Author name: Bhagya

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.1

Haryana State Board HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.1 Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.1

प्रश्न 1.
निम्नलिखित व्यंजकों में से प्रत्येक के पदों एवं गुणांकों को पहचानिए-
(i) 5xyz2 – 3zy
(ii) 1 + x + x2
(iii) 4x2y2 – 4x2y2 + z2
(iv) 3 – pq + qr – rp
(v) \(\frac{x}{2}\) + \(\frac{y}{2}\) – xy
(vi) 0.3a – 0.6ab + 0.5b
हल:
(i) 5xyz2 – 3zy मैं दूसरे पद है।
पहले पद 5xyz2 का गुणांक = 5
दूसरे पद -3zy का गुणांक = -3

(ii) 1 + x + x2 तीन पद है।
पहले पद 1 का गुणांक = 1
दूसरे पद x का गुणांक = 1
तिसरे पद x2 का गुणांक = 1

(iii) 4x2y2 – 4x2y2z2 + z2 मैं तीन पद है।
पहले पद 4x2y2 का गुणांक = 4
दूसरे पद – 4x2y2z2 का गुणांक = -4
तिसरे पद z2 का गुणांक = 1

(iv) 3 – pq + qr – rp मैं तीन पद है।
पहले पद 3 का गुणांक = 3
दूसरे पद -pq का गुणांक = -1
तिसरे पद qr का गुणांक = 1
चैथे पद -rp का गुणांक = -1

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(v) \(\frac{x}{2}\) + \(\frac{y}{2}\) – xy मैं तीन पद है।
पहले पद \(\frac{x}{2}\) का गुणांक = \(\frac{1}{2}\)
दूसरे पद \(\frac{y}{2}\) का गुणांक = \(\frac{1}{2}\)
तिसरे पद -xy का गुणांक = -1

(vi) 0.3a – 0.6ab + 0.5b मैं तीन पद है।
पहले पद 0.3a का गुणांक = 0.3
दूसरे पद – 0.6ab का गुणांक = – 0.6
तिसरे पद 0.5b का गुणांक = 0.5

प्रश्न 2.
निम्नलिखित बहुपदों को एकपदी, द्विपद एवं त्रिपद के रूप में वर्गीकृत कीजिए। कौन-सा बहुपद इन तीन श्रेणियों में से किसी में भी नहीं है?
x + y, 1000, x + x2 + x3 + x4, 7 + y + 5x,
2y – 3y2, 2y – 3y2 + 4y3, 5x – 4y + 3xy,
4z – 15z2, ab + bc + cd + da, pqr, p2q + pq2, 2p + 2q.
हल:
दिए गए बहुपद वर्गीकृत करने पर
एकपदी: 1000, pqr
द्विपदी: x + y, 2y – 3y2, 4z – 15z2, p2q + pq2, 2p + 2q
त्रिपदी: 7 + y + 5x, 2y – 3y2 + 4y3, 5x – 4y + 3xy
वे बहुपद जो तीनों श्रेणियों में से किसी में भी नहीं आते है-
x + x2 + x3 + x4, ab + bc + cd + da,

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित का योग ज्ञात कीजिए-
(i) ab – bc, bc – ca, ca – ab
(ii) a – b + ab, b – c + bc, c – a + ac
(iii) 2p2q2 – 3pq + 4, 5 + 7pq – 3p2q2
(iv) l2 + m2, m2 + n2, n2 + l2, 2lm + 2mn + 2nl.
हल:
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.1 -1

प्रश्न 4.
(a) 12a – 9ab + 5b – 3 में से 4a – 7ab + 3b + 12 को घटाइए।
हल:
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(b) 5xy – 2yz – 2zx + 10xyz में से 3xy + 5yz – 7zx को घटाइए।
हल:
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(c) 18 – 3p – 11q + 5pq – 2pq2 + 5p2q में से 4p2q – 3pq + 5pq2 – 8p + 7q – 10 को घटाइए।
हल:
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Ex 9.1 -4

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HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions

Haryana State Board HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions

(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 146)

प्रश्न 1.
एक चर वाले और दो चरों वाले व्यंजकों के पाँच-पाँच उदाहरण दीजिए।
हल:
एक चर वाले व्यंजक के पाँच उदाहरण x + 6, x – 6, 6 + y, 7 – y और 4 + 3x
दो चरों वाले व्यंजकों के पाँच उदाहरण- x + 6y, x – 2y, 4x + y, 2x – y और 3x + 2y

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions

प्रश्न 2.
x, x – 4, 2x + 1, 3x – 2 को संख्या रेखा पर दर्शाइए।
हल:
व्यंजक x का निरूपण-
माना संख्या रेखा पर चर x की स्थिति x है तो X, x को प्रदर्शित करता है जैसा आकृति में दिया है-
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions -1
व्यंजक x – 4 का निरूपण-
माना स्थिति X चर x को प्रदर्शित करती है।
यहाँ हम एक बिन्दु P चाहते हैं जो x से 4 कम हो। अतः x से आरम्भ करके यह बिन्दु X की बाईं ओर 4 इकाई दूरी पर होगा, जैसा कि आकृति में दिखाया गया है।
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2x + 1 का निरूपण-
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions -3
माना चर x की संख्या रेखा पर स्थिति x है। 2x की स्थिति बिन्दु A पर इस प्रकार है
OA = 2 × OX = 2x.
यहाँ, हमें 2x + 1 प्राप्त करना है अर्थात् 2x से एक अधिक। | अतः हम A से प्रारम्भ करेंगे और A के दाएँ 1 इकाई दूरी पर P होगा जो 2x + 1 को प्रदर्शित करता है, जैसा कि आकृति में दिखाया गया है।

व्यंजक 3x -2 का निरूपण-
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions -4
माना संख्या रेखा पर चर x की स्थिति x है। बिन्दु A, पर 3x की स्थिति इस प्रकार है-OA2 = 3 × OX = 3x. यहाँ, हमें 3x – 2 प्राप्त करना है अर्थात् 3x से 2 कम। अतः, हम A, से प्रारम्भ करेंगे और इसके बाएँ 2 इकाई बिन्दु पर P प्राप्त करेंगे जो 3x – 2 को प्रदर्शित करता है, जैसा कि आकृति में दिखाया गया है।

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions

(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 146)

प्रश्न 1.
व्यंजक x2y2 – 10x2y + 5xy2 – 20 के प्रत्येक पद के गुणांक को पहचानिए।
हल:
व्यंजक x2y2 – 10x2y2 + 5xy2 – 20 में x2y2 पद में xy का गुणांक 1 है।
– 10xy2 पद में ry का गुणांक – 10 है।
5xy2 पद में xy2 का गुणांक 5 है।

(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 146)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित बहुपदों को एकपद, द्विपद एवं त्रिपद के रूप में वर्गीकृत कीजिए -z + 5, x + y + z, y + z + 100, ab – ac, 17
हल:
दिए गए बहुपद निम्न प्रकार वर्गीकृत होंगे
एक पद : 17
द्विपद : -z + 5, ab – ac
त्रिपद : x + y + z, y + z + 100

प्रश्न 2.
बनाइए
(a) तीन ऐसे द्विपद जिनमें केवल एक चर x हों।
(b) तीन ऐसे द्विपद जिनमें x और y चर हों।
(c) तीन एकपद जिनमें और y चर हों।
(d) चार अथवा अधिक पदों वाले 2 बहुपद।
हल:
(a) तीन ऐसे द्विपद जिनमें केवल एक चर x हो वे हैं- 2x + 3, 4x + 7, 3 – x
(b) तीन द्विपद जिनमें x और y चर हों वे हैं- x + y, xy – 7, 4x – y.
(c) तीन एकपद, जिनमें x और y चर हों वे हैं xy, 3x2y, – 5xy2
(d) चार या अधिक पद वाले 2 बहुपद हैं-
3x3 – x2 + 2x + 3, 4 – 5x + 6x2 – 2x3 – 2x4

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions

(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 147)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से प्रत्येक के दो समान पद लिखिए
(i) 7xy
(ii) 4mn2
(iii) 2l
हल:
(i) 7xy के दो समान पद हैं 5xy, – 3xy

(ii) 4mn2 के दो समान पद हैं 3mn2, – 4n2m.

(iii) 2l के दो समान पद हैं 3l, – 4l

(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 150)

प्रश्न 1.
क्या आप ऐसी और दो परिस्थितियों के बारे में सोच सकते हैं जहाँ हमें बीजीय व्यंजकों को गुणा करना पड़ सकता है?
संकेत-
(i) एक वस्तु का अंकित मूल्य ₹ (x+2) हैं। इसी प्रकार की (x-5 y)$ वस्तुओं का मूल्य ज्ञात करने के लिये अंकित मूल्य व वस्तुओं की संख्या का गुणा करना पड़ेगा।

(ii) स्कूटर 2y km/hr की रफ्तार से (2x+5) hr के लिये चलता है। स्कूटर द्वारा तय की दूरी ज्ञात करने के लिए स्कूटर की रफ्तार व समय का गुणा करना होगा।

(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 151)

प्रश्न 1.
4x × 5y × 72 ज्ञात कीजिए-
सर्वप्रथम 4x × 5y ज्ञात कीजिए और फिर उसे 7z से गणा कीजिए, अथवा सर्वप्रथम 5y × 7z ज्ञात कीजिए और इसे 4x से गुणा कीजिए।
क्या परिणाम एक जैसा है? आप क्या विचार करते हैं? क्या गुणा करते समय क्रम का महत्त्व है?
हल:

4x × 5y × 7z = (4x × 5y) × 7z
= 20xy × 7 = 140xyz

और 4x × 5y ×7z = 4x × (5y × 7z)
= 4x × 35yz = 140xyz
∴ (4x × 5y) × 7z = 4x × (5y × 72) अर्थात् परिणाम एक जैसा है।
अतः एकपदी का गुणन साहचर्य है। अर्थात् हम किसी भी क्रम में गुणा करें क्रम का महत्त्व नहीं है।

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(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 153)

प्रश्न 1.
गुणनफल ज्ञात कीजिए-
(i) 2x(3x + 5xy)
(ii) a2(2ab – 5c)
हल:
(i) 2x(3x +5xy) = 2x × 3x + 2x × 5xy
= 6x2 + 10x2y

(ii) a2(2ab – 5c) = a2 × 2ab – a2 × 5c
= 2a3b – 5a2c

(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 158)

प्रश्न 1.
(4p2 + 5p + 7) × 3p का गुणनफल ज्ञात कीजिए।
हल:
(4p2 + 5p +7) × 3p = 4p2 × 3p + 5p × 3p + 7 × 3p
= 12p3 + 15p2 + 21p

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 9 बीजीय व्यंजक एवं सर्वसमिकाएँ Intext Questions

(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 158)

प्रश्न 1.
सर्वसमिका (I) में b के स्थान पर -b रखिए।क्या आपको सर्वसमिका (II) प्राप्त होती है?
हल:
(a + b)2 = a2 + 2ab + b2 में b = – b रखने पर
(a + (-b))2 = a2 + 2a(-b) + (-b)2
या (a – b)2 = a2 – 2ab + b2
अतः सर्वसमिका I में b = – b रखने पर सर्वसमिका II प्राप्त होती है।

(प्रयास कीजिए – पृष्ठ 158)

प्रश्न 1.
a = 2, b = 3, x = 5 के लिए सर्वसमिका (IV) का सत्यापन कीजिए।
[सर्वसमिका IV : (x + a) (x + b) = x2 + (a + b)x + ab]
हल:
a = 2, b = 3, x = 5 के लिए
बायाँ पक्ष = (5 + 2) (5 + 3) = (7) (8) = 56
और, दायाँ पक्ष = (5) + (2 + 3) (5) + (2) (3)
= 25 + 25 + 6 = 56
अतः, सर्वसमिका के दोनों पक्षों के मान a = 2, b = 3, x = 5 के लिए समान हैं।

प्रश्न 2.
सर्वसमिका (IV) में a = b लेने पर, आप क्या प्राप्त करते हैं? क्या यह सर्वसमिका (1) से सम्बन्धित है?
हल:
जब a = b तो सर्वसमिका (IV) होगी
(x + b) (x + b) = x2 + (b + b)x + (b.b)
या (x+ b) = x2 + 2bx + b2
हाँ, यह सर्वसमिका (I) से सम्बन्धित है।

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प्रश्न 3.
सर्वसमिका (IV) में a = -c तथा b = -c लेने पर आप क्या प्राप्त करते हैं? क्या यह सर्वसमिका (II) से सम्बन्धित है?
हल:
जब a = – c और b = -c, तो सर्वसमिका (IV) होगी
[(x+ (-c)][x + (-c)] = x2 + (-c-c)x + (-c) (-c)
⇒ (x – c) (x – c) = x2 + (-2c)x + c2
⇒ (x – c)2 = x2 – 2cx + c2
हाँ, यह सर्वसमिका (II) से सम्बन्धित है।

प्रश्न 4.
सर्वसमिका (IV) में b = -a लीजिए। आप क्या पाते हैं? क्या यह सर्वसमिका (III) से सम्बन्धित है?
हल:
जब b = – a तो सर्वसमिका (IV) होगी
(x + a) [(x + (-a)], = x2 + (a – a)x + (a)(-a)
या (x + a) (x – a) = x2 – a2
हाँ, यह सर्वसमिका (III) से सम्बन्धित है।

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HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2

Haryana State Board HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2

प्रश्न 1.
अभाज्य गुणनखंडन विधि द्वारा निम्नलिखित में से प्रत्येक संख्या का घनमूल ज्ञात कीजिए
(i) 64
(ii) 512
(iii) 10648
(iv) 27000
(v) 15625
(vi) 13824
(vii) 110592
(viii) 46656
(ix) 175616
(x) 91125
हल:
(i) 64 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) = 22 × 22
\(\sqrt[3]{64}\) = 2 × 2 = 4
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -1

(ii) 512 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) = (2)3 × (2)3 × (2)3
\(\sqrt[3]{512}\) = 2 × 2 × 2 = 8
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -2

(iii) 10648 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{11 \times 11 \times 11}\)
= (2)3 × (11)3
= (2 × 11)3
= 223
\(\sqrt[3]{10648}\) = 22
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -3

(iv) 27000 = \(\underline{3 \times 3 \times 3}\) × \(\underline{10 \times 10 \times 10}\)
= (3)3 × (10)3
= (3 × 10)3
= 303
\(\sqrt[3]{27000}\) = 30
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -4

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2

(v) 15625 = \(\underline{5 \times 5 \times 5}\) × \(\underline{5 \times 5 \times 5}\)
= (5)3 × (5)3
= (5 × 5)3
= 253
\(\sqrt[3]{15625}\) = 25
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -5

(vi) 13824 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\)
= (2)3 × (2)3 × (2)3 × (3)3
= (2 × 2 × 2 × 3)3
= 243
\(\sqrt[3]{15625}\) = 24
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -6

(vii) 110592 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\)
= (2)3 × (2)3 × (2)3 × (2)3 × (3)3
= (2 × 2 × 2 × 2 × 3)3
= 483
\(\sqrt[3]{15625}\) = 48
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -7

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2

(viii) 46656 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\)
= (2)3 × (2)3 × (3)3 × (3)3
= (2 × 2 × 3 × 3)3
= 363
\(\sqrt[3]{15625}\) = 36
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -8

(ix) 46656 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{7 \times 7 \times 7}\)
= (2)3 × (2)3 × (2)3 × (7)3
= (2 × 2 × 2 × 7)3
= 563
\(\sqrt[3]{15625}\) = 56
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -9

(x) 91125 = \(\underline{5 \times 5 \times 5}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\)
= (5)3 × (3)3 × (3)3
= (5 × 3 × 3)3
= 453
\(\sqrt[3]{15625}\) = 45
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2 -10

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2

प्रश्न 2.
बताइये सत्य है या असत्य-
(i) किसी भी विषम संख्या का घन सम होता है ।
(ii) एक पूर्ण घन दो शून्यों पर समाप्त नहीं होता है ।
(iii) यदि किसी संख्या का वर्ग 5 पर समाप्त होता है, तो उसका घन 25 पर समाप्त होता है ।
(iv) ऐसा कोई पूर्ण घन नहीं है, जो 8 पर समाप्त होता है ।
(v) दो अंकों की संख्या का घन तीन अंकों वाली संख्या हो सकती है।
(vi) दो अंकों की संख्या के घन में सात या अधिक अंक हो सकते हैं ।
(vii) एक अंक वाली संख्या का घन एक अंक वाली संख्या हो सकती है।
हल:
(i) असत्य
(ii) सत्य
(iii) असत्य
(iv) असत्य
(v) असत्य
(vi) असत्य
(vii) सत्य ।

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2

प्रश्न 3.
आपको यह बताया जाता है कि 1331 एक पूर्ण घन है। क्या बिना गुणनखण्ड किये आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि इसका घनमूल क्या है। इसी प्रकार 4913, 12167 और 32768 के घनमूलों के अनुमान लगाइए।
हल :
दिया है – 1331
1331 के सबसे दाईं ओर के अंक से प्रारम्भ करते हुए तीन-तीन अंकों के समूह बनाएँ । यह समूह 1 और 331 हैं । इस स्थिति में एक समूह 331 है, जिसमें तीन अंक हैं और दूसरा समूह 1 है, जिसमें 1 अंक है। सबसे पहले हम 331 लेते हैं। इसकी इकाई का अंक 1 है-
अत: घनमूल की इकाई का अंक 1 लेंगे ।
अब 1 को देखते हैं।
अत: घनमूल की दहाई का अंक 1 लेंगे ।
इस प्रकार,
\(\sqrt[3]{1331}\) = 11
हाँ, हम बिना गुणनखण्ड करके अनुमान लगा सकते हैं कि यह पूर्ण घन है।

(i) 4913 – 4913 के सबसे दाईं ओर के अंक से प्रारम्भ करते हुए तीन-तीन अंकों के समूह बनाएंगे । ये समूह 4 तथा 913 हैं । इस स्थिति में एक समूह 913 है जिसमें तीन अंक हैं और दूसरा समूह 4 है, जिसमें 1 अंक है।
पहले हम 913 लेंगे । इसकी इकाई का अंक 3 है । तो घनमूल की इकाई का अंक 7 लेते हैं, दूसरे समूह 4 को लेंगे।
1 का घन 1 है और 2 का घन 8 है । संख्या 4, संख्याओं 1 तथा 8 के बीच में स्थित है। अब 1 और 2 में से छोटी संख्या 1 है । 1 में इकाई का अंक स्वयं 1 है । हम 1 को वाँछित घनमूल का दहाई के अंक लेते हैं।
इस प्रकार, \(\sqrt[3]{4913}\) = 17

(ii) 12167 – 12167 के दाई ओर के अंक से प्रारम्भ करते हुए तीन-तीन अंकों के दो समूह 12 तथा 167 बनायेंगे । इनमें एक में 2 अंक तथा दूसरे में 3 अंक हैं ।
पहले हम 167 को लेंगे, इसकी इकाई का अंक 7 है तो घनमूल की इकाई का अंक 3 लेंगे ।
दूसरे समूह 12 को लेंगे । 2 का घन 8 है और 3 का घन 27 है । अत: संख्या 12, संख्याओं 8 और 27 के बीच में
अब, 2 और 3 में छोटी संख्या 2 है।
2 में इकाई का अंक स्वयं 2 है ।
हम 2 को वांछित घनमूल के दहाई का अंक लेते हैं।
इस प्रकार, \(\sqrt[3]{12167}\) = 23

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.2

(iii) 32768 – 32768. के दाई ओर के अंक प्रारम्भ करते हुए तीन-तीन अंकों के दो समूह 32 तथा 768 बनते पहले हम 768 को लेते हैं । इसकी इकाई का अंक 8 है। हम वांछित घनमूल की इकाई का अंक 2 लेते हैं।
दूसरे समूह 32 को लेते हैं । 3 का घन 27 है और 4 का घन 64 है। संख्या 32, संख्याओं 27 तथा 64 के बीच में स्थित है।
अब, 3 और 4 में छोटी संख्या 3 है।।
3 में इकाई का अंक स्वयं 3 है । हम 3 को वांछित घनमूल के दहाई का अंक लेते हैं।
इस प्रकार, \(\sqrt[3]{32768}\) = 32.

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

HBSE 12th Class Sanskrit दीनबन्धुः श्रीनायारः Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तराणि लिखत
(क) श्रीनायारः कुत्र गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ?
(ख) विभागस्य विपक्षे केषाम् अभियोगो नास्ति ?
(ग) श्रीनायारः स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं कुत्र प्रेषयति स्म ?
(घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा किम् अकरोत् ?
(ङ) बहुदिनेभ्यः स्थगितानां समस्यानां समाधानं कदा जातम् ?
(च) श्रीनायारस्य पार्वे पत्रं कया प्रेषितम् ?
(छ) आश्रमे के लालिताः पालिताश्च भवन्ति ?
(ज) पत्रलेखिका कस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रस्थानिकीमिच्छति ?
उत्तरम्:
(क) श्रीनायारः स्वराज्यं केरलं प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ?
(ख) विभागस्य विपक्षे उपभोक्तृणाम् अभियोगो नास्ति ?
(ग) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं केरलं प्रेषयति स्म ?
(घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् आर्द्रम् अकरोत् ?
(ङ) श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां समस्यानां समाधानं जातम् ?
(च) श्रीनायारस्य पार्वे पत्रं सुश्री ‘मेरी’ प्रेषितवती।
(छ) आश्रमे अनाथाः शिशवः लालिताः पालिताश्च भवन्ति ?
(ज) पत्रलेखिका श्रीनायारस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रस्थानिकीमिच्छति ?

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः

2. सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्यां कुरुत
(क) उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे
(ख) सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकी ज्ञापितवन्तः
(ग) त्वया निर्मितोऽयं क्षुद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः ।
उत्तरम्:
(क) ‘उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे’।

प्रसंग:-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘दीनबन्धुःश्रीनायारः’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति में दीनबन्धु श्रीनायार की सत्यनिष्ठा एवं कर्तव्यनिष्ठा के फलस्वरूप खाद्य-आपूर्ति विभाग के विरोध में उपभोक्ताओं की ओर से किसी प्रकार के अभियोग न होने का उल्लेख किया गया है।

श्रीनायार एक सत्यनिष्ठ तथा मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी थे। उड़ीसा सरकार के खाद्यआपूर्ति विभाग के सचिव पद को सम्भालते ही इस विभाग का कायाकल्प हो गया। खाद्यान्न में मिलावट या हेरा-फेरी नाममात्र रह गई, अतः श्रीनायार के कार्यकाल में उपभोक्ताओं को विभाग पर किसी प्रकार का अभियोग चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। श्रीनायार के आने से विभाग की न केवल सक्रियता बढ़ी अपितु ईमानदारी से काम करने का भी वातावरण बना। परिणामतः उपभोक्ता विभाग की कार्यप्रणाली से सन्तुष्ट हुए और कोर्ट-कचहरी के विवादों से विभाग मुक्त हो गया।

इस पंक्ति से श्रीनायार की कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदारी का संकेत मिलता है।

(ख) सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकी ज्ञापितवन्तः।

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती द्वितीयो भागः’ के ‘दीनबन्धुःश्रीनायारः’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

व्याख्या-‘सभी ने आँसु भरे हृदय से श्रीनायार को विदाई दी’ प्रस्तुतपंक्ति का सम्बन्ध श्रीनायार के जीवन के उस क्षण से है, जब केरल राज्य में श्रीनायार द्वारा स्थापित अनाथ आश्रम की संचालिका सुश्री मेरी ने श्रीनायार को एक पत्र लिखा कि अब उनका अन्तिम समय आ चुका है और उन्हें स्वयं यह आश्रम सँभाल लेना चाहिए।

एक दिन श्रीनायार अपने कार्यालय में बैठे एक पत्र पढ़ रहे थे, उनकी आँखों से अश्रुधारा बह रह थी, जिससे पत्र भी भीग चुका था। उसी क्षण श्रीनायार के क्लर्क श्रीदास का प्रवेश हुआ और उन्होंने श्रीदास को कहा कि अब उनका छुट्टी लेकर चले जाने का समय आ गया है। यदि मुझसे कोई रूखा व्यवहार किसी के साथ अनजाने में हुआ हो तो उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। श्रीनायार का व्यवहार विभाग के सभी सहकर्मियों के साथ पूर्णतया मानवीय, मित्रतापूर्ण तथा अत्यन्त मधुर था। विभाग के सभी लोग श्रीनायार के स्वभाव और व्यवहार से सन्तुष्ट थे। आज जब श्रीनायार केरल वापस जाने लगे,तो सहकर्मियों के हृदय को चोट पहुँची और न चाहते हुए भी उन्हें भीगी पलकों से विदाई की।

इस पंक्ति से विभाग के लोगों का श्रीनायार के प्रति सच्चा आदर-भाव तथा श्रीनायार की सद्-व्यवहारशीलता प्रकट होती है।

(ग) त्वया निर्मितोऽयं क्षुद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः।

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती द्वितीयो भागः’ के ‘दीनबन्धुःश्रीनायार:’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति सुश्री मेरी के उस पत्र की है, जो श्रीनायार के केरल वापस चले जाने के बाद उनके क्लर्क श्रीदास ने खोलकर पढ़ा था।

श्रीनायार ने एक अनाथ आश्रम की स्थापना केरल राज्य में की थी। जिसका संचालन सुश्री मेरी किया करती थी। मेरी अब मृत्यु के निकट थी, अतः उसने श्रीनायार को स्वयं यह अनाथ आश्रम सँभालने तथा अन्तिम क्षणों में श्रीनायार के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी। मेरी ने इस पत्र में यह भी बताया था कि यह आश्रम कभी बहुत छोटे रूप में था परन्तु आज यह बहुत बड़े वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। अब इसमें सौ से भी अधिक अनाथ शिशु पल रहे हैं। श्रीनायार इसी आश्रम के संचालन के लिए अपने वेतन का आधे से भी अधिक भाग प्रतिमास की एक तारीख को ही मनीआर्डर द्वारा सुश्री मेरी के पास भेज दिया करते थे। इस घटना से श्रीनायार का दीनों के प्रति सच्चा दया-भाव प्रकट होता है। इसीलिए पाठ का नाम भी ‘दीनबन्धु श्रीनायार’ उचित ही दिया गया है।

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3. अधः समस्तपदानां विग्रहाः दत्ताः तानाश्रित्य समस्तपदानि समासनामापि लिखत
(क) कालस्य खण्डः तस्मिन् = कालखण्डे।
षष्ठी-तत्पुरुषः
(ख) कर्मसु नैपुण्यम् = कर्मनैपुण्यम्।
सप्तमी-तत्पुरुषः
(ग) द्वि च त्रि च अनयोः समाहारः, तेषाम् = द्वित्राणाम्।
द्विगुः
(घ) दीर्घः अवकाशः, तम् = दीर्घावकाशम्।
कर्मधारयः
(ङ) धनाय आदेशः, तेन = धनादेशेन।
चतुर्थी-तत्पुरुषः
(च) जीवनस्य प्रदीपः = जीवनप्रदीपः।
षष्ठी-तत्पुरुषः

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4. रेखाकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्।
(ख) वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्।
(ग) तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्क: नास्ति।
(घ) पत्रस्य अर्धाधिकं भागं अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म।
(ङ) श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्।
(च) भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु।
उत्तरम्:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) श्रीनायारः कीदृग्भाषी आसीत् ?
(ख) कस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम् ?
(ग) तस्य केन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति?
(घ) पत्रस्य अर्धाधिकं भागं का आर्दीकरोति स्म?
(ङ) कः तत्पत्रमुद्घाटितवान् ?
(च) भगवान् कं दीर्घजीवनं कारयतु ?

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5. विपरीतार्थकपदानि मेलयत
(क) आगत्य (क) विस्मृतः
(ख) इच्छाम् (ख) गत्वा
(ग) स्वल्पभाषी (ग) न्यूनीभूतम्
(घ) प्रारभ्य (घ) पक्षे
(ङ) अधिकीभूतम् (ङ) बहुभाषी
(च) विपक्षे (च) समाप्य
(छ) स्मृतः (छ) लघुजीवनम्
(ज) दीर्घजीवनम् (ज) अनिच्छाम्
उत्तरम्:
विपरीतार्थकपदमेलनम्
(क) आगत्य – गत्वा
(ख) इच्छाम् – अनिच्छाम्
(ग) स्वल्पभाषी – बहुभाषी
(घ) प्रारभ्य – समाप्य
(ङ) अधिकीभूतम् – न्यूनीभूतम्
(च) विपक्षे – पक्षे
(छ) स्मृतः – विस्मृतः
(ज) दीर्घजीवनम् – लघुजीवनम्

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6. अधोलिखितानां विशेष्यपदानां विशेषणपदानि पाठात् चित्वा लिखत
वार्तालापः, वर्षत्रयस्य, अश्रुधारा, समस्यानाम्, व्यवहारः, पत्रम्, शिशवः ।
उत्तरम्:

विशेषणपदम्विशेष्यपदम
सन्तुलित:वार्तालाप:
गतस्यवर्षत्र्यस्य
विगलिताअश्रुधारा
स्थगितानाम्समस्यानाम्
रूक्ष:व्यवहारः
पूर्वतनम्पत्रम्
शताधिका:शिशव:

7. अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत
समाप्य, जातम्, त्यक्त्वा, धृत्वा, पठन्, संपोष्य।
उत्तरम्

प्रकृति:प्रत्यय:
(क) समाप्यसम् + √आप्ल्यप्
(ख) जातम्√जन्क्त
(ग) त्यक्त्वा√त्यज्क्त्वा
(घ) धृत्वा√धृक्त्वा
(ङ) पठन्√पठ्शतृ
(च) संपोष्यसम् + √पुष्ल्यप्

योग्यताविस्तारः

1. प्रस्तुतकथायाः मूललेखक: श्रीचन्द्रशेखरदासवर्मा ओडियासाहित्यक्षेत्रे लब्धप्रतिष्ठः कथाकारो वर्तते। अस्य जन्म 1945 तमे ईशवीयसंवत्सरे अभवत्। अस्य द्वादशकथाग्रन्थाः, एक: नाट्यसङ्ग्रहः त्रयः समीक्षा-ग्रन्थाश्च प्रकाशिताः सन्ति। पाषणीकन्या वोमा च श्रीवर्मणः प्रसिद्धौ कथासंग्रहौ स्तः । ‘दीनबन्धुः श्रीनायारः’ इति कथा पाषणीकन्या इति कथासंग्रहात् संकलिता।

2. भारतस्य प्रदेशा:-भारतवर्षे अष्टाविंशति-प्रदेशाः वर्तन्ते। षट् केन्द्रशासितप्रदेशाः सन्ति।

3. अत्रत्याः जनाः विविधभाषाभाषिणः सन्तिः । हिन्दीम् आङ्ग्लभाषां च अतिरिच्य मलयालम-तमिल-उडिया-बङ्गला गुजराती-मराठी-कोंकणी-कन्नड-असमिया-पञ्जाबी भाषाः अत्रत्याः जनाः वदन्ति।

4. पत्रलेखनं साहित्ये प्रसिद्धा विधा वर्तते प्रस्तुतपाठे समागतं पत्रम् अवलोक्य स्वकीयान् विचारान् लिखत।

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HBSE 9th Class Sanskrit दीनबन्धुः श्रीनायारः Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) आश्रमे के लालिताः पालिताश्च भवन्ति ?
(A) वृद्धाः
(B) स्त्रियः
(C) शिशवः
(D) अनाथशिशवः।
उत्तराणि:
(D) अनाथशिशवः

(ii) पत्रलेखिका कस्य हस्तयोः अनाथाश्रमं समर्प्य सौप्रास्थानिकीमिच्छति ?
(A) पुत्रस्य
(B) श्रीदासस्य
(C) श्रीनायारस्य
(D) सर्वकारस्य।
उत्तराणि:
(C) श्रीनायारस्य

(iii) श्रीनायार: कुत्र गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् ?
(A) दिल्लीम्
(B) केरलम्
(C) कोलकातानगरम्
(D) महाराष्ट्रम्।
उत्तराणि:
(B) केरलम्

(v) विभागस्य विपक्षे केषाम् अभियोगो नास्ति ?
(A) उपभोक्तृणाम्
(B) अधिकारिणाम्
(C) कर्मचारिणाम्
(D) मन्त्रिणाम्।
उत्तराणि:
(A) उपभोक्तृणाम्

(v) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं कुत्र प्रेषयति स्म ?
(A) कानपुरम्
(B) पूनानगरम्
(C) मद्रासम्
(D) केरलम्।
उत्तराणि:
(A) केरलम्।

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II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्।
(A) कः
(B) कीदृशः
(C) कथम्
(D) किया।
उत्तराणि
(B) कीदृशः

(ii) वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्।
(A) कस्य
(B) केन
(C) कति
(D) कस्मात्।
उत्तराणि
(A) कस्य

(iii) तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्क: नास्ति।
(A) काः
(B) केन
(C) कम्
(D) कस्मै।
उत्तराणि
(B) केन

(iv) पत्रस्य अर्धाधिकं भागम् अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म।
(A) कया
(B) कान्
(C) कथम्
(D) का।
उत्तराणि
(D) का

(v) श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्।
(A) कः
(B) काभ्याम्
(C) कस्याः
(D) कस्याम्।
उत्तराणि
(A) कः

(vi) भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु।
(A) कः
(B) कम्
(C) कस्याः
(D) कस्याम्।
उत्तराणि
(B) कम्।

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दीनबन्धुः श्रीनायारः पाठ्यांशः

1.श्रीनायारः केन्द्रसर्वकारतः स्थानान्तरणेन आगत्य ओडिशासर्वकारस्य अधीने प्रायः वर्षत्रयेभ्यः कार्यं करोति। तथाप्यस्मिन् वर्षत्रयात्मके कालखण्डे एकवारमपि स्वराज्यं केरलं प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान्। स स्वल्पभाषी, अतस्तस्य मनःकथा मनोव्यथा वा बोधगम्या नास्ति। सन्तुलितो वार्तालापः, साक्षात्समये आगमनम्, ततः सञ्चिकासु मनोनिवेशः, कार्य समाप्य स्वगृहं प्रत्यागमनञ्च तस्य वैशिष्ट्यमासीत्। तस्य कर्मनैपुण्यं दृष्ट्वा एव ओडिशासर्वकारस्तं स्थानान्तरणेन स्वीकृत्य खाद्यपूर्तिविभागे सचिवपदे नियुक्तवान्। गतस्य वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यद विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्।खाद्ये अपमिश्रणं न्यूनीभूतम्। अत उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे मन्त्रिणां मध्येऽपि तस्य सुख्यातिः वर्तते

हिन्दी-अनुवादः श्रीनायार केन्द्र सरकार से स्थानान्तरित होकर उड़ीसा सरकार के अधीन प्रायः तीन वर्ष तक कार्य करता है। तो भी (उसने) इस तीन वर्ष के कालखण्ड में एक बार भी अपने राज्य केरल की ओर जाने की इच्छा प्रकट नहीं की। वह बहुत कम बोलने वाला है, इसीलिए उसके मन की बात या मन की पीड़ा नहीं जानी जा सकती है। सन्तुलित वार्तालाप, ठीक समय पर पहुँचना, फिर रजिस्टरों में मन लगाए रखना और कार्य समाप्त कर अपने घर वापिस लौटना उसकी विशेषता थी। उसकी कार्यनिपुणता देखकर ही उड़ीसा सरकार ने उसका स्थानान्तरण स्वीकार कर उसे खाद्य-आपूर्तिविभाग में सचिव पद पर नियुक्त कर दिया था। पिछले तीन वर्ष के आकलन से पता चलता है कि विभाग की कार्यनिपुणता दस गुणा बढ़ गई है। खाद्य सामग्री में मिलावट कम हो गई है। अत: उपभोक्ताओं का भी विभाग के विरोध में (कोई) अभियोग (मुकद्दमा) नहीं है। मन्त्रियों के बीच में भी उसकी अच्छी ख्याति है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
तथाप्यस्मिन् = तब भी इसमें। (तथापि + अस्मिन) बोधगम्या = बोध (ज्ञान) के द्वारा गम्य, जानने योग्य; बोधेन गम्या। मनोनिवेशः = दत्तचित्त होना ; मनसः निवेशः, षष्ठी तत्पुरुष समास । प्रत्यागमनम् = वापिस लौटना; प्रति + आङ् + √गम् + ल्युट्। कर्मनैपुण्यम् = कर्मों में निपुणता; कर्मसु नैपुण्यम्, सप्तमी तत्पुरुष। स्वीकृत्य = स्वीकार करके; स्वी + √कृ + ल्यप्। अपमिश्रणम् = मिलावट; अप + √मिश् + ल्युट् > अन । अनुमीयते = अनुमान किया जाता है; अनु + √मा + लट् प्रथम पुरुष एकवचन। न्यूनीभूतम् = कम हो गया; न्यून + च्वी + √भू + क्त। अभियोगः = मुकद्दमा।

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2. श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां विविध समस्यानामपि समाधानं जातम्। स्वकार्यं त्यक्त्वा अपरस्य सहकारस्तस्य परमधर्मः। सः प्रतिमासं प्रथमदिवसे स्ववेतनस्य अर्धाधिकं भागं केरलं प्रेषयति स्म तेनानुमीयते तस्य राज्येन सह अस्ति कश्चित् सम्पर्कः। कानिचन मलयालमभाषायाः संवादपत्राणि अतिरिच्य कदापि तस्य नाम्ना किमपि पत्रमागतमिति कोऽपि कदापि न जानाति।

हिन्दी-अनुवादः श्रीनायार के दायित्व (पदभार) ग्रहण करने के एक महीने के अन्दर बहुत दिनों से स्थगित अनेक समस्याओं का भी समाधान हो गया। अपना कार्य छोड़कर दूसरों का सहयोग करना उसका परम धर्म है। वह प्रतिमास के पहले दिन अपने वेतन का आधे से अधिक भाग केरल भेज देता था। इसी से पता चलता है कि उसका राज्य के साथ कोई सम्पर्क है। कुछ मलियालम भाषा के संवाद पत्रों को छोड़कर कभी उसके नाम से कोई पत्र आया है, इसे कभी कोई नहीं जानता।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च सहकारः = सहायता। अर्धाधिकम् = आधे से अधिक। प्रतिमासम् = हर महीने; मासे मासे प्रतिमासम् (अव्ययीभाव समास)। अतिरिच्य = अतिरिक्त; अति + √रिच् + ल्यप्।
HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 10 दीनबन्धुः श्रीनायारः img-1

3. एकस्मिन् दिने श्रीनायारः पत्रमेकं धृत्वा मस्तकमवनमय्य पठन् आसीत्। नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा आर्दीकरोति स्म पत्रस्य अर्धाधिकं भागम्। तदानीमेव तस्य कार्यालयलिपिकः श्रीदासः प्रविशति। श्रीनायारः तमुक्तवान्-“अधुना मम गमनसमयः समुपागत एव। मम दायित्वहस्तान्तरणपत्रकं सजीकुरु।अहमधुना द्वित्राणां दिवसानां सकारणावकाशं स्वीकरिष्यामि। पुनः तदनु स्वीकरिष्यामि दीर्घावकाशम्। यदि कस्मैचिद् अज्ञातेन मया रूक्षो व्यवहारः प्रदर्शितः स्यात्, तदर्थं ते मह्यमुदारचित्तेन क्षमा प्रदास्यन्ति इति सर्वेभ्यो निवेदयतु”। अनन्तरं सर्वे अश्रुलहृदयैः सौप्रस्थानिकी ज्ञापितवन्तः।

हिन्दी-अनुवादः एक दिन श्रीनायार एक पत्र (हाथ में) पकड़कर मस्तक झुकाकर पढ़ रहा था। आँख के किनारे से गिरी हुई आश्रुधारा ने पत्र का आधे से भी अधिक भाग गीला कर दिया था। तभी उसके कार्यालय का लिपिक (क्लर्क) श्रीदास प्रवेश करता है। श्रीनायार ने उससे कहा-“अब मेरे जाने का समय समीप आ गया है। मेरा दायित्व-हस्तान्तरण पत्र (किसी दूसरे

दीनबन्धुः श्रीनायारः को पदभार सौंपने का पत्र) तैयार करो। अब मैं दो-तीन दिन का सकारण-अवकाश लूँगा (स्वीकार करूँगा)। फिर उसके बाद लम्बी छुट्टी लूँगा। यदि किसी के लिए अनजाने में मुझसे रूखा व्यवहार किया गया हो, तो उसके लिए वे मुझे उदारभाव से क्षमा देंगे-ऐसा सबसे निवेदन करो।” इसके बाद सभी ने आँसू भरे हृदय से विदाई दी।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च विगलिता = निकली हुई ; वि + √गिल् + क्त + टाप् + । अवनमय्य = झुकाकर ; अव + √नम् + ल्यप्। दायित्वहस्तान्तरणम् = दूसरे को प्रभार हस्तगत कराना। सज्जीकुरु = तैयार करो ; √सज्ज् + च्चि + √कृ + लोट् + मध्यम पुरुष एकवचन। सौप्रस्थानिकी = विदाई।

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4. तस्य गमनस्य दिवसत्रयात्परं कार्यालये पत्रमेकमागतम्। कौतूहलवशात् श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्। लेखिका आसीत् सुश्री मेरी यस्याः पार्वे सः प्रतिमासमर्धाधिकं धनं धनादेशेन प्रेषयति स्म। पत्रे एवं लिखितमासीत्….. श्रीनायार !

