Class 11

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण

Haryana State Board HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Multiple Choice Questions)

प्रश्न 1.
प्रत्यास्थता का विमीय सूत्र है-
(a) [MLT-2]
(b) [ML2T-2]
(c) [ML-1T-2]
(d) [M-1L-1T-2]
उत्तर:
(b) [ML2T-2]

प्रश्न 2.
यंग प्रत्यास्थता गुणांक का सही सूत्र है-
(a) \(\mathrm{Y}=\frac{\mathrm{Mg} \Delta \mathrm{L}}{\pi r^2 \mathrm{~L}}\)
(b) \(\mathrm{Y}=\frac{\mathrm{Mg}}{\pi r^2 \mathrm{~L}}\)
(c) \(\mathrm{Y}=\frac{\mathrm{MgL}}{\pi r^2 \Delta \mathrm{L}}\)
(d) \(\mathrm{Y}=\frac{\mathrm{Mgr^2}}{\pi \mathrm{L} \dot \Delta \mathrm{L}}\)
उत्तर:
(b) \(\mathrm{Y}=\frac{\mathrm{Mg}}{\pi r^2 \mathrm{~L}}\)

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण

प्रश्न 3.
निम्न में से सबसे अधिक प्रत्यास्थ पदार्थ है-
(a) स्टील
(b) क्वार्ट्ज
(c) काँच
(d) रबर ।
उत्तर:
(b) क्वार्ट्ज

प्रश्न 4.
पदार्थ का प्रत्यास्थता गुणांक ताप बढ़ाने पर –
(a) बढ़ता है
(b) घटता है
(c) निर्भर नहीं करता घटने लगता है।
(d) एक सीमा तक बढ़ता है फिर
उत्तर:
(b) घटता है

प्रश्न 5.
जब तार को संपीडित किया जाये तो उसके अणुओं की स्थितिज ऊर्जा-
(a) घटती है
(b) बढ़ती है
(c) अपरिवर्तित रहती है
(d) निश्चित नहीं ।
उत्तर:
(b) बढ़ती है

प्रश्न 6.
वे ठोस, जो प्रत्यास्थता सीमा के आगे टूट जाते हैं, कहलाते
(a) तन्य
(b) आघातवर्धनीय
(c) भंगुर
(d) प्रत्यास्थ
उत्तर:
(c) भंगुर

प्रश्न 7.
दो अणुओं के मध्य अन्तर- आण्विक बल-
(a) सदा आकर्षण का बल होता है।
(b) सदा प्रतिकर्षण का बल होता है।
(c) अधिक दूरी पर नगण्य उससे कम दूरी पर आकर्षण व बहुत कम दूरी पर प्रतिकर्षण बल हो जाता है
(d) अधिक दूरी पर प्रतिकर्षण बल होता है व कम दूरी पर आकर्षण बल होता है।
उत्तर:
(c) अधिक दूरी पर नगण्य उससे कम दूरी पर आकर्षण व बहुत कम दूरी पर प्रतिकर्षण बल हो जाता है

प्रश्न 8.
रबर स्टील, काँच को प्रत्यास्थता के बढ़ते हुए क्रम में लिखने पर सही क्रम होगा-
(a) स्टील, रबर, काँच
(b) रवर, काँच, स्टील
(c) काँच, स्टील, रबर
(d) काँच, रबर स्टील ।
उत्तर:
(b) रवर, काँच, स्टील

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प्रश्न 9.
किसी खिंचे हुए तार की प्रति एकांक आयतन की स्थितिज ऊर्जा होती है-
(a) \(\frac{1}{2}\) × प्रतिबल x विकृति
(b) \(\frac{1}{2}\) \(\frac{\text { प्रतिबल }}{\text { विकृति }}\)
(c) \(\frac{1}{2}\) × बंग प्रत्यास्थता गुणांक × विकृति
(d) \(\frac{1}{2}\) × बंग प्रत्यास्थता गुणांक × विकृति ।
उत्तर:
(c) \(\frac{1}{2}\) × बंग प्रत्यास्थता गुणांक × विकृति

प्रश्न 10.
एक ही पदार्थ तथा समान परिच्छेद क्षेत्रफल के दो तारों को लम्बाइयाँ 1 व 21 हैं। इन्हें लम्बाई के अनुदिश समान बल F लगाकर खींचा जाता है। तारों में उत्पन्न तनावों का अनुपात होगा-
(a) 1 : 1
(b) 1 : 2
(c) 2 : 1
(d) 4 : 1.
उत्तर:
(a) 1 : 1

प्रश्न 11.
एक ही पदार्थ के दो तारों पर जिनकी लम्बाईयाँ क्रमश: L तथा 2L और त्रिज्याएँ क्रमश: 2r तथा r हैं, समान भार लटकाया गया है। तारों की लम्बाई में वृद्धि का अनुपात होगा-
(a) 1 : 4
(b) 1 : 8
(c) 4 : 1
(d) 8 : 1.
उत्तर:
(b) 1 : 8

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प्रश्न 12.
एक तार से Mg भार लटकाने पर, तार की लम्बाई में वृद्धि l हो जाती है। इस प्रक्रिया में कृत कार्य होगा-
(a) Mgl
(b) 2mgl
(c) \(\frac{Mgl}{2}\)
(d) शून्य ।
उत्तर:
(c) \(\frac{Mgl}{2}\)

प्रश्न 13.
यदि किसी तार को खींचकर उसकी लम्बाई दोगुनी कर दी जाये, तो इसका यंग प्रत्यास्थता गुणांक होगा-
(a) आधा
(b) अपरिवर्तित
(c) दोगुना
(d) चार गुना।
उत्तर:
(b) अपरिवर्तित

प्रश्न 14.
एक आदर्श दृढ़ पिण्ड के लिए यंग प्रत्यास्थता गुणांक का मान-
(a) शून्य
(b) अनन्त
(c) 1
(d) 100.
उत्तर:
(b) अनन्त

प्रश्न 15.
अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल A व लम्बाई L का एक तार एक दृढ़ आधार से लटका है जिस पर M भार आरोपित है। इसकी लम्बाई में वृद्धि –
(a) L के व्युत्क्रमानुपाती होती है
(b) M के समानुपाती होती है
(c) यंग प्रत्यास्थता के समानुपाती होती है
(d) A के समानुपाती होती है।
उत्तर:
(b) M के समानुपाती होती है

प्रश्न 16.
रबर स्टील, काँच की प्रत्यास्थता के घटते क्रम में सही क्रम है-
(a) स्टील, रबर, काँच
(b) रबर, काँच, स्टील
(c) स्टील, काँच, रबर
(d) काँच, रबर, स्टील।
उत्तर:
(c) स्टील, काँच, रबर

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प्रश्न 17.
किसी पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक उस प्रतिबल के बराबर है, जो-
(a) तार की लम्बाई दोगुनी कर दें
(b) तार की लम्बाई अपरिवर्तित रहे
(c) तार की लम्बाई 50% बढ़ा दें
(d) तार की लम्बाई 25% बढ़ा दें।
उत्तर:
(a) तार की लम्बाई दोगुनी कर दें

अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Questions)

प्रश्न 1.
प्रतिबल का मात्रक लिखिए।
उत्तर:
प्रतिबल = \(\frac{F}{A}\)
प्रतिबल का मात्रक = \(\frac{N}{m^2}\) = Nm-2.

प्रश्न 2.
वह गुण जिससे बाह्य बल हटा लिए जाने पर वस्तु अपने प्रारम्भिक स्वरूप को प्राप्त कर लेती है, क्या कहलाता है ?
उत्तर:
प्रत्यास्थता ।

प्रश्न 3.
प्रत्यास्थता सीमा में प्रतिबल एवं विकृति का अनुपात क्या कहलाता है ?
उत्तर:
प्रत्यास्थता गुणांक ।

प्रश्न 4.
अनुप्रस्थ विकृति एवं अनुदैर्घ्य विकृति का अनुपात क्या कहलाता है ?
उत्तर:
पॉयसन अनुपात ।

प्रश्न 5.
यंग प्रत्यास्थता गुणांक का मात्रक लिखो ।
उत्तर:
न्यूटन / मी² या पॉस्कल ।

प्रश्न 6.
किसी द्रव का अपरूपण व बंग गुणांक कितना होता है?
उत्तर:
दोनों शून्य होते हैं।

प्रश्न 7.
किसी ठोस के यंग प्रत्यास्थता गुणांक पर ताप वृद्धि का क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
ताप वृद्धि के साथ यंग प्रत्यास्थता गुणांक का मान घटता है।

प्रश्न 8.
मशीनों को घूर्णी गति देने के लिए शाफ्ट कैसी होनी चाहिए?
उत्तर:
खोखली तथा छोटी ताकि बलयुग्म अधिक उत्पन्न हो सके।

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प्रश्न 9.
प्रतिबल तथा विकृति के बीच खिंचे ग्राफ का ढलान क्या प्रदर्शित करता है?
उत्तर:
प्रत्यास्थता गुणांक ।

प्रश्न 10.
एक पूर्ण दृढ़ पिण्ड का दृढ़ता गुणांक कितना होता है?
उत्तर:
अनन्त (00)।

प्रश्न 11.
जब एक ठोस को दबाया जाता है, तो उसके अणुओं की स्थितिज ऊर्जा पर क्या प्रभाव पड़ता है? यदि ठोस खींचा जाये, तब ?
उत्तर:
दोनों स्थितियों में स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है।

प्रश्न 12.
ठोस, द्रव तथा गैस में से किसकी संपीड्यता सबसे अधिक होती है ?
उत्तर:
गैस ।

प्रश्न 13.
क्या प्रतिबल सदिश राशि है ?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 14.
सुग्राही उपकरणों में निलम्बन तार प्रायः क्वार्ट्ज या फॉस्कर ब्रॉन्ज के ही क्यों बनाये जाते हैं ?
उत्तर:
क्योंकि इन दोनों में प्रत्यास्थ उत्तर प्रभाव नगण्य होता है।

प्रश्न 15.
भंजन प्रतिबल किस पर निर्भर करता है ?
उत्तर:
तार के पदार्थ पर।

प्रश्न 16.
गर्डर की आकृति के रूप में बनाने का क्या कारण है ?
उत्तर:
भार के कारण अवनमन कम से कम हो।

प्रश्न 17.
आयतन प्रत्यास्थता गुणांक के व्युत्क्रम को क्या कहते हैं?
उत्तर:
संपीड्यता ।

प्रश्न 18.
सर्वाधिक प्रबल अन्तर- परमाण्विक बल कौन-सा है ?
उत्तर:
आयनी आबन्ध

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प्रश्न 19.
अन्तर- आण्विक व अन्तर- परमाण्विक बल किस प्रकृति के होते हैं ?
उत्तर:
वैद्युत् चुम्बकीय प्रकृति के

प्रश्न 20.
किसी ठोस को संपीडित करने पर परमाणुओं की स्थितिज ऊर्जा बढ़ेगी या घटेगी ?
उत्तर:
बढ़ेगी।

प्रश्न 21.
वे वस्तुएँ क्या कहलाती हैं जो अपना प्रारम्भिक आकार प्राप्त करने की प्रवृत्ति नहीं होती है और स्थायी रूप से विकृत हो जाते हैं ?
उत्तर:
सुघट्य या प्लास्टिक ।

प्रश्न 22.
जब प्रतिबल शून्य होने पर भी विकृति शून्य नहीं होती तब द्रव्य में स्थायी विरूपण हो जाता है। ऐसे विरूपण को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
प्लास्टिक विरूपण ।

प्रश्न 23.
प्रत्यास्थालक (इलास्टोमर्स) के दो उदाहरण लिखो ।
उत्तर:
महाधमनी व रबड़ ।

प्रश्न 24.
किसी प्रारूपिक चट्टान की प्रत्यास्थता सीमा कितनी होती है ?
उत्तर:
30 × 107 Nm-2

प्रश्न 25.
दृढ़ता गुणांक का विमीय सूत्र क्या है ?
उत्तर:
[M1L-1T-2],

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प्रश्न 26.
अन्तर- परमाण्विक बल किसे कहते हैं ?
उत्तर:
विभिन्न परमाणुओं के मध्य लगने वाले बलों को अन्तर- परमाण्विक बल कहते हैं।

प्रश्न 27.
मशीनों को घूर्णी गति देने के लिए शॉफ्ट कैसी होनी चाहिए ?
उत्तर:
खोखली तथा छोटी ताकि अधिक बलयुग्म संचरित हो सके।

प्रश्न 28.
यंग प्रत्यास्थता गुणांक Y तथा अनुदैर्घ्य विकृति a के पदों में खिंचे तार के एकांक आयतन की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
U= \(\frac{1}{2}\)Yσ²

प्रश्न 29.
जब किसी तार को खींचते हैं तो हमें कार्य क्यों करना पड़ता है ?
उत्तर:
आन्तरिक प्रतिक्रिया बलों के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है।

प्रश्न 30.
विकृति की विमा लिखिए।
उत्तर:
विकृति विमाहीन राशि है।

प्रश्न 31.
क्या द्रवों में दृढ़ता का गुण पाया जाता है ?
उत्तर:
नहीं, द्रवों में दृढ़ता का गुण नहीं पाया जाता है, क्योंकि द्रवों की कोई आकृति नहीं होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

तो
प्रश्न 1.
प्रत्यानयन बल क्या होते हैं ?
उत्तर:
जब विकृतकारी बल के प्रभाव में कोई वस्तु विकृत होती है। वस्तु के अन्दर प्रतिक्रियात्मक बल उत्पन्न होते हैं जो विकृतकारी का विरोध करते हैं और इन्हीं बलों के कारण बाध्य बल हटाने पर वस्तु अपनी प्रारम्भिक अवस्था में आ जाती है। इसीलिए इन बलों को प्रत्यानयन बल (Restoring Forces) कहते हैं।

प्रश्न 2.
प्रतिबल किसे कहते हैं ?
उत्तर:
वस्तु के अनुप्रस्थ काट के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले प्रत्यानयन बल को प्रतिबल कहते हैं। अतः
प्रतिबल = \(\frac{\text { प्रत्यानयन बल }}{\text { क्षेत्रफल }}=\frac{F}{A}\)
∴ प्रतिबल का मात्रक – N/m².

प्रश्न 3.
प्रत्यास्थता की सीमा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
विकृतकारी बल की वह सीमा जहाँ तक वस्तु पूर्ण प्रत्यास्थ रहती है ओर इससे अधिक बल लगाने पर वस्तु में स्थायी विकृति उत्पन्न हो जाती है, प्रत्यास्थता सीमा कहलाती है।

प्रश्न 4.
यदि हाथी दाँत तथा गीली मिट्टी की एक जैसी ठोस गोलियाँ एक ही ऊँचाई से फर्श पर गिरायी जाती हैं तो फर्श से टकराने के बाद कौन सी गोली अधिक ऊँचाई तक उठेगी और क्यों ?
उत्तर:
यदि विभिन्न पदार्थों से बनी दो ठोस गोलियाँ फर्श पर एक ही ऊँचाई से गिरायी जायें तो अधिक ऊँचाई तक उठने वाली गोली अधिक प्रत्यास्थ होगी। हाथी दाँत की प्रत्यास्थता गीली मिट्टी से अधिक है, अतः हाथी दाँत की गोली अधिक ऊँचाई तक उठेगी।

प्रश्न 5.
साइकिल खोखले पाइप की क्यों बनायी जाती है ?
उत्तर:
यदि बेलनाकार छड़ है तो उसके अवनमन का सूत्र होता है-
\(\delta=\frac{\mathrm{W} l^3}{12 \mathrm{Y} \pi \mathrm{R}^4}\)
जहाँ R छड़ के काट की त्रिज्या है।
उपर्युक्त सूत्र से स्पष्ट है कि समान द्रव्यमान की खोखली बेलनाकार छड़ ठोस छड़ से अधिक मजबूत होगी क्योंकि उसी द्रव्यमान की खोखली छड़ की त्रिज्या अधिक होगी। यही कारण है कि साइकिलों में ठोस छड़ की अपेक्षा खोखला पाइप प्रयोग करते हैं जिससे पाइप की सामर्थ्य भी बढ़े तथा धातु की बचत होने पर कम खर्च आये ।

प्रश्न 6.
पीतल, स्टील व रबर के प्रतिबल – विकृति वक्र चित्र में प्रदर्शित हैं।
रेखा A, B और C क्रमशः किन-किन वक़ों पर प्रदर्शित करती हैं?
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण -1
उत्तर:
प्रदर्शित ग्राफ में-
वक्र का ढलान = \(\frac{\text { y-अक्ष }}{\text { x-अक्ष }}=\frac{\text { प्रतिबल }}{\text { विकृति }}\) = यंग प्रत्यास्थता गुणांक
θA > θB > θC
अत: YA > YB > YC (ग्राफ द्वारा)
लेकिन तालिका से Yखुर < Yपीतल < Yस्टील
वक्र A = स्टील = 20 × 1010 M/m²
वक्र B = पीतल = 9 × 1010 M/m²
वक्र C = रबर = 0.05 × 1010 M/m²

प्रश्न 7.
चित्रानुसार ग्राफ तार की लम्बाई के व्यवहार को, तार के पदार्थ के लिए उस क्षेत्र को प्रदर्शित करता है जहाँ हुक के नियम का पालन होता है। A तथा B क्या प्रदर्शित करते हैं?
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उत्तर:
प्रत्यास्थता की सीमा के अन्दर
प्रतिबल ∝ विकृति (हुक के नियम से)
ग्राफ की प्रकृति = एक सरल रेखा
जो ग्राफ में प्रदर्शित नहीं है।
तार में संचित ऊर्जा के लिए-
U = \(\frac{1}{2}\)kx² या U ∝ x²
ग्राफ की प्रकृति = परवलयाकार
जो ग्राफ में प्रदर्शित है।
अत: A तथा B, ऊर्जा तथा लम्बाई में वृद्धि को प्रदर्शित करते हैं।

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प्रश्न 8.
छोटी खोखली शाफ्ट लम्बी ठोस शाफ्ट से अधिक मजबूत होती है, क्यों?
उत्तर:
शाफ्ट एक ऐसी बेलनाकार छड़ है जो अन्य मशीनों को घूर्णन गति प्रदान करने में प्रयोग की जाती है। यदि शाफ्ट का एक सिरा दृढ़ता से कसकर दूसरे सिरे पर मरोड़ देने वाला बल लगायें तब छड़ में अपरूपण विकृति उत्पन्न हो जायेगी किसी ऐंठन कोण θ के लिए लगाये जाने वाले बल आघूर्ण का मान निम्न होता है-
\(\tau=\frac{\eta \pi r^4 \theta}{2 l}\)
जहाँ l = लम्बाई, r = शाफ्ट की त्रिज्या तथा η = शाफ्ट के पदार्थ का अपरूपण गुणांक है।
ठोस शाफ्ट में एकांक ऐंठन उत्पन्न करने के लिए आवश्यक बलयुग्म आघूर्ण –
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण -3
अर्थात् समान द्रव्यमान व पदार्थ की खोखली व ठोस शाफ्टों में, खोखली शाफ्ट को ऐंठने में ठोस शाफ्ट को ऐंठने की अपेक्षा अधिक कार्य करना होगा, अतः छोटी खोखली शाफ्ट लम्बी ठोस शाफ्ट से अधिक मजबूत होती है।

प्रश्न 9.
रेल की पटरी आकार की क्यों बनाई जाती है?
उत्तर:
रेल की पटरी के ऊपरी तथा नीचे के भागों में अधिक विकृति उत्पन्न होती है, जबकि बीच के भाग में कम विकृति होती है, इस कारण से ऊपरी व निचले भागों का क्षेत्रफल अधिक रखा जाता है जिससे कि इन भागों पर अभिलम्ब प्रतिबल (PA) कम लगे। बीच के भागों की विकृति कम होने के कारण ये भाग कम चौड़ाई के बनाए जाते हैं। इससे लोहे की भी बचत होती है तथा पटरी की मजबूती भी उसी प्रकार की बनी रहती है।

प्रश्न 10.
L लम्बाई तथा A परिच्छेद क्षेत्रफल वाले एक ऊर्ध्वाधर तार के निचले सिरे से M द्रव्यमान का एक गोला लटकाया जाता है। यदि तार का यंग प्रत्यास्थता गुणांक ४ हो तो ऊर्ध्वाधर तल में पिण्ड के दोलन करने की आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माना किसी तार में खिंचाव हैं तथा तार में प्रत्यानयन बल F है-
सूत्र-
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प्रश्न 11.
त्रिज्या की तार दो बिन्दुओं A व B के बीच बंधी है। सामान्य अवस्था में इसमें तनाव नहीं है। जब इसे खींचकर ACB के रूप का कर दिया जाता है तो तार में कितना तनाव है?
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उत्तर:
प्रारम्भिक लम्बाई AB = 2l
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प्रश्न 12.
विभिन्न पदार्थों के तीन तारों के लिए प्रतिबल – विकृति ग्राफ चित्र में प्रदर्शित हैं A,B व C तारों की प्रत्यास्थता की सीमाएँ हैं। चित्र से A, B C के बारे में क्या निष्कर्ष निकलते हैं?
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उत्तर:
ग्राफ में प्रतिबल, X- अक्ष व विकृति Y-अक्ष पर प्रदर्शित है,
अतः ग्राफ से, Y = cot θ = \(\frac{1}{tan θ}\) ∝ \(\frac{1}{θ}\)
[जहाँ θ = प्रतिबल अक्ष से कोण है]
अर्थात् A की प्रत्यास्थता न्यूनतम व की अधिकतम है।

प्रश्न 13.
जब किसी तार को (i) खींचा जाता है तथा (ii) सम्पीडित किया जाता है तो प्रत्यानयन प्रतिबल किस कारण उत्पन्न होता है?
उत्तर:
जब किसी तार को खींचा जाता है तो अन्तर- परमाण्विक आकर्षण बलों के कारण प्रत्यानयन प्रतिबल उत्पन्न होता है तथा जब तार को सम्पीडित किया जाता है तो अन्तरपरमाण्विक प्रतिकर्षण के कारण प्रत्यानयन प्रतिबल उत्पन्न होता है।

प्रश्न 14,
यंग प्रत्यास्थता गुणांक का मात्रक प्राप्त कीजिए। पीतल का बंग प्रत्यास्थता गुणांक लोहे से आधा है, पीतल के एक तार की लम्बाई लोहे के एक अन्य तार की लम्बाई के बराबर है। दोनों तारों पर एक-सा प्रतिबल लगा है। इन दोनों तारों की लम्बाई में वृद्धि के अनुपात की गणना कीजिए।
उत्तर:
Y का मात्रक = \(\frac{\text { प्रतिबल का मात्रक }}{\text { विकृति का मात्रक }}\)
= न्यूटन / मीर²
किसी पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक
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प्रश्न 15.
समान पदार्थ के चार तारों (P, Q, R व S) के भारों का उनकी लम्बाई वृद्धि के साथ ग्राफ प्रदर्शित है। अधिकतम मोटाई का तार किस रेखा द्वारा प्रदर्शित होगा ?
उत्तर:
यंग प्रत्यास्थता गुणांक
Y = \(\frac{FL}{Al}\) ∴ l ∝ \(\frac{F}{A}\)
(∵ Y, L व F नियत हैं)
ग्राफ से स्पष्ट है कि समान भार के लिए न्यूनतम लम्बाई वृद्धि OS से प्रदर्शित है,
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण -9

∵ लम्बाई वृद्धि (l) न्यूनतम होने पर अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A अधिकतम है।
अतः अधिकतम मोटाई का तार OS से प्रदर्शित है।

प्रश्न 16.
इस्पात तथा तांबे की समान आकारों की स्प्रिंगों को समान वृद्धि तक खींचा जाता है किस पर अधिक कार्य करना पड़ेगा ?
उत्तर:
इस्पात का यंग प्रत्यास्थता गुणांक (Y) ताँबे की तुलना में अधिक होता है अतः यदि स्प्रिंगें समान प्रकार की हैं (A. L बराबर हैं) तो बराबर-बराबर खींचने ( वृद्धि x) के लिए इस्पात की स्प्रिंग पर अधिक कार्य करना पड़ेगा।
चूँकि W = \(\frac{1}{2}\) \(\frac{YA}{L}\)x² ∴ W ∝ Y

प्रश्न 17.
यदि इन्हीं स्प्रिंगों को बराबर बल लगाकर खींचा जाये तब ?
उत्तर:
इस्पात की स्प्रिंग कम खिंचेगी। अतः अब की बार ताँबे की स्प्रिंग पर अधिक कार्य करना पड़ेगा।

प्रश्न 18.
पॉयसन अनुपात क्या होता है ?
उत्तर:
प्रत्यास्थता की सीमा के अन्दर अनुप्रस्थ (पार्श्व) विकृति एवं अनुदैर्घ्य विकृति का अनुपात पदार्थ का पॉयसन अनुपात कहलाता है। इसे σ से व्यक्त करते हैं।
पॉयसन अनुपात σ = \(\frac{\text { पार्श्व विकृति}}{\text { अनुदैर्ध्य विकृति }}\)

प्रश्न 19.
हुक का नियम लिखिए।
उत्तर:
प्रत्यास्थता सीमा के अन्दर, प्रतिबल विकृति के समानुपाती होता है।
अर्थात् प्रतिवल ∝ विकृति

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प्रश्न 20.
स्प्रिंगें इसपात की ही क्यों बनायी जाती हैं ?
उत्तर:
इस्पात का यंग प्रत्यास्थता गुणांक अन्य धातुओं जैसे- ताँबा, ऐल्यूमिनियम आदि से अधिक होता है इसीलिए स्प्रिंगें इस्पात की बनायी जाती है ताकि बाहरी बल हटाने पर स्प्रिंग शीघ्र अपनी पूर्वावस्था में आ जाये।

प्रश्न 21.
हम तार को बार-बार मोड़कर उसे तोड़ने में सफल क्यों हो जाते हैं ?
उत्तर:
जब किसी पदार्थ को बार बार विकृत किया जाता है तो पदार्थ का प्रत्यास्थ गुण तेजी से घटने लगता है, इसी को प्रत्यास्थता श्रांति कहते हैं। इसलिए तार को बार-बार मोड़कर हम उसे तोड़ने में सफल हो जाते हैं।

प्रश्न 22.
अनुदैर्घ्य विकृति तथा अनुदैर्घ्य प्रतिबल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
अनुदैर्घ्य विकृति : लम्बाई में परिवर्तन तथा आरम्भिक लम्बाई के अनुपात को अनुदैर्ध्य विकृति कहते हैं। तनन प्रतिबल के कारण, तार या छड़ की प्रारम्भिक लम्बाई L में ∆L वृद्धि हो तो,
अनुदैर्घ्य विकृति = \(\frac{∆L}{L}\)
अनुदैर्घ्य प्रतिबल : जब किसी तार पर बल आरोपित किया जाये तो वस्तु के प्रति एकांक काट क्षेत्र पर उत्पन्न प्रत्यानयन बल को अनुदैर्घ्य प्रतिबल कहते हैं।
अनुदैर्घ्यं प्रतिबल = \(\frac{F}{A}\)

प्रश्न 23.
पूर्ण प्रत्यास्थ, प्लास्टिक एवं दृढ़ पिण्ड किन्हें कहते हैं ? इनकी सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जो वस्तुएँ विरूपक बल हटाने से अपनी पूर्व अवस्था में लौट आती है। उन्हें पूर्ण प्रत्यास्थ कहते हैं जैसे- क्वार्ट्ज, फॉस्फर ब्रांज ।
जो वस्तुएँ विरूपक बल हटाने पर अपनी पूर्व अवस्था में नहीं लौटती हैं, बल्कि सदैव के लिए विरूपित हो जाती हैं, उन्हें प्लास्टिक या पूर्ण सुघट्य कहते हैं; जैसे – मोम, गीली मिट्टी।
यदि किसी पदार्थ में अणु या परमाणुओं के मध्य दूरी निश्चित हो एवं बाह्य बल के प्रभाव में भी अपरिवर्तित हो तो वह दृढ़ पिण्ड कहलाता है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

प्रश्न 1.
यंग प्रत्यास्थता गुणांक को परिभाषित कीजिए। यंग प्रत्यास्थता गुणांक ज्ञात करने की सल की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यंग प्रत्यास्थता गुणांक (Young’s Modulus of Elasticity):
“प्रत्यास्थता सीमा में अनुदैर्घ्य प्रतिबल एवं अनुदैर्घ्य विकृति के अनुपात को यंग प्रत्यास्थता गुणांक कहते हैं।” इसे Y से व्यक्त करते हैं।
यंग प्रत्यास्थता गुणांक \(Y=\frac{\text { अनुदैर्घ्य प्रतिबल }}{\text { अनुद्र्घ्य विकृति }}=\frac{\sigma}{\varepsilon}\)
यदि L लम्बाई एवं A अनुप्रस्थ परिच्छेद के तार पर F बल लगाने पर उसकी लम्बाई में वृद्धि $\Delta \mathrm{L}$ हो जाती है तो
अनुदुर्घ्य प्रतिबल \(\sigma=\frac{\mathrm{F}}{\mathrm{A}}\)
तथा अनुदैर्घ्य विकृति \(\varepsilon=\frac{\Delta \mathrm{L}}{\mathrm{L}}\)
\(\mathrm{Y}=\frac{\mathrm{F} / \mathrm{A}}{\Delta \mathrm{L} / \mathrm{L}}\)
या \(\mathrm{Y}=\frac{\mathrm{F} \cdot \mathrm{L}}{\Delta \mathrm{L} \cdot \mathrm{A}}\)
यंग प्रत्यास्थता गुणांक का मात्रक न्यूटन / मीटर² \(\left(\mathrm{~N}-\mathrm{m}^{-2}\right)\) या पॉस्कल (Pa) तथा विमीय सूत्र \(\left[\mathrm{M}^1 \mathrm{~L}^{-1} \cdot \mathrm{T}^{-2}\right]\) है। यंग प्रत्यास्थता गुणांक Y केवल ठोस पदार्थों के लिए ही होता है।

यदि तार के परिच्छेद की त्रिज्या r तथा Mg भार लटकाकर विरूपक बल लगाया गया हो तो
\(\mathrm{Y}=\frac{\mathrm{MgL}}{\pi r^2 \Delta \mathrm{L}}\)
यदि तार का अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल \(\mathrm{A}=\pi r^2=1 \mathrm{~m}^2\) तथा लम्बाई में वृद्धि ∆L = L हो तो Y = F
“अर्थात् किसी पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक उस बल के तुल्य होता है जो प्रत्यास्थता सीमा के अन्दर उस पदार्थ के एकांक अनुप्रस्थ परिच्छेद के तार की लम्बाई को दोगुना कर दे।”

किसी तार के पदार्थ का यंग गुणांक का मापन (Measurement of Young’s Modulus of Elasticity of Material of a Wire):
किसी तार के पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक ज्ञात करने की सर्ल विधि (Searl Method) के लिए प्रयुक्त उपकरण चित्र में दर्शाया है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण -10
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण -11

इसमें समान लम्बाई एवं समान त्रिज्या के दो ऊर्ध्वाधर पास-पास दृढ़ आधार से लटके होते हैं। इनमें तार A को सन्दर्भ तार (Reference wire) कहते हैं। इस निचले सिरे पर मिलीमीटर में अंकित प्रधान स्केल (Main Scale) M लगी होती है और एक स्थिर भार लटकाया जाता है, ताकि तार तना रहकर अपनी मूल लम्बाई में रहे। दूसरा तार B प्रायोगिक तार (Experimental Wire) होता है। जिसके निचले सिरे पर एक वर्नियर स्केल V लगी होती है जिसका सम्बन्ध मुख्य स्केल से रहता है और तार पर भार लटकाने के लिए एक हैंगर लगा होता है।

स्क्रूगेज की सहायता से तार B का व्यास कई स्थानों पर ज्ञात करके उसका औसत लेकर तार की त्रिज्या r ज्ञात कर लेते हैं। मीटर स्केल की सहायता से इस तार की प्रारम्भिक लम्बाई L ज्ञात कर लेते हैं। अब लम्बाई में वृद्धि ∆L ज्ञात करने के लिए मुख्य स्केल का पाठ पहले ज्ञात कर लेते हैं। इसके पश्चात् तार B के हैंगर पर क्रमशः वजन रखकर वर्नियर स्केल की सहायता से विभिन्न भारों के लिए लम्बाई में वृद्धि के मान ज्ञात कर लेते हैं। लम्बाई में वृद्धि एवं आरोपित भार के साथ ग्राफ खींचते हैं जो चित्र की भाँति सरल रेखा प्राप्त होती है। ग्राफीय रेखा के किसी एक बिन्दु के संगत M व ∆l के मान नोट कर लेते हैं। इसके मान को निम्न सूत्र में रखकर तार के पदार्थ का यंग गुणांक का मान ज्ञात कर लेते हैं-
\(\mathrm{Y}=\frac{\mathrm{MgL}}{\pi r^2 \Delta \mathrm{L}}\)

पदार्थयंग गुणांक (×109 Nm-2))
एल्युमिनियम70
ताँबा110
लोहा190
इस्पात200
काँच65
कक्रीट30
लकड़ी13
अस्थि9
पॉलीस्टीरीन3

प्रश्न 2.
बढ़ते भार के अन्तर्गत खिंचे तार के व्यवहार को प्रतिबल – विकृति ग्राफ की सहायता से समझाइए पराभव सामर्थ्य तथा चरम तनन सामर्थ्यं भी स्पष्ट कीजिए।
उतर:
प्रतिबल – विकृति वक्र (Stress-Strain Curve):
तनन प्रतिबल के प्रभाव में किसी दिए गए द्रव्य के लिए प्रतिबल तथा विकृति के मध्य सम्बन्ध एक प्रयोग द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। किसी बेलन या तार को एक प्रत्यारोपित बल (भार) द्वारा विस्तारित किया जाता है। लम्बाई में भिन्नात्मक परिवर्तन (विकृति) तथा इस विकृति के लिए आवश्यक विरूपक बल को नोट कर लेते हैं प्रत्यारोपित बल (या भार) को धीरे-धीरे बढ़ाते हैं और लम्बाई में वृद्धि के मान को नोट कर लेते हैं। अब सभी प्रेक्षणों के लिए प्रतिबल (\(\frac{F}{A}\)) तथा विकृति (\(\frac{∆l}{L}\)) के मान ज्ञात कर लेते हैं। प्रतिबल तथा विकृति के बीच ग्राफ खींचते हैं। किसी दी गई धातु के लिए एक प्रारूपिक प्रतिबल – विकृति ग्राफ चित्र में दर्शाया है।
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प्रतिबल-विकृति ग्राफ के अध्ययन से निम्न निष्कर्ष प्राप्त होते हैं-
(1) O से A तक वक्र रैखिक है अर्थात् इस क्षेत्र में हुक के नियम का पालन होता है। जब विरूपक बल हटा लिया जाता है तो तार पुनः अपनी प्रारम्भिक स्थिति में आ जाता है इस क्षेत्र में ठोस एक प्रत्यास्थ वस्तु जैसा आचरण करता है। A विन्दु को अनुक्रमानुपातीय सीमा- (Proportionality Limit) कहते हैं।

(2) A से B तक के क्षेत्र में प्रतिबल तथा विकृति अनुक्रमानुपाती नहीं है फिर भी भार हटा लेने पर तार अपनी प्रारम्भिक अवस्था में आ जाता है। बिन्दु B को पराभव बिन्दु अथवा प्रत्यास्थता सीमा कहते हैं तथा उसके संगत प्रतिबल को द्रव्य की पराभव सामर्थ्य (S) कहते हैं।

(3) भार को और अधिक बढ़ाने पर विकृति का मान बढ़ते प्रतिबल की तुलना में शीघ्रता से बढ़ता है तथा वक्र का B से D तक का भाग प्राप्त होता है। यदि B व D के मध्य कोई बिन्दु C माना जाये तो इस बिन्दु के संगत भार हटा लेने पर तार अपनी प्रारम्भिक स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है। अर्थात् तार का प्रत्यास्थ गुणं समाप्त हो जाता है। इस स्थिति में प्रतिबल को शून्य कर देने पर भी विकृति का मान शून्य नहीं होता है। अर्थात् तार में स्थायी विरूपण हो जाता है। स्थायी विरूपण को ‘प्लास्टिक विरूपण’ कहते हैं। ग्राफ पर बिन्दु D को द्रव्य की चरम तनन सामर्थ्य कहते हैं और इसे S से प्रदर्शित करते हैं। बिन्दु D पर प्रतिबल अपने अधिकतम सम्भव मान पर होता है इसे भंजक प्रतिबल (Breaking Stress) कहते हैं। बिन्दु D पर लगाये गये भार को विच्छेदन भार (Breaking Load) कहते हैं।

(4) बिन्दु D से आगे यदि आरोपित बल को घटाया भी जाये तब भी अतिरिक्त विकृति उत्पन्न हो जाती है तथा बिन्दु E पर तार टूट जाता है। यदि D और E पास-पास है तो पदार्थ भंगुर है तथा D व E अधिक दूरी पर होने पर द्रव्य को ‘तन्य’ पदार्थ कहते हैं।

(5) कुछ पदार्थों जैसे रबड़ के लिए ग्राफ का OA भाग सरल रेखा में नहीं होता क्योंकि ऐसे पदार्थों की प्रत्यास्थता की सीमा बहुत अधिक होती है, लेकिन हुक के नियम का पालन नहीं करते। इन्हें प्रत्यास्थक (Elastomer) कहते हैं।

प्रत्यास्थता से सम्बन्धित महत्वपूर्ण परिभाषाएँ (Important Definition Related to Elasticity):
प्रत्यास्थता की सीमा (Limit of Elasticity) : विरूपक बल के उस अधिकतम मान को जिसके परे पदार्थ की प्रत्यास्थता का गुण समाप्त हो जाता है, उस पदार्थ की प्रत्यास्थता की सीमा कहते हैं।

प्रत्यास्थता भ्रांति (Elastic Fatigue) : जब किसी वस्तु पर प्रत्यास्थता की सीमा के अन्दर एक विरूपक बल अधिक समय तक लगाये रखा जाता है, तो वस्तु में उत्पन्न विकृति का मान समय के साथ धीरे-धीरे कम होता जाता है। ऐसा लगता है कि वस्तु थक गई। यदि कुछ समय के लिए वस्तु पर से विरूपक बल हटा लिया जाए, तो उसमें पुनः नियमित विकृति होने लगती है। इसे प्रत्यास्थता श्रांति कहते हैं।

प्रत्यास्थ उत्तर प्रभाव (Elastic After Effect) : जब किसी वस्तु पर प्रत्यास्थता सीमा के अन्दर विरूपक बल लगाया जाता है तो विकृति उत्पन्न होती है। विरूपक बल हटा लेने पर वस्तु तुरन्त ही अपनी पूर्वावस्था ग्रहण नहीं कर पाती, बल्कि कुछ समय लगता है। इसे प्रत्यास्थ उत्तर प्रभाव कहते हैं।
धारामापी जैसे सुग्राही यंत्रों में निलम्बन तार फॉस्फर ब्रॉज तथा क्वार्टज के बनाने का कारण इन पदार्थों की नगण्य प्रत्यास्थ उत्तर प्रभाव ही है।

प्रत्यास्थ शैथिल्य (Elastic Hysteresis) : “विकृति को प्रतिलोमत करने पर प्रतिबल – विकृति वक्र का अपने मार्ग की पुनरावृत्ति न करना प्रत्यास्थ शैथिल्य कहलाता है।” सभी प्रत्यास्थकों जैसे रबड़, हृदय से रक्त ले जाने वाली महाधमनी में प्रत्यास्थ शैथिल्य पाया जाता है। रबड़ के एक नमूने के लिए प्रतिबल – विकृति वक्र चित्र 9.8 में प्रदर्शित है जिनमें भार बढ़ाते समय का वक्र OAB एवं भार घटाते समय का वक्र BCO है। स्पष्ट है कि उक्त दोनों वक्र भिन्न हैं।
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HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण

प्रश्न 3.
ठोसों के प्रत्यास्थ व्यवहार को स्प्रिंग गेंद मॉडल की सहायता से समझाइए ।
उत्तर:
ठोसों का प्रत्यास्थ व्यवहार (Elastic Behaviour Of Solids)
ठोसों के प्रत्यास्थ व्यवहार को परमाणवीय मॉडल के आधार पर भली प्रकार समझा जा सकता है। प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बना है। एक ठोस क्रिस्टल में ये परमाणु एक निश्चित व्यूह में वैद्युत आकर्षण बलों के द्वारा बँधे रहते हैं। इन वैद्युत बलों को अंतरा परमाणुक बल या अंतरा आणविक बल कहते हैं।

परमाणुओं के मध्य एक निश्चित दूरी पर आण्विक बल शून्य होता है अर्थात् वैद्युत आकर्षण बल एवं प्रतिकर्षण बल परिमाण में समान होता है। जब अन्तर परमाण्विक दूरी का मान से अधिक बढ़ता है तो To आकर्षण बल पहले बढ़ता है परन्तु एक सीमा से अधिक दूरी बढ़ाने पर आकर्षण बल घटने लगता है। बल की इस सीमा को प्रत्यास्थता सीमा कहते हैं। इसके बाद भी यदि बाह्य बल बढ़ाया जाता है तो आकर्षण बल घटते घटते शून्य हो जाता है और विच्छेद / भंजन (Breaking) की स्थिति आ जाती है ।

यदि अन्तर परमाण्विक दूरी का मान से कम हो जाता है तो इस दशा में परमाणुओं के बीच आवेश का वितरण इस प्रकार बदल जाता है। कि उनके बीच एक नेट प्रतिकर्षण बल लगने लगता है। बाह्य विरूपक बल हटा लेने पर परमाणु इसी प्रतिकर्षण बल के कारण एक-दूसरे से दूर हट कर अपनी पूर्व प्रारम्भिक स्थिति में लौटता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण -14
उक्त विवेचना में प्रत्यानयन बल की क्रियाविधि को समझने के लिए चित्र पर विचार करें, इसमें गेंद स्प्रिंग मॉडल में गेंद परमाणुओं को तथा स्प्रिंग अंतरा परमाण्विक बलों को निरूपित करती है। यदि किसी गेंद को अपनी स्थिति से विस्थापित करने का प्रयास करते हैं तो स्प्रिंग तन्त्र उस गेंद को वापस लाने का प्रयास करेगा। इस प्रकार ठोसों का प्रत्यास्थ व्यवहार ठोस की सूक्ष्मीय प्रकृति के आधार पर समझाया जा सकता है।
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प्रश्न 4.
किसी तार को खींचने में किये गये कार्य का सूत्र व्युत्पन्न कीजिए।
उत्तर:
खिंचे हुए तार में स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy in Astretching Wire)
जब किसी तार पर बाह्य बल लगाकर उसे खींचा जाता है तो तार में विकृति उत्पन्न होने पर उसके अन्दर प्रत्यानयन बल उत्पन्न होता है।
इसी प्रत्यानयन बल के विरुद्ध तार की लम्बाई बढ़ाने में जो कार्य करना पड़ता है, वह खिचे हुए तार में उसकी ‘प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा’ के रूप में निहित हो जाता है। इसका मान निम्न प्रकार ज्ञात करते हैं-
माना तार पर P बल लगाने पर इसकी लम्बाई में वृद्धि हो जाती है। चूँकि जो प्रत्यानयन बल उत्पन्न होते हैं, उनका प्रारम्भिक मान शून्य होता है जो अन्त में F हो जाता है अतः
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आंकिक प्रश्न

यंग प्रत्यास्थता गुणांक पर आधारित

प्रश्न 1.
4 मीटर लम्बे तथा 1.2 सेमी² अनुप्रस्थ काट वाले ताँबे के तार को 4.8 × 10³ न्यूटन कल द्वारा खींचा जाता है। यदि ताँबे के लिए यंग प्रत्यास्थता गुणांक Y = 1.2 × 1011 न्यूटन / मी हो तो ज्ञात कीजिए- (i) प्रतिबल (ii) विकृति
उत्तर:
(i) 4 × 107 न्यूटन /मी²
(ii) 3.3 × 10-4

प्रश्न 2.
ताँबे के तार की लम्बाई 10 मीटर है तथा इसका द्रव्यमान 50 ग्राम/मी है। यदि इस तार पर 2 किग्रा का भार लटकाया जाता है, तो लम्बाई में वृद्धि की गणना कीजिए ताँबे का यंग प्रत्यास्थता गुणांक = 1.2 × 1011 न्यूटन / मी तथा ताँबे का घनत्व p = 8.9 × 10³ kg/m³ है।
उत्तर:
10.29 मिमी

प्रश्न 3.
2 मीटर लम्बी एक हल्की छड़ समान लम्बाई के दो ऊर्ध्वाधर तारों से क्षैतिज लटकाई गई है। एक तार स्टील का है जिसका अनुप्रस्थ परिच्छेद 0.1 सेमी² है दूसरा तार पीतल का है जिसकी अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 0.2 सेमी² है। दोनों तारों में (i) समान प्रतिबल (ii) समान विकृति उत्पन्न करने के लिए किसी भार को छड़ पर कहाँ लटकाना चाहिए? (स्टील के लिए Y = 2.0 ×1011 N/m² तथा पीतल के लिए Y = 10× 1011 N/m²)
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उत्तर:
(i) स्टील के तार से 4/3m दूर
(ii) स्टील के तार से 1 m दूर

प्रश्न 4.
एक तार A पर kg भार लटकाने से उसकी लम्बाई में 1 mm की वृद्धि होती है, इसी धातु के दूसरे तार B के लिए 1.5 kg का भार लटकाने पर लम्बाई में वृद्धि का परिकलन कीजिए जबकि तार B की लम्बाई A की लम्बाई की 4/5 तथा उसका व्यास A के व्यास का 5/2 गुना है,
उत्तर:
0.192mm

प्रश्न 5.
एक पीतल की छड़ का व्यास 4.00 मिमी है। पीतल का बंग प्रत्यास्थता गुणांक 9.2 × 1010 न्यूटन / मी² है। (i) पीतल की छड़ की लम्बाई में 0.25% की वृद्धि करने पर प्रतिबल एवं विकृति की गणना कीजिए। (ii) आरोपित बल का मान क्या होगा ?
उत्तर:
2.3 × 108 Nm², 2.5 × 10-3, 2889 न्यूटन

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 9 ठोसों के यांत्रिक गुण

प्रश्न 6.
1 मीटर लम्बे स्टील के एक खम्भे को 5000 किग्रा की इमारत को सँभालना है। यदि खम्भे की लम्बाई में अधिक-से-अधिक 2 मिमी का परिवर्तन सम्भव हो, तो खम्भे के न्यूनतम अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल की गणना कीजिए। स्टील का यंग प्रत्यास्थता गुणांक Y = 2.2 × 1011 न्यूटन / मी²
उत्तर:
1.114 × 10-4 मीटर²

प्रश्न 7.
एक लिफ्ट का द्रव्यमान 3200 किग्रा है तथा लोहे के मोटे तारों से बंधा है। यदि लिफ्ट का महत्तम त्वरण 1.2 मी/से² हो राधा तार का अधिकतम सुरक्षित प्रतिबल 2.8 × 108 न्यूटन / मी² हो, तो तार का न्यूनतम व्यास क्या होना चाहिए ?
उत्तर:
1.27 मिमी

प्रश्न 8.
लोहे की एक छड़ जिसकी लम्बाई 2 मी है दो दृढ़ आधारों के मध्य बंधी है। यदि छड़ को 100°C तक गर्म किया जाये तो छड़ की विकृति ऊर्जा की गणना कीजिए। यदि रेखीय प्रसार गुणांक = 18 × 10-6/°C तथा अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A- 1 cm² |
उत्तर:
64.8 जूल

भंजक प्रतिबल तथा भंजक बल पर आधारित

प्रश्न 9.
स्टील के लिए भंजक प्रतिबल 8.5 × 106 Nm-2 है इसका घनत्व 8.5 × 10³ किग्रा / मी³ है इसके लिए किसी तार की वह अधिकतम लम्बाई ज्ञात कीजिए जिससे वह अपने ही भार के अन्तर्गत बिना टूटे लटकाया जा सके। (g = 10m / sec²)
उत्तर:
100 मी

प्रश्न 10.
ऐलुमिनियम का भंजक प्रतिबल 7.5 × 108 डाइन / सेमी² है। ऐलुमिनियम के तार की वह अधिकतम लम्बाई ज्ञात कीजिए जिसे तार टूटे बिना प्राप्त किया जा सकता है ऐलुमिनियम का घनत्व 2.7 ग्राम / सेमी³ है।
उत्तर:
2.834 किमी

तार में संचित ऊर्जा पर आधारित

प्रश्न 11.
एक तार (Y = 2 × 1011 N/m²) जिसकी लम्बाई 2 m तथा काट क्षेत्रफल 10-6 m² है तो 0.1mm खींचने में कितना कार्य करना पड़ेगा ?
उत्तर:
5 × 10-4 J

आयतन प्रत्यास्थता गुणांक पर आधारित

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प्रश्न 12.
रबर की एक गेंद को किसी झील की तली में 300 m गहराई पर ले जाने से उसके आयतन में 0.15% की कमी हो जाती है। रबर के आयतन प्रत्यास्थता गुणांक की गणना कीजिए। झील के जल का घनत्व 1.0 × 103 kg/m3 है तथा g 10m/sec2|
उत्तर:
2.0 × 109 N/m²

प्रश्न 13.
जब 1 cm त्रिज्या के एक वायु के बुलबुले को पारे के एक पात्र में । m की गहराई तक डुबोया जाता है तो बुलबुले की त्रिज्या में परिवर्तन क्या होगा ? पारे की सम्पीड्यता 3.7 × 10-11N-1m² तथा पारे का घनत्व 13.6 ग्राम / सेमी’ दिया गया है।
उत्तर:
0.162 mm

प्रश्न 14.
हिन्द महासागर की औसत गहराई लगभग 3 km है महासागर की तली में पानी के भिन्नात्मक संपीडन \(\frac{∆V}{V}\) की गणना कीजिए। दिया है कि पानी का आयतन गुणांक 2.2 × 109 N-m² है। g = 10 ms-2)
उत्तर:
1.36%

दृढ़ता गुणांक पर आधारित

प्रश्न 15.
एक 7 cm भुजा वाले रबर के घन का एक फलक स्थिर है जबकि 200 kg भार का एक स्पर्शरेखीय बल विपरीत फलक पर आरोपित किया गया है। उत्पन्न अपरूपण विकृति और विकृत भुजा द्वारा तय दूरी ज्ञात कीजिए। रबर के लिए η = 2 × 107 डाइन/सेमी
उत्तर:
0.2 रेडियन, 1.4cm

प्रश्न 16.
किसी 5 cm भुजा वाले रबर के घन का एक फलक स्थिर है जबकि इसके विपरीत फलक पर एक 180 kg का स्पर्शरेखीय बल आरोपित किया गया है, इसके द्वारा अपरूपण विकृति तथा धन की विकृत भुजा का पाश्र्व विस्थापन ज्ञात कीजिए। रबर का दृढ़ता प्रत्यास्थता गुणांक 2.4 × 106 न्यूटन मी दिया गया है।
उत्तर:
0.294 रेडियन, 0.0147 मी

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HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

Haryana State Board HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. परमाणु भार का आधुनिक आधार क्या है –
(1) O16 = 16.000
(2) C12 = 12.000
(3) साधारण O = 16.000
(4) H1 = 1.000.
उत्तर:
(2) C12 = 12.000

2. हाइड्रोजन परमाणु के आयनन से प्राप्त होगा-
(1) हाइड्राइड आयन
(2) हाइड्रोनियम आयन
(3) प्रोटॉन
(4) हाइड्रॉक्सिल आयन।
उत्तर:
(3) प्रोटॉन

3. न्यूट्रॉन की खोज में कठिनाई का कारण था-
(1) इसका आवेश रहित होना।
(2) इसका आवेश कम होना।
(3) इसका द्रव्यमान नगण्य होना।
(4) इसके आवेश तथा द्रव्यमान का अनुपात नगण्य होना।
उत्तर:
(1) इसका आवेश रहित होना।

4. जब एक इलेक्ट्रॉन L कोश से K कोश में कूदता है-
(1) ऊर्जा अवशोषित होती है।
(2) ऊर्जा निकलती है।
(3) ऊर्जा न तो अवशोषित होती है और न ही निकलती है।
(4) कभी ऊर्जा अवशोषित होती है तथा कभी निकलती है।
उत्तर:
(2) ऊर्जा निकलती है।

5. धनात्मक किरणों में e/m का मान सबसे अधिक किस गैस को लेने पर होगा-
(1) H2
(2) He
(3) N2
(4) O2
उत्तर:
(1) H2

6. α-कण का e/m… होता है प्रोटॉन के e/m का-
(1) दोगुना
(2) तीन गुना
(3) चार गुना
(4) बराबर।
उत्तर:
(1) दोगुना

7. 1 amu का मान होता है-
(1) 937 Mev
(2) 9310 MeV
(3) 931 Mev
(4) 127 MeV.
उत्तर:
(3) 931 Mev

8. सबसे हल्के नाभिक की तुलना में इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान होता है, लगभग-
(1) \(\frac { 1 }{ 80 }\)
(2) \(\frac { 1 }{ 800 }\)
(3) \(\frac { 1 }{ 1800 }\)
(4) \(\frac { 1 }{ 2800 }\)
उत्तर:
(3) \(\frac { 1 }{ 1800 }\)

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

9. निम्न में से उच्चतम तरंगदैर्ध्य वाली वैद्युत चुम्बकीय किरणें हैं-
(1) X – तरंगें
(2) अवरक्त तरंगें
(3) रेडियो तरंगें
(4) पराबैंगनी तरंगें।
उत्तर:
(3) रेडियो तरंगें

10. 4000 Å तरंगदैर्ध्य की किरणों तथा 2000 Å तरंगदैर्ध्य वाली किरणों के फोटॉनों की ऊर्जा का अनुपात है-
(1) \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(2) \(\frac { 1 }{ 4 }\)
(3) 2
(4) 4
उत्तर:
(3) 2

11. न्यूट्रॉन के द्रव्यमान की कोटि है-
(1) 10-23 किग्रा.
(2) 10-24 किग्रा.
(3) 10-26 किग्रा.
(4) 10-27 किग्रा.
उत्तर:
(4) 10-27 किग्रा.

12. परमाणु नाभिक की त्रिज्या की कोटि है-
(1) 10-12 सेमी.
(2) 10-8 सेमी.
(3) 10-10 सेमी.
(4) 10-7 सेमी.
उत्तर:
(2) 10-8 सेमी.

13. रदरफोर्ड ने कणों के प्रकीर्णन प्रयोग में प्रथम बार दर्शाया कि परमाणु में होता है-
(1) इलेक्ट्रॉन
(2) प्रोटॉन
(3) नाभिक
(4) न्यूट्रॉन।
उत्तर:
(3) नाभिक

14. हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम की कौन-सी श्रेणी दृश्य क्षेत्र में होगी-
(1) फुण्ड
(2) लाइमन
(3) बामर
(4) ब्रेकेट
उत्तर:
(3) बामर

15. न्यूनतम डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य सम्बन्धित है-
(1) इलेक्ट्रॉन से
(2) प्रोटॉन से
(3) CO2 अणु से
(4) SO2 अणु से।
उत्तर:
(4) SO2 अणु से।

16. हुण्ड के नियमानुसार किस तत्व में 6 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं?
(1) Fe
(2) Co
(3) Ni
(4) Cr
उत्तर:
(4) Cr

17. 2p तथा 3p कक्षकों में अन्तर होता है-
(1) 7 के मान में
(2) के मान में
(3) आकृति में
(4) आकार में।
उत्तर:
(4) आकार में।

18. किसी कक्ष में कक्षकों की संख्या होती है-
(1) N²
(2) 2²
(3) 2l + 1
(4) 2 (2n + l).
उत्तर:
(1) N²

19. यदि l = 3 हो, तो m के कुल मानों की संख्या होगी-
(1) 2
(2) 3
(3) 5
(4) 7
उत्तर:
(4) 7

20. सन् 1932 में पॉजिट्रॉन की खोज की-
(1) चैडविक ने
(2) रदरफोर्ड ने
(3) सी. डी. एन्डरसन ने
(4) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(3) सी. डी. एन्डरसन ने

21. उत्सर्जित एवं अवशोषित ऊर्जा के मान को कहते हैं-
(1) गतिज ऊर्जा
(2) क्वाण्टा
(3) मुक्त ऊर्जा
(4) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(2) क्वाण्टा

22. ψ किसको प्रदर्शित करता है-
(1) तरंग फलन
(2) इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान
(3) तरंगदैर्ध्य
(4) आवृत्ति।
उत्तर:
(1) तरंग फलन

23. चार क्वाण्टम संख्याओं क्रमश: n, l, m तथा s के मानों के चार समूह दिये जा रहे हैं, कौन सा समूह गलत है-
(1) n = 2, 1 = 0, m = +1, s = \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(2) n = 2, 1 = 1, m = – 1, s = + \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(3) n = 3, 1 = 2, m = 0, s = – \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(4) n = 3, 1 = 1, m = – 1, s = + \(\frac { 1 }{ 2 }\)
उत्तर:
(1) n = 2, 1 = 0, m = +1, s = \(\frac { 1 }{ 2 }\)

24. हाइड्रोजन परमाणु के निम्नलिखित में से कौन-से इलेक्ट्रॉनीय तल में फोटॉन का अवशोषण होगा न कि उत्सर्जन-
(1) 2s
(2) 2p
(3) 3s
(4) 1s
उत्तर:
(4) 1s

25. यदि बोर के प्रथम कक्ष की त्रिज्या r1 हो और तीसरे कक्ष की त्रिज्या r2 हो तो r1/r2 का मान है-
(1) 3
(2) 1/3
(3) 1/9
(4) 9
उत्तर:
(3) 1/9

26. हाइड्रोजन परमाणु He+ आयन तथा Li2+ आयन के क्रमश: प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय बोर कक्षाओं की त्रिज्या का अनुपात है-
(1) 4 : 3 : 2
(2) 4 : 2 : 3
(3) 2 : 3 : 4
(4) 2 : 4 : 3
उत्तर:
(2) 4 : 2 : 3

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

27. हाइड्रोजन परमाणु तथा He+ आयन की प्रथम बोर कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन के वेग का अनुपात है-
(1) 1 : 2
(2) 2 : 1
(3) 1 : 3
(4) 3 : 1
उत्तर:
(1) 1 : 2

28. किसी इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा अधिकतम होती है-
(1) नाभिक पर
(2) आद्य अवस्था में
(3) प्रथम उत्तेजित अवस्था में
(4) नाभिक में अनन्त दूरी पर।
उत्तर:
(3) प्रथम उत्तेजित अवस्था में

29. निम्न में से कौन-सा कथन असत्य है-
(1) तरंगदैर्ध्य तरंग कण के संवेग के व्युत्क्रमानुपाती होता है
(2) परमाणु के कक्षक ऊर्जा के बढ़ते क्रम में भरते हैं।
(3) (n + l) नियम हुण्ड के नियम का ही एक भाग है।
(4) (n + l) नियम कक्षकों की ऊर्जा के बढ़ते क्रम को निर्धारित करता है।
उत्तर:
(1) तरंगदैर्ध्य तरंग कण के संवेग के व्युत्क्रमानुपाती होता है

30. क्वाण्टम संख्याओं के निम्न में से किस सेट के लिये इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा अधिकतम होगी-
(1) 3, 2, +1, + \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(2) 4, 2, -1, + \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(3) 4, 1, 0, – \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(4) 5, 0, 0, + \(\frac { 1 }{ 2 }\)
उत्तर:
(2) 4, 2, -1, + \(\frac { 1 }{ 2 }\)

31. g – उपकोश के लिये सही है-
(1) n = 5
(2) m = 3
(3) l = 4
(4) l = 5
उत्तर:
(3) l = 4

32. निम्न में से वह स्पीशीज कौन-सी है जो अनुचुम्बकीय नहीं है-
(1) Cl
(2) Be
(3) Ne2+
(4) As+
उत्तर:
(1) Cl

33. परमाणु कक्षकों की ऊर्जा का सही आरोही क्रम है-
(1) 5p < 4f < 6s < 5d
(2) 5p < 6s < 4f < 5d
(3) 4f < 5p < 5d < 6s
(4) 5p < 5d < 4f < 6s.
उत्तर:
(2) 5p < 6s < 4f < 5d

34. समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज है-
(1) F, O2-
(2) F, O+
(3) F, O
(4) F, O2+.
उत्तर:
(1) F, O2-

35. मुख्य क्वाण्टम = 4 के लिये, 1 = 3 वाले कक्षकों की कुल संख्या है-
(1) 3
(2) 7
(3) 5
(4) 9
उत्तर:
(1) 3

36. किसी एक इलेक्ट्रॉन के संवेग में अनिश्चितता 1 x 10-18 g cm है। उसकी वेग में अनिश्चितता निम्न में से क्या होगी-
(1) 1 × 108 cm s-1
(2) 1 × 1011 cms-1
(3) 1 x 109 cm s-1
(4) 1 × 106 cms-1.
उत्तर:
(3) 1 x 109 cm s-1

37. हीलियम आयन का लाइन स्पेक्ट्रम ………….. के अनुरूप होता है-
(1) हाइड्रोजन परमाणु
(2) Li+ आयन
(3) हीलियम परमाणु
(4) लीथियम परमाणु।
उत्तर:
(1) हाइड्रोजन परमाणु

38. समभ्रंश कक्षकों के किसी सेट में इलेक्ट्रॉन स्वयं को इस प्रकार वितरित करते हैं जिससे कि जहाँ तक सम्भव हो उनका प्रचक्रण बना रहे। यह कथन सम्बन्धित है-
(1) पाउली के अपवर्जन के सिद्धान्त से
(2) ऑफबाऊ के सिद्धान्त से
(3) हुण्ड के नियम से
(4) स्लाटर के नियम से।
उत्तर:
(3) हुण्ड के नियम से

39. निम्न में से कौन इलेक्ट्रॉन प्रायिकता फलन को निरूपित करता है-
(1) 4π drψ²
(2) 4π r² drψ
(3) 4π r² drψ²
(4) 4π drψ
उत्तर:
(3) 4π r² drψ²

40. निम्न में से गलत कथन पहचानिए :
(1) 4f एवं 5f कक्षक समान रूप से परिरक्षित होते हैं।
(2) d-ब्लॉक के तत्व आपस में अनियमित एवं अस्थिर रासायनिक गुणधर्म दर्शाते हैं।
(3) La एवं Lu से आंशिक पूरित d-कक्षक होते हैं और कोई अन्य आंशिक पूरित कक्षक नहीं होते
(4) विभिन्न लेन्थेनॉयडों का रसायन समरूप होता है।
उत्तर:
(1) 4f एवं 5f कक्षक समान रूप से परिरक्षित होते हैं।

41. px ऑर्बिटल में नोडल तलों की संख्या है-
(1) 1
(2) 2
(3) 3
(4) 0
उत्तर:
(1) 1

42. ऑफबाऊ सिद्धान्त का उल्लंघन करने वाले कक्षक का रेखाचित्र है-
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 1
उत्तर:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 2

43. चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या बताती है–
(1) कक्षकों का आधार
(2) कक्षकों की आकृति
(3) अन्तरिक्ष में कक्षकों का दिशा विन्यास
(4) कक्षकों का ऊर्जा स्तर।
उत्तर:
(3) अन्तरिक्ष में कक्षकों का दिशा विन्यास

44. समान ऊर्जा वाले कक्षकों में होती है।
(1) समान ऊर्जा
(2) समान कार्य – फलन किन्तु भिन्न ऊर्जा
(3) भिन्न कार्य फलन किन्तु समान ऊर्जा
(4) समान कार्य – फलन।
उत्तर:
(4) समान कार्य – फलन।

45. 3p – कक्षकों में नोडों की संख्या है-
(1) 0
(2) 1
(3) 2
(4) 3.
उत्तर:
(2) 1

46. अपभ्रष्ट कक्षक वे होते हैं जिनमें-
(1) तरंग – फलन समान होते हैं।
(2) द्विक – विन्यास समान होते हैं
(3) ऊर्जा समान होती है
(4) (1) व (2) दोनों।
उत्तर:
(3) ऊर्जा समान होती है

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

47. इलेक्ट्रॉन का आवेश 4.8 x 10-10 es. u. होता है। Li3+ आयन पर आवेश की मात्रा है-
(1) 4.8 × 10-10 e.s.u.
(2) 9.6 × 10-10
(3) 1.44 × 10-9 e.s.u.
(4) 2.4 × 10-9 e.s.u.
उत्तर:
(3) 1.44 × 10-9 e.s.u.

48. इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा निम्नतम होगी-
(1) निम्नतम कक्षा में
(2) उच्च कक्षाओं में
(3) मध्य कक्षाओं में
(4) तृतीय कक्षा में।
उत्तर:
(1) निम्नतम कक्षा में

49. कैथोड किरणों के सम्बन्ध में असत्य कथन है-
(1) ये किरणें ऊष्मीय प्रभाव उत्पन्न करती हैं
(2) ये ऋणावेशित होती हैं
(3) उच्च द्रव्यमान वाले तत्वों से टकराकर X – किरणें उत्पन्न करती हैं
(4) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(4) इनमें से कोई नहीं।

50. रदरफोर्ड के α-कणों के प्रकीर्णन सिद्धान्त से निष्कर्ष निकलता है कि-
(1) ऊर्जा तथा द्रव्यमान सम्बन्धित होते हैं
(2) नाभिक के अन्दर परमाणु का द्रव्यमान तथा आवेश रहता है।
(3) नाभिक में न्यूट्रॉन उपस्थित होते हैं।
(4) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(2) नाभिक के अन्दर परमाणु का द्रव्यमान तथा आवेश रहता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एल्फा कण क्या है?
उत्तर:
एल्फा कण द्विधन आवेशित हीलियम का नाभिक है।

प्रश्न 2.
एक मोल इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान क्या है?
उत्तर:
6.023 x 1023 x 9.108 × 10-28 ग्राम।

प्रश्न 3.
नाभिक की खोज किसने की थी?
उत्तर:
रदरफोर्ड ने।

प्रश्न 4.
ऐनोड किरणों की प्रकृति किस पर निर्भर करती है?
उत्तर:
विसर्जन नली में भरी हुई गैस पर।

प्रश्न 5.
बोर का परमाणु मॉडल किस सिद्धान्त पर आधारित है?
उत्तर:
प्लांक के क्वाण्टम सिद्धान्त पर आधारित है।

प्रश्न 6.
बोर की गोलाकार कक्षाओं को क्या कहते हैं?
उत्तर:
ऊर्जा स्तर।

प्रश्न 7.
बोर की कक्षा को स्थाई कक्ष क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि स्थाई कक्षा में घूमते समय इलेक्ट्रॉन चुम्बकीय विकिरण के द्वारा ऊर्जा का ह्रास नहीं होता है।

प्रश्न 8.
इलेक्ट्रॉन का अधिकतम वेग कौन-से कक्ष में होता है?
उत्तर:
प्रथम कक्ष में।

प्रश्न 9.
किसी कक्ष में इलेक्ट्रॉन के संवेग का मान क्या होता है?
उत्तर:
mvr = \(\frac { nh }{ 2π }\)

प्रश्न 10.
किसी कक्ष की त्रिज्या का मान बताइए।
उत्तर:
r = 0.529 x \(\frac { n² }{ Z }\)Å

प्रश्न 11.
बोर त्रिज्या किसे कहते हैं?
उत्तर:
हाइड्रोजन की प्रथम कक्षा को बोर त्रिज्या कहते हैं?

प्रश्न 12.
ऊर्जा स्तरों को किन प्रतीकों से प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर:
K, L, M, N, O, P, Q के द्वारा।

प्रश्न 13.
उत्सर्जित प्रकाश की आवृत्ति किस समीकरण के द्वारा ज्ञात करते हैं?
उत्तर:
∆E = hv = E2 – E1

प्रश्न 14.
बोर का परमाणु मॉडल किस प्रकार के परमाणु स्पेक्ट्रम की व्याख्या करता है?
उत्तर:
बोर का परमाणु मॉडल केवल H परमाणु, He+, Li2+ आदि एक इलेक्ट्रॉनीय परमाणुओं और आयनों के स्पेक्ट्रम की व्याख्या करता है।

प्रश्न 15.
प्लांक नियतांक h का मान क्या है?
उत्तर:
h = 6.62 × 10-27 अर्ग-सेकण्ड।

प्रश्न 16.
स्पेक्ट्रम क्षेत्र में मिलने वाली रेखाओं की आवृत्ति को ज्ञात करने का सूत्र बताइए।
उत्तर:
\(\overline{\mathcal{V}}\) = R\(\left(\frac{1}{n_1^2}-\frac{1}{n_2^2}\right)\) cm-1

प्रश्न 17.
यदि = 1, 2, 3 तथा 4 हो तो मुख्य ऊर्जा स्तरों के नाम बताइये।
उत्तर:
n = 1  K ऊर्जा स्तर
n = 2  L ऊर्जा स्तर
n = 3  M ऊर्जा स्तर
n = 4  N ऊर्जा स्तर

प्रश्न 18.
विकिरण की ऊर्जा और आवृत्ति में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
E = hv = h\(\frac { c }{ λ }\)

प्रश्न 19.
3p-ऑर्बिटल में उपस्थित कुल कोणीय व वृत्तीय नोडों की कुल संख्या बतायें।
उत्तर:
3p-ऑर्बिटल के लिये, n = 3, l = 1
कोणीय नोडों (Angular nodes) की संख्या = 1 = 1
वृत्तीय नोडों (Radial nodes) की
संख्या = n – l – 1
= 3 – 1 – 1
= 1

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 20.
परमाणु क्रमांक 24 वाले तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
उत्तर:
परमाणु क्रमांक (24) = 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d5, 4s1

प्रश्न 21.
“अधिकांश तत्वों के परमाणु भार भिन्नात्मक होते हैं।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
तत्वों का परमाणु भार उनके समस्थानिकों के भार का औसत होता है, इस कारण अधिकांश तत्वों के परमाणु भार भिन्नात्मक होते हैं।

प्रश्न 22.
एक परमाणु M तथा इसके आयन M+ दोनों का द्रव्यमान समान क्यों होता है?
उत्तर:
क्योंकि दोनों में प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉनों की संख्या समान होती है।

प्रश्न 23.
किसी तत्व ‘X’ के परमाणु के कौन-कौन से कण उसके द्रव्यमान के लिये मुख्य रूप से उत्तरदायी होते हैं?
उत्तर:
प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन किसी भी तत्व के परमाणु के द्रव्यमान के लिये मुख्य रूप से उत्तरदायी होते हैं।

प्रश्न 24.
“परमाणु विद्युत उदासीन होता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परमाणु के नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या व नाभिक के बाहर इलेक्ट्रॉनों की संख्या बराबर-बराबर होती है, इस कारण परमाणु विद्युत उदासीन होता है।

प्रश्न 25.
विसर्जन नलिका के प्रयोग में नली की दीवार पर चमक क्यों उत्पन्न होती है?
उत्तर:
विसर्जन नलिका के प्रयोग में नली की दीवार पर चमक कैथोड किरणों के टकराने के कारण उत्पन्न होती है।

प्रश्न 26.
विसर्जन नली में उपस्थित वह कौन-सा कण है, जिसके e/m का मान अधिकतम है?
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन का e/m मान अधिकतम होता है।

प्रश्न 27.
विसर्जन नलिका धन किरणों का स्रोत क्या होता है?
उत्तर:
विसर्जन नलिका में धन किरणों का स्रोत नली में भरी गैस होती है।

प्रश्न 28.
परमाणु के तीन मूल कण कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:
परमाणु के तीन मूल कण इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व न्यूट्रॉन होते हैं।

प्रश्न 29.
रदरफोर्ड के कणों के प्रकीर्णन प्रयोग में, α-कणों का स्रोत क्या है?
उत्तर:
Ra (रेडियम) या Po (पोलेनियम )

प्रश्न 30.
यह कैसे सिद्ध होता है कि परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त या खोखला होता है।
उत्तर:
रदरफोर्ड के α- प्रकीर्णन प्रयोग में अधिकांश α-कण बिना विचलित हुये सीधे निकल जाते हैं, इससे यह सिद्ध होता है कि परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है।

प्रश्न 31.
किस प्रयोग से सिद्ध होता है कि परमाणु का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र में स्थित होता है?
उत्तर:
रदरफोर्ड के α-प्रकीर्णन के प्रयोग से सिद्ध होता है कि परमाणु का समस्त द्रव्यमान उसके केन्द्र में स्थित होता है।

प्रश्न 32.
“परमाणु द्वारा ऊर्जा का उत्सर्जन क्वाण्टीकृत (Quantised) होता है।” इस तथ्य को सर्वप्रथम किसने प्रस्तावित किया था?
उत्तर:
“परमाणु द्वारा ऊर्जा का उत्सर्जन क्वाण्टीकृत होता है।” इस तथ्य को सर्वप्रथम बोर (Bohr) ने प्रस्तावित किया था।

प्रश्न 33.
इलेक्ट्रॉनों तथा प्रोटॉनों में से किसका वेग अधिक होगा यदि दोनों की तरंगदैर्ध्य समान है?
उत्तर:
जिसका भार कम होगा उसका वेग उतना ही अधिक होगा क्योंकि λ = \(\frac { h }{ mv }\) अतः इलेक्ट्रॉन का वेग अधिक होगा।

प्रश्न 34.
एक परमाणु नाभिक में 14 प्रोटॉन तथा 13 न्यूट्रॉन हैं। इसकी द्रव्यमान संख्या क्या होगी?
उत्तर:
द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉन की + न्यूट्रॉन की
संख्या             संख्या

= 14 + 13 = 27
द्रव्यमान संख्या = 27 है।

प्रश्न 35.
तत्व \({ }_{19}^{39} \mathrm{~K}\) में इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन की संख्या बताएँ।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन की संख्या = परमाणु क्रमांक = 19 प्रोटॉन की संख्या = परमाणु क्रमांक = 19
न्यूट्रॉन की संख्या = द्रव्यमान संख्या – परमाणु क्रमांक
= 39 19 20

प्रश्न 36.
किसी तत्व के समस्थानिकों में क्या समानता होती है?
उत्तर:
समस्थानिकों में परमाणु क्रमांक समान होता है।

प्रश्न 37.
परमाणु के कौन से कण परमाणु भार के लिये उत्तरदायी होते हैं?
उत्तर:
प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन परमाणु भार के लिये उत्तरदायी होते हैं।

प्रश्न 38.
न्यूट्रॉन की खोज किसने की थी?
उत्तर:
न्यूट्रॉन की खोज सर जेम्स चेडविक ने की थी।

प्रश्न 39.
कौन-सा कण तत्वों के भिन्न-भिन्न प्रकार के समस्थानिकों के बनने का कारण होता है?
उत्तर:
न्यूट्रॉन तत्वों के समस्थानिकों के बनने का कारण होता है।

प्रश्न 40.
द्रव्यमान संख्या, न्यूट्रॉन की संख्या तथा परमाणु क्रमांक में क्या सम्बन्ध होता है।
उत्तर:
द्रव्यमान संख्या परमाणु क्रमांक + न्यूट्रॉन की संख्या

प्रश्न 41.
निम्नलिखित के पूर्ण प्रतीक लिखो।
(i) परमाणु संख्या 56 तथा द्रव्यमान संख्या 138 का नाभिक।
(ii) परमाणु संख्या 26 तथा द्रव्यमान संख्या 55 का नाभिक।
(iii) परमाणु संख्या 4 तथा द्रव्यमान संख्या 9 का नाभिक।
उत्तर:
(i) परमाणु संख्या 56 वाला तत्व Ba है। इसका प्रतीक \({ }_{138}^{56} \mathrm{Ba}\) है।
(ii) परमाणु संख्या 26 वाला तत्व Fe है। इसका प्रतीक \({ }_{55}^{26} \mathrm{Fe}\) है।
(iii) परमाणु संख्या 4 वाला तत्व Be है इसका प्रतीक \({ }_{9}^{4} \mathrm{Be}\) है।

प्रश्न 42.
एक गतिमान सूक्ष्म कण की तरंगदैर्ध्य तथा संवेग के मध्य सम्बन्ध बताइये। इस सम्बन्ध को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
λ = \(\frac { h }{ mv }\)
यहाँ λ = तरंगदैर्ध्य, h = प्लांक स्थिरांक
m = द्रव्यमान, v = वेग
उपर्युक्त सम्बन्ध डी-ब्रॉग्ली सम्बन्ध के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 43.
किसी कक्षा में इलेक्ट्रॉन के निश्चित पथ की बोर- अवधारणा में आये उस मूलभूत परिवर्तन का उल्लेख कीजिए, जिसका अवतरण हाइजेनबर्ग अनिश्चितता सिद्धान्त से हुआ।
उत्तर:
अनिश्चितता सिद्धान्त के अनुसार, इलेक्ट्रॉन का पथ सदैव प्रायिक होता है तथा यह स्थिर अथवा निश्चित नहीं होता जैसा कि बोर – अवधारणा में उल्लेखित है।

प्रश्न 44.
किसी गतिमान सूक्ष्म कण के वेग में परिवर्तन से इसकी तरंगदैर्ध्य पर प्रभाव पड़ता है। क्यों?
उत्तर:
तरंगदैर्ध्य, वेग के व्युत्क्रमानुपाती होती है (λ = \(\frac { h }{ mv }\)) इसका अर्थ है कि वेग बढ़ने पर, तरंगदैर्ध्य घटेगी तथा वेग कम होने पर बढ़ेगी।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 45.
क्या डी-ब्रॉग्ली सम्बन्ध केवल इलेक्ट्रॉन पर ही लागू किया जा सकता है?
उत्तर:
नहीं, यह सभी गतिमान सूक्ष्मतम कणों पर लागू किया जा सकता है।

प्रश्न 46.
बोर मॉडल के अनुसार, प्रत्येक स्थिर अवस्था की En निम्नलिखित व्यंजक द्वारा दी जा सकती है।
En = \(\frac { -1312 }{ n² }\) kJ mol-1
यहाँ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यहाँ n से तात्पर्य ऊर्जा स्तर से है।

प्रश्न 47.
प्रथम कक्ष के लिये बोर त्रिज्या का मान बताइये।
उत्तर:
प्रथम कक्ष के लिये,
r1 = 0.529 Å
r1 = 0.529 × 10-10 m
r1 = 5.29 × 10-11 m

प्रश्न 48.
बोर के अनुसार, H परमाणु के लिये पहले कक्ष की त्रिज्या का सूत्र क्या है?
उत्तर:
rn = r1 x n²

प्रश्न 49.
H- परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिये कितनी ऊर्जा की आवश्यकता होगी?
उत्तर:
H- परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिये 13-6ev की आवश्यकता होगी।

प्रश्न 50.
प्लांक नियतांक (h) का मान व इकाई बताइए।
उत्तर:
6.625 x 10-27 अर्ग सेकण्ड

प्रश्न 51.
कैसे प्रदर्शित होता है कि नाभिक धनावेशित होता है?
उत्तर:
इसे हम रदरफोर्ड के α-प्रकीर्णन प्रयोग द्वारा सिद्ध कर सकते हैं।

प्रश्न 52.
न्यूट्रॉन क्या है? यह प्रोटॉन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
on1, न्यूट्रॉन उदासीन कण है, जबकि प्रोटॉन धनावेशित कण है।

प्रश्न 53.
प्रोटॉन तथा H-परमाणु में विभेद कीजिए।
उत्तर:
परमाणु में से एक इलेक्ट्रॉन निकलने के बाद शेष बची रचना प्रोटॉन कहलाती है।

प्रश्न 54.
एक परमाणु के नाभिक में 17 प्रोटॉन तथा 18 न्यूट्रॉन हैं तो इसकी संयोजकता तथा द्रव्यमान संख्या क्या होगी?
उत्तर:
यहाँ संयोजकता = 1.
द्रव्यमान संख्या प्रोटॉन की संख्या + न्यूट्रॉन की संख्या
= 17 + 18 = 35

प्रश्न 55.
“सभी फोटॉनों की ऊर्जा बराबर नहीं होती है” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
फोटॉन की कर्जा प्रकाश की तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करती है।
E = \(\frac { hc }{ λ }\)

प्रश्न 56.
एक फोटॉन का द्रव्यमान क्या होगा?
उत्तर:
फोटॉन द्रव्यमान रहित ऊर्जा के पैकेट होते हैं। परन्तु इसके नगण्य द्रव्यमान को निम्न सूत्र द्वारा निकाल सकते हैं।
m = \(\frac { h }{ cλ }\)

प्रश्न 57.
निम्नलिखित तत्वों में किस प्रकार की समानता है?
\({ }_6^{14} \mathrm{C},{ }_7^{15} \mathrm{~N},{ }_8^{16} \mathrm{O}\)
उत्तर:
ये तत्व आपस में समन्यूट्रॉनिक हैं?

प्रश्न 58.
निम्नलिखित में प्रत्येक का उदाहरण दीजिये।
(i) \({ }_{17}^{35} \mathrm{Cl}\) का समस्थानिक
उत्तर:
\({ }_{17}^{35} \mathrm{Cl}\) का समस्थानिक \({ }_{17}^{35} \mathrm{Cl}\) है।

(ii) \({ }_{18}^{40} \mathrm{Ar}\) का समभारिक
उत्तर:
\({ }_{18}^{40} \mathrm{Ar}\) का समभारिक \({ }_{20}^{40} \mathrm{Ca}\) है।

(iii) \({ }_{7}^{15} \mathrm{N}\) का समन्यूट्रॉनिक
उत्तर:
\({ }_{7}^{15} \mathrm{N}\) का समन्यूट्रॉनिक \({ }_{8}^{16} \mathrm{O}\) है।

प्रश्न 59.
हाइड्रोजन के समस्थानिक लिखें।
उत्तर:
हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक होते हैं :

  1. प्रोटियम \(\left({ }_1^1 \mathrm{H}\right)\)
  2. ड्यूटीरियम \(\left({ }_1^2 \mathrm{H}\right)\)
  3. ट्राइटियम \(\left({ }_1^3 \mathrm{H}\right)\)

प्रश्न 60.
इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा को शून्य कब मानते हैं?
उत्तर:
जब इसकी नाभिक से दूरी अनन्त हो। इस समय इलेक्ट्रॉन तथा नाभिक के मध्य का आकर्षण बल शून्य हो जाता है तथा ऊर्जा भी शून्य हो जाती है।

प्रश्न 61.
एक फोटॉन तथा क्वाण्टम में क्या अन्तर है?
उत्तर:
क्वाण्टम निश्चित ऊर्जा (E = hv) का एक बन्डल होता है। इसका स्रोत कुछ भी हो सकता। जबकि फोटॉन, केवल प्रकाश के क्वाण्टम को कहते हैं।

प्रश्न 62.
कैथोड किरणें तभी उत्पन्न होती हैं जब डिस्चार्ज नली के अन्दर गैस का दाब बहुत-बहुत कम हो, क्यों?
उत्तर:
उच्च दाब पर नली में विद्युत धारा का प्रवाह नहीं हो पाता है। क्योंकि गैसें विद्युत की बहुत कम चालक होती हैं।

प्रश्न 63.
एक डिस्चार्ज नली में हाइड्रोजन गैस तथा दूसरी डिस्चार्ज नली में ऑक्सीजन गैस ली गयी है क्या कैथोड किरणों तथा ऐनोड किरणों में इलेक्ट्रॉन तथा धनायन समान होंगे या भिन्न।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन की संख्या तो समान होगी परन्तु धनायन समान नहीं होंगे।

प्रश्न 64.
जब α-कण सोने की पतली पत्नी पर टकराते हैं तो टकराने के पश्चात् कुछ α-कण वापस चले जाते हैं, यह क्या सिद्ध करता है?
उत्तर:
यह सिद्ध करता है कि परमाणु में अन्दर एक बहुत छोटा परन्तु भारी नाभिक उपस्थित होता है।

प्रश्न 65.
निम्नलिखित नाभिकों में से समस्थानिकों एवं समभारिकों को चुनिये-
(a) 10 प्रोटॉन + न्यूट्रॉन
(b) 10 प्रोटॉन +11 न्यूट्रॉन
(c) 19 प्रोटॉन + 23 न्यूट्रॉन
(d) 21 प्रोटॉन + 21 न्यूट्रॉन
उत्तर:
(a) तथा
(b) आपस में समस्थानिक जबकि
(c) व
(d) आपस में समभारिक है।

प्रश्न 66.
हाइड्रोजन के किस समस्थानिक में दो न्यूट्रॉन होते हैं।
उत्तर:
ट्राइट्रियम में \(\left({ }_1^3 \mathrm{H}\right)\) दो न्यूट्रॉन होते हैं।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 67.
द्रव्य की द्वैत प्रकृति की व्याख्या किस वैज्ञानिक ने की थी?
उत्तर:
डी-ब्रॉली ने।

प्रश्न 68.
अनिश्चितता का सिद्धान्त किस वैज्ञानिक की देन है?
उत्तर:
वर्नर हाइजेनबर्ग की

प्रश्न 69.
तरंग फलन को कैसे प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर:
ψ(Psi, साई से)।

प्रश्न 70.
परमाणु की तरंग यान्त्रिक मॉडल अवधारणा का समीकरण क्या है?
उत्तर:
λ = \(\frac { h }{ p }\)

प्रश्न 71.
इलेक्टॉन अभ्र क्या है?
उत्तर:
परमाणु में इलेक्टॉन का ऋणावेश अभ्र के रूप में नाभिक के चारों ओर विसरित रहता है अभ्र का घनत्व उस क्षेत्र में अधिक रहता है जिसमें इलेक्ट्रॉन मिलने की प्रायिकता अधिक होती है।

प्रश्न 72.
पाउली का अपवर्जन नियम क्या है?
उत्तर:
एक ही परमाणु में उपस्थित किन्हीं दो इलेक्ट्रॉनों की चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान समान नहीं हो सकते हैं।

प्रश्न 73.
n के किसी मान के लिये l का मान क्या होता है?
उत्तर:
(0) से (n – 1) तक।

प्रश्न 74.
दिगंशी क्वाण्टम संख्या l = 2 के लिये चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या m के मान लिखिए।
उत्तर:
l = 2, m = 2, – 1, 0, + 1, + 2

प्रश्न 75.
s p d f उपकोशों में कितने कक्षक होते हैं?
उत्तर:
2l + 1 कक्षक होते हैं।

प्रश्न 76.
Sc (परमाणु क्रमांक 21) के अन्तिम इलेक्ट्रॉनों की चारों क्वाण्टम सख्याएं लिखिए।
उत्तर:
Sc का अन्तिम इलेक्ट्रॉन 3d1 है अतः n = 3, l = 2, m = – 2 = – 2

प्रश्न 77.
निम्न में से कौन से उपकोश सम्भव नहीं हैं?
1s, 1p, 2s, 3d, 3f
उत्तर:
1p तथा 3f उपकोश सम्भव नहीं हैं क्योंकि l का मान n से कम नहीं है-
n = 1 l = 1 lp
n = 3 l = 3 3f

प्रश्न 78.
परमाणु की निम्न संरचना को ठीक करके लिखिए।
1s², 2s², 2px², 2py0, 2pz0
उत्तर:
1s², 2s², 2px1, 2py1, 2pz0

प्रश्न 79.
किसी तत्व के परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या व प्रोटॉनों की संख्या बराबर-बराबर होती है, परन्तु उसके परमाणु क्रमांक को केवल प्रोटॉनों के द्वारा परिभाषित किया जाता है, इलेक्ट्रॉनों के द्वारा नहीं, क्यों?
उत्तर:
एक परमाणु इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण भी कर सकता है और उत्सर्जित भी कर सकता है, परन्तु परमाणु के अन्दर उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या सदैव स्थिर रहती है।

प्रश्न 80.
यदि किसी परमाणु के नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या में परिवर्तन किया जाये तो बनने वाले परमाणु का मूल परमाणु से सम्बन्ध क्या होगा?
उत्तर:
समस्थानिक होगा।

प्रश्न 81.
जब एक इलेक्ट्रॉन किसी भी उच्च कक्षा से दूसरी कक्षा (n = 2) में कूदता है तो प्राप्त होने वाले रेखीय स्पेक्ट्रम की श्रेणी को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
बामर श्रेणी।

प्रश्न 82.
किसी कण की तरंगदैर्ध्य और संवेग के सम्बन्ध का सूत्र बतलाइए।
उत्तर:
λ = \(\frac { h }{ p }\) = \(\frac { h }{ mv }\)

प्रश्न 83.
किस उपकोश का आकार गोलाकार होता है?
उत्तर:
s-उपकोश का आकार गोलाकार होता है।

प्रश्न 84.
किसी परमाणु की कक्षा में कोणीय संवेग के क्वाण्टीकरण का निर्गमन किसने किया?
उत्तर:
डी-ब्रॉली ने सर्वप्रथम किसी परमाणु की कक्षा में कोणीय संवेग के क्वाण्टीकरण निर्गमन किया।

प्रश्न 85.
निम्न में से कौन-से ऑर्बिटल समभ्रंश (degenerate) हैं?
3dxy, 4dxy, 3dz², 3dyz, 4dyz, 4dz²
उत्तर:
3dxy, 3dz², 3dyz – समभ्रंश ऑर्बिटल
4dxy, 4dyz, 4dz² – समभ्रंश ऑर्बिटल

प्रश्न 86.
चौथी कक्षा में अधिकतम कितने इलेक्ट्रॉन आ सकते है?
उत्तर:
अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2n²
= 2(4)²
= 32 इलेक्ट्रॉन

प्रश्न 87.
पाउली के नियम को अपवर्जन नियम क्यों कहते हैं?
उत्तर:
पाउली के नियम को अपवर्जन नियम इसलिये कहते हैं क्योंकि यह नियम किसी कक्षक के अन्दर तीसरे इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति की सम्भावना को वर्जित करता है।

प्रश्न 88.
सभी फोटॉनों की ऊर्जा समान नहीं होती है। टिप्पणी दें।
उत्तर:
फोटॉनों की ऊर्जा उसके तरंगदैथ्यों पर निर्भर करती है, जिसे हम निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात कर सकते हैं।
E = \(\frac { hc }{ λ }\)
अतः फोटॉनों की ऊर्जा समान नहीं होती है।

प्रश्न 89.
किसी भी कक्षक में अधिकतम कितने इलेक्ट्रॉन उपस्थित रह सकते हैं?
उत्तर:
किसी भी कक्षक में विपरीत चक्रण वाले अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन ही रह सकते हैं।

प्रश्न 90.
“समान स्थिन क्वाण्टम संख्या वाले इलेक्ट्रॉन एक ही कक्षक में नहीं रह सकते।” यह कथन किस नियम को बताता है।
उत्तर:
पाउली के अपवर्जन नियम को।

प्रश्न 91.
एक गतिमान कण की तरंगदैर्ध्य का निम्न सूत्र है, यह किस सिद्धान्त से है-
λ = \(\frac { h }{ p }\)
उत्तर:
डी ब्रॉग्ली सिद्धान्त से

प्रश्न 92.
“किसी परमाणु के अन्दर इलेक्ट्रॉन की स्थिति और वेग दोनों को एक साथ ठीक-ठीक निर्धारित करना असम्भव है।” यह कथन किस सिद्धान्त पर आधारित है?
उत्तर:
हाइजेनवर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त।

प्रश्न 93.
“किसी परमाणु में स्थित किन्हीं भी दो इलेक्ट्रॉनों की चारों क्वाण्टम संख्याएँ समान नहीं हो सकतीं।” यह कथन किस वैज्ञानिक ने दिया था।
उत्तर:
पाठली ने।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 94.
यदि किसी परमाणु के नाभिक में न्यूट्रॉन की संख्या परिवर्तित हो तो अपने मूल परमाणु से उसका क्या सम्बन्ध होगा?
उत्तर:
यह समस्थानिक होगा।

प्रश्न 95.
किस वैज्ञानिक के अनुसार परमाणु की कक्षा में कोणीय संवेग क्वाण्टीकृत (quantised) होता है।
उत्तर:
बोर (Bohr) के अनुसार।

प्रश्न 96.
पाउली के अपवर्जन नियमानुसार d-उपकोश में अधिकतम कितने इलेक्ट्रॉन आ सकते हैं।
उत्तर:
दस।

प्रश्न 97.
कौन-सा प्रायोगिक प्रमाण इलेक्ट्रॉन के तरंग लक्षण का समर्थन करता है?
उत्तर:
डेविसन तथा जर्मर का इलेक्ट्रॉन विवर्तन वलयों पर आधारित प्रयोग इलेक्ट्रॉन के तरंग लक्षण का समर्थन करता है।

प्रश्न 98.
किसी गतिमान कण की तरंगदैर्ध्य क्या होगी यदि इसका वेग दोगुना कर दिया जाए।
उत्तर:
तरंगदैर्ध्य घटकर आधी रह जायेगी क्योंकि सूत्र के अनुसार, (λ = h/mv), यहाँ पर h तथा m दोनों ही नियतांक है।

प्रश्न 99.
गतिमान सूक्ष्म कण के वेग में परिवर्तन किसी कण की तरंगदैर्ध्य को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
तरंगदैर्ध्य वेग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। (λ = \(\frac { h }{ mv }\))। इसका अर्थ है कि यदि वेग बढ़ता है तो तरंगदैर्ध्य घटता है और वेग घटाने पर तरंगदैर्ध्य बढ़ जाता है।

प्रश्न 100.
नोडल तल से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
नोडल तल वह तल होता है, जहाँ पर इलेक्ट्रॉन के पाये जाने की सम्भावना नगण्य होती है, अर्थात् यहाँ पर (ψ² = 0) होता है।

प्रश्न 101.
ψ² का भौतिक महत्व क्या है?
उत्तर:
ψ² किसी भी इलेक्ट्रॉन के पाये जाने की प्रायिकता को प्रदर्शित करता है। यदि ψ² का मान शून्य है तो वहाँ पर इलेक्ट्रॉन के पाये जाने की प्रायिकता भी शून्य होती है।

प्रश्न 102.
किसी भी नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन की गति की गणना शुद्धता के साथ नहीं की जा सकती है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि नाभिक के चारों ओर गतिमान इलेक्ट्रॉन के वेग में अनिश्चितता होती है। यह नियम हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धान्त के अनुसार होता है।

प्रश्न 103.
किसी कक्षक में उपस्थित दो इलेक्ट्रॉनों का चक्रण विपरीत क्यों होता है?
उत्तर:
किसी कक्षक में उपस्थित दो इलेक्ट्रॉनों का चक्रण विपरीत होता है क्योंकि समान्तर अथवा समान चक्रण के इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।

प्रश्न 104.
स्टार्क प्रभाव से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
स्टार्क प्रभाव – विद्युत क्षेत्र में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का विपाटन (Splitting) स्टार्क प्रभाव कहलाता है।

प्रश्न 105.
जीमान प्रभाव से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जीमान प्रभाव – चुम्बकीय क्षेत्र में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का विपाटन (Splitting) जीमान प्रभाव कहलाता है।

प्रश्न 106.
ऊर्जा के क्वाण्टीकरण से क्या तात्पर्य होता है?
उत्तर:
ऊर्जा स्तरों की ऊर्जा के कुछ विशिष्ट मान होते हैं इन्हीं विशिष्ट मानों के कारण ही ऊर्जा का क्वाण्टीकरण होता है।

प्रश्न 107.
आवृत्ति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रति एकांक समय में किसी बिन्दु से होकर जाने वाली तरंगों की संख्या को आवृत्ति कहते हैं।

प्रश्न 108.
तरंगदैर्ध्य से क्या तात्र्त्य है?
उत्तर:
तरंगदैर्ध्य (Wave length) – दो समीपवर्ती शृंगों (Crests) गर्तौ (Troughs) के केन्द्रों के बीच की दूरी तरंगदैर्ध्य कहलाती है।

प्रश्न 109.
इलेक्ट्रॉनों की द्वैत प्रकृति (dual Nature) दर्शाने वाली दो परिघटनाओं के नाम बताइये।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनों की द्वैत प्रकृति निम्न परिघटनाओं द्वारा प्रदर्शित की जा सकती है।

  1. प्रकाश विद्युत प्रभाव
  2. विवर्तन

प्रश्न 110.
कृष्णिका विकिरण (Black body radiation) क्या है बताइए।
उत्तर:
कृष्णिका विकिरण (Black body Radiation ) – एक ऐसा आदर्श पिण्ड जो हर प्रकार की आवृत्ति की विकिरणों को उत्सर्जित तथा अवशोषित करता है, कृष्णिका (Black body) कहलाता है। इस कृष्णिका से उत्सर्जित होने वाला विकिरण कृष्णिका विकिरण (Black body Radiation) कहलाता है।

प्रश्न 111.
तरंग संख्या (Wave number) पर टिप्पणी दें।
उत्तर:
तरंग संख्या (Wave number) – प्रति एकांक लम्बाई में, तरंगदैर्ध्य की संख्या को तरंग संख्या (wave Number) कहते हैं। इसका मात्रक m-1 या cm-1 होता है।

प्रश्न 112.
विवर्तन क्या होता है?
उत्तर:
किसी बाधा के आ जाने के कारण, तरंग के पथ में होने वाला विचलन विवर्तन कहलाता है।

प्रश्न 113.
व्यतिकरण पर टिप्पणी दें।
उत्तर:
व्यतिकरण- एक समान आवृत्ति वाली दो तरंगें मिलकर एक ऐसी तरंग देती हैं जिसका त्रिविम में प्रत्येक बिन्दु पर विक्षोभ, प्रत्येक तरंग के उस बिन्दु पर विक्षोभ का
बीजगणितीय या सदिश योग होता है। तरंगों का इस प्रकार का संयोजन व्यतिकरण कहलाता है।

प्रश्न 114.
क्या क्रिकेट की एक गतिमान गेंद में तरंग लक्षण होता है?
उत्तर:
डी-ब्रॉग्ली के अनुसार, λ = h/mv होता है, चूँकि क्रिकेट की गेंद का द्रव्यमान अधिक होता है इस कारण इसके तरंगदैर्ध्य का मान बहुत कम होता है जिसे मापना सम्भव नहीं है। इस कारण गति करती हुई गेंद में तरंग लक्षण नहीं होता है।

प्रश्न 115.
क्या अनिश्चितता का सिद्धान्त किसी भी कण (छोटे अथवा बड़े) पर लागू होता है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
नहीं। यह सिद्धान्त केवल सूक्ष्म कर्णो जैसे- इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन आदि पर ही लागू होता है।

प्रश्न 116.
क्या एक हाथी तरंग-गति में चक्कर लगा सकता है? इसकी तरंग का भौतिक महत्व क्या होगा?
उत्तर:
हाँ, एक हाथी तरंग गति में चक्कर लगा सकता है, परन्तु इसकी द्रव्य तरंग का मान बहुत ही कम होगा जिसका कोई भौतिक महत्त्व नहीं होता है।

प्रश्न 117.
डी-ब्रॉग्ली सम्बन्ध की सार्थकता क्या है?
उत्तर:
डी-ब्रॉग्ली सम्बन्ध के द्वारा केवल अति सूक्ष्मकणों की द्वैत प्रकृति को समझ सकते हैं अर्थात् कणों में भी तरंग प्रकृति होती है। अर्द्धसूक्ष्म व वृहद कणों के कणीय लक्षण अधिक परन्तु तरंग लक्षण कम होते हैं। इन कणों के तरंगदैर्ध्य का मान इतना कम होता है कि उसको मापना सम्भव नहीं होता है।

प्रश्न 118.
यदि एक गतिशील इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटॉन के तरंगदैर्ध्य समान हैं तो इनमें से किसकी गति अधिक होगी और क्यों?
उत्तर:
λ = \(\frac { h }{ mv }\) के अनुसार, द्रव्यमान तथा वेग में व्युत्क्रम सम्बन्ध है। प्रश्नानुसार इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटॉन के h तथा λ का मान समान है। जिस कण का द्रव्यमान अधिक होगा उसका वेग कम होगा। अतः इलेक्ट्रॉन का वेग प्रोटॉन की तुलना में अधिक होगा क्योंकि इसका द्रव्यमान प्रोटॉन से कम होता है।

प्रश्न 119.
किसी तत्व के रेखीय स्पेक्ट्रम को उस तत्व का फिंगर प्रिन्ट कहा जाता है। इस तथ्य पर टिप्पणी दें।
उत्तर:
प्रत्येक परमाणु के लिये रेखीय स्पेक्ट्रम की तरंगदैर्ध्य का मान निश्चित होता है। अतः कोई भी तत्व उसके रेखीय स्पेक्ट्रम के द्वारा पहचाना जा सकता है। अतः तत्व के रेखीय स्पेक्ट्रम को उस तत्व का फिंगर प्रिन्ट कहते हैं।

प्रश्न 120.
क्या H-परमाणु के अन्दर इलेक्ट्रॉन की स्थिति निश्चित होती है?
उत्तर:
नहीं हाइजेनवर्ग के अनुसार किसी भी अतिसूक्ष्म कण जैसे- इलेक्ट्रॉन की स्थिति व संवेग का निर्धारण एक साथ ठीक-ठीक सम्भव नहीं है अतः H परमाणु के अन्दर इलेक्ट्रॉन की स्थिति निश्चित नहीं है।

प्रश्न 121.
वह कौन-सा प्रयोग है जिससे पदार्थ की तरंग तथा कणीय दोनों प्रकृति को सिद्ध किया जा सकता है?
उत्तर:
किसी एक प्रयोग के द्वारा पदार्थ की तरंग तथा कणीय प्रकृति सिद्ध नहीं की जा सकती है इसके लिये अलग-अलग प्रयोगों को करना पड़ता है परन्तु डी ब्रॉग्ली के सिद्धान्त के द्वारा पदार्थ की द्वैत प्रकृति को सिद्ध किया जा सकता है।

प्रश्न 122.
उन स्पेक्ट्री श्रेणियों के नाम बताइये जो कि विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रदर्शित होती है :
(i) दृश्य क्षेत्र
(ii) पराबैंगनी क्षेत्र
(iii) अवरक्त क्षेत्र
उत्तर:
(i) बामर श्रेणी
(ii) लाइमन श्रेणी
(iii) फुण्ड श्रेणी

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 123.
उत्सर्जन स्पेक्ट्रम क्या होता है?
उत्तर:
उत्सर्जन स्पेक्ट्रम (Emission Spectrum) – उत्सर्जन स्पेक्ट्रम को उत्तेजित पदार्थों से उत्सर्जित विकिरणों के विश्लेषण से प्राप्त किया जा सकता है? यह चमकदार रंगीन रेखाओं से बनता है जो एक-दूसरे से काले बैण्डों द्वारा पृथक रहता है। यह स्पेक्ट्रम केवल उच्च ताप पर ही प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 124.
अधिशोषण स्पेक्ट्रम पर टिप्पणी दें।
उत्तर:
अधिशोषण स्पेक्ट्रम (Absorption Spectrum) – इसे गैसीय या विलयन अवस्था में पदार्थ में से सफेद प्रकाश गुजारकर प्राप्त किया जाता है। इसमें काली रेखायें प्राप्त होती हैं। जो कि रंगीन बैण्डों द्वारा पृथक्कृत रहती हैं। इसे कमरे के ताप पर ही प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 125.
विद्युत चुम्बकीय विकिरण पर टिप्पणी दें।
उत्तर:
विद्युत चुम्बकीय विकिरण (Electro-magnetic Spectrum)-ये वे विकिरण होते हैं, जो आकाश में दोलायमान विद्युत तथा चुम्बकीय विक्षोभ तरंगों के रूप में संचरण करते हैं। जैसे- अवरक्त, पराबैंगनी, दृश्य तथा X – किरणें।

प्रश्न 126.
निम्न में से कौन विद्युत क्षेत्र में से गुजारने पर विचलन (deflection) प्रदर्शित नहीं करेगा।
प्रोटॉन, कैथोड किरणें, इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन
उत्तर:
न्यूट्रॉन।

प्रश्न 127.
हाइड्रोजन परमाणु में केवल एक इलेक्ट्रॉन ही होता है। अतः यहाँ इलेक्ट्रॉनों के मध्य प्रतिकर्षण अनुपस्थित है। जबकि बहुइलेक्ट्रॉनिक परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों के मध्य बहुत अधिक प्रतिकर्षण होता है। अतः बहुइलेक्ट्रॉनिक परमाणुओं में समान मुख्य क्वाण्टम संख्या के लिये कक्षक में एक इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा किस प्रकार प्रभावित होती है।
उत्तर:
हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा ‘n’ के मान से ज्ञात की जाती है जबकि बहुइलेक्ट्रॉनिक परमाणुओं में यह (n + 1) की सहायता से ज्ञात करते हैं। अतः दी गई मुख्य क्वाण्टम संख्या के लिये s, p, d तथा f कक्षकों के इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा भी भिन्न होती है।

प्रश्न 128.
निम्न में प्रत्येक का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखें तथा अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या भी बताएँ।
(i) Mn4+
(ii) Cr3+
(iii) Fe3+
(iv) Ni2+
(v) CO2+ +
(vi) Cu2+
उत्तर:

इलेक्ट्रॉनिक विन्यासयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(i) 25Mn4+1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d³3
(ii) 24Cr3+1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d³3
(iii) 26Fe3+1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d55
(iv) 28 Ni2+1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d82
(v) 27CO2+1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d73
(vi) 29Cu2+1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d91

प्रश्न 129.
नाइट्रोजन का आद्य अवस्था में 1s², 2s², 2px2, 2py1 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सही है या गलत और क्यों?
उत्तर:
यह इलेक्ट्रॉनिक विन्यास हुण्ड के नियम के अनुसार गलत है।

प्रश्न 130.
क्रोमियम (Z = 24 ) 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d4, 4s² इलेक्ट्रॉनिक विन्यास गलत है, क्यों?
उत्तर:
चूँकि अर्द्ध पूर्ण भरे उपकोश (half filled sub-shell ) अधिक स्थायी होते हैं। अत: Cr का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d5, 4s1 होता है।

प्रश्न 131.
कॉपर [Z = 29] का सम्भावित इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d9, 4s² होना चाहिये। जबकि इसका वास्तविक इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d104s1 है। स्पष्ट करो।
उत्तर:
क्योंकि पूर्ण भरी हुई उपकोश अधिक स्थायी होती है।

प्रश्न 132.
कोश तथा कक्षक दोनों में क्या समानता होती है?
उत्तर:
दोनों में ही ऊर्जा स्तर होते हैं।

प्रश्न 133.
परमाणु क्रमांक 20 तथा 22 का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखें।
उत्तर:
20Ca → 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 4s²
22Ti → 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d², 4s².

