Author name: Prasanna

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक InText Questions

Haryana State Board HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक InText Questions and Answers.

Haryana Board 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक InText Questions

पृष्ठ सं. 126 से (इन्हें कीजिए)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित स्थानों को + या – चिह्न से निरूपित कीजिए:
(a) शून्य के बाईं ओर 8 कदम
(b) शून्य के दाईं ओर 7 कदम
(c) शून्य के दाईं ओर 11 कदम
(d) शून्य के बाईं ओर 6 कदम।
हल :
(a) शून्य के बाईं ओर 8 कदम को – 8 द्वारा व्यक्त किया जाता है।
(b) शून्य के दाईं ओर 7 कदम को + 7 द्वारा व्यक्त किया जाता है।
(c) शून्य के दाईं ओर 11 कदम को + 11 द्वारा व्यक्त किया जाता है।
(d) शून्य के बाई और 6 कदम को – 6 द्वारा व्यक्त किया जाता है।

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पृष्ठ सं. 126 से

(मेरे पीछे कौन आ रहा है।)
⇒ किसी संख्या का परवर्ती उसकी अगली संख्या होती _है अर्थात् उस संख्या में 1 जोड़कर प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 1.
निम्नलिखित संख्याओं के परवर्ती लिखिए :
हल:

संख्यापरवर्ती
1010 + 1 = 11
88 + 1 = 9
– 5– 5 + 1 = 4
– 3– 3 + 1 = – 2
00 + 1 = 1

पृष्ठ सं. 127 से

प्रश्न 1.
अब निम्नलिखित संख्याओं के पूर्ववर्ती लिखिए :
हल:

संख्यापरवर्ती
1010 – 1 = 9
88 – 1 = 9
55 – 1 = 4
33 – 1 = 2
00 – 1 = – 1

इसी प्रकार की अन्य स्थितियाँ जहाँ हम इन चिह्नों का प्रयोग करते हैं।
नीचे एक दुकानदार का खाता दिखाया जा रहा है जो कुछ विशेष वस्तुओं की बिक्री से प्राप्त लाभ और हानि को दर्शाता है :

वस्तु का नामलाभहानिउचित चिह्न द्वारा निरूपण
सरसों का तेल₹150+ 150
चावल₹250– 250
काली मिर्च₹225+ 225
गेहूँ₹200+ 200
मूंगफली का तेल₹330– 330

⇒ समुद्र तल से ऊपर की ऊँचाई ‘+’ ive चिन्ह तथा नीचे की ओर को -‘ ive चिन्ह द्वारा व्यक्त करते हैं।
⇒ 0°C से ऊपर के तापमान को + ive चिन्ह तथा नीचे के तापमान को – ive चिन्ह द्वारा व्यक्त करते हैं।

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पृष्ठ सं, 128 से (प्रयास कीजिए)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित को उचित चिह्न के साथ लिखिए:
(a) समुद्र तल से 100 मीटर नीचे
(b) 0°C से 25°C ऊपर तापमान
(c) 0°C से 15°C नीचे तापमान
(d) 0 से छोटी कोई भी पाँच संख्याएँ।
हल :
(a) समुद्र तल से 100 मीटर नीचे = – 100 मीटर
(b) 0°C से 25°C ऊपर तापमान = + 25°C
(c) 0°C से 15°C नीचे तापमान = – 15°C
(d) 0 से छोटी पाँच संखयाएँ – 1, – 2, – 3, – 4, – 5 इत्यादि।

पृष्ठ सं. 129 से

प्रश्न 1.
संख्या रेखा पर -3, 7, -4, -8, -1 और +3 को अंकित कीजिए।
हल :
एक रेखा खींची और उस पर समान दूरी पर कुछ बिन्दु अंकित किए तथा उसके मध्य में एक बिन्दु को शून्य से अंकित किया। शून्य के दाईं ओर के बिन्दु धनात्मक पूर्णाक हैं और इन्हें +1, +2, +3 इत्यादि या केवल 1, 2, 3 इत्यादि से अंकित किया। शून्य के बाईं ओर के बिन्दु ऋणात्मक हैं और इन्हें -1, 2, -3 इत्यादि से अंकित किया जैसा कि आकृति में दर्शाया गया है।
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स्पष्ट है कि संख्या रेखा पर -3, 7, -4, – 8, -1 और 3 को क्रमश: A, B, C, D, E और F द्वारा दर्शाया गया है।

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पृष्ठ सं 130 से

प्रश्न 1.
रिक्त खानों को > और < चिन्हों का प्रयोग करते हुए भरिए:
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हल :
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पृष्ठ सं 131 से

प्रश्न 1.
निम्नलिखित संख्या युग्मों की > या < का प्रयोग करते हुए तुलना कीजिए :
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हल:
0 > – 8 ∵ – 8, 0 के बाईं ओर है।
5 > -5 ∵ – 5.5 के बाईं ओर है।
0 < 6, ∵ 6, 0 के दाईं ओर है।
-1 > – 15, ∵ – 15, – 1 के बाईं ओर स्थित है।
11 < 15. ∵ 15, 11 के दाईं ओर स्थित है।
– 20 < 2, ∵ 2, – 20 के दाईं ओर स्थित है।

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पृष्ठ सं. 136 से

प्रश्न 1.
निम्नलिखित का योग ज्ञात कीजिए :
(a) (-11) + (-12)
(b) (+ 10) + (+4)
(c) (-32) + (-25)
(d) (+ 23) + (+ 40).
हल :
(a) (-11) + (-12) = – 23
(b) (+ 10) + (+ 4) = + 14
(c) (-32) + (-25) = – 57
(d) (+23) + (+40) = + 63.

पृष्ठ सं. 137 से

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में प्रत्येक का योग ज्ञात कीजिए:
(a) (-7) + (+8)
(b) (-9) + (+ 13)
(c) (+ 7) + (-10)
(d) (+ 12) + (-7)
हल :
(a) (-7) + (+ 8) = (-7) + (+7) + (+ 1)
= 0 + (+ 1) = + 1 उत्तर
(b) (-9) + (+ 13) = (-9) + (+9) + (+4)
= 0 + (+4) = +4 उत्तर
(c) (+7) + (-10) = (+7) + (-7) + (-3)
= 0 + (-3) = – 3 उत्तर
(d) (+ 12) + (-7) = (+ 5) + (+7) + (-7)
= (+5) + 0 = +5 उत्तर

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पृष्ठ सं. 139 से

प्रश्न 1.
संख्या रेखा का प्रयोग करते हुए निम्न नखित योग ज्ञात कीजिए :
(a) (-2) + 6
(b) (-6) + 2
ऐसे दो प्रश्न और बनाइए तथा संख्या रेखा की सहायता से उन्हें हल कीजिए।
हल :
(a) संख्या रेखा पर पहले हम 0 के बाईं ओर 2 कदम चलकर – 2 पर पहुँचते हैं। तब हम – 2 के दायीं ओर 6 कदम चलते हैं, तो हम 4 पर पहुंचते हैं। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है।
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अतः (-2) + 6 = 4 उत्तर

(b) संख्या रेखा पर पहले हम 0 के बाईं ओर 6 कदम चलकर – 6 पर पहुँचते हैं। तब हम -6 के दाईं ओर 2 कदम चलते हैं, तो हम -4 पर पहुंचते हैं। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है।
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अतः (-6) + 2 = – 4 उत्तर
दो और प्रश्न इस प्रकार हैं:
संख्या रेखा का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित योग ज्ञात कीजिए:
(i) 5 + (-3) (ii) (-5) + 3
हल :
(i) पहले हम संख्या रेखा पर 0 से प्रारम्भ करके (0 के दाईं और 5 कदम चलते हैं और 5 पर पहुँचते हैं। फिर हम 5 के बाईं ओर 3 कदम चलते हैं और 2 पर पहुंचते हैं।
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इस प्रकार, 5 + (-3) = 2 है। उत्तर

(ii) पहले हम 0 से प्रारम्भ करके 0 के बाईं ओर 5 कदम चलते हैं और -5 पर पहुँचते हैं। फिर हम – 5 के दाई ओर 3 कदम चलते हैं और – 2 पर पहुंचते हैं।
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इस प्रकार, (-5) + (+3) = – 2 है। उत्तर

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प्रश्न 2.
संख्या रेखा का प्रयोग किए बिना निम्नलिखित का योग ज्ञात कीजिए:
(a) (+7) + (-11)
(b) (-13) + (+ 10)
(c) (-7) + (+9)
(d) (+ 10) + (-5)
ऐसे पाँच प्रश्न और बनाइए तथा उन्हें हल कीजिए।
हल :
(a) (+7) + (-11) = (+7) + (-7) + (-4)
= 0 + (-4) = -4 उत्तर

(b) (-13) + (+ 10) = (-3) + (-10) + (+ 10)
= (-3) + 0 = – 3 उत्तर

(c) (-7) + (+9) = (-7) + (+ 7) + (+ 2)
= 0 + (+2)
= +2 उत्तर

(d) (+ 10) + (-5) = (+5) + (+5) + (-5)
= (+5) + 0
= +5 उत्तर

प्रश्न 3.
पाँच और प्रश्न निम्न प्रकार हैं:
(i) (+9) + (-13)
(ii) (-8) + (+9)
(iii) (+6) + (-10)
(iv) (-14) + (+9)
(v) (+ 12) + (-7)
हल :
(i) (+9) + (- 13) = (+9) + (-9) + (-4)
= 0 + (-4) = -4 उत्तर
(ii) (-8) + (+9) = (-8) + (+ 8) + (+1)
= 0 + (+1)
= +1 उत्तर
(iii) (+6) + (-10) = (+6) + (-6) + (-4)
= 0 + (-4)
= – 4 उत्तर
(iv) (-14) + (+9) = (-5) + (-9) + (+9)
= (-5) + 0
= – 5 उत्तर
(v) (+ 12) + (-7) = (+5) + (+7) + (-7)
= (+5) + 0
= + 5 उत्तर

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प्रश्न 4.
का योज्य प्रतिलोम क्या है? -7 का योज्य प्रतिलोम क्या है?
हल :
6 का योज्य प्रतिलोम – 6 है तथा – 7 का योज्य प्रतिलोम +7 है।

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

HBSE 12th Class History  किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
कृषि इतिहास लिखने के लिए आईन-ए-अकबरी को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन-सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी मुगलकालीन कृषि इतिहास लेखन का एक अति महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह अकबर के काल की कृषि व्यवस्था के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालती है। इससे हमें मुगलकाल की फसलों, सिंचाई तकनीक, कृषकों तथा ज़मींदारों के आपसी संबंधों की जानकारी मिलती है। इतना होते हुए भी इस पुस्तक की कुछ सीमा रूपी समस्याएँ हैं। इसका वर्णन इस प्रकार है

(i) आइन-ए-अकबरी पूरी तरह से दरबारी संरक्षण में लिखी गई है। लेखक कहीं भी अकबर के विरुद्ध कोई शब्द प्रयोग नहीं कर पाया। उसने विभिन्न विद्रोहों के कारणों व दमन को भी एक पक्षीय ढंग से प्रस्तुत किया है।

(ii) आइन-ए-अकबरी में विभिन्न स्थानों पर जोड़ में गलतियाँ पाई गई हैं। यहाँ यह माना जाता है कि गलतियाँ अबल-फज्ल के सहयोगियों की गलती से हुई होंगी या फिर नकल उतारने वालों की गलती से।

(iii) आइन में आंकड़े राज्य के सन्दर्भ में तो सहायक हैं, जिसमें दर इत्यादि का वर्णन सही है। परन्तु मजदूरों की मजदूरी, जन-सामान्य की कर सम्बन्धी समस्या का वर्णन इसमें नहीं है। इसी तरह कई क्षेत्रों के सन्दर्भ में कीमतें भी विरोधाभासपूर्ण बताई गई हैं।

(iv) अबुल-फज़ल ने आइन का लेखन आगरा में किया; इसलिए आगरा व इसके आस-पास का वर्णन बहुत अधिक विस्तार के साथ किया गया है। इस बारे में उसकी सूचनाएँ पूरी तरह सही भी हैं। अन्य स्थानों के आंकड़ों एवं सूचनाओं में कमियाँ भी हैं तथा ये सीमित भी हैं।

इतिहासकार इन सीमा रूपी समस्याओं का निपटारा, अन्य स्रोतों का प्रयोग तुलना रूप में या जानकारी प्राप्त करके करता है। आंकड़ों से संबंधित जानकारी अबुल फज़्ल के ही वर्णन के अन्य स्थानों में मिल जाती है। जोड़ इत्यादि की गलतियों का निदान पुनः जोड़ करके इतिहासकार इसे स्रोत के रूप में प्रयोग कर लेता है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 2.
सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज़ गुज़ारे के लिए खेती कह सकते हैं? अपने उत्तर के कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल की मुख्य फसलें गेहूँ, चावल, जौ, ज्वार, कपास, बाजरा, तिलहन, ग्वार इत्यादि थीं। सामान्यतः कृषक खाद्यान्नों का ही उत्पादन करते थे। ये फसलें भौगोलिक स्थिति के अनुरूप उगाई जाती थीं। चावल मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होता था जहाँ 40 इंच या इससे अधिक वार्षिक वर्षा होती थी। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जौ, ज्वार, बाजरा इत्यादि बोए जाते थे, जबकि गेहूँ लगभग भारत के प्रत्येक क्षेत्र में बोई जाती थी। फसलों के उत्पादन में सर्वाधिक महत्त्व मानसून पवनों का था।

जहाँ वे अधिक सक्रिय होती थीं वहाँ गेहूँ व चावल का फसल चक्र रहता था। कम सक्रिय क्षेत्रों में कम वर्षा या कम पानी वाली फसलें उत्पादित होती थीं। इस काल में गन्ना, कपास व नील इत्यादि फसलें भी उगाई जाती थीं। इन फसलों को जिन्स-ए-कामिल कहा जाता था। मुगलकाल में रेशम, तम्बाकू, मक्का, जई, पटसन इत्यादि भी उत्पादित होने लगा था।

इन सभी तरह के फसलों के उत्पादन के बाद भी यह कहा जा सकता है कि इस समय कृषि उत्पादन महज गुजारे के लिए था। ऐसा इसलिए क्योंकि खाद्यान्न फसलों के अतिरिक्त फसलें सीमित क्षेत्र में उत्पादित होती थीं। कृषक समाज फसलें उत्पादित करते समय परिवार के भरण-पोषण का ध्यान भी रखता था। सरकार के पास राजस्व के रूप में फसल ही आती थी। नकदी मुद्रा नहीं के बराबर ही थी।

सरकार तथा ग्रामीण समुदाय के पास अनाज के भंडार न होना भी इस बात की पुष्टि करता है कि अतिरिक्त अनाज का अभाव था। इस कारण और अकाल इत्यादि के समय भूख से मरने के उदाहरण से भी इस बात की पुष्टि होती है कि कृषक जितना उत्पादन करता था उतना साथ-साथ उपभोग भी हो जाता था।

प्रश्न 3.
कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।
उत्तर:
मुगलकालीन समाज में महिलाएं पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य किया करती थीं। कार्य विभाजन की कड़ी में सामाजिक तौर पर यह माना जाता था कि पुरुष बाहर के कार्य करेंगे तथा महिलाएँ चारदीवारी के अन्दर। यहाँ विभिन्न स्रोतों में महिलाएँ कृषि उत्पादन व विशेष कार्य अवसरों पर साथ-साथ चलती हुई प्रतीत होती हैं। इस व्यवस्था में पुरुष खेत जोतने व हल चलाने का कार्य करते थे, जबकि महिलाएँ निराई, कटाई व फसल से अनाज निकालने के कार्य में हाथ बँटाती थीं।

फसल की कटाई व बिजाई के अवसर पर जहाँ श्रम शक्ति की आवश्यकता होती थी तो परिवार का प्रत्येक सदस्य उसमें शामिल होता था ऐसे में महिला कैसे पीछे रह सकती थी। सामान्य दिनचर्या में भी कृषक व खेतिहर मजदूर प्रातः जल्दी ही काम पर जाता था तो खाना, लस्सी व पानी इत्यादि को उसके पास पहुँचाना महिला के कार्य का हिस्सा माना जाता था। इसी तरह जब पुरुष खेत में होता था तो घर पर पशुओं की देखभाल का सारा कार्य महिलाएँ करती थीं। अतः स्पष्ट है कि कृषि उत्पादन में महिला की भागीदारी काफी महत्त्वपूर्ण थी।
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प्रश्न 4.
विचाराधीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।
उत्तर:
16वीं व 17वीं सदी में एशिया व यूरोप दोनों में हो रहे मौद्रिक परिवर्तनों से भारत को काफी लाभ हो रहा था। जल व स्थल मार्ग के व्यापार से भारत की चीजें पहले से अधिक दुनिया में फैली तथा नई-नई वस्तुओं का व्यापार भी प्रारंभ हुआ। इस व्यापार की खास बात यह थी कि भारत से विदेशों को जाने वाली मदों में उपयोग की चीजें थीं तथा बदले में भारत में चाँदी आ रही थी। भारत में चाँदी की प्राकृतिक दृष्टि से कोई खान नहीं थी। उसके बाद भी विश्व की चाँदी का बड़ा हिस्सा भारत में एकत्रित हो रहा था। चाँदी के साथ-साथ व्यापार विनिमय से भारत में सोना भी आ रहा था।

भारत में विश्व भर से सोना-चाँदी आने के कारण मुग़ल साम्राज्य समृद्ध हुआ। इसके चलते हुए अर्थव्यवस्था में कई तरह के बदलाव आए। मुग़ल शासकों के द्वारा शुद्ध-चाँदी की मुद्रा का प्रचलन किया गया। बाह्य व्यापार में मुद्रा के प्रचलन का प्रभाव आन्तरिक व्यापार पर भी पड़ा। इसमें भी अब वस्तु-विनिमय के स्थान पर मुद्रा विनिमय अधिक प्रचलन में आने लगी। शहरों में बाजार बड़े आकार के होने लगे। गाँवों से बिकने के लिए फसलें शहर आने लगीं। मुद्रा के प्रचलन में राज्य का राजस्व जिन्स के साथ नकद भी आने लगा। मुद्रा के कारण ही मज़दूरों को मज़दूरी के रूप में नकद पैसा दिया जाने लगा।

प्रश्न 5.
उन सबूतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुगल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू-राजस्व बहुत महत्त्वपूर्ण था।
उत्तर:
मुगलकाल में राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था। राज्य की आर्थिक स्थिति तथा कोष इस बात पर निर्भर करता था कि भू-राजस्व कितना तथा कैसे एकत्रित किया जा रहा है। आइन-ए-अकबरी में टोडरमल की नीति को स्पष्ट किया गया है कि अकबर ने अपने राजकोष को समृद्ध बनाने के लिए इस तरह की नीति अपनाई। उसने अपने राजकोष की स्थिति को देखकर सारे साम्राज्य की भूमि को नपवाया। इस नपाई के बाद प्रत्येक क्षेत्र को इस आधार पर बांटा की उससे भू-राजस्व एक करोड़ रुपया बनता हो।

इस तरह सारा साम्राज्य 182 परगनों में विभाजित किया गया। नपाई के बाद जमीन का बंटवारा भी उसके उपजाऊपन के आधार पर किया गया। इस बंटवारे का उद्देश्य भी राजस्व की वास्तविकता का ज्ञान करना था।

मुगलकाल में राज्य की आर्थिक स्थिति भी उसी समय तक अच्छी रही जब तक भू-राजस्व ठीक एकत्रित किया गया। उदाहरण के लिए औरंगजेब के काल में हम सर्वाधिक कृषक विद्रोह देखते हैं क्योंकि उसने कठोरता के साथ अधिक भू-राजस्व वसूलने का प्रयास किया। यह प्रयास असफल रहा। अतः स्पष्ट है कि मुगलकाल में राजकोषीय व्यवस्था का आधार भू-राजस्व व्यवस्था थी। * निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
आपके मुताबिक कृषि समाज में सामाजिक व आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने में जाति किस हद तक एक कारक थी?
उत्तर:
ग्रामीण समुदाय में पंचायत, गाँव का मुखिया, कृषक व गैर-कृषक समुदाय के लोग थे। इस समुदाय के इन घटकों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति में गहरा तालमेल था अर्थात् जो वर्ग साधन सम्पन्न था, उसी का सामाजिक स्तर भी ऊँचा था। वह अपने स्तर को बनाए रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहता था। गाँव में रहने वाला हर व्यक्ति सामाजिक ताने-बाने का एक हिस्सा था। मुगलकाल में जाति व गाँव एक-दूसरे के पूरक भी थे। अर्थात् जाति गाँव को बांधती थी तथा गाँव जाति व्यवस्था को बनाकर रखने में मदद करता था। एक गाँव में कृषक, दस्तकार तथा सेवा करने वाली जातियाँ होती थीं। प्रत्येक जाति अपना पुश्तैनी कार्य करती थी।

आर्थिक व सामाजिक स्तर पर इन जातियों में समानता की स्थिति नहीं थी। निम्न जातियों में मुख्य रूप से वो जातियाँ थीं जिनके पास भूमि की मिल्कियत नहीं थी। ये लोग गाँव में वे कार्य करते थे जिन्हें निम्न या हीन समझा जाता था; जैसे मृत पशुओं को उठाना, चमड़े के कार्य या सफाई कार्य इत्यादि। इन जातियों के लोग खेतों में मजदूरी भी करते थे। उस काल में खेती योग्य जमीन की कमी नहीं थी। फिर भी निम्न जातियों के लिए कुछ कार्य ही निर्धारित थे क्योंकि अन्य कार्य को करने की जिम्मेदारी अन्य उच्च वर्गों की मानी जाती थी। इस तरह यह कहा जा सकता है कि निम्न जातियों के लोग निर्धनता का जीवन जीने के लिए मजबूर थे।

जैसा कि स्पष्ट है कि गाँव में जाति, गरीबी व सामाजिक हैसियत के बीच प्रत्यक्ष संबंध था। निम्न वर्ग के लोगों की स्थिति अधिक गरीबी वाली थी। समाज में कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी स्थिति बीच वाली थी। इस बीच वाले समुदाय में कुछ वर्गों की आर्थिक स्थिति में बदलाव के साथ सामाजिक हैसियत में भी कुछ बदलाव आया। उदाहरण के तौर पर कहा जा सकता है कि इस काल में पशुपालन व बागबानी का काफी विकास हुआ। इसके कारण इन कार्यों को करने वाली अहीर, गुज्जर व माली जैसी जातियों की आर्थिक स्थिति सुधरी।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 7.
सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगलवासियों की जिंदगी किस तरह बदल गई?
उत्तर:
16वीं व 17वीं सदी में कृषि व्यवस्था पर आधारित समाज के अतिरिक्त भी भारत का ग्रामीण समाज था। यह समाज बड़े जंगल क्षेत्र, झाड़ियों (खरबंदी) का क्षेत्र, पहाड़ी कबीलाई क्षेत्र इत्यादि था। यह समाज मुख्य रूप से झारखंड, उड़ीसा व बंगाल का कुछ क्षेत्र, मध्य भारत, हिमालय का तराई क्षेत्र तथा दक्षिण के पठार व तटीय क्षेत्रों में फैला था। जंगल के लोगों का जीवन कृषि व्यवस्था से भिन्न था।

इस काल में भारत का विशाल भू-क्षेत्र जंगलों से सटा था तथा यहाँ के लोग आदिवासी थे जो कबीलों की जिन्दगी जीते थे। वे जंगलों में प्राकृतिक जीवन-शैली के अनुरूप रह रहे थे। जंगलों के उत्पादों, शिकार व स्थानांतरित कृषि के सहारे वे लोग अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। उनके कार्य मौसम (जलवायु) के अनुकूल होते थे। मुगलकाल में जंगल की व्यवस्था व जीवन-शैली में तेजी से बदलाव आया।

विभिन्न तरह के व्यापारियों, सरकारी अधिकारियों एवं स्वयं शासक भी विभिन्न अवसरों पर जंगलों में जाया करते थे। इस तरह अब जंगल का जीवन पहले की तरह स्वतंत्र व शान्त नहीं रहा, बल्कि समाज के आर्थिक व सामाजिक परिवर्तनों से प्रभावित होने लगा। इन परिवर्तनों के लिए बहुत-से कारण जिम्मेदार थे। इनमें से मुख्य का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है

(i) हाथियों की प्राप्ति-मुगलकाल की सेना में हाथियों का बहुत महत्त्व था। ये हाथी जंगलों में मिलते थे। राज्य इन्हें प्राप्त करने के लिए जंगली क्षेत्र पर नियंत्रण रखता था। मुगलकाल में राज्य जंगलवासियों से यह उम्मीद करता था कि वे भेंट अर्थात् पेशकश के रूप में हाथी दें।

(ii) शिकार यात्राएँ-मुग़ल शासक अपना सारा समय दरबार व महल में नहीं गुजारते थे, बल्कि वे अपने अधिकारियों व मनसबदारों के साथ शिकार के लिए भी जाया करते थे। यह शिकार मात्र मनोरंजन या भोजन विशेष के लिए नहीं होता था बल्कि इससे कुछ अधिक इसके सरोकार थे। शासक इस माध्यम से अपने पूरे साम्राज्य की वास्तविकता को जानना चाहता था। वह वहाँ लोगों की शिकायतें सुनता था तथा न्याय भी करता हेत शिविर था। शासक की इस तरह की गतिविधियों ने राज्य व जंगलवासियों की बीच की दूरियों में कमी की।
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(iii) वाणिज्यिक कृषि-वाणिज्यिक खेती व व्यापार के कारण भी जंगलवासियों का जीवन प्रभावित हुआ। जंगल में उत्पादित होने वाले पदार्थों विशेषकर शहद, मोम व लाख भारत से काफी मात्रा में निर्यात होता था। इन पदार्थों की पूर्ति जंगल से होती थी। भारतीय लाख की यूरोप में माँग बढ़ती जा रही थी। इसको जंगलवासी बड़ी कुशलता से तैयार करते थे। इस तरह धीरे-धीरे जंगलवासियों का एक वर्ग इन चीजों को उपलब्ध कराने वाला हो गया। इस समय जंगल में मुख्य व्यापार वस्तुओं के माध्यम से होता था, परन्तु धीरे-धीरे धातु मुद्रा भी वहाँ घुसपैठ कर रही थी।

(iv) व्यापारिक गतिविधियाँ-कुछ छोटे कबीले दो बस्तियों के बीच रहते थे। इन्होंने इन बस्तियों को जोड़ने के लिए व्यापारिक कार्य करने शुरू कर दिए। इस काल में कुछ कबीले गाँव व शहर के बीच व्यापार की कड़ी का काम कर रहे थे। इनके ऊपर गाँव व शहर दोनों की जीवन-शैली का प्रभाव पड़ रहा था।

(v) मुखियाओं का ज़मींदारों के रूप में उदय-जंगल की सामाजिक संरचना में कबीलों के कुछ सरदार या मुखिया जंगल के सरदार या ज़मींदार बन गए। उन्हें अपने जंगल की रक्षा के लिए सेना की आवश्यकता महसूस होने लगी। दूसरी ओर, शासक व अधिकारियों के सम्पर्क में रहने के कारण वह उस तरह की जीवन-शैली अपनाने लगा। कुछ कबीलों के मुखिया तो सरकारी क्षेत्र में आ गए। उन्होंने अपने करीबी लोगों एवं कबीलों के अन्य लोगों को भी सरकारी सेवा में लेने की स्थितियाँ बना दीं। इस तरह स्पष्ट है कि इस सामाजिक बदलाव ने जंगलवासियों व कबीलों की जिन्दगी को पूरी तरह से बदल दिया।
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प्रश्न 8.
मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल में ज़मींदार महत्त्वपूर्ण था क्योंकि वह बहुत बड़े भू-क्षेत्र का मालिक था। यह सारा भू-क्षेत्र उसके निजी प्रयोग के लिए था। अपने इस अधिकार के कारण वह गाँव व क्षेत्र में सामाजिक तौर पर भी ऊँची पहचान रखता था। इस ऊँची पहचान का कारण उसकी जाति भी थी। इस तरह वह व्यक्ति सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से बहुत ऊँची पहचान रखता था।

उसकी यह स्थिति पैतृक थी तथा राज्य उसकी इस स्थिति में सामान्य तौर पर बदलाव नहीं कर सकता था। इसलिए राज्य उससे विभिन्न प्रकार की सेवाएँ (खिदमत) लेता था जिनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण राजस्व की वसूली थी। राज्य की सेवाओं के बदले उसकी राजनीतिक हैसियत भी ऊँची होती थी। इन स्थितियों के चलते हुए उसके लिए कार्य करने वाले कृषक, दिहाड़ीदार मजदूर, खेतिहर वर्ग तथा गाँवों के अन्य लोग लगभग उसकें पराधीन होते थे। इसलिए उसे स्थानीय स्तर पर कोई चुनौती नहीं मिलती थी। मुगलकाल में ज़मींदार की तीन श्रेणियाँ थीं। इनका वर्णन इस प्रकार है

(i) प्रारंभिक ज़मींदार ये ज़मींदार वो ज़मींदार होते थे जो अपनी ज़मीन का राजस्व स्वयं कोष में जमा कराते थे। एक गाँव में प्रायः ऐसे ज़मींदार 4 या 5 ही हुआ करते थे।

(ii) मध्यस्थ ज़मींदार ये ज़मींदार वो थे जो अपने आस-पास के क्षेत्रों के ज़मींदारों से कर वसूल करते थे तथा उसमें से कमीशन के रूप में एक हिस्सा अपने पास रखकर कोष में जमा कराते थे। ऐसे ज़मींदार या तो एक गाँव में एक या फिर दो या तीन गाँवों का एक होता था।

(ii) स्वायत्त मुखिया ये ज़मींदार बहुत बड़े क्षेत्र के मालिक होते थे। कई बार इनके पास 200 या इससे अधिक गाँव भी होते थे। इनकी पहचान स्थानीय राजा की तरह होती थी। सरकारी तन्त्र भी उनके प्रभाव में होता था। इनके क्षेत्र में कर एकत्रित करने में सरकार के अधिकारी भी सहयोग देते थे। ये बहुत साधन सम्पन्न होते थे।

जमींदारों के अधिकार व कर्त्तव्य (Rights and Duties of Zamindars) अधिकार व कर्तव्यों की दृष्टि से इनको सामाजिक तौर पर कोई चुनौती नहीं थी। ज़मींदार वर्ग के बारे में बताया गया कि इससे ऊपर व अधीन वर्ग दोनों को इसकी जरूरत थी। ऐसे में अपनी ज़मीन की खरीद, बेच, हस्तांतरण, गिरवी रखने का अधिकार इनके पास था। विभिन्न तरह के प्रशासनिक पदों पर इन्हें नियुक्त किया जाता था। अपने क्षेत्र में विशेष पोशाक, घोड़ा, वाद्य यन्त्र बजवाने का अधिकार इनके पास था। भू-राजस्व से इन्हें एक निश्चित मात्रा में कमीशन मिलता था।

ज़मींदारों के कर्त्तव्यों के बारे में कहा जा सकता है कि अपने क्षेत्र में शांति व्यवस्था स्थापित करने की जिम्मेदारी इनकी थी। इनके क्षेत्र से शासक व शाही परिवार का कोई सदस्य गुजरता था तो उन्हें वहाँ उपस्थित होना पड़ता था। राज्य के प्रति स्वामीभक्ति इनका सबसे बड़ा कर्त्तव्य था। कुछ ज़मींदार अपनी पहचान बनाने के लिए सामाजिक पंचायतों में भाग लेते थे तथा विभिन्न तरह के झगड़ों को निपटाने के फैसले किया करते थे। कुछ ज़मींदार अपने क्षेत्र में धर्मशालाएँ बनवाना व कुएँ खुदवाना भी जरूरी समझते थे।

प्रश्न 9.
पंचायत और गाँव का मुखिया किस तरह से ग्रामीण समाज का नियमन करते थे? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
ग्रामीण समुदाय में एक महत्त्वपूर्ण पहलू पंचायत व्यवस्था थी। गाँव की सारी व्यवस्था, आपसी संबंध तथा स्थानीय प्रशासन का संचालन पंचायत द्वारा ही किया जाता था। ग्राम पंचायत प्राचीनकाल में ही शक्तिशाली संस्था के रूप में कार्य कर रही थी। विभिन्न प्रकार के राजनीतिक परिवर्तनों का इस पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। विभिन्न शक्तिशाली शासकों ने भी इसकी कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप नहीं किया। मुग़ल शासकों ने भी इस बारे में पहले से प्रचलित नीति का पालन किया।

(i) पंचायत का गठन-ग्राम पंचायत में मुख्य रूप से गाँव के सम्मानित बुजुर्ग होते थे। इन बुजर्गों में भी उनको महत्त्व दिया जाता था जिनके पास पुश्तैनी ज़मीन या सम्पत्ति होती थी। प्रायः गाँव में कई जातियाँ होती थी इसलिए पंचायत में भी इन विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि होते थे। परन्तु इसमें विशेष बात यह है कि साधन सम्पन्न व उच्च जातियों को ही पंचायत में महत्त्व दिया जाता था। खेती पर आश्रित भूमिहीन वर्ग को पंचायत में शामिल अवश्य किया जाता था, लेकिन उन्हें महत्त्व नहीं दिया जाता था। हाँ, इतना अवश्य है कि पंचायत में लिए गए फैसले को मानना सभी के लिए जरूरी था।

(ii) पंचायत का मुखिया-गाँव की पंचायत मुखिया के नेतृत्व में कार्य करती थी। इसे मुख्य रूप से मुकद्दम या मंडल कहते थे। मुकद्दम या मंडल का चुनाव पंचायत द्वारा किया जाता था। इसके लिए गाँव के पंचायती बुजुर्ग बैठकर किसी एक व्यक्ति के नाम पर सहमत हो जाते थे। प्रायः गाँव के सबसे बड़े कृषक या प्रभावशाली व्यक्ति को मुखिया माना जाता था। मुखिया का चुनाव होने के बाद पंचायत उसका नाम स्थानीय ज़मींदार के पास भेजती थी।

ज़मींदार प्रायः उस नाम को स्वीकार कर लेता था। इस तरह मुखिया के चयन की औपचारिकता पूरी होती थी। मुखिया के कार्यों में पटवारी मदद करता था। गाँव की आमदनी, खर्च व अन्य विकास कार्यों के करवाने की जिम्मेदारी उसकी होती थी। गाँव की जातीय व्यवस्था तथा सामाजिक बंधनों को लागू करने में वह अधिक समय लगाता था।

(iii) पंचायत के कार्य ग्राम पंचायत व मुखिया को गाँव के विकास तथा व्यवस्था की देख-रेख में कार्य करने होते थे। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

(a) गाँव की आय व खर्च का नियंत्रण पंचायत करती थी। गाँव का अपना एक खजाना होता था जिसमें गाँव के प्रत्येक परिवार का हिस्सा होता था। इस खजाने से पंचायत गाँव में विकास कार्य कराती थी।

(b) गाँव में प्राकृतिक आपदाओं विशेषकर बाढ़ व अकाल की स्थिति में भी पंचायत विशेष कदम उठाती थी। इसके लिए वह अपने कोष का प्रयोग तो करती ही थी साथ में सरकार से तकावी (विशेष आर्थिक सहायता) के लिए भी कार्य करती थी।

(c) गाँव के सामुदायिक कार्य जिन्हें कोई एक व्यक्ति या कृषक नहीं कर सकता था तो वह कार्य पंचायत द्वारा किए जाते थे। इनमें छोटे-छोटे बाँध बनाना, नहरों व तालाबों की खुदाई करवाना, गाँव के चारों ओर मिट्टी की बाड़ बनवाना तथा सुरक्षा के लिए कार्य करना इत्यादि प्रमुख थे।

(d) गाँव की सामाजिक संरचना विशेषकर जाति व्यवस्था के बंधनों को लागू करवाना भी पंचायत का मुख्य काम था। पंचायत किसी व्यक्ति को जाति की हदों को पार करने की आज्ञा नहीं देती थी। पंचायत शादी के मामले व व्यवसाय के मामले में इन बंधनों को कठोरता से लागू करती थी।

(e) गाँव में न्याय करना पंचायत का अति महत्त्वपूर्ण कार्य था। गाँव में हर प्रकार के झगड़े व सम्पत्ति-विवाद का समाधान पंचायत करती थी। पंचायत दोषी व्यक्ति को कठोर दण्ड दे सकती थी, जिसमें व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार तक कर दिया जाता था।

इस तरह स्पष्ट है कि पंचायत व गाँव का मुखिया गाँव नियमन परंपरावादी ढंग से करते थे। ग्रामीण ताना-बाना व जातीय परंपरा को बनाए रखना इनका मुख्य ध्येय होता था।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
विश्व के बहिरेखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था। इन इलाकों के साथ यातायात-मार्गों को भी दिखाएँ।
उत्तर:
मुग़लों का आर्थिक संपर्क, जल व थल मार्ग से कई देशों से था। इन देशों को विश्व के मानचित्र में प्रदर्शित किया जा सकता है मध्य एशिया के देश, पश्चिमी एशिया के देश, दक्षिणी एशिया के देश, अरब क्षेत्र के देश, फ्रांस, ब्रिटेन और पुर्तगाल।
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परियोजना कार्य 

प्रश्न 11.
पड़ोस के एक गाँव का दौरा कीजिए। पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन-सी फसलें उगाई जाती हैं, कौन-से जानवर पाले जाते हैं, कौन-से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और वहाँ की पंचायत किस तरह काम करती है। जो आपने सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के बारे में सीखा है उससे इस सूचना की तुलना करते हुए, समानताएँ नोट कीजिए। परिवर्तन और निरंतरता दोनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी इसके लिए सर्वप्रथम अपने गाँव या पड़ोस के गाँव का चयन करें। इसके लिए वह एक प्रश्नावली तैयार करें। जैसे

  • आपके गाँव में कौन-कौन सी फसलें होती हैं।
  • गाँव के लोग किन-किन पशुओं को पालते हैं।
  • गाँव में किस-किस दस्तकारी से संबंधित लोग रहते हैं।
  • क्या गाँव में महिलाओं को भूमि के मालिक होने का अधिकार है।
  • आपकी पंचायत क्या-क्या कार्य करती है।
  • आपकी पंचायत का चुनाव कैसे होता है।

इन प्रश्नों की जानकारी के बाद विद्यार्थी अध्याय को ध्यान से पढ़कर तुलना करें कि फसलों व जानवरों में कोई बदलाव आया है। इसमें विशेष अंतर पंचायत व्यवस्थाएँ यह हैं कि मुगल काल में पंचायतें प्रभावी वर्ग की स्थायी पैतृक पदों वाली तथा जातीय आधार पर होती थी जबकि आज की पंचायतों को चुनाव में गाँव का प्रत्येक स्त्री पुरुष बिना किसी जाति धर्म, क्षेत्र, भाषा के भेदभाव के बिना हिस्सा ले सकता है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 12.
आइन का एक छोटा सा अंश चुन लीजिए (10 से 12 पृष्ठ, दी गई वेबसाइट पर उपलब्ध)। इसे ध्यान से पढ़िए और इस बात का ब्योरा दीजिए कि इसका इस्तेमाल एक इतिहासकार किस तरह से कर सकता है?
उत्तर:
पाठ्यपुस्तक में वर्णित आइन को पढ़िए। इसके लिए आप इंटरनेट से भी मदद ले सकते हैं या फिर किसी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय के पुस्तकालय से आइन पुस्तक के रूप में ले सकते हैं। इस पुस्तक के किसी एक अध्याय को पढ़कर अपने विचार निश्चित कर सकते हैं। इसके लिए J.B.D. की पाठ्यपुस्तक आपके लिए मददगार होगी क्योंकि इस पुस्तक में अध्याय के प्रारंभ में भी स्रोतों का अध्ययन किया गया है। इसमें आइन-ए-अकबरी के विभिन्न भागों व अध्यायों का वर्णन है।

