Class 12

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

HBSE 12th Class Hindi रुबाइयाँ, गज़ल Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
शायर राखी के लच्छे को बिजली की चमक की तरह कहकर क्या भाव व्यंजित करना चाहता है?
उत्तर:
राखी एक पवित्र धागा है। इसे बहन अपने भाई की कलाई पर बाँधती है। भले ही यह कच्चा धागा है, परंतु इसका बंधन बहुत ही पक्का है। इसकी पावनता मन की प्रत्येक छटा को चीरकर चमकने लगती है। इसका आकर्षण बिजली जैसा है। जिस प्रकार आकाश में चमकने वाली बिजली की हम उपेक्षा नहीं कर सकते, उसी प्रकार राखी के धागे की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। भले ही भाई-बहन एक-दूसरे से दूर रहते हों। परंतु राखी की पावन याद एक-दूसरे की याद दिलाती रहती है। राखी का यह पर्व वर्षा की ऋतु (सावन) में आता है। इसलिए कवि ने इस ऋतु को प्रभावशाली बनाने के लिए राखी को उपादान बनाया है। फलतः कवि की भाव-व्यंजना अधिक मनोरम और प्रभावशाली बन पड़ी है।

प्रश्न 2.
खुद का परदा खोलने से क्या आशय है?
उत्तर:
‘खुद का परदा’ खोलना मुहावरे का प्रयोग कवि ने उन लोगों के लिए किया है जो दूसरों की निंदा करते हैं अथवा बुराई करते हैं। सच्चाई तो यह है कि ऐसे लोग अपने घटियापन का उद्घाटन करते हैं। इससे हमें यह पता चल जाता है कि निंदा करने वाले लोग कैसे हैं और कितने पानी में हैं। बिना बताए ये लोग अपने चरित्र के बारे में हमें बता देते हैं। कवि यह कहना चाहता है कि निंदा करना बुरी बात है। फिर भी कबीरदास ने कहा है
निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय ।
बिन साबुन पानी बिना निर्मल होत सुभाय।

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प्रश्न 3.
किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो ले हैं इस पंक्ति में शायर की किस्मत के साथ तना-तनी का रिश्ता अभिव्यक्त हुआ है। चर्चा कीजिए।
उत्तर:
किस्मत और मानव का गहरा संबंध है। सर्वप्रथम हम इस बात पर चर्चा करते हैं कि किस्मत हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। हम और किस्मत एक-दूसरे के पूरक हैं। विधाता ने जो कुछ हमारे भाग्य में लिखा है, वही प्राप्त होगा। अतः किस्मत पर रोना व उसे कोसना व्यर्थ है। हमारा कर्तव्य है कि हम किस्मत की अधिक चिंता न करके अपना कर्म और परिश्रम करें। परिश्रम करने से हमें जीवन में सफलता अवश्य मिलती है।

चर्चा का एक-दूसरा रूप यह भी हो सकता है कि कुछ लोग अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं। उनका यह कहना है कि मेहनत करने पर भी उन्हें पूरा फल नहीं मिलता। इसी कारण शायर कहता है कि हम किस्मत को रो लेते हैं और किस्मत हमें रुलाती है। कवि घोर निराशा से भरा हुआ है। इसलिए वह अपनी किस्मत को कोस रहा है।

टिप्पणी करें

(क) गोदी के चाँद और गगन के चाँद का रिश्ता।
(ख) सावन की घटाएँ व रक्षाबंधन का पर्व।
उत्तर:
(क) गोदी का चाँद शिशु के लिए प्रयुक्त हुआ है। प्रत्येक माँ के लिए उसकी संतान ही अनमोल है। वह अपने पुत्र को देखकर प्रसन्न होती है और उसी के सहारे जिंदा रहती है। जिस प्रकार आकाश में चाँद सुंदर लगता है, उसी प्रकार माँ को अपना शिशु सुंदर लगता है। इसीलिए शिशु को गोदी का चाँद कहा गया है। नन्हा अबोध शिशु जब आकाश में चाँद को देखता है तो वह अत्यधिक प्रसन्न होकर उसे पाना चाहता है। सूरदास के कृष्ण और तुलसीदास के राम चाँद के लिए हठ करते हुए वर्णित किए गए हैं। सूर का कृष्ण अपनी माता यशोदा से कहता है
मैया मैं तो चंद खिलौना लैहों।
लोरी में भी चाँद का जिक्र किया गया है “चंदा मामा दूर के” गीत द्वारा कवि ने अबोध बच्चों को चाँद की ओर आकर्षित किया है। लोक गीतों.तथा कविताओं में चाँद की बार-बार चर्चा की गई है। इसलिए गोदी के चाँद और गगन के चाँद का गहरा रिश्ता है।

(ख) रक्षाबंधन का पर्व सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। सावन मास में अकसर घने काले बादल आकाश को ढक लेते हैं, बिजली बार-बार चमकती है और मूसलाधार वर्षा होती है। अतः कवि ने सावन की घटाओं से रक्षाबंधन को जोड़कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। सावन के महीने में विवाहित युवतियाँ अपने-अपने मायके चली जाती हैं। वे अपनी सखी-सहेलियों से मिलकर झूला झूलती हैं और गीत गाती हैं। पूर्णिमा के दिन अपने भाइयों को राखी बाँधती हैं। इसी ऋतु में तीज का त्योहार भी आता है। इसलिए कवि ने रक्षाबंधन के पर्व को सावन की घटाओं के साथ जोड़कर एक सुंदर और खुशनुमा वातावरण का निर्माण किया है।

कविता के आसपास

प्रश्न 1.
इन रुबाइयों से हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के मिले-जुले प्रयोगों को छाँटिए।
उत्तर:
फ़िराक गोरखपुरी ने अपनी कविताओं में हिंदी, उर्दू तथा देशज शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है-
हिंदी के प्रयोग-
आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
गूंज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी
रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी
बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधती चमकती राखी
उर्दू के प्रयोग-
उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके
देख आईने में चाँद उतर आया है।
लोक भाषा के प्रयोग-
रह रह के हवा में जो लोका देती है
इसी प्रकार कवि ने आँगन, गोद, गूंज, दीवाली, निर्मल, रूपवती, नर्म आदि हिंदी के शब्दों का प्रयोग किया है। जिदयाया, आईना, शाम, सुबह, होशो-हवास, सौदा, कीमत, अदा, दीवाना आदि उर्दू के शब्दों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार पे, घुटनियों, हई, दे के आदि देशज शब्दों का प्रयोग किया है।

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प्रश्न 2.
फिराक ने सुनो हो, रक्खो हो आदि शब्द मीर की शायरी के तर्ज पर इस्तेमाल किए हैं। ऐसी ही मीर की कुछ गज़लें ढूँढ़ कर लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से स्वयं करें। यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

आपसदारी
कविता में एक भाव, एक विचार होते हुए भी उसका अंदाजे बयाँ या भाषा के साथ उसका बर्ताव अलग-अलग रूप में अभिव्यक्ति पाता है। इस बात को ध्यान रखते हुए नीचे दी गई कविताओं को पढ़िए और दी गई फिराक की गजल/रुबाई में से समानार्थी पंक्तियाँ ढूँदिए।
(क) मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों। -सूरदास
(ख) वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
उमड़ कर आँखों से चुपचाप
बही होगी कविता अनजान -सुमित्रानंदन पंत
(ग) सीस उतारे भुईं धरे तब मिलिहैं करतार -कबीर
उत्तर:
(क) आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है।

(ख) ये कीमत भी अदा करे हैं
हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास
तेरा सौदा करने वाले
दीवाना भी हो ले हैं।

(ग) तेरे गम का पासे-अदब है
कुछ दुनिया का ख्याल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे
चुपके-चुपके रो ले हैं

HBSE 12th Class Hindi रुबाइयाँ, गज़ल Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न-
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
1. आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूंज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी
उत्तर:

  1. इस पद्यांश में कवि ने माँ द्वारा अपने बच्चे को झूला झुलाने और उछाल-उछालकर खिलाने का सुंदर वर्णन किया है।
  2. बच्चे को ‘चाँद का टुकड़ा’ कहना माँ के प्यार को व्यंजित करता है।
  3. रह-रह’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है तथा रूपक अलंकार की भी योजना हुई है।
  4. ‘लोका देना’ में ग्रामीण संस्कृति का सुंदर प्रयोग है।
  5. संपूर्ण पद में दृश्य-बिंब की सुंदर योजना हुई है।
  6. सहज, सरल तथा प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग किया गया है।
  7. शब्द-चयन उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. वात्सल्य रस का परिपाक है तथा प्रसाद गुण है।

2. बालक तो हई चाँद पै ललचाया है।
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने एक बालक की प्रवृत्ति का सहज और स्वाभाविक वर्णन किया है।
  2. आईने में चाँद उतर आना ग्रामीण संस्कृति का द्योतक है।
  3. प्रसाद गुण तथा वात्सल्य रस का परिपाक हुआ है।
  4. हिंदी एवं उर्दू मिश्रित भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।

3. दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने दीवाली की जगमग, साज-सज्जा तथा रंग-रोगन आदि का प्रभावशाली वर्णन किया है।
  2. संपूर्ण पद में दृश्य-बिंब की योजना दर्शनीय है।
  3. यहाँ माँ की ममता तथा कोमलता का सुंदर और स्वाभाविक चित्रण किया गया है।
  4. सहज एवं सरल हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें लोक-प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया गया है।
  5. शब्द-चयन उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

4. नौरस गुंचे पंखड़ियों की नाजुक गिरहें खोले हैं
या उड जाने को रंगो-ब गलशन में पर तोले हैं।
उत्तर:

  1. इस शेर में कवि ने प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किया है।
  2. संदेह अलंकार का सफल प्रयोग किया गया है।
  3. रस और सुगंध में मानवीय भावना का आरोप है, अतः यहाँ मानवीकरण अलंकार का प्रयोग है।
  4. संपूर्ण शेर में उर्दू, फारसी तथा हिंदी का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
  5. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

5. जो मुझको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें
मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं
उत्तर:

  1. प्रस्तुत शेर में कवि ने निंदकों को आड़े हाथों लिया है।
  2. कवि का विचार है कि निंदा करने वाले ईर्ष्यालु होने के साथ-साथ बुरे लोग होते हैं।
  3. इस शेर की भाषा अत्यंत सरल और सहज है।
  4. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. भाव प्रधान वर्णनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

6. सदके फिराक एजाजे-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज़
इन गज़लों के परदों में तो ‘मीर’ की गज़लें बोले हैं
उत्तर:

  1. इस शेर में कवि अपनी शायरी पर मुग्ध दिखाई देता है। अतः वह अपनी कविता को मीर जैसी कविता बताता है।
  2. ‘के कैसे’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. उर्दू, फारसी और हिंदी तीनों भाषाओं का मिश्रित प्रयोग है।
  4. भाव प्रधान वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. उर्दू और फारसी के शेर छंद का सफल प्रयोग है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
फ़िराक गोरखपुरी ने वात्सल्य का मनोरम और स्वाभाविक वर्णन किया है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
वात्सल्य भाव संसार के सभी प्राणियों में विद्यमान है। यह निर्मल, निश्चल और निःवार्थ प्रेम है। प्रथम रुबाई में कवि ने माँ के पुत्र को चाँद का टुकड़ा कहा है, जिसे लेकर माँ अपने घर के आँगन में खड़ी है। वह बार-बार उसे झुलाती है और हवा में उछालती है और तत्काल उसे पकड़कर अपने गले से लगा लेती है। इस प्रेम-क्रीड़ा में माँ और पुत्र दोनों को असीम आनंद की प्राप्ति होती है। एक अन्य रुबाई में कवि कहता है कि माँ अपने नन्हें शिशु को नहलाती है। फिर दुलार कर उसके बालों में कंघी करती है। ऐसा करते समय वह अपने पुत्र का मुख निहारती है। वह अपने घुटनों में दबाकर उसे कपड़े पहनाती है। नन्हा शिशु भी माँ के स्नेह को अच्छी प्रकार समझता है और वह प्यार से माँ के मुख को देखता है।

प्रश्न 2.
कवि ने दीवाली के किन पारंपरिक रिवाजों का वर्णन किया है?
उत्तर:
दीवाली हिंदुओं का एक पावन त्योहार है। यह प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इससे पहले लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करते हैं। वे घरों को सुंदर बनाने के लिए घरों की लिपाई-पुताई करते हैं और उन्हें सजाते हैं। इस अवसर पर लोग मिठाइयाँ बाँटते हैं और खाते हैं। सायंकाल को दीपक जलाए जाते हैं। इस दिन सभी लोग सजते-सँवरते हैं। घर में सभी जगह पर दीपक जलाए जाते हैं। माँ अपने शिशु के घरौंदे में भी दीपक जलाती है। कवि ने एक ही रुबाई में दीवाली की सभी परंपराओं का वर्णन करके गागर में सागर भर दिया है।

प्रश्न 3.
रुबाई के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि वात्सल्य और बाल-हठ का गहरा संबंध है।
उत्तर:
माता-पिता का संतान के प्रति गहरा स्नेह होता है। वे बालक की प्रत्येक इच्छा को पूरा करने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी बालक इस स्नेह का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करता है और वह अनुचित वस्तु के लिए हठ कर बैठता है। प्रेम के वशीभूत होकर माता-पिता उसकी इच्छा पूरी करने का प्रयास करते हैं। मान लो बालक गुब्बारा, आइसक्रीम, खिलौना आदि की जिद करता है तो उसकी इच्छा पूरी कर दी जाती है। परंतु यदि बालक चाँद की माँग करे तो उसे कैसे पूरा किया जा सकता है। फिर भी माता-पिता बालक को खुश करने के लिए कोई-न-कोई उपाय निकाल लेते हैं। जैसे किसी थाली में पानी भरकर या कोई दर्पण में चाँद का प्रतिबिंब दिखाकर उसकी जिद को पूरा करने का प्रयास करते हैं। बच्चा केवल माता-पिता के वात्सल्य के कारण ही इस प्रकार की जिद करता है। वह किसी अन्य से जिद करके कुछ नहीं माँगता। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वात्सल्य और बालहठ का गहरा संबंध है।

प्रश्न 4.
सिद्ध कीजिए कि फ़िराक की गज़ल वियोग श्रृंगार से संबंधित है।
उत्तर:
प्रस्तुत गज़ल में फ़िराक ने अपने वियोग श्रृंगार का सुंदर वर्णन किया है। कवि स्वयं की किस्मत को खराब मानता है क्योंकि उसे प्रिया का प्रेम नहीं मिल सका। प्रेम के कारण ही विवेकशील कवि को भी दीवाना बनना पड़ता है। वह प्रिया की याद में रोता है और आँखों से आँसू बहाता है। इस गज़ल में कवि की विरह-वेदना व्यक्त हुई है। कवि शराब की महफिल में बैठकर भी अपनी प्रेमिका को याद करता है। एक स्थल पर कवि कहता भी है
तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का खयाल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं

प्रश्न 5.
कवि की गज़ल में प्रेम की दीवानगी व्यक्त हुई है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
फ़िराक की प्रस्तुत गज़ल में प्रेम की मस्ती और दीवानगी देखी जा सकती है। कवि प्रेम में इतना दीवाना हो चुका है कि वह सूनी रात में भी अपनी प्रिया को याद करता है।
तारे आँखें झपकावें हैं ज़र्रा-ज़र्रा सोये हैं
तुम भी सुनो हो यारो! शब में सन्नाटे कुछ बोले हैं
दीवानगी के कारण कवि को रात का सन्नाटा बोलता हुआ-सा लगता है। कवि स्वीकार करता है कि उसने सोच-समझकर प्रेम की दीवानगी को अपनाया है।
ये कीमत भी अदा करे हैं हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास
तेरा सौदा करने वाले दीवाना भी हो ले हैं।
आरोह (भाग 2) फिराख गोरखपुरी

प्रश्न 6.
फ़िराक की गज़ल में प्रेम और मस्ती का वर्णन हुआ है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
फ़िराक की गज़ल प्रेम और मस्ती की गज़ल है। उनका प्रेम दीवानगी तक पहुँच जाता है। कवि सूनी रातों में अपनी प्रिया को याद करके समय व्यतीत करता है। कवि को लगता है कि रात में प्रकृति का कण-कण सो रहा है। तारे भी आँखें झपका रहे हैं, परंतु कवि कहता है कि सन्नाटा कुछ-कुछ बोलता हुआ लगता है। कवि दीवानगी के कारण ही यह समझता है कि सन्नाटा बोल रहा है, परंतु कवि स्वीकार करता है कि उसने सोच-समझकर ही प्रेम की दीवानगी को स्वीकार किया है।

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प्रश्न 7.
‘गजल’ में निहित कवि की पीड़ा का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
फिराक की गज़ल में प्रेम के वियोग की पीड़ा की अनुभूति सहज ही अनुभव की जा सकती है। वियोग की पीड़ा में कवि अपनी प्रेमिका की याद में रोता है और व्याकल हो उठता है अर्थात तडपता है। उसकी आँखों से आँस छलकते रहते हैं। इस गजल में कवि की यही पीड़ा व्यक्त हुई है। उदाहरणार्थ यह शेर देखिए तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का ख्याल भी है। सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो लेते हैं।

प्रश्न 8.
‘गजल’ की मूल चेतना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कवि फिराक गोरखपुरी द्वारा रचित गज़ल की मूल चेतना कवि के हृदय की पीड़ा को शब्दों में ढालना है। प्रस्तुत गज़ल में कवि स्वयं की किस्मत को खराब बताता है क्योंकि उसे प्रेम के बदले प्रेम नहीं मिला। इसीलिए वह हर समय प्रिया की याद में चुपके-चुपके आँसू बहाता है-“सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं।” गज़ल में बताया गया है कि कवि प्रेम में इतना दीवाना हो चुका है कि रात के सन्नाटे में भी उसे प्रिया के ही शब्द सुनाई पड़ते हैं। अतः स्पष्ट है कि गज़ल की मूल चेतना कवि के प्रेम व विरह चेतना को उजागर करना है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘रुबाइयाँ’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) उमाशंकर जोशी
(B) फ़िराक गोरखपुरी
(C) हरिवंशराय बच्चन
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(B) फ़िराक गोरखपुरी

2. फिराक गोरखपुरी का मूल नाम क्या है?
(A) रघुपति सहाय
(B) रघुपति लाल
(C) रघुपति गुप्ता
(D) रघुपति राम
उत्तर:
(A) रघुपति सहाय

3. फिराक गोरखपुरी का जन्म कब हुआ?
(A) 28 अगस्त, 1896 में
(B) 28 अगस्त, 1897 में
(C) 28 अगस्त, 1898 में
(D) 28 अगस्त, 1899 में
उत्तर:
(A) 28 अगस्त, 1896 में

4. फिराक गोरखपुरी किस पद के लिए चुने गए थे?
(A) तहसीलदार
(B) पुलिस अधीक्षक
(C) डिप्टी कलेक्टर
(D) मुख्य सचिव
उत्तर:
(C) डिप्टी कलेक्टर

5. फिराक गोरखपुरी किस वर्ष डिप्टी कलेक्टर के पद के लिए चुने गए थे?
(A) सन् 1916 में
(B) सन् 1917 में
(C) सन् 1915 में
(D) सन् 1921 में
उत्तर:
(B) सन् 1917 में

6. फ़िराक गोरखपुरी ने डिप्टी कलेक्टर के पद से त्याग-पत्र क्यों दे दिया?
(A) बीमार होने के कारण
(B) पारिवारिक समस्या के कारण
(C) स्वराज आंदोलन के लिए
(D) शिक्षक बनने के लिए
उत्तर:
(C) स्वराज आंदोलन के लिए

7. फिराक गोरखपुरी ने किस वर्ष डिप्टी कलेक्टर के पद से त्याग-पत्र दिया?
(A) सन् 1918 में
(B) सन् 1917 में
(C) सन् 1919 में
(D) सन् 1920 में
उत्तर:
(A) सन् 1918 में

8. फिराक गोरखपुरी को जेल क्यों जाना पड़ा?
(A) चोरी करने के कारण
(B) लड़ाई करने के कारण
(C) स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण
(D) सरकार की आज्ञा न मानने के कारण
उत्तर:
(C) स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण

9. फिराक गोरखपुरी को कितने साल की जेल हुई?
(A) 1 वर्ष की
(B) 2 वर्ष की
(C) 1 वर्ष की
(D) 3 वर्ष की
उत्तर:
(C) 19 वर्ष की

10. फ़िराक गोरखपुरी को जेल कब जाना पड़ा?
(A) सन् 1920 में
(B) सन् 1921 में
(C) सन् 1922 में
(D) सन् 1923 में
उत्तर:
(A) सन् 1920 में

11. फिराक गोरखपुरी किस विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापक नियुक्त हुए?
(A) मुंबई विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) मेरठ विश्वविद्यालय
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
उत्तर:
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय

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12. फिराक गोरखपुरी का निधन कब हुआ?
(A) सन् 1983 में
(B) सन् 1982 में
(C) सन् 1981 में
(D) सन् 1984 में
उत्तर:
(A) सन् 1983 में

13. फिराक गोरखपुरी को किस रचना के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला?
(A) गुले-नग्मा के लिए
(B) बज्मे जिंदगी के लिए
(C) रंगे-शायरी के लिए
(D) उर्दू गज़लगोई के लिए
उत्तर:
(A) गुले-नग्मा के लिए

14. साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड के अतिरिक्त फ़िराक गोरखपुरी को कौन-सा पुरस्कार मिला?
(A) शिखर सम्मान
(B) कबीर पुरस्कार
(C) प्रेमचंद पुरस्कार
(D) ज्ञानपीठ पुरस्कार
उत्तर:
(D) ज्ञानपीठ पुरस्कार

15. ‘बज्मे जिंदगी’ के रचयिता का नाम क्या है?
(A) उमा शंकर जोशी
(B) विष्णु खरे
(C) फ़िराक गोरखपुरी
(D) धर्मवीर भारती
उत्तर:
(C) फ़िराक गोरखपुरी

16. ‘रंगे-शायरी’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) फ़िराक गोरखपुरी
(B) रजिया सज्जाद जहीर
(C) उमा शंकर जोशी
(D) विष्णु खरे
उत्तर:
(A) फ़िराक गोरखपुरी

17. फिराक गोरखपुरी ने किस भाषा में काव्य रचना की है?
(A) हिंदी भाषा में
(B) उर्दू भाषा में
(C) गुजराती भाषा में
(D) बांग्ला भाषा में
उत्तर:
(B) उर्दू भाषा में

18. पाठ्यपुस्तक में संकलित फिराक की रुबाइयों में मुख्य भाव कौन-सा है?
(A) वात्सल्य भाव
(B) भक्ति भाव
(C) सख्य भाव
(D) माधुर्य भाव
उत्तर:
(A) वात्सल्य भाव

19. रुबाइयों में फिराक ने किस भाषा का प्रयोग किया है?
(A) फारसी भाषा का
(B) हिंदी भाषा का
(C) उर्दू भाषा का
(D) हिंदी-उर्दू भाषा का
उत्तर:
(C) उर्दू भाषा का

20. प्रस्तुत गज़ल में रात में कौन बोल रहे हैं?
(A) पक्षी।
(B) सन्नाटे
(C) उल्लू
(D) भूत
उत्तर:
(B) सन्नाटे

21. रुबाइयों में फिराक ने किस शैली का प्रयोग किया है?
(A) विचारात्मक शैली
(B) वर्णनात्मक शैली
(C) संबोधनात्मक शैली
(D) नाटकीय शैली
उत्तर:
(B) वर्णनात्मक शैली

22. राखी के लच्छे किस तरह चमक रहे हैं?
(A) सूरज
(B) चाँद
(C) बिजली
(D) दर्पण
उत्तर:
(C) बिजली

23. रात के सन्नाटे क्या कर रहे हैं?
(A) खामोश हैं
(B) जाग रहे हैं
(C) पसरे हैं
(D) कुछ बोल रहे हैं
उत्तर:
(D) कुछ बोल रहे हैं

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24. प्रस्तुत गज़ल के अनुसार आँखें कौन झपका रहे हैं?
(A) बच्चे
(B) पक्षी
(C) सूर्य-चन्द्रमा
(D) तारे
उत्तर:
(D) तारे

25. ‘गजल’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) उमाशंकर जोशी
(B) रज़िया सज्जाद फरीद
(C) फ़िराक गोरखपुरी
(D) विष्णु खरे
उत्तर:
(C) फ़िराक गोरखपुरी

26. ‘गोदी का चाँद’ से क्या अभिप्राय है?
(A) आकाश का चाँद
(B) सुंदर लड़का
(C) संतान
(D) सुंदर लड़की
उत्तर:
(C) संतान

27. ‘गजल’ कविता में कवि अपनी गज़लों को किनके प्रति समर्पित करता है?
(A) गुलाम अली
(B) मजरूह सुल्तानपुरी
(C) भीर
(D) मिर्जा गालिब
उत्तर:
(C) मीर

28. फ़िराक गोरखपुरी द्वारा रचित रुबाइयों में किस रस का परिपाक हुआ है?
(A) श्रृंगार रस
(B) वीर रस
(C) हास्य रस
(D) वात्सल्य रस
उत्तर:
(D) वात्सल्य रस

29. ‘फितरत का कायम है तवाजुन’-यहाँ ‘तवाजुन’ का अर्थ है-
(A) तराजू
(B) राज्य
(C) संतुलन
(D) स्थिरता
उत्तर:
(C) संतुलन

30. ‘गजल’ किस साहित्य में अधिक प्रसिद्ध है?
(A) उर्दू में
(B) लैटिन में
(B) ग्रीक में
(D) संस्कृत में
उत्तर:
(A) उर्दू में

31. ‘रात गए गर्दू पै फरिश्ते’ यहाँ ‘गर्दू’ का अर्थ है
(A) धरती
(B) आकाश
(C) इन्द्र
(D) भगवान
उत्तर:
(B) आकाश

32. कवि किस प्रकार अपना दुख कम करता है?
(A) अकेले में हँसकर
(B) अपने-आप में बात करके
(C) अकेले में रोकर
(D) कविता रचकर
उत्तर:
(C) अकेले में रोकर

33. फिराक गोरखपुरी की गज़लों में किसकी गज़लें बोलती जान पड़ती हैं?
(A) राही मासूमरज़ा की
(B) नजीर अकबराबादी की
(C) मीर की
(D) इल्तान हुसैन हाली की
उत्तर:
(C) मीर की

34. ‘फितरत’ शब्द का क्या अर्थ है?
(A) आकर्षण
(B) विकर्षण
(C) आदत
(D) सलामत
उत्तर:
(C) आदत

35. ‘तारे आँखें झपकावें हैं ज़र्रा-जर्रा सोये है’ यहाँ ‘जर्रा-जर्रा’ का अर्थ है-
(A) ज़रा-ज़रा
(B) ज़रा-सा
(C) क्षण-क्षण
(D) कण-कण
उत्तर:
(D) कण-कण

36. ‘सदके फिराक एजाजे-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज़’-पंक्ति में भाषा कौन-सी है?
(A) उर्दू-फ़ारसी
(B) ब्रजभाषा
(C) तत्सम प्रधान
(D) तद्भव प्रधान
उत्तर:
(A) उर्दू-फारसी

रुबाइयाँ पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूंज
उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-चाँद का टुकड़ा = बहुत प्रिय बेटा। गोद-भरी = गोद में लेकर। लोका देती = उछाल-उछाल कर बच्चे के प्रति अपना स्नेह प्रकट करती।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से अवतरित है। इसके शायर फ़िराक गोरखपुरी हैं। प्रस्तुत रुबाई में कवि ने एक माँ द्वारा अपने बच्चे को झुलाने तथा उसे ऊपर हवा में उछालने का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या-शायर कहता है कि एक माँ अपने प्रिय बेटे को गोद में लिए हुए घर के आँगन में खड़ी है। कभी वह उसे गोद में लेती है और कभी उसे अपने हाथों पर सुलाती है। वह बार-बार हवा में अपने शिशु को उछाल कर बड़ी प्रसन्न होती है। शिशु भी माँ के हाथों से झूले खाकर खिलखिलाता हुआ हँसने लगता है। भाव यह है कि शिशु अपनी माँ का प्यार पाकर प्रसन्न हो उठता है।

विशेष-

  1. प्रस्तुत पद्यांश में शायर ने एक माँ के पुत्र-प्रेम का स्वाभाविक वर्णन किया है जो उसे अपने हाथों से झुलाती है और पुनः हवा में उछालती है।
  2. पुनरुक्ति प्रकाश तथा स्वभावोक्ति अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है।
  3. सहज एवं सरल साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित और सटीक है।
  5. ‘चाँद का टुकड़ा’ मुहावरे का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्य में दृश्य तथा श्रव्य बिंबों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  7. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘चाँद के टुकड़े’ का प्रयोग किसके लिए और क्यों किया गया है?
(ग) इस पद में माँ द्वारा शिशु को खिलाने का दृश्य अंकित किया गया है। स्पष्ट करें।
(घ) बच्चा क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करता है?
(ङ) इस काव्यांश में किस रस का परिपाक हुआ है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
(क) कवि-फ़िराक गोरखपुरी कविता-रुबाइयाँ

(ख) यहाँ नन्हें शिशु के लिए ‘चाँद के टुकड़े मुहावरे का मनोरम प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ है-प्यारा पुत्र। पुत्र माँ के लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय है। इसीलिए अकसर माँ अपने पुत्र को चाँद का टुकड़ा कहती है।

(ग) माँ अपने शिशु को कभी तो गोद में लेकर झुलाती है तो कभी वह उसे हवा में बार-बार उछालती है। इस प्रकार माँ अपने नन्हें पुत्र के प्रति अपने वात्सल्य भाव को व्यक्त करती है।

(घ) बच्चा अपनी माँ की गोद में झूले लेकर प्रसन्न हो जाता है। वह झूले खाकर इतना खुश होता है कि खिलखिलाकर हँसने लगता है। उसके मुख से हँसी अपने आप फूट पड़ती है।

(ङ) इस पद में वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है। माँ पुत्र को अपनी गोद में खिलाती है। उसे हवा में झुलाती है और नन्हा बेटा भी प्रसन्न होकर किलकारियाँ भरने लगता है। इन दृश्यों का संबंध वात्सल्य रस से है। अतः हम कह सकते हैं कि इस पद्यांश में कवि ने वात्सल्य रस का सही चित्रण किया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

[2] नहला के छलके छलके निर्मल जल से
उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके
किस प्यार से देखता है बच्चा मुँह को
जब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-छलके = ढुलक कर गिरना। निर्मल = स्वच्छ तथा पावन। गेसु = बाल। घुटनियाँ = घुटने। पिन्हाती = पहनाती।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से अवतरित है। इसके शायर फिराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि ने माँ और शिशु का सहज त

व्याख्या-सर्वप्रथम माँ ने अपने नन्हें पुत्र को स्वच्छ जल से छलका-छलका कर नहलाया। फिर उसने उसके उलझे हुए बालों में कंघी की। जब वह अपने घुटनों में अपने बच्चे को थाम कर उसे कपड़े पहनाती है तो वह शिशु बड़े प्यार से माँ के मुँह को देखता है। भाव यह है कि माँ अपने नन्हें पुत्र को स्वच्छ जल में नहलाकर उसे कंघी करती है। जब वह उसे कपड़े पहनाती है तो शिशु प्यार से माँ के मुँह को निहारता है।

विशेष-

  1. इस रुबाई में कवि ने माँ तथा उसके नन्हें बेटे की क्रियाओं का सहज तथा स्वाभाविक वर्णन किया है।
  2. अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश तथा स्वभावोक्ति अलंकारों का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. संपूर्ण पद में दृश्य बिंबों का सफल प्रयोग किया गया है।
  4. प्रसाद गुण तथा वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है।
  5. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग है, जिसमें ‘गेसु’ जैसे उर्दू शब्द का भी मिश्रण है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक हैं।
  7. रुबाई छंद का सफल प्रयोग किया गया है।
  8. ‘घुटनियों’ तथा ‘पिन्हाती’ जैसे कोमल शब्दों के प्रयोग के कारण भाषा-सौंदर्य में निखार आ गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) बच्चे को नहलाने का दृश्य अपने शब्दों में लिखिए।
(ख) माँ बच्चे के बालों में किस प्रकार कंघी करती है?
(ग) बच्चा माँ को प्यार से क्यों देखता है?
(घ) माँ बेटे को किस प्रकार कपड़े पहनाती है?
उत्तर:
(क) माँ अपने बेटे को स्वच्छ जल में नहलाती है। पानी के छलकने के कारण उसका बेटा अत्यधिक प्रसन्न और उमंगित हो उठता है।
(ख) नहाने से शिशु के बाल उलझ जाते हैं। अतः माँ उसके उलझे हुए बालों में कंघी करती है।
(ग) माँ अपने नन्हें बेटे को अपने घुटनों में थामकर उसे कपड़े पहनाती है। उस समय शिशु के मन में माँ के प्रति प्यार उमड़ आता है और वह माँ को बड़े प्यार से निहारने लगता है।
(घ) माँ बेटे को कपड़े पहनाने से पहले उसे अपनी घुटनियों में थाम लेती है ताकि वह जमीन पर न गिरे। तत्पश्चात् वह उसे कपड़े पहनाती है।

[3] दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-पुते = रंगे हुए। रूपवती = सुंदर। दमक = चमक। घरौंदा = बच्चों के द्वारा रेत पर बनाया गया घर। दिए = दीपक।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से उद्धृत है। इसके शायर फ़िराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि दीवाली के दृश्यों का सजीव वर्णन करता है।

व्याख्या दीपावली का सायंकाल है। सारा घर रंग-रोगन से पुता हुआ और सजा हुआ है। माँ अपने शिशु को प्रसन्न करने के लिए चीनी-मिट्टी के जगमगाते हुए सुंदर खिलौने लेकर आती है। माँ के सुंदर मुख पर एक कोमल चमक है। वह अत्यधिक प्रसन्न दिखाई देती है। बच्चों द्वारा रेत के बनाए हुए घर में वह एक दीपक जला देती है ताकि बच्चा प्रसन्न हो उठे।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने दीवाली के अवसर पर माँ के द्वारा की गई क्रियाओं का मनोरम वर्णन किया है।
  2. माँ की ममता और कोमलता का स्वाभाविक चित्रण है।
  3. प्रस्तुत पद्यांश में दृश्य बिंब की सुंदर योजना की गई है।
  4. पूरी रुबाई में ‘ए’ की मात्रा की आवृत्ति होने से सौंदर्य में वृद्धि हुई है।
  5. सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग किया गया है।
  6. शब्द-चयन उचित और सटीक है।
  7. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है।
  8. रुबाई छंद का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) दीवाली के दिन घर को कैसे सजाया गया है? (ख) दीवाली के दिन माँ अपने शिशु के लिए क्या लेकर आई?
(ग) बच्चों के लिए दिए जलाते समय माँ का चेहरा कैसा दिखाई देता है? (घ) माँ बच्चे के घरौंदे में दीपक क्यों जलाती है?
उत्तर:
(क) दीवाली के दिन सारे घर को साफ-सुथरा करके उसमें रंग-रोगन किया गया है और उसे अच्छे ढंग से सजाया गया है ताकि सारा घर सुंदर और आकर्षक लगे।

(ख) दीवाली के दिन माँ अपने बच्चे के लिए चीनी-मिट्टी के खिलौने लेकर आती है। वे खिलौने बड़े सुंदर और जगमगाते हैं और बच्चे के मन को आकर्षित करते हैं।

(ग) बच्चों के घरौंदे में दिए जलाते समय माँ के चेहरे पर कोमलता और चमक आ जाती है। इस चमक का कारण माँ के हृदय का वात्सल्य भाव है।

(घ) माँ अपने नन्हें पुत्र को प्रसन्न करने के लिए एक घरौंदा बनाती है जिसमें खिलौने सजे हुए हैं। दीवाली की शाम को वह उस घरौंदे में दिए जलाती हैं ताकि उसका नन्हा बेटा अपने घरौंदे को देखकर प्रसन्न हो जाए।

[4] आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है। [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-ठुनक = ठुनकना, मचलना, झूठ-मूठ का रोना। जिदयाया = जिद के कारण मचलता हआ। हई = है ही। दर्पण = शीशा। आईना = शीशा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से उद्धृत है। इसके शायर फ़िराक गोरखपुरी हैं। इस पद में कवि ने शिशु के मचलने तथा उसकी जिद का बड़ा स्वाभाविक वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि देखो यह शिशु आँगन में झूठ-मूठ में रो रहा है और मचल रहा है। वह जिद्द किए बैठा है क्योंकि वह बालक ही तो है। वह माँ से चाँद लेने की जिद्द कर रहा है अर्थात् वह चाहता है कि आकाश में चमकता हुआ चाँद वह अपने हाथों में ले ले। माँ अपने नन्हें बेटे के हाथ में दर्पण देकर उसे कहती है कि देखो चाँद इस शीशे में उतर कर आ गया है। तुम इस दर्पण को अपने हाथों में ले लो। अब तुम इससे खेल सकते हो। क्योंकि यह चाँद तुम्हारा हो गया है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने बच्चे की जिद तथा उसके मचलने का स्वाभाविक वर्णन किया है।
  2. संपूर्ण पद में स्वभावोक्ति अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. इस पद का वर्णन गतिशील होने के साथ-साथ चित्रात्मक भी है।
  4. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें उर्दू के शब्दों का सुंदर मिश्रण किया गया है।
  5. रुबाई में कोमलता लाने के लिए ‘ज़िदयाया’, ‘हई’ शब्दों का सुंदर प्रयोग किया गया है।
  6. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य रस का परिपाक हुआ है।
  7. रुबाई छंद का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) बालक के ठुनकने तथा जिद करने का वर्णन कीजिए।
(ख) कवि ने बाल मनोविज्ञान का किस प्रकार उद्घाटन किया है?
(ग) माँ चाँद को कैसे दर्पण में उतारकर अपने नन्हें बेटे को दिखाती है?
उत्तर:
(क) बच्चा आकाश में चमकते हुए सुंदर चाँद को देखकर प्रसन्न हो जाता है। वह माँ के सामने जिद्द कर बैठता है कि उसे खेलने के लिए यही चाँद चाहिए। जब उसकी इच्छा पूरी नहीं होती तो वह मचल उठता है और जिद्द करने लगता है।

(ख) बाल मनोविज्ञान का उद्घाटन करने के लिए कवि ने ‘बालक तो हई’ शब्दों का प्रयोग किया है। जिसका अर्थ है कि बालक स्वभाव से जिद्दी तथा चंचल होते हैं। वे जिस पर रीझ जाते हैं, उसे पाने की जिद्द करते हैं। चाँद को देखकर बच्चा उस पर रीझ गया और उसे पाने की जिद्द करने लगा।

(ग) माँ अपने हाथ में एक दर्पण ले लेती है और उसमें चाँद का प्रतिबिंब उतार लेती है। तब वह उसे अपने बेटे को दिखाकर उसे प्रसन्न करती है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

[5] रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी
बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधती चमकती राखी [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-रस की पुतली = मीठी-मीठी बातें करने वाली बेटी। घटा = जल से भरे हुए काले बादलों का समूह। गगन = आकाश। लच्छे = तारों से बना हुआ गहना जो हाथों या पैरों में पहना जाता है।
आरोह (भाग 2) फिराख गोरखपुरी]

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से उद्धृत है। इसके शायर फिराक गोरखपुरी हैं। इस पद्य में कवि ने रक्षाबंधन त्योहार की गतिविधियों का स्वाभाविक वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि आज रक्षाबंधन का त्योहार है। आकाश में काले-काले बादलों की हल्की घटाएँ छाई हुई हैं। मीठी-मीठी बातें करने वाली नन्हीं बालिका उमंग और खुशी से भरपूर है। उसके हाथों में राखी रूपी लच्छे बिजली के समान चमक रहे हैं। वह प्रसन्न होकर अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और प्रसन्न होती है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने राखियों के रेशमी लच्छों की तुलना बिजली से की है।
  2. पुनरुक्ति प्रकाश तथा उपमा अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  3. नन्हीं बालिका के लिए ‘रस की पुतली’ अत्यधिक सार्थक शब्द है।
  4. संपूर्ण पद में दृश्य-बिंब की सुंदर योजना हुई है।
  5. सहज, सरल तथा प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. रुबाई छंद का प्रयोग किया गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) ‘रस की पुतली’ किसे और क्यों कहा गया है?
(ख) राखी के दिन मौसम किस प्रकार का है?
(ग) ‘बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे का क्या आशय है?
(घ) राखी बाँधते समय नन्हीं बालिका की दशा कैसी है?
उत्तर:
(क) राखी बाँधने वाली बहन अर्थात् नन्हीं बालिका को ‘रस की पुतली’ कहा गया है। कारण यह है कि वह मीठी-मीठी बातें करती है और उसके मन में भाई के लिए अपार स्नेह है।
(ख) राखी का दिन है और आकाश में हल्के-हल्के बादलों की घटाएँ छाई हुई हैं। ऐसा लगता है कि हल्की-हल्की वर्षा होगी।
(ग) इसका आशय यह है कि बहन बिजली की तरह चमकते हुए लच्छों वाली राखी अपने भाई की कलाई पर बाँधती है।
(घ) राखी बाँधते समय बहन अत्यधिक प्रसन्न है। उसकी प्रसन्नता उसके द्वारा लाई गई चमकीली राखी से झलक रही है।

गज़ल पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] नौरस गुंचे पंखड़ियों की नाजुक गिरहें खोले हैं
या उड़ जाने को रंगो-बू गुलशन में पर तोले हैं। [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-नौरस = नया रस। गुंचे = कली। नाजुक = कोमल। गिरहें = गांठें। रंगो-बू = रंग और गंध । गुलशन = बाग। पर तोलना = पंख फैलाकर उड़ना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित ‘गजल’ में से उद्धृत है। इसके कवि फ़िराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि ने प्रकृति के सौंदर्य का आकर्षक वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि नवीन रस से भरी हुई कलियों की कोमल पंखुड़ियाँ अपनी गाँठों को खोल रही हैं अर्थात् कलियाँ खिलकर फूल बन रही हैं। उनमें से जो सुगंध उत्पन्न हो रही है, उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानों रंग और सुगंध दोनों आकाश में उड़ जाने के लिए अपने पंख फैला रहे हैं। भाव यह है कि कलियाँ खिलकर फूल बन रही हैं और चारों ओर उनकी मनोरम सुगंध फैल रही है।

विशेष-

  1. इस शेर में कवि ने प्रकृति के सौंदर्य का सजीव वर्णन किया है। यह शेर संयोग शृंगार की भूमिका के लिए लिखा गया है।
  2. इस शेर में संदेह अलंकार का प्रयोग तथा रस और सुगंध का मानवीकरण किया गया है।
  3. संपूर्ण शेर में उर्दू भाषा का सफल प्रयोग देखा जा सकता है। गुंचे, गिरहें, रंगों-बू, गुलशन आदि उर्दू के शब्द हैं।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘नौरस’ विशेषण का क्या अभिप्राय है?
(ग) पंखुड़ियों की नाजुक गिरह खोलने का आशय क्या है?
(घ) इस शेर का मूल आशय क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-फ़िराक गोरखपुरी कविता-गज़ल

(ख) ‘नौरस’ शब्द का प्रयोग नव रस के लिए किया गया है। इसका अर्थ है कि कलियों में नया रस भर आया है।

(ग) पंखुड़ियों की नाजुक गिरह खोलने का अर्थ है कि नन्हीं-नन्हीं कलियाँ धीरे-धीरे अपनी पंखुड़ियों को खोल रही हैं और उनमें से नव रस उत्पन्न होकर चारों ओर फैल रहा है।

(घ) इस शेर का आशय यह है कि कलियों की नन्हीं-नन्हीं पंखुड़ियाँ खिलने लगी हैं। उनमें से रंग और सुगंध निकलकर चारों ओर फैल रहे हैं जिससे आस-पास का वातावरण बड़ा मनोरम और आकर्षक बन गया है।

[2] तारे आँखें झपकावें हैं ज़र्रा-ज़र्रा सोये हैं
तुम भी सुनो हो यारो! शब में सन्नाटे कुछ बोले हैं [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-झपकावें = झपकना। ज़र्रा-ज़र्रा = कण-कण। शब = रात। सन्नाटा = मौन।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गज़ल’ में से उद्धृत है। इसके कवि फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में कवि ने प्रकृति के उद्दीपन रूप का वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि रात ढल रही है। तारे भी आँखें झपकाकर मानों सोना चाहते हैं। प्रकृति का कण-कण सोया हुआ है। ऐसा लगता है कि मानों रात सो रही है। यह चुप्पी मुझे मेरे प्रिय की याद दिलाती है। हे मेरे मित्रो! तुम भी तनिक सुनो। रात का यह सन्नाटा मेरे साथ कुछ बोल रहा है। भाव यह है कि रात का मौन केवल उसी के साथ वार्तालाप करता है जिसके दिल में प्रेम की पीड़ा होती है।

विशेष-

  1. इस शेर में कवि ने प्रकृति का उद्दीपन रूप में चित्रण करते हुए अपनी प्रेम-भावना को व्यक्त किया है।
  2. संपूर्ण शेर में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।
  3. सन्नाटा कुछ बोलता हुआ-सा प्रतीत होता है, अतः सन्नाटे का भी मानवीकरण किया गया है।
  4. ‘ज़र्रा-ज़र्रा’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है।
  5. इस शेर का भाव और भाषा दोनों उर्दू भाषा से प्रभावित हैं।
  6. शब्द-चयन उचित और सटीक है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) ‘तारे आँखें झपकावें हैं’ का आशय स्पष्ट करें।
(ख) शब में सन्नाटा कैसे बोलता है?
(ग) कवि किस दृश्य का वर्णन करना चाहता है?
उत्तर:
(क) ‘तारे आँखें झपकावें हैं’ का आशय है-तारों का टिमटिमाना। अब रात ढलने जा रही है। लगता है कि तारे आँखें झपकाकर सोना चाहते हों। वे धीरे-धीरे बुझते जा रहे हैं।

(ख) रात के समय चारों ओर मौन और चुप्पी छाई हुई है। ऐसे में कवि को लगता है कि मानों सन्नाटा बोल रहा है। कवि को चुप्पी और मौन में से भी हल्की-हल्की आवाज़ सुनाई देती है। क्योंकि उस समय सन्नाटे के अतिरिक्त और कोई आवाज़ नहीं होती।

(ग) इस शेर में कवि रात्रिकालीन चुप्पी और मौन के दृश्य का चित्रण करना चाहता है और इस संबंध में कवि को पूर्ण सफलता भी मिली है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

[3] हम हों या किस्मत हो हमारी दोनों को इक ही काम मिला
किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो ले हैं।
जो मुझको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें
मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं। [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-किस्मत = भाग्य। इक = एक। लेवे = लेती है। बदनाम = निंदा फैलाना। परदा = राज।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठयपस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गजल’ में से उदधत है। इसके कवि फिराक गोरखपुरी हैं। पहले शेर में कवि ने अपनी हृदयगत वेदना का वर्णन किया है और दूसरे शेर में कवि निंदकों को अपनी सीमा में रहने का संदेश देता है।

व्याख्या – कवि अपने भाग्य को और स्वयं को कोसता है। वह स्वीकार करता है कि वह स्वयं तथा उसका भाग्य अलग नहीं हैं, बल्कि एक जैसे हैं। दोनों एक ही काम करते हैं। कवि का मन अत्यधिक दुखी है। इसलिए वह कहता है कि भाग्य मुझ पर रोता है और मैं अपने भाग्य पर रोता हूँ। भाव यह है कि कवि घोर निराशा का शिकार बना हुआ है और वह स्वयं को कोसता है।

अगले शेर में कवि उन लोगों से अत्यधिक दुखी है जो उसे बदनाम करने का षड्यंत्र रचते रहते हैं। कवि कहता है कि काश वे निंदक ये सोच पाते कि वे मेरा पर्दाफाश कर रहे हैं, राज खोल रहे हैं या अपना राज खोल रहे हैं। भाव यह है कि निंदकों को इस बात का एहसास नहीं होता कि वे दूसरों की निंदा करके अपनी कमज़ोरी को प्रकट करते हैं। वे इस सच्चाई को नहीं जानते कि निंदा करने वालों को संसार बुरा ही कहता है। जिसकी वे निंदा करते हैं उसे लोग अच्छी प्रकार से जानते हैं। यदि हम किसी की निंदा करते हैं तो हमारी अपनी बुराई प्रकट हो जाती है।

विशेष-

  1. पहले शेर में कवि अपने भाग्य को कोसता हुआ प्रतीत होता है और दूसरे शेर में कवि निंदकों पर ज़ोरदार प्रहार करता है।
  2. पहले शेर में किस्मत का मानवीकरण किया गया है।
  3. इन शेरों में कवि ने उर्दू भाषा का सफल प्रयोग किया है। किस्मत, बदनाम, परदा आदि उर्दू के शब्द हैं।
  4. अभिव्यक्ति की दृष्टि से सभी शेर सरल और हृदयग्राही हैं।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि और उसकी किस्मत में क्या समानता है?
(ख) कवि को कौन बदनाम करते होंगे?
(ग) ‘मेरा परदा खोले है’ का आशय क्या है?
(घ) निंदा करने वाले क्या नहीं सोच पाते?
उत्तर:
(क) कवि और उसकी किस्मत में यह समानता है कि दोनों निराशा के शिकार हैं। यही कारण है कि किस्मत कवि को रोती है और कवि किस्मत को रोता है।

(ख) कवि के वे मित्र तथा संबंधी उसे बदनाम करते हैं जो उससे ईर्ष्या रखते हैं।

(ग) ‘मेरा परदा खोले है’ का आशय है कि कवि के विरोधी उसकी बदनामी करते हैं। वे कवि के दोषों का पर्दाफाश करना चाहते हैं। इस प्रकार के लोग निंदक हैं और वे कवि की निंदा करके उसे अपयश देना चाहते हैं।

(घ) निंदा करने वाले यह नहीं सोच पाते कि कवि के दोष निकालकर उसकी बदनामी करके वे अपनी बुराई को लोगों के सामने ला रहे हैं। ऐसा करने से कवि को कोई हानि नहीं होती, क्योंकि लोग निंदकों को अच्छी प्रकार से जानते हैं।

[4] ये कीमत भी अदा करे हैं हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास
तेरा सौदा करने वाले दीवाना भी हो ले हैं
तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का खयाल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-कीमत = मूल्य। अदा करे = चुकाना। बदुरुस्ती = भली प्रकार। होशो-हवास = सचेत । सौदा = व्यापार। दीवाना = पागल। गम = दुख। अदब = मर्यादा। खयाल = विचार। दर्द = पीड़ा।।

प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गजल’ में से अवतरित है। इसके कवि फिराक गोरखपुरी हैं। पहले शेर में कवि ने प्रेममय संपूर्ण समर्पण की बात कही है और दूसरे शेर में प्रेम और समाज के द्वंद्व पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या-कवि कहता है कि प्रिया मैं अपने होश-हवास में तुम्हारे प्रेम का मूल्य चुका रहा हूँ। जो व्यक्ति प्रेम में डूब जाता है और प्रेम का सौदा करता है वह पागल-सा हो जाता है। भाव यह है कि कवि भले ही प्रिया के प्रेम में दीवाना है, परंतु अभी तक उसने अपना विवेक नहीं खोया है।

कवि अपनी प्रिया से पुनः कहता है कि प्रिय! मेरे मन में तुम्हारे दुखों का पूरा ध्यान है। मैं हमेशा तुम्हारी चिंता करता हूँ। मुझे तुम्हारी फिक्र लगी रहती है, परंतु इसके साथ-साथ मुझे दुनियादारी की भी चिंता है। संसार यह नहीं चाहता है कि मैं तुम्हारे प्रेम में मग्न रहूँ। इसीलिए मैं सब लोगों से अपने दर्द को छिपा लेता हूँ और तुम्हारे प्रेम में मैं चुपचाप रोता रहता हूँ।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने अपने प्रेम की दीवानगी का संवेदनशील वर्णन किया है। दूसरे शेर में कवि प्रेम और समाज के संघर्ष पर प्रकाश डालता है।
  2. ‘चुपके-चुपके’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
  3. संपूर्ण पद में उर्दू भाषा का सहज और सरल प्रयोग किया गया है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावानुकूल है।
  5. वियोग शृंगार का परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि क्या कीमत चुकाता है?
(ख) कवि की मनोदशा पर प्रकाश डालिए।
(ग) कवि किस संघर्ष में उलझा हुआ है?
(घ) कवि छिपकर चुपके-चुपके क्यों रोता है?
उत्तर:
(क) कवि स्वयं को प्रिया के प्रेम पर न्योछावर कर देता है और वह दीवाना होकर प्रेम की कीमत चुकाता है।

(ख) कवि अपनी प्रिया के प्रेम में दीवाना है और उसने स्वयं को अपनी प्रिया पर पूर्णतया न्योछावर कर दिया है, परंतु वह पूरे होशो-हवास में रहते हुए अपने प्रेम की कीमत को चुका रहा है।

(ग) कवि संसार तथा प्रेम के संघर्ष में उलझा हुआ है। एक ओर कवि को सांसारिक दायित्व निभाने पड़ रहे हैं तो दूसरी ओर उसके मन में प्रेम की चाहत है। वह इन दोनों स्थितियों के बीच में झूल रहा है।

(घ) कवि संसार के सामने अपने प्रेम को प्रकट नहीं करना चाहता। यदि वह अपने प्रेम को प्रकट करेगा तो उसके अपने लोगों को ठेस लगेगी। इसलिए वह अपने मन में चुपके-चुपके रो लेता है और अपने-आप से अपना प्रेम प्रकट कर लेता है।

[5] फ़ितरत का कायम है तवाजुन आलमे-हुस्नो-इश्क में भी
उसको उतना ही पाते हैं खुद को जितना खो ले हैं
आबो-ताब अश्आर न पूछो तुम भी आँखें रक्खो हो
ये जगमग बैतों की दमक है या हम मोती रोले हैं [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-फ़ितरत = स्वभाव। कायम = बना हुआ। तवाजुन = संतुलन। आलमे हुस्नो-इश्क = प्रेम और सौंदर्य का संसार। आबो-ताब अश्आर = चमक-दमक के साथ। आँख रखना = देखने में समर्थ होना। बैत = शेर। दमक = चमक। मोती रोले = आँसू छलकना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गजल’ में से अवतरित है। इसके कवि फ़िराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि प्रेम और सौंदर्य की चर्चा करता है तथा अपनी शायरी के सौंदर्य पर प्रकाश डालता है।

व्याख्या-प्रथम शेर में कवि कहता है कि सौंदर्य और प्रेम में मनुष्य की प्रवृत्ति अधिक महत्त्व रखती है। इस क्षेत्र में लेन-देन का संतुलन हमेशा बना रहता है। जो प्रेमी प्रेम में स्वयं को जितना अधिक समर्पित कर देता है, वह उतना ही अधिक प्रेम प्राप्त करता है। भाव यह है कि समर्पण से ही प्रेम की प्राप्ति होती है।

दूसरे शेर में कवि कहता है कि तुम मेरी शायरी की चमक-दमक और कलाकारी पर आसक्त न हो जाओ। मेरी कविता का सौंदर्य न तो बनावटी है और न ही सजावटी है। जो लोग मेरे शेरों को अच्छी प्रकार से जानते हैं उन्हें इस बात का पता है कि मेरे शेरों में जो सुंदरता है वह मेरी आँखों के आँसुओं से मिलती है। भाव यह है कि मैंने अपनी प्रिया के वियोग में जो आँसू बहाए हैं, उन्हीं के कारण मेरी कविता में चमक उत्पन्न हुई है।

विशेष –

  1. यहाँ कवि ने प्रेम तथा सौंदर्य के साथ-साथ अपने काव्य-सौंदर्य पर भी प्रकाश डाला है।
  2. कवि ने अपनी अनुभूति से प्रेरित होकर अपनी विरह-वेदना को व्यक्त किया है।
  3. यहाँ वियोग श्रृंगार की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है।
  4. ‘मोती रोले’, ‘आँख रखना’ आदि मुहावरों का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. पहले शेर में दुरूह भाषा का प्रयोग हुआ है परंतु दूसरे शेर की भाषा कुछ-कुछ सरल है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि किस फ़ितरत की बात करता है?
(ख) प्रेम को प्राप्त करने के कौन-से उपाय हैं?
(ग) ‘जगमग बैतों की दमक’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(घ) ‘या हम मोती रोले हैं’ का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर:
(क) यहाँ कवि मानव प्रकृति की बात करता है। साथ ही वह प्रकृति के मूल स्वभाव पर भी प्रकाश डालता है। प्रकृति का यह नियम है कि हमें कोई वस्तु प्राप्त करने के लिए उस वस्तु के बराबर की कीमत चुकानी पड़ती है।

(ख) प्रेम को पाने का केवल एक ही उपाय है। जो मनुष्य स्वयं को प्रेम में समर्पित कर देता है वही व्यक्ति प्रेम पा सकता है।

(ग) ‘जगमग बैतों की दमक’ का अर्थ है-कविता का आलंकारिक सौंदर्य अथवा कविता कहने का कलात्मक ढंग जिसके कारण कविता चमक उठती है और वह पाठक और श्रोता को मंत्र मुग्ध कर देती है।

(घ) “या हम मोती रोले हैं का आशय है कि मैंने अपनी कविता में विरह-वेदना के आँसू बहाए हैं। मेरी यह कविता मेरी अनुभूति पर आधारित है। अतः मैंने अपनी सच्ची विरह-वेदना प्रकट की है।

[6] ऐसे में तू याद आए है अंजुमने-मय में रिंदों को
रात गए गर्दू पै फ़रिश्ते बाबेगुनह जग खोले हैं
सदके फिराक एजाजे-सखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज
इन गज़लों के परदों में तो ‘मीर’ की गज़लें बोले हैं [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-अंजुमने-मय = शराब की महफिल। रिंद = शराबी। गर्दू = आकाश। फ़रिश्ते = देवदूत। बाबे-गुनह = पाप का अध्याय। सदके = कुर्बान। एजाजे-सुखन = काव्य का सौंदर्य । परदों = शब्दों।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गज़ल’ में से उद्धृत है। इसके कवि फ़िराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि ने अपनी प्रेमिका की चर्चा करते हुए अपनी शायरी पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या-कवि कहता है कि जब रात को आकाश में देवता संसार के पापों का लेखा-जोखा कर रहे होते हैं और यह देखने का प्रयास करते हैं कि किस व्यक्ति ने कितने अधिक पाप किए हैं, उस समय हम शराब की महफिल में अपने गम को दूर करते हुए तुम्हें याद करते हैं। भाव यह है कि प्रेमी को अंधेरी रात में अपनी प्रिया की बहुत याद आती है। कभी-कभी वह अपनी विरह-वेदना को दूर करने के लिए शराब पीने लगता है।

दूसरे शेर में कवि कहता है कि अकसर लोग मेरी कविता पर आसक्त होकर मुझे कहते हैं कि हम तुम्हारी शायरी पर न्योछावर होते हैं। पता नहीं तुमने इतनी सुंदर और श्रेष्ठ शायरी कहाँ से सीख ली। तुम्हारी गजलों के शेरों में तो मीर की गज़लों की आवाज़ सुनाई देती है। भाव यह है कि तुम्हारी कविता मीर की कविता के समान सुघड़ और आकर्षक है।

विशेष-

  1. रात के समय प्रिय को अपनी प्रेमिका की अत्यधिक याद आती है।
  2. यहाँ कवि ने स्वयं अपनी शायरी की प्रशंसा की है। इस प्रकार की प्रवृत्ति संस्कृत तथा हिंदी के कवियों में दिखाई नहीं देती।
  3. प्रथम शेर में श्रृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  4. संपर्ण पद में उर्द भाषा का सहज, स्पष्ट और प्रभावशाली प्रयोग हआ है।
  5. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) प्रथम शेर में कवि ने किस प्रकार के वातावरण का प्रयोग किया है?
(ख) ‘तू’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है?
(ग) लोग फिराक की प्रशंसा किस प्रकार किया करते थे?
(घ) कवि ने स्वयं अपनी प्रशंसा किस प्रकार की है?
(ङ) ‘एजाजे-सुखन’ का क्या आशय है?
उत्तर:
(क) यहाँ कवि ने रात के सन्नाटे में शराबखाने का चित्रण किया है। प्रेमी शराब खाने में अपनी प्रेम-वेदना को दूर करने के लिए शराब पीता रहता है और अपनी प्रेमिका को याद करता रहता है।

(ख) यहाँ ‘तू’ शब्द का प्रयोग प्रेमिका के लिए किया गया है।

(ग) लोग फ़िराक की प्रशंसा करते हुए अकसर कहते थे कि उसकी शायरी उर्दू के प्रसिद्ध शायर मीर की मधुरता से घुल-मिल गई है।

(घ) कवि ने लोगों का हवाला देकर स्वयं के शेर में अपनी कविता की प्रशंसा की है। इसे हम आत्म-प्रशंसा का शेर कह सकते हैं। यह एक प्रकार से अपने मुँह मियाँ मिट्ठ बनने की बात है।

(ङ) “एजाज़े-सुखन’ का आशय है-काव्य का सौंदर्य अर्थात् कविता के भाव-पक्ष और कला-पक्ष का सौंदर्य । कविता की भाषा, छंद, अलंकार आदि ही उसके सौंदर्य का निर्माण करते हैं।

रुबाइयाँ, गज़ल Summary in Hindi

रुबाइयाँ, गज़ल कवि-परिचय

प्रश्न-
फिराक गोरखपुरी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा फिराक गोरखपुरी का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-फिराक गोरखपुरी का मूल नाम रघुपति सहाय ‘फ़िराक’ है। उनका जन्म 28 अगस्त, सन् 1896 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ। वे एक अमीर परिवार से संबंधित थे। उर्दू कविता के प्रति उनके मन में छोटी आयु में ही रुझान था। बाल्यावस्था में ही उन्होंने उर्दू में कविता लिखनी आरंभ कर दी। वे साहिर, इकबाल, फैज़ तथा कैफी आज़मी से अत्यधिक प्रभावित हुए।

रामकृष्ण की कहानियों से आरंभ करने के बाद उन्होंने अरबी, फारसी और अंग्रेज़ी में शिक्षा ग्रहण की। पढ़ाई में वे बड़े ही योग्य विद्यार्थी थे। 1917 ई० में वे डिप्टी कलेक्टर के पद के लिए चुने गए, परंतु स्वराज्य आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्होंने 1918 में इस पद से त्यागपत्र दे दिया। 1920 ई० में स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण उनको डेढ़ वर्ष की जेल की यात्रा सहन करनी पड़ी। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक भी रहे। ‘गुले-नग्मा’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। बाद में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड भी प्राप्त हुए। सन् 1983 में उनका निधन हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ–’गुले-नग्मा’, ‘बज़्मे ज़िंदगी’, ‘रंगे-शायरी’, ‘उर्दू गज़लगोई’।

3. काव्यगत विशेषताएँ-फिराक गोरखपुरी उर्दू के कवि के रूप में विख्यात हैं। प्रायः उर्दू साहित्य में रुमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता देखी जा सकती है। उर्दू कवियों ने लोक जीवन तथा प्रकृति पर बहुत कम लिखा है परंतु नज़ीर अकबराबादी, इल्ताफ़ हुसैन, हाली जैसे कुछ कवियों ने इस परंपरा को तोड़ने का प्रयास किया। उनमें फ़िराक गोरखपुरी भी एक ऐसे शायर हैं। वे आजीवन धर्म-निरपेक्षता के पक्षधर रहे हैं। उनका कहना था कि उर्दू केवल मुसलमानों की ही भाषा नहीं है, बल्कि यह आम भारतवासियों की भाषा है। पं० जवाहरलाल नेहरू उनकी इस सोच से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने फिराक को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। लगभग पचास वर्ष तक वे सांप्रदायिक सद्भाव के लिए काम करते रहे।

फ़िराक की कविता में कुछ स्थानों पर रुमानियत देखी जा सकती है। उन्होंने वियोग श्रृंगार के सुंदर चित्र अंकित किए हैं, परंतु उनका वियोग वर्णन व्यक्तिगत अनुभूति पर आधारित है। एक उदाहरण देखिए
तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का खयाल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं।
भारतीय परंपरा और संस्कृति को भी उन्होंने अपनी शायरी में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भोगा, उसे अपने काव्य में लिखा। अपनी कुछ रुबाइयों में फ़िराक साहब ने वात्सल्य का जो वर्णन किया है, वह बेमिसाल बन पड़ा है। लगता है कि कवि सूरदास और तुलसी से प्रभावित हुआ है। एक उदाहरण देखिए
आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया
है बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है
कहीं-कहीं कवि ने रक्षाबंधन, दीवाली जैसे, त्योहारों को भी अपनी कविता में स्थान दिया है। अन्यत्र कवि मजदूरों तथा शोषितों का भी पक्ष लेता हुआ दिखाई देता है। फिराक ने परंपरागत भाव-बोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उन्होंने सामाजिक दुख-दर्द, व्यक्तिगत अनुभूति को शायरी में ढाला है। इंसान के हाथों इंसान पर जो गुज़रती है उसकी तल्ख सच्चाई और आने वाले कल के प्रति एक उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर फ़िराक ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया।

4. भाषा-शैली-उर्दू शायरी अपने लाक्षणिक प्रयोगों तथा चुस्त मुहावरेदारी के लिए प्रसिद्ध है। फ़िराक भी कोई अपवाद नहीं है। उन्होंने भी यत्र-तत्र न केवल मुहावरों का प्रयोग किया है, बल्कि लाक्षणिक प्रयोग भी किए हैं। उन्होंने साधारण-जन से अपनी बात कही है। यही कारण है कि उनकी शैली में प्रकृति, मौसम और भौतिक जगत के सौंदर्य का यथार्थ वर्णन हुआ है। जहाँ तक उर्दू भाषा का प्रश्न है, उन्होंने उर्दू के साथ-साथ फ़ारसी के शब्दों का भी सुंदर मिश्रण किया है। कही-कहीं वे हिंदी के साथ-साथ देशज भाषा का भी मिश्रण करते हैं। उनका शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावानुकूल है। फ़िराक ने हिंदी में भी रुबाइयाँ लिखी हैं और इन रुबाइयों में सहज एवं सरल प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग किया है। एक उदाहरण देखिए

दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए

रुबाइयाँ कविता का सार

प्रश्न-
फिराक गोरखपुरी द्वारा रचित ‘रुबाइयाँ’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत रुबाइयों में कवि ने नन्हें शिशु की अठखेलियों और माँ के वात्सल्य भाव का सुंदर वर्णन किया है। माँ अपने शिशु को लेकर अपने आँगन में खड़ी है। वह कभी उसे झुलाती है और कभी हवा में उछालती है। इससे बालक खिलखिलाकर हँसने लगता है। पुनः माँ अपने नन्हें बालक को पानी में नहलाती है और उसके उलझे बालों को कंघी से सुलझाती है। शिशु माँ के घुटनों में से माँ के मुख को देखता है। दीवाली की सायंकाल को सारा घर सजाया जाता है। चीनी के खिलौने घर में जगमगाते हैं। सुंदर माँ अपने दमकते मुख से बच्चे के घरौंदे में दीपक जलाती है। एक अन्य दृश्य में कवि कहता है कि बच्चा चाँद लेने की जिद करता है। माँ उसे दर्पण में चाँद का प्रतिबिंब दिखाती है और कहती है कि देखो चाँद शीशे में उतर आया है। रक्षाबंधन के पर्व के अवसर पर आकाश में हल्की-हल्की घटाएँ छा जाती हैं। एक छोटी-सी लड़की बिजली के समान चमकते लच्छों वाली राखी अपने भाई की कलाई पर बांधती है। इन रुबाइयों में कवि ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति का बड़ा मनोरम वर्णन किया है।

गज़ल कविता का सार

प्रश्न-
फिराक गोरखपुरी द्वारा रचित ‘गज़ल’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘गज़ल’ में फ़िराक गोरखपुरी ने निजी प्रेम का वर्णन किया है। भले ही गज़ल का प्रत्येक शेर स्वतंत्र अस्तित्व रखता हो, परंतु इस गज़ल में एक संगति दिखाई देती है। कवि प्रकृति के उद्दीपन रूप का वर्णन करते हुए कहता है कि कलियों से नवरस छलकने लगा है और चारों ओर सुगंध फैल रही है। रात्रि के सन्नाटे में तारे आँखें झपका रहे हैं जिससे कवि को लगता है कि सन्नाटा कुछ बोल रहा है।
अगले शेर में कवि अपनी किस्मत को कोसता हुआ दिखाई देता है, क्योंकि उसे अपनी प्रिया का प्रेम प्राप्त नहीं हो सका। कवि के प्रेम को लेकर लोग उसकी निंदा और आलोचना करते हैं। लेकिन कवि का विचार है कि ऐसे निंदक लोग स्वयं बदनाम होते हैं। इससे कवि बदनाम नहीं होता।

कवि स्वीकार करता है कि प्रेम के कारण भले ही वह दीवानगी तक पहुंच गया है, फिर भी वह विवेकशील बना हुआ है। विरह की पीड़ा कवि को अत्यधिक व्यथित कर रही है, परंतु कवि को दुनियादारी का ध्यान है। इसलिए वह चुपचाप रोकर अपने दर्द को प्रकट करता है। पुनः कवि का कथन है कि प्रेम में प्रेमी की प्रकृति का विशेष महत्त्व होता है। जो प्रेमी जितना अधिक स्वयं को खो देता है, वह उतना ही गहरे प्रेम को प्राप्त करता है। कवि स्वीकार करता है कि विरह के कारण उसका प्रत्येक शेर आँसुओं में डूबा हुआ है। कवि कहता है कि रात्रि के समय देवता लोगों के पापों का लेखा-जोखा करते हैं। लेकिन कवि शराबखाने में बैठा हुआ अपनी प्रेयसी को याद करता है। अंत में कवि अपनी प्रशंसा करते हुए कहता है कि उसकी गज़लों पर मीर की गज़लों का प्रभाव है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh & Vitan Bhag 2 Haryana Board

Haryana Board HBSE 12th Class Hindi Solutions आरोह & वितान भाग 2

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Bhag 2

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh काव्य-खण्ड

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh गद्य-खण्ड

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Bhag 2

HBSE 12th Class Hindi अभिव्यक्ति और माध्यम

HBSE 12th Class Hindi व्याकरण

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध

HBSE 12th Class Hindi Anivarya (Compulsory) Question Paper Design

Class: 12th
Subject: Hindi
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 80
Time: 3 Hours

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKUASTotal
Percentage of Marks354520100
Marks28361680

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions44106 (4sub part)24
Marks Allotted2016202480
Estimated Time60564024180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
1. आरोह भाग-2 (पद्य भाग)25
2. आरोह भाग-2 (गद्य भाग)20
3. वितान पूरक पुस्तक10
4. अभिव्यक्ति और माध्यम15
5. पाठ आधारित व्याकरण : संधि, समास, वाक्य शोधन, अलंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास यमक, मानवीकरण, श्लेष, पुनरूक्ति प्रकाश)10
Total80

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice in Long Answer Question i.e. Essay Type in Two Questions

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% Marks
Average: 50% Marks
Easy: 40% Marks

Abbreviations: K (Knowledge), U (Understanding), A (Application), E (Essay Type), SA (Short Answer Type), VSA (Very Short Answer Type), O (Objective Type)

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन

HBSE 12th Class Physical Education ओलम्पिक आंदोलन Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
ओलम्पिक मूवमेंट के द्वारा किन गुणों को उन्नत किया जा सकता है?
अथवा
ओलम्पिक आंदोलन के माध्यम से किन-किन नैतिक मूल्यों को विकसित किया जा सकता है? वर्णन करें।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
ओलम्पिक खेल सर्वप्रथम यूनान के ओलम्पिया नगर में 776 ईसा पूर्व आयोजित किए गए थे। प्राचीनकाल में ओलम्पिक खेल धार्मिक त्योहारों तथा समारोहों से संबंधित थे जो जीयस देवता के प्रति समर्पित थे। इन प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबलों को भगवान को दी जाने वाली प्रार्थना समझा जाता था। विजेताओं को जैतून की शाखाओं से सम्मानित किया जाता था। विजेता लोगों की नजरों में नायक बन जाते थे। उनको पुरस्कार के तौर पर कोई धनराशि नहीं दी जाती थी। खिलाड़ी स्पष्ट रूप से सम्मान प्राप्त करने के लिए खेल को प्रतिस्पर्धात्मक भावना से खेलते थे। रोमनवासियों ने 393 ईस्वी में ओलम्पिक खेलों पर रोक लगा दी थी, क्योंकि वे खेल मुकाबलों की बजाय खून भरी लड़ाइयों में विश्वास करते थे। अंतत: रोमन सम्राट थियोडोसियस ने इन खेलों को बंद करवा दिया।

लम्बे अंतराल के बाद ओलम्पिक खेलों में एक नए युग का आरंभ हुआ। आधुनिक ओलम्पिक खेल 1896 ई० में आरंभ हुए। तब से अब तक ओलम्पिक खेलों का आयोजन निश्चित अंतराल पर हो रहा है। हालांकि विश्वयुद्धों के कारण 1916, 1940 व 1944 में आयोजित होने वाले खेलों का आयोजन नहीं हो सका।

ओलम्पिक आंदोलन द्वारा नैतिक मूल्यों का विकास (Development of Moral Values Through Olympic Movement):
यदि हम बैरन पियरे-डी-कोबर्टिन द्वारा निर्मित ओलम्पिक खेलों के उद्देश्य पर दृष्टिपात करें तो हमें ज्ञात होता है कि वे ओलम्पिक आंदोलन के द्वारा वैश्विक मूल्यों को विकसित करना चाहते थे। वास्तव में ओलम्पिक आंदोलन के माध्यम से निम्नलिखित प्रमुख मूल्यों/गुणों को विकसित किया जा सकता है

1. मित्रता (Friendship):
ओलम्पिक आंदोलन ऐसे अनेक मौके प्रदान करता है जिससे प्रतियोगियों में आपसी मित्रता की भावना विकसित होती है। जब कभी भी ओलम्पिक खेलों का आयोजन होता है, तो विभिन्न देशों के खिलाड़ी एक-दूसरे के निकट आते हैं और वे मित्र बन जाते हैं।

2. सहयोग की भावना (Spirit of Co-ordination):
ओलम्पिक आंदोलन ऐसे अनेक अवसर प्रदान करता है जिनके द्वारा न केवल प्रतियोगियों के बीच, अपितु राष्ट्रों के बीच भी सहयोग की भावना विकसित होती है। सहयोग की भावना से खिलाड़ियों में एक-दूसरे के प्रति विश्वास उत्पन्न होता है। ओलम्पिक खेलों के उद्देश्यों में भी सहयोग की भावना को महत्त्व दिया गया है।

3. बंधुभाव (Solidarity):
ओलम्पिक आंदोलन बंधुत्व या भाईचारे की भावना को विकसित करने में भी सहायक है। यह खिलाड़ियों को बहुत-से ऐसे अवसर प्रदान करता है जिससे विभिन्न देशों के खिलाड़ियों में परस्पर बंधुभाव उत्पन्न हो जाता है।

4. भेदभाव.से मुक्ति (Free of Discrimination):
आधुनिक ओलम्पिक आंदोलन के उद्देश्य में यह भी कहा गया है कि जाति, नस्ल, रंग व धर्म के आधार पर किसी से भी किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होगा। अतः ओलम्पिक आंदोलन इस पक्ष पर काफी जोर देता है।

5. निष्पक्षतापूर्ण खेल (Fairful Game):
ओलम्पिक आंदोलन निष्पक्षतापूर्ण खेल के अवसरों को बढ़ाते हैं। निष्पक्ष खेल न्याय पर आधारित होता है। ओलम्पिक आंदोलन के अंतर्गत प्रत्येक खिलाड़ी या टीम के साथ निष्पक्षतापूर्ण न्याय होना चाहिए। किसी से भी किसी प्रकार का अन्याय नहीं होना चाहिए। इस प्रकार की खेल से खेल-भावना विकसित होती है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन

प्रश्न 2.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के बारे में आप क्या जानते हैं? विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के उद्देश्यों एवं नियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत 776 ईसा पूर्व में हुई थी। ये खेल यूनान के ओलम्पिया’ नगर में आयोजित किए जाते थे। इन खेलों का आयोजन प्रत्येक चार साल बाद किया जाता था। ये खेल यूनानियों की देन थी जो उनके देवी-देवताओं खासकर जीयस देवता के सम्मान में आयोजित की जाती थीं। प्राचीन ओलम्पिक खेलें तीन से पाँच दिन तक चलती थीं, जिनमें केवल यूनानी ही भाग लेते थे।

प्राचीन ओलम्पिक खेलों के उद्देश्य (Objectives of Ancient Olympic Games):
जिस महीने या वर्ष में इन खेलों का आयोजन होता था, उसको यूनानी पवित्र मानते थे। यूनान के राज्यों के राजाओं के आपसी झगड़े समाप्त हो जाते थे। वे वैर-भावना को त्यागकर ओलम्पिक खेल देखने जाते थे। यूनानी लोग खुशी-खुशी इन खेलों में भाग लेते थे। अतः इन खेलों का मुख्य उद्देश्य यूनान के नगर-राज्यों में आपसी लड़ाई एवं वैर-भावना समाप्त करके उनमें एकता, मित्रता एवं सद्भावना स्थापित करना था।

प्राचीन ओलम्पिक खेलों के नियम (Rules of Ancient Olympic Games):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के मुख्य नियम निम्नलिखित थे-
(1) ओलम्पिक खेलों में केवल यूनान के नागरिक ही भाग ले सकते थे।
(2) ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी को 10 मास का प्रशिक्षण प्राप्त करना आवश्यक था और इन खेलों में भाग
लेते समय उसे सौगंध लेनी पड़ती थी कि उसने प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
(3) खिलाड़ियों को ओलम्पिक्स आरंभ होने से एक मास पूर्व ओलम्पिया शहर में पहुँचना होता था।
(4) सभी खिलाड़ियों को खेलों में शांतिपूर्वक भाग लेने की सौगंध लेनी पड़ती थी।
(5) व्यावसायिक खिलाड़ी इन खेलों में भाग नहीं ले सकता था।
(6) केवल ऊँचे चरित्र वाले खिलाड़ियों को ही इन खेलों में भाग लेने की आज्ञा थी।
(7) जजों को भी ठीक निर्णय देने की सौगंध लेनी पड़ती थी।
(8) पहला और अंतिम दिन धार्मिक गीतों और बलियों के लिए होता था।
(9) गुलाम एवं दंडित खिलाड़ी इन खेलों में भाग नहीं ले सकते थे।

प्राचीन ओलम्पिक खेलों के पुरस्कार (Awards of Ancient Olympic Games):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों में विजेता खिलाड़ियों को बहुत मान-सम्मान दिया जाता था। विजेता खिलाड़ियों को जीयस देवता के मन्दिर में लगे पवित्र जैतून वृक्ष की टहनियों का मुकुट बनाकर भेंट किया जाता था। लोग विजेताओं को धन दौलत और पशु उपहार के रूप में देते थे। कवि लोग उनके नामों से गीत गाते थे। शहर की दीवारों और दरवाज़े उनके स्वागत के लिए सजाए जाते थे। वे देश के हीरो होते थे। प्रत्येक यूनान निवासी की इच्छा इन खेलों में विजेता बनने की होती थी।

प्राचीन खेलों का महत्त्व (Importance of Ancient Olympic Games):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को यूनानी लोग एक धार्मिक उत्सव की भान्ति मनाते थे। जब ये आरम्भ होते थे तो सारे देश में लड़ाई-झगड़े बन्द कर दिए जाते थे। ओलम्पिया के मैदान में शत्रु मित्रों की भान्ति घूमते थे। प्रत्येक ओर शान्ति, पवित्रता, मित्रता वाला वातावरण पैदा हुआ दिखाई देता था। ये खेलें शान्ति पवित्रता और मित्रता का संदेश देती थीं।

प्रश्न 3.
प्राचीन ओलम्पिक खेल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का वर्णन कीजिए। इसकी अवनति व निष्कासन के कारणों को भी बताइए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनान के एक छोटे से नगर ओलम्पिया से आरम्भ हुईं। यह नगर एलफिस नदी के किनारे बसा था। यह नगर एलिस राज्य का एक जाना-पहचाना नगर था। यहाँ बहुत सारे मन्दिर थे जहाँ पवित्र अग्नि के दीप सदा जलते रहते थे। इन मन्दिरों में एक मन्दिर जीयस देवता का था जिसको यूनानियों की समृद्धि, सुरक्षा और तन्दुरुस्ती का देवता माना जाता था। इस मन्दिर के आंगन में एक जैतून का वृक्ष लगा हुआ था, जिसको बहुत ही पवित्र माना जाता था। एक जानकारी के अनुसार यह वृक्ष हरकुलिस ने स्वर्गी धरती से लाकर जीयस देवता के मन्दिर में लगाया था। इस मन्दिर के निकट ढलानदार पहाड़ियाँ थीं जिनके बीच खेल के लिए समतल मैदान प्राकृतिक तौर पर बना हुआ था। यूनानियों ने इन पहाड़ियों को काटकर दर्शकों के बैठने के लिए स्थान बनाया और इसको प्राकृतिक स्टेडियम का रूप दिया। इस स्टेडियम में प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेलें आरम्भ करवाई गईं।

प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनान के ओलम्पिया नगर में अगस्त, सितम्बर माह की पूर्णिमा की रात को आरम्भ हुईं। ये खेलें जीयस देवता को समर्पित की गईं। इन खेलों के आरम्भ होने के पक्के सबूत लिखित रूप में नहीं हैं परन्तु इनको 776 ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ माना जाता है। ये खेलें 1000 वर्ष से अधिक समय तक चलती रहीं। जब रोमन निवासियों ने यूनान पर कब्जा किया तो रोमन बादशाह थियोडिसियस ने इनको बन्द करवाने के आदेश दे दिए। यूनान निवासियों के दिलों में इन खेलों के प्रति बसी भावना को कोई भी रोमन बादशाह मिटा न सका।

प्राचीन ओलम्पिक खेलों की अवनति व निष्कासन के कारण (Causes of Decline or Eviction of Ancient Olympic Games):
प्राचीन ओलम्पिक खेलें बहुत ही शानदार एवं सम्मानपूर्वक ढंग से लम्बे वर्षों तक अर्थात् 776 ईसा पूर्व से 393 ईस्वी तक चलती रहीं, लेकिन यूनान पर रोम का अधिकार होते ही इन खेलों में गतिरोध उत्पन्न हो गया। प्राचीन ओलम्पिक खेलों की अवनति व निष्कासन के कारण निम्नलिखित थे-
(1) यूनानियों के अतिरिक्त बाहर के लोगों का इन खेलों में भाग लेना और किसी भी प्रकार से इन खेलों में जीत प्राप्त करना अपना उद्देश्य बना लिया था। उनके अन्दर अपनी विजय खोने का डर सदा बना रहता था।
(2) यूनान पर रोम का अधिकार होने के बाद रोमवासियों का इन खेलों के प्रति कोई विशेष उत्साह एवं लगाव नहीं रहा।
(3) रोम ने इन खेलों में अधिक जोखिम एवं उत्तेजना वाले खेलों को शामिल कर लिया। इसके कारण खिलाड़ी बुरी तरह से घायल होने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि अच्छे खिलाड़ियों ने इनमें भाग लेना बंद कर दिया।
(4) इन खेलों में कुछ बुराइयों; जैसे रिश्वतखोरी का आ जाना भी इनके पतन का कारण था। खिलाड़ी जीतने के लिए जजोंको रिश्वत देने लगे थे।
(5) रोमन यूनानियों की खेलों को अच्छा नहीं समझते थे। इस कारण भी इन खेलों का पतन हुआ। अंतत: 393 ईस्वी में रोम के तत्कालीन सम्राट् थियोडोसियस ने एक आज्ञा-पत्र जारी कर इन खेलों पर प्रतिबंध लगा दिया।

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प्रश्न 4.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों (Modern Olympic Games) के बारे में आप क्या जानते हैं? विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों को प्रारंभ किसने किया? इनके उद्देश्यों एवं नियमों का वर्णन करें।
अथवा
नवीन ओलम्पिक खेलों के इतिहास और नियमों का वर्णन करें।
अथवा
1896 में आधुनिक ओलम्पिक खेल कैसे शुरू हुए? स्पर्धा के नियमों का भी वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के समाप्त होने के अनेक वर्षों बाद सन् 1829 में फ्रांसीसी व जर्मन दल के पुरातत्व वैज्ञानिकों ने यूनान के ओलम्पिया नगर में खुदाई आरंभ करवाई। अनेक वर्षों की कठिन मेहनत के बाद 4 अक्तूबर, 1875 को अर्नेस्ट कर्टियस को खुदाई से कुछ सफलता प्राप्त हुई। उसे खुदाई से ओलम्पिया नगर के मंदिरों व स्टेडियम के अवशेष प्राप्त हुए। इन अवशेषों के अध्ययन से आधुनिक ओलम्पिक खेलों को पुनः आरंभ करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

आधुनिक या नवीन ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का सारा श्रेय फ्रांसीसी विद्वान् बैरन पियरे-डी-कोबर्टिन को जाता है, जिनके अथक प्रयासों के कारण ही इन खेलों का पुनः आरंभ हो सका। उन्होंने इन खेलों को पुनः आरंभ करने के लिए 18 जून, 1894 को पेरिस में सोरबोन सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें उन्होंने अपनी खेल से संबंधित योजनाओं को 11 देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष · प्रस्तुत किया। सम्मेलन द्वारा उनके प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद, प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों के लिए एक तारीख सुनिश्चित करने की आवश्यकता थी। खेलों के आयोजन एवं नियंत्रण हेतु अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (IOC) का गठन किया गया। देमित्रिस विकेलस को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया।

सर्वसम्मति से प्रथम नवीन ओलम्पिक खेलों को 6 अप्रैल, 1896 को यूनान के शहर एथेंस में आयोजित करना सुनिश्चित किया गया। इन खेलों के संबंध में कोबर्टिन ने एक आदर्श प्रस्तुत किया कि “ओलम्पिक में सबसे आवश्यक बात जीत प्राप्त करना नहीं, बल्कि भाग लेना है। जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण बात जीत प्राप्त करना नहीं, बल्कि संघर्ष करना है। आवश्यक यह नहीं कि आप जीते हैं, बल्कि यह है कि आप अच्छी तरह खेलें।” (The important thing in the olympics is not to win but to take part. As the important thing in life is not the triumph but the struggle. The essential thing is not to have conquered but to have fought well.)

आधुनिक ओलम्पिक खेलों के उद्देश्य (Objectives of Modern Olympic Games):
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) खिलाड़ियों में सामाजिक व नैतिक गुणों का विकास करना।
(2) खिलाड़ियों में विश्व-शान्ति, आपसी सद्भाव एवं मित्रता को बढ़ावा देना।
(3) खिलाड़ियों में खेल-भावना और आपसी सहयोग की भावना का विकास करना।
(4) युवाओं को खेलों के लिए प्रेरित करना तथा उनके व्यक्तित्व का विकास करना।
(5) खिलाड़ियों में देशभक्ति व भाईचारे की भावना का विकास करना।
(6) जाति, रंग, धर्म व नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव न होने देना।
(7) खिलाड़ियों का शारीरिक एवं चारित्रिक विकास करना।
(8) खिलाड़ियों में अच्छी आदतों का निर्माण करना।

आधुनिक ओलम्पिक खेलों में प्रवेश के नियम (Entry Rules of Modern Olympic Games):
ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी राष्ट्रीय ओलम्पिक खेल समिति द्वारा भेजे जाते हैं। राष्ट्रीय खेल संस्थाएँ अपने-अपने खिलाड़ियों को चुनती हैं तथा उनके प्रवेश के लिए उनके नाम अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति को भेजती हैं। इन खेलों का नियमानुसार आयोजन करवाने की जिम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति की होती है। सन् 1908 में लंदन में हुए ओलम्पिक खेलों में कुछ नियम बनाए गए, जो इस प्रकार हैं
(1) वह हर देश जो ओलम्पिक संघ का सदस्य है, अपने देशवासियों को खेलों में भाग लेने के लिए भेज सकता है।
(2) एक खिलाड़ी एक ही देश का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
(3) खिलाड़ी नशा करके इन खेलों में भाग नहीं ले सकते।
(4) यदि किसी खिलाड़ी ने एक देश की ओर से इन खेलों में भाग लिया हो तो दूसरे देश की ओर से इन खेलों में भाग नहीं ले सकता। परंतु नए बने देश के खिलाड़ियों के लिए यह शर्त लागू नहीं होती।
(5) ओलम्पिक खेलों में भाग लेते समय खिलाड़ी के लिंग की जाँच की जाती है।
(6) खिलाड़ी किसी आयु, लिंग, धर्म एवं जाति का हो सकता है। उसके साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

ओलम्पिक मॉटो (Olympic Motto):
ओलम्पिक मॉटो लैटिन भाषा के तीन शब्दों से मिलकर बना है
(1) सीटियस (Citius)-बहुत तेज (Faster)
(2) अल्टियस (Altius)-बहुत ऊँचा (Higher)
(3) फॉर्टियस (Fortius)-बहुत शक्तिशाली (Stronger)।

इनका अर्थ है-बहुत तेज दौड़ना, बहुत ऊँची कूद लगाना और बहुत जोर (शक्ति) से गोला (थ्रो) फेंकना। ये शब्द खिलाड़ियों में उत्साह भरते हैं और वे अच्छा प्रदर्शन करने हेतु प्रेरित होते हैं।

ओलम्पिक सौगंध (Olympic Oath):
ओलम्पिक खेलों के शुरू होने से पहले मेजबान देश का खिलाड़ी यह सौगंध (शपथ) लेता है कि-“हम सौगंध लेते हैं कि हम इन ओलम्पिक खेलों में सच्चे खिलाड़ीपन की भावना से भाग लेंगे तथा अपने देश के सम्मान एवं खेलों के गौरव के लिए इन खेलों के सारे नियमों का आदर एवं पालन करेंगे।” (We swear that we shall take part in these olympic games in the true spirit of sportsmanship and that we will respect and abide by the rules which govern them for the glory of sport and the honour of our country.)