प्रश्न 134.
निम्न परमाणुओं के लिये चौथे उपकोश की ऊर्जा-स्तर का क्रम बताइए।
(1) H – परमाणु
(2) Br- परमाणु
उत्तर:
(1) H – परमाणु के लिये
4s = 4p = 4d = 4f

(2) Br-परमाणु के लिये
4f > 4d > 4p > 4s

प्रश्न 135.
Cu, Cu+ Cu2+ तथा Cu3+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिये और निम्न का उत्तर दीजिए-
(1) इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या
(2) s-उपकोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या
(3) p-उपकोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या
(4) d उपकोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या
(5) अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या
(6) कुल स्पिन
(7) अनुचुम्बकीय अथवा प्रतिचुम्बकीय गुण
(8) अधिक स्थायी आयन
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
29Cu – 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d10, 4s1
29Cu+ – 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d10
29Cu2+ – 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d9
29Cu3+ – 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d8

गुणCuCu+Cu2+Cu3+
1. इलेक्ट्रॉन की कुल संख्या29282726
2. s-इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या7666
3. p-इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या12121212
4. d-इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या101098
5. अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या1012
6. कुल स्पिन = ±\(\frac { 1 }{ 2 }\) x अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या±\(\frac { 1 }{ 2 }\)0±\(\frac { 1 }{ 2 }\)±1
7. अनुचुम्बकीय (P) या प्रति चुम्बकीय (D) गुणPDPP

8. इसमें Cu+ आयन अत्यधिक स्थायी होगा क्योंकि इसमें d-कक्षक पूर्ण रूप से भरे हुए हैं।

प्रश्न 136.
कार्बन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s², 2s1, 2px1, 2py1, 2pz1 है। इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
इसका अर्थ है कि कार्बन परमाणु उत्तेजित अवस्था में है।

प्रश्न 137.
Cr3+ आयन के d-उपकोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या क्या होगी?
उत्तर:
तीन (3); Cr3+ → 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d³

प्रश्न 138.
परमाणु क्रमांक 46 वाला तत्व इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में अपवाद प्रदर्शित करता है। इस तत्व के 4d – उपकोश में कितने अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होंगे।
उत्तर:
46Pd : 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d10, 4s², 4p6, 4d10
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 3
कुल अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 0

प्रश्न 139.
कैल्सियम तथा क्लोरीन का परमाणु क्रमांक 20 तथा 17 है। Ca 2+ तथा CI का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास क्या होगा।
उत्तर:
Ca2+ में इलेक्ट्रॉन = 20 – 2 = 18;
Ca2+ : 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6
Cl में इलेक्ट्रॉन = 17 + 1 = 18;
Cl : 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6

प्रश्न 140.
‘किन-किन तत्वों में s-इलेक्ट्रॉन की कुल संख्या p-इलेक्ट्रॉन की कुल संख्या के बराबर होती है?
उत्तर:
8O → 1s², 2s², 2p4, (s तथा p में इलेक्ट्रॉन = 4)
12Mg → 1s², 2s², 2p6, 3s² (s तथा p में इलेक्ट्रॉन = 6)

प्रश्न 141.
Zn2+ तथा Sc2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखें।
उत्तर:
30Zn2+ → 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d10
21Sc2+ → 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d1

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 142.
नाइट्रोजन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s², 2s², 2px1, 2py1, 2pz1 होता है, 1s², 2s², 2p2x, 2p1y, नहीं क्यों।
उत्तर:
ऐसा हुण्ड के नियमानुसार होता है। इसके अनुसार समभ्रंश (degenerate) कक्षक पहले समान्तर इलेक्ट्रॉनिक चक्रण के साथ एकल रूप में भरते हैं। इसमें युग्मन नहीं होता है।

प्रश्न 143.
OF2 में ऑक्सीजन O2+ के रूप में होता है। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखे।
उत्तर:
O2+ → 1s², 2s², 2p²

प्रश्न 144.
1s इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा 2s इलेक्ट्रॉन से कम होती है क्योंकि?
उत्तर:
25 की तुलना में 1s इलेक्ट्रॉन नाभिक के अधिक समीप होते हैं जिससे इन पर आकर्षण बल अधिक होता है जिससे ऊर्जा कम हो जाती है।

प्रश्न 145.
कौन-सा कक्षक अदिशात्मक होता है?
उत्तर:
कक्षक अदिशात्मक होता है, क्योंकि इनका आकार गोलाकार होता है।

प्रश्न 146.
किस / कक्षक में चार पालियाँ (lobes) नहीं होती हैं।
उत्तर:
dz² में। इसमें केवल दो पालियाँ होती हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 4

प्रश्न 147.
किस d-कक्षक में अक्षों के अनुदिश चार पालियाँ (lobes) होती हैं?
उत्तर:
dx²-y² में। इसमें x तथा y-अक्षों के अनुदिश चार पालियाँ होती है।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 5

प्रश्न 148.
Px, Py तथा pz कक्षक की संरचना दें।
उत्तर:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 6

प्रश्न 149.
निम्नलिखित विन्यासों वाले तत्वों के नाम लिखें।
(1) 1s², 2s², 2p6
उत्तर:
निऑन (Ne)

(2) 1s², 2s² 2p6, 3s², 3p6, 3d², 4s²
उत्तर:
टाइटेनियम (Ti)

(3) 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p1
उत्तर:
ऐलुमिनियम (AI)

(4) 1s², 2s², 2p6, 3s², 2p4
उत्तर:
सल्फर (S)

प्रश्न 150.
ऑफबाऊ सिद्धान्त का उपयोग करते हुए निम्न परमाणुओं की आद्य अवस्था का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखें।
(1) बोरॉन (Z= 5)
(2) कैल्सियम (Z = 20)
(3) रूबीडियम (Z= 37)
उत्तर:
(1) बोरॉन (Z = 5); 1s², 2s², 2p1
(2) कैल्सियम (Z = 20); 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 4s²
(3) रूबीडियम (Z = 37 ); 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d10, 4s², 4p6, 5s1

प्रश्न 151.
एक p-उपकोश में जिसमें Px, Py तथा Pz कक्षक उपस्थित होते हैं। यदि मात्र एक ही इलेक्ट्रॉन है तो इन तीनों कक्षकों में से इलेक्ट्रॉन किसमें रहेगा?
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन Px, Py तथा Pz कक्षकों में से किसी में भी रह सकता है क्योंकि ये सभी समभ्रंश कक्षक होते हैं।

प्रश्न 152.
1s तथा 2s कक्षक गोलीय नोडों की संख्या में किस प्रकार भिन्न होते हैं?
उत्तर:
1s कक्षक में कोई नोड नहीं होता है जबकि 2s कक्षक में एक नोड उपस्थित होता है। क्योंकि गोलीय नोडों की संख्या (n – 1) के बराबर होती है जहाँ – मुख्य क्वाण्टम संख्या होती है।

प्रश्न 153.
किसी तत्व की द्रव्यमान संख्या उसके परमाणु क्रमांक की दोगुनी है। यदि 2 कक्षकों में 4 इलेक्ट्रॉन हों तो तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और नाम लिखें।
उत्तर:
तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s², 2s², 2p4 है। अर्थात् इसका परमाणु क्रमांक (Z = 8) और द्रव्यमान संख्या (A = 16) होती है। अतः तत्व ऑक्सीजन है।

प्रश्न 154.
2d तथा 35 कक्षक सम्भव क्यों नहीं हैं?
उत्तर:
चूँकि n = 2 के लिये l के 0 तथा 1 मान होते हैं अर्थात् n = 2 कक्ष में केवल s तथा p-कक्षक होते हैं यहाँ d-कक्षक उपस्थित नहीं होते। इसी प्रकार n = 3 के लिये l के 0, 1 तथा 2 मान होते हैं, इस कारण n = 3 कक्ष में f-कक्षकों की सम्भावना नहीं होती है।

प्रश्न 155.
4d तथा 5s कक्षकों में से पहले कौन-सा कक्षक भरेगा?
उत्तर:
4d तथा 5s-कक्षकों में से सर्वप्रथम 5s कक्षक भरा जायेगा। क्योंकि 5s कक्षक की ऊर्जा कम होती है। कक्षकों की ऊर्जा को (n + l) नियम द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। जिस कक्षक के लिये (n + l) का मान कम होता है उसकी ऊर्जा भी कम होती है। अतः
5s – कक्षक के लिये
n + l = 5 + 0 = 5
4d-कक्षक के लिये,
n + l = 4 + 2 = 6
ऊर्जा का क्रम = 4d > 5s
अतः 5s कक्षक पहले भरा जायेगा।

प्रश्न 156.
2p-उपकोश में इलेक्ट्रॉन 2s-उपकोश की अपेक्षा अधिक होते हैं। क्यों?
उत्तर:
2s – उपकोश में केवल एक ही कक्षक होता है जिसमें (m = 0) होता है जबकि 2p-उपकोश में तीन कक्षक ( m = – 1, 0 + 1 ) होते हैं। चूँकि एक कक्षक में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन भरे जा सकते हैं अतः 2p-उपकोश में अधिकतम छह इलेक्ट्रॉन भरे जा सकते हैं। जबकि 25- उपकोश में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन ही भरे जा सकते हैं।

प्रश्न 157.
निम्न दिये गये क्वाण्टम संख्याओं के सेटों को ऊर्जा के घटते क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
(A) n = 4, l = 0, me = 0, ms = ± \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(B) 2 = 3, l = 1, me = 1,ms = – \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(C) n = 3, l = 2, me = 0,ms = + \(\frac { 1 }{ 2 }\)
(D) n = 3, l = 0, me = 0,ms = – \(\frac { 1 }{ 2 }\)
उत्तर:
C > A > B > D

प्रश्न 158.
ऑक्सीजन परमाणु के 8वें इलेक्ट्रॉन के लिये चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान बताइये।
उत्तर:
8O = 1s², 2s², 2p4
8वें इलेक्ट्रॉन की चारों क्वाण्टम संख्यायें,
(n = 2, l = 1, m = + 1, या – 1, s = + \(\frac { 1 }{ 2 }\) या – \(\frac { 1 }{ 2 }\))

प्रश्न 159.
पाउली के अपवर्जन नियम की सहायता से मुख्य क्वाण्टम संख्या तीन (n = 3) वाले कोश में भरे जा सकने वाले इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या ज्ञात करें।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या = 2N²
= 2(3)²
= 18

प्रश्न 160.
l = 0, 1, 2, तथा 3 को क्रमशः किन अक्षरों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
उत्तर:
l = 0, 1, 2, तथा 3 के लिये क्रमश: s, p, d तथा f अक्षर होंगे।

प्रश्न 161.
n = 2, के लिये l और m के कुल मानों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर:
के किसी भी मान के लिये l व m के कुल मानों की संख्या क्रमश: n तथा n² होती है।
प्रश्नानुसार, n = 2
अतः l के कुल मान = 2
तथा m के कुल मान = (2)² = 4

प्रश्न 162.
l = 3 के लिये m के सम्भावित मान लिखिए।
उत्तर:
l के किसी भी मान के लिये m के सम्भावित मान – l से + l तक होते हैं जिसमें शून्य भी होता है।
प्रश्नानुसार, l = 3
अत: m = – 3, – 2, 1, 0, + 1 + 2, + 3

प्रश्न 163.
सोडियम परमाणु के अन्तिम इलेक्ट्रॉन की चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिये।
उत्तर:
11Na → 1s², 2s², 2p6 3s-1
n = 3, 1 = 0, m = 0, s = + \(\frac { 1 }{ 2 }\)

प्रश्न 164.
3p6 विन्यास में चौथे इलेक्ट्रॉन की चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिये।
उत्तर:
3p6 के p-उपकोश को हम निम्न प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 7
चौथे इलेक्ट्रॉन के लिये,
n = 3, l = 1, m = + 1, s = – \(\frac { 1 }{ 2 }\)

प्रश्न 165.
3d² इलेक्ट्रॉन के लिये n, l m तथा s क्वाण्टम संख्याओं के मान ज्ञात करें।
उत्तर:
3d² इलेक्ट्रॉन के लिये,
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 8
n = 3, l = 2, m = – 1, s = + \(\frac { 1 }{ 2 }\)

प्रश्न 166.
हीलियम के प्रथम इलेक्ट्रॉन की चारों क्वाण्टम संख्याएँ क्रमश: n = 1, l = 0, m = 0, s = + \(\frac { 1 }{ 2 }\) हो तो दूसरे इलेक्ट्रॉन की चारों क्वाण्टम संख्याएँ क्या होगीं?
उत्तर:
हीलियम के द्वितीय इलेक्ट्रॉन की क्वाण्टम संख्याएँ
n = 1, l = 0, m = 0, s = – \(\frac { 1 }{ 2 }\)

प्रश्न 167.
छठे ऊर्जा स्तर के लिये ‘l’ का मान क्या होगा?
उत्तर:
n = 6, l = 0, 1, 2, 3, 4, 5,

प्रश्न 168.
कौन-सा कोश है जिसमें प्रथम बार g-उपकोश आता है।
उत्तर:
पाँचवे कोश में प्रथम बार g उपकोश आता है।

प्रश्न 169.
n = 4 व l = 0 के लिए कक्षक कौन सा होता है?
उत्तर:
n = 4 व l = 0 के लिये 4s कक्षक होता है।

प्रश्न 170.
निम्नलिखित में से कौन-सा विन्यास आद्य अवस्था का और कौन-सा उत्तेजित अवस्था का है?
(i) 1s², 2s², 2p4
उत्तर:
आद्य अवस्था (Ground State )

(ii) 1s², 2s², 2p6, 3s1, 3p1
उत्तर:
उत्तेजित अवस्था (Excited state)

(iii) 1s2, 2s2, 2p6, 3s², 3p4
उत्तर:
आद्य अवस्था (Ground State )

(iv) 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d10, 4s²
उत्तर:
आद्य- अवस्था (Ground State)

(v) 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p4, 3d1
उत्तर:
उत्तेजित अवस्था (Excited State)

प्रश्न 171.
कक्षकों के नाम लिखिये, जब
(1) n = 2, l = 0
(2) n = 3, l = 2
(3) n = 5, l = 1
(4) n = 4, l = 3
उत्तर:
(1) 2s
(2) 3d
(3) 5p
(4) 4f

प्रश्न 172.
किसी बहु – इलेक्ट्रॉन परमाणु के लिये g – उपकोश में कितने कक्षक उपलब्ध होते हैं।
उत्तर:
g-उपकोश के लिये l = 4, कक्षकों की कुल संख्या = (2l + 1) अत: कक्षकों की कुल संख्या
= 2 × 4 + 1
= 9
g – उपकोश में कुल 9 कक्षक उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 173.
“dz² कक्षक के xy तल में इलेक्ट्रॉन का घनत्व शून्य होता है।” टिप्पणी दें।
उत्तर:
यह कथन सत्य नहीं है। dz² कक्ष के xy तल में भी इलेक्ट्रॉन घनत्व उपस्थित होता है जिसे वलय द्वारा दर्शाया जाता है।

प्रश्न 174.
dyz तथा dz² कक्षक आपस में किस प्रकार सम्बन्धित होते हैं?
उत्तर:
dyz तथा dz² कक्षक समान ऊर्जा के अर्थात् समभ्रंश (degenerate) कक्षक होते हैं। जबकि dyz कक्षक तल में होता है। जबकि dz² कक्षक y तथा 2 अक्षों में होता हैं।

प्रश्न 175.
n = 2 के लिये l तथा m के मान लिखें।
उत्तर:
n = 2, l = 0, 1, m = 1, 0, + 1

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 176.
s, p तथा d उपकोशों को, उनमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों द्वारा अनुभव किये जाने वाले प्रभावी नाभिकीय आकर्षण के आधार पर बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करें।
उत्तर:
जो उपकोश नाभिक के अत्यधिक पास होता है उस पर लगने वाला प्रभावी नाभिकीय आकर्षण बल भी उतना अधिक होता है, अतः बढ़ता हुआ क्रम है-
d < p < s

प्रश्न 177.
ऑक्सीजन परमाणु (Z = 8) में इलेक्ट्रॉन का वितरण आर्बिटल आरेख के द्वारा प्रदर्शित करें।
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 9

प्रश्न 178.
निकिल परमाणु दो इलेक्ट्रॉनों को त्याग कर Ni2+ आयन बनाता है। यदि निकिल का परमाणु क्रमांक 28 है तो निकिल किस उपकोश से इलेक्ट्रॉनों को त्यागेगा?
उत्तर:
Ni(28) = 1s² 2s² 2p6 3s² 3p6 4s² 3d8
Ni2+ = 1s² 2s² 2p6 3s² 3p6 3d8
निकिल s-उपकोश से इलेक्ट्रॉनों को त्यागेगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रोटॉन तथा हाइड्रोजन परमाणु में क्या अन्तर है?
उत्तर:
प्रोटॉन परमाणु का अति सूक्ष्म मौलिक कण है जिस पर इकाई धनावेश होता है। हाइड्रोजन परमाणु में केवल एक इलेक्ट्रॉन और एक प्रोटॉन होता है। जब हाइड्रोजन परमाणु से इलेक्ट्रॉन निकल जाता है तो इकाई धनावेशित प्रोटॉन प्राप्त होता है।

प्रश्न 2.
समइलेक्ट्रॉनिक से आप क्या समझते हों?
उत्तर:
परमाणु धनायनों तथा ऋणायनों का वह समूह जिनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होता है समइलेक्ट्रॉनिक कहलाते हैं।

  • He, Li+, Be++ तथा B+++ समइलेक्ट्रॉनिक हैं क्योंकि प्रत्येक में 2, 2 इलेक्ट्रॉन हैं।
  • O– –, F, Ne, Na+, Mg++, Al+++ समइलेक्ट्रॉनिक हैं क्योंकि प्रत्येक में 10-10 इलेक्ट्रॉन हैं।

प्रश्न 3.
प्लांक सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
दृश्य प्रकाश, X – किरणें, पराबैंगनी किरणें, राडार किरणें, टेलीविजन तथा रेडियों तरंगे विद्युत चुम्बकीय विकिरण हैं। इन सभी विकिरण की तरंग प्रकृति होती है। विकिरण की तरंगदैर्ध्य तथा आवृत्ति में निम्न सम्बन्ध होता है-
c = vλ

प्रश्न 4.
प्लांक क्वाण्टम सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जर्मन वैज्ञानिक मैक्स प्लांक (1901) ने विकिरण सम्बन्धित क्वाण्टम सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार-
(i) जब कोई पिण्ड विकिरण के रूप में प्रकाश या ऊष्मीय ऊर्जा का उत्सर्जन या अवशोषण करता है तो वह ऐसा सतत् रूप में नहीं कर सकता है।

(ii) ऊर्जा का उत्सर्जन या अवशोषण निश्चित मात्रा के छोटे-छोटे बण्डलों अथवा पैकिटों के रूप में होता है जिन्हें क्वाण्टा कहते हैं

(iii) विकिरित ऊर्जा को फोटॉन भी कहते हैं।
यदि विकिरण की आवृत्ति v हो तो विकिरण के फोटॉन की ऊर्जा
E = hv = चूँकि v = \(\frac { c }{ λ }\)
अथवा
E = hc\(\overline{\mathcal{V}}\) चूँकि \(\overline{\mathcal{V}}\) = \(\frac { 1 }{ λ }\)

प्रश्न 5.
ऊर्जा के क्वाण्टीकरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
ऊर्जा के क्वाण्टीकरण से तात्पर्य यह है कि ऊर्जा स्तरों की ऊर्जा के कुछ विशिष्ट मान होते हैं।

प्रश्न 6.
s p d f उपकोशों में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या क्या है?
उत्तर:
किसी उपकोश में अधिकतम इलेक्ट्रॉन की संख्या 2 (2l + 1) होती है अतः उपकोश में 2, p उपकोश में 6, d उपकोश में 10 तथा f उपकोश में 14 इलेक्ट्रॉन होते हैं।

प्रश्न 7.
बोर के परमाणु मॉडल के दोष लिखिए।
उत्तर:
(1) बोर के परमाणु मॉडल द्वारा हाइड्रोजन तथा एक इलेक्ट्रॉन युक्त आयनों (जैसे-He+, Li2+, Be3+ ) के स्पेक्ट्रमों की व्याख्या तो की जा सकी किन्तु बहु- इलेक्ट्रॉन परमाणुओं और आयनों के स्पेक्ट्रमों की व्याख्या बोर सिद्धान्त के द्वारा न हो सकी।

(2) उच्च विभेदन क्षमता वाले स्पेक्ट्रोस्कोप द्वारा जाँच करने पर पाया गया कि हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम में प्राप्त एकल सूक्ष्म रेखायें समूह से बनी हैं। इसकी व्याख्या बोर सिद्धान्त द्वारा न हो सकी।

(3) विकिरणों के परमाण्वीय स्रोत को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर स्पेक्ट्रम की एकल रेखायें परस्पर सटी हुई अनेक रेखाओं में विभक्त हो जाती हैं। इसको जीमान प्रभाव कहते हैं। बोर सिद्धान्त इसकी व्याख्या न कर सका।

(4) वैद्युत क्षेत्र की उपस्थिति में भी स्पेक्ट्रम रेखाएँ अनेक सूक्ष्मतम रेखाओं में विभक्त हो जाती हैं। इसे स्टार्क प्रभाव कहते हैं। इस प्रभाव की व्याख्या भी बोर सिद्धान्त नहीं कर सका।

प्रश्न 8.
प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन में विभेद करें।
उत्तर:
प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन में विभेद
(Difference between Proton and Electron)

प्रोटॉन (Proton)इलेक्ट्रॉन (Electron)
1. प्रोटॉन प्रत्येक परमाणु का इकाई धनावेशित कण है।1. इलेक्ट्रॉन प्रत्येक परमाणु का इकाई ऋणावेशित कण है।
2. इसका आवेश + 1.603 × 10-19 कूलॉम या +4 808 × 10-10 esu होता है।2. इसका आवेश – 1603 x 10-19 कूलॉम या -4.808 x 10-10 esu होता है।
3. इसका द्रव्यमान 1.6726 × 10-24 ग्राम होता है।3. इसका द्रव्यमान 9.1095 × 10-28 ग्राम होता है।
4. प्रोटॉन की त्रिज्या 10-13 सेमी होती है।4. इलेक्ट्रॉन की त्रिज्या 2.8 × 10-13 सेमी होती है।
5. प्रोटॉन परमाणु नाभिक में विद्यमान रहते हैं।5. इलेक्ट्रॉन परमाणु नाभिक से बाहर कक्षों में विद्यमान रहते हैं।
6. इसको 1H1 या p से व्यक्त करते हैं।6. इसको -1e0 या e से व्यक्त करते हैं।

प्रश्न 9.
नाभिक का संघटन बताइये।
उत्तर:
नाभिक का संघटन परमाणु के केन्द्रीय या मध्य भाग को केन्द्रक या नाभिक (Nucleus) कहते हैं। इस नाभिक में न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन उपस्थित होते हैं। प्रोटॉनों पर धनावेश जबकि न्यूट्रॉन उदासीन होते हैं। प्रोटॉनों पर धनावेश होने के कारण नाभिक धनावेशित होता है। नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों तथा न्यूट्रॉनों की संख्या का योग द्रव्यमान संख्या (Mass number) कहलाती है। नाभिक में उपस्थित कणों को (न्यूट्रॉन, प्रोटॉन आदि) न्यूक्लिऑन (Nucleons) कहते हैं। किसी तत्व का परमाणु भार उस तत्व की द्रव्यमान संख्या या उसमें उपस्थित न्यूक्लिऑनों की संख्या के लगभग बराबर होता है।

तत्व का परमाणु क्रमांक प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या परमाणु की द्रव्यमान संख्या
= न्यूक्लिऑन की संख्या व प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या

प्रश्न 10.
कैथोड किरणों के चार गुण लिखिए।
उत्तर:
कैथोड किरणों के चार गुण निम्न प्रकार हैं।

  • कैथोड किरणों में आयनन क्षमता होती है। जब कैथोड किरणें। किसी गैसीय माध्यम से गुजरती हैं तो उस गैस को आयनित कर देती हैं।
  • कैथोड किरणों में भेदन क्षमता होती है। कैथोड किरणें ऐलुमिनियम जैसी धातु की पतली पत्नी के आर-पार निकल जाती हैं। यद्यपि ये मोटी पन्नियों द्वारा रोक ली जाती हैं।
  • कैथोड किरणें सीधी रेखा में प्रवाह करती हैं।
  • कैथोड किरणें जब जिंक सल्फाइड से लेपित काँच की सतह या पर्दे पर पड़ती हैं तो प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती है।

प्रश्न 11.
फोटॉन तथा क्वाण्टम किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर:
क्वाण्टम एक निश्चित परिमाण की ऊर्जा (जिसका मान E = hv होता है) का एक बण्डल होता है। क्वाण्टम को किसी भी स्रोत के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जबकि फोटॉन केवल प्रकाश से सम्बन्धित ऊर्जा का क्वाण्टम ही होता है।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 12.
रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल में क्या कमियाँ थीं?
उत्तर:
रदरफोर्ड परमाणु मॉडल की कमियाँ
(1) नील बोर ने बताया कि विद्युत चुम्बकीय सिद्धान्त के अनुसार ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों में गति के कारण लगातार ऊर्जा में क्षति होनी चाहिये, जिससे उनकी कक्षा की त्रिज्या लगातार कम होती जायेगी तथा अन्त में वे नाभिक में गिर जायेंगे। परन्तु ऐसा नहीं होता है। अतः रदरफोर्ड मॉडल परमाणु निकाय के स्थायित्व की व्याख्या नहीं कर सका।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 10
(2) यह सिद्धान्त यह नहीं बता पाया कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर किस प्रकार व्यवस्थित होता है।

(3) रदरफोर्ड के मॉडल द्वारा परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटॉन की संख्या की कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती है।

(4) इस सिद्धान्त के अनुसार परमाणु स्पेक्ट्रम सतत् (Continuous ) होना चाहिये। परन्तु स्पेक्ट्रम में निश्चित आवृत्ति की कई रेखायें होती हैं। अतः रदरफोर्ड परमाणुओं के रैखिक स्पेक्ट्रम को नहीं समझा पाए।

प्रश्न 13.
सिद्ध करें कि इलेक्ट्रॉन एक सार्वत्रिक कण होता है।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन कैथोड किरणों के अवयव होते हैं। इन्हें विसर्जन नली के द्वारा प्राप्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों को प्राप्त करने के बहुत से अन्य स्रोत भी होते हैं। इसको प्राप्त करने के अन्य स्रोत निम्न प्रकार हैं-

  • एक तप्त धात्विक तन्तु से।
  • सक्रिय धातुओं; जैसे-सोडियम तथा पोटैशियम को पराबैंगनी किरणों के समक्ष लाने से।
  • ß- किरणों के रूप में रेडियोऐक्टिव पदार्थों से।

चूँकि इलेक्ट्रॉन किसी भी स्रोत से प्राप्त किया गया हो, उसका द्रव्यमान, आवेश e/m आवेश समान रहता है। अत: इलेक्ट्रॉन को सार्वत्रिक कण (universal Particle) कहते हैं।

प्रश्न 14.
इलेक्ट्रॉन की द्वैत प्रकृति के बारे में डी-ब्रॉग्ली की विचारधरा लिखिए। इलेक्ट्रॉन के संवेग तथा तरंगदैर्ध्य में सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
डी – ब्रॉग्ली का इलेक्ट्रॉन की द्वैत प्रकृति का सिद्धान्त- डी- ब्रॉली ने सन् 1924 में बताया कि जब इलेक्ट्रॉन किरणपुंज को क्रिस्टलीय ठोस में से गुजारा जाता है, तो वह उसी प्रकार विवर्तित होता है जिस प्रकार प्रकाश किरणपुंज ग्रेटिंग से गुजरने पर विवर्तित होता है। ‘डी-ब्रॉली ने बताया कि इलेक्ट्रॉन दोहरी प्रकृति प्रदर्शित करता है। यह एक ही समय में कण एवं तरंग दोनों जैसा व्यवहार करता है।
आइन्सटीन के अनुसार,
E = mc² … (1)
यहाँ, m = पिण्ड का द्रव्यमान
c = वेग
प्लांक के अनुसार,
E = hv … (2)
यहाँ
h = प्लांक स्थिरांक
v = आवृत्ति
अतः समीकरण (1) व (2) से,
mc² = hv
mc² = h.\(\frac { c }{ λ }\)
mc = \(\frac { h }{ λ }\)
λ = \(\frac { h }{ mc }\) ∵(v = \(\frac { c }{ λ }\))
यदि फोटॉन की जगह और कोई कण हो तो,
λ = \(\frac { h }{ mv }\) (यहाँ = कण का वेग)
λ = \(\frac { h }{ p }\) (क्योंकि p = mv)
यही डी-ब्रॉग्ली समीकरण है।

प्रश्न 15.
हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर:
हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त (Heisenberg’s Uncertainity Principle): हाइजेनबर्ग ने सन् 1927 में द्वैत प्रकृति वाले कणों एवं विकिरणों के लिए अनिश्चितता का सिद्धान्त दिया। इस सिद्धान्त के अनुसार, “किसी भी कण की स्थिति (position) और संवेग (momentum) दोनों का एक साथ यथार्थ (exact ) निर्धारण असम्भव है।”
इस अनिश्चितता सिद्धान्त को गणितीय रूप में निम्नलिखित समीकरण द्वारा व्यक्त कर सकते है-
(∆p) (∆x) ≥ \(\frac { h }{ 4π }\) or ∆v ∆x ≥ \(\frac { h }{ 4πm }\)
यहाँ ∆p = किसी कण के संवेग की अनिश्चितता
∆x = किसी कण की स्थिति की अनिश्चितता
इस सिद्धान्त से स्पष्ट है कि यदि इलेक्ट्रॉन कण की स्थिति बिल्कुल ठीक-ठीक निर्धारित की जाती है तो उसके वेग में अनिश्चितता होगी और यदि इलेक्ट्रॉन तरंग का वेग बिल्कुल ठीक-ठीक निर्धारित किया जाता है, तो उसकी स्थिति में अनिश्चितता होगी।

प्रश्न 16.
डी-ब्रॉग्ली सम्बन्ध का क्या महत्व है?
उत्तर:
डी-ब्रॉग्ली सम्बन्ध का महत्व – इलेक्ट्रॉन के कोणीय संवेग \(\frac { h }{ 2π }\) का पूर्णांक गुणज क्यों होता है। बोर बरी इसे स्पष्ट नहीं कर पाये। परन्तु डी-ब्रॉग्ली के समीकरण mvr = \(\frac { nh }{ 2π }\) द्वारा इसे आसानी से समझा जा सकता है।

डी-ब्रॉली के अनुसार इलेक्ट्रॉन में तरंग का गुण विद्यमान रहता है। एक तरंग कला तभी रह सकती है जब उसकी परिधि तरंगदैर्ध्य λ की सरल गुणक हो।
अतः 2πr = nλ
r = कक्षा की त्रिज्या
n = 1, 2, 3, 4, ……. आदि

प्रश्न 17.
श्रोडिंगर का तरंग समीकरण क्या है? समझाइये।
उत्तर:
श्रोडिंगर का तरंग समीकरण- हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धान्त एवं डी-ब्रॉग्ली की परिकल्पना के आधार पर श्रोडिंगर ने एक नया प्रतिरूप दिया। इस प्रतिरूप में इलेक्ट्रॉन के व्यवहार को एक तरंग समीकरण के रूप में प्रदर्शित किया गया है जिसे श्रोडिंगर समीकरण कहा गया।
\(\frac{\delta^2 \psi}{\delta x^2}+\frac{\delta^2 \psi}{\delta y^2}+\frac{\delta^2 \psi}{\delta z^2}+\frac{8 \pi^2 m}{h^2}(\mathrm{E}-\mathrm{V}) \psi\) = 0
यहाँ m = इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान
h = प्लांक नियतांक
E = इलेक्ट्रॉन की कुल ऊर्जा
V = इलेक्ट्रॉन की स्थितिज ऊर्जा
ψ = तरंग फलन (Wave function)
तथा x, y एवं z तीनों निर्देशांक हैं।

प्रश्न 18.
कक्ष एवं कक्षक में अन्तर बताइए।
उत्तर:
कक्ष एवं कक्षक में अन्तर:

कक्ष (Orbit)कक्षक (Orbital)
1. इसकी अवधारणा बोर ने दी थी।1. यह तरंग यान्त्रिकी सिद्धान्त पर आधारित है।
2. यह द्विविमीय पथ है जहाँ इलेक्ट्रॉन घूमते हैं।2. यह त्रिविमीय स्थान है जहाँ इलेक्ट्रॉन पाये जाने की सम्भावना सर्वाधिक होती है।
3. कक्ष में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या 2n² होती है।3. कक्षक में केवल 2 इलेक्ट्रॉन पाये जाते हैं।
4. कक्ष एक सुपरिभाषित वृत्ताकार मार्ग है।4. कक्षक की अवधारणा अनिश्चितता के सिद्धान्त पर आधारित है।
5. कक्षों में दिशात्मक गुण नहीं होते हैं।5. s-कक्षक को छोड़कर सभी कक्षकों में दिशात्मक गुण होता है।

प्रश्न 19.
हाइड्रोजन का स्पेक्ट्रम कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
उत्तर:
हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम, विसर्जन नली में अल्प दाब पर हाइड्रोजन गैस को नरकर, इसमें विद्युत विसर्जन प्रवाहित करके प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार उत्सर्जित प्रकाश का विश्लेषण स्पेक्ट्रोस्कोप द्वारा ही सम्भव है। हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम में निम्न श्रेणी प्राप्त होती हैं।

  • लाइमन श्रेणी
  • बामर श्रेणी
  • पाश्चन श्रेणी
  • ब्रेकेट श्रेणी
  • फुण्ड श्रेणी।

प्रश्न 20.
पाउली के अपवर्जन नियम के अनुप्रयोग लिखिये।
उत्तर:
पाउली के अपवर्जन नियम के अनुप्रयोग निम्न प्रकार हैं।

  • किसी भी मुख्य ऊर्जा स्तर में अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या का मान 2n² होता है।
  • किसी भी मुख्य ऊर्जा स्तर में उप-ऊर्जा स्तरों या उपकोश या सब-शैल (subshell) की कुल संख्या मुख्य ऊर्जा स्तर की मुख्य क्वान्टम संख्या ‘n’ के बराबर होती है।
  • किसी मुख्य ऊर्जा स्तर में कुल कक्षकों की संख्या n² के बराबर होती है।
  • एक कक्षक में दो इलेक्ट्रॉन होते हैं तथा इनका चक्रण विपरीत होता है।

प्रश्न 21.
इलेक्ट्रॉनों की द्वैत प्रकृति को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विभिन्न प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि परमाणु में चक्कर लगाने वाले इलेक्ट्रॉन में कण तथा तरंग दोनों के गुण व्यक्त करते हैं। इसकी पुष्टि निम्नलिखित तथ्यों द्वारा होती है।
(1) कैथोड किरणें (जिनमें केवल इलेक्ट्रॉन होते हैं) अपने मार्ग (पथ) में रखी हल्की वस्तु को चला सकती है। इससे सिद्ध होता है कि इलेक्ट्रॉनों में कण (Particle) के गुण होते हैं।

(2) प्रकाश किरणों की तरह इलेक्ट्रॉन किरण-पुंज भी विवर्तन (diffraction) और व्यतीकरण (interference) प्रक्रिया को प्रदर्शित करता है। इससे यह सिद्ध होता है कि इलेक्ट्रॉंनों में तरंग के गुण पाये जाते हैं। यह प्रयोग डेविसन तथा जर्मर (Davision and Germer) ने किया था। किसी भी एक प्रयोग द्वारा इलेक्ट्रॉनों के कण तथा तरंग प्रकृति को व्यक्त नहीं किया जा सकता हैं अतः इनमें कण तथा तरंग के गुणों को अलग-अलग प्रयोगों द्वारा ही व्यक्त किया जा सकता हैं।

प्रश्न 22.
वैद्युत चुम्बकीय तरंगें तथा द्रव्य तरंगों में अन्तर लिखें।
उत्तर:

वैद्युत चुम्बकीय तरंगेंद्रव्य तरंगों
1. सभी वैद्युत तरंगों का वेग प्रकाश के वेग के बराबर अर्थात् 3 x 108 ms-1 होता है।1. द्रव्य तरंगों का वेग प्रकाश के वेग से कम होता है।
2. वैद्युत चुम्बकीय तरंगों की तरंगदैर्ध्य काफी अधिक होती है, और इसे निम्न सूत्र से व्यक्त करते हैं।
λ = \(\frac { c }{ v }\)
2. द्रव्य तरंगें अधिक छोटी तरंगदैर्ध्य की होती हैं। इनकी तरंगदैर्ध्य के मान को डी-ब्रॉग्ली सूत्र से व्यक्त करते हैं।
λ = \(\frac { h }{ mv }\)
3. इनकी ऊर्जाएँ क्वाण्टित होती हैं।3. इनकी ऊर्जाएँ क्वाण्टित नहीं होती हैं।
4. इनकी तरंगदैर्ध्य स्पेक्ट्रम की सम्पूर्ण परास में होती है।4. इसकी तरंगदैर्ध्य बहुत ही अल्प होती है।
5. सभी वैद्युत चुम्बकीय तरंगें समान वेग से गति करती है।5. द्रव्य तरंगें विभिन्न वेग से गति करती हैं।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 23.
कण तथा तरंग में विभेद करें।
उत्तर:

कणतरंग
1. कण स्थानीकृत होता है अर्थात् कोई कण पूर्ण परिभाषित स्थान ग्रहण करता है।1. ये स्थानीकृत नहीं होती हैं। अर्थात् से दिक् स्थान में फैली होती हैं।
2. कोई भी दो कण दिक्स्थान में समान स्थान ग्रहण नहीं कर सकते।2. दो या दो से अधिक तरंगें दिक्स्थान में साथ-साथ रह सकती हैं।
3. कणों को गिना जा सकता है।3. तरंगों को गिना नहीं जा सकता।
4. यदि दो या दो से अधिक कण दिक् में समान क्षेत्र स्थान में उपस्थित हों तो उनका योग कणों की अलग-अलग संख्या के योग के बराबर होता है।4. दो या दो से अधिक तरंगें समान क्षेत्र में उपस्थित हों तो अध्यारोपण के कारण परिणामी तरंग वैयक्तिक तरंगों से या तो अधिक छोटी या फिर अधिक बड़ी हो सकती है।

प्रश्न 24.
‘इलेक्ट्रॉन नाभिक में नहीं रह सकता।’ इस कथन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
कोई इलेक्ट्रॉन नाभिक में नहीं रह सकता। यदि यह नाभिक में रह सकता तो इसके वेग में अनिश्चितता (∆v) का मान प्रकाश के वेग अर्थात् 3 x 108 ms-1 से कम होना चाहिये। अतः हम इलेक्ट्रॉन के वास्तविक ∆v की गणना करते हैं। यदि इलेक्ट्रॉन किसी नाभिक का हिस्सा हो तो, इसकी स्थिति में अनिश्चितता नाभिक के व्यास अर्थात् 10-15 से अधिक नहीं हो सकती। इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान 9.1 × 10-31 kg होता है अत:
∆x × ∆p = \(\frac { h }{ 4π }\)
Δx × m x Δν = \(\frac { h }{ 4π }\)
Δv = \(\frac{h}{4 \times \pi \times m \times \Delta x}\)
= \(\frac{6.6 \times 10^{-34} \mathrm{~kg} \mathrm{~m}^2 \mathrm{~s}^{-1}}{4 \times 3.14 \times\left(9 \cdot 1 \times 10^{-31} \mathrm{~kg}\right) \times\left(10^{-15} \mathrm{~m}\right)}\)
= 5.79 × 1010 ms1
चूँकि यह मान प्रकाश के वेग (3 x 108 ms-1) से बहुत अधिक है। इसका अर्थ है कि इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक में नहीं रह सकता है। अत: परमाणु में इलेक्ट्रॉन नाभिक से बाहर रहता है।

प्रश्न 25.
3s तथा 3p कक्षकों के नोडल तलों (Nodal Plane) को ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक कक्षक में दो प्रकार के नोडल तल होते हैं।
(i) कोणीय नोडल तल (Angular Nodal Plane) = l

(ii) वृत्तीय नोडल तल (Spherical Nodal Plane) = n – l – l
अत: कुल नोडल तल = l + (n – l – 1) = (n – 1)
3s कक्षकों के लिये
कोणीय नोडल तल = 0
वृत्तीय नोडल तल = 3 – 0 – 1 = 2
कुल नोडल तल = 0 + 2 = 2
3p-कक्षकों के लिये,
कोणीय नोडल तल = 1
वृत्तीय नोडल तल = 3 – 1 – 1 = 1
कुल नोडल तल = 1 + 1 = 2

प्रश्न 26.
एक तत्व के उदासीन परमाणु में 2K, 8L 10M तथा 2N इलेक्ट्रॉन हैं। इस तत्व के परमाणु में निम्न को ज्ञात करो।
(1) परमाणु क्रमांक
(2) कुल 5- इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(3) कुल p-इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(4) कुल d इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(5) तत्व की संयोजकता
(6) अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या।
उत्तर:
(1) परमाणु क्रमांक – इलेक्ट्रॉनों की संख्या (K + L + M + N कोश में)
= 22 + 8 + 10 + 2
= 22
(2) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6 3d², 4s²
कुल s-इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2 + 2 + 2 + 2 = 8
(3) कुल p इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 6 + 6 = 12
(4) कुल d-इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2
(5) तत्व की संयोजकता = + 2, + 3, + 4
(6) अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2

प्रश्न 27.
निम्न परमाणु क्रमांक वाले तत्वों के पूर्ण इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखें तथा इनका आवर्त सारणी में स्थान निर्धारित करें-
21, 24, 27
उत्तर:
(i) 21 → 1s², 2s², 2p6, 3s², 3P6, 3d1, 4s²
इसका आवर्त – IV है तथा वर्ग 3 (III B) है।

(ii) 24 → 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d5, 4s1
इसका आवर्त – IV है तथा वर्ग 6-(VI B) है।

(iii) 27 → 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d7, 4s²
इसका आवर्त – IV है तथा वर्ग-8 है।

प्रश्न 28.
निम्न क्वाण्टम संख्याओं की सहायता से कक्षकों के प्रतीक लिखिये।
(1) n = 3, l = 1 m = + 1
(2) n = 5, l = 2, m = – 1
उत्तर:
n, l तथा m के मान क्रमशः कोश, उपकोश तथा कक्षकों को व्यक्त करते हैं।
(1) n = 3 के लिये / 1 है तो यह p-उपकोश है।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 11
अतः प्रतीक 3px</sub< यां 3py

(2) n = 5 के लिये l = 2 अर्थात् (d-उपकोश)
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 12
अतः प्रतीक Sdyz या Sadxz

प्रश्न 29.
Sc (परमाणु क्रमांक 21) की मूल अवस्था (ground state) में अन्तिम इलेक्ट्रॉन के लिये चारों क्वाण्टम संख्याओं लिखिए।
उत्तर:
21Sc का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d1, 4s²
Sc के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में प्रयुक्त उपकोश में से 3d – उपकोश की ऊर्जा सबसे अधिक है। अतः अन्तिम इलेक्ट्रॉन 3d1 का होगा। 3d1 का अर्थ है कि तीसरे कोश की d-उपकोश में एक (1) इलेक्ट्रॉन है।

3d-उपकोश के लिये,
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 13

प्रश्न 30.
26Fe में d-ऑर्बिटल में उपस्थित छठे इलेक्ट्रॉन के लिये चारो क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखें।
उत्तर:
Fe का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
Fe = 1s² 2s² 2p6 3s² 3p6 3d6 4s²
Fe-परमाणु के 3d – उपकोश में 6 – इलेक्ट्रॉन हैं।
अतः 3d उपकोश के लिये,
n = 3
l = 2
3d-उपकोश के लिये m तथा s के मान निम्न प्रकार निकाल सकते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 14
m = – 2 या + 2
s = – \(\frac { 1 }{ 2 }\) या + \(\frac { 1 }{ 2 }\)
अर्थात् 3d6 के छठे इलेक्ट्रॉन के लिये,
n = 3, l = 2, m = – 2 या + 2
S = + \(\frac { 1 }{ 2 }\) या – \(\frac { 1 }{ 2 }\)

प्रश्न 31.
हाइड्रोजन परमाणु के 2s-कक्षक के लिए r के साथ त्रिज्य प्रायिकता घनत्व (R²) तथा त्रिज्य प्रायिकता फलन (4πr² R²) के परिवर्तन प्रदर्शित करने वाले वक्र खींचिए।
उत्तर:
हाइड्रोजन परमाणु के 2s – कक्षक के लिए r के साथ R² तथा 4πr²R² के परिवर्तन निम्नांकित चित्र में प्रदर्शित है-
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 15

प्रश्न 32.
सत्य / असत्य बताइए।
(i) रदरफोर्ड के α-प्रकीर्णन प्रयोग ने सर्वप्रथम यह सिद्ध किया कि परमाणु में नाभिक होता है।
(ii) किसी परमाणु के नाभिक में इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन होते हैं।
(iii) H1 की अपेक्षा H² अधिक क्रियाशील है।
(iv) किसी तत्व के परमाणु तथा उसके एक परमाणुक आयन का परमाणु क्रमांक व परमाणु भार एक जैसा होता है।
(v) F में इलेक्ट्रॉनों की संख्या Na+ से अधिक होती है।
(vi) किसी परमाणु के रासायनिक गुण उसके नाभिकीय आवेश के द्वारा निर्धारित होते हैं।
(vii) किसी परमाणु का वास्तविक द्रव्यमान उसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों प्रोटॉनों व न्यूट्रॉनों के द्रव्यमानों के योग के बराबर होता है।
(viii) धन किरणें, ऐनोड से उत्पन्न होती हैं।-
(ix) भिन्न-भिन्न परमाणुओं से प्राप्त इलेक्ट्रॉनों का e/m अनुपात भिन्न होता है।
(x) किसी तत्व का मौलिक गुण परमाणु भार है न कि परमाणु क्रमांक।
उत्तर:
(i) सत्य
(ii) असत्य
(iii) असत्य
(iv) सत्य
(v) असत्य
(vi) असत्य
(vii) असत्य
(viii) असत्य
(ix) असत्य
(x) असत्य।

प्रश्न 33.
क्वाण्टम संख्याएँ किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार की होती हैं? किसी परमाणु के कक्ष की आकृति तथा अभिविन्यास दर्शाने वाली क्वाण्टम संख्यायें आपस में किस प्रकार सम्बन्धित हैं? उदाहरण देकर समझाइये।
उत्तर:
क्वाण्टम संख्याएँ (Quantum Numbers) वे संख्याएँ जो किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा व स्थिति का वर्णन करती हैं, क्वाण्टम संख्याएँ कहलाती हैं। क्वाण्टम संख्याएँ चार प्रकार की होती हैं-
1. मुख्य क्वाण्टम संख्या (Principal Quantum Number)—
मुख्य क्वाण्टम संख्या (n) इलेक्ट्रॉन के मुख्य ऊर्जा स्तर को प्रदर्शित करती है। किसी भी इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा मुख्यतः n के मान पर निर्भर करती है। n का मान शून्य के
अतिरिक्त कोई भी पूर्णांक हो सकता है।
n के सम्भावित मान n = 1, 2, 3, 4, 5, …. ∞
n का मान इलेक्ट्रॉन कोश के आकार को निर्धारित करता है।

2. दिगंशी क्वाण्टम संख्या (Azimuthal Quantum Number ) –
दिगंशी क्वाण्टम संख्या l इलेक्ट्रॉन के उप ऊर्जा स्तर को प्रदर्शित करती है। l के मान मुख्य क्वाण्टम संख्या n पर निर्भर करते हैं। मुख्य क्वाण्टम संख्या n के लिए l के मान 0 से (n – 1) तक होते हैं।
l के सम्भावित मान l = 0 से (n – 1) तंक-
यदि n = 1, तो l = 0
n = 2, तो l = 0 और 1
n = 3, तो l = 0, 1, 2,
किसी n के लिए l के कुल मानों की संख्या n के बराबर होती हैं। l का मान उपकोशों की आकृति (shape) को निर्धारित करता है।

3. चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या (Magnetic Quantum Number) – चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या (m)-उप ऊर्जा स्तरों के आर्बिटलों को प्रदर्शित करती हैं। m के मान दिगंशी क्वाण्टम संख्या के मान पर निर्भर करते हैं। किसी l के लिए m के कुल मानों की संख्या (2l + l) होती है। अतः किसी उपकोश में आर्बिटलों की कुल संख्या (2l + 1) होती है।
m के सम्भावित मान m = – l से लेकर + l तक (शून्य सहित) –
यदि
l = 0 तो m = 0
l = 1, तो m = 1, 0, + 1
l = 2, m = – 2, – 1, 0, + 1, + 2
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 16
m का मान आर्बिटलों के अभिविन्यास (orientation) को निर्धारित करता है।

4. चक्रण क्वाण्टम संख्या (Spin Quantum Number) – यह क्वाण्टम संख्या इलेक्ट्रॉन के चक्रण की दिशा को प्रदर्शित करती है। किसी इलेक्ट्रॉन के चक्रण की दिशा दक्षिणावर्त (clockwise) या वामावर्त (anti-clock wise) हो सकती है। किसी m के लिए s का मान + \(\frac { 1 }{ 2 }\) और – \(\frac { 1 }{ 2 }\) होता है।

प्रश्न 34.
दिगंशी क्वाण्टम संख्या किसे कहते हैं? परमाणु की मुख्य क्वाण्टम संख्या तथा दिगंशी क्वाण्टम संख्या आपस में किस प्रकार सम्बन्धित हैं?
उत्तर:
दिगंशी क्वाण्टम संख्या (Azimuthal Quantum Number) – दिगंशी क्वाण्टम संख्या इलेक्ट्रॉन अक्ष की आकृति तथा उसके कोणीय संवेग (Angular momentum) को निर्धारित करती है। दिगंशी क्वाण्टम संख्या को l से प्रदर्शित करते हैं।

मुख्य क्वाण्टम संख्या (n) के लिए दिगंशी क्वाण्टम संख्या (l) के मान 0 से लेकर (n – 1) तक होते हैं। l के कुल मानों की संख्या n के बराबर होती है। उदाहरण-
n = 4 ∴ l = 0 से 3 (0, 1, 2, 3)
l का मान 0 1 2 3
उपकोश S P d f
किसी भी उपकोश में अधिकतम 2(2l + 1) इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं तथा कक्षकों की संख्या (2l + 1) होते हैं।

प्रश्न 35.
(n + l) का नियम लिखिए। इस नियम के आधार पर विभिन्न कक्षकों की बढ़ती ऊर्जा का क्रम बताइये।
उत्तर:
(n + l) का नियम-इस नियम के आधार पर विभिन्न कक्षकों की आपेक्षिक ऊर्जाओं की जानकारी प्राप्त होती है एवं इससे कक्षकों को भरने का क्रम निर्धारित होता है। ऊर्जा स्तरों एवं कक्षकों में इलेक्ट्रॉन उनकी ऊर्जा के अनुसार भरे जाते हैं। सर्वप्रथम निम्न ऊर्जा वाले कक्ष में इलेक्ट्रॉन भरे जाते हैं एवं इसके बाद उच्च ऊर्जा वाले कक्षक में इलेक्ट्रॉन भरे जाते हैं। यह नियम बोर – बरी ने दिया था।

इस नियम के अनुसार, “(n + l) का मान जिस कक्षक के लिए कम होता है, इलेक्ट्रॉन सर्वप्रथम उसी कक्षक में प्रवेश करता है।”

अत: इलेक्ट्रॉन उस कक्षक में पहले भरा जायेगा जिसके लिए (n + l) का मान न्यूनतम हो। यदि (n + l) का मान दो या अधिक कक्षकों के लिए समान है, तो नया इलेक्ट्रॉन उस कक्षक में प्रवेश करेगा जिसके लिए n का मान न्यूनतम हो। उदाहरण-3p कक्षक के लिए n = 3 तथा l = 1 होता है अत: (n + 1) = 3 + 1 = 4 होगा-

कक्षकों के लिए या उपकोशों के लिए ऊर्जा का क्रम इस प्रकार होगा ।
1s < 2s < 2p < 3s < 3p < 4s < 3d < 4p < 5s < 4d < 5p < 6s < 4f < 5d < 6p < 7s < 5f < 6d < 7p < 8s
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 17

प्रश्न 36.
(n + l) नियम की सहायता से निम्न प्रश्नों के उत्तर दें-
(a) निम्न ऑर्बिटलों को ऊर्जा के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करें।
(i) 1s, 2s, 3s, 2p
(ii) 4s, 3s, 3p, 4d
(iii) 5p, 4d, 5d, 4f, 6s
(iv) 5f, 6d, 7s, 7p

(b) निम्न में से किस ऑर्बिटल की ऊर्जा सबसे कम है?
4d, 4f, 5s, 5p

(c) निम्न में से किस ऑर्बिटल की ऊर्जा सर्वाधिक है?
5p, 5d, 5f, 6s, 6p
उत्तर:
(a) (i) 1s < 2s < 2p < 3s
(ii) 3s < 3p < 4s < 4d
(iii) 4d < 5p < 6s < 4f < 5d
(iv) 7s < 5f < 6d < 7p

(b) 5s की ऊर्जा सबसे कम है।

(c) 5f की ऊर्जा सर्वाधिक है।

आंकिक प्रश्न

प्रश्न 1.
एक तत्व का परमाणु क्रमांक 25 तथा द्रव्यमान 52 है। उसके नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल:
द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या
52 = परमाणु क्रमांक + न्यूट्रॉनों की संख्या
52 = 25 + न्यूट्रॉनों की संख्या
न्यूट्रॉनों की संख्या = 52 – 25 = 27

प्रश्न 2.
\({ }_{17}^{36} \mathrm{Cl}\) में प्रोटॉनों, न्यूट्रॉनों तथा इलेक्ट्रॉनों की संख्या का परिकलन कीजिए।
हल:
\({ }_{17}^{36} \mathrm{Cl}\) में परमाणु क्रमांक = 17
द्रव्यमान संख्या =36
द्रव्यमान संख्या = परमाणु क्रमांक + न्यूट्रॉनों की संख्या
36 = 17 + न्यूट्रॉनों की संख्या
न्यूट्रॉनों की संख्या = 36 – 17 = 19
प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या = परमाणु क्रमांक = 17

प्रश्न 3.
समान परमाणु भार वाले दो तत्व X तथा Y के परमाणु क्रमांक क्रमश : 18 व 19 हैं। यदि X तत्व के नाभिक में 21 न्यूट्रॉन हैं तो तत्व Y में न्यूट्रॉनों की संख्या क्या होगी?
हल:
तत्व X तथा Y के परमाणु भार समान हैं अर्थात् ये समभारिक हैं।
परमाणु भार = प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या
या
परमाणु भार = परमाणु क्रमांक + न्यूट्रॉनों की संख्या
X तत्व के लिये,
परमाणु भार = परमाणु क्रमांक + न्यूट्रॉनों की संख्या
= 18 + 21
= 39
Y तत्व के लिये,
परमाणु भार परमाणु क्रमांक + न्यूट्रॉनों की संख्या
39 = 19 + न्यूट्रॉनों की संख्या
न्यूट्रॉनों की संख्या = 39 – 19
= 20

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 4.
एक हाइड्रोजन परमाणु से इलेक्ट्रॉन पाँचवीं कक्षा से प्रथम कक्षा में कूदता है तो इसके स्पेक्ट्रम में कुल रेखाओं की कितनी संख्या प्राप्त होगी।
हल:
स्पेक्ट्रम में कुल रेखाओं की संख्या
= \(\frac{n(n-1)}{2}=\frac{5(5-1)}{2}\)
= \(\frac{5 \times 4}{2}\)
= 10
इन दस रेखाओं को निम्न प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 17a

प्रश्न 5.
हाइड्रोजन परमाणु में n = 4 अवस्था से n = 2 अवस्था वाले संक्रमण के दौरान उत्सर्जित फोटॉन की आवृत्ति तथा तरंगदैर्ध्य की गणना कीजिए।
हल:
n2 = 4, n1 = 2
अतः इस संक्रमण से बामर श्रेणी में एक स्पेक्ट्रमी रेखा प्राप्त होती है।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 18

प्रश्न 6.
Li2+ की प्रथम कक्षा से सम्बन्धित ऊर्जा की गणना कीजिए और बताइये इस कक्षा की त्रिज्या क्या होगी?
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 19

प्रश्न 7.
हाइड्रोजन परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन चतुर्थ कक्ष से प्रथम कक्ष में कूदता है तो स्पेक्ट्रमी रेखा की आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 20

प्रश्न 8.
निम्नलिखित सारणी को पूर्ण करें-
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 23
हल:
(1) Zn प्रोटॉनों की संख्या = परमाणु क्रमांक = 30
इलेक्ट्रॉन की संख्या = परमाणु क्रमांक = 30
न्यूट्रॉनों की संख्या = = द्रव्यमान सं. – परमाणु क्रमांक
= 64 – 30 = 34

(2) Sr2+ प्रोटॉनों की सं. = परमाणु क्रमांक = 38
इलेक्ट्रॉनों की सं. = परमाणु क्रमांक – 2
= 38 – 2
= 36
न्यूट्रॉनों की संख्या = द्रव्यमान सं. परमाणु क्रमांक
= 90 – 38 = 52

(3) Tc इलेक्ट्रॉन की सं. = प्रोटॉनों की सं. = 43
परमाणु क्रमांक = प्रोटॉनों की संख्या = 43
द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉनों की सं. + न्यूट्रॉनों की संख्या
= 43 + 56
= 99

(4) Br : Br में इलेक्ट्रॉनों की संख्या परमाणु क्रमांक से एक ज्यादा है।
परमाणु क्रमांक = इलेक्ट्रॉनों की संख्या – 1
= 36 – 1 = 35
प्रोटॉनों की संख्या = परमाणु क्रमांक = 35
द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या
= 35 + 44
= 79

प्रश्न 9.
1eV ऊर्जा वाले फोटॉन की तरंगदैर्ध्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
फोटॉन की ऊर्जा = lev
(E) = 1.602 × 10-19 J
प्लांक नियतांक (h) = 6.626 x 10-34 Js
प्रकाश का वेग = 3 x 108 m/s
E = hv
E = \(\frac { hc }{ λ }\)
λ = \(\frac { hc }{ E }\)
= \(\frac{6626 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^8}{1.602 \times 10^{-19}}\)
λ = 12.41 × 107 m
λ = 12.41 × 10-7 x 1010 Å
= 12.41 × 10³ Å

प्रश्न 10.
वैद्युत चुम्बकीय विकिरणों की स्थिति में 1 = 6.24 x 1014 s-1 और v2 = 3.36 × 1014s-1 आवृत्तियों के संगत तरंगदैर्ध्य का अनुपात ज्ञात कीजिए।
हल:
चुम्बकीय विकिरण के लिये
λ = \(\frac{c}{v} \propto \frac{1}{v}\)
अतः
\(\frac{\lambda_1}{\lambda_2}=\frac{v_2}{v_1}\)
प्रश्नानुसार, v1 = 6.24 × 1014s-1
v2 = 3.36 × 1014s-1
\(\frac{\lambda_1}{\lambda_2}=\frac{3.36 \times 10^{14}}{6.24 \times 10^{14}}\)
\(\frac{\lambda_1}{\lambda_2}\) = 0.54

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 11.
विकिरण के एक मोल फोटॉनों की ऊर्जा की गणना कीजिए, जिसकी आवृत्ति 5 x 1010s-1 है।
उत्तर:
एक फोटॉन की ऊर्जा (E) = hv
= 6.626 × 10-34 x 5 x 1010 J
= 33.13 × 10-24 J
एक मोल फोटॉनों की ऊर्जा
= एक फोटॉन की ऊर्जा आवोग्राद्रो संख्या
= 33.13 × 10-24 × 6.02 × 1023
= 19.93 J

प्रश्न 12.
नीले प्रकाश की तरंगदैर्ध्य 480 nm है। इस प्रकाश की आवृत्ति तथा तरंग संख्या ज्ञात कीजिये।
हल:
तरंगदैर्ध्य ( λ) = 480nm = 480 × 10-9 m
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 24

प्रश्न 13.
700 mm तरंगदैर्ध्य वाले प्रकाश के फोटॉन की ऊर्जा E हो तो 2E ऊर्जा वाले प्रकाश के फोटॉनों की तरंगदैर्ध्य क्या होगी ?
हल:
E = \(\frac { hc }{ λ }\) यहाँ hc नियतांक है तो
E ∝ \(\frac { 1 }{ λ }\) या E1λ1 = E2λ2
E1λ1 = E2λ2
E x 700 = 2E x λ2
λ = \(\frac { 700 }{ 2 }\)
= 350 nm

प्रश्न 14.
4000 Å तरंगदैर्ध्य का प्रकाश 2.0 eV कार्य फलन की धात्विक सतह पर डाला जाता है। ज्ञात कीजिये।
(i) फोटॉनों की ऊर्जा
(ii) फोटो इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा।
हल:
प्रकाश की तरंग दैर्ध्य (λ) = 4000 Å
= 4000 x 10-10 m = 4 × 10-7 m
कार्य फलन (h v0) = 2.0 ev
= 2.0 x 1.6 x 10-19 J
= 3.2 × 10-19 J
(i) फोटॉनों की ऊर्जा,
E = \(\frac{h c}{\lambda}\)
= \(\frac{6626 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^8}{4 \times 10^{-7}}\)
= \(\frac{6626 \times 3 \times 10^{-34} \times 10^8}{4 \times 10^{-7}}\)
= 4.97 × 10-19 J

(ii) फोटो इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा,
hv = v0 = K.E.
\(\frac{h c}{\lambda}\) – v0 = K.E.
4.97 x 10-19 – 3.2 x 10-19 = K.E.
1.77 x 10-19 = K.E.
K.E. = 1.77 x 10-19 J

प्रश्न 15.
एक बल्ब 4500 Å की तरंगदैर्ध्य का प्रकाश उत्सर्जित करता है। यदि बल्ब 150 वॉट का है और उससे 8% ऊर्जा प्रकाश के रूप में उत्सर्जित होती है, तो प्रति सेकेण्ड में उत्सर्जित होने वाले फोटॉनों की संख्या ज्ञात कीजिये।
हल:
एक फोटॉन की ऊर्जा (E) = \(\frac { hc }{ λ }\)
यहाँ h = 6·626 × 10-34 J sec.
c = 3 x 108 m/sec
λ = 4500 Å = 4500 × 10-10 m
E = \(\frac { hc }{ λ }\)
E = \(\frac{6626 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^8}{4500 \times 10^{-10}}\)
= 4.417 x 10-19 J
बल्ब के द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा 150 x \(\frac { 8 }{ 100 }\)J
n x E = \(\frac { 150×8 }{ 100 }\)
n × 4.417 × 10-19 = \(\frac { 150×8 }{ 100 }\)
n = \(\frac{15 \times 8}{10 \times 4.417 \times 10^{-19}}\)
फोटॉनों की संख्या n = 27.17 x 1018

प्रश्न 16.
एक हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन की प्रथम बोर कक्षा में ऊर्जा – 13.12 x 105 J mol-1 है तो इलेक्ट्रॉन की तृतीय बोर कक्षा में उत्तेजित होने के लिये आवश्यक ऊर्जा की गणना कीजिए।
हल:
हम जानते हैं कि.
En = – \(\frac{13 \cdot 12 \times 10^5}{(n)^2}\) J mol-1
n = 1 के लिये,
E1 = – 13.12 x 105 J mol-1
n = 3 के लिये, E3 = \(\frac{-13.12 \times 10^5}{(3)^2}\) J mol-1
= \(\frac{-13.12 \times 10^5}{9}\)
= – 1.46 × 105 J mol-1
उत्तेजित होने के लिये आवश्यक ऊर्जा,
∆E = E3 – E1
= (- 1.46 x 105)-(-13.12 x 105)
= – 1.46 × 105 + 13.12 × 105
= 13.12 × 105 – 1.46 × 105
= (13.12 – 1.46) × 105
∆E = 11.66 × 105 J mol-1

प्रश्न 17.
N. T. P. परं 6.0 लीटर ऑक्सीजन में प्रोटॉनों का संख्या क्या होगी, जबकि केवल 0.16 समस्थानिकों का ही प्रयोग किया गया हो।
हल:
6.0 ली. ऑक्सीजन में अणुओं की संख्या ज्ञात करना,
22.4 ली. ऑक्सीजन में अणुओं की संख्या
= 6.02 × 1023
6.0 ली. ऑक्सीजन में अणुओं संख्या = \(\frac{6.02 \times 10^{23} \times 6.0}{22.4}\)
= 1.6125 × 1023
ऑक्सीजन परमाणुओं की संख्या
= 1.6125 × 1023 x 2
प्रत्येक ऑक्सीजन परमाणु में प्रोटॉनों की संख्या = 8
कुल प्रोटॉनों की संख्या
= 2 × 1.6125 × 8 × 1023
= 25.8 × 1023

प्रश्न 18.
105 वाट का एक बल्ब 400 nm वाली तरंगदैर्ध्य का एकवर्णी प्रकाश उत्सर्जित करता है। बल्ब द्वारा प्रति सेकेण्ड उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या ज्ञात करें।
हल:
बल्ब की विद्युत शक्ति = 105 वॉट
= 105 जूल / सेकेण्ड
एक फोटॉन की ऊर्जा = E = hv
= \(\frac { hc }{ λ }\)
= \(\frac{6626 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^8}{400 \times 10^{-9}}\)
= 4.969 × 10-19 J
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 25

प्रश्न 19.
यदि H-परमाणु के लिये किसी संक्रमण में 100 nim की तरंगदैर्ध्य निकलती है तो He+ परमाणु के लिये संगत संक्रमण की तरंगदैर्ध्य ज्ञात कीजिए।
हल:
H परमाणु के लिये
\(\frac{1}{\lambda_{\mathrm{H}}}=\mathrm{R}_{\mathrm{H}}\left[\frac{1}{\left(n_1^2\right)}-\frac{1}{\left(n_2^2\right)}\right]\) … (1)
He+ परमाणु के लिये
\(\frac{1}{\lambda_{\mathrm{He}^{+}}}=\mathrm{R}_{\mathrm{H}} \cdot \mathrm{Z}^2\left[\frac{1}{\left(n_1^2\right)}-\frac{1}{\left(n_2^2\right)}\right]\) … (2)
समीकरण (1) व (2) से में,
\(\lambda_{\mathrm{He}^{+}}=\frac{\lambda_{\mathrm{H}}}{\mathrm{Z}^2}\)
= \(\frac{100}{(2)^2}=\frac{100}{4}\)
= 25 nm

प्रश्न 20.
किसी तत्व के एक आयन में एक इलेक्ट्रॉन है। इस आयन की प्रथम बामर श्रेणी और प्रथम लाइमन श्रेणी के तरंगदैथ्यों का अन्तर 59.3 nm है। इस आयन का नाम बताइए।
उत्तर:
रिडबर्ग के अनुसार,
\(\frac{1}{\lambda}=\mathrm{R}_{\mathrm{H}}(Z)^2\left[\frac{1}{\left(n_1^2\right)}-\frac{1}{\left(n_2^2\right)}\right]\)
बामर श्रेणी की प्रथम लाइन लिये, n1 = 2, n2 = 3
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 26
दोनों तरंगदैयों का अन्तर 59.3 nm है।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 27
अतः आयन Li2+ है।

प्रश्न 21.
जब 300 nm तरंगदैर्घ्य का विकिरण सोडियम धातु की सतह पर टकराता है तो 1.68 x 105 J mol-1 गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं सोडियम के इलेक्ट्रॉन के निष्कासन के लिए कम से कम कितनी ऊर्जा आवश्यक होगी? किसी प्रकाशित इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन के लिए अधिकतम तरंगदैर्ध्य क्या होगी?
हल:
फोटॉन की ऊर्जा (E) = hv = \(\frac { hc }{ λ }\)
∴ 300 nm (= 300 x 10-9 m) फोटॉन की ऊर्जा
= \(\frac{6.626 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^8}{300 \times 10^{-9}}\)
E = 6.626 x 10-19 J
एक मोल फोटॉन की ऊर्जा
= 6.626 × 10-19 x 6.02 × 1023
= 3.99 x 105 J mol-1
सोडियम से एक मोल इलेक्ट्रॉनों के निष्कासन के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा
= (3.991 – 1.68) x 105
= 2.31 × 105 J mol-1
एक इलेक्ट्रॉन के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा
= \(\frac{2.31 \times 10^5}{6022 \times 10^{23}}\)
= 3.84×10-19 J
इसकी तरंगदैर्ध्य निम्नवत् होगी
λ = \(\frac { hC }{ E }\)
= \(\frac{6.626 \times 10^{-34} \times 30 \times 10^8}{3.84 \times 10^{-19}}\)
यह हरे रंग के प्रकाश से सम्बन्धित है।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना

प्रश्न 22.
एक कण की स्थिति व वेग में अनिश्चितता क्रमशः 10-2 मीटर व 5.27 x 10-24 मीटर सेकेण्ड है। इस कण के द्रव्यमान की गणना कीजिए।
उत्तर:
हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धान्त के नियमानुसार,
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 28

प्रश्न 23.
एक इलेक्ट्रॉन की स्थिति में अनिश्चितता ज्ञात करो, उसके वेग की अनिश्चितता का मान 5.7 x 107 सेमी प्रति सेकेण्ड है। इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान 9.1 × 10-28 ग्राम है।
उत्तर:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 29

प्रश्न 24.
किसी इलेक्ट्रॉन की स्थिति और वेग में अनिश्चितता का गुणनफल ज्ञात कीजिए।
हल:
∆x, ∆v = \(\frac { h }{ 4π.m }\)
= \(\frac{6.626 \times 10^{-34}}{4 \times 3.14 \times 9.1 \times 9.1 \times 10^{-31}}\)
= 0.058 x 10-3
= 5.8 x 10-5 m² s-1

प्रश्न 25.
0.1 kg द्रव्यमान और 10 ms-1 वेग से गति कर रही एक गेंद की तरंगदैर्ध्य क्या होगी?
हल:
डी-ब्रॉग्ली समीकरण के अनुसार,
λ = \(\frac { h }{ mv }\)
= \(\frac{6.626 \times 10^{-34}}{0.1 \times 10}\)
λ = 6.626 × 10-34 m

प्रश्न 26.
एक इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान 9.1 x 10-31 kg है। यदि इसकी गतिज ऊर्जा 3.0 x 10-25 J है तो इसकी तरंगदैर्ध्य क्या होगी?
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 30

प्रश्न 27.
एक गेंद का द्रव्यमान 50g तथा गति 45 ms-1 है। यदि गति को 2% यथार्थता के अन्दर मापा जा सकता है तो इसकी स्थिति में अनिश्चितता की गणना कीजिए।
हल:
गति में 2% की अनिश्चितता,
= \(\frac { 45×2 }{ 100 }\)
= ∆v = 0.9 m/s
अनिश्चितता के सिद्धान्त के अनुसार,
∆x. m. ∆v = \(\frac { h }{ 4π }\)
∆x = \(\frac{h}{m . \Delta v \cdot 4 \pi}\)
यदि
h = 6.626 × 10-34. Js
m = 50g = 50 x 10-3 kg
= \(\frac{6.626 \times 10^{-34}}{50 \times 1 \times 4 \times 3.14 \times 10^{-3}}\)
= 0.0105 x 10-31
∆x = 1.05 x 10-33 m

प्रश्न 28.
बोर इलेक्ट्रॉन द्वारा अपनी तीसरी कक्षा में एक पूरे चक्कर में निर्मित तरंगों की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल:
हम जानते हैं कि
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 31
यहाँ mv कोणीय संवेग है।
इस प्रकार बोर की तीसरी कक्षा के लिये कोणीय संवेग निम्न प्रकार है, (n = 3)
mvr = \(\frac { nh }{ 2π }\) = \(\frac { 3h }{ 2π }\) … (ii)
(mvr) का मान समीकरण (i) में रखने पर,
तरंगों की संख्या = \(\frac { 2π }{ h }\)(\(\frac { 3h }{ 2π }\))
तरंगों की संख्या = 3
अतः बोर की तीसरी कक्षा में तरंगों की संख्या = 3

प्रश्न 29.
उस इलेक्ट्रॉन की डी-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य की गणना कीजिए जिसका वेग प्रकाश के वेग के 1% के बराबर हो।
हल:
डी-ब्रॉग्ली के अनुसार,
λ = \(\frac { h }{ mv }\)
यहाँ
m = 9.1 × 10-31 kg
h = 6.626 × 10-34 J.s
इलेक्ट्रॉन का वेग (∆v) = प्रकाश के वेग का 1%
= \(\frac{3 \times 10^8 \times 1}{100}\)
= 3 × 108 × 0.1
= 3 x 106 ms-1
इलेक्ट्रॉन की तरंगदैर्ध्य (λ) = \(\frac { h }{ mv }\)
= \(\frac{6.626 \times 10^{-34}}{9.1 \times 10^{-31} \times 3 \times 10^6}\)
∆v = 2.43 x 10-10 m

प्रश्न 30.
100 g द्रव्यमान की एक बेस बॉल 3 x 10² cm s-1 के वेग से गतिमान है, यदि बेसबॉल की स्थिति को उस त्रुटी के अन्तर्गत मानें जो प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्ध्य (2000 Å) के परिमाण के तुल्य हो तो संवेग में अनिश्चितता की तुलना बेसबॉल के सम्पूर्ण संवेग से किस प्रकार की जा सकती है?
हल:
हम जानते हैं कि,
∆x. ∆p = \(\frac { h }{ 4π }\)
∆p = \(\frac{h}{4 \pi \times \Delta x}\)
∆p = \(\frac{6.626 \times 10^{-34}}{4 \times 3.14 \times 2000 \times 10^{-10}}\)
∆p = 0.264 x 10-27
= 2.64 × 10-28 kg ms-1
\(\frac { ∆p }{ p }\) की गणना दिया है
m = 100g = 100 x 10-3 kg.
v = 3 x 10² cm s-1
= 3 ms-1
संवेग (p) = m.v.
= 100 × 10-3 x 3
= 300 x 10-3 kg ms-1
\(\frac { ∆p }{ p }\) = \(\frac{264 \times 10^{-28}}{300 \times 10^{-3}}\)
= \(\frac{2.64 \times 10^{-28}}{0.3}\)
= 8.8 × 10-28

प्रश्न 31.
एक इलेक्ट्रॉन का वेग 30 ms-1 है जो कि 98.99% तक शुद्ध है। इसकी स्थिति ज्ञात करने में क्या अनिश्चितता होगी?
हल:
∆x. m ∆v = \(\frac { h }{ 4π }\)
∆x = \(\frac{h}{4 \pi \cdot m \cdot \Delta v}\)
दिया है, h = 6.626 × 10-34 J.s.
m = 9.1 × 10-31 kg
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 32

प्रश्न 32.
एक इलेक्ट्रॉन पुंज का विवर्तन क्रिस्टल के द्वारा हो सकता है। इलेक्ट्रॉन पुंज किस विभव की ली जाए कि उसकी तरंगदैर्ध्य का मान 1.54 Å हो जाये।
हल:
एक इलेक्ट्रॉन के लिये,
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 2 परमाणु की संरचना 33

प्रश्न 33.
परमाणु क्रमांक, 34, 24 तथा 36 वाले परमाणुओं के लिये कुल स्पिन ज्ञात कीजिए।
हल:
परमाणु क्रमांक 34, 24 तथा 36 वाले परमाणुओं का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
34Se = 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d10, 4s², 4p4
(अयुग्मित इलेक्ट्रॉन) = 2
24Cr = 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d5, 4s1
(अयुग्मित इलेक्ट्रॉन) = 6
36Kr = 1s², 2s², 2p6, 3s², 3p6, 3d10, 4s², 4p6
(अयुग्मित इलेक्ट्रॉन) = 0
कुल स्पिन = ± \(\frac { 1 }{ 2 }\)x अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की संख्या
34Se के लिये कुल स्पिन = ± \(\frac { 1 }{ 2 }\) × 2 = ± 1
24Cr के लिये कुल स्पिन = ± \(\frac { 1 }{ 2 }\) x 6 = ± 3
36Kr के लिये कुल स्पिन = ± \(\frac { 1 }{ 2 }\) x 0 = 0

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HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

Haryana State Board HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

प्रश्न 1.
ऊर्जा का मात्रक नहीं है-
(a) बाट
(b) किलोवाट घण्टा
(c) जूल
(d) इलेक्ट्रॉन बोल्ट
उत्तर:
(a) बाट

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रतापूर्वक गिरती हुई वस्तु की गतिज ऊर्जा का मान-
(a) नियत रहता है
(b) घटता रहता है
(c) बढ़ता रहता है।
(d) शून्य रहता है।
उत्तर:
(c) बढ़ता रहता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 3.
चित्र में वेग समय चक्र दर्शाया गया है। बल द्वारा C से D तक किया गया कार्य होगा-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -1
(a) धनात्मक
(b) शन्य
(c) ऋणात्मक
(d) अनन्त
उत्तर:
(b) शन्य

प्रश्न 4.
यदि एक बल को किसी पिण्ड पर लगाने से उस पिण्ड को वेग प्राप्त होता है तो शक्ति होगी-
(a) F/V
(b) FV²
(c) FV
(d) E/V²
उत्तर:
(c) FV

प्रश्न 5.
एक लड़का दूरी तक सिर पर वजन रखकर ढोता है उसे अधिकतम कार्य करना पड़ता है जब वह वस्तु को लेकर
(a) खुरदरे क्षैतिज सतह पर चलता है।
(b) चिकनी क्षैतिज सतह पर चलता है।
(c) नत तल पर चलता है
(d) ऊर्ध्व तल पर ऊपर चलता है।
उत्तर:
(d) ऊर्ध्व तल पर ऊपर चलता है।

प्रश्न 6.
एक बॉक्स को फर्श से उठाकर किसी टेबिल पर रख देते हैं। हमारे द्वारा बॉक्स पर किया गया कार्य निर्भर करता है-
(a) बॉक्स को रखने में विभिन्न पथों पर
(b) हमारे द्वारा लिये गये स्थान पर
(c) हमारे भार पर
(d) बॉक्स से भार पर
उत्तर:
(d) बॉक्स से भार पर

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 7.
किसी निकाय पर संरक्षी आन्तरिक बल द्वारा किये गये कार्य का ऋणात्मक मान तुल्य होता है-
(a) कुल ऊर्जा में परिवर्तन के
(b) गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के
(c) स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन के
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन के

प्रश्न 8.
किसी पिण्ड की गतिज ऊर्जा में 0.1 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो उसके संवेग में प्रतिशत वृद्धि होगी-
(a) 0.05%
(b) 0.1%
(c) 1.0%
(d) 10%
उत्तर:
(a) 0.05%

प्रश्न 9.
राशियाँ जो किसी टक्कर में नियत रहती है-
(a) संवेग, गतिज ऊर्जा तथा ताप
(b) संवेग, लेकिन गतिज ऊर्जा तथा ताप नहीं
(c) संवेग, गतिज ऊर्जा लेकिन ताप नहीं
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(b) संवेग, लेकिन गतिज ऊर्जा तथा ताप नहीं

प्रश्न 10.
दो स्प्रिंगों के बल नियतांक व 2 हैं। उनमें समान खिंचाव x उत्पन्न किया जाता है। इनकी प्रत्यास्थ ऊर्जा E व E2 हो तो E1 व E2 का अनुपात होगा-
(a) \(\frac{k_1}{k_2}\)
(b) \(\frac{k_2}{k_1}\)
(c) \(\frac{\sqrt{k_2}}{\sqrt{k_1}}\)
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(a) \(\frac{k_1}{k_2}\)

प्रश्न 11.
पिण्ड पर किया गया कार्य निर्भर नहीं करता है-
(a) आरोपित बल पर
(b) पिण्ड की प्रारम्भिक चाल पर
(c) बल व विस्थापन के मध्य कोण पर
(d) विस्थापन पर
उत्तर:
(b) पिण्ड की प्रारम्भिक चाल पर

प्रश्न 12.
यदि किसी पिण्ड का संवेग दुगना कर दिया जाये तो गतिज ऊर्जा में वृद्धि होगी-
(a) 400%
(b) 200%
(c) 300%
(d) 50%
उत्तर:
(c) 300%

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 13.
m व 4m द्रव्यमान के दो अणुओं की गतिज ऊर्जा समान है। उनमें रेखीय संवेग का अनुपात होगा-
(a) 1 : 4
(b) 4 : 1
(c) 1 : 2
(d) 1 : √2
उत्तर:
(c) 1 : 2

प्रश्न 14.
एक पिण्ड समान वेग से चलता हुआ दूसरे समान द्रव्यमान के स्थिर पिण्ड से द्विविमीय टक्कर करता है। टक्कर के पश्चात् दोनों के मध्य कोण होगा-
(a) 450
(b) 90°
(c) 60°
(d) 30°
उत्तर:
(b) 90°

प्रश्न 15.
m द्रव्यमान की गोली 1 वेग से क्षैतिज दिशा में दागी जाती है। यह गोली m द्रव्यमान के रेत के थैले में धँस जाती है। टक्कर के कारण रेत के थैले का वेग होगा-
(a) \(\frac{mu}{M+m}\)
(b) \(\frac{m}{(M+m)u}\)
(c) \(\frac{mM}{(M+m)u}\)
(d) o
उत्तर:
(a) \(\frac{mu}{M+m}\)

प्रश्न 16.
पूर्णत: प्रत्यास्थ टक्कर के लिए प्रत्यावस्थान गुणांक ९ का मान होता है-
(a) 1
(b)0
(c) ∞
(d) – 1
उत्तर:
(a) 1

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 17.
एक रेलगाड़ी को रोकने के लिए समान मन्दन बल लगाया जाता है। यदि चाल दोगुनी कर दी जाये तो दूरी होगी-
(a) समान
(b) दो गुनी
(c) आधी
(d) चार गुनी
उत्तर:
(d) चार गुनी

प्रश्न 18.
एक गेंद 5 मीटर ऊँचाई से गिरकर 1.8 मीटर ऊँचाई तक उछलती है, उछलने के पश्चात् तथा पूर्व गेंद के वेगों का अनुपात होगा –
(a) \(\frac{4}{5}\)
(b) \(\frac{1}{5}\)
(c) \(\frac{2}{5}\)
(d) \(\frac{3}{5}\)
उत्तर:
(d) \(\frac{3}{5}\)

प्रश्न 19.
यदि \(\vec{F}=(20 \hat{i}+15 \hat{j}-5 \hat{k}) \mathrm{N} \text { तथा } \vec{v}=(6 \hat{i}-4 \hat{j}+3 \hat{k}) \mathrm{m} / \mathrm{s}\) है तो तात्क्षणिक शक्ति होगी-
(a) 35 W
(b) 25 W
(c) 90 W
(d) 45 W
उत्तर:
(d) 45 W

प्रश्न 20.
√Ek में खींचा गया वक्र है-
(E = गतिज ऊर्जा तन्त्र, p = रेखीय संवेग)
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -2
उत्तर:
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -3

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)

प्रश्न 1.
गुरुत्व के विरुद्ध किसी मनुष्य द्वारा किया गया कार्य कितना होगा, यदि वह समतल में चल रहा हो ?
उत्तर:
∵ W =F.d cos θ
समतल में चलने पर θ = 90° और F = mg
तो W = mg × cos 90°
या W = 0

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 2.
एक मनुष्य 10kg के भार को 1 min तक अपने कन्धों पर उठाये रखता है। मनुष्य द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
उत्तर:
W = F.d
यहाँ d = 0
W = 0

प्रश्न 3.
क्या यांत्रिक ऊर्जा हमेशा संरक्षित रहती है?
उत्तर:
नहीं; केवल विलगित निकाय की यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है जबकि असंरक्षी बल शून्य हो।

प्रश्न 4.
घड़ी में चाबी भरने पर स्प्रिंग में कौन-सी ऊर्जा संचित होती है? घड़ी चलते रहने पर यह ऊर्जा कौन-सी ऊर्जा में परिवर्तित होती है?
उत्तर:
घड़ी में चाबी भरने पर स्प्रिंग में उसकी स्थितिज ऊर्जा के रूप में ऊर्जा एकत्र होती है। घड़ी के चलते रहने पर यहीं स्थितिज ऊर्जा सुइयों की गतिज ऊर्जा में बदलती है।

प्रश्न 5.
क्या किसी निकाय के संवेग में परिवर्तन किये बिना गतिज ऊर्जा में परिवर्तन किया जा सकता है?
उत्तर:
हाँ; निकाय के कणों का कुल संवेग अपरिवर्तित रहेगा परन्तु उसके कणों के अलग-अलग संवेग बदल सकते हैं और फलस्वरूप गतिज ऊर्जा में परिवर्तन हो सकता है।

प्रश्न 6.
क्या किसी कण की गतिज ऊर्जा परिवर्तित किये बिना इसका संवेग परिवर्तित किया जा सकता है?
उत्तर:
हाँ; एक समान वृत्तीय गति में कण की चाल नियत होने से उसकी गतिज ऊर्जा अपरिवर्तित रहती है लेकिन प्रति क्षण वेग की दिशा बदलने से संवेग परिवर्तित होगा।

प्रश्न 7.
क्या किसी पूर्णतः अप्रत्यास्थ टक्कर में सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा क्षय हो सकती है?
उत्तर:
हाँ जब एक स्प्रिंग को दबाते हैं या वस्तु खुरदरे तल पर नियत वेग से खींची जाये।

प्रश्न 8.
संरक्षी बलों के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
गुरुत्वीय बल स्प्रिंग बल ।

प्रश्न 9.
असंरक्षी बलों के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
घर्षण बल श्यान बल ।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 10.
आइन्स्टीन का द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर:
E = mc²
जहाँ m = ऊर्जा में बदलने वाला द्रव्यमान
एवं c = प्रकाश की चाल = 3 × 100 ms-1

प्रश्न 11.
क्या किसी वस्तु की (EU) राशि ऋणात्मक हो सकती है? यहाँ E कुल ऊर्जा एवं स्थितिज ऊर्जा है।
उत्तर:
नहीं, क्योंकि राशि (EU) कुल गतिज ऊर्जा को व्यक्त करती है और गतिज ऊर्जा ऋणात्मक नहीं हो सकती है।

प्रश्न 12.
क्या किसी वस्तु पर बाह्य बल लगाये बिना निकाय की गतिज ऊर्जा परिवर्तित की जा सकती है?
उत्तर:
हाँ, जैसे बम विस्फोट में।

प्रश्न 13.
क्या रेखीय संवेग सदैव संरक्षित रहता है?
उत्तर:
नहीं; रेखीय संवेग केवल विलगित निकाय (Isolated System) में ही संरक्षित रहता है।

प्रश्न 14.
क्या किसी वस्तु पर बिना गतिज ऊर्जा परिवर्तन के बल लगाया जा सकता है?
उत्तर:
हाँ; जब एक स्प्रिंग को दबाते हैं या वस्तु खुरदरे तल पर नियत वेग से खींची जाये।

प्रश्न 15.
पानी में एक हवा का बुलबुला ऊपर उठता है तो उसकी स्थितिज ऊर्जा में क्या परिवर्तन होगा?
उत्तर:
स्थितिज ऊर्जा घटेगी।

प्रश्न 16.
ऋणात्मक कार्य का क्या अर्थ है?
उत्तर:
इसका अर्थ है कि विस्थापन बल के विपरीत है अर्थात् कार्य बल के विरुद्ध किया गया।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 17.
1 kWh में जूल (J) की संख्या लिखिए।
उत्तर:
1 kWh = 36 × 106 J

प्रश्न 18.
खिंची हुई स्प्रिंग की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा का मान कितना है?
उत्तर:
U(x) = \(\frac{1}{2}\) kx²

प्रश्न 19.
क्या यांत्रिक ऊर्जा हमेशा संरक्षित रहती है?
उत्तर:
नहीं; केवल विलगित निकाय की यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है, जब आन्तरिक असंरक्षी बल शून्य हो।

प्रश्न 20.
जब संरक्षी बल किसी वस्तु पर धनात्मक कार्य करता है, तो पिण्ड की स्थितिज ऊर्जा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
स्थितिज ऊर्जा घटती है।

प्रश्न 21.
धनात्मक कार्य के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
घोड़े द्वारा गाड़ी खींचना गिरते हुए पिण्ड पर गुरुत्व बल द्वारा कृत कार्य

प्रश्न 22.
एक व्यक्ति अपने हाथ में सूटकेस लिए हुए प्लेटफार्म पर खड़ा है, क्या वह कोई कार्य कर रहा है?
उत्तर:
नहीं; क्योंकि विस्थापन शून्य है।

प्रश्न 23.
1 जूल में कितने अगं होते हैं?
उत्तर:
1 जूल 107 अर्ग

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 24.
नाभिक के चारों ओर घूमते इलेक्ट्रॉन में स्थितिज ऊर्जा होती है अथवा नहीं?
उत्तर:
ऋणात्मक विद्युत् स्थितिज ऊर्जा होती है।

प्रश्न 25.
ऊर्जा के चार रूप लिखिए।
उत्तर:
ऊष्मीय ऊर्जा, विद्युत् ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा और प्रकाश ऊर्जा।

प्रश्न 26.
माचिस की तीली जलाने पर तीली से कौन-सी ऊर्जा ऊष्मा में बदलती है?
उत्तर:
रासायनिक ऊर्जा ऊष्मा में बदलती है।

प्रश्न 27.
किसी वस्तु के कार्य करने की क्षमता क्या कहलाती है?
उत्तर:
ऊर्जा।

प्रश्न 28.
जब किसी वस्तु का ताप बढ़ता है तो उसकी आन्तरिक ऊर्जा में क्या परिवर्तन होता है?
उत्तर:
आन्तरिक ऊर्जा बढ़ती है।

प्रश्न 29.
कमान से छोड़े गये तीर में गतिज ऊर्जा होती है, तीर को वह गतिज ऊर्जा कहाँ से मिलती है?
उत्तर:
तीर और कमान निकाय की स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है जो तीर को मिल जाती है।

प्रश्न 30.
क्या पूर्ण अप्रत्यास्थ संघट्ट में निकाय की सम्पूर्ण ऊर्जा क्षय हो जाती है?
उत्तर:
नहीं; केवल उतनी ही गतिज ऊर्जा का क्षय होता है जितनी कि संवेग संरक्षण के लिए आवश्यक होती है।

प्रश्न 31.
प्रत्यास्थ और अप्रत्यास्थ संघट्ट में से किसमें संवेग संरक्षित रहता है और किसमें यांत्रिक ऊर्जा ?
उत्तर:
प्रत्यास्थ और अप्रत्यास्थ दोनों ही प्रकार के संघट्टों में संवेग संरक्षित रहता है लेकिन यांत्रिक ऊर्जा केवल प्रत्यास्थ संघट्ट में संरक्षित रहती है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)

प्रश्न 1.
शून्य कार्य, धनात्मक कार्य एवं ऋणात्मक कार्य के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(i) शून्य कार्य –
∵ W = F.s.cos θ
यदि θ = 90° तो cos θ = 0 अत: W = 0
उदाहरण के लिए – वृत्तीय पथ पर गतिशील पिण्ड पर अभिकेन्द्रीय बल द्वारा कृत कार्य शून्य होता है।
धनात्मक कार्य – W=Fs.cos θ जब 80° तो cos 9 = 1 अतः W – F. अर्थात् कार्य धनात्मक होगा।
उदाहरण के लिए – जब कोई व्यक्ति किसी भार को ऊपर उठाता है तो व्यक्ति द्वारा कृत कार्य धनात्मक होता है।
ऋणात्मक कार्य – जब 0-180° तो cos81. अतः WFs अर्थात् कार्य ऋणात्मक होगा।
उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति किसी भार को ऊपर उठाता है तो गुरुत्वीय बल द्वारा कृत कार्य ऋणात्मक (-mgh) होता है।

प्रश्न 2.
किसी बन्दूक से गोली दागी जाती है, तो बन्दूक एवं गोली में से किसकी गतिज ऊर्जा अधिक होगी?
उत्तर:
∵ Ek = \(\frac{p^{2}}{2m}\)
या Ek ∝ \(\frac{1}{m}\) यदि p का मान नियत है।
∵ गोली एवं बन्दूक के संवेग परिमाण में समान होते हैं अतः गोली की गतिज ऊर्जा अधिक होगी क्योंकि इसका द्रव्यमान कम होता है।

प्रश्न 3.
गतिज ऊर्जा किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह ऊर्जा जो किसी पिण्ड में उसकी गति के कारण होती है. गतिज ऊर्जा कहलाती है और इसकी माप उस कार्य से की जाती है, जो शून्य वेग की अवस्था से उस वेग की अवस्था तक लाने में करना पड़ता है। 1 वेग की अवस्था में
K = \(\frac{1}{2}\) v²

प्रश्न 4.
तोप से दागा गया गोला ऊपर जाकर वायु में फट जाता है। संवेग तथा गतिज ऊर्जा में क्या परिवर्तन होगा?
उत्तर:
जब गोला फटता है तो संवेग संरक्षित रहता है लेकिन गतिज ऊर्जा में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 5.
गतिज ऊर्जा एवं संवेग में सम्बन्ध बताइये और इसकी सहायता से बताइये कि यदि हल्के एवं भारी पिण्डों के संवेग समान हैं तो किसकी गतिज ऊर्जा अधिक होगी?
उत्तर:
गतिज ऊर्जा,
\(K_i=\frac{1}{2} m v^2=\frac{m^2 v^2}{2 m}=\frac{p^2}{2 m}\)
या \(K=\frac{p^2}{2 m}\)
यदि P का मान नियत है, तो K ∝ \(\frac{1}{m}\)
स्पष्ट है कि हल्के पिण्ड ( कम द्रव्यमान m) की गतिज ऊर्जा अधिक होगी।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 6.
कार्य निर्देश तन्त्र पर किस प्रकार निर्भर करता है? समझाइये।
उत्तर:
कार्य, निर्देश तन्त्र पर निर्भर करता है क्योंकि निर्देश तन्त्र परिवर्तित होने से विस्थापन परिवर्तित हो जाता है। जैसे-यदि किसी बॉक्स जिसका द्रव्यमान है, को कोई व्यक्ति सिर पर रखकर ऊँचाई तक ले जाता है, तो व्यक्ति के सापेक्ष बॉक्स का विस्थापन शून्य होता है। अतः व्यक्ति के सापेक्ष कार्य शून्य होगा, लेकिन प्लेटफार्म पर खड़े व्यक्ति के लिए इसका मान Www.gh होता है क्योंकि प्लेटफार्म पर खड़े व्यक्ति के लिए बॉक्स का विस्थापन है।

प्रश्न 7.
स्थितिज ऊर्जा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
ऊर्जा एवं ऊर्जा के रूप (Energy and Types of Energy) :
ऊर्जा एक विशेष प्रचलित शब्द है अर्थात् बिना ऊर्जा के कोई भी कार्य करना सम्भव नहीं है। मनुष्य इसे खाना खाकर, दूध पीकर, फल खाकर, फलों एवं सब्जियों का जूस पीकर ग्रहण करता है।

किसी वस्तु में उसकी विशेष स्थिति अथवा गति के कारण कार्य करने की क्षमता पायी जाती है। “वस्तु द्वारा कार्य की कुल क्षमता को ऊर्जा कहते है।’ किसी वस्तु में विद्यमान ऊर्जा का मापन उस कार्य से किया जाता है, जितना कि वह कर सकती है जबकि वह कार्य करने के योग्य न रहे। ऊर्जा कार्य के कुल परिमाण को बताती है।

जब कोई वस्तु या पिण्ड कार्य करता है तो उसकी ऊर्जा घटती हैं। किसी भी ऊर्जा की माप उस कार्य से होती है जो वह शून्य ऊर्जा वाली स्थिति में आने तक करती है। स्पष्ट है कि वस्तु द्वारा किया गया अधिकतम कार्य ही ऊर्जा की माप है।

ऊर्जा के वही मात्रक होते हैं जो कार्य के होते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति में ऊर्जा का मात्रक जूल (J) होता है। ऊर्जा के अन्य मात्रक किलोवार घण्टा kWh तथा इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) होते हैं।
1 kWh = 10³ × 1 Watt × 1 hour = 10³ J.s-1 × 3600 s
या 1 kWh = 3.6 × 106 J
1 eV = 1.6 × 10-19 C × 1 J.C-1
या 1 eV = 1.6 × 10-19 J

स्थितिज ऊर्जा की अवधारणा
(Concept of Potential Energy)
किसी कण या पिण्ड या तन्त्र की वह ऊर्जा है जो उसकी स्थिति या अभिविन्यास के कारण होती है, स्थितिज ऊर्जा कहलाती है।
यह धनात्मक या ऋणात्मक हो सकती है। स्थितिज ऊर्जा सदैव सम्पूर्ण निकाय की होती है।

प्रतिकर्षण बलों के कारण स्थितिज ऊर्जा का मान धनात्मक तथा आकर्षण बलों के कारण स्थितिज ऊर्जा का मान ऋणात्मक होता है।
जब कणों के बीच लगने वाला बल आकर्षण होता है तो उनके बीच दूरी बढ़ाने पर स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है और जब कणों के बीच लगने वाला बल प्रतिकर्षण होता है तो उनके बीच की दूरी बढाने पर स्थितिज ऊर्जा घटती है।
आकर्षण तथा प्रतिकर्षण बलों के प्रभाव में स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तन चित्र 6.9 में दर्शाया है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -4

प्रश्न 8.
संरक्षी बलों को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संरक्षी तथा असंरक्षी बल
(Conservative and Non-conservative Forces)
प्रथम परिभाषा-जब किसी कण पर एक या एक एक से अधिक
बल इस प्रकार कार्य करते हैं कि कण की अपनी प्रारम्भिक अवस्था में लौटने पर वही गतिज ऊर्जा रहती है, जो प्रारिम्भक अवस्था में थी, तो ये बल संरक्षी बल कहलाते है। गतिज ऊर्जा के मान में कमी होने पर बलों को असंरक्षी बल कहते हैं।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -5
द्वितीय परिभाषा : वे बल जिनके द्वारा पिण्ड को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक विस्थापित करने में किया गया कार्य पथ पर निर्भर नहीं करता है, संरक्षी बल कहलाते है। अर्थात् पथों 1,2 व 3 के लिये
W1 = W2 = W3
उदाहरणार्थ – गुरुत्वीय बल, प्रत्यास्थ बल आदि।
इसके विपरीत जिन बलों के प्रभाव में वस्तुऐं एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक विस्थापित करनें में कृत कार्य पथ पर निर्भर करता है, असंरक्षी बल कहलाते हैं अर्थात् इनके लिए
W1 ≠ W2 ≠ W3
उदाहरण के लिए – घर्षण बल, श्यान बल आदि।

तृतीय परिभाषा : किसी बल को किसी कण पर लगाने से एक एक पूर्ण चक्कर में बल द्वारा सम्पन्न कार्य शून्य हो तो बल को संरक्षी बल कहते हैं। यदि कुल कार्य का परिमाण शून्य नहीं है तो बल को असंरक्षी कहते हैं।

