Author name: Bhagya

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

Haryana State Board HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

प्रश्न 1.
कल्पना कीजिए कि हल्का ग्रह भारी तारे के परितः R त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर गति कर रहा है तथा इसका परिक्रमण काल 7 है। भारी ग्रह व तारे के बीच गुरुत्वाकर्षण बल R-5/2 के अनुक्रमानुपाती हो तो-
(a) T² ∝ R³
(b) T² ∝ R7/2
(c) T² ∝ R3/2
(d) T² ∝ R3.75
उत्तर:
(b) T² ∝ R7/2

प्रश्न 2.
m द्रव्यमान के एक पिण्ड को पृथ्वी तल से h = R/5 ऊँचाई पर ले जाया जाता है, जहाँ R पृथ्वी की त्रिज्या है। यदि पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय त्वरण (g) हो तो पिण्ड की स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि होगी-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -1
(a) mgh
(b) \(\frac{4}{5}\)mgh
(c) \(\frac{5}{6}\)mgh
(d) \(\frac{6}{7}\)migh
उत्तर:
(b) \(\frac{4}{5}\)mgh

प्रश्न 3.
सोने के दो एकसमान ठोस गोले एक-दूसरे को स्पर्श कर रहे हैं। इनके बीच गुरुत्वाकर्षण बल होगा-
(a) त्रिज्या के वर्ग के समानुपाती ।
(b) त्रिज्या के घन के समानुपाती ।
(c) त्रिज्या के चतुर्थ घात के समानुपाती ।
(d) त्रिज्या के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती ।
उत्तर:
(c) त्रिज्या के चतुर्थ घात के समानुपाती ।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 4.
चन्द्रमा पर वायुमण्डल की अनुपस्थिति का निम्न कारण है-
(a) चन्द्रमा काफी हल्का है।
(b) चन्द्रमा पृथ्वी के परितः परिक्रमण करता है।
(c) गैसों के अणुओं की वर्ग माध्य मूल वेग पलायन वेग से अधिक है।
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(c) गैसों के अणुओं की वर्ग माध्य मूल वेग पलायन वेग से अधिक है।

प्रश्न 5.
सूर्य के चारों ओर घूमते ग्रह की माध्य त्रिज्या दी जाती है-
(a) दीर्घवृत्त की अर्ध दीर्घ अक्ष (a) के बराबर ।
(b) दीर्घवृत्त की अर्ध लघु अक्ष (b) के बराबर ।
(c) अर्घ दीर्घ व अर्थ लघु अक्ष का माध्य \(\frac{a+b}{2}\)।
(d) अर्ध दीर्घ व अर्ध लघु अक्ष का गुणोत्तर माध्य \(\sqrt{ab}\)।
उत्तर:
(a) दीर्घवृत्त की अर्ध दीर्घ अक्ष (a) के बराबर ।

प्रश्न 6.
पृथ्वी तल से \(\sqrt{gR_e}\), वेग से फेंके गये प्रक्षेप्य की ऊर्जा क्या होगी? (Re पृथ्वी की त्रिज्या है)।
(a) 2Re
(b) Re / 2
(c) Re
(d) अनन्त
उत्तर:
(c) Re

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प्रश्न 7.
गुरुत्वीय त्वरण का मान अधिकतम होता है-
(a) पृथ्वी की भूमध्य रेखा पर
(b) पृथ्वी के ध्रुवों पर
(c) किसी पहाड़ की चोटी पर
(d) पृथ्वी के अन्दर गहरी खान में
उत्तर:
(b) पृथ्वी के ध्रुवों पर

प्रश्न 8.
सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक G की विमा है-
(a) [ML2T-2]
(b) [M-1LT-2]
(c) [M-1L3T-2]
(d) [M-1L3T-1]
उत्तर:
(c) [M-1L3T-2]

प्रश्न 9.
यदि पृथ्वी की घूर्णन गति बढ़ जाये तो अक्षांश पर स्थित किसी वस्तु का भार-
(a) बढ़ जायेगा
(b) घट जायेगा
(c) अपरिवर्तित रहेगा
(d) कुछ निश्चित नहीं है
उत्तर:
(b) घट जायेगा

प्रश्न 10.
पृथ्वी की सतह के निकट चक्कर लगा है। उपग्रह का कक्षीय वेग लगभग होगा-
(a) 8km/s
(c) 4 km/s
(b) 11.2 km/s
(d) 6km/s
उत्तर:
(a) 8km/s

प्रश्न 11.
चन्द्रमा पर पलायन वेग है (लगभग).
(a) 11.2 km/s
(b) 5 km/s
(c) 10 km/s
(d) 2.4 km/s
उत्तर:
(d) 2.4 km/s

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प्रश्न 12.
पृथ्वी व चन्द्रमा के द्रव्यमान तथा त्रिज्या क्रमशः M1,R1 व M2,R2 हैं। उनके केन्द्रों के बीच की दूरी d है। उनके बीच मध्य- बिन्दु से m द्रव्यमान के कण को किस न्यूनतम वेग से प्रक्षेपित किया जाना चाहिए जिससे वह अनन्त पर पहुँच जाए?
(a) \(2 \sqrt{\frac{G}{d}\left(M_1+M_2\right)}\)
(b) \(2 \sqrt{\frac{2G}{d}\left(M_1+M_2\right)}\)
(c) \(2 \sqrt{\frac{2G}{d}\left(M_1+M_2\right)}\)
(d) \(2 \sqrt{\frac{GM(M_1+M_2)}{d(M_1+M_2)}}\)
उत्तर:
(a) \(2 \sqrt{\frac{G}{d}\left(M_1+M_2\right)}\)

प्रश्न 13.
न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम सार्वत्रिक होता है क्योंकि-
(a) वह सदैव आकर्षण होता है।
(b) वह सौरमण्डल के सभी सदस्यों एवं कणों पर लागू होता है।
(c) यह सभी द्रव्यमान पर दूरियों के लिए लागू होता है तथा माध्यम से प्रभावित नहीं होता है।
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(c) यह सभी द्रव्यमान पर दूरियों के लिए लागू होता है तथा माध्यम से प्रभावित नहीं होता है।

प्रश्न 14.
पृथ्वी तल के निकट परिक्रमा करने वाले कृत्रिम उपग्रह का परिक्रमण काल होता है-
(a) 24 घण्टा
(b) 84 मिनट
(c) 48 मिनट
(d) 12 घण्टा
उत्तर:
(b) 84 मिनट

प्रश्न 15.
किसी खोखले गोले के केन्द्र पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता होती है-
(a) \(\frac{GM}{r^2}\)
(b) g
(c) 0
(d) \(\frac{2GM}{r^2}\)
उत्तर:
(c) 0

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)

प्रश्न 1.
धूमकेतु की पूँछ सूर्य से दूर होने का क्या कारण है?
उत्तर:
सूर्य द्वारा उत्सर्जित विकिरणों के दाव के कारण इस पर उपस्थित गैसें सूर्य से दूर की ओर पूँछ बना लेती हैं।

प्रश्न 2.
किसी उपग्रह का वेग उसके द्रव्यमान पर किस प्रकार निर्भर करता है?
उत्तर:
उपग्रह का वेग उसके द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।

प्रश्न 3.
समुद्र में उत्पन्न ज्वार भाटे का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर:
चन्द्रमा का पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण प्रभाव ज्वार भाटे का प्रमुख कारण है।

प्रश्न 4.
तुल्यकाली उपग्रह क्या होता है?
उत्तर:
ऐसा उपग्रह जो पृथ्वी के किसी निश्चित भू-भाग के ऊपर सदैव देखा जा सकता है तुल्यकाली उपग्रह कहलाता है। इसका आवर्तकाल 24 घंटे होता है।

प्रश्न 5.
चन्द्रमा पर 10°C पर पानी से भरी बोतल का ढक्कन खोलने पर क्या होगा?
उत्तर:
पानी उबलने लगेगा क्योंकि चन्द्रमा पर वायुमण्डल न होने के कारण क्वथनांक काफी घट जाता है और पानी उबलने लगता है।

प्रश्न 6.
पृथ्वी के अन्दर केन्द्र की ओर जाने पर g का मान दूरी के साथ कैसे बदलता है?
उत्तर:
पृथ्वी अन्दर की ओर जाने पर गुरुत्वीय त्वरण का परिवर्तन चित्र की भाँति रेखीय रूप से होता है।

प्रश्न 7.
समुद्र में ज्वार भाटा क्यों उत्पन्न होता है?
उत्तर:
चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण ज्वार भाटा उत्पन्न होता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 8.
पृथ्वी ध्रुवों पर चपटी क्यों है?
उत्तर:
अपनी अक्ष पर घूर्णन के कारण पृथ्वी ध्रुवों पर चपटी होती

प्रश्न 9.
यदि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर वृत्तीय कक्षा में घूमती है, तो गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा किया गया कार्य क्या होगा?
उत्तर:
शून्य; क्योंकि पृथ्वी पर सूर्य का आकर्षण बल (अभिकेन्द्रीय बल) सदैव पृथ्वी की गति के लम्बवत् होता है।

प्रश्न 10.
1 kg wt (किग्रा भार ) में कितने न्यूटन होते हैं?
उत्तर:
1kg wt = 1kg द्रव्यमान का भार = mg
= 1 × 9.8 न्यूटन
1kg wt = 9.8 न्यूटन

प्रश्न 11.
एक उपग्रह को ग्रह के परितः घूमने के लिए अभिकेन्द्रीय बल कहाँ से प्राप्त होता है?
उत्तर:
ग्रह एवं उपग्रह के मध्य लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल ही आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल प्रदान करता है।

प्रश्न 12.
किसी उपग्रह की बन्धन ऊर्जा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ऊर्जा की वह मात्रा जो उपग्रह को देने पर उपग्रह पलायन कर जाये, उपग्रह की बन्धन ऊर्जा कहलाती है। इसका मान,
\(E_b=\frac{1}{2} \frac{G M m}{r}\)

प्रश्न 13.
सरल लोलक पर आधारित घड़ी उपग्रह पर काम में नहीं ली जाती है, क्यों?
उत्तर:
उपग्रह में वस्तुएँ भारहीनता की स्थिति में होती हैं अतः g = 0 होता है इसलिए सरल लोलक पर आधारित घड़ी \(\left(T=2 \pi \sqrt{\frac{l}{g}}\right)\) कार्य नहीं करती है।

प्रश्न 14.
पृथ्वी तल से ऊपर जाने पर g का मान किस प्रकार बदलता है? ग्राफ बनाइये।
उत्तर:
पृथ्वी तल से ऊपर जाने पर g का मान घटता है व निम्न चित्र के अनुसार बदलता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -2

प्रश्न 15.
कृत्रिम उपग्रह में चलने कूदने तथा पानी पीने में कठिनाई महसूस होती है, क्यों?
उत्तर:
भारहीनता के कारण।

प्रश्न 16.
किसी वस्तु को पृथ्वी तल से अनन्त तक ले जाने में कितना कार्य करना पड़ता है?
उत्तर:
पृथ्वी तल पर वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा \(\frac{GMm}{R}\) के बराबर कार्य करना पड़ता है।

प्रश्न 17.
यदि दो वस्तुओं के मध्य दूरी % घटा दी जाये तो उनके मध्य लगने वाला बल कितने प्रतिशत बढ़ जायेगा ?
उत्तर:
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प्रश्न 18.
पृथ्वी के केन्द्र पर ४ का मान क्या होगा?
उत्तर:
शून्य ।

प्रश्न 19.
संचार उपग्रह पृथ्वी सतह से कितनी ऊँचाई पर परिक्रमा करते हैं?
उत्तर:
36000km की ऊँचाई पर

प्रश्न 20.
ध्रुवीय उपग्रह किसे कहते हैं?
उत्तर:
वे कृत्रिम उपग्रह जिनकी कक्षा का तल पृथ्वी के उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के पास से गुजरता है, ध्रुवीय उपग्रह कहलाते हैं। इनकी कक्षा पश्च गतिक होती है।

प्रश्न 21.
समस्त पृथ्वी पर एक साथ संचार लिंक करने की दृष्टि से न्यूनतम कितने भू-स्थाई उपग्रह आवश्यक हैं?
उत्तर:
तीन

प्रश्न 22.
पार्किंग कक्षा किसे कहते हैं?
उत्तर;
उपग्रह की वह कक्षा जिसका केन्द्र पृथ्वी के केन्द्र से सम्पाती होता है, पार्किंग कक्षा कहलाती है।

प्रश्न 23.
ठोस गोले के केन्द्र पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का मान क्या होता है? यह मान सतह पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा के मान का कितने प्रतिशत होता है?
उत्तर:
गोले के केन्द्र पर स्थितिज ऊर्जा \(U_0=\frac{3}{2} \frac{G M m}{R}\)
सतह पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा \(U_s=-\frac{G M m}{R}\)
∴ \(\frac{U_0}{U_s} \times 100=\frac{3}{2} \times 100=\mathbf{1 5 0} \%\)

प्रश्न 24.
चन्द्रमा पर गुरुत्वीय त्वरण, पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण का कौन-सा भाग है?
उत्तर:
चन्द्रमा पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण का \(\frac{1}{6}\) भाग होता है अर्थात्
\(g_m=\frac{g_e}{6}\)

प्रश्न 25.
गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा किसे कहते हैं? इसकी विमा लिखिए।
उत्तर:
किसी वस्तु को अनन्त से किसी बिन्दु तक लाने में जो कार्य करना पड़ता है उसे उस बिन्दु पर उस वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। इसका विमीय सूत्र = [M1L2T-2]

प्रश्न 26.
पृथ्वी तल से किसी वस्तु के लिए पलायन वेग का मान 11.2 km / s है। जब वस्तु क्षैतिज से 30° पर फेंकी जाये तो पलायन वेग का मान क्या होगा?
उत्तर:
पलायन वेग प्रक्षेपण कोण पर निर्भर नहीं करता है अतः 30° के कोण पर प्रक्षेपित करने पर भी पलायन वेग 11.2 kms-1 ही होगा।

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प्रश्न 27.
चन्द्रमा पृथ्वी की तुलना में बहुत हल्का है, फिर ये पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण द्वारा गिरता क्यों नहीं?
उत्तर:
चन्द्रमा पृथ्वी के परितः वृत्तीय कक्षा में परिक्रमा करता है। अतः पृथ्वी द्वारा आरोपित समस्त गुरुत्वाकर्षण बल अभिकेन्द्र बल के रूप में व्यय हो जाता है इसीलिए हल्का होने पर भी चन्द्रमा गिरता नहीं है।

प्रश्न 28.
10g सोने का भार ध्रुवों पर भूमध्य रेखा की तुलना में अधिक होता है, क्यों?
उत्तर:
किसी स्थान पर किसी वस्तु का भार mg
स्पष्ट है कि भार का मान 8 पर निर्भर करता है, और ध्रुवों पर गुरुत्वीय त्वरण अधिकतम तथा भूमध्य रेखा पर न्यूनतम होता है। इसीलिए 10g सोने का भार ध्रुवों पर भूमध्य रेखा की अपेक्षा अधिक होता है।

प्रश्न 29.
भारत द्वारा छोड़े गये प्रथम उपग्रह का नाम बताइये।
उत्तर:
आर्यभट्ट 19 अप्रैल 1975 ।

प्रश्न 30.
गुरुत्वीय क्षेत्र की विमा लिखिए।
उत्तर:
गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता,
\(E_g=\frac{F}{M}\)
∴ Eg का विमीय सूत्र = \(\frac{\left[M^1 L^1 T^{-2}\right]}{\left[M^1\right]}=\left[M^0 L^1 T^{-2}\right]\)

प्रश्न 31 –
केप्लर का द्वितीय नियम किस भौतिक राशि के संरक्षण पर आधारित है?
उत्तर:
कोणीय संवेग संरक्षण के सिद्धान्त पर

प्रश्न 32.
पृथ्वी की परिक्रमा करते उपग्रह में बैठा अंतरिक्ष यात्री एक गेंद उपग्रह के बाहर छोड़ देता है। क्या गेंद पृथ्वी तल पर पहुँचेगी?
उत्तर:
नहीं गेंद भी उपग्रह के साथ-साथ पृथ्वी की परिक्रमा करेगी।

प्रश्न 33.
जब कोई वस्तु पृथ्वी की ओर गिरती है तो क्या पृथ्वी भी उस वस्तु की ओर गिरती है? यदि हाँ तो पृथ्वी का गिरना हमें दिखाई क्यों नहीं देता?
उत्तर:
क्योंकि पृथ्वी का द्रव्यमान बहुत अधिक होने के कारण, पृथ्वी का वस्तु की ओर त्वरण नगण्य होता है।

प्रश्न 34.
पृथ्वी के केन्द्र से R दूरी पर गुरुत्वीय विभव कितना होता है?
उत्तर:
पृथ्वी के केन्द्र से R दूरी पर गुरुत्वीय विभव
\(V_G=- \frac{GM}{R}\)

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प्रश्न 35.
केप्लर के तीसरे नियम का गणितीय स्वरूप क्या है?
उत्तर:
T² = K r³ ;
जहाँ T = ग्रह का आवर्तकाल
r = सूर्य एवं पृथ्वी के मध्य औसत दूरी;
K = नियतांक

प्रश्न 36.
चन्द्रमा पर उतरने से पहले अंतरिक्ष यात्री अपनी पीठ पर भारी वजन क्यों बाँध लेते हैं?
उत्तर:
चन्द्रमा पर 8 का मान कम होने के कारण।

प्रश्न 37.
किसी पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा शुक्र ग्रह पर.7.5 × 106 J है। पिण्ड को ग्रह से बाहर फेंकने के लिए आवश्यक ऊर्जा का मान बताइये।
उत्तर:
आवश्यक ऊर्जा =.0. (-7.5 × 106) J
= 7.5 × 105 J

प्रश्न 38.
पृथ्वी तल पर पलायन वेग का मान कितना है?
उत्तर:
पृथ्वी तल पर पलायन वेग 11.2 km.s-1 है।

प्रश्न 39.
किसी प्रक्षेप्य द्वारा प्राप्त महत्तम ऊँचाई का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
\(h=\frac{v^2 R}{2 g R-v^2}\)

प्रश्न 40.
एक कमानीदार तुला एक कृत्रिम उपग्रह में टंगी है जिससे 11 द्रव्यमान का एक पिण्ड लटका है। तुला का पाठ्यांक कितना होगा?
उत्तर:
शून्या

प्रश्न 41 –
गुरुत्वाकर्षण नियतांक 6 को सार्वत्रिक नियतांक क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि G का मान समय स्थिति अथवा पिण्डों की प्रकृति व अवस्था पर निर्भर नहीं होता है, अतः इसे सार्वत्रिक नियतांक कहते हैं।

प्रश्न 42 –
क्या घर्षण बल गुरुत्वाकर्षण से बढ़ता है?
उत्तर:
नहीं; क्योंकि घर्षण बल की उत्पत्ति विद्युतीय प्रकृति की है।

प्रश्न 43.
किस वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम G का प्रायोगिक मान ज्ञात किया?
उत्तर:
कैवेन्डिश

प्रश्न 44.
कृत्रिम उपग्रह की कक्षा को वायुमण्डल से बाहर क्यों रखा जाता है?
उत्तर:
ताकि वायु के घर्षण के कारण उपग्रह की ऊर्जा कम न हो जाये।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भार व द्रव्यमान में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भार व द्रव्यमान में अन्तर

भारद्रव्यमान
1. पृथ्वी द्वारा पिण्ड पर आरोपित आकर्षण बल पिण्ड का भार कहलाता है।1. किसी पिण्ड में उपस्थित द्रव्य की मात्रा को उसका द्रव्यमान कहते हैं।
2. इसका मात्रक न्यूटन या किग्रा-भार है।2. इसका मात्रक किग्रा है।
3. यह सदिश राशि है।3. यह अदिश राशि है।
4. इसका मान g के साथ परिवर्तित होता हैं।4. इसका मान g के साथ परिवर्तित नहीं होता है।

प्रश्न 2.
यदि कोई पिण्ड पृथ्वी तल से v(v > ve) वेग से फेंका जाता है तो पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र के बाहर इसका वेग ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी तल पर कुल ऊर्जा = अनन्त पर कुल ऊर्जा
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प्रश्न 3.
दो पिण्डों A व B के बीच की दूरी है। गुरुत्वाकर्षण की पारस्परिक क्रिया में बल को दूरी के व्युत्क्रम वर्ग के नियम के अनुसार लेने पर पिण्ड 1 का त्वरण है। यदि पारस्परिक क्रिया दूरी के व्युत्क्रम चतुर्थ घात के नियम का पालन करे, तो पिण्ड का त्वरण क्या होगा ?
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -5
उत्तर:
A पर B के कारण गुरुत्वीय बल
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प्रश्न 4.
किसी ग्रह से सूर्य की औसत दूरी पृथ्वी से सूर्य की औसत दूरी की नौ गुनी है। ग्रह कितने वर्ष में सूर्य की परिक्रमा करेगा?
उत्तर:
केप्लर के तृतीय नियम से
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -7

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 5.
दो पिण्डों के मध्य गुरुत्वाकर्षण बल F है। यदि उनके बीच की दूरी 2 गुनी कर दें, तो उनके मध्य आकर्षण बल कितना होगा?
उत्तर:
r दूरी पर बल F = \(\frac{G m_1 m_2}{r^2}\)
और 2r दूरी पर बल F’ = \(\frac{G m_1 m_2}{(2 r)^2}=\frac{1}{4} \frac{G m_1 m_2}{r^2}=\frac{1}{4} F\)
या F’ = \(\frac{F}{4}\)

प्रश्न 6.
बृहस्पति पर वातावरण हल्की गैसों (सामान्यतः हाइड्रोजन) से युक्त है, जबकि पृथ्वी के वातावरण में बहुत कम हाइड्रोजन गैस है, क्यों?
उत्तर:
बृहस्पति ग्रह पर पलायन वेग पृथ्वी पर पलायन वेग से काफी अधिक है। इसलिए वहाँ से वस्तुओं को पलायन के लिए काफी अधिक वेग की आवश्यकता होती है। ऊष्मीय वेग इस पलायन वेग से कम होता है; अतः वहाँ से हल्की गैसें पलायन नहीं कर पाती हैं। इसीलिए हाइड्रोजन गैस बृहस्पति ग्रह के वातावरण में अधिक पायी जाती है।

प्रश्न 7.
रेडियन प्रति घंटा में भूस्थिर उपग्रह का कोणीय वेग कितना होगा?
उत्तर:
भूस्थिर उपग्रह का आवर्तकाल
T = पृथ्वी के घूर्णन का आवर्तकाल = 24 घंटे
∴ कोणीय वेग ω = \(\frac{2π}{T}=\frac{2π}{24}\) रेडियन प्रति घंटा
या w = \(\frac{π}{12}\) रेडियन / घंटा

प्रश्न 8.
जब कोई उपग्रह गिरता हुआ पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करता है तो वह गर्म हो जाता है, अर्थात् उसकी यान्त्रिक ऊर्जा में ह्रास होता है। परन्तु उपग्रह बढ़ती हुई चाल से कुण्डलिनी के रूप में नीचे गिरता है, क्यों?
उत्तर:
अपनी कक्षा में घूमते हुए उपग्रह की कुल ऊर्जा ऋणात्मक होती है जब उपग्रह पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करता है तो उसकी यांत्रिक ऊर्जा में (जोकि ऋणात्मक होती है) हास होता है अतः यह और ऋणात्मक हो जाती है परन्तु कक्षीय चाल vo = \(\frac{GM_e}{R_e+h}\) तभी बढ़ेगी जब ऊँचाई घटेगी। अतः उपग्रह कुण्डलिनी के रूप में बढ़ती हुई चाल से नीचे गिरता है।

प्रश्न 9.
पृथ्वी पर कोई पिण्ड आपस में गुरुत्वीय बल के कारण एक दूसरे की तरफ गति नहीं करते; क्यों?
उत्तर:
दो पिण्डों के मध्य आकर्षण बल, पृथ्वी की तुलना में उनके कम द्रव्यमानों के कारण नगण्य होता है अतः इनसे निर्मित त्वरण भी बहुत कम (शून्य) होता है इसीलिए वे एक दूसरे की ओर गति नहीं करते हैं।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -8

प्रश्न 10.
पृथ्वी के परितः गतिशील उपग्रह पर एक बल लगता है। इस बल के कारण पृथ्वी द्वारा उपग्रह पर कितना कार्य किया जाता है?
उत्तर:
पृथ्वी द्वारा उपग्रह पर आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल उपग्रह को आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल प्रदान करने में व्यय हो जाता है। चूंकि अभिकेन्द्र बल एवं उपग्रह की कक्षीय चाल vo परस्पर लम्बवत् होते हैं। अतः इस बल द्वारा कोई कार्य नहीं किया जाता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 11.
चन्द्रमा के खिंचाव के कारण ज्वार भाटा अधिक तथा सूर्य के खिंचाव के कारण ज्वार भाटा कम प्रभावी होता है जबकि सूर्य का खिंचाव चन्द्रमा की अपेक्षा अधिक होता है। समझाइये क्यों?
उत्तर:
जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण बल दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है उसी प्रकार ज्वार भाटा दूरी की तृतीय घात के व्युत्क्रमानुपाती है। चूँकि पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी सूर्य की तुलना में काफी कम है, इसीलिए चन्द्रमा के खिचाव के कारण ज्वार भाटा अधिक आता है।

प्रश्न 12.
एक हाथी एवं एक चींटी में से किसका पलायन वेग अधिक होगा और किसकी पलायन ऊर्जा अधिक होगी?
उत्तर:
पलायन वेग के सूत्र ve = \(\sqrt{\frac{2GM}{R}}\) में वस्तु का द्रव्यमान (m) नहीं है। अतः हाथी एवं चीटी दोनों के लिए पलायन वेग समान होगा। परन्तु पलायन ऊर्जा Ee = \(\frac{1}{2}\)mve² द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती होती है अतः हाथी के लिए पलायन ऊर्जा काफी अधिक होगी।

प्रश्न 13.
समझाइये कि टेनिस की गेंद पहाड़ी पर अधिक एवं मैदान पर कम क्यों उछलती है?
उत्तर;
गुरुत्वीय त्वरण g का मान मैदान की अपेक्षा पहाड़ी पर कम होता है अतः टेनिस की गेंद का भार (mg) पहाड़ी पर कम एवं मैदान पर अधिक होता है भार जितना कम होता है गेंद उतनी ही अधिक उछलती है। इसीलिए मैदान की अपेक्षा पहाड़ी पर टेनिस की गेंद अधिक उछलती है।

प्रश्न 14.
मध्य रात्रि में सूर्य हमें पृथ्वी की दिशा में खींचता है। परन्तु मध्य दिन में पृथ्वी की विपरीत दिशा में खींचता है। क्या हमारा भार रात को अधिक एवं दिन में कम होता है? समझाइये |
उत्तर:
नहीं; क्योंकि गुरुत्वाकर्षण खिंचाव पिण्ड को निश्चित अभिकेन्द्रीय बल प्रदान करता है जिससे वह अपनी कक्षा में घूर्णन कर सके। वह पिण्ड के भार में परिवर्तन नहीं करता है।

प्रश्न 15.
m द्रव्यमान का एक कण, त्रिज्या के क्षैतिज वृत्त में एक अभिकेन्द्रीय बल \(\frac{k}{r^2}\) के अन्तर्गत् घूम रहा है, जहाँ k नियतांक है। कण में कुल कितनी ऊर्जा है ?
उत्तर:
गतिज ऊर्जा K = \(\frac{1}{2}\)mv²
दिया है –
F = \(\frac{k}{r^2}=frac{mv^2}{r^2}\) ⇒ mv² = \(\frac{k}{r}\)
∴ K = \(\frac{1}{2}\)mv² = \(\frac{k}{2r}\)
स्थितिज ऊर्जा U = -F.r = –\(\frac{k}{r^2}\).r = \(– \frac{k}{r}\)
कुल ऊर्जा,
Et = K + U = \(\frac{k}{2r}-\frac{k}{r}=- \frac{k}{2r}\)
या Et = \(– \frac{k}{2r}\)

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 16.
अपनी अक्ष पर पृथ्वी के घूमने की वह चाल ज्ञात कीजिए ताकि भूमध्य रेखा पर किसी वस्तु का भार इस समय के भार का 3/5 हो जाये। भूमध्य रेखा की त्रिज्या 6400 km मान लीजिए।
उत्तर:
दिया है- g’ = \(\frac{3}{5}\)g
जहाँ g = पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण
भूमध्य रेखा के लिए-
∵ g’ = g – R ω²
∴ \(\frac{3}{5}\)g = g – R ω²
या R ω² = g – \(\frac{3}{5}\)g = \(\frac{2}{5}\)g
या ω² = \(\frac{2g}{5R}\) ⇒ ω = \(\sqrt{\frac{2g}{5R}}=\sqrt{\frac{2 \times 9.8}{5 \times 6.4 \times 10^6}}\)
या ω = 7.8 × 10-4 rad.s-1

प्रश्न 17.
पृथ्वी के परितः वृत्तीय पथ पर परिक्रमा करते उपग्रह पर अभिकेन्द्र बल है। इस पर पृथ्वी का गुरुत्वीय बल कितना है? तथा इस पर परिणामी बल कितना है?
उत्तर:
पृथ्वी के परितः वृत्तीय पथ पर परिक्रमा करने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल गुरुत्वीय बल ही प्रदान करता है। अतः गुरुत्वीय बल ही परिणामी बल F है।

प्रश्न 18.
क्या घर्षण बल व अन्य सम्पर्क बल गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
नहीं; घर्षण अथवा अन्य सम्पर्क बलों की उत्पत्ति विद्युत बलों के कारण होती है।

प्रश्न 19.
यदि दो ग्रहों की त्रिज्याएं R1 व R2 हों तथा माध्य घनत्व ρ1 व ρ2 हों तो सिद्ध कीजिए कि दोनों ग्रहों पर गुरुत्वीय त्वरणों का अनुपात R1ρ1 : R2ρ2 होगा।
उत्तर:
गुरुत्वीय त्वरण
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HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 20.
यदि किसी उपग्रह की घूर्णन आवृत्ति N हो तो सिद्ध कीजिए कि (R+h)³ ∝ \(\frac{1}{N^2}\)
उत्तर:
उपग्रह का आवर्तकाल
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -10

प्रश्न 21.
यदि पृथ्वी के समीप परिक्रमा कर रहे उपग्रह की गतिज ऊर्जा दो गुनी हो जाये तो क्या उपग्रह अपनी कक्षा को छोड़कर पलायन कर जायेगा? यदि हाँ तो क्यों?
उत्तर:
गतिज ऊर्जा दो गुनी हो जाती है अतः
K’ = 2K
या \(\frac{1}{2}\)mv’² = \(\frac{1}{2}\)mv² × 2
या v’ = vo√2
पृथ्वी के समीप परिक्रमा करने वाले उपग्रह की कक्षीय चाल vo एवं पलायन वेग में निम्न सम्बन्ध होता है-
∵ ve = vo√2
∴ v’ = ve (पलायन वेग )
अतः उपग्रह अपनी कक्षा छोड़कर पलायन कर जायेगा।

प्रश्न 22.
साधारणतः पृथ्वी से फेंके गये प्रक्षेप्य का पथ परवलयाकार होता है परन्तु अधिक ऊँचाई तक फेंके गये प्रक्षेप्यों का पथ दीर्घ वृत्ताकार होता है, क्यों?
उत्तर;
साधारण ऊँचाई तक g का मान लगभग नियत रहता है। अतः प्रक्षेप्य लगभग नियत त्वरण के अन्तर्गत गति करता है जिससे इसका पथ परवलयाकार हो जाता है परन्तु अत्यधिक ऊंचाई पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के केन्द्र से दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती g ∝ \(\frac{1}{r^2}\) होता है, फलस्वरूप g का मान घटता चला जाता है अतः परिवर्ती गुरुत्वीय त्वरण के कारण प्रक्षेप्य पथ दीर्घ वृत्ताकार हो जाता है।
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HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 23.
किसी धातु के दो समान आकार के गोले (ठोस) एक-दूसरे को स्पर्श करते हुए रखे हैं। उनके बीच कार्य करने वाला बल उनकी त्रिज्या से किस प्रकार सम्बन्धित है?
उत्तर:
गोलों के मध्य गुरुत्वाकर्षण बल,
\(F=G \frac{m_1 m_2}{r^2}\)
गोले समान धातु के हैं अतः इनके घनत्व (ρ) भी समान होंगे अतः
= \(\frac{G m_1 m_2}{(2 r)^2}=\frac{G \frac{4}{3} \pi r^3 \rho \frac{4}{3} \pi r^3 \rho}{4 r^2}\)
\(F=\frac{4}{9} \pi^2 G \rho^2 r^4\)
या F ∝ r4

प्रश्न 24.
एक पिण्ड को पृथ्वी के केन्द्र से ऊपर उठाते हुए चन्द्रमा तक ले जाते हैं। पिण्ड के भार में क्या परिवर्तन होंगे?
उत्तर:
पृथ्वी के केन्द्र पर g= 0, अतः पिण्ड का भार भी शून्य होता है। पृथ्वी के केन्द्र से ऊपर जाने पर g का मान भी बढ़ता है और पृथ्वी सतह पर अधिकतम हो जाता है पुनः पृथ्वी सतह से ऊपर जाने पर g का मान दूरी घटने के साथ-साथ घटता है और जहाँ पर पृथ्वी व चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण सीमाएं मिलती है, वहाँ पर भार शून्य हो जाता है। इसके बाद चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण भार पुनः बढ़ता जायेगा।

प्रश्न 25.
पृथ्वी सतह से h ऊँचाई पर जाने पर यदि वस्तु पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल आधा रह जाता है तो h व R में सम्बन्ध बताइये।
उत्तर:
∵ Fh = \(\frac{1}{2}\)Fs
∴ \(\frac{G M \cdot m}{(R+h)^2}=\frac{1}{2} \frac{G M m}{R^2} \Rightarrow \frac{1}{(R+h)^2}=\frac{1}{2 R^2}\)
या (R+h )² = 2R²
या (R+h) = R√2
या h = R√2 – R = R(√2 – 1)
या h = R(1.414 – 1)
या h = 0.414 R

प्रश्न 26.
एक उपग्रह किसी ग्रह के समीप परिक्रमा करता है। यदि उपग्रह का आवर्तकाल T एवं ग्रह का माध्य घनत्व d हो, तो सिद्ध कीजिए कि T × √d एक सार्वत्रिक नियतांक है।
उत्तर:
किसी ग्रह के उपग्रह का आवर्तकाल,
\(T=2 \pi \sqrt{\frac{(R+h)^3}{G M}}\)
∵ उपग्रह ग्रह के समीप परिक्रमा करता है अतः h << R
∴ h को छोड़ने पर
\(2 \pi \sqrt{\frac{R^3}{G \cdot \frac{4}{3} \pi R^3 \cdot d}}=\sqrt{\frac{4 \pi^2 \times 3}{4 \pi G d}}=\sqrt{\frac{3 \pi}{G d}}\)
या T × √d = \(\sqrt{\frac{3 \pi}{G d}}\) = एक सार्वत्रिक नियतांक
या T . √d = सार्वत्रिक नियतांक

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प्रश्न 27.
एक ग्रह की त्रिज्या पृथ्वी की त्रिज्या से दो गुनी है तथा ग्रह तथा पृथ्वी दोनों के औसत घनत्व समान हैं। यदि ग्रह एवं पृथ्वी पर पलायन वेग क्रमशः vp तथा ve हों, तो सिद्ध कीजिए कि vp = 2ve.
उत्तर:
दिया है-
Rp = 2Re
ρp = ρe = ρ
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प्रश्न 28.
कोई ग्रह सूर्य के परितः v ms-1 की चाल से Ts में एक पूरा चक्कर लगाता है। दिखाइये कि इस ग्रह पर सूर्य की ओर दिष्ट
त्वरण का मान \(\frac{2πv}{T}\) होता है।
उत्तर:
अभिकेन्द्रीय त्वरण,
ac = \(\frac{v^2}{r}\)
= \(\frac{v}{r}\) v = ω v = \(\frac{2π}{T}\) v
या ac = \(\frac{2πv}{r}\)

प्रश्न 29.
यदि हम अपनी छोटी अंगुली भी हिलाते हैं तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को छोड़ना पड़ता है, क्यों?
उत्तर:
न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम से इस ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण दूसरे कणों को आकर्षित करता है और यह आकर्षण बल दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है अतः जब हम अपनी अंगुली उठाते हैं तो कणों के मध्य दूरी बदलती है जिससे आकर्षण बदलता है यह ब्रह्माण्ड को विचलित कर देता है।

प्रश्न 30.
कृत्रिम उपग्रह में कोई ईंधन नहीं होता फिर भी यह पृथ्वी के चारों ओर घूमता है क्यों?
उत्तर:
पृथ्वी तथा उपग्रह के मध्य लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल उपग्रह को पृथ्वी के चारों ओर वृत्तीय कक्षा में घूमने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल प्रदान करता है। इसीलिए उपग्रह पृथ्वी के परितः घूमता रहता है।

प्रश्न 31.
अंतरिक्ष यान में भारहीनता के कारण एक यात्री को क्या-क्या परेशानियाँ अनुभव होती हैं? इनका समाधान क्या है?
उत्तर:
भारहीनता के कारण अंतरिक्ष यात्री गिलास से पानी नहीं पी सकता है और न ही गिलास से पानी डाल सकता है। इस स्थिति से बचने के लिए अंतरिक्ष यान इस तरह बनाया जाता है कि इसमें खोखले रिम वाले बड़े-बड़े पहिए बनाये जाते हैं, पहियों को घुमा दिया जाता है। इस रिम में बने कैबिन में बैठा यात्री अभिकेन्द्र बल के कारण भार अनुभव करता है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions )

प्रश्न 1.
केप्लर के ग्रहीय गति के नियम लिखिए एवं केप्लर के तृतीय नियम से गुरुत्वाकर्षण नियम का सत्यापन कीजिए।
उत्तर:
केप्लर के नियम (Kepler’s Laws)
केप्लर (1571-1630) ने टायको ब्रेह (1546-1601) के द्वारा किये गये प्रहीय प्रेक्षणों का कई वर्षों तक अध्ययन किया और निम्नलिखित तीन नियम प्रस्तुत किये-

प्रथम नियम : प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घ-वृत्ताकार कक्षा (elliptical orbit) में परिक्रमण करता है और सूर्य कक्षा की एक नाभि (focus) पर स्थित होता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -13
द्वितीय नियम : ग्रह को सूर्य से मिलाने वाली रेखा समान समयान्तराल में समान क्षेत्रफल तय करती है अर्थात् ग्रह की क्षेत्रीय चाल (Areal Speed) नियत रहती है।
माना ग्रह dt समय में dA क्षेत्रफल प्रस्थार्पित करता है, तो क्षेत्रीय चाल \(\frac{d A}{d t}\) = नियतांक। चित्र में ग्रह को B से A तक जाने में जितना समय लगता है, उतना ही समय B’ से A’ तक जाने में लगता है। अत: क्षेत्रफल SAB = क्षेत्रफल SA’B’ । दोनों क्षेत्रफल समान होने का अर्थ है कि ग्रह की कक्षीय चाल बदलती है। सूर्य से दूर जाने पर कक्षीय चाल घटती है और पास आने पर बढ़ती है। अतः क्षेत्रीय चाल कोणीय संवेग के रूप में लिखने पर घूमते हुए ग्रह का कोणीय संवेग नियत रहता है। अर्थात्
\(\frac{d A}{d t}=\frac{L}{2m}\)
यहाँ L कोणीय संवेग है तथा m ग्रह का द्रव्यमान है।
तृतीय नियम-ग्रह के आवर्त काल का वर्ग ग्रह एवं सूर्य के बीच औसत दूरी के घन के अनुक्रमानुपाती होती है। अर्थात्
T² ∝ r³
या T² = k r³
जहाँ k, एक नियतांक है एवं r, सूर्य एवं ग्रह के मध्य औसत दूरी है।

केप्लर के नियम से न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम (Derivation of Newton’s Law of Gravitation from Kepler’s Law) :
न्यूटन ने पाया कि अधिकांश ग्रह सूर्य के परित: लगभग वृत्ताकार कक्षाओं में गति करते हैं। केप्लर के द्वितीय नियम के अनुसार, ग्रह के त्रिज्यीय सदिश की क्षेत्रफलीय चाल नियत रहती है। अत: वृत्ताकार कक्षा में त्रिज्य सदिश की तथा स्वयं ग्रह की रेखीय चाल क्रमशः v तथा ω नियत रहेगी।
माना r त्रिज्या के वृत्ताकार पथ पर गतिशील होने के कारण ग्रह के द्रव्यमान m पर केन्द्र की ओर लगने वाला अभिकेन्द्र बल F लगता है, तो
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -14
इस प्रकार केप्लर के नियमों के आधार पर न्यूटन ने निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले-

  • ग्रहों पर अभिकेन्द्र बल आरोपित होता है जिसकी दिशा सूर्य की ओर होती है।
  • इस बल का परिमाण, ग्रह तथा सूर्य के बीच दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है। (F ∝ \(\frac{1}{r^2}\))
  • यह बल ग्रह के द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती है,
    (F ∝ m)

प्रश्न 2.
गुरुत्वीय विभव से क्या तात्पर्य है? बिन्दु द्रव्यमान के लिए सूत्र निगमित कीजिए ।
उत्तर:
गुरुत्वीय विभव (Gravitational Potential) :
एकांक द्रव्यमान को अनन्त से किसी बिन्दु तक लाने में जो कार्य करना पड़ता है, उसे उस बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव कहते हैं।” ये सदैव ऋणात्मक होता है और अनन्त पर इसका मान शून्य मानते हैं। इसे V से व्यक्त करते हैं। इसका मात्रक Jkg-1 एवं विमीय सूत्र [M0 L2 T-2] है।

किन्हीं दो बिन्दुओं के मध्य गुरुत्वीय विभवान्तर उस कार्य के बराबर है जो एकांक द्रव्यमान को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में करना पड़ता है। अत: A व B दो बिन्दुओं के बीच गुरुत्वीय विभवान्तर
\(V_B-V_A=\left(\frac{U_B-U_A}{m}\right)\) …………..(1)

बिन्दु द्रव्यमान के कारण विभव (Potential due to Point Mass) :
माना M द्रव्यमान का कण स्थिति A पर रखा है। कण के केन्द्र से r दूरी पर बिन्दु P है जिस पर हमें कण के कारण गुरुत्वीय विभव ज्ञात करना है। बिन्दु P की स्थिति r का फलन है अत: इस बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव भी r का फलन होगा। अत: P पर गुरुत्वीय विभव-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -15

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 3.
गुरुत्वीय विभव से क्या तात्पर्य है? किसी ठोस गोलाकार पिण्ड के कारण विभिन्न स्थितियों में गुरुत्वीय विभव के लिए सूत्र निगमित कीजिए ।
उत्तर:
गुरुत्वीय विभव (Gravitational Potential) :
एकांक द्रव्यमान को अनन्त से किसी बिन्दु तक लाने में जो कार्य करना पड़ता है, उसे उस बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव कहते हैं।” ये सदैव ऋणात्मक होता है और अनन्त पर इसका मान शून्य मानते हैं। इसे V से व्यक्त करते हैं। इसका मात्रक Jkg-1 एवं विमीय सूत्र [M0 L2 T-2] है।

किन्हीं दो बिन्दुओं के मध्य गुरुत्वीय विभवान्तर उस कार्य के बराबर है जो एकांक द्रव्यमान को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में करना पड़ता है। अत: A व B दो बिन्दुओं के बीच गुरुत्वीय विभवान्तर
\(V_B-V_A=\left(\frac{U_B-U_A}{m}\right)\) …………..(1)

किसी ठोस गोलाकार पिण्ड के कारण गुरुत्वीय विभव (Gravitational Potential Due to Solid Sphere) :
माना M द्रव्यमान एवं R त्रिज्या का एक ठोस गोला है जिसका केन्द्र O है। किसी बाहरी बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव ज्ञात करने के लिए गोले को बिन्दु द्रव्यमान माना जा सकता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -16
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -17

प्रश्न 4.
खोखले गोले के कारण उसके बाहर पृष्ठ पर एवं उसके अन्दर गुरुत्वीय विभव के लिए सूत्र प्राप्त कीजिए ।
उत्तर:
गोलीय कोश के कारण गुरुत्वीय विभव (Gravitational Potential due to Hollow Sphere):
1. बाह्य बिन्दु A पर (r > R) गुरुत्वीय विभव
\(V_{\text {out }}=-\frac{G M}{r}\) ………..(7)
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -18
2. पृष्ठ पर स्थित बिन्दु (r = R) पर गुरुत्वीय विभव-
\(V_s=-\frac{G M}{R}\) ………….(8)

3. गोले के आन्तरिक बिन्दु C(r < R) पर विभव-
गोले के अन्दर गुरुत्वीय क्षेत्र का मान शून्य होता है। अत: एकांक द्रव्यमान को पृष्ठ के अन्दर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में कोई अतिरिक्त कार्य नहीं करना पड़ता है। अतः अन्दर किसी बिन्दु पर गुरुत्वीय वभव वही होगा जो उसके पृष्ठ पर होता है।
∴ \(V_{\text {in }}=-\frac{G M}{R}\) ……….(9)
खोखले गोले के कारण दूरी के साथ गुरुत्वीय विभव में परिवर्तन निम्न चित्र (8.23) में प्रदर्शित है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -19

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 5.
एक कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी के निकट निश्चित वृत्तीय कक्षा में चक्कर लगा रहा है। सिद्ध कीजिए कि इसका परिक्रमण काल \(T=\sqrt{\frac{3π}{ρG}}\) होगा, जहाँ ρ पृथ्वी का घनत्व एवं G गुरुत्वाकर्षण नियतांक है।
उत्तर:
उपग्रह का परिक्रमण काल (Revolution Period of Satellite):
उपग्रह अपने ग्रह के चारों ओर एक चक्कर लगाने में जितना समय लेता है, उसे उपग्रह का परिक्रमण काल कहते हैं।
यदि उपग्रह का परिक्रमण काल T हो, तो
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -20
\(T=2π \sqrt{\frac{(R+h)^3}{GM}}\)
उपग्रह पृथ्वी के अति निकट परिक्रमा करता है अत: h<< R
h को R की तुलना में छोड़ने पर-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -21

प्रश्न 6.
उपग्रह की ऊर्जा एवं बन्धन ऊर्जा से क्या अभिप्राय है?
इनके लिए सूत्र प्राप्त कीजिए ।
उत्तर:
उपग्रह की ऊर्जा (Energy of Satellite)
अपनी कक्षा में परिक्रमण करते समय उपग्रह की कक्ष्पिय चाल के कारण उसमें गतिज ऊर्जा होती है और उसकी स्थिति के कारण स्थितिज ऊर्जा होती है। इन दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का योग उपग्रह की कुल ऊर्जा होती है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -22
स्पष्ट है कि कुल ऊर्जा ऋणात्मक होती है जिसका अभिप्राय है कि उपग्रह ग्रह के साथ बद्ध निकाय है। इसे मुक्त करने के लिए बाह्य ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

उपग्रह की बन्धन ऊर्जा (Binding Energy of Satellite) :
“ऊर्जा की वह न्यूनतम मात्रा जो किसी उपग्रह को दे देने पर उपग्रह सदैव के लिए अपनी कक्षा छोड़कर चला जाये अर्थात् पलायन कर जाये, उपग्रह की बन्धन ऊर्जा कहलाती है।’ इसे Eb से व्यक्त करते हैं।
उपग्रह की कुल ऊर्जा, E_t=-\frac{1}{2} \frac{G M m}{r}
उपग्रह जब पलायन कर जायेगा तो अनन्त पर उसकी ऊर्जा शून्य हो जायेगी। अत: उपग्रह की बन्धन ऊर्जा
\(E_b=E_{\infty}-E_t=0-\left[-\frac{1}{2} \frac{G M m}{r}\right]\)
या \(E_b=\frac{1}{2} \frac{G M m}{r}\)

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 7.
सिद्ध कीजिए कि पलायन वेग पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।
उत्तर:
पलायन वेग (Escape Velocity) :
“वह न्यूनतम वेग जिससे फेंके जाने पर कोई वस्तु पलायन कर जाये अर्थात् पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण सीमा के बाहर चली जाये और लौटकर वापस न आ सके, पलायन वेग कहलाता है।’ इसकी कोई निश्चित दिशा नहीं होती है। अत: इसे पलायन वेग न कहकर पलायन चाल कहना अधिक यथार्थ होगा। आदतन हम इसे पलायन वेग कह देते हैं।

(i) पृथ्वी सतह से पलायन वेग के लिए सूत्र-हम जानते हैं कि जब किसी वस्तु को पृथ्वी सतह से दूर की ओर फेंका जाता है तो उसकी गतिज ऊर्जा गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा में बदलने लगती है और जहाँ पर सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा में बदल जाती है, वहीं से वस्तु वापस लौट आती है। इस आधार पर स्पष्ट है कि यदि वस्तु को पृथ्वी सतह से उसकी गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा के बराबर गतिज ऊर्जा दे दी जाये तो वह अनन्त पर पहुँच जायेगी अर्थात पलायन कर जायेगी। अत:
पलायन ऊर्जा = गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का परिमाण
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -23

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 8.
न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम लिखिए एवं सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक (G) की परिभाषा, मात्रक एवं विमीय सूत्र ज्ञात कीजिए।
उत्तर;
गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम (Universal Law of Gravitation) इस नियम के अनुसार, “बह्माण्ड में प्रत्येक द्रव्य कण किसी भी अन्य द्रव्य कण को अपनी ओर एक बल द्वारा आकर्षित करता है जिसका मान (परिमाण) दोनों कणों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती एवं उनके द्रव्यमान केन्द्रों के बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।” इस बल की दिशा दोनों कण्णों को मिलाने वाली रेखा की सीध में होती है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -24
माना m1 व m2 द्रव्यमान के दो कण परस्पर r दूरी पर चित्र के अनुसार हैं।
यदि इन दोनों के मध्य लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल F हो तो उक्त गुरुत्वाकर्षण बल के नियमानुसार
एवं \(F \propto m_1 m_2\)
\(F \propto \frac{1}{r^2}\)
दोनों नियमों को मिलाने पर
या \(F \propto \frac{m_1 m_2}{r^2}\)
या \(F=G \frac{m_1 m_2}{r^2}\) ……….(1)
जहाँ G एक नियतांक है जिसे सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक (Universal Constant of Gravity) कहते हैं। खगोलीय पिण्डों या पृथ्वी व सूर्य के मध्य दूरी इनके व्यास की तुलना में अत्यधिक होने के कारण इन्हें कण माना जा सकता है। अतः समीकरण (1) ऐसी समस्याओं पर भी लागू होता है।

सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक (G):
1. परिभाषा-
∵ गुरुत्वाकर्षण बल, \(F=G \frac{m_1 m_2}{r^2}\)
यदि m1 = m2 = 1, r = 1 तो F = G
अर्थात् “सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक उस गुरुत्व बल के तुल्य है जो एकांक द्रव्यमान के दो कणो के मध्य एकांक दूरी पर कार्य करता है।”
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -25

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 9.
पृथ्वी का उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर क्यों घूमता है? इसके आवर्तकाल एवं कक्षीय चाल के लिए सूत्रों का निगमन कीजिए।
उत्तर;
उपग्रह की कक्षीय चाल, परिक्रमण काल एवं कुल ऊर्जा (Orbital Speed, Period of Revolution and Total Energy):
उपग्रह (Satellite):
वे आकाशीय पिण्ड जो ग्रहों की परिक्रमा करते हैं, उपग्रह कहलाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-
(1) प्राकृतिक उपग्रह (Natural Satellites)
उदाहरण-चन्द्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है।
(2) कृत्रिम उपग्रह (Artificial Satellites)
उदाहरण-सभी मानव निर्मित उपग्रह कृत्रिम उपग्रह की श्रेणी में आते हैं; जैसे-INSAT-1A, IB; EDUSAT; G-SAT आदि।

उपग्रह का कक्षीय वेग (Orbital Velocity of Satellite) :
माना m द्रव्यमान का उपग्रह पृथ्वी (द्रव्यमान M ) सतह से h ऊँचाई पर vo कक्षीय चाल से पृथ्वी की परिक्रमा करता है। उपग्रह की कक्षा की त्रिज्या,
r = (R + h)
पृथ्वी एवं उपग्रह के मध्य लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल प्रदान करता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण -26

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आंकिक प्रश्न (Numerical Questions) :

गुरुत्वाकर्षण नियम पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1,.
M, 2M, 3M, 4M द्रव्यमान के चार कण a भुजा वाले वर्ग के शीर्षों पर रखे गये हैं तो वर्ग केन्द्र पर रखे M द्रव्यमान वाले कण पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल ज्ञात कीजिए।
उत्तर;
\(\frac{4 \sqrt{2} G M^2}{a^2}\)

प्रश्न 2.
दो गोलों के द्रव्यमान 60 kg तथा 50 kg हैं। इनके गुरुत्व केन्द्रों के बीच की दूरी 0.50m है। इनके बीच कितना गुरुत्वाकर्षण बल होगा?
उत्तर:
8.0 × 10-7 N

प्रश्न 3.
M द्रव्यमान का एक समरूप गोला तथा m द्रव्यमान और L लम्बाई की एक समरूप छड़ इस प्रकार रखे गये हैं कि छड़ का पास वाला सिरा गोले के केन्द्र से r दूरी पर स्थित हो तो गोले व छड़ के मध्य लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल की गणना कीजिए।
उत्तर:
\(\frac{GMm}{r(r+L)}\)

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गुरुत्वीय त्वरण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 4.
एक व्यक्ति का पृथ्वी तल पर भार 80 kg है। इस व्यक्ति का चन्द्रमा पर भार क्या होगा? दिया है, चन्द्रमा का द्रव्यमान 7.34 × 1022 kg त्रिज्या = 1.75 × 106 m; गुरुत्वीय नियतांक = 6.67 × 10-11 Nm.kg-2 व्यक्ति का चन्द्रमा पर द्रव्यमान क्या होगा?
उत्तर:
128 N; 80 kg

प्रश्न 5.
यदि पृथ्वी का व्यास उसके वर्तमान व्यास का आधा हो जाये तथा घनत्व वही रहे तो इस आहे आकार की पृथ्वी की सतह पर ‘8 का मान कितना होगा?
उत्तर:
4.90 ms

प्रश्न 6.
किसी व्यक्ति का पृथ्वी पर भार 490 N है। पृथ्वी पर . गुरुत्वीय त्वरण g 9.8 Nkg है। चन्द्रमा की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण & है। ज्ञात कीजिए-
(i) चन्द्रमा की सतह पर व्यक्ति का भार ।
(ii) पृथ्वी व चन्द्रमा पर व्यक्ति का द्रव्यमान ।
(iii) यदि व्यक्ति पृथ्वी सतह पर 1 min में 150 m चलता है तो चन्द्रमा पर मिनट में कितना चलेगा?
(iv) यदि व्यक्ति पृथ्वी तल पर 2 mm कूद सकता हो चन्द्रमा पर कितना कूदेगा?
उत्तर:
(i) 81.67 N;
(ii) पृथ्वी व चन्द्रमा दोनों पर द्रव्यमान
(iii) 150m;
(iv) 12m ]

गुरुत्वीय त्वरण में परिवर्तन पर आधारित

प्रश्न 7.
पृथ्वी की सतह से / ऊंचाई तक जाने पर किसी वस्तु के भार में 1% कमी आती है। यदि वस्तु के सतह से / गहराई नीचे ले जाया जाये तो भार में परिवर्तन कितना होगा?
जिससे
उत्तर:
0.5%

प्रश्न 8.
अपनी अक्ष पर पृथ्वी के घूर्णन की चाल ज्ञात कीजिए। ‘भूमध्य रेखा पर किसी व्यक्ति का भार इस समय के भार का
जाये। भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की त्रिज्या 6400 किमी है।
उत्तर:
5.53 x 104 रेडियन / से०

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 9.
किस ऊँचाई पर गुरुत्वीय त्वरण का मान पृथ्वी की के मान का (i) 4% तथा (ii) 50% होगा? पृथ्वी की त्रिज्या 6400 km है।
उत्तर:
(i) 25600 km;
(ii) 2649.6 km

प्रश्न 10.
पृथ्वी तल से कितना नीचे जाने पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण का (i) आधा रह जायेगा (ii) एक चौथाई रह जायेगा ? (पृथ्वी की त्रिज्या = 6400km )
उत्तर:
(i) 3200 km
(ii) 4800km

गुरुत्वीय क्षेत्र तथा गुरुत्वीय विभव पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 11.
चन्द्रमा तथा पृथ्वी के बीच की औसत दूरी 3.85 × 108 m है। दोनों के मध्य किस स्थान पर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता शून्य होगी?
(दिया है- पृथ्वी का द्रव्यमान = 5.96 × 1024 kg: चन्द्रमा का द्रव्यमान 7.36 ×1022 kg)
उत्तर:
पृथ्वी के केन्द्र से 3.465 × 108 m

प्रश्न 12.
2 किग्रा द्रव्यमान का एक कण 1.0 मी त्रिज्या तथा 100 किग्रा द्रव्यमान के एक समान गोले पर रखा है। गोले के पृष्ठ पर गुरुत्वीय विभव ज्ञात करो तथा कण को दूर करने में गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
V = 6.67 × 10-9 J/kg, W = 1.3340 × 10-8 J

प्रश्न 13.
(i) चन्द्रमा तथा पृथ्वी के बीच की दूरी 3.85 × 108 m है। दोनों के मध्य किस बिन्दु पर गुरुत्वीय बल क्षेत्र शून्य होगा? (पृथ्वी का द्रव्यमान = 6 × 1024 kg; चन्द्रमा का द्रव्यमान = 7.5 × 1022 kg)
(ii) इस बिन्दु पर गुरुत्वीय विभव कितना होगा?
उत्तर:
(i) पृथ्वी के केन्द्र से 3.46 × 108 cm;
(ii) -1.30 × 106 J.kg-1

गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा पर आधारित प्रश्नं

प्रश्न 14.
पृथ्वी का द्रव्यमान 6.0 × 1024 kg तथा त्रिज्या 6.4 × 106 m है।
(i) 4 kg के एक पिण्ड को पृथ्वी तल से अनन्त तक ले जाने में कितना कार्य करना होगा?
(ii) 4kg के पिण्ड की पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कितनी होगी?
(iii) पृथ्वी तल पर गुरुत्वीय विभव कितना होगा?
(iv) यदि पिण्ड अनन्त से पृथ्वी तल पर गिरे तो पृथ्वी तल से टकराते समय पिण्ड का वेग क्या होगा?
(G = 6.67 × 10-11 N.m²kg-2)
उत्तर:
(i) 2.5 × 108 J;
(ii) -2.5 × 108 J;
(iii) -6.25 × 107 J.kg-1;
(iv) 11.18 × 10³ ms-1

प्रश्न 15.
200g द्रव्यमान के तीन कण अनन्त से लाकर किसी समबाहु त्रिभुज के शीर्षो पर रखे जाते हैं। यदि त्रिभुज की प्रत्येक भुजा 40 cm हो तो किया गया कार्य कितना होगा?
उत्तर:
2.0 × 10-11 J

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

उपग्रह की कक्षीय चाल, पलायन वेग तथा परिक्रमण काल पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 16.
यदि पृथ्वी का द्रव्यमान और त्रिज्या किसी ग्रह की क्रमशः 9 गुनी तथा दुगुनी है तो रॉकेट को इस ग्रह के गुरुत्वाकर्षण बल से बाहर निकालने के लिए आवश्यक न्यूनतम वेग की गणना कीजिए। पृथ्वी की सतह पर पलायन वेग 11.2 km.s-1 लीजिए।
उत्तर:
5.28k.ms-1

प्रश्न 17.
m द्रव्यमान का एक पिण्ड पृथ्वी की सतह से 4R ऊंचाई पर स्थित है, जहाँ R पृथ्वी की त्रिज्या है। पिण्ड को कितना न्यूनतम वेग दिया जाये कि वह पलायन कर जाये?
उत्तर:

प्रश्न 18.
पृथ्वी के समीप उसकी परिक्रमा करने वाले उपग्रह के कक्षीय वेग की गणना कीजिए। यदि पृथ्वी की त्रिज्या 6.4 × 106 m तथा गुरुत्वीय त्वरण 10 ms-2 हो। यदि उपग्रह पृथ्वी तल से 2000 km की ऊँचाई पर रहे तब कक्षीय वेग कितना होगा?
उत्तर:
8 km.s-1; 6.98 kms-1

उपग्रह द्वारा प्राप्त ऊँचाई पर ऊर्जा पर आधारित

प्रश्न 19.
500g के पिण्ड को पृथ्वी से पलायन करने के लिए कितनी आवश्यक ऊर्जा ज्ञात कीजिए। (g = 10 ms-2 तथा पृथ्वी की from Re = 6400 km)
उत्तर:
3.2 × 107 J

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 8 गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 20.
किसी पिण्ड को पृथ्वी तल से किस वेग से फेंका जाये कि वह (i) 2Re; (ii) 4Re ऊँचाई तक पहुँच जाये? (पृथ्वी त्रिज्या R = 6400km; g = 10 ms-1)
उत्तर:
(i) 9.24 km.s-1;
(ii) 10.11 km.s-1

प्रश्न 21.
500kg का एक कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी से 1800 km की ऊंचाई पर पृथ्वी का चक्कर लगा रहा है। उपग्रह की (i) स्थितिज ऊर्जा, (ii) गतिज ऊर्जा, (iii) कुल ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया है- पृथ्वी की त्रिज्या 6400 km तथा g = 10 ms-1
(i) 2.5 × 1010 J;
(ii) 1.25 × 1010 J;
(iii) -1.25 × 1010 J

केप्लर के नियमों पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 22.
नेप्चून ग्रह की सूर्य से दूरी पृथ्वी से सूर्य की दूरी की 30 गुनी है। पृथ्वी का परिक्रमण काल 1 वर्ष है। नेप्चून के परिक्रमण काल की गणना कीजिए।
उत्तर:
164.3 वर्ष

प्रश्न 23.
बृहस्पति ग्रह की सूर्य से दूरी पृथ्वी की सूर्य से दूरी की 5.2 गुनी है तो बृहस्पति के घूर्णन का आवर्त्तकाल ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
11.86 वर्ष

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. जीवन की उत्पत्ति की सबसे तर्कसंगत जैव रासायनिक मत का प्रतिपादन किया-
(अ) मूरे
(ब) वीजमान
(स) स्टैनले मिलर
(द) ओपेरिन
उत्तर:
(द) ओपेरिन

2. किस जहाज पर डार्विन को प्रकृति- वैज्ञानिक के पद पर रखा गया था ?
(अ) सेन्चुरी
(स) बिगुल
(ब) सीगल
(द) बीगल
उत्तर:
(द) बीगल

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

3. डी व्रिज ने किसका प्रतिपादन किया था ?
(अ) प्रबलता का नियम
(स) पृथक्करण का नियम
(ब) प्राकृतिक चयनवाद
(द) उत्परिवर्तनवाद
उत्तर:
(द) उत्परिवर्तनवाद

4. आस्ट्रेलोपिथेकस नामक आदि मानव का चेहरा था-
(अ) हाइपेग्निथस प्रकार का
(स) हाइपरथेस प्रकार का
(ब) प्रोग्रेस प्रकार का
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) प्रोग्रेस प्रकार का

5. अग्नि का प्रथम प्रयोग करने वाला प्रगैतिहासिक मानव सम्भवतः था-
(अ) पेकिंग मानव
(ब) निएन्डरथल
(स) क्रो-मैगनॉन
(द) जावा कपि मानव
उत्तर:
(अ) पेकिंग मानव

6. मानव का कपियों से भिन्न, एक प्रमुख लक्षण है-
(अ) पैर हाथों से लम्बे
(ब) वस्तुओं को पकड़ने योग्य हाथ
(स) आगे निकले हुए जबड़े
(द) सिर कम विकसित
उत्तर:
(अ) पैर हाथों से लम्बे

7. पृथ्वी पर “जीवन की उत्पत्ति” की दिशा में इनमें से कौनसे यौगिकों का उद्विकास हुआ-
(अ) प्रोटीन्स एवं अमीनो अम्ल
(ब) प्रोटीन्स एवं न्यूक्लिक अम्ल
(स) यूरिया एवं अमीनो अम्ल
(द) यूरिया एवं न्यूक्लिक अम्ल
उत्तर:
(ब) प्रोटीन्स एवं न्यूक्लिक अम्ल

8. संरचनाओं में कौनसे समुच्चय में केवल समवृति अंग है-
(अ) कॉकरोच, मच्छर व मधुमक्खी के मैण्डिबल्स
(ब) मानव, बंदर व कंगारू के हाथ
(स) चमगादड़, पक्षी तथा मधुमक्खी के पंख
(द) घोड़े, टिड्डी व चमगादड़ के पश्चपाद ।
उत्तर:
(स) चमगादड़, पक्षी तथा मधुमक्खी के पंख

9. प्राकृतिक चयन के विषय में हमारी आधुनिक समझ के अनुसार, योग्यतम सदस्य हैं-
(अ) जिनमें वातावरण के अनुसार अनुकूलन की सबसे अधिक क्षमता होती है।
(ब) जिनके वंशजों की संख्या अधिकतम होती है
(स) जो बहुत सी संतानें उत्पन्न करते हैं, परन्तु कुछ ही संतानें लैंगिक परिपक्वता तक जीवित रहती हैं
(द) जिनमें विशिष्ट वातावरणीय दशाओं का सामना करने की अधिकतम क्षमता होती है।
उत्तर:
(द) जिनमें विशिष्ट वातावरणीय दशाओं का सामना करने की अधिकतम क्षमता होती है।

10. डार्विन ने किस स्थान को उद्विकास की जीवित प्रयोगशाला माना-
(अ) गेल्पेगोस द्वीप
(ब) लक्ष्य द्वीप
(स) मेडागास्कर
(द) माल द्वीप
उत्तर:
(अ) गेल्पेगोस द्वीप

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

11. जावा मानव का वैज्ञानिक नाम है-
(अ) पिथेकैन्थ्रोपस इरेक्टस
(ब) होमो इरेक्टस इरेक्टस
(स) होमो हैबिलिस
(द) अ व ब दोनों
उत्तर:
(द) अ व ब दोनों

12. निएन्डरथल मानव-
(अ) वर्तमान मानव से कम विकसित था
(ब) वर्तमान मानव से मिलता-जुलता था
(स) वर्तमान मानव से इसका मस्तिष्क बहुत बड़ा था
(द) इसका मस्तिष्क वर्तमान मानव के मस्तिष्क से छोटा था
उत्तर:
(अ) वर्तमान मानव से कम विकसित था

13. वीजमान अपने प्रयोग में पीढ़ी दर पीढ़ी नवजात चूहों की पूँछ को कर पृथक करते हरे । फिर भी पूँछ न तो गायब हुई और न ही छोटी हुई, उक्त प्रयोग से ज्ञात होता है-
(अ) लैमार्क के अर्जित लक्षणों की वंशागति का खण्डन
(ब) डार्विन के प्राकृतिक वरण मत का समर्थन
(स) डी – ब्रिज के उत्परिवर्तन मत का समर्थन
(द) सिद्ध होता है कि कशेरुकियों की पूँछ एक अनिवार्य लक्षण है
उत्तर:
(अ) लैमार्क के अर्जित लक्षणों की वंशागति का खण्डन

14. विज्ञान की वह शाखा जिसमें जीवाश्मों का अध्ययन किया जाता है-
(अ) इथोलॉजी
(ब) इरोलॉजी
(स) आर्निथोलॉजी
(द) पेलिओन्टोलॉजी
उत्तर:
(द) पेलिओन्टोलॉजी

15. जीनकोश (Gene pool) सदैव अपरिवर्तित रहते हैं, इसे कहते हैं-
(अ) आनुवंशिक संतुलन
(ब) रासायनिक संतुलन
(स) भौतिक संतुलन
(द) रासायनिक साम्य
उत्तर:
(अ) आनुवंशिक संतुलन

16. होमो सैपियंस (मानव) सर्वप्रथम विकसित हुआ-
(अ) ऑस्ट्रेलिया में
(ब) अफ्रीका में
(स) अमेरिका में
(द) रूस में
उत्तर:
(ब) अफ्रीका में

17. अमेरिकी वैज्ञानिक एच.एल. शैपिरो ने भावी मानव का नाम रखा है-
(अ) होमो फ्यूचेरिस
(ब) होमो यूचेरिस
(स) होमो ट्यूरेसिस
(द) होमो पीटूचेरिस
उत्तर:
(अ) होमो फ्यूचेरिस

18. जीव संख्या में सहसा आने वाले बड़े-बड़े परिवर्तन कहलाते हैं-
(अ) म्यूटेशन
(ब) आनुवंशिक संतुलन
(स) संस्थापक प्रवाह
(द) अभिसारी विकास
उत्तर:
(अ) म्यूटेशन

19. निम्न में औद्योगिक प्रदूषण का सूचक है-
(अ) पैन- स्पर्मिया
(ब) मृत यीस्ट
(स) बोगनविलिया
(द) लाइकेन
उत्तर:
(द) लाइकेन

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

20. मलयआर्क पेलौगो पर कार्य करने वाले वैज्ञानिक का नाम है-
(अ) डार्विन
(ब) एल्फ्रेड वॉलेस
(स) मेंडल
(द) लैमार्क
उत्तर:
(अ) डार्विन

21. 1938 में दक्षिण अफ्रीका में एक मछली पकड़ी गई जो …………….. थी।
(अ) सीलाकेंथि
(ब) पीलाकेंथि
(स) टीलाकेंथि
(द) मीलाकेंथि
उत्तर:
(अ) सीलाकेंथि

22. डी – व्रिज ने जैविक क्रम विकास से सम्बन्धित अपना उत्परिवर्तन मत किस जीव पर शोध करते हुए प्रस्तुत किया था ?
(अ) इवनिंग प्रिमरोज
(ब) ड्रोसोफिला
(स) पाइसम सेटाइवम
(द) ऐल्थीयारोजिया
उत्तर:
(अ) इवनिंग प्रिमरोज

23. एक पृथक्कृत जनसंख्या में जीन की आवृति में परिवर्तन क्या कहलाता है?
(अ) जेनेटिक ड्रिफ्ट
(ब) जीन प्रवाह
(स) उत्परिवर्तन
(द) प्राकृतिक वरण
उत्तर:
(अ) जेनेटिक ड्रिफ्ट

24. निम्न में से कौन मानव का सर्वाधिक निकट सम्बन्धी है ?
(अ) चिम्पैंजी
(ब) गोरिल्ला
(स) औरगउटान
(द) गिब्बन
उत्तर:
(अ) चिम्पैंजी

25. जीवों में विविधता का कारण है-
(अ) उत्परिवर्तन
(ब) दीर्घकालिक उद्विकासीय परिवर्तन
(स) क्रमिक परिवर्तन
(द) अल्पकालिक उद्विकासीय परिवर्तन
उत्तर:
(ब) दीर्घकालिक उद्विकासीय परिवर्तन

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

26. वर्तमान फसली पादपों में तीव्र जाति उद्भवन का कारण है-
(अ) उत्परिवर्तन
(ब) पृथक्करण
(स) बहुगुणिता
(द) लैंगिक जनन
उत्तर:
(अ) उत्परिवर्तन

27. हार्डी – वेनवर्ग साम्यता को प्रभावित करने वाला घटक है-
(अ) जीन प्रवाह
(ब) आनुवंशिक विचलन
(स) उत्परिवर्तन
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

28. ट्राइरेनोसोरस रेक्स की लगभग ऊँचाई कितनी थी ?
(अ) 20 फुट
(ब) 10 फुट
(स) 15 फुट
(द) 5 फुट
उत्तर:
(अ) 20 फुट

29. विशाल डरावने कटार जैसे दाँत वाला था-
(अ) डायनोसौर
(ब) ट्राइरेनोसोरस रेक्स
(स) इक्थियोसाएस
(द) ड्रायोपिथिकस
उत्तर:
(ब) ट्राइरेनोसोरस रेक्स

30. स्तनधारी प्राणी पूरी तरह से जल में रहते हैं-
(अ) समुद्री गायें
(ब) सील
(स) डॉल्फिन
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

31. दिशात्मक परिवर्तन या विदारण (डिसरप्शन ) किसके दोनों सिरों पर होता है-
(अ) संग्रह चक्र
(ब) वृद्धि वक्र
(स) वितरण वक्र
(द) तिरछा वक्र
उत्तर:

32. शारवनी अवरोहण और प्राकृतिक वरण विकास, ये संरचनाएँ किस वैज्ञानिक की हैं—
(अ) मिलर
(ब) आपेरिन
(स) एल्फ्रेड वालेस
(द) डार्विन
उत्तर:
(अ) मिलर

33. एक तलछट पर दूसरे तलछट की परत पृथ्वी के लम्बे इतिहास की गवाह है। यह संकेत देता है-
(अ) अर्थक्रस्ट (भूपर्थरी) का अनुप्रस्थ काट
(ब) अर्थक्रस्ट का लम्बवत् काट
(स) अर्थक्रस्ट का तिरछा काट
(द) अर्थक्रस्ट का अनुदैर्घ्य काट
उत्तर:
(द) अर्थक्रस्ट का अनुदैर्घ्य काट

34. “बिग बैंग” नामक महाविस्फोट का सिद्धान्त किससे सम्बन्धित है-
(अ) सूर्य की उत्पत्ति
(ब) मंगल ग्रह की उत्पत्ति
(स) ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
(द) चन्द्रमा की उत्पत्ति
उत्तर:
(अ) सूर्य की उत्पत्ति

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

35. खगोल वैज्ञानिक अभी भी अपना मन पसंदीदा सिद्धान्त मानते
(अ) बिग बैंग महाविस्फोट सिद्धान्त को
(ब) स्वतः जनन के सिद्धान्त को
(स) पेन- स्पर्मिया ( सर्वबीजाणु) सिद्धान्त को
(द) आपेरेन के सिद्धान्त को
उत्तर:
(स) पेन- स्पर्मिया ( सर्वबीजाणु) सिद्धान्त को

36. “मिल्की वे” क्या है?
(अ) आकाश गंगा
(ब) प्रकाश वर्ष
(स) महासागर
(द) पेन- स्पर्मिया
उत्तर:
(अ) आकाश गंगा

37. तारकीय दूरियों को मापा जाता है-
(अ) किलोमीटर में
(स) प्रकाश वर्ष में
(ब) मीलों में
(द) किलो वाट में
उत्तर:
(स) प्रकाश वर्ष में

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
किस वैज्ञानिक ने साल्टेशन को प्रजाति की उत्पत्ति का मुख्य कारण बताया?
उत्तर:
ह्यूगो डी ब्रिज वैज्ञानिक ने साल्टेशन को प्रजाति की उत्पत्ति का मुख्य कारण बताया।

प्रश्न 2.
जीवात् जीवोत्पत्ति का सिद्धान्त किसने दिया था?
उत्तर:
जीवात् जीवोत्पत्ति का सिद्धान्त हार्वे तथा हक्सले ने दिया था।

प्रश्न 3.
आधुनिक मानव का वैज्ञानिक नाम क्या है?
उत्तर:
आधुनिक मानव का वैज्ञानिक नाम होमो सैपियन्स है।

प्रश्न 4.
वर्तमान मानव के सबसे निकट सम्बन्धी मानव का नाम बताइये।
उत्तर:
क्रोमैगनॉन मानव वर्तमान मानव का सबसे निकटतम सम्बन्धी है।

प्रश्न 5.
पृथ्वी का उद्भव किस आकाश गंगा से हुआ ?
उत्तर:
पृथ्वी का उद्भव मिल्की आकाश गंगा से हुआ।

प्रश्न 6.
अध: मानव ( Subhuman) व आदि मानव किसे माना गया?
उत्तर:
रामापिथिकस को अधः मानव तथा आस्ट्रैलोपिथेकस को आदिमानव माना गया है।

प्रश्न 7.
तारकीय दूरियों को किसमें मापा जाता है ?
उत्तर:
तारकीय दूरियों को प्रकाश वर्षों (Light Years) में मापा जाता है।

प्रश्न 8.
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति में कौनसा महाविस्फोटक का सिद्धान्त बताने का प्रयास करता है?
उत्तर:
बिग बैंग (Big Bang ) नामक महाविस्फोट ।

प्रश्न 9.
अनुरूपता ( Analogy) का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
ऑक्टोपस (Octopus) तथा स्तनधारियों की आँखें अनुरूपता का उदाहरण हैं।

प्रश्न 10.
औद्योगिक प्रदूषण के सूचक का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
लाइकेन (Lichen ) औद्योगिक प्रदूषण के सूचक होते हैं।

प्रश्न 11.
योजक कड़ी (Connecting Link) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जन्तुओं में कुछ जीव ऐसे होते हैं जिनमें दो वर्गों के लक्षण एक साथ पाये जाते हैं। ऐसे जन्तुओं को योजक कड़ी (Connecting Link) कहते हैं। उदाहरण- आर्किओप्टेरिस में रेप्टाइल्स व पक्षियों दोनों के लक्षण मिलते हैं ।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

प्रश्न 12.
योग्यतम की उत्तरजीविता से क्या समझते हो ?
उत्तर:
जीवन संघर्ष में केवल वे ही जीव जीवित रह पाते हैं. जिनमें वातावरण के अनुरूप अनुकूलन की क्षमता होती है। इसे ही योग्यतम की उत्तरजीविता कहते हैं।

प्रश्न 13.
जीवाश्म की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
चार्ल्स लायल के अनुसार – “पूर्व जीवों के चट्टानों से प्राप्त अवशेष जीवाश्म कहलाते हैं।”

प्रश्न 14.
अनुहरण (Mimicry) किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी जीव का दूसरों को धोखा देने के लिए, अपनी सुरक्षा या किसी अन्य लाभ (आक्रमण) के लिए दूसरे जीवों के या किसी अन्य प्राकृतिक वस्तु के समान दिखाई देना या नकल करना अनुहरण कहलाता है।

प्रश्न 15.
उत्परिवर्तन को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर:
जीवों के आनुवंशिक संगठन में अचानक वंशागत होने वाले परिवर्तन उत्परिवर्तन (Mutation) कहलाते हैं।

प्रश्न 16.
उस वैज्ञानिक का नाम बताइए जिसने स्वतः जननवाद (Spontaneous generations theory) को गलत सिद्ध किया ।
उत्तर:
लुईस पाश्चर (Louis Pasteur ) ने स्वतः जननवाद को गलत सिद्ध किया ।

प्रश्न 17.
डार्विनवाद की दो मुख्य संकल्पनाएँ कौन-सी हैं ?
उत्तर:

  • शाखनी अवरोहण (Branching Descent )
  • प्राकृतिक वरण विकास (Natural Selection ) ।

प्रश्न 18.
होमोसेपियन्स के प्रवसन का कारण कौन-सी भौगोलिक प्रजातियाँ हैं ?
उत्तर:
चार प्रजातियाँ है- नीग्रॉयड (Negroid), ऑस्ट्रेलॉयड (Australoid), कॉकेसायड्स (Caucasoids) तथा मंगोलायड्स (Mongoloids)।

प्रश्न 19.
कौन से युग (काल) को डायनोसौर का स्वर्णिम युग कहते हैं?
उत्तर:
मीसोजोइक युग (काल) को डायनोसौर का स्वर्णिम युग कहते हैं।

प्रश्न 20.
किस समुद्री जहाज पर डार्विन ने प्रकृति का अध्ययन किया?
उत्तर:
बीगल नामक समुद्री जहाज पर डार्विन ने प्रकृति का अध्ययन किया।

प्रश्न 21.
मानव के किस पूर्वज ने सर्वप्रथम दो पैरों पर चलना आरम्भ किया?
उत्तर:
आस्ट्रेलोपिथिकस ने सर्वप्रथम दो पैरों पर चलना आरम्भ किया।

प्रश्न 22.
एक बच्चा पैदा हुआ जिसमें एक छोटी-सी पूँछ है, बताइए यह किसका उदाहरण है?
उत्तर:
पूर्वजानुरूपता का उदाहरण है।

प्रश्न 23.
क्रोमेग्नॉन मानव भोजन ग्रहण करने के आधार पर किस प्रकार का प्राणी था ?
उत्तर:
क्रोमेग्नॉन मानव भोजन ग्रहण करने के आधार पर मांसाहारी प्रकार का प्राणी था।

प्रश्न 24.
जीव विज्ञान की वह शाखा जिसमें जीवाश्मों का अध्ययन किया जाता है उसे क्या कहते हैं ?
उत्तर:
जीवाश्म विज्ञान (पेलियोन्टोलॉजी) शाखा जिसमें जीवाश्मों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 25
उस वैज्ञानिक का नाम बताइए जिसने स्वतः उत्पत्तिवाद सिद्धान्त का विरोध किया?
उत्तर:
वैज्ञानिक लुई पाश्चर (Louis Pasteur ) ने स्वत: उत्पत्तिवाद सिद्धान्त का विरोध किया।

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प्रश्न 26.
दो कशेरूकी शरीर के अंगों के नाम लिखिए जो मनुष्य की अग्रपाद के समजात अंग होते हैं।
उत्तर:

  • व्हेल के फ्लिपर
  • पक्षी का पंख ।

प्रश्न 27.
बोगनविलिया का कांटा तथा कुकुरबिटा का प्रतान किस प्रकार के अंग हैं समजात अथवा समवृत्ति ? उनमें इस प्रकार की समानता किस प्रकार के विकास से आयी है ?
उत्तर:
बोगनविलिया का कांटा तथा कुकुरबिटा का प्रतान समजात अंग हैं। यह समानता अपसारी विकास से आयी है।

प्रश्न 28.
मानव विकास के क्रम में कौनसे मानव के मस्तिष्क का आकार 1400 सी. सी. था?
उत्तर:
निएंडरथल (Neanderthal) मानव के मस्तिष्क का आकार 1400 सी. सी था

प्रश्न 29.
‘ड्रायोपिथिकस’ तथा ‘रामापिथिकस’ नामक नर वानर में दो समानताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • इनके शरीर बालों से भरपूर थे।
  • दोनों गोरिल्ला एवं चिंपैंजी जैसे चलते थे ।

प्रश्न 30.
महाकपियों तथा मानव के पूर्वज के नाम लिखिए।
उत्तर:
महाकपियों तथा मानव के पूर्वज का नाम ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus) है।

प्रश्न 31.
किस वैज्ञानिक ने प्रयोग करते हुए यह प्रदर्शित किया कि “जीवन पहले से विद्यमान जीवन से ही निकलकर आता है “?
उत्तर:
लुई पाश्चर ।

प्रश्न 32.
ड्रायोपिथिकस तथा रामापिथिकस नरवानरों में अन्तर बताइए ।
उत्तर:
ड्रायोपिथिकस वनमानुष (ऐप) जैसे थे जबकि रामापिथिकस अधिक मनुष्यों जैसे थे।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
पूर्वजता या प्रत्यावर्तन (Atavism or Reversion) किसे कहते हैं? इसके कोई दो उदाहरण दीजिए ।
उत्तर:
जीव जातियों में कभी-कभी अचानक ऐसे लक्षण आ जाते हैं जो उनकी स्वयं की जाति में नहीं पाये जाते किन्तु बहुत समय पूर्व पुराने पूर्वजों में ये लक्षण पाये जाते थे। इसे पूर्वजता या प्रत्यावर्तन कहते हैं।
इन संरचनाओं द्वारा यह सिद्ध होता है कि जो इन संरचनाओं को रखते हैं उनका विकास उन पूर्वजों से हुआ है जिनमें ये संरचनाएँ पूर्ण विकसित रही होंगी।
उदाहरण-

  • मानव शिशु में पूँछ की उपस्थिति
  • लम्बे तथा शरीर पर घने बाल हमारा आदि कपियों से संबध दर्शाता है।

प्रश्न 2.
स्वतः जननवाद (Spontaneous Creation) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्वतः जननवाद (Spontaneous Creation) – इसके अनुसार जीवों की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों द्वारा स्वत: हुई है। इस सिद्धान्त
का प्रतिपादन वान हैलमाण्ट ने किया था। इन्होंने बताया कि पसीने से भीगे कपड़े तथा गेहूं के भूसे को एक साथ रखने से 21 दिन में चूहे उत्पन्न हो जाते हैं। नील नदी पर जब सूर्य की किरणें गिरती हैं तो जीवों का निर्माण होता है। नम मिट्टी में मेंढक बनते हैं। भारत में आज भी कई लोग विश्वास करते हैं कि गधे के मूत्र और गाय के गोबर से बिच्छू उत्पन्न हो जाते हैं। इस विचार को वैज्ञानिकों ने अस्वीकार कर दिया है।

प्रश्न 3.
जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के संबंध में प्रमाणित हुए कोई चार तथ्य लिखिए।
उत्तर:
जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के संबंध में निम्न चार तथ्य प्रमाणित हुए-

  • जीवाश्म जो कि पुरानी चट्टानों से प्राप्त हुए सरल प्रकार के तथा जो नई चट्टानों से प्राप्त हुए जटिल प्रकार के थे।
  • विकास के प्रारम्भ में एककोशिकी प्रोटोजोआ जन्तु बने जिनसे बहुकोशिकी जन्तुओं का विकास हुआ।
  • कुछ जीवाश्म विभिन्न वर्ग के जीवों के बीच की योजक कड़ियों को प्रदर्शित करती हैं।
  • पौधों में एन्जिओस्पर्म (Angiosperm) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (Mammals) सबसे अधिक विकसित और आधुनिक हैं।
  • जीवाश्म के अध्ययन से किसी भी जन्तु जीवाश्म कथा ( विकासीय इतिहास) या वंशावली (Pedigree) का क्रमवार अध्ययन किया जा सकता है।

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प्रश्न 4.
जैव विकांस से क्या अभिप्राय है? समझाइये |
उत्तर:
ओपेरिन वैज्ञानिक के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद इसके जल भण्डार में रासायनिक पदार्थों के संयोजन से जीव की उत्पत्ति हुई। ये एक सरल कोशिका के बने जीव थे, इन्हीं से जैव विकास की क्रिया द्वारा विभिन्न प्रकार के जीवों की उत्पत्ति हुई। उद्विकास या जैव विकास का शाब्दिक अर्थ है, “सिमटी वस्तु का खुलकर या फैलकर समय-समय पर हुए परिवर्तनों को प्रदर्शित करना, सरल जीवों से जटिल जीवों के उत्पत्ति क्रम को जैव विकास कहते हैं।

” अन्य शब्दों में प्रारम्भिक निम्न कोटि के जीवों से क्रमिक परिवर्तनों द्वारा जटिल जीवों की उत्पत्ति को जैव विकास कहते हैं। ‘परिवर्तन के साथ अवतरण’ जैव विकास की मौलिक कल्पना है। पृथ्वी पर आवास करने वाले जीवधारी एक-दूसरे से भिन्न हैं परन्तु इन सभी का संरचनात्मक संगठन एक ही है, अर्थात् प्रत्येक का शरीर कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। सभी जीवों में जैविक क्रियायें समान रूप से होती हैं। सभी जीव अपना जीवन एक कोशिका समान संरचना युग्मनज से प्रारम्भ करते हैं जो इन विविध जीवधारियों के एक पूर्वजता को दर्शाता है।

प्रश्न 5.
डार्विनवाद को समझाने के लिए वैज्ञानिक वालेस ने कौन-सा चार्ट प्रस्तुत किया? समझाइए ।
उत्तर:
डार्विनवाद को समझाने के लिए वालेस ने एक चार्ट प्रस्तुत किया जिसे वालेस चार्ट कहते हैं-
यह सिद्धान्त बाद में डार्विन की पुस्तक, प्राकृतिक वरण द्वारा जाति उत्पत्ति में समझाया गया।

प्रमाणित तथ्य (Facts)परिणाम (Consequences)
(अ) जीव-जन्तुओं में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता

(ब) एक जाति के प्राणियों की संख्या स्थिर

जीवन संघर्ष
(अ) जीवन संघर्ष

(ब) विभिन्नताएँ तथा आनुवंशिकता

योग्यतम की उत्तरजीविता या प्राकृतिक वरण
(अ) योग्यतम की उत्तरजीविता

(ब) वातावरण में सतत् परिवर्तन

निर्तर प्राकृतिक वरण द्वारा नयी जाति की उत्पत्ति

प्रश्न 6.
जीवन की उत्पत्ति व विकास के सम्बन्ध में मिलर द्वारा किये गये प्रयोग को समझाइये |
अथवा
स्टैनले मिलर के प्रयोग का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइये ।
उत्तर:
मिलर ने एक तर्कपूर्ण प्रयोग किया। इस प्रयोग का उद्देश्य उस परिकल्पना का परीक्षण करना था जिसके अनुसार यह माना जाता है। कि अमीनो अम्ल सदृश पदार्थ अमोनिया, जल एवं मीथेन जैसे प्रथम यौगिकों से बने होंगे। मिलर ने एक विशिष्ट वायुरोधक उपकरण जिसे चिन्गारी विमुक्त उपकरण (Spark Discharge Apparatus) कहते हैं।

इस उपकरण में मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन (2:1:2) एवं जल का उच्च ऊर्जा ले विद्युत स्फुलिंग (High Energy Electrical Spark) में से परिवहन किया। जलवाष्प एवं उष्णता की पूत उबलते हुए जल के पात्र द्वारा की गई। परिवहन करती हुई जलवाष्प ठण्डी व संघनित होकर जल में परिवर्तित हो गई।
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इस प्रयोग का उद्देश्य उन परिस्थितियों का निर्माण करना था जो कि जीव की उत्पत्ति के समय पृथ्वी पर रही होंगी। मिलर ने दो सप्ताह तक इस उपकरण में गैसों का परिवहन होने दिया । इसके बाद उसने उपकरण की ‘U’ नली में जमे द्रव को निकाल कर निरीक्षण किया तो इसमें अमीनो अम्ल एवं कार्बनिक अम्लों के साथ-साथ राइबोस, शर्करा, प्यूरीन्स, पिरामिडिन्स आदि पाये गए।

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प्रश्न 7.
निएण्डरथल मानव के जीवाश्म कहाँ पाये गये? इसकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इसके जीवाश्म सी. फूहलरोट (C. Fullhrott) द्वारा 1956 में जर्मनी की निएण्डर घाटी से प्राप्त हुए या पाये गये । विशेषताएँ निम्न हैं-

  • इनकी उत्पत्ति और विकास 40,000 से 1 लाख वर्ष पहले हुआ।
  • ये खुले मैदानों में झोंपड़ियाँ बनाकर रहते थे।
  • कपाल गुहा का आयतन 1300-1600 सी.सी. (आज के मानव के समान) औसतन (1400 सी. सी.) ।
  • पूर्व ऊर्ध्व शरीर था।
  • शरीर पर बाल पूर्व मानव की तुलना में संख्या में कम थे ।
  • अल्पविकसित ठोड़ी (Chin) उपस्थित थी (आर्थीग्नेथस चेहरा) ।
  • बोलने का केन्द्र (Speech Centre) का प्रारम्भ इसी मानव से हुआ।
  • ये जानवरों की खाल के कपड़े पहनते थे ।
  • ये अपने मृतकों को क्रियाकर्म के साथ दफनाते थे।
  • स्वभाव में सर्वाहारी ।

प्रश्न 8.
जीवन की उत्पत्ति अंतरिक्ष से होने पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
कुछ वैज्ञानिक यह मानते हैं कि जीवन अंतरिक्ष से आया है। पूर्व ग्रीक विचारकों का मानना है कि जीवन की ‘स्पोर’ नामक इकाई विभिन्न या अनेक ग्रहों में स्थानान्तरित हुई, पृथ्वी जिसमें एक थी। कुछ खगोल वैज्ञानिक ‘पैन स्पर्मिया’ (सर्वबीजाणु) को अभी भी मान्यता देते हैं।

प्रश्न 9.
औद्योगिक अतिकृष्णता का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राकृतिक वरण के सिद्धान्त के अध्ययन के लिये इंग्लैण्ड में पाये जाने वाले विशेष शलभ (Moth Bistoy Betularia) का परीक्षण किया। इस प्रयोग के अध्ययन से यह तथ्य स्पष्ट हुआ कि इंग्लैण्ड में औद्योगिक विकास से पूर्व की वनस्पतियों के तने भूरे रंग के थे क्योंकि उन पर भूरी लाइकेन परत के रूप में जमा थी।

उस समय वहाँ भूरे रंग के शलभ की संख्या बहुत अधिक थी तथा काले रंग के शलभ कार्बोनेरिया संख्या में कम एवं दुर्लभ थे। इसका सम्भावित कारण तनों का भूरा रंग भूरे शलभों की मांसाहारी पक्षियों से सुरक्षा प्रदान कर रहा था क्योंकि तनों पर शलभ के समान पृष्ठभूमि के कारण पहचान में नहीं आते। औद्योगिक विकास होने पर कोयले का अत्यधिक उपयोग किया जाने लगा।

इससे वातावरण में कालिख की मात्रा बढ़ गई। जिसके फलस्वरूप तनों पर कालिख के जमने के कारण उनका रंग काला हो गया। इस समय भूरे शलभ पक्षियों की पहचान में आसानी से आने लगे। उन्होंने इन्हें मारकर नष्ट कर दिया। कुछ समय बाद देखा कि भूरे रंग की शलभों की संख्या तो कम हो गई परन्तु काले रंग के शलभों की संख्या में भारी वृद्धि हो गई क्योंकि इस समय तनों का रंग काला उनको सुरक्षा प्रदान कर रहा है।

वर्तमान में उद्योगों में कोयले के स्थान पर बिजली का उपयोग किया जाने लगा जिससे वातावरण में कालिख एवं धुआँ लगभग समाप्त हो गया जिसके कारण वनस्पतियों के तने वापस अपने पूर्व रंग अर्थात् भूरे हो गये। इस रंग परिवर्तन का प्रभाव काले रंग के शलभों की संख्या पर भी पड़ा।

अब पक्षियों द्वारा काले शलभों को पहचान लिए जाने के कारण इनका भक्षण अधिक संख्या में होने लगा परन्तु भूरे रंग के शलभों को पक्षी द्वारा नहीं पहचान पाने के कारण शिकार होने से बच गये। इससे इनकी संख्या में पुनः पूर्ववत् वृद्धि हो गई। इस तरह प्रकृति जीवों के चयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 10.
कृत्रिम चयन ( Artificial Selection) किसे कहते हैं? उदाहरण देकर समझाइये |
उत्तर:
कृत्रिम चयन ( Artificial Selection ) – मानव द्वारा जननिक विभिन्नताओं का उपयोग जन्तुओं तथा पौधों की उत्तम क्वालिटी नस्ल सुधार के लिए किया जाता है मानव वांछनीय लक्षणों वाले सदस्यों का आबादी से चयन कर उन्हें उन सदस्यों से पृथक् कर लेता है जिनमें ये लक्षण नहीं पाये जाते। अब चयनित सदस्यों के बीच अंत:प्रजनन (Interbreeding) कराई जाती है।

इस प्रक्रिया को ही कृत्रिम वरण चयन ( Artificial Selection) कहते हैं। यदि यह प्रक्रिया कई पीढ़ियों तक जारी रहे तो अंततः एक नई वांछनीय लक्षणों वाली प्रजाति की उत्पत्ति हो जाती है। जन्तु प्रजनकों (Animal Breeders) द्वारा कृत्रिम चयन के माध्यम से अनेक पालतू जानवरों की वांछनीय लक्षणों युक्त जातियों का उनके सामान्य पूर्वजों से विकास किया गया है जैसे कुत्ता, घोड़ा, कबूतर, मुर्गी, गाय, बकरी, भेड़ और सुअर आदि।

इसी प्रकार पादप प्रजनकों (Plant breeders) द्वारा उपयोगी पौधों की उत्तम किस्मों को प्राप्त किया गया है जैसे गेहूं, चावल, गन्ना, कपास, दाल, सब्जियाँ और फल आदि। कृत्रिम चयन प्राकृतिक वरण के ही समान हैं केवल इसमें प्रकृति का स्थान मानव द्वारा मानव उपयोगी लक्षणों के विकास के लिये ले लिया जाता है। चयनित लक्षण मानव उपयोगी होते हैं।

प्रश्न 11.
जन्तु वर्गीकरण किस प्रकार से जैव विकास को प्रमाणित करता है?
उत्तर:
प्रकृति में पाये जाने वाले विविध जाति के जन्तुओं को समानताओं (similarities) एवं विभिन्नताओं (dissimilarities) के आधार पर छोटे या बड़े समहों में वर्गीकृत (classify) किया गया है। जैव विकास का यह महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। सभी जन्तुओं को सर्वप्रथम लीनियस ने द्विनाम पद्धति के आधार पर विभिन्न समुदायों में बाँटा था।

पृष्ठवंशी उपसमुदाय (Subphylum vertebrata) को कई वर्गों (classes) में बाँटा गया जो कि क्रमिक विकास के अनुसार चतुर्मुखीय (cyclostomes), मत्स उभयचरों (Amphibians), सरीसृपों (Reptiles), पक्षियों (Aves) तथा स्तनियों (Mammals) में श्रेणीबद्ध किया गया है।

इस क्रम से स्पष्ट है कि आदिकाल में किसी अपृष्ठवंशी (non-chordates) मछली सदृश जन्तु से परिवर्तित होकर मछली बनी, मछली से विकसित होकर उभयचर, उभयचर से सरीसृप, सरीसृप से पक्षी तथा बाद में स्तनी बने। इन सब वर्गों में क्रमिक विकास का प्रमाण इनमें पायी जाने वाली समानताओं के द्वारा मिलता है। वर्गीकरण की इस विधि से समस्त जन्तुओं व पेड़-पौधों का वंश वृक्ष (Family tree) तैयार किया जा सकता है जिससे समुदाय प्रोटोजोआ से लेकर पृष्ठवंशी (Chordata) तक विभिन्न समुदायों के जन्तुओं में क्रमिक विकास का प्रमाण मिलता है।

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प्रश्न 12.
संयोजक कड़ियों से आप क्या समझते हैं? उचित उदाहरण देकर इनका जैव विकास में महत्व को समझाइए ।
उत्तर:
जीवों के वर्गीकरण में समान गुणों वाले जीवों को एक ही वर्ग में रखा गया है। कुछ जन्तु ऐसे भी हैं जिनमें दो वर्गों के गुण पाये जाते हैं। इन जन्तुओं को योजक कड़ियाँ (Connecting links) कहते हैं।

संयोजक कड़ियों के उदाहरण-
आर्किओप्टेरिक्स (Archeopteryx ) – जर्मनी के बवेरिया प्रदेश में आर्किओप्टेरिक्स नामक जन्तु के जीवाश्म मिले हैं। इस जन्तु के कुछ लक्षण जैसे चोंच, पंख, पैरों की आकृति एवीज वर्ग (पक्षी वर्ग) के तो कुछ लक्षण जैसे दाँत, पूँछ तथा शरीर के शल्कों का होना रेप्टीलिया वर्ग के हैं। अत: इस जन्तु को एवीज तथा रेप्टीलिया वर्ग के मध्य योजक कड़ी कहते हैं।

इससे प्रमाणित होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों (Reptiles ) से हुआ है। जैव विकास में संयोजक कड़ियों का महत्त्व-संयोजक कड़ियाँ जैव विकास को प्रमाणित करने के लिए महत्त्वपूर्ण आधार हैं। इनके माध्यम से विभिन्न जातियों एवं वर्गों की निश्चित वंशावली एवं पूर्वजों का ज्ञान उपलब्ध होता है। इनमें जैव विकास का क्रम और दिशा भी निर्धारित होती है।

प्रश्न 13.
उत्परिवर्तन किसे कहते हैं? उत्परिवर्तन सिद्धान्त के मुख्य बिन्दुओं का वर्णन कीजिये ।
उत्तर:
डी – ब्रीज (1901) ने इवनिंग प्रिमरोज जाति के पौधों पर परीक्षणों के पश्चात् ज्ञात किया कि कुछ पौधे अकस्मात् अपनी जाति से बिल्कुल भिन्न हो जाते हैं। यही नहीं, विभिन्न लक्षण वंशागत होकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते रहते हैं और नयी जाति का निर्माण करते हैं। जातीय लक्षणों में अकस्मात् वंशागत परिवर्तनों की क्रिया को डी- ब्रीज ने उत्परिवर्तन की संज्ञा दी एवं उत्परिवर्तनवाद का सिद्धान्त दिया। आधुनिक अनुसंधानों से यह भी पता चल चुका है कि जीवों में उत्परिवर्तन उनकी जनन कोशिकाओं में स्थित गुणसूत्रों एवं जीन्स की व्यवस्था में परिवर्तन के कारण होता है।

डी- ब्रीज के उत्परिवर्तन सिद्धान्त के तथ्य निम्नलिखित हैं-

  1. प्राकृतिक रूप से जनन करने वाली जातियों या समष्टियों में समय-समय पर उत्परिवर्तन विकसित होते हैं। उत्परिवर्ती जीव (mutant organisms) जनक जीवों से भिन्न होते हैं।
  2. उत्परिवर्तन वंशागत होते हैं तथा इनसे नयी जातियों का विकास होता है।
  3. उत्परिवर्तन दीर्घ एवं आकस्मिक होते हैं।
  4. ये किसी भी दिशा में हो सकते हैं। अतः लाभप्रद भी हो सकते हैं और हानिकारक भी।
  5. उत्परिवर्तनों पर प्राकृतिक वरण का प्रभाव पड़ता है। लाभप्रद उत्परिवर्तन जीवों के अन्दर संचित कर लिये जाते हैं और हानिकारक उत्परिवर्तन वाले जीव प्राकृतिक वरण द्वारा नष्ट हो जाते हैं।
  6. डार्विन ने इन आकस्मिक परिवर्तनों को स्पोर्ट्स (Sports) का नाम दिया। अंगों का अत्यधिक विशेषीकरण (Specialization) की व्याख्या इन्हीं स्पोर्ट्स (Sports) या आकस्मिक उत्परिवर्तन द्वारा की जा सकती है।
  7. अंगों के विकास की प्रारम्भिक अवस्था को उत्परिवर्तन सिद्धान्त के द्वारा समझाया जा सकता है, क्योंकि उत्परिवर्तन प्रारम्भ से ही पूर्ण होते हैं।

उत्परिवर्तनवाद का महत्त्व – इसमें किंचित् मात्र भी सन्देह नहीं है कि उत्परिवर्तन प्रकृति में होते हैं तथा विकास में इनका योगदान होता है। प्राकृतिक वरण एवं उत्परिवर्तनों के फलस्वरूप ही जीवों में विकास होता है।

प्रश्न 14.
डार्विन के संदर्भ में जीवन-संघर्ष को समझाइए ।
अथवा
डार्विन के अनुसार प्रकृति में जीवन संघर्ष कितने प्रकार का होता है? समझाइए ।
उत्तर:
जीवन संघर्ष तीन प्रकार का होता है-
(i) अन्त: जातीय संघर्ष यह एक ही जाति के सदस्यों के मध्य होता है, जैसे-दो कुत्तों के मध्य रोटी का टुकड़ा फेंक दिया जाये तो वे आपस में लड़ने लगते हैं। उनमें से जो अधिक शक्तिशाली होता है वही रोटी ग्रहण कर लेता है। अन्त: जातीय संघर्ष भोजन, स्थान व जनन के लिये होता है।

(ii) अन्तर्जातीय संघर्ष – यह संघर्ष दो विभिन्न जातियों में होता है। प्राय: देखा जाता है कि चूहे को देखते ही बिल्ली उसे खाने को दौड़ती है। चूहा अपनी रक्षा का प्रयास करता है। यह संघर्ष प्रायः भोजन के लिये होता है।

(iii) वातावरण संघर्ष – पृथ्वी के वातावरण में कई परिवर्तन होते रहते हैं। जैसे अधिक सर्दी, अधिक गर्मी, भूचाल, वर्षा आदि। जीवों को ऐसे परिवर्तनों से संघर्ष करना पड़ता है।

प्रश्न 15.
कपि एवं मानव में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कपि (Apes) एवं मानव ( Human) में अन्तर –

कपि (Apes)मानव (Human)
1. अर्द्ध ऊर्ध्व स्थितिपूर्ण ऊर्ध्व स्थिति
2. गर्दन छोटी व धंसी हुईलम्बी तथा ऊर्ध्व गर्दन
3. पूर्ण शरीर पर बालों की घनी वृद्धिमानव में घनी वृद्धि केवल कुछ स्थानों पर होती है।
4. कपाल गुहा का आयतन (cranial capacity) कम होता है। (450-500 सी.सी.)कपाल गुहा का आयतन (cranial capacity) अधिक होता है (1300-1600 सी.सी.)
5. कम बुद्धिमान होते हैंअधिक बुद्धिमान होते हैं
6. अग्र पाद पश्च पादों से लम्बेअग्र पाद पश्च पादों से छोटे
7. जबड़े ‘U’ आकृति के होते हैंमानव में अर्द्धवृत्ताकार जबड़े होते हैं
8. ठोड़ी (Chin) अनुपस्थित होती हैठोड़ी (Chin) उपस्थित होती है
9. अंगूठा हथेली के समानान्तर होता हैसम्मुख अंगूठा (हथेली के समकोण पर स्थित)
10. श्रोणि मेखला दीर्घीतचौड़ी श्रोणि मेखला
11. प्रमुख रूप से वृक्षाश्रयी वासस्थलीय वास
12. ऊपरी होंठ पर खाँच नहीं होतीऊपरी होंठ पर मध्यवर्ती खाँच (Furrow) उपस्थित
13. शिशु एवं बाल्यावस्था अपेक्षाकृत छोटीशिशु एवं बाल्यावस्था लम्बी
14. मादा में उभरे हुए स्तन नहींमादा में स्तन उभरे हुए
15. प्रीमैक्सिली हड्डियाँ मैक्सिली से पृथक्प्रीमैक्सिली हड्डियाँ मैक्सिली से समेकित

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प्रश्न 16.
डी – ब्रीज और लेमार्क के सिद्धान्त में क्या अन्तर है? समझाइए ।
उत्तर:
डी ब्रीज और लेमार्क के सिद्धान्त में अन्तर-

डी-व्रीज के सिद्धान्तलेमार्क के सिद्धान्त
1. डी-व्रीज ने जैव विकास के उत्परिवर्तन के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।जबकि लैमार्क ने उपार्जित लक्षणों की वंशागति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
2. डी-व्रीज के मतानुसार नई जातियों की उत्पत्ति छोटी-छोटी विभिन्नताओं के वंशागत होने से नहीं बल्कि उत्परिवर्तन के कारण आकस्मिक बड़ी विभिन्नताओं के वंशागत होने से होती है ।लैमार्क के मतानुसार जीवों की वृद्धि एवं उनकी आकृति पर वातावरण का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है जिससे उनके अंगों की संरचना में धीरेधीरे परिवर्तन होने लगता है। यह उपार्जित परिवर्तन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पैतृक गुणों में वंशागत रहते हैं।
3. उदाहरण-इवनिंग प्रिमरोजउदाहरण-जिराफ की गर्दन का लम्बा होना।

प्रश्न 17.
पादप या उसके भागों में पायी जाने वाली समजातता एवं तुल्यरूपता उपयुक्त उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर:
समजातता व्हेल, चमगादड़ों, चीता और मानव (सभी स्तनधारी) अग्रपाद की अस्थियों में समानता दर्शाते हैं। ये यद्यपि भिन्न-भिन्न क्रियाकलाप करते हैं परन्तु इनकी शारीरिक संरचना समान होती है। ये सभी संरचनाएँ समजातीय होती हैं, जिनमें समान पूर्वज परम्पराएँ होती हैं; इसे समजातता कहते हैं। तुल्यरूपता- पक्षी एवं तितलियों के पंख लगभग एक समान दिखते हैं; लेकिन इनमें पूर्वज परम्परा सामान्य नहीं है और न ही शरीर की रचना में समानता है। भले ही वे समान क्रिया को सम्पन्न करते हैं।

प्रश्न 18.
पृथ्वी पर जीवन के विकास की प्रक्रिया में डार्विन तथा डी- ब्रीज के मतों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
डार्विन तथा डी ब्रीज के मतों में अन्तर-

डार्विन का मतडी व्रीज का मत
1. डार्विन के परिवर्तन छोटे तथा दिशात्मक हैं।जबकि डी-व्रीज के उत्परिवर्तन (Mutation) आकस्मिक तथा दिशाहीन हैं।
2. डार्विन के अनुसार परिवर्तन तथा प्राकृतिक वरण अनेक पीढ़ियों के पश्चात् उत्पन्न होता है जो कि नई जाति के लिए उत्तरदायी होता है।जबकि डी-व्रीज के अनुसार आकस्मिक उत्परिवर्तन के द्वारा नयी जाति उत्पन्न होती है।
3. डार्विन के अनुस्रार विकास धीरे-धीरे अर्थात् चरणों में हुआ है।जबकि डी-व्रीज के अनुसार विकांस एक चरण में हुआ है।

प्रश्न 19.
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास 2
ऊपर दिखाये गए डार्विन के फिंच पक्षियों में आप क्या भिन्नताएँ देख रहे हैं? लिखिए।
अथवा
गैलेपेगॉस द्वीपों पर फिंचों की विभिन्न किस्मों के अस्तित्व को डार्विन ने किस प्रकार समझाया ?
उत्तर:
डार्विन ने दक्षिण अमेरिका के समीप स्थित गेलेपेगोस द्वीप (Galapogos Island) की भिन्न वातावरणीय परिस्थितियों के कारण उपस्थित भिन्न प्रकार के जन्तु और पादप समष्टि (Fauna \& Flora) अध्ययन किया। उन्होंने एक प्रकार की चिड़िया जिसे डार्विन की फिंच (Darwin’s Finch) के नाम से जाना जाता है, उसका अध्ययन किया।

उन्होंने लगभग 20 प्रकार की चिड़ियाँ (Finches) देखीं, जो विश्व के किसी क्षेत्र में नहीं मिलती हैं। इन सभी फिंच की चोंच की आकृति अलग-अलग प्रकार की थी। इसकी एक जाति की फिंच अपनी चोंच से पेड़ की छाल को भेद तो देती थी पर भेदे हुए छिद्र के अन्दर से कीटों (Insects) को निकालने में असमर्थ थी अत: यह फिंच चोंच से एक कांटे की सहायता से कीटों को निकाल कर भक्षण करती थी।

ये सभी चिड़ियाँ (फिंच) देखने पर भिन्न-भिन्न प्रकार की थीं लेकिन ये सभी फिंच जाती की थीं जिनका मूल निवास दक्षिणी अमेरिका था। इनमें से कुछ सम्भवतया इन द्वीपों पर पहुँच गयीं और धीरे-धीरे इनमें भिन्न वातावरण में अनुकूलन स्थापित होने के फलस्वरूप चिड़ियों के खाने में अर्थात् उपलब्ध भोजन के आधार पर परिवर्तन आया।

प्रारम्भ में ये बीजभक्षी थीं, फिर शाकाहारी और अन्त में कीटभक्षी हो गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन पक्षियों की चोंच में भिन्नता स्थानीय वातावरण एवं उसमें उपलब्ध भोजन से अनुकूलनता का परिणाम है। इस तरह मूल रूप से एक जाति के पक्षी में जो भिन्न-भिन्न वातावरण में अभिगमन कर गये उनसे अनेक जातियों एवं उपजातियों का विकास हुआ।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

प्रश्न 20.
(i) वह कौनसा विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र है जहाँ ये जीव पाये जाते हैं?
(ii) उस परिघटना का नाम लिखिए एवं समझाइए जिसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में इतनी विविध जातियों का विकास हुआ है।
(iii) अपरा (प्लेसेन्टल) भेडिया और तस्मानियाई भेड़िया का साथ-साथ एक ही पर्यावरण में रहते रहना किस प्रकार सम्भव हुआ, कारण प्रस्तुत करते हुए समझाइए।
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उत्तर:
यदि जैव विकास (Organic Evolution) हुआ है तो प्रारम्भ से लेकर आज तक की जीव-जातियों की रचना, कार्यिकी एवं रसायनी, भ्रूणीय विकास, वितरण आदि में कुछ न कुछ सम्बन्ध एवं क्रम होना आवश्यक है। लैमार्क, डार्विन वैलेस, डी व्रिज आदि ने जैव विकास के बारे में अपनी-अपनी परिकल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए इन्हीं – सम्बन्धों एवं क्रम को दिखाने वाले प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिन्हें हम

निम्नलिखित श्रेणियों में बाँट सकते हैं-

  1. जीवों की तुलनात्मक संरचना
  2. शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण
  3. संयोजक कड़ियों के प्रमाण
  4. अवशेषी अंग
  5. भ्रोणिकी से प्रमाण
  6. जीवाश्मीय प्रमाण
  7. जीवों के घरेलू पालन से प्रमाण
  8. रक्षात्मक समरूपता

(1) जीवों की तुलनात्मक संरचना ( Comparative Anatomy) से प्रमाण – जन्तुओं में शारीरिक संरचनाएँ दो प्रकार की होती हैं-
(i) समजात अंग (Homologous organ ) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हो, समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं। इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फ्लिपर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल (ह्यूमरस, रेडियस अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स व अंगुलास्थियाँ ) की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं।
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कीटों के मुखांग (Mouth Parts of Insects ) – कीटों के मुखांग क्रमशः लेब्रम ( Labrum), मेण्डिबल (Mandibles), मैक्सिला (Maxilla), लेबियम (Labium) एवं हाइपोफे रिंक्स (hypopharynx) से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक कीट में इनकी संरचना एवं परिवर्धन समान होता है लेकिन इनके कार्यों में भिन्नता पाई जाती है।

कॉकरोच के मुखांग भोजन को काटने व चबाने (Biting and Chewing) का कार्य करते हैं । तितली एवं मक्खी में भोजन चूसने का एवं मच्छर में मुखांग भेदन एवं चूषण (Piercing and Sucking) दोनों का कार्य करते हैं। अकशेरुकियों के पैर (Legs of Invertibrates) – इसी प्रकार कॉकरोच एवं मधुमक्खी ( Honeybee) के टांगों के कार्य भिन्न- भिन्न हैं।

कॉकरोच अपनी टांगों का उपयोग चलने (Walking) में करता है जबकि मधुमक्खी अपनी टांगों का उपयोग परागकण को एकत्रित (Collecting of Pollens) करने में करती है। जबकि दोनों की टांगों में खण्ड पाये जाते हैं तथा सभी खण्ड समान होते हैं जैसे कॉक्सा (Coxa), ट्रोकेन्टर (Trochanter ), फीमर (Femur), टिबिया (Tibia), 1 से 5 युग्मित टारसस (1-5 Jointed Tarsus)।
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बोगेनविलिया का काँटा और कुकुरबिटा के प्रतान (Tendril) में समानता होती है। इसी प्रकार और भी उदाहरण जैसे

  1. आलू व अदरक,
  2. गाजर व मूली ।

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1. अपसारित विकास ( अनुकूली अपसारिता / अनुकूली विकिरण ) [Divergent Evolution (adaptive divergence / adaptive radiation)] – विभिन्न जन्तुओं में पायी जाने वाली समजातता यह प्रदर्शित करती है कि इन सबकी उत्पत्ति किसी समान पूर्वज से हुई है। किसी एक पूर्वज से उत्पन्न होने के बाद जातियाँ अपने-अपने आवासों के अनुसार अनुकूलित हो जाती हैं। जिसे ही अनुकूली विकिरण या अपसारित विकास कहते हैं। इन जातियों में समजात अंग (Homologous Organs) पाये जाते हैं । जैसे आस्ट्रेलिया में अनुकूली विकिरण के द्वारा ही विभिन्न प्रकार के मासूपिल्स (Marsupials) की उत्पत्ति हुई ।
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2. समवृत्ति अंग (Analogous Organs) – वे अंग जिनके कार्य समान हों किन्तु उनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में अन्तर हो, समवृत्ति अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए-कीट, पक्षी तथा चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते हैं परन्तु इनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में बड़ा अन्तर होता है । इन अंगों में केवल आभासी समानताएँ पाई जाती हैं। वातावरण एवं स्वभाव के कारण कार्यों में समानता होती है। कीट के पंखों का विकास शरीर की भित्ति से निकले प्रवर्गों के रूप में होता है जबकि पक्षी एवं चमगादड़ में इनकी उत्पत्ति शरीर भित्ति के प्रवर्गों के रूप में नहीं होती है । अतः इनके कार्यों में तो समानता होती है, परन्तु उत्पत्ति एवं संरचना में भिन्नता होती है।
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इसी तरह मधुमक्खी के डंक एवं बिच्छू के डंक दोनों ही समान कार्य करते हैं परन्तु इनकी संरचना एवं परिवर्धन भिन्न होता है । मधुमक्खी एक कीट है, इसके बाह्य जननांग मिलकर अण्ड निक्षेपक (Ovipositor) नाल बनाते हैं। यही अण्ड निक्षेपक नाल रूपान्तरित होकर डंक बनाती है जबकि बिच्छू में शरीर का अन्तिम खण्ड रूपान्तरित होकर डंक बनाता है।

इसके अतिरिक्त समवृत्ति के उदाहरण निम्न हैं-

  • ऑक्टोपस (अष्ट भुज) तथा स्तनधारियों की आँखें (दोनों में रेटिना की स्थिति में भिन्नता है) या पेंग्विन और डॉल्फिन मछलियों के फिलपर्स ।
  • रस्कस का पर्णाभ स्तम्भ (Phylloclade) और सामान्य पर्ण।
  • आलू (तना) और शकरकंद (जड़)।

समवृत्ति अंगों में कार्य की समानता एवं विशिष्ट वातावरण की आवश्यकता के अनुरूप विकास, अभिसरण जैव विकास (Convergent Evolution) को प्रकट करता है।

(2) शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण (Evidence from Physiology and Biochemistry)-fafum. जीव शरीर क्रिया और जैव रसायन में समानता प्रदर्शित करते हैं, कुछ स्पष्ट उदाहरण निम्न हैं-

  • जीवद्रव्य (Protoplasm) – जीवद्रव्य की संरचना और संगठन सभी जन्तुओं में (प्रोटोजोआ से स्तनधारियों तक) लगभग समान होती है।
  • एन्जाइम (Enzyme) – सभी जीवों में एन्जाइम समान कार्य करते हैं। जैसे ट्रिप्सिन ( Trypsin) । अमीबा से लेकर मानव तक प्रोटीन पाचन और एमाइलेज (Amylase) पॉरीफेरा से स्तनधारियों तक स्टार्च पाचन करता है।
  • रुधिर (Blood) – रुधिर की रचना सभी कशेरुकियों में लगभग समान होती है।
  • हार्मोन (Hormones) – सभी कशेरुकियों में समान प्रकार के हार्मोन बनते हैं, जिनकी रचना व कार्य समान होते हैं।
  • अनुवांशिक पदार्थ (Hereditary Material) – सभी जीवों में आनुवांशिक पदार्थ DNA होता है जिसकी मूल संरचना सभी जीवों में समान होती है।
  • ए.टी.पी. (ATP) – सभी जीवों में जैविक ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ATP के रूप में ऊर्जा संचित होती है।
  • साइटोक्रोम – सी (Cytochrome – C) – यह श्वसन वर्णक है जो सभी जीवों के माइटोकॉन्ड्रिया में उपस्थित होता है। इस प्रोटीन में 78-88 तक अमीनो अम्ल एक समान होते हैं जो समपूर्वजता को प्रदर्शित करते हैं।

इस प्रकार शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सभी जीवों का विकास एक ही मूल पूर्वज (Common Ancestor) से हुआ है।

(3) संयोजक कड़ियों के प्रमाण (Evidence of Connective Links) – जीवों के वर्गीकरण में समान गुणों वाले जीवों को एक ही वर्ग में रखा गया है। कुछ जन्तु ऐसे भी हैं जिनमें दो वर्गों के गुण पाये जाते हैं। इन जन्तुओं को योजक कड़ियाँ (Connective Links) कहते हैं।

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संयोजक कड़ियों के उदाहरण-
(i) आर्किओप्टेरिक्स (Archeopteryx) – जर्मनी के बवेरिया प्रदेश में आर्किओप्टेरिक्स नामक जन्तु के जीवाश्म मिले हैं। इस जन्तु के कुछ लक्षण जैसे चोंच, पंख, पैरों की आकृति, एवीज वर्ग (पक्षी वर्ग) के तो कुछ लक्षण जैसे दाँत, पूँछ तथा शरीर पर शल्कों का होना रेप्टीलिया वर्ग के हैं।
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अतः इस जन्तु को एवीज तथा रेप्टीलिया वर्ग के मध्य योजक कड़ी कहते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों (Reptiles) से हुआ है।

(ii) प्लेटीपस और एकिडना (Platypus and Echidna ) – प्लेटीपस और एकिडना दोनों ही मैमेलिया वर्ग के जन्तु हैं। इनके शरीर पर बाल पाये जाते हैं तथा बच्चों को दूध पिलाने के लिए दुग्ध ग्रन्थियाँ (Mammary Glands) होती हैं जो मैमेलिया वर्ग के लक्षण हैं। ये दोनों ही जन्तु रेप्टीलिया वर्ग के जन्तुओं की भाँति कवचदार पीतकयुक्त अण्डे देते हैं। इस प्रकार प्लेटीपस और एकिडना रेप्टीलिया और मैमेलिया वर्ग के मध्य एक योजक कड़ी हैं। ये जन्तु भी सिद्ध करते हैं कि स्तनधारियों का विकास सरीसृपों ( Reptiles ) से हुआ है।

(iii) पेरीपेटस (Peripatus ) – यह एनेलिडा तथा आर्थोपोडा संघ के बीच की संयोजी कड़ी है। पेरीपेटस में एनेलिडा संघ के निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • बेलनाकार आकृति
  • देहभित्ति की आकृति व चर्म का पेशीय होना
  • क्यूटिकल द्वारा निर्मित बाह्य कंकाल अनुपस्थित एवं पार्श्व पादों के समान उभारों का उपस्थित होना।

संघ आर्थ्रोपोडा के समान पेरीपेटस में निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • तीन खण्डों के समेकन से सिर भाग का बनना
  • ऐंटिनी (Antennae ) का होना
  • एक जोड़ी सरल नेत्रों तथा एक जोड़ी मुख पैपिली का उपस्थित होना ।

अतः पेरिपेटस को एनीलीडा तथा आर्थ्रोपोडा संघ को जोड़ने वाली संयोजी कड़ी कहते हैं। यह प्रमाणित करता है कि आर्थोपोडा का विकास एनिलिडा से हुआ है ।

(iv) फुफ्फुस मछली (Lungfish ) प्रोटोप्टेरस (Portopterus) – प्रोटोप्टेरस में कुछ लक्षण मछलियों के (जैसे क्लोम तथा शल्कों की उपस्थिति) और कुछ लक्षण उभयचरों के (जैसे फुफ्फुस की उपस्थिति) पाये जाते हैं। अत: प्रोटोप्टेरस पिसीज तथा उभयचर संघ के बीच संयोजी कड़ी है।
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उपरोक्त के अतिरिक्त निम्न संयोजी कड़ियों के उदाहरण हैं-

  • वायरस (Virus) – संजीव और निर्जीव के मध्य
  • यूग्लीना (Euglena) – पादप और जन्तु के मध्य
  • प्रोटेरोस्पॉन्जिया (Proterospongia ) – प्रोटोजोआ और पॉरीफेरा के मध्य
  • नियोपाइलीना (Neopilina) – मोलस्का और एनेलिडा के मध्य उक्त कार्बनिक विकास और समपूर्वजता के अच्छे उदाहरण प्रदर्शित करते हैं।

(4) अवशेषी अंगों के प्रमाण (Evidences from Vestigeal Organs) – अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवन भर पूर्ण विकास नहीं होता है। ये जन्तु की जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते है। अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं। ऐसे अंगों को अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) कहते हैं। मनुष्य के शरीर में लगभग 180 ऐसी रचनायें होती हैं जिनमें सामान्य निम्न हैं-

  • कृमिरूपी – परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है, जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरहे जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं . क्रियाशील होती है।
  • कर्ण पल्लव (Earpinna ) – घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे जन्तुओं के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है ।
  • पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है किन्तु फिर भी पुच्छ कशेरुकाएँ अत्यधिक हासित दुम के रूप में अवशेषी अंग के रूप में पायी जाती हैं। इससे पता चलता है कि मनुष्य के पूर्वज में पूँछ थी ।

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  • निमेषक पटला (Nictitating Membrane)-मेढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है । इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।
  • त्वचा के बाल (Hair ) – बन्दरों, घोड़ों, सूअरों, कपियों आदि स्तनियों के शरीर पर घने बाल होते हैं। ये ताप नियन्त्रण में सहायता करते हैं। मानव में बालों का यह कार्य नहीं रहा, फिर भी शरीर पर कुछ बाल होते हैं।
  • अक्कल दाढ़ ( Wisdom Teeth) – तीसरा मोलर दन्त अन्य प्राइमेट (Primate) स्तनियों में सामान्य होता है । मानव में इसका उपयोग नहीं होता है। अतः यह देर से निकलता है और अर्ध विकसित रहता है। यह दंतरोगों के प्रति संवेदनशील होता है।