ओलम्पिक ध्वज (Olympic Flag):
बैरन पियरे-डी-कोबर्टिन के सुझाव पर सन् 1913 में ओलम्पिक ध्वज (Olympic Flag) का निर्माण किया गया और सन् 1914 में इसे जारी किया गया। ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम सन् 1920 में बेल्जियम के एंटवर्प (Antwerp) शहर में आयोजित हुए खेलों में फहराया गया। यह ध्वज सफेद रंग का होता है। इसमें पाँच चक्र (Rings) परस्पर जुड़े हुए भिन्न-भिन्न रंगों के होते हैं; जैसे नीला, पीला, काला, हरा व लाल। ये विश्व के पाँच महाद्वीपों; जैसे नीला रंग-यूरोप, पीला रंग-एशिया, काला रंग-अफ्रीका, हरा रंग-ऑस्ट्रेलिया और लाल रंग-अमेरिका का प्रतिनिधित्व करते हैं। ओलम्पिक ध्वज के ये चक्र उत्साह, आस्था, विजय, काम की नैतिकता और खेल-भावना को प्रदर्शित करते हैं। इन चक्रों का आपस में जुड़े होना इन पाँच महाद्वीपों की मित्रता एवं सद्भावना का प्रतीक है।
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ओलम्पिक मशाल (Olympic Flame):
ओलम्पिक मशाल या ज्योति ओलम्पिक खेलों का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। ओलम्पिक मशाल जलाने की प्रथा सन् 1936 के बर्लिन ओलम्पिक खेलों से शुरू हुई। यह ज्ञान, खुशी, शांति की प्रतीक है। पहले इस मशाल को खेल शुरू होने से कुछ दिन पूर्व यूनान के ओलम्पिया में हेरा मंदिर के सामने सूर्य की किरणों से प्रज्वलित किया जाता था। अब इसे सूर्य की किरणों से नहीं बल्कि शीशे से प्रज्वलित किया जाता है। साथ ही इसे मेजबानी करने वाले देश की दक्षता के आधार पर कुछ अलग आधार दिया जाता है। हालांकि इसके मूल रूप में आज तक कोई बदलाव नहीं किया गया है। इस मशाल को विभिन्न खिलाड़ियों या व्यक्तियों द्वारा उस स्थान पर पहुँचाया जाता है जहाँ ओलम्पिक खेलों का आयोजन होना होता है । जितने दिन ओलम्पिक खेल चलते हैं, उतने दिनों तक यह मशाल निरंतर प्रज्वलित रहती है और खेल समाप्ति पर इसे बुझा दिया जाता है।
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ओलम्पिक पदक (Olympic Awards):
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में पहले तीन स्थानों पर आने वाले खिलाड़ियों या टीमों को पदक या तमगे (Medals) दिए जाते हैं। पहले स्थान प्राप्तकर्ता को स्वर्ण पदक (Gold Medal), दूसरे स्थान प्राप्तकर्ता को रजत पदक (Silver Medal) और तीसरे स्थान प्राप्तकर्ता को कांस्य पदक (Bronze Medal) दिया जाता है। इसके अतिरिक्त जीतने वाले खिलाड़ी को डिप्लोमा भी दिया जाता है।

उद्घाटन समारोह (Opening Ceremony):
ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का समारोह बहुत प्रभावशाली होता है। एक मशाल जो ओलम्पिया (Olympia) नगर में सूर्य की किरणों के द्वारा प्रज्वलित की जाती है, उस नगर में लाई जाती है, जहाँ ओलम्पिक होना होता है तथा उस नगर के राजा या राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री द्वारा खेलों के आरंभ होने की घोषणा की जाती है। इसके साथ ही एथलीटों द्वारा मार्च-पास्ट (March Fast) तथा शपथ लेने (Oath-Taking) की रस्में अदा की जाती हैं, ओलम्पिक ध्वज फहराया जाता है और स्टेडियम में ओलम्पिक मशाल जला दी जाती है, जो खेलों के अंत तक जलती रहती है। मनोरंजनात्मक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा खेल अधिकारियों, खिलाड़ियों एवं दर्शकों का मनोरंजन किया जाता है। इसके बाद खेल आरंभ कर दिए जाते हैं।

समापन समारोह (Closing Ceremony):
ओलम्पिक खेलों का समापन समारोह बहुत साधारण होता है। अंतिम इवेंट के पश्चात् एथलीट या खिलाड़ी स्टेडियम में एकत्रित होते हैं। शहर का मेयर तथा प्रबंधक समिति का अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के अध्यक्ष को स्टेडियम तक ले जाते हैं। वह इन खेलों की समाप्ति की घोषणा करता है। तत्पश्चात् ओलम्पिक ध्वज को नीचे उतार लिया जाता है तथा अध्यक्ष द्वारा यह ध्वज मेयर को संभालने के लिए दिया जाता है। ओलम्पिक मशाल (ज्वाला) को बुझा दिया जाता है और फिर ओलम्पिक गीत के साथ खेलें समाप्त हो जाती हैं।

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प्रश्न 5.
नवीन ओलम्पिक खेलें किसने शुरू करवाईं? उसके विषय में आप क्या जानते हैं?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों को प्रारंभ करने में बैरन पियरे-डी-कोबर्टिन के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को रोमन बादशाह की ओर से बन्द करवा दिया गया था परन्तु वे खेलें समूचे विश्व के लिए एक पवित्र सन्देश छोड़ गई थीं कि सच्ची विजय मित्रता, प्यार और शान्ति से दिलों को जीतने में है। यह पवित्र भावना लोगों के दिलों में कोई भी बादशाह न मिटा सका। प्राचीन ओलम्पिक खेलों में पवित्र जोत जलती थी जो लोगों के मन में शताब्दियों तक जलती रही। एक दिन यह ज्योति नवीन ओलम्पिक खेलों के रूप में विश्व में प्रकाशमान हुई और आज तक जगमगा रही है। नवीन ओलम्पिक खेलों को आरम्भ करने का श्रेय एक पवित्र आत्मा को जाता है, जिसका नाम बैरन पियरे डी कोबर्टिन था।
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लगभग चौदह शताब्दियों तक ओलम्पिक खेलें विश्व के खेल नक्शे से अदृश्य रहीं। सन् 1829 को जापान और फ्रांसीसी पुरातत्व वैज्ञानिकों ने ओलम्पिया स्थान की खुदाई करवाई तो वहाँ मन्दिर और ओलम्पिक स्टेडियम के निशान मिल गए जहाँ प्राचीन ओलम्पिक खेलें हुआ। करती थीं। ये वैज्ञानिक केवल खोजकर्ता थे। इनका कार्य पुरानी घटनाओं, स्थानों और वस्तुओं को बैरन पियरे डी कोबर्टिन ढूँढने पर आधारित था। परन्तु इन ऐतिहासिक स्थानों की निशानदेही ने लोगों के अन्दर ओलम्पिक खेलों की भावना को और जागृत कर दिया।

कोबर्टिन नवीन ओलम्पिक खेलों के निर्माता माने जाते हैं, जिनका जन्म सन् 1863 में फ्रांस में हुआ था। वे फ्रांस में शिक्षा विभाग में कार्य करते थे। इनका खास झुकाव शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र की ओर था। उन्होंने सन् 1887 में बर्तानिया का दौरा किया। उन्हें हैरो और रंगबी के स्कूलों की पढ़ाई और प्रबन्ध बहुत पसन्द आए। उसने अनुभव किया कि पढ़ाई केवल कक्षा में बिठा कर ही प्रभावशाली नहीं बनाई जा सकती। बच्चों को पूर्ण रूप में शिक्षित करने के लिए कक्षा से बाहर मैदानों में ले जाकर भी शिक्षित किया जा सकता है। इसलिए शिक्षा और खेलों को भिन्न-भिन्न नहीं किया जा सकता। उसने इस विषय पर एक पुस्तक भी लिखी।

सन् 1889 में वे अमेरिका गए। वहाँ उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ओलम्पिक्स आरम्भ करने की सलाह दी। बहुत सारे खेल प्रेमियों ने उनके विचारों की प्रशंसा की और उनकी सहायता करने का वचन दिया। वे खेलों द्वारा सुन्दरता, स्वास्थ्य, मनोरंजन और भाईचारा बढ़ाना चाहते थे। बेशक इनकी कोशिश से पहले भी दो बार इसी प्रकार की ओलम्पिक खेल आरम्भ करने की कोशिश की गई, परन्तु असफल हुई। कोबर्टिन ने इसी संबंध में भिन्न-भिन्न देशों के दौरे किए। अपने देश में फ्रांसीसी खेल संघ स्थापित किए। 16 जून, 1894 को एक अन्तर्राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने ओलम्पिक योजना रखी गई, जिसके लिए सब ने सहमति प्रदान की। इन खेलों को आरम्भ करने के लिए वही देश यूनान चुना गया जहाँ प्राचीन ओलम्पिक खेलें हुआ करती थीं। सन् 1896 को प्रथम ओलम्पिक खेलें यूनान के शहर एथेंस में आरम्भ की गईं, जिसमें 14 राष्ट्रों के 289 खिलाड़ियों ने भाग लिया।

प्रश्न 6.
नवीन या आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भारत की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
अथवा
अब तक हुए आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भारत का सफर कैसा रहा? क्या यह संतोषजनक है?
अथवा
भारतीय खिलाड़ियों ने ओलम्पिक खेलों में क्या स्थान प्राप्त किए?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों में भारत का सफर वर्ष 1900 के पेरिस ओलम्पिक से शुरू हुआ। इसमें कोलकाता के रहने वाले एंग्लो इण्डियन नॉर्मन गिलबर्ड प्रिटिहार्ड ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था और 200 मीटर बाधा (हर्डल) दौड़ में रजत पदक जीता था। वर्ष 1900 के बाद लगभग 20 वर्षों तक भारत ने ओलम्पिक खेलों में भाग नहीं लिया। सन् 1920 के बेल्जियम (एंटवर्प) ओलम्पिक खेलों में भारत ने पहली बार अधिकृत रूप से अपनी ओलम्पिक टीम भेजी। इसके बाद से भारत का ओलम्पिक खेलों में भाग लेने का सफर निरंतर जारी है। लेकिन ओलम्पिक खेलों के इतिहास पर नजर डालें तो अब तक भारत का सफर संतोषजनक नहीं रहा है। भारत ने इन खेलों में अभी तक केवल 28 पदक ही प्राप्त किए हैं जिनमें से 11 पदक तो केवल हॉकी में प्राप्त हुए हैं।

ओलम्पिक खेलों में भारत का पहला स्वर्ण पदक सन् 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में जयपाल सिंह के नेतृत्व में हॉकी टीम ने प्राप्त किया। ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है। ओलम्पिक खेलों में लगातार छ: बार (1928, 1932, 1936, 1948, 1952, 1956) भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीते। इस दौरान टीम ने अनेक रिकॉर्ड तोड़े और स्थापित किए। यही वह दौर था जब ओलम्पिक खेलों में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का जादू चलता था। अनेक वर्षों तक भारतीय हॉकी टीम ने ओलम्पिक खेलों में एकछत्र राज किया।

सन् 1952 के हेलसिंकी ओलम्पिक खेलों में भारत के पहलवान के० डी० जाधव ने कुश्ती स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। सन् 1960 के रोम ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम को हार का सामना करना पड़ा, परन्तु सन् 1964 के टोकियो ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने फिर से पाकिस्तान को हराकर पदक प्राप्त किया। सन् 1980 के मॉस्को ओलम्पिक में भारतीय हॉकी ने पदक प्राप्त किया। सन् 1996 के एटलांटा ओलम्पिक खेलों में भारत के लिएंडर पेस ने टेनिस स्पर्धा में कांस्य पदक प्राप्त किया। सन् 2000 के सिडनी ओलम्पिक में पहली बार किसी भारतीय महिला खिलाड़ी कर्णम मल्लेश्वरी ने भारोत्तोलन स्पर्धा में कांस्य पदक प्राप्त किया। सन् 2004 के एथेंस ओलम्पिक खेलों में भारतीय निशानेबाज राज्यवर्द्धन राठौर ने रजत पदक प्राप्त किया।

सन् 2008 के बीजिंग ओलम्पिक खेलों में पहली बार भारतीय निशानेबाज खिलाड़ी अभिनव बिंद्रा ने शूटिंग स्पर्धा में व्यक्तिगत रूप से भारत के लिए स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इसी वर्ष विजेंद्र सिंह ने बॉक्सिंग स्पर्धा में और सुशील कुमार ने कुश्ती स्पर्धा में कांस्य पदक प्राप्त किए। सन् 2012 के लंदन ओलम्पिक खेलों में भारत ने अभी तक हुए ओलम्पिक खेलों में सबसे अधिक अर्थात् 6 पदक प्राप्त किए हैं। गगन नारंग व विजय कुमार ने निशानेबाजी में, सुशील कुमार व योगेश्वर दत्त ने कुश्ती में, साइना नेहवाल ने बैडमिंटन में और एम०सी० मैरीकॉम ने बॉक्सिंग में पदक प्राप्त किए। सन् 2016 में रियो डी जेनेरियो (ब्राजील) में हुए ओलम्पिक खेलों में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। इस ओलम्पिक में भारत के 119 खिलाड़ियों ने भाग लिया, परन्तु हमारे केवल दो खिलाड़ी ही पदक जीत पाए; जैसे साक्षी मलिक ने कुश्ती में कांस्य पदक और पी०वी० सिन्धू ने बैडमिंटन में रजत पदक जीते।

दिए गए विवरण से स्पष्ट होता है कि 121 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले देश का ओलम्पिक खेलों में प्रदर्शन संतोषजनक व उत्साहजनक नहीं रहा है। ओलम्पिक पदक तालिका में हम बहुत नीचे हैं। ओलम्पिक खेलों में हमें अपनी स्थिति को लगन व मेहनत से और मजबूत करना होगा, तभी हम ओलम्पिक खेलों में अपनी स्थिति अच्छी व संतोषजनक कर पाएँगे और विश्व को दिखा पाएँगे कि हम भी बहुत कुछ कर सकते हैं।

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प्रश्न 7.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति क्या है? इसके उद्देश्यों व कार्यों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (International Olympic Committee) पर विस्तृत नोट लिखें।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति/संघ बनाए जाने का श्रेय आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जनक बैरन पियरे डी कोबर्टिन को जाता है। उनके अथक प्रयासों से 23 जून, 1894 को यह समिति अस्तित्व में आई। यह समिति प्रत्येक चार साल बाद ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन करती है। इस समिति में विभिन्न देशों के सदस्य शामिल होते हैं। इस समिति के प्रथम अध्यक्ष देमित्रिस विकेलस थे। इसका मुख्यालय लोसाने (स्विट्ज़रलैण्ड) में है।

अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के उद्देश्य व कार्य (Objectives and Functions of International Olympic Committee):
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के मुख्य उद्देश्य व कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति ओलम्पिक खेलों का आयोजन स्थान एवं तारीख आदि निश्चित करती है।
(2) यह खेलों का प्रबंध करती है।
(3) यह खेलों व खिलाड़ियों के लिए आवश्यक नियम बनाती है।
(4) यह खिलाड़ियों को विश्व-शांति, सहयोग एवं भाईचारे की भावना बनाए रखने हेतु प्रेरित करती है।
(5) यह खेलों में नैतिकता को बनाए रखने और युवाओं को खेलों के लिए प्रोत्साहित करती है।
(6) यह खेलों में डोपिंग का विरोध करती है। यदि कोई खिलाड़ी डोपिंग में सकारात्मक रूप से भागीदार पाया जाता है तो उसके विरुद्ध उचित कार्रवाई करती है।
(7) यह खिलाड़ियों को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है।
(8) यह खेलों और खिलाड़ियों में किसी भी प्रकार के वाणिज्यकरण व राजनीतिकरण का विरोध करती है।

प्रश्न 8.
अब तक कितनी आधुनिक ओलम्पिक खेलें हुई हैं? ये कब और कहाँ-कहाँ आयोजित हुईं?
उत्तर:
अब तक 31 आधुनिक ओलम्पिक खेल हुए हैं। 31वें ओलम्पिक खेल ब्राजील के रियो डी जेनेरियो शहर में आयोजित हुए, जिसमें भारत ने कुल 2 पदक प्राप्त किए। 32वें ओलम्पिक खेल 2020 में जापान के टोकियो शहर में आयोजित होने थे, परंतु कोविड-19 नामक महामारी के कारण रद्द हो गए। 23 जुलाई से 8 अगस्त, 2021 तक इन खेलों का पुनः आयोजन किया जाएगा। अब तक हुए ओलम्पिक खेलों के आयोजित शहर (देश) तथा वर्ष का विवरण निम्नलिखित तालिका में दिया गया है-

क्र०सं०वर्षशहर/देश
11896एथेंस (यूनान/ग्रीस)
21900पेरिस (फ्राँस)
31904सेंट लूइस (अमेरिका)
41908लंदन (इंग्लैण्ड)
51912स्टॉकहोम (स्वीडन)
61916बर्लिन (जर्मनी)
71920एंटवर्प (बेल्जियम)
81924पेरिस (फ्राँस)
91928एम्सटर्डम (नीदरलैण्ड)
101932लॉस एंजिल्सि (अमेरिका)
111936बर्लिन (जर्मनी)
121940टोकियो (जापान)
131944लंदन (इंग्लैण्ड)
141948लंदन (इंग्लैण्ड)
151952हेलसिंकी (फिनलैण्ड)
161956मेलबोर्न (ऑस्ट्रेलिया)
171960रोम (इटली)
181964टोकियो (जापान)
191968मैक्सिको सिटी (मैक्सिको)
201972म्यूनिख (जर्मनी)
211976मांट्रियल (कनाडा)
221980मॉस्को (सोवियत संघ)
231984लॉस एंजिल्सि (अमेरिका)
241988सियोल (दक्षिण कोरिया)
251992बार्सीलोना (स्पेन)
261996एटलांटा (अमेरिका)
272000सिडनी (ऑस्ट्रेलिया)
282004एथेंस (यूनान)
292008बीजिंग (चीन)
302012लंदन (इंग्लैण्ड)
312016रियो डी जेनेरियो (ब्राजील)

आधुनिक ओलम्पिक खेलों में काफी उतार-चढ़ाव पाए जाते हैं। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध की छाया, फिर म्यूनिख ओलम्पिक में इजराइल खिलाड़ियों का कत्लेआम और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण सन् 1980 में मॉस्को और सन् 1984 में लॉस एंजिल्सि खेलों का बहिष्कार करने से खेलों के औपचारिक नियमों को बहुत ठेस लगी। सन् 1916, 1940 और 1944 के ओलम्पिक खेल प्रथम और दूसरे विश्वयुद्ध के कारण आयोजित नहीं हो सके। कितना अच्छा होगा यदि खेलों को इन घटनाओं से दूर रखा जाए, ताकि खेलों का वास्तविक उद्देश्य जो कि अन्तर्राष्ट्रीय भ्रातृत्व व विश्व-शांति है, उसको प्रफुल्लित किया जा सके।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के इतिहास का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनान के एक छोटे से नगर ओलम्पिया से आरम्भ हुईं। यह नगर एलफिस नदी के किनारे बसा था। यह नगर एलिस राज्य का एक जाना-पहचाना नगर था। यहाँ बहुत सारे मन्दिर थे जहाँ पवित्र अग्नि के दीप सदा जलते रहते थे। इन मन्दिरों में एक मन्दिर जीयस देवता का था जिसको यूनानियों की समृद्धि, सुरक्षा और तन्दुरुस्ती का देवता माना जाता था। इस मन्दिर के आंगन में एक जैतून का वृक्ष लगा हुआ था, जिसको बहुत ही पवित्र माना जाता था। एक जानकारी के अनुसार यह वृक्ष हरकुलिस ने स्वर्गी धरती से लाकर जीयस देवता के मन्दिर में लगाया था।

इस मन्दिर के निकट ढलानदार पहाड़ियाँ थीं जिनके बीच खेल के लिए समतल मैदान प्राकृतिक तौर पर बना हुआ था। यूनानियों ने इन पहाड़ियों को काटकर दर्शकों के बैठने के लिए स्थान बनाया और इसको प्राकृतिक स्टेडियम का रूप दिया। इस स्टेडियम में प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेलें आरम्भ करवाई गईं। प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनान के ओलम्पिया नगर में अगस्त, सितम्बर माह की पूर्णिमा की रात को आरम्भ हुईं। ये खेलें जीयस देवता को समर्पित की गईं। इन खेलों के आरम्भ होने के पक्के सबूत लिखित रूप में नहीं हैं परन्तु इनको 776 ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ माना जाता है। ये खेलें लम्बे वर्षों तक चलती रहीं। जब रोमन निवासियों ने यूनान पर कब्जा किया तो रोमन बादशाह थियोडिसियस ने इनको बद करवाने के आदेश दे दिए। यूनान निवासियों के मन में इन खेलों के प्रति बसी भावना को कोई भी रोमन बादशाह मिटा न सका।

प्रश्न 2.
प्राचीन ओलम्पिक खेलें क्यों आरम्भ हुईं? अथवा प्राचीन ओलम्पिक खेल शुरू करने के क्या कारण थे?
उत्तर:
प्राचीन खेलों से पहले यूनान के अन्दर छोटे-छोटे आत्म-निर्भर राज्य आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे जिनसे यूनान निवासियों की नस्ल, धन-दौलत, समृद्धि और शक्ति समाप्त होती जा रही थी। एलिस के बादशाह इफीटस इन लड़ाई-झगड़ों को बन्द करना और देशवासियों को आपसी जंग से बचाना चाहते थे। उसने अपने मन्त्रियों और खेल प्रेमियों को देश की मन्दी की स्थिति से भरी समस्याओं के हल ढूँढने के लिए अपने सुझाव देने के लिए कहा। उनके सुझावों के अनुसार ऐसी खेलें करवाई जाएँ जिनकी पवित्रता के लिए लड़ाइयाँ बन्द हों, प्रत्येक प्रकार की धोखेबाज़ी बन्द हो, खेलों के दौरान कोई भी नशे वाली वस्तु का प्रयोग न करें।

इन खेलों को धार्मिक दर्जा देने के लिए यह जीयस देवता को समर्पित किया जाए। बादशाह को सुझाव पसन्द आए जिसके फलस्वरूप प्रथम प्राचीन ओलम्पिक आरम्भ होने की संभावना मानी जाती है। बादशाह इफीटस ने एक ऐलाननामा जारी किया। सारे राज्यों को इन खेलों में भाग लेने के लिए निमन्त्रण पत्र भेजे गए जिनको एक धार्मिक निमन्त्रण पत्र समझकर मान लिया गया और ओलम्पिया नगर में ओलम्पिक खेलों की शुरुआत हुई। ये खेलें चार वर्षों के पश्चात् आयोजित हुआ करती थीं।

प्रश्न 3.
प्राचीन ओलम्पिक तथा आधुनिक ओलम्पिक खेलों में क्या अंतर है? अथवा आधुनिक व प्राचीन ओलम्पिक खेलों की समानताओं व असमानताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
समानताएँ-आधुनिक व प्राचीन ओलम्पिक खेलों में निम्नलिखित समानताएँ रही हैं-
(1) आधुनिक व प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत यूनान से हुई।
(2) दोनों ही तरह के ओलम्पिक्स चार साल के अंतराल में आयोजित हुए।

असमानताएँ/अंतर:
यद्यपि आधुनिक ओलम्पिक खेल प्राचीन ओलम्पिक खेलों का ही विकसित रूप है फिर भी इनमें काफी अंतर है –
(1) प्राचीन ओलम्पिक खेलों का आयोजन केवल यूनान के ‘ओलम्पिया’ नगर में ही किया जाता था लेकिन आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन विश्व के किसी भी शहर में किया जा सकता है।
(2) प्राचीन ओलम्पिक खेल तीन से पाँच दिन ही चलते थे, लेकिन आधुनिक ओलम्पिक खेल लगभग 16 दिन तक चलते हैं।
(3) प्राचीन ओलम्पिक खेलों में व्यक्तिगत स्पर्धा वाले खेल शामिल थे, जबकि आधुनिक ओलम्पिक खेलों में व्यक्तिगत व सामूहिक (टीम) दोनों प्रकार के खेल शामिल हैं।
(4) प्राचीन ओलम्पिक खेलों में केवल यूनान के निवासी ही भाग ले सकते थे जबकि आधुनिक ओलम्पिक में ऐसा नहीं है।

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प्रश्न 4.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के उद्घाटन समारोह (Opening Ceremony) का वर्णन करें।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के उद्घाटन समारोह के दिन सभी खिलाडी, उनके पिता, भाई व प्रशिक्षण देने वाले सभा-भवन में इकट्ठे होते थे। खेलों के विशेषज्ञ द्वारा खिलाड़ियों को शपथ दिलवाई जाती थी कि वे खेलों में नियमानुसार भाग लेंगे। उसके बाद हरकुलिस नामक देवता के सामने पशु की बलि दी जाती थी। इसके बाद सभी खिलाड़ी एक-एक करके मार्च-पास्ट करते हुए खेल के मैदान से बाहर आते थे। इसी दौरान उनका परिचय दर्शकों को दिया जाता था। इसके बाद खेलों को प्रारंभ करने की घोषणा होती थी।

प्रश्न 5.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के प्रमुख नियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के प्रमुख नियम निम्नलिखित थे
(1) ओलम्पिक खेलों में केवल यूनान के नागरिक ही भाग ले सकते थे।
(2) ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी को 10 मास का प्रशिक्षण प्राप्त करना आवश्यक था और इन खेलों में भाग लेते समय उसे सौगंध लेनी पड़ती थी कि उसने प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
(3) खिलाड़ियों को ओलम्पिक्स आरंभ होने से एक मास पूर्व ओलम्पिया शहर में पहुँचना होता था।
(4) सभी खिलाड़ियों को खेलों में शांतिपूर्वक भाग लेने की सौगंध लेनी पड़ती थी।
(5) महिलाएँ इन खेलों में भाग नहीं ले सकती थीं तथा उन्हें खेलें देखने की भी आज्ञा नहीं थी।
(6) पहला और अंतिम दिन धार्मिक गीतों और बलियों के लिए होता था।
(7) गुलाम एवं दंडित खिलाड़ी इन खेलों में भाग नहीं ले सकते थे।

प्रश्न 6.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों का पतन कैसे हुआ?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के बंद होने के मुख्य कारण बताएँ।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे
(1) यूनानियों के अतिरिक्त बाहर के लोगों का इन खेलों में भाग लेना और किसी भी प्रकार से इन खेलों में जीत प्राप्त करना अपना उद्देश्य बना लिया था। उनके अन्दर अपनी विजय खोने का डर सदा बना रहता था।
(2) यूनान पर रोम का अधिकार होने के बाद रोमवासियों का इन खेलों के प्रति कोई विशेष उत्साह एवं लगाव नहीं रहा।
(3) रोम ने इन खेलों में अधिक जोखिम एवं उत्तेजना वाले खेलों को शामिल कर लिया। इसके कारण खिलाड़ी बुरी तरह से घायल होने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि अच्छे खिलाड़ियों ने इनमें भाग लेना बंद कर दिया।
(4) इन खेलों में कुछ बुराइयों; जैसे रिश्वतखोरी का आ जाना भी इनके पतन का कारण था। खिलाड़ी जीतने के लिए जजों को रिश्वत देने लगे थे।
(5) रोमन यूनानियों की खेलों को अच्छा नहीं समझते थे। इस कारण भी इन खेलों का पतन हुआ। अंततः 393 ईस्वी में रोम के तत्कालीन सम्राट थियोडोसियस ने एक आज्ञा-पत्र जारी कर इन खेलों पर प्रतिबंध लगा दिया।

प्रश्न 7.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के इतिहास पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के समाप्त होने के अनेक वर्षों बाद सन् 1829 में फ्रांसीसी व जर्मन दल के पुरातत्व वैज्ञानिकों ने यूनान के ओलम्पिया नगर में खुदाई आरंभ करवाई। अनेक वर्षों की कठिन मेहनत के बाद 4 अक्तूबर, 1875 को अर्नेस्ट कर्टियस को खुदाई से कुछ सफलता प्राप्त हुई। उसे खुदाई से ओलम्पिया नगर के मंदिरों व स्टेडियम के अवशेष प्राप्त हुए। इन अवशेषों के अध्ययन से आधुनिक ओलम्पिक खेलों को पुनः आरंभ करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

आधुनिक/नवीन ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का सारा श्रेय फ्रांसीसी विद्वान् बैरन पियरे डी कोबर्टिन को जाता है, जिनके अथक प्रयासों के कारण ही इन खेलों का पुनः आरंभ हो सका। उन्होंने इन खेलों को पुनः आरंभ करने के लिए 18 जून, 1894 को पेरिस में सोरबोन सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें उन्होंने अपनी खेल से संबंधित योजनाओं को 11 देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष प्रस्तुत किया। सम्मेलन द्वारा उनके प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद, प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों के लिए एक तारीख सुनिश्चित करने की आवश्यकता थी। खेलों के आयोजन एवं नियंत्रण हेतु अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (IOC) का गठन किया गया। देमित्रिस विकेलस को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया। सर्वसम्मति से प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों को 6 अप्रैल, 1896 को यूनान के शहर एथेंस में आयोजित करना सुनिश्चित किया गया।

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प्रश्न 8.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के मुख्य उद्देश्यों व कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के मुख्य उद्देश्य व कार्य निम्नलिखित हैं
(1) अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति ओलम्पिक खेलों का आयोजन स्थान एवं तारीख आदि निश्चित करती है।
(2) यह खेलों का प्रबंध करती है। यह खेलों व खिलाड़ियों के लिए आवश्यक नियम बनाती है।
(3) यह खिलाड़ियों को विश्व-शांति, सहयोग एवं भाईचारे की भावना बनाए रखने हेतु प्रेरित करती है।
(4) यह खेलों में नैतिकता को बनाए रखने और युवाओं को खेलों के लिए प्रोत्साहित करती है।
(5) यह खेलों में डोपिंग का विरोध करती है। यदि कोई खिलाड़ी डोपिंग में सकारात्मक रूप से भागीदार पाया जाता है तो उसके विरुद्ध उचित कार्रवाई करती है।
(6) यह खिलाड़ियों को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है।
(7) यह खेलों और खिलाड़ियों में किसी भी प्रकार के वाणिज्यकरण व राजनीतिकरण का विरोध करती है।

प्रश्न 9.
भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के गठन पर सक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
भारत में ओलम्पिक लहर का आरंभ सर दोराबजी टाटा द्वारा खेलों का प्रोत्साहन करने के लिए दिए गए पैसों से हुआ। 5 फरवरी, 1927 में उन्होंने ए०सी० नौहरन की सहायता से खेलों के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए प्रांतों के प्रतिनिधियों को कलकत्ता (कोलकाता) में इकट्ठा किया। इस सभा की अध्यक्षता सर दोराबजी टाटा द्वारा की गई। इसमें एक एसोसिएशन बनाने का निर्णय लिया गया। इस तरह भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन का गठन हुआ। इसका अध्यक्ष सर दोराबजी टाटा, महासचिव ए०सी० नौहरन तथा सहायक सचिव जी०डी० सौंधी को बनाया गया। यह एसोसिएशन वर्ष 1927 में अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति की हिस्सा बनी।

भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के साथ-ही प्रांतों में भी अनेक खेल एसोसिएशन बनाई गईं; जैसे प्रांतीय ओलम्पिक एसोसिएशन, रेलवे कंट्रोल बोर्ड तथा सर्विस स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड आदि। इन सभी को भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के साथ जोड़ा गया। भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन का चुनाव चार वर्षों में एक बार होता है। इसमें शामिल अधिकारी व सदस्य होते हैं-एक अध्यक्ष, एक वरिष्ठ उपाध्यक्ष, आठ उपाध्यक्ष, एक महासचिव, छः सहायक सचिव, एक कोषाध्यक्ष, लगभग 21 प्रान्तीय ओलम्पिक एसोसिएशन के सदस्य और 9 राष्ट्रीय खेल एसोसिएशन के सदस्य, रेलवे स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड व सर्विस स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड आदि।

प्रश्न 10.
भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के मुख्य कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं
(1) अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के सभी नियमों को जारी करना।
(2) अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों के लिए खिलाड़ियों व टीमों का चयन करके उन्हें मुकाबले के लिए भेजना।
(3) देश में राष्ट्रीय स्तर के खेलों का प्रबंध करना।
(4) भारत के विभिन्न प्रांतों में प्रांतीय ओलम्पिक एसोसिएशन बनाना।
(5) अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में भेजी गई टीमों/खिलाड़ियों की जिम्मेदारी लेना।
(6) प्रांतीय स्तरीय ओलम्पिक एसोसिएशन के कार्यों पर निगरानी रखना।
(7) खेलों को अधिक-से-अधिक बढ़ावा देना तथा युवाओं को खेलों में भाग लेने हेतु प्रेरित करना।
(8) ओलम्पिक मामलों को सुलझाना तथा ओलम्पिक चार्टर का पालन करना।

प्रश्न 11.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के नियमों का उल्लेख करें।
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भाग लेने के नियम लिखें।
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी राष्ट्रीय ओलम्पिक खेल समिति द्वारा भेजे जाते हैं। राष्ट्रीय खेल संस्थाएँ अपने-अपने खिलाड़ियों को चुनती हैं तथा उनके प्रवेश के लिए उनके नाम अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति को भेजती हैं। इन खेलों का नियमानुसार आयोजन करवाने की जिम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति की होती है। सन् 1908 में लंदन में हुए ओलम्पिक खेलों में कुछ नियम बनाए गए, जो इस प्रकार हैं
(1) वह हर देश जो ओलम्पिक संघ का सदस्य है, अपने देशवासियों को खेलों में भाग लेने के लिए भेज सकता है।
(2) एक खिलाड़ी एक ही देश का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
(3) खिलाड़ी नशा करके इन खेलों में भाग नहीं ले सकते।
(4) यदि किसी खिलाड़ी ने एक देश की ओर से इन खेलों में भाग लिया हो तो दूसरे देश की ओर से इन खेलों में भाग नहीं ले सकता। परंतु नए बने देश के खिलाड़ियों के लिए यह शर्त लागू नहीं होती।
(5) ओलम्पिक खेलों में भाग लेते समय खिलाड़ी के लिंग की जाँच की जाती है।
(6) खिलाड़ी किसी आयु, लिंग, धर्म एवं जाति का हो सकता है। उसके साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

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प्रश्न 12.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के कौन-कौन-से उद्देश्य हैं?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख करें।
उत्तर:
कोबर्टिन के अनुसार आधुनिक ओलम्पिक खेलों के द्वारा निम्नलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सकती है
(1) खिलाड़ियों में सामाजिक व नैतिक गुणों का विकास करना।
(2) खिलाड़ियों में विश्व-शान्ति, आपसी सद्भाव एवं मित्रता को बढ़ावा देना।
(3) खिलाड़ियों में टीम-भावना की भावना का विकास करना।
(4) युवाओं को खेलों के लिए प्रेरित करना तथा उनके व्यक्तित्व का विकास करना।
(5) खिलाड़ियों में देशभक्ति व भाईचारे की भावना का विकास करना।
(6) जाति, रंग, धर्म व नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव न होने देना।
(7) खिलाड़ियों का शारीरिक एवं चारित्रिक विकास करना।।

प्रश्न 13.
शीतकालीन ओलम्पिक खेलों (Winter Olympic Games) पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
शीतकालीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत सन् 1924 में हुई। शीतकालीन ओलम्पिक खेलों में आईस हॉकी, स्केटिंग आदि के खेल मुकाबले होते हैं। ये खेलें भी प्रति चार वर्ष के पश्चात् होती हैं। ये केवल उन देशों के खिलाड़ियों द्वारा खेली जाती हैं, जिन देशों की जलवायु ठंडी होती है। इसमें ओलम्पिक खेलों की भाँति कोई तमगे नहीं दिए जाते तथा न ही इन्हें ओलम्पिक खेलों के समान समझा जाता है। ये केवल मुकाबले तक ही सीमित मानी जाती हैं। शीतकालीन ओलम्पिक खेलें तथा ओलम्पिक खेलें एक समय पर नहीं होती।

प्रश्न 14.
ओलम्पिक झण्डे की पृष्ठभूमि तथा इसका महत्त्व बताइए। अथवा ओलम्पिक ध्वज पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक झंडा क्या है? इसका क्या महत्त्व है?
अथवा
ओलम्पिक ध्वज के चक्रों (Rings) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बैरन पियरे डी कोबर्टिन के सुझाव पर सन् 1913 में ओलम्पिक ध्वज (Olympic Flag) का निर्माण किया गया और सन् 1914 में इसे जारी किया गया। ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम सन् 1920 में बेल्जियम के एंटवर्प (Antwerp) शहर में आयोजित हुए खेलों में फहराया गया। यह ध्वज सफेद रंग का होता है। इसमें पाँच चक्र (Rings) परस्पर जुड़े हुए भिन्न-भिन्न रंगों के होते हैं; जैसे नीला, पीला, काला, हरा व लाल। ये विश्व के पाँच महाद्वीपों; जैसे नीला रंग-यूरोप, पीला रंग-एशिया, काला रंग-अफ्रीका, हरा रंग-ऑस्ट्रेलिया और लाल रंग-अमेरिका का प्रतिनिधित्व करते हैं। ओलम्पिक ध्वज के ये चक्र उत्साह, आस्था, विजय, काम की नैतिकता और खेल-भावना को प्रदर्शित करते हैं। इन चक्रों का आपस में जुड़े होना इन पाँच महाद्वीपों की मित्रता एवं सद्भावना का प्रतीक है।

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प्रश्न 15.
ओलम्पिक मशाल (Olympic Flame) पर संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
ओलम्पिक ज्योति (Olympic Torch) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक मशाल या ज्योति ओलम्पिक खेलों का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। ओलम्पिक मशाल जलाने की प्रथा सन् 1936 के बर्लिन ओलम्पिक खेलों से शुरू हुई। यह ज्ञान, खुशी, शांति की प्रतीक है। पहले इस मशाल को खेल शुरू होने से कुछ दिन पूर्व यूनान के ओलम्पिया में हेरा मंदिर के सामने सूर्य की किरणों से प्रज्वलित किया जाता था। अब इसे सूर्य की किरणों से नहीं बल्कि शीशे से प्रज्वलित किया जाता है। साथ ही इसे मेजबानी करने वाले देश की दक्षता के आधार पर कुछ अलग आधार दिया जाता है। हालांकि इसके मूल रूप में आज तक कोई बदलाव नहीं किया गया है। इस मशाल को विभिन्न खिलाड़ियों या व्यक्तियों द्वारा उस स्थान पर पहुँचाया जाता है जहाँ ओलम्पिक खेलों का आयोजन होना होता है। जितने दिन ओलम्पिक खेल चलते हैं, उतने दिनों तक यह मशाल निरंतर प्रज्वलित रहती है और खेल समाप्ति पर इसे बुझा दिया जाता है।

प्रश्न 16.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के उद्घाटन समारोह पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का समारोह (Opening Ceremony) अत्यधिक प्रभावशाली होता है। एक मशाल जो ओलम्पिया (Olympia) नगर में सूर्य की किरणों के द्वारा प्रज्वलित की जाती है, उस नगर में लाई जाती है, जहाँ ओलम्पिक होना होता है तथा उस नगर के राजा या राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री द्वारा खेलों के आरंभ होने की घोषणा की जाती है। इसके साथ ही एथलीटों द्वारा मार्च-पास्ट (March Past) तथा शपथ लेने (Oath-Taking) की रस्में अदा की जाती हैं, ओलम्पिक ध्वज फहराया जाता है और स्टेडियम में ओलम्पिक मशाल जला दी जाती है, जो खेलों के अंत तक जलती रहती है। मनोरंजनात्मक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा खेल अधिकारियों, खिलाड़ियों एवं दर्शकों का मनोरंजन किया जाता है। इसके बाद खेल आरंभ कर दिए जाते हैं।

प्रश्न 17.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के समापन समारोह पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों का समापन समारोह (Closing Ceremony) बहुत साधारण होता है। अंतिम इवेंट के पश्चात् एथलीट या खिलाड़ी स्टेडियम में एकत्रित होते हैं। शहर का मेयर तथा प्रबंधक समिति का अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के अध्यक्ष को स्टेडियम तक ले जाते हैं। वह इन खेलों की समाप्ति की घोषणा करता है। तत्पश्चात् ओलम्पिक ध्वज को नीचे उतार लिया जाता है तथा अध्यक्ष द्वारा यह ध्वज मेयर को संभालने के लिए दिया जाता है। ओलम्पिक मशाल (ज्वाला) को बुझा दिया जाता है और फिर ओलम्पिक गीत के साथ खेलें समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 18.
ओलम्पिक्स के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आधुनिक संदर्भ में ओलम्पिक्स का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। ओलम्पिक्स खिलाड़ियों या टीमों को अनेक ऐसे अवसर प्रदान करते हैं जिनसे उनमें अनेक मूल्यों का विकास होता है। उनमें सद्भाव, मित्रता, सहानुभूति, बंधुत्व आदि जैसे गुण विकसित हो जाते हैं। इनके माध्यम से ही कोई खिलाड़ी न केवल अपना, बल्कि अपने माता-पिता व देश का नाम गौरवान्वित करता है। जब कभी भी ओलम्पिक्स का आयोजन होता है तो न केवल विभिन्न देशों के खिलाड़ियों, बल्कि राष्ट्रों में भी मैत्री या मित्रता की भावना विकसित होती है । इन खेलों के माध्यम से खिलाड़ी अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं और देश का सम्मान बढ़ाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार आधुनिक संदर्भ में इनका बहुत अधिक महत्त्व है।

प्रश्न 19.
ओलम्पिक शपथ, ओलम्पिक ध्वज तथा ओलम्पिक पुरस्कार पर नोट लिखें।
उत्तर:
ओलम्पिक शपथ-ओलम्पिक खेलों के शुरू होने से पहले मेजबान देश का खिलाड़ी यह शपथ लेता है कि “हम शपथ लेते हैं कि हम इन ओलम्पिक खेलों में सच्चे खिलाड़ीपन की भावना से भाग लेंगे तथा अपने देश के सम्मान एवं खेलों के गौरव के लिए खेलों के सारे नियमों का आदर एवं पालन करेंगे।”

ओलम्पिक ध्वज-बैरन पियरे डी कोबर्टिन के सुझाव पर सन् 1913 में ओलम्पिक ध्वज का निर्माण किया गया। ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम सन् 1920 में बेल्जियम के एंटवर्प शहर में आयोजित हुए खेलों में फहराया गया। यह ध्वज सफेद रंग का होता है। इसमें पाँच चक्र (Rings) परस्पर जुड़े हुए भिन्न-भिन्न रंगों के होते हैं; जो विश्व के पाँच महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन चक्रों का आपस में जुड़े होना इन पाँच महाद्वीपों की मित्रता एवं सद्भावना का प्रतीक है।

ओलम्पिक पुरस्कार-ओलम्पिक खेलों में पहले तीन स्थानों पर आने वाले खिलाड़ियों या टीमों को पदक या पुरस्कार दिए जाते हैं। पहले स्थान प्राप्तकर्ता को स्वर्ण पदक (Gold Medal), दूसरे स्थान प्राप्तकर्ता को रजत पदक (Silver Medal) और तीसरे स्थान प्राप्तकर्ता को काँस्य पदक (Bronze Medal) दिया जाता है।

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अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
ओलम्पिक मूवमेंट (आंदोलन) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ओलम्पिक मूवमेंट (आंदोलन) का अर्थ उन प्रयासों या प्रयत्नों से है जो प्राचीन ओलम्पिक खेलों और एक लम्बे अंतराल के बाद आधुनिक ओलम्पिक खेलों को शुरू करने में शामिल थे। यह एक ऐसा शब्द है जो हमें ओलम्पिक खेलों की प्रगति से लेकर आधुनिक युग तक की विशेष जानकारी प्रदान करता है।

प्रश्न 2.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
जिस महीने या वर्ष में इन खेलों का आयोजन होता था, उसको यूनानी पवित्र मानते थे। यूनान के राज्यों के राजाओं के आपसी झगड़े समाप्त हो जाते थे। वे वैर-भावना को त्यागकर ओलम्पिक खेलें देखने जाते थे। यूनानी लोग खुशी-खुशी इन खेलों में भाग लेते थे। अतः इन खेलों का मुख्य उद्देश्य यूनान के नगर-राज्यों में आपसी लड़ाई एवं वैर-भावना समाप्त करके उनमें एकता, मित्रता एवं सद्भावना स्थापित करना था।

प्रश्न 3.
प्राचीन ओलम्पिक में खिलाड़ियों को क्या पुरस्कार दिए जाते थे?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक पुरस्कारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक में पुरस्कार हेतु विजेता खिलाड़ियों को बहुत मान-सम्मान दिया जाता था। उन्हें जीयस देवता के मन्दिर में लगे पवित्र जैतून वृक्ष की टहनियों का मुकुट बनाकर भेंट किया जाता था। लोग विजेताओं को धन-दौलत और पशु उपहार के रूप में देते थे। कवि लोग उनके नामों से गीत गाते थे। शहर की दीवारों और दरवाज़े उनके स्वागत के लिए सजाए जाते थे। वे देश के हीरो होते थे। प्रत्येक यूनानी की इच्छा इन खेलों में विजयी बनने की होती थी।

प्रश्न 4.
प्राचीन ओलम्पिक खेलें किसने और क्यों बन्द करवा दी थीं?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें रोमन बादशाह थियोडिसियस ने एक हुक्मनामे द्वारा बन्द करवा दी थीं। उनके अनुसार जीयस देवता का मन्दिर और ओलम्पिक खेलें यूनानियों को नवीन शक्ति प्रदान करती थीं। ये खेलें देशवासियों को देश-प्रेमी, दृढ़ इरादे वाले, स्वस्थ, हुनरमंद और जोशीले बनाती थीं जो रोमनों की ओर से यूनानियों से प्राप्त की विजय के लिए चुनौती पैदा कर सकते थे। इसलिए रोम-वासियों ने यूनानियों के साहसिक स्रोत ओलम्पिक खेलों को बन्द करवा दिया।

प्रश्न 5.
प्राचीन ओलम्पिक में कैसी खेलें करवाई जाती थीं?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेलों में कौन-कौन-से इवेन्ट्स होते थे?
उत्तर:
शुरुआत में प्राचीन ओलम्पिक खेलों में केवल 200 गज़ की सीधी दौड़ थी जिसको पहली बार कोलोइस धावक ने जीता था। चौदहवीं ओलम्पिक्स में 400 गज़ की दौड़ की वृद्धि की गई। पन्द्रहवीं ओलम्पिक्स में तीन मील लम्बी दौड़ और अठारहवीं ओलम्पिक्स में पेंटाथलॉन (200 गज दौड़, लम्बी छलांग, नेज़ाबाज़ी, डिस्कस और कुश्तियों) की वृद्धि की गई। इसके पश्चात् तेइसवीं, पच्चीसवीं और तीसवीं ओलम्पिक्स में मुक्केबाजी, रथ दौड़ें, कुश्तियाँ और पानी की खेलें शामिल की गईं।

प्रश्न 6.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनानियों की देन थीं। यूनानियों के लिए इन खेलों का बहुत महत्त्व था। जिस महीने या वर्ष में इन खेलों का आयोजन होता था, उसको यूनानी पवित्र मानते थे। यूनान के राज्यों के राजाओं के आपसी झगड़े और वैर-भाव समाप्त हो जाती थी और एकता, मित्रता एवं सहयोग की भावना का विकास होता था। इन खेलों में जीतने वाले खिलाड़ी समाज में आदर एवं सम्मान पाते थे। उन्हें समाज में उच्च स्थान प्राप्त होता था।

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प्रश्न 7.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक संघ क्या है?
अथवा
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के बारे में बताएँ।
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति/संघ बनाए जाने का श्रेय आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जनक बैरन पियरे डी कोबर्टिन को जाता है। उनके अथक प्रयासों से 23 जून, 1894 ई० को यह समिति अस्तित्व में आई। यह समिति प्रत्येक चार साल बाद ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन करती है। इस समिति में विभिन्न देशों के सदस्य शामिल होते हैं। इस समिति के प्रथम अध्यक्ष देमित्रिस विकेलस थे। इसका मुख्यालय लोसाने (स्विट्ज़रलैण्ड) में है।

प्रश्न 8.
बैरन पियरे डी कोबर्टिन (Baron Pierre de Coubertin) कौन थे?
अथवा
बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म 1 जनवरी, 1863 को फ्रांस में हुआ था। वे फ्रांस के प्रसिद्ध भाषाविद् एवं समाजशास्त्री थे। उनकी सामाजिक कार्यों, खेलों एवं शिक्षा के क्षेत्र में विशेष रुचि थी। उन्हें आधुनिक ओलम्पिक खेलों का जन्मदाता माना जाता है।

प्रश्न 9.
ओलम्पिक आंदोलन के कोई दो उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:
(1) विश्व-शांति एवं बंधुता की भावना का विकास करना।
(2) राष्ट्रों में सहयोग की भावना बढ़ना और भेदभाव की भावना समाप्त करना।

प्रश्न 10.
भारतीय ओलम्पिक संघ के कोई दो कार्य बताएँ।
उत्तर:
(1) अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के सभी नियमों को जारी करना।
(2) अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों के लिए खिलाड़ियों व टीमों का चयन करके उन्हें मुकाबले के लिए भेजना।

प्रश्न 11.
आधुनिक ओलम्पिक का जनक कौन था? इसकी स्थापना कब, कहाँ और क्यों हुई?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेल क्यों शुरू हुए?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेल कब, कहाँ और क्यों आरंभ हुए?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों को शुरू करने का श्रेय कोबर्टिन को जाता है। इसलिए उनको आधुनिक ओलम्पिक खेलों का जनक माना जाता है। उन्होंने विश्व के राष्ट्रों को एक-दूसरे के निकट लाने और विश्व के युवाओं को युद्ध में लड़ने की बजाय खेल मुकाबलों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु इन खेलों को शुरू करने का सुझाव दिया। उन्होंने सोचा कि राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं को ओलम्पिक खेलों के माध्यम से आसानी से सुलझाया जा सकता है। काफी प्रयासों के बाद कोबर्टिन को प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों को 6 अप्रैल, 1896 को यूनान के शहर एथेंस में आयोजित करने में सफलता मिली।

प्रश्न 12.
ओलम्पिक खेलों के प्रमुख प्रतीक (Symbols) कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
(1) ओलम्पिक मशाल,
(2) ओलम्पिक ध्वज,
(3) ओलम्पिक आदर्श (मॉटो),
(4) ओलम्पिक शपथ।

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प्रश्न 13.
आधुनिक ओलम्पिक पुरस्कारों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में पहले तीन स्थानों पर आने वाले खिलाड़ियों या टीमों को पदक या तमगे (Medals) दिए जाते हैं। पहले स्थान प्राप्तकर्ता को स्वर्ण पदक (Gold Medal), दूसरे स्थान प्राप्तकर्ता को रजत पदक (Silver Medal) और तीसरे स्थान प्राप्तकर्ता को काँस्य पदक (Bronze Medal) दिया जाता है। इसके अतिरिक्त जीतने वाले खिलाड़ी को प्रमाण-पत्र भी दिया जाता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक कर्मचारी को जो ओलम्पिक खेलों के प्रबन्ध में सहायता करता है, तमगा (Medal) दिया जाता है।

प्रश्न 14.
ओलम्पिक ध्वज के वलय (चक्र) क्या प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज के वलय पाँच महाद्वीपों के प्रतीक हैं। ये पाँचों वलय उत्साह, आस्था, सद्भाव, काम की नैतिकता और खेल-भावना को प्रदर्शित करते हैं। इन वलयों या चक्रों का आपस में जुड़े होना पाँच महाद्वीपों की मित्रता एवं सद्भावना का प्रतीक है।

प्रश्न 15.
ओलम्पिक प्रतिज्ञा या शपथ (Olympic oath) क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों के शुरू होने से पहले मेजबान देश का खिलाड़ी यह प्रतिज्ञा लेता है कि “हम प्रतिज्ञा लेते हैं कि हम इन ओलम्पिक खेलों में सच्चे खिलाड़ीपन की भावना से भाग लेंगे तथा अपने देश के सम्मान एवं खेलों के गौरव के लिए खेलों के सारे नियमों का आदर एवं पालन करेंगे।”

प्रश्न 16.
ओलम्पिक मॉटो (Olympic Motto) क्या है?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में ‘मॉटो’ का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ओलम्पिक मॉटो निम्नलिखित तीन शब्दों से बना है
(1) सीटियस-बहुत तेज।
(2) अल्टियस-बहुत ऊँचा।
(3) फॉर्टियस-बहुत मज़बूत।
ये तीनों शब्द खिलाड़ियों को प्रेरित करने के लिए हैं, जिनका अर्थ क्रमशः तेज दौड़ना, ऊँचा कूदना और जोर से फेंकना होता है। ये शब्द खिलाड़ियों में उत्साह भरते हैं और वे अच्छा प्रदर्शन करने हेतु प्रेरित होते हैं।

प्रश्न 17.
ओलम्पिक आदर्श क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों के संबंध में कोबर्टिन ने एक आदर्श प्रस्तुत किया कि “ओलम्पिक में सबसे आवश्यक बात जीत प्राप्त करना नहीं, बल्कि भाग लेना है। जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण बात जीत प्राप्त करना नहीं, बल्कि संघर्ष करना है। आवश्यक यह नहीं कि आप जीते हैं, बल्कि यह है कि आप अच्छी तरह खेलें।”

प्रश्न 18.
आधुनिक या नवीन ओलम्पिक खेलों में कौन-कौन-सी मुख्य खेलें शामिल की गई हैं?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में निम्नलिखित मुख्य खेलें शामिल की गई हैं
(1) एथलेटिक्स
(2) फुटबॉल
(3) हैंडबॉल
(4) निशानेबाजी
(5) तैराकी और डाईविंग
(6) तीरंदाजी
(7) बास्केटबॉल
(8) रोइंग
(9) वाटर-पोलो
(10) हॉकी
(11) कैनोइंग
(12) याचिंग
(13) मुक्केबाज़ी
(14) तलवारबाजी
(15) पेंटाथलॉन
(16) वॉलीबॉल
(17) जूडो
(18) बैडमिंटन
(19) भारोत्तोलन
(20) कुश्ती
(21) टेबल टेनिस
(22) साइक्लिग
(23) घुड़सवारी
(24) लॉन टेनिस
(25) जिम्नास्टिक आदि।

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प्रश्न 19.
ओलम्पिक खेलों का महत्त्वपूर्ण चिह्न क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों का चिहन पाँच छल्लों या चक्रों का बना होता है जो आपस में जुड़े होते हैं। इनका रंग क्रमशः नीला, पीला, काला, लाल व हरा है जो पाँच महाद्वीपों अर्थात् यूरोप, एशिया, अफ्रीका, अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया को दर्शाते हैं। ओलम्पिक चिह्न निष्पक्ष व मुक्त स्पर्धा का प्रतीक है।

प्रश्न 20.
ओलम्पिक चार्टर क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक का अपना एक चार्टर है। ओलम्पिक चार्टर में इस खेल के उद्देश्य वर्णित हैं। इस चार्टर में अग्रलिखित उद्देश्य वर्णित हैं
(1) खेलों के लिए आवश्यक शारीरिक व नैतिक गुणों का विकास करना।।
(2) विश्व-शांति को अधिक सशक्त बनाने हेतु खेलों के माध्यम से युवाओं में आपसी सद्भाव व मित्रता बढ़ाना।
(3) अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना उत्पन्न करना।
(4) विश्व के सभी खिलाड़ियों को प्रति चार वर्ष बाद एक स्थान पर एकत्र करना।

HBSE 12th Class Physical Education ओलम्पिक आंदोलन Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-I : एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1. प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेल कब शुरू हुए थे?
उत्तर:
प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेल 776 ईसा पूर्व में शुरू हुए थे।

प्रश्न 2.
प्राचीन ओलम्पिक खेल कितने दिनों तक चलते थे?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेल पाँच दिनों तक चलते थे।

प्रश्न 3.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को कब और किसने बंद करवाया था?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेल किसने बन्द किए थे?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेल कब खत्म हुए थे?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को 393 ईस्वी में रोमन सम्राट थियोडोसियस ने बंद करवाया था।

प्रश्न 4.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को आरम्भ करने का श्रेय किसको जाता है?
उत्तर:
ऐलिस के बादशाह इफीटस (Ifetus) और क्लीओसथैनिस (Calliosthenes) को।

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प्रश्न 5.
प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित किए गए थे?
उत्तर:
प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेल यूनान के ओलम्पिया नगर में आयोजित किए गए थे।

प्रश्न 6.
प्रत्येक यूनानी का स्वप्न क्या होता था?
उत्तर:
प्रत्येक यूनानी का स्वप्न ओलम्पिक खेलों में विजयी बनने का होता था।

प्रश्न 7.
ओलम्पिक खेलें हमें क्या सन्देश देती हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलें हमें शान्ति, पवित्रता, मित्रता और आपसी भाईचारे का सन्देश देती हैं।

प्रश्न 8.
प्राचीन ओलम्पिक खेलें कितने वर्ष बाद करवाई जाती थीं?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें चार वर्ष बाद करवाई जाती थीं।

प्रश्न 9.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के समय यूनान में लड़ाइयाँ कब तक बन्द कर दी जाती थीं?
उत्तर:
सारे यूनान में ओलम्पिक खेलों के आरम्भ होने से लेकर खिलाड़ियों के घर वापिस जाने तक लड़ाइयाँ बन्द कर दी जाती थीं।

प्रश्न 10.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों की पहली स्पर्धा क्या थी?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों की पहली स्पर्धा दौड़ थी।

प्रश्न 11.
क्या प्रारंभ में महिलाओं को ओलम्पिक खेलों में भाग लेने की इजाजत थी?
उत्तर:
नहीं, प्रारंभ में महिलाओं को ओलम्पिक खेलों में भाग लेने की इजाजत नहीं थी।

प्रश्न 12.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के विजेताओं को किस वृक्ष के पत्तों से बनी माला पहनाई जाती थी?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक में विजेता को कैसे सम्मानित किया जाता था?
उत्तर:
जैतून (Olive) वृक्ष के पत्तों से बनी माला पहनाकर।

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प्रश्न 13.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जन्मदाता या जनक कौन थे?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिकि खेलों को शुरू करने का श्रेय किसे जाता है?
उत्तर:
‘बैरन पियरे डी कोबर्टिन।

प्रश्न 14.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भारत ने अपना पहला स्वर्ण पदक कब जीता था?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भारत ने अपना पहला स्वर्ण पदक वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में जीता था।

प्रश्न 15.
भारत ने ओलम्पिक खेलों में सर्वप्रथम कब भाग लिया?
उत्तर:
भारत ने ओलम्पिक खेलों में सर्वप्रथम सन् 1900 के पेरिस ओलम्पिक खेलों में भाग लिया।

प्रश्न 16.
भारत में ओलम्पिक एसोसिएशन कब स्थापित हुई?
उत्तर:
भारत में ओलम्पिक एसोसिएशन सन् 1927 में स्थापित हुई।

प्रश्न 17.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के नियम कब और कहाँ बनाए गए?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के नियम सन् 1908 के लंदन ओलम्पिक खेलों में बनाए गए।

प्रश्न 18.
ओलम्पिक खेल कितने वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित की जाती हैं?
अथवा
ओलम्पिक खेल कितने वर्ष बाद आयोजित किए जाते हैं?
उत्तर:
चार वर्षों के अंतराल के बाद ।

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प्रश्न 19.
IOC का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
International Olympic Committee.

प्रश्न 20.
ओलम्पिक ध्वज का रंग क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज का रंग सफेद है।

प्रश्न 21.
ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम किस ओलम्पिक खेलों में फहराया गया था?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम वर्ष 1920 के एंटवर्प ओलम्पिक खेलों में फहराया गया था।

प्रश्न 22.
किस महाद्वीप में किसी भी आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन नहीं हुआ है?
उत्तर:
अफ्रीका महाद्वीप में किसी भी आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन नहीं हुआ है।

प्रश्न 23.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक संघ की स्थापना कब हुई? ।
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक संघ की स्थापना सन् 1894 में हुई।

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प्रश्न 24.
ओलम्पिक मशाल को विभिन्न देशों में ले जाने की प्रथा कब शुरू हुई?
उत्तर:
ओलम्पिक मशाल को विभिन्न देशों में ले जाने की प्रथा सन् 1936 के बर्लिन ओलम्पिक खेलों से शुरू हुई।

प्रश्न 25.
ओलम्पिक खेल समारोह में किस देश के खिलाड़ियों का दल सर्वप्रथम स्टेडियम में प्रवेश करता है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेल समारोह में यूनान के खिलाड़ियों का दल सर्वप्रथम स्टेडियम में प्रवेश करता है।

प्रश्न 26.
ओलम्पिक खेल समारोह में किस देश के खिलाड़ियों का दल अन्त में स्टेडियम में प्रवेश करता है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेल समारोह में मेजबान देश के खिलाड़ियों का दल अन्त में स्टेडियम में प्रवेश करता है।

प्रश्न 27.
अभी तक हुए ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने कितने स्वर्ण पदक प्राप्त किए हैं?
उत्तर:
अभी तक हुए ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने 8 स्वर्ण पदक प्राप्त किए हैं।

प्रश्न 28.
किस भारतीय खिलाड़ी ने सन् 2008 के बीजिंग ओलम्पिक खेलों में स्वर्ण पदक जीता था?
उत्तर:
अभिनव बिन्द्रा ने सन् 2008 के बीजिंग ओलम्पिक खेलों में स्वर्ण पदक जीता था।

प्रश्न 29.
सन् 2016 में ओलम्पिक खेलों का आयोजन किस देश में हुआ?
उत्तर:
सन् 2016 में ओलम्पिक खेलों का आयोजन ब्राजील में हुआ।

प्रश्न 30.
ओलम्पिक ध्वज को कब निर्मित किया गया?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज को वर्ष 1913 में निर्मित किया गया।

प्रश्न 31.
ओलम्पिक शपथ कब शुरू हुई?
उत्तर:
ओलम्पिक शपथ सन् 1920 में शुरू हुई।

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प्रश्न 32.
छठे, बारहवें, तेरहवें ओलम्पिक खेल क्यों रद्द किए गए?
उत्तर:
प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्धों के कारण।

प्रश्न 33.
महिलाओं ने ओलम्पिक्स में भाग लेना कब शुरू किया?
उत्तर:
महिलाओं ने ओलम्पिक्स में भाग लेना सन् 1900 में हुए पेरिस ओलम्पिक्स से शुरू किया।

प्रश्न 34.
ओलम्पिक मशाल को कहाँ और कैसे प्रज्वलित किया जाता था?
उत्तर:
यूनान के ओलम्पिया शहर में हेरा मंदिर के सामने सूर्य की किरणों से।

प्रश्न 35.
बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर:
बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म फ्रांस में हुआ था।

प्रश्न 36.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जन्मदाता कोबर्टिन की मृत्यु किस सन में हुई?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जन्मदाता कोबर्टिन की मृत्यु सन् 1937 में हुई।

प्रश्न 37.
ओलम्पिया नगर में किस देवता का प्रसिद्ध मन्दिर था?
उत्तर:
ओलम्पिया नगर में जीयस देवता का प्रसिद्ध मन्दिर था।

प्रश्न 38.
ओलम्पिक झण्डे में छल्ले कितने महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं?
उत्तर:
पाँच महाद्वीपों का।

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प्रश्न 39.
ओलम्पिक ध्वज में कितने छल्ले (चक्र) होते हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज में पाँच छल्ले (चक्र) होते हैं।

प्रश्न 40.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाला प्रथम भारतीय खिलाड़ी कौन था?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाला प्रथम भारतीय खिलाड़ी एंग्लो इण्डियन नॉर्मन गिलबर्ड प्रिटिहार्ड था।

प्रश्न 41.
ओलम्पिक खेलों का प्रबंध कौन करता है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (International Olympic Committee)।

प्रश्न 42.
पहली नवीन ओलम्पिक खेलें कहाँ पर हुए थे?
उत्तर:
पहली नवीन ओलम्पिक खेलें यूनान के शहर एथेंस में हुए थे।

प्रश्न 43.
भारतीय हॉकी टीम ने प्रथम बार किस ओलम्पिक में सोने का मैडल जीता?
अथवा
भारतीय हॉकी टीम ने पहली बार सोने का तमगा कब और कहाँ जीता?
उत्तर:
भारतीय हॉकी टीम ने प्रथम बार सन् 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक्स में सोने का मैडल (तमगा) जीता।

प्रश्न 44.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों की पहली महिला चैंपियन का नाम बताएँ।
उत्तर:
ब्रिटेन की टेनिस खिलाड़ी चार्लोट कूपर (Charlotte Cooper)।

प्रश्न 45.
भारत की किस महिला खिलाड़ी ने 2000 के सिडनी ओलम्पिक्स में तृतीय स्थान प्राप्त किया?
उत्तर:
कर्णम मल्लेश्वरी ने 69 किलो भार वर्ग में 2000 सिडनी ओलम्पिक्स में भारत्तोलन (Weightlifting) में तृतीय स्थान प्राप्त किया।

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प्रश्न 46.
2012 की ओलम्पिक खेलें कहाँ हई?
उत्तर:
2012 की ओलम्पिक खेलें इंग्लैण्ड के लंदन शहर में हुईं।

प्रश्न 47.
ओलम्पिक झण्डे की बनावट किसने बनाई?
उत्तर:
ओलम्पिक झण्डे की बनावट बैरन पियरे डी कोबर्टिन ने बनाई।

प्रश्न 48.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के प्रथम विजेता खिलाड़ी का नाम बताएँ।
उत्तर:
जेम्स बी०कोनोली (James B. Connolly) जो एक धावक था।

प्रश्न 49.
टोकियो में ओलम्पिक खेल कब आयोजित होंगे?
उत्तर:टोकियो में ओलम्पिक खेल सन् 2020 में आयोजित होंगे।

प्रश्न 50.
सन् 2020 के ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित किए जाएंगे?
उत्तर:
सन् 2020 के ओलम्पिक खेल जापान के टोकियो शहर में आयोजित किए जाएंगे।

प्रश्न 51.
ओलम्पिक झण्डे के पाँच चक्र किस बात के प्रतीक हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक झण्डे के पाँच चक्र पाँच महाद्वीपों की आपसी मित्रता और सद्भावना के प्रतीक हैं।

प्रश्न 52.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.C.) का मुख्यालय किस देश में स्थित है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.C.) का मुख्यालय स्विट्ज़रलैण्ड में स्थित है।

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प्रश्न 53.
शीतकालीन ओलम्पिक खेलें कब शुरू हुई?
उत्तर:
शीतकालीन ओलम्पिक खेलें सन् 1924 में शुरू हुईं।

प्रश्न 54.
विकास व शांति के लिए किस दिन को अंतर्राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में चुना गया?
उत्तर:
विकास व शांति के लिए 6 अप्रैल को अंतर्राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में चुना गया।

प्रश्न 55.
ओलम्पिक मॉटो ‘सिटियस, आल्टियस, फॉर्टियस’ किसने बनाया था?
उत्तर:
ओलम्पिक मॉटो ‘सिटियस, आल्टियस, फॉर्टियस’ फादर डिडोन ने बनाया था।

प्रश्न 56.
सन् 1896 के प्रथम आधुनिक ओलम्पिक में कितने देशों ने भाग लिया था?
उत्तर:
सन् 1896 के प्रथम आधुनिक ओलम्पिक में 14 देशों ने भाग लिया था।

प्रश्न 57.
I.O.A. का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
Indian Olympic Association.

प्रश्न 58.
भारतवर्ष ने कुश्ती में ओलम्पिक खेलों में अभी तक कितने पदक जीते हैं?
उत्तर:
पाँच पदक।

प्रश्न 59.
उन भारतीय पुरुष खिलाड़ियों के नाम लिखें जिन्होंने लंदन ओलम्पिक्स में पदक प्राप्त किए थे।
उत्तर:
(1) गगन नारंग,
(2) विजय कुमार,
(3) सुशील कुमार,
(4) योगेश्वर दत्त।

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प्रश्न 60.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों का पहला चैंपियन कौन था?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों का पहला चैंपियन कोरोइबस था।

प्रश्न 61.
ओलम्पिक खेलों का दोबारा आयोजन कब शुरू हुआ?
अथवा
नवीन या आधुनिक ओलम्पिक खेलें कब शुरू हुई?
उत्तर:
वर्ष 1896 में।

प्रश्न 62.
ओलम्पिक ध्वज के पाँच छल्ले किसकी एकता को प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज के पाँच छल्ले पाँच महाद्वीपों की एकता को प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 63.
ओलम्पिक झंडे का सफेद रंग किसका प्रतीक है?
उत्तर:
ओलम्पिक झंडे का सफेद रंग विश्व-शान्ति का प्रतीक है।

प्रश्न 64.
ओलम्पिक अवार्ड क्या हैं?
उत्तर:
स्वर्ण पदक, रजत पदक व काँस्य पदक ओलम्पिक अवार्ड हैं।

प्रश्न 65.
रियो ओलम्पिक खेलों ( 2016) में भारत ने कितने पदक प्राप्त किए?
उत्तर:
रियो ओलम्पिक खेलों (2016) में भारत ने दो पदक प्राप्त किए।

प्रश्न 66.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन कब-कब नहीं हुआ?
अथवा
आधुनिक खेल कितनी बार नहीं हुए?
उत्तर:
ओलम्पिक खेल तीन बार 1916, 1940 व 1944 में नहीं हुए। सन् 2020 के टोकियो ओलम्पिक खेल रद्द हुए, लेकिन इनके पुनः आयोजन होने की संभावाना है।

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प्रश्न 67.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.C.) का पहला अध्यक्ष कौन था?
उत्तर:
देमित्रिस विकेलस (Demetrios Vikelas)।

प्रश्न 68.
33वें ओलम्पिक खेल (2024) किस देश में होंगे?
अथवा
सन् 2024 में ओलम्पिक खेल कहाँ होंगे? उत्तर:फ्रांस (पेरिस) में।

प्रश्न 69.
सन् 2028 में ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित होंगे?
अथवा
34वें ओलम्पिक खेल (2028) किस देश में होंगे?
उत्तर:
अमेरिका (लॉस एंजिल्सि) में।

प्रश्न 70.
टोकियो ओलम्पिक खेल (2020) क्यों रद्द किए गए?
उत्तर:
कोविड-19 नामक महामारी के कारण।

प्रश्न 71.
स्थगित हुए टोकियो ओलम्पिक खेल (2020) कब आयोजित किए जाएंगे?
उत्तर:
ये खेल 23 जुलाई से 8 अगस्त, 2021 तक आयोजित किए जा सकते हैं। ये खेल 24 जुलाई से 9 अगस्त, 2020 तक आयोजित होने थे, लेकिन कोविड-19 नामक महामारी के कारण स्थगित (रद्द) कर दिए गए थे।

प्रश्न 72.
एथेंस का कौन-सा स्टेडियम प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों का गवाह बना था?
उत्तर:
एथेंस का पनाथिनाइको स्टेडियम प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों का गवाह बना था।

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प्रश्न 73.
किंस एकमात्र ओलम्पिक में क्रिकेट को शामिल किया गया था?
उत्तर:
पेरिस ओलम्पिक (1900) में क्रिकेट को शामिल किया गया था।

प्रश्न 74.
दूसरा आधुनिक ओलम्पिक कब और कहाँ आयोजित हुआ था?
उत्तर:
दूसरा आधुनिक ओलम्पिक 1900 में पेरिस में आयोजित हुआ था।

प्रश्न 75.
खिलाड़ियों को पदक देने की परम्परा किस ओलम्पिक से शुरू हुई?
उत्तर:
खिलाड़ियों को पदक देने की परम्परा सेंट लूइस ओलम्पिक (1904) से शुरू हुई।

भाग-II: सही विकल्प का चयन करें-

1. प्राचीन ओलम्पिक खेल कितने वर्षों तक जारी रहे थे?
(A) लगभग 1194 वर्षों तक
(B) लगभग 1258 वर्षों तक
(C) लगभग 1170 वर्षों तक
(D) लगभग 1165 वर्षों तक
उत्तर:
(C) 1170 वर्षों तक

2. किस रोमन सम्राट् ने प्राचीन ओलम्पिक खेलों पर रोक लगाई थी?
(A) थियोडोसियस ने
(B) पैल्पोस ने
(C) सिकंदर ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) थियोडोसियस ने

3. अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.C.) का मुख्यालय किस देश में स्थित है?
(A) अमेरिका में
(B) फ्राँस में
(C) स्विट्ज़रलैण्ड में
(D) इंग्लैण्ड में
उत्तर:
(C) स्विट्ज़रलैण्ड में

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन

4. प्राचीन ओलम्पिक खेलों से संबंधी निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(A) प्रारंभ में महिलाओं को ओलम्पिक खेल देखने की इजाजत नहीं थी
(B) प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत रोम में हुई थी
(C) प्राचीन ओलम्पिक खेल तीन से पाँच दिन तक चलते थे
(D) प्राचीन ओलम्पिक खेलों को रोमन सम्राट थियोडोसियस ने बंद करवाया था
उत्तर:
(B) प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत रोम में हुई थी

5. शीतकालीन ओलम्पिक खेलें कब शुरू हुईं?
(A) सन् 1920 में
(B) सन् 1924 में
(C) सन् 1928 में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) सन् 1924 में

6. भारत में ओलम्पिक खेलों का आयोजन कितनी बार हुआ?
(A) दो बार
(B) चार बार
(C) एक बार
(D) एक बार भी नहीं
उत्तर:
(D) एक बार भी नहीं

7. ओलम्पिक ध्वज का रंग है
(A) ,सफेद
(B) हरा
(C) पीला
(D) नीला
उत्तर:
(A) सफेद

8. ओलम्पिक मॉटो Citius-Altius-Fortius’ का अर्थ है
(A) Faster-Higher-Stronger
(B) Higher-Stronger-Faster
(C) Stronger-Faster-Higher
(D) Faster-Stronger-Higher
उत्तर:
(A) Faster-Higher-Stronger

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9. आधुनिक ओलम्पिक खेलों को पुनः आरंभ करवाने का श्रेय किसे जाता है?
(A) पैल्पोस को
(B) थियोडोसियस को
(C) बैरन पियरे डी कोबर्टिन को
(D) यूनान की जनता को
उत्तर:
(C) बैरन पियरे डी कोबर्टिन को

10. प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन कहाँ किया गया?
(A) सेंट लूइस में
(B) एथेंस में
(C) एम्सटर्डम में
(D) लंदन में
उत्तर:
(B) एथेंस में

11. ओलम्पिक ध्वज के पाँच वलय (Rings) प्रतीक हैं
(A) पाँच नदियों के
(B) पाँच महाद्वीपों के
(C) पाँच महासागरों के
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) पाँच महाद्वीपों के

12. किस वर्ष ओलम्पिक में भारतीय राष्ट्रीय गान पहली बार बजा?
(A) सन् 1948 में
(B) सन् 1952 में
(C) सन् 1928 में
(D) सन् 1932 में
उत्तर:
(A) सन् 1948 में

13. बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म कहाँ हुआ था?
(A) रूस में
(B) इंग्लैण्ड में
(C) फ्राँस में
(D) अमेरिका में
उत्तर:
(C) फ्राँस में

14. सन् 2000 के ओलम्पिक खेल कहाँ पर आयोजित हुए थे?
(A) लंदन में
(B) पेरिस में
(C) सिडनी में
(D) टोकियो में
उत्तर:
(C) सिडनी में

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15. भारत ने ओलम्पिक खेलों में सर्वप्रथम कब भाग लिया?
(A) सन् 1936 में
(B) सन् 1900 में
(C) सन् 1976 में
(D) सन् 1986 में
उत्तर:
(B) सन् 1900 में

16. ‘अल्टियस’ ओलम्पिक मॉटो बताता है
(A) गति
(B) मजबूत
(C) ऊँचा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) ऊँचा

17. ओलम्पिक खेलों में कबूतर छोड़ना कब बंद किया गया?
(A) सन् 1936 में
(B) सन् 1996 में
(C) सन् 1976 में
(D) सन् 1986 में
उत्तर:
(B) सन् 1996 में

18. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के सबसे बड़े खेल हैं
(A) ओलम्पिक खेल
(B) एशियाई खेल
(C) राष्ट्रमण्डल खेल
(D) एफ्रो खेल
उत्तर:
(A) ओलम्पिक खेल

19. विशिष्ट ओलम्पिक में कौन प्रतिभागी होते हैं?
(A) शारीरिक रूप से अस्वस्थ
(B) मानसिक रूप से अस्वस्थ
(C) (A) एवं (B) दोनों
(D) बुजुर्ग
उत्तर:
(C) (A) एवं (B) दोनों

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20. ओलम्पिक खेलों का प्रारंभिक प्रतीक है
(A) ओलम्पिक मशाल
(B) ओलम्पिक ध्वज
(C) ओलम्पिक शपथ
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) ओलम्पिक मशाल

21. निम्नलिखित वर्ष के ओलम्पिक खेलों का आयोजन नहीं हो सका
(A) वर्ष 1916 के
(B) वर्ष 1940 के
(C) वर्ष 1944 के
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

22. ओलम्पिक मॉटो ‘सिटियस, अल्टियस, फॉर्टियस’ किसने बनाया था?
(A) फादर विलियम ने
(B) फादर रॉय ने
(C) फादर डिडोन ने
(D) कोबर्टिन ने
उत्तर:
(C) फादर डिडोन ने

23. सन् 1896 के पहले आधुनिक ओलम्पिक में कितने देशों ने भाग लिया था?
(A) 11
(B) 12
(C) 13
(D) 14
उत्तर:
(D) 14

24. 1896 के ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित किए गए थे?
(A) एथेन्स में
(B) स्पार्टा में
(C) पेरिस में
(D) लंदन में
उत्तर:
(A) एथेन्स में

25. भारतीय ओलम्पिक संघ (I.O.A.) का गठन कब किया गया?
(A) सन् 1925 में
(B) सन् 1926 में
(C) सन् 1927 में
(D) सन् 1928 में
उत्तर:
(C) सन् 1927 में

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26. हॉकी के अंदर कौन-से ओलम्पिक खेल में भारत अंतिम बार मेडल जीता?
(A) 1980, मॉस्को
(B) 1988, बार्सिलोना
(C) 1988, सियोल
(D) 2004, एथेन्स
उत्तर:
(A) 1980, मॉस्को

27. I.O.A. का पूरा नाम है
(A) Indian Olympic Acadmic
(B) International Olympic Association
(C) Indian Olympic Association
(D) International Olympic Acadmic
उत्तर:
(C) Indian Olympic Association

28. सन् 2024 में ओलम्पिक खेलों का आयोजन होगा
(A) टोकियो में
(B) लंदन में
(C) पेरिस में
(D) लॉस एंजिल्स
उत्तर:
(C) पेरिस में

29. सन् 2020 के ओलम्पिक खेल किस कारण स्थगित हुए?
(A) विश्व महायुद्ध के कारण
(B) विश्व महामंदी के कारण
(C) कोरोना-19 महामारी के कारण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) कोरोना-19 महामारी के कारण

30. ओलम्पिक खेल कितने वर्ष के अन्तराल पर होते हैं?
(A) एक वर्ष
(B) दो वर्ष
(C) तीन वर्ष
(D) चार वर्ष
उत्तर:
(D) चार वर्ष

31. ओलम्पिक शपथ का सर्वप्रथम प्रयोग ओलम्पिक खेलों में कब किया गया था?
(A) 1916 में
(B) 1920 में
(C) 1924 में
(D) 1928 में
उत्तर:
(B) 1920 में

32. 1916, 1940 व 1944 के ओलम्पिक खेलों का आयोजन किस कारण नहीं हुआ?
(A) विश्वयुद्धों के कारण ।
(B) धन के अभाव के कारण
(C) राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) विश्वयुद्धों के कारण

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33. ओलम्पिक ध्वज में कितने वलय/चक्र होते हैं?
(A) 5
(B) 4
(C) 6
(D) 3
उत्तर:
(A)5

34. प्राचीन ओलम्पिक खेल कितने वर्षों बाद आयोजित किए जाते थे?
(A) 2
(B) 3
(C) 4
(D) 7
उत्तर:
(C)4

35. 2028 के ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित किए जाएंगे?
(A) लॉस एंजिल्सि में
(B) पेरिस में
(C) टोकियो में
(D) बार्सिलोना में
उत्तर:
(A) लॉस एंजिल्सि में

भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. प्रथम ओलम्पिक खेल ………………. में आयोजित किए गए थे।
2. ओलम्पिक ध्वज में. ……………….. छल्ले हैं।
3. ओलम्पिक शपथ वर्ष ………………… में शुरू की गई।
4. महिलाओं ने ओलम्पिक में भाग लेना वर्ष …………………. में शुरू किया।
5. सन् 1896 में हुए प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों में कुल ………………… देशों ने भाग लिया था।
6. अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.A) का गठन वर्ष ………………… में किया गया।
7. ओलम्पिक खेल ………………… वर्ष बाद आयोजित किए जाते हैं।
8. प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेल सन् ………………… में शुरू हुए थे।
9. ओलम्पिक ध्वज का रंग ………………… है।
10. ……………….. ओलम्पिक (1920) में पहली बार ओलम्पिक शपथ का आयोजन हुआ।
11. अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति का कार्यालय ………………… में स्थित है।
12. ………………… में ओलम्पिक खेलों का आयोजन फ्रांस के पेरिस शहर में होगा।
उत्तर:
1. यूनान
2. पाँच
3. 1920
4. 1900
5. 14
6. 1894
7. चार
8. 1896
9. सफेद
10. एंटवर्प
11. स्विट्जरलैंड (लोसाने)
12. सन् 2024।

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ओलम्पिक आंदोलन Summary

ओलम्पिक आंदोलन परिचय

ओलम्पिक आंदोलन या मूवमेंट (Olympic Movement):
ओलम्पिक आंदोलन या मूवमेंट का अर्थ उन प्रयासों या प्रयत्नों से है जो प्राचीन ओलम्पिक खेलों और एक लम्बे अंतराल के बाद आधुनिक ओलम्पिक खेलों को शुरू करने में शामिल थे। यह एक ऐसा शब्द है जो हमें ओलम्पिक खेलों की प्रगति से लेकर आधुनिक युग तक की विशेष जानकारी प्रदान करता है। . प्राचीन ओलम्पिक खेल (Ancient Olympic Games)-प्राचीन ओलम्पिक खेल सर्वप्रथम यूनान के ओलम्पिया नगर में 776 ईसा पूर्व आयोजित किए गए थे।

प्राचीनकाल में ओलम्पिक खेल धार्मिक त्योहारों तथा समारोहों से संबंधित थे जो जीयस देवता के प्रति समर्पित थे। इन प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबलों को भगवान को दी जाने वाली प्रार्थना समझा जाता था। विजेताओं को जैतून की शाखाओं से सम्मानित किया जाता था। विजेता लोगों की नजरों में नायक बन जाते थे। खिलाड़ी स्पष्ट रूप से सम्मान प्राप्त करने के लिए खेल को प्रतिस्पर्धात्मक भावना से खेलते थे। रोमनवासियों ने 393 ईस्वी में ओलम्पिक खेलों पर रोक लगा दी थी, क्योंकि वे खेल मुकाबलों की बजाय खून भरी लड़ाइयों में विश्वास करते थे। अंततः रोमन सम्राट् थियोडोसियस ने इन खेलों को बंद करवा दिया।

आधुनिक ओलम्पिक खेल (Modern Olympic Games):
आधुनिक/नवीन ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का सारा श्रेय फ्रांसीसी विद्वान् बैरन पियरे डी कोबर्टिन को जाता है, जिनके अथक प्रयासों के कारण ही इन खेलों का पुनः आरंभ हो सका। उन्होंने इन खेलों को पुनः आरंभ करने के लिए 18 जून, 1894 को पेरिस में सोरबोन सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें उन्होंने अपनी खेल से संबंधित योजनाओं को 11 देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष प्रस्तुत किया।सम्मेलन द्वारा उनके प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद, प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों के लिए एकतारीख सुनिश्चित करने की आवश्यकता थी।खेलों के आयोजन एवं नियंत्रण हेतु अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (IOC) का गठन किया गया। देमित्रिस विकेलस को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया। सर्वसम्मति से प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों को 6 अप्रैल, 1896 को यूनान के शहर एथेंस में आयोजित करना सुनिश्चित किया गया।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा

HBSE 12th Class Physical Education योग शिक्षा Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
योग के बारे में आप क्या जानते हैं? इसका क्या उद्देश्य है?
अथवा
योग का अर्थ, परिभाषा तथा उद्देश्य पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
योग का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Yoga): ‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की मूल धातु ‘युज’ से हुई है जिसका अर्थ है-जोड़ या एक होना। जोड़ या एक होने का अर्थ है-व्यक्ति की आत्मा को ब्रह्मांड या परमात्मा की चेतना या सार्वभौमिक आत्मा के साथ जोड़ना। महर्षि पतंजलि (योग के पितामह) के अनुसार, ‘युज’ धातु का अर्थ है-ध्यान-केंद्रण या मन:स्थिति को स्थिर करना और आत्मा का परमात्मा से ऐक्य। सामान्य शब्दों में, योग व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा से मिलन का नाम है। योग का अभ्यास मन को परमात्मा पर केंद्रित करता है। यह व्यक्ति के गुणों व शक्तियों का आपस में मिलना है।

1. कठोपनिषद् (Kathopnishad) के अनुसार, “जब हमारी ज्ञानेंद्रियाँ स्थिर अवस्था में होती हैं, जब मस्तिष्क स्थिर अवस्था में होता है, जब बुद्धि भटकती नहीं, तब बुद्धिमान कहते हैं कि इस अवस्था में पहुँचने वाले व्यक्ति ने सर्वोत्तम अवस्था वाले चरण को प्राप्त कर लिया है। ज्ञानेंद्रियों व मस्तिष्क के इस स्थायी नियंत्रण को ‘योग’ की परिभाषा दी गई है। वह जो इसे प्राप्त कर लेता है, वह भ्रम से मुक्त हो जाता है।”

2. महर्षि पतंजलि (Maharshi Patanjali) के अनुसार, “योग: चित्तवृत्ति निरोधः” अर्थात् “मनोवृत्ति के विरोध का नाम ही योग है।”
3. श्री याज्ञवल्क्य (Shri Yagyavalkya) के अनुसार, “जीवात्मा से परमात्मा के मिलन को योग कहते हैं।”
4. महर्षि वेदव्यास (Maharshi Vedvyas) के अनुसार, “योग समाधि है।”
5. डॉ० संपूर्णानंद (Dr. Sampurmanand) के अनुसार, “योग आध्यात्मिक कामधेनु है।”
6. श्रीमद्भगवद् गीता (Shrimad Bhagvad Gita) के अनुसार, “बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।” अर्थात् समबुद्धि युक्त मनुष्य इस जीवन में ही अच्छे और बुरे कार्यों से अपने को मुक्त कर लेता है। अतः योग के लिए प्रयत्न करो क्योंकि सारा कार्य-कौशल यही है।
7. भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) ने कहा-“योग कर्मसुकौशलम्।” अर्थात् कर्म को कुशलतापूर्वक करना ही योग है। 8. स्वामी कृपालु जी (Swami Kripaluji) के अनुसार, “हर कार्य को बेहतर कलात्मक ढंग से करना ही योग है।”

इस प्रकार योग आत्मा एवं परमात्मा का संयोजन है। योग का अभ्यास मन को परमात्मा पर केंद्रित करता है और संपूर्ण शांति प्रदान करता है। योग हम को उन कष्टों का इलाज करने की सीख देता है जिनको भुगतने की जरूरत नहीं है और उन कष्टों का इलाज करता है जिनको ठीक नहीं किया जा सकता। बी०के०एस० आयंगर (B.K.S. Iyengar) के अनुसार, “योग वह प्रकाश है जो एक बार जला दिया जाए तो कभी कम नहीं होता। जितना अच्छा आप अभ्यास करेंगे, लौ उतनी ही उज्ज्वल होगी।”

योग का उद्देश्य (Objective of Yoga):
योग का उद्देश्य जीवात्मा का परमात्मा से मिलाप करवाना है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को नीरोग, फुर्तीला, जोशीला, लचकदार और विशिष्ट क्षमताओं या शक्तियों का विकास करके मन को जीतना है। यह ईश्वर के सम्मुख संपूर्ण समर्पण हेतु मन को तैयार करता है। योग व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक उद्देश्यों की पूर्ति वैज्ञानिक ढंगों से करता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा

प्रश्न 2.
अष्टांग योग क्या है? अष्टांग योग के विभिन्न अंगों या अवस्थाओं का वर्णन करें।
अथवा
महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के कौन-कौन-से आठ अंग बताए हैं? उनके बारे में लिखें।
अथवा
अष्टांग योग के आठ अंगों या घटकों के बारे में आप क्या जानते हैं? विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
अष्टांग योग का अर्थ (Meaning of Ashtanga Yoga):
महर्षि पतंजलि ने ‘योग-सूत्र’ में जिन आठ अंगों का उल्लेख किया है, उन्हें ही अष्टांग योग कहा जाता है। अष्टांग योग का अर्थ है-योग के आठ पथ या अंग। वास्तव में योग के आठ पथ योग की आठ अवस्थाएँ (Stages) होती हैं जिनका पालन करते हुए व्यक्ति की आत्मा या जीवात्मा का परमात्मा से मिलन हो सकता है। अष्टांग योग का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होता है, जिससे ज्ञान का प्रकाश चमकता है और विवेक (ख्याति) की प्राप्ति होती है।

अष्टांग योग के अंग या घटक (Components of Ashtanga Yoga): महर्षि पतंजलि ने इसके आठ अंग (अवस्थाएँ) बताए हैं; जैसे
1. यम (Yama, Forbearance):
यम योग की वह अवस्था है जिसमें सामाजिक व नैतिक गुणों के पालन से इंद्रियों व मन को आत्म-केंद्रित किया जाता है। यह अनुशासन का वह साधन है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन से संबंध रखता है। इसका अभ्यास करने से व्यक्ति अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता तथा त्याग करना सीखता है।

2.नियम (Niyama, Observance):
नियम से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समाज स्वीकृत नियमों के अनुसार ही आचरण करना है। जो व्यक्ति नियमों के विरुद्ध आचरण करता है, समाज उसे सम्मान नहीं देता। इसके विपरीत जो व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत नियमों के अनुसार आचरण करता है, समाज उसको सम्मान देता है। नियम के पाँच भाग होते हैं-शौच या शुद्धि (Purity), संतोष (Contentment), तप (Endurance), स्व-अध्याय (Self-Study) और ईश्वर प्राणीधान (Worship with Complete Faith)। इन पर अमल करके व्यक्ति परमात्मा को पा लेता है और आचारिक रूप से शक्तिशाली बनता है।

3. आसन (Asana, Posture): :
जिस अवस्था में शरीर ठीक से बैठ सके, वह आसन है। आसन का अर्थ है-बैठना। योग की सिद्धि के लिए उचित आसन में बैठना बहुत आवश्यक है। महषि पतंजलि के अनुसार, “स्थिर सुख आसनम्।” अर्थात् जिस रीति से हम स्थिरतापूर्वक, बिना हिले-डुले और सुख के साथ बैठ सकें, वह आसन है। ठीक मुद्रा में रहने से मन शांत रहता है।

4. प्राणायाम (Pranayama, Control of Breath):
प्राणायाम में दो शब्द हैं-प्राण व आयाम । प्राण का अर्थ है- श्वास और आयाम का अर्थ है-नियंत्रण व नियमन। इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। इसके तीन भाग हैं-(1) पूरक (Inhalation), (2) रेचक (Exhalation) और (3) कुंभक (Holding of Breath)।

5. प्रत्याहार (Pratyahara, Restraint of the Senses):
अष्टांग योग प्रत्याहार से अभिप्राय ज्ञानेंद्रियों व मन को अपने नियंत्रण में रखने से है। साधारण शब्दों में, प्रत्याहार का अर्थ मन व इन्द्रियों को उनकी संबंधित क्रियाओं से हटकर परमात्मा की ओर लगाना है।

6. धारणा (Dharna, Steadying of the Mind):
अपने मन के निश्चल भाव को धारणा कहते हैं । अष्टांग योग में ‘धारणा’ का बहुत महत्त्व है। धारणा का अर्थ मन को किसी इच्छित विषय में लगाना है। इस प्रकार ध्यान लगाने से व्यक्ति में एक महान् शक्ति उत्पन्न हो जाती है, साथ ही उसके मन की इच्छा भी पूरी हो जाती है।

7.ध्यान (Dhyana, Contemplation):
जब मन पूरी तरह से नियंत्रण में हो जाता है तो ध्यान लगना आरंभ हो जाता है अर्थात् मस्तिष्क की पूर्ण एकाग्रता ही ध्यान कहलाती है।

8. समाधि (Samadhi, Trance):
समाधि योग की सर्वोत्तम अवस्था है। यह सांसारिक दुःख-सुख से ऊपर की अवस्था है। समाधि योग की वह अवस्था है जिसमें साधक को स्वयं का भाव नहीं रहता। वह पूर्ण रूप से अचेत अवस्था में होता है। इस अवस्था में वह उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जहाँ आत्मा व परमात्मा का मिलन होता है।