संरक्षी तथा असंरक्षी बलों के उदाहरण
(i) गुरुत्वीय बल संरक्षी बल है : यदि एक गेंद को पृथ्वी की सतह पर कुछ गतिज ऊर्जा देकर ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर फेंका जाए तो कुछ समय पश्चात वह पुन: पृथ्वी पर लौट आती है तथा उसकी गतिज ऊर्जा वही होती है जितनी ऊपर की ओर फेकते समय थी।

(ii) स्प्र्रग का प्रत्यास्थ बल संरक्षी बल है : माना पिण्ड द्रव्यमान रहित स्प्रिग के सिरे से जुड़ा है। स्प्रिग का दूसरा सिरा एक दीवार से जुड़ा है। स्प्रिग तथा गुटके का यह निकाय एक घर्षण रहित चिकने क्षैतिज धरातल पर रखा है। गुर्युके को दीवार की ओर कुछ विस्थापित करने पर स्प्रिग संपीडित होती है। स्प्रिग प्रत्यास्थता के कारण गुटके के विस्थापन के विपरीत दिशा में एक प्रत्यानयन बल आरोपित करती है। जिससे गुटका स्थिर हो जायेगा तथा उसकी गतिज ऊर्जा शून्य हो जाती है। अब संपीडित स्प्रिग विपरीत दिशा में प्रसारित होता है जिससे गुटका पूर्व गति के विपरीत दिशा में गतिशील होता है। जब गुटका अपनी प्रारस्भिक स्थिति में पहुँचता है तो उसका वेग तथा गतिज ऊर्जा प्रारम्भिक मान के बराबर होते हैं। अतः परिवर्तन के पूर्ण चक्र में गुटके की गतिज ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। इससे स्पष्ट होता है कि स्प्रिग का प्रत्यास्थ बल संरक्षी बल होता है।

(iii) घर्षण बल एवं श्यान बल : यदि क्षैतिज तल चिकना न हो अर्थात् घर्षण युक्त हो या गेंद पर वायु प्रतिरोधी श्यान बल करें तो गुटके या गेंद के प्रारम्भिक अवस्था में लौटकर आने पर उनकी गतिज ऊर्जा परिवर्तित हो जायेगी। स्पष्ट है कि घर्षण बल तथा श्यान बल असंरक्षी बल होते हैं।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 9.
टक्कर के लिए न्यूटन का नियम लिखिए।
उत्तर:
संघट्ट या टक्कर (Collision) :
किन्हीं दो पिण्ड़ों के मध्य अल्प समय के लिए पारस्परिक क्रिया (mutual interaction) का होना जिसके द्वारा पिण्ड़ों के संवेग तथा ऊर्जाएँ बदल जायें, संघट्ट कहलाता हैं अर्थात् “जब एक पिण्ड दूसरे पिण्ड की ओर गति करता है तो समीप आने अथवा अन्योन्य क्रिया के कारण उनकी गति में परिवर्तन होता है तो इस प्रक्रिया को संघट्ट या टक्कर कहते है।”

मुख्य तथ्य-
1. टक्कर में दो पिण्डों का परस्पर सम्पर्क में आना आवश्यक नहीं है। साधारणतः दो स्थूल पिण्ड टक्कर में एक-दूसरे को स्पर्श करते हैं। परन्तु सूक्ष्म कणों की टक्कर में उनके बीच स्पर्श नहीं होता है। उदाहरणार्थ-किसी गेंद तथा बल्ले के बीच टक्कर में स्पर्श होता हैं परन्तु नाभिक द्वारा α-कण के प्रकीर्णन में कोई स्पर्श नहीं होता है।
2. टक्कर की प्रक्रिया में पिणड़ों के रेखीय संवेगों में पुनर्वितरण होता हैं लेकिन कुल संवेग संरक्षित रहता है।
3. टक्कर में कुल ऊर्जा हमेशा संरक्षित रहती है।
4. यदि एक टक्कर में टकराने वाले कण टक्कर से पूर्ण तथा टक्कर के पश्चात् एक ही सरल रेखा के अनुदिश गतिशील हों, तो इसे सम्मुख टक्कर (Head on collision) कहते है। वे टक्कर एक विमीय कहलाती है, जबकि यदि टक्कर करने वाली वस्तुओं के वेग एक रेखा के अनुदिश नहीं होने तथा टक्कर से पूर्व और पश्चात् एक ही तल में स्थित होने पर टक्कर द्विविमीय कहलाती है। इसे तिर्यक टक्कर (Oblique collision) भी कहते हैं।

प्रश्न 10.
किसी वस्तु के संवेग में 50% की वृद्धि करें तो उसकी गतिज ऊर्जा में कितनी वृद्धि हो जायेगी ?
उत्तर:
गतिज ऊर्जा एवं संवेग में सम्बन्ध
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -6

प्रश्न 11.
तिर्यक टक्कर किसे कहते हैं?
उत्तर:
यदि टक्कर करने वाली वस्तुओं के वेग एक रेखा के अनुदिश नहीं होते हैं और टक्कर के पूर्व तथा पश्चात् एक ही तल में होते हैं। तो इस टक्कर को द्विविमीय टक्कर या तिर्यक टक्कर कहते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

प्रश्न 1.
कार्य किसे कहते हैं? परिवर्ती बल द्वारा किया गया कार्य किस प्रकार ज्ञात करते हैं? समझाइये।
उत्तर:
अनुच्छेद 6.2 व 6.5 का अवलोकन कीजिए।
कार्य (Work) :
साधारण भाषा में कार्य शब्द किसी भी क्रिया को व्यक्त करता है जिसमें भौतिक या शारीरिक रूप से कोई कार्य सम्मिलित होता है। भौतिकी में कार्य का अर्थ अलग है। यदि किसी पिण्ड पर बल लगाया जाये और वह पिण्ड बल की दिशा में विस्थापित हो तो कहा जाता है कि कार्य किया गया है।

6.5. परिवर्तो बल के द्वारा किया गया कार्य (Work Done by Variable Force)
परिवर्ती बल की स्थिति में माना बिन्दु P पर बल \(\vec{F}\) द्वारा \(\vec{d} r\) विस्थापन देने में कृत कार्य
\(d W=\vec{F} \cdot \overrightarrow{d r}\)
या dW = Fdr cos θi …….(1)
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -7
यहाँ θi बिन्दु P पर \(\vec{F}\) व \(\vec{d}\) r के मध्य कोण है। \(\vec{d} r \)का मान इतना अत्यल्प है कि इस विस्थापन के लिये \(\vec{F}\) को नियत मान सकते हैं। इस प्रकार अल्प विस्थापन d r के संगत किया गया कार्य d W है। इस प्रकार सम्पूर्ण दूरी \(A \rightarrow B\) के लिये कृत कार्य ज्ञात करने के लिये सम्पूर्ण दूरी को अल्पांशों \(\Delta \overrightarrow{r_1}, \Delta \overrightarrow{r_2} \ldots\). इत्यादि में बाँट लेते हैं। ये अल्पांश इतने अल्प होने चाहिये कि इनके संगत बल को नियत माना जा सके। यदि इन अल्पांशों के संगत बलों के मान क्रमश: \(\vec{F}_1, \vec{F}_2, \vec{F}_3, \ldots\) इत्यादि हों, तो सम्पूर्ण विस्थापन में किया गया कार्य
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -8

प्रश्न 2.
गतिज ऊर्जा किसे कहते हैं? सिद्ध करें कि किसी पिण्ड की गतिज ऊर्जा mp” होती है? कार्य-कर्जा प्रमेय को समझाते हुए इसे व्युत्पन्न कीजिए।
उत्तर;
ऊर्जा एवं ऊर्जा के रूप (Energy and Types of Energy) :
ऊर्जा एक विशेष प्रचलित शब्द है अर्थात् बिना ऊर्जा के कोई भी कार्य करना सम्भव नहीं है। मनुष्य इसे खाना खाकर, दूध पीकर, फल खाकर, फलों एवं सब्जियों का जूस पीकर ग्रहण करता है।
किसी वस्तु में उसकी विशेष स्थिति अथवा गति के कारण कार्य करने की क्षमता पायी जाती है। “वस्तु द्वारा कार्य की कुल क्षमता को ऊर्जा कहते है।’ किसी वस्तु में विद्यमान ऊर्जा का मापन उस कार्य से किया जाता है, जितना कि वह कर सकती है जबकि वह कार्य करने के योग्य न रहे। ऊर्जा कार्य के कुल परिमाण को बताती है।

जब कोई वस्तु या पिण्ड कार्य करता है तो उसकी ऊर्जा घटती हैं। किसी भी ऊर्जा की माप उस कार्य से होती है जो वह शून्य ऊर्जा वाली स्थिति में आने तक करती है। स्पष्ट है कि वस्तु द्वारा किया गया अधिकतम कार्य ही ऊर्जा की माप है।

ऊर्जा के वही मात्रक होते हैं जो कार्य के होते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति में ऊर्जा का मात्रक जूल (J) होता है। ऊर्जा के अन्य मात्रक किलोवार घण्टा kWh तथा इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) होते हैं।
1 kWh = 10³ × 1 Watt × 1 hour = 10³ J.s-1 × 3600 s
या 1 kWh = 3.6 × 106 J
1 eV = 1.6 × 10-19 C × 1 J.C-1
या 1 eV = 1.6 × 10-19 J

कार्य-ऊर्जा प्रमेय (Work-Energy Theorem)
कथन-
” किसी बल द्वारा क्षैतिज तल पर एक वस्तु को विस्थापित करने में कृत कार्य उसकी गतिज ऊर्जा में वृद्धि के बराबर होता है।’ अर्थात्
W = ∆K
नियत बल के लिए कार्य-ऊर्जा प्रमेय-माना कोई कण जिसका द्रव्यमान m है, किसी क्षण प्रारम्भिक वेग \(\vec{u}\) से गतिमान है। अब यदि कोई बल \(\vec{F}\) उस पर गति की दिशा में लगाने से वस्तु का s दूरी तय करने के बाद अन्तिम वेग \(\vec{v}\) हो जाता है तथा वस्तु में उत्पन्न त्वरण \(\vec{a}\) है, तो गति के तृतीय नियम को सदिश रूप से लिखने पर
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -9
अत: किसी वस्तु पर लगाये गये कुल बल द्वारा सम्पन्न कार्य, वस्तु की दो विशिष्ट अवस्थाओं में विद्यमान गतिज ऊर्जाओं के अन्तर के बराबर होता है। यही कार्य-ऊर्जा प्रमेय है। स्पष्ट है कि-
(i) यदि W > 0 तो (Kf – Ki) >0 या Kf > Ki अर्थात् यदि सम्पन्न कार्य धनात्मक है तो अन्तिम गतिज ऊर्जा प्रारम्भिक गतिज ऊर्जा से अधिक होगी।
(ii) यदि W < 0 तो (Kf – Ki) < 0 या Kf < Ki अर्थात् यदि सम्पन्न कार्य ऋणात्मक है तो अन्तिम गतिज ऊर्जा प्रारिम्भक गतिज ऊर्जा से कम होगी।

परिवर्ती बल के अन्तर्गत कार्य ऊर्जा प्रमेय –
गतिज ऊर्जा \(K=\frac{1}{2} m v^2\)
गतिज ऊर्जा में परिवर्तन की दर
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -10
इस प्रकार परिवर्ती बल के लिए कार्य-ऊर्जा प्रमेय सिद्ध होती है। वास्तव में यह न्यूटन के द्वितीय का समालकन रूप है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 3.
ऊर्जा किसे कहते हैं? यांत्रिक ऊर्जा कितने प्रकार की होती है? यांत्रिक ऊर्जा का संरक्षण गुणत्व के अधीन स्वतंत्रतापूर्वक गिरते पिण्ड का उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
ऊर्जा एवं ऊर्जा के रूप (Energy and Types of Energy) :
ऊर्जा एक विशेष प्रचलित शब्द है अर्थात् बिना ऊर्जा के कोई भी कार्य करना सम्भव नहीं है। मनुष्य इसे खाना खाकर, दूध पीकर, फल खाकर, फलों एवं सब्जियों का जूस पीकर ग्रहण करता है।

किसी वस्तु में उसकी विशेष स्थिति अथवा गति के कारण कार्य करने की क्षमता पायी जाती है। “वस्तु द्वारा कार्य की कुल क्षमता को ऊर्जा कहते है।’ किसी वस्तु में विद्यमान ऊर्जा का मापन उस कार्य से किया जाता है, जितना कि वह कर सकती है जबकि वह कार्य करने के योग्य न रहे। ऊर्जा कार्य के कुल परिमाण को बताती है।

जब कोई वस्तु या पिण्ड कार्य करता है तो उसकी ऊर्जा घटती हैं। किसी भी ऊर्जा की माप उस कार्य से होती है जो वह शून्य ऊर्जा वाली स्थिति में आने तक करती है। स्पष्ट है कि वस्तु द्वारा किया गया अधिकतम कार्य ही ऊर्जा की माप है।

ऊर्जा के वही मात्रक होते हैं जो कार्य के होते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति में ऊर्जा का मात्रक जूल (J) होता है। ऊर्जा के अन्य मात्रक किलोवार घण्टा kWh तथा इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) होते हैं।
1 kWh = 10³ × 1 Watt × 1 hour = 10³ J.s-1 × 3600 s
या 1 kWh = 3.6 × 106 J
1 eV = 1.6 × 10-19 C × 1 J.C-1
या 1 eV = 1.6 × 10-19 J

यान्त्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Mechanical Energy) :
संरक्षी बलों (Conservative forces) की उपस्थिति में किसी पिण्ड अथवा निकाय की यात्त्रिक ऊर्जा अर्थात् गतिज ऊर्जा एवं स्थितिज ऊर्जा का योग नियत रहता है। यही यान्त्रिक ऊर्जा के संरक्षण का नियम है।
हम जानते हैं कि किसी निकाय पर संरक्षी बल लगाने पर उसके विन्यास में परिवर्तन होता है और इस निकाय की गतिज ऊर्जा ∆K से बदल जाती है। संरक्षी बल की परिभाषा के अनुसार निकाय की स्थितिज ऊर्जा में भी बराबर व विपरीत मात्रा में परिवर्तन होना चाहिए, जिससे कि दोनों परिवर्तनों का योग शून्य हो जाये अर्थात्
∆U = -∆K
या ∆U + ∆K = 0
या U + K = नियतांक ……………(1)
अत: संरक्षी बलों की उपस्थिति में किसी निकाय की गतिज ऊर्जा K में परिवर्तन, निकाय की स्थितिज ऊर्जा U में बराबर व विपरीत परिवर्तन के तुल्य होता है और गतिज एवं स्थितिज ऊर्जा का योग सदैव नियत रहता है।

यह नियम असंरक्षीय बल (अर्थात् क्षयकारी बल) जैसे-घर्षण बल के लिए लागू नहीं होता है क्योंकि असंरक्षी बलों (Non conservative forces) के कारण यान्त्रिक ऊर्जा का कुछ भाग ध्वनि, ऊष्मा, प्रकाश या अन्य प्रकार की ऊर्जाओं में परिवर्तित हो जाता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 4.
स्प्रिंग नियतांक वाली एक प्रत्यास्थ स्प्रिंग को x दूरी तक संपीडित किया जाता है, दशांइये कि स्थितिज ऊर्जा \(\frac{1}{2}\)Kx² होती है।
उत्तर:
यान्त्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Mechanical Energy) :
संरक्षी बलों (Conservative forces) की उपस्थिति में किसी पिण्ड अथवा निकाय की यात्त्रिक ऊर्जा अर्थात् गतिज ऊर्जा एवं स्थितिज ऊर्जा का योग नियत रहता है। यही यान्त्रिक ऊर्जा के संरक्षण का नियम है।
हम जानते हैं कि किसी निकाय पर संरक्षी बल लगाने पर उसके विन्यास में परिवर्तन होता है और इस निकाय की गतिज ऊर्जा ∆K से बदल जाती है। संरक्षी बल की परिभाषा के अनुसार निकाय की स्थितिज ऊर्जा में भी बराबर व विपरीत मात्रा में परिवर्तन होना चाहिए, जिससे कि दोनों परिवर्तनों का योग शून्य हो जाये अर्थात्
∆U = -∆K
या ∆U + ∆K = 0
या U + K = नियतांक ……………(1)
अत: संरक्षी बलों की उपस्थिति में किसी निकाय की गतिज ऊर्जा K में परिवर्तन, निकाय की स्थितिज ऊर्जा U में बराबर व विपरीत परिवर्तन के तुल्य होता है और गतिज एवं स्थितिज ऊर्जा का योग सदैव नियत रहता है।

यह नियम असंरक्षीय बल (अर्थात् क्षयकारी बल) जैसे-घर्षण बल के लिए लागू नहीं होता है क्योंकि असंरक्षी बलों (Non conservative forces) के कारण यान्त्रिक ऊर्जा का कुछ भाग ध्वनि, ऊष्मा, प्रकाश या अन्य प्रकार की ऊर्जाओं में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 5.
सिद्ध कीजिए कि दो समान द्रव्यमान की एक ही रेखा में गतिशील गेंदों के मध्य होने वाली प्रत्यास्थ टक्कर में गेंदे अपने वेगों को परस्पर बदल लेती हैं।
उत्तर:
एक विमीय प्रत्यास्थ टक्कर (One Dimensional Elastic Collision) :
माना चित्र में m1 व m2 द्रव्यमान के दो पिण्ड क्रमशः \(\overrightarrow{u_1}\) व \overrightarrow{u_2}[/latex] नियत वेगों \(\left(\vec{u}>\overrightarrow{u_2}\right)\) से एक सरल रेखा में चलते हुए प्रत्यास्थ रूप से टकराते हैं और टक्कर के बाद के उसी दिशा में क्रमश: \(\overrightarrow{v_1}\) व \(\overrightarrow{v_2}\) वेग से गति करते हैं।

प्रत्यास्थ टक्कर में ऊर्जा एवं संवेग दोनों संरक्षित रहते हैं। अतः संवेग संरक्षण के नियम से-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -11
इस प्रकार एक विमीय सम्मुख प्रत्यास्थ टक्कर में टक्कर के पूर्व कणों के समीप आने का आपेक्षिक वेग (u1 – u2) टक्कर के पश्चात् उनके दूर जाने के आपेक्षिक वेग (v2 – v1) के बराबर होता है अत: इस टक्कर के लिए प्रत्यावस्थान गुणांक
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -12

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 6.
दो विमीय टक्कर का वर्णन कीजिए। इस प्रकार की टक्कर में कणों के अन्तिम वेग किस प्रकार ज्ञात किये जाते हैं?
उत्तर:
द्विविमीय टक्कर अथवा तिर्यक टक्कर (Two Dimensional Collision or Oblique Collision) :
टक्कर के पश्चात् यदि टकराने वाली वस्तुओं के वेग एक रेखा के अनुदिश नहीं रहते तथा टक्कर के पूर्व व पश्चात् उनके तल समान रहते हैं तो इस प्रकार की टक्कर को द्विविमीय टक्कर कहते हैं। इसे तिर्यक टक्कर (oblique collision) भी कहते हैं।
चित्र में माना m1 द्रव्यमान का पिण्ड u1 वेग से चलते हुये m2 द्रव्यमान के स्थिर पिण्ड (u2 = 0) से टकराता है और टक्कर के पश्चात् वे मूल दिशा से क्रमशः θ व ϕ कोणों पर समान तल में गति करते हैं। अतः सदिश निरुपण में
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -13

प्रश्न 7.
बल विस्थापन ग्राफ की सहायता से कार्य का आंकलन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
परिवर्तो बल के द्वारा किया गया कार्य (Work Done by Variable Force)
परिवर्ती बल की स्थिति में माना बिन्दु P पर बल \(\vec{F}\) द्वारा \(\vec{d} r\) विस्थापन देने में कृत कार्य
\(d W=\vec{F} \cdot \overrightarrow{d r}\)
या dW = Fdr cos θi …….(1)
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -7.1
यहाँ θi बिन्दु P पर \(\vec{F}\) व \(\vec{d}\) r के मध्य कोण है। \(\vec{d} r \)का मान इतना अत्यल्प है कि इस विस्थापन के लिये \(\vec{F}\) को नियत मान सकते हैं। इस प्रकार अल्प विस्थापन d r के संगत किया गया कार्य d W है। इस प्रकार सम्पूर्ण दूरी \(A \rightarrow B\) के लिये कृत कार्य ज्ञात करने के लिये सम्पूर्ण दूरी को अल्पांशों \(\Delta \overrightarrow{r_1}, \Delta \overrightarrow{r_2} \ldots\). इत्यादि में बाँट लेते हैं। ये अल्पांश इतने अल्प होने चाहिये कि इनके संगत बल को नियत माना जा सके। यदि इन अल्पांशों के संगत बलों के मान क्रमश: \(\vec{F}_1, \vec{F}_2, \vec{F}_3, \ldots\) इत्यादि हों, तो सम्पूर्ण विस्थापन में किया गया कार्य
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -8.1

प्रश्न 8.
यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण नियम क्या है? प्रत्यास्थ स्प्रिंग लोलक का उदाहरण देकर समझाइये।
उत्तर:
यान्त्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Mechanical Energy) :
संरक्षी बलों (Conservative forces) की उपस्थिति में किसी पिण्ड अथवा निकाय की यात्त्रिक ऊर्जा अर्थात् गतिज ऊर्जा एवं स्थितिज ऊर्जा का योग नियत रहता है। यही यान्त्रिक ऊर्जा के संरक्षण का नियम है।

हम जानते हैं कि किसी निकाय पर संरक्षी बल लगाने पर उसके विन्यास में परिवर्तन होता है और इस निकाय की गतिज ऊर्जा ∆K से बदल जाती है। संरक्षी बल की परिभाषा के अनुसार निकाय की स्थितिज ऊर्जा में भी बराबर व विपरीत मात्रा में परिवर्तन होना चाहिए, जिससे कि दोनों परिवर्तनों का योग शून्य हो जाये अर्थात्
∆U = -∆K
या ∆U + ∆K = 0
या U + K = नियतांक ……………(1)
अत: संरक्षी बलों की उपस्थिति में किसी निकाय की गतिज ऊर्जा K में परिवर्तन, निकाय की स्थितिज ऊर्जा U में बराबर व विपरीत परिवर्तन के तुल्य होता है और गतिज एवं स्थितिज ऊर्जा का योग सदैव नियत रहता है।

(B) प्रत्यास्थ स्प्रिंग में यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण (Mechanical energy consevnation in elastic spring):
स्प्रिग बल भी संरक्षी परिवर्ती बल का उदाहरण है। चित्र में एक स्प्रिग जिसका बल नियतांक k है, दर्शाया है जिसका दूसरा सिरा किसी दृढ़ दीवार से जुड़ा है। स्प्रिग को द्रव्यमान रहित माना जा सकता है। स्प्रिग के लिए आदर्श स्थिति में बल का नियम निम्न है-

इसे हुक का नियम भी कहते हैं।
(i) जब गुटके को बाहर की ओर खींचते हैं तो विस्थापन x है। स्प्रिग बल द्वारा किया गया कार्य
\(W=\int_0^x F_x d x=-\int_0^x k x d x\)
\(W=-\frac{k x^2}{2}\)
यदि स्प्रिग को संपीडित किया जाता है तब भी उपर्युक्त व्यंजक सत्य है। परन्तु इस स्थिति में स्प्रिग बल धनात्मक होता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -14
किस स्प्रिग के गुटके को xi से पुन: xi तक आने दिया जाए तो किया गया कार्य
\(W=-\int_{x_i}^{x_i} k x d x=0\)
अर्थात् पूर्ण चक्र में किया गया कार्य शून्य होगा। अत: स्प्रिग बल एक संरक्षी बल है।
जब स्प्रिग को x दूरी संपीडित किया जाता है तो स्थितिज ऊर्जा
\(U_{(x)}=\frac{1}{2} k x^2\)
यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण के नियम से गुटके की चाल v हो तो गतिज ऊर्जा साम्यावस्था (xm = 0) पर अधिकतम होगी।
\(K=\frac{1}{2} m v_m^2=\frac{1}{2} k x_m^2\)

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 9.
संरक्षी व असंरक्षी बलों से क्या अभिप्राय है? समझाकर लिखिए।
उत्तर:
संरक्षी तथा असंरक्षी बल (Conservative and Non-conservative Forces) :
प्रथम परिभाषा-जब किसी कण पर एक या एक एक से अधिक-
बल इस प्रकार कार्य करते हैं कि कण की अपनी प्रारम्भिक अवस्था में लौटने पर वही गतिज ऊर्जा रहती है, जो प्रारिम्भक अवस्था में थी, तो ये बल संरक्षी बल कहलाते है। गतिज ऊर्जा के मान में कमी होने पर बलों को असंरक्षी बल कहते हैं।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -5
द्वितीय परिभाषा : वे बल जिनके द्वारा पिण्ड को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक विस्थापित करने में किया गया कार्य पथ पर निर्भर नहीं करता है, संरक्षी बल कहलाते है। अर्थात् पथों 1,2 व 3 के लिये
W1 = W2 = W3
उदाहरणार्थ – गुरुत्वीय बल, प्रत्यास्थ बल आदि।
इसके विपरीत जिन बलों के प्रभाव में वस्तुऐं एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक विस्थापित करनें में कृत कार्य पथ पर निर्भर करता है, असंरक्षी बल कहलाते हैं अर्थात् इनके लिए
W1 ≠ W2 ≠ W3
उदाहरण के लिए – घर्षण बल, श्यान बल आदि।

तृतीय परिभाषा : किसी बल को किसी कण पर लगाने से एक एक पूर्ण चक्कर में बल द्वारा सम्पन्न कार्य शून्य हो तो बल को संरक्षी बल कहते हैं। यदि कुल कार्य का परिमाण शून्य नहीं है तो बल को असंरक्षी कहते हैं।

संरक्षी तथा असंरक्षी बलों के उदाहरण
(i) गुरुत्वीय बल संरक्षी बल है : यदि एक गेंद को पृथ्वी की सतह पर कुछ गतिज ऊर्जा देकर ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर फेंका जाए तो कुछ समय पश्चात वह पुन: पृथ्वी पर लौट आती है तथा उसकी गतिज ऊर्जा वही होती है जितनी ऊपर की ओर फेकते समय थी।

(ii) स्प्र्रग का प्रत्यास्थ बल संरक्षी बल है : माना पिण्ड द्रव्यमान रहित स्प्रिग के सिरे से जुड़ा है। स्प्रिग का दूसरा सिरा एक दीवार से जुड़ा है। स्प्रिग तथा गुटके का यह निकाय एक घर्षण रहित चिकने क्षैतिज धरातल पर रखा है। गुर्युके को दीवार की ओर कुछ विस्थापित करने पर स्प्रिग संपीडित होती है। स्प्रिग प्रत्यास्थता के कारण गुटके के विस्थापन के विपरीत दिशा में एक प्रत्यानयन बल आरोपित करती है। जिससे गुटका स्थिर हो जायेगा तथा उसकी गतिज ऊर्जा शून्य हो जाती है। अब संपीडित स्प्रिग विपरीत दिशा में प्रसारित होता है जिससे गुटका पूर्व गति के विपरीत दिशा में गतिशील होता है। जब गुटका अपनी प्रारस्भिक स्थिति में पहुँचता है तो उसका वेग तथा गतिज ऊर्जा प्रारम्भिक मान के बराबर होते हैं। अतः परिवर्तन के पूर्ण चक्र में गुटके की गतिज ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। इससे स्पष्ट होता है कि स्प्रिग का प्रत्यास्थ बल संरक्षी बल होता है।

(iii) घर्षण बल एवं श्यान बल : यदि क्षैतिज तल चिकना न हो अर्थात् घर्षण युक्त हो या गेंद पर वायु प्रतिरोधी श्यान बल करें तो गुटके या गेंद के प्रारम्भिक अवस्था में लौटकर आने पर उनकी गतिज ऊर्जा परिवर्तित हो जायेगी। स्पष्ट है कि घर्षण बल तथा श्यान बल असंरक्षी बल होते हैं।

प्रश्न 10.
शक्ति से आप क्या समझते हैं? इसके मात्रक की परिभाषा कीजिए।
उत्तर:
शक्ति (Power) :
“किसी मशीन या यन्त्र द्वारा कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं।”
यदि यन्त्र द्वारा ∆t समय में कृत कार्य ∆W है, तो औसत शक्ति
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -15
अर्थात् बल तथा वेग का अदिश गुणनफल शक्ति प्रदान करता है। यदि θ = 0° अर्थात् बल एवं वेग समान दिशा में है, तो
cos θ = 1
∴ P = F.v
मात्रक एवं विमीय सूत्र-मात्रक :
∵ P = F.v = \(\frac{W}{t}\)
∴ P का मात्रक = \(\frac{J}{s}\) = वाट (Watt)
यदि W = 1 J, t = 1 s, तो P = 1 वाट
अर्थात् यदि कोई मशीन 1 s में 1 J कार्य करती है तो उसकी शक्ति 1 वाट होती है।
विद्युत् उपकरणों में शक्ति किलोवाट (kwatt) में नापी जाती है।
∴ 1 kW = 1000 Js-1 या वाट
व्यवहारिक मात्रक अश्वशक्ति (H.P.) = 746 वाट
विमीय सूत्र ∵ P = \(\frac{W}{t}\)
∴ P का विमीय सूत्र = \(\frac{\left[\mathrm{M}^1 \mathrm{~L}^2 \mathrm{~T}^{-2}\right]}{\left[\mathrm{T}^1\right]}=\left[\mathrm{M}^1 \mathrm{~L}^2 \mathrm{~T}^{-3}\right]\)

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

प्रश्न 11.
प्रत्यावस्थान गुणांक से क्या अभिप्राय है? विभिन्न प्रकार की टक्करों के लिए इसके मानों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
प्रत्यावस्थान गुणांक (Coefficient of Restitution):
“न्यूटन के अनुसार टक्कर के पश्चात् कणों के दूर आने आपेक्षिक वेग तथा टक्कर के पूर्व उनके समीप आने के आपेक्षिक वे का अनुपात नियत रहता है। यह नियतांक प्रत्यावस्थान गुणां कहलाता है।” इसे e से व्यक्त करते हैं।
अत: \(e=\frac{v_2-v_1}{u_1-u_2}\)
या \(\left(v_2-v_1\right)=e\left(u_1-u_2\right)\)
जहाँ v2 – v1= टक्कर के पश्चात् दूर जाने का आपेक्षिक वेग u1 – u1 = टक्कर के पूर्व समीप आने का आपेक्षिक वेग
e का मान शून्य से 1 के मध्य होता है अर्थात् 0 ≤ e ≤ 1

e का मान के आधार पर टक्करों के प्रकार-

  • प्रत्यास्थ टक्कर के लिए e = 1
  • अप्रत्यास्थ टक्कर के लिए 0 < e < 1
  • पूर्ण अप्रत्यास्थ टक्कर के लिए e = 0

सुमेलन सम्बन्धित प्रश्न (Matrix Match Type Questions)

प्रश्न 1.
स्तम्भ I में कुछ राशियाँ एवं स्तम्भ II में उनके दिये गये हैं। स्तम्भ I को स्तम्भ II से सुमेलित कीजिए।

स्तम्भ – Iस्तम्भ – II
(A) किसी बल द्वारा कृत कार्य(p) शून्य
(B) गतिज ऊर्जा एवं संवेग में सम्बन्ध(q) 1
(C) प्रत्यास्थ टक्कर के लिए प्रत्यावस्थान गुणांक का मान(r) p = √2mk
(D) पूर्णतः अप्रत्यास्थ टक्कर के लिए प्रत्यावस्थान गुणांक का मान(s) \(\vec{F} \cdot \vec{s}\)
(t) \(\int_{x_1}^{x_2} F d x\)

उत्तर:

स्तम्भ – Iस्तम्भ – II
(A) किसी बल द्वारा कृत कार्य(s) \(\vec{F} \cdot \vec{s}\), (t) \(\int_{x_1}^{x_2} F d x\)
(B) गतिज ऊर्जा एवं संवेग में सम्बन्ध(r) p = √2mk
(C) प्रत्यास्थ टक्कर के लिए प्रत्यावस्थान गुणांक का मान(q) 1
(D) पूर्णतः अप्रत्यास्थ टक्कर के लिए प्रत्यावस्थान गुणांक का मान(p) शून्य

आंकिक प्रश्न (Numerical Questions )

कार्य पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी निकाय पर तीन बल है \(\vec{F}_1=(2 \hat{i}+3 \hat{j}+4 \hat{k})\); \(\vec{F}_2=(\hat{i}+\hat{j}+\hat{k})\) तथा \(\vec{F}_3=(3 \hat{i}-2 \hat{j}-\hat{k})\) एक ही दिशा में कार्य कर रहे हैं। ये यल निकाय को बिन्दु (2, 3, 6) से बिन्दु (5, 3, 8) तक विस्थापित कर देते हैं। इस स्थिति में बल द्वारा किये गये कार्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
26 मात्रक

प्रश्न 2.
नियत बल के अन्तर्गत गतिमान एक कण के विस्थापन तथा समय के बीच सम्बन्ध √x + 3 है, जहाँ x मीटर में एवं सेकण्ड में है। ज्ञात कीजिए-
(i) कण का उस क्षण विस्थापन जब इसका वेग शून्य है,
(ii) पहले 65 में बल द्वारा किया गया कार्य।
उत्तर:
(i) शून्य
(ii) शून्य

प्रश्न 3.
एक स्प्रिंग जिसका बल नियतांक है, हुक के नियम का पालन करती है। इसको मूल लम्बाई से 10 cm खींचने में 4 जूल कार्य की आवश्यकता होती है। गणना करें-
(i) A का मान,
(ii) इसे अतिरिक्त 10 cm लम्बाई तक खींचने में कृत कार्य।
उत्तर:
(i) 800 Nmal,
(ii) 123

प्रश्न 4.
एक 6 kg का पत्थर जिसका घनत्व 2g .cm-3 है, पानी में डूबा हुआ है। इसे पानी के अन्दर 4m गहराई से 1 m की गहराई तक उठाने में किये गये कार्य की गणना कीजिए ।
उत्तर:
90 J

ऊर्जा पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 5.
चित्र में ABC एक चिकना वक्रीय पथ है जिसका 8 से आगे का भाग त्रिज्या के उर्ध्व वृत्त के रूप में है। इस पथ पर एक गेंद को किस न्यूनतम ऊँचाई से छोड़ा जाये कि वह पथ के सम्पर्क में रहते हुए उच्चतम बिन्दु C को पार कर ले?
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति -16
उत्तर:
h = (\(\frac{5}{2}\)) r

प्रश्न 6.
एक गेंद 10m की ऊंचाई से प्रारम्भिक वेग μ0 से नीचे की ओर फेंकी जाती है। यह पृथ्वी से टकराने पर 50% ऊर्जा खो देती है। तथा फिर उसी ऊँचाई तक उठती है। ज्ञात कीजिए-
(i) प्रारम्भिक वेग μ0
(ii) यदि प्रारम्भिक स्थिति नीचे न होकर ऊपर को हो तो पृथ्वी से टकराने के बाद गेंद कितनी ऊपर उठेगी?
उत्तर:
(i) 14 ms-1
(ii) 10 m

प्रश्न 7.
एक 50 kg भार का व्यक्ति एक 15 kg भार की वस्तु को अपने सिर पर उठाता है। यदि वह 20 m की दूरी तय करता है, तो उसके द्वारा किया गया कार्य ज्ञात कीजिए-
(a) क्षैतिज तल पर;
(b) 5 में 1 से झुके हुए तल पर [ g = 10 ms-2]
उत्तर:
(a) शून्य
(b) 2600 J

शक्ति पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 8.
एक पेट्रोल चालित पानी का पम्प, 30m गहराई से 0.50m³ min-1 की दर से पानी खींचता है। यदि पम्प की दक्षता 70% है, तो इंजन द्वारा जनित शक्ति ज्ञात कीजिए। (g = 10 ms-2 तथा पानी का घनत्व 10³ kg ):
उत्तर:
3500 वाट

प्रश्न 9.
एक ट्यूबवेल प्रति मिनट 2400 kg पानी खींचता है। यदि पाइप से पानी 3 ms-1 के वेग से बाहर निकलता है तो पम्प की शक्ति ज्ञात कीजिए 10 घण्टे में पम्प कितना कार्य करता है? (g = 10 ms-2 )।
उत्तर:
180 W; 6.48 × 106 J

प्रश्न 10.
एक मोटर वोट 36 km hr-1 की नियत चाल से गतिशील है। यदि नाव की गति के विरुद्ध प्रतिरोध 4000 N है, तो इंजन की शक्ति ज्ञात कीजिए ।
उत्तर:
40 kW

संघट्ट पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 11.
10 kg द्रव्यमान के एक पिण्ड की जिसका वेग 5ms-1 है। एक अन्य 10 kg द्रव्यमान के अन्य पिण्ड से जो विरामावस्था में है, सम्मुख प्रत्यास्थी टक्कर होती है। टक्कर के बाद दोनों पिण्डों के वेग ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
v1 = 0, v2 = 5 ms-1

प्रश्न 12.
एक प्रोटॉन 500 ms-1 के वेग से गति करते हुए दूसरे प्रोटॉन से जो विरामावस्था में है, प्रत्यास्थ संघट्ट करता है। संघ के पश्चात् पहला प्रोटॉन अपनी प्रारम्भिक गति की दिशा से 60° कोण पर प्रकीर्णित हो जाता है। दूसरे प्रोटॉन की संघट्ट के बाद गति की दिशा क्या होगी ? संघट्ट के पश्चात् दोनों प्राटोंनों की चाल क्या होगी ?
उत्तर:
प्रथम प्रोटॉन की प्रारम्भिक गति की दिशा से 30° कोण पर; 250 ms-1 व 433 ms-1

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HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन

Haryana State Board HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन

प्रश्न 1.
हाइड्रोजन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में इसकी स्थिति को युक्तिसंगत ठहराइए।
उत्तर:
हाइड्रोजन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s1 होता है। आवर्त सारणी में इसकी स्थिति अनिश्चित है क्योंक यह क्षार धातुओं तथा हैलोजन दोनों के साथ समानताएँ प्रदर्शित करती है।
क्षार धातु से समानता – हाइड्रोजन तथा क्षार धातुओं दोनों के बाह्यतम कोश में एक s इलेक्ट्रॉन होता है।
H – 1s1
Li – 1s2, 2s1
Na – 1s2, 2s2 2p6, 3s1
K – 1s2, 2s2 2p6, 3s23p6, 4s1
हैलोजन से समानता – अक्रिय गैस की स्थायी संरचना प्राप्त करने के लिए हाइड्रोजन तथा हैलोजन दोनों को ही एक-एक इलेक्ट्रॉन की आवश्यकता होती है।
H – 1s1
F – 1s2, 2s2, 2p5
Cl – 1s2, 2s22p6, 3s23p5
निष्कर्ष – इलेक्ट्रॉंनिक विन्यास के आधार पर हम सिद्ध कर सकते हैं कि यह ‘हाइड्रोजन’ क्षार धातुओं तथा हैलोजन दोनों के साथ समानता प्रदर्शित करती है अतः इसे क्षार धातुओं के साथ ‘IA’ ग्रुप में रखना तर्क संगत नहीं है।

प्रश्न 2. हाइड्रोजन के समस्थानिकों के नाम लिखिए तथा बताइए कि इन समस्थानिकों का द्रव्यमान अनुपात क्या है ?
उत्तर:
हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक होते हैं।
(i) प्रोटियम (1H1)
(ii) ड्यूटीरियम (1H2)
(iii) ट्राइटियम (1H3)
इन समस्थानिकों का द्रव्यमान अनुपात निम्नवत् है।

प्रश्न 3.
सामान्य परिस्थितियों में हाइड्रोजन एकल परमाण्विक की अपेक्षा द्विपरमाण्विक रूप में क्यों पाया जाता है ?
उत्तर:
एकल परमाण्विक रूप में हाइड्रोजन परमाणु के K-कोश में केवल 1 इलेक्ट्रॉन होता है क्योंकि इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (1s1) होता है। जबकि द्विपरमाण्विक रूप में इसका K-कोश पूर्ण रूप से भर जाता है, इसका तात्पर्य H2 के रूप में यह उत्कृष्ट गैस (हीलियम) का विन्यास प्राप्त कर लेती है इसलिए द्विपरमाण्विक रूप स्थायी होता है जबकि एकल परमाण्विक रूप अस्थायी होता है।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन

प्रश्न 4.
‘कोल गैसीकरण’ से प्राप्त हाइड्रोजन का उत्पादन कैसे बढ़ाया जा सकता है ?
उत्तर:
कोल से ‘संश्लेषण गैस’ या ‘सिन्नैस’ का उत्पादन करने की प्रक्रिया को ‘कोलगैसीकरण’ (coalgasification) कहते हैं-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 1
सिन्गैस में उपस्थित कार्बन मोनोक्साइड को आयरन क्रोमेट उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप से अभिकृत कराने पर हाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 2
यह भाप-अंगार गैस सृति अभिक्रिया कहलाती है।

प्रश्न 5.
विद्युत-अपघटन विधि द्वारा हाइड्रोजन वृहद् स्तर पर किस प्रकार बनाई जा सकती है ? इस प्रक्रम में विद्युत-अपघट्य की क्या भूमिका है ?
उत्तर:
विद्युत-अपघटन विधि द्वारा हाइड्रोजन का निर्माण (Formation of Dihydrogen by electrolytic process)-सर्वप्रथम शुद्ध जल में अम्ल तथा क्षारक की कुछ बूँदें मिलाकर इसे विद्युत का सुचालक बना लेते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 3
अब इसका विद्युत-अपघटन ( वोल्टामीटर में) करते हैं। जल के विद्युत-अपघटन से ऋणोद (कैथोड) पर हाइड्रोजन और धनोद (ऐनोड) पर ऑक्सीजन (सह-उत्पाद के रूप में) एकत्रित होती है। ऐनोड तथा कैथोड को एक ऐस्बेस्टस डायफ्राम की सहायता से पृथक्कृत कर दिया जाता है जो मुक्त होने वाली हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन को मिश्रित नहीं होने देता।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 4
इस प्रकार प्राप्त डाई-हाइड्रोजन पर्याप्त रूप से शुद्ध होती है। विद्युत-अपघट्य की भूमिका (Role of electrolyte) – शुद्ध जल विद्युत-अपघट्य नहीं होता और न ही विद्युत का चालक होता है। शुद्ध जल में अम्ल या क्षार की कुछ मात्रा मिलाकर इसे विद्युत-अपघट्य बनाया जाता है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित समीकरणों को पूरा कीजिए-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 5
उत्तर:
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 6

प्रश्न 7.
डाइहाइड्रोजन की अभिक्रियाशंलता के पदों में H – H बन्ध की उच्च एन्थैल्पी के परिणामों की विवेचना कीजिए ?
उत्तर:
डाइहाइड्रोजन की अभिक्रियाशीलता के पदों में H – H बन्ध की उच्च एन्थैल्पी के परिणामों की विवेचना निम्न प्रकार की जा सकती है। H – H बन्ध की बन्ध एन्थैल्पी काफी उच्च होती है जो किसी भी तत्व के दो परमाणुओं के एकल बन्ध के लिए अधिकतम है। इस उच्च बन्ध एन्थैल्पी का कारण हाइड्रोजन का लघु परमाण्वीय आकार तथा लघु बन्ध लम्बाई है। इस कारण से हाइड्रोजन का इसके परमाणुओं में वियोजन केवल 2000K के ऊपर लगभग 0.081% ही होता है जो 5000K पर बढ़कर 95.5% तक हो जाता है। अत: उच्च H – H बन्ध एन्थैल्पी के कारण कक्ष ताप पर H2 अपेक्षाकृत निष्क्रिय हैं। यह केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही रासायनिक संयोग करता है।

प्रश्न 8.
हाइड्रोजन के (i) इलेक्ट्रॉन न्यून (ii) इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध तथा (iii) इलेक्ट्रॉन समृद्ध यौगिकों से आप क्या समझते हैं ? उदाहरण द्वारा समझाइये।
उत्तर:
(i) इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक-ये सह-संयोजक हाइड्राइड का प्रकार है। इस प्रकार के हाइड्राइड में, लुइस संरचना लिखने के लिए इलेक्ट्रॉनों की संख्या अपर्याप्त होती है। ये आवर्त सारणी के 13 वें वर्ग के सभी तत्वों द्वारा बनाये जाते हैं। ये लुइस अम्ल की भाँति कार्य करते है। ये इलेक्ट्रॉन ग्राही होते हैं।
उदाहरण- BH3, AlH3 आदि। ये अधिकतर बहुलक के रूप में पाये जाते हैं। जैसे B2H6, B4 H10, (AlH3)n आदि।

(ii) इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध यौगिक-इस प्रकार के हाइड्राइड में परम्परागत लुइस संरचना के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉन की संख्या होती है। आवर्त सारणी के 14 वें वर्ग के सभी तत्व इस प्रकार के यौगिक बनाते हैं। इनकी ज्यामिती चतुष्फलकीय होती है।
उदाहरण- CH4, SiH4, GeH4 आदि ।

(iii) इलेक्ट्रॉन समृद्ध यौगिक-इस प्रकार के हाइड्राइड में इलेक्ट्रॉन आधिक्य एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म के रूप में उपस्थित रहते हैं। आवर्त सारणी में 15 वें से 17 वें वर्ग तक के सभी तत्व इस प्रकार के यौगिक बनाते हैं।
उदाहरण-
NH3, PH3, AsH3 एक एकाकी इलेक्ट्रान युग्म होता हैं।
H2O, H2S, H2Se दो एकाकी इलेक्ट्रान युग्म होते हैं।
HF, HCl, HBr, HI तीन एकाकी इलेक्ट्रान युग्म होते हैं।

ये लुइस क्षार की भाँति कार्य करते हैं। ये इलेक्ट्रॉन दाता होते हैं। उच्च विद्युत ऋणात्मकता वाले परमाणु जैसे- N,O तथा F के हाइड्राइड पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होने के कारण अणुओं में हाइड्रोजन बंध बनता है जिसके कारण अणुओं में संगुणन होता है।

प्रश्न 9.
संरचना एवं रासायनिक अभिक्रियाओं के आधार पर बताइए कि इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड के कौन-कौन से अभिलक्षण होते हैं ?
उत्तर:
(i) वे आण्विक-हाइड्राइड जिनमें केन्द्रीय परमाणु पर अष्टक नहीं होता है, इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड कहलाते हैं। वर्ग 13 के तत्वों के हाइड्राइड; जैसे – B2H6, (AlH3)n आदि, इलेक्ट्रॉन न्यून अणु होते हैं तथा इसलिए किसी दाता अणु; जैसे- NH3, PF3, CO आदि से इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखते हैं तथा योगात्मक यौगिक बनाते हैं। इन योगात्मक यौगिकों के निर्माण में इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड लुइस अम्लों की भाँति तथा दाता अणु लुइस क्षारकों की भाँति व्यवहार करते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 7
(ii) बोरोंन के हाइड्राइड पाना के साथ क्रिया करक हाइड्राजन मुक्त करते हैं।
B2H6 + 6H2O → B(OH)3 + 6H2

(iii) क्योंकि इनमें सामान्यतः सहसंयोजक बन्ध बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं अतः ये संगुणन करते हैं और बहुलक के रूप में पाये जाते हैं। जैसे- B2H6, B4H10, (AlH3)n आदि।

(iv) इलेक्ट्रॉन न्यून होने के कारण इसकी क्रियाशीलता अधिक होती है क्योंकि ये अपनी इलेक्ट्रॉन न्यूनता को दूर करने के लिए जल्द से जल्द अन्य यौगिक के साथ अभिक्रिया कर लेते हैं।
उदाहरण –
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 8

प्रश्न 10.
क्या आप आशा करते हैं कि (CnH2n + 2) कार्बनिक हाइड्राइड लुइस अम्ल या क्षार की भाँति कार्य करेंगे ? अपने उत्तर को युक्ति संगत ठहराइए।
उत्तर:
CnH2n + 2 कार्बनिक हाइड्राइड इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध प्रकार के हाइड्राइड होते हैं अर्थात् इनमें इलेक्ट्रॉन की संख्या उतनी ही होती है जितनी कि इन्हें सह-संयोजक बन्ध बनाने के लिए चाहिए होती है। अतः ये न तो इलेक्ट्रॉन को ग्रहण करते हैं और न ही उन्हें त्यागते हैं। अर्थात ये न तो लुइस अम्ल की तरह न ही लुइस क्षार की भाँति कार्य करते हैं।

प्रश्न 11.
अरससमीकरणमितीय हाइड्राइड से आप क्या समझते हैं ? क्या आप क्षारीय धातुओं से ऐसे यौगिकों की आशा करते हैं ? अपने उत्तर को न्याय संगत ठहराइए।
उत्तर:
अरससमीकरणमितीय हाइड्राइड-संक्रमण तथा अन्त: संक्रमण धातुएँ हाइड्रोजन को अपने जालक के अन्तराकोश में अवशोषित करके इस प्रकार के हाइड्राइड बनाती है। इनमें धातु और हाइड्रोजन का अनुपात समानुपात न होकर भिन्नात्मक होता है। इनका भिन्नात्मक अनुपात ताप तथा दाब के साथ बदलता रहता है।

क्षार धातुएँ प्रबल अपचायक होती हैं। ये अपने इलेक्ट्रॉन को हाइड्रोजन परमाणु को देकर H आयन बनाती हैं। क्षार धातुओं के हाइड्राइड आयनिक होते हैं। क्योंकि ये क्षार धातुओं से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके उस आयन के साथ आयनिक बन्ध बनाते हैं। अर्थात् क्षार धातुएँ अरससमीकरणमितीय हाइड्राइड नहीं बनातीं। ये आयनिक हाइड्राइड अर्थात् रससमीकरणमितीय यौगिक बनाती हैं।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन

प्रश्न 12.
हाइड्रोजन भण्डारण के लिए धात्विक हाइड्राइड किस प्रकार उपयोगी हैं ? समझाइए।
उत्तर:
हाइड्रोजन के उच्च ज्वलनशील होने के कारण इसका भण्डारण करना एक कठिनाई का विषय है। इस कठिनाई का एक हल यह है कि हाइड्रोजन का भण्डारण इसके मैग्नीशियम, मैग्नीशियम-निकिल तथा आयरन-टाइटेनियम मिश्र-धातु के साथ बने यौगिक के टैंक (tank) के रूप में किया जाए। ये धातु मिश्र-धातु छिद्रों की भाँति हाइड्रोजन की वृहद् मात्रा को अवशोषित कर लेती हैं तथा धात्विक हाइड्राइड बनाती हैं।

धात्विक हाइड्राइड तन्त्र को जलाना अथवा इसका विस्फोट होना सम्भव नहीं होता; अतः इसे हाइड्रोजन भण्डारण की सुरक्षित युक्ति माना जा सकता है। चूँकि हाइड्रोजन इन धातुओं से रासायनिक रूप से जुड़ी रहती है तथा यह धातु में तब तक भण्डारित रहती है जब तक कि इसे अतिरिक्त ऊर्जा न दी जाए। अतः हाइड्रोजन भण्डारण के लिए धात्विक हाइड्राइड अत्यन्त उपयोगी होते हैं।

प्रश्न 13.
कर्तन और वेल्डिंग में परमाणवीय हाइड्रोजन अथवा ऑक्सी-हाइड्रोजन टॉर्च किस प्रकार कार्य करती है ? समझाइए।
उत्तर:
परमाण्विक हाइड्रोजन या ऑक्सी-हाइड्रोजन टॉर्च का उपयोग कर्तन तथा वेल्डिंग में होता है। परमाण्विक हाइड्रोजन, परमाणु (जो विद्युत आर्क की सहायता से डाइहाइड्रोजन के वियोजन से बनते हैं) का पुनर्संयोग वेल्डिंग की जानी वाली धातुओं की सतह पर लगभग 4000K तक ताप उत्पन्न कर देता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 9
ऑक्सी-हाइड्रोजन टॉर्च की ज्वाला अत्यन्त उच्च ताप (3000K से भी अधिक) उत्पन्न करती है जो वेल्डिंग कार्य में प्रयोग किया जाता है। उपरोक्त कार्य में होने वाली अभिक्रिया निम्न है।
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उपरोक्त अभिक्रिया से बनने वाली परमाण्विक हाइड्रोजन का जीवन 0.3 sec होता है। अतः यह तुरन्त आण्विक हाइड्रोजन में परिवर्तित हो जाती है और साथ-साथ अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करती है जो वेल्डिंग तथा कर्तन में प्रयोग होती है।

प्रश्न 14.
NH3, H2O तथा HF में से किसका हाइड्रोजन बन्ध का परिमाण उच्चतम अपेक्षित है और क्यों ?
उत्तर:
उच्च इलेक्ट्रॉन ऋणात्मकता होने के कारण N, O तथा F हाइड्रोजन बन्ध बनाते हैं। HF अणु में हाइड्रोजन बन्ध का परिमाण उच्चतम अपेक्षित है; क्योंकि फ्लुओरीन आवर्त सारणी का सर्वाधिक विद्युत ऋणी तत्व (4.0) है परिणामस्वरूप H-F बन्ध प्रबल ध्रुवीय होने के कारण प्रबल अन्तर-आण्विक हाइड्रोजन बन्ध प्रदर्शित करता है।
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प्रश्न 15.
लवणीय हाइड्राइड जल के साथ प्रबल अभिक्रिया करके आग उत्पन्न करती है क्या इसमें CO2 (जो एक सुपरिचित अगिनशामक है) का उपयोग हम कर सकते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
लवणीय हाइड्राइड जैसे- NaH, CaH2 आदि जल के साथ प्रबल अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड तथा हाइड्रोजन उत्पन्न करते हैं। यह हाइड्रोजन आग पकड़ लेती है तथा अभिक्रिया अत्यधिक ऊष्माक्षेपी होती है।
NaH(s) + H2O(l) → NaOH(aq) + H2(g) + ऊष्मा
CaH2(s) + 2H2O(l) → Ca(OH)2(aq) + 2H2(g) + ऊष्मा
इस अभिक्रिया में उत्पन्न आग के लिए हम CO2 को अग्निशामक की तरह प्रयोग नहीं कर सकते हैं। क्योंकि इसमें बने हाइड्रॉक्साइड से CO2 क्रिया करके कार्बोनेट बना लेती है।

2NaOH(aq) + CO2(g) → Na2CO3(aq) + H2O(aq)

इसके साथ-साथ CO2 धातु हाइड्राइड से अभिक्रिया करके अपचयित हो जाती है।

NaH + CO2 → HCOONa

अत: अभिक्रिया में उत्पन्न आग को रेत से बुझाया जा सकता है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित को व्यवस्थित कीजिए-
(i) CaH2, BeH2 तथा TiH2 को उनकी बढ़ती हुई विद्युत्चालकता के क्रम में।
(ii) LiH, NaH तथा CsH को आयनिक गुण के बढ़ते हुए क्रम में।
(iii) H-H, D-D तथा F-F को उनके बन्ध-वियोजन एन्थैल्पी के बढ़ते हुए क्रम में।
(iv) NaH, MgH2 तथा H2O को बढ़ते हुए अपचायक गुण के क्रम में।
उत्तर:
(i) BeH2 <TiH2 < CaH2 : विद्युत् चालकता का बढ़ता क्रम।
(ii) LiH < NaH < CsH : आयनिक गुण का बढ़ता क्रम।
(iii) F-F (iv) H2O < MgH2 < NaH: अपचायक गुण का बढ़ता क्रम।

प्रश्न 17.
H2O तथा H2O2 की संरचनाओं की तुलना कीजिए।
उत्तर:
जल-अणु की संरचना:
गैस-प्रावस्था में जल एक बंकित (bent) अणु है तथा आबन्ध कोण एवं O-H आबन्ध दूरी के मान क्रमशः 104.5° तथा 95.7 pm हैं, जैसा चित्र (क) में प्रदर्शित किया गया है अत्यधिक ध्रुवित अणु चित्र- (ख) में तथा चित्र-(ग) में जल के अणु में ऑर्बिटल अतिव्यापन दर्शाया गया है।
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हाइड्रोजन परॉवसाइड अणु की संरचना:
हाइड्रोजन परॉक्साइड की संरचना असमतलीय (खुली पुस्तक के समान ) होती है। गैसीय प्रावस्था तथा ठोस प्रावस्था में इसकी आण्विक संरचना को निम्न चित्र में दर्शाया गया है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 13

प्रश्न 18.
जल के स्वतः प्रोटोनीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसका क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
जल का स्वतः प्रोटोनीकरण (Auto-protolysis of water)-एक जल-अणु किसी दूसरे जल-अणु से प्रोटॉन ग्रहण करके H3O+ तथा OH+ बनाता है। यह प्रक्रिया जल का स्वतः प्रोटोनीकरण कहलाती है।

H2O(l) + H2O(l) → H3O+(aq) + OH(aq)

प्रोटॉनीकरण का महत्त्व यह है कि जल अम्ल तथा क्षारक दोनों की भाँति कार्य कर सकता है अर्थात् इसकी प्रवृत्ति उभयधर्मी होती है। उपर्युक्त अभिक्रिया को एक साम्य स्थिरांक, ‘आयनिक गुणनफल’ (Kw) द्वारा निर्धारित किया जाता है। इसका मान निम्नवत् दर्शाया जा सकता है-
Kw = [H3O+] [OH]
298K पर Kw = 1.0 × 10-14 mol2 L-2
अतः जल के स्वतः प्रोटोनीकरण का अम्ल-क्षारक रसायन में अत्यधिक महत्त्व होता है।

प्रश्न 19.
F2 के साथ जल की अभिक्रिया में ऑक्सीकरण तथा अपचयन के पदों पर विचार कीजिए एवं बताइए कि कौन-सी स्पीशीज ऑक्सीकृत/अपचयित होती है ?
उत्तर:
फ्लुओरीन की जल के साथ अभिक्रिया निम्नवत् है
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ऑक्सीकरण संख्या में कमी (अपचयन)
अतः स्पष्ट है कि-
F2 ऑक्सीकारक है तथा H2O अपचायक है।
H2O का ऑक्सीकरण O2 में होता है।
F2 का अपचयन HF में होता है।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन

प्रश्न 20.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए-
(i) PbS(s) + 4H2O2(aq) →
(ii) 2MnO4(aq) + 3H2O2(aq) →
(iii) CaO(s) + H2O(g) →
(iv) AlCl3(g) + 3H2O(l) →
(v) Ca3N2(s) + 6H2O(l) →
उपर्युक्त को (क) जल-अपघटन, (ख) अपचयोपचय (redox) तथा (ग) जलयोजन अभिक्रियाओं में वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर:
(i) PbS(s) + 4H2O2(aq) → PbSO4(s) + 4H2O(aq) (अपचयोपचय अभिक्रिया)

(ii) 2MnO4(aq) + 3H2O2(aq) → 2MnO2(aq) + 3O2(aq) + 2H2O(l) + 2OH(aq) (अपचयोपचय अभिक्रिया)

(iii) CaO(s) + H2O(g) → Ca(OH)2(s) ( जलयोजन अभिक्रिया)

(iv) AlCl3(g) + 3H2O(l) → Al(OH)3(s) + 3HCl(l) (जल अपघटन अभिक्रिया)

(v) Ca3N2(s) + 6H2O(l) → 3Ca(OH)2(aq) + 2NH3(g) ( जल-अपघटन अभिक्रिया)

प्रश्न 21.
बर्फ के साधारण रूप की संरचना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बर्फ की संरचना
(Structure of Ice)
बर्फ एक अतिव्यवस्थित, त्रिविम, हाइड्रोजन आबन्धित संरचना है जिसे निम्नांकित चित्र में दर्शाया गया है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 15
X-किरणों द्वारा परीक्षण से पता चला है कि बर्फ क्रिस्टल में ऑक्सीजन परमाणु चार अन्य हाइड्रोजन परमाणुओं से 276 pm दूरी पर चतुष्फलकीय रूप से घिरा रहता है। हाइड्रोजन आबन्ध बर्फ में वृहद् छिद्र (एक प्रकार की खुली संरचना) बनाते हैं। ये छिद्र उपयुक्त आकार के कुछ दूसरे अणुओं को अन्तराकोश में ग्रहण कर सकते हैं।

उपर्युक्त चित्र में दर्शाई गयी बर्फ की संरचना से स्पष्ट है कि प्रत्येक ऑक्सीजन परमाणु चार हाइड्रोजन परमाणुओं से घिरा हुआ है जिनमें दो प्रबल सहसंयोजी आबन्ध (ठोस रेखा द्वारा प्रदर्शित) से तथा दो दुर्बल हाइड्रोजन आबन्धों (बिन्दुदार रेखा से प्रदशित) से जुड़े हुए हैं। चूँकि हाइड्रोजन बन्ध (177 pm) सहसंयोजी आबन्धों (95.7 pm) से लम्बे हैं; अतः जल-अणु क्रिस्टल जालक में निविड़-संकुलित (closely packed) नहीं होते। यही कारण है कि जल के घनत्व से बर्फ का घनत्व कम होता है तथा यह (बर्फ) जल की सतह पर तैरती है।

प्रश्न 22.
जल की अस्थायी एवं स्थायी कठोरता के क्या कारण हैं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अस्थायी कठोरता (Temporary hardness) अस्थायी कठोरता जल में कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के हाइड्रोजन कार्बोनेट की उपस्थिति के कारण होती है। इसे उबालकर दूर किया जा सकता है।
स्थायी कठोरता (Permanent hardness)-स्थायी कठोरता जल में विलेयशील कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के क्लोराइड तथा सल्फेट के रूप में घुले रहने के कारण होती है। यह उबालने से दूर नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 23.
संश्लेषित आयन विनिमयक विधि द्वारा कठोर जल के मृदुकरण के सिद्धान्त एवं विधि की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
संश्लेषित आयन विनिमयक विधि-यह दो प्रकार की होती है-
1. अकार्बनिक आयन विनिमयक विधि
2. कार्बनिक आयन विनिमयक विधि

1. अकार्बनिक आयन विनिमयक विधि-इसे जियोलाइट या परम्यूटिट विधि भी कहते हैं। यह कठोर जल को मृदु जल में परिवर्तित करती है। इसमें सोडियम जियोलाइट प्रयुक्त होता है जोकि सोडियम ऐल्युमिनियम सिलिकेट होता है जिसका सूत्र Na2Al2Si2O8 या NaAlSiO4. 3H2O होता है। सरलता के लिए इसे Na2Z लिख सकते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 16

परम्यूटिट विधि में हम दोनों प्रकार की कठोरता दूर कर सकते ? क्योंकि सोडियम जियोलाइट में उपस्थित सोडियम लवणों का यह गुण है कि ये अन्य आयनों द्वारा विस्थापित हो जाते हैं। कठोर जल को जियोलाइट की परत के ऊपर से प्रवाहित करने पर जल में उपस्थित कैल्सियम तथा मैग्नीशियम आयन इसमें उपस्थित सोडियम आयनों द्वारा विस्थापित हो जाते हैं और यहं मैग्नीशियम या कैल्सियम जियोलाइट में परिवर्तित हो जाता है।
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अब प्राप्त जल में कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के आयन नहीं होते हैं और वह मृदु जल बन जाता है।

परम्यूटिट का पुन: निर्माण-जब Na2Z पूर्णत: CaZ व MgZ में परिवर्तित हो जाता है तो इसके पुनः निर्माण के लिए इसमें कठोर जल के प्रवेश को रोककर इसके स्थान पर 10% NaCl विलयन प्रवाहित करते हैं तब Ca2+ तथा Mg2+ आयन Na+ आयनों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं जिससे परम्यूटिट का पुनः निर्माण हो जाता है और उसे हम पुनः प्रयोग कर सकते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 18

2. काबनिके आयन विनिमयक विध या संश्लाषित रीजन विधि-यह अत्यधिक आधुनिक विधि है। परम्यूटिट केवल Ca2+ तथा Mg2+ आयनों को जल से हटाता है जबकि कार्बनिक रेजिन जल में उपस्थित सभी आयनों को (H+ तथा OH को छोड़कर) हटाता है। इस प्रकार इस विधि से प्राप्त जल पूर्णतः आयनों रहित होता है। इस विधि में दो प्रकार के रेजिन प्रयोग में आते हैं।
(i) ऋणायन विनिमयक रेजिन
(ii) धनायन विनिमयक रेजिन

(i) ऋणायन विनिमयक रेजिन-इनमें हाइड्रोकार्बन समूह के साथ क्षारीय समूह -OH अथवा -NH2 जुड़े रहते हैं जिन्हें -OH रेजिन के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। ये जल में उपस्थित ऋणायन जैसे-Cl, HCO3, SO42- आदि का विनिमय OH के साथ करता है। इस प्रकार जल में उपस्थित सभी ऋणायन कठोर जल से मुक्त हो जाते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 19
जब ऋणायन विनिमयक रेजिन में से सभी OH आयन ऋणायनों के द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते है तब इस टैंक में NaOH का छिड़काव करते हैं जो कि -OH रेजिन को पुननिर्मित कर देता है।
RNH3+X + NaOH → RNH3+OH + NaX

(ii) धनायन विनिमयक रेजिन – ये हाइड्रोजन समूह ही है जिनके साथ अम्लीय समूह जैसे- COOH या -SO3H समूह जुड़े रहते हैं। इन्हें H रेजन भी कहते हैं। जब जल में उपस्थित सभी ऋणायनों का प्रतिस्थापन हो जाता है तब उस जल को धनायन विनिमयक रेजिन के टैंक में प्रवाहित करते हैं। जहाँ जल में उपस्थित सभी धनायन H+ आयनों के साथ प्रतिस्थापित हो जाते हैं। ये H+ आयन OH के साथ जल का निर्माण करते हैं। इनका पुनर्जनन NaCl/HCl विलयन से होता है।

2 RNa + M2+ → R2M + 2Na+(M = Ca,Mg)
R2M + 2Na+ → 2RNa + M2+ (पुनर्जनन)
या 2RH + M2+ → MR2 + 2H+ (M2+ → Ca2+, Mg2+)
MR2 + 2H+ → 2RH + M2+

अतः इस विधि द्वारा सभी धनायनों तथा ऋणायनों का प्रतिस्थापन क्रमशः H+ तथा OH द्वारा हो जाता है एवं हमें शुद्ध विखनिजित (demineralized) तथा विआयनित (deionised) जल प्राप्त होता है।

प्रश्न 24.
जल के उभयधर्मी स्वभाव को दर्शाने वाले रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर:
जल की उभयधर्मी प्रकृति (Amphoteric nature of water)—जल अम्ल तथा क्षारक दोनों रूपों में व्यवहार करता है। अतः यह उभयधर्मी है। ब्रॉन्स्टेड अवधारणा के सन्दर्भ में जल NH3 के साथ अम्ल के रूप में तथा H2S के साथ क्षारक के रूप में कार्य करता है-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 20
जल अपने से प्रबल अम्लों के साथ क्षारक की भाँति व्यवहार करता है; जैसे-उपर्युक्त अभिक्रिया (ii) में दर्शाया गया है। इसमें जल-अणु H2S से एक प्रोटॉन ग्रहण करके H3O+आयन बनाता है। अभिक्रिया (i) में जल-अणु एक प्रोटॉन का त्याग करता है। NH3 अणु इस प्रोटॉन को ग्रहण करके NH4+ आयन बनाता है। यहाँ जल एक अम्ल की भाँति कार्य करता है।

प्रश्न 25.
हाइड्रोजन परॉक्साइड के ऑक्सीकारक एवं अपचायक रूप को अभिक्रियाओं द्वारा समझाइए।
उत्तर:
हाइड्रोजन परॉक्साइड के अपघटन के दौरान ऑक्सीकरण-अवस्था परिवर्तन निम्नवत् दर्शाया जा सकता हैऑक्सीकरण-संख्या में वृद्धि = ऑक्सीकरण
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 21
चूँकि H2O2 में उपस्थित ऑक्सीजन परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्या में वृद्धि तथा कमी दोनों होती हैं; इसलिए यह अपचायक तथा ऑक्सीकारक दोनों की भाँति कार्य कर सकता है। इसे निम्नलिखित अभिक्रियाओं द्वारा समझा जा सकता है-

(i) अम्लीय माध्यम में H2O2 ऑक्सीकारक के रूप में-

2Fe2+(aq) + 2H+(aq) + H2O2(aq) → 2Fe3+(aq) + 2H2O(l)
PbS(s) + 4H2O2(aq) → PbSO4(s) + 4H2O(l)

(ii) अम्लीय माध्यम में H2O2 अपचायक के रूप में-

2MnO4(aq) + 6H+(aq) + 5H2O2 → 2Mn2+(aq) + 8H2O(l) + 5O2(g)
HOCl + H2O2 → H3O+ + Cl + O2(g)

(iii) क्षारीय माध्यम में H2O2 ऑक्सीकारक के रूप में-
2Fe2+ + H2O2 → 2Fe3+ + 2OH
Mn2+ + H2O2 → Mn4+ + 2OH

(iv) क्षारीय माध्यम में H2O2 अपचायक के रूप में-
I2 + H2O2 + 2OH → 2I + 2H2O + O2
2MnO4 + 3H2O2 → 2MnO2 + 3O2 ↑+ 2H2O + 2OH

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन

प्रश्न 26.
विखनिजित जल से क्या अभिप्राय है ? यह कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?
उत्तर:
वह जल जो सभी विलेयशील खनिज अशुद्धियों से पूर्णतया मुक्त हो, विखनिजित जल (demineralized water) कहलाता है। दूसरे शब्दों में धनायनों (Ca2+, Mg2+ आदि) तथा ऋणायनों (Cl, SO42-, HCO3 आदि) से पूर्णतया विमुक्त जल विखजनित जल कहलाता है। विखनिजित जल को आयन-विनिमयक रेजिन विधि से प्राप्त किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत आयन-विनिमयक रेजिनों द्वारा जल में उपस्थित सभी धनायनों तथा ऋणायनों को हटा दिया जाता है।

इसके लिए सर्वप्रथम कठोर जल को H+ रेजिन के टैंक से प्रवाहित करते हैं। जहाँ Na+, Ca2+, Mg2+ आदि सभी धनायन H+ आयनों से प्रतिस्थापित हो जाते हैं उसके बाद इस जल को -OH रेजिन के टैंक से प्रवाहित करते हैं जहाँ सभी ऋणायन जैसे- Cl, SO42-, HCO3, आदि OH से प्रतिस्थापित हो जाते हैं। इस प्रकार सभी ऋणायन तथा धनायन OH तथा H+ द्वारा प्रतिस्थापित होते हैं और हमें विखनिजित जल प्राप्त होता है।

प्रश्न 27.
क्या विखनिजित या आसुत जल पेय-प्रयोजनों में उपयोगी है यदि नहीं तो इसे उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है ?
उत्तर:
नही, विखनिजित या आसुत जल पेय-प्रयोजनों में उपयोगी नहीं है क्योंकि यह स्वादहीन होता है। यदि कुछ आयन जैसे- Na+, K+, Mg+, Li+ आदि जो हमारे शरीर के लिए उपयोगी होते हैं, को इन विखनिजित जल में डाल दें तो यह पेय-प्रयोजनों में प्रयुक्त हो सकता है। ऐसा करने के लिए हम इसमें लवण जैसे- NaCl, KCl आदि मिला देते हैं ।

प्रश्न 28.
जीवमण्डल एवं जैव-प्रणालियों में जल की उपयोगिता को समझाइए।
उत्तर:
जीवमण्डल एवं जैव-प्रणालियों में जल की उपयोगिता सभी सजीवों का एक वृहद् भाग जल द्वारा निर्मित है। मानव शरीर में लगभग 65 प्रतिशत एवं कुछ पौधों में लगभग 95 प्रतिशत जल होता है। जीवों को जीवित रखने के लिए जल एक महत्वपूर्ण यौगिक है। संघनित प्राबस्था (द्रव तथा टोस अवस्था) में जल के आयामान्य गुणों का कारण तथा अन्य तत्वों के हाइड्राइड H2S तथा H2Se की नुलना में जल का उच्व हिमांक, उच्च क्वधनांक, उच्च वाण्यन कप्मा उच्च संलयन ऊष्मा का कारण इसमें हाहड्रोजन-बन्ध का उपस्थित होनो है अन्य द्रवों की जुलना में जल की विशिष्ट कप्मा, तापीय नालकता. पृष्ठ-तनाव, द्विध्रुव आघर्ण तथा पराविद्युतांक के मान उच्च होते है।

इन्तीं गुणों के कारण जीवमण्डल में जल की महत्वमूण भृमिका है। शरीर तथा जलवायु के सामान्य ताप को बनाए रख्बने के लिए उत्तरदायी है। वनस्पतियों एवं प्राणियों के उपापचय (metabolism) में अणुओं के अभिगमन के लिए जल एक उत्तम विलायक का कार्य करता है। अल ध्रुवीय अणुओं के साथ हाइड्रोजन बन्ध बनाता है जिससे सहसंयोजक यौगिक; जैसे-ऐल्कोहॉल तथा काबॉहाइट्ट्रेट यौगिक जल में चिलेय होते हैं। अतः जैव-प्रणालियों के लिए भी यह आवश्यक होता दै।

प्रश्न 29.
जाल का कौन-सा गुण इसे विलायक के क्रष में उपयोगी बनाता है ? बह किस प्रकार के घौगिक-
(i) घोल सकता है। और
(ii) जल-अपघटन कर सकता हैं ?
उत्तर:
जल के गुण
जल के निम्नलिखित गुण हसे विलायक के रुप में ज्यतिमहत्वपयर्ण बनाते हैं-
(i) इसकी वाष्पन एन्धैल्पी तथा कप्मा-धारिता उच्च होती है।
(ii) यंह ताप की एक दीर्घ परास (0°C से 100°C तक ) के अन्तमंत द्रव-अवस्था में होता है।
(iii) यह ध्रुवी प्रकृति का होता है तथा इसका पराचित्रितांक उक्च (78-39) होता है।
(iv) अन्य यौगिकौं के साथ हाइड्रोजन बन्ध बना सकता है।

जल विलायक के मूप में:
(i) यह हाइड्रोजन बन्ध के कारण श्रुवी पदाधों तथा कछ कर्वंनिक यौगिकों को घोल सकता है। यह आयनिक पदार्थों तथा उन याँगिकों को घोल सकता है जो इसके साथ H-बन्ध बनाते हैं।
(ii) इसमें उपस्थित ऑक्सीजन की अनेक तस्चों से अत्यधिक वन्थूता के कारण यह सहसंयोजी यौगिकों को जल-अपधटित कर देता है। गह ऑक्साइडों, हैलाइडों, फॉस्फाइडों, नाहट्राइड्टों आदि को जल-अप्टित कर देता है।

प्रश्न 30.
H2O एवं D2O के गुणों को जानते हुए क्या आय मानते हैं कि D2O का उपयोग पेय-प्रयोजनों के रूप में किया जा सकता है ?
उत्तर:
D2O का उपयोग हम पेय-प्रयोजनों में नहीं कर सकते हैं। इसके निम्न कारण हैं-
(i) D2O की बन्ध ऊर्जा H2O की अपेक्षा अधिक होती है।
(ii) भारी अणु होने के कारण D2O का आयनन H2O की तुलना में एक तिहाई ही होता है।
(iii) कम पराविद्युतांक के कारण इसमें आयनिक पदार्थ जल की तुलना में कम विलेय होता है।
भारी जल शंरीर में होने वाली अपचयोपचयी अभिक्रियाओं को साधारण जल की तुलना में अति मन्द गति से करता है। जिससे ये असन्तुलित हो जाती है अतः यह जीवन के लिए हानिकारक होता है। यह पेड़-पौधों का विकास रोक देता है, बीजों का अंकुरण रोकता है, जल में रहने वाले जीवों को मार देता है।

प्रश्न 31.
जल-अपघटन तथा जलयोजन पदों में क्या अन्तर है ?
उत्तर:

जल-अपघटनजलयोजन
1. जल अपघटन अभिक्रिया में एक पदार्थ उदासीन, अम्लीय अथवा क्षारीय माध्यमों में जल से अभिक्रिया करता है।

उदाहरण-

AlCl3 + 3H2O → Al(OH)3 + 3HCl

1. किसी रासायनिक पदार्थ का वह गुण जिसमें वह क्रिस्टलन जल के अणु ग्रहण करके जलयोजित हो जाता है, जल योजन कहलाता है।

उदाहरण – निर्जलीय CuSO4 का रंग सफेद होता है तथा H2O के पाँच अणु ग्रहण करके यह CuSO4.5H2O बनाता है जो नीले रंग का होता है।

2. अभिक्रिया के दौरान pH परिवर्तित होता है।2. pH परिवर्तित नहीं होता है।
3. सह-संयोजी यौगिक प्रदर्शित करते हैं।3. आयनिक यौगिक प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 32.
लवणीय हाइड्राइड किस प्रकार कार्बनिक यौगिकों से अति सूक्ष्म जल की मात्रा को हटा सकते हैं ?
उत्तर:
लवणीय हाइड्राइडों में H2O के लिए अत्यधिक बन्धुता होती है। लवणीय हाइड्राइड; जैसे- NaH, H आयनों को मुक्त करता है जो प्रबल ब्रॉ्स्टेड क्षारकों की भाँति कार्य करते हैं (H2O एक दुर्बल ब्रॉन्स्टेड अम्ल होता है) । NaH जल से संयुक्त होकर हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है। लवणीय हाइड्राइडों का यह गुण कार्बनिक यौगिकों से अति सूक्ष्म जल की मात्रा को हटाने में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 33.
परमाणु क्रमांक 15,19,23 तथा 44 वाले तत्व यदि डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया कर हाइड्राइड बनाते हैं तो उनकी प्रकृति से आप क्या आशा करेंगे ? जल के प्रति इनके व्यवहार की तुलना कीजिए।
उत्तर:
परमाणु क्रमांक 15 वाला तत्व फॉस्फोरस (P) है। इसका हाइड्राइड (PH3) सहसंयोजी होता है।
परमाणु क्रमांक 19 वाला तत्व पोटैशियम (K) है। इसका हाइड्राइड (KH) आयनिक होता है।
परमाणु, क्रमांक 23 वाला तत्व वैनेडियम (V) है इसका हाइड्राइड अन्तराकाशी या धात्विक होगा।
परमाणु क्रमांक 44 वाला तत्व रूथेनियम (Ru) है। इसका हाइड्राइड अन्तराकाशी या धात्विक होगा।

जल के प्रति व्यवहार:
(i) परमाणु क्रमांक 15 वाला तत्व (P) सहसंयोजी हाइड्राइड (PH3) बनाता है जो जल में अल्प-विलेय होता है।
(ii) परमाणु क्रमांक 19 वाला तत्व (K) आयनिक हाइड्राइड (KH) बनाता है जो जल के साथ विस्फोटक रूप से अभिक्रिया करके डाइहाइड्रोजन गैस देता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 22
(iii) परमाणु क्रमांक 23 तथा 44 वाले तत्व V तथा Ru अन्तराकाशी या धात्विक हाइड्राइड बनाते हैं जो जल को संगुणित कर लेते हैं।

प्रश्न 34.
जब ऐलुमिनियम (III) क्लोराइड एवं पोटैशियम क्लोराइड को अलग-अलग (i) सामान्य जल, (ii) अम्लीय जल एवं (iii) क्षारीय जल से अभिकृत कराया जाएगा तो आप किन-किन विभिन्न उत्पादों की आशा करेंगे ? जहाँ आवश्यक हो, वहाँ रासायनिक समीकरण दीजिए।
उत्तर:
(i) सामान्य जल में-सामान्य जल में ऐलुमिनियम (III) क्लोराइड निम्नवत् जल-अपघटित होगा-
AlCl2 + 3H2O → Al(OH)3 + 3HCl
KCl जल में विलेय होगा तथा इसके आयन जलयोजित हो जायेंगे।
KCl(s) + H2O (आधिक्य) → K+(aq) + Cl(aq)

(ii) अम्लीय जल में-अम्लीय जल में ऐलुमिनियम (III) क्लोराइड जल-अपघटित हो जाएगा, परन्तु समआयन प्रभाव के कारण जल-अपघटन धीमी दर से होगा तथा यह HCl से अभिक्रिया करके AlCl3 बना लेगा जो Al3+ तथा Cl के रूप में उपस्थित होंगे।
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पोटैशियम क्लोराइड पर अम्लीय जल का कोई प्रभाव नहीं होगा।

(iii) क्षारीय जल में-क्षारीय जल में AlCl3 तीव्रता से जल-अपघटित होकर विलेय टेट्राहाइड्रॉक्सो-ऐलुमिनेट बनाता है।
AlCl3 + 3NaOH → Al(OH)3 + 3NaCl
Al(OH)3 + OH → [Al(OH4]
पोटैशियम क्लोराइड पर क्षारीय जल का कोई प्रभाव नहीं होगा।

प्रश्न 35.
H2O2 विरंजन कारक के रूप में कैसे व्यवहार करता है ? लिखिए।
उत्तर:
हाइड्रोजन परॉक्साइड (H2O2) निम्नलिखित अभिक्रिया के आधार पर विरंजन कारक के रूप में व्यवहार करता है-
H2O2 → H2O + [O] नवजात ऑक्सीजन
रंगीन पदार्थ + [O] → रंगहीन पदार्थ ( विरंजित)
दैनिक जीवन में इसका उपयोग बालो, ऊन, सिल्क, हाथा-दात आदि के विरंजन में किया जाता है।

प्रश्न 36.
निम्नलिखित पदों से आप क्या समझते हैं ?
(i) हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था,
(ii) हाइड्रोजनीकरण,
(iii) सिन्नैस,
(iv) भाप अंगार गैस सृति अभिक्रिया तथा
(v) ईंघन सेल।
उत्तर:
(i) हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था:
हम सभी जानते हैं कि कोयला तथा पेट्रोलियम सर्वाधिंक प्रयुक्त होने वाले ईंधन हैं, परन्तु ये संसाधन अत्यन्त तीव्र दर से समाप्त होते जा रहे हैं तथा आगामी भविष्य में उद्योग तथा परिवहन इससे बहुत अधिक प्रभावित हो सकते है। इसके अंतिरिक्त ये संसाधन मानव-स्वास्थ्य के प्रति भी अत्यन्त हानिकारक हैं: क्यौंकि ये वायु प्रदूषण के प्रमुख्य कारक हैं।

इनके दहन के फलस्वरूप उत्पन्न अनेक विपाक्त गैसे-कार्वन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड वायुमण्डल में मिल जाते हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए वैकल्पिक हैधनों की ख्रोज सदैव होती रही है। इस सन्दर्भ में भावी विकल्प ‘हाड़्रोजन अर्थव्यवस्था’ है। हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का मूल सिद्धान्त ऊर्जा का द्रव हाइड्रोजन अथवा गैसीय हाइड्रोजन के रूप में अभिगमन तथा भण्डारण है।

हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का मुख्य ध्येय तथा लाभ-ऊर्जा का संचरण विद्युत्-ऊर्जा के रूप में न होकर हाइड्रोजन के रूप में होना है। हमारे देश में पहली बार अक्श्बर, 2005 में आरम्भ परियोजना में डाइहाइड्रोजन स्बचालित वाहनों के हैधन के रूप में प्रयुक्त किया गया। प्रारम्भ में चौपढिया बाहन के लिए 5 प्रतिशत हाइहाइड्रोजन मिश्रित CNG का प्रयोग किया गया।

बाद में डाहहाइड्रोजन की प्रतिशतता धरि-धीरे अनुकूलतम स्तर तक बढ़ाई जाएगी। आजकल डाहाइड्रोजन का उपयोग ईद्रन सेलों में विद्युत्-उत्पादन के लिए किया जाता है। ऐसी आशा की जाती है कि आर्थिक रूप से व्यवत्तार्य तथा दाइहाइड्रोजन के सुरक्षित स्रोत का पता आने वाले वष्षों में लग सकेगा तथा उसका उपयोग ऊर्जा के रूप में हो सकेगा।

(ii) हाइड्रोजनीकरण:
असंतृप्त कार्वनिक यौगिक हाइड्रोजन से सीधे संयोग करके संतृप्त यौगिक बनाते हैं, यह अभिक्रिया हाइड्रोजनीकरण कहलाती है। यह अभिक्रिया उत्र्रेरक की उपस्थिति में होती है तथा इन अभिक्रियाओं से अनेक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक हाइड्रोजनीकृत उत्पाद प्राप्त होते हैं। वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण (Hydrogenation of Vegetable Oils)- 473K पर निकिल उत्त्रेरक की उपस्थिति में वनस्पति तेलों; जैसे – मूँगफली के तेल, बिनौले के तेल में हाइड्रोजन गैस प्रवाहित करने पर तेल ठोस वसाओं, जिन्हें वनस्पति घी कहा जाता है, में

परिवर्तित हो जाते हैं। वास्तव में तेल HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 24 बन्ध की उपस्थिति के कारण असंतृप्त होते हैं। हाइड्रोजनीकरण पर ये बन्ध HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 25 बन्ध में परिवर्तित हो जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप असंतृप्त तेल संतृप्त वसा में परिवर्तित हो जाते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 26
ओलिफिन का हाइड्रोफॉर्मिलीकरण (Hydrofor-mylation of Olefins) – ओलिफिन का हाइड्रोफॉर्मिलीकरण कराने पर ऐल्डिहाइड प्राप्त होता है, जो ऐल्कोहॉल में अपचयित हो जाता है।
RCH = CH2 + CO + H2 → RCH2CH2CHO
RCH2CH2CHO + H2 → RCH2CH2CH2OH
उपर्युक्त के अतिरिक्त कोयले का हाइड्रोजनीकरण करने पर द्रव हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण प्राप्त होता है जिसे आसुत करने पर कृत्रिम पेट्रोल प्राप्त होता है।

(iii) सिन्गैस:
हाइड्रोकार्बन अथवा कोक की उच्च ताप पर एवं उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप से अभिक्रिया कराने पर डाइहाइड्रोजन प्राप्त होती है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 27
CO एवं H2 के मिश्रण को वाटर गैस कहते हैं। CO एवं H2 का यह मिश्रण मेथेनॉल तथा अन्य कई हाइड्रोकार्बनों के संश्लेषण में काम आता है। अतः इसे ‘संश्लेषण गैस’ या ‘सिन्ञैस’ (syngas) भी कहते हैं। आजकल सिन्गैस वाहितमल (sewage waste), अखबार, लकड़ी का बुरादा, लकड़ी की छीलन आदि से प्राप्त की जाती है। कोल से सिन्गैस का उत्पादन करने की प्रक्रिया को ‘कोलगैसीकरण’ (coalgasification) कहते हैं-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 28

(iv) भाप-अंगार गैस सृति अभिक्रिया:
सिन्गैस में उपस्थित कार्बन मोनोक्साइड की आयरन क्रोमेट उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप से क्रिया कराने पर हाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 29

यह ‘भाप-अंगार गैस सृति अभिक्रिया’ (water gas shift reaction) कहलाती है। वर्तमान में लगभग 77 प्रतिशत डाइहाइड्रोजन का औद्योगिक उत्पादन शैल रसायनों (petro-chemicals), 18 प्रतिशत कोल, 4 प्रतिशत जलीय विलयनों के विद्युत्-अपघटन तथा 1 प्रतिशत उत्पादन अन्य स्रोतों से होता है।

(v) ईंधन सेल:
वह युक्ति जो ईंधन की रासायनिक ऊर्ग को विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित करती है, ईंधन सेल कहलाती है। कल डाइहाइड्रोजन का प्रयोग ईंधन सेलों में विद्युत्-उत्पादन के लिए किया जाता है। ये प्राथमिक सेलों की तरह ही होते हैं। इसमें ईंधन का दहन होता है तथा उसमें से उत्पन्न रासायनिक ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। इन सेलों को इस प्रकार बनाया जाता है कि इनमें ईंधन लगातार भरा जा सके जिससे कि विद्युत् धारा निरन्तर प्राप्त होती रहे।

इस सेल में ईंधन के रूप में H2, CO, CH4, C3H8, C2H5OH आदि को प्रयुक्त करते हैं। सर्वप्रथम बैकोन ने एक सेल बनाया जिसमें उन्होंने ईंधन के रूप में H2-O2 लिया था। इसे बैकोन सैल भी कहते हैं।

इस सेल में कार्बन के सरन्ध्र (Porous) इलेक्ट्रोड होते हैं जो Pt, Ag या CuO आदि के द्वारा संसेचित(impregnated) होते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 9 Img 30
यहाँ विद्युत्- अपघट्य इलेक्ट्रोडों के मध्य भरा होता है। विद्युत् -अपघट्य KOH या NaOH का विलयन होता है। H2 तथा O2 गैसों के सरन्ध्र इलेक्ट्रोडों में से विद्युत्-अपघट्य विलयन में भेजा जाता है।
अभिक्रियाएँ, इलेक्ट्रोडों पर निम्न प्रकार होती हैं-
ऐनोड : 2H2(g) + 4OH(aq) → 4H2O(l) + 4e
कैथोड : O2(g) + 2H2O(l) + 4e → 4OH(aq)
सम्पूर्ण अभिक्रिया-
2H2(g) + O2(g) → 2H2O(l)
नोट – चूँकि अभिक्रिया के दौरान ईंधन खर्च होता रहता है अतः इसे बार-बार भरते रहना चाहिए।

ईंधन सेल की विशेषताएँ-

  • ईंधन की लगातार पूर्ति करने पर लगातार विद्युत् धारा प्राप्त होती है इसलिए सेल की आयु लम्बी होती है।
  • ये सेल प्रदूषण रहित होते हैं।
  • इनकी दक्षता उच्च लगभग 75-80% होती है।

नोट – इस ईंधन सेल का प्रयोग सर्वप्रथम अन्तरिक्ष कार्यक्रम में अपोलो यान को विद्युत् ऊर्जा प्रदान करने के लिए किया गया था। यहाँ H2 तथा O2 परस्पर द्रव H2O बनाते हैं। इस जल वाष्प को संघनित कर उसका प्रयोग अन्तरिक्ष यात्रियों के पेयजल के रूप में किया जाता है।

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HBSE 11th Class Chemistry Important Questions and Answers

Haryana Board HBSE 11th Class Chemistry Important Questions and Answers

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions in Hindi Medium

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions in English Medium

  • Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry Important Questions
  • Chapter 2 Structure of Atom Important Questions
  • Chapter 3 Classification of Elements and Periodicity in Properties Important Questions
  • Chapter 4 Chemical Bonding and Molecular Structure Important Questions
  • Chapter 5 States of Matter Important Questions
  • Chapter 6 Thermodynamics Important Questions
  • Chapter 7 Equilibrium Important Questions
  • Chapter 8 Redox Reactions Important Questions
  • Chapter 9 Hydrogen Important Questions
  • Chapter 10 The s-Block Elements Important Questions
  • Chapter 11 The p-Block Elements Important Questions
  • Chapter 12 Organic Chemistry – Some Basic Principles and Techniques Important Questions
  • Chapter 13 Hydrocarbons Important Questions
  • Chapter 14 Environmental Chemistry Important Questions

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HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

Haryana State Board HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

प्रश्न 1.
क्षारीय धातुओं के सामान्य भौतिक तथा रासायनिक गुण क्या हैं ?
उत्तर:
क्षार धातुओं के भौतिक गुण:
(1) क्षार धातुएँ बहुत ही नरम तथा चाँदी के समान श्वेत होती है।

(2) घनत्व (Density) – क्षार धातुओं का बड़ा आकार होने के कारण इनका घनत्व कम होता है, जो लीथियम से सीजियम की ओर नीचे जाने पर कम होता जाता है, यद्यपि पोटैशियम धातु सोडियम की तुलना में हल्की होती है।

(3) क्वथनांक एवं गलनांक (Boiling and melting point) – क्षार धातुओं के क्वथनांक एवं गलनांक बहुत कम होते हैं क्योंकि क्षार धातुओं का परमाण्विक आकार अधिक होता है। इस कारण क्रिस्टल जालक में इनकी आबन्धन ऊर्जा का मान भी कम होता है। वर्ग में नीचे जाने पर परमाणुओं का आकार बढ़ता जाता है फलस्वरूप इनके क्वथनांक एवं गलनांक के मान भी कम होते जाते हैं।

Li > Na > K > Rb > Cs > Fr (क्वथनांक एवं गलनांक)

(4) ज्वाला परीक्षण (Flame test) – जब क्षार धातुओं के लवण ज्वाला में गर्म किये जाते हैं तो ये एक विशेष प्रकार के रंग देते हैं। ज्वाला की ऊष्मा से बाह्यतम् कक्ष का इलेक्ट्रॉन उत्तेजित हो जाता है तथा निम्न ऊर्जा स्तर से उच्च ऊर्जा स्तर में पहुँच जाता है। जब यह उत्तेजित इलेक्ट्रॉन वापस अपने कक्ष में पहुँचता है तो ऊर्जा को प्रकाश के रूप में निकालता है तथा ज्वाला में एक विशेष रंग दिखाई देता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 1
क्षार धातुओं में लीथियम का आकार सबसे छोटा होता है। इस कारण इलेक्ट्रॉनों को उत्तेजित करने के लिये अधिकतम ऊर्जा की आवश्यकता होती है जबकि सोडियम के लिये इस ऊर्जा का मान लीथियम से कम होता है। इस प्रकार वर्ग में नीचे जाने पर उत्तेजन के लिए आवश्यक ऊर्जा के मान में कमी आती जाती है। यही कारण है कि तत्वों की ज्वाला का रंग भिन्न-भिन्न होता है।

(5) ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation state) – समूह-1 के तत्व संयोजी कोश में एक इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति होने के कारण +1 ऑक्सीकरण अवस्था को प्रदर्शित करते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 2
(6) धन विद्युती गुण (Electropositive Property) – किसी भी तत्व की इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की प्रवृत्ति धन विद्युती गुण (Electropositive Property) कहलाती है। क्षार धातुओं के धन विद्युती गुण का मान आवर्त सारणी में अधिकतम होता है क्योंकि इनकी आयनन एन्थैल्पी काफी कम होती है। इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की प्रवत्ति वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर अधिक होती जाती है क्योंकि क्षार धातुओं का परमाण्विक आकार बढ़ता जाता है इसके साथ-साथ आयनन विभव भी कम होता जाता है।

Li < Na < K < Rb < Cs < Fr (धन विद्युती गुण)

नोट – आवर्त सारणी में ‘Fr’ सबसे अधिक धन विद्युती होता है।
क्षार धातुएँ एक इलेक्ट्रॉन को त्याग कर एकल संयोजी धनायन बनाती हैं।
M → M+ + e

(7) वैद्युत ॠणात्मकता (Electro negativity) – किसी भी तत्व की वैद्युत ऋणात्मकता उस तत्व द्वारा किसी यौगिक में आबन्धित इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर खींचने की प्रवृत्ति होती है। क्षार धातुओं की वैद्युत ऋणात्मकता सबसे कम होती है। समूह में ऊपर से नीचे आने पर विद्युत ऋणात्मकता का मान घटता जाता है क्योंकि परमाण्विक त्रिज्या का मान बढ़ता जाता है।

Li > Na > K > Rb > Cs > Fr ( वैद्युत ऋणात्मकता)

(8) अपचायक गुण (Reducing property) – क्षार धातुओं के आयनन विभव निम्न होते हैं। इसलिये ये आसानी से इलेक्ट्रॉन त्याग देते हैं, अत: ये प्रबल अपचायक हैं। ऊपर से नीचे आने पर अपचायक गुण बढ़ता जाता है।
Na < K < Rb < Cs < Li
अपवाद – Li क्षार धातुओं में सबसं प्रबलतम अपचायक है। इसके इस अपवाद को हम निम्न प्रकार समझ सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में तीन तरह की ऊर्जा मुख्य रूप से उत्तरदायी होती है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 3
इस पूरी प्रक्रिया में तीन तरह की ऊर्जा मुख्य रूप से उत्तरदायी होरी है।

  • ऊर्ध्वपातन ऊर्जा (Sublimation energy)
  • आयनन ऊर्जा (Ionisation energy)
  • जलयोजन ऊर्जा (Hydration energy)

इन सभी ऊर्जाओं में से ऊर्ध्वपातन एवं आयनन ऊर्जा हमारे द्वारा प्रदान की जाती है जबकि जलयोजन ऊर्जा अभिक्रिया से निकलती है। अत: यह ऊष्माक्षेपी ऊर्जा है। Li में जलयोजन ऊर्जा का मान ऊर्ध्वपातन तथा आयनन ऊर्जा की अपेक्षा बहुत अधिक होता है जिससे पूर्ण अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी हो जाती है तथा Li सबसे प्रबल अपचायक बन जाता है।

(9) प्रकाश वैद्युत प्रभाव (Photo electric effect) – Li के अतिरिक्त सभी क्षार धातुएँ प्रकाश विद्युत प्रभाव प्रदर्शित करती हैं। “जब किसी धातु की सतह पर निश्चित आवृत्ति की किरणें टकराती हैं तो धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होकर निकलते हैं, इसे प्रकाश विद्युत प्रभाव कहते हैं।”
या
“धातु की सतह पर फोटॉन के प्रहार से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन प्रकाश विद्युत प्रभाव कहलाता है।” प्रकाश विद्युत प्रभाव का कारण क्षार धातुओं की न्यूनतम आयनन ऊर्जा है। लीथियम यह प्रभाव नहीं दिखाता क्योंकि इसकी आयनन ऊर्जा का मानु अधिक होता है। क्षार धातुओं के भौतिक गुणों को हम सारणी 10.1 में सूचीबद्ध कर सकते हैं।

क्षार धातुओं के रासायनिक गुण:
क्षार धातुएँ बहुत अधिक क्रियाशील होती हैं क्योकि इनकी आयनन ऊर्जा का मान बहुत कम होता है। क्षार धातुओं के रासायनिक गुण निम्न हैं-

(1) डाई हाइड्रोजन से अभिक्रिया (Reaction with dihydrogen) – लगभग 673K (लीथियम के लिए 1073K) पर क्षार धातुएँ डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया करके हाइड्राइड बनाती हैं। सभी क्षार धातुओं के हाइड्राइड रंगहीन, क्रिस्टलीय एवं आयनिक होते हैं। इन हाइड्राइडों के गलनांक उच्च होते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 4
क्षार धातुओं के हाइड्राइडों की अपचायक क्षमता नीचे जाने पर बढ़ती जाती है क्योंकि बन्ध ऊर्जा का मान कम होता जाता है जिसके कारण धातु तथा हाइड्रोजन के मध्य का बन्ध आसानी से टूट जाता है।

LiH < NaH < KH < RbH < CsH (अपचायक गुण)

क्षार धातुओं के हाइड्राइड कार्बनिक यौगिकों के लिये प्रबल अपचायक का कार्य करते हैं। एक प्रबल अपचायक लीथियम एल्युमीनियम हाइड्राइड को निम्न प्रकार बनाया जा सकता है-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 5
क्षार धातुओं के हाइड्राइड जल से अभिक्रिया करने पर डाइहाइड्रोजन गैस उत्पन्न करते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 6
क्षार धातुओं के हाइड्राइडों का आयनिक अभिलक्षण Li से Cs तक बढ़ता जाता है।

LiH < NaH < KH < RbH < CsH (आयनिक अभिलक्षण)

इसका कारण कम आयनन ऊर्जा है। कम आयनन ऊर्जा के कारण क्षार धातुओं के परमाणु संयोजी इलेक्ट्रॉनों को आसानी से मुक्त कर हाइड्रोजन परमाणु को दे देते हैं जिसके कारण आयनिक हाइड्राइड (MH) बनता है।

(2) द्रव अमोनिया में विलेयता (Solubility in liquid ammonia)-क्षार धातुएँ द्रव अमोनिया में घुलनशील होती हैं। ये अमोनिया के साथ गहरे नीले रंग का विलयन बनाती हैं जो कि विद्युत का सुचालक होता है। क्षार धातुएँ कम आयनन ऊर्जा के कारण द्रव अमोनिया में आयनीकृत हो जाती हैं तथा अमोनीकृत धनायन एवं अमोनीकृत ऋणायन बनाती हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 7
क्षार धातुओं का अमोनिया में नीले रंग के विलयन के बनने का कारण अमोनीकृत इलेक्ट्रॉन होते हैं जो कि दृश्य प्रकाश क्षेत्र की संगत ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं। अमोनीकृत विलयन अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है, जो कुछ समय पड़े रहने पर हाइड्रोजन को मुक्त करता है। फलस्वरूप विलयन में ऐमाइड बनता है।

M+(am) + e + NH3(l) → MNH2(am) + 1/2H2(g)

जहाँ ‘am’ अमोनीकृत विलयन दर्शाता है। सान्द्र विलयन में नीला रंग ब्रॉन्ज रंग में बदल जाता है और विलयन प्रतिचुम्बकीय (diamagnetic) हो जाता है।

(3) वायु के साथ अभिक्रियाशीलता (Reactivity with air) – क्षार धातुएँ वायु की उपस्थिति में मलिन (exposed) हो जाती हैं; क्योंकि वायु की उपस्थिति में इन पर ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड की पर्त बन जाती है। ये ऑक्सीजन में तीव्रता से जलकर ऑक्साइड बनाती हैं। लीथियम और सोडियम क्रमशः मोनोऑक्साइड तथा परॉक्साइड का निर्माण करती हैं, जबकि अन्य धातुओं द्वारा सुपर ऑक्साइड आयन का निर्माण होता है। सुपर ऑक्साइड \(\mathrm{O}_2^{-}\) बड़े धनायनों; जैसे K+, Rb+ तथा Cs+ की उपस्थिति में स्थायी होता है।

4Li + O2 → 2Li2O (ऑक्साइड)
2Na +O2 → Na2O2 (परॉक्साइड)
M + O2 → MO2 (सुपर ऑक्साइड) (M = K, Rb, Cs)

इन सभी ऑक्साइडो में क्षार की ऑक्सीकरण अवस्था +1 होती है। लीथियम अपवाद स्वरूप वायु में उपस्थित नाइट्रोजन से अभिक्रिया करके नाइट्राइड, Li3N बना लेता है। इस प्रकार लीथियम भिन्न स्वभाव प्रदरित करता है। क्षार धातुओं की ऑक्सीजन के साथ अभिक्रियाशीलता Li से Cs तक बढ़ती जाती है क्योंकि आयनन ऊर्जा का मान कम होता जाता है।

क्षार धातुओं के ऑक्साइडों का स्थायित्व अभिक्रिया में भाग लेने वाले धनायनों एवं ऋणायनों के आकार एवं इन पर उपस्थित आवेशों पर निर्भर करता है। एक बड़े आकार का धनायन सदैव बड़े आकार के ऋणायन को स्थायी करेगा जबकि एक छोटे आकार का धनायन, एक छोटे आकार के ऋणायन को स्थायी करेगा। यही कारण है कि लीथियम आयन (Li+) आकार में छोटा होने के कारण एक छोटे ऋणायन जैसे ऑक्साइड आयन (O2-) के साथ संयोजन कर ऑक्साइड बनाता है। इसी प्रकार सोडियम आयन (Na+) का आकार बड़ा होता है।