आइन-ए-अकबरी की स्रोतों के रूप में सीमाएँ तथा महत्त्व को भी स्पष्ट रूप से इंगित किया गया है। इन्हीं पक्षों का प्रयोग आप विस्तृत विश्लेषण के लिए अपने चयनित किए गए अध्याय पर भी कर सकते हैं।

किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य HBSE 12th Class History Notes

→ आइन-ए-अकबरी-अकबर के शासनकाल में उसके दरबारी अबुल फज्ल द्वारा लिखी गई पुस्तक।

→ रैयत-इसका शाब्दिक अर्थ प्रजा है। मुगलकाल में यह शब्द कृषकों के लिए प्रयोग किया गया है। इस शब्द का बहुवचन ‘रिआया’ है।

→ खुद-काश्त-वह किसान जो ज़मीन का मालिक भी था तथा स्वयं उसको जोतता भी था।

→ पाहि-काश्त-यह वह किसान था जिसके पास अपनी जमीन नहीं होती थी। वह पड़ोस के गाँव या अपने ही गाँव में पड़ोसी की ज़मीन पर खेती करता था।

→ खालिसा-मुगलकाल की वह ज़मीन जिससे एकत्रित भू-राजस्व सीधे सरकारी कोष में जाता था।

→ जागीर-ज़मीन का वह हिस्सा जिसका राजस्व किसी अधिकारी को उसकी सरकारी सेवा अर्थात् वेतन के बदले दिया जाता था।

→ जिन्स-ए-कामिल-मुगलकाल में उत्पादित होने वाली वे फसलें जो खाद्यान्न नहीं होती थीं। राज्य को इन फसलों से अधिक कर प्राप्त होता था।

→ रबी-वह फसल जो अक्तूबर-नवंबर में बोई जाती तथा मार्च-अप्रैल में काटी जाती थी।

→ खरीफ वह फसल जो मई, जून व जुलाई में रोपित की जाती तथा अक्तूबर व नवंबर में काटी जाती थी।

→ पुश्तैनी-वह कार्य या संपत्ति जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता हो।

→ मल्लाहजादा-मल्लाह वह व्यक्ति होता है जो नौका चलाता है। उसका पुत्र मल्लाहजादा कहलाता था।

→ खेतिहर-वह व्यक्ति जो स्वयं ज़मीन का मालिक नहीं होता बल्कि कृषक के साथ मिलकर मज़दूर इत्यादि के रूप में कार्य करता था।

→ मीरास-किसी व्यक्ति को उसकी सेवा के बदले भूमि दी जाती थी। उसे मीरास या वतन कहा जाता था।

→ जंगली-वे लोग जिनका निवास स्थान जंगल में था।

→ कारवाँ–सामूहिक रूप में पशुओं व गाड़ियों के साथ व्यापार करने वाले लोग।

→ ज़मींदार-मुगलकाल का वह व्यक्ति जो ज़मीन का मालिक होता था। उसे अपनी ज़मीन बेचने, खरीदने व हस्तांतरण का अधिकार होता था।

→ स्वायत्त मुखिया-मुगलकाल में एक ऐसा ज़मींदार जो बहुत बड़े क्षेत्र का स्वामी होता था। जनता उन्हें उस क्षेत्र में शासक ही समझती थी।

→ जरीब-ज़मीन को नापने के लिए प्रयोग की जाने वाली लोहे की जंजीर जरीब कहलाती थी।

→ शिजरा-किसी गाँव, शहर या क्षेत्र का कपड़े पर बनाया गया नक्शा शिजरा कहलाता था। इसमें निवास क्षेत्र व कृषि क्षेत्र का उल्लेख होता था।

→ पोलज-मुगलकाल की वह कृषि भूमि जो सबसे अधिक उपजाऊ थी।

→ जमा-मुगलकाल में किसी क्षेत्र विशेष के लिए निर्धारित लगान दर जमा कहलाती थी। ”

→ हासिल-मुगलकाल में किसी क्षेत्र विशेष से जितना कर एकत्रित होता था वह हासिल कहलाता था।

→ टकसाल वह स्थान जहाँ पर किसी राज्य अथवा देश की मुद्रा छपती थी या आज भी छपती है।

→ मुकद्दम-मुगलकाल में गाँव के मुखिया को कहा जाता था।

→ एक ‘छोटा गणराज्य’-भारतीय गाँव के लिए अंग्रेज लेखकों द्वारा प्रयोग किया गया शब्द।

→ पायक-असम क्षेत्र में पैदल सैनिकों को पायक कहा जाता था।

→ सफावी-ईरान के शासकों को सफावी कहा जाता था।

मुगलकाल में कुल जनसंख्या के लगभग 85% से अधिक लोग गाँवों में रहते थे। गाँवों की अर्थव्यवस्था का केन्द्र कृषि थी। छोटे-से-छोटे कृषक तथा खेतिहर मजदूर से लेकर बड़े-से-बड़े व्यक्ति का सम्बन्ध कृषि से था। समाज के सभी वर्ग कृषि उत्पादन में अपना-अपना हिस्सा अपने-अपने ढंग से लेते थे। इस उत्पादन के बँटवारे में समाज के विभिन्न वर्गों में सहयोग, टकराव व प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चलती थी। इन्हीं रिश्तों व परिस्थितियों के बीच ग्रामीण समाज की संरचना बनती थी।

→ मुगल साम्राज्य की आय का मुख्य साधन भू-राजस्व था। वह विभिन्न तरीकों से विभिन्न व्यक्तियों के माध्यम से इसे एकत्रित करता था। इस राजस्व के एकत्रित करने में यह आवश्यक था कि ग्रामीण समाज पर नियंत्रण रखा जाए। मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व को एकत्रित करने के लिए जिन्स के साथ-साथ मुद्रा की नीति को भी अपनाया। इस काल में खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी या वाणिज्यिक फसलें भी उगाई जाती थीं। इस प्रक्रिया के चलते हुए व्यापार, मुद्रा व बाजार का सम्बन्ध गाँवों से हो गया। इस कारण गाँव भी अब अलग-अलग न रह कर शहर से जुड़ गए।

→ मुगलकाल का आर्थिक इतिहास जानने का एक प्रमुख साधन आइन-ए-अकबरी है। इस स्रोत से हमें यह पता चलता है कि राज्य का कृषि, कृषक व ज़मींदारों के बारे में दृष्टिकोण कैसा था? इसके अतिरिक्त कुछ और स्रोत भी हैं जो आर्थिक पक्ष की जानकारी देते हैं। इन स्रोतों का प्रयोग कर 16वीं व 17वीं शताब्दी के आर्थिक इतिहास का पुनर्निर्माण किया जा सकता है।

→ जैसा कि स्पष्ट है मुगलकाल में भी भारत कृषि प्रधान देश था। उस समय लोग आज की तुलना में कृषि पर अधिक निर्भर थे। ये लोग वर्ष भर खेती के कार्यों में लगे रहते थे। ज़मीन की जुताई, बिजाई व कटाई के अनुरूप इनकी दिनचर्या जुड़ी थी। इस समय कृषि पर आधारित उद्योग लगभग प्रत्येक गाँव में थे जिसमें लोग कृषि के मुख्य काम के अतिरिक्त समय गुजारते थे। भौगोलिक दृष्टि से भारत में कृषक व कृषि व्यवस्था की प्रणाली एक-जैसी नहीं थी।

→ मैदानी क्षेत्रों में बड़े-बड़े खेत थे तथा उनमें उत्पादन बड़े स्तर पर होता था। पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे-छोटे खेत व उत्पादन भी सीमित थे। इस तरह पठारी व मरुस्थल क्षेत्र की स्थिति भी अन्य से भिन्न थी। भारत के बहुत बड़े हिस्से पर जंगल भी थे। वहाँ रहने वाले लोगों की जीवन-शैली पूरी तरह से भिन्न थी। इस तरह से पूरे भारत के बारे में कृषक व कृषि के सन्दर्भ में एक जैसे निष्कर्ष निकालना सम्भव नहीं है।

→ मुगलकाल में कृषक के लिए मोटे तौर पर रैयत या मुज़रियान शब्द का प्रयोग मिलता है। कई स्थानों पर हमें कृषक के लिए किसान व आसामी शब्द भी मिलते हैं। 17वीं शताब्दी के स्रोतों में खुद-काश्त व पाहि-काश्त इत्यादि शब्दों का प्रयोग कृषकों के लिए मिलता है। यह शब्द उनकी प्रकृति में अन्तर को स्पष्ट करता है। कहीं-कहीं यह विभिन्न क्षेत्रों के भाषायी अन्तर के कारण है।

→ मुगलकाल में फसल चक्र खरीफ व रबी के नाम से जाना जाता था। यह फसल चक्र भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में था। उपजाऊ क्षेत्रों में दोनों फसलें होती थीं। जबकि कम उपजाऊ क्षेत्रों में एक फसल मौसम के अनुरूप ली जाती थी। रबी (बसन्त) की फसल अक्तूबर-नवम्बर में रोपित होती थी तथा मार्च-अप्रैल में काटी जाती थी जबकि खरीफ (पतझड़) की फसल की बिजाई मई, जून व जुलाई में होती थी तथा कटाई सितम्बर, अक्तूबर व नवम्बर में होती थी।

→  इस फसल चक्र का आधार मानसून पवनें थीं। भारत में जिन क्षेत्रों में वर्षा पर्याप्त मात्रा में होती थी या सिंचाई के साधन उपलब्ध थे, वहाँ तीन फसलें भी ली जाती थीं। तीसरी फसल मोटे तौर पर पशुओं के लिए चारा इत्यादि होता था। दूसरी ओर गन्ना व नील इस तरह की फसलें भी थीं जो वर्ष में एक बार ही हो पाती थीं।

→ कृषि सम्बन्धी इन पक्षों की एक विशेष बात यह थी कि मुगलकाल में जोत क्षेत्र काफी बड़ा था। कृषि क्षेत्र को बढ़ाने के लिए राज्य तथा कृषकों द्वारा लगातार कार्य किए गए। जोत क्षेत्र के बढ़ने तथा नई फसलों के आगमन का परिणाम यह रहा कि अकाल व भुखमरी की स्थिति पहले से कम हुई। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव जनसंख्या पर पड़ा। 1600 से 1700 तक भारत की जनसंख्या में लगभग 5 करोड़ की वृद्धि हुई तथा आगामी 100 वर्षों में यह और अधिक बढ़ी। स्रोतों के अनुमान के अनुसार 16वीं व 17वीं शताब्दी में भारत की जनसंख्या में लगभग 33% की वृद्धि हुई। इस जनसंख्या वृद्धि से कृषि उत्पादन भी बढ़ा क्योंकि कृषि पर काम करने वाले लोग भी बढ़े।

→ गाँव में व्यवस्था का संचालन पंचायतें करती थीं। गाँव में प्रायः कई जातियाँ होती थीं। प्रत्येक जाति की अपनी एक पंचायत होती थी। ये जातीय पंचायत गाँव की परिधि के बाहर भी महत्त्व रखती थी। इनका अस्तित्व क्षेत्रीय आधार पर भी होता था। ये बहुत शक्तिशाली होती थीं। ये पंचायतें अपनी जाति (बिरादरी) के झगड़ों का निपटारा करती थीं। जातीय परंपरा व बन्धनों के दृष्टिकोण से ये ग्रामीण पंचायतों की तुलना में अधिक कठोर थीं।

→ दीवानी झगड़ों का निपटारा, शादियों के जातिगत मानदण्ड, कर्मकाण्डीय गतिविधियों का आयोजन तथा अपने व्यवसाय को मजबूत करना इनके काम थे। व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को ये पंचायतें जाति से बाहर कर देती थीं। सामाजिक अस्तित्व की दृष्टि से यह दण्ड बेहद कठोर होता था क्योंकि इसके द्वारा व्यक्ति अपने परिवार, व्यवसाय व वैवाहिक संबंधों इत्यादि से भी कट जाता था।

→ ग्राम पंचायतों पर मुख्य रूप से उच्च वर्ग का प्रभुत्व था। वह वर्ग अपनी मनमर्जी के फैसले पंचायत के माध्यम से लागू करवाता था। सामान्य तौर पर निम्न वर्ग के लोग पंचायत की इस तरह की कार्रवाई को झेल लेते थे। परन्तु स्रोतों में विशेषकर महाराष्ट्र व राजस्थान से प्राप्त दस्तावेजों में इस तरह के प्रमाण मिले हैं कि निम्न वर्ग ने विरोध किया हो। इन दस्तावेज़ों में ऊँची जातियों व सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध जबरन कर वसूली या बेगार की शिकायत है, जिसके अनुसार निम्न वर्ग के लोग स्पष्ट करते हैं कि उनका शोषण किया जा रहा है तथा उन्हें उनसे न्याय की उम्मीद भी नहीं है।

→ भारतीय ग्राम प्राचीनकाल से छोटे गणराज्य के रूप में कार्य कर रहे थे। मुगलकाल में इस व्यवस्था में थोड़ा-बहुत बदलाव आना शुरू हो गया था। इस काल में शहरीकरण का थोड़ा विकास हुआ जिसके चलते गाँव व शहर के बीच व्यापारिक रिश्ते बढ़े। इस कड़ी में वस्तु-विनिमय की बजाय नकद धन का अधिक प्रयोग होने लगा। इसी तरह मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व की वसूली जिन्स के साथ-साथ नकदी में भी प्रारंभ की।

→ शासक की ओर से नकदी को अधिक महत्त्व दिया जाता था। इस काल में विदेशी व्यापार में भी वृद्धि हुई। विदेशों को निर्यात होने वाली चीजें गाँव में बनती थीं। इस व्यापार से नकद धन मिलता था।

→ इस तरह धीरे-धीरे मजदूरी का भुगतान भी नकद किया जाने लगा। इस काल में खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी फसलें भी उगाई जाने लगी, जिससे कृषक को पर्याप्त मात्रा में लाभ होता था। रेशम तथा नील मुगलकाल में अत्यधिक लाभ देने वाली फसलें मानी जाती थीं। इस तरह ग्रामीण समाज में वस्तु विनिमय के साथ मुद्रा का प्रयोग भी होने लगा। इससे ग्रामीण ताना-बाना व व्यवस्था प्रभावित होने लगी।

→ जंगलवासियों के जीवन में भी मुगलकाल में कई तरह के परिवर्तन आए। विभिन्न कारणों के होते हुए जंगलवासियों की दूरियाँ गाँव व नगरों से कम हुई, वहीं राज्य के साथ भी संबंधों में बदलाव आया। 16वीं सदी के एक बंगाली कवि मुकंदराम चक्रवर्ती ने ‘चंडीमंगल’ नामक कविता लिखी। इस कविता के नायक कालकेतु ने जंगल खाली करवाकर नए साम्राज्य की स्थापना की। उसने अपनी कविता में उस प्रक्रिया को वर्णित किया है जो जंगल में साम्राज्य का विस्तार करने के लिए अपनाई गई तथा जिसने जंगल के जीवन व व्यवस्था को बदल दिया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

→ मुगलकाल में कृषि संबंधों का अध्ययन करते हुए अभी तक हमने कृषक, गैर-कृषक व ग्रामीण समुदायों के कुछ पक्षों का वर्णन किया है। इन संबंधों में एक और बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष का अध्ययन जरूरी है। यह पक्ष ज़मींदार के नाम से जाना जाता था। यह कृषि व्यवस्था का केन्द्र था, क्योंकि वह भूमि का मालिक था। उसे ज़मीन के बारे में सारे अधिकार प्राप्त थे अर्थात् वह अपनी ज़मीन को बेच सकता था या किसी को हस्तांतरित कर सकता था।

→ वह अपनी भूमि से कर एकत्रित करके राज्य को देता था। इस तरह यह वर्ग अपने से ऊपर तथा नीचे वाले दोनों वर्गों पर प्रभाव रखता था। ज़मींदार के सन्दर्भ में एक खास बात यह भी है कि वह खेती की कमाई खाता था, लेकिन स्वयं खेती नहीं करता था। बल्कि वह अपने अधीन कृषकों व मजदूरों से कृषि करवाता था।

→ निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि 16वीं व 17वीं सदी सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है। इस काल में ग्रामीण व्यवस्था व कृषि व्यवस्था में कई तरह के बदलाव आए। ये बदलाव आपस में जुड़े थे। ग्रामीण व्यवस्था में जाति व्यवस्था प्रमुख थी। उसी आधार पर सामाजिक ताना-बाना बना था। कृषक समुदाय इस व्यवस्था में शीर्ष पर था। उसकी जाति भी उच्च थी। निम्न जातियों के लोग भूमि के मालिक नहीं थे। वे या तो गैर-कृषक कार्य करते थे या फिर खेतिहर मजदूर थे।

काल-रेखा

कालघटना का विवरण
1483 ई०बाबर का मध्य एशिया के फरगाना में जन्म
1504 ई०बाबर की काबुल-विजय
1526 ई०बाबर की पानीपत की पहली लड़ाई में जीत, दिल्ली सल्तनत का अन्त व मुग़ल वंश की स्थापना
1530 ई०हुमायूँ का गद्दी पर बैठना
1540 ई०हुमायूँ की शेरशाह सूरी द्वारा पराजय व हुमायूँ का (1540-55) भारत से निर्वासन
1540-45 ई०शेरशाह सूरी का शासन काल
1545-55 ई०शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारियों का काल
1555-56 ई०हुमायूँ द्वारा फिर से सत्ता पर अधिकार करना
1556 ई०पानीपत की दूसरी लड़ाई व अकबर के शासन काल का प्रारंभ
1556-1605 ई०अकबर का शासन काल
1605-1627 ई०जहाँगीर का शासन काल
1628-1658 ई०शाहजहाँ का शासन काल
1658-1707 ई०औरंगज़ेब का शासन काल
1707-1857 ई०औरंगज़ेब के बाद 11 मुग़ल शासकों का काल या उत्तर मुग़लकाल
1739 ई०नादिरशाह का दिल्ली पर आक्रमण व लूटमार
1757 ई०प्लासी की लड़ाई में बंगाल पर अंग्रेजों का कब्ना
1761 ई०पानीपत की तीसरी लड़ाई व मराठों की अब्दाली के हाथों हार
1765 ई०बंगाल, बिहार व उड़ीसा में अंग्रेजों को दीवानी अधिकार की प्राप्ति
1857 ई०1857 का जन विद्रोह, अन्तिम मुग़ल बादशाह को बन्दी बनाकर बर्मा की राजधानी रंगून भेजना।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना किसके काल में हुई?
(A) अलाऊद्दीन खिलजी
(B) मुहम्मद तुगलक
(C) बाबर
(D) अकबर
उत्तर:
(B) मुहम्मद तुगलक

2. विजयनगर साम्राज्य का पहला शासक था
(A) हरिहर राय
(B) बुक्का राय
(C) कृष्णदेव राय
(D) देवराय प्रथम
उत्तर:
(A) हरिहर राय

3. विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक थे
(A) हसन गंगू
(B) कृष्णदेव राय
(C) विजालय
(D) हरिहर राय एवं बुक्का राय
उत्तर:
(D) हरिहर राय एवं बुक्का राय

4. हम्पी के अवशेषों की जानकारी सर्वप्रथम किस व्यक्ति ने दी?
(A) जॉन मार्शल
(B) आर०जी०बैनर्जी
(C) डी०आर० साहनी
(D) कॉलिन मैकेन्जी
उत्तर:
(D) कॉलिन मैकेन्जी

5. ‘गजपति’ की उपाधि किस क्षेत्र के शासक लेते थे?
(A) विजयनगर
(B) बहमनी
(C) उड़ीसा
(D) महाराष्ट्र
उत्तर:
(C) उड़ीसा

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

6. किस हथियार के प्रयोग ने पुर्तगालियों को भारत के तटीय क्षेत्रों में शक्तिशाली बनाया?
(A) तलवार
(B) बंदूक
(C) तोपखाना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) बंदूक

7. विजयनगर का पहला राजवंश था
(A) संगम वंश
(B) सुलुव वंश
(C) तुलुव वंश
(D) अराविदु वंश
उत्तर:
(A) संगम वंश

8. तालीकोटा का युद्ध कब लड़ा गया?
(A) 1526 ई० में
(B) 1556 ई० में
(C) 1565 ई० में
(D) 1576 ई० में
उत्तर:
(C) 1565 ई० में

9. विजयनगर के शासकों को कहा जाता था
(A) सुल्तान
(B) राय
(C) सम्राट
(D) महाराजा
उत्तर:
(B) राय

10. संस्कृत साहित्य में यूनानियों तथा उत्तर:पश्चिम से आने वालों को कहा गया है
(A) तुर्क
(B) मलेच्छ
(C) यवन
(D) मंगोल
उत्तर:
(C) यवन

11. विजयनगर साम्राज्य में स्थानीय सैनिक प्रमुखों को कहा जाता था
(A) नायक
(B) विजेता
(C) कुलीन
(D) शहजादा
उत्तर:
(A) नायक

12. 15वीं शताब्दी के प्रारंभ में विजयनगर में किस जलाशय का निर्माण किया गया?
(A) कमल पुरम
(B) शाही जलाशय
(C) विरुपाक्ष
(D) हम्पी जलाशय
उत्तर:
(A) कमल पुरम

13. अब्दुर रज्जाक ने विजयनगर में दुर्गों की कितनी पंक्तियाँ बताई हैं?
(A) 5
(B) 7
(C) 8
(D) 10
उत्तर:
(B) 7

14. शहरी क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य में कहाँ स्थित था?
(A) पूर्व में
(B) पश्चिम में
(C) मध्य में
(D) उत्तर:पूर्व में
उत्तर:
(D) उत्तर:पूर्व में

15. डोमिंगो पेस द्वारा ‘विजय का भवन’ किसे कहा गया है?
(A) अस्तबल क्षेत्र को
(B) शाही महल को
(C) महानवमी डिब्बे को
(D) धार्मिक स्थल को
उत्तर:
(C) महानवमी डिब्बे को

16. हम्पी का नाम किस स्थानीय देवी-देवता से माना जाता है?
(A) विरुपाक्ष से
(B) विठ्ठल से
(C) पम्पा देवी से
(D) विष्णु से
उत्तर:
(C) पम्पा देवी से

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

17. मंदिरों का प्रवेश द्वार कहलाता था
(A) देव द्वार
(B) शाही द्वार
(C) नगरालय
(D) गोपुरम्
उत्तर:
(D) गोपुरम्

18. धार्मिक केंद्र में सबसे ऊँची इमारत होती थी
(A) गोपुरम्
(B) गर्भ गृह
(C) मंडप
(D) देव स्थल
उत्तर:
(A) गोपुरम्

19. विजयनगर में सबसे बड़ा मंदिर था
(A) विरुपाक्ष का
(B) विष्णु का
(C) विठ्ठल का
(D) जिन्जी का
उत्तर:
(A) विरुपाक्ष का

20. रथ की आकृति वाला मंदिर किस देवता का माना जाता है?
(A) विरुपाक्ष का
(B) विष्णु का
(C) विट्ठल का
(D) पम्पा देवी का
उत्तर:
(C) विठ्ठल का

21. नायकों द्वारा विजयनगर साम्राज्य में कहाँ गोपुरम् बनवाया गया था?
(A) हम्पी में
(B) मदुरई में
(C) धार्मिक केंद्र में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) मदुरई में

22. विजयनगर की खुदाई में मुख्य रूप से शामिल थे
(A) जॉन एम० फ्रिटज
(B) जॉर्ज मिशेल
(C) एम०एस० नागराज
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

23. बाजार का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है
(A) अब्दुर रज्जाक ने
(B) डोमिंगो पेस ने
(C) वास्कोडिगामा ने
(D) बरबोसा ने
उत्तर:
(B) डोमिंगो पेस ने

24. विजयनगर का सबसे प्रतापी शासक माना जाता है
(A) हरिहर राय
(B) बुक्का राय
(C) कृष्णदेव राय
(D) देवराय प्रथम
उत्तर:
(C) कृष्णदेव राय

25. विजयनगर का समकालीन दक्षिण भारतीय राज्य कौन-सा था?
(A) वारंगल
(B) काकतिया
(C) चोल
(D) बहमनी
उत्तर:
(D) बहमनी

26. किस मुगल शासक ने विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय का वर्णन किया है?
(A) बाबर ने
(B) अकबर ने
(C) जहांगीर ने
(D) शाहजहाँ ने
उत्तर:
(A) बाबर ने

27. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब हुई?
(A) 1320 ई० में
(B) 1336 ई० में
(C) 1350 ई० में
(D) 1380 ई० में
उत्तर:
(B) 1336 ई० में

28. ‘हम्पी’ क्षेत्र में साम्राज्य होने की बात सबसे पहले कब सामने आई?
(A) 1800 ई० में
(B) 1850 ई० में
(C) 1920-21 ई० में
(D) 1956 ई० में
उत्तर:
(A) 1800 ई० में

29. विजयनगर का वर्तमान नाम है
(A) हम्पी
(B) विजयनगर
(C) विजयवाड़ा
(D) बीजापुर
उत्तर:
(A) हम्पी

30. विजयनगर साम्राज्य काल में घोड़ों के व्यापारियों को कहा जाता था
(A) नगर सेठ
(B) तवरम
(C) अश्वपालक
(D) कुदिरई चेट्टी
उत्तर:
(D) कुदिरई चेट्टी

31. भारत में बंदूक लाने का श्रेय दिया जाता है
(A) अंग्रेज़ों को
(B) फ्रांसीसियों को
(C) पुर्तगालियों को
(D) डचों को
उत्तर:
(C) पुर्तगालियों को

32. विजयनगर साम्राज्य का अन्तिम राजवंश कौन-सा था?
(A) संगम वंश
(B) सुलुव वंश
(C) तुलुव वंश
(D) अराविदु वंश
उत्तर:
(C) तुलुव वंश

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33. तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर की सेना का नेतृत्व किसने किया?
(A) हरिहर ने
(B) बुक्का राय ने
(C) कृष्णदेव राय ने
(D) राम राय ने
उत्तर:
(D) राम राय ने

34. 1565 ई० में युद्ध तालीकोटा के किस क्षेत्र में हुआ?
(A) राक्षसी-तांगड़ी में
(B) चन्द्रगिरी में
(C) पेनुकोण्डा में
(D) गोलकुण्डा में
उत्तर:
(A) राक्षसी-तांगड़ी में

35. तालीकोटा की हार के बाद विजयनगर के शासकों ने अपनी राजधानी बनाई
(A) विजयनगर
(B) पेनुकोण्डा
(C) गोलकुण्डा
(D) मैसूर
उत्तर:
(B) पेनुकोण्डा

36. कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार की समस्या सुलझाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका थी
(A) मुगल शासकों की
(B) विजयनगर के दरबारियों की
(C) बीजापुर के सुल्तान की
(D) जनता की
उत्तर:
(C) बीजापुर के सुल्तान की

37. सैनिक प्रमुख के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य करने वाले वर्ग को विजयनगर में क्या नाम दिया जाता था?
(A) राय
(B) अमीर
(C) नायक
(D) अमर-नायक
उत्तर:
(D) अमर-नायक

38. तुंगभद्रा नदी विजयनगर से किस दिशा में थी?
(A) दक्षिण
(B) दक्षिण पूर्व
(C) पश्चिम
(D) उत्तर पूर्व
उत्तर:
(D) उत्तर पूर्व

39. कालीकट का वर्तमान नाम है
(A) कोजीकोड
(B) मालाबर
(C) त्रिअनन्तपुरम
(D) कोलकट्यम
उत्तर:
(A) कोजीकोड

40. विजयनगर के शासक जल प्रबंधन करते थे
(A) राजकीय क्षेत्र के लिए
(B) धार्मिक केंद्र के लिए
(C) कृषि क्षेत्र के लिए
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

41. सुरक्षा दृष्टि से विजयनगर का आश्चर्यजनक पहलू है
(A) मन्दिरों की बेजोड़ सुरक्षा
(B) शाही क्षेत्र की किलेबंदी
(C) कृषि क्षेत्र की किलेबंदी
(D) हथियारों में बंदूक का प्रयोग
उत्तर:
(C) कृषि क्षेत्र की किलेबंदी

42. “लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं” ये पंक्तियां किस यात्री ने लिखीं?
(A) डोमिंगो पेस मे
(B) बरबोसा ने
(C) अब्दुर रज्जाक ने
(D) नूनिज़ ने
उत्तर:
(B) बरबोसा ने

43. 11000 वर्ग फीट के आधार पर 40 फीट ऊँचे विशाल मंच को पुरातत्वविदों ने क्या नाम दिया है?
(A) महानवमी डिब्बा
(B) शाही केंद्र
(C) कल्याण मंडप
(D) सिंहासन मंडप
उत्तर:
(A) महानवमी डिब्बा

44. राजकीय केंद्र में सबसे सुन्दर भवन किसे माना जाता है?
(A) हजार राम मन्दिर को
(B) कमल महल को
(C) महानवमी डिब्बे को
(D) कल्याण मंडप को
उत्तर:
(B) कमल महल को

45. कमल भवन के नजदीक बहुत बड़ी संख्या में किस पशु की रख-रखाव की व्यवस्था विजयनगर के शासकों ने की?
(A) हाथी
(B) घोड़ा
(C) ऊँट
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) हाथी

46. धार्मिक केंद्र में लोगों की श्रद्धा सबसे अधिक किस मन्दिर में थी?
(A) विठ्ठल
(B) विरुपाक्ष
(C) चन्नकेशव
(D) वृहदेश्वर
उत्तर:
(B) विरुपाक्ष

47. विरुपाक्ष मन्दिर का कौन-सा प्रवेश द्वार सबसे ऊँचा, भव्य व मुख्य है?
(A) पूर्वी
(B) पश्चिमी
(C) उत्तरी
(D) दक्षिणी
उत्तर:
(A) पूर्वी

48. विट्ठल देवता का संबंध किस देवता के साथ जोड़ा जाता है?
(A) सूर्य के साथ
(B) शिव के साथ
(C) विष्णु के साथ
(D) जगन्नाथ के साथ
उत्तर:
(C) विष्णु के साथ

49. हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व स्थल कब घोषित किया गया?
(A) 1952 ई० में
(B) 1968 ई० में
(C) 1976 ई० में
(D) 1986 ई० में
उत्तर:
(C) 1976 ई० में

50. यूनेस्को द्वारा हम्पी को विश्व विरासत में कब शामिल किया गया?
(A) 1960 ई० में
(B) 1968 ई० में
(C) 1976 ई० में
(D) 1986 ई० में
उत्तर:
(D) 1986 ई० में

51. वर्तमान में हम्पी को कौन संरक्षित कर रहा है?
(A) भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग
(B) कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) व (B) दोनों

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना किसने की?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर एवं बुक्का ने की।

प्रश्न 2.
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई० में हुई।

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प्रश्न 3.
विजयनगर के शासकों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
विजयनगर के शासकों को राय कहा जाता था।

प्रश्न 4.
विजयनगर के पतन में सबसे अधिक भूमिका किस घटना की मानी जाती है?
उत्तर:
विजयनगर के पतन में सबसे अधिक भूमिका तालीकोटा के युद्ध की मानी जाती है।

प्रश्न 5.
विजयनगर साम्राज्य में इटली के किस यात्री ने यात्रा की?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में इटली के अब्दुर रज्जाक ने यात्रा की।

प्रश्न 6.
विजयनगर शहर का सबसे अधिक वर्णन किसने किया?
उत्तर:
विजयनगर शहर का सबसे अधिक वर्णन डोमिंगो पेस ने किया।

प्रश्न 7.
विजयनगर साम्राज्य में शाही केंद्र पर बना विशाल मंच क्या कहलाता था?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में शाही केंद्र पर बना विशाल मंच ‘महानवमी डिब्बा’ कहलाता था।

प्रश्न 8.
विजयनगर शहर में ‘कमल महल’ के नजदीक बड़ा भवन किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
विजयनगर शहर में ‘कमल महल’ के नजदीक बड़ा भवन हाथियों का अस्तबल के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 9.
विजयनगर साम्राज्य में सबसे महत्त्वपूर्ण मंदिर किस देवता का था?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में सबसे महत्त्वपूर्ण मंदिर विरुपाक्ष देवता का था।

प्रश्न 10.
महाराष्ट्र में किस देवता को ‘विट्ठल देव’ कहा जाता था?
उत्तर:
महाराष्ट्र में विष्णु को ‘विठ्ठल देव’ कहा जाता था।

प्रश्न 11.
विजयनगर में विरुपाक्ष के साथ किस देवी का विवाह उत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है?
उत्तर:
विजयनगर में विरुपाक्ष के साथ पम्पा देवी का विवाह उत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है।

प्रश्न 12.
विजयनगर के मानचित्र में किस अंग्रेजी वर्ण को प्रयोग में नहीं लाया गया है?
उत्तर:
विजयनगर के मानचित्र में I (आई) अंग्रेजी वर्ण को प्रयोग में नहीं लाया गया है।

प्रश्न 13.
‘हम्पी’ शहर को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत में कब शामिल किया गया?
उत्तर:
‘हम्पी’ शहर को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत में सन् 1986 में शामिल किया गया।

प्रश्न 14.
विजयनगर को विश्व का सबसे समृद्ध शहर कौन बताता है?
उत्तर:
विजयनगर को विश्व का सबसे समृद्ध शहर डोमिंगो पेस बताता है।

प्रश्न 15.
विजयनगर का क्या अर्थ है?
उत्तर:
विजयनगर का अर्थ है-विजय का शहर।

प्रश्न 16.
कॉलिन मैकेन्ज़ी को विजयनगर की प्रारम्भिक जानकारी किससे मिली?
उत्तर:
कॉलिन मैकेन्जी को विजयनगर की प्रारम्भिक जानकारी विरुपाक्ष व पम्पा देवी के पुजारियों से मिली।

प्रश्न 17.
कॉलिन मैकेन्ज़ी भारत का सर्वेयिर कब बना?
उत्तर:
कॉलिन मैकेन्ज़ी भारत का सर्वेयिर 1815 ई० में बना।

प्रश्न 18.
दक्षिण (बहमनी) के शासक क्या कहलाते थे?
उत्तर:
दक्षिण (बहमनी) के शासक सुल्तान कहलाते थे।

प्रश्न 19.
तंजावुर का ऐतिहासिक मन्दिर किस देवता से जुड़ा है?
उत्तर:
तंजावुर का ऐतिहासिक मन्दिर बृहदेश्वर देवता से जुड़ा है।

प्रश्न 20.
कुदिरई चेट्टी कौन थे?
उत्तर:
कुदिरई चेट्टी घोड़ों के व्यापारी थे।

प्रश्न 21.
विजयनगर साम्राज्य के प्रथम राजवंश का नाम बताइए।
उत्तर:
विजयनगर का पहला वंश संगम वंश था।

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प्रश्न 22.
कृष्णदेव राय किस वंश से संबंधित था?
उत्तर:
कृष्णदेव राय तुलुव वंश से संबंधित था।

प्रश्न 23.
विजयनगर का अंतिम वंश कौन-सा था?
उत्तर:
विजयनगर का अंतिम वंश अराविदु वंश था।

प्रश्न 24.
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार की समस्या का समाधान किसने करवाया?
उत्तर:
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार की समस्या का समाधान बीजापुर के सुल्तान ने करवाया।

प्रश्न 25.
कृष्णदेव राय द्वारा जलाशय बनवाने का वर्णन किस यात्री ने दिया है?
उत्तर:
कृष्णदेव राय द्वारा जलाशय बनवाने का वर्णन डोमिंगो पेस ने दिया है।

प्रश्न 26.
नगर में प्रवेश के लिए बने प्रवेश द्वारों की स्थापत्य कला को विशेषज्ञों ने क्या नाम दिया है?
उत्तर:
नगर में प्रवेश के लिए बने प्रवेश द्वारों की स्थापत्य कला को विशेषज्ञों ने इंडो-इस्लामिक नाम दिया है।

प्रश्न 27.
राजकीय केंद्र में लगभग कितने मन्दिर थे?
उत्तर:
राजकीय केंद्र में लगभग 60 से अधिक मन्दिर थे।

प्रश्न 28.
राजकीय केंद्र में सबसे भव्य मन्दिर कौन-सा है?
उत्तर:
राजकीय केंद्र में सबसे भव्य मन्दिर हजारराम मन्दिर है।

प्रश्न 29.
विजयनगर के शासकों द्वारा सबसे अधिक ऊँची इमारत कौन-सी बनाई जाती थी?
उत्तर:
विजयनगर के शासकों द्वारा सबसे अधिक ऊँची इमारत गोपुरम् बनाई जाती थी।

प्रश्न 30.
हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल कब घोषित किया गया?
उत्तर:
हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल 1976 ई० में घोषित किया गया।

प्रश्न 31.
हम्पी को विश्व पुरातत्व स्थल कब घोषित किया गया?
उत्तर:
हम्पी को विश्व पुरातत्व स्थल 1986 ई० में घोषित किया गया।

प्रश्न 32.
‘विजयनगर में आप हर वस्तु पा सकते हैं, यह बात किसने कही?
उत्तर:
विजयनगर में आप हर वस्तु पा सकते हैं’ यह बात यात्री डोमिंगो पेस ने कही।

प्रश्न 33.
‘गजपति’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘गजपति’ का अर्थ हाथियों का स्वामी है।

प्रश्न 34.
विजयनगर के शासक कौन-सी उपाधि धारण करते थे?
उत्तर:
विजयनगर के शासक ‘हिन्दू सूरतराणा’ की उपाधि धारण करते थे।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर साम्राज्य की खोज में कॉलिन मैकेन्ज़ी की क्या भूमिका है?
उत्तर:
कॉलिन मैकेन्जी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में अभियंता व पुरातत्वविद था। उसने विरुपाक्ष तथा पम्पा देवी के मंदिरों के पुजारियों से जानकारी प्राप्त की। उसने विजयनगर के क्षेत्र का सर्वेक्षण करवाया तथा रिपोर्ट प्रकाशित की। उसने इसके बाद इस क्षेत्र का मानचित्र भी तैयार करवाया। उसकी रिपोर्ट व मानचित्र ने इतिहासकारों को आकर्षित किया जिसके फलस्वरूप विजयनगर की खोज हुई।

प्रश्न 2.
अमर-नायक कौन थे? उनके क्या कार्य थे?
उत्तर:
अमर शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के समर शब्द से हुई है जिसका अर्थ युद्ध व लड़ाई से लिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि अमर-नायक प्रशासन व सेना में प्रमुख व्यक्ति होते थे। वे किसानों, दस्तकारों व व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूलते थे। इस वसूली राशि में से एक हिस्सा अपने व्यक्तिगत खर्च, सेना, हाथी व घोड़ों के रख-रखाव के लिए रख लेते थे। शेष राजस्व राशि राय के खजाने में जमा करवाते थे।

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प्रश्न 5.
विजयनगर शहर की आवास व्यवस्था की चर्चा करें।
उत्तर:
विजयनगर में आवास क्षेत्र शहर के किलेबन्द क्षेत्र में था। सारे शहर में एक जैसी बस्ती नहीं थी। शहर में विभिन्न धर्मों के लोग अलग-अलग क्षेत्रों में रहते थे। इस शहर के उत्तर:पूर्व क्षेत्र में साधन-सम्पन्न वर्ग के लोग रहते थे।

प्रश्न 6.
विजयनगर साम्राज्य के शाही स्थल की जानकारी दें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की सारी प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन जिस स्थल से होता था उसे शाही स्थल कहा गया है। शाही निवास, दरबार के अति महत्त्वपूर्ण भवनों के अतिरिक्त यहाँ 60 से अधिक मंदिर थे। यह इस बात का प्रमाण है कि शासक इन मन्दिरों व उपासना स्थलों को बनाकर जनता में यह संदेश देना चाहता था कि वह सबका शासक है इसलिए सभी उसे स्वीकार करें। इस तरह शाही स्थल पर मंदिरों का होना शासक द्वारा वैधता को प्राप्त करने का एक तरीका कहा जा सकता है।

प्रश्न 7.
मंदिरों के मंडपों के प्रकार व महत्त्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मंदिरों के अंदर विभिन्न तरह के मंडप होते थे। जिनकी पहचान, उत्सव व अनुष्ठान के आधार पर की जाती थी। ताजपोशी तथा शादी उत्सव का मंडप बड़े सभागार में होता था। समाज के कार्यक्रमों व सामान्य अवसरों की परंपराओं, विवाह, दान, सामाजिक कार्यों सभा इत्यादि के लिए मंडप अलग होते थे। कुछ मंडप धार्मिक केंद्र के बाह्य क्षेत्र में भी थे।

प्रश्न 8.
विजयनगर शहर की खुदाई का नेतृत्व किन-किन लोगों द्वारा किया गया?
उत्तर:
विजयनगर के उत्खनन (खुदाई) कार्य को करने वाले जॉन एम. फ्रिट्ज (John M. Fritz), जॉर्ज मिशेल (George Michell) तथा एम.एस. नागराज राव (M.S. Nagraja Rao) थे जो प्रारंभ से अंत तक खुदाई के कार्य से जुड़े रहे। इन्होंने पत्थरों की बीच की जगह, दरवाजों के छज्जों तथा मीनारों के बीच के विभिन्न बिन्दुओं की कल्पना की। .