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प्रश्न 3.
दैनिक जीवन में योग के महत्त्व पर विस्तारपूर्वक नोट लिखें।
अथवा
आधुनिक संदर्भ में योग की महत्ता एवं आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
“आधुनिक युग में योग सभी व्यक्तियों के लिए आवश्यक है।” इस कथन के बारे में अपने बहुमूल्य विचार दीजिए।
अथवा
‘योग’ आधनिक जीवन में स्वस्थपूर्ण जीवन के लिए कैसे सहायक होता है? वर्णन करें।
उत्तर:
हमारा पूरा जीवन ही योगमय है। हमें योग को अपनाकर इसका निरंतर अभ्यास करना चाहिए, क्योंकि योग उन्नति का द्योतक है। यह चाहे शारीरिक उन्नति हो या आध्यात्मिक। अध्यात्म की मान्यताओं की बात करें तो कहा जाता है कि संसार पाँच महाभूतों/तत्त्वों; जैसे पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु के मिश्रण या संयोग से बना है। हमारा शरीर भी पाँच महाभूतों के संयोग से बना है। अध्यात्म में मान्यता है कि पुरुष एवं प्रकृति के योग से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ। जड़ एवं चेतन के योग से जीव जगत् की रचना हुई। प्राणियों के आपस में योग से परिवार का निर्माण हुआ। अतः योग विकास का मूल मंत्र है जिससे हमारे अंतस्थ की उन्नति संभव है। महर्षि पतंजलि ने कहा-“योग मन को मौन करने की प्रक्रिया है। जब यह संभव हो जाता है, तब हमारा मूल प्राकृतिक स्वरूप सामने आता है।” अतः योग हमारे भीतर की चेतना को जगाकर हमें ऊर्जावान एवं हृष्ट-पुष्ट बनाता है। योग के महत्त्व या उपयोगिता का वर्णन निम्नलिखित है
(1) योग मन के विकारों को दूर कर उसे शांत करता है। हमारा मन चंचल और अस्थिर होता है। योग का सतत् अभ्यास, लोभ एवं मोह को त्याग कर मन को शांत एवं निर्विकार बनाया जा सकता है।
(2) कर्म स्वयं में एक योग है। कर्त्तव्य से विमुख न होना ही कर्म योग है। पूरी एकाग्रता एवं निष्ठा के साथ कर्म करना ही योग का उद्देश्य है। अतः योग से कर्म करने की शक्ति मिलती है।
(3) हमारी वाणी से जो विचार निकलते हैं, वे मन एवं मस्तिष्क की उपज होते हैं। यदि मन में कलुष भरा है तो हमारे विचार भी कलुषित होंगे। जब हम योग से मन को नियंत्रित कर लेते हैं तो हमारे विचार सकारात्मक रूप में हमारी वाणी से प्रवाहित होने लगते हैं।
(4) योग से नकारात्मक विचार सकारात्मक प्रवृत्ति में बदल जाते हैं।
(5) योग में सर्वस्व कल्याण हित है। यह धर्म-मजहब से परे की विधा है।
(6) योग आध्यात्मिक व मानसिक विकास में सहायक होता है।
(7) योग हमको उन कष्टों का इलाज करने की सीख देता है जिनको सहन करने की जरूरत नहीं है और उन कष्टों का इलाज करता है जिनको ठीक नहीं किया जा सकता।
(8) योग हमारे जीवन का आधार है। यह हमारी अंतर चेतना जगाकर विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की हिम्मत देता है। यह हमारी जीवन-शैली में बदलाव करने में सहायक है।
(9) योग धर्म, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, ऊँच-नीच तथा अमीर-गरीब आदि से परे है। किसी के साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करता।
(10) योग स्वस्थ रहने की कला है जो ध्यान, साधना, एकाग्रता एवं व्यायाम है। आज सभी का मूल फिट रहना है और यही चाह सभी को योग के प्रति आकर्षित करती है, क्योंकि योग हमारी फिटनेस में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(11) योग मन एवं शरीर में सामंजस्य स्थापित करता है अर्थात् यह शरीर एवं मस्तिष्क के ऐक्य का विज्ञान है।
(12) योग से शरीर की आंतरिक शुद्धता बढ़ती है।
(13) योग से शरीर में रक्त का संचार तीव्र होता है। इससे शरीर का रक्तचाप व तापमान सामान्य रहता है।
(14) योग मोटापे को नियन्त्रित करने में मदद करता है।
(15) योग से शारीरिक मुद्रा (Posture) में सुधार होता है।
(16) योग से मानसिक तनाव व चिंता दूर होती है। इससे मनो-भौतिक विकारों में सुधार आता है।
(17) योग रोगों की रोकथाम व बचाव में सहायता करता है।
(18) यह शारीरिक संस्थानों की कार्यक्षमता को सुचारु रखने में सहायक होता है।
(19) योग आत्म-विश्वास तथा मनोबल निर्माण में सहायता करता है।
(20) योग शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक पहलुओं में एकीकरण करने में सहायक होता है।
आधुनिक युग में, योग की महत्ता को देखते हुए आज योग विश्व-भर में फैल रहा है। योग दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाने से इसकी उपयोगिता या महत्ता और अधिक बढ़ गई है। प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून, 2015) मनाए जाने से यह सिद्ध हो चुका है कि आधुनिक संदर्भ में योग का महत्त्व दिन-प्रतिदिन निरंतर बढ़ रहा है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा

प्रश्न 4.
योगाभ्यास के मुख्य सिद्धांत कौन-कौन-से हैं? वर्णन करें।
अथवा
योगासन करते समय किन-किन मुख्य बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर:
योग एक विभिन्न प्रकार के शारीरिक व्यायामों व आसनों का संग्रह है। यह ऐसी विधा है जिससे मनुष्य को अपने अंदर छिपी हुई शक्तियों को बढ़ाने का अवसर मिलता है। योग धर्म, दर्शन, शारीरिक सभ्यता और मनोविज्ञान का समूह है। योगासन करते समय निम्नलिखित सिद्धांतों अथवा बातों को ध्यान में रखना चाहिए
(1) योगासन का अभ्यास प्रात:काल करना चाहिए।
(2) योगासन एकाग्र मन से करना चाहिए, इससे अधिक लाभ होता है।
(3) योगासन का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।
(4) योगासन करते समय शरीर पर कम-से-कम कपड़े होने चाहिएँ, परन्तु सर्दियों में उचित कपड़े पहनने चाहिएँ।
(5) योगासनों का अभ्यास प्रत्येक आयु में कर सकते हैं, परन्तु अभ्यास करने से पहले किसी अनुभवी व्यक्ति से जानकारी लेनी चाहिए।
(6) योगासन खाली पेट करना चाहिए। योगासन करने के दो घण्टे पश्चात् भोजन करना चाहिए।
(7) योगासन प्रतिदिन करना चाहिए।
(8) यदि शरीर अस्वस्थ या बीमार है तो आसन न करें।
(9) प्रत्येक आसन निश्चित समयानुसार करें।
(10) योग आसन करने वाला स्थान साफ-सुथरा और हवादार होना चाहिए।
(11) योग आसन किसी दरी अथवा चटाई पर किए जाएँ। दरी अथवा चटाई समतल स्थान पर बिछी होनी चाहिए।
(12) योगाभ्यास शौच क्रिया के पश्चात् व सुबह खाना खाने से पहले करना चाहिए।
(13) प्रत्येक अभ्यास के पश्चात् विश्राम का अंतर होना चाहिए। विश्राम करने के लिए शवासन करना चाहिए।
(14) प्रत्येक आसन करते समय फेफड़ों के अंदर भरी हुई हवा बाहर निकाल दें। आसन करने में सरलता होगी।
(15) योग करते समय जब भी थकावट हो तो श्वासन या मकरासन कर लेना चाहिए।
(16) योग आसन अपनी शक्ति के अनुसार ही करना चाहिए।
(17) योग अभ्यास से पूरा लाभ उठाने के लिए शरीर को पौष्टिक व संतुलित आहार देना बहुत जरूरी है।
(18) आसन करते समय श्वास हमेशा नाक द्वारा ही लें।
(19) हवा बाहर निकालने (Exhale) के उपरांत श्वास क्रिया रोकने का अभ्यास किया जाए।
(20) एक आसन करने के पश्चात् दूसरा आसन उस आसन के विपरीत किया जाए; जैसे धनुरासन के पश्चात् पश्चिमोत्तानासन करें। इस प्रकार शारीरिक ढाँचा ठीक रहेगा।

प्रश्न 5.
“योग भारत की एक विरासत है।” इस कथन को स्पष्ट करें।
उत्तर:
योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि भारत का इतिहास। इस बारे में अभी तक ठीक तरह पता नहीं लग सका है कि योग की उत्पत्ति कब हुई? लेकिन प्रामाणिक रूप से यह कहा जा सकता है कि योग का इतिहास भारत के इतिहास जितना ही पुराना है अर्थात् योग भारत की ही देन या विरासत है। इसलिए हमें योग की उत्पत्ति के बारे में जानने के लिए भारतीय इतिहास के कालों को जानना होगा, जिनसे स्पष्ट हो जाएगा कि योग भारत की एक विरासत है।
1. पूर्व वैदिक काल (Pre-Vedic Period): हड़प्पा सभ्यता के दो प्रसिद्ध नगरों-हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों व प्रतिमाओं से पता चलता है कि उस काल के दौरान भी योग किसी-न-किसी रूप में प्रचलित था।

2. वैदिक काल (Vedic Period): वैदिक काल में रचित वेद ‘ऋग्वेद’ में लिखित ‘युनजते’ शब्द से यह अर्थ स्पष्ट होता है कि लोग इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए योग क्रियाएँ किया करते थे। हालांकि वैदिक ग्रंथों में ‘योग’ और ‘योगी’ शब्दों का स्पष्ट रूप से प्रयोग नहीं किया गया है।

3. उपनिषद् काल (Upnishad Period): योग की उत्पत्ति का वास्तविक आधार उपनिषदों में पाया जाता है। उपनिषद् काल में रचित ‘कठोपनिषद्’ में ‘योग’ शब्द का प्रयोग तकनीकी रूप से किया गया है। उपनिषदों में यौगिक क्रियाओं का भी वर्णन किया गया है।

4. काव्य काल (Epic Period): काव्य काल में रचित महाकाव्यों में योग के विभिन्न रूपों या शाखाओं के नामों का उल्लेख किया गया है। महाकाव्यों; जैसे ‘रामायण’ व ‘महाभारत’ में यौगिक क्रियाओं के रूपों की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। रामायण के समय योग प्रक्रिया काफी प्रसिद्ध थी। भगवद्गीता’ में भी योग के तीन प्रकारों का वर्णन है।

5. सूत्र काल (Sutra Period): योग का पितामह महर्षि पतंजलि को माना जाता है, जिन्होंने योग पर आधारित प्रथम पुस्तक ‘योगसूत्र’ की रचना की। उन्होंने इस पुस्तक में योग के अंगों का व्यापक वर्णन किया है।

6. मध्यकाल (Medieval Period): इस काल में दो संप्रदाय; जैसे नाथ और संत (भक्ति) काफी प्रसिद्ध थे जिनमें यौगिक क्रियाएँ काफी प्रचलित थीं। नाथ हठ योग का और संत विभिन्न यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करते थे। इस प्रकार इन संप्रदायों या पंथों में योग काफी प्रसिद्ध था।

7.आधुनिक या वर्तमान काल (Modern Period): इस काल में स्वामी विवेकानंद, स्वामी योगेन्द्र, श्री अरबिन्दो और स्वामी रामदेव आदि ने योग के ज्ञान को न केवल भारत में बल्कि भारत से बाहर भी फैलाने का प्रयास किया है। स्वामी रामदेव आज भी योग को सारे विश्व में लोकप्रिय बनाने हेतु निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त वर्णित कालों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि योग भारतीय विरासत है। योग की उत्पत्ति भारत में ही हुई और विकास भी भारत में हुआ है। आज योग विश्व के विभिन्न देशों में फैल रहा है। इसी फैलाव के कारण प्रतिवर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।

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प्रश्न 6.
योग स्वास्थ्य का साधन है-इस विषय में अपने विचार प्रकट करें।
अथवा
“योगाभ्यास तंदुरुस्ती का साधन है।” इस कथन पर अपने विचार प्रकट करें।
अथवा
योगाभ्यास की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
योग का उद्देश्य है कि व्यक्ति को शारीरिक तौर पर तंदुरुस्त, मानसिक स्तर पर दृढ़ और चेतन, आचार-विचार में अनुशासित करना है। अतः योगाभ्यास तंदुरुस्ती का साधन है। इसकी मुख्य विशेषताएँ अग्रलिखित हैं
(1) योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति की मानसिक जटिलताएँ मिट जाती हैं। वह मानसिक तौर से संतुष्ट और शक्तिशाली हो जाता है।
(2) शरीर के आंतरिक अंगों की सफाई के लिए योगाभ्यास में खास क्रिया विधि अपनाई जाती है। धौती क्रिया से जिगर, बस्ती क्रिया से आंतड़ियों व नेती क्रिया से पेट की सफाई की जाती है।
(3) योग द्वारा कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है; जैसे चक्रासन द्वारा हर्निया रोग, शलभासन द्वारा मधुमेह का रोग दूर किए जाते हैं । योगाभ्यास द्वारा रक्त के उच्च दबाव (High Blood Pressure) तथा दमा (Asthma) जैसे रोग ठीक हो जाते हैं।
(4) योगाभ्यास द्वारा शारीरिक विकृतियों अर्थात् आसन को ठीक किया जा सकता है; जैसे रीढ़ की हड्डी का कूबड़, घुटनों का आपस में टकराना, टेढ़ी गर्दन, चपटे पैर आदि विकृतियों को दूर करने में योगासन लाभदायक हैं।
(5) योगासनों द्वारा मनुष्य को अपने संवेगों और अन्य अनुचित इच्छाओं पर नियंत्रण पाने की शक्ति मिलती है।
(6) योगाभ्यास द्वारा शारीरिक अंगों में लचक आती है; जैसे धनुरासन तथा हलासन रीढ़ की हड्डी में लचक बढ़ाते हैं।
(7) योग का शारीरिक संस्थानों की कार्यक्षमता पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। यह इनकी कार्यक्षमता को सुचारु करता है।
(8) योगाभ्यास करने से बुद्धि तीव्र होती है। शीर्षासन करने से दिमाग तेज़ और स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
(9) योग आसन करने से शरीर में चुस्ती और ताज़गी पैदा होती है।
(10) योग आसन मन को प्रसन्नता प्रदान करता है। मन सन्तुलित रहता है। जहां भोजन शरीर का आहार है, वहीं प्रसन्नता मन का आहार है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए दोनों की आवश्यकता होती है।
(11) योगाभ्यास द्वारा शरीर ताल में आ जाता है जो शरीर को कम शारीरिक बल खर्च करके अधिक कार्य करने का ढंग बताता है। योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ जाती है।
(12) योगाभ्यास करने वाला व्यक्ति देर तक कार्य करते रहने तक भी थकावट अनुभव नहीं करता। वह अधिक कार्य कर सकता है और अपने लिए अच्छे आहार के बढ़िया साधन प्राप्त कर सकता है। अतः योग शारीरिक तथा मानसिक थकावट दूर करने में सहायक होता है। अतः योग शारीरिक तथा मानसिक थकावट दूर करने में सहायक होता है।

प्रश्न 7.
प्राणायाम से क्या अभिप्राय है? इसके विभिन्न प्रकार बताते हुए उनके लाभ बताएँ।
अथवा
प्राणायाम क्या है? प्राणायाम के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
अथवा
प्राणायाम क्या है? किन्हीं तीन प्राणायामों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राणायाम का अर्थ (Meaning of Pranayama):
प्राणायाम में दो शब्द हैं-प्राण व आयाम।प्राण का अर्थ है-श्वास और आयाम का अर्थ है-नियंत्रण व नियमन । इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं। अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोकना ही प्राणायाम है।”

प्राणायाम के प्रकार और उनके लाभ (Types of Pranayama and their Benefits):
प्राणायाम में कई प्रकार की क्रियाएँ हैं; जैसे लंबे-लंबे श्वास खींचना, आराम से श्वास क्रिया करना, सैर करते समय प्राणायाम करना, समाधि लगाकर प्राणायाम करना, सूर्यभेदी प्राणायाम, उज्जई प्राणायाम, शीतकारी प्राणायाम, शीतली प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम, नाड़ी-शोधन प्राणायाम और कपालभाती प्राणायाम आदि। परंतु हठ योग में आठ प्राणायामों का वर्णन है। संक्षेप में, इनका वर्णन निम्नलिखित है-
1.सूर्यभेदी प्राणायाम (Suryabhedi Pranayama):
सूर्यभेदी प्राणायाम में बाएँ हाथ की उंगली के साथ नाक का बायाँ छेद बंद कर लिया जाता है। दाईं नाक से श्वास लिया जाता है। श्वास अंदर खींचकर कुम्भक किया जाता है। जब तक श्वास रोका जा सके, रोकना चाहिए। इसके पश्चात् दाएँ अंगूठे के साथ दाएँ छेद को दबाकर बाएँ छेद से आवाज़ करते हुए श्वास को बाहर निकालना चाहिए। इसमें श्वास धीरे-धीरे लेना चाहिए। कुम्भक से श्वास रोकने का समय धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। इसमें पूरक दाईं नाक से करते हैं और दाईं नाक सूर्य नाड़ी से जुड़ी होती है। इसी कारण इसको सूर्यभेदी प्राणायाम कहते हैं।

लाभ (Benefits): यह प्राणायाम शरीर के सैलों को शुद्ध करता है और इनको शक्तिशाली बनाता है। इससे पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं और आंतड़ियों का रोग दूर हो जाता है। यह प्राणायाम शरीर में गर्मी पैदा करता है।

2. उज्जई प्राणायाम (Ujjayi Pranayama):
श्वास को शक्ति से बाहर निकालने और अंदर खींचने को उज्जई प्राणायाम कहते हैं। उज्जई प्राणायाम को पद्मासन लगाकर करना चाहिए। श्वास लेते समय खर्राटों जैसी आवाज़ आनी चाहिए। यह अभ्यास 10-15 बार दोहराना चाहिए।

लाभ (Benefits): उज्जई प्राणायाम करने से टांसल, गला, नाक और कान की बीमारी से आराम मिलता है। इसके करने से आवाज़ में मधुरता आ जाती है।

3. शीतकारी प्राणायाम (Sheetkari Pranayama):
इस प्राणायाम से शरीर को ठंडक पहुँचती है। इसको करते समय सी-सी की आवाज़ निकलती है। इसके कारण ही इसका नाम शीतकारी प्राणायाम है। सिद्धासन में बैठकर दोनों हाथों को घुटनों पर रख लिया जाता है। आँखें बंद करके दाँत मिलाकर जीभ का अगला भाग दाँतों को लगाकर बाकी का भाग तालु के साथ लगा लिया जाता है। होंठ खुले रखे जाते हैं और मुँह द्वारा जोर से श्वास खींचा जाता है। श्वास खींचने के पश्चात् श्वास रोक लिया जाता है। इसके पश्चात् नाक के छेदों द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है।

लाभ (Benefits): इससे गले, दाँतों की बीमारियों और शरीर की गर्मी दूर होती है। इससे मन स्थिर और गुस्से पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

4. शीतली प्राणायाम (Shitali Pranayama):
इस प्राणायाम से शरीर में ठंडक बढ़ती है। पद्मासन लगाकर नाक के दोनों छेदों द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है। जीभ को मुँह से बाहर निकालकर दोनों किनारे मोड़कर नाली-सी बना ली जाती है। श्वास अंदर खींचते हुए नाली का प्रयोग करना चाहिए। फिर जीभ मुँह में करके श्वास रोक लिया जाता है। श्वास रोकने के पश्चात् नाक के दोनों छेदों में से श्वास बाहर निकाला जाता है। इस अभ्यास को 8-10 बार दोहराना चाहिए।

लाभ (Benefits): शीतली प्राणायाम रक्त को शुद्ध करता है। यह चमड़ी के रोग, क्षय रोग तथा पित्त की अधिकता जैसे रोगों को दूर करने में सहायक होता है।

5. भस्त्रिका प्राणायाम (Bhastrika Pranayama):
भस्त्रिका प्राणायाम में लुहार की धौंकनी की तरह श्वास अंदर और बाहर निकाला जाता है। पहले नाक के एक छेद द्वारा श्वास लेकर दूसरे छेद द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है। इसके पश्चात् दोनों छेदों से श्वास अंदर और बाहर किया जाता है। भस्त्रिका प्राणायाम शुरू में धीरे-धीरे करना चाहिए और बाद में इसकी रफ्तार बढ़ाई जानी चाहिए। पूरक व रेचक करते समय पेट अवश्य क्रियाशील रहना चाहिए।

लाभ (Benefits): यह प्राणायाम करने से मनुष्य का मोटापा कम होता है। मन की इच्छा बलवान होती है। इससे गले की सूजन ठीक होती है। यह प्राणायाम करने से पेट के अंग मजबूत होकर सुचारु रूप से कार्य करते हैं और हमारी पाचन शक्ति भी बढ़ती है।

6. भ्रामरी प्राणायाम (Bhramari Pranayama):
भ्रामरी प्राणायाम को किसी भी आसन में बैठकर कोहनियों को कंधों के बराबर करके श्वास लिया जाता है। थोड़ी देर श्वास रोकने के पश्चात् श्वास बाहर निकालते समय गले से भंवरे जैसी आवाज़ निकाली जाती है। फिर रेचक (श्वास को बाहर छोड़ना) करते समय भी भंवरे जैसी आवाज़ उत्पन्न होती है। इस प्राणायाम का अभ्यास 5-10 बार तक दोहराना चाहिए।

लाभ (Benefits): इस प्राणायाम से आवाज़ साफ और मधुर होती है। गले की बीमारियाँ दूर होती हैं। यह मस्तिष्क के रोगों को दूर करने में लाभदायक है।

7.मूर्छा (नाड़ी शोधन) प्राणायाम (Moorchha or Nadi Sodhana Pranayama):
इस प्राणायाम से नाड़ियों की सफाई होती है। सिद्धासन में बैठकर नाक के बाईं ओर से श्वास लेना चाहिए। श्वास लेकर कुम्भक करना चाहिए। इसके पश्चात् दूसरी ओर से श्वास धीरे-धीरे बाहर निकाला जाता है। इस तरह से फिर दाईं नाक से श्वास अंदर भरा जाता है। कुछ समय के लिए कुम्भक किया जाता है और साथ ही बाएँ नाक द्वारा श्वास बाहर निकाल दिया जाता है। कुंभक से ऑक्सीजन फेफड़ों के सारे छेदों में पहुँच जाती है। रेचक से फेफड़े सिकुड़ जाते हैं और हवा बाहर निकल जाती है। इस क्रिया को 10-15 बार दोहराना चाहिए।

लाभ (Benefits): इस प्राणायाम से फेफड़ों की बीमारियाँ और दिल की कमजोरी को दूर किया जा सकता है। यह मन स्थिर रखने में सहायक होता है।

8. कपालभाती प्राणायाम (Kapalbhati Pranayama): कपालभाती प्राणायाम और भस्त्रिका प्राणायाम में यही अंतर है कि इसमें रेचक करते समय जोर लगाया जाता है परंतु भस्त्रिका प्राणायाम में पूरक और रेचक दोनों में ही जोर लगाना पड़ता है। सिद्धासन या पद्मासन में बैठकर श्वास को बाहर छोड़ने व अंदर लेने की क्रिया करनी चाहिए। साँस को बाहर छोड़ते या अंदर लेते समय पेट को अंदर-बाहर की ओर धकेलना चाहिए।

लाभ (Benefits): इस प्राणायाम के अभ्यास से श्वास प्रणाली ठीक हो जाती है और फेफड़े विकसित होते हैं। रक्त साफ होता है और दमे के रोगी को आराम मिलता है। कब्ज, गैस की समस्याओं को दूर करने में यह प्राणायाप लाभदायक होता है।

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प्रश्न 8.
योग क्रियाओं के शारीरिक प्रणालियों पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए।
अथवा
योगाभ्यास शरीर के संस्थानों की शक्तियों का विकास करने में कैसे सहायक होते हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
योग क्रियाओं के शारीरिक प्रणालियों या संस्थानों पर पड़ने वाले प्रभाव निम्नलिखित हैं
1. रक्त संचार प्रणाली पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Circulatory System):
रक्त संचार प्रणाली (संस्थान) ही मनुष्य के शरीर में ठीक ढंग से रक्त का संचालन करती है। रक्त में प्लाज्मा, लाल कण, सफेद कण और बिम्बाणु होते हैं। लाल कणों में हीमोग्लोबिन होता है जिसका मुख्य कार्य ऑक्सीजन को लेकर जाना है। सफेद कण जो कम गिनती में होते हैं, वे बाहरी बीमारी के बैक्टीरिया के साथ लड़ते हैं और उनसे शरीर की रक्षा करते हैं। योग क्रियाओं से शरीर का तापमान एक समान बना रहता है। इनसे फेफड़ों में ऑक्सीजन की वृद्धि होती है। ऑक्सीजन रक्त में मिलकर व्यर्थ पदार्थ फेफड़ों में लाकर तेज़ी से बाहर निकाल देती है। इनसे व्यक्ति के शरीर में रक्त की गति तेज़ होती है। योग क्रिया करने से रक्त की रचना में अंतर आ जाता है। रक्त में हीमोग्लोबिन और लाल रक्ताणुओं की मात्रा में वृद्धि होती है। लाल रक्ताणु की गिनती बढ़ने के कारण ऑक्सीजन की अधिक मात्रा मिलती है। सफेद रक्ताणुओं के बढ़ने से हमारा शरीर रोगों का मुकाबला करने के योग्य होता है।

2. श्वास प्रणाली पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Respiratory System):
योग क्रियाएँ करने से श्वास की गति तेज़ हो जाती है, जिससे कार्बन-डाइऑक्साइड अधिक मात्रा में बाहर निकलती है और ऑक्सीजन की मात्रा फेफड़ों में बढ़ती है। योग क्रियाओं से फेफड़ों की क्षमता (Lung Capacity) में वृद्धि होती है। इनसे श्वास क्रिया ठीक होने के कारण हम कई रोगों से बच जाते हैं; जैसे जुकाम, सिरदर्द आदि। इनसे श्वास क्रिया तेज़ होती है, परिणामस्वरूप फेफड़ों को अधिक कार्य करना पड़ता है जिस कारण छाती फैल जाती है। योग क्रियाएँ करने से श्वसन प्रणाली संबंधी विकार दूर होते हैं।

3. पाचन प्रणाली पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Digestive System):
योग क्रियाएँ करते समय शरीर के अंगों को अधिक रक्त की आवश्यकता होती है क्योंकि क्रियाओं/गतिविधियों को अधिक शक्ति की आवश्यकता होती हैं। भोजन से शरीर को शक्ति व ऊर्जा प्राप्त होती है। हम जो भोजन खाते हैं, उसको शरीर में पचाने का कार्य पाचन प्रणाली करती है। यह भोजन को पेस्ट की शक्ल में बदलकर आँतड़ियों में पहुँचाती है। योग क्रियाओं से भूख बढ़ जाती है। इनसे पाचन अंगों की क्षमता और शक्ति में वृद्धि होती है। इनसे आंतड़ियों की मालिश हो जाती है जिससे मल-त्याग ठीक ढंग से होता है। इनसे कब्ज व पेट संबंधी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। इनसे आंतड़ियों में विकार पैदा करने वाले तत्त्वों का अंत हो जाता है। इनसे लार गिल्टियों के कार्य करने की क्षमता भी बढ़ जाती है।

4. स्नायु या नाड़ी संस्थान पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Nervous System):
योग क्रियाएँ तभी अच्छी तरह संभव हो सकती हैं यदि हमारा मस्तिष्क भली-भाँति शरीर के अंगों को आदेश दे सके। योग क्रियाओं से हमारे शरीर के अंगों में गति आ जाती है जिससे हमारा नाड़ी संस्थान तीव्र गति से कार्य करने लग जाता है। योग क्रियाओं से नाड़ी संस्थान संबंधी दोष दूर किए जा सकते हैं। नाड़ी संस्थान के ठीक कार्य करने से माँसपेशियों में ठीक तालमेल हो जाता है। इनसे मनुष्य के शरीर में प्रतिवर्त क्रियाओं की संख्या बढ़ जाती है। योग क्रियाओं से शरीर में भिन्न-भिन्न प्रणालियों के कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होती है जिस कारण थकावट देर से होती है।

5. माँसपेशी संस्थान पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Muscular System):
योग क्रियाएँ करते समय हमारी माँसपेशियों को शक्ति की आवश्यकता होती है। यह शक्ति उनको रक्त संचार प्रणाली से प्राप्त होती है। इससे माँसपेशियों में रासायनिक परिवर्तन आता है। इस परिवर्तन के कारण पैदा हुई ऊर्जा का कुछ भाग माँसपेशियों के सिकुड़ने और फैलने में समाप्त हो जाता है। योग क्रियाएँ करने से हमारी प्रणालियों की गति में वृद्धि होती है। योग क्रियाएँ तभी संभव हैं जब माँसपेशियों में तालमेल हो। क्रियाएँ करने से माँसपेशियों में तालमेल बढ़ जाता है और वे कार्य करने के योग्य बन जाती हैं । योग क्रियाओं द्वारा माँसपेशियों को ठीक ढंग से कार्य करने के योग्य बनाया जा सकता है। ये क्रियाएँ करने से शरीर के प्रत्येक भाग में रक्त की उचित मात्रा पहुँचती है और दिल की मांसपेशियाँ भी शीघ्रता से कार्य करने लगती हैं। इनसे माँसपेशियों में लचकता आ जाती है। माँसपेशियों में तालमेल होने से ये उत्तेजना अथवा प्रोत्साहन से प्रतिक्रिया करने में समर्थ हो जाती हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
योग के इतिहास पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि भारत का इतिहास। इस बारे में अभी तक ठीक तरह पता नहीं लग सका कि योग कब शुरू हुआ? परंतु योग भारत की ही देन या विरासत है। भारत में योग लगभग तीन हजार ईसा पूर्व पहले शुरू हुआ। आधुनिक समय में योग का आदि गुरु महर्षि पतंजलि को माना गया है। हजारों वर्ष पहले हिमालय में कांति सरोवर झील के किनारे पर आदि योगी ने अपने योग सम्बन्धी ज्ञान को पौराणिक सात ऋषियों को प्रदान किया। इन ऋषियों ने योग का विश्व के विभिन्न भागों में प्रचार किया। परन्तु व्यापक स्तर पर योग को सिन्धु घाटी सभ्यता के एक अमित सांस्कृतिक परिणाम के रूप में समझा जाता है। महर्षि पतंजलि द्वारा योग पर प्रथम पुस्तक ‘योग-सूत्र’ लिखी गई, जिसमें उन्होंने योग की अवस्थाओं एवं प्रकारों का विस्तृत उल्लेख किया है। हिंदू धर्म के ग्रंथ उपनिषद्’ में योग के सिद्धांतों या नियमों का वर्णन किया गया है। महर्षि पतंजलि के बाद अनेक योग गुरुओं एवं ऋषियों ने इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। भारत के मध्यकालीन युग में कई योगियों ने योग के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। इसने मानवता के भौतिक और आध्यात्मिक विकास में अहम् भूमिका निभाई है।

प्रश्न 2.
योग क्या है? योग ने किन व्यापक श्रेणियों को जन्म दिया है?
अथवा
‘योग’ का शाब्दिक अर्थ क्या है? इसकी चार श्रेणियों का उल्लेख करें।
उत्तर:
योग-‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘युज’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ है-जुड़ना या एक होना। जुड़ना या एक होने का अर्थ है-व्यक्ति की आत्मा को ब्रह्मांड या परमात्मा की चेतना या सार्वभौमिक आत्मा के साथ जुड़ना।
योग की श्रेणियाँ-योग व्यक्ति के शरीर, मन, भावना एवं शक्ति के स्तर पर कार्य करता है। योग ने चार व्यापक श्रेणियों को जन्म दिया है। जैसे
1. कर्म योग-कर्म योग जिसमें हम अपने शरीर का उपयोग करते हैं।
2. ज्ञान योग-ज्ञान योग जिसमें हम अपने मन या मस्तिष्क का उपयोग करते हैं।
3. भक्ति योग-भक्ति योग जिसमें हम अपने संवेगों या भावनाओं का उपयोग करते हैं।
4. क्रिया योग-क्रिया योग जिसमें हम अपनी शारीरिक ऊर्जा या शक्ति का उपयोग करते हैं।

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प्रश्न 3.
आसन से क्या तात्पर्य है? इसके प्रकारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आसन-जिस अवस्था में शरीर ठीक से बैठ सके, वह आसन है। आसन का अर्थ है-बैठना। योग की सिद्धि के लिए उचित आसन में बैठना बहुत आवश्यक है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “स्थिर सुख आसनम्।” अर्थात् जिस रीति से हम स्थिरतापूर्वक, बिना हिले-डुले और सुख के साथ बैठ सकें, वह आसन है। ठीक मुद्रा में रहने से मन शांत रहता है। आसन के प्रकार-आसन के प्रकारों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है-
1. ध्यानात्मक आसन-ध्यानात्मक आसन वे आसन होते हैं जिनको करने से व्यक्ति की ध्यान करने की क्षमता विकसित होती है; जैसे
(1) पद्मासन,
(2) सिद्धासन,
(3) गोमुखासन आदि।

2. विश्रामात्मक आसन-विश्रामात्मक आसन करने से शारीरिक एवं मानसिक थकावट दूर होती है और शरीर को पूर्ण विश्राम मिलता है; जैसे
(1) शवासन,
(2) मकरासन,
(3) शशांकासन आदि।

3. संवर्धनात्मक आसन-संवर्धनात्मक आसन शरीर की सभी क्रियाओं को व्यवस्थित करके प्राणायाम, प्रत्याहार व धारणा को सामर्थ्य देते है; जैसे
(1) शीर्षासन,
(2) सर्वांगासन,
(3) हलासन आदि।

प्रश्न 4.
योग के लाभों या महत्त्व का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जिस तरह से सूर्य अपनी रोशनी करने में किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करता, उसी प्रकार से योग करके कोई भी इसका लाभ प्राप्त कर सकता है। दुनिया के प्रत्येक मनुष्य को योग के लाभ समभाव से प्राप्त होते हैं; जैसे
(1) योग मस्तिष्क को शांत करने का अभ्यास है अर्थात् इससे मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।
(2) योग से बीमारियों से छुटकारा मिलता है और हमारे स्वास्थ्य में सुधार होता है।
(3) योग एक साधना है जिससे न सिर्फ शरीर बल्कि मन भी स्वस्थ रहता है।
(4) योग से मानसिक तनाव को भी दूर किया जा सकता है।
(5) योग से सकारात्मक प्रवृत्ति में वृद्धि होती है।
(6) योग तन-मन, चित्त-वृत्ति और स्वास्थ्य-सोच को विकार मुक्त करता है।
(7) योग से आत्मिक सुख एवं शान्ति प्राप्त होती है।

प्रश्न 5.
रक्त संचार प्रणाली पर योग क्रियाओं के क्या प्रभाव पड़ते हैं?
अथवा
योग क्रियाओं का रक्त प्रवाह तंत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
योग क्रियाओं के रक्त संचार प्रणाली पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं
(1) योग क्रियाओं से शरीर का तापमान एक समान बना रहता है।
(2) योग करने से फेफड़ों में ऑक्सीजन की वृद्धि होती है। ऑक्सीजन रक्त में मिलकर व्यर्थ पदार्थ फेफड़ों में लाकर तेज़ी से बाहर निकाल देती है।
(3) इनसे व्यक्ति के शरीर में रक्त की गति तेज़ होती है।
(4) इनसे कोशिकाएँ फूल जाती हैं जिससे शरीर में रक्त का संचार बढ़ जाता है।
(5) योग क्रिया करने से रक्त की रचना में अंतर आ जाता है। रक्त में हीमोग्लोबिन और लाल रक्ताणुओं की मात्रा में वृद्धि होती है। लाल रक्ताणु की संख्या बढ़ने के कारण ऑक्सीजन की अधिक मात्रा मिलती है। सफेद रक्ताणुओं के बढ़ने से हमारा शरीर रोगों का मुकाबला करने के योग्य होता है।

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प्रश्न 6.
यम क्या हैं ? इनका संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
अष्टांग योग के यमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यम: यम योग की वह अवस्था है जिसमें सामाजिक व नैतिक गुणों के पालन से इंद्रियों व मन को आत्म-केंद्रित किया जाता है। यह अनुशासन का वह साधन है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन से संबंध रखता है। इसका अभ्यास करने से व्यक्ति अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता तथा त्याग करना सीखता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार यम पाँच होते हैं-
1. सत्य-सत्य से अभिप्राय मन की शुद्धता या सच बोलने से है। हमें हमेशा अपने विचार, शब्द, मन और कर्म से सत्यवादी होना चाहिए।
2. अहिंसा-मन, वचन व कर्म आदि से किसी को भी शारीरिक-मानसिक स्तर पर कोई हानि या आघात न पहुँचाना अहिंसा कहलाता है। हमें हमेशा हिंसात्मक और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहना चाहिए।
3. अस्तेय-मन, वचन व कर्म से दूसरों की कोई वस्तु या चीज न चाहना या चुराना अस्तेय कहलाता है।
4. अपरिग्रह-इंद्रियों को प्रसन्न रखने वाले साधनों तथा धन-संपत्ति का अनावश्यक संग्रह न करना, कम आवश्यकताओं व इच्छाओं के साथ जीवन व्यतीत करना, अपरिग्रह कहलाता है। हमें कभी भी न तो गलत तरीकों से धन कमाना चाहिए और न ही एकत्रित करना चाहिए।
5. ब्रह्मचर्य-यौन संबंधों में नियंत्रण, चारित्रिक संयम ब्रह्मचर्य है। ऐसी चीजों का प्रयोग न करना जो यौन संबंधी इच्छाओं को उत्तेजित करती हैं। इसके अंतर्गत हमें कामवासना का पूर्णत: त्याग करना पड़ता है।

प्रश्न 7.
नियम से क्या तात्पर्य है? नियमों को सूचीबद्ध कीजिए।
अथवा
नियमों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नियम-नियम से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समाज स्वीकृत नियमों के अनुसार ही आचरण करना है। जो व्यक्ति नियमों के विरुद्ध आचरण करता है, समाज उसे सम्मान नहीं देता। इसके विपरीत जो व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत नियमों के अनुसार आचरण करता है, समाज उसको सम्मान देता है। नियम के पाँच भाग होते हैं। इन पर अमल करके व्यक्ति परमात्मा को पा लेता है।
1.शौच-शौच का अर्थ है-शुद्धता। हमें हमेशा अपना शरीर आंतरिक व बाहरी रूप से साफ व स्वस्थ रखना चाहिए।
2. संतोष-संतोष का अर्थ है-संतुष्टि। हमें उसी में संतुष्ट रहना चाहिए जो परमात्मा ने हमें दिया है।
3. तप-हमें प्रत्येक स्थिति में एक-सा व्यवहार करना चाहिए। जीवन में आने वाली मुश्किलों व परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक सहन करना तथा लक्ष्य-प्राप्ति की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहना तप कहलाता है।
4. स्वाध्याय-ग्रंथों, वेदों, उपनिषदों, गीता व अन्य महान् पुस्तकों का निष्ठा भाव से अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है।
5. ईश्वर प्राणीधान-ईश्वर प्राणीधान नियम की महत्त्वपूर्ण अवस्था है। ईश्वर को अपने सभी कार्मों को अर्पित करना ईश्वर प्राणीधान कहलाता है।

प्रश्न 8.
योग के रक्षात्मक एवं चिकित्सीय प्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
योग के नैदानिक व उपचारात्मक प्रभावों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
योग एक शारीरिक व्यायाम ही नहीं, बल्कि जीवन का दर्शनशास्त्र भी है। यह वह क्रिया है जो शारीरिक क्रियाओं तथा आध्यात्मिक क्रियाओं में संतुलन बनाए रखती है। वर्तमान भौतिक समाज आध्यात्मिक शून्यता के बिना रह रहा है, जहाँ योग सहायता कर सकता है। आधुनिक समय में योग के निम्नलिखित उपचार तथा रोकथाम संबंधी प्रभाव पड़ते हैं
(1) योग पेट तथा पाचन तंत्र की अनेक बीमारियों की रोकथाम में सहायता करता है।
(2) योग क्रियाओं के द्वारा कफ़, वात व पित्त का संतुलन बना रहता है।
(3) यौगिक क्रियाएँ शारीरिक अंगों को शुद्ध करती हैं तथा साधक के स्वास्थ्य में सुधार लाती हैं।
(4) योग के माध्यम से मानसिक शांति व स्व-नियंत्रण उत्पन्न होता है।
(5) योग अनेक मुद्रा-विकृतियों को ठीक करने में सहायता करता है।
(6) नियमित व निरंतर यौगिक क्रियाएँ, मस्तिष्क के उच्चतर केंद्रों को उद्दीप्त करती हैं, जो विभिन्न प्रकार के विकारों की रोकथाम करते हैं।
(7) योग से मानसिक शांति तथा संतुलन बनाए रखा जा सकता है।

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प्रश्न 9.
पद्मासन व धनुरासन के मुख्य लाभ बताएँ।
उत्तर:
पद्मासन के लाभ:
(1) पद्मासन से पाचन शक्ति बढ़ती है,
(2) यह मन की एकाग्रता के लिए सर्वोत्तम उपाय है,
(3) यह दिल तथा पेट के रोगों को दूर करने में सहायक होता है,
(4) यह कब्ज और फाइलेरिया जैसे रोगों को दूर करता है।

धनुरासन के लाभ:
(1) यह कब्ज, अपच, और जिगर की गड़बड़ी को दूर करने में लाभकारी होता है,
(2) इससे रीढ़ को मजबूती मिलती है,
(3) यह शरीर के पाचन संस्थान, उत्सर्जन संस्थान और प्रजनन संस्थान को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 10.
चक्रासन व शवासन के मुख्य लाभ बताएँ।
उत्तर:
चक्रासन के लाभ-
(1) चक्रासन से शरीर में लचक पैदा होती है,
(2) इससे पेट की चर्बी कम होती है,
(3) रीढ़ की हड्डी लचकदार बनती है,
(4) पेट की बहुत-सी बीमारियाँ दूर होती हैं।

शवासन के लाभ-
(1) शवासन के अभ्यास से रक्तचाप ठीक होता है,
(2) यह हृदय को संतुलित स्थिति में रखता है,
(3) इससे मन शांत रहता है,
(4) इससे तनाव, निराशा, दबाव और थकान दूर होती है।

प्रश्न 11.
पाचन प्रणाली पर योग क्रियाओं का क्या असर पड़ता है?
अथवा
योग क्रियाएँ पाचन प्रणाली को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
उत्तर:
योग क्रियाएँ पाचन प्रणाली को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित करती हैं
(1) योग क्रियाओं से भूख बढ़ जाती है।
(2) योग क्रियाओं से पाचन अंगों की क्षमता और शक्ति में वृद्धि होती है।
(3) योग क्रियाओं से आंतड़ियों की मालिश हो जाती है जिससे मल-त्याग ठीक ढंग से होता है।
(4) योग क्रियाओं से कब्ज व पेट संबंधी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं।
(5) योग क्रियाओं से आंतड़ियों में विकार पैदा करने वाले तत्त्वों का अंत हो जाता है।
(6) योग क्रियाओं से लार गिल्टियों के कार्य करने की क्षमता भी बढ़ जाती है।

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प्रश्न 12.
अष्टांग योग में ध्यान का क्या महत्त्व है?
अथवा
ध्यान के हमारे लिए क्या-क्या लाभ हैं?
उत्तर:
ध्यान के हमारे लिए लाभ या महत्त्व निम्नलिखित हैं
(1) ध्यान हमारे भीतर की शुद्धता के ऊपर पड़े क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, कुंठा आदि के आवरणों को हटाकर हमें सकारात्मक बनाता है।
(2) ध्यान से हमें शान्ति एवं प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।
(3) ध्यान सर्वस्व प्रेम की भावना एवं सृजन शक्ति को जगाता है।
(4) ध्यान से मन शान्त एवं शुद्ध होता है।

प्रश्न 13.
प्राणायाम क्या है? इसकी तीन अवस्थाओं का वर्णन करें।
अथवा
‘प्राणायाम’ पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
प्राणायाम का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके अंगों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्राणायाम का अर्थ-प्राणायाम में दो शब्द हैं-प्राण व आयाम। प्राण का अर्थ है-श्वास और आयाम का अर्थ हैनियंत्रण व नियमन। इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोकना ही प्राणायाम है।”

प्राणायाम की अवस्थाएँ या अंग-प्राणायाम को तीन अवस्थाओं में बाँटा जा सकता है
1. पूरक-श्वास को अंदर खींचने की क्रिया को पूरक कहते हैं।
2. रेचक-श्वास को बाहर निकालने की क्रिया को रेचक कहते हैं।
3. कुम्भक-श्वास को अंदर खींचकर कुछ समय तक अंदर ही रोकने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं।

प्रश्न 14.
प्राणायाम की महत्ता पर टिप्पणी कीजिए।
अथवा
प्राणायाम की आवश्यकता एवं महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में श्री श्री रविशंकर ने जीवन जीने की जो शैली सुझाई है, वह प्राणायाम पर आधारित है। आधुनिक जीवन में प्राणायाम की आवश्यकता एवं महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है
(1) प्राणायाम से शरीर का रक्तचाप व तापमान सामान्य रहता है।
(2) इससे शरीर की आंतरिक शुद्धता बढ़ती है।
(3) इससे रक्त के तेज़ दबाव से नाड़ी संस्थान की शक्ति में वृद्धि होती है।
(4) इससे सामान्य स्वास्थ्य व शारीरिक कार्य-कुशलता का विकास होता है।
(5) इससे मानसिक तनाव व चिंता दूर होती है।
(6) इससे हमारी श्वसन प्रक्रिया में सुधार होता है।
(7) इससे आँखों व चेहरे में चमक आती है और आवाज़ मधुर हो जाती है।
(8) इससे आध्यात्मिक व मानसिक विकास में मदद मिलती है।
(9) इससे कार्य करने की शक्ति में वृद्धि होती है।
(10) इससे फेफड़ों का आकार बढ़ता है और श्वास की बीमारियों तथा गले, मस्तिष्क की बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
(11) इससे इच्छा-शक्ति व स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
(12) प्राणायाम करने से पेट तथा छाती की मांसपेशियाँ मज़बूत बनती हैं।

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प्रश्न 15.
प्राणायाम करने की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राणायाम श्वास पर नियंत्रण करने की एक विधि है। प्राणायाम की तीन अवस्थाएँ होती हैं-
(1) पूरक (श्वास को अंदर खींचना),
(2) रेचक (श्वास को बाहर निकालना),
(3) कुंभक (श्वास को कुछ देर अंदर रोकना) ।

प्राणायाम में श्वास अंदर की ओर खींचकर रोक लिया जाता है और कुछ समय रोकने के पश्चात् फिर श्वास बाहर निकाला जाता है। इस तरह श्वास को धीरे-धीरे नियंत्रित करने का समय बढ़ा लिया जाता है। अपनी बाईं नाक को बंद करके दाईं नाक द्वारा श्वास खींचें और थोड़े समय तक रोक कर छोड़ें। इसके पश्चात् दाईं नाक बंद करके बाईं नाक द्वारा पूरा श्वास बाहर निकाल दें। अब फिर दाईं नाक को बंद करके बाईं नाक द्वारा श्वास खींचें र थोड़े समय तक रोक कर छोड़ें। इसके पश्चात् दाईं नाक बंद करके पूरा श्वास बाहर निकाल दें। इस प्रकार इस प्रक्रिया को कई बार दोहराना चाहिए।

प्रश्न 16.
सूर्यभेदी प्राणायाम से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
सूर्यभेदन प्राणायाम क्या है? इससे होने वाले फायदे बताएँ।
उत्तर:
सूर्यभेदी या सूर्यभेदन प्राणायाम में बाएँ हाथ की उंगली के साथ नाक का बायाँ छेद बंद कर लिया जाता है। दाईं नाक से श्वास लिया जाता है। श्वास अंदर खींचकर कुम्भक किया जाता है। जब तक श्वास रोका जा सके, रोकना चाहिए। इसके पश्चात् दाएँ अंगूठे के साथ दाएँ छेद को दबाकर बाएँ छेद से आवाज़ करते हुए श्वास को बाहर निकालना चाहिए। इसमें श्वास धीरे-धीरे लेना चाहिए। कुम्भक से श्वास रोकने का समय धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। इसमें पूरक दाईं नाक से करते हैं और दाईं नाक सूर्य नाड़ी से जुड़ी होती है। इसी कारण इसको सूर्यभेदी प्राणायाम कहते हैं। यह प्राणायाम शरीर के सैलों को शुद्ध करता है और इसको शक्तिशाली बनाता है। इससे पेट के कीड़े भी समाप्त हो जाते हैं और आंतड़ियों का रोग दूर हो जाता है। यह प्राणायाम शरीर में गर्मी पैदा करता है।

प्रश्न 17.
शीतकारी प्राणायाम से आप क्या समझते हैं?
अथवा
शीतकारी प्राणायाम का हमारे शरीर पर क्या लाभदायक प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
शीतकारी प्राणायाम से शरीर को ठंडक पहुँचती है। इसको करते समय सी-सी की आवाज़ निकलती है। इसके कारण ही इसका नाम शीतकारी प्राणायाम है। सिद्धासन में बैठकर दोनों हाथों को घुटनों पर रख लिया जाता है। आँखें बंद करके दाँत मिलाकर जीभ का अगला भाग दाँतों को लगाकर बाकी का भाग तालु के साथ लगा लिया जाता है। होंठ खुले रखे जाते हैं और मुँह द्वारा जोर से श्वास खींचा जाता है। श्वास खींचने के पश्चात् श्वास रोक लिया जाता है। इसके पश्चात् नाक के छेदों द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है। इससे गले, दाँतों की बीमारियों और शरीर की गर्मी दूर होती है। इससे मन स्थिर और गुस्से पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

प्रश्न 18.
भस्त्रिका प्राणायाम से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
भस्त्रिका प्राणायाम क्या है? इससे होने वाले प्रमुख फायदे बताएँ।
उत्तर:
भस्त्रिका प्राणायाम में लुहार की धौंकनी की तरह श्वास अंदर और बाहर निकाला जाता है। पहले नाक के एक छेद द्वारा श्वास लेकर दूसरे छेद द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है। इसके पश्चात् दोनों छेदों से श्वास अंदर और बाहर किया जाता है। भस्त्रिका प्राणायाम शुरू में धीरे-धीरे करना चाहिए और बाद में इसकी रफ्तार बढ़ाई जानी चाहिए। पूरक वरेचक करते समय पेट अवश्य क्रियाशील रहना चाहिए। यह प्राणायाम करने से मनुष्य का मोटापा कम होता है। मन की इच्छा बलवान होती है। इससे गले की सूजन ठीक होती है। इस प्राणायाम को करने से पेट के अंग मजबूत होकर सुचारु रूप से कार्य करते हैं और हमारी पाचन शक्ति भी बढ़ती है।

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प्रश्न 19.
सूर्य नमस्कार का अभ्यास कब और कैसे करना चाहिए?
उत्तर:
सूर्य उदय के समय सूर्य नमस्कार करना अति उत्तम होता है क्योंकि यह समय पूर्ण रूप से शांतिमय होता है। इसका अभ्यास खुली हवा या वातावरण में सूर्य की ओर मुख करके करना चाहिए। अभ्यास करते समय अपनी आँखों को बंद कर लेना चाहिए और अपने पैरों के बीच में थोड़ी-सी दूरी रखकर खड़े होना चाहिए। अपने शरीर का भार दोनों पैरों पर बराबर होना चाहिए और सूर्य की ओर कुछ देर हाथ जोड़कर नमस्कार करने के बाद, हाथों को पीछे की ओर करना चाहिए। शरीर पर हल्के कपड़े धारण होने चाहिएँ।

प्रश्न 20.
प्राण के विभिन्न प्रकार कौन-कौन-से हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
प्राण के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं
1. प्राण-यह गले से दिल तक है। इसी प्राण की शक्ति के साथ श्वास शरीर में नीचे जाता है।
2. अप्राण-नाभि से निचले भाग में प्राण को अप्राण कहते हैं। छोटी और बड़ी आंतड़ियों में यही प्राण होता है।
3. समाण-दिल और नाभि तक रहने वाली प्राण क्रिया को समाण कहते हैं। यह प्राण पाचन क्रिया और ऐड्रीनल ग्रंथि के कार्य करने की शक्ति को बढ़ाते हैं।
4. उदाण-गले से सिर तक रहने वाले प्राण को उदाण कहते हैं । आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों का कार्य इसी के द्वारा होता है।
5. ध्यान-यह प्राण शरीर के सारे भागों में रहता है और शरीर के दूसरे प्राणों के साथ मेल करता है।

प्रश्न 21.
खिलाड़ियों के लिए योग किस प्रकार लाभदायक है?
अथवा
एक खिलाड़ी को योग किस प्रकार सहायता करता है?
उत्तर:
खिलाड़ियों के लिए योग निम्नलिखित प्रकार से लाभदायक है
(1) योग खिलाड़ियों को स्वस्थ एवं चुस्त रखने में सहायक होता है।
(2) योग से उनके शरीर में लचीलापन आ जाता है।
(3) योग से उनकी क्षमता एवं शक्ति में वृद्धि होती है।
(4) योग खिलाड़ियों के मानसिक तनाव को भी कम करने में सहायक होता है।
(5) योग खिलाड़ियों के मोटापे को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 22.
प्राणायाम के मुख्य चिकित्सीय प्रभाव बताइए।
उत्तर:
प्राणायाम के मुख्य चिकित्सीय प्रभाव निम्नलिखित हैं
(1) प्राणायाम से स्मरण-शक्ति बढ़ती है और मस्तिष्क की बीमारियाँ समाप्त होती हैं।
(2) इससे श्वास तथा गले की बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
(3) इससे कफ़, वात व पित का संतुलन बना रहता है।
(4) यह पाचन-तंत्र की अनेक बीमारियों की रोकथाम में सहायता करता है।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
‘योग’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
अथवा
योग क्या है?
उत्तर:
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की मूल धातु ‘युज’ से हुई है जिसका अर्थ है-जोड़ या एक होना। जोड़ या एक होने का अर्थ है व्यक्ति की आत्मा को ब्रह्मांड या परमात्मा की चेतना या सार्वभौमिक आत्मा के साथ जोड़ना। महर्षि पतंजलि (योग के पितामह) के अनुसार, ‘युज’ धातु का अर्थ है-ध्यान-केंद्रण या मन:स्थिति को स्थिर करना और आत्मा का परमात्मा से ऐक्य। साधारण शब्दों में, हम कह सकते हैं-योग व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा से मिलन का नाम है। योग का अभ्यास मन को परमात्मा पर केंद्रित करता है। इस प्रकार से यह आत्मा को संपूर्ण शांति प्रदान करता है।

प्रश्न 2.
योग की कोई दो परिभाषाएँ दीजिए।
अथवा
योग को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
1. महर्षि पतंजलि के अनुसार, “मनोवृत्ति के विरोध का नाम योग है।”
2. श्री याज्ञवल्क्य के अनुसार, “जीवात्मा से परमात्मा के मिलन को योग कहते हैं।”

प्रश्न 3.
योग के विभिन्न प्रकारों (शाखाओं) के नाम लिखें।
उत्तर:
(1) ज्ञान योग
(2) भक्ति योग
(3) अष्टांग योग
(4) कर्म योग
(5) राज योग
(6) हठ योग
(7) कुण्डली योग
(8) मंत्र योग
(9) सांख्य योग
(10) ध्यान योग आदि।

प्रश्न 4.
योग और प्राणायाम में क्या अंतर है?
उत्तर:
योग केवल शारीरिक व्यायामों की एक प्रणाली ही नहीं, बल्कि यह संपूर्ण और भरपूर जीवन जीने की कला भी है। यह शरीर और मन का मिलन है। जबकि प्राणायाम का अर्थ है-श्वास प्रक्रिया पर नियंत्रण करना, जिसका उपयोग ध्यान केंद्रित करने के लिए किया जाता है। योग का क्षेत्र विस्तृत है। यह संपूर्ण शारीरिक प्रणालियों को प्रभावित करता है, जबकि प्राणायाम का क्षेत्र सीमित है। यह श्वसन प्रणाली को अधिक प्रभावित करता है।

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प्रश्न 5.
योग का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
योग का उद्देश्य आत्मा का परमात्मा से मिलाप करवाना है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को नीरोग, फुर्तीला और छिपी हुई शक्तियों का विकास करने, मन को जीतना है। यह शरीर, मन तथा आत्मा की आवश्यकताएँ पूर्ण करने का एक अच्छा साधन है।

प्रश्न 6.
अष्टांग योग का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अष्टांग योग का अर्थ है-योग के आठ पथ। वास्तव में योग के आठ पथ योग की आठ अवस्थाएँ होती हैं जिनका पालन करते हुए व्यक्ति की आत्मा या जीवात्मा का परमात्मा से मिलन हो सकता है। महर्षि पतंजलि ने योग-सूत्र’ में जिन आठ अंगों का उल्लेख किया है, उन्हें ही अष्टांग योग कहा जाता है।

प्रश्न 7.
योग को पूर्ण तंदुरुस्ती का साधन क्यों माना जाता है?
उत्तर:
योगाभ्यास को पूर्ण तंदुरुस्ती का साधन माना जाता है, क्योंकि इस अभ्यास द्वारा जहाँ शारीरिक शक्ति या ऊर्जा पैदा होती है, वहीं मानसिक शक्ति का भी विकास होता है । इस अभ्यास द्वारा शरीर की आंतरिक सफाई और शुद्धि की जा सकती है। व्यक्ति मानसिक तौर पर संतुष्ट, संयमी और त्यागी हो जाता है जिस कारण वह सांसारिक उलझनों से बचा रहता है।

प्रश्न 8.
प्राणायाम का क्या अर्थ है?
अथवा
प्राणायाम को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
प्राणायाम में दो शब्द हैं- प्राण व आयाम । प्राण का अर्थ है-श्वास और आयाम का अर्थ है-नियंत्रण व नियमन। इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोकना ही प्राणायाम है।”

प्रश्न 9.
आसन के कोई आठ भेद बताएँ। अथवा आसन के कोई चार उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) हलासन
(2) धनुरासन
(3) भुजंगासन
(4) ताड़ासन
(5) सिद्धासन
(6) वज्रासन
(7) शलभासन
(8) मयूरासन।

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प्रश्न 10.
लोग प्राणायाम क्यों करते हैं?
उत्तर:
योग में प्राणायाम का अर्थ है-श्वास प्रक्रिया पर नियंत्रण करना। प्राणायाम करने से शरीर से चिंता एवं तनाव दूर होता है। इससे व्यक्ति को मानसिक तनाव व चिंता नहीं रहती। इससे उनके शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है। इसलिए लोग प्राणायाम करते हैं।

प्रश्न 11.
प्राणायाम के शारीरिक मूल्य क्या हैं?
उत्तर:
प्राणायाम के मुख्य शारीरिक मूल्य हैं–प्राणायाम करने से शारीरिक कार्यकुशलता का विकास होता है। इससे मोटापा नियंत्रित होता है। इससे आँखों व चेहरे पर चमक आती है और शारीरिक मुद्रा (Posture) विकसित होती है।

प्रश्न 12.
प्राण क्या है?
उत्तर:
प्राण एक ऐसी शक्ति है जो जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्राण का अर्थ मस्तिष्क पर नियंत्रण है। मस्तिष्क प्राण की सहायता के बिना कार्य नहीं कर सकता।

प्रश्न 13.
योग के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) मानसिक व आत्मिक शांति व खुशी प्राप्त होना,
(2) शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य हेतु लाभदायक।

प्रश्न 14.
आसन का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
अथवा
अष्टांग योग में आसन का क्या अर्थ है?
अथवा
आसन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
जिस अवस्था में शरीर ठीक से बैठ सके, वह आसन है।आसन का अर्थ है-बैठना। योग की सिद्धि के लिए उचित आसन में बैठना बहुत आवश्यक है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “स्थिर सुख आसनम्।” अर्थात् जिस रीति से हम स्थिरतापूर्वक, बिना हिले-डुले और सुख के साथ बैठ सकें, वह आसन है। ठीक मुद्रा में रहने से मन शांत रहता है।

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प्रश्न 15.
आसन एवं व्यायाम में अंतर बताइए।
उत्तर:
(1) आसन में सभी शारीरिक क्रियाएँ असक्रिय अवस्था (Passive Condition) में की जाती है; जबकि व्यायाम में सभी शारीरिक क्रियाएँ सक्रिय अवस्था (Active Condition) में की जाती है।
(2) आसन करने से आध्यात्मिक विकास में अधिक वृद्धि होती है लेकिन व्यायाम में शारीरिक विकास को अधिक बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 16.
प्राणायाम के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) प्राणायाम से गला, नाक और कान से संबंधित बीमारियों से आराम मिलता है।
(2) प्राणायाम से फेफड़ों की बीमारियाँ दूर होती हैं।

प्रश्न 17.
मोटापे को कम करने के लिए कोई चार आसनों के नाम बताइए।
उत्तर:
(1) त्रिकोणासन
(2) पद्मासन
(3) भुजंगासन
(4) पश्चिमोत्तानासन।

प्रश्न 18.
प्रत्याहार क्या है?
उत्तर:
प्रत्याहार से अभिप्राय ज्ञानेंद्रियों को अपने नियंत्रण में रखने से है। सामान्य शब्दों में, प्रत्याहार का अर्थ है ‘मुड़ना’ अर्थात् मन का सांसारिक इच्छाओं से मुड़ना और इच्छाओं पर नियंत्रण करना।

प्रश्न 19.
अष्टांग योग में समाधि क्या है?
उत्तर:
समाधि योग की वह अवस्था है जिसमें साधक को स्वयं का भाव नहीं रहता। वह पूर्ण रूप से अचेत अवस्था में होता है। इस अवस्था में वह उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जहाँ आत्मा व परमात्मा का मिलन होता है।

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प्रश्न 20.
समाधि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
समाधि योग की सर्वोत्तम अवस्था है। यह सांसारिक दुःख-सुख से ऊपर की अवस्था है। समाधि योग की वह अवस्था है जिसमें साधक को स्वयं का भाव नहीं रहता। वह पूर्ण रूप से अचेत अवस्था में होता है। इस अवस्था में वह उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जहाँ आत्मा व परमात्मा का मिलन होता है। प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि काफी लम्बे समय तक समाधि में बैठते थे। इस विधि द्वारा हम दिमाग पर पूरी तरह अपना नियंत्रण कर सकते हैं।

प्रश्न 21.
प्राणायाम के प्रमुख प्रकार क्या हैं?
अथवा
किन्हीं चार प्राणायाम के नाम लिखें।
उत्तर:
(1) सूर्यभेदी प्राणायाम,
(2) उज्जई प्राणायाम,
(3) शीतकारी प्राणायाम,
(4) शीतली प्राणायाम,
(5) भस्त्रिका प्राणायाम,
(6) भ्रामरी प्राणायाम,
(7) नाड़ी-शोधन प्राणायाम,
(8) कपालभाती प्राणायाम आदि।

प्रश्न 22.
धारणा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अपने मन के निश्चल भाव को धारणा कहते हैं। अष्टांग योग में ‘धारणा’ का बहुत महत्त्व है। धारणा का अर्थ मन को किसी इच्छित विषय में लगाना है। धारणा की स्थिति में हमारा मस्तिष्क बिल्कुल शांत होता है। इस प्रकार ध्यान लगाने से व्यक्ति में एक महान् शक्ति उत्पन्न हो जाती है, साथ ही उसके मन की इच्छा भी पूरी हो जाती है।

प्रश्न 23.
शीतली प्राणायाम के दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) यह रक्त को शुद्ध रखने में सहायक होता है,
(2) यह तनाव को कम करता है।

प्रश्न 24.
भ्रामरी प्राणायाम के दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) यह शिथिलता दूर करने में सहायता करता है,
(2) इससे स्मरण-शक्ति बढ़ती है।

प्रश्न 25.
पश्चिमोत्तानासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) इससे रीढ़ की हड्डी में लचक आती है,
(2) इससे मोटापा घटता है।

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प्रश्न 26.
शलभासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) शलभासन से रक्त संचार क्रिया सही रहती है,
(2) इससे रीढ़ की हड्डी में लचक आती है।

प्रश्न 27.
ताड़ासन के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) ताड़ासन से शरीर का मोटापा कम होता है,
(2) इससे कब्ज दूर होती है।

प्रश्न 28.
सर्वांगासन के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) सर्वांगासन से कब्ज दूर होती है,
(2) इससे भूख बढ़ती है और पाचन क्रिया ठीक रहती है।

प्रश्न 29.
शीर्षासन के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) शीर्षासन से मोटापा कम होता है,
(2) इससे स्मरण-शक्ति बढ़ती है।

प्रश्न 30.
मयूरासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) यह कब्ज एवं अपच को दूर करता है,
(2) यह आँखों के दोषों को दूर करने में उपयोगी होता है।

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प्रश्न 31.
सिद्धासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) इससे मन एकाग्र रहता है,
(2) यह मानसिक तनाव को दूर करता है।

प्रश्न 32.
मत्स्यासन के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) इससे माँसपेशियों में लचकता बढ़ती है,
(2) इससे पीठ की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं।

प्रश्न 33.
भुजंगासन के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) यह रीढ़ की हड्डी में लचक बढ़ाता है,
(2) यह रक्त संचार को तेज करता है।

प्रश्न 34.
सूर्य नमस्कार के मुख्य लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) सूर्य नमस्कार से मन शांत होता है,
(2) इससे सभी शारीरिक संस्थान संतुलित हो जाते हैं,
(3) इससे शरीर की माँसपेशियों व हड्डियों में लचीलापन आता है,
(4) इससे शरीर में प्राण ऊर्जा का संचार होता है।

प्रश्न 35.
सूर्य नमस्कार की दो स्थितियाँ बताइए।
उत्तर:
(1) दोनों हाथ और पैर जोड़कर नमस्कार की मुद्रा में सीधे खड़े होना।
(2) साँस छोड़ते हुए दोनों हाथों से जमीन को स्पर्श करना।

प्रश्न 36.
अष्टांग योग के तत्त्वों या भागों को सूचीबद्ध कीजिए।
अथवा
योग के अंगों के बारे में बताएँ।
उत्तर:
महर्षि पतंजलि ने ‘योग-सूत्र’ में योग के आठ तत्त्वों या अंगों का वर्णन किया है जिन्हें अष्टांग या आठ पथ कहा जाता है; जैसे-
(1) यम (Forbearance),
(2) नियम (Observance),
(3) आसन (Posture),
(4) प्राणायाम (Control of Breath),
(5) प्रत्याहार (Restraint of the Senses),
(6) धारणा (Steading of the Mind),
(7) ध्यान (Contemptation),
(8) समाधि (Trance)।

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प्रश्न 37.
ध्यान प्राण क्या है?
उत्तर:
ध्यान प्राण शरीर के सारे भागों में रहता है और शरीर के दूसरे प्राणों के साथ मेल करता है। शरीर के हिलने-डुलने पर इसका नियंत्रण होता है।

प्रश्न 38.
समाण किसे कहते हैं?
उत्तर:
दिल और नाभि तक रहने वाली प्राण क्रिया को समाण कहते हैं । यह प्राण पाचन क्रिया और ऐड्रीनल ग्रंथि की शक्ति को बढ़ाता है।

प्रश्न 39.
उदाण किसे कहते हैं? उत्तर:गले से सिर तक रहने वाले प्राण को उदाण कहते हैं। आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों का कार्य इसी के द्वारा होता है।

HBSE 12th Class Physical Education योग शिक्षा Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-I: एक शब्द वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई?
उत्तर:
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई।

प्रश्न 2.
भारत में योग का इतिहास कितना पुराना है?
उत्तर:
भारत में योग का इतिहास लगभग 3000 ईसा पूर्व पुराना है।

प्रश्न 3.
प्रसिद्ध महर्षि पतंजलि ने योग की कितनी अवस्थाओं का वर्णन किया है?
अथवा
पतंजलि ने योग के कितने सोपान बताए हैं?
उत्तर:
प्रसिद्ध महर्षि पतंजलि ने योग की आठ अवस्थाओं/सोपानों का वर्णन किया है।

प्रश्न 4. किस आसन से स्मरण शक्ति बढ़ती है?
उत्तर:
शीर्षासन से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

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प्रश्न 5.
अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने को क्या कहते हैं?
उत्तर:
अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने को प्रत्याहार कहते हैं।

प्रश्न 6.
प्राण के कितने प्रकार होते हैं?
उत्तर:
प्राण के पाँच प्रकार होते हैं।

प्रश्न 7.
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाता है।

प्रश्न 8.
‘वज्रासन’ कब करना चाहिए?
उत्तर:
वज्रासन भोजन करने के बाद करना चाहिए।

प्रश्न 9.
योग का जन्मदाता किस देश को माना जाता है?
उत्तर:
योग का जन्मदाता भारत को माना जाता है।

प्रश्न 10.
मधुमेह रोग को ठीक करने वाले कोई दो आसनों के नाम बताइए।
उत्तर:
(1) शलभासन,
(2) वज्रासन।

प्रश्न 11.
छोटी व बड़ी आँत में कौन-सा प्राण होता है?
उत्तर:
छोटी व बड़ी आँत में अप्राण होता है।

प्रश्न 12.
किस आसन से बुढ़ापा दूर होता है?
उत्तर:
चक्रासन से बुढ़ापा दूर होता है।

प्रश्न 13.
दिल तथा नाभि तक रहने वाले प्राण को क्या कहते हैं?
उत्तर:
दिल तथा नाभि तक रहने वाले प्राण को समाण कहते हैं।

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प्रश्न 14.
गले से सिर तक रहने वाले प्राण को क्या कहते हैं?
उत्तर:
गले से सिर तक रहने वाले प्राण को उदाण कहते हैं।

प्रश्न 15.
‘प्राणायाम’ किस भाषा का शब्द है?
उत्तर:
‘प्राणायाम’ संस्कृत भाषा का शब्द है।

प्रश्न 16.
प्राणायाम की तीन अवस्थाओं के नाम बताएँ।
अथवा
‘प्राणायाम’ के तीन स्तर क्या हैं?
अथवा
प्राणायाम की कितनी अवस्थाएँ हैं?
उत्तर:
प्राणायाम की तीन अवस्थाएँ या स्तर हैं-
(1) पूरक,
(2) रेचक,
(3) कुम्भक।

प्रश्न 17.
किस प्राणायाम से मोटापा घटता है?
उत्तर:
भस्त्रिका प्राणायाम से मोटापा घटता है।

प्रश्न 18.
यौगिक व्यायाम करने के लिए कैसा स्थान होना चाहिए?
उत्तर:
यौगिक व्यायाम करने के लिए एकांत, हवादार और स्वच्छ स्थान होना चाहिए।

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प्रश्न 19.
योग क्रिया का रक्त पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
रक्त तीव्र एवं सुचारु रूप से प्रवाहित होता है।

प्रश्न 20.
प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस कब मनाया गया?
उत्तर:
प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून, 2015 को मनाया गया।

प्रश्न 21.
नाड़ी-शोधन प्राणायाम के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) यह नाड़ियों के स्वास्थ्य हेतु लाभदायक होता है,
(2) इससे रक्त संचार सही रहता है।

प्रश्न 22.
भुजंगासन का कोई एक लाभ लिखें।
उत्तर:
यह रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है।

प्रश्न 23.
रेचक क्या है?
उत्तर:
श्वास को बाहर निकालने की क्रिया को रेचक कहते हैं।

प्रश्न 24.
पूरक क्या है?
उत्तर:
श्वास को अंदर खींचने की क्रिया को पूरक कहते हैं।

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प्रश्न 25.
कुम्भक क्या है?
उत्तर:
श्वास को अंदर खींचकर कुछ समय तक अंदर ही रोकने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं।

प्रश्न 26.
भगवान् श्रीकृष्ण ने योग के बारे में क्या कहा?
उत्तर:
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-“योग कर्मसु कौशलम्” अर्थात् कर्म को कुशलतापूर्वक करना ही योग है।

प्रश्न 27.
“मनोवृत्ति के विरोध का नाम योग है।” यह किसका कथन है?
उत्तर:
यह कथन महर्षि पतंजलि का है।

प्रश्न 28.
‘युज’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
युज का अर्थ है-जोड़ या एक होना।

प्रश्न 29.
नियम कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
नियम पाँच प्रकार के होते हैं।

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प्रश्न 30.
पेट के बल किए जाने वाले आसन का नाम बताइए।
उत्तर:
पेट के बल किए जाने वाले आसन का नाम धनुरासन है।

प्रश्न 31.
क्या योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है?
उत्तर:
हाँ, योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का कार्य होता है।

प्रश्न 32.
प्राणायाम को किसकी आत्मा कहा जाता है?
उत्तर:
प्राणायाम को योग की आत्मा कहा जाता है।

प्रश्न 33.
“योग समाधि है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन महर्षि वेदव्यास ने कहा।

प्रश्न 34.
यम के अभ्यास द्वारा व्यक्ति क्या सीखता है?
उत्तर:
यम का अभ्यास व्यक्ति को अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता और त्याग करना सिखाता है।

प्रश्न 35.
नियम क्या सिखाता है?
उत्तर:
नियम द्वारा शरीर और मन की शुद्धि, संतोष, दृढ़ता और परमात्मा की आराधना करने का ढंग सीखा जाता है।

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प्रश्न 36.
कौन-सा प्राण पाचन क्रिया और ऐड्रीनल ग्रंथि के कार्य करने की शक्ति को बढ़ाता है?
उत्तर:
समाण पाचन क्रिया और ऐड्रीनल ग्रंथि के कार्य करने की शक्ति को बढ़ाता है।

प्रश्न 37.
शरीर के सभी भागों में पाया जाने वाला प्राण कौन-सा है?
उत्तर:
शरीर के सभी भागों में पाया जाने वाला प्राण ध्यान है।

प्रश्न 38.
आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों के कार्य किस प्राण के कारण होते हैं?
उत्तर:
आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों के कार्य उदाण के कारण होते हैं।

प्रश्न 39.
कौन-सा प्राणायाम रक्त को शुद्ध करने में सहायक होता है?
उत्तर:
शीतली प्राणायाम रक्त को शुद्ध करने में सहायक होता है।

प्रश्न 40.
मस्तिष्क की पूर्ण एकाग्रता क्या कहलाती है?
उत्तर:
मस्तिष्क की पूर्ण एकाग्रता ध्यान कहलाती है।।

प्रश्न 41.
योग से कब्ज दूर होती है। इसका संबंध किस प्रणाली से है?
उत्तर:
योग से कब्ज दूर होती है। इसका संबंध पाचन प्रणाली से है।

प्रश्न 42.
“योग आध्यात्मिक कामधेनु है।” योग की यह परिभाषा किसने दी?
उत्तर:
यह परिभाषा डॉ० संपूर्णानंद ने दी।

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प्रश्न 43.
“योग मस्तिष्क को शांत करने का अभ्यास है” यह किसने कहा?
उत्तर:
यह महर्षि पतंजलि ने कहा।

प्रश्न 44.
गरुढ़ासन का कोई एक लाभ बताएँ।
उत्तर:
यह आसन टाँगों व बाजुओं की थकावट दूर करने में सहायक होता है।

प्रश्न 45.
योग अभ्यास कब करना चाहिए?
उत्तर:
योग अभ्यास शौच के पश्चात् और सुबह खाना खाने से पहले करना चाहिए।

प्रश्न 46.
भारतीय व्यायाम की प्राचीन विधा कौन-सी है?
उत्तर:
भारतीय व्यायाम की प्राचीन विधा योग है।

प्रश्न 47.
योग व्यक्ति को किस प्रकार का बनाता है?
उत्तर:
योग व्यक्ति को शक्तिशाली, नीरोग और बुद्धिमान बनाता है।

प्रश्न 48.
योग किन मानसिक व्याधाओं या रोगों का इलाज है?
उत्तर:
योग तनाव, चिन्ताओं और परेशानियों का इलाज है।

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प्रश्न 49.
योग आसन कब नहीं करना चाहिए?
उत्तर:
किसी बीमारी की स्थिति में योग आसन नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 50.
नियम क्या है?
उत्तर:
नियम से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समाज स्वीकृत नियमों के अनुसार ही आचरण करना है।

प्रश्न 51.
शीर्षासन में शरीर की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
शीर्षासन में सिर नीचे और पैर ऊपर की ओर सीधे होने चाहिएँ।

प्रश्न 52.
शवासन कब करना चाहिए?
उत्तर:
प्रत्येक आसन करने के उपरान्त शरीर को ढीला करने के लिए शवासन करना चाहिए।

प्रश्न 53.
राज योग, अष्टांग योग, कर्म योग क्या हैं?
उत्तर:
ये योग के प्रकार हैं।

प्रश्न 54.
‘योग-सूत्र’ पुस्तक किसने लिखी?
उत्तर:
महर्षि पतंजलि ने।

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प्रश्न 55.
योग किन शक्तियों का विकास करता है?
उत्तर:
योग व्यक्तियों में मौजूदा आंतरिक शक्तियों का विकास करता है।

प्रश्न 56.
योग किसका मिश्रण है?
उत्तर:
योग धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान और शारीरिक सभ्यता का मिश्रण है।

प्रश्न 57.
योग का लक्ष्य लिखें।
उत्तर:
योग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार करना और मोक्ष प्राप्त करना है।

प्रश्न 58.
21 जून, 2020 में कौन-सा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया?
उत्तर:
21 जून, 2020 में छठा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया।

प्रश्न 59.
21 जून, 2022 में कौन-सा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाएगा?
उत्तर:
21 जून, 2022 में आठवाँ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाएगा।

प्रश्न 60.
योग किन मानसिक व्यधाओं या रोगों का इलाज है?
उत्तर:
योग तनाव, चिन्ताओं और परेशानियों का इलाज है।

प्रश्न 61.
शवासन में शरीर की स्थिति कैसी होनी चाहिए?
उत्तर:
शवासन में पीठ के बल सीधा लेटकर शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ना चाहिए।

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प्रश्न 62.
पद्मासन में कैसे बैठा जाता है?
उत्तर:
पद्मासन में टाँगों की चौकड़ी लगाकर बैठा जाता है।

प्रश्न 63.
ताड़ासन में शरीर की स्थिति कैसी होनी चाहिए?
उत्तर:
ताड़ासन में शरीर की स्थिति ताड़ के वृक्ष जैसी होनी चाहिए।

भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. ‘योग’ शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई?
(A) संस्कृत से
(B) लैटिन से
(C) फारसी से
(D) उर्दू से
उत्तर:
(A) संस्कृत से

2. ‘योग’ शब्द का उद्भव हुआ
(A) ‘युग’ शब्द से
(B) ‘योग’ शब्द से
(C) ‘योज’ शब्द से
(D) ‘युज’ शब्द से
उत्तर:
(D) ‘युज’ शब्द से

3. ‘युज’ का क्या अर्थ है?
(A) जुड़ना
(B) एक होना
(C) मिलन अथवा संयोग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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4. निम्नलिखित में से प्राण क्या है?
(A) मस्तिष्क पर नियंत्रण
(B) साँस पर नियंत्रण
(C) शरीर पर नियंत्रण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) मस्तिष्क पर नियंत्रण

5. निम्नलिखित में से प्राणायाम का अर्थ है
(A) मस्तिष्क पर नियंत्रण
(B) श्वास प्रक्रिया पर नियंत्रण
(C) शरीर पर नियंत्रण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) श्वास प्रक्रिया पर नियंत्रण

6. “मनोवृत्ति के विरोध का नाम ही योग है।” यह परिभाषा दी
(A) महर्षि पतंजलि ने
(B) महर्षि वेदव्यास ने
(C) भगवान् श्रीकृष्ण ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) महर्षि पतंजलि ने

7. प्रसिद्ध महर्षि पतंजलि ने योग की कितनी अवस्थाओं (सोपानों) का उल्लेख किया है?
(A) पाँच
(B) आठ
(C) सात
(D) चार
उत्तर:
(B) आठ

8. योग का जन्मदाता देश है
(A) अमेरिका
(B) चीन
(C) इंग्लैंड
(D) भारत
उत्तर:
(D) भारत

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9. भारत में योग का इतिहास कितना पुराना है?
(A) लगभग 3600 ईसा पूर्व
(B) लगभग 2400 ईसा पूर्व
(C) लगभग 3000 ईसा पूर्व
(D) लगभग 3400 ईसा पूर्व
उत्तर:
(C) लगभग 3000 ईसा पूर्व

10. श्वास पर नियंत्रण रखने की प्रक्रिया को कहते हैं
(A) योग
(B) प्राणायाम
(C) उदाण
(D) सप्राण
उत्तर:
(B) प्राणायाम

11. शरीर में ठीक ढंग से रक्त प्रवाह कौन-सी प्रणाली से होता है?
(A) रक्त संचार प्रणाली से
(B) पाचन प्रणाली से
(C) श्वास प्रणाली से
(D) माँसपेशी प्रणाली से
उत्तर:
(A) रक्त संचार प्रणाली से

12. योग आत्मा कहा जाता है
(A) योग को
(B) प्राणायाम को
(C) प्राण को
(D) व्यायाम को
उत्तर:
(B) प्राणायाम को

13. प्राणायाम के भाग या चरण हैं
(A) पूरक
(B) कुम्भक
(C) रेचक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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14. श्वास को अंदर खींचने की क्रिया को कहते हैं
(A) पूरक
(B) कुम्भक
(C) रेचक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) पूरक

15. श्वास को अंदर खींचने के कुछ समय पश्चात् श्वास को अंदर ही रोकने की क्रिया को कहते हैं
(A) पूरक
(B) कुम्भक
(C) रेचक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कुम्भक

16. श्वास को बाहर निकालने की क्रिया को कहते हैं
(A) पूरक
(B) कुम्भक
(C) रेचक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) रेचक

17. नाभि से निचले भाग में प्राण को कहते हैं
(A) अप्राण
(B) समाण
(C) उदाण
(D) ध्यान
उत्तर:
(A) अप्राण

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18. निम्नलिखित में से योग के प्रकार हैं
(A) अष्टांग योग व राज योग
(B) हठ योग व कर्म योग
(C) कुण्डली योग व सोम योग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

19. कौन-सा प्राण पाचन क्रिया और ऐडीनल ग्रंथि के कार्य करने की शक्ति को बढ़ाता है?
(A) समाण
(B) उदाण
(C) अप्राण
(D) प्राण
उत्तर:
(A) समाण

20. गले से दिल तक को क्या कहते हैं?
(A) प्राण
(B) अप्राण
(C) समाण
(D) उदाण
उत्तर:
(A) प्राण

21. भगवद्गीता के अनुसार योग की परिभाषा है
(A) तमसो मा ज्योतिर्गमय
(B) योग-कर्मसु कौशलम्
(C) सत्यमेव जयते
(D) अहिंसा परमोधर्म
उत्तर:
(B) योग-कर्मसु कौशलम्

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22. किस प्राणायाम से मोटापा कम होता है?
(A) नाड़ी-शोधन प्राणायाम से
(B) भस्त्रिका प्राणायाम से
(C) शीतकारी प्राणायाम से
(D) कपालभाती प्राणायाम से
उत्तर:
(B) भस्त्रिका प्राणायाम से

23. सूर्यभेदी प्राणायाम लाभदायक है
(A) शरीर के सैलों को शुद्ध करने में
(B) शरीर में गर्मी बढ़ाने में
(C) आंतड़ियों के रोग दूर करने में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. छोटी और बड़ी आँतड़ियों में कौन-सा प्राण होता है?
(A) अप्राण
(B) उदाण
(C) समाण
(D) प्राण
उत्तर:
(A) अप्राण

25. शरीर के सभी भागों में पाया जाने वाला प्राण है
(A) उदाण
(B) ध्यान
(C) समाण
(D) अप्राण
उत्तर:
(B) ध्यान

26. आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों के कार्य किस प्राण के कारण होते हैं?
(A) ध्यान
(B) उदाण
(C) समाण
(D) अप्राण
उत्तर:
(B) उदाण

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27. “योग समाधि है।” यह कथन है
(A) महर्षि वेदव्यास का
(B) महर्षि पतंजलि का
(C) भगवान् श्रीकृष्ण का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) महर्षि वेदव्यास का

28. आसन का अर्थ है
(A) श्वास लेने की प्रक्रिया
(B) शरीर की स्थिति
(C) मन की एकाग्रता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) शरीर की स्थिति

29. मस्तिष्क की पूर्ण एकाग्रता क्या कहलाती है?
(A) नियम
(B) धारणा
(C) ध्यान
(D) प्रत्याहार
उत्तर:
(C) ध्यान

30. यम कितने प्रकार के होते हैं?
(A) 4
(B) 3
(C) 5
(D) 2
उत्तर:
(C)5

31. अष्टांग योग का प्रथम अंग है-
(A) यम
(B) नियम
(C) आसन
(D) धारणा
उत्तर:
(A) यम

32. “योग मस्तिष्क को शांत करने का अभ्यास है।” यह किसने कहा? ।
(A) महर्षि वेदव्यास ने
(B) महर्षि पतंजलि ने
(C) भगवान श्रीकृष्ण ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) महर्षि पतंजलि ने

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33. परम चेतना या दिव्य मन में पूरी तरह से लीन होना कहलाती है-
(A) धारणा
(B) समाधि
(C) यम
(D) प्राणायाम
उत्तर:
(B) समाधि

34. किसके सतत् अभ्यास से तन एवं मन दोनों को रूपांतरित किया जा सकता है?
(A) योग के
(B) आसन के
(C) प्राण के
(D) प्राणायाम के
उत्तर:
(A) योग के

35. 21 जून, 2021 को कौन-सा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया?
(A) छठा
(B) चौथा
(C) पाँचवाँ
(D) सातवाँ
उत्तर:
(D) सातवाँ

36. “योग चितवृत्ति निरोध है।” यह किसका कथन है?
(A) पतंजलि का
(B) श्रीवेदव्यास का
(C) आगम का
(D) स्वामी रामदेव का
उत्तर:
(A) पतंजलि का

37. निम्नलिखित में से कौन-सा यम नहीं है?
(A) अहिंसा
(B) तप
(C) सत्य
(D) अस्तेय
उत्तर:
(B) तप

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38. निम्नलिखित में से कौन-सा अंग अष्टांग योग का नहीं है?
(A) यम’
(B) नियम
(C) प्रत्याहार
(D) परमात्मा
उत्तर:
(D) परमात्मा

39. निम्नलिखित में से कौन-सा उदाहरण नियम का नहीं है?
(A) शौच
(B) तप
(C) सत्य
(D) सन्तोष
उत्तर:
(C) सत्य

भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. योग का जन्मदाता देश ……………….. को माना जाता है।
2. ……………….. को योग का पितामह माना जाता है।
3. योग हमेशा ……………….. जगह पर करना चाहिए।
4. प्राणायाम की ……………….. अवस्थाएँ होती हैं।
5. दिल से नाभि तक रहने वाली प्राण क्रिया को ……………. कहते हैं।
6. गले से सिर तक रहने वाले प्राण को ……………….. कहते हैं।
7. श्वास पर नियंत्रण रखने वाली क्रिया को ……………….. कहते हैं।
8. राज योग, अष्टांग योग, कर्म योग, ……………….. के प्रकार हैं।
9. साँस को अंदर खींचने के बाद उसे वहीं रोकने की क्रिया को ……………….. कहते हैं।
10. ………………… आसन करने से मधुमेह रोग नहीं होता।
11. अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने को ……………….. कहते हैं।
12. अष्टांग योग की रचना ……………….. द्वारा की गई।
13. अभ्यास करते समय श्वास ……………….. से लेना चाहिए।
14. अष्टांग योग में अपने मन को पूरी तरह से नियंत्रण में रखना ……………….. कहलाता है।
15. ……………….. धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान और शारीरिक सभ्यता का मिश्रण है।।
उत्तर:
1. भारत
2. महर्षि पतंजलि
3. साफ-सुथरी एवं हवादार
4. तीन
5. समाण
6. उदाण
7: प्राणायाम
8. योग
9. कुम्भक
10. शलभ
11. प्रत्याहार
12. महर्षि पतंजलि
13. नाक
14. धारणा
15. योग।

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योग शिक्षा Summary

योग शिक्षा परिचय

योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि भारत का इतिहास। इस बारे में अभी तक ठीक तरह से पता नहीं लग सका कि योग कब शुरू हुआ? परंतु योग भारत की ही देन है। सिंधु घाटी में मोहनजोदड़ो की खुदाई से पता चलता है कि 3000 ईसा पूर्व में इस घाटी के लोग योग का अभ्यास करते थे। महर्षि पतंजलि द्वारा योग पर प्रथम पुस्तक ‘योग-सूत्र’ लिखी गई, जिसमें उन्होंने योग की अवस्थाओं एवं प्रकारों का विस्तृत उल्लेख किया है। योग के आदि गुरु महर्षि पतंजलि को माना जाता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “योग: चित्तवृति निरोधः”अर्थात् “मनोवृत्ति के विरोध का नाम ही योग है।” भारत के मध्यकालीन युग में कई योगियों ने योग के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। आज भी अनेक महा-पुरुष योग को संपूर्ण विश्व में फैलाने हेतु निरंतर प्रयास कर रहे हैं।
HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा 1

महर्षि पतंजलि हमारे जीवन में शारीरिक तंदुरुस्ती का अपना विशेष महत्त्व है। शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग रखने में योग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग एक ऐसी विधा है, जो शरीर तथा दिमाग पर नियंत्रण रखती है। वास्तव में योग शब्द संस्कृत भाषा के ‘युज’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- जोड़ या मेल। योग वह क्रिया है जिसमें जीवात्मा का परमात्मा से मेल होता है। भारतीय संस्कृति, साहित्य तथा हस्तलिपि के अनुसार, योग जीवन के दर्शनशास्त्र के बहुत नजदीक है। बी०के०एस० आयंगर के अनुसार, “योग वह प्रकाश है जो एक बार जला दिया जाए तो कभी कम नहीं होता। जितना अच्छा आप अभ्यास करेंगे, लौ उतनी ही उज्ज्वल होगी।”

योग का उद्देश्य जीवात्मा का परमात्मा से मिलाप करवाना है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को नीरोग, फुर्तीला, जोशीला, लचकदार और विशिष्ट क्षमताओं या शक्तियों का विकास करके मन को जीतना है। यह ईश्वर के सम्मुख संपूर्ण समर्पण हेतु मन को तैयार करता है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

HBSE 12th Class Hindi पतंग Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
‘सबसे तेज़ बौछारें गयीं, भादो गया’ के बाद प्रकृति में जो परिवर्तन कवि ने दिखाया है, उसका वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
भादो महीने के काले बादल अब छंट गए हैं और सारा आकाश साफ हो गया है। मूसलाधार वर्षा अब समाप्त हो गई है। इसके बाद खरगोश की लाल-भूरी आँखों जैसा शरदकालीन सवेरा उदय हो गया है। संपूर्ण प्राकृतिक वातावरण उज्ज्वल तथा धुला-धुला सा लग रहा है। चारों तरफ धूप चमक रही है और प्रकृति में उज्ज्वल निखार आ गया है। धीमी-धीमी हवा चल रही है और आकाश भी कोमल लगने लगा है। बच्चे समझ गए हैं कि पतंगबाजी की ऋतु आ गई है।

प्रश्न 2.
सोचकर बताएँ कि पतंग के लिए सबसे हलकी और रंगीन चीज, सबसे पतला कागज, सबसे पतली कमानी जैसे विशेषणों का प्रयोग क्यों किया है?
उत्तर:
यहाँ कवि पाठकों के सामने पतंग के रूप-रंग और उसके हलकेपन का वर्णन करना चाहता है। कवि पतंग की विशेषता बताते हुए लिखता है कि वह सबसे हलकी, सबसे रंगीन और सबसे पतली है। पतंग में सबसे पतले कागज़ और बाँस की सबसे पतली कमानी का प्रयोग किया गया है। पतंग की ये विशेषताएँ बच्चों को बलपूर्वक अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं और उनके मन में पतंग के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करती हैं।

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प्रश्न 3.
बिंब स्पष्ट करें –
सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके।
उत्तर:

  1. आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए – स्पर्श बिंब
  2. सवेरा हुआ – दृश्य (स्थिर) बिंब
  3. पतंग ऊपर उठ सके – दृश्य (स्थिर) बिंब
  4. घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से – श्रव्य बिंब
  5. तेज़ बौछारें – दृश्य (गतिशील) बिंब
  6. पुलों को पार करते हुए। – दृश्य (गतिशील) बिंब
  7. चमकीले इशारों से बुलाते हुए – दृश्य (गतिशील) बिंब
  8. खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा – दृश्य (स्थिर) बिंब
  9. अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए – दृश्य (गतिशील) बिंब

प्रश्न 4.
जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास-कपास के बारे में सोचें कि कपास से बच्चों का क्या संबंध बन सकता है?
उत्तर:
कपास बड़ी कोमल, गद्देदार और हलकी होती है। वह चोट को आसानी से सहन कर लेती है। बच्चों में कपास के गुण देखे जा सकते हैं। वे हलके-फुलके शरीर वाले होते हैं। उनका कोमल तथा छरहरा शरीर आसानी से चोट को सहन कर लेता है। उनके पाँवों की तलियाँ कपास जैसी कोमल होती हैं। ऊँचाई से कूदने पर भी उन्हें चोट नहीं लगती, बल्कि उन्हें कठोर छत भी कोमल लगने लगती है।

प्रश्न 5.
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं बच्चों का उड़ान से कैसा संबंध बनता है?
उत्तर:
जिस प्रकार पतंग आकाश में उड़ती हुई ऊँचाइयों का स्पर्श कर लेती है, उसी प्रकार बच्चे भी छतों पर उड़ते हुए दिखाई देते हैं। पतंग को उड़ता देखकर बच्चों में उत्साह तथा उमंग भर जाती है। ऐसी स्थिति में बच्चे खतरनाक ऊँचाइयों की भी परवाह नहीं करते। उन्हें दीवारों से गिरने का भी डर नहीं होता। वे अपने शरीर के तरंगित संगीत की लय पर पतंग के समान उड़ते हुए दिखाई देते हैं। छत पर वे यहाँ से वहाँ भागते दिखाई देते हैं। इसलिए कवि को लगता है कि बच्चे पतंगों के साथ उड़ रहे हैं।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों को पढ़कर प्रश्नों का उत्तर दीजिए
(क) छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए

(ख) अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं।
→ दिशाओं को मृदंग की तरह बजाने का क्या तात्पर्य है?
→ जब पतंग सामने हो तो छतों पर दौड़ते हुए क्या आपको छत कठोर लगती है?
→ खतरनाक परिस्थितियों का सामना करने के बाद आप दुनिया की चुनौतियों के सामने स्वयं को कैसा महसूस करते हैं?
उत्तर:
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाने का तात्पर्य है कि जब बच्चे पतंग उड़ाते समय ऊँची दीवारों से छतों पर कूदते हैं तो उनके पैरों से एक मनोरम संगीत उत्पन्न होता है। ऐसा लगता है कि आस-पास मृदंग बज रहा है और उसकी मधुर ध्वनि सभी ओर गूंज रही है।
→ पतंग उड़ाते समय बच्चों का ध्यान केवल पतंग उड़ाने में लगा रहता है। उनका उत्साह, उमंग तथा निराशा पतंग के साथ जुड़ी होती है। अन्य बातों का बच्चों से कोई मतलब नहीं होता। जब वे कठोर छतों पर कूदते हैं तो उन्हें छतों की कठोरता अनुभव नहीं होती। ऐसा लगता है कि मानों वे पतंग के साथ उड़ रहे हैं।

→ जब मनुष्य एक बार खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर लेता है तब उसमें निर्भीकता उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य सुनहले सूर्य के समान चमकने लगता है। उसका आत्मविश्वास कई गुणा बढ़ जाता है तथा वह कठिन-से-कठिन परिस्थिति का सामना करने में समर्थ हो जाता है।

कविता के आसपास

प्रश्न 1.
आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को देखकर आपके मन में कैसे ख्याल आते हैं? लिखिए।
उत्तर:
आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ता देखकर मेरे मन में विचार आता है कि मैं भी पतंग की तरह पक्षी के समान उन्मत्त होकर उड़ता रहूँ। पतंग के उड़ने में कुछ सीमाएँ हैं, क्योंकि उसकी डोर किसी के हाथ में होती है। वह आकाश में अपनी इच्छा से नहीं उड़ सकती। परंतु पक्षी तो अपनी इच्छानुसार आकाश में उड़ सकता है तथा खुली हवाओं का आनंद लेता है। मैं भी पक्षी बनकर हवा में उड़ना चाहता हूँ। ऐसी स्थिति में मुझे न स्कूल की चिंता होगी, न ही किताबों की।

प्रश्न 2.
‘रोमांचित शरीर का संगीत’ का जीवन के लय से क्या संबंध है?
उत्तर:
रोमांचित शरीर का संगीत’ जीवन की लय से उत्पन्न होता है। जब बच्चे पतंग उड़ाने में लीन हो जाते हैं तो उनके शरीर में एक लय आ जाती है। वे एकाग्र मन से पतंग उड़ाते हैं और उनका शरीर भी रोमांचित हो उठता है। उस समय उनके मन में उत्पन्न होने वाले संगीत में लय होती है और एक गति होती है जिसका वे पूरा आनंद उठाते हैं।

प्रश्न 3.
‘महज एक धागे के सहारे, पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ’ उन्हें (बच्चों को) कैसे थाम लेती हैं? चर्चा करें।
उत्तर:
पतंग उड़ाते समय बच्चों का ध्यान पतंग की ऊँचाइयों पर केंद्रित होता है, परंतु पतंग की डोर उनके हाथ में होती है जिससे वे पतंग पर पूरा नियंत्रण रखते हैं। उनका मन पतंग पर टिक जाता है। बच्चों का शरीर यंत्र के समान निरंतर पतंग के साथ-साथ चलता है। पतंग का धागा न केवल पतंग को नियंत्रित करता है, बल्कि पतंग उड़ाने वाले बच्चों को भी नियंत्रित करता है।

आपकी कविता

प्रश्न 1.
हिंदी साहित्य के विभिन्न कालों में तुलसी, जायसी, मतिराम, द्विजदेव, मैथिलीशरण गुप्त आदि कवियों ने भी शरद ऋतु का सुंदर वर्णन किया है। आप उन्हें तलाश कर कक्षा में सुनाएँ और चर्चा करें कि पतंग कविता में शरद ऋतु वर्णन उनसे किस प्रकार भिन्न है?