इस कारण यह बड़े “आकार के परॉक्साइड आयन (\(\mathrm{O}_2{ }^{2-}\)) के साथ संयोजन करके परॉक्साइड बनाता है जबकि K+, Rb+, Cs+ अधिक बड़े आकार के होने के कारण सुपर ऑक्साइड आयन (\(\mathrm{O}_2^{-}\)) से क्रिया कर सुपर ऑक्साइड बनाते हैं।
ऑक्साइड, परऑक्साइड एवं सुपर ऑक्साइड आयनों की संरचना निम्न है-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 8
ऑक्साइड एवं परॉक्साइड आयन अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति के कारण प्रतिचुम्बकीय प्रकृति के होते हैं जबकि सुपर ऑक्साइड आयन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण अनुचुम्बकीय प्रकृति का होता है।

(4) हैलोजनों से अभिक्रियाशीलता (Reactivity with halogens)-क्षार धातुएँ हैलोजन से प्रबल अभिक्रिया करके आयनिक हैलाइड बनाती हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 9
(M = Li, Na, K, Rb, Cs)
धातु की क्रियाशीलता का क्रम :
Li < Na < K < Rb <Cs
आयनन ऊर्जा कम होने के कारण क्रियाशीलता समूह में नीचे जाने पर बढ़ती है।
हैलोजनों की क्रियाशीलता का क्रम :
F2 > Cl2 > Br2 > I2
विद्युत ऋणात्मकता का मान वर्ग में नीचे जाने पर घटता जाता है अतः क्रियाशीलता कम होती जाती है।

यद्यपि लीथियम के हैलाइड आंशिक रूप से सहसंयोजक होते हैं। इसका कारण लीथियम की उच्च ध्रुवण-क्षमता है। (धनायन के कारण ऋणायन के इलेक्ट्रॉन अभ्र का विकृत होना ‘ध्रुवणता’ (polarisation) कहलाता है।) लीथियम आयन का आकार छोटा होता है; अतः यह हैलाइड आयन के इलेक्ट्रॉन अभ्र को विकृत करने की अधिक क्षमता दर्शाता है।

चूँकि बड़े आकार का ऋणायन आसानी से विकृत हो जाता है, इसलिए लीथियम आयोडाइड सहसंयोजक प्रकृति सबसे अधिक दर्शां हैं। अन्य क्षार धातुएँ आयनिक प्रवृत्ति की होती हैं। इनके गलनांक तथा क्वथनांक उच्च होते हैं। गलित हैलाइड विद्युत के सुचालक होते है। इनका प्रयोग क्षार धातुएँ बनाने में किया जाता है।

ध्रुवणता को हम फर्जॉन के नियम (Fajan’s Rule) द्वारा समझ सकते हैं। इसके अनुसार जिन यौगिको में निम्न प्रकृति होती है वे अधिक ध्रुवणता को प्रदर्शित करते हैं अर्थात् उनमें सहसंयोजक प्रकृति अधिकत। में पायी जाती है।

  • धनायन का आकार छोटा होना चाहिये।
  • ऋणायन का आकार बड़ा होना चाहिये।
  • धनायन एवं ऋणायन पर आवेश अधिक होना चाहिये।

उपरोक्त नियम के आधार पर हम हैलाइडों में उपस्थित आयनिक प्रवृत्ति को आसानी से समझ सकते हैं।

आयनिक प्रवृत्ति-
LiCl < NaCl < KCl < RbCl < CsCl < FrCl सहसंयोजक प्रवत्ति- LiCl > NaCl > KCl > RbCl > CsCl > FrCl

(5) जल से अभिक्रिया (Reaction with water) – क्षार धातुओं के ऑक्साइड, परॉक्साइड तथा सुपर ऑक्साइड जल में विलेय होकर घुलनशील हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं, जिन्हें क्षारक (Alkalies) कहा जाता है। उदाहरणार्थ-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 10
यद्यपि लीथियम के मानक इलेक्ट्रोड विभव (EΘ) का मान अधिकतम ऋणात्मक होता है, परन्तु जल के साथ इसकी अभिक्रियाशीलता सोडियम की तुलना में कम है, लीथियम के इस व्यवहार का कारण इसका छोटा आकार तथा अत्यधिक जलयोजन ऊर्जा का होना है। अन्य क्षार धातुएँ जल के साथ विस्फोटक अभिक्रिया करती हैं।

चूँकि अभिक्रिया उच्च ऊष्माक्षेपी होती है तथा विमुक्त होने वाली हाइड्रोजन आग पकड़ लेती है, इसलिए क्षार धातुओं को जल के सम्पर्क में नहीं रखते। यही कारण है कि लीथियम को छोड़कर सभी क्षार धातुओं को मिट्टी के तेल में रखते है। चूँक लीथियम का घनत्व कम होता है जिसके कारण यह मिट्टी के तेल की सतह पर तैरने लगता है, इस कारण इसे पैराफीन मोम में रखा जाता है।

क्षार धातुओं के हाइड्रॉक्साइड प्रबल क्षारीय प्रकृति के होते हैं। क्योंकि इनकी आयनन ऊर्जा कम होती है।
LiOH < NaOH < KOH < RbOH < CsOH (क्षारीय प्रकृति)

(6) क्षार धातुओं के अपचायक गुण (Reducing properties of slkali metals) – क्षार धातुएँ प्र बल अपचायक होती हैं क्योंकि जो तत्व जितनी आसानी से इलेक्ट्रॉनों का त्याग करता है वह उतना १े अच्छा अपचायक होता है। क्षार धातुओं की आयनन ऊर्जा का मान कम होता है अतः ये अच्छी अपचायक होती हैं।

उदाहरणार्थ-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 11

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

प्रश्न 2.
क्षारीय मृदा धातुओं के सामान्य अभिलक्षण एवं गुणों में आवर्तिता की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
क्षारीय मृदा धातुओं के यौगिकों के सामान्य अभिलक्षण निम्न प्रकार होते हैं।

(1) ऑक्साइड (Oxides)-ऑक्साइडों में BeO, जोकि सहसंयोजी है को छोड़ शेष सभी धातुओं के ऑक्साइड सफेद क्रिस्टलीय आयनिक ठोस हैं। ऑक्साइडों की क्षारीय प्रबलता समूह से नीचे जाने पर बढ़ती है। BeO < MgO < CaO < SrO < BaO ( क्षारीय प्रबलता)
ऑक्साइड जल से क्रिया कर अल्प विलेय हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं।
MO + H2O → M(OH)2
यहाँ (M = Mg, Ca, Sr, Ba, Ra)

(2) हाइड्रॉक्साइड (Hydroxides) – इनके हाइड्रॉक्साइड प्रबल क्षारीय होते हैं। ये जल में विलेय होते हैं। क्षारीय मृदा धातुओं के हाइड्रॉक्साइडों को गर्म करने पर ये धातु ऑक्साइड एवं जल में अपघटित हो जाते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 12
क्षारीय मृदा धातुओं के हाइड्रांक्साइडों के जलीय विलयन में CO2 गैस प्रवाहित करने से उनके कार्बोनेट अवक्षेपित हो जाते हैं। CO2 गैस की अधिकता में प्रवाहित करने से उनके कार्बोनेट जल में विलेय बाई कार्बोनेटों में बदल जाते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 13
क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइड धातुओं के संगत हाइड्रॉक्साइडों की तुलना में कम स्थायी होते हैं। हाइड्रॉक्साइडों का तापीय स्थायित्व, क्षारीय गुण, पानी में विलेयता ग्रुप में नीचे जाने पर बढ़ती जाती है क्योंकि धनायन का आकार नीचे बढ़ने पर बढ़ता जाता है जिससे M-OH बन्ध क्षीण होता जाता है और क्षारीय गुण बढ़ जाता है।

Be(OH)2 < Mg(OH)2 < Ca(OH)2 < Sr(OH)2 < Ba(OH)2

समूह में नीचे जाने पर आयनिक प्रवृति बढ़ती जाती है अतः जालक ऊर्जा बढ़ती है और तापीय स्थायित्व भी बढ़ जाता है।

(3) हैलाइड (Halide) – बेरीलियम हैलाइड के अतिरिक्त अन्य धातुओं के हैलाइडों की प्रकृति आयनिक होती है। बेरीलियम के हैलाइड सह संयोजक होते हैं। एवं कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं। ठोस अवस्था में बेरीलियम क्लोराइड की शृखला संरचना होती है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 14
वाष्प अवस्था में BeCl2 क्लोरो-सेतु द्विलक बनाता है जो 1200K के उच्च ताप पर रेखीय एकलक में वियोजित हो जाता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 15
हैलाइडों की हाइड्रेट बनाने की प्रवृति नीचे जाने पर कम होती जाती है क्योंकि जलयोजन ऊर्जा का मान कम हो जाता है।
MgCl2 . 8H2O
CaCl2 . 6H2O
SrCl2 . 6H2O
BaCl2 . 2H2O
हैलाइडों की विलेयता पानी में नीचे जाने पर घटती जाती है क्योंकि जलयोजन ऊर्जा घटती है तथा जालक ऊर्जा बढ़ती है। यही कारण है कि फ्लुओराइड क्लोराइड की तुलना में कम विलेय होते हैं।

(4) ऑक्सी अम्लों के लवण (Salts of oxyacids) – ऑक्सी अम्लों के लवण निम्न हैं-

(A) कार्बोनेट (Carbonates) – क्षारीय मृदा धातुओं के कार्बोनेट जल में अविलेय होते हैं जिन्हें इन तत्वों के विलेय लवणों के विलयन में सोडियम या अमोनियम कार्बोनेट विलयन मिलाकर अवक्षेपित किया जा सकता है। कार्बोनेट की विलेयता पानी में नीचे समूह में जाने पर घटती जाती है क्योंकि जालक ऊर्जा बढ़ती है परन्तु जलयोजन ऊर्जा घटती है।

BeCO3 > MgCO3 > CaCO3 > SrCO3 > BaCO3 (घुलनशीलता)

जल में कार्बोनेटों की घुलनशीलता CO2 को प्रवाहित करने पर बढ़ जाती है क्योंक कार्बोनेट बाइकार्बोनेट में परिवर्तित हो जाते हैं।

MCO3 + H2O + CO2 → M(HCO3)2 (बाइकार्बोनेट)

कार्बोनेटों का तापीय स्थायित्व BeCO3 से BaCO3 तक बढ़ता है। BeCO3 इतना अधिक अस्थायी होता है कि अग्र अभिक्रिया को न्यूनतम करने हेतु इसे CO2 के वातावरण में रखना पड़ता है।

BeCO3 < MgCO3 < CaCO3 < SrCO3 < BaCO3 (तापीय स्थायित्व)

इसका कारण यह है कि ऑक्साइडों का स्थायित्व जितना अधिक होगा, कार्बोनेटों की ऑक्साइड बनाने की प्रवृत्ति भी उतनी ही अधिक होगी अर्थात् BeO अधिकतम एवं BaO न्यूनतम स्थायो होता है।

(B) सल्फेट (Sulphate) – क्षारीय मृदा धातुओं के सल्फेट श्वेत एवं ठोस होते हैं तथा ताप के प्रति स्थायी होते हैं। यद्यपि उच्च ताप पर ये अपघटित होकर SO2 तथा O2 दे सकते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 16
BeSO4 एवं MgSO4 शीघ्रता से जल में विलेय हो जाते हैं। CaSO4 से BaSO4 तक विलेयता कम होती जाती है। Be2+ तथा Mg2+ आयनों की जलयोजन एन्थैल्पी इनकी जालक एन्थैल्पी की तुलना में अधिक होती है। अतः इनके सल्फेट जल में विलेय होते हैं।
BeSO4 > MgO > CaSO4 > SrSO4 > BaSO4
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 17
BeSO4 < MgSO4 < CaSO4 > SrSO4 > BaSO4 (तापीय स्थायित्व )

(C) नाइट्रेट (Nitrate) – इन धातुओं के कार्बोनेटों को तनु नाइट्रिक अम्ल में घोलकर इनके नाइट्रेट प्राप्त किए जाते हैं। उदाहरणार्थ-

MCO3 + 2HNO3 → M(NO3)2 + H2O + CO2 ↑(M = Be, Mg, Ca, Sr, Ba)

मैग्नीशियम नाइट्रेट जल के छह अणुओं के साथ क्रिस्टलित होता है, जबकि बेरियम नाइट्रेट निर्जल लवण के रूप में क्रिस्टलित होता है। यह फिर बढ़ते आकार के साथ घटती जलयोजन एन्थैल्पी के कारण कम जलयोजित लवण बनाने की प्रवृत्ति को पुन: दर्शाता है। लीथियम नाइट्रेट के समान सभी नाइट्रेट गर्म करने पर अपघटित होकर ऑक्साइड बनाते है।
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इनकी विलेयता नीचे जाने पर घटती जाती है क्योंकि जालक ऊर्जा बढ़ती है तथा जलयोजन ऊर्जा घटती है।

Be(NO3)2 > Mg(NO3)2 > Ca(NO3)2 >Sr(NO3)2 > Ba(NO3)2 (विलेयता)

Be(NO3)2 < Mg(NO3)2 < Ca(NO3)2 < Sr(NO3)2 < Ba(NO3)2 (तापीय स्थायित्व)

आवर्त सारणी में s-ब्लॉक के तत्वों का द्वितीय समूह क्षारीय मृदा धातुएँ (Alkaline earth metals) कहलाता है क्योंकि इस समूह के सभी तत्वों के ऑक्साइड क्षारीय एवं मृदा की तरह अगलनीय होते हैं एवं ये . सामान्यतः भू-पर्पटी (earth crust) में पाये जाते हैं। क्षारीय मृदा धातुएँ अत्यधिक क्रियाशील होती हैं अतः इस कारण ये स्वतन्त्र अवस्था में नहीं पायी जाती हैं। द्वितीय समूह में कुल छः क्षारीय मृदा धातुएँ होती हैं जो कि इस प्रकार हैं-

  1. बेरीलियम (Be)
  2. मैग्नीशियम (Mg)
  3. कैल्सियम (Ca)
  4. स्ट्रॉन्शियम (Sr)
  5. बेरियम (Ba)
  6. रेडियम (Ra)

इन सभी क्षारीय मृदा धातुओं में भू-पर्पटी में उपस्थिति के आधार पर कैल्सियम व मैग्नीशियम का स्थान क्रमशः पाँचवाँ व छठवाँ है। स्ट्रॉन्शियम एवं बेरियम की उपलब्धता बहुत कम है। बेरीलियम एक दुर्लभ धातु है जबकि रेडियम की मात्रा आग्नेय शैल में केवल 10-10% है।

इलेक्ट्रानिक विन्यास: क्षारीय मृदा धातुओं का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (उत्कृष्ट गैस) ns2 होता है। क्षारीय मृदा धातुओं का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार होता है-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 19
4Be – 1s2, 2s2
12Mg – 1s2, 2s22p6, 3s2
20Ca – 1s2, 2s22p6, 3s23p6, 4s2
38Sr – 1s2, 2s22p6, 3s23p63d10, 4s24p6, 5s2
56Ba – 1s2, 2s22p6, 3s23p63d10, 4s24p6,4d10, 5s25p6, 6s2
88Ra – 1s2, 2s22p6, 3s23p63d10, 4s24p6,4d10, 5s25p6, 6s26p6, 7s1

(1) परमाण्विक त्रिज्या (Atomic Radius) – क्षारीय मृदा धातुओं की परमाण्विक त्रिज्याएँ समूह में ऊपर से नीचे आने पर बढ़ती हैं क्योंकि कक्षकों की संख्या बढ़ जाती है।
Be < Mg < Ca < Sr Ba Ra (परमाण्विक त्रिज्याएँ)
क्षारीय मृदा धातुओं की त्रिज्याएँ अधिक होती हैं परन्तु ये समान आवर्त में उपस्थित क्षार धातुओं से कम होती हैं। चूँकि इन तत्वों के परमाणुओं में मात्र दो संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं तथा नाभिकीय आकर्षण बल काफी कम होता है अतः क्षारीय मृदा धातुओं का परमाण्विक आकार पर्याप्त रूप से अधिक होता है।

(2) आयनिक त्रिज्या (lonic Radius) – ये सभी तत्व दो इलेक्ट्रॉनों को त्यागकर द्वि-संयोजी धनायन (M2+ ) बनाते हैं। आयनिक त्रिज्या का मान समूह में नीचे जाने पर बढ़ता जाता है पर आयनिक त्रिज्याएँ परमाण्विक त्रिज्याओं से छोटी होती हैं।
Be2+ < Mg2+ < Ca2+ < Sr2+ < Ba2+

(3) आयनन एन्थैल्पी (lonisation Enthelpy ) – क्षारीय मृदा धातुओं के प्रथम आयनन विभव (I1) क्षार धातुओं से ऊँचे होते हैं क्योंकि क्षारीय मृदा धातुओं के तत्वों का आकार क्षार धातुओं के तत्वों के आकार से छोटा होता है। इनके आयनन विभव के मान वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटते जाते हैं क्योंकि परमाण्विक आकार बढ़ता जाता है।

M + I.E. (1) → M+(g) + e
M(g) + I.E. (1) → M++(g) + e
Be > Mg > Ca > Sr> Ba (आयनन ऊर्जा )

इन तत्वों के प्रथम द्वितीय व तृतीय आयनन विभवों के मान निम्न

धातुBeMgCaSrBa
IE (1) (eV)9.327-646.115.705-2
IE (2) (eV)18.2115.0311-8711-010-0
IE (3) (eV)153-8580-1251.2143-635.5

जैसा कि उपरोक्त मानों से स्पष्ट है कि क्षारीय मृदा धातुओं के प्रथम और द्वितीय आयनन विभवों के मानों में अन्तर कम है और उनके द्वि-संयोजक यौगिकों की जालक ऊर्जा एक संयोजक यौगिकों से उच्च है। अतः क्षारीय मृदा धातुएँ M+ प्रकार के धनायनों का निर्माण न करके M2+ प्रकार के धनायन बनाती हैं। क्षारीय मृदा धातुओं के IE 2 व IE 3 का अन्तर बहुत अधिक होने के कारण क्षारीय मृदा धातुएँ M3+ आयन नहीं बनाती हैं।

(4) जलयोजन ऊर्जा (Hydration Energy ) – ऊपर से नीचे आने पर आकार बड़ा होता जाता है। अतः जलयोजन एन्थैल्पी का मान घटता जाता है। क्षारीय मृदा धातुओं की जलयोजन ऊर्जा क्षार धातुओं की तुलना में ज्यादा होती है। इसलिये मृदा धातुओं के यौगिक क्षार धातुओं की तुलना में अधिक जलयोजित होते हैं।
Be2+ > Mg2+ > Ca2+ > Sr2+ > Ba2+ > Ra2+
क्षारीय मृदा धातुओं के गुणों को सारणी 10-2 में प्रदर्शित किया गया है।

क्षारीय मृदा धातुओं के परमाण्विक एवं भौतिक

गुणबेरीलियम Beमैग्नीशियम Mgकैल्सियम Caस्ट्रॉन्शियम Srबेरियम Baरेडियम Ra
परमाणु क्रमांक41220385688
परमाणु द्रव्यमान /g mol-19.0124.3140.0887.62137.33226.03
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास[He]2s2[Ne]3s2[Ar]4s2[Kr]5s2[Xe]6s2[Rn]7s2
आयनन एन्थैल्पी (I) kJ mol-1899737590549503509
आयनन एन्थैल्पी (II) kJ mol-11757145011451064965979
जलयोजन एन्थैपी (kJ mol-1)-2494-1921-1577-1443-1305
धात्विक त्रिज्या/pm112160197215222
आयनी त्रिज्या M2+/pm3172100118135148
गलनांक/K1560924112410621002973
क्वथनांक/K27451363176716552078(1973)
घनत्व / g cm-31.841.741.552.633.59(5.5)
मानक विभव EΘ/V (M2+/M)-1.97-2.36-2.84-2.89-2.92-2.92
स्थलमण्डल में प्राप्ति2*2.76**4.6**384*390*10-6

मृदा धातुओं के भौतिक गुण –

(1) क्षारीय मृदा धातुएँ सामान्यतया चाँदी की भाँति सफेद, चमकदार एवं गरम, परन्तु अन्य धातुओं की तुलना में कठोर होती हैं।

(2) बेरीलियम तथा मैग्नीशियम लगभग धूसर रंग (Greyish) के होते हैं।

(3) क्वथनांक एवं गलनांक (Boiling and Melting Point)- क्षारीय मृदा धातुओं के क्वथनांक एवं गलनांक क्षार धातुओं से अधिक होते हैं क्योंकि इनका आकार छोटा होता है।

(4) घनत्व (Density) – क्षारीय मृदा धातुओं का घनत्व उसी आवर्त मैं उपस्थित क्षार धातुओं से अधिक होता है। घनत्व पहले Be से Ca तक बढ़ता है और बाद में Ca से Ba तक घटता है। घनत्व की यह अनियमित प्रकृति उनकी क्रिस्टलीय संरचना के कारण होती है।

(5) ज्वाला परीक्षण (Flame test) – Be तथा Mg को छोड़कर अन्य सभी तत्व ज्वाला में रंग देते हैं। Be तथा Mg ज्वाला में कोई भी रंग नहीं देते हैं क्योंकि इनकी आयनन ऊर्जा का मान बहुत अधिक होता है। अन्य सभी तत्व निम्न रंग देते हैं-

CaSrBa
ईंट जैसाकिरमिजीहरा
लाललाल

ज्वाला में उच्च ताप पर वाष्प अवस्था में क्षारीय मृदा धातुओं के बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तर में चले जाते हैं। ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन जब पुनः अपनी तलस्थ अवस्था में लौटते हैं, तब दृश्य प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं, जिससे ज्वाला रंगीन दिखायी देती है।

(6) ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation state) – समूह दो के तत्व संयोजी कोश में दो इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण +2 ऑक्सीकरण अवस्था को प्रदर्शित करते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 20
(7) विद्युत ऋणात्मकता (Electronegativity) – क्षारीय मृदा धातुओं की विद्युत ऋणात्मकताओं के मान कम होते हैं। विद्युत ऋणात्मकता समुह में नीचे जाने पर घटती जाती है।

तत्वBeMgCaSrBa
विद्युत ऋणात्मकता1.51.21.01.00.9

प्रश्न 3.
क्षार धातुएँ प्रकृति में क्यों नहीं पायी जाती हैं ?
उत्तर:
क्षार धातुएँ कम आयनन एन्थैल्पी तथा प्रबल धन-विद्युती गुण के कारण उच्च क्रियाशील होती हैं। ये प्रकृति में मुक्त अवस्था में नहीं पाई जार्ती तथा सदैव अन्य तत्वों के साथ संयुक्त रहती हैं। इसलिए सामान्यतया क्षार धातुएँ प्रकृति में नहीं पाई जाती हैं।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

प्रश्न 4.
Na2O2 में सोडियम की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माना Na2O2 में सोडियम की ऑक्सीकरण अवस्था x है। तब
x – 1
Na2O2
2 x+2(-1) & =0
x =+1
अत: Na2O2 में सोडियम की ऑक्सीकरण अवस्था + 1 है।

प्रश्न 5.
पोटैशियम की तुलना में सोडियम कम अभिक्रियाशील क्यों है ? बताइये ।
उत्तर:
सोडियम कम अभिक्रियाशील होता है क्योंकि इसकी आयनन एन्थैल्पी पोटैशियम की तुलना में कम हैं। तथा पोटैशियम सोडियम की तुलना में अधिक धन-विद्युती तथा प्रबल अपचायक होता है। यह सोडियम की तुलना में जल से अधिक तीव्रता के साथ अभिक्रिया करता है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित के सन्दर्भ में क्षार धातुओं एवं क्षारीय मृदा धातुओं की तुलना कीजिए-
(क) आयनन एन्थैल्पी,
(ख) ऑक्साइडों की क्षारकता,
(ग) हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता।
उत्तर:
(क) आयनन एन्थैल्पी-क्षारीय मृदा धातुओं (वर्ग 2) की आयनन एन्थैल्पी समान आवर्त में उपस्थित क्षार धातुओं (वर्ग 1) की तुलना में अधिक होती है। इसका कारण क्षारीय मृदा धातुओं के परमाणुओं का छोटा आकार तथा अधिक सममिताकार विन्यास है। उदाहरणार्थ-
सोडियम (Na) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी = 496 kJ mol-1
मैग्नीशियम (Mg) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी = 737 kJ mol-1

(ख) ऑक्साइडों की क्षारकता-क्षार धातुओं के ऑक्साइड समान आवर्त में उपस्थित क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइडों की तुलना में प्रबल क्षारक होते हैं। उदाहरणार्थ- जब Na2O को जल में घोला जाता है, NaOH प्राप्त होता है जो एक प्रबल क्षारक है, जबकि MgO को जल में घोलने पर दुर्बल क्षारक, Mg(OH)2 प्राप्त होता है।

(ग) हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता- क्षार धातु हाइड्रॉक्साइड समान आवर्त में उपस्थित क्षारीय मृदा धातु हाइड्रॉक्साइडों की तुलना में जल में अधिक विलेय होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि क्षारीय मृदा धातुओं के हाइड्रॉक्साइडों की जालक ऊर्जा (Lattice energy) क्षार धातुओं के हाइड्रॉक्साइडों की तुलना में उच्च होती है।

प्रश्न 7.
लीथियम किस प्रकार मैग्नीशियम से रासायनिक गुणों में समानताएँ दर्शाता है ?
उत्तर:
लीथियम एवं मैग्नीशियम के रासायनिक गुणों में समानता के प्रमुख बिन्दु निम्नवत् हैं-
(1) लीथियम एवं मैग्नीशियम जल के साथ धीमी गति से अभिक्रिया करते हैं। इनके ऑक्साइड एवं हाइड्रॉक्साइड बहुत कम घुलनशील हैं। हाइड्रॉक्साइड गर्म करने पर विघटित हो जाते हैं। दोनों ही नाइट्रोजन से सीधे संयोग करके क्रमश: Li3N एवं Mg3N2 नाइट्राइड बनाते हैं।

(2) Li2O एवं MgO औक्सीजन के आधिक्य से अभिक्रिया करके सुपर ऑक्साइड नहीं बनाते हैं।

(3) लीथियम एवं वैग्नीशियम धातुओं के कार्बोनेट गम करने पर सरलतापूर्वंक बिघटित के का उनके आक्साद्ड एवं CO2 बनाते हैं। दोनों

(4) LiCl एवं MgCl2 एहधन में विलेय हैं।

(5) LiCl एवं MgCl2 दोनों ही प्रस्वेद्य (deliquescent) यौगिक हैं। ये जलीय विलयन से LiCl.2H2O एवं MgCl2.8H2O के रूप में क्रिस्टलीकृत होते हैं। नोट-अधिक जानकारी के लिए कृपया अनुच्छेद संख्या 10.6 को पृष्ठ संख्या 153 पर देखें।

प्रश्न 8.
क्षार धातुएँ तथा क्षारीय मृदा धातुएँ रासायनिक अपचयन विधि से क्यों नहीं प्राप्त की जा सकती हैं ? समझाइए।
उत्तर:
क्षार धातु तथा क्षारीय मृदा धतु परिवार के सदस्य अत्यन्त प्रबल अपचायक होते हैं। इसलिए इनके ऑक्साइडों को साधारण अपचायकों; जैसे-कार्बन (कोक), जिंक आदि की अभिक्रिया द्वारा अपचयित करना सम्भव नहीं है। इन्हें सामान्यतया इनके लवणों का गलित अवस्था में विद्युत-अपघटन कराने पर पृथक्कृत किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
प्रकाश-विद्युत सेल में लीथियम के स्थान पर पोटैशियम एवं सीजियम क्यों प्रयुक्त किए जाते हैं ?
उत्तर:
लीथियम की आयनन एन्थैल्पी अत्यन्त उच्च होती है। इस कारण प्रकाश के फोटॉन लीथियम धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन निष्कासित नहीं कर पाते हैं। अतः लीथियम धातु को प्रयोग करने पर प्रकाश-विद्युत प्रभाव नहीं देखा जाता है। पोटैशियम तथा सीजियम की आयनन एन्थैल्पी अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए जब निश्चित न्यूनतम आवृत्ति के फोटॉन इन धातुओं की सतह से टकराते हैं तो इन धातुओं की सतह से इलेक्ट्रॉन सरलता से उत्सर्जित हो जाते हैं।

प्रश्न 10.
जब एक क्षार धातु को द्रव अमोनिया में घोला जाता है, तब विलयन विभिन्न रंग प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार के रंग-परिवर्तन का कारण बताइए।
उत्तर:
क्षार धातुएँ द्रव अमोनिया में घुलनशील हैं। अमोनिया में इनके विलयन का रंग गहरा नीला होता है एवं विलयन प्रकृति में विद्युत का सुचालक होता है-

M + (x + y) NH3 → [M(NH3)x]+ + [e(NH3)y]

विलयन का नीला रंग अमोनीकृत इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है, जो दृश्य प्रकाश क्षेत्र की संगत ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं। अमोनीकृत विलयन अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है, जो कुछ समय पड़े रहने पर हाइड्रोजन को मुक्त करता है। फलस्वरूप विलयन में ऐमाइड बनता है।

M+(am) + e + NH3(l) → MNH2(am) + 1/2H2(g)
(यहाँ ‘am’ अमोनीकृत विलयन दर्शाता है।)
सान्द्र विलयन का नीला रंग ब्रॉन्ज में बदल जाता है और विलयन प्रतिचुम्बकीय हो जाता है।

प्रश्न 11.
ज्वाला को बेरिलियम एवं मैग्नीशियम कोई रंग नहीं प्रदान करते हैं, जबकि अन्य क्षारीय मृदा धातुएँ ऐसा करती हैं। क्यों ?
उत्तर:
बेरिलियम एवं मैग्नीशियम के परमाणुओं में इनके छोटे आकार के कारण बाह्यतम कोशों के इलेक्ट्रॉन इतनी प्रबलता से बँधे रहते हैं कि यदाला की ऊर्जा द्वारा इनका उत्तेजित होना कठिन हो जाता है। अतः ज्वाला में इन दोनों धातुओं का अपना कोई अभिलाक्षणिक रंग नहीं होता है। इन दोनों तत्वों के अतिरिक्त क्षारीय मृदा धातु परिवार के अन्य सदस्य, कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियम एवं बेरियम ज्वाला को क्रमशः ईंट जैसा लाल (brick red) रंग, किरमिजी लाल (Crimson red) एवं हरा (apple green) रंग प्रदान करते हैं।

ज्वाला में उच्च ताप पर वाष्प-अवस्था में क्षारीय मृदा धातुओं के बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तर पर चले जाते हैं। ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन जब पुन: अपनी तलस्थ अवस्था में लौटते हैं, तब दृश्य प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित होती है। फलस्वरूप ज्वाला रंगीन दिखाई देने लगती है।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

प्रश्न 12.
सॉल्वे प्रक्रम में होने वाली विभित्र अभिक्रियाओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
साधारणतया सोडियम कार्बोनेट ‘सॉल्वे विधि’ द्वारा बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में लाभ यह है कि सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट जो अमोनियम हाइड्रोजन कार्बोनेट एवं सोडियम क्लोराइड के संयोग से अवक्षेपित होता है, अल्प विलेय होता है। अमोनियम हाइड्रोजनकार्बोनेट CO2 गैस को सोडियम क्लोराइड के अमोनिया से संतृप्त सान्द्र विलयन में प्रवाहित कर बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में पहले अमोनियम कार्बोनेट और फिर अमोनियम हाइड्रोजन कार्बोनेट बनता है। सम्पूर्ण प्रक्रम की अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं-

2NH3 + H2O + CO2 → (NH4)2 CO3
(NH4)2 CO3 + H2O + CO2 → 2NH4HCO3 अमोनियम हाइड्रोजन कार्बोनेट
NH4HCO3 + NaCl → NH4Cl + NaHCO3 सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट

इस प्रकार सोडियम बाइकार्बोनेट के क्रिस्टल पृथक् हो जाते हैं जिन्हें गर्म करके सोडियम कार्बोनेट प्राप्त किया जाता है-

2NaHCO3 → Na2CO3 + CO2 ↑ + H2O

इस प्रक्रम में NH4Cl युक्त विलयन की Ca(OH)2 से अभिक्रिया पर NH3 को पुनः प्राप्त किया जा सकता है। कैल्सियम क्लोराइड सह-उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है-

2NH4Cl + Ca(OH)2 → 2NH3 ↑ + CaCl2 + 2H2O

प्रश्न 13.
पोटैशियम कार्बोनेट सॉल्वे विधि द्वारा नहीं बनाया जा सकता है। क्यों ?
उत्तर:
सॉल्वे विधि का उपयोग पोटैशियम कार्बोनेट के निर्माण में नहीं किया जा सकता है; क्योंकि पोटैशियम हाइड्रोजन कार्बोनेट की अधिक विलेयता के कारण इसे पोटैशियम क्लोराइड के संतृप्त विलयन में अमोनियम हाइड्रोजन कार्बोनेट के संयोग द्वारा अवक्षेपित करना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 14.
LI2CO3 कम ताप पर एवं Na2CO3 उच्च ताप पर क्यों विघटित होता है?
उत्तर:
गर्म करने पर, Li2CO3 विघटित होकर Li2O तथा CO2 बनाता है। Li+ आयन का छोटा आकार Li2O के जालक को Li2CO3 के जालक से अधिक स्थायी बना देता है क्योंकि यहाँ पर Li+ तथा O2- दोनों ही छोटे आकार के होते हैं, परन्तु Na+ आयन का बड़ा आकार Na2O के जालक को Na2CO3 के जालक से कम स्थायी कर देता है क्योंकि Na+ तथा \(\mathrm{CO}_3^{2-}\) दोनों ही बड़े आकार के हैं। फलस्वरूप Na2CO3 उच्च ताप पर भी विघटित नहीं होता है, जबकि Li2CO3 कम ताप पर ही विघटित हो जाता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 21

प्रश्न 15.
क्षार धातुओं के निम्नलिखित यौगिकों की तुलना क्षारीय मृदा धातुओं के संगत यौगिकों से विलेयता एवं तापीय स्थायित्व के आधार पर कीजिए-(क) नाइट्रेट (ख) कार्बोनेट (ग) सल्फेट।
उत्तर:
विलेयता एवं तापीय स्थायित्व के आधार पर क्षार धातुओं के यौगिकों की तुलना क्षारीय मृदा धातुओं के संगत यौगिकों से अग्रलिखित प्रकार की जा सकती है-

क्षार धातुओं के यौगिक
(क) नाइट्रेट-
(i) विलेयता-आयनिक प्रकृति के कारण ये यौगिक जल में विलेय होते हैं। इनकी विलेयता ग्रुप में नीचे जाने पर बढ़ती जाती है क्योंकि जालक ऊर्जा घटती जाती है तथा जलयोजन ऊर्जा बढ़ती जाती है।

LiNO3 < NaNO3 <KNO3 < RbNO3 < CsNO3 <FrNO3

(ii) तापीय स्थायित्व – गर्म करने पर ये नाइट्रेट में विघटित हो जाते है तथा ऑक्साइड एवं ऑक्सीजन देते हैं।

4LiNO3 → 2Li2O + 4NO2 ↑+ O2
2NaNO3 → 2NaNO2 + O2

(ख) कार्बोनेट-
(i) विलेयता-ये जल में विलेय होते है तथा समूह में नीचे जाने पर विलेयता बढ़ती जाती है।
Li2CO3 < Na2CO3 < K2CO3 <Rb2CO3 < Cs2CO3 < Fr2CO3

(ii) तापीय स्थायित्व-गर्म करने पर कार्बोनेट विघटित नहीं होते हैं। ये ऊष्मा के प्रति उच्च स्थायी होते हैं अर्थात् तापीय रूप से स्थायी होते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 22
(M = Na, K, Rb, Cs, Fr)

(ग) सल्फेट-
(i) विलेयता-ये जल में अल्प विलेय होते हैं। सोडियम तथा पोटैशियम के लवण जल में तीव्र विलेय होते हैं।
(ii) तापीय स्थायित्व-लीथियम को छोड़कर क्षार धातुओं के अन्य सभी तत्वों के सल्फेट तापीय रूप से स्थायी होते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 23

क्षारीय मृदा धातुओं के यौगिक
(क) नाइट्रेट-
(i) विलेयता-सभी क्षारीय मृदा धातुओं के नाइट्रेट जल में विलेय होते हैं। उनकी विलेयता समूह में नीचे जाने पर कम होती जाती है। क्योंकि जलयोजन ऊर्जा घटती है तथा जालक ऊर्जा बढ़ती है।
Be(NO3)2 < Mg(NO3)2 < Ca(NO3)2 < Sr(NO3)2 < Ba(NO3)2

(ii) तापीय स्थायित्व-गरम करने पर ये विघटित होकर ऑक्साइड देते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 24

(ख) कार्बोनेट-
(i) विलेयता- \(\mathrm{CO}_3^{2-}\) ॠणायन का आकार धनायन की अपेक्षा बहुत बड़ा होता है अत: इसकी जालक ऊर्जा समूह में नीचे जाने पर लगभग समान होती है। जबकि जलयोजन ऊर्जा का मान नीचे जाने पर पर घटता जाता है। अतः इनकी विलेयता नीचे जाने पर घटती जाती है।
BeCO3 > MgCO3 > CaCO3 > SrCO3 > BaCO3

(ii) तापीय स्थायित्व-गर्म करने पर ये विधटित हो जाते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 25
नीचे जाने पर इनका स्थायित्व बढ़ता जाता है क्योंकि इनका धन विद्युती गुण नीचे जाने पर बढ़ता जाता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 26

(ग) सल्फेट-
(i) विलेयता-इनकी विलेयता समूह में नीचे जाने पर घटती जाती है। Be तथा Mg के सल्फेट जल में विलेय होते हैं। Ca तथा Sr के सल्फेट जल में अल्प विलेय होते हैं जबकि BaSO4 अविलेय होता है।

BeSO4 > MgSO4 > CaSO4 > SrSO4 > BaSO3(विलेयता)

(ii) तापीय स्थायित्व-नीचे जाने पर इनका तापीय स्थायित्व बढ़ता जाता है क्योंकि इनका घन विद्युती गुण बढता जाता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 27

प्रश्न 16.
सोडियम क्लोराइड से प्रारम्भ करके निम्नलिखित को आप किस प्रकार बनाएँगे ?
(i) सोडियम धातु (ii) सोडियम हाइड्रॉक्साइड (iii) सोडियम पर्रॉक्साइड (vi) सोडियम कार्बोनेट।
उत्तर:
(i) सोडियम क्लोराइड से सोडियम धातु प्राप्त करना-सोडियम क्लोराइड लवण का गलित अवस्था में विद्युत-अपघटनी अपचयन कराने पर सोडियम धातु प्राप्त होती है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 28

(ii) सोडियम क्लोराइड से सोडियम हाइड्रॉक्साइड प्राप्त करना-सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन का नेलसन सेल अथवा कॉस्टनर-कैलनर सेल में विद्युत-अपघटन करने पर सोडियम हाइड्रॉक्साइड प्राप्त होता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 29

(iii) सोडियम क्लोराइड से सोडियम परॉक्साइड प्राप्त करनापहले सोडियम क्लोराइड के विद्युत-अपघटनी अपचयन द्वारा सोडियम प्राप्त करते हैं, इसके बाद धातु को 573K पर ऑक्सीजन के आधिक्य के साथ नमी तथा CO2 से मुक्त वायुमण्डल में गर्म करने पर सोडियम परॉक्साइड बनता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 30

(iv) सोडियम क्लोराइड से सोडियम कार्बोनेट प्राप्त करना-सोडियम क्लोराइड से सोडियम कार्बोनेट बनाने के लिए सॉल्वे-अमोनिया प्रक्रम का प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रम में सोडियम क्लोराइड अथवा ब्राइन के सान्द्र विलयन (लगभग 30%), जिसे अमोनिया द्वारा संतृप्त कर लिया जाता है, में कार्बन डाइऑक्साइड प्रवाहित करने पर सोडियम बाइकार्बोनेट प्राप्त होता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 31
विलयन में Na+ आयनों की उपस्थिति में सोडियम बाइकार्बोनेट अवक्षेपित जाता है। अवक्षेप को छानकर अलग करने पर सोडियम कार्बोनेट प्राप्त होता है।
2NaHCO3 → Na2CO3 + CO2 ↑ + H2O

प्रश्न 17.
क्या होता है, जब-

  1. मैग्नीशियम को हवा में जलाया जाता है।
  2. बिना बुझे चूने को सिलिका के साथ गर्म किया जाता है।
  3. क्लोरीन बुझे चूने से अभिक्रिया करती है।
  4. कैल्सियम नाइट्रेट को गर्म किया जाता है।

उत्तर:
(i) मैग्नीशियम ऑक्साइड तथा मैग्नीशियम नाइट्राइड का मिश्रण बनता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 32

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में प्रत्येक के दो-दो उपयोग लिखिए-

  1. कॉस्टिक सोडा,
  2. सोडियम कार्बोनेट
  3. बिना बुझा चूना।

उत्तर:
1. कॉस्टिक सोडा के उपयोग (Uses of caustic soda)-

  • साबुन, कागज, कृत्रिम रेशम तथा कई अन्य रसायनों के निर्माण में।
  • पेट्रोलियम के परिष्करण में।

2. सोडियम कार्बोनेट के उपयोग (Uses of sodium carbonate) –

  • जल के मृदुकरण, धुलाई एवं निर्मलन में।
  • पेट्रोलियम के परिष्करण में।
  • काँच, साबुन, बोरेक्स एवं कॉस्टिक सोडा के निर्माण में।

3. बिना बुझा चूना के उपयोग (Uses of Quick lime) –

  • सीमेन्ट के निर्माण के लिए प्राथमिक पदार्थ के रूप में तथा क्षारक के सबसे सस्ते रूप में।
  • शर्करा के शुद्धिकरण में रंजकों (dye stuffs) के निर्माण में।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित की संरचना बताइए-

  • BeCl2 (वाष्प),
  • BeCl2 (ठोस) ।

उत्तर:
1. वाष्प अवस्था में (In vapour state) – वाष्प अवस्था में यह यौगिक द्विलक (dimer) के रूप में पाया जाता है। (Be परमाणु sp2- संकरित होता है) जो लगभग 1000K ताप पर अपघटित होकर एक एकलक (monomer) देता है जिसमें Be परमाणु sp-संकरण अवस्था में होता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 33

2. ठोस अवस्था में (In solid state)-ठोस अवस्था में बेरिलियम क्लोराइड की शृंखला संरचना (बहुलक) होती है जिसमें समीपवर्ती अणुओं पर उपस्थित क्लोरीन परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन-युग्म इलेक्ट्रॉन न्यून Be परमाणु को दान करके उपसहसंयोजी बन्ध निम्नवत् बनता है-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 34
उपर्युक्त शृंखला संरचना में Be परमाणु sp3- संकरित होता है, परन्तु Cl-Be-Cl बन्ध कोण सामान्य चतुष्फलकीय बन्ध कोण (109.5°) से अत्यधिक कम (98°) होता है।

प्रश्न 20.
सोडियम एवं पोटैशियम के हाइड्रॉक्साइड एवं कार्बोनेट जल में विलेय हैं, जबकि मैग्नीशियम एवं कैल्सियम के संगत लवण जल में अल्प विलेय हैं, समझाइए।
उत्तर:
दिए गए सभी यौगिक क्रिस्टलीय ठोस हैं तथा इनकी जल में विलेयता जालक एन्थैल्पी तथा जलयोजन एन्थैल्पी दोनों के द्वारा निर्धारित होती है। सोडियम तथा पोटैशियम यौगिकों की स्थिति में जालक एन्थैल्पी का परिमाण जलयोजन एन्थैल्पी की तुलना में अत्यन्त कम होता है। चूँकि धनायनों का आकार बड़ा होता है, इसलिए सोडियम तथा पोटैशियम के यौगिक जल में तुरन्त विलेय हो जाते हैं।

यद्रपि संगत मैग्नीशियम तथा कैल्सियम यौगिकों की स्थिति में धनायनों का आकार कम होता है तथा धनावेश का परिमाण अधिक होता है। इसका अर्थ है कि इनकी जालक ऊर्जा (एन्थैल्पी) सोडियम तथा पोटैशियम के यौगिकों की तुलना में अधिक होती है। इसलिए इन धातुओं के हाइड्रॉक्साइड तथा कार्बोनेट जल में अल्प विलेय होते हैं।

सोडियम तथा पोटेशियम के हाइड्रॉक्साइड एवं कार्बोनेट जल में विलेय हैं क्योंकि,
जलयोजन ऊर्जा > जालक ऊर्जा

मैग्नीशियम तथा कैल्शियम के हाइड्रॉक्साइड एवं कार्बोनेट जल में अल्पविलेय हैं क्योंकि,
जलयोजन ऊर्जा ≤ जालक ऊर्जा

प्रश्न 21.
निम्नलिखित की महत्ता बताइए-

  1. चूना पत्थर,
  2. सीमेन्ट,
  3. प्लास्टर ऑफ पेरिस

उत्तर:
1. चूना पत्थर की महत्ता (Importance of Limestone)

  • संगमरमर के रूप में भवन-निर्माण में।
  • बुझे हुए चूने के निर्माण में।
  • कैल्सियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम कार्बोनेट के साथ लोहे जैसी धातुओं के निष्कर्षण में फ्लक्स (flux) के रूप में।
  • विशेष रूप से अवक्षेपित CaCO3 के प्रयोग से वृहद् रूप में उच्च गुणवत्ता वाले कागज के निर्माण में।
  • एन्टासिड, टूथपेस्ट में अपघर्षक के रूप में, चूइंगम के संघटक एवं सौन्दर्य प्रसाधनों में पूरक के रूप में।

2. सीमेन्ट की महत्ता: लोहा तथा स्टील के अतिरिक्त सीमेन्ट भी एक ऐसा ही पदार्थ है जो किसी राष्ट्र की उपयोगी वस्तुओं की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसका उपयोग कंक्रीट, प्रबलित कंक्रीट, प्लास्टरिंग, पुल-निर्माण आदि में किया जाता है।

3. प्लास्टर ऑफ पेरिस की महत्ता: ग्लास्टर ऑफ पेरिस का वृहत्तर उपयोग भवन-निर्माण उद्योग के साथ-साथ टूटी हुई हड्डियों के प्लास्टर में भी होता है। इसका उपयोग दन्त-चिकित्सा, अलंकरण-कार्य एवं मूर्तियों तथा मूर्तियों के साँचे बनाने में भी होता है।

प्रश्न 22.
लीथियम के लवण साधारणतया जलयोजित होते हैं, जबकि अन्य क्षार धातुओं के लवण साधारणतया निर्जलीय होते हैं। क्यों?
उत्तर:
लीथियम लवणों में लीथियम आयन (Li+) अपने छोटे आकार के कारण नमी अथवा जल के सम्पर्क में आने पर तुरन्त जलयोजित हो जाता है। इसलिए लीथियम के लवण साधारणतया जलयोजित होते हैं, जबकि अन्य क्षार धातु आयन अपेक्षाकृत बड़े आकार के होने के कारण जलयोजित नहीं होते। अतः ये निर्जलीय होते हैं।

प्रश्न 23.
LiF जल में लगभग अविलेय होता है, जबकि LiCl न सिर्फ जल में, बल्कि ऐसीटोन में भी विलेय होता है। कारण बताइए।
उत्तर:
LiF की जल में अल्प विलेयता इसकी उच्च जालक एन्थैल्पी के कारण होती है (F आकार में अत्यन्त छोटा होता है )। दूसरी ओर लीथियम क्लोराइड (LiCl) में जालक एन्थैल्पी अपेक्षाकृत कम होती है। इसका अर्थ है कि जलयोजन ऊर्जा का परिमाण अधिक है। इसलिए लीथियम क्लोराइड द्विध्रुवी आकर्षण के कारण न केवल जल में, अपितु ऐसीटोन में भी विलेय होता है (ऐसीटोन प्रवृत्ति में ध्रुवीय होता है)।

प्रश्न 24.
जैव द्रवों में सोडियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम एवं कैल्सियम की सार्थकता बताइए।
उत्तर:
सोडियम एवं पोटैशियम की जैव उपयोगिता : सोडियम आयन मुख्यतः अंतराकाशीय द्रव में उपस्थित रक्त प्लाज्मा, जो कोशिकाओं को घेरे रहता है, में पाया जाता है। यह आयन शिरा संकेतों के संचरण में भाग लेते है, जो कोशिका झिल्ली में जल प्रवाह को नियमित करते हैं तथा कोशिकाओं में शर्करा और एमीनो अम्लों के प्रवाह को भी नियन्त्रित करते हैं। Na और K रासायनिक रूप से समान होते हुए भी कोशिका झिल्ली को पार करने की क्षमता एवं एन्जाइम को सक्रिय करने में मात्रात्मक रूप से भिन्न हैं।

इसलिये कोशिका द्रव में पोटैशियम धनायन बहुतायत में होते हैं, जहाँ ये एन्जाइम को सक्रिय करते हैं एवं ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से ATP बनने में भाग लेते है। सोडियम आयन शिरा-संकेतों के संचरण के लिये उत्तरदायी हैं । कोशिका झिल्ली के अन्य हिस्सों में पाये जाने वाले Na एवं K आयनों की सांद्रता में उल्लेखनीय भिन्नता पाई जाती है।

उदाहरण – रक्त प्लाज्मा में लाल रक्त कोशिकाओं में Na की मात्रा 143 m mol L-1 जबकि K का स्तर केवल 5 m mol L-1 है। यह सान्द्रता 10 m mol L-1(Na+) एवं 105 mmolL-1(K+) तक परिवर्तित होती है। इसी असाधारण उतार चढ़ाव को सोडियम पोटैशियम पम्प कहते हैं । सेल झिल्ली पर कार्य करता है, जो मनुष्य की विश्रामावस्था के कुल उपभोगिता की एक-तिहाई के ज्यादा का उपयोग कर लेता है, जो मात्रा लगभग 15 किलो प्रति 24 घंटे तक हो सकती है।

मैग्नीशियम और कैल्सियम का जैविक महत्व: एक वयस्क व्यक्ति में लगभग 25 ग्राम मैग्नीशियम एवं 1200 ग्राम कैल्सियम होता है, जबकि लोहा मात्र 5 ग्राम एवं ताँबा 0.06 ग्राम होता है। मानव-शरीर में इनकी दैनिक आवश्यकता 200-300 मिलीग्राम अनुमानित की गई हैं। समस्त एन्जाइम, जो फॉस्फेट के संचरण में ATP का उपयोग करते हैं, मैग्नीशियम का उपयोग सह-घटक के रूप में करते हैं। पौधों में प्रकाश-संश्लेषण के लिए मुख्य रंजक (pigment) क्लोरोफिल में भी मैग्नीशियम होता है। शरीर में कैल्सियम का 99% दाँतों तथा हड्डियों में होता है।

यह अन्तरतांत्रिकीय पेशीय कार्यप्रणाली, अन्तरतांत्रिकीय प्रेषण कोशिका झिल्ली अखण्डता (cell membrane integrity) तथा रक्त-स्कन्दन (blood-coagulation)में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्लाज्मा में कैल्सियम की सान्द्रता लगभग 100 mg L-1 होती है। दो हॉमाकैल्सिटोनिन एवं पैराथायरॉइड इसे बनाए रखते हैं। चूँकि हड्डु अक्रिय तथा अपरिवर्तनशील पदार्थ नहीं है, यह किसी मनुष्य में लगभग 400 मिग्रा प्रतिदिन के अनुसार विलेयित और निक्षेपित होती है। इसका सारा कैल्सियम रक्त प्लाज्मा में ही गुजरता है।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

प्रश्न 25.
क्या होता है जब-

  1. सोडियम धातु को जल में डाला जाता है।
  2. सोडियम धातु को हवा की अधिकता में गर्म किया जाता है।
  3. सोडियम परॉक्साइड को जल में घोला जाता है।

उत्तर:
1. सोडियम धातु को जल में डालने पर उच्च ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया होती है तथा हाइड्रोजन मुक्त होती है जो आग पकड़ लेती है।
2 Na + 2H2O → 2NaOH + H2

2. सोडियम धातु को वायु की अधिकता में गर्म करने पर सोडियम परॉक्साइड बनता है।
2Na + O2 → Na2O2

3. सोडियम परॉक्साइड को जल में घोलने पर ऑक्सीजन मुक्त होता है।
2Na2O2 + 2H2O → 4NaOH + O2

प्रश्न 26.
निम्नलिखित में से प्रत्येक प्रेक्षण पर टिप्पणी लिखिए-
(क) जलीय विलयनों में क्षार धातु आयनों की गतिशीलता Li+ <Na+ <K+ <Rb+ <Cs+ क्रम में होती है।
(ख) लीथियम ऐसी एकमात्र क्षार धातु है, जो नाइट्राइड बनाती है।
(ग) M2+(aq) + 2e → M(s) हेतु EΘ (जहाँ M = Ca, Sr या Ba) लगभग स्थिरांक है।
उत्तर:
(क) जलीय विलयनों में क्षार धातु आयनों की गतिशीलता निम्नलिखित क्रम में होती हैं-
Li+ < Na+ < K+ < Rb+ < Cs+
इसे धनायनों के जल में जलयोजित होने के आधार पर समझाया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप धनायन का आकार बढ़ने पर इसकी गतिशीलता घटती है। Li+ आयन छोटे आकर के कारण अधिकतम जलयोजित होता है तथा न्यूनतम गतिशीलता रखता है, जबकि Cs+ न्यूनतम जलयोजन के कारण अधिकतम गतिशीलता रखता है।

(ख) लीथियम एक प्रबल अपचायक है; अतः यह नाइट्रोजन से सीधे संयोग करके नाइट्राइड (Li3N) बनाता है।
6Li + N2 → 2Li3N लीथियम नाइटाइड

(ग) क्षार धातुओं के इलेक्ट्रोड विभव (EΘ), जो M(s) से M+(aq) तक सभी परिवर्तनों में अन्य धातुओं द्वारा प्रदर्शित अपचायक क्षमता को मापते हैं, तीन कारकों पर निर्भर करते हैं-(a) ऊर्ध्वपातन, (b) आयनन एन्थैल्पी तथा (c) जलयोजन एन्थैल्पी। क्योंकि Ca, Sr तथा Ba के लिये इन तीनों कारकों का सामूहिक प्रभाव लगभग समान होता है अतः इनका इलेक्ट्रोड विभव भी लगभग स्थिरांक होता है।

प्रश्न 27.
समझाइए कि क्यों-
(क) Na2CO3 का विलयन क्षारीय होता है।
(ख) क्षार धातुएँ उनके संगलित क्लोराइडों के विद्युत-अपघटन से प्राप्त की जाती हैं।
(ग) पोटैशियम की तुलना में सोडियम अधिक उपयोगी है।
उत्तर:
(क) सोडियम कार्बोनेट (Na2CO3), जो प्रबल क्षार (NaOH) तथा दुर्बल अम्ल (H2CO3) का एक लवण है जल-अपघटन करने पर पर क्षारीय विलयन बनाता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 10 Img 35
(ख) क्षार धातुएँ उच्च अभिक्रियाशील तथा प्रबल अपचायक होती हैं; अतः इन्हें साधारण विधियों द्वारा निष्कर्षित नहीं किया जा सकता है। इन्हें जलीय विलयनों के विद्युत-अपघटन द्वारा निष्कर्षित नहीं किया जा सकता है; क्योंकि तब बनने वाली धातुएँ जल से अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड बना लेंगी। इसलिए इन धातुओं को सामान्यता इनके संगलित क्लोराइडों के विद्युत अपघटन द्वारा प्राप्त किया जाता है।

(ग) पोटैशियम की तुलना में सोडियम अधिक उपयोगी है। इसे निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. सोडियम का उपयोग Na/Pb मिश्रधातुओं में होता है जो PbEt4 तथा PbMe4 के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। इन कार्बलेड यौगिकों का उपयोग पेट्रोल में अपस्फोटरोधी के रूप में होता है।
  2. यह प्रबल अपचायक सोडियम अमलगम के रूप में प्रयुक्त होता है।
  3. सोडियम धातु का उपयोग सोडियम यौगिकों; जैसे-परॉक्साइड, ऐमाइड तथा सोडियम सायनाइड बनाने में किया जाता है।
  4. यह रंजक उद्योग में प्रयोग किया जाता है।
  5. द्रव सोडियम धातु का उपयोग नाभिकीय रिऐक्टर में शीतलक (coolant) के रूप में होता है।
  6. इसका उपयोग कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन, सल्फर तथा हैलोजेनों की उपस्थिति निर्धारित करने में किया जाता है।

प्रश्न 28.
निम्नलिखित के मध्य क्रियाओं के सन्तुलित समीकरण लिखिए-
(क) Na2CO3 एवं जल
(ख) KO2 एवं जल
(ग) Na2O एवं CO2.
उत्तर –
(ख) 2KO2 + 2H2O → 2KOH + H2O2 + O2
(ग) Na2O + CO2 → Na2CO3

प्रश्न 29.
आप निम्नलिखित तथ्यों को कैसे समझाएँगे-
(क) BeO जल में अविलेय है, जबकि BeSO4 विलेय है।
(ख) BaO जल में विलेय है, जबकि BaSO4 अविलेय है।
(ग) एथेनॉल में LiI, KI की तुलना में अधिक विलेय है।
उत्तर:
(क) छोटे आकार, उच्च आयनन विभव तथा उच्च इलैक्ट्रॉन ऋणात्मकता के कारण BeO अत्यधिक संहसयोजक गुण रखता है इसी कारण यह जल में अविलेय होता है जबकि BeSO4 आयनिक होता है एवं Be2+ आयन अत्यधिक छोटे आकार का होता है जिसके कारण इसकी जलयोजन ऊर्जा का मान अधिक होता है तथा जालक ऊर्जा का मान काफी कम। यही कारण है कि BeSO4 जल में विलेय होता है।

(ख) BaO तथा BaSO4 दोनों ही आयनिक यौगिक होते हैं। बेरियम ऑक्साइड (BaO) जल में विलेय होता है; क्योंकि इसकी जलयोजन ऊर्जा इसकी जालक ऊर्जा से अधिक होती है। दूसरी ओर BaSO4 की जालक ऊर्जा इसके द्विसंयोजी आवेशों के कारण उच्च होती है; इसलिए मुक्त होने वाली जलयोजन ऊर्जा जालक ऊर्जा से अधिक नहीं हो पाती तथा बन्ध टूट नहीं पाते हैं। इस कारण BaSO4 अविलेय होता है।

(ग) लीथियम आयोडाइड प्रवृत्ति में थोड़ा सहसंयोजी होता है। इसका कारण इसकी ध्रुवणता है (Li+ छोटे आकार के कारण सर्वाधिक ध्रुवण-क्षमता रखता है तथा आयोडाइड आयन बड़े आकार के कारण अधिकतम ध्रुवित किया जा सकता है) Li+ आयन की जलयोजन ऊर्जा K+ आयन से अधिक होती है; अत: Li+ आयन K+ आयन से बहुत अधिक जलयोजित हो जाते हैं। इसलिए Lil, KI की तुलना में अधिक विलेय है।

प्रश्न 30.
इनमें से किस क्षार धातु का गलनांक न्यूनतम है?
(क) Na
(ख) K
(ग) Rb
(घ) Cs.
उत्तर:
(घ) Cs.

प्रश्न 31.
निम्नलिखित में से कौन-सी क्षार धातु जलयोजित लवण देती है?
(क) Li
(ख) Na
(ग) K
(घ) Cs.
उत्तर:
(क) Li

प्रश्न 32.
निम्नलिखित में से कौन-सी क्षारीय मृदा धातु कार्बोनेट ताप के प्रति सबसे अधिक स्थायी है ?
(क) MgCO3
(ख) CaCO3
(ग) SrCO3
(घ) BaCO3
उत्तर:
(घ) BaCO3

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HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

Haryana State Board HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन


(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

1. ऑक्सिन का प्रमुख प्रभाव उद्दीपन करना है-
(A) कोशिका विभाजन
(B) कोशिका दीर्घण
(C) कोशिका स्फीति
(D) कोशिका विभेदन
उत्तर:
(B) कोशिका दीर्घण

2. सायटोकाइनिन उद्दीपित करते हैं-
(A) कोशिका विभाजन
(B) कोशिका दीर्घण
(C) कोशिका स्फीति
(D) कोशिका विभेदन
उत्तर:
(A) कोशिका विभाजन

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

3. जीर्णता के समय पौधों में बढ़ोत्तरी होती है-
(A) क्लोरोफिल की
(C) श्वसन की
(B) प्रोटीन की
(D) प्रकाश संश्लेषण की
उत्तर:
(C) श्वसन की

4. निम्न में से कौन-सा एक पुष्पीय हॉर्मोन समझा जाता है ?
(A) ऑक्सिन
(B) जिबरेलिन
(C) सायटोकाइनिन
(D) एब्सिसिक अम्ल
उत्तर:
(B) जिबरेलिन

5. ज्यामितीय वृद्धि वक्रं का आकार है-
(A) क्यूबॉइड
(B) सिग्मॉइड
(C) सरल रेखा
(D) त्रिकोणीय
उत्तर:
(B) सिग्मॉइड

6. निम्न में से किसके प्रयोग द्वारा कच्चे फलों को पकाया जा सकता है ?
(A) IAA
(B) GA 3
(C) ABA
(D) C2H1
उत्तर:
(D) C2H1

7. आलू को भण्डारगृह में अंकुरित होने से रोका जा सकता है ?
(A) मैलिक हाइड्रेनाइड द्वारा
(B) जिएटिन द्वारा
(C) जिबरेलिन द्वारा
(D) एथिलीन द्वारा
उत्तर:
(A) मैलिक हाइड्रेनाइड द्वारा

8. जब कोई पौधा पुष्पन न कर रहा हो तो इसमें साइटोकाइनिन निर्मित होता है-
(A) पत्तियों में
(B) पार्श्व कलिकाओं में
(C) जड़ों में
(D) प्ररोह शीर्ष में
उत्तर:
(C) जड़ों में

9. पौधों में पुष्पन उत्प्रेरित करने वाला हॉर्मोन है-
(A) वनेंलिन
(B) फ्लोरिजन
(C) ऑक्सिन
(D) एथिलीन
उत्तर:
(B) फ्लोरिजन

10. प्रदीप्तिकालिका परिघटना को सर्वप्रथम खोजा-
(A) गार्नर एवं एलार्ड ने
(B) याबुता व सुमिकी ने
(C) स्कूग व वेण्ट ने
(D) होमनर व बोनर ने ।
उत्तर:
(A) गार्नर एवं एलार्ड ने

11. जैवियम एक ………………. प्रदीप्तिकाली पौधा है।
(A) अल्प
(B) दीर्घ
(C) उदासीन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) अल्प

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

12. कम तापमान द्वारा पुष्पन को त्वरित करने की प्रक्रिया को कहते हैं-
(A) प्रदीप्तिकालिता
(B) बसन्तीकरण
(C) विपुंसीकरण
(D) अनुप्रेरण
उत्तर:
(B) बसन्तीकरण

13. प्रदीप्तिकाली प्रेरण के फलस्वरूप प्रेरित रसायन है-
(A) फ्लोरिजन
(B) वनेंलिन
(C) फाइटोक्रोम
(D) साइटोक्रोम
उत्तर:
(A) फ्लोरिजन

14. साइटोकाइनिन प्रेरित करता है- (UPCPMT)
(A) कोशिका दीर्घन
(B) कोशिका वृद्धि
(C) अनिषेक जनन
(D) कोशिका विभाजन
उत्तर:
(D) कोशिका विभाजन

15. संवहनी कैम्बियम में कोशिका विभाजन को प्रेरित करने वाला वृद्धि नियामक है-
(A) IAA
(B) ABA
(C) साइटोकाइनिन
(D) एथिलीन
उत्तर:
(A) IAA

16. फुलिश सीडलिंग रोग का कारण है-
(A) 2, 4-D
(B) GA
(C) ABA
(D) IAA
उत्तर:
(B) GA

17. निम्न में से खरपतवारनाशी है-
(A) ABA
(C) 2, 4-D
(B) IAA
(D) C2H4
उत्तर:
(C) 2, 4-D

18. साइटोकाइनिन नाम दिया- (RPMT)
(A) लीथम (1968) ने
(B) मिलर (1964) ने
(C) मग (1955) ने
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) लीथम (1968) ने

19. कौन-सा दीर्घ दिवस पादप है- (CBSE PMT)
(A) तम्बाकू
(B) सोयाबीन
(C) गुलाबांस
(D) पालक ।
उत्तर:
(D) पालक ।

20. कौन-सा आलू भेद में कलिका प्रसुप्ति तोड़ता है- ( CBSE PMT)
(A) जिब्बरेलिन
(B) V AA
(C) ABA
(D) जिएटिन ।
उत्तर:
(A) जिब्बरेलिन

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

21. कोशिका विभाजन प्रेरण तथा जीर्णता में देरी होती है- (UPCPMT)
(A) जिब्बरेलिन द्वारा
(B) ऑक्सिन द्वारा
(C) सायटोकाइनिन द्वारा
(D) इथाइलीन द्वारा।
उत्तर:
(C) सायटोकाइनिन द्वारा

22. शीर्ष प्रमुखता का कारण है- (RPMT, UPCPMT)
(A) IAA
(B) IBA
(C) 2,4-D
(D) 2,4,5-T
उत्तर:
(A) IAA

23. पौधे में जिंक की कमी होने पर किस हार्मोन का जैव संश्लेषण प्रभावित होता है- (CBSE PMT)
(A) एब्सिसिक अम्ल
(B) ऑक्सिन
(C) साइटोकाइनिन
(D) इथाइलीन ।
उत्तर:
(B) ऑक्सिन

24. हरे पौधों में पर्वों पर कोशिका दीर्घीकरण का कारण है- (CBSE PMT)
(A) IAA
(B) साइटोकाइ
(C) जिब्बरेलिन्स
(D) इथाइलीन ।
उत्तर:
(C) जिब्बरेलिन्स

25. बीजों का शीत उपचार कहलाता है- (RPMT)
(A) वनेंलाइजेशन
(B) स्ट्रेटीफिकेशन
(C) डिवनेंलाइजेशन
(D) फोटोफॉस्फोरिलेशन ।
उत्तर:
(A) वनेंलाइजेशन

26. वर्नेलाइजेशन की प्रक्रिया प्रेरित होती है- (UPCPMT)
(A) साइटोकाइनिन द्वारा
(B) ऑक्सिन द्वारा
(C) फोटो-ट्रॉपिस्म द्वारा
(D) GA द्वारा।
उत्तर:
(D) GA द्वारा।

27. पर्ण विलगन का कारण है- (UPCPMT)
(A) ABA
(B) साइटोकाइनिन
(C) ऑक्सिन
(D) जिब्बरेलिन ।
उत्तर:
(A) ABA

28. ऑक्सिन का जैव संश्लेषण है- (UPCPMT)
(A) एवीना वक्रण परीक्षण
(B) कैलस निर्माण
(C) कवक संवर्धन
(D) बीज प्रसुप्ति।
उत्तर:
(A) एवीना वक्रण परीक्षण

29. पुष्पीय पादपों में प्रकाश अवधि का महत्व प्रथम बार देखा गया- (CBSE PMT)
(A) लेम्ना में
(B) तम्बाकू में
(C) कपास में
(D) पिटूनिया में।
उत्तर:
(B) तम्बाकू में

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

30. पादपों में बसन्तीकरण की आवश्यकता को प्रतिस्थापित करने वाला हार्मोन है- (RPMT)
(A) इथाइलीन
(B) ऑक्सिन
(C) जिब्बरेलिन
(D) साइटोकाइनिन ।
उत्तर:
(C) जिब्बरेलिन

31. धान का मूठ नवोद्भिद रोग निम्न में से किसकी खोज का कारण बना है ? (RPMT)
(A) GA
(C) 2,4,8
(B) ABA
(D) IAA I
उत्तर:
(A) GA

32. निम्नलिखित में से कौन सा एक संश्लेषित ऑक्सिन है ? (CBSE AIPMT)
(A) NAA
(C) GA
(B) IAA
(D) IBA
उत्तर:
(A) NAA

33. निम्नलिखित में से कौन-सा अम्ल कैरोटीनॉएड्स का व्युत्पन्न है ? (CBSE AIPMT)
(A) इण्डोल ब्यूटारिक अम्ल
(B) इण्डोल-3 एसीटिक अम्ल
(C) जिबरेलिक अम्ल
(D) एब्सिसिक अम्ल ।
उत्तर:
(D) एब्सिसिक अम्ल ।

34. प्रकाशानुक्त झुकाव (phototropic curvature) निम्नलिखित में से किसके असमान वितरण के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है ? (CBSE AIPMT)
(A) जिबरेलिन
(B) फाइटोक्रोम
(C) साइटोकाइनिन
(D) ऑक्सिन ।
उत्तर:
(D) ऑक्सिन ।

35. दीप्तिकालिता को सर्वप्रथम खोजा गया था- (CBSE AIPMT)
(A) तम्बाकू में
(B) आलू में
(C) टमाटर में
(D) कपास में।
उत्तर:
(A) तम्बाकू में

36. चाय के बगानों में सामान्यतया प्रयोग होने वाला पादप वृद्धि हार्मोन है- (RPMT)
(A) ABA
(B) जीएटिन
(C) IAA
(D) इथाइलीन ।
उत्तर:
(B) जीएटिन

(B) अति लघु उत्तरीय प्रश्न ( Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
गन्ने की खेती में कौन-से वृद्धि नियामक के छिड़कने से तनों की लम्बाई बढ़ती है ?
उत्तर:
जिबरेलिन्स (Gibberellins) ।

प्रश्न 2.
वृद्धि की किस अवस्था में वृद्धि वक्र सबसे अधिक होता है ?
उत्तर:
प्रसार अवस्था में ।

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प्रश्न 3.
कौन-सा हॉर्मोन वृद्धि को कम करता है ?
उत्तर:
एब्सिसिक अम्ल (Abscisic acid )।

प्रश्न 4.
अनिषेक फलन के लिए उत्तरदायी हॉर्मोन का नाम लिखिए।
उत्तर:
जिब्बरेलिन्स (Gibberellins)।

प्रश्न 5.
ऑक्सिन का एक कार्य लिखिए।
उत्तर:
कोशिका की लम्बाई में वृद्धि का प्रेरण ।

प्रश्न 6.
कोशिका वृद्धि की तीन अवस्थाएँ कौन-सी हैं ?
उत्तर:

  • विभाजन,
  • विवर्धन तथा
  • विभेदन ।

प्रश्न 7.
एक कार्यिकीय प्रक्रिया का नाम बताइए जिसमें लैक्टुका सैटाइवा प्रयुक्त होता है।
उत्तर:
अंकुरण (Germination)।

प्रश्न 8.
प्रकाश पर आधारित किन्हीं तीन प्रक्रियाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
प्रकाश संश्लेषण, प्रकाशानुवर्तन, दीप्तिकालिता ।

प्रश्न 9.
LDP तथा SDP का एक-एक उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
LDP- चुकन्दर, SDP सूर्यमुखी।

प्रश्न 10.
वेण्ट ने अपने प्रयोग किस पौधे पर किये ?
उत्तर:
जई (Avena sativa) ।

प्रश्न 11.
पौधों में शीर्षस्थ प्रभाविता से सम्बन्धित हॉर्मोन कौन-सा है ?
उत्तर:
ऑक्सिन (Auxin) ।

प्रश्न 12.
अधोकुंचन (Epinesty ) से सम्बन्धित पादप हॉर्मोन का नाम बताइए ।
उत्तर:
एथिलीन (Ethylene)।

प्रश्न 13.
जिबरेलिन की खोज किसमें की गई ?
उत्तर:
धान पर परजीवी ऊतक जिबरेला फ्यूजीकुराई ( Gibberella fujikuroi) में ।

प्रश्न 14.
अधिकांश ऑक्सिन का निर्माण किस भाग में होता है ?
उत्तर:
प्ररोह शीर्ष में (shoot apex ) ।

प्रश्न 15.
साइटोकाइनिन की उपस्थिति जीर्णता में देरी का कारण है, इस प्रभाव को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
रिचमॉड एवं लैंग प्रभाव (Richmond and Lang effect)।

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प्रश्न 16.
सायटोकाइनिन रासायनिक आधार पर क्या है ?
उत्तर:
No फरफ्यूरिल – एमीनो प्यूरीन यौगिक ।

प्रश्न 17.
वृद्धि मापन किस यन्त्र द्वारा किया जाता है ?
उत्तर:
ऑक्सेनोमीटर (Auxanometer) द्वारा।

प्रश्न 18.
आलू के कन्द्र अंकुरण रोकने के लिए प्रयुक्त संश्लेषित हॉर्मोन का नाम बताइए।
उत्तर:
MCPA (2-मेथिल, 4- क्लोरोफीनॉक्सी ऐसीटिक अम्ल) ।

प्रश्न 19.
मानव मूत्र से पृथक् किये गये हॉर्मोन का नाम लिखिए।
उत्तर:
ऑक्सिन ।

(C) लघु उत्तरीयं प्रश्न-I (Short Answer Type Questions-1)

प्रश्न 1.
माली हेज लगाने में पौधों की छँटाई क्यों करता है ?
उत्तर:
ऑक्सिन नामक पादप हॉर्मोन प्ररोह शीर्ष में संश्लेषित होता है जो पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि को रोकता है। छँटाई करने से शीर्ष कलिका कट जाती है, जिससे पार्श्व कलिकाएँ वृद्धि करने लगती हैं। ऐसा होने से घनी झाड़ियाँ उत्पन्न होती हैं ।

प्रश्न 2.
जिब्बरेलिन की रासायनिक संरचना बताइए।
उत्तर:
इसकी संरचना में एक गिबेन रिंग पायी जाती है।
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प्रश्न 3.
ऑक्सिन की रासायनिक संरचना बताइए।
उत्तर:
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प्रश्न 4.
सायटोकाइनिन की रासायनिक संरचना लिखिए।
उत्तर:
सायटोकाइनिन 6- परफ्यूरिल अमीनोप्यूरीन है।

प्रश्न 5.
एक्सिसिक अम्ल की रासायनिक संरचना लिखिए।
उत्तर:
ओहकुमा ने एब्सिसिक अम्ल की रासायनिक संरचना दी। इसे 3- मेथिल-5 (1- हाइड्रॉक्सी 4-ऑक्सो 2’6’6′ ट्राइमेथिल 2- साइक्लोहेक्सेन-1 आइल)- सिस ट्रान्स 2′, 4′ पेन्टाडिनोइक अम्ल कहते हैं।
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प्रश्न 6.
एथिलीन की रासायनिक संरचना बताइए ।
उत्तर:
मेथिओनीन एमीनो अम्ल से ऐथिलीन का निर्माण होता है।
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प्रश्न 7.
यदि एक नवोद्भिद पौधे की शीर्षस्थ कलिका को काट दिया जाय तो वृद्धि रुक जाती है, क्यों ?
उत्तर:
तने के शीर्ष पर स्थित विभज्योतक कोशिकाओं से पादप हॉर्मोन संश्लेषित होकर पौधे के विभिन्न भागों में विसरित होते हैं। पादप हॉर्मोन (ऑक्सिन) के कारण कोशिकाओं में विभाजन एवं वृद्धि होती है। अतः शीर्षस्थ कलिका (apical bud) को काटने पर वृद्धि रुक जाती है।

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प्रश्न 8.
जीर्णावस्था पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
पादप अंगों की परिपक्वन अवस्था एवं क्रमिक निष्क्रियता आने की अवस्था को जीर्णावस्था कहते हैं। एब्सिसिक अम्ल तथा एथिलीन जीर्णावस्था (senescence) को प्रेरित करते हैं, जबकि सायटोकाइनिन जीर्णता को विलम्बित करता है।

(D) लघु उत्तरीय प्रश्न- II ( Short Answer Type Questions-II)

प्रश्न 1.
पादप हॉर्मोन क्या हैं? इनकी खोज किसने की ? विभिन्न पादप हॉर्मोन के नाम लिखिए।
उत्तर:
पादप हॉर्मोन ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जो पौधों में अल्प मात्रा में संश्लेषित होकर पौधों की वृद्धि का नियन्त्रण करते हैं। सर्वप्रथम जॉन वान सैक (J. V. Sachs) ने पादप हॉर्मोन की खोज की तथा इन्हें वृद्धि कारक कहा । हॉर्मोन्स को पाँच समूहों में बाँटा गया है-

  1. ऑक्सिन जैसे-इण्डोल ऐसीटिक एसिड (IAA), इण्डोल ब्यूटाइरिक एसिड (IBA) 2, 4-डाइक्लोरोफिनोक्सी-ऐसीटिक एसिड (2, 4-D) आदि ।
  2. जिब्बरेलिन्स, जैसे – GA3GA GA4 आदि ।
  3. सायटोकाइनिन, जैसे-काइनेटिन, जिएटिन आदि ।
  4. एब्सिसिक अम्ल, जैसे-ABA ।
  5. एथिलीन – एक गैसीय हॉर्मोन ।

प्रश्न 2.
हॉर्मोन्स तथा एन्जाइम में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
हॉर्मोन्स तथा एन्जाइम में अन्तर

हॉर्मोन्स (Hormones)एन्जाइम्स (Enzymes)
1. हॉर्मोन्स पादप विभज्योतक में संश्लेषित होकर किसी भी भाग को स्थानान्तरित होकर प्रभाव उत्पन्न करते हैं।इनका संश्लेषण कोशिकाओं में आवश्यकतानुसार होता है।
2. इनकी रासायनिक प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है।सभी एन्जाइम प्रोटीन प्रकृति के होते हैं।
3. ये सान्द्रता या न्यूनता अलग-अलग प्रभाव डालते हैं।इनकी सान्द्रता व न्यूनता का क्रिया पर कोई प्रभाव नहीं होता है।
4. ये क्रिया में प्रयुक्त हो जाते हैं।ये क्रिया में प्रयुक्त नहीं होते हैं।
5. उदाहरण-ऑक्सिन, जिब्बरेलिन आदि।उदाहरण-एल्डोलेज, हैक्सोकाइनेज आदि।

प्रश्न 3.
विलगन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विलगन (Abscission) – विभिन्न कारणों जैसे- सूखा, पोषण की कमी, जीर्णावस्था, प्रकाश की कमी आदि से पत्तियों में एथिलीन एवं एक्सिसिक अम्ल का निर्माण बढ़ जाता है जिसके प्रभाव से पत्तियों के वृन्त के आधार पर एक विलगन पर्त बन जाती है। यह पर्त पौधे एवं पत्ती के बीच पदार्थों का स्थानान्तरण रोक देती है। कुछ समय बाद पत्ती पौधे से अलग हो जाती है।

यह क्रिया विलगन कहलाती है। फलों के पकने पर भी इसी प्रक्रिया द्वारा विलगन होता है। IAA पादप हॉर्मोन विलगन एवं जीर्णावस्था में विलम्ब करता है। यदि IAA की उचित सान्द्रता का छिड़काव पर्णवृन्तों पर कर दिया जाय तो विलगन कुछ समय के लिए रुक जाता है।

प्रश्न 4.
ऑक्सिन तथा सायटोकाइनिन किस प्रकार पौधों में ऊतकों के विभेदन को प्रेरित करते हैं ?
उत्तर:
सायटोकाइनिन कोशिका विभाजन के अतिरिक्त ऊतक विभेदन को प्रेरित करता है। यदि किसी पादप ऊतक का संवर्धन शर्करा एवं खनिज लवण युक्त माध्यम पर कराया जाय तो कोशिकाएँ विभाजित होकर समूह कैलस (callus) बना लेती हैं। यदि माध्यम में अधिक सान्द्रता में साइटोकाइनिन तथा ऑक्सिन मिलाया जाय तो कैलस से प्ररोह का विकास हो जाता है।

कम सायटोकाइनिन तथा ऑक्सिन अनुपात में केवल जड़ों का विकास होता है। माध्यमिक सायटोकाइनिन व ऑक्सिन अनुपात में जड़ तथा प्ररोह दोनों विकसित होते हैं। मध्यम सायटोकाइनिन व कम ऑक्सिन अनुपात में केवल कैलस निर्मित होता है।
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प्रश्न 5
कारण बताइए-
(क) पुष्पों का खिलना ।
(ख) कभी-कभी फल परिपक्वता प्राप्त करने से पहले ही गिर जाते हैं। (ग) ड्यूरेन्टा या मेंहदी की झाड़ियों की बाड़ लगाने के लिए इनकी छँटाई करते हैं।
उत्तर:
(क) पौधे में पुष्पन क्रियां प्रकाश से प्रभावित होती है। पौधों को पुष्पन हेतु प्रतिदिन एक निश्चित अवधि तक प्रकाश की आवश्यकता होती है। इसे दीप्तिकाल या पुष्पन काल (Photoperiod or flowering period) कहते हैं। पौधों को अपने निर्णायक काल तक का प्रकाश मिलने पर ही इनमें पुष्पन प्रेरित होता है। इस प्रक्रिया के लिए एक हॉर्मोन फ्लोरिजन का संश्लेषण होता है।

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(ख) कभी-कभी फलों के वृन्त में एब्सिसिक अम्ल की सान्द्रता बढ़ जाती है, जिससे फलों का विलगन हो जाता है।

(ग) ड्यूरेन्टा एवं मेंहदी की शीर्ष कलिकाओं में ऑक्सिन का संश्लेषण होता है जो पार्श्व कलिकाओं (lateral buds) के विकास को रोक देता है जिसके कारण झाड़ियाँ घनी नहीं हो पाती हैं। शीर्ष कलिकाओं (apical buds) की छँटाई से ऑक्सिन का निर्माण रुक जाता है और पार्श्व कलिकाएँ वृद्धि करने लगती हैं।

प्रश्न 6.
अनाज के अंकुरित दानों में जिबरेलिन की क्या भूमिका है ?
उत्तर:
अंकुरण के समय अनाज के दाने जल अवशोषण करते हैं। इससे भ्रूण में कुछ मात्रा में जिब्बरेलिन का संश्लेषण होने लगता है। जिब्बरेलिन प्रोटिएज तथा एमाइलेज विकरों के संश्लेषण को प्रेरित करता है। यह निष्क्रिय B- एमाइलेज को सक्रिय करता है।

सक्रिय – तथा 8- एमाइलेज मिलकर मण्ड का पाचन करते हैं जिससे ग्लूकोज बनता है। ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से भ्रूण को ऊर्जा उपलब्ध होती है। अब सायटोकाइनिन तथा ऑक्सिन भी संश्लेषित होते हैं, जिससे कोशिका विभाजन, विवर्धन एवं विभेदन प्रारम्भ हो जाता है और एक नवोद्भिद का निर्माण होता है।

प्रश्न 7.
पादप हॉर्मोन्स के निर्माण स्थल एवं परिवहन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:

  1. ऑक्सिन इसका संश्लेषण विभज्योतकों में होता है। इसका संवहन एक कोशिका से दूसरी कोशिका में तथा अन्य ऊतकों तथा पौधे के विभिन्न भागों में विसरण द्वारा होता है। ऑक्सिन का प्रवाह एकदिशीय (unidirectional) होता है।
  2. जिब्बरेलिन इसका संश्लेषण तरुण पत्तियों, कलिकाओं, बीजों और जड़ों में होता है। इनका संवहन जाइलम तथा फ्लोएम द्वारा होता है। ये सम्पूर्ण पौधे को प्रभावित करता है।
  3. सायटोकाइनिन इसका निर्माण मुख्यतः जड़ शीर्ष पर या अंकुरित बीजों में होता है। ये जड़ों से जाइलम द्वारा तनों में पहुँचते हैं।
  4. एक्सिसिक अम्ल इसका संश्लेषण कैरोटिनाइड से होता है। यह जाइलम फ्लोएम तथा मृदूतक कोशिकाओं से पूरे पौधे में संवहन करता है।
  5. एथिलीन इसका निर्माण मेथिओनीन एमीनो अम्ल से होता है। यह जीर्णावस्था वाले पुष्पों, पके फलों, तने के शीर्ष, जड़ों आदि से वायु में मुक्त होता है। इसका स्थानान्तरण वायु द्वारा होता है।

(E) निबन्धात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
वृद्धि का मापन कैसे किया जाता है ? किन्हीं दो वृद्धि मापक यत्रों की क्रियाविधि लिखिए।
उत्तर:
पाद्वप वृद्धि मापन (Plant growth measurement)
वृद्धि मापन (Measurement of Growth)-पौधों में वृद्धि को निम्न प्रकार मापा जाता है-

  • लम्बाई में वृद्धि,
  • मोटाई में वृद्धि,
  • क्षेत्र तथा आयतन में वृद्धि,
  • कोशिका संख्या में वृद्धि।

वैसे तो मापन की कोई भी विधि प्रयोग की जा सकती है, परन्तु सही जानकारी के लिए हमें कई माप लेने चाहिए। जैसे-बीज के अंकुरण के समय अन्धकार की आवश्यकता होती है जिससे इसमें तीत्र वृद्धि होती है। परन्तु उसी समय उसके शुष्क भार में कमी आ जाती है क्योंकि पौधा संचित भोजन का उपयोग करके लम्बाई में वृद्धि करता है।
वृद्धि को विभिन्न विधियों से मापा जा सकता है-
1. प्रत्यक्ष विधि (Direct Method) – इस विधि द्वारा वृद्धिशील अंग (growing organ) पर निशान लगाकर समय के अन्तराल पर पैमाने से माप लिया जाता है और विशिष्ट समय पर हुई वृद्धि का पता लगाया जाता है।

2. आर्क वृद्धिमापी (Arc Auxanometer) – इस यन्न में एक छोटी घिरनी (pulley) से एक लम्बा सूचक लगा होता है जो एक चापाकार पैमाने पर घूमता है। घिरनी के ऊपर एक मजबूत धागा लगा होता है। धागे के एक सिरे को पौधे के शीर्ष से बाँध दिया जाता है तथा दूसरे सिरे पर एक भार लटका दिया जाता है।

ऐसा करने से धागा घिरनी पर तना रहता है। जब पौधा वृद्धि करता है तो भार के कारण धागा ऊपर खिंचता है साथ ही घिरनी और इसमें लगा सूचक (pointer) भी घूमता है। चाप पर सूचक की दूरी के अनुसार पौधे की इकाई समय में वृद्धि ज्ञात कर ली जाती है।

3. क्षैतिज सूक्ष्कदर्शी द्वारा (By Horizontal microscope) – किसी वृद्धिशील पादप (growing plant) के समीप इस सूक्ष्मदर्शी को लगा देते हैं। पौधे के सिरे पर एक निशान बनाकर उसी स्थान पर सूक्ष्मदर्शी फोकस (focus) कर देते हैं। कुछ दिनों के बाद सूक्ष्मदर्शी (microscope) के पेच को घुमाकर ऊपर उठाकर पुनः उसी बिन्दु पर फोकस करते हैं। दोनों गणनाओं का अन्तर ज्ञात कर लेते हैं। जो पौधे की लम्बाई में वृद्धि को प्रदर्शित करता है।
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4. पेकर का ऑक्सेनोमीटर (Ppeffer’s Auxanometer)- इस यन्त में दो छिरनियाँ (pullies) होती हैं। दोनों घिरनियों को एक स्टैण्ड पर एक सीध में कस द्विया जाता है। दोनों घिरनियों के ऊपर से एक धागा लगाया जाता है। धागे का एक सिरा गमले में लगे पौषे के शीर्ष से बाँध दिया जाता है तथा इसके सिरे पर एक भार लटका दिया जाता है।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

भार लटके धागे वाली ओर एक ऊर्ष्वाधर (vertical) बेलन लगा छोता है जिस पर कालिख लगी होती है। यह बेलन अपनी धुरी पर घूम सकता है। इसी ओर के धागे पर एक सूचक (pointer) लगा दिया जाता है। सूचक (pointer) की नोंक बेलन को छूती है। जब पौधा वृद्धि करता है तो धागा खिंचता है जिससे सूचक घूमते दुए बेलन पर नीचे की ओर चलता है। बेलन पर सूचक द्वारा चली दूरी के अनुसार पौधे की वृद्धि की गणना कर ली जाती है।
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प्रश्न 2.
दीप्तिकालिता तथा क्रान्ति दीप्तिकाल का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दीप्तिकालिता (Photoperiodism)
पौधों में विभिन्न क्रियाओं के लिए प्रकाश का बहुत्त महत्व है। पौधों के फलने-फूलने, वृद्धि, पुष्मन आदि पर प्रकाश की अवधि का प्रभाव पड़ता है। पौधों द्वारा प्रकाश की अवधि तथा समय के प्रति अनुक्रिया को दीजिक्कालिता कहते हैं। दीप्तिकालिता शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम गार्नर तथा एलाई (Garner and Allard; 1920) ने किया।

इन्होंने बताया कि तम्बाक् (Tobacce) की एक प्रजाति में गर्मी में बहुत अधिक कायिक वृद्धि (vegetative growth) होती है परन्तु यदि यही जाति (Nicotiana tabacum) सर्दियों में लगाई जाए तो कायिक वृद्धि के साथ-साथ बहुत अच्छा पुष्पन भी होता है। तब उन्होंने यह कहा कि दिन की लम्बाई अर्थात् प्रकाश के समय का पुष्पन पर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि सर्दियों में प्रकाश की अवधि कम होती है। अतः इन्हें अल्प प्रदीप्तिकाली पौधा (short day plant = SDP) कहा।

प्रकाश काल के पुष्पन पर प्रभाव के अनुसार पौषे तीन प्रकार के होते हैं-

  1. अल्प प्रदीप्तिकाली पौधे (Short Day Plant or SDP)-वे पौधे जिनमें क्रान्तिक दीप्तिकाल से कम समय तक प्रकाश देने से पुष्पन होता है; जैसे-तम्बाकू।
  2. दीर्घ प्रदीफिकाली पौधे (Long day plant or LDP)-ऐसे पौधे जिनमें क्रान्तिक दीप्तिकाल से अधिक समय तक प्रकाश देने से पुष्पन होता है; जैसे-जई, मूली आदि।
  3. दिवस निरेक्ष पौधे (Day Neutral Plants or DNP) – इन पौर्धों के पुष्पन पर प्रकाश के समय का कोई प्रभाव नहीं होता है, जैसे-टमाटर आदि।

कुछ पौधों में कुछ दिन अल्व प्रदीपित काल के पश्चात् फिर दीर्घ प्रदीधित काल मिलने से ही पुष्पन होता है। इन्हें अल्प-दीर्घ प्रद्दीष्तिकाली पौधे (Short-Long Day Plant) कहते हैं। जसे-कैन्डीटफ्ट। क्रान्ति दीप्तिकाल (Critical Day Length) क्रान्ति दीप्तिकाल वह दीप्ति समय है जो पौधे में पुष्वन क्रिया को आरम्भ करने के लिए आवश्यक है। दीप्तिकाल में प्रकाश से अधिक सतत् अन्धकार की आवश्यकता होती है। क्योंकि प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि इनका अन्धकार के समय पड़ने वाली प्रकाश की कुछ किरणें भी पुष्पन को प्रभावित करती हैं।
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दीप्तकालिका का प्रक्रम (Process of Photoperiodism) -फाइटो वर्णक पुष्पन अनुक्रिया के प्रेरण के लिए प्रकाश का अवशोषण करके पुष्पन उत्पन्न करने वाले हॉर्मोंन फ्लोरिजिन (Florigen) का संश्लेषण करता है। सम्पूर्ण प्रक्रम का संक्षेप में वर्णन निम्नवत् हैं।

(1) प्रकाश का अवशोषण (Absorption of Light) – पादपों में पुष्पन तब होता है जब वे प्रकाश तथा अंधेरे का उपयुक्त चक्र प्रहणण कर लेते हैं। इन चक्रों की संख्या विभिन्न प्रजातियों के लिए भिन्नभभिन्न होती है। जैन्थियम पेन्निसिल्वेनिकम (Xanthium pennsylvanicum) को पुष्पन के लिए केवल एक प्रेरक चक्र (Photoinductive cycle) की आवश्यकता होती है।

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साल्विया ऑक्सीडेन्टालिस (Salvia occidentalis) को सत्रह तथा प्लेंटेगो लेन्शियोलेटा (Plantago lanceolata) को 15 प्रकाश प्रेरक चक्रों की आवश्यकता अपने पुष्पन के लिए होती है। पौधों में पुष्पन की क्रिया केवल तभी सम्भव होती है जब वे प्रकाश प्रेरक चक्रों की वांछित संख्या प्राप्त कर लेते हैं। प्रकाश की समस्त तरंगदैर्घ्य पुष्पन को प्रेरित नहीं करती है। पुष्पन की सर्वाधिक उपयुक्त प्रकाश तरंगदैर्ध्य 560 nm – 640 nm

(2) फाइटोक्रोम (Phytochrome) – प्रकाश की तरंगदैर्ध्यों का अवशोषण पत्तियों द्वारा होता है। यह इस तथ्य से प्रमाणित होता है कि पत्तियों रहित पौधों में कभी भी पुष्पन की क्रिया नहीं होती है। वांछित प्रकाशकाल (photoperiod) को अवशोषित करने के लिए एकल पत्ती भी पर्याप्त होती है। आंशिक रूप से परिपक्व पत्तियाँ प्रकाश के लिए अत्यधिक संवेदनशील होती हैं।

पत्तियों में उपस्थित प्रोटीनयुक्त वर्णक फाइटोक्रोम प्रकाश का अवशोषण करके पुष्पन को प्रेरित करते हैं। फाइटोक्रोम अन्तरापरिवर्तनीय रूपों में पाया जाता है। Pr यह लाल रंग का प्रकाश का 660 nm का अवशोषण करता है तथा Pfr सुदू लाल प्रकाश का अवशोषण शीष्रता से करके या अंधेरे में मंद रूप से Pr में बदल जाता है।

दिन के समय जब श्वेत प्रकाश उपलख्य होता है तो Pfr पौधों में संचित हो जाता है। फाइटोक्रोम का यह रूप SDP में पुष्मन रोधक तथा LDP पुष्पन प्रेरक होता है। सायंकाल में Pfr तापीय रूप से स्वतः Pr में अपषटित हो जाता है। यह वर्णक SDP में पुष्वन प्रेक तथा LDP में पुषन रोधक होता है।
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(3) फ्लोरिजन (Florigen)-प्रकाश प्रेरणिक चक्रों से पुष्पन प्रेक हॉमोंन निर्मित होता है। इस हॉमोंन की उपस्थिति मार्फिंग प्रयोग से प्रमाणित हो जाती है। एक पौधा जिसने पुष्वन के लिए वांछित प्रकाशकाल प्रण नहीं किया हो को ऐसे पौधे के साथ कलम से बाँध दिया जाए जिसने पुष्पन के लिए पर्याप्त प्रकाश काल प्रहण कर लिया हो तो पुष्पन की क्रिया दोनों में होती है क्योंकि दूसरे पौधे में उत्पन्न पुष्वन प्रेरक पदार्थ पहले पौधे में स्थानान्तरित हो जाता है। इस पदार्थ को फ्लोरिजन (Florigen) कछे हैं।

फ्लोरिजन के निर्माण को विभिन्न वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार से समझाया है। SDP पौधों में इसका निर्माण जिबरेलिन सदृश्य हॉॉमोंन द्वारा होता है जोकि लाल प्रकाश की पर्याप्त मात्रा अवशोषित करके फ्लोरिजन में परिवर्तित हो जाता है। अन्थकार में यह हॉमोंन पुनः जिबरेलिन सदृश हॉम्मोन में परिवर्तित हो जाता है। जिबोलिन सदृश्य होंमोंन प्रकाश तथा ताप की उचित परिस्थितियों में फ्लोरिजन में परिवर्वित होता है। इसके पश्चात् यह पौधे के उन भागों में स्थानान्तरित हो जाता है जहाँ पष्षन की क्रिया होनी होती है।
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फ्लोरिजन से पौधों में पुष्पन की क्रिया प्रेरित होती है।

प्रश्न 3.
पादप वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वृद्धि दर एवं वृद्धि वक्क (Growth Rate and Growth curve) समय की प्रति इकाई के दौरान बढ़ी हुई वृद्धि को वृद्धि दर (growth rate) कहा जाता है। वृद्धि दर को विभिन्न रूपों में प्रदर्शित किया जाता है। जैसे-अंकगणिवीय वृद्धि, ज्यामितीय वृद्धि, सिग्माइड वृद्धि तथा सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर।

(अ) अकगणितीय धृन्दि (Arithmetic Growth)
यह वृद्धि का वह प्रकार है जिसमें आरम्भ से ही एक स्थिर दर से वृद्धि होती है। समसूत्री विभाजन (mitosis) के पश्चात् बनने वाली दो संतति कोशिकाओं में से केवल एक कोशिका निर्त्रर विभाजित होती रहती है और दूसरी कोशिका विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है। अंकगणितीय वृद्धि को हम निश्चित दर पर वृद्धि करती जड़ में देख सकते हैं। यह एक सरलतम अभिव्यक्ति होती है। यदि इस वृद्धि का प्राफ पर आकलन किया जाए तो हमें एक सीधी रेखा प्राप्त होती है। इस वृद्धि को छम गणितीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं-

Lt=Lo+rt
(यहाँ Lt= समय t पर लम्बाई,
L0= समय शून्य पर लम्बाई, r= वृद्धि दर)
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(ब) उसमिबीय शृबि (Geometrical Growth)
किसी एक कोशिका, पौधे के एक अंग अथवा पूर्ण पौधे की वृद्धि सदैव एकसमान नहीं होती है अर्थात् बदलती रहती है।
प्रारम्भिक अवस्था में वृद्धि धीमी होती है जिसे प्रारम्थिक धीमा वृद्धि काल (initial lag phase) कहते हैं। इसके पश्वात् वृद्धि तीव्रतम होकर उच्चतम बिन्दु पर पहुँच जाती है जिसे मध्य तीव्र वृद्धि काल (middle logarithmic phase) कहते हैं।

z`इसके पश्चात् वृद्धि पुन: धीमी होती है और अन्त में स्थिर हो जाती है। इसे अन्तिम घीमा वृद्धि काल (last stationary phase) कठते हैं। इसे सामूह्हिक रूप से ज्यामितीय वृद्धि (geometrical growth) कहते हैं। इसमें सूत्री विभाजन (mitosis) से बनी दोनों संतति कोशिकाओं में पुनः विभाजन होता है और इनसे बनी कोशिकाएँ मातृ कोशिकाओं का अनुसरण करती हैं।

यद्यपि सीमित पोषण आपूर्ति के साथ वृद्धि दर धीमी होकर स्थिर हो जाती है। समय के प्रति वृद्धि दर को म्राफ पर अंकित करने पर एक सिम्यॉड्ड वार (Sigmoid curve) प्राप्त होता है। यह ‘ S ‘ की आकृति का होता है। ज्यामितीय वृद्धि को गणितीय रूप से निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते हैं-

w1=woert

जहाँ (w1= अन्तिम आकार, भार, ऊँचाई, संख्या आदि, w0= प्रारम्भिक आकार वृद्धि के प्रारम्भ में, r= वृद्धि दर, t= समय, e= स्वाभाविक लघुगणक का आधार)। r एक सापेक्ष वृद्धि दर है। यह पौधे द्वारा नई पादप साममी भी निर्माण क्षमता को मापने के लिए है, जिसे एक दधाता सूंक्कांक (efficiency index) के रूप में सन्दर्रित किया जाता है, अतः w1 का अन्तिम आकार w0 के प्रारम्भिक आकार पर निर्भर करता है।
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HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

(स) सिभ्मॉइड वृद्धि वंज (Sigmoid Growth Curve) : ज्यामितीय वृद्धि को तीन प्रावस्थाओं में बाँटा जा सकता है-

  • प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (initial lag phase),
  • मध्य तीत्र वृद्धि काल (middle lag phase),
  • अन्तिम धीमा वृद्धि काल (last stationary phase)।

यदि समय के सापेक्ष वृद्धि दर का प्राफ खींचा जाय तो ‘S’ की आकृति का वंक्र प्राप्त होता है। इसे सिम्मॉइ (sigmoid curve) वक्र कहते हैं। एक सिग्मॉइड वक्र में निम्न चार चरण होते है-

  1. पश्चान्त प्राबस्था (Lag phase)-इस प्रावस्था में कोशिका में आन्तरिक परिवर्तन होते हैं, संचित खाध्य पदार्थ के काम आने से इसके शुष्क भार में कमी आती है और वृद्धि बहुत धीमी गति से होती है। इसे मंद वृद्धि काल कहते हैं।
  2. पश्च प्रांस्था (Log phase)-इस प्रावस्था में वृद्धि दर एक साथ तीव्र होती है। इसे ग्याफ में सीधी रेखा से दर्शाया गया है। इसे समग्र वृद्धि काल भी कहते हैं। इसे अधिकतम वृद्धि काल कहते हैं। भी कहते हैं। इसे अधिकतम वृद्धि काल कहते हैं।
  3. घटती प्राक्या (Decline phase)-इस प्रावस्था में वृद्धि दर क्रमशः कम होने लगती है। इसे न्यून वृद्धि काल कहते हैं।
  4. स्याई प्रावस्था (Steady phase)-इस प्रावस्था में कोशिका के पूर्ण परिपक्व हो जाने से वृद्धि लगभग स्थिर हो जाती है। इसे स्थिर वृद्धि काल कहते हैं।

(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर (Absolute and Relative Growth Rate)

  • प्रति इकाई समय और मापन में कुल वृद्धि को सम्पूर्ण या परमवृद्धि दर (absolute growth rate) कहते हैं।
  • किसी दी गई प्रणाली की प्रति इकाई समय में वृद्धि को सामान्य आधार पर प्रदर्शित करना सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहलाता है। सम्मुख चित्र में दोनों पत्तियों ने एक निश्चित समय में अपने सम्पूर्ण क्षेत्रफल में समान वृद्धि की है, फिर भी A की सापेक्ष वृद्धि दर अधिक है।

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प्रश्न 4.
वृद्धि से आप क्या समझते हैं ? वृद्धि की विभिन्न प्रावस्थाएँ लिखिए।
उत्तर:
वृद्धि (Growth)
जीवधारियों एवं पादपों-का आकार में बढ़ना वृद्धि (growth) कहलाता है, जिसके फलस्वरूप पौधे के शुष्क भार (dry weight) तथा जीवद्रव्य की मात्रा में भी बढ़ोत्तरी होती है। किसी जीवधारी के आकार में परिवर्तन, रूप में भिन्नता एवं जटिलता का उत्पन्न होना परिवर्धन (development) कहालाता है।