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अन्य जन्तुओं में अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in other Animals)

  • अजगर (Python) के पश्च पाद और श्रोणि मेखला
  • बिना उड़ने वाले ( Flightless) पक्षियों के पंख जैसे शुतुरमुर्ग, ईमू कीवी आदि ।
  • घोड़े के पैरों की स्पिलिंट अस्थियाँ (Splint Bones ) 2 और 4 अगुंली।
  • व्हेल के पश्चपाद और श्रोणि मेखला

पादपों के अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in Plants) – रस्कस और अनेक भूमिगत तनों की शल्की पत्तियाँ ।
अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे किन्तु इनके महत्त्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

(5) श्रोणिकी से प्रमाण (Evidences from Embryology) – श्रोणिकी तुलनात्मक भ्रोणिकी तथा प्रायोगिक श्रोणिकी से विकास के पक्ष में निर्णायक प्रमाण मिलते हैं। सभी मेटोजोअन प्राणी एक कोशिकीय युग्मनज (Zygote) से विकसित होते हैं और सभी प्राणियों के परिवर्धन की प्रारम्भिक अवस्थाओं में अत्यधिक समानता होती है।

मनुष्य सहित सभी मेटाजोअन वर्गों के प्राणियों के अण्डों के परिवर्धन के समय विदलन, ब्लास्टूला एवं गेस्टुला में वही मूलभूत समानताएँ पायी जाती हैं। प्रौढ़ जन्तुओं में जितने निकट का सम्बन्ध होता है उनके परिवर्धन में उतनी अधिक समानता देखने को मिलती है। विभिन्न वर्गों में परिवर्धन के बाद की अवस्थाएँ अपसरित हो जाती हैं व यह अपसरण एक विशाखित वृक्ष के समान होता हैं।
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इसी प्रकार विभिन्न कशेरुकियों के भ्रूणों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उच्च वर्ग के जन्तुओं के भ्रूण निम्न वर्गों के प्रौढ़ जन्तुओं के समान होते हैं, जैसे मेढ़क का टेडपोल लारवा मछली के समान होता है। इसी आधार पर हेकल ने पुनरावर्तन का सिद्धान्त (Recapitulation Theory ) प्रतिपादित किया।

इसके अनुसार प्रत्येक जीव भ्रूणीय परिवर्धन में अपनी जाति के जातीय विकास की कथा को दोहराता है। पुनरावर्तन सिद्धान्त के आधार पर निषेचित अण्डे की तुलना समस्त जन्तुओं के एककोशिकीय पूर्वज से ब्लास्टुला की प्रोटोजोआ मण्डल या कॉलोनी से की जा सकती है। मेढ़क के ही नहीं वरन् रेप्टाइल, पक्षी और यहाँ तक कि मनुष्य के भ्रूण में भी क्लोम दरारें, क्लोम, नोटोकॉर्ड, युग्मित आयोटिक चॉपें, प्रोनेफ्रोस, पुच्छ तथा पेशियाँ आदि मछली के समान होती हैं और आरम्भ में सभी का हृदय मछली के समान द्विकक्षीय होता है।

इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारम्भ मे समस्त वर्टिब्रेट्स का विकास मछली के समान पूर्वजों से हुआ है। मनुष्य के भ्रूणीय परिवर्धन में देखा गया है कि उसका भ्रूण प्रारम्भ में मछली से, बाद में एम्फिबियन से और फिर रेप्टाइल से मिलता-जुलता होता है और सातवें मास में यह शिशु कपि से मिलता- जुलता होता है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव अपने भ्रूण परिवर्धन में उन समस्त अवस्थाओं से गुजरता है जिनसे कभी उसके पूर्वज धीरे-धीरे विकसित होकर बने होंगे।

(6) जीवाश्मीय प्रमाण (Palaeontological Evidences) – वैज्ञानिक चार्ल्स लायल के अनुसार पूर्व जीवों के चट्टानों से प्राप्त अवशेष जीवाश्म ( Fossils) कहलाते हैं। जीवाश्म का अध्ययन पेलियो-ओन्टोलॉजी (Palacontology) कहलाता है। जीवाश्म कार्बनिक विकास के पक्ष में सर्वाधिक मान्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि जीवाश्म द्वारा जीवों के सम्पूर्ण विकासीय इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है।

जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के सम्बन्ध में निम्न तथ्य प्रमाणित हुए-

  • जीवाश्म जो कि पुरानी चट्टानों से प्राप्त हुए सरल प्रकार के तथा जो नई चट्टानों से प्राप्त हुए जटिल प्रकार के थे।
  • विकास के प्रारम्भ में एक कोशिकी प्रोटोजोआ जन्तु बने जिनसे बहुकोशिकी जन्तुओं का विकास हुआ।
  • कुछ जीवाश्म विभिन्न वर्ग के जीवों के बीच की संयोजक कड़ियाँ (Connecting-links) को प्रदर्शित करती हैं।
  • पौधों में एन्जिओस्पर्म (Angiosperm) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (mammals) सबसे अधिक विकसित और आधुनिक हैं।
  • जीवाश्म के अध्ययन से किसी भी जन्तु को जीवाश्म कथा ( विकासीय इतिहास) या वंशावली का क्रमवार अध्ययन किया जा सकता है।

घोड़े की वंशावली ( जीवाश्मीय इतिहास ) [Evolution (Pedigree) of Horse] वैज्ञानिक सी. मार्श (C. Marsh) के अनुसार घोड़े का प्रारम्भिक जीवाश्म उत्तरी अमेरिका में पाया गया जिसका नाम इओहिप्पस (Eohippus) था। इसका विकास इओसीन काल में हुआ। इओहिप्पस लोमड़ी के समान तथा लगभग एक फुट ऊँचे थे। इनके अग्रपादों में चार तथा पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं।
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ओलिगोसीन काल में इन पूर्वजों से भेड़ के आकार के मीसोहिप्पस (Mesohippus) घोड़ों का विकास हुआ। इनके अग्र व पश्च पादों में केवल तीन-तीन अंगुलियाँ थीं। बीच की अंगुलियाँ इधर- उधर की दोनों अंगुलियों से बड़ी थीं और शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं पर रहता था। इनसे मायोसीन काल के मेरीचिप्पस (Merychippus) घोड़ों का विकास हुआ।

ये टट्ट के आकार के थे। इनके अग्र व पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं जिनमें से बीच वाली सबसे लम्बी थी और केवल यही भूमि तक पहुँचती थी । प्लायोसीन काल में प्लीओहिप्पस (Pliohippus) घोड़ों का विकास हुआ। ये आकार में टट्ट से ऊँचे थे। इनके अग्र व पश्चपादों में केवल एक-एक अंगुली विकसित थी और इधर-उधर की अंगुलियाँ अत्यधिक हासित होकर स्प्लिट अस्थियों (Splint Bones)

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के रूप में त्वचा में दबी हुई थीं। केवल एक ही अंगुली की उपस्थिति के कारण ये तेजी से दौड़ सकते थे । प्लीस्टोसीन युग में इन्हीं घोड़ों से आधुनिक घोड़े इक्वस (Equus) का विकास हुआ। इक्वस की ऊँचाई लगभग 5 फीट है और यह उसी रूप में आज भी चला आ रहा है।

(7) जीवों के घरेलू पालन ( Domestication) से प्रमाण- मनुष्य अपने लिए उपयोगी जन्तुओं (घोड़े, गाय, कुत्ता, बकरी, भेड़, भैंस, कबूतर, मुर्गा आदि) तथा खेतिहर वनस्पतियों (गोभी, आलू, कपास, गेहूँ, चावल, मक्का, गुलाब आदि) की इनके जंगली पूर्वजों से नस्लें सुधार कर उत्पत्ति की है।

यद्यपि नस्लें सुधार कर नयी जातियों की उत्पत्ति वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं, फिर भी इस प्रक्रिया में बदले हुए लक्षण विकसीय ही माने जायेंगे हजारों-लाखों वर्षों का समय मिले तो सम्भवतः मानव इस विधि से नयी जीव जातियों की उत्पत्ति कर लेगा। अतः इतने पुराने इतिहास की प्रकृति में अनुमानत: इसी प्रकार नस्लों में सुधार के फलस्वरूप नयी-नयी जातियों की उत्पत्ति हुई होगी।

(8) रक्षात्मक समरूपता (Protective Resemblance) से प्रमाण – इंगलिस्तान (Britain) के औद्योगिक नगरों के आस-पास के पेड़ चिमनियों के धुएँ से काले पड़ जाते हैं। इन क्षेत्रों के कीटों, विशेष तौर से पतंगों (moths) की विभिन्न जातियों में, गत सदी में, औद्योगिक साँवलेपन (Industrial melanism) का रोग हो गया।

उदाहरणार्थ, पंतगों की बिस्टन बिटूलैरिया (Biston betularia) नामक जाति में शरीर व पंख हल्के रंग के काले धब्बेदार होते थे । सन् 1884 में इनकी आबादी में पहली बार एक बिल्कुल काला पतंगा देखा गया। यह परिवर्तन रंग के जीन में अचानक जीन – उत्परिवर्तन (gene- mutation) के कारण हुआ।

बाद में काले पतंगों की संख्या बढ़ते-बढ़ते 90% हो गयी। यह एक विकासीय परिवर्तन था। इससे पतंगों का रंग पेड़ों के रंग से मिलता-जुलता हो गया ताकि ये शत्रुओं (पक्षियों) और शिकार की निगाहों से बच सकें । जीन – उत्परिवर्तन के कारण वातावरण से रक्षात्मक समरूपता के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं। इसे सादृश्यता (Mimicry) कहते हैं।

ऐसी तितलियाँ होती हैं जो उन्हीं सूखी पत्तियों जैसी दिखायी देती हैं जिन पर ये आराम के समय बैठती हैं शाखाओं से मिलती-जुलती आकृति की कई कीट जातियाँ पायी जाती हैं। ये सब दृष्टान्त ‘जैव – विकास’ को प्रमाणित करते हैं । इंगलिस्तान के पतंगों के सम्बन्ध में तो यहाँ तक कहा – गया है कि इनमें “वैज्ञानिकों ने विकास प्रक्रिया को होते हुए स्वयं देखा है। ”
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प्रश्न 21.
हार्डी-वेनबर्ग का नियम लिखिए।
उत्तर:
इसके अनुसार किसी समुदाय में यदि प्रजनन बेतरतीब (Random) होता है, यदि उत्परिवर्तन नहीं होते हैं तथा यदि समुदाय में सदस्यों की संख्या विशाल होती है तब इस समुदाय की जीन की जीन आवृत्ति (Gen Frequency) एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में स्थिर रहेगी अर्थात् यह समुदाय आनुवंशिक संतुलन (Genetic Equilibrium) स्थिति में होगा।

इस हार्डी – वेनबर्ग ने निम्न समीकरण द्वारा समझाया-
सभी अलील आवृत्तियों का योग 1 (एक) होता है तथा व्यष्टिगत आवृत्तियों को pq कहा गया । द्विगुणित में p तथा q अलील A तथा अलील a की आवृत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक जीव संख्या में AA की आवृत्ति साधारणतया P2 होती है। ठीक इस प्रकार से aa की आवृत्ति q2 होती है और Aa की 2pg होती है अत: P2 + 2pg + q2=1 हुआ। यह (p+q)2 की द्विपदी अभिव्यक्ति है।

इस प्रकार हार्डी – वेनबर्ग सिद्धान्त यह स्पष्ट करता है कि यदि जीन आवृत्तियाँ परिवर्तित नहीं होती हैं अर्थात् वह समुदाय आनुवंशिक ‘संतुलन की दशा में होता है तब इसमें विकास की दर भी शून्य होती है । इस सिद्धान्त को दिये गये उदाहरण से समझाया जा सकता है। मान लीजिए किसी विशाल समुदाय में दी गई आवृत्ति में दो अलील (Allel) A व a उपस्थित हैं। मेन्डल के वंशागति नियमानुसार इस समुदाय में तीन प्रकार के सदस्य उपस्थित होंगे जिनका अनुपात निम्न होगा –

AAAaaa
36%48%16%

यदि यह माना जाये कि समुदाय के सदस्यों के बीच प्रजनन अव्यवस्थित (Random) ढंग से हो रहा तब ऐसी स्थिति में सभी सदस्य संख्या में लगभग एक सामान युग्मक उत्पादित करेंगे । यहाँ यह भी मान लें कि जीन A व a में उत्परिवर्तन नहीं होता है तब इस समुदाय के कुल उत्पादित युग्मकों ‘उत्पादित युग्मकों का प्रतिशत निम्न प्रकार का होगा-
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लैंगिक प्रजनन में इन युग्मकों में परस्पर निषेचन निम्नलिखित चार प्रकार से सम्भव होगा-
शुक्राणु A का संयुग्मन अण्ड A से
शुक्राणु a का संयुग्मन अण्ड a से
शुक्राणु A का संयुग्मन अण्ड a से तथा
शुक्राणु a का संयुग्मन अण्ड A से
उपर्युक्त उदाहरणानुसार युग्मकों के परस्पर संयुग्मन की आवृत्ति प्रतिशत निम्नलिखित प्रकार की होगी-
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अतः इस नयी अगली पीढ़ी में सदस्यों का वही अनुपात उपलब्ध होगा जो मूल जनक समुदाय में था । स्पष्ट है कि यहाँ जीन आवृत्ति अपरिवर्तित रहती है अर्थात् यह समुदाय पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवंशिक सन्तुलन की दशा में रहता है व ऐसे समुदाय में विकास की दर शून्य होगी। इस वर्णन से स्पष्ट है कि विकास परिवर्तन उसी दशा में सम्भव है जब हार्डी-वेनबर्ग नियम की एक या अधिक शर्तें भंग होती हैं तथा इसके फलस्वरूप जब समुदाय का आनुवंशिक सन्तुलन बिगड़ता है । पाँच घटक हार्डी-वेनबर्ग साम्यता को प्रभावति करते हैं जो निम्न हैं-

  • जीन पलायन (Gene Migration) या जीन प्रवाह (Gene flow),
  • आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift),
  • उत्परिवर्तन (Mutation),
  • आनुवंशिक पुनर्योग (Genetic Recombination) और
  • प्राकृतिक वरण (Natural Selection )

इस प्रकार किसी समुदाय में प्राकृतिक चयन प्रक्रिया तभी होती है जब उस समुदाय में प्रजनन अव्यवस्थित प्रकार से नहीं होता है, जब उसमें आनुवंशिक उत्परिवर्तन होते या जब समुदाय में सदस्यों की संख्या कम होती है, तभी विकास सम्भव होता है। जब जीन संख्या का स्थान परिवर्तन होता है तो जीन आवृत्तियाँ भी बदल जाती हैं। यह दोनों मौलिक (पुरानी) तथा नई जीव संख्या में होता है।

नयी समष्टि में नई जीनें और अलील जोड़ दी जाती हैं व पुरानी समष्टि में ये घट जाती हैं।. यदि यही प्रक्रिया बार- बार होगी तो जीन प्रवाह सम्भव होगा। यदि यह परिवर्तन संयोगवश होता है तो आनुवंशिक अपवाह (Genetic Drift) कहलाता है । कभी-कभी अलील आवृत्ति का यह परिवर्तन समष्टि के नये नमूने में इतना भिन्न हो जाता है तो वह नूतन प्रजाति (Species) ही हो जाती है।

मौलिक अपवाहित (Original Drifted Population) संस्थापक बन जाती है व इस प्रभाव को संस्थापक प्रवाह कहा जाता है। सूक्ष्म जीवों पर किये गये प्रयोग यह दर्शाते हैं कि पूर्व विद्यमान लाभकारी उत्परिवर्तन का वरण होता है व नये फीनोटाइप (Phenotype) दिखाई देते हैं तथा कुछ पीढ़ियों के बाद यही नयी जाति हो जाती है। प्राकृतिक वरण में इन्हें जनन के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं।

वास्तव में उत्परिवर्तन व युग्मों के निर्माण समय में पुनर्योजन या जीन अपवाह का परिणाम होता है, इससे आगामी पीढ़ी में जीन आवृत्ति में परिवर्तन आता है। धीरे-धीरे जनन की सफलता के सहारे से प्राकृतिक वरण इसे अलग समष्टि का रूप दे देता है। फिर प्राकृतिक वरण स्थायित्व प्रदान कर देता है। (व्यष्टियों को लक्षण प्राप्त होना) दिशात्मक परिवर्तन ( Directional) या विदारण (डिसरप्शन ) जो वितरण वक्र के दोनों सिरों में होता है।
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प्रश्न 22.
अपसारी विकास (Divergent Evolution) क्या है ? पौधों का उदाहरण लेते हुए समझाइये।
उत्तर:
अपसारी विकास (Divergent Evolution) – विभिन्न जन्तुओं में पायी जाने वाली समजातता यह प्रदर्शित करती है कि इन सबकी उत्पत्ति किसी समान पूर्वज से हुई है। किसी एक पूर्वज से उत्पन्न होने के बाद जातियाँ अपने-अपने आवासों के अनुसार अनुकूलित हो जाती हैं जिसे ही अपसारी विकास कहते हैं।

इन जातियों में समजात पाये जाते हैं- जैसे बोगनविलिया का कांटा तथा कुकुरबिटा के प्रतान (Tendril) समजात होते हैं। ये दोनों ही तने के रूपान्तरण हैं जो कार्य तथा भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार ( आकारिकी) रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रश्न 23.
मानव के अवशेषी अंगों की सूची बनाइए ।
उत्तर:
मानव के शरीर में लगभग 180 अवशेषी अंग हैं जिनमें से सामान्य निम्नलिखित हैं-

  1. कृमिरूपी परिशेषिका (Vermiform Appendix )
  2. कर्ण पल्लव (Ear pinna)
  3. पुच्छ कशेरूकाएँ (Caudal Vertebrae)
  4. निमेषक पटल (Nictitating Membrane)
  5. त्वचा के बाल (Hair )
  6. अक्कल दाढ़ (Wisdom Teeth)
  7. सरवाइकल फिस्टुला (Cervical Fistula)
  8. केनाइन दाँत (Canine teeth)
  9. अतिरिक्त चूचुक (Extra nipple )
  10. रूडीमेन्टरी गिल स्लिटस (Rudimentary gill slits)
  11. मानव शिशु में पूँछ (Human Body with Tail)

प्रश्न 24.
विकास के आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्त का वर्णन करें।
उत्तर:
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में हमें ‘बिग बैंग’ नामक महाविस्फोट का सिद्धान्त यह कहता है कि एक महा विस्फोट के फलस्वरूप ब्रह्माण्ड का विस्तार हुआ और तापमान में कमी आई। कुछ समय बाद हाइड्रोजन एवं हीलियम गैसें बनीं। ये गैसें गुरुत्वाकर्षण के कारण संघनीभूत हुईं और वर्तमान ब्रह्माण्ड की आकाश गंगाओं का गठन हुआ। आकाश गंगा के सौर मण्डल में पृथ्वी की रचना 4.5 बिलियन वर्ष (450 करोड़) पूर्व मानी जाती है। प्रारम्भिक अवस्था में पृथ्वी पर वायुमण्डल नहीं था।

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जल, वाष्य, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अमोनिया आदि धरातल को ढकने वाले गलित पदार्थों से निर्मुक्त हुई। सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (अल्ट्रावायलेट) किरणों ने पानी को (H2) तथा (O2) में विखण्डित कर दिया तथा हल्की (H2) मुक्त हो गई। ऑक्सीजन ने अमोनिया (NH2) एवं मीथेन (CH2) के साथ मिलकर पानी, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) तथा अन्य गैसों आदि की रचना की।

पृथ्वी के चारों तरफ ओजोन परत का गठन हुआ। जब यह ठण्डा हुआ, तो जल-वाष्प बरसात के रूप में बरसी और गहरे स्थान भर गए, जिससे महासागरों की रचना हुई। पृथ्वी की उत्पत्ति के लगभग 50 करोड़ वर्ष बाद अर्थात् 400 करोड़ वर्ष पहले जीवन प्रकट हुआ। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिकों एवं दार्शनिकों ने समय-समय पर अपनी-अपनी परिकल्पनाएँ प्रस्तुत कीं। इनमें प्रमुख

परिकल्पनाएँ निम्न हैं-
1. विशिष्ट सृष्टि का सिद्धान्त (Theory of Special Creation)-यह सिद्धान्त धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक फादर सुआरेझ (Father Suarez) थे, बाइबिल के अनुसार जीवन तथा सभी वस्तुओं की रचना भगवान द्वारा 6 दिनों में की गई।

प्रथम दिनस्वर्ग तथा नरक
द्वितीय दिनआकाश तथा जल
तीसरे दिनसूखी धरती और वनस्पति
चौथे दिनसूर्य, चन्द्रमा और तारे
पाँचवें दिनमछलियाँ और पक्षी
छठे दिनस्थलीय जन्तु और मनुष्य बने।

प्रथम मनुष्य (Adam) आदम बना और इसकी बारहवीं पसली से (Five) हौवा प्रथम नारी बनी। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विश्व और सृष्टि की रचना ब्रह्मा द्वारा की गई। (प्रथम मानव मनु और प्रथम नारी श्रद्धा थे ) । इसके अनुसार जीवन अपरिवर्तनशील है तथा उत्पत्ति के बाद उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। विशिष्ट सृष्टिवाद का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होने के कारण इसे स्वीकार नहीं किया गया।

2. स्वतः जनन का सिद्धान्त (अजीवात जीवोत्पत्ति) (Theory of Spontaneous Generation Abiogenesis or Autogenesis)-इस परिकल्पना का प्रतिपादन पुराने यूनानी दार्शानिक जैसे थेल्स, एनेक्सिमेन्डर, जेनोफेन्स, प्लेटो, एम्पीडोकल्स, अरस्तू द्वारा किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से अपने आप अचानक हुई। इनका विश्वास था कि नील नदी के कीचड़ पर प्रकाश की किरणें गिरने पर उससे मेंढ़क, सर्प, मगरमच्छ आदि उत्पन्न हो गये।

अजैविक उत्पत्ति का प्रायोगिक समर्थन वाल हेल्मोन्ट (Val Helmont 1642) द्वारा किया गया। इनके द्वारा अन्धेरे स्थल पर गेहूँ के चौकर (Barn) में पसीने से भीगी गन्दी कमीज (Shirt) को रखने पर 21 दिन में चूहों की उत्पत्ति को स्वतः जनन के द्वारा होना बताया।

3. ब्रह्माण्डवाद का सिद्धान्त (Cosmologic Theory)-यह सिद्धान्त रिचर (Richter) द्वारा प्रतिपादित किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन पृथ्वी पर सर्वप्रथम किसी अन्य ग्रह या नक्षत्र से जीवद्रव्य (Protoplasm), बीजाणु (Spores) या अन्य कणों के रूप में कॉस्मिक धूल के साथ पहुँचा जिसने जीवन के विभिन्न रूपों को जन्म दिया।

4. कॉस्मिक पेनस्पर्मिया सिद्धान्त (Cosmic Panspermia Theory)-यह सिद्धान्त आरीनियस (Arrhenius) द्वारा प्रतिपाद्ति किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवों के बीजाणु (Spores) ब्रह्माण्ड में एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर स्वतन्त्र रूप से आ जा सकते हैं। इन्होंने ही पृध्व्वी पर पहुँचकर जीवन के विभिन्न रूपों को जन्म दिया।

5. जीवन की अनन्तकालता का सिद्धान्त (Theory of Eternity of Life)-हेल्महॉट्ज (Helmhotz) ने जीवन की अनन्तकालिता (Eternity of Life) में विश्वास किया। इनके अनुसार जीवन की उत्पत्ति या सृष्टि का प्रश्न उठता ही नहीं, क्योंकि ‘जीवन अमर है; ब्रह्माप्ड की उत्पत्ति के समय ही अजीव और सजीव पदार्थों की एक साथ उत्पत्ति हुई ।

6. जीवात् जीवोत्पत्ति का सिद्धान्त (Theory of Biogenesis)-यह सिद्धान्त हार्वे (Harvey, 1951) और हक्सले (T.H. Huxley, 1870) नामक वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपाद्त किया। इनके अनुसार पृथ्वी पर नये जीवन की उत्पत्ति या निर्माण पूर्व जीवों से होता है न कि निर्जीव पदार्थों से। यह सिद्धान्त स्वतः जनन (Spontaneous Generation) का तो खण्डन करता है किन्तु पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है। जीवात् जीवोत्पत्ति का प्रायोगिक सत्यापन और स्वतः जनन का प्रायोगिक खण्डन करने के लिए प्रमुख वैज्ञानिकों द्वारा किये गये प्रयोग अग्र हैं।

7. फ्रांसेस्को रेडी (Francesco Redi, 1668-इटालियन ) का प्रयोग-इन्होंने मरे हुए सांपों, मछलियों और माँस के टुकड़ों को जारों में रखकर कुछ जार खुुले छोड़े तथा कुछ को सील किया या जालीदार कपड़े में बंद किया। खुले जारों में मक्खियों ने माँस पर अण्डे दिये जिनसे डिम्भक (Larvae of maggots) निकले बंद जारों में मक्खियाँ नहीं घुस पायीं।

अतः इनके माँस में डिम्भक (Larvae or maggots) नहीं दिखाई दिये। इस प्रयोग द्वारा सिद्ध होता है कि डिम्भक का विकास मक्खियों द्वारा दिये गये अण्डों से हुआ जबकि बंद जार में मक्खियों के नहीं घुस पाने के कारण उनमें किसी प्रकार के डिम्भक (Larvae) का विकास नहीं हुआ। अतः जीव का जन्म पहले से उपस्थित जीव द्वारा संभव है न कि स्वतः जनन द्वारा।
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8. लैजेरो स्पैलैन्जनी (Lazzaro Spallanzani 1767 इटालियन) का प्रयोग-इन्होंने बंद फ्लास्कों में सब्जियों और माँस को उबालकर जीवाणु रहित (Sterilized) पोषक शोरबा (Broth) तैयार किया। खुले या ढीले कार्क से बन्द्र जारों में रखने पर इस शोरबे में अनेक जीवाणु पनप जाते थे, परन्तु सीलबन्द करके रखने पर इसमें जीवाणु उत्पन्न नहीं होते थे।

नीधम (Needham) ने इस प्रयोग के विरोध में कहा कि अधिक उबालने से यह शोरबा जीवों के स्वतः उत्पादन के योग्य नहीं रहा। इस पर स्पैलैन्जनी (Spallanzani) ने सीलबंद फ्लास्कों की नलियों को तोड़ दिया। कुछ दिन बाद हवा के भीतर पहुँचने के कारण, इन जारों के शोरबे में भी जीवाणु हो गये। इससे सिद्ध हुआ कि सूक्ष्म जीवाणु भी स्वतः उत्पादन द्वारा नहीं, वरन् हवा में उपस्थित जीवाणु से ही बनते हैं।

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9. लुईस पाश्चर (Louis Pasteur, 1860-1862-फ्रांसीसी) का प्रयोग-लुईस पाश्चर ने रोगों का रोगाणु सिद्धान्त (Germ Theory of Diseases or Germ Theory) प्रतिपादित के साथ अजैव उत्पत्ति को गलत सिद्ध किया।
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इन्होंने शक्कर और यीस्ट (Yeast) का घोल उबाल कर उसे जीवाणु रहित कर दिया। अब इस घोल को दो प्रकार के फ्लास्क में रखा एक जार (फ्लास्क) की गर्दन को गरम करके खींच कर ‘S’ आकार (हंस की गर्दन के समान) का बना दिया तथा दूसरे की गर्दन को तोड़ दिया  ‘S’ आकृति की गर्दन वाले फ्लास्क में कोई जीवाणु दिखाई नहीं दिये क्योंकि मुड़ी गर्दन पर धूल कण और सूक्ष्म जीव चिपक गए और विलयन तक नहीं पहुँच सके। जबकि टूटी ग्रीवा वाले फ्लांस्क में वायु और सूक्ष्म जीव आसानी से पहुँच जाने के कारण उसमें सूक्ष्म जीवों की कॉलोनी का विकास हो गया। लुईस पाश्चर के प्रयोगों से अजीवात् जीवोत्पत्ति की धारणा समाप्त हो गई और सजीवों से ही जीवन की उत्पत्ति सिद्ध हो गई।

10. ओपेरिन-हेल्डेन सिद्धान्त (Oparin-Haldane Theory of Origin of Life)-वैज्ञानिक ए.आई. ओपेरियन और जे.बी.एस. हेल्डेन (इंग्लैण्ड में जन्मे भारतीय वैज्ञानिक) ने प्रकृतिवाद् या रासायनिक विकास का सिद्धान्त (Naturalistic Theory or Theory of Chemical Evolution) प्रतिपादित किया। यह सिद्धान्त जीवन की उत्पत्ति का आधुनिक सिद्धान्त (Modern Theory of Origin of Life) है। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति रसायनों के संयोग से हुई जिसे निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझाया गया है-
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(i) परमाणु अवस्था (The Atomic Stage)-पृथ्व्वी की उत्पत्ति लगभग 4-6 अरब वर्ष पूर्व हुई। ऐसे तत्व जो जीवद्रव्य बनाने में प्रमुख रूप से भाग लेते हैं केवल परमाण्वीय अवस्था में पाये जाते थे। केवल हल्के तत्वों ने मिलकर पृथ्वी का आद्य वातावरण निर्मित किया जैसे कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन। इनमें सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन उपस्थित थी।

(ii) आण्विक अवस्था (अणुओं और सरल अकार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति) Molecular Stage (Origin of Molecules and Simple Inorganic Compounds)-पृथ्वी के ताप में कमी होने के साथ हल्के स्वतन्त्र परमाणुओं में संयोग से अणु और सरल अकार्बनिक यौगिक बनने लगे। अति उच्च ताप के कारण सक्रिय हाइड्रोजन परमाणुओं ने सम्मूर्ण ऑक्सीजन से संबोग कर जल बनाया और वातावरण में मुक्त ऑक्सीजन नहीं रही।

इसलिए आद्य वातावरण अपचायी (Reducing) था जबकि वर्तमान वातावरण स्वतन्त्र ऑक्सीजन की उपस्थिति के कारण उपचायी (Oxidising) है। हाइड्रोजन परमाणुओं ने नाइट्रोजन से संयोग कर अमोनिया (NH3) का निम्माण किया। जल तथा अमोनिया सम्भवतः प्रथम अकार्घनिक (Inorganic) यौगिक थे। इन हल्के तत्वों में क्रियाओं द्वारा CO2,CO N2,H2 आदि का भी निर्माण हो गया।

(iii) प्रारम्भिक कार्बनिक याँगिकों की उत्पत्ति (Origin of Early Organic Compounds)-वातावरण में उपस्थित नाइट्रोजन और कार्बन के धात्चिक परमाणुओं के साथ संयोग से नाइट्राइड और कार्बाइड का निर्माण हुआ। जल वाष्प और धात्चिक कार्बाइड के क्रिया द्वारा प्रथम काबंनिक यौगिक मेथेन CH4 का निर्माण हुआ। इसके बाद HCN हाइड्रोजन सायनाइड बना।

उस समय जो जल पृथ्वी पर बनता उच्च ताप के कारण वाष्पीकृत हो जाता जिससे बादल बन जाते तथा जलवाष्प वर्षा बंदों के रूप में पुनः भूमि पर आ जाती जिससे लम्बे समय तक इस प्रक्रम के चलते रहने से पृथ्वी का ताप कम होने लगा और इस पर समुद्र बनने लगे।

(iv) सरल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति (Origin of Simple Organic Compounds)-आदि सागर के जल में बड़ी मात्रा में मेथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन, सायनाइड्स, कार्बाइड और नाइट्राइड्स उपस्थित थे। इन प्रारम्भिक यौगिकों में संयोग द्वारा सरल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हुआ जैसे अमीनो अम्ल, गिलसरॉल, वसा अम्ल, प्यूरीन, पिरीमिडीन आद्व। क्रियाओं के लिए ऊर्जा सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों और ज्बालामुखी आदि से प्राप्त हई ।

(v) जटिल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति (Origin of Complex Organic Compounds)-समुद्री जल में छोटे सरल कार्बनिक यौगिकों के संयोग से बड़े जटिल कार्बनिक यौगिक बनने लगे जैसे-एमीनो अम्लों के संयोग से बड़ी शृंखलाएँ पॉलीपेप्टाइड्स (Polypeptides) और प्रोटीन बने। वसा अम्ल और ग्लिसरॉल के संयोग से वसा (Fat) और लिपिड (Lipid) बने।

सरल शर्कराओं के संयोग से डाइसैकेराइड और पॉलीसेकेराइड बने। शर्करा, नाइट्रोजनी क्षारक और फास्फेट्स के संयोग से न्यूक्लिओटाइड बने जिनकें बहुलीकरण से न्यूक्लिक अम्ल बने। इस प्रकार समुद्री जल में ऐसे दीर्घ अणुओं (Macro molecules) का निर्माण हो गया जो जीवद्रव्य के मुख्य घटकों का निर्माण करते हैं। अतः आदि सागर में जीवन की उत्पत्ति की संम्भावनाएँ स्थापित हो गईं।
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लम्बे समय के बाद रासायनिक विकास के परिणामस्वरूप आदि सागरों का जल इन कार्बनिक यौगिकों से पूर्णतया संतृप्त हो गया। कोसरवेट व न्यूक्लिओ प्रोटीन का निर्माण-बड़े कार्बनिक अणु जो कि सागर में अजैव संश्लेषण द्वारा बने थे, एक-दूसरे के समीप आने लगे जिससे बड़ी कोलाइडी बूँदों के समान संरचनाओं का निर्माण हुआ। इन्हीं कोलाइडी बूँदों का ऑपेरिन द्वारा कोसरवेट नाम दिया गया।

कोसरवेट (संराशयक) वृहद् अणुओं का झुण्ड था जिसमें प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, लिपिड्स और पॉलीसेकेराइड्स आदि थे। इनमें वातावरण से कार्बनिक अणुओं के अवशोषण की क्षमता थी, ये जीवाणुओं के समान मुकुलन द्वारा विभाजित हो सकते थे, इनमें ग्लूकोज के अपघटन जैसी क्रियाएँ होती थीं। रासायनिक क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती थी।

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ओपैरिन के अनुसार कोसरवेट सर्वप्रथम बने सरलजीवीय अणु थे जिन्होंने बाद में कोशिका को जन्म दिया। स्टैनले मिलर का प्रयोग (Experiment of S. Miller)ओपैरिन की परिकल्पना के अनुसार, प्रबल ऊर्जा की उपस्थिति में, मीथेन, हाइड्रोजन, जलवाष्प एवं अमोनिया के संयोजन से अमीनो अम्लों, सरल शर्कराओं तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण की सम्भावना को, अमेरिकी वैज्ञानिक स्टैनले मिलर (Stanley Miller 1953,1957)

ने अपने आचार्य-हेरोल्ड यूरे (Harold Urey) की देखरेख में एक साधारण से प्रयोग द्वारा सिद्ध किया। उन्होंने 5 लीटर के एक फ्लास्क में 2: 1: 2 के अनुपात में, मीथेन, अमोनिया एवं हाइड्रोजन का गैसीय मिश्रण भरा। एक आधा लीटर के फ्लास्क को काँच की नली द्वारा बड़े फ्लास्क से जोड़ा। इस छोटे फ्लास्क में जल भरकर इसे उबालने का प्रंबध किया जिससे जलवाष्प पूरे उपकरण में घूमती है।

बड़े फ्लास्क में टंग्टन (Tungsten) के दो इलेक्ट्रोड (Electrodes) फिट करके, आदिवायुमण्डल की बिजली जैसे प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए एक सप्ताह तक तीव्र विद्युत की चिन्गारियाँ मुक्त कीं। इसलिए इस उपकरण को चिन्गारी-विमुक्ति उपकरण (Spark-Discharge Apparatus) कहते हैं। बड़े फ्लास्क को उन्होंने दूसरी ओर एक U नली द्वारा भी छोटे फ्लास्क से जोड़ा।

इस नली को एक स्थान पर एक कन्डेंसर (Condenser) में से निकाला। प्रयोग के अन्त में बनी गैस वाष्प के साथ जब कन्डेंसर के कारण ठण्डी हुई तो U नली में एक गहरा लाल-सा ग़द्दला तरल भर गया। विश्लेषण से पता लगा कि यह तरल ग्लाइसीन एवं एलैनीन नामक सरलतम अमीनो अम्लों, सरल शर्कराओं, कार्बनिक अम्लों तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों का मिश्रण था।
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अन्य वैज्ञानिकों ने भी इसी प्रकार आदि पृथ्वी पर उपस्थित दशाओं को प्रयोगशाला में उत्पन्न करके सरल अकार्बनिक एवं कार्बनिक यौगिकों से जटिल कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण को सिद्ध किया। उल्का पिण्डों सें प्राप्त रासायनिक विश्लेषण द्वारा भी पता चलता है कि अंतरिक्ष में भी यह घटना क्रम चलता होगा। इन कार्बनिक अणुओं से जीवन प्रारम्भ हुआ।

यह अणु अपने समान अणु बनाने में भी सक्षम थे। उसके पश्चात् एक कोशिकीय जीव जल में उत्पन्न हुए एवं उसके बाद धीरे-धीरे विकास की ओर लगातार बढ़ते हुए जैवविविधता बढ़ती गई व जो पृथ्वी पर आज हमें पादप व जीव-जन्तु देखने को मिलते हैं वह सभी एक कोशिकीय जलीय जीवों से विकसित हुये हैं।

प्रश्न 25.
समजात एवं तुल्यरूप अंगों में उदाहरण सहित अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
समजातता और समवृत्तता में अन्तर- समजात अंग (Homologous Organs) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हों समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं। इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं।

इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फिल्पर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं, जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं। इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं।

इन अंगों की समजातता यह सिद्ध करती है कि इन सभी जन्तुओं के पूर्वज समान रहे होंगे तथा कालान्तर में इनका क्रमिक विकास हुआ हुआ है। अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवनभर पूर्ण विकास नहीं होता है ये जन्तु जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते हैं अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं ऐसे अंगों

को अवशेषी अंग कहते हैं। मनुष्य के शरीर में अनेक रचनाएँ होती हैं जो निम्न हैं-
1. कृमिरूपी परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरगोश जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं क्रियाशील होती है।

2. कर्ण पल्लव (Ear Pinna ) घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे प्राणियों के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है।

3. पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है। फिर भी कशेरुकदण्ड के अन्त में 3 से 5 तक (प्राय: अर्धविकसित) पुच्छ कशेरुकाएँ होती हैं। भ्रूणीय परिवर्धन पूरा होते-होते, ये समेकित (Fused) होकर हड्डी का एक ही टुकड़ा, कोक्सिस (Coccyx ) बना लेती हैं।

4. निमेषक पटल (Nictitating Membrane) – मेंढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है। इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।

5. शरीर पर बाल (Hair on the Body ) – गाय, घोड़े, गधे, बन्दर आदि का पूर्ण शरीर वालों से ढका रहता है, जो शरीर के ताप आदि के नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण सहायता देते हैं। मनुष्य अपने शरीर को तापक्रम के अनुकूल कपड़ों से ढक लेता है, अर्थात् बालों की आवश्यकता नहीं होती है, अतः ये बहुत सूक्ष्म होते हैं।

अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे। किन्तु इनके महत्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 26.
एक भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिन्दु से शुरू होकर अन्य भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होता है। उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर:
डार्विन जब अपनी यात्रा के दौरान गैलापैगो द्वीप गए तो उन्होंने प्राणियों में यह घटना देखी डार्विन को एक काली छोटी चिड़िया (डार्विन फिंच) ने आश्चर्यचकित किया। उन्होंने महसूस किया कि उसी द्वीप के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की फिंच भी पाई जाती हैं। जितनी भी किस्मों को उन्होंने परिकल्पित किया था, वे सभी उसी द्वीप में ही विकसित हुई थीं।

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ये पक्षी मूलतः बीजभक्षी विशिष्टताओं के साथ-साथ अन्य स्वरूप में बदलावों के साथ अनुकूलित हुई और चोंच के ऊपर उठने जैसे परिवर्तनों ने इसे कीट भक्षी एवं शाकाहारी फिंच बना दिया। एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिंदु से शुरू होकर अन्य भू-भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होने को अनुकूल विकिरण (Adaptive radiation) कहा जाता है। डार्विन की फिंच इस प्रकार की घटना का एक सबसे अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 27.
आनुवंशिक संतुलन क्या है? हार्डी वेनबर्ग साम्यता को प्रभावित करने वाले कोई चार घटक लिखिए।
उत्तर:
हार्डी – वेनबर्ग के सिद्धान्तानुसार एक जीव संख्या में अलील (युग्मविकल्पी) आवृत्तियाँ और उनके लोकस (विस्थल) सुस्थिर होती हैं, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरन्तर रहते हैं। जीन कोश सदा अपरिवर्तनीय रहते हैं। इसे आनुवंशिक संतुलन कहते हैं। इसे प्रभावित करने वाले चार घटक निम्न प्रकार से हैं-

  • जीन पलायन या जीन प्रवाह
  • उत्परिवर्तन |
  • आनुवंशिक विचलन ।
  • आनुवंशिक पुनर्योग।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
प्राकृतिक वरण कितने प्रकार का होता है? प्रत्येक का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राकृतिक वरण मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है-

  1. स्थायीकारी वरण
  2. दिशात्मक वरण
  3. विचलित वरण

1. स्थायीकारी वरण (Stabilizing Selection ) – स्थायीकारी वरण तब कार्य करता है जब जीवों के लक्षण वातावरण के अनुकूल होते हैं। यह किसी भी पराकाष्ठा को रोक कर औसत या मध्यमान समलक्षणी समष्टि को प्रेरित करता है व घंटीनुमा आरेख (Bell-shaped Curve) के दोनों सिरों पर उपस्थित जीव धीरे-धीरे विलुप्त हो जाते हैं। स्थायीकारी चयन विभिन्नताओं को कम करता जाता है पर मध्यमान को नहीं बदलता है। इस प्रकार के वरण में उद्विकास की दर प्रारूपिक रूप से धीमी होती है।

स्थायीकारी वरण हमेशा अपरिवर्तित वातावरण में ही कार्य करता है। उदाहरण- शिशुओं में मृत्युदर मानव शिशुओं में जन्म के समय वजन (Birth weight) भी स्थायीकारी वरण का उदाहरण है। नये-नये जन्मे शिशुओं का उपयुक्ततम (Birth weight-7.3 पाउण्ड) होता है। जिनका वजन 55 पाउण्ड से कम या 10 पाउण्ड से ज्यादा होता है उनकी मृत्युदर ज्यादा होती है।

2.  दिशात्मक वरण (Directional) – इस प्रकार का वरण वातावरण संबंधी परिवर्तनों से संबद्ध होता है। यह पराकाष्ठा वाले जीवों का वरण करके समष्टि की जीनी संरचना को उसी दिशा की ओर प्रेरित करता है। इस प्रकार का वरण सामान्य या औसत के एक ओर स्थित जीवों की एक बड़ी संख्या को लुप्त करता है और इसकी ओर स्थित जीवों की संख्या में वृद्धि करता है।

यह ऐसे जीवों का वरण करता है जो परिवर्तित वातावरण के अनुसार सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं। इस प्रकार या समष्टि के मध्यमान को एक निश्चित दिशा में परिवर्तित कर देता है अर्थात् यह जीन- आवृति परिवर्तन उत्पन्न कर देता है। दिशात्मक वरण वातावरण संबंधी परिवर्तन के साथ-साथ उसके बाद होता है।

उदाहरण-

  • DDT के प्रति कीटों की प्रतिरोधकता ।
  • विस्टन बीटेलेरीया।

3.  विचलित वरण-यह एक दुर्लभ प्रकार का वरण होता है लेकिन उद्विकास के संदर्भ में काफी महत्त्वपूर्ण है। वातावरण की परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार उस समष्टि में एक से ज्यादा समलक्षणी जीव उपयुक्ततम हो सकते हैं। जब यह वरण काम करता है। तो दोनों छोरों पर स्थित सजीव केन्द्र पर स्थित औरों की तुलना में अधिक संतानें उत्पन्न करते हैं व समष्टि में दो चोटियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस प्रकार एक समष्टि दो उप समष्टि में विभक्त हो जाती है।

अगर इन दोनों उप समष्टि (Sub population) के बीच में जीन विनिमय (Gene flow) नहीं हो पाये तो प्रत्येक उपसष्टि (Sub population) से एक नयी जाति की उत्पत्ति हो जाती है। उदाहरण – समुद्री मॉलस्का (Limpets) में दो प्रकार के कवच पाये जाते हैं सफेद या भूरा सफेद रंग वाले मॉलस्का सफेद रंग के बार्नेकल जीव पर रहते हैं व भूरे वाले मॉलस्का भूरे रंग की चट्टानों पर रहते हैं। दोनों अपने-अपने वातावरण के सर्वाधिक अनुकूल होने के कारण बचे रहते हैं व समष्टि में दोनों की संख्या बनी रहती है।

प्रश्न 2.
भौगोलिक वितरण किस प्रकार जैव विकास में सहायक रहा? उपयुक्त उदाहरण द्वारा समझाइये।
उत्तर:
जीव-जन्तुओं के भौगोलिक वितरण से जैव-विकास के प्रमाण मिलते हैं। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विशेष प्रकार के जीव-जन्तु तथा पेड़-पौधे मिलते हैं। यद्यपि कुछ देश भौगोलिक दृष्टि से भिन्न होते हुए भी वहां समान प्रकार के जीव पाये जाते हैं जबकि समान जलवायु वाले ‘कुछ’ देशों में विभिन्न प्रकार के प्राणी व पौधे मिलते हैं।

उदाहरण के लिये हाथी तथा सिंह अफ्रीका में पाये जाते हैं परन्तु आस्ट्रेलिया व अमेरिका में नहीं। बाघ भारत में पाये जाते हैं परन्तु अमेरिका व आस्ट्रेलिया में नहीं। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में मार्सुपियोलिया गण के जन्तुओं जैसे कंगारू, तस्मानियन भेड़िया, अफ्रीका में दरियाई घोड़ा, जिराफ, गोरिल्ला आदि पाये जाते हैं, अन्यत्र नहीं मिलते।

डार्विन ने द. अमेरिका के पश्चिमी तट पर प्रशान्त महासागर में स्थित गेलेपगॉस द्वीप पर पायी जाने वाली फिन्चेज (काली चिड़िया) के अध्ययन में पाया कि ये पक्षी अमेरिका में पाये जाने वाले पक्षियों के समान हैं परन्तु इनके चोंच के आकार व संरचना में भिन्नता है।

उन्होंने बताया कि इन पक्षियों की चोंच में भिन्नता स्थानीय वातावरण एवं उसमें उपलब्ध भोजन से अनुकूलता का परिणाम है (चित्र पाठ्यपुस्तक के प्रश्न 8 में देखिये) । इस प्रकार मूल रूप से एक जाति के पक्षी में जो भिन्न- भिन्न वातावरण में अभिगमन कर गये उनसे अनेक जातियों एवं उप- जातियों का विकास हुआ। इस प्रकार जन्तुओं का भौगोलिक वितरण जैव-विकास में सहायक रहा।

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अतः एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिंदु से प्रारम्भ होकर अन्य भू-भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होने को अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation) कहा गया। एक अन्य उदाहरण आस्ट्रेलियाई मासुंपियल (शिशुधानी प्राणियों) का है।

अधिकांश मार्सुपियल जो एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न थे; एक पूर्वज प्रभाव से विकसित हुए, और वे सभी आस्ट्रेलियाई महाद्वीप के अंतर्गत हुए हैं। जब एक से अधिक अनुकूली विकिरण एक अलग- थलग भौगोलिक क्षेत्र में (भिन्न आवासों का प्रतिनिधित्व करते हुए) प्रकट होते हैं तो इसे अभिसारी विकास कहा जा सकता है।

आस्ट्रेलिया के अपरास्तनी जंतु भी इस प्रकार के स्तनधारियों की किस्मों के विकास में अनुकूली विकिरण प्रदर्शित करते हैं, जिनमें से प्रत्येक मेल खाते मासुंपियल (उदाहरणार्थ- अपरास्तनी भेड़िया तथा तस्मानियाई वूल्फ मासुपियल) के समान दिखते हैं।

प्रश्न 3.
जीवाश्मिकी (पुराजीवी विज्ञान) तथा श्रोणिकी से जैव विकास की पुष्टि के प्रमाण दीजिए।
उत्तर:
यदि जैव विकास (Organic Evolution) हुआ है तो प्रारम्भ से लेकर आज तक की जीव-जातियों की रचना, कार्यिकी एवं रसायनी, भ्रूणीय विकास, वितरण आदि में कुछ न कुछ सम्बन्ध एवं क्रम होना आवश्यक है। लैमार्क, डार्विन वैलेस, डी व्रिज आदि ने जैव विकास के बारे में अपनी-अपनी परिकल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए इन्हीं – सम्बन्धों एवं क्रम को दिखाने वाले प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिन्हें हम निम्नलिखित श्रेणियों में बाँट सकते हैं-

  1. जीवों की तुलनात्मक संरचना
  2. शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण
  3. संयोजक कड़ियों के प्रमाण
  4. अवशेषी अंग
  5. भ्रोणिकी से प्रमाण
  6. जीवाश्मीय प्रमाण
  7. जीवों के घरेलू पालन से प्रमाण
  8. रक्षात्मक समरूपता

(1) जीवों की तुलनात्मक संरचना ( Comparative Anatomy) से प्रमाण – जन्तुओं में शारीरिक संरचनाएँ दो प्रकार की होती हैं-
(i) समजात अंग (Homologous organ ) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हो, समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं। इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं।

इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फ्लिपर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं। इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल (ह्यूमरस, रेडियस अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स व अंगुलास्थियाँ ) की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं।
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कीटों के मुखांग (Mouth Parts of Insects ) – कीटों के मुखांग क्रमशः लेब्रम ( Labrum), मेण्डिबल (Mandibles), मैक्सिला (Maxilla), लेबियम (Labium) एवं हाइपोफे रिंक्स (hypopharynx) से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक कीट में इनकी संरचना एवं परिवर्धन समान होता है लेकिन इनके कार्यों में भिन्नता पाई जाती है।

कॉकरोच के मुखांग भोजन को काटने व चबाने (Biting and Chewing) का कार्य करते हैं । तितली एवं मक्खी में भोजन चूसने का एवं मच्छर में मुखांग भेदन एवं चूषण (Piercing and Sucking) दोनों का कार्य करते हैं। अकशेरुकियों के पैर (Legs of Invertibrates) – इसी प्रकार कॉकरोच एवं मधुमक्खी ( Honeybee) के टांगों के कार्य भिन्न- भिन्न हैं।

कॉकरोच अपनी टांगों का उपयोग चलने (Walking) में करता है जबकि मधुमक्खी अपनी टांगों का उपयोग परागकण को एकत्रित (Collecting of Pollens) करने में करती है। जबकि दोनों की टांगों में खण्ड पाये जाते हैं तथा सभी खण्ड समान होते हैं जैसे कॉक्सा (Coxa), ट्रोकेन्टर (Trochanter ), फीमर (Femur), टिबिया (Tibia), 1 से 5 युग्मित टारसस (1-5 Jointed Tarsus)।
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बोगेनविलिया का काँटा और कुकुरबिटा के प्रतान (Tendril) में समानता होती है। इसी प्रकार और भी उदाहरण जैसे

  1. आलू व अदरक,
  2. गाजर व मूली ।

1. अपसारित विकास ( अनुकूली अपसारिता / अनुकूली विकिरण ) [Divergent Evolution (adaptive divergence / adaptive radiation)] – विभिन्न जन्तुओं में पायी जाने वाली समजातता यह प्रदर्शित करती है कि इन सबकी उत्पत्ति किसी समान पूर्वज से हुई है। किसी एक पूर्वज से उत्पन्न होने के बाद जातियाँ अपने-अपने आवासों के अनुसार अनुकूलित हो जाती हैं।

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जिसे ही अनुकूली विकिरण या अपसारित विकास कहते हैं। इन जातियों में समजात अंग (Homologous Organs) पाये जाते हैं। जैसे आस्ट्रेलिया में अनुकूली विकिरण के द्वारा ही विभिन्न प्रकार के मासूपिल्स (Marsupials) की उत्पत्ति हुई ।
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(ii) समवृत्ति अंग (Analogous Organs) – वे अंग जिनके कार्य समान हों किन्तु उनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में अन्तर हो, समवृत्ति अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए-कीट, पक्षी तथा चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते हैं परन्तु इनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में बड़ा अन्तर होता है । इन अंगों में केवल आभासी समानताएँ पाई जाती हैं।

वातावरण एवं स्वभाव के कारण कार्यों में समानता होती है। कीट के पंखों का विकास शरीर की भित्ति से निकले प्रवर्गों के रूप में होता है जबकि पक्षी एवं चमगादड़ में इनकी उत्पत्ति शरीर भित्ति के प्रवर्गों के रूप में नहीं होती है । अतः इनके कार्यों में तो समानता होती है, परन्तु उत्पत्ति एवं संरचना में भिन्नता होती है।
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इसी तरह मधुमक्खी के डंक एवं बिच्छू के डंक दोनों ही समान कार्य करते हैं परन्तु इनकी संरचना एवं परिवर्धन भिन्न होता है । मधुमक्खी एक कीट है, इसके बाह्य जननांग मिलकर अण्ड निक्षेपक (Ovipositor) नाल बनाते हैं। यही अण्ड निक्षेपक नाल रूपान्तरित होकर डंक बनाती है जबकि बिच्छू में शरीर का अन्तिम खण्ड रूपान्तरित होकर डंक बनाता है।

इसके अतिरिक्त समवृत्ति के उदाहरण निम्न हैं-

  • ऑक्टोपस (अष्ट भुज) तथा स्तनधारियों की आँखें (दोनों में रेटिना की स्थिति में भिन्नता है) या पेंग्विन और डॉल्फिन मछलियों के फिलपर्स ।
  • रस्कस का पर्णाभ स्तम्भ (Phylloclade) और सामान्य पर्ण।
  • आलू (तना) और शकरकंद (जड़)।

समवृत्ति अंगों में कार्य की समानता एवं विशिष्ट वातावरण की आवश्यकता के अनुरूप विकास, अभिसरण जैव विकास (Convergent Evolution) को प्रकट करता है।

(2) शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण (Evidence from Physiology and Biochemistry)-fafum. जीव शरीर क्रिया और जैव रसायन में समानता प्रदर्शित करते हैं, कुछ स्पष्ट उदाहरण निम्न हैं-

  • जीवद्रव्य (Protoplasm ) – जीवद्रव्य की संरचना और संगठन सभी जन्तुओं में (प्रोटोजोआ से स्तनधारियों तक) लगभग समान होती है।
  • एन्जाइम (Enzyme) – सभी जीवों में एन्जाइम समान कार्य करते हैं। जैसे ट्रिप्सिन ( Trypsin) । अमीबा से लेकर मानव तक प्रोटीन पाचन और एमाइलेज (Amylase) पॉरीफेरा से स्तनधारियों तक स्टार्च पाचन करता है।
  • रुधिर (Blood) – रुधिर की रचना सभी कशेरुकियों में लगभग समान होती है।
  • हार्मोन (Hormones) – सभी कशेरुकियों में समान प्रकार के हार्मोन बनते हैं, जिनकी रचना व कार्य समान होते हैं।
  • अनुवांशिक पदार्थ (Hereditary Material ) – सभी जीवों में आनुवांशिक पदार्थ DNA होता है जिसकी मूल संरचना सभी जीवों में समान होती है।
  • ए.टी.पी. ( ATP ) – सभी जीवों में जैविक ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ATP के रूप में ऊर्जा संचित होती है।
  • (vii) साइटोक्रोम – सी ( Cytochrome – C ) – यह श्वसन वर्णक है जो सभी जीवों के माइटोकॉन्ड्रिया में उपस्थित होता है। इस प्रोटीन में 78-88 तक अमीनो अम्ल एक समान होते हैं जो समपूर्वजता को प्रदर्शित करते हैं।

इस प्रकार शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सभी जीवों का विकास एक ही मूल पूर्वज (Common Ancestor) से हुआ है।

(3) संयोजक कड़ियों के प्रमाण (Evidence of Connective Links) – जीवों के वर्गीकरण में समान गुणों वाले जीवों को एक ही वर्ग में रखा गया है। कुछ जन्तु ऐसे भी हैं जिनमें दो वर्गों के गुण पाये जाते हैं। इन जन्तुओं को योजक कड़ियाँ (Connective Links) कहते हैं।

संयोजक कड़ियों के उदाहरण-
(i) आर्किओप्टेरिक्स (Archeopteryx) – जर्मनी के बवेरिया प्रदेश में आर्किओप्टेरिक्स नामक जन्तु के जीवाश्म मिले हैं। इस जन्तु के कुछ लक्षण जैसे चोंच, पंख, पैरों की आकृति, एवीज वर्ग (पक्षी वर्ग) के तो कुछ लक्षण जैसे दाँत, पूँछ तथा शरीर पर शल्कों का होना रेप्टीलिया वर्ग के हैं। अतः इस जन्तु को एवीज तथा रेप्टीलिया वर्ग के मध्य योजक कड़ी कहते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों (Reptiles) से हुआ है।
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(ii) प्लेटीपस और एकिडना (Platypus and Echidna ) – प्लेटीपस और एकिडना दोनों ही मैमेलिया वर्ग के जन्तु हैं। इनके शरीर पर बाल पाये जाते हैं तथा बच्चों को दूध पिलाने के लिए दुग्ध ग्रन्थियाँ (Mammary Glands) होती हैं जो मैमेलिया वर्ग के लक्षण हैं। ये दोनों ही जन्तु रेप्टीलिया वर्ग के जन्तुओं की भाँति कवचदार पीतकयुक्त अण्डे देते हैं। इस प्रकार प्लेटीपस और एकिडना रेप्टीलिया और मैमेलिया वर्ग के मध्य एक योजक कड़ी हैं। ये जन्तु भी सिद्ध करते हैं कि स्तनधारियों का विकास सरीसृपों ( Reptiles ) से हुआ है।

(iii) पेरीपेटस (Peripatus ) – यह एनेलिडा तथा आर्थोपोडा संघ के बीच की संयोजी कड़ी है। पेरीपेटस में एनेलिडा संघ के निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • बेलनाकार आकृति
  • देहभित्ति की आकृति व चर्म का पेशीय होना
  • क्यूटिकल द्वारा निर्मित बाह्य कंकाल अनुपस्थित एवं पार्श्व पादों के समान उभारों का उपस्थित होना।

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संघ आर्थ्रोपोडा के समान पेरीपेटस में निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • तीन खण्डों के समेकन से सिर भाग का बनना
  • ऐंटिनी (Antennae ) का होना
  • एक जोड़ी सरल नेत्रों तथा एक जोड़ी मुख पैपिली का उपस्थित होना ।

अतः पेरिपेटस को एनीलीडा तथा आर्थ्रोपोडा संघ को जोड़ने वाली संयोजी कड़ी कहते हैं। यह प्रमाणित करता है कि आर्थोपोडा का विकास एनिलिडा से हुआ है ।

(iv) फुफ्फुस मछली (Lungfish ) प्रोटोप्टेरस (Portopterus) – प्रोटोप्टेरस में कुछ लक्षण मछलियों के (जैसे क्लोम तथा शल्कों की उपस्थिति) और कुछ लक्षण उभयचरों के (जैसे फुफ्फुस की उपस्थिति) पाये जाते हैं। अत: प्रोटोप्टेरस पिसीज तथा उभयचर संघ के बीच संयोजी कड़ी है।
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उपरोक्त के अतिरिक्त निम्न संयोजी कड़ियों के उदाहरण हैं-

  • वायरस (Virus) – संजीव और निर्जीव के मध्य
  • यूग्लीना (Euglena) – पादप और जन्तु के मध्य
  • प्रोटेरोस्पॉन्जिया (Proterospongia ) – प्रोटोजोआ और पॉरीफेरा के मध्य
  • नियोपाइलीना (Neopilina) – मोलस्का और एनेलिडा के मध्य उक्त कार्बनिक विकास और समपूर्वजता के अच्छे उदाहरण प्रदर्शित करते हैं।

(4) अवशेषी अंगों के प्रमाण (Evidences from Vestigeal Organs) – अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवन भर पूर्ण विकास नहीं होता है। ये जन्तु की जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते है। अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं। ऐसे अंगों को अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) कहते हैं। मनुष्य के शरीर में लगभग 180 ऐसी रचनायें होती हैं

जिनमें सामान्य निम्न हैं-

  • कृमिरूपी – परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है, जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरहे जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं . क्रियाशील होती है।
  • कर्ण पल्लव (Earpinna ) – घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे जन्तुओं के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है ।
  • पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है किन्तु फिर भी पुच्छ कशेरुकाएँ अत्यधिक हासित दुम के रूप में अवशेषी अंग के रूप में पायी जाती हैं। इससे पता चलता है कि मनुष्य के पूर्वज में पूँछ थी ।

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  • निमेषक पटला (Nictitating Membrane)-मेढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है । इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।
  • त्वचा के बाल (Hair ) – बन्दरों, घोड़ों, सूअरों, कपियों आदि स्तनियों के शरीर पर घने बाल होते हैं। ये ताप नियन्त्रण में सहायता करते हैं। मानव में बालों का यह कार्य नहीं रहा, फिर भी शरीर पर कुछ बाल होते हैं।
  • अक्कल दाढ़ ( Wisdom Teeth) – तीसरा मोलर दन्त अन्य प्राइमेट (Primate) स्तनियों में सामान्य होता है । मानव में इसका उपयोग नहीं होता है। अतः यह देर से निकलता है और अर्ध विकसित रहता है। यह दंतरोगों के प्रति संवेदनशील होता है।

अन्य जन्तुओं में अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in other Animals)

  • अजगर (Python) के पश्च पाद और श्रोणि मेखला
  • बिना उड़ने वाले ( Flightless) पक्षियों के पंख जैसे शुतुरमुर्ग, ईमू कीवी आदि ।
  • घोड़े के पैरों की स्पिलिंट अस्थियाँ (Splint Bones ) 2 और 4 अगुंली।
  • व्हेल के पश्चपाद और श्रोणि मेखला

पादपों के अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in Plants) – रस्कस और अनेक भूमिगत तनों की शल्की पत्तियाँ ।
अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे किन्तु इनके महत्त्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

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(5) श्रोणिकी से प्रमाण (Evidences from Embryology) – श्रोणिकी तुलनात्मक भ्रोणिकी तथा प्रायोगिक श्रोणिकी से विकास के पक्ष में निर्णायक प्रमाण मिलते हैं। सभी मेटोजोअन प्राणी एक कोशिकीय युग्मनज (Zygote) से विकसित होते हैं और सभी प्राणियों के परिवर्धन की प्रारम्भिक अवस्थाओं में अत्यधिक समानता होती है।

मनुष्य सहित सभी मेटाजोअन वर्गों के प्राणियों के अण्डों के परिवर्धन के समय विदलन, ब्लास्टूला एवं गेस्टुला में वही मूलभूत समानताएँ पायी जाती हैं। प्रौढ़ जन्तुओं में जितने निकट का सम्बन्ध होता है उनके परिवर्धन में उतनी अधिक समानता देखने को मिलती है। विभिन्न वर्गों में परिवर्धन के बाद की अवस्थाएँ अपसरित हो जाती हैं व यह अपसरण एक विशाखित वृक्ष के समान होता हैं।
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इसी प्रकार विभिन्न कशेरुकियों के भ्रूणों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उच्च वर्ग के जन्तुओं के भ्रूण निम्न वर्गों के प्रौढ़ जन्तुओं के समान होते हैं, जैसे मेढ़क का टेडपोल लारवा मछली के समान होता है। इसी आधार पर हेकल ने पुनरावर्तन का सिद्धान्त (Recapitulation Theory ) प्रतिपादित किया।

इसके अनुसार प्रत्येक जीव भ्रूणीय परिवर्धन में अपनी जाति के जातीय विकास की कथा को दोहराता है। पुनरावर्तन सिद्धान्त के आधार पर निषेचित अण्डे की तुलना समस्त जन्तुओं के एककोशिकीय पूर्वज से ब्लास्टुला की प्रोटोजोआ मण्डल या कॉलोनी से की जा सकती है। मेढ़क के ही नहीं वरन् रेप्टाइल, पक्षी और यहाँ तक कि मनुष्य के भ्रूण में भी क्लोम दरारें, क्लोम, नोटोकॉर्ड, युग्मित आयोटिक चॉपें, प्रोनेफ्रोस, पुच्छ तथा पेशियाँ आदि मछली के समान होती हैं और आरम्भ में सभी का हृदय मछली के समान द्विकक्षीय होता है।

इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारम्भ मे समस्त वर्टिब्रेट्स का विकास मछली के समान पूर्वजों से हुआ है। मनुष्य के भ्रूणीय परिवर्धन में देखा गया है कि उसका भ्रूण प्रारम्भ में मछली से, बाद में एम्फिबियन से और फिर रेप्टाइल से मिलता-जुलता होता है और सातवें मास में यह शिशु कपि से मिलता- जुलता होता है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव अपने भ्रूण परिवर्धन में उन समस्त अवस्थाओं से गुजरता है जिनसे कभी उसके पूर्वज धीरे-धीरे विकसित होकर बने होंगे।

(6) जीवाश्मीय प्रमाण (Palaeontological Evidences) – वैज्ञानिक चार्ल्स लायल के अनुसार पूर्व जीवों के चट्टानों से प्राप्त अवशेष जीवाश्म ( Fossils) कहलाते हैं। जीवाश्म का अध्ययन पेलियो-ओन्टोलॉजी (Palacontology) कहलाता है। जीवाश्म कार्बनिक विकास के पक्ष में सर्वाधिक मान्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि जीवाश्म द्वारा जीवों के सम्पूर्ण विकासीय इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है।

जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के सम्बन्ध में निम्न तथ्य प्रमाणित हुए-

  • जीवाश्म जो कि पुरानी चट्टानों से प्राप्त हुए सरल प्रकार के तथा जो नई चट्टानों से प्राप्त हुए जटिल प्रकार के थे।
  • विकास के प्रारम्भ में एक कोशिकी प्रोटोजोआ जन्तु बने जिनसे बहुकोशिकी जन्तुओं का विकास हुआ।
  • कुछ जीवाश्म विभिन्न वर्ग के जीवों के बीच की संयोजक कड़ियाँ (Connecting-links) को प्रदर्शित करती हैं।
  • पौधों में एन्जिओस्पर्म (Angiosperm) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (mammals) सबसे अधिक विकसित और आधुनिक हैं।
  • जीवाश्म के अध्ययन से किसी भी जन्तु को जीवाश्म कथा ( विकासीय इतिहास) या वंशावली का क्रमवार अध्ययन किया जा सकता है।

घोड़े की वंशावली ( जीवाश्मीय इतिहास ) [Evolution (Pedigree) of Horse] वैज्ञानिक सी. मार्श (C. Marsh) के अनुसार घोड़े का प्रारम्भिक जीवाश्म उत्तरी अमेरिका में पाया गया जिसका नाम इओहिप्पस (Eohippus) था। इसका विकास इओसीन काल में हुआ। इओहिप्पस लोमड़ी के समान तथा लगभग एक फुट ऊँचे थे। इनके अग्रपादों में चार तथा पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं ।
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ओलिगोसीन काल में इन पूर्वजों से भेड़ के आकार के मीसोहिप्पस (Mesohippus) घोड़ों का विकास हुआ। इनके अग्र व पश्च पादों में केवल तीन-तीन अंगुलियाँ थीं। बीच की अंगुलियाँ इधर- उधर की दोनों अंगुलियों से बड़ी थीं और शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं पर रहता था। इनसे मायोसीन काल के मेरीचिप्पस (Merychippus) घोड़ों का विकास हुआ।

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ये टट्ट के आकार के थे। इनके अग्र व पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं जिनमें से बीच वाली सबसे लम्बी थी और केवल यही भूमि तक पहुँचती थी । प्लायोसीन काल में प्लीओहिप्पस (Pliohippus) घोड़ों का विकास हुआ। ये आकार में टट्ट से ऊँचे थे। इनके अग्र व पश्चपादों में केवल एक-एक अंगुली विकसित थी और इधर-उधर की अंगुलियाँ अत्यधिक हासित होकर स्प्लिट अस्थियों

(Splint Bones) के रूप में त्वचा में दबी हुई थीं। केवल एक ही अंगुली की उपस्थिति के कारण ये तेजी से दौड़ सकते थे । प्लीस्टोसीन युग में इन्हीं घोड़ों से आधुनिक घोड़े इक्वस (Equus) का विकास हुआ। इक्वस की ऊँचाई लगभग 5 फीट है और यह उसी रूप में आज भी चला आ रहा है।

(7) जीवों के घरेलू पालन ( Domestication) से प्रमाण- मनुष्य अपने लिए उपयोगी जन्तुओं (घोड़े, गाय, कुत्ता, बकरी, भेड़, भैंस, कबूतर, मुर्गा आदि) तथा खेतिहर वनस्पतियों (गोभी, आलू, कपास, गेहूँ, चावल, मक्का, गुलाब आदि) की इनके जंगली पूर्वजों से नस्लें सुधार कर उत्पत्ति की है।

यद्यपि नस्लें सुधार कर नयी जातियों की उत्पत्ति वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं, फिर भी इस प्रक्रिया में बदले हुए लक्षण विकसीय ही माने जायेंगे हजारों-लाखों वर्षों का समय मिले तो सम्भवतः मानव इस विधि से नयी जीव जातियों की उत्पत्ति कर लेगा। अतः इतने पुराने इतिहास की प्रकृति में अनुमानत: इसी प्रकार नस्लों में सुधार के फलस्वरूप नयी-नयी जातियों की उत्पत्ति हुई होगी।

(8) रक्षात्मक समरूपता (Protective Resemblance) से प्रमाण – इंगलिस्तान (Britain) के औद्योगिक नगरों के आस-पास के पेड़ चिमनियों के धुएँ से काले पड़ जाते हैं। इन क्षेत्रों के कीटों, विशेष तौर से पतंगों (moths) की विभिन्न जातियों में, गत सदी में, औद्योगिक साँवलेपन (Industrial melanism) का रोग हो गया।

उदाहरणार्थ, पंतगों की बिस्टन बिटूलैरिया (Biston betularia) नामक जाति में शरीर व पंख हल्के रंग के काले धब्बेदार होते थे । सन् 1884 में इनकी आबादी में पहली बार एक बिल्कुल काला पतंगा देखा गया। यह परिवर्तन रंग के जीन में अचानक जीन – उत्परिवर्तन (gene- mutation) के कारण हुआ। बाद में काले पतंगों की संख्या बढ़ते-बढ़ते 90% हो गयी। यह एक विकासीय परिवर्तन था ।

इससे पतंगों का रंग पेड़ों के रंग से मिलता-जुलता हो गया ताकि ये शत्रुओं (पक्षियों) और शिकार की निगाहों से बच सकें । जीन – उत्परिवर्तन के कारण वातावरण से रक्षात्मक समरूपता के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं। इसे सादृश्यता (Mimicry) कहते हैं।

ऐसी तितलियाँ होती हैं जो उन्हीं सूखी पत्तियों जैसी दिखायी देती हैं जिन पर ये आराम के समय बैठती हैं शाखाओं से मिलती-जुलती आकृति की कई कीट जातियाँ पायी जाती हैं। ये सब दृष्टान्त ‘जैव – विकास’ को प्रमाणित करते हैं । इंगलिस्तान के पतंगों के सम्बन्ध में तो यहाँ तक कहा – गया है कि इनमें “वैज्ञानिकों ने विकास प्रक्रिया को होते हुए स्वयं देखा है।”
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प्रश्न 4.
समजातता और समवृत्तता का अन्तर बताइये समजात और अवशेषी अंगों को उदाहारण सहित समझाइये। इन सबसे किस प्रकार जैव विकास प्रमाणित होता है?
उत्तर:
समजातता और समवृत्तता में अन्तर- समजात अंग (Homologous Organs) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हों समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं। इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फिल्पर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं, जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं। इन अंगों की समजातता यह सिद्ध करती है कि इन सभी जन्तुओं के पूर्वज समान रहे होंगे तथा कालान्तर में इनका क्रमिक विकास हुआ हुआ है।

अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवनभर पूर्ण विकास नहीं होता है ये जन्तु जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते हैं अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं ऐसे अंगों को अवशेषी अंग कहते हैं। मनुष्य के शरीर में अनेक रचनाएँ होती हैं जो निम्न हैं-

1. कृमिरूपी परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरगोश जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं क्रियाशील होती है।

2. कर्ण पल्लव (Ear Pinna ) घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे प्राणियों के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है।

3. पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है। फिर भी कशेरुकदण्ड के अन्त में 3 से 5 तक (प्राय: अर्धविकसित) पुच्छ कशेरुकाएँ होती हैं। भ्रूणीय परिवर्धन पूरा होते-होते, ये समेकित (Fused) होकर हड्डी का एक ही टुकड़ा, कोक्सिस (Coccyx ) बना लेती हैं।

4. निमेषक पटल (Nictitating Membrane) – मेंढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है। इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।

5. शरीर पर बाल (Hair on the Body ) – गाय, घोड़े, गधे, बन्दर आदि का पूर्ण शरीर वालों से ढका रहता है, जो शरीर के ताप आदि के नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण सहायता देते हैं। मनुष्य अपने शरीर को तापक्रम के अनुकूल कपड़ों से ढक लेता है, अर्थात् बालों की आवश्यकता नहीं होती है, अतः ये बहुत सूक्ष्म होते हैं।

अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे। किन्तु इनके महत्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

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प्रश्न 5.
डार्विनिज्म पर एक निबंध लिखिये।
अथवा
डार्विनवाद क्या है? सविस्तार वर्णन कीजिए।
अथवा
प्राकृतिक वरण ( चयन) के सिद्धान्त के क्रियान्वयन के पदक्रमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी पर जीवों के क्रमिक परिवर्तन से नई जाति का बनना जैव विकास कहलाता है। यह आज सर्वमान्य है परन्तु जैव विकास की क्रियाविधि क्या रही है? इस समस्या के समाधान हेतु 19 वीं शताब्दी के आरम्भ में ही लेमार्क (Lamarck) द्वारा, बाद में डार्विन (Darwin) एवं ह्यूगो डी व्रिज (Hugo de Vries) द्वारा प्रयास किया गया।

(1) लामार्कवाद (Lamarckism)-फ्रांस के वैज्ञानिक जीन बेपटिस्ट डी लामार्क (1744-1829) ने अपनी संकल्पना प्रस्तुत की जिसे लामार्कवाद कहते हैं। इन्होंने उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।
लामार्कवाद की मुख्य चार अवधारणायें निम्न हैं-
(i) आंतरिक जैव बल (Internal vital force)-लामार्क के अनुसार सभी जीवों में कुछ आन्तरिक जैव बल उपस्थित हैं, इन बलों के कारण ही जीवों में अपने अंगों तथा पूर्ण शरीर के आकार में वृद्धि करने की प्रवृत्ति बनी रहती है।

(ii) वातावरण का प्रभाव और नई आवश्यकताएँ (Effect of environment and new needs)-वातावरण सभी प्रकार के जीवों को प्रभावित करता है। परिवर्तित वातावरण ही जीवों में नई आवश्यकताओं को उत्पन्न करता है। इन नई आवश्यकताओं के कारण जीव नई संरचनाओं को उत्पन्न करते हैं जिससे उनके स्वभाव और संरचनाओं में परिवर्तन आ जाते हैं।

(iii) अंगों का उपयोग तथा अनुपयोग (Use and disuse of organs)-यदि अंग लगातार उपयोग में आता है तो यह अधिक विकसित और शक्तिशाली हो जाता है तथा अनुपयोगी अंग धीरे-धीरे अपह्गासित होने लगते हैं।

(iv) उपार्जित लक्षणों की वंशागति (Inheritance of acquired character)-इस प्रकार जीव के जीवन काल में आंतरिक जैव बलों, वातावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव, नई आवश्यकता और अंगों के उपयोग तथा अनुपयोग के द्वारा नए लक्षणों का विकास हो जाता है। इन लक्षणों को उपार्जित लक्षण कहते हैं।

ये लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी से वंशागत होते हैं, कई पीढ़ियों तक इन लक्षणों की वंशागति से एक नई जाति का विकास हो जाता है जो अपने पूर्वज से भिन्न होती है उदाहरण-जिराफ, अफ्रीका में पाया जाने वाला जन्तु है। इसके पूर्वजों की आकृति काफी छोटी थी और उस समय उनके निवास स्थान में घास-फूस अधिक थी अतः पूर्वज घास पर निर्वाह करते थे।

धीरे-धीरे वातावरण में परिवर्तन हुआ जिसके कारण यह क्षेत्र रेगिस्तान बनने लगा। अतः जिराफ को भोजन के लिए ऊँचे पेड़-पौधों की पत्तियों पर निर्भर होना पड़ा। पेड़ों की पत्तियों तक पहुँचने के लिए छोटे जन्तु को अपनी गर्दन लगातार ऊपर करनी पड़ती तथा अग्र टाँगों द्वारा कूदकर पत्तियों तक पहुँचना पड़ता।

लामार्क ने बताया कि जिराफ की अगली टाँगों तथा गर्दन का अधिक उपयोग होने से ये अंग लम्बे होते गये। इन लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरण हुआ। जिराफ के अंगों का लम्बा होना उपार्जित लक्षण तथा इसका हस्तानान्तरण वंशागति कहलाते हैं जिसके फलस्वरूप आधुनिक जिराफ का विकास हुआ।
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(2) माल्थस (Malthus, 1838), चार्ल्स लाइल (Charles Lyell)- हरबर्ट स्पेन्सर (Herbert Spencer), वैलेस (Wallace 1823-1913) आदि के विचारों से प्रभावित होकर वैज्ञानिक वैलेस के साथ सन् 1858 में चार्स्स डार्विन ने जीवों में जीवन के लिए संघर्ष तथा प्रकृति द्वारा योग्य जातियों के चयन के विचार संयुक्त रूप से छपवाये। सन् 1959 में अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘प्राकृतिक वरण द्वारा जातियों की उत्पत्ति’ (Origin of Species by Natural Selection) का प्रकाशन कर प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त के रूप में किया। इसे ही आज डार्विनवाद कहा जाता है।

प्राकृतिक वरणवाद के मुख्य बिन्दु निम्न हैं-
(1) अत्यधिक प्रजनन (Over Production)-सभी जीव जातियों में संतानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता होती हैं और जीव गुणात्मक रूप में अपनी जाति की संख्या में वृद्धि करते हैं। जैसे-

  • पादप हजारों की संख्या में बीज पैदा करते हैं।
  • कीट सैकड़ों अण्डे एक बार में देते हैं।
  • एक जोड़ा हाथी सम्पूर्ण जीवन में लगभग 6 संतान पैदा करता है।

यदि सभी संतानें जीवित रहें और इसी प्रकार प्रजनन करें तो लगभग 750 वर्ष में एक जोड़े हाथी से 19 मिलियन हाथी पैदा हो जायेंगे। कुछ जीव अधिक संतान पैदा करते हैं, जबकि कुछ जीव कम संख्या में संतानोत्पत्ति करते हैं, इसे विभेदात्मक जनन कहते हैं।

(2) उत्तरजीविता के लिए संघर्ष (Struggle of Existence)- प्रत्येक जीव अपनी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे स्थान, आवास और भोजन आदि के लिए अपनी ही जाति अथवा अन्य जाति के सदस्यों के साथ प्रतियोर्गिता करते हैं। इसे उत्तरजीविता के लिए संघर्ष कहते हैं। यह संघर्ष जीव के सम्पूर्ण जीवन में जारी रहता है, युग्मनज (Zygote) बनने से लेकर प्राकृतिक मृत्यु तक।

उत्तरजीविता के लिए संघर्ष तीन प्रकार से होता है-

  • सजातीय संघर्ष (Intraspecific Struggle)-यह संघर्ष एक ही जाति के सदस्यों के बीच उनकी समान आवश्यकताओं के लिए होता है जैसे भोजन, आवास और जनन (यह सबसे तीव्रतम संघर्ष होता है)।
  • अन्तरजातीय संधर्ष (Interspecific Struggle)-यह
    भिन्न जाति के सदस्यों के बीच होता है। भोजन तथा आवास के लिए।
  • वातावरणीय संघर्ष (Environmental Struggle)-यह जीवों के उनके वातावरण की भिन्न परिस्थितियों के बीच होने वाले संघर्ष हैं, जैसे-जीव वर्षा, बाढ़-सूखा, भूकम्प, सर्दी-गर्मी आदि से सुरक्षित रहने के लिए संघर्ष करते हैं।

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(3) विभिन्नताएँ एवं वंशागति (Variations \& Heredity)-केवल समान जुड़वाँ संतानों (Identical Twins) को छोड़कर कोई भी दो जीव तथा उनकी आवश्यकताएँ समान नहीं होतीं। इसका अर्थ है जीवों के मध्य अन्तर होते हैं, यही अन्तर विभिन्नताएँ कहलाती हैं। इन्हीं विभिन्नताओं के कारण कुछ जीव दूसरों की अपेक्षा अपने वातावरण के प्रति अधिक अनुकूलित होते हैं।

डार्विन के अनुसार विभिन्नताएँ सतत होती हैं और ऐसी विभिन्नताएँ जो जीव को अपने वातावरण के प्रति अनुकूल बनाने या अनुकूलन स्थापित करने में सहायक होती हैं, अगली पीढ़ी में वंशागत हो जाती हैं जबकि अन्य विलुप्त हो जाती हैं।

(4) योग्यतम की उत्तरजीविता या प्राकृतिक वरण (Survival of Fittest or Natural Selection)-डार्विन के अनुसार उत्तरजीविता के लिए संघर्ष में केवल अधिक सफलतापूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले सदस्य ही योग्यतम सिद्ध होते हैं। संघर्ष में जो भी अधिक सक्षम होते हैं वही विजयी होकर योग्यतम सिद्ध होते हैं।

योग्यतम प्राणी ही अपने विशिष्ट लक्षणों के कारण लैंगिक प्रजनन के लिए संगम साथी (Mating Partner) को पाने में सफल होते हैं। इसे लैंगिक वरण (Sexual Selection) कहते हैं। उत्तरजीविता के लिए संघर्ष में केवल वही जीव जीवित रहते हैं जो लाभदायक विभिन्नताएँ रखते हैं अर्थात् प्रकृति केवल योग्यतम जीवों का ही चयन करती है, इसे प्राकृतिक वरण (Natural Selection) कहते हैं अर्थात् योग्यता अनुकूलन क्षमता का अन्तिम परिणाम होती है और प्रकृति द्वारा चयनित हो जाती है।

(5) नई जाति की उत्पत्ति (Origin of New Species)डार्विन ने स्पष्ट किया कि ऐसी विभिन्नताएँ जो वातावरणीय परिवर्तनों के कारण उत्पन्न होती हैं अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित हो जाती हैं जिससे नई संतान अपने पूर्वजों से भिन्नता प्रदर्शित करती है। अगली पीढ़ी में प्राकृतिक वरण का यही प्रक्रम पुनः दोहराया जाता है और कई पीढ़ियों के बाद अतंतः एक नई जाति का निर्माण हो जाता है।

प्राकृ तिक वरण के उदाहरण (Examples of Natural Selection)-
(i) औद्योगिक अतिकृष्णता (Industrial Melanism)-इस घटना का अध्ययन बेनार्ड केटलवेल द्वारा किया गया। औद्योगिक क्रान्ति के पहले श्लभ (मोथ विस्टन बेटेलेरिया) का स्लेटी रूप प्रभावी था, कारबोनेरिया रूप काला कम ही मिलता था क्योंकि यह पक्षी द्वारा परभक्षण के प्रति अनुकूलित (Susceptible) था। यह तभी दिखाई देता था जब पेड़ के तने पर विश्राम अवस्था में होता था।

औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप अत्यधिक मात्रा में धुआँ (Somke) होता है जो पेड़ के तने पर जमा होता जाता है और उसे काला कर देता है। अब ग्रे रूप (स्लेटी) अनुकूलित (Susceptible) हो जाता है और काला रूप पनप जाता है। कोयले का तेल और बिजली द्वारा प्रतिस्थापित काले रूप के उत्पादन को कम करता है जिससे स्लेटी मॉथथ की आकृति पुन: बढ़ जाती है।

(ii) औषधि प्रतिरोधिता (Drug Resistance)-औषधियाँ जो रोगजनक (Pathogens) को नष्ट करती हैं समय के साथ अप्रभावी होती जा रही हैं क्योंकि रोगजनक जाति के सदस्य इनको झेल लेते हैं और जीवित रहते हैं, पनपते हैं और प्रतिरोधी समष्टि का उत्पादन करते हैं।

प्रश्न 6.
‘जीवन की उत्पत्ति’ में केवल रासायनिक विकास ही हुआ। विस्तारपूर्वक लिखिये ।
उत्तर:
रासायनिक विकास का सिद्धान्त यह सिद्धान्त रूसी वैज्ञानिक ओपेरिन और हेल्डेन ने दिया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति रसायनों के संयोग से हुई, जिसे निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझाया गया-
(i) परमाणु अवस्था – पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व हुई। ऐसे तत्व जो जीवद्रव्य बनाने में प्रमुख रूप से भाग लेते हैं केवल परमाण्वीय अवस्था में पाये जाते थे। केवल हल्के तत्वों ने मिलकर पृथ्वी का आद्य वातावरण निर्मित किया जैसे कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन। इनमें सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन उपस्थित थी ।

(ii) आण्विक अवस्था (अणुओं और सरल अकार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति) – पृथ्वी के ताप में कमी होने के साथ हल्के स्वतन्त्र परमाणुओं के संयोग से अणु और सरल अकार्बनिक यौगिक बनने लगे। अति उच्च ताप के कारण सक्रिय हाइड्रोजन परमाणुओं ने सम्पूर्ण ऑक्सीजन से संयोग कर जल बनाया और वातावरण में मुक्त O2 नहीं रही।

आरम्भिक जीव- कोशिका का निर्माण इसलिए आद्य वातावरण अपचायी (Reducing ) था जबकि वर्तमान वातावरण स्वतन्त्र ऑक्सीजन की उपस्थिति के कारण उपचाय (Oxidising ) है। हाइड्रोजन परमाणुओं ने नाइट्रोजन से संयोग कर अमोनिया का निर्माण किया । जल तथा अमोनिया संभवतः प्रथम अकार्बनिक यौगिक थे । इन हल्के तत्वों में क्रियाओं द्वारा CO2, CO, N2, H2 आदि का भी निर्माण हो गया।

(iii) प्रारम्भिक कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति – वातावरण में उपस्थित नाइट्रोजन और कार्बन के धात्विक परमाणुओं के साथ संयोग से नाइट्राइड और कार्बाइड का निर्माण हुआ। जलवाष्प और धात्विक कार्बाइड की क्रिया द्वारा प्रथम कार्बनिक यौगिक मेथेन (CH4) का निर्माण हुआ। इसके बाद (HCN) हाइड्रोजन सायनाइड बना।

उस समय जो जल पृथ्वी पर बनता वह उच्च ताप के कारण वाष्पीकृत होकर बादल बन जाते तथा जलवाष्प वर्षा बूँदों के रूप में पुनः भूमि पर आ जाती जिससे लम्बे समय तक इस प्रक्रम के चलते रहने से पृथ्वी का ताप कम होने लगा और इस पर समुद्र बनने लगे ।

(iv) सरल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति- आदि सागर में जल में बड़ी मात्रा में मेथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन, सायनाइड्स, कार्बाइड और नाइट्राइड उपस्थित थे। इन प्रारम्भिक यौगिकों में संयोगों द्वारा सरल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हुआ, जैसे- अमीनो अम्ल, ग्सिलरॉल, वसा अम्ल, प्यूरीन, पिरामिडिन आदि।

क्रियाओं के लिए ऊर्जा सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों और ज्वालामुखी आदि से प्राप्त हुई। लेडरबर्ग ने प्रतिकृति प्लेटिंग प्रयोग द्वारा जीवाणुओं को उनके वातावरण के प्रति अनुकूलता की आनुवंशिकता का प्रदर्शन किया।

प्रश्न 18.
जीवन की उत्पत्ति के सम्बंध में ऑपेरिन मत पर निबंध लिखिए ।
उत्तर:
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में हमें ‘बिग बैंग’ नामक महाविस्फोट का सिद्धान्त यह कहता है कि एक महा विस्फोट के फलस्वरूप ब्रह्माण्ड का विस्तार हुआ और तापमान में कमी आई। कुछ समय बाद हाइड्रोजन एवं हीलियम गैसें बनीं। ये गैसें गुरुत्वाकर्षण के कारण संघनीभूत हुईं और वर्तमान ब्रह्माण्ड की आकाश गंगाओं का गठन हुआ।

आकाश गंगा के सौर मण्डल में पृथ्वी की रचना 4.5 बिलियन वर्ष (450 करोड़) पूर्व मानी जाती है। प्रारम्भिक अवस्था में पृथ्वी पर वायुमण्डल नहीं था। जल, वाष्य, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अमोनिया आदि धरातल को ढकने वाले गलित पदार्थों से निर्मुक्त हुई। सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (अल्ट्रावायलेट) किरणों ने पानी को (H2) तथा (O2) में विखण्डित कर दिया तथा हल्की (H2) मुक्त हो गई।

ऑक्सीजन ने अमोनिया (NH2) एवं मीथेन (CH2) के साथ मिलकर पानी, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) तथा अन्य गैसों आदि की रचना की। पृथ्वी के चारों तरफ ओजोन परत का गठन हुआ। जब यह ठण्डा हुआ, तो जल-वाष्प बरसात के रूप में बरसी और गहरे स्थान भर गए, जिससे महासागरों की रचना हुई। पृथ्वी की उत्पत्ति के लगभग 50 करोड़ वर्ष बाद अर्थात् 400 करोड़ वर्ष पहले जीवन प्रकट हुआ। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिकों एवं दार्शनिकों ने समय-समय पर अपनी-अपनी परिकल्पनाएँ प्रस्तुत कीं। इनमें प्रमुख परिकल्पनाएँ निम्न हैं-

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1. विशिष्ट सृष्टि का सिद्धान्त (Theory of Special Creation)-यह सिद्धान्त धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक फादर सुआरेझ (Father Suarez) थे, बाइबिल के अनुसार जीवन तथा सभी वस्तुओं की रचना भगवान द्वारा 6 दिनों में की गई।

प्रथम दिनस्वर्ग तथा नरक
द्वितीय दिनआकाश तथा जल
तीसरे दिनसूखी धरती और वनस्पति
चौथे दिनसूर्य, चन्द्रमा और तारे
पाँचवें दिनमछलियाँ और पक्षी
छठे दिनस्थलीय जन्तु और मनुष्य बने।

प्रथम मनुष्य (Adam) आदम बना और इसकी बारहवीं पसली से (Five) हौवा प्रथम नारी बनी। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विश्व और सृष्टि की रचना ब्रह्मा द्वारा की गई। (प्रथम मानव मनु और प्रथम नारी श्रद्धा थे ) । इसके अनुसार जीवन अपरिवर्तनशील है तथा उत्पत्ति के बाद उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। विशिष्ट सृष्टिवाद का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होने के कारण इसे स्वीकार नहीं किया गया।

2. स्वतः जनन का सिद्धान्त (अजीवात जीवोत्पत्ति) (Theory of Spontaneous Generation Abiogenesis or Autogenesis)-इस परिकल्पना का प्रतिपादन पुराने यूनानी दार्शानिक जैसे थेल्स, एनेक्सिमेन्डर, जेनोफेन्स, प्लेटो, एम्पीडोकल्स, अरस्तू द्वारा किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से अपने आप अचानक हुई।

इनका विश्वास था कि नील नदी के कीचड़ पर प्रकाश की किरणें गिरने पर उससे मेंढ़क, सर्प, मगरमच्छ आदि उत्पन्न हो गये। अजैविक उत्पत्ति का प्रायोगिक समर्थन वाल हेल्मोन्ट (Val Helmont 1642) द्वारा किया गया। इनके द्वारा अन्धेरे स्थल पर गेहूँ के चौकर (Barn) में पसीने से भीगी गन्दी कमीज (Shirt) को रखने पर 21 दिन में चूहों की उत्पत्ति को स्वतः जनन के द्वारा होना बताया।

3. ब्रह्माण्डवाद का सिद्धान्त (Cosmologic Theory)-यह सिद्धान्त रिचर (Richter) द्वारा प्रतिपादित किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन पृथ्वी पर सर्वप्रथम किसी अन्य ग्रह या नक्षत्र से जीवद्रव्य (Protoplasm), बीजाणु (Spores) या अन्य कणों के रूप में कॉस्मिक धूल के साथ पहुँचा जिसने जीवन के विभिन्न रूपों को जन्म दिया।

4. कॉस्मिक पेनस्पर्मिया सिद्धान्त (Cosmic Panspermia Theory)-यह सिद्धान्त आरीनियस (Arrhenius) द्वारा प्रतिपाद्ति किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवों के बीजाणु (Spores) ब्रह्माण्ड में एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर स्वतन्त्र रूप से आ जा सकते हैं। इन्होंने ही पृध्व्वी पर पहुँचकर जीवन के विभिन्न रूपों को जन्म दिया।

5. जीवन की अनन्तकालता का सिद्धान्त (Theory of Eternity of Life)-हेल्महॉट्ज (Helmhotz) ने जीवन की अनन्तकालिता (Eternity of Life) में विश्वास किया। इनके अनुसार जीवन की उत्पत्ति या सृष्टि का प्रश्न उठता ही नहीं, क्योंकि ‘जीवन अमर है; ब्रह्माप्ड की उत्पत्ति के समय ही अजीव और सजीव पदार्थों की एक साथ उत्पत्ति हुई ।

6. जीवात् जीवोत्पत्ति का सिद्धान्त (Theory of Biogenesis)-यह सिद्धान्त हार्वे (Harvey, 1951) और हक्सले (T.H. Huxley, 1870) नामक वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपाद्त किया। इनके अनुसार पृथ्वी पर नये जीवन की उत्पत्ति या निर्माण पूर्व जीवों से होता है न कि निर्जीव पदार्थों से।

यह सिद्धान्त स्वतः जनन (Spontaneous Generation) का तो खण्डन करता है किन्तु पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है। जीवात् जीवोत्पत्ति का प्रायोगिक सत्यापन और स्वतः जनन का प्रायोगिक खण्डन करने के लिए प्रमुख वैज्ञानिकों द्वारा किये गये प्रयोग अग्र हैं।

7. फ्रांसेस्को रेडी (Francesco Redi, 1668-इटालियन ) का प्रयोग-इन्होंने मरे हुए सांपों, मछलियों और माँस के टुकड़ों को जारों में रखकर कुछ जार खुुले छोड़े तथा कुछ को सील किया या जालीदार कपड़े में बंद किया। देखिए सामने। खुले जारों में मक्खियों ने माँस पर अण्डे दिये जिनसे डिम्भक (Larvae of maggots) निकले बंद जारों में मक्खियाँ नहीं घुस पायीं।

अतः इनके माँस में डिम्भक (Larvae or maggots) नहीं दिखाई दिये। इस प्रयोग द्वारा सिद्ध होता है कि डिम्भक का विकास मक्खियों द्वारा दिये गये अण्डों से हुआ जबकि बंद जार में मक्खियों के नहीं घुस पाने के कारण उनमें किसी प्रकार के डिम्भक (Larvae) का विकास नहीं हुआ। अतः जीव का जन्म पहले से उपस्थित जीव द्वारा संभव है न कि स्वतः जनन द्वारा।
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8. लैजेरो स्पैलैन्जनी (Lazzaro Spallanzani 1767 इटालियन) का प्रयोग-इन्होंने बंद फ्लास्कों में सब्जियों और माँस को उबालकर जीवाणु रहित (Sterilized) पोषक शोरबा (Broth) तैयार किया। खुले या ढीले कार्क से बन्द्र जारों में रखने पर इस शोरबे में अनेक जीवाणु पनप जाते थे, परन्तु सीलबन्द करके रखने पर इसमें जीवाणु उत्पन्न नहीं होते थे।

नीधम (Needham) ने इस प्रयोग के विरोध में कहा कि अधिक उबालने से यह शोरबा जीवों के स्वतः उत्पादन के योग्य नहीं रहा। इस पर स्पैलैन्जनी (Spallanzani) ने सीलबंद फ्लास्कों की नलियों को तोड़ दिया। कुछ दिन बाद हवा के भीतर पहुँचने के कारण, इन जारों के शोरबे में भी जीवाणु हो गये। इससे सिद्ध हुआ कि सूक्ष्म जीवाणु भी स्वतः उत्पादन द्वारा नहीं, वरन् हवा में उपस्थित जीवाणु से ही बनते हैं।

9. लुईस पाश्चर (Louis Pasteur, 1860-1862-फ्रांसीसी) का प्रयोग-लुईस पाश्चर ने रोगों का रोगाणु सिद्धान्त (Germ Theory of Diseases or Germ Theory) प्रतिपादित के साथ अजैव उत्पत्ति को गलत सिद्ध किया।
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इन्होंने शक्कर और यीस्ट (Yeast) का घोल उबाल कर उसे जीवाणु रहित कर दिया। अब इस घोल को दो प्रकार के फ्लास्क में रखा एक जार (फ्लास्क) की गर्दन को गरम करके खींच कर ‘S’ आकार (हंस की गर्दन के समान) का बना दिया तथा दूसरे की गर्दन को तोड़ दिया देखिए सामने ‘S’ आकृति की गर्दन वाले फ्लास्क में कोई जीवाणु दिखाई नहीं दिये क्योंकि मुड़ी गर्दन पर धूल कण और सूक्ष्म जीव चिपक गए और विलयन तक नहीं पहुँच सके।

जबकि टूटी ग्रीवा वाले फ्लांस्क में वायु और सूक्ष्म जीव आसानी से पहुँच जाने के कारण उसमें सूक्ष्म जीवों की कॉलोनी का विकास हो गया। लुईस पाश्चर के प्रयोगों से अजीवात् जीवोत्पत्ति की धारणा समाप्त हो गई और सजीवों से ही जीवन की उत्पत्ति सिद्ध हो गई।

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10. ओपेरिन-हेल्डेन सिद्धान्त (Oparin-Haldane Theory of Origin of Life)-वैज्ञानिक ए.आई. ओपेरियन और जे.बी.एस. हेल्डेन (इंग्लैण्ड में जन्मे भारतीय वैज्ञानिक) ने प्रकृतिवाद् या रासायनिक विकास का सिद्धान्त (Naturalistic Theory or Theory of Chemical Evolution) प्रतिपादित किया। यह सिद्धान्त जीवन की उत्पत्ति का आधुनिक सिद्धान्त (Modern Theory of Origin of Life) है। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति रसायनों के संयोग से हुई जिसे निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझाया गया है-
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(i) परमाणु अवस्था (The Atomic Stage)-पृथ्व्वी की उत्पत्ति लगभग 4-6 अरब वर्ष पूर्व हुई। ऐसे तत्व जो जीवद्रव्य बनाने में प्रमुख रूप से भाग लेते हैं केवल परमाण्वीय अवस्था में पाये जाते थे। केवल हल्के तत्वों ने मिलकर पृथ्वी का आद्य वातावरण निर्मित किया जैसे कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन। इनमें सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन उपस्थित थी।

(ii) आण्विक अवस्था (अणुओं और सरल अकार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति) Molecular Stage (Origin of Molecules and Simple Inorganic Compounds)-पृथ्वी के ताप में कमी होने के साथ हल्के स्वतन्त्र परमाणुओं में संयोग से अणु और सरल अकार्बनिक यौगिक बनने लगे। अति उच्च ताप के कारण सक्रिय हाइड्रोजन परमाणुओं ने सम्मूर्ण ऑक्सीजन से संबोग कर जल बनाया और वातावरण में मुक्त ऑक्सीजन नहीं रही।

इसलिए आद्य वातावरण अपचायी (Reducing) था जबकि वर्तमान वातावरण स्वतन्त्र ऑक्सीजन की उपस्थिति के कारण उपचायी (Oxidising) है। हाइड्रोजन परमाणुओं ने नाइट्रोजन से संयोग कर अमोनिया (NH3) का निम्माण किया। जल तथा अमोनिया सम्भवतः प्रथम अकार्घनिक (Inorganic) यौगिक थे। इन हल्के तत्वों में क्रियाओं द्वारा CO2,CO N2,H2 आदि का भी निर्माण हो गया।

(iii) प्रारम्भिक कार्बनिक याँगिकों की उत्पत्ति (Origin of Early Organic Compounds)-वातावरण में उपस्थित नाइट्रोजन और कार्बन के धात्चिक परमाणुओं के साथ संयोग से नाइट्राइड और कार्बाइड का निर्माण हुआ। जल वाष्प और धात्चिक कार्बाइड के क्रिया द्वारा प्रथम काबंनिक यौगिक मेथेन CH4 का निर्माण हुआ। इसके बाद HCN हाइड्रोजन सायनाइड बना।

उस समय जो जल पृथ्वी पर बनता उच्च ताप के कारण वाष्पीकृत हो जाता जिससे बादल बन जाते तथा जलवाष्प वर्षा बंदों के रूप में पुनः भूमि पर आ जाती जिससे लम्बे समय तक इस प्रक्रम के चलते रहने से पृथ्वी का ताप कम होने लगा और इस पर समुद्र बनने लगे।

(iv) सरल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति (Origin of Simple Organic Compounds)-आदि सागर के जल में बड़ी मात्रा में मेथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन, सायनाइड्स, कार्बाइड और नाइट्राइड्स उपस्थित थे। इन प्रारम्भिक यौगिकों में संयोग द्वारा सरल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हुआ जैसे अमीनो अम्ल, गिलसरॉल, वसा अम्ल, प्यूरीन, पिरीमिडीन आद्व। क्रियाओं के लिए ऊर्जा सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों और ज्बालामुखी आदि से प्राप्त हई ।

(v) जटिल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति (Origin of Complex Organic Compounds)-समुद्री जल में छोटे सरल कार्बनिक यौगिकों के संयोग से बड़े जटिल कार्बनिक यौगिक बनने लगे जैसे-एमीनो अम्लों के संयोग से बड़ी शृंखलाएँ पॉलीपेप्टाइड्स (Polypeptides) और प्रोटीन बने। वसा अम्ल और ग्लिसरॉल के संयोग से वसा (Fat) और लिपिड (Lipid) बने।

सरल शर्कराओं के संयोग से डाइसैकेराइड और पॉलीसेकेराइड बने। शर्करा, नाइट्रोजनी क्षारक और फास्फेट्स के संयोग से न्यूक्लिओटाइड बने जिनकें बहुलीकरण से न्यूक्लिक अम्ल बने। इस प्रकार समुद्री जल में ऐसे दीर्घ अणुओं (Macro molecules) का निर्माण हो गया जो जीवद्रव्य के मुख्य घटकों का निर्माण करते हैं। अतः आदि सागर में जीवन की उत्पत्ति की संम्भावनाएँ स्थापित हो गईं।
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लम्बे समय के बाद रासायनिक विकास के परिणामस्वरूप आदि सागरों का जल इन कार्बनिक यौगिकों से पूर्णतया संतृप्त हो गया। कोसरवेट व न्यूक्लिओ प्रोटीन का निर्माण-बड़े कार्बनिक अणु जो कि सागर में अजैव संश्लेषण द्वारा बने थे, एक-दूसरे के समीप आने लगे जिससे बड़ी कोलाइडी बूँदों के समान संरचनाओं का निर्माण हुआ।

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इन्हीं कोलाइडी बूँदों का ऑपेरिन द्वारा कोसरवेट नाम दिया गया। कोसरवेट (संराशयक) वृहद् अणुओं का झुण्ड था जिसमें प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, लिपिड्स और पॉलीसेकेराइड्स आदि थे। इनमें वातावरण से कार्बनिक अणुओं के अवशोषण की क्षमता थी, ये जीवाणुओं के समान मुकुलन द्वारा विभाजित हो सकते थे, इनमें ग्लूकोज के अपघटन जैसी क्रियाएँ होती थीं।

रासायनिक क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती थी। ओपैरिन के अनुसार कोसरवेट सर्वप्रथम बने सरलजीवीय अणु थे जिन्होंने बाद में कोशिका को जन्म दिया। स्टैनले मिलर का प्रयोग (Experiment of S. Miller)ओपैरिन की परिकल्पना के अनुसार, प्रबल ऊर्जा की उपस्थिति में, मीथेन, हाइड्रोजन, जलवाष्प एवं अमोनिया के संयोजन से अमीनो अम्लों, सरल शर्कराओं तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण की सम्भावना को, अमेरिकी वैज्ञानिक स्टैनले मिलर (Stanley Miller 1953,1957) ने अपने आचार्य-हेरोल्ड यूरे (Harold Urey) की देखरेख में एक साधारण से प्रयोग द्वारा सिद्ध किया।

उन्होंने 5 लीटर के एक फ्लास्क में 2: 1: 2 के अनुपात में, मीथेन, अमोनिया एवं हाइड्रोजन का गैसीय मिश्रण भरा। देखिए चित्र 7.5 में। एक आधा लीटर के फ्लास्क को काँच की नली द्वारा बड़े फ्लास्क से जोड़ा। इस छोटे फ्लास्क में जल भरकर इसे उबालने का प्रंबध किया जिससे जलवाष्प पूरे उपकरण में घूमती है।

बड़े फ्लास्क में टंग्टन (Tungsten) के दो इलेक्ट्रोड (Electrodes) फिट करके, आदिवायुमण्डल की बिजली जैसे प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए एक सप्ताह तक तीव्र विद्युत की चिन्गारियाँ मुक्त कीं। इसलिए इस उपकरण को चिन्गारी-विमुक्ति उपकरण (Spark-Discharge Apparatus) कहते हैं। बड़े फ्लास्क को उन्होंने दूसरी ओर एक U नली द्वारा भी छोटे फ्लास्क से जोड़ा।

इस नली को एक स्थान पर एक कन्डेंसर (Condenser) में से निकाला। प्रयोग के अन्त में बनी गैस वाष्प के साथ जब कन्डेंसर के कारण ठण्डी हुई तो U नली में एक गहरा लाल-सा ग़द्दला तरल भर गया। विश्लेषण से पता लगा कि यह तरल ग्लाइसीन एवं एलैनीन नामक सरलतम अमीनो अम्लों, सरल शर्कराओं, कार्बनिक अम्लों तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों का मिश्रण था।
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अन्य वैज्ञानिकों ने भी इसी प्रकार आदि पृथ्वी पर उपस्थित दशाओं को प्रयोगशाला में उत्पन्न करके सरल अकार्बनिक एवं कार्बनिक यौगिकों से जटिल कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण को सिद्ध किया। उल्का पिण्डों सें प्राप्त रासायनिक विश्लेषण द्वारा भी पता चलता है कि अंतरिक्ष में भी यह घटना क्रम चलता होगा। इन कार्बनिक अणुओं से जीवन प्रारम्भ हुआ।

यह अणु अपने समान अणु बनाने में भी सक्षम थे। उसके पश्चात् एक कोशिकीय जीव जल में उत्पन्न हुए एवं उसके बाद धीरे-धीरे विकास की ओर लगातार बढ़ते हुए जैवविविधता बढ़ती गई व जो पृथ्वी पर आज हमें पादप व जीव-जन्तु देखने को मिलते हैं वह सभी एक कोशिकीय जलीय जीवों से विकसित हुये हैं।

प्रश्न 19.
तुलनात्मक शरीर रचना से जैव विकास के लिए क्या प्रमाण प्राप्त होते हैं? विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यदि जैव विकास (Organic Evolution) हुआ है तो प्रारम्भ से लेकर आज तक की जीव-जातियों की रचना, कार्यिकी एवं रसायनी, भ्रूणीय विकास, वितरण आदि में कुछ न कुछ सम्बन्ध एवं क्रम होना आवश्यक है। लैमार्क, डार्विन वैलेस, डी व्रिज आदि ने जैव विकास के बारे में अपनी-अपनी परिकल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए इन्हीं – सम्बन्धों एवं क्रम को दिखाने वाले प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिन्हें हम

निम्नलिखित श्रेणियों में बाँट सकते हैं-

  1. जीवों की तुलनात्मक संरचना
  2. शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण
  3. संयोजक कड़ियों के प्रमाण
  4. अवशेषी अंग
  5. भ्रोणिकी से प्रमाण
  6. जीवाश्मीय प्रमाण
  7. जीवों के घरेलू पालन से प्रमाण
  8. रक्षात्मक समरूपता

(1) जीवों की तुलनात्मक संरचना ( Comparative Anatomy) से प्रमाण – जन्तुओं में शारीरिक संरचनाएँ दो प्रकार की होती हैं-
(i) समजात अंग (Homologous organ ) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हो, समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं। इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फ्लिपर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल (ह्यूमरस, रेडियस अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स व अंगुलास्थियाँ ) की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं।
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कीटों के मुखांग (Mouth Parts of Insects ) – कीटों के मुखांग क्रमशः लेब्रम ( Labrum), मेण्डिबल (Mandibles), मैक्सिला (Maxilla), लेबियम (Labium) एवं हाइपोफे रिंक्स (hypopharynx) से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक कीट में इनकी संरचना एवं परिवर्धन समान होता है लेकिन इनके कार्यों में भिन्नता पाई जाती है। कॉकरोच के मुखांग भोजन को काटने व चबाने (Biting and Chewing) का कार्य करते हैं ।

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तितली एवं मक्खी में भोजन चूसने का एवं मच्छर में मुखांग भेदन एवं चूषण (Piercing and Sucking) दोनों का कार्य करते हैं। अकशेरुकियों के पैर (Legs of Invertibrates) – इसी प्रकार कॉकरोच एवं मधुमक्खी ( Honeybee) के टांगों के कार्य भिन्न- भिन्न हैं। कॉकरोच अपनी टांगों का उपयोग चलने (Walking) में करता है जबकि मधुमक्खी अपनी टांगों का उपयोग परागकण को एकत्रित (Collecting of Pollens) करने में करती है। जबकि दोनों की टांगों में खण्ड पाये जाते हैं तथा सभी खण्ड समान होते हैं जैसे कॉक्सा (Coxa), ट्रोकेन्टर (Trochanter ), फीमर (Femur), टिबिया (Tibia), 1 से 5 युग्मित टारसस (1-5 Jointed Tarsus)।
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बोगेनविलिया का काँटा और कुकुरबिटा के प्रतान (Tendril) में समानता होती है। इसी प्रकार और भी उदाहरण जैसे

  1. आलू व अदरक,
  2.  गाजर व मूली ।

(i)अपसारित विकास ( अनुकूली अपसारिता / अनुकूली विकिरण ) [Divergent Evolution (adaptive divergence / adaptive radiation)] – विभिन्न जन्तुओं में पायी जाने वाली समजातता यह प्रदर्शित करती है कि इन सबकी उत्पत्ति किसी समान पूर्वज से हुई है। किसी एक पूर्वज से उत्पन्न होने के बाद जातियाँ अपने-अपने आवासों के अनुसार अनुकूलित हो जाती हैं। जिसे ही अनुकूली विकिरण या अपसारित विकास कहते हैं। इन जातियों में समजात अंग (Homologous Organs) पाये जाते हैं । जैसे आस्ट्रेलिया में अनुकूली विकिरण के द्वारा ही विभिन्न प्रकार के मासूपिल्स (Marsupials) की उत्पत्ति हुई ।
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(ii) समवृत्ति अंग (Analogous Organs) – वे अंग जिनके कार्य समान हों किन्तु उनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में अन्तर हो, समवृत्ति अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए-कीट, पक्षी तथा चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते हैं परन्तु इनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में बड़ा अन्तर होता है । इन अंगों में केवल आभासी समानताएँ पाई जाती हैं।

वातावरण एवं स्वभाव के कारण कार्यों में समानता होती है। कीट के पंखों का विकास शरीर की भित्ति से निकले प्रवर्गों के रूप में होता है जबकि पक्षी एवं चमगादड़ में इनकी उत्पत्ति शरीर भित्ति के प्रवर्गों के रूप में नहीं होती है । अतः इनके कार्यों में तो समानता होती है, परन्तु उत्पत्ति एवं संरचना में भिन्नता होती है।
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इसी तरह मधुमक्खी के डंक एवं बिच्छू के डंक दोनों ही समान कार्य करते हैं परन्तु इनकी संरचना एवं परिवर्धन भिन्न होता है । मधुमक्खी एक कीट है, इसके बाह्य जननांग मिलकर अण्ड निक्षेपक (Ovipositor) नाल बनाते हैं। यही अण्ड निक्षेपक नाल रूपान्तरित होकर डंक बनाती है जबकि बिच्छू में शरीर का अन्तिम खण्ड रूपान्तरित होकर डंक बनाता है।

इसके अतिरिक्त समवृत्ति के उदाहरण निम्न हैं-

  • ऑक्टोपस (अष्ट भुज) तथा स्तनधारियों की आँखें (दोनों में रेटिना की स्थिति में भिन्नता है) या पेंग्विन और डॉल्फिन मछलियों के फिलपर्स ।
  • रस्कस का पर्णाभ स्तम्भ (Phylloclade) और सामान्य पर्ण।
  • आलू (तना) और शकरकंद (जड़)।

समवृत्ति अंगों में कार्य की समानता एवं विशिष्ट वातावरण की आवश्यकता के अनुरूप विकास, अभिसरण जैव विकास (Convergent Evolution) को प्रकट करता है।

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(2) शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण (Evidence from Physiology and Biochemistry)-fafum. जीव शरीर क्रिया और जैव रसायन में समानता प्रदर्शित करते हैं, कुछ स्पष्ट उदाहरण निम्न हैं-

  • जीवद्रव्य (Protoplasm) – जीवद्रव्य की संरचना और संगठन सभी जन्तुओं में (प्रोटोजोआ से स्तनधारियों तक) लगभग समान होती है।
  • एन्जाइम (Enzyme) – सभी जीवों में एन्जाइम समान कार्य करते हैं। जैसे ट्रिप्सिन (Trypsin) । अमीबा से लेकर मानव तक प्रोटीन पाचन और एमाइलेज (Amylase) पॉरीफेरा से स्तनधारियों तक स्टार्च पाचन करता है।
  • रुधिर (Blood) – रुधिर की रचना सभी कशेरुकियों में लगभग समान होती है।
  • हार्मोन (Hormones) – सभी कशेरुकियों में समान प्रकार के हार्मोन बनते हैं, जिनकी रचना व कार्य समान होते हैं।
  • अनुवांशिक पदार्थ (Hereditary Material) – सभी जीवों में आनुवांशिक पदार्थ DNA होता है जिसकी मूल संरचना सभी जीवों में समान होती है।
  • ए.टी.पी. ( ATP) – सभी जीवों में जैविक ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ATP के रूप में ऊर्जा संचित होती है।
  • साइटोक्रोम – सी ( Cytochrome – C) – यह श्वसन वर्णक है जो सभी जीवों के माइटोकॉन्ड्रिया में उपस्थित होता है। इस प्रोटीन में 78-88 तक अमीनो अम्ल एक समान होते हैं जो समपूर्वजता को प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सभी जीवों का विकास एक ही मूल पूर्वज (Common Ancestor) से हुआ है।

(3) संयोजक कड़ियों के प्रमाण (Evidence of Connective Links) – जीवों के वर्गीकरण में समान गुणों वाले जीवों को एक ही वर्ग में रखा गया है। कुछ जन्तु ऐसे भी हैं जिनमें दो वर्गों के गुण पाये जाते हैं। इन जन्तुओं को योजक कड़ियाँ (Connective Links) कहते हैं।

संयोजक कड़ियों के उदाहरण-
(i) आर्किओप्टेरिक्स (Archeopteryx) – जर्मनी के बवेरिया प्रदेश में आर्किओप्टेरिक्स नामक जन्तु के जीवाश्म मिले हैं। इस जन्तु के कुछ लक्षण जैसे चोंच, पंख, पैरों की आकृति, एवीज वर्ग (पक्षी वर्ग) के तो कुछ लक्षण जैसे दाँत, पूँछ तथा शरीर पर शल्कों का होना रेप्टीलिया वर्ग के हैं। अतः इस जन्तु को एवीज तथा रेप्टीलिया वर्ग के मध्य योजक कड़ी कहते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों (Reptiles) से हुआ है।
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(ii) प्लेटीपस और एकिडना (Platypus and Echidna ) – प्लेटीपस और एकिडना दोनों ही मैमेलिया वर्ग के जन्तु हैं। इनके शरीर पर बाल पाये जाते हैं तथा बच्चों को दूध पिलाने के लिए दुग्ध ग्रन्थियाँ (Mammary Glands) होती हैं जो मैमेलिया वर्ग के लक्षण हैं। ये दोनों ही जन्तु रेप्टीलिया वर्ग के जन्तुओं की भाँति कवचदार पीतकयुक्त अण्डे देते हैं। इस प्रकार प्लेटीपस और एकिडना रेप्टीलिया और मैमेलिया वर्ग के मध्य एक योजक कड़ी हैं। ये जन्तु भी सिद्ध करते हैं कि स्तनधारियों का विकास सरीसृपों ( Reptiles ) से हुआ है।

(iii) पेरीपेटस (Peripatus ) – यह एनेलिडा तथा आर्थोपोडा संघ के बीच की संयोजी कड़ी है। पेरीपेटस में एनेलिडा संघ के निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • बेलनाकार आकृति
  • देहभित्ति की आकृति व चर्म का पेशीय होना
  • क्यूटिकल द्वारा निर्मित बाह्य कंकाल अनुपस्थित एवं पार्श्व पादों के समान उभारों का उपस्थित होना।

संघ आर्थ्रोपोडा के समान पेरीपेटस में निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • तीन खण्डों के समेकन से सिर भाग का बनना
  • ऐंटिनी (Antennae ) का होना
  • एक जोड़ी सरल नेत्रों तथा एक जोड़ी मुख पैपिली का उपस्थित होना ।

अतः पेरिपेटस को एनीलीडा तथा आर्थ्रोपोडा संघ को जोड़ने वाली संयोजी कड़ी कहते हैं। यह प्रमाणित करता है कि आर्थोपोडा का विकास एनिलिडा से हुआ है ।

(iv) फुफ्फुस मछली (Lungfish ) प्रोटोप्टेरस (Portopterus) – प्रोटोप्टेरस में कुछ लक्षण मछलियों के (जैसे क्लोम तथा शल्कों की उपस्थिति) और कुछ लक्षण उभयचरों के (जैसे फुफ्फुस की उपस्थिति) पाये जाते हैं। अत: प्रोटोप्टेरस पिसीज तथा उभयचर संघ के बीच संयोजी कड़ी है।
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उपरोक्त के अतिरिक्त निम्न संयोजी कड़ियों के उदाहरण हैं-

  • वायरस (Virus) – संजीव और निर्जीव के मध्य
  • यूग्लीना (Euglena) – पादप और जन्तु के मध्य
  • प्रोटेरोस्पॉन्जिया (Proterospongia ) – प्रोटोजोआ और पॉरीफेरा के मध्य
  • नियोपाइलीना (Neopilina) – मोलस्का और एनेलिडा के मध्य उक्त कार्बनिक विकास और समपूर्वजता के अच्छे उदाहरण प्रदर्शित करते हैं।

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(4) अवशेषी अंगों के प्रमाण (Evidences from Vestigeal Organs) – अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवन भर पूर्ण विकास नहीं होता है। ये जन्तु की जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते है। अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं। ऐसे अंगों को अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) कहते हैं। मनुष्य के शरीर में लगभग 180 ऐसी रचनायें होती हैं जिनमें सामान्य निम्न हैं-

  • कृमिरूपी – परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है, जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरहे जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं . क्रियाशील होती है।
  • कर्ण पल्लव (Earpinna ) – घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे जन्तुओं के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है ।
  • पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है किन्तु फिर भी पुच्छ कशेरुकाएँ अत्यधिक हासित दुम के रूप में अवशेषी अंग के रूप में पायी जाती हैं। इससे पता चलता है कि मनुष्य के पूर्वज में पूँछ थी ।

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  • निमेषक पटला (Nictitating Membrane)-मेढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है । इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।
  • त्वचा के बाल (Hair ) – बन्दरों, घोड़ों, सूअरों, कपियों आदि स्तनियों के शरीर पर घने बाल होते हैं। ये ताप नियन्त्रण में सहायता करते हैं। मानव में बालों का यह कार्य नहीं रहा, फिर भी शरीर पर कुछ बाल होते हैं।
  • अक्कल दाढ़ ( Wisdom Teeth) – तीसरा मोलर दन्त अन्य प्राइमेट (Primate) स्तनियों में सामान्य होता है । मानव में इसका उपयोग नहीं होता है। अतः यह देर से निकलता है और अर्ध विकसित रहता है। यह दंतरोगों के प्रति संवेदनशील होता है।

अन्य जन्तुओं में अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in other Animals)

  • अजगर (Python) के पश्च पाद और श्रोणि मेखला
  • बिना उड़ने वाले ( Flightless) पक्षियों के पंख जैसे शुतुरमुर्ग, ईमू कीवी आदि ।
  • घोड़े के पैरों की स्पिलिंट अस्थियाँ (Splint Bones ) 2 और 4 अगुंली।
  • व्हेल के पश्चपाद और श्रोणि मेखला

पादपों के अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in Plants) – रस्कस और अनेक भूमिगत तनों की शल्की पत्तियाँ ।
अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे किन्तु इनके महत्त्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

(5) श्रोणिकी से प्रमाण (Evidences from Embryology) – श्रोणिकी तुलनात्मक भ्रोणिकी तथा प्रायोगिक श्रोणिकी से विकास के पक्ष में निर्णायक प्रमाण मिलते हैं। सभी मेटोजोअन प्राणी एक कोशिकीय युग्मनज (Zygote) से विकसित होते हैं और सभी प्राणियों के परिवर्धन की प्रारम्भिक अवस्थाओं में अत्यधिक समानता होती है।

मनुष्य सहित सभी मेटाजोअन वर्गों के प्राणियों के अण्डों के परिवर्धन के समय विदलन, ब्लास्टूला एवं गेस्टुला में वही मूलभूत समानताएँ पायी जाती हैं। प्रौढ़ जन्तुओं में जितने निकट का सम्बन्ध होता है उनके परिवर्धन में उतनी अधिक समानता देखने को मिलती है। विभिन्न वर्गों में परिवर्धन के बाद की अवस्थाएँ अपसरित हो जाती हैं व यह अपसरण एक विशाखित वृक्ष के समान होता हैं।
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इसी प्रकार विभिन्न कशेरुकियों के भ्रूणों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उच्च वर्ग के जन्तुओं के भ्रूण निम्न वर्गों के प्रौढ़ जन्तुओं के समान होते हैं, जैसे मेढ़क का टेडपोल लारवा मछली के समान होता है। इसी आधार पर हेकल ने पुनरावर्तन का सिद्धान्त (Recapitulation Theory ) प्रतिपादित किया।

इसके अनुसार प्रत्येक जीव भ्रूणीय परिवर्धन में अपनी जाति के जातीय विकास की कथा को दोहराता है। पुनरावर्तन सिद्धान्त के आधार पर निषेचित अण्डे की तुलना समस्त जन्तुओं के एककोशिकीय पूर्वज से ब्लास्टुला की प्रोटोजोआ मण्डल या कॉलोनी से की जा सकती है। मेढ़क के ही नहीं वरन् रेप्टाइल, पक्षी और यहाँ तक कि मनुष्य के भ्रूण में भी क्लोम दरारें, क्लोम, नोटोकॉर्ड, युग्मित आयोटिक चॉपें,

प्रोनेफ्रोस, पुच्छ तथा पेशियाँ आदि मछली के समान होती हैं और आरम्भ में सभी का हृदय मछली के समान द्विकक्षीय होता है। इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारम्भ मे समस्त वर्टिब्रेट्स का विकास मछली के समान पूर्वजों से हुआ है। मनुष्य के भ्रूणीय परिवर्धन में देखा गया है कि उसका भ्रूण प्रारम्भ में मछली से, बाद में एम्फिबियन से और फिर रेप्टाइल से मिलता-जुलता होता है और सातवें मास में यह शिशु कपि से मिलता- जुलता होता है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव अपने भ्रूण परिवर्धन में उन समस्त अवस्थाओं से गुजरता है जिनसे कभी उसके पूर्वज धीरे-धीरे विकसित होकर बने होंगे।

(6) जीवाश्मीय प्रमाण (Palaeontological Evidences) – वैज्ञानिक चार्ल्स लायल के अनुसार पूर्व जीवों के चट्टानों से प्राप्त अवशेष जीवाश्म ( Fossils) कहलाते हैं। जीवाश्म का अध्ययन पेलियो-ओन्टोलॉजी (Palacontology) कहलाता है। जीवाश्म कार्बनिक विकास के पक्ष में सर्वाधिक मान्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि जीवाश्म द्वारा जीवों के सम्पूर्ण विकासीय इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है।