प्रश्न 2.
आपके जीवन में शरद ऋतु क्या मायने रखती है?
उत्तर:
ये प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है। विद्यार्थी इन्हें अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

HBSE 12th Class Hindi पतंग Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए –
कि पतंग ऊपर उठ सके –
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके –
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके –
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके –
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाजुक दुनिया
उत्तर:
(i) कवि की कल्पनाशीलता सराहनीय है। पतंग के ऊपर उठने की मनोरम कल्पना की गई है।
(ii) ‘उड़ सके’ की आवृत्ति से कविता में गतिशीलता उत्पन्न हो गई है।
(iii) सीटियों, किलकारियों, तितलियों आदि बहुवचनात्मक शब्दों के प्रयोग के कारण भाषा शिल्प में सौंदर्य उत्पन्न हो गया है।
(iv) संपूर्ण पद्य में बिंबात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।
‘पतंग ऊपर उठ सके’ में दृश्य बिंब है।
‘दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके’ में भी दृश्य बिंब है।
‘तितलियों की इतनी नाज़क दुनिया’ में श्रव्य बिंब है।
(v) पतली कमानी, सीटियों, किलकारियों तथा तितलियों में स्वर मैत्री है।
(vi) सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
(vii) शब्द-योजना सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
(viii) मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है तथा प्रसाद गुण है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए –
जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर
उत्तर:
(i) यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि बच्चों में जन्म से ही चोट, खरोंच आदि सहन करने की क्षमता विकसित हो जाती है। उनके शरीर की हड्डियाँ लचीली होती हैं। अतः कपास के समान किसी चीज़ से टकराने पर भी उन्हें चोट नहीं लगती और वे ज़मीन पर यहाँ-वहाँ अबाध गति से बेसुध होकर भागते हैं।

(ii) ‘पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास’, तथा ‘दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए’ में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।

(iii) संपूर्ण पद्यांश में ‘बेचैन पैर’, ‘पेंग भरते हुए’, ‘डाल की तरह लचीले वेग’ आदि का सार्थक एवं प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।

(iv) इन तीनों में उपमा अलंकार का भी सुंदर प्रयोग हुआ है।

(v) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है जिसमें तत्सम, तद्भव तथा उर्दू के शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
तत्सम पृथ्वी, दिशा, मृदंग, वेग आदि
तद्भव-अपने, साथ, कपास, घूमती आदि
उर्दू-नरम, बेचैन, बेसुध

(vi) शब्द-योजना सर्वथा सटीक एवं सार्थक है।

(vii) बिंबात्मकता के कारण भाव खिल उठे हैं
(क) ‘पृथ्वी घूमती हुई आती है, जब वे दौड़ते हैं बेसुध’ में दृश्य बिंब का प्रयोग हुआ है।
(ख) ‘दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए’ में श्रव्य बिंब है।

(viii) मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है तथा प्रसाद गुण है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।
उत्तर:
(i) इस पद्य में कवि ने पतंग उड़ाते हुए बच्चों की उमंग तथा मस्ती का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है।
(ii) संपूर्ण पद्य में लाक्षणिक पदावली का प्रयोग है। उदाहरण के लिए बच्चों का पतंग के साथ-साथ उड़ना लाक्षणिक प्रयोग कहा जा सकता है। ‘सूरज के सामने आने पर’ का लक्ष्यार्थ है-उमंग तथा उल्लास के साथ आगे बढ़ना।
(iii) ‘पृथ्वी का तेज़ घूमते हुए बच्चों के पास आना’ में मानवीकरण अलंकार है।
(iv) ‘साथ-साथ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार और ‘सुनहले सूरज’ में अनुप्रास अलंकार की छटा देखने योग्य है।
(v) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें संस्कृत तथा उर्दू शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
(vi) पृथ्वी और भी तेज़ घूमती आती है तथा उनके बेचैन पैरों के पास आदि में दृश्य बिंब की सुंदर योजना हुई है।
(vii) मुक्त छंद का प्रयोग है तथा प्रसाद गुण है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘पतंग’ कविता का प्रतिपाद्य/मूलभाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘पतंग’ कविता के माध्यम से कवि ने वर्षा ऋतु के पश्चात् शरद ऋतु के आगमन के अवसर पर पतंग उड़ाने वाले बच्चों के उत्साह का सजीव वर्णन किया है। शरद ऋतु एक खिलखिलाती हुई सुंदर ऋतु होती है। इस ऋतु में आकाश निर्मल और स्वच्छ हो जाता है। चमकीली धूप मानों उत्साही बच्चों को अपनी नई साइकिल को तेज़ चलाते हुए चमकीले इशारे करती है। आकाश में हल्की रंगीन, पतली कमानी वाली पतंगें उड़ने लगती हैं। चारों ओर बच्चों के झुंड किलकारियाँ तथा सीटियाँ बजाते नज़र आते हैं। ऐसा लगता है मानों आकाश में रंगीन तितलियों के समूह उड़ रहे हैं। छतों तथा दीवारों पर कूदते तथा फाँदते बच्चे कपास के समान कोमल लगते हैं। उनके कदमों से छतें भी नरम हो जाती हैं तथा दिशाएँ मृदंग के समान मधुर ध्वनि उत्पन्न करने लगती हैं। बच्चों के शरीर पेंग भरते हुए तीव्र गति से यहाँ-वहाँ कूदते रहते हैं। रोमांचित शरीर के फलस्वरूप वे खतरनाक किनारों से भी बच जाते हैं। लगता है कि वे पतंग के साथ उड़े जा रहे हैं। यदि कभी-कभार वे छत से गिर भी जाते हैं तो वे निर्भीक होकर उठ खड़े होते हैं। उनके पैर सारी धरती पर घूमने के लिए बेचैन नज़र आते हैं।

प्रश्न 2.
पठित कविता के आधार पर भादो और शरद ऋतु में क्या अंतर है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भादो के महीने में आकाश काले बादलों से घिरा रहता है और अकसर मूसलाधार वर्षा होती रहती है। काले बादलों के कारण दिन में भी अंधकार होता है। परंतु शरद ऋतु आते ही आकाश स्वच्छ और निर्मल हो जाता है। शरद ऋतु का सवेरा खरगोश की आँखों की तरह लाल होता है। आकाश में सूर्य की तेज धूप चमकती है तथा आकाश स्वच्छ तथा निर्मल होता है।

प्रश्न 3.
पतंगबाजों की मानसिकता का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
‘पतंग’ आलोक धन्वा की सुप्रसिद्ध काव्य रचना है। इसके माध्यम से कवि ने पतंग उड़ाने वाले बच्चों की मानसिकता को उजागर किया है। पतंग उड़ाते समय बच्चों की बाल सुलभ इच्छाओं और उमंगों को कल्पनाओं के पंख लग जाते हैं। पतंग की उड़ान के साथ-साथ वे भी आकाश में उड़ान को अनुभव करते हैं। पतंग उड़ाने वाले बच्चे अपेक्षाकृत अधिक उत्साही और निडर होते हैं। वे छतों के खतरनाक किनारों पर खड़े होकर भी अपनी पतंग उड़ाते हैं। पतंग उड़ाते समय खुरदरी छतें भी उन्हें कोमल लगती हैं। इस प्रकार पतंगबाज बच्चों की मानसिकता उत्साह, उमंग और निडरता से परिपूर्ण रहती है।

प्रश्न 4.
प्रस्तुत कविता में कवि ने किस प्रकार के प्रतीकों का प्रयोग किया है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में तीन प्रकार के बिंबों का सफल प्रयोग देखा जा सकता है। तेज़ बौंछारें, सवेरा हुआ, खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा, पुलों को पार करते हुए, अपनी नई तेज़ साइकिल चलाते हुए आदि गतिशील बिंबों की योजना है। इसी प्रकार घंटी बजाते हुए, ज़ोर-ज़ोर से, शुरू हो सके, शोर मचाते हुए, सीटियाँ बजाते हुए में श्रव्य बिंबों की योजना हुई है। आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए, छतों को भी नरम बनाते हुए आदि में स्पर्श बिंबों की योजना है।

प्रश्न 5.
पतंग उड़ाते हुए बच्चे बेसुध कैसे हो जाते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बच्चों को पतंग उड़ाने का बड़ा शौक होता है। पतंग उड़ाते समय वे मानों आकाश में पतंग के साथ उड़ने लगते हैं। इस अवसर पर न उन्हें दीन-दुनिया की खबर होती है, न उन्हें धूप, गरमी लगती है और न ही भूख-प्यास। वे खतरनाक दीवारों पर निडर होकर उछलते-कूदते चलते हैं। यदि वे कभी खतरनाक छतों से गिर भी जाते हैं तो और भी निर्भीक हो जाते हैं और फिर से पतंग उड़ाने लगते हैं।

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प्रश्न 6.
छत से गिरने पर उन्हें कौन बचाता है?
उत्तर:
पतंगबाज़ी करते समय बच्चों का छत से गिरने का भय बना रहता है। वे इस कदर बेसुध होकर दौड़ते हैं कि छत के किनारों पर खतरा भी उन्हें विचलित नहीं कर पाता। बच्चे लचीली डाल के समान छत के किनारे पर आकर झुक जाते हैं। इस अवसर पर भीतर का रोमांच ही उन्हें बचा लेता है। पतंग की नाजुक डोर मानों बच्चों को थाम लेती है और वे गिरने से बच जाते हैं।

प्रश्न 7.
“किशोर और युवा वर्ग समाज का मार्गदर्शक हैं”-‘पतंग’ कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किशोर और युवा वर्ग में खतरा उठाने की शक्ति होती है। वे अपने लक्ष्य को पाने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं। वे अपनी धुन में मस्त होकर काम करते हैं। उनके मन में गगन की ऊँचाइयों को पा लेने की क्षमता होती है। उनमें उत्साह, उमंग तथा आत्मविश्वास होता है। बच्चे हमारे समाज के लिए प्रेरणा का काम करते हैं। इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम ने स्वीकार किया है-“बच्चों की आँखों में महाशक्ति भारत की नींव है।” निश्चय से बच्चे हमारे देश का उज्ज्वल भविष्य हैं।

प्रश्न 8.
पृथ्वी का घूमते हुए बच्चों के पैरों के पास आने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यह एक सच्चाई है कि पृथ्वी निरंतर घूमती रहती है। बच्चे भी अपने सपनों को पूरा करने के लिए पतंग के पीछे भागते रहते हैं। ऐसा लगता है कि मानों बच्चे दौड़कर सारी पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं। पतंगबाज़ी करते हुए बच्चे इतने रोमांचकारी हो उठते हैं कि वे अपनी उमंग तथा उल्लास में सारी पृथ्वी को नापकर आनंद प्राप्त करना चाहते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. आलोक धन्वा का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1947 में
(B) सन् 1948 में
(C) सन् 1946 में
(D) सन् 1950 में
उत्तर:
(B) सन् 1948 में

2. आलोक धन्वा का जन्म किस राज्य में हुआ?
(A) उत्तर प्रदेश
(B) दिल्ली
(C) बिहार
(D) मध्य प्रदेश
उत्तर:
(C) बिहार

3. ‘पतंग’ कविता के रचयिता का नाम बताइए।
(A) रघुवीर सहाय
(B) हरिवंशराय बच्चन
(C) कुँवर नारायण
(D) आलोक धन्वा
उत्तर:
(D) आलोक धन्वा

4. आलोक धन्वा का जन्म बिहार के किस जनपद में हुआ?
(A) मुंगेर
(B) सारसा
(C) पटना
(D) मुज़फ्फरनगर
उत्तर:
(A) मुंगेर

5. आलोक धन्वा की प्रथम कविता का नाम क्या है?
(A) पतंग
(B) ब्रूनो की बेटियाँ
(C) जनता का आदमी
(D) नदी दौड़ती है
उत्तर:
(C) जनता का आदमी

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6. ‘जनता का आदमी’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) 1973 में
(B) 1972 में
(C) 1975 में
(D) 1971 में
उत्तर:
(B) 1972 में

7. आलोक धन्वा के एकमात्र काव्य संग्रह का नाम क्या है?
(A) दुनिया रोज़ बनती है
(B) भागी हुई लड़कियाँ
(C) ब्रूनो की बेटियाँ
(D) आत्महत्या के विरुद्ध
उत्तर:
(A) दुनिया रोज़ बनती है

8. ‘भागी हुई लड़कियाँ के कवि का नाम है
(A) मुक्तिबोध
(B) रघुवीर सहाय
(C) कुँवर नारायण
(D) आलोक धन्वा
उत्तर:
(D) आलोक धन्वा

9. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने आलोक धन्वा को किस पुरस्कार से सम्मानित किया?
(A) पहल सम्मान
(B) राहुल सम्मान
(C) साहित्य सम्मान
(D) भोजपुरी सम्मान
उत्तर:
(C) साहित्य सम्मान

10. किस कवि को ‘पहल सम्मान’ प्राप्त हुआ?
(A) कुँवर नारायण
(B) हरिवंश राय बच्चन
(C) आलोक धन्वा
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(C) आलोक धन्वा

11. ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ काव्य रचना किस कवि द्वारा रचित है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) हरिवंशराय बच्चन
(C) आलोक धन्वा
(D) मुक्तिबोध
उत्तर:
(C) आलोक धन्वा

12. किस कवि की रुचि काव्य रचना की अपेक्षा सामाजिक कार्यक्रमों में अधिक है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) आलोक धन्वा
(C) कुँवर नारायण
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(B) आलोक धन्वा

13. ‘पतंग’ कविता में किस छंद का प्रयोग हुआ है?
(A) मुक्त छंद
(B) सवैया छंद
(C) दोहा छंद
(D) कवित्त छंद
उत्तर:
(A) मुक्त छंद

14. ‘पतंग’ कविता किसके लिए प्रसिद्ध है?
(A) प्रतीकों के लिए
(B) व्यंग्यार्थ के लिए
(C) चित्र-विधान के लिए।
(D) बिंब-विधान के लिए
उत्तर:
(D) बिंब-विधान के लिए

15. ‘भादो’ महीना किस ऋतु में आता है?
(A) शरद
(B) ग्रीष्म
(C) हेमंत
(D) वर्षा
उत्तर:
(D) वर्षा

16. पतंग उड़ाते हुए बच्चे किसके सहारे स्वयं भी उड़ते से हैं?
(A) फेफड़ों के
(B) रंध्रों के
(C) साहस के
(D) शक्ति के
उत्तर:
(B) रंध्रों के

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17. उड़ाई जाने वाली सबसे हलकी और रंगीन चीज क्या है?
(A) पतंग
(B) तितली
(C) वायुयान
(D) राकेट
उत्तर:
(A) पतंग

18. पतंगों की ऊँचाइयाँ कैसी कही गई हैं?
(A) फड़कती
(B) कड़कती
(C) धड़कती
(D) सरकती
उत्तर:
(C) धड़कती

19. ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल’ किसे कहा गया है?
(A) लाल सवेरा
(B) बौछार
(C) पतंग
(D) पतला कागज
उत्तर:
(A) लाल सवेरा

20. ‘पतंग’ कविता में तितलियों की इतनी नाज़क दुनिया से कवि का अभिप्राय क्या है?
(A) आकाश में रंगीन तितलियाँ उड़ रही हैं।
(B) तितलियाँ आकाश में उड़कर इसे कोमल बनाती हैं
(C) तितलियों का शरीर कोमल होता है ।
(D) रंगीन पतंगों का कोमलमय संसार
उत्तर:
(D) रंगीन पतंगों का कोमलमय संसार

21. ‘पतंग’ नामक कविता में ‘चमकीले’ विशेषण किसके लिए प्रयुक्त किया गया है?
(A) पतंगों के लिए
(B) शरद के लिए
(C) दिशाओं के लिए
(D) इशारों के लिए
उत्तर:
(B) शरद के लिए

22. ‘सुनहले सूरज’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास
(B) यमक
(C) वक्रोक्ति
(D) उपमा
उत्तर:
(A) अनुप्रास

23. छत से गिरने और बचने के बाद बच्चे क्या बन जाते हैं?
(A) निडर
(B) डरपोक
(C) ईर्ष्यालु
(D) सहनशील
उत्तर:
(A) निडर

24. ‘जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास’ में ‘कपास’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
(A) रूई
(B) कोमलता
(C) चंचलता
(D) हलकापन
उत्तर:
(B) कोमलता

25. पतंग उड़ाने वाले बच्चे दिशाओं को किसके समान बजाते हैं?
(A) ढोलक के समान
(B) वीणा के समान
(C) बाँसुरी के समान
(D) मृदंग के समान
उत्तर:
(D) मृदंग के समान

26. पतंगबाजों के पैर कैसे कहे गए हैं?
(A) साफ
(B) बेचैन
(C) सुन्दर
(D) सपाट
उत्तर:
(B) बेचैन

पतंग पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके-
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके-
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाज़क दुनिया [पृष्ठ-11]

शब्दार्थ-भादो = एक महीना जिसमें मूसलाधार वर्षा होती है। शरद = सर्दी का प्रथम माह। झुंड = समूह । मुलायम = कोमल। किलकारी = खुशी से चिल्लाना। नाजुक = कोमल।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘पतंग’ से अवतरित है। इसके कवि आलोक धन्वा हैं। यह कविता कवि के एकमात्र संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में संकलित है। इस कविता में कवि ने वर्षा ऋतु के पश्चात् बच्चों द्वारा पतंग उड़ाने के उत्साह का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि भादो का महीना अब बीत गया है। उसके साथ-साथ मूसलाधार वर्षा भी अब बंद हो गई है। अब अंधेरे के बाद एक नवीन सवेरा हो गया है अर्थात् अब आकाश साफ है। खरगोश की आँखों के समान शरदकालीन लाल-भूरा सवेरा हो गया है। शरद ऋतु आरंभ हो चुकी है। चारों ओर उमंग तथा उत्साह का वातावरण फैल गया है। पुलों को पार करते हुए नई चमकीली साइकिलों पर सवार होकर बच्चे ज़ोर-ज़ोर से घंटियाँ बजाते हुए बड़ी तीव्र गति से चले आ रहे हैं। वे बड़े ही आकर्षक इशारों से पतंग उड़ाने वाले बच्चों को निमंत्रण देते हुए आकाश को अत्यधिक कोमल बना रहे हैं। भाव यह है कि बच्चे साइकिलों पर सवार होकर एक-दूसरे को पतंगबाज़ी के लिए बुला रहे हैं। बच्चों में अद्भुत उत्साह और उमंग है। धूप चमक रही है। बच्चे बड़े खुश नज़र आ रहे हैं और एक-दूसरे को पतंग उड़ाने के लिए बुला रहे हैं।

शरद ऋतु रूपी बालक ने आकाश को अत्यधिक कोमल और उज्ज्वल बना दिया है, ताकि आकाश की ऊँचाइयों को पतंग स्पर्श कर सकें। आकाश भी चाहता है कि पतंग ऊपर उठकर हवा के साथ तैरने लगे। पतंग संसार की सर्वाधिक हलकी और रंगीन वस्तु है जो कि बहुत ही पतले कागज़ से बनाई जाती है। आकाश रूपी बालक चाहता है कि वह उड़कर ऊपर उठे और उसके साथ बाँस की पतली कमानी भी उड़ने लगे। जब आकाश में पतंग उड़ने लगी तो बच्चे खुशी के मारे सीटियाँ बजाएँगे और किलकारियाँ मारने लगेंगे। सारा आकाश पतंगों से भर जाएगा। तब ऐसा लगेगा मानों रंग-बिरंगी कोमल तितलियों का संसार आकाश में उड़ रहा है। तात्पर्य यह है कि सारा आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाएगा और बच्चे सीटियाँ बजाकर तथा किलकारियाँ मारकर एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाएँगे।

विशेष-
(1) कवि ने शरद ऋतु में बच्चों द्वारा पतंग उड़ाने के दृश्य का मनोरम वर्णन किया है।
(2) ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल’ में उपमा अलंकार का प्रयोग है।
(3) प्रकृति का सुंदर मानवीकरण किया गया है।
(4) संपूर्ण पद्य में दृश्य, श्रव्य तथा स्पर्श बिंबों की सुंदर योजना हुई है।
(5) ‘ज़ोर-ज़ोर से’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है।
(6) सहज, सरल तथा आडम्बरहीन सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
(7) शब्द-प्रयोग सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
(8) संपूर्ण पद्य में मुक्त छंद की सुंदर योजना है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम बताइए।
(ख) कवि ने शरद ऋतु के आगमन को किस प्रकार प्रस्तुत किया है?
(ग) कवि ने पतंग की क्या-क्या विशेषताएँ बताई हैं?
(घ) शरद ऋतु के आने पर बच्चे किस प्रकार की क्रियाएँ करते हैं?
(ङ) तितलियों की नाज़क दुनिया से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
(क) कवि का नाम-आलोक धन्वा। कविता का नाम ‘पतंग’।
(ख) शरद ऋतु का आगमन बच्चों में एक नवीन उत्साह व उमंग भर देता है। इस ऋतु में चारों ओर चहल-पहल बढ़ जाती है। बच्चे साइकिलों पर सवार होकर घंटियाँ बजाते हुए एक-दूसरे को पतंग उड़ाने के लिए इशारे करते हैं।
(ग) पतंग रंग-बिरंगे तथा पतले कागज़ से बनी होती है, उनमें बांस की सबसे पतली कमानी लगी रहती है और वे सुंदर तितलियों के समान आकाश में उड़ती हैं।
(घ) शरद ऋतु के आते ही चारों ओर बच्चों की चहल-पहल मच जाती है। वे खेल-कूद करते हैं और नई-नई साइकिलों पर सवार होकर घंटियाँ बजाते हैं। पतंग उड़ाते समय किलकारियाँ मारते हैं तथा सीटियाँ बजाते हैं। इस ऋतु में बच्चों को आकाश बड़ा ही कोमल और सुंदर लगता है।
(ङ) तितलियों की नाज़क दुनिया से कवि का अभिप्राय है-रंगीन पतंगों का आकर्षक संसार। रंगीन पतंगें कोमल आकाश में तितलियों की तरह मँडराती हैं और हवा में लहराती हैं।

[2] जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर
छतों के खतरनाक किनारों तक
उस समय गिरने से बचाता है उन्हें
सिर्फ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे [पृष्ठ 11-12]

शब्दार्थ-कपास = कोमल तथा गद्देदार अनभतियाँ। बेसध = मस्त और लापरवाह। नरम = कोमल। मृदंग = एक वाद्य यंत्र जिसकी ध्वनि बड़ी मधुर होती है। पेंग भरना = झूले झूलना। लचीले वेग = लचीली चाल। रोमांचित= प्रसन्न। संगीत = मस्त गति। थाम लेना = पकड़ लेना। महज = केवल। रंध्र = छिद्र।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘पतंग’ से अवतरित है। इसके कवि आलोक धन्वा हैं। यह कविता कवि के एकमात्र संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में संकलित है। इस कविता में कवि ने लाक्षणिक भाषा का प्रयोग करते हुए बच्चों की क्रियाओं पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या कवि कहता है कि बच्चे जन्म से ही अपने साथ कपास जैसी कोमलता लेकर आते हैं। भाव यह है कि उनके शरीर में हर प्रकार की चोट और खरोंच सहन करने की शक्ति होती है। उनके पैरों में एक बेचैनी होती है जिसके कारण वे संपूर्ण पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं। जब बच्चे बेपरवाह होकर दौड़ने लगते हैं तो वे छतों को भी कोमल समझने लगते हैं। उनकी गति के कारण दिशाएँ मृदंग के समान मधुर ध्वनि उत्पन्न करने लगती हैं। जब वे तीव्र गति के साथ झूला झूलते हुए चलते हैं, तो वे पेड़ की शाखा के समान ढीले पड़ जाते हैं। उस समय उनकी गति में एक प्रखर वेग होता है, उन्हें किसी प्रकार का डर नहीं होता। छतों के

खतरनाक किनारों पर भी वे कदम रखते हुए आगे बढ़ते हैं। उस समय उनका प्रसन्न शरीर ही उन्हें गिरने से बचाता है। पतंग उड़ाते समय उनका संपूर्ण शरीर रोमांचित हो उठता है। पतंग की ऊपर जाती धड़कनें उन्हें गिरने से रोक लेती हैं। उस समय ऐसा प्रतीत होता है मानों पतंग का केवल एक धागा बच्चों को संभाल लेता है और वे नीचे गिरने से बच जाते हैं। यहाँ कवि पतंग उड़ाने वाले बच्चों का वर्णन करता हुआ कहता है कि कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि बच्चे भी पतंगों के साथ उड़ने लगे हैं। वे अपने शरीर के रोम-कूपों से निकलने वाले संगीत का सहारा लेकर उड़ने लगते हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

विशेष:
(1) इस पद्यांश में कवि ने पतंग उड़ाते हए बच्चों की बेसुध मस्ती का सजीव वर्णन किया है।
(2) बच्चों की तीव्र गति, झूलता हुआ शरीर, उनके रोमांचित अंग तथा लचीला वेग, उनके उत्साह और उमंग को व्यक्त करता है।
(3) ‘कपास’ शब्द का विशेष प्रयोग हुआ है। इस शब्द द्वारा कवि बच्चों के शरीर की लोच, नरमी तथा सहनशीलता की ओर संकेत करता है।
(4) संपूर्ण पद्य में मानवीकरण अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है; यथा-
‘पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं।
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए।
(5) संपूर्ण पद्य में दृश्य, स्पर्श तथा श्रव्य बिंबों की सुंदर योजना हुई है। कवि ने सहज, सरल अथवा सामान्य प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग किया है। इसमें तत्सम, तद्भव तथा उर्दू के शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
तत्सम-पृथ्वी, मृदंग, दिशा, रोमांचित, संगीत।
उर्दू-नरम, खतरनाक, अकसर, सिर्फ, महज़।
(6) शब्द-योजना सटीक और भावानुकूल है।
(7) मुक्त छंद का सफल प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) ‘जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास’ इस पंक्ति का बच्चों के साथ क्या संबंध है?
(ख) बच्चे बेसुध होकर क्यों दौड़ते हैं?
(ग) छतों के खतरनाक किनारों से बच्चे कैसे बच जाते हैं?
(घ) पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें कैसे थाम लेती हैं?
उत्तर:
(क) बच्चों का शरीर बड़ा ही कोमल होता है। उनका शरीर कोमलता के साथ-साथ सहनशील भी होता है। वे चोट और खरोंच लगने के आदी हो जाते हैं। उनके शरीर में लचीलापन होता है। किसी चीज से टकराने पर उन्हें बहुत कम चोट लगती है। इसलिए कवि ने बच्चों की तुलना कपास से की है।

(ख) बच्चों के मन में पतंग उड़ाने की बेचैनी होती है। पतंगबाजी करते समय बच्चों को धूप, गर्मी, कठोर छत आदि का ध्यान नहीं रहता। वे उछलते-कूदते और पतंग की डोर को थामे हुए पतंग उड़ाने में मस्त हो जाते हैं। इसलिए वे बेसुध होकर दौड़ते हैं।

(ग) प्रायः सभी को दीवार से गिरने का डर लगा रहता है, परंतु बच्चे बेसुध होकर अपने शरीर को लहराते हुए छतों के किनारों पर झुक जाते हैं, इस अवसर पर उनके अन्दर का उत्साह और उमंग उनकी रक्षा करता है और वे गिरने से बच जाते हैं।

(घ) पतंग की ऊपर उड़ती हुई धड़कनें बच्चों को गिरने से रोक लेती हैं। उस समय पतंग की डोर बच्चों के लिए सहारे का काम करती है और वे स्वयं को सँभाल लेते हैं।

[3] अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है। उनके बेचैन पैरों के पास। [पृष्ठ-12]

शब्दार्थ-खतरनाक = भयानक। निडर = निर्भय। बेचैन = व्याकुल।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘पतंग’ से अवतरित है। इसके कवि आलोक धन्वा हैं। यह कविता कवि के एकमात्र काव्यसंग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में संकलित है। इसमें कवि ने बच्चों द्वारा पतंग उड़ाने का बहुत ही सजीव व मनोहारी वर्णन किया है।

व्याख्या-बच्चे प्रायः पतंग उड़ाते समय कभी नहीं गिरते, परंतु दुर्भाग्य से कभी वे छतों के खतरनाक किनारों से गिर भी जाते हैं तो वे बच जाते हैं और वे अधिक निर्भय हो जाते हैं। अत्यधिक उत्साह के साथ वे सुनहले सूर्य के समान प्रकाशमान हो उठते हैं। ऐसा लगता है कि वे अपने बेचैन पैरों के साथ सारी पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं, वे दुगुने उत्साह के साथ घूमते-फिरते हैं और भाग-भागकर पतंग उड़ाते हैं।

विशेष-

  1. कवि ने पतंग उड़ाते हुए बच्चों की उमंग तथा मस्ती का बड़ा प्रभावशाली वर्णन किया है।
  2. संपूर्ण पद्य में लाक्षणिक भाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  3. उदाहरण के रूप में ‘सुनहले सूरज के सामने’ आदि में लाक्षणिकता विद्यमान है।
  4. ‘पृथ्वी का तेज़ घूमते हुए बच्चों के पास आना’ में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. ‘सुनहले सूरज’ में अनुप्रास अलंकार तथा ‘साथ-साथ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का सुंदर वर्णन हुआ है।
  6. सहज, सरल एवं प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  7. शब्द-योजना सटीक एवं भावानुकूल है।।
  8. संपूर्ण पद्य में दृश्य बिंब की सफल योजना हुई है।
  9. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम बताइए।
(ख) छतों के खतरनाक किनारों से बच जाने पर बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(ग) सुनहले सूरज के सामने आने का क्या अर्थ है?
(घ) पृथ्वी बच्चों के बेचैन पैरों के पास घूमती हुई आती है, इसका आशय क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-आलोक धन्वा कविता-‘पतंग’।
(ख) जब बच्चे छतों के खतरनाक किनारों से बच जाते हैं तो वे और अधिक निडर हो जाते हैं। उनमें किसी भी विपत्ति और कष्ट को सहन करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। तब वे खुले आसमान में तपते हुए सुनहले सूर्य के समान दिखाई देने लगते हैं।
(ग) सुनहले सूर्य के सामने आने का अर्थ है सूर्य के समान तेज़ से युक्त होकर सक्रिय हो जाना। जिस प्रकार सूर्य अपना तीव्र प्रकाश पृथ्वी के कोने-कोने पर फैलाता है उसी प्रकार बच्चे भी पतंग उड़ाते हुए मौज-मस्ती में चारों ओर फैल जाना चाहते हैं। उनके मन का भय समाप्त हो जाता है।
(घ) ‘पृथ्वी तेज़ घूमती हुई बच्चों के बेचैन पैरों के पास आती है’ का तात्पर्य है बच्चों के पैरों में गतिशीलता पैदा होना। बच्चे पतंग उड़ाते समय मानों सारी पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं।

पतंग Summary in Hindi

पतंग कवि-परिचय

प्रश्न-
आलोक धन्वा का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
आलोक धन्वा का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय आलोक धन्वा सातवें-आठवें दशक के कवि हैं। इनका नाम नई कविता से जुड़ा हुआ है। इनका जन्म सन् 1948 में बिहार के मुंगेर जनपद के एक साधारण परिवार में हुआ। बहुत छोटी अवस्था में अपनी कुछ गिनी-चुनी कविताओं के फलस्वरूप इन्होंने अपार लोकप्रियता अर्जित की। 1972-73 में इनकी जो आरम्भिक कविताएँ प्रकाशित हुईं, उन्होंने काव्य-प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। कुछ आलोचकों का तो यह भी दावा है कि इन कविताओं का अभी तक सही मूल्यांकन ही नहीं हुआ। इसका प्रमुख कारण यह है कि आलोक धन्वा ने लीक से हटकर एक नवीन शिल्प द्वारा भावाभिव्यक्ति की है। भले ही उनको अल्पकाल ही में ख्याति प्राप्त हो गई है, लेकिन उन्होंने अधिक काव्य रचना नहीं की।

पिछले दो दशकों से वे देश के विभिन्न भागों में सामाजिक तथा सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहे हैं। काव्य रचना की अपेक्षा उनकी रुचि सामाजिक कार्यक्रमों में अधिक रही है। जमशेदपुर में उन्होंने अध्ययन मंडलियों का संचालन किया। यही नहीं, उन्होंने अनेक राष्ट्रीय संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता की भूमिका भी निभाई है।

2. प्रमुख रचनाएँ-आलोक धन्वा की प्रथम कविता सन् 1972 में ‘जनता का आदमी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। तत्पश्चात् ‘भागी हुई लड़कियाँ’ तथा ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ काव्य-रचनाओं से इनको विशेष प्रसिद्धि मिली। ‘गोली दागो पोस्टर’ इनकी प्रसिद्ध कविता है। इनका एकमात्र संग्रह है-‘दुनिया रोज़ बनती है।

आलोक धन्वा को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। राहुल सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का साहित्य सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान तथा पहल सम्मान आदि से इस कवि को सम्मानित किया गया है। आलोक धन्वा सहज, सरल तथा सामान्य भाषा द्वारा आकर्षक तथा मनोहारी बिंबों की रचना करने में सिद्धहस्त हैं।

3. काव्यगत विशेषताएँ-आलोक धन्वा समकालीन कविता के एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनके काव्य में लगभग वे सभी प्रवृत्तियाँ देखी जा सकती हैं जो समकालीन कवियों की काव्य रचनाओं में हैं। आलोक धन्वा की काव्य रचनाओं में सामाजिक चेतना के प्रति सरोकार है। आरंभ में तो वे समाज के शोषितों के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं। इनकी कविताएँ वर्तमान समाज के ढाँचे की विडम्बनाओं को उद्घाटित करती हैं और मानवीय संबंधों पर भी प्रकाश डालती हैं। कुछ स्थलों पर वे आज की राजनीति पर करारा व्यंग्य भी करती हैं और बुनियादी मानसिकताओं पर चोट भी करती हैं। उनकी काव्य रचनाओं में बार-बार आम आदमी का स्वरूप भी उभरकर आता है। इसके साथ-साथ कवि ने युगीन रुचियों, आवेगों तथा वर्ग-संघर्ष का भी वर्णन किया है। ईश्वर के प्रति उनकी कविता में कोई खास स्थिरता नहीं है। मार्क्सवाद के प्रति आस्था होने के कारण ईश्वर के प्रति उनका विश्वास उठ गया है। हाँ, मानव के प्रति वे निरन्तर अपना सरोकार दिखाते हैं।

आज दिन-प्रतिदिन की निराशा, खटास, दुःख, पीड़ा आदि के फलस्वरूप मानव-जीवन अलगावबोध का शिकार बनता जा रहा है। आलोक धन्वा सच्चाई से पूर्णतया अवगत रहे हैं। वे मानव-जीवन की इस त्रासदी को उकेरने में भी सफल रहे हैं। ‘जनता का आदमी’ में वे कहते हैं

क्यों पूछा था एक सवाल मेरे पुराने पड़ोसी ने
मैं एक भूमिहीन किसान हूँ
क्या मैं कविता को छू सकता हूँ?
इसके अतिरिक्त उनकी काव्य रचनाओं में आधुनिक युग की विसंगतियों का वर्णन भी देखा जा सकता है। कहीं-कहीं वे महानगरीय बोध से जुड़ी हुई भावनाएँ व्यक्त करते हैं। लेकिन सच्चाई तो यह है कि आलोक धन्वा ने आम आदमी के जीवन से जुड़ी समस्याओं का अधिक वर्णन किया है। ‘पतंग’ नामक लम्बी कविता में उन्होंने पतंग जैसी साधारण वस्तु को काव्य का विषय बनाया है और उसके माध्यम से बच्चों में उमंग और उल्लास का मनोहारी वर्णन किया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

4. अभिव्यंजना शिल्प-आलोक धन्वा एक जनवादी कवि हैं। अतः उन्होंने सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग किया है जो आधुनिक परिस्थितियों को व्यक्त करने में समर्थ है। उन्होंने देशी-विदेशी शब्दों से कोई
परहेज़ नहीं किया। मानवीय संवेदना को उकेरने के लिए उन्होंने मुहावरों में भी नयापन लाने की कोशिश की है। उनकी भाषा नवीन बिंबों तथा नवीन चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। भले ही कवि ने अलंकारों के प्रयोग पर अधिक बल नहीं दिया, लेकिन उन्होंने अलंकार प्रयोग से परहेज़ भी नहीं किया और यत्र-तत्र स्वाभाविक रूप से अलंकारों का प्रयोग किया है। भले ही उनकी कविता मुक्त छंद में लिखी गई हो, लेकिन उसमें लयात्मकता भी है। उनकी लंबी कविता ‘पतंग’ से एक उदाहरण देखिए –
सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि आलोक धन्वा ने जो थोड़ा-बहुत काव्य लिखा है। वह पाठक को संवेदनशील बना देता हैं। उनके काव्य में वर्ग-संघर्ष, मानवतावाद, राजनीतिक दोगलापन, आधुनिक व्यवस्था की टूटन, युगीन चेतना आदि पर समुचित प्रकाश डाला गया है। लेकिन यह एक कटु सत्य है कि इस समकालीन कवि के काव्य का अभी तक समुचित मूल्यांकन नहीं हो पाया।

पतंग कविता का सार

प्रश्न-
आलोक धन्वा द्वारा रचित कविता ‘पतंग’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता आलोक धन्वा कवि के एकमात्र काव्य संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में से संकलित है। यह पूरी कविता न होकर ‘पतंग’ नामक कविता का एक अंश मात्र है। इसमें कवि ने पतंग के माध्यम से बच्चों की उमंग, उल्लास तथा खुशियों का मनोहारी वर्णन किया है। यह कविता दृश्य एवं श्रव्य बिंबों के लिए प्रसिद्ध है। कवि लिखता है कि भादो के महीने के बीत जाने के बाद शरद ऋतु का सवेरा होता है। आकाश से काले बादल छंट जाते हैं। शरद ऋतु मानों नई चमकीली साइकिल चलाकर बच्चों को पतंग उड़ाने का निमंत्रण देती है। बच्चों के पास ऊर्जा है और पतंग उनके सपनों का प्रतीक है। पतंग के समान बच्चों के सपने बड़े हलके होते हैं। शीघ्र ही पतंग उड़ाने वाले बच्चों का एक समूह साकार हो उठता है। पतंग उड़ाने वाले बच्चे जन्म से ही कोमल तथा हलके शरीर वाले होते हैं। पृथ्वी उनके पैरों के पास घूमती हुई आती है तथा वे अपनी मस्ती में छतों तथा दीवारों पर पतंग उड़ाते हुए नज़र आते हैं। छतों की कठोरता उनके लिए नरम हो जाती है। बच्चों को गिरने का भय नहीं होता। यदि वे कहीं गिर भी जाते हैं तो उनमें क्षमता और अधिक मजबूत हो जाती है। ऐसा लगता है मानों वे अपनी पतंग की डोर के सहारे पतंगों के साथ उड़ते नज़र आते हैं। वे उन्मत्त होकर आगे बढ़ते हैं और अपने सपनों को पूरा करने के लिए उड़ान भरते रहते हैं। पतंग उड़ाने से बच्चों का आत्मविश्वास और अधिक बढ़ जाता है।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार

HBSE 12th Class Physical Education राष्ट्रीय खेल पुरस्कार Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
देश के महत्त्वपूर्ण खेल पुरस्कार कौन-कौन से हैं? किन्हीं तीन का वर्णन करें।
अथवा
किन्हीं दो राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
देश के महत्त्वपूर्ण खेल पुरस्कार हैं
(1) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
(2) द्रोणाचार्य पुरस्कार
(3) अर्जुन पुरस्कार
(4) ध्यानचंद पुरस्कार आदि।
1. राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार (Rajiv Gandhi Khel Ratna Award):
भारत सरकार द्वारा देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1991-92 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार (Rajiv Gandhi Khel Ratna Award) शुरू किया गया। इस पुरस्कार में 25 लाख रुपए नकद, एक पदक तथा एक प्रशस्ति पत्र और दिल्ली आकर पुरस्कार प्राप्त करने के लिए टी० ए०/डी० ए० (TA/DA) दिया जाता है। जिस वर्ष पुरस्कार दिया जाता है, उस वर्ष आयकर में छूट होती है। पहले इस पुरस्कार में 5 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती थी। प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार ग्रैण्ड मास्टर विश्वनाथन आनंद (शतरंज) को दिया गया। यह पुरस्कार देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की याद में दिया जाता है। यह पुरस्कार किसी खिलाड़ी को जीवन में एक बार प्रदान किया जाता है।

2. द्रोणाचार्य पुरस्कार (Dronacharya Award):
भारत सरकार ने प्रशिक्षकों को सन् 1985 से द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित करना शुरू किया। महाभारत के पात्र गुरु द्रोणाचार्य की याद में यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जो किसी टीम या खिलाड़ियों को स्थायी या अस्थायी रूप से प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। यह पुरस्कार ऐसे प्रसिद्ध प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जिनकी टीम या खिलाड़ियों ने पिछले तीन वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार श्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो। नियमित रूप से इस पुरस्कार में एक ताँबे की मूर्ति, एक प्रशंसा-पत्र तथा 10 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर द्रोणाचार्य पुरस्कार का उद्देश्य प्रशिक्षकों का खेल के क्षेत्र में महत्त्व बढ़ाना है।

3. अर्जुन पुरस्कार (Arjuna Award):
अर्जुन पुरस्कार सन् 1961 में शुरू किया गया। यह पुरस्कार उन खिलाड़ियों को दिया जाता है जिनकी उस वर्ष (जिस वर्ष के लिए यह दिया जाना है) उत्कृष्ट व असाधारण उपलब्धि हो और पिछले तीन वर्षों में प्रदर्शन का स्तर उत्कृष्ट व श्रेष्ठ रहा हो। यह अवार्ड ‘महाभारत’ के पात्र अर्जुन की याद में भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार में काँस्य की अर्जुन की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र व 15 लाख रुपए से खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया जाता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार

प्रश्न 2.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार पर विस्तृत नोट लिखें।
अथवा
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के उद्देश्यों एवं सामान्य नियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार सर्वोत्तम राष्ट्रीय खेल पुरस्कार है। यह पुरस्कार सन् 1991-92 में शुरू किया गया। यह पुरस्कार ऐसे खिलाड़ी को प्रदान किया जाता है जिसका खेल के क्षेत्र में उस वर्ष उत्तम एवं उत्कृष्ठ प्रदर्शन रहा हो। यह पुरस्कार एक खिलाड़ी से अधिक खिलाड़ियों को भी प्रदान किया जा सकता है, परन्तु संबंधित खिलाड़ी किसी टीम गेम्स से हो। इस पुरस्कार में एक मैडल, एक प्रशंसा पत्र तथा 25 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। इस राशि पर उस वर्ष कोई आय-कर या संपत्ति कर नहीं लगता। पहले इस पुरस्कार में 5 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती थी। इस पुरस्कार के लिए जिस खिलाड़ी का चुनाव होता है उसे एक ब्लेजर, एक टाई और पुरस्कार लेने के लिए दिल्ली आने-जाने के लिए सरकार के द्वारा निश्चित TA/DA का भुगतान भी किया जाता है।

राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के उद्देश्य (Objectives of Rajiv Gandhi Khel Ratna Award):
इस पुरस्कार के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) खिलाड़ियों का समाज एवं देश में आदर बढ़ाने हेतु।
(2) देश में खेल संस्कृति को विस्तृत करने एवं फैलाने हेतु।
(3) खेलों में खिलाड़ियों को प्रेरित करने हेतु ताकि वे खेल प्रतिस्पर्धाओं या प्रतियोगिताओं में उच्चतम प्रदर्शन कर सकें।

राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के सामान्य नियम (General Rules of Rajiv Gandhi Khel Ratna Award):
इस पुरस्कार के सामान्य नियम निम्नलिखित हैं
(1) भारत सरकार द्वारा गठित कमेटी के सदस्य अन्तिम निर्णय के लिए प्रार्थना-पत्रों पर विचार तथा उनके बारे में पूरी छानबीन करते हैं।
(2) गठित कमेटी का निर्णय अन्तिम होता है। इसके विरुद्ध कोई भी सुनवाई नहीं हो सकती।
(3) खिलाड़ी को यह पुरस्कार अपने खेल जीवन में एक बार ही मिल सकता है।
(4) यह पुरस्कार मरणोपरान्त भी प्रदान किया जा सकता है।
(5) भारत सरकार द्वारा यह पुरस्कार रद्द भी किया जा सकता है।
(6) भारत सरकार चाहे तो रद्द किए गए पुरस्कार को पुनः प्रदान भी कर सकती है।

प्रश्न 3.
द्रोणाचार्य पुरस्कार क्या है? इस पुरस्कार की पात्रता हेतु सामान्य योग्यताएँ बताएँ।
अथवा
द्रोणाचार्य पुरस्कार (Dronacharya Award) पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
परिचय (Introduction)-भारत सरकार ने प्रशिक्षकों को सन् 1985 से द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित करना शुरू किया। महाभारत के पात्र गुरु द्रोणाचार्य की याद में यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जो किसी टीम या खिलाड़ियों को स्थायी या अस्थायी रूप से प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। यह पुरस्कार ऐसे प्रसिद्ध प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जिनकी टीम या खिलाड़ियों ने पिछले तीन वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार श्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो। नियमित रूप से इस पुरस्कार में, गुरु द्रोणाचार्य की काँस्य की प्रतिभा, एक प्रशंसा-पत्र तथा 10 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर द्रोणाचार्य पुरस्कार का उद्देश्य प्रशिक्षकों का खेल के क्षेत्र में महत्त्व बढ़ाना है।

द्रोणाचार्य पुरस्कार की पात्रता हेतु योग्यताएँ (Eligibility Rules for Dronacharya Award):
इस पुरस्कार की पात्रता के लिए प्रशिक्षकों में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिएँ-
1. व्यक्तिगत इवेंट्स (Individual Events):
वह प्रशिक्षक द्रोणाचार्य पुरस्कार का पात्र होता है जिसके प्रशिक्षण में खिलाड़ी/खिलाड़ियों ने निम्नलिखित उपलब्धियाँ प्राप्त की हों
(1) जिस खिलाड़ी ने वर्ल्ड चैम्पियनशिप में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो।
(2) जिस खिलाड़ी ने ओलम्पिक खेलों में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो।
(3) जिस खिलाड़ी ने वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा हो और उसको अंतर्राष्ट्रीय खेल संघ द्वारा मान्यता मिल चुकी हो।
(4) जिस खिलाड़ी ने एशियाई या राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता हो।

2. टीम इवेंट्स (Team Events):
वह प्रशिक्षक द्रोणाचार्य पुरस्कार का पात्र होता है जिसके प्रशिक्षण में टीम ने निम्नलिखित उपलब्धियाँ प्राप्त की हों
(1) जिस टीम ने विश्व कप, विश्व चैम्पियनशिप, ओलम्पिक खेलों या अन्य अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय खेलों में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदत जीता हो और पिछले वर्ष से उसके प्रदर्शन का स्तर ऊँचा हो।
(2) जिस टीम ने दो स्वर्ण पदक अर्थात् पहला एशियाई खेलों में और दूसरा एशियाई चैम्पियनशिप में जीता हो।
(3) जिस टीम ने दो स्वर्ण पदक अर्थात् पहला एशियाई खेलों में तथा दूसरा राष्ट्रमंडल खेलों में जीता हो।

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प्रश्न 4.
‘अर्जुन अवार्ड’ (Arjuna Award) का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिचय (Introduction)-अर्जुन अवार्ड सन् 1961 में शुरू किया गया। यह अवार्ड उन खिलाड़ियों को दिया जाता है जिनकी उस वर्ष (जिस वर्ष के लिए यह दिया जाना है) उत्कृष्ट व असाधारण उपलब्धि हो और पिछले तीन वर्षों में प्रदर्शन का स्तर उत्कृष्ट व श्रेष्ठ रहा हो। यह अवार्ड ‘महाभारत’ के पात्र अर्जुन की याद में भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। इस अवार्ड में कांस्य की अर्जुन की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र व 15 लाख रुपए से खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया जाता है।

अर्जुन अवार्ड के लिए पात्रता संबंधित नियम (Eligibility Rules for Arjuna Award)-
अर्जुन अवार्ड के लिए पात्रता संबंधी नियम निम्नलिखित हैं
(1) भारत सरकार राष्ट्रीय खेल संघों से निश्चित तारीख तक खिलाड़ियों की सूची मँगवाती है। सरकार द्वारा निश्चित तारीख
बढ़ाई भी जा सकती है।
(2) यदि भारत सरकार को खिलाड़ियों की सूची न मिले तो सरकार किसी विशेष खिलाड़ी को इस पुरस्कार से विभूषित कर सकती है।
(3) राष्ट्रीय खेल संघ अपने-अपने क्षेत्रों से तीन खिलाड़ियों के नाम भेज सकता है।
(4) संघ द्वारा भेजे गए तीन खिलाड़ियों में से भारत सरकार केवल एक खिलाड़ी को इस पुरस्कार से सम्मानित करती है लेकिन महिला खिलाड़ी की स्थिति में भारत सरकार इस नियम में संशोधन कर सकती है।
(5) यह पुरस्कार कहाँ और किस दिन देना है, इसका अंतिम फैसला भारत सरकार द्वारा किया जाता है।
(6) किसी भी खिलाड़ी को इस पुरस्कार से केवल एक बार ही सम्मानित किया जाता है अर्थात् दूसरी बार उसकी पात्रता रद्द कर दी जाती है।
(7) भारत सरकार के फैसले के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई सुनवाई नहीं हो सकती।
(8) यह पुरस्कार भारत सरकार रद्द भी कर सकती है।
(9) खिलाड़ी के मरणोपरांत भी यह पुरस्कार प्रदान किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
भीम अवार्ड क्या है? भीम अवार्ड के लिए पात्रता संबंधी आवश्यक नियम बताएँ।
उत्तर:
परिचय (Introduction)-भीम अवार्ड की शुरुआत सन् 1996 में हुई। यह अवार्ड अपने-अपने क्षेत्रों में ख्याति प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ताओं, खिलाड़ियों और ग्रामीण डॉक्टरों को प्रदान किया जाता है। इस अवार्ड में महाभारत के पात्र भीम की एक काँस्य की प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र, पाँच लाख रुपए, एक रंगीन जैकेट तथा टाई आदि प्रदान की जाती है। इस अवार्ड के लिए वे खिलाड़ी आवेदन कर सकते हैं जो पिछले तीन वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता तथा सीनियर राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में प्रथम, दूसरा तथा तीसरा स्थान प्राप्त किया हो या अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया हो।

भीम अवार्ड के लिए पात्रता संबंधी आवश्यक नियम (Eligibility Rules for Bhim Award):
भीम अवार्ड के लिए पात्रता संबंधी आवश्यक नियम अनलिखित हैं
(1) एक ही वर्ग के खेल में एक से ज्यादा खिलाड़ी को पुरस्कृत नहीं किया जाएगा, परन्तु यदि चयनित खिलाड़ी महिला हो तो एक वर्ग के लिए एक से ज्यादा अवार्ड दिया जा सकता है।
(2) यह अवार्ड केवल उन्हीं खिलाड़ियों को दिया जाएगा, जिन्होंने हरियाणा राज्य की ओर से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय फेडरेशन या राष्ट्रीय खेलों में कम-से-कम एक बार भाग लिया हो।
(3) खिलाड़ी की उपलब्धि का प्रमाण-पत्र खेल संघ के अध्यक्ष या सचिव द्वारा प्रमाणित एवं हस्ताक्षरित किया गया हो।
(4) वे खिलाड़ी जिनके विरुद्ध नशाखोरी व मादक द्रव्यों के प्रयोग इत्यादि की जाँच लम्बित हो या दण्डित किया गया हो, ऐसेखिलाड़ी इस पुरस्कार के पात्र नहीं होंगे।
(5) खेल पॉलिसी में दिए गए सभी खेलों की चैम्पियनशिप में पिछले चार वित्तीय वर्षों के सीनियर अन्तर्राष्ट्रीय तथा सीनियर फेडरेशन कप/सीनियर राष्ट्रीय चैम्पियनशिप एवं राष्ट्रीय खेलों में खिलाड़ियों की उपलब्धियों का इस पुरस्कार के लिए मूल्यांकन किया जाएगा।
(6) जिन्हें यह अवार्ड एक बार मिल चुका है वे दोबारा इस पुरस्कार के पात्र नहीं होंगे।
(7) इस अवार्ड के सम्बन्ध में हरियाणा सरकार का निर्णय अंतिम होगा और इसके विरूद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों का महत्त्व इस प्रकार है
(1) खिलाड़ियों को उत्कृष्ट व श्रेष्ठ प्रदर्शन हेतु प्रेरित करना।
(2) खिलाड़ियों व प्रशिक्षकों के सम्मान व स्तर को बढ़ाना।
(3) राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करना।
(4) युवाओं को खेल के लिए प्रेरित करना।
(5) सद्भाव, मित्रता व शांति की भावना विकसित करना।
(6) राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय भावना के लिए प्रेरित करना।

प्रश्न 2.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार पर संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार कब और कैसे दिया जाता है?
उत्तर:
भारत सरकार द्वारा देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1991-92 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार शुरू किया गया। यह पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार में 25 लाख रुपए नकद, एक पदक तथा एक प्रशस्ति पत्र और दिल्ली आकर पुरस्कार प्राप्त करने के लिए टी० ए०/डी० ए० दिया जाता है। जिस वर्ष पुरस्कार दिया जाता है, उस वर्ष आय-कर में छूट होती है। प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार ग्रैण्ड मास्टर विश्वनाथन आनंद (शतरंज) को दिया गया। यह पुरस्कार देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की याद में दिया जाता है। यह पुरस्कार किसी खिलाड़ी को जीवन में एक बार प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 3.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के कोई चार सामान्य नियम बताएँ।
उत्तर;
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के चार सामान्य नियम निम्नलिखित हैं
(1) भारत सरकार द्वारा गठित कमेटी के सदस्य अन्तिम निर्णय के लिए प्रार्थना-पत्रों पर विचार तथा उनके बारे में पूरी छानबीन करते हैं।
(2) गठित कमेटी का निर्णय अन्तिम होता है। इसके विरुद्ध कोई भी सुनवाई नहीं हो सकती।
(3) खिलाड़ी को यह पुरस्कार अपने खेल जीवन में एक बार ही मिल सकता है।
(4) यह पुरस्कार मरणोपरान्त भी प्रदान किया जा सकता है।

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प्रश्न 4.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के मुख्य उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) खिलाड़ियों का समाज व देश में सम्मान बढ़ाना।
(2) खेलों में खिलाड़ियों को प्रेरित करने हेतु ताकि वे खेल प्रतिस्पर्धाओं में उच्चतम प्रदर्शन कर सकें।
(3) देश में खेल संस्कृति का विस्तार करना।
(4) राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ाना आदि।

प्रश्न 5.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किन्हीं दस खिलाड़ियों और उनके खेलों की सूची बनाएँ।
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित दस खिलाड़ियों और उनके खेलों की सूची निम्नलिखित हैं-

खिलाड़ीखेल
1. कर्णम मल्लेश्वरीभारोत्तोलन
2. लिएंडर पेसटेनिस
3. सचिन तेंदुलकरक्रिकेट
4. धनराज पिल्लैहॉकी
5. अभिनव बिन्द्रानिशानेबाजी
6. एम०एस० धौनीक्रिकेट
7. सानिया मिर्जाकुश्ती
8. टेनिस साक्षी मलिकपैरा-एथलेटिक्स
9. देवेंद्र झाझरियाक्रिकेट
10. विराट कोहलीखेल

प्रश्न 6.
द्रोणाचार्य पुरस्कार पर संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
द्रोणाचार्य पुरस्कार कब और क्यों दिया जाता है?
उत्तर:
भारत सरकार ने प्रशिक्षकों को सन् 1985 से द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित करना शुरू किया। महाभारत के पात्र गुरु द्रोणाचार्य की याद में यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जो किसी टीम या खिलाड़ियों को स्थायी या अस्थायी रूप से प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। यह पुरस्कार ऐसे प्रसिद्ध प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जिनकी टीम या खिलाड़ियों ने पिछले तीन वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार श्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो। नियमित रूप से इस पुरस्कार में एक ताँबे की मूर्ति, एक प्रशंसा-पत्र तथा 10 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर द्रोणाचार्य पुरस्कार का उद्देश्य प्रशिक्षकों का खेल के क्षेत्र में महत्त्व बढ़ाना है।

प्रश्न 7.
अर्जुन अवार्ड संबंधी पात्रता के कोई चार नियम बताएँ।
उत्तर:
अर्जुन अवार्ड संबंधी पात्रता के चार नियम निम्नलिखित हैं
(1) भारत सरकार राष्ट्रीय खेल संघों से निश्चित तारीख तक खिलाड़ियों की सूची मँगवाती है। सरकार द्वारा निश्चित तारीख बढ़ाई भी जा सकती है।
(2) यदि भारत सरकार को खिलाड़ियों की सूची न मिले तो सरकार किसी विशेष खिलाड़ी को इस पुरस्कार से विभूषित कर सकती है।
(3) राष्ट्रीय खेल संघ अपने-अपने क्षेत्रों से तीन खिलाड़ियों के नाम भेज सकता है।
(4) संघ द्वारा भेजे गए तीन खिलाड़ियों में से भारत सरकार केवल एक खिलाड़ी को इस पुरस्कार से सम्मानित करती है लेकिन महिला खिलाड़ी की स्थिति में भारत सरकार इस नियम में संशोधन कर सकती है।

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प्रश्न 8.
ध्यानचंद पुरस्कार पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
खेलकूद में आजीवन उपलब्धियों के लिए ध्यानचंद पुरस्कार सन् 2002 में आरंभ किया गया। यह पुरस्कार हॉकी के महान् खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की याद में प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन खिलाड़ियों को दिया जाता है, जिन्होंने अपने प्रदर्शन से खेलों में उत्कृष्ट योगदान दिया है और जो सक्रिय खेल कैरियर से निवृत्त (Retired) होने के बाद भी खेल जगत को बढ़ावा देने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इस पुरस्कार में एक सर्टिफिकेट, एक प्रतिभा और 10 लाख रुपए का नकद पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 9.
अर्जुन पुरस्कार के लिए चयन पद्धति के बारे में लिखें।
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार भारत सरकार द्वारा खेलों में उत्कृष्ट एवं सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को दिया जाता है। इस पुरस्कार के चयन के लिए सरकार राष्ट्रीय खेल संघों से निर्धारित समय अवधि तक खिलाड़ियों की सूची मँगवाती है। यह पुरस्कार उस खिलाड़ी को दिया जाता है जिसका पिछले तीन वर्षों में उत्कृष्ट एवं श्रेष्ठ प्रदर्शन रहा हो और उस वर्ष जिस वर्ष यह पुरस्कार दिया जाना हो, खिलाड़ी की असाधारण उपलब्धियाँ हों। भारत सरकार द्वारा गठित समिति खिलाड़ियों के प्रदर्शन और उपलब्धियों पर बारीकी से अध्ययन करके सूची बनाकर भारत सरकार के पास भेज देती है।

प्रश्न 10.
भीम अवार्ड पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
भीम अवार्ड की शुरुआत सन् 1996 में हुई। यह अवार्ड अपने-अपने खेलों में ख्याति प्राप्त खिलाड़ियों को प्रदान किया जाता है। इस अवार्ड में महाभारत के पात्र भीम की एक काँस्य की प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र, पाँच लाख रुपए, एक रंगीन जैकेट तथा टाई आदि प्रदान की जाती है। इस अवार्ड के लिए वे खिलाड़ी आवेदन कर सकते हैं जो पिछले तीन वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता तथा सीनियर राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में प्रथम, दूसरा तथा तीसरा स्थान प्राप्त किया हो या अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया हो।

प्रश्न 11.
द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए पात्रता संबंधी आवश्यक योग्यताओं या उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए क्या-क्या पात्रता होती है? वर्णन करें।
उत्तर:
द्रोणचार्य पुरस्कार की पात्रता के लिए प्रशिक्षकों में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिएँ
1. व्यक्तिगत इवेंट्स-वह प्रशिक्षक द्रोणाचार्य पुरस्कार का पात्र होता है जिसके प्रशिक्षण में खिलाड़ी/खिलाड़ियों ने निम्नलिखित उपलब्धियाँ प्राप्त की हों
(1) जिस खिलाड़ी ने वर्ल्ड चैम्पियनशिप में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो।
(2) जिस खिलाड़ी ने ओलम्पिक खेलों में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो।
(3) जिस खिलाड़ी ने वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा हो और उसको अंतर्राष्ट्रीय खेल संघ द्वारा मान्यता मिल चुकी हो।
(4) जिस खिलाड़ी ने एशियाई खेलों या राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता हो।

2. टीम इवेंट्स-वह प्रशिक्षक द्रोणाचार्य पुरस्कार का पात्र होता है जिसके प्रशिक्षण में टीम ने निम्नलिखित उपलब्धियाँ प्राप्त की हों
(1) जिस टीम ने विश्व कप, विश्व चैम्पियनशिप, ओलम्पिक खेलों या अन्य अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय खेलों में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो और पिछले वर्ष से उसके प्रदर्शन का स्तर ऊँचा हो।
(2) जिस टीम ने दो स्वर्ण पदक अर्थात् पहला एशियाई खेलों में और दूसरा एशियाई चैम्पियनशिप में जीता हो।
(3) जिस टीम ने दो स्वर्ण पदक अर्थात् पहला एशियाई खेलों में तथा दूसरा राष्ट्रमंडल खेलों में जीता हो।

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अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
देश के महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय खेल पुरस्कार कौन-कौन-से हैं? अथवा राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
(1) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार,
(2) द्रोणाचार्य पुरस्कार,
(3) अर्जुन पुरस्कार,
(4) ध्यानचंद पुरस्कार।

प्रश्न 2.
पहले प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कारों की इनामी राशि क्या थी?
उत्तर:
(1) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार-₹7 लाख
(2) द्रोणाचार्य पुरस्कार (जीवन-पर्यंत व नियमित)-₹ 5 लाख
(3) अर्जुन पुरस्कार-₹5 लाख
(4).ध्यानचंद पुरस्कार (जीवन-पर्यंत व नियमित)-₹ 5 लाख।

प्रश्न 3.
अब प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कारों की इनामी राशि क्या है?
उत्तर:
(1) राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार-₹ 25 लाख
(2) द्रोणाचार्य पुरस्कार (जीवन-पर्यंत (Lifetime)-₹ 15 लाख
(3) द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित)-₹ 10 लाख
(4) अर्जुन पुरस्कार-₹ 15 लाख
(5) ध्यानचंद पुरस्कार (जीवन-पर्यंत)–₹ 15 लाख
(6) ध्यानचंद पुरस्कार (नियमित)-₹ 10 लाख।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार वे पुरस्कार हैं जो उन खिलाड़ियों एवं प्रशिक्षकों को दिया जाता है जिनका गत वर्षों में प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा हो। ये पुरस्कार उनको प्रोत्साहित करने के लिए दिए जाते हैं। ये पुरस्कार खिलाड़ियों एवं प्रशिक्षकों की सामान्य स्थिति को सुधारने और उन्हें समाज में उचित सम्मान एवं स्थान देने के उद्देश्य से दिए जाते हैं। अर्जुन अवार्ड एवं द्रोणाचार्य अवार्ड राष्ट्रीय खेल पुरस्कार के उदाहरण हैं।

प्रश्न 5.
द्रोणाचार्य पुरस्कार में क्या-क्या दिया जाता है? अथवा द्रोणाचार्य अवार्ड प्राप्त करने वाले प्रशिक्षकों को क्या-क्या दिया जाता है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रशिक्षकों को नियमित रूप से गुरु द्रोणाचार्य की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र, ब्लेजर और 10 लाख रुपए नकद इनाम दिया जाता है। यह पुरस्कार प्रशिक्षकों को राष्ट्रपति द्वारा वितरित किया जाता है। इस पुरस्कार की जीवन-पर्यंत राशि 15 लाख रुपए है।

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प्रश्न 6.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य खिलाड़ियों को सम्मानित कर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाना है ताकि वे समाज में सम्मान प्राप्त कर सकें।

प्रश्न 7.
अर्जुन पुरस्कार में क्या-क्या दिया जाता है?
अथवा
अर्जुन अवार्ड प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को क्या-क्या दिया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार प्राप्त करने वालों को अर्जुन की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र और 15 लाख रुपए नकद इनाम दिया जाता है। यह पुरस्कार खिलाड़ियों को राष्ट्रपति द्वारा वितरित किया जाता है।

प्रश्न 8.
भीम पुरस्कार प्राप्त करने के लिए खिलाड़ी की कोई दो पात्रता बताएँ।
उत्तर:
(1) एक ही वर्ग के खेल में एक से ज्यादा खिलाड़ी को पुरस्कृत नहीं किया जाएगा, परन्तु यदि चयनित खिलाड़ी- महिला हो तो एक वर्ग के लिए एक से ज्यादा पुरस्कार दिया जा सकता है।
(2) यह पुरस्कार केवल उन्हीं खिलाड़ियों को दिया जाएगा, जिन्होंने हरियाणा राज्य की ओर से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय फैडरेशन या राष्ट्रीय खेलों में कम-से-कम एक बार भाग लिया हो।

प्रश्न 9.
भीम अवार्ड से सम्मानित किन्हीं चार खिलाड़ियों के नाम व खेल बताएँ।
उत्तर:
(1) मनोज कुमार (कुश्ती में)
(2) सुमित सांगवान (बॉक्सिंग में)
(3) साक्षी मलिक (कुश्ती में)
(4) विकास कृष्ण कुमार (बॉक्सिंग में)।

प्रश्न 10.
अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किन्हीं चार खिलाड़ियों के नाम व खेल बताएँ।
उत्तर:
(1) कृष्णा पूनिया (एथलेटिक्स में)
(2) राजपाल सिंह (हॉकी में)
(3) विराट कोहली (क्रिकेट में)
(4) बजरंग पूनिया (कुश्ती में)।

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प्रश्न 11.
द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किन्हीं चार प्रशिक्षकों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) के०पी० थॉमस (एथलेटिक्स में)
(2) पुलेला गोपीचंद (बैडमिंटन में)
(3) फादके गोपाल पुरुषोत्तम (खो-खो में)
(4) नरेंद्र सिंह सैनी (हॉकी में)।

प्रश्न 12.
भीम पुरस्कार में क्या-क्या दिया जाता है?
अथवा
भीम अवार्ड प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को क्या-क्या दिया जाता है?
उत्तर:
भीम पुरस्कार प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को भीम स्मृति चिह्न, सम्मान-पत्र, ब्लेज़र, टाई/स्कार्फ और पाँच लाख रुपए नकद इनाम दिया जाता है।

प्रश्न 13.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार में क्या-क्या दिया जाता है? अथवा राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को क्या-क्या दिया जाता है?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार प्राप्तकर्ता को एक मैडल, एक सम्मान-पत्र और 25 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। यह पुरस्कार भारतीय राष्ट्रपति द्वारा वितरित किया जाता है।

प्रश्न 14.
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार किन्हें और क्यों दिए जाते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार भारत सरकार के खेल मंत्रालय द्वारा दिए जाते हैं। ये पुरस्कार उन खिलाड़ियों को सम्मानित करने के लिए दिए जाते हैं, जिनका खेलों के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन रहा हो। ये पुरस्कार खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने तथा उनकी क्षमता, योग्यता या प्रतिभा आदि को उजागर करने के लिए दिए जाते हैं।

प्रश्न 15.
हरियाणा की किन्हीं आठ महिला खिलाड़ियों के नाम बताएँ जिन्हें भीम अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।
उत्तर:
(1) बबीता कुमारी,
(2) साक्षी मलिक,
(3) दीपा मलिक,
(4) विनेश फोगाट,
(5) रानी रामपाल,
(6) पूजा रानी,
(7) शिवानी कटारिया,
(8) प्रियंका।

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प्रश्न 16.
हरियाणा के उन खिलाड़ियों के नाम बताएँ जिन्हें अब तक राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।
उत्तर:
2009 में मुक्केबाज विजेंद्र सिंह, 2012 में पहलवान योगेश्वर दत्त, 2016 में रेसलर साक्षी मलिक, 2017 में हॉकी खिलाड़ी सरदार सिंह, 2019 में कुश्ती में बजरंग पुनिया व पैरा-एथलेटिक्स में दीपा मलिक और 2020 में हॉकी में रानी रामपाल व कुश्ती में विनेश फोगाट को राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

प्रश्न 17.
अर्जुन पुरस्कार (Arjuna Award) का संक्षिप्त रूप में वर्णन कीजिए।
अथवा
अर्जुन पुरस्कार कब और क्यों दिया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार सन् 1961 में शुरू किया गया। यह पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन खिलाड़ियों को दिया जाता है जिनकी उस वर्ष (जिस वर्ष के लिए यह दिया जाना है) उत्कृष्ट व असाधारण उपलब्धि हो और पिछले तीन वर्षों में प्रदर्शन का स्तर उत्कृष्ट व श्रेष्ठ रहा हो। यह अवार्ड ‘महाभारत’ के पात्र अर्जुन की याद में भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार में काँस्य की अर्जुन की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र व 15 लाख रुपए से खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया जाता है।

प्रश्न 18.
सन् 2020 के लिए राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित खिलाड़ियों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) रोहित शर्मा (क्रिकेट)
(2) मरियप्पन थंगवेलु (पैरा-एथलेटिक्स)
(3) मनिका बतरा (टेबल टेनिस)
(4) विनेश फोगाट (कुश्ती)
(5) रानी रामपाल (हॉकी)।

प्रश्न 19.
सन् 2020 के लिए अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किन्हीं छः खिलाड़ियों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) दुती चंद (एथलेटिक्स)
(2) मनीष कौशिक (मुक्केबाजी)
(3) दीप्ति शर्मा (क्रिकेट)
(4) आकाशदीप सिंह (हॉकी)
(5) दीपक (कबड्डी)
(6) सौरभ चौधरी (निशानेबाजी)।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार

प्रश्न 20.
सन् 2020 के लिए द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किन्हीं छः प्रशिक्षकों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) धर्मेंद्र तिवारी (लाइफटाइम-तीरंदाजी)
(2) कृष्ण कुमार हुड्डा (लाइफटाइम-कबड्डी)
(3) ओमप्रकाश दहिया (लाइफटाइम-कुश्ती)
(4) योगेश मालवीय (मल्लखंब)
(5) जसपाल राणा (निशानेबाजी)
(6) गौरव खन्ना (पैरा-बैडमिंटन)।

HBSE 12th Class Physical Education राष्ट्रीय खेल पुरस्कार Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-1: एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय खेल दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल दिवस प्रतिवर्ष 29 अगस्त को मनाया जाता है।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार की शुरुआत कब हुई?
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार की शुरुआत सन् 2009 में हुई।

प्रश्न 3.
पहले विदेशी कोच का नाम बताइए, जिसे सन् 2012 में ‘द्रोणाचार्य अवार्ड’ दिया गया।
उत्तर:
श्री०बी०आई० फर्नाडिज।

प्रश्न 4.
‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ कब दिया जाता है?
उत्तर:
‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ 29 अगस्त को दिया जाता है।

प्रश्न 5.
द्रोणाचार्य पुरस्कार किसके द्वारा दिया जाता है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।

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प्रश्न 6.
‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ कब शुरू किया गया?
अथवा
किस वर्ष में द्रोणाचार्य अवार्ड शुरू किया गया था?
उत्तर:
‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ वर्ष 1985 में शुरू किया गया।

प्रश्न 7.
द्रोणाचार्य पुरस्कार किस भावना पर आधारित है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार गुरुओं के आदर एवं सम्मान की भावना पर आधारित है।

प्रश्न 8.
द्रोणाचार्य पुरस्कार से किन्हें नवाजा जाता है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार से प्रशिक्षकों को नवाजा जाता है।

प्रश्न 9.
सन् 2018 में द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किसी एक प्रशिक्षक का नाम बताएँ।
उत्तर:
सुखदेव सिंह पन्नू (एथलेटिक्स में)।

प्रश्न 10.
द्रोणाचार्य पुरस्कार का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षकों का खेल के क्षेत्र में महत्त्व बढ़ाना।

प्रश्न 11.
द्रोणाचार्य पुरस्कार भारत सरकार के किस मंत्रालय द्वारा दिया जाता है?
उत्तर:
युवा कल्याण एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा।

प्रश्न 12.
द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित ) में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित) में 10 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है।

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प्रश्न 13.
द्रोणाचार्य पुरस्कार किसकी याद में दिया जाता है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार गुरु द्रोणाचार्य की याद में दिया जाता है।

प्रश्न 14.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार किसके द्वारा दिया जाता है?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।

प्रश्न 15.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार विजेता को कितनी राशि नकद प्रदान की जाती है?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार विजेता को 25 लाख रुपए की राशि नकद प्रदान की जाती है।

प्रश्न 16.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार कब शुरू किया गया?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार वर्ष 1991-1992 में शुरू किया गया।

प्रश्न 17.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार कब दिया जाता है?
उत्तर:
राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार 29 अगस्त को भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।

प्रश्न 18.
पहले किस पुरस्कार में 77 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती थी?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार में।

प्रश्न 19.
प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार किसको दिया गया था?
उत्तर:
प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार विश्वनाथन आनंद को दिया गया था।

प्रश्न 20.
एक खिलाड़ी अपने जीवनकाल में कितनी बार राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड ले सकता है?
उत्तर:
एक खिलाड़ी अपने जीवनकाल में एक बार राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड ले सकता है।

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प्रश्न 21.
खेलों का राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार कौन-सा है?
उत्तर:
खेलों का राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार है।

प्रश्न 22.
‘अर्जुन पुरस्कार’ कब प्रारंभ किया गया?
उत्तर:
‘अर्जुन पुरस्कार’ सन् 1961 में प्रारंभ किया गया।

प्रश्न 23.
अर्जुन पुरस्कार किसके द्वारा वितरित किया जाता है?
अथवा
खिलाड़ियों को अर्जुन पुरस्कार किसके द्वारा प्रदान किया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा वितरित किया जाता है।

प्रश्न 24.
अर्जुन पुरस्कार किस तारीख को दिया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार 29 अगस्त को दिया जाता है।

प्रश्न 25.
अर्जुन पुरस्कार में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार में 15 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है।

प्रश्न 26.
अर्जुन पुरस्कार किस समिति की सिफारिशों पर दिया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार अखिल भारतीय खेल सलाहकार समिति की सिफारिशों पर दिया जाता है।

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प्रश्न 27.
हिमा दास को सन् 2018 में किस राष्ट्रीय खेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया?
उत्तर:
हिमा दास को सन् 2018 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

प्रश्न 28.
सन् 2012 में कितने खिलाड़ियों को ‘अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया?
उत्तर:
सन् 2012 में 25 खिलाड़ियों को ‘अर्जुन अवार्ड’ से नवाजा गया।

प्रश्न 29.
भीम अवार्ड की शुरुआत कब हुई?
उत्तर:
भीम अवार्ड की शुरुआत वर्ष 1996 में हुई।

प्रश्न 30.
‘भीम पुरस्कार’ किसके द्वारा प्रदान किया जाता है?
उत्तर:
भीम पुरस्कार’ हरियाणा के राज्यपाल द्वारा प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 31.
भीम अवार्ड में कितनी नकद राशि प्रदान की जाती है?
उत्तर:
भीम अवार्ड में 5 लाख रुपए की नकद राशि प्रदान की जाती है।

प्रश्न 32.
ध्यानचंद पुरस्कार कब शुरू किया गया?
उत्तर:
ध्यानचंद पुरस्कार सन् 2002 में शुरू किया गया।

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भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार कब आरंभ किया गया?
(A) सन् 1985-86 में
(B) सन् 1991-92 में
(C) सन् 1983-84 में
(D) सन् 1994-95 में
उत्तर:
(B) सन् 1991-92 में

2. राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
(A) 25 लाख रुपए
(B) 20 लाख रुपए
(C) 7 लाख रुपए
(D) 7.5 लाख रुपए
उत्तर:
(A) 25 लाख रुपए

3. अर्जुन पुरस्कार कब शुरू किया गया था?
(A) सन् 1951 में
(B) सन् 1961 में
(C) सन् 1971 में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) सन् 1961 में

4. निम्नलिखित में से कौन-सा पुरस्कार प्रशिक्षकों को दिया जाता है?
(A) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
(B) ध्यानचंद पुरस्कार
(C) अर्जुन पुरस्कार
(D) द्रोणाचार्य पुरस्कार
उत्तर:
(D) द्रोणाचार्य पुरस्कार

5. द्रोणाचार्य पुरस्कार कब देना आरंभ किया गया?
(A) सन् 1984 में
(B) सन् 1985 में
(C) सन् 1980 में
(D) सन् 1998 में
उत्तर:
(B) सन् 1985 में

6. अर्जुन पुरस्कार में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
(A) 15 लाख रुपए
(B) 12 लाख रुपए
(C) 7 लाख रुपए
(D) 7.5 लाख रुपए
उत्तर:
(A) 15 लाख रुपए

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7. द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित) में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
(A) 15 लाख रुपए
(B) 10 लाख रुपए
(C) 7 लाख रुपए
(D) 7.5 लख रुपए
उत्तर:
(B) 10 लाख रुपए

8. प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार प्राप्तकर्ता हैं
(A) विश्वनाथन आनंद
(B) साक्षी मलिक
(C) अभिनव बिन्द्रा
(D) सचिन तेन्दुलकर
उत्तर:
(A) विश्वनाथन आनंद

9. किस खेल पुरस्कार को हरियाणा के राज्यपाल द्वारा प्रदान किया जाता है?
(A) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
(B) द्रोणाचार्य पुरस्कार
(C) अर्जुन पुरस्कार
(D) भीम पुरस्कार
उत्तर:
(D) भीम पुरस्कार

10. निम्नलिखित में से राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित खिलाड़ी हैं
(A) अभिनव बिन्द्रा
(B) दीपा कर्माकर
(C) महेंद्र सिंह धोनी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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11. खेलों का राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार है
(A) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
(B) द्रोणाचार्य पुरस्कार
(C) अर्जुन पुरस्कार
(D) ध्यानचंद पुरस्कार
उत्तर:
(A) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार

12. सन् 2020 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित प्रशिक्षक हैं
(A) जसवंत सिंह
(B) बलवान सिंह
(C) ओमप्रकाश दहिया
(D) महाबीर प्रसाद
उत्तर:
(C) ओमप्रकाश दहिया

13. सन् 2020 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित प्राप्तकर्ता हैं
(A) दीप्ति शर्मा
(B) कृष्णा पूनिया
(C) खुशबीर कौर
(D) हिमा दास
उत्तर:
(A) दीप्ति शर्मा

14. निम्नलिखित में से राष्ट्रीय खेल पुरस्कार नहीं है
(A) आइफा अवार्ड
(B) अर्जुन अवार्ड
(C) द्रोणाचार्य अवार्ड
(D) ध्यानचंद अवार्ड
उत्तर:
(A) आइफा अवार्ड

15. भीम पुरस्कार किस राज्य की सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है?
(A) हरियाणा
(B) पंजाब
(C) राजस्थान
(D) तमिलनाडु
उत्तर:
(A) हरियाणा

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भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. खिलाड़ियों को अर्जुन अवार्ड ………………… के द्वारा वितरित किए जाते हैं।
2. द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित) में दी जाने वाली नकद राशि ………………… रुपए है।
3. द्रोणाचार्य पुरस्कार भारत सरकार द्वारा ………………… को दिया जाता है।
4. राष्ट्रीय खेल दिवस प्रतिवर्ष ………………… को मनाया जाता है।
5. अर्जुन पुरस्कार भारत के ………………. द्वारा प्रदान किया जाता है।
6. देश का सर्वोच्च राष्ट्रीय खेल पुरस्कार ………………… है।
7. भीम अवार्ड की शुरुआत सन् ………………… में हुई।
8. अर्जुन पुरस्कार में दी जाने वाली नकद राशि ………………… रुपए है।
9. राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार भारत के ………………… द्वारा वितरित किया जाता है।
10. कोचों को दिए जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार ………………….. है।
उत्तर:
1. राष्ट्रपति
2. 10 लाख
3. प्रशिक्षकों
4. 29 अगस्त
5. राष्ट्रपति
6. राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
7. 1996
8. 15 लाख
9. राष्ट्रपति
10. द्रोणाचार्य पुरस्कार।

राष्ट्रीय खेल पुरस्कार Summary

राष्ट्रीय खेल पुरस्कार परिचय

खिलाड़ियों को जीवन-पर्यंत सुख-सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, अगर वे अपने-अपने क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय पहचान प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हैं। ये प्रलोभन या पुरस्कार, नकद धनराशि और इनाम राज्य व केंद्र सरकारों द्वारा प्रदान किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त खिलाड़ी के अपने विभाग द्वारा पदोन्नति, घर के लिए प्लाट, मुफ्त वस्तुएँ आदि प्रदान की जाती हैं। पदक विजेता खिलाड़ियों तथा उनके कोच को विशेष पुरस्कार प्रदान करना आने वाली पीढ़ियों को खेल में अपना कैरियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करने का एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

प्रमुख खेल पुरस्कार (Main Sports Awards):
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार, भीम पुरस्कार, ध्यानचंद पुरस्कार आदि।

राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों के महत्त्व (Importance of National Sports Awards)-:
राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों का महत्त्व निम्नलिखित कारणों से है-

  • खिलाड़ियों को उत्कृष्ट व श्रेष्ठ प्रदर्शन हेतु प्रेरित करना।
  • खिलाड़ियों व प्रशिक्षकों के सम्मान व स्तर को बढ़ाना।
  • राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करना।
  • युवाओं को खेल के लिए प्रेरित करना।
  • सद्भाव, मित्रता व शांति की भावना विकसित करना।
  • राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय भावना के लिए प्रेरित करना।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

HBSE 12th Class Hindi आत्म-परिचय, एक गीत Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?
उत्तर:
सर्वप्रथम कवि जग-जीवन का भार ढोने की बात कहता है। इसका भाव यह है कि कवि संसार से पूर्णतया अलग नहीं हुआ। संसार की समस्याओं के प्रति वह भी सचेत है। परंतु वह अपनी कविता द्वारा संसार के कष्टों तथा दुखों को दूर करना चाहता है। वह संसार को सुखद बनाना चाहता है।

इस रास्ते पर चलते-चलते कवि को यह अनुभव होता है कि संसार उसकी उपेक्षा कर रहा है। वह संसार के व्यवहार से दुखी है। संसार की जड़-परंपराएँ तथा रूढ़ियाँ कवि के मार्ग को रोकना चाहती हैं, परंतु कवि इन बाधाओं की परवाह नहीं करता। वह अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ता है।

प्रश्न 2.
जहाँ पर दाना रहते हैं, वहीं नादान भी होते हैं कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा?
उत्तर:
कवि समझता है कि जो लोग सांसारिक सुख-सुविधाओं का संग्रह करने में सक्रिय हैं, उनको ‘दाना’ अर्थात् बुद्धिमान कहा जाता है। परंतु कवि का अपना दृष्टिकोण अलग है। वह ऐसे लोगों को मूर्ख समझता है। कवि सांसारिक सफलताओं को व्यर्थ समझता है। वह ऐसे लोगों को नादान कहता है जो धन-संपत्ति के पीछे भाग रहे हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 3.
मैं और, और जग और कहाँ का नाता-पंक्ति में और शब्द की विशेषता बताइए।
उत्तर:
इस पद्य पंक्ति में प्रयुक्त ‘और’ शब्द में यमक अलंकार का प्रयोग हुआ है। प्रथम एवं तृतीय ‘और’ का अर्थ ‘अन्य’ है अर्थात् भिन्न या अलग। कवि स्वयं के साथ जोड़कर भावनाओं से जुड़े हुए व्यक्ति को संकेतित करता है। तीसरा ‘और’ सांसारिक मोह-माया से लिप्त आम व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। दूसरे ‘और’ का प्रयोग ‘तथा’ के लिए प्रयुक्त हुआ है।

प्रश्न 4.
शीतल वाणी में आग के होने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘शीतल वाणी में आग’ से कवि का अभिप्राय यह है कि उसका अपना स्वभाव और स्वर कोमल एवं शांत है। परंतु उसके मन में विद्रोह की भावना विद्यमान है। कवि प्रेमहीन तथा स्वार्थी संसार से घृणा करता है। वह तो प्रेममय संसार से ही प्यार करता है।

प्रश्न 5.
बच्चे किस बात की आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे?
उत्तर:
बच्चे इस आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे कि उनके माता-पिता उनके लिए चुग्गा (भोजन सामग्री) लेकर आ रहे होंगे। वे शीघ्र घर पहुँचकर उन्हें भोजन देंगे और साथ ही प्यार भी करेंगे।

प्रश्न 6.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ की आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर:
यह पद्य पंक्ति गीत का मुखड़ा है। इसकी आवृत्ति से प्रेमजन्य व्याकुलता का पता चलता है। प्रेम के क्षण बड़े प्रिय लगते हैं। अतः प्रेम के क्षणों के बीतने का पता ही नहीं चल पाता।

कविता के आसपास

प्रश्न.
संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल कैसे पैदा किया जा सकता है?
उत्तर:
यह संसार निश्चय से काँटों की बाड़ है। यहाँ सुख और दुख दोनों साथ-साथ चलते हैं। कष्टों को सहकर भी हम खुशी से जीवन व्यतीत कर सकते हैं। यदि हमारे मन में सच्चे प्रेम की मस्ती है तो नित-नवीन कल्पनाओं को साकार करके हम सुखद जीवन जी सकते हैं। हमें यह स्वीकार करके कर्म करना चाहिए कि सांसारिक धन-वैभव क्षण-भंगुर हैं। प्रेम ही जीवन को खशी देता है।

