसे पेंशन दी। 1857 ई० के विद्रोह में विद्रोहियों के आग्रह से वे विद्रोह में शामिल हो गए। कानपुर में उन्होंने सेनापति नील और हेवलॉक को पराजित करके किले पर पुनः अधिकार कर लिया, लेकिन कोलिन कैम्पबेल की सेना के आने बाद नाना साहिब को पुनः पराजित कर दिया गया। वे भागकर नेपाल चले गए। प्रशंसकों ने इसे भी उनकी बहादुरी बताया।

प्रश्न 30.
तात्या टोपे कौन था? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
तात्या टोपे नाना साहिब की सेना का एक बहादुर व विश्वसनीय सेनापति था। उसने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध गुरिल्ला नीति अपनाकर उनकी नाक में दम कर दिया। उसने अंग्रेज़ जनरल बिन्द्रहैम को परास्त किया। उसने रानी लक्ष्मीबाई का पूर्ण निष्ठा के साथ सहयोग दिया। 1858 ई० में अंग्रेजों ने तात्या टोपे को फाँसी दे दी।

प्रश्न 31.
रानी लक्ष्मीबाई के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई झाँसी के राजा गंगाधर राव की पत्नी थी। राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने उनके दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया और लैप्स के सिद्धान्त के अनुसार झाँसी को अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिया। 1857 ई० के विद्रोह में स्वयं रानी ने अंग्रेज़ी सेनाओं से टक्कर ली। नाना साहिब के विश्वसनीय सेनापति तात्या टोपे और अफगान सरदारों की मदद से उन्होंने ग्वालियर पर पुनः अधिकार कर लिया। कालपी के स्थान पर अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए वह वीरगति को प्राप्त हई। उसकी वीरता हमेशा आजादी के दीवानों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रही।

प्रश्न 32.
शाह मल कौन था? संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
शाह मल उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगने के जाट परिवार से सम्बन्ध रखते थे। बड़ौत में 84 गाँवों की ज़मींदारी थी। जमीन उपजाऊ थी। लेकिन ऊँची लगान दर के कारण जमीन महाजनों व व्यापारियों के हाथों में जा रही थी। शाहमल ने किसानों को अंग्रेजों के खिलाफ संगठित किया। व्यापारियों व महाजनों के घर लूटे। बही-खाते जलाए, पुल व सड़कें तोड़ीं। शाह मल ने एक अंग्रेज़ अधिकारी के बंगले पर कब्जा करके उसे अपना कार्यालय बनाया और उसे न्याय भवन का नाम दिया। जहाँ वह लोगों के विवादों का निपटारा करने लगा। जुलाई, 1858 में शाह मल अंग्रेजों के साथ हुई एक लड़ाई में मारा गया।

प्रश्न 33.
विद्रोह को राजनीतिक वैधता कैसे मिली?
उत्तर:
बहादुशाह जफर ने स्वयं को भारत का बादशाह घोषित करके विद्रोह का नेता घोषित कर दिया। इससे सिपाहियों के विद्रोह को राजनीतिक वैधता मिल गई। एक सुप्रसिद्ध इतिहासकार के शब्दों में इससे विद्रोह को ‘एक सकारात्मक राजनीतिक अर्थ” (A positive political meaning’) मिल गया।

प्रश्न 34.
1857 का विद्रोह किस अफवाह से शुरू हुआ?
उत्तर:
1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफवाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों’ ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। उल्लेखनीय है कि यह कारतूस नई ‘एनफील्ड राइफल’ के लिए विशेषतौर पर तैयार किए गए थे।

प्रश्न 35.
‘सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम क्या था?
उत्तर:
1856 ई० में गवर्नर-जनरल लॉर्ड केनिंग के शासन काल में ‘सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम’ पास किया गया। इसके अनुसार भर्ती के समय ही प्रत्येक सैनिक को यह लिखित रूप में स्वीकार करना होता था कि जहाँ भी (भारत या भारत के बाहर) सरकार उसे युद्ध के लिए भेजेगी, वह जाएगा। इससे सैनिकों में भी असंतोष पैदा हुआ।

प्रश्न 36.
‘लेक्स लोसी एक्ट’ (Lex Loci Act, 1850) क्या था?
उत्तर:
1850 ई० में सरकार ने एक उत्तराधिकार कानून (Lex Loci Act, 1850) पास किया। इस कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म ग्रहण कर ले तो भी वह पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी रह सकता था। अब यदि कोई ईसाई धर्म ग्रहण करता था तो उसे पैतृक संपत्ति में से मिलने वाले हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता था।

प्रश्न 37.
महालवाड़ी भूमि कर प्रणाली विद्रोह के लिए क्यों उत्तरदायी थी?
उत्तर:
भूमि-कर की महालवाड़ी व्यवस्था में समय-समय पर भूमि-कर में वृद्धि करने का प्रावधान था। साथ ही भूमि-कर अदा करने का उत्तरदायित्व सामूहिक रूप से सारे गांव (महाल) पर था। कर की बढ़ौतरी व उसे न अदा कर पाने पर सारा गांव-ज़मींदार व किसान प्रभावित होते थे और सभी पर सरकारी जुल्म बरपता था। यही कारण है कि गांव-के-गांव विद्रोही हो गए थे।

प्रश्न 38.
लैप्स की नीति क्या थी?
उत्तर:
जिन राज्यों के नरेशों की अपनी निजी संतान (पुत्र) नहीं थी और गोद लिए हुए पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से कंपनी ने स्पष्ट इंकार कर दिया था। झांसी व सतारा इत्यादि राज्यों में यह नीति विद्रोह को हवा देने में एक बड़ा कारण रही। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र के राज अधिकार के लिए संघर्ष में उतरी थी।

प्रश्न 39.
‘यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।’ यह शब्द किसने क्यों कहे थे?
उत्तर:
1851 में ही लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध के बारे में कहा था कि “यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा” (“A cherry that will drop into our mouth one day”) डलहौज़ी उग्र साम्राज्यवादी नीति का पोषक था। उसने नैतिकता को दाव पर रखते हुए, देशी नरेशों के अस्तित्व को मिटाने तथा उनके राज क्षेत्रों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का निर्णय कर लिया था।

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प्रश्न 40.
एकमुश्त बन्दोबस्त का ताल्लुकदारों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1856 ई० में अधिग्रहण के बाद एकमुश्त बंदोबस्त (Summary Settlement of 1856) नाम से भू-राजस्व व्यवस्था लागू की गई, जो इस मान्यता पर आधारित थी कि ताल्लुकदार जमीन के वास्तविक मालिक नहीं हैं। वे भू-राजस्व एकत्रित करने वाले बिचौलिये ही रहे हैं, जो किसानों से कर वसूल करके नवाब को देते थे। उन्होंने ज़मीन पर कब्जा धोखाधड़ी व शक्ति के बल पर किया हुआ है। इस मान्यता के आधार पर ज़मीनों की जाँच की गई और ताल्लुकदारों की ज़मीनें उनसे लेकर किसानों को दी जाने लगीं और उन्हें मालिक घोषित किया गया।

प्रश्न 41.
‘इन मेमोरियम’ चित्र में कैसी भावनाओं को चित्रांकित किया गया है?
उत्तर:
1859 में जोसेफ नोएल पेटन (Joseph Noel Paton) का चित्र ‘इन मेमोरियम’ यानी ‘स्मृति में प्रकाशित हआ। इसमें अंग्रेज़ औरतें और बच्चे लाचार और मासूम स्थिति में परस्पर लिपटे हुए हैं। चित्र में भीषण हिंसा नहीं है फिर भी उस तरफ एक विशेष खामोशी संकेत कर रही है जैसे कुछ अनहोनी होने वाली है, जिसमें मृत्यु और बेइज्जती कुछ भी हो सकता है। दर्शक के मन में बेचैनी और क्रोध की भावना चित्र को निहारने से सहज रूप में उभरती है।

प्रश्न 42.
‘जस्टिस’ नामक चित्र के नीचे पंक्ति में क्या लिखा गया है?
उत्तर:
12 सितंबर, 1857 को पन्च नामक एक पत्रिका में ‘जस्टिस’ नामक प्रकाशित हुए एक चित्र में एक ब्रिटिश स्त्री को हाथ में तलवार और ढाल लिए आक्रामक मुद्रा में दिखाया गया है। प्रतिशोध से तड़पती हुई वह विद्रोहियों को कुचल रही हैं। भारतीय स्त्री-बच्चे डर से दुबके हुए हैं।
चित्र के नीचे एक पंक्ति में लिखा गया है कि “कानपुर में हुए भीषण जन-संहार के समाचार ने समूचे ब्रिटेन में बदले की गहरी इच्छा और भयानक अपमान के भाव को उत्पन्न कर दिया है।”