भगवान् यीशुस्तव मङ्गलं वितनोतु। मम पूर्वतनं पत्रं त्वया प्राप्तं स्यात्। तव समीपे इदं मम शेषपत्रम्। यतो हि मम जीवनप्रदीपो निर्वापितो भवितुमिच्छति। प्रायस्तवागमनसमये अहं न स्थास्यामि। पूर्वपत्रे अहमाश्रमस्य सर्वविधमायव्ययाकलनं प्रेषितवती। केवलं यीशोः समीपे गमनात्पूर्वं तव दर्शनमिच्छामि। प्रथमं त्वया निर्मितोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः। अधुनात्र शताधिका अनाथशिशवो लालिता: पालिताश्च भवन्ति। तव हस्तयोस्तव अनाथाश्रमं समर्प्य अहं सौप्रस्थानिकीमिच्छामि। अद्य समाजस्त्वत्तो बहु किमपि इच्छति यौ कौ वां तव पितरौ भवतां नाम, तौ धन्यवादाही। कदाचित्ताभ्यां त्वं विस्मृतः स्यात् त्वमवश्यमेतान् शिशून् संपोष्य उत्तममनुष्यान् कारयिष्यसीति मम कामना वर्तते। प्रभुः त्वत्त इमामेवाशां पोषयति। यो जन्म दत्तवान्, स जीवितुमधिकारमपि दत्तवान्। भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु। इति ॥
तव शुभाकाक्षिणी
सुश्री: मेरी

हिन्दी अनुवादः
उनके जाने के तीन दिन के पश्चात् कार्यालय में एक पत्र आया। जिज्ञासावश श्रीदास ने वह पत्र खोला। लेखिका थी सुश्री मेरी, जिसके पास वह प्रतिमास आधे से अधिक धन मनीआर्डर द्वारा भेजता था। पत्र में लिखा था श्रीनायार!

भगवान् यीशु तुम्हारा मंगल करें। मेरा पहला पत्र तुम्हें मिला होगा। तुम्हारे पास यह मेरा शेष पत्र है। क्योंकि मेरा जीवन-दीप बुझ जाना चाहता है। शायद तुम्हारे आने तक मैं न रहूँ। पिछले पत्र में मैंने आश्रम का सारा आय-व्यय चिट्ठा भेज दिया था। केवल यीशु के पास जाने से पहले तुम्हारा दर्शन करना चाहती हूँ। पहले तुम्हारे द्वारा निर्मित अनाथ आश्रम अब बड़े भारी वृक्ष में बदल गया है। अब यहाँ सौ से भी अधिक अनाथ शिशु लालित और पालित हो रहे हैं। तुम्हारे हाथों में तुम्हारा अनाथ आश्रम सौंपकर अब विदाई चाहती हूँ। आज समाज तुम से बहुत कुछ चाहता है। जो कोई भी तुम्हारे माता-पिता हैं, वे धन्यवाद के पात्र हैं। किसी कारणवश उन्होंने तुम्हें भुला दिया होगा, तुम अवश्य ही इन शिशुओं को पाल-पोसकर उत्तम मनुष्य बनाओगे, यह मेरा कामना है। प्रभु तुमसे यही आशा रखते हैं। जिसने जन्म दिया है, उसी ने जीने का अधिकार भी दिया है। भगवान् तुम्हें दीर्घजीवी करें।
तुम्हारी शुभेच्छु,
सुश्री मेरी

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च धनादेशेन = मनिआर्डर से; धनाय आदेशः तेन (चतुर्थी-तत्पुरुष) वितनोतु = करे, विस्तार करे; वि + √तन् + लोट्, प्रथम पुरुष, एकवचन। पूर्वतनम् = पहला निर्वापितः = शान्त, बुझा हुआ; निर् + √वप् (णिच्) + क्त। परिणतः = परिवर्तित हो गया, बदल गया; परि + √निम् + क्त। आयव्ययाकलनम् = आय व्यय का विवरण। पितरौ = माता-पिता; माता च पिता च (द्वन्द्व समास)

दीनबन्धुः श्रीनायारः (दीनबन्धु श्रीनायार) Summary in Hindi

दीनबन्धुः श्रीनायारः पाठ परिचय

श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा उड़िया भाषा के प्रख्यात साहित्यकार हैं। इनका जन्म 1945 ईस्वी में हुआ। इनके 12 कथासंग्रह, एक नाट्यसंग्रह तथा तीन समीक्षा-ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। ‘पाषणी-कन्या’ तथा ‘वोमा’ इनके प्रसिद्ध कथा संग्रह हैं। ‘पाषणीकन्या’ कथासंग्रह का संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है। इसी कथासंग्रह से ‘दीनबन्धुः श्रीनायारः’ शीर्षक कथा पाठ्यांश के रूप में संकलित है। – इस कथा के नाटक श्रीनायार का पालन-पोषण एक अनाथाश्रम में हुआ है। श्रीनायार ने अपनी कर्मदक्षता, दाक्षिण्य और सेवामनोवृत्ति से समाज में आदर्श स्थापित किया है। वे प्रतिमास अपने वेतन का आधे से अधिक भाग केरल में स्थापित अनाथाश्रम को भेजते हैं। प्रस्तुत कथा में श्रीनायार का लोककल्याणकारी आदर्श चरित्र वर्णित है।

दीनबन्धुः श्रीनायारः पाठस्य सारः

प्रस्तुत पाठ ‘दीनबन्धुःश्रीनायार:’ उड़िया भाषा के सुविख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथा संग्रह से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायणदास ने किया है। प्रस्तुत कथा के नायक श्रीनायार हैं। श्रीनायार स्वभाव से कर्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ, सेवानिष्ठ तथा परोपकारनिष्ठ महामानव हैं। श्रीनायार का पालनपोषण किसी अनाथ आश्रम में हुआ है। बड़े होकर श्रीनायार ने भी एक अनाथ आश्रम की स्थापना की है, जिसके खर्च में योगदान के लिए वे प्रतिमास अपने वेतन का आधे से भी अधिक भाग मनीआर्डर से भेज देते हैं। कथा का सारांश इस प्रकार है

श्रीनायार केन्द्र सरकार से स्थानान्तरित होकर उड़ीसा सरकार के अधीन कार्यरत हैं। श्रीनायार को कार्य करते हुए तीन वर्ष हो चुके हैं परन्तु इस बीच उन्होंने कभी भी अपने राज्य केरल जाने की इच्छा प्रकट नहीं की। वे उड़ीसा सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग में सचिव पद पर नियुक्त हैं। श्रीनायार की ईमानदारी और कर्मनिष्ठा से इस विभाग की कार्यनिपुणता दस गुणा बढ़ गई है। खाद्य सामग्री में मिलावट नाम मात्र रह गई है। उपभोक्ता पूरी तरह सन्तुष्ट हैं इसीलिए न्यायालय में विभाग के विरुद्ध कोई मुकद्दमा भी नहीं है। – श्रीनायार अपने अधीन कार्य करने वाले कर्मचारियों के साथ बड़े प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हैं। वे थोड़ा बोलते हैं और

अपने कार्य में लगे रहते हैं। हर महीने के पहले दिन वे अपने वेतन का आधे से अधिक भाग मनीआर्डर द्वारा भेज देते हैं। जिससे अनुमान होता है कि केरल के साथ इनका कोई संबंध है। कभी-कभी मलयालम भाषा में कोई पत्र आ जाता है। इस पत्र के अतिरिक्त कभी अन्य कोई पत्र श्रीनायार के पास नहीं आता। अचानक एक दिन विचित्र घटना घटती है कि श्रीनायार के हाथ में एक पत्र है। वे उसे पढ़ रहे हैं और उनकी आँखों से टपकते आँसुओं से पत्र भीगा जा रहा है। तभी एक क्लर्क श्रीदास का प्रवेश होता है। श्रीनायार उसे ‘दायित्व हस्तांतरण पत्र’ तैयार करने के लिए कहते हैं और उसे यह भी बताते हैं कि मेरे वापस लौट जाने का समय आ गया है। यदि किसी के साथ अनजाने में कोई दुर्व्यवहार हुआ हो तो मेरी ओर से क्षमायाचना कर लेना। इसके बाद विभाग के सभी कर्मचारियों ने श्रीनायार को भावभीनी विदाई दी।

श्रीनायार को केरल गए हुए तीन दिन बीत गए हैं। कार्यालय में एक पत्र आता है क्लर्क श्रीदास उत्सुकतावश पत्र खोलता है, जिसकी लेखिका सुश्री मेरी हैं। जिनके पास श्रीनायार प्रतिमास धनादेश भेजते थे। सुश्री मेरी ने पत्र में श्रीनायार को संबोधित करते हुए लिखा था कि उसका जीवनदीप बुझने वाला है। तुम्हारे द्वारा स्थापित अनाथ आश्रम अब बहुत बड़ा वृक्ष बन गया है, जिसमें सौ से अधिक अनाथ बच्चे पल रहे हैं। यह तुम्हारा आश्रम तुम्हारे हाथों में सौंप कर वह भगवान् यीशू की शरण में जाना चाहती है। इस कथा में श्रीनायार के सेवा भाव उदारता तथा कर्मनिष्ठा को बहुत ही सुन्दर शैली में चित्रित किया गया है।

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

HBSE 12th Class Sanskrit कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम्
(क) सायं समये भगवान् भास्कर: कुत्र जिगमिषुः भवति ?
(ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः कीदृशः भवति ?
(ग) नीडेषु के प्रतिनिवर्तन्ते ?
(घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं किं स्थानं प्रयाति स्म ?
(ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां कानि कलयन्ति ?
(च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषम् कीदृशमासीत् ?
(छ) मेघमाला कथं शोभते ?
उत्तरम्
(क) सायं समये भगवान् भास्करः अस्तं जिगमिषुः भवति।
(ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः अरुणः भवति।
(ग) नीडेषु कलविङ्काः प्रतिनिवर्तन्ते।
(घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं तोरणदुर्गं प्रयाति स्म।
(ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां वनानि कलयन्ति।
(च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषं राजतसूत्रितम्, बहुल-चाकचक्यम्, वक्रम्, हरितवर्णं च आसीत्।
(छ) मेघमाला दीर्घशुण्डमण्डितानां दिग्गजानां दन्तावला: इव भयानकाकारा शोभते।

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2. समीचीनोत्तरसख्यां कोष्ठके लिखत
अ. शिवराजविजयस्य रचयिता कः अस्ति ? ( )
(क) बाणभट्टः
(ख) श्रीहर्षः
(ग) अम्बिकादत्तव्यासः
(घ) माघः
उत्तरम्:
(ग) अम्बिकादत्तव्यासः

आ. कतिवर्षदेशीयो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म। ( )
(क) चतुर्दशवर्षदेशीयः
(ख) द्वादशवर्षदेशीयः
(ग) पञ्चदशवर्षदेशीयः
(घ) षोडशवर्षदेशीयः
उत्तरम्:
(घ) षोडशवर्षदेशीयः

इ. शिववीरस्य विश्वासपात्रं किम् आदाय तोरणदुर्गं प्रयाति ? ( )
(क) संवादम् आदाय
(ख) पत्रम् आदाय
(ग) पुष्पगुच्छम् आदाय
(घ) अश्वम् आदाय
उत्तरम्:
(ख) पत्रम् आदाय

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3. रिक्तस्थानानि पूरयत।
(क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला ……………. प्रादुरभूत्।
(ख) क्षणे क्षणे …………….खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति।
(ग) पदे पदे ……………. वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति।
(घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ ……………. निजकार्यान्न विरमति।
उत्तरम्:
(क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणी: इव प्रादुरभूत्।
(ख) क्षणे क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति।
(ग) पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति।
(घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरः निजकार्यान्न विरमति ।

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4. अधोलिखितानां पदानाम् अर्थान् विलिख्य वाक्येषु प्रयुञ्जत
भास्करः मेघमाला, वनानि, मार्गः वीरः, गगनतलम्, झञ्झावातः मासः, सायम्।
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगः)
(क) भास्करः (सूर्यः)-पूर्वदिशायां भास्कर: उदयति।
(ख) मेघमाला (मेघसमूहः)-मेघमाला आकाशम् आच्छादयति।
(ग) वनानि (अरण्यानि)-नगरं परितः वनानि सन्ति ।
(घ) मार्गः (पन्थाः)-महान्धकारे मार्गः न अवलोक्यते।
(ङ) वीरः (वीर्यवान्)-युद्धे वीरः एव जयति।।
(च) गगनतलम् (आकाशतलम्)-रात्रौ अन्धकारः गगनतलम् आच्छादयति।
(छ) झञ्झावातः (वात्याचक्रम्, ‘तूफान’ इति हिन्दीभाषायाम्)-सहसा झञ्झावातः प्रादुरभवत्।
(ज) मासः (‘महीना’ इति हिन्दी भाषायाम्)-मासोऽयम् आषाढः।
(झ) सायम् (सन्ध्यासमय:)-सायं समये भगवान् भास्करः अस्तं गच्छति।

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5. अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कृत्वा सन्धिनिर्देशं कुरुततस्यैव, शिखराच्छिखराणि, कोऽपि, प्रादुरभूत्, अथाकस्मात्, कार्यान्न।
(क) तस्यैव . = न + एव
(ख) शिखराच्छिखराणि = शिखरात् + शिखराणि
(ग) कोऽपि = कः + अपि
(घ) प्रादुरभूत् = प्रादुः + अभूत्
(ङ) अथाकस्मात् = अथ + अकस्मात्
(च) कार्यान्न = कार्यात् + न ।

6. अधोलिखितानां पदानां प्रकृतिप्रत्ययविभागं प्रदर्शयत
प्रयुक्तः, उत्थितः, उत्प्लुत्य, रुतैः, उपत्यकातः, उत्थितः, ग्रस्यमानः ।
उत्तरम्:
(क) प्रयुक्तः = प्र + √युज् + क्त (पुंल्लिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्)
(ख) उत्थितः = उत् + /स्था + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ग) उत्प्लुत्य = उत् + प्लुि + ल्यप् (अव्यय)
(घ) रुतैः रु + क्त। (नपुंसकलिङ्गम्, तृतीया-एकवचनम्)
(ङ) उपत्यकातः उपत्यका + तसिल > तस् (अव्ययपदम्)
(च) ‘ग्रस्यमानः √ग्रस् (कर्मवाच्ये) + शानच् (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)

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7. अलकारनिर्देशं कुरुत
(1) वदनाम्भोजेन
(2) दिगन्तदन्तावलः
(3) सिन्दूरद्रवस्नातानामिव वरुणदिगवलम्बिनाम् ।
उत्तरम्:
(षष्ठी-तत्पुरुषः) – (कर्मधारयः) (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(कर्मधारयः) (षष्ठी-तत्पुरुषः) (तृतीया-तत्पुरुषः)
(1) वदनाम्भोजेन – रुपकः अलङ्कारः
(2) दिगन्तदन्तावल: – अनुप्रासः अलङ्कारः
(3) सिन्दूरद्रवस्नातामिव वरुणदिगवलम्बिनाम्-उत्प्रेक्षा अलङ्कारः

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8. विग्रहवाक्यं विलिख्य समासनामानि निर्दिशत
मेघमाला, महान्धकारः, पवर्तश्रेणी:, महोत्साहः, विश्वासपात्रम्, हरितोष्णीषशोभितः ।
उत्तरम्:
(क) मेघमाला = मेघानां माला
(ख) महान्धकारः = महान् अन्धकारः
(ग) पर्वतश्रेणीः . = पर्वतानां श्रेणी:
(घ) महोत्साहः = महान् उत्साहः
(ङ) विश्वासपात्रम् = विश्वासस्य पात्रम्
(च) हरितोष्णीषशोभितः = हरितेन उष्णीषेण शोभितः

9. पाठ्यांशस्य सारं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत
उत्तरम्:
पाठ का सार पहले दिया जा चुका है, वहीं देखें।

10. पाठ्यांशे प्रयुक्तानि अव्ययानि चित्वा लिखत
उत्तरम्:
च (और)
सायम् (सायंकाल)
इव (की तरह, मानो)
अथ (इसके बाद, फिर)
अकस्मात् (अचानक)
परितः (चारों ओर)
परतः (दूसरी ओर)
ततः (उसके बाद)
उपर्युपरि (ऊपर-ऊपर)
एव (ही)
अपि (भी)
तावत् (तभी)
अकस्मात् (अचानक)
पुनः (फिर)
इति (यहाँ, इस विषय में)
न (नहीं)
परम् (परन्तु)
वा (अथवा, या)
इति (यह, इसप्रकार)
प्रतिक्षणम् (पल-पल)
आदाय (लेकर)
पर्वतश्रेणीतः (पर्वतश्रेणी से)
अधित्यकातः (अधित्यका से)
उपत्यकातः (उपत्यका से)

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योग्यताविस्तारः

शिवाजी इत्यस्य कथामाधारीकृत्य संस्कृते, अन्यासु भारतीय-भाषासु च लिखितानां कथानकानां ग्रन्थानां वा सूचना . संग्रहीतव्या। तद्यथा संस्कृते ‘श्रीशिवराज्योदय’ नाम महाकाव्यम् अस्ति।

द्वादशमासानां नामानि ज्ञेयानि, अस्मिन् पाठे कस्य मासस्य वर्णनं कृतम्, तेन कथाप्रसङ्गे कः विशेषः समुत्पन्न इति निरूपणीयम्। अस्मिन् पाठे निसर्गस्य (प्रकृतेः) कीदृशं स्वरूपं चित्रितम्, तस्माच्च घटनाचक्रं कथं परिवर्तते इति प्रतिपादनीयम्।

HBSE 9th Class Sanskrit कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) सायं समये भगवान् भास्कर: कुत्र जिगमिषुः भवति ?
(A) गङ्गायाम्
(B) समुद्रम्
(C) अस्तम्
(D) उदयम्।
उत्तराणि:
(B) अस्तम्

(ii) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्णः कीदृशः भवति ?
(A) अरुणः
(B) हरितः
(C) श्वेतः
(D) पीतः।
उत्तराणि:
(A) अरुणः

(iii) नीडेषु के प्रतिनिवर्तन्ते ?
(A) गर्दभाः
(B) अश्वाः
(C) गजाः
(D) कलविकाः
उत्तराणि:
(D) कलविङ्काः

(iv) शिववीरस्य विश्वासपात्रं किं स्थानं प्रयाति स्म ?
(A) वनानि
(B) चित्राणि
(C) भवनानि
(D) भुवनानि।
उत्तराणि:
(A) वनानि।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) अकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणी: इव प्रादुरभूत्।
(A) कया
(B) केन
(C) का
(D) कम्।
उत्तराणि:
(C) का

(ii) क्षणे क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्खलन्ति।
(A) कस्य
(B) कया
(C) कस्मात्
(D) कस्मिन्।
उत्तराणि:
(A) कस्य

(iii) पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति।
(A) काः
(B) कीदृश्यः
(C) कति
(D) के।
उत्तराणि:
(B) कीदृश्यः

(iv) कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरः निजकार्यान्न विरमति।
(A) कस्मात
(B) कस्याः
(C) कस्मिन्
(D) कः।
उत्तराणि:
(D) कः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् पाठ्यांशः

1. मासोऽयमाषाढः, अस्ति च सायं समयः, अस्तं जिगमिषुर्भगवान् भास्करः सिन्दूर-द्रव-स्नातानामिवं वरुण-दिगवलम्बिनामरुण-वारिवाहानामभ्यन्तरं प्रविष्टः। कलविकाश्चाटकैर-रुतैः परिपूर्णेषु नीडेषु प्रतिनिवर्तन्ते। वनानि प्रतिक्षणमधिकाधिका श्यामतां कलयन्ति। अथाकस्मात् परितो मेघमाला पर्वतश्रेणीव प्रादुरभूत्, क्षणं सूक्ष्मविस्तारा, परतः प्रकटित-शिखरि-शिखर-विडम्बना, अथ दर्शित-दीर्घ-शुण्डमण्डित-दिगन्तदन्तावल-भयानकाकारा ततः पारस्परिक-संश्लेष-विहित-महान्धकारा च समस्तं गगनतलं पर्यच्छदीत्।

हिन्दी-अनुवादः आषाढ़ का महीना है। सायं का समय है। अस्त होने की इच्छा वाला भगवान् भास्कर (सूर्य देव) सिन्दूर के घोल में स्नान-सा किए हुए, वरुण-दिशा (पश्चिम-दिशा) का आश्रय लिए हुए जलवाहक बादलों में प्रविष्ट हो रहा है। गौरैया पक्षी अपने शिशुओं की चहचहाचट से परिपूर्ण घोंसलों में वापस लौट रहे हैं। वन प्रतिक्षण अधिक और अधिक कालेपन को प्राप्त हो रहे हैं। तभी अकस्मात् चारों ओर मेघ माला पर्वत शृंखला की तरह प्रकट हो गई। क्षण भर में ही उन बादलों का सूक्ष्म विस्तार हो गया। मेघमाला ने किसी दूसरे ही पर्वत शिखर का सा रूप धारण कर लिया और वह मेघमाला लम्बी-लम्बी सैंडों से सुशोभित दिग्गजों की सुन्दर दन्तावली के समान भयानक आकार वाली हो गई। फिर बादलों के परस्पर मिल जाने से उत्पन्न घोर अन्धकार ने सम्पूर्ण आकाशमण्डल को पूरी तरह से ढक लिया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – जिगमिषुः = जाने के इच्छुक। √गम् + सन् + उ, इच्छार्थक ‘सन्’ प्रत्यय। सिन्दूरद्रवस्नातानाम् = सिन्दूर के घोल से स्नान किए हुए। स्नातानाम् = √ष्णा > स्ना (शौचे) + क्त प्रत्यय। षष्ठी विभक्ति बहुवचन । वरुणदिक् = पश्चिमदिशा। वरुणस्य दिक्। वरुणदेव को पश्चिम दिशा का अधिपति माना जाता है। वरुणदिगवलम्बिनाम् = पश्चिम दिशा का आश्रय लेने वाले। वरुणदिशः अवलम्बनं शीलं येषां ते, तेषाम्। अव + √लम्ब् + इन् प्रत्यय। अरुणवारिवाहानाम् = लालिमायुक्त बादलों के, अरुणाश्च ते वारिवाहाश्च, तेषाम्। वारि वहन्ति इति वारिवाहाः = मेघाः । कलविकाः = पक्षी (गौरैया)। चाटकैरः = पक्षिशावकों के द्वारा। चटकस्य अपत्यं चाटकैरः। चटका + एरच प्रत्यय। गौरैया का बच्चा। प्रतिक्षणम् = पल-पल। क्षणं क्षणम् = प्रतिक्षणम् (अव्ययीभाव समास)।

नीडेषु = घोंसलों में। नपुंसकलिङ्ग, सप्तमी बहुवचन। श्यामताम् = कालेपन को। श्यामस्य भावः = श्यामता। भावार्थ में तल्’ प्रत्यय। श्याम + तल्। कलयन्ति = प्राप्त करते हैं। √किल् (गतौ सङ्ख्याने च) + णिच्, लट्लकार प्रथम पुरुष, बहुवचन। चुरादिगण। अथ = अनन्तरम्। अव्यय। दर्शितदीर्घशुण्डमण्डित = लम्बी-लम्बी सूंडों से सुशोभित दिग्गजों के समान दिगन्तदन्तावलभयानकाकारा = भयानक आकार वाली (मेघमाला)। दीर्घश्चासौ शुण्डश्च = दीर्घशुण्डः । दर्शितश्चातो दीर्घशुण्डश्च। दर्शितदीर्घशुण्डः । दर्शितदीर्घशुण्डेन मण्डितः। दिशाम् अन्ताः दिगन्ताः। शोभनौ दन्तौ अस्य इति दन्तावलः। दिगन्ता एव दन्तावला: दिगन्तदन्तावलाः । दीर्घशुण्डमण्डिताश्च ते दिगन्तदन्तावलाश्च दर्शितदीर्घशुण्डमण्डितदिगन्तदन्तावलाः। भयानकश्च असौ आकारश्च भयानकाकारः। दर्शितदीर्घशुण्डमण्डितदिगन्त-दन्तावला इव भयानकाकारः यस्या सा (मेघमाला)।

प्रकटितशिखरिशिखरविडम्बना = पर्वत शिखरों का अनुकरण करने वाली (मेघमाला)। शिखरिणां शिखराणि शिखरिशिखराणि। शिखरिशिखराणां विडम्बनम् = शिखरिशिखरविडम्बनम्। प्रकटितं शिखरिशिखर-विडम्बनं यया सा (मेघमाला)। मेघमाला समस्तं गगनतलं परितः पर्यच्छदीत् = मेघमाला ने समस्त गगन मण्डल को आच्छादित कर लिया। ‘परितः’ अव्यय के प्रयोग से ‘गगनतलं’ और ‘समस्तं’ पदों में द्वितीया विभक्ति हुई है-‘अभितः परितः समयानिकषाहाप्रतियोगेऽपि’ इस अनुशासन से। परितः = चारों ओर। प्रादुरभूत् = प्रकट हुई। प्रादुस् + √भू + लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन। पारस्परिकसंश्लेषण = (बादलों के) परस्पर मिल जाने से। पर्यच्छदीत् = ढक लिया है। (व्याप्त हो गई)। परि + अच्छदीत्। √छद् (संवरणे) लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन।

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2. अस्मिन् समये एकः षोडशवर्ष-देशीयो गौरो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म। एष सुघटितदृढशरीरः श्याम-श्यामैर्गुच्छ-गुच्छैः कुञ्चित-कुञ्चितैः कच-कलापैः कमनीय-कपोलपालिः दूरागमनायासवशेन सूक्ष्ममौक्तिक-पटलेनेव स्वेदबिन्दु-व्रजेन समाच्छादित-ललाट-कपोल-नासाग्रोत्तरोष्ठः प्रसन्न-वदनाम्भोज-प्रदर्शितदृढसिद्धान्त-महोत्साहः, राजतसूत्र-शिल्पकृत-बहुल-चाकचक्य-वक्र-हरितोष्णीष-शोभितः, हरितेनैव च कञ्चुकेनव्यूढगूढचरता-कार्यः, कोऽपि शिववीरस्य विश्वासपात्रं सिंहदुर्गात् तस्यैव पत्रमादाय तोरणदुर्गं प्रयाति।
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हिन्दी-अनुवादः इसी समय लगभग सोलह वर्ष की आयु वाला एक गोरा युवक घोड़े से पर्वत शृंखला के ऊपर-ऊपर जा रहा था। इसका अच्छा गठा हुआ शरीर था। काले-काले, गुच्छेदार, घुघराले केश समूह से उसकी गालें सुशोभित हो रही थी। दूर से आने के परिश्रम से छोटे-छोटे मोतियों के समूह की भाँति पसीने की बूंदों से उसका ललाट, कपोल, नासिक का अग्रभाग तथा ऊपरी होंठ व्याप्त था। प्रसन्न मुख कमल से जिसके दृढ़ सिद्धान्त का उत्साह प्रकट हो रहा था। वह चाँदी के तार की कढ़ाई के कारण अत्यधिक चमकने वाली एक टेढ़ी बँधी हुई हरी पगड़ी से सुशोभित था। हरे रंग के कुर्ते से ही जिसने गुप्तचर का कार्य स्वीकार हुआ था। इस प्रकार का कोई शिवाजी का विश्वासपात्र (सैनिक) सिंहदुर्ग से उसी (शिवाजी) का पत्र लेकर तोरणदुर्ग की ओर प्रस्थान कर गया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च षोडशवर्षदेशीयः = लगभग सोलह वर्ष का। ‘लगभग’ इस अर्थ में ‘कल्पप्’, ‘देश्य’ या ‘देशीयर्’ प्रत्यय लगते हैं। यहाँ देशीयर’ प्रत्यय लगा है। षोडशवर्ष + देशीयर् । कुञ्चितकुञ्चितैः = घुघराले। कुञ्च् (गति-कौटिल्यालपीभावेषु) + क्त प्रत्यय। कचकलापैः = केश समूहों के द्वारा । कचानां कलापाः तैः । कमनीयकपोलपालिः = सुन्दर गालों वाला। कमनीये कपोलपाली यस्य सः /कम् (कान्तौ) + अनीयर् प्रत्यय । हयेन = घोड़े से। स्वेदबिन्दुव्रजेन = पसीने की बूंदों से। स्वेदबिन्दूनां व्रजः तेन। समाच्छादितललाट-कपोल-नासाग्रोत्तरोष्ठः = जिसका ललाट, कपोल, नासिका का अग्रभाग तथा ऊपरी ओंठ (पसीने की बूंदों से) व्याप्त है। ललाटश्च कपोलश्च नासाग्रश्च उत्तरोष्ठश्च = लालटकपोलनासाग्रोत्तरोष्ठम् (समास में एकवचन होना विशेष है) समाच्छादितं ललाटकपोलनासाग्रोत्तरोष्ठं यस्य सः बहुव्रीहि समास। प्रसन्नवदनाम्भोजेन =

प्रसन्नमुखकमल से। प्रसन्नवदनाम्भोजप्रदर्शित-दृढसिद्धान्तमहोत्साहः = प्रसन्न मुख कमल से दृढ सिद्धान्त के महोत्साह को प्रकट करने वाला। राजतसूत्रशिल्पकृतबहुल-चाकचक्यवक्रहरितोष्णीषशोभितः = चाँदी के तार की कढाई (शिल्प) के कारण अत्यधिक चमकने वाली तथा टेढ़ी बँधी हुई हरी पगड़ी से सुशोभित। राजतसूत्रस्य शिल्पेन कृतं बहुलं चाकचक्यं यस्य तथाभूतं वक्रं हरितं च यत् उष्णीषम्, तेन शोभितः, बहुव्रीहि समास। आदाय = लेकर। आ + √दा + ल्यप् प्रत्यय। प्रयाति = जाता है। प्र + √या (प्रापणे) + लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

3. तावदकस्मादुत्थितो महान् झञ्झावातः, एकः सायंसमयप्रयुक्तः स्वभाव-वृत्तोऽन्धकारः, स च द्विगुणितो मेघमालाभिः। झञ्झावातोद्भूतैः रेणुभिः शीर्णपत्रैः कुसुमपरागैः शुष्कपुष्पैश्च पुनरेष द्वैगुण्यं प्राप्तः। इह पर्वतश्रेणीतः पर्वतश्रेणीः, वनाद् वनानि, शिखराच्छिखराणि प्रपातात् प्रपातान्, अधित्यकातोऽधित्यकाः, उपत्यकात उपत्यकाः, न कोऽपि सरलो मार्गः, नानुद्भदिनी भूमिः, पन्थाः अपि च नावलोक्यते।