आपसदारी
जयशंकर प्रसाद की आत्मकथ्य कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। क्या पाठ में दी गई आत्मपरिचय कविता से इस कविता का आपको कोई संबंध दिखाई देता है? चर्चा करो।
आत्मकथ्य
मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
आरोह (भाग 2) हरिवंश राय बच्चन]
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मै मौन रहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
-जयशंकर प्रसाद

‘आत्मकथ्य’ जयशंकर प्रसाद द्वारा छायावाद के परिपेक्ष्य में रचित कविता है। परंतु बच्चन जी की ‘आत्मपरिचय’ कविता छायावाद से हटकर व्यक्तिगत प्रेम को आधार बनाकर रची गई कविता है। जहाँ प्रसाद जी अपने प्रेम को छिपाकर रखते हैं, वहाँ बच्चन जी सहज, सरल भाषा में बड़ी ईमानदारी के साथ प्रेमाभिव्यक्ति करते हैं। भले ही इन दोनों कविताओं के भाव लगभग समान हो, परंतु इनकी अभिव्यंजना शैली अलग-अलग है। बच्चन द्वारा यह कहना कि ‘मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ’ में प्रेम की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। परंतु प्रसाद जी द्वारा यह कहना –
“यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास ।
तब भी कहते हो कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।”
यहाँ प्रसाद जी ने छायावादी अभिव्यंजना शैली द्वारा अपनी प्रेमाभिव्यक्ति का संदेश दिया है।

HBSE 12th Class Hindi आत्म-परिचय, एक गीत Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!
उत्तर:
इन पद्य-पंक्तियों में कवि ने निजी प्रेम की अभिव्यक्ति की है। कवि का हृदय प्रिया के स्नेह से सराबोर है। वह हमेशा अपने मन में प्रिया के स्नेह को अनुभव किया करता है। इसीलिए वह संसार की परवाह नहीं करता।

  1. कवि ने सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  2. ‘किया करता’ में अनुप्रास अलंकार है तथा ‘स्नेह-सुरा’ में रूपक अलंकार है।
  3. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव दिखाई देता है।
  4. किया करता हूँ की आवृत्ति के कारण गीत में मधुर संगीत की उत्पत्ति हुई है।
  5. माधुर्य गुण है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  6. आत्मकथात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!
उत्तर:
इसमें कवि निजी प्रेम को स्वीकार करता हुआ कहता है कि कवि के हृदय में नवीन मनोभाव हैं जिन्हें वह संसार को उपहार के रूप में भेंट करना चाहता है। कवि को यह अधूरा संसार अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह सपनों के संसार में खोया रहता है।

  1. प्रस्तुत गीत में विषयानुकूल, सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  2. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावभिव्यक्ति में सहायक है।
  3. कोमलकांत पदावली का प्रयोग है।
  4. ‘लिए फिरता हूँ की आवृत्ति के कारण इस पद्य में संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. माधुर्य गुण है तथा श्रृंगार रस का परिपाक हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि उसका संसार के साथ निर्वाह नहीं हो सकता। कवि प्रतिदिन नए संसार की रचना करता है, परंतु अगले क्षण ही वह उसे नष्ट कर देता है। यह संसार धन-वैभव के पीछे पागल बना हुआ है परंतु कवि को इस धन-वैभव की कोई इच्छा नहीं है।

  1. कवि सांसारिक जीवन से अलग-थलग आदर्श लोक में विचरण करना चाहता है।
  2. ‘जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव’ में विशेषण-विपर्यय अलंकार है।
  3. ‘कहाँ का नाता’ में प्रश्न अलंकार है तथा ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. ‘और’ शब्द की आवृत्ति चमत्कार उत्पन्न करती है। इस शब्द में यमक अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है तथा कोमलकांत पदावली का प्रयोग है।
  6. शब्द-योजना सार्थक तथा सटीक बन पड़ी है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि उसके रुदन से भी प्रेम झलकता है, परंतु उसकी वाणी में एक कोमल ऊर्जा है। कवि का जीवन निराशा के कारण खंडहर बन चुका है, परंतु कवि अपने जीवन में उस प्रेम को महत्त्व देता है जिस पर बड़े-बड़े राजा महल को भी न्योछावर कर देते हैं।

  1. इसमें कवि ने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  2. शब्द-योजना सार्थक एवं सटीक बन पड़ी है।
  3. ‘मैं’ शब्द के प्रयोग के कारण आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
  4. ‘रोदन में आग’ तथा ‘शीतल वाणी में आग’ दोनों में विरोधाभास अलंकार का सफल प्रयोग है।
  5. माधुर्य गुण है तथा वियोग शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।
  6. लिए फिरता हूँ की आवृत्ति के कारण मधुरता की मस्ती उत्पन्न हो गई है।
  7. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि दुनिया में उसका कोई नहीं है और न ही उसकी कोई प्रतीक्षा कर रहा है। प्रेम के अभाव के कारण कवि के कदम शिथिल पड़ जाते हैं और उसके मन में उदासी छा जाती है।

  1. इसमें कवि ने खड़ी बोली के साहित्यिक रूप का वर्णन किया है।
  2. ‘मझसे मिलने को कौन विकल’ और ‘किसके हित चंचल’ दोनों में प्रश्न अलंकार है।
  3. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4.  प्रसाद गुण है तथा वियोग शृंगार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. आत्मकथात्मक तथा भावात्मक शैलियों का सफल प्रयोग हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न (आत्मपरिचय)

प्रश्न 1.
‘आत्मपरिचय’ कविता के आधार पर कवि के व्यक्तित्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
कवि प्रेम और मस्ती का जीवन जीना चाहता है। वह हमेशा प्रेम तथा स्नेह के काल्पनिक संसार में खोया रहता है। प्रेम ही उसके जीवन का प्राण है। इसलिए वह हमेशा स्नेह की सुरा का पान करता रहता है। परंतु प्रिया ने उसके प्रेम का अनुकूल उत्तर नहीं दिया। इसीलिए उसके हृदय में विरह-जन्य पीड़ा व अवसाद है। इसके साथ-साथ कवि सांसारिक मोह-माया से अलग-थलग प्रेममय संसार की रचना करना चाहता है। वह इस संपूर्ण संसार को मस्ती में डुबा देना चाहता है।

प्रश्न 2.
कवि को यह संसार अच्छा क्यों नहीं लगता?
उत्तर:
कवि इस संसार को अपूर्ण मानता है। कवि का विचार है कि संसार एक भार है। लोग व्यर्थ ही दुनियादारी में उलझे हैं। कवि सांसारिक मोह-माया से अलग-थलग आदर्श समाज की स्थापना करना चाहता है। वह स्वयं को संसार से अलग मानता है। इसीलिए वह कहता भी है
“जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता।”

प्रश्न 3.
‘जग पूछा रहा उनको, जो जग की गाते’-इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
कवि स्पष्ट करता है कि संसार केवल उन लोगों का सम्मान करता है जो लोग धन-वैभव के संग्रह में संलग्न हैं और संपन्न हैं। धनवान व्यक्ति का सभी आदर करते हैं, निर्धन को कोई नहीं पूछता। विशेषकर कवि जैसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति की कोई परवाह भी नहीं करता। परन्तु कवि तो अपने मन में प्रेम के गीत लिए फिरता है।

प्रश्न 4.
कवि ने जग को मूढ क्यों कहा है?
उत्तर:
कवि की दृष्टि में संसार के सभी लोग धन-वैभव के संग्रह में अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। वे सांसारिक विषय-वासनाओं में लीन हैं। अज्ञानता के कारण उनके जीवन से सच्चा प्रेम लुप्त हो चुका है। इसलिए यह संसार तथा इसके लोग मूढ़ हैं।

प्रश्न 5.
‘जग भक्-सागर तरने को नाव बनाए’ कथन का क्या आशय है?
उत्तर:
कवि की दृष्टि में संसार रूपी सागर महाभयंकर है। इसे पार करने के लिए मनुष्य को कोई-न-कोई नौका अवश्य चाहिए। संसार समझता है कि वह धन-संपत्ति द्वारा इस सागर को पार कर जाएगा, परंतु ऐसा संभव नहीं है। कवि अपने प्रिय के प्रेम को नाव बनाकर यह संसार पार करना चाहता है।

प्रश्न 6.
‘आत्मपरिचय’ गीत के आधार पर कवि के मन की दशा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कवि मौज और मस्ती का कवि है। वह प्रेम पाने और देने में विश्वास रखता है और एक प्यार भरी जिंदगी जीना चाहता है इसलिए वह अपने हार्दिक प्रेम को प्रिया के समक्ष प्रकट करना चाहता है। कवि प्रेम के बिना इस संसार को अधूरा मानता है और अपने मन में प्रेममय संसार की कल्पना करता है।

प्रश्न 7.
कवि अपने हृदय में अग्नि जलाकर क्यों जलता रहता है?
उत्तर:
कवि के मन में अपने प्रिय के लिए अत्यधिक प्रेम है। प्रिय की मधुर यादें उसे सुखानुभूति प्रदान करती हैं। अतः वह संयोग की दशा में भी प्रिय के वियोग की अग्नि जलाकर उसमें जलता रहता है। इससे कवि को आनंद मिलता रहता है।

प्रश्न 8.
कवि के अन्दर और बाहर कौन-सी असंगति है और यह असंगति क्यों है?
उत्तर:
कवि संसार के लोगों के सामने हँसता और खेलता दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि मानों वह अपने प्रेम की असफलता पर हँस रहा है, परंतु वह अपनी विरह-व्यथा के कारण मन-ही-मन रोता रहता है। बाहर से कवि प्रसन्न नज़र आता है, लेकिन मन-ही-मन वह विरह-जनित पीड़ा को अनुभव करता रहता है। इसलिए कवि का जीवन अन्दर और बाहर से असंगत हो जाता है।

प्रश्न 9.
कवि कौन-कौन से संसार बनाकर रोज़ मिटाता रहता है?
उत्तर:
कवि मन-ही-मन प्रेममय संसार की कल्पना करता है। परन्तु कवि का यह प्रेममय संसार प्रेम की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इसलिए कवि उसे मिटा देता है। वह फिर से प्रेममय संसार की रचना में लीन हो जाता है। परंतु संसार के लोग इससे बेखबर होकर धन-संपदा के संग्रह में लगे रहते हैं।

प्रश्न 10.
कवि की शीतल वाणी में आग क्यों है?
उत्तर:
कवि के मन में विरह-वेदना की आग जलती रहती है, लेकिन उसकी वाणी बड़ी कोमल, मधुर और शीतल है। वह अपनी विरह-जनित पीड़ा को कोमलकांत पदावली द्वारा व्यक्त करता है। परंतु प्रिय के वियोग की आग उसके मन में हमेशा जलती रहती है। अतः शीतलता और वियोग बड़ा विचित्र बन पड़ा है।

प्रश्न 11.
‘मैं और, और जग और, कहाँ का नाता’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
इस पद्य पंक्ति द्वारा कवि संसार और अपने स्वभाव के अंतर को स्पष्ट करता है। कवि स्वयं तो प्रेम भावना के लोक में विचरण करता रहता है, परंतु संसार के लोग स्वार्थ को पूरा करने में संलग्न हैं। इसलिए कवि का मेल नहीं खाता।

प्रश्न 12.
कवि दीवानों का वेश क्यों लिए फिरता है?
उत्तर:
कवि को प्रेम के क्षेत्र में असफलता मिली है। इसलिए वह प्रेम-दीवानों के समान अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। कवि का एकमात्र लक्ष्य अपने प्रिय को पाना है, परंतु वह उसे मिल नहीं पा रहा। इसलिए वह दीवानों का वेश धारण करके घूमता रहता है।

एक गीत

प्रश्न 1.
‘एक गीत’ कविता का प्रतिपाद्य/मूलभाव क्या है?
उत्तर:
यह गीत प्रेम के महत्त्व पर प्रकाश डालता है। कवि कहता है कि प्रेम मानव जीवन को उत्साह, उमंग और उल्लास प्रदान करता है। प्रेम के कारण मनुष्य को लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। इसलिए प्रेमी अपनी प्रिय से मिलने के लिए तेज कदमों से चल पड़ता है। यही नहीं, पक्षियों के पंखों में गतिशीलता आ जाती है। जिस किसी व्यक्ति का प्रिय उसकी प्रतीक्षा नहीं करता, उसका जीवन निष्क्रिय और शिथिल हो जाता है। इसलिए प्रेम ही जीवन का मूल आधार है।

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प्रश्न 2.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’, के आधार पर आशा और निराशा के क्रम को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
निश्चय ही यह गीत आशा और निराशा के भावों को क्रम से अभिव्यक्त करता है। प्रथम दो काव्यांशों में कवि ने आशा के भावों को जागृत किया है जिससे प्रेरित होकर दिन का पंथी अपने प्रियजनों से मिलने की आशा में शीघ्रता से चलना आरम्भ कर देता है। जब चिड़िया को यह ध्यान आया कि उसके बच्चे उसकी प्रतीक्षा में होंगे तो वह भी तेज गति से उड़ने लगती है। किन्तु जब कवि यह सोचता है कि उसका चाहने वाला कोई नहीं है और कोई उसकी प्रतीक्षा करने वाला नहीं है तो उसके मन का उत्साह नष्ट हो जाता है और उसके मन में निराशा का भाव समा जाता है। अतः स्पष्ट है कि प्रस्तुत गीत में कवि ने आशा और निराशा के भावों को क्रमशः अभिव्यक्ति किया है।

प्रश्न 3.
कवि के मन में शिथिलता उत्पन्न क्यों हो जाती है?
उत्तर:
कवि जानता है कि इस दुनिया में उसका कोई अपना नहीं है। कोई प्रियजन उसकी प्रतीक्षा नहीं करता है। इसलिए वह सोचता है कि मैं किसके लिए अपने को चंचल करूँ। उसका सारा उत्साह तथा उमंग नष्ट हो जाती है। इसलिए उसके कदम शिथिल हो जाते हैं। परंतु यह स्थिति कवि के मन में आतुरता का भाव भी उत्पन्न करती है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. हरिवंश राय बच्चन का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1909 में
(B) सन् 1908 में
(C) सन् 1907 में
(D) सन् 1912 में
उत्तर:
(C) सन् 1907 में

2. ‘आत्मपरिचय’ कविता के रचयिता हैं _________.
(A) माखनलाल चतुर्वेदी
(B) रघुवीर सहाय
(C) कुँवर नारायण
(D) हरिवंश राय बच्चन
उत्तर:
(D) हरिवंश राय बच्चन

3. हरिवंश राय बच्चन का जन्म किस नगर में हुआ?
(A) प्रयाग में
(B) बनारस में
(C) लखनऊ में
(D) कानपुर में
उत्तर:
(A) प्रयाग में

4. हरिवंश राय बच्चन का जन्म किस परिवार में हुआ?
(A) ब्राह्मण परिवार में
(B) कायस्थ परिवार में
(C) क्षत्रिय परिवार में
(D) राजपूत परिवार में
उत्तर:
(B) कायस्थ परिवार में

5. बच्चन जी की आरंभिक शिक्षा कहाँ पर हुई?
(A) काशी में
(B) लखनऊ में
(C) प्रयाग में
(D) मुम्बई में
उत्तर:
(A) काशी में

6. बच्चन जी ने स्नातकोत्तर परीक्षा कहाँ से उत्तीर्ण की?
(A) दिल्ली विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) कलकत्ता विश्वविद्यालय
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
उत्तर:
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय

7. बच्चन जी ने पी० एचण्डी की उपाधि कहाँ प्राप्त की?
(A) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(B) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय
(C) मुम्बई विश्वविद्यालय
(D) दिल्ली विश्वविद्यालय
उत्तर:
(B) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय

8. बच्चन जी की पहली पत्नी का नाम क्या था?
(A) श्यामा।
(B) तेजी
(C) मनोरमा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) श्यामा

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9. 1942 में बच्चन जी ने दूसरा विवाह किससे किया?
(A) मनोरमा से
(B) कमला देवी से
(C) तेजी से
(D) राधा से
उत्तर:
(C) तेजी से

10. बच्चन जी को किस मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया?
(A) वित्त मंत्रालय
(B) शिक्षा मंत्रालय
(C) कृषि मंत्रालय
(D) विदेश मंत्रालय
उत्तर:
(D) विदेश मंत्रालय

11. किस वर्ष बच्चन जी को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया?
(A) 1969 में
(B) 1965 में
(C) 1966 में
(D) 1970 में
उत्तर:
(C) 1966 में

12. भारत सरकार ने बच्चन जी को किस उपाधि से विभूषित किया?
(A) पद्म श्री
(B) पद्म विभूषण
(C) ज्ञान पीठ पुरस्कार
(D) व्यास सम्मान
उत्तर:
(B) पद्म विभूषण

13. ‘मधुशाला’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1935
(B) सन् 1936
(C) सन् 1938
(D) सन् 1937
उत्तर:
(A) सन् 1935

14. ये रचनाएँ हरिवंश राय बच्चन की हैं-
(A) मधुशाला, मधुबाला और अपरा
(B) मधुशाला, कामायनी, मधुबाला
(C) मधुकलश, मधुबाला, मधुशाला
(D) मधुकुशल, मधु, मधुबाला
उत्तर:
(C) मधुकलश, मधुबाला, मधुशाला

15. ‘मधुबाला’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1938 में
(B) सन् 1935 में
(C) सन् 1939 में
(D) सन् 1940 में
उत्तर:
(A) सन् 1938 में

16. ‘मधुकलश’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1935 में
(B) सन् 1936 में
(C) सन् 1937 में
(D) सन् 1938 में
उत्तर:
(D) सन् 1938 में

17. हरिवंश राय बच्चन किस भावना के कवि हैं?
(A) रहस्यवाद भावना के
(B) छायावादी भावना के
(C) प्रेम और मस्ती के
(D) प्रगतिवादी भावना के
उत्तर:
(C) प्रेम और मस्ती के

18. ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, किस विधा की रचना है?
(A) प्रबंध काव्य
(B) गीति काव्य
(C) जीवनी
(D) निबंध
उत्तर:
(C) जीवनी

19. हरिवंश राय बच्चन की आधुनिक काव्य रचनाओं पर किसका प्रभाव पड़ा?
(A) स्वच्छंदतावाद का
(B) उमर खय्याम का
(C) रहस्यवाद का
(D) प्रगतिवाद का
उत्तर:
(B) उमर खय्याम का

20. बच्चन जी द्वारा रचित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ उनके किस काव्य-संग्रह से संकलित है?
(A) निशा निमंत्रण
(B) मधुशाला
(C) सतरंगिणी
(D) मिलनयामिनी
उत्तर:
(A) निशा निमंत्रण

21. ‘भव-सागर’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) उत्प्रेक्षा
(B) उपमा
(C) रूपक
(D) अनुप्रास
उत्तर:
(C) रूपक

22. ‘सीखा ज्ञान भुलाना’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) विरोधाभास
(B) असंगति
(C) अनुप्रास
(D) रूपक
उत्तर:
(A) विरोधाभास

23: ‘साँसों के तार में कौन-सा अलंकार है?
(A) उपमा
(B) उत्प्रेक्षा
(C) अनुप्रास
(D) रूपक
उत्तर:
(A) उपमा

24. ‘स्नेह-सुरा’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) रूपक
(B) यमक
(C) उपमा
(D) उत्प्रेक्षा
उत्तर:
(A) रूपक

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25. ‘एक गीत’ नामक कविता में दिन का पंथी किसे माना गया है?
(A) ‘चिड़िया को
(B) कवि को
(C) सूर्य को
(D) प्रत्याशा को
उत्तर:
(B) कवि को

26. अपने बच्चों के विषय में सोचकर पक्षियों की चंचलता किन अंगों में सबसे अधिक व्यक्त होती है?
(A) आँखों में
(B) हृदय में
(C) पैरों में
(D) पंखों में
उत्तर:
(D) पंखों में 27.

27. मुझसे मिलने को कौन विकल? पंक्ति में कौन-सा भाव है?
(A) शिथिलता
(B) चंचलता
(C) विह्वलता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) विह्वलता

28. ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ गीत में नीड़ों से झांक रहे बच्चों का ध्यान चिड़िया के परों में क्या भरता है?
(A) शिथिलता
(B) चंचलता
(C) विकलता
(D) विह्वलता
उत्तर:
(B) चंचलता

29. ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ कविता में कवि हताश और दुखी क्यों है?
(A) पत्नी से तलाक होने के कारण
(B) प्रियतमा की निष्ठुरता के कारण
(C) संतान-सुख से वंचित होने के कारण
(D) परिवार से पिछड़ने के कारण
उत्तर:
(B) प्रियतमा की निष्ठुरता के कारण

30. किसके बच्चे प्रत्याशा में हैं?
(A) गाय के
(B) कवि के
(C) पंथी के
(D) चिड़िया के
उत्तर:
(D) चिड़िया के

31. ‘एक गीत’ नामक कविता में कवि की पंक्ति ‘मुझसे मिलने को कौन विकल’? किस भाव को व्यक्त करती है?
(A) प्रश्न
(B) प्रसन्नता
(C) आश्चर्य
(D) हताशा
उत्तर:
(D) हताशा

32. ‘हो जाए न पथ में रात कहीं’ सोचकर कौन जल्दी-जल्दी चलता है?
(A) चिड़िया के बच्चे
(B) पंथी
(C) चिड़िया
(D) तोता
उत्तर:
(B) पंथी

33. दिन ढलने के साथ ही बच्चे कहाँ से झाँकने लगे होंगे?
(A) दरवाजे से
(B) छत से
(C) नीड़ों से
(D) खिड़की से
उत्तर:
(C) नीड़ों से

34. मैं होऊँ किसके हित चंचल?- यह प्रश्न पैरों को कैसा कर देता है?
(A) शिथिल
(B) चंचल
(C) विह्वल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) शिथिल

35. ‘एक गीत’ कविता में किस भाव की प्रधानता है?
(A) रतिभाव
(B) उत्साह भाव
(C) हास्य भाव
(D) वात्सल्य भाव
उत्तर:
(D) वात्सल्य भाव

आत्म-परिचय पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-जग-जीवन = सांसारिक गतिविधियाँ। भार = बोझ। झंकृत = तारों को बजाकर स्वर निकालना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन पर प्रकाश डाला है। इसमें कवि निजी प्रेम को खुले शब्दों में स्वीकार करता हुआ कहता है

व्याख्या-यद्यपि मेरा जीवन सांसारिक बाधाओं और कष्टों के बोझ से दबा हुआ है, लेकिन फिर भी मैं अपने जीवन से प्रेम करता हूँ। मुझे अपने सामाजिक कर्तव्यों का बोध है। मेरा हृदय प्रेम से लबालब भरा है। किसी प्रिया ने मेरे हृदय के तारों को छूकर झंकृत कर दिया था, जिससे मेरी साँसों में संगीत के तार बजने लगे। फलस्वरूप मैं आज भी उसी प्रेम की झंकार में लीन रहता हूँ। भाव यह है कि भले ही मेरे सामने कुछ बाधाएँ और रुकावटें हैं, लेकिन मैं उनकी परवाह न करके प्रेम के सहारे अपना जीवन सुखपूर्वक जी रहा हूँ।

विशेष-

  1. कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है। उसके मन में किसी प्रकार की कुंठा नहीं है।
  2. सहज, सरल, प्रवाहमयी तथा संगीतात्मक भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. ‘साँसों के तार’ में रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, फिर भी’ के प्रयोग से पता चलता है कि कवि सांसारिक बाधाओं से ग्रस्त है।
  4. इसी में ‘रहस्यात्मकता’ देखी जा सकती है। यह कवि की प्रेमिका भी हो सकती है या कोई प्रियजन अथवा कोई दैवीय शक्ति।
  5. संपूर्ण पद्य में श्रृंगार रस का सुन्दर परिपाक हुआ है।
  6. प्रस्तुत गीत पर उमर खय्याम् की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।
  7. गीत की भाषा में विषय के अनुसार मस्ती, कोमलता, मादकता और मधुरता विद्यमान है।

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पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:

प्रश्न-
(क) कवि एवं कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘जग-जीवन के भार’ से कवि का क्या आशय है?
(ग) ‘फिर भी’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(घ) यहाँ कवि ने ‘किसी ने के द्वारा किस ओर संकेत किया है?
(ङ) इस पद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-हरिवंश राय बच्चन कविता-आत्मपरिचय

(ख) ‘जग-जीवन के भार’ से कवि का आशय है कि सांसारिक दायित्व और जीवन की जिम्मेदारियाँ, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को निभाना पड़ता है।

(ग) ‘फिर भी’ द्वारा कवि यह बताना चाहता है कि सामाजिक कर्तव्यों तथा दायित्वों के बोझ से उसका जीवन दब गया है। प्रायः संसार के प्राणी इन दायित्वों को निभाते-निभाते प्रेमशून्य हो जाते हैं, परंतु कवि फिर भी अपने जीवन में प्रेम को अत्यधिक महत्त्व देता है और उसी के सहारे जिंदा है।

(घ) यहाँ ‘किसी ने’ शब्द कवि के प्रिय का प्रतीक है। यह प्रिय कवि की प्रेमिका भी हो सकती है या कोई प्रियजन भी हो सकता है। यही नहीं, ‘किसी ने’ के द्वारा कवि परमात्मा की ओर भी संकेत कर सकता है।

(ङ) प्रस्तुत पद्यांश में कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि जीवन के दायित्वों और कर्तव्यों को निभाते हुए भी वह प्रेम के सहारे जीवनयापन कर रहा है। कवि खुले शब्दों में अपने प्रिय के प्रेम की घोषणा करता है।

[2] मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-सुरा = मदिरा, शराब । पान करना = पीना। जग = संसार । ध्यान करना = परवाह करना । जग की गाते = संसार की स्तुति करते।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन पर प्रकाश डाला है। इस पद्यांश में कवि स्वीकार करता है कि वह हमेशा अपने प्रेम की मस्ती में डूबा रहता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं हमेशा प्रेम रूपी मदिरा का पान करता रहा हूँ। भाव यह है कि मैं हमेशा प्रेम के भावों में डूबा रहा हूँ। इसलिए मुझे सांसारिक बाधाओं की कोई चिंता नहीं है। मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं कि संसार के लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं? संसार हमेशा उन लोगों की स्तुति करता है जो सदैव सामाजिक दायित्वों में उलझे रहते हैं तथा निजी सुख-दुख की परवाह नहीं करते, परंतु मैं तो अपने गीतों द्वारा अपने मन के भावों को व्यक्त करता हूँ। आशय यह है कि मेरी कविताओं में मेरे प्रेममय व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति हुई है।

विशेष-

  1. कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम की अभिव्यक्ति की है और सांसारिक बाधाओं की परवाह न करने का वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. अनुप्रास तथा रूपक अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है।
  5. प्रवाहमयी भाषा के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, कोमलता तथा मधुरता देखी जा सकती है।
  6. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:
प्रश्न-
(क) कवि जग का ध्यान क्यों नहीं करता?
(ख) ‘स्नेह-सुरा’ से कवि का क्या आशय है?
(ग) जग किसको पूछता है?
(घ) कवि ने अपने गीतों में किस प्रकार के भावों को व्यक्त किया है?
(ङ) इस पद्यांश में किस प्रकार की भाषा का प्रयोग हुआ है?
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रिय के प्रेम में रम गया है। वह हमेशा अपने प्रिय को पाना चाहता है। इसलिए वह संसार के झंझटों की परवाह नहीं करता और उससे दूर रहना चाहता है।

(ख) ‘स्नेह-सुरा’ का अर्थ है प्रेम की मस्ती अथवा प्यार का दीवानापन। कवि हमेशा प्रेम की मस्ती का पान करता रहता है। इसलिए उसे संसार की कोई चिंता नहीं है।

(ग) यह संसार केवल उसी को पूछता है जो उसकी चिंता करता है। यहाँ कवि यह कहना चाहता है कि सांसारिक प्राणी केवल उसी व्यक्ति को महत्त्व देते हैं जो अपनी कविताओं में सांसारिक बातों का वर्णन करते हैं।

(घ) कवि अपने गीतों में स्वच्छंद प्रेम की भावनाओं को व्यक्त करता है। कवि हमेशा प्रेम की मस्ती में डूबा रहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सहज, सरल, तत्समनिष्ठ तथा संगीतात्मक भाषा का प्रयोग किया है।

[3] मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-निज = अपने। उर = हृदय। उद्गार = भाव। उपहार = भेंट। अपूर्ण = अधूरा। भाना = अच्छा लगना। स्वप्नों का संसार = नवीन इच्छाओं का संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन का वर्णन किया है। इसमें कवि निजी प्रेम को खुले शब्दों में स्वीकार करता हुआ कहता है

याख्या-मेरे निजी हृदय में नए-नए मनोभाव हैं। हमेशा वे मनोभाव मेरे हृदय में उमडते-घमडते रहते हैं। इसलिए मैं इस संसार को अपने हृदय के कोमल भाव देना चाहता हूँ। यह बाह्य संसार अधूरा है, क्योंकि इसमें प्रेम का अभाव है। इस अधूरे संसार को मैं पसंद नहीं करता। मेरे मन में प्रेममय संसार का सपना निवास करता है, मैं उसी सपने को साकार करने के लिए भटकता रहता हूँ। भाव यह है कि मैं प्रेममय संसार में ही लीन रहना चाहता हूँ।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेममय संसार को अधिक महत्त्व प्रदान किया है तथा खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  5. प्रवाहमयी भाषा होने के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, मधुरता तथा कोमलता विद्यमान है।
  6. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  7. लिए फिरता हूँ के प्रयोग से काव्य में मस्ती का वातावरण उत्पन्न हो गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:
प्रश्न-
(क) कवि के हृदय में किस प्रकार के उद्गार हैं?
(ख) कवि संसार को अपूर्ण क्यों कहता है?
(ग) “स्वप्नों के संसार’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(घ) कवि के मन की दशा कैसी है?
(ङ) इस पयांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि के हृदय में प्रेममय उद्गार हैं। वह अपने प्रिय को भरपूर प्रेम देना चाहता है और प्रेममय जीवन-यापन करना चाहता है।

(ख) कवि के अनुसार प्रेमशून्य संसार अपूर्ण और अधूरा है। परन्तु यदि जीवन में प्रेम की प्राप्ति हो जाती है तो जीवन मधुर लगने लगता है।

(ग) स्वप्नों के संसार’ से कवि का तात्पर्य है-प्रेममय जीवन। जो लोग प्रेम की भावना से परिपूर्ण होकर जीते हैं, वे ही जीवन का आनंद उठाना जानते हैं।

(घ) कवि अपने हृदयगत प्रेम को अपने प्रिय के समक्ष प्रकट करना चाहता है। कवि को यह संसार प्रेम के बिना अपूर्ण लगता है। इसलिए वह प्रेममय जीवन जीना चाहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है और प्रेम को मानव-जीवन की मूल भावना माना है।

[4] मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ
जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-हृदय = मन। अग्नि = आग (भावों का आवेग)। दहा = जला। मग्न रहना = मस्त रहना। भव-सागर = संसार रूपी सागर। मौजों = किनारा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेममय संसार को अधिक महत्त्व प्रदान किया है। कवि प्रेम की दीवानगी को ही अपना जीवन मानता है और प्रेम की मस्ती में जीना चाहता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं स्वयं अपने हृदय में प्रेम की आग जलाता हूँ और उसी में जलता रहता हूँ। आशय यह है कि कवि को प्रेममय जीवन ही सुखद लगता है। वह प्रेम की दीवानगी में मस्त होकर जीवन के सुख-दुख को निरंतर भोगता रहता है। लोग इस संसार को मुसीबतों का सागर कहते हैं और उस पार उतरने के लिए कोई-न-कोई माध्यम अपनाते हैं। परंतु कवि प्रेम रूपी नाव के द्वारा ही सांसारिक बाधाओं को पार कर लेता है। इस प्रकार कवि संसार रूपी सागर के किनारे पर पहुँच जाता है। कवि यह सारा कार्य मौज और मस्ती के साथ करता है। प्रेम के कारण उसके मन में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेम को जीवन का आधार स्वीकार किया है। वह प्रेम की मस्ती को ही अपना जीवन मानता है।
  2. ‘अग्नि’, ‘नाव’ में रूपकातिशयोक्ति एवं भवसागर’ और ‘भव मौजों में रूपक तथा ‘सुख-दुख’ में अनुप्रास अलंकारों का सहज और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. प्रवाहमयी भाषा होने के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, मधुरता तथा कोमलता विद्यमान है।
  6. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न-
(क) कवि अपने हृदय में अग्नि जलाकर उसमें क्यों जला करता है?
(ख) कवि सुख-दुख में कैसे मग्न रहता है?
(ग) भव-सागर से पार उतरने के लिए नाव बनाने का क्या अर्थ है?
(घ) ‘भव मौजों से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रिय से अत्यधिक प्रेम करता है। प्रिय की यादें कवि को आनंद प्रदान करती हैं। इसलिए वियोगावस्था में भी कवि अपने प्रिय की विरहाग्नि में जलकर आनंद प्राप्त करता है।

(ख) अपने प्रिय की मधुर यादों में लीन रहने के कारण कवि सुख-दुख में भी मस्त रहता है, उसे सांसारिक चिंताएँ नहीं सतातीं।

(ग) इस संसार को भयंकर सागर कहा गया है। इसे पार करने के लिए कोई-न-कोई नौका अवश्य चाहिए। कवि अपने प्रिय के प्रेम को नौका बनाकर इस भव-सागर को पार करना चाहता है।

(घ) ‘भव मौजों से कवि का अभिप्राय है संसार रूपी सागर का किनारा। कवि का आशय यह है कि संसार के आकर्षणों में उसकी कोई रुचि नहीं है। वह संसार में प्रवेश ही नहीं करना चाहता। सांसारिक विषय-वासनाओं को त्यागकर ही वह प्रेम का सच्चा आनंद प्राप्त करना चाहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि वह प्रेम की उन्मत्तता में मस्त होकर जीवन के सुख-दुख को भोगना चाहता है। वह अपनी प्रेम रूपी नौका द्वारा ही इस संसार रूपी सागर को पार करना चाहता है।

[5] मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-यौवन = जवानी। उन्माद = मस्ती, पागलपन। अवसाद = दुख तथा निराशा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेममय संसार को ही श्रेष्ठ माना है। इसमें कवि प्रेम के वियोग पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति करता है तथा प्रेम की दीवानगी तथा निराशा का वर्णन करता है।

व्याख्या-कवि कहता है कि मेरे जीवन में यौवन की एक मस्ती है। मैं अपनी प्रिया को मिलने के लिए हमेशा व्याकुल रहता हूँ। मैं प्रिया के प्रेम का दीवाना हूँ। यद्यपि वियोगावस्था के कारण मेरे अंदर निराशा तथा दुख के भाव उत्पन्न हो गए हैं, लेकिन मैं लोगों के सामने हमेशा हँसता रहता हूँ। वियोग की पीड़ा मेरे हृदय को परेशान कर देती है। मेरे मन में प्रिया की याद ऐसे समा चुकी है कि मैं उसे याद करके मन ही मन रोता रहता हूँ, परंतु लोगों के सामने हँसने का अभिनय करता हूँ। भाव यह है कि प्रिया का वियोग हमेशा मुझे अन्दर-ही-अन्दर कचोटता रहता है।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने श्रृंगार के वियोग पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। कवि ने वियोगावस्था से उत्पन्न अपनी दीवानगी, निराशा तथा बेचैनी का स्वाभाविक वर्णन किया है।।
  2. कवि ने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. यह पद्यांश विषयानकल मस्ती, मादकता, मधुरता, कोमलता से परिपूर्ण है।
  5. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।
  6. संपूर्ण पद्यांश में संगीतात्मकता है तथा वियोग शृंगार का सफल वर्णन हुआ है।
  7. ‘हाय’ शब्द से कवि की विरह वेदना साकार हो उठी है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:

प्रश्न-
(क) ‘यौवन के उन्माद’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(ख) कवि अवसाद से ग्रस्त क्यों है?
(ग) कवि के भीतर तथा बाहर कैसी असंगति है?
(घ) इस पद्यांश में किस प्रकार के श्रृंगार रस का चित्रण हुआ है और क्यों?
(ङ) इस पयांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) ‘यौवन के उन्माद’ से कवि का अभिप्राय है-यौवनकालीन अल्हड़ जवानी में मन में प्रेम का जोश। लगता है कि कवि नए-नए प्रेम के कारण अत्यधिक व्याकुल है, प्रिया का वियोग उसे व्यथित कर देता है।

(ख) कवि की प्रिया उसे छोड़कर चली गई है। अतः कवि प्रेमजन्य निराशा के कारण अत्यधिक व्यथित है। इसलिए वह अवसाद से ग्रस्त है।

(ग) भले ही कवि विरह-व्यथा के कारण अन्दर-ही-अन्दर कसमसाता रहता है, परन्तु वह संसार के सामने हमेशा हँसता तथा मुस्कुराता रहता है। वह नहीं चाहता कि लोग उसकी विरह-व्यथा का मज़ाक बनाए। इसलिए कवि का मन अन्दर से सुंदर तथा बाहर से अंसगत दिखाई देता है।

(घ) इस पद्यांश में शृंगार रस के वियोग पक्ष का मार्मिक चित्रण हुआ है। कवि अपनी प्रिया के प्रेम से वंचित है इसलिए वह निराशा और अवसाद से ग्रस्त है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने अपनी विरह-व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। कवि सहज, सरल शब्दावली में अपनी वियोग जनित अभिलाषा और पीड़ा को व्यक्त करता है।

[6] कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-यत्न = कोशिश। नादान = भोला-भाला। दाना = लाभ। मूढ = मूर्ख। जग = संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेम की दीवानगी तथा मस्ती का संवेदनशील वर्णन किया है। इस पद्यांश में कवि सांसारिक दौड़-धूप को व्यर्थ बताता हुआ यही सलाह देता है कि मनुष्य को मस्ती के साथ जीना चाहिए।

व्याख्या कवि कहता है कि संसार के सभी लोग अनेक प्रयास करके थक चुके हैं। सभी ने सत्य को जानने की बड़ी कोशिश की, परंतु कोई सत्य को नहीं जान सका। इसका प्रमुख कारण यह है कि जो लोग संसार के धन-वैभव अथवा भोग-विलास की सामग्री एकत्रित करने में लगे हैं, वे सभी मूर्ख हैं। वे इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि संसार के जाल में उलझकर कोई सच्चा सुख प्राप्त नहीं कर सकता। कवि सोचता है कि मैं ऐसे लोगों को मूर्ख क्यों न कहूँ जो सांसारिक लाभ तथा लोभ में उलझे हुए हैं। मैं तो इस मूर्खता को समझ चुका हूँ। इसलिए मैं तो इस सांसारिक ज्ञान को भुलाकर प्रेम की मस्ती में जीना चाहता हूँ।

विशेष-
(1) इस पद्यांश में कवि ने सांसारिक सुख-वैभव की व्यर्थता को सिद्ध करने का प्रयास किया है।

(2) ‘कर यत्न मिटे सब सत्य’ में अनुप्रास अलंकार ‘सत्य किसी ने जाना’ में प्रश्नालंकार तथा “सीखा ज्ञान भुलाना’ में विरोधाभास अलंकारों का संदर व स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। इस संदर्भ में ‘कबीरदास’ ने भी कहा है
‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय’।

(3) कवि ने संसार को मूर्ख सिद्ध करने के लिए अनेक तर्क दिए हैं।

(4) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(5) शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

(6) इस पद्यांश में आत्मकथात्मक शैली का सफल प्रयोग किया गया है तथा मुक्त छंद है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि किसे नादान कहता है और क्यों?
(ख) ‘दाना’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ग) कवि ‘जग को मूढ़’ क्यों कहता है?
(घ) कवि किस प्रकार के ज्ञान को भलाना चाहता है?
(ङ) इस पद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि उन लोगों को नादान कहता है जो सांसारिक धन-वैभव को प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन भाग-दौड़ करते रहते हैं। कवि का विचार है कि अज्ञानता के कारण लोग प्रेम मार्ग को त्यागकर धन-वैभव तथा भोग-विलास में अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं।

(ख) ‘दाना’ से कवि का अभिप्राय है सांसारिक धन-वैभव और भोग-विलास जो मनुष्य को सच्चा सुख प्रदान नहीं करते।

(ग) जो लोग सांसारिक सुख भोग की संपत्ति का संग्रह करने में लगे हुए हैं, कवि उन्हें मूढ़ कहता है क्योंकि ऐसे लोग ही अज्ञान के कारण प्रेम को प्राप्त नहीं कर पाते।

(घ) कवि सांसारिक विषय-वासनाओं के ज्ञान को भुलाना चाहता है, क्योंकि यह ज्ञान कवि को सच्चा सुख प्रदान नहीं करता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सत्य पर प्रकाश डाला है कि संसार में जीवन के सत्य को कोई नहीं पहचान सका। जो लोग सांसारिक मोह-माया के शिकार बने हुए हैं, वह निश्चित ही मूर्ख हैं। कवि ने इस प्रकार के ज्ञान को भुलाने की कामना की है।

[7] मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग में उस पृथ्वी को ठुकराता! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-जग = संसार। नाता = संबंध। रोज़ = प्रतिदिन। वैभव = धन-संपत्ति। प्रतिपग = हर कदम।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने निजी प्रेम का खुले शब्दों में वर्णन किया है। इस पद्यांश में कवि ने स्वयं को सांसारिक मोह-माया से भिन्न बताया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मेरा इस संसार में कोई लंबा-चौड़ा संबंध नहीं है। मैं भावनाओं का कवि हूँ और संसार की रीति-नीति से सर्वथा भिन्न हूँ। संसार के लोग दुनियादारी निभाने में लगे रहते हैं, लेकिन मैं अपने जीवन में भावनाओं को महत्त्व देता हूँ। इसलिए मेरा संसार से कोई मेल नहीं है। मैं प्रतिदिन न जाने कितने संसार बनाता हूँ और न जाने कितने मिटा डालता हूँ। भाव यह है कि मैं प्रतिदिन एक आदर्श समाज बनाने की कल्पना करता हूँ। परंतु जब मेरी कल्पना साकार नहीं होती तो मैं नई कल्पना करने लगता हूँ। इस संसार के लोग धन-संपत्ति का संग्रह करने में लगे हैं, लेकिन मेरे मन में धन-वैभव के लिए कोई लालसा नहीं है। मैं हर कदम पर धन-वैभव में लगे हुए इस संसार को ठुकराता हुआ चलता हूँ। मेरे मन में सुख-समृद्धि की कोई इच्छा नहीं है।

विशेष-

  1. कवि ने सांसारिक धन-वैभव को त्यागकर भावनाओं के प्रति अपनी आसक्ति को व्यक्त किया है।
  2. कवि का यह चिंतन पूर्णतया मौलिक और दार्शनिक है।
  3. ‘जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव’ में विशेषण विपर्यय अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘कहाँ का माता’ में प्रश्नालंकार, ‘जग जिस पृथ्वी पर’, ‘प्रति पग में अनुप्रास, ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति अलंकार, ‘और’ में यमक (भिन्न तथा ‘व’ के अर्थ में) इन अलंकारों की छटा दर्शनीय है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. इस पद्यांश में प्रसाद गुण है तथा संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि स्वयं को संसार से अलग क्यों समझता है?
(ख) ‘और जग और’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ग) कवि किस प्रकार के संसार को मिटाता रहता है?
(घ) कवि स्वयं को संसार से क्यों नहीं जोड़ पाता?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि संसार के अन्य लोगों के समान धन-संपत्ति के संग्रह में विश्वास नहीं करता। वह तो निजी भावनाओं में ही खोया रहता है। इसलिए वह स्वयं को संसार से अलग समझता है।

(ख) ‘और जग और’ का भावार्थ यह है कि संसार के लोग कवि की भावनाओं को समझ नहीं पाते। सांसारिक प्राणी धन-संपत्ति के पीछे भागते रहते हैं, लेकिन कवि प्रेम और प्यार के संसार में खोया रहता है।

(ग) कवि तो प्रेम और प्यार में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। इसलिए वह कल्पना द्वारा एक आदर्श समाज बनाने का प्रयास करता है परंतु जब वह प्रेम की कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो वह उसे नष्ट कर देता है। इस प्रकार वह फिर से प्रेममय संसार की कल्पना करने लगता है।

(घ) कवि प्रेम और प्यार में विश्वास करने वाला व्यक्ति है, परंतु संसार के लोग धन-वैभव के संग्रह में लगे हुए हैं। इसलिए कवि और संसार के लक्ष्य अलग-अलग हैं। इसी कारण कवि स्वयं को संसार से जोड़ नहीं पाता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि स्वयं को संसार से अलग समझता है। वह प्रेम और प्यार की भावनाओं को अलग महत्त्व देता है। इसलिए वह एक ऐसा संसार बनाना चाहता है जो प्रेम और प्यार पर आधारित हो। इसलिए कवि सांसारिक धन-वैभव को ठोकर मारकर प्रेममय संसार बनाने की कामना करता है।

[8] मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ। [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-निज = अपना। रोदन = रोना। राग = प्रेम। आग = जोश, आवेश। भूप = राजा। प्रासाद = महल। खंडहर = टूटा-फूटा भवन। निछावर = कुर्बान करना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी विरह-वेदना को मुखरित किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मेरे रोने में प्रेम छिपा हुआ है अर्थात् मैं अपने गीत में प्रेम के आँसू बहाता रहता हूँ। भले ही मेरी वाणी कोमल तथा शीतल है फिर भी उसमें प्रेम-विरह की आग है। मेरे गीतों में एक ऐसा जोश है जो मुझे कविता लिखने की प्रेरणा देता है। प्रेम पर तो बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपने महलों को न्योछावर कर देते हैं, परंतु मेरा प्रेम निराशा के कारण टूटे-फूटे भवन जैसा हो गया है। फिर भी मैं अपने मन में उस मल्यवान प्रेम को लिए फिरता हूँ। मैं अपनी इस विरह-भावना से अत्यधिक प्रेम करता

विशेष-

  1. इसमें कवि ने अपनी विरह-वेदना को मुखरित किया है तथा साथ ही स्पष्ट किया है कि उसकी वाणी कोमल तथा शीतल है, परंतु उसमें विरहाग्नि छिपी हुई है। कवि ने अपने विरह जनित प्रेम को खंडहर बताकर अपनी निराशा को व्यक्त किया
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  5. माधुर्य गुण है तथा वियोग-शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्यांश में संगीतात्मकता का समावेश है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि अपने ‘रोदन में राग को क्यों लिए फिरता है?
(ख) ‘शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) राजाओं के प्रासाद किस पर न्यौछावर होते हैं?
(घ) कवि के अनुसार खंडहर का भाव क्या है?
(ङ) इस पद्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि के स्वर में निराशा और व्यथा है। लेकिन कवि के इस रुदन में सच्चे प्रेम की भावना है। वह वियोग जनित वेदना को इसलिए अपने हृदय में लिए हुए है, क्योंकि वह अपने प्रेम को भुला नहीं सकता।

(ख) विरह-वेदना के कारण कवि का स्वर कोमल तथा शीतल है, परंतु उसमें अपने प्रिय को न पा सकने की बेचैनी भी प्रबल है। यहाँ शीतलता और अग्नि का संयोग अद्भुत है। कवि अपनी विरहाग्नि को अपने गीतों में छिपाए हुए है। बडे राजा भी प्रेम के लिए अपना सब कछ त्याग देते हैं। यहाँ तक कि वे अपनी प्रिया को पाने के लिए राजगद्दी भी छोड़ देते हैं और एक सामान्य व्यक्ति के समान जीवन व्यतीत करने लगते हैं।

(घ) जिस प्रकार महल टूटकर खंडहर हो जाता है, उसी प्रकार कवि के प्रेम का महल भी टूट चुका है, अब उसके हृदय में केवल उसकी प्रिया की यादें ही बसी हैं जिसकी तुलना कवि खंडहर के साथ करता है।

(ङ) कवि ने अपने कोमल गीतों द्वारा अपनी विरह वेदना को व्यक्त किया है। यह वेदना अग्नि के समान कवि को गीत लिखने की प्रेरणा देती है।

[9] मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-फूट पड़ा = अत्यधिक आवेग से रोना। छंद बनाना = कविता लिखना। दीवाना = पागल।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने सरल शब्दों में यह समझाने का प्रयास किया है कि उसके प्रत्येक गीत में विरह-वेदना की अभिव्यक्ति हुई है।

व्याख्या कवि कहता है कि तुम मेरी कविता को गीत कहते हो। यह कोई गाना नहीं है, बल्कि मेरे हृदय का रुदन है, मेरी विरह-वेदना है। प्रेम की निराशा के कारण ही मेरी भावनाएँ अत्यधिक आवेग के साथ व्यक्त हुई हैं, परंतु तुम इसे कविता की संज्ञा देते हो। सच्चाई तो यह है कि मेरे गीतों के माध्यम से मेरा क्रंदन फूट पड़ा है। संसार मुझे कवि समझकर क्यों अपनाना चाहता है? सच्चाई तो यह है कि मैं कवि नहीं हूँ, मैं तो प्रेम का दीवाना हूँ। मेरे हृदय में प्रेम की मस्ती भरी हुई है। मैं गीतों के माध्यम से प्रेम-विरह की भावनाओं को प्रकट करता हूँ।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने स्वीकार किया है कि उसके प्रत्येक गीत में विरह-व्यथा का रुदन है। यह कोई गीत नहीं है।
  2. कवि स्पष्ट करता है कि उसकी आवेगपूर्ण भावनाओं के कारण ही गीत की उत्पत्ति होती है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘क्यों कवि कहकर’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. संबोधन शैली के प्रयोग के कारण इस पद्य में नाटकीयता तथा सजीवता उत्पन्न हो गई है।
  7. माधुर्य गुण है तथा वियोग-शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) लोग कवि के रुदन को गाना क्यों कहते हैं?
(ख) छंद बनाना और फूट पड़ना में क्या संबंध है?
(ग) कवि स्वयं को एक नया दीवाना क्यों कहता है?
(घ) संसार कवि को कवि कहकर क्यों अपनाना चाहता है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) भले ही कवि अपनी कविताओं के द्वारा अपनी विरह-व्यथा को व्यक्त करता है, लेकिन लोग उसकी कविता से प्यार करते हैं। इसीलिए उसे गाना कहते हैं।

(ख) जब कवि अपनी तीव्र विरह-व्यथा को काव्य में शब्दों द्वारा व्यक्त करता है तो उसे छंद बनाना कहते हैं। वस्तुतः एक उत्कृष्ट कविता में भावनाओं का आवेग अवश्य होना चाहिए तभी वह कविता पाठक को भाव-विभोर करती है।

(ग) कवि स्वयं को नया दीवाना इसलिए कहता है क्योंकि उसके हृदय में प्रेम की मस्ती है और अपने गीतों द्वारा प्रेममयी भावनाओं को व्यक्त करता है।

(घ) संसार कवि को कवि कहकर इसलिए अपनाना चाहता है क्योंकि कवि की भावनाएँ छंदोबद्ध रचना के माध्यम से व्यक्त हुई है। संसार के लोग कवि को मात्र कवि समझते हैं, परंतु कोई भी उसकी प्रेम भावनाओं को नहीं समझ पाता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सहज तथा स्पष्ट शब्दावली में यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके प्रत्येक गीत के पीछे उसकी विरह-वेदना छिपी हुई है। इस विरह-वेदना के कारण ही कवि के गीत उत्पन्न हुए हैं।

[10] मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-मादकता = मस्ती। निःशेष = पूर्ण। जग = संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी प्रेम भावना को मुखरित किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं इस संसार में प्रेम के दीवानों की वेशभूषा धारण करके विचरण कर रहा हूँ। इसलिए लोग मुझे दीवाना समझते हैं। परंतु मैं अपनी दीवानगी से सबको मस्त बना देता हूँ। मेरे संपूर्ण काव्य में एक मस्ती और उल्लास है। इसीलिए मैं प्रेम और यौवन के गीत गाता हूँ। यही कारण है कि लोग मेरे गीतों को सुनकर झूम उठते हैं। प्रेम से झुक जाते हैं और मस्ती से लहराने लगते हैं। मैं अपने पाठकों को मौज और मस्ती का संदेश देना चाहता हूँ। मेरी कविता में केवल प्रेममयी भावनाओं का ही वर्णन अभिव्यक्त हुआ है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने स्पष्ट किया है कि वह प्रेम के कारण दीवाना हो चुका है और सभी को प्रेम की मस्ती का संदेश देना चाहता है।
  2. ‘झूम झुके’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. ‘लिए फिरता हूँ शब्दों के प्रयोग के कारण इस पद्यांश में संगीत और मस्ती समाहित हो गई है।
  7. प्रसाद गुण है तथा शृंगार रस का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि संसार को क्या संदेश देना चाहता है?
(ख) कवि की किस बात को सुनकर संसार के लोग झूमते, झुकते और लहराने लगते हैं?
(ग) ‘मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
(घ) कवि के गीतों में मादकता क्यों है?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि संसार के लोगों को यह संदेश देना चाहता है कि वे सांसारिक झंझटों को त्यागकर प्रेम और मस्ती के साथ जीवन-यापन करें। इसी से उन्हें सच्चे आनंद की प्राप्ति होगी।

(ख) कवि के गीतों में प्रेम की मस्ती और मादकता है जिसे सुनकर संसार के लोग झूम उठते हैं, प्रेम से झुक जाते हैं और मस्ती में लहराने लगते हैं।

(ग) यहाँ कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि वह प्रेम के दीवानों के समान अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य अपनी प्रिया के प्रेम को प्राप्त करना है।

(घ) कवि प्रेम की मस्ती में आकंठ डूबा हुआ है। वह हमेशा प्रेम और यौवन के गीत गाता है। इसलिए हमेशा प्रेम और मस्ती में ही डूबा रहता है। उसे सांसारिक मोह-माया से कोई लगाव नहीं है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि प्रेम की मस्ती के कारण वह दीवाना बन चुका है। उसकी इसी मादकता पर संसार के लोग झूम उठते हैं और वह लोगों को इसी मस्ती का संदेश देना चाहता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

एक गीत पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! [पृष्ठ-7]

शब्दार्थ-पथ = रास्ता। मंजिल = लक्ष्य। पंथी = मुसाफिर । ढलना = समाप्त होना।

प्रसंग प्रस्तत पद्यांश हिंदी की पाठयपस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने प्रेम की बेचैनी का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि मुसाफिर बार-बार यह सोचता है कि कहीं उसे रास्ते में रात न हो जाए। मंजिल अब उस नहीं है। वह पास ही आने वाली है। भाव यह है कि वह अपने प्रिय को प्राप्त करने वाला है। बार-बार अपने प्रिय के बारे में सोचकर वह जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता है, ताकि वह अपने प्रिय से मिल सके। प्रिय-मिलन की बेचैनी के कारण उसे लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है और कभी भी छिप सकता है।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने प्रेम की बेचैनी का बड़ा ही सजीव, सूक्ष्म वर्णन किया है।
  2. प्रेमी को दिन के छिपने का डर लगा रहता है इसलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है। इस प्रकार प्रेमी की व्यग्रता को व्यक्त किया गया है।
  3. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. सहज, सरल, साहित्यिक और प्रवाहमयी हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. कोमलकांत पदावली के कारण इस गीत में संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘थका हुआ पंथी’ किस कारण जल्दी-जल्दी चलता है?
(ग) ‘पंथी’ किस आशा से प्रेरित होकर जल्दी-जल्दी चलता है?
(घ) ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है। कवि को यह कथन बेचैन क्यों करता है?
(ङ) इस,पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि का नाम हरिवंशराय बच्चन कविता का नाम एक गीत

(ख) थका हुआ मुसाफिर अपने लक्ष्य को पास देखकर उसे जल्दी से प्राप्त करना चाहता है, इसीलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है।

(ग) पंथी के मन में यह आशा उत्पन्न हो चुकी है कि उसकी मंजिल पास आ चुकी है इसलिए अब जल्दी से उसका प्रिय से मिलन होगा। इसलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है।

(घ) कवि अपनी मंजिल को पाने के लिए बेचैन है। वह चाहता है कि दिन छिपने से पहले अपने प्रिय को प्राप्त कर ले, लेकिन दिन जल्दी-जल्दी अस्त होने जा रहा है इसलिए वह बेचैन हो उठता है।

(ङ) कवि ने यह स्पष्ट किया है कि लक्ष्य को पाने वाला व्यक्ति हमेशा व्यग्र रहता है। उसे लगता है कि समय जल्दी से बीतता जा रहा है। इसलिए वह बड़ी तीव्र गति से अपने काम को पूरा करना चाहता है। इस प्रकार के व्यक्ति का मन बड़ा बेचैन हो उठता है।

[2] बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! [पृष्ठ-7]

शब्दार्थ-प्रत्याशा = आशा। नीड़ = घोंसला। झाँकना = बाहर देखना। पर = पंख। चंचलता = तीव्रता। .

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इसमें कवि ने चिड़िया के बिंब द्वारा अपनी मन की व्याकुलता को व्यक्त किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि जब चिड़ियाँ आकाश में उड़ती हुई अपने घोंसलों में लौटती हैं तो उनके मन में बार-बार यह विचार उठता है कि उनके बच्चे बेचैन होकर उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। वह बार-बार घोंसलों से मुँह बाहर निकालकर झाँक रहे होंगे। चिड़ियों को अपने बच्चों की चिंता सताने लगती है। इसलिए वे तीव्र गति से अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए घोंसलों की तरफ बढ़ने लगती हैं। उनके मन में यह भय सताता रहता है कि कहीं दिन न छिप जाए। इसलिए वह तीव्र गति से उड़ने लगती है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने चिड़िया के बिंब द्वारा प्रेमी के हृदय की बेचैनी को व्यक्त किया है।
  2. जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल, साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. इस पद्यांश का बिंब-विधान तथा चित्र-विधान दोनों ही आकर्षक बन पड़े हैं।
  6. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य भाव का सुन्दर परिपाक हुआ है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) बच्चे किस आशा से नीड़ों से बाहर झाँक रहे होंगे?
(ख) चिड़ियों के घोंसलों द्वारा किस दृश्य की कल्पना की गई है?
(ग) चिड़ियों के पंखों में चंचलता क्यों उत्पन्न हो जाती है?
(घ) चिड़ियों को क्यों लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है?
(ङ) इस कविता द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर:
(क) चिड़ियों के बच्चे इसलिए घोंसलों से बाहर झांक रहे हैं, क्योंकि वे माँ के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि माँ लौटकर उन्हें चुग्गा देगी। इसलिए वे माँ की ममता के लिए बेचैन हैं।

(ख) चिड़ियों के घोंसलों द्वारा उस दृश्य की कल्पना की है जब चिड़ियों के बच्चे अपने माँ के आने की प्रतीक्षा के कारण घोंसलों से बाहर झाँकने लगते हैं। एक ओर उनके मन में माँ की ममता होती है और दूसरी ओर वे भूखे होते हैं।

(ग) चिड़िया अपने बच्चों से शीघ्र मिलना चाहती है। बच्चों की ममता उन्हें पुकारती है। वे शीघ्र ही बच्चों को भोजन व सुरक्षा देना चाहती है। इसीलिए उनके पंखों में चंचलता उत्पन्न हो गई है।

(घ) चिड़ियों के मन में बेचैनी है। वे जल्दी-जल्दी अपने शावकों के पास पहुँच जाना चाहती हैं। परंतु उनकी मंजिल दूर है। इसी बेचैनी के कारण उन्हें लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है।

(ङ) कवि ने माँ की ममता का सजीव चित्रण किया है। वात्सल्य और प्रेम के कारण ही शावकों का मन बेचैन हो उठता है। चिड़ियों के माध्यम से कवि ने मानवीय ममता तथा वात्सल्य का सजीव वर्णन किया है।

[3] मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

शब्दार्थ-विकल = व्याकुल। हित = के लिए। चंचल = बेचैन, क्रियाशील। शिथिल = ढीला करना। पद = पाँव। उर = हृदय। विह्वलता = आतुरता का भाव।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी हृदयगत निराशा, उदासी तथा प्रेम की असफलता का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो मुझसे मिलने के लिए बेचैन हो। इसलिए मेरा मन किसी के लिए भी चंचल नहीं होता। आशय यह है कि मेरे मन में किसी के प्रति प्रेम की भावना नहीं है। यह स्थिति मेरे कदमों को शिथिल कर देती है। प्रेम के अभाव के कारण मैं ढीला पड़ जाता हूँ और मेरे हृदय में निराशा तथा उदासी की भावना उत्पन्न होकर मुझे व्याकुल कर देती है। फिर भी मैं प्रेम की तरंग में खो जाता हूँ और दिन जल्दी-जल्दी ढल जाता है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेम के क्षेत्र में असफल होने के कारण अपने हृदयगत निराशा और उदासी का संवेदनशील वर्णन किया है।
  2. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है तथा प्रथम दो पंक्तियों में प्रश्नालंकार है।
  3. सहज, सरल, साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व सटीक है।
  5. प्रसाद गुण है तथा वियोग-शृंगार का परिपाक हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता का समावेश है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि के मन में यह प्रश्न क्यों उठता है कि उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल है?
(ख) कवि किसके लिए चंचलता को त्याग देता है?
(ग) कवि के कदम शिथिल क्यों हो जाते हैं?
(घ) कवि के मन में कैसी विह्वलता उत्पन्न होती है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि अब अकेला रह गया है, क्योंकि उसका प्रिय उसे छोड़कर चला गया है। इसीलिए वह सोचता है कि उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल नहीं है।

(ख) कवि के मन में अब अपने प्रिय को मिलने की बेचैनी नहीं है। इसलिए वह चंचलता को त्याग देता है।

(ग) कवि अब समझ चुका है कि जिसे वह प्रेम करता था, अब वह उसे मिलने वाला नहीं है। इसलिए उसके कदम शिथिल हो जाते हैं और वह तटस्थ भाव से चलने लगता है।

(घ) कवि के मन में यह विह्वलता उत्पन्न होती है कि वह इस प्रेममय संसार में अकेला रह गया है। कोई भी व्यक्ति अब उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा, इसलिए कवि निराश व उदास है।

(ङ) कवि ने यह स्वीकार किया है कि उसकी प्रिया उसे छोड़कर चली गई है। अतः वह अब अकेला रह गया है। इसलिए इस पद्यांश में कवि की वियोगजन्य पीड़ा का मार्मिक वर्णन हुआ है।

आत्म-परिचय, एक गीत Summary in Hindi

आत्म-परिचय, एक गीत कवि-परिचय

प्रश्न-
श्री हरिवंश राय बच्चन का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री हरिवंश राय बच्चन का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-श्री हरिवंश राय बच्चन का आधुनिक हिंदी कवियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनका जन्म सन् 1907 में इलाहाबाद (प्रयाग) के कटरा मुहल्ले के एक कायस्थ परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम प्रताप नारायण था जो अपने मधुर स्वभाव के कारण सभी लोगों में प्रिय थे। बच्चन जी की आरंभिक शिक्षा काशी में हुई। सन् 1938 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात् वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य करने लगे। वे आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से भी संबद्ध रहे। भारत सरकार ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उनको विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया। सन् 1966 में बच्चन जी राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए।

बच्चन जी को अपने आरंभिक जीवन में अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ा। उनकी आर्थिक स्थिति सुखद नहीं थी। वे अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। तभी उनकी पत्नी श्यामा असाध्य रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु का शिकार हो गई। पत्नी की मृत्यु से कवि को गहरा आघात लगा। जिससे उनके जीवन में केवल निराशा एवं दुख छा गया। सन् 1942 में कवि ने तेजी बच्चन से दूसरा विवाह किया। तेजी बच्चन के आने से उनके जीवन का भाग्योदय हुआ और वे निरंतर प्रगति करते चले गए। भारत सरकार ने बच्चन जी को ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया।

2. प्रमुख रचनाएँ बच्चन जी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-‘मधुशाला’ (सन् 1935), ‘मधुबाला’ (सन् 1938), ‘मधुकलश’ (सन् 1938), ‘निशा निमंत्रण’, ‘आकुल-अंतर’, ‘एकांत संगीत’, ‘प्रणय पत्रिका’, ‘सतरंगिणी’, ‘दो चट्टानें’, ‘मिलनयामिनी’, ‘आरती’ और ‘अंगारे’, ‘नये पुराने झरोखे’, ‘टूटी-फूटी कड़ियाँ’ आदि। उनकी कुछ आत्मकथामूलक रचनाओं से उनके संपूर्ण जीवन का विशद वर्णन मिलता है। ये रचनाएँ हैं-‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’, ‘दशद्वार से सोपान तक।
सन् 2003, में मुंबई में इस महान् साहित्यकार का निधन हो गया।

3. काव्यगत विशेषताएँ उत्तर छायावादी कवियों में बच्चन जी को विशेष प्रसिद्धि मिली। वे हिंदी साहित्य में हालावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने उमर खय्याम की रुबाइयों का अत्यंत सुन्दर अनुवाद किया था। ‘मधुशाला’ बच्चन जी की एक उल्लेखनीय रचना है, जिसमें प्रेम की मस्ती देखी जा सकती है। ‘मधुशाला’, ‘मधुबाला’ तथा ‘मधुकलश’ उनकी कीर्ति की आधार-स्तंभ काव्य-रचनाएँ हैं। उनके काव्य में प्रेम भावना, मदमस्त जीवन तथा भाग्यवाद का समर्थन देखने को मिलता है। उनके काव्य की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं
(i) व्यक्तिनिष्ठता श्री हरिवंश राय बच्चन आधुनिक हिंदी काव्य की वैयक्तिक काव्यधारा के प्रमुख कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनकी विचारधारा व्यक्तिनिष्ठ है। उन्होंने वैयक्तिक यथार्थ की भूमिका पर ही जीवन एवं जगत को देखने व समझने का प्रयास किया है। वे समाज-हित के साथ-साथ व्यक्ति-हित को भूलने के पक्ष में नहीं हैं। कहीं-कहीं उनके साहित्य में वैयक्तिकता के नाम पर पलायनवादिता का स्वर भी सुनाई पड़ता है।

(ii) प्रेम,और सौंदर्य-वस्तुतः हरिवंश राय बच्चन प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं। उनके अन्य साहित्य में भी उनकी यह भावना देखी जा सकती है। उनके साहित्य में प्रेम और सौंदर्य के साथ जीवन के प्रति पूर्ण आस्था अभिव्यक्त हुई है। उनकी रचनाओं में गहन अनुभूतियों को भी सर्वत्र देखा जा सकता है
“इस पार प्रिये, तुम हो, मधु है,
उस पार न जाने क्या होगा।”

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

(iii) मानवतावाद-बच्चन जी की रचनाओं में मानवतावादी भावना भी मुखरित हुई है। उनकी रचनाओं में मानव मात्र के प्रति प्रेम का भाव सर्वत्र व्याप्त है। वे मानव की करता को देखकर व्यथित हो उठते हैं।

(iv) सामाजिक यथार्थ बच्चन जी की गद्य रचनाओं में सामाजिक यथार्थ का चित्रण अत्यंत सजीवता से हुआ है। सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ उनकी रचनाओं की प्रक्रिया भी अनायास ही मुखरित हो उठी है। उनकी आत्मकथात्मक रचनाओं में उनके संघर्षशील जीवन के दर्शन होते हैं।

(v) आशा और सूजन का स्वर-बच्चन जी की कविताओं में केवल प्रणय और निराशा ही नहीं, बल्कि आशा और सृजन का स्वर भी सुनाई पड़ता है। ‘पथ की पहचान’ नामक कविता में कवि ने मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। वे पाठकों को सृजन की कल्पना करने तथा यथार्थ को स्वीकार करने का संदेश भी देते हैं। ‘बंगाल का अकाल’ शीर्षक कविता तथा ‘परवर्ती’ काव्य में कवि ने जन-जीवन को प्रतिस्थापित किया है और नए संदर्भो को प्रस्तुत किया है। एक स्थल पर कवि कहता है
“किंतु जग के पथ पर यदि
स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,
सत्य का भी ज्ञान कर लो।”

4. भाषा, छंद एवं अलंकार-बच्चन जी ने अपनी काव्य रचनाओं में आडंबरहीन भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में यदि प्रवाह है, तो चित्र विधान की शक्ति तथा प्रतीक शब्द योजना भी है। वे हमेशा सीधे ढंग से अपनी बात कहते हैं। वे भाषा में अभिधा-शक्ति का प्रयोग करते हुए अपने मन के भाव पाठकों तक पहुँचाते हैं। गेय होने के कारण उनकी रचनाओं को गीत के रूप में मान्यता प्राप्त है। यही कारण है कि आधुनिक गीतकारों में उनका प्रमुख स्थान है।
बच्चन जी की कविताओं में अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप में हुआ है। अनुप्रास, रूपक, यमक, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण आदि उनके प्रिय अलंकार हैं। उदाहरण के लिए
अनुप्रास-“है अनिश्चित, कब सुमन, कब कंटकों के शर मिलेंगे।”
रूपक-“ये उदय होते, लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में।”
उपमा-“घूमती नूरमहल थी एक दिवस बन जिन महलों की नूर।
खड़े हैं खंडहर से वे आज किसी दिन हो जाएँगे धूर।”
मानवीकरण-“रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता।”
बच्चन जी के कवि-रूप पर विचार करते हुए डॉ० मत्येंद्र नाथ शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘कविता का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में लिखा है
“छायावादी संस्कारों से अलग हटकर बच्चन ने कविता को नितांत नवीन संदर्भ प्रदान किया है। इनकी रचना-यात्रा में व्यष्टि-समष्टि, सूक्ष्म-स्थूल, सामान्य-विशेष तथा विभिन्न सामाजिक रूपों का सफल चित्रण हुआ है।”

आत्म-परिचय कविता का सार

प्रश्न-
श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘आत्मपरिचय’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘आत्मपरिचय’ श्री हरिवंश राय बच्चन की एक उल्लेखनीय कविता है। इसमें कवि ने अपने प्रेममय व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है। कवि अपने कर्त्तव्यों के प्रति सदा सजग है। वह जीवन के कष्टों तथा बाधाओं चाहता है। प्रेम से उसका हृदय झंकृत है। वह हमेशा अपनी प्रिया के स्नेह में लीन रहता है। संसार के अन्य लोग हमेशा अपनी समस्याओं में उलझे रहते हैं, परंतु कवि का हृदय प्रेम से सदा सराबोर रहता है। वह संसार की कभी चिंता नहीं करता। सांसारिक जीवन के बोझ को ढोता हुआ भी वह जीवन में प्यार को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। कवि के हृदय में नए-नए मनोभाव हैं। ये मनोभाव उसके लिए उपहारस्वरूप हैं। यह अधूरा संसार कवि को अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह सपनों के संसार मे डूबा रहता है। सुख-दुख दोनों कवि के लिए एक समान हैं। वह अपने प्रेम की मस्ती और उमंग से जीवनयापन करना ही ठीक समझता है और इस प्रकार प्रेम रूपी नाव के द्वारा संसार की मुसीबतों को पार करता है। कवि के मन में सदा यौवन का पागलपन सवार रहता है। इसीलिए वह अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए बेचैन रहता है। प्रिया का वियोग कवि को पीड़ित करता है, लेकिन वह संसार के सामने हँसता रहता है। संसार के अनेक लोगों ने सत्य को जानने की कोशिश की, परंतु कोई भी सत्य को जान नहीं पाया। लोग संसार के भौतिक साधनों का संग्रह करने के चक्कर में उलझकर रह गए हैं। परंतु कवि जान चुका है कि इससे दूर रहने में ही भलाई है।

संसार जिसे हर रोज़ जोड़ने का प्रयास करता है, कवि उसे हर कदम पर ठुकराता हुआ चलता है। वह तो हमेशा भावनाओं के संसार में जीना चाहता है। कवि को अपने रोने में भी संगीत सुनाई देता है, उसकी शीतल वाणी में विद्रोह की आग है। उसका प्रेम भले ही खंडहर के समान टूटा-फूटा है, पर वह उस प्रेम पर राजाओं के महलों को भी न्योछावर करना चाहता है। अंत में कवि कहता है कि उसका रुदन ही गीत बन गया है। कवि ने खुलकर अपनी भावनाएँ व्यक्त की, पर लोग उसे छंद की संज्ञा देते हैं। सचमुच कवि एक दीवाना है, उसके गीतों में एक मस्ती है, उसके गीतों को सुनकर संसार के लोग झूम उठते हैं। इसलिए कवि सबके लिए प्रेम की मस्ती का संदेश लिए गीत लिखता है।

एक गीत कविता का सार

प्रश्न-
‘एक गीत’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत गीत ‘एक गीत’ ‘बच्चन जी’ का एक प्रसिद्ध प्रेमगीत है जो कि ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसमें कवि ने अपने प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है। कवि अपने प्रियजन से मिलने के लिए अत्यधिक बेचैन है। वह तीव्र गति से चलकर अपने प्रियजन तक पहुँच जाना चाहता है। उसे लगता है कि अब उसका लक्ष्य दूर नहीं है। कवि चिड़ियों का रूपक बाँधते हुए कहता है कि चिड़ियों के बच्चे अपने माता-पिता की प्रतीक्षा कर रहे होंगे और वह अपने घोंसलों से बाहर झांककर देख रहे होंगे। यह सोच चिड़िया के पंखों में चंचलता उत्पन्न कर देती है। परन्तु कवि सोचता है कि इस संसार में कोई भी उसका अपना नहीं है जो उसे मिलने के लिए व्याकुल हो रहा है। इसलिए उसके कदम शिथिल पड़ जाते हैं। अंत में कवि स्पष्ट करता है कि प्रेम के कारण मनुष्य के जीवन में गतिशीलता का संचरण होता है।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

HBSE 12th Class Physical Education शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
शारीरिक पुष्टि के घटक (अंग) कौन-कौन से हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
शारीरिक पुष्टि (Physical Fitness) के प्रमुख घटकों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि के विभिन्न घटक या अंग निम्नलिखित हैं
1. गति (Speed):
गति से अभिप्राय मनुष्य की उस योग्यता से है जो किसी भी स्थिति में कम-से-कम समय लेकर अपने कार्य को पूरा करती है। गति दूसरे शारीरिक योग्यता के अंगों; जैसे शक्ति तथा सहनशीलता से भिन्न है। यह नाड़ी प्रणाली पर आधारित है। गति को साधारणतया लगभग 20 प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता, क्योंकि गति बहुत सारी बातों पर आधारित होती है। भिन्न-भिन्न खेलों में गति भिन्न-भिन्न देखने को मिलती है। सभी खेल तेज तथा विस्फोटक मूवमैंट पर आधारित होते हैं।

2. शक्ति (Strength):
शक्ति शारीरिक पुष्टि का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। शक्ति हमारे शरीर की माँसपेशियों द्वारा उत्पन्न की गई वह ऊर्जा है जिसके द्वारा हम कुछ कार्य कर सकते हैं। शक्ति को मापने के लिए पौंड या डाइन का प्रयोग किया जाता है। शक्ति को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है-(1) स्थिर शक्ति, (2) गतिशील शक्ति। स्थिर शक्ति को ‘आइसोमीट्रिक शक्ति’ के नाम से भी जाना जाता है। आमतौर पर यह शक्ति खेलकूद में प्रयोग नहीं की जाती, परन्तु वजन उठाने में इसका प्रयोग थोड़ी मात्रा में किया जाता है। गतिशील शक्ति को ‘आइसोटोनिक शक्ति’ के नाम से भी जाना जाता है। खींचने वाली क्रियाओं में इसका अधिक प्रयोग किया जाता है।

3. सहनशीलता (Endurance):
सहनशीलता शक्ति की तरह शारीरिक पुष्टि का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। सहनशीलता एक प्रतिरोध योग्यता है जो थकावट के विरुद्ध होती है। सामान्य शब्दों में, यह खिलाड़ी की वह योग्यता है, जिसके कारण खिलाड़ी बिना किसी थकावट के क्रिया करता है। सहनशीलता प्रत्येक खेल में अच्छी कुशलता के लिए एक महत्त्वपूर्ण योग्यता है। एक अच्छी सहनशीलता वाला खिलाड़ी अधिक प्रशिक्षण का भार सहन करके अपनी कुशलता बढ़ा सकता है। कूपर और पीटर जैसे विद्वानों का विचार है कि सहनशीलता हृदय की बीमारियों और सामान्य स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है।

4. लचीलापन/लचक (Flexibility):
व्यक्ति के शरीर के जोड़ों की गतिक्षमता को लचक कहते हैं। अधिक लचक वाला व्यक्ति बिना किसी कष्ट के अधिक देर तक कार्य कर सकता है। अधिक लचक वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व भी अच्छा होता है। लचकदार शरीर वाले व्यक्ति जब कोई गतिविधि करते हैं तो उनकी मांसपेशियों में कम तनाव उत्पन्न होता है जिस कारण ऊर्जा या शक्ति का बचाव होता है।

5. स्फूर्ति/चुस्ती (Agility):
खिलाड़ी जब अपने शरीर अथवा शरीर के किसी हिस्से को हवा में तेजी के साथ और सही ढंग से उसकी दिशा को बदलता है, तो उसको स्फूर्ति कहा जाता है। इसमें शरीर की बड़ी माँसपेशियाँ भाग लेती हैं और बड़ी तेजी व ठीक ढंग से तालमेल करती हैं। इसको पूरा करने के लिए अनुभव, तकनीक और कौशल की बहुत आवश्यकता होती है। यह विशेषतौर पर हर्डल्ज, कुश्ती, ऊँची छलाँग, फुटबॉल और बास्केटबॉल जैसी खेलों में बहुत महत्त्वपूर्ण है।

6. तालमेल (Co-ordination):
शारीरिक अंगों के आपस में मिलकर कार्य करने की शक्ति को तालमेल कहते हैं। मानवीय विकास शक्ति और वृद्धि के तालमेल के बिना नहीं हो सकता। तालमेल से शरीर का प्रत्येक अंग मिल-जुलकर कार्य करता है। यदि मनुष्य के सारे अंग ठीक ढंग से कार्य करते हों परंतु दिमाग कार्य न करता हो तो शरीर के बाकी सारे अंग बेकार हो जाते हैं। इसलिए दिमाग, शरीर और स्थिति तालमेल की माँग करते हैं। तालमेल के बिना शारीरिक पुष्टि विकसित नहीं हो सकती।

7. संतुलन (Balance):
एक ही स्थिति में अधिक समय तक रहने की शक्ति को संतुलन कहते हैं। यह शारीरिक पुष्टि के लिए बहुत आवश्यक है। उदाहरण के लिए, जब मनुष्य एक टाँग के बल पर कुछ समय के लिए खड़ा होने में सक्षम हो तो इसको उसका संतुलन कहेंगे। हैंड-स्टैंड और शीर्षासन भी ऐसी क्रियाएँ हैं जो संतुलन की उदाहरण हैं। शारीरिक शिक्षा में ऐसी बहुत सारी क्रियाएँ हैं जो संतुलन के लिए काफी लाभकारी होती हैं। शारीरिक पुष्टि के लिए संतुलन का होना बहुत आवश्यक है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

प्रश्न 2.
शारीरिक पुष्टि व सुयोग्यता को परिभाषित कीजिए। शारीरिक पुष्टि व सुयोग्यता का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है?
अथवा
शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता से क्या अभिप्राय है? इनके महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
अथवा
शारीरिक पुष्टि से क्या तात्पर्य है? दैनिक जीवन में शारीरिक पुष्टि के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि का अर्थ (Meaning of Physical Fitness):
आज के यांत्रिक युग में प्रत्येक मनुष्य अपनी शारीरिक पुष्टि बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील है। यह मनुष्य की वह शक्ति तथा कार्य करने की योग्यता है, जिसको वह बिना किसी बाधा के आसानी से थोड़ी-सी शक्ति का प्रयोग करके पूरा कर लेता है। शारीरिक पुष्टि या योग्यता का अर्थ बहुत व्यापक है, इसलिए इसे परिभाषित करना बहुत कठिन है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि यह हमें अपने शरीर को सही ढंग से रखने और अधिक देर तक मेहनत करने की क्षमता प्रदान करती है।

1..डॉ०ए०के० उप्पल (Dr.A.K. Uppal) के अनुसार, “शारीरिक पुष्टि वह क्षमता है जिसके द्वारा शारीरिक क्रियाओं के विभिन्न रूपों को बिना थकावट के तर्कपूर्ण ढंग से किया जा सके। इसके अंतर्गत व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा नीरोगता के महत्त्वपूर्ण गुण सम्मिलित होते हैं।”

2. डेविड लैम्ब (David Lamb) के अनुसार, “शारीरिक पुष्टि को उस कुशलता के रूप में परिभाषित किया गया है जिसके द्वारा जीवन की वर्तमान तथा सशक्त शारीरिक चुनौतियों का सफलता के साथ मुकाबला किया जा सके।”

3. क्यूरेटन (Cureton) के अनुसार, “शारीरिक पुष्टि से अभिप्राय व्यक्ति को अपने शरीर का ठीक ढंग से प्रयोग करने और अधिक देर तक परिश्रम करने की क्षमता से है।”

सुयोग्यता का अर्थ (Meaning of Wellness):
सुयोग्यता एक ऐसी अवस्था है, जो हमारे दैनिक जीवन में प्रत्येक कार्य को प्रभावकारी ढंग से करने में सहायक होती है तथा शेष बची हुई शक्ति से हम खाली समय में मनोरंजन कर सकते हैं। सुयोग्यता क्रोध को सहन करने और तनाव को दूर करने में सहायक होती है। यह एक अच्छे स्वास्थ्य का चिह्न है। यह प्रत्येक मनुष्य में भिन्न-भिन्न होती है, क्योंकि इस पर पैतृक आदतों, व्यायाम, आयु तथा लिंग का प्रभाव पड़ता है। अतः सुयोग्यता व्यक्ति की वह क्षमता या योग्यता है जिसके द्वारा वह एक उत्तम एवं संतुलित जीवन व्यतीत करता है। इसमें मन, शरीर एवं आत्मा का संतुलन शामिल होता है। इसलिए । यह शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की दशा या विशेषता होती है।

शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता का महत्त्व (Importance of Physical Fitness and Wellness):
शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता का महत्त्व निम्नलिखित है-
(1) शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता शरीर की विभिन्न प्रणालियों की कार्यक्षमता में सुधार करती हैं। इनसे व्यक्ति कीकार्यकुशलता एवं क्षमता में वृद्धि होती है। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति पहले की अपेक्षा अधिक कार्य करने में सक्षम हो जाता है।
(2) ये वृद्ध होने की प्रक्रिया को धीमा करती हैं और मनुष्य को दीर्घायु बनाती हैं।
(3) ये रोग निवारक क्षमता को बढ़ाती हैं और शरीर के सुचारु विकास में मदद करती हैं।
(4) ये व्यक्ति का आसन (Posture) ठीक करती हैं।
(5) ये मानसिक स्वास्थ्य तथा चेतना में सुधार करती हैं और मानसिक क्षमता में वृद्धि करती हैं।
(6) ये तनाव व दबाव को दूर करने में सहायक होती हैं।
(7) ये हृदय और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों को दूर करती हैं।
(8) ये कार्य की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में वृद्धि करती हैं।
(9) ये व्यक्ति को सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने हेतु प्रेरित करती हैं।
(10) ये शरीर के आकार एवं बनावट में सुधार करती हैं तथा शरीर को मोटापे या स्थूलता से बचाती हैं।

प्रश्न 3.
शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता पर प्रभाव डालने वाले विभिन्न तत्त्वों या कारकों का वर्णन करें।
अथवा
शारीरिक सुयोग्यता व पुष्टि को प्रभावित करने वाले कारक बताएँ। शारीरिक सुयोग्यता व पुष्टि में इनका क्या योगदान है?
अथवा
शारीरिक पुष्टि को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता को प्रभावित करने वाले कारक या तत्त्व निम्नलिखित हैं
1. आयु (Age):
आयु शारीरिक पुष्टि व सुयोग्यता पर सबसे अधिक प्रभाव डालती है। जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है वैसे-वैसे उसकी शारीरिक क्रियाएँ कम हो जाती हैं जिसके कारण उसको कई प्रकार की बीमारियाँ घेर लेती हैं। शारीरिक क्रियाएँ कम होने से व्यक्ति की शारीरिक योग्यता प्रभावित होती है। जो व्यक्ति अपनी शारीरिक क्रियाओं को जारी रखते हैं वे स्वस्थ रहते हैं और उन पर बुढ़ापे के चिह्न कम नजर आते हैं। बच्चों की शारीरिक योग्यता पर कभी भी बड़ी आयु की शारीरिक योग्यताओं के व्यायाम नहीं थोपने चाहिएँ। प्रशिक्षण कार्यक्रम आयु-वर्गों के अनुसार ही तैयार करना चाहिए।

2.शारीरिक बनावट (Body Structure):
खिलाड़ियों का खेल के लिए चुनाव उनकी शारीरिक बनावट से किया जा सकता है। दौड़ों के लिए पतले शरीर का होना जरूरी है और फील्ड इवेंट्स में शरीर शक्तिशाली होना चाहिए। आजकल शारीरिक बनावट शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

3. लिंग-भेद (Gender Difference):
लिंग-भेद भी शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता को प्रभावित करता है। किशोरावस्था में लड़के-लड़कियों में शारीरिक विभिन्नताएँ आ जाती हैं; जैसे लड़कियों को माहवारी का आना, आवाज का मधुर होना आदि तथा लड़कों में दाड़ी-मूंछ आना, आवाज का भारी होना आदि। ये विभिन्नताएँ लड़के और लड़कियों की शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता को प्रभावित करती हैं। इन विभिन्नताओं के आधार पर ही दोनों वर्गों के लिए शारीरिक योग्यता के कार्यक्रम तैयार करने चाहिएँ।

4. अच्छा आसन (Good Posture):
अच्छे आसन वाला व्यक्ति जीवन में हर प्रकार से प्रशंसा का पात्र होता है। अच्छा आसन शारीरिक योग्यता को बढ़ाता है और व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुधारता है।

5. वातावरण (Environment):
शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता पर वातावरण का काफी प्रभाव पड़ता है। गर्मियों में शारीरिक योग्यता का कार्यक्रम सर्दियों के कार्यक्रम से अलग होना चाहिए। गर्मियों के मौसम में व्यायाम प्रात:काल अथवा सायंकाल करने चाहिएँ। गर्मियों में व्यायाम करते समय कपड़े खुले और हल्के पहनने चाहिएँ। सर्दियों के मौसम में शरीर को सर्दी से बचाकर रखना चाहिए।

6. उचित अनुकूलन (Proper Conditioning):
उचित अनुकूलन से शारीरिक पुष्टि व सुयोग्यता में वृद्धि होती है। अनुकूलन का शारीरिक योग्यता के साथ सीधा सम्पर्क है। यदि अनुकूलन बढ़ता है तो खेलकूद में भी कार्यकुशलता बढ़ती है। इसलिए खेलों में अनुकूलन एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

7. संतुलित एवं पौष्टिक आहार (Balanced and Nutritive Food):
संतुलित एवं पौष्टिक आहार से हमारी शारीरिक संरचना अच्छी रहती है। इससे न केवल खेलकूद के क्षेत्र में, बल्कि आम दैनिक जीवन में भी हमारी कार्यकुशलता एवं कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। संतुलित व पौष्टिक आहार से हमारा तात्पर्य उन पोषक तत्त्वों; जैसे वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, खनिज-लवणों, विटामिनों एवं जल आदि से है जो आहार में उचित मात्रा में उपस्थित होते हैं तथा शरीर का संतुलित विकास करते हैं। मोटापे के कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता में कमी आ जाती है। आजकल मोटापा एक गंभीर समस्या की भाँति फैल रहा है जिसको संतुलित आहार लेने से तथा उचित व्यायाम व आसन करने से नियंत्रित किया जा सकता है।

8. खेलकूद (Sports & Games):
खेलकूद शारीरिक पुष्टि के अंगों; जैसे शक्ति, गति, सहनशीलता, लचक और तालमेल संबंधी योग्यताओं को विकसित करके स्वस्थता की वृद्धि में अपना बहुमूल्य योगदान देते हैं । जब शारीरिक योग्यता से अंगों का विकास होता है तो व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ जाती है।

9. धूम्रपान न करना (No Smoking);
धूम्रपान फेफड़ों के लिए हानिकारक है। इससे हृदय की बीमारियाँ भी हो जाती हैं। उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) भी रहने लगता है। व्यक्ति की कार्यक्षमता धीरे-धीरे क्षीण हो जाती है। धूम्रपान करने से मुँह, गले व आहारनली में कैंसर हो जाता है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति कार्य को लंबी अवधि तक नहीं कर सकते। इसलिए शारीरिक पुष्टि व सुयोग्यता को बनाए रखने के लिए धूम्रपान नहीं करना चाहिए।

10. व्यायाम और प्रशिक्षण (Exercise and Training):
प्रात:काल और सायंकाल का समय व्यायाम और प्रशिक्षण के लिए बहुत लाभदायक होता है। प्रात:काल के व्यायाम शरीर को चुस्त और लचकदार बनाते हैं । सायंकाल के व्यायाम व्यक्ति को पूरे दिन के मानसिक तनाव और शारीरिक थकावट से छुटकारा दिलाते हैं। व्यायाम और प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाते समय अभ्यास सुविधाओं और गर्मी व सर्दी जैसे मौसम का ध्यान जरूर रखना चाहिए।

11. जिंदादिली व मनोरंजन (Joyfulness and Recreation):
शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता को बढ़ाने के लिए व्यक्ति को जिंदादिली व मनोरंजन के साथ जीना चाहिए। खेलकूद के द्वारा मनोरंजन व आमोद-प्रमोद भी होता है तथा व्यक्ति में जिंदादिली रहती है।

12. तनाव एवं दबाव (Tension and Stress):
अधिक तनाव व दबाव व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इस कारण उसे अनेक मानसिक बीमारियाँ भी हो सकती हैं। तनाव एवं दबाव के कारण व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता भी कम होती है। खेलकूद से तनाव व दबाव को कम किया जा सकता है।

13. अन्य कारक (Other Factors):
शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता को अन्य कारक; जैसे नशीले पदार्थ, रहन-सहन का स्तर, वंशानुक्रम तथा आराम आदि भी प्रभावित करते हैं।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

प्रश्न 4.
शारीरिक पुष्टि को बढ़ाने के लिए किन सिद्धांतों को अपनाना चाहिए?
अथवा
शारीरिक पुष्टि के विकास के प्रमुख सिद्धांत कौन-कौन से हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
शारीरिक पुष्टि के विकास की मुख्य विधियों या सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।
अथवा
आप शारीरिक पुष्टि का विकास कैसे करेंगे?
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि के विकास के प्रमुख सिद्धांत या विधियाँ निम्नलिखित हैं-
1. गर्माना (Warming up):
शरीर के लिए गर्माना आवश्यक है क्योंकि गर्माना खिलाड़ी को प्रशिक्षण के लिए तैयार करता है। गर्माने से काफी हद तक खेल चोटों से बचा जा सकता है। इसलिए प्रशिक्षण व खेल प्रतियोगिताओं से पहले गर्माने की प्रक्रिया की जाती है। गर्माना के आरंभ में धीमी गति से दौड़ना चाहिए। उसके बाद खिंचाव वाले व्यायाम करने चाहिएँ। गर्माना से नाड़ी की गति तथा शरीर का तापमान बढ़ जाता है।

2. नियमितता का सिद्धांत (Principle of Regularity):
शारीरिक पुष्टि के विकास हेतु पूरा कार्यक्रम नियमित रूप से करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन अभ्यास नहीं करता तो उसके शरीर का आकार ठीक नहीं होगा और उसकी शारीरिक पुष्टि में भी धीरे-धीरे कमी हो जाएगी। इसलिए शारीरिक पुष्टि के लिए व्यायाम नियमित रूप से करना अति आवश्यक है।

3. अतिभार का सिद्धांत (Principle of Overload):
शारीरिक पुष्टि के विकास के लिए अतिभार के सिद्धांत को अपनाना अति आवश्यक है। अतिभार के सिद्धांत को अपनाने के लिए लंबी दूरी के धावक धीरे-धीरे दूरी में बढ़ोतरी करते रहते हैं। अतिभार के लिए यह ध्यान रखना चाहिए कि जब तक अनुकूलन (Adaptation) न हो जाए, तब तक अतिभार नहीं करना चाहिए।