प्रश्न 43.
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग” कॉर्टून में किस चीज को दिखाया गया है?
उत्तर:
24 अक्तूबर, 1857 को पन्च नामक पत्रिका में प्रकाशित एक कॉर्टून (‘The Clemency of Canning’) में कैंनिग को एक सैनिक को क्षमा करते हुए दिखाया गया है। इसमें एक साथ कई भाव प्रकट होते हैं। भारतीय सिपाही को बौना और फटी पैंट में अपमानजनक स्थिति में दिखाया गया है। वहीं अभी भी उसकी तलवार से खून टपक रहा है यानी उसमें बर्बरता कायम है। फिर भी केनिंग एक दयावान बुजुर्ग (उपहास पात्र) के रूप में उसके सिर पर हाथ रखकर उसे क्षमा कर रहा है।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 के विद्रोह की शुरूआत व प्रसार में अफवाहों व भविष्यवाणियों पर प्रकाश डालिए? लोग इन पर क्यों विश्वास कर रहे थे?
उत्तर:
‘चर्बी वाले कारतूस’ तथा कुछ अन्य अफवाहों व भविष्यवाणियों से विद्रोह की शुरूआत व प्रसार हुआ। लेकिन अ तभी फैलती हैं जब उन अफवाहों में लोगों के मन में गहरे बैठे भय और संदेह की आवाज़ सुनाई देती है। अतः भय और संदेह पैदा करने वाली परिस्थितियों में ही किसी ऐसी घटना के दूसरे कारण छिपे होते हैं।
अफवाहें व भविष्यवाणियाँ-1857 का विद्रोह मुख्यतः चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह को लेकर शुरू हुआ। लेकिन अन्य कई और अफवाहों का भी इसमें योगदान था :

1. ‘चर्बी वाले कारतूस’ (Greased Cartridges)-1857 ई० का विद्रोह मुख्यतः चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह को लेकर शुरू हुआ। 1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफ़वाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। गाय हिंदुओं के लिए पूजनीय थी तो सूअर से मुसलमान घृणा करते थे। अतः दोनों धर्मों के सैनिकों ने इसे अंग्रेज़ों का धर्म भ्रष्ट करने का षड़यंत्र समझा। इन कारतूसों के प्रति सिपाहियों की नाराजगी को भांपते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने सिपाहियों को लाख समझाने का प्रयत्न किया परंतु किसी ने इस पर विश्वास नहीं किया। इसने सिपाहियों में अत्यंत रोष उत्पन्न कर दिया था।

2. अन्य अफवाहें व भविष्यवाणियाँ-अन्य अफ़वाहों में से एक थी आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट । इसे लोग अंग्रेज़ों के एक बड़े षड्यंत्र के रूप में देख रहे थे। उन्हें यह लग रहा था कि हिंदू और मुसलमान सभी भारतीयों के धर्म भ्रष्ट करने के एक षड्यंत्र के तहत ही आटे में गाय व सूअर की हड्डियों का चूरा मिलाया गया है। लोगों ने बाजार के आटे को हाथ तक लगाने से मना कर दिया। अधिकारी वर्ग के समझाने-बुझाने के प्रयास भी कोई काम नहीं आए। बल्कि रेल व तार जैसी व्यवस्था के बारे में यही भ्रांति एवं अफवाह थी कि यह भी ईसाई बनाने का एक षड्यंत्र ही है। इसी बीच ‘फूल और चपाती’ बाँटने की रिपोर्ट आ रही थीं और साथ ही यह भविष्यवाणी भी जोर पकड़ रही थी कि अंग्रेजी राज भारत में अपनी स्थापना के सौ वर्ष बाद समाप्त हो जाएगा।

प्रश्न 2.
सहायक संधि प्रणाली की विशेषताएँ लिखो।
उत्तर:
लॉर्ड वेलेजली ने 1798 ई० में भारत में सहायक संधि प्रणाली को अपनाया। इसकी प्रमुख शर्ते इस प्रकार थीं

  • देशी शासक को अपने दरबार में एक अंग्रेज़ रेजीडेंट रखना होता था और इसके परामर्शनुसार ही शासन का संचालन करना था।
  • देशी शासक को अपने राज्य में एक अंग्रेज़ी सहायक सेना को रखना होता था और इस सहायक सेना का व्यय देशी शासक को ही करना था।
  • देशी शासक अंग्रेजों के परामर्श के बिना किसी दूसरे शासक के साथ युद्ध अथवा संधि नहीं कर सकता था।
  • देशी शासक अंग्रेज़ों के अतिरिक्त किसी अन्य यूरोपीय जाति के व्यक्ति को राज्य में नौकरी पर नहीं रख सकता था।
  • देशी शासक को राज्य में सहायक सेना रखने के बदले में एक निश्चित धनराशि कंपनी को देनी होती थी। धनराशि न देने की स्थिति में देशी शासक को अपने राज्य का कुछ भू-भाग अंग्रेजों को देना होता था।

प्रश्न 3.
अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई न्याय व्यवस्था विद्रोह के लिए कैसे उत्तरदायी थी?
उत्तर:
ब्रिटिश कंपनी द्वारा स्थापित नई न्याय व्यवस्था भी भारतीयों में असंतोष का एक कारण रही। ‘कानून के सम्मुख समानता’ के सिद्धांत पर आधारित बताई गई इस व्यवस्था में तीन मुख्य दोष थे-अनुचित देरी, न्याय मिलने में अनिश्चितता और अत्यधिक व्यय। इन दोषों के कारण यह नया कानूनी तंत्र गरीब आदमी के शोषण का अमीर वर्ग के हाथ में एक हथियार बन गया अभियोग वर्षों तक चलता रहता था। कोर्ट फीस और वकीलों के खर्चे किसी आम आदमी के बस की बात नहीं थी। इसके अलावा न्यायालयों में भ्रष्टाचार का बोलबाला था। अमीर व चालाक आदमी झूठे गवाह बनाकर भी अभियोग का निर्णय अपने पक्ष में करवाने में सफल हो जाते थे।

उल्लेखनीय है कि विद्रोह से पहले के वर्षों में अंग्रेजों द्वारा स्थापित नई भूमिकर व्यवस्था तथा भूमि के स्वामित्व को लेकर ग्रामीण वर्गों में कई तरह के अंतर्विरोध उभर आए थे। इसके लिए उन्हें अदालतों के दरवाजे खटखटाने पड़ रहे थे। लेकिन गरीब किसान को न्याय नहीं मिल रहा था। उसकी जमीन महाजनों के हाथों में जा रही थी। अवध में तो किसान, ज़मींदार एवं ताल्लुकदार सभी भूमि के स्वामित्व को लेकर परेशान थे। धड़ाधड़ एक-दूसरे के विरुद्ध मुकद्दमें दायर कर रहे थे। इस प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए सादिक-उल-अखबार नामक एक समाचार-पत्र ने लिखा, “वे अपना धन व्यर्थ गंवा रहे हैं और सरकार के खजाने को भर रहे हैं।” वास्तव में, इन परिस्थितियों में यह न्याय-व्यवस्था भी विद्रोह के कारणों में से एक थी।

प्रश्न 4.
विद्रोह की असफलता के कोई पाँच कारण बताएँ।
उत्तर:
विद्रोह की असफलता के कारण निम्नलिखित थे
1. केनिंग की कूटनीति और साम्राज्य बनाए रखने का दृढ़ संकल्प-अंग्रेज़ अधिकारियों की रणनीति और उनके दृढ़ संकल्प की विद्रोह के दमन में विशेष भूमिका रही।

2. संगठन व योजना का अभाव-विद्रोहियों के पास संगठन और योजना का अभाव था। 31 मई की योजना के भी पुख्ता प्रमाण नहीं हैं। यदि थी भी तो कार्यान्वित नहीं हो पाई।

3. अस्त्र-शस्त्रों की कमी-उनके पास केवल वो ही गोला-बारूद व बंदूकें थीं जो उन्होंने ब्रिटिश शस्त्रागारों से लूटे थे। नए हथियारों की आपूर्ति ज्यादा संभव नहीं थी।

4. यातायात व संचार-साधनों पर अंग्रेजों का नियंत्रण-विशेषतः रेल व तार व्यवस्था पर अंग्रेजों का पूर्ण नियंत्रण था।जिनके बारे में एक अंग्रेज़ लेखक ने लिखा था-रेल व तार व्यवस्था ने 1857 ई० की क्रांति में हमारे लिए हजारों मनुष्यों का काम किया।

5. सभी सैनिकों का विद्रोह में शामिल होना-अंग्रेज़ फौज में लगभग आधे भारतीय सिपाही तो विद्रोही हो गए थे, लेकिन शेष सिपाहियों ने विद्रोह को कुचलने में अंग्रेज़ों का पूरा-पूरा साथ दिया।

6. अंग्रेज़ों को देशी शासकों का सहयोग–अधिकांश देशी नरेशों (हैदराबाद, ग्वालियर, पटियाला, नाभा, जींद, कपूरथला, बड़ौदा तथा राजपूताना के अधिकार शासक इत्यादि) विद्रोह के दमन कार्य में अंग्रेज़ों की सहायता की।

7. सीमित जन-समर्थन-उत्तर:भारत के काफी क्षेत्रों में सैनिक विद्रोहियों को व्यापक जन-समर्थन मिला। फिर भी पंजाब, पूर्वी बंगाल, राजस्थान व गुजरात इत्यादि क्षेत्रों में विद्रोह न के बराबर था। दक्षिणी भारत इससे लगभग अछूता रहा। शिक्षित मध्य वर्ग की सहानुभूति भी अंग्रेज़ों के साथ थी।