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जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के सम्बन्ध में निम्न तथ्य प्रमाणित हुए-

  • जीवाश्म जो कि पुरानी चट्टानों से प्राप्त हुए सरल प्रकार के तथा जो नई चट्टानों से प्राप्त हुए जटिल प्रकार के थे।
  • विकास के प्रारम्भ में एक कोशिकी प्रोटोजोआ जन्तु बने जिनसे बहुकोशिकी जन्तुओं का विकास हुआ।
  • कुछ जीवाश्म विभिन्न वर्ग के जीवों के बीच की संयोजक कड़ियाँ (Connecting-links) को प्रदर्शित करती हैं।
  • पौधों में एन्जिओस्पर्म (Angiosperm) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (mammals) सबसे अधिक विकसित और आधुनिक हैं।
  • जीवाश्म के अध्ययन से किसी भी जन्तु को जीवाश्म कथा ( विकासीय इतिहास) या वंशावली का क्रमवार अध्ययन किया जा सकता है।

घोड़े की वंशावली ( जीवाश्मीय इतिहास ) [Evolution (Pedigree) of Horse] वैज्ञानिक सी. मार्श (C. Marsh) के अनुसार घोड़े का प्रारम्भिक जीवाश्म उत्तरी अमेरिका में पाया गया जिसका नाम इओहिप्पस (Eohippus) था। इसका विकास इओसीन काल में हुआ। इओहिप्पस लोमड़ी के समान तथा लगभग एक फुट ऊँचे थे। इनके अग्रपादों में चार तथा पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं ।
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ओलिगोसीन काल में इन पूर्वजों से भेड़ के आकार के मीसोहिप्पस (Mesohippus) घोड़ों का विकास हुआ। इनके अग्र व पश्च पादों में केवल तीन-तीन अंगुलियाँ थीं। बीच की अंगुलियाँ इधर- उधर की दोनों अंगुलियों से बड़ी थीं और शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं पर रहता था। इनसे मायोसीन काल के मेरीचिप्पस (Merychippus) घोड़ों का विकास हुआ।

ये टट्ट के आकार के थे। इनके अग्र व पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं जिनमें से बीच वाली सबसे लम्बी थी और केवल यही भूमि तक पहुँचती थी । प्लायोसीन काल में प्लीओहिप्पस (Pliohippus) घोड़ों का विकास हुआ। ये आकार में टट्ट से ऊँचे थे। इनके अग्र व पश्चपादों में केवल एक-एक अंगुली विकसित थी और इधर-उधर की अंगुलियाँ अत्यधिक हासित होकर स्प्लिट अस्थियों (Splint Bones) के रूप में त्वचा में दबी हुई थीं। केवल एक ही अंगुली की उपस्थिति के कारण ये तेजी से दौड़ सकते थे । प्लीस्टोसीन युग में इन्हीं घोड़ों से आधुनिक घोड़े इक्वस (Equus) का विकास हुआ। इक्वस की ऊँचाई लगभग 5 फीट है और यह उसी रूप में आज भी चला आ रहा है।

(7) जीवों के घरेलू पालन ( Domestication) से प्रमाण- मनुष्य अपने लिए उपयोगी जन्तुओं (घोड़े, गाय, कुत्ता, बकरी, भेड़, भैंस, कबूतर, मुर्गा आदि) तथा खेतिहर वनस्पतियों (गोभी, आलू, कपास, गेहूँ, चावल, मक्का, गुलाब आदि) की इनके जंगली पूर्वजों से नस्लें सुधार कर उत्पत्ति की है।

यद्यपि नस्लें सुधार कर नयी जातियों की उत्पत्ति वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं, फिर भी इस प्रक्रिया में बदले हुए लक्षण विकसीय ही माने जायेंगे हजारों-लाखों वर्षों का समय मिले तो सम्भवतः मानव इस विधि से नयी जीव जातियों की उत्पत्ति कर लेगा। अतः इतने पुराने इतिहास की प्रकृति में अनुमानत: इसी प्रकार नस्लों में सुधार के फलस्वरूप नयी-नयी जातियों की उत्पत्ति हुई होगी।

(8) रक्षात्मक समरूपता (Protective Resemblance) से प्रमाण – इंगलिस्तान (Britain) के औद्योगिक नगरों के आस-पास के पेड़ चिमनियों के धुएँ से काले पड़ जाते हैं। इन क्षेत्रों के कीटों, विशेष तौर से पतंगों (moths) की विभिन्न जातियों में, गत सदी में, औद्योगिक साँवलेपन (Industrial melanism) का रोग हो गया।

उदाहरणार्थ, पंतगों की बिस्टन बिटूलैरिया (Biston betularia) नामक जाति में शरीर व पंख हल्के रंग के काले धब्बेदार होते थे । सन् 1884 में इनकी आबादी में पहली बार एक बिल्कुल काला पतंगा देखा गया। यह परिवर्तन रंग के जीन में अचानक जीन – उत्परिवर्तन (gene- mutation) के कारण हुआ। बाद में काले पतंगों की संख्या बढ़ते-बढ़ते 90% हो गयी।

यह एक विकासीय परिवर्तन था । इससे पतंगों का रंग पेड़ों के रंग से मिलता-जुलता हो गया ताकि ये शत्रुओं (पक्षियों) और शिकार की निगाहों से बच सकें । जीन – उत्परिवर्तन के कारण वातावरण से रक्षात्मक समरूपता के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं।

इसे सादृश्यता (Mimicry) कहते हैं। ऐसी तितलियाँ होती हैं जो उन्हीं सूखी पत्तियों जैसी दिखायी देती हैं जिन पर ये आराम के समय बैठती हैं शाखाओं से मिलती-जुलती आकृति की कई कीट जातियाँ पायी जाती हैं। ये सब दृष्टान्त ‘जैव – विकास’ को प्रमाणित करते हैं । इंगलिस्तान के पतंगों के सम्बन्ध में तो यहाँ तक कहा – गया है कि इनमें “वैज्ञानिकों ने विकास प्रक्रिया को होते हुए स्वयं देखा है। ”
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प्रश्न 20.
(a) 15 मिलियन साल पहले रहने वाले प्राइमेट्स का नाम दीजिए तथा उनके लक्षण दीजिए।
(b) (i) पहले मानव समान जन्तु कहाँ मिले?
(ii) निएण्डरथल, होमोबिलिस तथा होमोइरेक्टस इस पृथ्वी पर किस क्रम में विकसित हुए?
(iii) आधुनिक मानव इस गृह पर कब उत्पन्न हुआ?
उत्तर:
(a) 15 मिलियन साल पहले रहने वाले प्राइमेट्स का नाम ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus) है।

ड्रायोपिथेकस के लक्षण निम्न हैं-

  • माथा गोल,
  • आधुनिक मानव के समान,
  • किन्तु इसके लम्बे कैनाइन दाँत कपि की भाँति थे,
  • यह कुछ झुक कर चारों पादों पर चलता था,
  • मानव तथा कपियों दोनों का ही पूर्वज रहा है।

(b) (i) प्रथम स्तनधारी श्रूज ( Shrews ) ईस्ट अफ्रीका,
(ii) होमो हे बिलस (Homohabilis), होमो इरेक्टस (Homoerectus), निएण्डरथल (Neanderthal),
(iii) 10,000 से 11,000 वर्ष पूर्व आधुनिक मानव उत्पन्न हुआ ।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. पेंग्विन एवं डॉल्फिन के पक्ष के उदाहरण हैं- (NEET-2020)
(अ) अभिसारी विकास का
(ब) औद्योगिक मैलेनिज्म का
(स) प्राकृतिक वरण का
(द) अनुकूली विकिरण का
उत्तर:
(अ) अभिसारी विकास का

2. एस. एल. मिलर ने अपने प्रयोग में एक बंद फ्लास्क में किसका मिश्रण कर ऐमिनो अम्ल उत्पन्न किये- (NEET-2020)
(अ) 800°C पर CH3 H2, NH3 और जल वाष्प
(ब) 600°C पर CH4, H2, NH2 और जल वाष्प
(स) 600°C पर CH3, H2, NH2 और जल वाष्प
(द) 800°C पर CH4, H2, NH2 और जल वाष्प
उत्तर:
(द) 800°C पर CH4, H2, NH2 और जल वाष्प

3. अनेक कशेरूकों के अग्रपाद की अस्थि संरचना में समानता किसका उदाहरण है? (NEET-2019)
(अ) अभिसारी विकास
(ब) तुल्यरूपता
(द) अनुकूली विकिरण
(स) समजातता
उत्तर:
(स) समजातता

4. निम्नलिखित अपसारी विकास के उदाहरण में से गलत विकल्प का चयन कीजिए-
(अ) चमगादड़, मनुष्य एवं चीता का मस्तिष्क
(ब) चमगादड़, मानव एवं चीता का हृदय
(स) मानव, चमगादड़ एवं चीता के अग्रपाद
(द) ऑक्टोपस, चमगादड़ एवं मानव की आँखें
उत्तर:
(द) ऑक्टोपस, चमगादड़ एवं मानव की आँखें

5. ह्यूगो डी ब्रिज के अनुसार विकास की क्रियाविधि किस प्रकार होती है- (NEET-2018)
(अ) लैंगिक दृश्य प्ररूप परिवर्तन (लक्षणप्ररूपी विभिन्नता)
(ब) साल्टेशन
(स) बहुवरण उत्परिर्वन
(द) लघु उत्परिवर्तन
उत्तर:
(ब) साल्टेशन

6. आदिमानव से अभिनव मानव तक मानव विकास का कालानुक्रमिक क्रम है- (NEET II-2016 )
(अ) रामपिथेकस → होमो हैविलिस → आस्ट्रेलोपिथेकस → होमो इरेक्टस
(ब) आस्ट्रेलोपिथेकस → होमो हैविलिस → रामपिथेकस होमो → इरेक्टस
(स) आस्ट्रेलोपिथेकस → रामपिथेकस → होमो हैबिलिस → होमो इरेक्टस
(द) रामपिथेकस → आस्ट्रेलोपिथेकस → होमो हैविलिस → होमो इरेक्टस
उत्तर:
(द) रामपिथेकस → आस्ट्रेलोपिथेकस → होमो हैविलिस → होमो इरेक्टस

7. निम्नलिखित संरचनाओं में से कौनसी संरचना पक्षी के पंख के समजात है- (NEET-2016)
(अ) खरगोश का पश्च पाद
(ब) व्हेल का फ्लीपर
(स) शार्क का पृष्ठ पंख
(द) शलभ का पंख
उत्तर:
(ब) व्हेल का फ्लीपर

8. पक्षी के पंख और कीट के पंख- (NEET-2015)
(अ) अनुरूप संरचनाएँ और अभिसारी विकास को दर्शाती हैं।
(ब) वंशावली संरचनाएँ और अपसारी विकास को दर्शाती हैं।
(स) समजातीय संरचनाएँ हैं और अभिसारी विकास को दर्शाती हैं।
(द) समजातीय संरचनाएँ अपसारी विकास को दर्शाती हैं।
उत्तर:
(द) समजातीय संरचनाएँ अपसारी विकास को दर्शाती हैं।

9. बिल्ली और छिपकली के अग्रपाद चलने; व्हेल के अग्रपाद तैरने और चमगादड़ के अग्रवाद उड़ने के लिए होते हैं, ये किसके उदाहरण हैं- (NEET-2014)
(अ) समवृति अंग
(ब) अनुकूली विकिरण
(स) समजात अंग
(द) अभिसारी विकास
उत्तर:
(स) समजात अंग

10. अपने पूर्वजों से विकसित होने के दौरान, आधुनिक मानव (होमोसेपिएस) की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति क्या रही थी- (NEET-2012)
(अ) जबड़ों का छोटा होते जाना
(ब) द्विनेत्रीय दृष्टि
(स) बढ़ती जाति कपाल धारिता
(द) सीधी खड़ी देह भंगिमा
उत्तर:
(अ) जबड़ों का छोटा होते जाना

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

11. पूर्वजों से आधुनिक मनुष्य (होमो सैपियन्स) के उद्विकास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति थी- (CBSE, 2011 )
(अ) जबड़ों का छोटा होना
(ब) द्विनेत्री बाइनोकुलर दृष्टि
(स) मस्तिष्क क्षमता में वृद्धि
(द) सीधी मुद्रा
उत्तर:
(स) मस्तिष्क क्षमता में वृद्धि

12. जब कभी विभिन्न वंशवृत्तों की दो स्पेशीज अनुकूलनों के कारण एक-दूसरे के समान दिखने लगती हैं, तब इस परिघटना को क्या कहा जाता है? (CBSE-2007, RPMT-2010).
(अ) अपसारी विकास
(ब) अभिसारी विकास
(स) सूक्ष्म विकास
(द) सह विकास
उत्तर:
(ब) अभिसारी विकास

13. मिलर के प्रयोग में निम्नलिखित में से कौन अनुपस्थित था ? (CPMT, 2010)
(अ) CH4
(ब) H2
(स) NH3
(द) O2
उत्तर:
(द) O2

14. डार्विन की फिन्च एक अच्छा उदाहरण है- (CBSE PMT-2008, CBSE, 2010)
(अ) औद्योगिक मीलेनीकरण का
(ब) संयोजी कड़ी का
(स) अनुकूली विकिरण का
(द) अभिसारी जैव – विकास का
उत्तर:
(स) अनुकूली विकिरण का

15. मानव के पूर्वजों में से मस्तिष्क का आकार 1000 सी.सी. से अधिक था- (RPMT-2010)
(अ) होमो निएण्डरथेलेन्सिस
(ब) होमो इरेक्टस
(स) रामापिथेकस
(द) होमो हैबिलिस
उत्तर:
(अ) होमो निएण्डरथेलेन्सिस

16. आधुनिक मानव का नवीनतम एवं सीधा प्रागैतिहासिक पूर्वज है- (RPMT-2009)
(अ) क्रोमैगनॉन मानव
(ब) प्री-निएण्डरस्थल मानव
(स) निएण्डरथल मानव
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) क्रोमैगनॉन मानव

17. एक सबसे पुराना सर्वश्रेष्ठतः संरक्षित तथा सर्वाधिक पूर्ण होमिनिड जीवाश्म, जिसे लूसी नाम से जाना जाता है, किस वंश का प्रतिनिधित्व करता है- [AMU (Med)-2009]
(अ) आरियोबाइथेकस
(ब) ड्रायोपाइथेकस
(स) पाइथेकेन्थ्रोपस
(द) आस्ट्रेलोपाइथेकस
उत्तर:
(द) आस्ट्रेलोपाइथेकस

18. इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के दौरान पैपर्ड मॉथ अथवा विस्टन बेटुलेरिया की काले रंग की प्रजाति, इसके हल्के रंग वाली प्रजातियों पर अधिक प्रभावी हो गयी। यह एक उदाहरण है- (RPMT 2006, CBSE, 2009)
(अ) प्राकृतिक चयन का, जिसमें गहरे रंग वाली प्रजातियों का चयन हुआ
(ब) सूर्य के प्रकाश की बहुत कम मात्रा के कारण गहरे रंग वाले जीवों की उत्पत्ति का
(स) सुरक्षात्मक मिमिक्री का
(द) अंधेरे वातावरण के कारण गहरे रंग के गुण की आनुवंशिकता का
उत्तर:
(अ) प्राकृतिक चयन का, जिसमें गहरे रंग वाली प्रजातियों का चयन हुआ

19. विकास का महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करता है- (RPMT 2008)
(अ) जीवाश्म
(ब) आकारिकी
(स) भ्रूण
(द) अवशेषी अंग
उत्तर:
(अ) जीवाश्म

20. रासायनिक विकास की संकल्पना किस पर आधारित है- (CBSE-2007)
(अ) रसायनों का क्रिस्टलीकरण
(ब) तीव्र गर्मी में जल, वायु तथा मृत्तिका की परस्पर क्रिया
(स) रसायनों पर सौर विकिरण का प्रभाव
(द) उपयुक्त पर्यावरण परिस्थितियों में रसायनों के संयोजन द्वारा जीवन का संभावित उद्भव
उत्तर:
(द) उपयुक्त पर्यावरण परिस्थितियों में रसायनों के संयोजन द्वारा जीवन का संभावित उद्भव

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21. अनुकूली विकिरण का क्या अर्थ है ? (CBSE, 2007)
(अ) भौगोलिक पृथक्करण के कारण होने वाले अनुकूलन
(ब) एक समान पूर्वज से विभिन्न स्पीशीज का विकास
(स) किसी स्पीशीज के सदस्यों का विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में प्रवास
(द) किसी एक व्यष्टि की, विभिन्न पर्यावरणों के लिए अनुकूलन क्षमता
उत्तर:
(ब) एक समान पूर्वज से विभिन्न स्पीशीज का विकास

22. गेलोपेगॉस द्वीप समूह के फिंच पक्षी किस एक के पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करते हैं? (CBSE, 2007)
(अ) विशिष्ट सृजन
(ब) उत्परिवर्तनों के कारण हुआ विकास
(स) प्रतिगामी विकास
(द) जैव भौगोलिक विकास
उत्तर:
(द) जैव भौगोलिक विकास

23. मानव पूर्वजों में मस्तिष्क का आकार 1000 C. C. से ज्यादा किसका था? (CBSE, 2007)
(अ) होमो निएंडरथैलेसिस
(ब) होमो इरेक्टस
(स) रामापिथेकस
(द) होमो हैबिलिस
उत्तर:
(अ) होमो निएंडरथैलेसिस

24. प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त प्रतिपादित किया- (CPMT, 2006)
(अ) लैमार्क ने
(स) वैलेस ने
(ब) डार्विन ने
(द) वीजमान ने
उत्तर:
(द) वीजमान ने

25. जैव विकास के समर्थन में पाया जाने वाला एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण किसका पाया जाता है? (CBSE, 2006)
(अ) समजात तथा अवशेषी अंग
(ब) समवृत्ति तथा अवशेषी अंग
(स) केवल समजात अंग
(द) समजात एवं समवृत्ति अंग
उत्तर:
(अ) समजात तथा अवशेषी अंग

26. डी ब्रीज ने जैविक क्रमविकास से सम्बन्धित अपना उत्परिवर्तन मत किस जीव पर शोध करते हुए प्रस्तुत किया था- (CBSE, 2005)
(अ) इनोथेरा लैमार्कियाना ( सन्ध्या प्रिमरोज )
(ब) ड्रोसोफिलामेलोनोगेस्टर
(स) पाइसम सैटाइवम
(द) एल्थीया रोजिया
उत्तर:
(अ) इनोथेरा लैमार्कियाना ( सन्ध्या प्रिमरोज )

27. मुर्दे को दफन करने एवं धर्म के प्रमाण सर्वप्रथम किस जीवाश्म से मिलते हैं ? (RPMT, 2005 )
(अ) निएण्डरथल
(स) होमो इरेक्टस
(ब) क्रो-मैग्नॉन
(द) होमो हेबिलिस
उत्तर:
(अ) निएण्डरथल

28. निम्नलिखित में से किए गए प्रयोगों से ज्ञात होता है कि सरलतम सजीव जीवधारी निर्जीव पदार्थ से स्वतः जात उत्पन्न नहीं हो सकते थे- (NEET-2005)
(अ) सड़ते – गलते जैविक पदार्थों में लार्वा प्रकट हुए
(ब) मांस को यदि गर्म करके किसी पात्र में सील बंद करके रखा। गया तो मांस खराब नहीं हुआ
(स) भण्डारित मांस में सूक्ष्म जीव प्रकट नहीं हुए
(द) अनिजर्मीकृत जैव पदार्थ से सूक्ष्म जीव प्रकट हुए।
उत्तर:
(ब) मांस को यदि गर्म करके किसी पात्र में सील बंद करके रखा। गया तो मांस खराब नहीं हुआ

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29. निम्न में से कौनसा गलत है- (Orissa JEE-2004)
(अ) कीटों एवं पक्षियों के पंख समरूप हैं।
(ब) कीटों एवं चमगादड़ के पंख समरूप हैं।
(स) कीटों एवं पक्षियों के पंख समजात अंग हैं
(द) चिड़ियों एवं चमगादड़ के पंख समजात अंग हैं।
उत्तर:
(स) कीटों एवं पक्षियों के पंख समजात अंग हैं

30. आलू और शकरकंद- (AIMS-2004)
(अ) में खांचशील भाग होते हैं जो समजात अंग होते हैं।
(ब) में खांचशील भाग होते हैं जो समवृद्धि अंग होते हैं।
(स) किसी एक बाहरी स्थान से भारत में प्रविष्ट कराए गए हैं।
(द) एक ही जीन के दो स्पीशीज ।
उत्तर:
(ब) में खांचशील भाग होते हैं जो समवृद्धि अंग होते हैं।

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HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

Haryana State Board HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
क्या विलगित निकाय का ताप परिवर्तित हो सकता है ?
उत्तर:
हाँ; रुद्धोष्म प्रक्रम में विलगित निकाय का ताप परिवर्तित हो सकता है।

प्रश्न 2.
संलग्न चित्र में किसी गैस के लिए P-Vवक्र AB व AC प्रदर्शित है। बताइये इनमें कौन सा वक समतापीय एवं कौन-सा टोम वक्र है ?
उत्तर:
समतापीय वक्र कम ढाल एवं रुद्धोष्म वक्र दाब (P) अधिक ढाल वाले होते हैं।
अतः
AB – समतापीय वक्र
एवं AC – रुद्धोष्म वक्र

प्रश्न 3.
यदि दो निकाय A व B किसी तीसरे निकाय C से अलग-अलग ऊष्मीय साम्य अवस्था में हैं तो A व B क्या आपस में भी ऊष्मीय साम्य अवस्था में होंगे ?
उत्तर:
हाँ; ऊष्मागतिकी के शून्यांकी के नियमानुसार ।

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प्रश्न 4.
क्या ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से किसी क्रिया के होने की दिशा का ज्ञान हो सकता है ?
उत्तर;
नहीं।

प्रश्न 5.
मेयर का सम्बन्ध लिखिए ।
उत्तर:
मेयर सम्बन्ध = CP – CV= R
जहाँ CP = नियत दाब पर गैस की मोलर विशिष्ट ऊष्मा
CV = नियत आयतन पर गैस की मोलर विशिष्ट ऊष्मा
R = सार्वत्रिक गैस नियतांक

प्रश्न 6.
किसी आदर्श गैस के रुद्धोष्म प्रसार में P व V के मध्य सम्बन्ध लिखिए ।
उत्तर:
PVγ जहाँ γ = \(\frac{C_P}{C_V}\)

प्रश्न 7.
ऊष्मा इंजन की दक्षता की विमा क्या होती है ?
उत्तर:
ऊष्मा इंजन की दक्षता
η = \(\frac{W}{Q_1}\) जहाँ W= कृत कार्य; Q1 = स्रोत से ली गई ऊष्मा
∵ W एवं Q की विमाएँ समान है, अतः दक्षता η विमाहीन राशि है।
∴ η का विमीय सूत्र [ M°LOT]

प्रश्न 8.
समदाबीय प्रक्रम में निकाय की अवस्था परिवर्तन से दाब में क्या परिवर्तन होता है ?
उत्तर:
समदाबीय प्रक्रम में दाब नहीं बदलता है अतः दाब में परिवर्तन ∆P = 0

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प्रश्न 9.
क्या किसी गैस के ताप में वृद्धि बिना ऊष्मा दिये की जा सकती है ?
उत्तर:
हाँ, रुद्धोष्म सम्पीडन में गैस पर किया गया कार्य निकाय का ताप बढ़ाता है क्योंकि कृत कार्य ऊष्मा में बदलकर आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि करता है।

प्रश्न 10.
ऊष्मागतिकी का शून्य नियम किस ऊष्मागतिकी चर को परिभाषित करता है ?
उत्तर:
ताप को ।

प्रश्न 11.
समतापीय व रुद्धोष्म प्रक्रम में किसी गैस की विशिष्ट ऊष्मा क्या होती है ?
उत्तर:
विशिष्ट ऊष्मा S = \(\frac{Q}{m.∆T}\)
समतापी प्रक्रम में ∆T = 0. ∴ S = ∞ (अनन्त)
रुद्धोष्म प्रक्रम में Q = 0 ∴ S = 0 (शून्य)

प्रश्न 12.
कार्नो चक्र किस प्रकार का प्रक्रम है ?
उत्तर:
कान चक्र उत्क्रमणीय चक्रीय प्रक्रम है।

प्रश्न 13.
कार्नो इंजन की दक्षता किस पर निर्भर करती हैं ?
उत्तर:
कान इंजन की दक्षता,
η = \(1-\frac{T_2}{T_1}\)
अतः दक्षता स्रोत के ताप (T1) व सिंक के ताप (T2) पर निर्भर करती है।

प्रश्न 14.
बन्दूक से चली गोली लक्ष्य से टकरा कर गर्म हो जाती है। क्यों ?
उत्तर:
लक्ष्य से टकराने पर गोली की गतिज ऊर्जा ऊष्मीय ऊर्जा में बदल जाती है, इसलिए गोली गर्म हो जाती है।

प्रश्न 15.
मोम का जलना कौन-सा परिवर्तन है ?
उत्तर:
मोम का जलना समतापी प्रक्रम है क्योंकि ताप नियत रहता है।

प्रश्न 16.
आन्तरिक ऊर्जा के कौन-कौन से स्वरूप हैं ?
उत्तर:
अणुओं की स्थानान्तरीय गतिज ऊर्जा, आन्तरिक घूर्णन ऊर्जा तथा काम्पनिक ऊर्जा; आन्तरिक स्थितिज ऊर्जा आदि ।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 17.
आदर्श गैस को स्थिर ताप पर संपीडित करने पर आन्तरिक ऊर्जा में क्या परिवर्तन होगा ?
उत्तर:
कोई परिवर्तन नहीं होगा क्योंकि आदर्श गैस की आन्तरिक ऊर्जा केवल ताप पर निर्भर करती है।

प्रश्न 18.
चक्रीय प्रक्रम से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
वह प्रक्रम जिसमें कोई निकाय विभिन्न अवस्थाओं से होता हुआ पुनः अपनी प्रारम्भिक अवस्था में आ जाता है, चक्रीय प्रक्रम कहलाता है।

प्रश्न 19.
किसी गैस के रुद्धोष्म संपीडन में गैस के बाहर से कोई ऊष्मा नहीं दी जाती है पर गैस का ताप बढ़ जाता है क्यों ?
उत्तर:
रुद्धोष्म संपीडन में गैस पर किया गया कार्य ऊष्मा में बदल जाता है, इसीलिए गैस का ताप बढ़ जाता है।

प्रश्न 20.
स्थैतिक कल्प प्रक्रम से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर;
किसी ऊष्मागतिक निकाय में चलने वाला कोई ऐसा प्रक्रम, जिसकी प्रत्येक स्थिति में निकाय बाह्य परिवेश के साथ तापीय व यान्त्रिक साम्य में रहता है, स्थैतिक कल्प प्रक्रम कहलाता है।

प्रश्न 21.
मुक्त निकाय किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यह ऐसा निकाय होता है, जो बाह्य परिवेश ऊर्जा तथा पदार्थ दोनों का आदान-प्रदान कर सकता है

प्रश्न 22.
बन्द निकाय किसे कहते हैं ?
उत्तर:
ऐसा निकाय जो परिवेश के साथ केवल ऊर्जा का आदान-प्रदान कर सकता है, पदार्थ का नहीं बन्द निकाय कहलाता है।

प्रश्न 23.
समतापी प्रक्रम के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
बर्फ का गलना, ठोसों का पिघलना, द्रवों का उबलना आदि।

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प्रश्न 24.
प्रावस्था समीकरण किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी ऊष्मागतिक निकाय के लिए ऊष्मागतिक चरों (P., V, T) के मध्य सम्बन्ध को प्रावस्था समीकरण कहते हैं।

प्रश्न 25.
ऊष्मा इंजन क्या है ?
उत्तर:
ऊष्मा इंजन चक्र (cycle) में काम करने वाली एक ऐसी युक्ति है जो अविरत रूप से ऊष्मा को यान्त्रिक कार्य में परिवर्तित करती हैं।

प्रश्न 26.
ऊष्मा इंजन की दक्षता की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
किसी ऊष्मा इंजन द्वारा प्रदत्त यान्त्रिक कार्य (W) एवं इंजन द्वारा स्त्रोत से ली गई ऊष्मा (Q) के अनुपात को इंजन की दक्षता कहते हैं और इसे ” से व्यक्त करते हैं। अतः
η = \(\frac{W}{Q}\)

प्रश्न 27.
दो दिये गये तापों T1 तथा T2(T1 > T2) के मध्य कार्य करने वाले कार्यों की दक्षता बताइये।
उत्तर:
कानों इंजन की दक्षता
η = \(1-\frac{T_2}{T_1}\)

प्रश्न 28.
कार्नो इंजन की दक्षता किस राशि पर निर्भर करता है ?
उत्तर:
केवल उन तापों पर निर्भर करती है जिनके बीच कार्नो इंजन कार्य कर रहा है।

प्रश्न 29.
क्या कानों इंजन की दक्षता कार्यकारी पदार्थ पर निर्भर करती है ?
उत्तर:
नहीं।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 30.
ऊष्मा पम्प किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी ठण्डे स्थान से ऊष्मा लेकर गर्म स्थान को देने वाली युक्ति को ऊष्मा पम्प कहते हैं।

प्रश्न 31.
T1वे T2(T1 > T2) के मध्य करने वाले प्रशीतक के निष्पादन गुणांक का सूत्र लिखिए ।
उत्तर:
कानों के आदर्श प्रशीतक का निष्पादन गुणांक
ß = \(\frac{T_2}{T_1-T_2}\)

प्रश्न 32.
ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम का क्लॉसियस का प्रकथन बताइये ।
उत्तर:
इस कथन के अनुसार कोई ऐसा प्रक्रम सम्भव नहीं है जिसके द्वारा बिना बाह्य कार्य के किसी शीतल वस्तु से किसी तप्त वस्तु की ऊष्मा स्थानान्तरित की जा सके।

प्रश्न 33.
ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम का केल्विन प्लांक कथन बताइये ।
उत्तर:
इस कथन के अनुसार ऐसा कोई प्रक्रम सम्भव नहीं है जो किसी ऊष्मा भण्डार से ली गयी ऊष्मा को पूर्णतः कार्य में बदल सके।

प्रश्न 34.
कोई ऊष्मा इंजन एक चक्र में स्रोत से Q1 ऊष्मा लेता है तथा सिंक को Q2 ऊष्मा दे देता है। इंजन की दक्षता बताइये ।
उत्तर:
ऊष्मा इंजन की दक्षता
η = (\(1-\frac{Q_2}{Q_1}\))

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प्रश्न 35.
क्या कानों इंजन को व्यवहार में प्राप्त किया जा सकता है ?
उत्तर:
नहीं; यह एक आदर्श इंजन है जो व्यवहार में प्राप्त कर पाना में सम्भव नहीं है।

प्रश्न 36.
क्या किसी निकाय की सम्पूर्ण आन्तरिक ऊर्जा को कार्य में बदला जा सकता है ?
उत्तर:
नहीं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
CP का मान CV से अधिक होता है, क्यों ?
उत्तर:
मोलर विशिष्ट ऊष्मा की परिभाषा से-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -1

प्रश्न 2.
क्या किसी गैस को ऊष्मा दिये बिना उसके ताप में वृद्धि सम्भव है ?
उत्तर:
हाँ जब गैस का रुद्धोष्म संपीडन किया जाता है तो उसका ताप बढ़ जाता है।

प्रश्न 3.
सिद्ध कीजिए कि दो दिये गये तापों के बीच कार्य करने वाला कोई भी इंजन उन्हीं तापों के मध्य कार्य करने वाले उत्क्रमणीय इंजन से अधिक दक्ष नहीं हो सकता है।
उत्तर:
कार्नो प्रमेय (Carnot’s Theorem)
इस प्रमेय के अनुसार,
(अ) किन्हीं तापों T1 व T2 (T1 > T2) के मध्य कार्य करने वाले इंजन की दक्षता उन तापों के मध्य कार्य करने वाले कार्नो इंजन की दक्षता से अधिक नहीं हो सकती है अर्थात् कार्नो (उत्क्रमणीय) इंजन की दक्षता अधिकतम होती है।
(ब) किन्हीं दो तापों T1 व T2 के मध्य कार्य करने वाले सभी कार्नो उत्क्रमणीय इंजनों की दक्षता समान होती है चाहे कोई भी कार्यकारी पदार्थ लिया जाये।

प्रश्न 4.
भाप का अतितप्त होना समदाबी प्रक्रम है या समतापी और क्यों ?
उत्तर:
भाप का अतितप्त होना समदाबी प्रक्रम है, क्योंकि भाप को ऊष्मा देते रहने पर भाप ताप बढ़ता है लेकिन दाब नियत रहता है।

प्रश्न 5.
जब एक कार का पहाड़ी पर एक नियत चाल से नीचे उतरती है तो ब्रेक ड्रम गर्म हो जाते हैं क्यों ?
उत्तर:
नियत चाल से चलते रहने पर गतिज ऊर्जा तो नियत रहती है परन्तु . नीचे उतरने के कारण गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कम होती है जो आन्तरिक ऊर्जा में बदल जाती है जिसके कारण ड्रम गर्म हो जाते हैं।

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प्रश्न 6.
किस निकाय को दी गयी ऊष्मा पूर्णतः कार्य में बदल जाती है ?
उत्तर-
समतापीय प्रक्रम में क्योंकि ताप समान रहने से आन्तरिक ऊर्जा नियत रहती है अर्थात्
dU = 0
dQ = dU + dW = 0 + dW
या dQ = dW

प्रश्न 7.
यदि गर्म वायु ऊपर उठती है, तो पहाड़ों की ऊंचाई पर समुद्र तल की अपेक्षा ठण्डी क्यों होती है ?
उत्तर:
समुद्र तल से ऊँचाई पर जाने से वायुदाब घटता है; अतः गर्म हवा के ऊपर उठने पर इसका रुद्धोष्म प्रसार होता है जिसके कारण ताप में कमी उत्पन्न होती है इसीलिए समुद्र तल की अपेक्षा पहाड़ों पर वायु ठण्डी होती है।

प्रश्न 8.
कार्नो इंजन में सिंक का ताप बढ़ने पर इंजन की दक्षता पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर:
कार्नो इंजन की दक्षता η = \(1-\frac{T_2}{T_1}\)
स्पष्ट है कि सिंक का ताप T2 बढ़ने पर n का मान कम होगा।

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प्रश्न 9.
क्या दो समतापी वक्र एक दूसरे को काट सकते हैं ?
उत्तर:
नहीं; क्योंकि यदि दो समतापी वक्र काटते हैं तो कटान बिन्दु पर दो भिन्न तापों पर गैस के दाब व आयतन समान होंगे जोकि सम्भव नहीं हैं।

प्रश्न 10.
परम शून्य ताप शून्य ऊर्जा का ताप नहीं होता है; समझाइये।
उत्तर:
अणुओं की स्थानान्तरीय गतिज ऊर्जा ही ताप का फलन होती है, जबकि ऊर्जा के अन्य रूप जैसे अन्तराणविक स्थितिज ऊर्जा अणुओं के मध्य लगने वाले आणविक बलों एवं आणविक दूरी पर निर्भर करती है। अतः परम शून्य ताप पर केवल अणुओं की स्थानान्तरीय गतिज ऊर्जा तो शून्य हो जाती है लेकिन आणविक ऊर्जा के अन्य रूप शून्य नहीं होते हैं। इस प्रकार परम शून्य ताप शून्य ऊर्जा का ताप नहीं है।

प्रश्न 11.
स्काई लैब पृथ्वी पर गिरते समय जल गई थी, क्यों ?
उत्तर:
वायुमण्डल में प्रवेश करने पर वायु के घर्षण के कारण स्काई लैब घर्षण के विरुद्ध कार्य होने के कारण गर्म होने लगी। जिससे उसका ताप बढ़ने लगा। जैसे-जैसे वह पृथ्वी के समीप आती गई, वायुमण्डल का घनत्व बढ़ने से घर्षण भी बढ़ता गया और फलस्वरूप ताप बढ़ते रहने से एक स्थिति में वह जलने लगी।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 12.
“उत्क्रमणीयता एक आदर्श इंजन की कसौटी है।” उक्त कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
उत्क्रमणीय प्रक्रम में निकाय बाह्य परिस्थितियों में अल्प परिवर्तन से पुनः विपरीत क्रम में अपनी प्रारम्भिक स्थिति में लौट आता है फ्रान्सीसी इंजीनियर कार्नो ने उत्क्रमणीय क्रियाओं पर आधारित एक आदर्श इंजन की परिकल्पना की जिसको वास्तविक इंजन की सारी कमियों से मुक्त माना गया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि उत्क्रमणीयता एक आदर्श इंजन की कसौटी है, यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि आदर्श इंजन मात्र एक कल्पना है, यह व्यावहारिक नहीं है।

प्रश्न 13.
ऊष्मा इंजन की दक्षता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ऊष्मीय इंजन की कार्यविधि एवं दक्षता:
ऊष्मा इंजन में, कार्यकारी पदार्थ स्रोत से ऊष्मा ग्रहण कर, इस ऊष्मा का कुछ भाग कार्य के रूप में परिवर्तित कर देता है तथा शेष भाग सिंक को दे देता है एवं अपनी प्रारम्भिक अवस्था में लौट आता है। ऐसे परिवर्तनों की श्रेणी चक्र (cycle) कहलाती है। चक्र की बार-बार पुनरावृत्ति से कार्य सतत् रूप से मिलता रहता है।
माना कार्यकारी पदार्थ स्रोत से Q1 ऊष्मा लेता है तथा उसमें से Q2 ऊष्मा सिंक को दे देता है अतः कार्यकारी पदार्थ द्वारा अवशोषित ऊष्मा की मात्रा (Q1 – Q2) होगी। चूँकि कार्यकारी पदार्थ अपनी प्रारम्भिक स्थिति में लौट आता है अतः आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन शून्य है।
इसलिए ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से,
dQ = dU + dW
लेकिन dU = 0
क्योंकि प्रारम्भिक तथा अन्तिम अवस्था एक ही है
∴ dQ = dW
या Q1 – Q2 = W …….(1)
इंजन की ऊष्मीय दक्षता (Thermal efficiency) कार्यकारी पदार्थ द्वारा एक चक्र में किये गये कुल कार्य तथा स्रोत से कार्यकारी पदार्थ द्वारा अवशोषित ऊष्मा का अनुपात होती है, अर्थात्

दक्षता (η) = \(\frac{\text { कार्य में परिवर्तित ऊष्मा }}{\text { स्रोत से अवशोषित ऊष्मा }}\)
या η = \(\frac{W}{Q_1}\)
η = \(\frac{Q_1-Q_2}{Q_1}\) (समी 1 से)
या η = \(1-\frac{Q_2}{Q_1}\) ……….(2)
समीकरण (2) से स्पष्ट है कि यदि Q2 = 0 तो η = 1 अर्थात् दक्षता 100% होगी। दूसरे शब्दों में, यदि एक ऐसा इंजन बनाया जाये, जो इस प्रकार कार्य करे कि कार्यकारी पदार्थ किसी भी चक्र में सिंक को कोई ऊष्मा न दे तो ऊष्मा का कार्य में शत-प्रतिशत रूपान्तरण हो जायेगा । परन्तु शत-प्रतिशत दक्षता का इंजन बनाना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 14.
ऊष्मागतिकी क्या है ? ऊष्मागतिकी के शून्यांकी नियम की व्याख्या कीजिए तथा इसके महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम (Zeroth Law Of Thermodynamics):
इस नियम के आधार पर ताप की अविधारणा दी जाती है। इस नियम को समझने के लिए तीन निकाय A, B व C की कल्पना करते हैं निकाय A व B एक रुद्धोष्म दीवार से पृथक हैं और इनमें से प्रत्येक एक तीसरे निकाय C से एक सुचालक दीवार से सम्पर्क में हैं [ चित्र 12.3] 1 निकायों की अवस्थाएँ तब तक परिवर्तित होती हैं जब तक A व B दोनों निकाय C के साथ तापीय साम्य में नहीं आ जाते हैं।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -4
अब यदि A व B के बीच रुद्धोष्म दीवार को सुचालक दीवार से प्रतिस्थापित कर दी जाती है तथा C को A व B से किसी रुद्धोष्म दीवार से पृथक दिया जाता है। (चित्र 12.4 ) तब यह देखा जाता है कि A व B की अवस्थाएँ अब और नहीं बदलती हैं अर्थात् वे दोनों तापीय साम्य में होती है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -5
इससे ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम दिया गया जिसके अनुसार, “यदि दो निकाय किसी अन्य तीसरे निकाय के साथ पृथक्-पृथक् रूप से तापीय साम्य में है तो वे परस्पर भी तापीय साम्य में होते हैं।
अतः यदि निकायों A, B व C के ताप यदि TA, TB E TC हों और TA = TC एवं TB = TC तो TA = TB

यही ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम है अतः ताप पदार्थ का वह गुण है जो यह बताता है कि कोई निकाय अपने पड़ोसी निकाय के साथ ऊष्मीय साम्य में है अथवा नहीं। इस प्रकार ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम ताप की अवधारणा को प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 15.
एक निकाय की ऊष्मा, – कार्य व आन्तरिक ऊर्जा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ऊष्मा, कार्य एवं आंतरिक ऊर्जा (Heat, Work And Internal Energy):
ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम ताप की अवधारणा प्रदान करता है। और ताप किसी वस्तु की ऊष्णता या शीतलता का बोध कराता है। दो भिन्न ताप की वस्तुएँ जब सम्पर्क में लाई जाती हैं तो उच्च ताप की वस्तु से निम्न ताप की वस्तु की ओर ऊष्मा का प्रवाह होता है और यह तब तक होता रहता है, जब तक दोनों के ताप समान नहीं हो जाते हैं अर्थात् जब तक ‘ऊष्मीय साम्य’ स्थापित नहीं हो जाता है। यहाँ तापान्तर के कारण एक वस्तु से दूसरी वस्तु की ओर ऊर्जा का प्रवाह ऊष्मा कहलाता है। इस प्रकार का ऊष्मा स्थानान्तरण एक अयांत्रिक ऊर्जा स्थानान्तरण (Non- mechanical energy transfer) है।

उदाहरणार्थ- कोई पिण्ड चालन अथवा विकिरण द्वारा ऊर्जा का क्षय कर रहा है अर्थात् वह चालन अथवा विकिरण द्वारा ऊष्मा दे रहा है जो कि पिण्ड एवं वातावरण के तापान्तर पर निर्भर हो लेकिन यदि निकाय किसी अन्य विधि द्वारा बाह्य यांत्रिक बलों के विरुद्ध कार्य करने में ऊर्जा क्षय कर रहा हो तो हम कह सकते हैं कि ‘कार्य’ (Work) हो रहा है। अब ऊष्मा का अन्य सम्बन्धित राशियों जैसे – कार्य व आंतरिक ऊर्जा के मध्य सम्बन्ध की विवेचना करनी है। ऊष्मागतिकी में कार्य एवं ऊष्मा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं, अतः निम्नलिखित बातों का ध्यान आवश्यक है-

  • कार्य व ऊष्मा निकाय की परिसीमा एवं निकाय की अवस्था बदलने पर उत्पन्न होते हैं।
  • कार्य व ऊष्मा को परिवेश पर हुए प्रभाव द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।
  • कार्य व ऊष्मा दोनों का धनात्मक एवं ऋणात्मक मान सम्भव हैं।
  • चूँकि कार्य व ऊष्मा निकाय की अवस्था परिवर्तन की विधि मार्ग पर निर्भर करते हैं अर्थात् अवस्था फलन नहीं होते हैं। अतः इन्हें ऊष्मागतिकीय ‘अवस्था चर’ नहीं माना जा सकता है।

प्रश्न 16.
ऊष्मागतिकीय निकाय, ऊष्मागतिकीय चर राशियों व ऊष्मागतिकीय प्रक्रम से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
ऊष्मागतिकीय निकाय (Thermodynamics System) : बहुत बड़ी संख्या में कणों का ऐसा निकाय जिसके ताप, दाब तथा आयतन के कुछ निश्चित मान हो अर्थात् जिसे ताप, दाब तथा आयतन के पदों में व्यक्त किया जा सके, ऊष्मागतिकीय निकाय कहलाता हैं उदाहरणार्थ – एक बर्तन में भरी गैस ये दो प्रकार के होते हैं-

  • सूक्ष्म निकाय (Microscopic System): सूक्ष्म निकाय में कणों की संख्या बहुत कम होती है जिससे प्रत्येक कण का स्वतन्त्र रूप से अध्ययन किया जा सके, जैसे- एक परमाणु ।
  • स्थूल निकाय (Macroscopic System): स्थूल निकाय में कणों की संख्या अत्यधिक होती है किसी पात्र में बन्द गैस स्थूल निकाय का उदाहरण है। इसमें अणुओं की संख्या अवोद्रो संख्या की कोटि की होती है।

प्रश्न 17.
साइकिल में हवा भरते समय पम्प गर्म हो जाता है, क्यों ?
उत्तर:
हवा भरते समय वायु का रुद्धोष्म संपीडन होता है, अतः यान्त्रिक कार्य ऊष्मा में बदल जाता है इसीलिए पम्प गर्म हो जाती है।

प्रश्न 18.
बन्द कमरे में बिजली का पंखा चलाने पर क्या कमरे की वायु ठण्डी हो जायेगी ?
उत्तर:
नहीं, बल्कि वायु गर्म हो जायेगी क्योंकि पंखा चलने पर वायु के अणुओं का वेग बढ़ने से उनकी गतिज ऊर्जा बढ़ेगी।

प्रश्न 19.
ठण्डे जल की बाल्टी में गर्म लोहे का टुकड़ा डाला गया। क्या जल की आन्तरिक ऊर्जा बढ़ेगी ? क्या लोहे ने कुछ कार्य किया ?
उत्तर:
जल की आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि होगी। यह वृद्धि ऊष्मा के स्थानान्तरण के कारण होती है इसीलिए लोहे के टुकड़े द्वारा कोई कार्य नहीं किया जाता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 20.
आदर्श गैस का नियत दाब पर 1°C ताप बढ़ने पर किये जाने वाले कार्य के लिए कितने कैलोरी ऊष्मा की आवश्यकता होती है ?
उत्तर:
एक मोल गैस पर किया गया कुल कार्य
∆W = ∆Q – ∆U
=CP. ∆T – CV ∆T
= (CP – CV) ∆T = R.∆T
यदि ∆T = 1°C
तो ∆W = R = 2 कैलोरी ।

प्रश्न 21.
यदि कमरे में रेफ्रीजरेटर का दरवाजा खुला रख दिया जाये तो बताइये कि क्या कमरा ठण्डा हो जायेगा ? या गर्म ?
उत्तर:
रेफ्रीजरेटर विपरीत दिशा में कार्यरत ऊष्मीय इंजन के समान है अर्थात् कम ताप वाली वस्तु से ऊष्मा ग्रहण करता है तथा उच्च ताप की वस्तु में ऊष्मा का परित्याग करता है। अतः कमरे से अवशोषित ऊष्मा की तुलना में अधिक ऊष्मा का परित्याग करेगा। अतः कमरा गर्म हो जायेगा।

प्रश्न 22.
यदि कार्नो के उत्क्रमणीय इंजन में ऊर्जा नष्ट या अपव्यय नहीं होती है तो इसकी दक्षता 100% से कम क्यों होती है ?
उत्तर:
कार्नो इंजन की दक्षता
η = \(1-\frac{T_2}{T_1}\)
जहाँ T1 → स्रोत का ताप एवं
T2 → सिंक का ताप
जब तक T1 एवं T2 के मान भिन्न रहेंगे तब तक \(\frac{T_2}{T_1}\) का मान कुछ न कुछ रहेगा और η का मान 100% से कम होगा। केवल एक स्थिति ऐसी है जब T2 = 0K हो तो η = 100% हो जायेगा और T2 = 0K प्राप्त करना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 23.
संलग्न चित्र के अनुसार एक निकाय प्रारम्भिक अवस्था A से अन्तिम अवस्था B तक दो मार्गों अर्थात् प्रक्रमों I व II के द्वारा पहुँचता है। यदि इन प्रक्रमों के लिए आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन ∆UI व ∆UII हो तो इन दोनों में क्या सम्बन्ध होगा और क्यों ?
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -2
उत्तर:
∆UI = ∆UII
क्योंकि आन्तरिक ऊर्जा किसी स्थिति के लिए अद्वितीय फलन होती है और यह परिवर्तन के मार्ग पर निर्भर नहीं करती है।

प्रश्न 24.
संलग्न चित्र में प्रदर्शित सूचक आरेख में कुल कार्य की मात्रा का प्रकार (धनात्मक / ऋणात्मक) क्या होगा और क्यों ?
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -3
उत्तर:
चक्रीय प्रक्रम में किया गया कार्य बन्द वक्र के क्षेत्रफल से प्राप्त होता है। प्रक्रम (1) दक्षिणावर्त है अतः इसमें किया गया कार्य धनात्मक होगा और प्रक्रम (2) वामावर्त है अतः इसमें कृत कार्य ऋणात्मक होगा। चूँकि प्रक्रम (1) का क्षेत्रफल प्रक्रम (2) के क्षेत्रफल से कम है, अतः कुल कार्य ऋणात्मक होगा।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
ऊष्मागतिकी के शून्यांकी, प्रथम व द्वितीय नियम की विस्तारपूर्वक व्याख्या कीजिए ।
उत्तर;
ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम (Zeroth Law Of Thermodynamics):
इस नियम के आधार पर ताप की अविधारणा दी जाती है। इस नियम को समझने के लिए तीन निकाय A, B व C की कल्पना करते हैं निकाय A व B एक रुद्धोष्म दीवार से पृथक हैं और इनमें से प्रत्येक एक तीसरे निकाय C से एक सुचालक दीवार से सम्पर्क में हैं 1 निकायों की अवस्थाएँ तब तक परिवर्तित होती हैं जब तक A व B दोनों निकाय C के साथ तापीय साम्य में नहीं आ जाते हैं।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -4
अब यदि A व B के बीच रुद्धोष्म दीवार को सुचालक दीवार से प्रतिस्थापित कर दी जाती है तथा C को A व B से किसी रुद्धोष्म दीवार से पृथक दिया जाता है। तब यह देखा जाता है कि A व B की अवस्थाएँ अब और नहीं बदलती हैं अर्थात् वे दोनों तापीय साम्य में होती है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -5
इससे ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम दिया गया जिसके अनुसार, “यदि दो निकाय किसी अन्य तीसरे निकाय के साथ पृथक्-पृथक् रूप से तापीय साम्य में है तो वे परस्पर भी तापीय साम्य में होते हैं।
अतः यदि निकायों A, B व C के ताप यदि TA, TB व TC हों और TA = TC एवं TB = TC तो TA = TB

यही ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम है अतः ताप पदार्थ का वह गुण है जो यह बताता है कि कोई निकाय अपने पड़ोसी निकाय के साथ ऊष्मीय साम्य में है अथवा नहीं। इस प्रकार ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम ताप की अवधारणा को प्रदर्शित करता है।

ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम (First Law Of Thermodynamics):
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम दो भिन्न कथनों में निम्न प्रकार व्यक्त किया जाता है-
1. इस नियम के पहले कथन को ऊष्मा तथा कार्य की तुल्यता का नियम भी कहते हैं, इसके अनुसार जब ऊष्मा प्राप्त करने के लिए यांत्रिक कार्य किया जाता है तो कार्य की प्रत्येक इकाई द्वारा ऊष्मा की एक निश्चित मात्रा प्राप्त होती है। इसके विपरीत जब कार्य करने हेतु ऊष्मा दी जाती हैं तो इकाई कार्य प्राप्त करने के लिए ऊष्मा की समान मात्रा आवश्यक होती है अर्थात् कार्य एवं ऊष्मा एक दूसरे के तुल्य हैं। यदि W कार्य करने से Q ऊष्मा उत्पन्न होती है तो
W ∝ Q
या W =JQ
जहाँ J = 4.2 × 10³ Jkcal-1 होता है जिसे ऊष्मा का यांत्रिक तुल्यांक कहते हैं। उक्त नियम तभी सत्य है जब सम्पूर्ण कार्य ऊष्मा में या सम्पूर्ण ऊष्मा कार्य में परिणित हो रही हो।

2. इस नियम का दूसरा कथन ऊर्जा संरक्षण के नियम (Law of Conservation of Energy) पर आधारित है माना किसी निकाय को do ऊष्मा दी जाती है तो वह ऊष्मा दो रूपों में व्यय होती है- (i) अणुओं की आंतरिक ऊर्जा बढ़ाने में dU के रूप में और (ii) शेष भाग आन्तराण्विक आकर्षण बलों के विरुद्ध बाह्य कार्य करने में dW के रूप में इस प्रकार
dQ = dU + dW …………..(1)
इस समीकरण को ही ‘ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम’ कहते हैं, अर्थात् “किसी निकाय को दी गई ऊष्मा आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि एवं किये गये बाह्य कार्य के योग के बराबर होती है।” यह नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम का ही प्रतिपादन है जिसके अनुसार, “ऊर्जा को न तो उत्पन्न कर सकते है। और न ही नष्ट कर सकते हैं, केवल इसका रूपान्तरण सम्भव है।” जब भी हमें एक प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है तो किसी अन्य प्रकार की ऊर्जा लुप्त होती है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -6
माना संलग्न चित्र के अनुसार एक घर्षण रहित पिस्टन युक्त पात्र में गैस भरी है। पिस्टन का अनुप्रस्थ परिच्छेद क्षेत्रफल A हैं और इस पर बाह्य दाब P कार्यरत है। यदि इस निकाय को dQ ऊष्मा दी जाती है। जिससे इसकी आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि dU होती है और पिस्टन दाब P के विरुद्ध dx विस्थापन से विस्थापित होता है अतः बाह्य कार्य
dW = Fext × dx = P.A.dx
या dW = P.dV
जहाँ dV = A.dx आयतन में परिवर्तन
अतः dQ = dU + dW

ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम (Second Law Of Thermodynamics):
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम पर आधारित है। यह ऊष्मा तथा कार्य की तुल्यता का नियम है अर्थात् कार्य का ऊष्मा में अथवा ऊष्मा का कार्य में रूपान्तरण होने पर कार्य की निश्चित मात्रा से निश्चित ऊष्मा उत्पन्न होती है या निश्चित ऊष्मा से कार्य की निश्चित मात्रा उत्पन्न होती है, परन्तु उपलब्ध ऊष्मा का कितना भाग यांत्रिक कार्य में परिवर्तित होता है एवं इसकी शर्तें व सीमाएँ क्या है ? इसकी जानकारी ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम नहीं देता है।

उदाहरणार्थ – फर्श पर लुढ़कती हुई गेंद ऊष्मागतिकी के नियमानुसार उस समय रुक जायेगी जब उसकी सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा (यांत्रिक ऊर्जा ) ऊष्मा में बदल जायेगी। परन्तु क्या इस प्रक्रिया का व्युत्क्रम अर्थात् फर्श पर रुकी हुई गेंद ऊष्मा अवशोषित करके गतिशील हो जायेगी ? इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से प्रथम नियम नहीं देता है। इस प्रकार किसी क्रिया के होने व न होने की जानकारी को प्राप्त करने के लिए अन्य नियम की आवश्यकता है जिसे ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम कहते हैं। यह नियम प्रथम नियम का पूरक है। ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम को विभिन्न वैज्ञानिकों ने भिन्न-भिन्न कथनों के रूप में प्रस्तुत किया है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से सभी कथन सत्य हैं। यहाँ हम दो कथनों पर विचार करेंगे जिनमें एक आन्तरिक ऊर्जा को कार्य में बदलने की सीमा के बारे में है और दूसरा ऊष्मा प्रवाह की दिशा के बारे में है।

1. केल्विन प्लांक का कथन (Statement of Kelvin Planck) : इस कथन के अनुसार, “इस प्रकार के इंजन का निर्माण सम्भव नहीं है, जो सम्पूर्ण चक्र में किसी वस्तु से ऊष्मा लेकर कार्यकारी निकाय में कोई परिवर्तन किये बिना उसे पूर्णतः कार्य में परिवर्तित कर दे।” अर्थात् कोई ऐसा ऊष्मा इंजन नहीं बन सका है, जो लोत से ली गई सम्पूर्ण ऊष्मा को कार्य में बदल सके और सिंक को कुछ भी न दे। दूसरे शब्दों में ऊष्मा के अविरल रूप से कार्य में बदलने के लिए ठण्डी वस्तु अर्थात् सिंक का होना आवश्यक है।

2. क्लासियस का कथन (Claussius’s Statement) : इस कथन के अनुसार, “किसी भी चक्रीय प्रक्रम में कार्यकारी पदार्थ द्वारा निम्न ताप वाली वस्तु से उच्च ताप वाली वस्तु की ओर ऊष्मा का प्रवाह नहीं हो सकता जब तक कि कार्यकारी पदार्थ पर बाह्य कार्य नहीं किया जाता है।” यह कथन प्रशीतक (refrigerator) के सिद्धान्त पर आधारित है जो ठण्डी वस्तु में से ऊष्मा अवशोषित कर गर्म वस्तु (कमरे की वायु) को प्रदान करता है, लेकिन इस कार्य को करने के लिए प्रशीतक में संपीडक (compressor) की आवश्यकता होती है अर्थात् बिना सम्पीडक की बाह्य सहायता के प्रशीतक वस्तुओं को ठण्डा नहीं कर सकता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 2.
समतापी व रुद्धोष्म प्रक्रम में अन्तर स्पष्ट करते हुए इन प्रक्रमों में किये गये कार्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
समतापी प्रक्रम (Isothermal Process):
जब किसी ऊष्मागतिकीय निकाय में दाब (P), एवं आयतन (V) में परिवर्तन होता है, परन्तु ताप (T) नियत रहता है, तो ऐसे प्रक्रम को समतापी प्रक्रम कहते हैं। इस परिवर्तन के दौरान निकाय एवं परिवेश (Surroundings) के मध्य ऊष्मा का आदान-प्रदान आवश्यक है जब निकाय का प्रसार होता है तो निकाय द्वारा कार्य किया गया है, अतः इस कार्य के तुल्य ऊष्मा परिवेश से निकाय में आ जाती है जिससे निकाय का ताप नियत बना रहता है।

इसी प्रकार निकाय के संपीडन के समय निकाय पर किये गये कार्य के तुल्य ऊष्मा परिवेश से निकाय में आ जाती है। इससे निकाय का ताप नियत बना रहता है। इसी प्रकार निकाय के संपीडन के समय निकाय पर किये गये कार्य के तुल्य ऊष्मा निकाय से परिवेश को चली जाती है। यदि समतापीय परिवर्तन किसी भारहीन एवं घर्षण रहित पिस्टन युक्त सिलिण्डर में मौजूद किसी गैसीय निकाय के साथ पिस्टन की सहायता से किया जाता है तो समतापी प्रक्रम के लिए निम्नलिखित दो शर्तों को पूरा होना आवश्यक है-
(i) निकाय की परिसीमाएँ ( पिस्टन एवं सिलेण्डर) ऊष्मा की सुचालक होनी चाहिए ताकि उनसे होकर ऊष्मा का आदान-प्रदान हो सके।
(ii) परिवर्तन धीरे-धीरे होना चाहिए ताकि ऊष्मा के आदान-प्रदान के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

मोल गैस के लिए आदर्श गैस समीकरण PV = nRT यदि n को नियत रखकर समतापी परिवर्तन किया जाता है, तो
अतः nRT = नियतांक
PV = नियतांक ……..(1)
उक्त समीकरण (1) को समतापी प्रक्रम का अवस्था समीकरण कहते हैं। यही बॉयल का नियम है, जिसके अनुसार,
P ∝ \(\frac{1}{V}\), V ∝ \(\frac{1}{P}\)
अर्थात् किसी निश्चित द्रव्यमान की गैस का स्थिर ताप पर दाब व आयतन परस्पर व्युत्क्रमानुपाती होते हैं।

प्रश्न 3.
समतापी प्रक्रम की व्याख्या कीजिए एवं इस प्रक्रम में कृत कार्य के लिए सूत्र स्थापित कीजिए।
उत्तर:
समतापी प्रक्रम में किया गया कार्य (Work done in an Isothermal Process):
माना किसी सिलेण्डर में n मोल आदर्श गैस का समतापीय प्रसार किया जाता है तो वह अपनी प्रारम्भिक अवस्था A(P1 V1) से अन्तिम अवस्था B(P2 V2) में पहुँच जाती है। यह प्रक्रम संलग्न सूचक आरेख चित्र में समतापी वक्र AB द्वारा प्रदर्शित किया गया है। यदि आयतन के सूक्ष्म परिवर्तन dV के लिए दाब को P पर नियत मान लें तो इस अन्तराल में कृत कार्य-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -7
समी (1) व (2) समतापी प्रक्रम में n मोल आदर्श गैस के लिए किये गये कार्य को प्रदर्शित करते हैं। चूँकि समतापीय प्रक्रम के लिए अवस्था समीकरण
PV = नियतांक
अत: P dV + V.dP = 0
या V dP = -P dV
या \(\frac{d \mathrm{P}}{d \mathrm{~V}}=-\frac{\mathrm{P}}{\mathrm{V}}\)
अर्थात् समतापी प्रक्रम में P-V वक्र का ढाल (प्रवणता) ऋणात्मक होती है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 4.
रुद्धोष्म प्रकरण के लिए अवस्था समीकरण के सूत्र का निगमन कीजिए।
उत्तर:
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम का रुद्धोष्म प्रक्रम में अनुप्रयोग (First Law of Thermodynamics Applied to Adiabatic Process)
(अ) P व V के मध्य रुद्धोष्म सम्बन्ध (Adiabatic Relation between P and V):
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -8
यह समीकरण रुद्धोष्म प्रक्रम में दाब एवं आयतन में सम्बन्ध है। इसे ‘पायसन सम्बन्ध’ (Poisson’s relation) कहते हैं।

प्रश्न 5.
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम क्या है ? इसकी सहायता से आन्तरिक ऊर्जा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम (First Law Of Thermodynamics):
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम दो भिन्न कथनों में निम्न प्रकार व्यक्त किया जाता है-
1. इस नियम के पहले कथन को ऊष्मा तथा कार्य की तुल्यता का नियम भी कहते हैं, इसके अनुसार जब ऊष्मा प्राप्त करने के लिए यांत्रिक कार्य किया जाता है तो कार्य की प्रत्येक इकाई द्वारा ऊष्मा की एक निश्चित मात्रा प्राप्त होती है। इसके विपरीत जब कार्य करने हेतु ऊष्मा दी जाती हैं तो इकाई कार्य प्राप्त करने के लिए ऊष्मा की समान मात्रा आवश्यक होती है अर्थात् कार्य एवं ऊष्मा एक दूसरे के तुल्य हैं। यदि W कार्य करने से Q ऊष्मा उत्पन्न होती है तो
W ∝ Q
या W =JQ
जहाँ J = 4.2 × 10³ Jkcal-1 होता है जिसे ऊष्मा का यांत्रिक तुल्यांक कहते हैं। उक्त नियम तभी सत्य है जब सम्पूर्ण कार्य ऊष्मा में या सम्पूर्ण ऊष्मा कार्य में परिणित हो रही हो।

2. इस नियम का दूसरा कथन ऊर्जा संरक्षण के नियम (Law of Conservation of Energy) पर आधारित है माना किसी निकाय को do ऊष्मा दी जाती है तो वह ऊष्मा दो रूपों में व्यय होती है- (i) अणुओं की आंतरिक ऊर्जा बढ़ाने में dU के रूप में और (ii) शेष भाग आन्तराण्विक आकर्षण बलों के विरुद्ध बाह्य कार्य करने में dW के रूप में इस प्रकार
dQ = dU + dW …………..(1)
इस समीकरण को ही ‘ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम’ कहते हैं, अर्थात् “किसी निकाय को दी गई ऊष्मा आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि एवं किये गये बाह्य कार्य के योग के बराबर होती है।” यह नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम का ही प्रतिपादन है जिसके अनुसार, “ऊर्जा को न तो उत्पन्न कर सकते है। और न ही नष्ट कर सकते हैं, केवल इसका रूपान्तरण सम्भव है।” जब भी हमें एक प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है तो किसी अन्य प्रकार की ऊर्जा लुप्त होती है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -6.1
माना संलग्न चित्र के अनुसार एक घर्षण रहित पिस्टन युक्त पात्र में गैस भरी है। पिस्टन का अनुप्रस्थ परिच्छेद क्षेत्रफल A हैं और इस पर बाह्य दाब P कार्यरत है। यदि इस निकाय को dQ ऊष्मा दी जाती है। जिससे इसकी आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि dU होती है और पिस्टन दाब P के विरुद्ध dx विस्थापन से विस्थापित होता है अतः बाह्य कार्य
dW = Fext × dx = P.A.dx
या dW = P.dV
जहाँ dV = A.dx आयतन में परिवर्तन
अतः dQ = dU + dW

प्रश्न 6.
सूचक आरेख से क्या तात्पर्य है ? इसकी सहायता से बाह्य कार्य ज्ञात करने की प्रक्रिया समझाते हुए सिद्ध कीजिए कि बाह्य कार्य परिवर्तन के मार्ग पर निर्भर करता है।
उत्तर:
सूचक आरेख (Indicator Diagram):
किन्हीं दो चर राशियों द्वारा किसी ऊष्मागतिक निकाय की अवस्था का ग्राफीय प्रस्तुतीकरण निकाय का सूचक आरेख कहलाता है। यदि ग्राफ दाब व आयतन के मध्य खींचा जाये तो इस आरेख को P-V आरेख कहते हैं।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -9
माना किसी गैसीय निकाय का प्रसार होता है और A [P1, V1] प्रारम्भिक तथा B [P2, V2] अन्तिम अवस्थाएँ हैं। प्रक्रम को चित्र में दिये गये सूचक आरेख में प्रदर्शित किया गया है। प्रक्रम के दौरान दाब एवं आयतन में होने वाले परिवर्तन रेखा AB के विभिन्न बिन्दुओं द्वारा प्रदर्शित होंगे।

पूरे प्रक्रम (A → B) के लिए कार्य ज्ञात करने लिए आकृति ABCD का क्षेत्रफल ज्ञात करना होगा। इसके लिए माना दाब P पर सूक्ष्म आयतन परिवर्तन dV के संगत कृत कार्य
dW = PV आकृति EFGH का क्षेत्रफल
अत: A से B तक परिवर्तन के दौरान कृत कुल कार्य
या W = आकृति ABCD का क्षेत्रफल
\(\mathrm{W}=\int d \mathrm{~W}=\int_{\mathrm{V}_1}^{\mathrm{V}_2} \mathrm{P} . d \mathrm{~V}\)
अत: PV वक्र तथा आयतन अक्ष के मध्य घिरे क्षेत्रफल से किसी प्रक्रम में गैस द्वारा किया गया कार्य सीधे प्राप्त हो जाता है।

ऊष्मा के समान कार्य भी पथ का फलन होता है। किसी निकाय द्वारा किया गया कार्य अथवा निकाय पर किया गया कार्य प्रारम्भिक एवं अन्तिम अवस्थाओं के प्रक्रम के पथ पर भी निर्भर करता है। उदाहरण के लिए चित्र में प्रदर्शित सूचक आरेख में प्रारम्भिक अवस्था से अन्तिम अवस्था तक परिवर्तन के तीन पथ (i) if (ii) ior (iii) ib प्रदर्शित किये गये हैं। इन तीनों मार्गों के लिए कृत कार्य विभिन्न प्रकार से किये गये छायांकित भागों के क्षेत्रफलों द्वारा प्राप्त होगा। चित्र से स्पष्ट है-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -10
Wiaf > Wif > Wibf
स्पष्ट है कि दो निश्चित अवस्थाओं के एक अवस्था से दूसरी अवस्था तक पहुँचने में कृत कार्य अपनाये गये पथ पर निर्भर करता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -11
यदि परिवर्तन के दौरान विभिन्न प्रक्रमों से होते हुए निकाय पुन: अपनी प्रारम्भिक स्थिति में लौट आता है तो ऐसे प्रक्रम को ‘चक्रीय प्रक्रम’ (Cyclic Process) कहते हैं। चक्रीय प्रक्रम में किया कुल कार्य बन्द चक्र के क्षेत्रफल से प्राप्त होता है साथ ही साथ प्रक्रम यदि दक्षिणावर्त (clockwise) है तो कार्य धनात्मक एवं प्रक्रम यदि वामावर्त (anticlockwise) है तो कार्य ऋणात्मक होता है। उदाहरण के लिए चित्र में प्रारम्भिक अवस्था A से ACB एवं BDA होते हुए निकाय पुनः अवस्था A में लौट आता है। इन दो प्रक्रमों में प्रक्रम ACB में कृत कार्य
W1 = + आकृति ACBYXA का क्षेत्रफल
एवं प्रक्रम BDA में
W2 = – आकृति BDAXYB का क्षेत्रफल
अत किया गया कुल कार्य
W = W1 + W2
= + ACBYXA का क्षेत्रफल – BDAXYB का क्षेत्रफल
या W = + ACBDA का क्षेत्रफल
अर्थात् किया गया कार्य बन्द लूप के क्षेत्रफल के बराबर होता है। चित्र में प्रदर्शित प्रक्रम दक्षिणावर्त है अतः कुल कार्य धनात्मक मिला है। यदि प्रक्रम वामावर्त अर्थात् ADBCA होता तो कुल कार्य इतना ही होता परन्तु ऋणात्मक होता।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 7.
रुद्धोष्म प्रक्रम की व्याख्या कीजिए एवं इसमें कृत कार्य के सूत्र का निगमन कीजिए।
उत्तर:
रुद्धोष्म प्रक्रम (Adiabatic Process):
रुद्धोष्म प्रक्रम वह प्रक्रम है जिसमें निकाय के ताप (T), दाब (P) तथा आयतन (V) तीनों परिवर्तित हो सकते हैं, लेकिन निकाय की ऊर्जा अपरिवर्तित रहती है अर्थात् निकाय एवं परिवेश के मध्य ऊष्मा का कोई आदान-प्रदान नहीं होता है। निकाय एवं परिवेश के मध्य ऊष्मा का आदान प्रदान न हो सके, इसके लिए निम्न दो शर्तों का पूर्ण होना आवश्यक है- (i) निकाय की परिसीमाएँ (पिस्टन एवं सिलिण्डर) ऊष्मा की कुचालक होनी चाहिए ताकि उनसे होकर ऊष्मा का आदान-प्रदान न हो सके।
(ii) परिवर्तन शीघ्रता से होना चाहिए ताकि ऊष्मा के आदान-प्रदान के लिए पर्याप्त समय न मिल सके।

रुद्धोष्म प्रक्रम में किया गया कार्य (Work done in Adiabatic Process):
माना चित्र के अनुसार एक भारहीन एवं घर्षण रहित पिस्टनयुक्त सिलिण्डर में एक गैस के मोल मौजूद पिस्टन एवं सिलेण्डर दोनों ऊष्मा के कुचालक हैं। माना गैस का दाब P में पिस्टन का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A है। यदि पिस्टन ऊपर की ओर $d x$ दूरी पर विस्थापित होता है तो गैस द्वारा कृत कार्य
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -12
dW = F.dx = (P.A).dx
या dW = P.Adx = P.dV
जहाँ dV = A.dx = आयतन में परिवर्तन
अब माना गैस का रुद्धोष्म प्रसार प्रारम्भिक अवस्था (P1, V1, T1)$ से कम अवस्था (P2, V2, T2) तक होता है तो गैस द्वारा किया गया कुल
\(\mathrm{W}_{\text {रुद्धोष्म }}=\int d \mathrm{~W}=\int_{\mathrm{V}_1}^{\mathrm{V}_2} \mathrm{P} d \mathrm{~V}\)
रुद्धोष्म प्रक्रम में गैसीय निकाय “पायसन के नियम” (Poisson’s Law) का पालन करता है। जिसके अनुसार
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -13
यह समी. (4) n मोल आदर्श गैस द्वारा रुद्धोष्म प्रक्रम में किये गये कार्य को निरूपित करता है। स्पष्ट है कि जब T1 > T2 तभी W का मान धनात्मक होगा और यदि T1 < T2 तो Wरुद्धोष्म का मान ऋणात्मक होता है।

प्रश्न 8.
समआयतनीय एवं समदाबीय प्रक्रम की व्याख्या करते हुए इन प्रक्रमों में कृत कार्य की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
समआयतनीय प्रक्रम (Isochoric Process):
ऐसा प्रक्रम जिसमें परिवर्तन के दौरान दाब (P) व ताप (T) में तो परिवर्तन होता है परन्तु आयतन नियत रहता है, सम आयतनीय प्रक्रम कहलाता है। अतः इस प्रक्रम में न तो गैस द्वारा कोई कार्य किया जाता है और न ही परिवेश द्वारा गैसीय निकाय पर कोई कार्य किया जाता है क्योंकि आयतन नियत होने से इस प्रक्रम में aV 0 होता है।

समआयतनीय प्रक्रम में ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम (First Law of Thermodynamics Applied to Isochoric Process):
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम-
dQ = dU + dW
या dQ = dU + P.dV
∵ समआयतनीय प्रक्रम में आयतन नियत रहता है अतः $d V=0$
∴ P. dV = 0
अतः dQ = dU …………(1)
अर्थात् गैस द्वारा अवशोषित सम्पूर्ण ऊष्मा निकाय की आंतरिक ऊर्जा व उसके ताप को परिवर्तित करने में व्यय होती है।
∵ स्थिर आयतन पर मोलर विशिष्ट ऊष्मा-
\(\mathrm{C}_{\mathrm{V}}=\left(\frac{d \mathrm{Q}}{d \mathrm{~T}}\right)_{\mathrm{V}}\)
∴ dQ = CV.dT
अतः dQ = CV.dT ………….(2)

समदाबीय प्रक्रम (Isobaric Process):
ऐसा प्रक्रम जिसमें परिवर्तन के दौरान ताप (T) व आयतन (V) तो परिवर्तित होते हैं लेकिन दाब (P) नियत रहता है समदावीय प्रक्रम कहलाता है। अर्थात् जब पदार्थ की अवस्था परिवर्तित होती है तो दाब (P) नियत रहता है। उदाहरणार्थ- पानी का जमना (freezing of water); पानी का वाष्प बनना (formation of steam) इत्यादि ।

समदाबी प्रक्रम में किया गया कार्य (Work Done in an Isobaric Process):
माना नियत दाब (P) पर ऊष्मागतिकीय निकाय में मौजूद गैस का आयतन VI से V2 तक परिवर्तित होता है तो गैस द्वारा किया गया कार्य
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -14
चूँकि ताप परिवर्तन से आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन होता है। अतः समदाबीय प्रक्रम में अवशोषित ऊष्मा आंशिक रूप से आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि करने तथा शेष ऊष्मा कार्य करने में व्यय होती है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 9.
ऊष्मागतिकी के अध्ययन के आवश्यक महत्वपूर्ण पदों को परिभाषित कीजिए तथा ऊष्मीय साम्य की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
ऊष्मागतिकी निकाय (Thermodynamic System):
ब्रह्माण्ड का वह भाग जिसमें विशाल संख्या में अणु, परमाणु, आयन, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, फोटॉन आदि मौजूद हों तथा जिसका चयन ऊष्मागतिकी अध्ययन के लिए किया गया हो, ऊष्मागतिकी निकाय कहलाता है।
ऊष्मागतिकी निकाय निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
(i) सूक्ष्म निकाय (Microscopic System) – सूक्ष्म निकाय में कणों की संख्या बहुत कम होती है, जिससे प्रत्येक कण का स्वतन्त्र रूप से अध्ययन किया जा सके। जैसे-एक परमाणु।
(ii) स्थूल निकाय (Macroscopic System) – स्थूल निकाय में कणों की संख्या अत्यधिक होती है। किसी पात्र में बन्द गैस स्थूल निकाय के रूप में होती है क्योंकि इसमें अणुओं की संख्या अवागाद्रो संख्या की कोटि की होती है।
(iii) खुला निकाय (Open System)-यदि निकाय एवं वातावरण (परिवेश) के मध्य ऊष्मा तथा पदार्थ दोनों का आदान-प्रदान होता है तो उसे खुला निकाय कहते हैं।
(iv) बन्द निकाय (Closed System) – यदि निकाय एवं परिवेश के मध्ग केवल ऊष्मा का आदान-प्रदान होता है (पदार्थ का नहीं) तो उस निकाय को बन्द निकाय कहते हैं।
(v) विलगित निकाय (Isolated System) – यदि निकाय एवं परिवेश के मध्य ऊष्मा एवं पदार्थ का कोई आदान-प्रदान नहीं होता है तो उसे विलगित निकाय कहते हैं।
(vi) समांगी निकाय (Homogeneous System) – यदि किसी ऊष्मागतिक निकाय में उपस्थित सभी भाग समान प्रावस्था में हो तो वह समांगी निकाय कहलाता है। उदाहरणार्थ-शुद्ध ठोस, शुद्ध द्रव, शुद्ध गैस इत्यादि।
(vii) विषमांगी निकाय (Heterogeneous System)-यदि किसी ऊष्मागतिक निकाय में दो या दो से अधिक प्रावस्थाएँ हो तो वह विषमांगी निकाय कहलाता है। उदाहरणार्थ-अघुलनशील द्रवों का मिश्रण इत्यादि।

तापीय साम्य (Thermal Equilibrium):
यदि दो ऊष्मागतिक निकायों के ताप समान हो, तो वे दोनों ऊष्मीय साम्यावस्था में कहे जाते हैं।
माना दो भिन्न पात्रों A व B में दो गैसें भरी हैं और उन गैसों का दाब व आयतन (PA, VA) व (PB, VB) हैं। चित्र के अनुसार दोनों पात्र रुद्धोष्म दीवार (ऊष्मारोधी) द्वारा पृथक किये गये हैं जिससे A व B के मध्य ऊष्मा का विनिमय नहीं हो पाता है। यहाँ पर (PA, VA) के किसी भी सम्भावित युग्म का मान (PB, VB) के किसी भी सम्भव युग्म के मान के साथ साम्यावस्था में होगा।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -15
अब हम रुद्धोष्म दीवार के स्थान पर एक ऊष्मा पार्थ दीवार लेते हैं। उक्त दीवार ऊष्मा को एक निकाय से दूसरे निकाय में जाने देती है। इस समय हम पाते हैं कि निकाय A व B के स्थूल चर उस समय तक परिवर्तित होते हैं, जब तक दोनों निकाय साम्यावस्था की स्थिति प्राप्त नहीं कर लेते हैं। यह व्यवस्था चित्र में प्रदर्शित की गई है। माना कि A व B निकाय के चर परिवर्तित होकर (PA‘, VA‘) तथा (PB‘, VB‘) हो जाते हैं, ताकि नई अवस्था पुनः एक-दूसरे की साम्यावस्था में हो जाती हैं। यहाँ यह आवश्यक नहीं कि दोनों चर बदलें। इस समय निकाय A व B में ऊर्जा का प्रवाह नहीं होता है। ऐसी स्थिति में निकाय A व B ऊष्मीय साम्य में है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -16
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ऊष्मागतिकी साम्य वह अवस्था है जब ऊष्मागतिकीय स्थूल निकाय के घर जैसे-दाब, ताप इत्यादि में समय के साथ परिवर्तन न हो। ये सामान्यतः तीन प्रकार के होते हैं-
(i) ऊष्मीय साम्य (Thermal Equilibrium) : ऊष्मीय साम्य वह अवस्था है, जब ऊष्मागतिकीय स्थूल निकाय के चर जैसे-दाब, ताप इत्यादि में समय के साथ परिवर्तन न हो।
(ii) रासायनिक साम्य (Chemical Equilibrium) : यदि किसी निकाय की रासायनिक संरचना समय के साथ नहीं बदलती है तो निकाय रासायनिक साम्य में होता है।
(iii) यांत्रिक साम्य (Mechanical Equilibrium) : यदि निकाय के विभिन्न हिस्सों तथा निकाय के परिवेश के मध्य किसी प्रकार के असन्तुलित बल कार्य नहीं करें तो निकाय परिवेश के साथ यांत्रिक साम्य में होता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 10.
कार्नो के उत्क्रमणीय इंजन की कार्यविधि लिखते हुए प्रत्येक प्रक्रम में किये गये कार्य को P-V वक्र द्वारा ज्ञात कीजिए तथा दक्षता का सूत्र व्युत्पन्न कीजिए।
उत्तर:
कार्नो चक्र (Cornat’s Cycle)
कार्नो इंजन की कार्य प्रणाली को संलग्न चित्र 12.21 की सहायता से समझा जा सकता है। इस चित्र में चार प्रक्रम प्रदर्शित हैं, जिनमें दो प्रक्रम समतापी एवं दो रुद्धोष्म हैं। इस चक्र को कार्नों चक्र कहते हैं।
अब हमें विस्तार से चारों चक्रों पर विचार करते हैं। माना सिलेण्डर में कार्यकारी पदार्थ का एक मोल है और प्रारम्भिक अवस्था $\mathrm{A}$ से प्रदर्शित है जहाँ दाब, आयतन एवं ताप क्रमशः P1, V1 व T1 हैं।
प्रक्रम 1 : समतापीय प्रसार (Isothermal Expansion): गैस सिलेण्डर को स्रोत पर रखकर पिस्टन के दाब को धीरे-धीरे कम करते हैं और गैस को प्रसारित होने दिया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान स्रोत नियत ताप T1 पर होता है। गैस के प्रसार के कारण गैस को बाह्य
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -19
कार्य करना पड़ता है अतः उसका ताप कम होता है परन्तु सिलेण्डर का आधार ऊष्मा का सुचालक होता है। इसलिए आवश्यक ऊष्मा गैसीय निकाय स्रोत से ले लेता है और फलस्वरूप उसका ताप T1 पर नियत रहता है। अतः यह समतापीय प्रसार चक्र के AB भाग द्वारा प्रदर्शित है। माना निकाय द्वारा स्रोत से अवशोषित ऊष्मा Q1 है तथा ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से समतापीय प्रसार के लिए यह ऊष्मा बाह्य कार्य के बराबर होनी चाहिए क्योंकि समतापीय प्रक्रम में dU = 0 होता है। यहाँ पर B बिन्दु पर दाब, आयतन व ताप क्रमश: P2, V2 व T1 हैं। यदि किया गया कार्य W1 है अत:
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -20

प्रश्न 11.
ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम के केल्विन प्लांक व क्लासियस के कथनों को लिखिए तथा स्पष्ट कीजिए कि उक्त कथन एक-दूसरे के तुल्य है।
उत्तर:
ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम (Second Law Of Thermodynamics):
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम पर आधारित है। यह ऊष्मा तथा कार्य की तुल्यता का नियम है अर्थात् कार्य का ऊष्मा में अथवा ऊष्मा का कार्य में रूपान्तरण होने पर कार्य की निश्चित मात्रा से निश्चित ऊष्मा उत्पन्न होती है या निश्चित ऊष्मा से कार्य की निश्चित मात्रा उत्पन्न होती है, परन्तु उपलब्ध ऊष्मा का कितना भाग यांत्रिक कार्य में परिवर्तित होता है एवं इसकी शर्तें व सीमाएँ क्या है ? इसकी जानकारी ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम नहीं देता है।

उदाहरणार्थ – फर्श पर लुढ़कती हुई गेंद ऊष्मागतिकी के नियमानुसार उस समय रुक जायेगी जब उसकी सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा (यांत्रिक ऊर्जा ) ऊष्मा में बदल जायेगी। परन्तु क्या इस प्रक्रिया का व्युत्क्रम अर्थात् फर्श पर रुकी हुई गेंद ऊष्मा अवशोषित करके गतिशील हो जायेगी ? इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से प्रथम नियम नहीं देता है। इस प्रकार किसी क्रिया के होने व न होने की जानकारी को प्राप्त करने के लिए अन्य नियम की आवश्यकता है जिसे ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम कहते हैं। यह नियम प्रथम नियम का पूरक है। ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम को विभिन्न वैज्ञानिकों ने भिन्न-भिन्न कथनों के रूप में प्रस्तुत किया है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से सभी कथन सत्य हैं। यहाँ हम दो कथनों पर विचार करेंगे जिनमें एक आन्तरिक ऊर्जा को कार्य में बदलने की सीमा के बारे में है और दूसरा ऊष्मा प्रवाह की दिशा के बारे में है।

1. केल्विन प्लांक का कथन (Statement of Kelvin Planck) : इस कथन के अनुसार, “इस प्रकार के इंजन का निर्माण सम्भव नहीं है, जो सम्पूर्ण चक्र में किसी वस्तु से ऊष्मा लेकर कार्यकारी निकाय में कोई परिवर्तन किये बिना उसे पूर्णतः कार्य में परिवर्तित कर दे।” अर्थात् कोई ऐसा ऊष्मा इंजन नहीं बन सका है, जो लोत से ली गई सम्पूर्ण ऊष्मा को कार्य में बदल सके और सिंक को कुछ भी न दे। दूसरे शब्दों में ऊष्मा के अविरल रूप से कार्य में बदलने के लिए ठण्डी वस्तु अर्थात् सिंक का होना आवश्यक है।

2. क्लासियस का कथन (Claussius’s Statement) : इस कथन के अनुसार, “किसी भी चक्रीय प्रक्रम में कार्यकारी पदार्थ द्वारा निम्न ताप वाली वस्तु से उच्च ताप वाली वस्तु की ओर ऊष्मा का प्रवाह नहीं हो सकता जब तक कि कार्यकारी पदार्थ पर बाह्य कार्य नहीं किया जाता है।” यह कथन प्रशीतक (refrigerator) के सिद्धान्त पर आधारित है जो ठण्डी वस्तु में से ऊष्मा अवशोषित कर गर्म वस्तु (कमरे की वायु) को प्रदान करता है, लेकिन इस कार्य को करने के लिए प्रशीतक में संपीडक (compressor) की आवश्यकता होती है अर्थात् बिना सम्पीडक की बाह्य सहायता के प्रशीतक वस्तुओं को ठण्डा नहीं कर सकता है।

प्रश्न 12.
कान प्रमेय का कथन लिखते हुए व्युत्पन्न कीजिए।
उत्तर:
कार्नो प्रमेय (Carnot’s Theorem)
इस प्रमेय के अनुसार,
(अ) किन्हीं तापों T1 व T2 (T1 > T2) के मध्य कार्य करने वाले इंजन की दक्षता उन तापों के मध्य कार्य करने वाले कार्नो इंजन की दक्षता से अधिक नहीं हो सकती है अर्थात् कार्नो (उत्क्रमणीय) इंजन की दक्षता अधिकतम होती है।
(ब) किन्हीं दो तापों T1 व T2 के मध्य कार्य करने वाले सभी कार्नो उत्क्रमणीय इंजनों की दक्षता समान होती है चाहे कोई भी कार्यकारी पदार्थ लिया जाये।
व्युत्पत्ति (Proof) : कार्नो प्रमेय के प्रथम कथन (अ) की उपपत्ति के लिए समान स्रोत (T1 K) व समान सिंक (T2K) के मध्य कार्य करने वाले दो इंजन लेते हैं जिनमें एक अनुत्क्रमणीय (irreversible) एवं दूसरा उत्क्रमणीय (reversible) है। दोनों इंजनों में कार्यकारी पदार्थ का चयन इस प्रकार किया जाता है कि दोनों इंजनों का प्रत्येक चक्र में किया गया कार्य (W) समान हो । अब यदि अनुत्क्रमणीय इंजन स्रोत (ताप T1) से Q1 ऊष्मा लेकर उसके एक भाग को कार्य (W) में बदलकर अर्थात् W कार्य करके शेष ऊष्मा (Q1 – W) सिंक (ताप T2) को दे देता है तो इस अनुत्क्रमणीय इंजन की दक्षता,
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -21
\(\eta_I=\frac{W}{Q_1}\) ……………..(1)
इसी प्रकार यदि उत्क्रमणीय इंजन समान ताप T1 पर स्रोत से I ऊष्मा लेकर W कार्य करके सिंक को (Q1‘ – W) ऊष्मा देता है, तो किये गये उत्क्रमणीय इंजन की दक्षता
\(\eta_R=\frac{W}{Q_1′}\) ……………..(2)
यहाँ पर माना कि ηI > ηR
अतः \(\frac{\mathrm{W}}{\mathrm{Q}}>\frac{\mathrm{W}}{\mathrm{Q}_1^{\prime}} \Rightarrow \frac{1}{\mathrm{Q}_1}>\frac{1}{\mathrm{Q}_1^{\prime}}\)
या Q1‘ > Q1
अर्थात् (Q1‘ – Q1) = एक धनात्मक संख्या

अब यदि चित्र के अनुसार दोनों इंजनों को इस प्रकार जोड़ते हैं कि अनुत्क्रमणीय इंजन (i) सीधी दिशा में और उत्क्रमणीय इंजन (R) विपरीत दिशा में कार्य करें तो उत्क्रमणीय इंजन अनुत्क्रमणीय इंजन द्वारा चलित एक प्रशीतक (Refrigerator) की भाँति कार्य करता है तथा यह T2 ताप पर सिंक से (Q1 – W) ऊष्मा लेकर और इस पर W कार्य किया जाता है। यहाँ T1 ताप पर यह स्रोत को Q1‘ ऊष्मा देता है। उत्क्रमणीय इंजन पर किये गये कार्य W की सीधे अनुत्क्रमणीय इंजन द्वारा पूर्ति होती है तथा अनुत्क्रमणीय इंजन तथा प्रशीतक (उत्क्रमणीय) एक स्वचालित युक्ति की भाँति कार्य करते हैं।
यहाँ पर स्रोत अनुत्क्रमणीय इंजन को Q1 ऊष्मा देता है तथा उत्क्रमणीय इंजन से Q1‘ ऊष्मा लेता है
स्रोत द्वारा ली गई ऊष्मा (Q1‘ – Q1)
इसी प्रकार अनुत्क्रमणीय इंजन सिंक को (Q1 – W) ऊष्मा देता है और उत्क्रमणीय इंजन सिंक से (Q1‘ – W) ऊष्मा लेता है। अतः
सिंक द्वारा ऊष्मा क्षय = (Q1‘ – W) – (Q1 – W)
= (Q1‘ – Q1)
Q1‘ > Q1 अत: (Q1‘ – Q1) धनात्मक राशि है।
इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक चक्र में T2 (निम्न ताप) पर सिंक से (Q1‘ – Q1) ऊष्मा की मात्रा बिना किसी बाह्य ऊर्जा स्रोत की सहायता से उच्च ताप T1 पर स्रोत को स्थानान्तरित कर रही है जो कि ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम के अनुसार सम्भव नहीं है अर्थात् हमारी परिकल्पना ηI > ηR सम्भव नहीं है अतः हम कह सकते हैं कि समान तापों के मध्य कार्य कर रहे इंजनों में उत्क्रमणीय (कार्नो) इंजन की दक्षता अधिकतम होती है।
कान प्रमेय के द्वितीय कथन हेतु हम अनुत्क्रमणीय इंजन के स्थान पर एक अन्य उत्क्रमणीय इंजन (R’) लेते हैं अर्थात् दो समान तापों T1 (उच्च) व T2 (निम्न) के मध्य दो उत्क्रमणीय इंजन कार्य कर रहे हैं। अब यदि R इंजन की दक्षता (ηR) को इंजन (R’) की दक्षता (η’R) से अधिक मानें तो प्राप्त होने वाला परिणाम पुनः ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम का उल्लंघन होगा अर्थात् ऊष्मा का स्थानान्तरण बिना किसी बाह्य ऊर्जा स्रोत की सहायता के निम्न ताप से उच्च ताप की ओर होना सम्भव नहीं है। अत: ηR > η’R ठीक नहीं होगा। इसी प्रकार η’R > ηR माने तो समान परिणाम व उल्लंघन प्राप्त होता है कि ηR = η’R माने तो होना चाहिए।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समान तापों के मध्य कार्य रहे सभी उत्क्रमणीय इंजनों की दक्षता समान होती है, चाहे कार्यकारी पदार्थ कुछ भी लिया गया हो।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 13.
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम का उल्लेख करते हुए गैसों की विशिष्ट ऊष्माओं का मेयर सम्बन्ध Cp – Cy = R प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
CP व CV में मेयर सम्बन्ध (Mayer’s Relation Between CP And CV):
मोलर विशिष्ट ऊष्मा की परिभाषा से, नियत आयतन पर मोलर विशिष्ट ऊष्मा-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -22

आंकिक प्रश्न (Numerical Questions)

ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम पर आधारित

प्रश्न 1.
संलग्न चित्र में किसी आदर्श गैस के ऊष्मागतिकीय प्रक्रियाओं का दाब आयतन आरेख दर्शाया गया है। इससे A → B, B → C तथा C → A प्रक्रमों में अलग-अलग कृत कार्य तथा सम्पूर्ण चक्र ABCA में कृत कार्य ज्ञात कीजिए ।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -23
उत्तर:
शून्य, 150 जूल गैस द्वारा, 375 जूल गैस पर, 225 जूल गैस पर

प्रश्न 2.
एक ऊष्मागतिक प्रक्रिया में किसी गैस को 300 जूल ऊष्मा दी जाती है तथा गैस पर 200 जूल कार्य भी किया जाता है। गैस की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
500 जूल वृद्धि

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 3.
चित्र में किसी आदर्श गैस के एक चक्रीय प्रक्रम का दाब – आयतन आरेख दर्शाया गया है। गैस की आन्तरिक ऊर्जा का मान अवस्था A में 150 जूल, अवस्था B में 100 जूल तथा अवस्था C में 2500 जूल है, तो ज्ञात कीजिए-
(i) प्रक्रम A → B में गैस द्वारा दी गई ऊष्मा,
(ii) प्रक्रम B → C में गैस द्वारा कृत कार्य,
(iii) प्रक्रम B → C में गैस द्वारा ली गई ऊष्मा ।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी -24
उत्तर:
(i) 50 जूल,
(ii) 20 जूल,
(iii) 170 जूल

प्रश्न 4.
1 cm³ जल उसके क्वथनांक पर 1671 cm³ आयतन भाप बनाने के लिए 540 कैलोरी ऊष्मा अवशोषित करता है। यदि वायुमण्डलीय दाब 1.013 × 105 N/m² है और ऊष्मा का यान्त्रिक तुल्यांक = 4.19 जूल / कैलोरी है, अन्तराण्विक बलों के विरुद्ध इस प्रक्रम में खर्च ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
500 कैलोरी

प्रश्न 5.
एक मनुष्य का द्रव्यमान 60 kg है। यदि उसे भोजन से 105 cal ऊष्मा मिलती हो एवं उसके शरीर की दक्षता 28% हो तो वह मनुष्य कितनी ऊँचाई तक चढ़ सकता है ? [g = 9.8ms-2; J = 4.2 J.cal-1]
उत्तर:
200m

प्रश्न 6.
शीशे की एक गोली 150 ms-1 की चाल से एक लक्ष्य से टकराकर रुक जाती है यदि 80% गतिज ऊर्जा गोली में रह जाती है तो गोली के ताप में वृद्धि ज्ञात कीजिए। शीशे की विशिष्ट ऊष्मा 30 cal. kg-1C-1 है। (J = 4.2J cal-1)
उत्तर:
71.43°C

प्रश्न 7.
संलग्न चित्र में एक आदर्श गैस की ऊष्मागतिकी प्रक्रियाओं का P – V ग्राफ दिखाया गया है। इस ग्राफ से ज्ञात कीजिए-
(i) A → B
(ii) B → C
(iii) C → D
(iv) D → A प्रक्रमों में किया गया कार्य।
उत्तर:
(i) 6000; J
(ii) शून्य,
(iii) 1000J;
(iv) शून्य
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी - 25

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

प्रश्न 8.
ऊष्मागतिक प्रक्रम में किसी गैस के दाब में इस प्रकार परिवर्तन किया जाता है कि गैस के अणुओं के द्वारा 30J ऊष्मा निष्कासित होती है तथा गैस पर 10J का कार्य किया जाता है। यदि गैस की प्रारम्भिक ऊर्जा 40J हो तो अन्तिम आन्तरिक ऊर्जा का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
20 जूल

प्रश्न 9.
नियत वायुमण्डलीय दाब एवं 20°C प्रारम्भिक ताप वाले 1 kg द्रव्यमान के धातु के टुकड़े को 20000 J ऊष्मा दी जाती है। निम्न मानज्ञात कीजिए-
(a) ताप में परिवर्तन (b) कृत कार्य, (c) आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन ।
[दिया है- विशिष्ट ऊष्मा = 400 J kg-1 °C-1, आयतन प्रसार गुणांक (y) = 9 × 10-5/°C
घनत्व = 9000 kg/m³, वायुमण्डल दाब = 105 N/m²]
उत्तर:
(a) 50°C,
(b) 0.05 J,
(c) 19999.95 J

समतापी प्रक्रम पर आधारित

प्रश्न 10.
O2 गैस के एक मोल का आयतन 0°C पर एवं वायुमण्डलीय दाब पर 22.4 लीटर है। उसको समतापीय रूप से संपीडित करते हैं जिससे आयतन 11.2 लीटर तक घट जाता है। उस प्रक्रम में किया गया कार्य ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
1572.6 J

प्रश्न 11.
2 मोल आदर्श गैस का 27°C पर समतापी प्रसार किया जाता है जिससे उसका आयतन बढ़कर प्रारम्भिक आयतन का तीन गुना हो जाता है। गैस द्वारा कृत कार्य तथा अवशोषित ऊष्मा की मात्रा का परिकलन कीजिए। (R=8.31Jmol! K-1)
उत्तर:
5.48 × 103 J; 1.31 × 10° cal

प्रश्न 12.
किसी आदर्श गैस के 10 किलोग्राम अणुओं द्वारा कितनी ऊर्जा अवशोषित होगी यदि इसे 8 वायुमण्डलीय प्रारम्भिक दाब से 4 वायुमण्डलीय दाब तक स्थिर ताप 27°C पर प्रसारित किया जाए ?
उत्तर:
1.728107 J

रुद्धोष्म प्रक्रम पर आधारित

प्रश्न 13.
27°C पर एक आदर्श एवं एक परमाणु गैस के 2 मोल V आवतन घेरते हैं। गैस रुद्धोष्म प्रक्रम द्वारा 2V आयतन तक प्रसारित होती है। गणना कीजिए-
(i) गैस का अन्तिम ताप
(ii) गैस की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन
(ii) इस प्रक्रम में गैस द्वारा कृत कार्य ।
(R = 8.31 J. mole-1 K-1)
उत्तर:
(i) 189 K;
(ii) -2767.2 J;
(iii) 2767.23

प्रश्न 14.
एक पिस्टन किसी गैस सिलिण्डर को दो भागों में विभाजित करता है प्रारम्भ में पिस्टन को ऐसे दबाते हैं जिससे एक भाग में दाब P तथा आयतन 5V है तथा दूसरे भाग में दाब 8P तथा आयतन V है। अब पिस्टन को स्वतन्त्र छोड़ दिया जाता है। रुद्धोष्म तथा समतापी प्रक्रियाओं के लिए नये दाब तथा आयतन ज्ञात कीजिए। (γ = 1.5)
उत्तर:
(i) समतापी – \(\frac{13P}{6}\), \(\frac{48}{13}\) V एवं \(\frac{30}{13}\)
(ii) रुद्धोष्म प्रक्रम – 1.84P, \(\frac{8V}{3}\) एवं \(\frac{10V}{3}\)

प्रश्न 15.
एक आदर्श गैस जिसका प्रारम्भिक दाब P आयतन V तथा ताप T है, रुद्धोष्म प्रक्रिया द्वारा तब तक फैलती है जब तक कि आयतन बढ़कर 5.66 V तथा ताप गिरकर T/2 हो जाता है। (i) गैस की परमाणुकता क्या है ? (ii) प्रसार के दौरान गैस द्वारा किया गया कार्य प्रारम्भिक दाब P व आयतन V के फलन के रूप में ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
(i) y = 1.4.
(ii) = PV

प्रश्न 16.
27°C पर एक आदर्श एवं एकपरमाणुक गैस के 3 मोल V आयतन घेरते हैं। गैस रुद्धोष्म प्रक्रम द्वारा 8 V आयतन तक प्रसारित होती है। गणना कीजिए-
(i) गैस का अन्तिम ताप,
(ii) गैस की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन तथा
(iii) इस प्रक्रिया में गैस द्वारा किया गया कार्य दिया है- सार्वत्रिक गैस नियतांक R = 8.31 जूल / मोल K
उत्तर:
(i) 75 K,
(ii) 5609.251,
(iii) 5609.25 J

मेयर सूत्र पर आधारित

प्रश्न 17.
सामान्य ताप व दाब पर मोल ऑक्सीजन गैस का आयतन 22.4 लीटर है। ऑक्सीजन की दोनों मोलर ऊष्मा धारिताओं की गणना कीजिए।
उत्तर:
CV = 20.755 J. mol-1 K-1; CP = 29.085 J. mol-1 K-1

प्रश्न 18.
एक कान इंजन की दक्षता 50% तथा इसके सिंक का ताप 27°C है। यदि इसकी दक्षता 10% बढ़ा दी जाये तब इसके स्रोत के ताप में कितनी वृद्धि हो जायेगी।
उत्तर:
140K

प्रश्न 19.
500K तथा 400K तापों के मध्य कार्य करने वाला कार्नो इंजन यदि प्रत्येक चक्र में स्रोत से 2000 cal ऊष्मा ग्रहण करता है तो गणना कीजिए-
(i) प्रत्येक चक्र में सिंक में विसर्जित ऊष्मा की मात्रा
(ii) प्रत्येक चक्र में इंजन द्वारा किया गया बाह्य कार्य
(iii) इंजन की दक्षता
उत्तर:
(i) 1600 cal;
(ii) 1680 J;
(iii) 20%

प्रश्न 20.
किसी कार्नो इंजन की दक्षता 100K व TK तथा 180K व 900K के लिए समान है तब T की गणना कीजिए।
उत्तर:
500K

प्रश्न 21.
हिमांक व वाष्पन के मध्य कार्य कर रहे कार्नो इंजन की दक्षता की गणना कीजिए।
उत्तर:
27%

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HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

Haryana State Board HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

बहुविकल्पीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
न्यूटन के गति के नियम लागू होते हैं:
(a) घूर्णी तन्त्र में
(b) त्वरित तन्त्र में
(c) अजड़त्वीय निर्देश तन्त्रों में
(d) त्वरण रहित तन्त्र में
उत्तर:
(d) त्वरण रहित तन्त्र में

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

प्रश्न 2.
एक कार घर्षण युक्त सड़क पर नियत वेग से गतिशील है, तो:
(a) कार के इंजन के द्वारा बल लगाया जा रहा है
(b) कार के इंजन के द्वारा बल नही लगाया जा रहा है।
(c) कार का संवेग बढ़ रहा है
(d) यह सम्भव नहीं
उत्तर:
(a) कार के इंजन के द्वारा बल लगाया जा रहा है

प्रश्न 3.
एक किग्रा भार बराबर होता है:
(a) 1 न्यूटन
(b) 9.8 न्यूटन
(c) 980 न्यूटन
(d) 98 न्यूटन
उत्तर:
(b) 9.8 न्यूटन

प्रश्न 4.
न्यूटन का तृतीय तुल्य है:
(a) रेखीय संवेग संरक्षण के नियम के
(b) ऊर्जा संरक्षण के नियम के
(c) कोणीय संवेग संरक्षण के नियम के
(d) ऊर्जा व द्रव्यमान तुल्यता के नियम के
उत्तर:
(a) रेखीय संवेग संरक्षण के नियम के

प्रश्न 5.
न्यूटन का गति का तृतीय नियम देता है:
(a) बल की माप
(b) बल की परिभाषा
(c) जड़त्व की परिभाषा
(d) बल का गुण
उत्तर:
(d) बल का गुण

प्रश्न 6.
यदि किसी कण द्वारा तय की गई दूरी (x) एवं समय (t) सम्बन्ध t = ax2 + bx, यहाँ a एवं b स्थिरांक हैं, तो कण का मन्दन होगा:
(a) 2av3
(b) 2bv3
(c) 2av2
(d) 2bv2
उत्तर:
(a) 2av3

प्रश्न 7.
एक स्प्रिंग तुला के पलड़े पर एक बीकर में थोड़ा पानी रखा हुआ है। यदि हम बीकर की तली को बिना छुए जल में अपनी अँगुली डुबाएँ तो तुला का:
(a) पाठ्यांक पहले की अपेक्षा बढ़ जायेगा
(b) पाठ्यांक पहले की अपेक्षा घट जायेगा
(c) पाठ्यांक अपरिवर्तित रहेगा
(d) पाठ्यांक परिवर्तन बीकर में भरे पदार्थ पर निर्भर करेगा।
उत्तर:
(a) पाठ्यांक पहले की अपेक्षा बढ़ जायेगा

प्रश्न 8.
एक स्वचालित मशीन गन से एक ही दिशा में गोलियाँ दागी जती हैं। प्रत्येक गोली का द्रव्यमान 50 ग्राम एवं वेग 1000 मी/से है। यदि गोली चलाने वाले व्यक्ति पर लगने वाला औसत बल 200 न्यूटन हो, तो प्रति मिनट दागी गयी गोलियों की संख्या होगी।
(a) 30
(b) 60
(c) 120
(d) 240
उत्तर:
(d) 240

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

प्रश्न 9.
तीन घनाकार आकृति के पिण्ड जिनके द्रव्यमान क्रमश: m1 = 20 किग्रा m2 = 40 किग्रा एवं m3 = 60 किग्रा हैं, घर्षण रहित तल पर चित्रानुसार रखे हुए हैं। तीनों पिण्ड एक अविस्तारित डोरी से जुड़े हैं। तनाव T1 एवं T2 के मान होंगे:
(a) 20 एंव 10 न्यूटन
(b) 20 एवं 60 न्यूटन

(c) 40 एवं 20 न्यूटन
(d) 10 एवं 20 नयूटन
उत्तर:
(b) 20 एवं 60 न्यूटन

प्रश्न 10.
स्थिर 238U से एक a-कण 107 मी/से वेग से विघटित होता है।
शेष नाभिक का विघटित वेग होगा:
(a) 107 मी/से
(b) \(\frac{4}{238}\) × 107 मी/से
(c) \(\frac{4}{234}\) × 107 मी/से
(d) \(\frac{1}{238}\) × 107मी/से
उत्तर:
(c) \(\frac{4}{234}\) × 107 मी/से

प्रश्न 11.
जब एक व्यक्ति खुरदरी सतह पर चलता है, तो सतह द्वारा आरोपित घर्षण बल:
(a) व्यक्ति की गति की दिशा में होता है
(b) व्यक्ति की गति की दिशा से विपरीत होता है
(c) व्यक्ति की गति की दिशा के लम्बवत् होता है।
(d) व्यक्ति की गति की दिशा के लम्बवत् नीचे की ओर होता है।
उत्तर:
(a) व्यक्ति की गति की दिशा में होता है

प्रश्न 12.
एक पिण्ड पर F = 4t3 न्यूटन बल, प्रथम दो सेकण्ड तक लगाया जाता है। पिण्ड के रेखीय संवेग में वृद्धि होगी:
(a) 16 न्यूटन सेकण्ड
(b) 8 न्यूटन सेकण्ड
(c) 48 न्यूटन सेकण्ड
(d) 32 न्यूटन सेकण्ड
उत्तर:
(a) 16 न्यूटन सेकण्ड

प्रश्न 13.
एक बिन्दु पर 10-10 न्यूटन के दो बल कोण θ पर कार्य कर रहे है। उनका परिणामी बल भी होगा 10 न्यूटन कोण θ का मान हैं।
(a) 0°
(b) 60°
(c) 120°
(d) 180°
उत्तर:
(c) 120°

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प्रश्न 14.
2 किग्रा द्रव्यमान का एक ब्लॉक फर्श पर रखा हुआ है। स्थैतिक घर्षण गुणांक का मान 0.4 है। यदि 2.5 न्यूटन का एक बल चित्रानुसार ब्लॉक पर लगाया जाये तो ब्लॉक व फर्श के मध्य घर्षण बल का मान है

F = 2.5N
(a) 2.5 न्यूटन
(b) 5.0 न्यूटन
(c) 7.5 न्यूटन
(d) 10 न्यूटन
उत्तर:
(a) 2.5 न्यूटन

प्रश्न 15.
घर्षण रहित फर्श पर किस व्यक्ति को चलने के लिए निम्न नियम की सहायता लेनी होगी:
(a) न्यूटन के प्रथम नियम की
(b) न्यूटन के द्वितीय नियम की
(c) न्यूटन के तृतीय नियम की
(d) उपर्युक्त सभी नियमों की
उत्तर:
(c) न्यूटन के तृतीय नियम की

प्रश्न 16.
समान वेग से सरल रेखीय पथ पर गतिशील एक ट्रेन में एक बच्चे ने हाइड्रोजन गैस के गुब्बारे से बँधी हुई डोरी को हाथ में पकड़ रखा है। यदि ड्राइवर अचानक ब्रेक लगाता है तो गुब्बारा:
(a) पीछे जायेगा
(b) ऊर्ध्व ऊपर रहगा
(c) आगे जायेगा
(d) ऊर्ध्व नीचे रहेगा
उत्तर:
(a) पीछे जायेगा

प्रश्न 17.
एक गुटका एक मेज पर रखा हुआ है। प्रतिक्रिया बल होगा:
(a) नीचे की ओर मेज द्वारा
(b) नीचे की ओर गुटके द्वारा
(c) ऊपर की ओर गुटके द्वारा
(d) ऊपर की ओर मेज द्वारा।
उत्तर:
(d) ऊपर की ओर मेज द्वारा।

प्रश्न 18.
सरकस में दौड़ते हुए घोड़े की पीठ पर बैठा घुड़सवार उछलकर पुन: घोड़े पर आ जाता है क्योंकि:
(a) वृत्तीय पथ में गति है
(b) स्थिरता का जड़त्व है
(c) गतिशीलता का जड़त्व है
(d) यह असम्भव है
उत्तर:
(c) गतिशीलता का जड़त्व है

प्रश्न 19.
निम्न में से किस प्रक्रिया में बल की आवश्यकता नहीं होती है?
(a) समान चाल से वर्तुल गति
(b) समान वेग से रेखीय गति
(c) समान त्वरण से रेखीय गति
(d) सभी में बल की आवश्यकता होती है।
उत्तर:
(a) समान चाल से वर्तुल गति

प्रश्न 20.
यदि किसी पिण्ड पर कई बल कार्यरत हैं तो उसके साम्यावस्था में होने के लिए आवश्यक शर्त है।
(a) पिण्ड बहुत हल्का होना चाहिए
(b) पिण्ड बहुत भारी होना चाहिए
(c) पिण्ड पर कार्यरत् बल संगामी होने चाहिए
(d) पिण्ड पर कार्यरत् सभी बलों का सदिश योग शून्य होना चाहिए।
उत्तर:
(c) पिण्ड पर कार्यरत् बल संगामी होने चाहिए

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
एक वृत्ताकार चिकनी चकती पर एक चिकनी गोली रखी है। चकती को घुमाने पर गोली चकती से लुढ़ककर नीचे गिर जाती है, क्यों?
उत्तर:
चकती एवं गोली दोनों चिकनी हैं अतः गोली को चकती के साथ घूमने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल (घर्षण बल के द्वारा) नहीं मिल पाता है; अत; गोली वृत्त की स्पर्श रेखा की दिशा में गति करती हुई नीचे गिर जाती है।

प्रश्न 2.
कार में बैठा व्यक्ति कार के मुड़ने पर विपरीत दिशा में झुक जाता है, क्यों?
उत्तर:
कार के मुड़ने पर व्यक्ति के ऊपरी भाग को आवश्यक अभिकेन्द्र बल नहीं मिल पाता है अतः वह अपकेन्द्र बल के कारण विपरीत दिशा में झुक जाता है।

प्रश्न 3.
मोड़ पर सड़क के करवट के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
सड़क पर करवट से वाहन के अधिकतम सुरक्षित वेग में वृद्धि होती है जिससे वाहन बिना फिसले मोड़ से सुरक्षित गुजर जाते हैं।

प्रश्न 4.
यदि नियत परिमाण का बल सदैव गतिशील पिण्ड की गति की दिशा के लम्बवत् कार्य करता है, तो कण का पथ कैसा होगा?
उत्तर:
कण का पथ वृत्ताकार होगा क्योंकि लगाया गया बल अभिकेन्द्र बल का कार्य करेगा।

प्रश्न 5.
क्षैतिज वृत्त में घूमने वाले पिण्ड की गतिज ऊर्जा प्रत्येक स्थिति में समान रहती है। क्या ऊर्ध्व वृत्त में भी यह कथन सत्य होगा?
उत्तर:
नहीं; क्योंकि ऊध्वं वृत्तीय गति में गतिज ऊर्जा एवं स्थितिज ऊर्जा का एक-दूसरे में रूपान्तरण होता रहता है।

प्रश्न 6.
एक डोरी से भारी पत्थर लटकाया गया है। जैसे ही पत्थर को सरल लोलक की तरह दोलन कराया जाता है, डोरी टूट जाती है। इस घटना का क्या कारण है?
उत्तर:
केवल लटकाये जाने की स्थिति में डोरी में तनाव T = mg होता है, जो डोरी की सहनशीलता के अन्दर होता है और डोरी नहीं टूटती है। दोलन कराने पर निम्नतम बिन्दु तनाव अधिकतम Tmax = (mg + \(\frac{m v^2}{r}\)
हो जाता है, जो डोरी की सहनशीलता से अधिक हो जाता है जिससे डोरी टूट जाती है।

प्रश्न 7.
अभिकेन्द्रीय बल को यह नाम क्यों दिया गया?
उत्तर:
क्योंकि इसकी दिशा सदैव केन्द्र की ओर होती है।

प्रश्न 8.
पृथ्वी पर अभिकेन्द्रीय बल कहाँ अधिकतम होता है?
उत्तर:
अभिकेन्द्रीय बल F = \(\frac{m v^2}{r}\) ध्रुवों पर r का मान न्यूनतम होता है। अतः यहाँ पर F का मान अधिकतम होता है।

प्रश्न 9.
एक कार को समतल सड़क पर मुड़ने के लिए अभिकेन्द्रीय बल किसके द्वारा प्रदान किया जाता है?
उत्तर:
सड़क व कार के पहियों के टायरों के मध्य लगने वाला घर्षण बल ही आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल प्रदान करता है।

प्रश्न 10.
अभिकेन्द्र बल एवं अपकेन्द्र बल में कौन वास्तविक बल एवं कौन छद्म बल है?
उत्तर:
अभिकेन्द्र बल वास्तविक एवं अपकेन्द्र बल छद्म बल है।

प्रश्न 11.
ऊर्ध्व वृत्त में गतिमान पिण्ड की उच्चतम बिन्दु पर न्यूनतम चाल को क्या कहते हैं? इसका मान क्या होता है?
उत्तर:
उच्चतम बिन्दु पर न्यूतनतम चाल को क्रान्तिक चाल कहते हैं और इसका मान v = \(\sqrt{r g}\) होता है।

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प्रश्न 12.
ऊर्ध्वाधर वृत्त के निम्नतम बिन्दु पर क्रान्तिक चाल एवं डोरी में इस दशा में तनाव कितना होगा?
उत्तर:
डोरी में तनाव T = 6 mg तथा क्रान्तिक चाल Vc = \(\sqrt{5 r g}\)

प्रश्न 13.
जेट इंजन किसके संरक्षण पर आधारित है- ऊर्जा के, संवेग के या द्रव्यमान के?
उत्तर:
जेट इंजन संवेग संरक्षण के सिद्धान्त पर आधारित है।

प्रश्न 14.
पृथ्वी चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण बल लगाती है; इसका प्रतिक्रिया बल कहाँ लग रहा होगा?
उत्तर:
पृथ्वी के केन्द्र पर चन्द्रमा की ओर।

प्रश्न 15.
कुँए से पानी खींचते समय यदि रस्सी टूट जाये तो मनुष्य किस ओर गिरेगा?
उत्तर:
पीछे की ओर।

प्रश्न 16.
एक खिलाड़ी कूदने से पहले कुछ दूरी तक भागता क्यों है?
उत्तर:
खिलाड़ी गति जड़त्व के लिए कूदने से पहले कुछ दूर दौड़ता है।

प्रश्न 17.
यदि किसी पिण्ड पर नेट बल शून्य है, तो पिण्ड क्या विरामावस्था में होगा?
उत्तर:
आवश्यक नहीं है क्योंकि नियत वेग से गतिमान वस्तु पर भी नेट बल शून्य होता है।

प्रश्न 18.
जब कोई गेंद ऊपर की ओर फेंकी जाती है तो उसका वेग पहले घटता है फिर बढ़ता है। क्या इस प्रक्रिया में संवेग संरक्षण का उल्लंघन होता है?
उत्तर:
नहीं, क्योंकि (गेंद + पृथ्वी) का संवेग संरक्षित रहता है।

प्रश्न 19.
क्या रॉकेट मुक्त आकाश में उड़ सकता है?
उत्तर:
हाँ; रॉकेट मुक्त आकाश में उड़ सकता है।

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प्रश्न 20.
चलती बस के अचानक रुकने पर उसमें बैठा यात्री आगे की ओर गिर जाता है, क्यों?
उत्तर:
गति जड़त्व के कारण यात्री के शरीर का ऊपर वाला भाग गतिशील रहता है जबकि बस की सीट के सम्पर्क वाला भाग बस के साथ रुक जाता है। इसलिए यात्री आगे की ओर गिर जाता है।

प्रश्न 21.
यदि एक दीवार पर समान द्रव्यमान तथा समान वेग से बारी-बारी से लोहे, पत्थर, मिट्टी, टेनिस की गेंद मारी जाये तो किसके द्वारा सबसे अधिक बल लगेगा?
उत्तर:
टेनिस की गेंद से क्योंकि यह सर्वाधिक वेग से वापस लौटेगी तथा संवेग में परिवर्तन सर्वाधिक होगा।

प्रश्न 22.
दो तलों के मध्य घर्षण गुणांक किन-किन बातों पर निर्भर करता है?
उत्तर:
आर्द्रता, तलों की प्रकृति, ताप, तलों की स्वच्छता पर।

प्रश्न 23.
पृथ्वी किस प्रकार का निर्देश तन्त्र है?
उत्तर:
अजड़त्वीय निर्देश तन्त्र, क्योंकि पृथ्वी के घूर्णन के कारण इस पर स्थित वस्तुओं की गति त्वरित गति की श्रेणी में आती है।

प्रश्न 24.
पहिए गोल क्यों बनाये जाते हैं?
उत्तर:
पहिए गोल इसलिए बनाये जाते हैं ताकि वे सर्पी घर्षण को लोटनी घर्षण में बदल सकें।

प्रश्न 25.
किसी पिण्ड की गति प्रारम्भ करने की अपेक्षा उसकी गति को बनाये रखना आसान होता है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि गतिक घर्षण बल का मान सीमान्त घर्षण बल की तुलना में कम होता है।

प्रश्न 26.
दो समान द्रव्यमान के दो व्यक्ति अपने पैरों पर बर्फ पर चलने वाली स्की (ice-skates) बाँधकर बर्फ के समतल मैदान पर कुछ दूरी पर खड़े हैं। एक व्यक्ति की कमर में एक रस्सी बँधी है जिसका दूसरा सिरा दूसरे व्यक्ति के हाथ में है। यदि दूसरा व्यक्ति रस्सी को अपनी ओर खींचे तो दोनों व्यक्तियों की गति पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
दोनों व्यक्ति समान संवेग से एक-दूसरे की ओर गति करेंगे।

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प्रश्न 27.
एक वस्तु पर कार्यरत् असमान संगामी बलों की संख्या कम से कम क्या होनी चाहिए जिससे वस्तु संतुलित रहे?
उत्तर:
वस्तु पर कार्यरत् असमान संगामी बलों की संख्या तीन होनी चाहिए जिससे वस्तु संतुलित रह सके।

प्रश्न 28.
समतल पृष्ठ पर एक W भार के बक्से को ऊर्ध्वाधर से θ कोंण पर F परिमाण का बल लगाकर खींचा जा रहा है। यदि बक्सा क्षैतिज दिशा में खिसके तब समान पृष्ठ का बक्से पर कितना प्रतिक्रिया बल मिलता है?