4. लिम्बरिंग या कूलिंग डाउन (Limbering or Cooling Down):
लिम्बरिंग या कूलिंग डाउन भी गर्माना की तरह ही शरीर के लिए आवश्यक क्रिया है। किसी भी प्रतियोगिता या प्रशिक्षण के बाद यह क्रिया करनी चाहिए।

5. उचित आराम (Proper Rest):
शारीरिक पुष्टि के कार्यक्रम के दौरान तथा बाद में उचित आराम लेना चाहिए। यदि ऐसा न किया जाए तो व्यक्ति की कार्यक्षमता में कमी हो सकती है। इसके साथ-साथ उसकी गति में भी कमी आना स्वाभाविक है। उचित आराम न लेने की अवस्था में व्यक्ति की योग्यता के कार्यक्रम में रुचि कम होने लगती है।

6. सामान्य से जटिल का सिद्धांत (Principle of Simple to Complex):
शारीरिक पुष्टि के विकास के लिए जो भी व्यायाम या क्रियाएँ करें वे सभी सामान्य से जटिल सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिएँ अर्थात् सबसे पहले सामान्य व्यायाम और बाद में कठिन या जटिल व्यायाम करने चाहिएँ।

7. प्रगतिशीलता का सिद्धांत (Principle of Progression):
शारीरिक पुष्टि के विकास के लिए प्रशिक्षण में प्रगतिशील सिद्धांत का पालन करना चाहिए। जब भार को जल्दी-जल्दी बढ़ाया जाता है तो इससे प्रगति की बजाय अवनति होने लगती है। इसलिए प्रगति करने हेतु भार को धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए, तभी शारीरिक पुष्टि का संतुलित विकास होगा।

8. विभिन्नता का सिद्धांत (Principle of Variety):
शारीरिक पुष्टि के विकास हेतु विभिन्नता के सिद्धांत को अपनाना चाहिए। व्यायाम में विभिन्नता होने से रुचि को अधिक बढ़ावा मिलता है और रुचि से किया गया कार्य शारीरिक पुष्टि में बहुत महत्त्वपूर्ण होता है।

प्रश्न 5.
शारीरिक पुष्टि के विकास के साधन कौन-कौन से हैं? वर्णन करें।
अथवा
शारीरिक योग्यता या पुष्टि के विकास की विभिन्न एरोबिक या वायवीय क्रियाओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
शारीरिक पुष्टि में एरोबिक गतिविधियाँ कैसे सहायक होती हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि को विकसित करने वाले साधन निम्नलिखित हैं- .
1.खेलकूद में भागीदारी (Participation in Games & Sports):
खेलों में भाग लेने का सबसे मुख्य लाभ शारीरिक पुष्टि को विकसित करना है। वास्तव में, शारीरिक पुष्टि के अनेक अंग होते हैं और प्रत्येक खेल में इनका अलग-अलग मात्रा में विकास होता है; जैसे ऐसे खेल, जिनमें निरंतर गतियाँ होती हैं; जैसे तैरना और दौड़ना। इनसे फेफड़ों और हृदय की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। दूसरे खेल; जैसे जिम्नास्टिक से लचक (Flexibility) में वृद्धि होती है। खेलकूद के क्षेत्र में शारीरिक पुष्टि को विकसित करने के लिए अनेक कारक होते हैं।

2. वजन/भार प्रशिक्षण (Weight Training):
वजन/भार प्रशिक्षण शारीरिक पुष्टि का महत्त्वपूर्ण साधन है। वजन या भार प्रशिक्षण से अभिप्राय उन व्यायामों या कसरतों से है जो हमारे शरीर की विशेष माँसपेशियों को मज़बूत एवं शक्तिशाली बनाती हैं। यह प्रशिक्षण BAR-BELLS की सहायता से किया जाता है। इससे शरीर के विभिन्न भागों का अनुकूलन होता है।

3. सर्किट या परिधि प्रशिक्षण (Circuit Training):
सर्किट प्रशिक्षण बहुत प्रभावशाली और लोकप्रिय व्यायाम है। यह प्राय: शक्ति तथा सहनशीलता बढ़ाने के लिए किए जाता है। सन् 1957 में मॉर्गन तथा एडम्सन ने सर्किट प्रशिक्षण का प्रारंभिक रूप से विकास किया। मॉर्गन व एडम्सन के अनुसार, “सर्किट प्रशिक्षण एक ऐसी विधि है जिसमें विभिन्न व्यायामों को यन्त्रों तथा बिना यन्त्रों के निश्चित मात्रा में किया जाता है।” सर्किट प्रशिक्षण एक प्रभावकारी ढंग से किया जाने वाला व्यायाम है, जो शक्ति तथा सहनशीलता जैसी योग्यताओं में वृद्धि करता है।

4. वायवीय/एरोबिक क्रियाएँ या गतिविधियाँ (Aerobic Activities):
शारीरिक पुष्टि के साधन के रूप में एरोबिक क्रियाएँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। शारीरिक पुष्टि के विकास की विभिन्न एरोबिक या वायवीय क्रियाएँ निम्नलिखित हैं
(1) जॉगिंग (Jogging):
जॉगिंग एक वायवीय क्रिया है। जॉगिंग से तात्पर्य है कि धीरे-धीरे या आराम से दौड़कर शरीर को गर्माना। जॉगिंग गर्माने का सबसे बढ़िया ढंग है। इससे शरीर की सभी प्रणालियाँ अच्छे ढंग से काम करना शुरू कर देती हैं।

(2) साइकलिंग (Cycling):
साइकलिंग वायवीय तथा अवायवीय क्रिया है। इससे हृदय और फेफड़ों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। शक्ति, सहनशीलता के लिए भी साइकलिंग करना महत्त्वपूर्ण है। इसका अभ्यास यदि प्रतिदिन नियमित रूप से किया जाए तो शारीरिक पुष्टि का विकास भली-भाँति किया जा सकता है।

(3) कैलिसथैनिक्स (Calisthanics):
शारीरिक पुष्टि के विकास के लिए कैलिसथैनिक्स का प्रयोग भी किया जाता है। हालांकि कैलिसथैनिक्स के द्वारा केवल सामान्य योग्यता का विकास ही संभव है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी के लिए कैलिसथैनिक्स सामान्य आधारशिला का कार्य करती है। इससे माँसपेशियों का व्यायाम होता है जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य, शक्ति, सौंदर्य में वृद्धि करना होता है। वास्तव में, कैलिसथैनिक्स एक प्रकार का स्वतंत्र व्यायाम है; जैसे Pull-ups, Push-ups और Chin-ups आदि। कैलिसथैनिक व्यायाम माँसपेशियों के तापमान और रक्त प्रवाह में वृद्धि करता है। यह शरीर में लचक को विकसित करता है।

(4)लयबद्ध व्यायाम (Rhythmic Exercises):
इस प्रकार के व्यायाम लय के साथ किए जाते हैं; जैसे लेजियम, डम्बल, जिम्नास्टिक में ग्राउंड फ्लोर व्यायाम और लोकनृत्य आदि। इस प्रकार के लयबद्ध व्यायामों से भी शारीरिक पुष्टि का विकास होता है। ऐसे व्यायामों से थोड़ी-बहुत सहनशीलता का विकास भी होता है। इसके अतिरिक्त लचक तथा तालमेल संबंधी योग्यताओं का विकास भी होता है। लयबद्ध या तालबद्ध व्यायाम के कुछ उदाहरण हैं-आगे मुड़ना, पीछे मुड़ना, एक ही स्थान पर दौड़ना, चिट-अप, स्टेप-अप, बराबर में मुड़ना आदि।

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प्रश्न 6.
परिधि या सर्किट प्रशिक्षण विधि का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
अथवा
परिधि प्रशिक्षण विधि क्या है? इसके लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
सर्किट प्रशिक्षण क्या है? इसकी विशेषताओं तथा लाभों का वर्णन कीजिए।
अथवा
सर्किट प्रशिक्षण विधि का संक्षिप्त ब्योरा दीजिए। इसके क्या लाभ हैं?
अथवा
शारीरिक योग्यता के विकास के लिए सर्किट प्रशिक्षण का ब्योरा दीजिए। इसके लाभों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सर्किट या परिधि प्रशिक्षण विधि का अर्थ (Meaning of Circuit Training Method):
सन् 1957 में मॉर्गन तथा एडम्सन ने सर्किट (परिधि) प्रशिक्षण का प्रारंभिक रूप से विकास किया। मॉर्गन तथा एडम्सन (Morgan and Adamson) के अनुसार, “सर्किट प्रशिक्षण विधि एक ऐसी विधि है जिसमें विभिन्न व्यायामों को यन्त्रों तथा बिना यन्त्रों के निश्चित मात्रा में किया जाता है।” सन् 1979 में स्कोलिक ने सर्किट प्रशिक्षण के लिए नए-नए व्यायामों की जानकारी दी। सर्किट प्रशिक्षण में लगभग 10 से 15 तक व्यायाम चुने जाते हैं। इन व्यायामों को इस ढंग से चुना जाता है ताकि इनका प्रभाव प्रदर्शन पर प्रभावशाली ढंग से पड़े। प्रायः व्यायामों को एक क्रम में रखा जाता है ताकि भिन्न-भिन्न मांसपेशियों के समूह को चक्र में पूरा व्यायाम मिल सके। सर्किट प्रशिक्षण नई तकनीक सिखाने में बहुत सहायक होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सर्किट प्रशिक्षण एक प्रभावकारी ढंग से किए जाने वाला व्यायाम है, जो शक्ति तथा सहनशीलता जैसी योग्यताओं में वृद्धि करता है।

सर्किट या परिधि प्रशिक्षण की विशेषताएँ या लक्षण (Features of Circuit Training):
सर्किट प्रशिक्षण की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) इस विधि में व्यायाम सीखना आसान होता है तथा उसको लागू करना भी आसान होता है।
(2) इसमें व्यायाम मध्यम अवरोध तथा मध्यम भार के साथ किए जाते हैं।
(3) इसमें संख्या की अधिक पुनरावृत्ति होती है।
(4) इसका लक्ष्य सहनशीलता व शक्ति को बढ़ावा देना है।
(5) इसमें शरीर के सभी अंगों के व्यायाम शामिल होते हैं।
(6) इसमें खिलाड़ियों को तैयारी के समय मूल सहनशीलता व शक्ति बढ़ाने का अवसर प्राप्त होता है।
(7) इसमें व्यायाम का दबाव धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है।

सर्किट प्रशिक्षण के लाभ (Advantages of Circuit Training):
सर्किट प्रशिक्षण के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) इस विधि से एक ही समय में बहुत से खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
(2) यह विधि सीखने में बहुत सरल एवं रुचिकर है। कोई भी खिलाड़ी अपने-आप प्रशिक्षण ले सकता है।
(3) इस विधि को खिलाड़ी की योग्यता के अनुसार आसानी से घटाया-बढ़ाया जा सकता है।
(4) इस विधि द्वारा शक्ति, क्षमता एवं सहनशीलता का विकास होता है।
(5) इस विधि द्वारा समय की बचत होती है, क्योंकि इसमें विभिन्न व्यायामों को करने के लिए अधिक समय नहीं लगता।
(6) इस विधि से शरीर के सभी अंगों या भागों का व्यायाम हो सकता है।

प्रश्न 7.
भार प्रशिक्षण विधि (Weight Training Method) का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
अथवा
वज़न प्रशिक्षण से क्या अभिप्राय है? इससे होने वाले लाभों का वर्णन करें।
अथवा
भार प्रशिक्षण विधि क्या है? खिलाड़ियों के लिए इसके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भार प्रशिक्षण विधि का अर्थ (Meaning of Weight Training Method):
भार प्रशिक्षण विधि से हमारा अभिप्राय उन व्यायामों या कसरतों से है जो हमारे शरीर की विशेष माँसपेशियों को मज़बूत एवं शक्तिशाली बनाती हैं। यह प्रशिक्षण BAR-BELLS की सहायता से किया जाता है। इससे शरीर के विभिन्न भागों के आकार में परिवर्तन होता है और विभिन्न भागों का अनुकूलन भी होता है। इसके माध्यम से शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति सामान्य होने की कोशिश करता है। इससे माँसपेशियाँ मजबूत बनती हैं, उनके आकार तथा शरीर के भार में भी परिवर्तन होता है। यह प्रशिक्षण शारीरिक पुष्टि को विकसित करता है।

भार प्रशिक्षण विधि में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-
(1) भार प्रशिक्षण के समय श्वास क्रिया साधारण रूप से कार्य करती हुई होनी चाहिए।
(2) भार प्रशिक्षण सप्ताह में दो या चार दिन से अधिक न करें।
(3) प्रशिक्षण के कार्यक्रम को पहले साधारण शारीरिक विकास से शुरू करें। फिर इवेंट प्रशिक्षण के अनुसार व्यायाम करें।
(4) भार प्रशिक्षण के पश्चात् कुछ देर आराम करना जरूरी है।
(5) भार प्रशिक्षण इस प्रकार किया जाए कि शरीर के प्रत्येक अंग की कसरत हो, विशेषतौर पर बाजुओं, टाँगों तथा कमर आदि की।

भार प्रशिक्षण विधि का महत्त्व अथवा लाभ (Advantages or Importance of Weight Training Method):
खिलाड़ियों के लिए भार प्रशिक्षण विधि का महत्त्व अथवा लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) भार प्रशिक्षण से शक्ति तथा लचक में वृद्धि होती है।
(2) भार प्रशिक्षण से माँसपेशियों के सिकुड़ने तथा फैलने में वृद्धि होती है।
(3) शरीर के सभी अंगों को शक्ति मिलने से शारीरिक शक्ति का विकास होता है।
(4) भार प्रशिक्षण द्वारा नाड़ी-माँसपेशियों के आपसी तालमेल में वृद्धि होती है।
(5) भार प्रशिक्षण से माँसपेशियाँ तथा हड्डियाँ मजबूत होती हैं।
(6) यह प्रशिक्षण न केवल शारीरिक कार्यक्षमता में वृद्धि करता है, बल्कि दैनिक जीवन की गतिविधियों को करने की क्षमता में भी सुधार करता है।
(7) यह वसा मुक्त शरीर द्रव्यमान को कम करता है। अगर हम अपनी दिनचर्या में भार प्रशिक्षण को नहीं जोड़ते हैं तो यह वसा में बदल जाएगा।
(8) यह संयोजी ऊतकों व मांसपेशियों की ताकत को बढ़ाता है। इससे गामक प्रदर्शन में सुधार होता है और चोट का जोखिम कम हो जाता है।

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प्रश्न 8.
लचीलापन क्या है? इसकी विभिन्न किस्में कौन-कौन-सी हैं? इसको कैसे बढ़ाया जा सकता है? अथवा लचक से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
लचीलापन/लचक का अर्थ (Meaning of Flexibility):
व्यक्ति के शरीर के जोड़ों की गति-क्षमता को लचक कहते हैं। अधिक लचक वाला व्यक्ति बिना किसी कष्ट के अधिक देर तक कार्य कर सकता है तथा उसका व्यक्तित्व भी अच्छा होता है। लचकदार शरीर वाले व्यक्ति जब कोई गतिविधि करते हैं तो उनकी माँसपेशियों में कम तनाव उत्पन्न होता है जिस कारण ऊर्जा या शक्ति की बचत होती है। आमतौर पर लचीलापन, कोमलता और गतिशीलता को एक-दूसरे के लिए प्रयोग किया जाता है, परंतु इनमें बहुत अंतर है। अतः लचीलापन वह योग्यता है, जिसमें प्रत्येक क्रिया अधिक विस्तार से बिना किसी रोक-टोक के की जाती है।

लचक/लचीलेपन की किस्में अथवा प्रकार (Types of Flexibility):
लचीलेपन की किस्में (प्रकार) निम्नलिखित हैं
1. सक्रिय लचीलापन (Active Flexibility):
सक्रिय लचीलेपन को खिलाड़ी बिना किसी बाहरी सहायता के स्वतंत्र रूप से माँसपेशियों की क्रियाशीलता द्वारा प्राप्त करता है। सक्रिय लचीलापन न केवल माँसपेशियों के सिकुड़ने, बल्कि जोड़ों की मांसपेशियों पर भी निर्भर करता है। अतः बिना किसी बाहरी सहायता से शरीर के जोड़ों का अधिक देर तक गति करना सक्रिय लचीलापन कहलाता है; जैसे खिंचाव वाला व्यायाम बिना किसी की सहायता से करना आदि। यह दो प्रकार का होता है
(1) गतिशील लचीलापन (Dynamic Flexibility): शरीर गति में होने के कारण जब अधिक विस्तार से क्रिया करता है, तो उसको गतिशील लचीलापन कहते हैं।
(2) स्थिर लचीलापन (Static Flexibility): जब कोई खिलाड़ी लेटा, बैठा या खड़ा हुआ किसी प्रकार की गतिविधि करता है, तो उसे स्थिर लचीलापन कहते हैं।

2. निष्क्रिय लचीलापन (Passive Flexibility):
निष्क्रिय लचीलेपन से तात्पर्य बाहरी सहायता द्वारा अधिक-से-अधिक विस्तार से क्रिया करने वाली योग्यता से है। निष्क्रिय लचीलापन अन्य सभी किस्मों का आधार है। यह बहुत अधिक माँसपेशियों के सिकुड़ने, जोड़ों (लिगामेंट्स) और हड्डियों की बनावट पर निर्भर करता है।

लचक बढ़ाने के ढंग/तरीके (Methods of Increasing Flexibility):
लचक बढ़ाने के बहुत-से ढंग है, जिनमें सक्रिय, निष्क्रिय स्टैटिक और कनट्रैक्ट-रिलैक्स व्यायाम आते हैं। अतः लचक को बढ़ाने के तरीके निम्नलिखित हैं-
(1) सक्रिय ढंग में तेज और धीमी किस्म की मूवमैंट करनी चाहिएँ।
(2) निष्क्रिय ढंग में माँसपेशियों को ठीक स्थिति में रखने के लिए फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा व्यायाम करवाए जाते हैं। ये क्रियाएँ अपने-आप भी की जा सकती हैं अथवा किसी की सहायता से भी की जा सकती हैं।
(3) स्टैटिक व्यायाम में माँसपेशियों को धीमे स्तर पर मोड़ना होता है ताकि बिना किसी तकलीफ के इसको 10 से 60 सेकिण्ड तक बढ़ाया जा सके।
(4) कनट्रैक्ट-रिलैक्स किस्म के व्यायाम नाड़ी तथा माँसपेशियों के तालमेल पर आधारित होते हैं । जब माँसपेशियाँ खिंचाव की स्थिति में होती हैं तो वे फिर 5 से 10 सेकिण्ड तक अपनी पहली स्थिति में आ जाती हैं।
(5) विभिन्न प्रकार के आसनों; जैसे चक्रासन, धनुरासन, हलासन आदि द्वारा लचक को बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न 9.
सहनशीलता से क्या अभिप्राय है? इसकी किस्मों तथा उपयोगिता या महत्ता का वर्णन करें।
अथवा
सहनक्षमता या सहनशीलता क्या है? इसके प्रकारों या भेदों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सहनशीलता या सहनक्षमता का अर्थ (Meaning of Endurance):
सहनशीलता या सहनक्षमता शक्ति की तरह एक महत्त्वपूर्ण योग्यता है। यह एक प्रतिरोध योग्यता है जो थकावट के विरुद्ध होती है। सामान्य शब्दों में, यह खिलाड़ी की वह योग्यता है, जिसके साथ खिलाड़ी बिना किसी थकावट के क्रिया करता है। वास्तव में, किसी गति या भार को अधिक समय तक अपने ऊपर स्थिर रखने की व्यक्ति के शरीर की संरचनात्मक क्षमता को उसकी सहनक्षमता कहा जाता है।

सहनशीलता की किस्में या भेद (Types of Endurance):
सहनशीलता की किस्में (भेद) निम्नलिखित हैं-
1. बुनियादी या मौलिक सहनशीलता (Basic Endurance):
बुनियादी सहनशीलता को एरोबिक सहनशीलता भी कहते हैं। यह वह क्षमता है, जो धीरे से मध्यम गति के साथ क्रिया करने से होने वाली थकावट पर नियंत्रण रखती है। इसके अंतर्गत जॉगिंग एवं साइकलिंग आदि,क्रियाएँ आती हैं।

2. साधारण सहनशीलता (General Endurance):
भिन्न-भिन्न प्रकार की क्रियाएँ चाहे वे वायवीय (एरोबिक) अथवा अवायवीय (अनएरोबिक) हों, इसके दौरान आई थकावट पर नियंत्रण करने वाली क्षमता को साधारण सहनशीलता कहते हैं । साधारण सहनशीलता और बुनियादी सहनशीलता में अंतर है। बुनियादी सहनशीलता एरोबिक व्यायामों पर आधारित होती है जबकि साधारण सहनशीलता एरोबिक और अनएरोबिक व्यायामों को बिना किसी थकावट के लंबे समय तक करने वाली योग्यता है।

3. विशेष सहनशीलता (Special Endurance):
विशेष खेलों में थकावट का प्रतिरोध करने वाली योग्यता को विशेष सहनशीलता कहते हैं। जिस तरह स्वाभाविक रूप से थकावट भिन्न-भिन्न खेलों में भिन्न-भिन्न होती है, उसी तरह सहनशीलता भी भिन्न-भिन्न खेलों में भिन्न-भिन्न होती है। इसको शक्ति सहनशीलता भी कहते हैं। इसका प्रयोग लम्बी दूरी की दौड़ों, तैराकी, मैराथन दौड़ तथा पोल वॉल्ट में काफी हद तक किया जाता है।

सहनशीलता की महत्ता या उपयोगिता (Importance or Utility of Endurance):
सहनशीलता प्रत्येक खेल में अच्छी कुशलता के लिए एक महत्त्वपूर्ण योग्यता है। हमारे लिए इसकी महत्ता निम्नलिखित प्रकार से है
(1) एक अच्छी सहनशीलता वाला खिलाड़ी अधिक प्रशिक्षण का भार सहन करके अपनी कुशलता बढ़ा सकता है।
(2) अच्छी सहनशीलता वाला खिलाड़ी प्रतियोगिता के समय चौकन्ना रहता है और पूरा ध्यान रखता है ताकि चोट से बचा जा सके।
(3) लंबे समय वाली खेलों में तकनीकी कार्यकुशलता सहनशीलता पर आधारित होती है।
(4) सहनशीलता खिलाड़ी को मुकाबले के दौरान सामान्य बनाए रखती है। सहनशीलता केवल खिलाड़ियों के लिए ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह सामान्य पुरुषों, स्त्रियों और नौजवानों के लिए भी आवश्यक है। कूपर और पीटर जैसे विद्वानों का विचार है कि सहनशीलता हृदय की बीमारियों और सामान्य स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है।
(5) सहनशीलता का सीधा संबंध व्यक्ति के शारीरिक संस्थानों से है। यदि सहनशीलता बढ़ती है तो विशेष रूप से श्वसन वरक्त प्रवाह संस्थानों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

प्रश्न 10.
गति से आप क्या समझते हैं? इसको कैसे सुधारा जाए?
उत्तर:
गति का अर्थ (Meaning of Speed):
गति या रफ्तार से अभिप्राय मनुष्य की उस योग्यता से है जो किसी भी स्थिति में कम-से-कम समय लेकर अपने कार्य को पूरा करती है। गति दूसरे शारीरिक योग्यता अंगों; जैसे शक्ति तथा सहनशीलता से भिन्न है। यह नाड़ी प्रणाली पर आधारित है। गति को साधारणतया लगभग 20 प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता, क्योंकि गति बहुत सारी बातों पर आधारित होती है। भिन्न-भिन्न खेलों में गति भिन्न-भिन्न किस्मों में देखने को मिलती है।

गति को कैसे सुधारा जाए? (How can speed be improved?):
गति को अग्रलिखित तरीकों से सुधारा जा सकता है-
1. अच्छी तकनीक (Good Technique):
गति को सुधारने के लिए अच्छी तथा बढ़िया तकनीक की आवश्यकता होती है। जिम्नास्टिक तथा मुक्केबाज़ से अपनी खेल का प्रदर्शन बढ़िया कर सकते हैं।

2. विस्फोटक ताकत (Explosive Strength):
प्रत्येक विस्फोटक गति के लिए विस्फोटक शक्ति का होना अति आवश्यक है। एक अच्छे बॉक्सर तथा जिम्नास्ट की गति को तभी सुधारा जा सकता है जब उसमें विस्फोटक शक्ति होगी।

3. मांसपेशियों की बनावट (Structure of Muscles):
शरीर की भिन्न-भिन्न माँसपेशियों में भिन्न-भिन्न फास्ट ट्विच फाइबर (Fast Twitch Fiber) तथा स्लो ट्विच फाइबर (Slow Twitch Fiber) होते हैं। ये फाइबर जन्मजात होते हैं जो गति की कुशलता को दर्शाते हैं।

4. तालमेल या समन्वय की योग्यता (Co-ordination Ability):
लगभग सभी खेलों; जैसे फुटबॉल, हॉकी, बॉक्सिंग, बास्केटबॉल आदि में शारीरिक अंगों के तालमेल की आवश्यकता होती है।

5. लचीलापन (Flexibility):
जब खिलाड़ी के प्रत्येक जोड़ पर अधिक गतिविधि हो तथा उसके जोड़ प्रत्येक दिशा की ओर अत्यधिक झुक जाए अथवा मुड़ जाए तो गति-प्रदर्शन बढ़िया होगा। अल्पायु की लड़कियों में बड़ी आयु के व्यक्तियों से अधिक लचीलापन होता है।

6. प्रतिक्रिया की योग्यता (Metalogic Power):
गति सुधारने में ऊर्जा उत्पन्न करने वाली प्रतिक्रियाएँ भी पर्याप्त तीव्रतापूर्वक होनी चाहिए। प्रतिक्रिया की योग्यता, स्पीड मूवमैंट आदि में सुधार करके गति बढ़ाई जा सकती है।

7. अन्य तरीके (Other Methods):
(1) गति को बढ़ाने के लिए शक्ति व सहनशीलता दोनों का तालमेल जरूरी है।
(2) गति को बढ़ाने के लिए लचक व विस्फोटक शक्ति को बढ़ाना चाहिए।
(3) अच्छी तरह से गर्म होना गति को बढ़ाने में सहायक होता है।

प्रश्न 11.
शक्ति से आपका क्या अभिप्राय है? शक्ति को विकसित करने या सुधारने वाली विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
शक्ति के विकास की विधियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
शक्ति से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकार क्या हैं?
उत्तर:
शक्ति का अर्थ (Meaning of Strength):
शक्ति या ताकत शारीरिक योग्यता का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। साधारण शक्ति से अभिप्राय उस शक्ति से है, जो भिन्न-भिन्न स्थितियों में प्रत्येक किस्म का प्रतिरोध करती है। यह कोई क्रिया अथवा मूवमैंट नहीं है। विशेष शक्ति वह क्षमता है, जो विशेष खेलों में आवश्यक है। यह एक ऐसी क्रिया और मूवमैंट है जो हमेशा तकनीकी कौशल और तालमेल वाले सामर्थ्य के साथ जुड़ी हुई है। अतः शक्ति हमारे शरीर की माँसपेशियों द्वारा उत्पन्न की गई वह ऊर्जा है जिसके द्वारा हम कुछ कार्य कर सकते हैं। इसको मापने के लिए पौंड या डाइन (Dynes) का प्रयोग किया जाता है। एक सामान्य व्यक्ति के जीवन में साधारण शक्ति व एक खिलाड़ी लिए विशेष शक्ति आवश्यक होती है। प्रत्येक खेल में मूवमैंट अवश्य होते हैं और इनमें अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्रयोग की जाती हैं।

शक्ति के प्रकार (Types of Strength):
शक्ति के दो प्रकार होते हैं-
(1) स्थिर शक्ति
(2) गतिशील शक्ति।

शक्ति को विकसित करने की विधियाँ (Methods of Improving Strength):
शक्ति को विकसित करने या बढ़ाने के लिए बहुत सारे तरीके हैं लेकिन शक्ति को बढ़ाने के लिए भार प्रशिक्षण (Weight Training) सबसे अच्छा तथा कारगर तरीका है। इसमें खिलाड़ी की माँसपेशियाँ प्रतिरोध के विरुद्ध कार्य करती हैं और ऐसा करने से माँसपेशियों की शक्ति में वृद्धि होती है। शक्ति को ।
सुधारने या बढ़ाने की विधियाँ या तरीके निम्नलिखित हैं
1. अधिकतम उत्सुकता विधि (High Intensity Method):
यह विधि अक्सर वजन उठाने तथा थ्रो करते समय प्रयोग में लाई जाती है। इस तरीके में शक्ति तथा प्रतिरोध वाले व्यायाम अधिक लाभप्रद होते हैं।

2. विस्फोटक विधि (Explosive Method):
इस विधि को जिम्नास्ट तथा जम्प करने वाले ज्यादा प्रयोग में लाते हैं। जब कोई खिलाड़ी तीव्र गति से किसी प्रतिरोध को रोकने का प्रयास करता है तो उसकी इस क्षमता को विस्फोटक शक्ति कहते हैं।

3. प्रतिक्रिया विधि (Reaction Method):
इस विधि के द्वारा अधिकतम शक्ति तथा विस्फोटक शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। इसमें पुली द्वारा व्यायाम, रेत के थैलों के साथ व्यायाम तथा विशेष प्रकार से बने औजार (Equipment) के साथ व्यायाम करवाए जाते हैं।

4. आइसोकाइनेटिक व्यायाम (Isokinetic Exercise):
इस प्रकार के व्यायाम तैराकी के द्वारा करवाए जाते हैं क्योंकि तैराकी द्वारा माँसपेशियों की सिकुड़न अधिक तेजी के साथ होती है। इस विधि में चोट आदि लगने का खतरा कम रहता है।

5. आइसोमीट्रिक व्यायाम (Isometric Exercise):
शक्ति को बढ़ाने का यह तरीका गतिशील ताकत की जगह स्थिर – ताकत को ज़्यादा बढ़ाता है। इस प्रकार के व्यायाम में कम समय तथा कम उपकरणों की आवश्यकता होती है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

प्रश्न 12.
खेलकूद में भागीदारी की महत्ता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
खेलों में भागीदारी (Participation in Games & Sports) का क्या महत्त्व है? वर्णन करें।
उत्तर:
खेलों में भागीदारी का महत्त्व निम्नलिखित है
1. सामाजिक अनुभव (Social Experience):
खेलों में भागीदारी व्यक्तिगत तौर पर अकेले खेल खेलकर संभव नहीं है। किसी खेल को संभव बनाने के लिए एक से अधिक खिलाड़ियों का होना जरूरी है। जैसे कि फुटबॉल की टीम जब कभी किसी मुकाबले या प्रशिक्षण में भाग लेती है तो इसमें अधिकतम 25 (11+11+1+ 2) व्यक्ति शामिल होते हैं। वे खेल के नियमों तथा कोच या रैफरी द्वारा निर्देशित आदेशों की पालना करते हैं। इससे हमें समाज के नियमों को सीखने का अनुभव प्राप्त होता है।

2. सामाजिक मूल्य (Social Values):
सामाजिक मूल्य मनुष्य की अंतर-प्रतिक्रियाओं के वे पक्ष हैं, जिनको समाज में प्रत्येक स्थिति में सुरक्षित और उत्साहित रखना चाहिए। प्रत्येक समाज के कुछ ऐसे मूल्य हैं, जो उसकी परंपरा की देन हैं। जीवन के यही गुण हमें उन्नति की सीमा तक पहुँचाने के लिए सहायक होते हैं। सामाजिक गुण जीवन के आदर्श और वास्तविक का मेल हैं। शिक्षा के उद्देश्य ही व्यक्ति में इन मूल्यों और गुणों की उत्पत्ति के कारण हैं। इसलिए वही अध्यापक बच्चों में सामाजिक गुण पैदा कर सकता है, जिसके अंदर सामाजिक गुण मौजूद हों। एक अच्छी खेल-भावना (Sportmanship) रखने वाला शारीरिक शिक्षा का अध्यापक ही बच्चों में खिलाड़ीपन के गुणों का विकास कर सकता है।

3. प्रतिस्पर्धा (Competition):
सभ्यता की उन्नति का दूसरा तथ्य प्रतिस्पर्धा (Competition) है। प्रतिस्पर्धा वह चैलेंज है जिसमें व्यक्ति अथवा समूह दूसरे व्यक्ति अथवा समूह से आगे निकलने का प्रयत्न करता है। प्रतिस्पर्धा की भावना से जीवन-स्तर ऊँचा होता है, व्यक्ति और समूह कार्यशील रहते हैं और समाज उन्नति के रास्ते पर चलता रहता है। प्रतिस्पर्धा सामाजिक जीवन का एक स्वाभाविक क्रम है। बर–ड रसल (Bertrand Russel) का विचार है, “प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों व्यक्ति की प्राकृतिक क्रियाएँ हैं और व्यक्ति को पछाड़े बिना मुकाबले को समाप्त नहीं किया जा सकता।”

4. सहयोग (Co-operation):
समाज में रहकर हमें एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करना पड़ता है। इसका कारण यह है कि कोई भी सामाजिक जीव अपने आप में पूर्ण नहीं है। यह बहुत सारी चीजें समाज को देता है और बहुत सारी चीजें अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए समाज से लेता है। परिवार, देश, समाज और सारा विश्व व्यक्तियों, समूहों, दलों, की आपसी सहयोग के कारण ही सुरक्षित है। आपसी सहयोग तभी संभव है जब व्यक्ति और समूह अपने आपको उसके लिए पेश करे। हमदर्दी, मित्रता, प्रेम, त्याग आदि ऐसे गुण हैं, जिन पर सहयोग की नींव रखी जाती है। शारीरिक शिक्षा क्षेत्र में सहयोग की भावना बहुत ही आवश्यक है। सामूहिक खेलों में तो सहयोग की भावना की ओर भी अधिक जरूरत है। हॉकी, फुटबॉल, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल आदि खेल खिलाड़ियों के आपसी सहयोग के साथ ही खेली और जीती जा सकती हैं। सहयोग तभी लाभदायक सिद्ध हो सकता है जब उसके पीछे कार्य की इच्छा और भावना अच्छी हो। खेल के मैदान में सहयोग की भावना तभी शक्तिशाली हो सकती है जब खिलाड़ियों को खेलों का उद्देश्य अच्छी तरह बताया जाए और उनको पूरे अनुशासन में रहकर उस उद्देश्य की पूर्ति करनी सिखाई जाए। इस तरह सहयोग की. भावना दृढ़ होगी और समूह और समाज अच्छी तरह कार्य करेंगे।

5. सामाजिक पहचान (Social Recognition):
पहचान प्राप्त करने की प्रवृत्ति बच्चे में जन्मजात होती है और वह इसी स्वार्थ के लिए बचपन में ही अन्य व्यक्तियों का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयत्न करता है। यह कई प्रकार की योग्यताओं और विशेष कारनामों का दिखावा करता है। यह प्रवृत्ति जीवन के अंतिम समय तक बनी रहती है। प्रतिस्पर्धा और सहयोग की भावना की नींव इसी मूल-प्रवृत्ति पर रखी जाती है। व्यक्ति अपनी पहचान और मान प्राप्त करने के लिए ही प्रतिस्पर्धा करता है। वह चाहता है कि समाज के अन्य सदस्य उसकी योग्यताओं और गुणों का लोहा मानें। प्रशंसा द्वारा उसमें प्रतिस्पर्धा शक्ति और सहयोग प्रवृत्ति और भी तेज होती है।

प्रश्न 13.
सुयोग्यता (Wellness) के प्रमुख अंगों या घटकों का वर्णन करें।
अथवा
सुयोग्यता के अवयव कौन-कौन से हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
सुयोग्यता के प्रमुख अंग या घटक अग्रलिखित हैं
1. सामाजिक सुयोग्यता (Social Wellness):
सामाजिक सुयोग्यता व्यक्ति के सामाजिक एवं नैतिक विचारों के आदान-प्रदान से संबंधित कौशलों को बढ़ाने पर बल देती है। इसको बढ़ाने व विकसित करने के लिए व्यक्ति को सकारात्मक या रचनात्मक क्रियाएँ करते रहना चाहिए। उसे अपने पड़ोसियों व मित्रों से मिलते-जुलते रहना चाहिए।

2. शारीरिक सुयोग्यता (Physical Wellness):
शारीरिक सुयोग्यता की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को विभिन्न शारीरिक क्रियाओं; जैसे जॉगिंग, तैराकी व खेलों में भाग लेना चाहिए। उसे स्वयं को स्वच्छ एवं शुद्ध वातावरण में रहने का प्रयास करना चाहिए और संतुलित एवं पौष्टिक भोजन करना चाहिए।

3. भावनात्मक सुयोग्यता (Emotional Wellness):
भावनात्मक या संवेगात्मक सुयोग्यता भी शारीरिक सुयोग्यता के प्रमुख अंगों में से एक है। इसको बढ़ाने के लिए व्यक्ति को अतिभार से दूर रहने, हास्य फ़िल्में देखने व मनोरंजनदायक क्रियाओं में व्यस्त रहने पर ध्यान देना चाहिए।

4. बौद्धिक सुयोग्यता (Intellectual Wellness):
बौद्धिक या मानसिक सुयोग्यता व्यक्ति की तर्कसंगत निर्णय करने की योग्यता होती है जो मानसिक सजगता, नए विचारों का खुलापन, अभिप्रेरणा, सृजनता व जिज्ञासा पर बल देती है। इसको विकसित करने के लिए व्यक्ति को अपने ज्ञान को विस्तृत करने व कौशल को बढ़ाने का निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।

5. आध्यात्मिक सुयोग्यता (Spiritual Wellness):
आध्यात्मिक सुयोग्यता आध्यात्मिक नवीनीकरण व आत्मिक शान्ति पर बल देती है। इसको विकसित करने के लिए व्यक्ति को स्वयं के प्रति सच्चा रहना चाहिए, अच्छे चरित्र का निर्माण करना चाहिए तथा सद्गुणों को विकसित करना चाहिए।

6. पोषण-संबंधी सुयोग्यता (Nutritional Wellness):
पोषण संबंधी सुयोग्यता संतुलित व स्वास्थ्यवर्द्धक आहार के माध्यम से अधिकतम ऊर्जा के स्तरों की प्राप्ति पर बल देती है। पोषण-संबंधी सुयोग्यता बढ़ाने के लिए व्यक्ति को भोजन में वसा कम लेनी चाहिए तथा ताजे फल तथा सब्जियों का अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए।

7. पर्यावरणीय सुयोग्यता (Environmental Wellness):\
पर्यावरणीय सुयोग्यता भी शारीरिक सुयोग्यता का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। पर्यावरणीय सुयोग्यता, पृथ्वी की दशा व इसके भौतिक पर्यावरण पर हमारी आदतों के प्रभावों के प्रति सजगता होती है। इसको बढ़ाने के लिए व्यक्ति को प्रदूषण की मात्रा को कम करने का प्रयास करना चाहिए।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
शारीरिक पुष्टि की महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि की महत्ता को निम्नलिखित तथ्यों से समझा जा सकता है-
(1) शारीरिक पुष्टि शरीर की विभिन्न प्रणालियों के कार्य करने की गति में सुधार करती है।
(2) यह शरीर के संस्थानों को सुचारु रूप से कार्य करने में सहायता करती है।
(3) यह मनुष्य को दीर्घायु बनाती है।
(4) यह रोग निवारक क्षमता को बढ़ाती है।
(5) यह शरीर के सुचारु विकास में सहायक होती है।
(6) यह मानसिक स्वास्थ्य तथा चेतना में सुधार लाती है।

प्रश्न 2.
जीवन में शारीरिक सुयोग्यता के लाभ बताएँ।
अथवा
शारीरिक सुयोग्यता का महत्त्व लिखें।
उत्तर:
शारीरिक सुयोग्यता के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) खुशहाल जीवन जीने के लिए शारीरिक सुयोग्यता बहुत महत्त्वपूर्ण है।
(2) शारीरिक सुयोग्यता मानसिक क्षमता में वृद्धि करती है।
(3) शारीरिक सुयोग्यता से कार्य की गुणवत्ता एवं क्षमता में भी वृद्धि होती है।
(4) शारीरिक सुयोग्यता से तनाव एवं दबाव को दूर रखने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 3.
शारीरिक सुयोग्यता व खेलों में भार प्रशिक्षण कैसे महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
शारीरिक सुयोग्यता व खेलों में भार प्रशिक्षण का बहुत महत्त्व है। भार प्रशिक्षण में खेल संबंधी उपकरण आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं। इस प्रशिक्षण द्वारा खिलाड़ी बहुत कम समय में अच्छे परिणाम दे सकते हैं। खिलाड़ियों के लिए सीखने हेतु यह विधि बहुत आसान है। खिलाड़ी स्वयं भी प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रशिक्षण के द्वारा शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम हो जाता है। इससे माँसपेशियाँ और हड्डियाँ मजबूत होती हैं। शरीर के सभी अंगों को शक्ति मिलने से शारीरिक सुयोग्यता का विकास होता है। इस प्रकार भार प्रशिक्षण शारीरिक सुयोग्यता व खेलों में बहुत महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 4.
सहनशीलता या सहनक्षमता के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रत्येक खेल में अच्छी कुशलता के लिए सहनशीलता बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। हमारे लिए इसका महत्त्व निम्नलिखित है-
(1) एक अच्छी सहनशीलता वाला खिलाड़ी अधिक प्रशिक्षण का भार सहन करके अपनी कुशलता बढ़ा सकता है।
(2) अच्छी सहनशीलता वाला खिलाड़ी प्रतियोगिता के समय सतर्क रहता है, ताकि चोट से बचा जा सके।
(3) लंबे समय वाली खेलों में तकनीकी कार्यकुशलता सहनशीलता पर आधारित होती है।
(4) यह खिलाड़ी की मुकाबले के दौरान संयम बनाए रखने में सहायक होती है।
(5) यह थकावट को रोकने में सहायक होती है। इसकी सहायता से खिलाड़ी अपनी थकान को दूर कर सकता है।

प्रश्न 5.
एरोबिक गतिविधियों के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एरोबिक गतिविधियाँ वे गतिविधियाँ हैं जिनको करने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इन गतिविधियों में कम तीव्रता तथा लंबी अवधि वाली गतिविधियाँ शामिल होती हैं जो लयात्मक होती हैं और शरीर को गति में लाती हैं। जॉगिंग, साइकलिंग, लयबद्ध व्यायाम एरोबिक गतिविधियों के उदाहरण हैं । एरोबिक गतिविधियाँ करने से शारीरिक फिटनेस बनी रहती है। इनसे हृदय और फेफड़ों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इनसे रक्त धमनियों में सुधार होता है। एरोबिक गतिविधियाँ करने से पेट ठीक रहता है और पाचन शक्ति बढ़ती है। इनसे भूख में वृद्धि होती है और शरीर में लचकता बढ़ती है। इन गतिविधियों के मनोवैज्ञानिक फायदे भी हैं। इस प्रकार एरोबिक गतिविधियों का बहुत महत्त्व है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

प्रश्न 6.
अनएरोबिक गतिविधियों के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अनएरोबिक गतिविधियाँ एरोबिक गतिविधियों के विपरीत होती हैं। अनएरोबिक गतिविधियों में हमारा शरीर कसरत के दौरान ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए ऑक्सीजन का उपयोग नहीं करता। इन क्रियाओं में ऊर्जा का स्रोत एडिनोसिन ट्राईफास्फेट होता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए अनएरोबिक गतिविधियाँ बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं। ये गतिविधियाँ शारीरिक पुष्टि के विकास एवं इसे बनाए रखने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण साधन हैं। संक्षेप में, अनएरोबिक गतिविधियों का महत्त्व निम्नलिखित है
(1) अनएरोबिक गतिविधियों के माध्यम से माँसपेश्यिाँ मजबूत बनती हैं और माँसपेशियाँ की कमजोरियाँ दूर होती हैं।
(2) ये गतिविधियाँ मोटापे को कम करती हैं।
(3) ये गतिविधियाँ अन्य गतिविधियों के लिए सहनशक्ति में सुधार करती हैं।
(4) ये हड्डी के नुकसान के प्रभावों को दूर करने में सहायक होती हैं और टूटी हुई हड्डियों या ऑस्टियोपोरोसिस के जोखिम को कम करती हैं।
(5) ये गतिविधियाँ मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी होती हैं।

प्रश्न 7.
शारीरिक पुष्टि के विकास में जॉगिंग का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि के विकास में जॉगिंग या धीमी गति की दौड़ की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। जॉगिंग दौड़ का एक ऐसा रूप है जिसमें व्यक्ति लगातार धीमी गति से दौड़ता है। इसका मुख्य उद्देश्य शारीरिक पुष्टि को बढ़ाना है। इससे शरीर पर वह तनाव उत्पन्न नहीं होता, जो तेज गति की दौड़ के कारण होता है।

जॉगिंग वार्मिंग-अप का सबसे बढ़िया तरीका हैं। इसके लिए किसी विशेष तैयारी की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसे प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है। पहले की अपेक्षा पिछले कुछ वर्षों में यह एरोबिक क्रिया काफी लोकप्रिय हुई है। यह उन व्यक्तियों के लिए भी सबसे अच्छी क्रिया है जो अपने शरीर के भार को कम करना चाहते हैं। इसके द्वारा शरीर की सभी प्रमुख माँसपेशियों का व्यायाम हो जाता है। इसको हृदय वाहिका प्रणाली (Cardio-Vascular System) विशेषकर हृदय की कोरोनरी धमनियों (CoronaryArteries) के रोगों से बचाव के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। यह हृदय व फेफड़ों की कार्य-कुशलता को बढ़ाने के लिए अत्यन्त लाभदायक है। समूह में जॉगिंग करने से उत्साह व मनोरंजन प्राप्त होता है। इससे तनाव व थकान महसूस भी नहीं होती। जॉगिंग लम्बी अवधि के लिए की जाती है। इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि कपड़े कुछ ढीले पहनने चाहिएँ और जूते हल्के व सॉफ्ट होने चाहिएँ। जॉगिंग क्रिया न केवल शारीरिक पुष्टि को बढ़ाती, बल्कि सुयोग्यता में भी वृद्धि करने में सहायक होती है।

प्रश्न 8.
जॉगिंग करने के चार लाभ बताइए।
अथवा
जॉगिंग के लाभदायक प्रभाव क्या हैं?
उत्तर:
जॉगिंग करने के लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) जॉगिंग शरीर की साँस लेने वाली क्रिया में सुधार करती है।
(2) जॉगिंग से शरीर के सभी अंगों का अभ्यास होता है।
(3) जॉगिंग करने से समय से पहले बुढ़ापा नहीं आता।
(4) जॉगिंग मोटापे को कम करती है।
(5) जॉगिंग से उच्च रक्तचाप की समस्या दूर होती है।

प्रश्न 9.
कैलिसथैनिक्स पर एक संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए।
अथवा
कैलिस्थैनिक्स का शारीरिक पुष्टि के विकास के साधन के रूप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि के विकास के लिए कैलिसथैनिक्स का प्रयोग भी किया जाता है। हालांकि कैलिसथैनिक्स के द्वारा केवल सामान्य योग्यता का विकास ही संभव है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी के लिए कैलिसथैनिक्स सामान्य आधारशिला का कार्य करती है। सैंचुरी शब्दकोश के अनुसार, “कैलिसथैनिक्स हल्की जिम्नास्टिक की तरह का व्यायाम होता है।” इससे मांसपेशियों का व्यायाम होता है जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य, शक्ति, सौंदर्य में वृद्धि करना होता है। वास्तव में, कैलिसथैनिक्स एक प्रकार का स्वतंत्र व्यायाम है; जैसे Pull-ups, Push-ups और Chin-ups आदि। कैलिसथैनिक व्यायाम माँसपेशियों के तापमान और रक्त प्रवाह में वृद्धि करता है। यह शरीर में लचक को विकसित करता है। कैलिसथैनिक व्यायाम में विभिन्न प्रकार के हल्के उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है, जिन्हें करने में कम शक्ति की आवश्यकता पड़ती है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

प्रश्न 10.
शारीरिक पुष्टि के विकास में खेलकूद की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
खेलों में भाग लेने का सबसे मुख्य लाभ शारीरिक पुष्टि को प्राप्त करना है। वास्तव में, शारीरिक पुष्टि के अनेक अंग होते हैं और खेलों में इनका अलग-अलग मात्रा में विकास होता है; जैसे ऐसे खेल, जिनमें निरंतर गतियाँ होती हैं; जैसे तैरना और दौड़ना। इनसे फेफड़ों और हृदय की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। दूसरे खेल; जैसे जिम्नास्टिक से लचक (Flexibility) में वृद्धि होती है। खेलकूद के क्षेत्र में शारीरिक पुष्टि को विकसित करने के लिए अनेक कारक होते हैं। प्रशिक्षण और अभ्यास की सघनता, नियमितता और कौन-सा खेल है जिसके लिए प्रशिक्षण लिया जा रहा है, ये सभी कारक महत्त्वपूर्ण हैं। खिलाड़ी के किसी खेल में खेलने की दिशा और उसकी निपुणता (Skill) का स्तर भी उसकी योग्यता पर प्रभाव डालता है। यदि वह आईस हॉकी में गोल-कीपर के रूप में खेलता है तो उसकी एरोबिक योग्यता विकसित नहीं होगी। दूसरी ओर बास्केटबॉल, फुटबॉल तथा वाटर-पोलो में एरोबिक योग्यता का विकास होता है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि खेलों में भाग लेने से शारीरिक पुष्टि विकसित होती है।

प्रश्न 11.
शारीरिक सुयोग्यता में साइकलिंग के कोई चार योगदान बताइए।
अथवा
साइकिल चलाने (Cycling) के चार लाभ बताइए।
उत्तर:
साइकलिंग एक अनएरोबिक व्यायाम है। इसका शारीरिक सुयोग्यता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। इसके लाभ अथवा शारीरिक सुयोग्यता में योगदान निम्नलिखित हैं
(1) साइकिल चलाने से शरीर की माँसपेशियों में सुधार होता है।
(2) इससे श्वास संस्थान की निपुणता में सुधार होता है।
(3) इससे सहनशीलता का विकास होता है।
(4) इससे हृदय व फेफड़ों की कार्यकुशलता में बढ़ोतरी होती है।
(5) इससे शरीर से वसा कम होती है और दिल के दौरे को सामान्य बनाती है।

प्रश्न 12.
भार प्रशिक्षण के महत्त्व का वर्णन कीजिए। अथवा
भार प्रशिक्षण के मुख्य लाभ बताएँ। उत्तर-भार प्रशिक्षण के लाभ अथवा महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हैं-
(1) भार प्रशिक्षण के द्वारा शरीर के वजन को घटाया व बढ़ाया जा सकता है।
(2) भार प्रशिक्षण से शक्ति तथा लचक में वृद्धि होती है।
(3) भार प्रशिक्षण के द्वारा माँसपेशियों के सिकुड़ने तथा फैलने में वृद्धि होती है।
(4) शरीर के सभी अंगों को शक्ति मिलने से शारीरिक शक्ति का विकास होता है।
(5) भार प्रशिक्षण द्वारा नाड़ी-संस्थान के आपसी तालमेल में वृद्धि होती है।
(6) भार प्रशिक्षण से माँसपेशियाँ तथा हडियाँ मजबूत होती हैं।

प्रश्न 13.
भार प्रशिक्षण के प्रमुख सिद्धांत लिखें।
अथवा
आप भार प्रशिक्षण किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
भार प्रशिक्षण में अधिक भार सिद्धांत का प्रयोग किया जाता है अर्थात् व्यायाम धीरे-धीरे अधिक भार बढ़ाकर किए जाते हैं। इसके प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं
(1) व्यायाम सरल से कठिन की ओर होने चाहिएँ।
(2) भार प्रशिक्षण से पहले झुकने तथा मुड़ने वाले व्यायाम करने चाहिएँ, ताकि शरीर में गर्मी आ जाए।
(3) भार प्रशिक्षण के समय श्वसन क्रिया सामान्य रहनी चाहिए।
(4) व्यायाम करते हुए बीच-बीच में आराम करना चाहिए।
(5) शरीर को शक्तिशाली बनाने के लिए अधिक भार उठाना चाहिए तथा क्षमता बढ़ाने के लिए हल्के भार का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 14.
सर्किट (परिधि) प्रशिक्षण का संक्षिप्त ब्यौरा दें।
उत्तर:
सर्किट/परिधि प्रशिक्षण बहुत प्रभावशाली और लोकप्रिय व्यायाम है। यह प्रायः शक्ति तथा सहनशीलता बढ़ाने के लिए किए जाता है। सन् 1957 में मॉर्गन तथा एडम्सन ने सर्किट प्रशिक्षण का प्रारंभिक रूप से विकास किया। मॉर्गन तथा एडम्सन के अनुसार, “सर्किट प्रशिक्षण एक ऐसी विधि है जिसमें विभिन्न व्यायामों को यन्त्रों तथा बिना यन्त्रों के निश्चित मात्रा में किया जाता है।” इसके पश्चात् इस प्रशिक्षण में बहुत अधिक परिवर्तन आए। सन् 1979 में स्कोलिक ने सर्किट प्रशिक्षण के लिए नए-नए व्यायामों की जानकारी दी। सर्किट प्रशिक्षण में लगभग 10 से 15 तक व्यायाम चुने जाते हैं। इन व्यायामों को इस ढंग से चुना जाता है ताकि इनका प्रभाव प्रदर्शन पर प्रभावशाली ढंग से पड़े। प्रायः व्यायामों को एक क्रम में रखा जाता है ताकि भिन्न-भिन्न मांसपेशियों के समूह को चक्र में पूरा व्यायाम मिल सके। सर्किट प्रशिक्षण नई तकनीक सिखाने में बहुत सहायक होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सर्किट प्रशिक्षण एक प्रभावकारी ढंग से किया जाने वाला व्यायाम है, जो शक्ति तथा सहनशीलता जैसी योग्यताओं में वृद्धि करता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

प्रश्न 15.
सर्किट प्रशिक्षण खेलों व शारीरिक सुयोग्यता में कैसे महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
सर्किट प्रशिक्षण का खेलों व शारीरिक सुयोग्यता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यह निम्नलिखित बातों/तथ्यों से स्पष्ट है
(1) सर्किट प्रशिक्षण से थोड़े स्थान पर ही अधिक व्यायाम संभव हैं।
(2) इस प्रशिक्षण से खिलाड़ी के प्रत्येक अंग की तैयारी हो जाती है।
(3) इस प्रशिक्षण द्वारा बहुत-से खिलाड़ी एक-साथ अभ्यास कर सकते हैं।
(4) इस प्रशिक्षण द्वारा शक्ति, क्षमता एवं सहनशीलता का विकास होता है अर्थात् यह शारीरिक पुष्टि व सुयोग्यता के सभी घटकों के विकास में सहायक होती है।
(5) यह प्रशिक्षण आसान एवं रुचिकर होता है और इसमें विभिन्न आसन होते हैं, जिस कारण खिलाड़ी उबता नहीं है।

प्रश्न 16.
सर्किट प्रशिक्षण की प्रमुख विधियों का वर्णन करें।
अथवा
आप सर्किट प्रशिक्षण किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
सर्किट प्रशिक्षण की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं-
1. लगातार विधि: सर्किट प्रशिक्षण विधि में अन्य विधियों से अधिक व्यायाम होते हैं। इसमें बिना किसी रुकावट के व्यायाम करने होते हैं, जब तक एक चक्र पूरा नहीं हो जाता। दो चक्रों के मध्य 3 से 5 मिनट की रुकावट की जा सकती है। इसमें यह बताना कि कितनी बार दोहराई होनी है, बहुत कठिन है, परंतु कोच अपने निर्णय के अनुसार व्यायामों की दोहराई की संख्या निश्चित कर सकता है।

2. अंतराल विधि: इसमें लगातार विधि से कम व्यायाम होते हैं। इसमें तीव्रता अधिक होती है तथा आयतन कम होता है। इस विधि में खिलाड़ी निश्चित समय में ही निश्चित व्यायाम करता है तथा फिर थोड़ा आराम करता है।

3. दोहराई विधि: यह विधि सर्किट प्रशिक्षण में कम प्रयोग की जाती है। इसमें पहली दोनों विधियों से कम संख्या में व्यायाम होते हैं।

प्रश्न 17.
सर्किट प्रशिक्षण की मुख्य विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
सर्किट प्रशिक्षण की मुख्य विशेषताएँ अग्रलिखित हैं
(1) इस विधि में व्यायाम सीखना आसान होता है तथा उसको लागू करना भी आसान होता है।
(2) इसमें व्यायाम मध्यम अवरोध तथा मध्यम भार के साथ किए जाते हैं।
(3) इसमें संख्या की अधिक पुनरावृत्ति होती है।
(4) इसका लक्ष्य सहनशीलता व शक्ति को बढ़ावा देना है।
(5) इसमें शरीर के सभी अंगों के व्यायाम शामिल होते हैं।
(6) इसमें खिलाड़ियों को तैयारी के समय मूल सहनशीलता व शक्ति बढ़ाने का अवसर प्राप्त होता है।
(7) इसमें व्यायाम का दबाव धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है।

प्रश्न 18.
परिधि प्रशिक्षण के लाभों का वर्णन कीजिए।
अथवा
सर्किट प्रशिक्षण के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
परिधि/परिधि प्रशिक्षण के लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) परिधि प्रशिक्षण में खेल संबंधी उपकरण आसानी से प्राप्त किए जाते हैं।
(2) यह प्रशिक्षण रुचिकर है और सीखने में बहुत आसान है।
(3) इसमें विभिन्न अभ्यासों या व्यायामों को करने के लिए अधिक समय की जरूरत नहीं पड़ती।
(4) इनमें एक ही समय में बहुत-से खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
(5) इसमें सीखने वालों की योग्यता के अनुसार प्रशिक्षण को घटाया-बढ़ाया जा सकता है।
(6) यह प्रशिक्षण पुष्टि व सुयोग्यता के सभी घटकों के विकास में सहायक होता है।

प्रश्न 19.
तालमेल संबंधी योग्यता का वर्णन कीजिए।
अथवा
तालबद्ध व्यायाम क्या होते हैं? उदाहरण दें।
अथवा
तालबद्ध व्यायामों का शारीरिक पुष्टि के विकास के साधन के रूप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक अंगों के आपस में मिलकर कार्य करने की शक्ति को तालमेल कहते हैं। मानवीय विकास शक्ति और वृद्धि के तालमेल के बिना नहीं हो सकता। तालमेल से शरीर का प्रत्येक अंग मिल-जुलकर कार्य करता है। जब मानवीय शरीर तालमेल से कार्य करता है तो मनुष्य के व्यक्तित्व में वृद्धि होती है। यदि मनुष्य के सारे अंग ठीक ढंग से कार्य करते हों, परंतु दिमाग कार्य न करता हो तो शरीर के बाकी सारे अंग बेकार हो जाते हैं। इसलिए दिमाग, शरीर और स्थिति तालमेल की माँग करते हैं। तालमेल के बिना शारीरिक पुष्टि विकसित नहीं हो सकती। लेजियम, लोक-नृत्य, जम्पिंग, पी०टी० कसरतें आदि तालबद्ध व्यायाम हैं। इनमें शरीर की तालबद्ध गतिविधियाँ होती हैं जो समूह में की जाती हैं। ये गतिविधियाँ हृदय की माँसपेशियों के लिए जरूरी होती हैं। इन व्यायामों से लचक एवं लय संबंधी योग्यताओं का विकास होता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
शारीरिक पुष्टि से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि/योग्यता का अर्थ बहुत व्यापक है, इसलिए इसे परिभाषित करना बहुत कठिन है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि यह हमें अपने शरीर को सही ढंग से रखने और अधिक देर तक मेहनत करने की क्षमता प्रदान करती है। डॉ० ए० के० उप्पल के अनुसार, “शारीरिक पुष्टि वह क्षमता है जिसके द्वारा शारीरिक क्रियाओं के विभिन्न रूपों को बिना थकावट के तर्कपूर्ण ढंग से किया जा सके। इसके अंतर्गत व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा नीरोगता के महत्त्वपूर्ण गुण सम्मिलित होते हैं।”

प्रश्न 2.
सुयोग्यता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सुयोग्यता एक ऐसी अवस्था है, जो हमारे दैनिक जीवन में प्रत्येक कार्य को प्रभावकारी ढंग से करने में सहायक होती है तथा शेष बची हुई शक्ति से हम खाली समय में मनोरंजन कर सकते हैं। सुयोग्यता व्यक्ति की वह क्षमता या योग्यता है जिसके द्वारा वह एक उत्तम एवं संतुलित जीवन व्यतीत करता है। इसमें मन, शरीर एवं आत्मा का संतुलन शामिल होता है। इसलिए यह शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की दशा या विशेषता होती है।

प्रश्न 3. शारीरिक योग्यता के क्या अवयव हैं?
उत्तर:
(1) गति, (2) शक्ति, (3) लचक, (4) सहनशीलता, (5) स्फूर्ति, (6) तालमेल, (7) समन्वय आदि।

प्रश्न 4.
शक्ति या ताकत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शक्ति हमारे शरीर की माँसपेशियों द्वारा उत्पन्न की गई वह ऊर्जा है जिसके द्वारा हम कुछ कार्य कर सकते हैं। शक्ति को मापने के लिए पौंड या डाइन का प्रयोग किया जाता है। यह मुख्यतः दो प्रकार की होती है:

स्थिर शक्ति
गतिशील शक्ति।

प्रश्न 5.
स्थिर शक्ति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्थिर शक्ति को ‘आइसोमीट्रिक शक्ति’ भी कहा जाता है। कुछ समय के लिए मनुष्य लगातार अपनी माँसपेशियों की अधिक-से-अधिक जितनी शक्ति लगा सकता है, वह उसकी स्थिर शक्ति कहलाती है। इस शक्ति को डायनेमोमीटर (Dynamometer) द्वारा मापा जाता है। प्रत्यक्ष रूप से इस प्रकार की शक्ति में कार्य होता हुआ दिखाई नहीं पड़ता।

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प्रश्न 6.
लचक का क्या अर्थ है?
उत्तर:
व्यक्ति के शरीर के जोड़ों की गतिक्षमता को लचक कहते हैं। अधिक लचक वाला व्यक्ति बिना किसी कष्ट के अधिक देर तक कार्य कर सकता है तथा उसका व्यक्तित्व भी अच्छा होता है। आमतौर पर लचीलापन, कोमलता और गतिशीलता को एक-दूसरे के लिए प्रयोग किया जाता है, परंतु इनमें बहुत अंतर है। अतः लचक वह योग्यता है, जिसमें प्रत्येक क्रिया अधिक विस्तार से बिना किसी रोक-टोक के की जाती है।

प्रश्न 7.
सक्रिय लचक क्या है?
उत्तर:
सक्रिय लचक को खिलाड़ी बिना किसी बाहरी सहायता के स्वतंत्र रूप से माँसपेशियों की क्रियाशीलता द्वारा प्राप्त करता है। सक्रिय लचक न केवल माँसपेशियों के सिकुड़ने, बल्कि जोड़ों की मांसपेशियों पर भी निर्भर करती है। अतः बिना किसी बाहरी सहायता से शरीर के जोड़ों का अधिक देर तक गति करना सक्रिय लचक कहलाता है; जैसे खिंचाव वाला व्यायाम बिना किसी की सहायता से करना आदि।

प्रश्न 8.
गतिशील लचक से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब शरीर गति में होने के कारण अधिक विस्तार से क्रिया करता है, तो उसको गतिशील लचक कहते हैं। लचक का यह रूप शरीर को अधिक श्रम और खेल प्रदर्शन के लिए तैयार करता है। इस प्रकार की लचक चोट के जोखिम को कम करती है।

प्रश्न 9.
निष्क्रिय लचक क्या है?
उत्तर:
निष्क्रिय लचक से तात्पर्य बाहरी सहायता से अधिक-से-अधिक विस्तार से क्रिया करने वाली योग्यता से है। निष्क्रिय लचक अन्य सभी किस्मों का आधार है। यह बहुत अधिक माँसपेशियों के सिकुड़ने, जोड़ों (लिगामेंट्स) और हड्डियों की बनावट पर निर्भर करती है।

प्रश्न 10.
सहनक्षमता/सहनशीलता का क्या अर्थ है?
अथवा
सहनशीलता के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
सहनशीलता या सहनक्षमता एक प्रतिरोध योग्यता है जो थकावट के विरुद्ध होती है। सामान्य शब्दों में, यह खिलाड़ी की वह योग्यता है, जिसके साथ खिलाड़ी बिना किसी थकावट के क्रिया करता है। वास्तव में, किसी गति या भार को अधिक समय तक अपने ऊपर स्थिर रखने की व्यक्ति के शरीर की संरचनात्मक क्षमता को उसकी सहनक्षमता या सहनशीलता कहा जाता है।

प्रश्न 11.
अनएरोबिक क्रियाएँ क्या होती हैं? उदाहरण दें।
उत्तर:
अनएरोबिक क्रियाएँ वे होती हैं जो ऑक्सीजन के बिना की जाती हैं। इन क्रियाओं से एडिनोसिन ट्राइफास्फेट जोकि माँसपेशियों के लिए ऊर्जा या शक्ति का साधन होता है ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में कार्बन-डाइऑक्साइड के प्रयोग द्वारा तैयार होता है। थ्रोइंग व जम्पिंग क्रियाएँ, वेट लिफ्टिंग, तैराकी आदि अनएरोबिक क्रियाओं के उदाहरण हैं।

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प्रश्न 12.
एरोबिक क्रियाएँ क्या होती हैं? उदाहरण दें।
उत्तर:
एरोबिक क्रियाएँ वे होती हैं जिनको करने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत होती है। जॉगिंग, साइकलिंग आदि एरोबिक क्रियाएँ हैं।

प्रश्न 13.
प्रतिक्रिया योग्यता क्या है?
उत्तर:
प्रतिक्रिया योग्यता द्वारा खिलाड़ी किसी संकेत को देखकर अथवा सुनकर पूर्ण तीव्रता से प्रक्रिया प्रारम्भ करता है। जैसे दौड़ के प्रारम्भ होने के समय बंदूक की आवाज़ से पूर्व केवल संकेत का आभास करके खिलाड़ी ब्लॉक में से बाहर आकर दौड़ता है।

प्रश्न 14.
अधिकतम शक्ति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अधिकतम शक्ति, शक्ति का एक महत्त्वपूर्ण रूप है। अधिकतम अवरोध के विरूद्ध कार्य करने की योग्यता अधिकतम शक्ति (Maximum Strength) कहलाती है।

प्रश्न 15.
आहार शारीरिक योग्यता को कैसे प्रभावित करता है? अथवा संतुलित आहार शारीरिक योग्यता को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर:
संतुलित आहार से हमारी शारीरिक संरचना अच्छी रहती है। इससे न केवल खेलकूद के क्षेत्र में, बल्कि आम दैनिक जीवन में भी हमारी कार्यकुशलता एवं कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। संतुलित व पौष्टिक आहार से हमारा तात्पर्य उन पोषक तत्त्वों; जैसे वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, खनिज-लवणों, विटामिनों एवं जल आदि से है जो आहार में उचित मात्रा में उपस्थित होते हैं तथा शरीर का संतुलित विकास करते हैं। मोटापे के कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता में कमी आ जाती है। आजकल मोटापा एक महामारी की भाँति फैल रहा है जिसको संतुलित आहार लेने से तथा उचित व्यायाम करने से नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रश्न 16.
शारीरिक पुष्टि (Physical Fitness) के विकास के सिद्धांतों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि के विकास के सिद्धांत निम्नलिखित हैं
(1) निरंतरता का सिद्धांत
(2) नियमितता का सिद्धांत
(3) अतिभार का सिद्धांत
(4) विभिन्नता का सिद्धांत
(5) प्रगतिशीलता का सिद्धांत
(6) गर्माना
(7) लिम्बरिंग डाउन आदि।

प्रश्न 17.
विस्फोटक शक्ति क्या है?
उत्तर:
विस्फोटक शक्ति खिलाड़ी का वह सामर्थ्य है जब वह तेज गति से प्रतिरोध पर काबू पाता है। यह शक्ति हमेशा डायनैमिक होती है तथा प्रत्येक क्षेत्र के लिए महत्त्वपूर्ण होती है। यह गति तथा शक्ति का सुमेल है। यह भिन्न-भिन्न खेलों में भिन्न-भिन्न किस्मों में पाई जाती है।

प्रश्न 18.
गति क्या है?
उत्तर:
गति व्यक्ति की वह योग्यता या क्षमता है जिसके द्वारा वह एक ही प्रकार की हलचल या हरकत को पुनः तेज गति से करता है अर्थात् शरीर के अंगों या संपूर्ण शरीर को अधिकतम वेग से घुमाने की क्षमता को गति कहते हैं।

प्रश्न 19.
व्यायाम शारीरिक योग्यता को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
व्यायाम शारीरिक योग्यता को बहुत प्रभावित करता है। प्रात:काल और सायंकाल का समय व्यायाम और प्रशिक्षण के लिए अति लाभदायक है। प्रात:काल के व्यायाम शरीर को चुस्त और लचकदार: बनाते हैं । सायंकाल के व्यायाम व्यक्ति को पूरे दिन के मानसिक तनाव और शारीरिक थकावट से छुटकारा दिलाते हैं। व्यायाम और प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाते समय अभ्यास सुविधाओं और गर्मी व सर्दी जैसे मौसम का ध्यान जरूर रखना चाहिए।

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प्रश्न 20.
जॉगिंग (Jogging) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जॉगिंग से तात्पर्य है कि धीरे-धीरे या आराम से दौड़कर शरीर को गर्माना। जॉगिंग गर्माने का सबसे बढ़िया ढंग है। इससे शरीर की सभी प्रणालियाँ अच्छे ढंग से काम करना शुरू कर देती हैं।

प्रश्न 21.
साइकलिंग (Cycling) से आपका क्या आशय है?
उत्तर:
साइकलिंग वायवीय तथा अवायवीय क्रिया है। इससे हृदय और फेफड़ों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। साइकलिंग का अभ्यास यदि प्रतिदिन नियमित रूप से किया जाए तो शारीरिक पुष्टि आसानी से विकसित की जा सकती है।

प्रश्न 22.
भार प्रशिक्षण क्या है?
उत्तर:
भार प्रशिक्षण विधि से हमारा अभिप्राय उन व्यायामों या कसरतों से है जो हमारे शरीर की विशेष माँसपेशियों को मज़बूत एवं शक्तिशाली बनाती हैं। यह प्रशिक्षण BAR-BELLS की सहायता से किया जाता है। इससे शरीर के विभिन्न भागों के आकार में परिवर्तन होता है और विभिन्न भागों का अनुकूलन भी होता है। इसके माध्यम से शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति सामान्य होने की कोशिश करता है। इससे माँसपेशियाँ मजबूत बनती हैं, उनके आकार तथा शरीर के भार में भी परिवर्तन होता है। यह प्रशिक्षण शारीरिक पुष्टि को विकसित करता है।

प्रश्न 23.
वज़न (भार) प्रशिक्षण के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) वज़न प्रशिक्षण से शक्ति तथा लचक में वृद्धि होती है।
(2) वज़न प्रशिक्षण से माँसपेशियों के सिकुड़ने तथा फैलने में वृद्धि होती है।

प्रश्न 24.
स्फूर्ति किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब खिलाड़ी अपने शरीर या शरीर के किसी हिस्से को हवा में तेजी के साथ और सही ढंग से उसकी दिशा को बदलता है तो उसको स्फूर्ति कहते हैं।

प्रश्न 25.
सुयोग्यता कार्यक्रम क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
सुयोग्यता कार्यक्रम व्यक्ति के आकार एवं आकृति में सुधार करने में सहायता करते हैं। ये व्यक्ति की कार्यक्षमता, उत्पादकता व गुणवत्ता में सुधार करने में सहायक होते हैं। इसलिए सुयोग्यता कार्यक्रम हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 26.
वंशानुक्रम से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वंशानुक्रम से अभिप्राय है-अपने पूर्वजों से प्राप्त होने वाले शारीरिक गुण। यह व्यक्ति की शारीरिक योग्यता को प्रभावित करता है। इसका मुख्य कारण व्यक्ति की शारीरिक संरचना होती है जोकि व्यक्ति के वंश से मिले गुणों द्वारा निर्धारित होती है।

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प्रश्न 27.
तालबद्ध व्यायाम क्या होते हैं?
उत्तर:
तालबद्ध व्यायाम में शरीर की तालबद्ध गतिविधियाँ होती हैं जो समूह में की जाती हैं। ये गतिविधियाँ हृदय की मांसपेशियों के लिए अच्छी होती हैं। इन व्यायामों से लचक एवं लय संबंधी योग्यताओं का विकास होता है। लेजियम, समूह नृत्य, पी०टी० कसरतें आदि तालबद्ध व्यायाम हैं।

प्रश्न 28.
शारीरिक योग्यता के विकास में अतिभार का सिद्धांत कैसे सहायक है?
उत्तर:
शारीरिक योग्यता के विकास के लिए अतिभार के सिद्धांत को अपनाना अति आवश्यक है। अतिभार के सिद्धांत को अपनाने के लिए लंबी दूरी के धावक धीरे-धीरे दूरी में बढ़ोतरी करते रहते हैं। अतिभार सघनता के द्वारा भी बढ़ाया जा सकता है। अतिभार के लिए यह ध्यान में रखना चाहिए कि जब तक अनुकूलन न हो जाए तब तक अतिभार नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 29.
मनोरंजनात्मक क्रियाएँ क्या होती हैं?
उत्तर:
मनोरंजनात्मक क्रियाएँ, वे क्रियाएँ होती हैं जो व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक ऊर्जा का पुनरुद्धार (Restoring) करने में सहायक होती है। इस पुनरुद्धार से व्यक्ति अपना दैनिक कार्य अधिक कुशलतापूर्वक करने के योग्य हो जाता है।

प्रश्न 30.
सर्किट प्रशिक्षण विधि को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
मॉर्गन तथा एडम्सन के अनुसार, “सर्किट प्रशिक्षण विधि एक ऐसी विधि है जिसमें विभिन्न व्यायामों को यन्त्रों तथा यन्त्रों के बिना निश्चित मात्रा में किया जाता है।”

प्रश्न 31.
सर्किट प्रशिक्षण विधि के मुख्य व्यायामों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(1) स्टैपिंग-अप ऑन ए बॉक्स
(2) पुश-अप
(3) सिट-अप
(4) जंपिंग ओवर द हर्डल्स
(5) गुड मॉर्निंग व्यायाम
(6) पुल-अप।

प्रश्न 32.
सर्किट प्रशिक्षण विधि के प्रमुख सिद्धांत बताएँ।
उत्तर:
(1) प्रशिक्षण स्टेशनों की संख्या बढ़ाना
(2) सर्किट दोहराई
(3) भार में वृद्धि करना
(4) आराम की अवधि को घटाना
(5) व्यायाम के समय को बढ़ाना।

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प्रश्न 33.
बुनियादी या मौलिक सहनशीलता क्या है?
उत्तर:
बुनियादी सहनशीलता को एरोबिक सहनशीलता भी कहते हैं। यह वह योग्यता है, जो धीरे से मध्यम गति के साथ क्रिया करने से होने वाली थकावट पर नियंत्रण रखती है। इसके अंतर्गत जॉगिंग एवं साइकलिंग आदि क्रियाएँ आती हैं।

प्रश्न 34.
सामान्य सहनशीलता क्या है?
उत्तर:
भिन्न-भिन्न प्रकार की क्रियाएँ चाहे वे वायवीय (एरोबिक) अथवा अवायवीय (अनएरोबिक) हों, इसके दौरान आई थकावट पर नियंत्रण करने वाली क्षमता को सामान्य सहनशीलता कहते हैं। यह एरोबिक और अनएरोबिक व्यायामों को बिना किसी थकावट के लंबे समय तक करने वाली योग्यता है।

प्रश्न 35.
विशेष सहनशीलता क्या है?
उत्तर:
विशेष खेलों में थकावट का प्रतिरोध करने वाली योग्यता को विशेष सहनशीलता कहते हैं। जिस तरह स्वाभाविक रूप से थकावट भिन्न-भिन्न खेलों में भिन्न-भिन्न होती है, उसी तरह सहनशीलता भी भिन्न-भिन्न खेलों में भिन्न-भिन्न होती है। इसको शक्ति सहनशीलता भी कहते हैं। इसका प्रयोग लम्बी दूरी की दौड़ों, तैराकी, मैराथन दौड़ तथा पोल वॉल्ट में काफी हद तक किया जाता है।

प्रश्न 36.
संतुलन योग्यता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शारीरिक प्रक्रियाओं के दौरान खिलाड़ी को अपना संतुलन बनाए रखना पड़ता है। ऐसा करते समय वह अपनी क्रिया प्रारम्भ रखता है। कई खेल-क्रियाएँ ऐसी होती हैं जोकि खिलाड़ी का संतुलन बिगाड़ने में भूमिका निभाती है लेकिन खिलाड़ी तत्काल ही स्वयं संतुलन उत्पन्न कर लेता है। यथा-जिम्नास्टिक की प्रक्रियाओं के समय खिलाड़ी का संतुलन बिगड़ जाता है लेकिन पाँवों पर खड़ा होने के समय वह स्वयं ही संतुलित हो जाता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

HBSE 12th Class Physical Education शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-I : एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
शक्ति कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
शक्ति दो प्रकार की होती है।

प्रश्न 2.
लचक कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
लचक दो प्रकार की होती है।

प्रश्न 3.
वाटरलू की प्रसिद्ध लड़ाई कहाँ जीती गई?
उत्तर:
वाटरलू की प्रसिद्ध लड़ाई ऐटन के खेल के मैदानों पर जीती गई।

प्रश्न 4.
अत्यधिक गर्मी में अभ्यास करने से क्या हो सकता है?
उत्तर:
अत्यधिक गर्मी में अभ्यास करने से हीटस्ट्रोक हो सकता है।

प्रश्न 5.
अत्यधिक सर्दी में अभ्यास करने से क्या हो सकता है?
उत्तर:
अत्यधिक सर्दी में अभ्यास करने से फ्रास्ट बाइट हो सकता है।

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प्रश्न 6.
किस विधि में शरीर के सभी अंगों का अभ्यास हो सकता है?
उत्तर:
सर्किट या परिधि प्रशिक्षण विधि में शरीर के सभी अंगों का अभ्यास हो सकता है।

प्रश्न 7.
सहनशीलता कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
सहनशीलता तीन प्रकार की होती है।

प्रश्न 8.
भार प्रशिक्षण को सर्वप्रथम किस राष्ट्र ने अपनाया था?
उत्तर:
भार प्रशिक्षण को सर्वप्रथम जर्मनी ने अपनाया था।

प्रश्न 9.
जिम्नास्टिक द्वारा किस शारीरिक पुष्टि के घटक में वृद्धि होती है?
उत्तर:
जिम्नास्टिक द्वारा लचक में वृद्धि होती है।

प्रश्न 10.
किस योग्यता में प्रत्येक क्रिया अधिक विस्तार से बिना रोक-टोक के की जाती है?
उत्तर:
लचक में प्रत्येक क्रिया अधिक विस्तार से बिना रोक-टोक के की जाती है।

प्रश्न 11.
स्थिर शक्ति का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर:
स्थिर शक्ति का दूसरा नाम आइसोमीट्रिक (Isometric) शक्ति या क्षमता है।

प्रश्न 12.
1980 के दशक से पूर्व शारीरिक पुष्टि के कितने तत्त्व या घटक समझे जाते थे?
उत्तर:
1980 के दशक से पूर्व शारीरिक पुष्टि के पाँच तत्त्व या घटक समझे जाते थे।

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प्रश्न 13.
1980 के बाद शारीरिक पुष्टि का कौन-सा घटक नहीं माना जाता?
उत्तर:
1980 के बाद शारीरिक पुष्टि का फूर्तीलापन या स्फूर्ति घटक नहीं माना जाता।

प्रश्न 14.
गति सर्वाधिक किस प्रणाली पर निर्भर करती है?
उत्तर:
गति सर्वाधिक माँसपेशी प्रणाली पर निर्भर करती है।

प्रश्न 15.
सहनशीलता को कैसे मापा जा सकता है?
उत्तर:
सहनशीलता को पुनरावृत्ति की संख्या द्वारा मापा जा सकता है।

प्रश्न 16.
अतिभार किसके द्वारा बढ़ाया जा सकता है?
उत्तर:
अतिभार सघनता द्वारा बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न 17.
वायवीय क्रियाओं में किस गैस का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
वायवीय क्रियाओं में ऑक्सीजन का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 18.
साइकलिंग कैसी क्रिया है?
उत्तर:
साइकलिंग एक वायवीय एवं अवायवीय क्रिया है।

प्रश्न 19.
किसी खिलाड़ी की स्फूर्ति को कैसे परखा जा सकता है?
उत्तर:
साइड स्टैप परीक्षण से खिलाड़ी की स्फूर्ति को परखा जा सकता है।

प्रश्न 20.
शारीरिक पुष्टि का कोई एक घटक बताएँ।
उत्तर:
सहनशीलता।

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प्रश्न 21.
थो करने के लिए किस प्रकार की शक्ति आवश्यक होती है?
उत्तर:
थ्रो करने के लिए विस्फोटक शक्ति आवश्यक होती है।

प्रश्न 22.
पेशीय रेशे कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
पेशीय रेशे दो प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 23.
स्थिर शक्ति को किस प्रकार नापा जाता है?
उत्तर:
स्थिर शक्ति को डायनेमोमीटर द्वारा नापा जाता है।

प्रश्न 24.
कैलिसथैनिक्स में किस प्रकार के उपकरणों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
कैलिसथैनिक्स में हल्के उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 25.
जिम्नास्टिक में ग्राउंड फ्लोर व्यायाम और लोकनृत्य किस प्रकार के व्यायाम हैं?
उत्तर:
जिम्नास्टिक में ग्राउंड फ्लोर व्यायाम और लोकनृत्य लयबद्ध या तालबद्ध व्यायाम हैं।

प्रश्न 26.
जॉगिंग करते समय किस तरह के कपड़े पहनने चाहिएँ?
उत्तर:
जॉगिंग करते समय ढीले कपड़े (Loose Clothes) पहनने चाहिएँ।

प्रश्न 27.
जॉगिंग के लिए सतह कैसी होनी चाहिए?
उत्तर:
जॉगिंग के लिए सतह समतल होनी चाहिए।

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प्रश्न 28.
शारीरिक पुष्टि को प्रभावित करने वाले कोई दो कारक बताएँ।
उत्तर:
1. पौष्टिक आहार
2. नियमित व्यायाम।

प्रश्न 29.
शारीरिक अंगों का विकास किससे होता है?
उत्तर:
नियमित व्यायाम गतिविधियों एवं संतुलित व पौष्टिक आहार से शारीरिक अंगों का विकास होता है।

प्रश्न 30.
क्या शारीरिक योग्यता से हमारा स्वास्थ्य ठीक रहता है?
उत्तर:
हाँ, शारीरिक योग्यता से हमारा स्वास्थ्य ठीक रहता है।

प्रश्न 31.
क्या जिम्नास्टिक से शारीरिक योग्यता में वृद्धि होती है?
उत्तर:
हाँ, जिम्नास्टिक से शारीरिक योग्यता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 32.
हमारे शरीर में शक्ति किससे पैदा होती है?
उत्तर:
हमारे शरीर में शक्ति माँसपेशियों से पैदा होती है।

प्रश्न 33.
एरोबिक क्रियाओं के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:
1. जॉगिंग
2. साइकलिंग।

प्रश्न 34.
अनएरोबिक क्रियाओं के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:
1. वेट-लिफ्टिग
2. थ्रोइंग इवेंट्स।

प्रश्न 35.
कैलिसथैनिक्स कैसी क्रिया है?
उत्तर:
कैलिसथैनिक्स एक स्वतंत्र वायवीय क्रिया है।

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प्रश्न 36.
शक्ति को किस इकाई से मापा जाता है?
उत्तर:
शक्ति को पौंड या डाइन इकाई से मापा जाता है।

प्रश्न 37.
भार प्रशिक्षण के प्रयोग का सुझाव कब और किसने दिया था?
उत्तर:
भार प्रशिक्षण के प्रयोग का सुझाव सन् 1812 में कैड्रिक बान ने दिया था।

प्रश्न 38.
जॉगिंग किस प्रकार की क्रिया है?
उत्तर:
जॉगिंग एक वायवीय क्रिया है।

प्रश्न 39.
कौन-सी शक्ति, गति एवं शक्ति की योग्यताओं का संयोग होती है?
उत्तर:
विस्फोटक शक्ति, गति एवं शक्ति की योग्यताओं का संयोग होती है।

प्रश्न 40.
सर्किट प्रशिक्षण विधि किस प्रणाली पर आधारित है?
उत्तर:
सर्किट प्रशिक्षण विधि जिम्नास्टिक प्रणाली पर आधारित है।

प्रश्न 41.
सर्किट प्रशिक्षण पर अनुसंधान सर्वप्रथम कहाँ किया गया?
उत्तर:
सर्किट प्रशिक्षण पर अनुसंधान सर्वप्रथम यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स, इंग्लैंड में किया गया।

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प्रश्न 42.
जोड़ों की गति-क्षमता को क्या कहते हैं?
उत्तर:
जोड़ों की गति-क्षमता को लचक कहते हैं।

प्रश्न 43.
शीर्षासन से कौन-सी योग्यता मिलती है?
उत्तर:
शीर्षासन से शारीरिक योग्यता मिलती है।

प्रश्न 44.
भार प्रशिक्षण कितनी उम्र में शुरू करना चाहिए?
उत्तर:
भार प्रशिक्षण लगभग 12 वर्ष की उम्र में शुरू करना चाहिए।

प्रश्न 45.
सर्किट/परिधि प्रशिक्षण विधि का प्रतिपादन किसने किया था?
उत्तर:
परिधि प्रशिक्षण विधि का प्रतिपादन मॉर्गन व एडम्सन ने किया था।

प्रश्न 46.
परिधि प्रशिक्षण विधि का प्रतिपादन किस सन में किया गया था?
उत्तर:
परिधि प्रशिक्षण विधि का प्रतिपादन मॉर्गन व एडम्सन द्वारा सन् 1957 में किया गया था।

प्रश्न 47.
गतिशील शक्ति किस प्रकार की शक्ति है?
उत्तर:
गतिशील शक्ति एक आइसोटोनिक शक्ति है।

प्रश्न 48.
खींचने (Pull-up) तथा धक्का लगाने (Push-up) में कौन-सी शक्ति का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
खींचने (Pull-up) तथा धक्का लगाने (Push-up) में गतिशील शक्ति का प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 49.
तालमेल क्या है?
उत्तर:
शारीरिक अंगों के आपस में मिलकर कार्य करने की शक्ति को तालमेल कहते हैं।

प्रश्न 50.
शो/फेंकने के लिए कौन-सी गति की आवश्यकता होती है?
अथवा
गोला फेंकने में किस प्रकार की शक्ति की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
गोला फेंकने में गतिशील शक्ति (Dynamic Strength) की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 51.
ऊँची कूद, ट्रिपल जम्प तथा पोल वॉल्ट में उतरते समय कौन-सी शक्ति प्रयोग होती है?
उत्तर:
ऊँची कूद, ट्रिपल जम्प तथा पोल वॉल्ट में उतरते समय अधिकतम शक्ति प्रयोग होती है।

प्रश्न 52.
“सहनशीलता थकावट को रोकने या विरोध करने की योग्यता है।” ये शब्द किसने कहे?
उत्तर:
ये शब्द हर्रे ने कहे।

प्रश्न 53.
वह कौन-सी शक्ति है जो हमेशा तकनीकी कौशल और तालमेल व सामर्थ्य के साथ जुड़ी है?
उत्तर:
साधारण शक्ति हमेशा तकनीकी कौशल और तालमेल व सामर्थ्य के साथ जुड़ी है।

प्रश्न 54.
शारीरिक पुष्टि का कौन-सा घटक एक प्रतिरोध योग्यता है जो थकावट के विरुद्ध होता है?
उत्तर:
सहनशीलता।

प्रश्न 55.
तैराकी में बैक स्ट्रोक सीखने के लिए शरीर में कौन-सा शारीरिक पुष्टि का घटक होना चाहिए?
उत्तर:
तैराकी में बैक स्ट्रोक सीखने के लिए शरीर में लचक होनी चाहिए।

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प्रश्न 56.
शारीरिक योग्यता के कौन-से अंग को आंतरिक बल (Stamina) भी कहा जाता है?
उत्तर:
सहनशीलता को।

प्रश्न 57.
साइकलिंग शारीरिक पुष्टि के किस अवयव के लिए महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
साइकलिंग शक्ति व सहनशीलता के लिए महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 58.
तैराकी तथा दौड़ों के द्वारा शरीर के किस अंग की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है?
उत्तर:
तैराकी तथा दौड़ों के द्वारा फेफड़ों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 59.
ऑक्सीजन की उपस्थिति में किया गया शारीरिक अभ्यास क्या कहलाता है?
उत्तर:
ऑक्सीजन की उपस्थिति में किया गया शारीरिक अभ्यास एरोबिक अभ्यास कहलाता है।

प्रश्न 60.
एक ही स्थिति में अधिक समय तक रहने की शक्ति को क्या कहते हैं?
उत्तर:
एक ही स्थिति में अधिक समय तक रहने की शक्ति को संतुलन कहते हैं।

प्रश्न 61.
जॉगिंग करने से शरीर के किस अंग की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है?
उत्तर:
जॉगिंग करने से हृदय और फेफड़ों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 62.
वजन प्रशिक्षण को सप्ताह में कितने दिन करना चाहिए?
उत्तर:
वजन प्रशिक्षण को सप्ताह में दो से चार दिन करना चाहिए।

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प्रश्न 63.
सर्किट प्रशिक्षण में कितने व्यायाम होते हैं?
उत्तर:
सर्किट प्रशिक्षण में 10 से 15 व्यायाम होते हैं।

प्रश्न 64.
परिधि प्रशिक्षण विधि में लगभग कितने स्टेशन होते हैं ?
उत्तर:
परिधि प्रशिक्षण विधि में लगभग 8 से 12 स्टेशन होते हैं।

प्रश्न 65.
खिलाड़ियों को जॉगिंग कैसी सतह पर करनी चाहिए?
उत्तर:
खिलाड़ियों को जॉगिंग समतल सतह वाले मैदान पर करनी चाहिए।

प्रश्न 66.
अत्यधिक गर्मी व आर्द्रता वाले मौसम में खिलाड़ी को अभ्यास करते हुए कैसे कपड़े पहनने चाहिए?
उत्तर:
अत्यधिक गर्मी व आर्द्रता वाले मौसम में खिलाड़ी को अभ्यास करते हुए सूती के हल्के कपड़े पहनने चाहिए।

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भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. अनएरोबिक योग्यता सहायक है
(A) क्षमता के विकास में
(B) शक्ति के विकास में
(C) दिमाग एवं माँसपेशीय विकास में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) दिमाग एवं माँसपेशीय विकास में

2. “शारीरिक पुष्टि किसी के जीने के ढंग के दबावों का सफल अनुकूलन है।” ये शब्द किसने कहे?
(A) मॉर्गन ने
(B) एडम्सन ने
(C) डॉ० क्रोल्स ने
(D) डॉ०ए०के० उप्पल ने
उत्तर:
(C) डॉ० क्रोल्स ने

3. व्यक्ति की ऐसी दक्षता या कुशलता जिसके द्वारा व्यक्ति संतुलित जीवन व्यतीत करता है, को क्या कहते हैं?
(A) कुशलता
(B) सामर्थ्य
(C) सुयोग्यता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सुयोग्यता

4. निम्नलिखित में से कौन-सी शारीरिक गतिविधि मानसिक लाभ का वर्णन करती है?
(A) शारीरिक गतिविधि शारीरिक बनावट को बढ़ाती है
(B) शारीरिक गतिविधि नियम की समझ का विकास करती है
(C) शारीरिक गतिविधि स्ट्रेस व तनाव को दूर करने में सहायक है
(D) शारीरिक गतिविधि दोस्ती का विकास करती है
उत्तर:
(C) शारीरिक गतिविधि स्ट्रेस व तनाव को दूर करने में सहायक है