प्रश्न 5.
1857 ई० के विद्रोह के प्रमुख आर्थिक कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के प्रमुख आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं

1. भारत का आर्थिक शोषण भारत में अंग्रेज़ों की व्यवस्था शोषणकारी थी। अपनी राजनीतिक सत्ता का दुरुपयोग करते हुए अंग्रेजों ने कृषकों से अधिकाधिक लगान वसूल किया। कारीगरों को कोड़ियों के भाव अपना माल बेचने के लिए विवश किया। इस प्रकार भारतीय कारीगरों व किसानों की दुनिया देखते-ही-देखते उजड़ गई। बेरोजगारी, बदहाली और भुखमरी छा गई। इसी ने किसान, कारीगर और जन-सामान्य को विद्रोही बना दिया था।

2. महालवाड़ी भूमि-कर व्यवस्था-भूमि-कर की महालवाड़ी व्यवस्था को इरफान हबीब ने इस विद्रोह के लिए मुख्य तौर पर दोषी बताया है। इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमि-कर में वृद्धि करने का प्रावधान था। साथ ही भूमि-कर अदा करने का उत्तरदायित्व सामूहिक रूप से सारे गांव (महाल) पर था। कर न अदा कर पाने पर सारा गांव प्रभावित होता था। यही कारण है कि गांव-के-गांव विद्रोही हो गए थे।

3. भूमि-कर की सख्ती से उगाही-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अधिक-से-अधिक भूमि-कर वसूलना चाहती थी। अकाल और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय भी भारतीय किसान को अंग्रेजी हुकूमत कोई रियायत नहीं देती थी। सख्ती से डंडे के बल पर पैसा वसूला जाता था। भारतीय किसान भुखमरी की स्थिति में था। कर अदा करने के लिए वह कर्ज-पर-कर्ज लेता था। वास्तव में यही वह जुल्म था जिससे किसान विद्रोही हो गए थे।

4. बेरोजगारी और भुखमरी कंपनी शासन की शोषणकारी नीतियों से जन-सामान्य निरंतर गरीब होता रहा। कई स्थानों पर भुखमरी की स्थिति थी। सर सैयद अहमद खाँ लिखते हैं, “कुछ लोग इतने गरीब थे कि वे एक-एक आने अथवा एक-एक सेर आटे के लिए प्रसन्नतापूर्वक विद्रोहियों के साथ मिल गए।”

प्रश्न 6.
1857 के जनविद्रोह के पूर्व के कुछ वर्षों में अंग्रेज़ अधिकारियों और भारतीय सिपाहियों के बीच सम्बन्ध किस प्रकार बदल गए?
उत्तर:
1857 के जनविद्रोह से पहले, लगभग 15 वर्षों में अधिकारियों और सैनिकों (सिपाहियों) के बीच परस्पर सम्बन्धों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन उभरे। यह परिवर्तन भी सेना में आक्रोश का एक बड़ा कारण था। 1820 तक के दशक में गोरे अधिकारियों व भारतीय सिपाहियों के बीच संबंधों में काफी मित्रतापूर्ण भाव था। अधिकारी सिपाहियों के साथ तलवारबाज़ी, मल्ल-युद्ध इत्यादि खेलों में भाग लेते थे। इकट्ठे शिकार पर जाते थे। वे भारतीय रीति-रिवाज व संस्कृति में भी रुचि लेते थे और भारतीय भाषाओं से परिचय रखते थे। उनमें अभिभावक का स्नेह और अधिकारी का रौब दोनों था।

परंतु 1840 के बाद आए नए अधिकारियों में ये सब बातें नहीं थीं। उनमें नस्ली भेदभाव अधिक था। भारतीय सिपाहियों को वे गाली-गलौच व शारीरिक हिंसा पहुँचाने में कोई परहेज नहीं करते थे। उनके लिए सैनिकों की भावनाओं की कोई कद्र नहीं थी। ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ जाने से संदेह की भावना का पैदा होना स्वाभाविक था। डर एवं संदेह बढ़ जाने से अफवाहों की भूमिका बढ़ जाती है।

प्रश्न 7.
1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए किस प्रकार के कानूनों का सहारा लिया गया?
उत्तर:
1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए प्रत्येक ‘गोरे व्यक्ति’ को सर्वोच्च न्यायिक अधिकार प्रदान किए गए। इसके लिए कई कानून पारित किए गए। मई और जून (1857) में समस्त उत्तर भारत में मार्शल लॉ लगाया गया। साथ ही विद्रोह को कुचले जाने वाली सैनिक टुकड़ियों के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए। एक सामान्य अंग्रेज़ को भी उन भारतीयों पर मुकद्दमा चलाने व सजा देने का अधिकार था, जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था। सामान्य कानूनी प्रक्रिया को समाप्त कर दिया गया। इसके अभाव में केवल मृत्यु दंड ही सजा हो सकती थी। अतः यह स्पष्ट कर दिया था कि विद्रोह की केवल एक ही सजा है सजा-ए-मौत।

प्रश्न 8.
1857 ई० के विद्रोह के परिणाम बताएँ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के परिणाम भारतीयों तथा अंग्रेज़ों दोनों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण थे। अंग्रेज़ इसके बाद सजग हो गए। जबकि भारतीयों में यह राष्ट्रवाद के लिए एक प्रेरक तत्त्व बन गया। इस विद्रोह के संक्षेप में निम्नलिखित परिणाम निकले

1. प्रशासनिक ढांचे में परिवर्तन-1858 में ब्रिटिश संसद में एक एक्ट पारित करके भारत में कंपनी शासन को समाप्त कर दिया। भारत पर नियंत्रण के लिए लंदन में गृह-विभाग (भारत सचिव तथा उसकी 15 सदस्यीय परिषद्) बनाया गया। भारत में गवर्नर-जनरल (मुख्य प्रशासक) को भारतीय रियासतों के लिए वायसराय (प्रतिनिधि) कहा जाने लगा।

2. उच्च वर्गों के प्रति नई नीति-भारतीय नरेशों को अंग्रेजों ने पर्णतः अधीन रखते हए जनता के आंदोलनों के विरोध में ही नीति जागीरदारों और जमींदारों के साथ अपनाई गई। अतः 1858 के बाद यह भारतीय उच्च वर्ग ब्रिटिश सत्ता का आधार स्तंभ हो गया।

3. फूट डालो और राज करो की नीति-जन संघर्षों के विरुद्ध यह नीति ब्रिटिश प्रशासकों की एक मुख्य शस्त्र बन गई, सैनिकों में भी यही नीति अपनाई गई। हिंदू-मुसलमानों में फूट डलवाने का प्रयास विद्रोह के दौरान और भविष्य में जारी रहा। यह नीति भारत के लिए बहुत ही घातक सिद्ध हुई।

4. समाज-सुधारों के परित्याग की नीति-विद्रोह से पूर्व के कुछ दशकों में ‘समाज-सुधार’ की नीति (उदाहरण के लिए उन्होंने सती-प्रथा, कन्या-वध, बाल-विवाह आदि को अवैध घोषित किया, विधवा विवाह को कानूनी मान्यता दी) को इसके बाद पूर्णतः त्याग दिया गया।

5. राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरणा-1857 का विद्रोह आजादी के दीवानों के लिए एक प्रमुख प्रेरणा स्रोत बना।

प्रश्न 9.
“अफवाहें तभी फैलती हैं जब उनसे लोगों में भय और संदेह की अनुगूंज सुनाई दे।” स्पष्ट करें।
उत्तर:
1857 के विद्रोह के शुरू होने तथा उसके घटनाक्रम को निर्धारित करने में अफवाहों की बहुत बड़ी भूमिका थी। उदाहरण के लिए चर्बी लगे कारतूसों की बात या आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट पर सैनिकों सहित लोगों ने मन से विश्वास किया। इन अफवाहों के बारे में अधिकारियों ने अपने स्पष्टीकरण दिए और समझाने-बुझाने का प्रयास भी किया। लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया। इसका कारण था अफवाहों के पीछे का सच, जिसमें लोगों के मन में गहरे बैठे डर और संदेह की गूंज सुनाई देती है। ब्रिटिश नीतियों ने लोगों के मन में गहरे डर को जन्म दिया। उदाहरण के लिए कुछ नीतियों को देखें-

(1) भारतीय हिन्दू सैनिकों को दूसरे देशों (अफगानिस्तान, मिस्र, तिब्बत, बर्मा आदि) में लड़ने के लिए भेजा जाता था। ये सैनिक मुख्यतः उच्च जातियों से थे और बाहर जाने में अपने धर्म की क्षति समझते थे। जब उन्होंने विरोध किया तो कानून बनाकर उन्हें मजबूर किया गया। इससे यह विश्वास हआ कि सरकार उनके धर्म को नष्ट करना चाहती है।

(2) सामाजिक सुधार कानूनों और पाश्चात्य शिक्षा प्रसार से भी यही प्रकट हो रहा था कि अंग्रेज़ ईसाई धर्म का प्रसार करने के लिए यह सब कुछ कर रहे हैं।

(3) ईसाई मिशनरियों को स्कूलों, छावनियों एवं जेलों सभी जगह अपने धर्म प्रचार की खुली छूट दी गई थी। वास्तव में यहीं अंग्रेजों की नीतियाँ व गतिविधियाँ थीं जो अफवाहों के माध्यम से गूंज रही थीं।