प्रश्न 9.
डोमिंगो पेस विजयनगर शहर का वर्णन किस तरह करता है?
उत्तर:
डोमिंगो एक विदेशी यात्री था। उसने 16वीं शताब्दी में विजयनगर की यात्रा की। उसने शहर की बनावट, सड़कों व गलियों को बहुत अच्छा बताया। उसने विजयनगर के बाजार के बारे में लिखा कि यहाँ प्रत्येक वस्तु मिलती थी; जैसे कि अनाज, बहुमूल्य धातुएं तथा मोम इत्यादि।

प्रश्न 10.
विजयनगर शहर में कृषि क्षेत्र की किलेबंदी के लाभ व हानियाँ बताएँ।
उत्तर:
विजयनगर के खेतों को किलेबन्दी में लेने का सबसे बड़ा लाभ यह था कि लोगों के साथ-साथ फसलों की भी सुरक्षा हो जाती थी। इससे युद्ध काल में खाद्यान्न का संकट नहीं आता था। लेकिन इस व्यवस्था का दोष यह था कि यह महँगी थी। दूर-दराज तक के क्षेत्रों को किलेबन्दी में काफी खर्च करना पड़ता था।

प्रश्न 11.
विजयनगर के बाजार में मिलने वाली चीज़ों का वर्णन करें।
उत्तर:
विजयनगर का बाजार उपयोगी वस्तुओं की दृष्टि से काफी समृद्ध था। इसमें अनाज, दालें विभिन्न तरह के फल व सब्जियाँ, मांस तथा पशु-पक्षी मिलते थे। विभिन्न तरह के आभूषण, कपड़ा तथा अश्व भी यहाँ मिलते थे।

प्रश्न 12.
विजयनगर के हाथियों के अस्तबल के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
शाही क्षेत्र में हाथियों का अस्तबल बहुत बड़ा था। यह कमल महल के समीप था। इतने बड़े अस्तबल को देखकर यह अनुमान लगाया जाना सरल है कि रायों की सेना में हाथियों की संख्या काफी थी।

प्रश्न 13.
विजयनगर साम्राज्य में शासकों व व्यापारियों के संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य को संपन्न बनाने में व्यापारी वर्ग ने अपना योगदान दिया। इन व्यापारियों को शासकों द्वारा संरक्षण दिया गया था। व्यापारी साम्राज्य के लिए अश्व अरब व मध्य-एशिया से आते थे। प्रारंभ से ही राय अश्वों के लिए अरब व्यापारियों पर निर्भर थे। परंतु समय के साथ-साथ यहाँ कुदिरई चेट्टी (घोड़ों के व्यापारियों) का वर्ग पैदा हो गया। इन्होंने राज्य को पर्याप्त मात्रा में घोड़े उपलब्ध करवाए। 1498 ई० में पुर्तगालियों के भारत के पश्चिमी तट पर आने के बाद इन्होंने व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में भाग लिया।
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विजयनगर मसालों, रत्नों एवं आभूषणों के बाजार व व्यापार के लिए जाना जाता था। यहाँ की जनता की समृद्धि का ज्ञान उनकी जीवन-शैली, विदेशी वस्तुओं की माँग तथा रत्न व आभूषणों से होता था। इसके कारण व्यापारी लगातार उन्नति के मार्ग पर थे। इसके साथ ही राज्य के राजस्व में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी।

प्रश्न 14.
कृष्णदेव राय के व्यापार व व्यापारियों के बारे में क्या विचार थे?
उत्तर:
कृष्णदेव राय विजयनगर का सबसे प्रतापी शासक था। उसने तेलुगु भाषा में ‘अमुक्त मल्यद’ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उसने व्यापारियों के बारे में लिखा–“एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात हो सके। उसके अनुसार शासक को रोज बैठक में बुलाकर, व्यापारियों को तोहफे देकर तथा उचित मुनाफे की स्वीकृति देकर उन्हें अपने साथ जोड़ना चाहिए। कृष्णदेव राय के इस चिन्तन से पता चलता है कि राय व्यापारियों को किस तरह प्रोत्साहित कर, व्यापार को बढ़ावा देना चाहता था।

प्रश्न 15.
हरिहर व बुक्का राय के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हरिहर व बुक्का राय विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक थे। उन्होंने 1336 ई० में इसकी स्थापना की। इस साम्राज्य का प्रथम शासक हरिहर (1336-56) बना तथा उसने राज्य के लिए नियम कानून बनाए। उसकी मृत्यु के पश्चात् बुक्का राय (1356-1377) शासक बना। उसने प्रशासन व राज्य की समृद्धि की ओर ध्यान दिया। उसके समय में ही पड़ोसी राज्य बहमनी के साथ संघर्ष की शुरुआत हुई।

प्रश्न 16.
विजयनगर का पतन कैसे हुआ?
अथवा विजयनगर साम्राज्य के पतन के क्या कारण थे?
उत्तर:
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में दरबारी तनाव, गुटबंदी व षड्यंत्रों की शुरुआत हो गई। कृष्णदेव राय के उत्तराधिकारियों को दरबारियों तथा सेनापतियों से चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1542 ई० में विजयनगर साम्राज्य का एक हिस्सा अराविदु वंश के हाथों में आ गया। उन्होंने पेनुकोण्डा को राजधानी बनाया। बहमनी साम्राज्य के तीन राज्यों-बीजापुर, अहमदनगर व गोलकुण्डा की संयुक्त सेना ने 1565 ई० में विजयनगर पर आक्रमण किया। इस तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर की हार हुई तथा विजयी सेना ने विजयनगर शहर में भारी लूटमार की, जिससे यह क्षेत्र पूरी तरह उजड़ गया।

प्रश्न 17.
विजयनगर साम्राज्य में नायक कौन थे? उनकी गतिविधियाँ क्या थीं?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत सेना प्रमुखों को नायक कहा जाता था। इन सेना प्रमुखों का किलों पर नियंत्रण होता था। इनके पास शस्त्रधारी सैनिक भी होते थे। ये प्रायः भ्रमणशील होते थे तथा हमेशा उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे। इनकी भाषा प्रायः तेलुगु या कन्नड़ थी। इन्हें स्थानीय किसानों का समर्थन मिलता रहता था। ये नायक सामान्यतः विद्रोही प्रवृत्ति के होते थे।

प्रश्न 18.
विजयनगर शहर का वृत्तांत देने वाले प्रमुख यात्री कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
विजयनगर शहर का वृत्तांत देने वाले यात्रियों में इटली के निकोलो दे कॉन्ती (Nicolo-De-Konti), फारस के अब्दुर रज्जाक (Abdur Razak) तथा रूस के अफानासी निकितिन (Afanaci Niktian), डोमिंगो पेस (Domingo Pesh) तथा पुर्तगाल के फर्नावो नूनिज़ (Fernao Nuniz) है। इन सभी ने इस शहर में प्रवास किया तथा अलग-अलग पक्षों की जानकारी दी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 19.
विजयनगर की सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य के रायों ने सुरक्षा व्यवस्था की ओर विशेष ध्यान दिया। नगर की किलेबंदी बेजोड़ थी। फारस का दूत तथा यात्री अब्दुर रज्जाक सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित होकर लिखता है कि यहाँ दुर्गों की सात पंक्तियाँ हैं। इन दुर्गों की पंक्तियों में केवल शहर का आवासी क्षेत्र नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्र, जंगलों व जलाशयों के क्षेत्र को चारदीवारी के अंदर लिया गया है। उसके अनुसार इस दीवार को बनाने के लिए मिट्टी, चूना या किसी अन्य जोड़ने वाली चीज का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि पत्थरों को फानाकार बनाकर आपस में जोड़ा गया। दीवार में आयताकार व वर्गाकार बुर्ज भी बने थे। इस किलेबंदी में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात खेतों की दीवार द्वारा घेराबंदी थी।

प्रश्न 20.
विजयनगर में सड़कों की व्यवस्था की संक्षिप्त जानकारी दें।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों ने सड़कों को विशेष महत्त्व दिया। विजयनगर की चारदीवारी के अंदर प्रवेश करने के लिए प्रवेश द्वार थे। ये सुरक्षित तो थे ही साथ में स्थापत्य कला की दृष्टि से भी विशेष थे। प्रत्येक प्रकार की दीवार पर अलग-अलग स्थापत्य कला से प्रवेश द्वार बने थे। किलेबंद बस्ती के प्रवेश द्वार पर मेहराब थी जिसके ऊपर गुंबद था। कला इतिहासकार इसे तुर्की प्रभाव का होने के कारण इंडो-इस्लामिक (हिंद-इस्लामी) संस्कृति बताते हैं।

प्रवेश द्वार से होकर आंतरिक भाग तक पक्की सड़कें थीं। ये सड़कें पहाड़ी व मैदानी दोनों क्षेत्रों में थीं। नगरीय क्षेत्र, धार्मिक व राजकीय क्षेत्र को सड़कों से जोड़ा गया था। इन सड़कों के दोनों ओर बाजार थे। मंदिरों के प्रवेश द्वारों के साथ सड़कों की चौड़ाई थोड़ी अधिक होती थी। सड़कों को पत्थरों द्वारा पक्का किया गया था।

प्रश्न 21.
शाही केंद्र में कौन-कौन से प्रमुख भवन थे?
उत्तर:
शाही केंद्र में शाही महल केंद्र था। विभिन्न अनुष्ठानों का आयोजन स्थल महानवमी डिब्बा भी इसी क्षेत्र में था। सबसे सुंदर भवन कमल (लोटस) महल है। इसकी मेहराबों पर बहुत सुंदर डिज़ाइन बनाए गए हैं तथा इन मेहराबों को दूर से देखने के बाद कमल जैसी आकृति बनती है। शाही क्षेत्र में हाथियों का अस्तबल भवन बहुत बड़ा है। यह कमल महल के समीप था।

प्रश्न 22.
विजयनगर शहर के धार्मिक केंद्र के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
विजयनगर के राय शासकों ने कई मंदिरों का निर्माण विजयनगर शहर के तुंगभद्रा नदी से सटे क्षेत्र में करवाया। एक स्थान पर काफी मात्रा में मंदिर व उपासना स्थल होने के कारण इस क्षेत्र को धार्मिक केंद्र के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र पहाड़ियों के बीच था। स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, ये पहाड़ियाँ बाली व सुग्रीव के राज्य की रक्षा करती थीं। अन्य लोक परंपरा इस क्षेत्र का संबंध स्थानीय मातृदेवी, पम्पा देवी से जोड़ती है।

बरबोसा का उल्लेख
बरबोसा ने विजयनगर की प्रजा के धर्म संबंधी आचरण को लिखा है। प्रस्तुत है उसका एक अंश “राजा ने उन्हें इतनी स्वतंत्रता दी है कि प्रत्येक व्यक्ति  अपने उपासना स्थल, पर आ-जा सके और बिना कोई परेशानी झेले अपने धर्म का पालन कर सके। चाहे वह ईसाई हो या यहूदी मूर हो या कोई अन्य। न केवल शासक बल्कि लोग भी एक दूसरे के साथ बराबरी व न्याय का बर्ताव रखते थे।”

धार्मिक केंद्र में इतने अधिक उपासना स्थलों का मिलना इस  बात की पुष्टि करता है कि विभिन्न आस्थाओं व विचारधाराओं के | लोग आपस में मिल-जुल कर रहते थे तथा शासक भी यह दिखाने का |  प्रयास करता था कि वह किसी एक विशेष मत का शासक नही हैं।

प्रश्न 23.
गोपुरम् क्या थे? इनका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मंदिर के प्रवेश द्वार को गोपुरम् या राजकीय प्रवेश द्वार कहा जाता था। गोपुरम् किसी भी मंदिर एवं शहर की पहचान थे। ये कई मील से देखे जा सकते थे। शासक सबसे अधिक खर्च इसी पर करते थे। गोपुरम् शासक की पहचान तथा प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। इसलिए शासक स्थापत्य कला, तकनीक, ऊँचाई सभी दृष्टिकोणों से इसे विशिष्ट बनाना चाहते थे। विरुपाक्ष मंदिर, जिसका निर्माण शताब्दियों तक चलता रहा था, इसका महत्त्वपूर्ण द्वार पूर्वी क्षेत्र में है, जिसे पूर्वी गोपुरम् कहा जाता है। इसका निर्माण कृष्णदेव राय के द्वारा कराया गया था।

प्रश्न 24. विरुपाक्ष मन्दिर का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
विरुपाक्ष स्थानीय परंपराओं के अनुरूप शिव के रूप में सबसे महत्त्वपूर्ण देवता था। इस मंदिर का देवस्थल, वर्गाकार था तथा दो प्रवेश द्वार थे। मंदिर का अपना एक जलाशय था। मंदिर में दो बड़े सभागार व मंडप थे जिनको स्तंभों वाले बरामदे से जोड़ा गया था। इस मंदिर का मंडप कृष्णदेव राय के द्वारा राज्यरोहण के अवसर पर बनाया गया था। इसके स्तंभों पर चित्रों को विशेष कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण किया गया था। मंदिर का देवालय बीच में था। भले ही वह छोटे से क्षेत्र में था लेकिन आस्था व उपासना की दृष्टि से यही सबसे महत्त्वपूर्ण था क्योंकि यह मंदिर का गर्भ गृह था तथा देवता की परंपरागत मूर्ति भी यहीं थी। .

प्रश्न 25.
विट्ठल मन्दिर के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
विट्ठल महाराष्ट्र क्षेत्र में विष्णु के रूप में पूजे जाते थे। महाराष्ट्र के बाद यह देवता कर्नाटक में भी लोकप्रिय हुआ। यह मंदिर सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक था। इसमें भी सभागार, मंडप व देवालय था। इसकी विशेष महत्ता इसका स्थापत्य था। यह मंदिर रथ के आकार पर आधारित था।

प्रश्न 26.
मन्दिर क्षेत्र में सभागार की क्या भूमिका थी?
उत्तर:
मंदिर में सर्वाधिक प्रयोग स्थल सभागार थे। सभागार का आकार उसकी मान्यता व आवश्यकता के अनुरूप था। इन सभागारों में संगीत, नृत्य व नाटक इत्यादि के कार्यक्रम चलते रहते थे। देवताओं की मूर्तियों को स्थापना के समय या विशेष उत्सवों पर बाहर नहीं लाया जाता था। देवी-देवताओं के विवाह उत्सव के अवसर पर सभागारों की छटा बेहद सुंदर होती थी। देवी-देवताओं के सार्वजनिक दर्शन तथा झूला इत्यादि झुलाने के लिए विशिष्ट मूर्तियों का प्रयोग होता था।

प्रश्न 27.
हम्पी का खनन मानचित्र कैसे तैयार किया गया?
उत्तर:
सर्वप्रथम पूरे हम्पी क्षेत्र के फोटोग्राफ लिए गए तथा मानचित्र का निर्माण किया गया। इसके पहले चरण में संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बांटा गया जिन्हें अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर A से Z का नाम दिया गया। इसमें I (आई) शब्द का प्रयोग नहीं किया गया फिर उस प्रत्येक भाग को 25 भागों में बांटा गया। फिर उन्हें क्रमशः AA, AB, AC या BA, BB, BC की क्रिया अपनाते हुए ZAसे ZZ तक अर्थात् 25 टुकड़ों को आगे 25 छोटे वर्गाकार टुकड़ों में बांटा गया। फिर इन टुकड़ों को अन्य छोटी इकाइयों में आगे-से-आगे विभाजित किया जाता रहा। जब तक प्रत्येक फुट का क्षेत्र मानचित्र के दायरे में नहीं आ गया।

प्रश्न 28.
हम्पी की खनन प्रक्रिया से हमें किस-किस चीज की जानकारी मिल पाई?
उत्तर:
हम्पी की खनन प्रक्रिया द्वारा हम विजयनगर साम्राज्य के युग को समझ सके। इस क्रिया में हम विभिन्न भवनों, मार्गों, क्षेत्रों व जलाशयों के बारे में जानकारी भी ले सके। स्थापत्य कला तथा उसकी विभिन्न शैली तक भी पहुँच सके। इन भवनों के उद्देश्य तथा सांस्कृतिक महत्त्व के साथ-साथ हम निर्माणकर्ताओं की सोच इत्यादि के बारे में भी अनुमान लगा पाए। साम्राज्य की राजधानी की किलेबंदी तथा प्रतिरक्षा के बारे में भी काफी हद तक हमारी समझ बनी है। शासक तथा नायक वर्ग की विभिन्न चीजें व भवनों के आधार पर उनकी जीवन-शैली का अनुमान लगाया जा सका।

प्रश्न 29.
विजयनगर की जानकारी हेतु अभी किन-किन प्रश्नों का जवाब ढूँढ़ना बाकी है?
उत्तर:
विजयनगर की अभी तक शाही परिवार व भवनों के बारे में मिली जानकारी द्वारा हम उस स्थान पर बसे लोगों, उनके आपसी संबंधों, बच्चों के जीवन तथा उनकी गतिविधियों को नहीं जान पाए हैं, शहरी केंद्र के आस-पास ग्रामीण क्षेत्रों व इनके आपसी संबंधों को समझना अभी बाकी है। भवनों को बनाने वाले विशेषज्ञों की सोच, उनकी दैनिक मजदूरी व समाज में उनका स्थान, की स्थिति भी अभी स्पष्ट नहीं है। भवन निर्माण में उनका साथ देने वाले कारीगर, राजगीर, पत्थर काटने वाले व्यक्तियों की जानकारी भी हमारे पास नहीं है, मजदूर, निर्माण सामग्री का स्थल, यातायात व संचार के मुख्य साधन इत्यादि अनेक पक्ष ऐसे हैं जिनकी जानकारी अभी अधूरी है।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर की खोज पर नोट लिखें।
उत्तर:
विजयनगर का नाम वर्तमान में हम्पी है जो दक्षिण के एक ऐतिहासिक साम्राज्य विजयनगर की धरोहर से समृद्ध था। परन्तु समय बीतने के साथ यह विस्मृति के गर्भ में चला गया। कंपनी के एक अभियंता कॉलिन मैकेन्जी ने एक प्राचीन स्थल के बारे में खोज-बीन शुरू की। वहाँ पर विरुपाक्ष तथा पम्पादेवी के दो प्राचीन मंदिर थे। इन्हीं मंदिरों के पुजारियों से उसे इस स्थान के बारे में जानकारी प्राप्त हुई जिसके आधार पर उसने विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और उसकी रिपोर्ट को प्रकाशित किया। उसने इस क्षेत्र का प्रथम मानचित्र तैयार किया।

उसकी हम्पी संबंधी रिपोर्ट और मानचित्र ने इतिहासकारों को आकर्षित किया। इस क्षेत्र की खोज के प्रति उनका रुझान बढ़ गया। 1836 ई० में पुरातत्वविदों व अभिलेखज्ञाताओं ने इस क्षेत्र (हम्पी) के मंदिरों तथा अन्य स्थानों से अभिलेख एकत्रित किए। सन् 1856 में छाया चित्रकारों ने यहाँ के भवनों के चित्र संकलित करने आरंभ किए। इस प्रकार परत-दर-परत विस्मृत नगर सामने आने लगे। इतिहासकारों ने उपलब्ध पुरातात्विक सामग्री तथा यात्रियों के वृत्तांत और स्थानीय साहित्य (तेलुगु, तमिल, कन्नड़ व संस्कृत में) के आधार पर इस नगर के इतिहास का पुनर्निर्माण किया।
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प्रश्न 2.
विजयनगर के शासकों व व्यापारियों के बीच संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों के व्यापारियों से संबध काफी अच्छे थे। इस साम्राज्य को संपन्न बनाने में व्यापारी वर्ग ने अपना योगदान दिया। इन व्यापारियों को रायों द्वारा संरक्षण दिया गया था। रायों की सफलता में अश्व सेना की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। इनके अश्व अरब व मध्य-एशिया से आते थे। प्रारंभ में राय अश्वों के लिए अरब व्यापारियों पर निर्भर थे। परंतु समय के साथ-साथ यहाँ कुदिरई चेट्टी (घोड़ों के व्यापारियों) का वर्ग पैदा हो गया। इन्होंने राज्य को पर्याप्त मात्रा में घोड़े उपलब्ध करवाए।

विजयनगर मसालों, रत्नों एवं आभूषणों (रत्नों) के बाजार व व्यापार के लिए जाना जाता था। यहाँ की जनता की समृद्धि का ज्ञान उनकी जीवन-शैली, विदेशी वस्तुओं की माँग तथा रत्न व आभूषणों से होता था। इस जीवन-शैली व माँग के कारण व्यापारी लगातार उन्नति के मार्ग पर थे। इसके साथ ही राज्य के राजस्व में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी। कृष्णदेव राय विजयनगर का सबसे प्रतापी शासक कहा जाता है। उसने तेलुगु भाषा में ‘अमुक्त मल्यद’ नामक पुस्तक लिखी। कृष्णदेव राय के चिन्तन से पता चलता है कि राय व्यापारियों को किस तरह प्रोत्साहित कर व्यापार को बढ़ावा देना चाहते थे।

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प्रश्न 3.
कृष्णदेव राय का विजयनगर साम्राज्य के विकास में क्या योगदान था?
उत्तर:
1336 ई० में हरिहर व बुक्का राय दो भाइयों ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। इस साम्राज्य का प्रथम शासक हरिहर (1336-56) बना तथा उसने राज्य के लिए नियम कानून बनाए। उसकी मृत्यु के पश्चात् बुक्का (1356-1377) शासक बना। उसने प्रशासन व राज्य की समृद्धि की ओर ध्यान दिया। उसके समय में ही पड़ोसी राज्य बहमनी के साथ संघर्ष की शुरुआत हुई। उसके पश्चात् हरिहर द्वितीय (1377-1405) तथा देवराय प्रथम (1406-22) शासक बने। इन्होंने बहमनी से संघर्ष जारी रखा। साथ ही आर्थिक विकास, कृषि व व्यापार को भी प्रोत्साहन दिया। उनके बाद देवराय द्वितीय (1422-46) शासक बना। उसने इस साम्राज्य की सीमा का खूब विस्तार किया। फारसी यात्री अब्दुर रज्जाक ने उसकी खुले मन से प्रशंसा की है।

इसके बाद इस साम्राज्य में कई कमजोर शासक आए जिनको बहमनी के शासकों ने पराजित कर इनकी सीमा को छोटा कर दिया। विजयनगर अपने चरमोत्कर्ष पर कृष्णदेव राय (1509-29) के शासन काल में पहुँचा। उसने सुलुवों के राज्य को नष्ट कर सत्ता पर अधिकार कर लिया। उसने 1512 ई० में तुंगभद्रा व कृष्णा नदियों के बीच के क्षेत्र रायचूर, दोआब, 1514 ई० में उड़ीसा तथा 1520 ई० में बीजापुर के शासक को पराजित कर साम्राज्य का विस्तार किया। साथ ही उसने आंतरिक दृष्टि से भी राज्य को सुदृढ़ किया। उसका काल शांति, समृद्धि तथा मंदिरों के निर्माण के लिए जाना जाता है।
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प्रश्न 4.
विजयनगर के पतन की स्थितियों को अपने शब्दों में लिखें। ,
उत्तर:
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में दरबारी तनाव, गुटबंदी व षड्यंत्रों की शुरुआत हो गई। कृष्णदेव राय के उत्तराधिकारियों को दरबारियों तथा सेनापतियों से चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1542 ई० में विजयनगर साम्राज्य का एक हिस्सा अराविदु वंश के हाथों में आ गया। उन्होंने पेनुकोण्डा को राजधानी बनाया। बाद में उन्होंने राजधानी चन्द्रगिरी (तिरुपति के पास) से 17वीं शताब्दी तक शासन किया। दक्षिण में कई नई शक्तियाँ भी उभरीं जिन्होंने विजयनगर के राजनैतिक समीकरण को काफी कमजोर किया।

अन्ततः बहमनी साम्राज्य के तीन राज्यों-बीजापुर, अहमदनगर व गोलकुण्डा की संयुक्त सेना ने 1565 ई० में विजयनगर पर आक्रमण किया। विजयनगर का नेतृत्व रामराय ने किया। यह युद्ध तालीकोटा (वास्तव में राक्षसी-तांगड़ी क्षेत्र) में हुआ। इस युद्ध में विजयनगर की हार हुई तथा विजयी सेना ने विजयनगर शहर में भारी लूटमार की। जिससे यह क्षेत्र पूरी तरह उजड़ गया तथा अराविदु वंश नाम-मात्र के लिए पेनुकोण्डा व चन्द्रगिरी से शासन चलाता रहा।
अतः विजयनगर के पतन का मुख्य कारण बहमनी राज्यों से उसकी हार थी।

प्रश्न 5.
विजयनगर के राय, नायकों व अमर-नायकों के आपसी संबंधों का वर्णन करें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में शासन का प्रमुख राय होता था। राय अपने साम्राज्य में आंतरिक व बाह्य तौर पर शांति व सुरक्षा के लिए सेना पर निर्भर था। इस साम्राज्य में सेना अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रमुखों के नियंत्रण में होती थी। इन सेना प्रमुखों का किलों पर नियंत्रण होता था। इनके पास शस्त्रधारी सैनिक भी होते थे। ये प्रायः भ्रमणशील होते थे तथा हमेशा उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे।

इनकी भाषा प्रायः तेलुगु या कन्नड़ थी। इन्हें स्थानीय किसानों का समर्थन मिलता रहता था। सेना के प्रमुखों या सेनापतियों के वर्ग को नायक कहा जाता था। ये नायक सामान्यतः विद्रोही प्रवृत्ति के होते थे। नायक से ही अमर-नायक बना है। अमर-नायक सैनिक प्रमुख तो थे ही, साथ ही उन्हें राय द्वारा प्रशासनिक शक्ति भी दी गई थी। जबकि नायक के पास प्रशासनिक शक्तियाँ नहीं थीं। इस तरह अमर-नायक, नायक की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थे। अमर-नायक प्रशासन व सेना में प्रमुख व्यक्ति होते थे। वे किसानों, दस्तकारों व व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूलते थे।

इस वसूली राशि में से एक हिस्सा अपने व्यक्तिगत खर्च, सेना, हाथी व घोड़ों के रख-रखाव के लिए रख लेते थे। शेष राजस्व राशि राय के खजाने में जमा करवाते थे। इन्हीं नायकों के सहारे रायों ने साम्राज्य का विस्तार किया तथा आंतरिक तौर पर शांति स्थापित कर समृद्धि का वातावरण बनाया। अमर-नायक व नायक तथा राय में कुछ औपचारिक रिश्ते थे। वे वर्ष में एक बार उपहारों सहित दरबार में उपस्थित होकर स्वामीभक्ति प्रकट करते थे। राय अपनी शक्ति-प्रदर्शन तथा शक्ति संतुलन के लिए इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानातंरित कर देता था।

प्रश्न 6.
विजयनगर साम्राज्य की राजधानी कौन-सी थी? उसका वृत्तांत किन यात्रियों ने दिया है? किसी एक का वर्णन करें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की राजधानी स्वयं विजयनगर शहर था। इसकी संरचना व स्थापत्य कला की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण शहर था। यह शहर वे सारी विशेषताएँ रखता था जो किसी भी शक्तिशाली राज्य की राजधानी की जरूरत होती थी। इस शहर के मन्दिर, भवन तथा अन्य अवशेष व्यापक रूप में मिले हैं। नायक व अमर-नायकों के अभिलेख तथा यात्रियों का वृत्तांत ने शहर के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला है।

15वीं शताब्दी के यात्रियों में इटली के निकोलो दे कॉन्ती (Nicolo-De-Konti), फारस के अब्दुर रज्जाक (Abdur Razak) तथा रूस के अफ़ानासी निकितिन (Afanaci Niktian) मुख्य हैं। 16वीं शताब्दी के यात्रियों में दुआर्ते बरबोसा (Duarate Barbosa), डोमिंगो पेस (Domingo Pesh) तथा पुर्तगाल के फर्नावो नूनिज़ (Fernao Nuniz) के नाम आते हैं।

इन सभी ने इस शहर में प्रवास किया तथा अलग-अलग पक्षों की जानकारी दी। उदाहरण के लिए डोमिंगो पेस के वृत्तांत को दिया जा सकता है। उसके अनुसार, “इस शहर का परिमाप मैं यहाँ लिख नहीं रहा हूँ, क्योंकि यह एक स्थान से पूरी तरह नहीं देखा जा सकता, पर मैं एक पहाड़ पर चढ़ा जहाँ से मैं इसका एक बड़ा भाग देख पाया। मैं इसे पूरी तरह नहीं देख पाया, क्योंकि यह कई पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित है। वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ और देखने में अत्यंत सुन्दर। इसमें पेड़ों के कई उपवन हैं। आवासों के बगीचों में तथा पानी की कई नालियाँ जो इसमें आती हैं। इसमें कई स्थानों पर झीलें भी हैं तथा राजा के महल के समीप ही खजूर के पेड़ों का बगीचा तथा अन्य फल प्रदान करने वाले वृक्ष थे।”

प्रश्न 7.
विजयनगर साम्राज्य की जल आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?
उत्तर:
विजयनगर में जल प्रबंधन की एक निश्चित योजना थी। इस ओर शासकों ने विशेष ध्यान दिया। विजयनगर प्राकृतिक दृष्टि से पहाड़ियों के बीच था। इसके उत्तर:पूर्व में तुंगभद्रा नदी बहती थी। पहाड़ियों की जल धाराओं से यहाँ एक प्राकृतिक कुण्ड बना है। वहाँ पर शासकों ने बाँधों (जलाशयों) का निर्माण किया। इन बाँधों से पानी लेकर बड़े-बड़े कुण्डों में एकत्रित किया जाता था। इस क्षेत्र में आज भी कमलपुरम् नामक एक जलाशय है जिसका निर्माण 15वीं सदी में किया गया था। इन जलाशयों से कृषि में सिंचाई की जरूरत को पूरा किया।

इसके साथ ही शासकों द्वारा नहर के माध्यम से इस जलाशय का पानी शहर के मुख्य हिस्से ‘राजकीय केंद्र’ तक पहुँचाया गया। इस नहर को संगम वंश के शासकों द्वारा तैयार करवाया गया। यह नहर नगर के शहरी व धार्मिक केंद्र की पानी की आवश्यकता की पूर्ति करती थी। साथ ही यह कृषि क्षेत्र की सिंचाई भी करती थी। शासक विभिन्न जलाशयों का निर्माण करवाना गौरव की बात समझते थे। इसके लिए आर्थिक साधन कहीं बाधा नहीं बनते थे। डोमिंगो पेस ने कृष्णदेव राय द्वारा जलाशय निर्माण पर भी जानकारी दी जिसमें स्पष्ट किया गया है कि 15 से 20 हजार व्यक्ति वहीं कार्य करते थे। जलाशय एक निश्चित योजना के अनुरूप बना था।

प्रश्न 8.
विजयनगर की सुरक्षा व्यवस्था के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य व नगर की किलेबंदी बेजोड़ थी, जिसके बारे में हमें जानकारी फारस के दूत तथा यात्री अब्दुर रज्जाक से मिलती है। वह सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित होकर लिखता है कि यहाँ दुर्गों की सात पंक्तियाँ हैं। इन दुर्गों की पंक्तियों में केवल शहर का आवासी क्षेत्र नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्र, जंगलों व जलाशयों के क्षेत्र को चारदीवारी के अंदर लिया गया है। वह बताता है कि सबसे बाहरी दीवार चारों ओर बनी पहाड़ियों को आपस में जोड़ती है।

उसके अनुसार यह संरचना विशाल तथा शुण्डाकार थी। इस दीवार को बनाने के लिए मिट्टी, चूना या किसी अन्य जोड़ने वाली चीज का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि पत्थरों को फानाकार बनाकर आपस में जोड़ा गया। ये पत्थर खिसकते नहीं थे। दीवारों का आंतरिक भाग मिट्टी व मलबे के मिश्रण से बना था। दीवार में आयताकार व वर्गाकार बुर्ज भी बने थे। उसे इस किलेबंदी में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात खेतों की दीवार द्वारा घेराबंदी लगी।

विजयनगर भारतीय ऐतिहासिक संदर्भ में पहला ऐसा साम्राज्य है जिसने खेतों की भी किलेबंदी की। यह व्यवस्था महँगी जरूर थी, लेकिन इसके परिणाम सुखद थे। कृषि क्षेत्र के बाद दूसरी किलेबंदी नगरीय केंद्र के आंतरिक भाग की होती थी तथा तीसरी शासकीय केंद्र की जिसमें शाही महल, दरबार, सेना व अस्तबल इत्यादि होते थे। इस किलेबंदी की विशेष बात यह होती थी कि ज्यों-ज्यों अंदर की ओर आते थे त्यों-त्यों दीवारों की ऊँचाई बढ़ती जाती थी।

प्रश्न 9. विजयनगर शहर की आवास व्यवस्था कैसी थी? वर्णन करें।
उत्तर:
शहर की आवास व्यवस्था-किलेबंद चारदीवारी के अंदर थी। पुरातत्वविदों को सारे शहर में एक जैसी बस्ती नहीं मिली है बल्कि भवन निर्माण पद्धति के आधार पर उन्हें आसानी से समझा जा सकता है। पुरातत्वविदों ने शहर के उत्तर:पूर्वी कोने को भवन-निर्माण के आधार पर ही मुस्लिम रिहायशी मोहल्ला घोषित किया है। इसी क्षेत्र में अच्छी किस्म की चीनी मिट्टी की वस्तुएँ भी मिली हैं। जो इस बात को प्रमाणित करती हैं कि यहाँ साधन सम्पन्न लोग रहते होंगे। भवन चाहे मंदिर हों या मस्जिद एक जैसे सामान से बने हैं। मंदिर व मस्जिद की मौलिक विशेषताओं को छोड़कर ये सभी हम्पी के मन्दिरों जैसे ही हैं।

शहरी आवास व्यवस्था में पुरातत्वविदों ने एक नई चीज पाई कि इस क्षेत्र में बहुत-से विविध उपासना स्थल मिले हैं। स्थापत्य कला व शहर की बसावट से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ कई संप्रदायों के लोग रहते थे जो अपने-अपने उपासना स्थलों में उपासना करते थे। वे इनका रख-रखाव भी करते थे। स्थापत्य अवशेषों में कुओं, बरसात के पानी के जलाशयों तथा मंदिर के जलाशयों का काफी मात्रा में मिलना, इस बात का उदाहरण है कि ये पानी के स्रोत स्थानीय लोगों की जल से संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।

प्रश्न 10.
विजयनगर साम्राज्य के शाही आवास पर नोट लिखें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की सारी प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन जिस स्थल से होता था उसे शाही स्थल कहा गया है। पुरातत्वविदों ने इसे शाही केंद्र तथा राजकीय केंद्र इत्यादि नाम भी दिए हैं। शाही निवास, दरबार के अति महत्त्वपूर्ण भवनों के अतिरिक्त यहाँ 60 से अधिक मंदिर थे। यह इस बात का प्रमाण है कि शासक इन मन्दिरों व उपासना स्थलों को बनाकर जनता में यह संदेश देना चाहता था कि वह सबका शासक है इसलिए सभी उसे स्वीकार करें। इस तरह शाही स्थल पर मंदिरों का होना शासक द्वारा वैधता को प्राप्त करने का एक तरीका कहा जा सकता है।

विजयनगर के खनन में 30 ऐसे भवन मिले हैं जो आकार में काफी बड़े हैं। इन्हें पुरातत्वविदों ने महलों का नाम दिया है। इन भवनों में धर्म से संबंधित कार्य नहीं किए जाते थे। इन भवनों व उपासना स्थलों के बीच मुख्य अंतर यह था कि उपासना स्थलों में ईंट-पत्थर इत्यादि प्रयोग में लाए गए हैं जबकि इनमें विभिन्न प्रकार की सामग्री का पुनः प्रयोग भी किया गया है। इन भवनों में सामग्री की पवित्रता की अपेक्षा मजबूती पर ध्यान दिया गया है। शाही आवास में महानवमी डिब्बा, सभा मंडप, कमल महल व हाथियों के अस्तबल जैसे भवन थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 8

प्रश्न 11.
शाही आवास में राजमहल या महानवमी डिब्बे के अतिरिक्त कौन-कौन से भवन थे? वर्णन करें।
उत्तर:
शाही केंद्र या राजकीय केंद्र राजमहल या महानवमी डिब्बे के अतिरिक्त बहुत-से ऐसे भवन हैं जिनके प्रयोग के बारे में तो निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। अनुमान आकार, स्थापत्य निर्माण शैली व भवन की स्थिति के अनुरूप लगाए गए हैं। इन भवनों में सबसे सुंदर भवन कमल (लोटस) महल है।

इसकी मेहराबों पर बहुत सुंदर डिज़ाइन बनाए गए हैं तथा इन मेहराबों को दूर से देखने के बाद कमल जैसी आकृति बनती है, इसलिए पुरातत्वविदों, इतिहासकारों व यात्रियों (अंग्रेज) ने इसे यह नाम दिया। इसके उद्देश्य के बारे में स्पष्टता नहीं है, परंतु यह स्वीकार किया जाता है कि शासक यहाँ अपने सलाहकारों को मिलता था। अतः यह एक तरह का परिषदीय भवन था।

विजयनगर में सर्वाधिक मंदिरों वाले स्थल को धार्मिक केंद्र कहा गया है लेकिन राजकीय केंद्र में भी एक अत्यंत दर्शनीय व भव्य स्थल ‘हज़ार राम मंदिर’ है। यह मंदिर केवल शाही परिवार के सदस्यों द्वारा प्रयोग में लाया जाता था। मन्दिर के देवस्थल पर आज मूर्तियाँ नहीं हैं, लेकिन दीवारों पर उत्कीर्ण चित्र सुरक्षित हैं। इन चित्रों में कुछ रामायण के दृश्यों को अभिव्यक्त करते हैं इसलिए इस मंदिर का नाम राम के साथ जोड़ा गया। इसकी दीवारों पर घोड़े व हाथियों के चित्र बने हैं। शाही क्षेत्र में हाथियों का अस्तबल बहुत बड़ा है। यह कमल महल के समीप था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 12.
गोपुरम् क्या थे? ऐतिहासिक दृष्टि से इनका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मन्दिर का प्रवेश द्वार गोपुरम् कहा जाता था। गोपुरम् किसी भी मंदिर एवं शहर की पहचान थे। ये कई मील से देखे जा सकते थे। शासक सबसे अधिक खर्च इसी पर करते थे। गोपुरम् शासक की पहचान तथा प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। इसलिए शासक स्थापत्य कला, तकनीक, ऊँचाई सभी दृष्टिकोणों से इसे विशिष्ट बनाना चाहते थे। विरुपाक्ष मंदिर, जिसका निर्माण शताब्दियों तक चलता रहा था, इसका महत्त्वपूर्ण द्वार पूर्वी क्षेत्र में है, जिसे पूर्वी गोपुरम् कहा जाता है।