उत्तर:
बल को वियोजित करने पर,
R + Fcosθ = W
प्रतिक्रिया बल, R = W – Fcosθ

प्रश्न 29
एक नत समतल पर m द्रव्यमान की वस्तु रखी है जिस पर क्षैतिज बल F लग रहा है। वस्तु पर अभिलम्ब प्रतिक्रिया बल क्या है?
उत्तर:
बल F को एवं mg को वियोजित करने पर अभिलम्ब
प्रतिक्रिया
R = mg cosθ + F sinθ

प्रश्न 30.
कार की छत से धागे द्वारा लटकी गेंद कार के बायें मुड़ने पर किस ओर हटेगी?
उत्तर:
कार के बायीं ओर मुड़ने पर छद्म बल ( अपकेन्द्र बल) दायीं ओर को लगेगा। अतः गेंद दायीं ओर हटेगी।

प्रश्न 31.
एक लड़के के हाथ में एक पिंजरा है जिसकी फर्श पर एक चिड़िया बैठी है। यदि चिड़िया पिंजरे के भीतर उड़ने लगे तो क्या लड़के को पिंजरे के भार के कोई परिवर्तन अनुभव होगा?
उत्तर:
हाँ, पिंजरा पहले से हल्का प्रतीत होगा क्योकि अब चिड़िया का भार अनुभव नहीं होगा।

प्रश्न 32.
क्रिया व प्रतिक्रिया बल एक दूसरे के विपरीत व परिमाण में समान होते हैं लेकिन फिर भी वे एक दूसरे को निरस्त नहीं कर पाते हैं?
उत्तर:
प्रश्नगत क्रिया एवं प्रतिक्रिया बल एक दूसरे को निरस्त नही कर पाते क्योंकि ये दोनों बल एक ही वस्तु पर कार्य न करके दो अलग-अलग वस्तुओं पर कार्य करते हैं।

प्रश्न 33.
यदि किसी पिण्ड को तीन समान्तर बल सन्तुलन में रखते हैं तो उन बलों की विशेषता क्या होगी?
उत्तर:
बल समतलीय तथा संगामी होंगे।

लघु उत्तरीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
रेलगाड़ी का ड्राइवर स्टार्ट करने के लिए पहले रेल के इंजन को पीछे धकेलता है तथा फिर आगे बढ़ाता है। ऐसा क्यों करता है?
उत्तर:
इंजन को पीछे धकेलने से डिब्बों को जोड़ने वाली कड़ियाँ ढीली पड़ जाती हैं। अब इंजन द्वारा आगे की ओर बल लगाने पर सर्वप्रथम पहला डिब्बा तथा फिर बारी-बारी से पिछले डिब्बे त्वरित होते हैं। यदि ड्राइवर ऐसा न करे तो कड़ियों के तने होने पर पूरी गाड़ी एक साथ त्वरित होगी, जिसके लिए इंजन को बहुत अधिक बल लगाना पड़ेगा।

प्रश्न 2.
क्या समान वेग से गति करने वाला पिण्ड सन्तुलन में है?
उत्तर:
हाँ, सरल रेखीय गति में,
संतुलन की अवस्था में Fnet = 0
अर्थात्
Fnet = ma = \(\frac{m(\Delta v)}{t}\)
= 0
या
∆v = 0
अर्थात् पिण्ड समान वेग से गतिमान है।

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प्रश्न 3.
एक हल्के एवं दूसरे भारी पिण्ड के रेखीय संवेग समान हैं। किस पिण्ड की गतिज ऊर्जा अधिक होगी?
उत्तर:
गतिज ऊर्जा E = \(\frac{1}{2}\)mv2
= \(\frac{m^2 v^2}{2 m}\)
= \(\frac{p^2}{2 m}\)
∴ p2 = 2mE ⇒ P = \(\sqrt{2 m E}\)
दिया है:
P1 = P2
∴ \(\sqrt{2 m_1 E_1}\) = \(\sqrt{2 m_7 E_2}\)
या
m1E1 = m2E2
⇒ \(\frac{E_1}{E_2}\) = \(\frac{m_2}{m_1}\)
∵ m2 > m1
∴ E1 > E2
अर्थात् हल्के पिण्ड की गतिज ऊर्जा अधिक होगी।

प्रश्न 4.
एक हल्के एवं भारी पिण्ड की गतिज ऊर्जा समान है। किस पिण्ड का रेखीय संवेग अधिक होगा?
उत्तर:
गतिज ऊर्जा E = \(\frac{p^2}{2 m}\)
∵ E1 = E2
∴\(\frac{p_1^2}{2 m_1}\) = \(\frac{p_2^2}{2 m_2}\)
या
\(\frac{p_1^2}{p_2^2}\) = \(\frac{m_1}{m_2}\)
∵ m1 < m2
p12 < P22 या P1 < P2
अर्थात् हल्के पिण्ड का रेखीय संवेग कम होगा और भारी का अधिक।

प्रश्न 5.
समान द्रव्यमान M के तीन समरूप गुटके एक घर्षण रहित मेज पर चित्र के अनुसार धकेले जाते हैं। बताइये कि (i) गुटकों का त्वरण क्या है? (ii) गुटके A पर नेट बल कितना है ? (iii) गुटका A गुटके B पर कितना बल लगाता है? (iv) गुटका B गुटके C पर कितना बल लगाता है? (v) गुटकों के सम्पर्क तलों पर क्रिया तथा प्रतिक्रिया बलों को दिखाइये।

उत्तर:
(i) प्रत्येक गुटके का त्वरण a = \(\frac{F}{3 M}\)
(ii) गुटके A पर नेट बल = \(\frac{F}{3}\)
(iii) गुटके A द्वारा B पर लगाया गया बल = \(\frac{2 F}{3}\)
(iv) गुटके B द्वारा C पर लगाया गया बल = \(\frac{F}{3}\)
(v) क्रिया तथा प्रतिक्रिया बल चित्र में प्रदर्शित हैं।

प्रश्न 6.
समान द्रव्यमान के तीन गुटके डोरियों से बाँधकर एक चिकनी क्षैतिज मेज पर बल द्वारा खींचे जाते हैं। डोरियों में तनाव T1 व T2 ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माना बल F के कारण त्वरण a उत्पन्न होता है। अतः न्यूटन के गति के द्वितीय नियम से:

∴ प्रथम पिण्ड के लिए गति का समी०
F – T1 = ma ⇒ T1 = F – ma
= F – m\(\frac{F}{3 m}\)
या
T1 = F – \(\frac{F}{3 m}\) = \(\frac{2F}{3 m}\)
या
T1 = \(\frac{2F}{3 m}\)
इसी प्रकार दूसरे पिण्ड के लिए
T1 – T2 = ma = \(\frac{F}{3}\)
या
T2 = T1 – \(\frac{F}{3}\) = \(\frac{2F}{3}\) – \(\frac{F}{3}\) = \(\frac{F}{3}\)
या
T2 = \(\frac{F}{3}\)

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प्रश्न 7.
पेड़ की शाखा को हिलाने पर आम नीचे क्यों गिर जाते हैं?
उत्तर:
जब पेड़ की शाखा को हिलाते हैं तो यह गति करती है। जड़त्व के कारण आम स्थिर रहता है। इसी कारण आम शाखा से अलग होकर नीचे गिर जाता है।

प्रश्न 8.
धूल हटाने के लिए गलीचे को डण्डे से क्यों पिटते हैं?
उत्तर:
जब गलीचे को डण्डे से पीटते हैं तो गलीचा तो गति में आ जाता है लेकिन धूल के कण विराम जड़त्व के कारण गति में नहीं आ पाते हैं और वे गलीच से अलग हो जाते हैं।

प्रश्न 9.
स्पष्ट कीजिए कि क्यों किसी तीव्र गति से चल रही बस के यकायक रुकने पर यात्री आगे की ओर गिरते हैं?
उत्तर:
न्यूटन के गति के प्रथम नियम अर्थात् जड़त्व के नियम के अनुसार गतिशील वस्तु रुकने का विरोध करती है। इसीलिए तीव्र गतिशील वाहक के यकायक रुकने पर यात्री आगे की ओर गिरते हैं।

प्रश्न 10.
न्यूटन के गति के प्रथम नियम को जड़त्व का नियम क्यों कहते हैं?
उत्तर:
न्यूटन के गति के प्रथम नियम के अनुसार बाह्य बल की अनुपस्थिति में किसी पिण्ड की अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होता है और जड़त्व किसी वस्तु का वह गुण जिसके कारण वह अपनी अवस्था परिवर्तन का विरोध करती है। इसीलिए गति के प्रथम नियम को जड़त्व का नियम कहते हैं।

प्रश्न 11.
क्रिकेट का खिलाड़ी गेंद को लपकते समय अपने हाथ गेंद के साथ पीछे की ओर क्यों खींचता है?
उत्तर:
गति के द्वितीय नियम से F = \(\frac{\Delta p}{\Delta t}\)
स्पष्ट है कि ∆p संवेग परिवर्तन के लिए समयान्तराल ∆r का मान जितना अधिक होगा, बल F का मान उतना ही कम होगा। इसीलिए क्रिकेट खिलाड़ी गेंद को लपकते समय अपने हाथ गेंद के साथ पीछे खींच लेता है। ताकि गेंद का संवेग शून्य होने का समय बढ़ जाये और हाथ पर गेंद द्वारा आरोपित बल कम हो जाये।

प्रश्न 12.
बल की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
बल वह कारक है जो किसी वस्तु की अवस्था को बदल दे या बदलने का प्रयास करे।

प्रश्न 13.
एक जड़त्वीय तन्त्र के अन्तर्गत् एक कण का त्वरण मापने पर शून्य आता है। क्या हम कह सकते हैं कि कण पर कोई बल कार्यरत् नहीं है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जड़त्वीय निर्देश तन्त्र में न्यूटन के गति के प्रथम व द्वितीय नियम वैध होते हैं। गति की परिभाषा आपेक्षिक आधार पर की जाती है। सामान्यतः पृथ्वी को स्थिर मान कर हम गति को परिभाषित करते हैं और पृथ्वी को जड़त्वीय निर्देश तन्त्र मानते हैं। अतः पृथ्वी पर किसी वस्तु का त्वरण शून्य होने पर भी उस पर गुरुत्वीय बल (भार) कार्य करता है।

प्रश्न 14.
न्यूटन के गति के तृतीय नियम के अनुसार रस्साकशी के खेल में प्रत्येक टीम अपनी विरोधी टीम को समान बल से खींचता है, तो फिर एक टीम जीतती है और दूसरी हार जाती है ऐसा क्यों?
उत्तर:
रस्साकशी के खेल में दोनों टीमें जब तक समान बल से रस्से को सींचती हैं तब तक पूरे निकाय पर नेट बल शून्य रहता है। जैसे ही 1 एक टीम का बल दूसरी टीम के बल से अधिक हो जाता है, नेट बल लगने लगता और पूरा निकाय नेट बल की दिशा में गति करने लगता है। फलस्वरूप एक टीम जीत जाती है और दूसरी हार जाती है।

प्रश्न 15.
एक मेज पर एक किताब रखी हुई है। किताब का भार एवं मेज द्वारा किताब पर लगाया गया अभिलम्ब बल परिमाण में समान एवं दिशा में विपरीत हैं। क्या इसे न्यूटन के तृतीय नियम का उदाहरण माना जा सकता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हाँ, क्योंकि तृतीय नियम के लिए दोनों बल परिमाण में समान एवं दिशा में विपरीत होने चाहिए तथा दोनों बल दो अलग-अलग वस्तुओं पर लगने चाहिए । यहाँ ये शर्तें पूर्ण होती हैं।

प्रश्न 16.
किसी वस्तु पर लगने वाले आवेग की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
आवेग (Impulse): जब दो वस्तुओं में टक्कर होती है, तो वे एक दूसरे पर बल आरोपित करती हैं। फलस्वरूप प्रत्येक वस्तु के संवेग में दूसरी वस्तु द्वारा लगाये बल के कारण परिवर्तन होता है। सामान्यतः इस प्रकार की टक्कर में सम्पर्क का समय अर्थात् स्पर्श काल (Duration of Contact) अत्यल्प होता है जबकि वस्तुओं के संवेग में परिवर्तन अत्यधिक होता है। इसका अर्थ है कि टक्कर के समय लगने वाले बल का परिमाण अत्याधिक होना चाहिए। उदाहरणार्थ- क्रिकेट के खेल में बल्ले द्वारा गेंद पर अत्यधिक बल अत्यल्प समय के लिए लगाया जाता है। ऐसे ही बल को ‘आवेगी बल’ (Impulsive Force) कहते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि. सम्पर्क के समय बल एक समान ( uniform ) हो। इस प्रकार, “किसी वस्तु की गति पर बल के समग्र प्रभाव को आवेग कहते हैं और इसका मान बल एवं समयान्तराल के गुणनफल से प्राप्त करते हैं।” इसे / से व्यक्त करते हैं और यह सदिश राशि है जिसकी दिशा वही होती है, जो आरोपित बल की होती है।
अत:
आवेग = बल x समयान्तराल
या
I = F.∆l …..(1)
सदिश रूप में
\(\vec{I}\) = \(\vec{I}\)∆l …..(2)
∵ न्यूटन के गति के द्वितीय नियम से
\(\vec{F}\) = \(\frac{\Delta \vec{p}}{\Delta t}\)
\(\vec{I}\) = \(\frac{\Delta \vec{p}}{\Delta t}\) x ∆t
या
\(\vec{I}\) = \(\Delta \vec{p}\) ….(3)
अर्थात् “किसी वस्तु पर कार्यरत् आवेग, उसके संवेग में परिवर्तन के बराबर होता है।” यही आवेग संवेग प्रमेय हैं।
यदि किसी वस्तु पर कोई बल \(\vec{F}\) है अल्प समय dt के लिए कार्यरत् रहता है, तो बल का आवेग,
dI = F.dt
यदि ब F समय t1 से t2 तक के लिए आरोपित रहता है, तो कुल आवेग
I = \(\int d I\) = \(\int_{t_1}^{t_2} F \cdot d t\)
यदि बल समय का फलन (function) नहीं है तो नियत रहेगा। अतः
I = \(F \cdot \int_{t_1}^{t_2} d t-F \cdot[t]_{t_1}^{t_2}\)
या
I = F.∆t
मात्रक एवं विमीय सूत्र
∵ आवेग I = F. ∆t
∴ I का मात्रक = N. s.
तथा I का विमीय सूत्र = [M1L1T-2][T1]
= [M1L1T-1]

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प्रश्न 17.
आवेगी बल क्या होते हैं?
उत्तर:
अत्यधिक परिमाण के वे बल जो अत्यल्प अवधि (स्पर्श काल) के लिए कार्यरत् होते हैं, आवेगी बल कहलाते हैं।

प्रश्न 18.
विलगित निकाय किसे कहते हैं?
उत्तर:
ऐसा निकाय जिस पर कोई बाह्य बल कार्य न कर रहा हो या कार्यरत् बाह्य बलों का सदिश योग शून्य हो, विलगित निकाय कहलाता है।

प्रश्न 19.
किसी बन्दूक से एक गोली छोड़ने पर बन्दूक पीछे की ओर प्रतिक्षिप्त क्यों करती है?
उत्तर:
संवेग संरक्षण के सिद्धान्त के अनुसार बाह्य बल की अनुपस्थिति में किसी निकाय का कुल संवेग संरक्षित अर्थात् नियत रहता है। अतः जब बन्दूक से गोली दागी जाती है तो जिस संवेग से गोली गति करती है, ठीक उतने ही संवेग से बन्दूक प्रतिक्षिप्त होती है, ताकि कुल संवेग नियत रहे।

प्रश्न 20.
एक व्यक्ति सीमेन्ट के फर्श पर गिरता है तो रेत की ढेरी पर गिरने की अपेक्षा अधिक चोट लगती है, क्यों?
उत्तर:
जब व्यक्ति किसी ऊँचाई से सीमेन्ट की फर्श पर गिरता है तो अचानक रूक जाता है क्योंकि फर्श दबती नहीं है। अतः आवेग को संतुलित करने के लिए फर्श द्वारा अधिक बल लगाया जाता है है जिससे चोट अधिक लगती है। इसके विपरीत जब व्यक्ति रेत के ढेर पर गिरता है तो रेत दब जाता है और संवेग को शून्य होने के लिए अधिक समय लगता है, अतः रेत की फर्श द्वारा कम बल लगाया जाता है जिससे चोट कम लगती है।

प्रश्न 21.
एक गुब्बारे (द्रव्यमान M) से बंधी रस्सी से एक व्यक्ति (द्रव्यमान m) लटका है तथा गुब्बारा स्थिर है। यदि वह व्यकि इसी रस्सी के सहारे चढ़ने लगे तो गुब्बारा किस वेग से तथा किस दिशा में चलने लगेगा? व्यक्ति का रस्सी के सापेक्ष वेग v है।
उत्तर:
व्यक्ति तथा गुब्बारे का प्रारम्भिक संवेग शून्य है, अतः व्यक्ति जिस संवेग से ऊपर चढ़ेगा, गुब्बारा उतने ही संवेग से नीचे गति करेगा। यदि गुब्बारे का वेग u है, तो व्यक्ति ऊपर की ओर (V – u) वेग से ऊपर चढ़ेगा।
अतः व्यक्ति का संवेग + गुब्बारे का संवेग = 0
या
m(v – u) – Mu = 0
या
mv – mu – Mu = 0
या
mv – u(m + M) = 0
या
u(M + m) = mv
∴ u = \(\frac{m v}{M+m}\)

प्रश्न 22.
कीचड़ वाली सड़क पर हम फिसल क्यों जाते हैं?
उत्तर:
कीचड़ वाली सड़क पर हमारे पैरों और सड़क के बीच जल की एक पतली पर्त होती है। यह पर्त अन्तर्ग्रथन (interlocking) को समाप्त करके घर्षण को कम कर देती है। इसीलिए कीचड़ युक्त सड़क पर हम फिसल जाते हैं।,

प्रश्न 23.
चाल से गतिमान एक ट्रक के ड्राइवर को अपने सामने दूरी पर एक चौड़ी दीवार दिखाई देती है टक्कर से बचने के लिए उसे ब्रेक लगानी चाहिए अथवा बिना ब्रेक लगाये गाड़ी को वृत्तीय मोड़ देना चाहिए? कारण भी बताइये।
उत्तर:
ब्रेक लगाने चाहिए, ब्रेक लगाने पर ट्रक की गतिज ऊर्जा घर्षण बल के विरुद्ध कार्य करने में व्यय होगी। यदि घर्षण बल Ff तथा रुकने से पूर्व ट्रक द्वारा चली गई दूरी हो तो
\(\frac{1}{2}\)mv2 = Ff x. ∴ x = \(\frac{m v^2}{2 F_f}\)
ट्रक को टक्कर से बचाने के लिए x < r
∴ \(\frac{m v^2}{2 F_f} \leq r\) या \(F_f \geq \frac{m v^2}{2 r}\)
ट्रक को मोड़ने पर,. \(F_f=\frac{m v^2}{r^{\prime}}\)
∴ \(r^{\prime}=\frac{m v^2}{F_f}\)
टक्कर से बचने के लिए \(r^{\prime} \leq r,\)
या \(\frac{m v^2}{F_f} \leq r\)
स्पष्ट है कि ब्रेक द्वारा रोकने के आवश्यक घर्षण बल \(\frac{m v^2}{2 r}\) वृत्तीय मोड़ देने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल \(\frac{m v^2}{r}\) से आधा है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

प्रश्न 24.
एक राइफल से गोली दागी जाती है। यदि राइफल स्वतन्त्रता पूर्वक प्रतिक्षेपित होती है, तो बताइये कि राइफल की गतिज ऊर्जा गोली की गतिज से किस प्रकार सम्बन्धित होगी?
उत्तर:
गतिशील पिण्ड की गतिज ऊर्जा E = \(\frac{p^2}{2 m}\)
∴ गोली एवं राइफल दोनों के संवेग समान होंगे, अतः E ∝ \( \frac{1}{m}\) स्पष्ट है कि राइफल की गतिज ऊर्जा गोली की गतिज ऊर्जा से कम होगी क्योंकि राइफल का द्रव्यमान गोली के द्रव्यमान से अधिक होता है।

प्रश्न 25.
ढालू सड़क पर चढ़ने की अपेक्षा समतल सड़क पर टायरों की पकड़ अधिक मजबूत होती है, क्यों?
उत्तर:
समतल सड़क पर घर्षण बल μmg होता है जबकि ढालू सड़क पर μmg cosθ होता है। यदि θ > 0° तो cosθ < 1, अतः समतल सड़क पर घर्षण बल अधिक होने के कारण टायरों की पकड़ अधिक मजबूत होती है।

प्रश्न 26.
किसी सतह का अत्यधिक पॉलिश करने पर घर्षण बल बढ जाता है। कारण बताइये।
उत्तर:
जब किसी पृष्ठ को बहुत अधिक पॉलिश कर दिया जाता है तो पृष्ठ के अणु एक-दूसरे की आणविक परास के अन्दर आ जाते हैं। अतः अन्तरापरमाणवीय आकर्षण बढ़ जाता है जिसके कारण घर्षण बल बढ़ जाता है।

प्रश्न 27.
50g द्रव्यमान की वस्तु निर्वात् में नियत वेग 10ms-1 के वेग से क्षैतिज घर्षण रहित तल पर गति करती है, वस्तु पर बल क्या होगा?
उत्तर:
नियत वेग से गतिमान वस्तु का त्वरण शून्य होगा, अर्थात् a = 0 अतः उस पर लगने वाला बल F = ma = 0 होगा।

प्रश्न 28.
विद्युत् बन्द कर देने के बाद भी पंखा कुछ देर तक घूमता रहता है, कारण सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
गति जड़त्व के कारण पंखा विद्युत् आपूर्ति बन्द करने के बाद कुछ समय तक घूमता रहता है। यदि घर्षण बल जैसे विरोधी बल न हों तो पंखा अनन्त काल तक घूमता रहेगा।

प्रश्न 29.
भारहीन तथा घर्षण रहित एक घिरनी पर भारहीन तथा न बढ़ने वाली एक रस्सी के दोनों सिरों पर समान द्रव्यमान के दो बन्दर लटके हैं। रस्सी के सापेक्ष एक बन्दर तेजी से चढ़ता है। कौन सा बन्दर सबसे पहले ऊपर पहुँचेगा?
उत्तर:
किसी भी बन्दर को संवेग प्रदान करने वाला कोई भी बाहय बल आरोपित नहीं हो रहा है। केवल बन्दर ही एक दूसरे पर बराबर संवेग लगा रहे है। अतः दोनों बन्दर एक साथ घिरनी पर पहुँचेंगे।

प्रश्न 30.
एक क्षैतिज सड़क पर एक पहिया घूमता हुआ आगे बढ़ रहा है। इस पर घर्षण बल की दिशा बताइये।
उत्तर:
आगे बढ़ रहे घूमते पहिए पर दो घर्षण बल कार्य करते हैं:

  • लोटनी घर्षण बल एवं
  • गतिक घर्षण बल 1 चूँकि पहिया आगे बढ़ रहा है, अतः गतिक घर्षण बल पीछे की ओर कार्य करेगा। पहिए के सड़क के सम्पर्क वाले भाग की प्रवृत्ति पीछे की ओर है अतः लोटनी घर्षण बल आगे को लगेगा। चूँकि लोटनी घर्षण बल गतिक घर्षण बल से कम होता है अतः परिणामी घर्षण बल पीछे की ओर लगेगा।

प्रश्न 31.
एक डोरी के सिरे पर एक पत्थर बाँधकर उसे तेजी से घुमाने पर डोरी टूट जाती है और पत्थर स्पर्श रेखा की दिशा में दूर चला जाता है, क्यों?
उत्तर:
ऐसा दिशा के जड़त्व के कारण होता है। जब डोरी टूटती है तो पत्थर को डोरी द्वारा प्राप्त होने वाला अभिकेन्द्रीय बल समाप्त हो जाता है। बल की अनुपस्थिति में पत्थर तात्क्षणिक वेग की दिशा में दूर चला जाता है। यह दिशा डोरी टूटने
के बिन्दु पर वृत्तीय पथ की स्पर्श रेखा की दिशा में होती है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

प्रश्न 32.
एक नाभिक जो स्थिर अवस्था में है, अचानक दो समान भागों में टूट जाता है। दोनों नाभिकों के मध्य वह कोण ज्ञात कीजिए जिस पर ये एक दूसरे से दूर जाते हैं।
उत्तर:
बड़ा नाभिक स्थिर है अतः इसका संवेग = 0 (शून्य)। टूटने के बाद दोनों नाभिकों के द्रव्यमान m1 व m2 तथा उनके वेग क्रमशः \(\overrightarrow{v_1}\) व \(\overrightarrow{v_2}\) हैं, तो उनके संवेग
\(\overrightarrow{p_1}\) = m1 \(\overrightarrow{v_1}\)
एवं
\(\overrightarrow{p_2}\) = m2 \(\overrightarrow{v_2}\)
संवेग संरक्षण के सिद्धान्त से
टूटने के बाद कुल संवेग = टूटने के पूर्व संवेग
\(\overrightarrow{p_1}\) + \(\overrightarrow{p_2}\) = 0
∴ \(\vec{p}=-\overrightarrow{p_2}\)
या
m1 \(\overrightarrow{v_1}\) = m2 \(\overrightarrow{v_2}\)
∵ m1 व m2 अदिश राशियाँ हैं अतः \(\overrightarrow{v_1}\) व \(\overrightarrow{v_2}\) की दिशाएँ परस्पर विपरीत दिशा में अर्थात 180° के कोण पर होंगी।

प्रश्न 33.
एक स्थिर वाहन के अन्दर बैठे कुछ यात्री इसको अन्दर से धक्का लगा रहे हैं। कारण सहित बताइये कि वह वाहन चलेगा या नहीं?
उत्तर:
नहीं; क्योंकि यात्रियों द्वारा लगाया गया बल, वाहन की दीवार द्वारा आरोपित समान परन्तु विपरीत प्रतिक्रिया बल द्वारा संतुलित हो जाता है; अतः वाहन पर शुद्ध बल शून्य होगा और वाहन नहीं चलेगा।

प्रश्न 34.
विरामावस्था में रखा एक बम समान द्रव्यमान के तीन टुकड़ों में विस्फोटित हो जाता है। दो टुकड़ों का संवेग क्रमशः -2p\(\hat{i}\) और p\(\hat{j}\) है। तीसरे टुकड़ें के संवेग का परिमाण ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया है;
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-24

प्रश्न 35.
एक व्यक्ति पूर्णतया घर्षण रहित बर्फ के तालाब के मध्य में खड़ा है वह किनारे तक कैसे पहुँच सकता है?
उत्तर:
वह सामने की ओर फूँक मारकर या सामने की ओर थूककर किनारे पर पहुँच सकता है। ऐसा करने पर वह आगे की ओर कुछ बल लगाता है और वायु को कुछ संवेग प्रदान करता है। संवेग संरक्षण के सिद्धान्त से उसके शरीर को विपरीत दिशा में समान संवेग प्राप्त होता है। घर्षण की अनुपस्थिति में व्यक्ति की गतिज ऊर्जा में कोई हानि नहीं होती है और वह तालाब के किनारे पर पहुँच जाता है।

प्रश्न 36.
वर्षा होने पर सड़क के मोड़ पर स्कूटर प्रायः फिसल क्यों जाते हैं?
उत्तर:
वर्षा होने पर सड़क पानी के कारण गीली हो जाती है जिससे घर्षण कम हो जाता है। फलस्वरूप स्कूटर को घर्षण के द्वारा पर्याप्त अभिकेन्द्रीय बल नहीं मिल पाता है और वह फिसल जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

प्रश्न 1.
न्यूटन का गति का द्वितीय नियम लिखिए तथा इससे सिद्ध कीजिए कि F = ma; इस सूत्र की सहायता से बल के S.I. मात्रक की परिभाषा दीजिए तथा बल का विमीय सूत्र प्राप्त कीजिए।
उत्तर :
न्यूटन का गति का द्वितीय नियम (Newton’s Second Law of Motion) :
इस नियम के अनुसार, “किसी वस्तु के संवेग परिवर्तन की समय दर उस पर लगाये गये बाह्य बल के अनुक्रमानुपाती होती है और उसी दिशा में होती है जिस दिशा में बल लगाया जाता है।”

यदि m द्रव्यमान की वस्तु पर बल \(\vec{F}\) समयान्तराल ∆t के लिये लगाने पर उसका वेग \(\vec{v}\) से (\(\vec{v}+∆ \vec{v}\)) हो जाये तथा उसके संवेग में परिवर्तन \(\Delta \vec{p}\) हो तब
\(\vec{F} \propto \frac{\overrightarrow{∆ p}}{∆ t}\)
अति सूक्ष्म समयान्तराल (∆t → 0) के लिए \(\frac{\overrightarrow{∆ p}}{∆ t}\), समय t के सापेक्ष \(\vec{p}\) का अवकलन अथवा अवकल गुणांक हो जाता है जिसे \(\frac{d \vec{p}}{d t}\) द्वारा प्रदर्शित करते हैं। अतः
\(\vec{F} \propto \frac{d \vec{p}}{dt}\)
\(\vec{F}=k\frac{d \vec{p}}{dt}\)
जहाँ k = आनुपातिकता स्थिरांक (constant of proportionality) है।
k का मान चयनित मात्रकों की पद्धति पर निर्भर करता है। मात्रकों का चयन इस प्रकार करते हैं कि k = 1
अत: समी० (1) से
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-8
अतः किसी वस्तु पर कार्यरत् बल वस्तु के द्रव्यमान तथा उसमें उत्पन्न त्वरण के गुणनफल के बराबर होता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

प्रश्न 2.
जड़त्व क्या है? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर :
अनुच्छेद 5.4 का अवलोकन कीजिए।
जड़त्व का नियम (Law of Motion) :
जड़त्व (Inertia) :
जड़त्व शब्द की उत्पत्ति जड़ता शब्द से हुई है जिसका अर्थ स्थिरता या अपरिवर्तनीयता है। प्रत्येक वस्तु जिस अवस्था में होती है, उसी अवस्था में रहना चाहती है अर्थात् यदि वह विरामावस्था है तो विरामावस्था में ही रहना चाहती है और यदि गतिशील है तो उसी वेग से चलते रहना चाहती है तथा अपनी उक्त अवस्थाओं में परिवर्तन का विरोध करती है। यही कारण है कि वस्तु की अवस्था परिवर्तित करने के लिए बाह्य असन्तुलित बल की आवश्यकता होती है। वस्तु के इस गुण को गैलीलियो ने ‘जड़त्व’ नाम द्यिया।

अतः, “जड़त्व किसी वस्तु का वह गुण है जिस कारण वह अपनी अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती है।”

किसी वस्तु का द्रव्यमान उसके जड़त्व की माप है। अतः भारी वस्तु अपनी विरामावस्था में परिवर्तन का विरोध, हल्की वस्तु की तुलना में अधिक करती है।

जड़त्व के प्रकार (Kinds of Inertia) –

  1. विराम का जड़त्व (Inertia of Rest) : वस्तु का वह गुण जिसके कारण वह अपनी विरामावस्था में होने वाले परिवर्तन का विरोध करती है, विराम का जड़त्व कहलाता है।
  2. गति का जड़त्व (Inertia of Motion) : तस्तु का वह गुण जिसके कारण सरल रेखा में गतिशील वस्तु अपनी गति में होने वाले परिवर्तन का विरोध करती है, गति का जड़त्व कहलाता है।
  3. दिशा का जड़त्व (Inertia of Direction) : दिशा के जड़्व के कारण कोई वस्तु अपनी वास्तविक दिशा में रहने का प्रयास करती है और दिशा परिवर्तन का विरोध करती है।

प्रश्न 3.
न्यूटन के गति का द्वितीय नियम लिखिए तथा सिद्ध कीजिए कि बल का आवेग संवेग परिवर्तन के बराबर होता है। उदाहरण सहित इसका महत्त्व समझाइये।
उत्तर :
न्यूटन का गति का द्वितीय नियम (Newton’s Second Law of Motion) :
इस नियम के अनुसार, “किसी वस्तु के संवेग परिवर्तन की समय दर उस पर लगाये गये बाह्य बल के अनुक्रमानुपाती होती है और उसी दिशा में होती है जिस दिशा में बल लगाया जाता है।”
यदि m द्रव्यमान की वस्तु पर बल \(\vec{F}\) समयान्तराल ∆t के लिये लगाने पर उसका वेग \(\vec{v}\) से (\(\vec{v}+∆ \vec{v}\)) हो जाये तथा उसके संवेग में परिवर्तन \(\Delta \vec{p}\) हो तब
\(\vec{F} \propto \frac{\overrightarrow{∆ p}}{∆ t}\)
अति सूक्ष्म समयान्तराल (∆t → 0) के लिए \(\frac{\overrightarrow{∆ p}}{∆ t}\), समय t के सापेक्ष \(\vec{p}\) का अवकलन अथवा अवकल गुणांक हो जाता है जिसे \(\frac{d \vec{p}}{d t}\) द्वारा प्रदर्शित करते हैं। अतः
\(\vec{F} \propto \frac{d \vec{p}}{dt}\)
\(\vec{F}=k\frac{d \vec{p}}{dt}\)
जहाँ k = आनुपातिकता स्थिरांक (constant of proportionality) है।
k का मान चयनित मात्रकों की पद्धति पर निर्भर करता है। मात्रकों का चयन इस प्रकार करते हैं कि k = 1
अत: समी० (1) से
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-9
अतः किसी वस्तु पर कार्यरत् बल वस्तु के द्रव्यमान तथा उसमें उत्पन्न त्वरण के गुणनफल के बराबर होता है।

आवेग संवेग प्रमेय (Impulse Momentum Theorem) :
कथन-इस प्रमेय के अनुसार, ” किसी बल का आवेग उस बल के कारण उत्पन्न हुए संवेग परिवर्तन के बराबर होता है।” उप्पत्ति-न्यूटन के गति के द्वितीय नियम से-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-10

प्रश्न 4.
सिद्ध कीजिए कि तीन संयुग्मी बलों \(\vec{F}_1, \vec{F}_2 व \vec{F}_3\) की स्थिति में वस्तु साम्यावस्था में होगी जब \(\vec{F}_1+\vec{F}_2+\vec{F}_3=0\).
उत्तर :
किसी कण की साम्यावस्था (Equilibrium of a particle concurrent forces) ;
संगामी बल (Concurrent Forces) :
“यदि किसी वस्तु पर कार्य करने वाले सभी बलों की क्रिया रेखाएँ एक उभयनिष्ट बिन्दु से गुजरती हैं, तो उन्हें संगामी बल कहते हैं।” ऐसी अवस्था में वस्तु पर परिणामी बल उस पर कार्यरत् सभी बलों के सदिश योग के बराबर होता है और यही परिणामी बल वस्तु के रेखीय त्वरण को निर्धारित करता है। यदि वस्तु पर कार्यरत् बल संगामी नहीं हैं तो वस्तु पर परिणामी बलयुग्म लग सकता है और फलस्वरूप वस्तु घूर्णन गति भी कर सकती है। संगामी बलों के प्रभाव में यदि वस्तु साम्यावस्था में है तो सभी बलों का सदिश योग शून्य होगा। अर्थात्
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-11
या \(\vec{F}_1+\vec{F}_2+\ldots \ldots+\vec{F}_n=0\)

किसी वस्तु पर कार्यरत् बलों की संख्या के.अनुसार सदिशों के संयोजन हेतु उपयुक्त त्रिभुज नियम, समान्तर चतुर्भुज नियम या बहुभुज नियम का प्रयोग करते हुए परिणामी बल के परिमाण एवं दिशा ज्ञात की जा सकती है और तदानुसार वस्तु की गति का निर्धारण किया जा सकता है।

संगामी बलों के प्रभाव में संतुलन की आवश्यक शर्त (Necessary condition for equilibrium under effect of concurrent forces) :
संतुलन का अर्थ है कि वस्तु अपनी यथास्थिति को बनाये रखे। इसकी आवश्यक शर्तें निम्नलिखित हैं-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-12
(i) यदि पिण्ड पर दो संगामी बल कार्य करें तो बलों के संतुलन के लिए दोनों बल परिमाण में समान किन्तु परस्पर विपरीत दिशा में लगने चाहिए।
(ii) यदि बलों की क्रिया रेखाएँ समान नहीं हैं तो बलों की संख्या कम से कम तीन होनी चाहिए।
(iii) तीन संगामी बलों के प्रभाव में संतुलित अवस्था में
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-13

(iv) यदि किसी वस्तु पर लगने वाले N संगामी बल N भुजाओं वाले बहुभुज की भुजाओं द्वारा क्रमागतः रूप से व्यक्त किये जा सकते हैं तो ये बल संतुलन में होते हैं।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

प्रश्न 5.
बल निर्देशक आरेख क्या है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर ;
बल निर्देशक आरेख द्वारा यांत्रिकी में समस्याओं का हल (Solutions of Problems in Mechanics by Force Diagram)
बल निर्देशक आरेख (Force Diagram) :
आमतौर पर यांत्रिकी की किसी प्रारूपी समस्या में बलों की क्रिया के अधीन केवल एक पिण्ड का ही समावेश नहीं होता। अधिकांश प्रकरणों में हम विभिन्न पिण्डों के ऐसे संयोजन पर विचार करते हैं जिनमें पिण्ड परस्पर एक दूसरे पर बल लगाते हैं। इसके अतिरिक्त संयोजन का प्रत्येक पिण्ड गुरुत्वीय बल का भी अनुभव करता है। इस प्रकार की किसी समस्या को हल करने के लिए प्रयास करते समय हमें एक तथ्य को ध्यान रखना आवश्यक है कि हम संयोजन के किसी भी भाग को चुनकर उस पर न्यूटन के गति के नियमों को इस शर्त के साथ लागू कर सकते हैं कि चुने हुए भाग पर संयोजन के शेष भागों द्वारा आरोपित सभी बलों को सम्मिलित करना सुनिश्चित कर लिया गया है। संयोजन के चुने हुए भाग को हम ‘निकाय’ (System) कह सकते हैं तथा संयोजन के शेष भाग को ‘वातावरण’ (environment) कह सकते हैं। अब हमें यांत्रिकी की किसी प्रारूपी समस्या को सुव्यवस्थित ढंग से हल करने के लिए निम्नलिखित चरणों को अपनाना चाहिए-
(i) पिण्डों के संयोजन के विभिन्न भागों, सम्बन्धों आदि को दर्शाने वाला संक्षिप्त योजनाबद्ध आरेख खीचिए।

(ii) संयोजन के किसी भाग को, जिसकी गति के बारे में हमें जानना हो, निकाय के रूप में चुनिए।

(iii) एक पृथक् आरेख खींचिए जिसमें केवल निकाय तथा पिण्डों के संयोजन के शेष भागों (वातावरण) द्वारा निकाय पर आरोपित सभी बलों को सम्मिलित करके दर्शाया गया हो। निकाय पर सभी अन्य साधनों द्वारा आरोपित बलों को भी सम्मिलित कीजिए। परन्तु यह ध्यान रहे कि निकाय द्वारा वातावरण पर आरोपित बलों को इसमें सम्मिलित नही करना है। इस प्रकार के आरेख को ‘बल निर्देशक आरेख’ कहते हैं।

(iv) किसी बल निर्देशक आरेख में बलों से संबन्धित केवल वही सूचनाएँ (बलों के परिमाण तथा दिशाएँ) सम्मिलित कीजिए जो या तो आप को दी गई हैं अथवा जो निर्विवाद् निश्चित हैं। उदाहरण के लिए किसी पतली डोरी में तनाव की दिशा सदैव डोरी की लम्बाई के अनुदिश होती है; गुरुत्वीय बल की दिशा ऊध्र्वाधर नीचे की ओर होती है; अभिलम्ब प्रतिक्रिया बल तल के लम्बवत् होता है, आदि। शेष उन सभी को अज्ञात माना जाना चाहिए जिन्हें गति के नियमों के अनुप्रयोगों द्वारा ज्ञात किया जाना है।

(v) यदि आवश्यक हो तो संयोजन के किसी अन्य भाग को निकाय मानकर उसके लिए भी यही विधि अपनाइये। ऐसा करने के लिए न्यूटन के तृतीय नियम का ध्यान रखना आवश्यक है, अर्थात् यदि निकाय A के बल निर्देशक आरेख में B (वातावरण) के कारण A पर बल को \(\vec{F}\) द्वारा दर्शाया गया है, तो निकाय B के बल निर्देशक में A (वातावरण) के कारण B पर बल \(-\vec{F}\) द्वारा दर्शाया जाना चाहिए। यांत्रिकी की समस्याओं को हल करने में बल निर्देशक आरेख खोंचना सहायक है।

प्रश्न 6.
संवेग संरक्षण का नियम लिखकर इसे प्राप्त कीजिए एवं इस नियम की सहायता से गति का तृतीय नियम निगमित कीजिए।
उत्तर :
संवेग संरक्षण नियम एवं इसके अनुप्रयोग (Law of Conservation of Momentum and its Applications) :
संवेग संरक्षण नियम (Law of Conservation of Momentum) ;
न्यूटन के गति के द्वितीय नियम से किसी विलगित कण पर कार्य करने वाला बल, उसके संवेग परिवर्तन की दर के बराबर होता है, अर्थात्
\(\vec{F}=\frac{d \vec{p}}{d t}\)
यदि पिण्ड या कण पर आरोपित बल अनुपस्थित हो तो-
\(\vec{F}=0 \quad \text { अत: } \quad \frac{d \vec{p}}{d t}=0\)
या \(\vec{p}\) = नियतांक [क्योंकि नियतांक का अवकलन शून्य होता है] आंकिक रूप से p = नियतांक
या \(m \vec{v}\) = नियतांक
अर्थात् “बाह्य बल की अनुपस्थिति में किसी कण का कुल रेखीय संवेग नियत रहता है।’ यही रेखीय संवेग संरक्षण का सिद्धान्त है।

कणों के निकाय के लिए संवेग संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Momentum for System of Particles) :
जब हम कणों के एक निकाय पर विचार करते हैं तो हमें निकाय पर आरोपित बाह्य बलों और निकाय के आन्तरिक बलों में भेद करना होगा। चूँकि आन्तरिक बल बराबर एवं विपरीत बलों के युग्म के रूप में होते हैं (अर्थात् \(\overrightarrow{F_{B A}}=-\overrightarrow{F_{A B}}\) ), अतः आन्तरिक बलों का सदिश योग शून्य होगा और निकाय पर केवल बाह्य आरोपित बलों का ही प्रभाव होगा।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-14
अर्थात् ऐसा निकाय जिस पर कोई बाह्य बल कार्य नहीं कर रहा है या कार्यरत् बाह्य बलों का सदिश योग शून्य है, एक विलगित निकाय (Isolated System) कहलाता है। समीकरण (4) के अनुसार बाह्य बल की अनुपस्थिति में विलगित निकाय का कुल संवेग नियत या संरक्षित रहता है। यही एक विलगित निकाय के लिए संवेग संरक्षण का नियम है।

समीकरण (4) व (5) के अनुसार निकाय कण विशेष का संवेग या वेग परिवर्तित हो सकता है परन्तु बाह्य बल की अनुपस्थिति में निकाय का कुल संवेग नियत रहेगा।

कणों की खोज (Invention of Particles)-संवेग संरक्षण का नियम भौतिकी के मूलभूत नियमों में से एक है। संवेग संरक्षण के सामान्य नियम का अभी तक कोई अपवाद सामने नहीं आया है। वास्तव में जब कभी किसी प्रयोग में संवेग संरक्षण के सामान्य नियम का अतिक्रमण दृष्टि गोचर होता है, तो एक छिपे हुए या अज्ञात कण की खोज प्रारम्भ होती है, जो ऊपरी तौर से ऊर्जा संरक्षण नियम के अतिक्रमण के लिए भी उत्तरदायी होता है। इसी से न्यूट्रिनो, मेसॉन और कई अन्य मूल कणों की खोज सम्भव हो सकी है।

प्रश्न 7.
संगामी बलों से क्या तात्पर्य है? संगामी बलों के संतुलन के लिए आवश्यक शर्त क्या है?
उत्तर :

किसी कण की साम्यावस्था (Equilibrium of a particle concurrent forces) ;
संगामी बल (Concurrent Forces) :
“यदि किसी वस्तु पर कार्य करने वाले सभी बलों की क्रिया रेखाएँ एक उभयनिष्ट बिन्दु से गुजरती हैं, तो उन्हें संगामी बल कहते हैं।” ऐसी अवस्था में वस्तु पर परिणामी बल उस पर कार्यरत् सभी बलों के सदिश योग के बराबर होता है और यही परिणामी बल वस्तु के रेखीय त्वरण को निर्धारित करता है। यदि वस्तु पर कार्यरत् बल संगामी नहीं हैं तो वस्तु पर परिणामी बलयुग्म लग सकता है और फलस्वरूप वस्तु घूर्णन गति भी कर सकती है। संगामी बलों के प्रभाव में यदि वस्तु साम्यावस्था में है तो सभी बलों का सदिश योग शून्य होगा। अर्थात्
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-11
या \(\vec{F}_1+\vec{F}_2+\ldots \ldots+\vec{F}_n=0\)

किसी वस्तु पर कार्यरत् बलों की संख्या के.अनुसार सदिशों के संयोजन हेतु उपयुक्त त्रिभुज नियम, समान्तर चतुर्भुज नियम या बहुभुज नियम का प्रयोग करते हुए परिणामी बल के परिमाण एवं दिशा ज्ञात की जा सकती है और तदानुसार वस्तु की गति का निर्धारण किया जा सकता है।

संगामी बलों के प्रभाव में संतुलन की आवश्यक शर्त (Necessary condition for equilibrium under effect of concurrent forces) :
संतुलन का अर्थ है कि वस्तु अपनी यथास्थिति को बनाये रखे। इसकी आवश्यक शर्तें निम्नलिखित हैं-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-12
(i) यदि पिण्ड पर दो संगामी बल कार्य करें तो बलों के संतुलन के लिए दोनों बल परिमाण में समान किन्तु परस्पर विपरीत दिशा में लगने चाहिए।
(ii) यदि बलों की क्रिया रेखाएँ समान नहीं हैं तो बलों की संख्या कम से कम तीन होनी चाहिए।
(iii) तीन संगामी बलों के प्रभाव में संतुलित अवस्था में
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-15

(iv) यदि किसी वस्तु पर लगने वाले N संगामी बल N भुजाओं वाले बहुभुज की भुजाओं द्वारा क्रमागतः रूप से व्यक्त किये जा सकते हैं तो ये बल संतुलन में होते हैं।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

प्रश्न 8.
घर्षण से आप क्या समझते हैं? सीमान्त घर्षण, गतिक घर्षण तथा सर्पी घर्षण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
घर्षण (Friction) :
एक क्षैतिज मेज पर रखे m द्रव्यमान के पिण्ड पर लगने वाले बलों पर विचार करते हैं। जब तक कोई बाहरी बल पिण्ड पर नहीं लगाया जाता है तब तक पिण्ड विरामावस्था में रहता है और पिण्ड का भार \(\vec{W}=m \vec{g}\) व मेज द्वारा पिण्ड पर आरोपित अभिलम्ब बल परस्पर विपरीत दिशा में होने के कारण एक दूसरे को निरस्त कर देते हैं।

अब माना पिण्ड पर कोई बाह्य बल \(\vec{F}\) क्षैतिजत: आरोपित किया जाता है जो परिमाण में इतना कम है कि पिण्ड में कोई गति उत्पन्न नहीं कर पाता है। प्रश्न यह उठता है कि बाह्य बल \(\vec{F}\) परिमाण में भले ही कितना कम हो, लेकिन पिण्ड में इसके द्वारा त्वरण (\(\vec{a}=\frac{\vec{F}}{m}\)) उत्पन्न होना चाहिए

और वस्तु को गतिशील होना चाहिए था; परन्तु ऐसा नहीं होता है। इसका अर्थ यह है कि \(\vec{F}\) के विपरीत दिशा में निश्चित रूप से एक विरोधी बल उत्पन्न होता है जो \(\vec{F}\) का विरोध करता है और पिण्ड विरामावस्था में बना रहता है। यह विरोधी बल पिण्ड एवं मेज के सम्पर्क पृष्ठ के अनुदिश लगता है। इसी बल को घर्षण बल (Force of Friction) कहते हैं। इस बल को fs से व्यक्त करते हैं। इसे स्थैतिक घर्षण (Static Friction) कहते हैं। इस प्रकार,
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-16
“जब कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु की सतह पर फिसलती है या फिसलने का प्रयास करती है तो स्पर्शी तलों के मध्य एक विरोधी बल उत्पन्न हो जाता है जो गति के विपरीत दिशा में ( अर्थात् बाह्य बल की विपरीत दिशा में ) गति का विरोध करता है। इसी विरोधी बल को घर्षण बल कहते हैं।”

यह ध्यान देने योग्य है कि स्थैतिक घर्षण का तब तक कोई अस्तित्व नहीं है जब तक कोई बाह्य बल नहीं लगाया जाता है। स्थैतिक घर्षण बल स्वत: समायोजित होने वाला बल है अर्थात् बाह्य बल को बढ़ाने पर यह बढ़ता है और एक सीमा तक बढ़ने के बाद फिर नहीं बढ़ता है। इसी अधिकतम स्थैतिक घर्षण बल को सीमान्त घर्षण (Limiting Friction) कहते हैं। बाह्य बल का मान इससे अधिक करने पर पिण्ड गति आरम्भ कर देता है।

प्रश्न 9.
घर्षण से क्या हानियाँ हैं? घर्षण कम करने की विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर ;

घर्षण (Friction) :
एक क्षैतिज मेज पर रखे m द्रव्यमान के पिण्ड पर लगने वाले बलों पर विचार करते हैं। जब तक कोई बाहरी बल पिण्ड पर नहीं लगाया जाता है तब तक पिण्ड विरामावस्था में रहता है और पिण्ड का भार \(\vec{W}=m \vec{g}\) व मेज द्वारा पिण्ड पर आरोपित अभिलम्ब बल परस्पर विपरीत दिशा में होने के कारण एक दूसरे को निरस्त कर देते हैं।

अब माना पिण्ड पर कोई बाह्य बल \(\vec{F}\) क्षैतिजत: आरोपित किया जाता है जो परिमाण में इतना कम है कि पिण्ड में कोई गति उत्पन्न नहीं कर पाता है। प्रश्न यह उठता है कि बाह्य बल \(\vec{F}\) परिमाण में भले ही कितना कम हो, लेकिन पिण्ड में इसके द्वारा त्वरण (\(\vec{a}=\frac{\vec{F}}{m}\)) उत्पन्न होना चाहिए

और वस्तु को गतिशील होना चाहिए था; परन्तु ऐसा नहीं होता है। इसका अर्थ यह है कि \(\vec{F}\) के विपरीत दिशा में निश्चित रूप से एक विरोधी बल उत्पन्न होता है जो \(\vec{F}\) का विरोध करता है और पिण्ड विरामावस्था में बना रहता है। यह विरोधी बल पिण्ड एवं मेज के सम्पर्क पृष्ठ के अनुदिश लगता है। इसी बल को घर्षण बल (Force of Friction) कहते हैं। इस बल को fs से व्यक्त करते हैं। इसे स्थैतिक घर्षण (Static Friction) कहते हैं। इस प्रकार,
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-17
“जब कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु की सतह पर फिसलती है या फिसलने का प्रयास करती है तो स्पर्शी तलों के मध्य एक विरोधी बल उत्पन्न हो जाता है जो गति के विपरीत दिशा में ( अर्थात् बाह्य बल की विपरीत दिशा में ) गति का विरोध करता है। इसी विरोधी बल को घर्षण बल कहते हैं।”

यह ध्यान देने योग्य है कि स्थैतिक घर्षण का तब तक कोई अस्तित्व नहीं है जब तक कोई बाह्य बल नहीं लगाया जाता है। स्थैतिक घर्षण बल स्वत: समायोजित होने वाला बल है अर्थात् बाह्य बल को बढ़ाने पर यह बढ़ता है और एक सीमा तक बढ़ने के बाद फिर नहीं बढ़ता है। इसी अधिकतम स्थैतिक घर्षण बल को सीमान्त घर्षण (Limiting Friction) कहते हैं। बाह्य बल का मान इससे अधिक करने पर पिण्ड गति आरम्भ कर देता है।

घर्षण एक बुराई (Friction as an Evil) :

  • मशीनों में टूट फूट (wear and tear) का कारण घर्षण ही है।
  • घर्षण का प्रतिकार करने में ही शक्ति का बड़ा भाग व्यर्थ चला जाता है जिससे मशीनों की दक्षता काफी कम हो जाती है।
  • घर्षण के कारण ही मशीन के घूमने वाले हिस्सों में ऊष्मा उत्पन्न होती है जिससे वे गर्म हो जाती हैं।

घर्षण को कम करने की विधियाँ (Methods of Reducing Friction) :
1. पॉलिश द्वारा (By Polishing) :दो पृष्ठों के मध्य घर्षण को कम करने के लिए उन्हें पॉलिश किया जाता है। घड़ियों में प्रयुक्त ज्वेल बियरिंग (jewel-bearing) एवं तुला में प्रयुक्त छुर-धारों (knife-edges) पर उच्च कोटि की पॉलिश की जाती है ताकि घर्षण कम हो जाये।

2. बाल बियरिंग (Ball-Bearing) : लोटनी घर्षण फिसलन घर्षण से कम होता है। इसीलिए घूर्णन करने वाली मशीनों में शैफ्ट को बाल बियरिंग चित्र 5.22 पर जड़ (fix) दिया जाता है ताकि घर्षण को काफी कम किया जा सके। बाइसिकिल में फ्री-हील, मोटर कार की एक्सिल, मोटर एवं डायनमों की शैफ्ट आदि में बाल बियरिंग का प्रयोग किया जाता है।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-18

3. स्नेहक (Lubricants) : स्नेहक ऐसा पदार्थ (ठोस या द्रव) होता है, जो सम्पर्क वाली दोनों सतहों के मध्य एक पतली पर्त बना लेता है। यह सम्पर्क वाली सतहों के गड्ढ़ों (depressions) को भी भर देता है और घर्षण को काफी कम कर देता है। हल्की मशीनों में कम श्यानता का पतला तेल प्रयोग किया जाता है। भारी और तेज चलने वाली मशीनों में गाढ़ा तेल (thick oil) या ठोस स्नेहक (grease) प्रयोग किये जाते हैं। दो सतहों के मध्य स्नेहक के प्रयोग से घर्षण कम किया जाता है।
कभी-कभी ठोस पॉउडर के रूप में स्नेहक का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, फरम बोर्ड पर पॉउडर छिड़क देते हैं, जिससे बोर्ड व गोटियों के बीच घर्षण कम हो जाता है।

4. सुप्रवाहिता (Streamlining) : तीव्र गति वाले वाहनों जैसे-वायुयान, जलयान, जेटयान आदि को सामने की ओर विशेष आकार (नुकीला) का बनाना सुप्रवाहिता कहलाता है। इससे तरल घर्षण (अर्थात् वायु का घर्षण वाहन पर) घट जाता है।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

प्रश्न 10.
जड़त्वीय एवं अजड़त्वीय निर्देश तन्त्र की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
जड़त्वीय एवं अजड़त्वीय निर्देश तन्त्र ( प्रारम्भिक अवधारणा) (Inertial and Non-inertial Frames of References) :
जड़त्वीय निर्देश तन्त्र (Inertial Frame of Reference ) ;
निर्देश तंत्रों की परिकल्पना गति की विश्लेषणात्मक व्याख्या के लिए की जाती है। यदि हम एक निर्देशांक पद्धति (coordinate system) की कल्पना करें जो किसी दृढ़ पिण्ड से सम्बद्ध है तथा इस निर्देशांक पद्धति के सापेक्ष किसी कण की स्थिति का मापन करते हुए इसकी गति का अध्ययन करें तो इस निर्देशांक पद्धति को निर्देश तन्त्र कहा जाता है। सामान्यतः प्रेक्षक की स्थिति निर्देश तन्त्र के मूल बिन्दु पर ली जाती हैं किन्तु यह आवयश्क नहीं है। सामान्यतः प्रेक्षक उस निर्देश तन्त्र को काम में लेता है जो उसके सापेक्ष स्थिर होता है। कार्तीय निर्देशांक पद्धति (cartesian coordinate system) को सरलतम निर्देश तन्त्र के रूप में लिया जाता है। इस प्रकार के निर्देश तन्त्र त्रिविमीय आकाश (three dimensional space) में परस्पर लम्बवत् तीन सरल रेखीय अक्षों X, Y व 2 से मिलकर बनते हैं और ये अक्ष मूलबिन्दु पर मिलती हैं।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-19
इस प्रकार के तन्त्र से किसी क्षण पर स्थिति तीन निर्देशांकों (x. 31.2) द्वारा व्यक्त की जाती है। यद्यपि कार्तीय निर्देशांक पद्धति, दक्षिणावर्ती (right handed) (चित्र) व वामावर्ती (left handed) (चित्र b) दो प्रकार की होती है परन्तु अधिकांशतः दक्षिणावर्ती कार्तीय निर्देशांक पद्धति का ही प्रयोग निर्देश तन्त्र के रूप में किया जाता है।

ऐसे निर्देश तन्त्र जिनमें न्यूटन के गति सम्बन्धी प्रथम और द्वितीय नियम वैध होते हैं, जड़त्वीय निर्देश तन्त्र कहलाते हैं। इस प्रकार के तन्त्र में यदि किसी कण पर कोई बाह्य बल कार्यरत् नहीं है तो यह कण या तो स्थिर रहता है अथवा एक समान वेग से सरल रेखीय गति करता है (जड़त्व का नियम)। अत: इन्हें जगत्वीय निर्देश तन्त्र कहा जाता है। इस प्रकार के तन्त्रों को गैलीलियन तन्त्र अथवा न्यूटोनियन निर्देश तन्त्र के नाम से भी जाना जाता है।

गणितीय विश्लेषण से यह सिद्ध किया जा सकता है कि जड़त्वीय निर्देश तन्त्र या तो स्थिर होते हैं अथवा नियत वेग से गतिमान होते हैं। यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि किसी जड़त्वीय निर्देश तन्त्र के सापेक्ष नियत वेग से गतिमान अन्य कोई तन्त्र भी जड़त्वीय ही होगा।

जड़त्वीय निर्देश तन्त्र के लिए न्यूटन द्वारा निरपेक्ष आकाश (Absolute space) की कल्पना की गई। न्यूटन ने यह माना कि निरपेक्ष आकाश एक ऐसा जड़त्वीय तंत्र है जो स्वयं निरपेक्ष विरामावस्था में है, अतः इसके सापेक्ष सभी प्रकार की गतियों का अध्ययन किया जा सकता है। परन्तु आपेक्षिकता के विशिष्ट सिद्धान्त के आधार पर यह कल्पना यथार्थ की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है। अनुभवों के आधार पर यह ज्ञात है कि स्थिर तारे (fixed stars) निरपेक्ष आकाश के सापेक्ष लगभग स्थिर होते हैं। अतः इन तारों से सम्बद्ध निर्देश तन्त्र सर्वोत्तम उपलब्ध जड़त्वीय निर्देश तन्त्र है।

अजड़त्वीय निर्देश तन्त्र : वे निर्देश तन्त्र जिनमें न्यूटन के गति के प्रथम व द्वितीय नियम वैध नहीं रहते हैं, अजड़त्वीय निर्देश तन्त्र कहलाते हैं। इन तन्त्रों में बल की अनुपस्थिति में भी किसी कण की गति त्वरित प्रतीत होती है। सभी त्वरित तन्त्र एवं घूर्णन करते हुए तन्त्र अजड़त्वीय होते हैं।

क्या पृथ्वी जड़त्वीय निर्देश तन्त्र है? – पृथ्वी न केवल अपनी स्वयं की अक्ष पर अपितु सूर्य के चारों ओर भी घूर्णन करती है अतः पृथ्वी सम्बद्ध जड़त्वीय निर्देश तन्त्र वास्तव में जड़त्वीय निर्देश तन्त्र नहीं हैं। पृथ्वी की स्वयं की घूर्णन गति के कारण इसकी सतह पर स्थित कोई स्थिर कण इसके केन्द्र की ओर अभिकेन्द्रीय बल का अनुभव करता है।
उदाहरणार्थ : भूमध्य रेखा पर इस अभिकेन्द्रीय त्वरण का मान-
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-20
सामान्य यांत्रिकी की समस्याओं में इस त्वरण को यदि न्यून मानकर छोड़ दें, तो पृथ्वी को जड़त्वीय निर्देश तन्त्र माना जा सकता है। परन्तु कुछ समस्याओं में इस त्वरण के प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं। वास्तव में पृथ्वी के अपनी अक्ष पर घूमने तथा सूर्य के चारों ओर परिक्रमण से सम्बन्धित त्वरणों के संशोधन के पश्चात् ही पृथ्वी को व्यावहारिक निर्देश तन्त्र माना जा सकता है। हालांकि पृथ्वी को जड़त्वीय निर्देश तन्त्र मानकर ही हम भौतिकी की समस्याओं को हल करते हैं।

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

आंकिक प्रश्न (Numerical Questions)

न्यूटन के गति के नियमों, आवेग एवं संवेग पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
एक मीनार की दीवार पर जल के फब्बारे द्वारा लगाया जाने वाला बल ज्ञात कीजिए, जबकि पाइप का क्षेत्रफल 10-2 m-2 तथा पानी का वेग 15 ms-1 है। मान लीजिए कि जल दीवार से टकराने के बाद वापस नही लौटता है। (g = 10 ms-2)
उत्तर :
250 N

प्रश्न 2.
विरामावस्था में पड़ा एक बम तीन समान टुकड़ों में विभक्त हो जाता है दो टुकड़े समकोण पर क्रमशः 9 ms-1 व 12 ms-1 के वेग से गति करते है, तो तीसरे टुकड़े का वेग ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
15 ms-1

प्रश्न 3.
500 g का हथौड़ा 6 ms-1 के वेग से एक कील के सिरे पर टकराकर उस कील को 5 cm अन्दर धकेल देता है। यदि कील का द्रव्यमान उपेक्षणीय हो तो ज्ञात कीजिए-
(a) टक्कर के पश्चात त्वरण;
(b) टक्कर में लगा समय;
(c) आवेग का मान।
उत्तर :
(a) 360 ms-2;
(b) \(\frac{1}{60}\) s;
(c) 3N.s.

प्रश्न 4.
एक वस्तु का द्रव्यमान 2 kg तथा प्रारम्भिक वेग 5 ms-1 है, वस्तु की गति की दिशा में एक बल 4 s के लिए कार्य करता है। बल-समय ग्राफ संलग्न चित्र में प्रदर्शित है। वस्तु के आवेग तथा वेग की गणना कीजिए।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-21
उत्तर :
8.5 N.s. ; 9.25 ms-1

परिवर्ती द्रव्यमान पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 5.
500 kg द्रव्यमान का एक वाहन 6 ms-1 के वेग से गति कर रहा है। इस पर 10kg min-1 की दर से रेत डाली जा रही है। वाहन को नियत वेग से गतिशील रखने के लिए आवश्यक बल ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
N

प्रश्न 6.
एक रॉकेट का ईंधन 100 kg.s-1 की दर से जल रहा है। निष्कासित गैसें 4.5 × 104 ms-1 के वेग से निकलती हैं। रॉकेट पर उछाल बल ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
4.5 × 106 N

HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम

प्रश्न 7.
एक क्षैतिज घर्षण रहित सड़क पर खड़ी 2000kg की कार के ऊपर एक गन रखी गयी है। किसी समय गन द्वारा 10g की गोली कार के सापेक्ष 500 ms-1 के वेग से छोड़ी जाती है। प्रति सेकण्ड छोड़ी गयी गोलियों की संख्या 10 है, तो निकाय पर आरोपित औसत प्रणोद ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
50N

घर्षण पर आधरित प्रश्न

प्रश्न 8.
2 kg का एक गुटका क्षैतिज से 60° के कोण पर झुके हुए एक आनत तल पर रखा है गुटके एवं तल के बीच घर्षण गुणांक 0.7 है गुटके पर लगने वाला घर्षण बल ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
6.86N

प्रश्न 9.
10 ms-1 की चाल से सड़क पर लुढ़कता हुआ एक पिण्ड 50m दूरी तय करके विरामावस्था में आ जाता है। घर्षण गुणांक ज्ञात कीजिए। (g = 10 ms-2)
उत्तर :
0.1

प्रश्न 10.
एक मोटर कार सीधी क्षैतिज सड़क पर 1 चाल से चल रही है। यदि सड़क तथा टायरों के बीच स्वैतिक घर्षण गुणांक (4) हो, तो वह कम से कम दूरी क्या है जिसमें मोटर कार को रोका जा सकता है?
उत्तर :
\(\frac{u^2}{2 \mu_s \cdot g}\)

प्रश्न 11.
एक व्यक्ति जिसका द्रव्यमान 80kg है, एक खम्भे से नीचे फिसलता है। घर्षण बल 720 N पर नियत है। व्यक्ति का त्वरण ज्ञात कीजिए। (g = 10ms-2)
उत्तर :
1.0 ms-2

प्रश्न 12.
1200g द्रव्यमान का बक्सा क्षैतिज धरातल पर 12 g भार के बल से खींचा जाता है। घर्षण गुणांक 0.2 है सक्से में उत्पन्न त्वरण कितना होगा?
उत्तर :
7.84 ms-2

प्रश्न 13.
L लम्बाई की एक चेन अशंत मेज पर पड़ी है तथा अशंतः मेज के किनारे से लटकी है। यदि चेन तथा मेज के मध्य स्थैतिक घर्षण गुणक µs हो तो चेन कितनी अधिकतम लटकायी जा सकती है, जिससे कि मेज पर पड़ा चेन का भाग न खिसके?
उत्तर :
\(l=\frac{\mu_s \cdot L}{1+\mu_s}\)

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प्रश्न 14.
एक नत तल जिसकी लम्बाई 13 m तथा ऊँचाई 5m है और µ = \(\frac{1}{3}\) है। किस प्रारंभिक वेग से वस्तु प्रक्षेपित की जानी चाहिए ताकि वस्तु तल के उच्चतम बिन्दु पर विरामावस्था में आ जाये ?
उत्तर :
13.28 ms-1

प्रश्न 15.
धातु का बना एक ब्लॉक धातु से बनी नत तल की सतह जो क्षैतिज के साथ 30° का कोण बनाती है, पर रखा हुआ है। यदि ब्लॉक का द्रव्यमान 0.5 kg और घर्षण गुणांक 0.2 है तो (i) वस्तु को फिसलने से रोकने के लिए आवश्यक बल क्या होगा ? (ii) सतह पर ऊपर की ओर गति कराने के लिए आवश्यक बल क्या होगा ? (iii) ऊपर की ओर 20 cms-2 त्वरण से गति के लिए आवश्यक बल क्या होगा?
उत्तर :
(i) 1.6N
(ii) 3.299 N
(iii) 3.399 N

वृत्तीय गति पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 16.
0.10 kg द्रव्यमान का पिण्ड 1.0m व्यास के वृत्तीय पथ पर 31.48 में 10 चक्कर की दर से घूम रहा है। पिण्ड पर लगने वाले बल की गणना कीजिए।
उत्तर :
0.2N

प्रश्न 17.
वह अधिकतम वेग ज्ञात कीजिए जिससे एक रेलगाड़ी 100 m त्रिज्या वाले वृत्ताकार पथ पर चलाई जा सकती है। पटरियों का झुकाव 11.31° है। (tan 11.31° = 0.2, g = 10ms-2)
उत्तर :
14 ms-1

प्रश्न 18.
एक साइकिल सवार जिसका द्रव्यमान 100 kg है, 100 m त्रिज्या के वृत्तीय मोड़ को 10 ms की चाल से पार करना चाहता है। यदि साइकिल के टायरों व सड़क के बीच घर्षण गुणांक 11 0.6 हो, तो क्या सवार मोड़ को पार कर लेगा? (g = 10ms-2)
उत्तर :
हाँ

संगामी बलों पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 19.
2 किग्रा भार की एक वस्तु को संलग्न चित्र की भाँति लटकाया गया है। क्षैतिज डोरी में तनाव T1 (किग्रा भार में) ज्ञात कीजिए।
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-22
उत्तर :
2√3 किग्रा भार

प्रश्न 20.
M द्रव्यमान को किसी अवितान्य डोरी से संलग्न चित्र की भाँति लटकाते हैं। क्षैतिज डोरी में तनाव क्या होगा?
HBSE 11th Class Physics Important Questions Chapter 5 गति के नियम-23
उत्तर :
√3 Mg

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. ठंडी जलवायु वाले स्तनधारियों के कान व पाद प्रायः छोटे होते हैं ताकि उष्मा की हानि कम से कम होती है, यह किसका नियम है?
(अ) ऐलन का नियम
(ब) बेलन का नियम
(स) हेलन का नियम
(द) डेलन का नियम
उत्तर:
(अ) ऐलन का नियम

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ

2. तुंगता बीमारी का लक्षण है-
(अ) मिचली आना
(ब) थकान आना
(स) हृदय स्पंदन में वृद्धि
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

3. समष्टि का दूसरा विशिष्ट गुण है-
(अ) लिंग अनुपात
(ब) जन्म दर
(स) मृत्यु दर
(द) यूरीथर्मल
उत्तर:
(अ) लिंग अनुपात

4. ध्रुवीय समुद्रों में सील जैसे जलीय स्तनधारियों में उनकी त्वचा के नीचे वसा (तिमिवसा/बलबर) की मोटी परत होती है। इसका क्या कार्य है?
(अ) उष्माशोषी
(ब) उष्मारोध (इंसुलेटर)
(स) अस्टिवेशन
(द) डॉरमेसी
उत्तर:
(ब) उष्मारोध (इंसुलेटर)

5. नागफनी (ओपंशिया) का कौनसा भाग प्रकाश संश्लेषण का प्रकार्य करता है?
(अ) चपटा तना
(ब) पत्ती
(स) पुष्प
(द) कांटों द्वारा
उत्तर:
(अ) चपटा तना

6. डायापॉज (Diapause) की परिघटना सम्बन्धित है-
(अ) निम्न ताप के प्रति अनुकूलन
(ब) उच्च ताप के प्रति अनुकूलन
(स) विषम ताप के प्रति अनुकूलन
(द) रंग प्रतिरूप
उत्तर:
(अ) निम्न ताप के प्रति अनुकूलन

7. ‘स्पर्धी” अपवर्जन नियम (Competitive exclusion principle) को देने वाले थे-
(अ) प्रो. रामदेव मिश्र
(स) ऐलन
(ब) गॉसे
(द) स्वामीनाथन
उत्तर:
(ब) गॉसे

8. चारघातांकी वृद्धि के अन्तर्गत जब ग्राफ बनाया जाता है तो यह किस प्रकार का बनता है?
(अ) S-आकार का
(ब) J-आकार का
(स) L-आकार का
(द) M-आकार का
उत्तर:
(ब) J-आकार का

9. शीतनिष्क्रियता (hibernation) ग्रीष्मनिष्क्रियता (aestivation) व उपरति (diapause) किससे सम्बन्धित है?
(अ) प्रवास करने से
(ब) समष्टि से
(स) अनुकूलन से
(द) नियमन से
उत्तर:
(स) अनुकूलन से

10. पृथ्वी की सतह के स्वरूप और व्यवहार से सम्बन्धित कारक कहलाता है-
(अ) मृदीय
(ब) स्थलाकृतिक
(स) जलवायवीय
(द) जैविक
उत्तर:
(ब) स्थलाकृतिक

11. निम्न तापक्रम पर पौधे मर जाते हैं क्योंकि-
(अ) धानीयुक्त जीवद्रव्य (Vacuolated Protoplasm) से जल निकल जाता है और पौधे सूख जाते हैं
(ब) बर्फ के यांत्रिक दबाव (Mechanical Pressure) के कारण कोशिकाएँ फट जाती हैं
(स) कोशिकीय प्रोटीनों का अवक्षेपण हो जाता है
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

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12. पादप वृद्धि के लिए सबसे उपयुक्त है-
(अ) बलुई मृदा
(ब) दोमट मृदा
(स) मृण्मय मृदा
(द) बजरी
उत्तर:
(ब) दोमट मृदा

13. निम्नलिखित में से कौनसा कारक प्रथमतः किसी स्थान की वनस्पति को निर्धारित करता है?
(अ) जलवायवीय
(ब) स्थलाकृतिक
(स) जैविक
(द) मृदीय
उत्तर:
(अ) जलवायवीय

14. समष्टि घनत्व बढ़ता है-
(अ) तीव्र मृत्युदर से
(ब) स्वदेश त्याग से
(स) देशान्तरवास
(द) उपरोक्त किसी से नहीं
उत्तर:
(स) देशान्तरवास

15. जलीय तल में सबसे नीचे का स्तर है-
(अ) एपिलिम्निओन (Epilimnion)
(ब) थर्मोक्लीन (Thermocline)
(स) हाइपोलिम्निओन (Hypolimnion)
(द) मीजोलिम्निओन (Mesolimnion)
उत्तर:
(स) हाइपोलिम्निओन (Hypolimnion)

16. प्राणी जो तापक्रम की वृहद परास को सहन कर सकते हैं, कहते हैं-
(अ) यूरीथर्मल (Eurythermal)
(ब) स्टीनोथर्मल (Stenothermal)
(स) पेरीथर्मल (Perithermal)
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) यूरीथर्मल (Eurythermal)

17. निम्न में से एक्टोथर्मिक प्राणी होते हैं-
(अ) शीतरूधिरधारी प्राणी (Poikilothermic animals)
(ब) गर्मरुधिर प्राणी (Homeothermic animals)
(स) विषमजातीय प्राणी (Heterothermic animals)
(द) (ब) व (स) दोनों
उत्तर:
(अ) शीतरूधिरधारी प्राणी (Poikilothermic animals)

18. भू-आकृतिक या स्थलाकृतिक (topographic) कारक है-
(अ) ऊँचाई, वर्षा व वायु की आर्द्रता
(ब) ढलानों की प्रवणता, वर्षा व ऊँचाई
(स) वर्षा, प्रकाश व वायुमण्डल का तापक्रम
(द) ढलानों की प्रवणता, ऊँचाई व घाटियाँ
उत्तर:
(द) ढलानों की प्रवणता, ऊँचाई व घाटियाँ

19. जैविक कारक के अन्तर्गत विभिन्न जातियों के मध्य वह सहयोग जिसमें एक को लाभ परन्तु हानि दोनों में से किसी को नहीं होगी-
(अ) प्राक्-सहयोग
(ब) सहोपकारिता
(स) सहभोजिता
(द) परजीविता
उत्तर:
(ब) सहोपकारिता

20. परजीविता और परभक्षण में होता है-
(अ) दोनों जातियों को लाभ
(ब) दोनों जातियों को हानि
(स) एक जाति को लाभ व दूसरी जाति को हानि
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) एक जाति को लाभ व दूसरी जाति को हानि

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ

21. जैविक कारक में जब दोनों सहयोगी जातियाँ लाभान्वित होती हैं तो इस प्रकार के सम्बन्ध को कहते हैं-
(अ) प्राक्-सहयोग
(ब) सहोपकारिता
(स) सहयोजिता
(द) परजीविता
उत्तर:
(ब) सहोपकारिता

22. मृदा में उपस्थित अपक्षयित होते कार्बनिक पदार्थों को कहते हैं-
(अ) ह्यूमस
(ब) ह्यूमिक-सम्मिश्र
(स) डफ
(द) करकट
उत्तर:
(अ) ह्यूमस

23. अजैविक कारकों के प्रति अनुक्रियाओं के अन्तर्गत नियमन (regulate) करने वाले प्राणी हैं-
(अ) सभी पक्षी
(ब) स्तनधारी
(स) कुछ निम्न कशेरुकी (Vertebrates) व कुछ अकशेरूकी जातियाँ
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

24. राजस्थान के केवलादेव राप्र्रीय उद्यान में प्रवासी पक्षी कहाँ से आते हैं?
(अ) आस्ट्रेलिया
(ब) नाइजीरिया
(स) साइबेरिया
(द) इथोपिया
उत्तर:
(स) साइबेरिया

25. मरूद्भिदी प्रवृत्तियाँ तथा सजीवप्रजकता किन पादपों में पाई जाती है?
(अ) मरूद्भिदों में
(ब) अम्लोद्भिदों में
(स) लवणमृदोद्भिदों में
(द) दरारोद्धिभों में
उत्तर:
(स) लवणमृदोद्भिदों में

26. एक जीव वैज्ञानिक ने खलिहान में चूहों की समष्टि का अध्ययन किया। उसने पाया कि औसत जन्म दर 250 है, औसत मृत्यु दर 240 है, अप्रवासन दर 20 है और उत्प्रवासन दर 30 है। समएि की शुद्ध वृद्धि कितनी है ?
(अ) 10
(ब) 15
(स) 05
(द) शून्य
उत्तर:
(द) शून्य

27. यदि ‘+’ चिह्न को लाभदायी परस्पर क्रिया के लिए,’-‘ चिन्द को हानिकारक के लिए और ‘O’ चिह्न को उदासीन परस्पर क्रिया के लिए दिया जाता है, तो ‘+’ ‘-‘ द्वारा प्रदर्शित समष्टि परस्पर क्रिया किसे संदर्भित करती है?
(अ) सहयोजिता
(ब) परजीविता
(स) सहपरोपकारिता
(द) अंतरजातीय परजीविता
उत्तर:
(ब) परजीविता

28. ऑफ्रिस (Ophrys) नामक भूमध्य सागरीय मेडिटेरिनियन आर्मिड की एक जाति परागण कराने के लिए किसका सहारा लेती है-
(अ) लैंगिक कपट
(ब) अलैंगिक कपट
(स) कायिक कपट
(द) असूत्री कपट
उत्तर:
(अ) लैंगिक कपट

29. किसके पुष्प के साथ मक्षिका कूट मैथुन (Pseudo Copulates) करती है?
(अ) ऑंक्रिस आर्मिड
(ब) सरसों
(स) एल्थेरोजिया
(द) अंजीर
उत्तर:
(अ) ऑंक्रिस आर्मिड

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30. आमडा (Calotropis) में पाये जाने वाला विषैला पदार्थ होता है-
(अ) ग्लाइकोसाइड
(ब) निकोटीन
(स) कैफीन
(द) क्वीनीन
उत्तर:
(अ) ग्लाइकोसाइड

31. नीचे दिये जा रहे चित्र में जीवधारियों की अजैविक कारकों के प्रति अनुक्रिया का एक आरेखीय निरूपण दिया गया है। इसमें रेखायें (i), (ii) तथा (iii) क्रमशः किनके प्रतिदर्श हैं-
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 1

(i)(ii)(iii)
(अ) नियामकआंशिक नियामकसंरूपक
(ब) आंशिक नियामकनियामकसंरूपक
(स) नियामकसंरूपकआंशिक नियामक
(द) संरूपकनियामकआंशिक नियामक

उत्तर:

(स) नियामकसंरूपकआंशिक नियामक

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
सहोपकारिता व सहभोजिता में अंतर बताइये।
उत्तर:
सहोपकारिता में संपर्क में रहने वाले जीवों को आपस में लाभ होता है जबकि सहभोजिता में केवल एक जीव को ही लाभ तथा दूसरे को न लाभ न हानि होती है।

प्रश्न 2.
ऐलन का नियम क्या बताता है?
उत्तर:
ठंडी जलवायु वाले स्तनधारियों के कान व पाद प्रायः छोटे होते हैं ताकि ऊष्मा की हानि कम से कम होती है।

प्रश्न 3.
छोटे आकार के गुंजन पक्षियों के लिये ध्रुवीय प्रदेश एक उपयुक्त आवास क्यों नहीं है?
उत्तर:
गुंजन पक्षी ध्रुवीय प्रदेश की सर्दी को सहन नहीं कर पाने के कारण यह आवास इनके उपयुक्त नहीं होता है।

प्रश्न 4.
प्रकृति में परभक्षण द्वारा निभायी जाने वाली कोई दो महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ बताइये।
उत्तर:
परभक्षण द्वारा भक्षों की संख्या को नियंत्रित करना तथा खाद्य श्रृंखला का क्रियान्वयन करना है।

प्रश्न 5.
किसी जीव के पारिस्थितिक निकेत का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जैवीय पर्यावरण में प्राणी का स्थान तथा पारितंत्र में इसकी भूमिका को पारिस्थितिकी निकेत कहते हैं।

प्रश्न 6.
कीट पीड़कों (pest/ insect) के प्रबंध के लिये जैव- नियंत्रण विधि के पीछे क्या पारिस्थितिक सिद्धांत है ?
उत्तर:
कीट पीड़कों को उनके शिकारियों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रश्न 7.
शरीर की ऊष्मा हानि को कम करने के अनुकूलन का उदाहरण दें।
उत्तर:
ध्रुवीय समुद्रों में सील जैसे जलीय स्तनधारियों में उनकी त्वचा के नीचे बसा की मोटी परत होती है जो ऊष्मारोधी (insulator) का कार्य करती है व शरीर की ऊष्मा हानि को कम करती है।

प्रश्न 8.
प्राणियों में प्रवास क्रिया का उदाहरण दीजिये, यह क्यों होता है?
उत्तर:
प्रत्येक शीत ऋतु में साइबेरिया व अन्य अधिक ठण्डे उत्तरी क्षेत्रों से आने वाले प्रवासी पक्षियों का तांता राजस्थान स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर में लगा रहता है। अनुकूलता आते ही ये पक्षी वापस लौट जाते हैं। प्रतिकूलता से बचने के लिये ये पक्षी वहाँ से यहाँ आते हैं। इसे प्रवास करना कहते हैं।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँb

प्रश्न 9.
पृथुलवणी व तनुलवणी क्या होते हैं?
उत्तर:
जो जीव लवणता की व्यापक परास के प्रति सहनशील होते हैं, उन्हें पृथुलवणी (Eurohaline) तथा कम परास में रहने वालों को तनुलवणी ( Stenohaline) कहते हैं।

प्रश्न 10.
अनुकूलनों का विकास किस प्रकार हुआ ?
उत्तर:
एक लम्बे समय में प्राकृतिक वरण द्वारा अपने आवास में उत्तरजीविता (survival) व जनन को इष्टतम बनाने के लिये जीव ने अनुकूलनों का विकास किया है।

प्रश्न 11.
तुंगता बीमारी का समाधान हमारा शरीर किस प्रकार करता है?
उत्तर:
यह बीमारी उच्च तुंगता वाले स्थानों पर होती है। हमारा शरीर कम O2 उपलब्ध होने की क्षतिपूर्ति लाल रुधिर कोशिका का उत्पादन बढ़ाकर, हीमोग्लोबिन की बंधनकारी क्षमता पटाकर और श्वसन दर बढ़ाकर करता है।

प्रश्न 12.
किन स्थानों के व्यक्तियों में लाल रुधिर कोशिकाओं की संख्या व कुल हीमोग्लोबिन की मात्रा अधिक होती है?
उत्तर:
जो व्यक्ति उच्च तुंगता वाले स्थलों पर रहते हैं उनके अन्दर लाल रुधिर कोशिकाओं की संख्या व कुल हीमोग्लोबिन की मात्रा मैदानी क्षेत्रों वाले व्यक्तियों से अधिक होती है।

प्रश्न 13.
आयु पिरैमिड क्या दर्शाता है?
उत्तर:
पिरैमिड का आकार समष्टि की स्थिति को प्रतिबिंबित करता है क्या यह बढ़ रहा है, स्थिर है या घट रहा है?

प्रश्न 14.
समष्टि साइज का मापन किस विधि से अधिक उपयुक्त है?
उत्तर:
समष्टि साइज के माप के लिये प्रतिशत आवरण अथवा जीव भार (Biomass) अधिक उपयुक्त है।

प्रश्न 15.
आप्रवासन ( immigration) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
किसी जाति के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समय अवधि के दौरान आवास में कहीं और से आये हैं।

प्रश्न 16.
उत्प्रवासन (emigration) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समष्टि के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समयावधि के दौरान आवास छोड़कर कहीं और चले गये हैं।

प्रश्न 17.
यदि समय पर समष्टि घनत्व N है तो समय + पर इसका घनत्व क्या होगा?
उत्तर:
Nt+1 = N1 + [(B + 1) (D +E)]
B + 1 = जन्म लेने वालों की संख्या जमा आप्रवासियों की संख्या ।
D + E – मरने वाले की संख्या जमा उत्प्रवासियों की संख्या ।

प्रश्न 18.
डार्विन योग्यता किसे कहते हैं?
उत्तर:
समष्टियाँ जिस आवास में रहती हैं, उसमें अपनी जनन योग्यता को डार्विन योग्यता कहते हैं।

प्रश्न 19.
कुछ जीव अपने जीवन काल में केवल एक बार प्रजनन करते हैं, इसके दो उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
प्रशांत महासागरीय सामन मछली (Salmon Fish) तथा बाँस (Bamboo)।

प्रश्न 20.
ऐसे कोई दो उदाहरण दीजिये जो कुछ छोटी साइज की संतति बहुत बड़ी संख्या में उत्पन्न करती है।
उत्तर:
ऑयस्टर (Oysters) और पैलेजीक मछलियाँ ( Pelagic Fishes)।

प्रश्न 21.
कोई दो उदाहरण बताइये जिसमें बड़ी साइज की संतति कम संख्या में उत्पन्न करती है ।
उत्तर:
पक्षी और स्तनधारी ।

प्रश्न 22.
परजीविता व परभक्षण में किसको लाभ व हानि होती है?
उत्तर:
परजीवी व परभक्षी को लाभ होता है तथा परपोषी व शिकार को हानि होती है।

प्रश्न 23.
परभक्षी किस प्रकार महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
ये शिकार समष्टि को नियंत्रण में रखते हैं। यदि परभक्षी नहीं होते तो शिकार जातियों का समष्टि घनत्व बहुत ज्यादा हो जाता और परितंत्र में अस्थिरता आ जाती।

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प्रश्न 24.
मैंग्रोव (Mangrove) वनस्पति क्या है?
उत्तर:
उष्ण व उपोष्ण कटिबन्धों के समुद्रतटों पर मैंग्रोव वन पाये जाते हैं। इनकी मूलों को न्यूमेटोफोर कहते हैं तथा इनमें सजीव प्रजक बीजांकुरण पाया जाता है। जैसे- राइजोफोरा ।

प्रश्न 25.
मरुस्थलीय पौधों में वाष्पोत्सर्जन को कम करने हेतु पाये जाने वाले कोई चार अनुकूलन लिखिए।
उत्तर:
चार अनुकूलन निम्न हैं-

  • पर्ण तथा स्तम्भ की अधिचर्म मोटी क्यूटिकल युक्त होती है।
  • रन्ध्र (Stomata) गहरे गर्त में अर्थात् गर्ती रन्ध्र होते हैं, जैसे- कनेर ।
  • पत्तियाँ कांटों में रूपान्तरित हो जाती हैं।
  • तने व पत्तियों में मोम के समान आवरण पाया जाता है जो वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
किसी कार्यिकीय अनुकूलन को उदाहरण सहित समझाइये |
उत्तर:
कुछ जीवों के अनुकूलन कार्यिकीय होते हैं जिसकी वजह से वे दबावपूर्ण परिस्थितियों के प्रति शीघ्र अनुक्रिया करते हैं। यदि हमें कभी उच्च तुंगता वाले क्षेत्र में जाने का मौका मिले (3,500 मी. से अधिक, मनाली के पास रोहतांग दर्रा, तिब्बत में मानसरोवर) तो वहाँ ‘तुंगता बीमारी’ का अवश्य अनुभव होता है। इस ‘बीमारी’ के लक्षण हैं- मिचली, थकान और हृदय स्पंदन में वृद्धि ।

इसका कारण यह है कि उच्च तुंगता वाले क्षेत्र में वायुमंडलीय दाब कम होता है इसलिए शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती। लेकिन धीरे-धीरे पर्यानुकूलित (एक्लेमिटाइज्ड) हो जाते हैं और फिर हमें तुंगता बीमारी का अनुभव नहीं होता। इस समस्या का समाधान हमारा शरीर स्वयं करता है।

हमारा शरीर कम ऑक्सीजन उपलब्ध होने की क्षतिपूर्ति लाल रुधिर कोशिका का उत्पादन बढ़ाकर, हीमोग्लोबिन की बंधनकारी क्षमता घटाकर और श्वसन दर बढ़ाकर करता है। हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में अनेक जनजातियाँ रहती हैं जिसमें मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों की तुलना में सामान्यतया लाल रुधिर कोशिकाओं की संख्या (या कुल हीमोग्लोबिन) ज्यादा होती है।

प्रश्न 2.
जलवायु तथा मौसम में भेद कीजिये ।
उत्तर:
किसी क्षेत्र विशेष की जलवायु से तात्पर्य उस क्षेत्र के जलवायवीय कारकों (प्रकाश, तापमान, वर्षण, पवन, वायुमण्डलीय गैसें, आर्द्रता आदि) की मात्रा के वर्षभर के औसत से होता है। जब इन्हीं कारकों की मात्रा का निर्धारण अल्पावधि के लिये नियत जगह पर किया जाये तो मौसम कहलाता है। इस प्रकार मौसम में साप्ताहिक, दैनिक परिवर्तन होते हैं, जबकि जलवायु का निर्धारण दीर्घकालिक ऋतुओं और वर्षों के आधार पर होता है।

प्रश्न 3.
सजीव प्रजकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अधिकांश लवणोद्भिद् में सजीवप्रजक बीजांकुरण पाया जाता है। इसमें बीज का अंकुरण फल के भीतर मातृ पौधे पर ही हो जाता है, इसे ही सजीवप्रजकता कहते हैं। मैंग्रोव वनस्पति में इस प्रकार का बीजांकुरण पाया जाता है। इनके बीजों में विश्रामी अवस्था नहीं होती है। जैसे ही फल का भार बढ़ता है तो वह टूटकर नीचे दलदली भूमि पर गिरता है तथा इससे नये पौधे का विकास हो जाता है।

प्रश्न 4.
आतपोद्भिद तथा छायोद्भिद में अन्तर लिखिये ।
उत्तर:
आतपोद्भिद और छायोद्भिद पादपों में अन्तर-

आतपोद्भिद (Heliophytes)छायोद्भिद (Sciophytes)
1. जड़ें विकसित, संख्या में अधिक तथा पूर्ण शाखित होती हैं।जड़ें छोटी, संख्या में कम और अल्प शाखित होती हैं।
2. तना सुदृढ़ तथा जाइलम पूर्ण विकसित होता है।तना पतला, दुर्बल तथा जाइलम अल्प विकसित होता है।
3. पत्तियाँ छोटी, हल्की हरी तथा मोटी होती हैं।पत्तियाँ बड़ी, गहरी हरी तथा पतली होती हैं।
4. पर्णरंध्रों (Stomata) की संख्या अधिक होती है। पर्णरंध्र निचली सतह पर ऊपरी सतह की अपेक्षा अधिक होते हैं।पर्णरंध्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है तथा दोनों सतहों पर समान रूप से वितरित होते हैं।
5. पर्णमध्योतक (Mesophyll tissue) में खंभ ऊतक (Palisade tissue) अधिक विकसित तथा अन्तराकोशिकीय अवकाश काफी छोटे होते हैं।पर्णमध्योतक में स्पंजी ऊतक (Spongy tissue) अधिक विकसित तथा अन्तराकोशिकीय अवकाश (Inter-cellular space) अपेक्षाकृत अधिक होते हैं।
6. यांत्रिक ऊतक (Mechanical tissues) पूर्ण विकसित होते हैं।यांत्रिकी ऊतक अल्प विकसित या अनुपस्थित होते हैं।
7. पुष्प एवं फल उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है।पुष्प एवं फल उत्पन्न करने की क्षमता अपेक्षाकृत बहुत कम होती है।
8. खनिज लवणों की मात्रा अधिक होती है। इस कारण कोशिकाओं का परासरण दाब अधिक होता है।खनिज लवणों की मात्रा कम होती है। कोशिकाओं का परासरण दाब कम होता है।

प्रश्न 5.
ह्यूमस के प्रकार और निर्माण को समझाइये।
उत्तर:
मृदा के मृत अपघटित कार्बनिक अवशेषों को ह्यूमस कहते हैं। यह मृदा की उर्वरकता के लिये अति आवश्यक है। यह मुख्य रूप से पौधों तथा जन्तुओं के अवशेषों तथा उनके उत्सर्जी पदार्थों के अपघटन से बनता है। केंचुए ह्यूमस निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। मृत कार्बनिक पदार्थों का अपघटन मृदा सूक्ष्म जीवों, जैसे- जीवाणुओं, कवकों आदि द्वारा होता है। ह्यूमस निर्माण प्रक्रिया को ह्यूमीफिकेशन (Humification) कहते हैं तथा ह्यूमस का खनिज लवणों में परिवर्तन खनिजीकरण (Mineralization) कहलाता है।

ह्यूमस दो प्रकार के होते हैं-

  • मोर ह्यूमस (Mor Humus) – यह ह्यूमस अपरिपक्व अवस्था में होता है। इसमें खनिज लवण अपेक्षाकृत कम होते हैं। मृदा में केंचुओं का अभाव होता है। इसकी pH 3.8 4.0 होती है। अपघटन धीरे-धीरे होता है।
  • मल ह्यूमस (Mull Humus) – यह परिपक्व ह्यूमस होता है। इसमें केंचुओं की बाहुल्यता होती है। मृदा की pH 5.0 होती है। अपघटन तेजी से होता है।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिये-
(i) वसन्तीकरण
(ii) दीप्तिकालिकता ।
उत्तर:
(i) वसन्तीकरण (Vernalization) – कुछ पौधों में पुष्पीकरण न्यूनताप मिलने पर होता है। बीज पर न्यून तापक्रम प्रयोग द्वारा पुष्पीकरण शीघ्र प्राप्त करने की क्रिया को वसन्तीकरण कहते हैं । इसके लिये ऑक्सीजन की उपस्थिति आवश्यक होती है। वसन्तीकरण में वर्नेलिन (Vernalin) नामक पदार्थ बनता है जो फ्लोरीजन (Florigen ) या जिबरेलिन में परिवर्तित हो जाता है तथा यह पुष्पीकरण को समय से पूर्व प्रारम्भ करने के लिए उत्तरदायी होता है।

(ii) दीप्तिकालिकता (Photoperiodism)- पौधों के पुष्पीकरण तथा फलन क्रियाओं पर दैनिक प्रकाश की अवधि का प्रभाव पड़ता है, इसे दीप्तिकालिकता कहते हैं। दैनिक प्रकाश अवधि के प्रभाव के अनुसार पुष्पी पादपों को तीन वर्गों में बांटा गया है-

  • दीर्घ – प्रकाशीय (दीप्तिकाली) पौधे
  • अल्प- प्रकाशीय (दीप्तिकाली) पौधे
  • प्रकाश या दिवस निरपेक्ष पौधे ।

तापमान दीप्तिकालिकता को सबसे अधिक प्रभावित करता है। इसके अलावा पौधे की आयु और उसका प्रकार (श्यान या ऊर्ध्ववर्ती) भी दीप्तिकालिकता को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 7.
शुष्कतारोधी पादपों में पाये जाने वाले चार आकारिकी व शरीर क्रियात्मक अनुकूलन बताइये ।
उत्तर:
आकारिकी अनुकूलन-

  • मूलतंत्र सुविकसित, शाखित, गहरा तथा प्रसारित मूल रोम व मूल गोप पूर्ण विकसित होते हैं।
  • तना चपटा व मांसल हो जाता है तथा पर्ण व स्तम्भ दोनों का कार्य करता है, जिसे पर्णाभ स्तम्भ कहते हैं, जैसे-नागफनी, कोकोलाबा ।
  • पत्तियाँ बहुकोशिकीय रोमों से ढँकी होती हैं जिससे वाष्पोत्सर्जन कम होता है, जिसे रोम पर्ण पादप (Trichophyllous Plants) कहते हैं, जैसे- केलोट्रापिस ।
  • इनमें हाइड्रोकेसी या आर्द्रता स्फुटन का लक्षण पाया जाता है।

शारीरिकीय अनुकूलन-

  1. पर्ण तथा स्तम्भ की अधिचर्म मोटी क्यूटिकल युक्त होती है।
  2. रंध्र गहरे गर्त में अर्थात् गर्ती रंध्र होते हैं, जैसे- कनेर ।
  3. यांत्रिक व संवहन ऊतक सुविकसित होती है।
  4. अधिचर्म तथा अधश्चर्म में क्यूटीन, लिग्निन, सूबेरिन का निक्षेपण होता है।

प्रश्न 8.
पहाड़ियों के तीव्र ढलानों पर वनस्पति क्यों नहीं पायी जाती है? कारण सहित समझाइये |
उत्तर:
ढलान प्रवणता जितनी अधिक होगी वर्षाजल उतने ही वेग से नीचे की ओर प्रवाहित होगा। यह ढलानों की मृदा के गुणों को बदलता है। तीव्र ढलानों पर भूमि को जल अवशोषित करने का अवसर नहीं मिल पाता है, अतः अधिक ढलान वाले भागों पर कम वनस्पति, कम प्रवणता के ढलानों पर अपेक्षाकृत सघन वनस्पति पायी जाती है। अधिक प्रवणता वाले ढलानों पर वर्षा व वायु द्वारा होने वाला मृदा अपरदन भी अधिक होता है और ऐसे ढलानों पर पादप नहीं पाये जाते हैं।

प्रश्न 9.
पारिस्थितिकी में वनस्पति को ताप आधारित संवर्गों में वगीकृत किया गया है। इन संवर्गों के नाम दीजिये तथा प्रत्येक की ताप स्थिति व वनस्पति प्रकार का वर्णन कीजिये ।
उत्तर:
संवर्गों के नाम-

  1. उच्चतापी – ये वे पौधे हैं, जिन्हें वृद्धि व विकास के लिए निरन्तर उच्च तापक्रम चाहिए। उदाहरण- मरुस्थल, घास वन आदि ।
  2. मध्यतापी – पौधे निम्न तापक्रम को कुछ समय सह सकते हैं। उच्च एवं न्यून तापक्रम एकान्तर क्रम में पाया जाता है। उदाहरण- उष्णकटिबन्ध वन ।
  3. निम्नतापी- इनमें न्यून तापक्रम पर वृद्धि एवं विकास होता है। उदाहरण- शीतोष्ण वन ।
  4. अतिनिम्नतापी या हैकिस्टोथर्म- ये अधिकांशत: न्यून तापक्रम पर वृद्धि एवं विकास करते हैं, अल्पाइन वनस्पति ।

प्रश्न 10.
पर्यावरण से क्या तात्पर्य है? इनके विभिन्न कारकों के शीर्षक लिखिये ।
उत्तर:
पर्यावरण से तात्पर्य है ‘चारों ओर से घेरे हुये। पर्यावरण अनेक कारकों का मिला-जुला एक जटिल सम्मिश्र है जो जीव को चारों ओर से घेरे हुए है। कोई पदार्थ या परिस्थिति या बाहरी बल जो जीव के जीवन को किसी भी प्रकार से प्रभावित करे, वह पर्यावरण कारक होता है। इन्हें पर्यावरण कारक या पारिस्थितिकी कारक कहते हैं। ये कारक जैविक या अजैविक हो सकते हैं। अजैविक व जैविक कारकों का जटिल सम्मिश्र ही जीव का पर्यावरण बनता है। पर्यावरणी कारकों को निम्न चार वर्गों में वगीकृत किया गया है-

1. जलवायवी या वायुव कारक – इसमें
(अ) प्रकाश,
(ब) तापमान,
(स) वर्षा,
(द) पवन,
(य) वायुमण्डलीय आर्द्रता तथा
(र) वायुमण्डलीय गैसें होती हैं।

2. भू-आकृतिक या स्थलाकृतिक कारक – यह कारक पृथ्वी के भौतिक भूगोल से सम्बन्धित है। इसमें
(अ) ऊँचाई,
(ब) पर्वत श्रृंखलाओं की दिशा व घाटियां तथा
(स) ढलानों की प्रवणता आती है।

3. मृदीय कारक – इसमें मृदा का संगठन व उसके गुण आते हैं।

4. जैविक कारक विभिन्न प्रकार के जीवों की अन्तर्क्रियाएँ।

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प्रश्न 11.
जलवायवीय कारकों के अन्तर्गत पवन से होने वाले पादप प्रभाव को समझाइए ।
उत्तर:
बहती वायु को पवन कहते हैं। पवन का पौधों पर प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दोनों प्रकार का प्रभाव होता है। पवन की गति पादपों की आकृति, वाष्पोत्सर्जन, आन्तरिक संरचना, परागण, प्रजनन, फल एवं बीजों के प्रकीर्णन इत्यादि पर प्रभाव डालती है। यही नहीं, पवन का तापमान, वर्षण व वायुदाब पर भी प्रभाव पड़ता है। पवन के कारण पौधों में अनेक कार्यिकी एवं आन्तरिक संरचना में परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं।

समुद्रतट व ऊँचे पर्वतों के पादपों में तेज हवाओं के एक दिशा में गति के कारण स्थायी वक्रता उत्पन्न हो जाती है तथा इन पौधों की शाखाएँ भी एक ही ओर से निकलती हैं। शुष्क वायु के प्रभाव से पौधों में निर्जलीकरण हो जाता है तथा उनकी स्फीति कम हो जाती है। फलस्वरूप पौधे वामन या बौने रह जाते हैं। समुद्रतटों तथा ऊँचे पर्वतों की वनस्पति प्रायः बौनी होती है।

प्रश्न 12.
ऑर्किड में पाये जाने वाले लैंगिक कपट (Sexual Deceit) को समझाइये।
अथवा
मेडिटेरेनियन ऑर्किड पुष्प की एक पंखुड़ी का आकार, रंग तथा चिह्नों का मादा भक्षिका से मिलता-जुलता होने का क्या कारण है ? समझाइए ।
उत्तर:
ऑर्किड पुष्प प्रतिरूपों में आश्चर्यचकित करने वाली विविधता पाई जाती है। इनके पुष्पों में पुष्पीय संरचना परागणकारी कीट भ्रमरों व गुंज मक्षिकाओं (Bees and Bumblebees) को आकर्षित करने के लिये ही विकसित हुए हैं ताकि इसके द्वारा निश्चित रूप से परागण हो सके । यद्यपि यह प्रवृत्ति सभी ऑर्किड पुष्पों में नहीं पायी जाती है। परन्तु ऑफिस (Ophrys) नामक भूमध्य सागरीय मेडिटेरिनियन ऑर्किड मक्षिका (Boc) की एक जाति परागण कराने के लिए लैंगिक कपट (Sexual Doceit) का सहारा लेता है।

इस पुष्प की एक पंखुड़ी (petal) साइज, रंग और चिन्हों में मादा मक्षिका (Bee) से मिलती-जुलती होती है। नर मक्षिका इसे मादा समझकर इसकी ओर आकर्षित होती है तथा पुष्प के साथ कूट मैथुन (Pseudo copulates ) करती है। इस क्रिया के दौरान इस पर पुष्प से पराग झड़कर उस पर गिर जाते हैं।

जब यही मक्षिका अन्य पुष्प से कूट मैथुन करती है तो इसके शरीर पर लगे परागकण उस पुष्प पर गिर जाते हैं जिससे पुष्प को परागित करती है। परन्तु विकास के दौरान यदि किसी भी कारण से मादा मक्षिका का रंग-प्रतिरूप (Colour-pattern) जरा सा भी बदल जाता है तो परागण की सफलता कम रहेगी अतः इस कारण से ऑर्किड पुष्प अपनी पंखुड़ी को मादा मक्षिका के सदृश बनाए रखते हैं ।

प्रश्न 13.
बताइये कि दी गई अवधि के दौरान दिये गये आवास में समष्टि का घनत्व किन मूलभूत प्रक्रमों (Processes) में घटता-बढ़ता है?
उत्तर:
जन्मदर तथा आप्रवासन समष्टि घनत्व को बढ़ाते हैं तो मृत्युदर व उत्प्रवासन इसे घटाते हैं। इन प्रक्रमों को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा रहा है-

  • जन्मदर (Natality )-जन्मदर से तात्पर्य समष्टि में जन्मी उस संख्या से है जो दी गई अवधि के दौरान आरंभिक घनत्व में जुड़ती है।
  • मृत्युदर (Mortality )-यह दी गई अवधि समष्टि में होने वाली मृत्यु की संख्या है।
  • आप्रवासन (Immigration )-उसी जाति के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समय अवधि के दौरान आवास में कहीं और आए हैं।
  • उत्प्रवासन (Emigration )-समष्टि के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समयावधि के दौरान आवास छोड़कर कहीं और चले गए हैं।

प्रश्न 14.
समष्टि पारस्परिक क्रियाओं को संक्षेप में बताइये ।
उत्तर:
समष्टि पारस्परिक क्रियाएँ (Population Interactions)
पृथ्वी के किसी भी आवास पर किसी एक ही जाति का वास नहीं होता। विभिन्न प्रकार की जातियाँ एक दूसर पर निर्भर होती हैं। पौधे भले ही अपना भोजन स्वयं बनाते हैं परन्तु वे अकेले जीवित नंहीं रह सकते। जैसे मृदा के कार्बनिक पदार्थ को तोड़ने और अकार्बनिक पोषकों को इसके अवशोषण के लिये लौटने के लिये मृदा के सूक्ष्मजीवों की आवश्यकता पड़ती है।

इसके अतिरिक्त प्राणी एजेन्ट (agent) पादप परागण की व्यवस्था बनाते हैं। अतः कोई भी जीव पृथक् नहीं रहता जब वे साथ रहते हैं तो उनमें पारस्परिक क्रियायें होती हैं। अंतराजातीय (interspecific) पारस्परिक क्रियायें (दो भिन्न जातियों की समष्टियों के बीच) एक जाति या दोनों जातियों के लिये हितकारी, हानिकारक या उदासीन (न हानिकारक न लाभदायक) हो सकती हैं।

लाभदायक पारस्परिक क्रियाओं के लिये ‘ + ‘ चिन्ह तथा हानिकारक के लिये ‘-‘ चिन्ह तथा उदासीन के लिये ‘ 0 ‘ चिन्ह का उपयोग करते हैं। अंतराजातीय पारस्परिक क्रियाओं को निम्न सारणी में दर्शाया जा रहा है-

सारणी-समष्टियों की पारस्परिक क्रिया

जाति ‘अ’जाति ‘ब’पारस्परिक क्रिया का नाम
++सहोपकारिता (Mutualism)
स्पर्धा (Competition)
+परभक्षण (Predation)
+परजीविता (Parasitism)
+0सहभोजिता (Commensalism)
0अंतराजातीय परजीविता (Amensalism)

सहोपकारिता में दोनों जातियों को लाभ होता है और स्पर्धा में दोनों को हानि होती है। परजीविता और परभक्षण दोनों में केवल एक जाति को लाभ होता है (क्रमशः परजीवी और परभक्षी को) और पारस्परिक क्रिया दूसरी जाति (क्रमशः परपोषी और शिकार) के लिये हानिकारक है।

वह पारस्परिक क्रिया जिसमें एक जाति को लाभ होता है और दूसरी को न लाभ व न हानि होती है, उसे सहभोजिता कहते हैं। दूसरी ओर, अंतरजातीय परजीविता में एक जाति को हानि होती है जबकि दूसरी जाति अप्रभावित रहती है।

(क) परभक्षण (Predation) – यदि किसी समुदाय में पौधों को खाने वाले प्राणी न हों तो स्वपोषी जीवों द्वारा स्थिर की गई संपूर्ण ऊर्जा व्यर्थ होगी। प्राणियों के द्वारा पौधे खाये जाते हैं तथा ऊर्जा को उच्चतर पोषी स्तरों में स्थानांतरित करते हैं। परभक्षण वे होते हैं जो अन्य जीवों का भक्षण या खाते हैं। यद्यपि पौधों को खाने वाले जीवों को शाकाहारी कहते हैं परंतु सामान्य पारिस्थितिक संदर्भ में वे भी परभक्षी जैसे होते हैं।

परभक्षी पोषी स्तर तक ऊर्जा स्थानांतरण के लिये संनाल (Conduits) का कार्य करने के अतिरिक्त वे शिकार समष्टि को नियंत्रित रखते हैं। यदि प्रकृति में परभक्षी नहीं होते तो शिकार जातियों का समष्टि घनत्व बहुत अधिक हो जाता और परितंत्र में अस्थिरता आ जाती। जब भी किसी भौगोलिक क्षेत्र में कुछ विदेशज जातियाँ लाई जाती हैं तो वे आक्रामक होकर तेजी से फैलने लगती हैं क्योंकि उन स्थानों पर उसके प्राकृतिक परभक्षी नहीं होते हैं।

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सन् 1920 के आरंभ में आस्ट्रेलिया में लाई गई नागफनी ने वहाँ लाखों हेक्टेयर भूमि में तेजी से फैलकर तबाही मचा दी। अंत में नागफनी को खाने वाले परभक्षी (एक प्रकार का शलभ) को लाकर आक्रामक नागफनी को नियंत्रित किया जा सका। परभक्षी, स्पर्धी शिकार जातियों के बीच स्पर्धा की तीव्रता कम करके किसी समुदाय में जातियों की विविधता (diversity) बनाए रखने में भी सहायता करता है।

उदाहरणार्थ, अमेरिकी प्रशांत तट की चट्टानी अंतराज्वारीय (intertidal) समुदायों में पाइसैस्टर तारामीन एक महत्त्वपूर्ण परभक्षी है। प्रयोग में जब एक बंद अंतराज्वारीय क्षेत्र से सभी तारामीन को हटा दिया गया तो अंतराजातीय स्पर्धा के कारण एक वर्ष में ही अकशेरुकियों की 10 से अधिक जातियाँ विलुप्त हो गईं।

यदि परभक्षी ज्यादा ही दक्ष है तो वह अपने शिकार का अतिदोहन करता है जिससे शिकार विलुप्त हो जायेगा परंतु जब शिकार का अभाव हो जायेगा तो परभक्षी भी शिकार न मिलने के कारण विलुप्त हो जायेगा। प्रकृति में शिकारी जातियों ने परभक्षण के प्रभाव को कम करने के लिये विभिन्न रक्षा विधियाँ विकसित कर ली हैं। कीटों और मेढ़कों की कुछ जातियों ने परभक्षी से बचने के लिये गुप्त रूप से रंगीन (छद्मावरण) हो जाती हैं, जिससे परभक्षी उन्हें पहचान नहीं पाता।

कुछ शिकार जातियाँ विषैली होती हैं, इसके कारण परभक्षी उनका भक्षण नहीं करते। मॉनार्क तितली के शरीर में विशेष रसायन होने के कारण स्वाद में खराब होती है, इस कारण परभक्षी उन्हें नहीं खाते हैं। यह तितली इस रसायन को अपनी इल्ली अवस्था में विषैली खरपतवार खाकर प्राप्त करती है।

पौधों के लिये शाकाहारी प्राणी परभक्षी होते हैं। लगभग 25% कीट पादपभक्षी (phytophagous) होते हैं अर्थात् वे पादप रस या पादपों के अन्य भाग खाते हैं। पादपों के लिये परभक्षी से बचने के लिये एक समस्या है क्योंकि वे प्राणियों की जैसे भाग नहीं सकते। इस कारण पौधों ने शाकाहारियों से बचने के लिये आकारिकीय और रासायनिक रक्षाविधियाँ विकसित कर ली हैं।

आकारिकीय रक्षाविधियों का उदाहरण एकेशिया (Acacia) व कैक्टस (Cactus) में कांटे हैं। रासायनिक रक्षाविधियों में अनेक पादप ऐसे रसायन उत्पन्न कर एकत्रित कर लेते हैं जो कि शाकाहारी द्वारा खाये जाने पर, उन्हें बीमार कर देते हैं, पाचन का संदमन करते हैं, उनके जनन को भंग कर देते हैं या मार देते हैं।

प्रायः खाली खेतों में आकड़ा या मदार (Calotropis) की खरपतवार उगी रहती है, उसे कोई भी पशु नहीं खाता है क्योंकि इस पौधे में विषैला ग्लाइकोसाइड (glycoside) उत्पन्न होता है। विविध प्रकार के पौधों से अनेक प्रकार के व्यापारिक स्तर पर रासायनिक पदार्थ जैसे-निकोटीन, कैफीन, क्वीनीन, स्ट्रिकनीन, अफीम इत्यादि प्राप्त करते हैं। इन रसायनों के कारण पशु इन्हें नहीं खाते हैं तथा पौधे शाकाहारी प्राणियों से अपनी रक्षा करते हैं।

(ख) स्पर्धा (Competition)-डार्विन ने प्रकृति में जीवनसंघर्ष और योग्यतम की उत्तरजीविता के विषय में बताते हुये कहा कि जैव-विकास में अंतरजातीय स्पर्धा (interspecific competition) एक शक्तिशाली कारक है। वस्तुतः स्पर्धा प्रायः तब होती है जब निकट रूप से संबंधित जातियाँ उन्हीं संसाधनों के लिये स्पर्धा करती हैं जो सीमित हैं।

किन्तु यह सत्य नहीं है कि एक ही जाति के जीव आपस में प्रतिस्पर्धा रखें। डार्विन के अनुसार भोजन व स्थान के लिये विभिन्न समष्टियों के जीव भी स्पर्धा रख सकते हैं। उदाहरणार्थ, दक्षिण़ी अमेरिका की कुछ उथली (कम गहरी) झीलों में आगुंतक फ्लेमिंगो और वहीं क्री रहने वाली मछलियां दोनों ही झील में मिलने वाले प्राणिप्लवक (Zooplankton) के लिये प्रतिस्पर्धा करते हैं।

स्थान व खाद्य सामग्री पर्याप्त होने पर भी यह देखा गया है कि स्पर्धा में एक समष्टि के प्राणी बाधित हो जाते हैं क्योंकि दूसरी समष्टि के जीव अधिक आक्रामक होते हैं जिससे वे पहली जाति के जीवों को उपलब्ध स्थान व भोजन का उपयोग नहीं करने देते हैं। प्रकृति में यह देखा गया है कि एक जाति की योग्यता अधिक बढ़ने पर वह दूसरी जाति के जीवों को कम कर सकती है परन्तु उन्हें विलुप्त नहीं कर पाती।

यद्यपि प्रकृति में ऐसे उदाहरण हैं कि योग्य जाति दूसरी जाति को समाप्त कर देती है। गैलापेगो द्वीप में एबिंगडन (Abingdon) कहुए अधिक संख्या में पाये जाते थे परंतु जब बकरियाँ पहुँचीं तो उन्होंने अधिक चरने के कारण सारे पौधे समाप्त कर दिये जिससे 10 साल में ही कछुए समाप्त हो गये।

प्रतिस्पर्धा का एक अन्य प्रमाण स्पर्धी मोचन (competitive release) है। यदि एक योग्य जाति है जिसने अपने से कम योग्य जाति को स्थान विशेष में सीमित कर रखा है व किसी भी कारण से यदि योग्य जाति नष्ट हो जाती है व उस स्थान से प्रवास कर जाती है तो दूसरी जाति स्पर्धा के अभाव में उस पूरे क्षेत्र में फैल कर समष्टि घनत्व बढ़ा सकती है।

गॉसे (Gause) का स्पर्धी अपवर्जन नियम (Competitive exclusion principle) यह बताता है कि एक ही प्रकार के संसाधनों के लिये स्पर्धा करने वाली दो निकटतम संबंधित जातियाँ लंबे समय तक साथ-साथ नहीं रह सकतीं और स्पर्धी रूप से कमजोर जाति बाद में समाप्त हो जाती है। गॉसे का यह नियम केवल तब ही लागू होगा जब स्थान या भोजन सीमाकारी (limiting) हो जायेंगे अन्यथा स्पर्धा

का यह नियम लागू नहीं होगा। आधुनिक अध्ययन से यह भी ज्ञात हुआ है कि जब दो जातियाँ स्पर्धा करती हैं तब एक विलुप्त नहीं होती वरन् यह इस प्रकार के अनुकूलन विकसित कर लेती है जिससे दोनों का एक साथ अस्तित्व बना रहता है। इस प्रकार की क्रियाविधि को ‘संसाधन विभाजन’ कहते हैं।

यदि दो जातियां एक ही संसाधन के लिये स्पर्धा करती हैं तो वे आहार के लिये भिन्न समय या भिन्न चारण प्रतिरूप चुनकर स्पर्धा से बच सकती हैं। मैक आर्थर (Mac Arthur) ने बताया कि एक ही पेड़ पर रह रही फुदकी (Warblers) की पांच जातियां स्पर्धा से बचने में सफल रहीं और पेड़ की शाखाओं और वितान पर कीट शिकार के लिये तलाशने की अपनी चारण गतिविधियों में व्यावहारिक भिन्नताओं के कारण साथ-साथ रह सकीं।

(ग) परजीविता (Parasitism) – परजीविता में रहने व भोजन की मुफ्त व्यवस्था होती है। एक जीव दूसरे जीव पर भोजन या आश्रय के लिये उस पर निर्भर होता है। जो जीव दूसरे जीव पर निर्भर होता है उसे परजीवी (parasite) तथा जिसके ऊपर यह आश्रित होता है उसे परपोषी (host) कहते हैं। इसमें परजीवी को तो लाभ होता है परन्तु परपोषी का शोषण होता है।

परजीविता पादपों से लेकर उच्च कोटि के कशेरुकियों तक पाई जाती है। ऐसे परजीवी जो एक निश्चित परपोषी के साथ ही रहते हैं, यदि उनको अपना निश्चित परपोषी उपलब्ध नहीं होता है तो उनकी मृत्यु हो जाती है, ऐसे परजीवियों को अविकल्पी परजीवी (obligate parasite) कहते हैं।

परजीविता में परजीवियों ने विशेष अनुकूलन विकसित किये हैं, जैसे-आसंजी अंगों या चूषकांगों (haustoria) की उपस्थिति, पाचन तंत्र का लोप तथा उच्च जनन क्षमता आदि। परजीवियों का जीवन चक्र प्रायः जटिल होता है। जिसमें एक या दो मध्यस्थ पोषक अथवा रोगवाहक होते हैं।

उदाहरणस्वरूप मानव यकृत पर्णाभ (liver fluke) अपने जीवन चक्र को पूर्ण करने के लिये दो मध्यस्थ पोषकों जैसेघोंघा और मछली पर निर्भर करता है। मलेरिया परजीवी को दूसरे परपोषियों पर फैलने के लिये रोगवाहक (मच्छर) की आवश्यकता पड़ती है। अधिकांश परजीवी, परपोषी को हानि पहुँचाते हैं, परपोषी की उत्तरजीविता, वृद्धि और जनन को कम कर सकते हैं तथा उसके समष्टि घनत्व को घटा सकते हैं।

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परजीवी परपोषी को कमजोर बनाकर, उसे परभक्षण के लिये अधिक सुरक्षित बना देते हैं। परजीवी दो प्रकार के होते हैं-बाह्य परजीवी (Ecto-parasite) तथा अन्तः परजीवी (Endo-parasite)। वे परपोषी जो अपना पोषण परपोषी की बाहरी सतह से प्राप्त करते हैं, उन्हें बाह्य परजीवी कहते हैं, उदाहरण-जूँ मानव पर, कुत्तों पर चिंचिड़ियाँ (Tricks) तथा प्राणियों में कई मछलियों पर कोपीपॉड्स (copepods) इनके शरीर पर निवास करते हैं।

अमरबेल या आकाश बेल (Cuscuta) एक स्तम्भ परजीवी है जिसमें पत्तियों व पर्णहरित (chlorophyll) का अभाव होता है। इसमें केवल पीले रंग का दुर्बल तना होता है। इसके तने से अनेक चूषकांग (haustoria) निकलकर, परपोषी के अंदर घुसकर उसके संवहन ऊतक (जाइलम व फ्लोयम) से अपना संबंध स्थापित कर लेते हैं।

ये पूर्णतः तैयार भोजन अपने परपोषी से प्राप्त करते हैं। अंतःपरजीवी (endoparasite) वे हैं जो परपोषी के शरीर में भिन्न स्थलों जैसे यकृत, वृक्क, फुफ्फुस, लाल रुधिर कोशिका आदि में रहते हैं। पक्षियों में अंड परजीविता (egg or brood parasitism) का अच्छा उदाहरण है जिसमें परजीवी पक्षी अपने अंडे परपोषी के घोंसले में देता है और परपोषी को उन अंडों को सेने (incubate) देता है।

आगे जाकर परजीवी पक्षी के अंडे साइज और रंगों में परपोषी के अंडों की भांति विकसित हो जाते हैं। इससे परपोषी इन अंडों को अपना समझकर बाहर नहीं निकालता। कोयल में भी अंड परजीविता पाई जाती है।

(घ) सहभोजिता (Commensalism) – इस प्रक्रिया में एक जाति को लाभ और दूसरी जाति को न तो लाभ होता है व न हानि होती है। उदाहरणार्थ, ऑर्किड (Orchid) आम की शाखा पर अधिपाद्प (epiphyte) के रूप में उगता है, ठीक इसी प्रकार व्हेल (whale) की पीठ पर बार्नेकल (Barnacle) निवास करता है। इस संबंध में ऑर्किड व बार्नेकल को तो लाभ होता है परंतु आम व क्लेल को न तो इनसे लाभ व न हानि होती है।

इसी प्रकार अन्य उदाहरणों में पक्षी बगुला और चरने वाले पशु आपस में साहचर्य में रहते हैं जो कि सहभोजिता का एक अच्छा उदाहरण है। खेत में पशु चरते रहते हैं और उनके पास ही बगुला भोजन प्राप्त करता रहता है। वस्तुत: खेत में पशु चरते हुये वनस्पति को हिलाते रहते हैं जिससे कीट बाहर निकलते रहते हैं तथा बगुला उन कीटों को खा जाता है।

सहभोजिता का एक अन्य उदाहरण समुद्री ऐनीमोन (Sea anemons) की दंशन स्पर्शक (stinging tantacles) का है। इन समुद्री ऐनीमोन के बीच रहने वाली क्लाउन मछली को परभक्षियों से दंशक स्पर्शक द्वारा सुरक्षा मिल जाती है क्योंकि परभक्षी इन दंशन स्पर्शकों से दूर रहते हैं यद्यपि समुद्री ऐनीमोन को क्लाउन मछली से कोई लाभ नहीं मिलता है।

(ङ) सहोपकारिता (Mutualism)-इस प्रक्रिया में दोनों जीवों को लाभ होता है। इसे प्रकाश-संश्लेषी शैवाल या सायनोबैक्टीरिया व लाइकेन के मध्य देखा जा सकता है। यहां शैवाल प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा अपने तथा कवक सहभागी के लिये खाद्य पदार्थों का निर्माण करता है।

इसके बदले में कवक अपने तथा शैवाल सहभागी के लिये वर्षा का जल, नमी आदि एकत्र करके उसका जीवन आसान बनाता है। इसमें कवक व शैवाल दोनों को लाभ होता है। इसी प्रकार का संबंध कवकों और उच्च कोटि के पादपों की जड़ों के बीच कवकमूल (Mycorrhiza) संबंध होता है।

कवक, मृदा से आवश्यक पोषक तत्वों के अवशोषण में पादपों की सहायता करते हैं जबकि बदले में पादप, कवकों को ऊर्जा-उत्पादी कार्बोहाइड्रेट देते हैं। विकास की दृष्टि से सहोपकारिता के अच्छे उदाहरण पादपप्राणी संबंध में मिलते हैं। पादपों को अपने पुष्प परागित करने और बीजों के प्रकीर्णन के लिये प्राणियों की सहायता जरूरी है।

अनेक जंतु एवं पक्षी फलों व बीजों को खाकर अन्य स्थानों पर अपना मल विसर्जित करते हैं। इनके मल के साथ फलों के बीज भी बाहर आ जाते हैं, जिससे बीजों के प्रकीर्णन में सहायता मिलती है। विभिन्न पादपों में कुछ प्राणियों जैसे मधुमक्खी तथा तितलियों व अन्य पक्षियों की अहम भूमिका होती है।

ये पुष्पों पर मकरन्द प्राप्त करने के लिये जाते हैं तथा इसके बदले में परागकणों को एक पुष्प से अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरित करके परागण क्रिया संपन्न कराते हैं। इस प्रकार पादप- प्राणी पारस्परिक क्रिया में सहोपकारिता होती है या यों कहा जा सकता है कि पुष्य व इसके परागणकारी जातियों के विकास एक-दूसरे से मजबूती से जुड़े हुए हैं।

अंजीर के वृक्षों की अनेक जातियों में बर्र की परागणकारी जातियों के बीच अगाढ़ संबंध है। अंजीर की जाति केवल इसके ‘साथी’ बर्र की जाति से ही परागित हो सकती है, यह किसी बर्र की दूसरी जाति से परागित नहीं हो सकती। मादा बर्र फल को केवल अंड निक्षेपण (ovipositor) के लिये ही उपयोग में नहीं लेती, बल्कि फल के अंदर वृद्धि कर रहे बीजों के डिंबकों (larvae) के पोषण के लिये उपयोग करती है।

अंडे देने के लिये उपयुक्त स्थान की तलाश करते हुए बर्र अंजीर पुष्पक्रम को परागित करती है। इसके बदले में अंजीर अपने कुछ परिवर्धनशील बीज, परिवर्धनशील बर्र के डिंबकों को आहार के रूप में देती है। अ पुष्प प्रतिरूपों में अ श चर्य चकि त करने वाली विविधता पाई जाती है।
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इनके पुष्पों में पुष्पीय संरचना परागणकारी कीट भ्रमरों व गुंज मक्षिकाओं (Bees and Bumblebees) को आकर्षित करने के लिये ही विकसित हुए हैं ताकि इसके द्वारा निश्चित रूप से परागण हो सके। यद्यपि यह प्रवृत्ति सभी ऑर्किड पुष्पों में नहीं पायी जाती है परन्तु ऑफ्रिस (Ophrys) नामक भूमध्यसागरीय मेडिटेरिनियन ऑर्किड की एक जाति परागण कराने के लिए लैंगिक कपट (Sexual deceit) का सहारा लेती है।

इस पुष्प की एक पंखुड़ी (petal) साइज, रंग और चिन्हों में मादा मक्षिका (Bee) से मिलती-जुलती होती है। नर मक्षिका इसे मादा समझकर इसकी ओर आकर्षित होती है तथा पुष्प के साथ कूट मैथुन (Pseudo copulates) करती है। इस क्रिया के दौरान इस पर पुष्प से पराग झड़कर उस पर गिर जाते हैं।

जब यही मक्षिका अन्य पुष्प से कूट मैथुन करती है तो इसके शरीर पर लगे परागकण उस पुष्प पर गिर जाते हैं जिससे पुष्प को परागित करती है। परन्तु विकास के दौरान यदि किसी भी कारण से मादा मक्षिका का रंग-प तिरूप (Colourpattern) जरा-सा भी बदल जाता है तो परागण की सफलता कम रहेगी अतः इस कारण से ऑर्किड पुष्प अपनी पंखुड़ी को मादा मक्षिका के सदृश बनाए रखते हैं
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प्रश्न 15.
जीवोम से क्या समझते हैं? ये विभिन्न प्रकार के क्यों होते हैं? पाये जाने वाले जीवोम को सचित्र बताइये ।
उत्तर:
विश्व के मुख्य पादप समुदायों को जीवोम (Biomes ) कहते हैं । जीवोम में विभिन्नता तापक्रम, वर्षण व विभिन्न ऋतुओं के कारण होती है। प्रत्येक जीवोम के अंदर ही क्षेत्रीय और स्थलीय विभिन्नताओं के कारण आवास में व्यापक विभिन्नता होती है। भारत के प्रमुख जीवोम निम्न प्रकार से हैं-

  • मरुथल जीवोम (Desert Biome )
  • घास स्थल जीवोम (Grassland Biome)
  • उष्णकटिबंध वन जीवोम (Tropical Forest Biome)
  • शीतोष्ण वन जीवोम (Temperate Forest Biome)
  • शंकुधारी वन जीवोम (Coniferous Forest Biome)
  • उत्तरी ध्रुवीय और अल्पाइन टुंड्रा जीवोम (Arctic and Alpine Tundra Biome)

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प्रश्न 16.
जैविक अनुक्रिया के अन्तर्गत नियमन करने (Regulate) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कुछ जीव समस्थापन (Homeostasis) कार्यिकीय साधनों द्वारा बनाए रखते हैं जिसके कारण शरीर का तापमान, परासरणी सांद्रता इत्यादि स्थिर रहती है। सभी पक्षी और स्तनधारी तथा बहुत कम निम्न कशेरुकी (Lower vertebrates ) व अकशेरुकी ( invertebrates ) जातियाँ वास्तव में ताप व परासरण नियमन (Thermoregulation and Osmoregulation) बनाए रखने में सक्षम होते हैं।

विकासवादी जीव वैज्ञानिकों का यह विश्वास है कि स्तनधारियों की सफलता का मुख्य कारण यही है कि वे अपने शरीर का तापमान स्थिर बनाये रखने में सक्षम होते हैं, भले वे अंटार्कटिका में रहें या सहारा के मरुस्थल में । प्रायः स्तनधारी अपने शरीर के तापमान का नियमन उसी प्रकार करते हैं जैसे मानव करते हैं। हम शरीर का तापमान 37°C स्थिर रखते हैं।

गर्मियों के समय में जब बाहर का तापमान शरीर से अधिक हो जाता है तब हमें अधिक पसीना आता है। यह पसीना वाष्प बनकर उड़ता है उससे शरीर के तापमान का नियमन हो जाता है। सर्दियों में पर्यावरण में जब तापक्रम कम हो जाता है तब हम काँपने लगते हैं। काँपने से जो व्यायाम होता है उससे ऊष्मा पैदा होकर शरीर के ताप का नियमन होता है । परन्तु पादपों में नियमन करने का कोई तरीका नहीं होता है।