प्रश्न 10.
विद्रोहियों के प्रति अंग्रेज़ों ने दहशत का प्रदर्शन किस प्रकार किया?
उत्तर:
विद्रोह को सख्ती से कुचल दिया गया था, लेकिन इसके उपरान्त ‘दहशत के प्रदर्शन’ की नीति अपनाई गई। इसका उद्देश्य था कि भारतीय भविष्य में विद्रोह को स्मरण करते ही काँप उठे और वे पुनः विद्रोह करने की कभी न सोच सकें। इसलिए यह प्रदर्शन दो स्तरों पर किया गया

1. ब्रिटेन में प्रदर्शन-ब्रिटिश समाचार पत्र-पत्रिकाओं में भी अत्यधिक लोमहर्षक शब्दों में विद्रोह से संबंधित विवरण व कहानियाँ प्रकाशित की गईं। विशेषतः विद्रोहियों की हिंसात्मक कार्रवाइयों को भड़काऊ एवं ‘बर्बर’ रूप में प्रस्तुत किया गया, जिनको पढ़कर ब्रिटेन के आम लोगों में प्रतिशोध व ‘सबक सिखाने की मांग’ उठी। फलतः विद्रोहियों को कुचलने वाले, घरों व गांवों को जलाने वाले उन लोगों की दृष्टि में नायक बनकर उभरे। इंग्लैण्ड में कितने ही चित्र, रेखाचित्र, पोस्टर, कार्टून आदि बने और प्रकाशित हुए जिनसे प्रतिशोध की भावना को प्रोत्साहन मिला।

2. भारत में प्रदर्शन-इंग्लैण्ड में तो प्रतिशोध (बदला) के लिए मांग उठ रही थी तो भारत में दिल दहला देने वाली मार-काट और पाश्विक अत्याचार किए गए। प्रतिशोध के लिए सार्वजनिक दंड की नीति अपनाई गई। गांव के बाहर पेड़ों पर सरे आम फांसी दी गई। विद्रोही सिपाहियों को तोप के गोलों से उड़ाया गया। इसका उद्देश्य सैनिकों और आम लोगों को सबक सिखाना था।

प्रश्न 11.
दिल्ली पर अंग्रेज़ों के पुनः नियन्त्रण को संक्षेप में बताएँ।
उत्तर:
लॉर्ड केनिंग ने शुरू से ही दिल्ली पर पुनः अधिकार करने की रणनीति अपनाई। क्योंकि वह जानता था कि दिल्ली को विद्रोहियों से छीन लेने से उनकी कमर टूट जाएगी। इसके लिए 8 जून को अंबाला की ओर से आगे बढ़कर अंग्रेज़ी सेना ने दिल्ली को घेर लिया और अंतिम आक्रमण के लिए पंजाब से आने वाली एक दूसरी सैनिक टुकड़ी का इंतजार करने लगी। विद्रोही सिपाहियों ने मिर्जा मुगल तथा बख्त खाँ के नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेना पर कई धावे बोले, परंतु कोई जोरदार बड़ा आक्रमण नहीं कर पाए, क्योंकि सिपाहियों में अनुशासन व समन्वय का अभाव था। खजाना खाली था।

सिपाहियों को वेतन देने के लिए भी धन नहीं था। दिल्ली में विद्रोहियों में सर्वाधिक प्रभावशाली सैनिक नेता बख्त खाँ था। नजफगढ़ में उसकी सेना अंग्रेजों से हार गई जो विद्रोहियों के लिए गहरा आघात था। इसी बीच सितंबर के आरंभ तक जॉन निकलसन के नेतृत्व में पंजाब से एक बड़ी सैनिक टुकड़ी पहुँचने से अंग्रेज़ी सेना की शक्ति में और भी वृद्धि हो गई। अंत में पाँच दिन के घमासान संघर्ष के बाद 20 सितंबर, 1857 ई० को अंग्रेज़ी सेना ने विजयी होकर दिल्ली में प्रवेश किया, परंतु निकलसन इस लड़ाई में मारा गया। दिल्ली पर पुनः अधिकार करते ही अंग्रेज़ी सेना ने दिल्लीवासियों पर असीम अत्याचार किए।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 12.
कला व साहित्य ने 1857 के घटनाक्रम को जीवित रखने में योगदान दिया। झांसी की रानी के उदाहरण से स्पष्ट करें।
उत्तर:
साहित्य तथा चित्रों में विद्रोह के नेताओं को ऐसे नायकों के रूप में प्रस्तुत किया है जिन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध हथियार उठाये। उन्हें महान देशभक्त माना गया। देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन में वे हमेशा प्रेरणा स्रोत बने रहे। अनेक चित्रों व साहित्य में रानी लक्ष्मीबाई की छवि को एक मर्दाना योद्धा के रूप में स्थापित किया गया है। उसे सैनिक वेशभूषा में घोड़े पर सवार, एक हाथ में तलवार व एक हाथ में लगाम थामे युद्ध के मैदान में जाते हुए दिखाया गया है। इससे रानी लक्ष्मीबाई की छवि एक वीरांगना के रूप में उभरकर सामने आई। सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ और अधिक जोश भर देती हैं, “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।”

प्रश्न 13.
1857 ई० के विद्रोह ने भारतीय राजनीति पर दीर्घकालीन प्रभाव डालें। समीक्षा कीजिए।
अथवा
1857 ई० के विद्रोह की विरासत की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 ई० का विद्रोह असफल रहा लेकिन भारतीय राजनीति पर इसके दीर्घकालीन प्रभाव पड़े। वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के लिए भारतीय जनता का यह पहला शक्तिशाली विद्रोह था जिसमें हिन्दुओं व मुसलमानों ने सारे भेद भुलाकर समान रूप से भाग लिया। भारतीय जनता के मन पर इसने अमिट छाप छोड़ी।

आधुनिक राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास का आधार तैयार करने में इस विद्रोह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में 1857 के नायक हमेशा प्रेरणा स्रोत बने रहे। वीरों की गाथाएं घर-घर गाई जाने लगीं। उनके नाम जन-शक्ति का प्रतीक बनें और आज भी उन्हें स्मरण किया जाता है। पूरे देश में इस विद्रोह के 150 वर्ष पूरे होने पर स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक के कार्यक्रम आयोजित किए गए।

प्रश्न 14.
1857 ई० के विद्रोह के दौरान हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच एकता के महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह में हिन्दुओं तथा मुसलमानों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। दोनों समुदायों की एकता सैनिकों, जनता और नेताओं सभी में देखी गई। बहादुरशाह जफ़र को सभी हिंदुओं और मुसलमानों ने अपना नेता माना। हिंदुओं की भावनाओं को ठेस न पहुँचे इसलिए कई स्थानों पर गो हत्या पर प्रतिबन्ध लगाया गया। स्वयं बादशाह बहादशाह जफ़र की ओर से की गई घोषणा में मुहम्मद व महावीर दोनों की दुहाई देते हुए संघर्ष में शामिल होने की अपील की गई।

ब्रिटिश अधिकारियों ने इस एकता को तोड़ने के भरसक प्रयास किए। उदाहरण के लिए बरेली में विद्रोह के नेता खान बहादुर के विरुद्ध हिन्दू प्रजा को भड़काने के लिए वहाँ के अधिकारी जैम्स औट्रम द्वारा दिया गया धन का लालच भी कोई काम नहीं आया।

प्रश्न 15.
मौलवी अहमदुल्ला शाह पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
मौलवी अहमदुल्ला शाह नेताओं में ऐसा ही एक नाम है जिन्हें लोग पैगंबर मानने लगे थे। सन् 1856 में उन्हें अंग्रेज विरोधी प्रचार करते हुए गांव-गांव जाते देखा गया था। उनके साथ हजारों लोग जुड़ गए थे। वे एक पालकी में बैठकर चलते थे। पालकी के आगे-आगे ढोल और पीछे उनके हजारों समर्थक चलते थे। 1857 में उन्हें फैजाबाद की जेल में बंद कर दिया गया। रिहा होने पर 22वीं नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोही सिपाहियों ने उन्हें अपना नेता मान लिया। वे बहादुर व ताकतवर थे। साथ ही उनकी ‘पैगंबर’ होने की छवि ने उन्हें लोगों का विश्वास जीतने में सहायता की।

बहुत सारे लोगों का विश्वास था कि उन्हें कोई हरा नहीं सकता। उनके पास ईश्वरीय शक्तियाँ हैं। चिनहाट के संघर्ष में उन्होंने हेनरी लारेंस को पराजित किया। मौलवी अहमदुल्ला का वास्तविक नाम सैयद अहमदखान (जियाऊद्दीन) था। वह सूफी संत सैयद फरकान अली का शिष्य था। इसी संत ने उसे अहमदुल्ला शाह का नाम दिया था। उसके विचार जेहादी बनते गए और वह अंग्रेज़ विरोधी प्रचारक बन गया।

