Class 12

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् छन्द प्रकरणम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Chand Prakaranam Sahitya Itihas छन्द प्रकरणम् Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit व्याकरणम् छन्द प्रकरणम्

1. छन्दपरिचयः
छन्द श्लोक लिखते समय वर्णों की एक निश्चित व्यवस्था रखनी पड़ती है। यह व्यवस्था छन्द या वृत्त कहलाती है। वृत्त के भेद
प्रायः प्रत्येक श्लोक के चार भाग होते हैं, जो पाद या चरण कहलाते हैं। जिस वृत्त के चारों चरणों में बराबर अक्षर हो, वे समवृत्त कहलाते हैं। जिसके प्रथम और तृतीय तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण अक्षरों की दृष्टि से समान हों, वे अर्धसमवृत्त हैं। जिसके चारों चरणों में अक्षरों की संख्या समान न हो, वे विषमवृत्त कहे जाते हैं।

गुरु-लघु व्यवस्था
छन्द की व्यवस्था वर्णों पर आधारित रहती है-मुख्यतः स्वर वर्ण पर। ये वर्ण छन्द की दृष्टि से दो प्रकार के होते हैं-लघु एवं गुरु । सामान्यतः ह्रस्व स्वर लघु होता है और दीर्घ स्वर गुरु किंतु कुछ परिस्थितियों में ह्रस्व स्वर लघु न होकर गुरु माना जाता है।

छन्द में गुरु-लघु व्यवस्था का नियम इस प्रकार है
अनुस्वारयुक्त, दीर्घ, विसर्गयुक्त तथा संयुक्त वर्ण के पूर्व वाले वर्ण गुरु होते हैं। शेष सभी वर्ण लघु होते हैं। छंद के किसी पाद का अंतिम वर्ण लघु होने पर भी आवश्यकतानुसार गुरु मान लिया जाता है

सानुस्वारश्च दीर्घश्च विसर्गी च गुरुर्भवेत्।
वर्णः संयोगपूर्वश्च तथा पादान्तगोऽपि वा। -~छन्दोमञ्जरी 1.11

गुरु एवं लघु के लिए अधोलिखित चिह्न प्रयुक्त होते हैं
गुरु – 5
लघु – ।
लघु वर्ण अधोलिखित चार दशाओं में गुरु वर्ण मान लिया जाता है
s | s

1. अनुस्वार युक्त लघु वर्ण भी गुरु हो जाता है; जैसे- अंशतः ।
यहाँ ‘अ’ लघु होते हुए भी अनुस्वार युक्त ‘अं’ होने के कारण गुरु हो गया है।
s | s

2. विसर्ग युक्त लघु वर्ण भी गुरु हो जाता है; जैसे- अंशतः ।
यहाँ ‘त’ लघु होते हुए भी विसर्ग युक्त ‘तः’ होने के कारण गुरु हो गया है।
s s

3. संयुक्त वर्ण के पूर्व वाला वर्ण भी गुरु हो जाता है; जैसे- रक्तः ।
यहाँ ‘र’ लघु होते हुए भी संयोगपूर्व वाला ‘रक’ होने के कारण गुरु हो गया है।
| s | s s | | s | s s

4. छन्द के पादान्त में लघु वर्ण भी गुरु हो जाता है; जैसे- त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
यहाँ पादान्त में ‘व’ लघु होते हुए भी छन्द की आवश्यकतानुसार गुरु हो गया है।
गण-व्यवस्था
तीन वर्षों का एक गण माना जाता है। गुरु-लघु के क्रम से गण आठ प्रकार के होते हैं
भ – गण s । ।
य – गण । s s
म – गण s s s
ज – गण । s ।
र – गण s । s
न – गण । । ।
स – गण । । s
त – गण s s |
भगण (s।।) आदि गुरु,
जगण (। s ।) मध्य गुरु तथा सगण (।। s ) अन्त गुरु होते हैं। यगण (। s s) आदि लघु,
रगण (s । s) मध्य लघु और तगण (s s |) अन्त लघु होते हैं।
मगण (s s s) में सभी वर्ण गुरु और नगण ( | | ) में सभी वर्ण लघु होते हैं।
आदिमध्यावसानेषु भजसा यान्ति गौरवम्।
यरता लाघवं यान्ति मनौ तु गुरुलाघवम्॥ -छन्दोमजरी
इन गणों को सरलता से याद रखने के लिए नीचे दिया गया गणसूत्र याद कर लेना चाहिए
| s s s | s | | | s
यमाताराजभानसलगा
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HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् छन्द प्रकरणम्

(क) वैदिक छन्द
वैदिक मन्त्रों में गेयता का समावेश करने के लिए जिन छन्दों का प्रयोग हुआ है; उनमें गायत्री, अनुष्टुप् और त्रिष्टुप् छन्द प्रमुख हैं।

1. गायत्री (आठ अक्षरों के तीन पादों वाला समवृत्त)
जिस छन्द में तीन चरण हों और प्रत्येक चरण में आठ अक्षर हों तथा जिनमें पाँचवाँ अक्षर लघु और छठा अक्षर गुरु हो, वह गायत्री छन्द कहलाता है। अधोलिखित मन्त्र में गायत्री छन्द है

पावका नः सरस्वती,
वाजेभिर्वाजिनीवती।
यज्ञं वष्टु धिया वसुः॥

2. अनुष्टुप् (आठ अक्षरों वाला समवृत्त)
जिस छंद में चार चरण हों और प्रत्येक चरण में आठ अक्षर हों, जिनमें पाँचवाँ अक्षर लघु तथा छठा अक्षर गुरु हो, सातवाँ अक्षर जिसके पहले और तीसरे चरण में गुरु हो, किन्तु दूसरे और चौथे चरण में लघु हो, वह अनुप् छन्द कहलाता है।
उदाहरण
त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
छन्द की पूर्ति के लिए त्र्यम्बकं’ को ‘त्रियम्बकं’ पढ़ते हैं।

3. त्रिष्टुप् (ग्यारह अक्षरों वाला समवृत्त)
जिस छन्द में चार चरण हों और प्रत्येक चरण में ग्यारह अक्षर हों, वह त्रिष्टुप् छन्द कहलाता है।
प्रस्तुत पुस्तक के प्रथम पाठ का निम्नलिखित मन्त्र त्रिष्टुप् छन्द में है
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया,
समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति,
अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ -श्वेत०, उ० 2.4.6 तथा मुण्डक० ३.1.1
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे
ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय।
तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः
परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥ -मुण्डक० 3.2.8
वैदिक-छन्दों को अधोलिखित तालिका द्वारा सरलता से समझा जा सकता है
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(ख) लौकिक छन्द
प्रस्तुत पुस्तक के अनेक पाठों में अनेक लौकिक छन्दों का संकलन है। अतः संकलित छन्दों के लक्षण एवं उदाहरण प्रस्तुत है

1. अनुष्टुप्
(आठ अक्षरों वाला समवृत्त)
संस्कृत में लक्षण एवं उदाहरण
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥ -श्रुतबोध 10
अनुष्टुप् छन्द के चारों चरणों का पाँचवाँ वर्ण लघु, छठा वर्ण गुरु तथा प्रथम एवं तृतीय चरण का सातवाँ वर्ण गुरु और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण का सातवाँ वर्ण लघु होता है।
प्रस्तुत पुस्तक का द्वितीय पाठ अनुष्टुप् छन्द में है
(i) यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
(ii) ययातेरिव शर्मिष्ठा भर्तुर्बहुमता भव।
सुतं त्वमपि सम्राजं सेव पुरूमवाप्नुहि ॥

2. इन्द्रवज्रा
(त त ज ग ग)
(ग्यारहवर्णों वाला समवृत्त)
संस्कृत में लक्षण एवं उदाहरण
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः। -वृत्तरत्नाकर, 3/30
जिस छन्द के प्रत्येक पाद में दो तगण, एक जगण और दो गुरु वर्ण क्रम से हों, वह इन्द्रवज्रा छंद होता है ।
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उदाहरणम्- स्वर्गच्युतानामिह जीवलोके
चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे।
दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी
देवार्चनं पण्डित-तर्पणञ्च॥

3. उपेन्द्रवज्रा
(ज त ज ग ग)
(ग्यारहवर्णों का समवृत्त)
संस्कृत में लक्षण एवं उदाहरण
उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ। -वृत्तरत्नाकर, 3/31
जिस छन्द के प्रत्येक पाद में क्रमश: एक जगण, एक तगण, एक जगण और दो गुरु वर्ण हों, वह उपेन्द्रवज्रा छंद होता है।
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उदाहरणम्- त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वेमव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
(यहाँ प्रत्येक चरण का अन्तिम वर्ण लघु होते हुए भी छन्द की आवश्यकता के अनुसार गुरु मान लिया गया है।)

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4. उपजाति
(ग्यारह वर्गों का समवृत्त)
संस्कृत में लक्षण एवं उदाहरण
अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजौ पादौ यदीयावुपजातयस्ताः।
इत्थं किलान्यास्वपि मिश्रितासु वदन्ति जातिष्विदमेव नाम ॥ -वृत्तरत्नाकर, 3/32
इसके प्रथम एवं तृतीय चरण उपेन्द्रवज्रा तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण इन्द्रवज्रा छन्द के अनुसार, है, जिससे यह उपजाति छन्द है।
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अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा ( इन्द्रवज्रा )
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हिमालयो नाम नगाधिराजः । (उपेन्द्रवज्रा)
पूर्वापरौ तोयनिधि वगाह्य (इन्द्रवज्रा)
स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः ॥ (उपेन्द्रवज्रा)

इसके प्रथम तथा तृतीय पाद इन्द्रवज्रा छन्द में हैं। द्वितीय तथा चतुर्थ पाद उपेन्द्रवज्रा छन्द में हैं। (इसीलिए पूरा श्लोक उपजाति छन्द वाला बन गया है।)

5. वंशस्थ
(ज, त, ज, र)
(प्रतिचरण बारह वर्णों का समवृत्त)
संस्कृत में लक्षण एवं उदाहरण
जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ। -वृत्तरत्नाकर 3.47
जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः जगण, तगण, जगण एवं रगण हों, वह वंशस्थ छन्द कहलाता है।
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भवन्ति नम्रास्तरवो फलोद्गमैः
नवाम्बुभिर् दूरविलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥

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6. वसन्ततिलका
(चौदह अक्षरों वाला समवृत्त)
जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमश: तगण, भगण, जगण एवं दो गुरु वर्ण हों तथा 14 अक्षर हों, वह वसन्ततिलका छन्द कहलाता है।
संस्कृत में लक्षण
ज्ञेया ( उक्ता) वसन्ततिलका तभजा जगौ गः
इस पुस्तक के एकादश पाठ का निम्नलिखित पद्य वसन्ततिलका छन्द में है
उदाहरण
पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्यान् निगृहति गुणान् प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्र लक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥

7. मालिनी
(पन्द्रह अक्षरों वाला समवृत्त)
जिस छन्द के प्रत्येक चरण (पाद) में क्रमशः दो नगण, एक मगण तथा दो यगण हों और पन्द्रह अक्षर हों वह छन्द मालिनी कहलाता है। इसमें पहली यति (विराम) आठवें वर्ण के बाद और दूसरी यति पन्द्रहवें वर्ण के बाद होती है।
संस्कृत में लक्षण
नन मयययु तेयं मालिनी भोगिलोकैः।
उदाहरण
जयतु जयतु देशः सर्वतन्त्रस्स्वतन्त्रः
प्रतिदिनमिह वृद्धिं यातु देशस्य रागः।
व्रजतु पुनरयं नोदासतामन्ययदीयाम्॥
भवतु धन समृद्धिः सर्वतो भावसिद्धिः।

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8. शिखरिणी
(सत्रह अक्षरों वाला समवृत्त)
जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः यगण, मगण, नगण, सगण, भगण तथा एक लघु और एक गुरु वर्ण हों और सत्रह अक्षर हों वह शिखरिणी छन्द कहलाता है। छठे और सत्रहवें वर्ण के बाद इसमें यति होती है।
संस्कृत में लक्षण
– रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।
उदाहरण
अनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै
रनाविद्धं रत्तं मधु नवमनास्वादितरसम्
अखण्डं पुण्यानां फलमिह च तद्रूपमनघम्
न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः॥

9. शार्दूलविक्रीडितम्
(म, स, ज, स, त, त, ग)
(उन्नीस वर्गों वाला समवृत्त)
लक्षण-सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम्। -छन्दोमंजरी, 2/19
जिस छंद के प्रत्येक पाद में क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, दो तगण एवं एक गुरु वर्ण हों, वह शार्दूलविक्रीडित छन्द कहलाता है। इसमें बारहवें वर्ण के बाद पहली यति और उन्नीसवें अक्षर के बाद दूसरा यति होती है।

प्रस्तुत पुस्तक के तृतीय पाठ का अधोलिखित श्लोक शार्दूलविक्रीडित छंद में है :
HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् छन्द प्रकरणम् img-8
यास्यत्यद्य शंकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया,
कण्ठः स्तम्भितवाष्पवृत्तिकलषश्चिन्ताजडं दर्शनम्
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः,
पीड्यन्ते गृहिणः कथं न तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः॥

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10. मन्दाक्रान्ता
(म, भ, न, त, त, ग, ग)
(सत्रह अक्षरों वाला समवृत्त)
मगण, भगण, नगण, दो तगणों और दो गुरुओं से मन्दाक्रान्ता छंद होता है। इसमें चौथे अक्षर के बाद पहली यति, छठे अक्षर के बाद दूसरी यति तथा आठवें अक्षर के बाद तीसरी यति होती है।
संस्कृत में लक्षण एवं उदाहरण
मन्दाक्रान्ताम्बुधिरसनगैः मो भनौ तौ गयुग्यम्
उदाहरण
HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् छन्द प्रकरणम् img-9
‘पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजत्रम्
दीर्घग्रीवः स भवति, खुरास्तस्य चत्वार एव।
शष्याण्यत्ति, प्रकिरति शकृत्-पिण्डकानाम्र-मात्रा।
किं व्याख्यानैव्रजति स पुन(रमेयेहि याम॥

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HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् संस्कृतसाहित्यस्य-इतिहासः

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Sanskrit Sahitya Itihas संस्कृतसाहित्यस्य-इतिहासः Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit व्याकरणम् संस्कृतसाहित्यस्य-इतिहासः

1. महर्षि वाल्मीकि (रामायणम्)
रामायण के लेखक महर्षि वाल्मीकि संस्कृत साहित्य के आदि कवि हैं और उनका ‘रामायण’ महाकाव्य आदि काव्य माना जाता है। रामायण के रचयिता वाल्मीकि ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। वाल्मीकि के इस प्रथम अलंकृत काव्य ने परवर्ती समस्त भारतीय कवियों के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया है। रामायण एक ऐसा महाकाव्य है जिस पर भारत की साहित्यिक परम्परा को गर्व होना उचित ही है। रामायण ने भारतीय जनता पर अत्यधिक प्रभाव डाला है। रामायण के जीवन आदर्श और शिक्षाएँ भारतीय समाज में गहराई से व्याप्त हैं।

कला, साहित्य और दैनिक व्यवहार के सम्बन्ध में वाल्मीकि ऋषि का यह महाकाव्य आदि स्रोत का कार्य करता है। रामायण को हम इतिहास काव्य कह सकते हैं। राम के कार्य, सीता के कार्य, सीता का पतिव्रत धर्म, हनुमान के आश्चर्यजनक कार्य एवं अलौकिक शक्ति से सम्पन्न राक्षसों ने समस्त भारतीय जनता को प्रभावित किया है। नाटककार और कवि बहुधा अपने कथानकों के लिए रामायण का आश्रय लेते हैं। अनेक कवियों ने वाल्मीकि से आकृष्ट होकर उनकी शैली का भी अनुकरण किया है। कविकुलगुरू महाकवि कालिदास अपने ‘रघुवंश काव्य’ में वाल्मीकि को अपना गुरु स्वीकार करते हैं।

वाल्मीकि के सम्बन्ध में एक कथा प्रसिद्ध है। एक बार वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वहीं पर क्रौंच और क्रौंची ‘पक्षी का कामातुर जोड़ा विहार कर रहा था। इसी बीच एक व्याध आया और उसने अपने बाण से क्रौंच को मार डाला। क्रौंची पृथ्वी पर छटपटाते हुए अपने सहचर को देखकर करुण क्रन्दन करने लगी। यह दृश्य देखकर वाल्मीकि का हृदय करुणा और शोक से भर गया और उनके मुख से अनायास निम्न पद्य (श्लोक) निकल पड़ा

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती: समाः।
यत् कौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥

वाल्मीकि को अपने इस वचन में एक विशेष संगीत और लय का आभास हुआ। वे बार-बार इस पद्य को दोहराने लगे। बाद में इसी पद्य के अनुष्टुप् छन्द के आधार पर उन्होंने रामायण की रचना की। वाल्मीकि का शोक श्लोक बन गया। यह छन्द लौकिक संस्कृत का एक प्रसिद्ध छन्द बना और अनुष्टुप् अथवा श्लोक छन्द के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

रामायण का रचनाकाल 500 वर्ष ई० पू० माना जाता है। यह ग्रन्थ बाल काण्ड, अयोध्या काण्ड, अरण्य काण्ड, किष्किन्धा काण्ड, सुन्दर काण्ड, युद्ध काण्ड और उत्तर काण्ड इन सात काण्डों में विभक्त है। इनमें चौबीस हज़ार श्लोक • हैं कवि ने राम की कथा को आधार बनाकर आदर्श पुत्र, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श पत्नी और आदर्श सेवक का चरित्र प्रस्तुत किया है। वास्तव में वाल्मीकि रामायण के विषय में यह कथन पूर्ण सत्य है

यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्चे महीतले।
तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति॥

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2. महर्षि वेदव्यास (महाभारतम्)
महषि वेदव्यास ‘महाभारत’ ग्रन्थ के प्रणेता हैं। परम्परा के अनुसार पाराशर और मत्स्यगन्धा के पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यास महर्षि वेदव्यास के नाम से जाने जाते हैं। यह महर्षि व्यास पराशर्य, वेदव्यास, कृष्णद्वैपायन, सत्यवती सुत इत्यादि नामों से प्रसिद्ध हैं। उनके पिता महर्षि पाराशर और माता सरस्वती नाम की परम विदुषी देवी थी। यह वेदव्यास महाभारत के युद्धकाल में विद्यमान थे, ऐसा महाभारत के अध्ययन से ज्ञात होता है जैसा कि कहा गया है

तपसा ब्रह्मचर्येण यस्य वेदं सनातन्।
इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवती सुतः॥

महाभारत के आरंभ में ही यह संकेत मिलता है कि आदि महाभारत में 8800 श्लोक थे, वास्तव में यही वेदव्यास की कृति थी, जिसमें मूल रूप से कौरवों और पाण्डवों के युद्ध का वर्णन था, जो कि ‘जय’ के नाम से प्रसिद्ध था। उनके शिष्य वैशम्पायन ने जब इसे अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय को उनके नाम यज्ञ के अवसर पर सुनाया तो इसमें 24 हज़ार श्लोक थे और इसका नाम ‘भारत’ था। तदनन्तर तब सौति ने इसे नैमिषारण्य में ऋषियों को सुनाया तो इसमें लगभग अस्सी हज़ार श्लोक थे और इसका नाम ‘महाभारत’ हो गया। इसके बाद हरिवंश पुराण भी इसमें मिला दिया गया और इस प्रकार इसकी श्लोक संख्या एक लाख हो गई। महाभारत में यह घोषणा गर्व पूर्वक की गई है

‘धर्म चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥

भारतीय चिन्तन पद्धति का सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ ‘भगवगद्गीता’ महाभारत का ही एक अंश है। महाभारत में 18 पर्व हैं। यह पद्यबद्ध रचना है, किन्तु गद्य का भी कहीं-कहीं प्रयोग हुआ है। इसमें भारत के आदर्शों की अमूल्य निधि संचित है।

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3. भास एव उनकी रचनाएँ
महान् नाटककार भास का नाम कालिदास आदि अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं में बड़े आदर के साथ लिया है। ऐसी प्रशस्तियों से जहाँ भास कि विद्वत्ता और उनकी नाट्यप्रवीणता को गौरव प्राप्त होता है, वहीं यह बात भी सिद्ध हो जाती है कि भास कालिदास के पूर्ववर्ती कवि हैं। विद्वानों ने भास का स्थितिकाल ईसापूर्व चतुर्थ या पंचम शताब्दी स्वीकार किया है। 1909 ई० में पं० टी० गणपति शास्त्री ने भास द्वारा रचित 13 नाटकों की खोज की थी, जिन्हें गणपति शास्त्री ने ही 1918 ई० में त्रिवेन्द्रम् से पहली बार प्रकाशित करवाया था।

भास के नाटकों की अपनी कुछ मूलभूत विशेषताएँ हैं। भास की भाषा सरल तथा सुबोध है, इनके नाटकों के संवाद सशक्त तथा प्रभावपूर्ण हैं । इनकी भाषा में ओज, प्रसाद तथा माधुर्य तीनों गुणों का समावेश है। भास के लिए भाव संप्रेषण ही एकमात्र महत्त्वपूर्ण है, अत: उनकी भाषा सहजगम्य है और अनावश्यक रूप से किसी भी प्रकार से बोझिल नहीं है। इनके सभी नाटक प्राचीन काल से ही नाट्यमञ्चों पर बड़े प्रभावपूर्ण ढंग से अभिनय किए जाते रहे हैं- यह अभिनेयता इनके नाटकों की अद्वितीय विशेषता है। इनके नाटकों का मुख्य रस वीर है जो श्रृंगार आदि दूसरे रसों से सम्मिश्रित है। प्रकृति के कोमल रूप का इन्होंने बड़ा ही स्वाभाविक चित्रण अपने नाटकों में किया है। इनकी सभी तेरह रचनाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है

भास के नाटकों का संक्षिप्त परिचय

1. दूतवाक्यम्-एक एकांकी नाटक है, जिसमें महाभारत के युद्ध से पूर्व श्री कृष्ण का पांडवों की ओर से सन्धि प्रस्ताव लेकर दुर्योधन की सभा में दूत के रूप में जाने का वर्णन है।
2. मध्यमव्यायोगः- इसमें भीमसेन द्वारा राक्षस से एक ब्राह्मण के बिचले (मध्यम) पुत्र की रक्षा का वर्णन है। एकांकी है।
3. दूतघटोत्कचम्- इसमें अभिमन्यु की मृत्यु के पश्चात् श्री कृष्ण घटोत्कच को दूत बनाकर धृतराष्ट्र के पास भेजते हैं। परन्तु दुर्योधन द्वारा उसका अपमान होता है। यह इतिवृत्त कवि कल्पना पर आश्रित एकांकी है।
4. कर्णभारम्-यह एकांकी नाटक है, जिसमें कर्ण का ब्राह्मण वेषधारी इन्द्र को कवच और कुण्डल देने का वर्णन
5. उरुभंगम्-इस एकांकी में भीम तथा दुर्योधन के गदा युद्ध का और अन्त में भीम द्वारा दुर्योधन की जंघा को भंग करके मारने का वर्णन है।
6. पञ्चरात्रम्-इसमें 3 अंक हैं। इसमें कवि ने महाभारत की कथा का कल्पित रूप दे दिया है। यज्ञ की समाप्ति पर द्रोणाचार्य से दक्षिणा रूप में यह मांगा कि पांडवों को आधा राज्य पाँच रात में मिल जाए तो मैं आधा राज्य दे दूंगा। ऐसा दुर्योधन के मान लेने पर द्रोण के प्रयत्न से विराट नगर में पांडवों का पता चल गया और उन्हें आधा राज्य दे दिया गया।
7. बालचरितम्-इसमें 5 अंक हैं। इसमें श्रीकृष्ण के जन्म से कंस वध तक की कथा का वर्णन है।
8. प्रतिमानटकम्-इसमें 7 अंक हैं। इसमें राम के वनवास गमन से लेकर रावण वध तक की कथा का वर्णन है। इधर अपने ननिहाल से अयोध्या लौटने पर भरत को नगर के बाहर देवकुल में दशरथ की प्रतिमा देख कर उनकी मृत्यु का अनुमान हो जाता है। इसी प्रतिमा की घटना के कारण इस नाटक का नाम प्रतिमानाटकम् पड़ा है।
9. अभिषेकनाटकम्- इसमें 6 अंक हैं। इसमें किष्किन्धा, सुन्दरकांड तथा युद्धकांड की कथा के उपरान्त राम के राज्याभिषेक का वर्णन किया गया है।
10. प्रतिज्ञायौगन्धरायणम-इसमें 4 अंक हैं। इसमें कौशाम्बी की राजा उदयन का वर्णन है, जो अवन्तिराज महासेन द्वारा छल से कैद कर लिया जाता है। फिर उसकी कन्या वासवदत्ता को वीणा की शिक्षा देते समय उससे प्रेम हो जाता है। अपने मन्त्री यौगन्धरायण की सहायता से उदयन वासवदत्ता को लेकर उज्जयिनी को भाग निकलता है।
11. स्वप्नवासवदत्तम्-इसमें 6 अंक हैं। यह प्रतिज्ञायौगन्धरायण की कथा का उत्तरार्द्ध है। यौगन्धरायण की नीति के फलस्वरूप वासवदत्ता के अग्नि में भस्म हो जाने की अफवाह फैला कर उदयन के मगधराज दर्शक की बहन पद्मावती से विवाह तथा अपहत राज्य के पुनर्मिलन का वर्णन है। पद्मावती के घर में सोया हुआ उदयन स्वप्न में वासवदत्ता को देखता है। अन्त में, वह स्वप्न यथार्थ हो जाता है। इसी घटना पर इसका नाम स्वप्नवासवदत्तम् पड़ा है।
12. अविमारकम्- इसमें 6 अंक हैं। इसमें राजकुमार अविमारक का कुन्तिभोज की पुत्री कुरंगी के साथ प्रणयविवाह का वर्णन है।
13. चारुदत्तम्-इसमें केवल 4 अंक हैं। इसमें निर्धन किन्तु उदारचेता ब्राह्मण चारुदत्त और वसन्त सेना नाम की वेश्या के प्रणय सम्बन्ध का वर्णन हैं। यह नाटक अपूर्ण प्रतीत होता है।इन 13 नाटकों के अतिरिक्त कुछ विद्वान् वीणावासवदत्ता तथा यज्ञललम् को भी भासकृत मानते हैं। परन्तु इसके लिए कोई पुष्टप्रमाण नहीं हैं।
सम्भव है भासरचित अन्य नाटक भी हों, क्योंकि सुभाषित ग्रंथों में भास के नाम से कई ऐसे पद्य मिलते हैं, जो इन 13 नाटकों में नहीं पाए जाते। जनश्रुति के अनुसार भास ने 30 से अधिक ग्रंथ लिखे थे।

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4. अश्वघोष के काव्य
अश्वघोष संस्कृत महाकाव्य परम्परा में कालिदास के पूर्ववर्ती कवि हैं। अश्वघोष का स्थिति काल ईसा की प्रथम शताब्दी माना जाता है। ये राजा कनिष्क के गुरु और उनके आश्रित कवि थे। अश्वघोष का समग्र साहित्य प्रायः बौद्ध धर्म की दार्शनिक मान्यताओं को केन्द्र में रख कर रचा गया है। जिनका प्रमुख उद्देश्य बुद्ध धर्म का प्रचार प्रसार ही अधिक प्रतीत होता है।

अश्वघोष की सात प्रामाणिक कृतियों में ‘बुद्धचरितम्’ तथा ‘सौन्दरनन्दम्’ दो महाकाव्य हैं।

1. बुद्धचरितम्-चीनी और तिब्बती अनुवाद के साथ बुद्धचरितम् में 28 सर्ग मिलते हैं। संस्कृत में केवल 17 सर्ग ही उपलब्ध हैं। अब शेष सर्गों का संस्कृत में अनुवाद भी महन्त श्री रामचन्द्र दास द्वारा किया हुआ मिलता है। इस महाकाव्य में गौतम बुद्ध की जीवन गाथा चित्रित है। प्रथम पाँच सर्गों में बुद्ध के जन्म से लेकर निष्क्रमण तक की कथा है। छठे सातवें सर्ग में कुमार गौतम का तपोवन में परवेश, अन्तःपुर में विलाप, कुमार की खोज, कुमार का मगध गमन तथा बुद्धत्व की प्राप्ति का वर्णन करते हुए बुद्ध के शिष्यों, उपदेशों, सिद्धान्तों तथा निर्वाण प्राप्ति का वर्णन किया गया है। इसका मुख्य रस शान्त है। परन्तु प्रसंग के अनुसार श्रृंगार और वीर रस का प्रयोग भी हुआ है। वैराग्य प्रधान होने पर भी बुद्धिचरितम् में सांसारिक और मनोहारी चित्र उपलब्ध हो जाते हैं। यह एक सफल महाकाव्य है।

2. सौन्दरनन्दम्-अश्वघोष का यह दूसरा महाकाव्य है। इसका कथानक बुद्धचरितम् से मिलता-जुलता है, किन्तु कविता की दृष्टि से यह अधिक प्रौढ़ है। इसमें गौतम के सौतेले भाई नन्द के संन्यास का वर्णन है। वह अपनी पत्नी सुन्दरी से अत्यन्त प्रेम करता है और उसी में डूबा रहता है। बुद्ध की प्रेरणा से नन्द संन्यासी हो जाता है। इन दोनों के नाम पर ही इसका नाम ‘सौन्दरानन्दम्’ रखा गया है।
‘सौन्दरनन्दम्’ में 18 सर्ग हैं। इसका मुख्य रस शान्त है। करुण, शृंगार और वीर इसके सहयोगी रस हैं। नाटक का नायक छन्द है। धर्म, अर्थ काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में से मोक्ष की प्राप्ति ही लक्ष्य है। अश्वघोष की भाषा सुबोध है। कवि में इसमें हृदयहारी स्वभाविक उपमाओं का प्रयोग किया है। अनुष्टुप् उनका प्रिय छन्द है।

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5. महाकवि कालिदास एवं उनकी रचनाएँ
कविकुलशिरोमणि, कविताकामिनी के विलास, उपमासम्राट् दीपशिखा कालिदास आदि विरुदों से विभूषित महाकवि कालिदास भारतवर्ष के ही नहीं समस्त विश्व के अनन्य कवि हैं। ये महाराज विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि कालिदास का समय ईसापूर्व प्रथम शताब्दी है। संस्कृतसाहित्य में कालिदास की सात रचनाएं प्रामाणिक मानी गई हैं।

इनमें रघुवंशम्, कुमारसम्भवम् – दो महाकाव्य, मेघदूतम् तथा ऋतुसंहारम् – दो खण्डकाव्य तथा मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम् तथा अभिज्ञानशाकुन्तलम् – तीन नाटक हैं। काव्यकला एवं नाट्यकला की दृष्टि से कालिदास का कोई सानी नहीं है। नवरस वर्णन में कालिदास सर्वोपरि हैं। ‘उपमा अलंकार’ की सटीकता में वर्णन के कारण ही कालिदास के विषय में ‘उपमा कालिदासस्य’ कहा गया है तथा ‘दीपशिखा’ की उपाधि से अलंकृत किया गया है। यही नहीं इनकी रचनाओं में वैदर्भी रीति की विशिष्टता, माधुर्यगुण का सतत प्रवाह तथा सरसता ही इन्हें आज तक सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में प्रतिष्ठित किए हुए हैं।

रचनाओं का संक्षिप्त परिचय
1. रघुवंशम् – 19 सर्गीय रघुवंश कालिदास की अनन्यतम कृति है। इसमें रघुवंशीय दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम और कुश तक के राजाओं का विस्तृतरूपेण चित्रण तथा अन्य राजाओं का संक्षिप्त विवरण बड़े ही परिपक्व एवं प्रभावरूपेण किया गया है। जहां दिलीप की नन्दिनी सेवा, रघु की दिग्विजय, अज एवं इन्दुमती का विवाह, इन्दुमति की मृत्यु पर अज विलाप, राम का वनवास, लंका विजय, सीता का परित्याग, लव-कुश का अश्वमेधिक घोड़े को रोकना तथा अन्तिम सर्ग में राजा अग्निवर्ण का विलासमय चित्रण उनकी सूक्ष्मपर्यवेक्षण शक्ति का परिचय देता है।

2. कुमारसम्भवम्-17 सर्गीय कुमारसम्भव शिव-पार्वती के विवाह, कार्तिकेय के जन्म तथा तारकासुर के वध की कथा को लेकर लिखित सुप्रसिद्ध महाकाव्य है। कुछ आलोचक केवल आठ सर्गों को ही कालिदास लिखित मानते हैं लेकिन अन्यों के अनुसार सम्पूर्ण रचना कालिदास विरचित है। इस ग्रन्थ में हिमालय का चित्रण, पार्वती की तपस्या, शिव के द्वारा पार्वती के प्रेम की परीक्षा, उमा के सौन्दर्य का वर्णन, रतिविलाप आदि का चित्रण कालिदास की परिपक्व लेखनशैली को घोषित करता है। अन्त में कार्तिकेय के द्वारा तारकासुर के वध के चित्रण में वीर रस का सुन्दर परिपाक द्रष्टव्य है।

3. ऋतुसंहारम्-महाकवि कालिदास का ऋतुसंसार संस्कृत के गीतिकाव्यों में विशिष्टता लिए हुए हैं। जिसमें ऋतुओं के परिवर्तन के साथ-साथ मानव जीवन में बदलने वाले स्वभाव, वेशभूषा, एवं प्राकृतिक परिवेश का अवतरण द्रष्टव्य है। इसमें छः सर्ग तथा 144 पद्य हैं जिनमें ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर तथा वसन्त के क्रम से छ: ऋतुओं का वर्णन छः सर्गों में किया गया है।

4. मेघदूतम्-मेघदूत न केवल कालिदास का महान् गीतिकाव्य है, अपितु सम्पूर्ण संस्कृतसाहित्य का एक उज्ज्वल रत्न है। सम्पूर्ण मेघदूत दो भागों में विभक्त है-पूर्वमेघ तथा उत्तरमेघ जिनमें कुल 121 पद्य हैं। इस गीतिकाव्य में मन्दाक्रान्ता छन्द में एक यक्ष की विरहव्यथा का मार्मिक चित्रण किया गया है। पूर्वमेघ में कवि ने यक्ष द्वारा मेघ को अलकापुरी तक पहुंचाने के मार्ग का उल्लेख करते हुए उस मार्ग में आने वाले प्रमुख नगरों, पर्वतों, नदियों तथा वनों का भी सुन्दर चित्रण किया है। उत्तरमेघ में अलकापुरी का वर्णन, उसमें यक्षिणी के घर की पहचान तथा घर में विरहव्यथा से पीड़ित अपनी प्रेयसी की विरह पीड़ा का मार्मिक वर्णन द्रष्टव्य है।

5. मालविकाग्निमित्रम्-पांच अंकों में लिखित महाकवि कालिदास की प्रारम्भिक कृति ‘मालविकाग्निमित्र’ में विदिशा के राजा अग्निमित्र तथा मालवा के राजकुमार की बहन मालविका की प्रणयकथा का वर्णन है। मालविकाग्निमित्र कवि की आरम्भिक रचना होने पर भी नाटकीय नियमों की दृष्टि से इसके कथा निर्वाह, घटनाक्रम, पात्रयोजना आदि सभी में नाटककार के असाधारण कौशल की छाप है।

6. विक्रमोर्वशीयम्-नाटक रचनाक्रम की दृष्टि से कालिदास की द्वितीय कृति ‘विक्रमोर्वशीयम्’ एक उपरूपक है; जिसमें राजा पुरुरवा तथा उर्वशी नामक अप्सरा की प्रणयकथा वर्णित है। इस नाटक में कवि की प्रतिभा अपेक्षाकृत अधिक जागृत एवं प्रस्फुटित है।

7. अभिज्ञानशाकुन्तलम्-कालिदास का अन्तिम तथा सर्वोत्कृष्ट नाटक ‘अभिज्ञान-शाकुन्तलम्’ सात अंकों में विभक्त है; जिसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला की प्रणय कथा वर्णित है। यह नाटक संस्कृत का सर्वोपरि लोकप्रिय नाटक है। जिसमें कालिदास की कथानकीय मौलिकता, चरित्रचित्रण की सजीवता, रसों की परिपक्वता, संवादों की सुष्ठु योजना, प्रकृतिचित्रण की मर्मज्ञता तथा भाषा-शैली की विशिष्टता आदि स्वयं में अनुपम हैं। इन्हीं गुणों के कारण कहा गया है

“काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला”

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6. नाटककार भवभूति एवं उनकी रचनाएँ

संस्कृत के नाटककारों में भवभूति को कालिदास जैसा गौरव प्राप्त है। भवभूति पद्मपुर के निवासी थे तथा उदुम्बरकुल के ब्राह्मण थे। इनके पितामह का नाम भट्टगोपाल था, जो स्वयं एक महाकवि थे। इनके पिता का नाम नीलकण्ठ तथा माता का नाम जतुकर्णी था। भवभूति का दूसरा नाम ‘श्रीकण्ठ’ था। भवभूति शिव के उपासक थे, इनके गुरु का नाम ज्ञाननिधि था। भवभूति का स्थितकाल कतिपय पुष्ट प्रमाणों के आधार पर 700 ई० के आसपास माना जाता है।

रचनाएँ-भवभूति की तीन रचनाएं (नाटक) उपर. ध होती हैं
1. मालतीमाधवम् 2. महावीरचरितम् तथा 3. उत्तररामचरितम्।
1. मालतीमाधवम्-यह 10 अंकों का नाटक है। इसमें नाटक की नायिका मालती तथा नायक माधव के प्रेम और विवाह की कल्पित कथा चित्रित है। यह एक शृंगार प्रधान रचना है। मालतीमाधव में पाठकों की उत्सुकता जगाए रखने के पूरी चेष्टा की गई है, जिसमें भवभूति सफल हुए हैं। रोचक कथानक यथार्थ चित्रण तथा प्रभावपूर्ण भाषा के कारण यह नाटक प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ है। पाँचवें अंक में शमशान का वर्णन तथा नौवें अंक में वन का वर्णन दर्शनीय है। पत्नी के आदर्श सम्बन्ध का वर्णन भी अद्वितीय है। काव्य की दृष्टि से मालतीमाधव एक उत्कृष्ट कही जा सकती है।

2. महावीरचरितम्- यह सात अंकों का नाटक है। इसमें राम के विवाह से लेकर राम के राज्याभिषेक की कथा को नाटकीय रूप दिया गया है। कवि ने रामायण की कथा को रोचक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है और उसे अधिकाधिक नाटकीय बनाने के लिए कथा में स्वेच्छा से परिवर्तन भी किया गया है। नाटकीय तत्त्वों के अभाव तथा लम्बे संवादों के कारण यह नाटक सामाजिकों की ओर आकृष्ट नहीं कर सका। महावीरचरितम् में मुख्य रूप से वीररस का परिपाक हुआ है।

3. उत्तररामचरितम् – उत्तररामचरित भवभूति का अन्तिम और सर्वश्रेष्ठ नाटक है। यह कृति भवभूति के जीवन के प्रौढ़ अनुभवों की देन है। कवि के अन्य दोनों नाटकों की अपेक्षा उत्तररामचरित की कथावस्तु तथा नाटकीय कौशल अधिक प्रौढ़ हैं। भवभूति की अत्यधिक भावुकता ने इस ‘उत्तररामचरितम्’ को नाटक के स्थान पर गीति नाट्य बना दिया है। इसमें कुल सात अंक हैं। राम के उत्तरकालीन जीवन की कथा पर जितने भी ग्रन्थ लिखे गए हैं, उनमें उत्तररामचरित जैसी प्रसिद्धि किसी भी ग्रन्थ को नहीं मिल पाई।।

यद्यपि उत्तररामचरित का मूल आधार वाल्मीकि रामायण है परन्तु भवभूति ने इसमें अनेक मौलिक परिवर्तन किए हैं। उत्तररामचरित का प्रमुख रस करुण है। करुण रस की अभिव्यंजना में भवभूति इतने सिद्धहस्त हैं कि मनुष्य तो क्या निर्जीव पत्थर भी रो पड़ते हैं। भवभूति की स्थापना है कि एक करुण रस ही है, अन्य शृंगार आदि तो उसी के निमित्त

व्याकरणम् रूप है-‘एको रसः करुण एवं निमित्तभेदात्’ । ‘उत्तररामचरितम्’ के तीसरे अंक में करुण रस की जो अजस्र धारा बही है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। करुण रस की इस अद्भुत अभिव्यंजना के कारण ही ये उक्तियाँ प्रसिद्ध हो गई है

‘कारुण्यं भवभूतिरेव तनुते’
उत्तरे रामचरिते भवभूतिः विशिष्यते।

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7. श्रीमद्भगवद्गीता
‘कर्मगौरवम्’ यह पाठ ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के दूसरे एवं तीसरे अध्याय से संकलित है। श्रीमद्भगवद्गीता विश्व का सुप्रसिद्ध ग्रन्थ है। ‘गीता’ महाभारत के ‘भीष्म पर्व’ से उद्धृत है। इसमें 18 अध्याय हैं, 700 श्लोक हैं। तथा 18 प्रकार के योग का वर्णन है। समस्त योगों में कर्मयोग श्रेष्ठ है। मनुष्य कर्म करने के लिए संसार में आया है। किन्तु निष्काम कर्म करना ही मनुष्य को बन्धन से मुक्त करता है। सभी प्रकार की कामनाओं और फल की इच्छा से रहित कर्म ही निष्काम कर्म कहलाता है। इसी को ‘अनासक्ति’ कहा गया है। प्राणिमात्र का अधिकार केवल कर्म करने में निहित है, फल में नहीं। गीता के दूसरे-तीसरे अध्याय में इसी कर्मयोग की विस्तृत चर्चा है।

श्रीकृष्ण ने गीता में, अर्जुन को इसी निष्काम कर्मयोग की शिक्षा प्रदान की है। श्रीकृष्ण ने युद्ध क्षेत्र में, विषाद में पड़े हुए अर्जुन को स्व-क्षत्रियोचित कर्तव्य का उपदेश देकर धर्मयुद्ध के लिए उद्यत किया था। अर्जुन के माध्यम से मानवपात्र को निष्काम कर्म का उपदेश दिया गया है। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ यह गीता का सन्देश है।

8. पं० अम्बिकादत्त व्यास (शिवराजविजयः )
पं० अम्बिकादत्तं व्यास (1858-1900 ईस्वी) आधुनिक युग के संस्कृत लेखकों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। हिन्दी और संस्कृत में इनकी लगभग 75 रचनाएं मिलती हैं। इन सभी में ‘शिवराजविजयः’ नामक ऐतिहासिक उपन्यास इनकी श्रेष्ठतम रचना है। यह उपन्यास 1901 ईस्वी में प्रकाशित हुआ था।

शिवराजविजय शिवाजी और औरंगज़ेब की प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना पर आधारित उपन्यास है। शिवाजी इस उपन्यास के नायक हैं, जो भारतीय आदर्शों, संस्कृति, सभ्यता और मातृशक्ति के रक्षक के रूप में चित्रित किए गए हैं। शिवाजी और उनके सैनिकों की दृढ़ प्रतिज्ञा है-‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्’-कार्य सिद्ध करूंगा या देह का त्याग कर दूंगा।

गद्य काव्य की दृष्टि से शिवराजविजय एक उत्कृष्ट रचना है। इनकी भाषा की एक विशेषता है कि इनकी भाषा सदा भावों के अनुसार प्रयुक्त होती है। सरस प्रसंगों में ललित पदावली और वैदर्भी शैली का प्रयोग हुआ है। करुणा भरे प्रसंगों में प्रत्येक शब्द आंसुओं से भीगा हुआ मिलता है। वीर रस के प्रसंग में भाषा ओजस्विनी हो जाती है और पाठक की भुजाएं फड़कने लगती हैं। रस और अलंकारों का सुन्दर सामंजस्य है। सभी वर्णन स्वाभाविकता से ओत-प्रोत हैं। बाण और दण्डी के गद्य की सभी विशेषताएं व्यास जी के गद्य में मिलती हैं।

‘शिवराजविजयः’ उपन्यास में तीन विराम हैं तथा प्रत्येक विराम में चार निःश्वास हैं। कुल 12 निःश्वास हैं। प्रस्तुत पाठ ‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्’ इसी ऐतिहासिक उपन्यास के प्रथम विराम के चतुर्थ नि:श्वास से संकलित है। इस अंश में शिवाजी का एक विश्वासपात्र एवं कर्मठ गुप्तचर ‘कार्य वा साधयेयम्, देहं वा पातेययम्’ वाक्य द्वारा अपना दृढ़ संकल्प प्रकट करता है, जिसका तात्पर्य है-‘कार्य सिद्ध करूंगा या देह का त्याग कर दूंगा।’

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9. भारवि का ‘किरातार्जुनीयम्’
अलंकृत शैली तथा अर्थगौरव से परिपूर्ण कविता करने वाले भारवि ने अपनी प्रतिभा, कला और विद्वत्ता के कारण कालिदास के परवर्ती कवियों में सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त का है। इनका स्थितिकाल कतिपय पुष्ट प्रमाणों के आधार पर 600 ईस्वी के आसपास माना जाता है। भारवि की एकमात्ररचना है-‘किरातार्जुनीयम्’ इस अकेले महाकाव्य ने भारवि को काव्य जगत् में अमर कर दिया है।

‘किरातार्जुनीयम्’ की कथा का आधार महाभारत का वन पर्व है। महाकाव्य के सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त 18 सर्गों वाले इस महाकाव्य में ‘इन्द्रकील पर्वत और दिव्य अस्त्र प्राप्त करने के लिए तपस्या करने वाले अर्जुन और किरात वेषधारी भगवान् शंकर का युद्ध’ वर्णित हुआ है।

‘किरातार्जुनीयम्’ का मुख्य रस वीर है तथा शृंगार, शान्त आदि सहायक रस हैं। भारवि का भाषा पर अपूर्व अधिकार है। अलंकृत शैली के कारण भावबोध कुछ जटिल हो गया है। इन्हें काव्यपरम्परा में अलंकृत शैली का जनक माना जाता है। थोड़े शब्दों में अधिक गहरी और महत्त्वपूर्ण बात कहना इनकी विशेषता है। इसीलिए ‘भारवेरर्थगौरवम्’ के रूप में भारवि प्रसिद्ध हो गए हैं। संस्कृत के महाकाव्यों की बृहत्-त्रयी (किरातार्जुनीयम्, शिशपालवधम्, नैषधीयचरितम्) में ‘किरातार्जुनीयम्’ को विशेष स्थान प्राप्त है। इसके सुभाषित बहुत ही सारगर्भित हैं।।

10. माघ का काव्य ‘शिशुपालवधम्’
अलंकृत शैली में काव्य रचनाकारों में विशेष ख्याति प्राप्त है इनका स्थिति काल 650 ईस्वी के आसपास माना जाता है। इनकी एकमात्र रचना शिशुपालवधम् है। इसकी गणना संस्कृत की बृहत्-त्रयी (किरातार्जुनीयम्, शिशुपालवधम्, नैषधीय (चरितम्) में की जाती है।

‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य में 20 सर्ग और 650 श्लोक हैं। इस काव्य में श्रीकृष्ण द्वारा सुदर्शन चक्र चलाकर शिशुपाल के वध का वर्णन चित्रित किया गया है। माघ ने इस काव्य की रचना पूर्णतया भारवि के किरातार्जुनीयम् की शैली पर की है। इसमें वीर रस की प्रधानता है।

कवि का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। अलंकारों की भरमार है। कालिदास का उत्कर्ष उपमा अलंकार के प्रयोग में, भारवि का उत्कर्ष अर्थ के गौरव में और श्री हर्ष का उत्कर्ष पदलालित्य में स्वीकार किया गया है परन्तु माघ का उत्कर्ष इन तीनों ही गुणों में स्वीकार किया जाता है। इसीलिए यह सुभाषित प्रसिद्ध हो गया
उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थ गौरवम्। नैषधे पदलालित्यम् माघे सन्ति त्रयो गुणाः॥

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11. श्री हर्ष का काव्य ‘नैषधीयचरितम्’
श्री हर्ष कान्यकुब्ज के राजा विजय चन्द्र (1169-1195 ई०) सभापण्डित थे। नैषधीयचरितम् इनका प्रसिद्ध महाकाव्य है। अलंकृत शैली के इस महाकाव्य को संस्कृत महाकाव्य की बृहत्-त्रयी (किरातार्जुनीयम्, शिशुपालवधम्, नैषधीयचरितम्) में सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। महाभारत के प्रसिद्ध नल उपाख्यान को आधार बनाकर 22 सर्गों वाले इस महाकाव्य की रचना हुई है। छोटे से कथानक को श्रीहर्ष ने अपनी अद्भुत कल्पना शक्ति और प्रतिभा से इतना विस्तार दिया है। इस महाकाव्य का नायक नल और नायिका दमयन्ती है। शब्दों के सुन्दर विन्यास, भावों के समुचित निर्वाह, कल्पना की ऊंची उड़ान तथा प्रकृति के सजीव चित्रण की दृष्टि से यह महाकाव्य अद्वितीय है इनकी कविता में स्वभाविक माधुर्य है। शब्द और अर्थ की नवीनता है-नैषधीयचरितम् अपने पदलालित्य के लिए प्रसिद्ध है। इसका मुख्य रस शृंगार है तथा करुण आदि अन्य रस सहायक हैं। श्री हर्ष की कविता में अलंकारों की भरमार है और छन्द प्रयोग की कुशलता प्रशंसनीय है।

12. भर्तृहरि की गीति काव्य ‘नीतिशतकम्’
भर्तृहरि को परम्परा के अनुसार विक्रमादित्य का बड़ा भाई मानती है इनकी मृत्यु 650 ईस्वी में हुई थी इनके तीन गीतिकाव्य-1. शृंगारशतकम्, 2. नीतिशतकम्, 3. वैराग्यशतकम् प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त इनका एक व्याकरण ग्रन्थ ‘वाक्यपदीयम्’ के नाम से उपलब्ध है विद्वान् लोग भर्तृहरि का समय छठी शताब्दी का उत्तरार्ध मानते हैं।

नीतिशतकम्, शृंगारशतकम् और वैराग्यशतकम् प्रत्येक में लगभग 100 श्लोकों का संग्रह है। प्रत्येक पद्य स्वतन्त्र मुक्तक है अर्थात् प्रत्येक पद्य में अपने विषय की बात पूर्ण हो जाती है। इन शतकों में भर्तृहरि ने अपने जीवन के अनुभव अति सरल भाषा में भर दिए हैं। अधिकांश श्लोक सुभाषित एवं सूक्ति का रूप धारण कर गए हैं। ___ नीतिशतक में लौकिक व्यवहार के लिए उपयोगी उत्तम उपदेश प्रदान किए गए हैं इसमें वीरता, विद्या, साहस, मैत्री, विद्वान्, सज्जन, दुर्जन, सत्संगति, धन की महिमा, मूों की नीचता, स्वाभिमान, राजनीति, भाग्य एवम् पुरुषार्थ आदि अनेक विषयों का काव्यमयी भाषा में सुन्दर प्रतिपादन हुआ है। भर्तृहरि ने इनकी रचना में सरस सुबोध भाषा के साथसाथ गेय छन्दों का प्रयोग किया है। इनकी कविता पाठक के हृदय पर अनायास ही गहरा प्रभाव छोड़ती है। निश्चय ही कवि ने नीतिशतक के पद्यों में गागर में सागर भर दिया है।

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13. दण्डी का गद्य काव्य ‘दशकुमारचरितम्’
दण्डी के पिता वीरदत्त संस्कृत के महाकवि भारवि के छोटे पुत्र थे। दण्डी की माता का नाम गौरी था। इनका स्थिति काल ईसा की छठी शताब्दी माना जाता है। परम्परा के अनुसार दण्डी की तीन रचनाएं मानी जाती हैं-1. दशकुमारचरितम्, 2. काव्यादर्शः, 3. अवन्तिसुन्दरी कथा।

‘दशकुमारचरितम्’ दण्डी का प्रसिद्ध गद्य काव्य है। इसमें दशकुमारों के विचित्र चरित्र का विस्मयकारी चित्रण है। इसका कथानक घटना प्रधान है। कथानकों की सभी घटनाएं रोमांचक तथा पाठकों के हृदय में आकर्षण पैदा करने वाली हैं। इसकी विषय-वस्तु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। दण्डी ने अपनी रचना को यथार्थवादी बनाया है। इसमें निम्न कोटि का जीवन जीने वाले तथा साहसिक कार्य करने वाले जादूगर, धूर्त, तपस्वी, राजा, राजकुमारियां, चोर, वेश्याएं, प्रेमी-प्रेमिका आदि के रोचक वर्णन हैं। ब्राह्मणों, व्यापारियों एवं साधुओं पर तीखे व्यंग्य कसे गए हैं। वर्णन में हास्य विनोद की पुट है। दण्डी अपने पदलालित्य के कारण प्रसिद्ध हैं। अनुप्रास और यमक का प्रभावशाली प्रयोग इनकी रचना में हुआ है।

14. बाणभट्ट के गद्य काव्य
कवि सम्राट् बाण भट्ट महाराजा हर्षवर्धन के राजपण्डित थे। हर्षवर्धन के राज्यभिषेक 606 ईस्वी में हुआ था और उनकी मृत्यु 648 ईस्वी में हुई थी। इसीलिए बाण का स्थितिकाल ईसा की सातवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। बाण भट्ट की दो गद्य कृतियां प्रसिद्ध हैं-1. हर्षचरितम्, 2. कादम्बरी। हर्षचरितम्- यह बाण भट्ट की प्रथम रचना है। इसमें हर्ष का प्रामाणिक इतिहास सुरक्षित है। इसीलिए इसे आख्यायिका कहा जाता है। इसमें आठ उच्छ्वास हैं। आरम्भ के अढ़ाई उच्छ्वासों में बाण ने अपने वंश का तथा अपना वृत्तान्त दिया है। शेष उच्छ्वासों में हर्षवर्धन, प्रभाकरवर्धन तथा राज्यश्री-इन तीनों भाई-बहनों का सम्पूर्ण जीवन वृत्तान्त वर्णित है। संस्कृत साहित्य में ऐतिहासिक विषय को आधार बनाकर काव्य लिखने का शुभारम्भ बाण के हर्षचरितम् से ही हुआ है। हर्षचरितम् में बाणभट्ट की शैली, चरित चित्रण, वर्णन चातुरी, अत्यन्त उत्कृष्ट है। सती होने के लिए उद्यत यशोवती की मानसिक दशा का चित्रण बड़ा ही करुणामय है। यद्यपि हर्षचरितम् बाण की अधूरी रचना है फिर भी काव्य सौन्दर्य की दृष्टि से साहित्य में इसका विशिष्ट स्थान है।

कादम्बरी-कादम्बरी बाण की दूसरी प्रसिद्ध और प्रामाणिक रचना है। ‘शुकनासोपदेशः’ कादम्बरी का ही छोटा सा अंश है। बाण की असमय में मृत्यु हो जाने के कारण इसकी कथा को बाण के विद्वान् पुत्र भूषण भट्ट ने उत्तरार्ध के रूप में पूरा किया। इस प्रकार कादम्बरी का पूर्वार्ध ही बाण की मौलिक रचना है। इसकी कथा पूर्णतया काल्पनिक है। इसके घटनाक्रम में एक व्यक्ति के तीन-तीन जन्म का वृत्तान्त है।

कादम्बरी की कथा चन्द्रापीड़ और पुण्डरीक के तीन जन्मों से सम्बन्धित है। इसका कथानक अत्यन्त जटिल है, परन्तु इसके वर्णन इतने सजीव हैं कि पाठक को कथा प्रवाह के शिथिल होने का आभास ही नहीं हो पाता और वह वर्णन के आनन्द में ही डूब जाता है। कादम्बरी का रसपान करने वाले को भोजन भी अच्छा नहीं लगता। कहा भी है
‘कादम्बरी रसज्ञानाम् आहारोऽपि न रोचते’। ‘कादम्बरी’ में वर्णित राजतिलक से पूर्व राजकुमार चन्द्रापीड़ को मन्त्री शुकनास का सारगर्भित उपदेश बेजोड़ है। मन्त्री शुकनास का यह उपदेश ही शुकनासोपदेश के नाम से जाना जाता है। कादम्बरी में बाणभट्ट ने प्रसंग के अनुसार दीर्घ समासवाली, अल्पसमास वाली तथा समास रहित विविध शैलियों का प्रयोग किया है। बाण का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। वर्णन की दृष्टि से बाण ने संसार के सभी विषयों का स्पर्श किया है। इसीलिए बाण के सम्बन्ध में यह उक्ति प्रसिद्ध हो गई है

‘बाणोच्छिष्टं जगत् सर्वम्’।।

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15. ईशोपनिषद्
अथवा
ईशावास्योपनिषद्
“सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान का आदिस्रोत ‘वेद’ ही हैं”-ऐसा विद्वानों का मत है। वेदों का सार उपनिषदों में निहित है। उपनिषदों को ‘ब्रह्मविद्या’, ‘ज्ञानकाण्ड’ अथवा ‘वेदान्त’ नाम से भी जाना जाता है। ‘उप’ तथा ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक

सद् (षद्लु) धातु से ‘क्विप्’ प्रत्यय होकर ‘उपनिषद्’ शब्द निष्पन्न होता है-उप + नि + √भसद् + क्विप् > ० = उपनिषद। जिससे अज्ञान का नाश होता है, आत्मा का ज्ञान सिद्ध होता है, संसार चक्र का दुःख छूट जाता है; वह ज्ञानराशि ‘उपनिषद्’ कही जाती है। गुरु के समीप बैठकर अध्यात्मविद्या ग्रहण की जाती है-इस कारण भी

‘उपनिषद्’ शब्द सार्थक है। ‘उपनिषद्’ नाम से 200 से भी अधिक ग्रन्थ मिलते हैं। परन्तु प्रामाणिक दृष्टि से उन में 11 उपनिषद् ही महत्त्वपूर्ण हैं और इन्हीं पर आचार्य शङ्कर का भाष्य भी मिलता है। इनके नाम इस प्रकार हैं-1. ईशावास्य 2. केन, 3. कठ, 4. प्रश्न, 5. मुण्डक, 6. माण्डूक्य, 7. तैत्तिरीय, 8. ऐतरेय, 9. छान्दोग्य, 10. बृहदारण्यक तथा 11. श्वेताश्वतर।। . इनमें भी ‘ईशावास्य-उपनिषद्’ सबसे अधिक प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण है। [‘यजुर्वेद’ का अन्तिम चालीसवाँ अध्याय ही ‘ईशोपनिषद्’ के नाम से प्रसिद्ध है, इसमें कुल 17 मन्त्र हैं।] इस उपनिषद् में ‘समस्त जगत् ईश्वाराधीन है’-यह प्रतिपादित करके भगवद्-अर्पणबुद्धि से जगत् के पदार्थों का उपभोग करने का निर्देश किया गया है।

‘जगत्यां जगत्”ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है, सब जगत् अर्थात् गतिमय है’-उपनिषद् के इस सिद्धान्त की पुष्टि आधुनिक विज्ञान एवं आधुनिक खोज द्वारा भी होती है। निरन्तर परिवर्तन तथा निरन्तर गतिमयता ब्रह्माण्ड के समस्त सूर्य + चन्द्र + पृथ्वी आदि ग्रह-उपग्रहों का स्वभाव है। – इस उपनिषद् में ‘विद्या’ ‘अविद्या’ दो विशिष्ट वैदिक पदों का प्रयोग हुआ है। जो लोग ‘अविद्या’ शब्द द्वारा कहे जाने वाले यज्ञयाग, भौतिकशास्त्र आदि सांसारिक ज्ञान में दैनिक सुख-साधनों की प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील रहते हैं; उनकी सांसारिक उन्नति तो बहुत होती है, परन्तु उनका अध्यात्म पक्ष निर्बल रह जाता है। जो लोग केवल अध्यात्म ज्ञान में ही लीन रहते हैं और भौतिक ज्ञान की साधन सामग्री की अवहेलना करते हैं, वे सांसारिक जीवन के निर्वाह तथा सांसारिक उन्नति में पिछड़ जाते हैं।

इसीलिए अविद्या अर्थात् भौतिकज्ञान द्वारा जीवन की सुख-साधन सामग्री अर्जित कर विद्या अर्थात् अध्यात्मज्ञान द्वारा जन्म-मरण के दुःख से रहित अमृतपद को प्राप्त करने का सारगर्भित उपदेश इस उपनिषद में दिया गया है-‘अविद्यया मृत्युं तीर्खा विद्ययाऽमृतमश्नुते’। श्रीमद् भगवद्गीता में ईशोपनिषद् के ही दार्शनिक विचारों का विस्तार से व्याख्यान किया गया है।