प्रश्न 17.
संरूपण रखना भी जैविक अनुक्रिया का तरीका है, इसे स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
लगभग 99% प्राणी व सभी पौधे स्थिर आंतरिक पर्यावरण बनाये रखने में सक्षम नहीं होते हैं। उनके शरीर का तापमान पर्यावरण तापमान के अनुसार बदलता रहता है। जलीय प्राणियों में तो शरीर के द्रव की परासरण सांद्रता बाहरी जल की परासरण सांद्रता के अनुसार बदलती रहती है। ये प्राणी और पौधे संरूपी (Conform ) कहलाते हैं।

संरूपी या संरूपण जैविक अनुक्रिया की विधि है। अनेक जीवों के लिये ताप नियमन ( Thermoregulation) ऊर्जा की दृष्टि से महँगा है। यह तर्क मंजोरु ( Shrews ) व गुंजन पक्षी (Humming Birds) जैसे छोटे प्राणियों के विषय में सही है। ताप हानि या ताप लाभ पृष्ठीय क्षेत्रफल ( Surface Area) का प्रकार्य है।

चूंकि छोटे प्राणियों का पृष्ठीय क्षेत्रफल उनके आयतन की अपेक्षा ज्यादा होता है, इसलिए जब बाहर ठंड होती है तो उनके शरीर की ऊष्मा बहुत तेजी से कम होती है। ऐसी स्थिति में उन्हें उपापचय (Metabolism) द्वारा शरीर की ऊष्मा पैदा करने के लिए अधिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।

यह मुख्य कारण है कि बहुत छोटे प्राणी बिरले ही ध्रुवीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं। विकास के दौरान कुछ जातियों में नियमन करने की क्षमता उत्पन्न हो गई है ( केवल सीमित परास वाले पर्यावरण परिस्थितियों में ) । यदि पर्यावरण परास ज्यादा होता है तो वे केवल संरूपण (Conform ) करते हैं।

प्रश्न 18.
जीवों में प्रवास करने (Migration) को समझाइये।
उत्तर:
जीव दबावपूर्ण आवास से अस्थायी रूप से अधिक अनुकूल क्षेत्र में चला जाए और जब दबावभरी अवधि बीत जाये तो वापस लौट आए। मानव सादृश्य में, यह नीति ऐसी है जैसे गरमी की अवधि में व्यक्ति दिल्ली से शिमला चला जाए। अनेक प्राणी, विशेषत: पक्षी, शीतऋतु के दौरान लंबी दूरी का प्रवास करके अधिक अतिथि अनुकूली क्षेत्रों में चले जाते हैं।

प्रत्येक शीतकाल में राजस्थान स्थित प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर) साइबेरिया और अन्य अत्यधिक ठंडे उत्तरी क्षेत्रों से आने वाले प्रवासी पक्षियों को अतिथि के रूप में स्वागत करता है। इस प्रकार जीवों के एक स्थान से अन्य स्थान पर जाने की प्रक्रिया को प्रवास करना कहते हैं।

प्रश्न 19
गाँसे (Gauses) के स्पर्धी अपवर्जन नियम (Competitive Exclusion Principle) को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
गाँसे ‘स्पर्धी अपवर्जन नियम’ यह बतलाता है कि एक ही तरह के संसाधनों के लिए स्पर्धा करने वाली दो निकटतम से संबंधित जातियाँ अनंतकाल तक साथ-साथ नहीं रह सकतीं और स्पर्धी रूप से घटिया जाति अंततः विलुप्त कर दी जाती है। ऐसा तभी होगा जब संसाधन सीमाकारी होंगे अन्यथा नहीं।

अधिक वर्तमान अध्ययन स्पर्धा के ऐसे घोर सामान्यीकरण की पुष्टि नहीं करते। वे प्रकृति में अंतरजातीय स्पर्धा होने को नकारते तो नहीं पर वे इस ओर ध्यान दिलाते हैं स्पर्धा का सामना करने वाली जातियाँ ऐसी क्रियाविधि विकसित कर सकती हैं जो बहिष्कार की बजाय सह अस्तित्व को बढ़ावा दे। ऐसी क्रियाविधि ‘संसाधन विभाजन है।

अगर दो जातियाँ एक ही संसाधन के लिए स्पर्धा करती हैं तो उदाहरण के लिए वे आहार के लिए भिन्न समय अथवा भिन्न चारण प्रतिरूप चुनकर स्पर्धा से बच सकती हैं। मैकआर्थर ने दिखाया कि एक ही पेड़ पर रह रहीं फुदकी (वार्बलर) की पाँच निकटत: संबंधित जातियाँ स्पर्धा से बचने में सफल रहीं और पेड़ की शाखाओं और वितान पर कीट शिकार के लिए तलाशने की अपनी चारण गतिविधियों में व्यावहारिक भिन्नताओं के कारण साथ- साथ रह सकीं।

प्रश्न 20.
सहोपकारिता के अन्तर्गत पुष्पीय पादपों में पुष्प व इसके परागणकारी जातियों के विकास एक-दूसरे से मजबूती से जुड़े होते हैं, इस कथन की पुष्टि अंजीर (Fig) पादप से कीजिए ।
उत्तर:
अंजीर के पेड़ों की अनेक जातियों में बर्र की परागणकारी जातियों के बीच मजबूत संबंध है। इसका अर्थ यह है कि कोई दी गई अंजीर जाति केवल इसके ‘साथी’ बर्र की जाति से ही परागित हो सकती है, बर्र की दूसरी जाति से नहीं। मादा बर्र फल को न केवल अंडनिक्षेपण (अंडे देने) के लिए काम में लेती है; बल्कि फल के भीतर ही वृद्धि कर रहे बीजों को डिंबकों (लार्वी) के पोषण के लिए प्रयोग करती है। अंडे देने के लिए उपयुक्त स्थल की तलाश करते हुए बर्र अंजीर पुष्पक्रम (इनफ्लोरेसेंस) को परागित करती है। इसके बदले में अंजीर अपने कुछ परिवर्धनशील बीज, परिवर्धनशील बर्र के डिंबकों को आहार के रूप में देती है।

प्रश्न 21.
सहभोजिता एवं सहपरोपकारिता में अन्तर स्पष्ट कीजिए । प्रत्येक का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
सहभोजिता (Commensalism) – इस साहचर्य में दोनों में से केवल एक को लाभ होता है लेकिन हानि किसी को नहीं होती है। अधिपादप तथा कंठलताएँ इसका उपयुक्त उदाहरण हैं। अधिपादप स्वपोषी होते हुए भी अन्य पौधों पर उगते हैं। ये वेलामेन (Velamen) मूल द्वारा आर्द्रता को ग्रहण करते हैं तथा प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं।

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उदा – वैन्डा तथा आर्किड्स । हरित शैवाल बेसीक्लेडिया (Basicladia) अलवणीय जल में पाये जाने वाले कछुए के कवच पर उगता है, यह अधिजन्तु का उदाहरण है। कंठलताएँ काष्ठीय आरोही पौधे हैं जो पृथ्वी पर उगकर अन्य पेड़ों का सहारा लेकर ऊपर चढ़ते हैं तथा उनके शीर्ष भागों पर फैल जाते हैं ताकि उन्हें उचित प्रकाश प्राप्त हो।

उदाहरण- टीनोस्पोरा, बिग्नोनिया, बोगेनविलिया आदि । सहोपकारिता (Mutualism) – इसमें दोनों जातियों को लाभ पहुँचता है तथा जीवनयापन हेतु दोनों का साथ आवश्यक है। उदाहरण-शैक, सहजीवी नाइट्रोजन स्थिर कारक, कवकमूल साहचर्य आदि । कुछ उच्च श्रेणी के पौधों की मूलों व कवक में साहचर्य होता है, इसे कवकमूल साहचर्य कहते हैं।

उदाहरण-पाइनस, ओक, हिकरी, बीच आदि। इनमें कवक जल व खनिज लवणों का अवशोषण कर पौधे को उपलब्ध करवाता है तथा मूल कवक को भोजन प्रदान करते हैं। इस प्रकार के पौधों की मूल में मूलरोमों का अभाव होता है ।

प्रश्न 22.
रेगिस्तानी पौधों की पत्तियों में पाये जाने वाले चार अनुकूलन लिखिए।
उत्तर:

  • रंध्र (stomata) गहरे गर्त में व्यवस्थित होते हैं, ताकि वाष्पोत्सर्जन (transpiration) द्वारा जल की न्यूनतम हानि हो।
  • प्रकाश संश्लेषी (सी ए एम) मार्ग भी विशेष प्रकार के होते हैं जिसके कारण वे अपने रंध्र दिन के समय में बन्द रख सकते हैं।
  • कुछ पौधों जैसे-नागफनी, कैक्टस आदि में पत्तियाँ नहीं होतीं बल्कि वे काँटे के रूप में रूपान्तरित हो जाती हैं और प्रकाश संश्लेषण का प्रकार्य चपटे तनों द्वारा होता है।

प्रश्न 23.
जीवाणु, कवक और निम्न पादप प्रतिकूल परिस्थितियों में कैसे जीवित रहते हैं? समझाइए ।
उत्तर:
जीवाणुओं, कवकों और निम्न पादपों में विभिन्न प्रकार के मोटी भित्ति वाले बीजाणु बन जाते हैं, जिससे उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित बचे रहने में सहायता मिलती है। उपयुक्त पर्यावरण उपलब्ध होने पर ये अंकुरित हो जाते हैं।

प्रश्न 24.
जहाँ पशु चरते हैं, उसके पास ही बगुले भोजन प्राप्ति के लिए रहते हैं । इस पारस्परिक क्रिया को क्या कहते हैं? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
पक्षी बगुला और चारण पशु निकट साहचर्य में रहते हैं। यह सहभोजिता (Commensalism) का अच्छा उदाहरण है। इसका कारण यह है कि जब पशु चलते हैं तो उनके खुरों से जमीन से पौधों के हिलने से कीड़े बाहर निकलते हैं। बगुले उन कीटों को आसानी से पकड़कर खा लेते हैं।

प्रश्न 25.
परभक्षण तथा परजीविता में अन्तर स्पष्ट कीजिए । उत्तर- परभक्षण व परजीविता दोनों ऋणात्मक पारस्परिक सम्बन्ध हैं क्योंकि इन दोनों परस्पर सम्बन्धों में एक जाति को लाभ होता है तो दूसरी जाति को हानि होती है। परभक्षण प्रक्रिया में एक जीव दूसरे जीव को खाता है, जैसे बाघ हिरण को खाता है, जन्तु पौधों को खाते हैं। यहाँ बाघ शिकारी है व हिरण शिकार है।

परभक्षित जीव शिकार समष्टि को नियंत्रित करते हैं। परजीविता में छोटे आकार की जाति (परजीवी) बड़ी जातियों ( पोषक) के अन्दर या उन पर जीवित रहते हैं जिससे कि वह भोजन और आश्रय ग्रहण करते हैं। परजीवी पोषक के शारीरिक द्रव्य से भोजन लेते हैं। परजीवी, परभक्षक की तरह पोषक जातियों की संख्या को सीमित करते हैं।

परजीवी पोषक विशिष्ट होते हैं, उनके पास परभक्षियों की जैसे कोई विकल्प नहीं होता। परजीवी आकार में छोटे होते हैं और इनमें परभक्षक की तुलना में उच्च जैविक/ प्रजनन सामर्थ्य होता है। परजीवियों में प्रकीर्णन के लिए विशिष्ट संरचनाओं की आवश्यकता पोषक तक पहुँचने और उन पर आक्रमण करने के लिए होती है। परभक्षक चलनशील होते हैं और शिकार को पकड़ने के लिए समर्थ होते हैं।

प्रश्न 26.
किसी आवास में समष्टि के घनत्व के घटने-बढ़ने के चार मूलभूत प्रक्रमों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समष्टि के घनत्व के घटने-बढ़ने के चार मूलभूत प्रक्रम निम्न प्रकार से हैं-

  • जन्मदर – जन्म दर से तात्पर्य समष्टि में जन्मी उस संख्या से है जो दी गई अवधि के दौरान आरम्भिक घनत्व में जुड़ती है।
  • मृत्युदर – यह दी गई अवधि समष्टि में होने वाली मौतों की संख्या है।
  • आप्रवासन – उसी जाति के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समय अवधि के दौरान आवास में कहीं और से आये हैं।
  • उत्प्रवासन – समष्टि के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समयावधि के दौरान आवास छोड़कर कहीं और चले गये हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिए-
(क) परभक्षण
(ख) स्पर्धा
(ग) मृदा ।
उत्तर:
(क) परभक्षण (Predation) – यदि किसी समुदाय में पौधों को खाने वाले प्राणी न हों तो स्वपोषी जीवों द्वारा स्थिर की गई संपूर्ण ऊर्जा व्यर्थ होगी। प्राणियों के द्वारा पौधे खाये जाते हैं तथा ऊर्जा को उच्चतर पोषी स्तरों में स्थानांतरित करते हैं। परभक्षण वे होते हैं जो अन्य जीवों का भक्षण या खाते हैं।

यद्यपि पौधों को खाने वाले जीवों को शाकाहारी कहते हैं परंतु सामान्य पारिस्थितिक संदर्भ में वे भी परभक्षी जैसे होते हैं। परभक्षी पोषी स्तर तक ऊर्जा स्थानांतरण के लिये संनाल (Conduits) का कार्य करने के अतिरिक्त वे शिकार समष्टि को नियंत्रित रखते हैं। यदि प्रकृति में परभक्षी नहीं होते तो शिकार जातियों का समष्टि घनत्व बहुत अधिक हो जाता और परितंत्र में अस्थिरता आ जाती।

जब भी किसी भौगोलिक क्षेत्र में कुछ विदेशज जातियाँ लाई जाती हैं तो वे आक्रामक होकर तेजी से फैलने लगती हैं क्योंकि उन स्थानों पर उसके प्राकृतिक परभक्षी नहीं होते हैं। सन् 1920 के आरंभ में आस्ट्रेलिया में लाई गई नागफनी ने वहाँ लाखों हेक्टेयर भूमि में तेजी से फैलकर तबाही मचा दी।

अंत में नागफनी को खाने वाले परभक्षी (एक प्रकार का शलभ) को लाकर आक्रामक नागफनी को नियंत्रित किया जा सका। परभक्षी, स्पर्धी शिकार जातियों के बीच स्पर्धा की तीव्रता कम करके किसी समुदाय में जातियों की विविधता (diversity) बनाए रखने में भी सहायता करता है।

उदाहरणार्थ, अमेरिकी प्रशांत तट की चट्टानी अंतराज्वारीय (intertidal) समुदायों में पाइसैस्टर तारामीन एक महत्त्वपूर्ण परभक्षी है। प्रयोग में जब एक बंद अंतराज्वारीय क्षेत्र से सभी तारामीन को हटा दिया गया तो अंतराजातीय स्पर्धा के कारण एक वर्ष में ही अकशेरुकियों की 10 से अधिक जातियाँ विलुप्त हो गईं।

यदि परभक्षी ज्यादा ही दक्ष है तो वह अपने शिकार का अतिदोहन करता है जिससे शिकार विलुप्त हो जायेगा परंतु जब शिकार का अभाव हो जायेगा तो परभक्षी भी शिकार न मिलने के कारण विलुप्त हो जायेगा। प्रकृति में शिकारी जातियों ने परभक्षण के प्रभाव को कम करने के लिये विभिन्न रक्षा विधियाँ विकसित कर ली हैं।

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कीटों और मेढ़कों की कुछ जातियों ने परभक्षी से बचने के लिये गुप्त रूप से रंगीन (छद्मावरण) हो जाती हैं, जिससे परभक्षी उन्हें पहचान नहीं पाता। कुछ शिकार जातियाँ विषैली होती हैं, इसके कारण परभक्षी उनका भक्षण नहीं करते। मॉनार्क तितली के शरीर में विशेष रसायन होने के कारण स्वाद में खराब होती है, इस कारण परभक्षी उन्हें नहीं खाते हैं।

यह तितली इस रसायन को अपनी इल्ली अवस्था में विषैली खरपतवार खाकर प्राप्त करती है। पौधों के लिये शाकाहारी प्राणी परभक्षी होते हैं। लगभग 25% कीट पादपभक्षी (phytophagous) होते हैं अर्थात् वे पादप रस या पादपों के अन्य भाग खाते हैं। पादपों के लिये परभक्षी से बचने के लिये एक समस्या है क्योंकि वे प्राणियों की जैसे भाग नहीं सकते। इस कारण पौधों ने शाकाहारियों से बचने के लिये आकारिकीय और रासायनिक रक्षाविधियाँ विकसित कर ली हैं।

आकारिकीय रक्षाविधियों का उदाहरण एकेशिया (Acacia) व कैक्टस (Cactus) में कांटे हैं। रासायनिक रक्षाविधियों में अनेक पादप ऐसे रसायन उत्पन्न कर एकत्रित कर लेते हैं जो कि शाकाहारी द्वारा खाये जाने पर, उन्हें बीमार कर देते हैं, पाचन का संदमन करते हैं, उनके जनन को भंग कर देते हैं या मार देते हैं।

प्रायः खाली खेतों में आकड़ा या मदार (Calotropis) की खरपतवार उगी रहती है, उसे कोई भी पशु नहीं खाता है क्योंकि इस पौधे में विषैला ग्लाइकोसाइड (glycoside) उत्पन्न होता है। विविध प्रकार के पौधों से अनेक प्रकार के व्यापारिक स्तर पर रासायनिक पदार्थ जैसे-निकोटीन, कैफीन, क्वीनीन, स्ट्रिकनीन, अफीम इत्यादि प्राप्त करते हैं। इन रसायनों के कारण पशु इन्हें नहीं खाते हैं तथा पौधे शाकाहारी प्राणियों से अपनी रक्षा करते हैं।

(ख) स्पर्धा (Competition)-डार्विन ने प्रकृति में जीवनसंघर्ष और योग्यतम की उत्तरजीविता के विषय में बताते हुये कहा कि जैव-विकास में अंतरजातीय स्पर्धा (interspecific competition) एक शक्तिशाली कारक है। वस्तुतः स्पर्धा प्रायः तब होती है जब निकट रूप से संबंधित जातियाँ उन्हीं संसाधनों के लिये स्पर्धा करती हैं जो सीमित हैं।

किन्तु यह सत्य नहीं है कि एक ही जाति के जीव आपस में प्रतिस्पर्धा रखें। डार्विन के अनुसार भोजन व स्थान के लिये विभिन्न समष्टियों के जीव भी स्पर्धा रख सकते हैं। उदाहरणार्थ, दक्षिण़ी अमेरिका की कुछ उथली (कम गहरी) झीलों में आगुंतक फ्लेमिंगो और वहीं क्री रहने वाली मछलियां दोनों ही झील में मिलने वाले प्राणिप्लवक (Zooplankton) के लिये प्रतिस्पर्धा करते हैं।

स्थान व खाद्य सामग्री पर्याप्त होने पर भी यह देखा गया है कि स्पर्धा में एक समष्टि के प्राणी बाधित हो जाते हैं क्योंकि दूसरी समष्टि के जीव अधिक आक्रामक होते हैं जिससे वे पहली जाति के जीवों को उपलब्ध स्थान व भोजन का उपयोग नहीं करने देते हैं। प्रकृति में यह देखा गया है कि एक जाति की योग्यता अधिक बढ़ने पर वह दूसरी जाति के जीवों को कम कर सकती है परन्तु उन्हें विलुप्त नहीं कर पाती।

यद्यपि प्रकृति में ऐसे उदाहरण हैं कि योग्य जाति दूसरी जाति को समाप्त कर देती है। गैलापेगो द्वीप में एबिंगडन (Abingdon) कहुए अधिक संख्या में पाये जाते थे परंतु जब बकरियाँ पहुँचीं तो उन्होंने अधिक चरने के कारण सारे पौधे समाप्त कर दिये जिससे 10 साल में ही कछुए समाप्त हो गये। प्रतिस्पर्धा का एक अन्य प्रमाण स्पर्धी मोचन (competitive release) है।

यदि एक योग्य जाति है जिसने अपने से कम योग्य जाति को स्थान विशेष में सीमित कर रखा है व किसी भी कारण से यदि योग्य जाति नष्ट हो जाती है व उस स्थान से प्रवास कर जाती है तो दूसरी जाति स्पर्धा के अभाव में उस पूरे क्षेत्र में फैल कर समष्टि घनत्व बढ़ा सकती है। गॉसे (Gause) का स्पर्धी अपवर्जन नियम (Competitive exclusion principle) यह बताता है कि एक ही प्रकार के संसाधनों के लिये

स्पर्धा करने वाली दो निकटतम संबंधित जातियाँ लंबे समय तक साथ-साथ नहीं रह सकतीं और स्पर्धी रूप से कमजोर जाति बाद में समाप्त हो जाती है। गॉसे का यह नियम केवल तब ही लागू होगा जब स्थान या भोजन सीमाकारी (limiting) हो जायेंगे अन्यथा स्पर्धा  का यह नियम लागू नहीं होगा।

आधुनिक अध्ययन से यह भी ज्ञात हुआ है कि जब दो जातियाँ स्पर्धा करती हैं तब एक विलुप्त नहीं होती वरन् यह इस प्रकार के अनुकूलन विकसित कर लेती है जिससे दोनों का एक साथ अस्तित्व बना रहता है। इस प्रकार की क्रियाविधि को ‘संसाधन विभाजन’ कहते हैं। यदि दो जातियां एक ही संसाधन के लिये स्पर्धा करती हैं तो वे आहार के लिये भिन्न समय या भिन्न चारण प्रतिरूप चुनकर स्पर्धा से बच सकती हैं।

मैक आर्थर (Mac Arthur) ने बताया कि एक ही पेड़ पर रह रही फुदकी (Warblers) की पांच जातियां स्पर्धा से बचने में सफल रहीं और पेड़ की शाखाओं और वितान पर कीट शिकार के लिये तलाशने की अपनी चारण गतिविधियों में व्यावहारिक भिन्नताओं के कारण साथ-साथ रह सकीं।

मृदा (Soil)-भूमि की ऊपरी उपजाऊ सतह को मृदा कहते हैं। पौधों तथा जंतुओं के लिए मृदा प्राकृतिक आवास होता है। जीवधारियों को मृदा से जल एवं खनिज लवण प्राप्त होते हैं। विभिन्न स्थानों की मृदा की प्रकृति और गुण में भिन्नता होती है। मृदा का निर्माण कठोर चट्टानों के अपक्षय (weathering) के कारण होता है। यह अपक्षय प्रक्रिया भौतिक, रासायनिक व जैविक प्रकार की होती है।

इन अपक्षयित पदार्थों से मृदा का निर्माण होता है जिसे मृदाजनन (Pedogenesis) कहते हैं। इन कणों में अनेक जीवधारी व पादपों के भाग (पत्तियां, जड़ें, भूमिगत भाग इत्यादि) मृत्यु के पश्चात् कार्बनिक पदार्थों में रूपातंरित होकर मिल जाते हैं जिससे वास्तविक मृदा या उर्वर मृदा का निर्माण होता है। निर्माण के आधार पर मृदा दो प्रकार की होती-
(i) अवशिष्ट मृदा (Residual soil) – जिन चट्टानों के अपक्षय से मृदा कण बनते हैं, यदि वह मृदा उसी स्थान पर रहती है तो उसे अवशिष्ट मृदा कहते हैं।

(ii) वाहित मृदा (Transported soil) – निर्माण स्थल से जब मृदा किन्हीं कारकों द्वारा अन्य स्थानों पर पहुंच जाती है तो उसे वाहित मृदा कहते हैं। हवा द्वारा लायी गयी मृदा इओलियन मृदा (Eolian soil), गुरुत्व द्वारा लायी गई मृदा कोल्युवियल मृदा (Colluvial soil), जल द्वारा बहाकर लायी गई मृदा को एल्युवियल मृदा (Alluvial soil) तथा ग्लेशियरों के पिघलने से लायी गयी मृदा ग्लेसियल मृदा (Glacial soil) कहते हैं।

मृदा का अध्ययन विज्ञान की जिस शाखा में किया जाता है उसे मृदा विज्ञान (Pedology) कहते हैं। मृदा के तीन संस्तर (horizon) होते हैं-

  • शीर्ष मृदा (Top soil or ‘A’-horizon)-यह मृदा की सबसे ऊपरी परत है जिसमें बालू (sand) और ह्यूमस (humus) होता है। पौधों की जड़ें प्राय: इसी संस्तर में रहती हैं।
  • उपमृदा (Subsoil or ‘B’-horizon)-शीर्ष मृदा के नीचे वाले स्तर को उपमृदा कहते हैं, इसमें चिकनी मिट्टी होती है। वर्षा का जल रिसकर इस स्तर में एकत्रित होता रहता है। इसमें ह्यूमस व वायु की मात्रा कम होती है तथा इस संस्तरण में जीव भी नहीं पाये जाते हैं।
  • ‘C’ संस्तर (C’-horizon) – यह संस्तर ‘B’ के नीचे होता है। इसमें अपूर्ण क्षरित चट्टानें होती हैं तथा ह्यूमस एवं सूक्ष्मजीवों का अभाव होता है। इस संस्तर के नीचे बिना अपक्षयित मातृ चट्टानें होती हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित को समझाइये-
(क) समतापीय प्राणियों में उच्चताप के प्रति होने वाली अनुक्रियायें ।
(ख) चारघातांकी वृद्धि को सचित्र बताइये ।
उत्तर:
(क) समजात प्राणियों में उच्च ताप के प्रति होने वाली अनुक्रियाएँ – समतापीय प्राणियों में उच्च ताप के प्रति होने वाली अनुक्रियाएँ ( responses ) निम्न प्रकार से होती हैं-
(1) कम उपत्वचीय वसा (Less subcutaneous fat) – वे प्राणी जो प्रायः अधिक ताप वाले क्षेत्रों में रहते हैं, उनमें त्वचा में संचित वसा की मात्रा कम होती है। इसी कारण रेगिस्तानी प्राणियों में वसा कूबड़ (hump) में उपस्थित होती है।

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(2) लोमचर्म का झुकना (Lowerdown of pelage) – उत्थापक पेशी के शिथिलन के कारण, लोमचर्म पुनः सामान्य हो जाता है जिससे रोम के मध्य कोई वायु नहीं रहती है। इस कारण ऊष्मा का ह्रास विकिरणों के रूप में हो जाता है परन्तु ताप के और अधिक बढ़ जाने के कारण ऊष्मा का ह्रास विकिरणों के रूप में नहीं होता है बल्कि त्वचा अवरोधक का कार्य करती है।

(3) पृष्ठीय रक्तवाहिनियों का प्रसारित होना (Dialation of superficial blood vessels) – पृष्ठीय रक्तवाहिनियों के प्रसारित होने से रक्त समूह के निकट आ जाता है, जिससे वातावरण में ऊष्मा का ह्रास हो जाता है, सेतु वाहिनियाँ संकुचित हो जाती हैं, जिससे कुल रक्त का आयतन बढ़ जाता है। इस कारण भी सतह पर रक्त का प्रभाव बढ़ जाता है।

(4) पसीने का स्राव ( Secretion of Sweat ) – शरीर का ताप बढ़ने के साथ ही स्वेद ग्रंथियों द्वारा पसीने का स्राव होता है, जिसके वाष्पीकरण से शरीर का तापमान कम हो जाता है। वाष्पीकरण की दर प्रवाहित वायु के द्वारा भी प्रभावित होती है। इस क्रिया में ऊष्मा का ह्रास फेफड़ों से वाष्पीकरण द्वारा होता है, साथ ही रक्त के फुफ्फुसीय कोशिकाओं (pulmonary capillary) में प्रवाहित होने के कारण, ऊष्मा का कुछ ह्रास रक्त के द्वारा भी होता है।

(5) उपापचय का मंद होना (Fall of metabolism) – तापमान अधिक होने से प्राणियों में उपापचय दर कम हो जाती है व कम ऊष्मा का उत्पादन होता है। अतः ये प्राणी कम सक्रिय रहते हैं। स्तनधारियों में ताप का नियमन हाइपोथेलेमस द्वारा होता है। इसके अतिरिक्त इन प्राणियों में लम्बे कान होते हैं, जो एक रेडियेटर का कार्य करते हैं व ये रात्रिचर आवास के होते हैं।

(ख) चरघातांकी वृद्धि (Exponential growth) को सचित्र बताइये –
समष्टि में व्यष्टियों की संख्या का बढ़ना समष्टि वृद्धि (Population growth) कहलाता है। वैसे किसी भी जाति के लिये समष्टि का आकार स्थितिक (static) नहीं होता है। यह समय-समय पर बदलता रहता है जो विभिन्न कारकों जैसे आहार उपलब्घता, परभक्षण दाब और मौसमी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

यदि उपरोक्त दशाएँ अनुकूल होती हैं तो समष्टि की वृद्धि होती है परंतु प्रतिकूल दराओं के होने पर समध्टि की हानि होती है। किसी आवास में समष्टि का घनत्व चार मूलभूत प्रक्रमों में घटता व बढ़ता है। इन चारों में से जन्म दर व आप्रवासन (migration) समष्टि घनत्व को बढ़ाते है अरकि मृत्युदर तथा उत्प्रवासन (Emigration) इसे घटाते हैं।
(i) जन्म दर (Natality) समस्त जीव प्रजनन क्रिया द्वारा अपनी संतति में वृद्धि करके समष्टि में वृद्धि करते हैं अतः एक निश्चित अवधि में किसी समष्टि द्वारा उत्पन्न नये जोवों की औसत संख्या को उस समष्टि की जन्म दर कहते हैं।

(ii) मृत्यु दर (Death rate or Mortality)—समष्टि में सभी जीव एक निश्चित समय उपरांत मरते हैं अतः एक निश्चित अव्वि में समष्टि में मरने वाले जीवों की संख्या को मृत्यु दर कहते हैं। इससे समष्टि में कमी आती है।

(iii) आप्रवासन या अन्तःप्रवास (Immigration)- किसी स्थान पर एक जाति के जीवों का आगमन अन्तःप्रवास कहलाता है। इस प्रकार के प्रवास में किसी क्षेत्र में अंदर की ओर केवल एक तरफ गति होती है। इस प्रक्रिया फलस्वरूप आये हुये जीव वापस न तो लौटते हैं व न ही इरादा रखते हैं।

(iv) उत्प्रवासन या बहि:प्रवास (Emigration)-इस प्रक्रिया में जीवों का गमन आवास को छोड़कर अन्य स्थान की ओर होता है या एक देश से दूसरे देश की ओर होता है। अतः एक क्षेत्र से जाति के निकास को उत्प्रवासन कहते हैं। यह निकास स्थायी होता है क्योंकि ये जीव वापस पूर्व स्थान की और नहीं लौटते हैं।

इसलिये यदि समय t पर समष्टि धनत्व N है तो समय t+I पर इसका घनत्व
Nt+I = N1 + [(B+I) -(D+E)]
N1 = एक समय पर समष्टि घनत्व, B = जन्म दर (Birth rate), I = आप्रवासन (Immigration), D = मृत्यु दर (Death rate), E = उत्त्रवासन (Emigration) है।

उपरोक्त समीकरण को देखने पर हम यह कह सकते है कि यदि जन्मदर व आप्रवासन अधिक हो रहा है तब समष्टि घनत्व बढ़ जायेगा परंतु मृत्युदर व उत्त्रवासन अधिक होने पर समष्टि घनत्व घट जायेगा। सामान्यतः समष्टि घनत्व को जन्म दर व मृत्यु दर ही प्रभावित करते हैं। उत्प्रवासन व आप्रवासन इसे कम प्रभावित करते हैं परंत ऐसे समय में जब कहीं नया आवास बना हो तब वहाँ का समष्टि घनत्व जन्म दर से न बढ़कर बल्कि आप्रवासन से बढ़ेगा।
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वृद्धि मॉडल (Growth Model)-वृद्धि मॉडल के दो प्रारूप होते हैं-चरघातांकी वृद्धि तथा संभार तंत्र वृद्धि।

(अ) चरघातांकी वृद्धि (Exponential growth)-किसी भी समष्टि की निरंतर वृद्धि के लिये पर्याप्त संसाधन (आहार और स्थान) उपलब्ध होना आवश्यक है। यदि यह दोनों उपलब्ध हैं तब समष्टि की वृद्धि अबाधित रूप से चलती रहेगी। इसे डार्विन ने अपने प्राकृतिक वरण के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुये बताया था। ऐसी स्थिति में समष्टि चरघातांकी या ज्यामितीय (geometrical) शैली में वृद्धि करती है। यदि समष्टि घनत्व N में प्रति व्यक्ति जन्म दर को b से व प्रति व्यक्ति मृत्यु दर को d से दर्शाएं तब दिये गये समय t में वृद्धि की कमी या अधिकता को निम्न समीकरण द्वारा दर्शा सकते हैं-
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r = प्राकृतिक वृद्धि की इंट्रीन्जिक दर (intrinsic rate of natural increase) कहते हैं।
N = समष्टि का आकार
r का मान अलग-अलग समष्टियों के लिये अलग-अलग होता है, जैसे नार्वे चूहे के लिये r 0.015, आटा भृंग (floor betel) के लिये 0.12 तथा मानव आबादी के लिये 0.0205 होता है (1981 की गणना के अनुसार)। उपरोक्त दी गई समीकरण समष्टि के चरघातांकी था ज्यामितीय वृद्धि को बताता है।
और जबN को समय के संदर्भ में आरेखित करते हैं तो इससेJ-आकार का वक्र बनता है। अतः हम चरघातांकी समीकरण समाकलीय रूप से निम्न प्रकार से बता सकते हैं-
Nt = Noert
Nt  = समय t में समष्टि घनत्व
No = समय शून्य में समष्टि घनत्व

r = प्राकृतिक वृद्धि की इंट्रीन्जिक दर (आंतरिक दर)
e = प्राकृतिक लघुगणकों (logarithms) का आधार (2.71828)
असीमित संसाधन परिस्थितियों में चरघातांकी रूप से वृद्धि करने वाली कोई भी जाति कुछ ही समय में विशाल समष्टि घनत्वों तक पहुंच सकती है। डार्विन ने बताया कि हाथी जैसा धीमे बढ़ने वाला प्राणी, किसी प्रकार की रोक न होने पर विशाल संख्या तक पहुँच सकता है।
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(ब) संभार तंत्र (Logistic growth)-प्रकृति में किसी भी समष्टि के पास इतने असीमित संसाधन नहीं होते जिससे कि चरघातांकी वृद्धि होती रहे। इसके कारण सीमित संसाधनों के लिये व्यष्टियों में प्रतिस्पर्धा होती है। प्रतिस्पर्धा के कारण अन्त में ‘योग्यतम’ व्यष्टि जीवित रह पाती है और जनन करती रहती है। इस प्रकार के वृद्धि प्रारूप में समष्टि की सजीव संख्या में प्रारम्भ में तो धीरे-धीरे वृद्धि होती है, इसे पश्चता प्रावस्था (Lag Phase) कहते हैं।

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परन्तु इसके पश्चात् वृद्धि की दर तेजी से बढ़ती है। समष्टि की तेजी से वृद्धि होने पर वातावरणीय प्रतिरोध बढ़ जाने के कारण एक संतुलन स्तर या स्थिर अवस्था (Stationary Phase) स्थापित हो जाती है। यदि इस प्रकार की वृद्धि प्रदर्शित कर रही समष्टि एवं समय के मध्य एक आरेख बनाया जावे तो एक S – आकार का वक्र बनता है। इस वक्र को सिग्माइड वक्र (Sigmoid curve) कहते हैं। इस प्रकार की समष्टि वृद्धि विर्हुस्ट-पर्ल लॉजिस्टिक वृद्धि (Verhulst-Pearl logistic growth) कहलाती है। इसे निम्न समीकरण द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है-
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अधिकतर प्राणियों की समष्टियों में वृद्धि हेतु संसाधन सीमित होते हैं और धीरे-धीरे और अधिक सीमित होते जायेंगे। इस कारण से लॉजिस्टिक वृद्धि मॉडल को अधिक यथार्थपूर्ण माना जाता है।

प्रश्न 3.
पारिस्थितिकी के जैविक कारकों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर:
सजीवों के समस्त जैविक क्रियाओं तथा अन्योन्यक्रियाओं के प्रभाव को जैविक कारक कहते हैं। ओडम ने समस्त जैविक सम्बन्धों को धनात्मक तथा ऋणात्मक अन्योन्यक्रियाओं में बाँटा है।
I. धनात्मक अन्योन्यक्रियाएँ (Positive interactions ) – इस प्रकार की क्रियाओं में एक या दोनों जातियों को लाभ पहुँचता है। ये तीन प्रकार की होती हैं-
(अ) सहोपकारिता (Mutualism) – इसमें दोनों जातियों को लाभ पहुँचता है तथा जीवनयापन हेतु दोनों का साथ आवश्यक है। उदा. – शैक, सहजीवी नाइट्रोजन स्थिर कारक, कवकमूल साहचर्य आदि । कुछ उच्च श्रेणी के पौधों की मूलों व कवक में साहचर्य होता है, इसे कवकमूल साहचर्य कहते हैं। उदा. पाइनस, ओक, हिकरी, बीच · आदि। इनमें कवक जल व खनिज लवणों का अवशोषण कर पौधे को उपलब्ध करवाता है तथा मूल कवक को भोजन प्रदान करते हैं। इस प्रकार के पौधों की मूल में मूलरोमों का अभाव होता है।

(ब ) प्राक् सहयोगिता (Protocooperation)-इसमें दोनों समष्टियों को लाभ होता है परंतु जीवनयापन हेतु साथ रहना आवश्यक नहीं होता है। उदा. समुद्री एनिमोन तथा हर्मिट केंकड़े के बीच इसी प्रकार का सम्बन्ध होता है। समुद्री एनिमोन केंकड़े के कवच से चिपका रहता है जो इसे भोजन के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है तथा समुद्री एनिमोन अपनी दंश कोशिकाओं के हर्मिट केंकड़े को शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
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(स) सहभोजिता (Commensalism) – इस साहचर्य में दोनों में से केवल एक को लाभ होता है लेकिन हानि किसी को नहीं होती है। अधिपादप तथा कंठलताएँ इसका उपयुक्त उदाहरण हैं। अधिपादप स्वपोषी होते हुए भी अन्य पौधों पर उगते हैं। ये वेलामेन (Velamen) मूल द्वारा आर्द्रता को ग्रहण करते हैं तथा प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं।

उदा.- वैन्डा तथा आर्किड्स । हरित शैवाल बेक्लेडिया (Basicladia) अलवणीय जल में पाये जाने वाले कछुए के कवच पर उगता है, यह अधिजन्तु का उदाहरण है। कंठलताएँ काष्ठीय आरोही पौधे हैं जो पृथ्वी पर उगकर अन्य पेड़ों का सहारा लेकर ऊपर चढ़ते हैं तथा उनके शीर्ष भागों पर फैल जाते हैं ताकि उन्हें उचित प्रकाश प्राप्त हो उदा. टीनोस्पोरा, बिग्नोनिया, बोगेनविलिया आदि ।

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II. ऋणात्मक अन्योन्यक्रियाएँ (Negative interactions) – इस प्रकार का सहजीवन जिसमें एक या दोनों जीव को हानि पहुँचती है। इन्हें ऋणात्मक अन्योन्यक्रियाएँ या विरोध ( antagonism) कहते हैं। ऐसे सम्बन्धों को तीन वर्गों में विभक्त किया गया है –
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(अ) शोषण (Exploitation) – इसमें एक जीव अन्य जीव को आधार, आश्रय या भोजन हेतु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उपभोग करके हानि पहुँचाता है। भोजन के लिए शोषण दो प्रकार का होता है-
(i) परजीविता (Parasitism) – वे जीव जो भोजन के लिए अन्य जीव पर निर्भर रहते हैं, उन्हें परजीवी कहते हैं तथा जिससे भोजन प्राप्त करते हैं उसे परपोषी (host) कहते हैं। परजीवी, परपोषी से चूषकांग (haustoria) की सहायता से भोजन चूसते हैं।

परजीवी दो प्रकार के होते हैं- बाह्य परजीवी (Ectoparasite) – ऐसे परजीवी, परपोषी के बाहर रहते हैं किन्तु चूषकांगों को परपोषी की कोशिका में प्रवेश करा देते हैं। उदा. – अमरबेल, कसाईथा (Cassytha) आदि । ऐसे परजीवी जब परपोषी की मूलों से भोजन प्राप्त करते हैं तो मूल परजीवी कहलाते हैं।

ये आंशिक या पूर्ण मूल परजीवी हो सकते हैं, जैसे चंदन, शीशम, सीरस की जड़ों पर आंशिक परजीवी होता है। स्ट्राइगा घासों पर तथा ऑरोबैंकी, सोलेनेसी व क्रूसीफेरी कुल के पादपों की जड़ों पर पूर्ण मूल परजीवी होते हैं। वे परजीवी जो परपोषी के स्तम्भ से अपना भोजन प्राप्त करते हैं, जैसे अमरबेल, बेर, आक आदि पर पूर्ण स्तम्भ परजीवी होता है ।

कसाई था नीम पर पूर्ण स्तम्भ परजीवी तथा लोरेन्थस व विस्कम क्रमशः बोसविलीया (Boswellia) व पाइनस पर आंशिक स्तम्भ परजीवी होता है। अन्त: परजीवी (Endoparasite ) – इसमें परजीवी, परपोषी की कोशिकाओं के अन्दर रहते हैं, जैसे विषाणु, जीवाणु, माइकोप्लाज्मा आदि।

(ii) परभक्षिता (Predation ) – कुछ जीव अन्य जीवों को भोजन के लिए उपयोग करते हैं। प्रायः परभक्षी जन्तु होते हैं जो शाकाहारी या मांसाहारी हो सकते हैं। कवक डेक्टिलेला तथा जुफेगस आदि कीटों, गोलकृमि आदि को खाते हैं। कुछ कीटभक्षी पादप जैसे नेपेन्थीज, ड्रोसेरा, यूट्रीकुलेरिया, डायोनिया आदि प्रायः नाइट्रोजन की कमी व जलाक्रांत मृदा में उगते हैं। ये पौधे अपने विशेष अंगों की सहायता से कीटों को खाते हैं।

(ब) प्रतिजीविता (Antibiosis ) – इसमें एक जीव द्वारा कुछ रासायनिक पदार्थों का स्रवण किया जाता है जिससे दूसरे जीव की वृद्धि पूर्ण या आंशिक रूप से अवरुद्ध हो जाती है या उसकी मृत्यु हो जाती है, इसे प्रतिजीविता कहते हैं। कुछ उच्च श्रेणी पादपों की जड़ों से ऐसे रसायनों का स्रवण होता है जिससे दूसरे जाति के पौधों के बीजों के अंकुरण संदमित हो जाते हैं, इसे एलीलोपैथी (allelopathy) कहते हैं। उदा.- एरिस्टिडा घास फीनोल जैसे पदार्थों का स्रवण कर नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणु व शैवालों की वृद्धि को रोक देती है ।
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(स) स्पर्धा (Competition ) – पर्यावरण की समान आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए जीवों में स्पर्धा उत्पन्न होती है। यह स्पर्धा मुख्यतः जल, प्रकाश, पोषक तत्वों व आश्रय के लिए होती है। यह स्पर्धा जब एक ही जाति के पादपों के बीच होती है तो उसे अन्तरजातीय स्पर्धा कहते हैं। दो भिन्न जातियों के बीच होने वाली स्पर्धा को अन्तरजातीय स्पर्धा कहा जाता है।

प्रश्न 4.
तापमान पौधों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
सामान्यतः पौधे 0° से. से 52° से. तापमान परिसर में अपनी समस्त जैविक क्रियाओं को संचालित करते हैं किन्तु 20° से. से 30° से. का तापमान पादप वृद्धि हेतु अनुकूल होता है। तापमान पौधों को अग्र प्रकार से प्रभावित करता है-
1. उपापचयी क्रियाएँ (Metabolic activities) – जीवों की समस्त उपापचयी क्रियायें तापमान की एक निश्चित परास के अन्दर एन्जाइमों की सहायता से होती हैं। प्रत्येक 10° से. तापमान बढ़ने पर रासायनिक क्रिया दुगुनी हो जाती है। इसे Q10 या तापमान गुणांक कहते हैं। अधिक ताप पर एन्जाइम विकृत हो जाते हैं।

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2. वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)- अधिक तापमान पर वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है तथा कम तापमान पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

3. अवशोषण (Absorption ) – स्थलीय पौधों में जड़ों द्वारा अवशोषण 20° से. से 30° से. के बीच सबसे अधिक होता है। 0° से. के आसपास अवशोषण प्रायः रुक जाता है। 0° से. पर जल बर्फ में बदल जाता है। इस प्रकार के आवास स्थल कार्यिकी शुष्क होते हैं।

4. प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis ) – प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया प्राय: 5° से. ताप पर आरम्भ हो जाती है किन्तु इस क्रिया के लिए अनुकूलतम तापमान 10° से. से 30° से. है। एक सीमा तक ताप वृद्धि के पश्चात् प्रकाश संश्लेषण क्रिया में भारी गिरावट आती है क्योंकि अधिक ताप पर प्रकाश संश्लेषणीय एन्जाइम्स विकृत हो जाते हैं।

5. श्वसन (Respiration ) – श्वसन क्रिया पर तापमान का प्रभाव 0° से. से 40° से. के मध्य होता है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता जाता है श्वसन दर कम हो जाती है। इसमें भी उच्च ताप पर श्वसनीय एन्जाइम नष्ट हो जाते हैं।

6. गति ( Movement ) – पौधों में तापानुचलनी (thermotactic) व तापानुकुंचनी ( thermonastic ) गतियाँ ताप के उद्दीपन के कारण होती हैं।

7. तापकालिता (Thermoperiodism ) – पौधों की कुछ कार्यिक क्रियायें तापमान के दैनिक चक्र द्वारा प्रभावित व नियंत्रित होती हैं। उदाहरण के लिए, टमाटर में पुष्पन तभी होता है जब तापमान परास (range) 18° से. से 26° से. के बीच की होती है। इस प्रकार के तापक्रम को तापकालिता कहते हैं।
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8. बसन्तीकरण (Vernalisation)- कुछ पौधों में पुष्पों का निर्माण न्यून ताप पर होता है। बीज पर शीत या न्यून ताप का प्रयोग द्वारा पुष्पीकरण शीघ्र प्राप्त करने की क्रिया को बसन्तीकरण कहते हैं, किन्तु इसके लिए ऑक्सीजन की उपस्थिति आवश्यक है। वैज्ञानिकों के अनुसार बसन्तीकरण में वर्नेलिन नामक पदार्थ बनता है जो फ्लोरीजन (florigen ) या जिबरेलिन (gibberellin) में परिवर्तित हो जाता है। यह पुष्पीकरण को समय से पूर्व प्रारम्भ करने के लिए उत्तरदायी होता है।

9. पादप वृद्धि पर प्रभाव (Effect on plant growth) – अधिक व कम ताप दोनों ही पादप वृद्धि को अधिक प्रभावित करते हैं। न्यून या कम ताप से पौधों में तीन प्रकार की शीत क्षति (cold injury) हो सकती है-

  • निर्जलीकरण (dessication),
  • द्रुतशीतलन क्षति (chilling injury) तथा
  • प्रशीतलन क्षति ( freezing injury)

प्राय: 40° से. ताप पर जीवद्रव्य न्यूनतम क्रिया करने लगता है तथा 90° से. पर निष्क्रिय या मृत हो जाता है। इसे ऊष्मा क्षति (heat injury) कहते हैं। अतः न्यून या उच्च तापक्रम पर पौधे या तो प्रसुप्त रहते हैं या फिर मृत हो जाते हैं। अनेक मरुस्थलीय पौधे आकारिकीय, शारीरिकीय व कार्यिकीय अनुकूलन उत्पन्न कर 66° से. ताप पर भी जीवित रहते हैं। इन पौधों को ऊष्मा प्रतिरोध (heat resistant) कहते हैं। यद्यपि हवा में सूखी यीस्ट कोशिकाएँ 114° से. तथा जीवाणु 120° से. से 130° से. तक कार्यशील बने रह सकते हैं। कुछ कवक तो 89° से. ताप पर भी जीवित रहते हैं।

10. वनस्पति के विस्तार पर प्रभाव (Effect on distribution of vegetation) – तापक्रम का वनस्पति के विस्तारण पर भी प्रभाव पड़ता है । ताप के आधार पर समस्त वनस्पति को उच्चतापी, मध्यतापी, निम्नतापी तथा अतिनिम्नतापी या हैकिस्टोथर्म में विभक्त किया गया है। भूमध्य रेखा से उत्तरी या दक्षिणी ध्रुवों की ओर जैसे-जैसे अक्षांश बढ़ते जाते हैं त्यों- त्यों तापमान कम होता जाता है। इसी प्रकार समुद्र से पहाड़ों की ओर ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान कम होता जाता है। दोनों ओर लगभग समान प्रकार की वनस्पति समूह मिलते हैं जैसे उष्णकटिबन्धीय वर्षा सदाबहार वन, उष्णकटिबन्धीय वन, शंकुधारी वन, अल्पाइन वनस्पति आदि ।

प्रश्न 5.
पौधों पर प्रकाश के प्रभाव बताइए।
उत्तर:
प्रकाश का मुख्य स्रोत सूर्य है। सूर्य विकिरण का केवल 390nm से 760nm तक का दृश्यमान वर्णक्रम ही दृश्य प्रकाश (visible light) कहलाता है तथा इसे ही प्रकाश संश्लेषी सक्रिय विकिरण (PAR) कहते हैं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रकाश के नीले (430 से 470 nm) और लाल (650 से 760 nm ) भाग में अधिकतम होती है। प्रकाश की तीव्रता तथा अवधि का भी विशेष महत्त्व होता है। पादपों पर प्रकाश के निम्न प्रभाव होते हैं-
1. प्रकाश संश्लेषण पर प्रभाव (Effect on Photosynthesis) – पौधों में पर्णहरिम का निर्माण प्रकाश की उपस्थिति में होता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रकाशीय क्रिया में प्रकाश का महत्त्वपूर्ण योगदान है। प्रकाशीय ऊर्जा के आधार पर ही फोटोफोस्फोराइलेशन क्रिया द्वारा ATP अणुओं का निर्माण होता है तथा जल का प्रकाश अपघटन द्वारा सह एन्जाइम NADPH बनता है। प्रकाश संश्लेषण की अप्रकाशी अभिक्रिया में CO2 के स्थिरीकरण हेतु NADPH, महत्त्वपूर्ण होते हैं।

2. वाष्पोत्सर्जन पर प्रभाव (Effect on transpiration) – पौधों में रंध्रों का खुलना व बन्द होना प्रकाश पर आधारित है। रंध्र के द्वारा गैसों तथा जलवाष्प का विनिमय होता है। तीव्र प्रकाश में पर्णरंध्र खुल जाते हैं तथा वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। वाष्पोत्सर्जन की दर पर ही अवशोषण तथा रसारोहरण की दर निर्भर करती है।

3. श्वसन व पादप वृद्धि पर प्रभाव (Effect on respiration and plant growth) – अनेक पौधों में प्रकाश की तीव्रता में श्वसन दर बढ़ जाती है। श्वसन में वृद्धि प्रकाश के कोशिका झिल्ली का पारगम्यता तथा जीवद्रव्य की श्यानता ( viscocity) पर प्रभाव के फलस्वरूप होती है।

पौधों की अनेक क्रियायें जैसे बीजों का अंकुरण, नवोद्भिद की वृद्धि, कलियों का खिलना, प्ररोह की शीर्ष वृद्धि आदि क्रियायें प्रकाश द्वारा प्रभावित होती हैं। प्रकाश की अनुपस्थिति में नवोद्भिद पीला रहकर पाण्डुरित (etiolated) रह जाता है, इसे पाण्डुरिता (etiolation ) कहते हैं। पादप वृद्धि हार्मोन्स तथा फ्लोरीजन (पुष्पीय हार्मोन) के निर्माण में भी प्रकाश महत्त्वपूर्ण है।

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4. पादप वितरण पर प्रकाश का प्रभाव (Effect of light on plant distribution ) – पौधों के वितरण तथा वनस्पति के स्तरीकरण में प्रकाश एक महत्त्वपूर्ण कारक है। जलीय तंत्र में भी पादप वितरण प्रकाश की उपस्थिति व तीव्रता से नियंत्रित होता है। फलस्वरूप जल में वनस्पति के भिन्न-भिन्न क्षेत्र (जैसे- वेलांचल, सरोवरी तथा गंभीर क्षेत्र) बन जाते हैं।

5. प्रकाश का पौधों की आन्तरिक रचना पर प्रभाव (Effect of light on internal structure of plants) प्रकाश के आधार पर पौधों की आन्तरिक संरचना में अन्तर आता है। द्विबीजपत्री पौधों की पृष्ठाधारी पत्तियों में पर्णमध्योतक का खम्भ ऊतक तथा स्पंजी मृदूतक में विभेदन दोनों सतह पर प्रकाश के असंगत वितरण के कारण होता है।

एकबीजपत्री पौधों की पत्तियों को दोनों पार्श्व सतह को बराबर सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है अतः उनके पर्णमध्योतक में इस प्रकार का विभेदन नहीं पाया जाता है। जलीय तंत्र में प्रकाश एक सीमाकारक है। इसमें प्रकाश की उपलब्धता अधिकांश जैविक क्रियाओं को नियंत्रित करती है।

झील, समुद्र तथा गहरे जलीय तंत्र में प्रकाश की उपलब्धता तथा इसकी मात्रा उत्पादक व उपभोक्ता जीवों के प्रकार व जीव संख्या को निर्धारित करती है। जैसे अधिकतर पादप्लवक ( phytoplankton ) जल की सतह पर रहते हैं जहाँ उन्हें प्रकाश प्राप्त होता है जबकि नितलस्थ (benthic ) जन्तु झील के तलछट पर या तलछट के भीतर रहते हैं।
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प्रश्न 6.
स्थलाकृतिक कारक क्या होते हैं? पौधों को प्रभावित करने वाले स्थलाकृतिक कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूमि या स्थल की आकृति जैसे तुंगता, घाटियाँ, पर्वतों की दिशायें आदि स्थलाकृतिक कारक होते हैं। अक्षांश, समुद्रतल से ऊँचाई या तुंगता ( altitude) भूमध्यरेखा से दूरी तथा ढाल एवं पर्वतों की. दिशा, घाटियाँ आदि का पौधों के प्रकार व उनके वितरण पर प्रभाव होता है। स्थलाकृतिक कारक मुख्यरूप से चार प्रकार के होते हैं-
1. तुंगता या ऊँचाई ( Altitude) – प्राय: किसी स्थान की समुद्रतल से ऊँचाई बढ़ने पर ताप कम हो जाता है। यह देखा गया है कि समुद्रतल से प्रत्येक 165 मीटर की ऊँचाई पर तापमान 1° से. गिर जाता है। इस प्रकार प्रत्येक 1000 मीटर की ऊँचाई पर लगभग 6-7° से. तक तापमान कम हो जाता है परन्तु वर्षा अधिक होती है।

प्रत्येक 1000 से 1500 मीटर की ऊँचाई पर वनस्पति में सुस्पष्ट परिवर्तन आते हैं। पश्चिमी हिमालय के ढलान के अध्ययन से ज्ञात होता है कि प्रथम 1200 मीटर की ऊँचाई पर मिश्रित पर्णपाती वन, 1200-3300 मीटर तक शंकुधारी वन तथा ऊँचाई के साथ-साथ रोडोडेन्ड्रोन पौधे पाये जाते हैं। 3600 मीटर पर वन समाप्त हो जाते हैं। 4200 मीटर की ऊँचाई पर अल्पाइन क्षेत्र होता है जिसके नीचे कुछ मॉस, शैक आदि पाये जाते हैं। सबसे अधिक ऊँचाई पर अल्पाइन किस्म की वनस्पतियाँ मिलती हैं तथा इससे भी अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्र वनस्पति रहित होते हैं।

2. ढाल (Slope) – पर्वतों पर ढाल होती है। वर्षा के समय इन ढलानों पर जल बहकर नीचे आ जाता है तथा मृदा में इसका रिसाव नहीं हो पाता है । फलस्वरूप इन ढलानों पर वनस्पति का पूर्ण अभाव रहता है या कुछ झाड़ीनुमा मरुद्भिद् वनस्पति मिलती है, जैसे अगेव, यूफोर्बिया आदि।

3. ढाल का अनावरण (Exposure of slope ) – पर्वतों के दक्षिण अभिमुखी ढालों पर उत्तर अभिमुख ढालों की अपेक्षा अधिक धूप तथा गर्मी पड़ती है। इसी कारण दक्षिणी ढलानों पर मरुद्भिद् वनस्पति तथा उत्तरी ढलानों पर वन तथा सतही वनस्पति अधिक संख्या में होती है।
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4. पर्वतों की दिशा (Direction of mountains) – पर्वत दिशाओं का जलवायु तथा वनस्पति दोनों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। ये हवाओं को निश्चित दिशा में मोड़कर वात उत्पन्न करते हैं। दिशा के अनुसार पर्वतों को प्राप्त होने वाली प्रकाश की मात्रा, वायु तथा वायुमण्डलीय आर्द्रता में परिवर्तन आते हैं। ऊँचे पर्वतों से जैसे ही मानसूनी हवाएँ टकराती हैं, उससे वर्षा होती है।

यही कारण है कि बाहरी हिमालय सघन वनों से ढँका हुआ है ताकि यहाँ समोद्भिद् प्रकार की वनस्पति की बाहुल्यता होती है। मध्य व केन्द्रवर्ती हिमालय तुलनात्मक शुष्क है तथा यहाँ मरुद्भिद् प्रकार की वनस्पति मिलती है। यही कारण है कि ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं को जलवायु अवरोध (climatic barriers) कहते हैं।
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वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. निम्नलिखित में से कौन एक जीव संख्या का एक गुण नहीं है? (NEET-2020)
(अ) जन्म दर
(ब) मृत्यु दर
(स) जाति परस्पर क्रिया
(द) लिंग अनुपात
उत्तर:
(स) जाति परस्पर क्रिया

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2. निम्नलिखित में से कौनसा पादप शलभ की एक जाति के साथ ऐसा निकट सम्बन्ध दर्शाता है, जिसमें कोई भी एक-दूसरे के बिना अपना जीवन चक्र पूरा नहीं कर सकता? (NEET-2018)
(अ) केला
(ब) भुक्का
(स) हाइड्रिला
(द) वायोला
उत्तर:
(ब) भुक्का

3. श्वसन मूल किससे होते हैं? (NEET-2018)
(अ) माँसाहारी पादपों में
(ब) स्वतंत्र-अल्पलावक जलोद्भिद् में
(स) लवणमृदोद्भिद् में
(द) जलमान जलोद्भिद् में
उत्तर:
(स) लवणमृदोद्भिद् में

4. निकेत क्या है? (NEET-2018)
(अ) तापमान का वह परास जो जीव को रहने के लिए चाहिए
(ब) वह भौतिक स्थान जहाँ एक जीवधारी रहता है
(स) जीव के पर्यावरण में सभी जैविक कारक
(द) एक जीव द्वारा निभाई गई कार्यात्मक भूमिका, जहाँ वह रहता है।
उत्तर:
(द) एक जीव द्वारा निभाई गई कार्यात्मक भूमिका, जहाँ वह रहता है।

5. निम्नलिखित में से चिकित्सा विज्ञान में प्रतिजैविक के उत्पादन के लिए समष्टि की कौनसी पारस्परिक क्रिया बहुदा प्रयोग की जाती है? (NEET-2018)
(अ) परजीविता
(ब) सहोपकारिता
(स) सहभोजिता
(द) अंतराजातीय परजीविता (एमेन्सेलिज्म)
उत्तर:
(द) अंतराजातीय परजीविता (एमेन्सेलिज्म)

6. कवकमूल किसके उदाहरण हैं? (NEET-2017)
(अ) कवकरोधन
(ब) अंतराजातीय परजीविता
(स) प्रतिजीविता
(द) सहपरोपकारिका
उत्तर:
(द) सहपरोपकारिका

7. लॉजिस्टिक वृद्धि (संभार तंत्र) में अनंतस्पर्शी कब प्रास होता है? जब- (NEET-2017)
(अ) ‘r’ की मान शून्य की तरफ अग्रसर होता है
(ब) K=N
(स) K>N
(द) K<N
उत्तर:
(ब) K=N

8. सुस्पष्ट उध्ध्वाधर स्तरों में व्यवस्थित पादपों की अपनी लम्बाई के अनुसार उपस्थिति सबसे अच्छी कहाँ देखी जा सकती है? (NEET-2017)
(अ) उष्णकटिबन्धीय सवाना
(स) घास भूमि
(ब) उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन
(द) शीतोष्ण वन
उत्तर:
(ब) उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन

9. स्पर्धी अपवर्जन के नियम का प्रतिपादन किसने किया था? (NEET II-2016)
(अ) मैक्आर्थर
(ब) वरहुल्स्ट और पर्ल
(स) सी. डार्बिन
(द) जी.एफ. गॉसे
उत्तर:
(द) जी.एफ. गॉसे

10. स्पर्धी अपवर्जन का गॉसे नियम कहता है कि- (NEET-2016)
(अ) कोई भी दो स्पीशीज एक ही निकेत में असीमित अवधि के लिए नहीं रह सकती क्योंकि सीमाकारी संसाधान समान ही होते हैं।
(ब) अपेक्षाकृत बड़े आकार के जीव स्पर्धा द्वारा छोटे जन्तुओं को बाहर निकाल देते हैं।
(स) अधिक संख्या में पाए जाने वाली स्पीशीज स्पर्धा द्वारा कम संख्या में पाये जाने वाली स्पेशीज को अपवर्जित कर देगी।
(द) समान संसाधनों के लिए स्पर्धा उस स्पीशीज को अपवर्जित कर देगी जो भिन्न प्रकार के भोजन पर भी जीवित रह सकती है।
उत्तर:
(अ) कोई भी दो स्पीशीज एक ही निकेत में असीमित अवधि के लिए नहीं रह सकती क्योंकि सीमाकारी संसाधान समान ही होते हैं।

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11. निम्नलिखित में से किस पारस्परिक क्रिया में दो सभी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होते हैं? (NEET-2015)
(अ) परभक्षण
(ब) परजीविता
(स) सहोपकारिता
(द) स्पर्धा
उत्तर:
(द) स्पर्धा

12. एक ही पर्यावरण में रह रही विभिन्न स्पीशीजों की व्यट्टियों का पारस्परिक सम्बन्ध और क्रियात्मक क्रिया करना है- (NEET-2015)
(अ) जीवीय समुदाय
(ब) पारितंत्र
(स) समष्टि
(द) पारिस्थितिक निकेत
उत्तर:
(अ) जीवीय समुदाय

13. जिस प्रकार एक व्यक्ति गर्मी के मौसम में गर्मी से बचने के लिए दिल्ली से शिमला जाता है उसी प्रकार साइबेरिया और अन्य अत्यधिक ठंडे उत्तरी प्रदेशों से हजारों प्रवासी पक्षी किस ओर जाते हैं? (NEET-2014)
(अ) पश्चिमी घाट
(ब) मेघालय
(स) कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान
(द) केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान
उत्तर:
(द) केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान

14. एक स्थानबद्ध समुद्री एनीमोन केकड़े के कवच के अस्तर पर चिपक गया। यह सम्बन्ध क्या कहलाता है? (NEET-2013)
(अ) बाह्य परजीविता
(ब) सहजीविता
(स) सहयोजिता
(द) ऐमेन्सेलिज्म
उत्तर:
(ब) सहजीविता

15. नीलहरित शैवाल (सायनोबैक्टिरिया) धान के खेतों के अलावा किसके कायिक भाग के अन्दर भी पाये जाते हैं? (NEET-2013)
(अ) पाइनस
(ब) सायकस
(स) इम्वीसीटम
(द) साइलोटम
उत्तर:
(ब) सायकस

16. अमरबेल (कस्कुटा) किस एक का उदाहरण है? (Mains-2012)
(अ) बाह्य परजीविता
(ब) प्रजनन परजीविता
(स) परभक्षण
(द) अन्तःपरजीविता
उत्तर:
(अ) बाह्य परजीविता

17. नीचे दिये जा रहे आयुपिरामिड में किस प्रकार की मानव समष्टि प्रदर्शित की गई है? [CBSE PMT (Pre)-2011, NEET-2011]
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 15
(अ) गायब होती समष्टि
(ब) स्थिर समष्टि
(स) घटती समष्टि
(द) बढ़ती समष्टि
उत्तर:
(स) घटती समष्टि

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18. लघुगणक समष्टि वृद्धि (लॉजिस्टिक जनसंख्या वृद्धि) को किस समीकरण से अभिव्यक्त किया जाता है? [CBSE PMT (Mains)-2011, NEET-2011]
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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 18
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 19
उत्तर:
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19. चारघातांकी जनसंख्या वृद्धि का सूत्र कौनसा है? (NEET-2006, Kerala PMT-2010)
(अ) rN/dN = dt
(ब) dN/dt = rN
(स) dt/dN = rN
(द) dN/rN = dt
उत्तर:
(ब) dN/dt = rN

20. निश्चित वहन क्षमता के द्वारा सीमित जनसंख्या वाली लॉजिस्टिक वृद्धि का आकार किस अक्षर के समान होगा? (DUMET-2010)
(अ) J
(ब) L
(स) M
(द) S
उत्तर:
(द) S

21. निम्नलिखित में से किस एक में क्वेरकस की जातियाँ एक प्रभावी घटक होती हैं? (NEET-2008)
(अ) स्क्रब वन
(ब) उष्णकटिबंधीय वर्षा वन
(स) शीतोष्ण पर्णपाती वन
(द) ऐल्पाइन वन
उत्तर:
(स) शीतोष्ण पर्णपाती वन

22. किसी क्षेत्र में हाथियों की समष्टि की अधिक सघनता का नतीजा क्या हो सकता है? (NEET-2007)
(अ) एक-दूसरे का परभक्षण
(ब) सहोपकारिता
(स) अन्तरजातीय प्रतिस्पर्धा
(द) अन्तर्जातीय प्रतिस्पर्धा
उत्तर:
(अ) एक-दूसरे का परभक्षण

23. आयु संरचना का ज्यामितीय प्रदर्शन क्या दर्शाता है? (NEET-2007, CBSE PMT-2007)
(अ) जैविक समुदाय
(ब) जनसंख्या
(स) भूस्खलन
(द) परिस्थितिकी
उत्तर:
(ब) जनसंख्या

24. गर्तीय रंध्र (sunken stomata) पाये जाते हैं- (Orissa JEE 2006)
(अ) मरुद्भिदों में
(ब) जलोद्भिदों में
(स) समोद्भिदों में
(द) लवणोद्भिदों में
उत्तर:
(अ) मरुद्भिदों में

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25. इ.पी. ओडम है- (HP PMT 2005)
(अ) ब्रायोलोजिस्ट
(ब) फिजियोलोजिस्ट
(स) इकोलोजिस्ट
(द) माइकोलोजिस्ट
उत्तर:
(स) इकोलोजिस्ट

26. छोटी मछली शार्क के निचले तल के पास चिपक जाती है और पोषण प्राप्त करती है, तो ऐसा संबंध कहलाता है- (BHU 2005)
(अ) सहजीविता
(ब) सहभोजिता
(स) परभक्षण
(द) परजीविता
उत्तर:
(ब) सहभोजिता

27. प्राणियों में शिकारियों से बचने की स्वाभाविक क्षमता होती है, गलत उदाहरण को चुनिये- (CBSE, 2005)
(अ) केमीलोन में रंग परिवर्तन
(ब) पफर मछली में हवा खींचकर बड़ा आकार
(स) सर्पों का विष
(द) माँस में मेलेनिन
उत्तर:
(स) सर्पों का विष

28. दो जातियाँ जिनमें दोनों साथी एक-दूसरे के लाभकारी होते हैं तो ऐसा संबंध कहलाता है- (HP PMT 2005)
(अ) परजीविता
(ब) सहजीविता
(स) सहभोजिता (Commensalism)
(द) परभक्षण (Predation)
उत्तर:
(ब) सहजीविता

29. निम्न में से कौनसा, वातावरण का भाग नहीं है- (MP PMT 2005)
(अ) प्रकाश
(ब) तापमान
(स) मृदीय कारक
(द) अवक्षेपण
उत्तर:
(स) मृदीय कारक

30. शब्द ‘पारिस्थितिकी’ किसने प्रस्तावित किया- (M.P. PMT, 2003; KCET 2004)
(अ) हेकल
(ब) ओडम
(स) रीटर
(द) डोबेनमायर
उत्तर:
(स) रीटर

31. सहभोजिता होती है- (MP PMT 2004)
(अ) जब दोनों सहभागी लाभान्वित होते हैं।
(ब) जब दोनों सहभागियों को हानि होती है।
(स) कमजोर लाभान्वित होते हैं अपेक्षाकृत शक्तिशाली हानिकारक होते हैं।
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) कमजोर लाभान्वित होते हैं अपेक्षाकृत शक्तिशाली हानिकारक होते हैं।

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32. चरने वाले जंतुओं से संभवतः क्या लाभ है- (BVP 2003)
(अ) वन्य जीवधारियों को हटाना
(ब) खरपतवारों का नाश करना
(स) वन्य पौधों को हटाना
(द) उनके उत्सर्जी पदार्थों का मृदा में मिलना
उत्तर:
(द) उनके उत्सर्जी पदार्थों का मृदा में मिलना

33. पौधों की वृद्धि के लिये ह्यूमस आवश्यक है क्योंकि- (BVP 2003)
(अ) यह आंशिक अपघटित होती है
(ब) यह पत्तियों से व्युत्पन्नित होती है
(स) इसमें पोषक तत्वों की अधिकता एवं जल धारण करने की क्षमता भी अधिक होती है
(द) यह मृत कार्बनिक पदार्थों की बनी होती है
उत्तर:
(स) इसमें पोषक तत्वों की अधिकता एवं जल धारण करने की क्षमता भी अधिक होती है

34. निम्न में से कौनसा सही चयनित युग्म है- (AIIMS 2003)
(अ) शार्क एवं सकर मछलियाँ-असहभोजिता (Amensalism)
(ब) शैवाल एवं कवक का लाइकेन्स से-सहोपकारिता (Mutualism)
(स) आर्किड्स का वृक्षों पर उगना-परपोषिता
(द) परपोषिता (डोडर) का दूसरे पुष्पीय पौधों पर उगनाअधिपादपता
उत्तर:
(ब) शैवाल एवं कवक का लाइकेन्स से-सहोपकारिता (Mutualism)

35. झील के सतही जल में किसकी अधिकता होती है- (AFMC 2003)
(अ) कार्बनिक पदार्थ
(ब) खनिजों
(स) अकार्बनिक पदार्थ
(द) प्रदूषकों
उत्तर:
(अ) कार्बनिक पदार्थ

36. अधिकतर ह्यूमस की मात्रा पायी जाती है- (CPMT 2003)
(अ) सबसे निचली परत में
(ब) ऊपरी परत में
(स) मध्य परत में
(द) सभी जगह समान
उत्तर:
(ब) ऊपरी परत में

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37. जलधारण क्षमता अधिकतम होती है- (CMC Ludhiana 2003)
(अ) मृत्तिका (Clay) या चिकनी मिट्टी में
(ब) बालू में
(स) गाद (silt) में
(द) बजरी (gravel) में
उत्तर:
(अ) मृत्तिका (Clay) या चिकनी मिट्टी में

38. किसी समष्टि में अबाधिकजनन की क्षमता को क्या कहते हैं? (NEET-2002)
(अ) जैव विभव
(ब) उपजाऊता
(स) वहन क्षमता
(द) जन्म दर
उत्तर:
(अ) जैव विभव

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HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

Haryana State Board HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. एक मोल ऑक्सीजन में, ऑक्सीजन के अणुओं की संख्या होगी –
(1) 1
(2) 100
(3) 6·023 × 1023
(4) 0.6023 x 1023.
उत्तर:
(3) 6·023 × 1023

2. तुल्यांकी भार का मात्रक होता है-
(1) ग्राम
(2) किलोग्राम
(3) ग्राम प्रति लीटर
(4) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(4) इनमें से कोई नहीं

3. NTP पर प्रत्येक गैस के एक ग्राम अणु भार का आयतन –
(1) 224 लीटर होता है
(2) 224 c. c. होता है
(3) 2.24 लीटर होता है
(4) 22.4 लीटर होता है।
उत्तर:
(4) 22.4 लीटर होता है।

4. 44 ग्राम CO2 में उपस्थित अणुओं की संख्या है-
(1) 12 × 1023
(2) 3 × 1010
(3) 6 × 1023
(4) 1 × 1023
उत्तर:
(3) 6 × 1023

5. मानक ताप तथा दाब पर 0.25 मोल अमोनिया गैस का आयतन है-
(1) 2-24 लीटर
(2) 5.6 लीटर
(3) 11.2 लीटर
(4) 22.4 लीटर।
उत्तर:
(2) 5.6 लीटर

6. एक धातु के क्लोराइड का सूत्र MCl3 है और धातु का तुल्यांकी भार 9 है। तत्व का परमाणु भार होगा-
(1) 9
(2) 18
(3) 27
(4) 3
उत्तर:
(3) 27

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

7. किसी तत्व की परमाणुकता प्रकट करती है—
(1) तत्व का परमाणु क्रमांक
(2) तत्व का परमाणु भार
(3) तत्व की आवोगाद्रो संख्या
(4) तत्व के अणु में उपस्थित परमाणुओं की संख्या।
उत्तर:
(4) तत्व के अणु में उपस्थित परमाणुओं की संख्या।

8. 111 ग्राम CaCl2 में आयनों की कुल संख्या होगी –
(1) एक मोल
(2) दो मोल
(3) तीन मोल
(4) चार मोल।
उत्तर:
(3) तीन मोल

9. वायु है-
(1) यौगिक
(2) मिश्रण
(3) तत्व
(4) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(2) मिश्रण

10. एक मोल H2O में हैं-
(1) 6.02 × 1023 ऑक्सीजन के परमाणु
(2) 6.02 x 1023 हाइड्रोजन के परमाणु
(3) 18.1 × 1020 H2O के परमाणु
(4) H2O के 3 ग्राम अणु।
उत्तर:
(1) 6.02 × 1023 ऑक्सीजन के परमाणु

11. ऑक्सेलिक अम्ल (C2O4H2. 2H2O) का तुल्यांकी भार क्या है, यदि इसका अणु भार 126 है?
(1) 98
(2) 63
(3) 196
(4) 126
उत्तर:
(2) 63

12. पदार्थों का कौन सा युग्म गुणित अनुपात के नियम की व्याख्या करता है?
(1) CO तथा CO2
(2) H2O तथा D2O
(3) NaCl तथा NaBr
(4) MgO तथा Mg (OH)2
उत्तर:
(1) CO तथा CO2

13. MnSO4 का तुल्यांकी भार, अणु भार का आधा हो जाता है, जब यह परिवर्तित होता है-
(1) Mn2O3 में
(2) MnO2 मैं
(3) MnO4 मैं
(4) MnO42- में
उत्तर:
(4) MnO42- में

14. मोल X तथा 9 मोल Y निम्न क्रिया के अनुसार क्रिया करके बनाते हैं-
X + 2Y → Z
Z के कितने मोल बनेंगे ?
(1) 5 मोल Z
(2) 8 मोल 7
(3) 14 मोल Z
(4) 4 मोल Z
उत्तर:
(4) 4 मोल Z

15. 27 ग्राम एल्युमिनियम ऑक्सीजन के कितने ग्राम से पूर्णतः अभिक्रिया करेगी?
(1) 8 ग्राम
(2) 16 ग्राम
(3) 32 ग्राम
(4) 24 ग्राम।
उत्तर:
(4) 24 ग्राम।

16. चूने के पत्थर (CaCO) की कितनी मात्रा CaO के 56 किग्रा. देगी।
(1) 1000 किग्रा.
(2) 56 किग्रा.
(3) 2 किग्रा.
(4) 100 किग्रा.
उत्तर:
(4) 100 किग्रा.

17. Na2CO3 के 5-3 ग्राम 500 मिली में घुले हैं। विलयन की मोलरता होगी-
(1) 0.1 M
(2) 0.2 M
(3) 0.3 M
(4) 1.0 M
उत्तर:
(1) 0.1 M

18. निम्न में से अणुओं की न्यूनतम संख्या किसमें होगी?
(1) 0.1 मोल CO2 में
(2) 11 लीटर CO2 में
(3) 22 ग्राम CO2 मैं
(4) 22.4 x 10³ मिली CO2 में
उत्तर:
(1) 0.1 मोल CO2 में

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

19. NaOH में ऑक्सीजन का प्रतिशत है-
(1) 40
(2) 16
(3) 8
(4) 1
उत्तर:
(1) 40

20. शुद्ध जल की मोलरता होती है.
(1) 55.6
(2) 50
(3) 100
(4) 18
उत्तर:
(1) 55.6

21. अणुओं की न्यूनतम संख्या निम्न में से किसमें है?
(1) I मोल SO2 में
(2) SO2 गैस के 1 × 1023 अणुओं में
(3) S. T.P. पर 11.2 लीटर SO2 मैं
(4) सभी में समान है।
उत्तर:
(3) S. T.P. पर 11.2 लीटर SO2 मैं

22. अणुओं की सबसे अधिक संख्या उपस्थिति है।
(1) 28 ग्राम CO मैं
(2) 36 ग्राम जल में
(3) 54 ग्राम N2O5 में
(4) 46 ग्राम C2H5OH में
उत्तर:
(2) 36 ग्राम जल में

23. 560 ग्राम Fe में उपस्थित परमाणुओं की संख्या होगी-
(1) 70 ग्राम नाइट्रोजन की दोगुनी
(2) 20 ग्राम हाइड्रोजन की आधी
(3) (1) तथा (2) दोनों सही हैं
(4) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(3) (1) तथा (2) दोनों सही हैं

24. यदि जल का घनत्व 1 ग्राम / सेमी³ है, तो जल के एक अणु का आयतन होगा-
(1) 18 सेमी.³
(2) 22400 सेमी
(3) 6.02 x 10-23 सेमी³
(4) 3.0 x 10-23 सेमी³
उत्तर:
(4) 3.0 x 10-23 सेमी³

25 00300 में सार्थक अंकों की संख्या है-
(1) एक
(2) दो
(3) तीन
(4) चार।
उत्तर:
(3) तीन

26. 0.05 g भार वाले जल की बूँद में H2O अणुओं की संख्या है-
(1) 1.5 × 1023
(2) 1.672 × 1021
(3) 1.5 x 1020
(4) 6.02 × 1022
उत्तर:
(2) 1.672 × 1021

27. निश्चित ताप एवं दाब के अधीन विभिन्न गैसों के समान आयतन में होता है-
(1) समान घनत्व
(2) समान द्रव्यमान
(3) समान परमाणु
(4) समान अणु
उत्तर:
(4) समान अणु

28. मैग्नीशियम फॉस्फेट, Mg3 (PO4)2 के कितने मोल में 0-25 मोल ऑक्सीजन परमाणु होंगे?
(1) 0.02
(2) 3·125 x 10-2
(3) 1.25 x 10-2
(4) 2.5 × 10-2
उत्तर:
(2) 3·125 x 10-2

29. सल्फर का एक परमाणु कार्बन के एक परमाणु से कितने गुना भारी होता है?
(1) 32 गुना
(2) 12 गुना
(3) \(\frac { 8 }{ 3 }\) गुना
(4) \(\frac { 12 }{ 32 }\) 32 गुना।
उत्तर:
(3) \(\frac { 8 }{ 3 }\) गुना

30. निम्नलिखित के द्रव्यमानों का सही अवरोही क्रम क्या है?
(i) ऑक्सीजन के 6.022 x 1023 परमाणु
(ii) H2S के 1.0 × 1023 अणु
(iii) ऑक्सीजन के 6.022 x 1023 अणु
(1) (i) > (ii) > (iii)
(2) (i) > (iii) > (ii)
(3) (iii) > (i) > (ii)
(4) (ii) > (i) > (iii)
उत्तर:
(3) (iii) > (i) > (ii)

31. 294.406, 280.208 एवं 24 के योग का सही लिखा गया उत्तर होगा-
(1) 598.61
(2) 599
(3) 598.6
(4) 598.614
उत्तर:
(2) 599

32. मोललता की इकाई है-
(1) मोल्स
(2) मोल्स/ किग्रा.
(3) मोल्स / लीटर
(4) ग्राम/लीटर।
उत्तर:
(2) मोल्स/ किग्रा.

33. मोल अंश की इकाई है-
(1) मोल्स
(2) मोल्स / किग्रा.
(3) ईकाई नहीं होती
(4) मोल्स / लीटर।
उत्तर:
(3) ईकाई नहीं होती

34. यदि NA आवागाद्रो संख्या है, तो 4.2 g नाइट्राइड आयन (N3-) में संयोजक इलेक्ट्रॉनों की संख्या है-
(1) 4.2 NA
(2) 2.4 NA
(3) 1.6 NA
(4) 3.2 NA
उत्तर:
(2) 2.4 NA

35. एक विद्यार्थी की लम्बाई 64.25 इंच है, इसकी लम्बाई फीट में होगी-
(1) 5.345 फीट
(2) 5 फीट
(3) 5.3 फीट
(4) 5.34 फीट।
उत्तर:
(1) 5.345 फीट

36. समस्थानिक होते हैं-
(1) न्यूट्रॉनों की संख्या में भिन्न
(2) प्रोटॉनों की संख्या में भिन्न
(3) उपर्युक्त दोनों
(4) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(3) उपर्युक्त दोनों

37. एक परमाण्वीय द्रव्यमान इकाई (amu) का मान है-
(1) 166 × 10-24 ग्राम
(2) 1.66 × 10-27 ग्राम
(3) 1.008 ग्राम
(4) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(3) 1.008 ग्राम

38. कैल्सियम का परमाणु भार 40 है। यदि इसकी संयोजकता दो हो तो कैल्सियम का तुल्यांक भार होगा
(1) 20
(2) 40
(3) 10
(4) 80
उत्तर:
(1) 20

39. किसमें सबसे अधिक परमाणु हैं ?
(1) 24 g C – 12
(2) 56g Fe – 56
(3) 27 g Al – 23
(4) 108 g Ag – 108.
उत्तर:
(1) 24 g C – 12

40. CO के 6.022 x 1024 अणुओं में ऑक्सीजन के ग्राम अणुओं की संख्या है-
(1) 10 ग्राम मोल्स
(2) 5 ग्राम मोल्स
(3) 1 ग्राम मोल
(4) 0.5 ग्राम मोल
उत्तर:
(2) 5 ग्राम मोल्स

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

41. अभिव्यक्ति के किस ढंग में विलयन की संघनन क्षमता इसके तापमान से स्वतन्त्र होती है-
(1) मोलरता
(2) नॉर्मलता
(3) फॉर्मलता
(4) मोललता।
उत्तर:
(4) मोललता।

42. एक मोलल विलयन वह होता है जिसमें विलेय का एक मोल होता है –
(1) 1000 g विलायक में
(2) एक लीटर विलायक में
(3) एक लीटर विलयन में
(4) 22-4 लीटर विलयन में।
उत्तर:
(1) 1000 g विलायक में

43. 0.635 ग्राम कॉपर में उपस्थित परमाणुओं की संख्या होगी-
(1) 6·023 x 10-23
(2) 6·023 × 1023
(3) 6.023 x 1022
(4) 6·023 × 1021.
उत्तर:
(4) 6·023 × 1021.

44. यौगिक C66H122 के एक अणु का भार है—
(1) 1.4 × 10-21 ग्राम
(2) 1.09 × 1023 ग्राम
(3) 5.025 x 1023 ग्राम
(4) 16.023 x 1023 ग्राम।
उत्तर:
(1) 1.4 × 10-21 ग्राम

45. CO के 14 g के लिये असत्य कथन है-
(1) यह N.T.P. पर 2.24 लीटर घेरता है
(2) यह CO के \(\frac { 1 }{ 2 }\) मोल के लगभग है
(3) यह CO और N2 के समान मोलों के लगभग है
(4) यह CO के 3.01 × 1023 अणुओं के लगभग है।
उत्तर:
(1) यह N.T.P. पर 2.24 लीटर घेरता है

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रसायन के दो लाभ बताइए।
उत्तर:

  1. खाद्य पदार्थों की पैदावार बढ़ाने में।
  2. चिकित्सा क्षेत्र में।

प्रश्न 2.
रसायन का विनाशकारी रूप क्या है?
उत्तर:
परमाणु बम, हाइड्रोजन बम, विषैली गैसें जैसे मस्टर्ड गैस, टी. एन. टी. आदि रसायन के विनाशकारी रूप हैं।

प्रश्न 3.
रसायन विज्ञान के सिद्धान्तों का व्यावहारिक उपयोग किन-किन क्षेत्रों में होता है?
उत्तर:
रसायन विज्ञान के सिद्धान्तों का व्यावहारिक उपयोग मौसम विज्ञान, नाड़ी तन्त्र और कम्प्यूटर प्रचालन में होता है।

प्रश्न 4.
द्रव्य क्या है?
उत्तर:
द्रव्य वह वस्तु है जिसमें आयतन और द्रव्यमान होता है।

प्रश्न 5.
द्रव्य के सूक्ष्म कण को क्या कहते हैं?
उत्तर:
द्रव्य के सूक्ष्म कण को परमाणु कहते हैं।

प्रश्न 6.
द्रव्य भौतिक रूप में कितनी अवस्थाओं में पाया जाता है?
उत्तर:
द्रव्य भौतिक रूप में ठोस, द्रव तथा गैस तीन अवस्थाओं में पाया जाता है।

प्रश्न 7.
द्रव्य को विभिन्न अवस्थाओं में परिवर्तित किया जा सकता है या नहीं?
उत्तर:
ताप और दाब की परिस्थितियों के परिवर्तन द्वारा द्रव्य की इन तीनों अवस्थाओं को एक-दूसरे में परिवर्तित किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
ऐसे द्रव्य का नाम बताइए जो द्रव्य की तीनों अवस्थाओं में पाया जाता है?
उत्तर:
जल।

प्रश्न 9.
मिश्रण क्या है?
उत्तर:
किसी मिश्रण में दो या दो से अधिक घटकों का अनुपात अनिश्चित होता है।

प्रश्न 10.
यौगिक किसे कहते हैं?
उत्तर:
यौगिक एक शुद्ध समांगी पदार्थ है जो दो या दो से अधिक तत्वों के निश्चित अनुपात में संयोग करने पर प्राप्त होता है।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित को शुद्ध पदार्थ और मिश्रण के रूप में वर्गीकृत कीजिये।
(i) ग्रेफाइट, (ii) दूध, (iii) गैसोलीन, (iv) ऑक्सीजन, (v) आसुत जल, (vi) पीतल, (vii) सोडियम क्लोराइड, (viii) लोहा, (ix) इस्पात, (x) शर्बत, (xi) 24 कैरेट गोल्ड, (xii) ग्लूकोज, (xiii) 22 कैरेट गोल्ड, (xiv) शहद, (xv) बुझा हुआ चूना।
उत्तर:
शुद्ध पदार्थ – ग्रेफाइट, ऑक्सीजन, आसुत जल, सोडियम क्लोराइड, लोहा, 24 कैरेट गोल्ड, ग्लूकोज, बुझा हुआ चूना।
मिश्रण – दूध, गैसोलीन, पीतल, इस्पात, शर्बत, 22 कैरेट गोल्ड, शहद।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित को तत्व, यौगिक और मिश्रण में वर्गीकृत कीजिये-
(1) गन्धक का तेजाब, (2) कोल्ड ड्रिंक, (3) चीनी, (4) संगमरमर, (5) टिन, (6) लैड, (7) आयोडीन युक्त खाद्य लवण, (8) नल का पानी, (9) हीरा, (10) दूध, (11) सीमेन्ट, (12) सिलिका, (13) प्लास्टर ऑफ पेरिस, (14) निकिल।
उत्तर:
तत्व – टिन, लैड, हीरा, निकिल।
यौगिक-गंधक का तेजाब, चीनी, संगमरमर, सिलिका, प्लॉस्टर ऑफ पेरिस ।
मिश्रण – कोल्डड्रिंक, आयोडीन युक्त खाद्य लवण, नल का पानी, दूध, सीमेंट।

प्रश्न 13.
विज्ञान की किस शाखा के अन्तर्गत पदार्थ के अणुओं तथा परमाणुओं से सम्बन्धित ज्ञान प्राप्त किया जाता है?
उत्तर:
रसायन विज्ञान के अन्तर्गत पदार्थ के अणुओं तथा परमाणुओं से सम्बन्धित अध्ययन किया जाता है। नहीं ।

प्रश्न 14.
किस द्रव्य का अवस्था आयतन निश्चित होता है, आकार
उत्तर:
द्रव का आयतन निश्चित होता है, आकार नहीं।

प्रश्न 15.
जल में नमक का मिश्रण विलयन क्यों है, जबकि तेल और जल का मिश्रण विलयन नहीं है?
उत्तर:
जल में नमक का मिश्रण विलयन है क्योंकि नमक व जल दोनों आपस मे मिलकर एक समांगी मिश्रण बनाते हैं अतः ये विलयन का निर्माण करते हैं। जबकि जल और तेल आपस में मिलकर असमांगी मिश्रण बनाते हैं अतः ये विलयन नहीं है।

प्रश्न 16.
वायु को कभी-कभी विषमांगी मिश्रण क्यों माना जाता है?
उत्तर:
वायु को कभी-कभी विषमांगी मिश्रण माना जाता है, जब उसमें धूल के कण उपस्थित हों।

प्रश्न 17.
निम्न को धातुओं एवं अधातुओं में वर्गीकृत कीजिए-
(i) आर्गन, (ii) पोटैशियम, (III) हीलियम, (iv) पारा, (v) हीरा, (vi) सिलिकन, (vii) सीसा (Hg), (viii) मैग्नीशियम (Mg)
उत्तर:
धातुएँ पौटेशियम, पारा, सीसा (Hg), मैग्नीशियम (Mg)।
अधातुएँ-आर्गन, हीलियम, हीरा, सिलिकन।

प्रश्न 18.
किसी एक पर्यावरण प्रदूषक का नाम लिखें।
उत्तर:
क्लोरो फ्लुओरोकार्बन (फ्रिऑन)।

प्रश्न 19.
किस द्रव्य अवस्था का आयतन तथा आकार दोनों ही अनिश्चित होते हैं।
उत्तर:
गैस का आयतन तथा आकार दोनों ही अनिश्चित होते हैं।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

प्रश्न 20.
किस द्रव्य अवस्था का आयतन व आकार दोनों ही निश्चित होते हैं?
उत्तर:
ठोस का आयतन तथा आकार दोनों ही निश्चित होते हैं।

प्रश्न 21.
द्रव्य की किस अवस्था में अन्तरा अणुक अवकाश सबसे अधिक व किस अवस्था में सबसे कम होता है।
उत्तर:
द्रव्य की गैस अवस्था में अन्तरा अणुक अवकाश सबसे अधिक व ठोस अवस्था में अन्तरा अणुक अवकाश सबसे कम होता है।

प्रश्न 22.
अणु एक-दूसरे को किस विशेष आकर्षण बल द्वारा आकर्षित करते हैं?
उत्तर:
अणु एक-दूसरे को अन्तरा अणुक आकर्षण बल द्वारा आकर्षित करते हैं।

प्रश्न 23.
जल की गैसीय अवस्था वाष्प कहलाती है जबकि अमोनिया की गैसीय अवस्था गैस क्यों?
उत्तर:
उन पदार्थों की गैसीय अवस्था वाष्प कहलाती है जो कि कमरे के ताप पर द्रव होते हैं। चूँकि जल कमरे के ताप पर द्रव होता है अतः इसकी गैसीय अवस्था वाष्य कहलाती है परन्तु अमोनिया कमरे के ताप पर द्रव नहीं होती अतः इसकी गैसीय अवस्था गैस कहलाती है।

प्रश्न 24.
निम्न में से समांगी व असमांगी मिश्रण छॉटिये धुआँ, बादल, काष्ठ, नल का पानी
उत्तर:
समांगी मिश्रण धुआँ, बादल, काष्ठ। असमांगी मिश्रण नल का पानी।

प्रश्न 25.
लोहे का बुरादा एवं गन्धक का चूर्ण किस प्रकार का मिश्रण है।
उत्तर:
लोहे का बुरादा एवं गंधक का चूर्ण एक विषमांगी मिश्रण है।

प्रश्न 26.
मूल मात्रकों को व्यक्त करने के लिए कौन-सी पद्धति पूरे संसार में अपनाई जा रही है?
उत्तर:
मूल मात्रकों को व्यक्त करने के लिए पूरे संसार में अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति (S. I.) अपनाई जा रही है।

प्रश्न 27.
मात्रकों की अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति क्या है?
उत्तर:
मात्रकों की अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति (फ्रांसीसी में Le system international d’ units) S. I. (एस. आई.) कहा जाता है को सन् 1960 में भार और माप के ग्यारहवें सर्व सम्मेलन (Conference Generale des Poios at Measures. CGPM) में स्वीकृत किया गया था।

प्रश्न 28.
कौन-सा संस्थान भारतीय राष्ट्रीय मापन के मानकों का अनुरक्षण करता है?
उत्तर:
भारत में मापन के मानकों के अनुरक्षण का कार्य राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला, नई दिल्ली द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 29.
अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली में कितने मूल मात्रक हैं?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली में सात मूल मात्रक हैं।

प्रश्न 30.
ताप का ऋणात्मक मान किस पैमाने पर सम्भव होता है तथा किस पर नहीं?
उत्तर:
0°C से कम ताप (अर्थात् ऋणात्मक मान) सेल्सियस पैमाने पर तो सम्भव है परन्तु केल्विन पैमाने पर ताप का ऋणात्मक मान सम्भव नहीं है।

प्रश्न 31.
मानक किलोग्राम को परिभाषित करने के लिए पेरिस (फ्रान्स) के सैवरेस में सन्दर्भ सिलिण्डर प्लेटिनम- इरीडियम का ही क्यों है?
उत्तर:
प्लेटिनम- इरीडियम रासायनिक अभिक्रिया के प्रति निष्क्रिय है।

प्रश्न 32.
लम्बाई का मात्रक क्या है?
उत्तर:
लम्बाई का SI मात्रक मीटर है।

प्रश्न 33.
एक माइकॉन में कितने मीटर होते हैं?
उत्तर:
10-6 मीटर।

प्रश्न 34.
एक मीटर में कितने एंग्स्ट्रॉम होते हैं?
उत्तर:
1010 एंग्स्ट्रॉम

प्रश्न 35.
एक सौर दिन में कितने सेकण्ड होते हैं?
उत्तर:
86400 सेकण्ड

प्रश्न 36.
प्रकाश वर्ष किस राशि का मात्रक है?
उत्तर:
दूरी का मात्रक है।

प्रश्न 37.
ऊर्जा का SI मात्रक क्या है?
उत्तर:
जल।

प्रश्न 38.
घनत्व का S. I मात्रक क्या है?
उत्तर:
kg/m³।

प्रश्न 39.
निम्न मात्रक कौन-सी भौतिक राशि दर्शाते हैं?
(i) kg m²s-2
(ii) kg m2-2
उत्तर:
(i) बल
(ii) कार्य।

प्रश्न 40.
आधार मात्रक व परिशुद्ध मात्रक में अन्तर बताइए।
उत्तर:
आधार मात्रक वे मात्रक हैं जो दूसरी भौतिक राशियों से प्राप्त होते हैं। परिशुद्ध मात्रक आधार मात्रकों से प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 41.
मूल राशियाँ क्या हैं?
उत्तर:
वे भौतिक राशियाँ जो एक-दूसरे से स्वतन्त्र होती है। मूल राशियाँ कहलाती हैं ये राशियाँ अन्य राशियों पर निर्भर नहीं करती हैं।

प्रश्न 42.
व्युत्पन्न मात्रक क्या हैं?
उत्तर:
वे मात्रक जो मूल मात्रकों की सहायता से प्राप्त किये जाते हैं, व्युत्पन्न मात्रक कहलाते हैं।

प्रश्न 43.
जूल, मीटर किलोग्राम, किलोग्राम / मीटर सेकण्ड तथा ऐम्पियर में कौन-कौन मूल मात्रक हैं?
उत्तर:
मूल मात्रक किलोग्राम, सेकण्ड एम्पियर।
व्युत्पन्न मात्रक – जूल, किलोग्राम / मीटर।

प्रश्न 44.
माइकॉन से क्या समझते हो?
उत्तर:
इसे μ(म्यू) से प्रदर्शित करते हैं। इसके द्वारा अति सूक्ष्म जीवाणुओं के आकार को व्यक्त करते हैं।
1 माइक्रॉन = 106 मीटर

प्रश्न 45.
एंग्स्ट्रॉम (Å) क्या है?
उत्तर:
इसके द्वारा नाभिक का आकार तथा प्रकाश की तरंगदैर्ध्य मापी जाती है। इसे Å से प्रदर्शित करते हैं
1 एंग्स्ट्रॉम (Å) = 10-4
माइक्रॉन = 10-10 मीटर

प्रश्न 46.
एक परमाणु की त्रिज्या 10-10 m है। इसका माइक्रोमीटर में मान बताइये?
उत्तर:
10-10 m = \(\frac{10^{-10}}{10^{-6}}\) = 10-4 माइक्रोमीटर
चूँकि 1 माइक्रोमीटर = 10-6 मी.

प्रश्न 47.
वेनेडियम धातु लोहे के साथ मिलकर मिश्रधातु बनाती है। वेनेडियम का घनत्व 5.96g/cm³ है इसका SI मात्रक क्या होगा?
उत्तर:
S. I. मात्रक MKS पद्धति अर्थात् मी. किग्रा. सेकण्ड पद्धति, अतः वैनेडियम का घनत्व 5.96 kg/m³

प्रश्न 48.
40 कैलोरी को जूल में परिवर्तित कीजिए।
उत्तर:
1 कैलोरी = 4.2 जूल
अतः 40 कैलोरी = 4.2 x 40 जूल = 168.0 जूल

प्रश्न 49.
निम्न भौतिक राशियों की SI मात्रक लिखें।
(i) क्षेत्रफल, (ii) घनत्व, (iii) वेग, (iv) त्वरण (v) दाब,
(vi) सान्द्रता (vii) आवृत्ति, (viii) विद्युत आवेश, (ix) ऊर्जा (x) बल।
उत्तर:

भौतिक राशियाँS. I मात्रक
(i) क्षेत्रफलवर्ग मीटर (m²)
(ii) घनत्वकिग्रा. प्रति घनमीटर (kg/m²)
(iii) वेगमीटर प्रति सेकण्ड (m/s)
(iv) त्वरणमीटर प्रति सेकण्ड² (m/s²)
(v) दाबपास्कल या न्यूटन / मी.² (N/m²)
(vi) सान्द्रतामोल / मी.³ (mol/m³)
(vii) आवृत्तिहर्ट्ज (Hz या s-1)
(viii) विद्युत आवेशकूलॉम या एम्पियर सेकण्ड (As)
(ix) ऊर्जाजूल (kgm² s-2)
(x) बलन्यूटन (kgm/s²)

प्रश्न 50.
एक मील में कितने किलोमीटर व कितने मीटर होते हैं?
उत्तर:
एक मील में 1.6 किलोमीटर एवं 1609.3 मीटर होते हैं।

प्रश्न 51.
एक इंच में कितने मीटर होते हैं?
उत्तर:
एक इंच में 2.54 x 10-2 मीटर होते हैं।

प्रश्न 52.
एक अर्ग में कितने जूल होते हैं?
उत्तर:
एक अर्ग में 10-7 जुल होते हैं।

प्रश्न 53.
निम्न को मीटर में परिवर्तित करें
(1) माइक्रोमीटर (2) गीगा मीटर, (3) पिको मीटर, (4) सेन्टीमीटर।
उत्तर:
(1) एक माइक्रोमीटर = 10-6 मीटर
(2) एक गीगा मीटर = 109 मीटर
(3) एक पिको मीटर = 10-12 मीटर
(4) एक सेन्टी मीटर = 10-2 मीटर

प्रश्न 54.
2 फीट 2 इंच को S.I. इकाई में व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
1 फीट 12 इंच
2 फीट 2 इंच 26 इंच
1 इंच = 2.54 x 10-2 मी.
26 इंच = 2.54 × 10-2 × 26
= 66.04 × 10-2 मी.

प्रश्न 55.
0.000213 सेमी. को वैज्ञानिक पद्धति में लिखें।
उत्तर:
2.13 x 10-4 सेमी. अथवा 2.13 x 10-6 मीटर।

प्रश्न 56.
20°C को फारेनहाइट में परिवर्तित कीजिए।
उत्तर
°F = \(\frac { 9 }{ 5 }\) (°C) + 32
°F = \(\frac { 9 }{ 5 }\) × 20 + 32
= 36 + 32 – 68
अत: 20°C = 68°F

प्रश्न 57.
10°F को सेन्टीग्रेड में परिवर्तित कीजिए।
उत्तर:
°F = \(\frac { 9 }{ 5 }\) (°C) + 32
10 = \(\frac { 9 }{ 5 }\)(°C) + 32
10 – 32 = \(\frac { 9 }{ 5 }\)(°C)
– 22 = \(\frac { 9 }{ 5 }\)(°C) =
(°C) = – \(\frac { 22×5 }{ 9 }\) = – 12.22
10°F = – 12.22°C

प्रश्न 58.
किसी माप को लिखने की वैज्ञानिक विधि क्या है?
उत्तर:
किसी माप को 10 की घात में लिखने की विधि को वैज्ञानिक विधि कहते हैं।

प्रश्न 59.
मापन में सार्थक अंक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सार्थक अंक वे अर्थपूर्ण अंक होते हैं जो निश्चित रूप से ज्ञात होते हैं।

प्रश्न 60.
0.00018 को चर घातांकी संकेतन में लिखिए।
उत्तर:
1.8 × 104

प्रश्न 61.
परिशुद्धता और यथार्थपरकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
परिशुद्धता किसी राशि के विभिन्न मापनों व सामीप्य को व्यक्त करती है। यथार्थपरकता किसी विशिष्ट प्रायोगिक मान के वास्तविक मान से मेल रखने को व्यक्त करती है।

प्रश्न 62.
7.00g तथा 70g में क्या अन्तर है?
उत्तर:
700g में तीन सार्थक अंक हैं जबकि 70g में दो सार्थक अंक हैं। अतः प्रथम माप द्वितीय माप की तुलना में अधिक परिशुद्ध है।

प्रश्न 63.
इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान में सार्थक अंक बताइये।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान = 9.108 × 10-31kg
सार्थक अंक = 4 (चार)

प्रश्न 64.
निम्नलिखित संख्याओं को चार सार्थक अंकों सहित लिखिए।
(i) 7.024572
(ii) 2.6206 x 10³
उत्तर:
(i) 7.025
(ii) 2.621 × 10³

प्रश्न 65.
निम्नलिखित गणनाओं के परिणाम उपयुक्त सार्थक अंकों में व्यक्त कीजिए।
(i) \(\frac{3.24 \times 0.8606}{5.006}\)
(ii) 943 × 0.00345
उत्तर:
(i) \(\frac{3.24 \times 0.8606}{5.006}\) में तीनों संख्याओं में सार्थक अंक तीन, चार और चार हैं। अतः उपर्युक्त सार्थक अंकों में परिणाम 0.557 है।
(ii) 9.43 × 0-00345 का मान उपर्युक्त सार्थक अंकों में 0.0325 है।

प्रश्न 66.
निम्नलिखित संख्याओं में सार्थक अंकों की संख्या बताइये?
(i) 46.8, (ii) 0.00203, (iii) 3.630, (iv) 80.00
उत्तर:
(i) 46.8 में सार्थक अंकों की संख्या 3 है।
(ii) 0.00203 में सार्थक अंकों की संख्या 3 है।
(iii) 3.630 में सार्थक अंकों की संख्या 4 है।
(iv) 80.00 में सार्थक अंकों की संख्या 4 है।

प्रश्न 67.
निम्नलिखित में कितने सार्थक अंक उपस्थित हैं?
(i) 6000.0, (ii) 126,00, (iii) 4003, (iv) 2091, (v) 0.020, (vi) 52-82, (vii) 200
उत्तर:
(i) 60000 में पाँच सार्थक अंक हैं।
(ii) 126,00 में पाँच सार्थक अंक हैं।
(iii) 4003 में चार सार्थक अंक हैं।
(iv) 2091 में चार सार्थक अंक हैं।
(v) 0.020 में दो सार्थक अंक हैं।
(vi) 52.82 में चार सार्थक अंक हैं।
(vii) 200 में एक, दो व तीन सार्थक अंक हैं।

प्रश्न 68.
निम्न को वैज्ञानिक निरूपण में व्यक्त कीजिए-
(i) 0.0012, (ii) 213,0000, (iii) 2002, (iv) 600.0, (v) 5000, (vi) 7216:3
उत्तर:
(i) 0.0012 = 1.2 x 10-3
(ii) 213,0000 = 2.13 × 106
(iii) 2002 = 2.002 x 10³
(iv) 600.0 = 6.00 x 10²
(v) 5000 = 5.0 × 10³
(vi) 7216.3 = 7.2163 × 10³

प्रश्न 69.
C-12 के एक परमाणु का भार ग्राम में क्या है?
उत्तर:
1.992648 × 10-23 g ≈ 1.99 × 10-23 g.

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

प्रश्न 70.
निम्न में से किस संख्या में सबसे अधिक सार्थक अंक हैं?
(i) 0.00423,
(ii) 4.8032,
(iii) 5.123
उत्तर:
उपर्युक्त संख्याओं में से 4-8032 में सर्वाधिक सार्थक अंक 5 हैं।

प्रश्न 71.
योग कीजिए-
(i) 92.8 + 2.02 + 10.222
(ii) 77.85 + 14.10 + 8.3
उत्तर:
(i) 92.8 + 2.02 + 10.222 = 105.042
= 105.0 (सार्थक अंक के नियमानुसार)
उत्तर:
105.0

(ii) 77.85 + 14.10 + 8.3 = 100.25
= 100.2 (सार्थक अंक के नियमानुसार)
उत्तर:
100.2

प्रश्न 72.
घटाव कीजिए-
(i) 5.16 – 0.015
(ii) 237.5 – 16.92
(iii) 0.08638 – 0.0604
उत्तर:
(i) 5.16 – 0015 = 5.145 = 5.14
(सार्थक अंक के नियमानुसार )

(ii) 237.5 – 16.92 = 220.58 = 220.6
(सार्थक अंक के नियमानुसार)

(iii) 0.08638 – 0.0604 = 0.02598 = 0.0260
(सार्थक अंक के नियमानुसार)

प्रश्न 73.
गुणा कीजिए –
(i) 210 x 120
(ii) 5.02 x 1023
(iii) 0.06204 x 296.4 x 1.002
उत्तर:
(i) 210 x 120 = 25200
= 2.52 x 104

(ii) 5.02 x 1023 = 5.02 x 1023

(iii) 0.06204 × 296.4 x 1.002 = 18.425433 = 18.4

प्रश्न 74.
निम्नलिखित को तीन सार्थक अंकों के रूप में व्यक्त कीजिए।
(i) 6.5089
(ii) 32.1912
(iii) 8.721 × 1024
(iv) 30000.
उत्तर:
(i) 6.5089 तीन सार्थक अंकों के रूप में 6.51
(ii) 32.1912 तीन सार्थक अंकों के रूप में 32.2
(iii) 8.721 x 104 तीन सार्थक अंकों के रूप में 8.72 × 104
(iv) 30000 तीन सार्थक अंकों के रूप में, 3.00 x 104

प्रश्न 75.
निम्नलिखित गणनाओं में कितने सार्थक अंक हैं?
(i) \(\frac{312.21 \times 0.0212 \times 0.01323}{0.3454}\)
(i) 5 × 2.138
(iii) 0.112 + 0.8932 + 0.0123
उत्तर:
(i) चूँकि इसमें न्यूनतम परिशुद्ध अंक (0.0212) में तीन सार्थक अंक है अतः उत्तर में तीन सार्थक अंक होने चाहिये।
(ii) दूसरे अंक (2-138) में चार सार्थक अंक हैं, अतः उत्तर में चार सार्थक अंक होने चाहिये
(iii) इस स्थिति में दशमलव स्थानों की न्यूनतम संख्या तीन है अतः उत्तर में तीन सार्थक अंक होने चाहिये।

प्रश्न 76.
किसी भी संख्या में किस स्थिति में शून्य को सार्थक नहीं माना जाता है।
उत्तर:
जब किसी संख्या में शून्य प्रथम गैर शून्य अंक के बाँयीं ओर लिखा हो तो वह सार्थक नहीं रहता है।
उदाहरण 0.014 में दोनों शून्य सार्थक नहीं हैं।

प्रश्न 77.
बताइये निम्न में से कौन-सा मापन अधिक यथार्थ है? 5.0g या 5.00g.
उत्तर:
5.0 g तथा 500g में से 500g अधिक यथार्थ है क्योंकि इसमें मापन दशमलव के बाद दो स्थानों तक किया जा सकता है।

प्रश्न 78.
चरघातांकी संकेतन या वैज्ञानिक संकेतन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जब किसी संख्या को N x 10n के रूप में व्यक्त किया जाता है, तो इस संकेतन को चरघातांकी संकेतन या वैज्ञानिक संकेतन कहते हैं। यहाँ N दशमलव के बार्थी तरफ एक गैर-शून्य अंक वाली संख्या है।
यहाँ n = पूर्णांक, जिसे घातांक (exponent) कहते हैं।

प्रश्न 79.
S. I मात्रक मीटर से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मीटर (Metre) मीटर एक सेकण्ड के 1/299,792,458 वें समयान्तराल के दौरान निर्वात् में प्रकाश द्वारा तय किये गये पथ की लम्बाई होती है।

प्रश्न 80.
S. I मात्रक किलोग्राम को परिभाषित करें।
उत्तर:
किलोग्राम (Kilogram ) यह प्रारूपी ( Prototype) किलोग्राम के द्रव्यमान के बराबर होता है वास्तव में यह फ्रांस में भार और माप के अन्तर्राष्ट्रीय ब्यूरो में संग्रहित प्लेटिनम ब्लॉक का द्रव्यमान है।

प्रश्न 81.
तत्व द्रव्यमान के किस अनुपात में संयोग करते हैं
उत्तर:
स्थिर अनुपात के नियम के अनुसार।

प्रश्न 82.
द्रव्य की अविनाशिता का नियम किसने दिया था?
उत्तर:
यह नियम लोमोनोसोव ने 1756 ई. में दिया था।

प्रश्न 83.
amu से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
amu को परमाणु द्रव्यमान इकाई कहते हैं।

प्रश्न 84.
कार्बन का कौन सा समस्थानिक तत्व के सापेक्ष द्रव्यमान को व्यक्त करने में प्रयुक्त होता है?
उत्तर:
कार्बन-12(12C) समस्थानिक

प्रश्न 85.
तत्व के परमाणु द्रव्यमान अंशत: (Fractional) क्यों होते हैं?
उत्तर:
उनके समस्थानिकों की उपस्थिति के कारण।

प्रश्न 86.
मोल क्या है?
उत्तर:
किसी पदार्थ के मोल में उतने ही कण उपस्थित होते हैं जितनी कार्बन 12 समस्थानिक के 12g में परमाणुओं की संख्या होती है।

प्रश्न 87.
किसी तत्व के एक ग्राम परमाणु में कितने परमाणु होते हैं?
उत्तर:
6.023 x 1023 के तुल्य परमाणु।

प्रश्न 88.
परमाणु द्रव्यमान इकाई को समझाइए।
उत्तर:
कार्बन 12 के एक परमाणु का द्रव्यमान स्वेच्छा से 12 amu माना गया है। इसलिए- कार्बन 12 के एक परमाणु के द्रव्यमान के बारहवें भाग को परमाणु द्रव्यमान इकाई कहते हैं।
अतः 1 amu = \(\frac{1.9926 \times 10^{-23}}{12}\)
= 166 × 1024 g
1.9926 × 10-23, C-12 के एक परमाणु का वास्तविक द्रव्यमान।

प्रश्न 89.
औसत परमाणु द्रव्यमान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रकृति में तत्वों के समस्थानिक पाये जाते हैं। अतः तत्व के समस्थानिक परमाणु द्रव्यमानों के परिकलन में उनकी आपेक्षिक बाहुल्यता पर भी विचार किया जाता है। इस प्रकार परिकलित किया गया परमाणु द्रव्यमान औसत परमाणु द्रव्यमान कहलाता है।

प्रश्न 90.
आण्विक द्रव्यमान क्या है?
उत्तर:
किसी पदार्थ का आण्विक द्रव्यमान वह संख्या है जो यह प्रदर्शित करती है कि इस पदार्थ का एक अणु कार्बन 12 के एक परमाणु के 1/12 वें भाग से कितने गुना भारी है।

प्रश्न 91.
मोल संकल्पना क्या है?
उत्तर:
किसी पदार्थ का एक मोल उसकी वह मात्रा है जिसमें उतने ही कण उपस्थित रहते हैं जितनी C-12 समस्थानिक के ठीक 12g में परमाणुओं की संख्या होती है यह संख्या 6.023 x 1023 परमाणु / मोल होती है।

एक मोल में कर्णों की इस संख्या को आवोगाद्रो संख्या कहते हैं। इसे NA या N व्यक्त करते हैं।

प्रश्न 92.
मोलर द्रव्यमान क्या है?
उत्तर:
किसी पदार्थ के एक मोल में व्यक्त द्रव्यमान को मोलर द्रव्यमान कहते हैं। उदाहरणार्थ-
जल का मोलर द्रव्यमान = 18.02 g

प्रश्न 93.
हाइड्रोजन का आण्विक द्रव्यमान ज्ञात करो यदि उसकी परमाणुकता 2 हो?
उत्तर:
आण्विक द्रव्यमान परमाणु द्रव्यमान परमाणुकता = 1.008 x 2 = 2.016 u
∴ हाइड्रोजन का आण्विक द्रव्यमान 2.016 u होगा।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

प्रश्न 94.
मैग्नीशियम के 2.5 ग्राम परमाणुओं का द्रव्यमान बताइये।
उत्तर:
मैग्नीशियम का ग्राम परमाणु 24 g
मैग्नीशियम का 2.5 ग्राम परमाणु 24 x 2.5 = 60 g

प्रश्न 95.
48u ओजोन में कितने ऑक्सीजन परमाणु उपस्थिति होते हैं?
उत्तर:
48u ओजोन (O3) में ऑक्सीजन के \(\frac { 48u }{ 16u }\) = 3 परमाणु होते हैं।

प्रश्न 96.
उन तीन तत्वों के नाम लिखिये जो कि मनुष्य के शरीर का 90% भाग बनाते हैं?
उत्तर:
कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन।

प्रश्न 97.
हाइड्रोजन गैस आसानी से आग पकड़ लेती है और ऑक्सीजन दहन में सहायक होती है। परन्तु जल आग बुझाने के लिये क्यों प्रयुक्त किया जाता है?
उत्तर:
चूँकि जल (H2O) एक यौगिक है, इस यौगिक के गुण हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों के गुणों से भिन्न होते हैं। अतः जल को आग बुझाने के लिये प्रयुक्त करते हैं।

प्रश्न 98.
आवागाद्रो संकल्पना क्या है?
उत्तर:
दाब व ताप की समान परिस्थितियों में दो गैसों के समान आयतनों में अणुओं की संख्या समान होती है।

प्रश्न 99.
बताइये कि निम्नलिखित नियमों का प्रतिपादन किसने किया-
(1) स्थिर अनुपात का नियम
(2) द्रव्यमान संरक्षण का नियम
(3) गुणित अनुपात का नियम
(4) व्युत्क्रम अनुपात का नियम
(5) गैसीय आयतन का नियम
उत्तर:
(1) प्राउस्ट, (2) लेवोशिए, (3) जॉन डाल्टन (4) रिक्टर (5) गैलुसाक।

प्रश्न 100.
गैलुसाक के आयतन के नियम का पालन कब नहीं होता?
उत्तर:
जब अभिकारकों अथवा उत्पादों में से कोई ठोस अथवा द्रव्य हो।

प्रश्न 101.
स्थिर अनुपात के नियम का पालन किन अवस्थाओं में नहीं होता है?
उत्तर:
वे यौगिक जिनमें समस्थानिक उपस्थित होते हैं जैसे H2O और D2O। इन यौगिकों में स्थिर अनुपात के नियम का पालन नहीं होता है।

प्रश्न 102.
परमाणु स्वतन्त्र अवस्था में नहीं रह सकता है, क्यों?
उत्तर:
अपना इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पूर्ण करने के लिये परमाणु आपस में संयोग करके अणु बनाते इसलिये परमाणु स्वतन्त्र अवस्था में नहीं रह सकता है।

प्रश्न 103.
संख्या 3.82 में से 0.0016 को घटाइये तथा उत्तर सार्थक अंकों में दीजिए।
उत्तर:

3.82
– 0.016
3.8184     उत्तर = 3.82

प्रश्न 104.
यदि किसी जल के नमूने का भार 10 g है तो उसमें जल के कितने मोल उपस्थित हैं?
उत्तर:
जल का अणुभार = 2 + 16 = 18
जल में उपस्थित मोल = \(\frac { भार }{ अणुभार }\) = \(\frac { 10 }{ 18 }\) = 0.55 मोल

प्रश्न 105.
0.2 मोल CO2 में कितने ग्राम CO2 उपस्थित हैं?
उत्तर:
1 मोल CO2 = 12 + 32 = 44 g
0.1 मोल CO2 = 0.1 x 44 = 4.4 g

प्रश्न 106.
नाइट्रोजन गैस का आण्विक द्रव्यमान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
नाइट्रोजन गैस का परमाणु द्रव्यमान 14 g/mol
अतः नाइट्रोजन गैस का द्रव्यमान 14 x 2
= 28 g/mol

प्रश्न 107.
S8 का आण्विक द्रव्यमान ज्ञात कीजिए?
उत्तर:
सल्फर का परमाण्विक द्रव्यमान = 32 g/mol
अतः S8 का आण्विक द्रव्यमान 32 × 8
= 256 g/mol

प्रश्न 108.
0.1 मोल CO में कितने ग्राम CO2 उपस्थित है?
उत्तर:
1 मोल CO2 = 12 + 2 × 16 = 44 g
0.1 मोल CO2 = 0.1 x 44 = 4.4 g

प्रश्न 109.
4 ग्राम ऑक्सीजन में परमाणुओं की संख्या ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
परमाणुओं की संख्या
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 1

प्रश्न 110.
1 अणु कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) के द्रव्यमान की गणना करें।
उत्तर:
CO का मोलर द्रव्यमान 12 + 16 = 28 g
6.02 x 1023 अणुओं का द्रव्यमान = 28 g
1 अणु CO का द्रव्यमान = \(\frac{28}{5.02 \times 10^{23}}\)
= 4.65 × 10-23 g

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में, रसायन विज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान किस प्रकार है?
उत्तर:
रसायन विज्ञान का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान उर्वरकों, क्षारों, अम्लों, लवण, रंग, बहुलकों, दवाओं, साबुन, अपमार्जकों, धातुओं, मिश्र धातुओं तथा कार्बनिक, अकार्बनिक रसायनों सहित नवीन सामग्री के निर्माण में लगे रासायनिक उद्योग द्वारा है।

प्रश्न 2.
कैन्सर चिकित्सा तथा एड्स के उपचार हेतु प्रयोग में लायी जाने वाली औषधियाँ बताइए।
उत्तर:

  1. कैन्सर चिकित्सा में सिस प्लैटिन तथा टैक्सॉल औषधियां प्रयुक्त होती हैं।
  2. एड्स से ग्रस्त रोगियों के उपचार हेतु ऐजिडोथाइमिडिन (AZT) जीवन रक्षक औषधि प्रयुक्त की जाती है।

प्रश्न 3.
रासायनिक सिद्धान्तों के आधार पर किन-किन पदार्थों का संश्लेषण सम्भव हो सका?
उत्तर:
रासायनिक सिद्धान्तों के आधार पर चुम्बकीय, विद्युतीय और प्रकाशीय गुणधर्म युक्त पदार्थ संश्लेषित करना सम्भव हो सका है जिसके फलस्वरूप अतिचालक, सिरेमिक, सुचालक, बहुलक, प्रकाशीय फाइबर (तन्तु) जैसे पदार्थ संश्लेषित किये जा सकते हैं।

प्रश्न 4.
रसायन विज्ञान द्वारा पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्याओं को कैसे नियन्त्रित किया गया?
उत्तर:
समताप मण्डल (stratosphere) में ओजोन अवक्षय (Ozone depletion) उत्पन्न करने वाले एवं पर्यावरण प्रदूषक क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) जैसे पदार्थों के विकल्प सफलतापूर्वक संश्लेषित किये गये हैं।

प्रश्न 5.
रसायन विदों की भावी पीढ़ियों के लिए कौन-कौन सी बौद्धिक चुनौतियाँ हैं?
उत्तर:

  1. पर्यावरण की अनेक समस्याएँ,
  2. ग्रीन हाउस गैसों (मेथेन, कार्बन डाइ ऑक्साइड),
  3. जैव रासायनिक प्रक्रियाओं की समझ,
  4. रसायनों का व्यापक स्तर पर उत्पादन,
  5. विभिन्न ऐन्जाइमों का उपयोग,
  6. नवीन उपयोगी पदार्थों का उत्पादन।

प्रश्न 6.
तत्व के सापेक्ष परमाणु द्रव्यमान को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
किसी तत्व का परमाणु द्रव्यमान वह संख्या है जो यह प्रदर्शित करती है कि तत्व का एक परमाणु कार्बन- 12 के परमाणु के बारहवें भाग द्रव्यमान अथवा हाइड्रोजन के 1.008 भाग द्रव्यमान से कितने गुना भारी है। किसी भी तत्व का परमाणु द्रव्यमान इसके परमाणु का औसत सापेक्ष द्रव्यमान होता है, जबकि उसकी तुलना कार्बन परमाणु (C12 समस्थानिक) का भार 12 मानकर की जाती है।

प्रश्न 7.
यौगिक के सूत्र से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
किसी यौगिक के अणु का इसमें उपस्थित विभिन्न तत्वों के प्रतीकों के रूप में संक्षिप्त प्रदर्शन यौगिक का सूत्र कहलाता है। इन्हें दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है।

  • मूलानुपाती सूत्र – यौगिक का वह सूत्र जो यौगिक के एक अणु में उपस्थित भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणुओं का सरलतम अनुपात बताता है।
  • आण्विक सूत्र – यौगिक का वह सूत्र जो उस यौगिक में उपस्थित भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणुओं का वास्तविक अनुपात प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 8.
मूलानुपाती सूत्र व आण्विक सूत्र में सम्बन्ध बताएँ?
उत्तर:
आण्विक सूत्र =nx मूलानुपाती सूत्र
(यहाँ n = 1, 2, 3, 4 ……..)
मूलानुपाती व आण्विक सूत्रों में से आण्विक सूत्र यौगिक के वास्तविक सूत्र को व्यक्त करता है।

प्रश्न 9.
मोलरता एवं मोललता में अन्तर बताइए।
उत्तर:

मोलरतामोललता
1. यह 1 लीटर विलयन में घुले हुए हुए विलेय के मोलों की संख्या है।1. यह 1 किग्रा. विलायक में घुले हुए विलेय के मोलों की संख्या है।
2. यह ताप पर निर्भर करती है।2. यह ताप पर निभर्भर नहीं होती है।
3. इसका मात्रक mol L-1 है।3. इसका मात्रक mol L-1 है।

प्रश्न 10.
रूपान्तरण गुणक या विमीय विश्लेषण विधि से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
रूपान्तरण गुणक या विमीय विश्लेषण विधि – गणनाओं के लिये जो आँकड़े दिये जाते हैं, यह आवश्यक नहीं है कि वे सभी मात्रकों की एक ही पद्धति में हों। अत: कभी-कभी मात्रकों को एक पद्धति से दूसरी पद्धति में परिवर्तित करना पड़ता है। इस परिवर्तन के लिये जिस तकनीक का प्रयोग किया जाता है उसे विमीय विश्लेषण अथवा इकाई गुणक विधि या गुणक लेवल विधि या रूपान्तरण गुणक विधि कहते हैं।

प्रश्न 11.
एक व्यक्ति प्रति सेकण्ड दस लाख रुपये खर्च करता है। क्या वह अपने जीवन में 1 मोल खर्च कर सकता है।
उत्तर:
दस लाख रुपये खर्च करता है 1 सेकण्ड में,
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 2
अतः व्यक्ति अपने जीवनकाल में ये रुपये खर्च नहीं कर सकता।

आंकिक प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न को हल कीजिए :
(i) 2.3 x 105 + 2.9 x 104
(ii) 6.0 × 104 – 4.0 × 10-5
(iii) (5.0 × 106) × (2.0 × 106)
(iv) ( 3.2 x 10-2) ÷ (80×102)
हल:
(i) दोनों संख्याओं के चरघातांकों को समान करके जोड़ने योग
= (2.3 × 105) + (0.29 × 104)
= 2.59 × 104