प्रश्न 16.
विद्रोहियों के नेता के रूप में राव तुलाराम के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
राव तुलाराम ने रेवाड़ी क्षेत्र में विद्रोहियों को उल्लेखनीय नेतृत्व प्रदान किया। यह इसी क्षेत्र की एक छोटी रियासत के मालिक थे। इनका जन्म 1825 ई० में रामपुरा (रवाड़ी) के स्थान पर हुआ। 1839 ई० में पिता की मृत्यु के बाद इन्होंने रियासत को सँभाला। वह इस बात से नाराज थे कि अंग्रेजों ने अपनी नीति से इस रियासत को एक इस्तमरारी जागीर में बदल दिया अर्थात् ऐसी रियासत जिसमें सत्ता के अधिकार सीमित कर दिए गए हों, केवल भू-राजस्व एकत्र करने का अधिकार छोड़ा गया हो। राव तुलाराम ने 16 नवम्बर, 1857 को नारनौल के स्थान पर अंग्रेज़ों से जमकर लड़ाई की। इसमें हारने के बाद वे राजस्थान के कई राजाओं से सहायता माँगने के लिए गए। फिर सहायता के लिए ईरान व अफगानिस्तान गए। उन्होंने रूस के जार से भी सम्पर्क स्थापित किया। 23 सितंबर, 1863 में काबुल में 38 वर्ष की उम्र में इनका देहान्त हो गया।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 के प्रमुख राजनीतिक कारणों पर संक्षेप में प्रकाश डालें।
उत्तर:
1857 के विद्रोह के लिए उत्तरदायी प्रमुख राजनीतिक कारण इस प्रकार थे

1. विस्तार की नीति-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में साम्राज्य स्थापित करने के लिए भारतीय राज्यों को पराजित करके उन्हें सहायक संधि स्वीकार करने के लिए विवश किया। सहायक संधि भारतीय नरेशों को गुलाम बनाने का एक तरीका था। इसे स्वीकार करने वाले देशी राज्य की सैन्य-शक्ति को समाप्त कर दिया जाता था। फिर धीरे-धीरे उसका राज्य-क्षेत्र कंपनी के राज्य में मिलाया जाने लगता था। लेकिन 19वीं शताब्दी के मध्य पहुँचते-पहुँचते इन ‘अधीन’ भारतीय नरेशों को यह भय लगने लगा कि अंग्रेज़ धीरे-धीरे उनके राज्यों का अस्तित्व ही मिटा देंगे। क्योंकि अंग्रेज़ उग्र विस्तार की नीति अपना चुके थे।

2. राज्य हड़पने की नीति-लॉर्ड डलहौजी ने सात भारतीय राज्यों का विलय राज्य हड़पने की नीति के अंतर्गत कर लिया था अर्थात् इन राज्यों के नरेशों की अपनी निजी संतान (पुत्र) नहीं थी और गोद लिए हुए पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से कंपनी ने स्पष्ट इंकार कर दिया था। झांसी व सतारा में यह नीति विद्रोह का एक बड़ा कारण रही। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र के राज अधिकार के लिए संघर्ष में उतरी थी।

3. पेंशन व उपाधियों की समाप्ति-कर्नाटक व तंजौर के शासक तथा पेशवा बाजीराव द्वितीय के गोद लिए हुए पुत्र नाना साहिब (धोंधू पंत) की पेंशन व उपाधि दोनों छीन लिए थे। पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु (1852 ई०) के पश्चात् नाना साहिब को न तो ‘पेशवा’ स्वीकार किया गया और न ही उसे 8 लाख रुपए वार्षिक पेंशन प्रदान की गई। नाना साहिब इस असहनीय अपमान से सख्त नाराज़ हुए। इसी नाराज़गी के कारण उन्होंने विद्रोह में भाग लिया तथा सिपाहियों व जन-विद्रोहियों का अदम्य साहस के साथ नेतृत्व किया।

4. बहादुर शाह जफर के प्रति अनादर भाव-मुगल साम्राज्य का सूर्यास्त तो बहुत पहले ही हो चुका था। उसके पास न तो सैन्य शक्ति थी और न ही राज्य। फिर भी भारत के लोगों के मन में उनके प्रति सहानुभूति व आदर-सम्मान दोनों ही था। कंपनी के प्रशासक तब तक मुगल सम्राट के प्रति सम्मान करने का दिखावा करते रहे, जब तक उन्होंने भारत में अपनी स्थिति को मजबूत न कर लिया।

लॉर्ड डलहौजी ने मुगल बादशाह बहादुर शाह की उपाधि को समाप्त करके उसे राजमहल व किले से वंचित करने का सुझाव दिया था। लॉर्ड केनिंग ने यह सुनिश्चित कर दिया था कि बहादुर शाह की मृत्यु के पश्चात् मुगल बादशाह का पद समाप्त कर दिया जाएगा। इसके उत्तराधिकारी को महल व किले में रहने का अधिकार नहीं होगा। सम्राट् के प्रति यह दुर्व्यवहार बहुत-से लोगों के असंतोष का कारण बना।

5. विदेशी सत्ता कंपनी के शासन का चरित्र विदेशी था। इसे तलवार के बल पर स्थापित किया गया था। इस सत्ता के संचालक हज़ारों मील दूर लंदन में बैठे थे। वहीं भारत के लिए शासन संबंधी नीतियाँ व कानून बनाए जाते थे, जिन्हें लागू करने वाले अंग्रेज़ प्रशासनिक अधिकारी अपने जातीय अभिमान से ग्रस्त थे। वे भारतीयों को हीन समझते थे और उनसे मिलने-जुलने में अपनी तौहीन समझते थे।

ब्रिटिश सत्ता का भारत में लक्ष्य जन-कल्याण कभी नहीं रहा। इसका लक्ष्य इंग्लैंड के आर्थिक हितों को लाभ पहुंचाने में निहित था। स्पष्ट है कि इन राजनीतिक कारणों का भी जन-विद्रोह के विस्तार में योगदान रहा है।

प्रश्न 2.
विद्रोहियों के दृष्टिकोण पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखें।
अथवा
विद्रोही क्या चाहते थे? स्पष्ट करें।
उत्तर:
पर्याप्त स्रोतों के अभाव में विद्रोहियों के दृष्टिकोण को समझना इतना सरल नहीं है। वैसे तो इस विद्रोह से संबंधित दस्तावेजों की कमी नहीं है। परन्तु यह सब सरकारी रिकॉर्डस हैं। इनसे अंग्रेज़ अधिकारियों की सोच का तो पता चलता है लेकिन विद्रोहियों का दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं होता।

अंग्रेज़ इसमें विजेता थे और विजेताओं का अपना ही दृष्टिकोण होता है। हारने वालों का दृष्टिकोण तो वैसे भी उनके द्वारा दबा दिया जाता है। 19वीं सदी के मध्य में हुए इस विद्रोह में भाग लेने वाले अधिकांश लोग अनपढ़ थे। जो कोई पढ़े-लिखे भी थे, उन्हें भी, जिस तरीके से विद्रोह को कुचला गया उसके चलते, कोई ब्यान दर्ज करवाने का अवसर नहीं मिला। फिर भी विद्रोहियों . द्वारा जारी की गई कुछ घोषणाएँ व इश्तहार मिलते हैं, जिनसे हमें विद्रोहियों के दृष्टिकोण की कुछ झलक मिलती है।

1. एकता की सोच-विद्रोही भारत के सभी सामाजिक समुदायों में एकता (Unity) चाहते थे। विशेषतौर पर हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया गया। उनकी घोषणाओं में जाति व धर्म का भेद किए बिना विदेशी राज़ के विरुद्ध समाज के सभी समुदायों का आह्वान किया गया। अंग्रेज़ी राज से पहले मुगल काल में हिंदू-मुसलमानों के बीच रही सहअस्तित्व की भावना का उल्लेख किया गया। बादशाह बहादुरशाह जफर की ओर से की गई घोषणा में मुहम्मद और महावीर दोनों की दुहाई देते हुए संघर्ष में शामिल होने की अपील की गई।

बरेली में विद्रोह के नेता खानबहादुर के विरुद्ध हिंदू प्रजा को भड़काने के लिए अंग्रेज़ अधिकारी जेम्स औट्रम (James Outram) द्वारा दिया गया धन का लालच भी कोई काम नहीं आया था। अंततः हारकर उसे 50,000 रुपये वापस ख़जाने में जमा करवाने पड़े जो इस उद्देश्य के लिए निकाले गए थे। इसी प्रकार दिल्ली में बकरीद के अवसर पर भी सांप्रदायिक तनाव पैदा करवाने की असफल कोशिश की गई थी।

2. विदेशी सत्ता को समाप्त करने की कोशिश-विद्रोहियों की घोषणाओं में ब्रिटिश राज के विरुद्ध सभी भारतीय सामाजिक होने का आह्वान किया गया। ब्रिटिश राज को एक विदेशी शासन के रूप में शोषणकारी माना गया। इससे संबंधित प्रत्येक चीज़ को पूर्ण तौर पर खारिज किया जा रहा था। अंग्रेजी सत्ता को निरंकुश के साथ-साथ षड़यं के लिए अंग्रेजी राज में कंपनी व्यापार तबाही का मुख्य कारण था। जबकि छोटे-बड़े भूस्वामियों के लिए अंग्रेज़ों द्वारा लागू भू-राजस्व व्यवस्था बर्बादी का कारण थी। अतः व्यापार की नई व्यवस्था तथा भू-राजस्व व्यवस्था को निशाना बनाया गया। अंग्रेज़ी व्यवस्था के कारण जो जीवन-शैली प्रभावित हुई उसे भी उन्होंने इंगित किया। वे पुरानी व्यवस्था को पुनः स्थापित करना चाहते थे।