अतः वृद्धि एक मात्रात्मक (quantitative) दशा है जिसमें जीवधारियों के पदार्थों की मात्रा में बढ़ोत्तरी होती है। अतः वृद्धि एवं परिवर्धन को एक-दूसरे से आसानी से पृथक् नहीं किया जा सकता है, क्योंकि ये क्रियाएँ एक-दूसरे के बाद एक ही जीव में सम्पन्न रहती हैं। वृद्धि को किसी तुला से तौलकर तथा परिवर्धन को गुणात्मक गणना के आधार पर एक-दूसरे से पृथक् नहीं किया जा सकता है।

परिभाषा (Definition) ब्लैकमैन (Blackman) के अनुसार वृद्धि (growth) वह परिणाम है जो किसी जीव या अंग की विघटनकारी क्रियाओं की तुलना में निर्माणकारी उपापचयी क्रियाओं (metabolic reactions) के कारण उत्पन्न होता है। मिलर (Miller) के अनुसार, वृद्धि वह घटना है जो पादप के किसी अंग, भार, आयतन, आकार एवं रूप में स्थाई एवं अनुक्क्रमणीय (irreversible) परिवर्तन प्रदर्शित करती हैं।
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पादप वृद्धि स्थल (Plant growth places)
निम्न कोटि के पादपों (जैसे-शैवाल, कवक आदि) में वृद्धि उनके सम्पूर्ण शरीर में होती है जबकि उच्चकोटि के पादपों में वृद्धि कुछ विशेष भागों में होती है। इन स्थानों पर पाए जाने वाले ऊतक विभज्योतक (meristems) कहलाते हैं। इन ऊतकों की कोशिकाओं में विभाजन की अपार क्षमता होती है। पादपों में स्थिति के आधार पर विभज्योतक (meristems) निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं-
(a) शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical meristem) – यह तने या मूल (stem and root) के शीर्ष (apex) पर पाया जाता है। इसकी सक्रियता के कारण पौधे की लम्बाई में वृद्धि होती है।

(b) पार्श्व विभज्योतक (Lateral meristem) – जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ये ऊतक पौधों के पार्श्व उपांगों जैसे-पर्व एवं पर्वसन्धियों (node & internodes) के पार्श्व में पार्श्व कलिकाओं (lateral buds) के आधार भागों आदि स्थानों पर पाए जाते हैं। इनकी क्रियाशीलता के कारण तने एवं जड़ (root & stem की मोटाई में वृद्धि होती है। संवहन एधा (vascular cambium) तथा कॉर्क एधा (cork cambium) इसके उदाहरण हैं।

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(c) अन्तवेशी विभज्योतक (Intercalary meristem) – इस प्रकार के विभज्योतक सर्वदा पर्वसन्धि (node) के ऊपर पाए जाते हैं। इनकी सक्रियता के फलस्वरूप पौधे के तने के पर्व (internodes) लम्बाई में वृद्धि करते हैं।

प्रश्न 5.
वृद्धि दर एवं वृद्धि वक्र से आप क्या समझते हैं ? समझाइए ।
उत्तर:
वृद्धि दर एवं वृद्धि वक्क (Growth Rate and Growth curve) समय की प्रति इकाई के दौरान बढ़ी हुई वृद्धि को वृद्धि दर (growth rate) कहा जाता है। वृद्धि दर को विभिन्न रूपों में प्रदर्शित किया जाता है। जैसे-अंकगणिवीय वृद्धि, ज्यामितीय वृद्धि, सिग्माइड वृद्धि तथा सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर।

(अ) अकगणितीय धृन्दि (Arithmetic Growth)
यह वृद्धि का वह प्रकार है जिसमें आरम्भ से ही एक स्थिर दर से वृद्धि होती है। समसूत्री विभाजन (mitosis) के पश्चात् बनने वाली दो संतति कोशिकाओं में से केवल एक कोशिका निर्त्रर विभाजित होती रहती है और दूसरी कोशिका विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है। अंकगणितीय वृद्धि को हम निश्चित दर पर वृद्धि करती जड़ में देख सकते हैं। यह एक सरलतम अभिव्यक्ति होती है। यदि इस वृद्धि का प्राफ पर आकलन किया जाए तो हमें एक सीधी रेखा प्राप्त होती है। इस वृद्धि को छम गणितीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं-

Lt=Lo+rt
(यहाँ Lt= समय t पर लम्बाई,
L0= समय शून्य पर लम्बाई, r= वृद्धि दर)
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(ब) उसमिबीय शृबि (Geometrical Growth)
किसी एक कोशिका, पौधे के एक अंग अथवा पूर्ण पौधे की वृद्धि सदैव एकसमान नहीं होती है अर्थात् बदलती रहती है।
प्रारम्भिक अवस्था में वृद्धि धीमी होती है जिसे प्रारम्थिक धीमा वृद्धि काल (initial lag phase) कहते हैं। इसके पश्वात् वृद्धि तीव्रतम होकर उच्चतम बिन्दु पर पहुँच जाती है जिसे मध्य तीव्र वृद्धि काल (middle logarithmic phase) कहते हैं।

इसके पश्चात् वृद्धि पुन: धीमी होती है और अन्त में स्थिर हो जाती है। इसे अन्तिम घीमा वृद्धि काल (last stationary phase) कठते हैं। इसे सामूह्हिक रूप से ज्यामितीय वृद्धि (geometrical growth) कहते हैं। इसमें सूत्री विभाजन (mitosis) से बनी दोनों संतति कोशिकाओं में पुनः विभाजन होता है और इनसे बनी कोशिकाएँ मातृ कोशिकाओं का अनुसरण करती हैं।

यद्यपि सीमित पोषण आपूर्ति के साथ वृद्धि दर धीमी होकर स्थिर हो जाती है। समय के प्रति वृद्धि दर को म्राफ पर अंकित करने पर एक सिम्यॉड्ड वार (Sigmoid curve) प्राप्त होता है। यह ‘ S ‘ की आकृति का होता है। ज्यामितीय वृद्धि को गणितीय रूप से निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते हैं-

w1=woert

जहाँ (w1= अन्तिम आकार, भार, ऊँचाई, संख्या आदि, w0= प्रारम्भिक आकार वृद्धि के प्रारम्भ में, r= वृद्धि दर, t= समय, e= स्वाभाविक लघुगणक का आधार)। r एक सापेक्ष वृद्धि दर है। यह पौधे द्वारा नई पादप साममी भी निर्माण क्षमता को मापने के लिए है, जिसे एक दधाता सूंक्कांक (efficiency index) के रूप में सन्दर्रित किया जाता है, अतः w1 का अन्तिम आकार w0 के प्रारम्भिक आकार पर निर्भर करता है।
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(स) सिभ्मॉइड वृद्धि वंज (Sigmoid Growth Curve) : ज्यामितीय वृद्धि को तीन प्रावस्थाओं में बाँटा जा सकता है-

  • प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (initial lag phase),
  • मध्य तीत्र वृद्धि काल (middle lag phase),
  • अन्तिम धीमा वृद्धि काल (last stationary phase)।

यदि समय के सापेक्ष वृद्धि दर का प्राफ खींचा जाय तो ‘S’ की आकृति का वंक्र प्राप्त होता है। इसे सिम्मॉइ (sigmoid curve) वक्र कहते हैं। एक सिग्मॉइड वक्र में निम्न चार चरण होते है-
(1) पश्चान्त प्राबस्था (Lag phase)-इस प्रावस्था में कोशिका में आन्तरिक परिवर्तन होते हैं, संचित खाध्य पदार्थ के काम आने से इसके शुष्क भार में कमी आती है और वृद्धि बहुत धीमी गति से होती है। इसे मंद वृद्धि काल कहते हैं।

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(2) पश्च प्रांस्था (Log phase)-इस प्रावस्था में वृद्धि दर एक साथ तीव्र होती है। इसे ग्याफ में सीधी रेखा से दर्शाया गया है। इसे समग्र वृद्धि काल भी कहते हैं। इसे अधिकतम वृद्धि काल कहते हैं। भी कहते हैं। इसे अधिकतम वृद्धि काल कहते हैं।

(3) घटती प्राक्या (Decline phase)-इस प्रावस्था में वृद्धि दर क्रमशः कम होने लगती है। इसे न्यून वृद्धि काल कहते हैं।

(4) स्याई प्रावस्था (Steady phase)-इस प्रावस्था में कोशिका के पूर्ण परिपक्व हो जाने से वृद्धि लगभग स्थिर हो जाती है। इसे स्थिर वृद्धि काल कहते हैं।

(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर (Absolute and Relative Growth Rate)

  • प्रति इकाई समय और मापन में कुल वृद्धि को सम्पूर्ण या परमवृद्धि दर (absolute growth rate) कहते हैं।
  • किसी दी गई प्रणाली की प्रति इकाई समय में वृद्धि को सामान्य आधार पर प्रदर्शित करना सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहलाता है। सम्मुख चित्र में दोनों पत्तियों ने एक निश्चित समय में अपने सम्पूर्ण क्षेत्रफल में समान वृद्धि की है, फिर भी A की सापेक्ष वृद्धि दर अधिक है।

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प्रश्न 6.
वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वृद्धि के लिए दशाएँ अधवा वृद्धि पर प्रभाव ज्ञालने वाले कारक (Conditions for Growth or Factors Affecting Plant Growth)
वृद्धि विभिन्न प्रक्रियाओं का परिणाम है। अतः जो भी कारक इन प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं वृद्धि को भी प्रभावित करते हैं। वृद्धि को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्न प्रकार हैं-
1. जल (Water) – जल पादप वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण कारक है। जल अनेक पदार्थों के संवहन माध्यम का कार्य करता है। कोशिका की विभिन्न उपापचयी क्रियाएँ (metabolic processes) भी जलीय माध्यम में होती हैं। अधिकांश विकर (enzymes) भी जल की उपस्थिति में सक्रिय रहते हैं। अतः जल की कमी का पौधों की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव होता है।

2. ऑक्सी (respiration) द्रारा प्राप्त होती है और श्वसन के लिए ऑक्सीजन आवश्यक होती है। अतः ऑक्सीजन की कमी का उपापचयी क्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव होता है जिससे वृद्धि प्रभावित होती है।

3. प्रकाश (Light)-पौधे प्रकाश की उपस्थिति में ही प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) द्वारा भोज्य पदाथों का निर्माण करते हैं। क्लोरोफिल (chlorophyll) का निर्माण भी प्रकाश की उपस्थिति में होता है। क्लोरोफिल भी प्रकाश संश्लेषण में प्रमुख भूमिका अदा करता है। प्रकाश की अनुपस्थिति में पादपों में न तो क्लोरोफिल का गिर्माण होगा और न ही भोज्य पदार्थों का। भोज्य पदार्थों के अभाव में पौरों की वृद्धि नहीं हो सकती।

4. खनिज लवण (Mineral salts) – पौर्रों की वृद्धि के लिए विभिन्न खनिज लवर्णों की आवश्यकता होती है। पौधों में लगभग 92 तत्व पाए जाते हैं। इनमें से ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, कार्बन, पोटेशियम, सल्फर तथा नाइट्रोजन प्रमुख हैं। इनके अलावा बोरोन, जिंक, मोलीब्डेनम, कॉपर, लौह, मैग्नीशियम आदि तत्व भी आवश्यक होते हैं। इनकी कमी से पौधों में विकार उत्पन्न हो जाते हैं तथा पौधे समुचित वृद्धि नहीं कर पाते हैं।

5. होंमोंस (Hormones) – हॉर्मोन्स पौर्षों में ही अल्प मात्रा में संश्लेषित होते हैं और पौषों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं, जैसे-ऑक्सि, जिबरेलिन इत्यादि ।

6. ताप (Temperature) -10°C तापक्रम बढ़ने पर जैविक क्रियाओं की दर दोगुनी से तिगुनी हो जाती है किन्तु अत्यधिक ताप वृद्धि पादपों के लिए हानिकारक होती है।

7. प्रकाश तीब्ता (Intensity of Light) – अधिक तीव्र प्रकाश वृद्धि को कम करता है किन्तु पौधे छष्ट-पुष्ट होते हैं।

8. प्रकाश का प्रकार (Quality of Light)-पराबैंगनी (ultraviolet) तथा अवरक्त लाल किरणें (infra red rays) वृद्धि को रोकती हैं किन्तु लाल किरणें वृद्धि को प्रेरित करती हैं।

9. प्रकाश काल (Duration of Light) – प्रकाश काल का प्रभाव मुख्यतः पुष्पन (flowering) पर होता है।

10. प्रकाश की दिशा (Direction of Light)-प्रकाश की दिशा भी वृद्धि को प्रभावित करती है। तनों का प्रकाश की ओर बढ़ना धनात्मक प्रकाशानुवर्तन (positive phototropism) कहलाता है।

प्रश्न 7.
पादप वृद्धि नियम क्या है ? किन्हीं दो पादप वृद्धि नियामकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पादप वृद्धि नियामक (Plant Growth Regulators)
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामक विशेष प्रकार के कार्बनिक यौगिक छोते हैं, जो मुख्य रूप से जिक्योत्रों (Meristems) तथा विकासशील पीतियों एवं फ्रों में उत्पन्न होते हैं। इ्नकी अतिस्थि माश्र पौधों के विभिन्न भागों में पहुँचकर उनकी विभिन्न उपापचयी क्रियाओं (metabolic processes) को प्रभावित एवं नियन्त्रित करती है।

इन्हें पात्य होंकोस्स (plant hormones or phytohormones) भी कहो हैं। अनेक कृत्रिम कार्बनिक योगिक भी पादप हॉर्मोंस की तरह कार्य करते हैं। वेन्ट (Went; 1928) के अनुसार वृद्धि नियामक पदार्थों के अभाव में वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव होता है।
पादप हॉर्मोन्स को निम्नलिखित पाँच समुों में बाँटा जा सकता है-

  1. ऑक्सिन्स (Auxins),
  2. जिबरेलिन्स (Gibberellins),
  3. साइटोकाइनिन्स (Cytokinins)
  4. ऐब्सिसिक अम्ल (Abscisic acid),
  5. एथिलीन (Ethylene)।

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प्रश्न 8.
निम्नलिखित के कार्यिकीय प्रभाव लिखिए-
(अ) ऑक्सिन,
(ब) जिब्बरेलिन,
(स) साइटोकाइनिन।
उत्तर:
देखिए –
(अ)  ऑक्सिन्स (Auxins)
डार्विन (Darwin; 1880) ने केनरी घास (Phalaris canariensis) पर अपने प्रयोगों के दौरान देखा कि इस घास के नवोद्धिद (seedlings) के प्रांकर चोल (coleoptile) को एक ओर से प्रकाश दिया जाय तो यह प्रकाश की ओर मु० जाता है। यदि प्रांर चोल (coleoptile) का शीर्ष काटकर प्रकाश दिया जाय दो यह एक तरफा प्रकाश की ओर नहीं मुड़ता।
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बायसन-जेन्सन (Boysen-Jensen, 1910-1913) ने कटे हुए प्राकुर चोल (coleoptile) को अगार (Agar) के घनाकार टुकड़ों पर रखा। कुछ समय पश्चात् अगार के इस टुकड़े को उन्होने कटे हुए प्रांकुर चोल वाले स्थान पर रखकर एकतरफा प्रकाश दिया। ऐसा करने से प्रांकुर चोल (coleoptile) प्रकाश की ओर मुछ़ जाता है।

वेष्ट ने इसी प्रकार के प्रयोग जई (Avena sativa) के नवोद्भिदों पर किये तथा बताया कि प्रांकुर चोल के शीर्ष भाग में एक रासायनिक पदार्थ बनता है जो प्रकाश से उद्दीप्त हो जाता है। यदि प्रांकुर चोल (coleoptile) के टिप को काट दिया जाय तो इस पदार्थ का संश्लेषण नहीं होता और कटे टिप वाले प्रांकुर चोल पर प्रकाश का कोई प्रभाव नहीं होता है।

यदि टिप को अगार इलाक (agar block) पर रख दिया जाता है तो रासायनिक पदार्थ अगार ब्लाक में रिसकर चला जाता है तथा इस अगार ब्लाक को पुन: कटे प्रांकुर चोल पर रखें तो रासायनिक पदार्थ ठीक उसी प्रकार कार्य करता है जिस प्रकार बिना काटे हुए प्रांकुर चोल का।

एक अन्य प्रयोग में एफ. इन्यू. वेष्ट्ट (F. W. Went : 1926-1928) ने प्रांकुर चोल के कटे हुए टिप को दो अगार के ब्लाकों पर रखा जिनके मध्य पतली अंक्षेटेट (माइका) लगी थी। अब इस टिप को एकतरफा प्रकाश दिया गया। उन्होंने देखा कि रासायनिक पदार्थ की 65% मात्रा छाया वाले अगार ब्लाक में तथा 35% मात्रा प्रकाश की ओर वाले अगार ब्लाक में एकत्र थी।

वेण्ट ने इस रासायनिक पदार्थ को अंक्सि (Auxin) नाम दिया। ऑंक्सिन की उपस्थिति तने में वृद्धि को प्रेरित करती है तथा जड़ में वृद्धि का संदमन करती है। ऑक्सिन के असमान वितरण के कारण ही प्रकाशानुकर्तनी तथा गुर्तचानुकार्ती (phototropism and geotropism) गति होती है।

ऑक्सिन की खोज का श्रेय एफ. छष्ल्यू. वेन्ट को ही दिया जाता है। केनेब बीमान (Kenneth Thimann) ने आंक्सि को शुद्ध रूप में प्राप्त करके इसकी आण्विक संरचना ज्ञात की। ऑक्सिन की रासायनिक प्रकृति (Chemical Nature of Auxin) कॉगल तथा हाओेन स्थिध ने मानव मूत्र से ऑंक्सिन समान पदार्थ पृथक् किया। इसे उन्डोंने ऑंक्सिन्-a (ऑक्सिनोट्रायोलिक अम्ल) कहा जिसका सूत्र C18H32O5 होता है।

ऑक्सिन दो प्रकार के होते हैं-
(1) प्राकृतिक ऑक्सिन (Natural auxin)-कॉगन एवं साथियों ने पुन: मानव के मूत्र से ही एक अन्य पदार्थ पृथक् किया जिसे हि्डोओक्सिन (Heteroauxin) नाम दिया। इसे आजकल IAA (इन्डोल-3 ऐसीटिक एसिड) कहते हैं। यह प्रों में पाया जाने वाला प्राकृतिक ऑंक्सिन है। अन्य प्राकृतिक ऑक्सिन IAA के व्युतन्न के रूप में पाये जाते हैं।

प्राकृतिक आंक्सिन शीर्ष विभाज्योतकों (apical meristem) में बनते हैं और इनका संश्लेषण विभज्योतक क्षेत्र में ‘ट्रिप्टोफेन’ (triptophen) अमीनो अम्ल द्वारा छोता है। यह शीर्ष से सिर्फ आधार की ओर गमन करते हैं। इ्नका ‘बसेीपिट्य ट्रान्सपेर्ट’ (basipetal transport) होता है। इनकी मात्रा शीर्ष विभज्योतकों में अधिकतम छोती है। तीव्र प्रकाश में ऑंक्सिन नह हो जाते हैं। ऑंक्सिन संश्लेषण के लिए Zn अनिवार्य होता है।

(2) संश्लेकि ऑक्सिन (Synthetic auxins)- कुछ संश्लेषित रासायनिक यौगिक मी ऑक्सिन की भाँति कार्य करते हैं। इन्हें संख्लेषित ऑक्सिन (Auxin) कहते हैं। जैसे – नैफ्थलिन ऐसीटिक अम्ल (NAA), इ्डोल-3-ब्यूटाइरिक अम्ल (IBA), 2-4 डाइक्लोरोफिनांक्सि ऐसीटिक अम्ल (2-4D)। आँक्सिन सबसे अधिक103 या 0.001 M की सान्द्रता पर प्रभावी होता है।

संश्लेषित ऑक्सिन में ‘अधुवीय स्थनान्तरण’ पाया जाता है। पादप के किसी भी भाग पर डालने पर यह सम्पूर्ण पादप में फैल जाते हैं। एक पादप में एक समय एक ही ऑक्सिन (Auxin) पाया जाता है। ऑंक्सिन की सर्वाधिक सान्द्रता विभज्योतक उत्तक में पाई जाती है। आंक्सिन का स्थानान्तरण संवहन बंडल (vascular bundle) के द्वारा नहीं होता है बल्कि विसरण (diffusion) द्वारा एक कोशिका से दूसरी कोशिका में होता है।
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ऑक्सिन के कार्यिकीय प्रभाव एवं उपयोग (Physlological Effects & Uses of Auxins)
1. शीर्ष प्रमुख्ता (Apical dominance)- तनों की शीर्ष कलिका (apical bud) में संश्लेषित आक्सिन शीर्ष वृद्धि को बढ़ावा देते हैं तथा पार्श्व कलिकाओं (lateral buds) की वृद्धि का संदमन करते हैं। शीर्ष कलिका को काटने पर पार्श्व कलिकाएँ तेजी से वृद्धि करती हैं। इस गुण का प्रयोग चाय बागानों एवं हेज लगाने के लिए किया जाता है।

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2. विलगन (Abscission) – ऑक्सिन की विशिष्ट सान्द्रता का छिड़काव करने से पत्तियों, पुष्पों व फलों का असमय विलगन रोका जा सकता है।

3. प्रसुपता नियन्रण (Control of dormancy)-आँक्सिन के छिड़काव द्वारा आलू आदि भूमिगत कन्दों (tubers) की कलिकाओं को सामान्य ताप पर प्रस्सुटित (proliferate) होने से रोका जा सकता है।

4. कायिक प्रजनन (Vegetative propogation)-IBA का प्रयोग कलम में निचले भाग में शीष्र जड़ें उत्पन्न करा देता है।

5. खरपतवार नियमन्रण (Weed control) – ऑंक्सि, जैसे – 2, 4-D का प्रयोग चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों (weeds) को नृष्ट करने के लिए किया जाता है ।

6. अनिवेकफलन (Parthenocarpy)- बिना निषेचन (fertilization) फलों का निर्माण होना अनिषेकफलन (parthenocarpy) कहलाता है। कुछ पौधों जैसे-अंगूर, केला, सन्तरा आदि में परागण क्रिया को रोककर यदि ऑंक्सिन की उचित सान्द्रता वर्तिकाम्रों (stigmia) पर लगा दी जाय तो इनमें फलों का विकास हो जाता है।

7. कोशिका दीर्घीकरण (Cell elongation) – आँक्सिन का मुख्य कार्य प्रोह (shoot) में कोशिका दीर्घीकरण है। प्रोह में ऑंक्सिन की अधिक सान्द्रता कोशिका दीर्घीकरण भी प्रेरित करती है। इसलिए प्ररोह धनात्मक प्रकाशानुवर्तीं (+ ve phototropic) एवं ऋ्रणात्मक गुर्त्वानुवर्ती (-ve geotropic) होता है।

8. कोशिका विभाजन (Cell division) – ऑक्सिन कैम्बियम के विभाजन के समय, कलम बाँधने (grafting) के समय, घाव (wounds) होने पर तथा ऊतक संवर्धन (tissue culture) में कोशिका विभाजन को बढ़ाता है।

9. wके का समारथन (Root initiation) – ऑंक्सिन जड़ों के निकलने को प्रेरित करता है। कुछ पौधे जैसे-गुलाब, बोगेनविलिया, नींबू, संतरा आदि में तनों या कलमों को लगाकर नया पौधा तैयार किया जाता है। कलमों के कटे हुए भाग को ऑक्सिन (IBA या NAA) के घोल में हुबोकर लगाने से कलमों से जड़ें शीघ्रता से निकलती हैं तथा कलम जल्दी लग जाती है।

10. पुयन पर प्रथाव (Effects on flowering)-ऑक्सिन अनावश्यक पुष्यन की क्रिया को रोकते हैं, जैसे-आम में। इसी प्रकार सलाद के पौधे में पुष्प निर्माण को रोककर पौषे के वाणिज्य मूल्य को बनाये रखा जा सकता है, क्योंकि इस पौधे की केवल पत्तियाँ उपयोगी होती हैं। अनन्नास तथा लीची में ऑंक्सिन के छिड़ाव से पौधों के सभी फूल एक समय पर उत्पन्न होते हैं।

ऑक्सिन पुर्षों में ‘माद्रप्न प्रभाव’ (feminising effect) डालते हैं। ये मादा पुष्पों के निर्माण को बढ़ाते हैं। नर पुष्यों के निर्माण को रोकते हैं। जैसे-कुकरबिटा (Cucurbita) में दो प्रकार के पुष्प पाये जाते हैं। इसमें ऑक्सिन के छिड़काव द्वारा मादा पुष्प (female flower) अधिक प्राप्त किए जा सकते हैं।.
अन्य प्रभाव (Other effects) : आंक्सिन्स के कुछ अन्य प्रभाव निम्नलिखित हैं-

  • श्वसन क्रियाधारों की उपलब्धता बढाकर श्वसन को प्रेरित करते हैं।
  • कोशिकाओं में विलेयों के संग्रहण को बढ़ाते हैं।
  • एथिलीन में संश्लेषण को बढ़ाते हैं।

(ब) जिबरेलिन (Gibberellins)
जिबरेलिन की खोज (Discovery of Gibberellin)-जापान के फारमोसा (Formosa) में धान के खेत में कुछ पौधे अत्यधिक लम्बे पाए गए, जिनकी पत्तियाँ लम्बी व पीली हो जाती थीं तथा इन पौधों में दाना कम उत्पन्न होता था। धान का यह रोग एक कवक, जिबरेला फ्यूरीकुराई (Gibberella fujikuroiFusarium moniliforme) द्वारा होता है ।

इस रोग को फूलिश सीडलिग रोग या बकानी (Foolish seedling disease or Bakanae) रोग कठा जाता है। &. कुरोसावा (E. Kurosawa, 1926) ने प्रमाणित किया कि यदि कवक (fungus) द्वारा सावित रस को धान के स्वस्थ पौधों पर स्ते कर दिया जाए तो उनमें भी इस रोग के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।

या और ह्याशी (Yabuta and Hayashi, 1939) ने इस फफूँद में से एक वृद्धि नियन्नक पदार्थ पृथक् किया जिसे जिबरेलिन-A (GA) नाम दिया गया। विभिन्न प्रकार के पौधों में अब तक 110 से अधिक जिबरेलिन पृथक् किए जा चुके हैं। जिबरेलिन्स को अपरिपक्व बीजों, जड़ तथा तने के शीर्ष, तरुण पत्तियों तथा कवकों से पृथक् किया गया है। ये संभवतः शैवाल, मॉस तथा फर्न आदि में भी पाए जाते हैं।

श्वसन क्रिया में भाग लेने वाला प्रमुख योगिक ऐसीटिल कोएन्जाइम-A जिबरेलिन-A के निमाण में पूवेवर्ती (Precurser) योंगक का काम करता है।
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रासायनिक सूत्र एवं प्रकृति (Chemical formula and chemical nature): अधिकांश ज्ञात जिबरेलिन्स को GA1, GA2, GA3 ………….. आदि नाम दिए गए हैं।

जिनके रासायनिक संत्र निम्न प्रकार हैं-
GA1 = C19 H24 O6
GA2 = C19 H26 O6
GA3 = C19 H22 O6
सबसे सामान्य तथा सर्वाधिक महत्व का जिबरेलिन GA3 होता है।
(b) रासायनिक प्रकृति (Chemical Nature)-जिबरेलिन का अग्रक पदार्थ (Precurser) कॉरीन (kaurene) होता है। कॉरीन का अग्रक पदार्थ ऐसीटिल Co- A होता है। जिबरेलिन का स्थानान्तरण अधुवीय (non-polar) होता है तथा इनकी संरचना चक्रीय (cyclic structure) होती है। इनमें जिबेन वलय होती है। रासायनिक दृष्टि से सभी जिबरेलिन टरपीन्स (terpenes) होते हैं। ये सभी पादपों में पाये जाते हैं।

जिबरेलिन का कार्यिकीय प्रभाव एवं महत्व (Physiological Effects and Importance of Gibberellins)
1. लम्बाई बक्नाने की क्षमता (Efficiency of increase the length) – जिबरेलिन की उचित सान्द्रता के छिड़काव से बौने पौधे (dwarf plants) लम्बे हो जाते हैं। किन्तु इसका प्रभाव सीमित पौधों पर ही होता है। GA के प्रयोग से सेब के पौधे लम्बे हो जाते हैं। अंगूर के डण्ठल की लम्बाई बढ़ जाती है, गन्ने के तने की लम्बाई बढ़ जाती है।

2. पुप्यन पर प्रभाव (Effect of flowering)-कुछ पौधों को पुष्पन हेतु कम ताप तथा दीर्ष प्रकाश की आवश्यकता होती है। यदि इन पौधों पर GA3 का छिड़काव किया जाय तो पुष्पन आसानी से हो जाता है। द्विवर्षी पौधे (biennial plants), एकवर्षी पौधों (annual plants) की तरह व्यवहार करने लगते हैं, इसे वोस्टित प्रथा (bolting effect) कहते हैं। GA का पुष्पन की क्रिया पर ऑक्सिन की अपेक्षा उल्टा प्रभाव होता है। GA पादपों में पुंजननता (male ness) को प्रेरित करते हैं। अर्थात् नर पुष्पों के निर्माण को बढ़ाते हैं।

3. वृद्धि दर पर प्रथाव (Effect on growth rate)-जिबरेलिन्स कोशिका दीर्घन (cell elongation) के द्वारा वृद्धि को बढ़ाते हैं। जिबरेलिन्स, ऑक्सिन की तुलना में 500 गुना अधिक सक्रिय होते हैं।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

4. अनिषेक फलन (Parthenocarpy) – कृत्रिम अनिषेक फलन में भी GA का उपयोग किया जाता है। इसके द्वारा टमाटर, सेब, नाशपाती आदि फलों में अनिषेक फलन ऑक्सिन की तुलना में अधिक आसानी से कराया जा सकता है। इसका प्रयोग अति तनु अवस्था में किया जाता है।

5. दीर्घ प्रदीप्तिकाली पौधों में पुष्पन (Early flowering in long day plants) – LDP को पुष्पन के लिए दीर्घ प्रकाश अवधि की आवश्यकता होती है। जिबरेलिन के उपचार द्वारा इन पौधों में लघुप्रकाश अवधि (SDP) में ही पुष्पन कराया जा सकता है।

6. बसन्तीकरण या शीत उष्चार का प्रतिस्थापन (Vernalisation or substitution of cold treatment) – द्विवर्षीय पादपों में पुष्पन दूसरे वर्ष में एक शीतकाल के समाप्त होने के बाद होता है। इनमें पुख्पन के लिए शीतकाल में कम तापमान की आवश्यकता होती है। ज़िबरेलिन उपचार से इनमें वृद्धि के प्रथम वर्ष में ही पुष्पन हो जाता है।

7. प्रसुप्तावस्था भंग करना (Breaking of dormancy) – जिबरेलिन बीजों तथा कन्दों (tubers) की प्रसुप्तावस्था (dormancy) को नष्ट करते हैं तथा इन्हें अंकुरित होने के लिए प्रेरित करते हैं। जिबरेलिन बीजों तथा कन्दों के जटिल भोजन के पाचन को प्रेरित करते हैं, जिससे वे अंकुरण कर सकें।

8. एमाइलेज विकर का निर्माण (Synthesis of α-Amylase)-जिबरेलिन मक्का के अंकुरित बीजों में α एमाइलेज के निर्माण को प्रेरित करते हैं।

9. प्रकाश संवेदी बीजों में अंकुरण (Germination in light Sensitive seeds) – सलाद एवं तम्बाकृ के बीजों को अंकुरण के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है। इन बीजों को जिबरेलिन से उपचारित करने से इन्हें अंधेरे में उगाया जा सकता है।

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(स) साइटोकाइनिन।
सार्तेकामनिन के कायिक्डीय प्रथाव (Physiological Effect of Cytokinin)
1. डोरिता निथलन (Cell division)- साइटोकाइनिन का प्रमुख कार्य ऑक्सिन की उपस्थिति में कोरिका विभाजन (cell division) को प्रेरित करना है। ये पादर्यों में विभज्योतक निर्माण को भी प्रेरित करते है।

2. कोशिका वियेद्न (Cell differentiation) – साइ्टोकाइ़नन (cytokinin) ऑंक्सिन की उपस्थिति में विभिन्न अनुपात में अलग-अलग प्रभाव उत्पन्न करते हैं। ऊसक संवर्धन (tissue culture) प्रक्रिया में पोषक माध्यम (culture media) में अधिक सान्द्रता में साइटोकाइनिन तथा कम सान्द्रता में ऑंक्सि हो तो इससे कैलस (callus) का विकास प्रेरित होता है। साइटोकाइनिन की कम एवं ओंक्सिन की अधिक सान्द्रता जड़ निर्माण एवं विभेदन को प्रेरित करती है। यदि दोनों की मात्रा समान रखी जाए तो जड़ एवं तना दोनों ही समान रूप से विकसित होते हैं।

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3. शीर्ष प्रयाबिता निरोध (Counter action of apical dominance)-साइटोकाइनिन के प्रभाव से शीर्ष प्रमुखता प्रभाव नष्ट हो जाता है तथा पाश्व कलिकाओं (lateral buds) की वृद्धि होने लगती है।

4. प्रकाश संब्दी बीजं बा अंरण (Germination of light sensitive seeds)-साइटोकाइनिन से उपचारित सलाद व तम्बाकू के बीजों को अन्धेरे में उगाया जा सकता है।

5. जर्णता विलम्ब (Delay of Senescence)-पादपों में साइटोकाइनिन जीर्णता को विलंबित करते हैं। पर्णहरिम का विघटन, एन्जाइमों का नष्ट होना जीर्णता (senescence) के लक्षण हैं। साइटोकाइनिन के उपश्रार से जीर्णता (senescence) देरी से होती है। इस प्रभाव को रिचमॉण्ड लैंग प्रथाव (Richmond Lang Effect) कहते हैं।

6. घ्रतुर्जा नाशन (Breaking of dormancy)-साइटोकाइनिन के उपचार से कलिकाओं एवं बीजों की प्रसुप्तता को नष्ट किया जा सकता है।

7. लुदीफिकाली पौरों में पुष्मन (Flowering in SDP)-साइटोकाइनिन के उपचार से लघुदीप्तिकाली पौधों (SDP) में पुष्पन प्रेरित किया जा सकता

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HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन

Haryana State Board HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन गति Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs Type)

प्रश्न 1.
निम्न में से कौन-सा समीकरण सरल आवर्त गति को व्यक्त नहीं करता है-
(a) y =R sin (ωt + ϕ)
(b) y =R cos (ωt + ϕ)
(c) y = R sin ωt + b cos ωt
(d) y = R sin ωt cos 2 ωt
उत्तर :
(d) y = R sin ωt cos 2ωt

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प्रश्न 2.
सरल आवर्त गति करते कण का अधिकतम वेग 4 ms-1 है तथा अधिकतम त्वरण 16 ms-2 है तो कण का आयाम व आवर्तकाल क्या होगा-
(a) 1 m, \(\frac{\pi}{2}\)
(b) 2 m, π s
(c) 4 m, 2π s
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(a) 1 m, \(\frac{\pi}{2}\)

प्रश्न 3.
सरल आवर्त गति करते हुए एक पिण्ड का आवर्तकाल 0.05 s तथा आयाम 4 cm है। पिण्ड का अधिकतम वेग होगा-
(a) 1.6 π ms-1
(b) 2 π ms-1
(c) 3.1 π ms-1
(d) 4 π ms-1
उत्तर :
(a) 1.6 π ms-1

प्रश्न 4.
एक सरल लोलक का पृथ्वी पर आवर्तकाल T1 है, यदि पृथ्वी से R ऊँचाई पर आवर्तकाल T2 हो, तो \(\frac{T_2}{T_1}\) होगा-
(a) 1
(b) 2
(c) √2
(d) 4
उत्तर :
(b) 2

प्रश्न 5.
सरल आवर्त गति करते कण का अधिकतम विस्थापन की स्थिति में त्वरण होता है-
(a) अधिकतम
(b) न्यूनतम
(c) न अधिकतम न न्यूनतम
(d) शून्य
उत्तर :
(a) अधिकतम

प्रश्न 6.
0.2 किग्रा द्रव्यमान का एक पिण्ड x-अक्ष के अनुदिश 25/π हट्र्ज की आवृत्ति से सरल आवर्त गति कर रह्न है। x = 0.04 मीटर की दूरी पर पिण्ड की गतिज ऊर्जा 0.4 जूल है, दोलन का आयाम है –
(a) 0.12 m
(b) 0.03 m
(c) 0.06 m
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(c) 0.06 m

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प्रश्न 7.
सरल आवर्त गति में क्या स्थिर रहता है-
(a) गतिज ऊर्जा
(b) स्थितिज ऊर्जा
(c) प्रत्यानयन बल
(d) आवर्तकाल
उत्तर :
(d) आवर्तकाल

प्रश्न 8.
यदि एक सेकण्ड लोलक की लम्बाई, जहाँ g = 9.8 ms-2 है, 1 m है, किसी ग्रहपर, जहाँ g = 4.9 ms-2 है, सेकण्ड लोलक की लम्बाई होगी-
(a) 1 m
(b) 2 m
(c) 0.5 m
(d) 1.5 m
उत्तर :
(c) 0.5 m

प्रश्न 9.
यदि एक सरल लोलक मुक्त रूप से गुरुत्वाकर्षण बल के अन्तर्गत नीचे गिर रहा है तो उसका आवर्तकाल होगा-
(a) 2 π \(\sqrt{\frac{l}{g}}\)
(b) 2 π
(c) शून्य
(d) अनन्त
उत्तर :
(d) अनन्त

प्रश्न 10.
सरल आवर्त गति करते कण की स्थितिज ऊर्जा अधिकतम होती है-
(a) साम्य स्थिति में
(b) अधिकतम विस्थापन की स्थिति में
(c) आधे विस्थापन पर
(d) एक-चौथाई विस्थापन पर।
उत्तर :
(b) अधिकतम विस्थापन की स्थिति में

प्रश्न 11.
किसी सरल आवर्त गति का आयाम R है तथा आवर्तकाल T है। अधिकतम तात्कालिक वेग होगा-
(a) \(\frac{2 \pi R}{T}\)
(b) \(\frac{2 R}{T}\)
(c) \(\frac{4 \mathrm{R}}{\mathrm{T}}\)
(d) \(2 \pi \sqrt{\frac{R}{T}}\)
उत्तर :
(a) \(\frac{2 \pi R}{T}\)

प्रश्न 12.
सरल आवर्त गति करते हुए कण की साम्य स्थिति से x दूरी पर स्थितिज ऊर्जा होती है-
(a) \(\frac{1}{2} m \omega^2 \mathrm{R}^2\)
(b) \(\frac{1}{2} m \omega^2 x^2\)
(c) \(\frac{1}{2} m \omega^2\left(\mathrm{R}^2-x^2\right)\)
(d) शून्य।
उत्तर :
(b) \(\frac{1}{2} m \omega^2 x^2\)

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प्रश्न 13.
एक वस्तु का द्रव्यमान m है तथा \mathrm{F}=-k x बल के अधीन आयाम a से सरल आवर्त गति कर रही है। वस्तु की कुल ऊर्जा निर्भर करती है-
(a) k, x
(b) k, a
(c) k, a, x
(d) k, a, v
उत्तर :
(b) k, a

प्रश्न 14.
सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण का आवर्तकाल होता है-
(a) T = \(2 \pi \sqrt{\frac{\text { विस्थापन }}{\text { त्वरण }}}\)
(b) T = \(2 \pi \sqrt{\frac{g}{\text { विस्थापन }}}\)
(c) T = \(2 \pi \sqrt{\frac{\text { वेग }}{\text { विस्थापन }}}\)
(d) T = \(2 \pi \sqrt{g \times \text { विस्थापन }}\)
उत्तर :
(a) T = \(2 \pi \sqrt{\frac{\text { विस्थापन }}{\text { त्वरण }}}\)

प्रश्न 15.
एक कण समीकरण x = 7 cos 0.5 πt के अनुसार दोलन कर रहा है, जहाँ x विस्थापन तथा t समय है। कण अपनी माध्य स्थिति से अधिकतम विस्थापन तक की स्थिति में पहुँचने में समय लेता है-
(a) 4 सेकण्ड
(b) 2 सेकण्ड
(c) 1 सेकण्ड
(d) 0.5 सेकण्ड।
उत्तर :
(c) 1 सेकण्ड

प्रश्न 16.
एक स्प्रिंग से लटके किसी पिण्ड का आवर्तकाल T है, यदि इस स्प्रिंग को बराबर चार भागों में बाँट दिया जाए तथा उसी पिण्ड को किसी एक भाग से लटकाकर दोलन कराएँ तो नया आवर्तकाल होगा-
(a) \(\frac{T}{2}\)
(b) 2 T
(c) \(\frac{T}{4}\)
(d) T
उत्तर :
(a) \(\frac{T}{2}\)

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प्रश्न 17.
एक कण का विस्थापन x = 6 cos ωt + 8 sin ωt मीटर है। यह समीकरण एक सरल आवर्त दोलन व्यक्त करता है जिसका आयाम है-
(a) 14 m
(b) 2 m
(c) 10 m
(d) 5 m
उत्तर :
(c) 10 m

प्रश्न 18.
5 cm आयाम की सरल आवर्त गति करने वाले कण की अधिकतम चाल 31.4 cm s-1 है। इन दोलनों की आवृत्ति है-
(a) 13 Hz
(b) 2 Hz
(c) 4 Hz
(d) 1 Hz
उत्तर :
(d) 1 Hz

प्रश्न 19.
निम्न में से कौन-सा वक्र अवमन्दित दोलन प्रदर्शित करता है-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 1
उत्तर :
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 2

प्रश्न 20.
m द्रव्यमान का एक पिण्ड मूलबिन्दु के परितः X-अक्ष पर दोलन कर रहा है। इसकी स्थितिज ऊर्जा Ux = k|x|³ है, जहाँ k एक धनात्मक नियतांक है। यदि दोलन का आयाम r है, तब इसका आवर्तकाल T –
(a) \(\frac{1}{\sqrt{r}}\) के अनुक्रमानुपाती है
(b) r पर निर्भर करता है
(c) √r के अनुक्रमानुपाती है
(d) r3/2 के अनुक्रमानुपाती है।
उत्तर :
(a) \(\frac{1}{\sqrt{r}}\) के अनुक्रमानुपाती है

प्रश्न 21.
अनुनाद एक विशेष अवस्था है-
(a) मुक्त दोलन की
(b) प्रणोदित दोलन की
(c) अवमन्दित दोलनों की
(d) पोषित दोलनों की।
उत्तर :
(b) प्रणोदित दोलन की

प्रश्न 22.
एक कण का विस्थापन x = 3 sin (5 πt) + 4 cos (5 πt) द्वारा व्यक्त है। कण का आयाम होगा-
(a) 3
(b) 4
(c) 5
(d) 7
उत्तर :
(c) 5

प्रश्न 23.
एक लड़की झूले पर बैठी हुई झूल रही है। यदि वह खड़ी हो जाये तो झूलने का दोलन काल-
(a) घट जायेगा
(b) बढ़ जायेगा
(c) अपरिवर्तित रहेगा
(d) दो गुना हो जायेगा
उत्तर :
(a) घट जायेगा

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प्रश्न 24.
समान आवर्तकाल किन्तु π/2 कलान्तर वाली दो असमान आयाम वाली परस्पर लम्बवत् सरल आवर्त गतियों का परिणामी है-
(a) वृत्त
(b) दीर्घवृत्त
(c) सरल रेखा
(d) परवलय
उत्तर :
(b) दीर्घवृत्त

प्रश्न 25.
जब समान आयाम तथा समान आवृत्ति वाली दो सरल आवर्त गतियाँ π/2 कलान्तर में एक-दूसरे के ऊपर प्रत्यारोपित हैं तो परिणामी गति है-
(a) दीर्घवृत्ताकार
(b) वृत्ताकार
(c) सरल रेखीय
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर :
(b) वृत्ताकार

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer type Questions)

प्रश्न 1.
सरल आवर्त गति का विस्थापन समीकरण लिखिए।
उत्तर :
विस्थापन समीकरण y = R sin ωt
तथा यदि कण की प्रारम्भिक कला ϕ है तो विस्थापन समीकरण y = R sin (ωt + ϕ)

प्रश्न 2.
सरल आवर्त गति करते हुए कण के त्वरण व उसके विस्थापन के बीच सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर :
त्वरण a = -ω² y, जहाँ ω² एक नियतांक है। अतः a ∝ -y अतः त्वरण विस्थापन के अनुक्रमानुपातीं तथा विपरीत दिशा में है।

प्रश्न 3.
किसी सरल लोलक को खान में ले जाने पर उसकी आवृत्ति पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
आवर्तकाल T ∝ \(\frac{1}{\sqrt{g}}\), अतः खान में ले जाने से g का मान कम होने के कारण आवर्तकाल बढ़ जाएगा, अतः आवृत्ति (v=\(\frac{1}{T}\)) घट जाएगी।

प्रश्न 4.
सरल आवर्त गति करते हुए कण के वेग तथा त्वरण के व्यंजक, कण के विस्थापन के पदों में लिखिए।
उत्तर :
कण का वेग u = 0 \(\sqrt{A^2-y^2}\) तथा कण का त्वरण a = -ω² y, जहाँ y विस्थापन, A आयाम तथा ω कोणीय आवृत्ति है।

प्रश्न 5.
सरल आवर्त गति करते हुए कण के आवर्तकाल का सूत्र लिखिए।
उत्तर :
T= 2π \(\sqrt{\frac{\text { विस्थापन }}{\text { त्वरण }}}\)

प्रश्न 6.
सेकण्ड लोलक से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
जिस सरल लोलक का आवर्तकाल 2 सेकण्ड होता है, सेकण्ड लोलक कहलाता है।

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प्रश्न 7.
सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण के त्वरण, विस्थापन तथा आवृत्ति के बीच सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर :
कण का त्वरण
a = -ω² y = -(2πv)² y
या a = -4π²v²y

प्रश्न 8.
सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण की गति का समीकरण a = -bx से प्रदर्शित किया जाता है, जिसमें त्वरण है, x मध्यमान स्थिति से विस्थापन है तथा कोई नियतांक है। कण का दोलनकाल क्या होगा ?
उत्तर :
समीकरण a = -bx से,
\(\frac{\text { विस्थापन }(x)}{\text { त्वरण }(a)}=\frac{1}{b}\) (आंकिक रूप से)
अतः कण का दोलनकाल T= 2π \(\sqrt{\frac{\text { विस्थापन }}{\text { त्वरण }}}\)
या
T= 2π \(\sqrt{\frac{1}{b}}\)

प्रश्न 9.
क्या कृत्रिम भू-उपग्रह में कमानी द्वारा नियन्त्रित कलाई घड़ी प्रयुक्त की जा सकती है?
उत्तर :
हाँ, क्योंकि T = 2π \(\sqrt{\frac{m}{k}}\) द्रव्यमान m व बल नियतांक k नियत रहने से T नियत रहा है।

प्रश्न 10.
एक सरल लोलक के आवर्तकाल में प्रतिशत परिवर्तन ज्ञात कीजिए यदि लोलक की लम्बाई 4% बढ़ा दी जाए।
उत्तर :
T ∝ \(\sqrt{l}\)
अतः लोलक की लम्बाई 4% बढ़ा देने पर आवर्तकाल में 2% का परिवर्तन (बढ़) हो जायेगा।

प्रश्न 11.
एक लड़की झूलते झूलते खड़ी हो जाती है ? झूले के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
लड़की के खड़े होने पर गुरुत्व केन्द्र ऊँचा हो जाएगा। जिससे प्रभावी लम्बाई l घट जाएगी अतः सूत्र T = 2π \(\sqrt{\frac{l}{g}}\) से आवर्तकाल T भी घट जाएगा।

प्रश्न 12.
किसी स्प्रिंग के बल नियतांक का अर्थ समझाइए ।
उत्तर :
स्प्रिंग का बल नियतांक- यदि किसी स्प्रिंग पर F बल लगाने से उसकी लम्बाई में वृद्धि हो जाए, तो
F ∝ -x या F = -kx.
जहाँ = स्प्रिंग का बल नियतांक।
यदि x = 1, तो F (आंकिक रूप से)
अतः किसी स्प्रिंग का बल नियतांक उस बल के बराबर है जो उसकी लम्बाई में एकांक वृद्धि कर दे इसका मात्रक न्यूटन / मीटर होता है।

प्रश्न 13.
सरल आवर्त गति के आवश्यक प्रतिबन्ध लिखिए।
उत्तर :
सरल आवर्त गति के प्रतिबन्ध
(1) कण की गति एक स्थिर बिन्दु (माध्य स्थिति) के इधर-उधर सीधी रेखा में होती है।
(2) कण पर लगने वाला प्रत्यानयन बल (अथवा त्वरण) सदैव उस बिन्दु से कण के विस्थापन के अनुक्रमानुपाती होता है।
(3) बल (अथवा त्वरण) सदैव उस बिन्दु (मध्य बिन्दु) की ओर दिष्ट होता है।

प्रश्न 14.
एक भारहीन स्प्रिंग का बल नियतांक है। इससे लटकते हुए ” द्रव्यमान के कण की सरल आवर्त गति के आवर्त काल का सूत्र लिखिए।
उत्तर :
आवर्तकाल का सूत्र T = 2π \(\sqrt{\frac{m}{k}}\)

प्रश्न 15.
यदि लड़की झूला झूल रही है उसके पास उसके आधे भार का एक बच्चा आकर बैठ जाता है झूले के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर :
झूले का आवर्तकाल पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता, अतः आवर्तकाल वही रहेगा।

प्रश्न 16.
सरल आवर्त गति में कौन-सी भौतिक राशि संरक्षित रहती है।
उत्तर :
यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है।

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प्रश्न 17.
क्या कोई गायक अपने गाने से काँच की वस्तु के टुकड़े-टुकड़े कर सकता है?
उत्तर :
यदि गायक ऐसा स्वर उत्पन्न करे कि उसकी आवृत्ति काँच की वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो जाये तो अनुनाद के कारण वस्तु के दोलनों का आयाम बहुत अधिक बढ़ जायेगा और वस्तु के टुकड़े टुकड़े हो जाएँगे।

प्रश्न 18.
तार वाले वाद्य यन्त्र में प्रधान तार के साथ अन्य तार क्यों लगाए जाते हैं?
उत्तर :
स्वर की तीव्रता को बढ़ाने के लिए प्रधान तार के साथ अन्य तार लगाए जाते हैं।

प्रश्न 19.
ध्वनि तथा विद्युत् चुम्बकीय अनुनाद का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
(i) ध्वनि – सोनोमीटर।
(ii) विद्युत् चुम्बकीय अनुनाद – रेडियो ।

प्रश्न 20.
सरल आवर्त गति कर रहे किसी लोलक के लिए यह क्यों आवश्यक है कि उसका आयाम लम्बाई की तुलना में कम हो ?
उत्तर :
लोलक की गति सरल आवर्त गति तभी होती है, जबकि उसका कोणीय आयाम 10° से कम हो ।

प्रश्न 21.
वायु में सरल लोलक के दोलन किस प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
अवमन्दित दोलन ।

प्रश्न 22.
क्या अवमन्दन में यान्त्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है?
उत्तर :
हाँ

प्रश्न 23.
सरल आवर्त गति किस भौतिक राशि के संरक्षण पर आधारित है ?
उत्तर :
ऊर्जा संरक्षण पर ।

प्रश्न 24.
क्या कृत्रिम उपग्रह पर लोलक घड़ी प्रयुक्त की जा सकती है ?
उत्तर :
नहीं, कृत्रिम उपग्रह में भारहीनता की स्थिति होती है, अतः 8 का प्रभावी मान शून्य होता है।

प्रश्न 25.
निम्न स्थितियों में प्रत्यानयन बल कौन प्रदान करेगा-
(i) यदि स्प्रिंग को दबाकर कम्पन के लिए छोड़ दिया जाये।
(ii) यदि नली में पारे को विस्थापित करके छोड़ दिया जाये।
(iii) यदि सरल लोलक को माध्य स्थिति से विस्थापित कर छोड़ दिया जाये।
हल :
(i) स्प्रिंग के पदार्थ की प्रत्यास्थता के द्वारा
(ii) पारे के भार के द्वारा
(iii) लोलक के भार के द्वारा।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
जब लोलक घड़ी को पर्वत चोटी पर ले जाया जाये तो क्या यह समय ग्रहण करेगी या खाएगी ?
उत्तर :
पर्वत की चोटी पर जाने पर गुरुत्वीय त्वरण के मान घट जाने की वजह से आवर्तकाल बढ़ जायेगा, अतः घड़ी सुस्त हो जायेगी और समय ग्रहण करेगी।

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प्रश्न 2.
पोषित कम्पन क्या होते हैं?
उत्तर :
यदि कम्पन करने वाली वस्तु को किसी बाह्य अनावर्ती स्रोत से ऊर्जा देकर उसके स्वाभाविक कम्पनों का आयाम समय के साथ नियत रखा जाये तो इन कम्पनों को पोषित कम्पन कहते हैं, जैसे-विद्युत् पोषित स्वरित्र द्विभुज ।

प्रश्न 3.
प्रणोदित दोलनों से क्या तात्पर्य है? उदाहरण देकर समझाइए ।
उत्तर :
प्रणोदित दोलन (Force Oscillation ) :
“जब किसी दोलन करने वाली वस्तु पर कोई बाह्य आवर्ती बल कार्य करता है, तो प्रारम्भ में वस्तु अपनी स्वाभाविक आवृत्ति से दोलन करने का प्रयास करती है, परन्तु कुछ समय पश्चात् वह बाह्य आवर्ती बल की आवृत्ति से दोलन करने लगती है। वस्तु के इन दोलनों को प्रणोदित दोलन कहते हैं।” उदाहरण- जब तने हुए पतले तार से प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित करके को चुम्बक के ध्रुवों के बीच रखते हैं, तो तार प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति से प्रणोदित कम्पन करने लगता है।

प्रश्न 4.
मुक्त दोलन का अर्थ एक उदाहरण द्वारा समझाइए ।
उत्तर :
मुक्त दोलन (Free Oscillation ) :
जब किसी वस्तु को जो कि दोलन कर सकती हो, उसकी साम्य स्थिति से थोड़ा-सा विस्थापित करके छोड़ दिया जाता है तो वह एक निश्चित आवृत्ति से दोलन करने लगती है। यह आवृत्ति उस वस्तु के आकार व प्रत्यास्थता इत्यादि जैसे निजी गुणों पर निर्भर करती है। इसे वस्तु की ‘स्वाभाविक आवृत्ति’ (Natural Frequency) कहते हैं।
“वस्तु के इस प्रकार के दोलन जिस पर कोई भी बाह्य बल अपना प्रभाव नहीं डाल रहा है, मुक्त दोलन कहलाते हैं। ”
उदाहरणार्थ – स्वरित्र द्विभुज (Tuning Fork) को रबर की गद्दी पर मारने से उसकी भुजाएँ अपनी स्वाभाविक आवृत्ति से कम्पन करने लगती हैं। यह आवृत्ति भुजाओं की लम्बाई, मोटाई तथा उनके पदार्थ की प्रत्यास्थता पर निर्भर करती है।
इस प्रकार स्वरित्र द्विभुज के दोलनमुक्त दोलन हैं।

प्रश्न 5.
एक कण की दोलनी गति का समीकरण \(\frac{d^2 x}{d t^2}=-b x\) है जिसमें x माध्य स्थिति से विस्थापन तथा 6 नियतांक है। कण का दोलन काल क्या होगा ?
उत्तर :
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 3

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प्रश्न 6.
जब कहीं बम विस्फोट होता है तो दूर-दूर तक बनी इमारतों की खिड़कियों के काँच टूट जाते हैं। समझाइए, क्यों ?
उत्तर :
बम विस्फोट के द्वारा हवा में तरंगें उत्पन्न होती हैं। इन तरंगों से खिड़कियों के काँच में कम्पन उत्पन्न हो जाते हैं। जब इन तरंगों की आवृत्ति खिड़की के काँच की मूल आवृत्ति के बराबर हो जाती है तो कम्पनों का आयाम बहुत अधिक हो जाता है। इस स्थिति में खिड़कियों के काँच टूट जाते हैं।

प्रश्न 7.
क्या कोई कण अपनी चाल को परिवर्तित किये बिना त्वरित गति कर सकता है ?
उत्तर :
हाँ, जब कण नियत चाल से वृत्ताकार पथ पर गति करता है तो यह गति त्वरित होती है, क्योंकि इस गति में दिशा निरन्तर बदलती रहती है।

प्रश्न 8.
क्या स्वतन्त्रतापूर्वक गिरती हुई कलाई घड़ी सही समय का मापन कर सकती है ?
उत्तर :
हाँ, क्योंकि कलाई घड़ी स्प्रिंग के दोलन क्रिया पर आधारित होती है, और स्प्रिंग का आवर्तकाल (T) = 2π \(\sqrt{\frac{m}{k}}\) होता है जिसमें g (गुरुत्वीय त्वरण) का कोई पद नहीं होता है।

प्रश्न 9.
आवर्ती गति एवं दोलन गति को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर :
“जब कोई वस्तु एक निश्चित समय में एक निश्चित पथ पर बार-बार अपनी गति को दोहराती है तो उसकी गति को आवर्ती गति कहते हैं और उस निश्चित समय को आवर्तकाल (time period) कहते हैं।” उदाहरण के लिए, पेण्डुलम की गति, घड़ी की सुइयों की गति, ग्रहों एवं उपग्रहों की गति आदि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर 3654 दिन में अपनी परिक्रमा पूरी करती है, अतः पृथ्वी की आवर्ती गति का आवर्तकाल 365 दिन हुआ।

दोलनी या कम्पनिक गति (Oscillatory or Vibratory Motion) : जब कोई वस्तु आवर्ती गति में एक ही पथ पर किसी निश्चित बिन्दु के इधर-उधर या आगे-पीछे (to and fro ) गति करती है तो यह गति दोलनी अथवा कम्पनिक गति कहलाती है। जिस निश्चित बिन्दु के दोनों ओर दोलनी गत्ति होती है उसे माध्य स्थिति या साम्य स्थिति (mean position or equilibrium position) कहते हैं। उदाहरण के लिए; लोलक की गति, स्वरित्र द्विभुज की भुजाओं की गति आदि कम्पनिक गति के उदाहरण हैं। दोलन गति में वस्तु एक निश्चित साम्य स्थिति के एक ओर जाती है, फिर वापस उसी स्थिति में लौटकर दूसरी ओर चली जाती है और पुन: लौटकर माध्य स्थिति में आ जाती है।

प्रश्न 10.
l लम्बाई के एक सरल लोलक का गोलक ऋण आवेशित है। यदि गोलक के ठीक नीचे एक धनावेशित धातु की प्लेट रखकर लोलक का दोलन कराया जाये तो बताइए सरल लोलक के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
ऋण आवेश तथा धन आवेश में आकर्षण बल के कारण g का प्रभावी मान बढ़ जायेगा, अत: दोलन काल घट जायेगा ।

प्रश्न 11.
किसी पुल पर सैनिकों को गुजरते समय कदम से कदम न मिलाकर चलने के निर्देश क्यों दिये जाते हैं।
उत्तर :
जब सेना किसी पुल को पार करती है तब सैनिक कदम मिलाकर नहीं चलते। इसका कारण यह है कि यदि सैनिकों के कदमों की आवृत्ति, पुल की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो जाए तो पुल बड़े आयाम के कम्पन होने लगेंगे और पुल के टूटने का खतरा हो जाएगा।

प्रश्न 12.
यदि खोखला पाइप पृथ्वी के व्यास के अनुदिश रखकर उसमें एक पिण्ड गिरा दिया जाये तो इसके वेग और त्वरण में क्या परिवर्तन होगा ?
उत्तर :
यह पिण्ड पाइप में सरल आवर्त गति करेगा, जिसकी माध्य स्थिति पृथ्वी के केन्द्र पर होगी। पृथ्वी के केन्द्र से गुजरते समय वेग अधिकतम होगा तथा पृथ्वी की सतह पर न्यूनतम और त्वरण पृथ्वी की सतह पर अधिकतम होगा तथा पृथ्वी के केन्द्र पर न्यूनतम होता है।

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प्रश्न 13.
यदि सरल आवर्त गति करते हुए सरल लोलक को एक लिफ्ट में रख दिया जाये, जो ऊपर की ओर त्वरण (a) से गतिमान हो तो उसके आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
जब लिफ्ट ऊपर की ओर त्वरित होगी तो सरल लोलक पर कार्यकारी बल
R – mg = ma
या R = ma + mg = m (a + g)
या mg = m (a + g)
या g = (a + g)
∵ सरल लोलक का आवर्तकाल (T) = 2π \(\sqrt{\frac{l}{g}}\)
∵ T ∝ \(\frac{l}{\sqrt{g}}\)
∵ g बढ़ जायेगा, अतः आवर्तकाल घट जायेगा।

प्रश्न 14.
सरल आवर्त गति करते हुए किसी सरल लोलक को एक लिफ्ट में रख दिया जाये, यदि लिफ्ट त्वरण से नीचे की दिशा में त्वरित हो तो इसके आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
जब लिफ्ट (a) त्वरण से नीचे की ओर त्वरित होती है तो उसमें रखे लोलक पर प्रभावकारी बल
mg – R = ma
या R = mg – ma = m(g – a)
या mg’ = m(g – a)
या g’ = (g – a)
∵ सरल लोलक का आवर्तकाल (T) = 2π \(\sqrt{\frac{l}{g}}\)
T ∝ \(\frac{l}{\sqrt{g}}\)
∵गुरुत्वीय त्वरण का प्रभावी मान घट जाता है, इसलिए आवर्तकाल का मान बढ़ जाता है।

प्रश्न 15.
क्या दोलन करते सरल लोलक की डोरी में तनाव बल सदैव नियत रहता है ? यदि नहीं तो कब न्यूनतम व कब अधिकतम होता है ?
उत्तर :
जब लोलक माध्य स्थिति में θ कोण से विस्थापित होता है तो तनाव बल T = mg cos θ से होता है, क्योंकि θ का मान विभिन्न स्थानों पर दोलन करते समय भिन्न होगा। अतः तनाव बल का मान भी भिन्न होगा। अधिकतम विस्थापन की स्थिति में θ का मान अधिकतम होगा तथा cos θ का मान न्यूनतम होगा। इस कारण तनाव बल न्यूनतम होगा।
माध्य स्थिति पर θ = 0, cos θ = 1 जो कि cos θ का अधिकतम मान है, अतः तनाव बल अधिकतम होता है।

प्रश्न 16.
एक स्प्रिंग का स्प्रिंग नियतांक (k) है, जिसे तीन बराबर भागों में विभाजित कर दिया जाता है। प्रत्येक भाग का स्प्रिंग नियतांक क्या हो जायेगा ?
उत्तर :
चूँकि हम जानते हैं कि
k = \(\frac{F}{y}\)
जब स्प्रिंग को तीन भागों में काट दिया जाता है तो लम्बाई तीन गुनी कम हो जाती है। जिससे वल नियतांक का मान तीन गुना बढ़ जाता है।
y’ = \(\frac{y}{3}\)
∴ k’ = \(\frac{F}{y/3}=3 \frac{F}{y}\) = 3k

प्रश्न 17.
कभी-कभी भूकम्प बहुत विध्वंसकारी क्यों होता है ?
उत्तर :
जब इमारतों की मूल आवृत्ति भूकम्प के समय उत्पन्न पृथ्वी के कम्पनों की आवृत्ति के बराबर हो जाती है तो अनुनाद के कारण इमारतें बड़े आयाम के साथ कम्पन करना प्रारम्भ कर देती हैं, जिससे वह नीचे गिर जाती हैं।

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प्रश्न 18.
एक सरल लोलक के धात्विक गोले का आपेक्षिक घनत्व ρ है। इसका आवर्तकाल T है यदि गोलक को पानी में डुबोया जाये तो सरल लोलक के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
सरल लोलक का आवर्तकाल
T = 2π \(\sqrt{\frac{l}{g}}\)
यदि लोलक को पानी में डुबो दिया जाता है तो पानी से लगने वाले उछाल के कारण लोलक का आभासी भार कम होगा। अतः आभासी गुरुत्वीय त्वरण g’ का मान g से कम होगा। फलस्वरूप आवर्त काल T का मान बढ़ जायेगा।

प्रश्न 19.
एक द्रव्यमान m एवं k बल नियतांक तथा l लम्बाई वाली स्प्रिंग से लटकाया जाता है। इस द्रव्यमान की दोलन आवृत्ति f1 है। यदि स्प्रिंग को दो बराबर भागों में काटकर उसी द्रव्यमान को एक भाग से लटका दिया जाए और नयी आवृत्ति f2 हो तो f1 तथा f2 के मध्य क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर :
स्प्रिंग को दो बराबर भागों में तोड़ने पर प्रत्येक भाग का बल नियतांक दो गुना हो जाता है।
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प्रश्न 20.
सिद्ध कीजिए कि परवलयिक विभव कूप में कण सरल आवर्त गति करता है।
उत्तर :
जब कोई पिण्ड सरल आवर्त गति करता है तो उसकी माध्य स्थिति y दूरी पर स्थितिज ऊर्जा U = \(\frac{1}{2}\) ky² होती है। जब हम स्थितिज ऊर्जा U और विस्थापन में ग्राफ खींचते हैं तो एक परवलय प्राप्त होता है। इसका आकार कूप के समान होता है इस प्रकार के विभव फलन को परवलयिक विभव कूप (parabolic potential well) कहते हैं। सरल आवर्त गति इस प्रकार के कूप में पायी जाती है।
स्थितिज ऊर्जा U = \(\frac{1}{2}\) ky²
कण पर लगने वाला परिणामी बल
F = \(– \frac{d}{dy}\) |U|
या F = \(– \frac{d}{dy}\) (\(\frac{1}{2}\) ky²)
= \(\frac{1}{2}\) k . 2y
या F = -ky
स्पष्ट है कि प्रत्यानयन बल विस्थापन के समानुपाती होता है। जिसकी दिशा माध्य स्थिति की ओर होती है अतः पिण्ड सरल आवर्त गति करेगा।

प्रश्न 21.
यदि आपको एक हल्का स्प्रिंग, एक मीटर स्केल और एक ज्ञात द्रव्यमान दे दिया जाये तो आप घड़ी का उपयोग किये बिना आवर्तकाल कैसे ज्ञात करोगे ?
उत्तर :
हम दिये गये द्रव्यमान को स्प्रिंग से लटका देते हैं और स्केल की सहायता से स्प्रिंग में विस्तार ज्ञात कर लेते हैं। इस प्रकार स्प्रिंग के बल नियतांक की गणना की जा सकती है।
F = k . l लेकिन F = mg
kl = mg
k = \(\frac{mg}{l}\),
जहाँ l = स्प्रिंग की लम्बाई में वृद्धि
स्प्रिंग का आवर्तकाल (T) = 2π\(\sqrt{\frac{m}{k}}\)
k का मान रखने पर,
T = 2π \(\sqrt{\frac{m}{m g / l}}=\sqrt{\frac{l}{g}}\)
l तथा g के मान ज्ञात हैं, अतः T का मान ज्ञात हो सकता है।

प्रश्न 22.
सरल लोलक में लोहे के गोलक के स्थान पर उसी आकार का चाँदी का गोलक लटका कर प्रयोग करने पर आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
अपरिवर्तित रहेगा क्योंकि सरल लोलक का आवर्तकाल द्रव्यमान तथा घनत्व पर निर्भर नहीं करता है।

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प्रश्न 23.
सरल आवर्त गति कर रहे कण द्वारा एक सम्पूर्ण दोलन में कितना कार्य करना पड़ेगा ?
उत्तर :
कार्य (W) = बल × विस्थापन
चूँकि सम्पूर्ण दोलन में विस्थापन = 0
∴ W = 0
अतः कार्य शून्य होगा।

प्रश्न 24.
समान द्रव्यमान के दो पिण्ड P तथा Q दो द्रव्यमानहीन स्प्रिंगों से अलग-अलग लटके हैं। स्प्रिंगों के बल नियतांक क्रमशः k1 तथा k2 हैं यदि दोनों पिण्ड ऊर्ध्वाधर तल में इस प्रकार कम्पन करते हैं कि उनके अधिकतम वेग समान हों, तब P तथा Q के कम्पन के आयाम में क्या अनुपात होगा ?
उत्तर :
चूँकि दो पिण्ड P तथा Q के अधिकतम वेग समान हैं-
∴ P का अधिकतम वेग = Q का अधिकतम वेग
a1ω1 = a2ω2
या a1 × \(\frac{2л}{T_1}\) = a2 × \(\frac{2л}{T_2}\)
या a1 × \(\sqrt{\frac{k_1}{m}}\) = a2 × \(\sqrt{\frac{k_2}{m}}\)
या \(\frac{a_1}{a_2}\) = \(\sqrt{\frac{k_2}{k_1}}\)

प्रश्न 25.
एक सरल लोलक जिसके धागे की लम्बाई (l) तथा गोलक का दव्यमान m है, ऊर्ध्वाधर तल में θ कोण के वृत्तीय चाप पर गति कर रहा है। चाप के अन्तिम सिरे पर m द्रव्यमान का एक अन्य गोलक जो स्थिर स्थिति में रखा है से टकराता है तो गतिशील गोलक द्वारा स्थिर गोलक को कितना संवेग दिया जायेगा ?
उत्तर :
शून्य (0), क्योंकि अन्तिम बिन्दु पर गोलक का वेग शून्य होता है इसी कारण संवेग शून्य होगा।

प्रश्न 26.
l लम्बाई की एक स्प्रिंग का बल नियतांक & है, जब इस पर भार लटकाया जाता है तो इसकी लम्बाई में वृद्धि होती है। यदि स्प्रिंग को दो बराबर टुकड़ों में काटकर तथा उन्हें समान्तर क्रम में रखकर उन पर वही भार » लटकायें तो उसकी लम्बाई पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
स्प्रिंग को दो बराबर भागों में बाँटने पर उसकी स्प्रिंग का बल नियतांक दो गुना हो जायेगा। चूंकि स्प्रिंग दो स्प्रिंगों में बदल जाती हैं जिन्हें समान्तर क्रम में जोड़ने पर परिणामी बल नियतांक 46 हो जायेगा।
भार समान है इसलिए
∵ x ∝ \(\frac{1}{k}\)
∴ \(\frac{x_1}{x_2}=\frac{k_1}{k_2}=\frac{4k}{k}=4\)
x2 = \(\frac{x_1}{4}\)

प्रश्न 27.
यदि हम अपने कान के पास एक गिलास रख लें, तो हमें गुन-गुन की ध्वनि सुनाई देती है, क्यों ?
उत्तर :
वातावरण के कणों के कम्पनों की आवृत्ति गिलास में भरी वायु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो जाती है, जिससे अनुनाद की घटना होती है। अतः हमें गुन-गुन की ध्वनि सुनाई देती है।

प्रश्न 28.
ऊँचा सुनने वाला व्यक्ति अपने कान के पीछे हाथ क्यों लगा लेता है ?
उत्तर :
अनुनाद की घटना उत्पन्न करने के लिए, जिससे उसे स्पष्ट ध्वनि सुनाई दे।

प्रश्न 29.
स्प्रिंग का बल नियतांक किन कारकों पर निर्भर करता है ?
उत्तर :
किसी स्प्रिंग का बल नियतांक, स्प्रिंग के पदार्थ की प्रकृति, स्प्रिंग की बनावट एवं उसकी भौतिक अवस्था पर निर्भर करता है, अर्थात् मुलायम स्प्रिंग के लिए k का मान कम तथा कठोर स्प्रिंग के लिए k का मान अधिक होता है।
∴ \(k_{\text {कठोर }}>k_{\text {मुलायम }}\)

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Question)

प्रश्न 1.
सरल आवर्त गति के आवश्यक प्रतिबन्ध बताइए तथा सिद्ध कीजिए कि किसी वृत्त की परिधि पर एकसमान कोणीय वेग से गतिमान बिन्दु का वृत्त पर प्रक्षेप सरल आवर्त गति करता है ?
उत्तर :
रैखिक सरल आवर्त गति (Linear Simple Harmonic Motion) :
किसी वस्तु की रैखिक सरल आवर्त गति होने के लिए निम्नलिखित तीन प्रतिंबन्ध हैं–
(i) वस्तु की गति एक स्थिर बिन्दु (साम्य स्थिति) के इधर-उधर सरल रेखा में हो।
(ii) वस्तु पर कार्यरत् प्रत्यानयन बल अर्थात् वस्तु में उत्पन्न त्वरण सदैव माध्य स्थिति से वस्तु के विस्थापन के अनुक्रमानुपाती हो अर्थात् a ∝ (-y) जहाँ (-) चिह्न यह दर्शाता है कि त्वरण a की दिशा सदैव विस्थापन y की दिशा के विपरीत होती है।
(iii) बल अर्थात् त्वरण सदैव साम्य स्थिति की ओर दिष्ट हो।
इस प्रकार सरल आर्वत गति में प्रत्यानयन बल, साम्य स्थिति से विस्थापन के रामानुपाती रंध्या जिपरीत दिशा में होता है। अर्थात्
F ∝ -y
F = -k y …………(1)
यहाँ F प्रत्यानयन बल, y साम्य स्थिति से विस्थापन तथा k प्रत्यानयन बल नियतांक कहलाता है, जिसका मात्रक न्यूटन/मीटर होता है।
प्रत्यानयन बल (F) तथा विस्थापन (y) में वक्र निम्न प्रकार रैखिक प्राप्त होता है-

रैखिक सरल आवर्त गति का अवकल समीकरण :
माना कि किसी वस्तु का द्रव्यमान m है जिस पर F बल आरोपित है।
वस्तु की गति में त्वरण a = \(\frac{F}{m}\)
लेकिन समीकरण (l) से F = -k y
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सरल आवर्त गति : एकसमान वृत्तीय गति में प्रक्षेप (Simple Harmonic Motion : Project in Uniform Circular Motion) :
माना कोई कण त्रिज्या (A) के वृत्तीय पथ पर एकसमान कोणीय वेग ω से घूम रहा है। परिभाषा के अनुसार कण की गति आवर्ती गति तो है, परन्तु सरल आवर्त गति नहीं है।

जब कण बिन्दु N पर है, तो बिन्दु N से वृत्त के व्यास YY’ पर डाले गये लम्ब का पाद P बिन्दु पर मिलता है। जब कण Y पर है, तो लम्ब का पाद भी Y पर है। जब कण X’ पर पहुँचता है, तो लम्ब का पाद व्यास पर चलकर Y से O पर आ जाता है। जब कण Y’ पर पहुँचता है, तो पाद भी Y’ पर पहुँच जाता है। जब कण X पर पहुँचता है, तब लम्ब का पाद O पर पहुँच जाता है तथा जब कण लौटकर बिन्दु N तक पहुँचता है तो पुन: लम्ब का पाद P हो जाता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 7
सणष्ट है कि एकसमान वृत्तीय गति पर गतिमान कण की तात्कालिक स्थितियों से किसी व्यास Y.Y’ पर डाले गये लम्ब का पाद बिन्दु O के इधर-उधर एक सरल रेखा में गति करता है। लम्ब के पाद की यह गति दोलनी गति कहलाती है।

जितने समय में कण एक समान वृत्तीय गति पर एक चक्कर पूरा कर लेता है, लम्ब का पाद भी उतने समय में एक कम्पन पूरा कर लेता है। इस समय को दोलन काल कहते हैं।

कण की स्थिति N में लम्ब के पाद P का साम्य स्थिति से विस्थापन = (OP = y) कण पर केन्द्र की ओर बल F = mω²A लगता है जिसमें m कण का द्रव्यमान है। इस बल का y दिशा में घटक Fy = mω²A sin θ, ॠणात्मक चिह्न केवल प्रदर्शित करता है कि बल Fy की दिशा केन्द्र O की ओर है।
∴ त्रिभुज OPN में,
sin θ = \(\frac{OP}{ON}=\frac{y}{a}\)
y = A sin θ
∴ Fy = -mω²A sin θ
sin θ का मान रखने पर,
Fy = -mω²A . \(\frac{y}{a}\) = -mω²y
चूँक कण का द्रव्यमान (m) तथा कोणीय वेग (ω) नियत हैं, अर्थात् कह सकते हैं कि mω² = नियतांक = k
∴ Fy = -ky
Fy ∝ -y
अर्थात् लम्ब के पाद (N) पर कार्य करने वाला बल उसकी माध्य स्थिति से विस्थापन के अनुक्रमानुपाती है तथा इसकी दिशा माध्य स्थिति की ओर ही दिष्ट है। यही सरल आवर्त गति का आवश्यक तथा पर्याप्त त्रतिबन्ध है, अतः हम कह सकते हैं कि लम्ब के पाद की गति सरल आवर्त गति है।

इस प्रकार एकसमान वृत्तीय गति पर गतिमान कण की गति आवर्ती है, परन्तु सरल आवर्त गति नहीं, जबकि एकसमान वृत्तीय ति पर गतिमान कण की तात्कालिक स्थितियों से किसी व्यास पर डाले गये लम्ब के प्रक्षेप या लम्ब पाद की गति सरल आवर्त गति है।
नोट : इस वृत्त को सरल आवर्त गति का निर्देश वृत्त (reference circle) कहते हैं।

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प्रश्न 2.
सरल आवर्त गति से क्या अभिप्राय है ? सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण के त्वरण एवं विस्थापन में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर :
अनुच्छेद संख्या 14.7, 14.10 तथा 14 .12 . 2 देखें।

जब कोई कण अपनी साम्य या माध्य स्थिति के इधर-उधर गति इस प्रकार करे कि इस पर कार्यकारी बल प्रत्येक स्थिति में इसकी साम्य स्थिति की ओर दिष्ट रहे तब कण की गति सरल आवर्त गति (S.H.M.) कहलाती है।

उदाहरण के लिए, सरल लोलक के दोलन, स्प्रिंग में लटके पिण्ड के कम्पन, स्वरित्र द्विभुज की भुजाओं के कम्पन आदि।

एक वृत्त के चाप पर भी कोणीय गति हो सकती है। जैसे मरोड़ी लोलक में। वस्तु को जब माध्य स्थिति से विस्थापित किया जाता है तो उस पर एक प्रत्यानयन बल लगता है तो उसे माध्य स्थिति की ओर लाता है। सरल आवर्त गति, दोलन गति का एक विशेष रूप है, जो सबसे सरल होता है।

सरल आवर्त गति के प्रकार (Types of S.H.M.) :
सरल आवर्त गति निम्नलिखित दो प्रकार की होती हैं-
(i) रैखिक सरल आवर्त गति (Linear Simple Harmonic Motion)
(ii) कोणीय सरल आवर्त गति (Angular Simple Harmonic Motion)

सरल आवर्त गति का विस्थापन समीकरण (Displacement equation of S.H.M.) :
माना एक कण की एकसमान वृत्तीय मार्ग पर प्रारम्भिक स्थिति X है तथा t सेकण्ड में यह कण θ कोण घूम जाता है, तो
कोणीय विस्थापन = कोणीय वेग × समय
θ = ω.t

चित्र से स्पष्ट है कि t समय में लम्ब का पाद O से P तक पहुँचता है तथा इसकी माध्य स्थिति O से विस्थापन
x = OP = ON sin θ = A sin θ
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 8
y = A sin ωt ……………(1)

∵ पथ की त्रिज्या A ही सरल आवर्त गति का आयाम है अतः

y = A sin ωt ……………(1)

व्यापक रूप में प्रारम्भिक स्थिति को कहीं भी माना जा सकता है। माना कण की प्रारस्भिक स्थिति A पर है एवं ∠AOX = ϕo एवं ∠AOP = ωt
θ = ∠XOP = ωt – ϕ0
अतः y = A sin (ωt – ϕ0)
एवं x = A cos (ωt – ϕ0)

– ϕ0 को प्रारम्भिक कला कहते हैं। अगर कण की प्रारम्भिक स्थिति B पर है

एवं ∠BOX = ϕ0
तथा ∠BOP = ωt
तब θ = ∠XOP = ωt + ϕ0
अतः y = A sin (ωt + ϕ0)
एवं x = A cos (ωt + ϕ0)
यहाँ + ϕ0 को प्रारम्भिक कला कहते हैं।

सरल आवर्त गति में विस्थापन-समय आलेख :

विस्थापन व समय में आलेख निम्न प्रकार होगा-
(i) जब ϕ – शून्य हो-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 9

(ii) जब प्रारम्भिक कला कोण +ϕ हो-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 10

(iii) जब प्रारम्भिक कला कोण -ϕ हो-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 11

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन

सरल आवर्त गति में त्वरण के लिए व्यंजक (Expression for Acceleration in S.H.M.) :
हम जानते हैं कि जब कोई वस्तु वृत्तीय गति करती है तो उस पर एक अभिकेन्द्रीय त्वरण लगता है। यदि वस्तु का कोणीय वेग ω एवं पथ की त्रिज्या A हो तो अभिकेन्द्रीय त्वरण का मान Aω² होगा जिसकी दिशा केन्द्र की ओर होगी अर्थात् P बिन्दु OP दिशा में होगी। इस त्वरण का हमें वह घटक चाहिए, जो व्यास YY’ के अनुदिश हो क्योंक सरल आवर्त गति करने वाले लम्बपाद N की गति इसी व्यास के अनुदिश होती है। यदि यह घटक α से व्यक्त करें तो
α = -Aω² sin θ
(यहाँ ऋण चिह्न यह दर्शाता है कि त्वरण एवं विस्थापन की दिशाएँ एक-दूसरे के विपरीत हैं।)
θ = ωt
α = -Aω² sin θ
= -ω² (A sin θ)
या α = -ω²y …………..(1)
क्योंकि y = A sin ωt
कोंणीय वेग ω नियत है अतः
α ∝ -y
अर्थात् त्वरण ∝ -विस्थापन
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 12
स्पष्ट है कि सरल आवर्ते गति मे त्वरण वस्तु को साम्य स्थिति से उसके विस्थापन के अनुक्रमानुपाती होता है तथा इसकी दिशा विस्थापन की दिशा के विपरीत होती है।
(i) जब वस्तु माध्य स्थिति में होती है तो
y = 0
अतः त्वरण, α = ω²y = ω² × 0
या α = 0
(ii) जब वस्तु अधिकतम विस्थापन की स्थिति में होती है तो
y = A
अत: αmax = ω²A

त्वरण-समय वक्र (Time-Acceleration Curve):
सरल आवर्त गति में त्वरण,
α = -Aω² sin θ
या α = -Aω² . sin \(\frac{2π}{T}\).t
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 13
इन आँकड़ों के आधार पर खींचा गया समय-त्वरण ग्राफ चित्र में प्रदर्शित है-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 14

प्रश्न 3.
सरल आवर्त गति करते हुए पिण्ड की दोलन गतिज ऊर्जा एवं स्थितिज ऊर्जा के लिए व्यंजक स्थापित कीजिए तथा सिद्ध कीजिए कि सम्पूर्ण ऊर्जा दोलन की आवृत्ति तथा दोलन के आयाम के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है।
उत्तर :
सरल आवर्त गति में ऊर्जा (Energy in S.H.M.) ;
सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण की किसी क्षण कुल ऊर्जा को सरल आवर्त गति की कुल ऊर्जा कहते हैं। सरल आवर्त गति करते हुए कण की ऊर्जा दो प्रकार की होती है-
(i) गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)
(ii) स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy)।
इस प्रकार कुल ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा तथा गतिज ऊर्जा के योग के बराबर होती है अर्थात्
कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा
ET = K + U

(i) सरल आवर्त गति करते हुए कण की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy of Particle in S.H.M.) :
सरल आवर्त गति करते हुए कण में उसकी गति के कारण विद्यमान ऊर्जा सरल आवर्त गति की गतिज ऊर्जा कहलाती है।
माना कोई कण जिसका द्रव्यमान (m) तथा चाल u है तो कण की गतिज ऊर्जा
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 15

(ii) सरल आवर्त गति में कण की स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy of Particle in S.H.M.):
सरल आवर्त गति में कण की स्थिति के कारण निहित ऊर्जा कण की स्थितिज ऊर्जा कहलाती है।
माना दोलन करने वाले m द्रव्यमान के पिण्ड का किसी क्षण साम्य स्थिति से विस्थापन y है, अतः पिण्ड की सरल आवर्त गति का विस्थापन समीकरण,
y = A sin ωt
जहाँ A पिण्ड का दोलन आयाम तथा ω कोणीय वेग है।
अतः पिण्ड का रेखीय वेग,
v = \(\frac{dy}{dt}=\frac{d}{dt}\)(A sin ωt)
= Aω cos ωt
पिण्ड का रेखीय त्वरण
α = \(\frac{dv}{dt}=\frac{d}{dt}\)(Aω cos ωt)
या α = -Aω². sin ωt
या α = -ω².y
क्योंकि y = A sin ωt
पिण्ड पर लगने वाला प्रत्यानयन बल
F = mα = -mω²y …………..(1)

अतः पिण्ड में अत्यन्त सूक्ष्म विस्थापन dy के विपरीत प्रत्यानयन बल द्वारा किया गया कार्य,
dW = F × (-dy) = mω²y dy
या dW = mω².y.dy
अतः पिण्ड को y = 0 से y = y तक विस्थापित करने में कृत कार्य अर्थात् y विस्थापन में पिण्ड y की स्थितिज ऊर्जा
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 16
(i) जब पिण्ड का विस्थापन शून्य होता है अर्थात् पिण्ड माध्य स्थिति में होता है तो
y = 0
∴ Umin = 0 ……………(3)
(ii) जब पिण्ड अधिकतम विस्थापन की स्थिति में होता है तो,
y = a
∴ Umax = \(\frac{1}{2}\)mω²A ……………(3)

(iii) सरल आवर्त गति करते हुए कण की कुल ऊर्जा (Total Energy of Particle in S.H.M.) :
सरल आवर्त गति करने वाले कण की गतिज ऊर्जा एवं स्थितिज ऊर्जा का योग कुल ऊर्जा के बराबर होता है अर्थात्
ET = K + U
या
ET = \(\frac{1}{2}\)mω²(A² – y²) + \(\frac{1}{2}\)mω²A
= \(\frac{1}{2}\)mω²(A² – y² + y²)
= \(\frac{1}{2}\)mω²A²

स्पष्ट है कि कुल ऊर्जा का समय एवं स्थिति अर्थात् उसके विस्थापन पर निर्भर नहीं करती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि, सरल आवर्त गति में कण की कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है। स्पष्ट है कि सरल आवर्त गति में ऊर्जा संरक्षण के नियम का पालन होता है।
ω = 2πn (जहाँ n = आवृत्ति)
∴ ET = \(\frac{1}{2}\)m(2πn)²A²
= \(\frac{1}{2}\)m.4π²n²A²
या ET = 2mπ²n²A²
इस प्रकार सरल आवर्त गति में कण की कुल ऊर्जा,
ET = 2mπ²n²A²
ET ∝ A² अर्थात् (आयाम)²
तथा
ET ∝ n² अर्थात् (आवृत्ति)²
सरल आवर्त गति में कण की गतिज ऊर्जा (K), स्थितिज ऊर्जा (U)
तथा कुल ऊर्जा (ET) को विस्थापन के साथ निम्न चित्र में प्रदर्शित किया गया है-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 17
नोट – सरल आवर्त गति में कुल ऊर्जा की आवृत्ति शून्य होती है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन

प्रश्न 4.
एक समान परिच्छेद् वाला लकड़ी का बेलन जल में ऊध्र्वाधर तैर रहा है। जब इसे थोड़ा नीचे दबाकर छोड़ देते हैं तो यह दोलन करने लगता है। इसका दोलनकाल जल में डूबी लम्बाई के पदों में ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
तैरता हुआ लकड़ी का आयताकार (Oscillations of a Rectangular wooden Block):
माना एक बेलनाकार पिण्ड जिसका द्रव्यमान (m), लम्बाई (L), अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A) तथा घनत्व (ρ) है। ρ0 घनत्व के द्रव में आंशिक रूप से डूबकर तैर रहा है। यदि बेलन का h भाग द्रव के अन्दर है तो तैरने के सिद्धान्त से,
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 18
बेलन द्वारा हटाये गये द्रव का भार = बेलन का भार
(A . h) ρ0 g = mg
m = Ah ρ0 …………(1)
तैरने की स्थिति में यदि बेलन को थोड़ा नीचे दबाकर छोड़ देते हैं पिण्ड ऊर्ध्व रेखा में दोलन गति करने लगता है।
गति अवस्था में साम्यावस्था से y विस्थापन में प्रत्यानयन बल (F)
F = उत्प्लावन बल = हटाये गये द्रव का भार
F = -(A.y.ρ0)g …………(2)
ऋणात्मक चिह्न का अर्थ है कि प्रत्यानयन बल, विस्थापन के विपरीत होता है।
यदि पिण्ड का त्वरण (a) हो तो गति के द्वितीय नियम से,
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 19

प्रश्न 5.
दोलन के अवमन्दन से क्या अभिप्राय है ? उपयुक्त उदाहरण से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अवमंदित सरल आवर्त गति (Undamped Simple Harmonic Motion) :
यदि कम्पित वस्तु का आयाम धीरे-धीरे कम होता जाता है तथा अन्त में शून्य हो जाता है तो ऐसे कम्पन अवमन्दित कम्पन कहलाते हैं। चित्र 14.37 में अवमन्दित कम्पन के आयाम को घटता हुआ दिखाया गया है। इसके उदाहरण निम्नवत् हैं-
(1) सरल लोलक के कम्पनों के आयामों का धीरे-धीरे कम होना।
(2) स्वरित्र द्विभुज के कम्पनों का आयाम भी धीरे-धीरे घटकर शून्य हो जाता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 20
जब कोई वस्तु किसी बाह्य बल के अन्तर्गत, बाह्य बल की आवृत्ति से कम्पन करती है तो वस्तु के कम्पनों को प्रणोदित कम्पन कहते हैं। अवमन्दित कम्पन को प्रणोदित कम्पन में बदला जा सकता है; जैसे-जब कम्पन करते हुए किसी स्वरित्र द्विभुज के दस्ते को हम हाथ में पकड़े रहते हैं तो बहुत मन्द ध्वनि सुनाई पड़ती है। यदि इस दस्ते को मेज पर टिका दें तो ध्वनि तीव्र हो जाती है। इसका कारण यह है कि स्वरित्र द्विभुज को मेज पर टिकाने से स्वरित्र के कम्पन दस्ते के द्वारा मेज तक पहुँच जाते हैं तथा मेज में प्रणोदित कम्पन उत्पन्न हो जाते हैं।

प्रश्न 6.
सिद्ध कीजिए कि किसी स्प्रिंग से लटके किसी पिण्ड को साम्यावस्था में थोड़ा-सा नीचे विस्थापित करके छोड़ दिया जाए तो उसकी गति सरल आवर्त गति होगी। इसके आवर्तकाल का सूत्र भी स्थापित कीजिए।
उत्तर :
कमानी के दोलन (Oscillation of Spring) :
(i) स्प्रिंग से संलग्न द्रव्यमान के क्षैतिज तल में दोलन (Horizontal Vibrations of Mass Attached to a Spring)-माना नगण्य द्रव्यमान की एक स्प्रिंग का एक सिरा दृढ़ सतह से बँधा है और दूसरे सिरे से एक m द्रव्यमान का पिण्ड बँधा है तथा स्प्रिंग एक घर्षणरहित क्षैतिज मेज पर रखी है।
माना पिण्ड पर एक बाह्य बल F लगाकर उसमें x विस्थापन उत्पन्न करके छोड़ दिया जाता है तो द्रव्यमान क्षैतिज तल में दोलन करने लगता है।
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माना स्प्र्रंग का बल नियतांक k है तो x विस्थापन की स्थिति में पिण्ड पर लगने वाला प्रत्यानयन बल,
\(\overrightarrow{\mathrm{F}^{\prime}}=-k \vec{x}\)
यहाँ पर ऋण चिह्न का प्रयोग यह इंगित करता है कि F व x की दिशाएँ परस्पर विपरीत हैं।
यदि पिण्ड का त्वरण α हो तो
F’ = ma
अतः mα = -kx
या α = –\(\frac{k}{m}\)x
या α = -ω²x ……………..(1)
जहाँ ω² = \(\frac{k}{m}\) = नियतांक
∴ ω = \(\sqrt{\frac{k}{m}}\)
∴ समी (1) से α ∝ -x
या त्वरण ∝ -विस्थापन
अतः पिण्ड की गति सरल आवर्त गति होगी। इस गति में पिण्ड का आवर्त काल
\(\mathrm{T}=\frac{2 \pi}{\omega}=\frac{2 \pi}{\sqrt{\frac{k}{m}}}\)
\(\mathrm{~T}=2 \pi \sqrt{\frac{m}{k}}\)
स्पष्ट है कि स्प्रिंग से बँधे पिण्ड का दोलन काल पिण्ड के द्रव्यमान एवं स्प्रिंग के बल नियतांक पर निर्भर करता है।
नोट – स्प्रिंग से बँधे पिण्ड का आवर्तकाल गुरुत्वीय त्वरण (g) तथा सरल आवर्त गति के आयाम (A) पर निर्भर नहीं करता है।

प्रश्न 7.
k1 व k2 बल नियतांकों की दो स्प्रिंगों को लम्बाई में जोड़कर ऊध्र्वाधर लटका दिया जाता है। स्प्रिंग के निचले सिरे पर m द्रव्यमान का पिण्ड लटका दिया जाये तो पिण्ड के कम्पन का दोलन काल ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
भारित स्प्रिंग संयोजन के दोलन (Oscillation of Loaded Spring Combination):
माना k1 व k2 बल नियतांकों की दो स्प्रिंगें संयुक्त की जाती हैं। दोनों स्प्रिंगों के निम्न तीन प्रकार के संयोजन हो सकते हैं-
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स्थिति I –
माना कि दोनों स्प्रिंगों को चित्र 14.23 की भाँति समान्तर क्रम में एक दृढ़ आधार से लटकाकर संयोजन से m द्रव्यमान का पिण्ड लटकाने पर संयोजन में y विस्थापन उत्पन्न होता है। दोनों स्प्रिंगों में क्रमशः F1 व F2 विरोधी बल अर्थात् प्रत्यानयन बल उत्पन्न होते हैं अतः
F1 = -k1 y
तथा F2=-k2 y
∴ संयोजन द्वारा पिण्ड पर आरोपित परिणामी प्रत्यानयन बल
F = F1 + F2
F = -k1 y + (-k2 y)
या F = -(k1 + k2) y
यदि संयोजन का तुल्य बल नियतांक (Equivalent force constant) k है तो
F = -ky
∴ -ky = -(k1 + k2) y
या k = k1 + k2
∴ पिण्ड का आवर्तकाल,
\(\mathrm{T}=\frac{2 \pi}{\sqrt{\frac{k}{m}}}\)
\(\mathrm{~T}=\frac{2 \pi}{\sqrt{\frac{k}{k_1+k_2}}}\)

स्थिति II –
इस स्थिति में चित्र की भाँति पिण्ड को दोनों स्प्रिंगों के मध्य बाँधते हैं और स्प्रिंगों के दोनों मुक्त सिरे दो दृढ़ आधारों के मध्य सम्बद्ध कर दिये जाते हैं। पिण्ड में चित्र की भाँति यदि y विस्थापन दिया जाता है तो एक स्प्रिंग में विरलन एवं दूसरी में उतना ही सम्पीडन हो जाता है। इस स्थिति में भी परिणामी प्रत्यानयन बल
F = F1 + F2
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स्थिति III –
इस स्थिति में दोनों स्प्रिंगों को श्रेणी क्रम में जोड़कर संयोजन का एक सिरा दृढ़ आधार से सम्बद्ध करके दूसरे सिरे से m द्रव्यमान का पिण्ड सम्बद्ध कर देते हैं। संयोजन में उत्पन्न विस्थापन y दोनों स्प्रिंगों में उत्पन्न विस्थापनों क्रमशः y1 व y2 के योग के बराबर होता है। अतः
y = y1 + y2
दोनों स्प्रिंगें श्रेणी क्रम में जुड़ी हैं।
अतः दोनों में समान प्रत्यानयन बल F उत्पन्न होता है।
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HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन

प्रश्न 8.
किसी सरल लोलक के आवर्त काल के लिए व्यंजक स्थापित कीजिए। सेकण्ड लोलक से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
सरल लोलक (Simple pendulum) :
“यदि छोटे से पीतल के गोले को किसी हल्के एवं मजबूत धागे की सहायता से किसी दृढ़ आधार से लटका दें तो प्राप्त व्यवस्था को सरल लोलक कहते हैं।’ पीतल के गोले को ‘गोलक’ (bob) कहते हैं। दृढ़ आधार के जिस बिन्दु से लोलक को लटकाया जाता है, उसे ‘निलम्बन बिन्दु (point of suspension) कहते हैं। निलम्बन बिन्दु से गोले के गुरुत्व केन्द्र तक की दूरी को लोलक की प्रभावकारी लम्बाई (effective length) कहते हैं।
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सेकण्ड लोलक (Second’s Pendulum) :
ऐसा सरल लोलक जिसका आवर्तकाल 2 सेकण्ड हो तो उसे सेकण्ड लोलक कहते हैं। इस प्रकार का लोलक प्रत्येक 1 सेकण्ड बाद अपनी माध्य स्थिति से गुजरता है।
सेकण्ड लोलक की प्रभावकारी लम्बाई
T = 2 सेकण्ड, g = 9.8
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 26
अतः सेकण्ड लोलक की लम्बाई लगभग 100 सेमी होती है।

नोट :
1. लोलक की प्रभावकारी लम्बाई गोलक के गुरुत्व केन्द्र से नापी जाती है। गुरुत्व केन्द्र के परिवर्तित होने पर आवर्तकाल बदल जाता है।

2. यदि खोखली गेंद (जिसमें पारा भरा है) में एक छोटा-सा छेद करने पर उसमें से बूँद-बूँद कर पारा गिरने लगेगा जिस कारण गुरुत्व केन्द्र नीचे खिसक जायेगा और प्रभावकारी लम्बाई बढ़ जायेगी। अतः आवर्तकाल बढ़ जायेगा।

3. यदि सरल लोलक किसी दिये गये घनत्व ρ वाले द्रव के अन्दर दोलन कर रहा है जहाँ ρ0 (गोलक का घनत्व) तो सरल लोलक का आवर्तकाल बढ़ जायेगा क्योंकि-
गोलक का भार =m g=\mathrm{V} ρ g
गोलक पर कार्यरत् उत्प्लावन बल =V0} g
∴ गोलक पर परिणामी बल = V ρ g-V ρ0 g
F’ = V(ρ – ρ0) g (नीचे की ओर)
अतः यदि प्रभावी गुरुत्वीय त्वरण g’ हो तो
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4. अगर सरल लोलक को किसी तार द्वारा लटकाया जाये तो लोलक की प्रभावी लम्बाई ताप के बढ़ने पर बढ़ जाती है अतः सरल लोलक का आवर्तकाल बढ़ जाता है। माना ताप में परिवर्तन dθ है और α
तार का रेखीय प्रसार गुणांक है, तो तार की प्रभावी लम्बाई
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प्रश्न 9.
यदि पृथ्वी के केन्द्र से होकर पृथ्वी के आर-पार एक सुरंग बनाई जाये तथा उस सुरंग में एक कण छोड़ा जाये तो दिखाइए कि कण का त्वरण सदैव सुरंग के मध्य-बिन्दु (अर्थात् पृथ्वी के केन्द्र) से विस्थापन के अनुक्रमानुपाती होता है।
उत्तर :
पृथ्वी के आर-पार एक काल्पनिक सुरंग में पिण्ड की गति (Body moving in a tunnel through The Earth) :
पृथ्वी के आर-पार काल्पनिक सुरंग की निम्न दो स्थितियाँ सम्भव हैं-
(i) जब सुरंग पृथ्वी के केन्द्र से न गुजरे-माना कि O पृथ्वी का केन्द्र है तथा AB एक सुरंग है। यदि इस सुरंग में m द्रव्यमान की एक गोली डाली जाए तो इस पर केन्द्र O की ओर एक बल (गोली का भार) mg लगेगा। बल mg का सुरंग के अनुदिश घटक mg cos θ है जो गोली में सुरंग के अनुदिश त्वरण उत्पन्न करेगा, जिससे गोली का वेग लगातार बढ़ता जाएगा। यह वेग वृद्धि का क्रम सुरंग के मध्य-बिन्दु C तक चलेगा और C पर वेग अधिकतम होगा। जैसे ही गोली बिन्दु को पार करेगी उक्त बल m g cosθ की दिशा उलट जाएगी। अब यह बल गोली की गति का विरोध करेगा, फलस्वरूप C के बाद गोली का वेग घटना प्रार्भम्भ करेगा और बिन्दु B (सुरंग का दूसरा किनारा) पर शून्य हो जाएगा। बिन्दु B पर m g cos θ बल की दिशा बिन्दु A की ओर अर्थात् केन्द्र C की ओर होगी और गोली पूर्व की भाँति गति करके पुन: A तक जाएगी। इसी क्रम की पुनरावृत्ति होती रहेगी और गोली केन्द्र C के दोनों ओर सरल आवर्त गति करती रहेगी।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 29
अधिकतम विस्थापन की स्थिति A में गोली पर कार्यरत प्रत्यानयन
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प्रश्न 10.
अनुनाद से क्या तात्पर्य है ? यान्त्रिकी, ध्वनि तथा विद्युत् -चुम्बकीय अनुनाद का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
जब किसी दोलन करने वाली वस्तु पर कोई बाह्य आवर्ती बल लगाया जाता है तो वस्तु बल की आवृत्ति से प्रणोदित दोलन करने लगती है। यदि बाह्य बल की आवृत्ति, वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर (अथवा इसकी पूर्ण गुणज) हो तो वस्तु के प्रणोदित दोलनों का आयाम बहुत बढ़ जाता है। इस घटना को अनुनाद (resonance) कहते हैं। बाह्य बल और वस्तु की आवृत्ति में थोड़ा सा ही अन्तर होने पर आयाम बहुत कम हो जाता है। स्पष्ट है कि अनुनाद, प्रणोदित दोलनों की ही एक विशेष अवस्था है।

अनुनाद की व्याख्या- जब बाह्य बल की आवृत्ति वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर होती है तो दोनों समान कला में कम्पन करते हैं। अतः आवर्ती बल द्वारा लगाये गए उत्तरोत्तर आवेग वस्तु की ऊर्जा लगातार बढ़ाते जाते हैं और वस्तु का आयाम लगातार बढ़ता जाता है। सिद्धान्त रूप से वस्तु का आयाम अनन्त तक बढ़ता रहना चाहिए परन्तु व्यवहार में दोलन करती हुई वस्तु में वायु के घर्षण तथा ध्वनि विकिरण के कारण ऊर्जा क्षय होती रहती है। दोलन- आयाम बढ़ने के साथ-साथ ऊर्जा क्षय भी बढ़ता जाता है और एक ऐसी स्थिति आ जाती है कि बाह्य बल द्वारा प्रति दोलन दी गई ऊर्जा, वस्तु द्वारा प्रति दोलन में ऊर्जा क्षय के बराबर हो जाती है। इस स्थिति में आयाम का बढ़ना रुक जाता है।