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16. दाराशिकोह (समुद्रसङ्गमः)
मुगलसम्राट् शाहजहाँ के विद्वान् पुत्र दाराशिकोह संस्कृत तथा अरबी भाषा के तत्कालीन विद्वानों में अग्रगण्य थे। ‘समुद्रसङ्गमः’ दाराशिकोह द्वारा रचित प्रसिद्ध है। इसी ग्रन्थ में ‘पृथिवी-निरूपणम्’ के अन्तर्गत उन्होंने पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों आदि का विशिष्ट शैली में वर्णन किया है। उसी वर्णन के कुछ अंश यहाँ ‘भू-विभागाः’ पाठ में प्रस्तुत किए गए हैं।

दाराशिकोह मुगलसम्राट शाहजहाँ के सबसे बड़े पुत्र थे। उनका जीवनकाल 1615 ई० से 1659 ई० तक है। शाहजहाँ उनको राजपद देना चाहते थे पर उत्तराधिकार के संघर्ष में उनके भाई औरंगज़ेब ने निर्ममता से उनकी हत्या कर दी। दाराशिकोह ने अपने समय के श्रेष्ठ संस्कृत पण्डितों, ज्ञानियों और सूफी सन्तों की सत्संगति में वेदान्त और इस्लाम के दर्शन का गहन अध्ययन किया था। उन्होंने फ़ारसी और संस्कृत में इन दोनों दर्शनों की समान विचारधारा को लेकर विपुल साहित्य लिखा। फारसी में उनके ग्रन्थ हैं-सारीनतुल् औलिया, सकीनतुल् औलिया, हसनातुल् आरफीन (सूफी सन्तों की जीवनियाँ), तरीकतुल् हकीकत, रिसाल-ए-हकनुमा, आलमे नासूत, आलमे मलकूत (सूफी दर्शन के प्रतिपादक ग्रन्थ), सिर्र-ए-अकबर (उपनिषदों का अनुवाद)। श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ का भी फ़ारसी भाषा में उन्होंने अनुवाद किया। ‘मज्म-उल्-बहरैन्’ फ़ारसी में उनकी अमरकृति है, जिसमें उन्होंने इस्लाम और वेदान्त की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बतलाई हैं। इसी ग्रन्थ को दाराशिकोह ने ‘समुद्रसङ्गमः’ नाम से संस्कृत में लिखा।

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17. चन्द्रशेखरदास वर्मा (पाषाणीकन्या)
श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा उड़िया भाषा के प्रख्यात साहित्यकार हैं। इनका जन्म 1945 ईस्वी में हुआ। इनके 12 कथासंग्रह, एक नाट्यसंग्रह तथा तीन समीक्षा-ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। ‘पाषाणी-कन्या’ तथा ‘वोमा’ इनके प्रसिद्ध कथा संग्रह हैं। ‘पाषाणीकन्या’ कथासंग्रह का संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है। इसी कथासंग्रह से ‘दीनबन्धुः श्रीनायारः’ शीर्षक कथा पाठ्यांश के रूप में संकलित है।

इस कथा के नाटक श्रीनायार का पालन-पोषण एक अनाथाश्रम में हुआ है। श्रीनायार ने अपनी कर्मदक्षता, दाक्षिण्य और सेवामनोवृत्ति से समाज में आदर्श स्थापित किया है। वे प्रतिमास अपने वेतन का आधे से अधिक भाग केरल में स्थापित अनाथाश्रम को भेजते हैं। प्रस्तुत कथा में श्रीनायार का लोककल्याणकारी आदर्श चरित्र वर्णित है।

18. पं० हृषीकेश भट्टाचार्य (प्रबन्धमञ्जरी)
आधुनिक गद्य लेखकों में पण्डित हृषीकेश भट्टाचार्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनका समय 1850-1913 ई० है। ये ओरियण्टल कॉलेज, लाहौर में संस्कृत के प्राध्यापक थे। इन्होंने ‘विद्योदयम्’ नामक संस्कृत पत्रिका के माध्यम से 44 वर्ष तक निवन्ध-लेखन करके संस्कृत में निबन्ध-विधा को जन्म दिया है। श्री भट्टाचार्य द्वारा लिखित संस्कृत निबन्धों का एक संग्रह ‘प्रबन्धमञ्जरी’ के नाम से 1930 ई० में प्रकाशित हुआ। इसमें 11 निबन्ध संगृहीत हैं। इनमें से अधिकांश निबन्ध व्यङ्ग्य-प्रधान शैली में लिखे गए हैं। संस्कृत में व्यङ्ग्य-शैली का प्रादुर्भाव श्री भट्टाचार्य के इन निबन्धों से ही माना जाता है। इनका व्यंग्य अत्यन्त शिष्ट, परिष्कृत और प्रभावोत्पादक है। इनकी भाषा में सरलता, सरसता, मधुरता तथा सुबोधता है। इनकी भाषा में संस्कृत के महान् गद्यकार बाण की शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है।

प्रस्तुत पाठ ‘उद्भिज्ज-परिषद्’ श्री भट्टाचार्य की इसी ‘प्रबन्ध-मञ्जरी’ से सम्पादित करके लिया गया है। उभिज्ज शब्द का अर्थ है-वृक्ष और परिषद् का अर्थ है-सभा। इस प्रकार ‘उदभिज्ज-परिषद्’ शब्द का अर्थ हुआ ‘वृक्षों की सभा।’ इस सभा के सभापति हैं अश्वत्थ-पीपल। सभापति अपने भाषण में मानवों पर बड़े ही व्यंग्यपूर्ण प्रहार करते हैं।

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19. पं० भट्ट मथुरानाथ शास्त्री (प्रबन्धपारिजातः)
प्रस्तुत पाठ ‘किन्तोः कुटिलता’ देवर्षि श्रीकलानाथ शास्त्री द्वारा सम्पादित पं० श्री भट्ट मथुरानाथ शास्त्री के निबन्धसंग्रह ‘प्रबन्धपारिजातः’ से संकलित किया गया है। – पं० भट्ट मथुरानाथ शास्त्री के पिता पं० भट्ट द्वारकानाथ जयपुर निवासी थे। पं० भट्ट मथुरानाथ का जन्म जयपुर में सन् 1889 ई० में हुआ और निधन भी 4 जून, 1964 ई० को जयपुर में ही हुआ।

श्री भट्ट की पूर्वज परम्परा अत्यन्त प्रतिभा सम्पन्न रही। इन्होंने महाराजा संस्कृत कॉलेज से साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की और वहीं व्याख्याता बन गए। आप जयपुर से प्रकाशित ‘संस्कृतरत्नाकर’ पत्रिका के सम्पादक रहे। भट्ट मथुरानाथ शास्त्री द्वारा प्रणीत संस्कृत की रचनाओं में ‘जयपुरवैभवम्’, ‘गोविन्दवैभवम्’, ‘संस्कृतगाथासप्तशती’ और ‘साहित्यवैभवम्’ विशेष उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने चालीस कथाएँ और सौ से भी अधिक निबन्ध संस्कृत में लिखे। इनकी ‘सुरभारती’, ‘सुजनदुर्जन-सन्दर्भः’ और ‘युद्धमुद्धतम्’ नामक पद्य रचनाएँ भी उल्लेखनीय हैं।

यहाँ संकलित पाठ में श्री भट्ट जी ने दिखाया है कि जब कभी किसी कथन के साथ ‘किन्तु’ लग जाता है, तब बहुधा वह पहले कथन के अच्छे भाव को समाप्त कर उसे दोषपूर्ण और सम्बोधित व्यक्ति के लिए दुःख पैदा करने वाला, उसके उत्साह का नाशक और शत्रुरूप बना देता है। ऐसे अवसर विरल होते हैं जहाँ ‘किन्तु’ सम्बोधित व्यक्ति के लिए सुखदायक सिद्ध होता है।

लेख की भाषा सरल व सुबोध है, अलंकारों और दीर्घ समासों आदि का प्रयोग नहीं किया गया है। भाव सुस्पष्ट और सामान्य जीवन में जनसाधारण द्वारा अनुभूत हैं।

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20. सिंहासनद्वात्रिंशिका
‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ बत्तीस मनोरञ्जक कथाओं का संग्रह है। यह किसी अज्ञातकवि की रचना है। इसके केवल गद्यमय, केवल पद्यमय, गद्य-पद्यमय, ये तीन प्रकार के संस्करण मिलते हैं। इसमें बत्तीस पुत्तलिकाओं (पुतलियों) ने राजा विक्रमादित्य को बत्तीस कहानियाँ सुनाई हैं। अतः इस ग्रन्थ का समय राजा भोज (1018-1063) के अनन्तर ही माना जाता है। इसके रचयिता का नाम अज्ञात है।

एक टीले की खुदाई करने पर राजा भोज को एक सिंहासन मिलता है। वह सिंहासन राजा विक्रमादित्य का था। शुभ मुहूर्त में राजा भोज उस सिंहासन पर बैठना चाहता है तो सिंहासन पर बनी 32 पुत्तलिकाओं में से प्रत्येक पुत्तलिका राजा विक्रमादित्य के गुणों तथा पराक्रम की एक-एक कथा सुनाकर राजा को सिंहासन पर बैठने से पुन:पुनः रोकती है

और उड़ जाती है। प्रत्येक पुत्तलिका ने राजा से यही प्रश्न किया है-“क्या तुममें विक्रम जैसा गुण है? यदि है तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो अन्यथा नहीं।” ऐसा माना जाता है कि विक्रमादित्य को यह सिंहासन इन्द्र से प्राप्त हुआ था। उनके दिवंगत हो जाने पर यह सिंहासन भूमि में गाड़ दिया गया और 11वीं सदी में यह सिंहासन धारानरेश भोज को मिलता है, इसीलिए प्रत्येक कहानी में पुत्तलिका राजा भोज को सम्बोधित करके कहानी कहती है।

21. पण्डितराज जगन्नाथ
पंडितराज जगन्नाथ तैलंग ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम पेरुभट्ट और माता का नाम लक्ष्मीदेवी था। युवावस्था में वे दिल्ली गए और शाहजहाँ से उन्होंने पण्डितराज की उपाधि प्राप्त की। उनका स्थितिकाल 1650 – 1680 के लगभग माना जाता है। उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया था। वे काशी चले गए वहाँ उन्होंने ‘गंगालहरी’ की रचना की। उनके रचित ग्रन्थों में पीयूषलहरी’ अथवा ‘गंगालहरी’, ‘सुधालहरी’, ‘अमृतलहरी’, ‘करुणालहरी’, ‘लक्ष्मीलहरी’ यमुना वर्णन आदि प्रमुख हैं। रसगंगाधर पण्डित राज जगन्नाथ की सर्वश्रेष्ठ कृति है। अलंकार शास्त्र का यह परम प्रौढ़ ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त ‘भामिनी विलास’ मुक्तक गीतात्मक पद्यों का संग्र है।

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HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए

1. माइक्रो (Micro) और मैक्रो (Macro) शब्दों की उत्पत्ति निम्नलिखित में से कौन-सी भाषा से हुई है?
(A) अंग्रेज़ी
(B) लैटिन
(C) यूनानी (ग्रीक)
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) यूनानी (ग्रीक)

2. व्यष्टि (Micro) और समष्टि (Macro) शब्दों का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया?
(A) मार्शल
(B) रोबिन्स
(C) रैगनर नर्कसे
(D) रैगनर फ्रिश
उत्तर:
(D) रैगनर फ्रिश

3. समष्टि (मैक्रो) अर्थशास्त्र का संबंध है-
(A) व्यक्तिगत इकाइयों से
(B) सामूहिक कार्यों से
(C) एक फर्म से
(D) एक उद्योग से
उत्तर:
(B) सामूहिक कार्यों से

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

4. विश्वव्यापी महामंदी का काल बताइए
(A) 1929-30
(B) 1929-32
(C) 1929-33
(D) 1929-36
उत्तर:
(C) 1929-33

5. आय और रोजगार सिद्धांत निम्नलिखित में से कौन-से सिद्धांत की एक प्रमुख विशेषता है?
(A) व्यष्टि
(B) समष्टि
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) समष्टि

6. समष्टि अर्थशास्त्र तथा व्यष्टि अर्थशास्त्र में निम्नलिखित में से कौन-सा अंतर सही है?
(A) अध्ययन क्षेत्र में अंतर
(B) सामूहिकता में अंतर
(C) विभिन्न मान्यताओं में अंतर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

7. विश्वमंदी का अध्ययन होता है-
(A) व्यष्टि अर्थशास्त्र में
(B) समष्टि अर्थशास्त्र में
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) समष्टि अर्थशास्त्र में

8. समष्टि अर्थशास्त्र का विकास एक अलग शाखा के रूप में कब हुआ?
(A) 1930 से 1940 के बीच में
(B) 1910 से 1920 के बीच में
(C) 1920 से 1930 के बीच में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) 1930 से 1940 के बीच में

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

9. साधनों के आबंटन का अध्ययन होता है-
(A) व्यष्टि अर्थशास्त्र में
(B) समष्टि अर्थशास्त्र में
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) व्यष्टि अर्थशास्त्र में

10. समष्टि अर्थशास्त्र अध्ययन करता है-
(A) संपूर्ण अर्थव्यवस्था का
(B) एक उद्योग का
(C) एक फर्म का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) संपूर्ण अर्थव्यवस्था का

11. यदि समूचे चीनी उद्योग की जाँच की जाए, तो यह कौन-सा विश्लेषण कहलाएगा?
(A) व्यष्टिपरक
(B) समष्टिपरक
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) व्यष्टिपरक

12. आधुनिक समष्टि आर्थिक विश्लेषण का जनक किसे माना जाता है?
(A) डेविड रिकार्डो को
(B) डॉ० मार्शल को
(C) जॉन मेनार्ड केज़ को
(D) एडम स्मिथ को
उत्तर:
(C) जॉन मेनार्ड केज़ को

13. निम्नलिखित में से कौन-सा समष्टि तत्त्व नहीं है?
(A) रोज़गार का सिद्धांत
(B) माँग का सिद्धांत
(C) आय का सिद्धांत
(D) मौद्रिक नीति
उत्तर:
(B) माँग का सिद्धांत

14. राष्ट्रीय आय का अध्ययन होता है-
(A) समष्टि अर्थशास्त्र में
(B) व्यष्टि अर्थशास्त्र में
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) समष्टि अर्थशास्त्र में

15. उस अर्थशास्त्री का नाम बताइए जिसने सबसे पहले समष्टि अर्थशास्त्र की बुनियाद डाली।
(A) डेविड रिकार्डो
(B) डॉ० मार्शल
(C) जॉन मेनार्ड केज़
(D) एडम स्मिथ
उत्तर:
(D) एडम स्मिथ

16. समष्टि अर्थशास्त्र का मौलिक उद्देश्य यह जानना है कि-
(A) अर्थव्यवस्था में मंदी के क्या कारण हैं?
(B) अर्थव्यवस्था में धीमी संवृद्धि के क्या कारण हैं?
(C) कीमत स्तर में वृद्धि या बेरोज़गारी में वृद्धि के क्या कारण हैं?
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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17. निम्नलिखित में से कौन-सा समष्टि तत्त्व नहीं है?
(A) समग्र माँग
(B) राष्ट्रीय आय
(C) व्यापार चक्र
(D) उपभोक्ता संतुलन
उत्तर:
(D) उपभोक्ता संतुलन

18. निम्नलिखित में से कौन-सा समष्टि चर है?
(A) रोजगार का सिद्धान्त
(B) कीमत लोच
(C) लगान का सिद्धान्त
(D) वस्तु की कीमत
उत्तर:
(A) रोजगार का सिद्धान्त

B. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. कीमत सिद्धांत ……………. अर्थशास्त्र की एक प्रमुख विशेषता है। (व्यष्टि/समष्टि)
उत्तर:
व्यष्टि

2. संपूर्ण अर्थव्यवस्था का अध्ययन ……………. अर्थशास्त्र करता है। (समष्टि/व्यष्टि)
उत्तर:
समष्टि

3. ……………… समष्टिगत तत्त्व है। (माँग की लोच/मुद्रास्फीति)
उत्तर:
मुद्रास्फीति

4. विश्व महामंदी का वर्ष …………….. था। (1929/1942)
उत्तर:
1929

5. आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक ……………. है। (एडम स्मिथ जे०एम० केज)
उत्तर:
एडम स्मिथ

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6. राष्ट्रीय आय का अध्ययन करना ……………. अर्थशास्त्र की विशेषता है। (समष्टि/व्यष्टि)
उत्तर:
समष्टि

7. आधुनिक समष्टि आर्थिक विश्लेषण का जनक ………….. को माना जाता है। (जे०एम० केज/एडम स्मिथ)
उत्तर:
जे०एम० केज

C. बताइए कि निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत

  1. समष्टि अर्थशास्त्र का संबंध व्यक्तिगत इकाइयों से होता है।
  2. जो बात व्यष्टि अर्थशास्त्र के लिए सही है, वही बात समष्टि अर्थशास्त्र के लिए भी सही होती है।
  3. सभी प्रकार के आर्थिक समूहों और औसतों का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र के अर्न्तगत किया जाता है।
  4. प्रो० केज़ के अनुसार समष्टि अर्थशास्त्र सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के कार्यकरण से संबंधित है।
  5. व्यष्टि अर्थशास्त्र और समष्टि अर्थशास्त्र में कोई संबंध नहीं पाया जाता है।
  6. भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है।
  7. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का मुख्य उद्देश्य जन-कल्याण होता है।
  8. समष्टि अर्थशास्त्र और व्यष्टि अर्थशास्त्र परस्पर एक-दूसरे के विरोधी हैं।
  9. समष्टि अर्थशास्त्र का वैकल्पिक नाम आय एवं रोजगार का सिद्धांत है।
  10. कुल माँग एवं कुल पूर्ति व्यष्टि अर्थशास्त्र के उदाहरण हैं।
  11. समष्टि अर्थशास्त्र का सम्बन्ध व्यक्तिगत इकाइयों से होता है।
  12. समग्र माँग और समग्र पूर्ति समष्टि अर्थशास्त्र के मुख्य उपकरण हैं।
  13. सामान्य कीमत स्तर पर समष्टि अर्थशास्त्र एक आर्थिक अध्ययन है।
  14. प्रो० केज के अनुसार समष्टि अर्थशास्त्र सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के कार्यकरण से संबंधित है।

उत्तर:

  1. गलत
  2. गलत
  3. सही
  4. गलत
  5. गलत
  6. सही
  7. सही
  8. गलत
  9. सही
  10. गलत
  11. गलत
  12. सही
  13. सही
  14. गलत।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समष्टि अर्थशास्त्र का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र आर्थिक सिद्धांत की वह शाखा है जिसके अंतर्गत संपूर्ण अर्थव्यवस्था का एक इकाई के रूप में अध्ययन किया जाता है। समष्टि अर्थशास्त्र में आर्थिक समाहारों (Aggregates); जैसे सकल घरेलू उत्पाद, सकल राष्ट्रीय उत्पाद, सामान्य कीमत स्तर, रोज़गार का स्तर, कुल बचत, कुल निवेश, कुल माँग, कुल पूर्ति आदि का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
दो मुख्य विषय बताएँ जिनका अर्थशास्त्र में अध्ययन किया जाता है।
उत्तर:

  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र (Micro Economics)
  2. समष्टि अर्थशास्त्र (Macro Economics)।

प्रश्न 3.
व्यष्टि अर्थशास्त्र एवं समष्टि अर्थशास्त्र में कोई दो अंतर बताइए।
उत्तर:

  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन किया जाता है जबकि समष्टि अर्थशास्त्र में आर्थिक समूहों का अध्ययन किया जाता है।
  2. व्यष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की मान्यता पर आधारित है जबकि समष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था में संसाधनों के अपूर्ण व अल्प रोज़गार पर आधारित है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

प्रश्न 4.
आधनिक अर्थशास्त्र के जनक कौन हैं? उनके द्वारा लिखी गई सप्रसिद्ध पस्तक का नाम लिखें।
उत्तर:
एडम स्मिथ (Adam Smith) आधुनिक अर्थशास्त्र के जनक हैं। एडम स्मिथ द्वारा रचित सुप्रसिद्ध पुस्तक “An Enquiry into the Nature and Causes of the Wealth of Nations” है।

प्रश्न 5.
समष्टि अर्थशास्त्र पर जॉन मेनार्ड केञ्ज (Keynes) द्वारा लिखी गई पुस्तक का नाम बताइए। यह कौन-से वर्ष प्रकाशित हुई? .
उत्तर:
जॉन मेनार्ड केञ्ज की लिखी पुस्तक ‘रोज़गार, ब्याज और मुद्रा का सामान्य सिद्धांत’ (The General Theory of Employment, Interest and Money) है जो सन् 1936 ई० में प्रकाशित हुई।

प्रश्न 6.
भारत में बेरोज़गारी की समस्या का अध्ययन समष्टि आर्थिक अध्ययन क्यों कहलाता है?
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र संपूर्ण अर्थव्यवस्था के अध्ययन से संबंधित है। चूँकि बेरोज़गारी की समस्या का अध्ययन संपूर्ण अर्थव्यवस्था से संबंधित है, इसलिए बेरोजगारी की समस्या का अध्ययन समष्टि आर्थिक अध्ययन कहलाता है।

प्रश्न 7.
क्या एक फर्म के उत्पादन का स्तर समष्टि आर्थिक अध्ययन है? कारण दें।
उत्तर:
समष्टि आर्थिक सिद्धांत अर्थशास्त्र का वह भाग है जो अर्थव्यवस्था के कुल समूहों का अध्ययन करता है। इस दृष्टि . से एक फर्म के उत्पादन का स्तर समष्टि आर्थिक अध्ययन नहीं है।

प्रश्न 8.
सूती वस्त्र उद्योग का अध्ययन समष्टि आर्थिक अध्ययन है या व्यष्टि आर्थिक अध्ययन।
उत्तर:
सूती वस्त्र उद्योग समष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन नहीं बल्कि व्यष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन का विषय है। चूंकि यह अध्ययन किसी विशेष उद्योग से संबंधित है।

प्रश्न 9.
समष्टि अर्थशास्त्र में रोज़गार निर्धारण के किन तत्त्वों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में रोज़गार निर्धारण के कुल माँग, कुल पूर्ति, कुल उपभोग, कुल बचत, कुल निवेश आदि तत्त्वों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 10.
समष्टि अर्थशास्त्र के महत्त्वपूर्ण विषय कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
आय तथा रोज़गार का निर्धारण, सामान्य कीमत स्तर, आर्थिक विकास की समस्या, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समष्टि आर्थिक अध्ययन के महत्त्वपूर्ण विषय हैं।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

प्रश्न 11.
सन् 1929-33 की महामंदी काल में क्या बातें देखने में आईं?
उत्तर:
महामंदी के संकट के समय विश्व में उत्पादन तो था परंतु वस्तुओं की माँग नहीं थी। इस महामंदी के दौरान विश्व को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा था। श्रमिकों में बेरोज़गारी बढ़ गई थी।

प्रश्न 12.
समष्टि अर्थशास्त्र की दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  1. समष्टि अर्थशास्त्र अपूर्ण रोज़गार व अल्प रोज़गार की स्थिति पर आधारित है।
  2. समष्टि अर्थशास्त्र सरकारी हस्तक्षेप द्वारा सार्वजनिक निवेश में वृद्धि के महत्त्व को प्रकट करता है, चूँकि निवेश में वृद्धि पर ही आय तथा रोज़गार निर्भर करता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समष्टि अर्थशास्त्र का प्रादुर्भाव कैसे हुआ?
अथवा
समष्टि अर्थशास्त्र का उद्भव कैसे हुआ?
अथवा
समष्टि अर्थशास्त्र की विचारधारा का विकास किस प्रकार हुआ? समझाइए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र में काफी लंबे समय तक व्यष्टिगत आर्थिक सिद्धांतों का प्रचलन रहा और अर्थशास्त्रियों ने उन्हें मान्यता दी, परंतु 1929-33 की विश्वव्यापी मंदी के दौरान इन सिद्धांतों को सत्य नहीं पाया गया। इस अवधि के दौरान संसार के अनेक देशों में मंदी और बेरोज़गारी की समस्या का समाधान करने के लिए जे०एम०केञ्ज ने अपने सिद्धांत अपनी पुस्तक ‘The General Theory of Employment, Interest and Money’ में 1936 में प्रकाशित किए। इस पुस्तक ने आर्थिक जगत में नए विचारों का सूत्रपात किया। केज के विचारों से आर्थिक क्षेत्र में एक बड़ा परिवर्तन आया, जिसे ‘केजीयन क्रांति’ की संज्ञा दी गई। केजीयन क्रांति के बाद ही समष्टि स्तरीय आर्थिक चिंतन में अर्थशास्त्रियों की रुचि जागत हुई। उससे पहले के आर्थिक चिंतन में किसी प्रकार के आर्थिक संकट की संभावना को स्वीकार नहीं किया जाता था।

उस समय ऐसा माना जाता था कि बाज़ार व्यवस्था में ‘स्वचालित सामंजस्य’ की क्षमता होती है जो अर्थव्यवस्था को सदैव संतुलन में रखती है। उन लोगों की मान्यता थी कि किसी भी आर्थिक व्यवधान के समय सामंजस्य प्रक्रिया उस व्यवधान का अपने-आप समाधान कर देगी। परंतु 1929-33 की विश्वव्यापी महामंदी के दौरान इन सिद्धांतों के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ। समष्टि स्तरीय आर्थिक विश्लेषण का आरंभ इसी सिद्धांत से होता है। केज ने अपने सिद्धांत में संपूर्ण अर्थव्यवस्था से संबंधित समस्याओं का अध्ययन करने के लिए समष्टि अर्थशास्त्र की प्रणाली का उपयोग किया। मंदी, बेरोज़गारी, राष्ट्रीय आय व रोज़गार, सामान्य कीमत स्तर, सामान्य मज़दूरी स्तर आदि के अध्ययन के लिए समष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन को अपनाने पर जोर दिया। यह सिद्धांत मुख्य रूप से यह स्पष्ट करता है कि किसी देश में आय व रोजगार का निर्धारण किस प्रकार होता है।

प्रश्न 2.
समष्टि अर्थशास्त्र की सीमाओं का वर्णन करें।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र की सीमाएँ निम्नलिखित हैं-
(i) व्यक्ति की समस्याएँ समूह की समस्याओं से भिन्न होती हैं जबकि समष्टि अर्थशास्त्र में समूहों का अध्ययन होता है। समूह में परिवर्तन का प्रभाव व्यक्तिगत इकाइयों पर अलग-अलग पड़ सकता है। जिस प्रकार बढ़ती हुई कीमतों का प्रभाव समाज के धनी वर्ग पर कम और निर्धन वर्ग पर अधिक पड़ता है।

(ii) इसका एक प्रमुख दोष यह है कि सामान्य निष्कर्ष वैयक्तिक इकाइयों के लिए उपयुक्त नहीं होते। व्यक्ति के लिए अपनी आय से एक भाग बचाना अच्छी बात है, किंतु यदि सारा समाज ही धन बचाने में जुट जाए तो निश्चय ही अर्थव्यवस्था में मंदी आ जाएगी।

(iii) यदि जिन इकाइयों से मिलकर समूह बनता है, वे बदल जाती हैं, किंतु समूह अपरिवर्तित रहता है तो इसके परिणामस्वरूप अनेक भ्रमात्मक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

(iv) समष्टि अर्थशास्त्र समूहों की समरूपता की मान्यता पर आधारित है, लेकिन व्यवहार में हमें अधिकांश रूप से विभिन्न रूपों वाले समूह ही देखने को मिलते हैं।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

प्रश्न 3.
समष्टि अर्थशास्त्र के महत्त्व का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र के महत्त्व निम्नलिखित हैं
1. संपूर्ण अर्थव्यवस्था के अध्ययन के लिए उपयुक्त-समष्टि अर्थशास्त्र बताता है कि संपूर्ण अर्थव्यवस्था एक इकाई के रूप में कैसे कार्य करती है और राष्ट्रीय आय व रोज़गार का स्तर कैसे निर्धारित होता है।

2. आर्थिक समस्याओं को हल करने व नीति-निर्धारण में सहायक-समष्टि अर्थशास्त्र अनेक आर्थिक समस्याओं; जैसे बेरोज़गारी, व्याप्त गरीबी, मंदी व तेजी, निम्न उत्पादन स्तर, व्यापार चक्र जैसी समस्याओं के मूल कारकों की पहचान कराने और उपयुक्त निदानकारी नीति बनाने में यह सहायता करता है।

3. आर्थिक विकास प्राप्त करने में सहायक प्रत्येक देश का उद्देश्य शीघ्र आर्थिक विकास करना है। समष्टि अर्थशास्त्र उन तत्त्वों का विवेचन करता है जो आर्थिक विकास संभव बनाते हैं। यह आर्थिक विकास की उच्चतम अवस्था प्राप्त करने और उसे बनाए रखने की विधि बताता है।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समष्टि अर्थशास्त्र की परिभाषा दीजिए। इसके क्षेत्र का वर्णन करें।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषाएँ-समष्टि शब्द का अंग्रेज़ी रूपांतर मैक्रो (Macro) है जो ग्रीक (Greek) भाषा के ‘MAKROS’ से बना है, जिसका अर्थ होता है-बड़ा (Large)। समष्टि अर्थशास्त्र में संपूर्ण अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया जाता है। समष्टि अर्थशास्त्र आर्थिक सिद्धांत की वह शाखा है जो समग्र अर्थव्यवस्था का एक इकाई के रूप में अध्ययन करता है।
1. प्रो० बोल्डिंग के शब्दों में, “समष्टि अर्थशास्त्र व्यक्तिगत मात्राओं का अध्ययन नहीं करता बल्कि इन मात्राओं के समूहों का अध्ययन करता है; व्यक्तिगत आय का नहीं बल्कि राष्ट्रीय आय का; व्यक्तिगत कीमतों का नहीं बल्कि सामान्य कीमत स्तर का; व्यक्तिगत उत्पादन का नहीं अपितु राष्ट्रीय उत्पादन का अध्ययन करता है।”

2. शेपीरो के अनुसार, “समष्टि अर्थशास्त्र संपूर्ण अर्थव्यवस्था के कार्यकरण से संबंधित है।”
दूसरे शब्दों में, समष्टि अर्थशास्त्र में उन आर्थिक मुद्दों का अध्ययन होता है जिनका संबंध संपूर्ण अर्थव्यवस्था से होता है; जैसे समग्र माँग, समग्र पूर्ति, कुल रोज़गार, राष्ट्रीय आय, कीमत स्तर, कुल निवेश, कुल बचत आदि। उपमा के रूप में हम कह सकते हैं कि समष्टि अर्थशास्त्र आर्थिक वन का विश्लेषण करता है न कि वन के वृक्षों का।

समष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र-समष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। समष्टि अर्थशास्त्र के क्षेत्र में निम्नलिखित विषयों का अध्ययन किया जाता है
1. राष्ट्रीय आय का सिद्धांत-समष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत राष्ट्रीय आय का अर्थ, राष्ट्रीय आय संबंधी विभिन्न अवधारणाएँ, उसके विभिन्न तत्त्व, राष्ट्रीय आय के मापन की विधियाँ तथा सामाजिक लेखे (Social Accounting) आदि का अध्ययन किया जाता है।

2. रोज़गार का सिद्धांत-समष्टि अर्थशास्त्र में रोज़गार निर्धारण तथा बेरोज़गारी की समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। इसमें रोज़गार निर्धारण के विभिन्न कारकों; जैसे समस्त माँग, समस्त पूर्ति, कुल उपभोग, कुल बचत, कुल निवेश तथा कुल पूँजी-निर्माण आदि का अध्ययन किया जाता है।

3. मुद्रा का सिद्धांत मुद्रा की मात्रा का देश के उत्पादन, रोज़गार, आय, कीमत-स्तर आदि पर बहुत प्रभाव पड़ता है। अतः समष्टि अर्थशास्त्र में मुद्रा के कार्यों तथा मुद्रा पूर्ति से संबंधित सिद्धांतों, बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है।

4. सामान्य कीमत स्तर का सिद्धांत-समष्टि अर्थशास्त्र में सामान्य कीमत स्तर के निर्धारण तथा उसमें होने वाले परिवर्तन जैसे मुद्रास्फीति (Inflation) अर्थात कीमतों में होने वाली माँग जन्य तथा लागत जन्य वृद्धि एवं अवस्फीतिक (Deflation) अर्थात् कीमतों में होने वाली सामान्य कमी आदि समस्याओं का अध्ययन भी किया जाता है।

5. आर्थिक विकास का सिद्धांत-आर्थिक विकास के सिद्धांतों का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। इसमें किसी राष्ट्र के अल्पविकसित होने के कारणों, विकास करने की नीतियों एवं विधियों का अध्ययन किया जाता है।

6. व्यापार चक्र का सिद्धांत प्रत्येक अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास की गति में परिवर्तन आता रहता है। कभी तेजी (Boom) और कभी मंदी (Depression) की समस्या उत्पन्न हो जाती है। इन्हें व्यापार चक्र कहा जाता है। समष्टि अर्थशास्त्र व्यापार चक्र की समस्याओं का भी अध्ययन करता है।

7. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का सिद्धांत समष्टि अर्थशास्त्र में विभिन्न देशों के बीच में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का भी अध्ययन किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के सिद्धांत; जैसे कोटा (Quota), टैरिफ (Tariff) तथा संरक्षण (Protection) आदि के अध्ययन का समष्टि अर्थशास्त्र में विशेष महत्त्व है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

प्रश्न 2.
समष्टि अर्थशास्त्र के अलग अध्ययन की आवश्यकता क्यों है? समझाइए।
उत्तर:
निम्नलिखित कारणों से समष्टि अर्थशास्त्र के अलग अध्ययन की आवश्यकता है
1. व्यक्तिगत इकाइयाँ समूची अर्थव्यवस्था की दशा नहीं दर्शाती यद्यपि व्यष्टि अर्थशास्त्र व्यक्तिगत इकाइयों; जैसे एक उपभोक्ता, एक उत्पादक (एक फर्म) आदि के व्यवहार का विवेचन करता है परंतु व्यक्तिगत इकाइयाँ समूची अर्थव्यवस्था की दशा को प्रतिबिंबित नहीं करतीं।

2. आर्थिक विकास-वर्तमान युग में, संसार के प्रत्येक देश का उद्देश्य तीव्र आर्थिक विकास करना है। इसके लिए आर्थिक मुद्दों; जैसे राष्ट्रीय आय, सामान्य कीमत स्तर, गरीबी, कुल रोज़गार, मुद्रास्फीति, कुल व्यय, कुल बचत, कुल निवेश, अर्थव्यवस्था के संसाधनों का पूर्ण व सर्वोत्तम प्रयोग, आर्थिक नीतियों का निर्माण आदि के लिए समष्टि स्तर पर अध्ययन करना आवश्यक हो जाता है।

3. समष्टि आर्थिक विरोधाभास समष्टि आर्थिक विरोधाभास (Macro Economic Paradox) से अभिप्राय उन निष्कर्षों से है जोकि व्यक्तिगत इकाई के लिए सही होते हैं, परंतु संपूर्ण अर्थव्यवस्था के स्तर पर सही होना आवश्यक नहीं है। विरोधाभास के कारण भी समष्टि आर्थिक सिद्धांत की अलग से अध्ययन की आवश्यकता है; जैसे
(i) बचत का विरोधाभास-बचत निःसंदेह व्यक्तियों के लिए लाभकारी है परंतु बचत समाज या अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक भी सिद्ध होती है। विशेष रूप से उस समय जब समग्र माँग में कमी होने के फलस्वरूप बेरोज़गारी और मंदी फैली हुई हो। अतः बचत एक व्यक्ति के लिए तो ठीक है, परन्तु संपूर्ण समाज के लिए ठीक नहीं है। इस कारण आर्थिक समूहों का समुच्चय स्तर पर अलग से विश्लेषण करना बहुत जरूरी हो जाता है।

(ii) मज़दूरी-रोज़गार विरोधाभास-परंपरावादी (Classical) अर्थशास्त्री मंदी व बेरोज़गारी दूर करने के लिए मज़दूरी-दर को घटाने की वकालत करते हैं जिसके फलस्वरूप व्यक्तिगत उद्योग काम पर अधिक श्रमिक लगाते हैं क्योंकि लागत कम होने से लाभ बढ़ जाता है। दूसरी ओर, अर्थव्यवस्था में सब जगह मज़दूरी घटने से वस्तुओं व सेवाओं की कुल माँग गिर जाती है जिससे श्रमिकों के लिए माँग भी गिर जाती है क्योंकि श्रमिकों की माँग उन वस्तुओं की माँग पर निर्भर करती है जिन्हें श्रमिक उत्पन्न करने में सहायक होते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि एक श्रमिक कम मजदूरी लेकर अपनी बेरोज़गारी की समस्या तो हल कर लेता है पर समष्टि (या अर्थव्यवस्था) स्तर पर यदि सब श्रमिक कम मजदूरी प्राप्त करते हैं, तो कुल रोज़गार में अंततः गिरावट आ जाती है। अतः आर्थिक समूहों का समष्टि स्तर पर अलग से अध्ययन करना आवश्यक हो जाता है।

ये विरोधाभास ऐसे लगते हैं जैसे एक वृक्ष अपने पड़ोस की जलवायु नहीं बदल सकता, पर एक वन जलवायु बदल सकता है। इस दृष्टि से केज ने व्यष्टि सिद्धांत से हटकर समष्टि स्तर पर अलग से विवेचन करने की वकालत की है।

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HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् रचना निबंध-लेखनम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Rachana Nibandh Lekhan रचना निबंध-लेखनम् Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit व्याकरणम् रचना निबंध-लेखनम्

निबन्धलेखनम्

1. अनुशासनम्
नियमपालनम् आज्ञापालनं वा अनुशासनं भवति । अनुशासनं जीवने परमम् आवश्यकमस्ति । परिवारे, समाजे, राष्ट्र, अस्य आवश्यकता.वर्तते। अस्य पालनेन उन्नतिर्भवति। यत्र अनुशासनं न भवति, तत्र कार्येषु अवनतिः भवति। नियम-पालनस्य अभावे जीवनं दुष्करं भवेत् । यथा राजमार्गेषु यातायात-नियन्त्रणाय वामतः चलनमावश्यकं नियमं वर्तते । यदि अस्य पालनं न भवेत्, तदा अनेकाः दुर्घटनाः भविष्यन्ति। यदि सर्वे जनाः स्वच्छन्दाः स्युः तदा समाजस्य स्थितिः अस्तव्यस्ता स्यात्।
परिवारे एकः मुख्यः भवति। स एव परिवारे अनुशासनं रक्षति। केन किं कार्यं करणीयं इति परिवारे मुख्यः जनः एव निर्दिशति। यदि सर्वे सदस्याः अनुशासनं पालयन्ति तदा सर्वाणि कार्याणि सुचारुरूपेण सम्पन्नाः भवन्ति। अस्य अभावे अव्यवस्था भवति। सत्यं कथ्यते

सर्वे यत्र विनेतारः सर्वे पण्डितमानिनः। सर्वे महत्त्वमिच्छन्ति तत् कुलमवसीदति।

अद्य छात्रेषु अनुशासनस्य अभावः अस्ति। ते न गुरोराज्ञां पालयन्ति, न च पित्रोः आदेशं स्वीकुर्वन्ति। अनुशासनाभावे च प्रतिदिनं हट्टतालं कुर्वन्ति । अद्य सर्वत्रैव अनुशासनस्य अभावः एव दृश्यते । भारतीय-राजनीतौ, धार्मिक-सामाजिक- संस्थासु च न कोऽपि अनुशासनम् इच्छति। एवमेव वीथीनां नगरस्य च नियमाः भवन्ति, यथा-सार्वजनिकं स्थानं विकृतं न कुर्यात् अपशब्दं न वदेत्, इति नियमानां पालनेन सुविधा भवति, नियमानां भग्नेन च कलहाः जायन्ते। अतः अनुशासनस्य सर्वस्मिन् क्षेत्रे विशेषतः छात्र-जीवने महती आवश्यकता वर्तते।

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2. प्रातः काले भ्रमणम्
प्रात:काले सूर्योदयात् पूर्वं जागरणं प्राचीनकालतः एव स्वास्थ्यप्रदं मन्यते। प्रात:काले वातावरणं शान्तं शुद्धं स्वच्छं प्राणप्रदं शीतलम् ऊर्जाकरं च भवति। प्रात:कालस्य स्वच्छवायौ भ्रमणेन शरीरं रोगमुक्तं भवति। अथवा यैः रोगैः वयं ग्रसिता स्मः, तेभ्यः काचित् अपि रोगमुक्तता अवश्यम् अनुभूयते। बालः स्यात् वृद्धः वा, महिला स्यात् पुरुषः वा, प्रातः भ्रमणं सर्वेभ्यः संजीवनी इव जीवनकरं भवति । उत्तमस्वास्थ्याय दीर्घजीवनाय च प्रातःभ्रमणं सर्वथा सरल: सुविधाजनक: च उपायः अस्ति। अस्मिन् उपाये किमपि धनम् अपि च न व्ययीक्रियते।।

प्रातःकालः सर्वोत्तमः कालः भवति, यतः अस्मिन् काले वायुः शुद्धः, प्रदूषणरहितः, प्राकृतिकसौन्दर्येण परिपूरितः सूर्योदयस्य रक्ताभया मनोहारी शान्तिमयः च भवति। अस्मिन् काले भ्रमणात् बहवः लाभाः भवन्ति

प्रात:काले नियमित-भ्रमणेन शरीरं हष्टं पुष्टं बलिष्ठं च भवति । शरीरस्य स्थूलता क्षीयते। रोगाक्रमणशक्तिः वर्धते येन प्रायशः प्रथमं तु आक्रमन्ति एव न, यदि कदाचित् आक्रमन्ति अपि तर्हि तथा अनिष्टकराः न भवन्ति यथा तेभ्यः जनेभ्यः भवन्ति ये प्रातः भ्रमणं न कुर्वन्ति। श्वसनप्रक्रिया रक्तसञ्चार-प्रक्रिया च सन्तुलिता सशक्ता च भवतः । येन हृदयरोगः, रक्तचापः, स्नायुरोगः, मधुमेहः-इत्यादयः रोगाः प्रायशः न आक्रमन्ते। चिकित्सकाः अपि एतैः पीडितैः रुग्णान् प्रातः, भ्रमणाय उपदिशन्ति। प्रातः भ्रमणेन शरीरम् एव स्वस्थं न भवति मनः अपि स्वस्थं तिष्ठति। प्रातः भ्रमणेन मनुष्यस्य मानसिकक्षमता वर्धते अतएव सः अनावश्यकमानसिकद्वन्द्वेन मुक्तः तिष्ठति।
किमधिकं प्रातः भ्रमणं सर्वेभ्यः सर्वथा स्वास्थाकरं दीर्घायुष्यप्रदं च वर्तते। अतः प्रातः भ्रमणं सर्वैः नियमितरूपेण कर्तव्यम्।

3. समयस्य सदुपयोगः
मनुष्यजीवने समयस्य महत्त्वपूर्ण स्थानं वर्तते। गतः समयः पुनः न आगच्छति, अतः मनुष्यस्य एतत् कर्तव्यं भवति यत् प्राप्तस्य समयस्य सदुपयोगं कुर्यात्। यः जनः समयस्य सदुपयोगं न करोति तस्य जीवनं नश्यति। मानवस्य उन्नतौ समयस्य सदुपयोगितायाः महत्त्वपूर्ण योगदानं भवति। यतः समयः तु साक्षात् अवसरः एव भवति, यः अवसरं न गणयति, अवसरः अपि तं प्रमादिनं जनं दूरतः एव त्यजति । परिणामतः सः पश्चात्तापात् अन्यत् किमपि हस्तगतं न करोति। अतः समयस्य सदुपयोगः परमावश्यकः ।

समयः तु स्वगतिना गच्छति, न सः कस्मै अपि तिष्ठति अतः समयानुसारम् आवश्यकानि उचितानि कार्याणि अवश्यमेव सम्पादनीयानि। एष एव समयस्य सदुपयोगः कथ्यते।
छात्रजीवने एव यः मनुष्यः समयस्य महत्त्वं जानन् तदनुरूपं स्वकार्ययोजनां विधाय परिश्रमं करोति स एव सुखदम् उज्ज्वलं च भविष्यं निर्मातुं शक्नोति। छात्रजीवने यः जनः समयस्य सदुपयोगं न शिक्षते तस्य भाविजीवनम् अनेकविधं संकटमयम् अस्तव्यतं प्रायः च निष्फलम् एव जायते। अतः विपरीतं यः जनः समयस्य सदुपयोगं करोति तस्मै सर्वे उन्नतिमार्गाः निर्बाधाः भवन्ति, पदे पदे च विजयः सफलता वा तस्य चरणचुम्बनं करोति। वस्तुतः जीवने सफलतायाः कुञ्चिका समयस्य सदुपयोगिता एव अस्ति। समयस्य सदुपयोगेन कार्यक्षमता वर्धते, मानसिकद्वन्द्वं न जायते, जीवनं च स्वयमेव अनुशासनबद्धं भवति। अनेन प्रकारेण एव च मनुष्य यशस्वी सफलः च भवितुं शक्नोति। अतः छात्रजीवनतः एव समयस्य सदुपयोगस्य अभ्यासः करणीयः।

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4. अस्माकं/मम विद्यालयः
अस्मिन् देशे बहवः विद्यालयाः सन्ति। यत्र शिक्षकाः छात्रान् विद्यां पाठयन्ति स एव विद्यालयोऽस्ति। ‘विद्यायाः आलयः = विद्यालयः’ भवति। अस्माकं विद्यालयस्य नाम ‘राजकीय उच्चतर माध्यमिक: विद्यालयः’ कुरुक्षेत्रम् अस्ति। एतस्य भवनं विशालं सुन्दरं च अस्ति। एतस्मिन् च कुशलाः अध्यापकाः सन्ति। अस्माकं मुख्याध्यापकः सुयोग्यः प्रबन्धकः अस्ति। अध्यापकाः छात्राः च तं सम्मानयन्ति।
अस्माकं विद्यालये पुस्तकालयः अपि अस्ति। अर्धावकाशे वयं तत्र समाचारपत्राणि पठामः । अस्माकं विद्यालये एकः लघुः औषधालयः अस्ति। चिकित्सकः तत्र प्रतिदिनम् आगच्छति।।

अस्माकं विद्यालयस्य क्रीडाक्षेत्रं विशालम् अस्ति। तत्र सर्वतः रम्याः वृक्षाः सन्ति। सायंकाले वयं तत्र खेलामः। क्रीडाक्षेत्रे छात्राः विविधाः रोचकाः क्रीडाश्च कुर्वन्ति। अस्माकं विद्यालयस्य परीक्षाफलं सदैव श्लाघनीयं भवति । अयं विद्यालयः शतवर्षात् अधिकं देशवासिनां सेवां करोति। एनं विद्यालयं प्राप्य वयं धन्याः स्मः।

5. संस्कृतभाषायाः महत्त्वम्
संसारे अनेकाः भाषाः सन्ति । तासु भाषासु संस्कृतभाषा सर्वप्राचीना सर्वोत्तमा चास्ति । इयं भाषा ‘देववाणी’ अपि कथ्यते। इयमेव प्रायेण सर्वासां भाषाणां जननी अस्ति । भारतस्य सर्वाः एव भाषाः संस्कृतस्य कन्याः सन्ति। विशालम् अस्य साहित्यम्। वेदाः, गीता, रामायणं, महाभारतम् इत्यादयः ग्रन्थाः संस्कृतस्य गौरवं वर्धयन्ति। कालिदास-भास-भवभूति महाकविभिः रचितानि संस्कृतकाव्यानि समस्ते विश्वे सम्मानितानि सन्ति।

भारतीया संस्कृतिः संस्कृतभाषायामेव सुरक्षिता अस्ति। संस्कृतं तु अस्माकं संस्कृतेः आत्मा अस्ति। अस्माकं धर्मः, अस्माकम् इतिहासः, अस्माकं भूतं-भविष्यञ्च सर्वमपि संस्कृतेन सम्बद्धं वर्तते। अस्माकं सर्वाणि आदर्शवाक्यानि ‘सत्यमेव जयते’ अहिंसा परमो धर्मः, सर्वाणि संस्कृतभाषायामेव सन्ति । अस्यामेव भाषायां अस्माकं सर्वे संस्काराः सम्पन्नाः भवन्ति। – संस्कृतम् इति प्राचीना भाषा वर्तते । इयं च हिन्दी भाषायाः प्रमातामही अस्ति । संस्कृतम् इति शब्दस्य अर्थः परिष्कृतं

शुद्धम्, सम्यक् प्रकारेण कृतम् इति भवति। देववाणी, गीर्वाणवाणी, देवभाषा एते संस्कृतस्य पर्यायवाचिन: शब्दाः सन्ति। अस्माकं प्राचीनाः ऋषयः मुनयश्च अस्यामेव निजग्रन्थान् अलिखन्। वेदाः, उपनिषदः, स्मृतयः रामायणं, महाभारतं संस्कृतभाषायाम् एव सन्ति। गुप्त-साम्राज्य-काले संस्कृतं राज्यभाषा आसीत्। विदेशेषु अद्यापि संस्कृतस्य गौरवं वर्तते। संस्कृतस्य प्रचारेण एव हिन्दी-साहित्यस्य उत्तरोत्तरं वृद्धिः भवति।

इयं भाषा अतिमधुरा सरसा च अस्ति। प्राचीनकाले संस्कृतभाषा लोकव्यवहारस्य भाषा, आसीत्। जनाः संस्कृतभाषायामेव वार्तालापं कुर्वन्ति स्म। राजकार्याणि अपि संस्कृतभाषायामेव भवन्ति स्म । सम्प्रति अस्या भाषायाः उपेक्षा भवति। केचन जनाः इमां मृतभाषां कथयन्ति, तेषां विचारः अनुचितः । संस्कृतभाषा तु जीवन्तभाषा अस्ति। भारतीय भाषाणां समृद्धिः संस्कृतभाषां विना न भवितुं शक्नोति।

इयं वैज्ञानिकी समृद्धा च भाषा अस्ति । विशालः अस्य शब्दकोषः । एवं संस्कृतस्य धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्ट्या परमं महत्त्वमस्ति।

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6. दायजस्य कुप्रथा
‘दहेज’ इति हिन्दी-शब्दस्य दायजः इति संस्कृतरूपो वर्तते । भारते अस्य दायजस्य प्रथा प्राचीना अस्ति। एतस्य दायजस्य विशेषः सम्बन्धः कन्यादानात् वर्तते। प्राचीनकाले जनाः कन्यादानेन सह वराय रूप्यकाणि, आभूषणानि, अन्यानि च बहूनि वस्तूनि दक्षिणारूपेण यच्छन्ति स्म। तस्मिन् समये दायजस्य किमपि बन्धनं लोभो वा नासीत्। जनाः हर्षेण स्व आर्थिकस्थित्यनुसारं कन्यायै यच्छन्ति स्म । अस्य दायजस्य एतदपि लक्ष्यमासीत्, यत् कन्या स्व-श्वसुरालये किमपि कष्टं नानुभवेत् ।

परमद्य तु विवाहसमये एव वरपक्षकाः जनाः रूप्यकाणि वस्तूनि च याचन्ते। अद्य इयं प्रथा तिरस्करणीया संजाता। अद्यत्वे भारतीयसमाजे इयं कुप्रथा प्रतिदिनं वर्धते। इयं प्रथा अद्य हिन्दूनाम् समाजे कलंकरूपा वर्तते।

अस्मिन् युगे तु सर्वासु जातिषु इयं कुप्रथा प्रचलिता अस्ति । अद्य कन्यानाम् जनकाः अनया कुप्रथया भयभीताः त्रस्ताः च सन्ति । अस्याः कुप्रथायाः कारणात् नवोढा: करुणचीत्कारं कुर्वन्ति। अतः साम्प्रतम् इयं कुप्रथा भारतीयसमाजाय अभिशापः वर्तते।

अद्यत्वे यदि काचित् कन्या विवाह-समये दायजस्य पुष्कलां सामग्री न आनयति। तदा वरपक्षीयाः ताम् कन्याम् घृणादृष्ट्या तिरस्काररूपेण च पश्यन्ति । सा कन्या च विविधैः दण्डैः दण्ड्यते, दण्डम् असहमानाः कन्याः आत्महत्याम् कुर्वन्ति। अहो! धिक्इमाम् कुप्रथाम्। या समाजम् अवनतेः गर्ने प्रक्षिपति।

अद्य समाजस्य, युवकानां युवतीनाम् च सहयोगस्य आवश्यकता अस्ति। यदि अद्य युवकाः युवत्यश्च मिलित्वा प्रतिज्ञाम् कुर्युः यत् दायजं न याचितव्यम् न च गृहे नेतव्यम्; तदा एव एषा कुप्रथा विनष्टा भवेत्।

यावत्कालं समाजे जागृतिः नैव आगच्छति, तावत् अस्याः कुप्रथायाः समूलः विनाशः असंभवः वर्तते। अद्य इमाम् प्रथाम् समाजात् अपनेतुम् सहयोगस्य परमावश्यकता अस्ति।

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7. पुस्तकालयः
पुस्तकानाम् आलयः इति पुस्तकालयः। सर्वेषां पठनाय यत्र पुस्तकानां संग्रहः क्रियते पुस्तकालयः कथ्यते। पुस्तकालयेन शिक्षायाः अत्यधिकम् प्रचारः भवति। सम्प्रति
स्थान-स्थाने जनतायाः राज्यस्य च पुस्तकालयाः स्थापिताः सन्ति । पुस्तकालये विभिन्नविषयाणां बहूनि पुस्तकानि भवन्ति। सर्वेषां पठने समानः अधिकारः भवति। स्वल्पेन व्ययेन छात्राः साधारणाः जनाः वा तत्र विविधविषयाणां ज्ञानं प्राप्तुं शक्नुवन्ति। पुस्तकालये दैनिक-पत्राणि, पाक्षिक-पत्राणि, मासिक-पत्राणि अपि च भवन्ति। ये जनाः तानि क्रेतुं न शक्नुवन्ति ते तत्र पठितुं शक्नुवन्ति। अद्य तु जनेषु शिक्षाप्रसाराय ग्रामेषु पुस्तकालयानाम् आवश्यकता वर्तते।

अस्माकं महाविद्यालयस्य पुस्तकालयः सुमहान् वर्तते। अत्र अनेकानि अनुपलब्धानि पुस्तकानि अपि विद्यन्ते। अस्माकं पुस्तकालये महती सुव्यवस्था अस्ति। तत्र शान्तेः वातावरणं पूर्णम् अनुशासनं च भवति। प्रातः निर्धारिते समये पुस्तकालयः

7. पुस्तकालय
पुस्तकानाम् उद्घाटितो भवति, निश्चिते सायं समये च तस्य पिधानम् भवति। एवं पुस्तकालयानां महती उपयोगिता वर्तते। वस्तुतः साम्प्रतिके युगे प्रत्येकं गृहे एक: लघुः पुस्तकालय: उपयोगी वर्तते ।

8. स्वतन्त्रतादिवसः
अद्य अगस्तमासस्य पञ्चदशतारिका अस्ति। अस्मिन् दिवसे एव भारतदेश: आंगलशासनात् स्वतन्त्रः अभवत्। अत एव एषः दिवसः भारतदेशे ‘स्वतन्त्रतादिवसः’ इति रूपेण सोल्लासं मान्यते। अस्मिन् दिवसे भारतीयाः राजनैतिकरूपेण स्वतन्त्रतां प्राप्नुवन्तः। एषा स्वतन्त्रता सरलतया न अलभत, अपितु असंख्याः देशभक्ताः आंगलशासकानां भीषणान् अत्याचारान् सहमानाः स्वबलिदानं कृत्वा एतां स्वतन्त्राताम् अलभन्त। असंख्यैः देशभक्तैः स्वतन्त्रतायै आंगल-कारागारेषु स्वयुवावस्थां जीर्णीकृतवन्तः । असंख्यैः देशभक्तैः स्वरक्तेन स्वतन्त्रतायज्ञं कृतवन्तः। ते आत्मानम् आहुतवन्तः। तदा वयं स्वतन्त्रताफलं प्राप्नुवन्तः।

अद्य वयं स्वतन्त्राः स्मः, परन्तु तां बिभीषिकां न जानीमः या अस्माकं पूर्वजैः अनुभूता। नैव च तां सवृत्तिं ध्यायामः, यया प्रेरिताः ते निःस्वार्थभावेन स्वप्राणदानं कृतवन्तः। अद्य नासौ महात्मा गांधी, नासौ सुभाषः, चन्द्रेशखरः, बिस्मिलः, वा दृश्यते येभ्यः भारतदेशः एव सर्वोपरि आसीत्। अद्य तु वयं सर्वथा स्वार्थलिप्ताः अभवाम, न कथमपि राष्ट्रहितं पश्यामः। अस्मभ्यं तु आत्महितम् एव सर्वोपरि अभवत्। देशः गच्छतु भ्राष्ट्र, कोऽपि राजनेता तस्य कृते चिन्तातुरः न दृश्यते। राजनेतृभ्यः राजनीतिः अपि व्यापारः अभवत्। लोकहितं तेषां वचनेषु एव दृष्टिगोचरं भवति, न वास्तविकव्यवहारे। भ्रष्टाचारः सर्वेषु विभागेषु व्याप्तः ।

तेषां कृते स्वतन्त्रतायाः अर्थः भ्रष्टाचारं कर्तुं स्वतन्त्रता एव प्रतीयते। परन्तु ते एतत् तथ्यं विस्मरन्ति यदि देशः एव स्वतन्त्रः न भविष्यति, देशः एव प्रतिवेशिराष्ट्रेभ्यः भौगोलिकरूपेण, आर्थिकरूपेण, राजनैतिकरूपेण च सुरक्षितः आत्मनिर्भरः च न भविष्यति तदा भ्रष्टाचाराय अपि अवकाशः न भविष्यति। अतः अस्माभिः स्वतन्त्रतादिवसे काँश्चन लोकाकर्षकान् समारोहान् एव न सम्पाद्य वस्तुतः प्रत्येकं भारतीये देशनिष्ठायाः देशभक्तेः देशपरायणतायाः भाव: यथा उद्दीप्तः स्यात् तथा आचरणीयम्; येन अस्माकं देशस्य स्वतन्त्रता शाश्वती भवेत्। जयतु भारतम्, जयतु भारतदेशः ।

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9. महात्मा गांधी (प्रियः राष्ट्रनेता)
‘महात्मा’, ‘बापू’ इति लोके प्रसिद्धस्य मोहनदासगान्धि महोदयस्य नाम कस्य न विदितम् ? स जगद्वन्दनीयेषु महापुरुषेषु सर्वश्रेष्ठः नेता आसीत्। चिरकालाद् दासत्वं गतस्य भारतस्य पुनरपि स्वतन्त्रतायाः नायक: अयमेवासीत्। अनेन सत्यस्य अहिंसायाश्च बलेन पराधीना भारतभूमिः स्वतन्त्रीकृतम।

अयं महापुरुषः 1869 तमे ख्रीष्टाब्दे गुजरातप्रान्तस्य पोरबन्दर-नामके नगरे वणिक्-वंशे अजायत। अस्य पिता कर्मचन्दगान्धी माता च पुतलीबाई आसीत्। जन्मजात-संस्कारैः प्रभावितः अयं बाल: बाल्यादेव सत्यवादी, ईश्वरभक्तश्चासीत्। अस्य विवाहः त्रयोदशवर्षे कस्तूरबा कन्यया सह संजातः । विवाहानन्तरं दशमकक्षा उत्तीर्य अयं बैरिस्ट्री शिक्षाग्रहणार्थं इंगलैंडदेशं गतः । तत्र सः स्वाध्यायं कुर्वन् ‘बाईबल’ धर्मपुस्तकं श्रीमद्भगवद्गीतां च अपि अधीतवान्। स्वदेशम् आगत्य अयं वाक्कीलकार्य (वकालत) प्रारभत । गान्धी एकदा अफ्रीकादेशं गतः। तत्र भारतीयानां दुर्दशा आसीत्। भारतीयानां ईदृशम् अपमानम् अवलोक्य तेन तत्प्रतिकारया नेटालप्रदेशे ‘इण्डियन कांग्रेस’ (भारतीय महासभा) नाम्नी संस्था संस्थापिता। अयं गान्धिनः राजनीतौ प्रथमः प्रवेशः आसीत्।।

अफ्रीकातः निवृत्य भारतीय-कांग्रेस-सभायां-सम्मिलितो भूत्वा गान्धी ‘असहयोग-आन्दोलनम्’ अचालयत् । एतस्मिन् विषये गान्धिनः ‘डांडी’ यात्रा इतिहासे सुप्रसिद्धा विद्यते। 1942 तमे संवत्सरे ‘भारत छोड़ो’ इति आन्दोलनं तेन चालितं, यत् कारणात् गान्धी आंग्लैः कारागारे पातितः। गांधिनः सत्याग्रहेण पराधीनं भारतं 1947 तमे संवत्सरे स्वतन्त्रम् अभवत्।