5. निम्नलिखित में से शारीरिक पुष्टि के अंग हैं
(A) गति
(B) सहनशीलता
(C) शक्ति
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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6. गति का सीधा संबंध व्यक्ति के किस संस्थान से होता है?
(A) नाड़ी प्रणाली
(B) माँसपेशी प्रणाली
(C) पाचन प्रणाली
(D) श्वसन प्रणाली
उत्तर:
(B) माँसपेशी प्रणाली

7. नियमित व्यायाम करने से क्या किया जा सकता है?
(A) नियमितता बनाए रखी जा सकती है
(B) शरीर को स्थूल बनाया जा सकता है
(C) शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता बढ़ाई जा सकती है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता बढ़ाई जा सकती है

8. सुयोग्यता के आवश्यक अंग हैं
(A) सामाजिक सुयोग्यता
(B) शारीरिक सुयोग्यता
(C) बौद्धिक सुयोग्यता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

9. स्वास्थ्य संबंधित सुयोग्यता का उद्देश्य है
(A) शारीरिक सुयोग्यता का विकास करना
(B) पोषण संबंधी सुयोग्यता बढ़ाना
(C) सक्रिय व स्वस्थ जीवन-शैली का विकास करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

10. एरोबिक योग्यता का विकास होता है
(A) बास्केटबॉल खेलने से
(B) फुटबॉल खेलने से
(C) वाटर-पोलो खेलने से
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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11. शारीरिक पुष्टि को संतुलित बनाए रखने में सहायक है
(A) नियमित व्यायाम
(B) स्वच्छ वातावरण
(C) संतुलित व पौष्टिक भोजन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

12. शारीरिक पुष्टि का अर्थ है
(A) अच्छे शरीर का होना
(B) शरीर के सभी संस्थानों का सुचारु रूप से कार्य करना
(C) दैनिक कार्य करने की क्षमता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

13. शारीरिक पुष्टि का एक पहलू है
(A) शारीरिक सुयोग्यता
(B) शारीरिक शिक्षा
(C) शारीरिक क्रिया
(D) शारीरिक ढाँचा
उत्तर:
(A) शारीरिक सुयोग्यता

14. शारीरिक पुष्टि का एक घटक है
(A) माँसपेशीय शक्ति
(B) पोषण
(C) नींद
(D) दिखना
उत्तर:
(A) माँसपेशीय शक्ति

15. शारीरिक पुष्टि व्यक्ति की उम्र को ………..
(A) रोकती
(B) कम करती
(C) बढ़ाती
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) बढ़ाती

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16. शक्ति हमारे शरीर के किस अंग द्वारा पैदा होती है?
(A) फेफड़ों द्वारा
(B) माँसपेशियों द्वारा
(C) नाड़ियों द्वारा
(D) मस्तिष्क द्वारा
उत्तर:
(B) माँसपेशियों द्वारा

17. मनुष्य की वह योग्यता जो किसी भी स्थिति में कम-से-कम समय लेकर अपने कार्य को पूरा करती है, वह कहलाती है
(A) शक्ति
(B) स्फूर्ति
(C) गति
(D) सहनशीलता
उत्तर:
(C) गति

18. गति के विकास की विधियाँ हैं
(A) त्वरण दौड़ें
(B) पेस दौड़ें
(C) लिम्बरिंग डाउन
(D) (A) व (B) दोनों
उत्तर:
(D) (A) व (B) दोनों

19. गतिशील शक्ति किस प्रकार की शक्ति है?
(A) आइसोटोनिक
(B) आइसोकाइनेटिक
(C) आइसोमीट्रिक
(D) एरोबिक
उत्तर:
(A) आइसोटोनिक

20. खींचना (Pull-up) तथा धक्का लगाने (Push-up) में कौन-सी शक्ति का प्रयोग किया गया है?
(A) गतिशील शक्ति का
(B) स्थिर शक्ति का
(C) अधिकतम शक्ति का
(D) शक्ति सहनशीलता का
उत्तर:
(A) गतिशील शक्ति का

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21. सर्किट प्रशिक्षण विधि किस प्रणाली पर आधारित है?
(A) जिम्नास्टिक पर
(B) एथलेटिक्स पर
(C) स्पिंटस पर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) जिम्नास्टिक पर

22. शीर्षासन से कौन-सी योग्यता मिलती है?
(A) मानसिक योग्यता
(B) शारीरिक योग्यता
(C) सामाजिक योग्यता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) शारीरिक योग्यता

23. शक्ति के कितने प्रकार होते हैं?
(A) चार
(B) दो
(C) तीन
(D) पाँच
उत्तर:
(B) दो

24. स्थिर शक्ति को किस यन्त्र से मापा जाता है?
(A) थर्मामीटर
(B) लैक्टोमीटर
(C) डायनेमोमीटर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) डायनेमोमीटर

25. शरीर की शक्ति को नापा जा सकता है
(A) किलोग्राम में
(B) डाइन में
(C) मीटर में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) डाइन में

26. निम्नलिखित में से कौन-सा एक गतिशील शक्ति का भाग नहीं है?
(A) अधिकतम शक्ति
(B) शक्ति सहनक्षमता
(C) विस्फोटक शक्ति
(D) स्थिर शक्ति
उत्तर:
(D) स्थिर शक्ति

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27. लचक को बढ़ाने वाले आसन हैं
(A) चक्रासन व हलासन
(B) धनुरासन व भुजंगासन
(C) शलभासन व पश्चिमोत्तानासन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

28. ऊँची कूद, ट्रिपल जम्प तथा पोल वॉल्ट में उतरते समय कौन-सी शक्ति प्रयोग होती है?
(A) स्थिर शक्ति
(B) अधिकतम शक्ति
(C) विस्फोटक शक्ति
(D) शक्ति सहनशीलता
उत्तर:
(B) अधिकतम शक्ति

29. जैवलिन थ्रो तथा डिस्कस थ्रो में कौन-सी शक्ति प्रयोग होती है?
(A) विस्फोटक शक्ति
(B) अधिकतम शक्ति
(C) स्थिर शक्ति
(D) गतिशील शक्ति
उत्तर:
(A) विस्फोटक शक्ति

30. वह शक्ति जो भिन्न-भिन्न स्थितियों में तेज गति के साथ अवरोध पर काबू पाती है, कौन-सी शक्ति कहलाती है?
(A) साधारण शक्ति
(B) विस्फोटक शक्ति
(C) गतिशील शक्ति
(D) स्थिर शक्ति
उत्तर:
(B) विस्फोटक शक्ति

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31. वह कौन-सी शक्ति है जो हमेशा तकनीकी कौशल और तालमेल व सामर्थ्य के साथ जुड़ी है?
(A) साधारण शक्ति
(B) गतिशील शक्ति
(C) विशेष शक्ति
(D) विस्फोटक शक्ति
उत्तर:
(A) साधारण शक्ति

32. थकावट के विरुद्ध अवरोधक योग्यता कहलाती है
(A) गति
(B) शक्ति
(C) लचीलापन
(D) सहनशीलता
उत्तर:
(D) सहनशीलता

33. माँसपेशीय सहनशीलता विशेषतः एक
(A) शारीरिक थकावट को रोकने की क्षमता है
(B) सभी प्रकार के खिलाड़ियों की अर्जित विशेषता है
(C) जिम्नास्ट की मूलभूत सुयोग्यता का घटक है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) शारीरिक थकावट को रोकने की क्षमता है

34. जिम्नास्टिक द्वारा शारीरिक पुष्टि के किस घटक में वृद्धि होती है?
(A) लचक में
(B) गति में
(C) शक्ति में
(D) सहनशीलता में
उत्तर:
(A) लचक में

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35. स्वास्थ्य संबंधित सुयोग्यता के घटकों में से मुख्य घटक है
(A) गति
(B) शक्ति
(C) लचीलापन
(D) शारीरिक बनावट
उत्तर:
(D) शारीरिक बनावट

36. सर्किट प्रशिक्षण सर्वप्रथम किसके द्वारा शुरुआत, व्याख्यायित व अध्ययन किया गया?
(A) मॉर्गन व एडम्सन
(B) एच०क्लार्क व डी० क्लार्क
(C) स्कोलिक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) मॉर्गन व एडम्सन

37. सहनशीलता को कैसे मापा जा सकता है?
(A) अवधि द्वारा
(B) पुनरावृत्ति की संख्या द्वारा
(C) थर्मामीटर द्वारा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) पुनरावृत्ति की संख्या द्वारा

38. सहनशीलता की कितनी किस्में हैं?
(A) दो
(B) चार
(C) तीन
(D) पाँच
उत्तर:
(C) तीन

39. किस सहनशीलता के लिए जॉगिंग और साइकलिंग जैसी क्रियाएँ आवश्यक हैं?
(A) साधारण सहनशीलता
(B) विशेष सहनशीलता
(C) मौलिक सहनशीलता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) मौलिक सहनशीलता

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40. एरोबिक अथवा अनएरोबिक व्यायामों के दौरान आई थकावट पर नियंत्रण करने वाली क्षमता को क्या कहते हैं?
(A) मौलिक सहनशीलता
(B) साधारण सहनशीलता
(C) विशेष सहनशीलता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) साधारण सहनशीलता

41. तैराकी में बैक स्ट्रोक सीखने के लिए शरीर में कौन-सा शारीरिक पुष्टि का घटक होना चाहिए?
(A) स्फूर्ति
(B) लचक
(C) गति
(D) शक्ति
उत्तर:
(B) लचक

42. शारीरिक योग्यता के कौन-से अंग को आंतरिक बल (Stamina) भी कहा जाता है?
(A) सहनशीलता
(B) गति
(C) संतुलन
(D) तालमेल
उत्तर:
(A) सहनशीलता

43. पुनः दोहराना विधि सुधार में सहायक है
(A) तेजी योग्यता
(B) अधिकतम शक्ति
(C) विस्फोटक शक्ति
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

44. कैलिसथैनिक्स में किस प्रकार के उपकरणों का प्रयोग किया जाता है?
(A) भारी
(B) हल्के
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) हल्के

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45. साधारण शक्ति को बढ़ाया जा सकता है
(A) अंतराल प्रशिक्षण द्वारा
(B) फार्टलेक सिद्धांत द्वारा
(C) निरंतर प्रशिक्षण द्वारा
(D) सर्किट प्रशिक्षण द्वारा
उत्तर:
(D) सर्किट प्रशिक्षण द्वारा

46. स्फूर्ति में शरीर का कौन-सा अंग हिस्सा लेता है?
(A) माँसपेशियाँ
(B) त्वचा
(C) टाँगें
(D) पाँव
उत्तर:
(A) माँसपेशियाँ

47. प्रतिक्रिया व बढ़ना किस योग्यता के प्रकार हैं?
(A) लचीलापन
(B) फुर्ति
(C) सहनशीलता
(D) तेजी
उत्तर:
(D) तेजी

48. साइकलिंग शारीरिक पुष्टि के किस अवयव के लिए महत्त्वपूर्ण है?
(A) शक्ति
(B) गति
(C) लचक
(D) शक्ति व सहनशीलता
उत्तर:
(D) शक्ति व सहनशीलता

49. कौन-सा व्यायाम कार्बनिक शक्ति, शरीर के नियंत्रण तथा लचक को विकसित करता है?
(A) जॉगिंग
(B) साइकलिंग
(C) कैलिसथैनिक्स
(D) लयबद्ध व्यायाम
उत्तर:
(C) कैलिसथैनिक्स

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50. लेजियम, डम्बल, जिम्नास्टिक में ग्राउंड फ्लोर व्यायाम और लोक-नृत्य किस प्रकार के व्यायाम हैं?
(A) वायवीय
(B) अवायवीय
(C) लयबद्ध
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) लयबद्ध

51. तैराकी तथा दौड़ों के द्वारा शरीर के किस अंग की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है?
(A) दिमाग की
(B) जिगर की
(C) फेफड़ों की
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) फेफड़ों की

52. ऑक्सीजन की उपस्थिति में किया गया शारीरिक अभ्यास कहलाता है
(A) एरोबिक
(B) अनएरोबिक
(C) आइसोमीट्रिक
(D) आइसोकाइनेटिक
उत्तर:
(A) एरोबिक

53. शारीरिक अंगों के आपस में मिलकर कार्य करने की शक्ति को कहते हैं
(A) शक्ति
(B) लचीलापन
(C) तालमेल
(D) सहनशीलता
उत्तर:
(C) तालमेल

54. लय योग्यता, समायोजन की योग्यता, प्रतिक्रिया योग्यता और संतुलन की योग्यता किस प्रकार की क्रियाएँ हैं?
(A) शारीरिक क्रियाएँ
(B) मानसिक क्रियाएँ
(C) तालमेल संबंधी क्रियाएँ
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) तालमेल संबंधी क्रियाएँ

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55. एक ही स्थिति में अधिक समय तक रहने की शक्ति को क्या कहते हैं?
(A) संतुलन
(B) तालमेल
(C) स्फूर्ति
(D) सहनशीलता
उत्तर:
(A) संतुलन

56. सर्किट प्रशिक्षण का अनुसंधान कहाँ किया गया?
(A) कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी, कुरुक्षेत्र में
(B) ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, लंदन में
(C) कैंब्रिज यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड में
(D) यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स, इंग्लैंड में
उत्तर:
(D) यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स, इंग्लैंड में

57. ऐसी एक्टिविटी जो ऑक्सीजन की उपस्थिति में की जाती है, कहलाती है-
(A) अनएरोबिक
(B) एरोबिक
(C) एरोबिक व अनएरोबिक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) एरोबिक

58. वैज्ञानिक विधि से प्रशिक्षण प्राप्त करने की विधि है
(A) निरंतर प्रशिक्षण विधि
(B) सर्किट प्रशिक्षण विधि
(C) अंतराल प्रशिक्षण विधि
(D) वज़न प्रशिक्षण विधि
उत्तर:
(B) सर्किट प्रशिक्षण विधि

59. हमारी मांसपेशियाँ …………………… ऊतकों से बनी होती हैं।
(A) संयोजी
(B) धारीदार
(C) पेशीय
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) पेशीय

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

60. एरोबिक अभ्यास है
(A) कम अवधि का
(B) लम्बी अवधि का
(C) (A) व (B) दोनों
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) (A) व (B) दोनों

61. अतिभार (Overload) किसके द्वारा बढ़ाया जा सकता है?
(A) अधिक वजन उठाकर
(B) भरपेट भोजन खाकर
(C) सघनता द्वारा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सघनता द्वास

62. धीरे-धीरे या आराम से दौड़कर शरीर को गर्म करना क्या कहलाता है?
(A) जॉगिंग
(B) गर्माना
(C) अतिभार
(D) लिम्बरिंग डाउन
उत्तर:
(A) जॉगिंग

63. वायवीय प्रक्रिया में किस गैस का प्रयोग किया जाता है?
(A) नाइट्रोजन
(B) ऑक्सीजन
(C) कार्बन-डाइऑक्साइड
(D) ऑर्गन
उत्तर:
(B) ऑक्सीजन

64. जॉगिंग करने से शरीर के किस अंग की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है?
(A) हृदय की
(B) फेफड़ों की
(C) हृदय और फेफड़ों की
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) हृदय और फेफड़ों की

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

65. सर्किट ट्रेनिंग निम्नलिखित के विकास में एक प्रभावशाली विधि है
(A) गति
(B) लचीलापन
(C) ताकत क्षमता
(D) चपलता
उत्तर:
(C) ताकत क्षमता

66. भार प्रशिक्षण किस आयु-वर्ग में आरम्भ करना चाहिए?
(A) 11 वर्ष
(B) 12 वर्ष
(C) 13 वर्ष
(D) 14 वर्ष
उत्तर:
(B) 12 वर्ष

67. वजन प्रशिक्षण से सहज क्रियाएँ; जैसे माँसपेशियों के ……………… तथा ……………… में वृद्धि होती है।
(A) सिकुड़ने, फैलने
(B) फैलने, सिकुड़ने
(C) तीव्र, मंद
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) सिकुड़ने, फैलने

68. निम्नलिखित में से पुष्टि के विकास का साधन कौन-सा है?
(A) खेलकूद
(B) जॉगिंग
(C) तालबद्ध व्यायाम
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

69. परिधि प्रशिक्षण विधि का प्रतिपादन किसने किया था?
(A) मॉर्गन व स्टेनले
(B) मॉर्गन व एडम्सन
(C) हिल
(D) थॉम्पसन व डेवरिस
उत्तर:
(A) मॉर्गन व स्टेनले

भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. सर्किट प्रशिक्षण विधि ………………… पर आधारित है।
2. गति को साधारणतया लगभग ………………… तक बढ़ाया जा सकता है।
3. थ्रो फेंकने के लिए ………………… की आवश्यकता होती है।
4. शक्ति ………………… द्वारा पैदा होती है।
5. शरीर की शक्ति को ………………… में मापा जा सकता है।
6. व्यक्ति के शरीर के जोड़ों में गति-क्षमता को ……………….. कहते हैं।
7. ………………. प्रशिक्षण विधि में स्टेशन रखे जाते हैं।
8. एरोबिक्स ………………… वर्ष की उम्र के बाद नहीं करनी चाहिए।
9. विस्फोटक शक्ति गति और ……………… की योग्यताओं का मिश्रण है।
10. एक ही स्थिति में अधिक समय तक रहने की शक्ति को ………………… कहा जाता है।
11. अतिभार के सिद्धांत को निभाने के लिए लंबी दूरी के दौड़ाक धीरे-धीरे दूरी में ………………. करते हैं।
12. भार प्रशिक्षण को सर्वप्रथम ………………… ने अपनाया था।
13. एरोबिक्स में समय की अवधि ………………… होती है।
14. सभी तरह की खेलें ………………… पर आधारित होती हैं।
15. सक्रिय लचक ……………….. प्रकार की होती है।
उत्तर:
1. जिम्नास्टिक
2. 20 प्रतिशत
3. परिवर्तनशील गति
4. माँसपेशियों
5. पौंड या डाइन
6. लचक
7. सर्किट
8. 60
9. शक्ति
10. संतुलन
11. बढ़ोतरी
12. जर्मनी
13. लम्बी
14. विस्फोटक गति
15. दो।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता

शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता Summary

शारीरिक पुष्टि एवं सुयोग्यता परिचय
शारीरिक पुष्ट्रि(Physical Fitness):
आधुनिक युग में प्रत्येक मनुष्य अपनी शारीरिक पुष्टि बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील है। यह मनुष्य की वह शक्ति तथा कार्य करने की योग्यता है, जिसको वह बिना किसी बाधा के आसानी से थोड़ी-सी शक्ति का प्रयोग करके पूरा कर लेता है। शारीरिक पुष्टि का अर्थ बहुत व्यापक है, इसलिए इसे परिभाषित करना बहुत कठिन है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि यह हमें अपने शरीर को सही ढंग से रखने और अधिक देर तक मेहनत करने की क्षमता प्रदान करती है।

सुयोग्यता (Wellness):
सुयोग्यता एक ऐसी अवस्था है, जो हमारे दैनिक जीवन में प्रत्येक कार्य को प्रभावकारी ढंग से करने में सहायक होती है तथा शेष बची हुई शक्ति से हम खाली समय में मनोरंजन कर सकते हैं। यह क्रोध को सहन करने और तनाव को दूर करने में सहायक होती है। यह एक अच्छे स्वास्थ्य का चिह्न है। यह प्रत्येक मनुष्य में भिन्न-भिन्न होती है, क्योंकि इस पर पैतृक आदतों, व्यायाम, आयु तथा लिंग का प्रभाव पड़ता है। अतः सुयोग्यता व्यक्ति की वह क्षमता या योग्यता है जिसके द्वारा वह एक उत्तम एवं संतुलित जीवन व्यतीत करता है। इसमें मन, शरीर एवं आत्मा का संतुलन शामिल होता है। इसलिए यह शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की दशा या विशेषता होती है।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

HBSE 12th Class Physical Education स्वास्थ्य शिक्षा Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य क्या है? इसके महत्त्व या उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
स्वास्थ्य से क्या अभिप्राय है? हमारे जीवन में अच्छे स्वास्थ्य की क्या उपयोगिता है?
उत्तर:
स्वास्थ्य का अर्थ (Meaning of Health):
स्वास्थ्य से सभी परिचित हैं । सामान्यतया पारस्परिक व रूढ़िगत संदर्भ में स्वास्थ्य से अभिप्राय बीमारी की अनुपस्थिति से लगाया जाता है, परंतु यह स्वास्थ्य का विस्तृत अर्थ नहीं है। स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है, जिसमें वह मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसके सभी शारीरिक संस्थान व्यवस्थित रूप से सुचारू होते हैं। इसका अर्थ न केवल बीमारी अथवा शारीरिक कमजोरी की अनुपस्थिति है, अपितु शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना भी है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति का मन या आत्मा प्रसन्नचित्त और शरीर रोग-मुक्त रहता है।

स्वास्थ्य का महत्त्व या उपयोगिता (Importance or Utility of Health):
अच्छे स्वास्थ्य के बिना कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम नहीं कर सकता। अस्वस्थ व्यक्ति समाज की एक लाभदायक इकाई होते हुए भी बोझ-सा बन जाता है। एक प्रसिद्ध कहावत है-“स्वास्थ्य ही धन है।” यदि हम संपूर्ण रूप से स्वस्थ हैं तो हम जिंदगी में बहुत-सा धन कमा सकते हैं। अच्छे स्वास्थ्य का न केवल व्यक्ति को लाभ होता है, बल्कि जिस समाज या देश में वह रहता है, उस पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। साइरस (Syrus) के अनुसार, “अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ-दोनों जीवन के सबसे बड़े आशीर्वाद हैं।” इसलिए स्वास्थ्य का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है; जैसे
(1) स्वास्थ्य मानव व समाज का आधार स्तंभ है। यह वास्तव में खुशी, सफलता और आनंदमयी जीवन की कुंजी है।
(2) अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी होते हैं।
(3) स्वास्थ्य के महत्त्व के बारे में अरस्तू ने कहा-“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है।” इस कथन से भी हमारे जीवन में स्वास्थ्य की उपयोगिता व्यक्त हो जाती है।
(4) स्वास्थ्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुधारने व निखारने में सहायक होता है।
(5) स्वास्थ्य से हमारा जीवन संतुलित, आनंदमय एवं सुखमय रहता है।
(6) स्वास्थ्य हमारी जीवन-शैली को बदलने में हमारी सहायता करता है।
(7) किसी भी देश के नागरिकों के स्वास्थ्य व आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष संबंध पाया जाता है। यदि किसी देश के नागरिक शारीरिक रूप से स्वस्थ होंगे तो उस देश का आर्थिक विकास भी उचित दिशा में होगा।
(8) स्वास्थ्य से हमारी कार्यक्षमता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
(9) अच्छे स्वास्थ्य से हमारे शारीरिक अंगों की कार्य-प्रणाली सुचारू रूप से चलती है।

निष्कर्ष (Conclusion):
स्वास्थ्य एक गतिशील प्रक्रिया है जो हमारे शारीरिक संस्थानों को प्रभावित करती है और हमारी जीवन-शैली में आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण बदलाव करती है। अच्छा स्वास्थ्य रोगों से मुक्त होने के अतिरिक्त किसी व्यक्ति की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक खुशहाली एवं प्रसन्नता को व्यक्त करता है। यह हमेशा अच्छा महसूस करवाता है। वर्जिल के अनुसार, “सबसे बड़ाधन स्वास्थ्य है।” इस तरह हमारे जीवन में स्वास्थ्य बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। स्वास्थ्य की महत्ता बताते हुए महात्मा गाँधी ने कहा”स्वास्थ्य ही असली धन है न कि सोने एवं चाँदी के टुकड़े।” स्वास्थ्य ही हमारा असली धन है। जब हम इसे खो देते हैं तभी हमें इसका असली मूल्य पता चलता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य का क्या अर्थ है? इसके पहलुओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
स्वास्थ्य की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? इसके आयामों का वर्णन कीजिए।
अथवा
स्वास्थ्य का अर्थ एवं परिभाषा लिखें। इसके रूपों का भी वर्णन करें।
उत्तर:
स्वास्थ्य का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Health):
स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है, जिससे वह मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसके सभी शारीरिक संस्थान व्यवस्थित रूप से सुचारू होते हैं। इसका अर्थ न केवल बीमारी अथवा शारीरिक कमजोरी की अनुपस्थिति है, अपितु शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना भी है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति का मन या आत्मा प्रसन्नचित्त और शरीर रोग-मुक्त रहता है। विभिन्न विद्वानों ने स्वास्थ्य को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है-
1. जे०एफ० विलियम्स (J.F. Williams) के अनुसार, “स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएं प्रदान करता है।”
2. विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-W.H.O.) के अनुसार, “स्वास्थ्य केवल रोग या विकृति की अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुख की स्थिति को कहते हैं।”
3. वैबस्टर्स विश्वकोष (Webster’s Encyclopedia) के कथनानुसार, “उच्चतम जीवनयापन के लिए व्यक्तिगत, भावनात्मक और शारीरिक स्रोतों को संगठित करने की व्यक्ति की अवस्था को स्वास्थ्य कहते हैं।”
4. रोजर बेकन (Roger Bacon) के अनुसार, “स्वस्थ शरीर आत्मा का अतिथि-भवन और दुर्बल तथा रुग्ण शरीर आत्मा का कारागृह है।”
5. इमर्जन (Emerson) के अनुसार, “स्वास्थ्य प्रथम पूँजी है।”
संक्षेप में, स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है जिसमें वह मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसमें उसके शारीरिक अंग, आंतरिक तथा बाहरी रूप से अपने पर्यावरण से व्यवस्थित होते हैं।

स्वास्थ्य के विभिन्न पहलू या आयाम (Aspects or Dimensions of Health):
स्वास्थ्य एक गतिशील प्रक्रिया है जो हमारी जीवन-शैली को प्रभावित करता है। इसके विभिन्न आयाम या पहलू निम्नलिखित हैं-
1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health):
शारीरिक स्वास्थ्य संपूर्ण स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। इसके अंतर्गत हमें व्यक्तिगत स्वास्थ्य की जानकारी प्राप्त होती है। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि उसके सभी शारीरिक संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हों। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को न केवल शरीर के विभिन्न अंगों की रचना एवं उनके कार्यों की जानकारी होनी चाहिए, अपितु उनको स्वस्थ रखने की भी जानकारी होनी चाहिए। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समाज व देश के विकास एवं प्रगति में भी सहायक होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने शारीरिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाने हेतु संतुलित एवं पौष्टिक भोजन, व्यक्तिगत सफाई, नियमित व्यायाम व चिकित्सा जाँच और नशीले पदार्थों के निषेध आदि की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health):
मानसिक या बौद्धिक स्वास्थ्य के बिना सभी स्वास्थ्य अधूरे हैं, क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य का संबंध मन की प्रसन्नता व शांति से है अर्थात् इसका संबंध तनाव व दबाव मुक्ति से है। यदि व्यक्ति का मन चिंतित एवं अशांत रहेगा तो उसका कोई भी विकास पूर्ण नहीं होगा। आधुनिक युग में मानव जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि उसका जीवन निरंतर तनाव, दबाव व चिंताओं से घिरा रहता है। परन्तु जिन व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य उत्तम होता है वे आधुनिक संदर्भ में भी स्वयं को चिंतामुक्त अनुभव करते हैं। मानसिक स्वास्थ्य से व्यक्ति के बौद्धिक विकास और जीवन के अनुभवों को सीखने की क्षमता में वृद्धि होती है। लेकिन मानसिक अस्वस्थता के कारण न केवल मानसिक रोग हो जाते हैं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य भी गिर जाता है और शारीरिक कार्य-कुशलता में भी कमी आ जाती है। इसलिए व्यक्ति को अपने मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए तनाव व दबाव से दूर रहना चाहिए, उचित विश्राम करना चाहिए और सकारात्मक सोच रखनी चाहिए।

3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social Health):
सामाजिक स्वास्थ्य भी स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है । यह व्यक्ति की सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर करता है । यह व्यक्ति में संतोषजनक व्यक्तिगत संबंधों की क्षमता में वृद्धि करता है। व्यक्ति सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज के नियमों, मान-मर्यादाओं आदि का पालन करता है । यदि एक व्यक्ति अपने परिवार व समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत है तो उसे सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति कहा जाता है। सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति सैद्धांतिक, वैचारिक, आत्मनिर्भर व जागरूक होता है। वह अनेक सामाजिक गुणों; जैसे आत्म-संयम, धैर्य, बंधुत्व, आत्म-विश्वास आदि से पूर्ण होता है। समाज, देश, परिवार व जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण रचनात्मक व सकारात्मक होता है।

4. संवेगात्मक या भावनात्मक स्वास्थ्य (Emotional Health):
संवेगात्मक स्वास्थ्य में व्यक्ति के अपने संवेग; जैसे डर, गुस्सा, सुख, क्रोध, दुःख, प्यार आदि शामिल होते हैं। इसके अंतर्गत स्वस्थ व्यक्ति का अपने संवेगों पर पूर्ण नियंत्रण होता है। वह प्रत्येक परिस्थिति में नियंत्रित व्यवहार करता है। हार-जीत पर वह अपने संवेगों को नियंत्रित रखता है और अपने परिवार, मित्रों व अन्य व्यक्तियों से मिल-जुलकर रहता है। जिस व्यक्ति को अपने संवेगों पर नियंत्रण होता है वह बड़ी-से-बड़ी परिस्थितियों में भी स्वयं को संभाल सकता है और निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है।

5. आध्यात्मिक स्वास्थ्य (Spiritual Health):
आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति उसे कहा जाता है जो नैतिक नियमों का पालन करता हो, दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता हो, सत्य व न्याय में विश्वास रखने वाला हो और जो दूसरों को किसी भी प्रकार का कोई नुकसान न पहुँचाता हो आदि। ऐसा व्यक्ति व्यक्तिगत मूल्यों से संबंधित होता है। दूसरों के प्रति सहानुभूति एवं सहयोग की भावना रखना, सहायता करने की इच्छा आदि आध्यात्मिक स्वास्थ्य के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं । आध्यात्मिक स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु मुख्यत: योग व ध्यान सबसे उत्तम माध्यम हैं। इनके द्वारा आत्मिक शांति व आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 3.
स्वस्थ रहने के लिए व्यक्ति को किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए?
अथवा
अच्छे स्वास्थ्य हेतु हमें किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए?
उत्तर:
स्वस्थ रहने के लिए हमें निम्नलिखित आवश्यक नियम या सिद्धांत ध्यान में रखने चाहिएँ
1. शारीरिक संस्थानों या अगों का ज्ञान (Knowledge of Body System or Organs): हमें अपने शरीर के संस्थानों या अंगों; जैसे दिल, आमाशय, फेफड़े, तिल्ली, गुर्दे, कंकाल संस्थान, माँसपेशी संस्थान, उत्सर्जन संस्थान आदि का ज्ञान होना चाहिए।

2. डॉक्टरी जाँच (Medical Checkup): समय-समय पर अपने शरीर की डॉक्टरी जाँच करवानी चाहिए। इससे हम अपने स्वास्थ्य को बनाए रख सकते हैं। डॉक्टरी जाँच या चिकित्सा जाँच से हम समय पर अपने शारीरिक विकारों या बीमारियों को दूर कर सकते हैं।

3. निद्रा व विश्राम (Sleep and Rest): रात को समय पर सोना चाहिए और शरीर को पूरा विश्राम देना आवश्यक है।

4. व्यायाम (Exercises): प्रतिदिन व्यायाम या सैर आदि करनी आवश्यक है। हमें नियमित योग एवं आसन आदि भी करने चाहिएँ।

5. नाक द्वारा साँस लेना (Breathing by Nose): हमें हमेशा नाक द्वारा साँस लेनी चाहिए। नाक से साँस लेने से हमारे शरीर को शुद्ध हवा प्राप्त होती है, क्योंकि नाक के बाल हवा में उपस्थित धुल-कणों को शरीर के अंदर जाने से रोक लेते हैं।

6. साफ वस्त्र (Clean Cloth): हमें हमेशा साफ-सुथरे और ऋतु के अनुसार कपड़े पहनने चाहिएँ।

7. शुद्ध एवं स्वच्छ वातावरण (Pure and Clean Environment): हमें हमेशा शुद्ध एवं स्वच्छ वातावरण में रहना चाहिए।

8. संतुलित भोजन (Balanced Diet): हमें ताजा, पौष्टिक और संतुलित आहार खाना चाहिए।

9. शुद्ध आचरण (Good Conduct): हमेशा अपना आचरण व विचार शुद्ध व सकारात्मक रखने चाहिएँ और हमेशा खुश एवं संतुष्ट रहना चाहिए। कभी भी किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए। हमेशा बड़ों का आदर करना चाहिए।

10. मादक वस्तुओं से परहेज (Away from Intoxicants): मादक वस्तुओं का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसलिए हमें नशीली वस्तुओं से स्वयं को बचाना चाहिए। दूसरों को भी नशीली वस्तुओं के दुष्प्रभावों से अवगत करवाना चाहिए।

11. उचित मनोरंजन (Proper Recreation): आज के इस दबाव एवं तनाव-युक्त युग में स्वास्थ्य को बनाए रखने हेतु मनोरंजनात्मक क्रियाओं का होना अति आवश्यक है। हमें मनोरंजनात्मक क्रियाओं में अवश्य भाग लेना चाहिए। इनसे हमें आनंद एवं संतुष्टि की प्राप्ति होती है।

12. नियमित दिनचर्या (Daily Routine): समय पर उठना, समय पर सोना, समय पर खाना, ठीक ढंग से खड़े होना, बैठना, चलना, दौड़ना आदि क्रियाओं से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। व्यक्तिगत स्वच्छता, कपड़ों की सफाई व आस-पास की सफाई दिनचर्या के आवश्यक अंग होने चाहिएँ।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 4.
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों या तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं
1. वंशानुक्रमण (Heredity):
व्यक्ति के मानसिक व शारीरिक गुण जीन (Genes) द्वारा निर्धारित होते हैं । जीन या गुणसूत्र को ही वंशानुक्रमण की इकाई माना जाता है। इसी कारण वंशानुक्रमण द्वारा व्यक्ति का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। वंशानुक्रमण संबंधी गुण; जैसे ऊँचाई, चेहरा, रक्त समूह, रंग आदि माता-पिता के गुणसूत्रों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। बहुत-सी ऐसी बीमारियाँ हैं जो वंशानुक्रमण द्वारा आगामी पीढ़ी को भी हस्तान्तरित हो जाती हैं।

2. वातावरण (Environment):
अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ वातावरण का होना बहुत आवश्यक होता है। यदि वातावरण प्रदूषित है तो ऐसे वातावरण में व्यक्ति अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं।

3. संतुलित व पौष्टिक भोजन (Balanced and Nutritive Diet): भोजन शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और शरीर को विभिन्न प्रकार की बीमारियों से बचाता है। यदि हमारा भोजन संतुलित एवं पौष्टिक है तो इसका हमारे स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा और यदि भोजन में पौष्टिक तत्त्वों का अभाव है तो इसका हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

4. सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण (Social and Cultural Conditions):
वातावरण के अतिरिक्त व्यक्ति का अपना सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण भी उसके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। यदि व्यक्ति और उसके सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण के बीच असामंजस्य है तो इसका उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसीलिए व्यक्ति को अपने अच्छे स्वास्थ्य हेतु सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहिए। इसमें न केवल उसका हित है बल्कि समाज व देश का भी हित है।

5. आर्थिक दशाएँ (Economic Conditions):
स्वास्थ्य आर्थिक दशाओं से भी प्रभावित होता है। यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है अर्थात् गरीब है तो वह अपने परिवार के सदस्यों के लिए न तो संतुलित आहार की व्यवस्था कर पाएगा और न ही उन्हें चिकित्सा सुविधाएँ दे पाएगा। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी है तो वह अपने परिवार के सदस्यों की सभी आवश्यकताएँ पूर्ण कर पाएगा।

6. अन्य कारक (Other Factors):
स्वास्थ्य को जीवन-शैली भौतिक व जैविक वातावरण, स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर, मनोवैज्ञानिक कारक और पारिवारिक कल्याण सेवाएँ भी प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 5.
स्वास्थ्य शिक्षा को परिभाषित कीजिए। इसके मुख्य उद्देश्यों पर प्रकाश डालें।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या अभिप्राय है? इसके लक्ष्य तथा उद्देश्यों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ व परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों या पहलुओं के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाने में सहायता करते हैं। स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने विचार निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किए हैं

1.डॉ० थॉमस वुड (Dr. Thomas Wood) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”
2. सोफी (Sophie) के कथनानुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े व्यवहार से संबंधित है।”
3. विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-W.H.O.) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ रहने की स्थिति को कहते हैं न कि केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ या रोगमुक्त होने को।”
इस प्रकार स्वास्थ्य शिक्षा से अभिप्राय उन सभी बातों और आदतों से है जो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं।

स्वास्थ्य शिक्षा का लक्ष्य (Aim of Physical Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का लक्ष्य न केवल शारीरिक विकास या वृद्धि तक सीमित है बल्कि इसका महत्त्वपूर्ण लक्ष्य व्यक्ति के मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक आदि पक्षों को भी विकसित करना है। इसका लक्ष्य शरीर को हानि पहुँचाने वाली बुरी आदतों से अवगत करवाना और स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों हेतु अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण में सहायता करना है।

स्वास्थ्य शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. सामाजिक गुणों का विकास (Development of Social Qualities):
स्वास्थ्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति में अच्छे सामाजिक गुणों का विकास करके अच्छा नागरिक बनाना है। स्वास्थ्य शिक्षा जहाँ सर्वपक्षीय विकास करके अच्छे व्यक्तित्व को निखारती है, वहीं कई प्रकार के सामाजिक गुणों; जैसे सहयोग, त्याग-भावना, साहस, विश्वास, संवेगों पर नियंत्रण एवं सहनशीलता आदि का भी विकास करती है।

2. सर्वपक्षीय विकास (All Round Development):
सर्वपक्षीय विकास से अभिप्राय व्यक्ति के सभी पक्षों का विकास करना है। वह शारीरिक पक्ष से बलवान, मानसिक पक्ष से तेज़, भावात्मक पक्ष से संतुलित, बौद्धिक पक्ष से समझदार और सामाजिक पक्ष से निपुण हो। सर्वपक्षीय विकास से व्यक्ति के व्यक्तित्व में बढ़ोतरी होती है। वह परिवार, समाज और राष्ट्र की संपत्ति बन जाता है।

3. उचित मनोवृत्ति का विकास (Development of RightAttitude):
स्वास्थ्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल निर्देश देकर ही पूरा नहीं किया जा सकता बल्कि इसे पूरा करने के लिए सकारात्मक सोच की अति-आवश्यकता होती है। स्वास्थ्य संबंधी उचित मनोवृत्ति का विकास तभी अस्तित्व में आ सकता है, यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आदतें और व्यवहार इस प्रकार परिवर्तित करे कि वे उसकी आवश्यकताओं का अंग बन जाएँ, तो इससे एक अच्छे समाज और राष्ट्र की नींव रखी जा सकती है।

4. स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान (Knowledge about Health):
पुराने समय में स्वास्थ्य संबंधी बहुत अज्ञानता थी, परन्तु समय बदलने से रेडियो, टी०वी०, अखबारों और पत्रिकाओं ने संक्रामक बीमारियों और उनकी रोकथाम, मानसिक चिंताओं और उन पर नियंत्रण और संतुलित भोजन के गुणों के बारे में वैज्ञानिक ढंग से जानकारी साधारण लोगों तक पहुँचाई है। यह ज्ञान उन्हें अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए प्रेरित करता है।

5. स्वास्थ्य संबंधी नागरिक जिम्मेदारी का विकास (To Develop Civic Sense about Health):
स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य छात्रों या व्यक्तियों में स्वास्थ्य संबंधी नागरिक जिम्मेदारी या उत्तरदायित्व की भावना का विकास करना है। उन्हें नशीली वस्तुओं का सेवन करना, जगह-जगह पर थूकना, खुली जगह पर मल-मूत्र करना और सामाजिक अपराध आदि जैसी बुरी आदतों से दूर रहना चाहिए।

6. आर्थिक कुशलता का विकास (Development of Economic Efficiency):
आर्थिक कुशलता का विकास तभी हो सकता है अगर स्वस्थ व्यक्ति अपने कामों को सही ढंग से करें। अस्वस्थ मनुष्य अपनी आर्थिक कुशलता में बढ़ोतरी नहीं कर सकता। स्वस्थ व्यक्ति जहाँ अपनी आर्थिक कुशलता में बढ़ोतरी करता है, वहीं उससे देश की आर्थिक कुशलता में भी बढ़ोतरी होती है। इसीलिए स्वस्थ नागरिक समाज व देश के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। उनको देश की बहुमूल्य संपत्ति कहना गलत नहीं होगा।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 6.
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या अभिप्राय है? इसकी महत्ता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा क्या है? इसकी हमारे जीवन में क्या उपयोगिता है? वर्णन करें।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ (Meaning of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ उन सभी आदतों से है जो किसी व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं। इसका संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्म-निर्भर बनने में सहायता करते हैं। यह एक ऐसी शिक्षा है जिसके बिना मनुष्य की सारी शिक्षा अधूरी रह जाती है। इस प्रकार स्वास्थ्य शिक्षा से अभिप्राय उन सभी बातों और आदतों से है जो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं।

स्वास्थ्य शिक्षा की महत्ता या उपयोगिता (Importance orUtility of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) ने कहा था-“एक व्यक्ति जिसका शरीर या मन कमजोर है वह कभी भी मजबूत काया का मालिक नहीं बन सकता।” इसलिए स्वास्थ्य की हमारे जीवन में विशेष उपयोगिता है। स्वस्थ व्यक्ति ही समाज, देश आदि के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। अरस्तू ने कहा था कि “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है।” इसलिए हमें अपने स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य शिक्षा व्यक्ति को स्वास्थ्य से संबंधित विशेष जानकारियाँ प्रदान करती है, जिनकी पालना करके व्यक्ति संतुष्ट एवं सुखदायी जीवन व्यतीत कर सकता है। अतः स्वास्थ्य शिक्षा हमारे लिए निम्नलिखित कारणों से महत्त्वपूर्ण है

1.स्वास्थ्यप्रद आदतों का विकास (Development of Healthy Habits):
बचपन में बालक जैसी आदतों का शिकार हो जाता है वो आदत बालक के साथ जीवनपर्यन्त चलती है। अतः बालक को स्वास्थ्यप्रद आदतों को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर साफ-सफाई का ध्यान, सुबह जल्दी उठना, रात को जल्दी सोना, खाने-पीने तथा शौच का समय निश्चित होना ऐसी स्वास्थ्यप्रद आदतों को अपनाने से व्यक्ति स्वस्थ तथा दीर्घायु रह सकता है। यह स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा ही सम्भव है।

2. सामाजिक गुणों का विकास (Development of Social Qualities):
स्वास्थ्य शिक्षा व्यक्ति में सामाजिक गुणों का विकास करके उसे अच्छा नागरिक बनाने में सहायक होती है। स्वास्थ्य शिक्षा जहाँ सर्वपक्षीय विकास करके अच्छा व्यक्तित्व निखारती है, वहीं इसके साथ-साथ यह और कई प्रकार के गुणों; जैसे सहयोग, त्याग-भावना, साहस, विश्वास, संवेगों पर नियंत्रण एवं सहनशीलता आदि का भी विकास करती है।

3. प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी प्रदान करना (To Provide FirstAid Information):
स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा व्यक्ति को प्राथमिक चिकित्सा प्रदान की जा सकती है जिसके अन्तर्गत व्यक्तियों को प्राथमिक चिकित्सा के सामान्य सिद्धान्तों की तथा विभिन्न परिस्थितियों में जैसे-साँप के काटने पर, डूबने पर, जलने पर, अस्थि टूटने आदि पर प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी प्रदान की जाती है क्योंकि इस प्रकार की दुर्घटनाएँ कहीं भी, कभी भी तथा किसी के भी साथ घट सकती है तथा व्यक्ति का जीवन खतरे में पड़ सकता है। ऐसी जानकारी स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा ही दी जा सकती है।

4. स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक आदतों को बढ़ाने में सहायक (Helpful in increase the Desirable Health Habits):
स्वास्थ्य शिक्षा जीवन के सिद्धांतों एवं स्वास्थ्य की अच्छी आदतों का विकास करती है; जैसे स्वच्छ वातावरण में रहना, पौष्टिक व संतुलित भोजन करना आदि।

5. जागरूकता एवं सजगता का विकास (Development of Awareness and Alertness):
स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा एक स्वस्थ व्यक्ति सजग एवं जागरूक रह सकता है। उसके चारों तरफ क्या घटित हो रहा है उसके प्रति वह हमेशा सचेत रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्यों एवं अधिकारों के प्रति सजग एवं जागरूक रहता है।

6.बीमारियों से बचाव में सहायक (Helpful to Prevention of Diseases):
स्वास्थ्य शिक्षा संक्रामक-असंक्रामक बीमारियों से बचाव व उनकी रोकथाम के विषय में हमारी सहायता करती है। इन बीमारियों के फैलने के कारण, लक्षण तथा उनसे बचाव व इलाज के विषय में जानकारी स्वास्थ्य शिक्षा से ही मिलती है।

7. शारीरिक विकृतियों को खोजने में सहायक (Helpful in Discovering Physical Deformities):
स्वास्थ्य शिक्षा शारीरिक विकृतियों को खोजने में सहायक होती है। यह विभिन्न प्रकार की शारीरिक विकृतियों के समाधान में सहायक होती है।

8. मानवीय संबंधों को सुधारना (Improvement in Human Relations):
स्वास्थ्य शिक्षा अच्छे मानवीय संबंधों का निर्माण करती है। स्वास्थ्य शिक्षा विद्यार्थियों को यह ज्ञान देती है कि किस प्रकार वे अपने मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों व समुदाय के स्वास्थ्य के लिए कार्य कर सकते हैं।

9.सकारात्मक दृष्टिकोण (Positive View):
स्वास्थ्य शिक्षा से व्यक्ति की सोच काफी विस्तृत होती है। वह दूसरे व्यक्तियों के दृष्टिकोण को भली भाँति समझता है। उसकी सोच संकीर्ण न होकर व्यापक दृष्टिकोण वाली होती है।

प्रश्न 7.
स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आज का बालक कल का भविष्य है। उसको इस बात का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है कि वह अपने तन व मन को किस प्रकार से स्वस्थ रख सकता है। एक पुरानी कहावत है-“स्वास्थ्य ही जीवन है।” अगर धन खो दिया तो कुछ खास नहीं खोया, लेकिन यदि स्वास्थ्य खो दिया तो सब कुछ खो दिया। अतः सुखी व प्रसन्नमय जीवन व्यतीत करने के लिए उत्तम स्वास्थ्य का होना बहुत आवश्यक है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपने परिवार, समाज तथा देश के लिए हर प्रकर से सेवा प्रदान कर सकता है, जबकि अस्वस्थ या बीमार व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। तन व मन को स्वस्थ व प्रसन्न रखने में स्वास्थ्य शिक्षा महत्त्वपूर्ण योगदान देती है, क्योंकि स्वास्थ्य शिक्षा में वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं जिनसे व्यक्ति में स्वास्थ्य के प्रति सजगता बढ़ती है, और इनके परिणामस्वरूप उसका स्वास्थ्य तंदुरुस्त रहता है।
स्वास्थ्य शिक्षा को बहुत-से कारक प्रभावित करते हैं जिनमें से प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं-
1.संतुलित भोजन (Balance Diet):
संसार में प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ जीवन व्यतीत करना चाहता है और स्वस्थ जीवन हेतु भोजन ही मुख्य आधार है। वास्तव में हमें भोजन की जरूरत न केवल ऊर्जा या शक्ति की पूर्ति हेतु होती है बल्कि शरीर की वृद्धि, उसकी क्षतिपूर्ति और उचित शिक्षा प्राप्त करने हेतु भी होती है। अतः स्पष्ट है कि संतुलित भोजन स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करता है।

2.शारीरिक व्यायाम (Physical Exercise):
स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा व्यक्ति अपने शरीर को शारीरिक व्यायामों द्वारा लचीला एवं सुदृढ़ बनाता है। शारीरिक व्यायाम की क्रियाओं द्वारा पूरे शरीर को तंदुरुस्त बनाया जा सकता है। कौन-से व्यायाम कब करने चाहिएँ और कब नहीं करने चाहिएँ, का ज्ञान स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा प्राप्त होता है।

3. आदतें (Habits):
आदतें भी स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव व आदतें अलग-अलग होती हैं। बालक की स्वास्थ्य शिक्षा उसके स्वभाव एवं आदत पर निर्भर करती है। बच्चों में अच्छी आदतों का विकास किया जाए, ताकि वह एक सफल नागरिक बन सके। अच्छी आदतों वाला व्यक्ति उचित मार्ग पर अग्रसर होकर तरक्की करता है। स्वास्थ्य शिक्षा अच्छी आदतों का विकास करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।

4. बीमारी (Disease):
स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है कि “एक व्यक्ति जिसका शरीर या मन कमजोर है वह कभी भी मज़बूत काया का मालिक नहीं बन सकता।” अतः बीमारी भी स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करती है। एक बीमार बालक कोई भी शिक्षा प्राप्त करने में पूर्ण रूप से समर्थ नहीं होता। स्वास्थ्य शिक्षा के माध्यम से एक स्वस्थ व्यक्ति या बालक प्रायः बीमारियों से मुक्त रहता है।

5. जीवन-शैली (Lifestyle):
जीवन-शैली जीवन जीने का एक ऐसा तरीका है जो व्यक्ति के नैतिक गुणों या मूल्यों और दृष्टिकोणों को प्रतिबिम्बित करता है। यह किसी व्यक्ति विशेष या समूह के दृष्टिकोणों, व्यवहारों या जीवन मार्ग का प्रतिमान है। स्वास्थ्य शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करने हेतु एक स्वस्थ जीवन-शैली बहुत आवश्यक होती है। एक स्वस्थ जीवन-शैली व्यक्तिगत रूप से पुष्टि के स्तर को बढ़ाती है। यह हमें बीमारियों से बचाती है और हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करती है। इसके माध्यम से आसन संबंधी विकृतियों में सुधार होता है। इसके माध्यम से मनोवैज्ञानिक शक्ति या क्षमता में वृद्धि होती है जिससे तनाव, दबाव व चिंता को कम किया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक स्वस्थ जीवन-शैली स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करती है।

6. वातावरण (Environment):
स्वास्थ्य शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करने हेतु स्वच्छ वातावरण का होना बहुत आवश्यक है। वातावरण दो प्रकार के होते हैं-(1) आन्तरिक वातावरण, (2) बाह्य वातावरण। दोनों प्रकार के वातावरण बालक को प्रभावित करते हैं। शिक्षा प्राप्त करने हेतु स्कूली वातावरण विद्यार्थियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। बिना वातावरण के कोई भी विद्यार्थी किसी प्रकार का ज्ञान अर्जित नहीं कर सकता। इसलिए स्कूल प्रबन्धों को स्कूली वातावरण की ओर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए, ताकि विद्यार्थी बिना किसी बाधा के ज्ञान अर्जित कर सकें।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 8.
‘विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम’ क्या है? विद्यार्थियों के लिए इसके महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
अथवा
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम से आप क्या समझते हैं? इसकी उपयोगिता या महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम का अर्थ (Meaning of School Health Programme):
बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं। स्कूल में जाने वाले बच्चे किसी राष्ट्र को सशक्त व मजबूत बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समस्त राष्ट्र का उत्तरदायित्व उनके कंधों पर टिका होता है । इसलिए स्कूली बच्चों का स्वास्थ्य ही स्कूल प्रणाली का महत्त्वपूर्ण तथा प्राथमिक मुद्दा है।
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तीन चरण होते हैं-
(1) स्वास्थ्य सेवाएँ (Health Services)
(2) स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन या वातावरण (Healthful School Living or Environment) तथा
(3) स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन (Health Instructions)।
अतः स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम को इस प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है-“स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम वह ग्रहणित प्रक्रिया है जिसको स्कूल स्वास्थ्य सेवाएँ, स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन और स्वास्थ्य अनुदेशन के रूप में बच्चों के स्वास्थ्य के विकास के लिए अपनाया जाता है।”

स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम का महत्त्व (Importance of School Health Programme):
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के महत्त्व के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
(1) इससे स्कूल में जाने वाले बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों को आसानी से विकसित किया जा सकता है।
(2) इससे बच्चे अनेक बीमारियों की रोकथाम तथा उपचार के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
(3) स्वास्थ्य तथा स्वच्छता की जानकारी स्वस्थ समाज के निर्माण में सहायक है।
(4) स्कूली दिनों में बच्चों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति अति तीव्र होती है। उनकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए ये कार्यक्रम अति-आवश्यक होते हैं।
(5) सभी स्कूली छात्र कक्षा के अनुसार लगभग समान आयु के होते हैं, इसलिए उनकी समस्याएँ भी लगभग एक-जैसी होती हैं और उनके निदान के प्रति दृष्टिकोण भी एक-जैसा ही होता है। इसलिए स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम सभी छात्रों के लिए समान रूप से उपयोगी होते हैं।
(6) स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों को पोषक तत्त्वों एवं खनिज-लवणों की जानकारी की महत्ता बताई जाती है जो उनकी संपूर्ण जिंदगी में सहायक होती है।
(7) स्कूल के दिनों के दौरान विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम अनेक अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक हैं जो समाज के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।
(8) ये कार्यक्रम स्कूल के वातावरण को स्वास्थ्यप्रद रखने में स्कूल के अधिकारियों व कर्मचारियों की सहायता करते हैं।

प्रश्न 9.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के विभिन्न तत्त्व या घटक कौन-कौन-से हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंगों के आपसी संबंधों का वर्णन करें।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम के तीनों अंगों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम के मुख्य क्षेत्रों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का क्षेत्र बहुत विशाल है। यह केवल स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं है। इसमें स्वास्थ्य ज्ञान के अतिरिक्त और बहुत-से घटक शामिल हैं, जिनका आपस में गहरा संबंध होता है। ये सभी घटक या तत्त्व बच्चों के स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव डालते हैं। स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम के विभिन्न घटक या क्षेत्र निम्नलिखित हैं
1. स्वास्थ्य सेवाएँ (Health Services):
छात्रों को शिक्षा देने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की रक्षा करना भी विद्यालय का मुख्य उत्तरदायित्व माना जाता है। स्वास्थ्य सेवाएँ वे सेवाएँ हैं जिनके माध्यम से छात्रों के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है और उनमें पाए जाने वाले दोषों से माता-पिता को अवगत करवाया जाता है ताकि समय रहते उन दोषों का उपचार किया जा सके। इन सेवाओं के अंतर्गत स्कूल के अन्य कर्मचारियों एवं अध्यापकों के स्वास्थ्य की भी जाँच की जाती है।

आधुनिक युग में स्वास्थ्य सेवाओं की बहुत महत्ता है। स्वास्थ्य सेवाओं की सहायता से बच्चे और वयस्क अपने स्वास्थ्य का स्तर ऊँचा उठा सकते हैं । साधारण जनता को ये सेवाएँ सरकार की ओर से मिलनी चाहिएँ। जबकि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को स्कूल की ओर से ये सुविधाएँ मिलनी चाहिएँ। स्वास्थ्य सेवाओं का कार्य बच्चों में संक्रामक रोगों को ढूँढकर उनके माता-पिता की सहायता से ठीक करना है। इस कार्य को पूर्ण करने के लिए डॉक्टर, नर्स, मनोरोग चिकित्सक और स्कूलों के अध्यापक विशेष योगदान दे सकते हैं।

2. स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन या वातावरण (Healthful School Living or Environment):
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

बच्चे के स्कूल का वातावरण, रहने का स्थान और काम करने का स्थान स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । जिस देश के बच्चे और नवयुवक स्वस्थ होते हैं वह देश हमेशा प्रगति के रास्ते पर चलता रहता है, क्योंकि आने वाला भविष्य उनसे बंधा होता है। बच्चा अपना अधिकांश समय स्कूल में गुजारता है। बच्चे का उचित विकास स्कूल के वातावरण पर निर्भर करता है। यह तभी संभव हो सकता है, अगर साफ़-सुथरा एवं स्वच्छ स्कूल हो।स्वच्छ वातावरण बच्चे और वयस्क दोनों को प्रभावित करता है। स्वच्छ वातावरण केवल छात्रों के ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावात्मक और नैतिक विकास में भी सहायक होता है।

3. स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन (Health Instructions):
स्वास्थ्य निर्देशन का आशय है-स्कूल के बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना। बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी ऐसी जानकारी देना कि वे स्वयं को स्वस्थ एवं नीरोग बना सकें। स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों एवं दृष्टिकोणों का विकास करते हैं। ये बच्चों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी सभी महत्त्वपूर्ण पहलुओं से अवगत करवाना है ताकि वे स्वयं को स्वस्थ रख सकें। स्वास्थ्य संबंधी निर्देशन में वे सभी बातें आ जाती हैं जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होती हैं; जैसे अच्छी आदतें, स्वास्थ्य को ठीक रखने के तरीके और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना आदि। शरीर की बनावट या संरचना, संक्रामक रोगों के लक्षण एवं कारण, इनकी रोकथाम या बचाव के उपायों के लिए बच्चों को फिल्मों या तस्वीरों आदि के माध्यम से अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। स्वास्थ्य निर्देशन की जानकारी प्राप्त कर बच्चे अनावश्यक विकृतियों या कमजोरियों का शिकार होने से बच सकते हैं।

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प्रश्न 10.
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन से आप क्या समझते हैं? इसके क्षेत्र एवं प्रभाव पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन का अर्थ (Meaning of Healthful School Living):
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वस्थ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वस्थ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक व भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन का क्षेत्र (Scope of Healthful School Living):
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन के क्षेत्र में निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान दिया जाता है-

1. स्कूल अध्यापक का अनुभव (Experience of School Teacher): अध्यापकों को अपना पाठ्यक्रम बच्चों की इच्छाओं, आवश्यकताओं, रुचियों के अनुसार बनाना चाहिए। इसके लिए अध्यापक को अपने अनुभव का प्रयोग करना चाहिए।

2. विद्यालय की स्थिति (Situation of School): बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विद्यालय का भवन रेलवे स्टेशनों, सिनेमाघरों, कारखानों, यातायात सड़कों आदि से दूर होना चाहिए।

3. छात्र एवं अध्यापक में संबंध (Relationship between Student & Teacher): बच्चों के संपूर्ण विकास हेतु अध्यापकों एवं छात्रों में सहसंबंध होना चाहिए।

4. समय-सारणी (Time-Table): विद्यालय की समय-सारणी का विभाजन छात्रों के स्तर के अनुसार होना चाहिए।

स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन का प्रभाव (Effect of Healthful School Living):
व्यक्ति या बच्चे के स्वास्थ्य पर अच्छा-बुरा वातावरण बहुत अधिक प्रभाव डालता है। बच्चे के स्कूल का माहौल, रहने का स्थान और काम करने का स्थान स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। जिस देश के बच्चे और नवयुवक स्वस्थ होते हैं, वह देश हमेशा प्रगति के पथ पर अग्रसर रहता है। बच्चा अपना बहुत ज्यादा समय स्कूल में गुजारता है। बच्चे का उचित विकास स्कूल के वातावरण पर निर्भर करता है। यह तभी हो सकता है, अगर साफ-सुथरा स्कूल हो अर्थात् साफ व आकर्षक बगीचे, साफ-सुथरे व हवादार कमरे, कुर्सियाँ, डैस्क और अधिक-से-अधिक पेड़-पौधे लगाकर स्वच्छ वातावरण बनाया जाए। स्वच्छ वातावरण छात्रों को बहुत प्रभावित करता है। स्वच्छ वातावरण केवल छात्रों की ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक, नैतिक और बौद्धिक क्षमता व योग्यता को भी प्रभावित करता है।

प्रश्न 11.
विद्यालयी स्वास्थ्य अनुदेशन या शिक्षण पर विस्तृत नोट लिखें।
अथवा
स्वास्थ्य निर्देशन या अनुदेशन क्या है? इसके उद्देश्य एवं आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
स्वास्थ्य अनुदेशन क्या है? विद्यालय में इसकी आवश्यकता एवं महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन या अनुदेशन का अर्थ (Meaning of School Health Instruction):
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन का आशय है-स्कूल के बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी ऐसी जानकारी देना कि वे स्वयं को स्वस्थ एवं नीरोग बना सकें। स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों एवं दृष्टिकोणों का विकास करते हैं। ये हमें स्वास्थ्य से संबंधित बाधाओं या समस्याओं के बुरे प्रभावों से बचाव के लिए मार्गदर्शन करते हैं।

विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन के उद्देश्य (Objectives of School Health Instruction):
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की जानकारी देना।
(2) बच्चों को स्वास्थ्य के विषय में पर्याप्त ज्ञान देना।
(3) स्वास्थ्य संबंधी महत्त्वपूर्ण नियमों या सिद्धांतों की जानकारी देना।
(4) संक्रामक रोगों की रोकथाम के उपायों की जानकारी देना।
(5) बच्चों को अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देने हेतु प्रेरित करना।
(6) स्वास्थ्य को ठीक रखने के उपाय बताना।

faculteit Farren faldera ant rape cont a Hera (Need and Importance of School Health Instruction):
स्वास्थ्य के बिना मानव जीवन अधूरा है। वह अपने जीवन के उद्देश्य को तभी प्राप्त कर सकता है यदि वह शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ हो। अपने स्वास्थ्य को अच्छा बनाने के लिए हमें स्वास्थ्य निर्देशन का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य के सभी पहलुओं की जानकारी प्रदान करते हैं। इसलिए विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन की हमें बहुत आवश्यकता है। अत: इनका हमारे लिए निम्नलिखित प्रकार से विशेष महत्त्व है-
(1) विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन बच्चों को संक्रामक रोगों के लक्षणों एवं कारणों की उचित जानकारी प्रदान करते हैं।
(2) ये बच्चों को संक्रामक रोगों से बचाव या रोकथाम के उपायों की जानकारी देते हैं।
(3) ये बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की उपयोगिता से अवगत करवाते हैं।
(4) इनकी सहायता से बच्चे स्वयं को स्वस्थ रखने हेतु प्रेरित होते हैं।
(5) ये व्यक्तिगत स्वास्थ्य या स्वच्छता के साथ-साथ सार्वजनिक व पर्यावरण स्वच्छता की जानकारी भी देते हैं।
(6) ये बच्चों को अनावश्यक विकृतियों या कमजोरियों का शिकार होने से बचाने में सहायक होते हैं।

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प्रश्न 12.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं से आप क्या समझते हैं? इसके महत्त्व या उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं का अर्थ (Meaning of School Health Services):
छात्रों को शिक्षा देने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की रक्षा करना भी विद्यालय का मुख्य उत्तरदायित्व माना जाता है। स्वास्थ्य सेवाएँ वे सेवाएँ हैं जिनके माध्यम से छात्रों के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है और उनमें पाए जाने वाले दोषों से माता-पिता को अवगत करवाया जाता है ताकि समय रहते उन दोषों का उपचार किया जा सके। इन सेवाओं के अंतर्गत स्कूल के अन्य कर्मचारियों एवं अध्यापकों के स्वास्थ्य की भी जाँच की जाती है। इनके अंतर्गत छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा प्रदान की जाती है और उन्हें सभी प्रकार की बीमारियों के लक्षणों, कारणों, रोकथाम या बचाव के उपायों की जानकारी दी जाती है। विद्यालय में ऐसी सुविधाओं को विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ (School Health Services) कहा जाता है।

विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता एवं महत्त्व (Need and Importance of School Health Services):
आधुनिक युग में स्वास्थ्य सेवाओं की बहुत महत्ता है। स्वास्थ्य सेवाओं की सहायता से बच्चे और वयस्क अपने स्वास्थ्य का स्तर ऊँचा उठा सकते हैं। आम जनता को ये सेवाएँ सरकार की ओर से मिलनी चाहिएँ, जबकि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को स्कूल की ओर से ये सुविधाएँ मिलनी चाहिएँ। स्वास्थ्य सेवाओं का कार्य बच्चों में संक्रामक रोगों, कुपोषण जैसी बीमारियों को ढूँढकर उनके माता-पिता की सहायता से ठीक करना है। इस कार्य को पूर्ण करने के लिए डॉक्टर, नर्स, मनोवैज्ञानिक और स्कूलों के अध्यापक विशेष योगदान दे सकते हैं। ये सेवाएँ न केवल छात्रों के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होती हैं, बल्कि स्कूल के अन्य कर्मचारियों व शिक्षकों के लिए भी उपयोगी हैं। विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ निम्नलिखित प्रकार से आवश्यक व महत्त्वपूर्ण हैं-
(1) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ छात्रों के रोगों का पता लगाने और उनकी रोकथाम व बचाव में सहायक होती हैं।
(2) ये संक्रामक व असंक्रामक रोगों के लक्षणों एवं कारणों की जानकारी देती हैं।
(3) इनसे इन रोगों की रोकथाम व बचाव के उपाय करने में सहायता मिलती है।
(4) इन,सेवाओं से छात्रों, अध्यापकों व अन्य स्कूल कर्मचारियों के स्वास्थ्य के निरीक्षण में सहायता मिलती है।
(5) इनके माध्यम से रोगी बच्चों के उपचार में मदद मिलती है।
(6) ये अकस्मात् दुर्घटना या रोगों के दौरान छात्रों को आपातकालीन सुविधाएँ प्रदान करती हैं।

प्रश्न 13.
स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों के विभिन्न सिद्धांतों या नियमों का ब्योरा दें।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रमों के लिए किन-किन बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए?
अथवा
आप अपने स्कूल में स्वास्थ्य शिक्षण कार्यक्रम को कैसे अधिक प्रभावशाली बनाएँगे?
अथवा
उन विभिन्न माध्यमों का वर्णन कीजिए, जिनका प्रयोग आप अपने स्कूल में वस्तुतः प्रभावशाली स्वास्थ्य शिक्षण कार्यक्रम के लिए करेंगे।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों के लिए आवश्यक बातें या सिद्धांत निम्नलिखित हैं-
(1) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों की आयु और लिंग के अनुसार होना चाहिए।
(2) स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में जानकारी देने का तरीका साधारण और जानकारी से भरपूर होना चाहिए।
(3) स्वास्थ्य शिक्षा पढ़ने-लिखने तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए अपितु उसकी प्राप्तियों के बारे में कार्यक्रम बनाने चाहिएँ।
(4) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम लोगों या छात्रों की आवश्यकताओं, रुचियों और पर्यावरण के अनुसार होना चाहिए।
(5) मनुष्य का व्यवहार ही उसका सबसे बड़ा गुण है, जिसमें उसकी रुचि ज्यादा है वह उसे सीखने और करने के लिए तैयार रहता है। इसलिए कार्यक्रम बनाते समय बच्चों की उत्सुकता, रुचियों और इच्छाओं का ध्यान रखना चाहिए।
(6) स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में जानकारी देते समय जीवन से संबंधित मुश्किलों पर भी वार्तालाप होनी चाहिए।
(7) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्तर के अनुसार बनाना चाहिए।
(8) स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम ऐसे होने चाहिएँ जो बच्चों की अच्छी आदतों को उत्साहित कर सकें, ताकि वे अपने सोचने के तरीके को बदल सकें।
(9) स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों में बुरी आदतों को छोड़ने और अच्छी आदतों को ग्रहण करने हेतु फिल्में, चार्ट, टी०वी०, रेडियो आदि माध्यमों के प्रयोग द्वारा बच्चों को प्रेरित किया जाना चाहिए।
(10) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम केवल स्कूलों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अंग होना चाहिए।
(11) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम रुचिपूर्ण, शिक्षा से भरपूर और मनोरंजनदायक होना चाहिए।
(12) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम प्रस्तुत करते समय लोगों में प्रचलित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। यह भाषा उनकी आयु और समझने की क्षमता के अनुसार होनी चाहिए।
(13) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बनाते समय संक्रामक-असंक्रामक बीमारियों के बारे में तथा उनकी रोकथाम के उपायों के बारे में जानकारी देनी चाहिए।
(14) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम केवल एक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका क्षेत्र विशाल होना चाहिए।
(15) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम लोगों की आंतरिक भावनाओं को जानकर ही बनाना चाहिए।
(16) स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम में पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्तर के विषय शामिल होने चाहिएँ।

प्रश्न 14.
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण/जीवन से आपका क्या अभिप्राय है? स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने के लिए स्कूल अध्यापक को क्या करना चाहिए?
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण/जीवन का अर्थ (Meaning of Healthful School Environment/Living):
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण या जीवन का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने में स्कूल अध्यापक की भूमिका (Role of School Teacher in Creating Healthful Environment in School):
स्कूल अध्यापक को छात्रों को पढ़ाते समय कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है; जैसे अध्यापक द्वारा पढ़ाया जाने वाला कोई विषय या पाठ छात्रों की समझ में न आना, बच्चों द्वारा शरारतें करना, बच्चों द्वारा अध्ययन कार्य में रुचि न लेना आदि। यदि स्कूल अध्यापक छात्रों की रुचि, इच्छाओं एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर अपना पाठ्यक्रम बनाए तभी वह अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है अर्थात् वह छात्रों को पढ़ाए गए विषय को अच्छे से समझा सकता है।

कोई भी स्कूल अध्यापक तब तक अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता, जब तक वह छात्रों को पढ़ने या अध्ययन करने हेतु प्रेरित न करे। यदि छात्रों की पढ़ने में रुचि है तो अध्यापक अपने उद्देश्य में सफल होगा और यदि छात्रों की रुचि नहीं है तो अध्यापक पढ़ाकर भी छात्रों को पढ़ाए गए विषय का ज्ञान नहीं करा पाएगा। इसलिए स्कूल अध्यापक को अपना पाठ्यक्रम छात्रों की रुचि एवं आवश्यकतानुसार बनाना चाहिए। तभी वह स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने में सफल होगा और उसे पढ़ाने के दौरान किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। स्कूल अध्यापक को अपने अनुभवों का भी प्रयोग करना चाहिए। उसको समय-सारणी का विभाजन भी छात्रों के स्तर के अनुसार निश्चित करना चाहिए।

बच्चों के संपूर्ण विकास हेतु छात्रों और स्कूल अध्यापक में परस्पर सहसंबंध अवश्य होना चाहिए, तभी बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव होगा। इसलिए अध्यापक को कक्षा का वातावरण एवं पाठ्यक्रम रुचिकर बनाना चाहिए और उनके स्वास्थ्य के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इसके साथ-साथ उसे छात्रों की इच्छाओं, आवश्यकताओं, आदतों तथा समस्याओं आदि का भी पूरा ज्ञान होना चाहिए। अध्यापक को छात्रों को सभी सामाजिक गुणों के प्रति प्रेरित करना चाहिए, ताकि ये गुण उनके सामाजिक जीवन में उनकी सहायता कर सकें और उन्हें समाज का एक अच्छा नागरिक बना सकें। इस प्रकार स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने के लिए स्कूल अध्यापक महत्त्वपूर्ण भूमिका अंदा कर सकता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 15.
आधुनिक समय में जन स्वास्थ्य कल्याण हेतु कौन-कौन-सी मुख्य संस्थाएँ कार्य कर रही हैं?
अथवा
भारत में स्वास्थ्य कल्याण हेतु कार्यरत प्रमुख संस्थानों या संघों का वर्णन करें।
उत्तर:
आधुनिक युग में किसी देश की शक्ति का अनुमान वहाँ के स्वस्थ नागरिकों से लगाया जा सकता है। स्वास्थ्य की पूर्ण व्याख्या किसी व्यक्ति के सही शारीरिक पक्ष से की जा सकती है। स्वास्थ्य की पूर्ण व्याख्या से अभिप्राय व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक पक्ष के पूर्ण होने से है। प्रत्येक पक्ष से स्वस्थ व्यक्ति अच्छे समाज का निर्माण करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य का ज्ञान अति-आवश्यक है। विकासशील देशों में सरकार और अन्य संगठन लोगों के स्वास्थ्य के लिए भरपूर सेवाएँ उपलब्ध करवाते हैं। भारत में निम्नलिखित प्रमुख संघ या संस्थान स्वास्थ्य कल्याण हेतु कार्यरत हैं-
1. भारतीय तपेदिक रोग संगठन (Tuberculosis Association of India):
भारतीय तपेदिक रोग संगठन वर्ष 1939 में अस्तित्व में आया। इसका मुख्य कार्य टी०बी० से पीड़ित लोगों को इससे राहत देना है। भारत की बहुत-सी जनसंख्या इस रोग से पीड़ित है। भारत सरकार ने इस रोग पर नियंत्रण पाने के लिए कई बड़े-बड़े अस्पताल और अन्वेषण केंद्र स्थापित किए हैं, ताकि इस घातक बीमारी से लोगों को निजात दिलाई जा सके। यह संगठन डॉक्टरों, नौं और अन्य संगठन जो इस रोग के निवारण हेतु योगदान दे रहे हैं, उन्हें प्रशिक्षण की सुविधाएँ प्रदान करता है।

2. भारत सेवक समाज (Bharat Sewak Samaj):
भारत सेवक समाज संस्था वर्ष 1952 में अस्तित्व में आई। यह एक गैर-सरकारी संस्था है। इसका मुख्य कार्य लोगों को स्वस्थ रहने के तौर-तरीके बताना है। यह संस्था समय-समय पर शहरों और गाँवों में शिविर लगाकर लोगों को स्वास्थ्य चेतना या जागरूकता के बारे में जानकारी देती है।

3. अखिल भारतीय नेत्रहीन सहायक सोसायटी (All India Blind Relief Society):
यह सोसायटी वर्ष 1945 में स्थापित की गई। यह नेत्रहीन लोगों की सहायता के लिए कार्य कर रही है। यह अन्य कई संस्थाओं जोकि नेत्रहीनता को दूर करने के लिए कार्य कर रही हैं, उनकी सहायता करती है। इसका अस्तित्व सरकार की आर्थिक सहायता पर अधिक निर्भर करता है। यह समय-समय पर आँखों के शिविर लगाकर लोगों को आँखों की गंभीर बीमारियों से अवगत करवाती है और उन्हें इनके प्रति सुविधाएँ प्रदान करती है। यह लोगों को आँखें दान हेतु प्रेरित करती है, ताकि नेत्रहीनता के शिकार लोगों को रोशनी दी जा सके।

4. हिंद कुष्ठ निवारण संघ (Hind Kusht Niwaran Sangh):
हिंद कुष्ठ निवारण संघ वर्ष 1947 में स्थापित की गई। कुष्ठ रोग जैसी घातक बीमारी को रोकने के लिए यह संघ दिन-रात प्रयासरत है। यह संघ वैज्ञानिक खोजों से इस बीमारी के कारण और उपयुक्त इलाज संबंधी जानकारी लोगों को प्रदान कर रहा है।

5.भारतीय परिवार नियोजन संघ (Family Planning Association of India):
भारतीय परिवार नियोजन संघ की स्थापना वर्ष 1949 में हुई। भारत में बढ़ रही जनसंख्या पर रोक लगाने हेतु यह संघ प्रयासरत है। थोड़े ही समय में इसकी शाखाएँ पूरे भारत में खुल गई हैं। इस संघ ने अनेक डॉक्टरों और समाज-सुधारकों को प्रशिक्षण देकर लोगों को परिवार नियोजन के बारे में जागरूक किया है।

6. भारतीय बाल कल्याण परिषद् (Indian Council for Child Welfare):
भारतीय बाल कल्याण परिषद् की स्थापना वर्ष 1952 में हुई। इसका मुख्य कार्य बच्चों संबंधी समस्याओं का हल और उनके कल्याण संबंधी योजनाएं बनाना है। इस परिषद् ने भारत के पहले प्रधानमंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस 14 नवंबर को बच्चों का दिन (बाल-दिवस) मनाने का निर्णय लिया। अब भारत में प्रत्येक वर्ष 14 नवंबर को यह दिन मनाया जाता है। यह परिषद् अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़ी हुई है। यह प्रत्येक वर्ष बच्चों के कल्याण के लिए नई-नई योजनाएँ बनाती है।

7. भारतीय चिकित्सा संघ (Indian Medical Association):
इस संघ का मुख्य कार्य सरकार का ध्यान राष्ट्रीय स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की ओर दिलाना और उन्हें हल करने के लिए सहयोग देना है। यह संघ समय-समय पर सरकार से अपने वार्षिक बजट में आर्थिक सहायता की वृद्धि के लिए माँग करता है। भारतीय चिकित्सा संघ वैज्ञानिक अन्वेषण करके सरकार को घातक बीमारियों के फैलने और बचाव के बारे में सिफारिश करता रहता है। इस संघ की सिफारिश पर ही सरकार लोगों के स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार, अच्छी दवाइयाँ और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए नई-नई योजनाएँ बनाती रहती है।

8. भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी (Indian Redcross Society):
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी एक राष्ट्रीय संगठन है। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय सोसायटी का सदस्य है। भारत में यह वर्ष 1920 में अस्तित्व में आई। यह सोसायटी मानवता की सेवा में संलग्न है। यह लोगों को स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान, बीमारियों के बचाव और उपाय, युद्ध के दौरान घायलों की सहायता, प्राकृतिक आपदाओं के समय दवाइयाँ और आवश्यकतानुसार सुविधाएँ उपलब्ध करवाती है। भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी जन-कल्याण के लिए निम्नलिखित कार्य करती है-
(1) रक्त बैंक की स्थापना करना और आवश्यकता पड़ने पर रक्त की सुविधाएँ उपलब्ध करना।
(2) युद्ध के दौरान घायल हुए और रोगी सैनिकों की देखभाल करना।
(3) यह भूकंप, बाढ़, प्लेग और सूखा पड़ने से पीड़ित लोगों की सहायता करती है।
(4) यह बाल कल्याण और उनकी भलाई के लिए विशेष योगदान देती है।
(5) यह तपेदिक, कुष्ठ, एड्स और अन्य कई बीमारियों की रोकथाम के लिए मुफ्त दवाइयाँ प्रदान करती है।
(6) यह उन अन्य संगठनों, जो मानवता की सेवा में संलग्न हैं, की आर्थिक सहायता करती है।
(7) यह असमर्थ लोगों को नकली अंग देकर उनकी मदद करती है।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? अथवा ‘स्वास्थ्य’ से आप क्या समझते हैं?
अथवा
स्वास्थ्य का अर्थ एवं परिभाषा लिखें।
उत्तर:
स्वास्थ्य से सभी परिचित हैं। स्वास्थ्य से अभिप्राय बीमारी की अनुपस्थिति से लगाया जाता है, परंतु यह स्वास्थ्य का विस्तृत अर्थ नहीं है। स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है, जिससे वह मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसके सभी शारीरिक संस्थान व्यवस्थित रूप से सुचारू होते हैं। इसका अर्थ न केवल बीमारी अथवा शारीरिक कमजोरी की अनुपस्थिति है, अपितु शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना भी है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति का मन या आत्मा प्रसन्नचित्त और शरीर रोग-मुक्त रहता है। जे०एफ० विलियम्स के अनुसार, “स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएं प्रदान करता है।” रोजर बेकन के अनुसार, “स्वस्थ शरीर आत्मा का अतिथि-भवन और दुर्बल तथा रुग्ण शरीर आत्मा का कारागृह है।”

प्रश्न 2.
विद्यालय में विद्यार्थियों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में चिकित्सा परीक्षण की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विद्यालय में विद्यार्थियों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में चिकित्सा परीक्षण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, जैसे-
(1) चिकित्सा परीक्षण से विद्यार्थियों को अपने शारीरिक स्वास्थ्य और विकारों की जानकारी प्राप्त होती है। अतः समय रहते वे अपने विकारों को दूर कर सकते हैं।
(2) चिकित्सा परीक्षण से बच्चों के अभिभावकों को अपने बच्चों के स्वास्थ्य की पूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। वे उनके स्वास्थ्य के प्रति अधिक सचेत हो जाते हैं।
(3) चिकित्सा परीक्षण से विद्यार्थियों को अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा मिलती है और वे अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य व स्वच्छता की ओर ध्यान देने लगते हैं।
(4) चिकित्सा परीक्षण विद्यार्थियों के लिए भविष्य के संदर्भ में आधार देता है, क्योंकि स्वस्थ बालक ही कल के राष्ट्र-निर्माण में सहयोग दे सकता है।
(5) चिकित्सा परीक्षण विद्यार्थियों को नीरोग जीवन जीने हेतु प्रोत्साहित करता है।
(6) चिकित्सा परीक्षण से विद्यार्थियों को अपने सभी अंगों की पूर्ण जानकारी प्राप्त हो जाती है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि चिकित्सा परीक्षण सभी विद्यार्थियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। वर्ष में कम-से-कम एक बार विद्यार्थियों का चिकित्सा परीक्षण अवश्य करवाना चाहिए, ताकि उन्हें अपने स्वास्थ्य की पूर्ण जानकारी मिलती रहे।

प्रश्न 3.
स्वास्थ्य शिक्षा के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) विद्यालय में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण बनाए रखना।
(2) बच्चों में ऐसी आदतों का विकास करना जो स्वास्थ्यप्रद हों।
(3) रोगों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करना तथा प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी देना।
(4) सभी विद्यार्थियों के स्वास्थ्य का निरीक्षण करना व निर्देश देना।
(5) सभी विद्यार्थियों में स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान तथा अभिव्यक्ति का विकास करना।
(6) व्यक्तिगत सफाई तथा स्वच्छता के बारे में जानकारी देना।
(7) स्वास्थ्य संबंधी आदतों का विकास करना।
(8) रोगों से बचने का उपाय करना और शारीरिक रोगों की जाँच करना।

प्रश्न 4.
स्वस्थ व्यक्ति किसे कहते हैं? अच्छे स्वास्थ्य के कोई तीन लाभ बताएँ।
उत्तर:
स्वस्थ व्यक्ति-स्वस्थ व्यक्ति वह होता है जिसकी सभी शारीरिक प्रणाली सुचारू रूप से कार्य करती हैं। अतः स्वस्थ व्यक्ति के शरीर के सभी अंगों की बनावट और उसके शारीरिक संस्थानों की क्रिया सुचारू रूप से चलती है। वह हर प्रकार के मनोवैज्ञानिक, मानसिक व सामाजिक तनावों से मुक्त होता है। केवल शारीरिक रोगों से मुक्त व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ नहीं होता, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति को रोग घटकों से भी मुक्त होना चाहिए।
अच्छे स्वास्थ्य के लाभ-
(1) अच्छे स्वास्थ्य से व्यक्ति का जीवन सुखमय व आनंदमय होता है।
(2) अच्छे स्वास्थ्य का न केवल व्यक्तिगत लाभ होता है, बल्कि इसका सामूहिक लाभ होता है। इसका समाज व देश पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
(3) अच्छे स्वास्थ्य से व्यक्ति अपने जीवन को सफल बना सकता है। स्वस्थ व्यक्ति कोई भी लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।

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प्रश्न 5.
अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने में शिक्षा किस प्रकार सहायक होती है?
उत्तर:
अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक तौर पर विकारों तथा तनावों को दूर करने की आवश्यकता है, परंतु भारतवर्ष में बहुत-से लोग इस बात से भी अनभिज्ञ हैं कि कौन-कौन-से रोग किस-किस कारण से होते हैं? उनकी रोकथाम कैसे की जा सकती है तथा उनके बचाव के क्या उपाय हैं? केवल रोगों के निदान से ही स्वास्थ्य कायम नहीं होता। इसके लिए बाह्य कारक; जैसे प्रदूषण तथा सूक्ष्म-जीवों के संक्रमण से भी बचाव अत्यंत आवश्यक है। शिक्षा संतुलित आहार और उनमें पौष्टिक तत्त्व की कितनी-कितनी मात्रा होनी चाहिए आदि की जानकारी देने में हमारी सहायता करती है। शिक्षा के द्वारा ही हमें किसी रोग के कारण, लक्षण और उनकी रोकथाम के उपायों का पता चलता है। शिक्षा ही हमें पर्यावरण से संबंधित आवश्यक जानकारी देती है। इन सब बातों को जानने के लिए उचित शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है।

प्रश्न 6.
स्वास्थ्य शिक्षा के प्रमुख सिद्धांत कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं-
(1) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम व पाठ्यक्रम बच्चों की आयु और रुचि के अनुसार होना चाहिए।
(2) स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में जानकारी देने का तरीका साधारण और जानकारी से भरपूर होना चाहिए।
(3) स्वास्थ्य शिक्षा पढ़ने-लिखने तक ही सीमित नहीं रखनी चाहिए अपितु उसकी प्राप्तियों के बारे में कार्यक्रम बनाने चाहिएँ।
(4) स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम छात्रों की आवश्यकताओं, इच्छाओं और पर्यावरण के अनुसार होना चाहिए।
(5) स्वास्थ्य शिक्षा में स्वास्थ्य के सभी पक्षों की विस्तृत जानकारी दी जानी चाहिए।

प्रश्न 7.
स्वास्थ्य शिक्षा में सुधार के प्रमुख उपाय बताएँ।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा में सुधार के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-
(1) स्वास्थ्य शिक्षा का पाठ्यक्रम बच्चों की आवश्यकताओं एवं रुचियों के अनुसार होना चाहिए।
(2) स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रम व्यावहारिक जीवन से संबंधित होने चाहिएँ।
(3) स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी आदतें, पर्यावरण प्रदूषण, प्राथमिक उपचार, बीमारियों की रोकथाम आदि को चित्रों या फिल्मों की सहायता से समझाया या दिखाया जाना चाहिए।
(4) स्वास्थ्य शिक्षा में वाद-विवाद और भाषण आदि को अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
(5) स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्यपूर्ण कार्यक्रमों को अधिक-से-अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को नियमित डॉक्टरी जाँच और अन्य सुविधाओं से लाभ हो सके।
(6) स्वास्थ्य शिक्षा में उन सभी पक्षों को शामिल करना चाहिए, जो छात्रों के सर्वांगीण विकास में सहायक हों।

प्रश्न 8.
शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा में क्या संबंध है?
उत्तर:
शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा में परस्पर गहरा संबंध पाया जाता है। हमारा शरीर मन और आत्मा का संगठित रूप है और शिक्षा इसको सुदृढ़ करने में सहायक होती है। आज प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि उसकी वृद्धि एवं विकास शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। स्वास्थ्य शिक्षा इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होती है, क्योंकि कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है जिससे वह मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है। स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में स्वास्थ्य के प्रति चेतना जागृत करना है तथा उनमें स्वास्थ्य संबंधी विचारधाराओं में रुचि विकसित करना है। शिक्षा का उद्देश्य भी छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है और स्वास्थ्य शिक्षा के सभी उद्देश्य शिक्षा के उद्देश्यों में ही निहित हैं क्योंकि शिक्षा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। शिक्षा की तरह ही स्वास्थ्य शिक्षा भी लोगों या छात्रों के ज्ञान, भावनाओं व व्यवहार में परिवर्तन करने से संबंधित है। यह स्वास्थ्य संबंधी ऐसी आदतों को विकसित करने की ओर ध्यान देती है जो उनमें (छात्रों) तंदुरुस्त होने का अहसास उत्पन्न कर सके।

शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा में परस्पर संबंध इस तथ्य से भी स्पष्ट होता है कि आज खेल के मैदान को एक छोटा कक्षा-कक्ष’ माना जाता है, जिससे सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होते हैं। खेल के मैदान में बच्चों को अनेक सामाजिक-नैतिक गुण सीखने को मिलते हैं; जैसे सहयोग की भावना, सहानुभूति, नेतृत्व, मानवतावाद, देशभक्ति, भाईचारा, मित्रता, अनुशासन की भावना आदि। सामान्यतया शिक्षा नागरिक दायित्व का प्रशिक्षण देकर लक्ष्य को पूरा करने का प्रयास करती है। अतःस्वास्थ्य शिक्षा को शिक्षा का महत्त्वपूर्ण अंग कहा जाता है जो व्यक्ति के सभी पक्षों; जैसे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक आदि पक्षों में योगदान प्रदान करती है।

प्रश्न 9.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं। स्कूल में जाने वाले बच्चे किसी राष्ट्र को सशक्त व मजबूत बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समस्त राष्ट्र का उत्तरदायित्व उनके कोमल कंधों पर टिका होता है। इसलिए स्कूल के बच्चों का स्वास्थ्य ही स्कूल प्रणाली का महत्त्वपूर्ण तथा प्राथमिक मुद्दा है। अत: स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम वह ग्रहणित प्रक्रिया है जिसको स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं, स्वास्थ्यप्रद स्कूल जीवन और स्वास्थ्य निर्देश में बच्चों के स्वास्थ्य के विकास के लिए अपनाया जाता है। इस प्रकार स्कूल स्वास्थ्य कर्यक्रम के तीन चरण होते हैं-
(1) स्वास्थ्य सेवाएँ (Health Services),
(2) स्वास्थ्यप्रद स्कूली जीवन या वातावरण (Healthful School Living or Environment) तथा
(3) स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन (Health Instructions)।

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प्रश्न 10.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के महत्त्व पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम का महत्त्व निम्नलिखित है
(1) स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम से बच्चे अनेक बीमारियों की रोकथाम तथा उपचार के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
(2) स्कूल के दिनों में बच्चों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति अति तीव्र होती है। उनकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए ये कार्यक्रम अति-आवश्यक होते हैं।
(3) सभी स्कूली छात्र कक्षा के अनुसार लगभग समान आयु के होते हैं, इसलिए उनकी समस्याएँ भी लगभग एक-जैसी होती हैं और उनके निदान के प्रति दृष्टिकोण भी एक-जैसा ही होता है। इसलिए स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम सभी छात्रों के लिए समान रूप से उपयोगी होते हैं।
(4) स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों को पोषक तत्त्वों एवं खनिज लवणों की जानकारी की महत्ता बताई जाती है जो उनकी संपूर्ण जिंदगी में सहायक होती है।
(5) स्कूल के दिनों के दौरान विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम अनेक अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक हैं जो समाज के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 11.
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी वातावरण हेतु किन-किन मुख्य बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए?
अथवा
स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने के लिए स्कूल अध्यापक को क्या करना चाहिए?
अथवा
विद्यालय के वातावरण को स्वास्थप्रद बनाने के लिए क्या-क्या कदम उठाने चाहिएँ?
उत्तर:
स्कूल/विद्यालय छात्रों का सर्वांगीण विकास करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए स्कूल का वातावरण स्वास्थ्यपूर्ण होना चाहिए। अत: स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी वातावरण हेतु निम्नलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए-
(1) अध्यापकों को अपना पाठ्यक्रम बच्चों की इच्छाओं, आवश्यकताओं, रुचियों के अनुसार बनाना चाहिए। इसके लिए अध्यापक को अपने अनुभव का प्रयोग करना चाहिए।
(2) बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विद्यालय का भवन रेलवे स्टेशनों, सिनेमाघरों, कारखानों, यातायात सड़कों आदि से दूर होना चाहिए।
(3) बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु अध्यापकों को हमेशा तत्पर रहना चाहिए। बच्चों के संपूर्ण विकास हेतु अध्यापकों एवं छात्रों में सहसंबंध होना चाहिए।
(4) अध्यापक को विद्यालय की समय-सारणी का विभाजन छात्रों के स्तर के अनुसार करना चाहिए।
(5) स्कूल में नियमित खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन करना चाहिए और छात्रों को इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए।

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प्रश्न 12.
स्कूल के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शिक्षक/अध्यापक की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्कूल के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शिक्षक/अध्यापक निम्नलिखित प्रकार से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है-
(1) शिक्षक छात्रों को स्वास्थ्य कार्यक्रम की उपयोगिता बताकर उन्हें अपने स्वास्थ्य हेतु प्रेरित कर सकता है।
(2) वह छात्रों को व्यक्तिगत सफाई के लिए प्रेरित कर सकता है, ताकि छात्र स्वयं को नीरोग एवं स्वस्थ रख सकें।
(3) शिक्षक छात्रों को संक्रामक रोगों के कारणों एवं रोकथाम के उपायों की जानकारी दे सकता है।
(4) शिक्षक को चाहिए कि वह स्वास्थ्य शिक्षा की विषय-वस्तु से संबंधित विभिन्न सेमिनारों का आयोजन करे।
(5) वह छात्रों को अच्छी आदतें अपनाने के लिए प्रेरित करे।