इसका निर्माण कृष्णदेव राय के द्वारा कराया गया था। गोपुरम् की ऊँचाई के समान मंदिर या नगर का कोई और भवन नहीं होता था। उदाहरण के लिए विरुपाक्ष मंदिर के मुख्य गोपुरम् को कह सकते हैं कि यह 15 मंजिलों में बना है जिसमें पहली मंजिल की ऊँचाई 23 फीट है तथा सबसे ऊपरी मंजिल 11 फीट ऊँचाई रखती है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर साम्राज्य के धार्मिक केंद्र पर नोट लिखो।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों ने अधिकतर मंदिरों का निर्माण विजयनगर शहर के तुंगभद्रा नदी से सटे क्षेत्र में करवाया। इस स्थान पर काफी मात्रा में मंदिर व उपासना स्थल होने के कारण इस क्षेत्र को धार्मिक केंद्र के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र पहाड़ियों के बीच था। स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, ये पहाड़ियाँ बाली व सुग्रीव के राज्य की रक्षा करती थीं। अन्य लोक परंपरा इस क्षेत्र का संबंध स्थानीय मातृदेवी, पम्पा देवी से जोड़ती है। परंपरा अनुसार इस देवी ने इन्हीं पहाड़ियों में शिव के एक रूप माने जाने वाले देवता ‘विरुपाक्ष’ से शादी करने के लिए तपस्या की थी जिसमें वह अन्ततः सफल भी रही।
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इसलिए इस क्षेत्र में आज भी विरुपाक्ष मंदिर में इस विवाह को स्मरण करने के लिए विवाह का आयोजन होता है। इन पहाड़ियों में कुछ जैन मंदिर भी मिले हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र कई मतों में विश्वास करने वाले लोगों (हिंदू, मुस्लिम, जैन इत्यादि) की आस्था का केंद्र था लेकिन स्थानीय तौर पर सबसे अधिक महत्त्व विरुपाक्ष के मंदिर को दिया जाता है।

धार्मिक केंद्र में इतने अधिक उपासना स्थलों का मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि विभिन्न आस्थाओं व विचारधाराओं के लोग आपस में मिल-जुल कर रहते थे तथा शासक भी यह दिखाने का प्रयास करता था कि वह किसी एक विशेष मत का शासक नही हैं। वह मंदिरों के माध्यम से अपनी सत्ता की राजनैतिक वैधता प्राप्त करता था। वह इन मंदिरों को दान, धन व जमीन दोनों रूपों में देता था।

मंदिर केवल आस्था को ही दिशा नहीं देते थे, बल्कि शिक्षा का केंद्र भी थे। इन स्थानों पर विभिन्न तरह की सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी होती थीं। इन कार्यक्रमों के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग इनसे जुड़ा रहता था। शासकों की देखा-देखी नायक भी अपने क्षेत्रों के मंदिरों का निर्माण करवाते व दान देते थे। इसी तरह जनता भी उनकी नकल करती थी। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विजयनगर का धार्मिक केंद्र एक महत्त्वपूर्ण स्थल था।

प्रश्न 2.
विजयनगर की जानकारी के स्रोत कौन-कौन से हैं? इसके खनन की प्रक्रिया पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर की जानकारी के स्रोत हमें विभिन्न रूपों में मिलते हैं। इनमें पुरातात्विक सामग्री, साहित्यिक स्रोत तथा विदेशी यात्रियों के वृत्तांत शामिल हैं। इनमें से अध्ययनकर्ताओं ने फोटोग्राफ, मानचित्र, उपलब्ध भवनों की खड़ी संरचनाएँ व मूर्तियों की ओर विशेष ध्यान दिया है। मैकेन्जी द्वारा प्रारंभ के सर्वेक्षण के पश्चात् जो रिपोर्ट दी गई, उसको अभिलेखों के वर्णन तथा यात्रियों के वृत्तांत के साथ जोड़ा गया। 1976 ई० में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित करवा दिया।

1980 के दशक में खनन कार्य और अधिक गहन, व्यापक, योजनाबद्ध किया गया। इसके परिणामस्वरूप विजयनगर के अवशेष सामने आए। विजयनगर की जानकारी का मुख्य स्रोत पुरातात्विक सामग्री है। यह पुरातात्विक सामग्री एक खुदाई या खनन प्रक्रिया के बाद ही प्रयोग हो सकी है। संक्षेप में हम इस प्रक्रिया को इस तरह समझ सकते हैं

1. खनन मानचित्र–सर्वप्रथम पूरे क्षेत्र के फोटोग्राफ लिए गए तथा मानचित्र का निर्माण किया गया। इसके पहले चरण में संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बांटा गया। जिन्हें अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर A से Z का नाम दिया गया। इसमें (I) (आई) अक्षर का प्रयोग नहीं हुआ। फिर उस प्रत्येक भाग को 25 भागों में बांटा गया। फिर उन्हें क्रमशः AA, AB, AC या BA, BB, BC की क्रिया अपनाते हुए ZAसे .ZZ तक अर्थात् 25 टुकड़ों को आगे 25 छोटे वर्गाकार टुकड़ों में बांटा गया फिर इन टुकड़ों को अन्य छोटी इकाइयों में आगे-से-आगे विभाजित किया जाता रहा। जब तक प्रत्येक फुट का क्षेत्र मानचित्र के दायरे में नहीं आ गया।

2. खनन कार्य-पूरे क्षेत्र को इस तरह विभाजित करके खनन कार्य प्रारंभ किया गया। इसके बाद अलग-अलग क्षेत्र को अलग-अलग विशेषज्ञ की देख-रेख में बांटा गया तथा फिर गहन खनन का कार्य प्रारंभ हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों में संरचनाएँ बाहर आने लगीं, लेकिन इन्होंने आकार तब लिया जब आपस में इन टुकड़ों को जोड़ दिया गया। फिर यहाँ से देवस्थल, मंडप, विशाल गोपुरम्, शाही स्थल, धार्मिक केंद्र, सड़क, बरामदे, बाजार इत्यादि के अवशेष सामने आए। इन सभी स्थलों की पहचान स्तंभों के आधार पर की गई। प्राप्त अवशेषों में लकड़ी की कोई भी चीज उपलब्ध नहीं हो सकी।

प्रश्न 3.
नायक व अमर नायक व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
नायक व अमर नायक व्यवस्था (The System of Nayak and Amar Nayak)-विजयनगर साम्राज्य में शासन का प्रमुख राय होता था। राय अपने साम्राज्य में आंतरिक व बाह्य तौर पर शांति व सुरक्षा के लिए सेना पर निर्भर था। इस साम्राज्य में सेना अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रमुखों के नियंत्रण में होती थी। इन सेना प्रमुखों का किलों पर नियंत्रण होता था। इनके पास शस्त्रधारी सैनिक भी होते थे।

ये प्रायः भ्रमणशील होते थे तथा हमेशा उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे। इनकी भाषा प्रायः तेलुगु या कन्नड़ थी। इन्हें स्थानीय किसानों का समर्थन मिलता रहता था। सेना के प्रमुखों या सेनापतियों के वर्ग को नायक कहा जाता था। ये नायक सामान्यतः विद्रोही प्रवृत्ति के होते थे। अतः इन्हें शक्ति के सहारे ही नियंत्रित किया जाता था।

नायक से ही अमर-नायक बना है। अमर-नायक सैनिक प्रमुख तो थे ही, साथ ही उन्हें राय द्वारा प्रशासनिक शक्ति भी दी गई थी। जबकि नायक के पास प्रशासनिक शक्तियाँ नहीं थीं। इस तरह अमर-नायक, नायक की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थे। अमर शब्द फारसी के अमीर शब्द से मिलता-जुलता है जिसका अर्थ ऊँचे पद के कुलीन व्यक्ति से लिया जाता है। मान्यता अनुसार अमर शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के समर शब्द से हुई है जिसका अर्थ युद्ध व लड़ाई से लिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि अमर-नायक प्रशासन व सेना में प्रमुख व्यक्ति होते थे।

वे किसानों, दस्तकारों व व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूलते थे। इस वसूली राशि में से एक हिस्सा अपने व्यक्तिगत खर्च, सेना, हाथी व घोड़ों के रख-रखाव के लिए रख लेते थे। शेष राजस्व राशि राय के खजाने में जमा करवाते थे। इन्हीं नायकों के सहारे रायों ने साम्राज्य का विस्तार किया तथा आंतरिक तौर पर शांति स्थापित कर समृद्धि का वातावरण बनाया। रायों के भवन निर्माण व स्थापत्य कला के विकास के लिए धन इन्हीं के द्वारा जुटाया गया।

अमर-नायक व नायक तथा राय में कुछ औपचारिक रिश्ते थे। वे वर्ष में एक बार उपहारों सहित दरबार में उपस्थित होकर स्वामीभक्ति प्रकट करते थे। राय अपनी शक्ति-प्रदर्शन तथा शक्ति संतुलन के लिए इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानातंरित कर देता था। बाद में कई अमर-नायक बहुत शक्तिशाली हो गए थे। उन्होंने अपनी शक्ति को बढ़ाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए थे। इससे जहाँ रायों की राज्य पर पकड़ कमजोर हुई, वहीं राज्य विघटन की ओर गया।

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

HBSE 12th Class History एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
पिछली दो शताब्दियों में हम्पी के भवनावशेषों के अध्ययन में कौन-सी पद्धतियों का प्रयोग किया गया है? आपके अनुसार यह पद्धतियाँ विरुपाक्ष मन्दिर के पुरोहितों द्वारा प्रदान की गई जानकारी का किस प्रकार पूरक रहीं?
उत्तर:
विजयनगर की जानकारी का मुख्य स्रोत हम्पी से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री है। यह पुरातात्विक सामग्री एक खुदाई या खनन प्रक्रिया के बाद ही प्रयोग हो सकी है। संक्षेप में हम इस प्रक्रिया को इस तरह समझ सकते हैं।

1. खनन मानचित्र-सर्वप्रथम पूरे क्षेत्र के फोटोग्राफ लिए गए तथा मानचित्र का निर्माण किया गया। इसके पहले चरण में संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बांटा गया। फिर उस प्रत्येक भाग को 25 भागों में बांटा गया। उसके बाद फिर इन टुकड़ों को अन्य छोटी इकाइयों में आगे-से-आगे विभाजित किया जाता रहा। जब तक प्रत्येक फुट का क्षेत्र मानचित्र के दायरे में नहीं आ गया।

2. खनन कार्य-पूरे क्षेत्र को इस तरह विभाजित करके खनन कार्य प्रारंभ किया गया। इसके बाद अलग-अलग क्षेत्र को अलग-अलग विशेषज्ञ की देखरेख में बांटा गया तथा फिर गहन खनन का कार्य प्रारंभ हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों में संरचनाएँ बाहर आने लगीं, लेकिन इन्होंने आकार तब लिया जब आपस में इन टुकड़ों को जोड़ दिया गया। फिर यहाँ से देवस्थल, मंडप, विशाल गोपुरम्, शाही स्थल, धार्मिक केंद्र, सड़क, बरामदे, बाजार इत्यादि के अवशेष सामने आए।

जॉन एम. फ्रिट्ज (John M. Fritz), जॉर्ज मिशेल (George Michell) तथा एम.एस. नागराज राव (M.S. Nagraja Rao) वे व्यक्ति थे जो प्रारंभ से अंत तक खुदाई के कार्य से जुड़े रहे। पुरातात्विक सामग्री से प्राप्त इस भव्य नगर के बारे में सर्वप्रथम जानकारी कॉलिन मैकेन्जी ने दी। उसे इस बारे में ज्ञान विरुपाक्ष मन्दिर के पुजारियों से हुआ था। वे पुजारी बताते थे कि इस क्षेत्र में कभी भव्य साम्राज्य था इस तरह यह सत्य है कि दो शताब्दियों के खनन ने पुजारियों द्वारा दी गई जानकारी की पुष्टि की है।

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प्रश्न 2.
विजयनगर की जल-आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?
उत्तर:
विजयनगर की जल-आवश्यकताओं की पूर्ति जल प्रबंधन की एक निश्चित योजना के अनुरूप थी। शासकों ने इस ओर विशेष ध्यान दिया। विजयनगर प्राकृतिक दृष्टि से पहाड़ियों के बीच था। इसके उत्तर:पूर्व में तुंगभद्रा नदी बहती थी। पहाड़ियों की जल धाराओं से यहाँ एक प्राकृतिक कुण्ड बना है। वहीं पर शासकों ने बाँधों का निर्माण किया। इन बाँधों से पानी लेकर बड़े-बड़े कुण्डों में एकत्रित किया जाता था।

इन कुण्डों से कृषि में सिंचाई की जरूरत को पूरा किया जाता था। इसके साथ ही शासकों द्वारा नहर के माध्यम से इस जलाशय का पानी शहर के मुख्य हिस्से ‘राजकीय केंद्र’ तक पहुँचाया जाता था। अवशेषों के आधार पर कहा जा सकता है कि तुंगभद्रा नदी पर बाँध बनाकर कर हिरिया नहर का निर्माण करवाया गया।

प्रश्न 3.
शहर के किलेबंद क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के आपके विचार में क्या फायदे और नुकसान थे?
उत्तर:
खेतों को किलेबंदी क्षेत्र में लाने के फायदे व नुकसान देखने से पहले जरूरी है कि प्रश्न उठाया जाए कि इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका जवाब ढूँढने के लिए हमें मध्यकालीन युद्ध पद्धति को समझना होगा। इस काल में युद्ध मुख्य रूप से घेरा बंदियों से जीते जाते थे। यह घेराबंदी महीनों तक चलती थी तथा शत्रु खाद्यान्न व जल का संकट पैदा किया करता था जिससे बचने के लिए शासक किलों के अंदर बड़े-बड़े अन्नागारों का निर्माण करवाया करते थे।

विजयनगर व बहमनी में संघर्ष महीनों नहीं वर्षों चला करते थे। इसलिए विजयनगर के शासकों ने न केवल अन्नागारों बल्कि पूरे कृषि क्षेत्र को ही किलेबंद कर दिया। यह व्यवस्था महँगी जरूर थी, लेकिन इसके परिणाम सुखद थे।

प्रश्न 4.
आपके विचार में महानवमी डिब्बा से संबद्ध अनुष्ठानों का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
विजयनगर शहर में सबसे आकर्षक एवं ऊँचा स्थान ‘महानवमी डिब्बा’ था। यह 11000 वर्ग फीट वाले विशाल मंच पर 40 फीट की ऊँचाई वाला मंच था। इस विशाल मंच पर लकड़ी की संरचना बनी होने के प्रमाण मिलते हैं।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 1
इतिहासकार व पुरातत्वविद ‘महानवमी’ का अर्थ महान ‘नौवें दिवस’ से लेते हैं। यह कब आता था, इस बारे में साक्ष्य कोई जानकारी नहीं देते। इसलिए इसे अनुमानतः दशहरा, दुर्गा पूजा तथा नवरात्रों इत्यादि त्यौहारों से जोड़ा गया है। इनके आयोजन की कोई तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती। लेकिन इस बात का अनुमान लगाया जाता है कि शासक इस दिन को अपनी शक्ति प्रदर्शन, पहचान व संपन्नता इत्यादि के रूप में देखते थे।

इस दिन विभिन्न तरह के अनुष्ठान किए जाते थे। अनुष्ठान के अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों के नायक एवं अधीनस्थ राजा विजयनगर के राय व अतिथियों को भेंट देते थे। इस माध्यम से वे अपनी स्वामीभक्ति का प्रदर्शन भी करते थे। शासक इस कार्यक्रम के अंतिम दिन शाही सेना तथा नायकों की सेना का निरीक्षण भी करता था। अतः स्पष्ट है कि महानवमी डिब्बा अनुष्ठानों का केन्द्र बिन्दु था। ये अनुष्ठान शासक की शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक होते थे।

प्रश्न 5.
दिया गया चित्र विरुपाक्ष मन्दिर के एक अन्य स्तंभ का रेखाचित्र है। क्या आप कोई पुष्प-विषयक रूपांकन देखते हैं? किन जानवरों को दिखाया गया है? आपके विचार में उन्हें क्यों चित्रित किया गया है? मानव आकृतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दिखाया गया स्तम्भ रेखाचित्र काफी महत्त्वपूर्ण है। इस स्तंभ पर उत्कीर्ण की गई चीजें कई पक्षों को स्पष्ट करती हैं। इस स्तम्भ रेखाचित्र को कलाकारी के अनुरूप 8 भागों में बांटा जा सकता है। इसके प्रत्येक भाग में वनस्पति, मनुष्य या किसी-न-किसी जीव-जन्तु को दिखाया गया है। इसमें विभिन्न चार तरह के फूल दिखाए गए हैं।

जबकि पशुओं व बड़े जंतुओं में हाथी, घोड़ा, शेर व मगरमच्छ अधिक स्पष्ट उभरकर सामने आते हैं। इन पशुओं में शेर राज्य की शक्ति का प्रतीक है जबकि हाथी व घोड़ा थल सेना में इनके महत्त्व को इंगित करता है। मगरमच्छ इनकी समुद्री सीमा के सुदृढ़ पक्ष को बताता है। चित्र में वर्णित नाचता हुआ मोर साम्राज्य की समृद्धि को अभिव्यक्त करता है।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 2
चित्र में दिखाई गई मानव आकृतियों में तीन किसी-न-किसी देवता को अभिव्यक्त करती हैं जबकि एक में एक व्यक्ति शिवलिंग के सम्मुख विशेष नृत्य करता हुआ दिखाया गया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह स्तम्भ चित्र विजयनगर साम्राज्य की समृद्धि, सुरक्षा व सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन की सजीव प्रस्तुति है।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
“शाही केंद्र” शब्द शहर के जिस भाग के लिए प्रयोग किए गए हैं, क्या वे उस भाग का सही वर्णन करते हैं।
उत्तर:
पुरातत्वविदों को विजयनगर की खुदाई के दौरान विभिन्न प्रकार के अवशेष मिले। शहर के केन्द्र में कुछ भवन बड़े भव्य तथा अन्य स्थानों की तुलना में अधिक सुरक्षात्मक ढंग से बनाए गए थे। इनकी बनावट को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इसी स्थल से विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन चलता था इसलिए पुरातत्वविदों ने इसे शाही या राजकीय केंद्र कहा है। इस क्षेत्र में शासक का आवास, 60 से अधिक मन्दिर तथा बड़े-बड़े सभा स्थल हैं।

शहर के इसी हिस्से में ‘महानवमी डिब्बा’ जैसा भव्य चबूतरा है जहाँ शासक अपनी भव्यता, शक्ति का प्रदर्शन करते थे। हर तरह के शाही उत्सवों का आयोजन स्थल भी यही स्वीकारा जाता है। विभिन्न मंडपों के आंगन भी यहाँ हैं। शासक द्वारा सलाहकारों की सभा का आयोजन जिस कमल महल में होता है वह भी इसी क्षेत्र में है।

शाही केंद्र में हजार राम मंदिर जैसा दर्शनीय भव्य स्थल है जिसके बारे में यह कहा जाता है कि यह मंदिर केवल शाही परिवार के सदस्यों के लिए था। यह क्षेत्र राज्य के बीच में था। विजयनगर शहर सात दुर्गों की दीवारों के अन्दर था तो केवल यही क्षेत्र सातवें दुर्ग में था। इस केंद्र के बाहर राज्य की सबसे अधिक शक्तिशाली मानी जाने वाली सेना (अर्थात् हाथी सेना) का अस्तबल भी यहीं था। इस तरह के विभिन्न पक्षों को देखने के उपरांत तथा भवनों के अवशेषों के मूल्यांकन से स्पष्ट है कि यह शाही केंद्र था। इस बारे में जो वर्णन जिस तरह दिया गया है वह सही अर्थों में इसकी पुष्टि करता है।

प्रश्न 7.
कमल महल और हाथियों के अस्तबल जैसे भवनों का स्थापत्य हमें उनके बनवाने वाले शासकों के विषय में क्या बताता है?
उत्तर:
विजयनगर शहर के अवशेषों का नामकरण पुरातत्वविदों व इतिहासकारों ने उनकी बनावट, स्थिति व प्रयोग के आधार पर दिया है। विजयनगर शहर के शाही केंद्र में स्थित दो भवन अधिक चर्चा का मुद्दा है। जिनमें पहला है कमल महल तथा दूसरा है हाथियों का अस्तबल। इन दोनों भवनों का स्थापत्य अलग-अलग तरह का है। ऐसे में इनके बनाने के बारे में शासकों का दृष्टिकोण भी एक नहीं कहा जा सकता। इन दोनों को अलग-अलग करके ठीक समझा जा सकता है

(क) कमल महल-यह शाही केंद्र की सबसे सुन्दर इमारत है। किसी लिखित साक्ष्य । में इसके प्रयोग की जानकारी नहीं मिलती। यह भवन विभिन्न मंडपों के बीच बना है। इसके स्तम्भों पर चारों ओर नक्काशी की गई है। इसकी मेहराबों को चाहे किसी भी कोने से देखें तो यह कमल जैसी दिखती हैं। इसलिए अंग्रेज यात्रियों, पुरातत्वविदों ने इसे कमल (लोटस) महल का नाम दे दिया।

इसकी स्थिति के विभिन्न पक्षों को देखकर पता चलता है कि शासक इसके माध्यम से अपनी समृद्धि तथा राज्य के वास्तुविदों के कौशल को दुनिया के सामने रखना चाहता थी ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि शासक यहाँ अपने सलाहकारों से भेंट किया करता था। विभिन्न राजदूतों का स्वागतकक्ष भी यही था।
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(ख) हाथियों का अस्तबल हाथियों का अस्तबल भी शाही केंद्र में है तथा कमल महल के पास है। शाही केंद्र क्षेत्र में यह सबसे बड़ी इमारत है। हाथियों के अस्तबल के आकार को देखने से इस बात का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि विजयनगर के शासकों की सेना में हाथी काफी थे एवं उनका महत्त्व भी काफी अधिक था।

इसके निर्माण के पीछे शासकों का उद्देश्य अपनी हाथी सेना को सुरक्षा देना था। इसके साथ इस भवन की निर्माण शैली का अन्य कोई उदाहरण नहीं मिलता। शाही निवास के अति नजदीक होने के कारण यह भी कहा जा सकता है कि शासक हाथियों की सेना से शाही महल की सुरक्षा भी करवाता था।
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सारांश में यह कहा जा सकता है कि शासकों के इसे बनवाने के उद्देश्य को लिखित साक्ष्यों के अभाव में शत-प्रतिशत नहीं बताया जा सकता। लेकिन निर्माण शैली भवनों की स्थिति के आधार पर निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 8.
स्थापत्य की कौन-कौन सी परंपराओं ने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रेरित किया? उन्होंने इन परंपराओं में किस प्रकार बदलाव किए?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत के जिस क्षेत्र में स्थापित हुआ। वह स्थापत्य कला की दृष्टि से काफी समृद्ध था। इस क्षेत्र में पल्लव, चालुक्य, होयसल व चोलों का शासन रहा। इन सभी वंशों के शासकों ने पिछली कई शताब्दियों से विभिन्न तरह के भवनों का निर्माण करवाया। इन भवनों में सबसे अधिक मात्रा में मन्दिर थे। विजयनगर के वास्तुविदों को इन्हीं भवनों विशेषकर मन्दिरों को देखकर भवन बनाने की प्रेरणा मिली।

इसके अतिरिक्त विजयनगर के शासकों के अरब क्षेत्र के साथ लगातार संबंध रहे। वहाँ से वस्तुओं का आदान-प्रदान निरंतर होता रहा। विजयनगर के वास्तुविदों को अरब क्षेत्र विशेषकर ईरान के भवन देखने का मौका मिला। उत्तर भारत के भवनों तथा उड़ीसा के गजपति शासकों के भवनों ने भी उन्हें मार्गदर्शन दिया।

विजयनगर के वास्तुविदों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत से सीख लेकर भारत के अन्य स्थानों के भवनों जैसे भवन बनाने प्रारंभ किए। उन्होंने अरब क्षेत्र की भवन निर्माण शैली का भी प्रचूर भाषा में प्रयोग किया। उनका यह प्रयोग शाही भवनों, महलों, शहरी क्षेत्र की इमारतों के साथ-साथ बाजारों इत्यादि में भी दिखाई देता है।

विजयनगर में वास्तुविदों ने इस मिश्रित वास्तुकला का प्रयोग जल प्रबंधन में किया। इसमें मैदानी व पर्वतीय दोनों शैलियाँ प्रयोग की। राज्य को सुरक्षा देने की सोचते हुए इन्होंने दुर्गों की सात पंक्तियाँ बनाईं। दुर्गों की दीवारें, दरवाज़े व गुंबद तुर्की प्रभाव

आनुष्ठानिक दृष्टि से इस काल के दो भवन महत्त्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। पहला है निजामुद्दीन औलिया की खानकाह जो बाद में दरगाह बनी और दूसरी है दिल्ली की जामा मस्ज़िद जो मक्का के बाद इस्लाम जगत की सबसे बड़ी मस्ज़िद है। ये सभी भवन सामान्य आवास व्यवस्था से दूर तथा सुरक्षा की दृष्टि से विशेष चारदीवारी से घिरे थे।

संकेत 2-इन भवनों के स्थापत्य के लिए प्राध्यापक के निर्देशन में भ्रमण करें। साथ में ‘इंटरनेट’ पर उपलब्ध जानकारी का लाभ उठाएँ।

प्रश्न 11.
अपने आस-पास के किसी धार्मिक भवन को देखिए। रेखाचित्र के माध्यम से छत, स्तंभों, मेहराबों, यदि हों तो, गलियारों, रास्तों, सभागारों, प्रवेशद्वारों, जलआपूर्ति आदि का वर्णन कीजिए। इन सभी की तुलना विरुपाक्ष मन्दिर के अभिलक्षणों से कीजिए। वर्णन कीजिए कि भवन का हर भाग किस प्रयोग में लाया जाता था। इसके इतिहास के विषय में पता कीजिए।
उत्तर:
संकेत 1-हरियाणा के क्षेत्र में हम कई महत्त्वपूर्ण धार्मिक भवनों को देखते हैं, जिनमें ऐतिहासिक दृष्टि से कुरुक्षेत्र में छटी पातशाही का गुरुद्वारा, पानीपत में बू अली कलंदर की दरगाह, नारनौल में इब्राहिम सूर द्वारा बनाई गई मस्ज़िद तथा हिसार की लाट की मस्ज़िद प्रमुख हैं। कलायत के दो प्राचीन मंदिर भी उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आधुनिक काल में बनी बहुत-सी इमारतें हर शहर में देखी जा सकती हैं।

यह सभी भवन स्थापत्य की दृष्टि से जहाँ महत्त्वपूर्ण हैं, अपने युग की जीवन-शैली को भी कुछ हद तक स्पष्ट करते हैं। जैसे कि हम विरुपाक्ष के मंदिर में पाते हैं। इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं

  • इसमें दो प्रवेश द्वार हैं। पूर्वी द्वार विशाल गोपुरम् है।
  • गोपुरम् से तीन प्रवेश द्वारों से गुजरकर हम बरामदे से होकर देवालय तक पहुँचते हैं जहाँ विरुपाक्ष की मूर्ति स्थापित है।
  • गोपुरम् से देवालय तक चार मंडप बने हैं।
  • मंदिर के उत्तर में कमलपुरम् जलाशय है।

संकेत 2-इस मंदिर की विशेषताओं तथा ऊपर बताई गई हरियाणा की इमारतों की विशेषताओं की तुलना करें। कुछ स्थानों का स्वयं भ्रमण करें। स्थापत्य की विशेषताओं को नोट करें। उसके ऐतिहासिक पक्ष की जानकारी लें।

एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर HBSE 12th Class History Notes

→ शास्त्ररूढ़ शास्त्रों से संबंधित

→ विजयनगर-विजय का शहर

→ राय-विजयनगर के शासकों की उपाधि

→ तेलुगु-आन्ध्र प्रदेश क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा

→ कुदिरई चेट्टी-घोड़ों के व्यापारी

→ संगम वंश-विजयनगर का पहला राजवंश

→ सर्वेयर-सर्वेक्षण करने वाला

→ कन्नड़ कर्नाटक क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा

→ गजपति-उड़ीसा के शासकों की उपाधि

→ रायचूर दोआब-तुंगभद्रा व कृष्णा नदियों के बीच का क्षेत्र

→ गोपुरम्-मन्दिर का प्रवेश द्वार

→ नायक-सैनिक टुकड़ी के प्रमुख (क्षेत्र-विशेष में)

→ अमर-नायक-प्रशासन तथा सैनिक प्रमुख

→ इंडो-इस्लामिक-हिंद-इस्लामी

→ महानवमी-महान् नौवां दिन

→ पम्पादेवी-कर्नाटक क्षेत्र में स्थानीय देवी

→ देवस्थल-मन्दिर में देवता की मूर्ति स्थापित करने वाला स्थान

→ हिन्दू सूरतराणा-हिन्दू सुलतान

→ विरुपाक्ष-विजयनगर क्षेत्र का सबसे प्रमुख देवता

→ बिसनगर-विजयनगर के लिए डोमिंगो पेस द्वारा प्रयुक्त शब्द

→ हम्पी-विजयनगर का वर्तमान नाम

→ महानवमी डिब्बा-विजयनगर शहर में मंच पर बनाया गया एक भवन

→ विट्ठल महाराष्ट्र क्षेत्र में विष्णु के रूप में पूजा जाने वाला देवता

→ दक्षिण क्षेत्र में चोल व चालुक्यों के पतन के बाद देवगिरी, वारंगल द्वारसमुद्र तथा मदुरई जैसे राज्यों का उत्थान हुआ। इन राज्यों पर दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों (विशेषकर अलाऊद्दीन खलजी) द्वारा अधिकार कर लिया गया। दिल्ली से दूर होने के कारण दिल्ली के सुल्तान इस क्षेत्र को सुगमता से नियंत्रित नहीं कर पाए। मुहम्मद तुगलक ने दूरी की बाधा को पार करते हुए वर्तमान महाराष्ट्र के देवगिरी नामक स्थान का नाम दौलताबाद बदलकर इसे अपनी राजधानी बनाया।

→ परन्तु उसे वापिस दिल्ली पर ही केंद्रित करना पड़ा तथा दक्षिण अव्यवस्था के दौर में उलझ गया। यहाँ दो राज्यों का उत्थान हुआ, जिन्हें विजयनगर व बहमनी के नाम से जाना जाता है।

→ 1336 ई० में हरिहर व बुक्का राय दो भाइयों ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। इस साम्राज्य का प्रथम शासक हरिहर (1336-56) बना तथा उसने राज्य के लिए नियम कानून बनाए। उसकी मृत्यु के पश्चात् बुक्का (1356-1377) शासक बना। उसने प्रशासन व राज्य की समृद्धि की ओर ध्यान दिया। उसके समय में ही पड़ोसी राज्य बहमनी के साथ संघर्ष की शुरुआत हुई वह साम्राज्य को सही दिशा दे पाया। उसके पश्चात् हरिहर द्वितीय (1377-1405) तथा देवराय प्रथम (1406-22) शासक बने।

→ इन्होंने बहमनी से संघर्ष जारी रखा। साथ ही आर्थिक विकास, कृषि व व्यापार को भी प्रोत्साहन दिया। उनके बाद देवराय द्वितीय (1422-46) शासक बना। उसने इस साम्राज्य की सीमा का खूब विस्तार किया। फारसी यात्री अब्दुर रज्जाक ने उसकी खुले मन से प्रशंसा की है। इसके बाद इस साम्राज्य में कई कमजोर शासक आए जिनको बहमनी के शासकों ने पराजित कर इनकी सीमा को छोटा कर दिया। विजयनगर अपने चरमोत्कर्ष पर कृष्णदेव राय (1509-29) के शासन काल में पहुँचा।

→ बहमनी साम्राज्य के तीन राज्यों-बीजापुर, अहमदनगर व गोलकुण्डा की संयुक्त सेना ने 1565 ई० में विजयनगर पर आक्रमण किया। विजयनगर का नेतृत्व रामराय ने किया। यह युद्ध तालीकोटा (वास्तव में राक्षसी-तांगड़ी क्षेत्र) में हुआ। इस युद्ध में विजयनगर की हार हुई तथा विजयी सेना ने विजयनगर शहर में भारी लूटमार की।

→ जिससे यह क्षेत्र पूरी तरह उजड़ गया। विजयनगर शहर ही साम्राज्य की राजधानी था। इसकी संरचना व स्थापत्य कला को देखने से यह ज्ञात होता है कि यह महत्त्वपूर्ण शहर था। यह शहर वे सारी विशेषताएँ रखता था जो किसी भी शक्तिशाली राज्य की राजधानी की जरूरत होती थी।

→  इस शहर के मन्दिर, भवन तथा अन्य अवशेष व्यापक रूप में मिलते हैं। नायक व अमर-नायकों के अभिलेख तथा यात्रियों का वृत्तांत शहर के बारे में विस्तृत प्रकाश डालता है। 15वीं शताब्दी के यात्रियों में इटली के निकोलो दे कॉन्ती (Nicolo-De-Konti), फारस के अब्दुर रज्जाक (Abdur Razak) तथा रूस के अफानासी निकितिन (Afanaci Niktian) मुख्य हैं। 16वीं शताब्दी के यात्रियों में दुआर्ते बरबोसा (Duarate Barbosa), डोमिंगो पेस (Domingo Pesh) तथा पुर्तगाल के फर्नावो नूनिज़ (Fernao Nuniz) के नाम आते हैं।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

→ विजयनगर साम्राज्य के रायों ने जहाँ जल प्रबंधन उच्चकोटि का किया, वहीं सुरक्षा व्यवस्था तथा सड़कों के निर्माण की ओर विशेष ध्यान दिया। नगर की किलेबंदी बेजोड़ थी। जिसके बारे में हमें जानकारी फारस के दूत तथा यात्री अब्दुर रज्जाक से मिलती है। वह सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित होकर लिखता है कि यहाँ दुर्गों की सात पंक्तियाँ हैं। इन दुर्गों की पंक्तियों में केवल शहर का आवासी क्षेत्र नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्र, जंगलों व जलाशयों के क्षेत्र को चारदीवारी के अंदर लिया गया है।

→ विजयनगर साम्राज्य की सारी प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन जिस स्थल से होता था उसे शाही स्थल कहा गया है। पुरातत्वविदों ने इसे शाही केंद्र तथा राजकीय केंद्र इत्यादि नाम भी दिए हैं। शाही निवास, दरबार के अति महत्त्वपूर्ण भवनों के अतिरिक्त यहाँ 60 से अधिक मंदिर थे।

→ यह इस बात का प्रमाण है कि शासक इन मन्दिरों व उपासना स्थलों को बनाकर जनता में यह संदेश देना चाहता था कि वह सबका शासक है इसलिए सभी उसे स्वीकार करें। इस तरह शाही स्थल पर मंदिरों का होना शासक द्वारा वैधता को प्राप्त करने का एक तरीका कहा जा सकता है।

→ विजयनगर की जानकारी के स्रोत हमें विभिन्न रूपों में मिलते हैं। इनमें पुरातात्विक सामग्री, साहित्यिक स्रोत तथा विदेशी यात्रियों के वृत्तांत शामिल हैं। इनमें से अध्ययनकर्ताओं ने फोटोग्राफ, मानचित्र, उपलब्ध भवनों की खड़ी संरचनाएँ व मूर्तियों की ओर विशेष ध्यान दिया है। मैकेन्जी द्वारा प्रारंभ के सर्वेक्षण के पश्चात् जो रिपोर्ट दी गई, उसको अभिलेखों के वर्णन तथा यात्रियों के वृत्तांत के साथ जोड़ा गया।

→ इस क्षेत्र के अध्ययन का कार्य भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण तथा कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग द्वारा बड़े स्तर पर निरंतर ही किया गया। इस कड़ी में मिली सफलता ने सन् 1976 में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित करवा दिया। 1980 के दशक में खनन कार्य और अधिक गहन, व्यापक, योजनाबद्ध किया गया। इसके परिणामस्वरूप विजयनगर के अवशेष सामने आए।

समय रेखा
क्रम संख्याकालघटना का विवरण
1.1206 ई०दिल्ली सल्तनत की स्थापना
2.1290 ई०खलजी वंश की स्थापना
3.1320 ईoतुगलक वंश की स्थापना
4.1325 ईoमुहम्मद तुगलक का सत्ता पर आना
5.1336 ई०विजयनगर साम्राज्य की स्थापना
6.1347 ई०बहमनी साम्राज्य की स्थापना
7.1435 ई०उड़ीसा के गजपति राज्य की स्थापना
8.1486 ई०विजयनगर में सुलुव वंश की सत्ता
9.1490 ईoगुजरात, बीजापुर व बरार में स्वतंत्र राज्यों का उदय
10.1509-29 ई०विजयनगर में कृष्णदेव राय का शासन
11.1518 ई०बहमनी राज्य का अन्त, गोलकुण्डा का उत्थान
12.1526 ईभारत में मुगल वंश की स्थापना
13.1565 ई०तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर की हार व पतन का प्रांरभ
14.1707 ई०औरंगजेब की मृत्यु व मुगलों का पतन
15.1800 ई०कॉलिन मैकेन्जी की विजयनगर यात्रा
16.1815 ई०कॉलिन मैकेन्जी भारत में प्रथम सर्वेयर बना
17.1821 ई०कॉलिन मैकेन्जी की मृत्यु
18.1836 ई०पुरातत्वविदों द्वारा हम्पी के अभिलेखों का संकलन प्रारंभ
19.1856 ईअलेक्जैंडर ग्रनिलो द्वारा हम्पी के चित्र लेना
20.1876 ई०जे०एफ० फ्लीट द्वारा अभिलेखों का प्रलेखन प्रारंभ
21.1902 ईसर जॉन मार्शल द्वारा संरक्षण कार्य की शुरुआत
22.1986 ई०यूनेस्को द्वारा हम्पी को विश्व विरासत में शामिल करते हुए पुरातत्व स्थल घोषित

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. अल-बिरूनी किसके साथ भारत आया?
(A) कासिम के साथ
(B) महमूद के साथ
(C) गौरी के साथ
(D) बाबर के साथ
उत्तर:
(B) महमूद के साथ

2. अल-बिरूनी का जन्म स्थान वर्तमान में किस देश में है?
(A) अफगानिस्तान में
(B) कजाकिस्तान में
(C) तुर्कमेनिस्तान में
(D) उज्बेकिस्तान में
उत्तर:
(D) उज्बेकिस्तान में

3. अल-बिरूनी की रचना का क्या नाम है?
(A) शाहनामा
(B) तारीख-ए-गज़नवी
(C) किताब-उल-हिन्द
(D) चचनामा
उत्तर:
(C) किताब-उल-हिन्द

4. अल-बिरूनी ने अपने लेखन का आधार बनाया?
(A) वेदों को
(B) पुराणों को
(C) मनुस्मृति को
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

5. अल-बिरूनी भारत की किस भाषा से अधिक प्रभावित हुआ?
(A) संस्कृत से
(B) पंजाबी से
(C) सिन्धी से
(D) हिन्दी से
उत्तर:
(A) संस्कृत से

6. अल-बिरूनी ज्ञाता था
(A) संस्कृत का
(B) अरबी का
(C) फारसी का
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

7. अल-बिरूनी के अनुसार जाति-व्यवस्था से परे लोगों को कहा जाता था
(A) वैश्य
(B) शूद्र
(C) अंत्यज
(D) कोई नहीं
उत्तर:
(C) अंत्यज