गान्धिनः सत्याग्रह-अहिंसाबलेन या स्वतन्त्रता अस्माभिः प्राप्ता, सा मानवेतिहासस्य अद्वितीया घटना वर्तते। राजनीतिककार्येभ्यः अतिरिक्तम्, अस्पृश्यता निवारणाय, हरिजनोद्धाराय, शिक्षाप्रसाराय, खादीग्रामोद्योगप्रवर्तनाय, वैदेशिकवस्तु परित्यागाय, सामाजिक कुरीतीनां निवारणाय या क्रान्तिः गान्धिना विहिता, सा विश्वेतिहासस्य पृष्ठेषु स्वर्णाक्षरेषु लिखितास्ति। स्वल्प-कायोऽपि दिव्यशक्तिसम्पन्नः नूतनयुप्रवर्तकश्च गान्धी आसीत्। अस्मिन् भयावहे परमाणु-युगे अपि तस्य शिक्षाः सत्याहिंसा-सिद्धान्ताश्च मानवमात्रस्य कल्याणं विधातुं समर्थाः सन्ति।

10. स्वामी विवेकानन्दः
भारतभूमिः ऋषिमहर्षीणां सन्तमहात्मनां देशभक्तानां वीराणां कलाविदां विदुषां च जन्मस्थली अस्ति। अस्याम् एव पुण्यभूमौ स्वामी विवेकानन्दः जन्म अलभत। एषः महापुरुषः रामकृष्णपरमहंसस्य सुयोग्यः शिष्यः आसीत्। विवेकानन्दस्य गृहनाम नरेन्द्रनाथदत्तः आसीत्। अस्य जन्म 12 जनवरी 1863 ख्रीष्टाब्दे कलकत्तानगरे अभवत् । अस्य पिता श्रीविश्वनाथदत्त: पाश्चात्य-सभ्यतायाः पोषकः आसीत्। सः च स्वपुत्रं नरेन्द्रम् अपि तादृशः एव भवितुम् इच्छति स्म। नरेन्द्रः जन्मना एव परममेधावी प्रतिभासम्पन्नः तार्किकः च आसीत्। बाल्यकाले एव अस्य पिता परलोकं गतवान्। पितुः मृत्योः पश्चात् नरेन्द्रः रामकृष्णपरमहंस्य शिष्यतां प्राप्तवान्। सद्यः एव गुरुमुखात् वेदान्तशिक्षां प्राप्य सः संन्यासदीक्षां गृहीतवान्। संन्यासी भूत्वा च स: ‘स्वामी विवेकानन्दः’ इति नाम्ना प्रसिद्धः अभवत्।

स्वामी विवेकानन्दः भारतीयसंस्कृतेः वेदान्तस्य च समर्थकः आसीत् । सः सम्पूर्णभारतदेशस्य पदयात्रां कृत्वा जनजागरणं कृतवान्। सः 1893 ख्रीष्टाब्दे अमेरिकादेशस्य शिकागो-नगरे विश्वधर्मपरिषद्-सम्मेलने भारतस्य प्रतिनिधित्वम् अकरोत् । तत्र सः ओजस्वि-भाषणम् अकरोत् स्ववक्तृतामाध्यमेन च सर्वान् मन्त्रामुग्धान् अकरोत् । स्वामी विवेकानन्दः वर्षत्रयं यावत् अमेरिकादेशे अवसत्, तत्र वेदान्तप्रचारं च अकरोत्। विवेकानन्दस्य दृढ़ विश्वासः आसीत्-“अध्यात्मविद्यां भारतीयदर्शनं च विना संसारः अनाथः इत्र अस्ति”। सः अमेरिकादेशात् भारतम् आगत्य रामकृष्णमिशनसंस्थायाः स्थापनाम् अकरोत् । 4 जुलाई 1902 ख्रीष्टाब्दे एषः सांस्कृतिक-गुरुः महासमाधौ लीनः अभवत् ।

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11. मम प्रियः कविः (कालिदासः)
संस्कृतसाहित्यस्य रचयितारः बहवः कवयः सन्ति। परं तेषु सर्वेषु कविषु कालिदासः मम प्रियः कविः अस्ति। एषः कविः न केवलं भारते एव प्रसिद्धः अस्ति, अपितु सर्वस्मिन् विश्व प्रसिद्धः अस्ति। आंग्लदेशवासिनः तु एनं भारतस्य शेक्सपीयर् इति कथयन्ति। जर्मनवासिनश्च कालिदासम् विश्वकविम् स्वीकुर्वन्ति।

एषः कविः कदा कुत्र च अजायत एतत् सम्यक् न ज्ञायते। परम् एतत् श्रूयते, यदयं महाराजस्य विक्रमादित्यस्य नवरत्नेषु सवश्रेष्ठः आसीत्। अस्य महाकवेः विषये एका जनश्रुतिः श्रूयते । यदयं प्रारम्भे महामूर्खः आसीत्। तस्य विवाहः छलेन विदुष्या राजकन्यया सह अभवत्। पश्चात् अयं कालिंदेवीं ध्यात्वा अपठत् पण्डितश्च अभवत्।

कालिदासः संस्कृत-भाषायाः भारतस्य कवीनां च गौरवमस्ति। अस्य वैशिष्ट्यम्, व्यक्तित्वं कवित्वं च नाटकेषु गीतिकाव्येषु, महाकाव्येषु च प्रस्फुटितम् । मम प्रियकवेः कालिदासस्य चत्वारि काव्यानि, त्रीणि नाटकानि च उपलभन्ते। नाटकेषु अभिज्ञानशाकुन्तलं अस्य कवेः सर्वोत्तमं नाटकम् अस्ति।

जर्मनकविः गेटेमहोदयः-अभिज्ञानशाकुन्तलं मुक्तकण्ठेन प्राशंसत। अस्य काव्येषु अलंकाराणाम् प्रयोगः बाहुल्येन दृश्यते । उपमालंकारः अस्य कवेः प्रियः अलंकारः वर्तते। अस्य विषये कथितमस्ति

“उपमा कालिदासस्य” कालिदासेन रचितानि काव्यानि, नाटकानि च पाठकानाम् चेतांसि हरन्ति, आनन्दयन्ति च। अतः संस्कृतसाहित्यस्य प्रसिद्धः अयं कविः मम प्रियः कविरस्ति।

12. मम प्रियं पुस्तकम् (रामायणम्)
संस्कृत-साहित्ये बहूनि पुस्तकानि सन्ति। परं तेषु सर्वेषु पुस्तकेषु ‘रामायणम्’ मम प्रियम् पुस्तकमस्ति। एकदा आदिकवि: वाल्मीकिः तमसा-नद्याम् स्नात्वा स्व-आश्रमम् आगच्छत्। सः मार्गे केनचित् व्याधेन क्रौञ्चयुगलात् एकम् पक्षिणम् बाणेन विद्धम् अपश्यत्। तदा तस्य आदिकवे: वाल्मीके: मुखात् अयं श्लोकः निस्सृत:

मा निषाद ! प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौञ्च-मिथुनाद् एकमवधी: काममोहितम्॥

अस्य श्लोकस्य निर्माणम् दृष्ट्वा कविः स्वयं चकितोऽभवत्। तदनन्तरं स: रामायणम् (रामचरितम्) लिखितवान्। तत् एव रामायणम् महाकाव्यम् मम प्रियं पुस्तकं वर्तते ।

इदं पुस्तकं संस्कृत-साहित्यस्य आदिकाव्यम् अस्ति। अस्य रचनाकालं पुरातत्व-गवेषकाः बौद्ध-कालादपि प्राचीनं मन्यन्ते। अस्य पुस्तकस्य कथानक: रामचरित्रम् अस्ति।

अस्मिन् महाकाव्ये रघुवंशीयस्य रामस्य जन्मनः आरभ्य निर्वाण-पर्यन्तं सम्पूर्णकथा विद्यते। रामायणे अतीव सरलसंस्कृतस्य प्रयोगः अस्ति। यः श्रोतृणाम् मनांसि हरति। अलंकार-शैली अपि अतीव रमणीया अस्ति ।

भगवतः श्री रामस्य कथा अस्मान् सर्वान् शिक्षयति
1. यत् जीवने रामादिवत् वर्तितब्बम, रावणादिवत्।
2. जीवने अन्यायस्य विरोध: कर्त्तव्यः।
3. संसारे जनाः रामवत् पितृभक्ताः, लक्ष्मणवत् भ्रातृभक्ताः, हनुमतः तुल्यं च स्वामी-भक्ताः भवेयः।
4. सर्वाः नार्यः सीसवत् पतिव्रताः धर्मपरायणाः भवन्तु।
5. यथा रामेण स्वधर्म-रक्षणार्थं रावण-कुम्भकर्ण-मेघनादादीनां वधः कृतः पत्नीरक्षाव्रतं च पालितम्, तथैव अस्माभिः स्वधर्मरक्षायै, स्व-भार्या-रक्षायै च शत्रवः हन्तव्याः धर्मस्य च स्थापना कर्तव्या।
वस्तुतः रामायणं न केवलं धार्मिकम् एव पुस्तकम्, अपितु भारतीय-सभ्यतायाः संस्कृतेश्च प्रतीकमपि अस्ति । अत एव रामायणस्य विषये संस्कृतस्य केनचित् कविना एतत् सत्यमेव लिखितमस्ति
मर्यादां सभ्यतां लोके शिक्षयत् संस्कृति तथा।
रामायणं महाकाव्यं शिवं सत्यं च सुन्दरम्॥
अथ च
यावत् स्थास्यन्ति गिरयः नधश्च महीलले।
तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचलिष्यति ।

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13. स्वच्छतायाः महत्त्वम्
स्वच्छतायाः स्वास्थ्येन सह घनिष्ठः सम्बन्धः अस्ति-आरोग्यस्य मूलं स्वच्छता एव अस्ति। यत्र मलिनता राजते तत्र रोगाः अपि स्वयमेव आगच्छन्ति। स्वच्छतायाः क्षेत्रम् अतिविस्तृतम् अस्ति। सर्वप्रथमं शारीरिक-स्वच्छता अपेक्षिता भवति। प्रतिदिनं नियमपूर्वकं दन्तधावनम्, स्नानम्, स्वच्छवस्त्र-धारणम्, भोजनात, पूर्वं हस्तप्रक्षालनम् इत्यादीनी शारीरिक-स्वच्छतायाः अङ्गानि सन्ति। स्वच्छतया मनुष्यः सुरूपः भवति, सर्वे तेन सह स्थातुम् आलपितुं व्यवहर्तुं च इच्छन्ति।

दुर्गन्धियुक्तं मलिनमनुष्यं रोगकारणं मत्वा सर्वे तस्मात् दूरे एव तिष्ठन्ति। स्वच्छतया मानवतायाः विकासः भवति। यतः स्वच्छे सति कोऽपि जन: कमपि घृणां न करोति। माता अपि मलिनं. शिशुं कष्टेन स्पृशति, अतएव तं सर्वथा स्वच्छं कर्तुं यत्नशीला दृश्यते। स्वस्थ-शरीरे एव स्वस्थं मनः तिष्ठति। मलिनमनसि मलिनविचाराः एव उद्भवन्ति, मलिनविचारैः च मनुष्यः मलिनानि कर्माणि करोति। मलिनकर्माणं जनं च कोऽपि आदरेण न पश्यति।

अतः सर्वेषाम् आदरपात्रं मानसिकरूपेण च । स्वस्थः भवितुम् अपि शारीरिक-स्वच्छता आवश्यकी अस्ति। शारीरिक-स्वच्छतायाः अनन्तरं स्थानिक स्वच्छता अपि ध्यातव्या। स्थानिक-स्वच्छतायां प्रतिदिनं गृहस्य स्वच्छता तु…. आवश्यकी अस्ति एव, गृहस्य निकटस्थ-मार्गाः अपि च स्वच्छाः भवितव्याः । मल-मूत्रादिकं शौचालयेषु एव कर्तव्यम्। यदि इतस्ततः अवकरा: विकरिताः भवन्ति तर्हि वसतिषु मशक-मक्षिकादयः कीटा: जायन्ते सम्पूर्ण वातावरणं च दुर्गन्धेन

परिपूर्णं भवति। तेन च हैजा-मलेरिया-प्लेग-चेचक-प्रभृतयः संक्रामक रोगाः जायन्ते। केवलम् औषध-सेचनेन अथवा औषध-सेवनेन एव रोगाः विनष्टाः न भवन्ति अपितु रोगाणां मूलकारणस्य अस्वच्छतायाः निवारणम् अपि परमावश्यकम् अस्ति ।

अतः यदि वयम् इच्छामः यत् सर्वेषां प्रेमपात्राणि भवेम, आदरपात्राणि भवेम, शारीरिकरूपेण मानसिकरूपेण रोगरहिताः स्वस्थाः च भवेम, कोऽपि अस्मान् घृणया न व्यवहरेत् तर्हि अद्य एव स्वच्छतायाः महत्त्वं जानन्तः सर्वविध-स्वच्छाः भवितुं प्रयत्नं कुर्वेम।

14. महाविद्यालयस्य वार्षिकोत्सवः
मम महाविद्यलये अनेके उत्सवाः भवन्ति, परं तेषु वार्षिकोत्सवः सर्वाधिकः महत्त्वपूर्णः भवति। अयं पुरस्कारवितरणोत्सवः भवति। सम्पूर्णवर्षस्य गतिविधिः अस्मिन् उत्सवे प्रस्तूयते। पठने, क्रीडने, भाषणे, सांस्कृतिक-कार्यकलापे ये विशिष्टाः छात्राः भवन्ति, ते अस्मिन्नेव दिने पुरस्कार प्राप्नुवन्ति।

वार्षिक उत्सवः परमानन्दायकः भवति। छात्राः महाविद्यालस्य वार्षिकोत्सवस्य उत्सुकतया प्रतीक्षां कुर्वन्ति। अस्मिन् शुभदिने छात्राः उज्ज्वलानि वस्त्राणि धारयन्ति, प्रसन्नाश्च दृश्यन्ते।

अस्मांक महाविद्यालस्य वार्षिकत्सवः प्रतिवर्ष मार्चमासे भवति। एकः विशिष्टः महानुभावः अस्मिन् दिने आमन्त्र्यते। नगरस्य सुप्रतिष्ठिताः नागरिकाः अपि सम्मिलिताः भवन्ति। सम्पूर्णः मण्डपः सुसज्जितः भवति। विद्यार्थिषु अध्यापकेषु नवोत्साहः स्फूर्तिश्च भवति। अभ्यागतानां सम्मुखे विद्यालयस्य छात्राः मनोञ्जकं कार्यक्रम प्रस्तुवन्ति। आचार्यः महाविद्यालयस्य वार्षिकं प्रतिवेदनं (रिपोर्ट) पठति। मुख्यः अतिथिः सर्वमपि कार्यक्रमं दत्तावधानः पश्यति। मुख्यातिथि: विशिष्टेभ्यः छात्रेभ्यः अध्यापकेभ्यश्च पुरस्कारान् ददाति।।

अस्मिन् वर्षे अस्माकं महाविद्यालयस्य वार्षिकोत्सवे भारतस्य शिक्षामन्त्री आगच्छत्। तस्य अभिनन्दनम् अस्माकं छात्राः स्वागत-गीतेन अकुर्वन्। जनैः तस्य सम्मान करतल-ध्वनिना कृतम्। सः स्व-अध्यक्षीयभाषणे महाविद्यालयस्य अनुशासनस्य महतीं प्रशंसाम् अकरोत्। शिक्षा-महत्त्व-विषये च सारगर्भितं भाषणम् अयच्छत्। सः प्रसन्नो भूत्वा महाविद्यालयस्य विकासाय राजकोषतः पंचाशत्सहस्राणि रुप्यकाणि अपि अददात्।

अन्ते च आचार्यः सर्वेषां धन्यवादम् अकरोत्। ‘जनगणमन’ इति राष्ट्रीयगीतेन सह कार्यक्रमः समाप्तः अभवत्। सर्वे अभ्यागताः मुख्यातिथिना सह जलपानम् अकुर्वन्। एवं विद्यालयस्य वार्षिकोत्सवः निर्विघ्नं सम्पन्नः अभवत्।

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15. गणतन्त्र-दिवसः
गणतन्त्र-दिवस: भारतदेशस्य राष्ट्रीय पर्व अस्ति। एतत् पर्व प्रतिवर्ष जनवरीमासस्य 26 तारिकायां सोत्साहं मान्यते। 26 जनवरी 1950 ख्रीष्टाब्दः भारतीये इतिहासे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दिनम् अस्ति। अस्मिन् दिवसे स्वतन्त्र-भारतस्य प्रथम संविधानं प्रभावितम् अभवत्। अस्मिन् दिने एव भारतम् संप्रभुता-सम्पन्न-रज्यरूपेण प्रतिष्ठितम् अभवत्। ततः आरभ्य अस्मिन् एव उपलक्ष्ये प्रतिवर्षं सम्पूर्ण-भारतदेशे राष्ट्रियः अवकाशः भवति गणतन्त्रदिवसः च मान्यते। विद्यालयेषु महाविद्यालयेषु च प्रतियोगिताः समायोज्यन्ते। आधिकारिकरूपेण प्रतिनगरम् ध्वजारोहणं गणतन्त्रदिवस-समारोहाः च समायोजिताः भवन्ति। समारोहेषु भारतस्य स्वतन्त्रतायै सुरक्षायै च बलिदानिनां वीराणां श्रद्धापूर्वकं स्मरणं क्रियते।

अस्मिन् दिवसे भारत-देशस्य राजधान्यां रक्तदुर्गे गणतन्त्रदिवस-समारोहः भव्यरूपेरण समायोज्यते। राष्ट्रपतिः रक्तदुर्गात् राष्ट्राय सन्देशं ददाति। विभिन्नराज्यानां सांस्कृतिकं प्रदर्शन भवति। थलसेना-नौसेना-वायुसेनानां च भव्यगणवेषे शौर्यप्रदर्शनं भवति । युद्धेषु असाधारणसाहसाय वीरतायै च सैनिकेभ्यः पदकानि पुरस्काराणि च प्रदीयन्ते। विविधक्षेत्रेषु विशिष्टयोगदानाय कलाकारेभ्य: नागरिकेभ्यः अपि पदकानि पुरस्काराणि च प्रदीयन्ते। अद्भुत-साहस-प्रदर्शनाय प्रत्येक राज्यस्य बालक-बालिकाः पुरस्कृताः भवन्ति। सम्पूर्णदृश्यस्य प्रदर्शनस्य च प्रसारणं आकाशवाण्या दूरदर्शनेन च भवति। लक्षाधिकाः जनाः सम्पूर्णदृश्यस्य प्रदर्शनस्य च साक्षात् अवलोकनाय रक्तदुर्गं गच्छन्ति। अस्मिन् दिवसे सम्पूर्णदशस्य वातावरणम् अतीव उत्साहपूर्णं भवति।

16. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः
अद्यत्वे नारीणां दशा शोभना न वर्तते। तासाम् उपरि अनवरतं क्रियमाणैः अत्याचारैः समाचारपत्रपृष्ठानि प्रतिदिनं रञ्जितानि वर्तन्ते। तासाम् आदर: न क्रियते, अवहेलना क्रियते। कारणमस्ति यत् सर्वत्र राक्षसाः एव वसन्ति, न देवाः । देवाः तु नारीः पूजयन्ति आनन्देन वसन्ति च। कुत्र वसतिः आर्याणां कुत्र च अनार्याणां वसतिः अस्ति इत्यस्य निकषः तत्रत्यानां नारीणां दशा एव अस्ति। यत्र ताः पत्युः परिवारस्य च आदरं लभमाना आनन्दम् अनुभवन्ति तत्र वासः देवतानाम्, यत्र च वैपरीत्यं तत्र दैत्यानां वासः इति स्पष्टम्।।

नारी शरीरेण कोमला, स्वभावेन उदारा चरित्रेण च पुरुषापेक्षया अत्युदात्ता भवति। तस्याः सर्वं दिनं परिवारचिन्तया सेवया, शुश्रूषया च व्यत्येति। सा स्वयं क्षुधां पिपासां च सोदवा सर्वेषां क्षुधां पिपासां च शमयितुं यतते। परन्तु सा एतस्य प्रतिकारे सर्वस्य उपेक्षायाः एव पात्रं भवति। सभ्यसमाजे नारीणां दशा एतादृशी न भवति। सा तत्र साम्राज्ञी इव तिष्ठति। ‘न गृहं, गृहमित्याहुः गृहिणी गृहमित्युच्यते’ इत्यस्य भावः नार्याः गृहे उच्चस्थितिः स्यादिति। विद्वांसो हि देवाः । पुरुषाः विद्वांसः तदैव भवितुम् अर्हन्ति यदा तेषां माता, गृहिणी विदुषी च स्याताम्। विद्वांसः एव जानन्ति यत्कुले नार्याः प्रतिष्ठा अत्यपेक्षिता अस्ति। अतः मनुना सत्यमेव उक्तम्
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”।

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HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

पाठयपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
संतुलित व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यापार शेष वस्तुओं के आयात व निर्यात का लेखा होता है अर्थात् व्यापार शेष में केवल दृश्य मदों को सम्मिलित किया जाता है। इसमें सेवाओं; जैसे कि जहाज़रानी, बीमा, बैंकिंग, ब्याज एवं लाभांश भुगतान और पर्यटकों द्वारा व्यय आदि को सम्मिलित नहीं किया जाता। चालू खाते में वस्तुओं और सेवाओं के आयात और निर्यात और एक-पक्षीय हस्तांतरणों का ब्यौरा रखा जाता है। व्यापार शेष के निर्धारण में केवल दृश्य मदों पर ही विचार किया जाता है जबकि भुगतान शेष के चालू खाते में निम्नलिखित मदों को सम्मिलित किया जाता है

  1. वस्तुओं का आयात-निर्यात (दृश्य मदें)
  2. सेवाओं का आयात-निर्यात (अदृश्य मदें)
  3. एक-पक्षीय हस्तांतरण।

इस प्रकार व्यापार शेष एक संकुचित अवधारणा है और भुगतान शेष के चालू खाते का एक भाग है।

प्रश्न 2.
आधिकारिक आरक्षित निधि का लेन-देन क्या है? अदायगी-संतुलन में इनके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आधिकारिक आरक्षित निधि (Official Reserve Transactions) के लेन-देन से अभिप्राय उन लेन-देनों से है जो विदेशी विनिमय बाज़ार में विदेशी मुद्रा के क्रय-विक्रय से संबंधित है। आधिकारिक आरक्षित निधि के लेन-देन भुगतान शेष की समस्या को हल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। घाटे की स्थिति में एक देश की सरकार विदेशी बाज़ार में विदेशी मुद्रा की बिक्री कर सकती है, जिसके फलस्वरूप विदेशी विनिमय की आरक्षित निधि कम हो जाएगी।

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प्रश्न 3.
मौद्रिक विनिमय दर और वास्तविक विनिमय दर में भेद कीजिए। यदि आपको घरेलू वस्तु अथवा विदेशी वस्तुओं के बीच किसी को खरीदने का निर्णय करना हो, तो कौन-सी दर अधिक प्रासंगिक होगी?
उत्तर:
मौद्रिक विनिमय दर से अभिप्राय देशी मुद्रा के रूप में विदेशी मुद्रा की एक इकाई की कीमत से है। इसके विपरीत, वास्तविक विनिमय दर देशी वस्तु के रूप में विदेशी वस्तुओं की सापेक्ष कीमत होती है। वास्तविक विनिमय दर मौद्रिक विनिमय दर के बराबर होती है, जोकि विदेशी कीमत स्तर में देशी कीमत स्तर से भाग देकर प्राप्त की जाती है। वास्तविक विनिमय दर से किसी देश की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का मूल्यांकन होता है। वास्तविक विनिमय दर को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है-
वास्तविक विनिमय दर = \(\frac{e P_{f}}{P}\)
यहाँ,
P = देश का कीमत स्तर
Pf = विदेशी कीमत स्तर
e = मौद्रिक विनिमय दर इस प्रकार हम देखते हैं कि मौद्रिक विनिमय दर चालू कीमतों पर आधारित है, जबकि वास्तविक विनिमय दर स्थिर कीमतों पर आधारित है। यदि हमें घरेलू वस्तु अथवा विदेशी वस्तुओं के बीच किसी को खरीदने का निर्णय करना है तो वास्तविक विनिमय दर अधिक प्रासंगिक होगी।

प्रश्न 4.
यदि 1 रुपए की कीमत 1.25 येन है और जापान में कीमत स्तर 3 हो तथा भारत में 1.2 हो, तो भारत और जापान के बीच बास्तविक विनिमय दर की गणना कीजिए (जापानी वस्तु की कीमत भारतीय वस्तु के संदर्भ में)।
संकेत-रुपए में येन की कीमत के रूप में मौद्रिक विनिमय दर को पहले ज्ञात कीजिए।
हल:
वास्तविक विनिमय दर = \(\frac{e P_{f}}{P}\)
P= देश का कीमत स्तर = 1.2
Pf = विदेशी कीमत स्तर = 3
e = मौद्रिक विनिमय दर
= \(\frac { 1 }{ 1.25 }\)
= 0.8
वास्तविक विनिमय दर = \(\frac{0.8 \times 3}{1.2}\) = 2.4
= 2 उत्तर

प्रश्न 5.
स्वचालित युक्ति की व्याख्या कीजिए जिसके द्वारा स्वर्णमान के अंतर्गत अदायगी-संतुलन प्राप्त किया जाता था।
उत्तर:
स्वर्णमान के अंतर्गत सभी करेंसियाँ सोने के रूप में परिभाषित की जाती थीं। प्रत्येक देश एक निश्चित कीमत पर अपनी मुद्रा को मुफ़्त रूप से परिवर्तनीयता की गारंटी देने के लिए प्रतिबद्ध था। विनिमय दरों का निर्धारण सोने के रूप में उस मुद्रा के मूल्य द्वारा होता था जहाँ सोने की मुद्रा होती थी। दरों में एक ऊपरी सीमा और निचली सीमा के बीच उतार-चढ़ाव होता रहता था। अधिकृत समता को बनाए रखने के लिए प्रत्येक देश को सोने के पर्याप्त स्टॉक रखने की आवश्यकता होती थी। इस प्रकार स्वर्णमान के अंतर्गत अदायगी-संतुलन प्राप्त किया जाता था।

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

प्रश्न 6.
नम्य विनिमय दर व्यवस्था में विनिमय दर का निर्धारण कैसे होता है?
उत्तर:
नम्य विनिमय दर व्यवस्था में विनिमय दर का निर्धारण विदेशी मुद्रा बाज़ार में होता है। विदेशी मुद्रा बाज़ार में संतुलन उस बिंदु पर निर्धारित होता है, जहाँ विदेशी मुद्रा का माँग वक्र और मुद्रा का पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हों। विदेशी मुद्रा का माँग वक्र ऊपर से नीचे दाईं ओर गिरता हुआ होता है जबकि विदेशी मुद्रा का पूर्ति वक्र नीचे से ऊपर दाईं ओर उठता हुआ होता है। संलग्न रेखाचित्र में विदेशी मुद्रा बाज़ार में संतुलन की स्थिति को दिखाया गया है।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था समष्टि अर्थशास्त्र 1
संलग्न रेखाचित्र में माँग वक्र और पूर्ति वक्र एक-दूसरे को E बिंदु पर काटते हैं जहाँ संतुलन विनिमय दर OP है और संतुलन विदेशी मुद्रा की मात्रा OQ है।

प्रश्न 7.
अवमूल्यन और मूल्यहास में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अवमूल्यन (मूल्यवृद्धि) और मूल्यह्रास दोनों का संबंध देशीय मुद्रा के मूल्य में वृद्धि या कमी से है, जिससे विदेशी मुद्रा प्रभावित होती है। अवमूल्यन के अंतर्गत घरेलू मुद्रा की इकाइयों में विदेशी मुद्रा की कीमत कम हो जाती है और मूल्यह्रास के अंतर्गत घरेलू मुद्रा की इकाइयों में विदेशी मुद्रा की कीमत में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 8.
क्या केंद्रीय बैंक प्रबंधित तिरती व्यवस्था में हस्तक्षेप करेगा? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रबंधित तिरती व्यवस्था (Managed Floating System) से अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से है जिसमें केंद्रीय बैंक बाज़ार की शक्तियों के द्वारा विनिमय दर के निर्धारण की अनुमति प्रदान करता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में केंद्रीय बैंक विनिमय दरको प्रभावित करने के लिए हस्तक्षेप करता है।

प्रश्न 9.
क्या देशी वस्तुओं की माँग और वस्तुओं की देशीय माँग की संकल्पनाएँ एक-समान हैं?
उत्तर:
नहीं, देशी वस्तुओं की माँग और वस्तुओं की देशीय माँग की संकल्पनाएँ एक-समान नहीं होती। देशी वस्तुओं की माँग (Demand for Domestic Goods) में निवल निर्यात सम्मिलित नहीं होता। जब आय में वृद्धि होती है तो खुली अर्थव्यवस्था में बढ़ी हुई आमदनी का बड़ा भाग आयातों पर व्यय होता है और एक छोटा भाग ही देशी वस्तुओं की माँग बढ़ाता है। इस प्रकार विकासशील अर्थव्यवस्था में वस्तुओं की देशीय माँग (Domestic Demand for Goods) देशी वस्तुओं की माँग से अधिक होगी।

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प्रश्न 10.
जब M=60 + 0.06Y हो, तो आयात की सीमांत प्रवृत्ति क्या होगी? आयात की सीमांत प्रवृत्ति और समस्त माँग फलन में क्या संबंध है?
उत्तर
M = 60+ 0.06Y (दिया हुआ है)
M = \(\overline{\mathrm{M}}\) + mY
इस प्रकार, m = 0.06
यहाँ, m = आयात की सीमांत प्रवृत्ति
इसलिए आयात की सीमांत प्रवृत्ति = 0.06
आयात की सीमांत प्रवृत्ति और समस्त माँग फलन में धनात्मक संबंध होता है। आयात की सीमांत प्रवृत्ति बढ़ी हुई आय का वह भाग है जो आयात पर व्यय किया जाता है। यह आयात में परिवर्तन और आय में परिवर्तन का अनुपात है।
आयात की सीमांत प्रवृत्ति = \(\frac { ∆M }{ ∆Y }\)
आयात की माँग घरेलू आय और वास्तविक विनिमय दर पर निर्भर करती है। आय बढ़ने से माँग में वृद्धि होती है और बढ़ी हुई माँग का अधिकांश भाग आयातों के लिए होता है। फलस्वरूप आयात की सीमांत प्रवृत्ति में भी वृद्धि होती है।

प्रश्न 11.
खुली अर्थव्यवस्था के स्वायत्त व्यय (खर्च) गुणक बंद अर्थव्यवस्था के गुणक की तुलना में छोटा क्यों होता है?
उत्तर:
खुली अर्थव्यवस्था के स्वायत्त व्यय (खर्च) गुणक बंद अर्थव्यवस्था के स्वायत्त व्यय गुणक की तुलना में इसलिए छोटा होता है कि बंद अर्थव्यवस्था में व्यय गुणक केवल सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (c) पर निर्भर करता है जबकि खुली अर्थव्यवस्था में गुणक सीमांत उपभोग प्रवृत्ति और आयात की सीमांत प्रवृत्ति (m) दोनों के योग पर निर्भर करता है।
इस प्रकार, खुली अर्थव्यवस्था गुणक = \(\frac { 1 }{ 1-c+m }\)
बंद अर्थव्यवस्था गुणक =\(\frac { 1 }{ 1-c }\)

प्रश्न 12.
पाठ में एकमुश्त कर की कल्पना के स्थान पर आनुपातिक कर T = tY के साथ खुली अर्थव्यवस्था गुणक की गणना कीजिए।
उत्तर:
एकमुश्त कर की स्थिति में खुली अर्थव्यवस्था गुणक = \(\frac { 1 }{ 1-c+m }\)
आनुपातिक कर की स्थिति में खुली अर्थव्यवस्था गुणक = \(\frac{1}{1-c(1-t)+m}\)

प्रश्न 13.
मान लीजिए C = 40 + 0.8Y D, T = 50, I = 60, G = 40, x = 90, M = 50 + 0.05Y (a) संतुलन आय ज्ञात कीजिए, (b) संतुलन आय पर निवल निर्यात संतुलन ज्ञात कीजिए, (c) संतुलन आय और निवल निर्यात संतुलन क्या होता है, जब सरकार के क्रय में 40 से 50 की वृद्धि होती है?
हल:
(a) संतुलन आय (Y) = \(\overline{\mathrm{C}}\) + c(Y – T) + I + G + X – M
= 40 + 0.8(Y – 50) + 60 + 40 + 90 – (50 + 0.05Y)
= 40 + 0.8Y – 40 + 60 + 40 + 90 – 50 – 0.05Y
= 0.75Y + 230 – 90
= 0.75Y + 140
Y – 0.75Y = 140
0.25Y = 140
Y = 560
इस प्रकार संतुलन आय = 560 उत्तर

(b) निवल निर्यात = X – M
= 90 – (50 + 0.05Y)
= 90 – (50 + 0.05 x 560)
= 90 – (50 + 28)
= 90 – 78
= 12 उत्तर

(c) सरकार के क्रय में वृद्धि (∆G) = 50 – 40
संतुलन आय में परिवर्तन =\(\frac{1}{1-c+m} \Delta \mathrm{G}\)
= \(\frac{1}{1-0.8+0.05}\) x 10
= \(\frac{1}{0.25}\) x 10 = 40
नई संतुलन आय = पुरानी संतुलन आय + परिवर्तन
= 560 + 40 = 600
निवल निर्यात में परिवर्तन = X1 – M1
= 90 – (50 + 0.05 x 600)
= 90 – 50 + 30
= 90 – 80
= 10 उत्तर

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प्रश्न 14.
उपर्युक्त उदाहरण में यदि निर्यात में X = 100 का परिवर्तन हो, तो संतुलन आय और निवल निर्यात संतुलन में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
हल:
संतुलन आय में परिवर्तन (ΔY) = \(\frac{1}{1-c+m} \Delta \mathrm{X}\)
= \(\frac{1}{1-0.8+0.05}\) x 10
= \(\frac{1}{0.25}\) x 10
= 40
नई संतुलन आय = 560 + 40 = 600
निवल निर्यात में परिवर्तन = X1 – M1
= 100 – (50 + 0.05 x 600)
= 100 – (50 + 30)
= 100 – 80
= 20 उत्तर

प्रश्न 15.
व्याख्या कीजिए कि G – T = (Sg – I) – (X – M)।
उत्तर:
G – T = (Sg – I) – (X – M)
यहाँ, G = सरकारी व्यय
T = कर
G – T = निवल सरकारी व्यय
sg = सरकार की बचत
I = निवेश
Sg – I = निवल बचत
X = निर्यात
M = आयात
X – M = व्यापार शेष
दिए हुए समीकरण के अनुसार, निवल सरकारी व्यय निवल बचत और व्यापार शेष के योग के बराबर होता है। इसका अभिप्राय यह है कि निवल सरकारी व्यय की क्षतिपूर्ति सरकारी बचत और व्यापार घाटे से होती है।

प्रश्न 16.
यदि देश Bसे देश A में मुद्रास्फीति ऊँची हो और दोनों देशों में विनिमय दर स्थिर हो, तो दोनों देशों के व्यापार शेष का क्या होगा?
उत्तर:
यदि देश Bसे देश A में मुद्रास्फीति ऊँची है और दोनों देशों में विनिमय दर स्थिर है, तो देश A के व्यापार शेष में घाटा होगा जबकि देश Bका व्यापार शेष आधिक्य होगा। इसका कारण यह है कि मुद्रास्फीति के ऊँचे होने पर उस देश के आयात में वृद्धि होगी और निर्यात में कमी आएगी जिससे व्यापार शेष में घाटा होगा।

प्रश्न 17.
क्या चालू पूँजीगत घाटा खतरे का संकेत होगा? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि चालू पूँजीगत घाटे के फलस्वरूप निवेश में वृद्धि और भविष्य के निर्गत में वृद्धि होती है तो यह खतरे का संकेत (Cause for alarm) नहीं है। यदि चालू पूँजीगत घाटे के फलस्वरूप निजी अथवा सरकारी उपभोग में वृद्धि होती है तो यह खतरे का संकेत है।

प्रश्न 18.
मान लीजिए C = 100 + 0.75YD, I = 500, G = 750, कर आय का 20 प्रतिशत है, X = 150, M = 100 + 0.2Y, तो संतुलन आय, बजट घाटा अथवा आधिक्य और व्यापार घाटा अथवा आधिक्य की गणना कीजिए।
हल:
C = 100 + 0.75YD
I = 500
G = 750
आनुपातिक कर (T) = 20%
X = 150
M = 100 + 0.2Y
(a) संतुलन आय (Y) = \(\overline{\mathrm{C}}\) + c(Y – T)Y + I + G + X – M
= 100 + 0.75 (1-0.2)Y + 500 + 750 + 150 – (100 + 0.2Y)
= 100 + 0.75 (0.8)Y+ 500 +750 + 150-100-0.2Y
= 100 + 0.6Y+ 1300-0.2Y
= 1,400 + 0.4Y
Y – 0.4Y = 1,400
0.6Y = 1,400
Y = 2,333
संतुलन आय = 2,333 उत्तर

(b) बजट घाटा = सरकारी व्यय (G) – कर (T)
= 750 – 20%Y
= 750 – \(\frac { 20 }{ 100 }\) x 2,333
= 750 – 467 = 283 उत्तर

(c) व्यापार घाटा = M – X
= 100+ 0.2Y – X
= 100 + 0.2 x 2,333 – 150
= 100 + 467 – 150
= 417 उत्तर

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

प्रश्न 19.
उन विनिमय दर व्यवस्थाओं की चर्चा कीजिए, जिन्हें कुछ देशों ने अपने बाह्य खाते में स्थायित्व लाने के लिए प्रयोग किया है।
उत्तर:
निम्नलिखित विनिमय दर व्यवस्थाओं को कई देशों ने अपने बाह्य खाते में स्थायित्व लाने के लिए प्रयोग किया है

स्वर्णमान-स्वर्णमान व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक देश की मुद्रा सोने के मूल्य से संचालित होती है। विनिमय दरों का निर्धारण सोने के रूप में उस मुद्रा के मूल्य के द्वारा होता था।
स्थिर विनिमय दर-स्थिर विनिमय दर व्यवस्था के अंतर्गत देश अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष की अनुमति के बिना विनिमय दर में परिवर्तन नहीं कर सकता।
प्रबंधित तिरती कई देशों ने अपने केंद्रीय बैंकों को विनिमय दर नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करने की अनुमति दी है।
नम्य विनिमय दर-कई देशों ने स्वतंत्र कीमत प्रणाली का उपयोग किया है।

खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र HBSE 12th Class Economics Notes

→ विनिमय दर-विनिमय दर से अभिप्राय अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार (अथवा अंतर्राष्ट्रीय विनिमय बाज़ार) में एक करेंसी की अन्य करेंसियों के रूप में कीमत से है। उदाहरण के लिए, यदि 1 अमेरिकी डॉलर को खरीदने के लिए 50 रु० देने पड़ते हैं तो दोनों करेंसियों की विनिमय दर = 50 : 1 होगी।

→ विनिमय दर की प्रणालियाँ-मोटे तौर पर विनिमय दर को निर्धारित करने की दो प्रणालियाँ हैं-6) स्थिर विनिमय दर प्रणाली और (ii) नम्य (लोचशील) विनिमय दर प्रणाली।

→ स्थिर विनिमय दर प्रणाली स्वर्ण विनिमय दर तथा विनिमय दर की समंजनीय सीमा प्रणाली स्थिर विनिमय दर प्रणाली के दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तित रूप हैं। विनिमय दर की समंजनीय सीमा प्रणाली (जिसे ब्रेटन वुडस प्रणाली भी कहते हैं। विनिमय में कछ सीमा तक समंजन की अनमति देती है. यह प्रणाली उतनी कठोर नहीं है जितनी स्वर्ण विनिमय दर प्रणाली।

→ नम्य विनिमय दर का निर्धारण-नम्य विनिमय दर का निर्धारण अंतर्राष्ट्रीय विनिमय बाज़ार में विभिन्न करेंसियों की माँग तथा पूर्ति की कीमतों द्वारा होता है।

→ संतुलित विनिमय दर-संतुलित विनिमय दर तब स्थापित होती है जब विदेशी विनिमय की पूर्ति = विदेशी विनिमय की माँग। विनिमय दर की मिश्रित प्रणालियाँ-विनिमय दर की मिश्रित प्रणालियाँ हैं-(i) विस्तृत सीमापट्टी, (ii) चलित सीमाबंध तथा (ii) प्रबंधित तरणशीलता। विनिमय दर की ये प्रणालियाँ, ‘स्थिर’ तथा ‘नम्य’ विनिमय दरों की दो चरम स्थितियों के बीच है।

→ विस्तृत सीमापट्टी प्रणाली-इस प्रणाली के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में दो करेंसियों की ‘समता दर’ के बीच 10 प्रतिशत की कमी या वृद्धि करके अपने भुगतान शेष को ठीक करने की छूट होती है।

→ चलित (परिवर्तनशील) सीमाबंध-यह स्थिर (Fixed) विनिमय दर और नम्य (लचीली) (Flexible) विनिमय दर के बीच का एक समझौता (Compromise) है। इस प्रणाली में एक देश अपनी विनिमय दर घोषित कर उसमें 1 प्रतिशत तक उतार-चढ़ाव कर सकता है। प्रबंधित तरणशीलता-यह स्थिर विनिमय दर और लचीली (नम्य) विनिमय दर के प्रबंध की अंतिम संकर प्रजाति या मिश्रण है जो सरकार द्वारा प्रबंधित या नियंत्रित होती है। इसे प्रबंधित तरणशीलता कहते हैं, परंतु यह नियत दर समय-समय पर जरूरत के अनुसार मौद्रिक अधिकारी द्वारा संशोधित की जाती है।

→ हाज़िर (चालू) बाज़ार-हाज़िर बाज़ार वह बाज़ार है जिसमें विदेशी विनिमय का चालू क्रय-विक्रय होता है। इसमें तात्कालिक विनिमय दर का निर्धारण होता है।

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

→ वायदा बाज़ार-वायदा बाज़ार का संबंध विदेशी विनिमय के ऐसे क्रय तथा विक्रय से है जिसमें लेन-देन के प्रपत्रों पर हस्ताक्षर तो आज किए जाते हैं, किंतु यह लेन-देन भविष्य में किसी दिन पूरा होता है। यह भविष्य की विनिमय दर को परिभाषित करता है।

→ भुगतान शेष भुगतान शेष एक देश तथा विश्व के बीच सभी आर्थिक सौदों का संक्षिप्त विवरण है।

→ व्यापार शेष व्यापार शेष दृश्य निर्यात और दृश्य आयात का अंतर है।

→ व्यापार शेष और भुगतान शेष में अंतर व्यापार शेष में केवल दृश्य मदों का रिकॉर्ड होता है। भुगतान शेष में दृश्य तथा अदृश्य मदों के अतिरिक्त पूँजी अंतरण का रिकॉर्ड भी पाया जाता है।

→ स्वप्रेरित तथा समायोजक मदें-स्वायत्त या स्वप्रेरित मदें उन सौदों से संबंधित होती हैं जिनका निर्धारण लाभ को ध्यान में रखकर किया जाता है। समायोजक मदों का निर्धारण लाभ को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता है। इन मदों का ध्येय भुगतान शेष की समानता को पुनः स्थापित करना है।

→ भुगतान शेष में असंतुलन यह असंतुलन बचत वाला भी और घाटे वाला भी हो सकता है।

→ भुगतान शेष में असंतुलन के कारण-(i) आर्थिक कारक, (ii) राजनीतिक कारक और (iii) सामाजिक कारक।

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

HBSE 12th Class Sanskrit दीनबन्धुः श्रीनायारः Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तराणि लिखत
(क) श्रीनायारः कुत्र गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ?
(ख) विभागस्य विपक्षे केषाम् अभियोगो नास्ति ?
(ग) श्रीनायारः स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं कुत्र प्रेषयति स्म ?
(घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा किम् अकरोत् ?
(ङ) बहुदिनेभ्यः स्थगितानां समस्यानां समाधानं कदा जातम् ?
(च) श्रीनायारस्य पार्वे पत्रं कया प्रेषितम् ?
(छ) आश्रमे के लालिताः पालिताश्च भवन्ति ?
(ज) पत्रलेखिका कस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रस्थानिकीमिच्छति ?
उत्तरम्:
(क) श्रीनायारः स्वराज्यं केरलं प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ?
(ख) विभागस्य विपक्षे उपभोक्तृणाम् अभियोगो नास्ति ?
(ग) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं केरलं प्रेषयति स्म ?
(घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् आर्द्रम् अकरोत् ?
(ङ) श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां समस्यानां समाधानं जातम् ?
(च) श्रीनायारस्य पार्वे पत्रं सुश्री ‘मेरी’ प्रेषितवती।
(छ) आश्रमे अनाथाः शिशवः लालिताः पालिताश्च भवन्ति ?
(ज) पत्रलेखिका श्रीनायारस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रस्थानिकीमिच्छति ?

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

2. सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्यां कुरुत
(क) उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे
(ख) सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकी ज्ञापितवन्तः
(ग) त्वया निर्मितोऽयं क्षुद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः ।
उत्तरम्:
(क) ‘उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे’।

प्रसंग:-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘दीनबन्धुःश्रीनायारः’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति में दीनबन्धु श्रीनायार की सत्यनिष्ठा एवं कर्तव्यनिष्ठा के फलस्वरूप खाद्य-आपूर्ति विभाग के विरोध में उपभोक्ताओं की ओर से किसी प्रकार के अभियोग न होने का उल्लेख किया गया है।

श्रीनायार एक सत्यनिष्ठ तथा मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी थे। उड़ीसा सरकार के खाद्यआपूर्ति विभाग के सचिव पद को सम्भालते ही इस विभाग का कायाकल्प हो गया। खाद्यान्न में मिलावट या हेरा-फेरी नाममात्र रह गई, अतः श्रीनायार के कार्यकाल में उपभोक्ताओं को विभाग पर किसी प्रकार का अभियोग चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। श्रीनायार के आने से विभाग की न केवल सक्रियता बढ़ी अपितु ईमानदारी से काम करने का भी वातावरण बना। परिणामतः उपभोक्ता विभाग की कार्यप्रणाली से सन्तुष्ट हुए और कोर्ट-कचहरी के विवादों से विभाग मुक्त हो गया।

इस पंक्ति से श्रीनायार की कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदारी का संकेत मिलता है।

(ख) सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकी ज्ञापितवन्तः।

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती द्वितीयो भागः’ के ‘दीनबन्धुःश्रीनायारः’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

व्याख्या-‘सभी ने आँसु भरे हृदय से श्रीनायार को विदाई दी’ प्रस्तुतपंक्ति का सम्बन्ध श्रीनायार के जीवन के उस क्षण से है, जब केरल राज्य में श्रीनायार द्वारा स्थापित अनाथ आश्रम की संचालिका सुश्री मेरी ने श्रीनायार को एक पत्र लिखा कि अब उनका अन्तिम समय आ चुका है और उन्हें स्वयं यह आश्रम सँभाल लेना चाहिए।

एक दिन श्रीनायार अपने कार्यालय में बैठे एक पत्र पढ़ रहे थे, उनकी आँखों से अश्रुधारा बह रह थी, जिससे पत्र भी भीग चुका था। उसी क्षण श्रीनायार के क्लर्क श्रीदास का प्रवेश हुआ और उन्होंने श्रीदास को कहा कि अब उनका छुट्टी लेकर चले जाने का समय आ गया है। यदि मुझसे कोई रूखा व्यवहार किसी के साथ अनजाने में हुआ हो तो उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। श्रीनायार का व्यवहार विभाग के सभी सहकर्मियों के साथ पूर्णतया मानवीय, मित्रतापूर्ण तथा अत्यन्त मधुर था। विभाग के सभी लोग श्रीनायार के स्वभाव और व्यवहार से सन्तुष्ट थे। आज जब श्रीनायार केरल वापस जाने लगे,तो सहकर्मियों के हृदय को चोट पहुँची और न चाहते हुए भी उन्हें भीगी पलकों से विदाई की।

इस पंक्ति से विभाग के लोगों का श्रीनायार के प्रति सच्चा आदर-भाव तथा श्रीनायार की सद्-व्यवहारशीलता प्रकट होती है।

(ग) त्वया निर्मितोऽयं क्षुद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः।

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती द्वितीयो भागः’ के ‘दीनबन्धुःश्रीनायार:’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति सुश्री मेरी के उस पत्र की है, जो श्रीनायार के केरल वापस चले जाने के बाद उनके क्लर्क श्रीदास ने खोलकर पढ़ा था।

श्रीनायार ने एक अनाथ आश्रम की स्थापना केरल राज्य में की थी। जिसका संचालन सुश्री मेरी किया करती थी। मेरी अब मृत्यु के निकट थी, अतः उसने श्रीनायार को स्वयं यह अनाथ आश्रम सँभालने तथा अन्तिम क्षणों में श्रीनायार के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी। मेरी ने इस पत्र में यह भी बताया था कि यह आश्रम कभी बहुत छोटे रूप में था परन्तु आज यह बहुत बड़े वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। अब इसमें सौ से भी अधिक अनाथ शिशु पल रहे हैं। श्रीनायार इसी आश्रम के संचालन के लिए अपने वेतन का आधे से भी अधिक भाग प्रतिमास की एक तारीख को ही मनीआर्डर द्वारा सुश्री मेरी के पास भेज दिया करते थे। इस घटना से श्रीनायार का दीनों के प्रति सच्चा दया-भाव प्रकट होता है। इसीलिए पाठ का नाम भी ‘दीनबन्धु श्रीनायार’ उचित ही दिया गया है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

3. अधः समस्तपदानां विग्रहाः दत्ताः तानाश्रित्य समस्तपदानि समासनामापि लिखत
(क) कालस्य खण्डः तस्मिन् = कालखण्डे।
षष्ठी-तत्पुरुषः
(ख) कर्मसु नैपुण्यम् = कर्मनैपुण्यम्।
सप्तमी-तत्पुरुषः
(ग) द्वि च त्रि च अनयोः समाहारः, तेषाम् = द्वित्राणाम्।
द्विगुः
(घ) दीर्घः अवकाशः, तम् = दीर्घावकाशम्।
कर्मधारयः
(ङ) धनाय आदेशः, तेन = धनादेशेन।
चतुर्थी-तत्पुरुषः
(च) जीवनस्य प्रदीपः = जीवनप्रदीपः।
षष्ठी-तत्पुरुषः

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

4. रेखाकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्।
(ख) वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्।
(ग) तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्क: नास्ति।
(घ) पत्रस्य अर्धाधिकं भागं अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म।
(ङ) श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्।
(च) भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु।
उत्तरम्:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) श्रीनायारः कीदृग्भाषी आसीत् ?
(ख) कस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम् ?
(ग) तस्य केन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति?
(घ) पत्रस्य अर्धाधिकं भागं का आर्दीकरोति स्म?
(ङ) कः तत्पत्रमुद्घाटितवान् ?
(च) भगवान् कं दीर्घजीवनं कारयतु ?

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

5. विपरीतार्थकपदानि मेलयत
(क) आगत्य (क) विस्मृतः
(ख) इच्छाम् (ख) गत्वा
(ग) स्वल्पभाषी (ग) न्यूनीभूतम्
(घ) प्रारभ्य (घ) पक्षे
(ङ) अधिकीभूतम् (ङ) बहुभाषी
(च) विपक्षे (च) समाप्य
(छ) स्मृतः (छ) लघुजीवनम्
(ज) दीर्घजीवनम् (ज) अनिच्छाम्
उत्तरम्:
विपरीतार्थकपदमेलनम्
(क) आगत्य – गत्वा
(ख) इच्छाम् – अनिच्छाम्
(ग) स्वल्पभाषी – बहुभाषी
(घ) प्रारभ्य – समाप्य
(ङ) अधिकीभूतम् – न्यूनीभूतम्
(च) विपक्षे – पक्षे
(छ) स्मृतः – विस्मृतः
(ज) दीर्घजीवनम् – लघुजीवनम्

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6. अधोलिखितानां विशेष्यपदानां विशेषणपदानि पाठात् चित्वा लिखत
वार्तालापः, वर्षत्रयस्य, अश्रुधारा, समस्यानाम्, व्यवहारः, पत्रम्, शिशवः ।
उत्तरम्:

विशेषणपदम्विशेष्यपदम
सन्तुलित:वार्तालाप:
गतस्यवर्षत्र्यस्य
विगलिताअश्रुधारा
स्थगितानाम्समस्यानाम्
रूक्ष:व्यवहारः
पूर्वतनम्पत्रम्
शताधिका:शिशव:

7. अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत
समाप्य, जातम्, त्यक्त्वा, धृत्वा, पठन्, संपोष्य।
उत्तरम्

प्रकृति:प्रत्यय:
(क) समाप्यसम् + √आप्ल्यप्
(ख) जातम्√जन्क्त
(ग) त्यक्त्वा√त्यज्क्त्वा
(घ) धृत्वा√धृक्त्वा
(ङ) पठन्√पठ्शतृ
(च) संपोष्यसम् + √पुष्ल्यप्

योग्यताविस्तारः

1. प्रस्तुतकथायाः मूललेखक: श्रीचन्द्रशेखरदासवर्मा ओडियासाहित्यक्षेत्रे लब्धप्रतिष्ठः कथाकारो वर्तते। अस्य जन्म 1945 तमे ईशवीयसंवत्सरे अभवत्। अस्य द्वादशकथाग्रन्थाः, एक: नाट्यसङ्ग्रहः त्रयः समीक्षा-ग्रन्थाश्च प्रकाशिताः सन्ति। पाषणीकन्या वोमा च श्रीवर्मणः प्रसिद्धौ कथासंग्रहौ स्तः । ‘दीनबन्धुः श्रीनायारः’ इति कथा पाषणीकन्या इति कथासंग्रहात् संकलिता।

2. भारतस्य प्रदेशा:-भारतवर्षे अष्टाविंशति-प्रदेशाः वर्तन्ते। षट् केन्द्रशासितप्रदेशाः सन्ति।

3. अत्रत्याः जनाः विविधभाषाभाषिणः सन्तिः । हिन्दीम् आङ्ग्लभाषां च अतिरिच्य मलयालम-तमिल-उडिया-बङ्गला गुजराती-मराठी-कोंकणी-कन्नड-असमिया-पञ्जाबी भाषाः अत्रत्याः जनाः वदन्ति।

4. पत्रलेखनं साहित्ये प्रसिद्धा विधा वर्तते प्रस्तुतपाठे समागतं पत्रम् अवलोक्य स्वकीयान् विचारान् लिखत।

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HBSE 9th Class Sanskrit दीनबन्धुः श्रीनायारः Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) आश्रमे के लालिताः पालिताश्च भवन्ति ?
(A) वृद्धाः
(B) स्त्रियः
(C) शिशवः
(D) अनाथशिशवः।
उत्तराणि:
(D) अनाथशिशवः

(ii) पत्रलेखिका कस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रास्थानिकीमिच्छति ?
(A) पुत्रस्य
(B) श्रीदासस्य
(C) श्रीनायारस्य
(D) सर्वकारस्य।
उत्तराणि:
(C) श्रीनायारस्य

(iii) श्रीनायार: कुत्र गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ?
(A) दिल्लीम्
(B) केरलम्
(C) कोलकातानगरम्
(D) महाराष्ट्रम्।
उत्तराणि:
(B) केरलम्

(v) विभागस्य विपक्षे केषाम् अभियोगो नास्ति ?
(A) उपभोक्तृणाम्
(B) अधिकारिणाम्
(C) कर्मचारिणाम्
(D) मन्त्रिणाम्।
उत्तराणि:
(A) उपभोक्तृणाम्

(v) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं कुत्र प्रेषयति स्म ?
(A) कानपुरम्
(B) पूनानगरम्
(C) मद्रासम्
(D) केरलम्।
उत्तराणि:
(A) केरलम्।

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II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्।
(A) कः
(B) कीदृशः
(C) कथम्
(D) किया।
उत्तराणि
(B) कीदृशः

(ii) वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्।
(A) कस्य
(B) केन
(C) कति
(D) कस्मात्।
उत्तराणि
(A) कस्य

(iii) तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्क: नास्ति।
(A) काः
(B) केन
(C) कम्
(D) कस्मै।
उत्तराणि
(B) केन

(iv) पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म।
(A) कया
(B) कान्
(C) कथम्
(D) का।
उत्तराणि
(D) का

(v) श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्।
(A) कः
(B) काभ्याम्
(C) कस्याः
(D) कस्याम्।
उत्तराणि
(A) कः

(vi) भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु।
(A) कः
(B) कम्
(C) कस्याः
(D) कस्याम्।
उत्तराणि
(B) कम्।

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दीनबन्धुः श्रीनायारः पाठ्यांशः

1.श्रीनायारः केन्द्रसर्वकारतः स्थानान्तरणेन आगत्य ओडिशासर्वकारस्य अधीने प्रायः वर्षत्रयेभ्यः कार्यं करोति। तथाप्यस्मिन् वर्षत्रयात्मके कालखण्डे एकवारमपि स्वराज्यं केरलं प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान्। स स्वल्पभाषी, अतस्तस्य मनःकथा मनोव्यथा वा बोधगम्या नास्ति। सन्तुलितो वार्तालापः, साक्षात्समये आगमनम्, ततः सञ्चिकासु मनोनिवेशः, कार्य समाप्य स्वगृहं प्रत्यागमनञ्च तस्य वैशिष्ट्यमासीत्। तस्य कर्मनैपुण्यं दृष्ट्वा एव ओडिशासर्वकारस्तं स्थानान्तरणेन स्वीकृत्य खाद्यपूर्तिविभागे सचिवपदे नियुक्तवान्। गतस्य वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यद विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्।खाद्ये अपमिश्रणं न्यूनीभूतम्। अत उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे मन्त्रिणां मध्येऽपि तस्य सुख्यातिः वर्तते

हिन्दी-अनुवादः श्रीनायार केन्द्र सरकार से स्थानान्तरित होकर उड़ीसा सरकार के अधीन प्रायः तीन वर्ष तक कार्य करता है। तो भी (उसने) इस तीन वर्ष के कालखण्ड में एक बार भी अपने राज्य केरल की ओर जाने की इच्छा प्रकट नहीं की। वह बहुत कम बोलने वाला है, इसीलिए उसके मन की बात या मन की पीड़ा नहीं जानी जा सकती है। सन्तुलित वार्तालाप, ठीक समय पर पहुँचना, फिर रजिस्टरों में मन लगाए रखना और कार्य समाप्त कर अपने घर वापिस लौटना उसकी विशेषता थी। उसकी कार्यनिपुणता देखकर ही उड़ीसा सरकार ने उसका स्थानान्तरण स्वीकार कर उसे खाद्य-आपूर्तिविभाग में सचिव पद पर नियुक्त कर दिया था। पिछले तीन वर्ष के आकलन से पता चलता है कि विभाग की कार्यनिपुणता दस गुणा बढ़ गई है। खाद्य सामग्री में मिलावट कम हो गई है। अत: उपभोक्ताओं का भी विभाग के विरोध में (कोई) अभियोग (मुकद्दमा) नहीं है। मन्त्रियों के बीच में भी उसकी अच्छी ख्याति है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
तथाप्यस्मिन् = तब भी इसमें। (तथापि + अस्मिन) बोधगम्या = बोध (ज्ञान) के द्वारा गम्य, जानने योग्य; बोधेन गम्या। मनोनिवेशः = दत्तचित्त होना ; मनसः निवेशः, षष्ठी तत्पुरुष समास । प्रत्यागमनम् = वापिस लौटना; प्रति + आङ् + √गम् + ल्युट्। कर्मनैपुण्यम् = कर्मों में निपुणता; कर्मसु नैपुण्यम्, सप्तमी तत्पुरुष। स्वीकृत्य = स्वीकार करके; स्वी + √कृ + ल्यप्। अपमिश्रणम् = मिलावट; अप + √मिश् + ल्युट् > अन । अनुमीयते = अनुमान किया जाता है; अनु + √मा + लट् प्रथम पुरुष एकवचन। न्यूनीभूतम् = कम हो गया; न्यून + च्वी + √भू + क्त। अभियोगः = मुकद्दमा।

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2. श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां विविध समस्यानामपि समाधानं जातम्। स्वकार्यं त्यक्त्वा अपरस्य सहकारस्तस्य परमधर्मः। सः प्रतिमासं प्रथमदिवसे स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं केरलं प्रेषयति स्म तेनानुमीयते तस्य राज्येन सह अस्ति कश्चित् सम्पर्कः। कानिचन मलयालमभाषायाः संवादपत्राणि अतिरिच्य कदापि तस्य नाम्ना किमपि पत्रमागतमिति कोऽपि कदापि न जानाति।

हिन्दी-अनुवादः श्रीनायार के दायित्व (पदभार) ग्रहण करने के एक महीने के अन्दर बहुत दिनों से स्थगित अनेक समस्याओं का भी समाधान हो गया। अपना कार्य छोड़कर दूसरों का सहयोग करना उसका परम धर्म है। वह प्रतिमास के पहले दिन अपने वेतन का आधे से अधिक भाग केरल भेज देता था। इसी से पता चलता है कि उसका राज्य के साथ कोई सम्पर्क है। कुछ मलियालम भाषा के संवाद पत्रों को छोड़कर कभी उसके नाम से कोई पत्र आया है, इसे कभी कोई नहीं जानता।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च सहकारः = सहायता। अर्धाधिकम् = आधे से अधिक। प्रतिमासम् = हर महीने; मासे मासे प्रतिमासम् (अव्ययीभाव समास)। अतिरिच्य = अतिरिक्त; अति + √रिच् + ल्यप्।
HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः img-1

3. एकस्मिन् दिने श्रीनायारः पत्रमेकं धृत्वा मस्तकमवनमय्य पठन् आसीत्। नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म पत्रस्य अर्धाधिकं भागम्। तदानीमेव तस्य कार्यालयलिपिकः श्रीदासः प्रविशति। श्रीनायारः तमुक्तवान्-“अधुना मम गमनसमयः समुपागत एव। मम दायित्वहस्तान्तरणपत्रकं सजीकुरु।अहमधुना द्वित्राणां दिवसानां सकारणावकाशं स्वीकरिष्यामि। पुनः तदनु स्वीकरिष्यामि दीर्घावकाशम्। यदि कस्मैचिद् अज्ञातेन मया रूक्षो व्यवहारः प्रदर्शितः स्यात्, तदर्थं ते मह्यमुदारचित्तेन क्षमा प्रदास्यन्ति इति सर्वेभ्यो निवेदयतु”। अनन्तरं सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकी ज्ञापितवन्तः।

हिन्दी-अनुवादः एक दिन श्रीनायार एक पत्र (हाथ में) पकड़कर मस्तक झुकाकर पढ़ रहा था। आँख के किनारे से गिरी हुई आश्रुधारा ने पत्र का आधे से भी अधिक भाग गीला कर दिया था। तभी उसके कार्यालय का लिपिक (क्लर्क) श्रीदास प्रवेश करता है। श्रीनायार ने उससे कहा-“अब मेरे जाने का समय समीप आ गया है। मेरा दायित्व-हस्तान्तरण पत्र (किसी दूसरे

दीनबन्धुः श्रीनायारः को पदभार सौंपने का पत्र) तैयार करो। अब मैं दो-तीन दिन का सकारण-अवकाश लूँगा (स्वीकार करूँगा)। फिर उसके बाद लम्बी छुट्टी लूँगा। यदि किसी के लिए अनजाने में मुझसे रूखा व्यवहार किया गया हो, तो उसके लिए वे मुझे उदारभाव से क्षमा देंगे-ऐसा सबसे निवेदन करो।” इसके बाद सभी ने आँसू भरे हृदय से विदाई दी।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च विगलिता = निकली हुई ; वि + √गिल् + क्त + टाप् + । अवनमय्य = झुकाकर ; अव + √नम् + ल्यप्। दायित्वहस्तान्तरणम् = दूसरे को प्रभार हस्तगत कराना। सज्जीकुरु = तैयार करो ; √सज्ज् + च्चि + √कृ + लोट् + मध्यम पुरुष एकवचन। सौप्रस्थानिकी = विदाई।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

4. तस्य गमनस्य दिवसत्रयात्परं कार्यालये पत्रमेकमागतम्। कौतूहलवशात् श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्। लेखिका आसीत् सुश्री मेरी यस्याः पार्वे सः प्रतिमासमर्धाधिकं धनं धनादेशेन प्रेषयति स्म। पत्रे एवं लिखितमासीत्….. श्रीनायार !