हिन्दी-अनुवादः तभी बड़ा भारी अचानक तूफान उठा। एक तो सांय के समय में होने वाला स्वाभाविक अन्धकार, वह भी बादलों के समूह के कारण दोगुणा हो गया। तूफान से उठी हुई धूलियों, पुराने पत्रों, पुष्पपरागों तथा सूखे पत्तों से (यह अन्धकार) फिर से दुगना हो गया। इधर एक पर्वत शृंखला के बाद दूसरी पर्वत शृंखला पर, एक वन के बाद दूसरे वन में, एक शिखर के बाद दूसरे शिखर पर, एक झरने बाद दूसरे झरने पर, एक अधित्यका (पर्वत के ऊपर की ऊँची भूमि) के बाद दूसरी अधित्यका पर, एक उपत्यका (पर्वत के पास वाली निचली भूमि) के बाद दूसरी उपत्यका पर (जहाँ) कोई सरल मार्ग नहीं, कोई समतल भूमि नहीं और रास्ता भी दिखाई नहीं पड़ रहा है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च झञ्झावातोद्भूतैः = आँधी से उठी। झञ्झावातेन उद्धृतैः । उत् + √धू (कम्पने) क्त प्रत्यय। रेणुभिः= धूलों से। द्वैगुण्यम् = दुगना हो गया। द्विगुणस्य भावः। द्विगुण + ष्यञ्। अनुइँदिनी = समतल। न + उभेदिनी। न + उद् + √भिद् + इन् + डीप् प्रत्यय। प्रपातात् प्रपाता = झरने के बाद झरने। अधित्यकातोऽधित्यकाः = अधित्यका (पर्वत के ऊपर की ऊँची भूमि) के बाद अधित्यकाएँ। उपत्यकात उपत्यकाः = पर्वत के पास की नीची भूमि। उपत्यका के बाद उपत्यकाएँ। दोधूयमानाः = अत्यधिक हिलने वाले। पुनः पुनः अत्यधिकं कम्पमानाः । √धूञ् + यङ् + शानच् प्रत्यय। आघातः = अभिघात। चोट। आ + हिन् + क्त प्रत्यय। महान्धतमसेन = अत्यन्त अन्धकार से। अकारान्त नपुंसक शब्द है। अन्धयति इति अन्धम्। अन्धं च तत् तमश्च। अन्धतमसम्। महच्च तत् अन्धतमसं च महान्धतमसम्, तेन। कवलीकृतम् = ग्रसित होता हुआ। अकवलं कवलं सम्पद्यमानं कृतं कवलीकृतम्। कवल + च्चि + कृतम्। आनन्ति = आ + √हन् + लट्लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन। सादी = घुड़सवार।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

4. क्षणे-क्षणे हयस्य खुराश्चिक्कण-पाषाण-खण्डेषु प्रस्खलन्ति। पदे पदे दोधूयमानाः वृक्षशाखाः सम्मुखमानन्ति, परं दृढसड्कल्पोऽयं सादी (अश्वारोही) न स्वकार्याद् विरमति। परितः स-हडहडाशब्दं दोधूयमानानां परस्सहस्त्र-वृक्षाणां, वाताघात-संजात-पाषाण-पातानां प्रपातानाम्, महान्धतमसेन ग्रस्यमानानामिव सत्त्वानां क्रन्दनस्य च भयानकेन स्वनेन कवलीकृतमिव गगनतलम्। परं “देहं वा पातयेयं कार्यं वा साधयेयम्” इति कृतप्रतिज्ञोऽसौ शिववीरचरो निजकार्यान्न विरमति।

हिन्दी-अनुवादः क्षण-क्षण भर में घोड़े के खुर चिकने पत्थर-खण्डों पर फिसल रहे हैं। पग-पग पर झुलती हुई वृक्ष-शाखाएँ सामने से आघात (प्रहार) करती हैं। परन्तु यह दृढ़ संकल्प वाला घुड़सवार अपने कार्य से रुक नहीं रहा है। चारों ओर हड़हड़ शन के साथ बार-बार झूलते हुए हजारों वृक्षों तूफान की चोट से गिरने वाले पत्थरों से युक्त झरनों तथा घोर अन्धकार से ग्रसे जाते हुए से वन्यप्राणियों की चीख के भयानक शब्द से सम्पूर्ण आकाशमण्डल ही मानो ग्रस लिया गया था। परन्तु ‘कार्य सिद्ध करूँगा यां शरीर को नष्ट कर दूंगा’-ऐसी प्रतिज्ञावाला वह शिवाजी सैनिक अपने कार्य से रुक नहीं रहा है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – चिक्कणपाषाणखण्डेषु = चिकने पत्थर खण्डों पर। साधयेयम् = सिद्ध करूँगा। √साध् (संसिद्धौ) + णिच् प्रत्यय + लिङ्लकार उत्तम पुरुष एकवचन। पातयेयम् = नष्ट कर दूंगा। √पत् (गतौ) + णिच् प्रत्यय। लिङ्लकार उत्तम पुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 9 कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

कार्य वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् (कार्य सिद्ध करुंगा या देह का त्याग कर दूंगा) Summary in Hindi

कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् पाठ परिचय

पं० अम्बिकादत्त व्यास (1858-1900 ईस्वी) आधुनिक युग के संस्कृत लेखकों में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। हिन्दी और संस्कृत में इनकी लगभग 75 रचनाएँ मिलती हैं। इन सभी में ‘शिवराजविजयः’ नामक ऐतिहासिक उपन्यास इनकी श्रेष्ठतम रचना है। यह उपन्यास 1901 ईस्वी में प्रकाशित हुआ था।

शिवराजविजय शिवाजी और औरंगजेब की प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। शिवाजी इस उपन्यास के नायक हैं, जो भारतीय आदर्शों, संस्कृति, सभ्यता और मातृशक्ति के रक्षक के रूप में चित्रित किए गए हैं। शिवाजी और उनके सैनिकों की दृढ़ प्रतिज्ञा है-‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्’-कार्य सिद्ध करूँगा या देह का त्याग कर दूंगा।

गद्य काव्य की दृष्टि से शिवराजविजय एक उत्कृष्ट रचना है। इनकी भाषा की एक विशेषता है कि इनकी भाषा सदा भावों के अनुसार प्रयुक्त होती है। सरस प्रसंगों में ललित पदावली और वैदर्भी शैली का प्रयोग हुआ है। करुणा भरे प्रसंगों में प्रत्येक शब्द आँसुओं से भीगा हुआ मिलता है। वीर रस के प्रसंग में भाषा ओजस्विनी हो जाती है और पाठक की भुजाएँ फड़कने लगती हैं। रस और अलंकारों का सुन्दर सामंजस्य है। सभी वर्णन स्वाभाविकता से ओत-प्रोत हैं। बाण और दण्डी के गद्य की सभी विशेषताएँ व्यास जी के गद्य में मिलती हैं।

‘शिवराजविजयः’ उपन्यास में तीन विराम हैं तथा प्रत्येक विराम में चार निःश्वास हैं। कुल 12 निःश्वास हैं। प्रस्तुत पाठ ‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्’ इसी ऐतिहासिक उपन्यास के प्रथम विराम के चतुर्थ निःश्वास से संकलित है। इस अंश में शिवाजी का एक विश्वासपात्र एवं कर्मठ गुप्तचर ‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातेययम्’ वाक्य द्वारा अपना दृढ़ संकल्प प्रकट करता है, जिसका तात्पर्य है-‘कार्य सिद्ध करूँगा या देह का त्याग कर दूंगा।’

कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम् पाठस्य सारः

प्रस्तुत पाठ ‘कार्यं वा साधेययम् देहं वा पातयेयम्’ संस्कृत के आधुनिक गद्यकार पं० अम्बिकादत्त व्यास के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास ‘शिवराजविजयः’ के प्रथम विराम के चतुर्थ निःश्वास से संकलित है। इस पाठ्यांश में शिवाजी का एक विश्वासपात्र गुप्तचर ‘कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्’–‘कार्य सिद्ध करूँगा या देह त्याग कर दूंगा’-इस दृढ़ संकल्पपूर्वक सिंह दुर्ग से शिवाजी का पत्र लेकर तोरण दुर्ग की ओर प्रस्थान करता है। मार्ग में भयंकर प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं, परन्तु वीर सैनिक अपनी कार्यसिद्धि करके ही विश्राम लेता है।

आषाढ़ का महीना है। सायं का समय है। सूर्य अस्त हो रहा है। गौरैया पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे हैं। प्रकाश के अभाव में वन वृक्ष और भी काले हुए जा रहे हैं। तभी अचानक आकाश बादलों से ढक जाता है। चारों ओर धरती से आकाश तक घोर अन्धकार का साम्राज्य हो जाता है। बादल ऐसे भयावह लग रहे हैं। मानों वे कोई लम्बीलम्बी सूंड वाले दिग्गज हों और उनका विशाल दन्तसमूह उन्हें भयानक आकार दे रहा हो।

इसी समय लगभग सोलह वर्ष की आयु वाला गौरवर्ण युवक (गौरसिंह) घोड़े पर सवार होकर पर्वतों को पार करता हुआ जा रहा है। इसका गठा हुआ शरीर है, काले-धुंघराले बाल हैं, सुन्दर मुखमण्डल परिश्रम के कारण पसीने से नहाया हुआ है। कमल की भाँति खिले हुए मुख से उसका दृढ़ उत्साह प्रकट हो रहा है। उसकी हरे रंग की पगड़ी में चाँदी के तारों से कढ़ाई की हुई है। हरे रंग का कुर्ता है। शिवाजी का अत्यन्त विश्वासपात्र यह गुप्तचर सिंहदुर्ग से शिवाजी का ही पत्र लेकर तोरणदुर्ग की ओर प्रस्थान कर रहा है।

तभी अचानक भयंकर तूफान उठता है। बादलों की घटाएँ, तूफान से उठी धूल तथा सूखे पत्ते मिलकर सायंकाल • के अन्धकार को कई गुणा कर देते हैं। पर्वत, जंगल, पानी के झरने, पर्वतों के शिखर और तलहटियाँ, ऊबड़-खाबड़ भूमि, कोई सीधा सरल मार्ग नहीं, कोई समतल भूमि नहीं, इन सबसे बढ़कर घोर अंधकार जिसमें वह भयंकर रास्ता
भी दिखाई नहीं पड़ता। थोड़ी-थोड़ी देर बाद चिकने पत्थरों से घोड़ों के खुर टकराकर फिसल जाते हैं। पग पर वृक्षों की झूलती हुई शाखाएँ सामने से आ टकराती हैं, परन्तु शिवाजी का यह वीर सैनिक अपने कार्य से विराम नहीं लेता।

चारों ओर से हड़-हड़ की आवाज़ के साथ हज़ारों वृक्षों, तूफान से टकराकर झरनों में गिरने वाले पत्थरों तथा घने अन्धकार का ग्रास बन रहे वन्यप्राणियों के चीत्कार से सारा आकाश व्याप्त है। परन्तु शिवाजी का यह दृढ़प्रतिज्ञ गुप्तचर अपने कार्य से न रुका। ‘कार्यं वा साधयेयम् , देहं वा पातयेयम्’-‘कार्य सिद्ध करूँगा या देह का त्याग कर दूंगा।’ शिवाजी के इस दृढ़ संकल्प को अपना संकल्प बनाते हुए इस वीर सैनिक ने कार्य सिद्ध करके ही विश्राम लिया। इस अंश की भाषा एवं शब्दावली भावों के अनुरूप ओजस्विनी है। पाठ्यांश का स्पष्ट सन्देश है-निर्भयतापूर्वक कठोर परिश्रम ही सफलता की कुञ्जी है।

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग: Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

HBSE 12th Class Sanskrit भू-विभाग: Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम्
(क) पृथिव्याः कति भेदाः ?
(ख) पृथिव्याः सप्तपुटानां नामानि कानि सन्ति ? ।
(ग) पर्वताः कति सन्ति ?
(घ) समुद्राः कति सन्ति ?
(ङ) दधिसमुद्रः कस्य द्वीपस्यावरकः ?
(च) ‘अर्श’ इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(छ) ‘कुर्शी’ इति पदं कस्मिन्नर्थे प्रयुक्तम् ?
(ज) ‘अस्मद्वेद’ इति शब्दः दाराशिकोहेन कस्य ग्रन्थस्य कृते प्रयुक्तः ?
उत्तरम्:
(क) पृथिव्याः सप्त भेदाः ?
(ख) पृथिव्याः सप्तपुटानां नामानि सन्ति 1. अतलः 2. वितलः, 3. सुतलः, 4. प्रतलः, 5. तलातलः, 6. रसातल, 7. पातालः
(ग) पर्वताः सप्त सन्ति ?
(घ) समुद्राः सप्त सन्ति ?
(ङ) दधिसमुद्रः क्रौञ्च-द्वीपस्यावरकः ?
(च) ‘अर्श’ इति पदम् आकाशाय प्रयुक्तम् ?
(छ) ‘कुर्शी’ इति पदं परमेश्वस्य सिंहासने अर्थे प्रयुक्तम् ?
(ज) ‘अस्मद्वेद’ इति शब्दः दाराशिकोहेन ‘कुरानशरीफ़’ ग्रन्थस्य कृते प्रयुक्तः ?

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

2. हिन्दीभाषया आशयं लिखत
एतान् खण्डान् पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन न ज्ञायन्ते, किन्तु निःश्रेणी-सोपानवज्जानन्ति । सप्तपर्वतान् सप्तकुलाचलान् वदन्ति, तेषां पर्वतानां नामान्येतानि-प्रथमः सुमेरुमध्ये, द्वितीयो हिमवान्, तृतीयो हेमकूटः, चतुर्थो निषधः एते सुमेरोरुत्तरतः।

प्रसंगः-प्रस्तुत गद्यांश ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘भू-विभागाः’ नामक पाठ से उद्धृत है। यह पाठ दाराशिकोह द्वारा रचित ‘समुद्रसङ्गमः’ नामक ग्रन्थ से लिया गया है। प्रस्तुत गद्यांश में भूलोक के सात विभागों तथा सप्त पर्वतों की चर्चा की है।

व्याख्या-पृथिवी जिस पर सब लोगों का निवास है, दार्शनिकों ने उसके सात खण्ड माने हैं, इन्हें सप्तद्वीप भी कहा जाता है। ये खण्ड प्याज के छिलकों की तरह एक के नीचे एक-एक के नीचे एक नहीं होते, अपितु जैसे सीढ़ी में अलग-अलग समान दूरी पर लकड़ी/बाँस में डण्डे लगे होते हैं उसी प्रकार इन सप्तद्वीपों की स्थिति भी समझनी चाहिए। सप्तपर्वतों को ‘सप्तकुलाचल’ नाम से भी जाना जाता है। इन सात पर्वतों के नाम और उनकी स्थिति इस प्रकार है। पृथिवी के मध्य में सुमेरु नामक पहला पर्वत है। दूसरा हिमालय, तीसरा हेमकूट और चौथा निषध नामक पर्वत हैये तीनों सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में स्थित हैं। इन सबके अतिरिक्त माल्यवान्, गन्धमादन तथा कैलास पर्वत हैं। इन्हें जोड़कर ही सात समुद्रों की संख्या पूर्ण होती है। प्रस्तुत गद्यांश में इन तीनों का उल्लेख नहीं है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

3. अधोलिखितानां पदानां स्वसंस्कृतवाक्येषु प्रयोगं कुरुत
पुटानि, कृतवान्स, आवेष्टनरूपा, सर्वेभ्यः ब्रह्माण्डात्, परिभ्रमन्ति।
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगः)
(क) पुटानि – पृथिव्याः सप्त विभागाः ‘सप्तपुटानि’ अपि कथ्यन्ते।
(ख) कृतवान् – दाराशिकोहः श्रीमद्भगवद्गीतायाः अनुवादं फारसीभाषायां कृतवान्।
(ग) आवेष्टनरूपा:-सप्तद्वीपाः सप्तसमुद्राणाम् आवेष्टनरूपाः सन्ति।
(घ) सर्वेभ्यः-सर्वेभ्यः शिक्षकेभ्यः नमः।
(ङ) ब्रह्माण्डात्-स्वर्गनरकादिकं ब्रहमाण्डात् बहिः नास्ति।
(च) परिभ्रमन्ति-सप्त ग्रहाः गगने परिभ्रमन्ति।

4. अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कुरुतपुटान्युच्यन्ते, अस्मन्मते, पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधोभावेन, सोपानवजानन्ति, सुमेरोरुत्तरतः, समुद्रोऽपि, किञ्चिदहिरस्तीति, अस्मदीयास्तमर्श ।
उत्तरम्:
(क) पुटान्युच्यन्ते = पुटानि + उच्यन्ते।
(ख) अस्मन्यते = अस्मत् + मते।
(ग) पलाण्डुत्वग्वदपर्यधोभावेन = पलाण्डुत्वग्वत् + उपरि + अधः + भावेन।
(घ) सोपानवजानन्ति = सोपानवत् + जानन्ति।
(ङ) सुमेरोरुत्तरतः = सुमेरोः + उत् + तरतः।
(च) समुद्रोऽपि = समुद्रः + अपि।
(छ) किञ्चिद्वहिरस्तीति = किञ्चित् + बहिः + अस्ति + इति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

5. अधोलिखितानां पदानां पर्यायवाचिपदानि लिखत
पृथिवी, पर्वतः, समुद्रः, गगनम्, स्वर्गः
उत्तरम्:
(पर्यायवाचिपदानि)
(क) पृथिवी = भूमिः, भू, पृथ्वी, धरणी, धरा।
(ख) पर्वतः = गिरिः, अचलः, भूधरः, धरणीधरः ।
(ग) समुद्रः = सागरः, जलधिः, वारिधिः, रत्नाकरः।
(घ) गगनम् = आकाशः, खः, क्षितिजः, नभः।
(ङ) स्वर्गः = दिवम्, ‘अर्श’ इति फारसीभाषायाम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

6. रिक्तस्थानानाम् पूर्तिः विधेया
(क) पौराणिकास्तु ………….. द्वीपानि वदन्ति।
(ख) सप्त …………… सप्त कुलाचलान् वदन्ति ।
(ग) …………. जम्बुद्वीपस्यावरकः ।
(घ) स्वर्गभूमिं …………… वदन्ति।
उत्तरम्:
(क) पौराणिकास्तु सप्त द्वीपानि वदन्ति।
(ख) सप्त पर्वतान् सप्त कुलाचलान् वदन्ति।
(घ) स्वर्गभूमिम्: कुशी इति वदन्ति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

योग्यताविस्तारः

(क) संस्कृतवाङ्मये भूगोल-खगोलविषयकं ज्ञानं प्राचुर्येण उपलभ्यते। यथा-सूर्यसिद्धान्तादिशास्त्रेषु
भगवन् ! किम्प्रमाणा भूः किमाकारा किमाश्रया।
किंविभागा कथं चात्र सप्तपातालभूमयः॥
अहोरात्रव्यवस्थां च विदधाति कथं रविः।
कथं पर्येति वसुधां भुवनानि विभावयन्॥
कथं पर्येति वसुधां भुवनानि विभावयन्।
भूमेरुपर्युपर्युर्ध्वाः किमुत्सेधाः किमन्तराः॥

(ख) ‘कुलाचलाः’ सप्तपर्वतानां माला अस्ति। संस्कृतवाङ्मये एते सप्त पर्वताः
महेन्द्रो मलयः सहयः शुक्तिमान् ऋक्षपर्वतः।
विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तैते कुलपर्वताः।।

(ग) अस्मिन् पाठे वर्णितानां भौगोलिकतथ्यानां तुलना आधुनिकभूगोल-विज्ञानेन प्रमाणिततथ्यैः सह करणीया।

(घ) सप्तधा इति पदम् अनुसृत्य अधोलिखितैः संख्यावाचिभिः शब्दैः पदानि- निर्मातव्यानि एकम, द्वि, त्रि, चतुर, पञ्च
उत्तरम्:
एकधा, द्विधा, त्रिधा, चतुर्धा, पञ्चधा, षड्धा, सप्तधा, अष्टधा, नवधा, दशधा।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

HBSE 9th Class Sanskrit भू-विभाग: Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) पृथिव्याः कति भेदाः ?
(A) अष्ट
(B) सप्त
(C) षड्
(D) नव।
उत्तराणि:
(B) सप्त

(ii) पर्वताः कति सन्ति ?
(A) नव
(B) सहस्रम्
(C) अष्ट
(D) सप्त।
उत्तराणि:
(A) सप्त

(iii) समुद्राः कति सन्ति ?
(A) सप्त
(B) अष्ट
(C) नव
(D) चत्वारः।
उत्तराणि:
(D) सप्त

(iv) दधिसमुद्रः कस्य द्वीपस्यावरकः ?
(A) सुमेरुद्वीपस्य
(B) मालद्वीपस्य
(C) सिंहद्वीपस्य
(D) क्रौञ्चद्वीपस्य।
उत्तराणि:
(A) क्रौञ्चद्वीपस्य

(v) ‘अर्श’ इति पदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(A) आकाशाय
(B) द्वीपाय
(C) समुद्राय
(D) पर्वताय।
उत्तराणि:
(A) आकाशाय।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

II. रेखाकितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) परमेश्वरः पृथिव्याः सप्तविभागान् कृतवान्।
(A) किम्
(B) क:
(C) कस्याः
(D) काः।
उत्तराणि:
(C) कस्याः

(ii) पौराणिकाः सप्त द्वीपानि वदन्ति।
(A) काम्
(C) कः
(D) कति।
उत्तराणि:
(B) के

(iii) सप्तद्वीपानाम् आवेष्टनरूपाः सप्त समुद्राः।
(A) कः
(B) कस्मात्
(C) कति
(D) केषाम्।
उत्तराणि:
(D) केषाम्

(iv) सप्त ग्रहाः स्वर्गं परितः मेखलावत् परिभ्रमन्ति।
(A) कथम्
(B) कति
(C) केन
(D) कया।
उत्तराणि:
(A) कथम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

भू-विभाग: पाठ्यांशः

1. अथ पृथिवीनिरूपणम्-पृथिव्याः सप्तभेदाः। ते च भेदाः सप्तपुटान्युच्यन्ते। तानि च पुटानि-अतलवितल-सुतल-प्रतल-तलातल-रसातल-पातालाख्यानि। अस्मन्मतेऽपि सप्तभेदाः। यथाऽस्मद्वेदे श्रूयते परमेश्वरो यथा सप्तगगनानि तद्वत् पृथिव्याः सप्तविभागान् कृतवान्। अथ पृथिव्याः विभागनिरूपणं यत्र लोकास्तिष्ठन्ति। तस्याः दार्शनिकैः सप्तधा विभागः कृतस्तान् विभागान् सप्त अअक्लिम इति वदन्ति। पौराणिकास्तु सप्तद्वीपानि वदन्ति। एतान् खण्डान् पलाण्डुत्वग्वदुपर्यधो भावेन न ज्ञायन्ते, ‘किन्तु’ निःश्रेणी सोपानवजानन्ति।

हिन्दी-अनुवादः अब पृथिवी का निरूपण किया जाता है-पृथिवी के सात भेद हैं और उन्हें ‘सप्तपुट’ कहा जाता है। उन पुटों के नाम हैं-(1) अतल, (2) वितल, (3) सुतल, (4) प्रतल, (5) तलातल, (6) रसातल, (7) पाताल। हमारे मत में भी सात भेद हैं। जैसे कि हमारे वेद (कुरान शरीफ) में सुना जाता है; जैसे परमेश्वर ने सात प्रकार के आकाश बनाए हैं उसी प्रकार पृथिवी के सात भेद किए गए हैं। .. अब पृथिवी के विभागों का निरूपण किया जाता है, जहाँ लोग रहते हैं। उस पृथिवी के दार्शनिकों ने सात विभाग किए हैं, उन विभागों को सात अअक्लिम = अकूलीन = खण्ड कहते हैं। पौराणिक उन्हें सात द्वीप कहते हैं। इन खण्डों को प्याज के छिलके की तरह ऊपर-नीचे के भाव से नहीं समझना चाहिए, परन्तु सीढ़ी में लगने वाले काष्ठ-दण्ड की भाँति समझ सकते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च पुटानि = भेदाः, भेद या पुट। अअक्लिम = अकूलीन (खण्ड अथवा टुकड़ा)। पलाण्डुत्वक् = प्याज का छिलका। उपर्यधः = ऊपर-नीचे (उपरि + अधः)। कुलाचलाः = कुलपर्वत अथवा सात पर्वतों की माला। निःश्रेणी = निसेनी अथवा सीढ़ी। सोपानम् = निसेनी में एक समान दूरी पर लगने वाले छोटे-छोटे काष्ठ-खण्ड।

2. सप्त पर्वतान् सप्तकुलाचलान् वदन्ति, तेषां पर्वतानां नामान्येतानि प्रथमः सुमेरुमध्ये, द्वितीयो हिमवान्, तृतीयो हेमकूटः, चतुर्थो निषधः एते सुमेरोरुत्तरतः। माल्यवान् पूर्वस्यां, गन्धमादनः पश्चिमायां कैलासश्च मर्यादापर्वतेभ्योऽतिरिक्तः। यथाऽस्मद्वेदे श्रूयते-“अस्माभिः पर्वताः शङ्कवः कृता।” एतेषां सप्तद्वीपानां प्रत्येकमावेष्टनरूपाः सप्तसमुद्राः। लवणो जम्बुद्वीपस्यावरकः । इक्षुरसः प्लक्षद्वीपस्य, दधिसमुद्रः क्रौञ्चद्वीपस्य, क्षीरसमुद्रः शीकद्वीपस्य, स्वादुजलसमुद्रः पुष्करद्वीपस्यावरकः इति।समुद्राः सप्त अस्मद्वेदेऽपि प्रकटाः भवन्ति।

हिन्दी-अनुवादः सात पर्वतों को सात कुलाचलन कहते हैं। उन पर्वतों के नाम ये हैं-पहला सुमेरु पर्वत (जो) मध्य में है। दूसरा हिमालय, तीसरा हेमकूट, चौथा निषध-ये सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में हैं। (पाँचवाँ) मूल्यवान् पूर्व दिशा में (छठा) गन्धमादन पश्चिम दिशा में और (सातवाँ) कैलास पर्वत मर्यादा पर्वतों से अलग है। जैसा हमारे वेद (कुरान शरीफ) में सुना जाता है-“हमने पर्वतों को शकु (कीलें) बना दिया।” इन सात द्वीपों में प्रत्येक द्वीप के आवरण रूप सात समुद्र हैं। लवण (समुद्र) जम्बुद्वीप का आवरण है। इक्षुरस (सुरा) प्लक्षद्वीप का, दधिसमुद्र क्रौञ्चद्वीप का, क्षीर सागर शाकद्वीप का (और) स्वादु जल समुद्र पुष्कर द्वीप का आवरक है। हमारे वेद (कुरान शरीफ़) में भी सात समुद्र प्रकट होते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च शकवः = कीलें। आवेष्टनरूपा = आवरण करने वाले। इक्षुरसः = गन्ने का रस, सुरा अथवा मदिरा। आवरकः = ढकने वाला।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 8 भू-विभाग:

3. वृक्षाः लेखनी भवेयुः समुद्रोऽपि मसी भवेत्, परं भगवद्वाक्यानि समाप्तानि न भवन्ति। प्रतिद्वीपं प्रतिपर्वतं प्रतिसमुद्रं नानाजातयोऽनन्ता जन्तवस्तिष्ठन्ति। या पृथिवी ये पर्वताः ये समुद्राः सर्वाभ्यः पृथिवीभ्यः सर्वेभ्यः पर्वतेभ्यः समुद्रेभ्यः उपरि तिष्ठन्ति तान् ‘स्वर्ग’ इति वदन्ति। या पृथिवी ये पर्वता: ये समुद्राः सर्वाभ्यः पृथिवीभ्यः सर्वेभ्यः पर्वतेभ्यः सर्वेभ्यः समुद्रेभ्योऽधो भागे तिष्ठन्ति स’नरक’ इति वदन्ति। निश्चितं किल सिधैः स्वर्गनरकादिकं सर्वं ब्रह्माण्डान्न किञ्चिद्वहिरस्तीति । ते सप्तगगनाश्रिताः सप्त ग्रहाः स्वर्गं परितो मेखलावत् परिभ्रमन्तीति वदन्ति, न स्वर्गस्योपरि। अथ स्वर्गस्य यदि मन आकाशं जानन्ति अस्मदीयास्तमर्श इति वदन्ति । स्वर्गभूमिं कुर्शीति वदन्ति।”

हिन्दी-अनुवादः सभी वृक्ष लेखनी बन जाएँ, समुद्र स्याही बन जाए, परन्तु भगवद्-वचन समाप्त नहीं होते (अर्थात् भगवान् की . महिमा लिखने के लिए ये सब अपर्याप्त ही होते हैं)। प्रत्येक द्वीप में प्रत्येक पर्वत पर, प्रत्येक समुद्र में विविध जाति वाले अनन्त प्राणी रहते हैं। जो पृथिवी, जो पर्वत, जो समुद्र सभी पृथिवियों से, सभी पर्वतों से, सभी समुद्रों से ऊपर विद्यमान हैं उन्हें ‘स्वर्ग’ कहते हैं। जो पृथिवी, जो पर्वत, जो समुद्र सभी पृथिवियों से, सभी पर्वतों से तथा समुद्रों से निचले भाग में स्थित हैं उन्हें ‘नरक’ कहते हैं। सिद्ध पुरुषों ने निश्चित मत बनाया है कि स्वर्ग-नरक आदि (सब यहाँ पर ही हैं) ब्रह्माण्ड से कुछ भी बाहर नहीं है। सात आकाशों के आश्रित रहने वाले (जो) सात ग्रह हैं, वे स्वर्ग के चारों ओर मेखला की भाँति भ्रमण करते हैं, स्वर्ग के ऊपर नहीं। अब यदि स्वर्ग का मन आकाश को समझते हैं (तो) हमारे लोग उसे ‘अर्श’ कहते हैं। स्वर्गभूमि को ‘कुर्शी’ कहते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – मसी = स्याही। मेखलावत् = मेखला अथवा शृखला के समान। ‘अर्श’ = आकाश अथवा गगन, स्वर्ग के ऊपर की छत (फारसी शब्द)। ‘कुर्शी’ = परमेश्वर का सिंहासन अथवा स्वर्गभूमि, ‘कुर्शी’ को आठवाँ आसमान भी कहा गया है। (फारसी शब्द)।

भू-विभागः (भूमि के विभाग) Summary in Hindi

भू-विभाग: पाठ परिचय

मुगलसम्राट् शाहजहाँ के विद्वान् पुत्र दाराशिकोह संस्कृत तथा अरबी भाषा के तत्कालीन विद्वानों में अग्रगण्य थे। ‘समुद्रसङ्गमः’ दाराशिकोह द्वारा रचित प्रसिद्ध है। इसी ग्रन्थ में ‘पृथिवी-निरूपणम्’ के अन्तर्गत उन्होंने पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों आदि का विशिष्ट शैली में वर्णन किया है। उसी वर्णन के कुछ अंश यहाँ ‘भू-विभागाः’ पाठ में प्रस्तुत किए गए हैं।

दाराशिकोह मुगलसम्राट शाहजहाँ के सबसे बड़े पुत्र थे। उनका जीवनकाल 1615 ई० से 1659 ई० तक है। शाहजहाँ उनको राजपद देना चाहते थे पर उत्तराधिकार के संघर्ष में उनके भाई औरंगजेब ने निर्ममता से उनकी हत्या कर दी। दाराशिकोह ने अपने समय के श्रेष्ठ संस्कृत पण्डितों, ज्ञानियों और सूफी सन्तों की सत्संगति में वेदान्त और इस्लाम के दर्शन का गहन अध्ययन किया था। उन्होंने फारसी और संस्कृत में इन दोनों दर्शनों की समान विचारधारा को लेकर विपुल साहित्य लिखा। फारसी में उनके ग्रन्थ हैं-सारीनतुल् औलिया, सकीनतुल् औलिया, हसनातुल् आरफीन (सूफी सन्तों की जीवनियाँ), तरीकतुल् हकीकत, रिसाल-ए-हकनुमा, आलमे नासूत, आलमे मलकूत (सूफी दर्शन के प्रतिपादक ग्रन्थ), सिर-ए-अकबर (उपनिषदों का अनुवाद)। श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ का भी फारसी भाषा में उन्होंने अनुवाद किया। ‘मज्म-उल-बहरैन्’ फारसी में उनकी अमरकृति है, जिसमें उन्होंने इस्लाम और वेदान्त की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बतलाई हैं। इसी ग्रन्थ को दाराशिकोह ने ‘समुद्रसङ्गमः’ नाम से संस्कृत में लिखा।

भू-विभाग: पाठस्य सारः

‘भू-विभागाः’ यह पाठ मुगलसम्राट शाहजहाँ के सबसे बड़े पुत्र दाराशिकोह द्वारा रचित ‘समुद्रसंगमः’ नामक ग्रन्थ से संकलित है। दाराशिकोह ने संस्कृत के अनेक विद्वानों, ज्ञानियों तथा सूफी सन्तों की संगति की थी। वेदान्त और इस्लाम के दर्शन का इन्हें गहरा ज्ञान था। इन्होंने वेदान्त और इस्लाम दर्शन की समान विचारधारा को केन्द्र बिन्दु बनाकर फारसी तथा संस्कृत दोनों भाषाओं में अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। ‘समुद्रसंगमः’ ग्रन्थ में ‘पृथ्वी-निरूपणम्’ के अर्न्तगत उन्होंने पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों आदि का वर्णन अपनी विशिष्ट शैली में किया है। उसी वर्णन को ‘भू-विभागाः’ शीर्षक के अन्तर्गत पाठ्यपुस्तक में रखा गया है।

दाराशिकोह पृथ्वी का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पृथ्वी के सात भेद हैं। इन्हें ही सप्तपुट कहा जाता है। अतल, वितल, सुतल, प्रतल, तलातल, रसातल तथा पाताल-ये सप्तपुट हैं। कुरान में भी ये सात विभाग स्वीकार किए गए हैं। – पृथ्वी के जिस अंश पर लोग निवास करते हैं उसे सप्तद्वीप कहा जाता है। पृथ्वी के ये सात अअक्लिम = अकुलीन या खण्ड हैं। ये सात खण्ड प्याज के छिलके की तरह ऊपर-नीचे स्थित नहीं होते। किन्तु सीढ़ी में लगे हुए काष्ठदण्ड की तरह होते हैं।

सात पर्वतों को सात कुलाचल कहा जाता है-1. सुमेरु, 2. हिमालय, 3. हेमकूट, 4. निषध, 5. माल्यवान्, 6. गन्धमादन, 7. कैलाश। कुरान में भी ये ही सात पर्वत माने गए हैं।

सप्तद्वीपों का आवरण करने वाले सप्त समुद्र हैं-जम्बुद्वीप का आवरक ‘लवण-समुद्र’ प्लक्ष द्वीप का ‘इक्षुरससमुद्र’, क्रौंच द्वीप का ‘दधि-समुद्र’, शाक द्वीप का ‘क्षीर-समुद्र’ तथा पुष्कर द्वीप का ‘स्वादु जल-समुद्र’ आवरक है।

यदि पृथिवी के सारे वृक्षों के कलम बना लिए जाएँ और सभी समुद्र ‘स्याही’ बन जाएँ, फिर भी भगवद्-वचन (भगवान् की महिमा का वर्णन) लिखे नहीं जा सकते। सभी पृथिवियों, समुद्रों और पर्वतों से ऊपर का भाग ‘स्वर्ग’, कहलाता है तथा निचला भाग ‘नरक’ कहा जाता है। ये ‘स्वर्ग’ ‘नरक’ ब्रह्माण्ड से बाहर नहीं है अपितु इसके अन्दर ही हैं। सात प्रकार के आकाशों के आश्रित सात ग्रह स्वर्ग के चारों ओर मेखला की भाँति चक्कर काटते रहते हैं, स्वर्ग के ऊपर नहीं। कुरआन में स्वर्ग को ‘अर्श’ कहा गया है और स्वर्गभूमि को ‘कुर्शी’ कहा गया है।

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

HBSE 12th Class Sanskrit विक्रमस्यौदार्यम् Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तरत
(क) विक्रमस्यौदार्यम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः ?
(ख) उपार्जितानां वित्तानां रक्षणं कथं भवति ?
(ग) धनविषये कीदृशः व्यवहारः कर्तव्यः ?
(घ) जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं कः स्थितः ?
(ङ) समुद्रः राज्ञे किमर्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान् ?
(च) द्वितीयरत्नेन किम् उत्पद्यते ?
(छ) प्रीतिलक्षणम् कतिविधं भवति ?
उत्तरम्
(क) ‘विक्रमस्यौदार्यम्’ पाठः ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ ग्रन्थात् सङ्कलितः।
(ख) उपार्जितानां वित्तानां रक्षणं त्यागेन भवति।
(ग) धनविषये दानभोगैः व्यवहारः कर्तव्यः।
(घ) जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं ब्राह्मणः स्थितः ।
(ङ) समुद्रः राज्ञे व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान्।
(च) द्वितीयरत्नेन अमृततुल्यं भोजनादिकम् उत्पद्यते।
(छ) प्रीतिलक्षणं षड्विधं भवति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

2. रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) उपार्जितानां वित्तानां …………….. हि रक्षणम्।
(ख) दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये …………….. न कर्तव्यः ।
(ग) ततः शिल्पिभिरतीव …………….. मण्डपः कारितः ।
(घ) भो समुद्र ! …………….. यज्ञं करोति।
(ङ) तस्मै राज्ञे व्ययार्थं …………….. दास्यामि।
(च) यद्रत्नं चतुरङ्गबलं …………….. तद् ग्रहीष्यामः ।
(छ) सर्वेषां प्राणिनामनेनैव …………….. भवति।
उत्तरम्
(क) उपार्जितानां वित्तानां त्यागः हि रक्षणम्।
(ख) दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयः न कर्तव्यः ।
(ग) तत: शिल्पिभिरतीव मनोहरः मण्डपः कारितः।
(घ) भो समुद्र ! विक्रमार्कः राजा यज्ञं करोति।
(ङ) तस्मै राज्ञे व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दास्यामि।
(च) यद्रत्नं चतुरङ्गबलं ददाति तद् ग्रहीष्यामः ।
(छ) सर्वेषां प्राणिनामनेनैव प्राणधारणं भवति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

3. अधोलिखितानां पदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत
वित्तानाम्, शिल्पिभिः, गिरौ, एतेषाम्, दातव्यम्, रोचते।
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगः)
(क) वित्तानाम्-वित्तानां दानभोमैः रक्षणं कर्तव्यम्।
(ख) शिल्पिभिः-शिल्पिभिः मनोहर: मण्डपः कृतः।
(ग) गिरौ-गिरौ मयूरः नृत्यति।।
(घ) एतेषाम्-एतेषां याचना अवश्यं पूरणीया।
(ङ) दातव्यम्-यत् यस्मै रोचते तत् तस्मै दातव्यम्।
(च) रोचते-मह्यं पठनं रोचते।

4. प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम्
उपक्रान्तवान्, विधाय, गत्वा, गृहीत्वा, स्थितः, व्यतिक्रम्य, दातव्यम्।
उत्तरम्
उपसर्ग + प्रकृति + प्रत्यय
(क) उपक्रान्तवान् – उप + √क्रम् + क्तवतु (पुं०, प्रथमा एकवचनम्)
(ख) विधाय । -वि + √धा + ल्यप् (अव्ययपदम्)
(ग) गत्वा – √गम् + क्त्वा (अव्ययपदम्)
(घ) गृहीत्वा – √ग्रह् + क्त्वा (अव्ययपदम्)
(ङ) स्थितः – √स्था + क्त (पुं०, प्रथमा एकवचनम्)
(च) व्यतिक्रम्य – वि + अति + √क्रिम् + ल्यप् (अव्ययपदम्)

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

5. सन्धिच्छेदं कुरुत
तेनैव, यच्चोक्तम्, तस्येप्सितम्, चैव, यच्च, तदपि, सर्वापि, सोऽपि, प्राप्तैव, चेदस्मिन्, तच्छ्रुत्वा, त्वय्येवम्
उत्तरम्
(क) तेनैव = तेन + एव
(ख) यच्चोक्तम् = यत् + च + उक्तम्
(ग) तस्येप्सितम् = तस्य + ईप्सितम्
(घ) चैव = च + एव
(ङ) यच्च = यत् + च
(च) तदपि = तत् + अपि
(छ) सर्वापि = सर्वा + अपि
(ज) सोऽपि = सः + अपि
(झ) प्राप्तैव = प्राप्ता + एव
(ब) चेदस्मिन् = चेद् + अस्मिन्
(ट) तच्छ्रुत्वा = तत् + श्रुत्वा
(ठ) त्वय्येवम् = त्वयि + एवम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

6. सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
(क) उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
उत्तरम्
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य विक्रमस्यौदार्यम् नामक पाठ से लिया गया है। यह कथा किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ कथा संग्रह से संकलित है। प्रस्तुत पद्य में धन के दान को ही धन का सच्चा संरक्षण कहा गया है।

व्याख्या-मनुष्य जो भी धन अपने परिश्रम से इकट्ठा करता है। उसका संरक्षण खजाना भरकर नहीं हो सकता। अपितु असहायों की सहायता के लिए उस धन को दान कर देना ही उसकी सच्ची रक्षा है। तालाब में जल भरा होता है यदि वह जल तालाब में ही पड़ा रहे और किसी के काम न आएँ तो वह जल व्यर्थ है अपितु तालाब में ही पड़ेपड़े वह जल दुर्गन्धयुक्त हो जाता है, इसीलिए तालाब के जल को बाहर निकाल दिया जाता है, नया जल आ जाता है और उसका पानी उपयोगी बना रहता है। इसी प्रकार धन का दान करना ही धन का सच्चा उपयोग है।

(ख) ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।
भडक्ते भोजयते चैव षविधं प्रीतिलक्षणम्॥
उत्तरम्:
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘विक्रमौदस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से लिया गया है। यह कथा किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ कथासंग्रह से संकलित है। प्रस्तुत पद्य में समुद्र ने ब्राह्मण को मित्रता का लक्षण बताया है।

व्याख्या-सच्ची मित्रता की पहचान के छह सूत्र हैं
1. मित्र मित्र को धन आदि प्रदान करता है।
2. मित्र मित्र से धन आदि स्वीकार करता है।
3. अपनी गोपनीय (छिपाने योग्य) बात मित्र को बताता है।
4. मित्र की गोपनीय बात उससे पूछता है।
5. मित्र के साथ बैठकर भोजन करता है।
6. मित्र को भोजन खिलाता है।
जिन दो मित्रों के बीच उक्त छ: प्रकार के आचरण बिना किसी औपचारिकता के सम्पन्न होते हैं उन्हीं में सच्ची मित्रता समझनी चाहिए।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

7. अधोलिखितानां समस्तपदानां विग्रहं कुरुत
विक्रमतुल्यम्, क्रियाविधिज्ञम्, सकलगुणनिवासः, यज्ञसामग्री, समुद्रतीरम्, जलमध्ये, पुष्पाञ्जलिम्, देदीप्यमानशरीरः, यज्ञार्थम्, यज्ञसमाप्तिः, गुणकथनम्, ब्राह्मणसमूहः, प्राणधारणम्, राजसमीपम्।
(क) विक्रमतुल्यम्-विक्रमेण तुल्यम् (तृतीया-तत्पुरुषः)
(ख) क्रियाविधिज्ञम्-क्रियायाः विधिं जानाति इति क्रियाविधिज्ञः तम् (उपपद-तत्पुरुषः)
(ग) सकलगुणनिवासः-सकलानां गुणानां निवासः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(घ) यज्ञसामग्री-यज्ञाय सामग्री (चतुर्थी-तत्पुरुषः)
(ङ) समुद्रतीरम्-समुद्रस्य तीरम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(च) जलमध्ये-जलस्य मध्ये (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(छ) पुष्पाञ्जलिम्-पुष्पाणाम् अञ्जलिम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ज) देदीप्यमानशरीर:-देदीप्यमानः शरीर: (कर्मधारयः)
(झ) यज्ञार्थम्-यज्ञस्य अर्थम् (चतुर्थी-तत्पुरुषः)
(ञ) यज्ञसमाप्तिः-यज्ञस्य समाप्तिः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ट) गुणकथनम्-गुणस्य कथनम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ठ) ब्राह्मणसमूहः-ब्राह्मणानां समूहः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ड) प्राणधारणम्-प्राणानां धारणम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ढ) राजसमीपम्-राज्ञः समीपम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)

HBSE 9th Class Sanskrit विक्रमस्यौदार्यम् Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) विक्रमस्यौदार्यम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः ?
(A) विक्रमाकचरितात्
(B) विक्रमाङ्कदेवचरितात्
(C) सिंहासनद्वादशत्रिंशिकाग्रन्थात्
(D) आर्यासप्तशतीग्रन्थात्।
उत्तराणि
(C) सिंहासनद्वादशत्रिंशिकाग्रन्थात्

(ii) उपार्जितानां वित्तानां रक्षणं कथं भवति ?
(A) त्यागेन
(B) भोगेन
(C) सञ्चयेन
(D) लोभेन।
उत्तराणि
(A) त्यागेन

(iii) धनविषये कीदृशः व्यवहारः कर्तव्यः ?
(A) दानेन
(B) भोगेन
(C) रक्षणेन
(D) दानभोगैः।
उत्तराणि
(D) दानभौगैः

(iv) जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं कः स्थितः ?
(A) विक्रमः
(B) ब्राह्मणः
(C) पुत्तलिका
(D) राजा।
उत्तराणि
(B) ब्राह्मणः

(v) समुद्रः राज्ञे किमर्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान् ?
(A) व्ययार्थम्
(B) सञ्चयार्थम्
(C) दानार्थम्
(D) लोभनिवारणार्थम्।
उत्तराणि
(A) व्ययार्थम्

(vi) द्वितीयरत्नेन किम् उत्पद्यते ?
(A) वस्त्रादिकम्
(B) भूषणादिकम्
(C) भोजनादिकम्
(D) रत्नादिकम्।
उत्तराणि
(C) भोजनादिकम्

(vii) प्रीतिलक्षणम् कतिवधं भवति ?
(A) अष्टविधम्
(B) षड्विधम्
(C) पञ्चविधम्
(D) चतुर्विधम्।
उत्तराणि
(B) षड्विधम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) राजा सिंहासने समुपवेष्टुं गच्छति।
(A) कया
(B) कः
(C) केन
(D) कस्मिन्।
उत्तराणि:
(B) कः

(ii) उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव रक्षणम्।
(A) केषाम्
(B) कस्मिन्
(C) कः
(D) कस्मात्।
उत्तराणि:
(A) केषाम्

(iii) शिल्पिभिः अतीव मनोहरः मण्डपः कारितः ।
(A) कः
(B) केभ्यः
(C) कम्
(D) कैः।
उत्तराणि:
(D) कैः

(iv) राजा ब्राह्मणाय चत्वारि रत्नानि ददौ।
(A) कथम्
(B) किं
(C) कति
(D) कानि।
उत्तराणि:
(B) कति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

योग्यताविस्तारः

अधोलिखितानां सूक्तीनामध्ययनं कृत्वा प्रस्तुतपाठेन भावसाम्यम् अवधत्त
1. मित्रम्
(i) मित्रं प्रीतिरसायनं नयनयोरानन्दनं चेतसः
पात्रं यत्सुखदुःखयोः सह भवेन्मित्रेण तदुर्लभम्।
ये चान्ये सुहृदः समृद्धिसमये द्रव्याभिलाषाकुलाः,
ते सर्वत्र मिलन्ति तत्त्वनिकषग्रावा तु तेषां विपत्॥
(ii) न मातरि न दारेषु न सोदर्ये न चात्मजे।
विश्वासस्तादृशः पुंसां यादृङ् मित्रे स्वभावजे॥ कवितामृतकूपम्-88
(iii) न तन्मित्रं यस्य कोपाद्विभेति यद्वामित्रं शङ्कितेनोपचर्यम्।
यस्मिन्मित्रे पितरीवाश्वसीत तद्वै मित्रं सङ्गतानीतराणि ॥ नीतिकल्पतरु:-9.141
(iv) केनामृतमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम्।
आपदां च परित्राणं शोकसन्तापभेषजम्॥ पञ्चतन्त्रम्-2.60

2. औदार्यम्
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां हि वसुधैव कुटुम्बकम्॥ पञ्चतन्त्रम्-5.305

3. दानम्
(i) धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सजेत।
सन्निमत्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥
(ii) परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥ विक्रमोर्वशीयम्-66
(iii) अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥
(iv) श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन, दानेन पाणिन्तु कङ्कणेन।
विभाति कायः करुणापराणां परोपकारेण न चन्दनेन ॥ नीतिशतकम्-1.72
(v) पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्।
नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति
सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः ॥ नीतिशतकम्-1.74

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

विक्रमस्यौदार्यम् पाठ्यांशः

1. पुनरपि राजा सिंहासने समुपवेष्टुं गच्छति। ततोऽन्या पुत्तलिका समवदत् “भो राजन्! एतत्सिंहासने तेनैव अध्यासितव्यं यस्य विक्रमतुल्यम् औदार्यमस्ति।” भोजेनोक्तम्-“भो पुत्तलिके, कथय तस्यौदार्यम्।” सा वदति, “राजन् यस्त्वर्थिनां पूरयति, तस्येप्सितं देवः सम्पादयति।” यच्चोक्तम्
उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं, क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्। शूरं कृतज्ञं दृढनिश्चयं च, लक्ष्मीः स्वयं वाञ्छति वासहेतोः॥

हिन्दी-अनुवादः

राजा फिर भी सिंहासन पर बैठने के लिए जाता है। तभी दूसरी पुत्तलिका कहती है-“हे राजन् ! इस सिंहासन पर उसे ही बैठना चाहिए, जिसकी उदारता राजा विक्रम के समान है।” भोज ने कहा- “हे पुत्तलिके ! उसकी उदारता के विषय में बताओ।” वह बोली-“राजन् ! जो याचकों की (याचना) पूर्ण करता है, देव (विक्रम) उसकी इच्छा पूर्ण
करते हैं।” और जैसा कि कहा भी गया है

जो मनुष्य उत्साहयुक्त, निरर्थक लम्बी योजनाएँ न बनाने वाला, क्रियाविधि का ज्ञाता, व्यसनों से दूर, शूरवीर, कृतज्ञ तथा दृढनिश्चयी होता है-ऐसे मनुष्य के पास लक्ष्मी स्वयं निवास करना चाहती है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
पुत्तलिका = पुतली। समुपवेष्टुम् = बैठने के लिए ; सम् + उप + √विश् + तुमुन्। तेनैव = उसी के द्वारा ; तेन + एव। अध्यासितव्यम् = बैठना चाहिए ; अधि + √आस् + तव्यत्। औदार्यम् = उदारता ; उदार + अण्। यस्त्वर्थिनाम् = जो याचकों की (यः + तु + अर्थिनाम्)। ईप्सितम् = इच्छिते ; √ईप्स् + क्त।
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2. एवं सकलगुणनिवासः स विक्रमो राजा एकदा स्वमनस्यचिन्तयत्
‘अहो असारोऽयं संसारः, कदा कस्य किं भविष्यतीति न ज्ञायते। यच्चोपार्जितानां वित्तं तदपि दानभोगैर्विना
सफलं न भवति। तथा चोक्तम्-‘
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्॥
अपि च
दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयो न कर्तव्यः।
पश्येह मधुकरीणां सञ्चितमर्थं हरन्त्यन्ये॥

हिन्दी अनुवादः – इस प्रकार सभी गुणों से सम्पन्न उस राजा विक्रम ने एक बार अपने मन में विचार किया-“अहो, यह संसार सारहीन है, कब किसका क्या होगा-यह पता ही नहीं चलता। और जो धनवानों का धन है, वह भी दान-भोग के बिना सफल नहीं होता। और कहा भी है-”

इकट्ठे किए गए धन की रक्षा उस धन का त्याग ही है। जिस प्रकार तालाब की गहराई में स्थित जल की रक्षा उसका निकास ही होता है।

और भी धन का दान करना चाहिए, धन का भोग करना चाहिए, परन्तु धन का सञ्चय कदापि नहीं करना चाहिए। देखो, इस संसार में मधुमक्खियों द्वारा सञ्चित किए गए धन (मधु/शहद) को दूसरे लोग ही हर लेते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
यच्चोक्तम् = ऐसा कहा गया है ; यत् + च + उक्तम्। तटाकोदरसंस्थानाम् =तालाब की गहराई में स्थित, तटाकस्य उदरे संस्थानाम् (अवस्थितानाम्) । परीवाहः = परि + वह धातु + घञ् प्रत्यय, निकास। मधुकरीणाम् = मधुमक्खियों का।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

3. इत्येवं विचार्य सर्वस्वदक्षिणं यज्ञं कर्तुमुपक्रान्तवान्। ततः शिल्पिभिरतीव मनोहरो मण्डपः कारितः । सर्वापि यज्ञसामग्री समाहृता। देवमुनिगन्धर्वयक्षसिद्धादयश्च समाहूताः । तस्मिन्नवसरे समुद्राह्वानार्थं कश्चिद् ब्राह्मणः समुद्रतीरे प्रेषितः। सोऽपि समुद्रतीरं गत्वा गन्धपुष्पादिषोडशोपचारं विधायाब्रवीत् “भोः समुद्र विक्रमार्को राजा यज्ञं करोति। तेन प्रेषितोऽहं त्वामाह्वातुं समागतः।” इति जलमध्ये पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा क्षणं स्थितः। कोऽपि तस्य प्रत्युत्तरं न ददौ। तत उज्जयिनी यावत्प्रत्यागच्छति तावद्देदीप्यमानशरीरः समुद्रो ब्राह्मणरूपी सन् तमागत्यावदत् “भो ब्राह्मण, विक्रमेणास्मानाह्वातुं प्रेषितस्त्वं, तर्हि तेन यास्माकं सम्भावना कृता सा प्राप्तैव। एतदेव सुहृदो लक्षणं यत्समये दानमानादि क्रियते।”

हिन्दी-अनुवादः
यही विचार कर सर्वस्वदक्षिणा यज्ञ करना आरम्भ कर दिया। तब शिल्पियों से बहुत ही मनोहर मण्डप तैयार करवाया। सभी यज्ञसामग्री इकट्ठी की गई। देव, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध आदि आमन्त्रित किए गए। उसी अवसर पर समुद्र को बुलाने के लिए किसी ब्राह्मण को समुद्र के तट पर भेजा गया। वह भी समुद्र तट पर जाकर गन्ध, पुष्प आदि षोडशोपचार (पूजा) करके कहने लगा- “हे समुद्र ! राजा विक्रमादित्य यज्ञ कर रहे हैं। उनके द्वारा भेजा गया मैं आपको बुलाने के लिए आया हूँ।” इस प्रकार जल के बीच पुष्पाञ्जलि समर्पित कर क्षण भर के लिए ठहर गया। उसके निवेदन का उत्तर किसी ने भी नहीं दिया। फिर जैसे ही वह उज्जयिनी की ओर लौट रहा था तभी देदीप्यमान शरीर वाला समुद्र ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके पास आकर कहने लगा- “हे ब्राह्मण! राजा विक्रमादित्य ने हमें आमन्त्रित करने के लिए तुम्हें भेजा है। तो उन्होंने जो हमारा आदर-मान किया, वह प्राप्त हो गया। यही मित्र की पहचान होती है कि समय पर दान-मान आदि किया जाए।”

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
शिल्पिभिः = कारीगरों से; (शिल्प + इनि > इन् = शिल्पिन्)। समाहूताः = आमन्त्रित किए गए; सम्यक् आहूताः, (सम् + आ + √ढे + क्त)। समाहृताः = इकट्ठी कर दी गई है; (सम् + आ + √ह + क्त)। आह्वातुम् = बुलाने के लिए; (आ + हवे + तुमुन्)।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

4. उक्तं च
ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।
भुड्वते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्॥
दूरस्थितानां मैत्री नश्यति समीपस्थानां वर्धते इति न वाच्यम्।
गिरी कलापी गगने पयोदो लक्षान्तरेऽर्कश्च जले च पद्म।
इन्दुर्द्विलक्षे कुमुदस्य बन्धुर्यो यस्य मित्रं न हि तस्य दूरम्॥

हिन्दी-अनुवादः और कहा भी हैदेना, लेना, गोपनीय बात करना, गोपनीय बात पूछना, भोजन करना और भोजन करवाना–यह छः प्रकार का प्रीति का लक्षण होता है। .. दूर रहने वालों की मित्रता नष्ट हो जाती है और समीप रहने वालों की मित्रता बढ़ती है-यह बात कहने योग्य नहीं है अर्थात् उचित नहीं है।
पर्वत पर मयूर और आकाश में बादल, लाखों योजन दूर सूर्य और (सरोवर के) जल में कमल-एक दूसरे के मित्र हैं। बहुत दूरी होने पर भी चन्द्रमा कमलिनी का मित्र है। जो जिसका मित्र होता है, वह उससे दूर नहीं होता।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – गुह्यमाख्याति = गोपनीय को कहता है; गुह्यम् (गोपनीयम्) आख्याति। कलापी = मोर; कलापम् अस्ति
अस्य सः (बहुव्रीहिः), कलाप + इनि। लक्षान्तरेऽर्कश्च = लाखों योजन/मील की दूरी; (लक्ष + अन्तरे + अर्कः + च)। पद्म = कमल। इन्दुर्द्विलक्षे = चन्द्रमा से 2 लाख योजन दूर (अत्यधिक दूरी से आशय); इन्दुः + विलक्षे।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

5. तस्मै राज्ञे व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दास्यामि। एतेषां महात्म्यम्-एकं रत्नं यद्वस्तु स्मर्यते तद्ददाति। द्वितीयरत्नेन भोजनादिकममृततुल्यमुत्पद्यते। तृतीयरत्नाच्चतुरङ्गबलं भवति। चतुर्थाद्रत्नाद्दिव्याभरणानि जायन्ते। तदेतानि रत्नानि गृहीत्वा राज्ञो हस्ते प्रयच्छे ति। ततो ब्राह्मणस्तानि रत्नानि गृहीत्वा उज्जयिनी यावदागतस्तावद्यज्ञसमाप्तिर्जाता। राजावभृथस्नानं कृत्वा सर्वानर्थिजनान् परिपूर्णमनोरथानकरोत्। ब्राह्मणो राजानं दष्ट्वा रत्नान्यर्पयित्वा प्रत्येकं तेषां गुणकथनमकथयत्।

हिन्दी-अनुवादः (मैं समुद्र) उस राजा को खर्च करने के लिए चार रत्न समर्पित करूँगा। इन रत्नों का महात्म्य यह है-एक रत्न जो वस्तु याद की जाए वही प्रदान करता है। दूसरा अमृत के समान भोजन आदि पैदा करता है। तीसरे रत्न से चतुरंगिणी सेना पैदा हो जाती है। चौथे रत्न से दिव्य वस्त्र-आभूषण पैदा होते हैं। तो ये रत्न लेकर राजा के हाथ में दे देना। तत्पश्चात् ब्राह्मण उन रत्नों को लेकर जैसे ही उज्जयिनी आया तभी यज्ञ की समाप्ति हो गई। राजा ने अवभृथ स्नान करके सभी याचकों को पूर्ण मनोरथ वाला कर दिया। ब्राह्मण ने राजा का दर्शन कर रत्नों को समर्पित करके उनमें से प्रत्येक का गुणवर्णन किया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – चुतुरङ्गबलम् = घुड़सवार, हाथी सवार, रथ सवार, पैदल सैनिक-इन चारों को मिलाकर चार अगों वाली सेना। अवभृथस्नानम् = यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात् किया जाने वाला पापनाशक स्नान।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

6. ततो राजावदत्, “भो ब्राह्मण! भवान् यज्ञदक्षिणाकालं व्यतिक्रम्य समागतः। मया सर्वोऽपि ब्राह्मणसमूहो दक्षिणया तोषितः। तर्हि त्वमेतेषां रत्नानां मध्ये यत्तुभ्यं रोचते तद्गृहाणेति। ब्राह्मणेनोक्तम्, ‘गृहं गत्वा गृहिणी, पुत्रं, स्नुषां च पृष्ट्वा सर्वेभ्यो यद्रोचते तद्ग्रहीष्यामीति।’ राज्ञोक्तं ‘तथा कुरु।’ ब्राह्मणोऽपि स्वगृहमागत्य सर्वं वृत्तान्तं तेषामग्रेऽकथयत्। पुत्रेणोक्तं ‘यद्रतं चतुरङ्गबलं ददाति तद्ग्रहीष्यामः । यतः सुखेन राज्यं कर्तुमर्हिष्यामः।’ पित्रोक्तं ‘बुद्धिमता राज्यं न प्रार्थनीयम्।’ पुनः पिता वदति ‘यस्माद्धनं लभते तद् गृहाण। धनेन सर्वमपि लभ्यते।’ भार्ययोक्तं ‘यद्रलं षड्रसान् सूते तद्गृह्यताम्। सर्वेषां प्राणिनामन्नेनैव प्राणधारणं भवति।’ स्नुषयोक्तं ‘यद्रलं रत्नाभरणादिकं सूते तद् ग्राह्यम्।’

हिन्दी-अनुवादः तब राजा ने कहा- “हे ब्राह्मण! आप यज्ञ-दक्षिणा का समय निकल जाने पर आए हैं। मैंने समस्त ब्राह्मण समूह को दक्षिणा द्वारा सन्तुष्ट कर दिया। तो इन रत्नों में से जो तुम्हें अच्छा लगता है, वह ले लो। घर जाकर पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू से पूछकर सभी को जो अच्छा लगता है, वही ले लूँगा। राजा ने कहा-“ऐसा ही करो।” ब्राह्मण ने भी अपने घर आकर सब समाचार उनके सामने कहा। पुत्र ने कहा-“जो रत्न चतुरंगिणी सेना देता है, वही रत्न लेंगे। जिससे सुखपूर्वक राज्य करने में समर्थ होंगे।” पिता ने कहा-“बुद्धिमान् मनुष्य को राज्य की इच्छा नहीं करनी चाहिए।” फिर पिता ने कहा-“जिस रत्न से धन मिलता है, वही रत्न लो। धन से सब कुछ मिल जाता है।” पत्नी ने कहा-“जो रत्न छः रसों (वाले भोजन) को पैदा करता है, वही रत्न ले लो। सभी प्राणियों का प्राणधारण (जीवन) अन्न से ही चलता है।” पुत्रवधू ने कहा-“जो रत्न वस्त्र-गहने आदि पैदा करता है, वही रत्न लेना चाहिए।”

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च व्यतिक्रम्य = बीतने पर; अति + क्रिम् + ल्यप्। स्नुषाम् = पुत्रवधू को। ग्राह्यम् = ग्रहण करने योग्य; √ग्रह + ण्यत्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

7. एवं चतुर्णां परस्परं विवादो लग्नः । ततो ब्राह्मणो राजसमीपमागत्य चतुर्णां विवादवृत्तान्तमकथयत्। राजापि तच्छ्रुत्वा तस्मै ब्राह्मणाय चत्वार्यपि रत्नानि ददौ । इति कथां कथयित्वा पुत्तलिका राजानमवदत्, ‘भो राजन्, त्वय्येवंविध-सहजमौदार्यं विद्यते चेदस्मिन् सिंहासने समुपविश।’ तच्छ्रुत्वा राजा तूष्णीमासीत्।

हिन्दी-अनुवादः इस प्रकार चारों में झगड़ा हो गया। तब ब्राह्मण ने राजा के पास आकर चारों का विवाद-समाचार कह दिया। राजा ने भी उसे सुनकर उस ब्राह्मण को चारों ही रत्न प्रदान कर दिए। यह कथा कहकर पुत्तलिका ने राजा (भोज) को कहा-“हे राजन् आप में इस प्रकार की स्वाभाविक उदारता है तो इस सिंहासन पर बैठ जाओ।” यह सुनकर राजा (भोज) चुप हो गया।

विक्रमस्यौदार्यम् (विक्रमादित्य की उदारता) Summary in Hindi

विक्रमस्यौदार्यम् पाठ परिचय

‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ बत्तीस मनोरञ्जक कथाओं का संग्रह है। इसके केवल गद्यमय, केवल पद्यमय, गद्य-पद्यमय, ये तीन प्रकार के संस्करण मिलते हैं। इसमें बत्तीस पुत्तलिकाओं (पुतलियों) ने राजा विक्रमादित्य को बत्तीस कहानियाँ सुनाई हैं। अतः इस ग्रन्थ का समय राजा भोज (1018-1063) के अनन्तर ही माना जाता है। इसके रचयिता का नाम अज्ञात है।

एक टीले की खुदाई करने पर राजा भोज को एक सिंहासन मिलता है। वह सिंहासन राजा विक्रमादित्य का था। शुभ मुहूर्त में राजा भोज उस सिंहासन पर बैठना चाहता है तो सिंहासन पर बनी 32 पुत्तलिकाओं में से प्रत्येक पुत्तलिका राजा विक्रमादित्य के गुणों तथा पराक्रम की एक-एक कथा सुनाकर राजा को सिंहासन पर बैठने से पुनःपुनः रोकती है

और उड़ जाती है। प्रत्येक पुत्तलिका ने राजा से यही प्रश्न किया है-“क्या तुममें विक्रम जैसा गुण है ? यदि है तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो अन्यथा नहीं।” ऐसा माना जाता है कि विक्रमादित्य को यह सिंहासन इन्द्र से प्राप्त हुआ था। उनके दिवंगत हो जाने पर यह सिंहासन भूमि में गाड़ दिया गया और 11वीं सदी में यह सिंहासन धारानरेश भोज को मिलता है, इसीलिए प्रत्येक कहानी में पुत्तलिका राजा भोज को सम्बोधित करके कहानी कहती है।

प्रस्तुत पाठ उपर्युक्त ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ नामक कथासंग्रह से ही उद्धृत है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार राजा विक्रम को यह संसार असार प्रतीत होता है। अपनी उदारतावश वे सम्पूर्ण राजकोष को दान करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने ‘सर्वस्वदक्षिणायज्ञ’ का अनुष्ठान किया। उस यज्ञ में सब कुछ परित्याग कर दिया। यहाँ तक कि समुद्र की

ओर से प्रदान किए गए अद्वितीय चार रत्न भी ब्राह्मण को प्रदान कर दिए। इस प्रकार से इस कहानी के अनुसार विक्रम ने अत्यधिक उदारता का परिचय दिया है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 7 विक्रमस्यौदार्यम्

विक्रमस्यौदार्यम् पाठस्य सारः

‘विक्रमस्यौदार्यम्’ यह पाठ ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ नामक कथा संग्रह से लिया गया है। इसका रचयिता अज्ञात है। इस संग्रह की सभी कहानियाँ राजा भोज को सम्बोधित करके 32 पुत्तलिकाओं द्वारा कही गई हैं।

हर बार की तरह इस बार भी राजा भोज विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठना चाहता है। तभी एक पुतली आकर भोज को राजसिंहासन पर बैठने से रोकते हुए एक कहानी सुनाती है और कहती है कि यदि तुम में राजा भोज जैसी उदारता हो तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो। पुत्तलिका द्वारा सुनाई गई कहानी इस प्रकार है

उत्साह आदि सभी उत्तम गुणों से सम्पन्न राजा विक्रम ने संसार की सारहीनता पर विचार किया और दान भोग के बिना जीवन को व्यर्थ समझा। इसीलिए विक्रमादित्य ने सब कुछ दान कर देने के लिए सर्वस्वदक्षिणा यज्ञ’ करना आरम्भ कर दिया। इसी अवसर पर राजा ने समुद्र को भी आमन्त्रित किया। समुद्र ने राजा का निमन्त्रण लाने वाले ब्राह्मण के हाथ राजा को उपहार में देने के लिए अलग-अलग शक्ति वाले चार रत्न भेजे। इन चारों रत्नों की विशेषता इस प्रकार थी पहला रत्न जो वस्तु याद की जाती थी वही वस्तु दे देता था। दूसरा रत्न उत्तम भोजन सामग्री पैदा करता था। तीसरा रत्न सैन्य बल प्रदान करता था। चौथा रत्न दिव्य वस्त्र-आभूषण प्रदान करता था।

ब्राह्मण ने ये चारों रत्न राजा विक्रमादित्य को जाकर सौंप दिए और इनकी विशेषता भी बता दी। यज्ञ समाप्त हो चुका था। राजा ने सब कुछ दान कर दिया था। ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं लौटाया जा सकता था, इसलिए राजा ने इन चार रत्नों में से इच्छानुसार कोई एक रत्न लेने का आग्रह ब्राह्मण से किया। ब्राह्मण निश्चय नहीं कर पाया कि कौन सा रत्न लूँ। अतः उसने राजा से निवेदन किया कि वह घर में सलाह करके कोई एक रत्न ग्रहण करना चाहता है। राजा ने स्वीकृति दे दी। ब्राह्मण अपने घर चला गया। पत्नी, पुत्र, पुत्रवधू और स्वयं ब्राह्मण अलग-अलग रत्न लेने का आग्रह करते रहे। निश्चय न कर पाने, तथा विवाद बढ़ जाने पर ब्राह्मण राजा के पास चला गया और उसने राजा से सारा वृत्तान्त कह दिया। राजा ने चारों रत्न उस ब्राह्मण को दे दिए।

यह कहानी कहकर पुत्तलिका ने राजा भोज से कहा यदि आप में भी ऐसा दया भाव और उदारता है तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो। प्रत्युत्तर में राजा भोज चुप बैठ गया। इस कहानी में राजा विक्रमादित्य की अपूर्व दया-उदारता का वर्णन है।

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HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1

Haryana State Board HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौनसी संख्याएँ पूर्णघन नहीं है?
(i) 216
हल:
216 का अभाज्य गुणनखण्ड करने पर
216 = 6 × 6 × 6
अत: यहाँ 6 का त्रिक् बन रहा है ।
इसलिए 216 पूर्ण घन है ।
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -1

(ii) 128
हल:
28 का अभाज्य गुणनखण्ड करने पर
128 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × 2
यहाँ, 2 का त्रिक् बनने के बाद 2 शेष रहता है ।
अतः 128 पूर्ण घन नहीं है ।

(iii) 1000
हल:
1000 का अभाज्य गुणनखंड करने पर
1000 = 10 × 10 × 10
अत: यहाँ 10 का त्रिक् बन रहा है ।
इसलिए 1000 पूर्ण घन है ।
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -2

(iv) 100
हल:
100 के अभाज्य गुणनखंड करने पर
100 = 2 × 2 × 5 × 5
यहाँ, 2, 5 का त्रिक् नहीं बन शेष रहा है ।
अतः 100 पूर्ण घन नहीं है ।
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -3

(v) 46656
हल:
46656 के अभाज्य गुणनखंड करने पर
46656 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\)
यहाँ, 2, 3 का त्रिक् नहीं बन शेष रहा है ।
अतः 46656 पूर्ण घन नहीं है ।
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -4

प्रश्न 2.
वह सबसे छोटी संख्या ज्ञात कीजिए जिससे निम्नलिखित संख्याओं को गुणा करने पर पूर्ण घन प्राप्त हो जाए-
(i) 243
(ii) 256
(iii) 72
(iv) 675
(v) 100
हल:
(i) 243
243 को अभाज्य गुणनखंडों के गुणनफल के रूप में लिखने पर
243 = \(\underline{3 \times 3 \times 3}\) × 3 × 3
इस गुणनखण्ड में, 3 का त्रिक नहीं हैं।
अत: 243 पूर्ण घन नहीं है ।
हमें पूर्ण घन बनाने के लिए 3 से और गुणा करना पड़ेगा ।
अत: 243 × 3 =\(\underline{3 \times 3 \times 3}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\)
= 729
अतः 729 एक पूर्ण घन संख्या है ।
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -5

(ii) 256 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × 2 × 2
इस गुणनखण्ड में, 2 का त्रिक नहीं हैं।
अत: 256 पूर्ण घन नहीं है ।
हमें पूर्ण घन बनाने के लिए 2 से और गुणा करना पड़ेगा ।
अत: 256 पूर्ण घन नहीं है। हमें पूर्ण घन बनाने के लिए 2 से और गुणा करना पड़ेगा।
अत: 256 × 2 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\)
= 512
अतः 512 एक पूर्ण घन संख्या है ।
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -6

(iii) 72 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × 3 × 3
इस गुणनखण्ड में, 3 का त्रिक नहीं हैं।
पूर्ण घन बनाने के लिए एक 3 से गुणा करना पड़ेगा ।
अत: 72 × 3 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{3 \times 3 \times 3}\)
= 216
अतः 216 एक पूर्ण घन संख्या है ।
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -7

(iv) 675 = \(\underline{3 \times 3 \times 3}\) × 5 × 5
इस गुणनखण्ड में 5 का त्रिक नहीं है।
अत: 675 पूर्ण घन नहीं है ।
पूर्ण घन बनाने के लिए 5 से और गुणा करना पड़ेगा।
अत: 675 × 5 = 3× 3 × 3 × 5 × 5 × 5
= 3375
अत: 3375 एक पूर्ण घन संख्या है।
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -8