(ii) दोनों संख्याओं के चरघातांकों को समान करके घटाने पर-
घटाव = (6.0 × 10-4) – (0.40 × 104)
= 5.60 × 10-4

(iii)
= (5.0 × 106) × (2.0 × 106)
= (5·0 × 2·0) × (106+6)
= 100 × 1012 = 1.0 × 1013

(iv) (3.2 x 10-2) ÷ (8.0 × 102)
= \(\frac{3.2 \times 10^{-2}}{8.0 \times 10^2}\)
= \(\frac{3 \cdot 2}{8} \times 10^{-2-(2)}\)
= 0.4 × 10-4 = 4 x 10-5

प्रश्न 2.
2.12 g ग्लूकोज तथा 2.925 g नमक को 30.2 g पानी में मिलाया गया है, विलयन का द्रव्यमान ज्ञात कीजिए।
हल:
ग्लूकोज का द्रव्यमान = 2.12 g
नमक का द्रव्यमान = 2.925 g
पानी का द्रव्यमान = 30.2 g
विलयन का कुल द्रव्यमान = 35.245 g
यहाँ सही उत्तर 35.2g है क्योंकि यहाँ प्रश्न में दशमलव के बाद सबसे कम संख्या एक है।

प्रश्न 3.
चाँदी धातु का द्रव्यमान 6.342 g तथा घनत्व 1.2g/cm³ है। इसके आयतन की गणना करें।
हल:
चाँदी धातु का द्रव्यमान = 6.342 g
चौदी धातु का घनत्व = 1.2g/cm³
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 3
चूँकि दी गई संख्याओं में निम्नतम सार्थक अंक 2 है अतः अन्तिम परिणाम में भी दो सार्थक अंक होने चाहिये अतः परिणाम में से अन्तिम दो अंक 8 व 5 को हटाने के लिये 2 में एक अंक का योग हो जायेगा अतः सही उत्तर 5.3cm है।

प्रश्न 4.
हाइड्रोजन के एक परमाणु का द्रव्यमान 1008u है। अतः हाइड्रोजन के 10 परमाणुओं का द्रव्यमान कितना होगा ?
हल:
H के एक परमाणु का द्रव्यमान = 10.08 u
H के 10 के परमाणुओं का द्रव्यमान = 1008 × 10 = 10.08 u
चूँकि 10 एक यथार्थ संख्या है अतः इसके सार्थक अंक अनन्त होंगे। अतः अन्तिम परिणाम में सार्थक अंक दूसरी संख्या के सार्थक अंक के समान होना चाहिये। अतः कुल द्रव्यमान 10.08 है।

प्रश्न 5.
1.3 मिनट को सेकेण्ड में परिवर्तित करें।
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 4

प्रश्न 6.
निम्नलिखित को अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति (S.I.) में व्यक्त कीजिए।
(i) 90 मिलियन मील (यह सूर्य तथा पृथ्वी के बीच की दूरी है।
(ii) 90 मील प्रति घण्टा (राजधानी एक्सप्रेस की गति)
(iii) 5 फुट 6 इंच (भारतीय पुरुषों की औसत लम्बाई)
हल:
(i) 90 मीलियन मील दूरी की इकाई अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति में मीटर होती है।
1 मील 1.60 कि.मी. = 160 x 103 मी.
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 5

(ii) 90 मील प्रति घन्टा
1 मील = 1.6 कि.मी. = 1.6 x 103 मीटर
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 6

(iii) 5 फुट 6 इंच 5×12 + 666 इंच
1 इंच = 2.54 × 10-2 मीटर
रूपान्तरण गुणांक = 2.54 x 10-2 HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 7
66 इंच = 66 इंच x रूपान्तरण गुणांक
= 66 x 2.54 × 10-2 मीटर
= 167.64 × 10-2 मीटर
= 1.68 मीटर

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

प्रश्न 7.
10 दिनों में कितने सेकण्ड (4) होते हैं।
हल:
हम जानते हैं.
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 8

प्रश्न 8.
10 लीटर जल के आयतन को मीटर³ (m³) में व्यक्त कीजिए।
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 9

प्रश्न 9.
ट्रेन की चाल मीटर/सेकेण्ड में बताइये जो कि 950 मील की दूरी 25 घण्टे में तय करती है। (दिया गया है कि 1 मील 1.60 कि. मी.)।
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 9a

प्रश्न 10.
निम्नलिखित को हल करें तथा इसमें उपस्थित सार्थक अंकों को बताएँ।
(1) 3.412 × 11.5
(2) 80.674 + 6.2
(3) 6180.03546 + 406.27
हल:
(i) 3412 × 11.5 = 39.2380
चूँकि यहाँ पर न्यूनतम परिशुद्ध संख्या में तीन सार्थक अंक हैं, अतः परिणाम में कुल तीन सार्थक अंक होने चाहिये।
अतः सही उत्तर 39.2

(ii) \(\frac { 80.674 }{ 6.2 }\) = 13.0119
यहाँ भी उत्तर में दो सार्थक अंक होने चाहिये।
अत: सही उत्तर = 13

(iii) 6180.03546+ 406.27
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 10
यहाँ उत्तर में चार सार्थक अंक है क्योंकि गुणनफल में 618 एक परिशुद्ध अंक है तथा इसके सार्थक अंक तीन का प्रयोग उत्तर देने में नहीं किया जाता है।
21 . 91
406 . 27
428 . 18 उत्तर को दशमलव के दो स्थानों तक दें।
अतः सही उत्तर = 428.18

प्रश्न 11.
20.0 फुट³ एल्युमीनियम का भार ग्राम में ज्ञात करें यदि इसका घनत्व 2.70 g / cm³ है।
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 11

प्रश्न 12.
4.9 ग्राम सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा सोडियम क्लोराइड का कितना द्रव्यमान वियोजित होगा, बंदि इस अभिक्रिया में 6g सोडियम बाइसल्फेट (NaHSO) तथा 1.825g हाइड्रोजन क्लोराइड बनता हो।
हल:
अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण निम्न है-
NaCl + H2SO4 → NaHSO4 + HCl
अभिकारकों का द्रव्यमान = NaCl का द्रव्यमान + H2SO4 का द्रव्यमान
= x + 4.9 g
उत्पादों का द्रव्यमान = NaHSO4 का द्रव्यमान + HCl का द्रव्यमान
= 6.0g + 1.825 g
= 7.825 g
द्रव्यमान संरक्षण के नियमानुसार,
अभिकारकों का द्रव्यमान = उत्पादों का द्रव्यमान
x + 4.9 g = 7.825 g
x = 7.825 – 4.9 = 2.925 g
अत: NaCl का द्रव्यमान = 2.925 g

प्रश्न 13.
10g कैल्सियम कार्बोनेट को गर्म करने पर मानक ताप व दाब पर 2.24L CO2 गैस व 5.6g CaO बना सिद्ध करें कि ये आँकड़े द्रव्य की अविनाशिता का नियम सिद्ध करते हैं।
हल:
अभिक्रिया का समीकरण
COCO3 → CaO + CO2
दिया गया है CaCO3 का द्रव्यमान = 10g
CaO का द्रव्यमान = 5.6g
∵ 22.4L CO2 का मानक ताप व दाब पर द्रव्यमान = 44 g
1L CO2 का मानक ताप व दाव पर द्रव्यमान = \(\frac { 44 }{ 22.4 }\)g
∴ 2.24 L CO2 का मानक ताप व दाब पर द्रव्यमान
= \(\frac {44×22.4 }{ 22.4 }\)g = 4.4g
उत्पादों का कुल द्रव्यमान = 5.6 + 4.4 = 10g
चूँकि इस अभिक्रिया में अभिकारकों का द्रव्यमान व उत्पादों का द्रव्यमान समान है, अत: उपर्युक्त आँकड़े द्रव्य की अविनाशिता का नियम सिद्ध करते हैं।

प्रश्न 14.
17g सिल्वर नाइट्रेट, सोडियम क्लोराइड से क्रिया करके 14.35g सिल्वर क्लोराइड तथा 8.5g सोडियम नाइट्रेट देता है। सोडियम क्लोराइड का द्रव्यमान क्या होगा?
उत्तर:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 12
द्रव्यमान संरक्षण के नियमानुसार
अभिकारकों का द्रव्यमान = उत्पादों का द्रव्यमान
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 13
17g + x = 14.35g + 8.5g
17g + x = 22.85g
x = 22.85g – 17g = 5.85g

प्रश्न 15.
2.16g धात्विक कॉपर को नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म कर जलाने पर प्राप्त कॉपर ऑक्साइड का भार 2.7g पाया गया। एक अन्य प्रयोग में, 1.15g कॉपर ऑक्साइड अपचयित होकर 0.92g कॉपर प्राप्त होता है। दर्शाइये कि दिये गये आँकड़े ‘स्थिर अनुपात के नियम’ का पालन करते हैं।
हल:
प्रथम प्रयोग में,
धात्विक कॉपर का द्रव्यमान = 2.16g
कॉपर ऑक्साइड का द्रव्यमान = 2.7 g
ऑक्सीजन का द्रव्यमान = 2.7 – 2.16 = 0.54g
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 14
ऑक्सीजन का प्रतिशत = 100 – 80 = 20%
द्वितीय प्रयोग में,
धात्विक कॉपर का द्रव्यमान = 0.92g
कॉपर ऑक्साइड का द्रव्यमान = 1.15g
ऑक्सीजन का द्रव्यमान = 1.15 – 0.92 = 0.23g
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 15
ऑक्सीजन का प्रतिशत = 100 – 80 = 20%
दोनों प्रयोगों कॉपर तथा ऑक्सीजन दोनों के द्रव्यमानों का अनुपात एक जैसा है अतः यह स्थिर अनुपात के नियम को दर्शाते हैं।

प्रश्न 16.
सिद्ध कीजिए कि निम्नलिखित आँकड़े स्थिर अनुपात के नियम की पुष्टि करते हैं। कार्बन मोनो ऑक्साइड के दो विभिन्न नमूनों में कार्बन का द्रव्यमान निम्न प्रकार से है- (i) 1.26g कार्बन, 1.42g मोनो ऑक्साइड में, (ii) 1008g कार्बन, 1.136g मोनो ऑक्साइड में
हल:
प्रथम नमूने में
कार्बन मोनो ऑक्साइड का द्रव्यमान = 1.42g
कार्बन का द्रव्यमान = 1.26g
ऑक्सीजन का द्रव्यमान = 1.42 – 1.26 = 0.16g
कार्बन का प्रतिशत = \(\frac { 1.26 }{ 1.42 }\) x 100 = 88.73%
ऑक्सीजन का प्रतिशत = 100 – 88.73 = 11.27%
दूसरे नमूने में,
कार्बन मोनोऑक्साइड का द्रव्यमान = 136g
कार्बन का द्रव्यमान = 1.008g
ऑक्सीजन का द्रव्यमान = 0.128g
कार्बन की प्रतिशतता
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 16
ऑक्सीजन का प्रतिशत = 100 – 88.73 = 11.27%
चूँकि यहाँ पर दिये गये नमूने में कार्बन व ऑक्सीजन का प्रतिशत मात्राएँ समान हैं अतः ये आँकड़े स्थिर अनुपात के नियम का पालन करते हैं।

प्रश्न 17.
एक प्रयोग में तत्व ‘X’ के 15g तत्व ‘Y’ के 25g से संयोग करके एक यौगिक बनाते हैं। जबकि दूसरे प्रयोग में तत्व ‘X’ के 3g तत्व ‘Y’ के Sg से संयोग करके यौगिक बनाते हैं। कारण सहित बताइये कि इन आँकड़ों से रासायनिक संयोग के किस नियम का सत्यापन होता है।
हल:
पहले प्रयोग में,
X : Y
15 : 25
3 : 5
दूसरे प्रयोग में,
X : Y
3 : 5
यहाँ X तथा Y के द्रव्यमानों में अनुपात होने के कारण स्पष्ट है कि उपर्युक्त आँकड़े स्थिर अनुपात के नियम की पुष्टि करते हैं।

प्रश्न 18.
कॉपर सल्फेट क्रिस्टल में 25.45% कॉपर तथा 36.07% जल है। यदि स्थिर अनुपात का नियम सत्य हो तो 40g कॉपर सल्फेट का क्रिस्टल प्राप्त करने के लिये आवश्यक कॉपर के भार की गणना कीजिए।
हल:
दिये गये आँकड़ों के अनुसार,
कॉपर का प्रतिशत = 25.45%
जल का प्रतिशत = 36.07%
अत: सल्फेट प्रतिशत = 100 – (25.45 + 36.07)
= 100 – 61.52 = 38.48%
यदि स्थिर अनुपात का नियम सत्य है तो स्थिर संघटन का प्रतिशत कॉपर सल्फेट के दूसरे क्रिस्टल में भी वही होना चाहिये।
अतः
100g CuSO4 क्रिस्टल में Cu = 25.45g
40g CuSO4 क्रिस्टल में Cu = \(\frac { 25.45×40 }{ 100 }\)
= 10.18 g

प्रश्न 19.
कार्बन दो प्रकार के ऑक्साइड बनाता है जिनमें क्रमशः 42.8% व 27.27% कार्बन उपस्थित है। सिद्ध कीजिए कि ये प्रेक्षण गुणित अनुपात क नियम को सिद्ध करते हैं।
हल:
कार्बन के दोनों ऑक्साइड में कार्बन व ऑक्सीजन की निम्न प्रतिशत मात्राएँ हैं।
प्रथम ऑक्साइड
C = 42.8%
O = 57.2%
द्वितीय ऑक्साइड
27.27%
72.73
प्रथम ऑक्साइड में,
57.2g ऑक्सीजन से = 42.8g कार्बन संयोग करता है।
1g ऑक्सीजन से =\(\frac { 42.8 }{ 57.2 }\) = 0.748g
दूसरे ऑक्साइड में,
72.73g ऑक्सीजन = 27.27g कार्बन संयोग करता है।
1g ऑक्सीजन = \(\frac { 27.27 }{ 72.73 }\) = 0.375g
उपर्युक्त दोनों ऑक्साइड में कार्बन की विभिन्न मात्राओं में (0.748 : 0.375) एक सरल अनुपात 21 है अतः यह आँकड़े गुणित अनुपात नियम को सिद्ध करते हैं।

प्रश्न 20.
एक तत्व के दो सल्फाइडों में सल्फर का द्रव्यमान क्रमशः 53.33% और 36.36% है सिद्ध कीजिये कि ये आँकड़े गुणित अनुपात नियम की पुष्टि करते हैं।
हल:
प्रथम सल्फाइड में,
सल्फर की मात्रा = 53.33%
तत्व की मात्रा = 100 – 53.33 = 46.47%
अतः तत्व व सल्फर के प्रतिशतों का अनुपात
= 46.67:53.33
= 1 : 1 . 14
द्वितीय सल्फाइड में,
सल्फर की मात्रा = 26.36%
तत्व की मात्रा = 100 – 36.36 = 63.64%
= 1 : 0.57
तत्व और सल्फर के अनुपात = 63.64:36.36
चूँकि दोनों सल्फाइडों में तत्व की मात्रा निश्चित है अतः दोनों सल्फाइडों में सल्फर तत्व की निश्चित मात्रा में संयोग करने वाली मात्राओं में परस्पर अनुपात 0.571.14 या 2 है, जो एक सरल गुणित अनुपात है, अतः इन आँकड़ों से गुणित अनुपात का नियम सिद्ध होता है।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

प्रश्न 21.
कार्बन हाइड्रोजन के साथ क्रिया करके तीन यौगिक A. B तथा C बनाता है। यौगिक A, B तथा C में हाइड्रोजन की प्रतिशत मात्र क्रमश: 25, 14.3 तथा 7.7 है ये आँकड़े किस नियम को सिद्ध करते हैं ?
हल:
यौगिक में
हाइड्रोजन की प्रतिशत मात्रा = 25.0%
कार्बन की प्रतिशत मात्रा 100 – 25 = 75%
अत: हाइड्रोजन का 25 भाग अभिक्रिया करता है 75 भाग कार्बन से, हाइड्रोजन का 1 भाग अभिक्रिया करेगा
= \(\frac { 75 }{ 25 }\) = 3 भाग कार्बन से।
यौगिक B में
हाइड्रोजन की प्रतिशत मात्रा = 14.3%
कार्बन की प्रतिशतता = 100 – 14.3
= 85.7%
अतः हाइड्रोजन के 14.3 भाग से अभिक्रिया करता है
= 85.7 भाग कार्बन,
हाइड्रोजन के 1 भाग से अभिक्रिया करेगा
= \(\frac { 85.7 }{ 14.3 }\) = 6 भाग कार्बन
यौगिक C में
हाइड्रोजन की प्रतिशत मात्रा = 7.7%
कार्बन की प्रतिशतता = 100.7.7 = 92.3%
7.7 भाग हाइड्रोजन अभिक्रिया करता है = 92.3 भाग कार्बन से
1 भाग हाइड्रोजन अभिक्रिया करेगा = \(\frac { 92.3 }{ 77 }\) = 120 भाग कार्बन से। चूँकि यौगिक A, B तथा C में हाइड्रोजन की समान मात्रा से
अभिक्रिया करने वाले कार्बन की मात्राओं का प्रतिशत निम्न प्रकार से है
3 : 6 : 12
1 : 2 : 4
जो कि एक सरल गुणित अनुपात है अतः यह आँकड़े गुणित अनुपात के नियम को सिद्ध करते हैं।

प्रश्न 22.
H2 एवं Cl2, सूर्य के प्रकाश में क्रिया करके HCI गैस बनाती है। 20ml हाइड्रोजन से HCl का कितना आयतन प्राप्त होता?
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 17
1 आयतन हाइड्रोजन से प्राप्त होता है = 2 आयतन HCl
20 ml हाइड्रोजन से प्राप्त होगी = 2 x 20 ml HCl
= 40ml HCl

प्रश्न 23.
एक धातु दो ऑक्साइड बनाती है। इन ऑक्साइडों के एक-एक g को अलग-अलग अपचयित करने पर क्रमशः 0-798g तथा 0.888g धातु प्राप्त हुई। ये परिणाम रासायनिक संयोग के किस नियम की पुष्टि करते हैं?
हल:
प्रथम ऑक्साइड में,
ऑक्साइड की मात्रा = 1.00 g
धातु की मात्रा = 0.798g
ऑक्सीजन की मात्रा = 1.00 – 0.798
= 0.202 g
0.202g ऑक्सीजन संयुक्त होती है = 0.798g धातु से
1g ऑक्सीजन संयुक्त होगी = \(\frac { 0.798 }{ 0.202 }\) = 3.95g धातु से
द्वितीय ऑक्साइड में,
ऑक्साइड की मात्रा = 100g
धातु की मात्रा = 0.888g
ऑक्सीजन की मात्रा = 1.00 – 0.888 = 0.112g
0.112g ऑक्सीजन संयुक्त होती है = 0.888g धातु से
1g ऑक्सीजन संयुक्त होगी = \(\frac { 0.888 }{ 0.202 }\) = 3.95 g धातु से
अत: 1g ऑक्सीजन से संयुक्त होने वाली धातु की मात्राएँ क्रमशः 3.95 और 7.92g हैं, जो कि 1 : 2 के सरल अनुपात में हैं, अतः दिये गये आँकड़े गुणित अनुपात के नियम की पुष्टि करते हैं।

प्रश्न 24.
यदि नाइट्रिक ऑक्साइड निम्नांकित समीकरण के अनुसार बनती है।
N2(g) + O2(g) → 2NO(g)
तो 30 L NO गैस बनाने के लिये नाइट्रोजन का कितना आयतन आवश्यक होगा?
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 18
2L NO प्राप्त करने के लिये आवश्यक होती है = 1L इट्रोजन
30L NO प्राप्त करने के लिये आवश्यक होती है।
15 L नाइट्रोजन

प्रश्न 25.
6.488 ग्राम सीसा 1.002 ग्राम ऑक्सीजन से क्रिया कराने पर लैड परऑक्साइड (Pb2O2) प्राप्त होता है। लैड परऑक्साइड को हम लैड नाइट्रेट को गर्म करके भी प्राप्त कर सकते हैं जिसमें 13.38% ऑक्सीजन है उपरोक्त सूचनाएं स्थिर संघटन नियम को सिद्ध करती हैं।
हल:
प्रथम ऑक्साइड में,
लैड परऑक्साइड का द्रव्यमान,
6.488g + 1.002 = 7.490g
7.49g लैंड परऑक्साइड में है = 1.002g O2
100g लैड परऑक्साइड में होगी = \(\frac { 1.002×100 }{ 7.49 }\)O2
= 13.38%
अत: ऑक्सीजन की प्रतिशतता = 13.38%
दूसरे प्रयोग में भी 13-38% ऑक्सीजन उपस्थित है। जो प्रथम प्रयोग में ऑक्सीजन की प्रतिशत मात्रा के समतुल्य है, अतः स्थिर अनुपात नियम की सत्यता सिद्ध होती है।

प्रश्न 26.
निम्नलिखित के मोलर द्रव्यमान की गणना कीजिए।
C2H5COOH, P4, S8, PCl5, SO2Cl2
हल:
(i) C2H5COOH का मोलर द्रव्यमान-
= 2 × 12 + 5 × 1 + 12 + 16 × 2 + 1
= 24 + 5 + 12 + 32 + 1
= 74 g/mol

(ii) P4 का मोलर द्रव्यमान-
= 31 × 4 = 124 g/mol

(iii) S8 का मोलर द्रव्यमान-
= 32 × 8 = 256g/mol

(iv) PCl5 का मोलर द्रव्यमान-
= 31 + 35.5 x 5
= 31 + 177.5 = 208.5 g/mol

(v) SO2 Cl2 का मोलर द्रव्यमान
= 32 + 16 × 2 + 2 × 35.5
= 32 + 32+ 71.0 = 135.0g/mol

प्रश्न 27.
नीचे दिये गए यौगिकों के सूत्र द्रव्यमान का परिकलन
कीजिए।
(i) MgO (ii) CaCl 2 (iii) CaCO3 (iv) AlCl3
हल:
(i) MgO का सूत्र द्रव्यमान
= 24 + 16 = 40g

(ii) CaCl2 का सूत्र द्रव्यमान
= 40+2 × 35.5
= 40 + 71 = 111g

(iii) CaCO3 का सूत्र द्रव्यमान
= 40 + 12 + 16 × 3
= 40 + 12 + 48 = 100g

(iv) AlCl3 का सूत्र द्रव्यमान
= 27 +3 × 35.5
= 27 + 106.5 = 133.5g

प्रश्न 28.
120g कार्बन में ग्राम परमाणु तथा परमाणुओं की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 19
परमाणुओं की संख्या = ग्राम-परमाणुओं की संख्या x 6.02 × 1023
= 10 × 6.02 x 1023
= 6.02 x 1024 परमाणु

प्रश्न 29.
एक कार्बन परमाणु का द्रव्यमान ज्ञात कीजिए।
हल:
कार्बन का परमाणु द्रव्यमान = 12 u
1 मोल कार्बन परमाणुओं का द्रव्यमान = 12 g
अर्थात् 6.02 x 1023 परमाणुओं का द्रव्यमान = 12g
अतः एक C. परमाणु द्रव्यमान का = \(\frac{12}{6.02 \times 10^{23}}\)g
= 1.99 × 10-23g

प्रश्न 30.
5.75 g सोडियम में मोल संख्या ज्ञात कीजिये।
(सोडियम का परमाणु द्रव्यमान 23u)
हल:
1 मोल = परमाणु द्रव्यमान
23g सोडियम = 1 मोल सोडियम
5.75g सोडियम = \(\frac { 5.75 }{ 23 }\) मोल सोडियम
= 0.25 मोल सोडियम

प्रश्न 31.
2.3 g सोडियम में सोडियम परमाणुओं की संख्या कितनी होगी (सोडियम का परमाणु भार 23 )।
हल:
23g सोडियम में सोडियम परमाणु = 6.022 x 1023
2.3g सोडियम में सोडियम परमाणु
= \(\frac{6.022 \times 10^{23} \times 2.3}{23}\)
= 6.022 × 1022 Na परमाणु

प्रश्न 32.
0.585 ग्राम NaCl में Cl आयनों की संख्या कितनी है।
(NaCl का सूत्र भार = 58.5)
हल:
58.5g NaCl में उपस्थित है
= 6.02 × 1023 NaCl अणु
0.585g NaCl में उपस्थित हैं
= \(\frac{6.02 \times 10^{23} \times 0.585}{58.5}\)NaCl अणु
= 6.02 × 1021 NaCl अणु
एक अणु NaCl में उपस्थित है Cl आयन
6.02 x 1021 अणु NaCl में उपस्थित है
= 6.02 × 1021 Cl आयन

प्रश्न 33.
नाइट्रोजन व हाइड्रोजन के संयोग से बनी अमोनिया का अणुसूत्र ज्ञात करो।
हल:
नाइट्रोजन + हाइड्रोजन = आयतन
1 आयतन + 3 आयतन = 2 आयतन
अमोनिया आवोगाद्रो नियम से 1n अणु + 3n अणु = 2n अणु यदि n = 1 रखने पर,
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 20
\(\frac { 1 }{ 2 }\) अणु नाइट्रोजन = 1 नाइट्रोजन परमाणु
\(\frac { 3 }{ 2 }\) अणु हाइड्रोजन = \(\frac { 3 }{ 2 }\) x 2 = 3 हाइड्रोजन परमाणु
अतः अमोनिया का अणुसूत्र NH3 होगा।
या (NH3) x n का द्रव्यमान = 17 n
परन्तु अमोनिया का आण्विक द्रव्यमान = 17
n = \(\frac { 17 }{ 17 }\) = 1
अतः अमोनिया का अणुसूत्र NH3 होगा।

प्रश्न 34.
3.01 × 1022 NH3 अणुओं का द्रव्यमान बताइए ?
हल:
NH3 का मोलर द्रव्यमान = 14 + 3 = 17g/mol
6.02 × 1023 NH3 अणुओं का द्रव्यमान = 17g/mol
3.01 × 1022 NH3 अणुओं का = \(\frac{17 \times 3.01 \times 10^{22}}{602 \times 10^{23}}\)
= 8.5 × 10-1
= 0.85g/mol

प्रश्न 35.
2.31 x 10-6 कॉपर में परमाणुओं की कितनी संख्या होगी? कॉपर का परमाणु द्रव्यमान 63.5a.m.u है।
हल:
63.5g कॉपर 6.02 x 1023 कॉपर परमाणु
2.31 × 10-6g कॉपर = \(\frac{602 \times 10^{23} \times 2.31 \times 10^{-6}}{63.5}\) कॉपर परमाणु
= 0.219 × 1017
= 2.19 × 1016 कॉपर परमाणु

प्रश्न 36.
द्रव मर्करी का घनत्व 13.6 ग्राम / सेमी. है। एक लीटर धातु में मर्करी के कितने मोल उपस्थित हैं ?
हल:
मर्करी का द्रव्यमान = घनत्व x आयतन
= 13.6 × 1000 = 13600g
मर्करी की मोल संख्या
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 21
मर्करी की मोल संख्या = 68 मोल

प्रश्न 37.
निम्नलिखित का द्रव्यमान ग्राम में ज्ञात कीजिए –
(i) 2 ग्राम परमाणु Ca
(ii) 3N परमाणु He
(iii) \(\frac { 1 }{ 2 }\) मोल N2
(iv) 3N अणु O2
ग्राम परमाणु परमाणु भार
हल:
(i) 2 ग्राम परमाणु Ca
द्रव्यमान = ग्राम परमाणु x परमाणु भार
= 2 x 20
= 40 ग्राम

(ii) 3N परमाणु He
He के N परमाणु = ग्राम – परमाणु द्रव्यमान
He के 3N परमाणु = 3 x 4 = 12 ग्राम

(iii) \(\frac { 1 }{ 2 }\) मोल Na2
द्रव्यमान = ग्राम अणु x अणु – भार
= \(\frac { 1 }{ 2 }\) x 28
= 14 ग्राम

(iv) 3N अणु O2
= O2 के N अणु = ग्राम – अणु द्रव्यमान = 32 ग्राम
O2 के 3N अणु = 3 × 32
= 96 ग्राम

प्रश्न 38.
4.9g H2SO4 में कितने g अणु होते हैं?
हल:
H2SO4 का आण्विक द्रव्यमान
= 2 × 1 + 32 + 16 × 4
= 2 + 32 + 64 = 98 g
98g H2SO4 में उपस्थित है = ग्राम मोल
4.9g H2SO4 में उपस्थित है = \(\frac { 1 }{ 98 }\) x 49 ग्राम मोल
= 0.05g ग्राम मोल
अर्थात् 0.05 ग्राम अणु

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

प्रश्न 39.
सोडियम कार्बोनेट डेकाहाइड्रेट (NaCO3.10H2O) एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक रसायन है। इसके सूत्र द्रव्यमान का परिकलन कीजिए।
हल:
Na2CO3. 10H2O का सूत्र द्रव्यमान
= [2 × 23 + 12 + 3 × 16 + 10 (2 × 1 + 16)]g
= [46 + 12 + 48 + 180] = 286g

प्रश्न 40.
निम्नलिखित के द्रव्यमान का परिकलन कीजिए.
(i) N के 1 मोल परमाणु
(ii) Al के 5 mol परमाणु
(iii) Na+ आयन के 5.0 मोल
(iv) NaOH के 10 mol
हल:
(i) N का परमाण्वीय द्रव्यमान = 14g
अतः N के मोल परमाणु का द्रव्यमान = 14g

(ii) Al के 5 mol परमाणु में द्रव्यमान
Al का परमाण्वीय द्रव्यमान = 27g
Al के 1 मोल परमाणु का द्रव्यमान = 27g
अत: Al के 5 मोल परमाणु = 27 x 5 = 135g

(iii) Na+ आयन के 5.0 mol का द्रव्यमान
Na+ आयन का परमाणु द्रव्यमान = 23g
Na+ आयन के 1 मोल का द्रव्यमान = 23g
अत: Na+ आयन के 5.0 मोल का द्रव्यमान = 23 x 5.0 = 115.0g

(iv) NaOH के 10 मोल का द्रव्यमान
NaOH का द्रव्यमान = 40g
NaOH के 1 मोल का द्रव्यमान = 40g
अत: NaOH के 10 मोल का द्रव्यमान
= 40 × 10g = 400g

प्रश्न 41.
निम्न को मोल में परिवर्तित करें।
(i) 12g SO2 गैस
(ii) 25g जल
(iii) 22g कार्बन डाई ऑक्साइड
हल:
(i) SO2 गैस का परमाणु भार = 32 + 32 = 64g
64g SO2 = 1 मोल SO2
12g SO2 = \(\frac { 12 }{ 64 }\) मोल SO2
= 0.1875 मोल SO2

(ii) 25g जल
जल (H2O) का अणु भार = 2 + 16 = 18g
18 ग्राम जल = 1 मोल जल
25 ग्राम जल = \(\frac { 25 }{ 44 }\) मोल जल
= 1.39 मोल जल

(iii) 22g कार्बन डाई ऑक्साइड
कार्बन डाई ऑक्साइड CO2 = 12 + 32 = 44g
44g CO2 = 1 मोल CO2
22g CO2 = \(\frac { 22 }{ 44 }\) मोल CO2
= \(\frac { 1 }{ 2 }\) = 0.5 मोल CO2

प्रश्न 42.
1.4g नाइट्रोजन गैस में उपस्थित कुल इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए।
हल:
नाइट्रोजन गैस का मोलर द्रव्यमान
= 14 x 2 = 28g
28g नाइट्रोजन गैस में उपस्थित इलेक्ट्रॉन
= 14 मोल इलेक्ट्रॉन
1.4g नाइट्रोजन गैस में उपस्थित इलेक्ट्रॉन = \(\frac { 14×1.4 }{ 28 }\) मोल इलेक्ट्रॉन
= 0.7 मोल इलेक्ट्रॉन
= 0.7 × 6.02 × 1023 इलेक्ट्रॉन
= 4.214 1023 इलेक्ट्रॉन

प्रश्न 43.
3.42g सुक्रोज (C12H22O11) में उपस्थित प्रत्येक प्रकार के परमाणुओं की संख्या बताइये।
हल:
सुक्रोज (C12H22O11) का अणु भार
= 12 × 12 + 22 × 1 + 11 × 16
= 144 +22+ 176 = 342g
342g सुक्रोज में उपस्थित है = 6.02 x 1023 अणु
3.42g सुक्रोज में उपस्थित होंगे
= \(\frac{6.02 \times 3.42 \times 10^{23}}{342}\)अणु
= 6.02 × 1021 अणु
1 अणु सुक्रोज में है = 12 कार्बन परमाणु
6.02 x 1021 अणु सुक्रोज में उपस्थित होंगे
= 12 × 6.02 × 1021 कार्बन परमाणु
= 72.24 x 1021 कार्बन परमाणु
= 7.224 × 1022C परमाणु
1 अणु सुक्रोज में हैं = 22 हाइड्रोजन परमाणु
6.02 × 1021 अणु सुक्रोज में उपस्थित होंगे
= 22 × 6.02 × 1021
= 132.44 × 1021 हाइड्रोजन परमाणु
= 1.32 × 1023 H-परमाणु
1 अणु सुक्रोज में है = 11 ऑक्सीजन परमाणु
6.02 x 1021 अणु सुक्रोज में उपस्थित होंगे
= 11 × 6.02 × 1021 O-परमाणु
= 66.22 × 1021O-परमाणु
= 6.622 × 1022 O-परमाणु

प्रश्न 44.
1.21g ऐलुमिनियम ऑक्साइड (Al2O3) में उपस्थित एलुमिनियम आयन की संख्या बताइये।
हल:
Al2O3 का अणु भार
= 2 × 27 + 3 x 16 = 54 + 48
= 102 g/mol
102 g Al2O3 में उपस्थित है
= \(\frac{2 \times 1.21}{102}\) मोल एलुमिनियम आयन
= 0.024 मोल एलुमिनियम आयन
= 0.024 × 6.02 × 1023 एलुमिनियम आयन
= 0.144 × 1023 एलुमिनियम आयन
= 1.44 x 1022 एलुमिनियम आयन

प्रश्न 45.
कैल्सियम के कितने भार में परमाणुओं की संख्या 3.2g सल्फर में उपस्थित परमाणुओं की संख्या के बराबर होगी।
हल:
3.2g सल्फर में उपस्थित परमाणु
S का परमाणु भार = 32g
32g सल्फर में परमाणुओं की संख्या = 6.02 x 1023
3. 2g सल्फर में परमाणुओं की संख्या
= \(\frac{6.02 \times 3.2}{32}\) x 1023
= 6.02 × 1022
Ca के 6.02 x 1022 परमाणुओं का भार
Ca का परमाणु भार = 40g
6.02 × 1023 Ca-परमाणु का भार = 40g
6.02 × 10222 Ca-परमाणु का भार
= \(\frac{40 \times 6.02 \times 10^{22}}{602 \times 10^{23}}\)
= 4.0 g

प्रश्न 46.
SO2 के अणुओं की संख्या क्या होगी जिसमें 8.0g ऑक्सीजन उपस्थित हो।
हल:
SO2 का अणु भार = 32 + 2 × 16 = 64g
32 g ऑक्सीजन उपस्थित है = 64g SO2 में
8.0 g ऑक्सीजन उपस्थित होगी = \(\frac{64 \times 8 \cdot 0}{32}\)
= 16g SO2 में
64g SO2 में उपस्थित है
= 6.02 × 1023 अणु
16g SO2 में उपस्थित होगी
= \(\frac{6.02 \times 16}{64}\) x 1023 अणु
= 1.505 x 1023 अणु

प्रश्न 47.
200 mg H2S में से 1021 अणु हटा दिये गये हैं। बताइये कि H2S के कितने मोल शेष बचे।
हल:
H2S का अणु भार = 2 + 32 = 34g
34g H2S में अणुओं की संख्या = 6.02 × 1023
200 × 10-3g H2S में अणुओं की संख्या 6
= \(\frac{6.02 \times 10^{23} \times 200 \times 10^{-3}}{34}\)
= 35.41 × 1020
= 3.54 x 1021 अणु
इसमें से हटाये गये अणुओं की संख्या 1021
बचे अणुओं की संख्या = 3.54 x 1021 – 11.00 × 1021
= 2.54 x 1021 अणु
6.02 × 1023 H2S अणु उपस्थित है
= 1 मोल H2S में
2.54 × 1021 H2S अणु उपस्थित है।
= \(\frac{2.54 \times 10^{21}}{6.02 \times 10^{23}}\) मोल H2S में
= 0.42 × 10-2 मोल H2S
= 4.2 x 10-3 मोल H2S

प्रश्न 48.
1 मिली जल में उपस्थित अणुओं की संख्या क्या होगी ?
(यदि जल का घनत्व 1 ग्राम / मिली)
हल:
मिली जल का द्रव्यमान 1 x 1 = 1 ग्राम
1 मिली जल में मोलों की संख्या = \(\frac { 1 }{ 18 }\) मोल
अणुओं की संख्या = \(\frac { 1 }{ 18 }\)6.02 × 1023
= 3.34 x 1022 अणु

प्रश्न 49.
शरीर में पाये जाने वाले हार्मोन इन्सुलिन में 3.2% सल्फर पाया जाता है। इसका न्यूनतम अणुभार ज्ञात करो।
हल:
इन्सुलिन में न्यूनतम सल्फर परमाणु हो सकता है।
(सल्फर का परमाणु भार = 32g)
3.2% सल्फर से तात्पर्य है कि 100g इन्सुलिन में 3.2g सल्फर उपस्थित है।
3.2g ग्राम सल्फर उपस्थित है = 100 ग्राम इन्सुलिन में = 1000 ग्राम इन्सुलिन में
अतः इन्सुलिन का न्यूनतम अणु भार = 1000g

प्रश्न 50.
शरीर के रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन का अणु भार 89600 है। इसमें 0.25% (भारानुसार) आयरन होता है। हीमोग्लोबिन के एक अणु में आयरन परमाणुओं की संख्या ज्ञात करो।
हल:
0.25% के अनुसार,
100 ग्राम हीमोग्लोबिन में Fe की मात्रा = 0.25g
89600 ग्राम में उपस्थित Fe की मात्रा
= \(\frac { 0.25 }{ 100 }\) × 89600 = 224 ग्राम Fe
1 मोल हीमोग्लोबिन में 224 ग्राम Fe उपस्थित है अर्थात् \(\frac { 224 }{ 56 }\) = 4 ग्राम-परमाणु Fe उपस्थित है।
अतः 1 अणु हीमोग्लोबिन में Fe के परमाणुओं की संख्या = 4 परमाणु Fe

प्रश्न 51.
किसी तत्व के 3 x 1023 परमाणुओं का भार 66 ग्राम है। तत्व का परमाणु भार ज्ञात करें।
हल:
3 x 1023 परमाणुओं का भार = 66 ग्राम
6.02 × 1023 परमाणुओं का भार = \(\frac{66 \times 6.02 \times 10^{23}}{3 \times 10^{23}}\)ग्राम
तत्व का परमाणु भार 132-44 ग्राम है।

प्रश्न 52.
किसी गैस का 1 ग्राम N. T.P. पर 1400 मिली आयतन घेरता है। गैस का अणु भार क्या है? N. T. P. पर, 1 मिली. गैस में कितने अणु हैं?
हल :
1400 मिली गैस का भार = 1 ग्राम
N.T.P. पर 22400 मिली गैस का भार = \(\frac { 22400 }{ 1400 }\) ग्राम = 16 ग्राम
गैस का अणु भार = 16 ग्राम
N.T.P. पर 22400 मिली. गैस में अणुओं की संख्या = 6.02 x 1023 अणु
अतः 1 मिली. गैस में अणुओं की संख्या
= \(\frac{6.02 \times 10^{23}}{22400}\)
= 2.688 ×1019 अणु

प्रश्न 53.
61g ऑक्सीजन के द्वारा N. T.P. पर ग्रहण करने वाला आयतन क्या होगा?
हल:
ऑक्सीजन (O2) गैस का भार = 16 x 2 = 32g
328 ऑक्सीजन का N. T. P. पर आयतन = 22.4 ली.
16g ऑक्सीजन का N. T. P. पर आयतन
= \(\frac { 22.4×16 }{ 32 }\)
= 11.2 ली.

प्रश्न 54.
110g कॉपर सल्फेट (CuSO4) से कितना कॉपर प्राप्त होता है ?
हल:
CuSO4 का अणु भार = 63.5 + 32 + 4 × 16
= 159.5 g
159.5 g CuSO4 में Cu का द्रव्यमान = 63.5 g
110g CuSO4 में Cu का द्रव्यमान
= \(\frac{63.5 \times 110}{159 \cdot 5}\)
= 43.79 g

प्रश्न 55.
कैल्सियम क्लोराइड के अशुद्ध नमूने का अध्ययन करने पर क्लोरीन का प्रतिशत 45.5 पाया गया। इस नमूने में शुद्ध कैल्सियम क्लोराइड का प्रतिशत कितना होगा।
हल:
शुद्ध कैल्सियम क्लोराइड (CaCl2) का अणु भार
= Ca का परमाणु भार + 2Cl
का परमाणु भार
=40 + 2 × 35.5
= 40 + 71 = 111g
शुद्ध CaCl2 में क्लोरीन की प्रतिशत मात्रा
= \(\frac{71 \times 100}{111}\)
= 63.96 %
यदि क्लोरीन का 63.96 भाग है तो CaCl2 है = 100 भाग
यदि क्लोरीन का 45.5 भाग है तो CaCl2 है
= \(\frac{100 \times 45.5}{63.96}\)
= 71.14%
अतः शुद्ध CaCl की प्रतिशतता = 71.14%

प्रश्न 56.
KClO3 में उपस्थित KCl व ऑक्सीजन तत्वों की % मात्राएँ ज्ञात कीजिए।
हल:
KClO3 का मोलर द्रव्यमान = 39 + 35.5 + 3 x 16 = 122.5
K की प्रतिशत मात्रा = \(\frac{39 \times 100}{122.5}\) = 31.83 %
Cl की प्रतिशत मात्रा = \(\frac{35 \cdot 5}{122 \cdot 5}\) x 100 = 28.97 %
O की प्रतिशत मात्रा = \(\frac { 48 }{ 122.5 }\) x 100 = 39.20 %

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

प्रश्न 57.
एक यौगिक में Na, S, H व ऑक्सीजन तत्व उपस्थित हैं। इन तत्वों की % मात्राएँ क्रमशः 14 28%, 9.92%, 96.20% व 69-60% हैं। यौगिक का अणुसूत्र ज्ञात कीजिए। यौगिक में उपस्थित सभी हाइड्रोजन परमाणु H2O के रूप में स्थित हैं। क्रिस्टलीय यौगिक का सूत्र ज्ञात कीजिए, यदि इसका मोलर द्रव्यमान 322g हो।
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 22
अतः यौगिक का मूलानुपाती सूत्र Na2SH20O14

मूलानुपाती सूत्र द्रव्यमान
= 23 × 2 + 32 + 20 + 14 x 16
= 46 + 32 + 20 + 224
= 322 g

यौगिक का मोलर द्रव्यमान = 322 g
मोलर द्रव्यमान = 322 g
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 23
यौगिक का अणु सूत्र Na2SH20O14, क्रिस्टलीय यौगिक का सूत्र Na2SO4.10H2O

प्रश्न 58.
एक कार्बनिक यौगिक का रासायनिक विश्लेषण करने पर C, H और ऑक्सीजन तत्वों की उपस्थिति पायी गयी। कार्बन व H की % मात्राएँ क्रमश: 40% तथा 6.67% प्राप्त हुईं। यदि यौगिक का मोलर द्रव्यमान 180g हो तो यौगिक का अणुसूत्र ज्ञात कीजिए।
हल:
यौगिक का मूलानुपाती सूत्र निम्न प्रकार ज्ञात करते हैं-
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 24

प्रश्न 59.
धावन सोडे (Na2CO3. 10H2O) के शुद्ध नमूने में क्रिस्टलन जल की प्रतिशतता ज्ञात कीजिए ।
हल:
धावन सोडे (Na2CO3. 10H2O) का अणु भार
= 2 × Na का परमाणु भार + C का परमाणु भार + 3 x O का परमाणु भार + 10 x H2O का अणु भार
= 2 × 23 + 12 + 3 × 16 + 10 × 18
= 46+ 12 +48 + 180 = 286g
286g धावन सोडे के शुद्ध नमूने में जल = 180g
100g धावन सोडे के शुद्ध नमूने में जल = \(\frac { 180×100 }{ 286 }\)
= 62.94%

प्रश्न 60.
एक यौगिक का संघटन निम्न प्रकार से है.
C = 34·6%, H = 3 · 85% तथा O = 61.55% इस यौगिक का मूलानुपाती सूत्र ज्ञात कीजिए-
हल:

तत्वप्रतिशततापरमाणु द्रव्यमानआपेक्षिक संख्यासरलतम परमाणु संख्यासरलतम पूर्ण अनुपात
C34.612\(\frac { 34.6 }{ 12 }\) = 2.88\(\frac { 2.88 }{ 2.88 }\) = 11
H3.851\(\frac { 3.85 }{ 1 }\) = 38.5\(\frac { 3.85 }{ 2.88 }\) = 1.332
O61.5516\(\frac { 61.55 }{ 16 }\) = 3.85\(\frac { 3.85 }{ 2.88 }\) = 1.332

यौगिक का मूलानुपाती सूत्र CH2O2.

प्रश्न 61.
रासायनिक विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि किसी यौगिक में 10 ग्राम आयरन क्लोराइड में 3.438 ग्राम आयरन और 6.560 ग्राम क्लोरीन है। आयरन क्लोराइड का मूलानुपाती सूत्र निकालिये।
हल:
आयरन क्लोराइड में आयरन की प्रतिशतता = \(\frac{3.438 \times 100}{10}\) = 34.38%
आयरन क्लोराइड में क्लोरीन की प्रतिशतता = \(\frac{6.560 \times 100}{10}\) = 65.6%

तत्वप्रतिशततापरमाणु द्रव्यमानआपेक्षिक संख्यासरलतम परमाणु संख्यासरलतम पूर्ण अनुपात
Fe34.3855.8\(\frac { 34.38 }{ 55.8 }\) = 0.616\(\frac { 0.616 }{ 0.616 }\) = 11
Cl65.635.5\(\frac { 65.6 }{ 35.5 }\) = 1.848\(\frac { 1.848 }{ 0.616 }\) = 33

मूलानुपाती सूत्र – FeCl3

प्रश्न 62.
एक C, H एवं N युक्त यौगिक में तत्वों का भार सम्बन्धी अनुपात 9:1: 3.5 है। यदि यौगिक का वाष्प घनत्व 54 हो तो अणुसूत्र ज्ञात कीजिए।
हल:
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 25

प्रश्न 63.
एक यौगिक का विश्लेषण करने पर प्रतिशत रचना निम्न प्रकार है।
C = 54.5%, H = 9.9%, O = 36.41%
यदि इस यौगिक का वाष्प घनत्व 44.1 हो तो अणुसूत्र निकालिए।
हल:

तत्वप्रतिशततापरमाणु द्रव्यमानआपेक्षिक संख्यासरलतम परमाणु संख्यासरलतम पूर्ण अनुपात
C54.512\(\frac {45.6 }{ 12 }\) = 4.5411\(\frac { 4.541 }{ 2.275 }\) = 22
H9.91\(\frac { 99 }{ 1 }\) = 99\(\frac { 9.9 }{ 2.275 }\) = 44
O36.4116\(\frac { 36.41 }{ 16 }\) = 2.275\(\frac { 2.275 }{ 2.275 }\) = 11

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 26

प्रश्न 64.
5.325 ग्राम कार्बनिक यौगिक का अध्ययन करने पर पाया गया कि उसमें 3.758 ग्राम कार्बन, 0.316 ग्राम हाइड्रोजन तथा 1.251 ग्राम ऑक्सीजन है। इस यौगिक का मूलानुपाती सूत्र व अणुसूत्र ज्ञात करो यदि इसका वाष्प घनत्व 68 हो।
हल:
यौगिक का द्रव्यमान = 5.325
ग्राम कार्बन का द्रव्यमान = 3.758 ग्राम
हाइड्रोजन का द्रव्यमान = 0.316 ग्राम
ऑक्सीजन का द्रव्यमान = 1.251 ग्राम
कार्बन की प्रतिशतता = \(\frac { 3.758 }{ 5.325 }\) × 100 = 70.57%
हाइड्रोजन की प्रतिशतता = \(\frac { 0.316 }{ 5.325 }\) = 5.93%
ऑक्सीजन की प्रतिशतता = \(\frac { 1.251 }{ 5.325 }\) x 100 = 23.50%

तत्वप्रतिशततापरमाणु द्रव्यमानआपेक्षिक संख्यासरलतम परमाणु संख्यासरलतम पूर्ण अनुपात
C70.571270.57/ 12 = 5.88\(\frac { 5.88 }{ 1.47 }\) = 44
H5.9315.93/1 = 5.93\(\frac { 5.93 }{ 1.47 }\) = 44
O23.501623.50/16 = 1.47\(\frac { 1.47 }{ 1.47 }\) = 11

यौगिक का मूलानुपाती सूत्र = CHO
मूलानुपाती सूत्र का अणुभार = (4 x 12) + (4 × 1) + 16 = 68
यौगिक का अणुभार = 2 x वाष्प घनत्व = 2 × 68 = 136
यौगिक का अणुसूत्र = (मूलानुपाती सूत्र)n
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प्रश्न 65.
50g नाइट्रोजन और 8g हाइड्रोजन को मिला कर NH3(g) प्राप्त की गई है। सीमान्त अभिकर्मक कौन सा है? बनी हुई NH3 की मात्रा की गणना कीजिए।
हल:
अभिक्रिया की संतुलित समीकरण निम्न है-
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 28
समीकरण के अनुसार,
1.786 मोल N2 से क्रिया करने वाले H2 के मोलों की संख्या
= \(\frac { 3 }{ 1 }\) × 1.786 = 5.358 मोल
परन्तु H2 के उपस्थित मोल = 4
इसलिये सम्पूर्ण H2(g) अभिक्रिया में भाग लेगी अतः H2 सीमान्त अभिकर्मक है।
बनने वाली NH3
3 मोल H2 से बनी NH3 = 2 मोल
4 मोल H2 से बनी अमोनिया = \(\frac { 2 }{ 3 }\) × 4 मोल = 2.66 मोल
2.66 मोल = 2.66 × 17 = 45.22g

प्रश्न 66.
3.0g H2 व 30.0g O2 क्रिया करके जल बनाती है। इसमें सीमान्त अभिकर्मक क्या है? बनने वाले जल की मात्रा क्या होगी? एवं इसमें उस अभिकर्मक की मात्रा ज्ञात करें जो कि अनाभिकृत रह जाता है।
हल:
अभिक्रिया निम्न प्रकार होगी –
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 29
सीमान्त अभिकर्मक के लिये,
4g H2 क्रिया करती है = 32g O2 से
3g H2 क्रिया करेगी = \(\frac { 32×3 }{ 4 }\)
= 24g O2 से
परन्तु प्रश्न के अनुसार 30g O2 है अर्थात् O2 की मात्रा अधिक है।
यहाँ सीमान्त अभिकर्मक H2 है।
4g H2 से बनता है = 36g H2O
3g H2 से बनेगा = \(\frac { 36×3 }{ 4 }\)g H2O
= 27g H2O
चूँकि हम जानते हैं कि 3g H, क्रिया करती है 24g ऑक्सीजन से परन्तु प्रश्न के अनुसार 30g ऑक्सीजन है।
अत: O की शेष मात्रा 30 – 24 = 6g

प्रश्न 67.
1.0g Mg का एक बंद पात्र में दहन किया जाता है, जिसमें 0.5 g O2 उपस्थित है। सीमान्त अभिकर्मक क्या है ? तथा MgO अभिक्रिया में कितनी मात्रा में बनता है।
हल:
सन्तुलित अभिक्रिया निम्न प्रकार है.
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 30
सीमान्त अभिकर्मक का निर्धारण
48g Mg क्रिया करता है = 32 g O2 से
1g Mg क्रिया करता है = \(\frac { 32 }{ 48 }\) = 0.67g O2 से
परन्तु प्रश्नानुसार O2 की मात्रा = 0.5g
चूँकि उपलब्ध O2, आवश्यकता से कम है, अतः O2 एक सीमान्त अभिकर्मक है।
MgO की मात्रा का निर्धारण
32 g O2 मैग्नीशियम से क्रिया करके बनाती है = 80g MgO
∴ 0.5 g O2 मैग्नीशियम से क्रिया करके बनाती है।
= \(\frac { 80×0.5 }{ 32 }\)
= 1.25g MgO

प्रश्न 68.
एक लवण का अणुभार 40g mol-1 है। लवण की 4 ग्राम मात्रा 250 ग्राम जल में घोली गयी है, विलयन की मोललता बताएँ।
हल:
विलेय का अणुभार ‘MB‘ = 40g mol-1
विलेय का भार ‘WB‘ = 4 g
विलायक का भार ‘WA‘ = 250 g
मोललता (m) = \(\frac{\mathrm{W}_{\mathrm{B}} \times 1000}{\mathrm{M}_{\mathrm{B}} \times \mathrm{W}_{\mathrm{A}}}\)
= \(\frac{4 \times 1000}{40 \times 250}\)
= 0.4 मोल/ किग्रा.

प्रश्न 69.
यदि 10g ऑक्सेलिक अम्ल को 500ml विलयन (घनत्व = 1.1 g ml-1) में घोला जाए तो विलयन में ऑक्सलिक अम्ल का द्रव्यमान प्रतिशत क्या होगा?
हल:
विलेय का भार ‘WB‘ = 10 g
विलेय का घनत्व ‘d’ = 1.1 g/ml
विलयन का द्रव्यमान = आयतन x घनत्व = 500 x 1.1 = 550 g
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 31

प्रश्न 70.
सल्फ्यूरिक अम्ल के 49% (भार प्रतिशत) विलयन का घनत्व 1.109 ग्राम / मिली है विलयन की मोललता एवं मोलरता ज्ञात कीजिए।
हल:
49% (भार प्रतिशत) का अर्थ है कि 49 ग्राम विलेय 100 ग्राम विलयन में उपस्थित है।
विलेय का भार ‘WB‘ = 49g
विलायक का भार ‘WB‘ = 100 – 49 = 51 g
विलेय का अणुभार ‘MB‘ = 98g mol-1 (सल्फ्यूरिक अम्ल )
मोलरता
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 32

प्रश्न 71.
80 ग्राम जल तथा 90 ग्राम मेथिल ऐल्कोहॉल के मिश्रण में दोनों के मोल प्रभाज ज्ञात कीजिए।
हल:
जल का भार ‘WA‘ = 80g
जल का अणुभार ‘MA‘ = 18 g/mol
मैथिल ऐल्कोहॉल का भार ‘WB‘ = 90g
मेथिल ऐल्कोहॉल का अणुभार ‘MB‘ = 32g/mol
मेथिल ऐल्कोहॉल के मोल प्रभाज
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 33

प्रश्न 72.
सुक्रोज के विलयन का भार 214.2g है। इसमें 34.2g सुक्रोज घुला हुआ है। सुक्रोज की मोललता की गणना कीजिए।
हल:
सुक्रोज का भार ‘WB‘ = 34.2 g
जल का भार ‘WA‘ = विलयन का भार – विलेय का भार
= 214.2 – 34.2 = 180 g
सुक्रोज (C12H22O11) का मोलर द्रव्यमान
= 12 × 12 + 1 x 22 + 16 × 11
= 342g/mol
मोललता (‘m’) = \(\frac{\mathrm{W}_{\mathrm{B}} \times 1000}{\mathrm{M}_{\mathrm{B}} \times \mathrm{W}_{\mathrm{A}}}\)
= \(\frac{34.2 \times 1000}{342 \times 180}\)
= 0.55 m

प्रश्न 73.
5.85g सोडियम क्लोराइड को 500g जल में विलेय किया गया। प्राप्त विलयन की मोललता बताएँ।
हल:
विलेय का भार ‘WB‘ = 5.85g
विलेय का अणुभार ‘MB‘ = 2335.5
= 58.5g/mol
विलायक का भार ‘WA‘ = 500g
मोललता (m) = \(\frac{\mathrm{W}_{\mathrm{B}} \times 1000}{\mathrm{M}_{\mathrm{B}} \times \mathrm{W}_{\mathrm{A}}}\)
= \(\frac{5.85 \times 1000}{58.5 \times 500}\)
= 0.2 mol/kg

प्रश्न 74.
एथिलीन ग्लाइकॉल (C2H6O2) के मोल प्रभाज की गणना करो यदि विलयन में C2H6O2 का 20% द्रव्यमान उपस्थित हो।
हल:
20% C2H6O2 का मतलब है कि,
20g C2H6O2 100g विलयन में उपस्थित है।
अतः विलेय का भार WB = 20g
विलायक का भार WA = 100 – 20 = 80g
विलेय का मोलर द्रव्यमान MB
= 2 × 12 + 6 × 1 + 2 × 16 = 62g/mol
विलायक का मोलर द्रव्यमान
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 34
जल का मोल प्रभाज. = 1 – x(माइकल)
= 1 – 0.068 = 0.932
उत्तर-ग्लाइकॉल का मोल प्रभाज = 0.068
जल का मोल प्रभाज = 0.932

प्रश्न 75.
उस विलयन की मोलरता की गणना कीजिए। जिसमें 5g NaOH 450ml विलयन में घुला हुआ है।
हल:
विलेय का भार WB = 5g
विलेय का मोलर द्रव्यमान = MB = 40g/mol
विलयन का आयतन V = 450ml
मोलरता M = ?
M = \(\frac{W_B \times 1000}{40 \times 450}\)
= \(\frac{5 \times 1000}{40 \times 450}\)
= 0.278 mol/L
उत्तर. दिये गये विलयन की मोलरता 0.278 mol/ L है।

प्रश्न 76.
निम्नलिखित अभिक्रिया के लिए रासायनिक समीकरण लिखिए तथा इसे जाँच तथा भूल विधि द्वारा सन्तुलित कीजिए-
मैग्नीशियम नाइट्राइड + जल → मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड + अमोनिया
हल:
अभिक्रिया के लिए रासायनिक समीकरण निम्नवत् है
Mg3N2 + H2O → Mg(OH)2 + NH3
समीकरण को निम्नलिखित पदों में सन्तुलित किया जा सकता है
(i) Mg परमाणुओं को सन्तुलित करना
Mg3N2 + H2O → 3Mg(OH)2 + NH3

(ii) N परमाणुओं को सन्तुलित करना
Mg3N2 + H2O → 3Mg(OH)2 + 2NH3

(iii) O परमाणुओं को सन्तुलित करना
Mg3N2 + 6H2O → 3Mg(OH)2 + 2NH3
जाँच करने पर ज्ञात होता है कि H परमाणु पहले से ही सन्तुलित है अतः पूर्णतया सन्तुलित समीकरण निम्नवत् है-
Mg3N2 + 6H2O → 3Mg(OH)2 + 2NH3

प्रश्न 77.
100 किलो 90 प्रतिशत शुद्ध चूने के पत्थर (CaCO3) को गर्म करने पर प्राप्त CaO का द्रव्यमान ज्ञात करो ?
हल:
CaCO3 → CaO + CO2
CaCO3 का मोलर द्रव्यमान = 100g
90 प्रतिशत शुद्धता = 100kg CaCO3 में 90 kg शुद्ध CaCO3 उपस्थित है।
100kg CaCO3 में शुद्ध पदार्थ = 90kg
अभिक्रिया के अनुसार,
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ 35
अतः समीकरण के अनुसार
100g CaCO3 से CaO बनता है = 56g
या 100kg CaCO3 से CaO बनेगा = 56kg
अत: 90kg CaCO3 से CaO बनेगा = \(\frac { 56 }{ 100 }\) x 90
= 50.4 kg

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HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन

Haryana State Board HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन


(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

1. ग्लाइकोलाइसिस की क्रिया सम्पन्न होती है-
(A) माइटोकॉण्ड्रिया में
(B) कोशिकाद्रव्य में
(C) हरित लवक में
(D) केन्द्रक द्रव्य में
उत्तर:
(B) कोशिकाद्रव्य में

2. ग्लाइकोलाइसिस में कितने ATP अणुओं का लाभ होता है ? (UPCPMT)
(A) 2
(B) 4
(C) 6
(D) 8
उत्तर:
(A) 2

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन

3. यदि श्वसनी पदार्थ ग्लूकोज है जो इसका R. Q. होगा –
(A) 0.7
(B) 1
(C) 1.8
(D) 2
उत्तर:
(B) 1

4. ग्लूकोज के एक अणु के पूर्ण आक्सीकरण से कितने ATP बनते हैं ?
(A) 8
(B) 16
(C) 32
(D) 38
उत्तर:
(D) 38

5. ग्लाइकोलाइसिस तथा क्रेब्स चक्र के बीच मध्यस्थ कड़ी है-
(A) पाइरुविक अम्ल
(B) एसीटिक अम्ल
(C) ऐसीटिल CO ~ A
(D) सक्सिनिल CO ~ Α
उत्तर:
(C) ऐसीटिल CO ~ A

6. ऑक्सीसोम्स पाये जाते हैं-
(A) माइटोकॉण्ड्रिया की आन्तरिक कला पर
(B) माइटोकॉण्ड्रिया की बाह्य कला पर
(C) माइटोकॉण्ड्रिया की सतह पर
(D) इनमें से किसी में नहीं
उत्तर:
(A) माइटोकॉण्ड्रिया की आन्तरिक कला पर

7. ग्लूकोज के एक अणु के वायवीय ऑक्सीकरण में उत्पन्न ऊर्जा होती है-
(A) 247 kJ
(B) 300kJ
(C) 2870kJ
(D) 6700kJ
उत्तर:
(C) 2870kJ

8. मांसल शुष्कोद्भिदी पादपों में रात्रि में श्वसन भागफल होता है-
(A) 0
(B) 1
(C) 0.7
(D) 1 से अधिक
उत्तर:
(C) 0.7

9. क्रेब्स चक्र में कुल कितने ATP बनते हैं ?
(A) 8
(B) 12
(C) 24
(D) 36
उत्तर:
(C) 24

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन

10. किण्वन में भाग लेने वाला विकर (emzyme)
(A) हैक्सोकाइनेज
(B) पाइरुवेट
(C) फॉस्फेटेज
(D) जाइमेज
उत्तर:
(D) जाइमेज

11. यदि किसी पौधे के चारों ओर CO2 की सान्द्रता अत्यधिक हो तो श्वसन क्रिया-
(A) तीव्र हो जायेगी
(B) रुक जायेगी
(C) धीमी हो जायेगी
(D) अप्रभावित रहेगी
उत्तर:
(C) धीमी हो जायेगी

12. निम्न में से श्वसन संदमक हैं/
(A) आयोडोऐसीटेट
(B) मैलोनेट
(C) सायनाइड
(D) ये सभी
उत्तर:
(B) मैलोनेट

13. प्रकाश सन्तुलन तीव्रता में-
(A) प्रकाश अवशोषण बढ़ जाता है।
(B) वायुमण्डल से गैस विनिमय बढ़ जाता है।
(C) वायुमण्डल से गैस विनिमय नहीं हाता है।
(D) O2 का अवशोषण बढ़ जाता है
उत्तर:
(C) वायुमण्डल से गैस विनिमय नहीं हाता है।

14. क्रेब्स चक्र को कहते हैं-
(A) EMP चक्र
(B) TCA चक्र
(C) हेच स्लेक चक्र
(D) CAM चक्र
उत्तर:
(B) TCA चक्र

15. EMP पथ जैव-रासायनिक पथ है-
(A) ग्लाइकोलाइसिस में
(B) ETS में
(C) क्रेब्स चक्र में
(D) इन सभी में
उत्तर:
(A) ग्लाइकोलाइसिस में

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन

16. R. Q. सर्वाधिक होगा जब श्वसन पदार्थ होगा-
(A) ग्लूकोज
(B) वसा
(C) मैलिक अम्ल
(D) प्रोटीन
उत्तर:
(C) मैलिक अम्ल

17. उच्च श्रेणी के पादप के किस भाग में अनॉक्सी श्वसन होता है ?
(A) भीगे बीज में
(B) फल में
(C) पत्ती में
(D) शुष्क बीज में
उत्तर:
(D) शुष्क बीज में

18. पेन्टोज फॉस्फेट पथ बताया-
(A) नॉरेनवर्ग ने
(B) ब्लैकमैन ने
(C) वारबर्ग ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:

19. सायटोक्रोम सहायक होते हैं-
(A) इलेक्ट्रॉन अभिगमन में
(B) ऊर्जा के विमोचन में
(C) ऊर्जा संचयन में है
(D) ग्लूकोज के. ऑक्सीकरण में
उत्तर:
(C) ऊर्जा संचयन में है

20. कार्बनिक पदार्थों के टूटने के
(A) एक अपचय क्रिया
(B) एक उपचय क्रिया
(C) एक पाचन क्रिया
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) एक उपचय क्रिया

21. श्वसन दर बढ़ जाएगी यदि मात्रा बढ़ाई जाए-
(A) N2 की
(B) O2 की
(C) CO2 की
(D) CO की
उत्तर:
(C) CO2 की

22. श्वसन के पद नियंत्रित होते
(A) एन्जाइम द्वारा
(B) क्रियाधर द्वारा
(C) हार्मोन्स द्वारा
(D) देह द्रव द्वारा
उत्तर:
(A) एन्जाइम द्वारा

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन

23. पाइकुविक अम्ल किस क्रिया का उत्पाद है ? (RPMT)
(A) क्रेब्स चक्र
(B) केल्विन चक्र
(C) PPP
(D) ग्लाइकोलाइसिस
उत्तर:
(D) ग्लाइकोलाइसिस

24. श्वसन क्रिया में अन्तिम इलेक्ट्रॉन ग्राही है- (RPMT, UPPMT, UPCPMT)
(A) CO2
(B) O2
(C) H2
(D) NADH
उत्तर:
(B) O2

25. RQ श्वसन गुणांक एक से कम होता है-
(A) वसा का
(B) ग्लूकोज का
(C) फ्रक्टोज का
(D) कार्बनिक अम्ल का
उत्तर:
(A) वसा का

26. ऐल्कोड़लीय किण्बन निम्न की उपस्थिति में होता है- (RPMT)
(A) माल्टोज
(B) जाइमेज
(C) एमाइलेज
(D) इनवर्टेंज
उत्तर:
(B) जाइमेज

27. क्षेख घक्र कहुँ सम्पन्न होता है ?
(A) कोशिका द्रव्य
(B) माइटोकॉष्ड्रूया
(C) हरित लवक
(D) ER.
उत्तर:
(B) माइटोकॉष्ड्रूया

28. एक व्यर्ष प्रकिया है-
(A) श्वसन
(B) प्रकाश संश्लेषण
(C) प्रकाश श्वसन
(D) गति
उत्तर:
(C) प्रकाश श्वसन

29. सक्सिनिक जिताइड्रोजिनेय का एक प्रभिसर्षी संखमक्ड क्या दोका है ? (CBSE AIMPT)
(A) मैलानेट
(B) ऑक्सैलोएसीटेट
(C) α कीटोग्लटैरेट
(D) मैलेट
उत्तर:
(A) मैलानेट

30. सीमाकारी कारकों का नियम जिसने दिखा ? (UPCPMT)
(A) लीबिग ने
(B) स्लैकमन ने
(C) कैस्विन ने
(D) आर्नन ने
उत्तर:
(B) स्लैकमन ने

31. माझ्टोकौष्टिया में ATP का निर्माण क्जिता है- (UPCPMT)
(A) बाद्य झिल्ली पर
(B) अन्तः झिल्ली पर
(C)F1 कण पर
(D) क्रिस्टी पर
उत्तर:
(B) अन्तः झिल्ली पर

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन

32. क्रेख्स चक्र में GTP क्रा निर्माण होता है- (UPCPMT)
(A) ऑक्सीकरणीय फॉस्फेटीकरण में
(B) क्रियाधर फॅ्स्पेटीकरण में
(C) प्रकाश फॉस्पेटीकरण में
(D) विकाबोक्सीकरण में
उत्तर:
(B) क्रियाधर फॅ्स्पेटीकरण में

33. केष्क चक में ‘ऊर्ला सिक्का’ काजनाता है-
(A) AMP
(B) GTP
(C) NADPH2
(D) ATP
उत्तर:
(D) ATP

34. प्वसन मधध्यित वसा कार्बोकाइड्रेट और प्रोटिनों के भुन में कौन-सा उपापचयी सामान्यत होत्ता है ? (NDETUG)
(A) ग्लूकोस-6-फॉस्पेट
(B) फ्रक्टोस-1, 6-डाइफॉस्फेट
(C) पाइकुविक अम्ल
(D) ऐसीटिल CO ~ A
उत्तर:
(D) ऐसीटिल CO ~ A

35. निम्नलिखित में से किस प्रांक्या में CO2 मुक्त कीजी छोती है ?
(A) प्राणियों में वायु श्वसन
(B) ऐल्कोहॉली किण्वन
(C) लैक्टेट किण्वन
(D) पादपों में वायु श्वसन
उत्तर:
(C) लैक्टेट किण्वन

(B) अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions

प्रश्न 1.
श्वसन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
श्वसन एक अपचयी क्रिया है, जिसमें O2 प्रयुक्त तथा CO2 व ऊर्जा मुक्त होती है।

प्रश्न 2.
ऑक्सीश्वसन का समीकरण लिखिए।
उत्तर:
C6H12O6 + 6O2 → 6CO2+ 6 H2O + 2870kJ

प्रश्न 3.
कोशिकीय श्वसन में इलेक्ट्रॉन अभिगमन कहाँ होता है ?
उत्तर:
माइटोकॉण्ड्रिया के ऑक्सीसोम्स (Oxisomes ) पर ।

प्रश्न 4.
अत्यधिक ताप पर श्वसन क्रिया कैसे प्रभावित होती है ?
उत्तर:
अत्यधिक ताप पर विकर (Enzyme) विघटित हो जाते हैं।

प्रश्न 5.
ऑक्सी तथा अनॉक्सी श्वसन में कौन-सा प्रक्रम समान होता
उत्तर:
ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis)

प्रश्न 6.
कोशिका के कौन-से दो अणु इलेक्ट्रॉन बैंकर का कार्य करते
उत्तर:
NAD तथा FAD

प्रश्न 7.
क्रेन्स चक्र कोशिका के किस भाग में सम्पन्न होता है ?
उत्तर:
माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) में।

प्रश्न 8.
कोशिका का ऊर्जा गृह क्या कहलाता है ?
उत्तर:
माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria)।

प्रश्न 9.
कोशिका की ऊर्जा मुद्राएँ क्या होते हैं ?
उत्तर:
ATP (Adenosine Triphosphate) ।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन

प्रश्न 10.
ग्लूकोज का पायरुविक अम्ल में अपूर्ण आक्सीकरण क्या कहलाता है ?
उत्तर:
ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis) |

प्रश्न 11.
अनॉक्सीश्वसन की अवस्था में यीस्ट द्वारा 38 ATP के उत्पादन के लिए आवश्यक ग्लूकोस अणुओं की संख्या बताइए ।
उत्तर:
अनॉक्सी श्वसन में एक ग्लूकोज से 2 ATP निकलते हैं। अतः 38 ATP निकलने के लिए 19 ग्लूकोज अणुओं की आवश्यकता होगी।

प्रश्न 12.
ग्लूकोज को ग्लूकोज-6- फॉस्फेट में परिवर्तित करने वाले एन्जाइम का नाम लिखिए।
उत्तर:
हेक्सोकाइनेस (Hexokinase) ।

प्रश्न 13.
वान्ट हाफ का नियम लिखिए।
उत्तर:
वान्ट हाफ के अनुसार प्रति 10°C तापमान वृद्धि से श्वसन दर 2-3 गुणा घट जाती है ।

प्रश्न 14.
किसी जीव द्वारा ग्लूकोज पर अनॉक्सीश्वसन किया जा रहा है, इसका R. Q. कितना होगा ?
उत्तर:
अनन्त, क्योंकि अनॉक्सी श्वसन में O2 नहीं ली जाती है।

प्रश्न 15.
पाइरुविक अम्ल से ऐसीटिल CO ~ A के निर्माण में कितने ATP अणु निकलते हैं ?
उत्तर:
2 ATP

प्रश्न 16.
दहन तथा श्वसन में एक अन्तर लिखिए ।
उत्तर:
दहन क्रिया उच्च ताप पर तथा श्वसन क्रिया सामान्य ताप पर होती है।

प्रश्न 17.
दो श्वसन क्रिया संदमक पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कार्बन मोनो ऑक्साइड, आयोडोऐसीटेट ।

प्रश्न 18.
ETS में इलेक्ट्रॉन का अन्तिम ग्राही कौन होता है ?
उत्तर:
ऑक्सीजन ।

प्रश्न 19.
ATPase की भूमिका लिखिए।
उत्तर:
ADP तथा iP से ATP का निर्माण ।

प्रश्न 20.
जाइमोसिस (Zymosis) क्या है ?
उत्तर:
किण्वन का अन्य रूप ।

(C) लघु उत्तरीय प्रश्न – I (Short Answer Type Questions -1)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित के श्वसन गुणांक लिखिए-
1 अंकुरित मंडयुक्त गेहूँ,
2. अंकुरित तिलहन,
3. अंकुरित दलहनी बीज,
4. नागफनी का प्रकाश में।
उत्तर:
1. अंकुरित गेहूँ में कार्बोहाइड्रेट के श्वसन का RQ = 1
2. अंकुरित तिलहन में वसा होता है, अतः RQ = 0.64
3. अंकुरित दाल में श्वसन पदार्थ प्रोटीन है, अतः RQ = 0.8 – 0.9
4. नागफनी का प्रकाश में डीएसिडिफिकेशन होता है, अत: RQ = 1.33

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन

प्रश्न 2.
जन्तुओं की पेशियाँ थकावट क्यों महसूस करती हैं ?
उत्तर:
जन्तुओं द्वारा कार्य किये जाने में ऊर्जा खर्च होती है जो कि पेशियों द्वारा अनॉक्सीश्वसन से उत्पन्न होती है। इस क्रिया के फलस्वरूप पेशियों में लैक्टिक अम्ल (Lactic Acid) जमा हो जाती है। लैक्टिक अम्ल की अधिकता के कारण पेशियों में थकावट महसूस होती है।

प्रश्न 3.
पाश्चर प्रभाव क्या है ?
उत्तर:
किसी जीवधारी की अवायवीय परिस्थितियों को वायवीय परिस्थितियों में बदल देने की क्रिया को पाश्चर प्रभाव (Pasteur effect) कहते हैं। यह क्रिया भोज्य पदार्थों ( Substrate – क्रियाधर) को बचाने के लिए होती है।

प्रश्न 4.
एक वायुरोधक काँच के एक जार में एक खरगोश को बन्द कर दिया गया जिसका सम्बन्ध एक द्रोणी (trough) से कर दिया गया जिसमें हरी शैवाल उगी है। क्या खरगोश कुछ समय तक जीवित रहेगा ? कारण बताइए ।
उत्तर:
कोई भी जीव भोजन के बिना कुछ समय तक जीवित रह सकता है किन्तु श्वसन के बिना नहीं। खरगोश को श्वसन के लिए ऑक्सीजन चाहिए जो उसे द्रोणी में उगी शैवाल से प्राप्त हो जाती है । परन्तु शैवाल दिन के समय ही O2 निकालेंगे। रात्रि के समय शैवाल CO2 निकालेंगे अतः रात्रि के समय O2 के अभाव में खरगोश मर सकता है।

प्रश्न 5.
नागफनी जैसे माँसल पौधों में श्वसन गुणांक कैसे पता लगायेंगे ?
उत्तर:
नागफनी में दिन के समय अपूर्ण आक्सीकरण होता है।
C6H12O6 +3O2 → C4H6O5 + 2 CO2 + 3H2O
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन 1
नागफनी में रात के समय डीएसिडीफिकेशन (Deacidification) होता है-
C4H6O5 +3O2 → 4CO2 + 3H2O
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन 2

प्रश्न 6.
श्वसन भागफल तथा प्रकाश संश्लेषण भागफल में दो अन्तर लिखिए।
उत्तर:
श्वसन भागफल तथा प्रकाश संश्लेषण भागफल में अन्तर-

श्वसन भागफल (Respiratory Quotient)प्रकाश संश्लेषण भागफल (Photosynthetic Quotient)
1. यह एक निर्धारित समय में छोड़ी गई CO2 तथा ली गई O2 की मात्रा का अनुपात है ।1. यह एक निर्धारित समय में छोड़ी गई O2 तथा ली गई CO2 की है।
2. विभिन्न श्वसन पदार्थों का R.Q. भिन्न-भिन्न होता है।2. मात्रा का अनुपात है । | लगभग सभी पदार्थों का P.Q. 1. होता है।

(D) लघु उत्तरीय प्रश्न- II ( Short Answer Type Questions-II)

प्रश्न 1.
ऑक्सी श्वसन क्या है ? यह अनॉक्सी श्वसन से अधिक दक्ष क्यों माना जाता है ?
उत्तर:
ऑक्सी श्वसन (Aerobic respiration) – श्वसन का वह प्रकार जिसमें खाद्य पदार्थों में जैवरासायनिक ऑक्सीकरण के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, ऑक्सीश्वसन कहलाता है।
C6H12O + 6O2 → 6CO2 + 6H2O + 2870kJ
ऑक्सी श्वसन, अनॉक्सी श्वसन की अपेक्षा दक्ष होता है, क्योंकि-
1. ग्लाइकोलासिस में जितनी ऊर्जा निकलती है तथा जितने ATP अणु बनते हैं, उनकी संख्या दोनों क्रियाओं में समान है।
2. ऑक्सीश्वसन में क्रेब्स द्वारा पाइरुविक अम्ल (Pyruvic acid) का पूर्ण आक्सीकरण (Oxidation) होता है। मुक्त ऊर्जा ATP के रूप में संचित होती है।
3. अनॉक्सी श्वसन में केवल आन्तरिक परिवर्तन द्वारा CO2 तथा एल्कोहॉल बनते हैं। अधिकतम ऊर्जा इन यौगिकों में रह जाती है।
4. ऑक्सीश्वसन में ग्लूकोज में एक अणु से ATP के 38 अ हैं, जबकि अनॉक्सीश्वसन में केवल 2 ATP अणु ही बनते हैं।
अतः ऑक्सीश्वसन, अनॉक्सीश्वसन की अपेक्षा अधिक दक्ष है।

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प्रश्न 2.
ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में भी श्वसन होता है। कैसे सिद्ध करोगे ? प्रयोग द्वारा समझाइए ।
उत्तर:
श्वसन क्रिया के प्रथम पद में ग्लूकोज से पाइरुविक अम्ल के निर्माण की क्रिया में ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है। इसे ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis) कहते हैं। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में नॉक्सीश्वसन (Anaerobic respiration) होता है- विकर C6H12O6 → 2 C2H5OH + 2 CO2 ↑ + 247 kJ
उपरोक्त प्रक्रिया को निम्न प्रयोग द्वारा समझाया जा सकता है- प्रयोग – काँच की एक परखनली को पारे से पूर्णतः भरकर पेट्रीप्लेट में भरे पारे पर इस प्रकार उलटते हैं कि परखनली में पारे का तल नीचे न गिरे।
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अब कुछ अंकुरित बीज चिमटी की सहायता से परखनली में प्रवेश कराते हैं। ये बीज ऊपर उठकर परखनली की पेंदी में ऊपर की ओर पहुँच जाते हैं। परखनली को स्टैण्ड पर कस देते हैं। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। अंकुरित बीजों (germinating seeds) में अनॉक्सीश्वसन की क्रिया होने के फलस्वरूप CO2 उत्पन्न होती है।

CO2 के एकत्र होने के कारण धीरे-धीरे नली में भरे पारे का तल गिरने लगता है। यह देखने के लिए कि परखनली में CO2 ही उत्पन्न हुई है, एक KOH की टिकिया पारे के ऊपर पहुँचाते हैं। यह परखनली की CO2 को सोख लेती है और पारे का तल पुनः ऊपर उठ जाता है।

प्रश्न 3.
हरे पौधों द्वारा श्वसन क्रिया का प्रदर्शन कीजिए।
अथवा
सिद्ध कीजिए कि हरे पौधों में ऑक्सीश्वसन में CO2 उत्पन्न होती है।
उत्तर:
एक बेलजार A में एक हरा पौधा (इसके स्थान पर अंकुरित बीज, आलू अथवा प्याज) लेते हैं । बेलजार के दोनों ओर चूने के पानी से भरी दो बोतलें A तथा B को नली की सहायता से जोड़ दिया जाता है। बेलजार B को काले कपड़े या कागज से ढँक देते हैं ताकि पौधों में प्रकाश संश्लेषण न हो ।

बोतल C का सम्बन्ध KOH से भरी U नली से कर देते हैं, U नली से कर देते हैं, U नली का एक सिरा रखते हैं तथा A नली के एक सिरे से चूषण पम्प जोड़ देते हैं। बोतल, बेलजार तथा नली को चित्रानुसार जोड़ते हैं तथा पूरे उपकरण को वायुरुद्ध (air tight) रखा जाता है। चूषण पम्प को कुछ देर बाद खोलने से वायु का खिंचाव होता है जिससे वायु U नली में रखे KOH से होती हुई C बोतल में प्रवेश करती है।

वायु में उपस्थित CO2 KOH द्वारा अवशोषित हो जाती है। बोतल C के चूने के पानी का दूधिया न होना इसका प्रमाण है । कुछ समय पश्चात् हम देखते हैं कि A बोतल के चूने के पानी का रंग दूधिया हो गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि अंकुरित बीज श्वसन में CO2 गैस निकालते हैं जो कि A बोतल के चूने के पानी को दूधिया कर देती है।
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प्रश्न 4.
श्वसनमापी द्वारा ऑक्सी श्वसन का प्रदर्शन कैसे किया जाता
उत्तर:
श्वसनमापी द्वारा श्वसन क्रिया का प्रदर्शन-
श्वसन मापी काँच का बना एक उपकरण है, जिसमें एक नलिका के मुड़े सिरे पर एक बल्ब लगा रहता है। बल्ब में कॉर्क लगा एक मुँह भी होता है। बल्ब में कुछ अंकुरित बीज रखकर इसमें लगी नली के दूसरे छोर को पारे से भरी एक नाद से सम्पर्क कर देते हैं। नली के मुँह में पारे के ऊपर KOH की एक टिकिया रखकर उपकरण को स्टैण्ड पर कस देते हैं।

दूसरे दिन उपकरण को देखने से ज्ञात होता है कि पारा श्वसनमापी ( Respirometer) नलिका में ऊपर चढ़ गया है। इसका कारण है कि बल्ब में रखे बीज श्वसन क्रिया में. O2 अवशोषित करके CO2 उत्पन्न करते हैं। CO2 को KOH द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है जिससे नलिका में वायुदाब कम होता है और पारा नली में ऊपर चढ़ जाता है।
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प्रश्न 5.
यीस्ट कोशिकाओं को चीनी के घोल में रखने से आप यीस्ट कोशिकाओं एवं चीनी के घोल में किन परिवर्तनों की आशा करते हैं ?
अथवा
खजूर का ताजा रस देर तक रखे रस की अपेक्षा मीठा होता है और मादक होता जाता है। समझाइए ।
उत्तर:
चीनी के घोल में यीस्ट कोशिकाओं को रखने से इसमें निम्न परिवर्तन होता है-
चीनी के घोल में परिवर्तन – यीस्ट कोशिकाओं द्वारा चीनी के घोल में एल्कोहॉलिक किण्वन (Alcoholic fermentation) होता है, फलस्वरूप यीस्ट कोशिकाओं में उपस्थित जाइमेज समूह के विकर, सुक्रोज ( Sucrose) पर क्रिया करके इसे ग्लूकोज आदि में तोड़ देते हैं। बाद में अनॉक्सी श्वसन के द्वारा ग्लूकोज (Glucose) से ऐल्कोहॉल तथा CO2 बनते हैं। इस क्रिया में उत्पन्न ऊर्जा घोल का ताप भी बढ़ाती है। देर तक रखे खजूर (Date palm) के रस का यीस्ट द्वारा किण्वन (Fermentation) से ऐल्कोहॉल बनने के कारण यह मादक (Narcotic) हो जाता है।
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यीस्ट कोशिकाओं में परिवर्तन- यीस्ट कोशिकाएँ प्रचुरता में पोषण तथा ऊर्जा पाकर कायिक वृद्धि करके संख्या में वृद्धि करती हैं। इस प्रक्रिया को मुकुलन (budding) कहते हैं।

प्रश्न 6.
प्रकाश संश्लेषण तथा श्वसन में अन्तर लिखिए ।
उत्तर:
प्रकाश संश्लेषण तथा श्वसन में अन्तर

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis)श्वसन (Respiration)
1. इसमें प्रकाश आवश्यक है।1. इसमें प्रकाश आवश्यक नहीं है।
2. CO2 तथा H2O कच्चे माल हैं।2. कार्बोहाइड्रेट कच्चा माल (Raw material) है।
3. काबोंहाइड्रेट उत्पाद होता है।3. CO2 व जल उत्पाद होते हैं।
4. यह ऊर्जाशोषी (endo- thermic) अभिक्रिया है।4. यह ऊर्जाक्षेपी अभिक्रिया (Exothermic reaction) है।
5. यह संश्लेषणात्मक क्रिया है।5. यह विघटनात्मक क्रिया है।
6. इससे शुष्क भार में वृद्धि होती है।6. इससे शुष्क भार में कमी होती है।
7. प्रकाश फॉस्फेटीकरण होता है।7. ऑक्सीकरणीय फॉस्फेटीकरण होता है।

प्रश्न 7.
क्या कारण है कि बीज से भरे गोदाम को खोलने पर गर्मी महसूस होती है ?
अथवा
हरी घास के अन्दर का ताप बाहर के वातावरण से अधिक होता है। उत्तर- बीज भरे गोदाम या अनाज से भरे गोदाम को खोलने पर गर्मी निकलती है क्योंकि बीज जीवित होते हैं तथा इनमें धीमी गति से श्वसन क्रिया होती है जिससे ऊष्मा उत्पन्न होती है। यह ऊष्मा हमें गोदाम खोलने पर महसूस होती है। ऐसा ही घास के ढेर में होता है, कटी घास की पत्तियों में काफी समय तक श्वसन होता रहता है जिससे ऊष्मा निकलती है जो अन्दर के वातावरण को गर्म कर देती है।

प्रश्न 8.
ऐसीटिक अम्ल किण्वन तथा लैक्टिक अम्ल किण्वन पर टिप्पणी लिखिए ।
उत्तर:
(i) ऐसीटिक अम्ल किण्वन (Acetic Acid Fermenta- tion) – कुछ जीवाणुओं में एल्कोहॉलिक किण्वन (Fermentation) होने से ऐथिल ऐल्कोहॉल को ऐसीटिक अम्ल में ऑक्सीकृत कर दिया जाता है। इसे ऐसीटिक अम्ल किण्वन कहते हैं-
C2H5 OH + O2 → CH3COOH + H2O + 118.2 kcal ऐथिल एल्कोहल ऐसीटिक अम्ल

(ii) लैक्टिक अम्ल किण्वन (Lactic Acid Fermentation) – उच्च श्रेणी के पादपों, जन्तुओं की माँसपेशियों तथा कुछ जीवाणुओं जैसे- लैक्टोबैसीलस लैक्टाइ आदि में यह क्रिया होती है। इसमें ग्लूकोज से पाइरुविक अम्ल (Pyruvic acid) तथा फिर विकर की उपस्थिति में लैक्टिक अम्ल (Lactic acid) बनता है-
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किण्वन प्रक्रिया अवायवीय दशाओं में तीव्रतम होती है।

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प्रश्न 9.
निम्न पर टिप्पणियाँ लिखिए-
(i) प्रोटोप्लाज्मिक श्वसन,
(ii) फ्लोटिंग श्वसन तथा
(iii) लवणीय श्वसन ।
उत्तर:
(i) प्रोटोप्लाज्मिक श्वसन-यदि क्रिया में श्वंसन पदार्थ प्रोटीन होता है तो ऐसे श्वसन को प्रोटोप्लाज्मिक श्वसन कहते हैं।
(ii) फ्लोटिंग श्वसन यदि श्वसन क्रिया में श्वसनी पदार्थ कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं तो इसे फ्लोटिंग श्वसन (Floating respiration) कहते हैं।
(iii) लवणीय श्वसन -पौधों को लवणीय जल में रखने पर श्वसन दर में वृद्धि होती है। इसे लवणीय श्वसन (Salt respiration) कहते हैं।

(E) निबन्धात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
ग्लाइकोलाइसिस की क्रिया का वर्णन कीजिए।
अथवा
EMP पथवे क्या है ? इसके विभिन्न पदों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ग्लाइकोलिसिस शब्द्ध की उत्पवि ग्रीक शब्द ग्लाइकोस अर्थात् शरंकर एवं लाइसिस अर्थात् टृटना से हुआ है। ग्लाइकोलिसिस की प्रक्रिया गुस्ताव इबेडेन, ओटो मेयर हॉफ तथा जे पारानास द्वारा दिया गया तथा इसे सामान्यतः इएमपी पाथ कहते हैं। अनाक्सी जीवों में साँस की केवल यड़ी प्रक्रिया है। ग्लाइकोलिसिस कोशिका द्रव्य में संपन्न होता है और यह सभी सजीवों में मिलता है । इस प्रक्रिया में ग्लूकोज आशिक ऑक्सीकरण द्वारा पाइरविक अम्ल के दो अणुओं में बदल जाता है।

पादपों में यह ग्लूकोज सुक्रोज से प्राप्त होता है जो कि प्रकाश संश्लेषित कार्बन अभिक्रियाओं का अंतिम उत्पाद है या संचयित कार्बोहाइड्रेट से प्राप्त होता है। सुक्रोस इवर्टेस नामक एंजाइम की सहायता से ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज में परिवतितत हो जाता है। ये दोनों मोनोसैकेराइड सरलता से ग्लाइकोलाइटिक चक्र में प्रवेश कर जाते हैं।

ग्लूकोज एवं फ्रक्टोज, हैक्सोकाइनेज एंजाइम द्वारा फॉस्फरिकृत होकर ग्लूकोज-6 फॉस्फ़टट बनाते है। न्लूकोज का फॉस्फरिकृत रुप समायवीकरण द्वारा फ्रुक्टोज- 6 फॉस्पेट में परिवर्तित हो जाता है। ग्लूकोज एवं फ्रुक्टोज के उपापच्य के बाद के क्रम एक समान होते हैं। ग्लाइकोलिसिस के विभिन्न चरण में दर्शाए गए हैं। ग्लाइकीलिसस में दस मृंखलाबद्ध अभिक्रियाओं में विभिन्न एंजाइम द्वारा ग्लूकोज से पाइस्वेट का निर्माण होता है। म्लाइकोलिसिस के विभिन्न चरणों के अध्ययन के दौरान उन चरणों पर ध्यान दें जिसमें एटीपी का उपयोग (एटीपी ऊर्जा) अथवा संश्लेषण (इस मामले में NADH+H+) होता है।

एटीपी का उपयोग दो चरणों में होता है: पहले चरण में जब ग्लूकोज-6 फॉस्फेंट में परिवर्तन होता है तथा दूसरे चरण में व दूसरे फ्रक्टोज -6 फास्फ्टंट का फ्रुक्येज 1,6 , बिसफॉस्फेंड में परिकतन होता है। प्रक्ट्टोज 1.6 विसफॉस्फेट टूटकर डाइहाइड्रोक्सीएसीटोन फॉस्फेंट तथा 3-फौस्फोग्लिखासि्डहाइड (पीजीएएल) बनाता है। जब 3-फॉस्फोंम्लिसरलिद्धाइड (पीजीएएल) का 1 , 3 -बाई फॉस्फोग्लिसरेट (बीपीजीए) में परिवर्तन होता है तो NAD+ से NADH+H+ का निर्मांण होता है।

पीजीएएल से दो समान अपचयोपचय (रिडॉक्स) दो हाइड्रोजन अणु पृथक होकर NAD के एक अणु की और स्थानांतरित होता है। पीजीएल्ल अक्सीकृत होकर अकार्बनिक फॉस्फेट से मिलकर बीपीजीए में परिवर्तित हो जाता है। डीपीजीए का 3- फॉस्फोग्लिसरीक अम्ल में परिवर्तन ऊर्जा उत्पाद्न करने वाली प्रक्रिया है।

इस ऊर्जा का उपयोग एटीपी (ATP) निर्मांण में ह्रोता है। पीईपी (P.E.P.) का पायरूविक अम्ल में परिवर्तन के दौरान भी एटीपी का निमाँण होता है। क्या हुम यह गणना कर सकते हो कि एक अणु से कितने एटीपी के अणुख्तों का प्रत्यक्ष रूप से संश्लेषण होता है? पायरूविक अम्ल न्लाइकोलिसिस का मुख्य उत्पाद है।

पायरुवेट का उपापच्यी भविघ्य क्या है? यह कोशिकीय आवश्यकता पर निर्भर है। यहाँ तीन प्रमुख तरीके हैंजिसमें विधिन्न कोशिकाएं ग्लाइकोलिसिस द्वारा उत्पन्न पायरुविक अम्ल का उपयोग करती हैं। ये लैक्टिक अम्ल किष्वन, एल्कोहलिक किण्वन और ऑक्सी साँस है। अधिकांश प्रोकेरियोट तथा एक कोशिका यूकैरियोट में किण्वन अनाक्सी परिस्थितियों में होता है।

ग्लूकोज के पूर्ण औक्सीकरण के फलस्वरूप कार्बनडाइऑक्साइड तथा जल बनने हंतु जीवथारियों में क्रेंख्स चक्र के द्वारा होता है, जिसे ऑंक्सी श्वसन या साँस कहते हैं, जिसमें ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
ऑक्सीश्वसन से आप क्या समझते हैं ? क्रेब्स चक्र का आरेख बनाकर वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ऑक्सी श्वसन (Aerobic Respiration)
जैसा कि पहले बताया जा चुका है, ऑक्सीश्वसन वह क्रिया है जिसमें ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। यद्यपि उपरोक्त ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis) की क्रिया ऑक्सी तथा अनॉक्सी (acrobic and anaerobic) दोनों प्रकार के श्वसन में ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis) की क्रिया ऑक्सी तथ अनॉक्सी (acrobic and anaerobic) दोनों प्रकार के श्वसन में सामान्य होती है।

परन्तु जब ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis) में बने पाइरुविक अम्ल का विघटन ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है तब इसे ऑक्सीश्वसन (aerobic respiration) कहते हैं। यदि पाइरुविक अम्ल का विघटन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है तो इसे अनॉक्सीश्वसन (anaerobic respiration) कहते हैं।

ग्लाइकोलाइसिस में उत्पन्न हुआ पाइरुविक अम्ल माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में प्रवेश करता है तथा एन्जाइम संकुलों की उपस्थिति में ऑक्सीकरणीय विकार्बोक्सलिकरण से सक्रिय ऐसीटेट बनाता है। अभिक्रिया में पाइर्वेट डिहाइड्रोजिनेस तथा NAD + कोएन्जाइम A, थियामिन फॉस्फेट (TPP) तथा लाइपोइक अम्ल की आवश्यकता होती है। अभिक्रिया का सम्पूर्ण रासायनिक समीकरण अग्रवत् है-

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लाइपोइक अम्ल
पाइरुवेट डिहाइड्रोजिनेस
पाइरुविक अम्ल + सहएन्जाइम A+NaD+ Mg++ ,TPP
ऐसीटिल CO ~ A+ NaDH+H++ CO2
ऐसीटिल CO ~ A क्रेम्स चक्र (Kreb’s cycle) में प्रवेश कर जाता है।

क्रेब्स चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र (Kreb’s Cycle or Tricarboxylic acid cycle)
इस चक्र की खोज हेन्स क्रेब (Hans Krebs) ने 1937 में की थी। इसके लिए इन्हें 1953 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था। इसे सिट्रिक अम्ल चक्र (Citric acid cycle) या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र (Tricarboxylic acid cycle or TCA Cycle) भी कहते हैं। यह चक्र माइटोकॉन्ड्रिया के मेट्रिक्स में पूर्ण होता है। इस चक्र के प्रमुख चरण निम्नवत् हैं-

(i) संघनन (Condensation ) ऐसीटिल CO ~ A जल की उपस्थिति में सामान्यतः कोशिका में उपस्थित ऑक्सेलोऐसीटेट से क्रिया करके 6- कार्बन वाला यौगिक सिट्रेट बनाता है तथा COM A को मुक्त कर देता है। इस अभिक्रिया के लिए ऊर्जा ऐसीटिल CO ~ A का उच्च ऊर्जा आबन्ध प्रदान करता है। यह अभिक्रिया सिट्रेट सिन्थेटेस एन्जाइम द्वारा उत्प्रेरित होती है। सिट्रेट में 3- COOH समूह उपस्थित होते हैं। अतः इसे ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र (Tricarboxylic acid cycle or TCA cycle) कहते हैं।
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(ii) निर्डलन (Dehvdration)-सिट्टेट ऐकोनाइडेस एन्दाइम की उपस्थिति में H2O निष्कासित करके सिसऐकोनाइट्रेट बनाता हैं।
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(iii) जलयोजन (Hydration)-सिसऐकोनाइट्रेट ऐकोनाइटेस एन्जाइम की उपस्थिति में H2O से संयोग करके आइसोसिट्रेट बनाता है।
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(iv) ऑक्सीकरणीय विकाबोंक्सिलीकरण (Oxidative Decarboxylation) – आइसोसिट्रेट हास्र्रोजन परमाणुओं का एक युग्म देकर (ऑक्सीकरण) CO2 का एक अणु निक्षासित करके (विकार्बोक्सिलीकणण) 5 -कार्षन -कीटोग्लूटरोट बनाता है। यह किया आइसोस्ट्रेट किछाम्रोजिनेस एव्ञाइम द्वारा उत्रेरित होती है।
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(v) ऑक्सीकरणीय विकार्बोक्सिलीकरण (Oxidative Decarboxylation)- यह दो पदों में पूर्ण होता है।

(i) प्रथम पद में Co ~ A, α कीटोग्लूटारेट से अभिक्रिया करके 4- कार्बन सक्सिनिल CO ~ A बनाता है तथा हाइड्रोजन परमाणुओं का एक युग्म तथा CO2 को निर्मुक्त करता है। इस अभिक्रिया में α -कीटोग्लूटारेट डिहाइड्रोजिनेस संकुल एन्जाइम भाग लेता है।
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(ii) द्वितीय पद में सक्सीनिल CO ~ A 4 कार्बन सक्सीनेट तथा CO ~ A एवं HO अणु में टूट जाता है।
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(vi) विहाइड्रोजनीकरण (Dehydrogenation ) – इस प्रक्रम में सक्सीनेट 4- कार्बन फ्यूमेरेट में सक्सीनेट डीहाइड्रोजिनेस एन्जाइम की उपस्थिति में बदल जाता है तथा हाइड्रोजन परमाणुओं का एक युग्म निर्मुक्त करता है।
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(vii) जलयोजन (Hydration) – फ्यूमेरेस एन्जाइम की उपस्थिति में फ्यूमेरेट H2O के साथ जलयोजित होकर 4 कार्बन मेलेट बनाता है।
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(viii) विहाइड्रोजनीकरण (Dehydrogenation ) – इस प्रक्रम में ऑक्सेलोऐसीटेट का निर्माण होता है। यह क्रिया मैलेट डीहाइड्रोजिनेस एन्जाइम द्वारा उत्प्रेरित होती है।
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ऑक्सेलोऐसीटेट ऐसीटिल CO ~ A से संयुक्त होकर सिट्रेट बनाता है।
इस प्रकार क्रेन्स चक्र नियमित रूप से चलता रहता है।

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प्रश्न 3.
इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETS) का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इलेक्ट्रोन परिवान तन्र या प्वृसन में ATP का ऑक्सीकरणीय उपादन (Electron Transport System or Oxidative Production of ATP in Respiration) ग्लूकोस का ऑक्सीजन की उपस्थिति में वियोजित होना ऑक्सीकरण प्रक्रिया है। इस प्रक्रम के दौरान कुछ मध्यवर्ती जैसे फॉस्फोग्लिसरेल्हिद्धाइड, पाइइविक अम्ल, आइसोसिट्रिक अम्ल, α-कीटोग्लूटारिक अम्ल, सक्सीनिक अम्ल तथा मैलिक अम्ल ऑक्सीकृत होते हैं। प्रत्येक ऑक्सीकरण पद में 2H निर्मुक्त होते हैं,
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प्रश्न 4.
किण्वन को परिभाषित कीजिए तथा विभिन्न प्रकार की किण्वन प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किण्वन (Fermentation)
अनेक सूक्ष्मजीवों में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में श्वसन क्रिया छोती है तथा यह जीवन की अन्य क्रियाओं से सम्बन्धित होती है। उदाहरण के लिए-सूक्ष्म जीव जिस पोषक माध्यम (किसी कार्बनिक पदार्थ का कोलॉइडी घोल (Colloidal solution) या अन्य प्रकार का नम पदार्थ) में पाये जाते हैं को पहले कुछ पाचक क्रियाओं द्वारा घुलनशील तथा अवशोषण योग्य बनाकर भोजन अवशोषित करते हैं।

ये पोषक पदार्थ जीव के शरीर में पहुँचकर O2 के अभाव में विघटित हो जाते हैं। इससे उत्पन्न कर्जा जैविक क्रियाओं (Vital activities) को सम्पन्न करती है। इस प्रक्रिया में पोषक पदार्थ पूर्णतः विखण्डित नहीं हो पाता है और न ही उससे सम्पूर्ण ऊर्जा कोशिका को प्राप्त छोती है। अपूर्ण विखण्डित पदार्थ वातावरण में मुक्त कर दिया जाता है।

उपरोक्त क्रिया को सामूधिक रूप से दिण्न्न (Fermentation) कहते हैं। यह क्रिया प्रायः कवकों (Fungi) एक जटिल समूह के रूप में होते हैं। जैसे-यीस्ट (Yeast) में इसे जाइमेज (Zymase) समूह का़ जाता है। एल्कोईगिलिक किष्बन (Alcoholic Fermentation) – यह्ठ क्रिया प्राय: यीस्ट (Yeast) में पायी जाती है। इसमें सर्वप्रथम जटिल कार्बोहाड्रेट्स को ग्लूकोज आदि सरल कार्बोहाइड्डेट्स में तोड़ा जाता है।
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किण्वन को प्रर्भावित करने वाले कारक (Factors Affecting Fermentation)
1. ऑक्सीजन की उपस्थिति किण्वन को कम करती है क्योंकि किण्वन अनॉक्सी प्रक्रिया है।
2. प्रकाश की तीव्रता से किण्वन की क्रिया घटती है।
3. तापमान से किण्वन की क्रिया बढ़ती है। तापमान के कम होने से घटती है।

प्रश्न 5.
श्वसन को प्रभावित करने वाले कारक लिखिए।
उत्तर:
श्वसन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Respiration)
(अ) आन्तरिक कारक (Internal Factors)
1. श्वसनी पदार्थ या क्रियाधर की सान्द्रता (Concentration of Respiratory Substrate)-श्वसन क्रिया में श्वसनी पदार्थ की सान्द्रता बढ़ने पर श्वसन की दर बढ़ जाती है तथा पदार्थ की सान्द्रता में कमी होने पर श्वसन दर घट जाती है।
2. औीवद्रु्य (Protoplasm)-जीवद्रव्य की मात्रा एवं सान्द्रता से श्वसन प्रभावित होता है, जैसे-विभाजन करने वाली कोशिकाओं में जीवद्रव्य की मात्रा अधिक होती है, अत: इनमें श्वसन दर भी अधिक होती है।
3. विकर (Enzyme)-समुचित विकर सान्द्रता होने पर ही श्वसन क्रिया ठीक प्रकार से संचालित होती है।

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(ब) बाद्य कारक (External Factors)
1. तापमान (Temperature)-सामान्यतः श्वसन 5°C से 25°C ताप पर होता है। यदि ताप को 35°C तक बढ़ाया जाय तो श्वसन दर बढ़ती है परन्तु इसमे अधिक ताप बढ़ने पर श्वसन दर घटने लगती है। कुछ जीवाणु 10°C तथा 60°C पर भी श्वसन करते हैं।
2. ऑक्सीजन (Oxygen) – ऑक्सीश्वसन के लिए O2 मङखवपूर्ण कारक है। इसकी उचित सान्द्रता (concentration) में श्वसन दर बड़ती है किन्तु अत्याधक सान्द्रता विकरों का संदमन करती है जिससे श्वसन दर घट जाती है।
3. जल (Water)-समस्त जैविक क्रियाएँ जल की उपस्थिति में होती हैं। विकर (enzyme) जल की उपस्थिति में ही क्रियाशील होते हैं। जल की कमी से श्वसन दर घटती है।
4. प्रकाश (Light)-प्रकाश श्वसन को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। प्रकाश के कारण ही श्वसन में प्रयुक्त भोज्य पदार्थ का संश्लेषण होता है। भोज्य पदार्थ की कमी होने पर श्वसन दर घट जाती है।
5. CO2 वायुमण्डल में = CO2 = की सान्द्रता बढ़ने पर श्वसन दर घट जाती है।
6. श्वसन संदमक (Respiration inhibitors) – कुछ पदार्थ जैसे-कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)2 सायनाइड (Cyanide), आयोडोऐसेटेट, मैलोनेट आदि श्वसन संदमक का कार्य करते हैं।

प्रश्न 6.
श्वसन भागफल से आप क्या समझते हैं ? विभिन्न खाद्य पदार्थों के श्वसन भागफल बताइए।
उत्तर:
देखिए अनुच्छेद 14.5 (श्वसन भागफल या श्वसन गुणांक) ।
“श्वसन पथ एक ऐम्पीबोलिक पथ होता है”
(Respiratory Pathway is an Amphibolic Pathway)
श्वसन क्रिया के लिए ग्लूकोब एक सामान्य क्रियाधर (Common Substrate) होता है, जिसे कोशिकीय ईधन (Cellular fuel) कहते हैं, अन्य काबोंहाइड्डेटस भी श्वसन क्रिया से पहले ग्लूकोज में परिवर्तित कर दिये जाते हैं। वसा (Fat) को पहले गिलसरॉल तथा वसीय अम्लों (Fatty acids) में विर्घटित किया जाता है।

वसीय अम्ल ऐसीटिल कोएनाइम (Acetyle Co-A) बनकर श्वसन मार्ग में प्रवेश करता है। गिलसरॉल फॉस्पोम्लिसरेलिड़हाइड (PGAL) में बदलकर श्वसन पथ में प्रवेश करता है। प्रोटीन्स विषटित होकर ऐमीनो अम्ल बनाती हैं। एमीनो अम्ल (Amino acids) विएमिनीकरण (veamination) के पश्चात क्रेब्स चक्र के विभिन्न चरणों में प्रवेश करता है।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन

इसी प्रकार वसा अम्ल के संश्लेषण में श्वसन मार्ग से ऐसीटिल कोएन्जाइम पृथक् हो जाता है। अत: वसा अम्ल के संश्लेषण एवं विषटन के दौरान श्वसनीय पथ का प्रयोग होता है। इसी प्रकार प्रोटीन के संश्लेषण व विषटन के दौरान मी श्वसन पथ का प्रयोग होता है। इस तरह श्वसन पथ में उपचय (Anabolism) तथा अप्य (Catabohism) क्रियाएँ साथ-साथ होती रहती हैं। यही कारण है कि श्वसन पथ को ऐम्प्रीबोलिक पथ (Amphibolic Pathway) कहा जाता है।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 14 पादप में श्वसन 20

श्वसन भागफल या श्वसन गुणांक (Respiratory Quotient, R.Q.)
किसी दिये गये समय, ताप व दाब पर निष्कासित CO2 तथा प्रयुक्त O2 के अनुपात को श्वसन भागफल RQ कहते हैं।
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HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

Haryana State Board HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. तत्त्वों का प्रथम आवर्ती वर्गीकरण किसने प्रस्तुत किया था?
(1) डॉबेराइनर
(2) जे. ए. आर. न्यूलैण्ड
(3) डी. आई. मेण्डलीव
(4) लोथर मेयर।
उत्तर:
(3) डी. आई. मेण्डलीव

2. निम्न ऑक्साइडों में उभयधर्मी ऑक्साइड कौन-सा है?
(1) MgO
(2) Al2O3
(3) P2O5
(4) SiO2.
उत्तर:
(2) Al2O3

3. परमाणु क्रमांक 21 के तत्त्व का आवर्त सारणी में क्या स्थान है?
(1) आवर्त – 3, वर्ग II
(2) आवर्त – 4, वर्ग II
(3) आवर्त – 4, वर्ग III
(4) आवर्त – 3, वर्ग III.
उत्तर:
(3) आवर्त – 4, वर्ग III

4. दीर्घाकार आवर्त सारणी तत्त्वों के किस लक्षण पर आधारित है?
(1) संयोजकता
(2) परमाणु द्रव्यमान
(3) परमाणु आकार
(4) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
उत्तर:
(4) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

5. निम्न में से कौन-सा युग्म आवर्त सारणी एक ही आवर्त में है?
(1) Na, Ca
(2) Na, Cl
(3) Ca, Cl
(4) Hg, Sb.
उत्तर:
(2) Na, Cl

6. कैलिफोर्नियम तत्त्व निम्न परिवार का सदस्य है-
(1) ऐक्टिनॉइड श्रेणी
(2) क्षारीय धातु समूह
(3) क्षारीय मृदा समूह
(4) लैन्थेनॉइड श्रेणी।
उत्तर:
(1) ऐक्टिनॉइड श्रेणी

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

7. आवर्त सारणी को बनाने वाला मेण्डलीव था-
(1) फ्रेंच रसायनशास्त्री
(2) जर्मन रसायनशास्त्री
(3) डच रसायनशास्त्री
(4) रूसी रसायनशास्त्री।
उत्तर:
(4) रूसी रसायनशास्त्री।

8. आवर्त तालिका में निम्न में से किस तत्त्व की विद्युत ऋणात्मकता अधिकतम है?
(1) नाइट्रोजन
(2) ऑक्सीजन
(3) क्लोरीन
(4) फ्लुओरीन।
उत्तर:
(4) फ्लुओरीन।

9. Fe2+ (Fe की परमाणु संख्या = 26) में d- इलेक्ट्रॉनों की संख्या बराबर नहीं है
(1) Ne (प. सं. = 10) में p- इलेक्ट्रॉनों की
(2) Mg (प. सं. = 10) में p- इलेक्ट्रॉनों की
(3) Fe में d – इलेक्ट्रॉनों की
(4) Cl (Cl की प. सं. = 17) में p- इलेक्ट्रॉनों की।
उत्तर:
(4) Cl (Cl की प. सं. = 17) में p- इलेक्ट्रॉनों की।

10. सबसे हल्की धातु है-
(1) Li
(2) Mg
(3) Ca
(4) Na
उत्तर:
(1) Li

11. 3d – संक्रमण श्रेणी के तत्त्वों का परमाणु क्रमांक है-
(1) 22 से 30
(2) 21 से 30
(3) 21 से 31
(4) 21 से 291
उत्तर:
(2) 21 से 30

12. निम्न में से कौन अधिकतम अधात्विक गुण प्रदर्शित करेगा-
(1) Be
(2) B
(3) Mg
(4) Al
उत्तर:
(2) B

13. समइलेक्ट्रॉनिक सदस्यों की त्रिज्या-
(1) नाभिकीय आवेशों के बढ़ने के साथ बढ़ती है
(2) नाभिकीय आवेशों के बढ़ने के साथ घटती है
(3) पहले बढ़ती है और फिर घटती है
(4) सभी के लिए समान होती है।
उत्तर:
(2) नाभिकीय आवेशों के बढ़ने के साथ घटती है

14. निम्नलिखित ऑक्साइडों में से कौन-सा सर्वाधिक क्षारीय है?
(1) Na2O
(2) SiO2
(3) SO2
(4) Al2O3
उत्तर:
(1) Na2O

15. निम्न में कौन-सा तत्त्व अत्यधिक विद्युत धनात्मक है?
(1) Al
(2) Mg
(3) P
(4) S
उत्तर:
(2) Mg

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

16. Vth आवर्त में उपस्थित तत्त्वों की संख्या है—
(1) 18
(2) 32
(3) 8
(4) 24
उत्तर:
(1) 18

17. IIB के तत्त्व कहलाते हैं-
(1) सामान्य तत्त्व
(2) संक्रमण तत्त्व
(3) क्षारीय धातु
(4) क्षारीय मृदा धातु।
उत्तर:
(3) क्षारीय धातु

18. निम्नलिखित में से सबसे दुर्बल क्षार है-
(1) NaOH
(2) KOH
(3) Ca(OH)2
(4) Cu(OH)2
उत्तर:
(4) Cu(OH)2

19. निम्नलिखित यौगिकों में सर्वाधिक अम्लीय है—
(1) p2O5
(2) As2O3
(3) Sb2O3
(4) Bi2O3
उत्तर:
(1) p2O5

20. तत्त्वों में उच्चतम आयनन विभव (IE) किस तत्त्व का है-
(1) H
(2) He
(3) Hg
(4) Au
उत्तर:
(2) He

21. निम्न में उपधातु कौन-सी है-
(1) Zn
(2) Ge
(3) Sn
(4) Al
उत्तर:
(2) Ge

22. ज्ञाततत्त्वों में उच्चतम इलेक्ट्रॉन बन्धुता किस तत्त्व की है—
(1) H
(2) O
(3) F
(4) Cl.
उत्तर:
(4) Cl.

23. निम्न में उभयधर्मी ऑक्साइड कौन-सा है-
(1) BaO
(2) SnO
(3) SiO2
(4) Li2O.
उत्तर:
(2) SnO

24. C, N, P और SI तत्त्वों की विद्युत ऋणात्मकता के बढ़ने का क्रम है-
(1) C.N. Si. P
(2) N, Si, C, P
(3) Si. P. C.N
(4) P, Si, N. C.
उत्तर:
(3) Si. P. C.N

25. उदासीन ऑक्साइड है-
(1) CO
(2) ZnO
(3) SO2
(4) SnO2
उत्तर:
(1) CO

26. निम्न में से किसकी त्रिज्या सबसे बड़ी है-
(1) Na+
(2) O2-
(3) F
(4) Mg2-
उत्तर:
(2) O2-

27. किस तत्त्व की द्वितीय इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य होती है-
(1) Cl
(2) O
(3) S
(4) N.
उत्तर:
(1) Cl

28. निम्नांकित में लघुतम आयनिक त्रिज्या वाला आयन है-
(1) K+
(2) Ca2+
(3) Ti3+
(4) Ti4+
उत्तर:
(4) Ti4+

29. निम्नलिखित में सबसे बड़ा आयन कौन-सा है-
(1) Al3+
(2) Ba2+
(3) Mg2+
(4) Na+
उत्तर:
(2) Ba2+

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

30. त्रिज्या (radii) का सही क्रम है-
(1) N < Be < B
(2) F < O2- < N3-
(3) Na < Li < K
(4) Fe3+ < Fe2 < Fe4+
उत्तर:
(2) F < O2- < N3-

31. प्रथम आयनन विभव के सही क्रम वाला समूह है-
(1) K > Na > Li
(2) Be > Mg > Ca
(3) B > C > N
(4) Ge > Si > C.
उत्तर:
(2) Be > Mg > Ca

32. निम्न में से किसकी विद्युत ऋणात्मकता सर्वाधिक है-
(1) H
(2) E
(3) He
(4) Na.
उत्तर:
(2) E

33. निम्न में से सबसे अधिक आकार होगा –
(1) Li+
(2) Na+
(3) Mg2+
(4) Rb+
उत्तर:
(4) Rb+

34. निम्न में से किस तत्त्व की आयनन ऊर्जा अधिकतम है-
(1) [Ne] 3s2 3p1
(2) [Ne] 3s² 3p2
(3) [Ne] 3s² 3p²
(4) [Ar] 3d10, 4s² 4p²
उत्तर:
(3) [Ne] 3s² 3p²

35. निम्नलिखित में से किसकी श्रेणी के तत्त्वों की परमाणु त्रिज्या लगभग समान होगी-
(1) Li, Be, B, C
(2) Na, K, Rb, Cs
(3) F, Cl, Br, I
(4) Fe, Co, Ni, Cr.
उत्तर:
(4) Fe, Co, Ni, Cr.

36. विद्युत ऋणात्मकता का सही क्रम है-
(1) O+ > O > O
(2) O > O+ > O
(3) O+ > O > O
(4) O+ > O > O+
उत्तर:
(1) O+ > O > O

37. आयनन विभव का न्यूनतम मान है-
(1) हैलोजनों का
(2) अक्रिय गैस का
(3) क्षारीय मृदा धातुओं का
(4) क्षार धातुओं का।
उत्तर:
(4) क्षार धातुओं का।

38. फ्लुओरीन व निऑन की परमाणु त्रिज्याएँ (Å ) क्रमश: हैं-
(1) 0.72, 1.60
(2) 1.60, 1.60
(3) 0.72, 0.72
(4) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(1) 0.72, 1.60

39. आयोडीन स्पीशीज के आकार का सही क्रम है-
(1) I > I+ > I
(2) I > I > I+
(3) I+ > I > I
(4) I > I > I+
उत्तर:
(4) I > I > I+

40. हैलोजन परिवार की विद्युत ऋणात्मकता का क्रम होता है-
(1) Cl > Br > F > I
(2) I > Br > Cl > F
(3 ) F> Cl > Br > I
(4) Br > Cl > F > I
उत्तर:
(3 ) F> Cl > Br > I

41. निम्न में से किस धातु की ऑक्सीकरण अवस्था एक से अधिक है-
(1 ) Na
(2) Mg
(3) Fe
(4) AL
उत्तर:
(3) Fe

42. N3-, O2- पर F आयनों की आयनिक त्रिज्याओं के मान का सही क्रम है-
(1 ) N3- > O2- > F
(2) N3- < O2- < F
(3) N3- > O2- < F
(4) N3- < O2- > F
उत्तर:
(1 ) N3- > O2- > F

43. आयनिक त्रिज्याओं का सही क्रम है-
(1) Ti4- < Mn3+
(2) 35Cl < 37Cl
(3) K+ < Cl
(4) p3+ > p5+
उत्तर:
(4) p3+ > p5+

44. निम्न तत्त्वों में किस तत्त्व की परमाणु त्रिज्या सबसे कम होगी-
(1) N
(2) F
(3) Na
(4) K.
उत्तर:
(2) F

45. इलेक्ट्रॉन बन्धुता निर्भर करती है-
(1) परमाणु आकार
(2) नाभिकीय आवेश
(3) परमाणु क्रमांक
(4) परमाणु आकार तथा नाभिकीय आवेश दोनों पर।
उत्तर:
(4) परमाणु आकार तथा नाभिकीय आवेश दोनों पर।

46. K, Ca तथा Ba के द्वितीय आयनन विभव का घटता क्रम है-
K = 19, Ca = 20, Ba = 56
(1) K > Ca > Ba
(2) Ca > Ba > K
(3) Ba > K > Ca
(4) K > Ba > Ca
उत्तर:
(1) K > Ca > Ba

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किन्हीं दो प्रारूपी तत्त्वों (Typical elements) के नाम बताओ।
उत्तर:
Na और Mg.

प्रश्न 2.
किन्हीं दो सेतु तत्त्वों (Bridge elements) के नाम बताओ।
उत्तर:
Na और Mg.

प्रश्न 3.
किन्हीं दो संक्रमण तत्त्वों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. क्रोमियम (Cr)
  2. कॉपर (Cu).

प्रश्न 4.
ट्रान्स- यूरेनिक तत्त्वों के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. Np
  2. Pul

प्रश्न 5.
d-ब्लॉक तत्त्वों को संक्रमण तत्त्व क्यों कहते हैं?
उत्तर:
ये तत्त्व – ब्लॉक व p-ब्लॉक तत्त्वों के बीच सेतु (Bridge) बनाते हैं।

प्रश्न 6.
परमाणु क्रमांक 58 से 71 तक के तत्त्वों को दुर्लभ मृदा तत्त्व (Rare earth elements) कहते हैं। क्यों?
उत्तर:
ये प्रकृति (Nature) में अल्प मात्रा में पाये जाते हैं।

प्रश्न 7.
बोरॉन (B) उपधातु (Metalloid) है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बोरॉन में धातु व अधातु दोनों के गुण पाये जाते हैं।

प्रश्न 8.
प्रबलतम धात्विक प्रकृति वाला तत्त्व कौन-सा है?
उत्तर:
सीजियम (Cs).

प्रश्न 9.
एक तत्त्व (X) आवर्त सारणी के तीसरे वर्ग में है। इस तत्त्व के ऑक्साइड का सूत्र क्या होगा?
उत्तर:
X2O3.

प्रश्न 10.
डॉबेराइनर के त्रिक किन्हें कहा जाता है?
उत्तर:
डॉबेराइनर ने लगभग समान गुण-धर्म वाले अनेक तत्त्वों को तीन-तीन के समूह में उनके परमाणु भार में वृद्धि के क्रमानुसार रखा। इस प्रकार के समूह डॉबेराइनर के त्रिक कहलाते हैं।

प्रश्न 11.
मेण्डलीव की आधुनिक आवर्त सारणी में वर्गों तथा आवर्तों की संख्या लिखिए।
उत्तर:
मेण्डलीव की आवर्त सारणी में नौ वर्ग (समूह) तथा सात आवर्त हैं।

प्रश्न 12.
संक्रमण तत्त्वों के दो गुण लिखिए।
उत्तर:

  1. विभिन्न संयोजकताएँ प्रदर्शित करना।
  2. रंगीन संकर आयन बनाना।

प्रश्न 13.
दीर्घाकार आवर्त सारणी में कुल कितने वर्ग व आवर्त हैं?
उत्तर:
वर्ग – 18, आवर्त – 7.

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

प्रश्न 14.
p-ब्लॉक के एक तत्त्व की बाह्यतम कक्षा में चार (4) इलेक्ट्रॉन हैं। इस तत्त्व का वर्ग व नाम बताओ यदि यह तत्त्व तीसरे आवर्त का है।
उत्तर:
वर्ग-14 (IVA), नाम- सिलिकॉन (14Si).

प्रश्न 15.
आवर्त सारणी में फॉस्फोरस को किस आवर्त और किस समूह में रखा गया है?
उत्तर:
आवर्त सारणी में फॉस्फोरस को तृतीय आवर्त तथा वर्ग 15 में रखा गया है।.

प्रश्न 16.
आवर्त सारणी में प्रत्येक आवर्त किस क्वाण्टम संख्या के साथ प्रारम्भ होता है?
उत्तर:
मुख्यं क्वाण्टम संख्या (17).

प्रश्न 17.
मानव निर्मित तत्त्व किस श्रेणी से सम्बन्धित होते हैं?
उत्तर:
ऐक्टिनॉइड श्रेणी।

प्रश्न 18.
कार्बन के फ्लुओराइड का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
CF4

प्रश्न 19.
द्वितीय आवर्त किस तत्त्व पर समाप्त होता है?
उत्तर:
निऑन (Ne)।

प्रश्न 20.
ns² np6 का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास रखने वाले तत्त्व अक्रिय क्यों कहलाते हैं?
उत्तर:
क्योंकि इनकी संयोजी कक्षा पूर्ण रूप से भरी होती है।

प्रश्न 21.
f – ब्लॉक के तत्त्वों को f-ब्लॉक तत्त्व ही क्यों कहते हैं?
उत्तर:
क्योंकि इन तत्त्वों में अन्तिम विभेदी इलेक्ट्रॉन (n – 2 ) f उपकोश में प्रवेश करता है।

प्रश्न 22.
अर्द्ध-पूर्ण तथा पूर्ण कक्षक अधिक स्थायी होते हैं, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अर्द्ध-पूर्ण तथा पूर्ण इलेक्ट्रॉनिक विन्यास वाले कक्षकों की ऊर्जा निम्न होती है। अतः ये स्थायी होते हैं। इसके अतिरिक्त इनके विन्यास में सममिति पायी जाती है।

प्रश्न 23.
किन्हीं दो उभयधर्मी ऑक्साइड का उदाहरण दें।
उत्तर:
जल (H2O), बेरीलियम ऑक्साइड (BeO)।

प्रश्न 24.
तीन ऐसे तत्त्वों के नाम लिखें जिनके ऑक्साइड उभयधर्मी होते हैं?
उत्तर:
Al, As, Sb.

प्रश्न 25.
उत्कृष्ट गैसें आवर्त सारणी के किस समूह में रखी जाती हैं?
उत्तर:
शून्य वर्ग या समूह 18.

प्रश्न 26.
हैलोजनों को आवर्त सारणी के किस समूह में रखा गया हैं?
उत्तर:
समूह 17 में (VII A ).

प्रश्न 27.
क्षार धातुओं को आवर्त सारणी के किस समूह में रखा गया है?
उत्तर:
समूह 1 में (IA).

प्रश्न 28.
क्षारीय मृदा धातुओं को आवर्त सारणी के किस समूह में रखा गया है?
उत्तर:
समूह 2 में (IIA ).