भगवान् यीशुस्तव मङ्गलं वितनोतु। मम पूर्वतनं पत्रं त्वया प्राप्तं स्यात्। तव समीपे इदं मम शेषपत्रम्। यतो हि मम जीवनप्रदीपो निर्वापितो भवितुमिच्छति। प्रायस्तवागमनसमये अहं न स्थास्यामि। पूर्वपत्रे अहमाश्रमस्य सर्वविधमायव्ययाकलनं प्रेषितवती। केवलं यीशोः समीपे गमनात्पूर्वं तव दर्शनमिच्छामि। प्रथमं त्वया निर्मितोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः। अधुनात्र शताधिका अनाथशिशवो लालिता: पालिताश्च भवन्ति। तव हस्तयोस्तव अनाथाश्रमं समर्प्य अहं सौप्रस्थानिकीमिच्छामि। अद्य समाजस्त्वत्तो बहु किमपि इच्छति यौ कौ वां तव पितरौ भवतां नाम, तौ धन्यवादाही। कदाचित्ताभ्यां त्वं विस्मृतः स्यात् त्वमवश्यमेतान् शिशून् संपोष्य उत्तममनुष्यान् कारयिष्यसीति मम कामना वर्तते। प्रभुः त्वत्त इमामेवाशां पोषयति। यो जन्म दत्तवान्, स जीवितुमधिकारमपि दत्तवान्। भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु। इति ॥
तव शुभाकाक्षिणी
सुश्री: मेरी

हिन्दी अनुवादः
उनके जाने के तीन दिन के पश्चात् कार्यालय में एक पत्र आया। जिज्ञासावश श्रीदास ने वह पत्र खोला। लेखिका थी सुश्री मेरी, जिसके पास वह प्रतिमास आधे से अधिक धन मनीआर्डर द्वारा भेजता था। पत्र में लिखा था श्रीनायार!

भगवान् यीशु तुम्हारा मंगल करें। मेरा पहला पत्र तुम्हें मिला होगा। तुम्हारे पास यह मेरा शेष पत्र है। क्योंकि मेरा जीवन-दीप बुझ जाना चाहता है। शायद तुम्हारे आने तक मैं न रहूँ। पिछले पत्र में मैंने आश्रम का सारा आय-व्यय चिट्ठा भेज दिया था। केवल यीशु के पास जाने से पहले तुम्हारा दर्शन करना चाहती हूँ। पहले तुम्हारे द्वारा निर्मित अनाथ आश्रम अब बड़े भारी वृक्ष में बदल गया है। अब यहाँ सौ से भी अधिक अनाथ शिशु लालित और पालित हो रहे हैं। तुम्हारे हाथों में तुम्हारा अनाथ आश्रम सौंपकर अब विदाई चाहती हूँ। आज समाज तुम से बहुत कुछ चाहता है। जो कोई भी तुम्हारे माता-पिता हैं, वे धन्यवाद के पात्र हैं। किसी कारणवश उन्होंने तुम्हें भुला दिया होगा, तुम अवश्य ही इन शिशुओं को पाल-पोसकर उत्तम मनुष्य बनाओगे, यह मेरा कामना है। प्रभु तुमसे यही आशा रखते हैं। जिसने जन्म दिया है, उसी ने जीने का अधिकार भी दिया है। भगवान् तुम्हें दीर्घजीवी करें।
तुम्हारी शुभेच्छु,
सुश्री मेरी

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च धनादेशेन = मनिआर्डर से; धनाय आदेशः तेन (चतुर्थी-तत्पुरुष) वितनोतु = करे, विस्तार करे; वि + √तन् + लोट्, प्रथम पुरुष, एकवचन। पूर्वतनम् = पहला निर्वापितः = शान्त, बुझा हुआ; निर् + √वप् (णिच्) + क्त। परिणतः = परिवर्तित हो गया, बदल गया; परि + √निम् + क्त। आयव्ययाकलनम् = आय व्यय का विवरण। पितरौ = माता-पिता; माता च पिता च (द्वन्द्व समास)

दीनबन्धुः श्रीनायारः (दीनबन्धु श्रीनायार) Summary in Hindi

दीनबन्धुः श्रीनायारः पाठ परिचय

श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा उड़िया भाषा के प्रख्यात साहित्यकार हैं। इनका जन्म 1945 ईस्वी में हुआ। इनके 12 कथासंग्रह, एक नाट्यसंग्रह तथा तीन समीक्षा-ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। ‘पाषणी-कन्या’ तथा ‘वोमा’ इनके प्रसिद्ध कथा संग्रह हैं। ‘पाषणीकन्या’ कथासंग्रह का संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है। इसी कथासंग्रह से ‘दीनबन्धुः श्रीनायारः’ शीर्षक कथा पाठ्यांश के रूप में संकलित है। – इस कथा के नाटक श्रीनायार का पालन-पोषण एक अनाथाश्रम में हुआ है। श्रीनायार ने अपनी कर्मदक्षता, दाक्षिण्य और सेवामनोवृत्ति से समाज में आदर्श स्थापित किया है। वे प्रतिमास अपने वेतन का आधे से अधिक भाग केरल में स्थापित अनाथाश्रम को भेजते हैं। प्रस्तुत कथा में श्रीनायार का लोककल्याणकारी आदर्श चरित्र वर्णित है।

दीनबन्धुः श्रीनायारः पाठस्य सारः

प्रस्तुत पाठ ‘दीनबन्धुःश्रीनायार:’ उड़िया भाषा के सुविख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथा संग्रह से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायणदास ने किया है। प्रस्तुत कथा के नायक श्रीनायार हैं। श्रीनायार स्वभाव से कर्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ, सेवानिष्ठ तथा परोपकारनिष्ठ महामानव हैं। श्रीनायार का पालनपोषण किसी अनाथ आश्रम में हुआ है। बड़े होकर श्रीनायार ने भी एक अनाथ आश्रम की स्थापना की है, जिसके खर्च में योगदान के लिए वे प्रतिमास अपने वेतन का आधे से भी अधिक भाग मनीआर्डर से भेज देते हैं। कथा का सारांश इस प्रकार है

श्रीनायार केन्द्र सरकार से स्थानान्तरित होकर उड़ीसा सरकार के अधीन कार्यरत हैं। श्रीनायार को कार्य करते हुए तीन वर्ष हो चुके हैं परन्तु इस बीच उन्होंने कभी भी अपने राज्य केरल जाने की इच्छा प्रकट नहीं की। वे उड़ीसा सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग में सचिव पद पर नियुक्त हैं। श्रीनायार की ईमानदारी और कर्मनिष्ठा से इस विभाग की कार्यनिपुणता दस गुणा बढ़ गई है। खाद्य सामग्री में मिलावट नाम मात्र रह गई है। उपभोक्ता पूरी तरह सन्तुष्ट हैं इसीलिए न्यायालय में विभाग के विरुद्ध कोई मुकद्दमा भी नहीं है। – श्रीनायार अपने अधीन कार्य करने वाले कर्मचारियों के साथ बड़े प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हैं। वे थोड़ा बोलते हैं और

अपने कार्य में लगे रहते हैं। हर महीने के पहले दिन वे अपने वेतन का आधे से अधिक भाग मनीआर्डर द्वारा भेज देते हैं। जिससे अनुमान होता है कि केरल के साथ इनका कोई संबंध है। कभी-कभी मलयालम भाषा में कोई पत्र आ जाता है। इस पत्र के अतिरिक्त कभी अन्य कोई पत्र श्रीनायार के पास नहीं आता। अचानक एक दिन विचित्र घटना घटती है कि श्रीनायार के हाथ में एक पत्र है। वे उसे पढ़ रहे हैं और उनकी आँखों से टपकते आँसुओं से पत्र भीगा जा रहा है। तभी एक क्लर्क श्रीदास का प्रवेश होता है। श्रीनायार उसे ‘दायित्व हस्तांतरण पत्र’ तैयार करने के लिए कहते हैं और उसे यह भी बताते हैं कि मेरे वापस लौट जाने का समय आ गया है। यदि किसी के साथ अनजाने में कोई दुर्व्यवहार हुआ हो तो मेरी ओर से क्षमायाचना कर लेना। इसके बाद विभाग के सभी कर्मचारियों ने श्रीनायार को भावभीनी विदाई दी।

श्रीनायार को केरल गए हुए तीन दिन बीत गए हैं। कार्यालय में एक पत्र आता है क्लर्क श्रीदास उत्सुकतावश पत्र खोलता है, जिसकी लेखिका सुश्री मेरी हैं। जिनके पास श्रीनायार प्रतिमास धनादेश भेजते थे। सुश्री मेरी ने पत्र में श्रीनायार को संबोधित करते हुए लिखा था कि उसका जीवनदीप बुझने वाला है। तुम्हारे द्वारा स्थापित अनाथ आश्रम अब बहुत बड़ा वृक्ष बन गया है, जिसमें सौ से अधिक अनाथ बच्चे पल रहे हैं। यह तुम्हारा आश्रम तुम्हारे हाथों में सौंप कर वह भगवान् यीशू की शरण में जाना चाहती है। इस कथा में श्रीनायार के सेवा भाव उदारता तथा कर्मनिष्ठा को बहुत ही सुन्दर शैली में चित्रित किया गया है।

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

HBSE 12th Class Sanskrit कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम्
(क) सायं समये भगवान् भास्कर: कुत्र जिगमिषुः भवति ?
(ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः कीदृशः भवति ?
(ग) नीडेषु के प्रतिनिवर्तन्ते ?
(घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं किं स्थानं प्रयाति स्म ?
(ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां कानि कलयन्ति ?
(च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषम् कीदृशमासीत् ?
(छ) मेघमाला कथं शोभते ?
उत्तरम्
(क) सायं समये भगवान् भास्करः अस्तं जिगमिषुः भवति।
(ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः अरुणः भवति।
(ग) नीडेषु कलविङ्काः प्रतिनिवर्तन्ते।
(घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं तोरणदुर्गं प्रयाति स्म।
(ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां वनानि कलयन्ति।
(च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषं राजतसूत्रितम्, बहुल-चाकचक्यम्, वक्रम्, हरितवर्णं च आसीत्।
(छ) मेघमाला दीर्घशुण्डमण्डितानां दिग्गजानां दन्तावला: इव भयानकाकारा शोभते।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

2. समीचीनोत्तरसख्यां कोष्ठके लिखत
अ. शिवराजविजयस्य रचयिता कः अस्ति ? ( )
(क) बाणभट्टः
(ख) श्रीहर्षः
(ग) अम्बिकादत्तव्यासः
(घ) माघः
उत्तरम्:
(ग) अम्बिकादत्तव्यासः

आ. कतिवर्षदेशीयो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म। ( )
(क) चतुर्दशवर्षदेशीयः
(ख) द्वादशवर्षदेशीयः
(ग) पञ्चदशवर्षदेशीयः
(घ) षोडशवर्षदेशीयः
उत्तरम्:
(घ) षोडशवर्षदेशीयः

इ. शिववीरस्य विश्वासपात्रं किम् आदाय तोरणदुर्गं प्रयाति ? ( )
(क) संवादम् आदाय
(ख) पत्रम् आदाय
(ग) पुष्पगुच्छम् आदाय
(घ) अश्वम् आदाय
उत्तरम्:
(ख) पत्रम् आदाय

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3. रिक्तस्थानानि पूरयत।
(क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला ……………. प्रादुरभूत्।
(ख) क्षणे क्षणे …………….खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति।
(ग) पदे पदे ……………. वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति।
(घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ ……………. निजकार्यान्न विरमति।
उत्तरम्:
(क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणी: इव प्रादुरभूत्।
(ख) क्षणे क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति।
(ग) पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति।
(घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरः निजकार्यान्न विरमति ।

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4. अधोलिखितानां पदानाम् अर्थान् विलिख्य वाक्येषु प्रयुञ्जत
भास्करः मेघमाला, वनानि, मार्गः वीरः, गगनतलम्, झञ्झावातः मासः, सायम्।
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगः)
(क) भास्करः (सूर्यः)-पूर्वदिशायां भास्कर: उदयति।
(ख) मेघमाला (मेघसमूहः)-मेघमाला आकाशम् आच्छादयति।
(ग) वनानि (अरण्यानि)-नगरं परितः वनानि सन्ति ।
(घ) मार्गः (पन्थाः)-महान्धकारे मार्गः न अवलोक्यते।
(ङ) वीरः (वीर्यवान्)-युद्धे वीरः एव जयति।।
(च) गगनतलम् (आकाशतलम्)-रात्रौ अन्धकारः गगनतलम् आच्छादयति।
(छ) झञ्झावातः (वात्याचक्रम्, ‘तूफान’ इति हिन्दीभाषायाम्)-सहसा झञ्झावातः प्रादुरभवत्।
(ज) मासः (‘महीना’ इति हिन्दी भाषायाम्)-मासोऽयम् आषाढः।
(झ) सायम् (सन्ध्यासमय:)-सायं समये भगवान् भास्करः अस्तं गच्छति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

5. अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कृत्वा सन्धिनिर्देशं कुरुततस्यैव, शिखराच्छिखराणि, कोऽपि, प्रादुरभूत्, अथाकस्मात्, कार्यान्न।
(क) तस्यैव . = न + एव
(ख) शिखराच्छिखराणि = शिखरात् + शिखराणि
(ग) कोऽपि = कः + अपि
(घ) प्रादुरभूत् = प्रादुः + अभूत्
(ङ) अथाकस्मात् = अथ + अकस्मात्
(च) कार्यान्न = कार्यात् + न ।

6. अधोलिखितानां पदानां प्रकृतिप्रत्ययविभागं प्रदर्शयत
प्रयुक्तः, उत्थितः, उत्प्लुत्य, रुतैः, उपत्यकातः, उत्थितः, ग्रस्यमानः ।
उत्तरम्:
(क) प्रयुक्तः = प्र + √युज् + क्त (पुंल्लिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्)
(ख) उत्थितः = उत् + /स्था + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ग) उत्प्लुत्य = उत् + प्लुि + ल्यप् (अव्यय)
(घ) रुतैः रु + क्त। (नपुंसकलिङ्गम्, तृतीया-एकवचनम्)
(ङ) उपत्यकातः उपत्यका + तसिल > तस् (अव्ययपदम्)
(च) ‘ग्रस्यमानः √ग्रस् (कर्मवाच्ये) + शानच् (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)

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7. अलकारनिर्देशं कुरुत
(1) वदनाम्भोजेन
(2) दिगन्तदन्तावलः
(3) सिन्दूरद्रवस्नातानामिव वरुणदिगवलम्बिनाम् ।
उत्तरम्:
(षष्ठी-तत्पुरुषः) – (कर्मधारयः) (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(कर्मधारयः) (षष्ठी-तत्पुरुषः) (तृतीया-तत्पुरुषः)
(1) वदनाम्भोजेन – रुपकः अलङ्कारः
(2) दिगन्तदन्तावल: – अनुप्रासः अलङ्कारः
(3) सिन्दूरद्रवस्नातामिव वरुणदिगवलम्बिनाम्-उत्प्रेक्षा अलङ्कारः

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8. विग्रहवाक्यं विलिख्य समासनामानि निर्दिशत
मेघमाला, महान्धकारः, पवर्तश्रेणी:, महोत्साहः, विश्वासपात्रम्, हरितोष्णीषशोभितः ।
उत्तरम्:
(क) मेघमाला = मेघानां माला
(ख) महान्धकारः = महान् अन्धकारः
(ग) पर्वतश्रेणीः . = पर्वतानां श्रेणी:
(घ) महोत्साहः = महान् उत्साहः
(ङ) विश्वासपात्रम् = विश्वासस्य पात्रम्
(च) हरितोष्णीषशोभितः = हरितेन उष्णीषेण शोभितः

9. पाठ्यांशस्य सारं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत
उत्तरम्:
पाठ का सार पहले दिया जा चुका है, वहीं देखें।

10. पाठ्यांशे प्रयुक्तानि अव्ययानि चित्वा लिखत
उत्तरम्:
च (और)
सायम् (सायंकाल)
इव (की तरह, मानो)
अथ (इसके बाद, फिर)
अकस्मात् (अचानक)
परितः (चारों ओर)
परतः (दूसरी ओर)
ततः (उसके बाद)
उपर्युपरि (ऊपर-ऊपर)
एव (ही)
अपि (भी)
तावत् (तभी)
अकस्मात् (अचानक)
पुनः (फिर)
इति (यहाँ, इस विषय में)
न (नहीं)
परम् (परन्तु)
वा (अथवा, या)
इति (यह, इसप्रकार)
प्रतिक्षणम् (पल-पल)
आदाय (लेकर)
पर्वतश्रेणीतः (पर्वतश्रेणी से)
अधित्यकातः (अधित्यका से)
उपत्यकातः (उपत्यका से)

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योग्यताविस्तारः

शिवाजी इत्यस्य कथामाधारीकृत्य संस्कृते, अन्यासु भारतीय-भाषासु च लिखितानां कथानकानां ग्रन्थानां वा सूचना . संग्रहीतव्या। तद्यथा संस्कृते ‘श्रीशिवराज्योदय’ नाम महाकाव्यम् अस्ति।

द्वादशमासानां नामानि ज्ञेयानि, अस्मिन् पाठे कस्य मासस्य वर्णनं कृतम्, तेन कथाप्रसङ्गे कः विशेषः समुत्पन्न इति निरूपणीयम्। अस्मिन् पाठे निसर्गस्य (प्रकृतेः) कीदृशं स्वरूपं चित्रितम्, तस्माच्च घटनाचक्रं कथं परिवर्तते इति प्रतिपादनीयम्।

HBSE 9th Class Sanskrit कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) सायं समये भगवान् भास्कर: कुत्र जिगमिषुः भवति ?
(A) गङ्गायाम्
(B) समुद्रम्
(C) अस्तम्
(D) उदयम्।
उत्तराणि:
(B) अस्तम्

(ii) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः कीदृशः भवति ?
(A) अरुणः
(B) हरितः
(C) श्वेतः
(D) पीतः।
उत्तराणि:
(A) अरुणः

(iii) नीडेषु के प्रतिनिवर्तन्ते ?
(A) गर्दभाः
(B) अश्वाः
(C) गजाः
(D) कलविकाः
उत्तराणि:
(D) कलविङ्काः

(iv) शिववीरस्य विश्वासपात्रं किं स्थानं प्रयाति स्म ?
(A) वनानि
(B) चित्राणि
(C) भवनानि
(D) भुवनानि।
उत्तराणि:
(A) वनानि।

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II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) अकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणी: इव प्रादुरभूत्।
(A) कया
(B) केन
(C) का
(D) कम्।
उत्तराणि:
(C) का

(ii) क्षणे क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति।
(A) कस्य
(B) कया
(C) कस्मात्
(D) कस्मिन्।
उत्तराणि:
(A) कस्य

(iii) पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति।
(A) काः
(B) कीदृश्यः
(C) कति
(D) के।
उत्तराणि:
(B) कीदृश्यः

(iv) कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरः निजकार्यान्न विरमति।
(A) कस्मात
(B) कस्याः
(C) कस्मिन्
(D) कः।
उत्तराणि:
(D) कः।

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कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् पाठ्यांशः

1. मासोऽयमाषाढः, अस्ति च सायं समयः, अस्तं जिगमिषुर्भगवान् भास्करः सिन्दूर-द्रव-स्नातानामिवं वरुण-दिगवलम्बिनामरुण-वारिवाहानामभ्यन्तरं प्रविष्टः। कलविकाश्चाटकैर-रुतैः परिपूर्णेषु नीडेषु प्रतिनिवर्तन्ते। वनानि प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां कलयन्ति। अथाकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणीव प्रादुरभूत्, क्षणं सूक्ष्मविस्तारा, परतः प्रकटित-शिखरि-शिखर-विडम्बना, अथ दर्शित-दीर्घ-शुण्डमण्डित-दिगन्तदन्तावल-भयानकाकारा ततः पारस्परिक-संश्लेष-विहित-महान्धकारा च समस्तं गगनतलं पर्यच्छदीत्।

हिन्दी-अनुवादः आषाढ़ का महीना है। सायं का समय है। अस्त होने की इच्छा वाला भगवान् भास्कर (सूर्य देव) सिन्दूर के घोल में स्नान-सा किए हुए, वरुण-दिशा (पश्चिम-दिशा) का आश्रय लिए हुए जलवाहक बादलों में प्रविष्ट हो रहा है। गौरैया पक्षी अपने शिशुओं की चहचहाचट से परिपूर्ण घोंसलों में वापस लौट रहे हैं। वन प्रतिक्षण अधिक और अधिक कालेपन को प्राप्त हो रहे हैं। तभी अकस्मात् चारों ओर मेघ माला पर्वत शृंखला की तरह प्रकट हो गई। क्षण भर में ही उन बादलों का सूक्ष्म विस्तार हो गया। मेघमाला ने किसी दूसरे ही पर्वत शिखर का सा रूप धारण कर लिया और वह मेघमाला लम्बी-लम्बी सैंडों से सुशोभित दिग्गजों की सुन्दर दन्तावली के समान भयानक आकार वाली हो गई। फिर बादलों के परस्पर मिल जाने से उत्पन्न घोर अन्धकार ने सम्पूर्ण आकाशमण्डल को पूरी तरह से ढक लिया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – जिगमिषुः = जाने के इच्छुक। √गम् + सन् + उ, इच्छार्थक ‘सन्’ प्रत्यय। सिन्दूरद्रवस्नातानाम् = सिन्दूर के घोल से स्नान किए हुए। स्नातानाम् = √ष्णा > स्ना (शौचे) + क्त प्रत्यय। षष्ठी विभक्ति बहुवचन । वरुणदिक् = पश्चिमदिशा। वरुणस्य दिक्। वरुणदेव को पश्चिम दिशा का अधिपति माना जाता है। वरुणदिगवलम्बिनाम् = पश्चिम दिशा का आश्रय लेने वाले। वरुणदिशः अवलम्बनं शीलं येषां ते, तेषाम्। अव + √लम्ब् + इन् प्रत्यय। अरुणवारिवाहानाम् = लालिमायुक्त बादलों के, अरुणाश्च ते वारिवाहाश्च, तेषाम्। वारि वहन्ति इति वारिवाहाः = मेघाः । कलविकाः = पक्षी (गौरैया)। चाटकैरः = पक्षिशावकों के द्वारा। चटकस्य अपत्यं चाटकैरः। चटका + एरच प्रत्यय। गौरैया का बच्चा। प्रतिक्षणम् = पल-पल। क्षणं क्षणम् = प्रतिक्षणम् (अव्ययीभाव समास)।

नीडेषु = घोंसलों में। नपुंसकलिङ्ग, सप्तमी बहुवचन। श्यामताम् = कालेपन को। श्यामस्य भावः = श्यामता। भावार्थ में तल्’ प्रत्यय। श्याम + तल्। कलयन्ति = प्राप्त करते हैं। √किल् (गतौ सङ्ख्याने च) + णिच्, लट्लकार प्रथम पुरुष, बहुवचन। चुरादिगण। अथ = अनन्तरम्। अव्यय। दर्शितदीर्घशुण्डमण्डित = लम्बी-लम्बी सूंडों से सुशोभित दिग्गजों के समान दिगन्तदन्तावलभयानकाकारा = भयानक आकार वाली (मेघमाला)। दीर्घश्चासौ शुण्डश्च = दीर्घशुण्डः । दर्शितश्चातो दीर्घशुण्डश्च। दर्शितदीर्घशुण्डः । दर्शितदीर्घशुण्डेन मण्डितः। दिशाम् अन्ताः दिगन्ताः। शोभनौ दन्तौ अस्य इति दन्तावलः। दिगन्ता एव दन्तावला: दिगन्तदन्तावलाः । दीर्घशुण्डमण्डिताश्च ते दिगन्तदन्तावलाश्च दर्शितदीर्घशुण्डमण्डितदिगन्तदन्तावलाः। भयानकश्च असौ आकारश्च भयानकाकारः। दर्शितदीर्घशुण्डमण्डितदिगन्त-दन्तावला इव भयानकाकारः यस्या सा (मेघमाला)।

प्रकटितशिखरिशिखरविडम्बना = पर्वत शिखरों का अनुकरण करने वाली (मेघमाला)। शिखरिणां शिखराणि शिखरिशिखराणि। शिखरिशिखराणां विडम्बनम् = शिखरिशिखरविडम्बनम्। प्रकटितं शिखरिशिखर-विडम्बनं यया सा (मेघमाला)। मेघमाला समस्तं गगनतलं परितः पर्यच्छदीत् = मेघमाला ने समस्त गगन मण्डल को आच्छादित कर लिया। ‘परितः’ अव्यय के प्रयोग से ‘गगनतलं’ और ‘समस्तं’ पदों में द्वितीया विभक्ति हुई है-‘अभितः परितः समयानिकषाहाप्रतियोगेऽपि’ इस अनुशासन से। परितः = चारों ओर। प्रादुरभूत् = प्रकट हुई। प्रादुस् + √भू + लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन। पारस्परिकसंश्लेषण = (बादलों के) परस्पर मिल जाने से। पर्यच्छदीत् = ढक लिया है। (व्याप्त हो गई)। परि + अच्छदीत्। √छद् (संवरणे) लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

2. अस्मिन् समये एकः षोडशवर्ष-देशीयो गौरो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म। एष सुघटितदृढशरीरः श्याम-श्यामैर्गुच्छ-गुच्छैः कुञ्चित-कुञ्चितैः कच-कलापैः कमनीय-कपोलपालिः दूरागमनायासवशेन सूक्ष्ममौक्तिक-पटलेनेव स्वेदबिन्दु-व्रजेन समाच्छादित-ललाट-कपोल-नासाग्रोत्तरोष्ठः प्रसन्न-वदनाम्भोज-प्रदर्शितदृढसिद्धान्त-महोत्साहः, राजतसूत्र-शिल्पकृत-बहुल-चाकचक्य-वक्र-हरितोष्णीष-शोभितः, हरितेनैव च कञ्चुकेनव्यूढगूढचरता-कार्यः, कोऽपि शिववीरस्य विश्वासपात्रं सिंहदुर्गात् तस्यैव पत्रमादाय तोरणदुर्गं प्रयाति।
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हिन्दी-अनुवादः इसी समय लगभग सोलह वर्ष की आयु वाला एक गोरा युवक घोड़े से पर्वत शृंखला के ऊपर-ऊपर जा रहा था। इसका अच्छा गठा हुआ शरीर था। काले-काले, गुच्छेदार, घुघराले केश समूह से उसकी गालें सुशोभित हो रही थी। दूर से आने के परिश्रम से छोटे-छोटे मोतियों के समूह की भाँति पसीने की बूंदों से उसका ललाट, कपोल, नासिक का अग्रभाग तथा ऊपरी होंठ व्याप्त था। प्रसन्न मुख कमल से जिसके दृढ़ सिद्धान्त का उत्साह प्रकट हो रहा था। वह चाँदी के तार की कढ़ाई के कारण अत्यधिक चमकने वाली एक टेढ़ी बँधी हुई हरी पगड़ी से सुशोभित था। हरे रंग के कुर्ते से ही जिसने गुप्तचर का कार्य स्वीकार हुआ था। इस प्रकार का कोई शिवाजी का विश्वासपात्र (सैनिक) सिंहदुर्ग से उसी (शिवाजी) का पत्र लेकर तोरणदुर्ग की ओर प्रस्थान कर गया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च षोडशवर्षदेशीयः = लगभग सोलह वर्ष का। ‘लगभग’ इस अर्थ में ‘कल्पप्’, ‘देश्य’ या ‘देशीयर्’ प्रत्यय लगते हैं। यहाँ देशीयर’ प्रत्यय लगा है। षोडशवर्ष + देशीयर् । कुञ्चितकुञ्चितैः = घुघराले। कुञ्च् (गति-कौटिल्यालपीभावेषु) + क्त प्रत्यय। कचकलापैः = केश समूहों के द्वारा । कचानां कलापाः तैः । कमनीयकपोलपालिः = सुन्दर गालों वाला। कमनीये कपोलपाली यस्य सः /कम् (कान्तौ) + अनीयर् प्रत्यय । हयेन = घोड़े से। स्वेदबिन्दुव्रजेन = पसीने की बूंदों से। स्वेदबिन्दूनां व्रजः तेन। समाच्छादितललाट-कपोल-नासाग्रोत्तरोष्ठः = जिसका ललाट, कपोल, नासिका का अग्रभाग तथा ऊपरी ओंठ (पसीने की बूंदों से) व्याप्त है। ललाटश्च कपोलश्च नासाग्रश्च उत्तरोष्ठश्च = लालटकपोलनासाग्रोत्तरोष्ठम् (समास में एकवचन होना विशेष है) समाच्छादितं ललाटकपोलनासाग्रोत्तरोष्ठं यस्य सः बहुव्रीहि समास। प्रसन्नवदनाम्भोजेन =

प्रसन्नमुखकमल से। प्रसन्नवदनाम्भोजप्रदर्शित-दृढसिद्धान्तमहोत्साहः = प्रसन्न मुख कमल से दृढ सिद्धान्त के महोत्साह को प्रकट करने वाला। राजतसूत्रशिल्पकृतबहुल-चाकचक्यवक्रहरितोष्णीषशोभितः = चाँदी के तार की कढाई (शिल्प) के कारण अत्यधिक चमकने वाली तथा टेढ़ी बँधी हुई हरी पगड़ी से सुशोभित। राजतसूत्रस्य शिल्पेन कृतं बहुलं चाकचक्यं यस्य तथाभूतं वक्रं हरितं च यत् उष्णीषम्, तेन शोभितः, बहुव्रीहि समास। आदाय = लेकर। आ + √दा + ल्यप् प्रत्यय। प्रयाति = जाता है। प्र + √या (प्रापणे) + लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन।

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3. तावदकस्मादुत्थितो महान् झञ्झावातः, एकः सायंसमयप्रयुक्तः स्वभाव-वृत्तोऽन्धकारः, स च द्विगुणितो मेघमालाभिः। झञ्झावातोद्भूतैः रेणुभिः शीर्णपत्रैः कुसुमपरागैः शुष्कपुष्पैश्च पुनरेष द्वैगुण्यं प्राप्तः। इह पर्वतश्रेणीतः पर्वतश्रेणीः, वनाद् वनानि, शिखराच्छिखराणि प्रपातात् प्रपातान्, अधित्यकातोऽधित्यकाः, उपत्यकात उपत्यकाः, न कोऽपि सरलो मार्गः, नानुद्भदिनी भूमिः, पन्थाः अपि च नावलोक्यते।

हिन्दी-अनुवादः तभी बड़ा भारी अचानक तूफान उठा। एक तो सांय के समय में होने वाला स्वाभाविक अन्धकार, वह भी बादलों के समूह के कारण दोगुणा हो गया। तूफान से उठी हुई धूलियों, पुराने पत्रों, पुष्पपरागों तथा सूखे पत्तों से (यह अन्धकार) फिर से दुगना हो गया। इधर एक पर्वत शृंखला के बाद दूसरी पर्वत शृंखला पर, एक वन के बाद दूसरे वन में, एक शिखर के बाद दूसरे शिखर पर, एक झरने बाद दूसरे झरने पर, एक अधित्यका (पर्वत के ऊपर की ऊँची भूमि) के बाद दूसरी अधित्यका पर, एक उपत्यका (पर्वत के पास वाली निचली भूमि) के बाद दूसरी उपत्यका पर (जहाँ) कोई सरल मार्ग नहीं, कोई समतल भूमि नहीं और रास्ता भी दिखाई नहीं पड़ रहा है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च झञ्झावातोद्भूतैः = आँधी से उठी। झञ्झावातेन उद्धृतैः । उत् + √धू (कम्पने) क्त प्रत्यय। रेणुभिः= धूलों से। द्वैगुण्यम् = दुगना हो गया। द्विगुणस्य भावः। द्विगुण + ष्यञ्। अनुइँदिनी = समतल। न + उभेदिनी। न + उद् + √भिद् + इन् + डीप् प्रत्यय। प्रपातात् प्रपाता = झरने के बाद झरने। अधित्यकातोऽधित्यकाः = अधित्यका (पर्वत के ऊपर की ऊँची भूमि) के बाद अधित्यकाएँ। उपत्यकात उपत्यकाः = पर्वत के पास की नीची भूमि। उपत्यका के बाद उपत्यकाएँ। दोधूयमानाः = अत्यधिक हिलने वाले। पुनः पुनः अत्यधिकं कम्पमानाः । √धूञ् + यङ् + शानच् प्रत्यय। आघातः = अभिघात। चोट। आ + हिन् + क्त प्रत्यय। महान्धतमसेन = अत्यन्त अन्धकार से। अकारान्त नपुंसक शब्द है। अन्धयति इति अन्धम्। अन्धं च तत् तमश्च। अन्धतमसम्। महच्च तत् अन्धतमसं च महान्धतमसम्, तेन। कवलीकृतम् = ग्रसित होता हुआ। अकवलं कवलं सम्पद्यमानं कृतं कवलीकृतम्। कवल + च्चि + कृतम्। आनन्ति = आ + √हन् + लट्लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन। सादी = घुड़सवार।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

4. क्षणे-क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कण-पाषाण-खण्डेषु प्रस्खलन्ति। पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमानन्ति, परं दृढसड्कल्पोऽयं सादी (अश्वारोही) न स्वकार्याद् विरमति। परितः स-हडहडाशब्दं दोधूयमानानां परस्सहस्त्र-वृक्षाणां, वाताघात-संजात-पाषाण-पातानां प्रपातानाम्, महान्धतमसेन ग्रस्यमानानामिव सत्त्वानां क्रन्दनस्य च भयानकेन स्वनेन कवलीकृतमिव गगनतलम्। परं “देहं वा पातयेयं कार्यं वा साधयेयम्” इति कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरो निजकार्यान्न विरमति।

हिन्दी-अनुवादः क्षण-क्षण भर में घोड़े के खुर चिकने पत्थर-खण्डों पर फिसल रहे हैं। पग-पग पर झुलती हुई वृक्ष-शाखाएँ सामने से आघात (प्रहार) करती हैं। परन्तु यह दृढ़ संकल्प वाला घुड़सवार अपने कार्य से रुक नहीं रहा है। चारों ओर हड़हड़ शन के साथ बार-बार झूलते हुए हजारों वृक्षों तूफान की चोट से गिरने वाले पत्थरों से युक्त झरनों तथा घोर अन्धकार से ग्रसे जाते हुए से वन्यप्राणियों की चीख के भयानक शब्द से सम्पूर्ण आकाशमण्डल ही मानो ग्रस लिया गया था। परन्तु ‘कार्य सिद्ध करूँगा यां शरीर को नष्ट कर दूंगा’-ऐसी प्रतिज्ञावाला वह शिवाजी सैनिक अपने कार्य से रुक नहीं रहा है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – चिक्कणपाषाणखण्डेषु = चिकने पत्थर खण्डों पर। साधयेयम् = सिद्ध करूँगा। √साध् (संसिद्धौ) + णिच् प्रत्यय + लिङ्लकार उत्तम पुरुष एकवचन। पातयेयम् = नष्ट कर दूंगा। √पत् (गतौ) + णिच् प्रत्यय। लिङ्लकार उत्तम पुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

कार्य वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् (कार्य सिद्ध करुंगा या देह का त्याग कर दूंगा) Summary in Hindi

कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् पाठ परिचय

पं० अम्बिकादत्त व्यास (1858-1900 ईस्वी) आधुनिक युग के संस्कृत लेखकों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। हिन्दी और संस्कृत में इनकी लगभग 75 रचनाएँ मिलती हैं। इन सभी में ‘शिवराजविजयः’ नामक ऐतिहासिक उपन्यास इनकी श्रेष्ठतम रचना है। यह उपन्यास 1901 ईस्वी में प्रकाशित हुआ था।

शिवराजविजय शिवाजी और औरंगजेब की प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। शिवाजी इस उपन्यास के नायक हैं, जो भारतीय आदर्शों, संस्कृति, सभ्यता और मातृशक्ति के रक्षक के रूप में चित्रित किए गए हैं। शिवाजी और उनके सैनिकों की दृढ़ प्रतिज्ञा है-‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्’-कार्य सिद्ध करूँगा या देह का त्याग कर दूंगा।

गद्य काव्य की दृष्टि से शिवराजविजय एक उत्कृष्ट रचना है। इनकी भाषा की एक विशेषता है कि इनकी भाषा सदा भावों के अनुसार प्रयुक्त होती है। सरस प्रसंगों में ललित पदावली और वैदर्भी शैली का प्रयोग हुआ है। करुणा भरे प्रसंगों में प्रत्येक शब्द आँसुओं से भीगा हुआ मिलता है। वीर रस के प्रसंग में भाषा ओजस्विनी हो जाती है और पाठक की भुजाएँ फड़कने लगती हैं। रस और अलंकारों का सुन्दर सामंजस्य है। सभी वर्णन स्वाभाविकता से ओत-प्रोत हैं। बाण और दण्डी के गद्य की सभी विशेषताएँ व्यास जी के गद्य में मिलती हैं।

‘शिवराजविजयः’ उपन्यास में तीन विराम हैं तथा प्रत्येक विराम में चार निःश्वास हैं। कुल 12 निःश्वास हैं। प्रस्तुत पाठ ‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्’ इसी ऐतिहासिक उपन्यास के प्रथम विराम के चतुर्थ निःश्वास से संकलित है। इस अंश में शिवाजी का एक विश्वासपात्र एवं कर्मठ गुप्तचर ‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातेययम्’ वाक्य द्वारा अपना दृढ़ संकल्प प्रकट करता है, जिसका तात्पर्य है-‘कार्य सिद्ध करूँगा या देह का त्याग कर दूंगा।’

कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् पाठस्य सारः

प्रस्तुत पाठ ‘कार्यं वा साधेययम् देहं वा पातयेयम्’ संस्कृत के आधुनिक गद्यकार पं० अम्बिकादत्त व्यास के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास ‘शिवराजविजयः’ के प्रथम विराम के चतुर्थ निःश्वास से संकलित है। इस पाठ्यांश में शिवाजी का एक विश्वासपात्र गुप्तचर ‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्’–‘कार्य सिद्ध करूँगा या देह त्याग कर दूंगा’-इस दृढ़ संकल्पपूर्वक सिंह दुर्ग से शिवाजी का पत्र लेकर तोरण दुर्ग की ओर प्रस्थान करता है। मार्ग में भयंकर प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं, परन्तु वीर सैनिक अपनी कार्यसिद्धि करके ही विश्राम लेता है।

आषाढ़ का महीना है। सायं का समय है। सूर्य अस्त हो रहा है। गौरैया पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे हैं। प्रकाश के अभाव में वन वृक्ष और भी काले हुए जा रहे हैं। तभी अचानक आकाश बादलों से ढक जाता है। चारों ओर धरती से आकाश तक घोर अन्धकार का साम्राज्य हो जाता है। बादल ऐसे भयावह लग रहे हैं। मानों वे कोई लम्बीलम्बी सूंड वाले दिग्गज हों और उनका विशाल दन्तसमूह उन्हें भयानक आकार दे रहा हो।

इसी समय लगभग सोलह वर्ष की आयु वाला गौरवर्ण युवक (गौरसिंह) घोड़े पर सवार होकर पर्वतों को पार करता हुआ जा रहा है। इसका गठा हुआ शरीर है, काले-धुंघराले बाल हैं, सुन्दर मुखमण्डल परिश्रम के कारण पसीने से नहाया हुआ है। कमल की भाँति खिले हुए मुख से उसका दृढ़ उत्साह प्रकट हो रहा है। उसकी हरे रंग की पगड़ी में चाँदी के तारों से कढ़ाई की हुई है। हरे रंग का कुर्ता है। शिवाजी का अत्यन्त विश्वासपात्र यह गुप्तचर सिंहदुर्ग से शिवाजी का ही पत्र लेकर तोरणदुर्ग की ओर प्रस्थान कर रहा है।

तभी अचानक भयंकर तूफान उठता है। बादलों की घटाएँ, तूफान से उठी धूल तथा सूखे पत्ते मिलकर सायंकाल • के अन्धकार को कई गुणा कर देते हैं। पर्वत, जंगल, पानी के झरने, पर्वतों के शिखर और तलहटियाँ, ऊबड़-खाबड़ भूमि, कोई सीधा सरल मार्ग नहीं, कोई समतल भूमि नहीं, इन सबसे बढ़कर घोर अंधकार जिसमें वह भयंकर रास्ता
भी दिखाई नहीं पड़ता। थोड़ी-थोड़ी देर बाद चिकने पत्थरों से घोड़ों के खुर टकराकर फिसल जाते हैं। पग पर वृक्षों की झूलती हुई शाखाएँ सामने से आ टकराती हैं, परन्तु शिवाजी का यह वीर सैनिक अपने कार्य से विराम नहीं लेता।

चारों ओर से हड़-हड़ की आवाज़ के साथ हज़ारों वृक्षों, तूफान से टकराकर झरनों में गिरने वाले पत्थरों तथा घने अन्धकार का ग्रास बन रहे वन्यप्राणियों के चीत्कार से सारा आकाश व्याप्त है। परन्तु शिवाजी का यह दृढ़प्रतिज्ञ गुप्तचर अपने कार्य से न रुका। ‘कार्यं वा साधयेयम् , देहं वा पातयेयम्’-‘कार्य सिद्ध करूँगा या देह का त्याग कर दूंगा।’ शिवाजी के इस दृढ़ संकल्प को अपना संकल्प बनाते हुए इस वीर सैनिक ने कार्य सिद्ध करके ही विश्राम लिया। इस अंश की भाषा एवं शब्दावली भावों के अनुरूप ओजस्विनी है। पाठ्यांश का स्पष्ट सन्देश है-निर्भयतापूर्वक कठोर परिश्रम ही सफलता की कुञ्जी है।

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HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए

1. पूर्ण प्रतियोगिता उस दशा में पाई जाती है, जब प्रत्येक उत्पादन उपज की माँग
(A) अत्यधिक लोचदार होती है
(B) पूर्णतया लोचदार होती है
(C) पूर्णतया बेलोचदार होती है
(D) कम. बेलोचदार होती है
उत्तर:
(B) पूर्णतया लोचदार होती है

2. पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में कीमत समान रहती है, अतः AR रेखा की आकृति-
(A) U आकृति होती है
(B) आकृति होती है
(C) मूल बिंदु से 45° का कोण बनाती हुई सीधी रेखा होती है
(D) X-अक्ष के समानांतर होती है
उत्तर:
(D) X-अक्ष के समानांतर होती है

3. किस प्रकार के बाज़ार में एक फर्म कीमत स्वीकारक होती है?
(A) पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में
(B) एकाधिकार बाज़ार में
(C) एकाधिकारी प्रतिस्पर्धी बाज़ार में
(D) अल्पाधिकार बाज़ार में
उत्तर:
(A) पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

4. पूर्ण प्रतियोगिता (प्रतिस्पर्धा) में वस्तु की कीमत का निर्धारण-
(A) अकेली वस्तु की माँग करती है
(B) अकेली वस्तु की पूर्ति करती है
(C) वस्तु की माँग और पूर्ति दोनों द्वारा होता है
(D) सरकार द्वारा किया जाता है
उत्तर:
(C) वस्तु की माँग और पूर्ति दोनों द्वारा होता है

5. फर्मों के निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन के कारण-
(A) फर्मे अधि-सामान्य लाभ अर्जित करती हैं
(B) फळं हानि उठाती हैं
(C) फर्मे सामान्य लाभ अर्जित करती हैं
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) फर्मे सामान्य लाभ अर्जित करती हैं

6. सही समीकरण चुनिए-
(A) TR = \(\frac { AR }{ Q }\)
(B) AR = \(\frac { MR }{ Q }\)
(C) MR = \(\frac{\Delta \mathrm{TR}}{\Delta \mathrm{Q}}\)
(D) AR = TR x Q
उत्तर:
(C) MR = \(\frac{\Delta \mathrm{TR}}{\Delta \mathrm{Q}}\)

7. फर्म के आगम का अर्थ है-
(A) उत्पादन की इकाइयों का मूल्य
(B) बिक्री से प्राप्त आगम
(C) बिक्री पर किया गया व्यय
(D) लागत एवं लाभ का अंतर
उत्तर:
(B) बिक्री से प्राप्त आगम

8. निम्नलिखित में से कौन-सा सत्य है?
(A) कुल आगम = बिक्री इकाइयाँ x सीमांत आगम
(B) कुल आगम = बिक्री इकाइयाँ x औसत आगम
(C) कुल आगम = कुल आगम – कुल लागत
(D) कुल आगम = कुल लागत – कुल आगम
उत्तर:
(B) कुल आगम = बिक्री इकाइयाँ – औसत आगम

9. उस स्थिति को क्या कहते हैं, जिसमें असामान्य लाभ शून्य होते हैं?
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 1
(A) लाभ-अलाभ बिंदु
(B) सम-विच्छेद बिंदु
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) और (B) दोनों

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

10. दिए गए रेखाचित्र में औसत आगम तथा सीमांत आगम वक्र किस बाज़ार में पाए जाते हैं?
(A) एकाधिकार
(B) पूर्ण प्रतियोगिता
(C) अल्पाधिकार
(D) एकाधिकारी प्रतियोगिता
उत्तर:
(B) पूर्ण प्रतियोगिता

11. दो इकाइयों की कुल आगम 100 इकाइयाँ हैं, तो औसत आगम होगी-
(A) 50
(B) 200
(C) 20
(D) 80
उत्तर:
(A) 50

12. पहली इकाई बेचने से मोहन को 20 रु० मिले, दूसरी इकाई बेचने से 16 रु० मिले। दोनों इकाइयों की औसत आगम (AR) होगी-
(A) 16 रु०
(B) 18 रु०
(C) 36 रु०
(D) 4 रु०
उत्तर:
(B) 18 रु०

13. पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में सीमांत आगम-
(A) औसत आगम के बराबर होती है
(B) औसत आगम से अधिक होती है
(C) औसत आगम से कम होती है
(D) औसत आगम के अंश के बराबर है
उत्तर:
(A) औसत आगम के बराबर होती है

14. औसत आगम (AR) के स्थिर रहने पर, MR और AR में क्या संबंध होता है?
(A) MR > AR
(B) AR < MR
(C) AR = MR
(D) AR # MR
उत्तर:
(C) AR = MR

15. औसत आगम हो सकती है-
(A) धनात्मक
(B) ऋणात्मक
(C) शून्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) धनात्मक

16. सीमांत आगम (MR) हो सकती है-
(A) धनात्मक
(B) ऋणात्मक
(C) शून्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

17. औसत आगम वक्र को कहा जाता है-
(A) माँग वक्र
(B). उत्पादन वक्र
(C) पूर्ति वक्र
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) माँग वक्र

18. पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में कीमत समान रहती है। अतः कुल आगम रेखा की आकृति निम्नलिखित में से कौन-सी होती है-
(A) X-अक्ष के समानांतर
(B) U आकृति की
(C) आकृति की
(D) मूल बिंदु से 45° का कोण बनाती हुई सीधी रेखा होती है
उत्तर:
(D) मूल बिंदु से 45° का कोण बनाती हुई सीधी रेखा होती है

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

19. जब AR वक्र सीधी रेखा में होते हैं, तब AR से Y-अक्ष पर डाले गए लंब को MR वक्र-
(A) मध्य-बिंदु पर काटती है
(B) मध्य-बिंदु से बाईं ओर काटती है
(C) मध्य-बिंदु से दाईं ओर काटती है
(D) Y-अक्ष पर ही काटती है
उत्तर:
(D) Y-अक्ष पर ही काटती है

20. उत्पादक (फर्म) का उद्देश्य क्या होता है?
(A) अधिकतम लाभ प्राप्त करना
(B) व्यापार करना
(C) सामान्य लाभ प्राप्त करना
(D) हानि से बचना
उत्तर:
(A) अधिकतम लाभ प्राप्त करना

21. संतुलन की अवस्था में एक फर्म को-
(A) आवश्यक रूप से अधिकतम लाभ मिलता है
(B) आवश्यक रूप से न्यूनतम हानि होती है
(C) अधिकतम लाभ अथवा न्यूनतम हानि कुछ भी हो सकती है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) आवश्यक रूप से अधिकतम लाभ मिलता है

22. कुल आगम और कुल लागत के अंतर को क्या कहते हैं?
(A) कुल लाभ
(B) प्रति इकाई लाभ
(C) सामान्य लाभ
(D) असामान्य हानि
उत्तर:
(A) कुल लाभ

23. लाभ की अवस्था में एक फर्म का संतुलन तभी होता है जब-
(A) कुल आगम कुल लागत से अधिक हो
(B) कुल आगम और कुल लागत बराबर हो
(C) कुल आगम कुल लागत से कम हो
(D) कुल आगम कुल लागत से अधिक हो और इनमें अधिकतम अंतर हो
उत्तर:
(D) कुल आगम कुल लागत से अधिक हो और इनमें अधिकतम अंतर हो

24. हानि की अवस्था में एक फर्म का संतुलन तभी होता है जब
(A) कुल आगम कुल लागत से कम हो
(B) कुल आगम कुल लागत से कम हो और इनमें न्यूनतम अंतर हो
(C) कुल आगम और कुल लागत बराबर हों
(D) कुल आगम कुल लागत से अधिक हो
उत्तर:
(B) कुल आगम कुल लागत से कम हो और इनमें न्यूनतम अंतर हो

25. उत्पादक संतुलन की स्थिति में MR तथा MC होते हैं-
(A) अधिक
(B) कम
(C) बराबर
(D) शून्य
उत्तर:
(C) बराबर

26. पूर्ण प्रतियोगिता की अवस्था में फर्म संतुलन की अवस्था में होगी, जब-
(A) MR = 0
(B) MC = TR
(C) MC = MR
(D) AC = AR
उत्तर:
(C) MC = MR.