धर्म, सम्मान व रोजगार के लिए लड़ने का आह्वान किया गया। इस लड़ाई को एक ‘व्यापक सार्वजनिक भलाई’ घोषित किया गया। विद्रोहियों की घोषणाओं में सर्वाधिक डर इसी बात को लेकर अभिव्यक्त हुआ कि अंग्रेज़ हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं। वे हमारी जाति व धर्म को भ्रष्ट करके अंततः हमें ईसाई बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इस डर और संदेह के कारण अफवाहें जोर पकड़ने लगीं। लोग इनमें विश्वास करने लगे।

3. अन्य उत्पीड़कों के विरुद्ध विद्रोह के दौरान विद्रोहियों के व्यवहार से कुछ एक ऐसा भी लगता है कि वे अंग्रेजी राज़ के साथ-साथ अन्य उत्पीड़कों के भी विरुद्ध थे। वे उन्हें भी नष्ट करना चाहते थे। उदाहरण के लिए उन्होंने सूदखोरों के बही-खाते जला दिये और उनके घरों में तोड़-फोड़ व आगजनी की। शहरी संभ्रांत लोगों को जानबूझ कर अपमानित भी किया। वे उन्हें अंग्रेजों के वफादार और उत्पीड़क मानते थे।

4. विकल्प की तलाश-निःसंदेह अंग्रेजी राज व्यवस्था को विद्रोही उखाड़ फेंकना चाहते थे। इसे उखाड़ने के बाद उनके पास भविष्य की नई राजनीतिक व्यवस्था की योजना नहीं थी। इसलिए वे पुरानी व्यवस्था को ही विकल्प के रूप में देख रहे थे। वे देशी राजा-रजवाड़ा शाही ही पुनः स्थापित करने के लिए लड़ रहे थे। वे 18वीं सदी की पूर्व ब्रिटिश दुनिया को ही दोबारा स्थापित देखना चाहते थे। इसलिए पुराने ढर्रे पर दरबार और दरबारी नियुक्तियाँ की गईं। आदेश जारी किए गए। भू-राजस्व वसूली और सैनिकों के वेतन भुगतान का प्रबंध किया गया। अंग्रेज़ों से लड़ने की योजना बनाने तथा सेना की कमान श्रृंखला निश्चित करने में भी प्रेरणा स्रोत 18वीं सदी का मुगल जगत ही था।

प्रश्न 3.
सन् 1857 के विद्रोह के लिए उत्तरदायी धार्मिक कारणों का संक्षिप्त में वर्णन करें।
उत्तर:
1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक कारणों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी। कई तरह की अफवाहें इस विद्रोह के शुरू होने और इसके फैलने से जुड़ी हुई थीं। इन अफवाहों के विश्वास के पीछे भी धार्मिक भावनाएं थीं। सैनिक और सामान्य लोग सभी इनसे आहत थे। 19वीं सदी के दूसरे दशक से कम्पनी सरकार ने भारतीय समाज को ‘सुधारने के लिए कई कानून बनाए और साथ ही ईसाई प्रचारकों को ईसाई धर्म प्रचार की छूट दी। इनसे विद्रोह की भावनाएं उत्पन्न हुईं। संक्षेप में हम इस संदर्भ में धार्मिक विश्वासों की भूमिका को इस प्रकार रेखांकित कर सकते हैं

1. सामाजिक सुधार कानून-गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक (1828-35) ने सती प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-वध इत्यादि को रोकने के लिए कानून बनाए। 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पास किया। इन कानूनों का रूढ़िवादी भारतीयों ने विरोध किया क्योंकि वे इन्हें सामाजिक और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बता रहे थे। चूंकि ये एक विदेशी सत्ता द्वारा बनाए गए कानून थे। इसलिए भी लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक था।

2. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार-अंग्रेज़ी शिक्षण संस्थाओं में ईसाई धर्म व पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार धड़ल्ले से किया जा रहा था। नव-शिक्षित वर्ग पश्चिमी रहन-सहन और भाषा को अपनाकर गर्व अनुभव करने लगा था। इससे स्वाभाविक रूप से यह विश्वास होने लगा कि अंग्रेज़ हमारे धर्म को नष्ट करना चाहते हैं और वे हमारे बच्चों को ईसाई बनाना चाहते हैं।

3. ईसाई धर्म का प्रचार-धर्म के मामले में तो भारतीय भयभीत हो गए थे। लोगों में यह डर बैठ गया था कि अंग्रेज़ उन्हें ईसाई बनाना चाहते हैं। मिशनरियों द्वारा स्कूलों में धड़ल्ले से धर्म-प्रचार किया जाता था। जेलों में भी पादरी कैदियों में ईसाई धर्म का प्रचार करते थे। सेना में सरकार की ओर से पादरी नियुक्त किए जाने लगे जो धर्म-प्रचार करते थे। धर्म परिवर्तन करने वाले भारतीय सिपाहियों को पदोन्नति का प्रलोभन दिया जाता था।

4. उत्तराधिकार कानून-1850 ई० में सरकार ने एक उत्तराधिकार कानून (Lex Loci Act, 1850) पास करके लोगों की शंका को विश्वास में बदल दिया था। इस कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म ग्रहण कर ले तो भी वह पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी रह सकता था। अब यदि कोई ईसाई धर्म ग्रहण करता था तो उसे पैतृक संपत्ति में से मिलने वाले हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता था।

5. सामान्य सेवा अधिनियम-1856 ई० में अंग्रेजों ने ‘सामान्य सेवा भती अधिनियम’ पास किया। इसके अनुसार भर्ती के समय ही प्रत्येक सैनिक को यह लिखित रूप में स्वीकार करना होता था कि जहाँ भी (भारत या भारत के बाहर) सरकार उसे युद्ध के लिए भेजेगी, वह जाएगा। इससे सैनिकों में भी असंतोष हुआ क्योंकि वे (अधिकांश उच्च जाति के हिन्दू सैनिक) समझते थे कि वे समुद्र पार जाने से उनकी जाति और धर्म दोनों नष्ट हो जाएंगे।

6. ‘चर्बी वाले कारतूस’ व अन्य अफवाहें-1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफवाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों’ ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। गाय हिंदुओं के लिए पूजनीय थी तो सूअर से मुसलमान घृणा करते थे। अतः दोनों धर्मों के सैनिकों ने इसे अंग्रेज़ों का धर्म भ्रष्ट करने का षड्यंत्र समझा।

अन्य कई तरह की अफवाहों में से एक थी आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट। इसे लोग अंग्रेजों के एक बड़े षड्यंत्र के रूप में देख रहे थे। उन्हें यह लग रहा था कि हिंदू और मुसलमान सभी भारतीयों के धर्म भ्रष्ट करने के एक षड्यंत्र के तहत ही आटे में गाय व सूअर की हड्डियों का चूरा मिलाया गया है। लोगों ने बाजार के आटे को हाथ तक लगाने से मना कर दिया। अधिकारी वर्ग के समझाने-बुझाने के प्रयास भी कोई काम नहीं आए। स्पष्ट है कि 1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में बहुत-से धार्मिक विश्वासों की भूमिका रही है, क्योंकि अंग्रेजों की नीतियों से यह विश्वास आहत हो रहे थे।

प्रश्न 4.
जन विद्रोह के प्रसार का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
विद्रोह 10 मई को मेरठ से शुरू हुआ। 11 मई को बहादुरशाह जफर ने स्वयं को विद्रोह का नेता घोषित करके समर्थन दे दिया। 12 और 13 मई को उत्तर भारत में शांति नज़र आई। लेकिन दिल्ली में विद्रोहियों के कब्जे और बहादुर शाह के नेतृत्व की सूचना जहाँ-जहाँ पहुंचती गई, वहाँ-वहाँ उत्तर भारत में विद्रोह तेज होता गया। एक महीने के भीतर ही उत्तर भारत की सैन्य छावनियों, शहर व. देहात में बड़े स्तर पर विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। भारत में अंग्रेज़ी सेना में लगभग 2 लाख 32 हजार भारतीय सैनिक थे। इनमें से लगभग आधे. इसमें कूद पड़े। विद्रोह शुरू करने का तरीका (Pattern) लगभग सभी जगह एक जैसा ही था।

सिपाहियों ने विद्रोह शुरू होने का संकेत प्रायः शाम को तोप का गोला दाग कर या फिर बिगुल बजाकर दिया। फिर जेल, सरकारी खजाने, टेलीग्राफ दफ्तर, रिकॉर्ड रूम, अंग्रेज़ों के बंगलों सहित तमाम सरकारी भवनों पर हमले किए गए। रिकॉर्ड रूम जलाए गए।