8. इब्न बतूता कहाँ का रहने वाला था?
(A) अरब क्षेत्र का
(B) स्पेन का
(C) मोरक्को का
(D) चीन का
उत्तर:
(C) मोरक्को का

9. रिहला किस भाषा में लिखी गई?
(A) अरबी
(B) फारसी
(C) तुर्की
(D) संस्कृत
उत्तर:
(B) फारसी

10. इब्न बतूता के आगमन के समय भारत का शासक था
(A) गाजी तुगलक
(B) मुहम्मद तुगलक
(C) फिरोज तुगलक
(D) अलाऊद्दीन खिलजी
उत्तर:
(B) मुहम्मद तुगलक

11. इब्न बतूता भारत कब आया?
(A) 1265 ई० में
(B) 1321 ई० में
(C) 1333 ई० में
(D) 1398 ई० में
उत्तर:
(C) 1333 ई० में

12. इब्न बतूता ने भारत में स्थानों की दूरी बताई है
(A) कि०मी० में
(B) मीलों में
(C) कोसों में
(D) दिन को इकाई मान कर
उत्तर:
(D) दिन को इकाई मान कर

13. मुहम्मद तुगलक ने बतूता को दूत के रूप में कहाँ भेजा?
(A) बर्मा
(B) चीन
(C) रूस
(D) लंका
उत्तर:
(B) चीन

14. इन बतूता ने दिल्ली के किस दरवाजे को सबसे बड़ा बताया है?
(A) बदायूँ
(B) तुगलकाबाद
(C) अजमेरी
(D) गुल
उत्तर:
(A) बदायूँ

15. बतूता की रचना किस नाम से जानी जाती है?
(A) रिला
(B) तजाकिश
(C) मशविरा
(D) तारीख-ए-हिन्द
उत्तर:
(A) रिला

16. बतूता को भारत में विचित्र क्या लगा?
(A) नारियल
(B) पान
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) और (B) दोनों

17. बतूता ने दिल्ली की प्राचीर में दरवाजों की संख्या बताई है
(A) 20
(B) 28
(C) 35
(D) 49
उत्तर:
(B) 28

18. बतूता ने भारत में कपड़े की किस किस्म का वर्णन अधिक किया है?
(A) सूती कपड़े का
(B) ऊनी कपड़े का
(C) जरी वाले कपड़े का
(D) मलमल का
उत्तर:
(D) मलमल का

19. बतूता के अनुसार पैदल डाक-सेवा कहलाती थी?
(A) उलुक
(B) दावा
(C) फरमान
(D) कोई नहीं
उत्तर:
(B) दावा

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20. बतूता ने दौलताबाद के गायकों के बाजार को क्या कहा है?
(A) ताराबबाद
(B) शमशीराबाद
(C) संगीतालय
(D) गुलकेन्द्र
उत्तर:
(A) ताराबबाद

21. बर्नियर भारत कब आया?
(A) 1645 ई० में
(B) 1656 ई० में
(C) 1670 ई० में
(D) 1688 ई० में
उत्तर:
(B) 1656 ई० में

22. ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर किसकी रचना है?
(A) अल-बिरूनी की
(B) बतूता की
(C) बर्नियर की
(D) तैवर्नियर की
उत्तर:
(C) बर्नियर की

23. बर्नियर भारत को किस रूप में वर्णित करता है?
(A) परंपरागत
(B) अविकसित
(C) उद्योग प्रधान
(D) विकसित
उत्तर:
(B) अविकसित

24. बर्नियर के अनुसार व्यापारिक दृष्टि से उन्नत क्षेत्र था
(A) यूरोप
(B) भारत
(C) अरब क्षेत्र.
(D) अफ्रीका
उत्तर:
(B) भारत

25. बर्नियर के विचारों से कौन-सा यूरोपियन लेखक प्रभावित हुआ?
(A) कॉर्ल मार्क्स
(B) मॉन्टेस्क्यू.
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) और (B) दोनों

26. फ्रांसिस्को पेलसर्ट किस देश का रहने वाला था?
(A) ब्रिटेन का
(B) फ्रांस का
(C) जर्मनी का
(D) हॉलैण्ड का
उत्तर:
(D) हॉलैण्ड का

27. इन बतूता ने भारत में सर्वप्रथम उपहार किसको दिए?
(A) मुल्तान के गवर्नर को
(B) मुहम्मद तुगलक को
(C) शेख निजामुद्दीन औलिया को
(D) जियाऊद्दीन बर्नी को
उत्तर:
(A) मुल्तान के गवर्नर को

28. बर्नियर ने भारत की किस प्रथा को असभ्यता करार दिया है?
(A) जाति प्रथा को
(B) सूदखोरी को
(C) भूमि स्वामित्व को
(D) सती प्रथा को
उत्तर:
(D) सती प्रथा को

29. बर्नियर ने भारत की किस राजनीतिक घटना का वर्णन अधिक विस्तृत किया है?
(A). शाहजहाँ के बेटों में युद्ध
(B) औरंगजेब की ताजपोशी
(C) औरंगजेब का दक्षिण अभियान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) शाहजहाँ के बेटों में युद्ध

30. महमूद गजनवी ने भारत पर कुल कितने आक्रमण किए?
(A) 15
(B) 17
(C) 20
(D) 23
उत्तर:
(B) 17

31. अल-बिरूनी ने शिक्षा कहाँ प्राप्त की?
(A) ख्वारिज्म में
(B) गजनी में
(C) बगदाद में
(D) मक्का में
उत्तर:
(A) ख्वारिज्म में

32. अल-बिरूनी ने अपना अधिकतर लेखन कार्य किस स्थान पर किया?
(A) ख्वारिज्म में
(B) गजनी में
(C) बगदाद में
(D) मक्का में
उत्तर:
(B) गजनी में

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33. अल-बिरूनी ने संस्कृत के अतिरिक्त भारत की कौन सी अन्य भाषाओं का साहित्य पढ़ा?
(A) पाली
(B) प्राकृत
(C) उपर्युक्त दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) उपर्युक्त दोनों

34. अल-बिरूनी ने भारतीय क्षेत्र में आम व्यक्ति द्वारा बोली जाने वाली भाषा को क्या कहा?
(A) संस्कृत
(B) हिन्दवी
(C) पंजाबी
(D) खड़ी बोली
उत्तर:
(B) हिन्दवी

35. अल-बिरूनी ने संस्कृत भाषा को समझने की समस्या का समाधान कैसे किया?
(A) सीखकर
(B) अनुवादित ग्रंथों को पढ़कर
(C) द्वि-भाषिए की मदद से
(D) भाषा को महत्त्व देकर
उत्तर:
(A) सीखकर

36. इब्न बतूता भारत के अतिरिक्त अन्य किस देश में काज़ी के पद पर नियुक्त हुआ?
(A) इरान में
(B) चीन में
(C) लंका में
(D) मालद्वीप में
उत्तर:
(D) मालद्वीप में

37. बतूता ने भारत से चीन जाने के लिए किस क्षेत्र का मार्ग प्रयोग किया?
(A) कश्मीर का मार्ग
(B) मध्य एशिया का मार्ग
(C) लंका व मालद्वीप का मार्ग
(D) बर्मा व सुमात्रा का मार्ग
उत्तर:
(D) बर्मा व सुमात्रा का मार्ग

38. बतूता सर्वप्रथम चीन की किस बन्दरगाह पर गया?
(A) जायतुन
(B) कैंटन
(C) पोर्टस माऊथ
(D) तीनस्तीन
उत्तर:
(A) जायतुन

39. बतूता की तरह का चीन से संबंधित वृत्तांत वेनिस के किस अन्य यात्री का माना जाता है?
(A) दूरते बारबोसा का
(B) मनूची का
(C) फ्रैन्को पेलसर्ट का
(D) मार्को पोलो का
उत्तर:
(D) मार्को पोलो का

40. बतूता के यात्रा अनुभवों को संकलित करने का आदेश किस देश के शासक द्वारा दिया गया?
(A) भारत
(B) मोरक्को
(C) चीन
(D) मालद्वीप
उत्तर:
(B) मोरक्को

41. बतूता ने भारत का सबसे बड़ा शहर किसे कहा है?
(A) देहली को
(B) दौलताबाद को
(C) मुल्तान को
(D) सिन्ध को
उत्तर:
(A) देहली को

42. बतूता ने दिल्ली में फलों का बाजार किस स्थान पर बताया है?
(A) बदायूँ के दरवाजे के पास
(B) मांडवी दरवाजे के पास
(C) गुल दरवाजे के पास
(D) तुगलकाबाद के बाहरी क्षेत्र में
उत्तर:
(C) गुल दरवाजे के पास

43. बतूता के अनुसार सिन्ध से दिल्ली तक जाने में 50 दिन का समय लगता था लेकिन गुप्तचरों को सूचना देने में कितना समय लगता था?
(A) 50 दिन
(B) 20 दिन
(C) 10 दिन
(D) 5 दिन
उत्तर:
(D) 5 दिन

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44. भारत में जल मार्ग से पहला पुर्तगाली कौन आया?
(A) वास्कोडिगामा
(B) अल्बुकर्क
(C) मार्निस हस्टमान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) वास्कोडिगामा

45. वास्कोडिगामा भारत कब आया?
(A) 1484 ई० में
(B) 1498 ई० में
(C) 1509 ई० में
(D) 1520 ई० में
उत्तर:
(B) 1498 ई० में.

46. हीरे-जवाहरात का व्यापार करने के लिए फ्रांस से आने वाला प्रमुख यात्री कौन था, जिसने अपना वृत्तांत भी दिया हो? ..
(A) बर्नियर
(B) तैवर्नियर
(C) मनूची
(D) वान-डी-ब्रूस
उत्तर:
(B) तैवर्नियर

47. भारत में आने वाले उस इटली के यात्री का नाम बताओ जो वापिस नहीं गया?
(A) बर्नियर
(B) तैवर्नियर
(C) मनूची
(D) पेलसर्ट
उत्तर:
(C) मनूची

48. बर्नियर ने भूमि के राजकीय स्वामित्व को किसके लिए हानिकारक बताया है?
(A) शासक के लिए
(B) जनता के लिए
(C) उपर्युक्त दोनों के लिए
(D) किसी के लिए नहीं
उत्तर:
(B) जनता के लिए

49. 18वीं सदी में किस यूरोपीय चिन्तक ने बर्नियर के वृत्तांत को आधार मानकर भारत का अध्ययन किया?
(A) कार्ल मार्क्स ने
(B) मॉन्टेस्क्यू ने
(C) (A) और (B) दोनों
(D) किसी ने नहीं
उत्तर:
(C) (A) और (B) दोनों

50. “विश्व की सभी बहुमूल्य वस्तुएँ यहाँ आकर समा जाती हैं।” बर्नियर ने ये पक्तियाँ किस देश के लिए कही हैं?
(A) फ्रांस के लिए
(B) ब्रिटेन के लिए
(C) रूस के लिए
(D) भारत के लिए
उत्तर:
(A) फ्रांस के लिए

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51. विभिन्न शहरों में व्यापारी वर्ग के मुखिया को मुगल काल में क्या कहा जाता था?
(A) नगर सेठ
(B) महाजन
(C) मालिक
(D) वोहरा
उत्तर:
(A) नगर सेठ

52. दासों के बारे में बतूता को भारत में क्या आश्चर्यपूर्ण लगा?
(A) दासों के सांस्कृतिक कार्यक्रम
(B) दासों के कार्य
(C) दासों द्वारा गुप्तचरी करना
(D) दासों का बाजार में बिकना
उत्तर:
(D) दासों का बाजार में बिकना

53. बतूता ने दासों के कार्य को प्रमुख रूप से बताया है
(A) गृह कार्य
(B) कृषि कार्य
(C) गुप्तचर का कार्य करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

54. बर्नियर को भारत में सर्वाधिक अमानवीय कार्य क्या लगा?
(A) सती प्रथा
(B) दासों की खरीद-बेच
(C) कारीगरों की कार्य प्रणाली
(D) कृषक की दशा
उत्तर:
(A) सती प्रथा

55. बतूता को किस शताब्दी का विश्व यात्री कहा जाता है?
(A) 13वीं शताब्दी का
(B) 14वीं शताब्दी का
(C) 15वीं शताब्दी का
(D) 16वीं शताब्दी का
उत्तर:
(B) 14वीं शताब्दी का

56. अल-बिरूनी की पुस्तक ‘किताब-उल-हिन्द’ की भाषा है
(A) फारसी
(B) तुर्की
(C) अरबी
(D) उर्दू
उत्तर:
(C) अरबी

57. इब्न बतूता का मोरक्को में जन्म स्थान था
(A) ओवल
(B) गाजा
(C) तैंजियर
(D) रियाद
उत्तर:
(C) तैंजियर

58. बर्नियर को भारत आने के बाद प्रारंभ में किसका संरक्षण मिला?
(A) औरंगजेब का
(B) दारा का
(C) शाहजहाँ का
(D) मुराद का
उत्तर:
(B) दारा का

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59. मुगल काल में शाही कारखाने थे
(A) शासकों की आवश्यकता की चीजें उत्पादन
(B) सेना के रख-रखाव का स्थल करने वाले स्थल
(C) दरबारी प्रबंध व्यवस्था का स्थल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) शासकों की आवश्यकता की चीजें उत्पादन करने वाले स्थल

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
अल-बिरूनी का जन्म कब हुआ?
उत्तर:
अल-बिरूनी का जन्म 973 ई० में हुआ।

प्रश्न 2.
अल-बिरूनी का जन्म कहाँ हुआ?
उत्तर:
अल-बिरूनी.का जन्म ख्वारिज्म (उज़्बेकिस्तान) में हुआ।

प्रश्न 3.
अल-बिरूनी ने किताब-उल-हिन्द किस भाषा में लिखी?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने किताब-उल-हिन्द अरबी भाषा में लिखी।

प्रश्न 4.
अल-बिरूनी की मृत्यु कब हुई?
उत्तर:
अल-बिरूनी की मृत्यु 1048 ई० में हुई।

प्रश्न 5.
अल-बिरूनी के अनुसार भारतीय समाज में श्रेष्ठ स्थान पर कौन थे?
उत्तर:
अल-बिरूनी के अनुसार भारतीय समाज में श्रेष्ठ स्थान पर ब्राह्मण थे।

प्रश्न 6.
इन बतूता का जन्म कब हुआ?
उत्तर:
इन बतूता का जन्म 1304 ई० में हुआ।

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प्रश्न 7.
इन बतूता कहाँ का रहने वाला था?
उत्तर:
इब्न बतूता मोरक्को का रहने वाला था।

प्रश्न 8.
इब्न बतूता भारत कब आया?
उत्तर:
इन बतूता 1333 ई० में भारत आया।

प्रश्न 9.
भारत से महम्मद तगलक का दूत बनकर चीन कौन गया?
उत्तर:
भारत से मुहम्मद तुगलक का दूत बनकर इब्न बतूता चीन गया।

प्रश्न 10.
बर्नियर भारत में कब-से-कब तक रहा?
उत्तर:
बर्नियर भारत में 1656 से 1668 ई० तक भारत में रहा।

प्रश्न 11.
अल-बिरूनी ने भारत को समझने के लिए किस भाषा को सीखना अनिवार्य बताया?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने भारत को समझने के लिए संस्कृत भाषा को अनिवार्य बताया।

प्रश्न 12.
संस्कृत को अल-बिरूनी कैसी भाषा बताता है?
उत्तर:
संस्कृत को अल-बिरूनी विशाल पहुँच वाली भाषा बताता है।

प्रश्न 13.
इन बतूता नारियल की तुलना किससे करता है?
उत्तर:
इब्न बतूता नारियल की तुलना मानव के सिर से करता है।

प्रश्न 14.
इब्न बतूता दिल्ली के मुकाबले में शहर किसे कहता है?
उत्तर:
इन बतूता दौलताबाद को दिल्ली के मुकाबले में शहर कहता है।

प्रश्न 15.
इन बतूता के अनुसार अश्व डाक व्यवस्था क्या कहलाती थी?
उत्तर:
इब्न बतूता के अनुसार अश्व डाक व्यवस्था उलुक कहलाती थी।

प्रश्न 16.
बतूता ने किस क्षेत्र के संगीत बाजार का वर्णन किया है?
उत्तर:
बतूता ने दौलताबाद क्षेत्र के संगीत बाजार का वर्णन किया है।

प्रश्न 17.
बर्नियर ने अपना भारत से संबंधित वृत्तांत किस रचना में दिया?
उत्तर:
बर्नियर ने अपना भारत से संबंधित वृत्तांत ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर में किया।

प्रश्न 18.
बर्नियर के अनुसार भारत में भूमि का स्वामी कौन था?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार भारत में भूमि का स्वामी शासक था।

प्रश्न 19.
बर्नियर किस देश का रहने वाला था?
उत्तर:
बर्नियर फ्रांस का रहने वाला था।

प्रश्न 20.
तैवर्नियर ने भारत की यात्रा कितनी बार की?
उत्तर:
तैवर्नियर ने भारत की यात्रा 6 बार की।

प्रश्न 21.
बर्नियर ने ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर की रचना किस उद्देश्य से की?
उत्तर:
बर्नियर ने ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर की रचना यूरोप को भारत से श्रेष्ठ दिखाने के उद्देश्य से की।

प्रश्न 22.
बतूता सर्वप्रथम भारत में कहाँ पहुँचा?
उत्तर:
बतूता सर्वप्रथम सिन्ध में पहुंचा।

प्रश्न 23.
बतूता ने सुल्तान मुहम्मद तुगलक को उपहार में क्या दिया?
उत्तर:
बतूता ने सुल्तान मुहम्मद तुगलक को उपहार में घोड़े, ऊँट व दास दिए।

प्रश्न 24.
बर्नियर ने किसानों की दुर्दशा का मुख्य कारण क्या बताया है?
उत्तर:
बर्नियर ने किसानों की दुर्दशा का मुख्य कारण भूमि पर राजकीय स्वामित्व बताया है।

प्रश्न 25.
फिरदौसी की रचना का क्या नाम है?
उत्तर:
फिरदौसी की रचना का नाम शाहनामा है।

प्रश्न 26.
अल-बिरूनी किसके साथ भारत आया?
उत्तर:
अल-बिरूनी महमूद के साथ भारत आया।

प्रश्न 27.
इन बतूता ने अपने देश के बाद सबसे पहले किस स्थान की यात्रा की?
उत्तर:
इन बतूता ने अपने देश के बाद सबसे पहले मक्का की यात्रा की।

प्रश्न 28.
सर टॉमस रो किस देश का यात्री था?
उत्तर:
सर टॉमस रो ब्रिटेन का यात्री था।

प्रश्न 29.
दूरते बारबोसा का संबंध किस देश से है?
उत्तर:
दूरते बारबोसा का संबंध पुर्तगाल से है।

प्रश्न 30.
बर्नियर ने अपनी भारत संबंधित रचना को फ्रांस में किसे भेंट किया?
उत्तर:
बर्नियर ने अपनी भारत संबंधित रचना को शासक लुई XIV को भेंट किया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 31.
अल-बिरूनी को बन्दी किसने बनाया?
उत्तर:
अल-बिरूनी को महमूद गज़नी ने बन्दी बनाया।

प्रश्न 32.
अल-बिरूनी ने यूनानी भाषा में अनुवादित किस-किस का साहित्य पढ़ा?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने यूनानी भाषा में अनुवादित अरस्तु व प्लेटो का साहित्य पढ़ा।

प्रश्न 33.
अल-बिरूनी की भारत के बारे में समझ के मुख्य आधार क्या थे?
उत्तर:
अल-बिरूनी की भारत के बारे में समझ के मुख्य आधार ब्राह्मणवादी ग्रन्थ थे।

प्रश्न 34.
अल-बिरूनी समाज में किन दो वर्गों की स्थिति एक जैसी बताते हैं?
उत्तर:
अल-बिरूनी समाज में वैश्य व शूद्र वर्गों की स्थिति एक जैसी बताते हैं।

प्रश्न 35.
बर्नियर ने भारतीय कृषक की दुर्दशा का क्या कारण बताया है?
उत्तर:
बर्नियर ने भारतीय कृषक की दुर्दशा का कारण भारत में भूमि का राजकीय स्वामित्व बताया है।

प्रश्न 36.
बतूता ने भारत में सर्वप्रथम किस स्थान के गवर्नर को उपहार दिए?
उत्तर:
बतूता ने भारत में सर्वप्रथम मुल्तान के गवर्नर को उपहार दिए।

प्रश्न 37.
बतूता के संस्मरणों को किसने लिखा?
उत्तर:
बतूता के संस्मरणों को इब्न जुजाई ने लिखा।

प्रश्न 38.
बतूता ने किस तरह के कपड़े को केवल अमीरों के प्रयोग में आने वाला बताया है?
उत्तर:
बतूता ने मलमल के कपड़ों को केवल अमीरों के प्रयोग में आने वाला बताया है।

प्रश्न 39.
बतूता किस तरह की डाक को अधिक तेज बताता है?
उत्तर:
बतूता पैदल डाक को अधिक तेज बताता है।

प्रश्न 40.
बतूता के अनुसार खुरासान के फल प्रायः भारत कैसे पहुँचते थे?
उत्तर:
बतूता के अनुसार खुरासान के फल पैदल डाक द्वारा भारत पहुँचते थे।

प्रश्न 41.
बतूता ने दौलताबाद में सबसे महत्त्वपूर्ण जगह कौन-सी बताई?
उत्तर:
बतूता ने दौलताबाद में सबसे महत्त्वपूर्ण जगह संगीत बाजार (ताराबबाद) बताई।

प्रश्न 42.
वह कौन-सा यूरोपीय यात्री था जो चिकित्सक के रूप में भारत आया था, लेकिन वापिस नहीं गया?
उत्तर:
मनूची नामक यूरोपीय यात्री जो चिकित्सक के रूप में भारत आया था लेकिन वापिस नहीं गया।

प्रश्न 43.
बर्नियर ने भारत व यूरोप की तुलना के लिए मुख्य रूप से किन शब्दों का प्रयोग किया है?
उत्तर:
बर्नियर ने भारत व यूरोप की तुलना के लिए मुख्य पूर्व व पश्चिम शब्दों का प्रयोग किया है।

प्रश्न 44.
बर्नियर किस तरह के भूमि स्वामित्व को अच्छा मानता है?
उत्तर:
बर्नियर निजी स्वामित्व को अच्छा मानता है।

प्रश्न 45.
बर्नियर के विचार किस विचारधारा से प्रभावित लगते हैं?
उत्तर:
बर्नियर के विचार यूरोप में पूंजीवादी धारणा से प्रभावित लगते हैं।

प्रश्न 46.
बर्नियर ने भारतीय नगरों के लिए क्या शब्द प्रयोग किया है?
उत्तर:
बर्नियर ने भारतीय नगरों के लिए शिविर नगर का प्रयोग किया है।

प्रश्न 47.
अल-बिरूनी ने किस-किस भारतीय भाषा के साहित्य को मौलिक या अनुवादित रूप में पढ़ा?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने संस्कृत, पाली, प्राकृत नामक भारतीय भाषा के साहित्य को मौलिक या अनुवादित रूप में पढ़ा।

प्रश्न 48.
बतूता ने मुहम्मद तुगलक को कैसा शासक बताया है?
उत्तर:
बतूता ने मुहम्मद तुगलक विद्वान, कला, साहित्य का संरक्षक बताया है।

प्रश्न 49.
जौहरी के रूप में भारत आने वाले प्रमुख यात्री का नाम बताओ।
उत्तर:
जौहरी के रूप में भारत आने वाले प्रमुख यात्री का नाम ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर था।

प्रश्न 50.
अल-बिरूनी ने समाज की जाति व्यवस्था से बाहर वाले वर्ग को क्या लिखा है?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने समाज की जाति व्यवस्था से बाहर वाले वर्ग को अंत्यज लिखा है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 51.
इन बतूता को भारत में वनस्पति के तौर पर कौन-कौन से पौधे आश्चर्यजनक लगे?
उत्तर:
इन बतूता को भारत में वनस्पति के तौर पर नारियल व पान के पौधे आश्चर्यजनक लगे।

प्रश्न 52.
‘रिहला’ तथा ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एंपायर’ के लेखक कौन थे?
उत्तर:
‘रिहला’ के लेखक इब्नबतूता तथा ‘ट्रेवलस इन द मुगल एंपायर’ के लेखक बर्नियर थे।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेशी यात्रियों के भारत आने का उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
प्राचीनकाल से ही अनेक यात्री भारत में आते रहे हैं। ये एक देश से लोग दूसरे देशों में व्यापार व रोजगार के लिए जाते थे। कई लोग धर्म-प्रचार या तीर्थ यात्रा के उद्देश्य से दूसरे देश में जाते थे। कई बार ये यात्री विद्या अध्ययन के लिए भी जाते थे। भारत में भी यात्री इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आए।

प्रश्न 2.
इब्न बतूता विश्व यात्रा क्यों करता है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
इब्न बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था। उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की। 1325-1332 ई० तक उसने मक्का व मदीना की यात्रा की तथा इसके बाद सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के देशों की यात्रा की। उसने अपनी यात्राएँ जल एवं थल दोनों मार्गों से की। भारत व चीन की यात्रा करने के उपरांत वह स्पेन, मोरक्को गया।

प्रश्न 3.
फ्रांस्वा बर्नियर कौन था? उसने भारत के बारे में क्या जानकारी दी है?
उत्तर:
बर्नियर का जन्म फ्रांस के अजों नामक प्रान्त के नामक स्थान पर 1620 ई० में हुआ। उसका परिवार कृषि का कार्य करता था। उसने मुगल काल में भारत की यात्रा की। 1656 से 1668 तक का समय उसने भारत में बिताया। वह इन वर्षों में दरबार से भी जुड़ा रहा तथा विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा भी करता रहा। उसने जो कुछ देखा व समझा उसे ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक रचना में लिखा।

प्रश्न 4.
अल-बिरूनी ने भारत की जाति-व्यवस्था का वर्णन कैसे किया है?
उत्तर:
अल-बिरूनी की भारतीय समाज के बारे में समझ उसी ऋग्वैदिक पर आधारित थी जिसमें वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है। इस समझ के अनुसार ब्राह्मण इस समाज में सर्वोच्च स्थान था। उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के सिर से हुई। उसके बाद क्षत्रियों का स्थान था जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के कंधों व हाथों से हुई। क्षत्रियों के बाद वैश्यों का स्थान था। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की जंघाओं से हुई है। इस कड़ी में चौथा स्थान शूद्रों का है। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के चरणों से हुई है। वह यह भी लिखता है कि तीसरे व चौथे वर्ण में कोई अधिक अंतर नहीं है।

प्रश्न 5.
इन बतूता ने भारत में नारियल व पान के बारे में क्या वर्णन किया है?
उत्तर:
बतूता ने भारतीय नारियल व पान की विशेष चर्चा की है। नारियल के बारे में वह लिखता है कि, “ये हू-ब-हू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं। नारियल के वृक्ष का फल मानव के सिर से मेल खाता है, क्योंकि इसमें मानों दो आँखें तथा एक मुख है और अन्दर का भाग हरा होने के कारण मस्तिष्क जैसा दिखता है। पान के बारे में बतूता बताता है कि, “पान एक ऐसा वृक्ष है जिसे अंगूर-लता की तरह उगाया जाता है। पान का कोई फल नहीं होता और इसे केवल पत्तियों के लिए ही उगाया जाता है।”

प्रश्न 6.
इन बतूता के दिल्ली से संबंधित वृत्तांत का उल्लेख करें।
उत्तर:
दिल्ली को बतूता ने देहली कहा है। उसके अनुसार, “देहली बड़े क्षेत्र में फैला घनी आबादी वाला शहर है। शहर के चारों ओर बनी प्राचीर अतुलनीय है, दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ है। प्राचीर के अन्दर खाद्य सामग्री, ह घेरेबंदी में काम आने वाली मशीनों के संग्रह के लिए भंडार गृह बने हुए थे।”

प्रश्न 7.
बतूता भारतीय डाक व्यवस्था से क्यों प्रभावित हुआ तथा उसने इसका वर्णन कैसे किया?
उत्तर:
इब्न बतूता भारत की संचार व्यवस्था से बहुत अधिक प्रभावित हुआ। उसने इसके बारे में विस्तृत जानकारी दी। वह इसे अद्भुत या अनूठी बताता है। उसके अनुसार उस समय दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी जिसे उलुक तथा दावा कहा जाता था। उलुक घोड़ों की डाक सेवा थी। हर चार मील की दूरी पर स्थापित चौंकी में शाही सेना के घोड़े होते थे। इस तरह एक घोड़ा एक समय में चार मील ही जाया करता था।

दूसरी तरह की डाक सेवा दावा थी जिसका पैदल व्यवस्था से संबंध था। इस व्यवस्था में प्रति मील तीन व्यक्ति बदले जाते थे। प्रारंभ में एक संदेशवाहक एक हाथ में छड़ी तथा दूसरे में पत्र या माल लेकर अपनी अधिकतम . क्षमतानुसार भागता था। यह क्रिया पत्र में गंतव्य स्थान तक पहुंचने तक चलती रहती थी।

प्रश्न 8.
बर्नियर ने भारतीय किसानों की स्थिति के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
बर्नियर ने कृषकों के विषय में काफी कुछ लिखा है। उसके अनुसार, “हिंदुस्तान के ग्रामीण अंचलों में काफी भूमि रेतीली या बंजर है। यहाँ की खेती भी अच्छी नहीं है। कृषक जीवन-निर्वहन के साधनों से वंचित कर दिया जाता था। निरंकुशता से हताश हो किसान गाँव छोड़कर चले जाते थे।”

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 9.
बर्नियर ने भारत में भूमि स्वामित्व के बारे में क्या विचार दिए हैं?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार भारत में भूमि पर निजी स्वामित्व नहीं था, बल्कि सारे साम्राज्य की भूमि का मालिक स्वयं सम्राट था। उसका यह विचार सोलहवीं व सत्रहवीं सदी के अन्य कुछ यात्रियों ने भी अपनाया है। वर्णन के अनुसार यह व्यवस्था यूरोप से भिन्न थी क्योंकि वहाँ भूमि पर निजी स्वामित्व था। बर्नियर के अनुसार निजी स्वामित्व का अभाव राज्य व जनता दोनों के लिए हानिकारक था। क्योंकि कृषक न तो अपनी जमीन अपनी संतान को दे सकते थे, न ही वे किसी तरह का निवेश कृषि में करते थे। इसके कारण भारत में कृषि व्यवस्था पिछड़ी हुई रही तथा किसानों का असीम शोषण हुआ।

प्रश्न 10.
बर्नियर का भारतीय अर्थव्यवस्था से संबंधित वृत्तांत विरोधाभासपूर्ण क्यों हैं?
उत्तर:
बर्नियर अपने वृत्तांत के द्वारा यूरोप के शासकों को चेतावनी देता है कि वे निजी स्वामित्व में हस्तक्षेप न करें क्योंकि राज्य के स्वामित्व का सिद्धांत यूरोप के खेतों को विनाश के कगार पर ले जाएगा तथा उनकी पहचान के लिए भी घातक होगा। इसलिए वह भारत की ऐसी तस्वीर बनाता है लेकिन अपने वर्णन में अन्य स्थान पर भारत में व्यापार, कृषि के उद्योगों की प्रशंसा करता है।

प्रश्न 11.
अल-बिरूनी कौन था? उसे कौन-सी दो समस्याओं का सामना करना पड़ा?
उत्तर:
अल-बिरूनी एक विदेशी यात्री था। वह महमूद गज़नवी के साथ भारत आया। उसका वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य-एशिया में स्थित आधुनिक उज्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। अल-बिरूनी ने ख्वारिज्म में शिक्षा प्राप्त की। अल-बिरूनी द्वारा वर्णित की गई दो समस्याएँ निम्नलिखित प्रकार से हैं

  • वह बताता है कि सबसे पहली समस्या संस्कृत भाषा थी। जो लिखने, पढ़ने व अनुवाद करने में अरबी व फारसी से बहुत – भिन्न थी। यह भाषा ऊँची पहुँच वाली थी।
  • दूसरी समस्या यहाँ की धार्मिक अवस्था तथा रीति-रिवाज़ थी। जो उसके समाज से भिन्न थी। उन्हें समझना कठिन था।

प्रश्न 12.
इब्न बतूता के भारत में प्रवास की जानकारी दें।
उत्तर:
बतूता 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा तथा उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से भेंट की। सुल्तान ने बतूता को दिल्ली का काज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त कर उसे शाही सेवा में ले लिया। उसने 8 वर्षों तक इस पद पर कार्य किया। इसी दौरान सुल्तान के साथ उसका मतभेद हो गया। लेकिन बाद में सुल्तान ने एक बार फिर उस पर विश्वास कर शाही सेवा में ले लिया। इस बार उसे चीन में सुल्तान की ओर से दूत बन कर जाने का आदेश दिया। इस तरह 1342 ई० में इन बतूता ने चीन की ओर प्रस्थान किया।

प्रश्न 13.
इब्न बतूता का वृत्तांत किन अन्य लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना?
उत्तर:
इन बतूता का वृत्तांत उच्च लेखकों व यात्रियों के लिए यह मार्गदर्शक पहलू बन गया। इनमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाले यात्रियों में समरकंद का अब्दुर रज्जाक (यात्रा लगभग 1440), महमूद वली बलखी (यात्रा लगभग 1620) तथा शेख अली हाजिन (यात्रा लगभग 1740) के नाम लिए जा सकते हैं। इनमें बलखी तो भारत से इतना प्रभावित हुआ।

प्रश्न 14.
इब्न बतूता के दौलताबाद के बारे में वृत्तांत का वर्णन दें।
उत्तर:
दौलताबाद के बारे में बतूता बताता है कि यह दिल्ली से किसी तरह कम नहीं था और आकार में उसे चुनौती देता था। यहाँ पुरुष व महिला गायकों के लिए एक बाजार है जिसे ताराबबाद कहते हैं। यह सबसे बड़े एवं सुन्दर बाजारों में से एक है। यहाँ बहुत सी दुकानें हैं और प्रत्येक दुकान में एक ऐसा दरवाजा है जो मालिक के आवास में खुलता है। इस बाजार में इबादत के लिए मस्जिदें बनी हुई हैं।

प्रश्न 15.
बर्नियर की ‘अविकसितं पूर्व की धारणा की व्याख्या करें।
उत्तर:
बर्नियर ने अपनी रचना में भारत का वृत्तांत तुलनात्मक ढंग से किया है। उसने अपनी रचना को आलोचनात्मक, अंतर्दृष्टिपूर्ण व गहन चिन्तन पर आधारित किया है। वह वर्णन में उन चीजों को विशेष महत्त्व देता है जो यूरोप से विपरीत थी। वह यूरोप को भारत से श्रेष्ठ दिखाने पर विशेष जोर देता है। इस आधार पर वह भारत को ‘अविकसित पूर्व के रूप में वर्णित करता है। .