प्रश्न 29.
आवर्त सारणी में p-ब्लॉक में तीसरे आवर्त में कुल तत्त्वों की संख्या क्या है?
उत्तर:
छ: (6).

प्रश्न 30.
s-ब्लॉक तत्त्वों में अधिकतम आयनन ऊर्जा वाला तत्त्व कौन-सा है?
उत्तर:
(Be) बेरीलियम।

प्रश्न 31.
d-ब्लॉक के तत्त्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास क्या है?
उत्तर:
(n-1)d1 – 10 ns1-2.

प्रश्न 32.
क्षार धातुएँ प्रबल अपचायक क्यों होती क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि क्षार धातुओं में इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की प्रबल प्रवृत्ति होती है

प्रश्न 33.
हैलोजन प्रबल ऑक्सीकारक क्यों होते हैं?
उत्तर:
क्योंकि हैलोजनों में इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण करने की प्रबल प्रवृत्ति होती है।

प्रश्न 34.
उन दो तत्त्वों के नाम लिखें, जिनके लिये मेण्डलीव ने आवर्त सारणी में स्थान छोड़ दिया था और जिनकी खोज बाद में हुई।
उत्तर:
स्कैण्डियम (Sc) तथा गैलियम (Ga).

प्रश्न 35.
92U के बाद के तत्त्व ट्रान्स- यूरेनिक तत्त्व कहलाते हैं।
उत्तर:
92U के बाद के तत्त्व कृत्रिम रूप से बनाये गये हैं, जिसके कारण इन तत्त्वों को ट्रान्स- यूरेनिक तत्त्व कहते हैं।

प्रश्न 36.
किन्हीं दो दुर्लभ मृदा तत्त्वों के नाम लिखो।
उत्तर:

  1. लैन्थेनम (La )
  2. सीरियम (Ce).

प्रश्न 37.
आवर्त सारणी में तत्त्वों का वर्गीकरण करने के लिये मेण्डलीव ने तत्त्वों के कौन से गुण का प्रयोग किया?
उत्तर:
परमाणु भार का।

प्रश्न 38.
लोथर मेयर वक्र के आधार पर तत्त्वों के गुण किसके आवर्ती फलन हैं?
उत्तर:
लोथर मेयर वक्र के आधार पर तत्त्वों के गुण सामान्यतः उनके परमाणु भारों के आवर्ती फलन होते हैं।

प्रश्न 39.
समान गुणों वाले तत्त्व एक ही वर्ग में क्यों रखे गये हैं?
उत्तर:
क्योंकि इनमें संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है अथवा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होता है।

प्रश्न 40.
प्रारूपिक तत्त्व क्या हैं?
उत्तर:
s-ब्लॉक तथा p-ब्लॉक के तत्त्वों को सम्मिलित रूप से प्रारूपिक तत्त्व कहते हैं।

प्रश्न 41.
प्रथम बार तत्त्वों का आवर्ती वर्गीकरण किसने किया था?
उत्तर:
प्रथम बार तत्त्वों का आवर्ती वर्गीकरण इवानोविच मेण्डलीव ने किया था।

प्रश्न 42.
तत्त्वों के गुणों की आवर्तिता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक नियमित अन्तर के बाद गुणों की पुनरावृत्ति होने को गुणों की आवर्तिता कहते हैं।

प्रश्न 43.
जिन तत्त्वों की सभी कक्षायें पूर्ण हैं वे कौन से तत्त्व हैं?
उत्तर:
वे तत्त्व अक्रिय गैसें हैं।

प्रश्न 44.
दुर्लभ तत्त्वों की संख्या कितनी है?
उत्तर:
कुल 14 तत्त्व, ये लैन्थेनॉइड हैं। (Ci से Cu तक)

प्रश्न 45.
दुर्लभ तत्त्वों के गुणों में अत्यधिक समानता क्यों पाई जाती है?
उत्तर:
इन तत्त्वों के सबसे बाहरी कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होता है।

प्रश्न 46.
प्रत्येक आवर्त के अन्तिम तत्त्व कौन से हैं?
उत्तर:
प्रत्येक आवर्त के अन्तिम तत्त्व अक्रिय गैसें हैं।

प्रश्न 47.
मुद्रा धातुओं से क्या समझते हो?
उत्तर:
कॉपर, सिल्वर तथा गोल्ड को मुद्रा धातु कहते हैं क्योंकि इनका उपयोग मुद्राएँ बनाने में होता है।

प्रश्न 48.
आवर्त सारणी के भिन्न-भिन्न आवर्तों में तत्त्वों की संख्या भी भिन्न होती है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि प्रत्येक कोश में उपकोशों की संख्या अलग-अलग होती है तथा प्रत्येक आवर्त एक नये कोश के साथ भरना प्रारम्भ करता है इस प्रकार यह ns – np विन्यास पर पूर्ण हो जाता है।

प्रश्न 49.
f – ब्लॉक के तत्त्वों को अन्तः संक्रमण तत्त्व क्यों कहते हैं?
उत्तर:
f-ब्लॉक के तत्त्वों में अन्तिम इलेक्ट्रॉन (n – 2)f उपकोश में प्रवेश करता है। जबकि संक्रमण तत्त्वों में अन्तिम या विभेदी इलेक्ट्रॉन (- 1)d उपकोश में प्रवेश करता है।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

प्रश्न 50.
क्षारीय मृदा तत्त्व क्या होते हैं?
उत्तर:
वे तत्त्व जिनके ऑक्साइड मृदा (सिलिका, SiO2) के समान गलनीय होते हैं तथा क्षारीय गुण व्यक्त करते हैं। क्षारीय मृदा तत्त्व कहलाते हैं, जैसे-Ca, Sr, Ba, Mg आदि।

प्रश्न 51.
MgO, Al2O3, Na, O, SO3 व p2O5 में सर्वाधिक क्षारीय ऑक्साइड कौन-सा है, और क्यों?
उत्तर:
Na, O सर्वाधिक क्षारीय ऑक्साइड है क्योंकि यह क्षारीय धातुओं का ऑक्साइड है।

प्रश्न 52.
सम- इलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज में किसकी संख्या समान होती है?
उत्तर:
सम- इलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है।

प्रश्न 53.
वर्ग 17 तथा वर्ग 18 के रेडियोऐक्टिव तत्त्वों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. ऐस्टेटीन (At) वर्ग-17
  2. रेडॉन (Rn) – वर्ग-18

प्रश्न 54.
122 परमाणु क्रमांक वाले तत्त्व का IUPAC नाम तथा प्रतीक क्या होगा?
उत्तर:
IUPAC के अनुसार 1 को un, 2 को bi कहते हैं। अत: 122 परमाणु क्रमांक वाले तत्त्व का नाम Unbibium (Ubb) होगा।

प्रश्न 55.
निम्नलिखित तत्त्वों को अधात्विक लक्षणों के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
B, C, Si, N, F
उत्तर:
अधात्विक लक्षण का बढ़ता हुआ क्रम
Si < B < C < N < F
अधात्विक लक्षण आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर बढ़ता है तथा समूह में ऊपर से नीचे आने पर घटता है।

प्रश्न 56.
निम्नलिखित तत्त्वों को धात्विक लक्षणों के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करें-
B, Al, Mg, K
उत्तर:
धात्विक लक्षणों का बढ़ता हुआ क्रम- B

प्रश्न 57.
निम्नलिखित आयनों को आकार के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
Be2+, Cl, S2-, Na+, Mg2+, Br
उत्तर:
बढ़ते हुए आकार का सही क्रम
Be2+ < Mg2+ < Na+ < Cl < S2- < Br

प्रश्न 58.
उन स्पीशीज का नाम लिखिए जो निम्न परमाणुओं या आयनों में से प्रत्येक की सम- इलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज हैं-
(i) Na+ (ii) Cl (iii) K+ (iv) Rb
उत्तर:
(i) Ne (ii) Ar (iii) Ca2+ (iv) Sr+.

प्रश्न 59.
एक तत्त्व तृतीय आवर्त में है। इसके संयोजी कोश में पाँच इलेक्ट्रॉन हैं। यह आवर्त सारणी के किस वर्ग से सम्बन्धित है?
उत्तर:
यह आवर्त सारणी के वर्ग 15 से सम्बन्धित है।

प्रश्न 60.
एक तत्त्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d5 4s1 है। क्या यह s – ब्लॉक से सम्बन्धित है?
उत्तर:
नहीं, यह s – ब्लॉक से सम्बन्धित नहीं है। यह d – ब्लॉक का तत्त्व है।

प्रश्न 61.
निम्न संयोजी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास वाले तत्त्वों के ब्लॉक लिखिए।
(i) 3s² 3p5
(ii) 3d10 4s2
(iii) 3p6 4s2
(iv) 4s1 3d5
उत्तर:
(i) 3s² 3p5 → p ब्लॉक के तत्त्व
(ii) 3d10 4s2 → d – ब्लॉक के तत्त्व
(iii) 3p6 4s2 → s – ब्लॉक के तत्त्व
(iv) 4s1 3d5 → d ब्लॉक के तत्त्व

प्रश्न 62.
जल में घुलनशील, सिल्वर हैलाइड कौन-सा है?
उत्तर:
जल में घुलनशील सिल्वर हैलाइड – AgF

प्रश्न 63.
जल में अघुलनशील सिल्वर हैलाइड कौन-सा है?
उत्तर:
जल में अघुलनशील सिल्वर हैलाइड – AgCl, AgBr, AgI।

प्रश्न 64.
जल में घुलनशील क्षारीय मृदा धातुओं के सल्फेटों के उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
घुलनशील सल्फेट – BeSO4, MgSO4, BaSO4

प्रश्न 65.
जल में अघुलनशील सल्फेटों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
अघुलनशील सल्फेट – CaSO4, SrSO4, BaSO4

प्रश्न 66.
उपधातुओं के कुछ उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
सिलिकॉन (Si), आर्सेनिक (As), एन्टीमनी (Sb), टेलुरियम (Te).

प्रश्न 67.
p-ब्लॉक के तत्त्वों की कुल संख्या क्या है?
उत्तर:
p-ब्लॉक में कुल 30 तत्त्व होते हैं।

प्रश्न 68.
मेण्डलीव का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
मेण्डलीव का पूरा नाम दमित्री इवानोविच मेण्डलीव था।

प्रश्न 69.
दुर्लभ मृदा धातुएँ किन्हें कहते हैं।
उत्तर:
वे धातुऐं जो पृथ्वी में पायी जाती हैं व इनकी उपलब्धता बहुत. ही कम मात्रा में होती है’ उन्हें दुर्लभ मृदा धातुएँ कहते हैं। ये f-ब्लॉक तत्त्व होते हैं। इन्हें अन्तः संक्रमण तत्त्व भी कहते हैं।

प्रश्न 70.
तीसरे आवर्त में 8 तत्त्व होते हैं, 18 तत्त्व नहीं, क्यों?
उत्तर:
तीसरा आवर्त 3s1 इलेक्ट्रॉन से भरना शुरू होता है और 3p6

प्रश्न 71.
प्रबलतम अधात्विक तत्त्व कौन-सा है?
उत्तर:
फ्लुओरीन (F) पर पूर्ण होता है।

प्रश्न 72.
अधिकतम इलेक्ट्रॉन बन्धुता वाला तत्त्व कौन-सा है?
उत्तर:
क्लोरीन (Cl)

प्रश्न 73.
एक तत्त्व की तृतीय इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य (0) है। यदि यह तत्त्व तीसरे आवर्त का है तो इसका नाम लिखिए।
उत्तर:
नोवल गैसों की प्रथम इलेक्ट्रॉन बन्धुता लगभग शून्य होती है। सल्फर (S)

प्रश्न 74.
F, Cl, Br, I को बढ़ते हुए विद्युत ऋणात्मकता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर:
I < Br < Cl < F (विद्युत ऋणात्मकता)

प्रश्न 75.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर बतायें कि 15P31 आवर्त सारणी में कहाँ स्थित है?
उत्तर:
15P31 = 1s² 2s² 2p63s² 3p³.
आवर्त = तृतीय, ब्लॉक = p-ब्लॉक, वर्ग = 15 (VA)

प्रश्न 76.
सभी संक्रमण तत्त्व d-ब्लॉक के तत्त्व होते हैं परन्तु सभी d-block के तत्त्व संक्रमण तत्त्व नहीं कहलाते हैं। क्यों?
उत्तर:
वे सभी d-ब्लॉक के तत्त्व जिनकी मूल (आद्य) अवस्था अवस्था में 3d – कक्षक अपूर्ण भरित होते हैं, वे संक्रमण तत्त्व कहलाते हैं। परन्तु d-ब्लॉक के कुछ तत्त्व जैसे- Zn, Cd एवं Hg में 3d-कक्षक पूर्ण भरित होते हैं इन्हें संक्रमण तत्त्व नहीं माना गया है।

प्रश्न 77.
परमाणु क्रमांक 119 वाले तत्त्व की संयोजकता व ग्रुप बताएँ इसके बाह्यतम कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तथा इसके ऑक्साइड का सामान्य सूत्र लिखें।
उत्तर:
समूह (group) = 1, संयोजकता = 1
बाह्यतम कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = 8s1
ऑक्साइड का सूत्र = M2O

प्रश्न 78.
हैलोजनों को बढ़ती हुई विद्युत ऋणात्मकता के क्रम में लिखिये।
उत्तर:
I < Br < Cl< F (विद्युत – ऋणात्मकता का क्रम )

प्रश्न 79.
N की इलेक्ट्रॉन बन्धुता C से कम होती है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि N का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास स्थायी होता है।

प्रश्न 80.
हैलोजन सबसे अधिक ऋण विद्युती होते हैं, क्यों।
उत्तर:
आवर्त में बायें से दायें चलने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ता है। अत: हैलोजनों की इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति भी बढ़ती है।

प्रश्न 81.
धातुओं के ऑक्साइड क्षारीय होते हैं, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि धातुओं के ऑक्साइड जल से क्रिया करके क्षार बनाते हैं।

प्रश्न 82.
अधातुओं के ऑक्साइड अम्लीय होते हैं, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अधातुओं के ऑक्साइड जल से क्रिया करके अम्ल बनाते हैं।

प्रश्न 83.
एक तत्त्व की तृतीय इलेक्ट्रॉन बन्धुता का मान शून्य हो जाता है। यह तत्त्व तीसरे आवर्त में स्थित होता है। उस तत्त्व का नाम बताइये।
उत्तर:
सल्फर (S).

प्रश्न 84.
उत्कृष्ट गैसों में सहसंयोजक त्रिज्या नहीं होती है, कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चूँकि उत्कृष्ट गैसों के परमाणु परस्पर सहसंयोजक बन्ध नहीं बनाते हैं इसलिये उत्कृष्ट गैसें सहसंयोजक त्रिज्या नहीं बनाती हैं।

प्रश्न 85.
सबसे प्रबल अधात्विक लक्षण वाले तत्त्व का नाम बताओ?
उत्तर:
फ्लुओरीन (F).

प्रश्न 86.
SO2 की अपेक्षा SO2 प्रबल अम्लीय है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी अधातु के ऑक्साइड में ऑक्सीकरण बढ़ने के साथ उसकी अम्लीय प्रकृति बढ़ती है। इस कारण SO2 ज्यादा अम्लीय है।

प्रश्न 87.
हैलोजन प्रबल ऑक्सीकारक क्यों हैं?
उत्तर:
क्योंकि हैलोजन के अन्दर इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति अधिकतम होती है।

प्रश्न 88.
हैलोजनों को उनकी घटती ऑक्सीकारक क्षमता के क्रम में लिखिये।
उत्तर:
F2 > Cl2 > Br2 > I2

प्रश्न 89.
उत्कृष्ट गैसों का परमाणु आकार हैलोजनों से अधिक क्यों होता है?
उत्तर:
उत्कृष्ट गैसों का परमाणु आकार हैलोजनों से अधिक होता है, क्योंकि वाण्डर वाल्स त्रिज्या सह संयोजी त्रिज्या से बड़ी होती है।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

प्रश्न 90.
क्षार धातुओं की आयनन ऊर्जा निम्नतम क्यों होती है।
उत्तर:
इनका परमाणु आकार बड़ा होता है जिसमें संयोजी इलेक्ट्रॉनों तथा नाभिक के मध्य आकर्षण कम होता है।

प्रश्न 91.
सोडियम एक प्रबल धन विद्युतीय तत्त्व क्यों है?
उत्तर:
सोडियम की आयनन एन्थैल्पी कम है, क्योंकि यह एक इलेक्ट्रॉन निकाल कर धन आयन बनाता है, अतः यह प्रबल धन- विद्युतीय है।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता 1

प्रश्न 92.
निम्नलिखित तत्त्वों में से किस तत्त्व की प्रथम आयनन एन्यैल्पी सबसे कम है और क्यों?
Na, F, I, Mg
उत्तर:
Na, F, I, Mg में आयोडीन (I) की आयनन एन्थल्पी सबसे कम है, क्योंकि इसका आकार इन सबसे उच्च है।

प्रश्न 93.
प्रभावी नाभिकीय आवेश के मान में प्रयुक्त परिरक्षण नियतांक (σ) को ज्ञात करने का नियम किस वैज्ञानिक ने दिया था?
उत्तर:
स्लेटर ने।

प्रश्न 94.
प्रभावी नाभिकीय आवेश पर टिप्पणी दीजिए।
उत्तर:
नाभिकीय आवेश का वह भाग जिसे संयोजी इलेक्ट्रॉन महसूस करता है, प्रभावी नाभिकीय आवेश कहलाता है।

प्रश्न 95.
आवर्त में किस सदस्य के तत्त्वों का आकार सबसे कम होता है और क्यों?
उत्तर:
आवर्त में हैलोजन तत्त्वों का आकार सबसे कम होता है क्योंकि इनका प्रभावी नाभिकीय आवेश बहुत अधिक होता है।

प्रश्न 96.
आवर्त सारणी में स्थित संक्रमण तत्त्वों में आवर्त में Sc से Mn तक जाने पर आकार लगातार कमी होती जाती हैं, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि Sc से Mn तक जाने पर नाभिकीय आकर्षण बल बढ़ता है। यह बल परिरक्षण प्रभाव से अधिक होता है। अतः आकार में लगातार कमी होती जाती है।

प्रश्न 97.
आवर्त सारणी में संक्रमण धातुओं में Mn, Fe, Co तथा Ni के आकार लगभग समान क्यों होते हैं?
उत्तर:
इन तत्त्वों में नाभिकीय आकर्षण बल तथा परिरक्षण प्रभाव दोनों आपस में तुल्य होते हैं, जिसके कारण Mn Fe Co तथा Ni के आकार लगभग समान होते हैं।

प्रश्न 98.
Cr तथा Mn धातु के एक-एक अम्लीय ऑक्साइड तथा उनके द्वारा प्राप्त अम्ल का नाम लिखिये।
उत्तर:

  1. Cr का अम्लीय ऑक्साइड CrO3 [क्रोमियम (VI) ऑक्साइड) होता है तथा इससे प्राप्त अम्ल H, Cro
  2. Mn का अम्लीय ऑक्साइड Mn2O7 [मँगनीज (VII) ऑक्साइड] होता है तथा इससे प्राप्त अम्ल HMnO4 है।

प्रश्न 99.
Cl2O7 किस अम्ल का अम्लीय ऐनहाइड्राइड है?
उत्तर:
Cl2O7 (क्लोरीन (VII) ऑक्साइड) HClO4 का अम्लीय ऐनहाइड्राइड है।

प्रश्न 100.
ZnO, N2O2, P2O5 तथा MgO को उनके बढ़ते हुए अम्लीय लक्षण के क्रम में लिखिए।
उत्तर:
MgO < Na2O < ZnO < p2O5.
(धातुओं के ऑक्साइड क्षारीय जबकि अधातुओं के ऑक्साइड अम्लीय होते हैं।)

प्रश्न 101.
Cl2O3, Cl2O तथा Cl2O5 ऑक्साइडों को उनकी अम्लीयता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कजिए।
उत्तर:
जैसे-जैसे ऑक्सीकरण संख्या बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे अम्लीयता भी बढ़ती जाती है। अतः अम्लीयता का क्रम निम्न प्रकार होगा-
(I)        (III)         (V)
Cl2O < Cl2O3 < Cl2O5

प्रश्न 102.
क्षार धातुओं में सबसे अधिक एवं सबसे कम आयनन ऊर्जा किसकी होती है?
उत्तर:
क्षार धातुओं में सबसे अधिक आयनन ऊर्जा II की तथा सबसे कम Cs की होती है।

प्रश्न 103.
क्षार धातुएँ प्रबल अपचायक तथा सबसे अधिक धन विद्युती होती हैं, स्पष्ट करें।
उत्तर:
क्षार धातुओं में इलेक्ट्रॉनं त्यागने की प्रवृत्ति अधिकतम होती हैं क्योंकि इनकी आयनन एन्थैल्पी बहुत कम होती है अतः ये प्रबल अपचायक होने के साथ-साथ सर्वाधिक धन विद्युती होती हैं।

प्रश्न 104.
हैलोजन की द्वितीय इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य होती है, क्यों?
उत्तर:
हैलोजनों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 np5 होता है। अत: यह केवल एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ns² np6 का स्थायी विन्यास प्राप्त कर लेता है। इस विन्यास में अब दूसरा इलेक्ट्रॉन जोड़ना सम्भव नहीं होता है। अत: हैलोजन की द्वितीय इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य होती है।

प्रश्न 105.
Cl आयन का आकार Cl परमाणु से बड़ा क्यों होता है?
उत्तर:
Cl परमाणु के द्वारा एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर लेने पर प्राप्त Cl आयन में प्रभावी नाभिकीय आवेश कम हो जाता है एवं अन्तर इलेक्ट्रॉनिक प्रतिकर्षण बढ़ता है अतः संयोजी कक्ष बाहर की ओर फैल जाता है। इसलिए आकार बढ़ जाता है।

प्रश्न 106.
उत्कृष्ट गैसों का परमाणु आकार हैलोजनों से अधिक क्यों होता है?
उत्तर:
उत्कृष्ट गैसों का परमाणु आकार हैलोजनों से अधिक होता है क्योंकि वाण्डर वाल्स त्रिज्याएँ सहसंयोजी त्रिज्याओं से बड़ी होती हैं।

प्रश्न 107.
वर्ग के तत्त्व क्षार धातुएँ क्यों कहलाते हैं?
उत्तर:
वर्ग के तत्त्व क्षार धातुएँ इसलिये कहलाते हैं क्योंकि इनके ऑक्साइड जल में विलेय क्षार बनाते हैं तथा इनकी राख क्षारीय प्रकृति की होती हैं।

प्रश्न 108.
निम्नलिखित ऑक्साइडों में सर्वाधिक क्षारीय ऑक्साइड कौन-सा है?
Na, O, As, O BaO, Al, O.
उत्तर:
उपरोक्त ऑक्साइडों में सर्वाधिक क्षारीय ऑक्साइड Na2O है क्योंकि यह प्रथम समूह में उपस्थित है तथा प्रथम समूह के ऑक्साइड सर्वाधिक क्षारीय होते हैं।

प्रश्न 109.
Al की तुलना में Mg की ∆1H1 या IE1 अधिक क्यों होती है?
उत्तर:
Al के छोटे आकार एवं अधिक इसकी प्रथम आयनन ऊर्जा का मान नाभिकीय आवेश के कारण Mg से अधिक होने की आशा की जाती है परन्तु वास्तव में यह कम होती है क्योंकि Mg का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पूर्ण पूरित अर्थात् अधिक सममित होता है।

Mg के अन्तर कक्षा का इलेट्रॉनिक विन्यास 3s² है जिसका भेदन प्रभाव उच्च है। अतः IE1 ज्यादा होगी।

प्रश्न 110.
शून्य वर्ग की आयनन ऊर्जा आवर्त सारणी में अधिकतम क्यों होती है?
उत्तर:
पूर्णपूरित इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (ns² np6) के कारण उत्कृष्ट गैसों में से एक इलेक्ट्रॉन को निकालना अत्यन्त मुश्किल होता है। अतः उत्कृष्ट गैसों की आयनन ऊर्जा सर्वाधिक होती है।

प्रश्न 111.
आवर्त सारणी में उच्चतम आयनन विभव किस तत्त्व का होता है?
उत्तर:
आवर्त सारणी में उच्चतम आयनन विभव He हीलियम का होता है क्योंकि इसका आकार छोटा होता है व इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s² होता है। अतः इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिये अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 112.
निम्न को प्रथम आयनन एन्थैल्पी के घटते क्रम में व्यवस्थित करिए-
Mg, Al, P, S, Cl, Ne
उत्तर:
Ne > C1 > SP > Al > Mg (होना चाहिये।)
परन्तु यह गलत क्रम है क्योंकि P की आयनन एन्यैल्पी स्थाई अर्द्धपूर्ण विन्यास के कारण S से ज्यादा होनी चाहिये। इसी प्रकार Mg की Al से ज्यादा आयनन एन्थैल्पी होनी चाहिये। अतः सही क्रम होगा।
Ne > Cl > P > S > Mg > Al (सही क्रम)

प्रश्न 113.
Ga व Al की प्रथम आयनन एन्थैल्पी के मान लगभग समान क्यों होते हैं?
उत्तर:
निम्न परिरक्षण प्रभाव के कारण Al व Ga के आकार लगभग समान होते हैं। इस कारण इन दोनों तत्त्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी के मान लगभग समान होते हैं।

प्रश्न 114.
क्षारीय मृदा धातुओं की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी लगभग शून्य क्यों होती है?
उत्तर:
पूर्ण भरे कक्षक ns² तथा इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की बहुत कम क्षमता के कारण क्षारीय मृदा धातुओं की इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य होती है।

प्रश्न 115.
N व P की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान क्रमशः C व SI से कम होता है, क्यों?
उत्तर:
NP में अर्द्धपूर्ण भरे कक्षक (ns² np³) होते हैं जो अधिक स्थायी होते हैं। अत: इनकी इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान C व Si से कम होता है।
N < C, P < Si

प्रश्न 116.
A की संयोजकता 3 व B की संयोजकता 2 है। A की विद्युत ऋणात्मकता का मान B से अधिक है तो यौगिक का सूत्र होगा।
उत्तर:
B3A2.

प्रश्न 117.
Li+, Mg2+, K+ तथा Al3+ को बढ़ती आयनिक त्रिज्या के क्रम में लिखिए।
उत्तर:
Li+ < Al3+ < Mg2+ < K+.

प्रश्न 118.
Na, Mg व AI को बढ़ते धन विद्युती क्रम में लिखिए।
उत्तर:
Al < Mg < Na (बढ़ता हुआ धन विद्युतीक्रम)।

प्रश्न 119.
N3-, Na+, F, O2- व Mg2+ को आयनिक आकार के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करिए।
उत्तर:
Mg2+ < Na+ < F < O2- < N3- (आयनिक आकार)

प्रश्न 120.
Cl, S2-, Ca2+ व Ar को बढ़ते हुये आकार के क्रम में व्यवस्थित करिए।
उत्तर:
Ca2+ < Ar < Cl < S2- (बढ़ते हुए आकार का क्रम)

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

प्रश्न 121.
CO2, N2O5, SiO2 व SiO3 को बढ़ते हुए अम्लीय लक्षण के क्रम में लिखिये।
उत्तर:
SiO2 < CO2 < N2O5 < SO3 (बढ़ते हुए अम्लीय लक्षणों का क्रम)

प्रश्न 122.
F, Cl, Br तथा I को उनकी इलेक्ट्रॉन बन्धुता बढ़ते क्रम में लिखिए।
उत्तर:
I < Br < F

प्रश्न 123.
6A12, 7B14, 8C16 तथा 9D19 को उनकी आयनन ऊर्जा के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करिए।
उत्तर:
A < C < B < D (आयनन ऊर्जा)

प्रश्न 124.
AsH3, NH3, PH3, BiH, तथा SbH3 को अपचायक क्षमता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करिए।
उत्तर:
NH3 < PH3 < AsH3 < SbH3 < BiH3 (अपचायक क्षमता)

प्रश्न 125.
हैलाइड आयनों की अपचायक क्षमता का घटता क्रम लिखिए।
उत्तर:
I > Br > Cl > F (अपचायक क्षमता)

प्रश्न 126.
H2SO3 की अपेक्षा H2SO4 प्रबल ऑक्सी अम्ल होता है, क्यों?
उत्तर:
ऑक्सी अम्लों में ऑक्सीजन की संख्या बढ़ाने पर ऑक्सी अम्लों की तीव्रता भी बढ़ती जाती है। इस कारण HSO4 प्रबल ऑक्सी अम्ल है जबकि H2SO3 कम प्रबल ऑक्सी अम्ल है।

प्रश्न 127.
सबसे प्रबल अम्लीय ऑक्साइड कौन-सा होता है?
उत्तर:
Cl2O7 [क्लोरीन (VII) ऑक्साइड]

प्रश्न 128.
निम्नलिखित तत्त्वों को इलेक्ट्रॉन बन्धुता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करिए-
Be, B, C, N, O, F, Ne.
उत्तर:
Ne < Be < N < B < C < O < F
(इलेक्ट्रॉन बन्धुता)

प्रश्न 129.
VII A वर्ग के तत्त्वों की क्रियाशीलता VIA वर्ग के तत्त्वों से अधिक होती है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि VII A वर्ग के तत्त्वों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता VIA वर्ग के तत्त्वों से अधिक होती है। इसलिये VII A वर्ग के तत्त्व अधिक क्रियाशील होते हैं।

प्रश्न 130.
S की इलेक्ट्रॉन बन्धुता O से अधिक होती है, क्यों?
उत्तर:
O का आकार छोटा होता है। इस कारण इलेक्ट्रॉन घनत्व सल्फर से उच्च होता है जिससे आने वाला इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन के ऊपर अधिक इलेक्ट्रॉन घनत्व होने के कारण प्रतिकर्षण महसूस करता है।

अतः इलेक्ट्रॉन बन्धुत का मान कम हो जाता है जबकि सल्फर की इलेक्ट्रॉन बन्धुता अधिक हो जाती है। क्रम लिखिए।

प्रश्न 131.
द्वितीय आवर्त के तत्त्वों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता का सही
उत्तर:
Be < Li < N < B < C < O < F (इलेक्ट्रॉन बन्धुता)

प्रश्न 132.
क्षारीय धातुओं के हाइड्रॉक्साइड प्रबलतम क्षारीय क्यों होते हैं?
उत्तर:
आयनन विभव के मान निम्नतम होने के कारण क्षारीय धातुओं के हाइड्रॉक्साइड प्रबलतम क्षारीय होते हैं।

प्रश्न 133.
क्षार धातुएँ (+1) ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करती हैं? ये (+2) ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित नहीं करतीं, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि क्षार धातुओं की प्रथम व द्वितीय आयनन एन्थैल्पी में अन्तर 16 eV से अधिक होता है।

प्रश्न 134.
Mg तत्त्व (+ 2) ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है (+ 1) नहीं, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि Mg तत्त्व के प्रथम व द्वितीय आयनन विभवों में अन्तर 11 eV से कम होता है।

प्रश्न 135.
HF, HCl, HBr तथा HI की अम्लीय प्रबलता का बढ़ता हुआ क्रम लिखिए।
उत्तर:
HF < HCl < HBr < HI (अम्लीय प्रबलता)

प्रश्न 136.
F2, Cl2, Br2 तथा I2 की बढ़ती हुयी क्रियाशीलता का क्रम लिखिए।
उत्तर:
I2 < Br2 < Cl2 < F2 (क्रियाशीलता)

प्रश्न 137.
Li, B तथा Be को प्रथम आयनन ऊर्जा के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित करिए।
उत्तर:
Li < B < Be (प्रथम आयनन विभव)

प्रश्न 138.
F2, N2, Cl2, तथा O2 को बढ़ती बन्ध लम्बाई के क्रम में व्यवस्थित करिए।
उत्तर:
N2 < O2 < F2 < Cl2 (बन्ध लम्बाई)

प्रश्न 139.
HClO, HClO2, HClO3, HClO4 को तापीय स्थायित्व के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित करिए।
उत्तर:
HClO < HClO2 < HClO3 < HClO4
(तापीय स्थायित्व )

प्रश्न 140.
N2, O2, F2 व Cl2 को बन्ध वियोजन ऊर्जा के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित करिए।
उत्तर:
F2 < C2 > O2 N2 (बन्ध वियोजन ऊर्जा)

प्रश्न 141.
O, O, O2- को आयनिक त्रिज्या के बढ़ते क्रम में लिखिए।
उत्तर:
O < O < O2- (आयनिक त्रिज्या)

प्रश्न 142.
Na+, O2-, F को आयनिक त्रिज्या के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित करिए।
उत्तर:
Na+ < F < O2-.

प्रश्न 143.
निम्न युग्मों में से किसकी इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अपेक्षाकृत अधिक ऋणात्मक है-
(i) Br, Cl
(ii) F, Cl
(iii) O, S
(iv) O, O-
उत्तर:
(i) Cl
(ii) Cl
(iii) S
(iv) O.

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
वर्ग 15 के तत्त्वों के हाइड्राइडों में N का हाइड्राइड (NH3) सबसे अधिक स्थायी होता है। क्यों ?
उत्तर:
वर्ग 15 के तत्त्वों में धन विद्युती गुण N से Bi तक बढ़ता जाता है। इस प्रकार N सर्वाधिक इलेक्ट्रॉन ऋणात्मकता वाला तत्त्व है। यहाँ NH3 में H एक विद्युतधनी तत्त्व है जबकि N विद्युतऋणी तत्त्व की भाँति कार्य करता है, विद्युत ऋणात्मकता में अन्तर के कारण इस NH3 एक स्थायी यौगिक हो जाता है।

प्रश्न 2.
आवर्त सारणी में लैन्थेनॉइडों और एक्टिनॉइडों की संख्या केवल 14-14 है, क्यों ?
उत्तर:
लैन्थेनॉइड तथा एक्टिनॉइड दोनों ही f-ब्लॉक के तत्त्व हैं, अर्थात् दोनों में ही अन्तिम इलेक्ट्रॉन f- उपकोश में प्रवेश करता है जिसमें अधिकतम 14 इलेक्ट्रॉन ही आ सकते हैं। इस कारण लैन्येनॉइडों व एक्टिनॉइडों में अधिकतम 14-14 तत्त्व होते हैं।

प्रश्न 3.
आवर्त सारणी में Ar (परमाणु भार 39.90) को K (परमाणु भार 39.10) से पहले क्यों रखा गया है?
उत्तर:
आधुनिक आवर्त सारणी में तत्त्वों को परमाणु क्रमांक के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित किया गया है। Ar का परमाणु क्रमांक (18) तथा K का परमाणु क्रमांक (19) है अत: Ar को K से पहले रखा गया है। Ar सक्रिय गैस तत्त्व है जो कि समूह 18 (शून्य) में आता है जबकि K एक क्षार धातु तत्त्व है इसे समूह l (IA) में रखा गया है।

प्रश्न 4.
सोडियम एक प्रबल धातु है जबकि क्लोरीन एक प्रबल अधातु है क्यों ?
उत्तर:
सोडियम (ns1) की आयनन ऊर्जा बहुत कम होती है। इस कारण सोडियम की प्रवृत्ति इलेक्ट्रॉन त्यागने की होती है। इस प्रवृत्ति के कारण यह एक प्रबल धातु है जबकि क्लोरीन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (ns² np5) होता है। इसकी इलेक्ट्रॉन बन्धुता बहुत अधिक है। अतः इसकी प्रवृत्ति इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की होती है, अत: Cl एक प्रबल अधातु है।

प्रश्न 5.
आवर्त सारणी में एक नियमित अन्तर के बाद तत्त्व के गुणों की पुनरावृत्ति होती है। इस गुण को आवर्तिता (Periodicity) कहते हैं। इसका कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक आवर्त सारणी में तत्त्वों को परमाणु क्रमांक के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित किया जाता है जिससे उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की पुनरावृत्ति होती है, इसे आवर्तिता कहते हैं। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में आवर्ती परिवर्तन (Periodic Change) ही तत्त्वों के गुणों में आवर्तिता का कारण है।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

प्रश्न 6.
किसी वर्ग में ऊपर से नीचे आने पर तत्त्वों का ऑक्सीकारक गुण क्यों घट जाता है।
उत्तर:
वर्ग में ऊपर से नीचे की ओर आने पर आयनन विभव मान में कमी आती जिसके कारण इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की प्रवृत्ति बढ़ती है अर्थात् अपचायक गुण बढ़ता है तथा ऑक्सीकारक गुण घट जाता है।

प्रश्न 7.
निम्न परमाणु क्रमांक वाले तत्त्वों में प्रत्येक का ब्लॉक व आवर्त क्या होगा ?
(1) 25
(2) 30
(3) 35
(4) 19
(5) 12
उत्तर:
(1) 25 = 1s² 2s² 2p6 3s² 3p6 3d5 4s²
ब्लॉक – d
आवर्त – चौथा (4)
वर्ग – सातवां (7)

(2) 30 = 1s² 2s² 2p6 3s² 3p6 3d10 4s²
ब्लॉक ⇒ d
आवर्त ⇒ चौथा (4)
वर्ग ⇒ बारहवां (12)

(3) 35 = 1s² 2s³ 2p6 3s² 3p6 3d10 4s² 4p5
ब्लॉक = p
आवर्त = चौथा (4)
वर्ग = 17

(4) 19 = 1s² 2s² 2p6 3s² 3p6 4s1
ब्लॉक – s
आवर्त चौथा – (4)
वर्ग प्रथम – (1)

(5) 12 = 1s² 2s² 2p6 3s²
ब्लॉक – s
आवर्त तृतीय – (3)
द्वितीय – (2)

प्रश्न 8.
निम्न में से प्रत्येक का नाम व परमाणु क्रमांक लिखिए।
(1) छठी उत्कृष्ट गैस (The sixth noble gas)
(2) तीसरी क्षार धातु (The third alkali metal)
(3) चौथा संक्रमण तत्त्व (The fourth transition element)
(4) चौथी हैलोजन (The fourth halogen)
उत्तर:
(1) Rn (परमाणु क्रमांक: 86)
(2) K (परमाणु क्रमांक 19)
(3) Cr (परमाणु क्रमांक 24)
(4) 1 (परमाणु क्रमांक : 53)

प्रश्न 9.
निम्न गुणों को क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
(1) क्षार धातुओं के गलनांक
(2) हैलोजनों के क्वथनांक
(3) सोडियम हैलाइडों के गलनांक
(4) क्षार धातुओं के फ्लुओराइडों की घुलनशीलता।
उत्तर:
(1) Li > Na > KR > b > Cs.
(क्षार धातुओं के गलनांक)

(2) I2 > Br2 > Cl2 > F2
(हैलोजनों के क्वथनांक)

(3) NaF > NaCl > NaBr Nal
(सोडियम हैलाइडों के गलनांक)

(4) CsF > RbF > KF > NaF > LiF
(फ्लुओराइडों की घुलनशीलता)

प्रश्न 10.
यदि तत्त्वों के विन्यास निम्न प्रकार हैं तो प्रत्येक तत्त्व का ब्लॉक तथा वर्ग बताइए।
(i) 3s² 3p5
(ii) 3d10 4s²
(iii) 3s² 3p6 4s1
(iv) 6s² 4f3
उत्तर:
(i) p-ब्लॉक, वर्ग = 17
(ii) d-ब्लॉक, वर्ग = 12
(iii) ब्लॉक, वर्ग = 1
(iv) f-ब्लॉक, वर्ग = 3

प्रश्न 11.
एक तत्त्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s² 2s² 2p6, 3s² 3p6, 4s1 है तथा इसका परमाणु भार 39 है।
(i) इसके नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या क्या होगी ?
(ii) इस तत्त्व का आवर्त सारणी में स्थान बताएँ।
(iii) इस तत्त्व का नाम व प्रतीक क्या है?
उत्तर:
(i) तत्त्व का परमाणु क्रमांक = 15
परमाणु भार = 39
न्यूट्रॉनों की संख्या = 39 – 19
= 20

(ii) आवर्त सारणी में इसका स्थान,
ब्लॉक s
आवर्त = 4
वर्ग = I (IA)

(iii) पोटैशियम (K)

प्रश्न 12.
निम्नलिखित परमाणु क्रमांकों के IUPAC नाम तथा प्रतीक लिखिए।
(1) 104
(2) 108
(3) 110
(4) 115
(5) 120
उत्तर:

परमाणु क्रमांकोंसंकेतनाम
(1) 104Unqअननिलक्वाडियम (Unnilquadium)
(2) 108Uuoअननिलऑक्टियम (Unniloctium)
(3) 110Uunअनअननिलियम (Ununnilium)
(4) 115Uupअनअनपेन्टियम (Ununpentium)
(5) 120Ubnअनबाईनिलियम (Unbinilium)

प्रश्न 13.
किसी वर्ग में परमाणु क्रमांक वृद्धि के साथ गलनांक (m. pt.) तथा क्वथनांक (b.pt.) घटता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी वर्ग में परमाणु क्रमांक के बढ़ने पर प्रोटॉनों तथा इलेक्ट्रॉनों के मध्य आकर्षण बल का मान घटता है। जिसके फलस्वरूप उनकी अवस्था परिवर्तन में धीरे-धीरे कम ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। जिससे अवस्था परिवर्तन (ठोस से द्रव) कम तापक्रम पर होता है।
व्यय ऊर्जा ∝ तापक्रम
अतः किसी वर्ग में ऊपर से नीचे की ओर आने पर तत्त्वों के परमाणु क्रमांकों की वृद्धि के साथ गलनांकों तथा क्वथनांकों के मानों में कमी होती जाती है।

प्रश्न 14.
मेण्डलीव की आवर्त सारणी के सामान्य लक्षण लिखिए।
उत्तर:
मेण्डलीव की आवर्त सारणी के सामान्य लक्षण निम्नलिखित हैं।

  • प्रत्येक आवर्त में तत्त्व अपने परमाणु भारों के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित हैं।
  • एक ही समूह के सभी तत्त्वों के गुण-धर्म समान होते हैं।
  • प्रत्येक आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर तत्त्वों की ऋण विद्युत संयोजकता कम होती जाती है। जबकि धन विद्युत संयोजकता बढ़ती जाती है।
  • तत्त्वों का परमाणु भार उसका मौलिक गुण होता है।
  • आवर्त सारणी में रिक्त स्थानों के तत्त्वों के गुण-धर्मों को पहले ही बताया जा सकता है।

प्रश्न 15.
लघु आवर्त तथा दीर्घ आवर्त से क्या तात्पर्य है ? आवर्त सारणी में कितने लघु आवर्त तथा कितने दीर्घं आवर्त होते हैं।
उत्तर:
लघु आवर्त (Short Period) – जिन आवतों में तत्वों की संख्या 8 होती है, उन्हें लघु आवर्त कहते हैं।

दीर्घं आवर्त (Long Period) – जिन आवर्ती में तत्त्वों की संख्या 8 से अधिक होती है, उन्हें दीर्घ आवर्त कहते हैं।

आवर्त सारणी में प्रथम तीन आवर्त (प्रथम, द्वितीय व तृतीय) लघु आवर्त कहलाते हैं। इनमें प्रथम आवर्त दो तत्व हैं, जबकि द्वितीय व तृतीय आवर्त में आठ-आठ तत्त्व है। आवर्त सारणी में बाद के चार आवर्त (चतुर्थ, पंचम, षष्टम तथा सप्तम) दीर्घ आवर्त कहलाते हैं। इनमें चतुर्थ व पंचम आवतों में 18-18 तत्त्व हैं, जबकि षष्ठम आवर्त में 32 तत्त्व हैं और सप्तम आवर्त अपूर्ण है।

प्रश्न 16.
नये तत्त्वों की खोज में मेण्डलीव की आवर्त सारणी की क्या उपयोगिता है?
उत्तर:
मेण्डलीव ने अपनी मूल आवर्त सारणी में नये तत्त्वों के लिये ने. कई खाली स्थान छेड़ दिये थे तथा इन तत्त्वों के गुणों के बारे में जानकारी भी दी थी। इस सारणी के ज्ञान से ही नये तत्त्वों को खोजने में काफी सहायता मिली। इन तत्त्वों की खोज के बाद पाये गये इन तत्त्वों के गुण मेण्डलीव के द्वारा बताये गये गुणों के समान ही थे। उदाहरण-स्कैण्डियम (Sc), गैलियम (Ga), जर्मेनियम (Ge) आदि की खोज काफी समय बाद हुई थी।

प्रश्न 17.
आवर्त सारणी में किन तत्त्वों को प्रारूपी तत्त्व कहते हैं? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
प्रारूपी या प्रतिरूपी या निरूपक तत्त्व (Typical elements) द्वितीय एवं तृतीय आवर्त के तत्त्व प्रतिरूपी या निरूपक तत्त्व (representative or typical elements) कहलाते हैं ये तत्त्व अपने वर्गों में उपस्थित अन्य तत्त्वों का आदर्श प्रतिनिधित्व करते हैं। Li व Na प्रथम वर्ग (I group) के निरूपक तत्त्व हैं जबकि Be व Mg द्वितीय वर्ग (II group) के निरूपक तत्त्व हैं। इस प्रकार अन्य वर्गों के निरूपक तत्त्व निम्न प्रकार है।

वर्ग (group)IIIIIIIVVVIVII
द्वितीय आवर्तLiBeBCNOF
तृतीय आवर्तNaMgAlSiPSCl

प्रश्न 18.
सेतु तत्त्व (Bridge elements) कौन से तत्त्व होते हैं? टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सेतु तत्त्व (Bridge elements) – तृतीय आवर्त (3rd period) में I से VII वर्ग के तत्त्व सेतु तत्त्व (Bridge elements) कहलाते हैं। ये तत्त्व अपने वर्ग के दोनों उपवर्गों (Sub-group) के तत्त्वों के मध्य एक सेतु (Bridge) का कार्य करते हैं। इनके अपने वर्ग के दोनों उपवर्गों (Sub-group) के तत्त्वों के गुणों से मिलते-जुलते हैं।

सेतु तत्त्वों (Bridge elements) के गुण उस उपवर्ग के तत्त्वों के गुणों से अधिक समानता रखते हैं जिनमें वे स्वयं उपस्थित होते हैं।
उदाहरणार्थ-
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता 2

प्रश्न 19.
नॉर्मल तत्त्व (Normal Elements) किन्हें कहते हैं।
उत्तर:
नॉर्मल तत्त्व (Normal elements) – जिन तत्त्वों के गुण सेतु तत्त्वों के गुणों से अधिक समानता रखते हैं, उन्हें नॉर्मल या सामान्य तत्त्व कहते हैं। सेतु तत्त्व भी नॉर्मल तत्त्व होते हैं। सभी A उपवर्गों को नॉर्मल तत्त्व कहते हैं।

प्रश्न 20.
आवर्त सारणी का उपयोग करते हुए, निम्नलिखित युग्मों वाले तत्त्वों के संयोग से बने यौगिकों के अणु सूत्र की प्रागुक्ति कीजिए-
(क) सिलिकॉन एवं ब्रोमीन
(ख) ऐलुमीनियम एवं सल्फर
उत्तर:
(क) सिलिकॉन आवर्त सारणी के 14वें वर्ग का तत्त्व है जिसकी संयाजकता 4 है। ब्रोमीन, जो 17वें वर्ग (हैलोजन परिवार का सदस्य है) की संयोजकता । है अतः यौगिकों का अणुसूत्र SiBr4 होगा।

(ख) आवर्त सारणी में 13वें वर्ग का तत्त्व ऐलुमीनियम है जिसकी संयोजकता 3 है, सल्फर 16वें वर्ग का तत्त्व है जिसकी संयोजकता 2 है, अतः ऐलुमीनियम तथा सल्फर से बने यौगिकों का अणसूत्र AL2S3 होगा।

प्रश्न 21.
लीथियम किस तत्त्व के साथ विकर्ण सम्बन्ध प्रदर्शित करता है। उसका नाम तथा संकेत लिखें। विकर्ण समानता प्रदर्शित करने वाले दो गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
लीथियम मैग्नीशियम के साथ विकर्ण सम्बन्ध रखता है।

IAIIA
Li ( लीथियम)Mg (मैग्नीशियम)

विकर्ण समानता के कारण समान गुण-
(1) इनका परमाणु आकार लगभग समान होता है।
(2) इनकी विद्युत ऋणात्मकता लगभग समान है।
(3) इन दोनों तत्त्वों के कार्बोनेट ताप द्वारा समान रूप से अपघटित होते हैं।
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प्रश्न 22.
कुछ तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नलिखित है
(i) 1s² 2s² p6 3s²
(ii) 1s² 2s² 2p5
(iii) 1st 2s² 2p6 3s² 3p²
(iv) 1s² 2s² p6 3s² 3p6
(v) 1s² 2s² 2p6 3s² 3p³
(vi) 1s² 2s² 2p6 3s² 3p6 3d5 4s1
उपर्युक्त इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर बताइये कि प्रत्येक कौन-सा तत्त्व है।
उत्तर:
(i) जिस तत्त्व का संयोजी कोश विन्यास ns² np5 होगा वह हैलोजन परिवार का तत्त्व होगा। अतः तत्त्व (ii) एक हैलोजन है।

(ii) जिस तत्त्व का संयोजी कोश विन्यास ns² होगा वह क्षारीय मृदा तत्त्व होगा अतः तत्त्व (i) क्षारीय मृदा तत्त्व है।

(iii) कार्बन परिवार के तत्त्वों का संयोजी कोश विन्यास ns np होता है अतः तत्त्व (iii) कार्बन परिवार का तत्त्व है।

(iv) जिस तत्त्व का संयोजी कोश विन्यास ns2 np6 होगा वह तत्त्व उत्कृष्ट गैस का तत्त्व होगा। अतः तत्त्व (iv) उत्कृष्ट गैसों का तत्त्व होगा।

(v) वे तत्त्व जिनका संयाजी कोश विन्यास ns² np3 होता है वह तत्त्व नाइट्रोजन परिवार का तत्त्व होगा। तत्त्व (vi) नाइट्रोजन परिवार का तत्त्व है।

(vi) संक्रमण तत्त्व का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n-1) d1-10 ns1-2 होता है अतः तत्त्व (v) एक संक्रमण तत्त्व है।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

प्रश्न 23.
तत्त्वों को वर्गीकृत करने के लिये परमाणु क्रमांक, परमाणु भार की तुलना में एक अच्छा आधार क्यों है?
उत्तर:
तत्त्वों का परमाणु भार नाभिक से सम्बन्ध रखता है जो कि परमाणु के केन्द्र में उपस्थित होता है। लेकिन तत्त्वों के गुणधर्म इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पर निर्भर करते हैं, जो कि परमाणु क्रमांक से सम्बन्धित होता है। इसलिए परमाणु क्रमांक तत्त्वों के वर्गीकरण के लिये परमाणु भार की तुलना में एक अच्छा आधार है।

प्रश्न 24.
निम्नलिखित पदों पर टिप्पणी दें-
(1) आवरण प्रभाव
(2) भेदन प्रभाव
(3) धात्विक गुण
उत्तर:
(1) आवरण प्रभाव (Screening effect)- संयोजी इलेक्ट्रॉन तथा नाभिक के बीच उपस्थित अन्तः इलेक्ट्रॉन, संयोजी या बाह्यतम इलेक्ट्रॉनों को नाभिक से परिरक्षित करते हैं। इसे आवरण या परिरक्षण प्रभाव कहते हैं जैसे-जैसे अन्तः इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ती जाती है। वैसे-वैसे आवरण प्रभाव भी बढ़ता जाता है।

(2) भेदन – प्रभाव (Penetration effect)-कक्षक की आकृति के कारण s-इलेक्ट्रॉन नाभिक का भेदन P d या f-इलेक्ट्रॉनों की तुलना में अधिक समीप से करते हैं तथा अधिक दृढ़ता से बँधे रहते हैं, इसे ही भेदन प्रभाव कहा जाता है।
भेदन क्षमता (Penetration Power) – s > p > d > f

(3) धात्विक गुण (Metallic Character) – इलेक्ट्रॉन को त्यागने की प्रवृत्ति धात्विक प्रकृति होती है अर्थात् जो धातु जितनी आसानी से इलेक्ट्रॉन त्याग देगी या जिस धातु की आयनन एन्थैल्पी का मान बहुत कम होगा, उसका धात्विक गुण उतना ही अधिक होगा।

अतः “धातुओं के वे गुण जिनके कारण उनमें सरलता से धनायन बनाने की प्रवृत्ति पाई जाती है तथा कुछ विशेष गुण जैसे-धात्विक चमक, तन्यता तथा आघातवर्धनीयता, ऊष्मा तथा विद्युत चालकता आदि होते हैं। धातुओं के धात्विक गुण कहलाते हैं।”

प्रश्न 25.
Na+, Mg2+ तथा Al3+ आयनों की आयनिक त्रिज्या का क्रम Na+ > Mg2+ > Al3+ होता है। कारण स्पष्ट करें।
उत्तर:
यदि आयनों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है तो आकार प्रोटॉनों की संख्या पर निर्भर करता है प्रोटॉन की संख्या अधिक होने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश अधिक होगा तथा आकार उतना ही कम
हो जायेगा।
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प्रश्न 26.
आर्वत सारणी के किसी वर्ग में तत्त्वों के परमाणु क्रमांकों की वृद्धि के साथ उनके निम्नलिखित गुणों में क्या परिवर्तन होता है?
(1) परमाणु आकार
(2) विद्युत ऋणात्मकता
(3) आयनन एन्बैल्पी
उत्तर:
(1) आवर्त सारणी के किसी भी वर्ग में तत्त्वों के परमाणु क्रमांकों की वृद्धि के साथ उनके परमाणु आकार में क्रमशः वृद्धि होती है।

(2) आवर्त सारणी के किसी भी वर्ग में तत्त्वों के परमाणु क्रमांकों की वृद्धि के साथ उनकी विद्युत ऋणात्मकता का गुण क्रमशः घटता है।

(3) आवर्त सारणी के किसी भी वर्ग में तत्त्वों की आयनन एन्थैल्पी परमाणु क्रमांक के बढ़ने के साथ घटती है।

प्रश्न 27.
निम्नलिखित प्रत्येक समूह में से उस परमाणु का चयन करें जिसकी आयनन ऊर्जा सर्वाधिक हो तथा उत्तर को स्पष्ट करें-
(1) F, O, N
(2) Mg, P, Ar
(3) B, Al, Ga
उत्तर:
(1) F की आयनन ऊर्जा सर्वाधिक होगी क्योंकि इसका आकार सबसे कम है जिसके परिणामस्वरूप इसका प्रभावी नाभिकीय आवेश उच्चतम होगा।

(2) स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के कारण Ar की आयनन एन्थैपी सर्वाधिक होगी।

(3) B, Al, Ga के समूह में B की आयनन एन्थैल्पी सर्वाधिक है क्योंकि इसका परमाणु आकार सबसे कम है तथा प्रभावी नाभिकीय आवेश सर्वाधिक है।

प्रश्न 28.
आयनन ऊर्जा के कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य लिखें।
उत्तर:
आयनन ऊर्जा के कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य निम्न प्रकार हैं-
(1) बाह्यतम कोश का स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होने के कारण अक्रिय गैसों की आयनन एन्यैल्पी अधिक होती है। उन आपनों की भी आयनन एन्थल्पी अधिक होती है जिनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास अक्रिय गैस जैसा होता है।

(2) एक ही कोश के विभिन्न उपकोशों से इलेक्ट्रॉन बाहर निकालने के लिये आवश्यक ऊर्जा का क्रम निम्न प्रकार है-
s > p > d > f.

(3) किसी आवर्त में क्षार धातुओं की आयनन एन्थेल्पी सबसे कम और अक्रिय गैसों की सर्वाधिक होती है।

(4) सभी ज्ञात तत्त्वों में से हीलियम की आयनन एन्थैल्पी सबसे अधिक व सीजियम (Cs) की आयनन एन्थैल्पी सबसे कम होती है।

(5) तत्त्व की प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान सदैव द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से कम होता है।

प्रश्न 29.
तत्त्वों के निम्न युग्मों में से किसकी इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्यैल्पी अपेक्षाकृत ऋणात्मक होती है।
(1) N या O (2) F या Cl (3) Be या B, उत्तर की व्याख्या करें।
उत्तर:
(1) O परमाणु की इलेक्ट्रॉन बन्धुता अधिक ऋणात्मक होती है क्योंकि इसके परमाणुओं को उत्कृष्ट गैस तत्त्व का विन्यास प्राप्त करने के लिए दो इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है। जबकि नाइट्रोजन
का विन्यास सममित होता है। इसे इलेक्ट्रॉन की आवश्यकता नहीं होती है। इसकी इलेक्ट्रॉन बन्धुता धनात्मक होती है।

(2) Cl की इलेक्ट्रॉन बन्धुता अधिक ऋणात्मक होती है क्योंकि इसका आकार F से बड़ा होता है जिसके कारण अन्तः इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण बल कम होता है। इससे आने वाला इलेक्ट्रॉन अधिक आकर्षण बल महसूस करता है और ऊर्जा ऋणात्मक हो जाती है।

(3) सममित विन्यास के कारण तत्त्व Be को इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान धनात्मक (+ 66 kJ mol-1) होती है किन्तु B की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्फैल्पी का मान ( 88kJ mol) ऋणात्मक होता है क्योंकि इसका विन्यास सममित नहीं होता है अतः B की इलेक्ट्रॉन लब्धि ऊर्जा अधिक ऋणात्मक होती है।

प्रश्न 30.
सही मिलान करें-

तत्त्वगुण
1. Clशून्य वर्ग से सम्बन्धित तत्त्व
2. Brसंयोजी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन वाला तत्त्व
3. Fनिम्नतम आयनन एन्थैल्पी वाला तत्त्व
4. Oतत्त्व जो सर्वाधिक संख्या में यौगिक बनाता है
5. Xeवह तत्त्व जो कमरे के ताप पर द्रव है
6. Cलघुतम आकार वाला तत्त्व
7. Csउच्चतम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी वाला तत्त्व

उत्तर:
सही मिलान निम्न प्रकार है-

तत्त्वगुण
1. Clउच्चतम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी वाला तत्त्व वह तत्त्व जो कमरे के ताप पर द्रव है
2. Brलघुतम आकार वाला तत्त्व
3. Fसंयोजी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन वाला तत्त्व
4. Oशून्य वर्ग से सम्बन्धित तत्त्व
5. Xeतत्त्व जो सर्वाधिक संख्या में यौगिक बनाता है
6. Cनिम्नतम आयनन एन्थैल्पी वाला तत्त्व
7. Csउच्चतम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी वाला तत्त्व वह तत्त्व जो कमरे के ताप पर द्रव है

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधुनिक आवर्त नियम क्या है? आवर्त सारणी के दीर्घ स्वरूप का संक्षिप्त वर्णन कीजिये। इस सारणी से क्या लाभ हैं।
उत्तर:
जब मेण्डलीव ने आवर्त सारणी का विकास किया, तब रसायनज्ञों को परमाणु की आन्तरिक संरचना का ज्ञान नहीं था। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अवपरमाणुक कणों का विकास हुआ।

सन् 1913 में अंग्रेज भौतिकी वैज्ञानिक हेनरी मोजले ने तत्त्वों के अभिलाक्षणिक X- किरण स्पेक्ट्रमों में नियमितता पाई और देखा कि \(\sqrt{v}\) (जहाँ v, X-किरण की आवृत्ति है) और परमाणु क्रमांक (Z) के मध्य ग्राफ खींचने पर एक सरल रेखा प्राप्त होती है। परन्तु परमाणु भार व \(\sqrt{v}\) के आलेख में सरल रेखा प्राप्त नहीं होती है।

अतः मोजले ने बताया कि परमाणु भार की तुलना में परमाणु क्रमांक किसी तत्त्व के गुणों को दर्शाने में अत्यधिक सक्षम हैं। इसी के अनुसार मेण्डलीव के आवर्त नियम में परिवर्तन किया गया।

सन् 1913 में मोजले (Mosley) ने आधुनिक आवर्त नियम दिया जिसे आधुनिक आवर्त नियम (Modern Periodic Law) कहते हैं। इस नियम के अनुसार, “तत्त्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु क्रमांकों के आवर्ती फलन होते हैं।

अर्थात् यदि तत्त्वों को उनके परमाणु क्रमांकों के बढ़ते हुये क्रम में रखा जाये तो एक नियमित अन्तराल (Regular interval) के बाद समान गुणों की पुनरावृत्ति होती है और नियमित अन्तराल के बाद समान गुणों वाले तत्त्व की पुनरावृत्ति होती है ।

आधुनिक आवर्त नियम की सहायता से प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले 92 तत्त्वों में समानताएँ मिलीं। ऐक्टीनियम (Ac) और प्रोटोक्टीनियम (Pa) की भाँति नूप्ट्यूनियम (Np) और प्लूटोनियम (Pu) भी यूरेनियम के अयस्क पिच ब्लैंड में पाये गये। इन्हें भी बाद में आधुनिक आवर्त सारणी में स्थान दिया गया।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता 5

प्रश्न 2.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर तत्त्वों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है? समझाइये।
उत्तर:
परमाणु संरचना वाले अध्याय में हम पढ़ चुके हैं कि किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉन की पहचान क्वाण्टम संख्याओं से होती है। किसी परमाणु में विभिन्न उपकोशों व कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को ही उसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration) कहते हैं। में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration in Periods).

आवर्त में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration in Periods):
दीर्घ आवर्त सारणी में तत्त्वों को उनके परमाणु क्रमांकों के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित किया गया है। इसलिए प्रत्येक तत्त्व में अपने से पहले वाले तत्त्व की तुलना में एक इलेक्ट्रॉन अधिक होता है। तत्त्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास मुख्य ऊर्जा तल, हुण्ड का नियम, पाऊली अपवर्जन सिद्धान्त (ऑफबाऊ सिद्धान्त) के आधार पर देते हैं।

आवर्त मुख्य ऊर्जा या बाह्य कोश के लिये n का मान बताता है। आवर्त सारणी में प्रत्येक उत्तरोत्तर आवर्त (Successive period) की पूर्ति अगले उच्च मुख्य ऊर्जा स्तर n = 1, n = 2 आदि से सम्बन्धित होती है।

प्रत्येक आवर्त में तत्त्वों की संख्या, भरे जाने वाले ऊर्जा स्तर में उपलब्ध परमाणु कक्षकों की संख्या से दोगुनी होती है। अतः प्रत्येक आवर्त में उपलब्ध तत्त्वों की संख्या को निम्न प्रकार व्याख्यायित कर सकते हैं।
(1) प्रथम आवर्त (n = 1) का प्रारम्भ सबसे निचले स्तर (1s) के भरने से प्रारम्भ होता है। s-उपकोश में एक ही कक्षक होता है अतः इसमें 2 तत्त्व ही होते हैं। हाइड्रोजन जिसका विन्यास 1s है तथा हीलियम जिसका विन्यास 1s1 है। इस प्रकार प्रथम कोश (K-कोश) पूर्ण हो जाता है।

(2) दूसरे आवर्त (n = 2) का प्रारम्भ Li से होता है इसमें दो उपकोश s तथा p होते हैं। इस प्रकार इस आवर्त में कुल चार कक्षक उपस्थित होते हैं। अतः इसमें कुल 8 तत्त्व होते हैं। पहला लीथियम जिसका विन्यास (1s², 2s1) होता है। दूसरा बेरीलियम जिसका विन्यास (1s², 2s²) होता है। इसके बाद बोरॉन तत्त्व आता है जहाँ से शुरू करते हुये जब हम निऑन तत्त्व तक पहुँचते हैं, तो 2p कक्षक पूर्ण रूप से इलेक्ट्रॉनों से भर जाता है। इस प्रकार L-कोश निऑन तत्त्व के साथ (2s², 2p6) पूर्ण रूप से भर जाता है अतः दूसरे आवर्त में कुल आठ तत्त्व होते हैं।

(3) तीसरे आवर्त m = 3 का आरम्भ सोडियम (Na) के साथ होता है। जिसमें इलेक्ट्रॉन 35 कक्षक में जाता है। धीरे-धीरे 3s एवं 3p कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के भरने के पश्चात् तीसरे आवर्त में तत्त्वों की संख्या सोडियम से ऑर्गन तक कुल मिलाकर आठ होती है।

(4) चौथे आवर्त (n = 4), का प्रारम्भ पोटैशियम से होता है तथा इलेक्ट्रॉन 4s कक्षक में प्रवेश करना प्रारम्भ कर देता है। यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि 4p कक्षकों के भरने से पहले 3d-कक्षक भरते हैं जो कि ऊर्जात्मक (Energetically) रूप से अनुकूल है। 3d-कक्षक प्रथम संक्रमण श्रेणी (First transition series) बनाते हैं।

यह श्रेणी स्केन्डियम (Sc, Z = 21) से प्रारम्भ होती है इनका विन्यास 301 452 होता है। 3d- श्रेणी जिंक (Zn, Z = 30) पर पूर्ण हो जाती है जिसकी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d104s² होता है। यह चौथा आवर्त 4p कक्षकों के भरने के साथ क्रिप्टॉन (Kr, Z = 36) पर समाप्त हो जाता है। इस प्रकार चौथे आवर्त में कुल मिलाकर 18 तत्त्व होते हैं।

(5) पाँचवें आवर्त (n 5) का प्रारम्भ रूबीडियम से होता है। यह आवर्त चौथे आवर्त के समान होता है। इसमें 4d संक्रमण श्रेणी आती है। यह संक्रमण श्रेणी इट्रियम (Ytrrium, Z 39) से शुरू होती है संक्रमण श्रेणी में इलेक्ट्रॉन भरने के पश्चात् 5p-कक्षकों में इलेक्ट्रॉन भरते हैं। तथा आवर्त जीनॉन पर खत्म हो जाता है। इस आवर्त में भी कुल 18 तत्त्व होते हैं।

(6) छठवें आवर्त (n = 6) में कुल 32 तत्त्व होते हैं। यहाँ उत्तरोत्तर इलेक्ट्रॉन क्रमश: 6s, 4f, 5d तथा 6p के कक्षकों में भरते हैं। इलेक्ट्रॉनों का भरना 4f-कक्षकों में सीरियम (Cerium Z = 58) से शुरू होता है तथा ल्यूटीशियम (Lutetium, Z = 71) पर समाप्त होता है। 4f इस श्रेणी 45 आन्तरिक संक्रमण श्रेणी या लैन्थेनॉइड श्रेणी (Inner transition series or Lanthanoid series) कहते हैं।

(7) सातवाँ आवर्त (n = 7) छठवें आवर्त के समान है, जिसमें इलेक्ट्रॉन उत्तरोत्तर 7s, 5f, 6d और 7p कक्षक में भरते हैं। इनमें कृत्रिम विधियों (Artificial methods) द्वारा मानव निर्मित रेडियोधर्मी तत्त्व (Radioactive elements) आते हैं। सातवां आवर्त परमाणु क्रमांक 118 वाले तत्त्व जिसकी खोज हो चुकी है के साथ पूर्ण होता है। यह तत्त्व उत्कृष्ट गैस परिवार से सम्बन्धित होगा। ऐक्टीनियम (Ac, Z = 89) के पश्चात् 14 इलेक्ट्रॉन 5f श्रेणी में भरते हैं। इस श्रेणी को 5f-आन्तरिक संक्रमण श्रेणी या ऐक्टिनॉइड श्रेणी (5f-inner transition series or Actinoid series) कहते हैं। उपरोक्त विवरण को संक्षिप्त रूप में हम निम्न सारणी द्वारा व्यक्त कर सकते हैं।
HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता 6

वर्ग में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration in Group):
एक ही वर्ग या ऊर्ध्वाधर स्तम्भ में उपस्थित तत्त्वों के संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होते हैं। इनके बाह्य कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या एवं गुणधर्मों में भी समानता होती है।

उदाहरणार्थ- क्षार धातुओं की संयोजकता कोश का विन्यास mst होता है। इस विन्यास से यह स्पष्ट होता है कि किसी तत्त्व के गुणधर्म उसके परमाणु क्रमांक पर निर्भर करते हैं, न कि उसके सापेक्षिक परमाणु द्रव्यमान पर।

प्रश्न 3.
मेण्डलीव की आवर्त सारणी की विवेचना कीजिए। इसके मुख्य दोष क्या हैं? इसकी उपयोगिता भी बताइये।
उत्तर:
रूसी रसायनज्ञ दमित्री मेण्डलीव ने सर्वप्रथम आवर्त सारणी को प्रतिपादित किया। इन्होंने बड़ी संख्या में तत्त्वों के रसायनिक गुणों का अध्ययन किया और सन् 1869 में आवर्त नियम को प्रस्तुत किया। इस नियम के अनुसार, “परमाणु भार तत्त्वों का मूल लक्षण है तथा तत्त्वों के भौतिक व रासायनिक गुण उनके परमाणु भारों के आवर्ती फलन होते हैं।”

यदि तत्त्वों को उनके परमाणु भारों के बढ़ते हुए क्रम से क्षैतिज पंक्तियों (Horizontal lines) में रखा जाये तो समान गुणों वाले तत्त्व एक नियमित अन्तराल (Regular interval) के बाद पुन: आते हैं। अर्थात् तत्त्वों के भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्म (या तत्त्वों के गुण) की एक निश्चित अन्तराल (या आवर्त) के बाद पुनरावृत्ति होती है। नियमित अन्तराल के पश्चात् गुणों की इस प्रकार की पुनरावृत्ति को आवर्तिता (Periodicity) कहते हैं।

मेण्डलीव द्वारा तत्त्वों का वर्गीकरण निश्चित तौर पर लोथर मेयर के वर्गीकरण से अधिक विस्तृत था।

HBSE 11th Class Chemistry Important Questions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

प्रश्न 4.
निम्न पर टिप्पणी लिखिए।
(1) डोबेराइनर त्रिक
(2) न्यूलैण्ड का अष्टक नियम
(3) लोथर मेयर का परमाण्वीय आयतन वक्र।
उत्तर:
मेण्डलीव की आवर्त सारणी की मुख्य उपयोगिताएँ निम्न प्रकार हैं-
1. तत्त्वों का व्यवस्थित अध्ययन (Systematic study of the elements)-मेण्डलीव ने प्रथम बार तत्त्वों को आवर्तों व वर्गों में व्यवस्थित किया। इन्होंने तत्त्वों को इस प्रकार से व्यवस्थित किया कि किसी विशेष वर्ग में एक समान गुणधर्मों वाले तत्त्व ही व्यवस्थित हुए। इस प्रकार इन्होंने लगभग 105 तत्त्वों को केवल 9 वर्गों में व्यवस्थित कर दिया।

2. तत्त्वों के गुणों का अध्ययन (Study of properties of elements)-मेण्डलीव की आवर्त सारणी में किसी तत्त्व विशेष का अध्ययन करने से ही उस समूह के अन्य सभी तत्त्वों का अध्ययन हो जाता है, क्योंकि एक ही समूह में स्थित सभी तत्त्वों के गुण समान होते हैं।

3. नये तत्त्वों की खोज (Discovery of new elements)मेण्डलीव की आवर्त सारणी अज्ञात तत्त्वों को खोजने में एवं उनके गुणधर्मो के अध्ययन करने में अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुई। मेण्डलीव ने उस समय के अज्ञात तत्त्वों के लिए आवर्त सारणी में रिक्त स्थान छोड़ दिया तथा उनके गुणों की भी भविष्यवाणी की थी जो कि बाद में सत्य सिद्ध हुई एवं इससे नये तत्त्वों की खोज में काफी सहायता मिली।

उदाहरणार्थ-मेण्डलीव की मूल आवर्त सारणी में बाद में खोजे गये तत्त्व स्कैण्डियम (Sc), गैलियम (Ga) और जर्मेनियम (Ge) के स्थान रिक्त छोड़े गये और उन्होंने इन्हें क्रमशः एका-बोरॉन (Eka-Boron), एका-ऐलुमिनियम (Eka-Aluminium) तथा एका-सिलिकॉन (EkaSilicon) कहा। मेण्डलीव ने इन नये तत्त्वों की पहचान ही नहीं की बल्कि इन तत्त्वों के कुछ भौतिक गुणधर्मों का भी ब्यौरा दिया जिसे सारणी 3.3 में सूचीबद्ध किया गया है।

सारणी 3.3 – मेण्डलीव द्वारा एका-ऐलुमिनियम (गेलियम) तथा एका सिलिकॉन (जर्मेनियम) तत्वों की प्रागुक्ति

गुणएका-ऐलुमिनियम (भविष्य सूचक तत्त्व)गैलियम (खोजा गया तत्त्व)एका-सिलिकॉन (भविष्य सूचक तत्त्व)जर्मेनियम (खोजा गया तत्त्व)
परमाणु भार68707272.6
घनत्व (g/cm³)5.95.945.55.36
गलनांक/Kनिम्न302.93उच्च1231
ऑक्साइड का सूत्रE2O3Ga2O3EO2GeO2
क्लोराइड का सूत्रECl3GaCl3ECl4GeCl4

4. सन्देहपूर्ण परमाणु द्रव्यमानों का सुधार (Correction of doubtful atomic masses) मेण्डलीव की आवर्त सारणी की सहायता से बहुत से तत्त्वों के परमाणु भारों का सही निर्धारण किया गया। चूँकि आवर्त सारणी में किसी भी तत्त्व की स्थिति से उसकी संयोजकता ज्ञात की जा सकती है और उसका तुल्यांकी भार ज्ञात होने पर परमाणु भार ज्ञात किया जा सकता है।
परमाणु भार = तुल्यांकी भार x संयोजकता
यदि तत्त्वों की सही संयोजकता ज्ञात हो तो तत्त्व का सही परमाणु भार ज्ञात किया जा सकता है।

उदाहरणार्थ-सन् 1869 से पहले बेरीलियम (Be) का परमाणु भार 13.5 माना जाता था। इसकी गणना निम्न प्रकार की गयी थी।
परमाणु भार = तुल्यांकी भार x संयोजकता
= 4.5 x 3
= 13.5
इस परमाणु भार के अनुसार बेरीलियम (Be) की स्थिति मूल आवर्त सारणी में कार्बन तथा नाइट्रोजन के मध्य होनी चाहिए। परन्तु इस तत्त्व के गुणधर्म के अनुसार इसे वर्ग IIA के तत्त्वों Mg एवं Ca के साथ लीथियम व बोरॉन के मध्य होना चाहिए। अत: मेण्डलीव ने इसकी शुद्ध संयोजकता 2 मान कर इसका शुद्ध व सही परमाणु भार 9 निकला
परमाणु भार = 4.5 x 2 = 9
इसी प्रकार मेण्डलीव की मूल आवर्त सारणी की सहायता से कुछ अन्य तत्त्वों के सही परमाणु भारों को ज्ञात करने में सहायता मिली।

(2) अंग्रेज रसायनज्ञ जॉन एलेक्जेंडर न्यूलैण्ड ने सन् 1865 में अष्टक नियम (Law of octaves) को विकसित किया। इसके अनुसार, “जब तत्त्वों को उनके परमाणु द्रव्यमानों के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित किया जाता है तो प्रत्येक आठवाँ तत्त्व पहले तत्त्व से गुणधर्म में समानता रखता है।” यह सम्बन्ध उसी प्रकार का था, जैसा आठवें संगीत स्वर (Eight musical note) का सम्बन्ध प्रथम संगीत स्वर के साथ होता है। इसी कारण न्यूलैण्ड ने इसे ‘अष्टक का नियम’ नाम दिया।
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इस प्रकार यदि बोरॉन (B) से शुरूआत करें तो आठव्वॉं तत्त्व एलुमीनियम (Al) आता है और इन दोनों तत्त्वों के गुणधर्म आपस में समान हैं। सीमाएँ (Limitations)

  • यह नियम केवल कैल्सियम तक ही सफल रहा। कैल्सियम के पश्चात् प्रत्येक आठवां तत्त्व अपने समूह में ऊपर आने वाले तत्त्व के समान गुणधर्म नहीं रखता था।
  • अज्ञात तत्त्वों के लिए इस वर्गीकरण में कोई स्थान सुरक्षित नहीं रखा गया।
  • यह नियम अधिक परमाणु भार वाले तत्त्वों पर लागू नहीं होता है।
  • उत्कृष्ट गैसों (Noble gases) की खोज के पश्चात् यह नियम पूर्ण रूप से असफल हो गया क्योंकि अब नवाँ तत्त्व प्रथम तत्त्व के समान था न कि आठवाँ।

(3) जर्मन वैज्ञानिक लोथर मेयर (Lother Meyer) ने सन् 1869 में यह विचार दिया था। इसके अनुसार, “तत्त्वों के गुणधर्मों व परमाणु आयतन (परमाणु भार/घनत्व) के बीच एक घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। लोथर मेयर ने तत्त्वों के परमाणु भार एवं परमाणु आयतनों के मध्य एक ग्राफ (वक्र) खींचा तथा बताया कि समान गुणधर्म वाले तत्त्व इस वक्र पर समान स्थितियों में आते हैं।”

इस प्रकार लोथर मेयर ने पाया कि परमाणु भारों की वृद्धि के साथ परमाणु आयतनों में नियमित समानता होती है अर्थात् यहाँ पर आवर्तिता (Periodicity) पायी जाती है।
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इस वक्र की कुछ विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

  • प्रबल विद्युतधनी तत्त्वों जैसे-क्षार, धातुओं ने वक्र में शिखर पर स्थान प्राप्त किया।
  • कुछ कम विद्युतधनी तत्त्वों जैसे-क्षारीय मृदा धातुओं ने वक्र के अवरोही भाग में स्थान प्राप्त किया।
  • विद्युतऋणी तत्त्व जैसे-हैलोजनों ने वक्र के चढ़ते हुए भाग में स्थान ग्रहण किया।
  • आठवें समूह के तत्त्व वक्र के निचले भाग में स्थित हुए।

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HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

बहुविकल्पीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
फलक-केन्द्रित घनीय एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या कितनी होती है ?
(अ) 1
(ब) 2
(स) 4
(द) 6
उत्तर:
(स) 4

प्रश्न 2.
घनीय निविड संकुलन (ccp) संरचना की संकुलन क्षमता होती है-
(अ) 68%
(ब) 74%
(स) 78%
(द) 84%
उत्तर:
(ब) 74%

प्रश्न 3.
अक्रिस्टलीय ठोस है-
(अ) ग्रेफाइट
(ब) काँच
(स) श्वेत टिन
(द) एकनताक्ष गंधक
उत्तर:
(ब) काँच

प्रश्न 4.
फेरीचुंबकीय पदार्थ का उदाहरण है –
(अ) Fe2O3
(ब) Mn2O3
(स) MnO
(द) Fe3O4
उत्तर:
(द) Fe3O4

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 5.
हीरे का क्रिस्टल किसका उदाहरण है ?
(अ) आयनिक ठोस
(ब) धात्विक ठोस
(स) सहसंयोजक ठोस
(द) आण्विक ठोस
उत्तर:
(स) सहसंयोजक ठोस

प्रश्न 6.
क्रिस्टलों का घनत्व ज्ञात करने का सही सूत्र है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 21
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 22

प्रश्न 7.
किसी ठोस पदार्थ के क्रिस्टल में कितने प्रकार के त्रिविमीय जालकों का निर्माण संभव है ?
(अ) 7
(ब) 14
(स) 21
(द) 28
उत्तर:
(ब) 14

प्रश्न 8.
लोहचुंबकीय पदार्थ का उदाहरण है-
(अ) TiO2
(ब) VO2
(स) CuO
(द) CrO2
उत्तर:
(द) CrO2

प्रश्न 9.
क्रिस्टलीय ठोस का उदाहरण है-
(अ) हीरा
(ब) काँच
(स) रबर
(द) हीरा तथा काँच दोनों
उत्तर:
(अ) हीरा

प्रश्न 10.
अनुचुंबकीय पदार्थ है-
(अ) N2
(ब) F2
(स) O2
(द) CO2
उत्तर:
(स) O2

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से कौनसी व्यवस्था षट्कोणीय निविड संकुलन को दर्शाती है ?
(अ) ABC…..ABA……
(ब) ABC…..ABC……
(स) ABABA….
(द) ABB ABB….
उत्तर:
(स) ABABA….

प्रश्न 12.
षट्कोणीय निविड संकुलन संरचना में धातु की उपसहसंयोजन संख्या होती है-
(अ) 4
(ब) 12
(स) 8
(द) 16
उत्तर:
(ब) 12

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से सहसंयोजक ठोस है-
(अ) Fe
(ब) NaCl
(स) Cu
(द) SiC
उत्तर:
(द) SiC

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से किस प्रकार के ठोसों का गलनांक उच्चतम होता है ?
(अ) आयनिक ठोस
(ब) सहसंयोजक ठोस
(स) आण्विक ठोस
(द) धात्विक ठोस
उत्तर:
(ब) सहसंयोजक ठोस

प्रश्न 15.
एक N गोलों वाली निविड संकुलन व्यवस्था में चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या होगी-
(अ) \(\frac { N }{ 2 }\)
(ब) N
(स) 4N
(द) 2N
उत्तर:
(द) 2N

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से किस दोष के कारण क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है ?
(अ) शॉट्की
(ब) फ्रेंकेल
(स) अन्तराकाशी
(द) F-केन्द्र
उत्तर:
(अ) शॉट्की

प्रश्न 17.
फलक – केन्द्रित घन संरचना में प्रत्येक गोले के लिए अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या होगी-
(अ) 8
(ब) 4
(स) 1
(द) 2
उत्तर:
(स) 1

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में से किसमें फ्रेंकेल दोष पाया जाता है ?
(अ) NaCl
(ब) AgBr
(स) CsCl
(द) हीरा
उत्तर:
(ब) AgBr

प्रश्न 19.
सरल घनीय जालक की संकुलन क्षमता होती है-
(अ) 68%
(ब) 74%
(स) 52.4%
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) 52.4%

प्रश्न 20.
हाइड्रोजन आबंधित आण्विक ठोस का उदाहरण है-
(अ) HCl
(ब) H2O
(स) H2
(द) Fe
उत्तर:
(ब) H2O

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 21.
विषमदैशिक प्रकृति के ठोस होते हैं-
(अ) क्रिस्टलीय
(ब) अक्रिस्टलीय
(स) क्रिस्टलीय तथा अक्रिस्टलीय
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) क्रिस्टलीय

प्रश्न 22.
प्रकाश वोल्टीय (Photo Voltic) पदार्थ है-.
(अ) Cs
(ब) Si ( अक्रिस्टलीय)
(स) NaCl
(द) ग्रेफाइट
उत्तर:
(ब) Si ( अक्रिस्टलीय)

प्रश्न 23.
विद्युत का सुचालक ठोस है-
(अ) NaCl ठोस
(ब) ग्रेफाइट
(स) हीरा
(द) AlN
उत्तर:
(ब) ग्रेफाइट

प्रश्न 24.
शॉट्की दोष युक्त यौगिक का उदाहरण है-
(अ) NaCl
(ब) KCl
(स) CsCl
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 25.
ताप बढ़ाने पर अर्धचालकों की विद्युत चालकता –
(अ) कम होती है
(ब) बढ़ती है
(स) स्थिर रहती है
(द) कम या अधिक हो सकती है।
उत्तर:
(ब) बढ़ती है

प्रश्न 26.
वे पदार्थ जिनमें सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं, वे होते हैं-
(अ) अनुचुंबकीय
(ब) प्रतिचुंबकीय
(स) लोहचुंबकीय
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) प्रतिचुंबकीय

प्रश्न 27.
एक क्रिस्टलीय ठोस नर्म तथा विद्युत का सुचालक है जिसमें परमाणुओं के मध्य सहसंयोजी बन्ध होता है, वह होगा-
(अ) सिल्वर
(ब) हीरा
(स) AlN
(द) ग्रेफाइट
उत्तर:
(द) ग्रेफाइट

प्रश्न 28.
सोलर सेल में कौनसा तत्व प्रयुक्त किया जाता है ?
(अ) Rb
(ब) Pb
(स) Si
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(स) Si

प्रश्न 29.
CaF2 में क्रिस्टल की एकक कोष्ठिका में Ca2+ आयनों की संख्या होती है-
(अ) 6
(ब) 8
(स) 4
(द) 12
उत्तर:
(स) 4

प्रश्न 30.
एकान्तर धारा (A.C.) को दिष्ट धारा (D.C.) में परिवर्तित करने में प्रयुक्त अर्धचालक होता है-
(अ) p-प्रकार
(ब) n-p संधि
(स) n- प्रकार
(द) नैज
उत्तर:
(द) नैज

प्रश्न 31.
बिन्दु दोष पाया जाता है-
(अ) आयनिक ठोस में
(ब) अक्रिस्टलीय ठोस में
(स) आण्विक ठोस में
(द) द्रवों में
उत्तर:
(अ) आयनिक ठोस में

प्रश्न 32.
निम्नलिखित चित्र में किस प्रकार का क्रिस्टल दोष दर्शाया गया है ?
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 1
(अ) फ्रेन्केल दोष
(ब) फ्रेन्केल तथा शॉट्की दोष
(स) अन्तराकाशी दोष
(द) शॉट्की दोष
उत्तर:
(द) शॉट्की दोष

प्रश्न 33.
एक ठोस की घनीय क्रिस्टल जालक संरचना में W परमाणु घन के शीर्षों पर, O परमाणु भुजाओं के केन्द्र में तथा Na परमाणु घन के केन्द्र पर स्थित है तो यौगिक का सूत्र है-
(अ) NaWO2
(ब) NaWO3
(स) Na2WO5
(द) NaWO4
उत्तर:
(ब) NaWO3

प्रश्न 34.
एक ठोस AX में A+ आयन पर X की व्यवस्था ( सही मापसूचक में नहीं) चित्र में दी गयी है। यदि X का अर्द्धव्यास 250 pm है तो A+ का अर्द्धव्यास होगा।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 2
(अ) 104 pm
(ब) 125 pm
(स) 183 pm
(द) 57 pm
उत्तर:
(अ) 104 pm

प्रश्न 35.
कैल्सियम फलक – केन्द्रित घनीय एकक कोष्ठिका में क्रिस्टलित होता है तो कैल्सियम (Ca) की एकक कोष्ठिका के लिए संकुलन भिन्न होगी-
(अ) π/6
(ब) π/3
(स) \(\frac{\sqrt{2} \pi}{3}\)
(द) \(\frac{\sqrt{2} \pi}{6}\)
उत्तर:
(द) \(\frac{\sqrt{2} \pi}{6}\)

प्रश्न 36.
निम्नलिखित में से किसकी संकुलन क्षमता निम्नतम है ?
(अ) आद्य घनीय एकक कोष्ठिका
(ब) अंतः केन्द्रित घनीय एकक ‘कोष्ठिका
(स) फलक- केन्द्रित घनीय एकक कोष्ठिका
(द) षट्कोणीय निविड संकुलित संरचना
उत्तर:
(अ) आद्य घनीय एकक कोष्ठिका

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न :

प्रश्न 1.
क्रिस्टल जालक किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी ठोस के अन्तराल (space) में बिन्दुओं (परमाणु या आयनों) की नियमित त्रिविमीय व्यवस्था को क्रिस्टल जालक कहते हैं।

प्रश्न 2.
धात्विक ठोस के गुण बताइए ।
उत्तर:
धात्विक ठोस कठोर, उच्च गलनांक युक्त तथा विद्युत के सुचालक होते हैं। इनमें आघातवर्ध्यता तथा तन्यता का गुण भी होता है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 3.
अंत: केंद्रित घनीय एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या कितनी होती है ?
उत्तर:
अंत: केंद्रित घनीय एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या दो होती है।

प्रश्न 4.
फलक- केन्द्रित घन संरचना की विलगित एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या तथा एक एकक कोष्ठिका में कणों की वास्तविक संख्या कितनी होती है ?
उत्तर:
फलक- केन्द्रित घन संरचना की विलगित एकक कोष्ठिका में 14 परमाणु तथा एक एकक कोष्ठिका में कणों की वास्तविक संख्या 4 होती है।

प्रश्न 5.
एकक कोष्ठिका तथा क्रिस्टल जालक में क्या सम्बन्ध होता है ?
उत्तर:
एकक कोष्ठिका की पुनरावृत्ति से ही क्रिस्टल जालक का निर्माण होता है ।

प्रश्न 6.
ज्यामितीय विन्यास के आधार पर क्रिस्टलों को कितने समूहों में वर्गीकृत किया जाता है ?
उत्तर:
ज्यामितीय विन्यास के आधार पर क्रिस्टलों को सात समूहों में वर्गीकृत किया जाता है।

प्रश्न 7.
घनीय क्रिस्टल तंत्र में अक्षीय कोण का मान बताइए ।
उत्तर:
घनीय क्रिस्टल तंत्र में अक्षीय कोण α = β = γ = 90° होते हैं।

प्रश्न 8.
एक घन में कितने फलक तथा कितने किनारे होते हैं ?
उत्तर:
एक घन में 6 फलक तथा 12 किनारे होते हैं।

प्रश्न 9.
धात्विक ठोसों का रंग तथा चमक का कारण क्या है ?
उत्तर:
मुक्त इलेक्ट्रॉन ।

प्रश्न 10.
अष्टफलकीय रिक्ति की त्रिज्या (r) तथा परमाणु (गोले) की त्रिज्या (R) में क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर:
r = 0.414R

प्रश्न 11.
hcp तथा ccp संरचना युक्त धातुएँ उच्च गलनांक की होती हैं। क्यों ?
उत्तर:
hcp तथा ccp संरचना की संकुलन क्षमता उच्च (74%) होने के कारण परमाणु एक-दूसरे के अधिक निकट होते हैं तथा इनमें प्रबल धात्विक बन्ध होता है, अतः इनका गलनांक उच्च होता है।

प्रश्न 12.
यदि किसी क्रिस्टल के लिए त्रिज्या अनुपात 0.225 है तो उसकी ज्यामिति किस प्रकार की होगी ?
उत्तर:
त्रिज्या अनुपात 0.225 होने पर क्रिस्टल की ज्यामिति चतुष्फलकीय होगी।

प्रश्न 13.
अष्टफलकीय रिक्ति की समन्वयी संख्या कितनी होती है ?
उत्तर:
अष्टफलकीय रिक्ति की समन्वयी संख्या छः होती है ।

प्रश्न 14.
Zn+2, Cu+1, Cu+2 तथा Fe+3 में से अनुचुंबकीय आयन कौनसे हैं ?
उत्तर:
Cu+2 तथा Fe3+ अनुचुंबकीय हैं क्योंकि इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं।

प्रश्न 15.
प्रतिलोहचुम्बकीय पदार्थ का उदाहरण बताइए ।
उत्तर:
MnO प्रतिलोहचुम्बकीय पदार्थ का उदाहरण है।

प्रश्न 16.
किस प्रकार के ठोसों में दाब विद्युत गुण पाया जाता है ?
उत्तर:
नेट द्विध्रुव युक्त क्रिस्टलों में दाब विद्युत गुण पाया जाता है।

प्रश्न 17.
ताप विद्युत प्रभाव किसे कहते हैं ?
उत्तर:
ऐसे क्रिस्टल जिन्हें गर्म करने पर विद्युत धारा उत्पन्न होती है, उन्हें ताप विद्युत क्रिस्टल कहते हैं तथा इस प्रभाव को ताप विद्युत प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 18.
ताप बढ़ाने पर चालकों की चालकता कम हो जाती है। क्यों ?
उत्तर:
ताप बढ़ाने पर चालकों में ऊष्मीय कम्पन बढ़ने के कारण प्रतिरोध बढ़ता है, जिससे उनकी चालकता कम हो जाती है।

प्रश्न 19.
चालकों तथा अर्धचालकों की चालकता को किस सिद्धान्त द्वारा समझाया जाता है ?
उत्तर:
बैण्ड सिद्धान्त या आण्विक कक्षक सिद्धान्त ।

प्रश्न 20.
CaF2 में समन्वयी संख्याओं का अनुपात बताइए ।
उत्तर:
8 : 4 (CaF2)

प्रश्न 21.
CsCl की एकक कोष्ठिका का नाम लिखिए ।
उत्तर:
अन्तः केन्द्रित घन संरचना ।

प्रश्न 22.
सूर्य के प्रकाश को विद्युत में परिवर्तित करने के लिए उपयुक्त ठोस पदार्थ बताइए ।
उत्तर:
अक्रिस्टलीय सिलिका। यह एक फोटोवोल्टीय पदार्थ है ।

प्रश्न 23.
क्यूरी ताप किसे कहते हैं ?
उत्तर:
वह ताप जिससे कम ताप पर कोई चुम्बकीय पदार्थ, लोहचुम्बकीय हो जाता है, उसे क्यूरी ताप कहते हैं ।

प्रश्न 24.
गैस लाइटर को दबाने से चिंगारी उत्पन्न होती है, क्यों ?
उत्तर:
गैस लाइटर में दाब विद्युत क्रिस्टल होते हैं, अतः जब इस पर दाब लगाया जाता है तो विद्युत चिंगारी उत्पन्न होती है।

प्रश्न 25.
किस ताप पर अधिकतर धातुएँ अतिचालक की भाँति व्यवहार करती हैं?
उत्तर:
2K – 5K

लघूत्तरात्मक प्रश्न :

प्रश्न 1.
ठोसों की विषमदैशिक तथा समदैशिक प्रकृति में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
विषमदैशिक ठोस वे होते हैं जिनके भौतिक गुण जैसे विद्युत प्रतिरोधकता तथा अपवर्तनांक, भिन्न-भिन्न दिशाओं में मापने पर भिन्न-भिन्न मान दर्शाते हैं। यह अलग-अलग दिशाओं में कणों की भिन्न- भिन्न व्यवस्था के कारण होता है। क्रिस्टलीय ठोस विषमदैशिक होते हैं। अपवाद – घनीय क्रिस्टल |
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 3
समदैशिक ठोस वे होते हैं जिनके भौतिक गुणों का मान सभी दिशाओं में समान होता है। अक्रिस्टलीय ठोस समदैशिक होते हैं, क्योंकि इनमें कणों की दीर्घ परासी व्यवस्था नहीं होती तथा सभी दिशाओं में अनियमित विन्यास होता है ।

प्रश्न 2.
(a) सरल घनीय एकक कोष्ठिका में अवयवी कणों की गणना किस प्रकार करते हैं?
उत्तर:
सरल घन की एकक कोष्ठिका में आठ कोनों पर आठ कण होते हैं तथा प्रत्येक कण का योगदान \(\frac { 1 }{ 8 }\) होता है अतः कुल अवयवी कण = \(\frac { 1 }{ 8 }\) × 8 = 1

(b) बन्धों की प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित ठोसों का वर्गीकरण कीजिए-
CaO, Sn, बर्फ ।
उत्तर:
CaO – प्रबल स्थिर वैद्युत आकर्षण बल (आयनिक ठोस )
Sn – धात्विक बन्ध ( धात्विक ठोस )
बर्फ – परमाणुओं के मध्य सहसंयोजी बन्ध तथा अणुओं के मध्य हाइड्रोजन बन्ध (हाइड्रोजन आबन्धित आण्विक ठोस) ।

प्रश्न 3.
हाइड्रोजन बंधित आण्विक ठोसों की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर:
हाइड्रोजन बंधित आण्विक ठोसों में अणुओं के मध्य प्रबल हाइड्रोजन बन्ध होता है। इसके लिए H तथा F, O व N के मध्य ध्रुवीय सहसंयोजी बन्ध होना चाहिए। ये ठोस विद्युत के कुचालक होते हैं। उदाहरण – बर्फ (ठोस H2O) तथा ठोस NH3 आदि।

प्रश्न 4.
धात्विक ठोसों के गुण लिखिए।
उत्तर:
धातुएँ सामान्यतः ठोस अवस्था में होती हैं, अतः इन्हें धात्विक ठोस कहते हैं। इनमें धनायन, मुक्त तथा गतिशील इलेक्ट्रॉनों के समुद्र में व्यवस्थित होते हैं। प्रत्येक धातु परमाणु, एक या अधिक इलेक्ट्रॉन देता है । ये इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल में समान रूप से फैले रहते हैं । गतिशील इलेक्ट्रॉनों के कारण ही धातुएं विद्युत एवं ऊष्मा की सुचालक होती हैं। विद्युत प्रवाहित करने पर इलेक्ट्रॉन, धनायनों के नेटवर्क में प्रवाहित होते हैं। धातुओं का विशेष रंग होता है तथा उनमें चमक पायी जाती है। धातुएं अत्यधिक आघातवर्धनीय एवं तन्य होती हैं।

प्रश्न 5.
पदार्थों के अनुचुम्बकीय तथा लोहचुम्बकीय गुण में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
अनुचुम्बकीय गुण बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति में ही पाया जाता है जबकि लोहचुम्बकीय गुण चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में भी पाया जाता है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 6.
क्षार धातु हैलाइडों में शुद्ध अवस्था में फ्रेंकेल दोष क्यों नहीं पाया जाता?
उत्तर:
शुद्ध अवस्था में क्षार धातु हैलाइडों में फ्रेंकेल दोष नहीं पाया जाता क्योंकि क्षार धातु आयनों के बड़े आकार के कारण ये अन्तराकाशी स्थानों में स्थान ग्रहण नहीं कर सकते।

प्रश्न 7.
लोहचुम्बकीय तथा फेरीचुम्बकीय पदार्थों में अन्तर बताइए ।
उत्तर:
लोहचुम्बकीय पदार्थों में अधिक संख्या में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं तथा इनमें चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में भी चुम्बकीय गुण पाया जाता है जबकि फेरीचुम्बकीय पदार्थों में डोमेनों के चुम्बकीय आघूर्णों की व्यवस्था समानान्तर तथा प्रतिसमानान्तर दिशा में असमान संख्या में होती है जिसके कारण इनमें परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण पाया जाता है तथा ये चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं।

प्रश्न 8.
प्रतिलोहचुम्बकत्व तथा फेरीचुम्बकत्व (लघु- लोहचुम्बकत्व) में अन्तर बताइए ।
उत्तर:
प्रतिलोहचुम्बकत्व उन पदार्थों का गुण है जिनमें चुम्बकीय आघूर्ण का मान शून्य होता है जबकि फेरीचुम्बकत्व युक्त पदार्थों में अल्प मात्रा में चुम्बकीय आघूर्ण होता है अतः इनका चुम्बकत्व कम होता है। MnO प्रतिलोहचुम्बकीय पदार्थ है जबकि Fe3O4 चुम्बकीय होता है।

प्रश्न 9.
फ्रेंकेल तथा शॉट्की दोषों में दो अन्तर बताइए ।
उत्तर:
(i) फ्रेंकेल त्रुटि (दोष) से पदार्थ का घनत्व अपरिवर्तित रहता है जबकि शॉट्की त्रुटि के कारण पदार्थ का घनत्व कम हो जाता है ।
(ii) फ्रेंकेल त्रुटि उन क्रिस्टलों में पाई जाती है जिनमें समन्वयी संख्या निम्न होती है जबकि शॉट्की त्रुटि, उच्च समन्वयी संख्या युक्त क्रिस्टलों में पाई जाती है।

बोई परीक्षा के हृष्टिकोण से सम्भावित महवपूर्ण प्रश्न :

प्रश्न 1.
ठोस क्रिस्टलों में किस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व अप्रभावित रहता है?
उत्तर:
फ्रेन्केल त्रुटि ।

प्रश्न 2.
सिलिकन के क्रिस्टल में जब आर्सेनिक की अशुद्धि मिलाते हैं तो इस प्रकार बने अर्धचालक का नाम क्या होगा?
उत्तर:
n – प्रकार का अर्धचालक ।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए –
(अ) शॉट्की त्रुटि
(ब) अन्तराकाशी त्रुटि ( दोष ) ।
उत्तर:
(अ) शॉट्की त्रुटि – यह मुख्य रूप से आयनिक ठोसों का रिक्तिका दोष ( vacancy defect) है। विद्युत उदासीनता को बनाए रखने के लिए क्रिस्टल से गायब होने वाले धनायनों और ऋणायनों की संख्या बराबर होती है अर्थात् धनायन तथा ऋणायन दोनों ही अपने स्थान से गायब हो. जाते हैं। सरल रिक्तिका दोष की भाँति, शॉट्की दोष से भी पदार्थ का घनत्व कम हो जाता है। आयनिक ठोसों के ऐसे दोषों में संख्या महत्वपूर्ण होती है ।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 4
जैसे NaCl में कमरे के ताप पर लगभग 10° शॉट्की युगल प्रति cm3 होते हैं। एक cm में करीब 1022 आयन होते हैं। इस प्रकार प्रति 1016 आयनों में एक शॉट्की दोष होता है। शॉट्की दोष उन आयनिक पदार्थों में होता है जिनमें धनायन और ऋणायन लगभग समान आकार के होते हैं तथा जिनकी समन्वयी संख्या उच्च होती है। उदाहरण NaCl, KCl, CsCl | AgBr में फ्रेंकेल तथा शॉट्की दोनों ही प्रकार के दोष होते हैं।

(ब) अन्तराकाशी दोष : किसी क्रिस्टल जालक में जब कुछ अवयवी कण अंतराकाशी स्थल पर उपस्थित होते हैं तो इसे अंतराकाशी दोष कहते हैं। इससे पदार्थ का घनत्व बढ़ जाता है। ‘रिक्तिका दोष तथा अंतराकाशी दोष अनआयनिक ठोसों में पाए जाते हैं। आयनिक ठोसों में विद्युत उदासीनता रहना आवश्यक है। अतः इन दोषों को फ्रेंकेल तथा शॉट्की दोषों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 5
(a) फ्रें केल दोष या फ्रें के ल त्रुटि (Frenkel defect) – यह दोष आयनिक ठोसों में पाया जाता है। छोटा आयन (साधारणतः धनायन) अपने वास्तविक स्थान से विस्थापित होकर अन्तराकाशी स्थान में चला जाता है। इससे वास्तविक स्थान पर रिक्तिका दोष और नए स्थान पर अंतराकाशी दोष उत्पन्न होता है। (dislocation defect) भी कहते हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 6
इससे ठोस के घनत्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल विद्युत चालकता दर्शा सकते हैं तथा इससे यौगिक का परावैद्युतांक (Dielectric Constant) बढ़ जाता है। फ्रेंकेल दोष उन आयनिक पदार्थों द्वारा दर्शाया जाता है जिनमें आयनों (धनायन तथा ऋणायन) के आकार में अधिक अंतर होता है तथा जिनमें समन्वयी संख्या कम होती है। उदाहरण – ZnS, AgCl, AgBr और AgI |
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 7

प्रश्न 4.
सिल्वर fcc एकक कोष्ठिका के रूप में पाया जाता है जिसकी कोर लम्बाई 409 pm है तो सिल्वर परमाणु की त्रिज्या ज्ञात कीजिए। (इसमें प्रत्येक फलक परमाणु चार कोनों को स्पर्श कर रहा है )।
उत्तर:
एक एकक कोष्ठिका की कोर लम्बाई a = 409 pm
अतः (fcc संरचना) परमाणु त्रिज्या (r) = \(\frac{a}{2 \sqrt{2}}\) = \(\frac{409}{2 \sqrt{2}}\)
r = \(\frac{409}{2 \times 1.414}\) = 144.6 pm

प्रश्न 5.
एक ध्रुवीय आण्विक ठोस में अणुओं को परस्पर एकत्र रखने में किस प्रकार की पारस्परिक क्रिया होती है?
उत्तर:
एक ध्रुवीय आण्विक ठोस में अणुओं को परस्पर एकत्र रखने में द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्य क्रिया होती है।

प्रश्न 6.
कॉपर धातु का घनत्व 8.95 g cm-3 है। यदि कॉपर परमाणु की त्रिज्या 127.8 pm हो तो कॉपर एकक सेल इनमें से किस प्रकार का होगा – साधारण घनीय, काय- केन्द्रित घनीय अथवा फलक- केन्द्रित घनीय?
(दिया गया है – Cu का परमाणु द्रव्यमान = 63.54 g mol-1 और NA = 6.02 × 1023 mol-1)
उत्तर:
दिया गया है – d = 8.95 g cm-3, r = 127.8 pm = 127.8 × 10-10 cm
M = 63.54 g mol-1, NA = 6.02 × 1023, Z = ?
माना Cu की संरचना फलक – केन्द्रित घनीय है जिसके लिए a = 2√2r अतः
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 8
अतः कॉपर का एकक सेल फलक-केन्द्रित घनीय होगा

प्रश्न 7.
यदि आप एक अज्ञात धातु का द्रव्यमान, घनत्व और इसके क्रिस्टल के एकक सेल की लम्बाई-चौड़ाई (विमाएँ ) जानते हों तो इसका परमाणु द्रव्यमान कैसे ज्ञात करेंगे? व्याख्या कीजिए ।
उत्तर:
माना दिया गया द्रव्यमान घनत्व = d
तथा एकक सेल की विमा = a
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 9
माना एक परमाणु का द्रव्यमान = M
तथा एक एकक सेल में परमाणुओं की संख्या = Z
एक एकक सेल का परमाणु द्रव्यमान = ZM = IMG
M = मोलर द्रव्यमान, NA = आवोगाद्रो संख्या
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 10
इस सूत्र की सहायता से M ज्ञात किया जा सकता है, जब z का मान ज्ञात हो ।

प्रश्न 8.
साधारण घनाकार जालक के लिए एक धातु क्रिस्टल की पैकिंग क्षमता परिकलित कीजिए ।
उत्तर:
सरल घनीय क्रिस्टल की संकुलन क्षमता 52.4 प्रतिशत होती है। जिसकी गणना निम्नलिखित है-
एक सरल घनीय जालक में परमाणु केवल घन के कोनों पर स्थित होते हैं। घन के किनारों पर स्थित कण एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 11
a = 2r
इसलिए घन की भुजा की लंबाई ‘a’ और प्रत्येक कण की त्रिज्या, में निम्न संबंध है-
a = 2r
अतः घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन = a3 = (2r)3 = 8r3
चूँकि सरल घनीय एकक कोष्ठिका में केवल 1 परमाणु उपस्थित होता है।
इसलिए घेरे गए त्रिविमीय स्थान का आयतन = \(\frac { 4 }{ 3 }\) πr3
अतः, संरचना की संकुलन क्षमता
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 12

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 9.
कॉपर फलक- केन्द्रित घनीय यूनिट सेलों में क्रिस्टलित होता है। यदि कॉपर परमाणु की त्रिज्या 127.8 pm है तो कॉपर धातु का घनत्व परिकलित कीजिए।
(Cu का परमाणु द्रव्यमान = 63.554 और ऐवोगाद्रो संख्या NA = 6.022 × 1023 mol-1 )
अथवा
आयरन का यूनिट सेल कॉय-केन्द्रित घनीय होता है और इस सेल का सिरा 286.65 pm है। आयरन का घनत्व 7.87 g cm-3 है । इस सूचना का उपयोग करके ऐवोगाद्रो संख्या का परिकलन | (Fe का परमाणु द्रव्यमान = 56.04)
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 13

प्रश्न 10.
काँच को अतिशीतित द्रव कहते हैं । कारण दीजिए ।
उत्तर:
काँच अक्रिस्टलीय ठोस है तथा इसमें द्रवों के समान ‘प्रवाह’ की प्रवृत्ति होती है, यद्यपि यह बहुत धीमे होता है, अतः इसे अतिशीतित द्रव कहते हैं।

प्रश्न 11.
लौह चुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक बनाते हैं। कारण दीजिए ।
उत्तर:
लौह चुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक बनाते हैं क्योंकि ये चुम्बकीय क्षेत्र की ओर प्रबलता से आकर्षित होते हैं। ठोस अवस्था में इनमें धातु आयन छोटे खण्डों में एक साथ समूहित हो जाते हैं, इन्हें डोमेन कहते हैं। पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर सभी डोमेन चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में अभिविन्यासित हो जाते हैं जिससे स्थायी तथा प्रबल चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न होता है ।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित क्रिस्टल संरचनाओं की संकुलन क्षमता तथा उपसहसंयोजन संख्या दीजिए |
(अ) अंतःकेन्द्रित घनीय
(ब) घनीय निविड संकुलन ।
उत्तर:
(अ) अंतः केन्द्रित घनीय क्रिस्टल संरचना की संकुलन क्षमता 68% तथा उपसहसंयोजन संख्या 8 होती है।
(ब) घनीय निविड संकुलन क्रिस्टल संरचना की संकुलन क्षमता 74% तथा उपसहसंयोजन संख्या 12 होती है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से कौन-से ध्रुवीय आण्विक ठोस हैं? ठोस सल्फर डाइऑक्साइड, ठोस अमोनिया, आयोडीन क्रिस्टल, ग्रेफाइट, कार्बन टेट्राक्लोराइड ।
उत्तर:
ठोस सल्फर डाइऑक्साइड तथा ठोस अमोनिया ध्रुवीय आण्विक ठोस हैं।

प्रश्न 14.
एक घनीय क्रिस्टल P तथा Q दो तत्वों से बना है । इसमें Q के परमाणु घन के कोनों पर तथा P घन के केन्द्र में स्थित है तो यौगिक का सूत्र क्या होगा ?
उत्तर:

  • घन के कोने पर स्थित परमाणु का एकक कोष्ठिका में योगदान = \(\frac { 1 }{ 8 }\)
    अतः Q परमाणुओं की संख्या = \(\frac { 1 }{ 8 }\) × 8 = 1
  • घन के केन्द्र में स्थित परमाणु का एकक कोष्ठिका में योगदान = 1
    अतः P परमाणुओं की संख्या = 1 × 1 = 1
    इसलिए यौगिक का सूत्र = P : Q = 1 : 1 = PQ

प्रश्न 15.
(a) निम्नलिखित का कारण बताइए-
(i) शॉट्की त्रुटि के कारण ठोस का घनत्व कम हो जाता है।
(ii) Si को P से डोपित करने पर चालकता बढ़ती है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 14
उत्तर:
(a)

  • शॉट्की त्रुटि में धनायन तथा ऋणायन समान संख्या में क्रिस्टल में से गायब हो जाते हैं अतः द्रव्यमान कम हो जाता है इसलिए घनत्व कम हो जाता है।
  • Si को P से डोपित करने पर, बन्ध बनाने के पश्चात् बचे इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र रहते हैं जिनके कारण चालकता बढ़ जाती है।

(b) उपर्युक्त संरेखण में चुम्बकीय आघूर्ण के सभी डोमेन एक ही दिशा में अभिविन्यासित हैं अतः यह लोहचुम्बकत्व को प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित त्रुटियुक्त क्रिस्टल का परीक्षण कीजिए-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 15
तथा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(i) क्रिस्टल किस प्रकार का रससमीकरणमितीय दोष दर्शाता
(ii) इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल के घनत्व पर क्या प्रभाव होता है?
(iii) किस प्रकार के आयनिक यौगिक यह त्रुटि दर्शाते हैं?
उत्तर:
(i) क्रिस्टल में शॉट्की दोष (त्रुटि) है।
(ii) इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है।
(iii) यह त्रुटि उन आयनिक यौगिकों द्वारा दर्शाई जाती है जिनमें धनायन तथा ऋणायन लगभग समान आकार के होते हैं।

प्रश्न 17.
एक तत्व जिसका घनत्व 11.2 g cm-3 जाक बनाता है जिसके किनारे की लम्बाई 4 × 10-8cm है तो तत्व का परमाणु द्रव्यमान परिकलित कीजिए । (NA = 6.022 × 1023 mol-1)
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 16

प्रश्न 18.
(i) LiCI के गुलाबी रंग के लिए किस प्रकार का अरससमीकरणमितीय दोष उत्तरदायी होता है?
(ii) NaCl किस प्रकार का रससमीकरणमितीय दोष दर्शाता है?
उत्तर:

  • ऋणायनिक रिक्तिका के कारण धातु आधिक्य दोष
  • शॉट्की दोष ।

प्रश्न 19.
( अ ) यह मानते हुए कि परमाणु एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं, सरल घनीय धातु के क्रिस्टल में संकुलन क्षमता की गणना कीजिए ।
(ब) आयनिक ठोसों की प्रकृति के आधार पर फ्रेंकेल दोष एवं शॉटकी दोष की तुलना कीजिए।
उत्तर:
(अ) सरल घनीय क्रिस्टल की संकुलन क्षमता 52.4 प्रतिशत होती है जिसकी गणना निम्नलिखित है-
एक सरल घनीय जालक में परमाणु केवल घन के कोनों पर स्थित होते हैं। घन के किनारों पर स्थित कण एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं इसलिए घन की भुजा की लंबाई ‘a’ और प्रत्येक कण की त्रिज्या r में निम्न संबंध है –
a = 2r
अतः घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन
= a3 = (2r)-3 = 8r3
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 17
चूँकि सरल घनीय एकक कोष्ठिका में केवल 1 परमाणु उपस्थित
इसलिए घेरे गए स्थान का आयतन = \(\frac { 4 }{ 3 }\)πr3,
अतः, संरचना की संकुलन क्षमता
एक परमाणु का आयतन घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 18
(ब) आयनिक ठोसों की प्रकृति के आधार पर फ्रेंकेल दोष एवं शॉट्की दोष की तुलना निम्नलिखित है
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 19

प्रश्न 20.
( अ ) षट्कोणीय क्रिस्टल तंत्र हेतु अक्षीय कोणों के मान लिखिए।
(ब) सिलिकन में बोरॉन अपमिश्रित करने पर किस प्रकार का अर्धचालक प्राप्त होता है? समझाइए ।
उत्तर:
(अ) षट्कोणीय क्रिस्टल तंत्र में अक्षीय कोण a, B तथा y का मान क्रमश: 90°, 90° तथा 120° होता है।
(ब) सिलिकन में बोरॉन अपमिश्रित करने पर p-प्रकार का अर्धचालक प्राप्त होता है क्योंकि बोरॉन में तीन संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं अतः वह स्थान जहाँ चौथा इलेक्ट्रॉन नहीं होता उसे इलेक्ट्रॉन छिद्र कहते हैं। पास वाले परमाणु से इलेक्ट्रॉन आकर इस इलेक्ट्रॉन छिद्र को भर देता है, ऐसा होने पर वह अपने मूल स्थान पर इलेक्ट्रॉन छिद्र छोड़ देता है, इससे ऐसा लगता है जैसे कि इलेक्ट्रॉन छिद्र जिस इलेक्ट्रॉन द्वारा यह भरा गया है।

उसकी विपरीत दिशा में चल रहा है। विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में इलेक्ट्रॉन, इलेक्ट्रॉन छिद्रों में से धनावेशित प्लेट की ओर चलते हैं। परन्तु ऐसा लगता है जैसे इलेक्ट्रॉन छिद्र धनावेशित हैं तथा ॠणावेशित प्लेट की ओर चल रहे हैं । अतः इस प्रकार के अर्धचालकों को p-प्रकार के अर्धचालक कहते हैं। यहाँ p= धनात्मक (Positive)

प्रश्न 21.
उस यौगिक का सूत्र लिखिए जिसमें Y तत्त्व ccp जालक बनाता है और X के परमाणु चतुष्फलकीय रिक्तियों का 1/3 वाँ भाग घेरते हैं ।
उत्तर:
ccp जालक, तत्त्व Y से बना है अतः उत्पन्न चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या उसमें उपस्थित Y परमाणुओं की संख्या की दोगुनी होगी। इन रिक्तियों का 1/3 भाग X के परमाणुओं से भरा है अतः Y तथा X के परमाणुओं का अनुपात Y: 2X x 1/3 है। इसलिए यौगिक का सूत्र Y3X2 या X2Y3 है।

प्रश्न 22.
दिए गए दोषपूर्ण क्रिस्टल की जाँच कीजिए-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 20
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(i) उपर्युक्त दोष रससमीकरणमितीय (स्टॉइकियोमीट्रिक ) है अथवा अ-रससमीकरणमितीय ( अन-स्टॉइकियोमीट्रिक ) है ?
(ii) इलेक्ट्रॉन वाली स्थिति के लिए जो पद प्रयुक्त होता है, उसे लिखिए।
(iii) इस प्रकार का दोष दिखाने वाले यौगिक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • उपर्युक्त दोष अरससमीकरणमितीय है क्योंकि इस यौगिक के आयन रससमीकरणमितीय अनुपात में नहीं हैं।
  • इलेक्ट्रॉन की इस स्थिति को F केन्द्र कहते हैं ।
  • NaCl इस प्रकार का दोष दर्शाता है ।

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. निम्नलिखित कथन प्रतिबंधन एण्ड्रोन्यूक्लिएज एंजाइम के लक्षणों का वर्णन करते हैं। गलत कथन को चुनिए-
(अ) यह एंजाइम डी.एन.ए. पर एक विशिष्ट पैलीन्ड्रोमिक न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम की पहचान करता है।
(ब) यह एंजाइम डी.एन.ए, पर पहचाने हुए स्थान पर डी.एन.ए. अणु को काटता है।
(स) यह एंजाइम डी.एन.ए. को विशेष स्थलों पर जोड़ता है और दो में से केवल एक लड़ी को काटता है।
(द) यह एंजाइम प्रत्येक लड़ी पर विशेष स्थलों पर शर्कराफास्फ्रेट रज्जु को काटता है।
उत्तर:
(स) यह एंजाइम डी.एन.ए. को विशेष स्थलों पर जोड़ता है और दो में से केवल एक लड़ी को काटता है।

2. विलोदित टैक जैव रिऐक्टर किस लिए अभिकल्पित किए गए हैं?
(अ) सारी प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीजन की प्राप्यता बनाए रखने के लिए
(ब) प्रवर्धन नलिका में अवायवीय दशाओं को बनाये रखने के लिए
(स) उत्पादों के शुद्धिकरण के लिए
(द) उत्पादों में परिरक्षकों को मिलाने के लिए
उत्तर:
(अ) सारी प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीजन की प्राप्यता बनाए रखने के लिए

3. निम्नलिखित में से कौनसा अनुप्रवाह प्रक्रमण का एक अवयव नहीं है ?
(अ) परिरक्षण
(ब) अभिव्यक्ति
(स) पृथक्करण
(द) शुद्धिकरण
उत्तर:
(ब) अभिव्यक्ति

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

4. निम्नलिखित में से कौनसा एक प्लाज्मिड का अभिलक्षण नहीं है?
(अ) स्थानान्तरण योग्य
(ब) एकल-रज्जुकीय
(स) स्वतंत्र प्रतिकृतीयन
(द) वृत्तीय संरचना
उत्तर:
(ब) एकल-रज्जुकीय

5. निम्नलिखित में से कौनसा एक प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज है?
(अ) डी.एन.एज. I
(ब) आर.एन.एज.
(स) हिन्द II
(द) प्रोटीएज
उत्तर:
(स) हिन्द II

6. प्रतिबन्ध एंजाइम प्राकृतिक रूप से पाये जाते हैं-
(अ) यूकैरियोटिक कोशिकाओं में
(ब) यीस्ट में
(स) जीवाणु में
(द) उपरोक्त सभी में
उत्तर:
(स) जीवाणु में

7. वे एन्जाइम जो DNA को विशिष्ट पहचान वाले स्थलों पर काटते हैं, वह हैं-
(अ) लाइगेज
(ब) एक्सोन्यूक्लिएज
(स) सीकामारी एन्डोन्यूक्लिएज
(द) DNA पॉलिमरेज
उत्तर:
(स) सीकामारी एन्डोन्यूक्लिएज

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

8. उच्च श्रेणी के पादपों में जीन क्लोनिंग हेतु कौनसा जीवाणु अधिक उपयोगी है-
(अ) ई.कोली
(ब) राइजोबियम
(स) एग्रोबैक्टीरियम
(द) स्यूडोमोनॉस
उत्तर:
(स) एग्रोबैक्टीरियम

9. जीन में हेर-फेर से तात्पर्य है-
(अ) आनुवंशिक पदार्थ को जोड़ना
(ब) आनुवंशिक पदार्थ को हटाना
(स) आनुवंशिक पदार्थ को ठीक करना
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

10. वांछित DNA को परपोषी कोशिका में पहुँचाने वाला अणु होता है
(अ) वाहक
(ब) परपोषी
(स) परजीवी
(द) एन्जाइम
उत्तर:
(अ) वाहक

11. निम्न में से कौनसा वांछित DNA हो सकता है-
(अ) संश्लेषित DNA
(ब) C-DNA
(स) जीनोमिक DNA
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

12. सीमाकारी एन्जाइम EcoRI DNA को निम्न में से किस स्थान पर काटता है-
(अ) GATTC
(ब) GACCTG
(स) AAATTT
(द) GGGCCC
उत्तर:
(अ) GATTC

13. न्यूक्लिक अम्ल का एकल रज्जु जिसके साथ एक रेडियोधर्मी अणु जोड़ दिया गया हो, क्या कहलाता है?
(अ) वेक्टर
(ब) चयनशील मार्कर
(स) प्लाज्मिड
(द) प्रोब
उत्तर:
(द) प्रोब

14. तथाकथित ‘चिपचिपे सिर’ किससे बने होते हैं?
(अ) अयुग्मित क्षारकों से
(ब) DNA तंतुक के सिरे पर चिपचिपे पॉलिसैकेराइड से
(स) मिथाइल समूह से
(द) अयुग्मित RNA क्षारकों से
उत्तर:
(अ) अयुग्मित क्षारकों से

15. द्विबीजपत्रियों में जीन स्थानान्तरण हेतु सामान्यतः प्रयुक्त प्लाज्मिड है-
(अ) PBR 322
(ब) PBR 235
(स) Ti प्लाज्मिड
(द) कास्मिड
उत्तर:
(स) Ti प्लाज्मिड

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

16. प्रथम प्रतिबंधन एण्डोन्यूक्लिएज कौनसा पहचाना गया था?
(अ) EcoRI
(ब) Hind II
(स) Hind III
(द) Taq I
उत्तर:
(ब) Hind II

17. एग्रोबैक्टिरियम ट्यूमीफेशिएंस का DNA खंड (T-DNA) सामान्य पौधों की कोशिकाओं में क्या रोग उत्पन्न करता है-
(अ) कैंसर
(ब) अपघटन
(स) अर्बुद
(द) कुछ नहीं
उत्तर:
(स) अर्बुद

18. रीट्रोवाइरस (पश्च विषाणु) सामान्य जन्तु कोशिकाओं में कौनसा रोग उत्पन्न करता है?
(अ) कैंसर
(ब) विघटन
(स) अर्बुद
(द) कुछ नहीं
उत्तर:
(अ) कैंसर

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

19. एक रेस्ट्रीक्शन (प्रतिबंधन) एन्डोन्यूक्लिएज को EcoRI का नाम दिया गया है। इसमें भाग “co” किसके लिए है?
(अ) colon (वृहदांत्र)
(ब) coelom (देहगुहा)
(स) coenzyme (सहएन्जाइम)
(द) coli (कोलाई)
उत्तर:
(द) coli (कोलाई)

20. जीवाणु कोशिका में गुणसूत्रीय DNA के अतिरिक्त पाया जाने वाला वर्तुल (Circular) DNA कहलाता है-
(अ) एपीसोम
(ब) कोस्मिड
(स) प्लाज्मिड
(द) फेज्मिड
उत्तर:
(स) प्लाज्मिड

21. pBR322 वाहक में किसके प्रति प्रतिरोधक जीन होती है?
(अ) एम्पीसिलिन
(ब) टेट्रासाइक्लिन
(स) उपर्युक्त दोनों
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(द) इनमें से कोई नहीं

22. प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज द्वारा DNA के कटे खण्डों को किस तकनीक द्वारा अलग करते हैं?
(अ) बायोरियक्टर
(ब) इलेक्ट्रोफोरेसिस
(स) बायोलिस्टिक
(द) माइक्राइंजेक्शन
उत्तर:
(ब) इलेक्ट्रोफोरेसिस

23. वह विधि जिसके द्वारा पुनर्योगज DNA को सीधे जंतु कोशिका के केन्द्रक के अन्दर अंतःक्षेपित कर सकते हैं, वह है-
(अ) जीन गन
(ब) बायोलिस्टिक
(स) माइक्रोइं जेक्शन
(द) बायोरियक्टर
उत्तर:
(स) माइक्रोइं जेक्शन

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24. प्लाज्मिड जिसमें वांछित DNA खण्ड जुड़ा रहता है, उसे कहते हैं-
(अ) विजातीय प्लाज्मिड
(ब) काइमेरिक प्लाज्मिड
(स) सेलेरा प्लाज्मिड
(द) विदलनीय प्लाज्मिड
उत्तर:
(ब) काइमेरिक प्लाज्मिड

25. कौनसे एंजाइम DNA को खण्डित करते हैं-
(अ) लाइगेज
(ब) टाइप II रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज
(स) पॉलीमरेज
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ब) टाइप II रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज

26. वाहक DNA है-
(अ) प्लाज्मिड
(ब) C-DNA
(स) संश्लेषित DNA
(द) उपर्युक्त DNA
उत्तर:
(अ) प्लाज्मिड

27. लेडरबर्ग के रेप्लीका प्लेटिंग प्रयगो में स्ट्रेप्टोमायसीन प्रतिरोधी विभेद प्राप्त करने हेतु किसका उपयोग किया गया?
(अ) न्यूनतम माध्यम एवं स्ट्रेप्टोमायसीन
(ब) पूर्ण माध्यम और स्ट्रेप्टोमायसीन
(स) केवल न्यूनतम माध्यम
(द) केवल पूर्ण माध्यम
उत्तर:
(अ) न्यूनतम माध्यम एवं स्ट्रेप्टोमायसीन