‘मारो फिरंगियों को’ नारों के साथ हिंदी, उर्दू व फारसी में अपीलें जारी की गईं। बड़े स्तर पर गोरे लोगों पर आक्रमण हुए। हिंदुओं और मुसलमानों ने एकजुट होकर विद्रोह में आह्वान किया। लोग अंग्रेजी शासन के प्रति नफरत से भरे हुए थे। वे लाठी, दरांती, तलवार, भाला तथा देशी बंदूकों जैसे अपने परंपरागत हथियारों के साथ विद्रोह में कूद पड़े। इनमें किसान, कारीगर, दकानदार व नौकरी पेशा तथा धर्माचार्य इत्यादि सभी लोग शामिल थे। सिपाहियों का यह विद्रोह एक व्यापक ‘जन-विद्रोह’ बन गया।

  • क्षेत्रीय विस्तार-सामाजिक व क्षेत्रीय दोनों तरह से निम्नलिखित क्षेत्र इसकी चपेट में आए

1. उत्तर प्रदेश-इस प्रदेश में लगभग समस्त गांवों, कस्बों और शहरों में यह फैल गया था। जून के पहले सप्ताह तक बरेली, लखनऊ, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ, बनारस जैसे बड़े-बड़े नगर स्वतंत्र हो चुके थे। विद्रोहियों ने इन पर अधिकार जमा लिया था। बरेली में रूहेला सरदार खान बहादुर खाँ, कानपुर में नाना साहिब (धोंधू पंत) तथा इलाहाबाद में पेशे से एक अध्यापक व वहाबी नेता मौलवी लियाकत खाँ ने प्रशासन की कमान संभाल ली। लखनऊ में अवध के नवाबों के राजवंश ने सत्ता संभाल ली थी परंतु यहाँ विद्रोह का असली नेता अहमदुल्ला शाह था।

2. बिहार में विद्रोह-बिहार में पटना, दानापुर, शाहबाद तथा छोटा नागपुर में काफी बड़े स्तर पर जन-विद्रोह के रूप में फूटा। यहाँ नेतृत्व जगदीशपुर के ज़मींदार कुंवर सिंह व कुछ अन्य स्थानीय ज़मींदारों ने किया।

3. मध्य भारत में विद्रोह-मध्य-भारत के झाँसी, ग्वालियर, इंदौर, सागर तथा भरतपर आदि क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव रहा। मख्यतः यहाँ विद्रोह का नेतृत्व झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने किया। राजस्थान और मध्य प्रदेश के अधिकतर देशी राजा अंग्रेज़ों के वफादार बने रहे। परंतु कई स्थानों पर जनता और सेना अपने शासकों का साथ छोड़कर विद्रोही हो गई थी। उदाहरण के लिए ग्वालियर के सैनिकों और लोगों ने विद्रोह में भाग लिया, परंतु सिंधिया राजा ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों का साथ दिया।

4. पंजाब व हरियाणा में विद्रोह-पंजाब में तो अंग्रेज़ों के विरुद्ध जेहलम, स्यालकोट आदि इलाकों में कुछ छिट-पुट घटनाएँ ही हुईं, लेकिन हरियाणा के हांसी, हिसार, रोहतक, रिवाड़ी और दिल्ली के साथ लगते मेवात क्षेत्र में बड़े स्तर पर लोगों ने हथियार उठाए। रिवाड़ी में राव तुला राम व उसके चचेरे भाई राव कृष्ण गोपाल ने इसका नेतृत्व किया। झज्जर में अब्दुल रहमान खाँ, मेवात में सरदार अली हसन खाँ तथा बल्लभगढ़ में राव नाहर सिंह और फर्रुखनगर के नवाब फौजदार खाँ विद्रोहियों के नेता थे।

यह विद्रोह मुख्यतः उत्तर भारत में ही था लेकिन कुछ छुट-पुट घटनाएँ दक्षिण व पूर्वी भारत में भी घटीं। पूर्व में दूर-दराज के क्षेत्र आसाम में भी इस विद्रोह की हवा पहुंची।
इस प्रकार यह उत्तर भारत में एक व्यापक विद्रोह था। बहुत-से अंग्रेज़ अधिकारियों में इससे घबराहट फैल गई थी। उन्हें लगने लगा था कि भारत उनके हाथ से निकल रहा है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 5.
अवध में विद्रोह की व्यापकता के कारण स्पष्ट करें।
अथवा
अवध में विद्रोह अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक ‘लोक प्रतिरोध’ में कैसे बदल गया? स्पष्ट करें।
उत्तर:
अन्य स्थानों की अपेक्षा अंग्रेजों के विरुद्ध लोक-प्रतिरोध अवध में अधिक था। लोग फिरंगी राज के आने से अत्यधिक आहत थे। उन्हें लग रहा था कि उनकी दुनिया लुट गई है। वह सब कुछ बिखर गया है, जिन्हें वे प्यार करते थे। अंग्रेजी राज की नीतियों ने किसानों, दस्तकारों, सिपाहियों, ताल्लुकदारों और राजकुमारों को परस्पर जोड़ दिया था। फलस्वरूप यह एक लोक-प्रतिरोध बनकर उभरा।

1. अवध का विलय-अवध का विलय 1856 में विद्रोह फूटने से लगभग एक वर्ष पहले ‘कुशासन’ का आरोप लगाते हुए किया गया था। इसे लोगों ने न्यायसंगत नहीं माना। बल्कि वे इसे अंग्रेज़ों का एक विश्वासघात पूर्ण कदम मान रहे थे। अवध को ब्रिटिश राज में मिलाने की इच्छा काफी पहले से बन चुकी थी। 1851 में ही लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध के बारे में कहा था कि “यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा” उसकी दिलचस्पी अवध की उपजाऊ जमीन को हड़पने में भी थी।

यह जमीन नील और कपास की खेती के लिए उपयुक्त थी। अवध के विलय से एक भावनात्मक उथल-पुथल शुरू हो गई। लोगों में नवाब व उसके परिवार से गहरी सहानुभूति थी। वे उन्हें दिल से चाहते थे। जब नवाब लखनऊ से विदा ले रहे थे तो बहुत सारे लोग उनके पीछे विला

2. उच्च वर्गों के हितों को हानि-देशी रियासतों के पतन के बाद परंपरागत दरबारी कुलीन उच्च वर्ग भी बर्बाद हो गया। राजा-नवाबों की ओर से इन परिवारों के सदस्यों को विशेषाधिकार प्राप्त थे। जन-सामान्य में यह प्रतिष्ठित लोग थे। देशी राज्यों के विलय के बाद इनकी सुख-सुविधा, विशेषाधिकार व प्रतिष्ठा सब खत्म हो गई। इससे असंतोष पनपा और वे विद्रोहियों के सहयोगी बन गए।

3. आश्रित वर्गों को हानि-देशी राज्यों के विलय से सेना व सामान्य वर्ग के लोगों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ा। हज़ारों सैनिक बेरोज़गार हो गए। कुछ तो रोजी-रोटी को मोहताज़ हो गए थे। अवध की सेना में से 45,000 सिपाहियों को मामूली पेंशन देकर बर्खास्त कर दिया गया था। मात्र 1000 को ब्रिटिश सेना में रखा गया और वे भी कंपनी की नौकरी से खुश नहीं थे। दरबार व उसकी संस्कृति खत्म होने के साथ ही कवि, कारीगर, बावर्ची, संगीतकार, नर्तक, सरकारी कर्मचारी व अन्य बहुत सारे लोगों की आजीविका समाप्त हो गई।

4. ताल्लुकदारों को क्षति-ताल्लुकदार अवध क्षेत्र में वैसे ही छोटे राजा थे जैसे बंगाल में ज़मींदार थे। वे छोटे महलनुमा घरों इनके अपने दुर्ग व सेना थी। 1856 में अवध का अधिग्रहण करते ही इन ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग भी ध्वस्त कर दिए गए।

जिनके पास ज़मीन के कागज-पत्र ठीक नहीं थे, उनकी ज़मीनें छीन ली गई थीं। लगभग 21,000 ताल्लुकदारों से ज़मीनें छीन ली गईं। सबसे बुरी मार दक्षिणी अवध के ताल्लुकदारों पर पड़ी। कुछ तो रोज़ी-रोटी को मोहताज़ हो गए थे। उनका सामाजिक सम्मान, स्थिति सब चली गई। ऐसी स्थिति में इन. जागीरदारों ने विद्रोहियों का साथ दिया।

5. किसानों में असंतोष-विद्रोह में बहुत बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। इससे अंग्रेज़ अधिकारी काफी परेशान हुए थे। उन्हें यह आशा थी कि जिन किसानों को हमने ज़मीन का मालिक घोषित किया है वे तो अंग्रेज़ समर्थक रहेंगे ही। परंतु ऐसा नहीं हुआ।

ब्रिटिश व्यवस्था की अपेक्षा वे ताल्लुकदारी को ही बेहतर मान रहे थे। ज़मींदार बुरे वक्त में उनकी सहायता भी करता था। लोगों की दृष्टि में इन ताल्लुकदारों की छवि दयालु अभिभावकों की थी। तीज-त्योहारों पर भी उन्हें कर्जा अथवा मदद मिल जाती थी, फसल खराब होने पर भी उनकी दया-दृष्टि किसानों पर रहती थी। मुसीबत के समय यह नई सरकार कोई सहानुभूति की भावना कृषकों से नहीं रखती थी।