प्रश्न 16.
यात्रियों के वृत्तांत के दो कमजोर पक्ष बताओ।
उत्तर:

  • यात्री वृत्तांत देते समय अपने क्षेत्र, धर्म व देश की परम्पराओं व रीति-रिवाजों को अन्य से श्रेष्ठ बताते हैं।
  • वे स्थानीय लोगों की भाषा से परिचित नहीं होते तथा इन्हें क्षेत्र-विशेष को समझने के लिए द्विभाषीय पर निर्भर रहना पड़ता है।

प्रश्न 17.
यात्रियों के वृत्तांत का सकारात्मक पक्ष क्या होता है?
उत्तर:
यात्रियों के वृत्तांत में स्थानीय व्यक्तियों का प्रभाव नहीं होता, वे जैसा देखते हैं वैसा वर्णन कर देते हैं। जिसमें सच्चाई व यथार्थ की जानकारी की अधिक संभावना रहती है।

प्रश्न 18.
अल-बिरूनी के प्रारंभिक जीवन का वर्णन करें।
उत्तर:
अल-बिरूनी का वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य एशिया में स्थित आधुनिक उज्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। अल-बिरूनी ने ख्वारिज्म में शिक्षा ली। उसने यहाँ पर सीरियाई, हिब्रू, फारसी, अरबी व संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। अपनी योग्यता व प्रतिभा के बल पर वह मामूनी राज व्यवस्था में मंत्री के पद तक पहुँच गया।1017 ई० में महमूद गजनी ने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया तथा जीत हासिल की। विजय के बाद उसने यहाँ पर कुछ लोगों को बंदी बनाया। अल-बिरूनी भी इन्हीं बंदी लोगों में एक था, उसे गजनी लाया गया। बाद में अल-बिरूनी महमूद गज़नी का राजकवि भी बना।

प्रश्न 19.
अल-बिरूनी ने अपनी समस्याओं का समाधान कैसे किया? क्या वह उसमें सफल रहा?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने अपनी समस्याओं के समाधान के लिए ब्राह्मणों द्वारा रचित पुस्तकों व अनुवादों को अधिक-से-अधिक पढ़ा। उसका यह पक्ष कमजोर रहा क्योंकि उसने निजी विचारों व अनुभवों को महत्त्व नहीं दिया बल्कि वह पूरी तरह ब्राह्मणों द्वारा रचित साहित्य पर आश्रित रहा। उसने भारतीय समाज के बारे में जानकारी देते हुए वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की रचनाओं तथा मनुस्मृति के अंश यथावत् ही लिख दिए।

प्रश्न 20.
‘हिन्दू’ शब्द की उत्पत्ति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हिंदू शब्द की उत्पत्ति सिन्धु से हुई है। फारसी भाषा में ‘स’ शब्द का उच्चारण ‘ह’ से किया जाता है। जिसके कारण वे सिन्धु को हिन्दू या सप्ताह को हप्ताह बोलते हैं। फारस क्षेत्र के लोग सिन्धु नदी के पूर्व रहने वाले लोगों के लिए हिन्दू का प्रयोग करते हैं तथा उनका क्षेत्र हिन्दोस्तान ईरानी अभिलेखों में ‘हिन्द’ शब्द का प्रयोग छठी सदी ई०पू० में सिन्धु क्षेत्र के लिए मिलता है।

प्रश्न 21.
अल-बिरूनी ने फारस के समाज के विभाजन को किस तरह समझा?
उत्तर:
अल-बिरूनी के अनुसार फारस (वर्तमान ईरान) क्षेत्र चार सामाजिक वर्गों में विभाजित था। इन चार वर्गों में वह पहले वर्ग में शासक व घुड़सवार, दूसरे वर्ग में भिक्षु, तीसरे वर्ग में आनुष्ठानिक पुरोहित, चिकित्सक, खगोल शास्त्री व वैज्ञानिक तथा चौथे में कृषक व शिल्पकार को बताता है।

प्रश्न 22.
इब्न बतूता के प्रारंभिक जीवन का परिचय दें।
उत्तर:
इब्न बतूता का जन्म अफ्रीका महाद्वीप के मोरक्को नामक देश के तैंजियर नामक स्थान पर 24 फरवरी, 1304 ई० को हुआ। उसने पारिवारिक परंपरा के अनुरूप साहित्यिक व धार्मिक ज्ञान अच्छी तरह से प्राप्त किया। इस तरह वह कम आयु में ही उच्चकोटि का धर्मशास्त्री बन गया। – इब्न बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था। उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की।

प्रश्न 23.
इब्न बतूता की रिहला का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
रिला या किताब-ए-रला इब्न बतूता के संस्मरणों पर आधारित रचना है। इसे ‘सफरनामा’ के नाम से अनुवादित किया गया है। बतूता के मोरक्को वापिस पहुँचने पर वहाँ के शासक ने इब्न जुज़ाई नामक व्यक्ति को यह कार्य दिया कि वह बतूता से बातचीत करे तथा उसकी स्मृति को एक रचना के रूप में प्रस्तुत करे। इब्न जुज़ाई ने बतूता से जानकारी लेकर इसे लिखा। इसमें कुल 13 अध्याय हैं।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 24.
इब्न बतूता ने भारतीय शहरों के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
इब्न बतूता के अनुसार भारतीय शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे। यहाँ सड़कें तंग, भीड़-भाड़ वाली, रंगीन बाजार तथा बड़े-बड़े भवन थे। इन शहरों में जीवन-यापन की सारी चीजें मिल जाती थीं। वह बताता है कि ये शहर मात्र व्यापार या आर्थिक विनिमय के केन्द्र नहीं थे बल्कि सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र भी थे। प्रत्येक शहर में मन्दिर व मस्जिद देखने को मिलते थे। अधिकतर नगरों में संगीत एवं नृत्य के लिए विशेष स्थल भी थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 Img 1

प्रश्न 25.
इब्न बतूता ने भारतीय गाँवों के बारे में क्या बताया है?
उत्तर:
इब्न बतूता बताता है कि भारतीय गाँवों की व्यवस्था कृषि पर निर्भर है। यहाँ कृषि उन्नत है। इसके उन्नत होने का मुख्य कारण भूमि का उपजाऊपन है। यहाँ कृषक वर्ष में दो फसलें उगाते हैं। उसके अनुसार शहर की सम्पन्नता का कारण गाँव हैं। उसके अनुसार अधिकतर भारतीय गाँव कच्चे तथा घास-फूस की झोंपड़ी वाले थे। वह गाँवों के लोगों के आपसी सम्बन्ध काफी अच्छे बताता है।

प्रश्न 26.
इब्न बतूता ने भारतीय व्यापार व वाणिज्य के बारे में क्या विचार दिए हैं?
उत्तर:
बतूता के अनुसार भारत में व्यापार व वाणिज्य काफी विकसित अवस्था में था। मध्य पश्चिमी एशिया व दक्षिण पूर्वी एशिया, जिसमें वह स्पष्ट करता है कि इनके साथ भारत लगभग प्रत्येक चीज का व्यापार करता था। यह व्यापार कारवाँ में होता था। उसके अनुसार भारतीय कपड़ा (सूती, महीन मलमल, रेशमी, जरी वाला व काटन) तथा शिल्पकारी की चीज़ों की लगभग इस . क्षेत्र में पूरी माँग थी जिसमें व्यापारियों को खूब मुनाफा होता था। वह भारतीय मलमल की विभिन्न किस्मों (गंगाजल, मलमलखास, सरकार-ए-आली, शबनम) इत्यादि के बारे में बताता है।

प्रश्न 27.
बर्नियर का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
बर्नियर का जन्म फ्रांस में 1620 ई० में हुआ। उसने कृषि के साथ-साथ पढ़ाई की तथा पेशे से चिकित्सक बन गया। वह चिकित्सक के रूप में 1656 ई० में सूरत पहुँचा। उसे दारा शिकोह ने अपना चिकित्सक बना दिया। दारा की मृत्यु के बाद उसे आर्मीनियाई अमीर (सामन्त) डानिश खान ने संरक्षण दिया। उसने भारत में सूरत, आगरा, लाहौर, कश्मीर, कासिम बाजार, मसुलीपट्टम व गोलकुण्डा इत्यादि स्थानों का भ्रमण किया। वह 1668 ई० में भारत से फ्रांस लौट गया 1688 ई० में उसके पैतृक स्थान पर ही उसकी मृत्यु हो गई।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 Img 2

प्रश्न 28.
बर्नियर की रचना ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
फ्रांस्वा बर्नियर ने 1656 से 1668 तक का समय भारत में बिताया। वह इन वर्षों में मुगल दरबार से भी जुड़ा रहा तथा विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा भी करता रहा। उसने जो कुछ देखा व समझा उसे ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक रचना में लिखता गया। उसकी यह रचना फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुई तथा इसे फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित किया गया।

प्रश्न 29.
मॉन्टेस्क्यू ने बर्नियर के वृत्तांत से क्या प्रेरणा ली?
उत्तर:
मॉन्टेस्क्यू 18वीं शताब्दी का फ्रांसीसी चिन्तक था। उसने बर्नियर के वृत्तांत का प्रयोग करके यूरोप में निरंकुशता के सिद्धांत को स्थापित करने का प्रयास किया, साथ ही शासकों को अति निरंकुशता से बचने की सलाह दी क्योंकि एशिया के शासकों की अति निरंकुशता के कारण प्रजा को गरीबी व दासता की स्थिति का जीवन जीनां पड़ता है। उसने अपने लेखन में स्पष्ट किया कि एशिया में सारी भूमि का स्वामित्व राजा के पास था तथा निजी सम्पत्ति अस्तित्व में नहीं थी।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 Img 3

प्रश्न 30.
कार्ल मार्क्स ने बर्नियर के वृत्तांत का प्रयोग करके एशिया को किस प्रकार समझा?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने बर्नियर के वृत्तांत का प्रयोग एशियाई उत्पादन शैली तथा व्यवस्था (ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर) को समझने में किया। उसके अनुसार उपनिवेशवाद से पहले भारत एवं अन्य एशियाई देशों में अधिशेष का अधिग्रहण राज्य करता था। जिसके कारण एक ऐसे समाज का निर्माण हुआ जो काफी हद तक स्वायत्त था तथा आन्तरिक दृष्टि से सामन्तवादी था। वास्तव में यह प्रणाली गतिहीन तथा निष्क्रिय थी क्योंकि शासक व समाज में यह एक समझौता था।

प्रश्न 31.
बर्नियर भारत के ग्रामीण समाज का वर्णन किस तरह देता है?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार भारत के ग्रामीण समाज में सामाजिक व आर्थिक अन्तर बड़े स्तर पर थे। इस समाज में एक ओर बड़े-बड़े जमींदार थे जो भूमि पर उच्चाधिकारों का प्रयोग करते थे, दूसरी ओर अस्पृश्य भूमि विहीन श्रमिक थे। इन दोनों के मध्य कृषक था जो किराए के श्रम का प्रयोग करके माल (उपज) उत्पादित करता था। कृषकों में भी एक वर्ग छोटे किसानों के रूप में था जो मुश्किल से अपने गुजारे योग्य उत्पादन कर पाता था।

प्रश्न 32.
बर्नियर ने राजकीय कारखानों के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
भारत में शाही आवश्यकता की पूर्ति की चीजें जिस स्थान पर बनती थीं, उन्हें राजकीय कारखाने कहा जाता था। इन कारखानों के विभिन्न कक्षों में कारीगर अपना-अपना काम करते थे। ये कारीगर या शिल्पकार अपने कारखानों में हर रोज सुबह आते हैं, जहाँ वे पूरा दिन कार्यरत रहते हैं और शाम को अपने-अपने घर चले जाते हैं। ये कारीगर जीवन की उन स्थितियों में सुधार करने के इच्छुक नहीं हैं जिनमें वह पैदा हुए हैं।

प्रश्न 33.
यात्रियों के वृत्तांत में दास व दासियों के मुख्य रूप से क्या कार्य बताए गए हैं?
उत्तर:
यात्रियों के अनुसार, पुरुष दास का प्रयोग घरेलू कार्यों; जैसे बाग-बगीचों की देखभाल, पशुओं की देखरेख, महिलाओं … व पुरुषों को पालकी या डोली में एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के लिए होता था। दासियाँ शाही महल, अमीरों के आवास पर घरेलू कार्य करने व संगीत गायन के लिए खरीदी जाती थीं। सुल्तान अपने अमीरों व दरबारियों पर नियंत्रण रखने के लिए भी दासियों का प्रयोग करता था।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अल-बिरूनी कौन था? वह भारत कैसे आया?
उत्तर:
अल-बिरूनी एक विदेशी यात्री था। वह महमूद गज़नवी के साथ भारत आया। उसका वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य-एशिया में स्थित आधुनिक उज़्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। अल-बिरूनी ने ख्वारिज्म में शिक्षा प्राप्त की। उसने यहाँ पर सीरियाई, हिब्रू, फारसी, अरबी व संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। वह यूनानी भाषा को नहीं समझता था। इसी कारण वह प्लेटो व अरस्तु के दर्शन व ज्ञान को अनुवादित रूप में पढ़ पाया। वह अपनी योग्यता व प्रतिभा के बल पर मामूनी राज व्यवस्था में मंत्री के पद तक पहुँच गया।

1017 ई० में महमूद गजनवी ने खारिज़्म पर आक्रमण किया तथा जीत हासिल की। विजय के बाद उसने यहाँ पर कुछ लोगों को बंदी बनाया। इनमें कुछ विद्वान तथा कवि भी थे। अल-बिरूनी भी इन्हीं बंदी लोगों में एक था तथा वह इसी अवस्था में गजनी लाया गया। गजनी में रहते हुए महमूद उसकी प्रतिभा से प्रभावित हुआ। फलतः न केवल महमूद ने उसे मुक्त किया वरन् उसे दरबार में सम्मानजनक पद भी दिया।

बाद में अल-बिरूनी उसका राजकवि भी बना। गजनी प्रवास के दौरान उसने खगोल-विज्ञान, गणित व चिकित्सा से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं। वह महमूद के साथ भारत में कई बार आया तथा उसने इस क्षेत्र में ब्राह्मणों, पुरोहितों व विद्वानों के साथ काफी समय बिताया। उनके साथ रहने के कारण वह संस्कृत भाषा में और प्रवीण हो गया। अब वह न केवल इसे समझ सकता था बल्कि अनुवाद करने में भी सक्षम हो गया। उसने सहारा रेगिस्तान से लेकर वोल्गा नदी तक की यात्रा के आधार पर लगभग 20 पुस्तकों की रचना की। इन रचनाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण ‘किताब-उल-हिन्द’ है। गजनी में ही 1048 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 2.
अल-बिरूनी की प्रमुख समस्याएँ क्या थीं? उसने इनका समाधान कैसे किया?
उत्तर:
अल-बिरूनी को भारत में कई समस्याएँ आईं। उसने इनका वर्णन इस प्रकार किया
(i) वह बताता है कि सबसे पहली बाधा संस्कृत भाषा थी। जो लिखने, पढ़ने व अनुवाद करने में अरबी व फारसी से बहुत भिन्न थी। यह भाषा ऊँची पहुँच वाली थी। इस भाषा में एक चीज के लिए कई शब्द (मूल तथा व्युत्पन्न) प्रयोग होते थे तथा एक शब्द कई चीजों के लिए प्रयुक्त होता था।

(ii) उसके अनुसार दूसरी बाधा यहाँ की धार्मिक अवस्था तथा रीति-रिवाज़ व प्रथाएँ थीं। जो उसके समाज से भिन्न थीं। एक अपरिचित के रूप में उन्हें समझना कठिन था।

(iii) तीसरी बाधा स्थानीय लोगों का अभिमान तथा अलग रहने की प्रवृत्ति थी जिसके कारण वे बाह्य व्यक्ति के साथ इतनी आसानी से नहीं घुलते-मिलते थे।
इन समस्याओं के समाधान के लिए उसने ब्राह्मणों द्वारा रचित पुस्तकों व अनुवादों को अधिक-से-अधिक समझा। वह पूरी तरह ब्राह्मणों द्वारा रचित साहित्य पर आश्रित रहा। उसने भारतीय ग्रन्थों, वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की रचनाओं तथा मनुस्मृति का अध्ययन किया। उसने इसी आधार पर अपनी समस्याएँ सुलझाईं।

प्रश्न 3.
इब्न बतूता कौन था? उसके जीवन के बारे में आप क्या जानते हो? वह भारत क्यों आया?
उत्तर:
इब्न बतूता चौदहवीं शताब्दी का एक यात्री था। उसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों का 1325 से 1354 ई० तक भ्रमण किया। अफ्रीका, एशिया व यूरोप के कुछ हिस्से की यात्रा करने के कारण उसे एक प्रारंभिक विश्व यात्री की संज्ञा दी जाती है। इब्न बतूता का जन्म अफ्रीका महाद्वीप के मोरक्को नामक देश के तैंजियर नामक स्थान पर 24 फरवरी, 1304 ई० को हुआ। बतूता का परिवार मोरक्को क्षेत्र में सबसे सम्मानित, शिक्षित व इस्लामी कानूनों का विशेषज्ञ माना जाता था। पारिवारिक परंपरा विरासत में मिलने व अपनी लगन के कारण वह कम आयु में ही उच्चकोटि का धर्मशास्त्री बन गया। इब्न बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था।

उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की। 1325-1332 ई० तक उसने मक्का व मदीना की यात्रा की। उसने अपनी यात्राएँ जल एवं थल दोनों मार्गों से की। वह मध्य-एशिया के रास्ते । से भारत की ओर बढ़ा तथा 1333 ई० में सिन्ध पहुँचने में सफल रहा।

वह 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा तथा सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से भेंट की। ये दोनों एक दूसरे की विद्वता से प्रभावित हुए। सुल्तान ने बतूता को दिल्ली का काज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त कर उसे शाही सेवा में ले लिया। उसने 8 वर्षों तक इस पद पर कार्य किया। 1342 ई० में उसे मुहम्मद तुगलक ने चीन में भारत का दूत नियुक्त किया।

उसने चीन पहुँचकर विभिन्न स्थानों की यात्रा की। चीनी शासक ने उसे दूत के रूप में स्वीकार किया। 1347 ई० में वहाँ से वापिस अपने देश मोरक्को के लिए चल दिया। वह 8 नवम्बर, 1349 ई० को अपने पैतृक स्थान तैंजियर पहुँच गया। उसने अपनी स्मृति के आधार पर यह सारी जानकारी शासक को उपलब्ध कराई जिसे संकलित कर रिला या रह्ला या सफरनामा नामक पुस्तक के रूप में सुरक्षित किया गया। इसमें 1325-1354 के बीच की उसकी यात्राओं का वर्णन है। इब्न बतूता की मृत्यु 1377 ई० तैंजियर में हुई।

प्रश्न 4.
इब्न बतूता के ‘रिहला’ पर नोट लिखो।
उत्तर:
रिहला या किताब-ए-रला इब्न बतूता के संस्मरणों पर आधारित रचना है। इसे ‘सफरनामा’ के नाम से अनुवादित किया गया है। बतूता के मोरक्को वापिस पहुँचने पर वहाँ के शासक ने इब्न जुजाई नामक व्यक्ति को यह कार्य दिया कि वह बतूता से बातचीत करे तथा उसकी स्मृति को एक रचना के रूप में प्रस्तुत करे। इब्न जुजाई रिहला की प्रस्तावना में लिखता है कि मोरक्को में राजा के द्वारा एक निर्देश दिया गया कि वे (इब्न बतूता) अपनी यात्रा में देखे गए शहरों का तथा अपनी स्मृति में बैठ गई रोचक घटनाओं का एक वृत्तांत लिखवाएँ और साथ ही विभिन्न देशों के शासकों में से जिनसे वे मिले, उनके महान साहित्यकारों के तथा उनके धर्मनिष्ठ संतों के बारे में बताएं।

तदनुसार उन्होंने इन सभी विषयों पर एक कथानक लिखवाया जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी। साथ ही उन्होंने कई प्रकार के असाधारण विवरण जिनके प्रतिपादन से लाभप्रद उपदेश मिलते हैं, दिए तथा असाधारण चीजों के बारे में बताया जिनके सन्दर्भ से अभिरुचि जगी।

रिहला में भारत के बारे में विस्तृत वर्णन दिया गया है। इस वर्णन में भारत की प्रकृति, पशु-पक्षी, वन, नदियों, गाँव व शहरों के बारे में बताया गया है। उसने मुहम्मद तुगलक के बारे में भी विस्तृत प्रकाश डाला है। बतूता मुहम्मद तुगलक को सन्तुलित, शिक्षित, न्यायप्रिय, प्रतिभाशाली व दूरदर्शी शासक बताता है।

इब्न बतूता ने भारत में लगभग 14 वर्ष का समय लगाया तथा राज्य, समाज, धर्म, प्रकृति तथा अर्थव्यवस्था से संबंधित हर प्रकार की सूचना एकत्रित की। उसका वृत्तांत उसके समकालीन लेखकों की तुलना में अधिक विश्वसनीय है। उसने सूचनाओं को काफी हद तक दरबार से मुक्त भी रखा है। वह कृषि, उद्योग व व्यापार की दृष्टि से भारत को उन्नत बताता है। सड़कों को असुरक्षित लिखता है। परिवहन के साधनों में पशुओं के प्रयोग को विशेष महत्त्व देता है। भारतीय बाजार के बारे में रिहला का विवरण उल्लेखनीय है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 5.
इब्न बतूता ने भारतीय शहरों व शहरी जीवन पर क्या प्रकाश डाला है? अथवा इब्न बतूता द्वारा वर्णित भारतीय शहरों की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
इब्न बतूता ने भारत में अपना अधिक समय शहरों में बिताया इसलिए उसके वर्णन में शहरों का विशेष उल्लेख है। उसने सिन्ध, मुल्तान, लाहौर, दिल्ली, अजमेर, उज्जैन, काबुल, कन्धार, दौलताबाद इत्यादि; शहरों में अधिक समय बिताया। इसलिए वह इन स्थानों का वर्णन और स्थानों से अलग करता है। उसके अनुसार भारतीय शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे। यहाँ सड़कें तंग, भीड़-भाड़ वाली, रंगीन बाजार तथा बड़े-बड़े भवन थे। इन शहरों में जीवन-यापन की सारी चीजें मिल जाती थीं। वह बताता है कि ये शहर मात्र व्यापार या आर्थिक विनिमय के केन्द्र नहीं थे बल्कि सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र भी थे। प्रत्येक शहर में मन्दिर व मस्जिद देखने को मिलते थे।
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अधिकतर नगरों में संगीत एवं नृत्य के लिए विशेष स्थल भी थे। जहाँ पर विशेष तरह के आयोजन चलते रहते थे।
इब्न बतूता मुहम्मद तुगलक के शासन काल में भारत आया था। इसलिए वह स्पष्ट करता है कि उसकी दो राजधानियाँ थीं। दोनों ही आकार व सुविधाओं की दृष्टि से एक-दूसरे का पूरा मुकाबला करती थीं। वह यह भी बताता है कि दिल्ली पुराना शहर था जबकि दौलताबाद एक नया शहर था।

दिल्ली-दिल्ली को उसने अन्य तत्कालीन स्रोतों की भाँति देहली कहा है। उसके अनुसार, “देहली बड़े क्षेत्र में फैला घनी आबादी वाला शहर है। शहर के चारों ओर बनी प्राचीर अतुलनीय है, दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ है। प्राचीर का निचला भाग पत्थर से बना है जबकि ऊपरी भाग ईंटों से। इस शहर में कुल 28
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द्वार हैं जिन्हें दरवाजा कहा जाता है। इनमें सबसे विशाल बदायूँ दरवाजा है।” दौलताबाद-दौलताबाद के बारे में बतूता बताता है कि यह दिल्ली से किसी तरह कम नहीं था और आकार में उसे चुनौती देता था। यहाँ पुरुष व महिला गायकों के लिए एक बाजार है जिसे ताराबबाद कहते हैं। यह सबसे बड़े एवं सुन्दर बाजारों में से एक है। यहाँ बहुत सी दुकानें हैं और प्रत्येक दुकान में एक ऐसा दरवाजा है जो मालिक के आवास में खुलता है। दुकानों को कालीन से सजाया जाता था। बाजार के मध्य में एक विशाल गुंबद खड़ा है।
इस प्रकार कहा जा सकता है उसने भारतीय शहरों को अलग-अलग ढंग से देखा तथा उसी के अनुरूप वर्णन किया है।

प्रश्न 6.
इब्न बतूता ने भारत की संचार प्रणाली की क्या जानकारी दी है?
उत्तर:
इब्न बतूता भारत की संचार व्यवस्था से बहुत अधिक प्रभावित हुआ। वह इसे अद्भुत या अनूठी प्रणाली बताता है। उसके अनुसार इस संचार प्रणाली के दो उद्देश्य थे। पहला एक राज्य क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक तत्काल सूचना भेजना तथा दूसरा अल्प सूचना पर सामान भेजना। राज्य के द्वारा इसका विशेष प्रबन्ध किया गया था। बतूता के अनुसार उस समय दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी जिसे उलुक तथा दावा कहा जाता था। उलुक घोड़ों की डाक सेवा थी। हर चार मील की दूरी पर स्थापित चौंकी में शाही सेना के घोड़े होते थे। इस तरह एक घोड़ा एक समय में चार मील ही जाया करता था। दूसरी तरह की डाक सेवा दावा थी जिसका पैदल व्यवस्था से संबंध था। इस व्यवस्था में प्रति मील तीन व्यक्ति बदले जाते थे। उसके अनुसार भारत में औसतन तीन मील की दूरी पर गाँव थे। गाँव के बाहर तीन मंडप होते थे।

वहाँ लोग समूह में बैठे होते थे। उनमें से प्रत्येक के पास दो हाथ लम्बी एक छड़ी होती थी जिसके ऊपर तांबे की घंटियाँ लगी होती थीं। जब डाक प्रारंभ होती थी तो एक संदेशवाहक एक हाथ में छड़ी तथा दूसरे में पत्र या माल लेकर अपनी अधिकतम क्षमतानुसार भागता था। मंडप में बैठे लोग घंटी की आवाज सुनते ही तैयार हो जाते थे। जैसे ही संदेशवाहक उनके पास पहुँचता तो उनमें से एक उससे पत्र लेता तथा अगले दावा तक तेज दौड़ता था। यह क्रिया पत्र में गंतव्य स्थान तक पहुँचने तक चलती रहती थी। उसके अनुसार पैदल डाक अश्व डाक से पहले पहुँचती थी। वह स्पष्ट कहता है कि सिन्ध से दिल्ली तक आने के लिए सामान्य रूप से पचास दिन का समय लगता था, लेकिन सुल्तान के पास गुप्तचरों की सूचना मात्र पाँच दिन में पहुँच जाती थी।

प्रश्न 7.
बर्नियर कौन था? उसकी रचना ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ के बारे में आप क्या जानते हैं? अथवा बर्नियर कौन था? उसने भारत के बारे में क्या जानकारी दी है?
उत्तर:
बर्नियर मुगल काल का एक यात्री था। वह फ्रांस से भारत आया। बर्नियर का जन्म फ्रांस के अजों नामक प्रान्त के जं नामक स्थान पर 1620 ई० में हुआ। उसका परिवार कृषि का कार्य करता था। उसने कृषि के साथ-साथ पढ़ाई की तथा पेशे से चिकित्सक बन गया। इसी व्यवसाय को करते हुए वह 1656 ई० में सूरत पहुँचा तथा इसी वर्ष दारा शिकोह ने उसे अपना चिकित्सक बना दिया। उसने शाहजहाँ के शासनकाल में उत्तराधिकार के युद्ध की कुछ घटनाएँ देखीं हैं। दारा की मृत्यु के बाद उसे आर्मीनियाई अमीर (सामन्त) डानिश खान ने संरक्षण दिया। उसने भारत में सूरत, आगरा, लाहौर, कश्मीर, कासिम बाजार, मसुलीपट्टम व गोलकुण्डा इत्यादि स्थानों का भ्रमण किया। वह 1668 ई० में भारत से फ्रांस लौट गया। 1688 ई० में उसके पैतृक स्थान पर ही उसकी मृत्यु हो गई।

उसने भारत में 1656 से 1668 तक का समय बिताया। वह इन वर्षों में दरबार से भी जुड़ा रहा तथा विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा भी करता रहा। उसने जो कुछ देखा व समझा उसे ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक रचना में लिखता गया। उसकी यह रचना फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुई तथा इसे फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित किया गया। इस रचना में दिए गए वृत्तांत की विशेष बात यह है कि उसने भारत व यूरोप अर्थात् पूर्व व पश्चिम की तुलना बड़े स्तर पर की है। वह भारत की स्थिति को यूरोप की तुलना में दयनीय बताया है। उसने अपनी रचना में प्रभावशाली लोगों व अधिकारियों के मंत्रियों के पद को विशेष महत्त्व दिया है।

प्रश्न 8.
बर्नियर के भूमि स्वामित्व संबंधी दृष्टिकोण की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
बर्नियर के वृत्तांत में सर्वाधिक चर्चा का मुद्दा उसका भूमि स्वामित्व संबंधी वर्णन है। उसके अनुसार भारत में निजी स्वामित्व नहीं था, बल्कि सारे साम्राज्य की भूमि का मालिक स्वयं सम्राट था। उसके वर्णन के अनुसार भारत में भूमि स्वामित्व व्यवस्था यूरोप से . भिन्न थी क्योंकि वहाँ भूमि पर निजी स्वामित्व था। बर्नियर के अनुसार भारतीय व्यवस्था राज्य व जनता दोनों के लिए हानिकारक थी। बर्नियर इस वर्णन के माध्यम से भारत के बारे में इस तरह की समझ रखने वाले यूरोप के शासकों को चेतावनी देता है कि क्षेप न करें क्योंकि राज्य के स्वामित्व का सिद्धांत यूरोप के खेतों को विनाश के कगार पर ले जाएगा तथा उनकी पहचान के लिए भी घातक होगा।

बर्नियर के इस वृत्तांत से इस बात की पुष्टि होती है कि फ्रांस में निजी स्वामित्व के अधिकार को जारी रखने के लिए वह मुगल साम्राज्य की नकारात्मक तस्वीर खींच रहा है। बर्नियर का वृत्तांत देखकर भारत की दुर्दशा का चित्र आँखों के सामने आता है परन्तु यह स्पष्ट तौर पर एक पक्षीय भी दिखाई देता है। आलोचनात्मक ढंग से देखें तो हमें मुगलकालीन किसी भी दस्तावेज व अन्य स्थानीय स्रोत में इस तरह की जानकारी नहीं मिलती कि शासक ही सारी भूमि का मालिक था। बर्नियर से पहले दबाव में यूरोपीय यात्रियों ने भारत की ऐसी तस्वीर नहीं दी है। अतः बर्नियर का वृत्तांत एक पक्षीय है तथा वह भारत को निम्न तथा यूरोप को श्रेष्ठ बताना चाहता है।

प्रश्न 9.
बर्नियर के वृत्तांत में विरोधाभासपूर्ण सच्चाई क्या है? अपने शब्दों में व्यक्त करो।
उत्तर:
बर्नियर का वर्णन सामाजिक व आर्थिक स्थिति के बारे में काफी विरोधाभासपूर्ण है। वह भारत में दस्तकारी व कृषि उत्पादन प्रणाली को पतनशील मानता है। इसके लिए वह यहाँ की राज्य व्यवस्था को उत्तरदायी मानता है। कृषि इसलिए विकसित नहीं थी क्योंकि राजकीय स्वामित्व था। कृषकों को समुचित प्रोत्साहन नहीं था। इसी तरह दस्तकारों के लिए भी अपने उत्पादन को अच्छा बनाने के लिए प्रोत्साहन की परिस्थितियाँ नहीं थीं क्योंकि उनका अधिकांश मुनाफा भी राज्य ले लेता था।

इन सबके बाद भी वह यह भी उल्लेख करता है कि भारत का बड़ा-भू-भाग मिस्र से भी उपजाऊ है तथा यहाँ के शिल्पकार आलसी होते हुए भी अपने बहुत सारे उत्पादन का निर्यात करते हैं। इसके कारण भारत में बड़े पैमाने पर सोना-चाँदी आता है। उल्लेखनीय है कि बर्नियर यूरोप में प्रचलित वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित है जो सोना-चाँदी के संचय को प्राथमिकता देती है। भारत में सोना-चाँदी के संचय की बात को इसी पृष्ठभूमि में समझने की आवश्यकता है। अतः भारत की अर्थ-व्यवस्था को पतनशील बताना तथा भारत में धन के संचय की बात करना उसके विरोधाभास को स्पष्ट करती है।

प्रश्न 10.
बर्नियर ने राजकीय कारखाने का वर्णन किस तरह किया है?
उत्तर:
राजकीय कारखाने मुगल काल में शाही आवश्यकता की पूर्ति की चीजें एक स्थान पर बनती थीं जिन्हें राजकीय कारखाने कहा जाता था। वह इन कारखानों की कार्यप्रणाली पर भी अपने विचार देता है जो इस प्रकार हैं, “कई स्थानों पर बड़े कक्ष दिखाई देते हैं जिन्हें कारखाना या शिल्पकारों की कार्यशाला कहा जाता है। एक कक्ष में कसीदाकार एक मास्टर के निरीक्षण में व्यस्तता से कार्यरत रहते हैं।

एक अन्य में आप सुनारों को देखते हैं, तीसरे में चित्रकार, चौथे में प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले, पाँचवें में बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा जूते बनाने वाले, छठे में रेशम, जरी तथा महीन मलमल का कार्य करने वाले शिल्पकार अपने कारखानों में हर रोज सुबह आते हैं, जहाँ वे पूरा दिन कार्यरत रहते हैं और शाम को अपने-अपने घर चले जाते हैं। इसी प्रकार निश्चेष्ट नियमित ढंग से उनका समय बीतता जाता है, कोई भी जीवन की उन स्थितियों में सुधार करने का इच्छुक नहीं है जिनमें वह पैदा हुआ है।”
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प्रश्न 11.
बर्नियर ने भारतीय शहरों का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
बर्नियर शहर से संबंधित वृत्तांत में बताता है कि भारत में लगभग 15% आबादी नगरों में रहती है। यह शहरी जनसंख्या अनुपात तत्कालीन पश्चिमी यूरोप से अधिक था। वह भारतीय नगरों को शिविर नगर कहता है क्योंकि उसका मानना है कि इन नगरों का अस्तित्व शाही शिविर के साथ था, शिविर लगते ही ये विकसित हो जाते थे जबकि प्रस्थान से नगरों का पतन भी हो जाता था। बर्नियर का शहर से संबंधित वृत्तांत अधूरा तथा अति सरलीकृत प्रतीत होता है, क्योंकि अन्य सभी साक्ष्यों से इस बात की पुष्टि होती है कि भारत में नगर उत्पादन केन्द्र, व्यापारिक, नगर, बन्दरगाह नगर, धार्मिक केन्द्र, तीर्थ स्थान व प्रशासन के केन्द्र थे। इन नगरों में समृद्ध व्यापारिक व व्यावसायिक वर्ग, प्रशासनिक अधिकारी, अमीर (सामन्त) तथा विद्वान स्थायी रूप में रहते थे।

इन नगरों में व्यापारी व व्यावसायिक वर्ग समुदाय में रहते थे। यह संस्थाओं के माध्यम से व्यवस्था को चलाते थे। पश्चिमी भारत में व्यापारिक समूह महाजन कहलाता था तथा उनका मुखिया सेठ। अहमदाबाद, सूरत, भड़ौच जैसे व्यापारिक केन्द्रों पर सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधि भी होता था जिसे ‘नगर सेठ’ कहा जाता था। व्यवसायी तथा व्यापारी वर्ग के अतिरिक्त हकीम, वैद्य (चिकित्सक), पंडित व मौलवी (शिक्षक), वकील, चित्रकार, वास्तुकार, संगीतकार, लेखक इत्यादि भी होते थे। इनमें से कुछ तो शाही संरक्षण में होते थे। कुछ अन्य अमीर वर्गों की सहायता से अपना जीवन-यापन करते थे।

अतः बर्नियर का भारतीय नगरों को ‘शिविर नगर’ कहना उसके सीमित ज्ञान की प्रस्तुति है। उसका यह दृष्टिकोण अन्य यात्रियों के वर्णन से मेल नहीं खाता, जिन्होंने भारत में दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, लाहौर, अजमेर, सूरत इत्यादि नगरों को यूरोप के नगरों से बड़े तथा विकसित बताया है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अल-बिरूनी कौन था? अल-बिरूनी की रचना ‘किताब-उल-हिन्द’ पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
अल-बिरूनी का वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य-एशिया में स्थित आधुनिक उज्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। ख्वारिज्म पर उस समय मामूनी वंश का राज था। इस समय स्थान शिक्षा का अति महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। अल-बिरूनी को इसी स्थान पर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। उसने यहाँ पर सीरियाई, हिब्रू, फारसी, अरबी व संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।

इसलिए वह इन भाषाओं में लिखित मौलिक ग्रन्थों को पढ़ पाया। वह यूनानी भाषा को नहीं समझता था लेकिन इस भाषा के सभी प्रमुख ग्रन्थ अनुवादित हो चुके थे। इसी कारण वह प्लेटो व अरस्तु के दर्शन व ज्ञान को अनुवादित रूप में पढ़ पाया। इस तरह वह अपने जीवन के प्रारंभिक दौर में ही विभिन्न भाषाओं के साहित्य से परिचित हो गया। उल्लेखनीय यह है कि अपनी योग्यता व प्रतिभा के बल पर वह मामूनी राज व्यवस्था में मंत्री के पद तक पहुंच गया।

1017 ई० में महमूद ने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया तथा जीत हासिल की। विजय के बाद उसने यहाँ पर कुछ लोगों को बंदी बनाया। इनमें कुछ विद्वान तथा कवि भी थे। अल-बिरूनी भी इन्हीं बंदी लोगों में एक था तथा वह इसी अवस्था में गजनी लाया गया। गजनी में रहते हुए महमूद उसकी प्रतिभा से प्रभावित हुआ। फलतः न केवल महमूद ने उसे मुक्त किया वरन् उसे दरबार में सम्मानजनक पद भी दिया।

बाद में अल-बिरूनी उसका राजकवि भी बना। गजनी प्रवास के दौरान उसने खगोल-विज्ञान, गणित व चिकित्सा से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं। वह महमूद के साथ भारत में कई बार आया तथा उसने इस क्षेत्र में ब्राह्मणों, पुरोहितों व विद्वानों के साथ काफी समय बिताया। उनके साथ रहने के कारण वह संस्कृत भाषा में और प्रवीण हो गया। अब वह न केवल इसे समझ सकता था बल्कि अनुवाद करने में भी सक्षम हो गया।

उसने सहारा रेगिस्तान से लेकर वोल्गा तक की यात्रा के आधार पर लगभग 20 पुस्तकों की रचना की। इन रचनाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण ‘किताब-उल-हिन्द’ है जिसे ‘अल बरूनीज इण्डिया’ के नाम से जाना जाता है। उसने अपनी रचनाएँ गजनी में लिखीं। गजनी में ही 1048 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

अल-बिरूनी ने जो कुछ लिखा वह भारत में बहुत बाद में पहुँचा परन्तु मध्य एशिया के क्षेत्र में यह पहले चर्चा में आ गया। भारत में यह लगभग 1500 ई० में सामने आया। महमूद की ‘1030 ई० में’ मृत्यु के बाद उसके पुत्र मसूद ने भी उसे राजकीय संरक्षण दिया तथा उसके लेखन को सुरक्षित करने की दिशा में कदम उठाए।

किताब-उल-हिन्द (The Kitab-ul-Hind)-‘किताब-उल-हिन्द’, अल-बिरूनी द्वारा रचित सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसे ‘तहकीक-ए-हिन्द’ के नाम से भी जाना जाता है। मौलिक तौर पर यह ग्रंथ अरबी भाषा में लिखा गया है तथा बाद में यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में अनुवादित हुआ। इसमें कुल 80 अध्याय हैं जिनमें भारत के धर्म, दर्शन, समाज, परंपराओं, रीति-रिवाज़ों, नाप-तोल, खगोल-विज्ञान, . चिकित्सा, ज्योतिष, मूर्तिकला, कानून, न्याय इत्यादि विषयों को विस्तृत ढंग से लिखा गया है।

भाषा की दृष्टि से लेखक ने इसे सरल व स्पष्ट बनाने का प्रयास किया है। अल-बिरूनी ने इस रचना-लेखन का उद्देश्य इन शब्दों में स्पष्ट किया है कि “यह उन लोगों के लिए सहायक हो जो उनसे (हिन्दुओं से) धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं और ऐसे लोगों के लिए सूचना का संग्रह, जो उनके साथ संबद्ध होना चाहते हैं।” इससे स्पष्ट होता है कि अल-बिरूनी ने इस पुस्तक की रचना इस उपमहाद्वीप के सीमान्त क्षेत्र के लिए की थी, क्योंकि उनका इस क्षेत्र से किसी-न-किसी रूप में संबंध होता रहता था।

अल-बिरूनी ने इस रचना के लेखन में विशेष शैली का प्रयोग किया है। वह प्रत्येक अध्याय को एक प्रश्न से प्रारंभ करता है, फिर उसका उत्तर संस्कृतवादी परंपराओं के अनुरूप विस्तृत वर्णन के साथ करता है। फिर उसका अन्य संस्कृतियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करता है। वह इस कार्य में पाली, प्राकृत इत्यादि भाषाओं के अनुवाद का प्रयोग करता है। वह विभिन्न दन्त कथाओं से लेकर विभिन्न वैज्ञानिक विषयों खगोल-विज्ञान व चिकित्सा विज्ञान इत्यादि विषयों की रचनाएँ हैं। वह प्रत्येक पक्ष का वर्णन आलोचनात्मक ढंग से करता है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह उनमें सुधार करना चाहता था। उसके लेखन में ज्यामितीय संरचना, स्पष्टता तथा पूर्वानुमान की धारणा विशेष रूप से उभरकर आती है।

हिंदू शब्द की उत्पत्ति सिन्धु से हुई है। फारसी भाषा में ‘स’ शब्द का उच्चारण ‘ह’ से किया जाता है। जिसके कारण वे सिन्धु को हिन्दू या सप्ताह को हप्ताह बोलते हैं। फारस क्षेत्र के लोग सिन्धु नदी के पूर्व रहने वाले लोगों के लिए हिन्दू का प्रयोग करते हैं तथा उनका क्षेत्र हिन्दोस्तान तथा उनकी भाषा को ‘हिंदवी’ के नाम से जानते हैं।

ईरानी अभिलेखों में ‘हिन्द’ शब्द का प्रयोग छठी सदी ई०पू० में सिन्धु क्षेत्र के लिए मिलता है। इसी प्रकार ‘हिन्दुस्तान’ शब्द पहली बार तीसरी सदी ई० में ईरानी के शासानी शासकों के अभिलेखों में मिलता है। अल-बिरूनी ने अपनी इस रचना में ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग किया है।

प्रश्न 2.
इन बतूता का जीवन परिचय दें एवं उसकी पुस्तक ‘रिला’ पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय (Life Sketch)-इब्न बतूता का संक्षिप्त जीवन परिचय निम्न प्रकार से है

(i) पारिवारिक परंपरा (Family Tradition)-इन बतूता का जन्म अफ्रीका महाद्वीप के मोरक्को नामक देश के तैंजियर नामक स्थान पर 24 फरवरी, 1304 ई० को हुआ। बतूता का परिवार इस क्षेत्र में सबसे सम्मानित, शिक्षित व इस्लामी कानूनों का विशेषज्ञ माना जाता था। पारिवारिक परंपरा के अनुसार साहित्यिक व धार्मिक ज्ञान उसे विरासत में मिला जिसको उसने न तथा ज्ञान प्राप्त करने की लालसा के कारण और अच्छी तरह से प्राप्त किया। इस तरह वह कम आयु में ही उच्चकोटि का धर्मशास्त्री बन गया।

(ii) यात्रा पर (On Pilgrimage)-इन बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था। उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की। 1325-1332 ई० तक उसने मक्का व मदीना की यात्रा की तथा इसके बाद सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के देशों की यात्रा की।

उसने अपनी यात्राएँ जल एवं थल दोनों मार्गों से की। इन देशों की यात्रा के उपरांत वह मध्य-एशिया के रास्ते से भारत की ओर बढा तथा । रास्ते से भारत की ओर बढ़ा तथा 1333 ई० में सिन्ध पहुँचने में सफल रहा। भारत आने का उसका मुख्य कारण दिल्ली सल्तनत के सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक की ख्याति थी। उसने सुल्तान के कला व साहित्य को संरक्षण देने वाले गुण, विद्वता तथा दया भाव के बारे में सुना था इसलिए वह सिन्ध से दिल्ली की ओर मुल्तान व उच्च के रास्ते से आगे बढ़ा।