27. संतुलन की स्थिति में सीमांत लागत वक्र सीमांत आगम (MR) वक्र को कहाँ से काटता है?
(A) ऊपर से
(B) नीचे से
(C) कहीं से भी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) नीचे से

28. पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म के संतुलन के लिए-
(A) सीमांत लागत और सीमांत आगम का बराबर होना आवश्यक है
(B) सीमांत लागत वक्र का सीमांत आगम वक्र को ऊपर से काटना आवश्यक है
(C) सीमांत लागत वक्र का सीमांत आगम वक्र का बराबर होना व नीचे से काटना आवश्यक है
(D) औसत आगम और औसत लागत का बराबर होना आवश्यक है
उत्तर:
(C) सीमांत लागत वक्र का सीमांत आगम वक्र का बराबर होना व नीचे से काटना आवश्यक है।

29. संलग्न रेखाचित्र में कौन-सा बिंदु फर्म का संतुलन बिंदु है?
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 2
(A) A
(B) B
(C) C
(D) D
उत्तर:
(B) B

30. संलग्न रेखाचित्र में फर्म का संतुलन किस बिंदु पर होगा?
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 3
(A) बिंदु E1 पर
(B) बिंदु E2 पर
(C) बिंदु M पर
(D) उपर्युक्त किसी बिंदु पर नहीं
उत्तर:
(B) बिंदु E2 पर

31. पूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल की अवस्था में
(A) TR = TC
(B) फर्म न्यूनतम औसत लागत पर उत्पादन करती है
(C) फर्मों को उद्योग में प्रवेश या उद्योग को छोड़ने की प्रवृत्ति नहीं होती उत्पादन(निर्गत)
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) फर्म न्यूनतम औसत लागत पर उत्पादन करती है

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

32. उद्योग में फर्मों के स्वतंत्र प्रवेश और निकासी का क्या प्रभाव पड़ता है?
(A) फर्मों के लाभों में वृद्धि
(B) फर्मों को दीर्घकाल में केवल सामान्य लाभ
(C) औसत लागत में वृद्धि
(D) फर्मों को दीर्घकाल में असामान्य हानि
उत्तर:
(B) फर्मों को दीर्घकाल में केवल सामान्य लाभ

33. फर्म को सामान्य लाभ तब उत्पन्न होते हैं, जब-
(A) AR > AC
(B) AR = AC
(C) AR < AC
(D) TR > TC
उत्तर:
(B) AR = AC

34. उत्पादन-बंद करने वाले बिंदु उस स्थिति में उत्पन्न होते हैं, जब-
(A) TR > TVC
(B) TR = TVC
(C) TR < TVC
(D) TR = Zero
उत्तर:
(B) TR = TVC

35. सम-स्तर बिंदु अथवा लाभ-अलाभ बिंदु क्या दर्शाता है?
(A) असामान्य लाभ
(B) असामान्य हानि
(C) अधिकतम लाभ
(D) न लाभ-न हानि
उत्तर:
(D) न लाभ-न हानि

36. पूर्ति से अभिप्राय है-
(A) वस्तु का स्टॉक
(B) वस्तु की उपभोग की जाने वाली मात्रा
(C) किसी कीमत पर वस्तु की बेची जाने वाली मात्रा
(D) वस्तु की उत्पादित मात्रा
उत्तर:
(C) किसी कीमत पर वस्तु की बेची जाने वाली मात्रा

37. कीमत और पूर्ति का सामान्यतया संबंध होता है-
(A) प्रत्यक्ष
(B) विलोम
(C) स्थिर।
(D) आनुपातिक
उत्तर:
(A) प्रत्यक्ष

38. पूर्ति वक्र होता है-
(A) नीचे से ऊपर दाईं ओर ढालू
(B) ऊपर से नीचे दाईं ओर ढालू
(C) Y-अक्ष के समानांतर
(D) X-अक्ष के समानांतर
उत्तर:
(A) नीचे से ऊपर दाईं ओर ढालू

39. कीमत के घटने पर पूर्ति-
(A) बढ़ती है
(B) घटती है
(C) स्थिर रहती है
(D) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
उत्तर:
(B) घटती है

40. एक निश्चित समय एवं कीमत पर उत्पादक द्वारा बिक्री के लिए प्रस्तुत की जाने वाली वस्तु की मात्रा को क्या कहते हैं?
(A) भंडार
(B) पूर्ति
(C) आगम
(D) लागत
उत्तर:
(B) पूर्ति

41. समविच्छेद बिन्दु पर फर्म की लाभ तथा हानि होती है
(A) शून्य
(B) धनात्मक
(C) ऋणात्मक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) शून्य

42. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
(A) कीमत के बढ़ने के साथ-साथ पूर्ति घटती है
(B) कीमत के घटने से पूर्ति बढ़ती है
(C) कीमत के बढ़ने से पूर्ति बढ़ती है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) कीमत के बढ़ने से पूर्ति बढ़ती है

43. पूर्ति वक्र का ढलान होता है-
(A) ऋणात्मक
(B) धनात्मक
(C) OX-अक्ष के समानांतर
(D) OY-अक्ष के समानांतर
उत्तर:
(B) धनात्मक

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

44. पूर्ति में वृद्धि के कारण हैं-
(A) तकनीकी प्रगति
(B) उत्पादन साधनों की कीमत में कमी
(C) बाज़ार में फर्मों की संख्या में वृद्धि
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

45. पूर्ति का नियम पूर्ति एवं कीमत में कैसा संबंध दर्शाता है?
(A) सीधा
(B) उल्टा
(C) अप्रत्यक्ष
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) सीधा

46. पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन कब होता है?
(A) वस्तु की अपनी कीमत में परिवर्तन के कारण
(B) तकनीकी में परिवर्तन
(C) आगतों की कीमत में परिवर्तन
(D) सरकारी नीति में परिवर्तन
उत्तर:
(A) वस्तु की अपनी कीमत में परिवर्तन के कारण

47. तकनीकी उन्नति से पूर्ति वक्र पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(A) यह बाईं ओर खिसक जाता है
(B) यह दाईं ओर खिसक जाता है
(C) यह स्थिर रहता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) यह दाईं ओर खिसक जाता है

48. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है?
(A) पूर्ति स्टॉक का अंग है
(B) पूर्ति वक्र बाएँ से दाएँ ऊपर की ओर ढालू होता है
(C) पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन और पूर्ति में परिवर्तन का समान अर्थ है
(D) प्रतिस्पर्धी फर्म P = MC स्तर के उत्पादन पर अधिकतम लाभ अर्जित करेगी
उत्तर:
(C) पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन और पूर्ति में परिवर्तन का समान अर्थ है

49. जब किसी वस्तु की कीमत के अतिरिक्त अन्य तत्त्वों में परिवर्तन के कारण उसकी आपूर्ति में परिवर्तन होता है, तो उसे क्या कहते हैं?
(A) पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन
(B) पूर्ति में परिवर्तन
(C) पूर्ति वक्र पर संचलन
(D) पूर्ति का विस्तार
उत्तर:
(B) पूर्ति में परिवर्तन

50. कौन-सा पूर्ति की कमी का कारण है?
(A) साधन कीमत में गिरावट
(B) अन्य वस्तुओं की कीमत में वृद्धि
(C) उत्पादन कर में वृद्धि
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) उत्पादन कर में वृद्धि

51. पूर्ति में विस्तार होने पर-
(A) पूर्ति वक्र में दाईं ओर खिसकाव आता है
(B) पूर्ति वक्र में बाईं ओर खिसकाव आता है
(C) उसी पूर्ति वक्र पर ऊपर की ओर संचरण होता है
(D) उसी पूर्ति वक्र पर नीचे की ओर संचरण होता है
उत्तर:
(C) उसी पूर्ति वक्र पर ऊपर की ओर संचरण होता है

52. कीमत के 5 रु० प्रति इकाई से बढ़कर 7 रु० प्रति इकाई हो जाने पर पूर्ति 50 से बढ़कर 60 हो जाती है। पूर्ति में यह परिवर्तन-
(A) पूर्ति में वृद्धि है
(B) पूर्ति में कमी है
(C) पूर्ति में संकुचन है
(D) पूर्ति में विस्तार है
उत्तर:
(D) पूर्ति में विस्तार है

53. पूर्ति वक्र का दाईं ओर खिसकाव पूर्ति में क्या दर्शाता है?
(A) कमी
(B) वृद्धि
(C) स्थिरता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) वृद्धि

54. यदि अति अल्पकाल में सब्जी की कीमत बहुत बढ़ जाती है तो भी पूर्ति बढ़ाना असंभव होगा क्योंकि अति अल्पकाल में सब्जी का पूर्ति वक्र होगा-
(A) पूर्णतया लोचदार
(B) पूर्णतया बेलोचदार
(C) लोचदार
(D) बेलोचदार
उत्तर:
(B) पूर्णतया बेलोचदार

55. पूर्ति लोच का तात्पर्य है, पूर्ति में परिवर्तन निम्नलिखित के परिवर्तन के कारण होना-
(A) वस्तु की कीमत
(B) पूर्ति की अवस्था
(C) उपभोक्ता की रुचि
(D) वस्तु की माँग
उत्तर:
(A) वस्तु की कीमत

56. पूर्ति लोच का तात्पर्य है-
(A) ∆q/∆p x p0/q0
(B) ∆p/∆q x q0p0
(C) ∆q/∆p
(D) q0/p0
उत्तर:
(A) ∆q/∆p x p0/q0

57. पूर्ति की लोच का सूत्र कौन-सा है?
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 4
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

58. पूर्ति की लोच को मापने की विधि है-
(A) प्रतिशत विधि
(B) ज्यामितीय विधि
(C) (A) एवं (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) एवं (B) दोनों

59. यदि कीमत 10 रु० से बढ़कर 12 रु० हो गई, जिसके कारण पूर्ति 15 इकाइयों से बढ़कर 20 इकाइयाँ हो गईं तो पूर्ति की लोच होगी-
(A) इकाई से कम
(B) इकाई से अधिक
(C) इकाई के बराबर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) इकाई से अधिक

60. पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले कारक हैं-
(A) प्राकृतिक बाधाएँ
(B) वस्तु की प्रकृति
(C) उत्पादन लागत
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

61. जब कीमत में काफी परिवर्तन आने पर भी पूर्ति में कोई परिवर्तन न आए, तब पूर्ति कहलाती है-
(A) पूर्णतया लोचदार
(B) पूर्णतया बेलोचदार
(C) इकाई लोचदार
(D) इकाई से कम लोचदार
उत्तर:
(B) पूर्णतया बेलोचदार

62. पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति वक्र की लोच कितनी होगी?
(A) अनंत
(B) इकाई
(C) शून्य
(D) 1 से 10 तक
उत्तर:
(C) शून्य

63. पूर्ति की इकाई लोच की स्थिति में एक सरल रेखा पूर्ति वक्र-
(A) X-अक्ष को काटता है
(B) Y-अक्ष को काटता है
(C) मूल बिंदु से गुजरता है
(D) Y-अक्ष के समानांतर होता है
उत्तर:
(C) मूल बिंदु से गुजरता है

64. पूर्णतया लोचदार पूर्ति वक्र की लोच होती है
(A) es = ∞
(B) es = 1
(C) es = 0
(D) es = 1 to 10
उत्तर:
(A) es = ∞

65. इकाई लोचदार पूर्ति की स्थिति में, पूर्ति एवं कीमत में परिवर्तन कैसे होते हैं?
(A) समान दर से
(B) असमान दर से
(C) कीमत परिवर्तन पूर्ति परिवर्तन से अधिक होता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) समान दर से

66. जब कीमत में थोड़ा परिवर्तन होने पर पूर्ति में अनंत परिवर्तन हो जाता है, तब वस्तु की पूर्ति होती है-
(A) पूर्णतया लोचदार
(B) पूर्णतया बेलोचदार
(C) इकाई से अधिक लोचदार
(D) इकाई से कम लोचदार
उत्तर:
(A) पूर्णतया लोचदार

67. किसी वस्तु की पूर्ति की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन तथा उसकी कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के अनुपात के माप को कहते-
(A) माँग की कीमत लोच
(B) पूर्ति की कीमत लोच
(C) पूर्ति की आय लोच
(D) माँग की तिरछी लोच
उत्तर:
(B) पूर्ति की कीमत लोच

68. पूर्ति की लोच का मूल्य हो सकता है
(A) 0 से ∞ के बीच
(B) -1 से +1 तक
(C) 0 से 1 तक
(D) 1 से 10 तक
उत्तर:
(A) 0 से ∞ के बीच

69. यदि एक सीधी पूर्ति रेखा X-अक्ष पर रूकती है तो पूर्ति लोच होती है-
(A) इकाई के बराबर
(B) इकाई से कम
(C) इकाई से अधिक
(D) शून्य
उत्तर:
(B) इकाई से कम

B. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. संतुलन बिंदु पर जहाँ MC = MR है वहाँ MC का ढाल …………. होना चाहिए। (धनात्मक/ऋणात्मक)
उत्तर:
धनात्मक

2. जब पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में कीमत समान होती है तो AR वक्र की आकृति ……….. के समानांतर होती है। (x-अक्ष/Y-अक्ष)
उत्तर:
X-अक्ष

3. …………. बाजार में एक फर्म कीमत स्वीकारक होती है। (अल्पाधिकार/पूर्ण प्रतिस्पर्धी)
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धी

4. पूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार में सीमांत संप्राप्ति, औसत संप्राप्ति ……………. होती है। (से कम/के बराबर)
उत्तर:
के बराबर

5. औसत संप्राप्ति (आगम) वक्र को …………… कहा जाता है। (उत्पादन वक्र/माँग वक्र)
उत्तर:
माँग वक्र

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6. जब कीमत के बढ़ने पर पूर्ति बढ़ जाती है तो इसे ……………. कहते हैं। (पूर्ति का विस्तार पूर्ति में वृद्धि)
उत्तर:
पूर्ति का विस्तार

7. पूर्ति वक्र का दाईं ओर खिसकाव पूर्ति में ………… दर्शाता है। (कमी/वृद्धि)
उत्तर:
वृद्धि

8. एक फर्म तब संतुलन में होती है जब वह ……………. लाभ कमा रही होती है। (सामान्य/अधिकतम)
उत्तर:
अधिकतम

C. बताइए कि निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत

  1. फर्म का संतुलन निर्धारित करने के लिए AR तथा AC की आवश्यकता होती है।
  2. एक फर्म उस समय संतुलन की अवस्था में होती है जब AC तथा MC दोनों बराबर होते हैं।
  3. एक फर्म तब संतुलन में होती है जब MC = MR है तथा MC वक्र MR को नीचे से काटता है।
  4. संतुलन बिंदु पर जहाँ MC = MR है वहाँ MC का ढाल धनात्मक होना चाहिए।
  5. दीर्घकाल में, पूर्ण प्रतियोगिता में, संतुलन बिंदु इष्टतम उत्पादन बिंदु होता है।
  6. एक उद्योग संपूर्ण वस्तुओं का उत्पादन करने वाली फर्मों के समूह को कहा जाता है।
  7. औसत आगम कभी ऋणात्मक नहीं होती है।
  8. जब सीमांत आगम ऋणात्मक हो तो कुल आगम घटती है।
  9. सीमांत आय जब शून्य होती है, तो कुल आय अधिकतम होती है।
  10. पूर्ति वक्र की धारणा केवल पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में लागू होती है।
  11. एक उद्योग तब संतुलन स्थिति में होता है जब सभी फर्मे संतुलन की स्थिति में होती हैं।
  12. जब एक उद्योग संतुलन की स्थिति में होता है तो सभी फर्मों को असामान्य लाभ प्राप्त होता है।
  13. पूर्ण प्रतियोगिता में उत्पादन बन्द करने का बिंदु वह बिंदु है जिस पर कीमत औसत परिवर्तनशील लागत (AVC) के बराबर होती है।
  14. पूर्ति तथा स्टॉक में अन्तर नहीं होता है।
  15. पूर्ति स्टॉक से भी अधिक हो सकती है।
  16. जब पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में कीमत समान होती है तो AR वक्र की आकृति X-अक्ष के समानांतर होती है।
  17. अल्पाधिकार बाज़ार में एक फर्म कीमत स्वीकारक होती है।
  18. पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत सदैव सीमांत लागत के बराबर होती है।
  19. कीमत और पूर्ति का संबंध सामान्यतया प्रत्यक्ष होता है।
  20. पूर्ति वक्र का दाईं ओर खिसकाव पूर्ति में वृद्धि को दर्शाता है।

उत्तर:

  1. गलत
  2. गलत
  3. सही
  4. सही
  5. सही
  6. सही
  7. सही
  8. सही
  9. सही
  10. सही
  11. सही
  12. गलत
  13. सही
  14. सही
  15. गलत
  16. सही
  17. गलत
  18. गलत
  19. सही
  20. सही।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रतियोगिता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता से अभिप्राय बाज़ार की उस स्थिति से है जिसमें किसी वस्तु के क्रेता व विक्रेता बहुत अधिक संख्या में होते हैं और समरूप वस्तुओं को बाज़ार में एक समान कीमत पर बेचा जाता है।

प्रश्न 2.
पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म का माँग वक्र किस प्रकार का होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म का माँग वक्र X-अक्ष के समानांतर एक सीधी रेखा के रूप में होता है।

प्रश्न 3.
पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म कीमत स्वीकारक क्यों होती है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म का उद्योग में अति नगण्य स्थान होता है और कीमत उद्योग द्वारा निर्धारित होती है अर्थात् एक फर्म उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत में परिवर्तन नहीं कर सकती।

प्रश्न 4.
आगम (Revenue) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी वस्तु की बिक्री करने से एक फर्म को जो कुल आगम प्राप्त होती है, उसे फर्म की आगम कहते हैं।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 5.
कुल आगम (TR) की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
एक फर्म द्वारा वस्तु की विशेष मात्रा बेचने से जो मुद्रा राशि प्राप्त होती है, उसे कुल आगम कहते हैं। अर्थात् TR = q x p – 1 अथवा कुल आगम = बेची गई मात्रा x कीमत

प्रश्न 6.
औसत आगम (AR) की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
बेची गई वस्तु की प्रति इकाई के आगम या आगम को औसत आगम कहते हैं।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 5

प्रश्न 7.
क्या औसत आगम (संप्राप्ति) कीमत के बराबर होता है?
उत्तर:
हाँ, औसत आगम कीमत के बराबर होता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 6

प्रश्न 8.
सीमांत आगम (MR) किसे कहते हैं?
उत्तर:
वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के बेचने से कुल आगम में जो वृद्धि होती है, उसे सीमांत आगम कहते हैं।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 7

प्रश्न 9.
क्या MR शून्य या ऋणात्मक हो सकता है?
उत्तर:
हाँ, MR शून्य या ऋणात्मक हो सकता है, जब एकाधिकार तथा एकाधिकारी प्रतियोगिता में कीमत कम हो रही होती है।

प्रश्न 10.
पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म के लिए कीमत तथा सीमांत आगम में क्या संबंध है?
उत्तर:
किसी प्रतिस्पर्धी फर्म के लिए कीमत (AR) तथा सीमांत आगम (MR) दोनों परस्पर बराबर होते हैं।

प्रश्न 11.
एक फर्म का संतुलन कब होता है?
उत्तर:
एक फर्म का संतुलन उस समय होता है, जब उसे अधिकतम लाभ प्राप्त होता है।

प्रश्न 12.
एक फर्म के लाभ को अधिकतम करने की सामान्य शर्ते क्या हैं?
उत्तर:
TR और TC वक्रों के बीच अंतर अधिकतम होना चाहिए।

प्रश्न 13.
एक प्रतिस्पर्धी फर्म की अधिकतम लाभ की शर्त क्या है?
उत्तर:
एक पूर्ण प्रतियोगिता फर्म के अधिकतम लाभ की स्थिति तब होगी. जब कीमत (P) सीमांत लागत (MC) के बराबर होगी अर्थात् P = MC।

प्रश्न 14.
संतुलन बिंदु पर MC बढ़ती हुई क्यों होनी चाहिए?
उत्तर:
गिरती MC का अर्थ है कि उत्पाद की एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने पर सीमांत लागत घटती है। वह स्थिति जिसमें कीमत स्थिर रहती है (जैसे पूर्ण प्रतियोगिता में), इसका अर्थ वह स्थिति होगी जिसमें फर्म का कुल लाभ TR-TC बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में फर्म अपना उत्पादन बढ़ाना चाहेगी और संतुलन में नहीं होगी। इसलिए फर्म केवल तब संतुलन अवस्था प्राप्त करेगी जब MC बढ़ रही होती है।

प्रश्न 15.
MC < MR होना उत्पादक संतुलन स्तर क्यों नहीं है?
उत्तर:
MC < MR अधिकतम लाभ की स्थिति नहीं है, क्योंकि उत्पादक इस स्थिति में उत्पादन बढ़ाकर अपना लाभ बढ़ा सकता है।

प्रश्न 16.
MC > MR होना उत्पादक के लिए लाभ अधिकतमीकरण की स्थिति क्यों नहीं है?
उत्तर:
MC > MR की स्थिति भी अधिकतम लाभ की स्थिति नहीं है, क्योंकि यदि ऐसी स्थिति में उत्पादक अधिक उत्पादन करता है तो उसके लाभों में कमी होती है।

प्रश्न 17.
क्या होता है यदि फर्म अपना उत्पादन बढ़ाती है जबकि MR = MC है?
उत्तर:
वह स्थिति जिसमें MR = MC उत्पादन में कोई भी वृद्धि का अर्थ होगा MC > MR ऐसा इसलिए क्योंकि MR को स्थिर मान लिया गया है (जैसे कि पूर्ण प्रतियोगिता में) और (संतुलन दु पर) MC बढ़ रही है। तब यह वह स्थिति होगी जिसमें TR = ∑MR तथा TVC = ∑MC के बीच के अंतर में घटने की प्रवृत्ति होती है अथवा फर्म का सकल लाभ कम होना शुरू हो जाता है।

प्रश्न 18.
फर्म के संतुलन की प्रथम क्रम की शर्त (Condition of First Order) क्या है?
उत्तर:
फर्म के संतुलन की प्रथम क्रम की शर्त यह है कि सीमांत आगम सीमांत लागत के बराबर (MR = MC) होनी चाहिए।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 19.
फर्म के संतुलन की द्वितीय क्रम की शर्त (Condition of Second Order) क्या है?
उत्तर:
फर्म के संतुलन के लिए द्वितीय क्रम की शर्त यह है कि MC वक्र MR वक्र को नीचे से ऊपर की ओर काटती हो।

प्रश्न 20.
सामान्य लाभ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
सामान्य लाभ वह न्यूनतम लाभ है जो साहसी को व्यवसाय में बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 21.
पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले कोई दो कारक बताएँ।
उत्तर:

  • उत्पादन लागत
  • वस्तु की प्रकृति।

प्रश्न 22.
असामान्य लाभ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
असामान्य लाभ का अभिप्राय कुल लागत (सामान्य लाभ सहित) पर कुल आगम के आधिक्य से है।
असामान्य लाभ = कुल आगम – कुल लागत

प्रश्न 23.
असामान्य हानि का क्या अर्थ है?
उत्तर:
असामान्य हानि का अभिप्राय कुल आगम पर कुल लागत के आधिक्य से है।
असामान्य हानि = कुल लागत कुल आगम

प्रश्न 24.
उत्पादन-बंद बिंदु (Shut-down Point) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उत्पादन-बंद बिंदु उत्पादन के उस स्तर को बताता है जहाँ फर्म अल्पकाल में हानि की स्थिति में उत्पादन बंद कर देगी। इस उत्पादन स्तर पर कीमत (p), औसत परिवर्ती लागत (AVC) के बराबर होती है।

प्रश्न 25.
यदि वर्तमान फर्मे असामान्य लाभ कमा रही हों, तो उद्योग में फर्मों की संख्या पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
यदि वर्तमान फर्मे असामान्य लाभ कमा रही हों, तो उद्योग में फर्मों की संख्या में वृद्धि होगी।

प्रश्न 26.
यदि वर्तमान फर्मों को असामान्य हानि उठानी पड़ रही हो, तो उद्योग में फर्मों का किस प्रकार का परिवर्तन होगा?
उत्तर:
यदि वर्तमान फर्मों को असामान्य हानि उठानी पड़ रही हो, तो उद्योग में फर्मों की संख्या में कमी होगी।

प्रश्न 27.
दीर्घकालीन प्रतियोगिता संतुलन में सीमांत और औसत लागतों का क्या संबंध रहता है?
उत्तर:
दीर्घकालीन प्रतियोगिता संतुलन में सीमांत और औसत लागत बराबर होते हैं। इस प्रकार, औसत लागत (AC) = सीमांत लागत (MC)

प्रश्न 28.
पूर्ण प्रतिस्पर्धी उद्योग में दीर्घकालिक संतुलन की शर्ते बताइए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी उद्योग में दीर्घकालिक संतुलन की शर्ते निम्नलिखित हैं कीमत (P) = दीर्घकालीन औसत लागत (LAC) = दीर्घकालीन सीमांत लागत (LMC)।

प्रश्न 29.
दीर्घकालिक संतुलन की दशा में पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म अपने दीर्घकालीन औसत लागत वक्र के किस बिंदु पर उत्पादन करेगी?
उत्तर:
दीर्घकालिक संतुलन की दशा में पूर्ण प्रतियोगी फर्म अपने दीर्घकालीन औसत लागत (LAC) वक्र के न्यूनतम बिंदु पर उत्पादन करेगी।

प्रश्न 30.
‘लाभ-अलाभ बिंदु’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘लाभ-अलाभ बिंदु’ उत्पादन मात्रा के उस स्तर को बताता है, जिस पर फर्म की कुल आगम और कुल लागत बराबर होते हैं।

प्रश्न 31.
क्या एक फर्म ‘सम-स्तर बिंदु’ अर्थात् ‘लाभ-अलाभ बिंदु’ पर भी लाभ प्राप्त करती है?
उत्तर:
सम-स्तर बिंद’ अर्थात ‘लाभ-अलाभ बिंद’ से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उत्पादक (फर्म) का लाभ शन्य है। वास्तव में इस बिंदु पर भी फर्म को सामान्य लाभ प्राप्त होता है क्योंकि उसकी कुल आगम, कुल लागत के बराबर है और कुल लागत में उसका सामान्य लाभ शामिल होता है।

प्रश्न 32.
‘पूर्ति’ का अर्थ बताइए।
उत्तर:
एक निश्चित समय में, निश्चित कीमत पर उत्पादक द्वारा बिक्री के लिए प्रस्तुत की जाने वाली वस्तु की मात्रा को पूर्ति कहते हैं।

प्रश्न 33.
पूर्ति को प्रभावित (निर्धारित) करने वाले किन्हीं तीन तत्त्वों के नाम बताइए।
उत्तर:

  • उत्पादन के कारकों की कीमत
  • उत्पादन तकनीक तथा
  • प्राकृतिक तत्त्व।

प्रश्न 34.
पूर्ति तालिका की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
पूर्ति तालिका एक ऐसी तालिका है जो वस्तु की विभिन्न कीमतों पर बिक्री के लिए प्रस्तुत की जाने वाली विभिन्न मात्राओं को दर्शाती है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 35.
व्यक्तिगत पूर्ति की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिगत पूर्ति से अभिप्राय किसी वस्तु की उस मात्रा से है जिसे एक विक्रेता एक विशेष समय में वस्तु की विभिन्न कीमतों पर बाज़ार में बेचने के लिए तैयार है।

प्रश्न 36.
बाज़ार पूर्ति की परिभाषा दीजिए अथवा बाज़ार आपूर्ति क्या है?
उत्तर:
बाज़ार पूर्ति से अभिप्राय किसी वस्तु की उस मात्रा से है जिसे सभी विक्रेता एक विशेष समय में वस्तु की विभिन्न. कीमतों पर बाज़ार में बेचने के लिए तैयार है।

प्रश्न 37.
पूर्ति के नियम का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पूर्ति का नियम यह बताता है कि अन्य बातें समान रहने पर, वस्तु की कीमत बढ़ने पर पूर्ति बढ़ जाती है और कीमत कम होने पर पूर्ति कम हो जाती है।

प्रश्न 38.
एक काल्पनिक पूर्ति तालिका बनाइए।
उत्तर:

कीमत प्रति 1 किलो (रपाए)पूर्ति (किल्नो)
103,000
115,000
128,000

प्रश्न 39.
पूर्ति वक्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
पूर्ति वक्र वह वक्र है जो वस्तु की विभिन्न कीमतों पर बिक्री की जाने वाली विभिन्न मात्राएँ दर्शाता है।

प्रश्न 40.
एक पूर्ति वक्र बनाइए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 8

प्रश्न 41.
पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन से हमारा अभिप्राय वस्तु की अपनी कीमत में परिवर्तन के कारण पूर्ति की मात्रा में होने वाले परिवर्तन से है। इसे एक ही पूर्ति वक्र पर चलन भी कहते हैं।

प्रश्न 42.
पूर्ति में परिवर्तन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अन्य कारकों; जैसे तकनीकी परिवर्तन, आगतों की कीमत में परिवर्तन, उत्पादन कर की दर में परिवर्तन आदि के कारण पूर्ति वक्र का खिसकान (दाईं अथवा बाईं ओर) पूर्ति में परिवर्तन कहलाता है।

प्रश्न 43.
पूर्ति वक्र पर चलने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब पूर्ति वक्र में होने वाले परिवर्तन को उसी पूर्ति वक्र पर दर्शाया जाता है, तो इसे हम पूर्ति वक्र पर चलना कहते हैं।

प्रश्न 44.
पूर्ति में विस्तार से क्या आशय है?
उत्तर:
वस्तु की कीमत में वृद्धि के फलस्वरूप पूर्ति की मात्रा में बढ़ोतरी को पूर्ति में विस्तार कहते हैं।

प्रश्न 45.
पूर्ति में संकुचन से क्या आशय है?
उत्तर:
वस्तु की कीमत में कमी के फलस्वरूप पूर्ति की मात्रा में कमी को पूर्ति में संकुचन कहते हैं।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 46.
पूर्ति वक्र पर खिसकने का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब पूर्ति में होने वाले परिवर्तन को दूसरी पूर्ति वक्र से दर्शाया जाता है तो इसे हम पूर्ति वक्र पर खिसकना कहते हैं।

प्रश्न 47.
पूर्ति में वृद्धि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वस्तु की कीमत में वृद्धि के अतिरिक्त अन्य कारकों; जैसे अन्य वस्तुओं की कीमतों में कमी, उत्पादन साधनों (कारकों) की लागत में कमी आदि से वस्तु की पूर्ति में होने वाली बढ़ोतरी को पूर्ति में वृद्धि कहते हैं।

प्रश्न 48.
पूर्ति में कमी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वस्तु की कीमत में कमी के अतिरिक्त अन्य कारकों; जैसे अन्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि, उत्पादन साधनों की लागत में वृद्धि आदि से वस्तु की पूर्ति में होने वाली गिरावट को पूर्ति में कमी क

प्रश्न 49.
आपूर्ति वक्र को खिसका सकने वाले तीन कारक बताएँ।
उत्तर:

  • तकनीकी सुधार
  • आगतों (Inputs) की कीमतों में परिवर्तन
  • उत्पादन शुल्क की दर में परिवर्तन।

प्रश्न 50.
ऐसे दो उदाहरण दें जिनमें तकनीकी प्रगति आपूर्ति वक्र को खिसका देती है।
उत्तर:

  • इंटरनेट का प्रयोग
  • फोटो कॉपी निकालने की मशीन (Duplicating Machine) का प्रयोग।

प्रश्न 51.
आगत कीमत की वृद्धि का आपूर्ति वक्र पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर:
आगत कीमतों में वृद्धि से आपूर्ति वक्र बाईं ओर खिसक जाता है।

प्रश्न 52.
उत्पादन शुल्क दर में वृद्धि का आपूर्ति वक्र पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर:
उत्पादन शुल्क की दर में वृद्धि के परिणामस्वरूप आपूर्ति वक्र बाईं ओर खिसक जाता है, क्योंकि परिवर्ती लागत में शुल्क जुड़ने से सीमांत लागत बढ़ जाती है।

प्रश्न 53.
फर्मों की संख्या में वृद्धि किस प्रकार बाज़ार पूर्ति वक्र को प्रभावित करेगी?
उत्तर:
जब किसी उद्योग में फर्मों की संख्या बढ़ जाती है तो उत्पाद का बाज़ार पूर्ति वक्र दाईं ओर खिसक जाएगा। यह पूर्ति में वृद्धि का सूचक है।

प्रश्न 54.
प्रौद्योगिकी/तकनीकी में परिवर्तन का पूर्ति पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 9
प्रौद्योगिकी या तकनीकी विकास उत्पादन के प्रत्येक स्तर पर सीमांत लागतों को कम कर देते हैं, जिससे वस्तु की पूर्ति में वृद्धि हो जाती है। लागतों में बचत करने वाले प्रौद्योगिकी परिवर्तन के कारण पूर्ति वक्र दाईं ओर खिसक जाता है।

प्रश्न 55.
एक ही पूर्ति वक्र पर ऊपर की ओर संचलन का क्या कारण होता है?
उत्तर:
किसी वस्तु के पूर्ति वक्र पर ऊपर की ओर संचलन का कारण वस्तु की अपनी कीमत में वृद्धि का होना है। यह पूर्ति के विस्तार की स्थिति है।

प्रश्न 56.
किसी वस्तु के पूर्ति वक्र पर नीचे की ओर संचलन का क्या कारण होता है?
उत्तर:
पूर्ति वक्र पर नीचे की ओर संचलन का कारण वस्तु की अपनी कीमत में कमी का होना है। यह पूर्ति के संकुचन की स्थिति होती है।

प्रश्न 57.
‘बाज़ार काल’ से क्या तात्पर्य है? बाज़ार काल में पूर्ति वक्र कैसा होता है?
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 10
बाजार काल वह अल्प अवधि होती है जिसमें फर्मे कीमत परिवर्तन के कारण अपना उत्पादन परिवर्तित नहीं कर पाती। बाज़ार काल में पूर्ति वक्र उदग्र (Vertical) होता है।

प्रश्न 58.
अल्पकाल तथा दीर्घकाल में किसी प्रतिस्पर्धी फर्म के पूर्ति वक्र में क्या अंतर है?
उत्तर:
अल्पकाल में AVC के न्यूनतम बिंदु के ऊपर MC पूर्ति वक्र है, जबकि दीर्घकाल में AC के न्यूनतम बिंदु के ऊपर LMC पूर्ति वक्र है।

प्रश्न 59.
‘पूर्ति की कीमत लोच’ की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
एक वस्तु की कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप उसकी पूर्ति में जिस दर से परिवर्तन आता है, उसे पूर्ति की कीमत लोच कहते हैं।

प्रश्न 60.
आपूर्ति की कीमत लोच किस चीज का मान निर्धारण/मापन करती है?
उत्तर:
आपूर्ति की कीमत लोच कीमत परिवर्तन के प्रति आपूर्ति की प्रतिक्रिया के परिमाण को व्यक्त करती है।

प्रश्न 61.
पूर्ति की कीमत लोच ज्ञात करने का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 11

प्रश्न 62.
यदि दो पूर्ति वक्र परस्पर काटते हैं तो प्रतिच्छेदन बिंदु पर कौन-सा वक्र अधिक लोचदार होगा?
उत्तर:
यदि दो पूर्ति वक्र परस्पर काट रहे हों तो प्रतिच्छेदन बिंदु पर जो वक्र कम ढलवाँ या अधिक चपटा (More Flatter) होगा, उसकी लोच अधिक होगी।

प्रश्न 63.
अधिक लोचदार पूर्ति कब होती है?
उत्तर:
जब कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप पूर्ति में तुलनात्मक अधिक परिवर्तन होता है, तब पूर्ति अधिक लोचदार कही जाएगी।

प्रश्न 64.
कम लोचदार पूर्ति से क्या आशय है?
उत्तर:
जब पूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन, कीमत में प्रतिशत परिवर्तन की अपेक्षा कम हो, उसे कम लोचदार पूर्ति कहेंगे।

प्रश्न 65.
शून्य लोचदार पूर्ति (Zero Elastic Supply) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब वस्तु की कीमत का उसकी पूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, तो उस वस्तु की पूर्ति शून्य लोचदार कहलाती है।

प्रश्न 66.
एक वस्तु की पूर्ति को लोचदार (Elastic) कब कहा जाता है?
उत्तर:
एक वस्तु की पूर्ति को लोचदार तब कहा जाता है, जब कीमत में प्रतिशत परिवर्तन की तुलना में पूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन अधिक हो।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 67.
एक वस्तु की पूर्ति को बेलोचदार कब कहा जाता है?
उत्तर:
एक वस्तु की पूर्ति को बेलोचदार तब कहा जाता है, जब वस्तु की पूर्ति में होने वाला प्रतिशत परिवर्तन वस्तु की कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन से कम हो।

प्रश्न 68.
X-अक्ष के मूल बिंदु से गुजरने वाले सरल रेखीय (Straight line) पूर्ति वक्र की पूर्ति की लोच (e) क्या होती है?
उत्तर:
सरल रेखीय पूर्ति वक्र यदि अक्ष केंद्र (अर्थात् X-अक्ष के मूल बिंदु) से गुजरे तो उसकी लोच का मान सदा एक इकाई के बराबर (es =1) होता है।

प्रश्न 69.
यदि दो पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हैं तो प्रतिच्छेदित बिंदु पर किस पूर्ति वक्र (कम ढलवाँ या अधिक ढलवाँ) की लोच अधिक होती है?
उत्तर:
यदि दो पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते (intersect) हैं तो प्रतिच्छेदन बिंदु (point of intersection) पर कम ढलवाँ (Less flatter) पूर्ति वक्र की लोचशीलता (कम ढलवाँ माँग वक्र की भाँति) अधिक होती है।

प्रश्न 70.
पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार की दो मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) विक्रेताओं और क्रेताओं की बड़ी संख्या पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या बहुत बड़ी होती है। प्रत्येक क्रेता या विक्रेता कुल उत्पादन का बहुत ही सूक्ष्म भाग खरीदता या बेचता है और इस प्रकार वह कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता।

(ii) समरूप वस्तु-पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में सभी फर्मे ही वस्तु का उत्पादन करती हैं। बाज़ार में सभी फर्मों द्वारा जो वस्तुएँ बेची जाती हैं। वे रंग-रूप, आकार व गुणवत्ता में एक-समान होती हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म का माँग वक्र पूर्णतया लोचदार क्यों होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार की वह स्थिति है जिसमें एक बड़ी संख्या में फर्मे समरूप वस्तु को बेचने की प्रतियोगिता करती हैं। पूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार में वस्तु की कीमत उद्योग द्वारा निर्धारित होती है और एक फर्म को वही कीमत स्वीकार करनी पड़ती है। उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत पर फर्म जितना माल बेचना चाहे बेच सकती है। इसलिए पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म का माँग वक्र पूर्णतया लोचदार होता है। इसे हम निम्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 12

प्रश्न 2.
पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म मूल्य स्वीकारक क्यों होती है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार में समान कीमत का प्रचलन होता है। कीमत का निर्धारण समस्त उद्योग की माँग व पूर्ति द्वारा किया जाता है और सभी फर्मों को वह कीमत स्वीकार करनी पड़ती है। उद्योगों द्वारा निर्धारित मूल्य (P) फर्म के AR और MR वक्र होते हैं। इसीलिए पूर्ण प्रतियोगिता में उद्योग को कीमत निर्धारक और फर्म को कीमत स्वीकारक कहा जाता है। इसे हम निम्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 13
रेखाचित्र में DD बाज़ार माँग वक्र तथा SS बाज़ार पूर्ति वक्र है। ये दोनों E बिंदु पर काटते हैं। संतुलन कीमत OP है जिस पर बाज़ार माँग और बाज़ार पूर्ति दोनों बराबर हैं। एक फर्म OP प्रति इकाई कीमत पर जितना माल बेचना चाहे बेच सकती है। क्योंकि इस बाज़ार में विक्रेताओं की संख्या बहुत अधिक होती है। एक विक्रेता कुल बिक्री के अति सूक्ष्म भाग को बेचता है जिससे वह अपनी गतिविधियों से बाज़ार मूल्य को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होता। इस प्रकार विक्रेता को वस्तु का मूल्य अपनी इच्छानुसार निर्धारित करने की जरा भी स्वतंत्रता नहीं होती।

प्रश्न 3.
फर्म के लाभ अधिकतमीकरण (Profit Maximisation) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
फर्म का उद्देश्य केवल लाभ कमाना ही नहीं होता बल्कि लाभ का अधिकतमीकरण होता है। कुल लाभ मोटे तौर पर कुल आगम (TR) और कुल लागत (TC) का अंतर होता है। समीकरण के रूप में,
कुल लाभ = कुल आगम – कुल लागत
स्पष्ट है, लाभ अधिकतमीकरण का अर्थ है-कुल आगम और कुल लागत के अंतर को अधिकतम करना। यह अंतर जितना अधिक होगा, लाभ उतना ही अधिक होगा। अब प्रश्न उठता है कि उत्पादन (निर्गत) के किस स्तर पर फर्म का लाभ अधिकतम होगा? उत्पादन के उस स्तर (Level of Output) पर फर्म का लाभ अधिकतम होता है जहाँ एक अतिरिक्त इकाई की बिक्री से प्राप्त आगम (MR), अतिरिक्त इकाई की लागत (MC) के बराबर होता है अर्थात् जहाँ MR = MC । इसे फर्म की संतुलन स्थिति (State of Firm’s Equilibrium) भी कहा जाता है।

प्रश्न 4.
वस्तु के पूर्णतया समरूप होने का क्या अर्थ है? इसका बाज़ार में उत्पादकों द्वारा वसूल की जा रही कीमत पर क्या प्रभाव होता है?
उत्तर:
वस्तु के पूर्णतया समरूप होने का अर्थ यह है कि बाज़ार में बेची जाने वाली वस्तुएँ रंग-रूप, आकार तथा गुण में समान होती हैं। इस प्रकार एक विक्रेता द्वारा बेची गई वस्तु दूसरे विक्रेता द्वारा बेची गई वस्तु का पूर्ण स्थानापन्न होती है।

वस्तु के पूर्णतया समरूप होने का प्रभाव यह होता है कि बाज़ार में सभी फर्मों द्वारा वस्तु की समान कीमत वसूल की जाएगी। यदि एक विक्रेता उस वस्तु की कीमत उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत से अधिक वसूल करने का प्रयास करेगा तो कोई भी विक्रेता उससे वस्तु क्रय नहीं करेगा क्योंकि बाज़ार में अन्य विक्रेता उसी प्रकार की वस्तु बेचते हैं।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 5.
समझाइए कि दीर्घकाल में प्रतिस्पर्धी उद्योग में फर्मों का निर्बाध प्रवेश और बहिर्गमन असामान्य लाभों को शून्य कैसे कर देती है?
उत्तर:
यदि अल्पकाल में फर्मों को असामान्य लाभ प्राप्त होता है तो यह स्थिति नयी फर्मों को बाज़ार में प्रवेश करने के निमंत्रण का कार्य करती है। नयी फर्मों के प्रवेश से पूर्ति वक्र अपने दाहिने ओर खिसक जाएगा, जिससे कीमत में गिरावट आएगी। इस प्रकार जो फर्मे असामान्य लाभ कमा रही थीं, उनका असामान्य लाभ समाप्त हो जाएगा।

यदि अल्पकाल में फर्मों को असामान्य हानि होती है तो यह स्थिति वर्तमान फर्मों को बाज़ार से निकासी के लिए प्रेरित करने का कार्य करती है। कुछ फर्मों की निकासी से पूर्ति वक्र अपने बाईं ओर खिसक जाएगा जिससे कीमत में बढ़ोतरी होगी। इस प्रकार जो फर्मे असामान्य हानि अर्जित कर रही थीं, उनकी असामान्य हानि समाप्त हो जाएगी।

प्रश्न 6.
अल्पकाल में, पूर्ण प्रतियोगिता में यदि नई फर्मे उद्योग में प्रवेश न पा सकें तथा पुरानी फर्मे उसे छोड़कर न जा सकें, तो क्या होता है?
उत्तर:
यदि उद्योग में वर्तमान में काम कर रही फर्मे असामान्य लाभ कमा रही हैं [कुल आगम (TR) > कुल लागत (TC)] अथवा [औसत आगम (AR) > औसत लागत (AC)] तो वे असामान्य लाभ प्राप्त करती रहेंगी, क्योंकि नई प्रतिस्पर्धी फमें उद्योग में प्रवेश नहीं पा सकती। इसके विपरीत यदि उद्योग में काम कर रही फर्में हानि उठा रही हैं [कुल आगम/आगम < कुल लागत] अथवा [औसत आगम/आगम < औसत लागत तो वे हानि को उठाती रहेंगी, क्योंकि वे उद्योग को छोड़कर नहीं जा सकती।

प्रश्न 7.
दीर्घकाल में, जब नई फर्मे उद्योग में प्रवेश कर सकती हैं और पुरानी फमें उद्योग को छोड़कर जा सकती हैं, तो क्या होता है?
उत्तर:
असामान्य लाभ की स्थिति में कई नई प्रतिस्पर्धी फर्मे उद्योग में प्रवेश कर जाएँगी। उनके आने से बाज़ार वस्तु की पूर्ति बहुत बढ़ जाएगी तथा बाजार कीमत (औसत आगम) गिर जाएगी। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक असामान्य लाभ समाप्त नहीं हो जाते। इनके विपरीत हानि की स्थिति में उद्योग में काम कर रही फळं उद्योग को छोड़ जाएँगी। फलस्वरूप बाज़ार में वस्तु की पूर्ति कम हो जाएगी तथ बाज़ार कीमत (औसत आगम) बढ़ जाएगी। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक कि फर्मों को होने वाली हानि समाप्त नहीं हो जाती।

प्रश्न 8.
पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत एक फर्म की औसत आगम वक्र की प्रकृति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 14
पूर्ण प्रतियोगिता में मूल्य का निर्धारण उद्योग द्वारा किया जाता है और फर्म को वह मूल्य स्वीकार करना पड़ता है। फर्म को इसी मूल्य पर अपना उत्पादन बेचना होता है। इसलिए पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म की वस्तु की माँग पूर्णतया लोचदार (Perfectly Elastic) होती है। ऐसी स्थिति में औसत आगम वक्र जो की माँग रेखा भी है, X-अक्ष के समानांतर होगा। ऐसी स्थिति में औसत आगम और सीमांत आगम बराबर होते हैं। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।

प्रश्न 9.
एक प्रतियोगिता फर्म का AR सदा MR के समान क्यों होता है?
उत्तर:
एक प्रतियोगिता फर्म कीमत स्वीकारक होती है और उसे उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत को स्वीकार करना पड़ता है। फलस्वरूप एक फर्म को अपनी बिक्री एक ही कीमत पर करनी पड़ती है। इसलिए प्रतिस्पर्धी फर्म का AR और MR बराबर रहता है। इसे हम निम्नलिखित उदाहरण द्वारा व्यक्त कर सकते हैं-

बिक्री की इकाइयाँप्रति इकाई कीमतTRARMR
110101010
210201010
310301010
410401010
510501010

प्रश्न 10.
किसी प्रतिस्पर्धी फर्म का कुल आगम वक्र अक्ष केंद्र से गुजरने वाली सरल रेखा क्यों बन जाता है?
उत्तर:
एक प्रतिस्पर्धी फर्म मूल्य स्वीकारक होती है अर्थात् एक प्रतिस्पर्धी फर्म को एक दी हुई कीमत स्वीकार करनी पड़ती है। फर्म की बिक्री चाहे जितनी ही क्यों न हो, फर्म वस्तु की कीमत बदल नहीं सकती। कुल आगम कीमत और बेची गई इकाइयों का गुणनफल है। इसलिए कुल आगम वक्र एक सरल रेखा बन जाता है।
कुल आगम = कीमत x बेची गई इकाइयाँ
इसे निम्नलिखित तालिका तथा संलग्न रेखाचित्र द्वारा व्यक्त किया गया है-

कीमत (रु०)बेची गई इकाइयाँकुल आगम (रु०)
10110
10220
10330
10440

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 15

प्रश्न 11.
पूर्ण प्रतियोगिता में TR और MR में संबंध एक रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट करें।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में उद्योग कीमत निर्धारित करता है और फर्म कीमत स्वीकार करती है। अतः उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत पर फर्म वस्तु की जितनी भी इकाइयाँ बेचेंगी, उसे प्रत्येक इकाई से प्राप्त आगम अर्थात् MR, उस कीमत अर्थात् AR के बराबर होगी। अन्य शब्दों में, पूर्ण प्रतियोगिता में MR=AR, यदि कीमत AR स्थिर रहती है, तो MR (MR = AR) भी स्थिर रहता है। फलस्वरूप कुल आगम भी स्थिर दर या समान दर (= MR) से बढ़ेगी। रेखाचित्र में प्रदर्शन करने पर TR वक्र मूल बिंदु ‘O’ (शून्य) से शुरू होकर ऊपर की ओर ढलान वाली 45° एक सरल रेखा बनेगी। जैसे कि संलग्न रेखाचित्र में दिखाया गया है। क्योंकि कीमत =AR = MR हैं, इसलिए MR/AR वक्र X-अक्ष के समानांतर एक सरल समतल रेखा होगी।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 16

प्रश्न 12.
एक कीमत स्वीकारक फर्म का कुल आगम वक्र कैसा दिखाई देता है? यह ऐसा क्यों दिखाई देता है?
उत्तर:
कुल आगम उत्पादन की कीमत (p) तथा बिक्री की मात्रा (q) का गुणनफल है।
TR = p x q
एक प्रतिस्पर्धी बाज़ार में कीमत दी गई होती है और कोई फर्म इसे प्रभावित नहीं कर सकती। इसलिए जब कीमत दी गई है, कुल आगम बेची गई मात्रा के अनुरूप बढ़ेगी।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 17
उत्पादन के शून्य स्तर पर कुल आगम शून्य होगी। जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ता है, कुल आगम भी बढ़ती है समीकरण TR = p x q एक सीधी रेखा का समीकरण है। इसलिए TR वक्र ऊपर उठती हुई एक सीधी रेखा के रूप में होगा, जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दिखाया गया है।

प्रश्न 13.
पूर्ति क्या है? पूर्ति को प्रभावित करने वाले किन्हीं चार कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
किसी निश्चित अवधि में अलग-अलग कीमतों पर एक विक्रेता किसी वस्तु की जिन मात्राओं को बेचने के लिए तैयार है, उसे पूर्ति कहते हैं।
पूर्ति को प्रभावित करने वाले चार कारक निम्नलिखित हैं-

  • वस्तु की कीमत।
  • अन्य वस्तुओं की कीमतें।
  • उत्पादन तकनीक।
  • उत्पादन साधनों (Factors) की लागत।

प्रश्न 14.
एक फर्म का पूर्ति वक्र प्रायः बाएँ से दाएँ, नीचे से ऊपर की ओर ढलवाँ क्यों होता है?
उत्तर:
एक फर्म का पूर्ति वक्र प्रायः बाएँ से दाएँ, नीचे से ऊपर की ओर ढलवाँ होता है। इसका अर्थ है कि एक फर्म अधिक कीमत होने पर अधिक पूर्ति करने को तत्पर होगी और कम कीमत पर कम। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक विक्रेता अधिक त पर अधिक पूर्ति कर अधिक लाभ कमाने के लिए प्रेरित होता है। इस प्रकार वह कम कीमत होने पर कम पर्ति करने को तैयार होगा।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 15.
पूर्ति का नियम बताइए और इसकी मान्यताएँ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पूर्ति का नियम वस्तु की कीमत और पूर्ति की मात्रा के बीच सीधे और प्रत्यक्ष संबंध को प्रदर्शित करता है। पूर्ति के नियम के अनुसार, “यदि अन्य बातें समान रहें तो नीची कीमत पर वस्तु की पूर्ति कम होगी और ऊँची कीमत पर वस्तु की पूर्ति अधिक होगी।”

पूर्ति के नियम की मान्यताएँ निम्नलिखित हैं-

  • उत्पादन के साधनों (Factors) की कीमत में परिवर्तन नहीं होता।
  • उत्पादन तकनीक में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  • संबंधित वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन नहीं होता।
  • फर्म के उद्देश्यों में कोई परिवर्तन नहीं होता।

प्रश्न 16.
पूर्ति का नियम एक पूर्ति अनुसूची और पूर्ति वक्र की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
पूर्ति का नियम यह बताता है कि यदि अन्य कारक अपरिवर्तित रहें तो वस्तु की कीमत बढ़ने पर उसकी पूर्ति की मात्रा बढ़ जाएगी और कीमत घटने पर वस्तु की पूर्ति कम हो जाएगी। इस प्रकार पूर्ति का नियम पूर्ति और कीमत के धनात्मक संबंध को प्रदर्शित करता है। इसे हम निम्न तालिका और रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं

सेर्बों की कीमत
(रु० प्रति कि०ग्रा०)
सेबों की माँग
(कि०ग्रा०)
8200
9300
10400
11500

इस रेखाचित्र में हम देखते हैं कि OP कीमत पर वस्तु की पूर्ति OQ है। जैसे ही वस्तु की कीमत OP से बढ़कर OP1 हो जाती है तो वस्तु की पूर्ति OQ से बढ़कर OQ1 हो जाती है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 18

प्रश्न 17.
वस्तु की ऊँची कीमत पर अधिक पूर्ति क्यों की जाती है?
उत्तर:
ऊँची कीमत पर वस्तु की अधिक पूर्ति के दो निम्नलिखित कारण हैं-
(i) अन्य बातें समान रहने पर, ऊँची कीमत का अर्थ ऊँचा लाभ है। फलस्वरूप, उत्पादक अधिक उत्पादन करने तथा अधिक . मात्रा बेचने के लिए प्रोत्साहित होता है।

(ii) अधिक उत्पादन (अधिक पूर्ति के लिए) प्रायः ह्रासमान प्रतिफल नियम के अंतर्गत किया जाता है, जिसका अर्थ उत्पादन के बढ़ने पर सीमांत लागत (MC) का बढ़ना है। फलस्वरूप कीमत भी बढ़ेगी यदि अधिक पूर्ति के लिए उत्पादन को बढ़ाया जाता है।

प्रश्न 18.
उत्पादन के साधनों की कीमत या उत्पादन लागत का एक वस्तु की पूर्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
एक वस्तु का उत्पादन करने के लिए जिन साधनों को प्रयोग में लाया जाता है उनकी कीमत में वृद्धि से उत्पादन लागत बढ़ जाती है और लाभ कम होने लगता है। अतः उत्पादक ऐसी वस्तु का उत्पादन करने को तैयार नहीं होंगे। इसके विपरीत उत्पादन लागत में कमी उस वस्तु की पूर्ति में वृद्धि करती है। उत्पादन के साधनों की कीमत में परिवर्तन से विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन की सापेक्षिक लाभप्रदता बदल जाएगी। उदाहरण के लिए, भूमि की कीमत में कमी से कृषि उत्पाद की उत्पादन लागत कम हो जाएगी।

प्रश्न 19.
एक ही पूर्ति वक्र पर चलन से क्या तात्पर्य है? रेखाचित्र द्वारा समझाइए।
उत्तर:
जब उत्पादक एक ही पूर्ति वक्र पर ऊपर से नीचे अथवा नीचे से ऊपर पहुँचता है, तो इसे एक ही पूर्ति वक्र पर चलन कहते हैं। (रेखाचित्र देखिए)
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 19
पूर्ति में संकुचन ऊपर की ओर चलन अर्थात पूर्ति में विस्तार → बिंदु A से B की ओर चलन।
नीचे की ओर चलन अर्थात पूर्ति में संकुचन → बिंदु A से C की ओर चलन।

प्रश्न 20.
रेखाचित्र की सहायता से पूर्ति वक्र के खिसकाव का क्या अर्थ है? समझाइए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 20
जब पूर्ति में परिवर्तन कीमत के अलावा अन्य कारकों में परिवर्तन के कारण आता है तो उसे पूर्ति वक्र में खिसकाव कहते हैं। जब अन्य कारकों में परिवर्तन के कारण पूर्ति में वृद्धि आती है तो पूर्ति वक्र दाईं ओर खिसक जाता है, जबकि पूर्ति वक्र का बाईं ओर खिसकना पूर्ति में कमी को बताता है। जैसाकि है रेखाचित्र में दर्शाया गया है। रेखाचित्र में OP कीमत पर PA पूर्ति की जाती है। पूर्ति वक्र का SS से S1S1 की स्थिति में पहुंचना पूर्ति में वृद्धि तथा S2S2 की स्थिति में पूर्ति में कमी को बताता है।

प्रश्न 21.
पूर्ति में वृद्धि के तीन कारण बताइए।
अथवा
पूर्ति वक्र के दाईं ओर खिसकने के कोई तीन कारण बताइए।
उत्तर:
एक पूर्ति वक्र के दाईं ओर खिसकने के तीन कारण निम्नलिखित हैं-
1. अन्य सभी वस्तुओं की कीमत में कमी-यदि दूसरी सभी वस्तुओं की कीमतों में कमी होती है तो उत्पादकों को अन्य सभी वस्तुओं की पूर्ति करना अधिक लाभदायक नहीं लगेगा और वे इस दी गई वस्तु का उत्पादन व पूर्ति करना अधिक लाभदायक महसूस करेंगे। इस प्रकार जिस वस्तु की कीमत में कमी नहीं आई है, उसका पूर्ति वक्र दाई ओर खिसक जाएगा।

2. उत्पादन साधनों की कीमतों में कमी-उत्पादन साधनों की कीमतों में कमी होने से उस वस्तु की लागत अन्य वस्तुओं की तुलना में कम होगी। इस प्रकार उत्पादक उस वस्तु का उत्पादन अधिक करेंगे जिसकी लागत में कमी हुई है। इस प्रकार उस वस्तु का पूर्ति वक्र दाईं ओर खिसक जाएगा।

3. तकनीकी सुधार-जब नए अनुसंधान तथा नवप्रवर्तनों से उत्पादन तकनीक में सुधार होता है तो उससे वस्तु की पूर्ति बढ़ती है जिससे वस्तु का पूर्ति वक्र दाईं ओर खिसक जाएगा।

प्रश्न 22.
पूर्ति में कमी के तीन कारण बताइए।
अथवा
पूर्ति वक्र के बाईं ओर खिसकने के कोई तीन कारण बताइए।
उत्तर:
पूर्ति वक्र के बाईं ओर खिसकने (अर्थात् पूर्ति में कमी) के कारण निम्नलिखित हैं-
1. अन्य सभी वस्तुओं की कीमतें-अन्य सभी वस्तुओं की कीमतों का वस्तु की पूर्ति पर प्रभाव पड़ता है। यदि दूसरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं तो उत्पादकों को उन वस्तुओं का उत्पादन अधिक लाभदायक लगेगा और वे उन वस्तुओं का उत्पादन अधिक करेंगे। इस प्रकार जिस वस्तु की कीमत नहीं बढ़ी है, उसकी पूर्ति कम हो जाएगी।

2. उत्पादन साधनों की कीमतें-उत्पादन साधनों की कीमतों में वृद्धि होने से उस वस्तु की लागत अन्य वस्तुओं की तुलना में अधिक होगी। इस प्रकार उत्पादक उन वस्तुओं का उत्पादन अधिक करेंगे जिनकी लागत में वृद्धि या तो नहीं हुई है या कम हुई है। जिसकी लागत में अधिक वृद्धि हुई है, उस वस्तु की तुलना में अन्य वस्तुओं की पूर्ति बढ़ जाएगी और उस वस्तु की पूर्ति में कमी हो जाएगी जिसके फलस्वरूप पूर्ति वक्र बाईं ओर खिसक जाएगा।

3. तकनीकी अवनति-तकनीकी अवनति के कारण एक वस्तु की पूर्ति में कमी हो सकती है जिससे उसका पूर्ति वक्र बाईं ओर खिसक जाएगा।

प्रश्न 23.
पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले तीन कारकों का वर्णन करो।
उत्तर:
पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले तीन कारक निम्नलिखित हैं-
1. उत्पादन लागत-यदि एक वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई को उत्पादित करने की लागत बढ़ती जाती है तो उत्पादक वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर भी पूर्ति को नहीं बढ़ाएगा, इस स्थिति में पूर्ति बेलोचदार होगी। इसके विपरीत, यदि अतिरिक्त इकाई को उत्पादित करने की लागत लगातार कम हो जाती है, तो उत्पादकों को वस्तु की पूर्ति बढ़ाने से अधिक लाभ प्राप्त हो सकेंगे। इस स्थिति में आपूर्ति लोचदार हो जाएगी।

2. वस्तु की प्रकृति शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं की पूर्ति बेलोच होती है क्योंकि कीमत में परिवर्तनों के अनुसार वस्तु की पूर्ति को बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता। इसके विपरीत, टिकाऊ वस्तुओं की पूर्ति लोचदार होती है।

3. समय तत्त्व-समय जितना अधिक दीर्घ होगा, उतनी ही एक वस्तु की पूर्ति अधिक लोचदार होगी। इसका कारण है कि दीर्घकाल में वस्तु की पूर्ति को आसानी से घटाया या बढ़ाया जा सकता है। इसके विपरीत, अल्पकाल में पूर्ति बेलोचदार होगी।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 24.
पूर्ति की लोच के पाँच प्रकारों को सारणीबद्ध करें।
उत्तर:
पूर्ति की लोच के पाँच प्रकार, निम्नलिखित सारणीबद्ध हैं-

क्रम संख्यापूर्ति की लोचपूर्ति की लोच के प्रकारविवरण
1es = 0पूर्णतया बेलोचदार पूर्तिवस्तु की कीमत में परिवर्तन का उसकी पूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं। पूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन, कीमत में प्रतिशत परिवर्तन से कम । पूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन, कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के समान। पूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन, कीमत में प्रतिशत परिवर्तन से अधिक। वस्तु की कीमत में परिवर्तन हुए बिना ही उसकी पूर्ति का घट अथवा बढ़ जाना।
2es < 0बेलोचदार पूर्ति
3es = 1पूर्ति में इकाई लोच
4es > 1लोचदार पूर्ति
5es = ∞पूर्ण लोचदार पूर्ति

प्रश्न 25.
रेखाचित्र की सहायता से शून्य उत्पादन की स्थिति समझाइए।
उत्तर:
अल्पकाल में एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म को हानि हो सकती है। एक फर्म की हानि का अर्थ है कुल लागत का कुल आगम से अधिक होना। कुल लागत के दो भाग होते हैं-

  • स्थिर लागत
  • परिवर्ती लागत

यदि उत्पादन को बंद करने या शून्य करने का निर्णय लिया जाता है, तो फर्म की हानि स्थिर लागत के बराबर होगी क्योंकि उत्पादन बंद करने से परिवर्ती लागत शून्य होगी। जब तक कीमत परिवर्ती लागत को पूरा करने में समर्थ है, तब तक फर्म उत्पादन करती रहेगी। जैसे ही कीमत परिवर्ती लागत को पूरा नहीं करती फर्म उत्पादन बंद कर देगी। इसे हम संलग्न चित्र द्वारा दिखा सकते हैं
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 21
संलग्न चित्र में फर्म का संतुलन बिंदु E है जहाँ वस्तु की प्रति इकाई लागत OD है और प्रति इकाई कीमत OL है। वस्तु की औसत परिवर्ती लागत OF है अर्थात् औसत स्थिर लागत NF है। चूँकि वस्तु की कीमत AVC से अधिक है, फर्म उत्पादन जारी रखेगी। यदि वस्तु की कीमत OF से कम होगी, तो फर्म उत्पादन बंद कर देगी। इस प्रकार R अथवा F उत्पादन-बंद बिंदु है।

प्रश्न 26.
पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में एक फर्म के दीर्घकालीन संतुलन की स्थिति समझाइए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में दीर्घकाल में एक फर्म की संतुलन स्थिति के लिए निम्नलिखित शर्तों का होना आवश्यक है
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 22
(i) p (बाज़ार कीमत) = LRMC (दीर्घकालीन सीमांत लागत)

(ii) p (बाज़ार कीमत) = LRAC (दीर्घकालीन औसत लागत)
रेखाचित्र से स्पष्ट है कि फर्म का दीर्घकालीन संतुलन E बिंदु पर है। चूँकि यहाँ, (i) P = LRMC, (ii) P = तथा

(iii) दीर्घकालीन सीमांत लागत घटती हुई बढ़ रही होनी चाहिए। अर्थात् संतुलन बिंदु पर दीर्घकालीन सीमांत लागत (LRMC)। एक प्रतिस्पर्धी फर्म की दीर्घकालीन संतुलन स्थिति को हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।

रेखाचित्र से स्पष्ट है कि फर्म का दीर्घकालीन संतुलन E बिंदु पर है। चूँकि यहाँ (i), P = LRMC, (ii) P = LRAC तथा LRMC बढ़ती हुई है।

दीर्घकाल में लागत और आगम बराबर होते हैं जिसके फलस्वरूप एक फर्म को न तो असामान्य लाभ होगा और न असामान्य हानि। रेखाचित्र से फर्म का संतुलन बिंदु E पर केवल मात्र सामान्य लाभ ही प्राप्त होते हैं।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार की शर्ते बताइए। पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत फर्म का माँग वक्र कैसा होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार के लिए निम्नलिखित शर्तों का होना आवश्यक है-
(i) क्रेताओं और विक्रेताओं की बहुत बड़ी संख्या, जिसके अंतर्गत प्रत्येक विक्रेता या खरीददार कुल उत्पादन का बहुत ही छोटा भाग बेचता या खरीद पाता है जिससे उस क्रय-विक्रय से कीमत अप्रभावित रहती है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 23
(ii) समरूप वस्तु, ताकि वस्तु और विक्रेता दोनों ही मानकीकृत हों और इस कारण वस्तु की एक इकाई या एक विक्रेता को अन्य इकाइयों या विक्रेताओं के मुकाबले में अधिक पसंद न किया जा सके।

(iii) बाज़ार में वस्तुओं और उत्पादन-साधनों की पूर्ण गतिशीलता।

(iv) क्रेताओं और विक्रेताओं द्वारा सामयिक तथा भविष्य की कीमतों एवं उत्पादन मूल्यों का पूर्ण ज्ञान होता है।

(v) पूर्ण प्रतियोगिता वाले उद्योग में फर्मों को आने-जाने की पूर्ण स्वतंत्रता रहती है यानी नई फर्में उद्योग में आना चाहें तो आ सकती हैं और
वस्तु की मात्रा पुरानी फर्मे बाहर जाना चाहें तो उद्योग से बाहर जा सकती हैं।

पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म मूल्य स्वीकारक होती है। इसे उद्योग द्वारा निर्धारित मूल्य पर ही वस्तु की कम या अधिक मात्रा बेचनी है। अतः फर्म का माँग वक्र पूर्णतया लोचदार होता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।

प्रश्न 2.
पूर्ण प्रतियोगिता का विक्रेता किस प्रकार कीमत स्वीकारक होता है? इस संदर्भ में बाज़ार की इस विशेषता का कि “विक्रेताओं की अधिक संख्या है” का क्या औचित्य है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता में क्रेता तथा विक्रेता बहुत अधिक संख्या में होते हैं और सभी विक्रेता समरूप वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। फर्मों के समूह को उद्योग कहा जाता है। पूर्ण प्रतियोगिता में मूल्य निर्धारण उद्योग द्वारा कुल माँग और कुल पूर्ति की शक्तियों के आधार पर किया जाता है। एक व्यक्तिगत फर्म को यही कीमत स्वीकार करनी होती है और वह इसे प्रभावित नहीं कर सकती। उद्योगों द्वारा निर्धारित मूल्य Pफर्म के AR और MR वक्र होते हैं। इसे हम अग्रांकित रेखाचित्र द्वारा दिखा

पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म कीमत स्वीकारक इसलिए होती है क्योंकि इस बाज़ार में विक्रेताओं की संख्या बहुत अधिक होती है। एक विक्रेता कुल बिक्री के अति सूक्ष्म भाग को बेचता है और इस तरह वह अपनी गतिविधियों से बाज़ार मूल्य को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होता। इस प्रकार विक्रेता को वस्तु का मूल्य अपनी इच्छानुसार निर्धारित करने की स्वतंत्रता नहीं होती।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 24

प्रश्न 3.
पूर्ति से क्या अभिप्राय है? इसे प्रभावित करने वाले तत्त्वों या कारकों की व्याख्या करें।
उत्तर:
पूर्ति का अर्थ-एक निश्चित समय में, निश्चित कीमत पर उत्पादक द्वारा बिक्री के लिए प्रस्तुत की जाने वाली वस्तु की मात्रा को पूर्ति कहते हैं।

पूर्ति को प्रभावित करने वाले तत्त्व या कारक-किसी वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करने वाले मुख्य तत्त्व निम्नलिखित हैं-
1. कीमत-किसी वस्तु की कीमत के कम होने पर पूर्ति कम होती है और कीमत के बढ़ने पर पूर्ति बढ़ती है।

2. उत्पादन की लागत उत्पादन की लागत के कम होने से वस्तुओं की पूर्ति बढ़ जाती है और उत्पादन की लागत बढ़ जाने से वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है।

3. उत्पादन के कारकों की उपलब्धि-यदि उत्पादन के कारक सस्ते तथा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों, तो वस्तु की पूर्ति बढ़ जाएगी। यदि उत्पादन के साधन महँगे तथा कम हों, तो वस्तु की पूर्ति कम हो जाएगी।

4. फर्मों की संख्या किसी वस्तु की बाज़ार पूर्ति फर्मों की संख्या पर भी निर्भर करती है। फर्मों की संख्या अधिक होने पर पूर्ति अधिक तथा फर्मों की संख्या कम होने पर पूर्ति कम हो जाती है।

5. उत्पादकों के उद्देश्य-यदि उत्पादकों का उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना है तो केवल अधिक कीमत पर ही अधिक प्रति जाएगी। इसके विपरीत यदि उत्पादकों का उद्देश्य बिक्री, उत्पादन या रोज़गार को अधिकतम करना है अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करनी है तो वर्तमान कीमत पर भी अधिक पूर्ति की जाएगी।

6. प्राकृतिक तत्त्व-प्राकृतिक तत्त्वों; जैसे मौसम, वर्षा, सूखा, ओले इत्यादि का भी कृषि पदार्थों की पूर्ति पर काफी प्रभाव पड़ता है। मौसम ठीक रहने पर इनकी पूर्ति बढ़ जाती है और मौसम के खराब रहने पर इनकी पूर्ति कम हो जाती है।

7. यातायात तथा संचार के साधन-यातायात तथा संचार के साधनों; जैसे रेलें, मोटरें, ट्रक, टेलीफोन, डाक-तार इत्यादि की सहायता से पूर्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुगमता से कम लागत पर भेजा जा सकता है, जिससे वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है। यदि यातायात के साधन अविकसित होंगे, तो वस्तु की पूर्ति कम होगी।

8. सरकार की नीति-सरकार की नीति भी पूर्ति को प्रभावित करती है। सरकार जिन वस्तुओं के उत्पादन में रियायतें (Subsidies) देती है, उनकी पूर्ति बढ़ जाती है। इसके विपरीत, यदि सरकार किसी वस्तु पर कर (Taxes) लगाती है, तो उनकी पूर्ति कम हो जाती है। सरकार जिन वस्तुओं का आयात (Import) करती है, उनकी पूर्ति बढ़ जाती है और जिनका निर्यात (Export) करती है, उनकी पूर्ति कम हो जाती है।

प्रश्न 4.
रेखाचित्रों की सहायता से ‘पूर्ति के विस्तार’ तथा ‘पूर्ति में वृद्धि’ में अंतर बताइए।
उत्तर:
पूर्ति का विस्तार-अन्य बातें समान रहने पर, जब किसी वस्तु की कीमत बढ़ने से वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है, तो इसे पूर्ति का विस्तार कहते हैं।
उदाहरण के लिए-

पूर्ति का विस्तार
कीमतपूर्ति
110
550

दी गई तालिका से स्पष्ट है कि जब वस्तु की कीमत रु० 1 से बढ़कर रु० 5 हो जाती है, तो वस्तु की पूर्ति 10 इकाइयों से बढ़कर 50 इकाइयाँ हो जाती है तो इसे पूर्ति में विस्तार कहते हैं। चित्र में SS वस्तु का पूर्ति वक्र है। जब कीमत OP है तो वस्तु की पूर्ति OQ है और जब कीमत बढ़कर OP1 हो जाती है, तो वस्तु की पूर्ति बढ़कर OQ1 हो जाती है। वस्तु की पूर्ति में QQ1 की वृद्धि पूर्ति का विस्तार है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 25

पूर्ति में वृद्धि-जब वस्तु की कीमत के अतिरिक्त किन्हीं अन्य तत्त्वों; जैसे उत्पादन करने के ढंग में सुधार, सरकार की नीति, साधनों की लागत में कमी, यातायात और संचार साधनों के विकास, मौसम में परिवर्तन इत्यादि के कारण वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है, तो इसे पूर्ति में वृद्धि कहते हैं। अन्य शब्दों में, पूर्ति में वृद्धि से अभिप्राय है-

  • समान कीमत, अधिक पूर्ति (Same Price, More Supply)
  • कम कीमत, समान पूर्ति (Less Price, Same Supply)

पूर्ति वृद्धि को निम्नांकित उदाहरणों या तालिकाओं की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है-
(I)

समान कीमतअधिक पूर्ति
कीमतपूर्ति
3
3
30
40

(II)

कम कीमतसमान पूर्ति
कीमतपूर्ति
3
3
30
30

तालिका I से स्पष्ट है कि समान कीमत पर वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है और तालिका II से स्पष्ट है कि वस्तु की कम कीमत पर वस्तु की पूर्ति समान रहती है। पूर्ति में वृद्धि को चित्र की सहायता से भी स्पष्ट किया जा सकता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 26
चित्र में SS वस्तु की प्रारंभिक पूर्ति वक्र है जो यह स्पष्ट करता है कि जब वस्तु की कीमत OP है, तो वस्तु की पूर्ति OQ है। जब कीमत की अपेक्षा किन्हीं अन्य कारणों से वस्तु की अधिक पूर्ति की जाती है, तो प्रारंभिक पूर्ति वक्र SS दाईं ओर खिसककर S1S1 हो जाएगा। स्पष्ट है कि उसी कीमत OP1 पर वस्तु की पूर्ति OQ से बढ़कर OQ1 हो जाती है या फिर कम कीमत OP1 पर वस्तु की समान पूर्ति अर्थात् OQ ही रहती है। यह पूर्ति में वृद्धि को स्पष्ट करती है।

प्रश्न 5.
रेखाचित्रों की सहायता से पूर्ति के संकुचन और पूर्ति में कमी में भेदं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पूर्ति का संकुचन-अन्य बातें समान रहने पर, जब किसी वस्तु की कीमत कम होने से वस्तु की पूर्ति कम हो जाती है, तो इसे पूर्ति का संकुचन कहते हैं। उदाहरण के लिए-

पूर्ति का संकुचन
कीमतपूर्ति
5
1
50
10

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि जब वस्तु की कीमत 5 रुपए से घटकर 1 रुपया हो जाती है, तो वस्तु की पूर्ति 50 इकाइयों से घटकर 10 इकाइयाँ रह जाती हैं तो इसे पूर्ति का संकुचन कहते हैं। रेखाचित्र में SS वस्तु का पूर्ति वक्र है। जब कीमत OP है, तो वस्तु की पूर्ति OQ है और जब कीमत गिरकर OP1 हो जाती है, तो वस्तु की पूर्ति घटकर OQ1 रह जाती है। वस्तु की पूर्ति में Q1Q की कमी पूर्ति का संकुचन है।
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पूर्ति में कमी-जब वस्तु की कीमत के अतिरिक्त किन्हीं अन्य तत्त्वों; जैसे कच्चे माल का न मिलना, बिजली की कमी, सरकारी नीति, साधनों की लागत में वृद्धि, मौसम में परिवर्तन इत्यादि के कारण वस्तु की पूर्ति कम हो जाती है, तो इसे पूर्ति में कमी कहते हैं। अन्य शब्दों में, पूर्ति में कमी से अभिप्राय है

  1. समान कीमत, कम पूर्ति (Same Price, Less Supply)
  2. अधिक कीमत, समान पूर्ति (More Price, Same Supply)

पूर्ति में कमी को निम्नांकित तालिकाओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
(I)

समान कीमतकम पूर्ति
कीमतपूर्ति
3
3
30
20

(II)

अधिक कीमतसमान पूर्ति
कीमतपूर्ति
3
4
30
30

तालिका (I) से स्पष्ट है कि समान कीमत पर वस्तु की पूर्ति घट जाती है और तालिका (II) से स्पष्ट है कि वस्तु की अधिक कीमत पर वस्तु की पूर्ति समान रहती है। पूर्ति में कमी को रेखाचित्र की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 28
संलग्न रेखाचित्र में SS वस्तु का प्रारंभिक पूर्ति वक्र है जो यह स्पष्ट करता है कि जब वस्तु की कीमत OP है, तो वस्तु की पूर्ति OQ है। जब कीमत की अपेक्षा किन्हीं अन्य कारणों से वस्तु की पूर्ति घट जाती है, तो प्रारंभिक पूर्ति वक्र SS बाईं ओर खिसककर S1S1 हो जाता है। स्पष्ट है कि उसकी कीमत OP पर पूर्ति OQ से घटकर OQ1 हो जाती है या फिर वस्तु की अधिक कीमत OP, पर वस्तु की पूर्ति उतनी ही OQ रहती है। यह पूर्ति में कमी को स्पष्ट करती है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 6.
पूर्ण प्रतियोगिता किसे कहते हैं? पूर्ण प्रतियोगिता में अल्पकाल में फर्म के संतुलन की सीमांत विधि द्वारा व्याख्या करें।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता का अर्थ-‘पूर्ण प्रतियोगिता’ बाज़ार की वह अवस्था है, जिसमें वस्तु के क्रेता तथा विक्रेता बहुत अधिक संख्या में होते हैं। सभी विक्रेता समरूप (Homogeneous) वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जिनकी बाज़ार में एक ही कीमत होती है। समरूप वस्तुओं का उत्पादन करने वाली सभी फर्मों के समूह को उद्योग कहा जाता है। उद्योग की कुल माँग तथा कुल पूर्ति द्वारा ही सन्तुलन कीमत का निर्धारण होता है। कोई भी व्यक्तिगत फर्म इस कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती। प्रत्येक फर्म को यह कीमत स्वीकार करनी पड़ती है। पूर्ण प्रतियोगिता में इस कीमत पर एक फर्म जितना माल बेचना चाहे बेच सकती है।

फर्म के सन्तुलन का अर्थ–पूर्ण प्रतियोगी बाज़ार में कीमत का निर्धारण उद्योग द्वारा किया जाता है तथा व्यक्तिगत फर्मों को यह कीमत स्वीकार करनी पड़ती है। प्रत्येक फर्म को यह निर्णय लेना होता है कि बाज़ार में प्रचलित कीमत पर इसे कितना उत्पादन करना चाहिए। जिस स्थिति में फर्म या उत्पादक उत्पादन-सम्बन्धी निर्णय लेता है, उसे फर्म का सन्तुलन कहते हैं।

फर्म के सन्तुलन का निर्धारण-पूर्ण प्रतियोगिता में एक फर्म की सन्तुलन की स्थिति का वर्णन निम्नलिखित दो विधियों द्वारा किया जा सकता है

  • कुल आय तथा कुल लागत विधि
  • सीमान्त आय तथा सीमान्त लागत विधि।

यहाँ हम केवल सीमान्त विधि द्वारा एक फर्म का संतुलन निर्धारित करेंगे।
सीमान्त आय तथा सीमान्त लागत विधि-एक फर्म की सन्तुलन की स्थिति को सीमान्त आय (MR) और सीमान्त लागत (MC) की सहायता से भी स्पष्ट किया जा सकता है।

1. सीमान्त आय सीमान्त लागत के बराबर (MR = MC) पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के सन्तुलन की MR = MC की अनिवार्य शर्त (Necessary Condition) चित्र द्वारा स्पष्ट की गई है। चित्र में, MC और MR वक्र एक-दूसरे को K बिन्दु पर काटते हैं। यह सन्तुलन बिन्दु है। यहाँ सन्तुलन मात्रा OQ है। यदि फर्म उत्पादन को घटाकर OQ1 कर देती है तो यहाँ सीमान्त आय, सीमान्त लागत से अधिक है। अतः इस उत्पादन मात्रा पर रुकने से फर्म को बिन्दांकित त्रिभुज के बराबर लाभ से वंचित रहना पड़ता है, क्योंकि OQ उत्पादन तक फर्म को प्रत्येक इकाई से लाभ मिल रहा है। दूसरी ओर, यदि फर्म उत्पादन को OQ से बढ़ाकर OQ2 कर देती है तो बिन्दु वाली त्रिभुज के समान हानि होती है, क्योंकि OQ मात्रा के पश्चात् सीमान्त लागत सीमान्त आय से अधिक है। इसलिए फर्म का उत्पादन सदैव उस बिन्दु पर होगा जहाँ MR व MC
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 29

2. सीमान्त लागत वक्र सीमान्त आय वक्र को नीचे से ऊपर की ओर काटने वाली शर्त पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में फर्म के सन्तुलन MC = MR वाली शर्त अनिवार्य (Necessary) तो है किन्तु, पर्याप्त (Sufficient) नहीं है। यहाँ फर्म की दूसरी शर्त है कि “MC वक्र MR वक्र को नीचे से ऊपर को काटता हो” भी पूरी होनी चाहिए। यदि MC वक्र MR वक्र को दो स्थानों पर काटता है तो सन्तुलन उस स्थान पर होगा जहाँ यह नीचे से ऊपर की ओर काटता है। इसे हम चित्र द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 30

चित्र में MC वक्र MR वक्र को दो बिन्दुओं Z और K पर काट रहा है। दोनों बिन्दुओं पर MR = MC है, किन्तु दोनों बिन्दुओं में केवल K वाला बिन्दु ही सन्तुलन बिन्दु है, क्योंकि इस पर MR = MC भी है और MR, MC को नीचे से काट रही है जैसा कि तीर (Arrow) के चिह्न से स्पष्ट है। इसलिए सन्तुलन मात्रा OQ है। Z पर MC =MR तो है, परन्तु MC वक्र ऊपर से नीचे को आता हुआ MR को काट रहा है, जैसा कि तीर (Arrow) के चिह्न से स्पष्ट है। अतः OQ1 तक तो प्रत्येक इकाई की MC, MR से अधिक है और OQ1 से OQ तक प्रत्येक इकाई की MC, MR से कम है। अतः फर्म को उत्पादन बढ़ाने से लाभ होगा। इसलिए यह सन्तुलन बिन्दु नहीं हो सकता।

स्पष्ट है कि पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म तब सन्तुलन स्थिति में होगी जब (i) उसकी MR = MC हो, तथा (ii) उसका MC वक्र MR वक्र को नीचे से ऊपर काटे।

प्रश्न 7.
पूर्ति की कीमत लोच को मापने की प्रतिशत विधि को उदाहरण सहित सुस्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रतिशत या आनुपातिक विधि के अनुसार, पूर्ति की कीमत लोच को पूर्ति की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन और वस्तु की कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के अनुपात के रूप में मापा जाता है। इसे आनुपातिक विधि भी कहा जाता है। अन्य शब्दों में, पूर्ति की लोच मापने के लिए पूर्ति की मात्रा में हुए आनुपातिक परिवर्तन को कीमत में हुए आनुपातिक परिवर्तन से भाग देते हैं। यदि भाज्यफल एक से अधिक हो तो पूर्ति अधिक लोचदार, यदि एक के बराबर हो तो इकाई लोचदार और यदि एक से कम हो तो बेलोचदार कहलाती है। सूत्र के रूप में,
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 31
सांकेतिक रूप में,
es = \(\frac{\frac{\Delta q}{q^{0}} \times 100}{\frac{\Delta p}{p^{0}} \times 100}=\frac{\Delta q}{q^{0}} \times \frac{p^{0}}{\Delta p}=\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
यहाँ, ∆q = पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन, q° = प्रारंभिक पूर्ति
∆p = कीमत में परिवर्तन, p° = प्रारंभिक कीमत
इस प्रकार पूर्ति की लोच को मापने का सूत्र है-
es = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
वैकल्पिक विधि
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 32
उदाहरण:
मान लो एक वस्तु का मूल्य 4 रु० है तो उसकी पूर्ति 2000 इकाइयाँ हैं। यदि वस्तु का मूल्य बढ़कर 5 रु० हो जाता है तो पूर्ति 3000 इकाइयाँ हो जाती है। वस्तु की पूर्ति लोच होगी
हल:
es = \(\frac{\frac{1000}{2000}}{\frac{1}{4}}\)
es = \(\frac{1000}{2000} \times \frac{4}{1}=\frac{4}{2}\) = 2
q0 = 2000
∆q = 1000
p0 = 4
∆q = 1.
अर्थात् es > 1 है। अतः पूर्ति अधिक लोचदार है।

प्रश्न 8.
पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक बताइए।
उत्तर:
पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
1. लागत-यदि वस्तु के उत्पादन पर बढ़ती लागतों का नियम लागू हो रहा है अर्थात् उत्पादन के बढ़ाने से प्रति इकाई लागत बढ़ती है तो उत्पादक वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर भी पूर्ति को नहीं बढ़ाएगा। अतः पूर्ति बेलोचदार होगी। इसके विपरीत, यदि उत्पादन लागत घटती है, तो उत्पादक को पूर्ति बढ़ाने से अधिक लाभ प्राप्त होगा। अतः पूर्ति लोचदार होगी।

2. समय तत्त्व-समय तत्त्व भी पूर्ति को प्रभावित करने वाला एक मुख्य तत्त्व है। समय जितना लंबा होगा, वस्तु की पूर्ति की लोच उतनी ही अधिक होगी और समय जितना कम होगा, वस्तु की पूर्ति की लोच उतनी ही अधिक बेलोचदार होगी।

3. उत्पादन प्रणाली-जिन वस्तुओं की उत्पादन प्रणाली सरल है और जिनमें अधिक पूँजी की आवश्यकता नहीं होती, उनकी पूर्ति लोचदार होती है, क्योंकि इनकी पूर्ति को कीमत में परिवर्तित करके सरलता से घटाया-बढ़ाया जा सकता है, परंतु स वस्तु की उत्पादन प्रणाली जटिल है और जिसमें अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है, उसकी पूर्ति बेलोचदार होती है।

4. वस्तु की प्रकृति-जो वस्तुएँ शीघ्र नष्ट होने वाली होती हैं, उनकी पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार होती है, क्योंकि कीमत में परिवर्तन करके उनकी पूर्ति को घटाया-बढ़ाया जा सकता है, परंतु जो वस्तुएँ टिकाऊ होती हैं, उनकी पूर्ति लोचदार होती है।

5. भावी कीमतों में परिवर्तन-यदि उत्पादक को भविष्य में वस्तु की कीमत के अधिक होने की आशा है तो वे वस्तु की वर्तमान पूर्ति में कमी कर देंगे, जिसके कारण पूर्ति बेलोचदार हो जाएगी। यदि भविष्य में कीमत कम होने की आशा है, तो उत्पादक . वर्तमान समय में अधिक मात्रा बेचने लगेंगे, जिनके कारण पूर्ति लोचदार हो जाएगी।

6. उत्पादन के नियम-जिस वस्तु के उत्पादन में घटते प्रतिफल अथवा बढ़ती लागतों का नियम लागू होता है, उसकी पूर्ति कम लोचदार होती है। इसके विपरीत, जिस वस्तु के उत्पादन में बढ़ते प्रतिफल अथवा घटती लागत का नियम लागू होता है, उसकी पूर्ति अधिक लोचदार होती है।

7. प्रकृति का प्रभाव-जिन वस्तुओं के उत्पादन पर प्रकृति का प्रभाव अधिक होता है उनकी पूर्ति बेलोचदार होती है; जैसे कृषि उत्पादन। इसके विपरीत, कारखाने में होने वाला उत्पादन मनुष्य के नियंत्रण
में है। यहाँ पर उत्पादन कई तरह से बढ़ाया जा सकता है। इसलिए कारखानों में बनी वस्तुओं का उत्पादन अपेक्षाकृत लोचदार होता है।

संख्यात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
यदि वस्तु की प्रत्येक इकाई 5 रु० में बिक रही हो तो इस तालिका की पूर्ति करें-

बिक्री की मात्राTRMRAR
1
2
3
4
5
6
7

हल:

बिक्री की मात्राTRMRAR
1555
21055
31555
42055
52555
63055
73555

प्रश्न 2.
एक फर्म की TR सारणी निम्नलिखित तालिका में दर्शाई गई है। फर्म के समक्ष बाज़ार में वस्तु की कीमत क्या है?

उत्पादनTR (रु०)
17
214
321
428
535

हल:

उत्पादनTR (रु०)AR (कीमत)
177
2147
3217
4287
5357

फर्म के समक्ष बाज़ार में वस्तु की कीमत औसत आगम के बराबर अर्थात् 7 रु० होगी।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित तालिका के आधार पर TR, AR, MR की गणना कीजिए

बिक्री (इकाई)345
कीमत (रु०)1098

हल:

बिक्री (इकाईकीमतTRARMR
3103010
493696
584084

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 4.
एक विक्रेता हीरे की तीन अंगूठियों को 12,000 रु० प्रति अंगूठी के हिसाब से बेच सकता है। यदि चार अंगूठियाँ बेचे तो उसकी सीमांत आय 10,500 रु० होगी। बताइए वह चार अंगूठियों को किस कीमत पर बेच सकता है?
हल:
3 अंगूठियों के बेचने से TR = 12,000 x 3 = 36,000 रु०
चौथी अंगूठी को बेचने से आगम = 10,500 रु०
चार अंगूठियों से TR = 36,000 + 10,500 = 46,500 रु०
प्रति अंगूठी आगम (कीमत) = 46,500 ÷ 4 = 11,625 रु०

प्रश्न 5.
निम्नलिखित तालिका को पूरा कीजिए

बेची गई इकाइयाँकीमत = A RTRMR
10100
911
1296
713
1484
515
1664

हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 33

प्रश्न 6.
निम्नलिखित तालिका को पूरा करो-

औसत आगम या मूल्य (प्रति इकाई)बेची गई इकाइयों की संख्याकुल आगमसीमांत आगम
10100
119-1
1296-3
137-5
1484-7
155-9
1664-11

हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 34

प्रश्न 7.
मयंकदीप 10 वस्तुएँ 50 रु० प्रति वस्तु के हिसाब से बेचता है, यदि वह 11 वस्तुएँ 47 रु० प्रति वस्तु के हिसाब से बेचता है तो उसकी सीमांत आगम निकालिए।
हल:

वस्तुओं की बिक्रीकीमतकुल आगमसीमांत आगम
1050 रु०500 रु०
1147 रु०517 रु०17 रु०

प्रश्न 8.
निम्नलिखित तालिका से कुल आय (TR) तथा सीमांत आय (MR) निकालिए-

उत्पादन इकाइयाँऔसत कीमत आय (₹ )कुल आय (₹)सीमांत लागत (₹)
56______
47______
38______

हल:

उत्पादन इकाइयाँऔसत कीमत आय (₹ )कुल आय (₹)सीमांत लागत (₹)
5630_
4728-2
3824-4

प्रश्न 9.
कल्पना कीजिए कि मांग तथा पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित किसी वस्तु की बाज़ार कीमत 4 रु० प्रति इकाई है। इस कीमत के संदर्भ में किसी फर्म के विभिन्न उत्पादन स्तरों पर औसत, सीमांत तथा कुल आगम ज्ञात कीजिए। इस स्थिति में फर्म के समक्ष जो मांग वक्र होगी उसकी आकृति कैसी होगी?
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 35
फर्म के समक्ष मांग वक्र की आकृति OX-अक्ष के समानांतर होगी।

प्रश्न 10.
एक विक्रेता की कुल आगम (TR) अनुसूची नीचे दी गई है। इसके आधार पर 6 इकाइयों की AR और MR ज्ञात कीजिए। क्या यह विक्रेता पूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार में बेच रहा है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दीजिए।

बेची गई इकाइयाँकुल आगम
5300
6330

हल:

बेची गई इकाइयाँTRARMR
530060
63305530

यह पूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार नहीं है, क्योंकि यहाँ AR और MR भिन्न-भिन्न हैं।

प्रश्न 11.
कल्पना कीजिए कि किसी वस्तु की बाज़ार कीमत 5 रु० प्रति इकाई है, जो माँग व पूर्ति के नियमों के आधार पर निर्धारित हुई है। इस कीमत को लेकर किसी फर्म द्वारा उत्पादन के विभिन्न स्तरों से संबंधित AR, MR तथा TR के कक्रों का रेखाचित्र बनाइए।
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 36

प्रश्न 12.
एक प्रतिस्पर्धी फर्म की बाज़ार में कीमत 15 रु० है।
(क) इसकी कुल आगम तालिका का निर्माण करें, यदि बिक्री 0 से 10 इकाई तक हो।
(ख) मान लीजिए कि कीमत 17 रु० हो जाती है। क्या नए TR वक्र का ढाल पहले वाले से अधिक होगा या कम?
हल:
(क) कुल आगम तालिका

उत्पादन             कुल आगम
जब कीमत 15 रु० होजब कीमत 17 रु० हो
000
11517
23034
34551
46068
57585
690102
7105119
8120136
9135153
10150170

(ख) यदि कीमत 15 रु० से बढ़कर 17 रु० हो जाती है, तो TR वक्र का ढाल पहले वाले से अधिक तीखा होगा।

प्रश्न 13.
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म की वस्तु की बाज़ार कीमत 10 रु० प्रति इकाई है, बिक्री के विभिन्न स्तरों के लिए TR अनुसूची व्युत्पन्न करें। यदि फर्म कुछ समय के लिए उत्पादन बंद करने का निर्णय लेती है, तो बाज़ार कीमत क्या होगी?
हल:

वस्तु की बिक्री (इकाइयाँ)कीमत (रु०)कुल आगम (रु०)
11010
21020
31030
41040
51050
61060
71070
81080
91090
1010100

यदि पूर्ण प्रतियोगी फर्म कुछ समय के लिए उत्पादन बंद करने का निर्णय लेती है, तो बाज़ार कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होगा क्योंकि पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में कोई अकेली फर्म बाज़ार में प्रचलित कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 14.
नीचे दी गई सारणी से कुल आगम, औसत आगम और माँग की कीमत लोच की गणना कीजिए
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 37a
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 37b
प्रयोग किए गए सूत्र-
(i) कुल आगम = सीमांत आगम, + सीमांत आगम, + …………… + सीमांत आगम,
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 37

प्रश्न 15.
निम्नलिखित तालिका से उत्पादन का वह स्तर ज्ञात कीजिए जिस पर उत्पादक संतुलन की स्थिति में है। कारण बताइए।

उत्पादन (इकाइयाँ)12345
कुल लागत (रु०)200300380540640
कुल आगम (रु०)180340480480600

हल:

उत्पादन (इकाइयाँ)TCTRलाभ (TR-TC)
1200180-20
230034040
3380480100
4500480-20
5640600-40

उत्पादन की 3 इकाइयों के स्तर पर उत्पादक संतुलन की स्थिति में है, क्योंकि इस स्तर पर लाभ अधिकतम अर्थात् 100 रु० है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित तालिका से उत्पादक के संतुलन का निर्धारण करें। तार्किक कारण दीजिए।

बेची गई मात्रा (इकाइयाँ)5678910
कुल आगम (रु०)152025303540
कुल लागत (रु०)182226273038

हल:

बेची गई मात्रा (इकाइयाँ)कुल आगम (रु०)कुल लागत

(रु०)

लाभ (रु०)
51518-3
62022-2
72526-1
830273
935305
1040382

9वीं इकाई उत्पादन स्तर पर लाभ अधिकतम होगा। इस स्तर पर TR एवं TC के बीच का अंतर अधिकतम है जो कि 5. है। इस प्रकार उत्पादक संतुलन 9वीं इकाई के उत्पादन स्तर पर होगा।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर कुल आगम (TR) व कुल लागत (TC) में तुलना करते हुए उत्पादक के अधिकतम लाभ वाली स्थिति बताइए।

उत्पादन इकाइयाँ12345
औसत आगम (AR) (र०)12111098
औसत लागत (AC) (रु०)79101112

हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 38a
उत्पादन के अधिकतम लाभ (अर्थात् 5 रु०) की स्थिति 1 इकाई के उत्पादन पर होगी।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित तालिका को पूरी करें। अधिकतम लाभ वाली अवस्था भी बताइए।

उत्पादन (इकाइयाँ)कुल आगम (रु०)कुल लागत (रु०)लाभ (रु०)
168
29-1
3100
41211
5148

हल:

उत्पादन (इकाइयाँ)कुल आगम (रु०)कुल लागत (रु०)लाभ (रु०)
168-2
289-1
310100
412111
51486

उत्पादक के अधिकतम लाभ (अर्थात् 6 रु०) की स्थिति 5वीं इकाई के उत्पादन स्तर पर है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 19.
निम्नलिखित तालिका से बेची गई मात्रा के प्रत्येक स्तर पर लाभ ज्ञात करें।

बेची गई मात्रा (इकाइयाँ)कीमत (रु० प्रति इकाई)औसत लागत (रु०)
11515
21612
31710
41812
51914

हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 38

प्रश्न 20.
निम्नलिखित तालिका से TR-TC विधि द्वारा लाभ अधिकतम उत्पादन स्तर ज्ञात करें।

बेची गई मात्रा (इकाइयाँ)कुल आगम (रु०)सीमांत लागत
(रु०)
11215
2269
3346
4402
5423

हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 39
लाभ अधिकतम तब होगा, जब उत्पादन स्तर 4 है क्योंकि इस स्तर पर लाभ अधिकतम है, जो कि 8 है। इस उत्पादन स्तर के बाद लाभ घटने लगता है।

प्रश्न 21.
निम्नलिखित तालिका में सीमांत आगम (MR) और सीमांत लागत (MC) में तुलना करते हुए प्रतिस्पर्धी फर्म की संतुलन की स्थिति ज्ञात कीजिए।

उत्पादन (इकाइयाँ)23456
कीमत (र०)1010101010
सीमांत ज्ञागत (MC) (र०)678910

हल:
प्रतियोगी फर्म 6 इकाइयों के उत्पादन स्तर पर संतुलन की स्थिति में है, क्योंकि इस पर MR = MC = 10 रु० (पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत = AR = MR)।

प्रश्न 22.
कीमत 10 रु० से बढ़कर 12 रु० हो गई, जिसके फलस्वरूप पूर्ति 15 इकाइयों से बढ़कर 20 इकाइयाँ हो गईं। पूर्ति की लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
इस उदाहरण में,
p0 = 10, ∆p = 2, q0 = 15, ∆q = 5
∴ es = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}=\frac{5}{2} \times \frac{10}{15}=\frac{5}{3}=1.66\)
पूर्ति की लोच इकाई से अधिक है।

प्रश्न 23.
मान लो जब आइसक्रीम की कीमत 5 रु० प्रति कप है तो 5 आइसक्रीम की पूर्ति की जाती है। यदि कीमत बढ़कर 10 रु० हो जाती है तो पूर्ति बढ़कर 10 हो जाती है। पूर्ति की कीमत लोच ज्ञात करें।
हल:
es = \(\frac{p^{0}}{q^{0}} \times \frac{\Delta q}{\Delta p}\)
p0 = 5 रु०, p1 = 10 रु०, ∆p = 10 – 5 = 5 रु०
q0 = 5, q1 = 10, ∆q = 10 – 5 = 5
es = \(\frac { 5 }{ 5 }\) x \(\frac { 5 }{ 5 }\) = 1 (इकाइ)

प्रश्न 24.
जब कीमत 4 रु० प्रति इकाई है तो गुड़िया बनाने वाली प्रतिदिन 8 गुड़ियों की पूर्ति करती है। कीमत 5 रु० प्रति गुड़िया होने पर वह प्रतिदिन 10 गुड़ियों को बेचने को तैयार है। गुड़िया की पूर्ति की लोच क्या होगी?
हल:
पूर्ति की लोच (e) = es = \(\frac{p^{0}}{q^{0}} \times \frac{\Delta q}{\Delta p}\)
p0 = 4 रु०, p1 = 5 रु०, ∆p = 5 – 4 = 1 रु०
q0 = 8 गुड़ियाँ, q1 = 10 गुड़ियाँ,
∆q = 10 – 8 = 2 गुड़ियाँ
es = \(\frac { 4 }{ 8 }\) x \(\frac { 2 }{ 1 }\) = 1 (इकाई)

प्रश्न 25.
वस्तु की कीमत 12 रु० प्रति इकाई पर वस्तु की पूर्ति 25 इकाइयाँ थीं। कीमत में 8 रु० प्रति इकाई की वृद्धि हो जाने से वस्तु की पूर्ति बढ़कर 35 इकाइयाँ हो गईं। पूर्ति की लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
इस उदाहरण में,
p0 = 12 रु०, p1 = 20 रु०, ∆p = 20 – 12 = 8 रु०
q0 = 25, q1 = 35, ∆q= 35 – 25 = 10
∴ \(e_{s}=\frac{p^{0}}{q^{0}} \times \frac{\Delta q}{\Delta p}=\frac{12}{25} \times \frac{10}{8}=0.6\)
पूर्ति की लोच इकाई से कम है।

प्रश्न 26.
कीमत में 20% वृद्धि होने के फलस्वरूप पूर्ति 35 इकाइयों से बढ़कर 70 इकाइयाँ हो गईं। पूर्ति की लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 40
पूर्ति की लोच इकाई से अधिक है।

प्रश्न 27.
जब किसी वस्तु की बाजार कीमत 4 रु० है तो विक्रेता 600 इकाइयाँ बेचने को तैयार है। यदि कीमत बढ़कर 5 रु० हो जाती है तो वह 850 इकाइयाँ बेचने को तैयार है। पूर्ति की लोच ज्ञात करें।
हल:
es = \(\frac{p^{0}}{q^{0}} \times \frac{\Delta q}{\Delta p}\)
p0 = 4 रु०, p1 = 5 रु०, ∆p = 5 – 4 = 1 रु०
q0 = 600, q1 = 850, ∆q = 850 – 600 = 250
es = \(\frac{4}{600} \times \frac{250}{1}=\frac{1000}{600}\) = 1 (इकाई)
= 1.6
पूर्ति की लोच इकाई से अधिक है।

प्रश्न 28.
निम्नलिखित सूचना के आधार पर पूर्ति की लोच ज्ञात कीजिए-

कीमत (रु०)बिक्री आगम (र०)
8224
12504

हल:
दिए गए उदाहरण में पहले हमें पूर्ति की मात्रा ज्ञात करनी होगी।

कीमत (रु०)बिक्री आगम (र०)पूर्ति (इकाइयाँ)
822428
1250442

\(e_{s}=\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{a^{0}}=\frac{14}{4} \times \frac{8}{28}\) = 1
अर्थात् इकाई पूर्ति की लोच।

प्रश्न 29.
एक फर्म को 50 रु० आगम की प्राप्ति हो रही थी, जब वस्तु की कीमत 10 रु० थी। कीमत बढ़कर 15 रु० हो जाने से फर्म को कुल आगम 150 रु० प्राप्त हो रहा है। फर्म की आपू की कीमत लोच क्या है?
हल:
\(q^{0}=\frac{50}{10}=5, q^{1}=\frac{150}{15}=10\)
∴ ∆q = q1-q0 = 10 – 5 = 5
P0 = 10, p1 = 15 ∴ ∆p = 15 – 10 = 5
∴ es = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}=\frac{5}{5} \times \frac{10}{5}=2\)

प्रश्न 30.
एक वस्तु की पूर्ति की कीमत लोच इकाई है। 5 रु० प्रति इकाई कीमत पर एक फर्म उस वस्तु की 25 इकाइयों की पूर्ति करती है। यदि इस वस्तु की कीमत बढ़कर 6 रु० प्रति इकाई हो जाती है तो वह फर्म उस वस्तु की कितनी इकाइयों की पूर्ति करेगी ?
हल:
पूर्ति की कीमत लोच =\(\frac{p^{0}}{q^{0}} \times \frac{\Delta q}{\Delta p}\)
यहाँ,
p° = प्रारंभिक कीमत q° = प्रारंभिक पूर्ति
= पूर्ति में परिवर्तन Ap = कीमत में परिवर्तन
इस प्रकार,
1 = \(\frac{5}{25} \times \frac{\Delta q}{1}\)
1 = \(\frac{\Delta q}{5}\)
∆q = 5
पूर्ति में परिवर्तन = 5
इस प्रकार, परिवर्तित पूर्ति = प्रारंभिक पूर्ति + पूर्ति में परिवर्तन
= 25 + 5
= 30 इकाइयाँ

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 31.
एक वस्तु की पूर्ति की लोच का गुणांक 3 है। 8 रु० प्रति इकाई कीमत पर एक विक्रेता इस वस्तु की 20 इकाइयाँ सप्लाई करता है। इस वस्तु की कीमत 2 रु० प्रति इकाई बढ़ने पर विक्रेता इसकी कितनी मात्रा सप्लाई करेगा?
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 41
मात्रा में परिवर्तन = 3 x 5 = 15
इस प्रकार विक्रेता वस्तु की 20 + 15 = 35 मात्रा सप्लाई करेगा।

प्रश्न 32.
जब एक वस्तु की कीमत 10 रु० से बढ़कर 11 रु० प्रति इकाई हो जाती है, तो उसकी पूर्ति मात्रा 100 इकाई बढ़ती है। इसकी पूर्ति की कीमत लोच 2 है। बढ़ी हुई कीमत पर इसकी पूर्ति मात्रा ज्ञात कीजिए।
हल:
पूर्ति की कीमत लोच (e) = 2
पूर्ति में परिवर्तन ∆q = 100
कीमत में परिवर्तन ∆p = 11 – 10 = 1
प्रारंभिक कीमत p0 = 10
प्रारंभिक पूर्ति q0 = ?
पूर्ति की कीमत लोच = \(\frac{p^{0}}{q^{0}} \times \frac{\Delta q}{\Delta p}\)
2 = \(\frac{10}{q^{0}} \times \frac{100}{1}\)
2q0 = 10 x 100 = 1,000
q0 = \(\frac { 1000 }{ 2 }\) = 500
प्रारंभिक पूर्ति = 500
नई पूर्ति = 500 + 100 = 600

प्रश्न 33.
एक वस्तु की पूर्ति कीमत लोच 2 है। जब इसकी कीमत 10 रु० से घटकर 8 रु० प्रति इकाई हो जाती है, तो इसकी पूर्ति मात्रा 500 इकाई कम हो जाती है। घटी हुई कीमत पर इसकी पूर्ति मात्रा ज्ञात कीजिए।
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 42
पूर्ति की नई मात्रा = प्रारंभिक पूर्ति + मात्रा में परिवर्तन
= 1250 + (-500) = 750 इकाइयाँ
मात्रा में परिवर्तन = मात्रा में गिरावट

प्रश्न 34.
X और Y वस्तुओं की पूर्ति की कीमत लोच बराबर है। X की कीमत में 20% वृद्धि होने से उसकी पूर्ति 400 इकाई से बढ़कर 500 इकाई हो जाती है। यदि Y की कीमत 8% घटती है, तो उसकी पूर्ति में होने वाली प्रतिशत कमी का परिकलन कीजिए।
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 43

प्रश्न 35.
एक फर्म 10 रु० प्रति इकाई कीमत पर उत्पाद की 1000 इकाई बेचती है। इसकी पूर्ति लोच 3 है। यदि कीमत गिर कर 7.50 रु० प्रति इकाई हो जाए तो फर्म कितनी इकाइयाँ बेचने योग्य होंगी ?
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 44
फर्म 250 = 1000 – 750 पूर्ति में परिवर्तन) इकाई बेचने योग्य होगी।

प्रश्न 36.
एक वस्तु की कीमत पूर्ति लोच 5 है। एक उत्पादक 5 रु० प्रति इकाई पर इस वस्तु की 500 इकाइयाँ बेचता है। 6 रु० प्रति इकाई पर वह कितनी मात्रा बेचना पसंद करेगा?
हल:
\(e_{s}=\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
\(5=\frac{q^{0}-500}{1(=6-5)} \times \frac{5}{500} \text { अथवा } \frac{5 q^{0}-2500}{500}\)
2500 = 5q0 – 2500 अथवा 5q0 अथवा q0 = 1000
उत्पादक 1000 इकाइयाँ बेचना पसंद करेगा।

प्रश्न 37.
एक वस्तु की कीमत 10रु० प्रति इकाई है और इस कीमत पर पूर्ति की मात्रा 500 इकाई है। यदि इसकी कीमत 10% कम हो जाती है तो इसकी पूर्ति की मात्रा घटकर 400 इकाई हो जाती है। इसकी पूर्ति की कीमत लोच का परिकलन कीजिए।
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 46

प्रश्न 38.
एक वस्तु की कीमत 8 रु० प्रति इकाई है और उसकी पूर्ति की मात्रा 200 इकाई है। इसकी कीमत पूर्ति लोच 1.5 है। यदि यह कीमत बढ़कर 10रु० प्रति इकाई हो जाती है तो नई कीमत पर इसकी पूर्ति मात्रा ज्ञात कीजिए।
हल:
\(e_{s}=\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\) या 1.5 =\(\frac{\Delta q}{2} \times \frac{8}{200}\) \(\frac { Δq }{ 50 }\) या
= Δq
= 75

प्रश्न 39.
एक वस्तु की पूर्ति की कीमत लोच 2.5 है। 5 रु० प्रति इकाई कीमत पर इसकी पूर्ति मात्रा 300 इकाई है। 4 रु० प्रति इकाई कीमत पर इसकी पूर्ति मात्रा कितनी होगी? ज्ञात कीजिए।
हल:
\(e_{s}=\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\) या 2.5 =\(\frac{\Delta q}{1} \times \frac{5}{300}\) या
\(\frac { Δq }{ 60 }\)
= Δq
= 150
पूर्ति की मात्रा = 300 – 150 = 150 इकाइयाँ (कीमत गिरने पर पूर्ति कम हो जाएगी।

प्रश्न 40.
एक वस्तु की कीमत 12 रु० प्रति इकाई है और इसकी पूर्ति 500 इकाई है। जब इसकी कीमत बढ़कर 15 रु० प्रति इकाई हो जाती है तो इसकी पूर्ति मात्रा बढ़कर 650 इकाई हो जाती है। इसकी पूर्ति की कीमत लोच ज्ञात कीजिए। क्या इसकी पूर्ति लोचदार है?
हल:
\(e_{s}=\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\) \(\frac{150}{3} \times \frac{12}{500}\) = 1.2
पूर्ति लोचदार है क्योंकि लोच इकाई से अधिक है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का

प्रश्न 41.
एक वस्तु की कीमत 8 रु० प्रति इकाई है और उसकी पूर्ति मात्रा 400 इकाई है। उसकी पूर्ति की कीमत लोच 2 है। वह कीमत ज्ञात कीजिए जिस पर उसकी पूर्ति मात्रा 600 इकाई होगी।
हल:
\(e_{s}=\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\) या 2 = \(\frac { 200(600-400) }{ Δp }\) या = Δp = 4 ÷ 2 = 2
नई कीमत = 8 + 2 = 10 रु० होगी (क्योंकि पूर्ति बढ़ गई है)।

प्रश्न 42.
जब एक वस्तु की कीमत 10 रु० प्रति इकाई से घटकर 9 रु० प्रति इकाई हो जाती है तो इसकी पूर्ति मात्रा 20% घट जाती है। इसकी पूर्ति की कीमत लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
कीमत में % गिरावट =\(\frac{1(10-9)}{10} \times 100=10\)
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 47
= \(\frac{20}{10}\) = 2

प्रश्न 43.
एक वस्तु की कीमत 5 रु० प्रति इकाई है और उसकी पूर्ति मात्रा 600 इकाई है। यदि इसकी कीमत बढ़कर 6 रु० प्रति इकाई हो जाती है तो इसकी पूर्ति मात्रा 25% बढ़ जाती है। इसकी पूर्ति की कीमत लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
कीमत में % गिरावट =\(\frac{1(6-5)}{5} \times 100\) = 20
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का 47
= \(\frac{25}{20}\) = 1.25

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग: Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

HBSE 12th Class Sanskrit भू-विभाग: Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम्
(क) पृथिव्याः कति भेदाः ?
(ख) पृथिव्याः सप्तपुटानां नामानि कानि सन्ति ? ।
(ग) पर्वताः कति सन्ति ?
(घ) समुद्राः कति सन्ति ?
(ङ) दधिसमुद्रः कस्य द्वीपस्यावरकः ?
(च) ‘अर्श’ इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(छ) ‘कुर्शी’ इति पदं कस्मिन्नर्थे प्रयुक्तम् ?
(ज) ‘अस्मद्वेद’ इति शब्दः दाराशिकोहेन कस्य ग्रन्थस्य कृते प्रयुक्तः ?
उत्तरम्:
(क) पृथिव्याः सप्त भेदाः ?
(ख) पृथिव्याः सप्तपुटानां नामानि सन्ति 1. अतलः 2. वितलः, 3. सुतलः, 4. प्रतलः, 5. तलातलः, 6. रसातल, 7. पातालः
(ग) पर्वताः सप्त सन्ति ?
(घ) समुद्राः सप्त सन्ति ?
(ङ) दधिसमुद्रः क्रौञ्च-द्वीपस्यावरकः ?
(च) ‘अर्श’ इति पदम् आकाशाय प्रयुक्तम् ?
(छ) ‘कुर्शी’ इति पदं परमेश्वस्य सिंहासने अर्थे प्रयुक्तम् ?
(ज) ‘अस्मद्वेद’ इति शब्दः दाराशिकोहेन ‘कुरानशरीफ़’ ग्रन्थस्य कृते प्रयुक्तः ?

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

2. हिन्दीभाषया आशयं लिखत
एतान् खण्डान् पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन न ज्ञायन्ते, किन्तु निःश्रेणी-सोपानवज्जानन्ति । सप्तपर्वतान् सप्तकुलाचलान् वदन्ति, तेषां पर्वतानां नामान्येतानि-प्रथमः सुमेरुमध्ये, द्वितीयो हिमवान्, तृतीयो हेमकूटः, चतुर्थो निषधः एते सुमेरोरुत्तरतः।

प्रसंगः-प्रस्तुत गद्यांश ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘भू-विभागाः’ नामक पाठ से उद्धृत है। यह पाठ दाराशिकोह द्वारा रचित ‘समुद्रसङ्गमः’ नामक ग्रन्थ से लिया गया है। प्रस्तुत गद्यांश में भूलोक के सात विभागों तथा सप्त पर्वतों की चर्चा की है।

व्याख्या-पृथिवी जिस पर सब लोगों का निवास है, दार्शनिकों ने उसके सात खण्ड माने हैं, इन्हें सप्तद्वीप भी कहा जाता है। ये खण्ड प्याज के छिलकों की तरह एक के नीचे एक-एक के नीचे एक नहीं होते, अपितु जैसे सीढ़ी में अलग-अलग समान दूरी पर लकड़ी/बाँस में डण्डे लगे होते हैं उसी प्रकार इन सप्तद्वीपों की स्थिति भी समझनी चाहिए। सप्तपर्वतों को ‘सप्तकुलाचल’ नाम से भी जाना जाता है। इन सात पर्वतों के नाम और उनकी स्थिति इस प्रकार है। पृथिवी के मध्य में सुमेरु नामक पहला पर्वत है। दूसरा हिमालय, तीसरा हेमकूट और चौथा निषध नामक पर्वत हैये तीनों सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में स्थित हैं। इन सबके अतिरिक्त माल्यवान्, गन्धमादन तथा कैलास पर्वत हैं। इन्हें जोड़कर ही सात समुद्रों की संख्या पूर्ण होती है। प्रस्तुत गद्यांश में इन तीनों का उल्लेख नहीं है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

3. अधोलिखितानां पदानां स्वसंस्कृतवाक्येषु प्रयोगं कुरुत
पुटानि, कृतवान्स, आवेष्टनरूपा, सर्वेभ्यः ब्रह्माण्डात्, परिभ्रमन्ति।
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगः)
(क) पुटानि – पृथिव्याः सप्त विभागाः ‘सप्तपुटानि’ अपि कथ्यन्ते।
(ख) कृतवान् – दाराशिकोहः श्रीमद्भगवद्गीतायाः अनुवादं फारसीभाषायां कृतवान्।
(ग) आवेष्टनरूपा:-सप्तद्वीपाः सप्तसमुद्राणाम् आवेष्टनरूपाः सन्ति।
(घ) सर्वेभ्यः-सर्वेभ्यः शिक्षकेभ्यः नमः।
(ङ) ब्रह्माण्डात्-स्वर्गनरकादिकं ब्रहमाण्डात् बहिः नास्ति।
(च) परिभ्रमन्ति-सप्त ग्रहाः गगने परिभ्रमन्ति।

4. अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कुरुतपुटान्युच्यन्ते, अस्मन्मते, पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन, सोपानवजानन्ति, सुमेरोरुत्तरतः, समुद्रोऽपि, किञ्चिदहिरस्तीति, अस्मदीयास्तमर्श ।
उत्तरम्:
(क) पुटान्युच्यन्ते = पुटानि + उच्यन्ते।
(ख) अस्मन्यते = अस्मत् + मते।
(ग) पलाण्डुत्वग्वदपर्यधोभावेन = पलाण्डुत्वग्वत् + उपरि + अधः + भावेन।
(घ) सोपानवजानन्ति = सोपानवत् + जानन्ति।
(ङ) सुमेरोरुत्तरतः = सुमेरोः + उत् + तरतः।
(च) समुद्रोऽपि = समुद्रः + अपि।
(छ) किञ्चिद्वहिरस्तीति = किञ्चित् + बहिः + अस्ति + इति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

5. अधोलिखितानां पदानां पर्यायवाचिपदानि लिखत
पृथिवी, पर्वतः, समुद्रः, गगनम्, स्वर्गः
उत्तरम्:
(पर्यायवाचिपदानि)
(क) पृथिवी = भूमिः, भू, पृथ्वी, धरणी, धरा।
(ख) पर्वतः = गिरिः, अचलः, भूधरः, धरणीधरः ।
(ग) समुद्रः = सागरः, जलधिः, वारिधिः, रत्नाकरः।
(घ) गगनम् = आकाशः, खः, क्षितिजः, नभः।
(ङ) स्वर्गः = दिवम्, ‘अर्श’ इति फारसीभाषायाम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

6. रिक्तस्थानानाम् पूर्तिः विधेया
(क) पौराणिकास्तु ………….. द्वीपानि वदन्ति।
(ख) सप्त …………… सप्त कुलाचलान् वदन्ति ।
(ग) …………. जम्बुद्वीपस्यावरकः ।
(घ) स्वर्गभूमिं …………… वदन्ति।
उत्तरम्:
(क) पौराणिकास्तु सप्त द्वीपानि वदन्ति।
(ख) सप्त पर्वतान् सप्त कुलाचलान् वदन्ति।
(घ) स्वर्गभूमिम्: कुशी इति वदन्ति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

योग्यताविस्तारः

(क) संस्कृतवाङ्मये भूगोल-खगोलविषयकं ज्ञानं प्राचुर्येण उपलभ्यते। यथा-सूर्यसिद्धान्तादिशास्त्रेषु
भगवन् ! किम्प्रमाणा भूः किमाकारा किमाश्रया।
किंविभागा कथं चात्र सप्तपातालभूमयः॥
अहोरात्रव्यवस्थां च विदधाति कथं रविः।
कथं पर्येति वसुधां भुवनानि विभावयन्॥
कथं पर्येति वसुधां भुवनानि विभावयन्।
भूमेरुपर्युपर्युर्ध्वाः किमुत्सेधाः किमन्तराः॥

(ख) ‘कुलाचलाः’ सप्तपर्वतानां माला अस्ति। संस्कृतवाङ्मये एते सप्त पर्वताः
महेन्द्रो मलयः सहयः शुक्तिमान् ऋक्षपर्वतः।
विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तैते कुलपर्वताः।।

(ग) अस्मिन् पाठे वर्णितानां भौगोलिकतथ्यानां तुलना आधुनिकभूगोल-विज्ञानेन प्रमाणिततथ्यैः सह करणीया।

(घ) सप्तधा इति पदम् अनुसृत्य अधोलिखितैः संख्यावाचिभिः शब्दैः पदानि- निर्मातव्यानि एकम, द्वि, त्रि, चतुर, पञ्च
उत्तरम्:
एकधा, द्विधा, त्रिधा, चतुर्धा, पञ्चधा, षड्धा, सप्तधा, अष्टधा, नवधा, दशधा।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

HBSE 9th Class Sanskrit भू-विभाग: Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) पृथिव्याः कति भेदाः ?
(A) अष्ट
(B) सप्त
(C) षड्
(D) नव।
उत्तराणि:
(B) सप्त

(ii) पर्वताः कति सन्ति ?
(A) नव
(B) सहस्रम्
(C) अष्ट
(D) सप्त।
उत्तराणि:
(A) सप्त

(iii) समुद्राः कति सन्ति ?
(A) सप्त
(B) अष्ट
(C) नव
(D) चत्वारः।
उत्तराणि:
(D) सप्त

(iv) दधिसमुद्रः कस्य द्वीपस्यावरकः ?
(A) सुमेरुद्वीपस्य
(B) मालद्वीपस्य
(C) सिंहद्वीपस्य
(D) क्रौञ्चद्वीपस्य।
उत्तराणि:
(A) क्रौञ्चद्वीपस्य

(v) ‘अर्श’ इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(A) आकाशाय
(B) द्वीपाय
(C) समुद्राय
(D) पर्वताय।
उत्तराणि:
(A) आकाशाय।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

II. रेखाकितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) परमेश्वरः पृथिव्याः सप्तविभागान् कृतवान्।
(A) किम्
(B) क:
(C) कस्याः
(D) काः।
उत्तराणि:
(C) कस्याः

(ii) पौराणिकाः सप्त द्वीपानि वदन्ति।
(A) काम्
(C) कः
(D) कति।
उत्तराणि:
(B) के

(iii) सप्तद्वीपानाम् आवेष्टनरूपाः सप्त समुद्राः।
(A) कः
(B) कस्मात्
(C) कति
(D) केषाम्।
उत्तराणि:
(D) केषाम्

(iv) सप्त ग्रहाः स्वर्गं परितः मेखलावत् परिभ्रमन्ति।
(A) कथम्
(B) कति
(C) केन
(D) कया।
उत्तराणि:
(A) कथम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

भू-विभाग: पाठ्यांशः

1. अथ पृथिवीनिरूपणम्-पृथिव्याः सप्तभेदाः। ते च भेदाः सप्तपुटान्युच्यन्ते। तानि च पुटानि-अतलवितल-सुतल-प्रतल-तलातल-रसातल-पातालाख्यानि। अस्मन्मतेऽपि सप्तभेदाः। यथाऽस्मद्वेदे श्रूयते परमेश्वरो यथा सप्तगगनानि तद्वत् पृथिव्याः सप्तविभागान् कृतवान्। अथ पृथिव्याः विभागनिरूपणं यत्र लोकास्तिष्ठन्ति। तस्याः दार्शनिकैः सप्तधा विभागः कृतस्तान् विभागान् सप्त अअक्लिम इति वदन्ति। पौराणिकास्तु सप्तद्वीपानि वदन्ति। एतान् खण्डान् पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधो भावेन न ज्ञायन्ते, ‘किन्तु’ निःश्रेणी सोपानवजानन्ति।

हिन्दी-अनुवादः अब पृथिवी का निरूपण किया जाता है-पृथिवी के सात भेद हैं और उन्हें ‘सप्तपुट’ कहा जाता है। उन पुटों के नाम हैं-(1) अतल, (2) वितल, (3) सुतल, (4) प्रतल, (5) तलातल, (6) रसातल, (7) पाताल। हमारे मत में भी सात भेद हैं। जैसे कि हमारे वेद (कुरान शरीफ) में सुना जाता है; जैसे परमेश्वर ने सात प्रकार के आकाश बनाए हैं उसी प्रकार पृथिवी के सात भेद किए गए हैं। .. अब पृथिवी के विभागों का निरूपण किया जाता है, जहाँ लोग रहते हैं। उस पृथिवी के दार्शनिकों ने सात विभाग किए हैं, उन विभागों को सात अअक्लिम = अकूलीन = खण्ड कहते हैं। पौराणिक उन्हें सात द्वीप कहते हैं। इन खण्डों को प्याज के छिलके की तरह ऊपर-नीचे के भाव से नहीं समझना चाहिए, परन्तु सीढ़ी में लगने वाले काष्ठ-दण्ड की भाँति समझ सकते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च पुटानि = भेदाः, भेद या पुट। अअक्लिम = अकूलीन (खण्ड अथवा टुकड़ा)। पलाण्डुत्वक् = प्याज का छिलका। उपर्यधः = ऊपर-नीचे (उपरि + अधः)। कुलाचलाः = कुलपर्वत अथवा सात पर्वतों की माला। निःश्रेणी = निसेनी अथवा सीढ़ी। सोपानम् = निसेनी में एक समान दूरी पर लगने वाले छोटे-छोटे काष्ठ-खण्ड।

2. सप्त पर्वतान् सप्तकुलाचलान् वदन्ति, तेषां पर्वतानां नामान्येतानि प्रथमः सुमेरुमध्ये, द्वितीयो हिमवान्, तृतीयो हेमकूटः, चतुर्थो निषधः एते सुमेरोरुत्तरतः। माल्यवान् पूर्वस्यां, गन्धमादनः पश्चिमायां कैलासश्च मर्यादापर्वतेभ्योऽतिरिक्तः। यथाऽस्मद्वेदे श्रूयते-“अस्माभिः पर्वताः शङ्कवः कृता।” एतेषां सप्तद्वीपानां प्रत्येकमावेष्टनरूपाः सप्तसमुद्राः। लवणो जम्बुद्वीपस्यावरकः । इक्षुरसः प्लक्षद्वीपस्य, दधिसमुद्रः क्रौञ्चद्वीपस्य, क्षीरसमुद्रः शीकद्वीपस्य, स्वादुजलसमुद्रः पुष्करद्वीपस्यावरकः इति।समुद्राः सप्त अस्मद्वेदेऽपि प्रकटाः भवन्ति।

हिन्दी-अनुवादः सात पर्वतों को सात कुलाचलन कहते हैं। उन पर्वतों के नाम ये हैं-पहला सुमेरु पर्वत (जो) मध्य में है। दूसरा हिमालय, तीसरा हेमकूट, चौथा निषध-ये सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में हैं। (पाँचवाँ) मूल्यवान् पूर्व दिशा में (छठा) गन्धमादन पश्चिम दिशा में और (सातवाँ) कैलास पर्वत मर्यादा पर्वतों से अलग है। जैसा हमारे वेद (कुरान शरीफ) में सुना जाता है-“हमने पर्वतों को शकु (कीलें) बना दिया।” इन सात द्वीपों में प्रत्येक द्वीप के आवरण रूप सात समुद्र हैं। लवण (समुद्र) जम्बुद्वीप का आवरण है। इक्षुरस (सुरा) प्लक्षद्वीप का, दधिसमुद्र क्रौञ्चद्वीप का, क्षीर सागर शाकद्वीप का (और) स्वादु जल समुद्र पुष्कर द्वीप का आवरक है। हमारे वेद (कुरान शरीफ़) में भी सात समुद्र प्रकट होते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च शकवः = कीलें। आवेष्टनरूपा = आवरण करने वाले। इक्षुरसः = गन्ने का रस, सुरा अथवा मदिरा। आवरकः = ढकने वाला।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