(v) 100 = 2 × 2 × 5 × 5
इस गुणनखण्ड में 2 तथा 5 दोनों का त्रिक नहीं है।
अत: 100 पूर्ण घन नहीं है ।
पूर्ण घन बनाने के लिए 2 तथा 5 से गुणा करना पड़ेगा।
अत: 100 × 10 = 2 × 2 × 5 × 5 × 2 × 5
= 1000
अतः 1000 पूर्ण घन संख्या है।
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -9

प्रश्न 3.
वह सबसे छोटी संख्या ज्ञात कीजिए, जिससे निम्नलिखित संख्याओं को भाग देने पर भागफल एक पूर्ण घन प्राप्त हो जाये
(i) 81
(ii) 128
(iii) 135
(iv)192
(v) 704
हल :
(i) 81 = \(\underline{3 \times 3 \times 3}\) × 3
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -10
अभाज्य गुणनखण्ड में 3 त्रिक में नहीं 3/81 आ रहा है ।
अत: 81 एक पूर्ण घन नहीं है।
अतः इसे पूर्ण घन बनाने के लिए 81 में 39 3 का भाग दें, तो भागफल के अभाज्य 33 गुणनखण्ड में 3 नहीं आयेगा ।
इस प्रकार, 81 ÷ 3 = 3 × 3 × 3 = 27
अत: वह सबसे छोटी संख्या 3 है जिससे 81 को भाग देने पर भागफल एक पूर्ण घन प्राप्त होगा ।
अत: छोटी संख्या 3 है।

(ii) 128 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × 2
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -11
इस गुणनखण्ड में 2 का त्रिक नहीं है।
अत: 128 पूर्ण घन नहीं है ।
अत: 128 को 2 से भाग देने पर-
128 ÷ 2 = 2 × 2 × 2 × 2 × 2 × 2
= 64
अत: 2 से भाग देने पर, भागफल के अभाज्य गुणनखण्ड में 2 नहीं आयेगा ।
अत: सबसे छोटी संख्या 2 है, जिससे 128 में भाग देने पर भागफल पूर्ण घन संख्या प्राप्त होती है ।
अतः छोटी से छोटी संख्या = 2

(iii) 135 = \(\underline{3 \times 3 \times 3}\) × 5
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -12
गुणनखण्ड में 5 का त्रिक नहीं है ।
अत: 5 का भाग देने पर –
135 ÷ 5 = 3 × 3 × 3
= 27
संख्या 27 एक पूर्ण घन है।
अत: छोटी से छोटी संख्या = 5

(iv) 192 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × 3
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -13
गुणनखण्ड में 3 का त्रिक नहीं है ।
अत: 3 का भाग देने पर
192 ÷ 3 = 2 × 2 × 2 × 2 × 2 × 2
= 64
जो कि एक पूर्ण घन है ।
अतः छोटी से छोटी संख्या = 3

(v) 704 = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × 11
HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 7 घन और घनमूल Ex 7.1 -14
गुणनखण्ड में 11 का त्रिक नहीं है।
अत: 11 से भाग देने पर-
704 ÷ 11 = 2 × 2 × 2 × 2 × 2 × 2
= 64 जोकि एक पूर्ण घन संख्या है ।
अत: छोटी से छोटी संख्या = 11

प्रश्न 4.
परीक्षित प्लास्टिसिन का एक घनाभ बनाता है, जिसकी भुजाएँ 5cm, 2cm और 5cm हैं। एक घन बनाने के लिए ऐसे कितने घनाभों की आवश्यकता होगी?
हल :
माना, उसे । घनाभों की आवश्यकता होगी ।
तथा उसकी भुजाएँ = 5 cm, 2 cm तथा 5 cm हैं ।
तो घनाभ का आयतन = n × 5 × 2 ×5
अत: इसे पूर्ण घन बनाने के लिए 2 × 2 × 5 से गुणा करना पड़ेगा ।
अतः = \(\underline{2 \times 2 \times 2}\) × \(\underline{5 \times 5 \times 5}\)
अत: घन बनाने के लिए उसे (2 × 2 × 5) = 20 घनाभों की आवश्यकता होगी ।

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HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 6 वर्ग और वर्गमूल Ex 6.1

Haryana State Board HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 6 वर्ग और वर्गमूल Ex 6.1 Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Maths Solutions Chapter 6 वर्ग और वर्गमूल Ex 6.1

प्रश्न 1.
निम्नलिखित संख्याओं के वर्गों के इकाई के अंक क्या होंगे?
(i) 81
(ii) 272
(iii) 799
(iv) 3853
(v) 1234
(vi) 26387
(vii) 52698
(viii) 99880
(ix) 12796
(x) 55555
हल:
संख्या 81 के वर्ग की इकाई का अंक 1 होगा ।
(i) 81 – संख्या 81 के वर्ग की इकाई का अंक 1 होगा ।
∵ 12 = 1

(ii) 272 – संख्या 272 के वर्ग की इकाई का अंक 4 होगा ।
∵ 22 = 4

(iii) 799 – संख्या 799 के वर्ग की इकाई का अंक 81 होगा ।
∵ 92 = 81

(iv) 3853 – संख्या 3853 के वर्ग की इकाई का अंक 9 होगा ।
∵ 32 = 9

(v) 1234 – संख्या 1234 के वर्ग की इकाई का अंक 16 होगा ।
∵ 42 = 16

(vi) 26387 – संख्या 26387 के वर्ग की इकाई का अंक 49 होगा ।
∵ 72 = 49

(vii) 52698 – संख्या 26387 के वर्ग की इकाई का अंक 64 होगा ।
∵ 82 = 64

(viii) 99880 – संख्या 99880 के वर्ग की इकाई का अंक 0 होगा ।
∵ 02 = 0

(ix) 12796 – संख्या 99880 के वर्ग की इकाई का अंक 36 होगा ।
∵ 62 = 36

(x) 55555 – संख्या 99880 के वर्ग की इकाई का अंक 25 होगा ।
∵ 52 = 25

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित संख्याएँ स्पष्ट रूप से पूर्ण वर्ग संख्याएँ नहीं हैं, इसका कारण दीजिए।
(i) 1057
(ii) 23453
(iii) 7928
(iv) 222222
(v) 64000
(vi) 89722
(vii) 222000
(viii) 505050.
हल:
(i) 1057 – संख्या 1057 के इकाई के स्थान पर 7 है, जो किसी की पूर्ण वर्ग संख्या में नहीं आता है। इसलिए संख्या 1057 एक पूर्ण वर्ग नहीं है।
(∵ जिस संख्या के अन्त (इकाई) में 0, 1, 4,5,6, 9 होता है, वह संख्या पूर्ण वर्ग होती (हो सकती) है ।

(ii) 23453 – इस संख्या में इकाई के स्थान पर 3 है, अत: यह पूर्ण वर्ग संख्या नहीं होगी ।

(iii) 7928 – इस संख्या में इकाई के स्थान पर 8 है, अतः यह पूर्ण वर्ग संख्या नहीं है ।।

(iv) 222222 – इस संख्या में इकाई के स्थान पर 2 है, अतः यह पूर्ण वर्ग संख्या नहीं है ।।

(v) 64000 – इस संख्या के अन्त में शून्यों की संख्या विषम (3) है विषम शून्यों वाली संख्या पूर्ण वर्ग संख्या नहीं होती है।

(vi) 89722 – इस संख्या में इकाई के स्थान पर 2 है। अतः यह पूर्ण वर्ग संख्या नहीं है ।।

(vii) 222000 – इस संख्या में शून्यों की संख्या विषम (3) है । अतः यह संख्या पूर्ण वर्ग संख्या नहीं है।

(viii)505050 – इस संख्या में इकाई स्थान पर शून्य है। अत: यह संख्या पूर्ण वर्ग संख्या नहीं है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित संख्याओं में से किस संख्या का वर्ग विषम संख्या होगा?
(i) 431
(ii) 2826
(iii) 7779
(iv) 82004.
हल:
(i) 431 – संख्या 431 में इकाई के स्थान पर 1 है। और 1 विषम संख्या है। अतः इस संख्या का वर्ग भी एक विषम संख्या होगा ।
(ii) 2826 – इस संख्या 2826 में इकाई के स्थान पर 6 है। और 6 विषम संख्या है। अतः इस संख्या का वर्ग भी एक विषम संख्या होगा ।
(iii) 7779 – इस संख्या 7779 में इकाई के स्थान पर 9 है। और 9 विषम संख्या है। अतः इस संख्या का वर्ग भी एक विषम संख्या होगा ।
(iv) 82004 – इस संख्या 82004 में इकाई के स्थान पर 4 है। और 4 विषम संख्या है। अतः इस संख्या का वर्ग भी एक विषम संख्या होगा ।

प्रश्न 4.
निम्न. प्रतिरूप का अवलोकन कीजिए और रिक्त स्थान भरिए
112 = 121
1012 = 10201
10012 = 1002001
1000012 = 1………….. 2 …………….. 1
100000012 = ………………..
हल:
112 = 121
1012 = 10201
10012 = 1002001
1000012 = 10000200001
100000012 = 100000020000001
[नियम : जिस संख्या का वर्ग करते हैं, उस संख्या में 1 और 1 के बीच जितने शून्य होते हैं, तो वर्ग करने में 1, 2, 1 के बीच में उतने ही शून्य लगाये जाते हैं ।]

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प्रश्न 5.
निम्नांकित प्रतिरूप का अवलोकन कीजिए और रिक्त स्थानों को भरिए
112 = 121
1012 = 10201
101012 = 102030201
10101012 = ……………..
……………..2 = 10203040504030201
हल:
112 = 121
1012 = 10201
101012 = 102030201
10101012 = 1020304030201
1010101012 = 10203040504030201

प्रश्न 6.
दिये गये प्रतिरूप का उपयोग करते हुए लुप्त संख्याओं को ज्ञात कीजिए।
12 + 22 + 22 = 32
22 + 32 + 62 = 72
32 + 42 + 122 = 132
42 + 52 + _2 = 212
52 + (_)2 + 302 = 312
62 + 72 + (_)2 = (_)2
हल :
इस प्रतिरूप में हम देखते हैं कि पहली संख्या तथा दूसरी संख्या का गुणा ही तीसरी संख्या है और तीसरी संख्या जो है उसके बाद जो संख्या होती है, वही चौथी संख्या है। अत: इसके द्वारा प्रारूप (प्रतिरूप) को पूरा कर सकते हैं।

(i) (4)2 + (5)2 + ( )2 = (21)2
पहली तथा दूसरी संख्या का गुणनफल (4 × 5) = 20 तथा बीस के बाद 21 आ रहा है ।
अत: 42 + 52 + 202 = 212

(ii) 52 + k2 + 302 = 312
∵5 × (k) = 30
∴ k = \(\frac{30}{5}\) = 6
अत: 52 + 62 + 302 = 312

(iii) 62 + 72 + 422 = m2
6 और 7 का गुणा = 42 तथा 42 के बाद वाली संख्या = 43
अत: 62 + 72 + 422 = 432

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प्रश्न 7.
योग संक्रिया किये बिना योगफल ज्ञात कीजिए।
(i) 1 + 3 + 5 + 7 + 9
(ii) 1 + 3 + 5 + 7 + 9 + 11 + 13 + 15 + 17 + 19
(iii) 1 + 3 + 5 + 7 + 9 + 11 + 13 + 15 + 17 + 19 + 21 + 23.
नियम : प्रथम ॥ विषम संख्याओं का योगफल = n2
हल :
(i) 1 + 3 + 5 + 7 + 9 = 52 = 25.

(ii) 1 + 3 + 5 + 7 + 9 + 11 + 13 + 15 + 17 + 19 = 102 = 100.

(iii) 1 + 3 + 5 + 7 + 9 + 11 + 13 + 15 + 17 + 19 + 21 + 23 = 122 = 144.

प्रश्न 8.
(i) 49 को 7 विषम संख्याओं के योग के रूप में लिखिए।
(ii) 121 को 11 विषम संख्याओं के योग के रूप में लिखिए ।
हल :
(i) 49
(a) 49 – 1 = 48
(b)48 – 3 = 45
(c) 45 – 5= 40
(d) 40 – 7 = 33
(e) 33 – 9 = 24
(f) 24 – 11 = 13
(g) 13 – 13 = 0
अतः 49 = 1 + 3 + 5 + 7 + 9 + 11 + 13

(ii) 121
(a) 121 – 1 = 120
(b) 120 – 3 =117
(c) 117 – 5 = 112
(d) 112 – 7 = 105
(e) 105 – 9 = 96
(f)96 – 11=85
(g) 85 – 13=72
(h) 72 – 15=57
(I) 57 – 17 =40
(j) 40 – 19=21
(k) 21 – 21 =0
अत: 121 = 1 + 3 + 5 + 7 + 9 + 11 + 13 + 15 + 17 + 19+ 21

HBSE 8th Class Maths Solutions Chapter 6 वर्ग और वर्गमूल Ex 6.1

प्रश्न 9.
निम्नलिखित संख्याओं के वर्ग के बीच में कितनी संख्याएँ हैं?
(i) 12 और 13
(ii) 25 और 26
(iii) 99 और 100
हल :
(i) 12 और 13
122 and 132 के बीच में 2 × 12 = 24 संख्याएँ हैं, जो इन वर्ग संख्याओं के अन्तर से 1 कम है।
∵ (13)2 – (12)2 = 169 – 144 = 25

(ii) 25 और 26
252 and 262 के बीच में 2 × 25 = 50 संख्याएँ हैं। जो इन वर्ग संख्याओं के अन्तर से 1 कम है।
∵ (26)2 – (25)2 = 676 – 625 = 51

(iii) 99 और 100
992 and 1002 के बीच में 99 × 2 = 198 संख्याएँ हैं। जो इन वर्ग संख्याओं के अन्तर से 1 कम है।
∵ (100)2 – (99)2 = 10000 – 9801 = 199

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

HBSE 12th Class Sanskrit रघुकौत्ससंवादः Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तरं लिखत
(क) कौत्सः कस्य शिष्यः आसीत् ?
(ख) रघुः कम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म ?
(ग) कौत्सः किमर्थं रघु प्राप ?
(घ) मन्त्रकृताम् अग्रणीः कः आसीत् ?
(ङ) तीर्थप्रतिपादितद्धिः नरेन्द्रः कथमिव आभाति स्म ?
(च) चातकोऽपि कं न याचते ?
(छ) कौत्सस्य गुरुः गुरुदक्षिणात्वेन कियद्धनं देयमिति आदिदेश ?
(ज) रघुः कस्मात् परीवादात् भीतः आसीत् ?
(झ) कस्मात् अर्थं निष्क्रष्टुम् रघुः चकमे ?
(ञ) हिरण्मयीं वृष्टिं के शशंसुः ?
(ट) कौ अभिनन्धसत्वौ अभूताम् ?
उत्तरम्:
(क) कौत्सः महर्षेः वरतन्तोः शिष्यः आसीत्।
(ख) रघुः ‘विश्वजित्’-नामकम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म।
(ग) कौत्सः गुरुदक्षिणार्थं धनं याचितुं रघु प्राप।
(घ) मन्त्रकृताम् अग्रणी: महर्षिः वरतन्तुः आसीत्।
(ङ) तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः नरेन्द्रः स्तम्बेन अवशिष्टः नीवारः इव आभाति स्म।
(च) चातकोऽपि निर्गलिताम्बुग) शरद्घनं न याचते।
(छ) कौत्सस्य गुरु: गुरुदक्षिणात्वेन चतुर्दशकोटी: सुवर्णमुद्राः प्रदेयाः इति आदिदेश।
(ज) ‘कश्चित् याचक: गुरुप्रदेयम् अर्थं रघोः अनवाप्य अन्यं दातारं गतः’ इति परीवादात् रघुः भीतः आसीत्।
(झ) कुबेरात् अर्थं निष्क्रष्टुम् रघुः चकमे।
(ञ) हिरण्मयीं वृष्टिं गृहकोषे नियुक्ताः अधिकारिणः शशंसुः ।
(ट) द्वौ रघुकौत्सौ अभिनन्द्यसत्त्वौ अभूताम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

2. कोष्ठकात् समुचितं पदमादाय रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) यससा ………………… अतिथिं प्रत्युज्जगाम। (प्रकाशः, कृष्णः, आतिथेयः)
(ख) मानधनाग्रयायी ……………….. तपोधनम् उवाच। (विशाम्पतिः, अकृताञ्जलिः, कौत्सः)
(ग) कुशाग्रबुद्धे ! ………………… कुशली। (ते शिष्यः, ते गुरुः, अग्रणी:)
(घ) हे राजन् ! सर्वत्र ………………… अवेहि। (दुःखम्, वार्तम्, असुखम्)
(ङ) स्तम्बेन अवशिष्टः …………… इव आभासि। (धान्यम्, नीवारः, वृक्षः)
(च) हे विद्वन् ! ………………… गुरवे कियत् प्रदेयम्।। (त्वया, मया, लोकेन)
(छ) ………………… अचिन्तयित्वा गुरुणा अहमुक्तः। (शरीरक्लेशम्, अर्थकार्यम्, रोगक्लेशम्)
उत्तरम्:
(क) प्रकाशः
(ख) विशाम्पतिः
(ग) ते गुरुः
(घ) वार्तम्
(ङ) नीवारः
(च) त्वया
(छ) अर्थकार्यम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

3. अधोलिखितानां सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
(क) कोटीश्चतस्रो दश चाहर।
(ख) माभूत्परीवादनवावतारः।
(ग) द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढुमर्हन्।
(घ) निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।
(ङ) दिदेश कौत्साय समस्तमेव।
उत्तरम्:
(क) कोटीश्चतस्रो दश चाहर।
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ से ‘रघुकौत्ससंवादः’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ कविकुलशिरोमणि महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग में से सम्पादित किया गया है। इसमें महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्स का गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह, बार-बार के आग्रह से क्रोधित ऋषि द्वारा पढ़ाई गई चौदह विद्याओं की संख्या के अनुरूप चौदह करोड़ मुद्राएँ देने का आदेश, सर्वस्वदान कर चुके राजा रघु से कौत्स की धनयाचना ‘रघु के द्वार से’ याचक खाली हाथ लौट गया-इस अपकीर्ति के भय से रघु का कुबेर पर आक्रमण का विचार तथा भयभीत कुबेर द्वारा रघु के खजाने में धन वर्षा करने को संवाद रूप में वर्णित किया गया है।

व्याख्या-महर्षि वरतन्तु मन्त्रद्रष्टा ऋषि थे। न उनमें विद्या का अभिमान था, न गुरुदक्षिणा में धन का लोभ। कौत्स नामक एक शिष्य ने ऋषि से चौदह विद्याएँ अत्यन्त भक्ति भाव से ग्रहण की। विद्याप्राप्ति के पश्चात् कौत्स ने गुरुदक्षिणा स्वीकार करने का आग्रह किया। ऋषि ने कौत्स के भक्तिभाव को ही गुरुदक्षिणा मान लिया। परन्तु कौत्स गुरुदक्षिणा देने के लिए जिद्द करता रहता रहा और इस जिद्द से रुष्ट होकर कवि ने उसे पढ़ाई गई एक विद्या के लिए एक करोड़ सुवर्णमुद्राओं के हिसाब से चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ भेंट करने का आदेश दे दिया–’कोटीश्चतस्त्रो दश चाहर’।

(ख) मा भूत्परीवादनवावतारः।
(किसी निन्दा का नया प्रादुर्भाव न हो जाए।)
(ग) द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढमर्हन।
(हे पूजनीय ! दो-तीन तक आप मेरे पास ठहर जाएँ।)
(घ) निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।
(रघु ने कुबेर से धन ग्रहण करने की इच्छा की।)
(ङ) दिदेश कौत्साय समस्तमेव ।
(रघु ने कुबेर से प्राप्त सारा धन कौत्स के लिए दे दिया।)
उत्तर:
(ख), (ग), (घ) तथा (ङ) के लिए संयुक्त प्रसंग एवं व्याख्या

प्रसंग-(क) वाला ही उपयोग करें।

व्याख्या-महर्षि वरतन्तु का शिष्य कौत्स राजा रघु के पास गुरुदक्षिणार्थ धन याचना के लिए आता है। रघु विश्वजित् यज्ञ में सर्वस्व दान कर चुके हैं, अतः वे सुवर्णपात्र के स्थान पर मिट्टी के पात्र में जल आदि लेकर कौत्स का स्वागत करते हैं। कौत्स मिट्टी का पात्र देखकर अपने मनोरथ की पूर्ति में हताश हो जाता है और वापस लौटने लगता है। राजा रघु खाली हाथ लौटते हुए कौत्स को रोकते हैं क्योंकि सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से बढ़कर होता है अत: उन्हें भय यह है कि कहीं प्रजा में यह निन्दा न फैल जाए कि कोई याचक रघु के पास आया था और खाली हाथ लौट गया था। वे कौत्स से उसका मनोरथ पूछते हैं। कौत्स सारा वृत्तान्त सुनाते हुए कहता है कि गुरु के आदेश के अनुसार चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा में भेंट करनी हैं। रघु कौत्स से दो-तीन के लिए

आदरणीय अतिथि के रूप में ठहरने का अग्रह करते हैं, जिससे उचित धन का प्रबन्ध किया जा सके। कौत्स राजा की प्रतिज्ञा को सत्य मानकर ठहर जाता है। रघु भी उसकी याचना पूर्ति के लिए धन के स्वामी कुबेर पर आक्रमण का विचार करते हैं। कुबेर रघु के पराक्रम से भयभीत होकर रघु के खजाने में सुवर्ण वृष्टि कर देते हैं। उदार रघु यह सारा धन कौत्स को दे देते हैं, परन्तु निर्लोभी कौत्स उनमें से केवल 14 करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ लेकर लौट जाता है।

दाता सम्पूर्ण धनराशि देकर अपनी उदारता प्रकट करते हैं और याचक आवश्यकता से अधिक एक कौड़ी भी ग्रहण न करके उत्तम याचक का आदर्श उपस्थित करते हैं। इस प्रकार दोनों ही यशस्वी हो जाते हैं।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

4. अधोलिखितेषु रिक्तस्थानेषु विशेष्य विशेषणपदानि पाठ्यांशात् चित्वा लिखत
(क) ………………….. अध्वरे।
(ख) ………………….. कोषजातम्।
(ग) …………………… अनुमितव्ययस्य।
(घ) ………………….. फलप्रसूतिः।
(ङ) ………………….. विवर्जिताय।
उत्तरम्
(क) विश्वजिति अध्वरे।
(ख) निःशेष-विश्राणित-कोषजातम्।
(ग) अर्घ्यपात्र-अनुमितव्ययस्य ।
(घ) आरण्यकोपात्त-फलप्रसूतिः।
(ङ) स्मयावेश-विवर्जिताय।

5. विग्रहपूर्वकं समासनाम निर्दिशत
(क) उपात्तविद्यः
(ख) तपोधनः
(ग) वरतन्तुशिष्यः
(घ) महर्षिः
(ङ) विहिताध्वराय
(च) जगदेकनाथः
(छ) नृपतिः
(ज) अनवाप्य
उत्तरम्:
(क) उपात्तविद्यः = उपात्ता प्राप्ता विद्या येन सः। (बहुव्रीहिः समासः)
(ख) तपोधनः = तपः एव धनं यस्य सः। (बहुव्रीहिः समासः)
(ग) वरतन्तुशिष्यः = वरतन्तोः शिष्यः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(घ) महर्षिः = महान् ऋषिः (कर्मधारयः)
(ङ) विहिताध्वराय = विहितम् अध्वरं येन सः, तस्मै। (बहुव्रीहिः समासः)
(छ) नृपतिः = नृणां पतिः। (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ज) अनवाप्य = न अवाप्य।

6. अधोलिखितानां पदानां समुचितं योजनं कुरुत
(अ) – (आ)
(क) ते (1) चतुर्दश
(ख) चतस्र: दश च (2) गुरुदक्षिणार्थी
(ग) अस्खलितोपचाराम् (3) अहानि
(घ) चैतन्यम् (4) स्वस्ति अस्तु
(ङ) कौत्स: (5) प्रबोध: प्रकाशो वा
(च) द्वित्राणि (6) भक्तिम्
उत्तरम-
(क) ते स्वस्ति अस्तु
(ख) चतस्र: दश च चतुर्दश
(ग) अस्खलितोपचारां भक्तिम्
(घ) चैतन्यम् प्रबोधः प्रकाशो वा
(ङ) कौत्सः गुरुदक्षिणार्थी
(च) द्वित्राणि अहानि

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

7. प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम्
(क) अर्थी (ख) मृण्मयम् (ग) शासितुः (घ) अवशिष्टः (ङ) उक्त्वा
(च) प्रस्तुतम् (छ) उक्तः (ज) अवाप्य (झ) लब्धम् (ब) अवेक्ष्य।
उत्तरम्:
(क) अर्थी = अर्थ + इनि > इन् (पुंल्लिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्)
(ख) मृण्मयम् = मृत् + मयट् (नपुं०, प्रथमा-एकवचनम्)
(ग) शासितुः = √शास् + तृच् (पुंल्लिङ्गम् षष्ठी-एकवचनम्)
(घ) अवशिष्टः = अव + √शास् + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ङ) उक्त्वा = √वच् + क्त्वा (अव्ययपदम्)
(च) प्रस्तुतम् = प्र + √स्तु + क्त (नपुं०, प्रथमा-एकवचनम्)
(छ) उक्तः = √वच् + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ज) अवाप्य = अव + √आप् + ल्यप् (अव्ययपदम्)
(झ) लब्धम् = √लभ् + क्त (नपुं, प्रथमा-एकवचनम्)
(ब) अवेक्ष्य = अव + √ईक्ष् + ल्यप् (अव्ययपदम्)

8. विभक्ति-लिङ्ग-वचनादिनिर्देशपूर्वकं पदपरिचयं कुरुत
(क) जनस्य (ख) द्वौ (ग) तौ (घ) सुमेरोः (ङ) प्रातः (च) सकाशात् (छ) मे (ज) भूयः (झ) वित्तस्य
(ब) गुरुणा
उत्तरम्:
HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः img-1

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

9. अधोलिखितानां क्रियापदानाम् अन्येषु पुरुषवचनेषु रूपाणि लिखत
(क) अग्रहीत् (ख) दिदेश (ग) अभूत् (घ) जगाद (ङ) उत्सहते (च) अर्दति (छ) याचते (ज) अवोचत्।
उत्तरम्:
HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः img-2

10. अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि लिखत
(क) नि:शेषम् (ख) असकृत् (ग) उदाराम् (घ) अशुभम् (ङ) समस्तम्
उत्तरम्:
(विलोमपदानि)
(क) नि:शेषम् – शेषम्
(ख) असकृत् – सकृत्
(ग) उदाराम् – अनुदाराम्
(घ) अशुभम् – शुभम्
(ङ) समस्तम् – असमस्तम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

11. अधोलिखितानां पदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत
(क) नृपः (ख) अर्थी (ग) भासुरम् (घ) वृष्टिः (ङ) वित्तम् (च) वदान्यः (छ) द्विजराजः (ज) गर्वः
(झ) घनः (ब) वार्तम्
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगाः)
(क) नृपः (राजा)-नृपः रघुः कौत्साय समस्तं धनम् अयच्छत्।
(ख) अर्थी (याचक:)-कौत्सः गुरुदक्षिणार्थम् अर्थस्य अर्थी आसीत्।
(ग) भासुरम् (भास्वरम्)-रघुः भासुरं सुवर्णराशिं कौत्साय अयच्छत् ।
(घ) वृष्टिः (वर्षा)-रघोः कोषगृहे सुवर्णमयी वृष्टिः अभवत्।
(ङ) वित्तमद् (धनम्)-मुनीनां तपः एव वित्तं भवति।।
(च) वदान्यः (दानी)-रघुः याचकेषु उदारः वदान्यः आसीत्।
(छ) द्विजराजः (चन्द्रमाः)-रात्रौ आकाशे द्विजराजः दीव्यति।
(ज) गर्वः (अहंकारः)-गर्वः उचितः न भवति।।
(झ) घनः (मेघ:)-वर्षौ घनः गर्जति वर्षति च।
(ञ) वार्तम् (कुशलताम्)-राजा प्रजायाः वार्तम् इच्छति।

12. अधोलिखितानाम् (श्लोकानाम्) अन्वयं कुरुत
(क) सः मृण्मये वीतहिरण्मयत्वात् …….. आतिथेयः।
(ख) समाप्तविद्येन मया महर्षिः ……………….. पुरस्तात्।
(ग) स त्वं प्रशस्ते महिते मदीये ………………….. त्वदर्थम्।
उत्तरम्:
उपुर्यक्त तीनों श्लोकों का अन्वय पाठ में देखें।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

13. अधोलिखितेषु प्रयुक्तानाम् अलङ्काराणां निर्देशं कुरुत
(क) ‘यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्तं लोकेन चैतन्यमिवोष्णरश्मेः’।
(ख) शरीरमात्रेण नरेन्द्र ! तिष्ठना भासि …………… इवावशिष्टः॥
(ग) तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं ………………. वज्रभिन्नम्।
उत्तरम्:
(क) उपमा – अलङ्कारः।
(ख) उपमा – अलङ्कारः ।
(ग) अनुप्रासः, उपमा च अलङ्कारौ।

14. अधोलिखितेषु छन्दः निर्दिश्यताम्
(क) तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं ………….. वरतन्तुशिष्यः॥
(ख) गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृश्वा …… नवावतारः॥
(ग) स त्वं प्रशस्ते महिते …………. त्वदर्थम्॥
उत्तरम्:
(क) उपजातिः छन्दः
(ख) उपजाति: छन्दः
(ग) उपजातिः छन्दः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

15. ‘रघुकौत्ससंवाद’ सरलसंस्कृतभाषया स्वकीयैः वाक्यैः विशदयत
उत्तरम्-रघुः विश्वजिते यज्ञे सर्वस्वदानम् अकरोत्। तदा एव वरतन्तुशिष्यः कौत्सः गुरुदक्षिणार्थं धनं याचितुं रघुम् उपागच्छत् । रघुः मृत्तिकापात्रे अर्घ्यम् आदाय कौत्सं सत्कृतवान्। मृत्तिकापात्रेण कौत्सः ज्ञातवान् यत् रघुः तस्य धनाशां पूरयितुं समर्थः न अस्ति। अत: कौत्सः राज्ञे स्वस्ति कथयित्वा प्रतियातुकामः अभवत्। ‘रघोः द्वारात् याचकः अपूर्णकामः निवृत्तः’ इति परिवादात् भीत: रघुः कौत्सम् अवरुध्य तस्य मनोरथम् अपृच्छत्। कौत्सः सर्वं वृत्तान्तं कथयन् अवदत्

महर्षि-वरतन्तोः अहं चतुदर्श विद्याम् अधीतवान्। ततः अहं तस्मै गुरुदक्षिणायै निवेदितवान्। सः मम गुरुभक्तिम् एव गुरुदक्षिणाम् अमन्यत। मम भूयोभूयः निर्बन्धात् महर्षिः रुष्ट: जातः । सः चतुदर्शविद्यापरिसंख्यया मह्यं चतुर्दशकोटी: सुवर्णमुद्राः उपहर्तुम् आदिदेश। अतः एव अहं धनार्थी सन् भवतः समीपे आगच्छम्।।

रघुः सर्वं वृत्तान्तं श्रुत्वा कौत्साय द्वित्राणि दिनानि अतिथिरूपेण स्थातुं निवेदितवान्। कौत्सः राज्ञः निवेदनं स्वीकृतवान्। याचक-मनोरथं पूरयितुं रघुः प्रातः एव कुबेरम् आक्रमितुम् अचिन्तयत्। आक्रमणभीत: कुबेर: रात्रौ एव रघोः कोषगृहे सुवर्णवृष्टिम् अकरोत्। रघुः उदारभावात् समस्तं सुवर्णराशिं कौत्साय अयच्छत्। परन्तु कौत्सः केवलं चतुर्दशकोटी: मुद्राः एव गृहीत्वा गतवान्। एवम् उदारः रघुः निर्लोभः कौत्सः च द्वौ एव जगति धन्यौ अभवताम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

योग्यताविस्तारः

कालिदासीया काव्यशैली सहृदयानां मनो नितरां रञ्जयति। प्रतिमहाकाव्यं सुललितैः सुमधुरैः प्रसादगुणभरितैः च शब्दसन्दर्भ: मनोहारिणः संवादान् कविः समायोजयति । तत्र हृदयङ्गमाः परिसरसन्निवेशाः आश्रमोपवनादयः, लतागुल्मादयः, शुक-पिक-मयूर-मरन्द-हरिणादयः स्वभावरमणीयाः कविना चित्र्यन्ते। तादृशाः संवादाः कालिदासीयमहाकाव्योः सन्त्यनेको। यथा-रघुवंशे एवं द्वितीयसर्गे सिंह-दिलीपयोः संवादे’
अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् ।
न पादपोन्मूलनशक्तिरंह: शिलोच्चये मूर्च्छति मारुतस्य ॥ रघुवंशम् 2.34
सम्बन्धमाभाषणपूर्वमाहुर्वृत्तः स नौ सङ्गतयोर्वनान्ते ।
तदभूतनाथानुग ! नार्हसि त्वं सम्बन्धिनो मे प्रणयं विहन्तुम् ॥
कालिदासः उपमालङ्कारप्रियः। तस्य सर्वेषु काव्येषु उपमायाः हृदयहारीणि उदाहरणानि लभ्यन्ते। यथा
वन्यवृत्तिरिमां शश्वदात्मानुगमनेन गाम्।
विद्यामभ्यसनेनेव प्रसादयुित मर्हसि॥ रघुवंशम् 1.88

अर्घ्यम् – अय॑म् इति पदेन अतिथिसत्कारार्थं सङ्ग्राह्यं द्रव्यम् अभिधीयते। भारतीयायाम् अतिथिसत्कार परम्परायाम् एतेषां द्रव्याणां नितरां महत्त्वं वर्तते । तानि द्रव्याणि दूरादागतस्य अतिथिजनस्य अध्वश्रमम् अपनेतुं समर्थानि; अत एव तानि अर्घ्यद्रव्येषु स्थानं भजन्ते। अर्घस्य, अय॑स्य वा द्रव्याणि तु – दूर्वा, अक्षतानि, सर्षपाः पुष्पाणि, सुगन्धीनि, चन्दनादिसुगन्धिद्रव्याणि, स्वादु शीतलं जलञ्च। अर्घः अयं वा अतिथीनाम् उपचारार्थम्, आदरार्थं वा विधीयत इति याज्ञवलक्यः प्राह । तद्यथा’दूर्वा सर्षपपुष्पाणां दत्त्वाघ पूर्णमञ्जलिम्’ इति।

विद्या – प्राचीनकाले चतुर्दश विद्याः पाठ्यन्ते स्म। ताः स्मृतिषु उल्लिखिताः सन्ति। तद्यथा
अगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा-न्यायविस्तरः।
पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या येताश्चतुर्दश॥
शिक्षा, व्याकरणं, छन्दः, निरुक्तं, ज्यौतिषं, कल्पः इति षट् वेदाङ्गानि; ऋक्, साम, यजुः, अथर्वण इति चत्वारो वेदाः । वेदार्थविचाराय प्रवृत्तं मीमांसाशास्त्रम्, न्यायविस्तरशब्देन ज्ञायमाना आन्वीक्षिकी, दण्डनीतिः, वार्ता च अष्टादश-पुराणानि; धर्मशास्त्रञ्च चतुर्दश-विद्यासु अन्तर्भवन्ति।