(iii) भारत आगमन (Arrived in India)-बतूता सिन्ध से 50 दिन तथा मुल्तान से 40 दिन की यात्रा करने के बाद 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा तथा सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से भेंट की। ये दोनों एक दूसरे की विद्वता से प्रभावित हुए। सुल्तान ने बतूता को दिल्ली का काज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त कर उसे शाही सेवा में ले लिया। उसने 8 वर्षों तक इस पद पर कार्य किया।

इसी दौरान सुल्तान के साथ उसका मतभेद हो गया जिसके कारण उसे पद से हटाकर जेल में डाल दिया गया। परन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही तथा सुल्तान ने एक बार फिर उस पर विश्वास कर शाही सेवा में ले लिया। इस बाद समाज के बारे में उनकी समझ बार उसे चीन में सुल्तान की ओर से दूत बन कर जाने का आदेश दिया। इस समय चीन में मंगोलों का राज्य था। इस तरह 1342 ई० में इन बतूता ने नई नियुक्ति स्वीकार कर चीन की ओर प्रस्थान किया।

(iv) चीन में (To China)-बतूता ने चीन जाने के लिए मालाबार से प्रस्थान किया फिर वहाँ से वह मालद्वीप पहुंचा। वहाँ पर उसने 18 महीनों तक काज़ी के पद पर कार्य किया। मालद्वीप से वह श्रीलंका गया तथा फिर मालाबार लौट आया। उसने एक बार फिर चीन जाने का फैसला किया। परन्तु इस बार उसने बंगाल की खाड़ी का मार्ग पकड़ा तथा बंगाल व असम में भी कुछ समय बिताया।

इसके पश्चात् वह सुमात्रा पहुँचा एवं वहाँ से चीनी बन्दरगाह जायतुन (वर्तमान नाम क्वानझू) उतरा। उसने यहाँ से चीन के विभिन्न स्थानों की यात्रा की तथा मंगोल शासक को बीजिंग में मुहम्मद तुगलक का पत्र सौंपा। शासक ने उसे दूत के रूप में स्वीकार किया लेकिन बतूता, स्वयं वहाँ लम्बे समय तक नहीं रुक सका।

(v) वतन को वापसी (Returned to the Watan)-1347 ई० में वहाँ से वापिस अपने देश मोरक्को के लिए चल दिया। वह 8 नवम्बर, 1349 ई० को अपने पैतृक स्थान तैंजियर पहुँच गया। इसके बाद उसने कुछ समय आधु में बिताया तथा मोरक्को के समीपवर्ती देशों की यात्राएँ भी की। मोरक्को के शासक ने उससे अपने अनुभव तथा विभिन्न स्थानों की जानकारी देने के लिए कहा।

उसने अपनी स्मृति के आधार पर यह सारी जानकारी शासक को उपलब्ध कराई जिसे संकलित कर रिला या रह्ना या सफरनामा नामक पुस्तक के रूप में सुरक्षित किया गया। इसमें 1325-1354 के बीच की उसकी यात्राओं का वर्णन है। इन बतूता ने अपनी मृत्यु 1377 ई० तक का बाकी समय अपने पैतृक स्थान तैंजियर में बिताया तथा शासक ने उसे हर प्रकार की मदद दी।

(vi) संस्मरण (Memoir)-इन बतूता की यात्राओं के बारे में पढ़ते समय हम अहसास कर सकते हैं कि इस विश्व यात्री ने लगभग 30 वर्ष तक विभिन्न महाद्वीपों की यात्रा की। उस युग में यात्राएँ कितनी कठिन थीं, कितनी तरह के संकट थे, यह केवल कल्पना ही की जा सकती है। वह बताता है कि यात्राओं के दौरान उसने कई बार डाकुओं के आक्रमणों को झेला क्योंकि डाकू कारवों पर भी आक्रमण कर देते थे।

मुल्तान से दिल्ली मार्ग पर उनके कारवां पर एक खतरनाक आक्रमण हुआ, जिनमें से कई यात्रियों की मृत्यु हो गई तथा कई घायल हो गए। वह स्वयं भी इसमें घायल हुआ। इसके अतिरिक्त उस युग में आवागमन के साधन नहीं के बराबर थे। प्रायः यात्रा पैदल या पशुओं की गाड़ी में होती थी। इससे बहुत समय लगता था। वह बताता है कि उसने मुल्तान से दिल्ली तथा दिल्ली से दौलताबाद की दूरी 40-40 दिन में तय की। इसी तरह ग्वालियर से दिल्ली 10 दिन में तय की।

इन कठिनाई भरी यात्राओं के बाद भी उसने विभिन्न नई-नई संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं, चीजों व परम्पराओं को कुशलतापूर्वक लिखा। जो विश्व के बड़े हिस्से की जानकारी का स्रोत बन गया। चीन के वृत्तांत के बारे में तो उसकी तुलना वेनिस (13वीं सदी का) यात्री मार्को पोलो से की जाती है, जिसने हिन्द महासागर के रास्ते चीन व भारत की यात्रा की। भारत व चीन के अतिरिक्त बतूता का वर्णन उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम एशिया व मध्य-एशिया के बारे में विस्तृत जानकारी देता है। उससे सुनकर बतूता के अनुभवों का लेखक इन जुजाई लिखता है कि उसकी जानकारी बताने का तरीका इतना अच्छा था कि ऐसा लगता था कि वह उसके साथ यात्रा कर रहा है।

2. रिहला : एक परिचय (Rihla : An Introduction)-रिला या किताब-ए-रला इब्न बतूता के संस्मरणों पर आधारित रचना है। इसे ‘सफरनामा’ के नाम से अनुवादित किया गया है। बतूता के मोरक्को वापिस पहुंचने पर वहाँ के शासक ने इन जुजाई नामक व्यक्ति को यह कार्य दिया कि वह बतूता से बातचीत करे तथा उसकी स्मृति को एक रचना के रूप में प्रस्तुत करे। इन जुजाई रिला की प्रस्तावना में लिखता है

(राजा के द्वारा) एक शालीन निर्देश दिया गया कि वे (इब्न बतूता) अपनी यात्रा में देखे गए शहरों का तथा अपनी स्मृति में बैठ गई रोचक घटनाओं का एक वृत्तांत लिखवाएँ और साथ ही विभिन्न देशों के शासकों में से जिनसे वे मिले, उनके महान् साहित्यकारों के तथा उनके धर्मनिष्ठ संतों के बारे में बताएं। तदनुसार उन्होंने इन सभी विषयों पर एक कथानक लिखवाया जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी। साथ ही उन्होंने कई प्रकार के असाधारण विवरण जिनके प्रतिपादन से लाभप्रद उपदेश मिलते हैं, दिए तथा असाधारण चीजों के बारे में बताया जिनके सन्दर्भ से अभिरुचि जगी।”

इन जुजाई के इस लेखन से इस बात का ज्ञान होता है कि बतूता का वृत्तांत किस तरह, क्यों लिखवाया गया तथा उसने किस-किस प्रकार की जानकारी दी।

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रिला में भारत के बारे में विस्तृत वर्णन दिया गया है। इस वर्णन में भारत की प्रकृति, पशु-पक्षी, वन, नदियों, गाँव व शहरों के बारे में बताया गया है। उसने मुहम्मद तुगलक के बारे में भी विस्तृत प्रकाश डाला है। उसकी जानकारी कई अर्थों में जियाऊद्दीन बर्नी की तारीख-ए-फिरोज शाही से भिन्न है। बतूता मुहम्मद तुगलक को सन्तुलित, शिक्षित, न्यायप्रिय, प्रतिभाशाली व दूरदर्शी शासक बताता है जबकि बर्नी उसे जल्दबाज, अन्यायी, मूर्ख, जिद्दी तथा अपरिपक्व बताता है।

इब्न बतूता ने जो कुछ बताया वह बाद में इस रचना के रूप में आया जो उच्च लेखकों व यात्रियों के लिए यह मार्गदर्शक पहलू बन गया। इनमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाले यात्रियों में समरकंद का अब्दुर रज्जाक (यात्रा लगभग 1440), महमूद वली बलखी (यात्रा लगभग 1620) तथा शेख अली हाजिन (यात्रा लगभग 1740) के नाम लिए जा सकते हैं। इनमें बलखी तो भारत से इतना प्रभावित हुआ कि कुछ समय के लिए संन्यासी बन गया।

दूसरी ओर हाजिन भारत से निराश हुआ तथा घृणा भी करने लगा क्योंकि उसे भारत में आशा के अनुरूप स्वागत नहीं मिला। इन सभी यात्रियों के बारे में सामान्य बात यह है कि इन्होंने भारत का वर्णन अचंभों के देश के रूप में किया। इनको इस क्षेत्र के आम व्यक्ति की गतिविधियाँ भी विचित्र लगती थीं। उदाहरण के तौर पर भारतीय किसान का खेती का कार्य करते हुए मात्र लंगोटी बांधना या फिर लोटे से बिना मुँह लगाए पानी-पीना इत्यादि।

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

HBSE 12th Class History यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
किताब-उल-हिन्द पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
‘किताब-उल-हिन्द’, अल-बिरूनी द्वारा रचित सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसे ‘तहकीक-ए-हिन्द’ के नाम से भी जाना जाता है। मौलिक तौर पर यह ग्रंथ अरबी भाषा में लिखा गया है तथा बाद में यह विश्व की कई प्रमुख भाषाओं में अनुवादित हुआ। इसमें कुल 80 अध्याय हैं जिनमें भारत के धर्म, दर्शन, समाज, परंपराओं, चिकित्सा, ज्योतिष इत्यादि विषयों को विस्तृत ढंग से लिखा गया है। भाषा की दृष्टि से लेखक ने इसे सरल व स्पष्ट बनाने का प्रयास किया है।

अल-बिरूनी ने इस रचना के लेखन में विशेष शैली का प्रयोग किया है। वह प्रत्येक अध्याय को एक प्रश्न से प्रारंभ करता है, फिर उसका उत्तर संस्कृतवादी परंपराओं के अनुरूप विस्तृत वर्णन के साथ करता है। फिर उसका अन्य संस्कृतियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करता है। वह इस कार्य में पाली, प्राकृत इत्यादि भाषाओं के अनुवाद का प्रयोग करता है। वह विभिन्न दन्त कथाओं से लेकर विभिन्न वैज्ञानिक विषयों खगोल-विज्ञान व चिकित्सा विज्ञान इत्यादि विषयों की रचनाएँ है। वह प्रत्येक पक्ष का वर्णन आलोचनात्मक ढंग से करता है।

प्रश्न 2.
इब्न बतूता और बर्नियर ने जिन दृष्टिकोणों से भारत में अपनी यात्राओं के वृत्तांत लिखे थे, उनकी तुलना कीजिए तथा अंतर बताइए।
उत्तर:
इब्न बतूता और बर्नियर दोनों ही विदेशी यात्री हैं। इन दोनों ने ही भारत के बारे में अपना वृत्तांत विस्तार से लिखा है। तुलनात्मक दृष्टि से इनके वृत्तांत में कुछ समानता है तो कुछ अंतर भी है।

इब्न बतूता अफ्रीका में मोरक्को देश का रहने वाला था। वह धर्मशास्त्री था। उसने साहित्यिक व शास्त्रीय यात्राओं के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से 1325 ई० में यात्रा प्रारंभ की। मध्य-एशिया में उसने भारत के शासक मुहम्मद-बिन-तुगलक की प्रशंसा सुनी। इससे उसके मन में शासक से मिलने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। वह 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा।

मुहम्मद-बिन-तुगलक व इब्न बतूता दोनों एक-दूसरे की विद्वता से प्रभावित हुए। शासक ने उसे दिल्ली का काज़ी नियुक्त किया तथा बाद में दूत बनाकर चीन भी भेजा। चीन जाने के बाद वह 1349 ई० में स्वदेश चला गया। मोरक्को के शासक के निर्देश पर इन जुजाई ने उससे अनुभव लेकर ‘रिला’ नामक ग्रंथ की रचना की।

दूसरी ओर बर्नियर फ्रांस का रहने वाला था। वह व्यवसाय से चिकित्सक था। वह शाहजहाँ के शासन काल के अंतिम दिनों 1656 ई० में भारत आया तथा 1668 में स्वदेश चला गया। उसने ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक पुस्तक लिखी। . दोनों में समानता यह है कि दोनों ने अपने-अपने समय के शासकों के दरबार, सामंतों व अन्य उच्च वर्ग के लोगों के जीवन की जानकारी दी। दोनों ने समाज की परंपराओं विशेषकर विवाह प्रणाली, सती प्रथा तथा त्योहारों इत्यादि का वर्णन किया है। दोनों का वृत्तांत अन्य लोगों के लिए प्रेरणा बना है।

दोनों में अंतर मुख्य रूप से उद्देश्य को लेकर है। बतूता अधिक-से-अधिक जानकारी लेकर जिज्ञासा को शांत करना चाहता है जबकि बर्नियर पूर्व (भारत) तथा पश्चिम (यूरोप) की तुलना करते हुए, भारत को निम्न बताना चाहता है। वह यूरोप में पूंजीवाद के उत्थान की स्थितियों के अनुरूप लिखता है। इब्न बतूता ने स्वयं कुछ नहीं लिखा जबकि बर्नियर ने रचना स्वयं लिखी है।

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प्रश्न 3.
बर्नियर के वृत्तांत से उभरने वाले शहरी केंद्रों के चित्र पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर ने मुगल काल के नगरों का वर्णन किया है। उसके अनुसार भारत की जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग मनपात यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था। मुगलकालीन नगरों को बर्नियर शिविर नगर’ कहता था अर्थात् ऐसे नगर जो अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर करते थे। ये ‘शिविर नगर’ तभी बनते थे जब राजकीय दरबार का आगमन होता था। राजकीय कारवाँ के निकल जाने के बाद इन शिविर नगरों का आविर्भाव समाप्त हो जाता था। यह सामाजिक और आर्थिक रूप से राजकीय प्रश्रय पर निर्भर करते थे।

बर्नियर के अनुसार उस काल में सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे। ये नगर उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि श्रेणियों में विभाजित थे। वास्तव में इनका अस्तित्व समृद्ध व्यापारिक समुदायों तथा व्यावसायिक वर्गों के अस्तित्व का परिचायक था। . इस काल में नगरों की एक विशेषता और भी उभरकर सामने आई। घ्यापारी वर्ग मजबूत सामुदायिक एवं बंधुत्व के संबंधों से जुड़े हुए थे।

वे व्यावसायिक और जातिगत संस्थाओं के माध्यम से संगठित थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा. जाता था और उनके मुखिया को सेठ। अहमदाबाद जैसे शहरी केंद्रों के सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय के मुखिया या सेठ द्वारा होता था। शहर के अन्य समुदायों के व्यावसायिक वर्ग में चिकित्सक (हकीम-वैद्य), अध्यापक (मुल्ला-पंडित), अधिवक्ता (वकील) चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक आदि सम्मलित थे। ये राजकीय आश्रय अथवा अन्य के संरक्षण में रहते थे।

प्रश्न 4.
इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के संबंध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के बारे में कई साक्ष्य दिए गए हैं। उसके अनुसार भारत में दास बाजार में उसी तरह बिकते हैं जैसी कि अन्य दैनिक प्रयोग की वस्तुएँ। लोग इन दास-दासियों को घरेलू कार्यों तथा उपहार इत्यादि के लिए खरीदते हैं। वह जब स्वयं सिन्ध पहुँचा तो उसने सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक को भेंट देने के लिए दास खरीदे। उसने मुल्तान पहुँचकर, वहाँ के गवर्नर को किशमिश व बादाम के साथ एक दास और कुछ घोड़े भेंट किए। सुल्तान मुहम्मद तुगलक ने नसीरुद्दीन नामक एक धर्मोपदेशक को उसके ज्ञान व प्रवचन से प्रभावित होकर एक लाख टके तथा दो सौ दास दिए।

इब्न बतूता के अनुसार, पुरुष दास का प्रयोग घरेलू कार्यों; जैसे बाग-बगीचों की देखभाल, पशुओं की देखरेख, महिलाओं व पुरुषों को पालकी या डोली में एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के लिए होता था। दासियाँ शाही महल, अमीरों के आवास पर घरेलू कार्य करने व संगीत गायन के लिए खरीदी जाती थीं। वह बताता है कि शासक की बहन की शादी में इन दासियों ने बहुत उच्चकोटि के कार्यक्रम प्रस्तुत किए थे। सुल्तान अपने अमीरों व दरबारियों पर नियंत्रण रखने के लिए भी दासियों का प्रयोग करता था।

प्रश्न 5.
सती प्रथा के कौन से तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा?
उत्तर:
बर्नियर ने अपने वृत्तांत में सती प्रथा के बारे में काफी विस्तार से लिखा है। उसने 12 वर्ष की आयु की एक लड़की के सती होने का मार्मिक वर्णन किया है। उसने सती होने या करने की विधि भी लिखी है। बर्नियर अपने वर्णन में सती के विभिन्न पक्षों का उल्लेख करते हुए जिस तरह लिखता है उससे स्पष्ट होता है कि कई तत्वों ने उसका ध्यान इस दिशा में खींचा। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

  • सती प्रथा यूरोप की प्रथाओं से अलग थी। किसी जीवित व्यक्ति को जलाने की प्रथा उसे अमानवीय लगी।
  • उसे भारत में अल्पवयस्क शादी आश्चर्यजनक लगी और अल्पावस्था में विधवा को सती करना और अधिक आश्चर्यजनक लगा।
  • उसे सती होने जा रही बच्ची की मनोदशा पर तरस आ रहा था।
  • उसे परिवार की बूढ़ी महिला व ब्राह्मणों का व्यवहार अजीब लगा। क्योंकि वे किसी जीवित व्यक्ति को जलाने को महसूस नहीं कर रहे थे, बल्कि प्रथा का पालन करने में व्यस्त थे।
  • विधवा के हाथ-पाँव बाँधना तथा फिर ढोल-नगाड़ों की आवाज में मरने वाले प्राणी की आवाज को दबाने से अधिक आश्चर्यजनक पहलू और क्या हो सकता था।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
जाति व्यवस्था के संबंध में अल-बिरूनी की व्याख्या पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
अल-बिरूनी की भारतीय समाज के बारे में समझ उसी वैदिक ज्ञान पर आधारित थी जिसमें वर्गों की उत्पत्ति बताई गई है। इस समझ के अनुसार ब्राह्मण का इस समाज में सर्वोच्च स्थान था। उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के सिर से हुई, उसके बाद क्षत्रियों का स्थान था जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के कंधों व हाथों से हुई। क्षत्रियों के बाद वैश्यों का स्थान था। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की जंघाओं से हुई है। इस कड़ी में चौथा स्थान शूद्रों का है। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के चरणों से हुई है। वह यह भी लिखता है कि तीसरे व चौथे वर्ण में कोई अधिक अंतर नहीं है।

अल-बिरूनी इस विभाजन को ब्राह्मण वर्ग द्वारा संचालित बताता है, परन्तु वह अपवित्रता की धारणा को स्वीकार नहीं कर पाता। वह लिखता है कि हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है वह पूर्णतया स्थायी नहीं होती बल्कि वह अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को प्राप्त करने का प्रयास करती है तथा अन्ततः सफल भी होती है। वह अपने मत के पक्ष में उदाहरण देकर स्पष्ट करता है कि हवा कितनी भी प्रदूषित क्यों न हो, सूर्य उसे स्वच्छ कर देता है। इसी तरह समुद्र के पानी में नमक की उपस्थिति भी उसे गंदा होने से बचाती है। उसके अनुसार यदि प्रकृति में अशुद्ध को शुद्ध करने का गुण नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन सम्भव नहीं होता।

इसी तरह जाति-व्यवस्था में अपवित्रता की व्याख्या प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। अल-बिरूनी भारतीय समाज की जाति प्रथा की तुलना फारस से करता है। वह यह भी स्पष्ट करता है कि भारत में वर्गों की उत्पत्ति का संबंध ब्रह्मा से माना जाता है लेकिन फारस में विभाजन का आधार कार्य है। वहाँ पहले वर्ग में शासक व घुड़सवार (अर्थात सैनिक), दूसरे वर्ग में भिक्षु, तीसरे में चिकित्सक, शिक्षक, पुरोहित थे, जबकि चौथे में कृषक व शिल्पकार थे। इन सभी में व्यवसायों में बदलाव से समाज में इनकी पहचान भी बदल जाती थी।

अल-बिरूनी बताता है कि भारतीय समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र के अतिरिक्त भी एक वर्ग था जिससे व्यवस्था से बाहर माना जाता था। उसे लोग अंत्यज कहते थे। यह वर्ग सामाजिक दृष्टि से व्यवस्था से बाहर अवश्य था, लेकिन आर्थिक तौर पर कृषि इत्यादि में अपनी सेवा निरंतर देता रहता था।

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प्रश्न 7.
क्या आपको लगता है कि समकालीन शहरी केंद्रों में जीवन-शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्न बतूता का वृत्तांत सहायक है? अपने उत्तर के कारण दीजिए।
उत्तर:
इन बतूता ने भारत के विभिन्न शहरों में अपना काफी समय बिताया। उसने जो कुछ वहाँ देखा, उसका वर्णन कर दिया। उसने अपना वर्णन इतनी कुशलता से किया है कि पाठक को यह एहसास होता है जैसे वह उस स्थान पर हो। उसके वृत्तांत से तत्कालीन शहर की बसावट तथा जीवन-शैली की विस्तार से जानकारी मिल जाती है। इस बात की पुष्टि उसके द्वारा दिल्ली व दौलताबाद के वृत्तांत से हो जाती है। उदाहरण के लिए इस वृत्तांत को लिया जा सकता है।

दिल्ली-बतूता के अनुसार “देहली बड़े क्षेत्र में फैला घनी आबादी वाला शहर है………. शहर के चारों ओर बनी प्राचीर अतुलनीय है, दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ है; और इसके भीतर रात्रि के पहरेदार तथा द्वारपालों के कक्ष हैं। प्राचीर के अन्दर खाद्य सामग्री, हथियार, बारूद, प्रक्षेपास्त्र तथा घेरेबंदी में काम आने वाली मशीनों के संग्रह के लिए भंडार गृह बने हुए थे……….. प्राचीर के भीतरी भाग में घुड़सवार तथा पैदल सैनिक शहर की ओर से दूसरे छोर तक आते-जाते हैं।

प्राचीर में खिड़कियाँ बनी हुई हैं जो शहर की ओर खुलती हैं और इन्हीं खिड़कियों के माध्यम से प्रकाश अंदर आता है। प्राचीर का निचला भाग पत्थर से बना है जबकि ऊपरी भाग ईंटों से। इस शहर में कुल 28 द्वार हैं जिन्हें दरवाजा कहा जाता है। इनमें सबसे विशाल बदायूँ दरवाजा है। मांडवी दरवाजे के अन्दर अनाज मण्डी है, गुल दरवाजे के बगल में फलों का एक बगीचा है…….देहली शहर में एक बेहतरीन कब्रगाह है जिसमें : बनी कब्रों के ऊपर गुंबद बनाई गई है और जिन कब्रों पर गुंबद नहीं हैं उनमें निश्चित रूप से मेहराब है। कब्रगाह में कंदाकार, चमेली

तथा जंगली गुलाब जैसे फूल उगाए जाते हैं और ये फूल सभी मौसमों में खिले रहते हैं।” दौलताबाद-दौलताबाद के बारे में बतूता बताता है कि यह दिल्ली से किसी तरह कम नहीं था और आकार में उसे चुनौती देता था। यहाँ पुरुष व महिला गायकों के लिए एक बाजार था जिसे ताराबंबाद कहते थे। यह सबसे बड़े एवं सुन्दर बाजारों में से एक था। यहाँ बहुत सी दुकानें थीं। दुकानों को कालीन से सजाया जाता था। बाजार के मध्य में एक विशाल गुंबद खड़ा था जिसमें कालीन बिछाए गए थे। प्रत्येक गुरुवार सुबह की इबादत के बाद संगीतकारों के प्रमुख अपने सेवकों और दासों के साथ स्थान ग्रहण करते थे।

गायिकाएँ एक के बाद एक झुण्डों में उनके समक्ष आकर सूर्यास्त का गीत गाती और नाचती थीं। इन बतूता के दोनों शहरों के वृत्तांत को जानने के बाद शहरी जन-जीवन की विस्तृत झांकी आँखों के सामने आती है जिससे स्पष्ट होता है कि शहर की बनावट कैसी थी। उसकी सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए थे। वहाँ बाजार में क्या मिलता था। शहरों में सांस्कृतिक गतिविधियाँ किस तरह चलती थीं। अतः स्पष्ट है कि इन बतूता का वृत्तांत समकालीन शहरी केंद्रों की जानकारी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

प्रश्न 8.
चर्चा कीजिए कि बर्नियर का वृत्तांत किस सीमा तक इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज को पुनर्निर्मित .. करने में सक्षम करता है?
उत्तर:
बर्नियर ने अपने वृत्तांत में भारतीय ग्रामीण समाज के बारे में बहुत कुछ लिखा है। वह इस बारे में स्पष्ट करता है कि भारत में ग्रामीण समाज पिछड़ा हुआ है। उसके अनुसार “हिंदुस्तान के साम्राज्य के विशाल ग्रामीण अंचलों में अधिकतर रेतीली या बंजर हैं। यहाँ की खेती अच्छी नहीं है और इन इलाकों में आबादी भी कम है। यहाँ तक कि कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा श्रमिकों के अभाव में कृषि विहीन रह जाता है, गरीब लोग अपने लोभी स्वामियों की माँगों को पूरा करने में प्रायः असमर्थ रहते हैं।

वे अत्यंत निरंकुशता से हताश हो गाँव छोड़कर चले जाते हैं।” बर्नियर का यह वृत्तांत एक पक्षीय है। इस बात को समझने के लिए इतिहासकार को उसके लेखन का उद्देश्य समझना होगा। जिसमें यह स्पष्ट है कि वह यूरोप में निजी स्वामित्व जारी रखना चाहता है। वह भारत के कृषक व ग्रामीण समाज की दुर्दशा के लिए भूमि स्वामित्व को जिम्मेदार ठहराता है। यह भारत में स्वामित्व निजी के स्थान पर शासकीय मानता है।

इतिहासकार उसके वृत्तांत को पढ़कर सामान्य रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि भारतीय ग्राम पिछड़े हुए थे। ऐसा कार्ल मार्क्स व मॉन्टेस्क्यू ने भी कहा है। इसके लिए जरूरी है कि इतिहासकार अन्य तुलनात्मक स्रोतों का अध्ययन करें। वह बर्नियर की स्थिति तथा लेखन के उद्देश्य को भी समझे। इतिहासकार ग्रामीण समाज के अन्य पक्षों विशेषकर लोगों की जीवन शैली के बारे में भी जानने का प्रयास करे। इन बिंदुओं पर ध्यान रखकर 17वीं शताब्दी के गाँवों के बारे में इतिहासकार समझ बना सकता है।

इसी कदम पर आगे बढ़ते हुए इतिहासकार समकालीन ग्रामीण समाज को भी समझ सकता है। वह बर्नियर की तरह के स्रोतों का जब मूल्यांकन कर लेगा तथा अन्य स्रोतों का अध्ययन उसकी विषय-वस्तु में होगा तो निश्चित तौर पर समकालीन समाज को अच्छी तरह समझ सकता है। अतः बर्नियर का वृत्तांत इतिहास को समकालीन ग्रामीण समाज समझने का मार्ग तो देता है लेकिन उसके दोषों के प्रति भी उसे सचेत होना होगा।

यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ HBSE 12th Class History Notes

→ शास्त्ररूढ़-शास्त्रों से संबंधित

→ शरिया (शरियत)-इस्लामी कानून

→ कारवाँ-बड़ी सामूहिक यात्रा

→ श्रुतलेख-सुनकर लिखना

→ इतालवी-इटली का निवासी

→ ऑटोमन साम्राज्य-तुर्की का साम्राज्य

→ अमीर (मध्यकाल में) सामंत

→ डच हॉलैण्ड के निवासी

→ पुनः मुद्रित दोबारा प्रकाशन

→ हस्तलिपियाँ हाथ से लिखे गए ग्रन्थ

→ अवरोध-समस्या

→ पतंजलि की कृति–पतंजलि की रचना

→ अंत्यज-सामाजिक वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोग

→ काज़ी-न्याय करने वाला इस्लाम धर्म का विशेषज्ञ

→ ताराबबाद-गायकों का बाजार

→ उलुक-अश्व वाली डाक सेवा

→ दावा-पैदल डाक सेवा

→ कालीकट-वर्तमान कोजीकोड (केरल)

→ द्वि-विपरीतता दोनों को एक-दूसरे के विपरीत

→ बेहतर-भूमि धारकों का वर्ग

→ बलाहार-भूमिहीन कृषक

→ टका-सल्तनत काल की मुद्रा

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

→ भारत में प्राचीन काल से विदेशी यात्री आते रहे हैं। ये यात्री व्यापार, रोजगार, तीर्थ यात्रा या धर्म प्रचार इत्यादि उद्देश्यों से आए। इन यात्रियों में से कुछ ने अपने वृत्तांत पुस्तक, व्यक्तिगत डायरी व संस्मरण के रूप में लिखे हैं। उनके यही लिखित साक्ष्य हमें भारतीय इतिहास के विभिन्न पक्षों को समझने का आधार देते हैं।

→ प्रस्तुत अध्याय में भारतीय उपमहाद्वीप में आने वाले उन यात्रियों का वर्णन है जिन्होंने मध्यकालीन समाज के बारे में विस्तृत वर्णन दिया है। इस बारे में भी सभी यात्रियों का वर्णन सम्भव नहीं है अतः केवल तीन यात्रियों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। ये यात्री ग्यारहवीं शताब्दी में मध्य-एशिया वर्तमान उज्बेकिस्तान से आने वाले अल-बिरूनी, चौदहवीं शताब्दी में मोरक्को (अफ्रीका) से आने वाले इब्न बतूता तथा सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर हैं।

→ इन यात्रियों ने जिस तरह सामाजिक स्थिति का वर्णन किया है उससे कालक्रम के अनुरूप लगभग पूरे मध्यकाल की समझ बनती है। अरब लेखकों में सबसे महत्त्वपूर्ण व विस्तृत जानकारी देने वाला व्यक्ति अल-बिरूनी है जो महमूद क देने वाला व्यक्ति अल-बिरूनी है जो महमूद के साथ भारत आया, जिसने तत्कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व धार्मिक स्थिति पर प्रकाश डाला।

→ अल-बिरूनी का वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य-एशिया में स्थित आधुनिक उज्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। ख्वारिज्म इस समय शिक्षा का अति महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। अल-बिरूनी को इसी स्थान पर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। उसने यहाँ पर सीरियाई, हिब्रू, फारसी, अरबी व संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। इसलिए वह इन भाषाओं में लिखित मौलिक ग्रन्थों को पढ़ पाया। वह यूनानी भाषा को नहीं समझता था लेकिन इस भाषा के सभी प्रमुख ग्रन्थ अनुवादित हो चुके थे। इसी कारण वह प्लेटो व अरस्तु के दर्शन व ज्ञान को अनुवादित रूप में पढ़ पाया। इस तरह वह अपने जीवन के प्रारंभिक दौर में ही विभिन्न भाषाओं के साहित्य से परिचित हो गया।

→1017 ई० में महमूद ने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया तथा जीत हासिल की। विजय के बाद उसने यहाँ पर कुछ लोगों को बंदी बनाया। इनमें कुछ विद्वान तथा कवि भी थे। अल-बिरूनी भी इन्हीं बंदी लोगों में एक था तथा वह इसी अवस्था में गजनी लाया गया। गजनी में रहते हुए महमूद उसकी प्रतिभा से प्रभावित हुआ। फलतः न केवल महमूद ने उसे मुक्त किया वरन् उसे दरबार में सम्मानजनक पद भी दिया। बाद में अल-बिरूनी उसका राजकवि भी बना। गजनी प्रवास के दौरान उसने खगोल-विज्ञान, गणित व चिकित्सा से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं। वह महमूद के साथ भारत में कई बार आया तथा उसने इस क्षेत्र में ब्राह्मणों, पुरोहितों व विद्वानों के साथ काफी समय बिताया।

→ उनके साथ रहने के कारण वह संस्कृत भाषा में और प्रवीण हो गया। अब वह न केवल इसे समझ सकता था बल्कि अनुवाद करने में भी सक्षम हो गया। उसने सहारा रेगिस्तान से लेकर वोल्गा नदी तक की यात्रा के आधार पर लगभग 20 पुस्तकों की रचना की। इन रचनाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण ‘किताब-उल-हिन्द’ है जिसे ‘अल बरूनीज इण्डिया’ के नाम से जाना जाता है। गजनी में ही 1048 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

→ इब्न बतूता चौदहवीं शताब्दी का यात्री था। उसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण 1325 से 1354 ई० तक किया। अफ्रीका, एशिया व यूरोप के कुछ हिस्से की यात्रा करने के कारण इसे, एक प्रारंभिक विश्व यात्री की संज्ञा दी जाती है। इब्न बतूता का जन्म अफ्रीका महाद्वीप के मोरक्को नामक देश के तैंजियर नामक स्थान पर 24 फरवरी, 1304 ई० को हुआ। बतूता का परिवार इस क्षेत्र में सबसे सम्मानित, शिक्षित व इस्लामी कानूनों का विशेषज्ञ माना जाता था। बतूता कम आयु में ही उच्चकोटि का धर्मशास्त्री बन गया।

→ इन बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था। उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की। 1325-1332 ई० तक उसने मक्का व मदीना की यात्रा की तथा इसके बाद सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के देशों की यात्रा की। उसने अपनी यात्राएँ जल एवं थल दोनों मार्गों से की। इन देशों की यात्रा के उपरांत वह मध्य-एशिया के रास्ते से भारत की ओर बढ़ा तथा 1333 ई० में सिन्ध पहुँचने में सफल रहा।

→ बतूता 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा तथा सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से भेंट की। ये दोनों एक दूसरे की विद्वता से प्रभावित हुए। सुल्तान ने बतूता को दिल्ली का काजी (न्यायाधीश) नियुक्त कर उसे शाही सेवा में ले लिया। उसने 8 वर्षों तक इस पद पर कार्य किया। इसी दौरान सुल्तान के साथ उसका मतभेद हो गया जिसके कारण उसे पद से हटाकर जेल में डाल दिया गया।

→ परन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही तथा सुल्तान ने एक बार फिर उस पर विश्वास कर शाही सेवा में ले लिया। इस बार उसे चीन में सुल्तान की ओर से दूत बन कर जाने का आदेश दिया। इस समय चीन में मंगोलों का राज्य था। इस तरह 1342 ई० में इन बतूता ने नई नियुक्ति स्वीकार कर चीन की ओर प्रस्थान किया। . वह सुमात्रा होते हुए चीनी बन्दरगाह जायतुन (वर्तमान नाम क्वानझू) उतरा। उसने यहाँ से चीन के विभिन्न स्थानों की यात्रा की तथा मंगोल शासक को बीजिंग में महम्मद तगलक का पत्र सौंपा। शासक ने उसे दूत के रूप में स्वीकार किया, लेकिन बतता स्वयं वहाँ लम्बे समय तक नहीं रुक सका।

→ 1347 ई० में वहाँ से वापिस अपने देश मोरक्को के लिए चल दिया। वह 8 नवम्बर, 1349 ई० को अपने पैतृक स्थान तेंजियर मोरक्को के शासक ने उससे अपने अनुभव तथा विभिन्न स्थानों की जानकारी देने के लिए कहा। उसने अपनी स्मृति के आधार पर यह सारी जानकारी शासक को उपलब्ध कराई जिसे संकलित कर रिला या रला या सफरनामा नामक पुस्तक के रूप में सुरक्षित किया गया। इब्न बतूता की अपने पैतृक स्थान तैंजियर में 1377 ई० में मृत्यु हो गई।

→ बर्नियर एक राजनीतिज्ञ, दार्शनिक तथा इतिहासकार था। उसने बारह वर्ष (1656-68) का समय भारत में लगाया। वह शाहजहाँ के बड़े बेटे दारा शिकोह का चिकित्सक था। बर्नियर का जन्म फ्रांस के अजों नामक प्रान्त के जुं नामक स्थान पर 1620 ई० में हुआ। उसका परिवार कृषि का कार्य करता था। उसने कृषि के साथ-साथ पढ़ाई की तथा पेशे से चिकित्सक बन गया। इसी व्यवसाय को करते हुए उसने फिलिस्तीन, सीरिया व मिस्र की यात्रा की। वह 1656 ई० में सूरत पहुँचा तथा इसी वर्ष दारा शिकोह ने उसे अपना चिकित्सक बना दिया।

→ उसने शाहजहाँ के शासनकाल में उत्तराधिकार के युद्ध की कुछ घटनाएँ देखी जिसका उसने विस्तार से वर्णन किया है। दारा की मृत्यु के बाद उसे आर्मीनियाई अमीर (सामन्त) डानिश मंडखान ने संरक्षण दिया। उसने भारत में सूरत, आगरा, लाहौर, कश्मीर, कासिम बाजार, मसुलीपट्टम व गोलकुण्डा इत्यादि स्थानों का भ्रमण किया। वह 1668 ई० में भारत से फ्रांस लौट गया। 1688 ई० में उसके पैतृक स्थान पर ही उसकी मृत्यु हो गई।

→ फ्रांस्वा बर्नियर ने मुगल काल में भारत की यात्रा की। उसने जो कुछ देखा व समझा उसे ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक रचना में लिखता गया। उसकी यह रचना फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुई तथा इसे फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित किया गया। प्रारंभिक पाँच वर्षों 1670-75 के बीच यह रचना अंग्रेजी, डच, जर्मन तथा इतालवी में अनुवादित हो गई तथा आठ बार फ्रांसीसी में इसका पुनर्मुद्रण हुआ। इन तीनों ही यात्रियों ने भारत के बारे में वृत्तांत दिया है। यह वृत्तांत काफी सूचनाप्रद तथा रोचक है।

क्रम संख्याकालयात्रीदेश/क्षेत्र
1.711-12मोहम्मद-बिन-कासिमअरब क्षेत्र
2.973-1048अल-बिरूनीउज्बेकिस्तान
3.1254-1323मार्को पोलोइटली
4.1304-1377इब्न बतूतामोरक्को (अफ्रीका)
5.1413-82अंब्दुर-रज़्ज़ाकसमरकन्द
6.1498वास्कोडिगामापुर्तगाल
7.1518दूरते बारबोसापुर्तगाल
8.1580-84फादर मान्सरेतस्पेन
9.1582-91राल्फ फिचइंग्लैड
10.1615-19सर टॉमस रोइंग्लैंड
111617-20एडवर्ड टेरीइंग्लैंड
121626-31महमूदवली बलखीबल्ख
131620-27फ्रेन्को पेलसर्टइंग्लैंड
141600-1667पीटर मुंडीइंग्लैंड
151605-1689तैवर्नियरफ्रांस
161620-1688फ्रांस्वा बर्नियरफ्रांस
171653-1708मनूकीइटली

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HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.3

Haryana State Board HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.3 Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Exercise 6.3

प्रश्न 1.
घटाइए:
(a) 35 – (20)
(b) 72 – (90)
(c) (-15) – (-18)
(d) (-20) – (13)
(e) 23 – (-12)
(f) (-32) – (-40)
हल :
(a) 35 – (20) = (15 + 20) – 20
= 15 + (20 – 20)
= 15 + 0 = 15 उत्तर

(b) 72 – 90 = 72 – (72 + 18)
= (72 – 72) – (18)
= 0 – (18)
= – 18. उत्तर

(c) (-15) – (-18) = – 15 + 18
= – 15 + (15 + 3)
= (- 15 + 15) + 3
= 0 + 3 = + 3 उत्तर

(d) (-20) – 13 = – 20 – 13
= – (20 + 13)
= – 33 उत्तर

(e) 23 – (-12) = 23 + 12 = 35 उत्तर

(f) (-32) – (-40) = – 32 + 40
= (-32 + 32) + 8= 0 +8 = 8 उत्तर

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.3

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों को >,< या = से भरिए:
(a) (-3) + (-6)………. (-3) – (-6)
(b) (-21) – (-10)……….. (-31) + (-11)
(c) 45 – (-11)…………57 + (-4)
(d) (-25) – (-42)…………. (-42) – (-25)
हल :
(a) (-3) + (-6) = – 3 – 6 = – 9
और (-3) – (-6) = -3 + 6 = 3
∴ -9 < 3
अतः (-3) + (-6) < (-3) – (-6) उत्तर

(b) (-21) – (-10) = – 21 +10 = – 11 (- 31) + (-11)= -31 – 11 = – 42 ∴ -11 > -42
अतः (-21) – (-10) > (-31) + (-11) उत्तर

(c) 45 – (-11) = 45 + 11 = 56 और
57 + (-4) = 57 – 4 = 53
∴ 56 > 53
अत: 45 – (-11) > 57 + (-4) उत्तर

(d) (-25) – (-42) = – 25 + 42
= – 25 + (25 + 17)
= (-25) + (+25) + 17
= 0 + 17 = 17
और (-42) – (-25) = – 42 + 25
= (-17 – 25) + 25
= -17+ (-25) + (+25)
= -17 + 0 = – 17
∴ 17 > – 17
अतः (-25) – (-42) > (-42) – (-25) उत्तर

प्रश्न 3.
रिक्त स्थानों को भरिए :
(a) (-8) + …….. = 0
(b) 13 + ……… = 0
(c) 12 + (-12) = …….
(d) (-4)+ …….. = – 12
(e) …….. – 15 = – 10
हल :
(a) (-8) + (+8) = 0
(b) 13 + (-13) = 0
(c) 12 + (-12) = 0
(d) (-4) + (-8) = – 12, [∵ – 12 – (-4) = – 12 + 4 = – 8]
(e) 5 – 15 = – 10 (∵ 10 + 15 = 5)

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.3

प्रश्न 4.
निम्नलिखित के मान ज्ञात कीजिए:
(a) (-7) – 8 – (-25)
(b) (-13) + 32 – 8 – 1
(c) (-7) + (-8) + (-90)
(d) 50 – (-40) – (-2)
हल :
(a) (-7) – 8 – (-25) = – 7 – 8 + 25 = – 15 + 25 = 10 उत्तर
(b) (-13) + 32 – 8 – 12 – 13 – 8 – 1 + 32
= – 22 + 32 = 10 उत्तर
(c) (-7) + (-8) + (-90)
= – 7 – 8 – 90 = – 105 उत्तर
(d) 50 – (-40) – (-2) = 50 + 40 + 2 = 92 उत्तर

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HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2

Haryana State Board HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Exercise 6.2

प्रश्न 1.
संख्या रेखा का प्रयोग करते हुए वह पूर्णांक ज्ञात कीजिए, जो:
(a) 5 से 3 अधिक है
(b) – 5 से 5 अधिक है
(c) 2 से 6 कम है
(d) – 2 से 3 कम है
हल :
(a) हम 5 से 3 अधिक पूर्णाक ज्ञात करना चाहते हैं। हम 5 से दाईं ओर 3 कदम चलते हैं, तो 8 प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है:
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 1
अतः 8, 5 से 3 अधिक है। उत्तर

(b) हम – 5 से 5 अधिक पूर्णाक ज्ञात करना चाहते हैं। इसलिए हम – 5 से दाईं ओर 5 कदम चलते हैं, तो 0 प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है :
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 2
अत: 0, – 5 से 5 अधिक है। उत्तर

(c) हम 2 से 6 छोटा पूर्णांक ज्ञात करना चाहते हैं। इसलिए 2 से बाईं ओर 6 कदम चलते हैं तो – 4 प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है :
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 3
अत: -4,2 से 6 कम है। उत्तर

(d) हम – 2 से 3 कम पूर्णाक ज्ञात करना चाहते हैं। इसलिए – 2 से बाई ओर 3 कदम चलते हैं, तो – 5 प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है:
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 4
अत: – 5, – 2 से 3 कम है। उत्तर

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2

प्रश्न 2.
संख्या रेखा का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित योग ज्ञात कीजिए:
(a) 9 + (-6)
(b) 5 + (-11)
(c) (-1) + (-7)
(d) (-5) + 10
(e) (-1) + (-2) + (-3)
(f) (-2) + 8 + (-4)
हल :
(a) संख्या रेखा पर पहले हम 0 से दाईं ओर 9 कदम चलने पर 9 पर पहुँचते हैं। तब हम 9 से बाई ओर 6 कदम चलते हैं तो 3 पर पहुँचते हैं। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है :
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 5
अत: 9 + (-6) = 3.