उदाहरण- (1) यान्त्रिक अनुनाद सेना का पुल पार करना- जब सेना किसी पुल को पार करती है तब सैनिक कदम मिलाकर नहीं चलते। इसका कारण यह है कि यदि सैनिकों के कदमों की आवृत्ति, पुल की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो जाए तो पुल में बड़े आयाम के कम्पन होने लगेंगे और पुल के टूटने का खतरा हो जाएगा।

(2) ध्वनि अनुनाद – डोरियों के कम्पन– यदि समान आवृत्ति की दो डोरियाँ एक ही बोर्ड पर तनी हों तथा उनमें से एक को कम्पित किया जाए तो दूसरी स्वयं कम्पन करने लगती है।

(3) विद्युत् चुम्बकीय दोलन में अनुनाद – रेडियो द्वारा विभिन्न स्टेशनों से प्रेषित प्रोग्राम का सुनना भी अनुनाद के कारण ही सम्भव होता है विभिन्न स्टेशनों द्वारा विभिन्न आवृत्तियों की तरंगें प्रसारित की जाती हैं। रेडियो में एक विद्युत् परिपथ (L-C परिपथ) होता है जिसमें विद्युत् कम्पन उत्पन्न होते हैं। इन विद्युत् कम्पनों की स्वाभाविक आवृत्ति सूत्र T = \(\frac{1}{2π{\sqrt{LC}}}\) से ज्ञात की जाती है। जब रेडियो की ट्यून वाली घुण्डी को घुमाया जाता है तो विद्युत् परिपथ में लगे संधारित्र की धारिता C बदल जाती है जिससे विद्युत् कम्पन की स्वाभाविक आवृत्ति बदल जाती है।

जब यह आवृत्ति किसी स्टेशन द्वारा प्रसारित विद्युत् चुम्बकीय तरंगों की आवृत्ति के ठीक बराबर हो जाती है तो विद्युत् परिपथ उन तरंगों को ग्रहण कर लेता है तथा उस स्टेशन का प्रोग्राम सुनाई देने लगता है।

नोट :
अनुनाद की तीक्ष्णता एवं अवमन्दन- जिस माध्यम में कोई वस्तु दोलन करती है, उस माध्यम के कारण वस्तु पर एक अवमन्दन बल कार्य करता है, जिससे दोलनों का आयाम घटता जाता है। यदि अनुनादित वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति तथा बाह्य आवर्त बल की आवृत्ति में थोड़ा-सा अन्तर आ जाने पर आयाम बहुत कम हो जाता है तो अनुनाद तीक्ष्ण कहलाता है अन्यथा सपाट अनुनाद की तीक्ष्णता अवमन्दन पर निर्भर करती है। अवमन्दन के कम होने पर अनुनाद तीक्ष्ण होता है, जैसा स्वरमापी के तार में देखा जाता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन

प्रश्न 11.
प्रणोदित दोलनों से क्या अभिप्राय है ? उदाहरण देकर समझाइए। मेल्डी का प्रयोग देकर इनकी उत्पत्ति समझाइए।
उत्तर :
प्रणोदित दोलन (Forced Oscillation) ;
जब किसी दोलन करती हुई वस्तु पर कोई बाह्य आवर्त बल आरोपित किया जाता है, जिसकी आवृत्ति का मान वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति से भिन्न होता है तो प्रारम्भ में वस्तु स्वाभाविक आवृत्ति से दोलन करती है, लेकिन बाह्य बल के प्रभाव में वस्तु बाह्य आवर्त बल की आवृत्ति से दोलन करने लगती है। इस प्रकार के दोलन परिचालित दोलन या प्रणोदित दोलन कहलाते हैं।

अतः इस प्रकार जब कोई वस्तु किसी बाह्य आवर्ती बल के प्रभाव में, बाह्य आवृत्ति से दोलन करती है तब वस्तु के दोलन प्रणोदित दोलन कहलाते हैं।

उदाहरण के लिए चित्र में दो भिन्न-भिन्न लम्बाइयों के लोलक R तथा N एक छड़ X-Y द्वारा लटकाये गये हैं। इनकी स्वाभाविक आवृत्तियाँ अलग-अलग है।

जब लोलक R को दोलन कराते हैं तब लोलक N का सम्बन्ध छड़ X-Y से होने के कारण एक आवर्त बल आरोपित होता है जिसकी आवृत्ति लोलक R की आवृत्ति के बराबर होती है उस आवर्त बल के प्रभाव से लोलक N, लोलक R की आवृत्ति से दोलन करता है। लोलक N के दोलन प्रणोदित दोलन कहलाते हैं। यहाँ लोलक Rको चालक (driver) लोलक, और N को चालित (driven) लोलक कहते हैं।

नोट-
1. जब तने हुए तार में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित करके तार को चुम्बक के ध्रुवों के बीच रखते हैं तो तार प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति के प्रणोदित कम्पन करने लगता है।
2 सितार वायलिन, स्वरमापी के तार पर जब किसी आवृत्ति का स्वर उत्पन्न किया जाता है तो तार के कम्पन सेतु के द्वारा खोखले ध्वनि बोर्ड में पहुँच जाते हैं। इससे बोर्ड के अन्दर की वायु में प्रणोदित दोलन उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे ध्वनि की तीव्रता बढ़ जाती है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 31
माना अवमन्दित दोलक पर कोई समय के साथ विचरण करने वाले आयाम का आवर्ती बाह्य बल F(1) आरोपित किया जाता है, इसे निम्न प्रकार निरूपित करते हैं-
F (t) = F0 cos ωdt ………..(1)
रैखिक प्रत्यानयन बल, अवमन्दक बल तथा कालाश्रित प्रणोदित बल के संयोजी प्रभाव के अन्तर्गत कण की गति का समीकरण निम्नलिखित होगा-
ma = -kx ( t ) – bv (t) + F0 cos ωdt ………….(2)
जहाँ F = -kx प्रत्यानयन बल तथा Fd = -bv अवमन्दक बल है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 32
यह m द्रव्यमान वाले दोलित्र, जिस पर ०५ आवृत्ति का बल कार्यरत है, की गति का समीकरण है। दोलित्र प्रारम्भ में अपनी प्राकृतिक आवृत्ति से दोलन करता है। जब इस पर बाह्य आवर्ती वल आरोपित किया जाता है तब आरोपित बाह्य बल की आवृत्ति से दोलन होने लगते हैं। प्राकृतिक दोलन के शान्त होने पर दोलित्र का विस्थापन निम्नवत् होता है-
x (t) = A cos (ωdt + ϕ) ……….(4)
आयाम A कोणीय आवृत्तियों तथा प्रणोदित आवृत्ति ω का फलन है जिसे हम निम्न प्रकार व्यक्त करते हैं-
A = \(\frac{\mathrm{F}_0}{\left\{m^2\left(\omega^2-\omega_d^2\right)+\omega_d^2 b^2\right\}^{1 / 2}}\) ………..(5)
तथा tan – = \(\frac{v_0}{\omega_d x_0}\) ………(6)
यहाँ m कण का द्रव्यमान ωd तथा v0 व x0 समय t = 0 पर कण के क्रमशः वेग व विस्थापन हैं। इसी क्षण हम आवर्ती बल आरोपित करते हैं। ωd व ω में अत्यधिक भिन्नता होने और इनके समीप होने की अवस्थाओं में हम दोलित्र का भिन्न-भिन्न व्यवहार देखते हैं। ये दोनों स्थितियाँ निम्नवत् हैं।

प्रश्न 12.
दर्शाइये कि U-नली में भरे एक द्रव की गति सरल आवर्त गति होती है तथा यदि द्रव को n दूरी तक विस्थापित किया जाता है तो दोलन के आवर्तकाल का सूत्र ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
U-नली में द्रव का दोलन (Oscillation of Liquid of U-Tube) :
माना कि एक U-नली में h ऊँचाई तक द्रव भरा है। जिसकी अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A) एकसमान है। प्रारम्भिक स्थिति में दोनों भुजाओं में द्रव का तल समान है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 33
जब तल B को y दूरी नीचे बिन्दु D तक दबाया जाता है तो तल C उतनी ही दूरी y ऊपर चढ़ जाता है। इस प्रकार U-नली में दायीं भुजा में D’E अतिरिक्त द्रव स्तम्भ है। द्रव के दबाये हुए तल छोड़ देने पर सम्पूर्ण द्रव स्तम्भ D’E के भार के कारण उत्पन्न प्रत्यानयन बल के कारण ऊपर-नीचे दोलन करने लगता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 34
माना नली में एकांक लम्बाई में द्रव का द्रव्यमान = m हो तो द्रव पर कार्य करने वाला प्रत्यानयन बल
F = -(एकांक द्रव्यमान × लम्बाई) × g
F = -(m × 2 y) . g ………..(1)
ऋणात्मक चिह्न केवल यह प्रदर्शित करता है कि बल द्रव के विस्थापन के विपरीत दिशा में है।
अतः नली में सम्पूर्ण द्रव का द्रव्यमान
(M)=m × 2 h ………….(2)
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 35

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन

प्रश्न 13.
सरल आवर्त गति करते हुए कण की गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा एवं कुल ऊर्जा में विस्थापन के साथ होने वाले परिवर्तनों की ग्राफीय विधि द्वारा विवेचना कीजिए।
उत्तर :
सरल आवर्त गति में ऊर्जा (Energy in S.H.M.) ;
सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण की किसी क्षण कुल ऊर्जा को सरल आवर्त गति की कुल ऊर्जा कहते हैं। सरल आवर्त गति करते हुए कण की ऊर्जा दो प्रकार की होती है-
(i) गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)
(ii) स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy)।
इस प्रकार कुल ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा तथा गतिज ऊर्जा के योग के बराबर होती है अर्थात्
कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा
ET = K + U

(i) सरल आवर्त गति करते हुए कण की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy of Particle in S.H.M.) :
सरल आवर्त गति करते हुए कण में उसकी गति के कारण विद्यमान ऊर्जा सरल आवर्त गति की गतिज ऊर्जा कहलाती है।
माना कोई कण जिसका द्रव्यमान (m) तथा चाल u है तो कण की गतिज ऊर्जा
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(ii) सरल आवर्त गति में कण की स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy of Particle in S.H.M.):
सरल आवर्त गति में कण की स्थिति के कारण निहित ऊर्जा कण की स्थितिज ऊर्जा कहलाती है।
माना दोलन करने वाले m द्रव्यमान के पिण्ड का किसी क्षण साम्य स्थिति से विस्थापन y है, अतः पिण्ड की सरल आवर्त गति का विस्थापन समीकरण,
y = A sin ωt
जहाँ A पिण्ड का दोलन आयाम तथा ω कोणीय वेग है।
अतः पिण्ड का रेखीय वेग,
v = \(\frac{dy}{dt}=\frac{d}{dt}\)(A sin ωt)
= Aω cos ωt
पिण्ड का रेखीय त्वरण
α = \(\frac{dv}{dt}=\frac{d}{dt}\)(Aω cos ωt)
या α = -Aω². sin ωt
या α = -ω².y
क्योंकि y = A sin ωt
पिण्ड पर लगने वाला प्रत्यानयन बल
F = mα = -mω²y …………..(1)

अतः पिण्ड में अत्यन्त सूक्ष्म विस्थापन dy के विपरीत प्रत्यानयन बल द्वारा किया गया कार्य,
dW = F × (-dy) = mω²y dy
या dW = mω².y.dy
अतः पिण्ड को y = 0 से y = y तक विस्थापित करने में कृत कार्य अर्थात् y विस्थापन में पिण्ड y की स्थितिज ऊर्जा
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 37
(i) जब पिण्ड का विस्थापन शून्य होता है अर्थात् पिण्ड माध्य स्थिति में होता है तो
y = 0
∴ Umin = 0 ……………(3)
(ii) जब पिण्ड अधिकतम विस्थापन की स्थिति में होता है तो,
y = a
∴ Umax = \(\frac{1}{2}\)mω²A ……………(3)

(iii) सरल आवर्त गति करते हुए कण की कुल ऊर्जा (Total Energy of Particle in S.H.M.) :
सरल आवर्त गति करने वाले कण की गतिज ऊर्जा एवं स्थितिज ऊर्जा का योग कुल ऊर्जा के बराबर होता है अर्थात्
ET = K + U
या
ET = \(\frac{1}{2}\)mω²(A² – y²) + \(\frac{1}{2}\)mω²A
= \(\frac{1}{2}\)mω²(A² – y² + y²)
= \(\frac{1}{2}\)mω²A²

स्पष्ट है कि कुल ऊर्जा का समय एवं स्थिति अर्थात् उसके विस्थापन पर निर्भर नहीं करती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि, सरल आवर्त गति में कण की कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है। स्पष्ट है कि सरल आवर्त गति में ऊर्जा संरक्षण के नियम का पालन होता है।
ω = 2πn (जहाँ n = आवृत्ति)
∴ ET = \(\frac{1}{2}\)m(2πn)²A²
= \(\frac{1}{2}\)m.4π²n²A²
या ET = 2mπ²n²A²
इस प्रकार सरल आवर्त गति में कण की कुल ऊर्जा,
ET = 2mπ²n²A²
ET ∝ A² अर्थात् (आयाम)²
तथा
ET ∝ n² अर्थात् (आवृत्ति)²
सरल आवर्त गति में कण की गतिज ऊर्जा (K), स्थितिज ऊर्जा (U)
तथा कुल ऊर्जा (ET) को विस्थापन के साथ निम्न चित्र में प्रदर्शित किया गया है-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 14 दोलन - 38
नोट – सरल आवर्त गति में कुल ऊर्जा की आवृत्ति शून्य होती है।

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. वृषण की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है-
(अ) वृक्क नलिकाएँ
(स) एपीडिडाइमिस
(ब) शुक्रजनन नालिकाएँ
(द) मुलेरियन नलिकाएँ
उत्तर:
(ब) शुक्रजनन नालिकाएँ

2. बुम्ब किसे कहते हैं-
(अ) योनि
(ब) बच्चादानी
(द) भगशेफ
(स) भग
उत्तर:
(ब) बच्चादानी

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

3. स्त्रियों में अण्डाणु बनना किस आयु में बंद हो जाता है-
(अ) 13 वर्ष
(ब) 20 वर्ष
(स) 40 वर्ष
(द) 50 वर्ष
उत्तर:
(द) 50 वर्ष

4. वृषणकोष में उदर गुहा की तुलना में कितने ताप की कमी होती है-
(अ) 2-2.50 C
(ब) 5°C
(स) 6°C
(द) 13° C
उत्तर:
(अ) 2-2.50 C

5. मानव में सगर्भता की अवधि है-
(अ) 15 महीने
(ब) 9 महीने
(स) 12 महीने
(द) 18 महीने
उत्तर:
(ब) 9 महीने

6. कोरकपुटी (ब्लास्टोसिस्ट) गर्भाशय के कौनसे स्तर में अन्तःस्थापित होती है-
(अ) परिगर्भाशय
(ब) गर्भाशय पेशी स्तर
(स) गर्भाशय अन्त:स्तर
(द) अध: श्लेष्मिका
उत्तर:
(स) गर्भाशय अन्त:स्तर

7. प्रति आर्तव चक्र में अण्डोत्सर्ग के दौरान कितने अण्डाणु मोचित होते हैं-
(अ) एक
(ब) दो
(स) तीन
(द) चार
उत्तर:
(अ) एक

8. एक शिशु के लिंग का निर्धारण निम्न में से किसके द्वारा होता है-
(अ) पिता
(ब) माता
(स) भाई
(द) बहन
उत्तर:
(अ) पिता

9. शुक्राणुओं का निर्माण निम्न में किस अंग में होता है-
(अ) वृषण
(ब) अधिवृषण
(स) शुक्रवाहिनी
(द) प्रोस्टेट ग्रन्थि
उत्तर:
(अ) वृषण

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

10. 8 से 16 कोरक खण्डों वाले भ्रूण को क्या कहते हैं-
(अ) तूतक (मोरुला)
(ब) ब्लास्टूला
(स) कोरकपुटी
(द) अंतर्रोपण
उत्तर:
(अ) तूतक (मोरुला)

11. आर्तव चक्र के दौरान रक्तस्राव कितने दिन तक चलता रहता है-
(अ) 10-15 दिन
(ब) 3-5 दिन
(स) 20-25 दिन
(द) उपर्युक्त में कोई नहीं ।
उत्तर:
(ब) 3-5 दिन

12. ग्रेफियन पुटक (Graffian Follicle) का फटना व अण्डाणु का मुक्त होना कहलाता है
(अ) संयुग्मन
(ब) केस्ट्रेशन
(स) क्रिप्टोडि
(द) अण्डोत्सर्ग
उत्तर:
(द) अण्डोत्सर्ग

13 तरुणावस्था (Puberty) में पहली बार रजस्राव (Menstruation) कहलाता है-
(अ) रजोदर्शन
(ब) रजोनिवृत्ति
(स) कामोन्माद
(द) क्रिप्टोकिंडिज्म
उत्तर:
(अ) रजोदर्शन

14. HCGC (ह्यूमन कोरिओनिक गोनेडोट्रॉपिन) का स्रावण होता है-
(अ) सरोली कोशिकाओं से
(ब) डिस्कस प्रालिजेरस
(स) अपरा (Placenta ) से
(द) पुटक कोशिकाओं से
उत्तर:
(स) अपरा (Placenta ) से

15. वृषण उदरगुहा के बाहर एक थैली में स्थित होते हैं जिसे कहते हैं-
(अ) वृषणकोष
(स) शुक्राशय
(ब) अधिवृषण
(द) अण्डाशय
उत्तर:
(अ) वृषणकोष

16. नर जर्म कोशिकाएँ किस विभाजन के फलस्वरूप शुक्राणुओं का निर्माण होता है?
(अ) अर्धसूत्री विभाजन
(ब) समसूत्री विभाजन
(स) असूत्री विभाजन
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) अर्धसूत्री विभाजन

17. पुरुष लिंग की सहायक ग्रन्थि है-
(अ) शुक्राशय
(ब) प्रोस्टेट ग्रन्थि
(स) बल्बोयूरेथ्रल ग्रन्थि
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

18. शुक्राणुजनन के पश्चात् शुक्राणु हो जाता शीर्ष किन कोशिकाओं में अन्तःस्थापित है?
(अ) स्ट्रोमा में
(ब) ध्रुव कोशिकाओं में
(स) सर्टोली कोशिकाओं में
(द) थीका इन्टरना में
उत्तर:
(स) सर्टोली कोशिकाओं में

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19. शुक्राणुओं की पूंछ को गति करने के लिए ऊर्जा किससे प्राप्त होती है?
(अ) गॉल्जीकाय
(ब) माइटोकॉन्ड्रिया
(स) लाइसोसोम
(द) केन्द्रक
उत्तर:
(ब) माइटोकॉन्ड्रिया

20. रजोधर्म की अनुपस्थिति किसका संकेत देती है?
(अ) गर्भपात का
(स) आर्तव चक्र का
(ब) गर्भधारण का
(द) मद चक्र का
उत्तर:
(ब) गर्भधारण का

21. मानव में एक महीने की सगर्भता के बाद भ्रूण अंग विकसित होता है
(अ) हृदय
(ब) पाद् व अंगुलियाँ
(स) बालों का
(द) बाह्य जननाँग
उत्तर:
(अ) हृदय

22. अपरा (प्लैसेंटा) का निम्न में से कार्य है-
(अ) पोषण
(ब) उत्सर्जन
(स) श्वसन
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

23. शुक्राणुओं के साथ-साथ शुक्राणु प्लाज्मा मिलकर बनाता है-
(अ) वीर्य
(ब) हॉर्मोन
(स) एंजाइम
(द) क्षारीय द्रव
उत्तर:
(अ) वीर्य

24. स्त्री के प्राथमिक लैंगिक अंग हैं-
(अ) गर्भाशय
(ब) अण्डाशय
(स) अण्डवाहिनी
(द) इन्फन्डीबुलम
उत्तर:
(ब) अण्डाशय

25. शिश्न का अन्तिम वर्धित भाग कहलाता है-
(अ) फोरस्किन
(ब) मौंसप्यूबिस
(स) ग्लांस पेनिस
(द) अधिवृषण
उत्तर:
(स) ग्लांस पेनिस

26. फल शर्करा पाई जाती है-
(अ) मूत्र में
(ब) पसीने में
(स) ऑक्सीटोसिन में
(द) शुक्रिय प्लाज्मा में
उत्तर:
(द) शुक्रिय प्लाज्मा में

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27. मानव के शुक्राणु के शीर्ष भाग में उपस्थित केन्द्रक होता है-
(अ) गोलाकार
(ब) अण्डाकार
(स) त्रिकोणाकार
(द) दीर्घीकार (इलोगेटेड)
उत्तर:
(द) दीर्घीकार (इलोगेटेड)

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
फटी हुई पुटक कोशिकाओं द्वारा निर्मित ग्रन्थिल संरचना से स्रावित एक हारमोन का नाम बताइए ।
उत्तर:
प्रोजेस्टरोन (Progestron) अथवा एस्ट्रोजन ( Estrogen ) ।

प्रश्न 2.
शुक्र कायान्तरण को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर:
शुक्राणु पूर्वी कोशिकाएँ ( Spermatids ) गोल, अचल एवं अगुणित संरचनाएँ हैं। इनके आकारिकी, उपापचयी एवं क्रियात्मक रूप में एक अति विशिष्ट संरचना ‘शुक्राणु’ में परिवर्तन को शुक्र कायान्तरण कहते हैं।

प्रश्न 3.
एक पंचास वर्षीय स्त्री का रजचक्र समाप्त होना क्या कहलाता है ?
उत्तर:
एक पचास वर्षीय स्त्री का रजचक्र का समाप्त होना रजोनिवृत्ति (Menopause) कहलाता है ।

प्रश्न 4.
वीर्यसेचन ( Insemination) को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर:
स्त्री एवं पुरुष के संभोग (मैथुन) के दौरान शिश्न द्वारा (वीर्य) शुक्राणु स्त्री की योनि में छोड़ने की क्रिया को वीर्यसेचन कहते हैं।

प्रश्न 5.
गर्भावस्था (Gestation Period) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
निषेचन से शिशु के जन्म (प्रसव) के बीच के समय को गर्भावस्था कहते हैं ।

प्रश्न 6.
कॉरपोरा केवरनौसा कहाँ पाया जाता है ?
उत्तर:
कॉरपोरा केंवरनौसा शिश्न (Penis) में पाया जाता है।

प्रश्न 7.
स्तनधारियों के एक्रोसोम द्वारा स्रावित एन्जाइम का नाम लिखिए जो अण्डकलाओं को घोलने में सहायता करता है ।
उत्तर:
स्तनधारियों के एक्रोसोम द्वारा हाएलसोयूरोनाइडेज एन्जाइम का स्रावण किया जाता है जो अण्ड कलाओं को घोलने में सहायता करता है।

प्रश्न 8.
हाथी, कुत्ता एवं बिल्ली में औसत गर्भकाल क्या है ?
उत्तर:
हाथी – 641 दिन, कुत्ता – 63 दिन एवं बिल्ली – 63 दिन ।

प्रश्न 9.
क्लोस्ट्रम क्या है ?
उत्तर:
प्रसव के पश्चात् मादा के स्तनों से प्रथम स्रावित दुग्ध क्लोस्ट्रम कहलाता है। यह हल्का पीला, गाढ़ा व रोग प्रतिरोधक होता है ।

प्रश्न 10.
भ्रूण का माता के गर्भाशय से सम्बन्ध बनाने की क्रिया को क्या कहते हैं?
उत्तर:
भ्रूण का माता के गर्भाशय से सम्बन्ध बनाने की क्रिया को आरोपण (Implantation) कहते हैं ।

प्रश्न 11.
अण्डाशय पीठिका कौनसे दो भागों में विभेदित होता है?
उत्तर:

  • परिधीय वल्कुट (Peripheral Cortex)
  • आन्तरिक मध्यांश (Internal Medulla)

प्रश्न 12.
रजोधर्म की अनुपस्थिति किस बात का संकेत है?
उत्तर:
रजोधर्म की अनुपस्थिति गर्भधारण का संकेत है।

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प्रश्न 13.
मनुष्य में किस प्रकार का अपरा (Placenta ) पाया जाता है ?
उत्तर:
मनुष्य में हीमोकारियल अपरा (Placenta ) पाया जाता है।

प्रश्न 14.
अण्डोत्सर्ग (Ovulation) के बाद ग्रेफियन पुटिका (Graffian Follicle) द्वारा निर्मित स्रावी संरचना का नाम लिखिए ।
उत्तर:
अण्डोत्सर्ग (Ovulation ) के बाद ग्रेफियन पुटिका (Graffian Follicle) द्वारा निर्मित स्रावी संरचना को कॉरपस ल्यूटियम (Corpus luteum) कहते हैं।

प्रश्न 15.
प्रसव के बाद दुग्ध संश्लेषण ( Milk Synthesis) के लिए उत्तरदायी हारमोन का नाम लिखिए ।
उत्तर:
प्रसव के बाद दुग्ध संश्लेषण ( Milk Synthesis) के लिए उत्तरदायी हारमोन LTH (Lactotrophic Hormone)।

प्रश्न 16.
शुक्राणुओं का संग्रहण व परिपक्वन (Storage & Maturation ) किस अंग में होता है ?
उत्तर:
अधिवृषण (Epididymis) में शुक्राणुओं का संग्रहण परिपक्वन होता है।

प्रश्न 17.
वृषण के एक पिण्डक (Lobule) में शुक्रज- नलिकाओं (Seminiferous Tubules) की संख्या कितनी होती है?
उत्तर:
वृषण के एक पिण्डक (Lobule) में शुक्रजन नलिकाओ (Seminiferous Tubules) की संख्या 1-3 होती है।

प्रश्न 18.
उस हारमोन का नाम लिखिए जो प्रसक (Parturition) के समय प्यूबिक सिम्फाइसिस (Pubic Symphysis) का शिथिलन करता है।
उत्तर:
रिलेक्सिन हारमोन प्रसव के समय प्यूबिक सिम्फाइसिस का शिथिलन करता है।

प्रश्न 19.
लैंगिक उत्तेजना (Sexual Excitement) के समय महिलाओं में रंगहीन पदार्थ का स्रावण किस ग्रन्थि द्वारा किया जाता है?
उत्तर:
लैंगिक उत्तेजना (Sexual Excitement) के समय महिलाओं में रंगहीन पदार्थ का स्रावण बार्थोलिन ग्रन्थियों (Bartholian glands) द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 20.
योनि का द्वार प्राय: एक पतली झिल्ली से आंशिक रूप से ढका होता है जिसे क्या कहते हैं?
उत्तर:
योनि का द्वार प्राय: एक पतली झिल्ली से आंशिक रूप से ढका होता है जिसे योनिच्छद (Hymen) कहते हैं।

प्रश्न 21.
एक छोटी अंगुली जैसी संरचना जो मूत्र द्वार के ऊपर दो वृहद् भगोष्ठ से ऊपरी मिलन बिन्दु के पास स्थित होती है उसे क्या कहते हैं?
उत्तर:
एक छोटी अंगुली जैसी संरचना जो मूत्र द्वार के ऊपर दो वृहद् भगोष्ठ के ऊपरी मिलन बिन्दु के पास स्थित होती है उसे भगशेफ (Clitoris) कहते हैं।

प्रश्न 22.
जघन शैल (माँस प्यूबिस) किस प्रकार के ऊतकों से बनता है?
उत्तर:
जघन शैल (माँस प्यूबिस) वसामय ऊतकों से बना होता है।

प्रश्न 23.
गर्भाशय की भित्ति कितनी परतों से बनी होती है? नाम लिखिए ।
उत्तर:
गर्भाशय की भित्ति तीन परतों से बनी होती है-

  • परिगर्भाशय (पेरिमैट्रियम)
  • गर्भाशय पेशी स्तर (मायोमैट्रियम)
  • गर्भाशय अन्तःस्तर (एंडोमैट्रियम) ।

प्रश्न 24.
स्त्री के गर्भाशय की आकृति किस फल के समान होती है?
उत्तर:
स्त्री के गर्भाशय की आकृति उल्टी रखी हुई नाशपाती के समान होती है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

प्रश्न 25.
उस भ्रूण अवस्था का नाम लिखिए जो मानव स्त्री की गर्भाशय भित्ति में अन्तर्रोपित हो जाती है।
उत्तर:
ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst) मानव स्त्री की गर्भाशय भित्ति में अन्तरोंपित हो जाती है।

प्रश्न 26.
नवजात शिशुओं में कोलोस्ट्रम (Colostrum ) किस प्रकार रोगों के प्रति आरम्भिक सुरक्षा प्रदान करता है? एक कारण दे।
उत्तर:
कोलोस्ट्रम ( खीस) में कई प्रकार के प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) होती है जो नवजात शिशुओं में रोगों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न करती है।

प्रश्न 27.
वह क्या चीज है जो प्रसव के लिए उत्तरदायी हार्मोन्स के विमोचन के लिए पीयूष (पिट्यूटरी) को उत्तेजित करती है? उस हार्मोन का नाम लिखिए।
उत्तर:
गर्भ उत्क्षेपन प्रतिवर्त (फीटल इंजेक्शन रेफलेक्स) पीयूष ग्रन्थि को आक्सीटोसिन (Oxytocin) हार्मोन के स्रावण को उद्दीपन करते हैं।

प्रश्न 28.
मादा के अण्डाशय से अण्डोत्सर्ग के लिए ग्राफी पुटक को फटने के लिए कौनसा हार्मोन प्रेरित करता है?
उत्तर:
LH हार्मोन के प्रभाव से ग्राफी पुटक फट जाती है।

प्रश्न 29.
मानव अण्डाशय में कौनसा भाग प्रोजेस्ट्रॉन स्त्रावित करता है?
उत्तर:
मानव अण्डाशय में पीत पिण्ड ( कार्पसल्यूटियम) प्रोजेस्ट्रॉन स्रावित करता है।

प्रश्न 30.
मानव भ्रूण में ट्रोफोब्लास्ट का क्या कार्य है?
उत्तर:
मानव भ्रूण में ट्रोफोब्लास्ट का कार्य गर्भाशय ( Uterus ) की आन्तरिक भित्ति (एण्डोमेट्रियम) को भेदने का कार्य है। जिससे ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst) आन्तरिक भित्ति में रोपित हो सके।

प्रश्न 31.
अंडोत्सर्ग को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
अण्डाशय की ग्राफियन पुटिका में से द्वितीयक ऊसाइट का फट कर उदर गुहा में मुक्त होना अंडोत्सर्ग कहलाता है।

प्रश्न 32.
प्रथम स्तन्य या खीस क्या है?
उत्तर:
प्रसव के बाद मादा के स्तनों से आरम्भिक कुछ दिनों तक जो दूध निकलता है, उसे प्रथम स्तन्य या खीस (कोलोस्ट्रम) कहते हैं ।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
अपरा (Placenta ) किसे कहते हैं? गर्भाशय में अपरा को दर्शाते हुए मानव भ्रूण का नामांकित चित्र बनाइए एवं इसके कोई चार कार्य लिखिए।
उत्तर:
अपरा (Placenta ) – भ्रूण के अन्तर्रोपण के पश्चात् पोषकोरक पर अंगुली जैसी संरचनाएँ उभरती हैं, जिन्हें जरायु अंकुरक (Chorionic Villi) कहते हैं। ये जरायु अंकुरक गर्भाशयी ऊतक और मातृ रक्त से आच्छादित होते हैं। जरायु अंकुरक और गर्भाशयी ऊतक एक-दूसरे के साथ अंतरागुलियुक्त (Interdigited) हो जाते हैं तथा संयुक्त रूप से परिवर्धशील भ्रूण (Foetus ) और मातृ शरीर के साथ एक संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई को गठित करते हैं जिसे अपरा (Placenta ) कहते हैं। देखिए चित्र में ।

अपरा (Placenta ) के कार्य- अपरा के निम्नलिखित कार्य हैं-

  • भ्रूण को ऑक्सीजन तथा पोषण की आपूर्ति एवं कार्बन -डाइऑक्साइड तथा भ्रूण द्वारा उत्पन्न उत्सर्जी (Excretory ) अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य करता है।
  • अपरा एक नाभिरज्जु ( umbilical cord) द्वारा भ्रूण से जुड़ा होता है जो भ्रूण तक सभी आवश्यक पदार्थों को अन्दर लाने तथा बाहर ले जाने के कार्य में सहायता करता है।
  • अपरा अन्तःस्रावी (Endocrine) ऊतकों का कार्य करता है।
  • इसके द्वारा अनेक हार्मोनों का स्रावण किया जाता है जैसे मानव जरायु गोनेडोट्रॉपिन (HCG), मानव अपरा लैक्टोजन (HPL), एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रोजन आदि ।
  • प्रोजेस्टरोन पूरे गर्भकाल तक गर्भ को साधे रखता है, प्रसव के समय अपरा से ही रिलेक्सिन का स्राव होता है जो प्रसव के समय मूत्रमार्ग व जननमार्ग को चिकना कर भ्रूण के निकास में सहायता करता है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन 1

प्रश्न 2.
अपवाहक नलिका तथा शुक्रवाहिनी में कोई चार अन्तर लिखिए।
उत्तर:
अपवाहक नलिका (Vasa Efferentia) तथा शुक्रवाहिनी (Vasa Deferentia) में अन्तर

अपवाहक नलिका (Vasa Efferentia)शुक्रवाहिनी (Vasa Deferentia)
1. अपवाहक नलिका की उत्पत्ति वृषण जालक (Rete Testis) से होती है।जबकि शुक्रवाहिनी की उत्पत्ति कॉडा एपिडिडाइमिस (Cauda epididymis) से होती है।
2. अपवाहक नलिकाओं की संख्या 15-20 होती है।जबकि शुक्रवाहिनी की संख्या दो होती है।
3. अपवाह क नलिका अत्यधिक वलित होती है।वृषणकोष में आंशिक रूप से कुण्डलित तथा उदरगुहा में सीधी होती है।
4. वृषण जालक (Rete Testis) से शुक्राणुओं का कैपट एपिडिडाइमिस की ओर वहन करती है।शुक्रवाहिनी शुक्राणुओं का कॉडा एपिडडडाइ मिस से स्खलन वाहिनी (Eijculatory duct) की ओर वहन करती है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

प्रश्न 3.
सगर्भता के विभिन्न महीनों में भ्रूण परिवर्धन के प्रमुख लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानव में सगर्भता की अवधि 9 महीने की होती है। सगर्भता के विभिन्न महींनों में भ्रूण परिवर्धन के प्रमुख लक्षण अग्र हैं-

  1. मानव में एक महीने की सगर्भता के बाद भ्रूण के हृदय का निर्माण होता है। हृदय की धड़कनों को स्टेथेस्कोप की सहायता से ध्यानपूर्वक सुना जा सकता है।
  2. सगर्भता के दूसरे माह के अन्त तक भ्रूण के पाद एवं अंगुलियाँ विकसित होती हैं।
  3. 12वें सप्ताह ( पहली तिमाही) के अन्त तक लगभग सभी प्रमुख अंग तंत्रों की रचना बन जाती है, जैसे पाद एवं बाह्य जननांग अच्छी तरह से विकसित हो जाते हैं।
  4. गर्भावस्था के पाँचवें माह के दौरान गर्भ की पहली गतिशीलता और सिर पर बाल उग आते हैं ।
  5. 24वें सप्ताह के अन्त तक (दूसरी तिमाही), पूरे शरीर पर कोमल बाल निकल आते हैं।
  6. आँखों की पलकें अलग-अलग हो जाती हैं और बरौनियाँ बन जाती हैं।
  7. गर्भावस्था के 9वें माह के अन्त तक गर्भ पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है और प्रसव के लिए तैयार हो जाता है।

प्रश्न 4.
युग्मक जनन किसे कहते हैं? इसके कोई तीन महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
जनदों (वृषणों एवं अण्डाशयों) में जननिक उपकला (Germinal epithelium) की कोशिकाओं से युग्मक कोशिकाओं के बनने की प्रक्रिया को युग्मक जनन ( Gametogenesis) कहते हैं । युग्मक जनन का महत्त्व (Importance of Gametogenesis )

  • इसके फलस्वरूप अगुणित युग्मकों का निर्माण होता है। नर एवं मादा युग्मक संयुजन करके द्विगुणित युग्मनज (Diploid Zygote) का निर्माण करते हैं जिसके विकास से नए जीव की उत्पत्ति होती है।
  • इसमें होने वाले अर्धसूत्री विभाजन में जीन विनिमय (Crossingover) होता है जिससे नये संयोगों का निर्माण होता है।
  • युग्मक जनन की समानताओं के आधार पर जीवों का विकासीय क्रम जाना जा सकता है।

प्रश्न 5.
स्टेम कोशिकाएँ किसे कहते हैं? समझाइए ।
उत्तर:
अंतर्रोपण के तुरन्त पश्चात् अन्तर कोशिका समूह (भ्रूण) बाह्य त्वचा (Ectoderm) नामक तथा एक बाहरी स्तर और अंतस्त्वचा (Endoderm) नामक एक भीतरी स्तर में विभेदित हो जाता है। इस बाह्यस्त्वचा और अंतस्त्वचा के बीच जल्दी ही मध्यजननस्तर (Mesoderm) बन जाता है। ये तीनों ही स्तर वयस्कों में भी ऊतकों (अंगों ) का निर्माण करते हैं। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस अन्तरकोशिका समूह में कुछ निश्चित तरह की कोशिकाएँ जिन्हें स्टेम कोशिकाएँ कहते हैं, समाहित रहती हैं, जिनमें यह क्षमता होती है कि वे सभी अंगों एवं ऊतकों को उत्पन्न कर सकती हैं।

प्रश्न 6.
यदि मनुष्य की एपिडिडाइमिस को काट दिया गया है तो कौनसा कार्य प्रभावित होगा? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
यदि मनुष्य की एपिडिडाइमिस को काट दिया जाये तो इसके अभाव में शुक्राणुओं का परिपक्वन, पोषण एवं संग्रह (एक माह तक) कार्य नहीं होगा । एपिडिडाइमिस के अभाव में वृषण से शुक्राणु शुक्रवाहिनी तक नहीं जा पायेंगे जिसके फलस्वरूप निषेचन क्रिया नहीं होगी।

प्रश्न 7.
प्रजनन क्रिया में स्त्रियों की पुरुषों की तुलना में अधिक जिम्मेदारी होती है। क्यों? समझाइये |
उत्तर:
प्रजनन क्रिया में स्त्रियों की पुरुषों की तुलना में अधिक जिम्मेदारी होती है, क्योंकि मादा जनन तन्त्र द्वारा जनन से सम्बन्धित कई कार्य सम्पादित किये जाते हैं; जैसे- अण्डाणु निर्माण, मैथुन के समय शुक्राणुओं को ग्रहण करना, गर्भाधान हेतु अनुकूल वातावरण तैयार करना, नवजात शिशु को भ्रूणावस्था एवं प्रसव पश्चात् पोषण देना, स्तन ग्रन्थियों द्वारा दूध का संश्लेषण एवं स्रावण आदि ।

प्रश्न 8.
मदचक्र किसे कहते हैं? मदचक्र एवं रजचक्र के कोई तीन अन्तर लिखिए।
उत्तर:
मदचक्र (Estrous cycle ) – नॉन प्राइमेट्स स्तनधारियों की मादाओं के जनन तन्त्र में होने वाले चक्रीय परिवर्तनों को मद चक्र कहते हैं। इस काल या चक्र में मादा उत्तेजित अवस्था में होती है एवं मैथुन हेतु तैयार होती है। मद चक्र (Estrous cycle) एवं रजचक्र (Menstrual cycle) में अन्तर –

मद चक्र (Estrous cycle)रजचक्र (Menstrual cycle)
1. प्राइमेट्स को छोड़कर सभी स्तनधारियों में चक्र पाय जाता है। उदाहरण-कुत्तायह चक्र प्राइमेट्स मादा स्तनियों में पाया जाता है। उदाहरण-स्त्री
2. इसमें रक्त का स्राव नही होता है ।इस चक्र के अन्त में रक्त का साव होता है ।
3. एण्डोमीट्रियम का क्षरण एवं रक्तस्राव नहीं होता है ।एण्डोमीट्रियम का क्षरण एवं रक्तस्राव होता है।
4. मद चक्र में मादा उत्तेजित अवस्था में होती है एवं मैथुन हेतु तैयार होती है।इस चक्र में ऐसा नहीं होता है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

प्रश्न 9.
भगशेफ क्या है?
उत्तर:
भगशेफ/क्लाइटोरिस ( Clitoris ) – यह भग (Vulva) के अग्र छोर पर स्थित एक घुण्डीनुमा रचना होती है जिसे क्लाइटोरिस (Clitoris) कहते हैं। यह स्पर्शकणिकाओं की अधिक उपस्थिति के कारण अत्यधिक संवेदी होता है। क्लाइटोरिस नर के शिश्न के समजात अंग है। लैंगिक संभोग के समय यह मादा में उत्तेजना तरंगों को प्रसारित करने में सहायक होता है।

प्रश्न 10.
यदि नर के वृषण से निकले हारमोन को मादा में प्रवेश करा दिया जावे तो क्या प्रभाव होगा?
उत्तर:
नर के वृषण से स्रावित होने वाला हारमोन नर के द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का नियन्त्रण करता है। इन नर हारमोन्स को यदि मादा में प्रवेश कराया जायेगा तो मादा में नर के द्वितीयक लक्षण बनने की सम्भावना पैदा हो जायेगी।

प्रश्न 11.
अण्डाशय को अन्तःस्रावी ग्रन्थि क्यों कहा जाता है ? समझाइये |
उत्तर:
अण्डाशय भी अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के समान हारमोन स्रावित करता है । अण्डाशय में पाये जाने वाला कॉरपस ल्यूटियम (Corpus Luteum) निषेचन के तुरन्त बाद सक्रिय होकर निम्न हारमोन्स का स्रावण करता है-

  • प्रोजेस्टेरॉन (Progesteron ) – यह हारमोन गर्भ धारण = गर्भावस्था के लिये आवश्यक है। अतः इसे गर्भावस्था हारमोन (Pregnancy Hormone) कहते हैं।
  • रिलैक्सिन (Relaxin) – प्रसव के समय यह हारमोन श्रोणि मेखला के प्यूबिक सिम्फाइसिस को शिथिल करता है, जिससे जन्म नाल (Birth Canal) या वेजाइना चौड़ी हो जाती है और शिशु का जन्म सुगमता से हो जाता है।

प्रश्न 12.
यदि मादा की अण्डवाहिनियों के स्थान पर प्लास्टिक की नलिकायें लगा दी जायें, तो अण्डाणुओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
मादा में अण्डवाहिनियों का प्रारम्भिक कार्य अण्डों को निषेचन के लिए आगे बढ़ाना, शुक्राणुओं को स्थान देना तथा उनकी गति व जीवन को सुरक्षित रखते हुए निषेचन के लिए स्थान देना आदि होते हैं । प्लास्टिक की नली में अण्डों को आगे कैसे बढ़ाया जा सकेगा तथा विशेष तरल पदार्थों की अनुपस्थिति में तो शुक्राणु अण्डों तक कैसे पहुँचेंगे अर्थात् निषेचन नहीं हो सकेगा। इसके बाद की प्रक्रियायें जैसे रोपण, गर्भधारण, भ्रूण परिवर्धन आदि की तो बात ही नहीं की जा सकती। इस प्रकार अण्डाणु नष्ट हो जायेगा ।

प्रश्न 13.
यदि पुरुष के शरीर से प्रोस्टेट ग्रन्थि तथा काउपर्स ग्रन्थियाँ निकाल दी जाएँ तो शुक्राणुओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
प्रोस्टेट ग्रन्थि का स्राव शुक्राणुओं के लिए जीवनदायक होता है। ये एपिडिडाइमिस में रहने तक निष्क्रिय होते हैं, किन्तु इस व्यन्थि के स्राव के सम्पर्क में आते ही सक्रिय हो जाते हैं। वीर्य के अधिकांश भाग में इसी ग्रन्थि का स्राव होता है। काउपर्स ग्रन्थि का स्राव क्षारीय होता है तथा शुक्राणुओं की रक्षा करता है।

नर में मूत्र मार्ग और शुक्र रस का मार्ग एक ही होता है और सूत्र हल्का अम्लीय होता है। यदि दोनों ग्रन्थियों को पुरुष के शरीर से निकाल दिया जाये तो शुक्राणु न तो निष्क्रियता छोड़कर सक्रिय हो सकेंगे और न ही उनकी सुरक्षा अम्ल इत्यादि से हो सकेगी। अतः निषेचन करने योग्य भी नहीं होंगे।

प्रश्न 14.
यौवनारम्भ (Puberty) किसे कहते हैं? समझाइए ।
उत्तर:
यौवनारम्भ (Puberty ) – मानव में नर एवं मादा में अपरिपक्व जनन अंगों का परिपक्व होकर जनन क्षमता का विकास होना यौवनारम्भ कहलाता है। नर की अपेक्षा मादा में यौवनारम्भ पहले प्रारम्भ होता है। मानव नर में यौवनारम्भ 14-16 वर्ष की आयु में वृषणों की सक्रियता तथा शुक्राणु उत्पादन के साथ शुरू होता है जबकि मादा में 12-14 वर्ष की आयु में स्तन ग्रन्थियों की वृद्धि एवं रजोदर्शन के साथ प्रारम्भ होता है।

प्रश्न 15.
वृषण देहगुहा के बाहर क्यों होते हैं? समझाइये ।
उत्तर:
मानव में वृषण देहगुहा के बाहर होते हैं क्योंकि वृषण कोष में ताप शरीर के ताप से लगभग 2-2.5°C तक कम होता है जिसके कारण शुक्राणुओं का निर्माण सुगमता से होता है। यदि वृषण देहगुहा के अन्दर होंगे तो शरीर के तापमान पर शुक्राणुओं का बनना असम्भव होगा।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

प्रश्न 16.
प्राथमिक शुक्र कोशिकाओं व 100 प्राथमिक tus कोशिकाओं से कितने शुक्राणु व अण्डाणु बनेंगे? समझाइए ।
उत्तर:
100 शुक्राणु व 100 अण्डाणु बनेंगे। शुक्रजनन में प्रथम एवं द्वितीय परिपक्वन विभाजन केन्द्रक एवं कोशिकाद्रव्यी विभाजन में समान होते हैं एवं परिणामस्वरूप चार समान शुक्राणु निर्मित होते हैं। अतः 25 प्राथमिक कोशिकाओं से 100 शुक्राणुओं का निर्माण होता है। जबकि अण्डजनन में दोनों परिपक्वन विभाजन असमान कोशिकाद्रव्यी विभाजन दर्शाते हैं तथा इसके फलस्वरूप एक बड़ी अण्डाणु कोशिका तथा तीन ध्रुवकायों का निर्माण होता है। तीनों ध्रुवकाय नष्ट हो जाती हैं, केवल एक अण्डाणु शेष रहता है। अतः 100 प्राथमिक अण्ड कोशिकाओं से 100 अण्डाणुओं का निर्माण होता है।

प्रश्न 17.
मानव नर व मादा में यौवनारम्भ शुरू होने पर क्या-क्या परिवर्तन दिखाई देते हैं?
उत्तर:
यौवनारम्भ के समय मानव नर तथा मादा में होने वाले परिवर्तन-

नर (Male)मादा (Female)
1. शिश्न, वृषण कोषों, प्रॉस्टेट ग्रन्थि एवं शुक्राशय ग्रन्थि के आकार में वृद्धि होती है।गर्भाशय, योनि, अण्डवाहिनियों तथा भग के आकार में वृद्धि होती है।
2. वृषणों के आकार में वृद्धि एवं शुक्राणुजनन प्रारम्भ होता है।वक्ष स्थल पर स्तन ग्रन्थियों में वृद्धि तथा रजोदर्शन के साथ मासिक चक्र का प्रारम्भ होना।
3. आवाज का भारी होना।आवाज महीन, तीव्र एवं मधुर हो जाती है।
4. शरीर के विभिन्न क्षेत्रों जैसे चेहरे, वक्षस्थल एवं श्रोणि भाग में बालों का उगना।शरीर पर बालों का अभाव होना।
5. शरीर में तीव्र वृद्धि तथा अंसीय क्षेत्र में वृद्धि होना।श्रोणि भाग में तीव्र वृद्धि, नितम्ब भाग का फैलकर चौड़ा होना, स्तनों की वृद्धि, शरीर में वसा का संचय।
6. टेस्टोस्टेरोन, FSH, LH इत्यादि हारमोन के स्रावण में वृद्धि।प्रोजेस्टेरोन, ऐस्ट्रोजन तथा FSH, LH हारमोन के स्राव में वृद्धि होना।
7. मादा की ओर मनोवैज्ञानिक आकर्षण।नर की तरफ मनोवैज्ञानिक आकर्षण।

प्रश्न 18.
पुरुषों में सहायक जनन ग्रन्थियाँ वीर्य निर्माण एवं जनन प्रक्रिया में किस प्रकार सहायता करती हैं?
उत्तर:
पुरुषों में सहायक जनन ग्रन्थियाँ तीन प्रकार की पायी जाती हैं। ये सभी स्रावी पदार्थ अधिवृषण एवं शुक्राशय द्वारा स्रावित पदार्थों एवं शुक्राणुओं से मिलकर वीर्य का निर्माण करती हैं।
(1) प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate Gland) – यह ग्रन्थि मूत्र मार्ग के आधार भाग पर स्थित होती है। यह कई पिण्डों से मिलकर बनी होती है। इस ग्रन्थि द्वारा हल्के सफेद क्षारीय तरल पदार्थ का स्रावण किया जाता है, जो वीर्य का 25-30 प्रतिशत भाग बनाता है। इस तरल में फॉस्फेट्स, सिट्रेट, लाइसोजाइम, फाइब्रिनोलाइसिन, स्पर्मिन आदि पदार्थ पाये जाते हैं। यह शुक्राणुओं को सक्रिय बनाता है एवं वीर्य के स्कंदन को रोकता है।

(2) शुक्राशय (Seminal Vesicle ) – यह मूत्राशय की पश्च सतह एवं मलाशय के बीच में स्थित होता है जो एक जोड़ी थैलीनुमा रचना है। शिश्न के उत्तेजित अवस्था में स्खलन के समय शुक्राशय संकुचित होकर स्राव मुक्त करते हैं। यह स्राव वीर्य का 60% भाग बनाता है। स्राव की क्षारीय प्रकृति के कारण यह स्राव योनि मार्ग की अम्लीयता को समाप्त कर शुक्राणुओं की सुरक्षा करता है ।

(3) काउपर ग्रन्थि या ब्लबोयूरीथल ग्रन्थि (Cowper’s Gland or Bulbouretheral Gland) – मैथुन के समय इस ग्रन्थि द्वारा एक गाढ़ा, चिपचिपा तथा क्षारीय पारदर्शी तरल पदार्थ स्रावित किया जाता है जो मूत्र मार्ग को चिकना बनाता है तथा मूत्र मार्ग की अम्लीयता को समाप्त कर उसे उदासीन या हल्का क्षारीय बनाता है। यह तरल मादा की योनि को चिकना कर मैथुन क्रिया को सुगम बनाता है। अतः हम कह सकते हैं कि पुरुषों में सहायक जनन ग्रन्थियाँ वीर्य निर्माण एवं जनन प्रक्रिया में सहायता करती हैं।

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प्रश्न 19.
कार्पस ल्यूटियम का निर्माण किस प्रकार होता है तथा इसका प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर:
अण्डोत्सर्ग (Ovulation) के पश्चात् रिक्त या खाली ग्राफियन पुटिका नष्ट न होकर ल्यूटिनाइजिंग हारमोन (LH) के प्रभाव से, एक पीली ग्रन्थिल रचना में बदल जाती है जिसे कॉर्पस ल्यूटियम (Corpus Luteum) अथवा पीत पिण्ड कहते हैं। अण्ड के बाहर निकल जाने पर पुटिका का फटा हुआ भाग बंद हो जाता है और इसकी गुहा में रक्त जमा होकर एक थक्का (Clot ) बन जाता है।

थक्के के चारों ओर की पुटिका कोशिकाएँ LH के कारण ल्यूटिन की कोशिकाओं में परिवर्तित हो जाती हैं। इनके द्रव्य में ल्यूटिन नामक पीला-सा वर्णक बन जाता है। ये कोशिकाएँ आमाप में बड़ी होती हैं तथा प्रोजेस्ट्रान (Progestrone) तथा रिलेक्सिन (Relaxin) नामक हारमोन का स्रावण करती हैं। इस प्रकार यह एक अन्तःस्रावी ग्रन्थि होती है।

यदि अण्डाणु का निषेचन (फैलोपियन नलिका में) हो जाता है तो यह प्रोजेस्ट्रान तथा रिलेक्सिन हारमोन का स्रावण करती रहती है अन्यथा निष्क्रिय होकर नष्ट होने लगती है। कार्पस ल्यूटियम की अपभ्रष्ट (Degenerate) हुई रचना को कार्पस एल्बिकैन्स (Corpus Albicans) कहते हैं। यह अन्त में समाप्त हो जाती है।

कार्य-

  1. पीत पिण्ड (Corpus Luteum) द्वारा स्रावित प्रोजेस्टरोन हारमोन भ्रूण के सफल परिवर्धन के लिए गर्भ को बनाये रखता है। इसलिये उसे सगर्भता हारमोन (Pregnancy Hormone) भी कहते हैं।
  2. भ्रूणीय परिवर्धन पूर्ण हो जाने के उपरान्त शिशु के जन्म के लिए पीत पिण्ड (Corpus Luteum) द्वारा रिलेक्सन (Relaxin) हारमोन उत्पन किया जाता है।

प्रश्न 20.
मानव में मादा के विभिन्न जनन अंगों के महत्त्वपूर्ण कार्य लिखिए।
उत्तर:
मानव में मादा के विभिन्न जनन अंगों के महत्त्वपूर्ण कार्य

अंग का नाम (Name of Organ)जनन अंगों के कार्य (Functions of Reproductive organ)
1. अण्डाशय (Ovary)अंडों का निर्माण करता है।
2. अण्डवाहिनियाँ Oviducts)निषेचन स्थल, निषेचित अंड/भू को गर्भाशय में स्थानान्तरित करती है।
3. गर्भाशय (Uterus)आन्तरिक परत भ्रूण को ग्रहण करती है और उसे पोषण प्रदान करती है। मांसल भित्ति के संकुचनी प्रसव के दौरान शिशु को बाहर निकालने में सहायता करती है।
4. गर्भ ग्रीवा (Cervix)जलीय श्लेष्म उत्पन्न करती है जो शिश्न के लिये एक स्नेहक प्रदान करता है जिसमें स्खलन के पश्चात् शुक्राणु तैरते हैं।
5. योनि (Vagina)लैंगिक समागम के दौरान शिश्न को ग्रहण करती है व प्रसव के दौरान शिशु को निकालने के लिए नलिका का काम करती है।
6. क्लाइटोरिस (Clitoris)नर शिश्न के समजात।

प्रश्न 21.
25 प्राथमिक शुक्र कोशिकाएँ व 25 प्राथमिक अण्ड कोशिकाओं से कितने शुक्राणु व अण्डाणु बनेंगे? कारण सहित समझाइए ।
उत्तर:
1000 शुक्राणु व 25 अण्डाणु बनेंगे। शुक्रजनन में प्रथम एवं द्वितीय परिपक्व विभाजन केन्द्रक एवं कोशिकाद्रव्यी विभाजन में समान होते हैं एवं परिणामस्वरूप चार समान शुक्राणु निर्मित होते हैं। होता है। अतः 25 प्राथमिक कोशिकाओं से 100 शुक्राणुओं का निर्माण जबकि अण्डजनन में दोनों परिपक्वन विभाजन असमान कोशिकाद्रव्यी विभाजन दर्शाते हैं तथा इसके फलस्वरूप एक बड़ी अण्डाणु कोशिका तथा तीन ध्रुवकायों का निर्माण होता है। तीनों ध्रुवकाय नष्ट हो जाती हैं, केवल एक अण्डाणु शेष रहता है। अतः 25 प्राथमिक अण्ड कोशिकाओं से 25 अण्डाणुओं का निर्माण होता है।

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प्रश्न 22.
शुक्रजनन का क्या महत्व है?
उत्तर:
शुक्रजनन का निम्न महत्त्व है-

  1. शुक्रजनन क्रिया के फलस्वरूप अगुणित युग्मक अर्थात् शुक्राणुओं का निर्माण होता है।
  2. इस क्रिया से पैतृक के आनुवंशिक गुण शुक्राणु में गुणसूत्रों एक समुच्चय के रूप में आ जाते हैं। यह निषेचन अण्डाणु में प्रवेश करते हैं।
  3. इस क्रिया से बनी अगुणित, पुच्छयुक्त संरचना होती है। यह द्रवीय माध्यम में सरलता से गति करने योग्य होते हैं।

प्रश्न 23.
शुक्रजनन व अण्डजनन में कोई चार समानताएँ लिखिये ।
उत्तर:
शुक्रजनन व अण्डजनन में समानताएँ-

  1. दोनों क्रियाएँ जनदों में जनन उपकला की प्राथमिक जनन कोशिकाओं द्वारा आरम्भ होती हैं।
  2. दोनों क्रियाओं में तीन प्रावस्थाएँ पाई जाती हैं गुणन प्रावस्था वृद्धि प्रावस्था व परिपक्वन प्रावस्था ।
  3. गुणन प्रावस्था के तहत दोनों में समसूत्री विभाजन द्वारा जनन कोशिकाओं की संख्यात्मक वृद्धि होती है।
  4. दाना क्रियाओं का परिपक्वन प्रावस्था में प्रथम एवं द्वितीय परिपक्वन विभाजन होते हैं जो अर्धसूत्रीय विभाजन होता है।

प्रश्न 24.
वयस्क की शुक्रवाहिनी को हटाकर उसके स्थान पर रबर की नलिका लगा दी जावे तो क्या प्रभाव पड़ेगा? समझाइए ।
उत्तर;
वयस्क में शुक्रवाहिनी को हटाकर उसके स्थान पर रबड़ की नलिका लगा दी जाती है तो शुक्राणुओं में गमन नहीं हो पायेगा क्योंकि शुक्रवाहिनी की कोशिकाएँ विशेष तरल पदार्थ का स्राव करती हैं जो शुक्रवाहिनी के मार्ग को शुक्राणुओं के गमन हेतु चिकना बनाती हैं । इसके साथ ही शुक्रवाहिनी की दीवार में पेशियों में तरंग गति उत्पन्न होती है जिससे शुक्राणु आगे बढ़ते हैं । अतः रबड़ की नलिका में शुक्राणुओं का गमन नहीं होगा ।

प्रश्न 25.
शुक्रजनक नलिकाओं (वर्धित) आरेखीय काट का नामांकित चित्र बनाइए ।
उत्तर:
शुक्रजनक नलिकाओं (वर्धित) के आरेखीय काट का चित्र-
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प्रश्न 26.
सर्टोली कोशिकाओं से क्या तात्पर्य है? इनका क्या कार्य है?
उत्तर:
सर्टोली कोशिकायें (Sertoli Cells) – इन्हें आलम्बन अथवा धात्री कोशिकायें (Nurse Cells) भी कहते हैं। ये कोशिकायें मुग्दाकार, संख्या में कम एवं आकार में बड़ी होती हैं। इनके स्वतन्त्र भाग में शुक्राणुपूर्व कोशिकायें (Spermatids ) सटकर लगी होती हैं।
सर्टोली कोशिकाओं का कार्य –

  • ये विकासशील जनन कोशिकाओं को सुरक्षा, आलम्बन तथा पोषण प्रदान करती हैं।
  • शुक्राणुपूर्व कोशिका के बेकार कोशिकाद्रव्य का विघटन करती हैं।
  • इनके द्वारा शुक्राणु उत्पादन प्रेरित करने वाले हारमोन की क्रिया का नियमन करने हेतु इन्हिबिन (Inhibin) हारमोन का स्रावण किया जाता है।

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प्रश्न 27.
सगर्भता किसे कहते हैं? सगर्भता को बनाये रखने वाले हार्मोन्स के नाम लिखिए ।
उत्तर:
सगर्भता (Pregnancy) – भ्रूण का गर्भाशय की भित्ति से जुड़ना आरोपण कहलाता है और बाद में यह सगर्भता का रूप धारण कर लेती है। रजोधर्म का न आना ही सगर्भता का संकेत है। सगर्भता को बनाये रखने वाले हार्मोन्स निम्न हैं- मानव जरायु गोनेडोट्रापिन, मानव अपरा लेक्टोजन, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रोन आदि हार्मोन अपरा द्वारा स्रावित किये जाते हैं। सगर्भता के उत्तरार्द्ध की अवधि में अण्डाशय द्वारा रिलैक्सिन नामक एक हार्मोन भी स्रावित किया जाता है।

मानव जरायु गोनेडोट्रापिन मानव अपरा लेक्टोजन और रिलैक्सिन स्त्री में केवल सगर्भता की स्थिति में उत्पादित होते हैं। इसके अलावा दूसरे हार्मोनों जैसे एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रोन, कॉर्टिसाल, प्रोलेक्टिन, थॉइराक्सिन आदि की भी मात्रा सगर्भता के दौरान माता के रक्त में कई गुणा बढ़ जाती है। इन हार्मोनों के उत्पादन में बढ़ोतरी होना भी भ्रूण वृद्धि, माता की उपापचयी क्रियाओं में परिवर्तनों तथा सगर्भता को बनाये रखने के लिए आवश्यक होता है।

प्रश्न 28.
यदि निषेचन पश्चात् स्त्री के अण्डाशय को काटकर हटा दिया जावे तो गर्भ पर क्या प्रभाव होगा? समझाइए ।
उत्तर:
अण्डाशय में उपस्थित कार्पस ल्यूटियम एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रान तथा रिलैक्सिन हार्मोन्स का सक्रिय स्रावण करता है। यही गर्भाशय की दीवार के संकुचन को रोक कर गर्भ की सुरक्षा करता है। इसलिए गर्भधारण के बाद लगभग 6 सप्ताह तक कॉर्पस ल्यूटियम का सक्रिय रहना आवश्यक है। यदि इस दौरान अण्डाशय को हटा दिया जाये तो गर्भपात ( abortion) हो जाता है। लगभग 6 सप्ताह के गर्भकाल के पश्चात् अपरा (Placenta ) से ही एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्ट्रोन की मात्रा स्रावित होने लगती है जिससे गर्भपात की आशंका समाप्त हो जाती है अतः अब अण्डाशयों को हटा दिया जाए तो गर्भपात नहीं होगा ।

प्रश्न 29.
वीर्यसेचन को परिभाषित करते हुए निषेचन क्रिया को समझाइए ।
उत्तर:
वीर्यसेचन (Insemination ) – स्त्री एवं पुरुष के संभोग मैथुन के दौरान शिश्न द्वारा शुक्र (वीर्य) स्त्री की योनि में छोड़ना वीर्यसेचन कहलाता है । निषेचन क्रिया- गतिशील शुक्राणु तेजी से तैरते हुए गर्भाशय ग्रीवा से होकर गर्भाशय में प्रवेश करते हैं और अन्त में अण्डवाहिनी नली के संकीर्ण पथ (इस्थमस) तथा तुंबिका (Ampulla) के संधिस्थल तक पहुँचते हैं।

इसी बीच अण्डाशय द्वारा मोचित अंडाणु भी इस संधिस्थल तक पहुँच जाता है, जहाँ निषेचन की क्रिया सम्पन्न होती है। निषेचन तभी हो सकता है जब अण्डाणु तथा शुक्राणु दोनों एक ही समय में तुंबिका – संकीर्ण पथ के संधिस्थल पर पहुँच जाएँ। यही कारण है जिससे कि संभोग क्रियाएं निषेचन व सगर्भता की स्थिति में नहीं पहुँच पाती हैं।
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शुक्राणु के साथ एक अण्डाणु के संलयन की प्रक्रिया को निषेचन (Fertilization) कहते हैं। निषेचन के दौरान एक शुक्राणु अण्डाणु के पारदर्शी अण्डावरण (Zona Pellucida ) स्तर के सम्पर्क में आता है। देखिए चित्र में और अतिरिक्त शुक्राणुओं के प्रवेश को रोकने हेतु उसके उक्त स्तर में बदलाव प्रेरित करता है।

इस प्रकार यह सुनिश्चित हो जाता है कि एक अण्डाणु को केवल एक ही शुक्राणु निषेचित कर सकता है। अग्रपिण्डक (Acrosome ) का स्रवण शुक्राणु की पारदर्शी अंडावरण के माध्यम से अंडाणु के कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) तथा प्लाज्मा भित्ति से प्रवेश करने में मदद करता है। यह द्वितीयक अंडक के अर्द्धसूत्री विभाजन को प्रेरित करता है।

दूसरा अर्धसूत्री विभाजन भी असमान होता है और इसके फलस्वरूप द्वितीयक ध्रुवीय पिंड (Secondary Polar Body ) की रचना होता है और एक अगुणित अंडाणु बनता है। शीघ्र ही शुक्राणु का अंडाणु के अगुणित केन्द्रक के साथ संलयन (Fusion ) होता है, जिससे कि द्विगुणित युग्मनज (Diploid Zygote) की रचना होती है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

प्रश्न 30.
स्तन ग्रन्थि का आरेखीय काट का नामांकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए एवं दुग्ध स्रवण को समझाइए ।
उत्तर:
स्तन ग्रन्थि का पाया जाना सभी मादा स्तनधारियों का लक्षण है। मादा (स्त्री) में एक जोड़ी स्तन ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। प्रत्येक स्तन ग्रन्थि में ग्रन्थिल ऊतक एवं वसीय ऊतक होता है। स्तन का ग्रन्थिल ऊतक 15-20 स्तन पालियों (Mammary lobes) में विभक्त होता है। इसमें कोशिकाओं के गुच्छ होते हैं, जिन्हें कूपिका (alveoli) कहते हैं। इन कूपिकाओं की कोशिकाओं के द्वारा दूध का स्रावण किया जाता है।

यह दूध कूपिकाओं की गुहाओं ( अवकाशिकाओं) में संग्रह किया जाता है। ये कूपिकाएँ स्तन नलिकाओं (Mammary tubules) में खुलती हैं। प्रत्येक पाली की नलिकाएँ मिलकर स्तन वाहिनी (Mammary ducts) का निर्माण करती हैं। विभिन्न स्तन वाहिनियाँ (Mammary ducts) मिलकर एक वृहद् स्तन तुंबिका (ampulla) बनाती हैं जो दुग्ध वाहिनी (Lactiferous duct) से जुड़ी होती हैं। जिससे कि दूध स्तन से बाहर निकलता है।
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दुग्ध स्रवण (Lactation) –
सगर्भता की अवस्था में प्रोजेस्ट्रान व एस्ट्रोजन हार्मोन्स के प्रभाव से स्तन ग्रन्थियों की वृद्धि से स्त्री के वक्ष बड़े आकार के हो जाते हैं। प्रोलेक्टिन के प्रभाव से शिशु जन्म के 24 घण्टे के अन्दर दुग्ध ग्रन्थियों से दुग्ध स्रावण (Lactation) हो जाता है। प्रारम्भ में वक्ष की चूचुकों से कोलस्ट्रम (Colstrum) का स्राव होता है। यह पीले रंग का होता है जिसमें ग्लोबुलिन प्रोटीन (Globulin Protein) काफी मात्रा में होता है। इसमें माता की एण्टीबॉडीज (Antibodies) होती है जो नवजात शिशु की संक्रमण से रक्षा करती है।

प्रश्न 31.
मानव शुक्राणु (Human Sperm) की सूक्ष्मदर्शीय संरचना का नामांकित चित्र बनाइये ।
उत्तर:
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प्रश्न 32.
मनुष्य के अण्डाशय की काट का एक नामांकित चित्र बनाइए जिसमें ग्राफी पुटिका की विभिन्न अवस्थाएँ प्रदर्शित हों ।
उत्तर:
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन 6

प्रश्न 33.
एक परिपक्व ग्रेफियन पुटिका ( Mature Graffian Follicle) का नामांकित चित्र बनाइए ।
उत्तर:
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन 7

प्रश्न 34.
शुक्र कोशिका निर्माण (Spermatogenesis) एवं शुक्र कायान्तरण ( Spermiogenesis) में कोई चार अन्तर लिखिए।
उत्तर:
शुक्र कोशिका निर्माण एवं शुक्र कायान्तरण में अन्तर

शुक्र कोशिका निर्माण (Spermatogenesis)शुक्र कायान्तरण (Spermiogenesis)
1. यह पूर्व शुक्राणु निर्माण की द्वितीय प्रावस्था होती है।यह पूर्व शुक्राणु निर्माण के पश्चात् की प्रावस्था होती है।
2. इ समें स्पर मे टो गो निया (Spermatogonia) से प्राथमिक शुक्र कोशिकाएँ (Primary Spermatocytes) बनती हैं।इसमें स्पर मेट्ट्स् (Spermatids) से परिपक्व अगुणित शुक्राणुओं (Sperms) का निर्माण होता है।
3. यह शुक्रजनन कोशिकाओं की वृद्धि में भाग लेता है।इस क्रिया में कोशिकाओं का स्थानान्तरण होता है।
4. इ समें अनेक प्रक्रिया सम्मिलित होती हैं।यह शुक्राणु निर्माण की अन्तिम प्रावस्था है।

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प्रश्न 35.
दिये गये चित्र का अध्ययन कीजिए और पूछे जा रहे प्रश्नों का उत्तर दीजिए-
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन 8

(अ) चित्र में प्रदर्शित मानव भ्रूण की अवस्था का नाम लिखिए ।
(ब) चित्र ‘a’ नामांकित भाग का नाम लिखिए एवं उसका कार्य लिखिए ।
(स) गर्भाशय के भीतर अन्तर्रोपित होने के बाद भीतरी कोशिका संहति का क्या होता है? लिखिए।
(द) इस भ्रूणम में स्टेम (मूल) कोशिकाएँ कहाँ हैं?
उत्तर:
(अ) ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst)
(ब) ट्रोफोब्लास्ट ( Trophoblast), कार्य-ट्रोफोब्लास्ट भ्रूण को सुरक्षा एवं पोषण उपलब्ध करवाती है।
(स) यह वास्तविक भ्रूण बनाती है।
(द) स्टेम (मूल) कोशिकाएँ भीतरी कोशिका संहति में है।

प्रश्न 36.
दिये गये चित्र के आधार पर प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन 9

  • शुक्राणुजनन की क्रिया किस कोशिका में होती है? नाम लिखिए।
  • ‘a’ तथा ‘b’ कोशिकाओं के नाम लिखिए। गुणसूत्रों की संख्या के आधार पर दोनों में क्या अन्तर होता है?
  • समसूत्री कोशिका को चिन्हित कर नाम लिखिए ।
  • ‘f’ कोशिका क्या है? इसका कार्य लिखिए।
  • उपरोक्त चित्र किस संरचना का भाग है? नाम लिखिए।

उत्तर:

  • ‘d’ शुक्राणु पूर्वी (Spermatid)
  • ‘a’ स्पर्मेटोगोनिया (Spermatogonia) ‘b’ प्राथमिक स्पर्मेटोसाइट (Primary Spermatocyte), दोनों कोशिकाएँ द्विगुणित (Diploid) होती है। प्रत्येक में गुणसूत्र 46 होते हैं ।
  • समसूत्री विभाजन-‘e’
  • ‘T’ कोशिका – सर्टोली कोशिका (Sertoli Cell) कार्य – विकासशील शुक्राणुओं को पोषण एवं आलम्बन प्रदान करती है।
  • शुक्रजनन नलिका (Seminiferous tubule)

प्रश्न 37.
मानव गर्भाशय की पेशीय तथा ग्रन्थीय परतों के नाम लिखिए। रजोचक्र के दौरान इनमें से किस परत में चक्रीय परिवर्तन होता है? इस परत के बने रहने के लिए अनिवार्य हार्मोन का नाम लिखिए।
उत्तर:
मानव गर्भाशय की पेशीय तथा ग्रन्थीय परतें निम्न हैं-

  1. एपिमेट्रियम (Epimatrium) – यह बाह्य तथा विसरल पेरीटोनियम से बनी होती है।
  2. मायोमेट्रियम (Myomatrium) – यह मध्य चिकनी कोशिकाओं से बनी होती है।
  3. एण्डोमेट्रियम (Endomatrium) – यह सबसे अन्दर की परत है जो ग्रन्थिल होती है।

रजोचक्र के दौरान एण्डोमेट्रियम परत में चक्रीय परिवर्तन होते हैं। इस परत के बने रहने के लिए अनिवार्य हार्मोन निम्न हैं- FSH, LH, तथा एस्ट्रोजन ।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

प्रश्न 38.
लेडिग कोशिकाएँ कहां पाई जाती हैं? प्रजनन में इनकी क्या भूमिका है?
उत्तर:
वृषण में शुक्रजनन नलिकाओं (Seminiferous tubules) के बाहर संयोजी ऊतक में धँसी हुई अनेक कोशिकाओं के समूह पाये जिन्हें लेडिंग कोशिकाएँ कहते हैं। इन्हें अन्तराली कोशिकाएँ (Interstial Cells) भी कहते हैं । इनके द्वारा नरलिंगी हार्मोन (male sex hormone) पुंजन ( एन्ड्रोजन) स्रावित किया जाता है ।

प्रश्न 39.
रजोदर्शन ( Menarch) तथा रजोनिवृत्ति (Menopause) में क्या अन्तर है?
उत्तर:
रजोदर्शन तथा रजोनिवृत्ति में अन्तर

रजोदर्शन (Menarch)रजोनिवृत्ति (Menopause)
किसी बालिका के जीव काल में प्रथम बार रजोधर्म य ॠतुस्राव (Menstrual होने को रजोदर्श (Menarch) कहते हैं।स्त्री में स्थायी रूप से ऋतु स्राव चक्रों के रुकने को रजोनिवृत्ति (Menopause) कहते हैं।
यह 12-13 वर्ष की आयु मे प्रारम्भ होता है।स्त्रियों में ॠतुसाव चक्र सामान्यतः 45-50 वर्ष की आयु में रुक जाता है।

प्रश्न 40.
मानव शिशु में यदि वृषणों का वृषण कोषों में स्थानान्तरण नहीं हुआ तो युवावस्था में जनन की कौनसी क्रिया प्रभावित होगी? कारण बताइये ।
उत्तर:
युवा अवस्था में शुक्राणुजनन (Spermatogenesis) की क्रिया प्रभावित होगी। शुक्राणुजनन के लिए तापमान शरीर के तापक्रम से 2- 2.5 डिग्री सेंटीग्रेड कम होना चाहिए। यदि वृषण कोष में स्थानान्तरित नहीं होते हैं तो अधिक तापमान के कारण शुक्राणुओं ( Sperms) का निर्माण नहीं होगा।

प्रश्न 41.
25 प्राथमिक शुक्र कोशिकाओं तथा 25 प्राथमिक अण्ड कोशिकाओं से बनने वाले शुक्राणुओं तथा अण्डाणुओं का अनुपात कितना होगा? कारण सहित समझाइए ।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन 10

प्रश्न 42.
सजीव प्रजक प्राणियों की संतानों का उत्तर जीवन अधिक जोखिमपूर्ण नहीं होता है। दो कारण बताते हुए इस कथन की पुष्टि कीजिए।
अथवा
सजीव प्रजक जीवों में संतानों की उत्तर जीविता की अधिक सम्भावनाएँ हैं। कारण सहित समझाइए ।
उत्तर:
सजीव प्रजक जीवों में (अधिकतर स्तनधारी जिनमें मानव शामिल हैं) मादा जीव के शरीर के भीतर युग्मनज विकसित होकर शिशु का विकास करता है और एक निश्चित अवधि एवं विकास के चरणों को पूरा करने के बाद मादा जीव के शरीर से प्रसव द्वारा पैदा किये जाते हैं। भ्रूणीय सही देखभाल तथा संरक्षण के कारण सजीव प्रजक जीवों के उत्तरजीवित रहने के सुअवसर बढ़ जाते हैं।

प्रश्न 43.
मानव मादा जनन तंत्र को समझाइए ।
उत्तर:
स्त्रियों में एक जोड़ी अण्डाशय (Ovary) प्राथमिक जननांगों (Primary Sex Organs) के रूप में होते हैं। इसके अतिरिक्त अण्डवाहिनी (Oviduct), गर्भाशय (Uterus), योनि (Vagina), भग (Vulva), जनन ग्रन्थियाँ (Reproductive glands) तथा स्तन या छाती (Breast) सहायक जननांगों का कार्य करते हैं।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन 11

(1) अण्डाशय (Ovary)-स्त्रियों में अण्डाशय की संख्या दो होती है, जिनकी आकृति बादाम के समान होती है। प्रत्येक अण्डाशय की लम्बाई लगभग 2 से 4 से. मी. होती है। दोनों अण्डाशय उदरगुहा में वृक्कों के काफी नीचे श्रोणि भाग (Pelvic region) में पीछे की ओर गर्भाशय (Uterus) के इधर-डधर स्थित होते हैं।

प्रत्येक अण्डाशय उदरगुहीय पेरीटोनियम के वलन से बनी मीसोविरियम (Mesovarium) नामक झिल्लीनुमा मीसेन्ट्री (Mesentery) द्वारा श्रोणि भाग की दीवार से टिका होता है। ऐसे ही एक झिल्ली अण्डाशयी लिगामेन्ट (Ovarian Ligament) प्रत्येक अण्डाशय को दूसरी ओर से गर्भाशय से जोड़ती है।

अण्डाशय की संरचना-प्रत्येक अण्डाशय भी वृषण के समान तीन स्तरों से घिरा होता है। बाहरी स्तर को ट्यूनिका एलब्यूजिनिया (Tunica Albuginea) कहते हैं। यह संयोजी ऊतक का महीन स्तर होता है। आन्तरिक स्तर को ट्यूनिका प्रोपरिया (Tunica Propria) कहते हैं तथा इनके बीच वाले स्तर को जनन उपकला (Germinal Epithelium) कहते हैं।

जनन उपकला घनाकार कोशिकाओं का बना होता है। अण्डाशय के बीच वाला भाग जो तन्तुमय होता है तथा संवहनीय संयोजी ऊतक (Vascular Connective Tissue) का बना होता है उसे स्ट्रोमा कहते हैं। स्ट्रोमा दो भागों में विभक्त होता है जिन्हें क्रमशः परिधीय वल्कुट (Peripheral Cortex) एवं आंतरिक मध्यांश (Internal Medulla) कहते हैं।

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अण्डाशय के वल्कुट (Cortex) भाग में अनेक अण्ड पुटिकाएँ (Ovarian Follicles) पायी जाती हैं। जिनका निर्माण जनन उपकला से होता है। पुटिकाएँ बहुकोशिकीय झिल्ली मेम्ब्रेना ग्रेन्यूलोसा (Membrana Granulosa) से घिरी होती हैं। जिसके भीतर फॉलीक्यूलर गुहा (Follicular Cavity) होती है जो फॉलीक्यूलर द्रव (Follicular Fluid) से भरी होती है।

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इस गुहा में अण्ड कोशिका (Ovum) होती है जो चारों ओर अनेक फॉलीकुलर कोशिकाओं से घिरी रहती है। इन कोशिकाओं को जोना पेल्यूसिडा (Zonapellucida) एवं चारों ओर के मोटे स्तर को कोरोना रेडिएटा (Corona Radiata) कहते हैं। इस संरचना को अब परिपक्व ग्राफियन पुटिका (Mature Graatian Follicle) कहते हैं। परिपक्व ग्राफियन पुटिका अण्डाशय की सतह पर पहुँच कर फट जाती है तथा अण्ड बाहर निकलकर उदरीय गुहा में आ जाता है। इस क्रिया को डिम्बोत्सर्ग (Ovulation) कहते हैं।

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(2) अण्डवाहिनी (Oviduct)-स्त्री में दो अण्डवाहिनियाँ होती हैं जो अण्डाणु को अण्डाशय से गर्भाशय तक पहुँचाती हैं। प्रत्येक अण्डवाहिनी की लम्बाई 10-12 से.मी. होती है। अण्डवाहिनी का स्वतन्त्र सिरा जो अण्डाशय के निकट होता है, कीप रूपी (Funnellike) एवं चौड़ा होता है तथा इसे आस्टियम (Ostium) कहते हैं।

आस्टियम या मुखिका का किनारा झालरदार (Fimbriated) एवं रोमाभि (Ciliated) होता है। अतः मुखिका को फिम्ब्रिएटेड कीप (Fimbriated Funnel) भी कहते हैं। अण्डोत्सर्ग के बाद अण्ड अण्डाशय से निकलकर उदरगुहा में आकर इसी फिम्ब्रिएटेड कीप के द्वारा फैलोपियन नलिका (Fallopian Tube) में चला जाता है। फैलोपियन नलिका की भित्ति पेशीयुक्त होती है तथा भीतर से अत्यन्त वलित (Folded) होती है। निषेचन की क्रिया फैलोपियन नलिका में ही होती है। प्रत्येक फैलोपियन नलिका अपनी ओर के गर्भाशय (Uterus) में अपने पश्च अन्त द्वारा खुलती है।

(3) गर्भाशय (Uterus)-इसे बच्चादानी (वुम्ब) भी कहते हैं। इसकी आकृति उल्टी नाशपाती के समान होती है। यह श्रोणि भित्ति से स्नायुओं द्वारा जुड़ा होता है। यह लगभग 7.5 से.मी. लम्बा, 3 से.मी, मोटा तथा अधिकतम 5 से.मी, चौड़ा खोखला तथा शंक्वाकार अंग होता है। इसका संकरा भाग नीचे की ओर तथा चौड़ा भाग ऊपर की ओर होता है।

इसके पीछे की ओर मलाशय (Rectum) तथा आगे की ओर मूत्राशय (Urinary Bladder) होता है। गर्भाशय की भित्ति, फतकों की तीन परतों से बनी होती हैबाहरी पताली झिल्लीमय स्तर को परिगभांशय (पेरिमेट्रियम), मध्य मोटी चिकनी पेशीख स्तर को गभाँशय पेशी स्तर (मायोमैट्रियम) और आन्तरिक ग्रान्थल स्तर को गर्भाशय अन्तःस्तर (एंड्रोमैट्रियम) कहते हैं जो गभाशएय गुहा को आस्तरित करती है। आतंव चक्र (Menstrual Cycle) के चक्र के दौरान गर्भाशब के अन्तःस्तर में चक्रीय परिवर्तन होते हैं, जबकि गभांशय पेशी स्तर में प्रसव के समय काफी तेज संकुचन होंता है।

गर्भाशाब को तीन भागों में विभेदित किया गया है-

  • फण्डस (Fundus)-ऊपर की और उभरा हुआ भाग फण्डस कहलाता है।
  • काय (Body)-बीच का प्रमुख भाग ग्रीवा (Cervix) कहलाता है।
  • ग्रीवा (Cervix)-सबसे निचला भाग ग्रीवा (Cervix) कहलाता है जो योनि से जुड़ा होता है।

भूण का विकास गर्भाशय (Uterus) में होता है। शूण अपरा (Placenta) की सहायता से गर्भाशय की भित्ति से संलग्न होता है। यहाँ भ्रूण को सुरक्षा एवं पोषण प्राप्त होता है।

(4) योनि (Vagina)-गर्भाशय ग्रीवा (Cervix Uteri) आगे बढ़कर एकपेशीय लचीली नलिका रूपी रचना का निर्माण करती है जिसे योनि (Vagina) कहते है। योनि स्त्रियों में मैथुन अंग (Copulatory organ) की तरह कार्य करती है। इसके अतिरिक्त योनि गर्भाशाय से उत्पन्न मास्तिक स्राव को निक्कासन हेतु पथ उपलख्ब करवाती है एवं शिशु जन्म के समय गर्भस्थ शिशु के बाहर निकालने के लिए जन्मनाल (Birth Canal) की तरह कार्य करती है।

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(5) बाद्य जननांग (External Genitila)-स्त्रियों के बाह्ष जननांग निम्न हैं-

(i) जघन शौल (Mons Pubis)-यह प्यूबिस लिम्फाइसिस के ऊपर स्थित होता है जो गद्दीनुमा होता है क्योंकि इसकी त्वचा के नीचे वसीय परत होती है। तरुण अवस्था में इस पर घने रोम उग आते हैं जो अन्त तक रहते हैं।

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(ii) वृहद् भगोष्ठ (Labia Majora)-ये जघन शैल (प्यूबिस मुंड) से नीचे की तरफ व पीछे की ओर से विस्तृत एक जोड़ी बड़े अनुद्रै्घ्य वलन होते हैं। इनकी बाह्य सतह पर रोम पाये जाते हैं।

(iii) लघु भगोष्ठ (Labia Minora)-ये आन्तरिक व छोटे वलन होते हैं। इन पर रोम नहीं पाये जाते हैं। लेबिया माइनोरा प्रघाण (Vestibule) को घेरे रहते हैं।

(iv) भगशेफ या क्लाइटोरिस (Clitoris)-यह जघन शैल (Mons Pubis) लेबिया माइनोरा के अग्र कोने पर स्थित एक संवेदी तथा घुण्डीनुमा अथवा अंगुलीनुमा रचना है। यह नर के शिश्न के समजात अंग है। यह अत्यधिक संवेदनशील होता है क्योंक इसमें स्पर्शकणिकाओं की अधिकता पायी जाती है।

(v) योनिच्छद (Hymen)-योनि द्वार पर पतली झिल्ली पाई जाती है जिसे योनिच्छद (Hymen) कहते हैं। यह लैंगिक सम्पर्क, शारीरिक परिश्रम एवं व्यायाम के कारण फट जाती है। बार्थोलिन की ग्रन्थियाँ (Bartholian Glands)-योनिद्वार के दोनों ओर एक-एक सेम की आकृति की ग्रन्थि लेबिया मेजोरा पर स्थित होती है। ये ग्रन्थियाँ एक क्षारीय व स्रेहक द्रव का स्राव करती हैं जो कि भग (Vulva) को नम रखता है एवं लैंगिक परस्पर व्यवहार को सुगम बनाता है।

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(6) स्तनग्रन्थि (Mammary Glands)-स्त्री में स्तन ग्रन्थियों (Mammary Glands) से युक्त एक जोड़ी स्तन उपस्थित होते हैं। ये वक्ष के सामने की तरफ अंसीय पेशियों (Pectoral Muscles) के ऊपर स्थित होते हैं। प्रत्येक स्तन ग्रन्थि में भीतर का संयोजी ऊतक $15-20$ नलिकाकार कोष्ठकीय पालियों का बना होता है। इनके बीच-बीच में वसीय ऊतक होता है। प्रत्येक पाली में अंगूर के गुच्छों के समान दुग्ध ग्रन्थियाँ होती हैं जो दुग्ध का स्राव करती हैं। यह दूध नवजात शिशु के पोषण का कार्य करता है।

प्रत्येक पालिका से निकली कई छोटी वाहिनियां एक दुग्ध नलिका या लैक्टीफेरस नलिका (Lactiferous Duct) बनाती हैं। ऐसी कई दुग्ध नलिकाएँ स्वतन्त्र रूप से आकर चूचुक (Nipples) में खुल जाती हैं। चूचुक स्तनग्रन्थियों के शीर्ष भाग पर उभरी हुई वर्णांकित (Pigmented) रचना है। इसके आसपास का क्षेत्र भी गहरा वर्णांकित हो जाता है। इस क्षेत्र को स्तन परिवेश (Areola Mammae) कहते हैं। स्त्रियों में चूचुक के चारों तरफ का क्षेत्र वसा के जमाव तथा पेशियों के कारण काफी उभरा हुआ होता, है। चूचुक में 0.5 मिमी. के 15-25 छिद्र पाये जाते हैं। पुरुषों में चूचुक अवशेषी होते हैं।

प्रश्न 44.
शुक्राणु जनन एवं अण्ड जनन में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न के निबन्धात्मक प्रश्न क्रमांक 8 का अवलोकन करें।

शुक्रजनन (Spermatogenesis)अण्डजनन (Oogenesis)
1. यह क्रिया वृषणों (Testes) में सम्पन्न होती है।यह क्रिया अण्डाशय (Ovaries) में सम्पन्न होती है।
2. शुक्रजनन की क्रिया प्राणी में जीवन पर्यन्त जारी रहती है।यह क्रिया एक निश्चित आयु के पश्चात् बन्द हो जाती है।
3. इस क्रिया में सभी शुक्रजनक कोशिकाएँ शुक्राणुओं का निर्माण करती हैं।के वल एक अण्ड जनक कोशिका अण्डाणु का निर्माण करती है। अन्य अनेक अण्डजनक कोशिकाएँ वृद्धि प्रावस्था में नष्ट हो जाती हैं।
4. दोनों परिपक्वन विभाजन वृषण में ही होते हैं।दोनों परिपक्वन विभाजन या कम से कम द्वितीय परिपक्वन विभाजन अण्डाशय से बाहर होते हैं।
5. वृद्धि प्रावस्था छोटे अन्तराल की एवं कम वृद्धि होती है।वृद्धि प्रावस्था लम्बे समय तक जारी रहती है एवं अधिक वृद्धि होती है।
6. इस क्रिया में एक शुक्रजनन कोशिका से चार पूर्व शुक्राणु कोशिकाओं का निर्माण होता है ।इस क्रिया में एक ऊगोनिया से एक अण्डाणु एवं तीन ध्रुवकाय निर्मित होती हैं।
7. इस क्रिया में प्रथम एवं द्वितीय परिपक्वन विभाजन समान होते हैं एवं परिणामस्वरूप चार समान शुक्राणु (Sperm) निर्मित होते हैं। ये चारों ही स्वतन्त्र जनन इकाई होते हैं।दोनों परिपक्वन विभाजन असमान होते हैं तथा इसके फलस्वरूप एक बड़ी अण्डाणु कोशिका तथा तीन ध्रुवकाय का निर्माण होता है। इसमें केवल अण्डाणु (Ovum) ही स्वतन्त्र जनन इकाई है।
8. शुक्राणु निर्माण में कायान्तरण की क्रिया होती है।इसमें कायान्तरण नहीं होता।
9. शुक्राणु पीतक रहित एवं गतिशील होते हैं।अण्डाणु पीतकयुक्त एवं गतिहीन होते हैं।

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प्रश्न 45.
वृषण के अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइए ।
उत्तर:
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प्रश्न 46.
यदि पीतपिंड निष्क्रिय हो जाये तो भ्रूण परिवर्धन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? कारण सहित समझाइए ।
उत्तर:
पीतपिंड भारी मात्रा में प्रोजेस्ट्रॉन स्रावित करता है, जो कि गर्भाशय अंतःस्तर को बनाए रखने के लिये आवश्यक है। इस प्रकार गर्भाशय अंतःस्तर निषेचित अण्डाणु के अंतर्रोपण (inplantation) तथा सगर्भता की अन्य घटनाओं के लिये आवश्यक है। यदि पीतपिंड निष्क्रिय हो जाये तो यह अंत: स्तर का विखंडन कर देता है, जिससे फिर से रजोधर्म का नया चक्र शुरू हो जाता है यानी माहवारी पुनः होती है।

प्रश्न 47.
एक स्त्री जिसे आगे गर्भावस्था नहीं चाहिए, वह किस स्थाई विधि को अपनाएगी और क्यों?.
उत्तर:
शल्यक्रिया का उपयोग किया जाता है। महिलाओं के लिये डिंबनलिका उच्छेदन ( Tubectomy) का प्रयोग करते हैं। इसमें स्त्री के उदर में छोटा-सा चीरा लगाकर अथवा योनि द्वारा डिंबवाहिनी नली का छोटा-सा भाग निकाल या बांध दिया जाता है। यह शल्यक्रिया प्रभावशाली है और इसका कोई दुष्परिणाम भी नहीं है।

प्रश्न 48.
मानव के यौवनारम्भ के पश्चात् होने वाली लैंगिक जनन की चार जनन घटनाओं के नाम दीजिए ।
उत्तर:
निम्न चार जनन घटनाएँ होती हैं-

  • युग्मकजनन
  • युग्मक स्थानान्तरण
  • निषेचन
  • भ्रूणोद्भव ।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
मानव शुक्राणु (Sperms) की संरचना का वर्णन कीजिए ।
अथवा
शुक्राणु की संरचना का सचित्र वर्णन करिये तथा शुक्राणुजनन को परिभाषित कीजिये ।
उत्तर:
शुक्राणुओं की आकृति भिन्न-भिन्न जाति में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। जैसे अस्थिल मछलियों में गोलाकार, मनुष्य में चमचाकार (Spoon-shaped), चूहों में हुक के आकार के व पक्षियों में सर्पिलाकार होते हैं।

शुक्राणु के चार भाग पाये जाते हैं-

  1. शीर्ष (Head)
  2. ग्रीवा (Neck)
  3. मध्य भाग (Middle piece)
  4. पूँछ (Tail)

(1) शीर्ष (Head) – मनुष्य में शीर्ष तिकोना एवं चपटा होता है। इसकी आकृति केन्द्रक की आकृति पर निर्भर होती है। शीर्ष भाग अंग्र दो संरचनाओं से मिलकर बना होता है-

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(i) केन्द्रक (Nucleus) – शुक्राणु के शीर्ष का अधिकांश भाग केन्द्रक द्वारा घिरा होता है। केन्द्रक में प्रमुख रूप से ठोस क्रोमेटिन पदार्थ पाये जाते हैं। DNA अत्यधिक संघनित अवस्था में होता है।

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(ii) अग्रपिंडक / एक्रोसोम (Acrosome ) – केन्द्रक के अग्र भाग में टोपी के समान रचना पाई जाती है जिसे एक्रोसोम कहते हैं। टोपी के समान एक्रोसोम पाया जाता है। यह स्पर्मलाइसिन्स नामक पाचक एन्जाइम का स्रावण करता है । स्तनधारियों में इसके द्वारा हाएलोयूरोनाइडेज एन्जाइम एवं प्रोएक्रोसिन, एसिड फॉस्फेटेस, बाइन्डीन का स्रावण किया जाता है। प्रोएक्रोसिन, एक्रोसोम क्रिया द्वारा एक्रोसिन में बदल जाता है । ये दोनों एन्जाइम अण्डभेदन में सहायक होते हैं।

(2) ग्रीवा (Neck ) – शीर्ष एवं मध्य भाग के बीच जहाँ तारक केन्द्र उपस्थित रहते हैं, ग्रीवा क्षेत्र कहलाता है। इस भाग में तारककाय पायी जाती है। समीपस्थ तारककाय केन्द्रक के पश्च भाग में एक गर्त में स्थित होता है, जो निषेचन के बाद खण्डीभवन को प्रेरित करता है । इसके पास ही दूरस्थ तारककाय पाया जाता है।

(3) मध्यभाग (Middle Piece ) – यह भाग शुक्राणु का ऊर्जा कक्ष या इंजन कहलाता है । मध्य भाग दूरस्थ तारककाय से मुद्रिका तारककाय तक होता है जिसमें अक्षीय तन्तुओं के चारों ओर माइटोकॉन्ड्रिया के आपस में आंशिक समेकन के फलस्वरूप बनी सर्पिल कुण्डली के रूप में व्यवस्थित रहते हैं ।

स्तनधारियों में माइटोकॉन्ड्रिया के आपस में आंशिक समेकन के फलस्वरूप बनी सर्पिल कुण्डली को बेनकर्म आच्छद (Nebenkerm Sheath) कहते हैं । मध्य भाग द्वारा ही शुक्राणु की गति के लिये आवश्यक ऊर्जा प्रदान की जाती है। शीर्ष के पश्च भाग एवं सम्पूर्ण मध्य भाग को चारों ओर कोशिकाद्रव्य की महीन पर्त घेरे रहती है जिसे मेनचैट (Manchette) कहते हैं। मध्य भाग के अंत में एक मुद्रिका सेन्ट्रियोल पायी जाती है।

(4) पूँछ (Tail) – यह पश्च भाग होता है । यह जीवद्रव्य की झिल्ली से बनी नलिका की तरह होता है। इसके बीचोंबीच में एक अक्षीय सूत्र (Axial Filament) होता है। अक्षीय सूत्र आगे सेट्रिओल से जुड़ा रहता है तथा पीछे की तरफ झिल्ली से स्वतन्त्र रहता है जिसे अन्तिम  खण्ड (End Piece) कहते हैं । पूँछ की तरंग गति द्वारा शुक्राणु तरल मध्यम में तैरते रहते हैं । शुक्राणुजनन (Spermatogenesis) – वृषण की जनन उपकला कोशिकाओं के समसूत्रीय व अर्धसूत्रीय विभाजन द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण शुक्रजनन कहलाता है ।

प्रश्न 2.
आर्तव चक्र किसे कहते हैं? इसकी विभिन्न घटनाओं को आरेख की सहायता से समझाइए ।
अथवा
आर्तव चक्र की और अवस्थाओं को चित्र बनाकर वर्णन कीजिए ।
अथवा
आर्तव चक्र की विभिन्न अवस्थाओं की व्याख्या कीजिए । आर्तव चक्र की विभिन्न अवस्थाओं का चित्रीय निरूपण कीजिए ।
उत्तर:
प्राइमेट्स मादाओं में पाये जाने वाले जनन चक्र को आर्तव चक्र या रजचक्र (Menstruation) कहते हैं। स्त्रियों में रजचक्र 28 दिन का होता है। प्रथम रजचक्र तरुणावस्था (Puberty) में प्रारम्भ होता है । इसे रजोदर्शन ( Menarche ) कहते हैं । इस चक्र के दौरान स्त्रियों की योनि मार्ग से महीने में एक बार रक्त का स्राव होता है। चालीस से पचास वर्ष की उम्र में यह चक्र लगभग समाप्त हो जाता है । इस अवस्था को रजोनिवृत्ति (Menopause) कहते हैं । गर्भवती महिलाओं में रज चक्र अनुपस्थित होता है । आर्तव चक्र (Menstrual Cycle) में निम्न चार अवस्थायें पायी जाती हैं-

(1) आर्तव प्रावस्था / रजस्राव प्रावस्था (Menstrual Phase)- यह चक्र स्त्रियों में रजस्राव शुरू होने के पहले दिन से प्रारम्भ होता है। इसकी अवधि स्त्रियों में 3-5 दिन की होती है। इस प्रावस्था में गर्भाशय की एण्डोमीट्रियम (Endometrium) का अस्थायी स्तर जिसे स्ट्रेटम फंक्सनेलिस (Stratum Functionalis) कहते हैं ।

रक्तस्राव का प्रारम्भ ऐस्ट्रोजन ( Estrogen) एवं प्रोजेस्ट्रोन (Progesterone) हार्मोन की मात्रा में अचानक कमी हो जाने के कारण होता है। इस प्रावस्था में एन्डोमीट्रियम की रक्त कोशिकायें एवं ग्रन्थियां फट जाती हैं एवं रक्तस्राव प्रारम्भ हो जाता है। रक्त गर्भाशयी ऊतकों से बाहर योनि मार्ग द्वारा निकलता रहता है।

(2) पश्च आर्तव / पुटिकीय प्रावस्था (Follicular Phase) – यह अवस्था आर्तव एवं अण्डोत्सर्ग के बीच की अवस्था होने के कारण इस अवस्था को पूर्व अण्डोत्सर्ग (Pre-ovulatory Phase) कहते हैं स्त्री में इसकी अवधि 8-10 दिन की होती है। इस प्रावस्था में निम्न कार्य सम्पन्न होते हैं-

  • गर्भाशय की एन्डोमीट्रियम पुनः निर्मित होती है एवं टूटी रुधिर वाहिनी एवं ऊतकों की मरम्मत होती है।
  • गर्भाशयी एवं फैलोपियन नलिका की क्षतिग्रस्त म्यूकस झिल्ली की मरम्मत होती है।
  • गर्भाशय की दीवार में पेशियों की मोटाई तथा रक्त नलिकाओं व ग्रन्थियों की संख्या बढ़ जाती है।

इस प्रावस्था में एस्ट्रोजन हार्मोन स्राव अधिक होता है।

(3) अण्डोत्सर्ग प्रावस्था (Ovulatory Phase ) – इस प्रावस्था में अण्डोत्सर्ग होता है जो स्त्री में 14वें दिन होता है अर्थात् अण्डाशय में स्थित ग्राफियन पुटिका फट जाती है एवं परिपक्व अण्डा मुक्त हो जाता है । अण्डाणु मुक्त होने को ही अण्डोत्सर्ग कहते हैं। यह क्रिया LH (Luteinizing Hormone) द्वारा नियन्त्रित होती है। इस प्रावस्था में स्त्रियों के शरीर का तापमान बढ़ जाता है ।

(4) पश्च अण्डोत्सर्ग या ल्यूटियल प्रावस्था (Luteal Phase)- इसको पूर्व रज – स्राव प्रावस्था भी कहते हैं । यह प्रावस्था 15- 28 वें दिन तक चलती है । अण्डोत्सर्ग के पश्चात् फटी हुई ग्राफियन कोशिकाओं में वृद्धि होती है एवं कार्पस ल्यूटियम ( Corpus Luteum) का निर्माण करती है । यह कार्पस ल्यूटियम एक अन्तःस्रावी ग्रन्थि का कार्य करती है एवं इससे एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन का अत्यधिक मात्रा में स्रावण किया जाता है। ये हार्मोन निषेचित अण्डाणु को गर्भाशय की भित्ति जुड़ने अर्थात् रोपण हेतु तैयार करते हैं।

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यदि निषेचन नहीं होता है, यह कॉर्पस ल्यूटियम जिसे पीत ग्रन्थि (Yellow gland) भी कहते हैं, धीरे-धीरे विघटित होकर एक श्वेत पदार्थ के रूप में परिवर्तित हो जाती है, जिसे कार्पस एल्बीकेन्स (Corpus Albicans) कहते हैं । एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्ट्रोन का स्राव कम हो जाता है एवं पुनः निर्मित एवं मोटी एन्डोमीट्रियम नष्ट होना प्रारम्भ हो जाती है एवं रजचक्र अथवा आर्तव चक्र प्रारम्भ हो जाता है।

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प्रश्न 3.
मनुष्य में नर जनन तन्त्र का वर्णन कीजिए ।
उत्तर:
पुरुषों में एक जोड़ी वृषण (Testis) प्राथमिक जननांग के रूप में होते हैं। इसके अतिरिक्त सहायक जननांग (Accessory Reproduction organs) मुख्यतया वृषणकोष (Scrotal Sac), अधिवृषण (Epididymis), शुक्रवाहिनियां (Vas-deferences), शिश्न (Penis) तथा प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate Gland) एवं कॉउपर ग्रन्थि (Cowper’s Gland) पाये जाते हैं।

वृषण (Testis)-वृषण प्राथमिक जननांग होते हैं जिनका निर्माण भ्रूणीय मीसोडर्म (Mesoderm) से होता है। ये मीसोर्कियम (Mesorchium) की सहायता से उदरगुहा की पृष्ठभित्ति से जुड़े रहते हैं। वृषण संख्या में दो होते हैं। इनका रंग गुलाबी तथा आकृति में अण्डाकार होते हैं जिसकी लम्बाई 4 से 5 से.मी., चौड़ाई लगभग 2 से 3 से.मी. एवं वजन में 12 ग्राम होता है।