किसान ये जान चुके थे कि अवध में भू-राजस्व की दर का आकलन बहुत बढ़ा-चढ़ा कर किया गया है। कुछ स्थानों पर तो भू-राजस्व की माँग में 30 से 70% तक की वृद्धि हुई थी। इस राजस्व व्यवस्था से सरकार के राजस्व में तो वृद्धि हुई लेकिन किसानों का शोषण कम होने की बजाय बढ़ गया। वस्तुतः इन्हीं कारणों से किसानों ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध शस्त्र उठाए।

6. किसान व सेना में संबंध-अवध में किसान और सैनिक परस्पर गहन रूप से जुड़े हुए थे। सेना का गठन गांवों के किसानों तथा ज़मींदारों में से ही किया गया था। बल्कि अवध को तो “बंगाल आर्मी की पौधशाला” (“Nursery of the Bengal Army”) कहा जाता था। यह सैनिक अपने गांव-परिवार से जुड़े हुए थे। हर सैनिक किसी किसान का बेटा, भाई या पिता था। एक भाई खेत में हल जोत रहा था तो दूसरे ने वर्दी पहन ली थी।

वह भी गांव में किए जा रहे अंग्रेज़ अधिकारियों के जुल्म से दुखी होता था। स्वाभाविक तौर पर उसमें भी इससे आक्रोश पैदा होता था। भूमि-कर की बढ़ी दरों व कठोरता से उसकी उगाही से किसान त्राही-त्राही कर रहा था। यहीं से अधिकांश सैनिक भर्ती किए हुए थे। नए भू-राजस्व कानूनों से जहाँ किसान, जमींदार ताल्लुकदार सभी पीड़ित थे वहीं सैनिक भी कम दुखी नहीं थे। स्पष्ट हैं कि इन सभी कारणों के संयोजन से ही अवध में विद्रोह एक जबरदस्त लोक-प्रतिरोध का रूप धारण कर गया।

प्रश्न 6.
1857 की घटना के बारे में प्रचलित दो मुख्य विचारधाराओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
अथवा
1857 की घटना ‘प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम’ था या मात्र एक ‘सैनिक विद्रोह’ था? स्पष्ट करें।
उत्तर:
1857 की घटना की प्रकृति को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद रहा है। भारतीय देशभक्तों ने आजादी की लड़ाई लड़ते हुए इसे ‘प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम’ की संज्ञा दी, जबकि दूसरी ओर अंग्रेज़ अधिकारियों और लेखकों ने इसे शुद्ध रूप में एक ‘सैनिक विद्रोह’ बताया। आजकल इतिहासकार इसे ‘जन-विद्रोह’ अथवा ‘1857 का आंदोलन’ के नाम से पुकारते हैं। यहाँ हम इन्हीं दो विचारों के तर्कों पर विचार करेंगे कि यह सैनिक विद्रोह था अथवा प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम।

1. सैनिक विद्रोह-अंग्रेज लेखक सर जॉन लारेंस तथा जॉन सीले इत्यादि ने 1857 की घटना को एक सैनिक विद्रोह बताया है। सीले का विचार है कि “यह देशभक्ति की भावना से रहित स्वार्थपूर्ण सैनिक विद्रोह था।” इस विचार के पक्ष में इन लेखकों ने निम्नलिखित तर्क दिए हैं

  • विद्रोह की शुरूआत मेरठ सैनिक छावनी से हुई और इसका प्रभाव क्षेत्र मुख्यतः सैनिकों में था। विशेषतः उत्तर भारत की छावनियों में ही रहा।
  • कुछ स्वार्थी लोगों को छोड़कर आम लोगों ने सैनिकों का साथ नहीं दिया।
  • विद्रोहियों में देश प्रेम , की भावना नहीं थी।
  • सैनिक वेतन, भत्ते व अन्य कुछ छोटी-मोटी समस्याओं से नाराज थे। साथ ही उनकी धार्मिक भावनाओं को ध्यान में न रखने के कारण वे भड़क उठे।
  • सभी जगह विद्रोह पहले सैनिकों ने शुरू किया और बाद में वे शासक उनके साथ मिल गए जिनकी सत्ता छीन ली गई थी।
    अतः इन तर्कों के आधार पर पश्चिमी लेखकों का मत है कि 1857 की घटना एक सैनिक विद्रोह’ से अधिक कुछ नहीं था।

2. प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम-इस मत के समर्थकों में वीर सावरकर, अशोक मेहता, पट्टाभि सीतारमैय्या तथा इतिहासकार ईश्वरीप्रसाद सरीखे महानुभाव हैं। उल्लेखनीय है कि सन् 1909 में वीर सावरकर की पुस्तक ‘1857 का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम’ आजादी के दीवानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई थी। इन लेखकों के मुख्य तर्क इस प्रकार हैं

1. विद्रोही देश भक्ति से प्रेरित थे। वे स्वधर्म और स्वराज के लिए लड़े।,

2. विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए यह एक सामूहिक प्रयास था। इसमें हिन्दू, मुसलमान और विभिन्न जातियों के लोगों ने मिलकर संघर्ष किया और बलिदान दिया।
धर्बी वाले कारतूसों’ ने तो मात्र चिंगारी का काम किया। वास्तव में यह ब्रिटिश नीतियों से पैदा हुए दीर्घकालीन असंतोष का परिणाम था। यदि ये ‘कारतूस’ न भी होते तो भी यह मुक्ति का आंदोलन तो चलना ही था। यद्यपि उपरोक्त तर्कों के आधार पर इसे आजादी की पहली लड़ाई बताया गया। तथापि कुछ इतिहासकारों ने इस विचार को भी उचित नहीं माना है। उदाहरण के लिए आर०सी० मजूमदार ने लिखा है, “तथाकथित राष्ट्रीय मुक्ति-संग्राम न तो पहला था, न राष्ट्रीय था और न ही मुक्ति का संग्राम था।”

निष्कर्ष-उपरोक्त दोनों मत अपनी-अपनी दृष्टि का परिणाम हैं। अंग्रेज़ लेखक कभी यह मानने को तैयार नहीं थे कि ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण यह संग्राम पैदा हुआ। वे अपनी छोटी-मोटी गलतियों; जैसे कि कारतूसों का मामला आदि से ही इसे जोड़कर देखते थे। दूसरी ओर ‘पहला स्वतन्त्रता संग्राम’ बताने वाले लेखक देशभक्ति की भावना से प्रेरित थे और यही भावना पैदा करना चाहते थे। इसलिए उस जमाने में राष्ट्रीय विचारधारा के अभाव में भी उन्होंने इसे राष्ट्रीय आंदोलन बताया। इसकी सबसे बड़ी कमी थी कि विद्रोहियों के सामने भविष्य की स्पष्ट योजना नहीं थी। वे पुरानी व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की सोच रहे थे।

प्रश्न 7.
1857 ई० के विद्रोह में भारतीय सैनिक क्यों शामिल हुए?
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह में भारतीय सैनिकों के शामिल होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(1) सिपाहियों के वेतन और भत्ते बहुत कम थे। एक घुड़सवार सेना के सिपाही को 27 रुपए और पैदल सेना के सिपाही को मात्र 7 रुपए मिलते थे। वर्दी और भोजन का खर्च निकालकर मुश्किल से उनके पास एक या दो रुपए बच पाते थे।

(2) सेना में गोरे व काले के आधार पर भेदभाव आम बात थी। गोरे सैनिकों के अधिकार व सुविधाएँ भारतीय सैनिकों की तुलना में कहीं अधिक थीं। वेतन और भत्तों में भेदभाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों के पदोन्नति के अवसर लगभग न के बराबर थे।

(3) सिपाहियों को अपनी जाति तथा धर्म के खोने का भय सता रहा था। सिपाहियों के धर्म और जाति से सम्बन्धित चिह्न पहनने पर रोक लगा दी गई थी। सैनिकों के लिए विदेश में कुछ समय काम करना अनिवार्य कर दिया गया था।

(4) 1857 ई० का विद्रोह मुख्यतः चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह को लेकर शुरू हुआ। 1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफवाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों’ ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। अतः दोनों धर्मों के सैनिकों ने इसे अंग्रेजों का धर्म भ्रष्ट करने का षड्यंत्र समझा। इन कारतूसों के प्रति सिपाहियों की नाराज़गी को भांपते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने सिपाहियों को लाख समझाने का प्रयत्न किया परंतु किसी ने इस पर विश्वास नहीं किया। इसने सिपाहियों में अत्यंत रोष उत्पन्न कर दिया था।

(5) सिपाहियों को अपने देशवासियों तथा गाँव के लोगों से बहुत प्रेम था। अतः बहुत-से स्थानों पर सिपाही गाँव की जनता का साथ देने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए।

(6) अंग्रेज अधिकारी भारतीय सैनिकों से दुर्व्यवहार किया करते थे। वे उन्हें अंग्रेज सिपाहियों की तुलना में हीन समझते थे। वे भारतीय सिपाहियों के रहन-सहन तथा उनकी परम्पराओं का मजाक उड़ाते थे। इसी कारण भारतीय सैनिकों में रोष बढ़ने लगा और वे 1857 ई० में हुए विद्रोह में शामिल हो गए।

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