मन्त्रः- मन्त्र इति पदं ‘मत्रि’ (गुप्तभाषणे) धातोः घञ् प्रत्यये कृते निष्पन्नः, ऋषिभिः दृष्टानाम् आनुपूर्वाप्रधानाम् ऋग्यजुस्सामाथाख्यानां सामान्येन बोधकम्। प्रत्येकं वेदे अन्तर्गतानां मन्त्राणां बोधकतया भिन्नाः भिन्नाः शब्दाः प्रयुज्यन्ते। केवलम् ऋङ्मन्त्रणां कृते ‘ऋच’ इति साममन्त्राणां ‘सामानि’ इति, यजुर्मन्त्राणां ‘यजूंषि’ इति अथर्वमन्त्राणां ‘आथर्वा’ इति च संज्ञा। ज्ञानाथकात् ‘मन्’ धातोः अपि मन्त्रशब्दस्य व्युत्पत्तिं प्रदर्शयन्ति। ध्यानावस्थायां मन्त्रान् ऋषयः अपश्यन् इति कारणात् ते ‘मन्त्रद्रष्टार’ इत्युच्यन्ते। सर्वदा मननं कुर्वन्ति, ध्यानमग्ना भवन्ति इति कारणात् ऋषयः मन्त्रकृत इत्यपि उच्यन्ते।

बहुभाषाज्ञानम् -अधोलिखितानाम् अन्यभाषाशब्दानां समानार्थकानि पदानि पाठे अन्वेष्टव्यानि मेजबान (Host) अगवानी (to receive) जिद (insistance)

उत्तरम्- मेजबान (Host) = आतिथेयः।
आगवानी (to receive) = प्रति + उत् + √गम्।
जिद (Insistance) = निर्बन्धः।

विशिष्टवाक्यनिर्माणकौशलम्
‘सूर्ये तपति कथं तमिस्रा’-एतत्सदृशानि वाक्यानि निर्मेयानि
1. सूर्ये अस्तम् ………………. (गम्) चन्द्र उदेति।
2. मयि मार्गे ……………….. (स्था) यानम् आगतम् ।
3. तस्मिन् …………………. (प्रच्छ्) अहम् उत्तरम् अयच्छम्।
उत्तरम्:
1. सूर्ये अस्तं गते चन्द्र उदेति।
2. मयि मार्गे स्थिते यानम् आगतम्।
3. तस्मिन् पृष्टे अहम् उत्तरम् अयच्छम्।

अनेकार्थकशब्दः – पाठ्यांशे दृष्टानाम् अनेकार्थकशब्दानां सङ्ग्रहं कृत्वा नाना अर्थान् उल्लिखत।
काव्यसौन्दर्यबोधः – कालिदासस्य अन्येषु काव्येषु – ऋतुसंहार-मेघदूतयोः, मालविकाग्निमित्र विक्रमोर्वशीयाभिज्ञानशाकुन्तलेषु कुमारसम्भवे च भवद्भिः अवलोकिताः अलङ्कारैः सुशोभिताः श्लोकाः सङ्ग्राह्याः, काव्यसौन्दर्यं च समुपस्थापनीयम्।
चित्रलेखनम् – कालिदासकृतं प्रकृतिचित्रणम्, आश्रमचित्रणं, वृक्षादीनां पशुपक्षिणां च चित्रणं श्लोकोल्लेखनपूर्वकं फलकेषु पत्रेषु वा वर्णैः लेपनीयम्।

HBSE 9th Class Sanskrit रघुकौत्ससंवादः Important Questions and Answers

I. समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) रघुवंशस्य रचयिता कः ?
(A) भासः
(B) कालिदासः
(C) माघः
(D) अश्वघोषः

(ii) कौत्सः कस्य शिष्यः आसीत् ?
(A) रघोः
(B) महर्षेः
(C) महर्षिवरतन्तोः
(D) वसिष्ठस्य।

(ii) रघुः कम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म ?
(A) विश्वजित्-नामकम्
(B) पुत्रीयेष्टि-नामकम्
(C) पौर्णमास-नामकम्
(D) पाक्षिकम्।

(iv) मन्त्रकृताम् अग्रणीः कः आसीत् ?
(A) रघुः
(B) दिलीपः
(C) रामः
(D) वरतन्तुः

(v) कस्मात् अर्थं निष्क्रष्टुम् रघुः चकमे ?
(A) कृष्णात्
(B) इन्द्रात्
(C) कुबेरात्
(D) शिवात्।

(vi) हिरण्मयीं वृष्टिं के शशंसुः ?
(A) अधिकारिणः
(B) मित्राणि
(C) याचकाः
(D) प्रजाः।

(vii) कौ अभिनन्धसत्वौ अभूताम् ?
(A) गुरुशिष्यौ
(B) वरतन्तुकौत्सौ
(C) रघुकौत्सौ
(D) रघुवरतन्तू।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितम् पदं चित्त्वा लिखत
(i) मा भूत् परीवादनवावतारः।
(A) कस्य
(B) कस्मात्
(C) कस्मिन्
(D) कस्याम्।
उत्तरम्:
(A),कस्य

(ii) दिदेश कौत्साय समस्तमेव।
(A) कः
(B) कस्मिन्
(C) कस्मै
(D) कम्।
उत्तराणि:
(C) कस्मै

(ii) कौत्सः वरतन्तोः शिष्यः आसीत्।
(A) कम्
(B) कस्मै
(C) कस्मात्
(D) कस्य।
उत्तराणि:
(D) कस्य

(iv) रघुः विश्वजितम् अध्वरम् अनुतिष्ठति स्म।
(A) कः
(B) कम्
(C) कस्मै
(D) कस्याः ।
उत्तराणि:
(B) कम्

(v) वरतन्तुः मन्त्रकृताम् अग्रणीः आसीत्।
(A) केषाम्
(B) कस्य
(C) कस्मिन्
(D) कस्याः ।
उत्तराणि:
(A) केषाम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

रघुकौत्ससंवादः पाठ्यांशः

1 .तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं
निःशेषविश्राणितकोषजातम्।
उपात्तविद्यो गुरुदक्षिणार्थी
कौत्सः प्रपेदे वरतन्तुशिष्यः॥ 1 ॥

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अन्वयः- विश्वजिति अध्वरे नि:शेषविश्राणितकोशजातं तं क्षितीशं (रघुम्) उपात्तविद्यः वरतन्तुशिष्यः कौत्सः गुरुदक्षिणार्थी प्रपेदे।

प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘रघुकौत्ससंवादः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग से सम्पादित किया गया है। इस पाठ में ऋषि वरतन्तु के शिष्य कौत्स तथा महाराजा रघु के बीच हुए संवाद को वर्णित किया गया है। (पूरे पाठ में इसी प्रसंग का प्रयोग किया जा सकता है)।

सरलार्थ:–‘विश्वजित्’ नामक यज्ञ में अपनी सम्पूर्ण धनराशि दान कर चुके उस राजा रघु के पास वरतन्तु ऋषि का विद्यासम्पन्न शिष्य कौत्स गुरुदक्षिणा देने की इच्छा से धनयाचना करने के लिए पहुँचा।।

भावार्थ:-प्राचीन काल में राजा लोग ‘विश्वजित्’ यज्ञ करते थे। राजा रघु ने भी यह यज्ञ किया और अपना सम्पूर्ण खजाना (राजकोष-धनधान्य) दान कर दिया। तभी वरतन्तु का शिष्य कौत्स भी राजा के पास इस आशा में पहुँचा कि वह अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में देने के लिए चौदह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ राजा रघु से माँग लेगा।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च विश्वजिति अध्वरे = विश्वजित् नामक यज्ञ में। कोषजातम् = धनसमूह, सम्पूर्ण धनराशि। विश्राणितम् = प्रदत्तम्; दान में दिया हुआ। वि + √श्रणु (दाने) + क्त; दत्तम् । उपात्तविद्यः = विद्या को प्राप्त किया हुआ, विद्यासम्पन्न। उपात्ता विद्या येन सः (बहुव्रीहि)। गुरुदक्षिणार्थी = गुरुदक्षिणा देने की इच्छा से प्रार्थना करने वाला। गुरुदक्षिणायै अर्थी (चतुर्थी-तत्पुरुष) प्रपेदे = पहुँचा। प्र + √पद् (गतौ) + लिट् + प्रथम पुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

2. स मृण्मये वीतहिरण्मयत्वात्
पात्रे निधायार्थ्यमनर्घशीलः।
श्रुतप्रकाशं यशसा प्रकाशः
प्रत्युजगामातिथिमातिथेयः॥ 2॥

अन्वयः-सः अनर्घशीलः, यशसा प्रकाशः, आतिथेयः, वीतहिरण्मयत्वात् मृण्मये पात्रे अर्घ्यं निधाय श्रुतप्रकाशम् अतिथिं (कौत्सम्) प्रति उज्जगाम।

सरलार्थः-वह प्रशंसनीय स्वभाव वाला, यश से प्रकाशवान, अतिथि सत्कार करने वाला राजा रघु सुवर्ण-निर्मित पात्र न रहने से मिट्टी के बने हुए पात्र में अर्घ्य अर्थात् सत्कार के लिए जल आदि लेकर वेदज्ञान से प्रकाशमान अतिथि कौत्स के पास उठकर गया।

भावार्थ:-विश्वजित् यज्ञ में सम्पूर्ण धन-कोष दान कर देने के कारण राजा रघु निर्धन हो चुका था। अब उसके पास सोने के बर्तन नहीं थे। परन्तु अतिथि का सत्कार तो प्रत्येक दशा में करना ही चाहिए। इसी भाव से रघु मिट्टी के पात्र में सत्कार-सामग्री रखकर, अपने आसन से उठकर याचक ब्रह्मचारी कौत्स के पास पहुंचे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
मृण्मये= मिट्टी के बने हुए। मृत् + मयट्। वीतहिरण्मयत्वात् = सोने के बने हुए पात्रों के न रहने से। हिरण्यस्य विकारः = हिरण्मयम्। वि + √इण् + क्त = वीतम्। निधाय = रखकर । संस्थाप्य। नि + √धा + ल्यप् । अर्घ्यम् = अर्घ निमित्तक द्रव्य। अर्घार्थम् योग्यम् इदं द्रव्यम् अर्घ + यत्। अनर्धशीलः = असाधारण आचारवान्, प्रशंसनीय स्वभाववाला। अमूल्यस्वभावः, असाधारण-स्वभावो वा। नञ् + अर्घः = अनर्घः = अमूल्यम्। श्रुतप्रकाशं = वेदादि शास्त्रों के अध्ययन से प्रसिद्ध। श्रुतम् = शास्त्रम्। श्रुतेन प्रकाशः। यस्मिन् तम् (बहुव्रीहि)। श्रुतम् = वेदादि शास्त्र। श्रूयते इति श्रुतम्-वेदादिशास्त्रम्। √श्रु + क्त। प्रत्युजगाम = पास उठकर गया। प्रति + उत् + गम् + लिट् । प्रथमपुरुष एकवचन। आतिथेयः = अतिथि सत्कार करने वाला, मेजबान (Host) अतिथये साधुः । अतिथि + ढञ्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

3. तमर्चयित्वा विधिवद्विधिज्ञः
तपोधनं मानधनाग्रयायी।
विशांपतिर्विष्टरभाजमारात्
कृताञ्जलिः कृत्यविदित्युवाच॥ ३॥

अन्वयः-विधिज्ञः मानधनाग्रयायी कृत्यवित् विशांपतिः विष्टरभाजं तं तपोधनं विधिवत् अर्चयित्वा आरात् कृताञ्जलिः सन् इति उवाच।।

सरलार्थः-शास्त्रविधि को जानने वाले, स्वाभिमान को ही धन मानने वालों में अग्रगण्य, अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व को समझने वाले, प्रजा के स्वामी राजा रघु ने आसन पर विराजमान उस तपस्वी कौत्स का विधिपूर्वक सत्कार करके निकट ही हाथ जोड़े हुए (रघु ने) इस प्रकार कहा

भावार्थ:-स्वाभिमानी राजा रघु ने तपस्वी कौत्स का पूजन करके आदरपूर्वक हाथ जोड़कर अगले पद्यों में कहे जाने वाले वचन कहे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अर्चयित्वा = पूजन करके, सत्कार करके। √अर्च् (पूजायाम्) + णिच् + क्त्वा। स्वार्थे णिच्। विधिवत् = शास्त्रोक्त नियमों के अनुरूप। यथाशास्त्रम्। विधि + वत्। विधिज्ञः = शास्त्रज्ञ । शास्त्र नियमों के वेत्ता। तपोधनम् = ऋषि को। रघुकौत्ससंवादः जिसका तप ही धन है। तपः धनं यस्य (बहुब्रीहि समास)। मानधनाग्रयायी = आत्म गौरव को ही धन मानने वालों में अग्रगण्य/अग्रेसर। विशाम्पतिः = राजा। विश् = प्रजा। पति = स्वामी। विशां पतिः (अलुक्-षष्ठी तत्पुरुष) विष्टरभाजाम् = आसन पर/पीठ पर बैठे हुए। विष्टरम् = आसनम् अथवा पीठम्। आरात् = समीप में। दूर और समीप दोनों अर्थों में ‘आरात्’ पद का प्रयोग होता है। अव्यय। कृत्यवित्= अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व को समझने वाला। √कृ + यत् + √विद् + क्विप्। उवाच = √वच् (परिभाषणे) लिट्, प्रथम पुरुष, एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

4. अप्यग्रणीमन्त्रकृतामृषीणां
कुशाग्रबुद्धे कुशली गुरुस्ते।
यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्तं
लोकेन चैतन्यमिवोष्णरश्मेः॥ 4॥

अन्वयः-(हे) कुशाग्रबुद्धे ! अपि मन्त्रकृताम् ऋषीणाम् अग्रणीः ते गुरुः कुशली ? यतः त्वया अशेषं ज्ञानं लोकेन उष्णरश्मेः चैतन्यम् इव आप्तम्।

सरलार्थ:-राजा रघु ने कौत्स से विनयपूर्वक कहा-हे तीव्रबुद्धि ! क्या मन्त्रद्रष्टा ऋषियों में अग्रगण्य आपके गुरु कुशलपूर्वक हैं ? क्योंकि आपने समस्त ज्ञान अपने गुरु से उसी प्रकार प्राप्त किया है, जिस प्रकार संसार के समस्त लोग उष्णरश्मि (= सूर्य) से जागृति प्राप्त करते हैं।

भावार्थ:-वरतन्तु मन्त्रद्रष्टा श्रेष्ठ ऋषि हैं। राजा रघु उनके शिष्य से ऋषिश्रेष्ठ का कुशल समाचार पूछकर सज्जनोचित शिष्टाचार प्रकट कर रहे हैं। जैसे सूर्य से लोग ऊर्जा प्राप्तकर चेतनावान् हो जाते हैं, इसी प्रकार कौत्स वरतन्तु से समस्त 14 विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर विद्यावान् हुआ है।

विशेष:-यहाँ उपमा अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
मन्त्रकृताम्= मन्त्रद्रष्टाओं में। मनन करने वालों में। चिन्तन करने वालों में। कृ-धातु का प्रथम अर्थ ‘दर्शन करना’ है न कि निर्माण करना। ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः । कुशाग्रबुद्धे = हे सूक्ष्मदर्शी ! कुशस्य अग्र कुशाग्रं कुशाग्रमिव बुद्धिर्यस्य सः कुशाग्रीयम्। तत्सम्बोधनम्। कुश एक विशेष प्रकार की तीखी नोंक वाली घास होती है जिसका उपयोग यज्ञ-यागादि में किया जाता है। अशेषम् = सम्पूर्ण। अविद्यमानः शेषः यस्मिन् तत्। न + शेषम्। शेष न रहने तक। लोकेन = लोगों से। समूहवाचीपद। उष्णरश्मिः =सूर्य। उष्णः रश्मिः यस्य सः। बहुव्रीहि समास। आप्तम् = प्राप्त किया गया। आप्लु (व्याप्तौ) + क्त।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

5. तवाहतो नाभिगमेन तृप्तं मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे।
अप्याज्ञया शासितुरात्मना वाप्राप्तोऽसि सम्भावयितुं वनान्माम् ॥5॥

अन्वयः-अर्हतः तव अभिगमनेन नियोगक्रियया उत्सुकं मे मनः न तृप्तम् अपि शासितुः आज्ञया आत्मना वा मां संभावयितुं वनात् प्राप्तः असि ?

सरलार्थ:-राजा रघु ने कौत्स से पुन: कहा-“आप पूजनीय के आगमन से आज्ञापालन के लिए उत्सुक मेरा मन सन्तुष्ट/प्रसन्न हो गया है। क्या आप गुरु की आज्ञा से अथवा अपने-आप से ही मुझ पर कृपा करने के लिए वन (आश्रम) से यहाँ पधारे हैं ?”

भावार्थ:-राजा रघु स्वभाव से विनम्र एवं शिष्टाचार में निपुण हैं। वे तपस्वियों की याचना को भी अपने ऊपर तपस्वियों की कृपा ही मानते हैं। रघु के पूछने का तात्पर्य है कि वह अपने गुरुदेव के प्रयोजन से मेरे पास आया है अथवा उसका कोई अपना ही व्यक्तिगत प्रयोजन है ?

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अर्हतः = प्रशंसा के योग्य का। √अर्ह (पूजायाम्) + शत, षष्ठी एकवचन। अहूं-धातु से ‘प्रशंसा’ के अर्थ में ही शतृ प्रत्यय होता है। अभिगमेन = आगमन से। तृप्तम् = सन्तुष्ट। √तृप् (प्रीणने) + क्त। नियोगक्रियया = आज्ञा से। उत्सुकम् = उत्कण्ठित। सम्भावयितुम् = कृतार्थ करने के लिए। सम् + √भू + णिच् + तुमुन्।

6. इत्यर्घ्यपात्रानुमितव्ययस्य
रघोरुदारामपि गां निशम्य।
स्वार्थोपपत्तिं प्रति दुर्बलाशः
तमित्यवोचद्वरतन्तुशिष्यः॥6॥

अन्वयः-अर्घ्यपात्रेण अनुमितव्ययस्य रघोः इति उदारां गाम् अपि निशम्य वरतन्तुशिष्यः स्वाथोपपत्तिं प्रति दुर्बलाशः तम् इति अवोचत्।

सरलार्थ:-अर्घ्यपात्र मिट्टी का बना हुआ होने से जिसके खर्च करने की सामर्थ्य का अनुमान किया जा सकता है, ऐसे उस राजा रघु की इस उदारतापूर्ण वाणी को सुनकर भी वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने अपने कार्य की सिद्धि के प्रति हताश होते हुए राजा रघु से ये वचन कहे

भावार्थ:-राजा रघु विश्वजित् यज्ञ में अपना सम्पूर्ण धन दान कर चुके हैं, अत: कौत्स का सत्कार करने के लिए आज उनके पास सोने का पात्र नहीं है; अपितु मिट्टी का पात्र है। इस मिट्टी के बर्तन से ही अब रघु की दान शक्ति का परिचय मिल जाता है। कौत्स को अपने उद्देश्य की सिद्धि पूर्ण होती हुई प्रतीत नहीं होती, इसीलिए वह हताश होकर अगले पद्यों में कहे गए वचन राजा रघु के सामने निवेदन करता है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अर्घ्यपात्रानुमितव्ययस्य = (मृण्मय) अर्घ्यपात्र से ही जिसके सम्पूर्ण धन के व्यय हो जाने का पता लगता है, उसका। अर्घ्यस्य पात्रम् अर्घ्यपात्रेण अनुमितः व्ययः यस्य सः, तस्य = रघोः। गाम् = वाणी को। ‘गो’ शब्द अनेकार्थक है, इस स्थान पर वाणी का वाचक है। निशम्य = सुनकर। नि + √शम् + ल्यप् । स्वार्थोपपत्तिम् = अपने प्रयोजन (कार्य) की सिद्धि को। यहाँ अर्थ शब्द प्रयोजन वाचक है। दुर्बलाशः = निराश होते हुए; शिथिल मनोरथ होते हुए दुर्बला आशा यस्य सः (बहुव्रीहि) अवोचत् = बोला। √वच् + (परिभाषणे) लङ् प्रथमपुरुष, एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

7. सर्वत्र नो वार्तमवेहि राजन् !
नाथे कुतस्त्वय्यशुभं प्रजानाम्।
सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्टे:
कल्पेत लोकस्य कथं तमिस्त्रा॥7॥

अन्वयः-(हे) राजन् ! सर्वत्र नः वार्तम् अवेहि। त्वयि नाथे प्रजानाम् अशुभं कुतः ? सूर्ये तपति तमिस्रा लोकस्य दृष्टेः आवरणाय कथं कल्पेत ? .

सरलार्थ:-वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने राजा रघु को सम्बोधन करते हुए कहा-हे राजन् ! आप तो सभी जगह हमारी कुशलता को जानते ही हैं। आप के राजा होते हुए प्रजाओं का अशुभ कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं। सूर्य के प्रकाशमान होने पर अंधकार समूह (कृष्ण पक्ष की रात्री) संसार के लोगों की दृष्टि को ढकने में कैसे समर्थ हो सकता

भावार्थ:-कौत्स राजा रघु के राजा होने पर सन्तुष्ट है और राजा के समक्ष वह स्पष्ट कर रहा है कि उनके राजा रहते हुए उनके शासन में किसी भी प्रकार के अनिष्ट की कल्पना नहीं की जा सकती। समस्त प्रजा का केवल कल्याण ही होता है। सूर्य के रहते हुए अंधकार कैसे ठहर सकता है?

विशेषः-प्रस्तुत पद्य में पहले वाक्य की कही गई बात को दूसरे वाक्य की बात से पुष्ट किया गया है। अत: यहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
वार्तम् = कुशलता, नीरोगता। ‘वार्तम् , स्वास्थ्यम्, आरोग्यम्, अनामयम्’ इति पर्यायपदानि। अवेहि = जानो। अव + इहि । √इण् गतौ, लोट् मध्यमपुरुष एकवचन । सूर्ये तपति (सति) = सूर्य के प्रकाशमान होने पर। सती सप्तमी प्रयोग। तपति – √तप् + शतृ सप्तमी विभक्ति एकवचन (पुंल्लिंग) कथं कल्पेत = कैसे पर्याप्त होगा। (समर्थ नहीं होगा)। √क्लुप् (सामर्थ्य) विधिलिङ्, प्रथम पुरुष एकवचन। तमिस्रा = अन्धकार समूह, कृष्णपक्ष की रात्री ‘तमिस्रा तु तमस्ततौ’।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

8. शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्
आभासि तीर्थप्रतिपादितर्द्धिः।
आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिः
स्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः॥ 8॥

अन्वयः-(हे) नरेन्द्र ! तीर्थे प्रतिपादितार्द्धिः अपि शरीरमात्रेण तिष्ठन् आरण्यकोपात्त-फलप्रसूतिः स्तम्बेन अवशिष्टः नीवारः इव आभासि।

सरलार्थ:-वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने राजा रघु से कहा-हे राजन् ! सत्पात्रों को अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान. में देने वाले आप केवल शरीर से उसी प्रकार सुशोभित हो रहे हैं जैसे वनों में रहने वाले मुनि लोगों को अपने फल प्रदान कर देने वाले नीवार के पौधे डंठल मात्र से शेष रहकर सुशोभित होते हैं।

भावार्थ:-रघु सर्वस्व दान कर देने के पश्चात् भी सुशोभित हो रहे हैं, क्योंकि उन्होंने यह दान सदाचारी याचकों को दिया है। कवि कालिदास ने धन-सम्पत्ति से रहित होने के कारण शरीर मात्र से विद्यमान रघु को उसी प्रकार सुशोभित बताया है जिस प्रकार मुनियों द्वारा नीवार-अन्न (साँवकी) ग्रहण कर लेने पर नीवार का पौधा डंठल मात्र रहकर सुशोभित होता है।

विशेषः- यहाँ उपमा अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च शरीरमात्रेण = केवल शरीर से। केवलं शरीरं शरीरमात्रम्। मात्रच् प्रत्यय। आभासि = सुशोभित हो रहे हो। आ + √भा (दीप्तौ) लट्लकार मध्यम पुरुष एकवचन। तीर्थप्रतिपादितार्द्धिः = सत्पात्रों को सारी सम्पत्ति दान करने वाले। तीर्थ-सत्पात्रे प्रतिपादिता-दत्ता ऋद्धिः-समृद्धिः (सम्पत्) येन सः। आरण्यकाः = अरण्य में निवास करने वाले मुनिजन आदि। अरण्ये भवाः आरण्यकाः । स्तम्बेन = डाँठ (डंठल) मात्र से। तृतीया विभक्ति एकवचन। नीवारः =धान्य विशेष। जंगल में स्वतः उत्पन्न हुआ धान्य विशेष।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

9. तदन्यतस्तावदनन्यकार्यों
गुर्वर्थमाहर्तुमहं यतिष्ये।
स्वस्त्यस्तु ते निर्गलिताम्बुगर्भ
शरद्घनं नार्दति चातकोऽपि ॥ १॥

अन्वयः-तत् तावत् अनन्यकार्यः अहम् अन्यतः गुर्वर्थम् आहर्तुं यतिष्ये। ते स्वस्ति। चातकः अपि निर्गलिताम्बुगर्भ शरद्-घनं न अर्दति।

सरलार्थ:-कौत्स राजा रघु से कह रहा है-(क्योंकि आप पहले ही सब कुछ दान कर चुके हैं। इसीलिए (धन याचना के अतिरिक्त मेरा) कोई अन्य प्रयोजन न होने से मैं किसी दूसरे राजा के पास गुरुचरणों में दक्षिणा रूप में देने के लिए धन-याचना करने का प्रयास करूंगा। आपका कल्याण हो। जल वर्षा कर देने से रिक्त हुए शरद् ऋतु के बादलों से तो चातक भी जल की याचना नहीं करता।

भावार्थ:-जिसके पास जो वस्तु हो, उससे वही वस्तु माँगनी चाहिए। कौत्स को धन की आवश्यकता है। राजा रघु पहले ही सम्पूर्ण धन का दान कर चुके हैं। कौत्स का धन याचना के अतिरिक्त कोई अन्य प्रयोजन भी नहीं है। अतः वह राजा रघु से कह रहा है कि मैं गुरुदक्षिणा के लिए धन प्राप्त करने हेतु किसी अन्य राजा से निवेदन करूँगा क्योंकि जल रहित बादलों से तो चातक पक्षी भी याचना नहीं करता। विशेष:-पहले वाक्यार्थ की पुष्टि दूसरे वाक्यार्थ से हो रही है। अतः यहाँ ‘अर्थान्तरन्यास’ अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अनन्यकार्यः = जिसे निर्दिष्ट उद्देश्य के अतिरिक्त अन्य कार्य न हो। प्रयोजनान्तर-रहितः । न विद्यते अन्यकार्यं यस्य, सः (बहुव्रीहि समास) अन्यच्च तत् कार्यञ्च अन्यकार्यम् (कर्मधारय समास) आहर्तुम् = ग्रहण करने के लिए आ + √ह (हरणे) + तुम्। यतिष्ये = प्रयत्न करूँगा। √यती (प्रयत्ने) + लृट् उत्तम पुरुष बहुवचन। निर्गलिताम्बुगर्भ = जिसके गर्भ से जल निकल चुका हो। अम्ब्वेव गर्भः अम्बुगर्भः । निर्गलितः अम्बुगर्भः यस्मात् सः। शरधनम् = शरत्कालिक मेघ । नार्दति =याचना नहीं करता है। न + अर्दति। √अर्दु (गतौ याचने च) लट्लकारप्रथम पुरुष एकवचन। चातकः = पपीहा (पक्षी-विशेष) चातक पक्षी।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

10. एतावदुक्त्वा प्रतियातुकामं
शिष्यं महर्षेर्नृपतिर्निषिध्य।
किं वस्तु विद्वन् ! गुरवे प्रदेयं
त्वया कियद्वेति तमन्वयुक्तं ॥ 10॥

अन्वयः – एतावद् उक्त्वा प्रतियातुकामं महर्षेः शिष्यं नृपतिः (रघुः) निषिध्य-“(हे) विद्वन् ! त्वया गुरवे प्रदेयं वस्तु किम्, कियत् वा” इति तम् अन्वयुक्त।

सरलार्थः-उपर्युक्त वचन कहकर जब महर्षि वरन्तु का शिष्य वापस लौटने लगा तब महाराज रघु ने उसे रोक कर इस प्रकार पूछा- “हे विद्वान् ! अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में देने के लिए क्या वस्तु चाहिए और कितनी चाहिए ?”

भावार्थ:-कौत्स अपनी धन याचना पूर्ण न होते हुए देखकर वापस लौट जाना चाहता है। रघु उसे रोकते हैं क्योंकि महाराज रघु एक स्वाभिमानी राजा हैं और किसी याचक का खाली हाथ लौट जाना रघु को स्वीकार नहीं है। इसीलिए वे कौत्स से पूछते हैं कि उसे गुरुदक्षिणा में देने के लिए कितने परिमाण में किस वस्तु की आवश्यकता

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
प्रतियातुकामम् = लौट जाने की इच्छा वाले को। प्रतियातुं कामः यस्य सः तम्। प्रति = √या (प्रापणे) + तुम्। ‘तुंकाममनसोरपि’ इस नियम से ‘तुम्’ प्रत्यय के मकार का लोप होता है। निषिध्य = निवारण कर। निवार्य। नि + √षिध् (गत्याम्) + ल्यप्। प्रदेयम् = देने योग्य। प्र + √दा (दाने) + यत्। कियत् = कितना ? किं परिमाणम् ? अन्वयुक्त = पूछा। अनु + (युज् + लङ् प्रथम पुरुष एकवचन। अयुक्त, अयुजाताम्, अयुञ्जत।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

11. ततो यथावद्विहिताध्वराय
तस्मै स्मयावेशविवर्जिताय।
वर्णाश्रमाणां गुरवे स वर्णी
विचक्षणः प्रस्तुतमाचचक्षे॥ 11 ॥

अन्वयः-ततः यथावत् विहिताध्वराय स्मयावेशविर्जिताय वर्णाश्रमाणां गुरवे तस्मै स: विचक्षणः वर्णी प्रस्तुतम् आचचक्षे।

सरलार्थ:-राजा रघु के पूछने पर विधिपूर्वक यज्ञ अनुष्ठान कर लेने वाले अभिमान से शून्य ब्राह्मण आदि वर्गों तथा ब्रह्मचर्य आदि आश्रमों के व्यवस्थापक उस राजा रघु को वरतन्तु के शिष्य कौत्स ने अपना उद्देश्य कहा।

भावार्थ:-राजा रघु धर्मवृत्ति हैं, उनमें नाममात्र को भी अभिमान नहीं है। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों; ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास इन चारों आश्रमों पर नियन्त्रण करने वाले हैं। ऐसे प्रजापालक राजा के पूछने पर कौत्स ने अपना मनोरथ राजा के सामने प्रकट किया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
यथावत् = विधिवत् शास्त्रों के नियमानुरूप। स्मयावेशविवर्जिताय = जो गर्व के आवेश से वर्जित हो, अभिमानशून्य, गर्वाभिनिवेशशून्याय। स्मयः = गर्वः। वर्णी = ब्रह्मचारी। वर्ण + इन्। (पुंल्लिंग, प्रथमा-एकवचन) आचचक्षे = कहने लगा था। आ + √चिक्षिङ् (व्यक्तायां वाचि) लिट् प्रथमपुरुष एकवचन। गुरवे = नियामक व्यवस्थापक को। प्रजानां नियामकाय।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

12. समाप्तविद्येन मया महर्षिर्
विज्ञापितोऽभूद्गुरुदक्षिणायै।
स मे चिरायास्खलितोपचारां
तां भक्तिमेवागणयत्पुरस्तात्॥ 12 ॥

अन्वयः-समाप्तविद्येन मया महर्षिः गुरुदक्षिणायै विज्ञापितः अभूत्। स चिराय अस्खलितोपचारां तां मे भक्तिम् एव पुरस्तात् अगणयत्।

सरलार्थः-कौत्स ने राजा रघु को सारा वृत्तान्त समझाते हुए कहा कि जब मैंने विद्या समाप्त कर ली तो महर्षि वरतन्तु से मैंने गुरु दक्षिणा स्वीकार कर लेने के लिए प्रार्थना की। उन आदरणीय गुरु जी ने पहले तो मेरी पूर्ण निष्ठापूर्वक की गई उस भक्ति को ही बहुत दिनों तक गुरुदक्षिणा रूप में समझा (जो विद्या अध्ययन करते समय मैंने निष्ठापूर्वक गुरु सेवा की थी)।

भावार्थ:-महर्षि वरतन्तु सच्चे गुरु थे, उन्हें धन की कोई इच्छा नहीं थी। इसीलिए वे कौत्स के सेवाभाव को ही बहुत दिनों तक गुरु दक्षिणा के रूप में मानते रहे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
गुरुदक्षिणायै = गुरुदक्षिणा स्वीकार करने हेतु। चिराय = चिरकाल से (बहुत वर्षों से/बहुत दिनों से)। यह एक अव्यय है जिसके अन्त में नाना विभक्तियों के रूप दिखाई पड़ते हैं। जैसे चिरम्, चिरात्, चिरस्य। ये सभी समानार्थक हैं। अगणयत् = गिन लिया। √गिण (संख्याने) + णिच् + लङ्। चुरादिगण। पुरस्तात् = सब से पहले। अव्यय।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

13. निर्बन्धसञ्जातरुषार्थकार्य
मचिन्तयित्वा गुरुणाहमुक्तः
वित्तस्य विद्यापरिसंख्यया मे
कोटीश्चतस्रो दश चाहरेति ॥ 13 ॥

अन्वयः-निर्बन्धसञ्जातरुषा अर्थकार्यम् अचिन्तयित्वा अहं वित्तस्य चतस्रः दश च कोटीः आहर इति विद्यापरिसंख्यया उक्तः।

सरलार्थः-कौत्स महाराज रघु से शेष वृत्तान्त निवेदन करते हुए कहता है-“मेरे बार-बार प्रार्थना (जिद्द) करने से क्रोधित हुए गुरु जी ने मेरी निर्धनता का विचार किए बिना मुझे कहा कि चौदह विद्याओं की संख्या के अनुसार तुम चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ ले आओ।” ।

भावार्थ:-गुरुदेव वरतन्तु को न धन का लोभ था, न विद्या का अभिमान । परन्तु शिष्य कौत्स की बार-बार जिद्द ने उन्हें क्रोधित कर दिया और उन्होंने कौत्स को पढ़ाई गई चौदह विद्याओं के प्रतिफल में चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा में समर्पित करने का आदेश दे दिया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
निर्बन्धेन = बार-बार किए जाने से। प्रार्थनातिशयेन। अर्थकाय॑म् = अर्थसंकट, दारिद्रय। अचिन्तयित्वा = बिना सोचे। नञ् + √चिती (संज्ञाने) + णिच् + त्वा। विद्यापरिसङ्ख्यया = विद्या की गणना (संख्या) के अनुसार। आहर = लाओ। आ + √हृ + लोट्। मध्यम पुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

14. इत्थं द्विजेन द्विजराजकान्ति
रावेदितो वेदविदां वरेण।
एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिरेनं
जगाद भूयो जगदेकनाथः ॥ 14 ॥

अन्वयः-द्विजराजकान्तिः एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिः जगदेकनाथ: वेदविदां वरेण द्विजेन इत्थम् आवेदितः एनं भूयः जगाद।

सरलार्थः-वेद विद्या को जानने वालों में श्रेष्ठ उस ब्राह्मण कौत्स के द्वारा इस प्रकार निवेदन किए गए, चन्द्रमा के समान कान्ति वाले, जितेन्द्रिय, संसार के पालन करने वाले उस राजा रघु ने याचक कौत्स को फिर कहा-

भावार्थ:-राजा रघु ने कौत्स द्वारा कहे गए सम्पूर्ण घटनाक्रम को सुनकर अगले पद्य में कहे जाने वाले वचन कौत्स से कहे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
द्विजराजकान्तिः = चन्द्रमा के समान कान्ति वाले। द्विजराजः (चन्द्रमाः) इव कान्ति यस्य सः (बहुव्रीहि समास) वेदविदाम् वरेण = वेदविद्या को जानने वालों में श्रेष्ठ। वेदं वेत्ति जानाति इति वेदवित् तेषाम्। एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिः = जितेन्द्रिय। पापों से निवृत्त इन्द्रियवृत्ति वाले। एनः = पाप, अपराध। जगाद = कहा √गिद् (व्यक्तायां वाचि) + लिट। प्रथमपुरुष एकवचन।

15. गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृश्वा
रघोः सकाशादनवाप्य कामम्।
गतो वदान्यान्तरमित्ययं मे
मा भूत्परीवादनवावतारः ॥ 15 ॥