दोनों वृषण उदरगुहा के बाहर एक थैले में स्थित होते हैं जिसे वृषणकोष (Scrotal Sac) कहते हैं। वृषणकोष एक ताप नियंत्रक की भांति कार्य करता है। वृषणों का तापमान शरीर के तापमान से 2-2.5° C नीचे बनाये रखता है। यह तापमान शुक्राणुओं के विकास के लिए उपयुक्त होता है। वृषणकोषों की दीवार पतली, लचीली एवं रोमयुक्त होती है।

इसके अन्दर पेशी तन्तुओं का मोटा अवत्वक (Subcutaneous) स्तर होता है जिसे डारटोस पेशी (Dartos muscle) कहते हैं। रेखित पेशी तन्तुओं का एक दण्डनुमा गुच्छा वृषणकोष के प्रत्येक अर्धभाग के अवत्वक पेशी स्तर को उदरीय अवत्वक पेशी स्तर से जोड़ता है, जिसे वृषणोत्कर्ष पेशी (cremaster muscles) कहते हैं।

प्रत्येक वृषण कोष की गुहा उदरगुहा से एक सँकरी नलिका द्वारा जुड़ी होती है जिसे वक्षणनाल (Inguinal Canal) कहते हैं। वक्षणनाल के द्वारा होकर वृषण धमनी, वृषणशिरा तथा वृषण तन्त्रिका एक वृषण रज्जु (Spermatic Cord) के रूप में वृषण तक जाती है।

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वृषण पर दो आवरण पाये जाते हैं जिन्हें वृषण खोल (Testicular capsule) कहते हैं। इसमें बाहरी महीन आवरण को मौनिक स्तर (Tunica Vaginalis) कहते हैं। यह उदरगुहा के उदरावण से बनता है जबकि भीतरी स्तर को श्वेत कुंचक अथवा ट्यूनिका ऐल्ब्यूजिनिया (Tunica Albuginea) कहते हैं। वृषण की गुहा भी इसी ऊतक की पट्टियों द्वारा लगभग 250 पालियों या वेश्मों में बंटी रहती है।

प्रत्येक पाली में अनेक कुण्डलित रूप में एक-दूसरे से सटी हुई कई पतली नलिकाएँ पायी जाती हैं, जिन्हें शुक्रजनन नलिका (Seminiferous Tubules) कहते हैं। इन नलिकाओं के बीच संयोजी ऊतक पाया जाता है जिसमें विशेष प्रकार की अन्तराली कोशिकाएँ या लैडिग कोशिकाएँ (Leydig cells) पायी जाती हैं।

इन कोशिकाओं द्वारा नर हार्मोन टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) का विकास होता है। प्रत्येक शुक्रजनक नलिका (Seminiferous Tubules) के चारों ओर झिल्लीनुमा आवरण पाया जाता है जिसे ट्यूनिका प्रोप्रिया (Tunica Propria) कहते हैं। इस झिल्ली के नीचे जनन उपकला (Germinal Epithelium) का स्तर पाया जाता है। शुक्रजनक नलिका (Seminiferous Tubules) को वृषण की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई कहा जाता है। जनन उपकला स्तर में दो प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं-
(i) स्परमेटोगोनिया कोशिकाएँ (Spermatogonia cells)इनके द्वारा शुक्रजनन (Spermatogenesis) द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण होता है।

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(ii) सरटोली कोशिकाएँ (Sertoli cells)-सरटोली कोशिकाओं को अवलम्बन या पोषी या नर्स या मातृ या सबटेन्टाकुलर कोशिकाएँ (Supporting or Nutritive or Nurse or Mother or Subtentacular cells) भी कहते हैं। ये कोशिकाएँ आकार में बड़ी, संख्या में कम एवं स्तम्भी प्रकार की होती हैं। इनका स्वतन्त्र भाग कटाफटा होता है। इस भाग में शुक्राणुपूर्व कोशिकाएँ (Spermatids) सर्टोली कोशिकाओं से सटकर संलग्न रहती हैं।

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सरटोली कोशिकाओं के कार्य (Functions of Sertoli Cells)-

  • शुक्राणुओं को आलम्बन प्रदान करती हैं।
  • ये कोशिकाएँ शुक्राणुओं को संरक्षण एवं पोषण प्रदान करती हैं।
  • शुक्रकायान्तरण (Spermiogenesis) के दौरान अवशिष्ट कोशिकाद्रव्य (Residual Cytoplasm) का भक्षण करना।
  • सरटोली कोशिका द्वारा एन्टीमुलेरियान हार्मोन का स्रावण किया जाता है। यह भूरणीय अवस्था में मादा जननवाहिनी के विकास का संदमन करता है।
  • सरटोली कोशिकाओं के द्वारा इनहिबिन (Inhibin) हार्मोन का स्रावण किया जाता है जो FSH का संदमन करता है।
  • इन कोशिकाओं के द्वारा ABP (एण्ड्रोजन बाइडिंग प्रोटीन) का स्रावण किया जाता है।

शुक्रजनन नलिका (Seminiferous Tubules) से पतलीपतली नलिकाएँ निकलती हैं, वृषण के अन्दर ये नलिकाएँ आपस में मिलकर एक जाल बनाती हैं, इसे वृषण जालक (Rete Testis) कहते हैं। इससे लगभग 15-20 संवलित नलिकाएँ (Convoluted ductules) निकलती हैं जिन्हें वास इफरेंशिया (Vas Efferentia) कहते हैं। ये नलिकाएँ वृषण की अग्र या ऊपरी सतह पर पहुँचकर लम्बी रचना में खुलती हैं जिसे अधिवृषण (Epididymis) कहते हैं।

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अधिवृषण (Epididymis)-यह एक लम्बी तथा अत्यधिक कुंडलित नलिका है जिसकी लम्बाई 6 मीटर होती है। प्रत्येक वृषण के भीतरी किनारों पर अत्यधिक कुण्डलित नलिका द्वारा निर्मित एक रचना पाई जाती है जिसे अधिवृषण कहते हैं। अधिवृषण को तीन भागों में बाँटा गया है-

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  • कैपुट एपिडिडाइमिस (Caput Epididymis)-यह वृषण के ऊपर केप (Cap) के समान होती है। इमें वृषण से आने वाली वास इफरेन्शिया (Vas Efferentia) खुलती है। कैपुट एपिडिडाइमिस को ग्लोबस मेजर (Globus Major) भी कहते हैं।
  • कॉर्पस एपिडिडाइमिस (Corpus Epididymis)-यह मध्य भाग है व संकरा होता है। इसे एपिडिडाइमिस काय (Epididymis body) भी कहते हैं।
  • कॉडा एपिडिडाइमिस (Cauda Epididymis)-यह एपिडिडाइमिस का पश्च व सबसे छोटा भाग है। इसे ग्लोबस माइनर (Globus Minor) भी कहते हैं। कॉडा एपिडिडाइमिस से इसकी नली पीछे निकलकर शुक्रवाहिनी (Vas deference) बनाती है। अधिवृषण

(Epididymis) के कार्य-

  • शुक्राणुओं को अधिवृषण में संग्रहित किया जाता है व यहाँ इनका परिपक्वन होता है।
  • यह वृषणों से शुक्रवाहिनी में शुक्राणुओं के पहुँचने के लिए मार्ग प्रदान करते हैं।
  • अधिवृषण (Epididymis) में शुक्राणु एक माह तक संचित रह सकते हैं। स्खलन न होने की स्थिति में शुक्राणुओं का विघटन न होने पर इनके तरल का अवशोषण इसी में होता है।
  • इसकी नलिका में क्रमाकुंचन के कारण शुक्राणु वास डिफरने्स (Vas deference) की ओर बहते हैं।

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शुक्रवाहिनी (Vas deference)-शुक्रवाहिनी लगभग 45 सेमी. लम्बी नलिका होती है। इसकी दीवार पेशीय होती है। शुक्रवाहिनी अधिवृषण के पश्च भाग से प्रारम्भ होकर ऊपर की ओर वक्षणनाल से होकर गुहा में मूत्राशय के पश्च तल पर नीचे की ओर मुड़कर चलती हुई अन्त में एक फूला हुआ भाग तुम्बिका (Ampulla) बनाती है। यहाँ इसमें शुक्राशय (Seminal Vesicle) की छोटी वाहिनी आकर खुलती है। दोनों के मिलने से स्खलनीय वाहिनी (Ejaculatory Duct) का निर्माण होता है।

शुक्रवाहिनी की भित्ति पेशीय होती है व इसमें संकुचन व शिथिलन की क्षमता पायी जाती है। संकुचन व शिथिलन द्वारा शुक्राणु शुक्राशय तक पहुँचा दिये जाते हैं। शुक्रवाहिनियों में ग्रन्थिल कोशिकाएँ पाई जाती हैं जो चिकने पदार्थ का सावण करती हैं। यह द्रव शुक्राणुओं को गति करने में सहायता करता है। तुम्बिका (Ampulla) में शुक्राणुओं को अस्थायी रूप से संग्रह किया जाता है।

स्खलनीय वाहिनियां अन्त में मूत्र मार्ग (Urethra) में आकर खुलती हैं। मूत्रमार्ग (Urethra)-मूत्राशय से मूत्रवाहिनी निकलकर स्खलनीय वाहिनी से मिलकर मूत्रजनन नलिका या मूत्रमार्ग (Urinogenital Duct or Urethra) बनाती है। यह लगभग 20 से.मी. लम्बी नाल होती है जो शिश्न के शिखर भाग पर मूत्रजनन छिद्र (Urinogenital Aperture) द्वारा बाहर खुलती है। मूत्रमार्ग एवं वीर्य दोनों के लिए एक उभयनिष्ठ मार्ग (Common Passage) का कार्य करता है।

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मूत्रमार्ग (Urethra) तीन भागों में बँटा होता है-

  1. प्रोस्टेटिक मूत्रमार्ग (Prostatic Urethra)
  2. झिल्लीमय मूत्रमार्ग (Membranous Urethra)
  3. स्पंजी मूत्रमार्ग (Spongy Urethra)

1. प्रोस्टेटिक मूत्रमार्ग (Prostatic Urethra)-यह मूत्रमार्ग का 2-3 से.मी. लम्बा भाग होता है। यह प्रोस्टेट ग्रन्थि के मध्य से गुजरता तथा दोनों ओर की स्खलन वाहिनियाँ इसी भाग में खुलती हैं।

2.  झिल्लीमय मूत्रमार्ग (Membranous Urethra)-यह मध्य का लगभग 1 से.मी. लम्बा भाग होता है जो प्रोस्टेट ग्रन्थि तथा शिश्न (Penis) के बीच स्थित पेशीय तन्तुपट (Muscular Diaphragm) को बेधता हुआ शिश्न में प्रवेश करता है।

3.  स्पंजी मूत्रमार्ग (Spongy Urethra)-यह मूत्रमार्ग का अन्तिम या शिखर भाग है जो शिश्न में से गुजरता है। यह स्पंजी तथा सर्वाधिक लम्बाई (16-17 से.मी.) वाला भाग है।

शिश्न (Penis)-पुरुष का मैथुनी अंग है जो एक लम्बा, संकरा, बेलनाकार तथा वहिःसारी (Protrusible) होता है। इसका स्वतन्त्र सिरा फूला हुआ तथा अत्यधिक संवेदी होता है तथा शिश्नमुण्ड (Galns Penis) कहलाता है। यह भाग एक त्वचा के आवरण से ढका रहता है। यह आवरण शिश्न = मुण्डछद (Prepuce) कहलाता है। शिश्न दोनों वृषणकोषों के ऊपर व मध्य में उदर के निचले भाग में लटका रहता है।
यह तीन भागों में विभेदित होता है-

  • शिश्नमूल (Root of Penis)-यह मूत्रोजनन तनुपट (Urinogenital diaphargm) से लगा शिश्न का समीपस्थ भाग होता है।

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  • शिश्नकाय (Body of Penis)-यह शिश्न का मुख्य लम्बा भाग है।
  • शिश्नमुण्ड (Glans Penis)-यह शिश्न का शिखर भाग होता है ।

शिश्न की संरचना पेशियों एवं रुधिर कोटरों (Blood Sinus) से होती है। ये तीन मोटे अनुदैर्घ्य डोरियों के समान रज्ञुओं (Cords) के रूप में होते हैं। पृष्ठ भाग में ऐसी संरचनाएँ दो होती हैं जिन्हें कॉरपोरा केवरनोसा (Corpora Cavernosa) तथा अधर भाग में एक कॉर्पस स्पंजिओसम (Corpus Spongiosum) कहलाती है। सामान्य अवस्थाओं में शिश्न शिथिल एवं छोटा होता है।

मैथुन उत्तेजना के समय इसके कोटर रुधिर से भर जाते हैं तथा यह लम्बा, मोटा तथा कड़ा हो जाता है। इस अवस्था में शिश्नमुण्ड नग्न हो जाता है तथा यह स्त्री की योनि में आसानी से प्रविष्ट कराया जा सकता है। मैथुन क्रिया में सुगमतापूर्वक शुक्राणुओं को वीर्य के साथ स्थानान्तरित किया जा सकता है।

सहायक ग्रन्थियाँ (Accessory Glands)-पुरुषों में मुख्यतः तीन प्रकार की सहायक जनन ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं जो जनन में सहायता करती हैं-

(1) प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate Gland)-इस ग्रन्थि की आकृति सिंघाड़ेनुमा होती है। यह मूत्रमार्ग के आधार भाग पर स्थित होती है एवं कई पिण्डों में विभक्त होती है। प्रत्येक पिण्ड एक छोटी नलिका द्वारा मूत्रमार्ग में खुलता है। इस ग्रन्थि का स्राव विशेष गंध युक्त, सफेद एवं हल्का क्षारीय होता है जो वीर्य का 25-30 प्रतिशत भाग बनाता है।

इस स्राव में फॉस्फेट्स सिट्रेट, लाइसोजाइम, फाइब्रिनोलाइसिन, स्पर्मिन (Spermin) आदि पाये जाते हैं। वृद्ध पुरुषों में यह ग्रन्थि बड़ी हो जाती है व मूत्रोजनन मार्ग में अवरोध उत्पन्न कर देती है। इसे शल्य क्रिया द्वारा हटा दिया जाता है। कार्य-इस ग्रन्थि का साव (प्रोस्टेटिक द्रव) शुक्राणुओं को सक्रिय बनाता है एवं वीर्य के स्कंदन को रोकता है।

(2) काडपर गन्थि (Cowper’s Gland)-इ से बल्बोयूरेश्रिल ग्रन्थियाँ (Bulbourethral Glands) भी कहते हैं। ये ग्रन्थियाँ एक जोड़ी प्रोस्टेट ग्रन्थि के पीछे स्थित होती हैं। इनका स्राव चिकना, पारदर्शी व क्षारीय होता है जो मूत्रोजनन मार्ग की अम्लीयता को नष्ट करता है। यह तरल मादा की योनि को चिकना कर मैथुन क्रिया को सुगम बनाता है।

(3) शुक्राशय (Seminal Vesicle)-शुक्राशय एक थैलीनुमा रचना होती है जो एक जोड़ी के रूप में मूत्राशय की पश्च सतह एवं मलाशय के बीच में स्थित होती है। इसके द्वारा एक पीले रंग का चिपचिपे पदार्थ का स्रावण किया जाता है। यही तरल पदार्थ वीर्य का अधिकांश भाग (लगभग 60 प्रतिशत) बनाता है।

इसमें फ्रक्टोस, शर्क रा, प्रोस्टाग्लैं डिन्स (Prostaglandins) तथा प्रोटीन सेमीनोजेलिन (Semenogelin) होते हैं। फ्रक्टोस शुक्राणुओं को ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करता है। क्षारीय प्रकृति के कारण यह स्राव योनि मार्ग की अम्लीयता को समाप्त कर शुक्राणुओं की सुरक्षा करता है। प्रत्येक शुक्राशय से एक छोटी नलिका निकल कर शुक्रवाहिनी की तुम्बिका में खुलती है। शिश्न की उत्तेजित अवस्था में स्खलन के समय दोनों शुक्राशय संकुचित होकर अपने स्राव को मुक्त करते हैं।

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प्रश्न 4.
स्त्रियों में मादा जनन तन्त्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्त्रियों में एक जोड़ी अण्डाशय (Ovary) प्राथमिक जननांगों (Primary Sex Organs) के रूप में होते हैं। इसके अतिरिक्त अण्डवाहिनी (Oviduct), गर्भाशय (Uterus), योनि (Vagina), भग (Vulva), जनन ग्रन्थियाँ (Reproductive glands) तथा स्तन या छाती (Breast) सहायक जननांगों का कार्य करते हैं।

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(1) अण्डाशय (Ovary)-स्त्रियों में अण्डाशय की संख्या दो होती है, जिनकी आकृति बादाम के समान होती है। प्रत्येक अण्डाशय की लम्बाई लगभग 2 से 4 से. मी. होती है। दोनों अण्डाशय उदरगुहा में वृक्कों के काफी नीचे श्रोणि भाग (Pelvic region) में पीछे की ओर गर्भाशय (Uterus) के इधर-डधर स्थित होते हैं। प्रत्येक अण्डाशय उदरगुहीय पेरीटोनियम के वलन से बनी मीसोविरियम (Mesovarium) नामक झिल्लीनुमा मीसेन्ट्री (Mesentery) द्वारा श्रोणि भाग की दीवार से टिका होता है।

ऐसे ही एक झिल्ली अण्डाशयी लिगामेन्ट (Ovarian Ligament) प्रत्येक अण्डाशय को दूसरी ओर से गर्भाशय से जोड़ती है। अण्डाशय की संरचना-प्रत्येक अण्डाशय भी वृषण के समान तीन स्तरों से घिरा होता है। बाहरी स्तर को ट्यूनिका एलब्यूजिनिया (Tunica Albuginea) कहते हैं। यह संयोजी ऊतक का महीन स्तर होता है।

आन्तरिक स्तर को ट्यूनिका प्रोपरिया (Tunica Propria) कहते हैं तथा इनके बीच वाले स्तर को जनन उपकला (Germinal Epithelium) कहते हैं। जनन उपकला घनाकार कोशिकाओं का बना होता है। अण्डाशय के बीच वाला भाग जो तन्तुमय होता है तथा संवहनीय संयोजी ऊतक (Vascular Connective Tissue) का बना होता है उसे स्ट्रोमा कहते हैं। स्ट्रोमा दो भागों में विभक्त होता है जिन्हें क्रमशः परिधीय वल्कुट (Peripheral Cortex) एवं आंतरिक मध्यांश (Internal Medulla) कहते हैं।

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अण्डाशय के वल्कुट (Cortex) भाग में अनेक अण्ड पुटिकाएँ (Ovarian Follicles) पायी जाती हैं। जिनका निर्माण जनन उपकला से होता है। पुटिकाएँ बहुकोशिकीय झिल्ली मेम्ब्रेना ग्रेन्यूलोसा (Membrana Granulosa) से घिरी होती हैं। जिसके भीतर फॉलीक्यूलर गुहा (Follicular Cavity) होती है जो फॉलीक्यूलर द्रव (Follicular Fluid) से भरी होती है।

इस गुहा में अण्ड कोशिका (Ovum) होती है जो चारों ओर अनेक फॉलीकुलर कोशिकाओं से घिरी रहती है। इन कोशिकाओं को जोना पेल्यूसिडा (Zonapellucida) एवं चारों ओर के मोटे स्तर को कोरोना रेडिएटा (Corona Radiata) कहते हैं। इस संरचना को अब परिपक्व ग्राफियन पुटिका (Mature Graatian Follicle) कहते हैं। परिपक्व ग्राफियन पुटिका अण्डाशय की सतह पर पहुँच कर फट जाती है तथा अण्ड बाहर निकलकर उदरीय गुहा में आ जाता है। इस क्रिया को डिम्बोत्सर्ग (Ovulation) कहते हैं।

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(2) अण्डवाहिनी (Oviduct)-स्त्री में दो अण्डवाहिनियाँ होती हैं जो अण्डाणु को अण्डाशय से गर्भाशय तक पहुँचाती हैं। प्रत्येक अण्डवाहिनी की लम्बाई 10-12 से.मी. होती है। अण्डवाहिनी का स्वतन्त्र सिरा जो अण्डाशय के निकट होता है, कीप रूपी (Funnellike) एवं चौड़ा होता है तथा इसे आस्टियम (Ostium) कहते हैं। आस्टियम या मुखिका का किनारा झालरदार (Fimbriated) एवं रोमाभि (Ciliated) होता है। अतः मुखिका को फिम्ब्रिएटेड कीप (Fimbriated Funnel) भी कहते हैं।

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अण्डोत्सर्ग के बाद अण्ड अण्डाशय से निकलकर उदरगुहा में आकर इसी फिम्ब्रिएटेड कीप के द्वारा फैलोपियन नलिका (Fallopian Tube) में चला जाता है। फैलोपियन नलिका की भित्ति पेशीयुक्त होती है तथा भीतर से अत्यन्त वलित (Folded) होती है। निषेचन की क्रिया फैलोपियन नलिका में ही होती है। प्रत्येक फैलोपियन नलिका अपनी ओर के गर्भाशय (Uterus) में अपने पश्च अन्त द्वारा खुलती है।

(3) गर्भाशय (Uterus)-इसे बच्चादानी (वुम्ब) भी कहते हैं। इसकी आकृति उल्टी नाशपाती के समान होती है। यह श्रोणि भित्ति से स्नायुओं द्वारा जुड़ा होता है। यह लगभग 7.5 से.मी. लम्बा, 3 से.मी, मोटा तथा अधिकतम 5 से.मी, चौड़ा खोखला तथा शंक्वाकार अंग होता है। इसका संकरा भाग नीचे की ओर तथा चौड़ा भाग ऊपर की ओर होता है।

इसके पीछे की ओर मलाशय (Rectum) तथा आगे की ओर मूत्राशय (Urinary Bladder) होता है। गर्भाशय की भित्ति, फतकों की तीन परतों से बनी होती हैबाहरी पताली झिल्लीमय स्तर को परिगभांशय (पेरिमेट्रियम), मध्य मोटी चिकनी पेशीख स्तर को गभाँशय पेशी स्तर (मायोमैट्रियम) और आन्तरिक ग्रान्थल स्तर को गर्भाशय अन्तःस्तर (एंड्रोमैट्रियम) कहते हैं जो गभाशएय गुहा को आस्तरित करती है। आतंव चक्र (Menstrual Cycle) के चक्र के दौरान गर्भाशब के अन्तःस्तर में चक्रीय परिवर्तन होते हैं, जबकि गभांशय पेशी स्तर में प्रसव के समय काफी तेज संकुचन होंता है।

गर्भाशाब को तीन भागों में विभेदित किया गया है-

  • फण्डस (Fundus)-ऊपर की और उभरा हुआ भाग फण्डस कहलाता है।
  • काय (Body)-बीच का प्रमुख भाग ग्रीवा (Cervix) कहलाता है।
  • ग्रीवा (Cervix)-सबसे निचला भाग ग्रीवा (Cervix) कहलाता है जो योनि से जुड़ा होता है।

भूण का विकास गर्भाशय (Uterus) में होता है। शूण अपरा (Placenta) की सहायता से गर्भाशय की भित्ति से संलग्न होता है। यहाँ भ्रूण को सुरक्षा एवं पोषण प्राप्त होता है।

(4) योनि (Vagina)-गर्भाशय ग्रीवा (Cervix Uteri) आगे बढ़कर एकपेशीय लचीली नलिका रूपी रचना का निर्माण करती है जिसे योनि (Vagina) कहते है। योनि स्त्रियों में मैथुन अंग (Copulatory organ) की तरह कार्य करती है। इसके अतिरिक्त योनि गर्भाशाय से उत्पन्न मास्तिक स्राव को निक्कासन हेतु पथ उपलख्ब करवाती है एवं शिशु जन्म के समय गर्भस्थ शिशु के बाहर निकालने के लिए जन्मनाल (Birth Canal) की तरह कार्य करती है।

(5) बाद्य जननांग (External Genitila)-स्त्रियों के बाह्ष जननांग निम्न हैं-
(i) जघन शौल (Mons Pubis)-यह प्यूबिस लिम्फाइसिस के ऊपर स्थित होता है जो गद्दीनुमा होता है क्योंकि इसकी त्वचा के नीचे वसीय परत होती है। तरुण अवस्था में इस पर घने रोम उग आते हैं जो अन्त तक रहते हैं।
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(ii) वृहद् भगोष्ठ (Labia Majora)-ये जघन शैल (प्यूबिस मुंड) से नीचे की तरफ व पीछे की ओर से विस्तृत एक जोड़ी बड़े अनुद्रै्घ्य वलन होते हैं। इनकी बाह्य सतह पर रोम पाये जाते हैं।

(iii) लघु भगोष्ठ (Labia Minora)-ये आन्तरिक व छोटे वलन होते हैं। इन पर रोम नहीं पाये जाते हैं। लेबिया माइनोरा प्रघाण (Vestibule) को घेरे रहते हैं।

(iv) भगशेफ या क्लाइटोरिस (Clitoris)-यह जघन शैल (Mons Pubis) लेबिया माइनोरा के अग्र कोने पर स्थित एक संवेदी तथा घुण्डीनुमा अथवा अंगुलीनुमा रचना है। यह नर के शिश्न के समजात अंग है। यह अत्यधिक संवेदनशील होता है क्योंक इसमें स्पर्शकणिकाओं की अधिकता पायी जाती है।

(v) योनिच्छद (Hymen)-योनि द्वार पर पतली झिल्ली पाई जाती है जिसे योनिच्छद (Hymen) कहते हैं। यह लैंगिक सम्पर्क, शारीरिक परिश्रम एवं व्यायाम के कारण फट जाती है।

बार्थोलिन की ग्रन्थियाँ (Bartholian Glands)-योनिद्वार के दोनों ओर एक-एक सेम की आकृति की ग्रन्थि लेबिया मेजोरा पर स्थित होती है। ये ग्रन्थियाँ एक क्षारीय व स्रेहक द्रव का स्राव करती हैं जो कि भग (Vulva) को नम रखता है एवं लैंगिक परस्पर व्यवहार को सुगम बनाता है।
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(6) स्तनग्रन्थि (Mammary Glands)-स्त्री में स्तन ग्रन्थियों (Mammary Glands) से युक्त एक जोड़ी स्तन उपस्थित होते हैं। ये वक्ष के सामने की तरफ अंसीय पेशियों (Pectoral Muscles) के ऊपर स्थित होते हैं। प्रत्येक स्तन ग्रन्थि में भीतर का संयोजी ऊतक $15-20$ नलिकाकार कोष्ठकीय पालियों का बना होता है। इनके बीच-बीच में वसीय ऊतक होता है। प्रत्येक पाली में अंगूर के गुच्छों के समान दुग्ध ग्रन्थियाँ होती हैं जो दुग्ध का स्राव करती हैं। यह दूध नवजात शिशु के पोषण का कार्य करता है।

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प्रत्येक पालिका से निकली कई छोटी वाहिनियां एक दुग्ध नलिका या लैक्टीफेरस नलिका (Lactiferous Duct) बनाती हैं। ऐसी कई दुग्ध नलिकाएँ स्वतन्त्र रूप से आकर चूचुक (Nipples) में खुल जाती हैं। चूचुक स्तनग्रन्थियों के शीर्ष भाग पर उभरी हुई वर्णांकित (Pigmented) रचना है। इसके आसपास का क्षेत्र भी गहरा वर्णांकित हो जाता है। इस क्षेत्र को स्तन परिवेश (Areola Mammae) कहते हैं। स्त्रियों में चूचुक के चारों तरफ का क्षेत्र वसा के जमाव तथा पेशियों के कारण काफी उभरा हुआ होता, है। चूचुक में 0.5 मिमी. के 15-25 छिद्र पाये जाते हैं। पुरुषों में चूचुक अवशेषी होते हैं।

प्रश्न 5.
प्रसव किसे कहते हैं? प्रसव एवं दुग्ध स्रवण क्रिया को समझाइए ।
उत्तर:
गर्भावस्था (Gestation) के पश्चात् माता के गर्भाशय (Uterus) से पूर्ण विकसित शिशु के बाहर आने की प्रक्रिया को प्रसव कहते है।
शिशु जन्म (Parturition) का नियन्त्रण हार्मोन द्वारा होता है, अतः यह क्रिया एक अन्तःस्रावी-नियमित क्रिया (Endocrine Regulatory Process) होती है। शिशु जन्म में दो हार्मोन प्रमुख हैं। पीयूष के पश्च भाग का आक्सीटोसिन (Oxytocin) तथा अण्डाशय द्वारा स्रावित रिलेक्सिन (Relaxin) हार्मोन।

जैसे गर्भावस्था का अन्त होने लगता है तथा जब फीटस (Foetus) पूर्ण विकसित हो जाता है, प्लेसेन्टा (Placenta) द्वारा स्रावित हार्मोन मुख्यतः प्रोजेस्टरोन की मात्रा कम होने लगती है तथा जन्म के समय न्यूनतम हो जाती है, जिसके फलस्वरूप प्लेसेन्टा का गर्भाशय से सम्बन्ध कमजोर हो जाता है। अतः शिशु जन्म के समय आक्सीटोसिन गर्भाशय को उत्तेजित करता है तथा इसमें क्रमिक संकुचन होने लगता है, इसे प्रसव पीड़ा (Labour Pain) कहते हैं।

इसके साथ ही रिलेक्सिन हार्मोन भी मुक्त होता है जिसके फलस्वरूप जघनास्थिसंधि (Pubic Symphysis) एवं जघन पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। इन क्रियाओं के फलस्वरूप पूर्ण रचित शिशु योनि में से होते हुए भग से बाहर आ जाता है। इस क्रिया को प्रसव कहते हैं। गर्भाशय में शिशु, नाभिनाल (Umbilical) द्वारा माता के गर्भाशय से जुड़ा रहता है जिसे काटकर हटा दिया जाता है।

यदि माता में प्राकृतिक रूप से प्रसव पीड़ा प्रारम्भ न हो तो चिकित्सक उन्हें आक्सीटोसिन (Oxytocin) हार्मोन का इन्जेक्शन लगाते हैं जिससे प्रसव पीड़ा प्रारम्भ हो जाती है और प्रसव आसानी से हो जाता है।

दुग्धस्रवण (Lactation)-सगर्भता की अवस्था में प्रोजेस्ट्रॉन व एस्ट्रोजन हार्मोन्स के प्रभाव से स्तन ग्रन्थियों की वृद्धि से स्त्री के वक्ष बड़े आकार के हो जाते हैं। प्रौलेक्टिन के प्रभाव से शिशु जन्म के 24 घन्टे के अन्दर दुग्ध ग्रन्थियों से दुग्धस्रवण (Lactation) हो जाता है। प्रारम्भ में वक्ष की निप्पलों से कोलस्ट्रम (Colstrum) का स्राव होता है। यह पीले रंग का होता है जिसमें ग्लोबुलिन प्रोटीन (Globulin Protein) काफी में मात्रा में होता है। इसमें माता की एन्टीबॉडीज होती है जो नवजात शिशु की संक्रमण से रक्षा करती है।

प्रश्न 6.
युग्मकजनन को परिभाषित कीजिए । शुक्राणुजनन व अण्डजनन को विस्तार से समझाइए ।
उत्तर:
जनद (Gonods) द्वारा युग्मकों के निर्माण को युग्मकजनन कहते हैं। युग्मकजनन के दौरान समसूत्रीय व अर्धसूत्रीय दोनों प्रकार के विभाजन पाये जाते हैं। इस प्रकार अगुणित (Haploid) युग्मकों का निर्माण होता है। युग्मक दो प्रकार के होते हैं जिन्हें क्रमशः शुक्राणु व अण्डाणु कहते हैं।

शुक्रजनन की क्रियाविधि
वृषण की जनन उपकला कोशिकाओं के समसूत्रीय व अर्धसूत्रीय विभाजन द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण शुक्रजनन (Spermatogenesis) कहलाता है। शुक्रजनन एक सतत (Continuous) क्रिया है। शुक्रजनन में अग्र दो चरण पाये जाते हैं-
(A) शुक्र णुपूर्वी का निर्माण या स्पर्में टोसाइटोसिस (Formation of Spermatid or Spermatocytosis)
(B) शुक्राणुपूर्वी का शुक्राणु में कायान्तरण अथवा स्पर्मिओजे नेसिस (Metarmorphosis of Spermatids in to Spermatozoa or Spermiogenesis)

(A) शुकाणुपूर्वी का निमर्णा (Formation of Spermatids)-यह क्रिया तरुणावस्था (Puberty) में आरम्भ होती है। शुक्रजनन प्राथमिक जनन कोशिका अथवा आदि जनन कोशिका से आरम्भ होता है। इस क्रिया में निम्न तीन चरण पाये जाते हैं-

(a) गुणन प्रावस्था (Multiplication phase)
(b) वृद्धि प्रावस्था (Growth phase)
(c) परिपक्वन प्रावस्था (Maturation phase)
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(a) गुणन प्रावस्था (Multiplication phase)-इस दौरान प्राथमिक जनन कोशिका या आदि जनन कोशिका में एक के बाद एक समसूत्री विभाजन पाये जाते हैं, इससे निर्मित कोशिका को स्परमेटोगोनिया (Spermatogonia) कहते हैं। स्परमेटोगोनिया द्विगुणित (Diploid) या (2n) कोशिका है।

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(b) वृद्धि प्रावस्था (Growth phase)-इस दाँरान स्परमेटोगोनिया के आकार में वृद्धि होती है। यह वृद्धि दुगुने (Double) के बराबर होती है। इस वृद्धि द्वारा निर्मित कोशिका को प्राथमिक स्परमेटोसाइट्स (Primary Spermatocytes) कहते हैं। वृद्धि प्रावस्था, अण्डजनन की वृद्धि प्रावस्था से अल्पावधि की होती है। इस अवस्था में किसी भी प्रकार का विभाजन नहीं पाया जाता है। प्राथमिक स्परमेटोसाइट्स द्विगुणित (2n) कोशिका है।

(c) परिपक्व प्रावस्था (Maturation phase)-इस दौरान प्राथमिक स्परमेटेसाइट्स में दो बार विभाजन होता है-

  • प्रथम परिपक्वन विभाजन (First maturation division)-अर्धसूत्रीय-I (Meiosis-I) होता है। इसके परिणामस्वरूप दो द्वितीयक स्परमेटोसाइट्स (Secondary Spermatocytes) का निर्माण होता है।
  • द्वितीय परिपक्वन विभाजन (Second maturation division)-अर्धसूत्रीय-II होता है। यह समसूत्रीय विभाजन के समान होता है। इस प्रकार 4 शुक्राणुपूर्वी (Spermatid) का निर्माण हो जाता है। शुक्राणुपूर्वी अगुणित होते हैं। देखिए चित्र में।

(B) शुक णुपूर्वी का शुक्राणु में कायान्तरण (Spermiogenesis)-गोल, अचल व पूंछविहीन शुक्राणु पूर्वी (Spermatid) का तर्कुकार, चल व पूंछयुक्त शुक्राणु में बदलना शुक्रकायान्तरण (Spermiogenesis) कहलाता है। इस शुक्राणु में निम्न परिवर्तन होते हैं-
(i) शीर्ष का निर्माण (Formation of Head)-शुक्राणुपूर्व कोशिका के केन्द्रक से जल के कम हो जाने से गुणसूत्र एक छोटे व अत्यधिक संहत् पिण्ड का निर्माण कर लेते हैं। RNA तथा केन्द्रिका (Nucleolus) की हानि हो जाने से केन्द्रक में केवल आनुवंशिक पदार्थ (DNA व क्रोमेटिन) रह जाते हैं। गोलाकार केन्द्रक दीर्घित हो जाता है और धीरे-धीरे उत्केन्द्री (Ecentric) स्थिति ग्रहण कर लेता है। कोशिकाद्रव्य निर्माणाधीन पूंछ की ओर चला जाता है। केन्द्रक कोशिकाद्रव्य के एक पतले आवरण से आवरित रह जाता है।

(ii) अग्रपिण्डक या एक्रोसोम का निर्माण (Formation of Acrosome)-शुक्राणुपूर्वी के गॉल्जीकाय से शुक्राणु का अग्रपिण्डक (स्क्रोसोम) बनता है। शुक्राणुपूर्वी के गाल्जीकाय में अनेक छोटी-छोटी रिक्तिकाओं का समूह होता है। इनमें से अग्रपिण्डक के निर्माण हेतु एक रिक्तिका बड़ी होने लगती है और इसमें एक सघन प्रोएक्रोसोमल कणिका (Proacrosomal Granule) बन जाती है ।

अब गॉल्जीकाय को अग्रकोरक (Acroblast) कहते हैं। अन्य रिक्तिकाओं के संयुक्त हो जाने से एक्रोसोमल कणिका भी अब बड़ी होकर एक्रोसोमल कणिका (Acrosomal granule) बन जाती है। एक्रोसोम आशय में उपस्थित तरल पदार्थ धीर-धीरे कम होने लगता है।
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(iii) ग्रीवा का निर्माण (Formation of Neck)-शुक्राणुपूर्व में पहले से ही दो तारक केन्द्र (Centrioles) होते हैं। ये बेलनाकार तथा परस्पर समकोणिक होते हैं, शुक्राणुजनन में ये दोनों तारक केन्द्र के पश्च भाग में चले जाते हैं। केन्द्रक के पश्च तल पर बने एक गड्ढे में एक तारक केन्द्र शुक्राणु के लम्बे अक्ष पर समकोणिक स्थिति में व्यवस्थित हो जाता है।

इसे समीपस्थ तारक केन्द्र (Proximal Centriole) कहते हैं। दूसरे तारक केन्द्र को दूरस्थ तारक केन्द्र (Distal Centriole) कहते हैं। इसका लम्बा अक्ष शुक्राणु के लम्बे अक्ष की संपाती स्थिति में होता है।

(iv) मध्य खण्ड का निर्माण (Formation of Middle Piece)-दूरस्थ तारक केन्द्र से बना एक सूत्र धीरे-धीरे पीछे की ओर लम्बाई में बढ़ने लगता है। शुक्राणुपूर्व के सभी माइटोकॉन्ड्रिया इस सूत्र के समीपस्थ भाग के पास सर्पिल कुण्डली के रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं। यह शुक्राणु का मध्य खण्ड होता है।

(v) पूंछ का निर्माण (Formation of Tail)-दूरस्थ तारक केन्द्र द्वारा बना सूत्र निरन्तर लम्बा होता जाता है तथा इसे ढकता हुआ कोशिकाद्रव्य भी पश्च भाग की ओर प्रवाहित होता रहता है। इसी सूत्र की पूंछ को अक्ष्रीय सूत्र (Axial filament) कहते हैं। यह सूत्र तेज गति से बढ़ता हुआ अन्ततः कोशिकाओं से निकलकर बाहर आ जाता है। यह भाग कोशिकाद्रव्य से अनावरित होता है। अक्ष्षीय सूत्र का कोशिकाद्रव्य से अवरित भाग पूंछ का मुख्य खण्ड होता है तथा अनावरित भाग अन्त्यखण्ड (End piece) कहलाता है।

इस समय तक शेष बचे कोशिकाद्रव्य को गॉल्जीकाय के अनावश्यक अवयवों सहित त्याग दिया जाता है और एक अत्यन्त सक्रिय शुक्राणु (Sperm) का निर्माण हो जाता है। शुक्राणु की संरचना शुक्राणुओं की आकृति भिन्न-भिन्न जाति में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। जैसे अस्थिल मछलियों में गोलाकार, मनुष्य में चमचाकार, चूहों में हुक के आकार के व पक्षियों में सर्पिलाकार होते हैं।

शुक्राणु के चार भाग पाये जाते हैं-

  1. शीर्ष
  2. ग्रीवा
  3. मध्य भाग
  4. पूँछ

1. शीर्ष-मनुष्य में शीर्ष तिकोना एवं चपटा होता है। इसकी आकृति केन्द्रक की आकृति पर निर्भर होती है। शीर्ष भाग निम्न दो संरचनाओं से मिलकर बना होता है-
(i) केन्द्रक-शुक्राणु के शीर्ष का अधिकांश भाग केन्द्रक द्वारा घिरा होता है। केन्द्रक में प्रमुख रूप से ठोस क्रोमेटिन पदार्थ पाये जाते हैं। DNA अत्यधिक संघनित अवस्था में होता है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

(ii) अग्रपिंडक/एक्रोसोम-केन्द्रक के अग्र भाग में टोपी के समान रचना पाई जाती है जिसे एक्रोसोम कहते हैं। टोपी के समान एक्रोसोम पाया जाता है। यह स्पर्मलाइसिन्स नामक पाचक एन्जाइम का स्रावण करता है। स्तनधारियों में इसके द्वारा हाएलोयूरोनाइडेज एन्जाइम एवं प्रोएक्रोसिन, एसिड फॉस्फेटेस, बाइन्डीज का स्रावण किया जाता है। प्रोएक्रोसिन, एक्रोसोम क्रिया द्वारा एक्रोसिन में बदल जाता है। ये दोनों एन्जाइम अण्डभेदन में सहायक होते हैं।
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2. ग्रीवा-शीर्ष एवं मध्य भाग के बीच जहाँ तारक केन्द्र उपस्थित रहते हैं, ग्रीवा क्षेत्र कहलाता है। इस भाग में तारककाय पायी जाती है। समीपस्थ तारककाय केन्द्रक के पश्च भाग में एक गर्त में स्थित होता है, जो निषेचन के बाद खण्डीभवन को प्रेरित करता है। इसके पास ही दूरस्थ तारककाय पाया जाता है।

3. मध्य भाग-यह भाग शुक्राणु का ऊर्जा कक्ष या इंजन कहलाता है। मध्य भाग दूरस्थ तारककाय से मुद्रिका तारककाय तक होता है जिसमें अक्षीय तन्तुओं के चारों ओर माइटोकॉन्ड्रिया के आपस में आंशिक समेकन के फलस्वरूप बनी सर्पिल कुण्डली के रूप में व्यवस्थित रहते हैं।

स्तनधारियों में माइटोकॉन्ड्रिया के आपस में आंशिक समेकन के फलस्वरूप बनी सर्पिल कुण्डली को नेबेनकर्न (Nebenkern) आच्छद कहते हैं। मध्य भाग द्वारा ही शुक्राणु की गति के लिये आवश्यक ऊर्जा प्रदान की जाती है। शीर्ष के पश्च भाग एवं सम्पूर्ण मध्य भाग को चारों ओर कोशिकाद्रव्य की महीन पर्त घेरे रहती है जिसे मेनचैट (Manchette) कहते हैं। मध्य भाग के अंत में एक मुद्रिका सेन्ट्रियोल पायी जाती है।

4. पूंछ-यह शुक्राणु का सबसे लम्बा तन्तुमय भाग है जो गति में सहायक है।
अण्डजनन (Oogenesis)-अण्डाशय की जनन उपकला द्वारा अण्डाणु निर्माण एवं परिपक्वन की क्रिया को अण्डजनन कहते हैं। अण्डजनन में निम्न तीन चरण पाये जाते हैं-
(A) गुणन प्रावस्था (Multiplication phase)
(B) वृद्धि प्रावस्था (Growth phase)
(C) परिपक्वन प्रावस्था (Maturation phase)

(A) गुणन प्रावस्था (Multiplication phase)-प्रारम्भिक अथवा प्राथमिक जनन कोशिकाओं (Primordial or Primary Germ Cells) के बारम्बार समसूत्री विभाजन के फलस्वरूप वर्त्त कोशिकाएँ अण्डजन या ऊगोनिया (Oogonia) कहलाती हैं। ऊगोनिया द्विगुणित (2n) कोशिकाएँ हैं।
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(B) वृद्धि प्रावस्था (Growth phase)-इस दौरान ऊगोनिया में पुन: समसूत्रीय विभाजन होता है। इसके फलस्वरूप स्तनधारियों के अण्डाशय में कोशिकाओं के समूह का निर्माण होता है, जिन्हें अण्डवाही रज्जु (Ovigerous cord) कहते हैं। अण्डवाही रज्जु की एक ऊगोनिया कोशिका वृद्धि करती है व शेष कोशिकाएँ घेर लेती हैं। ऊगोनिया की वृद्धि से प्राथमिक ऊसाइट (Primary Oocyte) का निर्माण होता है। प्राथमिक ऊसाइट को घेरने वाली कोशिकाओं को पुटक कोशिकाएँ (Follicle cells) कहते हैं।

(C) परिपक्वन प्रावस्था (Maturation phase)-प्राथमिक ऊसाइट (Primary Oocyte) में, अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) प्रथम द्वारा द्वितीयक ऊसाइट (Secondary Oocyte) व एक पोलर बॉडी (Polar Body) का निर्माण होता है। प्रारम्भिक पुटिक की पुटिकीय कोशिकाओं में निरन्तर विभाजन होने लगता है जिसके फलस्वरूप विकासशील अण्डकोशिका के चारों ओर एक बहुस्तरीय आवरण बन जाता है जिसे मेम्ब्रेना ग्रेन्यूलोसा (Membrana Granulosa) कहते हैं तथा सम्पूर्ण पुटिका समूह को अब द्वितीयक पुटिका (Secondary Follicle) कहते हैं।

धीरे-धीरे अण्डाणु व मेम्ब्रेना ग्रेन्यूलोसा के बीच रिक्त स्थान का निर्माण होने लगता है जिसे पुटिका गुहा (Follicular Cavity) कहते हैं। इसमें पाये जाने वाले पोषक तरल पदार्थ को पुटिका द्रव्य (Follicular Fluid) कहते हैं। पुटिका कोशिकाओं का स्तर जो अण्डाणु के चारों ओर उपस्थित होता है उसे कोरोना रेडिएटा (Corona Radiata) कहते हैं।

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इसके ठीक नीचे अण्डाणु के चारों तरफ एक ओर पारदर्शी आवरण पाया जाता है जिसे जोना पेल्यूसिडा (Zona Pellucida) कहते हैं। इस अवस्था में पुटिका अपने परिमाण के चरम सीमा पर होती है और इसे अब ग्राफ्रियन पुटिका (Graffian Follicle) कहते हैं। ग्राफियन पुटिका (Graffian Follicle) अण्डाशय के आवरण के निकट पहुँचकर फट जाती है तथा इसमें अण्डाणु (Ovum) बाहर निकलकर देहगुहा में आ जाता है। पुटिका से अण्डाणु के बाहर निकलने की प्रक्रिया को अण्डोत्सर्ग (Ovulation) कहते हैं।

शुकजनन व अण्डजनन में समानताएँ

  1. शुक्र जनन (Spermatogenesis) व अण्ड जनन (Oogenesis) दोनों क्रियाएँ जनन उपकला (Germinal Epithelium) से प्रारम्भ होती है।
  2. दोनों ही क्रियाओं में तीन समान प्रावस्थाएँ होती हैं-
    • गुणन प्रावस्था
    • वृद्धि प्रावस्था
    • परिपक्वन प्रावस्था
  3. गुणन प्रावस्था में दोनों क्रियाओं में समसूत्री विभाजन होता है ।
  4. परिपक्वन प्रावस्था में अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis division) होता है।
  5. दोनों की अन्तिम प्रावस्था में अगुणित युग्मक का निर्माण होता है।

प्रश्न 7.
अंतर्रोपण किसे कहते हैं? अंतर्रोपण क्रिया का चित्र बनाकर वर्णन कीजिए ।
उत्तर:
स्त्री एवं पुरुष के संभोग (मैथुन) के दौरान शुक्र (वीय) स्त्री की योनि में छोड़ा जाना वीर्यसेचन (Insemination) कहलाता है। गर्भाशय में होने वाली तरंग गति के कारण शुक्राणु गति करते हुए गर्भाशय में प्रवेश करते हुए अन्त में अंडवाहिनी नली के संकीर्ण पथ इस्थमस तथा तुंबिका (Ampulla) के संधिस्थल तक पहुँच जाता है। यहीं पर द्वितीय ऊसाइट (Secondary oocyte) होता है।

ऊसाइट द्वारा फर्टीलाइजिन (Fertilizin) एवं शुक्राणुओं द्वारा एन्टीफर्टीलाइजिन (anti-fertilizin) नामक रासायनिक पदार्थों का स्रावण किया जाता है जिसके परिणामस्वरूप ऊसाइट (oocyte) व शुक्राणु एक दूसरे के समीप आ जाते हैं। वे फर्टीलाइजिन व एन्टी-फर्टीलाइजिन दोनों जाति विशिष्ट होते हैं।

अब शुक्राणु के एक्रोसोम (Acrosome) द्वारा हाएलुरोनिडेज (Hyaluronidase) नामक रासायनिक पदार्थ का स्रावण किया जाता है। इस एन्जाइम की उपस्थिति के कारण अण्डाणु के आवरण कोरोना रेडियेटा (Corona Rodiata) तथा जोना पैल्युसिडा (Zona pellucida) को नष्ट कर देता है, जिसके फलस्वरूप शुक्राणु अण्ड में प्रवेश कर जाता है एवं इसकी पूँछ बाहर ही रह जाती है। केवल एक शुक्राणु ही अण्डे में प्रवेश कर पाता है। इसके बाद अण्डे की प्लाज्मा झिल्ली निध्रुवित हो जाती है जिससे अन्य शुक्राणु प्रवेश नहीं कर पाते हैं।
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शुक्राणु को केन्द्रक अण्ड के केन्द्रक से आपस में संलयन करते हैं जिसके परिणामस्वरूप द्विगुणित रचना का निर्माण होता है जिसे युग्मनज (Zygote) कहते हैं। इस क्रिया को निषे चन (Fertilization) कहते हैं। निषेचन की क्रिया फैलोपियन नलिका अथवा अण्डवाहिनी में होती है। इसी समय भ्रूण के लिंग का निर्धारण हो जाता है।

स्त्री में XX लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosome) व पुरुष में XY लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosome) पाये जाते हैं। अर्थात् स्त्री द्वारा सिर्फ X गुणसूत्र के ही अगुणित युग्मक (अण्ड) निर्मित होते हैं। पुरुष द्वारा 50% X गुणसूत्र व 50% Y गुणसूत्र के अगुणित युग्मक शुक्राणु बनते हैं। पुरुष युग्मक (शुक्राणु) व स्त्री युग्मक (अण्ड) के संयोजन के बाद युग्मनज (Zygote) XYया XXप्रकार के होते हैं।

XXयुग्मनज मादा भ्रण (लड़की) व XYवाले युग्मनज नर भूण (लड़का) में परिवर्तित हो जाते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि एक शिशु का लिंग निर्धारण उसके पिता द्वारा होता है न कि माता के द्वारा। निषेचन के पश्चात् युग्मनज (Zygote) में विदलन समसूत्री विभाजन प्रारम्भ हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप 2,4,8,16 संतति कोशिकाओं का निर्माण होता है जिसे कोरकखण्ड (Blastomeres) कहते हैं।

8 से 16 कोरकखण्डों वाले भूण को मोरुला (Morulla) कहते हैं। देखिए आगे चित्र (य)। यह मोरुला लगातार विभाजित होता रहता है और जैसे-जैसे गर्भाशय की ओर बढ़ता है, यह कोरकपुटी (Blastocyst) के रूप में परिवर्तित हो जाता है। देखिए का (र)। एक कोरकपुटी में कोरकखण्ड बाहरी परत में व्यवस्थित होते हैं, जिसे पोषक कोरक (Trophoblast) कहते हैं। कोशिकाओं के भीतरी समूह जो पोषक कोरक से जुड़े होते हैं उन्हें अंतरकोशिका (Inner Cell Mass) कहते हैं।
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अब पोषक कोरक स्तर गभाशय के अन्तः स्तर (Endometrium) से संलग्न हो जाता है और अन्तर कोशिका समूह भ्रूण के रूप में अलग-अलग या विभेदित हो जाता है। संलग्न होने के बाद गर्भाशयी क्डोशिकाएँ तेजी से विभक्त होती हैं औरकोरकपुटी (Blastocyst) को आवृत कर लेती हैं। इसके परिणामस्वरूप कोरकपुटी गर्भाशय अन्तःस्तर में अन्तःस्थापित हो जाती है। देखिए चित्र (ल) इसे ही अन्तर्रोपण (Implantation) कहते हैं और बाद में सगर्भता का रूप धारण कर लेती है।

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प्रश्न 8.
शुक्रजनन ( Sperminatogenesis) एवं अण्डजनन (Oogenesis) में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
शुक्रजनन (Spermatogenesis) एवं अण्डजनन (Oogenesis) में अन्तर

शुक्रजनन (Spermatogenesis)अण्डजनन (Oogenesis)
1. यह क्रिया वृषणों (Testes) में सम्पन्न होती है।यह क्रिया अण्डाशय (Ovaries) में सम्पन्न होती है।
2. शुक्रजनन की क्रिया प्राणी में जीवन पर्यन्त जारी रहती है।यह क्रिया एक निश्चित आयु के पश्चात् बन्द हो जाती है।
3. इस क्रिया में सभी शुक्रजनक कोशिकाएँ शुक्राणुओं का निर्माण करती हैं।के वल एक अण्ड जनक कोशिका अण्डाणु का निर्माण करती है। अन्य अनेक अण्डजनक कोशिकाएँ वृद्धि प्रावस्था में नष्ट हो जाती हैं।
4. दोनों परिपक्वन विभाजन वृषण में ही होते हैं।दोनों परिपक्वन विभाजन या कम से कम द्वितीय परिपक्वन विभाजन अण्डाशय से बाहर होते हैं।
5. वृद्धि प्रावस्था छोटे अन्तराल की एवं कम वृद्धि होती है।वृद्धि प्रावस्था लम्बे समय तक जारी रहती है एवं अधिक वृद्धि होती है।
6. इस क्रिया में एक शुक्रजनन कोशिका से चार पूर्व शुक्राणु कोशिकाओं का निर्माण होता है ।इस क्रिया में एक ऊगोनिया से एक अण्डाणु एवं तीन ध्रुवकाय निर्मित होती हैं।
7. इस क्रिया में प्रथम एवं द्वितीय परिपक्वन विभाजन समान होते हैं एवं परिणामस्वरूप चार समान शुक्राणु (Sperm) निर्मित होते हैं। ये चारों ही स्वतन्त्र जनन इकाई होते हैं।दोनों परिपक्वन विभाजन असमान होते हैं तथा इसके फलस्वरूप एक बड़ी अण्डाणु कोशिका तथा तीन ध्रुवकाय का निर्माण होता है। इसमें केवल अण्डाणु (Ovum) ही स्वतन्त्र जनन इकाई है।
8. शुक्राणु निर्माण में कायान्तरण की क्रिया होती है।इसमें कायान्तरण नहीं होता।
9. शुक्राणु पीतक रहित एवं गतिशील होते हैं।अण्डाणु पीतकयुक्त एवं गतिहीन होते हैं।

प्रश्न 9.
मानव में भ्रूणीय अवस्थाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानव में भ्रूणीय अवस्थाओं का सारांश (Summary of Embryonic Development Stage in Human)
1 दिन – निषेचन (Fertilization), निषेचित अण्डाणु का व्यास लगभग 0.15 मि.मी. होता है।
2 दिन – दो कोशिका अवस्था (Two Cell Stage)।
3 दिन – 16 कोशिका अवस्था (16 Cell Stage), मॉर्ला (Morula)।
4 दिन – कोरकपुटी (Blastocyst) का गर्भाशय अवकाशिका (Uterine Lumen) में प्रवेश, जोना पैल्यूसिडा (Zona pellucida) का विलोपन, कोरपुटी का व्यास लगभग 0.3 मि.मी।
7-8 दिन – कोरकपुटी का गर्भाशय की एण्डोमीट्रियम में आंशिक प्रवेश, रोपण (Implantation)।
12 दिन – कोरकपुटी का एण्डोमीट्रियम में प्रवेश पूर्ण, भ्रूणीय डिस्क (Embryonic Disc) का निर्माण, अतिरिक्त भूर्णीय अन्तश्चर्म (Extra-embryonic Endoderm), अतिरिक्त भ्रूणीय मध्यचर्म (Extra-embryonic Mesoderm), एम्निऑन (Amnion), पीतक कोष (Yolk Sac) का निर्माण।
14 दिन – आदि रेखा (Primitive Streak) का निर्माण।
18 दिन – 3-5 जोड़ी कायखण्डों (Somites) का निर्माण।
19 दिन – तन्त्रिका खाँच (Neural Groove), तन्त्रिका पट्ट (Neural Plate), पृष्ठ रज्जु पट्ट् (Notochordal plate), 6-8 जोड़ी कायखण्डों का निर्माण।
24 दिन – सिर एवं पुच्छ भागों का निर्धारण 21-23 जोड़ी कायखण्ड निर्मित। अधर भाग में हुदय (Heart) का निर्माण जारी।
28 दिन – हुदय का धड़कना प्रारम्भ, तन्त्रिका नाल (Neural Tube) का निर्माण पूर्ण, तीन जोड़ी ग्रसनी चाप (Viscerl Arch) निर्मित, 30-31 दिन जोड़ी कायखण्ड निर्मित रुधिर द्वीप (Blood Islands) दिखने लगते हैं।
32 दिन – 30-39 जोड़ी कायखण्ड निर्मित।
7 सप्ताह – जबड़े, उँगलियाँ, बाह्य कर्ण आदि दृष्टिगोचर होने लगते हैं। भूरण की शिखर कटिप्रोथ लम्बाई (CR length, crown rump lengte) सिर से नितम्ब के तल तक की लम्बाई ) 19-20 मिमी. हो जाती है।

8 सप्ताह – भ्रूण पूर्णरूपेण एम्निऑन द्वारा घेर लिया जाता है। उँगलियाँ एवं पंजे (Toes) स्पष्ट होते हैं। लगभग सभी अंग निर्मित होकर विकसित हो रहे होते हैं। 8 वें सप्ताह के अन्त तक भूरण एक छोटे मनुष्य का आकार ले लेता है। अब इसे गर्भ (Foetus) कहते हैं। CR लम्बाई 28 से 30 मिमी.।

5 महीने – अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में रक्त निर्माण प्रारम्भ। पाती सम्पुट (Decidua Capsularis) पैराइटेलिस (Parietails) जुड़ जाती हैं। बाल आने लगते हैं।

9 महीने – अपरा (Placenta) का आकार अधिकतम हो जाता है। उँगलियाँ पर नाखून (Nails) आ जाते हैं। अगले 10 दिन में गर्भ जन्म लेने को तैयार होता है। मनुष्य में गर्भकाल 280 दिन का होता है।
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उपर्युक्त समयावधि सन्निकट समयावधि (Approximate Time Period) है। कभी-कभी किसी कारणवश कुछ बच्चों का जन्म कुछ माह पहले हो जाता है। सातवें माह में जन्म लेने वाले शिशु भी सामान्य शिशु की भाँति विकसित हो जाते हैं।

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प्रश्न 10.
(a) मानव शुक्रजनक नलिका की काट का नामांकित चित्र बनाइए ।
(b) मानव नर तथा मादा में युग्मक जनन में निम्न आधार पर अन्तर लिखिए-
(i) प्रक्रिया के प्रारम्भ होने का समय ।
(ii) प्रक्रिया के अन्त में बनी संरचनाएँ ।
उत्तर:
(a) [ संकेत- मानव शुक्रजनक नलिका की काट का नामांकित चित्र हेतु देखिए चित्र 3.13]
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(b) (i) प्रक्रिया के प्रारम्भ होने का समय-नर में यौवनारम्भ की आयु में होता है जबकि मादा में विकास की भ्रूणीय अवस्था में होता है।
(ii) प्रक्रिया के अन्त में बनी हुई संरचनाएँ – नर में एक प्राथमिक स्पर्मेटोसाइट में चार स्पर्मेटोजोआ बनते हैं जबकि मादा में एक प्राथमिक असाइट से एक क्रियात्मक अण्ड तथा दो ध्रुवीयकाय (Pol body) बनाती है।

प्रश्न 11.
शुक्राणुजनन क्या है? संक्षेप में शुक्राणुजनन की प्रक्रिया का वर्णन करें।
उत्तर:
युग्मकजनन को परिभाषित कीजिए । शुक्राणुजनन व अण्डजनन को विस्तार से समझाइए ।
जनद (Gonods) द्वारा युग्मकों के निर्माण को युग्मकजनन कहते हैं। युग्मकजनन के दौरान समसूत्रीय व अर्धसूत्रीय दोनों प्रकार के विभाजन पाये जाते हैं। इस प्रकार अगुणित (Haploid) युग्मकों का निर्माण होता है। युग्मक दो प्रकार के होते हैं जिन्हें क्रमशः शुक्राणु व अण्डाणु कहते हैं।

शुक्रजनन की क्रियाविधि
वृषण की जनन उपकला कोशिकाओं के समसूत्रीय व अर्धसूत्रीय विभाजन द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण शुक्रजनन (Spermatogenesis) कहलाता है। शुक्रजनन एक सतत (Continuous) क्रिया है। शुक्रजनन में अग्र दो चरण पाये जाते हैं-
(A) शुक्र णुपूर्वी का निर्माण या स्पर्में टोसाइटोसिस (Formation of Spermatid or Spermatocytosis)
(B) शुक्राणुपूर्वी का शुक्राणु में कायान्तरण अथवा स्पर्मिओजे नेसिस (Metarmorphosis of Spermatids in to Spermatozoa or Spermiogenesis)

(A) शुकाणुपूर्वी का निमर्णा (Formation of Spermatids)-यह क्रिया तरुणावस्था (Puberty) में आरम्भ होती है। शुक्रजनन प्राथमिक जनन कोशिका अथवा आदि जनन कोशिका से आरम्भ होता है। इस क्रिया में निम्न तीन चरण पाये जाते हैं-
(a) गुणन प्रावस्था (Multiplication phase)
(b) वृद्धि प्रावस्था (Growth phase)
(c) परिपक्वन प्रावस्था (Maturation phase)
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(a) गुणन प्रावस्था (Multiplication phase)-इस दौरान प्राथमिक जनन कोशिका या आदि जनन कोशिका में एक के बाद एक समसूत्री विभाजन पाये जाते हैं, इससे निर्मित कोशिका को स्परमेटोगोनिया (Spermatogonia) कहते हैं। स्परमेटोगोनिया द्विगुणित (Diploid) या (2n) कोशिका है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

(b) वृद्धि प्रावस्था (Growth phase)-इस दाँरान स्परमेटोगोनिया के आकार में वृद्धि होती है। यह वृद्धि दुगुने (Double) के बराबर होती है। इस वृद्धि द्वारा निर्मित कोशिका को प्राथमिक स्परमेटोसाइट्स (Primary Spermatocytes) कहते हैं। वृद्धि प्रावस्था, अण्डजनन की वृद्धि प्रावस्था से अल्पावधि की होती है। इस अवस्था में किसी भी प्रकार का विभाजन नहीं पाया जाता है। प्राथमिक स्परमेटोसाइट्स द्विगुणित (2n) कोशिका है।

(c) परिपक्व प्रावस्था (Maturation phase)-इस दौरान प्राथमिक स्परमेटेसाइट्स में दो बार विभाजन होता है-

  • प्रथम परिपक्वन विभाजन (First maturation division)-अर्धसूत्रीय-I (Meiosis-I) होता है। इसके परिणामस्वरूप दो द्वितीयक स्परमेटोसाइट्स (Secondary Spermatocytes) का निर्माण होता है।
  • द्वितीय परिपक्वन विभाजन (Second maturation division)-अर्धसूत्रीय-II होता है। यह समसूत्रीय विभाजन के समान होता है। इस प्रकार 4 शुक्राणुपूर्वी (Spermatid) का निर्माण हो जाता है। शुक्राणुपूर्वी अगुणित होते हैं। देखिए चित्र में।

(B) शुक णुपूर्वी का शुक्राणु में कायान्तरण (Spermiogenesis)-गोल, अचल व पूंछविहीन शुक्राणु पूर्वी
(Spermatid) का तर्कुकार, चल व पूंछयुक्त शुक्राणु में बदलना शुक्रकायान्तरण (Spermiogenesis) कहलाता है। इस शुक्राणु में निम्न परिवर्तन होते हैं-
(i) शीर्ष का निर्माण (Formation of Head)-शुक्राणुपूर्व कोशिका के केन्द्रक से जल के कम हो जाने से गुणसूत्र एक छोटे व अत्यधिक संहत् पिण्ड का निर्माण कर लेते हैं। RNA तथा केन्द्रिका (Nucleolus) की हानि हो जाने से केन्द्रक में केवल आनुवंशिक पदार्थ (DNA व क्रोमेटिन) रह जाते हैं। गोलाकार केन्द्रक दीर्घित हो जाता है और धीरे-धीरे उत्केन्द्री (Ecentric) स्थिति ग्रहण कर लेता है। कोशिकाद्रव्य निर्माणाधीन पूंछ की ओर चला जाता है। केन्द्रक कोशिकाद्रव्य के एक पतले आवरण से आवरित रह जाता है।

(ii) अग्रपिण्डक या एक्रोसोम का निर्माण (Formation of Acrosome)-शुक्राणुपूर्वी के गॉल्जीकाय से शुक्राणु का अग्रपिण्डक (स्क्रोसोम) बनता है। शुक्राणुपूर्वी के गाल्जीकाय में अनेक छोटी-छोटी रिक्तिकाओं का समूह होता है। इनमें से अग्रपिण्डक के निर्माण हेतु एक रिक्तिका बड़ी होने लगती है और इसमें एक सघन प्रोएक्रोसोमल कणिका (Proacrosomal Granule) बन जाती है ।

अब गॉल्जीकाय को अग्रकोरक (Acroblast) कहते हैं। अन्य रिक्तिकाओं के संयुक्त हो जाने से एक्रोसोमल कणिका भी अब बड़ी होकर एक्रोसोमल कणिका (Acrosomal granule) बन जाती है। एक्रोसोम आशय में उपस्थित तरल पदार्थ धीर-धीरे कम होने लगता है।
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(iii) ग्रीवा का निर्माण (Formation of Neck)-शुक्राणुपूर्व में पहले से ही दो तारक केन्द्र (Centrioles) होते हैं। ये बेलनाकार तथा परस्पर समकोणिक होते हैं, शुक्राणुजनन में ये दोनों तारक केन्द्र के पश्च भाग में चले जाते हैं। केन्द्रक के पश्च तल पर बने एक गड्ढे में एक तारक केन्द्र शुक्राणु के लम्बे अक्ष पर समकोणिक स्थिति में व्यवस्थित हो जाता है। इसे समीपस्थ तारक केन्द्र (Proximal Centriole) कहते हैं। दूसरे तारक केन्द्र को दूरस्थ तारक केन्द्र (Distal Centriole) कहते हैं। इसका लम्बा अक्ष शुक्राणु के लम्बे अक्ष की संपाती स्थिति में होता है।

(iv) मध्य खण्ड का निर्माण (Formation of Middle Piece)-दूरस्थ तारक केन्द्र से बना एक सूत्र धीरे-धीरे पीछे की ओर लम्बाई में बढ़ने लगता है। शुक्राणुपूर्व के सभी माइटोकॉन्ड्रिया इस सूत्र के समीपस्थ भाग के पास सर्पिल कुण्डली के रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं। यह शुक्राणु का मध्य खण्ड होता है।

(v) पूंछ का निर्माण (Formation of Tail)-दूरस्थ तारक केन्द्र द्वारा बना सूत्र निरन्तर लम्बा होता जाता है तथा इसे ढकता हुआ कोशिकाद्रव्य भी पश्च भाग की ओर प्रवाहित होता रहता है। इसी सूत्र की पूंछ को अक्ष्रीय सूत्र (Axial filament) कहते हैं। यह सूत्र तेज गति से बढ़ता हुआ अन्ततः कोशिकाओं से निकलकर बाहर आ जाता है।

यह भाग कोशिकाद्रव्य से अनावरित होता है। अक्ष्षीय सूत्र का कोशिकाद्रव्य से अवरित भाग पूंछ का मुख्य खण्ड होता है तथा अनावरित भाग अन्त्यखण्ड (End piece) कहलाता है। इस समय तक शेष बचे कोशिकाद्रव्य को गॉल्जीकाय के अनावश्यक अवयवों सहित त्याग दिया जाता है और एक अत्यन्त सक्रिय शुक्राणु (Sperm) का निर्माण हो जाता है।

शुक्राणु की संरचना शुक्राणुओं की आकृति भिन्न-भिन्न जाति में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। जैसे अस्थिल मछलियों में गोलाकार, मनुष्य में चमचाकार, चूहों में हुक के आकार के व पक्षियों में सर्पिलाकार होते हैं।
शुक्राणु के चार भाग पाये जाते हैं-

  1. शीर्ष
  2. ग्रीवा
  3. मध्य भाग
  4. पूँछ

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1. शीर्ष-मनुष्य में शीर्ष तिकोना एवं चपटा होता है। इसकी आकृति केन्द्रक की आकृति पर निर्भर होती है। शीर्ष भाग निम्न दो संरचनाओं से मिलकर बना होता है-
(i) केन्द्रक-शुक्राणु के शीर्ष का अधिकांश भाग केन्द्रक द्वारा घिरा होता है। केन्द्रक में प्रमुख रूप से ठोस क्रोमेटिन पदार्थ पाये जाते हैं। DNA अत्यधिक संघनित अवस्था में होता है।

(ii) अग्रपिंडक/एक्रोसोम-केन्द्रक के अग्र भाग में टोपी के समान रचना पाई जाती है जिसे एक्रोसोम कहते हैं। टोपी के समान एक्रोसोम पाया जाता है। यह स्पर्मलाइसिन्स नामक पाचक एन्जाइम का स्रावण करता है। स्तनधारियों में इसके द्वारा हाएलोयूरोनाइडेज एन्जाइम एवं प्रोएक्रोसिन, एसिड फॉस्फेटेस, बाइन्डीज का स्रावण किया जाता है। प्रोएक्रोसिन, एक्रोसोम क्रिया द्वारा एक्रोसिन में बदल जाता है। ये दोनों एन्जाइम अण्डभेदन में सहायक होते हैं।
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2.  ग्रीवा-शीर्ष एवं मध्य भाग के बीच जहाँ तारक केन्द्र उपस्थित रहते हैं, ग्रीवा क्षेत्र कहलाता है। इस भाग में तारककाय पायी जाती है। समीपस्थ तारककाय केन्द्रक के पश्च भाग में एक गर्त में स्थित होता है, जो निषेचन के बाद खण्डीभवन को प्रेरित करता है। इसके पास ही दूरस्थ तारककाय पाया जाता है।

3. मध्य भाग-यह भाग शुक्राणु का ऊर्जा कक्ष या इंजन कहलाता है। मध्य भाग दूरस्थ तारककाय से मुद्रिका तारककाय तक होता है जिसमें अक्षीय तन्तुओं के चारों ओर माइटोकॉन्ड्रिया के आपस में आंशिक समेकन के फलस्वरूप बनी सर्पिल कुण्डली के रूप में व्यवस्थित रहते हैं।

स्तनधारियों में माइटोकॉन्ड्रिया के आपस में आंशिक समेकन के फलस्वरूप बनी सर्पिल कुण्डली को नेबेनकर्न (Nebenkern) आच्छद कहते हैं। मध्य भाग द्वारा ही शुक्राणु की गति के लिये आवश्यक ऊर्जा प्रदान की जाती है। शीर्ष के पश्च भाग एवं सम्पूर्ण मध्य भाग को चारों ओर कोशिकाद्रव्य की महीन पर्त घेरे रहती है जिसे मेनचैट (Manchette) कहते हैं। मध्य भाग के अंत में एक मुद्रिका सेन्ट्रियोल पायी जाती है।

4. पूंछ-यह शुक्राणु का सबसे लम्बा तन्तुमय भाग है जो गति में सहायक है।
अण्डजनन (Oogenesis)-अण्डाशय की जनन उपकला द्वारा अण्डाणु निर्माण एवं परिपक्वन की क्रिया को अण्डजनन कहते हैं। अण्डजनन में निम्न तीन चरण पाये जाते हैं-
(A) गुणन प्रावस्था (Multiplication phase)
(B) वृद्धि प्रावस्था (Growth phase)
(C) परिपक्वन प्रावस्था (Maturation phase)

(A) गुणन प्रावस्था (Multiplication phase)-प्रारम्भिक अथवा प्राथमिक जनन कोशिकाओं (Primordial or Primary Germ Cells) के बारम्बार समसूत्री विभाजन के फलस्वरूप वर्त्त कोशिकाएँ अण्डजन या ऊगोनिया (Oogonia) कहलाती हैं। ऊगोनिया द्विगुणित (2n) कोशिकाएँ हैं।
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(B) वृद्धि प्रावस्था (Growth phase)-इस दौरान ऊगोनिया में पुन: समसूत्रीय विभाजन होता है। इसके फलस्वरूप स्तनधारियों के अण्डाशय में कोशिकाओं के समूह का निर्माण होता है, जिन्हें अण्डवाही रज्जु (Ovigerous cord) कहते हैं। अण्डवाही रज्जु की एक ऊगोनिया कोशिका वृद्धि करती है व शेष कोशिकाएँ घेर लेती हैं। ऊगोनिया की वृद्धि से प्राथमिक ऊसाइट (Primary Oocyte) का निर्माण होता है। प्राथमिक ऊसाइट को घेरने वाली कोशिकाओं को पुटक कोशिकाएँ (Follicle cells) कहते हैं।

(C) परिपक्वन प्रावस्था (Maturation phase)-प्राथमिक ऊसाइट (Primary Oocyte) में, अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) प्रथम द्वारा द्वितीयक ऊसाइट (Secondary Oocyte) व एक पोलर बॉडी (Polar Body) का निर्माण होता है। प्रारम्भिक पुटिक की पुटिकीय कोशिकाओं में निरन्तर विभाजन होने लगता है जिसके फलस्वरूप विकासशील अण्डकोशिका के चारों ओर एक बहुस्तरीय आवरण बन जाता है जिसे मेम्ब्रेना ग्रेन्यूलोसा (Membrana Granulosa) कहते हैं तथा सम्पूर्ण पुटिका समूह को अब द्वितीयक पुटिका (Secondary Follicle) कहते हैं।

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धीरे-धीरे अण्डाणु व मेम्ब्रेना ग्रेन्यूलोसा के बीच रिक्त स्थान का निर्माण होने लगता है जिसे पुटिका गुहा (Follicular Cavity) कहते हैं। इसमें पाये जाने वाले पोषक तरल पदार्थ को पुटिका द्रव्य (Follicular Fluid) कहते हैं। पुटिका कोशिकाओं का स्तर जो अण्डाणु के चारों ओर उपस्थित होता है उसे कोरोना रेडिएटा (Corona Radiata) कहते हैं।

इसके ठीक नीचे अण्डाणु के चारों तरफ एक ओर पारदर्शी आवरण पाया जाता है जिसे जोना पेल्यूसिडा (Zona Pellucida) कहते हैं। इस अवस्था में पुटिका अपने परिमाण के चरम सीमा पर होती है और इसे अब ग्राफ्रियन पुटिका (Graffian Follicle) कहते हैं। ग्राफियन पुटिका (Graffian Follicle) अण्डाशय के आवरण के निकट पहुँचकर फट जाती है तथा इसमें अण्डाणु (Ovum) बाहर निकलकर देहगुहा में आ जाता है। पुटिका से अण्डाणु के बाहर निकलने की प्रक्रिया को अण्डोत्सर्ग (Ovulation) कहते हैं।

शुकजनन व अण्डजनन में समानताएँ

  1. शुक्र जनन (Spermatogenesis) व अण्ड जनन (Oogenesis) दोनों क्रियाएँ जनन उपकला (Germinal Epithelium) से प्रारम्भ होती है।
  2. दोनों ही क्रियाओं में तीन समान प्रावस्थाएँ होती हैं-
    • गुणन प्रावस्था
    • वृद्धि प्रावस्था
    • परिपक्वन प्रावस्था
  3. गुणन प्रावस्था में दोनों क्रियाओं में समसूत्री विभाजन होता है ।
  4. परिपक्वन प्रावस्था में अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis division) होता है।
  5. दोनों की अन्तिम प्रावस्था में अगुणित युग्मक का निर्माण होता है।

प्रश्न 12.
(a) मानव शुक्राणु का चित्र बनाइए तथा उसके कोशिकीय घटकों को नामांकित कीजिए। किन्हीं तीन भागों के कार्य बताइए ।
(b) शुक्राणुजनन के बाद जीवित रहने के लिए इनका सिर कहाँ धंसा होता है?
उत्तर:
संकेत-
(a) शुक्राणु के चित्रों एवं तीन भागों के कार्य हेतु अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न के निबन्धात्मक प्रश्न क्रमांक 1 का अवलोकन करें।]
(b) शुक्राणुओं का सिर सर्टोली कोशिकाओं (Sertoli Cells) में धंसा होता है।

प्रश्न 13.
मानव जनन तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए ।
उत्तर:
पुरुष जनन तंत्र (Male Reproductive System)
पुरुषों में एक जोड़ी वृषण (Testis) प्राथमिक जननांग के रूप में होते हैं। इसके अतिरिक्त सहायक जननांग (Accessory Reproduction organs) मुख्यतया वृषणकोष (Scrotal Sac), अधिवृषण (Epididymis), शुक्रवाहिनियां (Vas-deferences), शिश्न (Penis) तथा प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate Gland) एवं कॉउपर ग्रन्थि (Cowper’s Gland) पाये जाते हैं।

वृषण (Testis)-वृषण प्राथमिक जननांग होते हैं जिनका निर्माण भ्रूणीय मीसोडर्म (Mesoderm) से होता है। ये मीसोर्कियम (Mesorchium) की सहायता से उदरगुहा की पृष्ठभित्ति से जुड़े रहते हैं। वृषण संख्या में दो होते हैं। इनका रंग गुलाबी तथा आकृति में अण्डाकार होते हैं जिसकी लम्बाई 4 से 5 से.मी., चौड़ाई लगभग 2 से 3 से.मी. एवं वजन में 12 ग्राम होता है। दोनों वृषण उदरगुहा के बाहर एक थैले में स्थित होते हैं जिसे वृषणकोष (Scrotal Sac) कहते हैं। वृषणकोष एक ताप नियंत्रक की भांति कार्य करता है।

वृषणों का तापमान शरीर के तापमान से 2-2.5° C नीचे बनाये रखता है। यह तापमान शुक्राणुओं के विकास के लिए उपयुक्त होता है। वृषणकोषों की दीवार पतली, लचीली एवं रोमयुक्त होती है। इसके अन्दर पेशी तन्तुओं का मोटा अवत्वक (Subcutaneous) स्तर होता है जिसे डारटोस पेशी (Dartos muscle) कहते हैं।

रेखित पेशी तन्तुओं का एक दण्डनुमा गुच्छा वृषणकोष के प्रत्येक अर्धभाग के अवत्वक पेशी स्तर को उदरीय अवत्वक पेशी स्तर से जोड़ता है, जिसे वृषणोत्कर्ष पेशी (cremaster muscles) कहते हैं। प्रत्येक वृषण कोष की गुहा उदरगुहा से एक सँकरी नलिका द्वारा जुड़ी होती है जिसे वक्षणनाल (Inguinal Canal) कहते हैं। वक्षणनाल के द्वारा होकर वृषण धमनी, वृषणशिरा तथा वृषण तन्त्रिका एक वृषण रज्जु (Spermatic Cord) के रूप में वृषण तक जाती है।
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वृषण पर दो आवरण पाये जाते हैं जिन्हें वृषण खोल (Testicular capsule) कहते हैं। इसमें बाहरी महीन आवरण को मौनिक स्तर (Tunica Vaginalis) कहते हैं। यह उदरगुहा के उदरावण से बनता है जबकि भीतरी स्तर को श्वेत कुंचक अथवा ट्यूनिका ऐल्ब्यूजिनिया (Tunica Albuginea) कहते हैं। वृषण की गुहा भी इसी ऊतक की पट्टियों द्वारा लगभग 250 पालियों या वेश्मों में बंटी रहती है।

प्रत्येक पाली में अनेक कुण्डलित रूप में एक-दूसरे से सटी हुई कई पतली नलिकाएँ पायी जाती हैं, जिन्हें शुक्रजनन नलिका (Seminiferous Tubules) कहते हैं। इन नलिकाओं के बीच संयोजी ऊतक पाया जाता है जिसमें विशेष प्रकार की अन्तराली कोशिकाएँ या लैडिग कोशिकाएँ (Leydig cells) पायी जाती हैं। इन कोशिकाओं द्वारा नर हार्मोन टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) का विकास होता है।

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प्रत्येक शुक्रजनक नलिका (Seminiferous Tubules) के चारों ओर झिल्लीनुमा आवरण पाया जाता है जिसे ट्यूनिका प्रोप्रिया (Tunica Propria) कहते हैं। इस झिल्ली के नीचे जनन उपकला (Germinal Epithelium) का स्तर पाया जाता है। शुक्रजनक नलिका (Seminiferous Tubules) को वृषण की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई कहा जाता है। जनन उपकला स्तर में दो प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं-
(i) स्परमेटोगोनिया कोशिकाएँ (Spermatogonia cells)इनके द्वारा शुक्रजनन (Spermatogenesis) द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण होता है।
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(ii) सरटोली कोशिकाएँ (Sertoli cells)-सरटोली कोशिकाओं को अवलम्बन या पोषी या नर्स या मातृ या सबटेन्टाकुलर कोशिकाएँ (Supporting or Nutritive or Nurse or Mother or Subtentacular cells) भी कहते हैं। ये कोशिकाएँ आकार में बड़ी, संख्या में कम एवं स्तम्भी प्रकार की होती हैं। इनका स्वतन्त्र भाग कटाफटा होता है। इस भाग में शुक्राणुपूर्व कोशिकाएँ (Spermatids) सर्टोली कोशिकाओं से सटकर संलग्न रहती हैं।
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सरटोली कोशिकाओं के कार्य (Functions of Sertoli Cells)-

  • शुक्राणुओं को आलम्बन प्रदान करती हैं।
  • ये कोशिकाएँ शुक्राणुओं को संरक्षण एवं पोषण प्रदान करती हैं।
  • शुक्रकायान्तरण (Spermiogenesis) के दौरान अवशिष्ट कोशिकाद्रव्य (Residual Cytoplasm) का भक्षण करना।
  • सरटोली कोशिका द्वारा एन्टीमुलेरियान हार्मोन का स्रावण किया जाता है। यह भूरणीय अवस्था में मादा जननवाहिनी के विकास का संदमन करता है।
  • सरटोली कोशिकाओं के द्वारा इनहिबिन (Inhibin) हार्मोन का स्रावण किया जाता है जो FSH का संदमन करता है।
  • इन कोशिकाओं के द्वारा ABP (एण्ड्रोजन बाइडिंग प्रोटीन) का स्रावण किया जाता है।

शुक्रजनन नलिका (Seminiferous Tubules) से पतलीपतली नलिकाएँ निकलती हैं, वृषण के अन्दर ये नलिकाएँ आपस में मिलकर एक जाल बनाती हैं, इसे वृषण जालक (Rete Testis) कहते हैं। इससे लगभग 15-20 संवलित नलिकाएँ (Convoluted ductules) निकलती हैं जिन्हें वास इफरेंशिया (Vas Efferentia) कहते हैं। ये नलिकाएँ वृषण की अग्र या ऊपरी सतह पर पहुँचकर लम्बी रचना में खुलती हैं जिसे अधिवृषण (Epididymis) कहते हैं।

अधिवृषण (Epididymis)-यह एक लम्बी तथा अत्यधिक कुंडलित नलिका है जिसकी लम्बाई 6 मीटर होती है। प्रत्येक वृषण के भीतरी किनारों पर अत्यधिक कुण्डलित नलिका द्वारा निर्मित एक रचना पाई जाती है जिसे अधिवृषण कहते हैं। अधिवृषण को तीन भागों में बाँटा गया है-
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  • कैपुट एपिडिडाइमिस (Caput Epididymis)-यह वृषण के ऊपर केप (Cap) के समान होती है। इमें वृषण से आने वाली वास इफरेन्शिया (Vas Efferentia) खुलती है। कैपुट एपिडिडाइमिस को ग्लोबस मेजर (Globus Major) भी कहते हैं।
  • कॉर्पस एपिडिडाइमिस (Corpus Epididymis)-यह मध्य भाग है व संकरा होता है। इसे एपिडिडाइमिस काय (Epididymis body) भी कहते हैं।
  • कॉडा एपिडिडाइमिस (Cauda Epididymis)-यह एपिडिडाइमिस का पश्च व सबसे छोटा भाग है। इसे ग्लोबस माइनर (Globus Minor) भी कहते हैं। कॉडा एपिडिडाइमिस से इसकी नली पीछे निकलकर शुक्रवाहिनी (Vas deference) बनाती है। अधिवृषण

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(Epididymis) के कार्य-

  • शुक्राणुओं को अधिवृषण में संग्रहित किया जाता है व यहाँ इनका परिपक्वन होता है।
  • यह वृषणों से शुक्रवाहिनी में शुक्राणुओं के पहुँचने के लिए मार्ग प्रदान करते हैं।
  • अधिवृषण (Epididymis) में शुक्राणु एक माह तक संचित रह सकते हैं। स्खलन न होने की स्थिति में शुक्राणुओं का विघटन न होने पर इनके तरल का अवशोषण इसी में होता है।
  • इसकी नलिका में क्रमाकुंचन के कारण शुक्राणु वास डिफरने्स (Vas deference) की ओर बहते हैं।

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  • सरटोली कोशिका द्वारा एन्टीमुलेरियान हार्मोन का सावण किया जाता है। यह भ्रूणीय अवस्था में मादा जननवाहिनी के विकास का संदमन करता है।
  • सरटोली कोशिकाओं के द्वारा इनहिबिन (Inhibin) हार्मोन का स्रावण किया जाता है जो =FSH= का संद्मन करता है।
  • इन कोशिकाओं के द्वारा ABP (एण्ड्रोजन बाइडिंग प्रोटीन) का स्रावण किया जाता है।

शुक्रवाहिनी (Vas deference)-शुक्रवाहिनी लगभग 45 सेमी. लम्बी नलिका होती है। इसकी दीवार पेशीय होती है। शुक्रवाहिनी अधिवृषण के पश्च भाग से प्रारम्भ होकर ऊपर की ओर वक्षणनाल से होकर गुहा में मूत्राशय के पश्च तल पर नीचे की ओर मुड़कर चलती हुई अन्त में एक फूला हुआ भाग तुम्बिका (Ampulla) बनाती है। यहाँ इसमें शुक्राशय (Seminal Vesicle) की छोटी वाहिनी आकर खुलती है। दोनों के मिलने से स्खलनीय वाहिनी (Ejaculatory Duct) का निर्माण होता है।

शुक्रवाहिनी की भित्ति पेशीय होती है व इसमें संकुचन व शिथिलन की क्षमता पायी जाती है। संकुचन व शिथिलन द्वारा शुक्राणु शुक्राशय तक पहुँचा दिये जाते हैं। शुक्रवाहिनियों में ग्रन्थिल कोशिकाएँ पाई जाती हैं जो चिकने पदार्थ का सावण करती हैं। यह द्रव शुक्राणुओं को गति करने में सहायता करता है। तुम्बिका (Ampulla) में शुक्राणुओं को अस्थायी रूप से संग्रह किया जाता है। स्खलनीय वाहिनियां अन्त में मूत्र मार्ग (Urethra) में आकर खुलती हैं।

मूत्रमार्ग (Urethra)-मूत्राशय से मूत्रवाहिनी निकलकर स्खलनीय वाहिनी से मिलकर मूत्रजनन नलिका या मूत्रमार्ग (Urinogenital Duct or Urethra) बनाती है। यह लगभग 20 से.मी. लम्बी नाल होती है जो शिश्न के शिखर भाग पर मूत्रजनन छिद्र (Urinogenital Aperture) द्वारा बाहर खुलती है। मूत्रमार्ग एवं वीर्य दोनों के लिए एक उभयनिष्ठ मार्ग (Common Passage) का कार्य करता है।

मूत्रमार्ग (Urethra) तीन भागों में बँटा होता है-

  1. प्रोस्टेटिक मूत्रमार्ग (Prostatic Urethra)
  2. झिल्लीमय मूत्रमार्ग (Membranous Urethra)
  3. स्पंजी मूत्रमार्ग (Spongy Urethra)

1. प्रोस्टेटिक मूत्रमार्ग (Prostatic Urethra)-यह मूत्रमार्ग का 2-3 से.मी. लम्बा भाग होता है। यह प्रोस्टेट ग्रन्थि के मध्य से गुजरता तथा दोनों ओर की स्खलन वाहिनियाँ इसी भाग में खुलती हैं।

2. झिल्लीमय मूत्रमार्ग (Membranous Urethra)-यह मध्य का लगभग 1 से.मी. लम्बा भाग होता है जो प्रोस्टेट ग्रन्थि तथा शिश्न (Penis) के बीच स्थित पेशीय तन्तुपट (Muscular Diaphragm) को बेधता हुआ शिश्न में प्रवेश करता है।

3. स्पंजी मूत्रमार्ग (Spongy Urethra)-यह मूत्रमार्ग का अन्तिम या शिखर भाग है जो शिश्न में से गुजरता है। यह स्पंजी तथा सर्वाधिक लम्बाई (16-17 से.मी.) वाला भाग है।

शिश्न (Penis)-पुरुष का मैथुनी अंग है जो एक लम्बा, संकरा, बेलनाकार तथा वहिःसारी (Protrusible) होता है। इसका स्वतन्त्र सिरा फूला हुआ तथा अत्यधिक संवेदी होता है तथा शिश्नमुण्ड (Galns Penis) कहलाता है। यह भाग एक त्वचा के आवरण से ढका रहता है। यह आवरण शिश्न = मुण्डछद (Prepuce) कहलाता है। शिश्न दोनों वृषणकोषों के ऊपर व मध्य में उदर के निचले भाग में लटका रहता है।

यह तीन भागों में विभेदित होता है-

  • शिश्नमूल (Root of Penis)-यह मूत्रोजनन तनुपट (Urinogenital diaphargm) से लगा शिश्न का समीपस्थ भाग होता है।

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  • शिश्नकाय (Body of Penis)-यह शिश्न का मुख्य लम्बा भाग है।
  • शिश्नमुण्ड (Glans Penis)-यह शिश्न का शिखर भाग होता है ।

शिश्न की संरचना पेशियों एवं रुधिर कोटरों (Blood Sinus) से होती है। ये तीन मोटे अनुदैर्घ्य डोरियों के समान रज्ञुओं (Cords) के रूप में होते हैं। पृष्ठ भाग में ऐसी संरचनाएँ दो होती हैं जिन्हें कॉरपोरा केवरनोसा (Corpora Cavernosa) तथा अधर भाग में एक कॉर्पस स्पंजिओसम (Corpus Spongiosum) कहलाती है।

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सामान्य अवस्थाओं में शिश्न शिथिल एवं छोटा होता है। मैथुन उत्तेजना के समय इसके कोटर रुधिर से भर जाते हैं तथा यह लम्बा, मोटा तथा कड़ा हो जाता है। इस अवस्था में शिश्नमुण्ड नग्न हो जाता है तथा यह स्त्री की योनि में आसानी से प्रविष्ट कराया जा सकता है। मैथुन क्रिया में सुगमतापूर्वक शुक्राणुओं को वीर्य के साथ स्थानान्तरित किया जा सकता है।

सहायक ग्रन्थियाँ (Accessory Glands)-पुरुषों में मुख्यतः तीन प्रकार की सहायक जनन ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं जो जनन में सहायता करती हैं-
(1) प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate Gland)-इस ग्रन्थि की आकृति सिंघाड़ेनुमा होती है। यह मूत्रमार्ग के आधार भाग पर स्थित होती है एवं कई पिण्डों में विभक्त होती है। प्रत्येक पिण्ड एक छोटी नलिका द्वारा मूत्रमार्ग में खुलता है। इस ग्रन्थि का स्राव विशेष गंध युक्त, सफेद एवं हल्का क्षारीय होता है जो वीर्य का 25-30 प्रतिशत भाग बनाता है।

इस स्राव में फॉस्फेट्स सिट्रेट, लाइसोजाइम, फाइब्रिनोलाइसिन, स्पर्मिन (Spermin) आदि पाये जाते हैं। वृद्ध पुरुषों में यह ग्रन्थि बड़ी हो जाती है व मूत्रोजनन मार्ग में अवरोध उत्पन्न कर देती है। इसे शल्य क्रिया द्वारा हटा दिया जाता है। कार्य-इस ग्रन्थि का साव (प्रोस्टेटिक द्रव) शुक्राणुओं को सक्रिय बनाता है एवं वीर्य के स्कंदन को रोकता है।

(2) काडपर गन्थि (Cowper’s Gland)-इ से बल्बोयूरेश्रिल ग्रन्थियाँ (Bulbourethral Glands) भी कहते हैं। ये ग्रन्थियाँ एक जोड़ी प्रोस्टेट ग्रन्थि के पीछे स्थित होती हैं। इनका स्राव चिकना, पारदर्शी व क्षारीय होता है जो मूत्रोजनन मार्ग की अम्लीयता को नष्ट करता है। यह तरल मादा की योनि को चिकना कर मैथुन क्रिया को सुगम बनाता है।

(3) शुक्राशय (Seminal Vesicle)-शुक्राशय एक थैलीनुमा रचना होती है जो एक जोड़ी के रूप में मूत्राशय की पश्च सतह एवं मलाशय के बीच में स्थित होती है। इसके द्वारा एक पीले रंग का चिपचिपे पदार्थ का स्रावण किया जाता है। यही तरल पदार्थ वीर्य का अधिकांश भाग (लगभग 60 प्रतिशत) बनाता है।

इसमें फ्रक्टोस, शर्क रा, प्रोस्टाग्लैं डिन्स (Prostaglandins) तथा प्रोटीन सेमीनोजेलिन (Semenogelin) होते हैं। फ्रक्टोस शुक्राणुओं को ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करता है। क्षारीय प्रकृति के कारण यह स्राव योनि मार्ग की अम्लीयता को समाप्त कर शुक्राणुओं की सुरक्षा करता है। प्रत्येक शुक्राशय से एक छोटी नलिका निकल कर शुक्रवाहिनी की तुम्बिका में खुलती है। शिश्न की उत्तेजित अवस्था में स्खलन के समय दोनों शुक्राशय संकुचित होकर अपने स्राव को मुक्त करते हैं।

पुरुष जनन तंत्र (Female Reproductive System)
इस पाठ के बिन्दु सं. 3.2 का अवलोकन करें।
स्त्रियों में एक जोड़ी अण्डाशय (Ovary) प्राथमिक जननांगों (Primary Sex Organs) के रूप में होते हैं। इसके अतिरिक्त अण्डवाहिनी (Oviduct), गर्भाशय (Uterus), योनि (Vagina), भग (Vulva), जनन ग्रन्थियाँ (Reproductive glands) तथा स्तन या छाती (Breast) सहायक जननांगों का कार्य करते हैं।
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(1) अण्डाशय (Ovary)-स्त्रियों में अण्डाशय की संख्या दो होती है, जिनकी आकृति बादाम के समान होती है। प्रत्येक अण्डाशय की लम्बाई लगभग 2 से 4 से. मी. होती है। दोनों अण्डाशय उदरगुहा में वृक्कों के काफी नीचे श्रोणि भाग (Pelvic region) में पीछे की ओर गर्भाशय (Uterus) के इधर-डधर स्थित होते हैं। प्रत्येक अण्डाशय उदरगुहीय पेरीटोनियम के वलन से बनी मीसोविरियम (Mesovarium) नामक झिल्लीनुमा मीसेन्ट्री (Mesentery) द्वारा श्रोणि भाग की दीवार से टिका होता है।

ऐसे ही एक झिल्ली अण्डाशयी लिगामेन्ट (Ovarian Ligament) प्रत्येक अण्डाशय को दूसरी ओर से गर्भाशय से जोड़ती है। अण्डाशय की संरचना-प्रत्येक अण्डाशय भी वृषण के समान तीन स्तरों से घिरा होता है। बाहरी स्तर को ट्यूनिका एलब्यूजिनिया (Tunica Albuginea) कहते हैं। यह संयोजी ऊतक का महीन स्तर होता है।

आन्तरिक स्तर को ट्यूनिका प्रोपरिया (Tunica Propria) कहते हैं तथा इनके बीच वाले स्तर को जनन उपकला (Germinal Epithelium) कहते हैं। जनन उपकला घनाकार कोशिकाओं का बना होता है। अण्डाशय के बीच वाला भाग जो तन्तुमय होता है तथा संवहनीय संयोजी ऊतक (Vascular Connective Tissue) का बना होता है उसे स्ट्रोमा कहते हैं। स्ट्रोमा दो भागों में विभक्त होता है जिन्हें क्रमशः परिधीय वल्कुट (Peripheral Cortex) एवं आंतरिक मध्यांश (Internal Medulla) कहते हैं।
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अण्डाशय के वल्कुट (Cortex) भाग में अनेक अण्ड पुटिकाएँ (Ovarian Follicles) पायी जाती हैं। जिनका निर्माण जनन उपकला से होता है। पुटिकाएँ बहुकोशिकीय झिल्ली मेम्ब्रेना ग्रेन्यूलोसा (Membrana Granulosa) से घिरी होती हैं। जिसके भीतर फॉलीक्यूलर गुहा (Follicular Cavity) होती है जो फॉलीक्यूलर द्रव (Follicular Fluid) से भरी होती है।

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इस गुहा में अण्ड कोशिका (Ovum) होती है जो चारों ओर अनेक फॉलीकुलर कोशिकाओं से घिरी रहती है। इन कोशिकाओं को जोना पेल्यूसिडा (Zonapellucida) एवं चारों ओर के मोटे स्तर को कोरोना रेडिएटा (Corona Radiata) कहते हैं। इस संरचना को अब परिपक्व ग्राफियन पुटिका (Mature Graatian Follicle) कहते हैं। परिपक्व ग्राफियन पुटिका अण्डाशय की सतह पर पहुँच कर फट जाती है तथा अण्ड बाहर निकलकर उदरीय गुहा में आ जाता है। इस क्रिया को डिम्बोत्सर्ग (Ovulation) कहते हैं।
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(2) अण्डवाहिनी (Oviduct)-स्त्री में दो अण्डवाहिनियाँ होती हैं जो अण्डाणु को अण्डाशय से गर्भाशय तक पहुँचाती हैं। प्रत्येक अण्डवाहिनी की लम्बाई 10-12 से.मी. होती है। अण्डवाहिनी का स्वतन्त्र सिरा जो अण्डाशय के निकट होता है, कीप रूपी (Funnellike) एवं चौड़ा होता है तथा इसे आस्टियम (Ostium) कहते हैं। आस्टियम या मुखिका का किनारा झालरदार (Fimbriated) एवं रोमाभि (Ciliated) होता है।

अतः मुखिका को फिम्ब्रिएटेड कीप (Fimbriated Funnel) भी कहते हैं। अण्डोत्सर्ग के बाद अण्ड अण्डाशय से निकलकर उदरगुहा में आकर इसी फिम्ब्रिएटेड कीप के द्वारा फैलोपियन नलिका (Fallopian Tube) में चला जाता है। फैलोपियन नलिका की भित्ति पेशीयुक्त होती है तथा भीतर से अत्यन्त वलित (Folded) होती है। निषेचन की क्रिया फैलोपियन नलिका में ही होती है। प्रत्येक फैलोपियन नलिका अपनी ओर के गर्भाशय (Uterus) में अपने पश्च अन्त द्वारा खुलती है।

(3) गर्भाशय (Uterus)-इसे बच्चादानी (वुम्ब) भी कहते हैं। इसकी आकृति उल्टी नाशपाती के समान होती है। यह श्रोणि भित्ति से स्नायुओं द्वारा जुड़ा होता है। यह लगभग 7.5 से.मी. लम्बा, 3 से.मी, मोटा तथा अधिकतम 5 से.मी, चौड़ा खोखला तथा शंक्वाकार अंग होता है। इसका संकरा भाग नीचे की ओर तथा चौड़ा भाग ऊपर की ओर होता है।

इसके पीछे की ओर मलाशय (Rectum) तथा आगे की ओर मूत्राशय (Urinary Bladder) होता है। गर्भाशय की भित्ति, फतकों की तीन परतों से बनी होती हैबाहरी पताली झिल्लीमय स्तर को परिगभांशय (पेरिमेट्रियम), मध्य मोटी चिकनी पेशीख स्तर को गभाँशय पेशी स्तर (मायोमैट्रियम) और आन्तरिक ग्रान्थल स्तर को गर्भाशय अन्तःस्तर (एंड्रोमैट्रियम) कहते हैं जो गभाशएय गुहा को आस्तरित करती है। आतंव चक्र (Menstrual Cycle) के चक्र के दौरान गर्भाशब के अन्तःस्तर में चक्रीय परिवर्तन होते हैं, जबकि गभांशय पेशी स्तर में प्रसव के समय काफी तेज संकुचन होंता है।

गर्भाशाब को तीन भागों में विभेदित किया गया है-

  • फण्डस (Fundus)-ऊपर की और उभरा हुआ भाग फण्डस कहलाता है।
  • काय (Body)-बीच का प्रमुख भाग ग्रीवा (Cervix) कहलाता है।
  • ग्रीवा (Cervix)-सबसे निचला भाग ग्रीवा (Cervix) कहलाता है जो योनि से जुड़ा होता है।

भूण का विकास गर्भाशय (Uterus) में होता है। शूण अपरा (Placenta) की सहायता से गर्भाशय की भित्ति से संलग्न होता है। यहाँ भ्रूण को सुरक्षा एवं पोषण प्राप्त होता है।

(4) योनि (Vagina)-गर्भाशय ग्रीवा (Cervix Uteri) आगे बढ़कर एकपेशीय लचीली नलिका रूपी रचना का निर्माण करती है जिसे योनि (Vagina) कहते है। योनि स्त्रियों में मैथुन अंग (Copulatory organ) की तरह कार्य करती है। इसके अतिरिक्त योनि गर्भाशाय से उत्पन्न मास्तिक स्राव को निक्कासन हेतु पथ उपलख्ब करवाती है एवं शिशु जन्म के समय गर्भस्थ शिशु के बाहर निकालने के लिए जन्मनाल (Birth Canal) की तरह कार्य करती है।

(5) बाद्य जननांग (External Genitila)-स्त्रियों के बाह्ष जननांग निम्न हैं-
(i) जघन शौल (Mons Pubis)-यह प्यूबिस लिम्फाइसिस के ऊपर स्थित होता है जो गद्दीनुमा होता है क्योंकि इसकी त्वचा के नीचे वसीय परत होती है। तरुण अवस्था में इस पर घने रोम उग आते हैं जो अन्त तक रहते हैं।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन 51