3. वृक्षाः लेखनी भवेयुः समुद्रोऽपि मसी भवेत्, परं भगवद्वाक्यानि समाप्तानि न भवन्ति। प्रतिद्वीपं प्रतिपर्वतं प्रतिसमुद्रं नानाजातयोऽनन्ता जन्तवस्तिष्ठन्ति। या पृथिवी ये पर्वताः ये समुद्राः सर्वाभ्यः पृथिवीभ्यः सर्वेभ्यः पर्वतेभ्यः समुद्रेभ्यः उपरि तिष्ठन्ति तान् ‘स्वर्ग’ इति वदन्ति। या पृथिवी ये पर्वता: ये समुद्राः सर्वाभ्यः पृथिवीभ्यः सर्वेभ्यः पर्वतेभ्यः सर्वेभ्यः समुद्रेभ्योऽधो भागे तिष्ठन्ति स’नरक’ इति वदन्ति। निश्चितं किल सिधैः स्वर्गनरकादिकं सर्वं ब्रह्माण्डान्न किञ्चिद्वहिरस्तीति । ते सप्तगगनाश्रिताः सप्त ग्रहाः स्वर्गं परितो मेखलावत् परिभ्रमन्तीति वदन्ति, न स्वर्गस्योपरि। अथ स्वर्गस्य यदि मन आकाशं जानन्ति अस्मदीयास्तमर्श इति वदन्ति । स्वर्गभूमिं कुर्शीति वदन्ति।”

हिन्दी-अनुवादः सभी वृक्ष लेखनी बन जाएँ, समुद्र स्याही बन जाए, परन्तु भगवद्-वचन समाप्त नहीं होते (अर्थात् भगवान् की . महिमा लिखने के लिए ये सब अपर्याप्त ही होते हैं)। प्रत्येक द्वीप में प्रत्येक पर्वत पर, प्रत्येक समुद्र में विविध जाति वाले अनन्त प्राणी रहते हैं। जो पृथिवी, जो पर्वत, जो समुद्र सभी पृथिवियों से, सभी पर्वतों से, सभी समुद्रों से ऊपर विद्यमान हैं उन्हें ‘स्वर्ग’ कहते हैं। जो पृथिवी, जो पर्वत, जो समुद्र सभी पृथिवियों से, सभी पर्वतों से तथा समुद्रों से निचले भाग में स्थित हैं उन्हें ‘नरक’ कहते हैं। सिद्ध पुरुषों ने निश्चित मत बनाया है कि स्वर्ग-नरक आदि (सब यहाँ पर ही हैं) ब्रह्माण्ड से कुछ भी बाहर नहीं है। सात आकाशों के आश्रित रहने वाले (जो) सात ग्रह हैं, वे स्वर्ग के चारों ओर मेखला की भाँति भ्रमण करते हैं, स्वर्ग के ऊपर नहीं। अब यदि स्वर्ग का मन आकाश को समझते हैं (तो) हमारे लोग उसे ‘अर्श’ कहते हैं। स्वर्गभूमि को ‘कुर्शी’ कहते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – मसी = स्याही। मेखलावत् = मेखला अथवा शृखला के समान। ‘अर्श’ = आकाश अथवा गगन, स्वर्ग के ऊपर की छत (फारसी शब्द)। ‘कुर्शी’ = परमेश्वर का सिंहासन अथवा स्वर्गभूमि, ‘कुर्शी’ को आठवाँ आसमान भी कहा गया है। (फारसी शब्द)।

भू-विभागः (भूमि के विभाग) Summary in Hindi

भू-विभाग: पाठ परिचय

मुगलसम्राट् शाहजहाँ के विद्वान् पुत्र दाराशिकोह संस्कृत तथा अरबी भाषा के तत्कालीन विद्वानों में अग्रगण्य थे। ‘समुद्रसङ्गमः’ दाराशिकोह द्वारा रचित प्रसिद्ध है। इसी ग्रन्थ में ‘पृथिवी-निरूपणम्’ के अन्तर्गत उन्होंने पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों आदि का विशिष्ट शैली में वर्णन किया है। उसी वर्णन के कुछ अंश यहाँ ‘भू-विभागाः’ पाठ में प्रस्तुत किए गए हैं।

दाराशिकोह मुगलसम्राट शाहजहाँ के सबसे बड़े पुत्र थे। उनका जीवनकाल 1615 ई० से 1659 ई० तक है। शाहजहाँ उनको राजपद देना चाहते थे पर उत्तराधिकार के संघर्ष में उनके भाई औरंगजेब ने निर्ममता से उनकी हत्या कर दी। दाराशिकोह ने अपने समय के श्रेष्ठ संस्कृत पण्डितों, ज्ञानियों और सूफी सन्तों की सत्संगति में वेदान्त और इस्लाम के दर्शन का गहन अध्ययन किया था। उन्होंने फारसी और संस्कृत में इन दोनों दर्शनों की समान विचारधारा को लेकर विपुल साहित्य लिखा। फारसी में उनके ग्रन्थ हैं-सारीनतुल् औलिया, सकीनतुल् औलिया, हसनातुल् आरफीन (सूफी सन्तों की जीवनियाँ), तरीकतुल् हकीकत, रिसाल-ए-हकनुमा, आलमे नासूत, आलमे मलकूत (सूफी दर्शन के प्रतिपादक ग्रन्थ), सिर-ए-अकबर (उपनिषदों का अनुवाद)। श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ का भी फारसी भाषा में उन्होंने अनुवाद किया। ‘मज्म-उल-बहरैन्’ फारसी में उनकी अमरकृति है, जिसमें उन्होंने इस्लाम और वेदान्त की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बतलाई हैं। इसी ग्रन्थ को दाराशिकोह ने ‘समुद्रसङ्गमः’ नाम से संस्कृत में लिखा।

भू-विभाग: पाठस्य सारः

‘भू-विभागाः’ यह पाठ मुगलसम्राट शाहजहाँ के सबसे बड़े पुत्र दाराशिकोह द्वारा रचित ‘समुद्रसंगमः’ नामक ग्रन्थ से संकलित है। दाराशिकोह ने संस्कृत के अनेक विद्वानों, ज्ञानियों तथा सूफी सन्तों की संगति की थी। वेदान्त और इस्लाम के दर्शन का इन्हें गहरा ज्ञान था। इन्होंने वेदान्त और इस्लाम दर्शन की समान विचारधारा को केन्द्र बिन्दु बनाकर फारसी तथा संस्कृत दोनों भाषाओं में अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। ‘समुद्रसंगमः’ ग्रन्थ में ‘पृथ्वी-निरूपणम्’ के अर्न्तगत उन्होंने पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों आदि का वर्णन अपनी विशिष्ट शैली में किया है। उसी वर्णन को ‘भू-विभागाः’ शीर्षक के अन्तर्गत पाठ्यपुस्तक में रखा गया है।

दाराशिकोह पृथ्वी का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पृथ्वी के सात भेद हैं। इन्हें ही सप्तपुट कहा जाता है। अतल, वितल, सुतल, प्रतल, तलातल, रसातल तथा पाताल-ये सप्तपुट हैं। कुरान में भी ये सात विभाग स्वीकार किए गए हैं। – पृथ्वी के जिस अंश पर लोग निवास करते हैं उसे सप्तद्वीप कहा जाता है। पृथ्वी के ये सात अअक्लिम = अकुलीन या खण्ड हैं। ये सात खण्ड प्याज के छिलके की तरह ऊपर-नीचे स्थित नहीं होते। किन्तु सीढ़ी में लगे हुए काष्ठदण्ड की तरह होते हैं।

सात पर्वतों को सात कुलाचल कहा जाता है-1. सुमेरु, 2. हिमालय, 3. हेमकूट, 4. निषध, 5. माल्यवान्, 6. गन्धमादन, 7. कैलाश। कुरान में भी ये ही सात पर्वत माने गए हैं।

सप्तद्वीपों का आवरण करने वाले सप्त समुद्र हैं-जम्बुद्वीप का आवरक ‘लवण-समुद्र’ प्लक्ष द्वीप का ‘इक्षुरससमुद्र’, क्रौंच द्वीप का ‘दधि-समुद्र’, शाक द्वीप का ‘क्षीर-समुद्र’ तथा पुष्कर द्वीप का ‘स्वादु जल-समुद्र’ आवरक है।

यदि पृथिवी के सारे वृक्षों के कलम बना लिए जाएँ और सभी समुद्र ‘स्याही’ बन जाएँ, फिर भी भगवद्-वचन (भगवान् की महिमा का वर्णन) लिखे नहीं जा सकते। सभी पृथिवियों, समुद्रों और पर्वतों से ऊपर का भाग ‘स्वर्ग’, कहलाता है तथा निचला भाग ‘नरक’ कहा जाता है। ये ‘स्वर्ग’ ‘नरक’ ब्रह्माण्ड से बाहर नहीं है अपितु इसके अन्दर ही हैं। सात प्रकार के आकाशों के आश्रित सात ग्रह स्वर्ग के चारों ओर मेखला की भाँति चक्कर काटते रहते हैं, स्वर्ग के ऊपर नहीं। कुरआन में स्वर्ग को ‘अर्श’ कहा गया है और स्वर्गभूमि को ‘कुर्शी’ कहा गया है।

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

HBSE 12th Class Sanskrit विक्रमस्यौदार्यम् Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तरत
(क) विक्रमस्यौदार्यम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः ?
(ख) उपार्जितानां वित्तानां रक्षणं कथं भवति ?
(ग) धनविषये कीदृशः व्यवहारः कर्तव्यः ?
(घ) जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं कः स्थितः ?
(ङ) समुद्रः राज्ञे किमर्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान् ?
(च) द्वितीयरत्नेन किम् उत्पद्यते ?
(छ) प्रीतिलक्षणम् कतिविधं भवति ?
उत्तरम्
(क) ‘विक्रमस्यौदार्यम्’ पाठः ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ ग्रन्थात् सङ्कलितः।
(ख) उपार्जितानां वित्तानां रक्षणं त्यागेन भवति।
(ग) धनविषये दानभोगैः व्यवहारः कर्तव्यः।
(घ) जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं ब्राह्मणः स्थितः ।
(ङ) समुद्रः राज्ञे व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान्।
(च) द्वितीयरत्नेन अमृततुल्यं भोजनादिकम् उत्पद्यते।
(छ) प्रीतिलक्षणं षड्विधं भवति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

2. रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) उपार्जितानां वित्तानां …………….. हि रक्षणम्।
(ख) दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये …………….. न कर्तव्यः ।
(ग) ततः शिल्पिभिरतीव …………….. मण्डपः कारितः ।
(घ) भो समुद्र ! …………….. यज्ञं करोति।
(ङ) तस्मै राज्ञे व्ययार्थं …………….. दास्यामि।
(च) यद्रत्नं चतुरङ्गबलं …………….. तद् ग्रहीष्यामः ।
(छ) सर्वेषां प्राणिनामनेनैव …………….. भवति।
उत्तरम्
(क) उपार्जितानां वित्तानां त्यागः हि रक्षणम्।
(ख) दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयः न कर्तव्यः ।
(ग) तत: शिल्पिभिरतीव मनोहरः मण्डपः कारितः।
(घ) भो समुद्र ! विक्रमार्कः राजा यज्ञं करोति।
(ङ) तस्मै राज्ञे व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दास्यामि।
(च) यद्रत्नं चतुरङ्गबलं ददाति तद् ग्रहीष्यामः ।
(छ) सर्वेषां प्राणिनामनेनैव प्राणधारणं भवति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

3. अधोलिखितानां पदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत
वित्तानाम्, शिल्पिभिः, गिरौ, एतेषाम्, दातव्यम्, रोचते।
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगः)
(क) वित्तानाम्-वित्तानां दानभोमैः रक्षणं कर्तव्यम्।
(ख) शिल्पिभिः-शिल्पिभिः मनोहर: मण्डपः कृतः।
(ग) गिरौ-गिरौ मयूरः नृत्यति।।
(घ) एतेषाम्-एतेषां याचना अवश्यं पूरणीया।
(ङ) दातव्यम्-यत् यस्मै रोचते तत् तस्मै दातव्यम्।
(च) रोचते-मह्यं पठनं रोचते।

4. प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम्
उपक्रान्तवान्, विधाय, गत्वा, गृहीत्वा, स्थितः, व्यतिक्रम्य, दातव्यम्।
उत्तरम्
उपसर्ग + प्रकृति + प्रत्यय
(क) उपक्रान्तवान् – उप + √क्रम् + क्तवतु (पुं०, प्रथमा एकवचनम्)
(ख) विधाय । -वि + √धा + ल्यप् (अव्ययपदम्)
(ग) गत्वा – √गम् + क्त्वा (अव्ययपदम्)
(घ) गृहीत्वा – √ग्रह् + क्त्वा (अव्ययपदम्)
(ङ) स्थितः – √स्था + क्त (पुं०, प्रथमा एकवचनम्)
(च) व्यतिक्रम्य – वि + अति + √क्रिम् + ल्यप् (अव्ययपदम्)

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

5. सन्धिच्छेदं कुरुत
तेनैव, यच्चोक्तम्, तस्येप्सितम्, चैव, यच्च, तदपि, सर्वापि, सोऽपि, प्राप्तैव, चेदस्मिन्, तच्छ्रुत्वा, त्वय्येवम्
उत्तरम्
(क) तेनैव = तेन + एव
(ख) यच्चोक्तम् = यत् + च + उक्तम्
(ग) तस्येप्सितम् = तस्य + ईप्सितम्
(घ) चैव = च + एव
(ङ) यच्च = यत् + च
(च) तदपि = तत् + अपि
(छ) सर्वापि = सर्वा + अपि
(ज) सोऽपि = सः + अपि
(झ) प्राप्तैव = प्राप्ता + एव
(ब) चेदस्मिन् = चेद् + अस्मिन्
(ट) तच्छ्रुत्वा = तत् + श्रुत्वा
(ठ) त्वय्येवम् = त्वयि + एवम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

6. सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
(क) उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
उत्तरम्
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य विक्रमस्यौदार्यम् नामक पाठ से लिया गया है। यह कथा किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ कथा संग्रह से संकलित है। प्रस्तुत पद्य में धन के दान को ही धन का सच्चा संरक्षण कहा गया है।

व्याख्या-मनुष्य जो भी धन अपने परिश्रम से इकट्ठा करता है। उसका संरक्षण खजाना भरकर नहीं हो सकता। अपितु असहायों की सहायता के लिए उस धन को दान कर देना ही उसकी सच्ची रक्षा है। तालाब में जल भरा होता है यदि वह जल तालाब में ही पड़ा रहे और किसी के काम न आएँ तो वह जल व्यर्थ है अपितु तालाब में ही पड़ेपड़े वह जल दुर्गन्धयुक्त हो जाता है, इसीलिए तालाब के जल को बाहर निकाल दिया जाता है, नया जल आ जाता है और उसका पानी उपयोगी बना रहता है। इसी प्रकार धन का दान करना ही धन का सच्चा उपयोग है।

(ख) ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।
भडक्ते भोजयते चैव षविधं प्रीतिलक्षणम्॥
उत्तरम्:
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘विक्रमौदस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से लिया गया है। यह कथा किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ कथासंग्रह से संकलित है। प्रस्तुत पद्य में समुद्र ने ब्राह्मण को मित्रता का लक्षण बताया है।

व्याख्या-सच्ची मित्रता की पहचान के छह सूत्र हैं
1. मित्र मित्र को धन आदि प्रदान करता है।
2. मित्र मित्र से धन आदि स्वीकार करता है।
3. अपनी गोपनीय (छिपाने योग्य) बात मित्र को बताता है।
4. मित्र की गोपनीय बात उससे पूछता है।
5. मित्र के साथ बैठकर भोजन करता है।
6. मित्र को भोजन खिलाता है।
जिन दो मित्रों के बीच उक्त छ: प्रकार के आचरण बिना किसी औपचारिकता के सम्पन्न होते हैं उन्हीं में सच्ची मित्रता समझनी चाहिए।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

7. अधोलिखितानां समस्तपदानां विग्रहं कुरुत
विक्रमतुल्यम्, क्रियाविधिज्ञम्, सकलगुणनिवासः, यज्ञसामग्री, समुद्रतीरम्, जलमध्ये, पुष्पाञ्जलिम्, देदीप्यमानशरीरः, यज्ञार्थम्, यज्ञसमाप्तिः, गुणकथनम्, ब्राह्मणसमूहः, प्राणधारणम्, राजसमीपम्।
(क) विक्रमतुल्यम्-विक्रमेण तुल्यम् (तृतीया-तत्पुरुषः)
(ख) क्रियाविधिज्ञम्-क्रियायाः विधिं जानाति इति क्रियाविधिज्ञः तम् (उपपद-तत्पुरुषः)
(ग) सकलगुणनिवासः-सकलानां गुणानां निवासः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(घ) यज्ञसामग्री-यज्ञाय सामग्री (चतुर्थी-तत्पुरुषः)
(ङ) समुद्रतीरम्-समुद्रस्य तीरम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(च) जलमध्ये-जलस्य मध्ये (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(छ) पुष्पाञ्जलिम्-पुष्पाणाम् अञ्जलिम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ज) देदीप्यमानशरीर:-देदीप्यमानः शरीर: (कर्मधारयः)
(झ) यज्ञार्थम्-यज्ञस्य अर्थम् (चतुर्थी-तत्पुरुषः)
(ञ) यज्ञसमाप्तिः-यज्ञस्य समाप्तिः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ट) गुणकथनम्-गुणस्य कथनम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ठ) ब्राह्मणसमूहः-ब्राह्मणानां समूहः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ड) प्राणधारणम्-प्राणानां धारणम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ढ) राजसमीपम्-राज्ञः समीपम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)

HBSE 9th Class Sanskrit विक्रमस्यौदार्यम् Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) विक्रमस्यौदार्यम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः ?
(A) विक्रमाकचरितात्
(B) विक्रमाङ्कदेवचरितात्
(C) सिंहासनद्वादशत्रिंशिकाग्रन्थात्
(D) आर्यासप्तशतीग्रन्थात्।
उत्तराणि
(C) सिंहासनद्वादशत्रिंशिकाग्रन्थात्

(ii) उपार्जितानां वित्तानां रक्षणं कथं भवति ?
(A) त्यागेन
(B) भोगेन
(C) सञ्चयेन
(D) लोभेन।
उत्तराणि
(A) त्यागेन

(iii) धनविषये कीदृशः व्यवहारः कर्तव्यः ?
(A) दानेन
(B) भोगेन
(C) रक्षणेन
(D) दानभोगैः।
उत्तराणि
(D) दानभौगैः

(iv) जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं कः स्थितः ?
(A) विक्रमः
(B) ब्राह्मणः
(C) पुत्तलिका
(D) राजा।
उत्तराणि
(B) ब्राह्मणः

(v) समुद्रः राज्ञे किमर्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान् ?
(A) व्ययार्थम्
(B) सञ्चयार्थम्
(C) दानार्थम्
(D) लोभनिवारणार्थम्।
उत्तराणि
(A) व्ययार्थम्

(vi) द्वितीयरत्नेन किम् उत्पद्यते ?
(A) वस्त्रादिकम्
(B) भूषणादिकम्
(C) भोजनादिकम्
(D) रत्नादिकम्।
उत्तराणि
(C) भोजनादिकम्

(vii) प्रीतिलक्षणम् कतिवधं भवति ?
(A) अष्टविधम्
(B) षड्विधम्
(C) पञ्चविधम्
(D) चतुर्विधम्।
उत्तराणि
(B) षड्विधम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) राजा सिंहासने समुपवेष्टुं गच्छति।
(A) कया
(B) कः
(C) केन
(D) कस्मिन्।
उत्तराणि:
(B) कः

(ii) उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव रक्षणम्।
(A) केषाम्
(B) कस्मिन्
(C) कः
(D) कस्मात्।
उत्तराणि:
(A) केषाम्

(iii) शिल्पिभिः अतीव मनोहरः मण्डपः कारितः ।
(A) कः
(B) केभ्यः
(C) कम्
(D) कैः।
उत्तराणि:
(D) कैः

(iv) राजा ब्राह्मणाय चत्वारि रत्नानि ददौ।
(A) कथम्
(B) किं
(C) कति
(D) कानि।
उत्तराणि:
(B) कति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

योग्यताविस्तारः

अधोलिखितानां सूक्तीनामध्ययनं कृत्वा प्रस्तुतपाठेन भावसाम्यम् अवधत्त
1. मित्रम्
(i) मित्रं प्रीतिरसायनं नयनयोरानन्दनं चेतसः
पात्रं यत्सुखदुःखयोः सह भवेन्मित्रेण तदुर्लभम्।
ये चान्ये सुहृदः समृद्धिसमये द्रव्याभिलाषाकुलाः,
ते सर्वत्र मिलन्ति तत्त्वनिकषग्रावा तु तेषां विपत्॥
(ii) न मातरि न दारेषु न सोदर्ये न चात्मजे।
विश्वासस्तादृशः पुंसां यादृङ् मित्रे स्वभावजे॥ कवितामृतकूपम्-88
(iii) न तन्मित्रं यस्य कोपाद्विभेति यद्वामित्रं शङ्कितेनोपचर्यम्।
यस्मिन्मित्रे पितरीवाश्वसीत तद्वै मित्रं सङ्गतानीतराणि ॥ नीतिकल्पतरु:-9.141
(iv) केनामृतमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम्।
आपदां च परित्राणं शोकसन्तापभेषजम्॥ पञ्चतन्त्रम्-2.60

2. औदार्यम्
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां हि वसुधैव कुटुम्बकम्॥ पञ्चतन्त्रम्-5.305

3. दानम्
(i) धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सजेत।
सन्निमत्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥
(ii) परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥ विक्रमोर्वशीयम्-66
(iii) अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥
(iv) श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन, दानेन पाणिन्तु कङ्कणेन।
विभाति कायः करुणापराणां परोपकारेण न चन्दनेन ॥ नीतिशतकम्-1.72
(v) पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्।
नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति
सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः ॥ नीतिशतकम्-1.74

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

विक्रमस्यौदार्यम् पाठ्यांशः

1. पुनरपि राजा सिंहासने समुपवेष्टुं गच्छति। ततोऽन्या पुत्तलिका समवदत् “भो राजन्! एतत्सिंहासने तेनैव अध्यासितव्यं यस्य विक्रमतुल्यम् औदार्यमस्ति।” भोजेनोक्तम्-“भो पुत्तलिके, कथय तस्यौदार्यम्।” सा वदति, “राजन् यस्त्वर्थिनां पूरयति, तस्येप्सितं देवः सम्पादयति।” यच्चोक्तम्
उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं, क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्। शूरं कृतज्ञं दृढनिश्चयं च, लक्ष्मीः स्वयं वाञ्छति वासहेतोः॥

हिन्दी-अनुवादः

राजा फिर भी सिंहासन पर बैठने के लिए जाता है। तभी दूसरी पुत्तलिका कहती है-“हे राजन् ! इस सिंहासन पर उसे ही बैठना चाहिए, जिसकी उदारता राजा विक्रम के समान है।” भोज ने कहा- “हे पुत्तलिके ! उसकी उदारता के विषय में बताओ।” वह बोली-“राजन् ! जो याचकों की (याचना) पूर्ण करता है, देव (विक्रम) उसकी इच्छा पूर्ण
करते हैं।” और जैसा कि कहा भी गया है

जो मनुष्य उत्साहयुक्त, निरर्थक लम्बी योजनाएँ न बनाने वाला, क्रियाविधि का ज्ञाता, व्यसनों से दूर, शूरवीर, कृतज्ञ तथा दृढनिश्चयी होता है-ऐसे मनुष्य के पास लक्ष्मी स्वयं निवास करना चाहती है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
पुत्तलिका = पुतली। समुपवेष्टुम् = बैठने के लिए ; सम् + उप + √विश् + तुमुन्। तेनैव = उसी के द्वारा ; तेन + एव। अध्यासितव्यम् = बैठना चाहिए ; अधि + √आस् + तव्यत्। औदार्यम् = उदारता ; उदार + अण्। यस्त्वर्थिनाम् = जो याचकों की (यः + तु + अर्थिनाम्)। ईप्सितम् = इच्छिते ; √ईप्स् + क्त।
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2. एवं सकलगुणनिवासः स विक्रमो राजा एकदा स्वमनस्यचिन्तयत्
‘अहो असारोऽयं संसारः, कदा कस्य किं भविष्यतीति न ज्ञायते। यच्चोपार्जितानां वित्तं तदपि दानभोगैर्विना
सफलं न भवति। तथा चोक्तम्-‘
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
अपि च
दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयो न कर्तव्यः।
पश्येह मधुकरीणां सञ्चितमर्थं हरन्त्यन्ये॥

हिन्दी अनुवादः – इस प्रकार सभी गुणों से सम्पन्न उस राजा विक्रम ने एक बार अपने मन में विचार किया-“अहो, यह संसार सारहीन है, कब किसका क्या होगा-यह पता ही नहीं चलता। और जो धनवानों का धन है, वह भी दान-भोग के बिना सफल नहीं होता। और कहा भी है-”

इकट्ठे किए गए धन की रक्षा उस धन का त्याग ही है। जिस प्रकार तालाब की गहराई में स्थित जल की रक्षा उसका निकास ही होता है।

और भी धन का दान करना चाहिए, धन का भोग करना चाहिए, परन्तु धन का सञ्चय कदापि नहीं करना चाहिए। देखो, इस संसार में मधुमक्खियों द्वारा सञ्चित किए गए धन (मधु/शहद) को दूसरे लोग ही हर लेते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
यच्चोक्तम् = ऐसा कहा गया है ; यत् + च + उक्तम्। तटाकोदरसंस्थानाम् =तालाब की गहराई में स्थित, तटाकस्य उदरे संस्थानाम् (अवस्थितानाम्) । परीवाहः = परि + वह धातु + घञ् प्रत्यय, निकास। मधुकरीणाम् = मधुमक्खियों का।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

3. इत्येवं विचार्य सर्वस्वदक्षिणं यज्ञं कर्तुमुपक्रान्तवान्। ततः शिल्पिभिरतीव मनोहरो मण्डपः कारितः । सर्वापि यज्ञसामग्री समाहृता। देवमुनिगन्धर्वयक्षसिद्धादयश्च समाहूताः । तस्मिन्नवसरे समुद्राह्वानार्थं कश्चिद् ब्राह्मणः समुद्रतीरे प्रेषितः। सोऽपि समुद्रतीरं गत्वा गन्धपुष्पादिषोडशोपचारं विधायाब्रवीत् “भोः समुद्र विक्रमार्को राजा यज्ञं करोति। तेन प्रेषितोऽहं त्वामाह्वातुं समागतः।” इति जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं स्थितः। कोऽपि तस्य प्रत्युत्तरं न ददौ। तत उज्जयिनी यावत्प्रत्यागच्छति तावद्देदीप्यमानशरीरः समुद्रो ब्राह्मणरूपी सन् तमागत्यावदत् “भो ब्राह्मण, विक्रमेणास्मानाह्वातुं प्रेषितस्त्वं, तर्हि तेन यास्माकं सम्भावना कृता सा प्राप्तैव। एतदेव सुहृदो लक्षणं यत्समये दानमानादि क्रियते।”

हिन्दी-अनुवादः
यही विचार कर सर्वस्वदक्षिणा यज्ञ करना आरम्भ कर दिया। तब शिल्पियों से बहुत ही मनोहर मण्डप तैयार करवाया। सभी यज्ञसामग्री इकट्ठी की गई। देव, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध आदि आमन्त्रित किए गए। उसी अवसर पर समुद्र को बुलाने के लिए किसी ब्राह्मण को समुद्र के तट पर भेजा गया। वह भी समुद्र तट पर जाकर गन्ध, पुष्प आदि षोडशोपचार (पूजा) करके कहने लगा- “हे समुद्र ! राजा विक्रमादित्य यज्ञ कर रहे हैं। उनके द्वारा भेजा गया मैं आपको बुलाने के लिए आया हूँ।” इस प्रकार जल के बीच पुष्पाञ्जलि समर्पित कर क्षण भर के लिए ठहर गया। उसके निवेदन का उत्तर किसी ने भी नहीं दिया। फिर जैसे ही वह उज्जयिनी की ओर लौट रहा था तभी देदीप्यमान शरीर वाला समुद्र ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके पास आकर कहने लगा- “हे ब्राह्मण! राजा विक्रमादित्य ने हमें आमन्त्रित करने के लिए तुम्हें भेजा है। तो उन्होंने जो हमारा आदर-मान किया, वह प्राप्त हो गया। यही मित्र की पहचान होती है कि समय पर दान-मान आदि किया जाए।”

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
शिल्पिभिः = कारीगरों से; (शिल्प + इनि > इन् = शिल्पिन्)। समाहूताः = आमन्त्रित किए गए; सम्यक् आहूताः, (सम् + आ + √ढे + क्त)। समाहृताः = इकट्ठी कर दी गई है; (सम् + आ + √ह + क्त)। आह्वातुम् = बुलाने के लिए; (आ + हवे + तुमुन्)।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

4. उक्तं च
ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।
भुड्वते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्॥
दूरस्थितानां मैत्री नश्यति समीपस्थानां वर्धते इति न वाच्यम्।
गिरी कलापी गगने पयोदो लक्षान्तरेऽर्कश्च जले च पद्म।
इन्दुर्द्विलक्षे कुमुदस्य बन्धुर्यो यस्य मित्रं न हि तस्य दूरम्॥

हिन्दी-अनुवादः और कहा भी हैदेना, लेना, गोपनीय बात करना, गोपनीय बात पूछना, भोजन करना और भोजन करवाना–यह छः प्रकार का प्रीति का लक्षण होता है। .. दूर रहने वालों की मित्रता नष्ट हो जाती है और समीप रहने वालों की मित्रता बढ़ती है-यह बात कहने योग्य नहीं है अर्थात् उचित नहीं है।
पर्वत पर मयूर और आकाश में बादल, लाखों योजन दूर सूर्य और (सरोवर के) जल में कमल-एक दूसरे के मित्र हैं। बहुत दूरी होने पर भी चन्द्रमा कमलिनी का मित्र है। जो जिसका मित्र होता है, वह उससे दूर नहीं होता।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – गुह्यमाख्याति = गोपनीय को कहता है; गुह्यम् (गोपनीयम्) आख्याति। कलापी = मोर; कलापम् अस्ति
अस्य सः (बहुव्रीहिः), कलाप + इनि। लक्षान्तरेऽर्कश्च = लाखों योजन/मील की दूरी; (लक्ष + अन्तरे + अर्कः + च)। पद्म = कमल। इन्दुर्द्विलक्षे = चन्द्रमा से 2 लाख योजन दूर (अत्यधिक दूरी से आशय); इन्दुः + विलक्षे।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

5. तस्मै राज्ञे व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दास्यामि। एतेषां महात्म्यम्-एकं रत्नं यद्वस्तु स्मर्यते तद्ददाति। द्वितीयरत्नेन भोजनादिकममृततुल्यमुत्पद्यते। तृतीयरत्नाच्चतुरङ्गबलं भवति। चतुर्थाद्रत्नाद्दिव्याभरणानि जायन्ते। तदेतानि रत्नानि गृहीत्वा राज्ञो हस्ते प्रयच्छे ति। ततो ब्राह्मणस्तानि रत्नानि गृहीत्वा उज्जयिनी यावदागतस्तावद्यज्ञसमाप्तिर्जाता। राजावभृथस्नानं कृत्वा सर्वानर्थिजनान् परिपूर्णमनोरथानकरोत्। ब्राह्मणो राजानं दष्ट्वा रत्नान्यर्पयित्वा प्रत्येकं तेषां गुणकथनमकथयत्।

हिन्दी-अनुवादः (मैं समुद्र) उस राजा को खर्च करने के लिए चार रत्न समर्पित करूँगा। इन रत्नों का महात्म्य यह है-एक रत्न जो वस्तु याद की जाए वही प्रदान करता है। दूसरा अमृत के समान भोजन आदि पैदा करता है। तीसरे रत्न से चतुरंगिणी सेना पैदा हो जाती है। चौथे रत्न से दिव्य वस्त्र-आभूषण पैदा होते हैं। तो ये रत्न लेकर राजा के हाथ में दे देना। तत्पश्चात् ब्राह्मण उन रत्नों को लेकर जैसे ही उज्जयिनी आया तभी यज्ञ की समाप्ति हो गई। राजा ने अवभृथ स्नान करके सभी याचकों को पूर्ण मनोरथ वाला कर दिया। ब्राह्मण ने राजा का दर्शन कर रत्नों को समर्पित करके उनमें से प्रत्येक का गुणवर्णन किया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – चुतुरङ्गबलम् = घुड़सवार, हाथी सवार, रथ सवार, पैदल सैनिक-इन चारों को मिलाकर चार अगों वाली सेना। अवभृथस्नानम् = यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात् किया जाने वाला पापनाशक स्नान।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

6. ततो राजावदत्, “भो ब्राह्मण! भवान् यज्ञदक्षिणाकालं व्यतिक्रम्य समागतः। मया सर्वोऽपि ब्राह्मणसमूहो दक्षिणया तोषितः। तर्हि त्वमेतेषां रत्नानां मध्ये यत्तुभ्यं रोचते तद्गृहाणेति। ब्राह्मणेनोक्तम्, ‘गृहं गत्वा गृहिणी, पुत्रं, स्नुषां च पृष्ट्वा सर्वेभ्यो यद्रोचते तद्ग्रहीष्यामीति।’ राज्ञोक्तं ‘तथा कुरु।’ ब्राह्मणोऽपि स्वगृहमागत्य सर्वं वृत्तान्तं तेषामग्रेऽकथयत्। पुत्रेणोक्तं ‘यद्रतं चतुरङ्गबलं ददाति तद्ग्रहीष्यामः । यतः सुखेन राज्यं कर्तुमर्हिष्यामः।’ पित्रोक्तं ‘बुद्धिमता राज्यं न प्रार्थनीयम्।’ पुनः पिता वदति ‘यस्माद्धनं लभते तद् गृहाण। धनेन सर्वमपि लभ्यते।’ भार्ययोक्तं ‘यद्रलं षड्रसान् सूते तद्गृह्यताम्। सर्वेषां प्राणिनामन्नेनैव प्राणधारणं भवति।’ स्नुषयोक्तं ‘यद्रलं रत्नाभरणादिकं सूते तद् ग्राह्यम्।’

हिन्दी-अनुवादः तब राजा ने कहा- “हे ब्राह्मण! आप यज्ञ-दक्षिणा का समय निकल जाने पर आए हैं। मैंने समस्त ब्राह्मण समूह को दक्षिणा द्वारा सन्तुष्ट कर दिया। तो इन रत्नों में से जो तुम्हें अच्छा लगता है, वह ले लो। घर जाकर पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू से पूछकर सभी को जो अच्छा लगता है, वही ले लूँगा। राजा ने कहा-“ऐसा ही करो।” ब्राह्मण ने भी अपने घर आकर सब समाचार उनके सामने कहा। पुत्र ने कहा-“जो रत्न चतुरंगिणी सेना देता है, वही रत्न लेंगे। जिससे सुखपूर्वक राज्य करने में समर्थ होंगे।” पिता ने कहा-“बुद्धिमान् मनुष्य को राज्य की इच्छा नहीं करनी चाहिए।” फिर पिता ने कहा-“जिस रत्न से धन मिलता है, वही रत्न लो। धन से सब कुछ मिल जाता है।” पत्नी ने कहा-“जो रत्न छः रसों (वाले भोजन) को पैदा करता है, वही रत्न ले लो। सभी प्राणियों का प्राणधारण (जीवन) अन्न से ही चलता है।” पुत्रवधू ने कहा-“जो रत्न वस्त्र-गहने आदि पैदा करता है, वही रत्न लेना चाहिए।”

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च व्यतिक्रम्य = बीतने पर; अति + क्रिम् + ल्यप्। स्नुषाम् = पुत्रवधू को। ग्राह्यम् = ग्रहण करने योग्य; √ग्रह + ण्यत्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

7. एवं चतुर्णां परस्परं विवादो लग्नः । ततो ब्राह्मणो राजसमीपमागत्य चतुर्णां विवादवृत्तान्तमकथयत्। राजापि तच्छ्रुत्वा तस्मै ब्राह्मणाय चत्वार्यपि रत्नानि ददौ । इति कथां कथयित्वा पुत्तलिका राजानमवदत्, ‘भो राजन्, त्वय्येवंविध-सहजमौदार्यं विद्यते चेदस्मिन् सिंहासने समुपविश।’ तच्छ्रुत्वा राजा तूष्णीमासीत्।

हिन्दी-अनुवादः इस प्रकार चारों में झगड़ा हो गया। तब ब्राह्मण ने राजा के पास आकर चारों का विवाद-समाचार कह दिया। राजा ने भी उसे सुनकर उस ब्राह्मण को चारों ही रत्न प्रदान कर दिए। यह कथा कहकर पुत्तलिका ने राजा (भोज) को कहा-“हे राजन् आप में इस प्रकार की स्वाभाविक उदारता है तो इस सिंहासन पर बैठ जाओ।” यह सुनकर राजा (भोज) चुप हो गया।

विक्रमस्यौदार्यम् (विक्रमादित्य की उदारता) Summary in Hindi

विक्रमस्यौदार्यम् पाठ परिचय

‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ बत्तीस मनोरञ्जक कथाओं का संग्रह है। इसके केवल गद्यमय, केवल पद्यमय, गद्य-पद्यमय, ये तीन प्रकार के संस्करण मिलते हैं। इसमें बत्तीस पुत्तलिकाओं (पुतलियों) ने राजा विक्रमादित्य को बत्तीस कहानियाँ सुनाई हैं। अतः इस ग्रन्थ का समय राजा भोज (1018-1063) के अनन्तर ही माना जाता है। इसके रचयिता का नाम अज्ञात है।

एक टीले की खुदाई करने पर राजा भोज को एक सिंहासन मिलता है। वह सिंहासन राजा विक्रमादित्य का था। शुभ मुहूर्त में राजा भोज उस सिंहासन पर बैठना चाहता है तो सिंहासन पर बनी 32 पुत्तलिकाओं में से प्रत्येक पुत्तलिका राजा विक्रमादित्य के गुणों तथा पराक्रम की एक-एक कथा सुनाकर राजा को सिंहासन पर बैठने से पुनःपुनः रोकती है

और उड़ जाती है। प्रत्येक पुत्तलिका ने राजा से यही प्रश्न किया है-“क्या तुममें विक्रम जैसा गुण है ? यदि है तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो अन्यथा नहीं।” ऐसा माना जाता है कि विक्रमादित्य को यह सिंहासन इन्द्र से प्राप्त हुआ था। उनके दिवंगत हो जाने पर यह सिंहासन भूमि में गाड़ दिया गया और 11वीं सदी में यह सिंहासन धारानरेश भोज को मिलता है, इसीलिए प्रत्येक कहानी में पुत्तलिका राजा भोज को सम्बोधित करके कहानी कहती है।

प्रस्तुत पाठ उपर्युक्त ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ नामक कथासंग्रह से ही उद्धृत है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार राजा विक्रम को यह संसार असार प्रतीत होता है। अपनी उदारतावश वे सम्पूर्ण राजकोष को दान करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने ‘सर्वस्वदक्षिणायज्ञ’ का अनुष्ठान किया। उस यज्ञ में सब कुछ परित्याग कर दिया। यहाँ तक कि समुद्र की

ओर से प्रदान किए गए अद्वितीय चार रत्न भी ब्राह्मण को प्रदान कर दिए। इस प्रकार से इस कहानी के अनुसार विक्रम ने अत्यधिक उदारता का परिचय दिया है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

विक्रमस्यौदार्यम् पाठस्य सारः

‘विक्रमस्यौदार्यम्’ यह पाठ ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ नामक कथा संग्रह से लिया गया है। इसका रचयिता अज्ञात है। इस संग्रह की सभी कहानियाँ राजा भोज को सम्बोधित करके 32 पुत्तलिकाओं द्वारा कही गई हैं।

हर बार की तरह इस बार भी राजा भोज विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठना चाहता है। तभी एक पुतली आकर भोज को राजसिंहासन पर बैठने से रोकते हुए एक कहानी सुनाती है और कहती है कि यदि तुम में राजा भोज जैसी उदारता हो तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो। पुत्तलिका द्वारा सुनाई गई कहानी इस प्रकार है

उत्साह आदि सभी उत्तम गुणों से सम्पन्न राजा विक्रम ने संसार की सारहीनता पर विचार किया और दान भोग के बिना जीवन को व्यर्थ समझा। इसीलिए विक्रमादित्य ने सब कुछ दान कर देने के लिए सर्वस्वदक्षिणा यज्ञ’ करना आरम्भ कर दिया। इसी अवसर पर राजा ने समुद्र को भी आमन्त्रित किया। समुद्र ने राजा का निमन्त्रण लाने वाले ब्राह्मण के हाथ राजा को उपहार में देने के लिए अलग-अलग शक्ति वाले चार रत्न भेजे। इन चारों रत्नों की विशेषता इस प्रकार थी पहला रत्न जो वस्तु याद की जाती थी वही वस्तु दे देता था। दूसरा रत्न उत्तम भोजन सामग्री पैदा करता था। तीसरा रत्न सैन्य बल प्रदान करता था। चौथा रत्न दिव्य वस्त्र-आभूषण प्रदान करता था।

ब्राह्मण ने ये चारों रत्न राजा विक्रमादित्य को जाकर सौंप दिए और इनकी विशेषता भी बता दी। यज्ञ समाप्त हो चुका था। राजा ने सब कुछ दान कर दिया था। ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं लौटाया जा सकता था, इसलिए राजा ने इन चार रत्नों में से इच्छानुसार कोई एक रत्न लेने का आग्रह ब्राह्मण से किया। ब्राह्मण निश्चय नहीं कर पाया कि कौन सा रत्न लूँ। अतः उसने राजा से निवेदन किया कि वह घर में सलाह करके कोई एक रत्न ग्रहण करना चाहता है। राजा ने स्वीकृति दे दी। ब्राह्मण अपने घर चला गया। पत्नी, पुत्र, पुत्रवधू और स्वयं ब्राह्मण अलग-अलग रत्न लेने का आग्रह करते रहे। निश्चय न कर पाने, तथा विवाद बढ़ जाने पर ब्राह्मण राजा के पास चला गया और उसने राजा से सारा वृत्तान्त कह दिया। राजा ने चारों रत्न उस ब्राह्मण को दे दिए।

यह कहानी कहकर पुत्तलिका ने राजा भोज से कहा यदि आप में भी ऐसा दया भाव और उदारता है तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो। प्रत्युत्तर में राजा भोज चुप बैठ गया। इस कहानी में राजा विक्रमादित्य की अपूर्व दया-उदारता का वर्णन है।

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

HBSE 12th Class Sanskrit रघुकौत्ससंवादः Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तरं लिखत
(क) कौत्सः कस्य शिष्यः आसीत् ?
(ख) रघुः कम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म ?
(ग) कौत्सः किमर्थं रघु प्राप ?
(घ) मन्त्रकृताम् अग्रणीः कः आसीत् ?
(ङ) तीर्थप्रतिपादितद्धिः नरेन्द्रः कथमिव आभाति स्म ?
(च) चातकोऽपि कं न याचते ?
(छ) कौत्सस्य गुरुः गुरुदक्षिणात्वेन कियद्धनं देयमिति आदिदेश ?
(ज) रघुः कस्मात् परीवादात् भीतः आसीत् ?
(झ) कस्मात् अर्थं निष्क्रष्टुम् रघुः चकमे ?
(ञ) हिरण्मयीं वृष्टिं के शशंसुः ?
(ट) कौ अभिनन्धसत्वौ अभूताम् ?
उत्तरम्:
(क) कौत्सः महर्षेः वरतन्तोः शिष्यः आसीत्।
(ख) रघुः ‘विश्वजित्’-नामकम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म।
(ग) कौत्सः गुरुदक्षिणार्थं धनं याचितुं रघु प्राप।
(घ) मन्त्रकृताम् अग्रणी: महर्षिः वरतन्तुः आसीत्।
(ङ) तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः नरेन्द्रः स्तम्बेन अवशिष्टः नीवारः इव आभाति स्म।
(च) चातकोऽपि निर्गलिताम्बुग) शरद्घनं न याचते।
(छ) कौत्सस्य गुरु: गुरुदक्षिणात्वेन चतुर्दशकोटी: सुवर्णमुद्राः प्रदेयाः इति आदिदेश।
(ज) ‘कश्चित् याचक: गुरुप्रदेयम् अर्थं रघोः अनवाप्य अन्यं दातारं गतः’ इति परीवादात् रघुः भीतः आसीत्।
(झ) कुबेरात् अर्थं निष्क्रष्टुम् रघुः चकमे।
(ञ) हिरण्मयीं वृष्टिं गृहकोषे नियुक्ताः अधिकारिणः शशंसुः ।
(ट) द्वौ रघुकौत्सौ अभिनन्द्यसत्त्वौ अभूताम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

2. कोष्ठकात् समुचितं पदमादाय रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) यससा ………………… अतिथिं प्रत्युज्जगाम। (प्रकाशः, कृष्णः, आतिथेयः)
(ख) मानधनाग्रयायी ……………….. तपोधनम् उवाच। (विशाम्पतिः, अकृताञ्जलिः, कौत्सः)
(ग) कुशाग्रबुद्धे ! ………………… कुशली। (ते शिष्यः, ते गुरुः, अग्रणी:)
(घ) हे राजन् ! सर्वत्र ………………… अवेहि। (दुःखम्, वार्तम्, असुखम्)
(ङ) स्तम्बेन अवशिष्टः …………… इव आभासि। (धान्यम्, नीवारः, वृक्षः)
(च) हे विद्वन् ! ………………… गुरवे कियत् प्रदेयम्।। (त्वया, मया, लोकेन)
(छ) ………………… अचिन्तयित्वा गुरुणा अहमुक्तः। (शरीरक्लेशम्, अर्थकार्यम्, रोगक्लेशम्)
उत्तरम्:
(क) प्रकाशः
(ख) विशाम्पतिः
(ग) ते गुरुः
(घ) वार्तम्
(ङ) नीवारः
(च) त्वया
(छ) अर्थकार्यम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

3. अधोलिखितानां सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
(क) कोटीश्चतस्रो दश चाहर।
(ख) माभूत्परीवादनवावतारः।
(ग) द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढुमर्हन्।
(घ) निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।
(ङ) दिदेश कौत्साय समस्तमेव।
उत्तरम्:
(क) कोटीश्चतस्रो दश चाहर।
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ से ‘रघुकौत्ससंवादः’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ कविकुलशिरोमणि महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग में से सम्पादित किया गया है। इसमें महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्स का गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह, बार-बार के आग्रह से क्रोधित ऋषि द्वारा पढ़ाई गई चौदह विद्याओं की संख्या के अनुरूप चौदह करोड़ मुद्राएँ देने का आदेश, सर्वस्वदान कर चुके राजा रघु से कौत्स की धनयाचना ‘रघु के द्वार से’ याचक खाली हाथ लौट गया-इस अपकीर्ति के भय से रघु का कुबेर पर आक्रमण का विचार तथा भयभीत कुबेर द्वारा रघु के खजाने में धन वर्षा करने को संवाद रूप में वर्णित किया गया है।

व्याख्या-महर्षि वरतन्तु मन्त्रद्रष्टा ऋषि थे। न उनमें विद्या का अभिमान था, न गुरुदक्षिणा में धन का लोभ। कौत्स नामक एक शिष्य ने ऋषि से चौदह विद्याएँ अत्यन्त भक्ति भाव से ग्रहण की। विद्याप्राप्ति के पश्चात् कौत्स ने गुरुदक्षिणा स्वीकार करने का आग्रह किया। ऋषि ने कौत्स के भक्तिभाव को ही गुरुदक्षिणा मान लिया। परन्तु कौत्स गुरुदक्षिणा देने के लिए जिद्द करता रहता रहा और इस जिद्द से रुष्ट होकर कवि ने उसे पढ़ाई गई एक विद्या के लिए एक करोड़ सुवर्णमुद्राओं के हिसाब से चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ भेंट करने का आदेश दे दिया–’कोटीश्चतस्त्रो दश चाहर’।

(ख) मा भूत्परीवादनवावतारः।
(किसी निन्दा का नया प्रादुर्भाव न हो जाए।)
(ग) द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढमर्हन।
(हे पूजनीय ! दो-तीन तक आप मेरे पास ठहर जाएँ।)
(घ) निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।
(रघु ने कुबेर से धन ग्रहण करने की इच्छा की।)
(ङ) दिदेश कौत्साय समस्तमेव ।
(रघु ने कुबेर से प्राप्त सारा धन कौत्स के लिए दे दिया।)
उत्तर:
(ख), (ग), (घ) तथा (ङ) के लिए संयुक्त प्रसंग एवं व्याख्या

प्रसंग-(क) वाला ही उपयोग करें।

व्याख्या-महर्षि वरतन्तु का शिष्य कौत्स राजा रघु के पास गुरुदक्षिणार्थ धन याचना के लिए आता है। रघु विश्वजित् यज्ञ में सर्वस्व दान कर चुके हैं, अतः वे सुवर्णपात्र के स्थान पर मिट्टी के पात्र में जल आदि लेकर कौत्स का स्वागत करते हैं। कौत्स मिट्टी का पात्र देखकर अपने मनोरथ की पूर्ति में हताश हो जाता है और वापस लौटने लगता है। राजा रघु खाली हाथ लौटते हुए कौत्स को रोकते हैं क्योंकि सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से बढ़कर होता है अत: उन्हें भय यह है कि कहीं प्रजा में यह निन्दा न फैल जाए कि कोई याचक रघु के पास आया था और खाली हाथ लौट गया था। वे कौत्स से उसका मनोरथ पूछते हैं। कौत्स सारा वृत्तान्त सुनाते हुए कहता है कि गुरु के आदेश के अनुसार चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा में भेंट करनी हैं। रघु कौत्स से दो-तीन के लिए

आदरणीय अतिथि के रूप में ठहरने का अग्रह करते हैं, जिससे उचित धन का प्रबन्ध किया जा सके। कौत्स राजा की प्रतिज्ञा को सत्य मानकर ठहर जाता है। रघु भी उसकी याचना पूर्ति के लिए धन के स्वामी कुबेर पर आक्रमण का विचार करते हैं। कुबेर रघु के पराक्रम से भयभीत होकर रघु के खजाने में सुवर्ण वृष्टि कर देते हैं। उदार रघु यह सारा धन कौत्स को दे देते हैं, परन्तु निर्लोभी कौत्स उनमें से केवल 14 करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ लेकर लौट जाता है।

दाता सम्पूर्ण धनराशि देकर अपनी उदारता प्रकट करते हैं और याचक आवश्यकता से अधिक एक कौड़ी भी ग्रहण न करके उत्तम याचक का आदर्श उपस्थित करते हैं। इस प्रकार दोनों ही यशस्वी हो जाते हैं।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

4. अधोलिखितेषु रिक्तस्थानेषु विशेष्य विशेषणपदानि पाठ्यांशात् चित्वा लिखत
(क) ………………….. अध्वरे।
(ख) ………………….. कोषजातम्।
(ग) …………………… अनुमितव्ययस्य।
(घ) ………………….. फलप्रसूतिः।
(ङ) ………………….. विवर्जिताय।
उत्तरम्
(क) विश्वजिति अध्वरे।
(ख) निःशेष-विश्राणित-कोषजातम्।
(ग) अर्घ्यपात्र-अनुमितव्ययस्य ।
(घ) आरण्यकोपात्त-फलप्रसूतिः।
(ङ) स्मयावेश-विवर्जिताय।

5. विग्रहपूर्वकं समासनाम निर्दिशत
(क) उपात्तविद्यः
(ख) तपोधनः
(ग) वरतन्तुशिष्यः
(घ) महर्षिः
(ङ) विहिताध्वराय
(च) जगदेकनाथः
(छ) नृपतिः
(ज) अनवाप्य
उत्तरम्:
(क) उपात्तविद्यः = उपात्ता प्राप्ता विद्या येन सः। (बहुव्रीहिः समासः)
(ख) तपोधनः = तपः एव धनं यस्य सः। (बहुव्रीहिः समासः)
(ग) वरतन्तुशिष्यः = वरतन्तोः शिष्यः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(घ) महर्षिः = महान् ऋषिः (कर्मधारयः)
(ङ) विहिताध्वराय = विहितम् अध्वरं येन सः, तस्मै। (बहुव्रीहिः समासः)
(छ) नृपतिः = नृणां पतिः। (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ज) अनवाप्य = न अवाप्य।

6. अधोलिखितानां पदानां समुचितं योजनं कुरुत
(अ) – (आ)
(क) ते (1) चतुर्दश
(ख) चतस्र: दश च (2) गुरुदक्षिणार्थी
(ग) अस्खलितोपचाराम् (3) अहानि
(घ) चैतन्यम् (4) स्वस्ति अस्तु
(ङ) कौत्स: (5) प्रबोध: प्रकाशो वा
(च) द्वित्राणि (6) भक्तिम्
उत्तरम-
(क) ते स्वस्ति अस्तु
(ख) चतस्र: दश च चतुर्दश
(ग) अस्खलितोपचारां भक्तिम्
(घ) चैतन्यम् प्रबोधः प्रकाशो वा
(ङ) कौत्सः गुरुदक्षिणार्थी
(च) द्वित्राणि अहानि

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

7. प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम्
(क) अर्थी (ख) मृण्मयम् (ग) शासितुः (घ) अवशिष्टः (ङ) उक्त्वा
(च) प्रस्तुतम् (छ) उक्तः (ज) अवाप्य (झ) लब्धम् (ब) अवेक्ष्य।
उत्तरम्:
(क) अर्थी = अर्थ + इनि > इन् (पुंल्लिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्)
(ख) मृण्मयम् = मृत् + मयट् (नपुं०, प्रथमा-एकवचनम्)
(ग) शासितुः = √शास् + तृच् (पुंल्लिङ्गम् षष्ठी-एकवचनम्)
(घ) अवशिष्टः = अव + √शास् + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ङ) उक्त्वा = √वच् + क्त्वा (अव्ययपदम्)
(च) प्रस्तुतम् = प्र + √स्तु + क्त (नपुं०, प्रथमा-एकवचनम्)
(छ) उक्तः = √वच् + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ज) अवाप्य = अव + √आप् + ल्यप् (अव्ययपदम्)
(झ) लब्धम् = √लभ् + क्त (नपुं, प्रथमा-एकवचनम्)
(ब) अवेक्ष्य = अव + √ईक्ष् + ल्यप् (अव्ययपदम्)

8. विभक्ति-लिङ्ग-वचनादिनिर्देशपूर्वकं पदपरिचयं कुरुत
(क) जनस्य (ख) द्वौ (ग) तौ (घ) सुमेरोः (ङ) प्रातः (च) सकाशात् (छ) मे (ज) भूयः (झ) वित्तस्य
(ब) गुरुणा
उत्तरम्:
HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः img-1

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

9. अधोलिखितानां क्रियापदानाम् अन्येषु पुरुषवचनेषु रूपाणि लिखत
(क) अग्रहीत् (ख) दिदेश (ग) अभूत् (घ) जगाद (ङ) उत्सहते (च) अर्दति (छ) याचते (ज) अवोचत्।
उत्तरम्:
HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः img-2

10. अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि लिखत
(क) नि:शेषम् (ख) असकृत् (ग) उदाराम् (घ) अशुभम् (ङ) समस्तम्
उत्तरम्:
(विलोमपदानि)
(क) नि:शेषम् – शेषम्
(ख) असकृत् – सकृत्
(ग) उदाराम् – अनुदाराम्
(घ) अशुभम् – शुभम्
(ङ) समस्तम् – असमस्तम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

11. अधोलिखितानां पदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत
(क) नृपः (ख) अर्थी (ग) भासुरम् (घ) वृष्टिः (ङ) वित्तम् (च) वदान्यः (छ) द्विजराजः (ज) गर्वः
(झ) घनः (ब) वार्तम्
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगाः)
(क) नृपः (राजा)-नृपः रघुः कौत्साय समस्तं धनम् अयच्छत्।
(ख) अर्थी (याचक:)-कौत्सः गुरुदक्षिणार्थम् अर्थस्य अर्थी आसीत्।
(ग) भासुरम् (भास्वरम्)-रघुः भासुरं सुवर्णराशिं कौत्साय अयच्छत् ।
(घ) वृष्टिः (वर्षा)-रघोः कोषगृहे सुवर्णमयी वृष्टिः अभवत्।
(ङ) वित्तमद् (धनम्)-मुनीनां तपः एव वित्तं भवति।।
(च) वदान्यः (दानी)-रघुः याचकेषु उदारः वदान्यः आसीत्।
(छ) द्विजराजः (चन्द्रमाः)-रात्रौ आकाशे द्विजराजः दीव्यति।
(ज) गर्वः (अहंकारः)-गर्वः उचितः न भवति।।
(झ) घनः (मेघ:)-वर्षौ घनः गर्जति वर्षति च।
(ञ) वार्तम् (कुशलताम्)-राजा प्रजायाः वार्तम् इच्छति।

12. अधोलिखितानाम् (श्लोकानाम्) अन्वयं कुरुत
(क) सः मृण्मये वीतहिरण्मयत्वात् …….. आतिथेयः।
(ख) समाप्तविद्येन मया महर्षिः ……………….. पुरस्तात्।
(ग) स त्वं प्रशस्ते महिते मदीये ………………….. त्वदर्थम्।
उत्तरम्:
उपुर्यक्त तीनों श्लोकों का अन्वय पाठ में देखें।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

13. अधोलिखितेषु प्रयुक्तानाम् अलङ्काराणां निर्देशं कुरुत
(क) ‘यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्तं लोकेन चैतन्यमिवोष्णरश्मेः’।
(ख) शरीरमात्रेण नरेन्द्र ! तिष्ठना भासि …………… इवावशिष्टः॥
(ग) तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं ………………. वज्रभिन्नम्।
उत्तरम्:
(क) उपमा – अलङ्कारः।
(ख) उपमा – अलङ्कारः ।
(ग) अनुप्रासः, उपमा च अलङ्कारौ।

14. अधोलिखितेषु छन्दः निर्दिश्यताम्
(क) तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं ………….. वरतन्तुशिष्यः॥
(ख) गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृश्वा …… नवावतारः॥
(ग) स त्वं प्रशस्ते महिते …………. त्वदर्थम्॥
उत्तरम्:
(क) उपजातिः छन्दः
(ख) उपजाति: छन्दः
(ग) उपजातिः छन्दः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

15. ‘रघुकौत्ससंवाद’ सरलसंस्कृतभाषया स्वकीयैः वाक्यैः विशदयत
उत्तरम्-रघुः विश्वजिते यज्ञे सर्वस्वदानम् अकरोत्। तदा एव वरतन्तुशिष्यः कौत्सः गुरुदक्षिणार्थं धनं याचितुं रघुम् उपागच्छत् । रघुः मृत्तिकापात्रे अर्घ्यम् आदाय कौत्सं सत्कृतवान्। मृत्तिकापात्रेण कौत्सः ज्ञातवान् यत् रघुः तस्य धनाशां पूरयितुं समर्थः न अस्ति। अत: कौत्सः राज्ञे स्वस्ति कथयित्वा प्रतियातुकामः अभवत्। ‘रघोः द्वारात् याचकः अपूर्णकामः निवृत्तः’ इति परिवादात् भीत: रघुः कौत्सम् अवरुध्य तस्य मनोरथम् अपृच्छत्। कौत्सः सर्वं वृत्तान्तं कथयन् अवदत्

महर्षि-वरतन्तोः अहं चतुदर्श विद्याम् अधीतवान्। ततः अहं तस्मै गुरुदक्षिणायै निवेदितवान्। सः मम गुरुभक्तिम् एव गुरुदक्षिणाम् अमन्यत। मम भूयोभूयः निर्बन्धात् महर्षिः रुष्ट: जातः । सः चतुदर्शविद्यापरिसंख्यया मह्यं चतुर्दशकोटी: सुवर्णमुद्राः उपहर्तुम् आदिदेश। अतः एव अहं धनार्थी सन् भवतः समीपे आगच्छम्।।

रघुः सर्वं वृत्तान्तं श्रुत्वा कौत्साय द्वित्राणि दिनानि अतिथिरूपेण स्थातुं निवेदितवान्। कौत्सः राज्ञः निवेदनं स्वीकृतवान्। याचक-मनोरथं पूरयितुं रघुः प्रातः एव कुबेरम् आक्रमितुम् अचिन्तयत्। आक्रमणभीत: कुबेर: रात्रौ एव रघोः कोषगृहे सुवर्णवृष्टिम् अकरोत्। रघुः उदारभावात् समस्तं सुवर्णराशिं कौत्साय अयच्छत्। परन्तु कौत्सः केवलं चतुर्दशकोटी: मुद्राः एव गृहीत्वा गतवान्। एवम् उदारः रघुः निर्लोभः कौत्सः च द्वौ एव जगति धन्यौ अभवताम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