अन्वयः-श्रुतपारदृश्वा गुर्वर्थम् अर्थी रघोः सकाशात् कामम् अनवाप्य वदान्यान्तरं गतः इति अयं परीवादनवावतारः मे मा भूत्।

सरलार्थ:–राजा रघु ने कौत्स से कहा कि आप शास्त्रों को जानने वाले हैं तथा गुरुदक्षिणा देने के लिए धन याचना करने वाले है आप रघु के पास से अपना मनोरथ पूरा किए बिना किसी दूसरे दानी के पास चले गए-इस प्रकार की निन्दा का नया प्रार्दुभाव न हो जाए।

भावार्थ:-सम्मानित व्यक्तियों के लिए समाज में फैला हुआ अपयश मृत्यु से भी बढ़कर होता है, इसीलिए राजा रघु बिल्कुल नहीं चाहते कि समाज में यह निन्दा फैल जाए कि कोई वेद का विद्वान्, शास्त्रों का ज्ञाता ब्राह्मण अपने गुरु को गुरुदक्षिणा देना चाहता था और इसी उद्देश्य से धन याचना करने के लिए वह राजा रघु के पास आया और खाली हाथ लौट गया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
श्रुतपारदृश्वा = शास्त्रज्ञ, शास्त्रमर्मज्ञ। श्रुतस्य पारं दृष्टवान् । श्रुत + पार + √दृश् + क्वनिप्। सकाशात् = पास से। अव्यय। वदान्यान्तरम् = दूसरे दाता। वदान्यः = दानी। अन्यः वदान्यः वदान्यान्तरम्। माभूत् = न होवे। माङ् + अभूत् । √भू + लुङ् प्रथमपुरुष, एकवचन। परीवादः = निन्दा। ‘परिवाद’ शब्द भी निन्दार्थक है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

16. स त्वं प्रशस्ते महिते मदीये
वसंश्चतुर्थोऽग्निरिवाग्न्यगारे
द्वित्राण्यहान्यहसि सोढुमर्हन्
यावद्यते साधयितुं त्वदर्थम्॥ 16 ॥

अन्वयः-स त्वं मदीये महिते प्रशस्ते अग्न्यगारे चतुर्थः अग्निः इव वसन् द्वित्राणि अहानि सोढुम् अर्हसि। (हे) अर्हन् ! त्वदर्थं साधयितुं यावत् यते।

सरलार्थ:- रघु ने कौत्स से निवेदन किया कि आप मेरी विशाल तथा प्रशंसनीय यज्ञशाला में चतुर्थ अग्नि के समान दो-तीन दिन बिता सकते हैं। हे पूजनीय ब्रह्मचारी! मैं आपके प्रयोजन को सिद्ध के लिए यत्न करूंगा।

भावार्थ:-दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्नि नाम से यज्ञ की अग्नि तीन प्रकार की होती है, ये तीनों अग्नियाँ याजकों के लिए अति श्रद्धेय होती हैं। रघु कौत्स को चतुर्थ अग्नि की भाँति पूजनीय समझते हैं और उससे निवेदन करते हैं की आप मेरी ही यज्ञशाला में दो-तीन दिन तक प्रतीक्षा करें, जिससे 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का प्रबन्ध किया जा सके।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
वसन् = रहते हुए। वस् (निवासे) + शतृ। प्रथमा विभक्ति, एकवचन। चतुर्थः अग्निः इव = चौथी अग्नि जैसा। दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्नि नाम से अग्नि के तीन प्रकार हैं। अग्न्यगारे = अग्निशाला में। यज्ञशाला में। अग्नि + अगारे। त्वदर्थं साधयितुं यावद्यते = तुम्हारा प्रयोजन पूरा करने के लिए यत्न करूँगा। तव + अर्थम्, = त्वदर्थम् यावत् = यते। ‘यतिष्ये’ इस अर्थ में ‘यते’ का प्रयोग। यती (प्रयत्ने) + लट्, आत्मनेपदी। उत्तमपुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

17. तथेति तस्यावितथं प्रतीत:
प्रत्यग्रहीत्सङ्गरमग्रजन्मा।
गामात्तसारां रघुरप्यवेक्ष्य
निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।। 17 ॥

अन्वयः-अग्रजन्मा प्रतीतः तस्य अवितथं सगारं तथा इति प्रत्यग्रहीत्। रघुः अपि गाम् आत्तसाराम् अवेक्ष्य कुबेरात् अर्थं निष्क्रष्टुं चकमे।।

सरलार्थः-ब्राह्मण कौत्स ने प्रसन्न होकर उस राजा रघु के सत्यवचन । प्रतिज्ञा को ‘ठीक है’ यह कहकर स्वीकार किया। रघु ने भी पृथिवी को प्राप्तधन वाली देखकर कुबेर से धन छीन लेने की इच्छा की।

भावार्थः-याचक कौत्स और दाता रघु दोनों को परस्पर विश्वास है। कौत्स ने रघु के वचनों को सत्य प्रतिज्ञा के रूप में ग्रहण किया। रघु ने कौत्स की याचना के पूर्ण करने हेतु धन के स्वामी कुबेर पर आक्रमण कर उसका धन हरण कर लेने की इच्छा की।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अवितथम् = सत्य। वितथम् = मिथ्या, न वितथम् = अवितथम्। प्रत्यग्रहीत् = स्वीकार किया। प्रति + √ग्रह + लुङ् प्रथमपुरुष एकवचन। सङ्गरम् = प्रतिज्ञा को, वचन को। ‘सङ्गर’ समानार्थक शब्द है। गाम् = भूमि को। ‘गाम्’ अनेकार्थक शब्द है। निष्क्रष्टुम् = हर लेने के लिए। आहर्तुम्। निर् + √क्रिष् + तुमुन्। आत्तसाराम् = प्राप्तधन वाली। अवेक्ष्य = देखकर । अ + √ईक्ष् + ल्यप् । चकमे = इच्छा की। √कम् (कान्तौ), लिट्, आत्मनेपदी, प्रथमपुरुष एकवचन। प्रतीतः = प्रसन्न। प्रति√इ + क्त = प्रतीतः । प्रीतः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

18. प्रातः प्रयाणाभिमुखाय तस्मै
सविस्मयाः कोषगृहे नियुक्ताः।
हिरण्मयी कोषगृहस्य मध्ये
वृष्टिं शशंसुः पतितां नभस्तः ॥ 18 ॥

अन्वयः-प्रातः प्रयाणाभिमुखाय तस्मै कोषगृहे नियुक्ताः सविस्मयाः (सन्तः) कोषगृहस्य मध्ये नभस्तः पतितां । हिरण्मयीं वृष्टिं शशंसुः।।

सरलार्थ:-प्रात:काल (कुबेर की ओर) प्रस्थान करने के लिए तैयार हुए उस रघु के कोषगृह में नियुक्त अधिकारियों ने आश्चर्यचकित होते हुए खजाने में आकाश से गिरने वाली सुवर्णमयी वर्षा के बारे में कहा।

भावार्थ:-राजा रघु जैसे ही प्रातःकाल कुबेर की ओर प्रस्थान करने के लिए तैयार हुआ, तभी रघु के कोशगृह के अधिकारियों ने देखा कि उस खजाने में सुवर्ण मुद्राओं की वर्षा हो चुकी है। अधिकारियों को यह सब देखकर आश्चर्य हुआ और उन्होंने राजा रघु को यह समाचार सुनाया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
प्रयाणाभिमुखाय = प्रस्थान के लिए तैयार। सविस्मयाः = आश्चर्यचकित। आश्चर्यचकिताः । कोषगृहे = खजाने में। ‘कोशगृह’ पद भी प्रचार में है। हिरण्मयीम् = सुवर्ण वाली। सुवर्णमयीम् । सुवर्ण + मयट + ङीप्। शशंसु = कहा था। कथयामासुः √शिंस् + लिट् प्रथम पुरुष बहुवचन। नभस्तः = आकाश की ओर से। नभस् + तसिल्। अव्यय।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

19. तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं
लब्धं कुबेरादभियास्यमानात्।
दिदेश कौत्साय समस्तमेव
पादं सुमेरोरिव वज्रभिन्नम्॥ 19 ॥

अन्वयः-भूपतिः अभियास्यमानात् कुबेरात् लब्धं वज्रभिन्नं सुमेरोः पादम् इव तं भासुरं समस्तम् एव हेमराशिं कौत्साय दिदेश।

सरलार्थ:-राजा रघु ने आक्रमण किए जाने वाले कुबेर से प्राप्त, वज्र के द्वारा टुकड़े किए गए सुमेरु पर्वत के चतुर्थ भाग के समान प्रतीत हो रही, उन चमकती हुई समस्त सुवर्ण मुद्राओं को कौत्स के लिए दे दिया।

भावार्थ:-कुबेर ने रघु के आक्रमण के भय से उसके खजाने को सुवर्ण मुद्राओं से भर दिया। वे सुवर्ण मुद्राएँ परिमाण में इतनी अधिक थी कि ऐसा लगता था मानो सुमेरु पर्वत का ही वज्र से काटकर उसका चौथा हिस्सा खजाने में रख दिया। महाराज रघु ने कुबेर से प्राप्त हुई सभी सुवर्ण मुद्राएँ याचक कौत्स को प्रदान कर दी अर्थात् चौदह करोड़ ही न देकर पूरा खजाना ही कौत्स को सौंप दिया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
भासुरम् = चमकते हुए। चमकीला। भास्वरम्। अभियास्यमानात् = आक्रमण किए जाने वाले (कुबेर से)। अभि + √या (प्रापणे) + लृट् (कर्मणि) यक् + शानच् । अभिगमिष्यमाणात्। दिदेश = दे दिया। √दिश् (अतिसर्जने) लिट् प्रथम पुरुष एकवचन। सुमेरोः = सुमेरु पर्वत का। पुराणों के अनुसार यह स्वर्णमय पर्वत है। वज्रभिन्नम् = वज्रायुध से कटा हुआ। ‘वज्र’ इन्द्र का आयुध है। उसने वज्रायुध से पर्वतों के पंख काट दिए, ऐसी पौराणिक कथा है। पादम्तलहटी, चतुर्थभाग। गिरिपादः। प्रत्यन्तपर्वतमिव स्थितम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

20. जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ
द्वावप्यभूतामभिनन्धसत्त्वौ।
गुरुप्रदेयाधिकानिःस्पृहोऽर्थी
नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ॥ 20॥

अन्वयः-तौ द्वौ अपि साकेतनिवासिनः जनस्य अभिनन्द्यसत्त्वौ अभूताम्। गुरुप्रदेयाद् अधिकनिःस्पृहः अर्थी अर्थिकामात् अधिकप्रदः नृपः च (आसीत्)।

सरलार्थः-वे (महाराजा रघु और कौत्स) दोनों ही अयोध्यावासी लोगों के लिए प्रशंसनीय व्यवहार वाले हो गए। क्योंकि गुरु को समर्पण करने योग्य धन से अधिक.धन लेने में इच्छा न रखने वाला याचक कौत्स था और याचक की याचना से अधिक धन देने वाला राजा रघु था।

भावार्थ:-कौत्स की निर्लोभता की सीमा नहीं थी और महाराज रघु की उदारता की सीमा नहीं थी। कौत्स गुरुदक्षिणा में देने योग्य चौदह करोड़ मुद्राओं से एक थी अधिक नहीं लेना चाहता और राजा सारा खजाना ही उसे दे देना चाहते थे-दोनों के इस अद्भुत व्यवहार से अयोध्यावासी धन्य हो गए और दोनों की ही अत्यधिक प्रशंसा करने लगे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अभिनन्द्यसत्त्वौ = प्रशंसनीय व्यवहार वाले (दोनों)। अभिनन्द्यं सत्त्वं ययोः तौ। गुरुप्रदेयाधिकानिःस्पृहः = गुरु को देने से अधिक द्रव्य को लेने में इच्छा न रखने वाला (अर्थी) अधिकप्रदः = अधिक देने वाला। अधिकं प्रददाति इति। साकेतनिवासिनः = अयोध्या के निवासी लोग। साकेत + निवास + इन्। षष्ठी विभक्ति एकवचन।

हिन्दीभाषया पाठस्य सारः

प्रस्तुत पाठ ‘रघुकौत्ससंवादः’ महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंश-महाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग से सम्पादित है। इसमें महाराज रघु एवं वरतन्तु ऋषि के शिष्य कौत्स नामक ब्रह्मचारी के मध्य साकेत नगरी में हुआ संवाद वर्णित है।

कौत्स अपने गुरु ऋषि वरतन्तु से वेद, पुराण, वेदाङ्ग, दर्शन आदि 14 विद्याओं का अध्ययन समाप्त करके अपने गुरु से बार-बार गुरुदक्षिणा लेने की प्रार्थना करता है। गुरु द्वारा गुरुभक्ति को ही गुरुदक्षिणा रूप में मानने पर भी कौत्स गुरुदक्षिणा स्वीकार करने की निरन्तर प्रार्थना करता है। इससे रुष्ट होकर वरतन्तु उसे गुरुदक्षिणा के रूप में 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देने की आज्ञा देते हैं।

महाराज रघु विश्वजित् नामक यज्ञ में सर्वस्व दान कर चुके हैं। कौत्स उनके पास गुरुदक्षिणा के लिए धन माँगने आता है। कौत्स महाराज रघु की धनहीनता देखकर वापस लौटने लगता है। महाराज रघु उसे रोकते हैं और पूछते हैं कि वह अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में क्या देना चाहता है ? वह बताता है कि गुरुदेव ने चौदह विद्याओं को पढ़ाने के प्रतिफल में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा के रूप में देने का आदेश दिया है। ब्रह्मचारी कौत्स की याचना पूर्ण करने के उद्देश्य से महाराज रघु धनपति कुबेर पर आक्रमण करने की योजना बनाते हैं। भयभीत कुबेर रघु के कोषागार में सुवर्ण-वृष्टि कर देते हैं। रघु कौत्स को सारा धन प्रदान कर सन्तुष्ट होते हैं परन्तु कौत्स उनमें से केवल 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ देने के लिए गुरुदक्षिणा प्राप्त कर सन्तुष्ट भाव से लौट जाते हैं।

प्रस्तुत पाठ से यह सन्देश मिलता है कि महाराज रघु की भाँति शासक को सर्वसाधारण जन के प्रति उदार एवं कल्याणकारी होना चाहिए तथा याचक को कौत्स की भाँति अपनी आवश्यकता से अधिक धन प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 2 रघुकौत्ससंवादः

रघुकौत्ससंवादः (रघु और कौत्स का संवाद) Summary in Hindi

रघुकौत्ससंवादः पाठ परिचय

कविकुलशिरोमणि, कविताकामिनी के विलास, उपमासम्राट् दीपशिखा कालिदास आदि विरुदों से विभूषित महाकवि कालिदास भारतवर्ष के ही नहीं समस्त विश्व के अनन्य कवि हैं। ये महाराज विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि कालिदास का समय ईसापूर्व प्रथम शताब्दी है। संस्कृतसाहित्य में कालिदास की सात रचनाएँ प्रामाणिक मानी गई हैं। इनमें रघुवंशम्, कुमारसम्भवम्-दो महाकाव्य, मेघदूतम् तथा ऋतुसंहारम्-दो खण्डकाव्य तथा मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम् तथा अभिज्ञानशाकुन्तलम्-तीन नाटक हैं। काव्यकला एवं नाट्यकला की दृष्टि से कालिदास का कोई सानी नहीं है। नवरस वर्णन में भी कालिदास सर्वोपरि हैं। ‘उपमा अलंकार’ की सटीकता में वर्णन के कारण ही कालिदास के विषय में ‘उपमा कालिदासस्य’ कहा गया है तथा ‘दीपशिखा’ की उपाधि से अलंकृत किया गया है। यही नहीं इनकी रचनाओं में वैदर्भी रीति की विशिष्टता, माधुर्यगुण का सतत प्रवाह तथा सरसता ही इन्हें आज तक सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में प्रतिष्ठित किए हुए हैं।
रचनाओं का संक्षिप्त परिचय

1. रघुवंशम्-19 सर्गीय रघुवंश कालिदास की अनन्यतम कृति है। इसमें रघुवंशीय दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम और कुश तक के राजाओं का विस्तृतरूपेण चित्रण तथा अन्य राजाओं का संक्षिप्त विवरण बड़े ही परिपक्व एवं प्रभावरूपेण किया गया है। जहाँ दिलीप की नन्दिनी सेवा, रघु की दिग्विजय, अज एवं इन्दुमती का विवाह, इन्दुमति की मृत्यु पर अज विलाप, राम का वनवास, लंका विजय, सीता का परित्याग, लव-कुश का अश्वमेधिक घोड़े को रोकना तथा अन्तिम सर्ग में राजा अग्निवर्ण का विलासमय चित्रण उनकी सूक्ष्मपर्यवेक्षण शक्ति का परिचय देता है।

2. कुमारसम्भवम्-17 सर्गीय कुमारसम्भव शिव-पार्वती के विवाह, कार्तिकेय के जन्म तथा तारकासुर के वध की कथा को लेकर लिखित सुप्रसिद्ध महाकाव्य है। कुछ आलोचक केवल आठ सर्गों को ही कालिदास लिखित मानते हैं लेकिन अन्यों के अनुसार सम्पूर्ण रचना कालिदास विरचित है। इस ग्रन्थ में हिमालय का चित्रण, पार्वती की तपस्या, शिव के द्वारा पार्वती के प्रेम की परीक्षा, उमा के सौन्दर्य का वर्णन, रतिविलाप आदि का चित्रण कालिदास की परिपक्व लेखनशैली को घोषित करता है। अन्त में कार्तिकेय के द्वारा तारकासुर के वध के चित्रण में वीर रस का सुन्दर परिपाक द्रष्टव्य है।

3. ऋतुसंहारम्-महाकवि कालिदास का ऋतुसंहार संस्कृत के गीतिकाव्यों में विशिष्टता लिए हुए हैं। जिसमें ऋतुओं के परिवर्तन के साथ-साथ मानव जीवन में बदलने वाले स्वभाव, वेशभूषा, एवं प्राकृतिक परिवेश का अवतरण द्रष्टव्य है। इसमें छः सर्ग तथा 144 पद्य हैं जिनमें ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर तथा वसन्त के क्रम से छः ऋतुओं का वर्णन छः सर्गों में किया गया है।

4. मेघदूतम्- मेघदूत न केवल कालिदास का महान् गीतिकाव्य है, अपितु सम्पूर्ण संस्कृतसाहित्य का एक उज्ज्वल रत्न है। सम्पूर्ण मेघदूत दो भागों में विभक्त है-पूर्वमेघ तथा उत्तरमेघ जिनमें कुल 121 पद्य हैं। इस गीतिकाव्य में मन्दाक्रान्ता छन्द में एक यक्ष की विरहव्यथा का मार्मिक चित्रण किया गया है। पूर्वमेघ में कवि ने यक्ष द्वारा मेघ को अलकापुरी तक पहुँचने के मार्ग का उल्लेख करते हुए उस मार्ग में आने वाले प्रमुख नगरों, पर्वतों, नदियों तथा वनों का भी सुन्दर चित्रण किया है। उत्तरमेघ में अलकापुरी का वर्णन, उसमें यक्षिणी के घर की पहचान तथा घर में विरह-व्यथा से पीड़ित अपनी प्रेयसी की विरह पीड़ा का मार्मिक वर्णन द्रष्टव्य है।

5. मालविकाग्निमित्रम्-पाँच अंकों में लिखित महाकवि कालिदास की प्रारम्भिक कृति ‘मालविकाग्निमित्र’ में विदिशा के राजा अग्निमित्र तथा मालवा के राजकुमार की बहन मालविका की प्रणयकथा का वर्णन है। मालविकाग्निमित्र रघुकौत्ससंवादः कवि की आरम्भिक रचना होने पर भी नाटकीय नियमों की दृष्टि से इसके कथा निर्वाह, घटनाक्रम, पात्रयोजना आदि सभी में नाटककार के असाधारण कौशल की छाप है।

6. विक्रमोर्वशीयम्-नाटक रचनाक्रम की दृष्टि से कालिदास की द्वितीय कृति ‘विक्रमोर्वशीयम्’ एक उपरूपक है। जिसमें राजा पुरुरवा तथा उर्वशी नामक अप्सरा की प्रणयकथा वर्णित है। इस नाटक में कवि की प्रतिभा अपेक्षाकृत अधिक जागृत एवं प्रस्फुटित है।

7. अभिज्ञानशाकुन्तलम्-कालिदास का अन्तिम तथा सर्वोत्कृष्ट नाटक ‘अभिज्ञान-शाकुन्तलम्’ सात अंकों में विभक्त है; जिसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला की प्रणय कथा वर्णित है। यह नाटक संस्कृत का सर्वाधिक लोकप्रिय नाटक है। जिसमें कालिदास की कथानकीय मौलिकता, चरित्रचित्रण की सजीवता, रसों की परिपक्वता, संवादों की सुष्ठु योजना, प्रकृतिचित्रण की मर्मज्ञता तथा भाषा-शैली की विशिष्टता आदि स्वयं में अनुपम हैं। इन्हीं गुणों के कारण कहा गया है”

काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला”

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

HBSE 12th Class Sanskrit विद्ययाऽमृतमश्नुते Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तरं लिखत
(क) ईशावास्योपनिषद् कस्याः संहितायाः भागः?
(ख) जगत्सर्वं कीदृशम् अस्ति?
(ग) पदार्थभोगः कथं करणीयः?
(घ) शतं समाः कथं जिजीविषेत्?
(ङ) आत्महनो जनाः कीदृशं लोकं गच्छन्ति?
(च) मनसोऽपि वेगवान् कः?
(छ) तिष्ठन्नपि कः धावतः अन्यान् अत्येति?
(ज) अन्धन्तमः के प्रविशन्ति?
(ङ) धीरेभ्यः ऋषयः किं श्रुतवन्तः?
(च) अविद्यया किं तरति?
(ट) विद्यया किं प्राप्नोति?
उत्तरम्:
(क) ईशावास्योपनिषद् ‘यजुर्वेद-संहितायाः’ भागः ।
(ख) जगत्सर्वम् ईशावास्यम् अस्ति।
(ग) पदार्थभोगः त्यागभावेन करणीयः।
(घ) शतं समाः कर्माणि कुर्वन् एव जिजीविषेत्।
(ङ) आत्महनो जनाः ‘असुर्या’ नामकं लोकं गच्छन्ति।
(च) मनसोऽपि वेगवान् आत्मा अस्ति।
(छ) तिष्ठन्नपि परमात्मा धावतः अन्यान् अत्येति।
(ज) ये अविद्याम् उपासते ते अन्धन्तमः प्रविशन्ति।
(ङ) धीरेभ्यः ऋषयः इति श्रुतवन्तः यत् विद्यया अन्यत् फलं भवति अविद्यया च अन्यत् फलं भवति।
(च) अविद्यया मृत्युं तरति।
(ट) विद्यया अमृतं प्राप्नोति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

2. ‘ईशावास्यम्…….कस्यस्विद्धनम्’ इत्यस्य भावं सरलसंस्कृतभाषया विशदयत
उत्तरम्:
(संस्कृतभाषया भावार्थः)
अस्मिन् सृष्टिचक्रे यत् किमपि जड-चेतनादिकं जगत् अस्ति, तत् सर्वम् ईश्वरेण व्याप्तम् अस्ति। ईश्वरः संसारे व्यापकः अस्ति, सः एव च संसारस्य सर्वेषां पदार्थानाम् ईशः = स्वामी। अतः त्यागभावेन एव सांसारिक-पदार्थानाम् उपभोगः करणीयः। कदापि कस्य अपि धने लोभ: न करणीयः।

3. ‘अन्धन्तमः प्रविशन्ति…….विद्यायां रताः’ इति मन्त्रस्य भावं हिन्दीभाषया आंग्लभाषया वा विशदयत
उत्तरम्:
पञ्चममन्त्रस्य भावार्थं पश्यत।

4. ‘विद्यां चाविद्यां च…….ऽमृतमश्नुते’ इति मन्त्रस्य तात्पर्यं स्पष्टयत
उत्तरम्:
सप्तममन्त्रस्य भावार्थं पश्यत।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

5. रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) इदं सर्वं जगत् ………………..।
(ख) मा गृधः …………………..!
(ग) शतं समाः ………………….. जिजीविषेत्।
(घ) असुर्या नाम लोका ………………….. आवृताः ।
(ङ) आवद्योपासकाः ………………….. प्रविशन्ति।
उत्तरम्:
(क) इदं सर्वं जगत् ईशावास्यम्।
(ख) मा गृधः कस्यस्वित् धनम्।
(ग) शतं समाः कर्माणि कुर्वन् एव जिजीविषेत्।
(घ) असुर्या नाम लोका अन्धेनतमसा आवृताः ।
(ङ) अविद्योपासकाः अन्धन्तमः प्रविशन्ति।

6. अधोलिखितानां सप्रसंग हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
(क) तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः।
(ख) न कर्म लिप्यते नरे।
(ग) तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति।
(घ) अविद्यया मृत्युं ती| विद्ययाऽमृतमश्नुते।
(ङ) एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति।
(च) तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः।
(छ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनदेवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
उत्तरम्:
(क) तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः। (त्यागपूर्वक भोग कर)
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशावास्य-उपनिषद्’ से संगृहीत ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ पाठ के ‘ईशावास्यम्……….’ मन्त्र से लिया गया है। इसमें त्यागपूर्वक भोग करने का उपदेश दिया गया है।

व्याख्या-परमेश्वर सब जड़-चेतन पदार्थों में व्यापक है। वही संसार के सभी पदार्थों का स्वामी है। मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन पदार्थों को त्यागपूर्वक ग्रहण करे। इनके उपयोग में लोभकदापि न करे, क्योंकि लोभवश पदार्थों का उपभोग करने से प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ जाता है और मनुष्य का अपना शरीर भी रोगी हो जाता है। प्रकृति के संरक्षण में ही अपनी सुरक्षा छिपी है। इस मन्त्रांश में सन्तुलित एवं स्वस्थ जीवन का रहस्य छिपा है

पदार्थ + त्यागभाव = भोजन, पदार्थ + लोभवृत्ति = भोग। भोजन से शरीर को ऊर्जा मिलती है और भोग करने में रोग का भय रहता है-‘भोगे रोगभयम्’।

(ख) न कर्म लिप्यते नरे।
(मनुष्य में कर्मों का लेप नहीं होता है)
प्रसंगः-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशावास्योपनिषद्’ से संगृहित ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ पाठ के दूसरे मन्त्र से लिया गया है। इसमें बताया गया है कि निष्काम कर्म बन्धन का कारण नहीं होते।

व्याख्या-मन्त्रांश का अर्थ है-‘मनुष्य में कर्मों का लेप नहीं होता है।’ वे कौन से कर्म हैं, उन कर्मों की क्या विधि है, जिनसे कर्म मनुष्य के बन्धन का कारण नहीं बनते। पूरे मन्त्र में इस भाव को अच्छी प्रकार स्पष्ट किया गया है। मन्त्र में कहा गया है कि मनुष्य अपनी पूर्ण इच्छाशक्ति से जीवन भर कर्म करे, निठल्ला-कर्महीन-अकर्मण्य बिल्कुल न रहे, पुरुषार्थी बने। जिन पदार्थों को पाने के लिए हम कर्म करते हैं, उनका वास्तविक स्वामी सर्वव्यापक ईश्वर है। वही प्रतिक्षण हमारे अच्छे बुरे कर्मों को देखता है। अतः यदि मनुष्य पदार्थों के ग्रहण में त्याग भाव रखते हुए, ईश्वर को सर्वव्यापक समझते हुए कर्तव्य भाव से (अनासक्त भाव से) कर्म करता है तो ऐसे निष्काम कर्म मनुष्य को सांसारिक बन्धन में नहीं डालते अपितु उसे जीवन्मुक्त बना देते हैं।

(ग) तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति। (उसी में वायु जलों को धारण करता है)
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशावास्योपनिषद्’ से संगृहीत ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ पाठ में संकलित मन्त्र से लिया गया है। इसमें वायु को जलों का धारण करने वाला कहा गया है।

व्याख्या-मन्त्र में परमात्मा का स्वरूप वर्णन करते हुए उसे अचल, एक तथा मन से भी गतिशील बताते कहा गया है कि इस संसार में ईश्वर-व्यवस्था निरन्तर कार्य कर रही है। उसी के नियम से वायु बहती है, सूर्य-चन्द्र चमकते हैं, पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, फल-फूल-वनस्पतियाँ पैदा होती हैं। यहाँ तक कि वायु = गैसों से जल का निर्माण भी ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन ही होता है। मित्र-वरुण नामक दो वायुतत्त्व (गैसें) हैं, इन्हें विज्ञान की भाषा में हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन कह सकते हैं, इनके मेल से (H2 ,O) से जल का निर्माण होता है। ‘अप:’ का अर्थ जल के अतिरिक्त कर्म भी होता है। सभी प्राणी ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन होकर अपने-अपने कर्म फलों को प्राप्त करते हैं। यह भी मन्त्रांश का भाव है।

(घ) अविद्यया मृत्युं तीा विद्ययाऽमृतमश्नुते।
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशावास्य-उपनिषद्’ से संकलित ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ में संगृहीत मन्त्र से उद्धृत है। इस मन्त्रांश में व्यावहारिक ज्ञान द्वारा मृत्यु को जीतकर अध्यात्म ज्ञान द्वारा अमरत्व प्राप्ति का रहस्य उद्घाटित किया गया है।

व्याख्या-प्रस्तुत मन्त्रांश की व्याख्या के लिए सप्तम मन्त्र के भावार्थ का उपयोग करें।

(ङ) एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति।
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशोपनिषद्’ से सम्पादित विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ में संकलित मन्त्र से उद्धत है। इस मन्त्रांश में उस मार्ग की ओर संकेत किया गया है, जिस मार्ग पर चलकर मनुष्य कर्मबन्धन में नहीं पड़ता।

व्याख्या-मन्त्रांश का सामान्य अर्थ है-‘इस प्रकार तुझ में (कर्म का लेप नहीं होता), इससे भिन्न कोई मार्ग नहीं। यह मन्त्रांश ईशोपनिषद् के पहले दो मन्त्रों के उपदेश की ओर पाठक का ध्यान केन्द्रित करता है। साधारण रूप से कर्म के सम्बन्ध में यह धारणा है कि कर्म चाहे अच्छा हो या बुरा-मनुष्य कर्मबन्धन में अवश्य बँधता है। परन्तु इन दो मन्त्रों में एक ऐसा मार्ग बताया गया है, जिसके अनुसार कर्म करने/जीवन यापन करने पर मनुष्य कर्मबन्धन में नहीं पड़ता। वह मार्ग है ईश्वर को सदा सर्वत्र व्यापक मानते हुए आसक्ति छोड़कर कर्तव्य भाव से कर्म करने का मार्ग। अनासक्त भाव से किया गया कर्म सदा शुभ ही होता है, अतः ऐसे कर्म मनुष्य के बन्धन का कारण नहीं होते अपितु उसे जीवन्मुक्त बना देते हैं। इस मार्ग को छोड़कर जीवन्मुक्त होने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

(च) ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः।
प्रसंग-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ में संगृहीत मन्त्र से उद्धृत है। इस मन्त्रांश में आत्मा का तिरस्कार करने वाले मनुष्यों की मरण-उपरान्त गति के बारे में बताया गया है।

व्याख्या-प्रस्तुत मन्त्रांश की व्याख्या के लिए तृतीय मन्त्र के भावार्थ का उपयोग करें।

(छ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशोपनिषद्’ से सम्पादित ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ में संगृहीत मन्त्र से उद्धृत है। इस मन्त्रांश में आत्मा के स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है।

व्याख्या-‘अनेजत्’ का अर्थ है-कम्पन से रहित, अचल, स्थिर। परमात्मा अनेजत्-अर्थात् कम्पन रहित है, वह अपने स्वरूप में सदा स्थिर बना रहता है। परमात्मा के स्वरूप की दूसरी विशेषता है कि वह एक अर्थात् अद्वितीय है। वह स्थिर होकर भी मन से अधिक वेग वाला है। उसका वेग इतना अधिक है कि देव अर्थात् प्रकाशक इन्द्रियाँ उसको पकड़ ही नहीं पाती क्योंकि परमात्मा सूक्ष्म से सूक्ष्म है और इन्द्रियाँ केवल स्थूल वस्तु का ही ज्ञान कर पाती हैं। परमात्मा सर्वव्यापक है अतः वह ‘पूर्वम् अर्षत्’-सभी जगह पहले से पहुँचा हुआ रहता है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

7. उपनिषन्मन्त्रयोः अन्वयं लिखत.
(क) अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥
(ख) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥
उत्तरम्:
उपर्युक्त दोनों मन्त्रों का अन्वय पाठ में दिया जा चुका है।

8. प्रकृति प्रत्ययं च योजयित्वा पदरचनां कुरुत
त्यज् + क्तः; कृ + शत; तत् + तसिल्
उत्तरम्:
(क) त्यज् + क्त = त्यक्तः
(ख) कृ + शतृ = कुर्वन्
(ग) तत् + तसिल् = ततः

9. प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम्
प्रेत्य, तीर्खा, धावतः, तिष्ठत्, जवीयः
उत्तरम्:
(क) प्रेत्य = प्र + इ + ल्यप्
(ख) तीर्त्वा = √तृ + क्त्वा
(ग) धावतः = √धाव् + शतृ (नपुंसकलिङ्गम्, षष्ठी-एकवचनम्)
(घ) तिष्ठत् = (स्था + शतृ (नपुंसकलिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ङ) जवीयः = जव + ईयसुन् > ईयस् (नपुंसकलिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)

10. अधोलिखितानि पदानि आश्रित्य वाक्यरचनां कुरुत
जगत्याम्, धनम्, भुञ्जीथाः, शतम्, कर्माणि, तमसा, त्वयि, अभिगच्छन्ति, प्रविशन्ति, धीराणाम्, विद्यायाम्, भूयः, समाः ।
उत्तरम्:
(वाक्यरचना)
(i) जगत्याम्-जगत्याम् अनेके ग्रहाः उपग्रहाः च सन्ति ।
(ii) धनम्-कस्य अपि धनं मा गृधः ।
(iii) भुञ्जीथा:-जगतः भोगान् त्यागभावेन भुञ्जीथाः।
(iv) शतम्-कर्माणि कुर्वन् एवं शतं वर्षाणि जिजीविषेत्।
(v) कर्माणि-सदा शुभानि कर्माणि एव कुर्यात्।
(vi) तमसा-एतत् कूपं तमसा आवृतम् अस्ति।
(vii) त्वयि-त्वयि कः स्निहयति ?
(viii) अभिगच्छन्ति-छात्राः पठनाय गुरुम् अभिगच्छन्ति।
(ix) प्रविशन्ति-अविद्यायाः उपासकाः अन्धन्तमः प्रविशन्ति।
(x) धीराणाम्-धीराणाम् उपदेशः धैर्येण श्रोतव्यः।
(xi) विद्यायाम्-प्रायः योगिनः विद्यायाम् एव रताः भवन्ति ।
(xii) भूयः (पुनः)-सः आगत्य भूयः अगच्छत्।
(xiii) समाः (वर्षाणि)-सदाचारिणः जनाः शतं समाः जीवन्ति।

11. सन्धि/सन्धिच्छेदं वा कुरुत
उत्तरम्:
(क) ईशावास्यम् – ईश + आवास्यम्
(ख) कुर्वन्नेवेह – कुर्वन् + एव + इह
(ग) जिजीविषेत् + शतं – जिजीविषेच्छतम्
(घ) तत् + धावतः – तद्धावतः
(ङ) अनेजत् + एकं – अनेजदेकम्
(च) आहुः + अविद्यया – आहुरविधया
(छ) अन्यथेतः – अन्यथा + इतः
(ज) ताँस्ते – तान् + ते।

12. अधोलिखितानां समुचितं योजनं कुरुत
धनम् – वायुः
समाः – आत्मानं ये घ्नन्ति
असुर्याः – श्रुतवन्तः स्म
आत्महनः – तमसाऽऽवृताः
मातरिश्वा – वर्षाणि शुश्रुम
अमरतां अमृतम् – वित्तम्
उत्तरम्:
धनम् – वित्तम्
समाः – वर्षाणि
असुर्याः – तमसाऽऽवृताः
आत्महनः – आत्मानं ये जन्ति
मातरिश्वा – वायुः
शुश्रुम – श्रुतवन्तः स्म
अमृतम् – अमरताम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