(ii) वृहद् भगोष्ठ (Labia Majora)-ये जघन शैल (प्यूबिस मुंड) से नीचे की तरफ व पीछे की ओर से विस्तृत एक जोड़ी बड़े अनुद्रै्घ्य वलन होते हैं। इनकी बाह्य सतह पर रोम पाये जाते हैं।

(iii) लघु भगोष्ठ (Labia Minora)-ये आन्तरिक व छोटे वलन होते हैं। इन पर रोम नहीं पाये जाते हैं। लेबिया माइनोरा प्रघाण (Vestibule) को घेरे रहते हैं।

(iv) भगशेफ या क्लाइटोरिस (Clitoris)-यह जघन शैल (Mons Pubis) लेबिया माइनोरा के अग्र कोने पर स्थित एक संवेदी तथा घुण्डीनुमा अथवा अंगुलीनुमा रचना है। यह नर के शिश्न के समजात अंग है। यह अत्यधिक संवेदनशील होता है क्योंक इसमें स्पर्शकणिकाओं की अधिकता पायी जाती है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन

(v) योनिच्छद (Hymen)-योनि द्वार पर पतली झिल्ली पाई जाती है जिसे योनिच्छद (Hymen) कहते हैं। यह लैंगिक सम्पर्क, शारीरिक परिश्रम एवं व्यायाम के कारण फट जाती है। बार्थोलिन की ग्रन्थियाँ (Bartholian Glands)-योनिद्वार के दोनों ओर एक-एक सेम की आकृति की ग्रन्थि लेबिया मेजोरा पर स्थित होती है। ये ग्रन्थियाँ एक क्षारीय व स्रेहक द्रव का स्राव करती हैं जो कि भग (Vulva) को नम रखता है एवं लैंगिक परस्पर व्यवहार को सुगम बनाता है।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 3 मानव जनन 52

(6) स्तनग्रन्थि (Mammary Glands)-स्त्री में स्तन ग्रन्थियों (Mammary Glands) से युक्त एक जोड़ी स्तन उपस्थित होते हैं। ये वक्ष के सामने की तरफ अंसीय पेशियों (Pectoral Muscles) के ऊपर स्थित होते हैं। प्रत्येक स्तन ग्रन्थि में भीतर का संयोजी ऊतक $15-20$ नलिकाकार कोष्ठकीय पालियों का बना होता है। इनके बीच-बीच में वसीय ऊतक होता है। प्रत्येक पाली में अंगूर के गुच्छों के समान दुग्ध ग्रन्थियाँ होती हैं जो दुग्ध का स्राव करती हैं। यह दूध नवजात शिशु के पोषण का कार्य करता है।

प्रत्येक पालिका से निकली कई छोटी वाहिनियां एक दुग्ध नलिका या लैक्टीफेरस नलिका (Lactiferous Duct) बनाती हैं। ऐसी कई दुग्ध नलिकाएँ स्वतन्त्र रूप से आकर चूचुक (Nipples) में खुल जाती हैं। चूचुक स्तनग्रन्थियों के शीर्ष भाग पर उभरी हुई वर्णांकित (Pigmented) रचना है। इसके आसपास का क्षेत्र भी गहरा वर्णांकित हो जाता है। इस क्षेत्र को स्तन परिवेश (Areola Mammae) कहते हैं। स्त्रियों में चूचुक के चारों तरफ का क्षेत्र वसा के जमाव तथा पेशियों के कारण काफी उभरा हुआ होता, है। चूचुक में 0.5 मिमी. के 15-25 छिद्र पाये जाते हैं। पुरुषों में चूचुक अवशेषी होते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. द्वितीयक अंडक का अर्धसूत्री विभाजन पूर्ण होता है- (NEET-2020)
(अ) सम्भोग के समय
(ब) युग्मनज बनने के बाद
(स) शुक्राणु एवं अण्डाणु के संलयन के समय
(द) अण्डोत्सर्ग के पहले
उत्तर:
(स) शुक्राणु एवं अण्डाणु के संलयन के समय

2. निम्न में से कौन ग्राफी पुटक से अण्डाणु का मोचन (अण्डोत्सर्ग) करेगा ?(NEET-2020)
(अ) प्रोजेस्टरोन की उच्च सान्द्रता
(ब) LH की निम्न सान्द्रता
(स) FSH की निम्न सान्द्रता
(द) एस्ट्रोजन की उच्च सान्द्रता
उत्तर:
(द) एस्ट्रोजन की उच्च सान्द्रता

3. निम्न स्तम्भों का मिलान कर सही विकल्प का चयन करो-

स्तम्भ-Iस्तम्भ-II
(क) अपरा(i) एन्ड्रोजन
(ख) जोनापेल्युसिडा(ii) मानव जरायु गोनेडोट्रोपिन
(ग) बल्बो-यूरेश्रल ग्रन्थियाँ(iii) अण्डाणु की परत
(घ) लीडिंग कोशिकाएँ(iv) शिश्न का स्नेहन
(क)(ख)(ग)(घ)
(अ)(i)(iv)(ii)(iii)
(ब)(iii)(ii)(iv)(i)
(स(ii)(iii)(iv)(i)
(द)(iv)(iii)(i)(ii)

उत्तर:

(स(ii)(iii)(iv)(i)

4. अण्डाणु केन्द्रक से द्वितीय ध्रुवीय पिण्ड कब बाहर निकलते हैं? (NEET-2019)
(अ) प्रथम विदलन के साथ-साथ
(ब) शुक्राणुओं के प्रवेश के बाद लेकिन निषेचन से पहले
(स) निषेचन के बाद
(द) शुक्राणु का अण्डाणु में प्रवेश से पहले
उत्तर:
(ब) शुक्राणुओं के प्रवेश के बाद लेकिन निषेचन से पहले

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5. नर जनन तंत्र में शुक्राणु कोशिकाओं के परिवहन के सही क्रम का चयन करो- (NEET-2019)
(अ) वृषण → अधिवृषण → शुक्रवाहिकाएँ → शुक्रवाहक → स्खलनीय वाहिनी → वृषण नाल → मूत्र मार्ग → यूरेश्रल मीटस
(ब) वृषण → अधिवृषण → शुक्रवाहिकाएँ → वृषण जालिकाएँ → वृषण नाल → मूत्र मार्ग
(स) शुक्रजनक नलिकाएँ → वृषण जालिकाएँ → शुक्रवाहिकाएँ → अधिवृषण → शुक्रवाहक → स्खलनीय वाहिनी → मूत्र मार्ग → यूरेश्रल मीटस
(द) शुक्रजनक नलिकाएँ → शुक्रवाहिकाएँ → अधिवृषण → वषण नाल → मत्र मार्ग।
उत्तर:
(स) शुक्रजनक नलिकाएँ → वृषण जालिकाएँ → शुक्रवाहिकाएँ → अधिवृषण → शुक्रवाहक → स्खलनीय वाहिनी → मूत्र मार्ग → यूरेश्रल मीटस

6. सगर्भता को बनाए रखने के लिए अपरा कौन-से हॉर्मोन स्रावित करती है? (NEET-2018)
(अ) hCG, hPL, प्रोजेस्टेरोन, एस्ट्रोजन
(ब) hCG, hPL, एस्ट्रोजन, रिलैक्सिन, आक्सीटोसिन
(स) CG PL प्रोजेस्टेरोन, प्रोलेक्टिन
(द) HCG, प्रोजेस्ट्रोन, एस्ट्रोजन, ग्लूकोकोर्टिकाइडस ।
उत्तर:
(अ) hCG, hPL, प्रोजेस्टेरोन, एस्ट्रोजन

7. असत्य कथन को चुनिए- (NEET-2016)
(अ) पुटकीय अवस्था के दौरान LH और FSH धीरे-धीरे कम होते जाते हैं।
(ब) LH, लेडिंग कोशिका स्रावित एन्ड्रोजन का संदमन करता है।
(स) FSH, सरटोली कोशिका को उत्तेजित करके, शुक्राणुजनन में मददगार है।
(द) LH, अण्डाणु में अण्डोत्सर्ग को संदमित करता है।
उत्तर:
(अ) पुटकीय अवस्था के दौरान LH और FSH धीरे-धीरे कम होते जाते हैं।

8. निम्नलिखित घटनाओं में से कौनसी घटना स्त्री में अण्डोत्सर्ग से सम्बन्धित नहीं है ? (NEET-2015)
(अ) ग्राफीपुटक का पूर्ण विकास
(ब) द्वितीयक अण्डक का निर्मोचन
(स) LH प्रवाह
(द) एस्ट्रेडिओल में कमी
उत्तर:
(द) एस्ट्रेडिओल में कमी

9. एन्ट्रम (Antram) पुटक में निम्नलिखित में से कौनसी सतह अकोशिकीय होती है ? (NEET-2015)
(अ) थीमा इंटरना
(स) जोना पेल्युसीडा
(ब) स्ट्रोमा
(द) ग्रैनुलोसा
उत्तर:
(स) जोना पेल्युसीडा

10. मानव मादाओं में अर्धसूत्री विभाजन- II किसके पूर्ण होने तक नहीं होता है ? (NEET-2015)
(अ) निषेचन
(ब) गर्भाशय में आरोपण
(स) जन्म
(द) यौवनारंभ
उत्तर:
(अ) निषेचन

11. मानव नर में जनन और मूत्र प्रणाली की साझेदारी अंतस्थ वाहिका है। (NEET-2014)
(अ) मूत्र मार्ग
(ब) मूत्र वाहिनी
(स) शुक्रवाहक
(द) शुक्रवाहिका
उत्तर:
(अ) मूत्र मार्ग

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12. शुक्राणु -1 निर्माण का सही क्रम क्या है? (NEET-2013, CBSE PMT-2009)
(अ) स्पर्मेटिड, स्पर्मेटोसाइट, स्पर्मेटोगोनिया, स्पर्मेटोजोआ (शुक्राणु)
(ब) स्पर्मेटोगोनिया, स्पर्मेटोसाइट, स्पर्मेटोजोआ (शुक्राणु), स्पर्मेटिड
(स) स्पर्मेटोगोनिया, स्पर्मेटोजोआ (शुक्राणु), स्पर्मेटोसाइट, स्पर्मेटिड
(द) स्पर्मेटोगोनिया, स्पर्मेटोसाइट, स्पर्मेटिड, स्पर्मेटोजोआ (शुक्राणु)
उत्तर:
(द) स्पर्मेटोगोनिया, स्पर्मेटोसाइट, स्पर्मेटिड, स्पर्मेटोजोआ (शुक्राणु)

13. रक्त बहाव किसकी कमी के कारण होता है ? ( NEET 2013 )
(अ) प्रोजेस्ट्रोन
(ब) FSH
(स) ऑक्सीटोसिन
(द) वैसोप्रेसिन
उत्तर:
(अ) प्रोजेस्ट्रोन

14. स्तनीय शुक्राणु की जीवन क्षमता के विषय में निम्नलिखित में से कौनसा कथन असत्य है ? (NEET-2012)
(अ) शुक्राणु केवल 24 घण्टे तक जीवनक्षम बना रहता है।
(ब) शुक्राणु की उत्तरजीविता माध्यम के PH पर निर्भर होती है। और क्षारीय माध्यम में वह अधिक सक्रिय बना रहता है।
(स) शुक्राणु की जीवन क्षमता उसकी गतिशीलता द्वारा निर्धारित होता है।
(द) शुक्राणुओं का सान्द्रण एक गाढ़े निलम्बन के भीतर होना चाहिए।
उत्तर:
(अ) शुक्राणु केवल 24 घण्टे तक जीवनक्षम बना रहता है।

15. मानव शरीर में पायी जाने वाली लेडिंग कोशिकाओं से किसका स्रवण होता है? (NEET-2012)
(अ) प्रोजेस्ट्रोन
(स) ग्लूकैगॉन
(ब) आंत्र श्लेस्म
(द) ऐन्ड्रोजन
उत्तर:
(द) ऐन्ड्रोजन

16. मानव आर्तव – चक्र में पायी जाने वाली स्रवण प्रावस्था को एक यह नाम भी दिया जाता है एवं वह कितने दिनों तक रहती है? (Mains-2012)
(अ) पीतपिण्ड प्रावस्था, अंतिम लगभग 6 दिन तक
(ब) पुटक प्रावस्था, अंतिम लगभग 6 दिन तक
(स) पीतपिण्ड प्रावस्था, अंतिम लगभग 13 दिन तक
(द) पुटक प्रावस्था, अन्तिम लगभग 13 दिन तक
उत्तर:
(स) पीतपिण्ड प्रावस्था, अंतिम लगभग 13 दिन तक

17. फैलोपियन नलिका का कौनसा भाग अण्डाशय के निकटतम होता है- (NEET 2010, CBSE PMT (Pre)- 2010)
(अ) इन्फंडीबुलम (कीपम)
(ब) सर्विक्स ग्रीवा
(स) ऐम्पूला ( तुम्बिका)
(द) इस्थमस (तनुयोजी)
उत्तर:
(अ) इन्फंडीबुलम (कीपम)

18. वृषण की कौनसी कोशिकाएँ टेस्टोस्टीरोन (नर लिंग हॉर्मोन) स्रावित करती हैं ? ( CBSE PMT – 2001, JPMT – 2007)
(अ) अन्तराली कोशिकाएँ अथवा लीडिंग कोशिकाएँ
(ब) जनन एपीथिलियम की कोशिकाएँ
(स) सरटोली कोशिकाएँ
(द) द्वितीयक स्पर्मेटोसाइट।
उत्तर:
(अ) अन्तराली कोशिकाएँ अथवा लीडिंग कोशिकाएँ

19. वृषण में पाई जाने वाली सर्टोली कोशिकाएँ क्या होती हैं? (MP PMT-2007)
(अ) पोषक कोशिकाएँ
(ब) प्रजनन कोशिकाएँ
(स) संवेदी कोशिकाएँ
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(अ) पोषक कोशिकाएँ

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20. 400 शुक्राणुओं के निर्माण के लिए कितने सेकण्डरी स्पर्मेटोसाइट्स की आवश्यकता होगी- (MP PMT-2006)
(अ) 100
(स) 40
(ब) 200
(द) 400
उत्तर:
(ब) 200

21. रजोचक्र का तात्कालिक शुरू हो जाना निम्नलिखित में से किस हॉर्मोन की उपलब्धता समाप्त होने के कारण होता है- (NEET-2006)
(अ) ऐस्ट्रोजन
(ब) FSH
(स) FSH-RH
(द) प्रोजेस्ट्रोन
उत्तर:
(द) प्रोजेस्ट्रोन

22. सर्टोली कोशिकाओं का नियमन कौनसे पिट्यूटरी हॉर्मोन से होता है (NEET-2005)
(अ) FSH
(ब) GH
(स) प्रोलेक्टिन
(द) LH
उत्तर:
(अ) FSH

23. यदि स्तनी अण्डाणु निषेचन नहीं हो पाता तो निम्नलिखित में से कौनसा एक असम्भावित है- (NEET-2006)
(अ) एस्ट्रोजन का स्रवण और भी तेज हो जाएगा
(ब) प्रोजेस्ट्रोन का स्रवण तेजी से गिर जाएगा
(स) का सल्यूटियम विघटित हो जाएगा
(द) प्राथमिक पुष्टक विकसित होने लग जाता है।
उत्तर:
(अ) एस्ट्रोजन का स्रवण और भी तेज हो जाएगा

24. मानव स्त्रियों में रजोचक्र के दौरान अण्डोत्सर्ग सामान्यतः किस समय होता है- (NEET-2004)
(अ) स्रवण प्रावस्था के समाप्त होने के ठीक पूर्व
(ब) प्रचुरोद्भवन प्रावस्था के आरम्भ होने पर
(स) प्रचुरोद्भवन प्रावस्था के समाप्त होने पर
(द) मध्य स्रावण प्रावस्था पर
उत्तर:
(स) प्रचुरोद्भवन प्रावस्था के समाप्त होने पर

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25. निम्नलिखित में से कौनसा एक हॉर्मोन अपरा (Placenta ) का स्रवण उत्पाद नहीं है- (NEET-2004)
(अ) प्रोलेक्टिन
(ब) एस्ट्रोजन
(स) प्रोजेस्ट्रोन
(द) मानव कारियोनिक गोनेडोट्रोपिन ।
उत्तर:
(अ) प्रोलेक्टिन

26. भ्रूण परिवर्धन के दौरान अग्र/पश्च पृष्ठ / अधर अथवा मध्य / पार्श्व अक्ष पर ध्रुवता की स्थापना को क्या कहते हैं? (NEET 2003)
(अ) आर्गेनाइजर परिघटना,
(ब) अक्षनिर्माण
(स) ऐनाफार्मोसिस
(द) प्रतिरूप निर्माण
उत्तर:
(अ) आर्गेनाइजर परिघटना,

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HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

Haryana State Board HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

प्रश्न 1.
पर्यावरणीय रसायन शास्त्र को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरणीय रसायन शास्त्र, विज्ञान की वह शाखा है जिसमें हम पर्यावरण में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों का अध्ययन करते हैं। इसमें हमारे चारों ओर का परिवेश सम्मिलित होता है; जैसे-वायु, जल, मिट्टी, वन, सूर्य का प्रकाश आदि। व्यापक रूप से, पर्यावरण के तीन प्रमुख घटक हैं-

  • अजैविक घटक (Abiotic or Non-living components) – स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल अजैविक घटक कहलाते हैं।
  • जैविक घटक (Biotic or Living components)-पर्यावरण के जैविक घटक पादप तथा जन्तु हैं। इनमें मनुष्य भी सम्मिलित है।
  • ऊर्जा घटक (Energy components)-पर्यावरण के ऊर्जा घटक में सौर ऊर्जा, भू-रासायनिक ऊर्जा, ताप-रासायनिक ऊर्जा, जल-विद्युत ऊर्जा तथा नाभिकीय ऊर्जा सम्मिलित हैं। ये ऊर्जाएँ विभिन्न जीवों को जीवित रखने के लिए अति आवश्यक हैं।

प्रश्न 2.
क्षोभमण्डलीय प्रदूषण को लगभग 100 शब्दों में समझाइए।
उत्तर:
क्षोभमण्डल भूमि से ऊपरी वायु का क्षेत्र होता है, जो पृथ्वी को घेरे रहता है। वायु में उपस्थित अवांछनीय ठोस तथा गैस कणों के कारण क्षोभमण्डलीय प्रदूषण होता है। वायु का क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र की मुख्य प्रदूषक वस्तुयें निम्न होती हैं-

(i) विघाक्त गैसें (Toxic Gases) – बढ़ते हुए औद्योगीकरण तथा बढ़ते हुए वाहनों के कारण क्षोभमण्डल में उपस्थित वायु में विषाक्त गैसें विसरित (Diffuse) हो जाती हैं। इन गैसों में वाहनों से उत्सर्जित CO, N2O, NO, SO2, SO3, H2S, ऐल्केन्स प्रदूषण का प्रमुख कारण होती हैं। इसके अतिरिक्त कीटनाशक एवं सधूम कारकों (Fumigents) का प्रभाव भी क्षोभमण्डल पर पड़ रहा है तथा वह दिन-प्रतिदिन अधिक प्रदूषित होता जा रहा है।

(ii) धूल कण (Sand Particles) – तीव्र गति से चलने वाले वाहन, वायु इत्यादि के साथ धूल, रेत आदि के कोलॉइडी कण क्षोभ मण्डल को प्रदूषित करते हैं। औद्योगिक अपशिष्ट के कण, राख, सीमेण्ट, सीसा इत्यादि के महीन कण भी क्षोभमण्डल को प्रदूषित करते हैं। अपशिष्ट प्रबन्धन द्वारा इसे नियन्त्रित किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
कार्बन डाईऑक्साइड अपेक्षा कार्बन मोनो ऑक्साइड अधिक खतरनाक क्यों है? समझाइए।
उत्तर:
CO2 की अपेक्षा CO ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह ऑक्सीजन की अपेक्षा अधिक प्रबलता से हीमोग्लोबिन के साथ संयुक्त होकर स्थायी संकुल बनाती है। इसके द्वारा कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनता है जो ऑक्सीहीमोग्लोबिन की अपेक्षा 300 गुना अधिक स्थायी है। यदि रक्त में कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन की मात्रा 3 – 4% तक पहुँच जाये तो रक्त में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम हो जाती है।

ऑक्सीजन की कमी से सिरदर्द, नेत्र दृष्टि में क्षीणता, तंत्रकीय आवेश में न्यूनता, हृदयवाहिका में तन्त्र अवस्था हो जाती है। CO की 1300 ppm की सान्द्रता प्राण घातक होती है। जबकि CO2 केवल वायुमण्डल की ताप वृद्धि के लिए उत्तरदायम है. वह हीमोग्लोबिन के साथ क्रिया नहीं करती है।

प्रश्न 4.
ग्रीन हाउस प्रभाव के लिये कौनसी गैसें उत्तरदायी हैं?
उत्तर:
ग्रीन हाउस-प्रभाव के लिए कार्बन डाइऑक्साइड, मेथेन, ओजोन, क्लोरोफ्लुओरो कार्बन यौगिक तथा जलवाष्प उत्तरदायी होती हैं। ये गैसें वायुमण्डल में विकिरित सौर-ऊर्जा की कुछ मात्रा अवशोषित करके भूमण्डलीय ताप बढ़ा देती हैं।

प्रश्न 5.
अम्ल वर्षा मूर्तियों तथा स्मारकों को कैसे दुष्प्रभावित करती है ?
उत्तर:
अम्ल वर्षा में वायुमण्डल से पृथ्वी की सतह पर अम्ल निक्षेपित हो जाता है। अम्लीय प्रकृति के नाइट्रोजन एवं सल्फर के ऑक्साइड वायुमण्डल में ठोस कणों के साथ हवा में बहकर या तो ठोस रूप में अथवा जल में द्रव रूप में कुहासे से या हिम की भाँति निक्षेपित होते हैं। नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड ऑक्सीकरण के पश्चात् जल के साथ अभिक्रिया करके अम्ल वर्षा में प्रमुख योगदान देते हैं, क्योंकि प्रदूषित वायु में सामान्यतया कणिकीय द्रव्य उपस्थित होते हैं जो ऑक्सीकरण को उत्प्रेरित करते हैं-

2SO2(g) + O2(g) + 2H2O(l) → 2H2SO4(aq)
4NO2(g) + O2(g) + 2H2O(l) → 4HNO3(aq)

अम्लवर्षा पत्थर एवं धातुओं से बनी संरचनाओं; जैसे- मूर्तियों तथा स्मारकों को नष्ट करती है। यह संगमरमर (CaCO3) से अग्रवत् अभिक्रिया करती है-

CaCO3 + H2SO4 → CaSO4 + H2O + CO2
संगमरमर
CaCO3 + 2HNO3 → Ca(NO3)2 + H2O + CO2

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

प्रश्न 6.
धूम्र कोहरा क्या है? सामान्य धूम्र कोहरा प्रकाश रासायनिक धूम्र कोहरा से कैसे भिन्न है?
उत्तर:
धूम-कोहरा-यह धूम एवं कोहरे से मिलकर बना है। यह दो प्रकार का होता है।

सामान्य धूम्न कोहरा: यह धूम्र, कोहरे एवं SO2 का मिश्रण है। रासायनिक रूप में ये एक अपचायक मिश्रण है। इसे अपचायक धूम्र कोहरा भी कहते है।

प्रकाश रासायनिक धूम्र कोहरा : यह उष्ण, शुष्क एवं साफ धूपमयी जलवायु में होता है। यह स्वचालित वाहनों तथा कारखानों से निकलने वाले नाइट्रोजन के ऑक्साइडों तथा हाइड्रोकार्बनों पर सूर्य के प्रकाश की क्रिया के कारण उत्पन्न होता आक्यीकारक है इ्रांक द्यमें ऑक्षीकारा से चै की जत्ला शम्ला त्रो कहते है|

प्रश्न 7.
प्रकाश रासायनिक धूम्र कोहरे के निर्माण के दौराम होने वाली अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
प्रकाश रासायनिक धूम्र कोहरे के निर्माण के दौरांन होने वाली अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 14 Img 1

प्रश्न 8.
प्रकाश रासायनिक धूम्र कोहरे के दुष्परिणाम क्या हैं? इन्हें कैसे नियन्त्रित किया जा सकता है ?
उत्तर:
प्रकाश रासायनिक धूम्र का निर्माण सामान्यतः विषैली गैसों के कारण होता है। इनका सामान्य घटक हानिकारक गैसों का उच्च आनुपातिक मिश्रण होता है, जिसमें NO, NO2, O3, CH2 = CH-CHO, HCHO, ऐसीटिल नाइट्रेट इत्यादि होते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 14 Img 2
जब मनुष्य इन्हें वायु के साथ ग्रहण करता है तो यह मानव स्वास्थ्य पर गम्भीर प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इन गैसों के कारण खाँसी, गले की तकलीफ, फेफड़ों की तकलीफ, सिरदर्द, आधासीसी, उच्च रक्तचाप, मिर्गी एवं दमा जैसे रोग होना आम बात है। प्रकाश रासायनिक कुहरे के परिणामस्वरूप रबर में दरार उत्पन्न हो जाती है। यह पौधों की वृद्धि पर भी कुप्रभाव डालता है तथा पौधों की वृद्धि को रोकता है।

मार्बल पत्थर पर प्रभाव, धातुओं (धातुओं के तारों पर) तथा मूर्तियों एवं भवनों के रंगों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है तथा उनके रंग धीरे-धीरे हल्के एवं मंद हो जाते हैं। सारांश में यह कहा जा सकता है कि प्रकाश रासायनिक कोहरे का व सजीव एवं निर्जीव तंत्रों पर क्षयकारी होता है।

नियन्त्रण (Control) – प्रकाश रासायनिक धूम्र का प्राथमिक कारण हानिकारक गैसें हैं। यदि वायुमण्डल में औद्योगिक क्षेत्रों से अथवा वाहनों से निकलने वाले धुएँ पर नियन्त्रण किया जाए तो उपरोक्त समस्याओं से बचा जा सकता है। महानगरों में यूरो मानक Uro-4 का उत्सर्जन लागू किया गया है, जिससे कुछ हद तक NO, SO2 इत्यादि की बढ़ती मात्रा पर नियंत्रण किया गया है।

प्रश्न 9.
क्षोभमण्डल पर ओजोन परत के क्षय में होने वाली अभिक्रिया कौन-सी है।
उत्तर:
क्षोभमण्डल पर ओजोन परत के क्षय में होने वाली अभिक्रियाएँ-कार्बन यौगिक, हैलोजेन, क्लोरोफॉर्म, NO आदि के बढ़ते हुए उपयोग के कारण वायुमण्डल में इन सभो पदार्थों की अधिकता होती जा रही है। यही प्रदूषक ओजोन परत के अपक्षय का मुख्य कारण हैं। वायुमण्डल में लम्बे समय तक पाए जाने के कारण, ये यौगिक सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों द्वारा विघटित हो जाते हैं। विघटन से बनने वाले उत्पाद ओजोन परत को नष्ट करते हैं।

ओजोन परत के क्षय के लिए क्लोरो-फ्लुओरो कार्बन (CFCs) गैसें सर्वाधिक उत्तरदायी हैं। क्लोरो-फ्लुओरो कार्बन वस्तुतः रेफ्रीजरेटरों, वातानुकूल संयन्त्रों, फोम निर्माण, सौन्दर्य प्रसाधन स्प्रे आदि में प्रयोग किया जाता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 14 Img 3
अत: उपर्युक्त अभिक्रियाओं से स्पष्ट है कि क्लोरो-फ्लुओरो कार्बन द्वारा उत्पादित एक क्लोरीन मूलक ओजोन के कई अणुओं को नष्ट कर देता है।
सुपरसोनिक विमानों द्वारा निकली नाइट्रिक ऑक्साइड ओजोन परत में पहुँचकर उसे नष्ट करती है।
NO + O3 → NO2 + O2

प्रश्न 10.
ओजोन छिद्र से आप क्या समझते हैं? इसके परिणाम क्या हैं?
उत्तर:
ओजोन छिद्र (Ozone hole)-हाइड्रोकार्बन्स तथा फ्रेऑन्स अथवा गैसीय प्लास्टिक अवशिष्टों के वायुमण्डल में ओजोन से क्रिया करके उसकी परत को पतला कर देना ओजोन छिद्र बनना कहलाता है। ओजोन छिद्र बनने के कारण पृथ्वी के ऊपर ओजोन की रक्षक परत सूर्य से आने वाले घातक पराबैंगनी विकिरण को पूर्ण रूप से नहीं रोक पा रही है। इस कारण पृथ्वी के तापमान में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

ओजोन परत अपक्षय का जीवन पर प्रभाव-ओजोन परत पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों के लिए एक चादर का कार्य करती है। सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी विकिरण यदि सीधे पृथ्वी तक पहुँचती हैं, तो त्वचा केंसर जैसा भयानक रोग उत्पन्न हो जायेगा। इसके साथ-साथ आनुवांशिक गुणों में भी परिवर्तन आ जाएगा। पौधों में प्रकार संश्लेषण की दर कम हो जायेगी। पराबेंगनी विकिणों के कारण मनुष्य में से हिस्टेमिन नामक रसायन निकलता है। जिसके कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।

प्रश्न 11.
जल प्रदूषण के मुख्य कारण क्या हैं? समझाइये। उत्तर-जल में प्रदूषण उत्पन्न करने वाले मुख्य प्रदूषक तथा उनके स्रोत निम्नलिखित माने गये हैं
उत्तर:

प्रदूषणस्रोत/कारण
(i) सूक्ष्म जीवघरेलू सीवेज से
(ii) कार्बनिक अपशिष्टघरेलू सीवेज, पशु अपशिष्ट, सड़े हुए मृत पशु तथा पौधे, खाद्य संसाधन, कारखानों से विसर्जन से
(iii) पादप पोषकरासायनिक उर्वरक से
(iv) विषाक्त भारी वस्तुउद्योग तथा रसायन कारखानों से कीटों, कवक तथा खरपतवार को नष्ट करने के लिये प्रयुक्त रसायन से
(v) पीड़कनाशीयूरेनियम युक्त खनिजों के खनन से
(vi) रेडियोधर्मी पदार्थस्रोत/कारण

यदपि वर्गौकृत सभी प्रदूषण्क जल के लिए घातक हैं। परन्तु इनमें सबसे अधिक घातक प्रदूषक रेड्वियोधर्मीं पदार्थ है, जो बिकसित देशों में गम्भीर समस्या उत्पन्न करते हैं। भारत जैसे विकसित देश में रासायनिक प्रदूषक, जल पर तीव्र प्रभाव डाल रहे हैं। नदियों के किनारे स्थित चमड़ा उद्योग, काँच उद्योग, वस्त्र उच्योग, कागज उद्योग, प्लास्टिक उद्योग, रंजक उदोग, उर्वरक उधोग, पेय (Beverage) उद्योग इत्यादि जल प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। जल का सबसे प्रमुख गुण यह है कि वह सार्वभौमिक विलायक है। अतः यह आसानी से प्रदूषित हो जाता है।

प्रश्न 12.
क्या आपने अपने क्षेत्र में जल प्रदूषण देखा है। इसे नियन्त्रित करने के कौन-से उपाय हैं?
उत्तर:
हाँ। हमारे क्षेत्र में जल प्रदूषिता हो रहा है। जल के प्रदूषित होने की जाँच हम स्वयं कर सकते हैं। इसके लिए हम स्थानीय झोतों का निरीक्षण कर सकते हैं। जैसे कि नदी, तालाब, कुणँ, झील आदि का पानी अप्रदूषित या आंशिक प्रद्धित या सामान्य प्रद्षित या अत्यधिक प्रद्षित हैं, इसकी जानकारी हम pH के द्वारा ज्ञात कर सकते है।

जल प्रदूषण नियंत्रण हेतु उपाय-जल प्रदूषण को नियँत्रित करने के लिए अग्रलिखित उपाय किए जाने चाहिए-

  • उछोगों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों को बिना उपचार के नदी में नही बहाना चाहिए।
  • घरेलू बहिंसाव एवं सीवेज में बहने वाले अपशिष्ट पदार्थाँ को उपचारित करने के बाद ही जल में ब्रेड़ना चाहिए।
  • औधोगिक क्षेत्र, आवादी क्षेत्रों से दूर होने चाहिए।
  • साजुन और अपमार्जकीं (डिटरजेंट) का प्रयोग कम से कम करना चाहिए।
  • पीने के पानी की पाइ्दप लाइन, सीखेज लाइन से काफी दूर होनी चाहिए।
  • मरे हुए जानवरों के शरीर को तालाब या नदी में नहीं डालना चाहिए।
  • जलाशय में कछुआ, मछली, घोंघा आदि की संख्या में वृद्धि होनी चाहिए जिससे कि जलाशय को साफ रखा जा सके।
  • उर्वरकों एवं रसायनों का प्रयोग कृषि में कम से कम किया जाना चाहिए।
  • जलाशय में पशुओं को नहलाना नहीं चाहिए।
  • जल में विलेय ऑक्सीजन की मात्रा को बनाए रखने के लिए वनस्पति को जल में बढ़ने से रोकना चाहिए।
  • नए उद्योग लगाने की दशा में, स्थापना के समय ही जल उपचार संयंत्र अवश्य लगाना चाहिए।
  • समुद्री जल को प्रदूषण से बचाने के लिए उसमें खनिज तेलों को फैलने से रोकना चाहिए।
  • जल प्रदूषण के नियंत्रण के सम्बन्ध में सरकार द्वारा मानक मापदण्ड निर्धारित करके उनको लागू करना चाहिए।
  • लोगों को जल प्रदूषण रोकने के लिए जन चेतना जाग्रत करना चाहिए।
    उपर्युक्त सभी जल-प्रदूषण नियंत्रण के कारगर उपाय हैं।

प्रश्न 13.
आप अपने ‘जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग’ (BOD) से क्या समझते हैं?
उत्तर:
जल के एक नमूने के निश्चित आयतन में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ को विखण्डित करने के लिए जीवाणु द्वारा आवश्यक जॉक्सीजन को ‘जैवरासायनिक ऑक्सीजन माँग (BOD)’ कहा जाता है। अतः जल में BOD की मात्रा कार्बनिक पदार्थ को जैवीय रूप में विखण्डित करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा होती है। स्वच्छ जल की BOD का मान 5 ppm से कम होता है, जबकि अत्यधिक प्रदूषित जल में यह 17 ppm या इससे अधिक होता है।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

प्रश्न 14.
क्या आपने आस-पास के क्षेत्र में भूमि प्रदूषण देखा है? आप भूमि प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिये क्या प्रयास करेंगे ?
उत्तर:
हाँ, हमने अपने आसपास के क्षेत्र में भूमि-प्रदूषण देखा है। भूमि प्रदूषण की रोकथाम के उपाय-

  1. औद्योगिक संस्थान के कचरे का उपचार किये बिना निष्कासित किये जाने पर दण्ड का प्रावधान होना चाहिए एवं घरेलू कचरे का प्रबन्धन भी भली प्रकार होना चाहिये।
  2. कृषि में स्थिर प्रकृति के रसायनों के उपयोग पर रोक होनी चाहिए। इसके स्थान पर जैव उर्वरक व जैविक कीटनाशी के प्रयोग पर बदल देना चाहिए।
  3. अनियन्त्रित उत्खनन पर पाबन्दी लगनी चाहिए।
  4. भूमि अपरदन (soil erosion) रोकने के लिए सधन वृक्षारोपण होना चाहिए।
  5. अपमार्जकों का प्रयोग कम करना चाहिए तथा प्रदूषित जल सिंचाई के लिये उपयोग नहीं किया जाना चाहिये।
  6. भूमिगत परमाणु परीक्षणों पर रोक लगानी चाहिये।
  7. अधिक से अधिक संख्या में वृक्षारोपण करना चाहिये।
  8. जनता को मृदा प्रदूषण से होने वाले नुकसान के बारे में अंखबार, टेलीविजन, मीडिया, नाटकों द्वारा जागरूक करना चाहिये।

प्रश्न 15.
पीडकनाशी तथा शाकनाशी से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित समझाइये ।
उत्तर:
पीडकनाशी-द्वितीय विश्वयुद्ध से पूर्व प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले अनेक रसायनों जैसे निकोटीन का प्रयोग अनेक फसलों के लिए पीडक-नियन्त्रण के रूप में किया जाता था। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मलेरिया तथा अन्य कीटजनित रोगों के नियन्त्रण में D.D.T बहुत उपयोगी पाया गया। युद्ध के पश्चात् D.D.T का प्रयोग कृषि में कीट, सेर्डेंट, खर-पतवार तथा फसलों के अनेक रोगों के नियन्त्रण में किया जाने लगा परन्तु बाद में यह प्रतिबन्धित किया गया।
मूल रूप से पीडकनाशी विषैले रसायन हैं जो पारिस्थितिकी प्रतिघाती भी हैं। इनका प्रयोग फसलों को हानिकारक कीटों तथा रोगों से बचाने हेतु करते हैं।

उदाहरणार्थ डाइऐल्ड्रीन, बी.एच.सी. ऐल्ड़ीन आदि। ये जल में अविलेय तथा अजैवनिम्नीकरणीय होते हैं। ये उच्च प्रभाव वाले जीव-विष भोजन शृंखला द्वारा निम्नपोषी स्तर से उच्चपोषी स्तर तक स्थानान्तरित होते हैं। समय के साथ-साथ उच्व प्राणियों में जीव-विषों की सान्द्रता बढ़ जाती है। यह अधिक सान्द्रता उपापचयी तथा शरीर क्रियात्मक अव्यवस्था का कारण बन जाती है। उच्च स्थायित्व वाले क्लोरीनीकृत कार्बनिक जीव-विष के प्रत्युत्तर में निम्न स्थायित्व अथवा अधिक जैव निम्नीकरणीय उत्पादों जैसेआर्गेनों फोंस्फेट्स तथा काबोनेट्स को प्रचलन में लाया गया परन्तु ये और अधिक हानिकारक होते हैं।

शाकनाशी-वे रसायन जो खरपतवार का नाश करने के लिए प्रयोग किये जाते हैं। उन्हें शाकनाशी कहते हैं। उदाहरण-सोडियम क्लोरेट, सोडियम आर्सिनेट, पोटैशियम आर्सिनेट आदि। ये स्तनधारियों के लिए विषैले होते हैं परन्तु कार्बक्लोराइड के समान स्थायी नहीं होते तथा कुछ समय पश्चात् अपघटित हो जाते हैं।

प्रश्न 16.
हरित रसायन से आप क्या समझते हैं? यह वातावरणीय प्रदूषण को रोकने में किस प्रकार सहायक है ?
उत्तर:
हरित रसायन (Green Chemistry)-विषैले रसायनों की मात्रा वायुमण्डल में कम से कम करने या फैलने से रोकने के लिए एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया है, जिसे हरित रसायन कहते हैं। हरित रसायन के द्वारा अभिक्रियाओं का प्रारूप तैयार करके उस अभिक्रिया के अभिकर्मकों एवं उत्पादों के गुणों व प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। रासायनिक अभिक्रिया में उन पदार्थों तथा विलायकों का प्रयोग किया जाना चाहिए जो मनुष्य एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक न हों।

मानव के लिए उपयोग – हरित रसायन मानव के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है। कृषि रसायनों के उत्पादन के लिए अब विषैले पदार्थों जैसे-सायनाइड, फॉर्मेल्डिहाइड आदि की आवश्यकता नहीं होती है। वायु प्रदूषण रोकने के लिए वाहनों में पेट्रोल, डीजल के स्थान पर हौलियम आदि का प्रयोग किए जाने पर शोधकार्य किए जा रहे हैं।

प्रदूषण घटाने में योगदान-दरित रसायन एक नया क्षेत्र अबश्य है, परन्तु इसके द्वारा प्रदूषण घटाने में कुछ विशेष उपलब्धियाँ हासिल की गई है। हरित रसायन के द्वारा किसी भी रासायनिक अभिक्रिया का प्रारूप तैयार करके उसमें प्रयुक्त रसायन एवं बनने वाले उत्पाद के गुणों एवं प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

रासायनिक अभिक्रियाओं को सूय्य के पराबैगनी प्रकाश, ध्वनि तरंगों एवं सुक्ष्म तरंगों की उपस्थिति में कराने पर सकारात्मक परिणाम सामने आए है। आजकल प्रतिजैविकों के निमांण में एन्जाइम का उपयोग उत्प्रेरक की तरह किया जा रहा है। हरित रसायन की मदद से कुछ ऐसे कार्बनिक विलायक बनाए गए हैं जो कि मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नह़ी हैं और न ही पर्यावरण में प्रदूषण उत्पन्न करते हैं।

हरित रसायन के ही द्वारा SO2 को सल्फर में अपचयित कर वायु प्रदूषण कम करने की विधि तैयार की गई है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 14 Img 5
SO2 गैस के अवशोषण के लिए चूने के पत्थर का उपयोग उद्योगों में किया जा रहा है।
2CaCO3 + 2SO2 + O2 → 2CaSO4 + 2CO2

हरित रसायन के द्वारा जिओलाइट पर आधारित अपमार्जंकों का उपयोग किया जाता है जो कि प्रदूषण को कम करता है। आजकल फोम शीटों के पैकिंग के लिए क्लोरो-फ्लूओरो कार्बन के स्थान पर CO2 का उपयोग किया जा रहा है। मोटर वाहनों के द्वारा होने वाले वायु प्रदूषण को रोकने के लिए पेट्रोल, डीजल के स्थान पर हीलियम आदि के प्रयोग के लिए शोधकार्य किए जा रहे हैं।

कृषि रसायनों के निर्माण में ऐसी विधियाँ खोजी जा रही हैं, जिनमें विधले पदार्थ सायनाइड, फॉर्मेल्डिहाइड आदि की आवश्यकता नहीं पद्ती है। अतः हरित रसायन अभी सिर्फ एक शुरुआत है। इसके द्वारा अनेक शोध कार्य किए जा रहे हैं। कुछ ऐंसी तकनीकों का विकास किया जा रहा है जो प्रदूषण रोकने के लिए महत्वपूर्ण भुमिका अदा करेंगी।

प्रश्न 17.
क्या होता, जब भू-वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसें नहीं होतीं ? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
यदि भू-वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसें न होतीं तो पृथ्वी का ताप घट जाता। पौधे प्रकाश-संश्लेषण नहीं कर पाते (यदि CO2 उपस्थिति नहीं होती)। पौधों की अनुपस्थिति में मानव-जीवन भी नहीं होता।

प्रश्न 18.
एक झील्ल में अचानक असंख्य मृत मछलियाँ तैरती हुई मिलीं। इसमें कोई विषाक्त पदार्थ नहीं था, परन्तु बहुतायत में पादप प्लवक पाए गए। मछलियों के मरने का कारण बताइए।
उत्तर:
जल में कार्बनिक द्रव्यों; जैसे-पत्तियों, घास, कूड़ा-करकट आदि की उपस्थिति के कारण पादप प्लवक विकसित हो जाते हैं। ये जल में घुलित ऑक्सीजन की अत्यधिक मात्रा का उपभोग कर लेते हैं जो जलीय जीवों; जैसे-मछली के जीवन हेतु अत्यन्त आवश्यक होती है। यदि जल में घुलित ऑक्सीजन की सान्द्रता 6 ppm से नीचे हो जाए तो मछलियों का विकास रूक जाता है।

जल में ऑक्सीजन या तो वातावरण या कई जलीय पौर्धों द्वारा दिन में प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रम से पहुँचती है। रात में प्रकाश-संश्लेषण रूक जाता है, परन्तु पौधे श्वसन करते हैं जिससे जल में घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है। घुलित ऑक्सीजन सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा कार्बनिक यौगिकों के ऑक्सीकरण में भी उपयोग में ली जाती है। इस प्रकार पादप प्लवकों तथा अन्य कारणों से जल में आँक्सीजन की कमी हो जाने के कारण मछलियाँ मृत पाई गई।

प्रश्न 19.
घरेलू अपशिष्ट किस प्रकार खाद के रूप में काम आ सकते हैं ?
उत्तर:
घरेलू अपशिष्ट में जैवनिम्नीकरण तथा अजैवनिम्नीकरण, दोनों घटकों का समावेश होता है। अपशिष्ट में से दोनों घटकों को छँटकर पृथक् कर लेते हैं। जैव अनिम्नीकरण पदार्थों; जैसे-प्लास्टिक, काँच, धातु छीलन आदि को पुनर्चक्रण के लिए भेज दिया जाता है। जैवुनिम्निकरण अपशिष्टों को खुले मैदानों में मिट्टी में दबा दिया जाता है। जैवनिम्नीकरण अपशिष्ट में कार्बनिक द्रव्य होते हैं जो कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रश्न 20.
आपने अपने कृषि-क्षेत्र अथवा उद्यान में कम्पोस्ट खाद के लिए गड्डे बना रखे हैं। उत्तम कम्पोस्ट बनाने के लिए इस प्रक्रिया की व्याख्या दुर्गाध, मक्खियों तथा अपशिष्टों के चक्रीकरण के सन्दर्भ में कीजिए।
उत्तर:
यदि अपशिष्ट को कम्पोस्ट में परिवर्तित न किया जाए तो वह नालियों में चला जाता है। इसमें से कुछ मवेशियों द्वारा खा लिया जाता है। कम्पोस्ट खाद बनाने की प्रक्रिया दुर्गन्धपूर्ण होती है। इस पर मक्खियाँ उड़ती रहती हैं, इसे दुर्गन्ध तथा मक्खियों से बचाने के लिए मिट्टी से ढक दिया जाता है। अपशिष्ट के कम्पोस्ट खाद में परिवर्तन के पश्चात् इस पर डाली गई मिट्टी को हटा दिया जाता है तथा कम्पोस्ट खाद प्राप्त कर ली जाती है। यह खाद पौधों के लिए अत्यन्त उपयोगी होती है।

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HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

Haryana State Board HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

प्रश्न 1.
निम्नलिखित स्पीशीज में प्रत्येक रेखांकित तत्व की ऑक्सीकरण संख्या का निर्धारण कीजिए-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 1
उत्तर:
(क) NaH2PO4 में माना कि P की ऑक्सीकरण संख्या x है।
Na H2 P O4
(+1) + 2 × (+1) + x + 4 × (- 2) = 0
या + 1 + 2 + x – 8 = 0
या x + 5 = 0
x = + 5

(ख) NaHSO4 में माना कि S की आ. सं. x है।
Na H SO4
+ 1 + 1 + x + 4 × (- 2) = 0
या + 2 + x – 8 = 0
या x – 6 = 0
∴ x = + 6

(ग) H4P2O7 में माना कि P की आ. सं. x है।
H4 P2 O7
4 × (+ 1) + 2 × x + 7 (- 2) = 0
या + 4 + 2x – 14 = 0
या 2x – 10 = 0
या 2x = +10
∴ x = \(\frac { 10 }{ 2 }\) = +5

(घ) K2MnO4 में माना कि Mn की आ. सं. x है
K2 Mn O4
2 × (+ 1) + x + 4 × (- 2) = 0
या + 2 + x – 8 = 0
या x – 6 = 0
∴ x = +6

(ङ) CaO2 में माना कि O की आ. सं. x है।
Ca O2
+ 2 + 2 × x = 0
या 2x = – 2
या x = \(\frac { -2 }{ 2 }\)
∴ x = -1

(च) NaBH4 में माना कि B की आ. सं. x है।
Na B H4
+ 1 + x + 4 × (-1) = 0
या + 1 + x – 4 = 0
या x – 3 = 0
∴ x = +3

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

(छ) H2S2O7 में माना कि S की आ. सं. x है।
H2 S2 O7
2 ×(+1) + 2 × x + 7 ×(- 2) = 0
या + 2 + 2x – 14 = 0
या 2x – 12 = 0
या 2x =+ 12
या x = \(\frac { +12 }{ 2 }\)
∴ x = +6

(ज) KAl(SO4)2.12H2O में माना S की आ. सं. x है।
K Al (SO4)2. 12H2O
+ 1 + 3 + 2[x + 4 (-2)] + 12 (2 × 1 + (-2) = 0
या 2x – 12 = 0
या 2x = + 12
या x = \(\frac { +12 }{ 2 }\)
x = +6

प्रश्न 2.
निम्नलिखित यौगिकों के रेखांकित तत्वों की ऑक्सीकरण संख्या क्या है तथा इन परिणामों को आप कैसे प्राप्त करते हैं ?
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 2
उत्तर:
(क) माना कि KI3 में I की ऑक्सीकरण संख्या x है।
K I3
(+1) + x × 3 = 0
या 3x = -1
∴ x = \(\frac { +1 }{ 3 }\)

स्पष्टीकरण-उपर्युक्त उदाहरण में आयोडीन की ऑक्सीकरण संख्या भिन्नात्मक अर्थात् \(\left(-\frac{1}{3}\right)\) आयी है, जो कि सम्भव प्रतीत नहीं होती है। यदि हम \(\mathrm{I}_3^{-}\) की संरचना पर विचार करें तो हम पायेंगे कि आयोडीन के दो परमाणु सहसंयोजक आबन्ध (I – I) के द्वारा जुड़े हुए हैं तथा आयोडीन आयन (I) इस अणु से उपसहसंयोजक बन्ध (I) के द्वारा जुड़ा हुआ है। [I – I ← I] इस प्रकार KI3 को हम निम्न रूप से प्रदर्शित कर सकते हैं-
K+[I – I ← I]
अब \(\mathrm{I}_3^{-}\) आयन में दो आयोडीन परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्या शून्य एवं एक I आयन की ऑक्सीकरण संख्या -1 है। अतः \(\mathrm{I}_3^{-}\) आयन की औसत ऑक्सीकरण संख्या इस प्रकार आयेगी-
\(\frac{0+0+(-1)}{3}\) = \(-\frac{1}{3}\)

(ख) H2S4O6 में माना कि S की ऑक्सीकरण संख्या x है।
H2 S4 O6
2 × (+1) + 4 × x + 6 × (-2) = 0
या + 2 + 4 x – 12 = 0
या 4x – 10 = 0
या 4x = +10
या x = \(\frac { +10 }{ 4 }\)
∴ x = +\(\frac { 5 }{ 2 }\) या + 2.5

स्पष्टीकरण-यहाँ सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या भिन्नात्मक है। इस भिन्नात्मक मान को हम अम्ल की संरचना के द्वारा ही स्पष्ट कर सकते हैं। H2S4O6 की संरचना निम्न प्रकार है-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 3
संरचना से स्पष्ट है कि दो मध्यवर्ती सल्फर परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्या शून्य है जबकि सीमान्त स्थिति में स्थित सल्फर परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्या +5 है।
अतः सल्फर की औसत ऑक्सीकरण संख्या
= \(\frac { 1 }{ 4 }\) [5 + 0 + 0 + 5] = \(\frac { 10 }{ 4 }\) = \(\frac { 5 }{ 2 }\)

(ग) Fe3O4 में माना कि Fe की ऑक्सीकरण संख्या x है।
Fe3 O4
3 × x + 4 × (-2) = 0
या 3x – 8 = 0
या 3x = +8
∴ = \(\frac { +8 }{ 3 }\)
स्पष्टीकरण- Fe3 O4 में Fe की ऑक्सीकरण संख्या भिन्नात्मक है। इसका कारण है कि Fe3 O4 एक मिश्रित ऑक्साइड है। यह FeO तथा Fe2 O3 का सममोलर मिश्रण होता है।

FeO में Fe की ऑक्सीकरण संख्या +2 है जबकि Fe2 O3 में दोनों Fe की ऑक्सीकरण संख्या +3 है। अतः
Fe की औसत ऑक्सीकरण संख्या
= \(\frac { 1 }{ 3 }\) [+ 2 + 3 + 3] = \(\frac { 8 }{ 3 }\)

(घ) माना कि CH3CH2OH में C की ऑक्सीकरण संख्या x है।
CH3 CH2 OH
x + 3 + x + 2 + (-2) + 1 = 0
या 2x + 4 = 0
या 2x = -4
या x = \(\frac { -4 }{ 2 }\)
x = -2

स्पष्टीकरण – अब हम CH3CH2OH में C1 तथा C2 परमाणुओं की ऑक्सीकरण संख्या की गणना करते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 4
C2 कार्बन परमाणु तीन हाइड्रोजन परमाणुओं के साथ जुड़ा है। ये हाइड्रोजन परमाणु कम वैद्युत ऋणात्मक होते हैं साथ ही यही C2 कार्बन परमाणु एक CH2OH समूह से भी जुड़ा हुआ है। यह समूह कार्बन से अधिक वैद्युत ॠणात्मक है। अतः C2 की ऑक्सीकरण संख्या = 3 × (+1) + x + 1 ×(-1) = 0; x = -2

C1 कार्बन परमाणु जैसा कि चित्र से स्पष्ट है कि, यह एक OH समूह से (जिसकी ऑक्सीकरण संख्या -1 है) तथा दो H परमाणु से (जिसकी ऑक्सीकरण संख्या +1) एवं एक CH3 समूह से (ऑक्सीकरण संख्या = +1) से जुड़ा है, अत:
C1 की ऑक्सीकरण संख्या =
1 × (+1) + x + 1 × (-2) + 1 ×(-1) = 0
या +1 + x – 2 – 1 = 0
∴ x = + 2
कार्बन की औसत ऑक्सीकरण संख्या
= \(\frac { 1 }{ 2 }\) [+2 + -2] = 0

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं का अपचयोपचय अभिक्रियाओं के रूप में औचित्य स्थापित करने का प्रयास करें-
(क) CuO(s) +H2(g) → Cu(s) + H2O(g)
(ख) Fe2O3(s) + 3CO(g) → 2Fe(s) + 3 CO2(g)
(ग) 4BCl3(g) + 3LiAlH4(s) → 2 B2H6(g) + 3LiCl(g) + 3 AlCl3(s)
(घ) 2K(s) + F2(g) → 2K2F(s)
(ङ) 4NH3(g) + 5O2(g) → 4NO(g) + 6H2O(g)
उत्तर:
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 5
उपर्युक्त अभिक्रिया में CuO से ऑक्सीजन निकल रही है और यह Cu में अपचयित हो रहा है, इसी के साथ-साथ Cu की ऑक्सीकरण संख्या +2 से 0 हो रही है अत: CuO, Cu में अपचयित हो रहा है। इसके साथ-साथ हाइड्रोजन से ऑक्सीजन जुड़ रही है और यह H2 से H2O में परिवर्तित हो रहा है, इसी के साथ-साथ हाइड्रोजन की आ. स. 0 से बढ़कर +1 हो रही है अत: इसका ऑक्सीकरण हो रहा है। इसलिए यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 6
यहाँ Fe की आ. सं. +3 से 0 में परिवर्तित हो रही है। अतः इसका अपचयन हो रहा है जबकि कार्बन की आ. सं. +2 से +4 में परिवर्तित हो रही है अतः इसका ऑक्सीकरण हो रहा है। चूंकि अभिक्रिया में ऑक्सीकरण तथा अपचयन दोनों हो रहे हैं अतः यह एक अपचयोपचय अधिक्रिया है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 7
चूंकि उपर्युक्त अभिक्रिया में आ. सं. में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है अतः अपचयोपचय अभिक्रिया नहीं है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 8
उपर्युक्त अभिक्रिया में K की ऑक्सीकरण संख्या 0 से +1 हो रही है अतः इसका ऑक्सीकरण हो रहा है तथा F की ऑक्सीकरण संख्या 0 से -1 हो रही है अतः इसका अपचयन हो रहा है चूंकि यहाँ ऑक्सीकरण और अपचयन दोनों हो रहे हैं। अतः यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 9
यहाँ ऑक्सीजन का अपचयन हो रहा है क्योंकि ऑक्सीकरण संख्या 0 से -2 में बदल रही है तथा नाइट्रोजन का ऑक्सीकरण हो रहा है क्योंकि इसकी ऑक्सीकरण संख्या -3 से +2 में परिवर्तित हो रही है। अतः यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है। है-

प्रश्न 4.
फ्लोरीन बर्फ से अभिक्रिया करके यह परिवर्तन लाती
H2O(s) + F2(g) → HF(g) + HOF(g)
इस अभिक्रिया का अपचयोपचय औचित्य स्थापित कीजिए।
उत्तर:
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 10
उपर्युक्त अभिक्रिया में फ्लोरीन का अपचयन और ऑक्सीकरण दोनों हो रहा है। यह अपचयोपचय अभिक्रिया के असमानुपात प्रकार का उदाहरण है।

प्रश्न 5.
H2SO5, Cr2O72- तथा NO3 में सल्फर, क्रोमियम तथा नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या की गणना कीजिए। साथ ही इन यौगिकों की संरचना बताइए तथा इसमें हेत्वाभास (Fallacy) का स्पष्टीकरण कीजिए।
उत्तर:
(i) H2SO5 में सल्फर की आ. सं. :
H2 S O5
2 × (+1) + x + 5 × (-2) = 0
+2 + x – 10 = 0
x = +8
परन्तु सल्फर की आ. सं. यहाँ +8 गलत है क्योंकि सल्फर की अधिकतम आ. सं. +6 हो सकती है इससे अधिक नहीं। परन्तु यहाँ सल्फर की आ. सं. +8 इसलिए आयी है क्योंकि यहाँ ऑक्सीजन की आ. सं. को गलत लिखा गया है, यहाँ ऑक्सीजन परऑक्साइड के रूप में उपस्थित है जिसकी आ. सं. (-1) होगी।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 11

H2 SO2 O3
2 × (+1) + x + 2 × (-1) + 3 × (-2) = 0
या + 2 + x – 2 – 6 = 0
∴ x = +6
अत: सल्फर की आ. सं. +6 है।
(ii) Cr2O72- में क्रोमियम की आ. सं. :
Cr2O72-
2 × x + 7 × (-2) = – 2
या 2x – 14 = – 2
या 2x = +12
∴ x = +6
यह आ. संख्या सही है क्योंकि चित्र के अनुसार प्रत्येक ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या (-2) है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 12

(iii) NO3 में N की ऑक्सीकरण संख्या-
NO3
x + 3 ×(-2) = -1
या x – 6 = -1
x = +5
यह ऑक्सीकरण संख्या सही है क्योंकि प्रत्येक ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण संख्या का मान यहाँ -2 ही है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 13

प्रश्न 6.
निम्नलिखित यौगिकों के सूत्र लिखिए-
(क) मरकरी (II) क्लोराइड
(ख) निकिल (II) सल्फेट
(ग) टिन (IV) ऑक्साइड
(घ) थैलियम (I) सल्फेट
(ङ) आयरन (III) सल्फेट
(च) क्रोमियम (III) ऑक्साइड
उत्तर:
(क) HgCl2
(ख) NiSO4
(ग) SnO2
(घ) Tl2SO4
(ङ) Fe2(SO4)3
(च) Cr2O3

प्रश्न 7.
उन पदार्थों की सूची तैयार कीजिए जिनमें कार्बन की -4 से +4 तक तथा नाइट्रोजन -3 से +5 तक की ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
उत्तर:
कार्बन की परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (-4 से +4 तक)
Table

प्रश्न 8.
अपनी अभिक्रियाओं में सल्फर डाइ- ऑक्साइड तथा हाइड्रोजन परऑक्साइड ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों ही रूपों में क्रिया करते हैं जबकि ओजोन तथा नाइट्रिक अम्ल केवल ऑक्सीकारक के रूप में ही। क्यों ?
उत्तर:
सल्फर डाइऑक्साइड SO2 तथा हाइड्रोजन परऑक्साइड (H2O2) में सल्फर तथा ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्रमश: +4 तथा -1 हैं। ये यौगिक रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेने के दौरान अपनी ऑक्सीकरण संख्याएँ घटा या बढ़ा सकते हैं अर्थात् ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों ही रूपों में क्रिया कर सकते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 14
ओजोन (O3) में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है, जबकि नाइट्रिक अम्ल में नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण अवस्था +5 है। चूँकि ये दोनों ऑक्सीकरण अवस्था में कमी तो प्रदर्शित कर सकते हैं, परन्तु वृद्धि नहीं कर सकते; अतः ये केवल ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करते है, अपचायक के रूप में नहीं।

प्रश्न 9.
इन अभिक्रियाओं को देखिए-
(क) 6CO2(g) + 6H2O(l) → C6H12O6(aq) + 6O2(g)
(ख) O3(g) + H2O2(l) → H2O(l) + 2O2(g)
बताइए कि इन्हें निम्नलिखित ढंग से लिखना ज्यादा उचित क्यों है ?

(क) 6CO2(g) + 12H2O(l) → C6H12O6(aq) + 6H2O(l) + 6O2(g)
(ख) O3(g) + H2O2(l) → H2O(l) + O2(g) + O2(g)
उपर्युक्त अपचयोपचय अभिक्रियाओं (क) तथा (ख) के अन्वेषण की विधि सुझाइए।
उत्तर:
(क) 6CO2(g) + 6H2O(l) → C6H12O6(aq) + 6O2(g)
उपर्युक्त समीकरण को असन्तुलित अवस्था में लिखते हैं-
CO2(g) + H2O(l) → C6H12O6(aq) + O2(g)
अब इस समीकरण को अर्द्ध-अभिक्रिया या आयन इलेक्ट्रॉन विधि से सन्तुलित करने पर-

पद 1. सर्वप्रथम सभी की आक्सीकरण संख्या लिखते हैं। अपचयन
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 15

पद 2. अब इन्हें ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया के रूप में लिखने पर,
(A) ऑक्सीकरण अर्द्ध अभिक्रिया-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 16
पद (a) ऑक्सीजन को सन्तुलित करने
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 17
पद (b) ऑक्सीकरण संख्या सन्तुलित करने पर,
2H2O → O2 + 4e
पद (c) हाइड्रोजन सन्तुलित करने पर,
2H2O → O2 + 4e + 4H+

(B) अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 18
पद (a) कार्बन सन्तुलित करने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 19
पद (b) ऑक्सीकरण संख्या सन्तुलित करने पर,
6CO2 + 24e → C6H12O6
पद (c) ऑक्सीजन संतुलित करने पर,
6CO2 + 24e → C6H12O6 + 6H2O
पद (d) हाइड्रोजन की संख्या संतुलित करने पर,
6CO2 + 24e + 24H+ → C6H12O6 + 6H2O

पद 3. अब सन्तुलित ऑक्सीकरण तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर तथा इलेक्ट्रॉन की संख्या सन्तुलित करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में 6 का गुणा करने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 20
उपर्युक्त लिखी अपचयोपचय अभिक्रिया की अन्वेषण की विधि बताती है कि किस प्रकार इलेक्ट्रॉन त्यागे या स्रहण किये जाते हैं, तथा इसके साथ-साथ इस अभिक्रिया को संशोधित रूप में किस तरह लिखते हैं, यह भी बताती है।
(ख) O3(g) + H2O2(l) → H2O(l) + 2O2(g)
इस समीकरण को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा सन्तुलित करते हैं-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 21
सन्तुलित ऑक्सीकरण तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रियाएँ लिखकर उन्हें जोड़ने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 22

  • इस अभिक्रिया में O3 ऑक्सीकारक की भाँति तथा H2O2 अपचायक की भाँति कार्य करते हैं।
  • यदि दो समान परमाणुओं के मध्य एक उपसहसंयोजी आबन्ध उपस्थित होता है तो दाता परमापु +2 ऑक्सीकरण संख्या प्राप्त करता है तथा ग्राही -2 ऑक्सीकरण संख्या प्राप्त करता है।

इस प्रकार अभिदि के अन्बेषण की विधि स्पष्ट हो जाती है तथा इसे संशोधित रूप में लिखने का कारण भी स्पष्ट हो जाता है।

प्रश्न 10.
AgF2 एक अस्थिर यौगिक है। यदि यह बन जाए तो यह यौगिक एक अति शक्तिशाली ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है। क्यों ?
उत्तर:
AgF2 वियोजित होकर Ag2+ तथा 2F देता है। Ag2+, अपचायक द्वारा एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके Ag+ में अपचयित हो जाता है।
Ag2+ + 6– → Ag+
Ag+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पूर्णतया भरे हुए d-कक्षकों के कारण स्थायी होता है।
Ag+(46) : 1s2, 2s2 2p6, 3s23p63d10, 4s24p64d10, 5s0
अतः AgF2 एक अति शक्तिशाली ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

प्रश्न 11.
“जब भी एक ऑक्सीकारक तथा अपचायक के बीच अभिक्रिया सम्पन्न की जाती है, तब अपचायक के आधिक्य में निम्नतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक तथा ऑक्सीकारक के आधिक्य में उच्चतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक बनता है।” इस वक्तव्य का औचित्य तीन उदाहरण देकर दीजिए।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 23

प्रश्न 12.
इन प्रेक्षणों की अनुकूलता को कैसे समझायेंगे ?
(क) यद्यपि क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट तथा अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट दोनों ही ऑक्सीकारक हैं। फिर भी टॉलुईन से बेन्जोइक अम्ल बनाने के लिए हम ऐल्कोहॉलिक पोटैशियम परमैंगनेट का प्रयोग ऑक्सीकारक के रूप में क्यों करते हैं? इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित अपचयोपचय समीकरण दीजिए।
(ख) क्लोराइड युक्त अकार्बनिक यौगिक में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल डालने पर हमें तीक्ष्ण गन्ध वाली HCl गैस प्राप्त होती है, परन्तु यदि मिश्रण में ब्रोमाइड उपस्थित हो तो हमें ब्रोमीन की लाल वाष्प प्राप्त होती है, क्यों ?
उत्तर:
(क) उदासीन माध्यम में KMnO4 निम्नलिखित प्रकार से ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है-
MnO4 + 2H2O + 3e → MnO2 + 4OH
प्रयोगशाला में टॉलुईन को बेन्जोइक अम्ल में ऑक्सीकृत करने के लिए क्षारीय $\mathrm{KMnO}_4$ का प्रयोग किया जाता है-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 24
औद्योगिक निर्माण के दौरान ऐल्कोहॉलिक KMnO4 को प्रयोग करने के निम्नलिखित दो कारण हैं-

  • अभिक्रिया के दौरान क्षार (OH आयन स्वतः उत्पन्न हो जाता है; अतः क्षार मिलाने का अतिरिक्त व्यय नहीं होता।
  • एक कार्बनिक ध्रुवी विलायक, एथिल ऐल्कोहॉल, दोनों अभिकारकों, $\mathrm{KMnO}_4$ (इसकी ध्रुवी प्रकृति के कारण) तथा टॉलुईन (इसके कार्बनिक यौगिक होने के कारण) को मिश्रित करने में सहायता प्रदान क्रता है।

(ख) एक क्लोराइडयुक्त अकार्बनिक यौगिक; जैसे- NaCl, जब सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया करता है, तब हाइड्रोजन क्लोराइड गैस उत्पन्न होती है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 25
ब्रोमाइड (जैसे- NaBr) की H2SO4 से अभिक्रिया पर भी HBr की वाष्प उत्पन्न होती है, परन्तु HBr के प्रबल अपचायक होने के कारण, यह सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा ऑक्सीकृत होकर ब्रोमीन की लाल वाष्प मुक्त करता है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 26

प्रश्न 13.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में ऑक्सीकृत, अपचयित, ऑक्सीकारक तथा अपचायक पदार्थ पहचानिए-

(क) 2AgBr(s) + C6H6O2(aq) → 2Ag(s) + 2HBr(aq) + C6H4O2(aq)
(ख) HCHO(l) + 2[Ag(NH3)2]+(aq) + 3OH(aq) → 2Ag(aq) + HCOO(aq) + 4NH3(aq) + 2H2O(l)
(ग) HCHO(l) + 2Cu2+(aq) + 5OH(aq) → Cu2O(s) + HCOO(aq) + 3H2O(l)
(घ) N2H4(l) + 2H2O2(l) → N2(g) + 4H2O(l)
(ङ) Pb(s) + PbO2(s) + 2H2SO4(aq) → 2PbSO4(s) + 2H2O(l)
उत्तर:
(क) 2AgBr(s) + C6H6O2(aq) → 2Ag(s) + 2HBr(aq) + C6H4O2(aq)
ऑक्सीकारक : AgBr (अपचयित पदार्थ)
अपचायक : C6H4O2(aq) (ऑक्सीकृत पदार्थ)

(ख) HCHO(l) + 2[Ag(NH3)2]+(aq) + 3OH(aq) → 2Ag(s) + HCOO(aq) + 4NH3(aq) + 2H2O(l)
ऑक्सीकारक : [Ag(NH3)2]+ (अपचयित पदार्थ)
अपचायक : HCHO (ऑक्सीकृत पदार्थ)

(ग) HCHO(l) + 2Cu2+(aq) + 5OH(aq) + 3H2O(l)
ऑक्सीकारक : Cu2+ (अपचयित पदार्थ)
अपचायक : HCHO (ऑक्सीकृत पदार्थ)

(घ) N2H4(l) + 2H2O2(l) → N2(g) + 4H2O(l)
ऑक्सीकारक : H2O2 (अपचयित पदार्थ)
अपचायक : N2H4 (ऑक्सीकृत पदार्थ)

(ङ) Pb(s) + PbO2(s) + 2H2SO4(aq) → 2PbSO4(s) + 2H2O(l)
ऑक्सीकारक : PbO2 (अपचयित पदार्थ)
अपचायक : Pb (ऑक्सीकृत पदार्थ)

प्रश्न 14.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में एक ही अपचायक थायोसल्फेट, आयोडीन तथा ब्रोमीन से अलग-अलग प्रकार से अभिक्रिया क्यों करता है?
2S2O32-(aq) + I2(s) → S4O62-(aq) + 2I(aq)
S2O32-(aq) + 2Br2(l) + 5H2O(l) → 2SO42-(aq) + 4Br(aq) + 10H+(aq)
उत्तर:
आयोडीन (I2) थायोसल्फेट आयन को टेट्राथायोनेट आयन में ऑक्सीकृत कर देती है अर्थात् S2O32- में S की ऑक्सीकरण संख्या +2 से S4O62- आयन में S की ऑक्सीकरण संख्या (\(\frac { 5 }{ 2 }\)) में परिवर्तित हो जाती है।

ब्रोमीन (Br2) थायोसल्फेट आयन को सल्फेट आयन में ऑक्सीकृत कर देती है अर्थात् S की ऑक्सीकरण संख्या +2 (S2O32- में) से +6(SO42- आयन में ) में परिवर्तित हो जाती है। इसका कारण यह है कि ब्रोमीन, आयोडीन की तुलना में प्रबल ऑक्सीकारक है।
E0(Br2/2Br = 1.09 V, E0(I2/2I) = 0.54 V |

प्रश्न 15.
अभिक्रिया देते हुए सिद्ध कीजिए कि हैलोजन में फ्लुओरीन श्रेष्ठ ऑक्सीकारक तथा हाइड्रो हैलिक यौगिकों में हाइड्रो आयोडिक अम्ल श्रेष्ठ अपचायक है।
उत्तर:
हैलोजनों में इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की क्षमता बहुत प्रबल होती है। अतः ये शक्तिशाली ऑक्सीकारक होते हैं। हैलोजनों की ऑक्सीकारक क्षमता इलेक्ट्रोड विभव के आधार पर निम्न प्रकार होती है।
F2(+2.87V)>Cl2(+1.36V) > Br2(+1.09V)>I2(+0.54V)
इलेक्ट्रोड विभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि F2 सर्वश्रेष्ठ ऑक्सीकारक है तथा यह अन्य हैलोजनों को उनके यौगिकों से मुक्त कर देता है।
F2 + 2Cl → 2F + Cl2
F2 + 2Br → 2F + Br2
F2 + 2I → 2F + I2
तथा Cl2 अपने से नीचे वाले हैलोजनों को उनके यौगिकों से विस्थापित कर देता है।
Cl2 + 2Br → 2Cl + Br2
Cl2 + 2I → 2Cl + I2

जबकि हैलाइड आयनों की प्रकृति इलेक्ट्रॉन को मुक्त करने की होती है। अतः वे अपचायक की तरह कार्य करते हैं। हैलाइड आयनों के इलेक्ट्रोड विभव निम्न प्रकार से हैं-
I(-0.54V) > Br(-1.09V) > Cl(-1.36V) > F(-2.87V)
अतः इनकी अपचायक प्रकृति निम्न प्रकार है-
HI > HBr > HCl > HF
अतः हाइड्रोआयोडिक एसिड सबसे प्रबल अपचायक है।
उदाहरण:
(i) HI तथा HBr, H2SO4 को SO2 में अपचयित कर देते हैं परन्तु HCl तथा HF नहीं कर सकते।
2HBr + H2SO4 → Br2 + SO2 + 2H2O
2HI + H2SO4 → I2 + SO2 + 2H2O

(ii) I, Cu2+ को Cu+ में अपचयित कर सकता है परन्तु Br नहीं
2Cu2+ +4I → Cu2I2 + I2
Cu2++ 2Br → कोई भी अभिक्रिया नहीं
अतः HI सबसे प्रबल अपचायक है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित अभिक्रिया क्यों होती है?
XeO64-(aq) + 2F(aq) + 6H+(aq) → XeO3(g) + F2(g) + 3H2O(l)
यौगिक Na4XeO6 (जिसका एक भाग XeO64- है) के बारे में आप इस अभिक्रिया में क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
उत्तर:
XeO64-(aq) + 2F(aq) + 6H+(aq) → XeO3(g) + F2(g) + 3H2O(l)

F2 के रासायनिक विधियों द्वारा निर्माण की हाल ही में यह अभिक्रिया विकसित की गई रासायनिक विधियों की श्रेणी में से एक है। यह प्रचलित विद्युत्-रासायनिक विधि नहीं है। इस अभिक्रिया में XeO64- एक प्रबल ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करते हुए F को F2 ऑक्सीकृत कर देता है जो विद्युत्-रासायनिक श्रेणी में सर्वाधिक अपचायक क्षमता वाला तत्व है।
F2 के निर्माण की एक अन्य रासायनिक विधि में अन्य प्रबल ऑक्सीकारक K2MnF6 प्रयुक्त होता है।
2K2MnF6 + 4SbF5 → 4KSbF6 + 2MnF3 + F2

प्रश्न 17.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में-
(क) H3PO2(aq) + 4AgNO3(aq) + 2H2O(l) → H3PO4(aq) + 4Ag(s) + 4HNO3(aq)

(ख) H3PO2(aq) + 2CuSO4(aq) + 2H2O(l) → H3PO4(aq) + 2Cu(s) + 2H2SO4(aq)

(ग) C6H5CHO(l) + 2[Ag(NH3)2]+(aq) + 3OH(aq) → C6H5COO(aq) + 2H2O(l)

(घ) C6H5CHO(l) + 2Cu2+(aq) + 5OH(aq) → कोई परिवर्तन नहीं।
इन अभिक्रियाओं से Ag+ तथा Cu2+ के व्यवहार के विषय में निष्कर्ष निकालिए।
उत्तर:
(क) Ag+ आयन Ag में अपचयित होकर अवक्षेपित हो जाते हैं।
(ख) Cu2+ आयन Cu में अपचयित होकर अवक्षेपित हो जाते हैं।
(ग) संकुल में उपस्थित Ag+(aq),Ag में अपचयित हो जाता है जो चमकदार दर्पण की भाँति अवक्षेपित हो जाता है।
(घ) Cu2+(aq) आयन C6H5CHO (बेन्जैल्डिाइड) द्वारा अपचयित नहीं होते जो एक दुर्बल अपचायक है।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

प्रश्न 18.
आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा निम्नलिखित रेडॉक्स अभिक्रियाओं को सन्तुलित कीजिए-
(क) MnO4(aq) + I(aq) → MnO2(s) + I2(s) (क्षारीय माध्यम)
(ख) MnO4(aq) + SO2(g) → Mn2+(aq) + HSO4(aq) (अम्लीय माध्यम)
(ग) H2O2(aq) + Fe2+(aq) → Fe3+(aq) + H2O(l) (अम्लीय माध्यम)
(घ) Cr2O72+ + SO2(g) → Cr+3(aq) + SO42-(aq) (अम्लीय माध्यम)
उत्तर:
(क) आयन इलेक्ट्रॉन विधि-
पद 1. सभी की ऑक्सीकरण संख्या लिखने पर-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 27

पद 2. अभिक्रिया को ऑक्सीकरण व अपचयन अर्द्ध अभिक्रिया में विभाजित करने पर,
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया-
पद (a) ऑक्सीकरण की संख्या सन्तुलित करने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 28

पद (b) ऑक्सीजन की संख्या सन्तुलित करने पर,
MnO4 + 3e → MnO2 + 2H2O

पद (c) हाइड्रोजन की संख्या को क्षारीय माध्यम में सन्तुलित करने के लिए दाईं तरफ 4OH तथा बाईं तरफ 4H2O को जोड़ने पर,
MnO4 + 3e + 4H2O → MnO2 + 2H2O + 4OH (सन्तुलित अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया)

ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 29
पद (a) आयोडीन की संख्या बराबर करने पर,
2I → I2

पद (b) आवेश बराबर करने पर,
2I → I2 + 2e (सन्तुलित ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया)

पद 3. अब सन्तुलित ऑक्सीकरण तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ें तथा इलेक्ट्रॉनों की संख्या सन्तुलित करने के लिए अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में 2 का तथा ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में 3 का गुणा करें।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 30

उत्तर:
आयन इलेक्ट्रॉन विधि-
पद 1. सर्वप्रथम प्रत्येक की ऑक्सीकरण संख्या लिखिए-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 31
पद 2. अंब अभिक्रिया को अपचयन तथा ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में विभाजित करें।
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया-
MnO4 → Mn2+
पद (a) इस पद में आवेश सन्तुलित करने पर,
MnO4 + 5e → Mn2+

पद (b) ऑक्सीजन की संख्या सन्तुलित करने पर,
MnO4 + 5e → Mn2+ + 4H2O

पद (c) अम्लीय माध्यम में हाइड्रोजन की संख्या सन्तुलित करने पर,
MnO4 + 5e + 8H+ → Mn2+ + 4H2O
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया-
SO2 → HSO4

पद (a) इस पद में आवेश सन्तुलित करने पर,
SO2 → HSO4 + 2e

पद (b) इस पद में ऑक्सीजन की संख्या सन्तुलित करने पर,
SO2 + 2H2O → HSO4 + 2e

पद (c) अम्लीय माध्यम में हाइड्रोजन की संख्या संतुलित करने पर,
SO2 + 2H2O → HSO4 + 2e + 3H+

पद 3. अब ऑक्सीकरण व अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया को जोड़ने पर तथा इलेक्ट्रॉन की संख्या को सन्तुलित करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में 5 का तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में 2 का गुणा करने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 32

(ग) H2O2(aq) + Fe2+(aq) → Fe3+(aq) + H2O(l) (अम्लीय माध्यम)
उत्तर:
आयन इलेक्ट्रॉन विधि-
पद 1. सर्वप्रथम प्रत्येक की ऑक्सीकरण संख्या लिखने पर-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 33

पद 2. अब अपचयन व ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में विभाजित करने पर,
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 34
पद (a) ऑक्सीजन की संख्या सन्तुलित करने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 35

पद (b) ऑक्सीकरण संख्या सन्तुलित करने पर,
H2O2 + 2e → 2H2O

पद (c) अम्लीय माध्यम में हाइड्रोजन की संख्या सन्तुलित करने पर,
H2O2 + 2e + 2H+ → 2H2O
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया
Fe2+ → Fe3+

पद (d) ऑक्सीकरण संख्या सन्तुलित करने पर-
Fe2+ → Fe3+ + e

पद 3. इस पद में ऑक्सीकरण व अपचयन अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर तथा इलेक्ट्रॉन की संख्या को सन्तुलित करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में 2 का गुणा करने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 36

(घ) Cr2O72+(aq) + SO2(g) → Cr3+(aq) + SO42-(aq) (अम्लीय माध्यम)
सर्वप्रथम आ. संख्या लिखने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 37
पद 1. अभिक्रिया को अपचयन व ऑक्सीकरण अर्द्ध- अभिक्रिया में विभाजित करने पर,
ऑसीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया
SO2 → SO42-

(a) आ. सं. को सन्तुलित करने पर,
SO2 → SO42- + 2e

(b) ऑक्सीजन की संख्या सन्तुलित करने पर,
SO2 + 2H2O → SO42- + 2e

(c)अम्लीय माध्यम में हाइड्रोजन संतुलित करने पर-
SO2 + 2H2O → SO42- + 2e + 4H+

अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 38
(a) क्रोमियम की संख्या सन्तुलित करने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 39
(b) ऑक्सीकरण संख्या व्यवस्थित करने पर,
6e + Cr2O22- → 2Cr3+

(c) ऑक्सीजन की संख्या संतुलित करने पर-
Cr2O22- + 6e → 2Cr3+ + 7H2O

(d) हाइड्रोजन की संख्या अम्लीय माध्यम में व्यवस्थित करने पर,
Cr2O72- + 6e + 14H+ → 2Cr3+ + 7H2O

पद 2. संतुलित ऑक्सीकरण व अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया को जोड़ने पर तथा इलेक्ट्रॉन की संख्या सन्तुलित करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द-अभिक्रिया में 3 का गुणा करने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 40

प्रश्न 19.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के समीकरणों को आयन-इलेक्ट्रॉन तथा ऑक्सीकरण संख्या विधि (क्षारीय माध्यम में) द्वारा सन्तुलित कीजिए तथा इनमें ऑक्सीकारक और अपचायकों की पहचान कीजिए-
(क) P4(s) + OH(aq) → PH3(g) + H2PO2(aq)
(ख) N2H4(l) + ClO3(aq) → NO(g) + Cl(g)
(ग) Cl2O7(g) + H2O2(aq) → ClO2(aq) + O2(g) + H+(aq)
उत्तर:
(क) आयन इलेक्ट्रॉन विधि से समीकरण सन्तुलित करना-
पद 1. पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं-
P4(s) + OH(aq) → PH3(g) + H2PO2(aq)

पद 2. दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं-
(i) ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया :
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 41
(ii) अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया :
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 42
(P) ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों की भाँति कार्य करता है)

पद 3. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में पहले $P$ परमाणुओं को सन्तुलित करके O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम बाईं ओर आठ जल अण जोडते हैं।
P4(s) + 8H2O(l) → 4H2PO2(aq)

इस अभिक्रिया में H परमाणु सन्तुलित करने के लिए आठ H+ आयन दाई ओर जोड़ते हैं।
P4(s) + 8H2O(l) → 4H2PO2(aq) + 8H+(aq)
अब चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है; अतः दोनों ओर OH आयन जोड़ते हैं-
P4(s) + 8H2O(l) + 8OH(aq) → 4H2PO2(aq) + 8H2O(l)

या P4(s) + 8H2O(l) + 8OH(aq) → 4H2PO2(aq) + 8H2O(l)

या P4(s) + 8OH(aq) → 4H2PO2(aq)

पद 4. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में P परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं-
P4(s) → 4PH3(g)

H-परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम उपर्युक्त अभिक्रिया में बाई ओर बारह (6)H+ आयन जोड़ देते हैं-
P4(s) + 12H+(aq) → 4PH3(g)

क्योंकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है; अत: 12H+ आयनों के लिए 12OH आयन समीकरण के दोनों ओर ज़ड़ते हैं-
P4(s) + 12H+(aq) + 12OH(aq) → 4PH3(g) + 12OH(aq)

H+ तथा OH के संयोग से जल अणु बनने के कारण परिणामी समीकरण निम्नलिखित होगी-
P4(s) + 12H2O(l) → 4PH3(g) + 12OH(aq)

पद 5. इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन निम्नवत् करते हैं-
P4(s) + 8OH(aq) → 4H2PO2(aq) + 4e
P4(s) + 12H2O(l) + 12e → 4PH3(g) + 12OH(aq)

पद 6. उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर-
4P4(s) + 12H2O(l) + 12OH(aq) → 4PH3(g) + 12H2PO2(aq)
या P4(s) + 3H2O(l) + 3OH(aq) → PH3(g) + 3H2PO2(aq)

अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि समीकरण में दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

ऑक्सीकरण संख्या विधि से समीकरण सन्तुलित करना-

पद 1. अभिक्रिया का ढाँचा इस प्रकार है-
P4(s) + OH(aq) → PH3(g) + H2PO2(aq)

पद 2. अभिक्रिया में P की ऑक्सीकरण संख्या लिखते हैं-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 43
यह इस बात का सूचक है कि P ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों रूपों में कार्य करता है।

पद 3. P की ऑक्सीकरण अवस्था 3 घटती है तथा 1 बढ़ती है। अतः हमें H2PO2 को 3 से गुणा करना होगा।
P4(s) + OH(aq) → PH3(g) + 3H2PO2(aq)

पद 4. चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है तथा दोनों ओर के आयनों का आवेश एकसमान नहीं है। अतः हम बाई ओर तीन OH आयन जोड़ेंगे जिससे आवेश एकसमान हो जाए।
P4(s) + 3OH(aq) → PH3(g) + 3H2PO2(aq)

पद 5. इस पद में हाइड्रोजन आयनों को संतुलित करने के लिए हम तीन जल अणुओं को बाईं ओर जोड़ते हैं-

P4(s) + 3OH(aq) + 3H2O(l) → PH3(g) + 3H2PO2(aq)
यह सन्तुलित अभिक्रिया है।

(ख) आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से समीकरण सन्तुलित करना-

पद 1. पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं-
N2H4(l) + ClO3(aq) → NO(g) + Cl(g)

पद 2. दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं-
(i) ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया :
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 44
(ii) अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया :
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 45

(N2H4 अपचायक तथा ClO3 ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है।)
पद 3. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में N-परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं-
N2H4(l) → 2NO(g)
अब O परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण में बाईं ओर दो जल अणु जोड़ते हैं-
N2H4(l) + 2H2O(l) → 2NO(g)

अब H परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण में दाईं ओर 8H+ जोड़ते हैं-

N2H4(l) + 2H2O(l) → 2NO(g) + 8H+(aq)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है; अतः समीकरण के दोनों ओर 8OH आयन जोड़ते हैं-
N2H4(l) + 2H2O(l) + 8OH(aq) → 2NO(g) + 8H+ + 8OH(aq)
H+ तथा OH आयनों के संयोग पर जल अणु बनने के कारण समीकरण निम्नवत् होगी-
N2H4(l) + 8OH(aq) → 2NO(g) + 6H2O(l)

पद 4. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए समीकरण के दाई ओर तीन जल अणु जोड़ते हैं-
ClO3(aq) → Cl(g) + 3H2O(l)

H परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण के बाईं ओर छ: H+ आयन जोड़ते हैं-

ClO3(aq) + 6H+(aq) + 6OH(aq) → Cl(g) + 3H2O(l)

चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है; अतः समीकरण में दोनों ओर छः OH आयन जोड़ते हैं-

ClO3(aq) + 6H+(aq) + 6OH(aq) → Cl(g) + 3H2O(l) + 6OH(aq)

H+ तथा OH के संयोग से जल अणु बनने पर,
ClO3(aq) + H2O(l) → Cl(g) + 6OH(aq)

पद 5. इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं के आवेश का सन्तुलन निम्नवत् करते हैं-
N2H4(l) + 8OH(aq) → 2NO(g) + 6H2O(l) + 8e
ClO3(aq) + 3H2O(l) + 6e → Cl(g) + 6OH(aq)

इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्धअभिक्रिया को 3 से तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया को 4 से गुणा करते हैं-
3N2H4(l) + 24OH(aq) → 6NO(g) + 18H2O(l) + 24e
4ClO3(aq) + 12H2O(l) + 24e → 4Cl(g) + 24OH(aq)

पद 6. दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर-
3N2H4(l) + 4ClO3(aq) → 6NO(g) + 4Cl(g) + 6H2O(l)
अन्तिम सत्यापन दरांता है कि उपर्युक्त समीकरण परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से सन्तुलित हैं।
ऑक्सीकरण संख्या विधि से समीकरण सन्तुलित करना-

पद 1. अभिक्रिया का ढ्वाँचा इस प्रकार है-
N2H4(l) + ClO3(aq) → NO(g) + Cl(g)

पद 2. अभिक्रिया में N तथा Cl की ऑक्सीकरण संख्या लिखते हैं-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 46
स्पष्ट है कि N2H4 अपचायक तथा ClO3 ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करते हैं।

पद 3. ऑक्सीकरण संख्या में होने वाली वृद्धि तथा कमी की गणना करते हैं तथा इन्हें एकसमान बनाते हैं।
3N2H4(l) + 4ClO3(aq) → 6NO(g) + 4Cl(g)

पद 4. चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है तथा अभिक्रिया आवेश की दृष्टि से सन्तुलित है; अतः O तथा H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए अभिक्रिया में दाईं ओर 6 जल अणु जोड़ देने पर पूर्णतया सन्तुलित समीकरण प्राप्त हो जायेगी।

3N2H4(l) + 4ClO3(aq) → 6NO(g) + 4Cl(g) + 6H2O(l) यह सन्तुलित समीकरण है।

(ग) आयन इलेक्ट्रॉन विधि से समीकरण सन्तुलित करना-

पद 1. पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं-

Cl2O7(g) + H2O2(aq) → ClO(aq) + O2(aq) + H+(aq)

पद 2. दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं-

(i) ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया :
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 47
(ii) अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया :
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 48
(H2O2 अपचायक तथा Cl2O7ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करते है।)

पद 3. ऑक्सीकरण अर्द्ध अभिक्रिया में H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दो H+ दाईं ओर जोड़ते हैं-
H2O2(aq) → O2(g) + 2H+(aq)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में सम्पन्न होती है; अतः दोनों ओर दो-दो OH आयन जोड़ने पर,
2OH(aq) + H2O2(aq) → O2(g) + 2H+(aq) + 2OH(aq)
H+ तथा OH आयन के संयोग से जल अणु बनने पर परिणामी समीकरण निम्नवत् होगी-
H2O2(aq) + 2OH(aq) → O2(aq) + 2H2O(l)

पद 4. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में सर्वप्रथम Cl परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं-
Cl2O7(g) → 2ClO2(aq)
O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दाईं ओर तीन जल-अणु जोड़ते हैं-
Cl2O7(g) → 2ClO2(aq) + 3H2O(l)
H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम 6H+ बाईं ओर जोड़ते हैं-
Cl2O7(g) + 6H+(aq) → 2ClO2(aq) + 3H2O(l)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में सम्पन्न होती है; अतः 6H+ के लिए दोनों ओर 6OH जोड़ते हैं-
Cl2O7(g) + 6H+(aq) + 6OH(aq) → 2ClO2(aq) + 3H2O(l) + 6OH(aq)
H+ तथा OH के संयोग से जल अणु बनने पर परिणामी समीकरण निम्नवत् होगी-
Cl2O7(g) + 3H2O(l) → 2ClO2(aq) + 6OH(aq)

पद 5. इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन निम्नवत् करते हैं-
H2O2(aq) + 2OH(aq) → O2(g) + 2H2O(l) + 2e
Cl2O7(g) + 3H2O(l) + 8e → 2ClO2(aq) + 6OH(aq)

इलेक्ट्रॉनों की संख्या एकसमान करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में 4 से गुणा करते हैं।
4H2O2(aq)+ 8OH(aq) → 4O2(g) + 8H2O(l) + 8e
Cl2O7(aq) + 3H2O(l) + 8e → 2ClO2(aq) + 6OH(aq)

पद 6. उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर,
Cl2O7(g) + 4H2O2(aq) + 2OH(aq) → 2ClO2(aq) + 4O2(g) + 5H2O(l)
अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि समीकरण में दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

ऑक्सीकरण संख्या विधि से समीकरण सन्तुलित करना-

पद 1. अभिक्रिया का ढाँचा इस प्रकार है-
Cl2O7(g) + H2O2(aq) → ClO2(aq) + O2(aq) + H+(aq)

पद 2. अभिक्रिया में Cl तथा O की ऑक्सीकरण संख्या लिखते हैं-
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 49
स्पष्ट है कि H2O2 अपचायक तथा Cl2O2 ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करते हैं।

पद 3. ऑक्सीकरण संख्या में होने वाली कमी तथा वृद्धि की गणना करते हैं तथा इन्हें एकसमान बनाते हैं-
Cl2O7(g) + 4H2O2(aq) → 2ClO2(aq) + 4O2(g)

पद 4. चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है तथा दोनों ओर के आयनों का आवेश एकसमान नहीं है; अतः हम दो OH आयन बाईं ओर जोड़ देते हैं-
Cl2O7(g) + 4H2O2(aq) + 2OH(aq) → 2ClO2(aq) + 4O2(g)
H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए दाईं ओर पाँच जल-अणु जोड़ते हैं।
Cl2O7(g) + 4H2O2(aq) + 2OH(aq) → 2ClO2(aq) + 4O2(g) + 5H2O(l)
यह सन्तुलित समीकरण है।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित अभिक्रिया से आप कौन-सी सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं-
(CN)2(g) + 2OH(aq) → CN(aq) + CNO(aq) + H2O(l)
उत्तर:
(CN)2(g) + 2OH(aq) → CN(aq) + CNO(aq) + H2O(l)
इस अभिक्रिया से निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त होती हैं-

  • अभिक्रिया में क्षारीय माध्यम में सायनोजन (CN)2 का वियोजन हो रहा है।
  • (CN)2 तथा CN दोनों प्रकृति में छद्म हैलोजेन (pseudo halogen) हैं अर्थात् इनके गुण हैलोजनों के समान हैं।
  • यह एक असमानुपातन अभिक्रिया है। इसमें एक पदार्थ का ऑक्सीकरण तथा अपचयन होता है। सायनोजन (CN})2 का CNO में ऑक्सीकरण तथा CN में अपचयन होता है।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

प्रश्न 21.
Mn3+ आयन विलयन में अस्थायी होता है तथा असमानुपातन द्वारा Mn2+, MnO2 और H+ आयन देता है। इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित आयनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार असमानुपातन अभिक्रिया निम्नवत् होगी –
Mn3+ → Mn2+ + MnO2 + H+
इस अभिक्रिया को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा निम्नांकित पदों में सन्तुलित किया जाता है-

पद 1. पहले हम ढाँचा समीकरण लिखते हैं-
Mn3+ → Mn2+ + MnO2 + H+

पद 2. दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं-
(i) ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया :
Mn3+ → MnO2
(ii) अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया :
Mn3+ → Mn2+

पद 3. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को सन्तुलित करने के लिए इसमें बाईं ओर दो जल अणु जोड़ते हैं। इससे O-परमाणु सन्तुलित हो जाते हैं।
Mn3+ + 2H2O → MnO2
अब H परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए चार H+ दाई ओर जोड़ देते हैं-
Mn3+ + 2H2O → MnO2 + 4H+

पद 4. सन्तुलित अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया निम्नलिखित है-
Mn3+ + 2H2O → Mn2+ + 4H+

पद 5. इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन निम्नलिखित प्रकार करते हैं-
Mn3+ + 2H2O → MnO2 + 4H+ + le
Mn3+ + le → Mn2+

पद 6. उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर,
2Mn3+ + 2H2O → MnO2 + Mn2+ + 4H+
यही सन्तुलित समीकरण है।

प्रश्न 22.
Cs, Ne, I तथा F में ऐसे तत्व की पहचान कीजिए, जो
(क) केवल ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) केवल धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(घ) न ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
उत्तर:
(क) F (फ्लुओरीन) केवल ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) Cs (सीजियम) केवल धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) I (आयोडीन) ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(घ) Ne ( निऑन) न ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 23.
जल के शुद्धिकरण में क्लोरीन को प्रयोग में लाया जाता है। क्लोरीन की अधिकता हानिकारक होती है। सल्फर डाइ-ऑक्साइड से अभिक्रिया करके इस अधिकता को दूर किया जाता है। जल में होने वाले इस अपचयोपचय परिवर्तन के लिए सन्तुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर:
क्लोरीन तथा सल्फर डाइऑक्साइड की अभिक्रिया निम्नलिखित समीकरण द्वारा व्यक्त की जा सकती है-
Cl2 + SO2 → Cl + SO42-
इस अपचयोपचय अभिक्रिया को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से निम्नांकित पदों में सन्तुलित करते हैं-

पद 1. पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं-
Cl2 + SO2 → Cl + SO42-

पद 2. दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं-
(i) ऑक्सीकरण अर्द-अभिक्रिया :
SO2 → SO42-
(ii) अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया :
Cl2 → Cl

पद 3. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण में बाई ओर दो जल अणु जोड़ते हैं-
SO2 + 2H2O → 4H+

पद 4. सन्तुलित अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया निम्नवत् होगी-
Cl2 → 2Cl

पद 5. इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन इस प्रकार करेंगे-
SO2 + 2H2O → SO42- + 4H+ + 2e

पद 6. उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर,
Cl2 + SO2 + 2H2O → 2Cl + SO42- + 4H+
अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि समीकरण परमाणुओं की संख्या एवं आवेश की दृष्टि से सन्तुलित है।

प्रश्न 24.
आवर्त सारणी की सहायता से निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(क) सम्भावित अधातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन की अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
(ख) किन्हीं तीन धातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
उत्तर:
(क) वे अधातुएँ जो परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाओं में रह सकती हैं, असमानुपातन अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हैं। फॉस्फोरस, क्लोरीन तथा सल्फर ऐसी ही अधातुएँ हैं।
(ख) संक्रमण श्रेणी (d-ब्लॉक तत्व) से सम्बद्ध धातुएँ असमानुपातन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित कर सकती हैं। उदाहरणार्थ-मैंगनीज, आयरन तथा कॉपर।

प्रश्न 25.
नाइट्रिक अम्ल निर्माण की ओस्टवाल्ड विधि के प्रथम पद में अमोनिया गैस के ऑक्सीजन गैस द्वारा ऑक्सीकरण से नाइट्रिक ऑक्साइड गैस तथा जलवाष्प बनती है। 10.0 g अमोनिया तथा 20.00 g ऑक्सीजन द्वारा नाइट्रिक ऑक्साइड की कितनी अधिकतम मात्रा प्राप्त हो सकती है?
उत्तर:
ओस्टवाल्ड विधि में अमोनिया गैस निम्न प्रकार ऑक्सीजन से क्रिया करके नाइट्रिक ऑक्साइड गैस तथा जलवाष्प बनाती है।
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 50
68 g अमोनिया अभिक्रिया करती है = 160 g ऑक्सीजन से अतः
10 g अमोनिया अभिक्रिया करेगी = \(\frac { 160 × 10 }{ 68 }\) = 23.6 g ऑक्सीजन;
परन्तु ऑक्सीजन की उपलब्ध मात्रा 20g है जो आवश्यक मात्रा से कम है अतः ऑक्सीजन सीमान्त अभिकर्मक है।
अत: 160 g ऑक्सीजन बनाती है = 120 g NO
20 g ऑक्सीजन बनायेगी = \(\frac { 120 × 20 }{ 160 }\) = 15 g NO

प्रश्न 26.
पाठ्य-पुस्तक की सारणी 8.1 में दिए गए मानक विभवों की सहायता से अनुमान लगाइए कि क्या इन अभिकारकों के बीच अभिक्रिया सम्भव है?
(क) Fe3+ तथा I(aq)
(ख) Ag+ तथा Cu(s)
(ग) Fe3+(aq) तथा Br(aq)
(घ) Ag(s) तभा Fe3+(aq)
(ङ) Br2(aq) तथा Fe2+
उत्तर:
(क) Fe3+ तथा I(aq)
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 51

(ख) Ag+ तथा Cu(s)
सारणी के अनुसार, E0Ag+/Ag = +0.80 V E0Cu++/Cu = 0.34V
2Ag+ + 2e → 2Ag (अपचयन, कैथोड पर)
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 52

(ग) Fe3+(aq) तथा Br(aq)
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 53

(घ) Ag(s) तभा Fe3+(aq)
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 54

(ङ) Br2(aq) तथा Fe2+
HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 Img 55

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में से प्रत्येक के विद्युत्-अपघटन से प्राप्त उत्पादों के नाम बताइए।
(क) सिल्वर इलेक्ट्रोड के साथ AgNO3 का जलीय विलयन
(ख) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ AgNO(s) का जलीय विलयन
(ग) प्लैटिनम इलेक्टोड के साथ H2SO4 का तनु विलयन
(घ) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ CuCl2 का जलीय विलयन
उत्तर:
(क) सिल्वर इलेक्ट्रोड के साथ AgNO3 का जलीय विलयन
ऐनोड पर, Ag → Ag+ + e
कैथोड पर, Ag+ + e → Ag
ऐनोड पर सिल्वर छड़ घुल जायेगी तथा कैथोड पर सिल्वर छड़ पर जमा होने लगेगा।

(ख) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ AgNO3 का जलीय विलयन-
AgNO3 → Ag+ + NO3
H2O → H+ + OH
ऐनोड पर, 4OH → 2H2O + O2 + 4e
कैथोड पर, Ag+ + e → Ag
कैथोड पर सिल्वर जमा होगा तथा ऐनोड पर ऑक्सीजन गैस प्राप्त होगी।

(ग) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ H2SO4 का तनु विलयन
H2SO4 → 2H+ + SO42-
H2O → H+ + OH
ऐनोड पर, 4OH → 2H2O + O2 + 4e
कैथोड पर, 2H+ + 2e → H2
कैथोड पर हाइड्रोजन तथा ऐनोड पर ऑक्सीजन गैस प्राप्त होती है।

(घ) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ CuCl2 का जलीय विलयन
CuCl2 → Cu2+ + 2Cl
H2O → H+ + OH
ऐनोड पर, 2Cl → Cl2 + 2e
कैथोड पर, Cu2+ + 2e → Cu
कैथोड पर कॉपर जमा होगा तथा ऐनोड पर क्लोरीन गैस प्राप्त होगी।

HBSE 11th Class Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

प्रश्न 28.
निम्नलिखित धातुओं को उनके लवणों के विलयन में से विस्थापन की क्षमता के क्रम में लिखिए-
Al, Cu, Fe, Mg तथा Zn
उत्तर:
Mg > Al > Zn > Fe > Cu.

प्रश्न 29.
नीचे दिए गए मानक इलेक्ट्रोड विभवों के आधार पर धातुओं को उनकी बढ़ती अपचायक क्षमता के क्रम में लिखिए-
K+/K = -2.93 V,
Ag+/Ag = 0.80V,
Hg2+/Hg = 0.79 V
Mg2+/Mg = -2.37 V,
Cr3+/Cr = -0.74V
उत्तर:
Ag < Hg < Cr < Mg < K .

प्रश्न 30.
उस गैल्वेनिक सेल को चित्रित कीजिए, जिसमें निम्नलिखित अभिक्रिया होती है-
Zn(s) + 2Ag+(aq) → Zn2+(aq) + 2Ag(s)
अब बताइए कि-
(क) कौन-सा इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है?
(ख) सेल में विद्युत्-धारा के वाहक कौन हैं?
(ग) प्रत्येक इलेक्ट्रोड पर होने वाली अभिक्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर:
Zn(s)| Zn2+(aq) | | Ag+(aq) | Ag(s)
(क) Zn इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है।
(ख) इलेक्ट्रॉन।
(ग) ऐनोड पर, Zn → Zn2+ + 2e
कैथोड पर, Ag+ + e → Ag

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