प्रश्न 13.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
छात्रों को शिक्षा देने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की रक्षा करना भी विद्यालय का मुख्य उत्तरदायित्व माना जाता है। विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ, वे सेवाएँ हैं जिनके माध्यम से छात्रों के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है और उनमें पाए जाने वाले दोषों से माता-पिता को अवगत करवाया जाता है ताकि समय रहते उन दोषों का उपचार किया जा सके। इन सेवाओं के अंतर्गत स्कूल के अन्य कर्मचारियों एवं अध्यापकों के स्वास्थ्य की भी जाँच की जाती है। इनके अंतर्गत छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा प्रदान की जाती है और उन्हें सभी प्रकार की बीमारियों के लक्षणों, कारणों, रोकथाम या बचाव के उपायों की जानकारी प्रदान की जाती है। स्कूल/विद्यालय में ऐसी सुविधाओं को विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ (School Health Services) कहा जाता है। आधुनिक युग में इन सेवाओं की बहुत आवश्यकता है।

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प्रश्न 14.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं की क्यों आवश्यकता होती है?
उत्तर:
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ निम्नलिखित प्रकार से आवश्यक हैं
(1) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ छात्रों के रोगों का पता लगाने और उनकी रोकथाम व बचाव में सहायक होती हैं।
(2) ये संक्रामक व असंक्रामक रोगों के लक्षणों एवं कारणों की जानकारी देती हैं।
(3) इनसे इन रोगों की रोकथाम व बचाव के उपाय करने में सहायता मिलती है।
(4) इन सेवाओं से छात्रों, अध्यापकों व अन्य स्कूल कर्मचारियों के स्वास्थ्य के निरीक्षण में सहायता मिलती है।
(5) इनके माध्यम से रोगी बच्चों के उपचार में मदद मिलती है। (6) ये अकस्मात् दुर्घटना या रोगों के दौरान छात्रों को आपातकालीन सुविधाएँ प्रदान करती हैं।

प्रश्न 15.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं के विभिन्न कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं के विभिन्न कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ विद्यार्थियों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं।
(2) ये विद्यार्थियों के स्वास्थ्य हेतु उचित वातावरण प्रदान करती हैं और स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों का विकास करती है।
(3) ये विद्यार्थियों के स्वास्थ्य हेतु उचित अभिवृत्तियों को विकसित करने का कार्य करती हैं।
(4) ये विद्यार्थियों को अनेक प्रकार के संक्रामक व असंक्रामक रोगों की जानकारी प्रदान करती हैं और उनसे बचने के उपायों की जानकारी प्रदान करती हैं।।
(5) ये अभिभावकों को बच्चों के स्वास्थ्य की जानकारी प्रदान करती हैं।
(6) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ रोगों का पता लगाने और उनके उपचार व इलाज में सहायता करती हैं।

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प्रश्न 16.
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन या वातावरण का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

व्यक्ति या बच्चे के स्वास्थ्य पर अच्छा-बुरा माहौल बहुत अधिक प्रभाव डालता है। बच्चे के स्कूल का माहौल, रहने का स्थान और काम करने का स्थान स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। जिस देश के बच्चे और नवयुवक स्वस्थ होते हैं वह देश हमेशा प्रगति के रास्ते पर चलता रहता है, क्योंकि आने वाला भविष्य उनसे बंधा होता है। बच्चा अपना बहुत ज्यादा समय स्कूल में गुजारता है। बच्चे का उचित विकास स्कूल के माहौल पर निर्भर करता है। यह तभी संभव हो सकता है, अगर साफ़-सुथरा एवं स्वच्छ स्कूल हो। स्वस्थ माहौल बच्चे और वयस्क दोनों को प्रभावित करता है। स्वस्थ माहौल केवल छात्रों का ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावात्मक, नैतिक और बौद्धिक विकास में भी सहायक होता है।

प्रश्न 17.
स्कूल में स्वास्थ्य निर्देशन के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
स्कूल में स्वास्थ्य निर्देशन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की जानकारी देना।
(2) बच्चों को स्वास्थ्य के विषय में पर्याप्त ज्ञान देना।
(3) स्वास्थ्य संबंधी महत्त्वपूर्ण नियमों या सिद्धांतों की जानकारी देना।
(4) संक्रामक रोगों की रोकथाम के उपायों की जानकारी देना।
(5) बच्चों को अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देने हेतु प्रेरित करना।
(6) अच्छी आदतें एवं सेहत को ठीक रखने के उपाय बताना।

प्रश्न 18.
स्वास्थ्य निर्देशन के क्षेत्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य निर्देशन के क्षेत्र निम्नलिखित हैं
1. वाद-विवाद-वाद-विवाद, स्वास्थ्य निर्देशन प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण तरीका है। इसके अंतर्गत बच्चों को कोई विषय देकर वाद-विवाद करवाया जाता है।
2. भाषण-भाषण द्वारा भी बच्चों को निर्देशन प्रदान किए जाते हैं। बच्चों को एक विषय देकर अपने विचार व्यक्त करने को कहा जाता है, ताकि सुनने वाले बच्चों को भी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्राप्त हो सके।
3. रेडियो, सिनेमा, टी०वी०-बच्चों को रेडियो, सिनेमा, टी०वी० के माध्यम से भी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्रदान की जा सकती है।
4. प्रदर्शन व प्रदर्शनी-प्रदर्शन व प्रदर्शनी द्वारा भी स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान प्रदान किया जा सकता है। प्रदर्शनी में अनेक प्रकार की हृदय-श्रव्य सामग्री का प्रदर्शन किया जा सकता है।
5. स्वास्थ्य संबंधी भ्रमण एवं साहित्य-समय-समय पर छात्र-छात्राओं के स्वास्थ्य हेतु शैक्षणिक भ्रमणों की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसे भ्रमणों से उन्हें प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान प्रदान किया जा सकता है। इसके साथ ही हमें स्वास्थ्य संबंधी साहित्य की व्यवस्था स्कूल पुस्तकालय में करवानी चाहिए।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 19.
स्वास्थ्य का महत्त्व बताएँ।
उत्तर:
स्वास्थ्य का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है; जैसे-
(1) स्वास्थ्य मानव व समाज का आधार स्तंभ है। यह वास्तव में खुशी, सफलता और आनंदमयी जीवन की कुंजी है।
(2) अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी होते हैं।
(3) स्वास्थ्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुधारने व निखारने में सहायक होता है।
(4) स्वास्थ्य से हमारा जीवन संतुलित, आनंदमय एवं सुखमय रहता है।
(5) स्वास्थ्य हमारी जीवन-शैली को बदलने में हमारी सहायता करता है।
(6) किसी भी देश के नागरिकों के स्वास्थ्य व आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष संबंध पाया जाता है। यदि किसी देश के नागरिक शारीरिक रूप से स्वस्थ होंगे तो उस देश का आर्थिक विकास भी उचित दिशा में होगा।
(7) स्वास्थ्य से हमारी कार्यक्षमता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 20.
स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं के अभिकरण बताएँ।
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य स्वास्थ्य विकास और कल्याण को बढ़ावा देना है, ताकि छात्र अपनी पूरी क्षमता तक पहुंच सकें। स्वास्थ्य सेवाएँ संयुक्त रूप से स्वास्थ्य विभाग और शिक्षा विभाग द्वारा प्रदान की जाती हैं। स्कूल स्वास्थ्य सेवा टीम में सामुदायिक स्वास्थ्य नर्स और अन्य स्वास्थ्य पेशेवर शामिल होते हैं । एक सामुदायिक स्वास्थ्य नर्स आमतौर पर स्कूल की यात्रा करती है और छात्रों के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्राप्त करती है। सामुदायिक स्वास्थ्य टीम में सहयोगी स्वास्थ्य पेशेवर भी स्कूल में चल रहे कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ लिखते हुए कोई एक परिभाषा लिखें। अथवा स्वास्थ्य शिक्षा को परिभाषित कीजिए।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों या पहलुओं के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्मनिर्भर बनने में सहायता करते हैं। डॉ० थॉमस वुड के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य शिक्षा का क्या लक्ष्य है?
उत्तर:स्वास्थ्य शिक्षा का लक्ष्य न केवल शारीरिक विकास या वृद्धि तक सीमित है बल्कि इसका महत्त्वपूर्ण लक्ष्य व्यक्ति के मानसिक, भावात्मक, सामाजिक आदि पक्षों को भी विकसित करना है। इसका लक्ष्य शरीर को हानि पहुँचाने वाली बुरी आदतों से अवगत करवाना और स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों हेतु अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण में सहायता करना है।

प्रश्न 3.
विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम के विभिन्न अंग या तत्त्व कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
(1) स्वास्थ्य सेवाएँ,
(2) स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण,
(3) स्वास्थ्य निर्देश ।

प्रश्न 4.
शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य शिक्षा में क्या अंतर है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य शिक्षा में परस्पर अटूट संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं, क्योंकि आज एक ओर जहाँ स्वास्थ्य शिक्षा को शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत पढ़ाया जाता है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य शिक्षा के अध्ययन में भी शारीरिक शिक्षा के पक्षों पर जोर दिया जाता है। फिर भी इनमें कुछ अंतर है। शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत शारीरिक गतिविधियों या क्रियाओं पर विशेष बल दिया जाता है, जबकि स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

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प्रश्न 5.
विभिन्न स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) चिकित्सा परीक्षण,
(2) प्राथमिक चिकित्सा/सहायता सेवाएँ,
(3) आहार-पोषण पर विशेष ध्यान,
(4) माता-पिता को छात्रों की स्वास्थ्य रिपोर्ट की जानकारी देना,
(5) बीमार छात्रों का उपचार आदि।

प्रश्न 6.
स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम मुख्यतः कैसे होने चाहिएँ?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम रुचिकर, मनोरंजक तथा शिक्षाप्रद होने चाहिएँ, ताकि इनमें सभी बढ़-चढ़कर भाग ले सकें। ये बच्चों की रुचि, स्वास्थ्य के स्तर तथा वातावरण की आवश्यकता के अनुसार तथा व्यावहारिक भी होने चाहिएँ, ताकि इनसे स्वास्थ्य संबंधी सभी पहलुओं की उचित जानकारी प्राप्त हो सके।

प्रश्न 7.
स्वास्थ्य के विभिन्न पहलू या मापक बताइए।
उत्तर:
(1) शारीरिक स्वास्थ्य
(2) मानसिक स्वास्थ्य,
(3) सामाजिक स्वास्थ्य,
(4) आध्यात्मिक स्वास्थ्य,
(5) संवेगात्मक स्वास्थ्य।

प्रश्न 8.
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण की परिभाषा दीजिए।
अथवा
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन या वातावरण का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

प्रश्न 9.
स्कूल में स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक क्या हैं?
अथवा
विद्यालयी छात्रों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों को बताइए।
अथवा
अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आवश्यक कारक बताएँ।
उत्तर:
(1) वातावरण
(2) संतुलित व पौष्टिक आहार
(3) व्यक्तिगत स्वच्छता
(4) सामाजिक व आर्थिक कारक ।

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प्रश्न 10.
स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन क्या है?
उत्तर:
स्वास्थ्य निर्देशन का आशय है-स्कूल के बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी ऐसी जानकारी देना कि वे स्वयं को स्वस्थ एवं नीरोग बना सकें। स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों एवं दृष्टिकोणों का विकास करते हैं। स्वास्थ्य से संबंधित बाधाओं या समस्याओं के बुरे प्रभावों से बचाव के लिए ये हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

प्रश्न 11.
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
(1) बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की महत्ता की जानकारी देना।
(2) बच्चों को स्वास्थ्य के विषय में पर्याप्त ज्ञान देना।

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प्रश्न 12.
स्वास्थ्य अनुदेशन के कोई दो मार्गदर्शक सिद्धांत बताइए।
उत्तर:
(1) स्वास्थ्य संबंधी किसी विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता करवाना।
(2) स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से संबंधित साहित्य स्कूल पुस्तकालय में उपलब्ध करवाना।

प्रश्न 13.
शारीरिक स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
शारीरिक स्वास्थ्य वह स्वास्थ्य है जिसमें शारीरिक पक्ष संबंधी विशेष जानकारी दी जाती है। शारीरिक स्वास्थ्य में शारीरिक संस्थान व उनके अंगों या भागों को शामिल किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति को न केवल शरीर के विभिन्न अंगों या भागों की बनावट एवं उनके कार्यों की जानकारी होनी चाहिए, बल्कि शारीरिक अंगों या भागों को उत्तम स्वास्थ्य की स्थिति में रखने का भी ज्ञान होना चाहिए।

प्रश्न 14.
राष्ट्रीय स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय स्वास्थ्य से अभिप्राय है कि हम अपने आस-पास के वातावरण को ऐसा बनाएँ, जिससे हम उसका अधिक-से-अधिक लाभ समाज व देश को दे सकें, ताकि हमारा समाज व देश स्वच्छ एवं नीरोग हो सके। अत: यह ऐसा स्वास्थ्य है जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी पक्षों पर बल दिया जाता है। अतः हम सभी को स्वास्थ्य संबंधी पक्षों में विशेष रुचि लेनी चाहिए, ताकि देश का स्वास्थ्य उचित बना रहे।

प्रश्न 15.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
(1) छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना अर्थात् उन्हें स्वास्थ्य के नियमों से अवगत कराना। (2) उन्हें संक्रामक-असंक्रामक रोगों के कारणों और उनकी रोकथाम या बचाव के उपायों की जानकारी देना।

प्रश्न 16.
स्कूल में स्वास्थ्य शिक्षा के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर:
(1) बच्चों में ऐसी स्वाभाविक आदतों का विकास करना जो स्वास्थ्यप्रद हो
(2) छात्रों के स्वास्थ्य का निरीक्षण करना
(3) छात्रों को रोगों के बारे में विस्तृत जानकारी देना
(4) छात्रों को रोगों से बचने के उपायों की जानकारी देना।

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प्रश्न 17.
स्वास्थ्य शिक्षा के कोई दो आधारभूत नियम बताएँ।
उत्तर:
(1) स्वास्थ्य शिक्षा छात्रों में अच्छी आदतों का विकास करती है।
(2) स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम व्यावहारिक, स्वास्थ्य के स्तर एवं वातावरण की आवश्यकतानुसार होने चाहिएँ।

प्रश्न 18.
जन-साधारण को स्वास्थ्य-संबंधी उपयोगी जानकारी देने वाले माध्यम या साधन बताएँ।
उत्तर:
(1) टेलीविजन,
(2) रेडियो,
(3) वार्तालाप,
(4)भाषण,
(5) अखबार,
(6) पत्रिकाएँ एवं विज्ञापन आदि।

प्रश्न 19.
स्वस्थ व्यक्ति की क्या पहचान है? अथवा स्वस्थ व्यक्ति की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
(1) स्वस्थ व्यक्ति अपने सभी कार्य अच्छे से एवं तीव्रता से करने में समर्थ होता है,
(2) उसके शरीर में फूर्ति एवं लचकता होती है,
(3) उसके शारीरिक संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हैं और उनकी कार्यक्षमता अधिक होती है,
(4) उसका मन शांत और शरीर स्वस्थ होता है।

प्रश्न 20.
विद्यार्थियों के लिए स्वस्थ रहना क्यों अधिक महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
विद्यार्थी का मुख्य उद्देश्य शिक्षा प्राप्त करना होता है। शिक्षा प्राप्त करने हेतु विद्यार्थी का स्वास्थ्य बहुत महत्त्वपूर्ण होता है, इसलिए विद्यार्थियों के लिए स्वस्थ रहना अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अस्वस्थ विद्यार्थी के लिए शिक्षा प्राप्त करना कठिन होता है। किसी ने ठीक ही लिखा है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है। अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा ही विद्यार्थी अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकता है। अच्छी शिक्षा प्राप्त करके वह देश के विकास में अपना योगदान देता है।

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HBSE 12th Class Physical Education स्वास्थ्य शिक्षा Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-I : एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें-

प्रश्न 1.
किस शिक्षा में स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्रदान की जाती है?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा में स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्रदान की जाती है।

प्रश्न 2.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) ने स्वास्थ्य को कैसे परिभाषित किया है?
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार “स्वास्थ्य केवल रोग या विकृति की अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुख की स्थिति को कहते हैं।”

प्रश्न 3.
“स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएं प्रदान करता है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन जे०एफ० विलियम्स ने कहा।

प्रश्न 4.
“स्वास्थ्यप्रद शरीर आत्मा के लिए आरामगृह, परन्तु कमजोर व बीमार व्यक्ति के लिए कारागृह है।” यह किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन रोजर बेकन ने कहा।

प्रश्न 5.
“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कंथन अरस्तू ने कहा।

प्रश्न 6.
किसी देश का कल्याण किसके स्वास्थ्य पर निर्भर करता है?
उत्तर:
किसी देश का कल्याण उस देश के नागरिकों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।

प्रश्न 7.
स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत आने वाले कोई दो कार्यक्रमों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) एड्स जागरूकता संबंधी कार्यक्रम
(2) मेडिकल निरीक्षण कार्यक्रम।

प्रश्न 8.
प्राचीनकाल में स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध किससे था?
उत्तर:
प्राचीनकाल में स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध स्वास्थ्य निर्देशन से था।

प्रश्न 9.
आनन्दमय जीवन की कुँजी क्या है?
उत्तर:
आनन्दमय जीवन की कुँजी स्वस्थ शरीर है।

प्रश्न 10.
भारतीय बाल कल्याण परिषद् की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारतीय बाल कल्याण परिषद् की स्थापना वर्ष 1952 में हुई।

प्रश्न 11.
विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को मनाया जाता है।

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प्रश्न 12.
भारत सेवक समाज संस्था कब अस्तित्व में आई?
उत्तर:
भारत सेवक समाज संस्था वर्ष 1952 में अस्तित्व में आई।

प्रश्न 13.
प्रारंभ में स्वास्थ्य निर्देशन के अन्तर्गत किस विषय पर बल दिया जाता था?
उत्तर:
प्रारंभ में स्वास्थ्य निर्देशन के अन्तर्गत स्वास्थ्य शिक्षा पर बल दिया जाता था।

प्रश्न 14.
स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख उद्देश्य स्वास्थ्य विकास कल्याण को बढ़ावा देना है ताकि छात्र अपनी संपूर्ण क्षमता तक पहुँच सकें।

प्रश्न 15.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) की स्थापना अप्रैल, 1948 में हुई।

प्रश्न 16.
स्कूली बच्चों को स्वास्थ्य शिक्षा देने की कोई दो विधियाँ बताएँ।
उत्तर:
(1) भ्रमण द्वारा
(2) स्वास्थ्य संबंधी भाषण।

प्रश्न 17.
W.H.0. का क्या अर्थ है?
उत्तर:
World Health Organisation.

प्रश्न 18.
स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम मुख्यतः कैसा होना चाहिए?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों की आवश्यकताओं, रुचियों और पर्यावरण के अनुसार होना चाहिए।

प्रश्न 19.
स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम किसको ध्यान में रखकर तय करना चाहिए?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों की आवश्यकताओं, रुचियों और पर्यावरण को ध्यान में रखकर तय करना चाहिए।

प्रश्न 20.
“स्वास्थ्य प्रथम पूँजी है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन इमर्जन ने कहा।

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प्रश्न 21.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम तीन प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 22.
क्या स्वास्थ्य निर्देशन के अन्तर्गत शरीर के संस्थानों की जानकारी प्रदान की जाती है?
उत्तर:
हाँ, स्वास्थ्य निर्देशन के अन्तर्गत शरीर के संस्थानों की जानकारी प्रदान की जाती है।

प्रश्न 23.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
रोगों का पता लगाना और उनके उपचार में सहायता करना।

प्रश्न 24.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं का कोई एक उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:
छात्र-छात्राओं को स्वास्थ्य से संबंधी नियमों से अवगत करवाना।

प्रश्न 25.
अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन कैसा होता है?
उत्तर:
अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन शांत एवं सुखमय होता है।

प्रश्न 26.
मानसिक स्वास्थ्य का क्या अर्थ है?
उत्तर:
दबाव व तनाव से मुक्ति।

प्रश्न 27.
शहरों में स्वास्थ्य संबंधी एक प्रमुख समस्या क्या है?
उत्तर:
यातायात वाहनों की अधिकता के कारण बढ़ता प्रदूषण।

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प्रश्न 28.
‘प्रोटीन’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया?
उत्तर:
‘प्रोटीन’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम बरजेलियास ने किया।

प्रश्न 29.
भारतीय परिवार नियोजन संघ की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारतीय परिवार नियोजन संघ की स्थापना वर्ष 1949 में हुई।

प्रश्न 30.
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की स्थापना वर्ष 1920 में हुई।

भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. स्वास्थ्य का शाब्दिक अर्थ है
(A) स्वस्थ शरीर
(B) स्वस्थ दिमाग
(C) स्वस्थ आत्मा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. “स्वास्थ्य हृष्ट-पुष्ट होने की एक दशा है।” यह कथन किसके अनुसार है?
(A) डॉ० थॉमस वुड के ।
(B) विश्व स्वास्थ्य संगठन के
(C) अंग्रेज़ी पद के
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) अंग्रेज़ी पद के

3. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम किसको ध्यान में रखकर तय करना चाहिए?
(A) बच्चों की आयु और लिंग को
(B) बच्चे के स्वास्थ्य को
(C) केवल आयु को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) बच्चों की आयु और लिंग को

4. “स्वस्थ शरीर आत्मा का अतिथि-भवन और दुर्बल तथा रुग्ण शरीर आत्मा का कारागृह है।” यह कथन है
(A) रोजर बेकन का
(B) डॉ० थॉमस वुड का
(C) हरबर्ट स्पेंसर का
(D) जे०एफ०विलियम्स का
उत्तर:
(A) रोजर बेकन का

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5. निम्नलिखित में से कौन-सा विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम का अंग (चरण) है?
(A) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ
(B) स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण
(C) स्वास्थ्य निर्देश
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

6. स्वास्थ्य का आयाम है
(A) शारीरिक स्वास्थ्य
(B) मानसिक स्वास्थ्य
(C) सामाजिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

7. किसने स्वास्थ्य को ‘प्रथम पूँजी’ कहा?
(A) स्वामी विवेकानंद ने
(B) इमर्जन ने

(D) डॉ० थॉमस वुड ने
उत्तर:
(B) इमर्जन ने

8. स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य है
(A) स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान देना
(B) उचित मार्गदर्शन करना
(C) स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों का विकास करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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9. प्राचीनकाल में स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध किससे था?
(A) स्वास्थ्य सेवाओं से
(B) स्वास्थ्य अनुदेशन से
(C) स्वास्थ्य निरीक्षण से
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) स्वास्थ्य अनुदेशन से

10. भारत में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति कब बनाई गई?
(A) वर्ष 1983 में
(B) वर्ष 1988 में
(C) वर्ष 1992 में
(D) वर्ष 1999 में
उत्तर:
(A) वर्ष 1983 में

11. भारतीय बाल कल्याण परिषद् की स्थापना हुई
(A) वर्ष 1950 में
(B) वर्ष 1951 में
(C) वर्ष 1952 में
(D) वर्ष 1955 में
उत्तर:
(C) वर्ष 1952 में

12. विश्व स्वास्थ्य संगठन का मुख्यालय कहाँ स्थित है?
(A) न्यूयॉर्क में
(B) पेरिस में
(C) जेनेवा में
(D) लंदन में
उत्तर:
(C) जेनेवा में

13. साधारण जनता को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दी जाती है
(A) रेडियो द्वारा
(B) टेलीविजन द्वारा
(C) अखबार द्वारा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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14. स्कूल स्वास्थ्य प्रणाली का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्राथमिक मुद्दा है
(A) स्कूल का प्रबंधन
(B) बच्चों का स्वास्थ्य
(C) बच्चों की पढ़ाई
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) बच्चों का स्वास्थ्य

15. अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का जीवन कैसा होता है?
(A) सुखमय
(B) आरामदायक
(C) दुखदायी
(D) (A) व (B) दोनों
उत्तर:
(D) (A) व (B) दोनों

16. स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम कितने चरणों में पूरा होता है?
(A) 1
(B) 2
(C) 3
(D) 4
उत्तर:
(C)3

17. विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
(A) 7 अप्रैल को
(B) 8 मार्च को
(C) 14 अप्रैल को
(D) 15 मार्च को
उत्तर:
(A)7 अप्रैल को

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18. पोषण से होता है
(A) वृद्धि एवं विकास
(B) सहनशीलता
(C) रफ्तार
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) वृद्धि एवं विकास

19. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम मुख्यतः किसको ध्यान में रखकर तय करना चाहिए?
(A) शिक्षकों को
(B) स्कूल के अन्य कर्मचारियों को
(C) छात्रों को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) छात्रों को

20. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम होना चाहिए
(A) रुचिपूर्ण
(B) शिक्षा से भरपूर
(C) मनोरंजनात्मक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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भाग-III : रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. स्वास्थ्य एक ………………. उत्तरदायित्व है।
2. स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम ……………….. की आवश्यकता के अनुसार होने चाहिएँ।
….. के बिना हमारा शारीरिक स्वास्थ्य अधूरा है।
4. स्वास्थ्य शिक्षा छात्रों को ……………….. संबंधी जानकारी देने वाला विषय है।
5. “स्वास्थ्य शिक्षा लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े व्यवहार से संबंधित है।” यह कथन ……………. ने कहा।
6. स्वास्थ्य शिक्षा ……………….. प्रक्रिया है।
7. विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम . ……………… चरणों में पूरा होता है।
……… के बिना कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कार्य नहीं कर सकता।
9. ………………….. शिक्षा से अभिप्राय उन सभी साधनों से है जो व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान प्रदान करते हैं।
10. अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन ……………….. होता है।
उत्तर:
1. व्यक्तिगत
2. बच्चों
3. मानसिक स्वास्थ्य
4. स्वास्थ्य
5. सोफी
6. जन स्वास्थ्य संबंधी
7. तीन
8. अच्छे स्वास्थ्य
9. स्वास्थ्य
10. आनंदमय एवं सुखमय।

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स्वास्थ्य शिक्षा Summary

स्वास्थ्य शिक्षा परिचय

स्वास्थ्य (Health):
अच्छा स्वास्थ्य होना जीवन की सफलता के लिए बहुत आवश्यक है, क्योंकि अच्छे स्वास्थ्य से कोई व्यक्ति किसी निर्धारित उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हो सकता है। आरोग्य व्यक्ति को स्वस्थ कहना बहुत बड़ी भूल है। स्वस्थ व्यक्ति उसे कहा जाता है जिसकी सभी शारीरिक प्रणालियाँ ठीक ढंग से कार्य करती हों और वह स्वयं को वातावरण के अनुसार ढालने में सक्षम हो। अलग-अलग लोगों के लिए स्वास्थ्य का अर्थ भिन्न-भिन्न होता है। कुछ लोगों के लिए यह बीमारी से छुटकारा है तो कुछ के लिए शरीर और दिमाग का सुचारू रूप से कार्य करना। स्वास्थ्य का शाब्दिक अर्थ-स्वस्थ शरीर, दिमाग तथा आत्मा से चुस्त-दुरुस्त होने की अवस्था है, विशेष रूप से किसी बीमारी या पीड़ा से मुक्त रहना। अत: स्वास्थ्य कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि जीवन में उपलब्धि प्राप्त करने का साधन है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) के अनुसार, “स्वास्थ्य केवल रोग या विकृति की अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुख की स्थिति को कहते हैं।”

स्वास्थ्य शिक्षा (Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ उन सभी आदतों से है जो किसी व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं। इसका संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्म-निर्भर बनाने में सहायता करते हैं। अतः यह एक ऐसी शिक्षा है जिसके बिना मनुष्य की सारी शिक्षा अधूरी रह जाती है। डॉ० थॉमस वुड (Dr Thomas Wood) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Haryana Board

Haryana Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions

HBSE 12th Class Physical Education Solutions in Hindi Medium

HBSE 12th Class Physical Education Solutions in English Medium

  • Chapter 1 Physical Fitness and Wellness
  • Chapter 2 Training Methods
  • Chapter 3 Health Education
  • Chapter 4 Athletic Care
  • Chapter 5 Sociological Aspects of Physical Education
  • Chapter 6 Family Life Education
  • Chapter 7 Yoga Education
  • Chapter 8 Olympic Movement
  • Chapter 9 National Sports Awards

HBSE 12th Class Physical Education Syllabus

Class: XII
Subject: Physical Education

1. Unit I: Physical Fitness & Wellness
Part-A: Meaning & Definition of Physical Fitness, Method of Fitness development, Components of Physical Fitness, Factor affecting Physical Fitness, Means of Fitness development
Part-B: Practical – Athletics
History of Athletics, Track & Field (Sector) Measurements, Rules & Regulations of different Track & Field Events

2. Unit II: Training Method
Part-A: Meaning & Concept of Training, Different training methods, Methods of strength development: isometric, isotonic, isokinetic exercise, Methods of endurance development: Continuous training, Fartlek training & Interval training method, Methods of speed development: Acceleration & Pace Running, Meaning of Warming-up & Limbering down, Importance of Warming-up & Limbering down, Types & Methods of Warming-up
Part-B: Practical – Foot Ball & KHO-KHO
History of Foot Ball & KHO-KHO, Ground Measurements of Foot Ball & KHO-KHO, Rules & Regulations of Foot Ball & KHO-KHO

3. Unit III: Health Education
Part-A: Meaning & Definition of Health Education, Objectives of Health Education, Meaning of School Health Programme, Importance of School Health Programme, Components of School Health Programme – Healthful School Living – Health Services – Health Instruction, Role of teacher in School Health Programme
Part-B: Practical – Hockey & Kabaddi
Ground Measurements of Hockey & Kabaddi, Rules & Regulations of Hockey & Kabaddi

4. Unit IV: Athletic Care
Part-A: Meaning of Athletic Care, Meaning & Definition of first aid, Qualities & duties of a first aider, Common sports injuries: Causes, Symptoms & their treatment – sprain, strain, fracture, dislocation, confusion, abrasion
Part-B: Practical – Cricket & Judo
History of Cricket & Judo, Ground Measurements of Cricket & Judo, Rules & Regulations of Cricket & Judo

5. Unit V: Sociological Aspects of Physical Education
Part-A: Meaning & Definition of Sociology, Importance of Sociology in Physical Education, Meaning of Socialization, Role of Physical Education in Socialization, Effects of Social Institution on individual behaviour, Game & sports as men Cultural Heritage
Part-B: Practical – Hand Ball, Basket Ball
History of Hand Ball & Basket Ball, Ground Measurements of Hand Ball & Basket Ball, Rules & Regulations of Hand Ball & Basket Ball

6. Unit VI: Family Life Education
Part-A: Meaning of Family, Types of Family, Importance of Family as a social institution, Role of parents in child care, Preparation of Marriage, Meaning of Adolescence, Problem & Management of adolescence Problem
Part-B: Practical – VolleyBall & Wrestling
History of Volley Ball & Wrestling, Ground Measurements of Volley Ball & Wrestling, Rules & Regulations of Volley Ball &
Wrestling

7. Unit VII: Yoga Education
Part-A: Meaning & Definition of Yoga, Importance of Yoga, Elements of Yoga (Ashtanga Yog), Meaning & Types of Pranayam
Part-B: Practical – Yogic Exercise
History of Yoga, Different Asanas

8. Unit VIII: Olympic Movements
Part-A: History of Ancient & Modern Olympic Games, Rules of Participations in Modern Olympic Games, Objectives of Modern Olympic Games, Short Notes on – Olympic oath, Olympic flag, Olympic Motto, Olympic Prize, Meaning of Olympic movement
Part-B: Practical – Badminton & Table Tennis
History of Badminton & Table Tennis, Ground Measurements of Badminton & Table Tennis, Rules & Regulations of Badminton & Table Tennis

9. Unit IX: National Sports Awards
Part-A: Meaning of National sports awards, Explain the following in detail – Rajiv Gandhi Khel Ratna award – Arjuna award, Dronacharya award, Bhim award
Part-B: Practical – Boxing, Judo
History of Boxing & Judo, Ground Measurements of Boxing & Judo, Rules & Regulations of Boxing & Judo

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. देश के किस शहर में वायु प्रदूषण स्तर सबसे अधिक है?
(अ) दिल्ली
(ब) अहमदाबाद
(स) जयपुर
(द) बॉम्बे
उत्तर:
(अ) दिल्ली

2. कितने डेसिबल स्तर की ध्वानि को सुनने से कर्ण-पट्ट (eardrum) क्षतिग्रस्त हो सकता है?
(अ) 50 डेसिबल
(ब) 100 डेसिबल
(स) 150 डेसिबल या इससे अधिक
(द) 30 डेसिबल
उत्तर:
(स) 150 डेसिबल या इससे अधिक

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

3. जल प्रदूषण निरोध एवं नियंत्रण अधिनियम कब पारित किया गया?
(अ) 1971 में
(ब) 1972 में
(स) 1973 में
(द) 1974 में
उत्तर:
(द) 1974 में

4. जलाशयों में काफी मात्रा में पोषकों की उपस्थिति के कारण प्लवकीय शैवाल की अतिशय वृद्धि होती है। इसे कहा जाता है-
(अ) शैवाल प्रस्फुटन
(ब) कवक प्रस्फुटन
(स) ऐस्चुएरी
(द) बी.ओ.डी.
उत्तर:
(अ) शैवाल प्रस्फुटन

5. बंगाल का आतंक किसे कहा जाता है?
(अ) आइकोर्निया केसिपीज
(ब) वेलसनेरीया
(स) नीलाशोण
(द) क्लेमाइडोमोनास
उत्तर:
(अ) आइकोर्निया केसिपीज

6. अस्पतालों के वाहित मल में पाये जाने वाले अबंधित रोगजनक सूक्ष्मजीवों द्वारा होने वाले रोग हैं-
(अ) पेचिश
(ब) पीलिया
(स) हैजा
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

7. ‘इकौसेन’ किसे कहते हैं?
(अ) शौचालय
(ब) पालनाघर
(स) विश्वविद्यालय
(द) अभ्यारण्य
उत्तर:
(अ) शौचालय

8. बंगलोर में प्लास्टिक की बोरी के उत्पादनकर्ता हैं-
(अ) ओम बिड़ला
(ब) मुकेश अम्बानी
(स) राम जी दास मोदानी
(द) अहमद् खान
उत्तर:
(द) अहमद् खान

9. ऐसे कम्म्यूटर और इलेक्टॉनिक सामान जो मरम्मत के लायक नहीं रह जाते हैं। वे कहलाते हैं-
(अ) ई-वेस्ट्स
(ब) वी-वेस्ट्स
(स) यू-वेस्ट्स
(द) सी-वेस्ट्स
उत्तर:
(अ) ई-वेस्ट्स

10. हरियाणा किसान कल्याण क्लब का निर्माता है-
(अ) रमेश चंद्र डागर
(ब) सुरेश चंद्र नागर
(स) रमेश चंद्र डांगी
(द) दिनेश चंद्र मोगर
उत्तर:
(अ) रमेश चंद्र डागर

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

11. ग्रीन हाउस प्रभाव यदि नहीं होता तो आज पृथ्वी की सतह का औसतन तापमान 15 डिग्री सेन्टीग्रेड रहने के बजाय कितना रहता है?
(अ) -18 (शून्य से नीचे) डिग्री सेंटीग्रेड
(ब) 12 डिग्री सेंटीग्रेड
(स) 8 डिग्री सेंटीग्रेड
(द) कोई परिवर्तन नहीं होता
उत्तर:
(अ) -18 (शून्य से नीचे) डिग्री सेंटीग्रेड

12. विश्वव्यापी उष्यता को किस प्रकार नियंत्रित कर सकते हैं?
(अ) जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को कम करना
(ब) ऊर्जा दक्षता में सुधार करना
(स) वनोन्मूलन को कम करना
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

13. ओजोन की मोटाई किसमें नापी जाती है?
(अ) डॉबसन यूनिट में
(ब) डी.बी. यूनिट में
(स) डॉयसन यूनिट में
(द) डी.सी. यूनिट में
उत्तर:
(अ) डॉबसन यूनिट में

14. बड़े क्षेत्र में ओजोन की परत काफी पतली हो गई है जिसे सामान्यतः कहा जाता है-
(अ) नाइट्रोजन छिद्र
(ब) हिम अंधता
(स) ऑक्सीज छिद्र
(द) ओजोन छिद्र
उत्तर:
(द) ओजोन छिद्र

15. एक ऐसे क्षेत्र में जिसमें DDT को बड़े व्यापक रूप में इस्तेमाल किया गया था, जहाँ के पक्षियों की आबादी बहुत ज्यादा गिर गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि-
(अ) पक्षियों ने अण्डे देना बंद कर दिया
(ब) उस क्षेत्र में केंचुओं की समाति हो गई
(स) नाग-सांप सिर्फ पक्षियों का ही भोजन करते थे
(द) पक्षियों द्वारा दिये गये बहुत से अण्डों से बच्चे बाहर नहीं निकले।
उत्तर:
(द) पक्षियों द्वारा दिये गये बहुत से अण्डों से बच्चे बाहर नहीं निकले।

16. जलीय निकायों की यूट्रोफिकेशन जिसके कारण मछलियाँ मरने लगती हैं, किसकी उपलब्धता न होने के कारण होता है-
(अ) प्रकाश
(ब) आवश्यक खनिज
(स) ऑक्सीजन
(द) भोजन
उत्तर:
(स) ऑक्सीजन

17. किसी स्थान पर वृक्षों पर लाइकेनों की प्रचुर मात्रा में वृद्धि क्या संकेत देती है?
(अ) वृक्ष अत्यधिक स्वस्थ हैं
(ब) वृक्ष भारी पीड़ा से ग्रस्त हैं
(स) वह स्थान अत्यधिक प्रदूषित है
(द) वह स्थान प्रदूषित नहीं है
उत्तर:
(द) वह स्थान प्रदूषित नहीं है

18. चिपको आंदोलन किससे सम्बन्धित है?
(अ) वृक्षों की रक्षा के लिए
(ब) बाघों की रक्षा के लिए
(स) नील गाय की रक्षा के लिए
(द) मोर की रक्षा के लिए
उत्तर:
(अ) वृक्षों की रक्षा के लिए

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19. वन्यजीवों की रक्षा के लिए अद्भुत साहस और समर्पण दिखाने वाले ग्रामीण क्षेत्र के व्यक्ति को कौनसा पुरस्कार दिया जाता है?
(अ) अमृता देवी विश्नोई वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार
(ब) सीता देवी विश्नोई वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार
(स) गीता देवी विश्नोई वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार
(द) नम्रता देवी विश्नोई वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार
उत्तर:
(अ) अमृता देवी विश्नोई वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार

20. आनुवंशिक दुष्प्रभाव उत्पन्न होते हैं-
(अ) वायु प्रदूषण से
(ब) मृदा प्रदूषण से
(स) ध्वनि प्रदूषण से
(द) रेडियोएक्टिव प्रदूषण से
उत्तर:
(द) रेडियोएक्टिव प्रदूषण से

21. ठोस अपशिष्ट है-
(अ) खनन अपशिष्ट
(ब) प्लास्टिक
(स) उपरोक्त दोनों
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(स) उपरोक्त दोनों

22. ओजोन परत कौनसी हानिकारक विकिरणों को अवशोषित कर लेती है?
(अ) एक्स-किरणें
(ब) गामा-किरणें
(स) अल्ट्रा वॉयलेट विकिरण
(द) अल्ट्रा विकिरण
उत्तर:
(स) अल्ट्रा वॉयलेट विकिरण

23. पुनःचक्रण (Recycle) में किया जाता है-
(अ) अनुपयोगी से उपयोगी
(ब) उपयोगी से अनुपयोगी
(स) उपरोक्त दोनों
(द) उपरोक्त कोई नहीं
उत्तर:
(अ) अनुपयोगी से उपयोगी

24. जैवचिकित्सकीय अवशिष्ट है-
(अ) प्रयोगशाला अवशिष्ट
(ब) फार्मास्यूटीकल अवशिष्ट
(स) सुईयां व सीरिंज
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

25. विषाक (Toxic) अवशिष्ट होते हैं-
(अ) Pb
(ब) Hg
(स) Cd
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

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26. किस देश में मिनीमाटा रोग के कारण सैकड़ों जानें गई थी-
(अ) भारत में
(ब) चीन में
(स) जापान में
(द) अफगानिस्तान में
उत्तर:
(स) जापान में

27. मिनीमाटा रोग किस प्रदूषक के कारण होता है-
(अ) लेड के संक्रमण से
(ब) मर्करी के संक्रमण से
(स) ताम्बे के संक्रमण से
(द) लोहे के संक्रमण से
उत्तर:
(ब) मर्करी के संक्रमण से

28. भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाये गये सभी कानूनों की छतरी कानून (Umbrella Act) कौनसा है-
(अ) भारतीय वन कानून, 19327
(ब) जल प्रदूषण (रोकथाम एवं नियंत्रण) कानून, 1974
(स) कीटनाशक कानून, 1968
(द) पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986
उत्तर:
(द) पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
ओजोन परत को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
इसे ‘सुरक्षा छतरी’ (Umbrella Layer) भी कहते हैं।

प्रश्न 2.
कौनसे विकसित देश CFCs का सर्वाधिक उपयोग करते हैं?
उत्तर:
अमेरिका तथा यूरोपीय देश।

प्रश्न 3.
ग्लोबल वार्मिंग हेतु कौनसी गैसें उत्तरदायी हैं?
उत्तर:
CO2, CH4, CFCs, N2O इत्यादि।

प्रश्न 4.
ताप के बढ़ने से पृथ्वी पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर:
र्ध्रुवीय बर्फ पिघलेगी, जिससे समुद्र का जल स्तर बढ़ जायेगा।

प्रश्न 5.
पृथ्वी का तापमान बढ़ने से जैव विविधता पर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर:
र्जैव विविधता में तेजी से कमी आयेगी।

प्रश्न 6.
जैविक आवर्धन को समझाइये।
उत्तर:
पारा (मर्करी) एक संचयी विष है, शरीर इसका उत्सर्जन करने में असमर्थ होता है तथा उच्च पोष स्तर पर इसका सर्वाधिक सांद्रण होता है। ऐसी परिघटना को जैविक-आवर्धन कहते हैं।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

प्रश्न 7.
ध्वनि प्रदूषण से होने वाले दो दुष्प्रभाव बताइये।
उत्तर:
इससे श्रवण शक्ति कमजोर तथा आंखों की पुतली फैल जाती है जिससे दृष्टि कमजोर हो जाती है।

प्रश्न 8.
प्रदूषण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
प्रदूषण वायु, भूमि, जल तथा मृदा के भौतिक, रासायनिक या जैवीय अभिलक्षणों का एक अवांछनीय परिवर्तन है।

प्रश्न 9.
वायु प्रदूषण में कणिकीय पदार्थों को निकालने हेतु व्यापक रूप से किसका प्रयोग होता है?
उत्तर:
स्थिर वैद्युत अवक्षेपित्र (Electrostatic Precipitator)।

प्रश्न 10.
भारत में वायु प्रदूषण निरोध एवं नियंत्रण अधिनियम कब बना?
उत्तर:
1981 में लागू हुआ, परंतु 1987 में संशोधन कर शोर को भी वायु प्रदूषण के रूप में सम्मिलित किया गया।

प्रश्न 11.
अनिद्रा व हार्ट बीटिंग किससे बढ़ती है?
उत्तर:
शोर प्रदूषण से।

प्रश्न 12.
जल प्रदूषण निरेध एवं नियंत्रण अधिनियम कब पारित हुआ?
उत्तर:
सन् 1974 में।

प्रश्न 13.
घरेलू मल में मुख्यतः क्या होता है?
उत्तर:
घरेलू मल में मुख्य रूप से जैव निम्नीकरणीय कार्बनिक पदार्थ होते हैं।

प्रश्न 14.
कोई जलीय पादप का उदाहरण दो जो सुपोषी जलाशयों में अधिक वृद्धि कर पारितंत्र गति को असंतुलित करता है।
उत्तर:
जल कुम्भी (Eichhornia crassipes), इसे बंगाल का आतंक भी कहते हैं।

प्रश्न 15.
प्रदूषित जल से होने वाले रोग बताइये।
उत्तर:
पेचिश (अतिसार), टाइफाइड, पीलिया (जांडिस), हैजा (कोलेरा) आदि।

प्रश्न 16.
बिना व्यवस्थित अनुमोदन व क्षतिपूरक भुगतान के जैव संसाधनों का उपयोग करना क्या कहलाता है?
उत्तर:
बिना व्यवस्थित अनुमोदन व क्षतिपूरक भुगतान के जैव संसाधनों का उपयोग करना बायोपाइरेसी (Biopiracy) कहलाता है।

प्रश्न 17.
सी.एन.जी. का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
सी.एन.जी. का पूरा नाम संपीडित प्राकृतिक गैस (कम्प्रेस्ड नैचुरल गैस) है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

प्रश्न 18.
शैवाल प्रस्फुटन क्या है?
उत्तर:
जलाशयों में काफी मात्रा में पोषकों की उपस्थिति के कारण प्लवकीय (मुक्त-प्लावी) शैवाल की अतिशय वृद्धि होती है, इसे शैवाल प्रस्फुटन (अल्गल ब्लूम) कहा जाता है।

प्रश्न 19.
वायुमण्डल के किस भाग में ‘अच्छा’ ओजोन पाया जाता है? वायुस्तम्भ में ओजोन की मोटाई मापन की इकाई का नाम लिखिए।
उत्तर:
समताप मण्डल, डॉबसन यूनिट (DU)।

प्रश्न 20.
वाहनों में डीजल के स्थान पर संपीडित प्राकृतिक गैस (सी एन जी) का उपयोग बेहतर क्यों है? कोई दो कारण बताइये।
उत्तर:

  • सी एन जी सबसे अच्छी तरह जलती है और बहुत ही कम मात्रा में जलने से बच जाती है।
  • यह पेट्रोल या डीजल से सस्ती है, इसकी चोरी नहीं हो सकती व इसे अपमिश्रित नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 21.
स्वचालित वाहनों में सीसा रहित पेट्रोल या डीजल का उपयोग क्यों करना चाहिए?
उत्तर:
सीसा रहित पेट्रोल या डीजल का प्रयोग होने से उत्सर्जित प्रदूषकों की मात्रा कम होती है।

प्रश्न 22.
जल के उचित निकास के बिना सिंचाई, फसल की वृद्धि के लिए नुकसानदेह है। क्यों?
उत्तर:
जल के उचित निकास के बिना सिंचाई के कारण मृदा में जलाक्रांति (water logging) होती है। फसल को प्रभावित करने के साथ-साथ इससे मृदा की सतह पर लवण आ जाता है। तब यह लवण भूमि की सतह पर एक पर्पटी (crust) के रूप में जमा हो जाता है। या पौधों की जड़ों पर एकत्रित होने लगता है। लवण की बढ़ी हुई मात्रा फसल की वृद्धि के लिये नुकसानदेह है और कृषि के लिये बेहद हानिकर है। जलाक्रांति और लवणता कुछ ऐसी समस्याएँ हैं जो हरित क्रान्ति के कारण आई हैं।

प्रश्न 23.
पर्यावरण पर वनोन्मूलन से पड़ने वाला एक कुप्रभाव बताइए।
उत्तर:
वायुमण्डल में CO2 की सान्द्रता बढ़ जाती है। मृदा अपरदन तथा मरुस्थलीकरण होता है।

प्रश्न 24.
स्वचालित वाहनों में उत्प्रेरक परिवर्तक का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
ये परिवर्तक स्वचालित वाहनों में लगे होते हैं जो विषैले गैसों के उत्सर्जन को कम करते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉनिक एवं ताप प्रदूषण पर टिप्पणी लिखिए। उत्तर- इलेक्ट्रॉनिक प्रदूषण (Electronic Pollution ) – इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों जैसे टेलीविजन, कंप्यूटर व वीडियो गेम्स तथा मोबाइल, टेलीफोन से निकलने वाली अदृश्य विद्युत चुम्बकीय तरंगों के प्रदूषण को इलेक्ट्रॉनिक प्रदूषण कहते हैं।

इलेक्ट्रॉन उपकरणों से निकलने वाली अदृश्य किरणों से आँख पर ही नहीं वरन् संपूर्ण स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इन विकिरणों से नेत्र पटल के साथ-साथ मस्तिष्क तंतुओं की भी क्षति होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार कंप्यूटर पर काम करने वाली महिलाओं में गर्भपात की घटनाएँ कंप्यूटर पर कार्य न करने वाली महिलाओं की तुलना में अधिक होती हैं।

ताप प्रदूषण (Thermal Pollution ) – ताप विद्युत गृहों के यंत्रों को ठंडा करने के लिए नदी, तालाबों के जल का प्रयोग किया जाता है। शीतलन की इस प्रक्रिया के लिए प्रयुक्त जल अपने में बहुत अधिक मात्रा में ऊष्मा एकत्र करके नदियों के जल क्षेत्र में जल के तापक्रम को बढ़ाता है जिससे जलीय प्राणियों एवं वनस्पतियों के प्रजनन एवं वृद्धि पर सीधा प्रभाव पड़ता है ।

प्रश्न 2.
‘इकोसैन’ (Ecosan) शौचालयों के विषय पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
प्रायः यह धारणा है कि शौचालयों में मानव अपशिष्ट, उत्सर्ग (Excreta) यानी मलमूत्र के निपटान हेतु जल जरूरी है। इसमें अधिक मात्रा में जल खर्च होता है। अतः मलमूत्र के निपटान हेतु शुष्क टॉयलेट कम्पोस्टिंग का प्रयोग प्रारंभ किया गया है। मानव अपशिष्ट निपटान के लिए यह व्यावहारिक, स्वास्थ्यकर व कम लागत की विधि है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

कम्पोस्ट की इस विधि से मानव मलमूत्र (उत्सर्ग = Excreta) का पुनश्चक्रण कर संसाधन (प्राकृतिक उर्वरक ) के रूप में परिवर्तित किया जाता है। इससे रासायनिक खाद की आवश्यकता कम हो जाती है। केरल के कई भागों और श्रीलंका में ‘इकोसैन’ (Ecosan) शौचालयों (Toilets) का प्रयोग किया जा रहा है।

प्रश्न 3.
रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से कई पर्यावरणीय समस्याएँ जुड़ी हैं, इनके रोकथाम हेतु एक किसान को आप क्या सुझाव देंगे? तर्क सहित समझाइये।
उत्तर:
रासायनिक उर्वरकों का अधिक उपयोग भूमि को हानि पहुँचा रहा है। भूमि प्रदूषित हो रही है क्योंकि अधिकतर रसायन बिना नष्ट हुए बहुत लम्बे समय तक मिट्टी में रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पौधों के द्वारा और जल के द्वारा हमारी खाद्य श्रृंखला (food chain) में प्रवेश कर पर्यावरण को हानि पहुँचाते हैं। इससे बचने के लिए किसानों. को रासायनिक उर्वरकों का कम उपयोग करना चाहिये।

रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैव उर्वरक का उपयोग करना चाहिये । जैव उर्वरक पर्यावरण के किसी भाग को प्रदूषित नहीं करते हैं। ये रासायनिक उर्वरकों से उत्पन्न पार्श्व प्रभावों को भी उत्पन्न नहीं होने देते हैं। इनके लिए किसानों को अधिक व्यय भी नहीं करना पड़ता, इसलिये ये रासायनिक उर्वरकों की तुलना में अधिक उपयोगी व प्रभावशाली होते हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
वायु प्रदूषण के स्रोत, प्रकार एवं प्रभावों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायु गुणवत्ता का अपघटन एवं प्राकृतिक वायुमण्डलीय
परिस्थिति से मिलकर वायु प्रदूषण होता है। वायु प्रदूषक गैस या कणिकीय पदार्थ हो सकते हैं (जैसे हवा में तैरता हुआ ऐरोसोल जो कि ठोस तथा तरल से बना होता है) । वायुमंडलीय प्रदूषकों की सांद्रता वायुमंडल में उत्सर्जित कुल द्रव्यमान पर निर्भर करती है। हवा जिसमें हम सांस लेते हैं, उसमें अधिक मात्रा में O2 व N2 गैस होती है। इसमें लगभग 1 प्रतिशत में CO2 व जल वाष्प होती है।

इस 1 प्रतिशत भाग में कणिकीय पदार्थ व गैसों सहित वायु प्रदूषक हो सकते हैं। वायु प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोतों में परागकण, धूल तथा धुआँ होते हैं, जो कि वायुमंडल में उत्सर्जित होते हैं। मानवोद्भवी वायु प्रदूषक वायुमंडल में अचल तथा सक्रिय स्रोतों से प्रवेश करते हैं। अचल स्रोतों में बड़ी फैक्ट्रियाँ, विद्युत शक्ति संयंत्र, खनिज प्रगालक तथा अन्य प्रकार के लघु उद्योग होते हैं तथा सक्रिय स्रोतों में यातायात वाहनों का सड़क पर घूमना, रेल व हवा इत्यादि होते हैं।

वायु प्रदूषक दो श्रेणियों के होते हैं- प्राथमिक तथा द्वितीयक प्राथमिक प्रदूषक वायुमंडल में विविध स्रोतों के द्वारा सीधे प्रवेश करते हैं जबकि द्वितीयक प्रदूषक प्राथमिक वायु प्रदूषकों तथा अन्य वायुमंडलीय अवयवों, जैसे जल वाष्प के आपस में रासायनिक प्रतिक्रिया होने के उपरांत उत्पन्न होते हैं। प्रायः यह प्रतिक्रिया सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में होती है।

I. प्राथमिक वायु प्रदूषक तथा उनके प्रभाव (Primary Air Pollutants and their Effects)-
प्राथमिक वायु प्रदूषकों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कणकीय पदार्थ, कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)2 हाइड्रोकार्बन (HCs)2 सल्फर डाइऑक्साइड (SO2 +) तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) होते हैं। कणकीय पदार्थ ठोस कणों या तरल बूंदों (एरोसोल) के बने होते हैं, ये आकार में बहुत ही छोटे होते हैं तथा सदैव वायु में तैरते रहते हैं, जैसे- कालिख, धुआँ, धूल, ऐस्बेस्टस तंतु, कीटनाशक, कुछ धातु (Hg, Pb, Cu तथा Fe), परागकण इत्यादि ।

ये मानव के श्वसन तंत्र को उत्तेजित कर देते हैं जिससे दमा, श्वसनी शोथ आदि बीमारियाँ हो जाती हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) जीवाश्मी ईंधन के पूर्ण रूप से नहीं जलने पर बनता है। 50 प्रतिशत CO का उत्सर्जन ऑटोमोबाइल से होता है। वैसे CO वायुमंडल में कम समय रहती है तथा इसका ऑक्सीकरण होकर CO2 बन जाती है।

CO हानिकर होती है, श्वसन के साथ अंदर जाकर यह रक्त की ऑक्सीजन ढोने की क्षमता को घटाती है। हाइड्रोकार्बन (HCs) या वाष्पशील जैविक कार्बन (VOCs ) संयुक्त हाइड्रोजन तथा कार्बन के बने होते हैं। HCs प्राकृतिक रूप से कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के समय एवं खास प्रकार के पौधे से उत्पन्न होते हैं (जैसे चीड़ के वृक्ष )।

मिथेन (CH4) वायुमंडल में प्रचुर मात्रा में भूमि से निकला हाइड्रोकार्बन है। यह बाढ़ वाले धान के खेतों तथा दलदल से उत्पन्न होता है। हाइड्रोकार्बन जीवाश्मी ईंधन के जलने (पेट्रोलियम तथा कोयला) से भी उत्पन्न होता है। सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) सल्फर युक्त कोयला जलाने पर, अयस्क प्रगालक तथा तेल शोधकों से उत्सर्जित होते हैं। SO2 की वायुमंडल में उच्च सांद्रता गंभीर श्वसन समस्या पैदा करती है तथा पौधों के लिए भी अधिक हानिकर होती है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) मुख्यत: जीवाश्मी ईंधन के उच्च ताप पर ऑटोमोबाइल इंजन में जलने पर N2 व O2 से बनता है। NO तथा NO2 के अनिश्चित मिश्रण का नाम NOx है। NOx लाल भूरे रंग की धुंध (भूरी हवा) भीड़-भाड़ वाले शहरी क्षेत्र के यातायात की वायु में रहती है जो हृदय तथा फेफड़े की समस्या को बढ़ाती है। यह कारसिनोजनिक भी हो सकती है। NOx अम्ल वर्षा को बढ़ाती है।

II. द्वितीयक वायु प्रदूषक तथा उनके प्रभाव (Secondary Air Pollutants and their Effects)- प्रकाशरासायनिक धूम कोहरा – जहाँ अधिक यातायात रहता है। वहाँ गर्म परिस्थितियों तथा तेज सूर्य विकिरण से प्रकाश रासायनिक धूम कोहरा का निर्माण होता है। इसका निर्माण ओजोन (O3), पेरोक्सिएसिटाइल नाइट्रेट (PAN) तथा NOx से होता है। ओटोमोबाइल निर्वातक में HC तथा NO रहता है एवं ये शहरी पर्यावरण में O3 तथा PAN के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाते हैं। धूम कोहरे के निर्माण को निम्न क्रियाओं द्वारा बताया जा रहा है-
इंजन के अंदर की प्रतिक्रियाएं-
N2 + O → 2NO2
वायुमंडल में होने वाली प्रतिक्रियाएं-
2NO + O2 → 2NO2
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे 1

धूम कुहरा ओजोन पौधों व जंतु जीवन को हानि पहुँचाता है। पौधों की पत्तियों को हानि पहुँचाता है। ओजोन मनुष्यों में फेफड़े के रोग उत्पन्न करती है। O3 एक प्रभावकारी ऑक्सीकारक है। यह पुरानी इमारतों-स्मारकों, संगमरमर की मूर्तियों को संक्षारित कर सांस्कृतिक धरोहर को नुकसान पहुँचाता है। PAN के प्रभाव से क्लोरोप्लास्ट नष्ट हो जाता है जिससे प्रकाश संश्लेषण की क्षमता कम होकर पौधों का विकास बाधित होता है। PAN से मानव नेत्र में उत्तेजना पैदा हो जाती है।

अम्ल वर्षा (Acid Rains) नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), VOCS तथा SO2 का उत्पादन कोयला (उद्योगों में) तथा पेट्रोलियम (ऑटोमोबाइल में) के जलने से होता है। आसमान में प्रकाश होने से NO2 का प्राकृतिक रूप से उत्पादन होता है। ये गैसें हवा में अतिप्रतिक्रियात्मक होती हैं व शीघ्र ही अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाती हैं (सल्फ्यूरिक अम्ल व नाइट्रिक अम्ल) ।

ये आसानी से जल में घुलनशील होते हैं तथा पृथ्वी पर घुलकर अम्ल वर्षा के रूप में आ जाते हैं। साधारणतः वर्षा का जल थोड़ा अम्लीय होता है ( pH 5.6-6.5), क्योंकि जल तथा CO2 वायु में मिलकर कमजोर अम्ल का निर्माण करते हैं। अम्ल वर्षा का pH 5.6 से भी कम हो सकता है। अम्ल वर्षा ऐतिहासिक इमारतों, धरोहर स्मारकों (आगरा का ताजमहल) का संरक्षण कर हानि पहुँचाती है।

अम्ल वर्षा का ‘उष्णकटिबंधीय तथा जलीय वनस्पतियों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अधिकतर मोलस्का तथा मछलियाँ 50 pH से कम वाले जल को सहन नहीं कर सकतीं। कम pH मृदा के जीवाणु समुदाय को नष्ट कर देती है।

प्रश्न 2.
मृदा तथा ध्वनि प्रदूषण के प्रकार एवं नियंत्रण के उपाय बताइये ।
उत्तर:
(1) मृदा प्रदूषण (Soil Pollution ) – वस्तुतः मृदा या भूमि प्रदूषण मनुष्यों की विभिन्न क्रियाओं जैसे अपशिष्टों का जमाव, कृषि रसायनों का उपयोग, खनन कार्य तथा शहरीकरण का परिणाम है। इसे निम्न बिंदुओं के अंतर्गत समझाया जा रहा है-

(i) अपशिष्ट (Waste Dumps ) – औद्योगिक अपशिष्ट जल, नगरीय, मेडिकल एवं अस्पतालों के अपशिष्टों को फेंकने से भूमि प्रदूषित हो जाती है। इन अपशिष्टों में विद्यमान कार्बनिक, अकार्बनिक रासायनिक मिश्रण एवं भारी धातु मृदा प्रदूषण करती हैं। औद्योगिक उत्सर्जन के गिरने से तथा ताप ऊर्जा संयंत्र से निकलने वाला फ्लाई ऐश (राख) आस-पास के पर्यावरण को दूषित करता है। औद्योगिक उत्सर्जन के लिए लगाए गए ऊँची चिमनी से निकले कणकीय पदार्थ जल्दी से पृथ्वी की सतह पर आकर बैठ जाते हैं।

नाभिकीय परीक्षण प्रयोगशालाओं, नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र तथा नाभिकीय विस्फोट से निकले अपशिष्ट विकिरण मृदा को संक्रमित करते हैं। रेडियो विकिरण पदार्थ भूमि में लंबे अंतराल तक रह सकते हैं, क्योंकि उनका आधा जीवन साधारणतः लंबा होता है। उदाहरणार्थ स्ट्रान्शयम – 90 का आधा जीवन 28 वर्ष का तथा केसियम 137 ( Cacsium) का 30 वर्षों का होता है।

(ii) नगरीय अपशिष्ट (Municipal Wastes ) – इसके अंतर्गत घरेलू तथा रसोई, बाजार के अस्पताल के, पशुओं व पोल्ट्री के एवं कसाईखानों के अपशिष्ट आते हैं। इनमें से कुछ अपशिष्टों का जैविक अपघटन नहीं होता है जैसे पोलिथीन बैग, अपशिष्ट प्लास्टिक शीट, बोतलें आदि । अस्पताल के अपशिष्टों में कार्बनिक पदार्थ, रासायनिक पदार्थ, धातु की सुइयाँ, प्लास्टिक तथा शीशे की बोतलें आदि होते हैं। घरेलू सीवेज तथा अस्पताल के कार्बनिक अपशिष्टों के गिराने से पर्यावरण संक्रमित हो जाता है तथा रोगाणु मनुष्य के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालते हैं।

(iii) कृषि रसायन (Agro-chemicals) – वर्तमान में कृषि प्रणाली में कीट एवं खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिये अत्यधिक कीटनाशक व खरपतवार नाशक रसायनों का उपयोग किया जाता है। अत्यधिक अकार्बनिक उर्वरकों तथा जैवनाशकों के अवशेष, भूमि एवं भूमिगत जल संसाधनों को संक्रमित कर देते हैं।

अकार्बनिक पोषकों, जैसे-फॉस्फेट तथा नाइट्रेट घुलकर जलीय पारिस्थितिक तंत्र में आ जाते हैं तथा सुपोषण को बढ़ाते हैं। नाइट्रेट पेयजल को भी प्रदूषित करता है। अकार्बनिक उर्वरक तथा कीटनाशक अवशेष मृदा के रासायनिक गुणों को बदल देते हैं तथा मृदा जीवों पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

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(iv) खनन ऑपरेशन (Mining Operations ) – विवृत खनन (एक प्रक्रिया जहां धरती की सतह का खनन कर भूमिगत जमा पदार्थ को निकाला जाता है) से ऊपरी भूमि का पूरी तरह नुकसान होता है। तथा संपूर्ण क्षेत्र जहरीली धातु एवं रसायन से संक्रमित हो जाता है।

मृदा प्रदूषण का नियंत्रण (Control of soil pollution) – मृदा या भूमि प्रदूषण के नियंत्रण के अंतर्गत सुरक्षित भूमि उपयोग, योजनाबद्ध, शहरीकरण, नियंत्रित विकास कार्यक्रम, सुरक्षित डिस्पोजल (disposal) तथा मानव आवास स्थल एवं उद्योगों के ठोस अपशिष्टों का प्रबंधन किया जाता है। ठोस अपशिष्टों के प्रबंधन के अंतर्गत निम्नलिखित उपाय किये जाते हैं-

  • अपशिष्टों को एकत्र करना तथा उनका वर्गीकरण करना।
  • खराब धातुओं तथा प्लास्टिकों जैसे संसाधनों को एकत्र कर उसे पुनः चक्रण के पश्चात् फिर से उपयोग करना तथा
  • पर्यावरण को कम से कम हानि पहुँचाते हुए उसे फेंकना।

मल जल तथा औद्योगिक ठोस अपशिष्ट का उपयोग भूमिभरण के लिए किया जाता है। विषैले रसायन तथा हानिकारक धातु जिसमें अपशिष्ट रहते हैं, सड़क बनाने में बिछाने वाली सामग्री के रूप में उपयोग कर लिया जाता है। फ्लाई राख का उपयोग भी इसी उद्देश्य हेतु किया जाता है।

फ्लाई राख से ईंट बनाकर भवन निर्माण में उपयोग करते हैं। ठोस अपशिष्टों से छुटकारा पाने का अन्य महत्वपूर्ण तरीका भस्मीकरण (O2, की उपस्थिति में दहन ) एवं ताप अपघटन (O2) की अनुपस्थिति में दहन) है। नगरीय ठोस अपशिष्ट को कृषि के कार्बनिक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है।

(2) ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution ) – तेज विक्षोभी ध्वनि को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। ध्वनि तरंगों में चलती है तथा हमारे कर्ण पटल को प्रभावित करती है। ध्वनि तरंग की तीव्रता औसत दर प्रति इकाई क्षेत्र, जिस पर ऊर्जा तरंगें स्थानान्तरित होकर सतह पर आती हैं, पर निर्भर करती है। ध्वनि की मापन इकाई डेसीबल (Decibel = dB) होती है, इसे यह नाम एलेक्जेंडर ग्राहम बेल के कार्य की सराहना पर दिया गया।

मानव द्वारा उत्पन्न शोर, औद्योगिक मशीनों, यातायात वाहनों, ध्वनि प्रवर्धक पटाखों को जलाने, औद्योगिक तथा लघु स्थानों पर अधिस्फोटन से होता है। जेट एयरक्राफ्ट के उतरने या उड़ान भरने के समय बहुत अधिक ध्वनि प्रदूषण हवाई अड्डे के आस-पास होती है। शोर के अनेक दुष्प्रभाव मानव की शरीर क्रिया पर पड़ते हैं।

शोर दिल की धड़कन, पेरीफरल संवहन तथा श्वसन तरीकों पर गहन प्रभाव डालते हैं। निरंतर शोरगुल वाले पर्यावरण से गुस्सा, उत्तेजनशीलता, सिरदर्द एवं अनिद्रा तथा मनुष्य की कार्यक्षमता पर गंभीर प्रभाव डालते हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल द्वारा क्षेत्र के अनुसार परिवेशीय शोर का स्तर निम्न सारणी में दिया गया जा रहा है-

सारणी- क्षेत्रानुसार परिवेश शोर स्तर की अनुमति

क्षेत्रदिन (6.00-21.00 hr.)रात्रि (21.00-6.00hr.)
उद्योग70 bB70 bB
व्यापारिक65 bB55 bB
आवास स्थल55 bB45 bB
शांत क्षेत्र00 bB40 bB

ध्वनि प्रदूषण का नियंत्रण (Control of Noise Pollution ) – ध्वनिरोधी इंसुलेटिंग जैकेट या छन्ना का उपयोग मशीन से होने वाली ध्वनि को कम कर सकता है। औद्योगिक कर्मचारियों एवं रनवे ट्रैफिक कर्मचारियों को कर्णमफ (Ear Muff) का उपयोग करना चाहिए। अधिक ध्वनि उत्पन्न करने वाले यंत्रों, लाउडस्पीकर तथा विवाह पर डी. जे. पार्टी पर उचित ध्वनि तक के उपयोग हेतु कानूनी सहायता से नियंत्रण करना आवश्यक है।

प्रश्न 3.
ओजोन छिद्र व ओजोन ह्रास के प्रभाव को समझाइये ।
उत्तर:
सन् 1956-1970 के दौरान अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत की मोटाई 280 से 325 डोबसन इकाई थी। [1 डोबसन इकाई (DU) = 1 ppb]। 1979 में यह 136 DU थी व 1994 में 94 DU रह गई।
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इस ह्रास को ओजोन छिद्र कहा गया, इसकी खोज 1985 में अंटार्कटिका के ऊपर की गई थी। CFCs, N2O व CH2 का बिखरना O3 को नष्ट करता है। ध्रुवीय समतापमंडल बादल कम तापमान पर क्लोरीन को स्वतंत्र क्रिया करने के लिए सतह प्रदान करते हैं। ओजोन ह्रास क्रियाएं बहुत तेज होती हैं।

सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में तथा अंटार्कटिक में बसंत की शुरुआत में बर्फ जमने के समय क्लोरीन ओजोन अणुओं पर आक्रमण करती है। फलस्वरूप अंटार्कटिका में O3 घटना शुरू हो जाता है। आर्कटिक समतापमंडल बसंत में जल्दी गर्म तथा ठंडा होता है तथा सूर्य प्रकाश के क्रांतिक अति व्याप्ति का समय कम हो जाता है जो कि O3 ह्रास हेतु आवश्यक है।

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ओजोन ह्रास का प्रभाव- समतापमंडलीय O3 परत पराबैंगनी विकिरणों को अवशोषित कर लेती है, इससे इन विकिरणों की मात्रा पृथ्वी सतह पर आने से कम हो जाती है। मनुष्यों में पराबैंगनी के बढ़ने से मोतियाबिंद, त्वचा कैंसर, मेलानोमा आदि की घटना बढ़ जाती है। पराबैंगनी – बी (UV-B) विकिरणों के संपर्क में ज्यादा आने से मानव के भीतर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।

UV- B की मात्रा बढ़ने से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है। व सजीवों में न्यूक्लियक अम्ल नष्ट हो जाते हैं। UV-B विकिरणों से पादप प्लवकों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया अवरोधित होती है, जिससे उत्पादकता घट जाती है अर्थात् पूरी जैव आहार श्रृंखला प्रभावित होती है, उदाहरण जूप्लैंकटोन, क्रील, ऐस्क्पीड, मछली तथा व्हेल इत्यादि।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. अंटर्कटिक क्षेत्र में हिम-अंधता किस कारण होती है? (NEET-2020)
(अ) UV-B विकिरण की उच्च मात्रा के कारण कॉर्निया का शोध
(ब) हिम से प्रकाश का उच्च परावर्तन
(स) अवरक्त किरणों द्वारा रेटीना में क्षति
(द) निम्न ताप द्वारा आँख में द्रव के जमने के कारण
उत्तर:
(अ) UV-B विकिरण की उच्च मात्रा के कारण कॉर्निया का शोध

2. सन् 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल किस पर नियंत्रण के लिए हस्ताक्षरित किया गया था? (NEET-2020)
(अ) ओजोन को क्षति पहुँचाने वाले पदार्थों का उत्सर्जन
(ब) हरित गृह गैसों का छेड़ना
(स) e-वेस्ट (c कृड़ा करकट) का निययन
(द) एक देश से दूसरे देश में आनुव्वंशिकतः रूपान्तरित जीवों के परिवहन के लिए
उत्तर:
(अ) ओजोन को क्षति पहुँचाने वाले पदार्थों का उत्सर्जन

3. पॉलिब्लेंड पुनश्चक्रित रूपान्तरित प्लास्टिक का महीन पाठडर है जो निम्नलिखित में से किसके लिए एक सुयोग्य पदार्थ के रूप में पुष्टिकृत हुई है- (NEET-2019)
(अ) नलियाँ और पाइप बनाने में
(ब) प्लास्टिक की थैलियाँ बनाने में
(स) उर्वरक के रूप में
(द) सड़क के निमांण में
उत्तर:
(द) सड़क के निमांण में

4. निम्नलिखित में से गैसों का कौनसा युग्म हरित गृह प्रभाव के लिए मुख्य रूप में उत्तरदायी है- (NEET-2019)
(अ) कार्बन डाइऑक्साइड और मिथेन
(ब) ओजोन और अमोनिया
(स) ऑक्सीजन और नाइट्रोजन
(द) नाइट्रोजन और सल्फरडाइऑक्साइड
उत्तर:
(अ) कार्बन डाइऑक्साइड और मिथेन

5. निम्न में से कौनसी विधि नाभिकीय अपरिश्षों के निपटान के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है ? (NEET-2019)
(अ) अपशिष्ट को पृथ्वी की सतह के नीचे गहरी चट्ट्यनों में दबा कर
(ब) अपशिष्ट को अंतरिक्ष में दाग देना
(स) अपशिष्ट को अंटार्काटिक में हिम आच्छादन में दबा देना
(द) अपशिष्ट को गहरे महासागर के नीचे चट्टानों में डाल देना
उत्तर:
(अ) अपशिष्ट को पृथ्वी की सतह के नीचे गहरी चट्ट्यनों में दबा कर

6. निम्नलिखित में से कौनसा एक द्वितीयक प्रदूपक है? (DUMET-2009, NEET-2018)
(अ) SO2
(ब) CO2
(स) CO
(द) O3
उत्तर:
(द) O3

7. समताप मंडल में, ओजोन के विकृतिकरण और आप्किक ऑक्सीजन की विमुक्ति में निम्नलिखित में से कौनसा तत्व उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है? (NEET-2018)
(अ) Fe
(ब) Cl
(स) कार्बन
(द) ऑक्सीजन
उत्तर:
(ब) Cl

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8. विश्व ओजोन दिवस कब मनाया जाता है? (NEET-2018)
(अ) 16 सितम्बर
(ब) 21 अप्रैल
(स) 5 जून
(द) 22 अप्रैल
उत्तर:
(अ) 16 सितम्बर

9. निम्नलिखित में से किसमें बहिः इसावों के कारण प्रदुषित होने वाले जल निकायों में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) प्रदूषण के लिए एक अच्छा सूचक नहीं है? (NEET-2016)
(अ) पेट्रोलियम उद्योग
(ब) शर्करा उद्योग
(स) घरेलू वाहित मल
(द) दुग्ध उद्योग
उत्तर:
(अ) पेट्रोलियम उद्योग

10. एक नदी में जब कार्बनिक अपशिष्ट से भरपूर घरेलू वाहित मल बह्कर गिरता हो, ते उसका परिणाम क्या होगा? (NEET I-2016)
(अ) बायोडिग्रेडेबल पोषण के कारण मछली का उत्पादन बढ़ जएगा
(ब) ऑक्सीजन की कमी के कारण मह्हलियाँ मर जाएंगी
(स) शैवाल प्रस्कुटन के कारण नदी जल्दी ही सूख जाएगी
(द) जलीख भोजन की समम्टि में वृद्धि हो जाएगी
उत्तर:
(ब) ऑक्सीजन की कमी के कारण मह्हलियाँ मर जाएंगी

11. अम्लीय वर्षा वात्तावरण में किसकी सान्द्रता की अधिकता के कारण होती है? (Orissa JEE-2011, WB JEE-2011, NEET-2015)
(अ) SO3 और CO
(ब) CO2 और CO
(स) O3 और धूल
(द) SO2 और NO2
उत्तर:
(द) SO2 और NO2

12. निम्नलिखित में से कौन एक पर्यावरण में SO2 प्रदूषण का योग्य संकेतक है ? (NEET-2015)
(अ) शंकुधारी
(ब) शैवाल
(स) कवक
(द) लाइकेन
उत्तर:
(द) लाइकेन

13. वायुमण्डल का वह क्षेत्र जिसमें ओजोन परत उपस्थित है, उसे क्या कहा जाता है? [CBSE PMT (Mains)-2011, NEET-2014]
(अ) आयनमंडल
(ब) मध्यमंडल
(स) समतापमंडल
(द) क्षोभमंडल
उत्तर:
(स) समतापमंडल

14. एक रासायनिक प्रौद्योगिक संस्थान के निकास में लगा हुआ स्क्रबर क्या हटाता है? (NEET-2014)
(अ) सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैस
(ब) 5 माइक्रोमीटर के या इससे बड़े कणिकीय पदार्थ
(स) ओजोन और मीथेन जैसी गैस
(द) 2.5 माइक्रोमीटर के या इससे छोटे कणिकीय पदार्थ
उत्तर:
(अ) सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैस

15. वैस्किक उष्प का नियंत्रण किया जा सकता है- (NEET-2013)
(अ) वनोन्मूलन को कम करके, जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करके
(ब) पेड़ें को लगाना कम करके, जीवाश्म ईंचन का उपयोग बढ़ करके
(स) वनोन्मूलन में वृद्धि करके, जनसंख्या वृद्धि की दर को कम करके
(द) वनोन्मूलन में वृद्धि करके, ऊर्जा के उपयोग की कारगरता को कम करके
उत्तर:
(अ) वनोन्मूलन को कम करके, जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करके

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16. जल सुपोषण होना प्रायः किसमें देखा जाता है? [PMT-2005, NEET-2011, CBSE PMT (Pre)-2011]
(अ) मरुस्थलों में
(ब) अलवणीय झीलों में
(स) महासागर में
(द) पहाड़ों में
उत्तर:
(ब) अलवणीय झीलों में

17. भोपाल ग्रासदी के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौनसा एक कथन गलत है? [CBSE PMT (Pre)-2011, NEET-2011]
(अ) मेथिल आइसो सायनेट गैस का रिसाव हुआ था
(ब) हजारों लोग मर गए थे
(स) पूरे भोपाल पर रेंडियोएक्टिव अवपात छा गया था
(द) यह दिसम्बर 2/3/1984 की रात हुआ था
उत्तर:
(स) पूरे भोपाल पर रेंडियोएक्टिव अवपात छा गया था

18. dB एक मानक संकेताक्षर है जिसका उपयोग निम्नलिखित में से किस एक का मात्रात्मक अभिव्यकि के लिए किया जाता है? [NEET-2010, CBSE PMT (Pre)-2010]
(अ) एक विशिष्ट पीड़काशी की
(ब) किसी माध्यम में बैक्टीरिया के घनत्व की
(स) एक विशिष्ट प्रदूषक की
(द) किसी संवर्धन में प्रभावी बेसिलस की
उत्तर:
(स) एक विशिष्ट प्रदूषक की

19. द्वितीयक प्रदूषक जो हिल अभिक्रिया को रोकता है, वह है- (Kerala CET-2002, CPMT-2010)
(अ) गंधक का अम्ल
(ब) नाइट्रिक अम्ल
(स) परऑॅक्सीऐसेटाइल नाइट्रेट (PAN)
(द) एल्डिहाइडस
उत्तर:
(स) परऑॅक्सीऐसेटाइल नाइट्रेट (PAN)

20. किसी नदी के जल की BOD के संबंध में क्या सही है- (AIIMS-2008; CBSE PMT-2009)
(अ) इसके जल के अंदर साल्मोनेला के माप का पता चलता है
(ब) यह तब एक समान बनी रहती है जब ऐल्गाल ब्लूम (शैवाल प्रस्फुटन) होता है
(स) यह तब बढ़ जाती है जब नदी के जल में मल-जल मिल जाता है
(द) इसके जल के अंदर की ऑक्सीजन-सांद्रता से कोई संबंध नहीं है
उत्तर:
(स) यह तब बढ़ जाती है जब नदी के जल में मल-जल मिल जाता है

21. अधिक समता मुक्त उपकरण जो कि औचोगिक उत्सर्जित पदार्थों (Emission) से पार्टोकुलेर मैटर को हटाता है- (Kerala PMT-2009)
(अ) साइक्लोनिंग सेप्रेटर
(ब) ट्रेजेक्टरी सेप्रेटर
(स) पाइरोलिसिस
(द) इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रेसिपिटेटर
उत्तर:
(द) इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रेसिपिटेटर

22. वायु प्रदूषण के नियंत्रण के लिए भारत सरकार द्वारा उठाये गये कदमों में सम्मिलित है- (NEET-2009, CBSE PMT-2009)
(अ) पेट्रोल में 20% इथाइल एल्कोहॉल और डीजल में 20% बायोडीजल अनिवार्य रूप से मिलाया जाना।
(ब) पेट्रोल चलित वाहनों का अनिवार्य PUC (Pollution Under Control) प्रमाण पत्र दिया जाना जिसमें कार्बन मोनो ऑक्साइड तथा हाइड्रो कार्बनों का परीक्षण होता है।
(स) वाहनों के लिए ईंधन के रूप में केवल ऐसे शुद्ध डीजल के उपयोग की अनुमति देना जिसमें अधिकतम सल्फर 500 PPM तक हो।
(द) समस्त बसों और ट्रकों द्वारा केवल अप्रदूषणकारी सम्पीडित प्राकृतिक गैसों (CNG) का उपयोग किया जाना।
उत्तर:
(द) समस्त बसों और ट्रकों द्वारा केवल अप्रदूषणकारी सम्पीडित प्राकृतिक गैसों (CNG) का उपयोग किया जाना।

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23. आटोमोबाइल निष्कासन में सबसे हानिकारक धात्विक प्रदूषक है- (Pb PMT-2000; MP PMT-2002; BHU-2008)
(अ) पारा (Hg)
(ब) लैड (Pb)
(स) कैडमियम (Cd)
(द) कॉपर (Cu)
उत्तर:
(ब) लैड (Pb)

24. ऊर्जा के विकिरण से तापक्रम का बढ़ना जिसे ओजोन CO2 एवं जलवाष्प से निर्धाति किया जाता है, कहलाता है- (J\&K CET-2008)
(अ) रेडियो सक्रियता
(ब) ओजोन प्रभाव
(स) सौर अभिक्रिया
(द) ग्रीन हाउस प्रभाव
उत्तर:
(द) ग्रीन हाउस प्रभाव

25. कोयला ईंधन वाले बिजली संयंत्र में विद्युत स्थैतिक प्रेसिपिटेटर्स किसके निष्कासन को रोकने के लिए लगाए जाते हैं? (CBSE PMT-2007, NEET-2007)
(अ) CO
(ब) SO2
(स) NOx
(द) SPM
उत्तर:
(द) SPM

26. वायुमण्डल में O3 की परत किससे नष्ट होती है या कौनसा रासायनिक पदार्थ वायुमण्डल में ओजोन की मात्रा को कम करने के लिये उत्तरदायी है- (CPMT-2009; MP PMT-2006: DPMT-2006)
(अ) HCl अम्ल
(ब) फोटोकेमिकल स्रोत
(स) क्लोरोफ्लोरो कार्बन
(द) SO2
उत्तर:
(स) क्लोरोफ्लोरो कार्बन

27. गैसें जिन्हें ग्रीन हाउस गैसें कहते हैं, वे हैं- (BHU-2003; CPMT-2003; RPMT-2006)
(अ) CO2, O2, NO2, NH2
(ब) CFC, CO2, NH3, N2
(स) CH4, N2, CO2, NH3
(द) CFC, CO2, CH4, NO2
उत्तर:
(द) CFC, CO2, CH4, NO2

28. माँट्रियल प्रोटेकॉल जिसमें ओजोन परत को मानव क्रियाक्लापों से सुरक्षित बचाए रखने के लिये कार्यवाही करने को कहा गया है, किस वर्ष में पारित किया गया था- (NEET-2006; CBSE PMT-2006)
(अ) 1985
(ब) 1986
(स) 1987
(द) 1988
उत्तर:
(स) 1987

29. निम्न में से कौनसी रणनीति ग्लोबल वार्मिंग के लिये उपयोगी नहीं है- (AMU-2005)
(अ) जीवाश्म ईंधनों का सीमित मात्रा में उपयोग करना
(ब) वनों में वृद्धि
(स) नाइट्रोजन उर्वरकों के उपयोग में वृद्धि
(द) CFC के स्थान पर अन्य विकल्पों का उपयोग करना
उत्तर:
(स) नाइट्रोजन उर्वरकों के उपयोग में वृद्धि

30. वह प्रक्रम जिसमें जल के पोषण की प्रचुरता के कारण एक या कुछ जीवों में अत्यधिक वृद्धि का होना तथा साथ ही जाति विविधता में कमी कहलाती है- (AMU-2005)
(अ) जैवीय आवर्धन (Biological magnification)
(ब) जाति प्रमोशन (Species promotion)
(स) सुपोषण (Eutrophication)
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) सुपोषण (Eutrophication)

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31. DDT होता है- (MP PMT-2004; AIIMS-2005)
(अ) विघटित न होने वाला प्रदूषक
(ब) विघटित होने वाला प्रदूषक
(स) एन्टीबायोटिक
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) विघटित न होने वाला प्रदूषक

32. CFC फ्रीजों में उपयोग हेतु अनुमोदित नहीं किये जाते हैं क्योंकि वे- (DPMT-2003; BVP-2004)
(अ) तापक्रम बढ़ाते हैं
(ब) ओजोन को कम करते हैं
(स) पर्यावरण प्रभावित करते हैं
(द) मानव शरीर को प्रभावित करते हैं
उत्तर:
(ब) ओजोन को कम करते हैं

33. ग्रीन हाउस प्रभाव संबंधित है- (CPMT-2004)
(अ) पृथ्वी के शीतलन से
(ब) पृथ्वी के गरम होने से
(स) UV को ग्रहण करने से
(द) अनाज उत्पादन से
उत्तर:
(ब) पृथ्वी के गरम होने से

34. सुपोषण निम्न के कारण होता है- (MHCET-2004)
(अ) अम्ल वर्षा
(ब) नाइट्रेट्स और फॉस्फेट्स
(स) सल्फेट्स और कार्बोनेट्स
(द) CO2 और CO
उत्तर:
(ब) नाइट्रेट्स और फॉस्फेट्स

35. ‘जैविक आवर्धन’ प्रदर्शित करता है- (Kerala PMT-2004)
(अ) भोजन के उपयोग के कारण जीवों में वृद्धि
(ब) समष्टि के परिणाम में वृद्धि
(स) मनुष्य द्वारा वायुमण्डलीय मुद्दों को बढ़ाना
(द) अनिम्नीकरणीय प्रदूषक की बढ़ती हुई मात्रा खाद्य शृंखला द्वारा स्थानान्तरित होती है।
उत्तर:
(द) अनिम्नीकरणीय प्रदूषक की बढ़ती हुई मात्रा खाद्य शृंखला द्वारा स्थानान्तरित होती है।

36. पैट्रोल एवं डीजल से चलने वाले स्वचालित वाहनों के रेचन (exhaust) से युक्त किस प्रदूषक की मात्रा अधिक होती है- (BVP-2004)
(अ) CO
(ब) CO2
(स) NO2, SO2 एवं Pb
(द) हाइड्रोकार्बन
उत्तर:
(अ) CO

37. दफ्तरों में उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण का स्तर सामान्यतः होता है- (AIIMS-2004)
(अ) 20 dB
(ब) 30 dB
(स) 40 dB
(द) 60 dB
उत्तर:
(स) 40 dB

38. यह कहा जाता है कि ताज नष्ट हो रहा है- (CPMT-2004)
(अ) यमुना नदी की बाढ़ के कारण
(ब) उच्च ताफ्क्रम के कारण संगमरमर के विघटन के कारण
(स) मथुरा के तेल शोधक कारखाने से निकले वायु प्रदूषकों के कारण
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(स) मथुरा के तेल शोधक कारखाने से निकले वायु प्रदूषकों के कारण

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39. SO2 एवं इसके रूपातंरित उत्पादों के कुछ प्रभाव पौधों में होते हैं, जैसे- (BHU-2004)
(अ) क्लोरोफिल का अपघटन
(ब) प्लाज्मोलाइसिस (Plasmolysis)
(स) गॉल्जी काय का विनिष्ट होना
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) क्लोरोफिल का अपघटन

40. BOD का क्या अर्थ है- (Kerala PMT-2004)
(अ) बायोलोजिक आर्गेनिज्म डेथ
(ब) बायोकेमिकल आर्गोनिक मेटर डिके
(स) बायोटिक ऑक्सीजन डिमांड
(द) बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमान्ड
उत्तर:
(द) बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमान्ड

41. लाइकेन सामान्यतः शहरों में नहीं उगते- (AFMC-2004)
(अ) सही प्रकार के शैवाल व कवकों की अनुपस्थिति के कारण
(ब) नमी की कमी के कारण
(स) SO2 प्रदूषण के कारण
(द) प्राकृतिक आवास न मिलने के कारण
उत्तर:
(स) SO2 प्रदूषण के कारण

42. कभी-कभी झील में वाटर ब्लूम्स (Water blooms) का पाया जाना प्रदर्शित करता है- (AIEEE-2003)
(अ) पोषण की कमी
(ब) ऑक्सीजन की कमी
(स) अत्यधिक पोषण की उपलब्धता
(द) झील में शाकाहारियों की अनुपस्थिति
उत्तर:
(ब) ऑक्सीजन की कमी

43. 70 से 90 डेसीबल प्रबलता की औसत ध्वनि होती है- (AIEEE-2003)
(अ) अधिक प्रबल
(ब) असहज
(स) कष्टदायक
(द) शांत
उत्तर:
(अ) अधिक प्रबल

44. घने शहरों में पाया जाने वाला प्रकाश रासायनिक धूम्र कोहरे में मुख्यतः सम्मिलित होता है-(AIIMS-2003)
(अ) ओजोन, परऑक्सीएसीटायल नाइट्रेट और NOx
(ब) धुआँ, पसऑक्सीएसीटायल नाइट्रेट और SO2
(स) हाइड्रोकार्बन्स, SO2 और CO2
(द) हाइड्रोकार्बन्स, O3 और SO2
उत्तर:
(ब) धुआँ, पसऑक्सीएसीटायल नाइट्रेट और SO2

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45. डीफोरेस्टेशन प्रदर्शित करता है- (MHCET-2003)
(अ) मृदा क्षरण
(ब) ग्लोबल वार्मिंग
(स) मृदा संरक्षण
(द) दोनों ‘अ’ व ‘ब’
उत्तर:
(द) दोनों ‘अ’ व ‘ब’

46. वनों द्वारा भूमि का आच्छादित भाग है अथवा भारतीय वन नीति के अनुसार वनाच्छादित भूमि क्षेत्र का प्रतिशत है- (AIEEE-2003)
(अ) 11%
(ब) 22%
(स) 33%
(द) 60%
उत्तर:
(स) 33

47. किससे प्रदूषण नहीं होता- (CPMT-2002)
(अ) हाइड्रोइलेक्ट्रिक स्कीम
(ब) ऑटोमोबाइल
(स) न्यूक्लियर ऊर्जा प्रोजेक्ट
(द) थर्मल पावर प्रोजेक्ट
उत्तर:
(अ) हाइड्रोइलेक्ट्रिक स्कीम

48. निम्न में से कौनसा देश वायुमण्डल में सर्वाधिक ग्रीन हाउस गैसें मुक्त करने के लिये उत्तरदायी है- (CBSE PMT-2002; BVP-2002)
(अ) रूस
(ब) जर्मनी
(स) ब्राजील
(द) अमेरिका (USA)
उत्तर:
(द) अमेरिका (USA)

49. जल प्रदूषण से- (BHU-2002)
(अ) ऑक्सीजन में वृद्धि होती है
(ब) गंदलेपन में कमी होती है
(स) गंदलेपन और विऑक्सीजनीकरण में वृद्धि होती है
(द) प्रकाश-संश्लेषण में वृद्धि होती है
उत्तर:
(स) गंदलेपन और विऑक्सीजनीकरण में वृद्धि होती है

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50. जैविक अपघटन वाले प्रदूषक हैं- (Pb. PMT-2000)
(अ) प्लास्टिक
(ब) जल प्रदूषण
(स) भूमि प्रदूषण
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(ब) जल प्रदूषण

51. जल प्रदूषण कारक कौन है- (MP PMT-2000)
(अ) धुआँ
(ब) औद्योगिक वर्ज्य पदार्थ
(स) डिटरजेन्ट
(द) अमोनिया
उत्तर:
(ब) औद्योगिक वर्ज्य पदार्थ

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