13. अधोलिखितानां पदानां पर्यायपदानि लिखत
नरे, ईशः, जगत, कर्म, धीराः, विद्या, अविद्या
उत्तरम्:
(पर्यायपदानि)
नरे = मनुष्ये
ईशः = ईश्वरः
जगत् = संसारः
कर्म = कार्यम्
धीराः = विद्वांसः, पण्डिताः
विद्या = अध्यात्मज्ञानम्
अविद्या = अध्यात्मेतरविद्या, व्यावहारिकज्ञानम्

14. अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि लिखत
एकम्, तिष्ठत्, तमसा, उभयम्, जवीयः, मृत्युम्
उत्तरम्:
(विलोमपदानि)
एकम् – अनेकम्
तिष्ठत् – धावत्
तमसा – प्रकाशन
उभयम् – एकम्
जवीयः – शनैश्चरम्, तिष्ठत्
मृत्युम् – अमृतम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

योग्यताविस्तारः
समग्रेऽस्मिन् विश्वे ज्ञानस्याद्यं स्रोतो वेदराशिरिति सुधियः आमनन्ति। तादृशस्य वेदस्य सार: उपनिषत्सु समाहितो वर्तते। उपनिषदां ‘ब्रह्मविद्या’ ‘ज्ञानकाण्डम्’ ‘वेदान्तः’ इत्यपि नामान्तराणि विद्यन्ते। उप-नि इत्युपसर्गसहितात् सद् (षद्लु) धातोः क्विप् प्रत्यये कृते उपनिषत्-शब्दो निष्पद्यते, येन अज्ञानस्य नाशो भवति, आत्मनो ज्ञानं साध्यते, संसारचक्रस्य दुःखं शिथिलीभवति तादृशो ज्ञानराशिः उपनिषत्पदेन अभिधीयते । गुरोः समीपे उपविश्य अध्यात्मविद्याग्रहणं भवतीत्यपि कारणात् उपनिषदिति पदं सार्थकं भवति।

प्रसिद्धासु 108 उपनिषत्स्वपि 11 उपनिषदः अत्यन्तं महत्त्वपूर्णाः महनीयाश्च । ताः ईश-केन-कठ-प्रश्न-मुण्डकमाण्डूक्य-ऐतरेय-तैत्तिरीय-छान्दोग्य-बृहदारण्यक-श्वेताश्वतराख्याः वेदान्ताचार्याणां टीकाभिः परिमण्डिताः सन्ति।

आद्यायाम् ईशावास्योपनिषदि ‘ईशाधीनं जगत्सर्वम्’ इति प्रतिपाद्य भगवदर्पणबुद्ध्या भोगो निर्दिश्यते। ईशोपनिषदि ‘जगत्यां जगत्’ इति कथनेन समस्तब्रह्माण्डस्य या गत्यात्मकता निरूपिता सा आधुनिकगवेषणाभिरपि सत्यापिता। सततं परिवर्तमाना ब्रह्माण्डगता चलनस्वभावा या सृष्टि:-पशूनां प्राणिनां, तेजः पुञ्जानां, नदीनां, तरङ्गाणां वायोः वा; या च स्थिरत्वेन अवलोक्यमाना सृष्टि:-पर्वतानां, वृक्षाणां, भवनादीनां वा सा सर्वा अपि सृष्टिः ईश्वराधीना सती चलत्स्वभावा एव। ईश्वरस्य विभूत्या सर्वा अपि सृष्टिः परिपूर्णा चलत्स्वभावा च चकास्ते। तदुक्तं भगवद्गीतायाम्

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ॥ इति ॥ भगवद्गीता-10.41

उपनिषत्प्रस्थानरहस्यं विद्याया अविद्यायाश्च समन्वयमुखेन अत्र उद्घाटितमस्ति। ये जना अविद्यापदवाच्येषु यज्ञयागादिकर्मसु, भौतिक-शास्त्रेषु, लौकिकेषु ज्ञानेषु दैनन्दिनसुखसाधन-सञ्चयनार्थं संलग्नमानसा भवन्ति ते लौकिकीम् उन्नतिं प्राप्नुवन्त्येव; किन्तु तेषां तेषां जनानाम् आध्यात्मिकं बलम्, अन्तरसत्त्वं वा निस्सारं भवति। ये तु विद्यापदवाच्ये आत्मज्ञाने एव केवलं संलग्नमनसः भवन्ति, भौतिकज्ञानस्य साधनसामग्रीणां च तिरस्कारं कुर्वन्ति ते जीवननिर्वाहे, लौकिकेऽभ्युदये च क्लेशमनुभवन्ति।

अत एव अविद्यया भौतिकज्ञानराशिभिः मानवकल्याणकारीणि जीवनयात्रासम्पादकानि वस्तूनि सम्प्राप्य विद्यया आत्मज्ञानेन-ईश्वरज्ञानेन जन्ममृत्युदुःखरहितम् अमृतत्वं प्राप्नोति । विद्याया अविद्यायाश्च ज्ञानेन एव इहलोके सुखं परत्र च अमृतत्वमिति कल्याणी वाचम् उपदिशति उपनिषत् ‘अविद्यया मृत्युं तीा विद्ययाऽमृतमश्नुते’ इति।

पाठ्यांशेन सह भावसाम्यं पर्यालोचयत
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायोऽह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ भगवद्गीता-3.8
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥ कठोपनिषत्-3.15

कठोपनिषदि प्रतिपादितं श्रेयं प्रेयश्च अधिकृत्य सङ्ग्रणीत-दिङ्मानं यथा

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ
संपरीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमात् वृणीते॥ कठोपनिषत्-2.2

विविधासु उपनिषत्सु प्रतिपादिताम् आत्मप्राप्तिविषयकजिज्ञासां विशदयत
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष
आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ।। कठोपनिषत्-2.23

वैदिकस्वराः
वैदिकमन्त्रेषु उच्चारणदृष्ट्या त्रिविधानां ‘स्वराणां’ प्रयोगो भवति। मन्त्राणाम् अर्थमधिकृत्य चिन्तनं, प्रकृतिप्रत्यययोः योगं, समासं वाश्रित्य भवति। तत्र अर्थनिर्धारणे स्वरा महत्त्वपूर्णा भवन्ति। ‘उच्चैरुदात्त:’ ‘नीचैरनुदात्तः’ ‘समाहारः स्वरितः’ इति पाणिनीयानुशासनानुरूपम् उदात्तस्वर: ताल्वादिस्थानेषु उपरिभागे उच्चारणीयः, अनुदात्तस्वरः ताल्वादीनां नीचैः स्थानेषु, उभयोः स्वरयोः समाहाररूपेण (समप्रधानत्वेन)स्वरित उच्चारणीय इति उच्चारणक्रमः। वैदिकशब्दानां निर्वचनार्थं प्रवृत्ते निरुक्ताख्ये ग्रन्थे पाणिनीयशिक्षायां च स्वरस्य महत्त्वम् इत्थमुक्तम्

मन्त्रो हीनस्स्वरतो वर्णतो वा
मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति
यथेन्द्रशत्रुस्स्वरतोऽपराधात्॥

मन्त्राः स्वरसहिताः उच्चारणीया इति परम्परा। अतः स्वरितस्वरः अक्षराणाम् उपरि चिह्नन, अनुदात्तस्वरः अक्षराणां नीचैः चिह्नन उदात्तस्वरः किमपि चिह्न विना च मन्त्राणां पठन-सौकर्यार्थं प्रदर्श्यते।

निष्कर्षः
वैदिक मन्त्रों के उच्चारण में तीन प्रकार के स्वरों का प्रयोग होता है-1. उदात्तस्वर, 2. अनुदात्तस्वर और 3. स्वरितस्वर। स्वरों के परिवर्तन से कभी-कभी अर्थ-परिवर्तन भी हो जाता है। अतः मन्त्रों के सस्वर पाठ की प्राचीन परम्परा रही है। लेखन में अक्षर के ऊपर स्वरितस्वर के लिए खड़ी रेखा (इति), अनुदात्तस्वर के लिए नीचे पड़ी रेखा (ततः) लगाई जाती है। उदात्तस्वर के लिए किसी चिह्न का प्रयोग नहीं होता है; जैसे-(यः)।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

HBSE 9th Class Sanskrit विद्ययाऽमृतमश्नुते Important Questions and Answers

1. समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) ईशावास्योपनिषद् कस्याः संहितायाः भागः ?
(A) ऋग्वेदसंहितायाः
(B) यजुर्वेदसंहितायाः
(C) सामवेदसंहितायाः
(D) अथर्ववेदसंहितायाः।
उत्तराणि:
(B) यजुर्वेदसंहितायाः

(ii) जगत्सर्वं कीदृशम् अस्ति ?
(A) वास्यम्
(B) आवास्यम्
(C) सर्वम्
(D) ईशावास्यम्।
उत्तराणि:
(D) ईशावास्यम्

(iii) पदार्थभोगः कथं करणीयः ?
(A) त्यागभावेन
(B) लोभवृत्त्या
(C) साधुवृत्त्या
(D) भोगभावेन।
उत्तराणि:
(A) त्यागभावेन

(iv) आत्महनो जनाः कीदृशं लोकं गच्छन्ति ?
(A) सूर्यलोकम्
(B) चन्द्रलोकम्
(C) असुर्यालोकम्
(D) ब्रह्मलोकम्।
उत्तराणि:
(C) असुर्यालोकम्

(v) मनसोऽपि वेगवान् कः ?
(A) वायुः
(B) आत्मा
(C) आत्मीयः
(D) वायव्यः।
उत्तराणि:
(B) आत्मा

(vi) तिष्ठन्नपि कः धावतः अन्यान् अत्येति ?
(A) परमात्मा
(B) दुरात्मा
(C) अश्वः
(D) मनः।
उत्तराणि:
(A) परमात्मा

(vii) अविद्यया किं तरति ?
(A) अमृतम्
(B) वित्तम्
(C) ऋतम्
(D) मृत्युम्।
उत्तराणि:
(D) मृत्युम्

(vii) विद्यया किं प्राप्नोति ?
(A) अमृतम्
(B) धनम्
(C) यशः
(D) मृत्युम्।
उत्तराणि:
(A) अमृतम्।

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितम् पदं चित्वा लिखत
(i) इदं सर्वं जगत् ईशावास्यम्
(A) कः
(B) कीदृशम्
(C) कति
(D) कस्मात्।
उत्तराणि:
(B) कीदृशम्

(ii) शतं समाः कर्माणि कुर्वन् एव जिजीविषेत्।
(A) कस्य
(B) केषाम्
(C) किम्
(D) कुत्र।
उत्तराणि:
(C) किम्

(iii) असुर्या नाम लोका अन्धेन तमसा आवृताः।
(A) केन
(B) कस्य
(C) कस्मै
(D) कस्याम्।
उत्तराणि:
(A) केन

(iv) अविद्योपासकाः अन्धन्तमः प्रविशन्ति।
(A) कः
(B) को
(C) काः
(D) के।
उत्तराणि:
(D) के।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

विद्ययाऽमृतमश्नुते पाठ्यांशः

1. शावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य॑ स्विद्धनम्॥1॥

अन्वयः-इदं सर्वं यत् किं च जगत्यां जगत् (तत्) ईशावास्यम्, तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः, कस्यस्वित् धनं मा गृधः ।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में परमात्मा की सर्वव्यापकता तथा त्यागपूर्वक भोग का उपदेश दिया गया है।

सरलार्थ:-यह सब जो कुछ सृष्टि में चराचर जगत् है, वह सब परमेश्वर से व्याप्त है। इसीलिए त्याग भाव से सृष्टि के पदार्थों का उपभोग कर। किसी के भी धन का लालच मत कर।

भावार्थ:-इस सृष्टि में जो भी जड़-चेतन पदार्थ दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उन सबमें एकरस होकर परमात्मा व्यापक त्यागभाव से ही सृष्टि के पदार्थों का उपभोग करना चाहिए। किसी के भी धन पर गृद्ध दृष्टि नहीं रखनी चाहिए क्योंकि अन्ततः यह धन किसी का भी नहीं। त्यागपूर्वक भोग शरीर के लिए भोजन (शरीर की शक्ति) बन जाता है और आसक्ति/लालच से किसा गया भोग विषय-भोग बन जाता है। ऐसा आसक्तिमय भोग ही रोग का कारण होता है-‘भोगे रोगभयम्’।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च

ईशावास्यम् = ईश के रहने योग्य अर्थात् ईश्वर से व्याप्त। ईशस्य ईशेन वा आवास्याम्। जगत्याम् = जगती अर्थात् ब्रह्माण्ड/सृष्टि में। सप्तमी एकवचन। जगत् = सतत परिवर्तनशील संसार। गच्छति इति जगत्। सततं परिवर्तमानः प्रपञ्चः । भुञ्जीथाः = भोग करो। विषय वस्तु का ग्रहण करो। भोगं कुरु। ।भुज् (पालने अभ्यवहारे च), आत्मनेपदी, विधिलिङ् मध्यम पुरुष, एकवचन। मा गृधः = लोलुप मत हो। लोभ मत करो। लोलुपः मा भव। गध (अभिकांक्षायाम) लङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन में ‘अगृधः’ रूप बनता है। व्याकरण के नियमानुसार निषेधार्थक ‘माङ्’ अव्यय के योग में ‘अगृधः’ के आरम्भ में विद्यमान ‘अ’ कार का लोप हो जाता है। कस्यस्विद् = किसी का। इसके समानार्थक पद हैं-कस्यचित्, कस्यचन। अव्यय।।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

2. कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
वं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥2॥

अन्वयः-इह कर्माणि कुर्वन् एव शतं समाः जिजीविषेत् । एवं त्वयि नरे कर्म न लिप्यते। इतः अन्यथा (मार्गः) न अस्ति। __ प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में कर्तव्य भाव से कर्म करने की प्रेरणा दी गई है।

सरलार्थः-इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करे। इस प्रकार तुझ मनुष्य में कर्मों का लेप/बन्धन नहीं होता। इससे अन्य दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

भावार्थ:-उपनिषद् के पहले मन्त्र में त्यागपूर्वक भोग की बात कही गई है। इस मन्त्र में कर्म करते हुए-पुरुषार्थी बनकर ही सौ वर्षों के दीर्घजीवन का संकल्प प्रकट किया गया है। दोनों मन्त्रों का समन्वित भाव यह है कि मनुष्य को संसार में अनासक्त भाव से कर्म करते हुए स्वाभिमान पूर्वक जीवन यापन करना चाहिए। लोभ/आसक्ति के कारण ही मनुष्य पाप कर्म करता है-‘लोभः पापस्य कारणम्’। कर्तव्य भाव से किए गए कर्म सदा शुभ होते हैं। अतः ऐसे निष्काम कर्म मनुष्य को कर्म-बन्धन में नहीं बाँधते अपितु उसे मुक्त जीवन प्रदान करते है। श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग का मूल स्रोत उपनिषद् के ये वचन ही हैं।

प्रस्तुत मन्त्र का यह सारगर्भित सन्देश है कि मनुष्य को निठल्ले रहकर नहीं अपितु जीवन भर पुरुषार्थी बनकर कर्तव्य भाव से शुभ कर्म करते हुए ही अपना जीवन यापन करना चाहिए। जीवन्मुक्त होने का यही एक उपाय है, इससे भिन्न कोई उपाय नहीं है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
कुर्वन्नेव = करते हुए ही। कृ + शत, पुंल्लिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन। कुर्वन् + एव। जिजीविषेत् = जीने की इच्छा करें। जीवितुम् इच्छेत्। Vजीव् (प्राणधारणे), इच्छार्थक सन् प्रत्यय से विधिलिङ्। जीव + सन् + विधिलिङ् प्रथमपुरुष, एकवचन। शतं समाः = सौ वर्ष; शतं वर्षाणि। कर्म न लिप्यते = कर्म लिप्त नहीं होता। लिप् (उपदेहे), लट्, कर्मणि प्रयोग। ‘कर्म नरे न लिप्यते-यह एक विशिष्ट वैदिक प्रयोग है। तुलना कीजिए–’लिप्यते न स पापेन।’ – (भगवद्गीता-5.10)।

पन्थाः = मार्ग, उपाय। पथिन्, पुंल्लिग, प्रथमा-एकवचन। अन्यथा इतः = इससे भिन्न।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

3. असुर्या ना ते लोकाऽन्धेसाऽऽवृताः।
ताँस्ते प्रेत्यापिं गच्छन्ति ये के चात्मनो जनाः ॥3॥

अन्वयः-असुर्याः नाम ते लोकाः, (ये) अन्धेन तमसा आवृताः (सन्ति), ये के च आत्महनः जनाः (भवन्ति), ते प्रेत्य तान् अभिगच्छन्ति।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में आत्मस्वरूप का तिरस्कार करने वाले को आत्महन्ता कहा गया है।

सरलार्थः-असुरों अर्थात् केवल प्राणपोषण में लगे हुए लोगों के वे प्रसिद्ध लोक (योनियाँ) हैं, जो गहरे अज्ञानअन्धकार से ढके हुए हैं। जो कोई लोग आत्मा के हत्यारे (आत्मा के विरुद्ध अधर्म का आचरण करने वाले) होते हैं, वे मरकर उन अज्ञान के अन्धकार से युक्त योनियों को प्राप्त करते हैं।

भावार्थ:-आत्मा अमर है, यह कभी नहीं मरता। आत्मा के विरुद्ध अधर्म का आचरण करना तथा आत्मा की सत्ता को स्वीकार न करना ही आत्महत्या है। आत्मा के दो रूप हैं-परमात्मा और जीवात्मा। परमात्मा सम्पूर्ण जड-चेतन में व्यापक होकर उसे अपने शासन में रखता है। जीवात्मा शरीर में व्यापक होकर उसे अपने नियन्त्रण में रखता है। जो लोग आत्मा के इस स्वरूप का तिरस्कार करते हैं तथा अपने प्राणपोषण के लिए आसक्तिपूर्वक सृष्टि के पदार्थों का भोग करते हैं, वे असुर हैं। ऐसे राक्षसवृत्ति लोगों को मरने के पश्चात् उन ‘असुर्या’ नामक अन्धकारमयी योनियों में जन्म मिलता है, जहाँ ज्ञान का प्रकाश नहीं होता।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
असुर्याः = प्रकाशहीन। अथवा असुर सम्बन्धी। अविद्यादि दोषों से युक्त, प्राणपोषण में निरत। असुषु प्राणेषु रमते यः सः असुरः। असुर + यत् = असुर्य। प्रथमा विभक्ति बहुवचन। अन्धेन तमसा = अज्ञान रूपी घोर अन्धकार से। ‘तमः’ शब्द अज्ञान का बोधक। आवृताः = आच्छादित। आ +/ वृ (वरणे) + क्त। प्रेत्य = मरणं प्राप्य, मरण प्राप्तकर। इण (गतौ) धातु। प्र + इ + ल्यप्। आत्महनः = आत्मानं ये घ्नन्ति । आत्मा की व्यापकता को जो स्वीकार नहीं करते। ‘आत्मानं = ईशं सर्वतः पूर्ण चिदानन्दं घ्नन्ति = तिरस्कुर्वन्ति (शाकरभाष्ये)’।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

4. अनेदेकं मनसो जवीयो नैनदेवा आप्नुन् पूर्वमर्शत्।
तद्धावतोऽन्यानत्यति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मारिश्वा दधाति॥4॥

अन्वयः-अनेजत्, एकम् मनसः जवीयः। देवाः एनत् न आप्नुवत्। पूर्वम् अर्षत्। तत् तिष्ठत् धावतः अन्यान् अत्येति। तस्मिन् मातरिश्वा अपः दधाति।।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में सर्वव्यापक परमात्मा के स्वरूप का निरूपण किया गया है।

सरलार्थ:-(वह परमात्मा) निश्चल, एक, मन से भी अधिक वेग वाला है। देव (इन्द्रियाँ) उस तक नहीं पहुँच पाते हैं। (यह सर्वव्यापक होने से सब जगह) पहले से ही पहुँचा हुआ है। इसीलिए वह परमात्मा अपने स्वरूप में स्थिर रहते हुए दौड़ने वाले दूसरे ग्रह-उपग्रह आदि का अतिक्रमण कर जाता है। उसी परमात्मा के नियम से वायु जलों को धारण करता है अथवा यह जीवात्मा कर्मों को धारण करता है।

भावार्थ:-वह परमात्मा अचल, एक, मन से भी अधिक वेगवान् तथा इन्द्रियों की पहुँच से परे है। परमात्मा की व्यवस्था से ही मित्र और वरुण नामक वायु मिलकर जल का रूप (H2,O) धारण करते हैं अथवा परमात्मा की व्यवस्था में ही सभी जीवात्माएँ अपने-अपने कर्मों को धारण करती हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अनेजत् = कम्पन रहित। विकार रहित, स्थिर, अचल। √ एज़ (कम्पने)। न + √ एज् + शतृ। नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन। जवीयः = अधिक वेगवाला। अतिशयेन जववत्। जव + ईयस्। नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन। देवाः = इन्द्रियाँ । न आप्नुवन् = प्राप्त नहीं किया। /आप्लु (व्याप्तौ), लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन। अर्षत् = गच्छत्। गमनशील। √ ऋषी (गतौ)। शतृ प्रत्यय, नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन। अथवा √ऋ (गतौ), लेट् लकार। तिष्ठत् = स्थिर रहने वाला। परिवर्तन रहित। (स्था + शतृ, नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन। अपः = जल, कर्म । मातरिश्वा = वायु , प्राणवायु। मातरि – अन्तरिक्षे श्वयति – गच्छति इति मातरिश्वा। नकारान्त पुंलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

5. न्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
तो भूय इ ते तमो य उ विद्याया रताः॥

अन्वयः-ये अविद्याम् उपासते, (ते) अन्धन्तमः प्रविशन्ति। ततः भूयः इव ते तमः (प्रविशन्ति), ये उ विद्यायां रताः ।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽ-मृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में बताया गया है कि केवल अविद्या = भौतिक विद्या अथवा केवल विद्या = अध्यात्म विद्या में लगे रहना अन्धकार में पड़े रहने के समान है।

सरलार्थः-जो लोग केवल अविद्या अर्थात् भौतिक साधनों की प्राप्ति कराने वाले ज्ञान की उपासना करते हैं, वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं। परन्तु उनसे भी अधिक घोर अन्धकारमय जीवन उन लोगों का होता है, जो केवल विद्या अर्थात् अध्यात्म ज्ञान प्राप्त करने में ही लगे रहते हैं।

भावार्थ:-अविद्या और विद्या वेद के विशिष्ट शब्द हैं। ‘अविद्या’ से तात्पर्य है शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता करने वाला ज्ञान। ‘विद्या’ का अर्थ है, आत्मा के रहस्य को प्रकट करने वाला अध्यात्म ज्ञान। वेद मन्त्र का तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति केवल भौतिक साधनों को जुटाने का ज्ञान ही प्राप्त करता है और ‘आत्मा’ के स्वरूपज्ञान को भूल जाता है तो बहुत बड़ा अज्ञान है, उसका जीवन अन्धकारमय है। परन्तु जो व्यक्ति केवल अध्यात्म ज्ञान में ही मस्त रहता है, उसकी दुर्दशा तो भौतिक ज्ञान वाले से भी अधिक दयनीय होती है। क्योंकि भौतिक साधनों के अभाव में शरीर की रक्षा भी कठिन हो जाएगी। अत: वेदमन्त्र का स्पष्ट संकेत है कि भौतिक ज्ञान तथा अध्यात्म ज्ञान से युक्त सन्तुलित जीवन ही सफल और आनन्दित जीवन है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अन्धन्तमः = घोर अन्धकार। प्रविशन्ति= प्रवेश करते हैं। प्र + विश् (प्रवेशने) लट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन। उपासते = उपासना करते हैं। उप + आसते। आस् (उपवेशने) धातु लट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन। आस्ते आसाते आसते। ततो भूय इव = उससे अधिक। तीनों पद अव्यय हैं। ततः + भूयः + इव। रताः = रमण करते हैं। निरत हैं। रिम् (क्रीडायाम्) + क्त प्रथमा विभक्ति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

6. न्यदेवाहुर्विद्यया न्याहुरविद्यया।
इति शुश्रु धीराणां ये स्तद्विचचक्षिरे॥6॥

अन्वयः-विद्यया अन्यत् एव (फलम्) आहुः । अविद्यया अन्यत् एव (फलम् आहुः) इति धीराणां (वचांसि) शुश्रुम, ये नः तत् विचचक्षिरे।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में विद्या और अविद्या के अलग-अलग फल की चर्चा की गई है।

सरलार्थ:-अविद्या अर्थात् व्यावहारिक ज्ञान का अलग प्रकार का फल होता है और विद्या अर्थात् अध्यात्मज्ञान का अलग प्रकार का फल होता है। इस प्रकार से हमने उन विद्वान् ज्ञानी पुरुषों के वचनों को सुना है, जिन विद्वानों ने उस विद्या और अविद्या के रहस्य को हमारे लिए स्पष्ट उपदेश किया है।

भावार्थ:-व्यावहारिक ज्ञान से सांसारिक सुख-साधनों की प्राप्ति तथा शरीर की भूख-प्यास दूर होती है। अध्यात्मज्ञान आत्मा को अपने स्वरूप में स्थिर बनाता है। इस प्रकार दोनों प्रकार का ज्ञान अलग-अलग उद्देश्य को सिद्ध करता है। जिन विद्वान् लोगों ने अविद्या और विद्या के इस रहस्य को हमारे कल्याण के लिए समझाया है, उन्हीं से हमने ऐसा सुना

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
आहुः = कहते हैं। ब्रूञ् (व्यक्तायां वाचि), लट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन । शुश्रुम = सुन चुके हैं। √श्रु (श्रवणे), लिट् लकार उत्तम पुरुष बहुवचन। विचचक्षिरे = स्पष्ट उपदेश किए थे। वि + √चक्षिङ् (आख्याने), लिट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन। चचक्षे चचक्षाते चचक्षिरे। विद्या = ज्ञान, अध्यात्म ज्ञान। । √विद् (ज्ञाने) + क्यप् + टाप् । यहाँ ‘अध्यात्म विद्या’ के अर्थ में ‘विद्या’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इस चराचर जगत् में सर्वत्र व्याप्त आत्मस्वरूप ईश्वर के ज्ञान को तथा शरीर में व्याप्त आत्मस्वरूप जीव के ज्ञान को ‘अध्यात्मविद्या’ की संज्ञा दी गई है। यह यथार्थ ज्ञान ‘विद्या’ है। इसे ही ‘मोक्ष विद्या’ नाम से भी जाना जाता है। अविद्या = अध्यात्मेतर विद्या, व्यावहारिक विद्या। अध्यात्म ज्ञान से भिन्न सभी ज्ञान। न + विद्या ‘न’ का अर्थ है ‘इतर’ अथवा ‘भिन्न’। अर्थात् ‘आत्मविद्या से भिन्न’ जो भी ज्ञानराशि है; जैसे-सृष्टिविज्ञान, यज्ञविद्या, भौतिक विज्ञान, आयुर्विज्ञान, प्रौद्योगिकी, सूचना-तन्त्र-ज्ञान आदि अविद्या पद में समाहित

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

7. विद्यां चाविद्यां यस्तद्वेदोभयं ह।
अविद्यया मृत्युं तीर्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥7॥

अन्वयः-यः विद्यां च अविद्यां च उभयं सह वेद, (सः) अविद्यया मृत्यु तीा विद्यया अमृतम् अश्नुते।

प्रसंगः-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में अध्यात्मज्ञान तथा व्यावहारिक ज्ञान द्वारा सन्तुलित जीवन यापन करने का आदेश दिया है।

सरलार्थः-जो मनुष्य विद्या अर्थात् अध्यात्मज्ञान तथा अविद्या अर्थात् अध्यात्म ज्ञान से भिन्न सभी प्रकार का व्यावहारिक ज्ञान, दोनों को एक साथ जानता है। वह व्यावहारिक ज्ञान द्वारा मृत्यु को पारकर अध्यात्म ज्ञान द्वार। जन्ममृत्यु के दुःख से रहित अमरत्व को प्राप्त करता है।

भावार्थ:-‘विद्या’ और ‘अविद्या’-ये दोनों शब्द विशिष्ट वैदिक प्रयोग हैं। ‘विद्या’ शब्द का प्रयोग यहाँ अध्यात्म ज्ञान’ के अर्थ में हुआ है। इस जड़-चेतन जगत् में सर्वत्र व्याप्त परमात्मा तथा शरीर में व्याप्त जीवात्मा के ज्ञान को अध्यात्म ज्ञान कहा जाता है। यह मोक्षदायी यथार्थ ज्ञान ही ‘विद्या’ है। इससे भिन्न सभी प्रकार के ज्ञान को ‘अविद्या’ नाम दिया गया है। अध्यात्म ज्ञान से भिन्न सृष्टिविज्ञान, यज्ञविज्ञान, भौतिकविज्ञान, आयुर्विज्ञान, गणितविज्ञान, अर्थशास्त्र प्रौद्योगिकी, सूचनातन्त्र आदि सभी प्रकार का ज्ञान ‘अविद्या’ शब्द में समाहित हो जाता है। यह अध्यात्मेतर ज्ञान मनुष्ट को मृत्यु दुःख से छुड़वाता है और इसी अध्यात्म ज्ञान द्वारा मनुष्य फिर अमरत्व अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, जन्ममरण के चक्र से छूट जाता है। इस प्रकार यह दोनों प्रकार का ज्ञान ही मनुष्य के लिए आवश्यक है, तभी वह इहलोक तथा परलोक दोनों को सिद्ध कर सकता है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
वेद = जानता है। विद् (ज्ञाने), लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन । उभयम् = दोनों। तीर्वा =पार जाकर, तरणकर। √तृ (प्लवनतरणयोः) + क्त्वा। अव्यय। अमृतम् = अमरता को। जन्म-मृत्यु के दुःख से रहित अमरत्व को। अश्नुते = प्राप्त करता है। अश् (भोजने) भोजनार्थक धातु इस सन्दर्भ में प्राप्ति के अर्थ में है। (अश्नुते प्राप्तिकर्मा; निघण्टुः 2.18)

विद्ययाऽमृतमश्नुते (अध्यात्मज्ञान से अमरता प्राप्त होती है) Summary in Hindi

विद्ययाऽमृतमश्नुते पाठ-परिचय

“सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान का आदिस्रोत ‘वेद’ ही हैं”-ऐसा विद्वानों का मत है। वेदों का सार उपनिषदों में निहित है। उपनिषदों को ‘ब्रह्मविद्या’, ‘ज्ञानकाण्ड’ अथवा ‘वेदान्त’ नाम से भी जाना जाता है। ‘उप’ तथा ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक सद् (षद्ल) धातु से ‘क्विप्’ प्रत्यय होकर ‘उपनिषद्’ शब्द निष्पन्न होता है-उप + नि + √सद् + क्विप् > 0 = उपनिषद् जिससे अज्ञान का नाश होता है, आत्मा का ज्ञान सिद्ध होता है, संसार चक्र का दुःख छूट जाता है; वह ज्ञानराशि ‘उपनिषद्’ कही जाती है। गुरु के समीप बैठकर अध्यात्मविद्या ग्रहण की जाती है-इस कारण भी ‘उपनिषद्’ शब्द सार्थक है।

‘उपनिषद्’ नाम से 200 से भी अधिक ग्रन्थ मिलते हैं। परन्तु प्रामाणिक दृष्टि से उन में 11 उपनिषद् ही महत्त्वपूर्ण हैं और इन्हीं पर आचार्य शकर का भाष्य भी मिलता है। इनके नाम इस प्रकार हैं-1. ईशावास्य 2. केन, 3. कठ, 4. प्रश्न, 5. मुण्डक, 6. माण्डूक्य, 7. तैत्तिरीय, 8. ऐतरेय, 9. छान्दोग्य, 10. बृहदारण्यक तथा 11. श्वेताश्वतर। • इनमें भी ‘ईशावास्य-उपनिषद्’ सबसे अधिक प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण है। ‘यजुर्वेद’ का अन्तिम चालीसवाँ अध्याय ही ‘ईशोपनिषद्’ के नाम से प्रसिद्ध है, इसमें कुल 17 मन्त्र हैं।

इस उपनिषद् में ‘समस्त जगत् ईश्वाराधीन है’- यह प्रतिपादित करके भगवद्-अर्पणबुद्धि से जगत् के पदार्थों का उपभोग करने का निर्देश किया गया है। ‘जगत्यां जगत्”ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है, सब जगत् अर्थात् गतिमय है’-उपनिषद् के इस सिद्धान्त की पुष्टि आधुनिक विज्ञान एवं आधुनिक खोज द्वारा भी होती है। निरन्तर परिवर्तन तथा निरन्तर गतिमयता ब्रह्माण्ड के समस्त सूर्य + चन्द्र + पृथ्वी आदि ग्रह-उपग्रहों का स्वभाव है।

इस उपनिषद् में ‘विद्या’ ‘अविद्या’ दो विशिष्ट वैदिक पदों का प्रयोग हुआ है। जो लोग ‘अविद्या’ शब्द द्वारा कहे जाने वाले यज्ञयाग, भौतिकशास्त्र आदि सांसारिक ज्ञान में दैनिक सुख-साधनों की प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील रहते हैं; उनकी सांसारिक उन्नति तो बहुत होती है, परन्तु उनका अध्यात्म पक्ष निर्बल रह जाता है। जो लोग केवल अध्यात्म ज्ञान में ही लीन रहते हैं और भौतिक ज्ञान की साधन सामग्री की अवहेलना करते हैं, वे सांसारिक जीवन के निर्वाह तथा सांसारिक उन्नति में पिछड़ जाते हैं।

इसीलिए अविद्या अर्थात् भौतिकज्ञान द्वारा जीवन की सुख-साधन सामग्री अर्जित कर विद्या अर्थात् अध्यात्मज्ञान द्वारा जन्म-मरण के दुःख से रहित अमृतपद को प्राप्त करने का सारगर्भित उपदेश इस उपनिषद् में दिया गया है-‘अविद्यया मृत्युं तीा विद्ययाऽमृतमश्नुते’। श्रीमद्भगवद्गीता में ईशोपनिषद् के ही दार्शनिक विचारों का विस्तार से व्याख्यान किया गया है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

विद्ययाऽमृतमश्नुते पाठस्य सारः

प्रस्तुत पाठ ‘ईशावास्योपनिषद्’ से संकलित है। ‘ईशावास्यम्’ पद से आरम्भ होने के कारण इसे ‘ईशावास्योपनिषद्’ नाम दिया गया है। इसे ही ‘ईशोपनिषद्’ के नाम से भी जाना जाता है। यह उपनिषद् यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है, जिसमें 18 मन्त्र हैं।

इस पाठ के पहले दो मन्त्रों में ईश्वर की सर्वत्र विद्यमानता को दर्शाते हुए, कर्तव्य भावना से कर्म करने एवं त्यागपूर्वक संसार के पदार्थों का उपयोग एवं संरक्षण करने का उल्लेख है। तीसरे मन्त्र में उन लोगों को अज्ञानी तथा आत्महन्ता कहा गया है जो लोग परमात्मा की व्यापकता को स्वीकार नहीं करते हैं। चतुर्थ मन्त्र में चैतन्य स्वरूप, स्वयं प्रकाश एवं विभु सर्वव्यापक आत्म तत्त्व का निरूपण है। पञ्चम एवं षष्ठ मन्त्रों में अविद्या अर्थात् व्यावहारिक ज्ञान एवं विद्या अर्थात् आध्यात्मिक ज्ञान पर सूक्ष्म चिन्तन किया गया है। अन्तिम मन्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि व्यावहारिक ज्ञान से लौकिक अभ्युदय एवं अध्यात्मज्ञान से अमरता की प्राप्ति होती है।

इस पाठ में संकलित मन्त्रों में परमात्मा की सर्वव्यापकता, त्यागपूर्वक भोग, स्वाभिमान से पूर्ण कर्मनिष्ठ जीवन का उपदेश देते हुए यह सारगर्भित सन्देश दिया गया है कि लौकिक एवं अध्यात्म विद्या एक-दूसरे की पूरक हैं तथा मानव जीवन की परिपूर्णता और उसके सर्वांगीण विकास में समान रूप से महत्त्व रखती हैं।

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