योग्यताविस्तारः

कालिदासीया काव्यशैली सहृदयानां मनो नितरां रञ्जयति। प्रतिमहाकाव्यं सुललितैः सुमधुरैः प्रसादगुणभरितैः च शब्दसन्दर्भ: मनोहारिणः संवादान् कविः समायोजयति । तत्र हृदयङ्गमाः परिसरसन्निवेशाः आश्रमोपवनादयः, लतागुल्मादयः, शुक-पिक-मयूर-मरन्द-हरिणादयः स्वभावरमणीयाः कविना चित्र्यन्ते। तादृशाः संवादाः कालिदासीयमहाकाव्योः सन्त्यनेको। यथा-रघुवंशे एवं द्वितीयसर्गे सिंह-दिलीपयोः संवादे’
अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् ।
न पादपोन्मूलनशक्तिरंह: शिलोच्चये मूर्च्छति मारुतस्य ॥ रघुवंशम् 2.34
सम्बन्धमाभाषणपूर्वमाहुर्वृत्तः स नौ सङ्गतयोर्वनान्ते ।
तदभूतनाथानुग ! नार्हसि त्वं सम्बन्धिनो मे प्रणयं विहन्तुम् ॥
कालिदासः उपमालङ्कारप्रियः। तस्य सर्वेषु काव्येषु उपमायाः हृदयहारीणि उदाहरणानि लभ्यन्ते। यथा
वन्यवृत्तिरिमां शश्वदात्मानुगमनेन गाम्।
विद्यामभ्यसनेनेव प्रसादयुित मर्हसि॥ रघुवंशम् 1.88

अर्घ्यम् – अय॑म् इति पदेन अतिथिसत्कारार्थं सङ्ग्राह्यं द्रव्यम् अभिधीयते। भारतीयायाम् अतिथिसत्कार परम्परायाम् एतेषां द्रव्याणां नितरां महत्त्वं वर्तते । तानि द्रव्याणि दूरादागतस्य अतिथिजनस्य अध्वश्रमम् अपनेतुं समर्थानि; अत एव तानि अर्घ्यद्रव्येषु स्थानं भजन्ते। अर्घस्य, अय॑स्य वा द्रव्याणि तु – दूर्वा, अक्षतानि, सर्षपाः पुष्पाणि, सुगन्धीनि, चन्दनादिसुगन्धिद्रव्याणि, स्वादु शीतलं जलञ्च। अर्घः अयं वा अतिथीनाम् उपचारार्थम्, आदरार्थं वा विधीयत इति याज्ञवलक्यः प्राह । तद्यथा’दूर्वा सर्षपपुष्पाणां दत्त्वाघ पूर्णमञ्जलिम्’ इति।

विद्या – प्राचीनकाले चतुर्दश विद्याः पाठ्यन्ते स्म। ताः स्मृतिषु उल्लिखिताः सन्ति। तद्यथा
अगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा-न्यायविस्तरः।
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या येताश्चतुर्दश॥
शिक्षा, व्याकरणं, छन्दः, निरुक्तं, ज्यौतिषं, कल्पः इति षट् वेदाङ्गानि; ऋक्, साम, यजुः, अथर्वण इति चत्वारो वेदाः । वेदार्थविचाराय प्रवृत्तं मीमांसाशास्त्रम्, न्यायविस्तरशब्देन ज्ञायमाना आन्वीक्षिकी, दण्डनीतिः, वार्ता च अष्टादश-पुराणानि; धर्मशास्त्रञ्च चतुर्दश-विद्यासु अन्तर्भवन्ति।

मन्त्रः- मन्त्र इति पदं ‘मत्रि’ (गुप्तभाषणे) धातोः घञ् प्रत्यये कृते निष्पन्नः, ऋषिभिः दृष्टानाम् आनुपूर्वाप्रधानाम् ऋग्यजुस्सामाथाख्यानां सामान्येन बोधकम्। प्रत्येकं वेदे अन्तर्गतानां मन्त्राणां बोधकतया भिन्नाः भिन्नाः शब्दाः प्रयुज्यन्ते। केवलम् ऋङ्मन्त्रणां कृते ‘ऋच’ इति साममन्त्राणां ‘सामानि’ इति, यजुर्मन्त्राणां ‘यजूंषि’ इति अथर्वमन्त्राणां ‘आथर्वा’ इति च संज्ञा। ज्ञानाथकात् ‘मन्’ धातोः अपि मन्त्रशब्दस्य व्युत्पत्तिं प्रदर्शयन्ति। ध्यानावस्थायां मन्त्रान् ऋषयः अपश्यन् इति कारणात् ते ‘मन्त्रद्रष्टार’ इत्युच्यन्ते। सर्वदा मननं कुर्वन्ति, ध्यानमग्ना भवन्ति इति कारणात् ऋषयः मन्त्रकृत इत्यपि उच्यन्ते।

बहुभाषाज्ञानम् -अधोलिखितानाम् अन्यभाषाशब्दानां समानार्थकानि पदानि पाठे अन्वेष्टव्यानि मेजबान (Host) अगवानी (to receive) जिद (insistance)

उत्तरम्- मेजबान (Host) = आतिथेयः।
आगवानी (to receive) = प्रति + उत् + √गम्।
जिद (Insistance) = निर्बन्धः।

विशिष्टवाक्यनिर्माणकौशलम्
‘सूर्ये तपति कथं तमिस्रा’-एतत्सदृशानि वाक्यानि निर्मेयानि
1. सूर्ये अस्तम् ………………. (गम्) चन्द्र उदेति।
2. मयि मार्गे ……………….. (स्था) यानम् आगतम् ।
3. तस्मिन् …………………. (प्रच्छ्) अहम् उत्तरम् अयच्छम्।
उत्तरम्:
1. सूर्ये अस्तं गते चन्द्र उदेति।
2. मयि मार्गे स्थिते यानम् आगतम्।
3. तस्मिन् पृष्टे अहम् उत्तरम् अयच्छम्।

अनेकार्थकशब्दः – पाठ्यांशे दृष्टानाम् अनेकार्थकशब्दानां सङ्ग्रहं कृत्वा नाना अर्थान् उल्लिखत।
काव्यसौन्दर्यबोधः – कालिदासस्य अन्येषु काव्येषु – ऋतुसंहार-मेघदूतयोः, मालविकाग्निमित्र विक्रमोर्वशीयाभिज्ञानशाकुन्तलेषु कुमारसम्भवे च भवद्भिः अवलोकिताः अलङ्कारैः सुशोभिताः श्लोकाः सङ्ग्राह्याः, काव्यसौन्दर्यं च समुपस्थापनीयम्।
चित्रलेखनम् – कालिदासकृतं प्रकृतिचित्रणम्, आश्रमचित्रणं, वृक्षादीनां पशुपक्षिणां च चित्रणं श्लोकोल्लेखनपूर्वकं फलकेषु पत्रेषु वा वर्णैः लेपनीयम्।

HBSE 9th Class Sanskrit रघुकौत्ससंवादः Important Questions and Answers

I. समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) रघुवंशस्य रचयिता कः ?
(A) भासः
(B) कालिदासः
(C) माघः
(D) अश्वघोषः

(ii) कौत्सः कस्य शिष्यः आसीत् ?
(A) रघोः
(B) महर्षेः
(C) महर्षिवरतन्तोः
(D) वसिष्ठस्य।

(ii) रघुः कम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म ?
(A) विश्वजित्-नामकम्
(B) पुत्रीयेष्टि-नामकम्
(C) पौर्णमास-नामकम्
(D) पाक्षिकम्।

(iv) मन्त्रकृताम् अग्रणीः कः आसीत् ?
(A) रघुः
(B) दिलीपः
(C) रामः
(D) वरतन्तुः

(v) कस्मात् अर्थं निष्क्रष्टुम् रघुः चकमे ?
(A) कृष्णात्
(B) इन्द्रात्
(C) कुबेरात्
(D) शिवात्।

(vi) हिरण्मयीं वृष्टिं के शशंसुः ?
(A) अधिकारिणः
(B) मित्राणि
(C) याचकाः
(D) प्रजाः।

(vii) कौ अभिनन्धसत्वौ अभूताम् ?
(A) गुरुशिष्यौ
(B) वरतन्तुकौत्सौ
(C) रघुकौत्सौ
(D) रघुवरतन्तू।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितम् पदं चित्त्वा लिखत
(i) मा भूत् परीवादनवावतारः।
(A) कस्य
(B) कस्मात्
(C) कस्मिन्
(D) कस्याम्।
उत्तरम्:
(A),कस्य

(ii) दिदेश कौत्साय समस्तमेव।
(A) कः
(B) कस्मिन्
(C) कस्मै
(D) कम्।
उत्तराणि:
(C) कस्मै

(ii) कौत्सः वरतन्तोः शिष्यः आसीत्।
(A) कम्
(B) कस्मै
(C) कस्मात्
(D) कस्य।
उत्तराणि:
(D) कस्य

(iv) रघुः विश्वजितम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म।
(A) कः
(B) कम्
(C) कस्मै
(D) कस्याः ।
उत्तराणि:
(B) कम्

(v) वरतन्तुः मन्त्रकृताम् अग्रणीः आसीत्।
(A) केषाम्
(B) कस्य
(C) कस्मिन्
(D) कस्याः ।
उत्तराणि:
(A) केषाम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

रघुकौत्ससंवादः पाठ्यांशः

1 .तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं
निःशेषविश्राणितकोषजातम्।
उपात्तविद्यो गुरुदक्षिणार्थी
कौत्सः प्रपेदे वरतन्तुशिष्यः॥ 1 ॥

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः img-3
अन्वयः- विश्वजिति अध्वरे नि:शेषविश्राणितकोशजातं तं क्षितीशं (रघुम्) उपात्तविद्यः वरतन्तुशिष्यः कौत्सः गुरुदक्षिणार्थी प्रपेदे।

प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘रघुकौत्ससंवादः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग से सम्पादित किया गया है। इस पाठ में ऋषि वरतन्तु के शिष्य कौत्स तथा महाराजा रघु के बीच हुए संवाद को वर्णित किया गया है। (पूरे पाठ में इसी प्रसंग का प्रयोग किया जा सकता है)।

सरलार्थ:–‘विश्वजित्’ नामक यज्ञ में अपनी सम्पूर्ण धनराशि दान कर चुके उस राजा रघु के पास वरतन्तु ऋषि का विद्यासम्पन्न शिष्य कौत्स गुरुदक्षिणा देने की इच्छा से धनयाचना करने के लिए पहुँचा।।

भावार्थ:-प्राचीन काल में राजा लोग ‘विश्वजित्’ यज्ञ करते थे। राजा रघु ने भी यह यज्ञ किया और अपना सम्पूर्ण खजाना (राजकोष-धनधान्य) दान कर दिया। तभी वरतन्तु का शिष्य कौत्स भी राजा के पास इस आशा में पहुँचा कि वह अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में देने के लिए चौदह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ राजा रघु से माँग लेगा।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च विश्वजिति अध्वरे = विश्वजित् नामक यज्ञ में। कोषजातम् = धनसमूह, सम्पूर्ण धनराशि। विश्राणितम् = प्रदत्तम्; दान में दिया हुआ। वि + √श्रणु (दाने) + क्त; दत्तम् । उपात्तविद्यः = विद्या को प्राप्त किया हुआ, विद्यासम्पन्न। उपात्ता विद्या येन सः (बहुव्रीहि)। गुरुदक्षिणार्थी = गुरुदक्षिणा देने की इच्छा से प्रार्थना करने वाला। गुरुदक्षिणायै अर्थी (चतुर्थी-तत्पुरुष) प्रपेदे = पहुँचा। प्र + √पद् (गतौ) + लिट् + प्रथम पुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

2. स मृण्मये वीतहिरण्मयत्वात्
पात्रे निधायार्थ्यमनर्घशीलः।
श्रुतप्रकाशं यशसा प्रकाशः
प्रत्युजगामातिथिमातिथेयः॥ 2॥

अन्वयः-सः अनर्घशीलः, यशसा प्रकाशः, आतिथेयः, वीतहिरण्मयत्वात् मृण्मये पात्रे अर्घ्यं निधाय श्रुतप्रकाशम् अतिथिं (कौत्सम्) प्रति उज्जगाम।

सरलार्थः-वह प्रशंसनीय स्वभाव वाला, यश से प्रकाशवान, अतिथि सत्कार करने वाला राजा रघु सुवर्ण-निर्मित पात्र न रहने से मिट्टी के बने हुए पात्र में अर्घ्य अर्थात् सत्कार के लिए जल आदि लेकर वेदज्ञान से प्रकाशमान अतिथि कौत्स के पास उठकर गया।

भावार्थ:-विश्वजित् यज्ञ में सम्पूर्ण धन-कोष दान कर देने के कारण राजा रघु निर्धन हो चुका था। अब उसके पास सोने के बर्तन नहीं थे। परन्तु अतिथि का सत्कार तो प्रत्येक दशा में करना ही चाहिए। इसी भाव से रघु मिट्टी के पात्र में सत्कार-सामग्री रखकर, अपने आसन से उठकर याचक ब्रह्मचारी कौत्स के पास पहुंचे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
मृण्मये= मिट्टी के बने हुए। मृत् + मयट्। वीतहिरण्मयत्वात् = सोने के बने हुए पात्रों के न रहने से। हिरण्यस्य विकारः = हिरण्मयम्। वि + √इण् + क्त = वीतम्। निधाय = रखकर । संस्थाप्य। नि + √धा + ल्यप् । अर्घ्यम् = अर्घ निमित्तक द्रव्य। अर्घार्थम् योग्यम् इदं द्रव्यम् अर्घ + यत्। अनर्धशीलः = असाधारण आचारवान्, प्रशंसनीय स्वभाववाला। अमूल्यस्वभावः, असाधारण-स्वभावो वा। नञ् + अर्घः = अनर्घः = अमूल्यम्। श्रुतप्रकाशं = वेदादि शास्त्रों के अध्ययन से प्रसिद्ध। श्रुतम् = शास्त्रम्। श्रुतेन प्रकाशः। यस्मिन् तम् (बहुव्रीहि)। श्रुतम् = वेदादि शास्त्र। श्रूयते इति श्रुतम्-वेदादिशास्त्रम्। √श्रु + क्त। प्रत्युजगाम = पास उठकर गया। प्रति + उत् + गम् + लिट् । प्रथमपुरुष एकवचन। आतिथेयः = अतिथि सत्कार करने वाला, मेजबान (Host) अतिथये साधुः । अतिथि + ढञ्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

3. तमर्चयित्वा विधिवद्विधिज्ञः
तपोधनं मानधनाग्रयायी।
विशांपतिर्विष्टरभाजमारात्
कृताञ्जलिः कृत्यविदित्युवाच॥ ३॥

अन्वयः-विधिज्ञः मानधनाग्रयायी कृत्यवित् विशांपतिः विष्टरभाजं तं तपोधनं विधिवत् अर्चयित्वा आरात् कृताञ्जलिः सन् इति उवाच।।

सरलार्थः-शास्त्रविधि को जानने वाले, स्वाभिमान को ही धन मानने वालों में अग्रगण्य, अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व को समझने वाले, प्रजा के स्वामी राजा रघु ने आसन पर विराजमान उस तपस्वी कौत्स का विधिपूर्वक सत्कार करके निकट ही हाथ जोड़े हुए (रघु ने) इस प्रकार कहा

भावार्थ:-स्वाभिमानी राजा रघु ने तपस्वी कौत्स का पूजन करके आदरपूर्वक हाथ जोड़कर अगले पद्यों में कहे जाने वाले वचन कहे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अर्चयित्वा = पूजन करके, सत्कार करके। √अर्च् (पूजायाम्) + णिच् + क्त्वा। स्वार्थे णिच्। विधिवत् = शास्त्रोक्त नियमों के अनुरूप। यथाशास्त्रम्। विधि + वत्। विधिज्ञः = शास्त्रज्ञ । शास्त्र नियमों के वेत्ता। तपोधनम् = ऋषि को। रघुकौत्ससंवादः जिसका तप ही धन है। तपः धनं यस्य (बहुब्रीहि समास)। मानधनाग्रयायी = आत्म गौरव को ही धन मानने वालों में अग्रगण्य/अग्रेसर। विशाम्पतिः = राजा। विश् = प्रजा। पति = स्वामी। विशां पतिः (अलुक्-षष्ठी तत्पुरुष) विष्टरभाजाम् = आसन पर/पीठ पर बैठे हुए। विष्टरम् = आसनम् अथवा पीठम्। आरात् = समीप में। दूर और समीप दोनों अर्थों में ‘आरात्’ पद का प्रयोग होता है। अव्यय। कृत्यवित्= अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व को समझने वाला। √कृ + यत् + √विद् + क्विप्। उवाच = √वच् (परिभाषणे) लिट्, प्रथम पुरुष, एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

4. अप्यग्रणीमन्त्रकृतामृषीणां
कुशाग्रबुद्धे कुशली गुरुस्ते।
यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्तं
लोकेन चैतन्यमिवोष्णरश्मेः॥ 4॥

अन्वयः-(हे) कुशाग्रबुद्धे ! अपि मन्त्रकृताम् ऋषीणाम् अग्रणीः ते गुरुः कुशली ? यतः त्वया अशेषं ज्ञानं लोकेन उष्णरश्मेः चैतन्यम् इव आप्तम्।

सरलार्थ:-राजा रघु ने कौत्स से विनयपूर्वक कहा-हे तीव्रबुद्धि ! क्या मन्त्रद्रष्टा ऋषियों में अग्रगण्य आपके गुरु कुशलपूर्वक हैं ? क्योंकि आपने समस्त ज्ञान अपने गुरु से उसी प्रकार प्राप्त किया है, जिस प्रकार संसार के समस्त लोग उष्णरश्मि (= सूर्य) से जागृति प्राप्त करते हैं।

भावार्थ:-वरतन्तु मन्त्रद्रष्टा श्रेष्ठ ऋषि हैं। राजा रघु उनके शिष्य से ऋषिश्रेष्ठ का कुशल समाचार पूछकर सज्जनोचित शिष्टाचार प्रकट कर रहे हैं। जैसे सूर्य से लोग ऊर्जा प्राप्तकर चेतनावान् हो जाते हैं, इसी प्रकार कौत्स वरतन्तु से समस्त 14 विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर विद्यावान् हुआ है।

विशेष:-यहाँ उपमा अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
मन्त्रकृताम्= मन्त्रद्रष्टाओं में। मनन करने वालों में। चिन्तन करने वालों में। कृ-धातु का प्रथम अर्थ ‘दर्शन करना’ है न कि निर्माण करना। ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः । कुशाग्रबुद्धे = हे सूक्ष्मदर्शी ! कुशस्य अग्र कुशाग्रं कुशाग्रमिव बुद्धिर्यस्य सः कुशाग्रीयम्। तत्सम्बोधनम्। कुश एक विशेष प्रकार की तीखी नोंक वाली घास होती है जिसका उपयोग यज्ञ-यागादि में किया जाता है। अशेषम् = सम्पूर्ण। अविद्यमानः शेषः यस्मिन् तत्। न + शेषम्। शेष न रहने तक। लोकेन = लोगों से। समूहवाचीपद। उष्णरश्मिः =सूर्य। उष्णः रश्मिः यस्य सः। बहुव्रीहि समास। आप्तम् = प्राप्त किया गया। आप्लु (व्याप्तौ) + क्त।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

5. तवाहतो नाभिगमेन तृप्तं मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे।
अप्याज्ञया शासितुरात्मना वाप्राप्तोऽसि सम्भावयितुं वनान्माम् ॥5॥

अन्वयः-अर्हतः तव अभिगमनेन नियोगक्रियया उत्सुकं मे मनः न तृप्तम् अपि शासितुः आज्ञया आत्मना वा मां संभावयितुं वनात् प्राप्तः असि ?

सरलार्थ:-राजा रघु ने कौत्स से पुन: कहा-“आप पूजनीय के आगमन से आज्ञापालन के लिए उत्सुक मेरा मन सन्तुष्ट/प्रसन्न हो गया है। क्या आप गुरु की आज्ञा से अथवा अपने-आप से ही मुझ पर कृपा करने के लिए वन (आश्रम) से यहाँ पधारे हैं ?”

भावार्थ:-राजा रघु स्वभाव से विनम्र एवं शिष्टाचार में निपुण हैं। वे तपस्वियों की याचना को भी अपने ऊपर तपस्वियों की कृपा ही मानते हैं। रघु के पूछने का तात्पर्य है कि वह अपने गुरुदेव के प्रयोजन से मेरे पास आया है अथवा उसका कोई अपना ही व्यक्तिगत प्रयोजन है ?

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अर्हतः = प्रशंसा के योग्य का। √अर्ह (पूजायाम्) + शत, षष्ठी एकवचन। अहूं-धातु से ‘प्रशंसा’ के अर्थ में ही शतृ प्रत्यय होता है। अभिगमेन = आगमन से। तृप्तम् = सन्तुष्ट। √तृप् (प्रीणने) + क्त। नियोगक्रियया = आज्ञा से। उत्सुकम् = उत्कण्ठित। सम्भावयितुम् = कृतार्थ करने के लिए। सम् + √भू + णिच् + तुमुन्।

6. इत्यर्घ्यपात्रानुमितव्ययस्य
रघोरुदारामपि गां निशम्य।
स्वार्थोपपत्तिं प्रति दुर्बलाशः
तमित्यवोचद्वरतन्तुशिष्यः॥6॥

अन्वयः-अर्घ्यपात्रेण अनुमितव्ययस्य रघोः इति उदारां गाम् अपि निशम्य वरतन्तुशिष्यः स्वाथोपपत्तिं प्रति दुर्बलाशः तम् इति अवोचत्।

सरलार्थ:-अर्घ्यपात्र मिट्टी का बना हुआ होने से जिसके खर्च करने की सामर्थ्य का अनुमान किया जा सकता है, ऐसे उस राजा रघु की इस उदारतापूर्ण वाणी को सुनकर भी वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने अपने कार्य की सिद्धि के प्रति हताश होते हुए राजा रघु से ये वचन कहे

भावार्थ:-राजा रघु विश्वजित् यज्ञ में अपना सम्पूर्ण धन दान कर चुके हैं, अत: कौत्स का सत्कार करने के लिए आज उनके पास सोने का पात्र नहीं है; अपितु मिट्टी का पात्र है। इस मिट्टी के बर्तन से ही अब रघु की दान शक्ति का परिचय मिल जाता है। कौत्स को अपने उद्देश्य की सिद्धि पूर्ण होती हुई प्रतीत नहीं होती, इसीलिए वह हताश होकर अगले पद्यों में कहे गए वचन राजा रघु के सामने निवेदन करता है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अर्घ्यपात्रानुमितव्ययस्य = (मृण्मय) अर्घ्यपात्र से ही जिसके सम्पूर्ण धन के व्यय हो जाने का पता लगता है, उसका। अर्घ्यस्य पात्रम् अर्घ्यपात्रेण अनुमितः व्ययः यस्य सः, तस्य = रघोः। गाम् = वाणी को। ‘गो’ शब्द अनेकार्थक है, इस स्थान पर वाणी का वाचक है। निशम्य = सुनकर। नि + √शम् + ल्यप् । स्वार्थोपपत्तिम् = अपने प्रयोजन (कार्य) की सिद्धि को। यहाँ अर्थ शब्द प्रयोजन वाचक है। दुर्बलाशः = निराश होते हुए; शिथिल मनोरथ होते हुए दुर्बला आशा यस्य सः (बहुव्रीहि) अवोचत् = बोला। √वच् + (परिभाषणे) लङ् प्रथमपुरुष, एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

7. सर्वत्र नो वार्तमवेहि राजन् !
नाथे कुतस्त्वय्यशुभं प्रजानाम्।
सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्टे:
कल्पेत लोकस्य कथं तमिस्त्रा॥7॥

अन्वयः-(हे) राजन् ! सर्वत्र नः वार्तम् अवेहि। त्वयि नाथे प्रजानाम् अशुभं कुतः ? सूर्ये तपति तमिस्रा लोकस्य दृष्टेः आवरणाय कथं कल्पेत ? .

सरलार्थ:-वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने राजा रघु को सम्बोधन करते हुए कहा-हे राजन् ! आप तो सभी जगह हमारी कुशलता को जानते ही हैं। आप के राजा होते हुए प्रजाओं का अशुभ कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं। सूर्य के प्रकाशमान होने पर अंधकार समूह (कृष्ण पक्ष की रात्री) संसार के लोगों की दृष्टि को ढकने में कैसे समर्थ हो सकता

भावार्थ:-कौत्स राजा रघु के राजा होने पर सन्तुष्ट है और राजा के समक्ष वह स्पष्ट कर रहा है कि उनके राजा रहते हुए उनके शासन में किसी भी प्रकार के अनिष्ट की कल्पना नहीं की जा सकती। समस्त प्रजा का केवल कल्याण ही होता है। सूर्य के रहते हुए अंधकार कैसे ठहर सकता है?

विशेषः-प्रस्तुत पद्य में पहले वाक्य की कही गई बात को दूसरे वाक्य की बात से पुष्ट किया गया है। अत: यहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
वार्तम् = कुशलता, नीरोगता। ‘वार्तम् , स्वास्थ्यम्, आरोग्यम्, अनामयम्’ इति पर्यायपदानि। अवेहि = जानो। अव + इहि । √इण् गतौ, लोट् मध्यमपुरुष एकवचन । सूर्ये तपति (सति) = सूर्य के प्रकाशमान होने पर। सती सप्तमी प्रयोग। तपति – √तप् + शतृ सप्तमी विभक्ति एकवचन (पुंल्लिंग) कथं कल्पेत = कैसे पर्याप्त होगा। (समर्थ नहीं होगा)। √क्लुप् (सामर्थ्य) विधिलिङ्, प्रथम पुरुष एकवचन। तमिस्रा = अन्धकार समूह, कृष्णपक्ष की रात्री ‘तमिस्रा तु तमस्ततौ’।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

8. शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्
आभासि तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः।
आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिः
स्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः॥ 8॥

अन्वयः-(हे) नरेन्द्र ! तीर्थे प्रतिपादितार्द्धिः अपि शरीरमात्रेण तिष्ठन् आरण्यकोपात्त-फलप्रसूतिः स्तम्बेन अवशिष्टः नीवारः इव आभासि।

सरलार्थ:-वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने राजा रघु से कहा-हे राजन् ! सत्पात्रों को अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान. में देने वाले आप केवल शरीर से उसी प्रकार सुशोभित हो रहे हैं जैसे वनों में रहने वाले मुनि लोगों को अपने फल प्रदान कर देने वाले नीवार के पौधे डंठल मात्र से शेष रहकर सुशोभित होते हैं।

भावार्थ:-रघु सर्वस्व दान कर देने के पश्चात् भी सुशोभित हो रहे हैं, क्योंकि उन्होंने यह दान सदाचारी याचकों को दिया है। कवि कालिदास ने धन-सम्पत्ति से रहित होने के कारण शरीर मात्र से विद्यमान रघु को उसी प्रकार सुशोभित बताया है जिस प्रकार मुनियों द्वारा नीवार-अन्न (साँवकी) ग्रहण कर लेने पर नीवार का पौधा डंठल मात्र रहकर सुशोभित होता है।

विशेषः- यहाँ उपमा अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च शरीरमात्रेण = केवल शरीर से। केवलं शरीरं शरीरमात्रम्। मात्रच् प्रत्यय। आभासि = सुशोभित हो रहे हो। आ + √भा (दीप्तौ) लट्लकार मध्यम पुरुष एकवचन। तीर्थप्रतिपादितार्द्धिः = सत्पात्रों को सारी सम्पत्ति दान करने वाले। तीर्थ-सत्पात्रे प्रतिपादिता-दत्ता ऋद्धिः-समृद्धिः (सम्पत्) येन सः। आरण्यकाः = अरण्य में निवास करने वाले मुनिजन आदि। अरण्ये भवाः आरण्यकाः । स्तम्बेन = डाँठ (डंठल) मात्र से। तृतीया विभक्ति एकवचन। नीवारः =धान्य विशेष। जंगल में स्वतः उत्पन्न हुआ धान्य विशेष।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

9. तदन्यतस्तावदनन्यकार्यों
गुर्वर्थमाहर्तुमहं यतिष्ये।
स्वस्त्यस्तु ते निर्गलिताम्बुगर्भ
शरद्घनं नार्दति चातकोऽपि ॥ १॥

अन्वयः-तत् तावत् अनन्यकार्यः अहम् अन्यतः गुर्वर्थम् आहर्तुं यतिष्ये। ते स्वस्ति। चातकः अपि निर्गलिताम्बुगर्भ शरद्-घनं न अर्दति।

सरलार्थ:-कौत्स राजा रघु से कह रहा है-(क्योंकि आप पहले ही सब कुछ दान कर चुके हैं। इसीलिए (धन याचना के अतिरिक्त मेरा) कोई अन्य प्रयोजन न होने से मैं किसी दूसरे राजा के पास गुरुचरणों में दक्षिणा रूप में देने के लिए धन-याचना करने का प्रयास करूंगा। आपका कल्याण हो। जल वर्षा कर देने से रिक्त हुए शरद् ऋतु के बादलों से तो चातक भी जल की याचना नहीं करता।

भावार्थ:-जिसके पास जो वस्तु हो, उससे वही वस्तु माँगनी चाहिए। कौत्स को धन की आवश्यकता है। राजा रघु पहले ही सम्पूर्ण धन का दान कर चुके हैं। कौत्स का धन याचना के अतिरिक्त कोई अन्य प्रयोजन भी नहीं है। अतः वह राजा रघु से कह रहा है कि मैं गुरुदक्षिणा के लिए धन प्राप्त करने हेतु किसी अन्य राजा से निवेदन करूँगा क्योंकि जल रहित बादलों से तो चातक पक्षी भी याचना नहीं करता। विशेष:-पहले वाक्यार्थ की पुष्टि दूसरे वाक्यार्थ से हो रही है। अतः यहाँ ‘अर्थान्तरन्यास’ अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अनन्यकार्यः = जिसे निर्दिष्ट उद्देश्य के अतिरिक्त अन्य कार्य न हो। प्रयोजनान्तर-रहितः । न विद्यते अन्यकार्यं यस्य, सः (बहुव्रीहि समास) अन्यच्च तत् कार्यञ्च अन्यकार्यम् (कर्मधारय समास) आहर्तुम् = ग्रहण करने के लिए आ + √ह (हरणे) + तुम्। यतिष्ये = प्रयत्न करूँगा। √यती (प्रयत्ने) + लृट् उत्तम पुरुष बहुवचन। निर्गलिताम्बुगर्भ = जिसके गर्भ से जल निकल चुका हो। अम्ब्वेव गर्भः अम्बुगर्भः । निर्गलितः अम्बुगर्भः यस्मात् सः। शरधनम् = शरत्कालिक मेघ । नार्दति =याचना नहीं करता है। न + अर्दति। √अर्दु (गतौ याचने च) लट्लकारप्रथम पुरुष एकवचन। चातकः = पपीहा (पक्षी-विशेष) चातक पक्षी।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

10. एतावदुक्त्वा प्रतियातुकामं
शिष्यं महर्षेर्नृपतिर्निषिध्य।
किं वस्तु विद्वन् ! गुरवे प्रदेयं
त्वया कियद्वेति तमन्वयुक्तं ॥ 10॥

अन्वयः – एतावद् उक्त्वा प्रतियातुकामं महर्षेः शिष्यं नृपतिः (रघुः) निषिध्य-“(हे) विद्वन् ! त्वया गुरवे प्रदेयं वस्तु किम्, कियत् वा” इति तम् अन्वयुक्त।

सरलार्थः-उपर्युक्त वचन कहकर जब महर्षि वरन्तु का शिष्य वापस लौटने लगा तब महाराज रघु ने उसे रोक कर इस प्रकार पूछा- “हे विद्वान् ! अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में देने के लिए क्या वस्तु चाहिए और कितनी चाहिए ?”

भावार्थ:-कौत्स अपनी धन याचना पूर्ण न होते हुए देखकर वापस लौट जाना चाहता है। रघु उसे रोकते हैं क्योंकि महाराज रघु एक स्वाभिमानी राजा हैं और किसी याचक का खाली हाथ लौट जाना रघु को स्वीकार नहीं है। इसीलिए वे कौत्स से पूछते हैं कि उसे गुरुदक्षिणा में देने के लिए कितने परिमाण में किस वस्तु की आवश्यकता

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
प्रतियातुकामम् = लौट जाने की इच्छा वाले को। प्रतियातुं कामः यस्य सः तम्। प्रति = √या (प्रापणे) + तुम्। ‘तुंकाममनसोरपि’ इस नियम से ‘तुम्’ प्रत्यय के मकार का लोप होता है। निषिध्य = निवारण कर। निवार्य। नि + √षिध् (गत्याम्) + ल्यप्। प्रदेयम् = देने योग्य। प्र + √दा (दाने) + यत्। कियत् = कितना ? किं परिमाणम् ? अन्वयुक्त = पूछा। अनु + (युज् + लङ् प्रथम पुरुष एकवचन। अयुक्त, अयुजाताम्, अयुञ्जत।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

11. ततो यथावद्विहिताध्वराय
तस्मै स्मयावेशविवर्जिताय।
वर्णाश्रमाणां गुरवे स वर्णी
विचक्षणः प्रस्तुतमाचचक्षे॥ 11 ॥

अन्वयः-ततः यथावत् विहिताध्वराय स्मयावेशविर्जिताय वर्णाश्रमाणां गुरवे तस्मै स: विचक्षणः वर्णी प्रस्तुतम् आचचक्षे।

सरलार्थ:-राजा रघु के पूछने पर विधिपूर्वक यज्ञ अनुष्ठान कर लेने वाले अभिमान से शून्य ब्राह्मण आदि वर्गों तथा ब्रह्मचर्य आदि आश्रमों के व्यवस्थापक उस राजा रघु को वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने अपना उद्देश्य कहा।

भावार्थ:-राजा रघु धर्मवृत्ति हैं, उनमें नाममात्र को भी अभिमान नहीं है। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों; ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास इन चारों आश्रमों पर नियन्त्रण करने वाले हैं। ऐसे प्रजापालक राजा के पूछने पर कौत्स ने अपना मनोरथ राजा के सामने प्रकट किया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
यथावत् = विधिवत् शास्त्रों के नियमानुरूप। स्मयावेशविवर्जिताय = जो गर्व के आवेश से वर्जित हो, अभिमानशून्य, गर्वाभिनिवेशशून्याय। स्मयः = गर्वः। वर्णी = ब्रह्मचारी। वर्ण + इन्। (पुंल्लिंग, प्रथमा-एकवचन) आचचक्षे = कहने लगा था। आ + √चिक्षिङ् (व्यक्तायां वाचि) लिट् प्रथमपुरुष एकवचन। गुरवे = नियामक व्यवस्थापक को। प्रजानां नियामकाय।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

12. समाप्तविद्येन मया महर्षिर्
विज्ञापितोऽभूद्गुरुदक्षिणायै।
स मे चिरायास्खलितोपचारां
तां भक्तिमेवागणयत्पुरस्तात्॥ 12 ॥

अन्वयः-समाप्तविद्येन मया महर्षिः गुरुदक्षिणायै विज्ञापितः अभूत्। स चिराय अस्खलितोपचारां तां मे भक्तिम् एव पुरस्तात् अगणयत्।

सरलार्थः-कौत्स ने राजा रघु को सारा वृत्तान्त समझाते हुए कहा कि जब मैंने विद्या समाप्त कर ली तो महर्षि वरतन्तु से मैंने गुरु दक्षिणा स्वीकार कर लेने के लिए प्रार्थना की। उन आदरणीय गुरु जी ने पहले तो मेरी पूर्ण निष्ठापूर्वक की गई उस भक्ति को ही बहुत दिनों तक गुरुदक्षिणा रूप में समझा (जो विद्या अध्ययन करते समय मैंने निष्ठापूर्वक गुरु सेवा की थी)।

भावार्थ:-महर्षि वरतन्तु सच्चे गुरु थे, उन्हें धन की कोई इच्छा नहीं थी। इसीलिए वे कौत्स के सेवाभाव को ही बहुत दिनों तक गुरु दक्षिणा के रूप में मानते रहे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
गुरुदक्षिणायै = गुरुदक्षिणा स्वीकार करने हेतु। चिराय = चिरकाल से (बहुत वर्षों से/बहुत दिनों से)। यह एक अव्यय है जिसके अन्त में नाना विभक्तियों के रूप दिखाई पड़ते हैं। जैसे चिरम्, चिरात्, चिरस्य। ये सभी समानार्थक हैं। अगणयत् = गिन लिया। √गिण (संख्याने) + णिच् + लङ्। चुरादिगण। पुरस्तात् = सब से पहले। अव्यय।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

13. निर्बन्धसञ्जातरुषार्थकार्य
मचिन्तयित्वा गुरुणाहमुक्तः
वित्तस्य विद्यापरिसंख्यया मे
कोटीश्चतस्रो दश चाहरेति ॥ 13 ॥

अन्वयः-निर्बन्धसञ्जातरुषा अर्थकार्यम् अचिन्तयित्वा अहं वित्तस्य चतस्रः दश च कोटीः आहर इति विद्यापरिसंख्यया उक्तः।

सरलार्थः-कौत्स महाराज रघु से शेष वृत्तान्त निवेदन करते हुए कहता है-“मेरे बार-बार प्रार्थना (जिद्द) करने से क्रोधित हुए गुरु जी ने मेरी निर्धनता का विचार किए बिना मुझे कहा कि चौदह विद्याओं की संख्या के अनुसार तुम चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ ले आओ।” ।

भावार्थ:-गुरुदेव वरतन्तु को न धन का लोभ था, न विद्या का अभिमान । परन्तु शिष्य कौत्स की बार-बार जिद्द ने उन्हें क्रोधित कर दिया और उन्होंने कौत्स को पढ़ाई गई चौदह विद्याओं के प्रतिफल में चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा में समर्पित करने का आदेश दे दिया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
निर्बन्धेन = बार-बार किए जाने से। प्रार्थनातिशयेन। अर्थकाय॑म् = अर्थसंकट, दारिद्रय। अचिन्तयित्वा = बिना सोचे। नञ् + √चिती (संज्ञाने) + णिच् + त्वा। विद्यापरिसङ्ख्यया = विद्या की गणना (संख्या) के अनुसार। आहर = लाओ। आ + √हृ + लोट्। मध्यम पुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

14. इत्थं द्विजेन द्विजराजकान्ति
रावेदितो वेदविदां वरेण।
एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिरेनं
जगाद भूयो जगदेकनाथः ॥ 14 ॥

अन्वयः-द्विजराजकान्तिः एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिः जगदेकनाथ: वेदविदां वरेण द्विजेन इत्थम् आवेदितः एनं भूयः जगाद।

सरलार्थः-वेद विद्या को जानने वालों में श्रेष्ठ उस ब्राह्मण कौत्स के द्वारा इस प्रकार निवेदन किए गए, चन्द्रमा के समान कान्ति वाले, जितेन्द्रिय, संसार के पालन करने वाले उस राजा रघु ने याचक कौत्स को फिर कहा-

भावार्थ:-राजा रघु ने कौत्स द्वारा कहे गए सम्पूर्ण घटनाक्रम को सुनकर अगले पद्य में कहे जाने वाले वचन कौत्स से कहे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
द्विजराजकान्तिः = चन्द्रमा के समान कान्ति वाले। द्विजराजः (चन्द्रमाः) इव कान्ति यस्य सः (बहुव्रीहि समास) वेदविदाम् वरेण = वेदविद्या को जानने वालों में श्रेष्ठ। वेदं वेत्ति जानाति इति वेदवित् तेषाम्। एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिः = जितेन्द्रिय। पापों से निवृत्त इन्द्रियवृत्ति वाले। एनः = पाप, अपराध। जगाद = कहा √गिद् (व्यक्तायां वाचि) + लिट। प्रथमपुरुष एकवचन।

15. गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृश्वा
रघोः सकाशादनवाप्य कामम्।
गतो वदान्यान्तरमित्ययं मे
मा भूत्परीवादनवावतारः ॥ 15 ॥

अन्वयः-श्रुतपारदृश्वा गुर्वर्थम् अर्थी रघोः सकाशात् कामम् अनवाप्य वदान्यान्तरं गतः इति अयं परीवादनवावतारः मे मा भूत्।

सरलार्थ:–राजा रघु ने कौत्स से कहा कि आप शास्त्रों को जानने वाले हैं तथा गुरुदक्षिणा देने के लिए धन याचना करने वाले है आप रघु के पास से अपना मनोरथ पूरा किए बिना किसी दूसरे दानी के पास चले गए-इस प्रकार की निन्दा का नया प्रार्दुभाव न हो जाए।

भावार्थ:-सम्मानित व्यक्तियों के लिए समाज में फैला हुआ अपयश मृत्यु से भी बढ़कर होता है, इसीलिए राजा रघु बिल्कुल नहीं चाहते कि समाज में यह निन्दा फैल जाए कि कोई वेद का विद्वान्, शास्त्रों का ज्ञाता ब्राह्मण अपने गुरु को गुरुदक्षिणा देना चाहता था और इसी उद्देश्य से धन याचना करने के लिए वह राजा रघु के पास आया और खाली हाथ लौट गया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
श्रुतपारदृश्वा = शास्त्रज्ञ, शास्त्रमर्मज्ञ। श्रुतस्य पारं दृष्टवान् । श्रुत + पार + √दृश् + क्वनिप्। सकाशात् = पास से। अव्यय। वदान्यान्तरम् = दूसरे दाता। वदान्यः = दानी। अन्यः वदान्यः वदान्यान्तरम्। माभूत् = न होवे। माङ् + अभूत् । √भू + लुङ् प्रथमपुरुष, एकवचन। परीवादः = निन्दा। ‘परिवाद’ शब्द भी निन्दार्थक है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

16. स त्वं प्रशस्ते महिते मदीये
वसंश्चतुर्थोऽग्निरिवाग्न्यगारे
द्वित्राण्यहान्यहसि सोढुमर्हन्
यावद्यते साधयितुं त्वदर्थम्॥ 16 ॥

अन्वयः-स त्वं मदीये महिते प्रशस्ते अग्न्यगारे चतुर्थः अग्निः इव वसन् द्वित्राणि अहानि सोढुम् अर्हसि। (हे) अर्हन् ! त्वदर्थं साधयितुं यावत् यते।

सरलार्थ:- रघु ने कौत्स से निवेदन किया कि आप मेरी विशाल तथा प्रशंसनीय यज्ञशाला में चतुर्थ अग्नि के समान दो-तीन दिन बिता सकते हैं। हे पूजनीय ब्रह्मचारी! मैं आपके प्रयोजन को सिद्ध के लिए यत्न करूंगा।

भावार्थ:-दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्नि नाम से यज्ञ की अग्नि तीन प्रकार की होती है, ये तीनों अग्नियाँ याजकों के लिए अति श्रद्धेय होती हैं। रघु कौत्स को चतुर्थ अग्नि की भाँति पूजनीय समझते हैं और उससे निवेदन करते हैं की आप मेरी ही यज्ञशाला में दो-तीन दिन तक प्रतीक्षा करें, जिससे 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का प्रबन्ध किया जा सके।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
वसन् = रहते हुए। वस् (निवासे) + शतृ। प्रथमा विभक्ति, एकवचन। चतुर्थः अग्निः इव = चौथी अग्नि जैसा। दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्नि नाम से अग्नि के तीन प्रकार हैं। अग्न्यगारे = अग्निशाला में। यज्ञशाला में। अग्नि + अगारे। त्वदर्थं साधयितुं यावद्यते = तुम्हारा प्रयोजन पूरा करने के लिए यत्न करूँगा। तव + अर्थम्, = त्वदर्थम् यावत् = यते। ‘यतिष्ये’ इस अर्थ में ‘यते’ का प्रयोग। यती (प्रयत्ने) + लट्, आत्मनेपदी। उत्तमपुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

17. तथेति तस्यावितथं प्रतीत:
प्रत्यग्रहीत्सङ्गरमग्रजन्मा।
गामात्तसारां रघुरप्यवेक्ष्य
निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।। 17 ॥

अन्वयः-अग्रजन्मा प्रतीतः तस्य अवितथं सगारं तथा इति प्रत्यग्रहीत्। रघुः अपि गाम् आत्तसाराम् अवेक्ष्य कुबेरात् अर्थं निष्क्रष्टुं चकमे।।

सरलार्थः-ब्राह्मण कौत्स ने प्रसन्न होकर उस राजा रघु के सत्यवचन । प्रतिज्ञा को ‘ठीक है’ यह कहकर स्वीकार किया। रघु ने भी पृथिवी को प्राप्तधन वाली देखकर कुबेर से धन छीन लेने की इच्छा की।

भावार्थः-याचक कौत्स और दाता रघु दोनों को परस्पर विश्वास है। कौत्स ने रघु के वचनों को सत्य प्रतिज्ञा के रूप में ग्रहण किया। रघु ने कौत्स की याचना के पूर्ण करने हेतु धन के स्वामी कुबेर पर आक्रमण कर उसका धन हरण कर लेने की इच्छा की।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अवितथम् = सत्य। वितथम् = मिथ्या, न वितथम् = अवितथम्। प्रत्यग्रहीत् = स्वीकार किया। प्रति + √ग्रह + लुङ् प्रथमपुरुष एकवचन। सङ्गरम् = प्रतिज्ञा को, वचन को। ‘सङ्गर’ समानार्थक शब्द है। गाम् = भूमि को। ‘गाम्’ अनेकार्थक शब्द है। निष्क्रष्टुम् = हर लेने के लिए। आहर्तुम्। निर् + √क्रिष् + तुमुन्। आत्तसाराम् = प्राप्तधन वाली। अवेक्ष्य = देखकर । अ + √ईक्ष् + ल्यप् । चकमे = इच्छा की। √कम् (कान्तौ), लिट्, आत्मनेपदी, प्रथमपुरुष एकवचन। प्रतीतः = प्रसन्न। प्रति√इ + क्त = प्रतीतः । प्रीतः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

18. प्रातः प्रयाणाभिमुखाय तस्मै
सविस्मयाः कोषगृहे नियुक्ताः।
हिरण्मयी कोषगृहस्य मध्ये
वृष्टिं शशंसुः पतितां नभस्तः ॥ 18 ॥

अन्वयः-प्रातः प्रयाणाभिमुखाय तस्मै कोषगृहे नियुक्ताः सविस्मयाः (सन्तः) कोषगृहस्य मध्ये नभस्तः पतितां । हिरण्मयीं वृष्टिं शशंसुः।।

सरलार्थ:-प्रात:काल (कुबेर की ओर) प्रस्थान करने के लिए तैयार हुए उस रघु के कोषगृह में नियुक्त अधिकारियों ने आश्चर्यचकित होते हुए खजाने में आकाश से गिरने वाली सुवर्णमयी वर्षा के बारे में कहा।

भावार्थ:-राजा रघु जैसे ही प्रातःकाल कुबेर की ओर प्रस्थान करने के लिए तैयार हुआ, तभी रघु के कोशगृह के अधिकारियों ने देखा कि उस खजाने में सुवर्ण मुद्राओं की वर्षा हो चुकी है। अधिकारियों को यह सब देखकर आश्चर्य हुआ और उन्होंने राजा रघु को यह समाचार सुनाया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
प्रयाणाभिमुखाय = प्रस्थान के लिए तैयार। सविस्मयाः = आश्चर्यचकित। आश्चर्यचकिताः । कोषगृहे = खजाने में। ‘कोशगृह’ पद भी प्रचार में है। हिरण्मयीम् = सुवर्ण वाली। सुवर्णमयीम् । सुवर्ण + मयट + ङीप्। शशंसु = कहा था। कथयामासुः √शिंस् + लिट् प्रथम पुरुष बहुवचन। नभस्तः = आकाश की ओर से। नभस् + तसिल्। अव्यय।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

19. तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं
लब्धं कुबेरादभियास्यमानात्।
दिदेश कौत्साय समस्तमेव
पादं सुमेरोरिव वज्रभिन्नम्॥ 19 ॥

अन्वयः-भूपतिः अभियास्यमानात् कुबेरात् लब्धं वज्रभिन्नं सुमेरोः पादम् इव तं भासुरं समस्तम् एव हेमराशिं कौत्साय दिदेश।

सरलार्थ:-राजा रघु ने आक्रमण किए जाने वाले कुबेर से प्राप्त, वज्र के द्वारा टुकड़े किए गए सुमेरु पर्वत के चतुर्थ भाग के समान प्रतीत हो रही, उन चमकती हुई समस्त सुवर्ण मुद्राओं को कौत्स के लिए दे दिया।

भावार्थ:-कुबेर ने रघु के आक्रमण के भय से उसके खजाने को सुवर्ण मुद्राओं से भर दिया। वे सुवर्ण मुद्राएँ परिमाण में इतनी अधिक थी कि ऐसा लगता था मानो सुमेरु पर्वत का ही वज्र से काटकर उसका चौथा हिस्सा खजाने में रख दिया। महाराज रघु ने कुबेर से प्राप्त हुई सभी सुवर्ण मुद्राएँ याचक कौत्स को प्रदान कर दी अर्थात् चौदह करोड़ ही न देकर पूरा खजाना ही कौत्स को सौंप दिया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
भासुरम् = चमकते हुए। चमकीला। भास्वरम्। अभियास्यमानात् = आक्रमण किए जाने वाले (कुबेर से)। अभि + √या (प्रापणे) + लृट् (कर्मणि) यक् + शानच् । अभिगमिष्यमाणात्। दिदेश = दे दिया। √दिश् (अतिसर्जने) लिट् प्रथम पुरुष एकवचन। सुमेरोः = सुमेरु पर्वत का। पुराणों के अनुसार यह स्वर्णमय पर्वत है। वज्रभिन्नम् = वज्रायुध से कटा हुआ। ‘वज्र’ इन्द्र का आयुध है। उसने वज्रायुध से पर्वतों के पंख काट दिए, ऐसी पौराणिक कथा है। पादम्तलहटी, चतुर्थभाग। गिरिपादः। प्रत्यन्तपर्वतमिव स्थितम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

20. जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ
द्वावप्यभूतामभिनन्धसत्त्वौ।
गुरुप्रदेयाधिकानिःस्पृहोऽर्थी
नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ॥ 20॥

अन्वयः-तौ द्वौ अपि साकेतनिवासिनः जनस्य अभिनन्द्यसत्त्वौ अभूताम्। गुरुप्रदेयाद् अधिकनिःस्पृहः अर्थी अर्थिकामात् अधिकप्रदः नृपः च (आसीत्)।

सरलार्थः-वे (महाराजा रघु और कौत्स) दोनों ही अयोध्यावासी लोगों के लिए प्रशंसनीय व्यवहार वाले हो गए। क्योंकि गुरु को समर्पण करने योग्य धन से अधिक.धन लेने में इच्छा न रखने वाला याचक कौत्स था और याचक की याचना से अधिक धन देने वाला राजा रघु था।

भावार्थ:-कौत्स की निर्लोभता की सीमा नहीं थी और महाराज रघु की उदारता की सीमा नहीं थी। कौत्स गुरुदक्षिणा में देने योग्य चौदह करोड़ मुद्राओं से एक थी अधिक नहीं लेना चाहता और राजा सारा खजाना ही उसे दे देना चाहते थे-दोनों के इस अद्भुत व्यवहार से अयोध्यावासी धन्य हो गए और दोनों की ही अत्यधिक प्रशंसा करने लगे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अभिनन्द्यसत्त्वौ = प्रशंसनीय व्यवहार वाले (दोनों)। अभिनन्द्यं सत्त्वं ययोः तौ। गुरुप्रदेयाधिकानिःस्पृहः = गुरु को देने से अधिक द्रव्य को लेने में इच्छा न रखने वाला (अर्थी) अधिकप्रदः = अधिक देने वाला। अधिकं प्रददाति इति। साकेतनिवासिनः = अयोध्या के निवासी लोग। साकेत + निवास + इन्। षष्ठी विभक्ति एकवचन।

हिन्दीभाषया पाठस्य सारः

प्रस्तुत पाठ ‘रघुकौत्ससंवादः’ महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंश-महाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग से सम्पादित है। इसमें महाराज रघु एवं वरतन्तु ऋषि के शिष्य कौत्स नामक ब्रह्मचारी के मध्य साकेत नगरी में हुआ संवाद वर्णित है।

कौत्स अपने गुरु ऋषि वरतन्तु से वेद, पुराण, वेदाङ्ग, दर्शन आदि 14 विद्याओं का अध्ययन समाप्त करके अपने गुरु से बार-बार गुरुदक्षिणा लेने की प्रार्थना करता है। गुरु द्वारा गुरुभक्ति को ही गुरुदक्षिणा रूप में मानने पर भी कौत्स गुरुदक्षिणा स्वीकार करने की निरन्तर प्रार्थना करता है। इससे रुष्ट होकर वरतन्तु उसे गुरुदक्षिणा के रूप में 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देने की आज्ञा देते हैं।

महाराज रघु विश्वजित् नामक यज्ञ में सर्वस्व दान कर चुके हैं। कौत्स उनके पास गुरुदक्षिणा के लिए धन माँगने आता है। कौत्स महाराज रघु की धनहीनता देखकर वापस लौटने लगता है। महाराज रघु उसे रोकते हैं और पूछते हैं कि वह अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में क्या देना चाहता है ? वह बताता है कि गुरुदेव ने चौदह विद्याओं को पढ़ाने के प्रतिफल में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा के रूप में देने का आदेश दिया है। ब्रह्मचारी कौत्स की याचना पूर्ण करने के उद्देश्य से महाराज रघु धनपति कुबेर पर आक्रमण करने की योजना बनाते हैं। भयभीत कुबेर रघु के कोषागार में सुवर्ण-वृष्टि कर देते हैं। रघु कौत्स को सारा धन प्रदान कर सन्तुष्ट होते हैं परन्तु कौत्स उनमें से केवल 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ देने के लिए गुरुदक्षिणा प्राप्त कर सन्तुष्ट भाव से लौट जाते हैं।

प्रस्तुत पाठ से यह सन्देश मिलता है कि महाराज रघु की भाँति शासक को सर्वसाधारण जन के प्रति उदार एवं कल्याणकारी होना चाहिए तथा याचक को कौत्स की भाँति अपनी आवश्यकता से अधिक धन प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

रघुकौत्ससंवादः (रघु और कौत्स का संवाद) Summary in Hindi

रघुकौत्ससंवादः पाठ परिचय

कविकुलशिरोमणि, कविताकामिनी के विलास, उपमासम्राट् दीपशिखा कालिदास आदि विरुदों से विभूषित महाकवि कालिदास भारतवर्ष के ही नहीं समस्त विश्व के अनन्य कवि हैं। ये महाराज विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि कालिदास का समय ईसापूर्व प्रथम शताब्दी है। संस्कृतसाहित्य में कालिदास की सात रचनाएँ प्रामाणिक मानी गई हैं। इनमें रघुवंशम्, कुमारसम्भवम्-दो महाकाव्य, मेघदूतम् तथा ऋतुसंहारम्-दो खण्डकाव्य तथा मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम् तथा अभिज्ञानशाकुन्तलम्-तीन नाटक हैं। काव्यकला एवं नाट्यकला की दृष्टि से कालिदास का कोई सानी नहीं है। नवरस वर्णन में भी कालिदास सर्वोपरि हैं। ‘उपमा अलंकार’ की सटीकता में वर्णन के कारण ही कालिदास के विषय में ‘उपमा कालिदासस्य’ कहा गया है तथा ‘दीपशिखा’ की उपाधि से अलंकृत किया गया है। यही नहीं इनकी रचनाओं में वैदर्भी रीति की विशिष्टता, माधुर्यगुण का सतत प्रवाह तथा सरसता ही इन्हें आज तक सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में प्रतिष्ठित किए हुए हैं।
रचनाओं का संक्षिप्त परिचय

1. रघुवंशम्-19 सर्गीय रघुवंश कालिदास की अनन्यतम कृति है। इसमें रघुवंशीय दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम और कुश तक के राजाओं का विस्तृतरूपेण चित्रण तथा अन्य राजाओं का संक्षिप्त विवरण बड़े ही परिपक्व एवं प्रभावरूपेण किया गया है। जहाँ दिलीप की नन्दिनी सेवा, रघु की दिग्विजय, अज एवं इन्दुमती का विवाह, इन्दुमति की मृत्यु पर अज विलाप, राम का वनवास, लंका विजय, सीता का परित्याग, लव-कुश का अश्वमेधिक घोड़े को रोकना तथा अन्तिम सर्ग में राजा अग्निवर्ण का विलासमय चित्रण उनकी सूक्ष्मपर्यवेक्षण शक्ति का परिचय देता है।

2. कुमारसम्भवम्-17 सर्गीय कुमारसम्भव शिव-पार्वती के विवाह, कार्तिकेय के जन्म तथा तारकासुर के वध की कथा को लेकर लिखित सुप्रसिद्ध महाकाव्य है। कुछ आलोचक केवल आठ सर्गों को ही कालिदास लिखित मानते हैं लेकिन अन्यों के अनुसार सम्पूर्ण रचना कालिदास विरचित है। इस ग्रन्थ में हिमालय का चित्रण, पार्वती की तपस्या, शिव के द्वारा पार्वती के प्रेम की परीक्षा, उमा के सौन्दर्य का वर्णन, रतिविलाप आदि का चित्रण कालिदास की परिपक्व लेखनशैली को घोषित करता है। अन्त में कार्तिकेय के द्वारा तारकासुर के वध के चित्रण में वीर रस का सुन्दर परिपाक द्रष्टव्य है।

3. ऋतुसंहारम्-महाकवि कालिदास का ऋतुसंहार संस्कृत के गीतिकाव्यों में विशिष्टता लिए हुए हैं। जिसमें ऋतुओं के परिवर्तन के साथ-साथ मानव जीवन में बदलने वाले स्वभाव, वेशभूषा, एवं प्राकृतिक परिवेश का अवतरण द्रष्टव्य है। इसमें छः सर्ग तथा 144 पद्य हैं जिनमें ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर तथा वसन्त के क्रम से छः ऋतुओं का वर्णन छः सर्गों में किया गया है।

4. मेघदूतम्- मेघदूत न केवल कालिदास का महान् गीतिकाव्य है, अपितु सम्पूर्ण संस्कृतसाहित्य का एक उज्ज्वल रत्न है। सम्पूर्ण मेघदूत दो भागों में विभक्त है-पूर्वमेघ तथा उत्तरमेघ जिनमें कुल 121 पद्य हैं। इस गीतिकाव्य में मन्दाक्रान्ता छन्द में एक यक्ष की विरहव्यथा का मार्मिक चित्रण किया गया है। पूर्वमेघ में कवि ने यक्ष द्वारा मेघ को अलकापुरी तक पहुँचने के मार्ग का उल्लेख करते हुए उस मार्ग में आने वाले प्रमुख नगरों, पर्वतों, नदियों तथा वनों का भी सुन्दर चित्रण किया है। उत्तरमेघ में अलकापुरी का वर्णन, उसमें यक्षिणी के घर की पहचान तथा घर में विरह-व्यथा से पीड़ित अपनी प्रेयसी की विरह पीड़ा का मार्मिक वर्णन द्रष्टव्य है।

5. मालविकाग्निमित्रम्-पाँच अंकों में लिखित महाकवि कालिदास की प्रारम्भिक कृति ‘मालविकाग्निमित्र’ में विदिशा के राजा अग्निमित्र तथा मालवा के राजकुमार की बहन मालविका की प्रणयकथा का वर्णन है। मालविकाग्निमित्र रघुकौत्ससंवादः कवि की आरम्भिक रचना होने पर भी नाटकीय नियमों की दृष्टि से इसके कथा निर्वाह, घटनाक्रम, पात्रयोजना आदि सभी में नाटककार के असाधारण कौशल की छाप है।

6. विक्रमोर्वशीयम्-नाटक रचनाक्रम की दृष्टि से कालिदास की द्वितीय कृति ‘विक्रमोर्वशीयम्’ एक उपरूपक है। जिसमें राजा पुरुरवा तथा उर्वशी नामक अप्सरा की प्रणयकथा वर्णित है। इस नाटक में कवि की प्रतिभा अपेक्षाकृत अधिक जागृत एवं प्रस्फुटित है।

7. अभिज्ञानशाकुन्तलम्-कालिदास का अन्तिम तथा सर्वोत्कृष्ट नाटक ‘अभिज्ञान-शाकुन्तलम्’ सात अंकों में विभक्त है; जिसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला की प्रणय कथा वर्णित है। यह नाटक संस्कृत का सर्वाधिक लोकप्रिय नाटक है। जिसमें कालिदास की कथानकीय मौलिकता, चरित्रचित्रण की सजीवता, रसों की परिपक्वता, संवादों की सुष्ठु योजना, प्रकृतिचित्रण की मर्मज्ञता तथा भाषा-शैली की विशिष्टता आदि स्वयं में अनुपम हैं। इन्हीं गुणों के कारण कहा गया है”

काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला”

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