(b) संख्या रेखा पर हम पहले 0 से दाई ओर 5 कदम चलते हैं और 5 पर पहुँचते हैं। तब हम 5 से बाईं ओर 11 कदम चलते हैं, तो – 6 प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है:
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 6
अत: 5 + (-11) = – 6. उत्तर

(c) संख्या रेखा पर पहले हम 0 से बाईं ओर 1 कदम चलने पर – 1 पर पहुंचते हैं। तब -1 से बाईं ओर 7 कदम चलते हैं, तो – 8 पर पहुँचते हैं। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है:
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 7
अतः (-1) + (-7) = – 8. उत्तर

(d) संख्या रेखा पर पहले हम 0 से बाई ओर 5 कदम चलते हैं, तो – 5 पर पहुँचते हैं। तब हम – 5 के दाईं ओर 10 कदम चलते हैं तथा 5 प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है:
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 8
अत: (-5) + 10 = 5. उत्तर

(e) संख्या रेखा पर हम 0 के बाईं ओर 1 कदम चलते हैं, तो-1 पर पहुँचते हैं। तब हम – 1 से बाई ओर 2 कदम चलते हैं, तो – 3 प्राप्त होता है। फिर हमें -3 के बाईं ओर 3 कदम चलने पर – 6 प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है।
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 9
अतः (-1) + (-2) + (-3) = – 6. उत्तर

(f) संख्या रेखा पर पहले हम 0 के बाई ओर 2 कदम चलते हैं तो -2 पर पहुँचते हैं। तब हम – 2 के दाईं ओर 8 कदम चलकर 6 पर पहुँचते हैं। फिर हम 6 से बाईं ओर 4 कदम चलते हैं, तो 2 प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त है:
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2 - 10
अतः (-2) + 8 + (-4) = 2 उत्तर

प्रश्न 3.
संख्या रेखा का प्रयोग किए बिना निम्नलिखित योग ज्ञात कीजिए :
(a) 11 + (-7)
(b) (-13) + (+18)
(c) (-10) + (+ 19)
(d) (-250) + (+ 150)
(e) (-380) + (-270)
(f) (-217) + (-100)
हल :
(a) 11 + (-7) = 4 + 7 + (-7)
= 4 + 0 = 4 उत्तर
(b) (-13) + (+ 18) = (-13) + (+ 13) +(+5)
= 0 + (+ 5) = 5 उत्तर
(c) (-10) + (+ 19) = (-10) + (+ 10) + (+9)
= 0 + (+9) = 9 उत्तर
(d) (-250) + (+ 150)
= (-100) + (-150) + (+ 150)
= (-100) +0 = – 100 उत्तर
(e) (-380) + (-270) = – 650 उत्तर
(f) (-217) + (-100)= – 317 उत्तर

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.2

प्रश्न 4.
निम्नलिखित का योग ज्ञात कीजिए :
(a) 137 और – 354
(b) – 52 और 52
(c) – 312, 39 और 192
(d) – 50, – 200 और 300
हल :
(a) (+ 137) + (- 354)
= (+ 137) + (-137) + (-217)
= 0 + (-217) = -217 उत्तर

(b) (-52) + (+52) = 0 उत्तर

(c) (-312) + (+ 39) + (+ 192)
= (-312) + (+231)
= (-81) + (-231) + (+231)
= (-81) + 0 = – 81 उत्तर

(d) (-50) + (-200) + (+ 300)
= (-250) + (+300)
= (-250) + (250) + (+50)
= 0 + (+50) = + 50 उत्तर

प्रश्न 5.
निम्नलिखित के मान ज्ञात कीजिए :
(a) (-7) + (-9) + 4 + 16
(b) (37) + (-2) + (-65) + (-8)
हल :
(a) (-7) + (-9) + 4 + 16
= (-16) + 4 + 16
= (-16) + (+16) + 4
= 0 + 4 = 4 उत्तर

(b) (37) + (-2) + (-65) + (-8)
= (37) + (-75)
= (37) + (-37) + (-38)
= 0 + (-38) = -38 उत्तर

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HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6

Haryana State Board HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6 Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Exercise 8.6

प्रश्न 1.
निम्न को घटाओ :
(a) 20.75 रुपये में से 18.25 रुपये
(b) 250 मीटर में से 202.54 मीटर
(c) 8.4 रुपये में से 5.40 रुपये
(d) 5.206 किमी में से 2.051 किमी
(e) 2.107 किग्रा में से 0.314 किग्रा।
हल :
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6 1

प्रश्न 2.
मान ज्ञात कीजिए :
(a) 9.756 – 6.28
(b) 21.05 – 15.27
(c) 18.5 – 6.79
(d) 11.6 – 9.847
हल :
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6 2

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6

प्रश्न 3.
राजू एक पुस्तक 35.65 रुपये की खरीदता है। उसने दुकानदार को 50 रुपये दिये। दुकानदार ने उसे कितने रुपये वापस दिए ?
हल :
पुस्तक की कीमत = 35.65 रुपये
दुकानदार को दिए = 50 रुपये
वापस मिले पैसे = 50 रुपये – 35.65 रुपये
= 14.35 रुपये
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6 3
अतः दुकानदार ने उसे 14.35 रु. वापिस दिए। उत्तर

प्रश्न 4.
रानी के पास 18.50 रुपये हैं। उसने 11.75 रुपये की एक आइसक्रीम खरीदी। अब उसके पास कितने रुपये बचे?
हल :
रानी के पास = 18.50 रुपये
आइसक्रीम पर खर्च किए = 11.75 रुपये
रानी के पास बचे = 18.50 रुपये – 11.75 रुपये
= 6.75 रुपये
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6 4
अतः अब उसके पास रु. 8.75 बचे उत्तर

प्रश्न 5.
टीना के पास 20 मीटर 5 सेमी लम्बा कपड़ा है। उसमें से उसने एक पर्दा बनाने के लिए 4 मीटर 50 सेमी कपड़ा काट लिया। टीना के पास अब कितना लम्बा कपड़ा बचा ?
हल :
टीना के पास कुल कपड़ा = 20 मीटर 5 सेमी
= 20 मीटर + \(\frac{5}{100}\) मीटर
= 20 मीटर + .05 मीटर
= 20.05 मीटर
पर्दा बनाने में कपड़ा काटा = 4 मी 50 सेमी
= 4 मीटर + \(\frac{50}{100}\) मीटर
= 4 मीटर + .50 मीटर
= 4.50 मीटर
शेष बचा कपड़ा = 20.05 मीटर – 4.50 मीटर
अब,
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6 5
अतः टीना के पास शेष कपड़ा बचा = 15.55 मीटर उत्तर

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6

प्रश्न 6.
नमिता प्रतिदिन 20 किमी 50 मीटर की दूरी तय करती है। इसमें से 10 किमी 200 मीटर दूरी वह बस द्वारा तय करती है और शेष ऑटो-रिक्शा द्वारा। नमिता ऑटो-रिक्शा द्वारा कितनी दूरी तय करती है ?
हल :
कुल तय की गई दूरी
= 20 किमी 50 मीटर
= 20.050 किमी
बस द्वारा तय की गई दूरी = 10 किमी 200 मीटर
= 10.200 किमी
शेष ऑट-विरा द्वारा तय की गई दुरी
= 20.050 किमी – 10.200 किमी
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6 6
अत: ऑटो-रिया द्वारा तय की गई दूरी = 9.85 किमी

प्रश्न 7.
आकाश 10 किग्रा मस्ती सीता जिसमें से 3 किया 500 ग्राम पाज, किया 75 ग्राम टमाटर और शेष आल है। आल का मजन ज्ञात कीजिए।
हल :
कुल खरीदी गई सब्जी का वजन = 10 किग्रा
प्याज का वजन = 3 किग्रा 500 ग्राम
टमाटर का वजन = 2 किग्रा 75 ग्राम
आलू का वजन = ज्ञाता करना है।
प्याज और टमाटर का वजन = 3 किग्रा 500 ग्राम + 2 किम 75 ग्राम
= 5 किला 575 ग्राम
= 5.575 क्रिया
आलू का वजन = 10 किग्रा – 5 किग्रा 575 ग्राम
= 4 किग्रा 425 किग्रा = 4.425 किग्रा
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 8 दशमलव Ex 8.6 7
अतः आलू का वजन 4.425 किया है।

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 10 परिवहन तथा संचार

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 10 परिवहन तथा संचार Textbook Exercise Questions and Answers.

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अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. भारतीय रेल प्रणाली को कितने मंडलों में विभाजित किया गया है?
(A) 9
(B) 16
(C) 12
(D) 17
उत्तर:
(D) 17

2. निम्नलिखित में से कौन-सा भारत का सबसे लंबा राष्ट्रीय महामार्ग है?
(A) एन एच-1
(B) एन एच-7
(C) एन एच-6
(D) एन एच-8
उत्तर:
(D) एन एच-8

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 10 परिवहन तथा संचार

3. राष्ट्रीय जल मार्ग संख्या-1 किस नदी पर तथा किन दो स्थानों के बीच पड़ता है?
(A) ब्रह्मपुत्र-सादिया-धुबरी
(B) गंगा-हल्दिया-इलाहाबाद
(C) पश्चिमी तट नहर-कोट्टापुरम से कोल्लाम
(D) राजपुरम-मालिकपुर-राजहंस
उत्तर:
(B) गंगा-हल्दिया-इलाहाबाद

4. निम्नलिखित में से किस वर्ष में पहला रेडियो कार्यक्रम प्रसारित हुआ था?
(A) 1911
(B) 1927
(C) 1936
(D) 1923
उत्तर:
(D) 1923

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
परिवहन किन क्रियाकलापों को अभिव्यक्त करता है? परिवहन के तीन प्रमुख प्रकारों के नाम बताएँ।
उत्तर:
परिवहन तीन प्रकार के क्रियाकलापों को अभिव्यक्त करता है। परिवहन के तीन प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

  1. स्थल परिवहन
  2. जल परिवहन
  3. वायु परिवहन।

प्रश्न 2.
पाइप लाइन परिवहन से लाभ एवं हानि की विवेचना करें।
उत्तर:
लाभ-

  • तरल और गैस पदार्थों के लिए पाइप लाइनें सर्वश्रेष्ठ साधन हैं।
  • पाइप लाइनों को ऊबड़-खाबड़ भू-भागों तथा पानी के नीचे भी बिछाया जा सकता है।

हानि-

  • एक बार पाइप लाइन बिछ जाने के बाद उसकी क्षमता में वृद्धि नहीं की जा सकती।
  • भूमिगत पाइप लाइन की मरम्मत करना कठिन होता है।

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प्रश्न 3.
‘संचार’ से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
एक-स्थान से दूसरे स्थान पर सूचना एवं संदेश भेजने या प्राप्त करने की विस्तृत व्यवस्था को संचार कहा जाता है। रेडियो, दूरदर्शन, दूरभाष, उपग्रह संचार के मुख्य साधन हैं।

प्रश्न 4.
भारत में वायु परिवहन के क्षेत्र में ‘एयर इंडिया’ तथा ‘इंडियन’ के योगदान की विवेचना करें।
उत्तर:
एयर इण्डिया-एयर इण्डिया विदेशी उड़ानों की व्यवस्था करता है। यह यात्रियों व नौयार यातायात दोनों के लिए अंतर्राष्ट्रीय वायु सेवाएँ उपलब्ध कराता है। यह अपनी सेवाओं द्वारा विश्व के सभी महाद्वीपों को जोड़ता है।

इण्डियन इण्डियन देश में प्रमुख घरेलू उड़ानें भरती है। एयरलाइंस एयर के साथ मिलकर यह देश के 63 स्थानों से अधिक को वायु सेवा उपलब्ध कराती है। 8 दिसंबर, 2005 को इण्डियन एयरलाइंस ने अपने नाम से ‘एयरलाइंस’ शब्द को अलग कर दिया और अब इसे केवल ‘इण्डियन’ के नाम से ही जाना जाता है। अब इसे नए लोगों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
भारत में परिवहन के प्रमुख साधन कौन-कौन से हैं? इनके विकास को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना करें।
उत्तर:
भारत में परिवहन के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं-
HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 10 परिवहन तथा संचार 1
परिवहन के विभिन्न साधनों के विकास को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-
1. भौगोलिक कारक-तकनीकी दृष्टि से रेलमार्गों व सड़क के निर्माण के लिए समतल मैदानी क्षेत्र सर्वश्रेष्ठ होते हैं। जबकि पठारी क्षेत्रों में असमतल धरातल के कारण रेल की पटरियों को बिछाना व सड़कें बनाना महंगा और कठिन होता है। इसलिए मैदानी क्षेत्रों में सड़कों का घनत्व तथा गुणवता दोनों ही ऊँचे होते हैं। असमतल धरातल के कारण ही उत्तर की ओर हिमालय पर्वत श्रेणियों पर रेलमार्ग नहीं बनाए जा सके।

2. आर्थिक कारक-सड़क व रेलमार्गों के विकास के लिए आर्थिक परिस्थितियों का अनुकूल होना भी आवश्यक है। यही कारण है कि सघन जनसंख्या, विकसित कृषि क्षेत्र तथा औद्योगिक प्रदेशों में परिवहन के साधनों का सबसे अधिक विकास हुआ है।

3. राजनीतिक कारक-स्वतंत्रता-प्राप्ति से पहले अंग्रेजों ने परिवहन के साधनों का विकास अपने शासन को दृढ़ करने, सैनिक शक्ति को बढ़ाने और भारत के कच्चे माल का शोषण करने के उद्देश्य से ही किया था। उन्होंने बंदरगाहों को उनके संपूर्ण पृष्ठ प्रदेश से इसलिए जोड़ा ताकि गाँवों से अधिशेष उत्पाद छोटे नगरों, वहाँ से बड़े नगरों और फिर बंदरगाहों तक लाया जा सके। रेलमार्गों के विकास ने अंतर्देशीय जल परिवहन का महत्त्व कम किया है। भारी और कम मूल्य के पदार्थों की पूर्ति के लिए जलमार्ग सस्ते व उपयुक्त साधन हैं।

विशाल दूरियों और विभिन्न भू-आकारों वाले देश में वायुयान जैसे परिवहन के आधुनिक साधन का महत्त्व दिनो-दिन बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 2.
पाइप लाइन परिवहन से लाभ एवं हानि की विवेचना करें।
उत्तर:
परिवहन के विभिन्न साधनों में से पाइप लाइन परिवहन एक आधुनिक परिवहन का साधन है। यह एक सस्ती एवं सुगम परिवहन प्रणाली है। इस साधन का उपयोग खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस को एक-स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए किया जाता है। वस्तुतः खनिज तेल और प्राकृतिक गैस जिन स्थानों से निकाले जाते हैं वहाँ उनका उपभोग नहीं हो सकता, इसीलिए इन तरल पदार्थों का परिवहन पाइप लाइनों के द्वारा उपभोग के स्थान पर तथा तेल शोधनशालाओं तक पहुँचाया जाता है। पाइप लाइनों से पूर्व यह कार्य सड़कों तथा रेलों द्वारा किया जाता था जिससे अधिक व्यय के साथ-साथ कठिनाई भी होती थी, लेकिन बाद में पाइप लाइनों का प्रयोग किए जाने से कई समस्याओं का समाधान हो गया।

पाइप लाइन परिवहन के लाभ-पाइप लाइन परिवहन के लाभ निम्नलिखित हैं-

  • पाइप लाइनों को ऊबड़-खाबड़ भूमि पर बिछाया जा सकता है।
  • पाइप लाइनों को पानी के नीचे भी बिछाया जा सकता है।
  • तरल व गैस पदार्थों के परिवहन का सबसे उत्तम माध्यम है।
  • पाइप लाइनों के रख-रखाव में बहुत कम खर्चा होता है।
  • इनमें ऊर्जा का उपयोग भी कम होता है।
  • यह परिवहन पर्यावरण अनुकूलन है।

पाइप लाइन परिवहन की हानियाँ-पाइप लाइन परिवहन की हानियाँ निम्नलिखित हैं-

  • पाइप लाइनों को बिछाने के बाद इसकी क्षमता को घटाया या बढ़ाया नहीं जा सकता।
  • लोचशीलता के अभाव के कारण पाइप लाइन परिवहन को निश्चित स्थानों के लिए ही प्रयोग किया जा सकता है।
  • पाइप लाइनों की सुरक्षा व्यवस्था करना कठिन होता है।
  • पाइप लाइनों के मरम्मत में भी बहुत कठिनाई आती है।

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प्रश्न 3.
भारत के आर्थिक विकास में सड़कों की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
आदिकाल से ही भारत में स्थल मार्ग परिवहन के अन्तर्गत सड़कों का अधिक महत्त्व रहा है। इसे परिवहन के अन्य सभी प्रकारों का आधार स्तम्भ भी कहा जा सकता है। सड़क परिवहन अपनी लचक, माल की सुरक्षा, समय की बचत, सेवा का व्यापक क्षेत्र तथा सस्ती सेवा के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय साधन माना जाता है। भारत में सड़कों की व्यवस्था बहुत पुरानी है। यह मोहनजोदड़ो और हड़प्पा काल के क्षेत्रों की खुदाई के पश्चात् भी पाई गई थी। भारतीय शासकों ने अपने राज्यों को दूसरे राज्यों से जोड़ने के लिए अनेक सड़कों का निर्माण करवाया। इन पक्की सड़कों पर जल के बहकर चले जाने की व्यवस्था भी रखी गई थी। सम्राट अशोक ने इन राजकीय राजमार्गों को सुधारा तथा उनका विस्तार किया।

मुगल बादशाहों में शेरशाह सूरी का योगदान सड़कें बनाने में अत्यधिक माना जाता है। उन्होंने ढाका से वाराणसी, आगरा, दिल्ली होते हुए लाहौर तक और वहाँ से सिन्धु नदी तक ग्रांड ट्रंक रोड (G.T. Road) बनवाई जो आगरा से जोधपुर, आगरा से इन्दौर, आगरा से चित्तौड़गढ़ तथा लाहौर से मुल्तान तक जाती थी। बाद में अंग्रेजों द्वारा इस ग्रांड ट्रंक रोड की मुरम्मत वर्ष 1880 में करवाई गई। यह राष्ट्रीय राजमार्ग शेरशाह सूरी मार्ग के नाम से जाना जाता है। सन् 1870 के पश्चात् अंग्रेजों का ध्यान रेलमार्गों के विकास की ओर होने के कारण सड़कों का विकास तीव्र गति से नहीं हो पाया। केवल उन्हीं सड़क मार्गों के निर्माणों पर ध्यान दिया गया जिनका आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से अधिक महत्त्व था।

भारत के आर्थिक विकास में सड़कों की भूमिका इस प्रकार है
1. राष्ट्रीय राजमार्ग ये राजमार्ग राज्य की राजधानियों, बड़े-बड़े औद्योगिक तथा व्यापारिक नगरों, मुख्य बंदरगाहों, खनन क्षेत्रों तथा राष्ट्रीय महत्त्व के शहरों तथा कस्बों को आपस में जोड़ते हैं जो न केवल आर्थिक दृष्टि से, अपितु सैनिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण, सुधार, रख-रखाव तथा विकास की जिम्मेदारी पूर्णतः केन्द्र सरकार की है। ये भारत को म्यांमार, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, चीन तथा पाकिस्तान से भी जोड़ता है। भारत में कुल सड़क परिवहन का लगभग 40% राष्ट्रीय राजमार्गों से होकर गुजरता है, जबकि कुल सड़क तंत्र में इनका हिस्सा केवल 15% है।

2. प्रांतीय अथवा राजकीय राजमार्ग-ये राज्यों की प्रमुख सड़कें हैं। ये व्यापार, उद्योग तथा सवारी यातायात की दृष्टि से राज्यों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। ये सड़कें राज्य के प्रत्येक कस्बे, जिला मुख्यालयों, राज्य के महत्त्वपूर्ण व्यापारिक-औद्योगिक नगरों तथा राज्य की राजधानी को आपस में जोड़ती हैं। ये राष्ट्रीय राजमार्गों तथा निकटवर्ती राज्यों से मिली होती हैं। इन राजमार्गों के निर्माण तथा रख-रखाव की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर होती है।

3. जिला सड़कें-ये सड़कें जिले के बड़े गांवों, विभिन्न कस्बों, प्रमुख नगरों, उत्पादक केन्द्रों और मण्डियों को आपस में तथा जिला मुख्यालय से जोड़ती हैं। इनमें से अधिकांश सड़कें कच्ची होती हैं जो वर्षा काल में अनुपयुक्त हो जाती हैं। अनेक स्थानों पर ये बड़ी सड़कों से भी जुड़ी होती हैं। इनके निर्माण तथा देखभाल का दायित्व जिला बोर्ड, जिला परिषदों या संबंधित सार्वजनिक निर्माण विभाग का होता है।

4. ग्रामीण सड़कें विभिन्न गांवों को आपस में जोड़ने वाली ये सड़कें गांवों को जिला एवं राज्य सड़कों से भी जोड़ती हैं। ये सड़कें प्रायः कच्ची संकरी तथा पगडण्डियाँ मात्र होती हैं। ग्राम पंचायत इन सड़कों का निर्माण तथा रख-रखाव करती है। जिला प्रशासन भी इन सड़कों के निर्माण में सहायता करता है। आजकल इन्हें पक्का करने की प्राथमिकता दी जा रही है।

5. द्रुत राजमार्ग-देश में व्यापारिक यातायात के त्वरित संचलन के लिए इन राजमार्गों का निर्माण किया जाता है।

प्रमुख द्रुत राजमार्ग हैं-

  • पूर्वी एक्सप्रेस राजमार्ग
  • पश्चिमी एक्सप्रेस राजमार्ग
  • कोलकाता से दमदम हवाई अड्डे के बीच द्रुत राजमार्ग
  • सुकिन्दा खानों से पारा बन्दरगाह के बीच द्रुत राजमार्ग
  • दुर्गा-कोलकाता द्रुत राजमार्ग
  • दिल्ली-आगरा द्रुत राजमार्ग
  • अहमदाबाद-वडोदरा द्रुत राजमार्ग।

6. अन्तर्राष्ट्रीय राजमार्ग-ये राजमार्ग एशिया-प्रशान्त आर्थिक एवं सामाजिक आयोग के साथ किए गए करार के अधीन विश्व बैंक की सहायता से बनाए गए हैं। इनका उद्देश्य भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों को इन राजमार्गों से जोड़ना है, जिससे ये पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार तथा बांग्लादेश के साथ जुड़ सकें।

7. सीमा सड़कें देश की सीमाओं पर सीमावर्ती सड़कों के निर्माण व रख-रखाव के लिए सन् 1960 में सीमा सड़कें विकास बोर्ड की स्थापना की गई। इसकी स्थापना का उद्देश्य अल्प-विकसित जंगली, पर्वतीय तथा मरुस्थलीय सीमा क्षेत्रों में आर्थिक विकास को गति देने के साथ-साथ रक्षा सैनिकों के लिए अनिवार्य आपूर्ति को भी बनाए रखना था। देश की प्रतिरक्षा तथा सुरक्षा में इन सड़कों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह संगठन हिमालय, पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों तथा राजस्थान के मरुस्थलीय भागों में सड़कों के निर्माण तथा रख-रखाव के लिए उत्तरदायी है।

परिवहन तथा संचार HBSE 12th Class Geography Notes

→ परिवहन तंत्र (Transport System) : यह एक ऐसा तंत्र है जिसमें यात्रियों तथा माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाया और ले जाया जाता है।

→ परिवहन के साधन (Sources of Transport) : परिवहन के साधनों को सामान्यतया तीन वर्गों में बाँटा गया है-

  • स्थल परिवहन : स्थल परिवहन के अंतर्गत सड़क और रेल परिवहन आते हैं।
  • जल परिवहन : जल परिवहन के अंतर्गत नदियाँ तथा अंतःस्थलीय परिवहन आता है।
  • वायु परिवहन : वायु परिवहन देश के आधुनिक परिवहन का साधन है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 10 परिवहन तथा संचार

→ भारत की मुख्य सड़कें (Main Roads of India):

  • स्वर्णिम चतुर्भुज महा राजमार्ग : दिल्ली-कोलकाता, चेन्नई-मुंबई व दिल्ली को जोड़ने वाले 6 लेन वाले महामार्ग।
  • राष्ट्रीय राजमार्ग : देश के दूरस्थ भागों को जोड़ने वाले मार्ग; जैसे दिल्ली-अमृतसर मार्ग (राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-1)।
  • राज्य राजमार्ग : राज्यों की राजधानियों को जिला मुख्यालयों से जोड़ने वाले मार्ग।
  • जिला मार्ग : जिले के विभिन्न प्रशासनिक केंद्रों को जिला मुख्यालय से जोड़ने वाले मार्ग।
  • ग्रामीण सड़कें : ग्रामीण क्षेत्रों तथा गाँवों को शहरों से जोड़ने वाली सड़कें।
  • सीमांत सड़कें : सीमा सड़क संगठन द्वारा देश के सीमावर्ती दुर्गम क्षेत्रों में बनाई गई सड़कें।

→ संचार तंत्र (Communication System): एक-स्थान से दूसरे स्थान पर सूचना एवं संदेश भेजने या प्राप्त करने की विस्तृत व्यवस्था को संचार तंत्र कहा जाता है।

→ संचार के साधन (Sources of Communication) : रेडियो, टी०वी०, दूरभाष, उपग्रह, यंत्र, पोस्टकार्ड, समाचार-पत्र व पत्रिकाएँ, चलचित्र आदि। नोट : भारतीय रेल प्रणाली में पहले 16 रेल मंडल होते थे, लेकिन वर्तमान में 17 रेल मंडल हो चुके हैं। मैट्रो रेल मण्डल नया मण्डल बना है।

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HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1

Haryana State Board HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1 Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Exercise 6.1

प्रश्न 1.
निम्नलिखित के विपरीत (opposites) लिखिए:
(a) भार में वृद्धि
(b) 30 किमी उत्तर दिशा
(c) 80 मी पूर्व
(d) 1700 की हानि
(e) समुद्र तल से 100 मीटर ऊपर।
हल :
(a) भार में कमी,
(b) 30 किमी दक्षिण दिशा,
(c) 80 मी पश्चिम,
(d) ₹ 700 का लाभ,
(e) समुद्र तल से 100 मीटर नीचे।

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में प्रयुक्त हुई संख्याओं को उचित चिह्न लगाकर पूर्णाकों के रूप में लिखिए :
(a) एक हवाई जहाज भूमि से दो हजार मीटर की ऊँचाई पर उड़ रहा है।
(b) एक पनडुब्बी समुद्र तल से 800 मीटर की गहराई पर चल रही है।
(c) खाते में 200 रु. जमा कराना।
(d) खाते में से 700 रु. निकालना।
हल :
(a) + 2000,
(b) – 800,
(c) + 200,
(d) – 700,

प्रश्न 3.
निम्नलिखित संख्याओं को संख्या रेखा पर निरूपित कीजिए:
(a) + 5,
(b) – 10,
(c) + 8,
(d) – 1,
(e) – 6.
हल :
पूर्णांकों को संख्या रेखा पर निरूपित करने के लिए हम एक रेखा खींचते हैं। उसके मध्य में एक बिन्दु O अंकित किया। अब बिन्दु O के दाईं ओर और बाई ओर समान दूरी पर बिन्दु अंकित करते हैं। O के दाईं ओर 1, 2, 3, 4, … इत्यादि धनात्मक संख्याएँ रखते हैं तथा 0 के बाई ओर – 1, – 2, – 3, – 4, … इत्यादि ऋणात्मक संख्याएँ रखते हैं, जैसा कि आकृति में दर्शाया गया है :
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1 - 1
अत: संख्या रेखा पर (a) + 5. (b) – 10. (c) + 8, (d) – 1, (e) – 6 को क्रमशः बिन्दुओं A, B, C, D, E द्वारा दर्शाया गया है।

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1

प्रश्न 4.
संलग्न आकृति में एक ऊर्ध्वाधर संख्या रेखा को दिखाया गया है, जो पूर्णाकों को निरूपित करती है। इस रेखा को देखिए और निम्नलिखित बिन्दुओं के स्थान ज्ञात कीजिए:
(a) यदि बिन्दु D पूर्णाक + 8 है, तो – 8 वाला बिन्दु कौन-सा है ?
(b) क्या G एक ऋणात्मक पूर्णाक हैया धनात्मक ?
(c) बिन्दु B और E के संगत पूर्णाक लिखिए।
(d) इस संख्या रेखा पर अंकित बिन्दुओं में से किसका मान सबसे कम है ?
(e) सभी बिन्दुओं को उनके मानों के घटते हुए क्रम में लिखिए।
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1 - 2
हल :
दी गई ऊर्ध्वाधर संख्या रेखा में :
(a) बिन्दु F, – 8 को निरूपित करता है।
(b) ∵ बिन्दु G, O से नीचे स्थित है, अत: यह ऋणात्मक पूर्णांक है।
(c) बिन्दु B, + 4 को निरूपित करता है, तथा बिन्दु E, – 10 को निरूपित करता है।
(d) E का सबसे कम मान है।
(e) बिन्दुओं को अवरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर, D, C, B, A, O, H, G, E, E.

प्रश्न 5.
वर्ष के विशेष दिन के लिए भारत के पाँच स्थानों पर रहे तापमानों की सूची नीचे दी गई है। +

स्थानतापमान
सियाचिन0°C से 10°C नीचे …………………..
शिमला0°C से 2°C नीचे …………………..
अहमदाबाद0°C से 30°C नीचे …………………..
दिल्ली0°C से 20°C नीचे …………………..
श्रीनगर0°C से 5°C नीचे …………………..

(a) इन स्थानों के तापमानों को पूर्णाकों के रूप में रिक्त स्तम्भ में लिखिए।
(b) निम्नलिखित संख्या रेखा डिग्री सेल्सियस (Degree Celsius) में तापमानों को निरूपित करती है :
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1 - 3
उपर्युक्त स्थानों के नाम संख्या रेखा पर उनके तापमानों के संगत अंकित कीजिए।
(c) कौन-सा स्थान सबसे ठण्डा है?
(d) उन स्थानों के नाम लिखिए जिनका तापमान 10°C से ऊपर है।
हल :
(a) सियाचिन : – 10°C, शिमला : – 2°C, अहमदाबाद : + 30°C, दिल्ली : + 20°C, श्रीनगर : – 5°C.
(b) उपर्युक्त स्थानों के तापमानों को संख्या रेखा पर व्यक्त करने पर :
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1 - 4
(c) सबसे ठण्डा स्थान सियाचिन है।
(d) 10°C से ऊपर तापमान दिल्ली तथा अहमदाबाद का है।

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1

प्रश्न 6.
निम्नलिखित युग्मों में कौन-सी संख्या, संख्या रेखा पर दूसरी संख्या के दाईं ओर स्थित है ?
(a) 2, 9
(b) – 3, – 8
(c) 0, – 1
(d) – 11, 10
(e) – 6, 6
(f) 1, – 100
हल :
(a) संख्या रेखा पर 9, 2 की दाई ओर है।
(b) संख्या रेखा पर – 3, – 8 की दाईं ओर है।
(c) संख्या रेखा पर 0, – 1 की दाई ओर है।
(d) संख्या रेखा पर 10, – 11 की दाईं ओर है।
(e) संख्या रेखा पर 6, – 6 की दाईं ओर है।
(f) संख्या रेखा पर 1, – 100 की दाई ओर है।

प्रश्न 7.
नीचे दिए हुए युग्मों के पूर्णांकों के बीच के सभी पूर्णांक लिखिए (बढ़ते हुए क्रम में लिखिए):
(a) 0 और – 7,
(b) – 4 और 4,
(c) – 8 और – 15,
(d) – 30 और – 23.
हल :
(a) 0 और – 7 के बीच के सभी पूर्णांक बढ़ते हुए क्रम में :
-6, – 5, – 4, – 3, – 2, – 1.
(b) – 4 और 4 के बीच के सभी पूर्णाक बढ़ते हुए क्रम में :
– 3, – 2, – 1, 0, 1, 2, 3.
(c) – 8 और – 15 के बीच के सभी पूर्णांक बढ़ते हुए क्रम में :
– 14, – 13, – 12, – 11, – 10, – 9.
(d) – 30 और – 23 के बीच के सभी पूर्णांक बढ़ते हुए क्रम में:
– 29, – 28, – 27, – 26, – 25, – 24.

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1

प्रश्न 8.
(a) – 20 से बड़े चार ऋणात्मक पूर्णांक लिखिए।
(b) – 10 से छोटे चार ऋणात्मक पूर्णांक लिखिए।
हल :
(a) – 20 से चार बड़े ऋणात्मक पूर्णांक निम्न हैं: – 19, – 18, – 17 तथा – 16
(b) – 10 से छोटे चार ऋणात्मक पूर्णांक हैं : – 11, – 12, – 13 तथा – 14

प्रश्न 9.
निम्नलिखित कथनों के लिए सत्य अथवा असत्य लिखिए। यदि कथन असत्य है, तो सत्य बनाइए।
(a) संख्या रेखा पर – 8, – 10 के दाईं ओर स्थित है।
(b) संख्या रेखा पर – 100, – 50 के दाईं ओर स्थित है।
(c) सबसे छोटा ऋणात्मक पूर्णांक – 1 है।
(d) – 26 पूर्णांक – 25 से बड़ा है।
हल :
(a) सत्य।
(b) असत्य, सत्य कथन निम्न है – संख्या रेखा पर – 100, – 50 के बाई ओर स्थित है।
(c) असत्य, सत्य कथन निम्न है – सबसे बड़ा ऋणात्मक पूर्णांक – 1 है।
(d) असत्य, सत्य कथन निम्न है – -26 पूर्णांक – 25 से छोटा है।

HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1

प्रश्न 10.
एक संख्या रेखा खींचिए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(a) यदि हम – 2 के दाईं ओर 4 कदम चलें, तो हम किस संख्या पर पहुंच जाएंगे?
(b) यदि हम 1 के बाईं ओर 5 कदम चलें, तो हम किस संख्या पर पहुँच जाएंगे?
(c) यदि हम संख्या रेखा पर – 8 पर हैं, तो – 13 पर पहुँचने के लिए हमें किस दिशा में चलना चाहिए ?
(d) यदि हम संख्या रेखा पर – 6 पर हैं, तो – 1 पर पहुँचने के लिए हमें किस दिशा में चलना चाहिए?
हल :
(a) जब हम संख्या रेखा पर – 2 से दाईं ओर चलना शुरू करते हैं, तो 4 कदम चलने पर 2 प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त किया गया है।
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1 - 5
(b) जब हम संख्या रेखा पर 1 के बाईं ओर चलना शुरू करते हैं, तो 5 कदम चलने पर – 4 पूर्णांक प्राप्त होता है। जैसा कि संख्या रेखा पर व्यक्त किया गया है।
HBSE 6th Class Maths Solutions Chapter 6 पूर्णांक Ex 6.1 - 6
(c) चूकि – 13 < – 8, अतः – 13 पर पहुँचने के लिए हमें संख्या रेखा पर – 8 पूर्णांक के बाईं ओर चलना होगा। (d) चूँकि – 1 > – 6, अत: संख्या रेखा पर – 6 से – 1 तक पहुँचने के लिए हमें – 6 के दाईं ओर चलना होगा।

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