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28. निम्नलिखित में से किसका जीन क्लोनिंग में उपयोग किया जाता है?
(अ) लोमासोम्स
(ब) मीजोसोम्स
(स) प्लाज्मिडस
(द) न्यूक्लिओइडस
उत्तर:
(अ) लोमासोम्स

29. निम्न में जैव प्रौद्योगिकी का भाग है-
(अ) जीन का संश्लेषण एवं उपयोग
(ब) डी.एन.ए. टीका का निर्माण या दोषमुक्त
(स) पात्रे (इनविट्रो) निषेचन द्वारा परखनली शिशु का निर्माण
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

30. जीव के आनुवंशिक रूपांतर में मूलभूत चरण है-
(अ) वांछित जीनयुक्त डी.एन.ए. की पहचान
(ब) चिन्हित डी.एन.ए. का परपोषी में स्थानान्तरण
(स) स्थानान्तरित डी.एन.ए. को परपोषी में सुरक्षित रखना तथा उसकी संतति में स्थानान्तरित करना
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लक्ष्य जीन को पृथक् करने के लिए कौनसे एन्जाइम की आवश्यकता होती है ?
उत्तर:
लक्ष्य जीन को पृथक् करने के लिए प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज एंजाइम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
कौनसा DNA पॉलीमरेज उच्च ताप पर भी सक्रिय रहता है?
उत्तर:
टेक (Taq) DNA पॉलीमरेज उच्च ताप पर भी सक्रिय रहता है।

प्रश्न 3.
किन्हीं तीन प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज एन्जाइमों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • EαRI,
  • Hind II
  • Hind III

प्रश्न 4.
PCR का पूर्ण नाम लिखिए। इसमें कौनसा एन्जाइम प्रयुक्त होता है?
उत्तर:
पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया (Polymerase Chain Reaction), इसमें टेक (Taq) DNA पॉलीमरेज एन्जाइम प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 5.
जीवाणुभोजी (Bacteriophage) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जीवाणुओं को संक्रमित करने वाले विषाणु को जीवाणुभोजी कहते हैं।

प्रश्न 6.
प्रथम पुनर्योगज DNA का निर्माण किसमें हुआ था?
उत्तर:
जीवाणु सालमोनेला टाइफीमूरियम में।

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प्रश्न 7.
आणविक कैंची किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रतिबंधन एन्जाइम (Restriction Enzyme) को आणविक कैंची कहते हैं।

प्रश्न 8.
हिंड II (Hind II) DNA अणु को कहाँ से काटता है?
उत्तर:
हिंड II, DNA अणु को उस विशेष बिंदु पर काटते हैं जहाँ पर छः क्षारक युग्मों (Base pairs) का विशेष अनुक्रम होता है।

प्रश्न 9.
पैलिंड्रोम (Palindrom) क्या है?
उत्तर:
ये वर्णों के समूह हैं जिन्हें आगे व पीछे दोनों तरफ से पढ़ने पर एक ही शब्द बनता है जैसे ‘मलयालम’।

प्रश्न 10.
चिपचिपे सिरे किस एंजाइम के कार्य में सहायता करते हैं?
उत्तर:
एंजाइम DNA लाइगेज के कार्य में सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 11.
DNA खंड किस प्रकार के आवेशित अणु होते हैं?
उत्तर:
ऋणात्मक आवेशित (Charged) अणु होते हैं।

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प्रश्न 12.
इलेक्ट्रोफोरेसिस में DNA को देखने के लिये किससे अभिरंजित किया जाता है?
उत्तर:
इथीडियम ब्रोमाइड नामक यौगिक से अभिरंजित करते हैं।

प्रश्न 13.
रूपान्तरण (Transformation) क्या प्रक्रिया है?
उत्तर:
यह एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा DNA के एक खण्ड को परपोषी जीवाणु में प्रवेश कराते हैं।

प्रश्न 14.
पौधों व जन्तुओं की कोशिकाओं में पुनर्योगज DNA को किस विधि से अंतःक्षेपित किया जाता है?
उत्तर:
पौधों में बायोलिस्टिक या जीन गन से तथा जन्तुओं में माइक्रोइंजेक्शन विधि से अंतःक्षेपित किया जाता है।

प्रश्न 15.
पुनर्योगज DNA टेक्नोलॉजी के विभिन्न चरण बताइये ।
उत्तर:
DNA का विलगन, DNA का खंडन, DNA खंड का संवाहक से बंधन, पुनर्योगज DNA का परपोषी में स्थानांतरण, परपोषी कोशिकाओं का माध्यम में व्यापक स्तर पर संवर्धन व वांछित उत्पाद का निष्कर्षण।

प्रश्न 16.
DNA पृथक्करण हेतु विभिन्न कोशिकाओं को किस प्रकार तोड़कर खोलते हैं?
उत्तर:
जीवाणु कोशिकाओं को लाइसोजाइम, पादप कोशिकाओं को सेलुलेज तथा कवक कोशिकाओं को काइटिनेज एंजाइम द्वारा तोड़ा जाता है अर्थात् भित्तियों को इन एंजाइम की क्रिया से नष्ट करते हैं।

प्रश्न 17.
लाभकारी जीन का प्रवर्धन किस प्रक्रिया द्वारा होता है?
उत्तर:
प्रवर्धन पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (PCR) द्वारा होता है।

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प्रश्न 18.
पुनर्योगज प्रोटीन किसे कहते हैं?
उत्तर:
यदि कोई प्रोटीन कूटलेखन ( इनकोडिंग ) जीन किसी विषमजात (हेटेरोलोगस) परपोषी में अभिव्यक्त होता है तो उसे पुनर्योगज प्रोटीन कहते हैं।

प्रश्न 19.
बायोरिएक्टर कितने प्रकार के उपयोग में लिये जाते हैं?
उत्तर:
दो प्रकार के साधारण विलोडन हौज बायोरिएक्टर (simple stirred tank bioreactor) तथा दंड विलोडक हौज बायोरिएक्टर (sparged strirred tank bioreactor )।

प्रश्न 20.
इलेक्ट्रोफोरेसिस में क्या होता है ?
उत्तर:
DNA खंड का पृथक्करण एवं विलगन ।

प्रश्न 21.
यूरोपीय जैव प्रौद्योगिकी संघ द्वारा जैव प्रौद्योगिकी की क्या परिभाषा दी गई है ?
उत्तर:
जैव प्रौद्योगिकी-नये उत्पादों तथा सेवाओं के लिए प्राकृतिक विज्ञान व जीवों, कोशिकाओं, इसके अंग एवं आण्विक अवरूपों के समायोजन को जैव प्रौद्योगिकी कहते हैं।

प्रश्न 22.
जीवाणु कोशिका में मिलने वाले वर्तुल डी एन ए का प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर:
यह संवाहक (वेक्टर) की तरह कार्य करता है।

प्रश्न 23.
किण्वक से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यावसायिक पैमाने पर सूक्ष्मजीवियों को पैदा करने के लिए बड़े बर्तन की आवश्यकता होती है जिसे किण्वक या फरमैंटर कहते हैं ।

प्रश्न 24.
उस तकनीक का नाम लिखिए, जिसके द्वारा डीएनए खंडों को अलग कर सकते हैं।
उत्तर:
जैल वैद्युत का संचलन (Electrophoresis)

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प्रश्न 25.
क्षारक युग्मों के ऐसे अनुक्रम को क्या कहते हैं, जिसे पढ़ने के अभिविन्यास को समान रखने पर डीएनए की दोनों लड़ियों को एक जैसा पढ़ा जाता है?
उत्तर:
पैलिंड्रोम क्षारक युग्म।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विजातीय DNA के खंड को परपोषी जीवों में पहुंचाने के लिये संवाहक का विचार जैव प्रौद्योगिकी वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में कैसे आया?
उत्तर:
जैव प्रौद्योगिकी में हम जानते हैं कि प्लाज्मिड DNA संवाहक (Vector) की तरह कार्य करता है जो इससे जुड़े DNA को स्थानान्तरित करता है। यह विचार मच्छर व कीट संवाहकों से उत्पन्न हुआ। प्रायः मच्छर, कीट संवाहक के रूप में मलेरिया परजीवी को मानव शरीर में स्थानान्तरित करता है। ठीक उसी तरह से प्लाज्मिड को संवाहक के रूप में प्रयोग कर विजातीय DNA के खंड को परपोषी जीवों में पहुंचाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज एंजाइमों का नामकरण किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
इन एंजाइमों के नामकरण में परंपरानुसार नाम का पहला शब्द वंश व दूसरा एवं तीसरा शब्द प्राकेंद्रकी कोशिकाओं की जाति से लिया गया है, जिनसे ये पृथक् किए गए थे। जैसे – ईको आर I ( EαRI) एशरिशिया कोलाई RY13, ईको आर I में अक्षर ‘आर (R) ‘ प्रभेद के नाम से लिया गया है। नाम के बाद रोमन अंक उस क्रम को दर्शाते हैं जिसको जीवाणु के प्रभेद से एंजाइम पृथक् किए गए थे।

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प्रश्न 3.
पुनर्योगज DNA को जीवाणु में प्रवेश करवाने के लिये क्या विधि अपनाई जाती है?
उत्तर:
DNA जलरागी (Hydrophillic) अणु है, इस कारण यह कोशिका झिल्ली के द्वारा प्रवेश नहीं कर पाता है। अतः जीवाणु को प्लाज्मिड ग्रहण करने हेतु सक्षम बनाया जाता है। इसके लिये कैल्सियम की विशिष्ट सान्द्रता के साथ संसाधित किया जाता है जिससे DNA को जीवाणु की कोशिका भित्ति में स्थित छिद्रों से प्रवेश करने में सहायता मिलती है। इन कोशिकाओं को पुनर्योगज DNA के साथ पहले बर्फ पर रखते हैं फिर पुनर्योगज DNA को उन कोशिकाओं में बलपूर्वक प्रवेश कराया जाता है। इसके पश्चात् कोशिकाओं को कुछ समय के लिए 42° सेल्शियस (तापप्रघात) पर रखते हैं व पुनः बर्फ पर रखते हैं। इससे पुनर्योगज DNA जीवाणु में प्रवेश कर जाता है।

प्रश्न 4.
परपोषी कोशिकाओं में विजातीय DNA को प्रवेश करवाने की अन्य विधियों के विषय में बताइये ।
उत्तर:
परपोषी कोशिकाओं में विजातीय डीएनए को प्रवेश कराने हेतु अन्य विधियाँ भी हैं। जैसे सूक्ष्म अंतःक्षेपण (microinjection) विधि में पुनर्योगज डीएनए को सीधे जंतु कोशिका के केंद्रक के भीतर अंतःक्षेपित किया जाता है।

दूसरी विधि जो पौधों के लिए उपयोगी है, कोशिकाओं पर डीएनए से विलेपित, स्वर्ण या टंग्स्टन के उच्च वेग सूक्ष्म कणों से बमबारी करते हैं जिसे बायोलिस्टिक या जीन गन (Biolistics or Gene gun) कहते हैं। अंतिम विधि जिसमें अहानिकारक रोगजनक संवाहक का उपयोग किया जाता है। इन संवाहकों को जब कोशिकाओं को संक्रमित करने दिया जाता है तब ये पुनर्योगज डीएनए को परपोषी में स्थानांतरित कर देते हैं।

प्रश्न 5.
पौधों तथा जन्तुओं में जीन क्लोनिंग हेतु संवाहक सम्बन्ध में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जीवाणु व विषाणुओं से ज्ञान अर्जित कर पौधों व जन्तुओं में भी जीन क्लोनिंग करवाई गई। कुछ इस प्रकार के जीवाणु व विषाणुओं का अध्ययन किया गया जो पादप व जन्तुओं में रोगजनक पैथोजन है। उदाहरणार्थ- एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेशिएंस कई द्विबीजपत्री पौधों का रोगजनक पैथोजन है।

वह डीएनए के एक खंड जिसे ‘टी- डीएनए’ कहते हैं, को स्थानांतरित कर सामान्य पौधों की कोशिकाओं को अर्बुद (ट्यूमर) में रूपांतरित करता है और ये अर्बुद कोशिकाएँ रोगजनक के लिए जरूरी रसायनों का उत्पादन करते हैं। ठीक इसी तरह से जंतु कोशिकाओं में पश्चविषाणु ( रीट्रोवायरस) सामान्य कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं पर रूपांतरित कर देते हैं। रोगजनकों द्वारा अपने सुकेंद्रकी परपोषी में जीन स्थानांतरण की कला को अच्छी तरह से समझ कर रोगजनकों की इस विधि का उपयोग कर, अच्छे संवाहक के रूप में प्रयोग कर, मानव के लिए उपयोगी जीन का स्थानांतरण कर सकते हैं।

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एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेशियंस का टी आई (Ti) प्लाज्मिड क्लोनिंग संवाहक के रूप में अब रूपांतरित कर दिया गया है जो पौधों के लिए रोगजनक नहीं है, लेकिन इसका उपयोग अपनी अभिरुचि के जीन को अनेक पौधों में स्थानांतरित करने में किया जाता है। ठीक इसी तरह से पश्चविषाणु को अहानिकारक बनाकर जंतु कोशिकाओं में वांछित जीन को रूपांतरित करने में उपयोग किया जाता है। इस तरह से जब एक जीन या डीएनए के खंड को उचित संवाहक से जोड़ दिया जाता है तब इसे जीवाणु, पौधों व जंतु परपोषी में स्थानांतरित किया जाता है (जहाँ यह गुणित होता रहता है)।

प्रश्न 6.
क्लोनिंग के लिये ई. कोली जीवाणु को उपयुक्त परपोषी क्यों माना जाता है?
उत्तर:
क्लोनिंग के लिये ई. कोली जीवाणु को उपयुक्त परपोषी निम्न गुणों के कारण माना जाता है-

  1. यह आसानी से रूपान्तरित हो जाता है ।
  2. इसमें कार्यशील सीमाकारी एन्जाइमों का अभाव होता है।
  3. यह पुनर्योगज डी.एन.ए. की पुनरावृत्ति में सहायता करता है।
  4. इसके डी. एन. ए. की संरचना व अन्य जैव रासायनिक क्रियायें पूर्णत: ज्ञात हैं।
  5. इसके प्लाज्मिड व जीवाणुभोजियों को स्पष्ट रूप से अभिलक्षित किया जा चुका है।

प्रश्न 7.
वाहक के रूप में जीवाणुभोजी की उपयोगिता पर संक्षिप्त लेख लिखिए ।
उत्तर:
जीवाणुभोजी में सामान्य रूप से एक रैखिक डी. एन. ए. अणु पाया जाता है। इसको एक स्थान से तोड़ने पर दो खण्ड बन जाते हैं। इन दोनों खण्डों के बीच वांछित डी.एन.ए. के निवेशन से पुनर्योगज डी.एन.ए. का निर्माण हो जाता है। जीवाणुभोजी जीवाणुओं को संक्रमित कर लयन चक्र पूरा कर पुनर्योगज डी.एन.ए. की कई प्रतियाँ निर्मित कर लेता है। इस वन्य जीवाणुभोजी डी.एन.ए. में से आवश्यक भाग को हटाकर इसका पुनः निर्माण किया जाता है। इस पुनः निर्मित जीवाणुभोजी डी.एन.ए. में 20-25 Kb बाहरी DNA निवेशित किया
जाता है। कई जीवाणुभोजियों, मुख्य रूप से (लेम्डा) व M13 फाजी का वाहक के रूप में उपयोग करते हैं।

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प्रश्न 8.
उत्तम वाहक के कोई चार गुणधर्म लिखिए ।
उत्तर:
उत्तम वाहक के गुणधर्म निम्न हैं-

  1. इसका बिलगन एवं शोधन सरल एवं सुविधाजनक होना चाहिए।
  2. इसको परपोषी कोशिका में सफलतापूर्वक प्रविष्ट कराया जा सके अर्थात् इसके द्वारा रूपान्तरण दक्ष एवं सरल होना चाहिए।
  3. इसको वांछित DNA की अभिव्यक्ति करनी होती हैं। इसलिए वाहक में प्रमोटर ऑपरेटर जैसे नियामक अवयव एवं अन्य आवश्यक क्रमों का उपस्थित होना आवश्यक है।
  4. जीन रूपान्तरण के लिए वाहक में यह क्षमता होनी चाहिए कि या तो वह स्वयं या अपने DNA निवेश को परपोषी क्रोमोसोम में समाकलित कर सके।
  5. इसमें उपयुक्त रिपोर्टर जीन होने चाहिये जिससे रूपान्तरित परपोषी कोशिकाओं का आसानी से वरण किया जा सके।

प्रश्न 9.
pBR322 क्या है? इसका चित्र बनाकर वर्णन कीजिये।
उत्तर:
इस प्लाज्मिड का क्लोनिंग वाहक के रूप में उपयोग किया जाता है। इसमें p = प्लाज्मिड BR इसे बनाने वाले वैज्ञानिक बोलिवर तथा रोड्रिगन के नाम का प्रथम अक्षर तथा 322 उनके प्रयोग पर आधारित संख्या है। इनका आकार 1.5 Kb से लेकर 1500 Kb तक हो सकता है। इसमें तीन जीनों से लेकर कई हजार जीन हो सकते हैं।

इन वाहकों में 15 Kb से छोटे DNA खण्डों का ही क्लोन कर सकते हैं। इसमें दो प्रतिजीव प्रतिरोधिता जीनें पाई जाती हैं। एक जीन ऐम्पिसिलिन तथा दूसरी टेट्रासाइक्लिन में प्रतिरोधिता प्रदान करती है। इसमें अनेक विशिष्ट सीमाकारी एन्जाइमों का अभिज्ञान स्थल पाये जाते हैं। इसमें 4361 क्षार युग्म पाये जाते हैं तथा इसे शुद्ध रूप से प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 10.
पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया तथा जीन क्लोनिंग ‘तुलना कीजिए।
उत्तर:

पॉलीमरेज शृंखला अभिक्रिया (Polymerase chain reaction = PCR)जीन क्लोनिंग (Gene cloning)
1. इसमें बहुत कम DNA की आवश्यकता होती है, यहाँ तक जीन की एक प्रति भी पर्यास होती है।इसमें अधिक DNA की आवश्यकता होती है।
2. यह एक सस्ती विधि है क्योंकि इसमें महंगे प्रतिबन्धन एन्जाइम, लाइगेज व वाहक DNA की आवश्यकता नहीं होती है।इसमें इन सब की आवश्यकता होती है अतः यह एक महंगी विधि है।
3. इसमें कम समय (4-5 घन्टे) श्रम व दक्षता की आवश्यकता होती है।इसमें अधिक समय (2-4 दिन), श्रम व दक्षता की आवश्यकता होती है।
4. इसके अनेक अनुप्रयोग हैं और वर्तमान में नये अनुप्रयोग विकसित हो रहे हैं।इसके सीमित अनुप्रयोग हैं।
5. यह एक पूर्णरूप से स्वचालित विधि है।स्वचालित नहीं है।

प्रश्न 11.
आनुवंशिक अभियान्त्रिकी में प्रयुक्त कौनसे एन्जाइम आण्विक कैंची के नाम से प्रख्यात हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक का नाम व कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आनुवंशिक अभियान्त्रिकी में प्रयुक्त प्रतिबन्धन एन्जाइम (Restriction Enzyme) आण्विक कैंची के नाम से प्रख्यात है।

ये दो प्रकार के होते हैं –
1. प्रतिबंधन एक्सोन्यूक्लिएज (RestrictionExonuclease) – कार्य ये DNA के सिरे से न्यूक्लियोटाइड को अलग करते हैं।
2. प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज (Restriction Endonuclease) – कार्य ये DNA के भीतर विशिष्ट स्थलों पर काटते हैं। प्रत्येक प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज DNA अनुक्रम की लंबाई के निरीक्षण पश्चात् कार्य करता है। जब यह अपना विशिष्ट पहचान अनुक्रम पा जाता है तब यह DNA से जुड़ता है तथा द्विकुंडलिनी की दोनों लड़ियों को शर्करा – फॉस्फेट आधारस्तंभों के विशिष्ट केन्द्रों पर काटता है।

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प्रश्न 12.
पुनर्योगज डी एन ए किसे कहते हैं? परपोषी कोशिकाओं में विजातीय डी एन ए के प्रवेश करवाने की सूक्ष्म अंतःक्षेपण तथा जीन गन विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किसी एक जीव से DNA का एक खण्ड लेकर उसका दूसरे जीव के DNA के साथ संकरण करवाना पुनर्योगज DNA कहते हैं। इस तकनीक में एक जाति के DNA को दूसरी प्रजाति के DNA में प्रवेश करवा कर पुनर्योगज DNA (recombinant DNA ) प्राप्त किया जाता है।

सूक्ष्म अंतःक्षेपण (Microinjection) – इसमें DNA को प्रोटोप्लास्टों अथवा परागकणों अथवा सीधे ही विकासशील पुष्पक्रमों में दबाव के साथ अंत:क्षेपित (inject) कर प्रवेश करा दिया जाता है। जीन गन (Gene Gun) – DNA से विलोपित ( coated) स्वर्ण या टंग्स्टन के 1-3 माइक्रो मी. व्यास वाले कणों को बुलेट ( bullet) के द्वारा उच्च वेग से लक्ष्य कोशिकाओं में दाग दिया जाता है। इससे कोशिका भित्ति को भेदकर कोशिका के अन्दर प्रविष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 13.
प्रतिबन्धित एन्जाइम किसे कहते हैं? जैल वैद्युत- संचलन तकनीक से डी एन ए खण्ड के पृथक्करण एवं विलगन की प्रक्रिया समझाइए |
उत्तर:
वे एन्जाइम जो DNA को निश्चित बिन्दुओं पर काटकर उसको निश्चित आकार के छोटे-छोटे टुकड़ों में कर देते हैं, इन्हें सीमाकारी या प्रतिबंधित एन्जाइम (Restriction enzyme) कहते हैं। जैल वैद्युत संचलन (Electrophoresis ) से DNA खण्ड का पृथक्करण एवं विलगन कर सकते हैं।

DNA खण्ड ऋणात्मक आवेशिक (charged) अणु होते हैं, इसलिए इन्हें विद्युत क्षेत्र में माध्यम / आधात्री द्वारा एनोड की तरफ बलपूर्वक भेजकर अलग कर सकते हैं। इसमें ऐगारोज माध्यम का उपयोग होता है। DNA खण्डों को ऐगारोज जैल के छलनी प्रभाव द्वारा उनके आकार के अनुसार अलग करते हैं। इस कारण खण्ड जितने छोटे आकार के होंगे, वे अधिक दूर तक जायेंगे।

इथीडियम ब्रोमाइड अभिरंजित जैल को पराबैंगनी प्रकाश से अनावृत करने पर DNA की चमकीली नारंगी रंग की पट्टी दिखाई पड़ती है। DNA की पृथक्कृत पट्टियों को ऐगारोज जैल से काट कर निकालते हैं और जैल के टुकड़ों से निष्कर्षित (extract) कर लेते हैं। इस प्रकार शुद्ध किये गये DNA को क्लोनिंग संवाहक से जोड़कर, पुनर्योगज DNA निर्माण में उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 14.
आनुवंशिक इंजीनियरिंग किसे कहते हैं? पुनर्योगज डीएनए निर्माण की तकनीक समझाइए ।
उत्तर:
वह तकनीक जिसमें एक जाति के DNA को दूसरी प्रजाति के DNA में प्रवेश करवा कर पुनर्योजी DNA (recombinant (DNA) प्राप्त किया जाता है, आनुवंशिक इंजीनियरिंग कहते हैं। आनुवंशिक इंजीनियरिंग में जीन क्लोनिंग एवं जीन स्थानांतरण का उपयोग कर पुनर्योगज डीएनए का निर्माण किया जाता है। प्रथम पुनर्योगज DNA का निर्माण सालमोनेला टाइफीमूरियम के प्लाज्मिड में प्रतिजैविक प्रतिरोधी कूटलेखन जीन के जुड़ने से हुआ था।

स्टेनले कोहेन व हरबर्ट बोयर ने 1972 में यह कार्य प्लाज्मिड से DNA का टुकड़ा काटकर सम्पन्न किया, जिसमें प्रतिजैविक प्रतिरोध प्रदान करने के लिए जिम्मेदार जीन थी। आणविक कैंची कहे जाने वाले ‘प्रतिबंधन एन्जाइम’ (Restriction Enzyme) की खोज से DNA को विशिष्ट जगहों पर काटना संभव हो सका। कटे हुए DNA का भाग प्लाज्मिड DNA से जोड़ा जाता है।

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यह प्लाज्मिड DNA संवाहक ( vector) की भांति कार्य करता है जो इससे जुड़े DNA को स्थानांतरित करता है। प्रतिजैविक प्रतिरोधी जीन को संवाहक के साथ जोड़ने का काम एंजाइम DNA लाइगेज के द्वारा होता है जो DNA अणु के कटे हुए भाग पर कार्य कर उसके किनारों को जोड़ने का काम करता है। इस संयोजन से पात्रे ( in vitro) नये गोलाकार स्वतः प्रतिकृति बनाने वाले DNA का निर्माण होता है जिसे पुनर्योगज DNA कहते हैं। जब यह DNA एशरिकिआ कोलाई में स्थानांतरित किया जाता है तो यह नए परपोषी के DNA पॉलीमरेज एंजाइम का उपयोग कर अनेक प्रतिकृतियाँ बना लेता है।

प्रश्न 15.
बायोरिएक्टर क्या है? इसकी कार्यप्रणाली समझाइए ।
उत्तर;
लगभग सभी पुनर्योगज प्रौद्योगिकियों का मुख्य उद्देश्य वांछित प्रोटीन का उत्पादन करना होता है। इसके लिए वांछित जीन को क्लोन करने, लक्ष्य प्रोटीन की अभिव्यक्ति को प्रेरित करने वाली परिस्थितियों को अनुकूलतम बनाने के पश्चात् इनका व्यापक स्तर पर उत्पादन सम्भव है। लाभकारी जीनों को आश्रय देने वाली कोशिकाओं का छोटे पैमाने पर प्रयोगशाला में वर्धन किया जा सकता है।

संवर्धन को वांछित प्रोटीन का निष्कर्षण कर पृथक्करण की विभिन्न विधियों का प्रयोग कर प्रोटीन का शोधन कर सकते हैं। कोशिकाओं को सतत संवर्धन तंत्र में गुणित कर सकते हैं, जिसमें उपयोग किये गये माध्यम को एक तरफ से निकालकर दूसरी तरफ से ताजा माध्यम को भरते हैं ताकि कोशिकाएँ अपने क्रियात्मक रूप से सर्वाधिक सक्रिय लॉग (exponential) प्रावस्था में बनी रहें।

यह संवर्धन विधि अधिक जैव मात्रा के उत्पादन में वांछित प्रोटीन के अधिक उत्पादन हेतु उपयोगी है। इन उत्पादों के अधिक मात्रा में उत्पादन हेतु बायोरिएक्टर का उपयोग किया जाता है। बायोरिएक्टर एक बर्तन के समान होते हैं, जिसमें सूक्ष्मजीवों, पौधों, जन्तुओं व मानव कोशिकाओं का उपयोग करते हुए कच्चे माल को जैव रूप से विशिष्ट उत्पादों व्यष्टि एन्जाइम आदि में परिवर्तित किया जाता है। बायोरिएक्टर वांछित उत्पाद प्राप्त करने के लिए अनुकूलतम परिस्थितियाँ उपलब्ध करता है।

तापमान, PH, क्रियाधार, लवण, विटामिन, ऑक्सीजन आदि वृद्धि हेतु अनुकूलतम परिस्थितियाँ हैं । प्रायः विलोडन ( stirring) प्रकार का बायोरिएक्टर सर्वाधिक उपयोग में लाया जाता है। विलोडित हौज बायोरिएक्टर (stirred tank bioreacter) बेलनाकार होते हैं। इसके आधार घुमावदार होने से बायोरिएक्टर के अंदर अंतर्वस्तु के मिश्रण में सहायता मिलती है। बायोरिएक्टर में ऑक्सीजन की उपलब्धता तथा मिश्रण मिलाने की विलोडन ( stirrer ) सुविधा होती है। एकान्तर में बायोरिएक्टर में हवा बुलबलों के रूप में भेजी जाती है।

बायोरिएक्टर में एक प्रक्षोभक तंत्र (agitator system), ऑक्सीजन प्रदाय तंत्र, झाग नियंत्रण तंत्र, पीएच नियंत्रण तंत्र, तापक्रम नियंत्रण तंत्र व प्रतिचयन प्रद्वार (sampling ports ) लगा होता है जिससे संवर्धन की थोड़ी मात्रा समय-समय पर निकाली जा सकती है।

प्रश्न 16.
जीन क्लोनिंग में एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस के कार्य को समझाइए ।
उत्तर:
जीन क्लोनिंग में एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस का उपयोग होता है। वैसे एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस अनेक द्विबीजपत्री पौधों का रोगजनक पैथोजन है। यह DNA के एक खण्ड जिसे ‘टी. डीएनए’ कहते हैं, को स्थानान्तरित कर सामान्य पौधों की कोशिकाओं को अर्बुद (Tumor ) में रूपान्तरित करता है और ये अर्बुद कोशिकाएँ रोगजनक के लिए आवश्यक रसायनों का उत्पादन करते हैं। इसी आधार पर एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस का टीआई (Ti) प्लाज्मिड क्लोनिंग संवाहक के रूप में अब रूपान्तरित कर दिया गया है जो पौधों के लिए रोगजनक नहीं है, परन्तु इसका उपयोग अपनी अभिरुचि के जीन को अनेक पौधों में स्थानान्तरित करने में किया जाता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आनुवंशिक अभियान्त्रिकी को परिभाषित कीजिए । इसके प्रमुख चरणों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर:
आनुवंशिक अभियान्त्रिकी (Genetic Engineering)-इस तकनीक द्वारा आनुवंशिक पदार्थों (डी.एन.ए. या आर.एन.ए.) के रसायन में परिवर्तन कर इसे परपोषी जोवों में प्रवेश कराकर इसके समलक्षणी (फीनोटाइप) में परिवर्तन करते हैं।

आनुवंशिक अभियांत्रिकी के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं –
(1) वांछित जीन अथवा लक्ष्य जीन की पहचान व पृथक्करण किसी भी जीन का चयन उसकी उपयोगिता पर निर्भर करता है। वैज्ञानिकों का उद्देश्य सूक्ष्मजीवों के जीनों का उपयोग कर मानव के लिए आवश्यक हार्मोन का संश्लेषण करना, रोगों का निदान करना, आवश्यक एन्जाइमों, विटामिन, ऐन्टीबायोटिक का उत्पादन बढ़ाना, ऐसे सूक्ष्म जीव उत्पन्न करना जो उपयोगी पौधों को शाकनाशी एवं कीटनाशियों के प्रभाव से बचा सकें। उच्च श्रेणी के पौधों की प्रकाश संश्लेषण की दक्षता बढ़ाना, लेग्यूमिनोसी कुल के अतिरिक्त अन्य पौधों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता विकसित करना, फसल की पैदावार एवं पोषणिक मान बढ़ाना आदि हो सकते हैं। अतः वांछित DNA का चयन उद्देश्य पर निर्भर करता है।

वांछित डी. एन. ए. तीन प्रकार का होता है –

  1. जीनोमिक DNA
  2. C – DNA
  3. संश्लेषित DNA

क्लोनिंग के लिए वांछित जीन की पहचान कर उसे पृथक् करने का कार्य सीमाकारी एन्जाइम द्वारा किया जाता है।
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(2) पुनर्योगज DNA ( Recombinant DNA = r.DNA) या काइमेरिक DNA (Chimeric DNA ) का निर्माण – इस चरण में पृथक् की गई वांछित जीन को वाहक DNA के साथ जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया DNA लाइगेज नामक एन्जाइम द्वारा उत्प्रेरित होती है। यह एन्जाइम प्रत्येक कोशिका में संश्लेषित होता है। वांछित जीन वाहक DNA में जोड़ने से पुनर्योगज DNA का निर्माण हो जाता है।

(3) पुनर्योगज DNA का परपोषी कोशिका अथवा ग्राही कोशिका में स्थानान्तरण- पुनर्योगज DNA का जीवाणु कोशिका में प्रवेश रूपान्तरण क्रिया द्वारा किया जाता है। इस हेतु पुनर्योगज DNA को जीवाणु कोशिकाओं के साथ 37-43°C वाले उष्ण विलयन में स्थानान्तरित कर इन्हें ताप प्रघात दिया जाता है जिससे r DNA जीवाणु कोशिका में प्रवेश कर जाता है।

यूकैरियोटिक जीन स्थानान्तरण के लिए यीस्ट कोशिकाओं तथा वाहक के रूप में यीस्ट प्लाज्मिड का उपयोग करते हैं। पादप कोशिकाओं में जीन स्थानान्तरण के लिए एग्रोबैक्टिरियम के Ti एवं Ri प्लाज्मिड का उपयोग होता है। संवर्धित माध्यम की कोशिकाओं में पुनर्योजी DNA का स्थानान्तरण ट्रांसफेक्शन के द्वारा किया जाता है।

(4) पुनर्योगज DNA युक्त परपोषी कोशिकाओं का चयन एवं गुणन निवेशित जीन की सफलता जानने के लिए सामान्यतः प्रतिजैविकों के लिए प्रतिरोधकता प्रदान करने वाली जीनों को चिन्हक जीनों के रूप में उपयोग किया जाता है। ये ऐम्पिसिलिन, टेट्रासाइक्लिन, केनामाइसिन आदि प्रतिजैविकों के लिए प्रतिरोधी जीन हो सकती हैं।

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जिन कोशिकाओं में क्लोनित जीन की उपस्थिति का परीक्षण करना हो उनका संवर्धन उपर्युक्त प्रतिजैविकों युक्त माध्यम में किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि ऐम्पिसिलिन के प्रतिरोधी जीन चिन्हक के रूप में प्रयोग की गई है और पुनर्योगज DNA युक्त कोशिकाएँ ऐम्पिसिलिन माध्यम में वृद्धि करती हैं तो इसका तात्पर्य है कि क्लोनित जीन ठीक स्थान पर निवेशित हुई ।

इसके विपरीत यदि इस माध्यम में कोशिकाओं की वृद्धि नहीं होती है तो निश्चित ही पुनर्योगज DNA में क्लोनित जीन ठीक स्थान पर निवेशित नहीं हुई है। चयनित जीवाणु कोशिकाओं को ठोस माध्यम पर संवर्धित किया जाता है। जहाँ प्लाज्मिड युक्त जीवाणुओं की कालोनियां बन जाती हैं, जीवाणु कोशिका में वृद्धि के साथ-साथ वांछित जीन की संख्या में भी वृद्धि हो जाती है। इस क्रिया को क्लोनिंग कहते हैं।

(5) चयनित क्लोनों से वांछित जीन की ग्राही कोशिका में अभिव्यक्ति – चयनित पुनर्योगज कोशिकाओं व निवहों को विलगित कर वांछित उद्देश्य के अनुसार उपयोग किया जाता है। इन्हें वांछित प्रोटीन के संश्लेषण के लिए संवर्धित करते हैं। आवश्यकतानुसार इन जीनों को विभिन्न माध्यमों द्वारा जीवाणु, या यीस्ट, पादप व जन्तुओं में स्थानान्तरित किया जाता है।

इस तरह वांछित जीनों को अन्य जीवों में स्थानान्तरित कर इन जीवों को वांछित कार्य करने के लिए तैयार कर लिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी पादप में रोगाणु प्रतिरोधी जीन का निवेशन करवाया जाता है तो वह पादप रोग के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. एक वेक्टर में सहलग्नी डी. एन. ए. की प्रति की संख्या को नियंत्रित करने वाले अनुक्रम को क्या कहा गया है? (NEET 2020)
(अ) ओरी साइट
(ब) पेलीड्रोमिक अनुक्रम
(स) रिकॉग्नीशन (पहचान ) साइट
(द) चयनयुक्त मार्कर
उत्तर:
(अ) ओरी साइट

2. जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस में पृथक् हुए डी.एन.ए. के खण्डों को किसकी सहायता से देखा जा सकता है? (NEET-2020)
(अ) UV विकिरण में एथिडियम ब्रोमाइड से
(ब) UV विकिरण में एसीटोकार्यिन से
(स) अवरक्त विकिरण में एथिडियम ब्रोमाइड
(द) चमकीले नीले प्रकाश में एसीटाकार्यिन से
उत्तर:
(अ) UV विकिरण में एथिडियम ब्रोमाइड से

3. प्रतिबंधन एंजाइमों के विषय में गलत कथन को पहचानिए- (NEET-2020)
(अ) ये डी.एन.ए. की लड़ी को पैलिन्ड्रोमिक स्थलों पर काटते हैं
(ब) ये आनुवंशिक इंजीनियरिंग में उपयोगी हैं।
(स) चिपचिपे सिरे डी. एन. ए. लाइगेज द्वारा जोड़े जा सकते हैं।
(द) प्रत्येक प्रतिबंधन एंजाइम डी.एन.ए. क्रम की लम्बाई का निरीक्षण करके कार्य करते हैं।
उत्तर:
(स) चिपचिपे सिरे डी. एन. ए. लाइगेज द्वारा जोड़े जा सकते हैं।

4. निम्नलिखित में से सही युग्म को चुनिए-( NEET 2020 )
(अ) पॉलिमरेज डी.एन.ए. को खण्डों में तोड़ता है
(ब) न्यूक्लियेज डी.एन.ए. के दो रज्जुकों को पृथक् करता है
(स) एक्सोन्यूक्लियेज डी.एन.ए. में विशिष्ट स्थानों पर काट लगाता है।
(द) लाइगेज दो डी.एन.ए. के अणुओं को जोड़ता है।
उत्तर:
(द) लाइगेज दो डी.एन.ए. के अणुओं को जोड़ता है।

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5. इको आर I द्वारा पहचाने जाने वाला पैलिन्ड्रोमिक क्रम है-(NEET-2020)
(अ) 5′ GGACC – 3′
3′ CCTTGG – 5′
(ब) 5′- CTTAAG – 3′
3′ – GAATTC – 5′
(स) 5′-GGATCC -3′
3′ CCTAGG – 5′
(द) 5′ GAATTC – 3′
3′ CTTAAG – 5′
उत्तर:
(द) 5′ GAATTC – 3′
3′ CTTAAG – 5′

6. जैव जीवाणुओं के एक मिश्रण में किससे उपचार करके डी.एन.ए. अवक्षेपण को प्राप्त किया जा सकता है? (NEET-2019)
(अ) शीतित क्लोरोफार्म से
(ब) आइसोप्रोपेनॉल से
(स) शीतित इथेनॉल से
(द) कमरे के तापमान पर मिथेनॉल से
उत्तर:
(स) शीतित इथेनॉल से

7. पॉलिमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (PCR) में चरणों का सही क्रम क्या है? (NEET-2018)
(अ) विकृतिकरण, विस्तारण, अनीलन
(ब) अनीलन, विस्तारण, विकृतिकरण
(स) विस्तारण, विकृतिकरण, अनीलन
(द) विकृतिकरण, अनीलन, विस्तारण
उत्तर:
(द) विकृतिकरण, अनीलन, विस्तारण

8. एमरोज जैल में पृथक् हुए डी.एन.ए. खण्ड को किसके अभिरंजन के बाद देखा जा सकता है? (NEET-2017)
(अ) ब्रोमोफिनोल ब्ल्यू
(ब) एसिटोकार्यिन
(स) एनिलीन ब्ल्यू
(द) इथिडियम ब्रोमाइड
उत्तर:
(द) इथिडियम ब्रोमाइड

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9. डी. एन. ए. के खण्ड कैसे होते हैं?
(अ) धनात्मक आवेशित
(ब) ऋणात्मक आवेशित
(स) उदासीन
(द) वे अपने आमाप के अनुसार धनात्मक या ऋणात्मक आवेशित हो सकते हैं।
उत्तर:
(ब) ऋणात्मक आवेशित

10. बाजार में भेजने से पहले अभिव्यक्त प्रोटीन के पृथक्करण और शुद्धिकरण की प्रक्रिया को क्या कहा जाता है? (NEET-2017)
(अ) प्रतिप्रवाह प्रक्रमण
(ब) अनुप्रवाह प्रक्रमण
(स) जैव प्रक्रमण
(द) पश्च उत्पादन प्रक्रमण
उत्तर:
(ब) अनुप्रवाह प्रक्रमण

11. एक ही प्रतिबंधन एण्डोन्यूक्लिएज से काटे गये एक विजातीय DNA और प्लाज्मिड को पुनर्योगज प्लाज्मिड बनाने के लिए जिसका उपयोग करके इन्हें जोड़ा जा सकता है- (NEET II-2016)
(अ) पॉलिमरेज-III
(ब) लाइगेज
(स) EαRI
(द) टेक पॉलिमरेज
उत्तर:
(ब) लाइगेज

12. DNA को विशिष्ट स्थानों पर काट देना किसके आविष्कार से सम्भव हुआ? (NEET-2016)
(अ) प्रोब्स
(स) लाइगेज
(ब) सलैक्टेबल मार्करस
(द) रेस्ट्रिक्शन एंजाइम
उत्तर:
(द) रेस्ट्रिक्शन एंजाइम

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13. निम्नलिखित में से कौनसा प्रतिबंधित एंजाइम कुंठित सिरे उत्पन्न करता है? (NEET-2016)
(अ) Xαl
(ब) Hind III
(स) Sal I
(द) EαRV
उत्तर:
(द) EαRV

14. DNA अंगुलिछापी की किसी भी तकनीक के लिए निम्नलिखित में से किसी एक की आवश्यकता नहीं होती? ( NEET – 2016 )
(अ) प्रतिबंधित एन्जाइम
(ब) DNA-DNA संकरण
(स) पॉलिमरेज श्रृंखला अभिक्रिया
(द) जिंक अंगुलि विश्लेषण
उत्तर:
(ब) DNA-DNA संकरण

15. उस DNA को क्या कहते जिसमें क्लोनिंग के लिए रूचि वाली जीन को समाकलित किया जाता है? (NEET-2015)
(अ) टेम्पलेट
(ब) वेक्टर
(स) करियर
(द) रूपान्तरक
उत्तर:
(ब) वेक्टर

16. कौनसा संवाहक DNA के केवल एक छोटे टुकड़े को क्लोन कर सकता है? (NEET-2014)
(अ) जीवाणु का कृत्रिम गुणसूत्र
(ब) यीस्ट का कृत्रिम गुणसूत्र
(स) प्लाज्मिड
(द) कॉस्मिड
उत्तर:
(स) प्लाज्मिड

17. मानव जीनोम अनुक्रमण के लिए आमतौर पर प्रयुक्त वेक्टर है- (NEET-2014)
(अ) T-DNA
(ब) बी.ए.सी. और बाई. ए.सी.
(स) अभिव्यक्ति वेक्टर
(द) T/A क्लोनिंग वेक्टर
उत्तर:
(ब) बी.ए.सी. और बाई. ए.सी.

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18. जीव और उसकी कोशिका भित्ति निम्नकारक एंजाइम के लिए निम्नलिखित में से कौन सही सुमेलित नहीं है? (NEET-2013)
(अ) जीवाणु – लाइसोजाइम
(ब) पादप कोशिकाएँ – सेलुलोज
(स) शैवाल मिथाइलेज
(द) कवक काइटीनेज
उत्तर:
(स) शैवाल मिथाइलेज

19. बायोलिस्टिक (जीन गोलाबारी) किसके लिए उपयुक्त है? (NEET-2012)
(अ) रोगजनक संवाहकों को निष्क्रिय करना
(ब) पादप कोशिकाओं का रूपान्तरण
(स) संवाहकों के साथ जोड़कर पुनर्योग्ज DNA का बनाना
(द) DNA फिंगर प्रिंटिंग
उत्तर:
(ब) पादप कोशिकाओं का रूपान्तरण

20. EαRI क्लोनिंग वेक्टर pBR322 के दिये जा रहे आरेखिये प्रतिदर्श में निम्नलिखित में से किस एक विकल्प के भाग को सही पहचान की गई है? [CBSE PMT] (Pre) – 2012, NEET-2012)
(अ) Ori-मूल कर्तन एंजाइम
(ब) rop घट गयी परासरणी दाब
(स) Hind III EcoRI चयनशील
(द) amp tet ऐन्टीबायोटिक प्रतिरोधी जीन
उत्तर:
(द) amp tet ऐन्टीबायोटिक प्रतिरोधी जीन

21. रूपान्तरण हेतु DNA से लेपित सूक्ष्म कण जिनको “जीन गन” से दागा जाता हो, किसके बने होते हैं? ” (NEET-2012)
(अ) रजत अथवा प्लेटिनम
(ब) प्लेटिनम अथवा जिंक
(स) सिलिकॉन अथवा प्लेटिनम
(द) स्वर्ण अथवा टंगस्टन
उत्तर:
(द) स्वर्ण अथवा टंगस्टन

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22. एक कोई रोगी जो अनुमानतः एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंसी सिन्ड्रोम (उपार्जित प्रतिरक्षा न्यूनता संलक्षण) से पीड़ित है इसकी पहचान के लिए आप कौनसी निदान तकनीक की सलाह देंगे? (NEET-2012)
(अ) एलिसा
(ब) एम.आर.आई.
(स) अल्ट्रासाउण्ड
(द) विडाल
उत्तर:
(अ) एलिसा

23. निम्न में से कौनसी एक तकनीक आनुवंशिकी अभियांत्रिक जीवित जीवों को सम्भव बनाती है? (CBSE PMT Mains 2011, NEET 2011 )
(अ) संकरण
(ब) पुर्नसंयोजित DNA तकनीक
(स) X किरण परावर्तन
(द) भारी समस्थानिकों द्वारा चिन्हित करना
उत्तर:
(ब) पुर्नसंयोजित DNA तकनीक

24. अनुषंगी DNA किस एक क्षेत्र में उपयोगी साधन होता है ? (NEET-2010)
(अ) लिंग निर्धारण
(ब) फोरेन्सिक विज्ञान
(स) आनुवंशिक इंजीनियरिंग
(द) अंग प्रतिरोपण
उत्तर:
(ब) फोरेन्सिक विज्ञान

25. DNA प्रतिलिपिकरण के लिये आवश्यकता होती है- (CBSE-2010)
(अ) DNA पॉलीमरेज की
(ब) DNA लाइगेज की
(स) DNA पॉलीमरेज तथा DNA लाइगेज की
(द) ट्रांसलोकेज तथा RNA पॉलीमरेज की
उत्तर:
(स) DNA पॉलीमरेज तथा DNA लाइगेज की

26. प्रतिबन्धन एन्जाइम (Restriction enzyme ) – (RPMT-2010)
(अ) संवाहक हीन प्रत्यक्ष जीन के अन्तरण में सहायक होते हैं।
(ब) DNA खंडों को काटते या जोड़ते हैं
(स) एण्डोन्यूक्लिवेज होते हैं, जो DNA को विशेष स्थलों पर विदलित करते हैं
(द) विद्यमान DNA या RNA को पूरक DNA बनाते हैं।
उत्तर:
(स) एण्डोन्यूक्लिवेज होते हैं, जो DNA को विशेष स्थलों पर विदलित करते हैं

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27. जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस (Gel electrophoresis ) का प्रयोग होता है- (RPMT-2010)
(अ) DNA अणु के विगलन के लिये
(ब) DNA को खण्डों में काटने के लिये
(स) DNA अणुओं को उनके आकार के अनुसार पृथक् करने के लिए
(द) क्लोनकारी संवाहक को जोड़कर पुनर्योगज DNA निर्माण के लिए
उत्तर:
(स) DNA अणुओं को उनके आकार के अनुसार पृथक् करने के लिए

28. आनुवंशिकी अभियांत्रिकी में ‘आण्विक कैंची’ की तरह उपयोग किया जाता है- (KCET 2000; WBJWW-2009)
(अ) DNA पॉलीमरेज
(ब) DNA लाइगेज
(स) हेलिकेज
(द) रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज
उत्तर:
(द) रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज

29. निम्नलिखित में से किस एक विजातीय DNA को फसली पौधों में डलने के लिए सामान्यतः उपयोग में लाया जाता है? (NEET-2009)
(अ) पेनिसीलियम एम्सपैसम
(ब) ट्राइकोडर्मा हरजिएनम
(स) मेलॉयडोगाइन एन्कोनिआ
(द) एप्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस
उत्तर:
(द) एप्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस

30. ऐन्टीबायोटिक प्रतिरोध जीन का प्लाज्मिड वाहक के साथ जोड़ा जा सकना किससे सम्भव हुआ? (CBSE PMT 2008, NEET 2008)
(अ) DNA पॉलीमरेजों से
(ब) एक्सोन्यूक्लिऐजों से
(स) DNA लाइगेज से
(द) एण्डोन्यूक्लिएजों से
उत्तर:
(स) DNA लाइगेज से

31. शाकनाशी- प्रतिरोधी आनुवंशिकता : रूपान्तरित (GM) फसलों के उत्पाद / उपयोग का मुख्य उद्देश्य क्या है? (CBSE PMT-2008, NEET-2008)
(अ) पर्य- प्रेमी शाकनाशियों को बढ़ावा देना
(ब) स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए खाद्य वस्तओं में शाकनाशी का संचयन कम करना
(स) मानव श्रम का उपयोग किए बिना ही खेत से खरपतवारों का सफाया कर देना
(द) बिना शाकनाशियों का उपयोग किए ही खेत से खरपतवारों को दूर कर देना
उत्तर:
(ब) स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए खाद्य वस्तओं में शाकनाशी का संचयन कम करना

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32. pBR322 वाहक में किसके प्रति प्रतिरोधक जीन होती है- (CBSE PMT-2006)
(अ) एम्पीसिलिन
(ब) टेट्रासाइक्लिन
(स) उपर्युक्त दोनों
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(स) उपर्युक्त दोनों

33. प्रतिबन्धन एन्डोन्यूक्लिएज काटता है- (Haryana PMT-2006)
(अ) DNA के दोनों रज्जुकों को
(ब) एक DNA रज्जु को विशिष्ट स्थल पर
(स) DNA के दोनों रज्जुओं को किसी भी स्थल पर
(द) एकल रज्जुकी RNA को किसी भी स्थान पर
उत्तर:
(अ) DNA के दोनों रज्जुकों को

34. आनुवंशिक अभियांत्रिकी में प्रयोग होने वाले दो महत्त्वपूर्ण जीवाणु हैं- (CBSE PMT 2006 )
(अ) नाइट्रोबैक्टर एवं एजेटोबैक्टर
(ब) राइजोबियम एवं डिप्लोकोकस
(स) नाइट्रोसोमोनॉस एवं कैलिबसिल्ला
(द) इश्वीरिचिया एवं एग्रोबैक्टिरियम
उत्तर:
(द) इश्वीरिचिया एवं एग्रोबैक्टिरियम

35. प्लाज्मिड (Plasmid ) है, एक ( Haryana PMT-2006)
(अ) जीवाणु
(ब) कवक
(स) प्लाज्मा झिल्ली का एक भाग
(द) जीवाणु कोशिका में अतिरिक्त गुणसूत्रीय DNA
उत्तर:
(द) जीवाणु कोशिका में अतिरिक्त गुणसूत्रीय DNA

36. प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज का प्रयोग पुनर्योगज DNA तकनीक में व्यापक रूप से किया जाता है। ये प्राप्त किये जाते हैं- (KCET-2006)
(अ) प्लाज्मिड से
(ब) सभी प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं से
(स) जीवाणुभोजी से
(द) जीवाणु कोशिका से
उत्तर:
(द) जीवाणु कोशिका से

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37. पारजीनी जीवों में लक्ष्य ऊतक में पारजीन की अभिव्यक्ति किसके द्वारा निर्धारित होती है ?
(अ) पारजीन (ट्रांसजीन)
(ब) रिपोर्टर द्वारा
(स) संवाहक (रिपोर्टर)
(द) संवृद्धिकर (एन्हेंसर) में ट्रांसजीन की ट्रांसजेनिक
उत्तर:
(स) संवाहक (रिपोर्टर)

38. लक्ष्य ऊतक (Target tissue) अभिव्यक्ति निर्धारित होती है-(NEET-2004)
(अ) इन्हेन्सर द्वारा
(ब) उन्नायक (प्रमोटर )
(स) प्रमोटर द्वारा
(द) ट्रांसजीन द्वारा
उत्तर:
(ब) उन्नायक (प्रमोटर )

39. आनुवंशिक पदार्थ पृथक् करने के लिए एन्जाइम का उपयोग होता है- (APMC-2004)
(अ) हाइड्रोलेज
(ब) एमाइलेज
(स) लाइगेज
(द) रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज
उत्तर:
(द) रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज

40. निम्नलिखित में से कौनसा एक जीवाणु पौधों में आनुवंशिक इंजीनियरिंग में सर्वाधिक उपयोग में लाया जाता है? (NEET-2003)
(अ) क्लास्ट्रिडियम सेप्टिकम
(ब) जेन्थेमोनास बिट्राइ
(स) बेसिलस कोएगुलेन्स
(द) एग्रोबैक्टिरियम ट्यूमीफेसिएन्स
उत्तर:
(द) एग्रोबैक्टिरियम ट्यूमीफेसिएन्स

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41. किसकी खोज के कारण आनुवंशिक अभियांत्रिकी में DNA का तोड़-फोड़ सम्भव हो सका ? (NEET-2002)
(अ) रेस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज
(ब) DNA लाइगेज
(स) ट्रांसक्रिप्टेज
(द) प्राइमेज
उत्तर:
(अ) रेस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज

42. अभी तक खोजे गये प्लाज्मिड्स में अधिकतम क्षारकों की संख्या (MP PMT-2000)
(अ) 50 किलो बेस
(ब) 500 किलो बेस
(स) 5000 किलो बेस
(द) 5 किलो बेस अभियान्त्रिकी में प्रयुक्त होता
उत्तर:
(ब) 500 किलो बेस

43. निम्न में से कौन-सा आनुवंशिक (NEET-2001)
(अ) RNA पॉलीमरेज
(ब) DNA पॉलीमरेज’
(स) प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज
(द) न्यूक्लिएज
उत्तर:
(स) प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज

44. निम्न में से किसके द्वारा पादपों और जन्तुओं को इच्छित (desired) लक्षणों के साथ प्रजनन करना सम्भव है- (KCET-1994)
(अ) आनुवंशिक इंजीनियरिंग द्वारा
(ब) गुणसूत्र इंजीनियरिंग द्वारा
(स) आइकेबाना विधि द्वारा
(द) ऊतक संवर्धन द्वारा
उत्तर:
(अ) आनुवंशिक इंजीनियरिंग द्वारा

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-
1. मनुष्य के अगुणित डी.एन.ए. में कितने क्षार युग्म होते हैं?
(अ) 5.5 × 107
(ब) 4.6 × 106
(स) 3.3 × 109
(द) 6.3 × 108
उत्तर:
(स) 3.3 × 109

2. केन्द्रक में मिलने वाले अम्लीय पदार्थ डी.एन.ए. की खोज किसने की थी?
(अ) फ्रेडरीच मेस्वर
(ब) राबर्ट हुक
(स) वाटसन क्रिक
(द) राबर्ट ब्राउन
उत्तर:
(अ) फ्रेडरीच मेस्वर

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

3. डी.एन.ए. का वह खण्ड जो आर. एन. ए. का कूटलेखन करता है, उसे कहते हैं-
(अ) रज्जुक
(ब) क्रोमोसोम
(स) जीन
(द) इंट्रान
उत्तर:
(स) जीन

4. फिंगर प्रिंट के लिए निम्न में से किसका DNA का सैम्पल लिया जाता है-
(अ) कपड़ों पर लगे वीर्य
(ब) योनि स्राव
(स) बाल या मृत व्यक्ति के बाल
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

5. मानव में लगभग 1.4 करोड़ जगहों पर अलग इकहरा क्षार पाया जाता है जिसे कहते हैं-
(अ) स्निप्स
(ब) पिनिप्स
(स) जिनीप्स
(द) टिनिप्स
उत्तर:
(अ) स्निप्स

6. मानव में ज्ञात सबसे बड़ी जीन डिसट्राफिन (Distraphin) में कितने करोड़ क्षार पाए जाते हैं-
(अ) 2.4 करोड़
(ब) 3.4 करोड़
(स) 4.4 करोड़
(द) 5.4 करोड़
उत्तर:
(अ) 2.4 करोड़

7. गुणसूत्रों के एक अगुणित समुच्चयी (Haploid set ) को क्या कहते हैं?
(अ) अनुलेखन
(ब) आनुवंशिक कूट
(स) लैक ओपेरॉन
(द) जीनोम
उत्तर:
(द) जीनोम

8. डी.एन.ए. में अनुलेखन इकाई का भाग नहीं है-
(अ) उन्नायक (प्रमोटर )
(ब) संरचनात्मक जीन
(स) समापक
(द) लैक ओपेरॉन ।
उत्तर:
(द) लैक ओपेरॉन ।

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9. पहला आनुवांशिक पदार्थ था-
(अ) DNA
(ब) RNA
(स) प्रोटीन
(द) CSC
उत्तर:
(ब) RNA

10. आर.एन.ए. के रासायनिक रूपांतरण से किसका विकास हुआ-
(अ) tRNA
(ब) mRNA
(स) rRNA
(द) DNA
उत्तर:
(द) DNA

11. फ्रेडेरिक ग्रिफीथ (1928) ने स्ट्रेप्टोकोकस नीमोनी किस रोग के लिए जिम्मेदार माना-
(अ) हैजा
(ब) निमोनिया
(स) टीबी
(द) टॉयफाइड
उत्तर:
(ब) निमोनिया

12. ‘न्यूक्लिन’ नाम किस वैज्ञानिक ने दिया?
(अ) मेण्डल ने
(ब) हर्ष ने
(स) ओसवाल्ड एवेरी ने
(द) फ्रेडरीच मेस्चर ने।
उत्तर:
(द) फ्रेडरीच मेस्चर ने।

13. निम्न में से किसे पालिन्यूक्लिओटाइड एंजाइम कहते हैं?
(अ) पॉलीमरेज- I
(ब) पॉलीमरेज- II
(स) लाइगेज
(द) राइबोन्यूक्लिएज
उत्तर:
(स) लाइगेज

14. न्यूक्लिओसाइड न्यूक्लिोटाइड से भिन्न होता है, क्योंकि इसमें नहीं होता-
(अ) फास्फेट
(ब) शर्करा
(स) नाइट्रोजन क्षारक
(द) फास्फेट व शर्करा
उत्तर:
(अ) फास्फेट

15. 64 कोडोन्स में से 61 कोडोन्स 20 अमीनो अम्ल को कोड करते हैं, यह कहलाता है-
(अ) कोडोन की वॉवलिंग
(ब) जीन का अतिव्यापन
(स) कोडोन की सार्वभिकता
(द) जेनिटिक कोड का ह्रास
उत्तर:
(द) जेनिटिक कोड का ह्रास

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16. संरचनात्मक जीन्स की क्रिया किसके द्वारा नियंत्रित होती है –
(अ) आपरेटर
(ब) प्रमोटर
(स) लाइगेज
(द) रेग्यूलेटरी जीन ।
उत्तर:
(अ) आपरेटर

17. DNA का अनुलेखन (Transcription ) किसके द्वारा सहायक होता है?
(अ) RNA पॉलीमरेज
(ब) DNA पॉलीमरेज
(स) एक्सोन्यूक्लिएज
(द) रीकाम्बीनेज
उत्तर:
(अ) RNA पॉलीमरेज

18. ओकाजाकी खण्ड किस समय दिखाई देते हैं-
(अ) प्रतिलिपिकरण (Replication)
(ब) पारक्रमण (Transduction )
(स) ट्रांसक्रिप्शन (Transcription)
(द) अनुलिपिकरण (Translation)
उत्तर:
(अ) प्रतिलिपिकरण (Replication)

19. DNA का एक्सरे क्रिस्टलोग्राफी द्वारा अध्ययन करने वाले थे-
(अ) गिफिथ
(ब) वाटसन एवं क्रिक
(स) विलकिन्स
(द) मैकलिन्टॉक
उत्तर:
(स) विलकिन्स

20. आनुवंशिक कूट होते हैं-
(अ) एकक
(ब) द्विक
(स) त्रिक
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) त्रिक

21. आनुवंशिक कूट का वहन करने वाले हैं-
(अ) इन्ट्रॉन
(ब) एम्सॉन
(स) स्पलाइसोम
(द) SRNA
उत्तर:
(ब) एम्सॉन

22. कोशिका जैविकी का केन्द्रीय सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया?
(अ) वाटसन
(ब) विलिकिन्स
(स) ग्रिफिथ
(द) क्रिक
उत्तर:
(द) क्रिक

23. प्रोटीन संश्लेषण स्थान पर अमीनो अम्लों को कौन ले जाता है?
(अ) m.RNA
(स) t.RNA
(ब) r.RNA
(द) DNA
उत्तर:
(स) t.RNA

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24. न्यूक्लिक अम्ल के खोजकर्ता थे-
(अ) मीशर
(स) खुराना
(ब) वानमोल
(द) वाटसन क्रिक
उत्तर:
(अ) मीशर

25. यूकैरियोटोप में DNA के अनुलेखन के पश्चात् बनने वाले RNA को कहते हैं-
(अ) rRNA
(स) RNA
(ब) mRNA
(द) H RNA
उत्तर:
(द) H RNA

26. DNA में क्षारक युग्मों की परस्पर दूरी होती है-
(अ) 20A°
(स) 344°
(ब) 3.4A°
(द) 10A°
उत्तर:
(ब) 3.4A°

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
DNA आनुवंशिक पदार्थ है। इसके बारे में सुस्पष्ट प्रमाण किसने दिये ?
उत्तर:
अल्फ्रेड हर्षे व मार्था चेस ने।

प्रश्न 2.
DNA में शर्करा एवं फॉस्फोरिक अम्ल के मिलने से कौनसा बन्ध बनता है?
उत्तर:
फॉस्फो डाइएस्टर बन्ध ।

प्रश्न 3.
ऐसे खण्डों का नाम बताइये जो hnRNA में से RNA स्प्लाइसिंग के द्वारा काटकर अलग कर दिये जाते हैं।
उत्तर:
इन्ट्रॉन (Intron ) ।

प्रश्न 4.
उस एन्जाइम का नाम लिखिये जो अनुलेखन में सहायता करता है।
उत्तर:
RNA पॉलीमरेज विकर।

प्रश्न 5.
जीन अभिव्यक्ति के नियमन की ऑपेरॉन अवधारणा किन वैज्ञानिकों ने दी ?
उत्तर:
जैकब एवं मोनाड ।

प्रश्न 6.
hnRNA में पाये जाने वाले वे खण्ड जो प्रोटीन संश्लेषण में भाग नहीं लेते हैं, क्या कहलाते हैं?
उत्तर:
इन्ट्रॉन (Intron ) ।

प्रश्न 7.
ऋणात्मक नियमन क्या है ?
उत्तर:
इस नियमन में नियामक जीन का उत्पाद जीन की अभिव्यक्ति को रोक देता है। उदाहरण- लेक ऑपेरॉन ।

प्रश्न 8.
आनुवंशिक कूट में कोमारहित का क्या तात्पर्य है? उत्तर- दो कोडोन के बीच विराम नहीं होता है। एक के बाद दूसरा कोडोन तुरन्त प्रारम्भ हो जाता है।

प्रश्न 9.
snRNP का पूर्ण नाम बताइये ।
उत्तर:
लघुकेन्द्रकीय राइबोन्यूक्लियोप्रोटीन ( Small nuclear ribonucleoprotein) |

प्रश्न 10
सबसे छोटा RNA कौनसा होता है व इसमें कितने न्यूक्लियोटाइड होते हैं?
उत्तर:
t.RNA सबसे छोटे होते हैं। इसमें 75-80 न्यूक्लियोटाइड होते हैं।

प्रश्न 11.
सिस्ट्रॉन की संख्या के आधार पर m. RNA कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
दो प्रकार के मोनोसिस्ट्रानिक ( Monocistronic) तथा पॉलीसिस्ट्रॉनिक (Polycistronic)।

प्रश्न 12.
मोनोसिस्ट्रॉनिक किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह m. RNA जिसमें केवल एक सिस्ट्रॉन अर्थात् प्रोटीन के एक अणु के संकेत अनुलेखित होते हैं। उदाहरण-यूकैरियोटिक कोशिकाओं में।

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प्रश्न 13.
रेप्लीसोम ( Replisome) किसे कहते हैं?
उत्तर:
DNA प्रतिकृति विधि में एन्जाइमों की एक श्रृंखला भाग लेती है जिसे रेप्लीसोम कहते हैं।

प्रश्न 14.
DNA के एक कुण्डल की लम्बाई तथा एक कुण्डल में नाइट्रोजनी क्षारकों की संख्या बताइये।
उत्तर:
लम्बाई 34A° तथा क्षारकों की संख्या 11) होती है।

प्रश्न 15.
RNA कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
तीन प्रकार के r. RNA. t.RNA m. RNA तथा इनके अतिरिक्त विषमांगी केन्द्रकी RNA (hnRNA) तथा लघु केन्द्रकीय RNA भी होते हैं।

प्रश्न 16.
कोशिका में कितने प्रकार के r.RNA अणु पाये जाते हैं?
उत्तर:
लगभग 60 विभिन्न प्रकार के ।

प्रश्न 17.
ओकाजाकी खंड किस घटना से सम्बन्धित है ?
उत्तर:
प्रतिकरण से ।

प्रश्न 18.
BAC व YAC का पूर्ण नाम लिखिए।
उत्तर:
BAC = Bacterial Artificial Chromosome YAC = Yeast Artificial Chromosome.

प्रश्न 19
प्रोटीन में अमीनो अम्लों के अनुक्रमों को निर्धारित करने वाली विधि के विकास का श्रेय किसे जाता है ?
उत्तर:
फ्रेडिरक सेंगर ।

प्रश्न 20.
DNA अंगुलिछापी में किन DNA का महत्त्व है?
उत्तर:
पुनरावृत्ति DNA ( Repetitive DNA ) व अनुषंगी DNA (Satellite DNA) का।

प्रश्न 21.
आनुवंशिक पदार्थ के अणु हेतु आवश्यक चार मानदण्डों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर:
आनुवंशिक पदार्थ के अणु हेतु आवश्यक चार मानदण्ड निम्न हैं-

  • यह अपनी प्रतिकृति बनाने में सक्षम है। (प्रतिकृति)
  • इसे रचना व रासायनिक संगठन के आधार पर स्थित होना चाहिये।
  • इसमें धीमे परिवर्तनों (उत्परिवर्तन) की सम्भावना होती है जो विकास के लिये आवश्यक है।
  • इसे स्वयं ‘मेंडल के लक्षण’ के अनुरूप अभिव्यक्त होना चाहिए।

प्रश्न 22.
आनुवंशिक कूट की चार विशेषताएँ बताइए ।
उत्तर:

  • प्रकूट त्रिक होता है।
  • एक प्रकूट केवल एक अमीनो अम्ल का कूट लेखन होता है अतः यह असंदिग्ध व विशिष्ट होता है।
  • कुछ अमीनो अम्ल का कूट लेखन एक से अधिक प्रकूटों द्वारा होता है, इस कारण इन्हें अपहासित कूट कहते हैं।
  • कूट लगभग सार्वभौमिक होते हैं।

प्रश्न 23.
यदि DNA के एक रज्जुक का अनुक्रम निम्नानुसार है-
5′ – AAGTTACTAGAC – 3′
तो इसके आधार पर बनने वाले m RNA के अनुक्रम लिखिए।
उत्तर:
5′- AAGUUACUAGAC – 3′

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
पॉलीन्यूक्लियोटाइड से क्या तात्पर्य है? इनके घटकों को बताइये ।
उत्तर:
अनेक न्यूक्लियोटाइड्स आपस में जुड़कर पॉलीन्यूक्लियोटाइड की श्रृंखला बनाकर DNA व RNA की संरचना बनाते हैं। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड के तीन घटक होते हैं – नाइट्रोजनी क्षार, पेंटोस शर्करा (RNA में रिबोस तथा DNA में डीऑक्सीरिबोज) और एक फॉस्फेट समूह । नाइट्रोजनी क्षार दो प्रकार के होते हैं प्यूरीन्स (एडेनीन व ग्वानीन) व पायरिमिडीन (साइटोसीन, यूरेसिल व थाइमीन) । साइटोसीन DNA व RNA दोनों में मिलता है जबकि थाइमीन DNA में मिलता है ।

थाइमीन के स्थान पर यूरेसील RNA में मिलता है । नाइट्रोजनी क्षार नाइट्रोजन ग्लाइकोसिडिक बंध द्वारा पेंटोस शर्करा से जुड़कर न्यूक्लियोटाइड बनाता है जैसे एडीनोसीन या डीऑक्सी एडीनोसीन, ग्वानोसीन या डीऑक्सी ग्वानोसीन, साइटीडीन या डीऑक्सी साइटीडीन व यूरीडीन या डीऑक्सी थाइमीडिन ।

जब फॉस्फेट समूह फॉस्फोएस्टर बंध द्वारा न्यूक्लियोसाइड 5′ हाइड्रॉक्सिल समूह से जुड़ जाता है तब संबंधित न्यूक्लियोटाइड्स का निर्माण होता है। दो न्यूक्लियोटाइड्स 3-5 फॉस्फोडाइस्टर बंध द्वारा जुड़कर डाइन्यूक्लियोटाइड का निर्माण करता है। इस तरह से अनेक न्यूक्लियोटाइड्स जुड़कर एक पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला का निर्माण करते हैं।

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प्रश्न 2.
निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये-
(i) चारगाफ का तुल्यता नियम
(ii) अर्द्ध-संरक्षणीय प्रतिकृतिकरण
(iii) क्लोवर पत्ती प्रतिरूप
(iv) स्प्लाइसियोसोम
(v) समापन कोडोन
(vi) विपरीत अनुलेखन
(vii) बहुराइबोसोम
(viii) hnRNA
उत्तर:
(i) चारगाफ का तुल्यता नियम- चारगाफ ने 1949 में विभिन्न स्रोतों से DNA प्राप्त कर व अध्ययन कर नियम बनाये, जिन्हें चारगाफ का नियम कहते हैं-

  • प्यूरीन की कुल मात्रा पिरिमिडीन की कुल मात्रा के बराबर होती है (A + G = T + C) ।
  • A वT तथा G और C का अनुपात बराबर होता है परन्तु A + T व G+ C का समान होना आवश्यक नहीं है अतः A = T,

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(ii) अर्द्ध संरक्षणीय प्रतिकृतिकरण – DNA के प्रतिकृतिकरण सम्बन्ध में मेसलसन एवं स्टाइल (1958) के द्वारा प्रस्तुत अर्द्ध संरक्षणीय प्रतिकृत मत सर्वमान्य है । इसके अनुसार DNA अणु के दोनों सूत्र एक- दूसरे से अलग होकर अपने-अपने अस्तित्व को बनाये रखते हैं और प्रत्येक सूत्र, कोशिका में उपलब्ध न्यूक्लिओटाइडों के कुण्ड (pool) से अपने सम्पूरक सूत्र का संश्लेषण करते हैं।

इस प्रकार नये बने DNA अणु में एक सूत्र पूर्ववर्ती DNA अणु का एवं एक सूत्र नया संश्लेषित होता है अर्थात् आधा पूर्व जैसा तथा आधा नया, इसे अर्ध संरक्षणीय प्रतिकृति कहते हैं। मेसलसन एवं स्टाइल ने इसकी पुष्टि ई कोलाई जीवाणु पर भारी समस्थानिक N15 का उपयोग करके की थी ।

(iii) क्लोवर पत्ती प्रतिरूप – 1- RNA की संरचना का राबर्ट होले ने प्रतिरूप प्रस्तुत किया जिसे क्लोवर पत्ती प्रतिरूप कहते हैं। क्लोवर पत्ती प्रतिरूप के अनुसार RNA की एक पोलीन्यूक्लिओटाइड श्रृंखला मुड़कर के पांच भुजाएँ बनाती है। मुड़ने के कारण 5 व 3 सिरे पास-पास आ जाते हैं। प्रत्येक tRNA अणु के 3 छोर पर CCA अनुक्रम होता है, इस पर अमीनो अम्ल सिन्थेटेज एन्जाइम की सहायता से एक विशिष्ट अमीनो अम्ल जुड़ जाता है। 5′ छोर पर ‘G’ होता है। दो भुजाएँ –

  • TψC भुजा – इसकी सहायता से 1-RNA राइबोसोम्स से बन्धन करता है तथा
  • D भुजा या DHU भुजा – यह अमीनो अम्ल सिन्थेटेज से बन्धन में भाग लेती है। 1-RNA के नीचे लूप वाले भाग पर तीन क्षारों का अनुक्रम एन्टीकोडन वाले होते हैं। यह m RNA के विशिष्ट कोडोन से क्षार युग्मन करती है।

(iv) स्प्लाइसियोसोम – यूकैरियोटों में अनुलेखन के बाद बनने वाले RNA को hnRNA कहते हैं। RNA दो प्रकार के भागों का बना होता है। इसमें एक को इन्ट्रॉन ( Intron ) कहते हैं, इसमें कोड नहीं होता है। दूसरे भाग को एक्सॉन (Exon) कहते हैं जो आनुवंशिक कूट का वाहन करता है। इनमें से इन्ट्रॉन को RNA Splicing की प्रक्रिया द्वारा निकाल दिया जाता है। स्प्लाइसियोसोम नामक केन्द्रकीय अवयव इस प्रक्रिया में सहायता करते हैं।

(v) समापन कोडोन – ये कोड प्रोटीन श्रृंखला के निर्माण को रोकने या समापन के लिए होते हैं अर्थात् ये किसी भी अमीनो अम्ल को कोड नहीं करते हैं। ये UAA, UAG व UGA हैं। इन्हें स्टोप सिग्नल (Stop Signal) कहते हैं अर्थात् अनर्थक कोडोन (Nonsense Codon) होते हैं। ऐसे कुल 03 कोडोन होते हैं।

(vi) विपरीत अनुलेखन (Reverse transcription)-1970 में टेमिन एवं बाल्टीमोर (Temin and Baltimore) ने इसकी खोज की। अनेक ट्यूमर जनक विषाणुओं में आनुवंशिक पदार्थ के रूप में RNA होता है जिससे पूरक DNA बनता है। यह विपरीत अनुलेखन ट्रान्सक्रिप्टेज द्वारा किया जाता है। ऐसे विषाणुओं को रेट्रो वाइरस (Retro Virus) कहते हैं। इसके अन्तर्गत एड्स रोग HIV विषाणु भी आते हैं।

(vii) बहुराइबोसोम (Polyribosome ) – कभी प्रोटीन संश्लेषण के दौरान m – RNA पर अनेक राइबोसोम का समूह एकत्रित हो जाता है, इसे बहुराइबोसोम कहते हैं। ये राइबोसोम m. RNA के ऊपर 5′ सिरे से 3 सिरे की ओर गति करते हैं । m RNA की लम्बाई के अनुसार 5 से 20 तक राइबोसोम एक के बाद एक क्रम में जुड़ते जाते हैं। वह राइबोसोम जो 5′ सिरे के निकट होता है वह सबसे छोटी तथा जो 3 सिरे के पास होता है सबसे बड़ी पैप्टाइड श्रृंखलायुक्त होता है।

(viii) hnRNA – इसे विषमांगी केन्द्रकी RNA (Heterogenous nuclear RNA) कहते हैं। यूकैरियोटों में DNA के अनुलेखन पश्चात् बनने वाले RNA को ही hnRNA कहते हैं। इसे उच्च आणविक भार RNA या पूर्व केन्द्रकीय RNA या DNA जैसा RNA भी कहते हैं। यह प्राथमिक दूत RNA दो प्रकार के भागों का बना होता है।

इसमें एक को इन्ट्रॉन (Intron ) कहते हैं, इसमें कोड नहीं होता है। दूसरे भाग को एक्सॉन (Exon) कहते हैं जो आनुवंशिक कूट को वहन करता है। इनमें से इन्ट्रॉन को RNA Splicing की प्रक्रिया द्वारा निकल दिया जाता है। स्प्लाइसिओसोम (Spliceosome) नामक केन्द्रकीय अवयव इस प्रक्रिया में सहायता करता है। इसके बाद m – RNA का निर्माण होता है, जो अनुवादन की क्रिया में भाग लेता है।

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प्रश्न 3.
निम्न में अन्तर स्पष्ट कीजिए-
(i) न्यूक्लिओसाइड एवं न्यूक्लिओटाइड
(ii) DNA एवं RNA
(iii) इन्ट्रॉन एवं एक्सॉन
(iv) कोडोन एवं एन्टीकोडोन
(v) अनुलेखन एवं अनुवादन
(vi) प्रेरणीय एवं निरोधक नियमन
(vii) RNA स्प्लाइसिंग एवं RNA सम्पादन ।
उत्तर:
(i) न्यूक्लिओसाइड एवं न्यूक्लिओटाइड (Nucleoside and Nucleotide ) – एक अणु नाइट्रोजन क्षारक के साथ एक अणु शर्करा, के जुड़ने से जो संरचना बनती है, उसे न्यूक्लियोसाइड कहते हैं। इसी प्रकार एक अणु न्यूक्लियोसाइड के साथ फॉस्फोरिक अम्ल का एक अणु जुड़कर न्यूक्लियोटाइड बनता है।

  • नाइट्रोजन क्षारक + शर्करा = न्यूक्लियोसाइड
  • नाइट्रोजन क्षारक + शर्करा + फॉस्फोरिक अम्ल = न्यूक्लियोटाइड ।

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(ii) DNA u RNA

लक्षणDNARNA
1. प्राप्ति स्थानपादप विषाणुओं के अतिरिक्त अन्य विषाणुओं एवं सभी जीवों में पाया जाता है।जन्तु विषाणु, जीवाणुभोजियों (Bacterio-phages) के अतिरिक्त अन्य विषाणुओं में तथा सभी जीवों में पाया जाता है।
2. कोशिका में स्थितिप्रायः केन्द्रक में पाया जाता है।प्रायः कोशिका द्रव्य में पाया जाता है।
3. रज्जुकों की संख्याद्विरज्जुकीयएकरज्जुकीय
4. पैन्टोस शर्कराडीऑक्सीराइबोस (C5H10O4)राइबोज (C5H10O4)
5. पिरमिडीन क्षारकथायमीन एवं साइटोसिनयूरेसिल एवं साइटोसिन
6. प्यूरीन एवं पिरिमिडीन की मात्राबराबर होती है।नहीं होती।
7. असामान्य क्षारकये बहुत ही कम अथवा अनुपस्थित होते हैं।इसमें अधिक संख्या में पाये जाते हैं।
8. क्षारकों का युग्मनपूरी लम्बाई में होता है।केवल मुड़े हुए भाग में होता है।
9. संश्लेषण के लिए एन्जाइमडी एन ए पॉलीमरेज।आर एन ए पॉलीमरेज।
10. कार्ययह प्राणियों में आनुवंशिक पदार्थ का कार्य करता है।इसका मुख्य कार्य प्रोटीन संश्लेषण होता है। पादप विषाणुओं एवं कुछ अन्य विषाणुओं में यह आनुवंशिक पदार्थ का कार्य करता है।

(iii) इन्ट्रॉन एवं एक्सॉन

इन्ट्रॉन (Intron)एक्सॉन (Exon)
इसमें कोड नहीं होता है अतः ये आनुवंशिक कूट को वहन नहीं करते।यह आनुवंशिक कूट को वहन करता है।
RNA Splicing की प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाल दिये जाते हैं।बाहर नहीं निकाले जाते हैं।
अनुवादन की क्रिया में भाग नहीं लेता है।भाग लेता है।

(iv) कोडोन एवं एन्टीकोडोन

कोडोन (Codon)एन्टीकोडोन (Anticodon)
m-RNA पर तीन अक्षरों के कोडोन होते हैं।t-RNA पर तीन अक्षरों का एन्टीकोडोन होता है।
इसमें अनर्थक कोडोन (nonsense codons) होते हैं जो संख्या में तीन होते हैं।अनर्थक एन्टीकोडोन नहीं होते हैं।
m-RNA जिस पर कोडोन होते हैं वह m-RNA स्थिर होता है।t-RNA कोशिकाद्रव्य से अमीनो अम्ल को पकड़कर t-RNA उस स्थल पर लगते हैं जहाँ उपयुक्त कोडोन होता है।

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(v) अनुलेखन एवं अनुवाद

अनुलेखन (Transcription)अनुवादन (Translation)
इसमें आनुवंशिक सूचना का स्थानांतरण DNA से RNA में होता है ।m-RNA में न्यूक्लिओटाइडों की शृंखला का अमीनो अम्लों की पॉलिपेप्टाइड शृंखला में परिवर्तन होता है।
यह क्रिया केन्द्रक में होती है तथा वहां से m-RNA कोशिकाद्रव्य में आता है।यह क्रिया कोशिकाद्रव्य में राइबोसोम की सतह पर होती है।
इसमें कोडोन होते हैं, राइबोसोम पर m-RNA के 5 सिरे पर जुड़ता है।राइबोसोम की m-RNA की 3 सिरे की तरफ गति के होने से m = RNA के कोडोन अनुवादित होते हैं।
इस क्रिया के लिए DNA टेम्पलेट, RNA पॉलीमरेज विकर, सक्रिय अग्रदूत तथा द्विसंयोजक धातु आयन की आवश्यकता होती है।इसके लिये m-RNA, t-RNA राइबोसोम, अमीनो अम्ल विभिन्न अनुवादन कारक आवश्यक होते हैं।

(vi) प्रेरणीय नियमन एवं निरोधक नियमन

प्रेरणीय नियमन (Inducible Regulation)निरोधक नियमन (Repressible Regulation)
इस नियमन के द्वारा जीन को प्रोटीन उत्पन्न करने के लिए प्रेरित किया जाता है।इसमें जीन की सक्रियता निरुद्ध हो जाती है, जिसके कारण प्रोटीन संश्लेषण रुक जाता है।
इन पदार्थों को प्रेरक (Inducer) कहते हैं।इन्हें दमनकर (Repressor) कहते हैं।
उदा.-ई. कोलाई में लेक्टोज के अपचय का नियमन।उदा.-ई.कोलाई के ट्रप्टीफान ऑपेरॉन, हिस्टीडीन ऑपेरॉन।

(vii) RNA स्प्लाइसिंग एवं RNA सम्पादन

RNA स्प्लाइसिंग (RNA Splicing)RNA सम्पादन (RNA Processing)
RNA में से इन्ट्रॉन निकालने की क्रिया है।विभिन्न प्रकार के RNA जैसे m-RNA, t-RNA तथा r-R N A इत्यादि।
प्रोटीन संश्लेषण से पूर्व यह क्रिया होती है।प्रोटीन संश्लेषण के दौरान आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4.
DNA की आणविक संरचना का नामांकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए ।
उत्तर:
DNA एक दीर्घ अणु है। इसकी इकाइयों को न्यूक्लिओटाइड कहते हैं। प्रत्येक न्यूक्लिओटाइड में तीन यौगिक- पेन्टोज शर्करा, फॉस्फोरिक अम्ल तथा नाइट्रोजनी क्षारक होते हैं।
I. पेन्टोज शर्करा (Pentose Sugar) – यह पाँच कार्बन युक्त शर्करा होती है जिसे डीआक्सीराइबोज कहते हैं। इसमें राइबोज शर्करा की तुलना में दूसरे कार्बन पर एक ऑक्सीजन का अणु कम होता है।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 3

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II. फॉस्फोरिक अम्ल (Phosphoric Acid ) – यह आर्थोफॉस्फोरिक अम्ल (H3PO4) होता है। न्यूक्लिक अम्लों में फॉस्फोरिक अम्ल एवं पैन्टोज शर्करा एकान्तर क्रम में पाये जाते हैं अर्थात् दो शर्करा के अणुओं के बीच फॉस्फोरिक अम्ल का एक अणु पाया जाता है। प्रत्येक फॉस्फेट समूह एक शर्करा के 3°C तथा दूसरी शर्करा के 5°C से जुड़कर फॉस्फो डाइएस्टर बन्ध (Phospho diester bond) बनाता है। न्यूक्लिक अम्ल की श्रृंखला 5°C से प्रारम्भ होकर 3°C पर समाप्त होती है अथवा 3°C शुरू होकर 5°C पर समाप्त होती है।

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III. नाइट्रोजनी क्षारक (Nitrogenous bases) – ये दो प्रकार के होते हैं-
(i) पिरिमिडीन (Pyrimidine ) – इनमें एक विषमचक्रीय षट्भुजी वलय होती है जिसमें चार कार्बन एवं दो नाइट्रोजन होते हैं। DNA में दो प्रकार के पिरिमिडीन थाइमीन (Thymine = T) एवं साइटोसीन (Cystosine = C ) पाये जाते हैं। RNA में थाइमीन के स्थान पर यूरेसिल (Uracil = U) होता है।

(ii) प्यूरीन (Purine ) – इसमें पिरिमिडीन वलय के चौथे एवं पाँचवें कार्बन से एक इमिडेजोल वलय (imidazole ring) संयुक्त होती है। DNA तथा RNA दोनों में ही एडीनीन (Adenine = A) एवं गुआनीन (Guanine = G) नामक प्यूरीन पाये जाते हैं।

प्रश्न 5.
DNA प्रतिकृतिकरण में भाग लेने वाले प्रमुख एन्जाइमों के नाम लिखिये।
उत्तर:
DNA प्रतिकृतिकरण में भाग लेने वाले एन्जाइम निम्न प्रकार से हैं-

  • हेलिकेज एन्जाइम – DNA की द्विकुण्डली खोलते हैं।
  • एस. एस. बी. प्रोटीन्स एकल लड़ी बंधन प्रोटीन्स सम्बद्ध होकर स्थिति को स्थिर रखते हैं।
  • टोपोआइसोमेरेज एन्जाइम कुण्डलीकरण तनाव को कम करते हैं।
  • R.N.A. पॉलिमेरेज या प्राइमेज एन्जाइम (R.N.A. प्राइमर) – DNA संश्लेषण की प्रक्रिया करने के लिए RNA का छोटा हिस्सा बनाते हैं।
  • DNA पॉलीमेरेज III एन्जाइम प्राइमर को 5-3 दिशा में आगे बढ़ाने का कार्य करने हैं।
  • DNA पॉलीमेरेज I-DNA के खण्डों के मध्य पाये जाने वाले रिक्त स्थानों की पूर्ति करते हैं।
  • लाइगेज एन्जाइम – DNA के खण्डों को जोड़ते हैं।
  • एण्डोन्यूक्लिएज एवं एक्सोन्यूक्लिएज एन्जाइम सही न्यूक्लियोटाइड को जोड़ने का कार्य करते हैं।

प्रश्न 6.
tRNA के क्लोवर पत्ती प्रतिरूप का नामंकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राबर्ट होले (Robert Holley) तथा उनके साथियों ने यीस्ट के एलीनीन T- RNA की संरचना का अध्ययन कर बताया कि 1- RNA की संरचना क्लोवर की पत्ती की भांति होती है, इसे क्लोवर पत्ती प्रतिरूप (Model) कहते हैं। इसके अनुसार RNA की एक पोलीन्यूक्लिओटाइड श्रृंखला मुड़कर के पाँच भुजायें बनाती है। मुड़ने के कारण इसके 5 व 3 सिरे पास-पास आ जाते हैं। 5 सीमान्त छोर पर गुआनीन अवशेष ‘G’ तथा 3 सिरे पर ‘CCA अयुग्मित अनुक्रम होता है। अमीनो अम्ल को केवल 3’ छोर पर स्वीकार किया जाता है

क्लोवर पत्ती प्रतिरूप के अनुसार 1-RNA में निम्न भुजायें होती हैं-

  1. ग्राही भुजा (Acceptor arm ) – इसके 3 सिरे पर अमीनो अम्ल जुड़ता है।
  2. डाइहाइड्रो यूरीडीन भुजा (DHU भुजा अथवा D भुजा) – यह अमीनो अम्ल सिन्थेटेज नामक एन्जाइम को बाँधती है।
  3. एन्टीकोडोन (Anticodon arm ) – इसकी लूप में तीन न्यूक्लिओटाइडों का विशिष्ट क्रम प्रतिकूट (anticodon) होता है जो mRNA के कूट (Codon) से क्षार युग्मन करता है।
  4. अतिरिक्त भुजा – यह एन्टीकोडोन भुजा एवं TC भुजा के मध्य पाई जाती है। इसकी लम्बाई अनिश्चित होती है।
  5. TyC भुजा – इसकी भुजा से प्रोटीन संश्लेषण के समय राइबोसोम जुड़ता है।

t.RNA का कार्य – इसकी मुख्य भूमिका प्रोटीन संश्लेषण में त्रिक् आनुवंशिक कूट को पहचान कर अनुरूप अमीनो अम्लों को राइबोसोम तक पहुँचाना है।

प्रश्न 7.
विषमांगी केन्द्रकी RNA व लघुकेन्द्रकीय RNA पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विषमांगी केन्द्रकी RNA (Heterogenous nuclear RNA = hnRNA)- यूकैरियोटों में DNA में अनुलेखन के पश्चात् बनने वाले RNA को ही hnRNA कहते हैं। इसे उच्च आणविक भार या पूर्व केन्द्रीय RNA या DNA जैसा RNA कहते हैं। यह प्राथमिक m. RNA दो प्रकार के भागों इन्ट्रॉन (intron ) एवं एक्सॉन (exon) से बना होता है। एक्सॉन आनुवंशिक कूट वहन करता ।

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परन्तु इन्ट्रॉन वहन नहीं करता । इन्ट्रॉन को RNA Splicing विधि द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है, इसके लिए केन्द्रकीय अवयव स्प्लाइसिओसोम (Spliceosome) सहायता करते हैं। इसके बाद m- RNA का निर्माण होकर अनुवादन क्रिया में भाग लेता है। लघुकेन्द्रकीय RNA ( Small nuclear RNA = snRNA)- यह यूकैरियोटों के केन्द्रक में मिलता है।

यह केन्द्रक में प्रोटीनों के साथ मिलकर लघुकेन्द्रकीय राइबोन्यूक्लिओप्रोटीन (snRNP) का निर्माण करता है। इसे प्राय: स्नर्प (Snurps ) भी कहते हैं । इनसे स्प्लाइसिओसोम बनता है जो RNA Splicing में सहायता करता है।

प्रश्न 8.
अनुवादन के प्रमुख चरणों के नाम लिखिये ।
उत्तर:
m – RNA में न्यूक्लिओटाइडों की श्रृंखला का अमीनो अम्लों की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में परिवर्तन को ही अनुवादन (Translation) कहते हैं । यह क्रिया कोशिकाद्रव्य में राइबोसोम की सतह पर होती है। राइबोसोम – RNA के 5 ́ सिरे पर जुड़ता है तथा इसकी 3 ́ सिरे की ओर गति होने से m-RNA के कोडोन अनुवादित हो जाते हैं। अनुवादन हेतु m-RNA, t-RNA राइबोसोम, अमीनो अम्ल व विभिन्न अनुवादन कारक आवश्यक होते हैं। प्रोकैरियोटों में यह क्रिया निम्न चरणों में पूर्ण होती है-

  1. अमीनो अम्ल का सक्रियण ।
  2. सक्रिय अमीनो अम्ल का t-RNA से जुड़ना ।
  3. पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का समारम्भ।

समारम्भ की प्रक्रिया में समारम्भ कारक (Initiation Factors) आवश्यक होते हैं। प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में ये IFs होते हैं ।

प्रश्न 9.
सेंट्रल डोमा सिद्धान्त किसने बताया व उससे क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
आण्विक जीव विज्ञान में फ्रांसिस क्रिक ने सेंट्रल डोमा (Central dogma) का विचार प्रस्तुत किया । सिद्धान्त के अनुसार आनुवंशिक सूचनाओं का बहाव DNA से RNA व इससे प्रोटीन की ओर होता है (DNA → RNA → प्रोटीन) । यद्यपि कुछ विषाणुओं में यह बहाव विपरीत दिशा अर्थात् RNA से DNA की ओर होता है।
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प्रश्न 10.
RNA प्रथम आनुवंशिक पदार्थ है, व्याख्या कीजिए ।
उत्तर:
RNA पहला आनुवंशिक पदार्थ था । अब बहुत पर्याप्त प्रमाण हैं कि जीवन के आवश्यक प्रक्रमों (जैसे- उपापचयी, स्थानांतरण, संबंधन आदि) का विकास RNA से हुआ। RNA आनुवंशिक पदार्थ के साथ एक उत्प्रेरक (जैविक तंत्र में कुछ ऐसी महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक अभिक्रियाएँ हैं जो RNA उत्प्रेरक द्वारा उत्प्रेरित की जाती हैं, प्रोटीन एंजाइम का इसमें कोई योगदान नहीं है )

RNA उत्प्रेरक के रूप में क्रियाशील लेकिन अस्थायी है। इस कारण से RNA के रासायनिक रूपांतरण से DNA का विकास हुआ, जिससे यह अधिक स्थायी है। DNA के द्विरज्जुकों व पूरक रज्जुकों के कारण तथा इनमें मरम्मत प्रक्रियाओं के विकास से अपने में होने वाले परिवर्तनों के प्रति प्रतिरोधी है।

प्रश्न 11.
अनुलेखन की इकाई व जीन को समझाइये |
उत्तर:
जीन वंशागति ( inheritance) की क्रियात्मक इकाई है। जीन DNA पर स्थित होती हैं। DNA अनुक्रम जो 1. RNA व r. RNA को कोडित (Coding) करते हैं उसे भी जीन परिभाषित करते हैं। परिभाषा के अनुसार समपार (Cistron) DNA का वह खंड है जो पॉलीपेप्टाइड का कूटलेखन (Coding) करता है, अनुलेखन (transcription ) इकाई में संरचनात्मक जीन मोनोसिस्ट्रानिक (Monocistronic ) या पॉलीसिस्ट्रानिक (Polycistronic) हो सकती है।

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प्रायः सुकेन्द्रकी (cukaryotic) में मोनोसिस्ट्रानिक तथा पॉलीसिस्ट्रानिक जीवाणु या असीमकेन्द्री (Prokaryotic) में होती है। सुकेन्द्रकी में मोनोसिस्ट्रानिक संरचनात्मक जीन मिलती है जिसमें अंतरापित कूटलेखन (Interrupted Coding) अनुक्रम पाये जाते हैं। सुकेन्द्रकी में जीन विखंडित (Split) होते हैं। कूटलेखन अनुक्रम या अभिव्यक्त अनुक्रमों को व्यक्तेक (exon) कहते हैं।

व्यक्तेक वे अनुक्रम हैं जो परिपक्व या संसाधित (Processed) RNA में मिलते हैं। व्यक्तेक, अव्यक्तेक (intron ) द्वारा अंतरापित (interrupted) होते हैं। अव्यक्तेक या मध्यवर्ती ( intervening) अनुक्रम परिपक्व या संसाधित RNA में नहीं मिलते हैं। लक्षण की वंशागति संरचनात्मक जीन के उन्नायक व नियामक (Promotor and Regulatory) अनुक्रमों द्वारा प्रभावित होती है. क्योंकि कभी-कभी नियामक अनुक्रम अस्पष्ट रूप से नियामक जीन कहलाते हैं। इसके बावजूद भी ये अनुक्रम किसी RNA या प्रोटीन का कूटलेखन नहीं करते हैं ।

प्रश्न 12.
DNA के अग्रक रज्जुक एवं पश्चगामी रज्जुक में अन्तर बताइये ।
उत्तर:

अग्रक रज्जुक (Leading strand)पश्चगामी रज्जुक (Lagging strand)
1. अग्रक सूत्र या रज्जुक DNA के 3→5 सूत्र पर संश्लेषित होता है ।पश्चगामी सूत्र जनक DNA के 5→3 सूत्र पर संश्लेषित होता है ।
2. इसके संश्लेषण की दिशा 5→3 व द्विगुणन शाख की तरफ होती है।यह पूर्ण सूत्र 3→5 दिशा में तथा द्विगुणन शाख के विपरीत दिशा में संश्लेषित होता है परन्तु इनके खण्डों का संश्लेषण 5→3 दिशा में ही होता है।
3. इसका संश्लेषण एक शृंखला के रूप में होता है।पश्चगामी रज्जुक का संश्लेषण छोटे -छोटे पॉलीन्यूक्लियोटाइड खण्डों में होता है जिन्हें ओकाजॉकी खण्ड कहते हैं।
4. इसके संश्लेषण हेतु केवल एक RNA प्राइमर होता है।इसमें ओकाजॉकी खण्ड के संश्लेषण हेतु अलग-अलग RNA प्राइमर चाहिए।
5. इसमें संश्लेषण के लिये DNA लाइगेज एन्जाइम की आवश्यकता नहीं होती है।इनमें ओकाजॉकी खण्डों को जोड़ने के लिये DNA लाइगेज एन्जाइम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 13.
रो – कारक (Rho – factor ) क्या होते हैं?
उत्तर:
ई. कोलाई ( E. coli ) जीवाणु में वह प्रोटीन जो RNA पॉलीमरेज द्वारा एक प्रकार के अनुलेखन (transcription ) समापन स्थलों (terminating sites) पर अनुलेखन समाप्त करने में सहायक होता है, ऐसे स्थलों को रो – निर्भर समापन स्थल कहते हैं। प्रोकैरियोट्स के समापन स्थलों को दो वर्गों में विभक्त किया गया है-

  • रो – स्वतन्त्र समापन स्थल ( rho independent terminator)
  • रो- आश्रित समापन स्थल (rho-dependent terminator)

प्रश्न 14.
यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाये जाने वाले RNA पॉलीमरेज एन्जाइम की स्थिति, कार्य व प्रतिशत को – बताइये ।
उत्तर:

एन्जाइम (Enzyme)स्थिति (Position)कार्य (Functions)प्रतिशतता (Percentage)
1. RNA पॉलीमेरेज-Iकेन्द्रक मेंr.RNA का संश्लेषण50-70%
2. RNA पॉलीमेरेज-IIकेन्द्रक द्रव्य मेंm.RNA का संश्लेषण20-40%
3. RNAपॉलीमेरेज-IIIकेन्द्रक द्रव्य मेंt.RNA व 5 S RNA का संश्लेषण10%

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प्रश्न 15.
प्रेरण व दमन में क्या अन्तर होता है?
उत्तर:

प्रेरण (Induction)दमन (Repression)
1. यह ऑपेरॉन को प्रारम्भ करता है।यह समाप्त करता है।
2. यह अनुलेखन व अनुवादन को प्रारम्भ करता है।यह अनुलेखन व अनुवादन को रोकता है।
3. यह उपचयी पथ (metabolic path) को सुचारु व व्यवस्थित करता है ।यह उपचयी पथ को संचालित करता है।
4. ऑपेरॉन जीन से जुड़ने से प्रेरण द्वारा दमन को रोका जाता है।ऑपरेटर जीन से सह-दमनकर के जुड़ने से एपोरिप्रेसर उत्पन्न होता है।

प्रश्न 16.
प्रोकैरियोटिक व यूकैरियोटिक कोशिकाओं में होने वाले अनुलेखन में क्या अन्तर होता है? तुलना कीजिए।
उत्तर:

लक्षणप्रोकैरियोटिक अनुलेखनयूकैरियोटिक अनुलेखन
1. स्थानकोशिक द्रव्य में सम्पन्न होता है।केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm) में होता है।
2. समयइसके लिये कोशिका चक्र की कोई निश्चित अवस्था नहीं होती है।कोशिका चक्र की G1 व G2 अवस्थाओं में अनुलेखन होता है।
3. RNA संसाधनविभिन्न प्रकार के RNAs का संसाधन या परिपक्वन कोशिका द्रव्य में होता है।RNAS का संसाधन केन्द्रक द्रव्य में होता है।
4. अनुलेखन इकाईएक इकाई में एक से अधिक जीन हो सकते हैं।इसमें केवल एक जीन होती है।
5. एन्जाइमतीनों प्रकार के RNA के संश्लेषण हेतु केवल एक एन्जाइम, RNA पॉलीमेरे ज-I की आवश्यकता होती है।तीनों प्रकार के RNA संश्लेषण हेतु अलग-अलग प्रकार के एन्जाइम की आवश्यकता होती है। इसमें पॉलीमेरेज-I, II व III की आवश्यकता होती है।
6. RNA पॉलीमरेज की संरचनाRNA पॉलीमरेज, 5-पॉलीपेप्टाइड शृंखला की जटिल संरचना है।RNA पॉलीमरे ज में 10-15 पॉलीपे प्टाइ ड शृंखलायें होती हैं।
7. अनुलेखन व अनुवादनm.RNA का अनुलेखन तथा पॉलीपेप्टाइड श्वृंखला का अनुवादन साथ होते हैं।ऐसा नहीं होता है।
8. राइबोसोमी RNAतीन प्रकार के राइबोसोमी RANs (23S, 16S, 5S) के लिये केवल एक प्राथमिक ट्रान्सक्रिप्ट RNA अणु बनता है।चार प्रकार के राइबोसोमी RNA के लिये दो प्राथमिक प्रतिलिपि RNA बनते हैं। एक अनुलेखन से 28S, 18S व 5.8S r.RNA बनते हैं तथा दूसरे से केवल 5S r.RNA बनता है।
9. प्रमोटरसरल व छोटा होता है।तुलनात्मक जटिल, बड़ा व विविधापूर्ण होता है।
10 अनुलेखन संकुलक्रोड एन्जाइम + σ  कारकRNA पॉलीमरेज व अनुलेखन कारक।

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प्रश्न 17.
प्रोकैरियोटिक व यूकैरियोटिक DNA में अन्तर बताइये ।
उत्तर:

प्रोकैरियोटिक DNAयूकैरियोटिक DNA
1. DNA के साथ हिस्टोन प्रोटीन्स नहीं पाये जाते हैं।हिस्टोन प्रोटीन्स पाये जाते हैं।
2. निष्क्रिय (non-coding) DNA की बहुत कम मात्रा होती है।बहुत अधिक होती है।
3. कोडिंग खण्डों में नॉन-कोडिंग अनुक्रम (introns) नहीं होते हैं।नॉन-कोडिंग खण्ड पाये जाते हैं।
4. DNA अणु वृत्ताकार होता है।केन्द्रकीय DNA अणु रैखिक (linear) होता है।
5. DNA एक अति कुण्डलित गुणसूत्र बनाता है।गुणसूत्रों की संख्या सदैव एक से अधिक होती है।

प्रश्न 18.
लैक ओपेरॉन क्या है? लैक ओपेरॉन की संरचना तथा इसकी कार्यविधि समझाइये। लेक ओपेरॉन प्रक्रिया का नामांकित चित्र बनाइये ।
उत्तर:
लैक-प्रचालेक (Lac-Operon)-
1. लैक ऑपेरॉन के विषय में स्पष्ट जानकारी जैकब व मोनाड (Jacob \& Monod) ने दी।

2. लैक ऑपेरॉन (यहाँ लैक से तात्पर्य लैक्टोज से है) में पॉलीसिस्ट्रोनिक संरचनात्मक जीन का नियमन एक सामान्य प्रमोटर व नियामक (regulatory) जीन द्वारा होता है। इस प्रकार की व्यवस्था जीवाणु में बहुत सामान्य रूप से देखने को मिलती है व इसे ऑपेरॉन कहा जाता है। उदाहरणार्थ val ऑपेरॉन, his ऑपेरॉन, trp ऑपेरॉन, lac ऑपेरॉन आदि।

3. मानव की आंत में पाये जाने वाले जीवाणु ई-कोलाई सामान्यतया लैक्टोज के अपचय से ऊर्जा को प्राप्त करते हैं। जैकब व मोनाड ने ज्ञात किया कि इसके DNA में तीन जीन का एक समूह लैक्टोज का अपचय करने वाले तीन एन्जाइम के संश्लेषण से सम्बन्धित होता है।
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4. जब पोषण माध्यम में लैक्टोज उपस्थित होता है तो ये जीन सक्रिय होते हैं किन्तु लैक्टोज की अनुपस्थिति होने पर ये निष्क्रिय होते हैं। जैकब व मोनाड ने इन जीन की सक्रियता के नियमन के लिये ऑपेरॉन संकल्पना (operon concept) दी।

5. उक्त संकल्पना के अनुसार जीन की सक्रियता का नियमन अनुलेखन (transcription) स्तर पर प्रेरण या दमन (induction or repression) द्वारा होता है।

6. लैक्टोज के अपघटन और उससे ऊर्जा उत्पादन हेतु तीन एन्जाइम्स की आवश्यकता होती है-

  • बीटा गैलेक्टोसाइडेज (beta-galactosidase),
  • परमिएज (permease) तथा
  • ट्रान्सएसीटिलेज (transacetylase)।

7. इन एन्जाइ म्स का संश्लेषण एक बहु सिस्ट्र भॅनिक (polycistronic) m.RNA अणु के अनुवादकरंण (translation) से होता है। इस बहुसिस्ट्रॉनिक m.RNA का संश्लेषण लैक ऑपेरॉन में स्थित तीन संरचनात्मक जीन्स या सिस्ट्रॉन्स (structural genes or cistrons) की शृंखला के अनुलेखन (transcription) के द्वारा होता है।

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8. इन तीन संरचनात्मक जीन या सिस्ट्रॉन में-

  • सिस्ट्रॉन-Z,
  • सिस्ट्रॉन-Y तथा सिस्ट्रॉन- a होती है। ये एक-दूसरे के समीप होती हैं व इनमें परस्पर समन्वय होता है। ये तीनों जीन इनको कन्ट्रोल करते हैं। इन्हें रेगुलेटर जीन (Regulator gene), प्रोमोटर जीन (Promotor gene) तथा ओपरेटर जीन (Operator gene) कहते हैं।

9. सिस्ट्रॉन- Z जीन बींटा गैलेक्टोसाइडेज के लिये कोड करता है जो डाइसैकेराइड लैक्टोज का जल अपघटन करके उन्हें गैलेक्टोज व ग्लूकोज में विभक्त कर देता है। सिस्ट्रॉन-Y जीन परमीएज के लिये कोड करता है जो beta-गैलेक्टोसाइडेज के लिये कोशिका की पारगम्यता को बढ़ा देते हैं। सिस्ट्रॉन-a जीन ट्रान्सएसीटिलेज के लिये कोड करता है। अतः लैक्टोज के उपापचय के लिये तीनों जीन के उत्पाद लैक ऑप्रॉन में आवश्यक हैं।

लैक ऑपेरॉन का प्रकार्य (Functioning of Lac Operon)-
ई.कोलाई जीवाणु में लैक ऑपेरॉन की कार्यविधि को दो प्रकार से स्पष्ट किया गया है-
(i) लैक्टोज की उपस्थिति में-माध्यम में लैक्टोज-प्रेरक (inducer) के उपस्थित होने पर प्रेरक कोशिका में प्रवेश करके नियामक जीन (regulator gene) से उत्पन्न दमनकारी (repressor) के साथ जुड़ जाता है। परिणामस्वरूप दमनकारी प्रचालक (operator) जीन से नहीं जुड़ने पाता और प्रचालक जीन स्वतन्त्र रहती है।

यह RNA पॉलीमरेज को प्रमोटर जीन (promotor gene) के समारम्भन स्थल से जुड़ने के लिये प्रेरित करता है। फलस्वरूप संरचनात्मक जीन या सिस्ट्रॉन से बहुसिस्ट्रॉनिक m.RNA का अनुलेखन होता है जो लैक्टोज उपयोग के लिये आवश्यक तीनों एन्जाइम्स को कोडित करता है अर्थात् यह लेक्टोज उत्प्रेरक का कार्य करता है। अतः सम्पूर्ण क्रिया एन्जाइम प्रेरण है या यह उत्प्रेरण या प्रेरण (induction or inducer) का उदाहरण है।

(ii) लैक्टोज की अनुपस्थिति में-लैक्टोज प्रेरक की अनुपस्थिति में नियामक जीन एक दमनकारी प्रोटीन उत्पन्न करता है (यह i जीन द्वारा संश्लेषित होता है) जो ओपरेटर स्थल से जुड़कर इसके अनुलेखन को रोक देती है। अतः संरचनात्मक जीन m.RNA का संश्लेषण नहीं कर पाते और प्रोटीन का निर्माण रुक जाता है।

यह संदमन या दमनकारी (repression) का उदाहरण है। कभी-कभी लैक्टोज उत्प्रेरक से जुड़कर दमनकारी में संरचनात्मक परिवर्तन करता है और ओपरेटर से जुड़कर इसके अनुलेखन को रोक देता है। इस प्रकार के उत्प्रेरक को सहदमनकारी (co-repressor) कहते हैं। क्योंकि यह प्रचालक स्थल (operator side) को निष्क्रिय करने के लिये दमनकारी (repressor) को सक्रिय करता है।

प्रश्न 19.
अनुलेखन ( ट्रांसक्रिप्सन) से क्या तात्पर्य है? अनुलेखन क्रिया को चित्र सहित समझाइए ।
अथवा
अनुलेखन किसे कहते है ? जीवाणु में अनुलेखन प्रक्रिया को नामांकित चित्र बनाकर समझाइए ।
उत्तर:

  1. आनुवंशिक सूचनाओं का स्थानान्तरण, DNA से RNA में होता है। वह प्रक्रिया जिसके द्वारा DNA से RNA का निर्माण होता है, अनुलेखन या ट्रांसक्रिप्सन (Transcription) कहलाती है।
  2. हम जानते हैं कि DNA विशिष्ट प्रकार के प्रोटीन्स का संश्लेषण करता है। प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं के केन्द्रकाय ( Nucleoid) तथा यूकेरियोटिक कोशिकाओं के केन्द्रक में DNA पाये जाते हैं परन्तु प्रोटीन संश्लेषण कोशिका द्रव्य में होता है।
  3. DNA अणु केन्द्रक से कोशिका द्रव्य में नहीं जाते और सीधे ही प्रोटीन संश्लेषण को निर्देशित नहीं करते हैं।
  4. DNA अणु प्रोटीन संश्लेषण की सूचनाओं को सन्देशवाहक RNA (m.RNA) पर अंकित करते हैं और कोशिका द्रव्य में जाकर राइबोसोम से जुड़ते हैं। अत: DNA फर्मे (DNA Template) पर RNA के निर्माण को अनुलेखन कहते हैं।
  5. DNA पर जब m. RNA का निर्माण होता है तो इसमें नाइट्रोजन बेस थायमीन के स्थान पर यूरेसिल होता है।
  6. यह प्रक्रिया विशेष प्रकार के एन्जाइम RNA पॉलीमरेज (RNA Polymerase) की उपस्थिति में होती है।

अनुलेखन इकाई (Transcription Unit) –
1. एक DNA खण्ड, जो RNA के अणु का अनुलेखन करता है, उसे अनुलेखन इकाई कहते हैं। अनुलेखन इकाई एक जीन के समान या इसमें अनेक सतत जीन हो सकते हैं।

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2. DNA में अनुलेखन इकाई के मुख्यतः तीन भाग होते हैं-

  • उन्नायक ( Promoter )
  • संरचनात्मक जीन (Structural gene)
  • समापक (Treminator)

3. DNA निर्भर RNA पॉलीमरेज बहुलकीकरण केवल एक दिशा 5→3′ की ओर उत्प्रेरित होते हैं।

4. रज्जुक जिसमें ध्रुवत्व 3→5 की ओर होता है वह टेम्पलेट के रूप में कार्य करता है। इस कारण इसे टेम्पलेट रज्जुक (Template Strand) कहते हैं।

5. दूसरा रज्जुक जिसमें ध्रुवत्व 5→3′ होता है व अनुक्रम (Sequences) RNA के समान होते हैं (थायमीन के स्थान पर यूरेसिल) वह अनुलेखन प्रक्रिया के दौरान विस्थापित (displaced ) या स्थानांतरित हो जाता है। वह रज्जुक जो किसी के लिये कूटलेखन नहीं करता है उसे कूटलेखन रज्जुक (Coding Strand) कहते हैं।

सभी उपर्युक्त बिन्दु या संदर्भ बिन्दु (reference point) जो अनुलेखन इकाई के भाग होते हैं। वे कूटलेखन रज्जुक से बने होते हैं। उदाहरण के रूप में एक परिकल्पित अनुलेखन इकाई के अनुक्रम निम्न प्रकार के होंगे- 3′-AT GC AT GC AT GC AT GC AT GC AT GC 5′ टेम्पलेट रज्जुक 5′-TA CG TA CG TA CG TA CG TA CG TA CG-3′ कूटलेखन रज्जुक

6. अनुलेखन इकाई में संरचनात्मक जीन के दोनों सिरों पर प्रमोटर (उन्नायक ) व टर्मिनेटर ( समापक) जीन उपस्थित होती हैं। संरचनात्मक जीन के 5 (प्रतिप्रवाह upstream) सिरे पर प्रमोटर जीन तथा 3′ ( अनुप्रवाह; down stream) सिरे पर समापन जीन होती है और इससे अनुलेखन प्रक्रम की समाप्ति का निर्धारण होता है। इसके अतिरिक्त उन्नायक (Promoter) के प्रतिप्रवाह ( upstream) व अनुप्रवाह (downstream) की तरफ नियामक अनुक्रम (regulatory sequences) उपस्थित होते हैं।
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6.5.2 अनुलेखन इकाइ व जान (Transcription unit and Gene) –
1. जीन वंशागति ( inheritance) की क्रियात्मक इकाई है। यह t.DNA पर स्थित होते हैं। वह DNA अनुक्रम जो T. RNA अथवा r. RNA अणु के लिये कूटलेखन (Code) करता है, वह भी जीन कहलाता है।

2. समपार या सिस्ट्रॉन (Cistron) DNA का वह खण्ड है जो पॉलीपेप्टाइड का कूटलेखन करता है या जिसमें एक पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के संश्लेषण की सूचना कोडित होती है। अतः यह एक जीन के समतुल्य है तथा सिस्ट्रॉन शब्द का प्रयोग एक जीन के लिये ही किया जाता है।

3. प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं में एक ही m. RNA अणु में प्राय: एक से अधिक पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाओं के बहुलकीकरण (Polymerization) की सूचना निहित होती है। अतः इन m. RNA अणुओं को पॉलीसिस्ट्रॉनिक (Polycistronic ) कहते हैं।

4. यूकेरियोटिक कोशिकाओं के m. RNA अणु में केवल एक ही पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के बहुलकीकरण की सूचना निहित होती है। इसलिये इन्हें मोनोसिस्ट्रॉनिक (Monocistronic ) कहते हैं।

5. जैसा कि यूकेरियोटिक कोशिकाओं में अधिकांश जीनों में एक ही प्रोटीन के संश्लेषण की संकेत सूचना DNA के कई छोटे-छोटे खण्डों में होती है। इस कारण इन्हें विपटित जीन (Split genes) कहते हैं। ये DNA खण्ड व्यक्तेक या एक्सॉन ( exon) कहलाते हैं। एक्सॉन्स के बीच-बीच में अक्रिय DNA खण्ड पाये जाते हैं जिनमें प्रोटीन संश्लेषण की सूचना नहीं होती है।

DNA के ये निष्क्रिय खण्ड अव्यक्तेक या इन्ट्रॉन्स (introns) कहलाते हैं। अतः RNA की प्राथमिक प्रतिलिपियों में एक्सॉन्स व इन्ट्रॉन्स दोनों प्रकार के खण्ड होते हैं। RNA की ऐसी प्राथमिक प्रतिलिपि को विषमांगी केन्द्रकीय RNA (heterogenous nuclear RNA or hn RNA) भी कहते हैं।

RNA के प्रकार व अनुलेखन का प्रक्रम (Types of RNA and Process of Transcription)-
1. अनुलेखन में आनुवंशिक सूचनाओं का स्थानान्तरण DNA से RNA में होता है। इस क्रिया में DNA कुण्डली की एक श्रृंखला पर RNA के न्यूक्लियोटाइड्स ( राइबोन्यूक्लियोटाइड्स) आकर जुड़ जाते हैं जिससे एक अस्थायी DNA-RNA संकर का निर्माण हो जाता है। कुछ समय पश्चात् RNA की समजात (complementary) श्रृंखला अलग हो जाती है। इसमें नाइट्रोजन बेस थायमीन के स्थान पर यूरेसिल होता है। इस क्रिया को अनुलेखन कहते हैं। यह क्रिया एन्जाइम RNA पॉलीमरेज (RNA polymerase) द्वारा होती है।

प्रोकेरियोट्स में अनुलेखन (Transcription in Prokaryotes) –
1. प्रोकेरियोट्स में पॉलिसिस्ट्रानिक व सतत संरचनात्मक जीन पाये जाते हैं।

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2. जीवाणुओं में RNA पॉलिमरेज की एक ही जाति से m. RNA, t.RNA तथा r. RNA का संश्लेषण होता है ये तीनों प्रकार के RNA प्रोटीन संश्लेषण के लिये आवश्यक होते हैं। m. RNA टेम्पलेट प्रदान करता है, t.RNA अमीनो अम्लों के लाने व आनुवंशिक कूट को पढ़ने का काम व r.RNA स्थानान्तरण के दौरान संरचनात्मक व उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है।

3. RNA पॉलीमरेज एन्जाइम अनुलेखन के प्रारम्भ होने वाले DNA का वर्धक व प्रमोटर स्थल को पहचानने में सहायता करता है। इस एन्जाइम के दो भाग होते हैं-क्रोड एन्जाइम (Core enzyme) तथा क्रोड एन्जाइम के साथ जुड़ने वाला सिग्मा (०) कारक, जो कि RNA का संवर्धन का प्रारम्भन ( initiation) करता है।

4. क्रोड एन्जाइम चार प्रकार के पॉलीपेप्टाइडों से बना होता है-

  • दो a श्रृंखलायें ये पॉलीपेप्टाइड वर्धक (Promotor) DNA के साथ बंध बनाते हैं।

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  • पहली B श्रृंखला – RNA संवर्धन हेतु प्रयुक्त . न्यूक्लियोटाइड को बाँधने का काम यह श्रृंखला करती है।
    दूसरी श्रृंखला – यह टेम्पलेट DNA के बंध स्थापित कर अनुलेखन क्रिया में सहायता करती है।.

5. सिग्मा (σ) कारक क्रोड एन्जाइम के साथ सम्बद्ध होकर इसे सक्रिय बनाने का काम करता है। यह DNA के वर्धक या प्रमोटर स्थल को पहचान करके क्रोड RNA पॉलीमरेज को इसके साथ जोड़ता है एवं अनुलेखन का समारंभ ( initiation) करने में सक्रिय भाग लेता है ।

6. RNA के संवर्धन में (DNA से अनुलेखन की क्रिया में), क्रोड RNA पॉलीमरेज का सिग्मा कारक से सम्बद्ध (bind) होकर सक्रिय हो जाता है । वर्धक स्थल (promotor site ) पर सिग्मा युक्त RNA पॉलीमरेज का बन्धन हो जाता है। इस स्थान से DNA रज्जुक खुल जाता है। दोनों रज्जुकों की पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलायें खुलकर अलग हो जाती हैं। दोनों रज्जुकों में से केवल एक रज्जुक (प्रधान रज्जुक) पर ही संदेशवाहक RNA अणु का निर्माण होता है।
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7. प्रधान रज्जुक फर्मों की भांति काम करता है। प्रधान रज्जुक के क्षारक क्रमों के अनुसार RNA रज्जुक पर क्षारक आते जाते हैं। इस प्रकार RNA श्रृंखला का निर्माण होता जाता है व RNA पॉलीमरेज आगे बढ़ता चला जाता है और अन्त में एक विशेष कारक (रो-p-कारक ) की उपस्थिति में समापन (termination) हो जाता है तथा पॉलीमरेज अलग हो जाता है। इस प्रकार RNA रज्जुक का निर्माण पूरा हो जाता है।

यूकेरियोट्स में अनुलेखन (Transcription in Eukaryotes)-
1. यूकेरियोट्स में तीन प्रकार के पॉलीमरेज होते हैं। इनमें से एक केन्द्रक में होता है तथा इसे RNA पॉलीमरेज – I या RNA पॉलीमरेज (A) कहते हैं। यह राइबोसोमल RNA (285, 18S व 5.8S) को अनुलेखित करता है ।

2. दूसरा RNA पॉलीमरेज केन्द्रकद्रव्य ( Nucleoplasm ) में पाया जाता है। इसे RNA पॉलीमरेज- II या RNA पॉलीमेरज B कहा जाता है। यह hn RNA ( heterogenous nuclear RNA ) के संश्लेषण हेतु उत्तरदायी होता है।

3. तीसरा RNA पॉलीमरेज भी केन्द्रकद्रव्य में ही पाया जाता है। इसे RNA पॉलीमरेज -III कहते हैं जो 5sr RNA व छोटे केन्द्रकीय RNA (snRNA) तथा t. RNA के संश्लेषण के लिये उत्तरदायी होता है।
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4. यूकेरियोट्स में अधिकतर जीन्स विभक्त या स्पिलिट जीन (Split gene) होते हैं। इन खण्डों में संबंधित प्रोटीन अणुओं के संश्लेषण की संकेत सूचना होती है। इन खण्डों को एक्सॉन्स ( exons) कहते हैं। एक्सॉन्स के बीच-बीच में निष्क्रिय DNA के खण्ड होते हैं, जिनमें प्रोटीन अणुओं को संश्लेषण की संकेत सूचना नहीं होती है। DNA के इन निष्क्रिय खण्डों को इन्ट्रॉन्स ( introns) कहते हैं। अनुलेखन क्रिया दोनों ही प्रकार के खण्डों की होती है। अतः इस प्रकार के RNA अणु को प्राथमिक प्रतिलिपि या विषमांगी केन्द्रकीय RNA ( heterogenous nuclear RNA=hnRNA ) कहते हैं।

5. hnRNA अणु को एन्जाइम्स द्वारा पहले एक्सॉन्स तथा इन्ट्रान्स की प्रतिलिपियों में तोड़ा जाता है और इसके बाद केवल एक्सॉन्स की प्रतिलिपियों को संयोजित करके वास्तविक और परिपक्व RNA अणु का निर्माण किया जाता है। इस प्रक्रिया को RNA अणुओं का संसाधन (Processing) या समबंधन ( Splicing) कहते हैं ।

hnRNA में आच्छादन (Capping) व पुच्छन (Tailing) की. अतिरिक्त क्रियाएँ भी होती हैं। आच्छादन के दौरान एक असाधारण न्यूक्लियोटाइड मीथाइल ग्वानोसीन ट्राइफास्फेट hnRNA के 5′ सिरे से जुड़ जाता है व पुच्छन में 200-300 एडीनायलेट अवशेष ( Adenylate residue) hnRNA टेम्पलेट के 3′ सिरे पर स्वतन्त्र रूप से जुड़ जाते हैं।

अब यह पूर्णरूप से संसाधित (Processed) hnRNA या m. RNA कहलाता है व ट्रांसलेशन की क्रिया के लिये केन्द्रक से बाहर स्थानान्तरित हो जाता है। यूकेरियोट्स में अनुलेखन प्रक्रिया में व्याप्त जटिलतायें व विभक्त जीन व्यवस्था (Split gene arrangement) जीनोम के आद्य लक्षण (Primitive character) को दर्शाते हैं।

प्रश्न 20
अर्थ- संरक्षी प्रतिकृति से आपका क्या तात्पर्य है? DNA में अर्ध-संरक्षी प्रतिकृतियन की क्रिया होती है, को प्रमाणित करने के लिए मैथ्यू मेसेल्सन तथा फ्रैंकलिन स्टाल द्वारा किये गये प्रयोग का वर्णन कीजिए। अर्थ- संरक्षी DNA प्रकृतियन प्रतिरूप का चित्र बनाइए।
उत्तर:
जब कोई कोशिका वृद्धि की अधिकतम सीमा तक पहुँच जाती है तो उसके बाद विभाजन के लिये तैयार होती है, इसमें DNA का द्विगुणन भी होता है। सभी जीवों के सम्पूर्ण जीवन चक्र में आनुवंशिक पदार्थ अर्थात् DNA-की बारंबार प्रतिकृति होती है। प्रतिकृति के फलस्वरूप संतति कोशिकाओं में DNA की हूबहू प्रतिलिपियाँ प्राप्त होती हैं।

यद्यपि प्रतिकृति क्रिया के दौरान किसी प्रकार की त्रुटि नहीं होती है परन्तु थोड़ी बहुत ज्रुटि होनी भी चाहिये जिससे उत्परिवर्तन होते रहें। इन उत्परिवर्तनों के फलस्वरूप आनुवंशिक विविधता होती रहती है जो कि जैविक विकास हेतु आवश्यक है।
1. सभी जैविक अणुओं में केवल DNA अणु ही स्वद्विगुणन (Self-duplication) करने में सक्षम होते हैं। DNA स्वद्विगुणन की प्रक्रिया को प्रतिकृतिकरण या रेप्लिकेशन (replication) कहते हैं।

2. सुकेन्द्रीय कोशिकाओं (Eucaryotic cells) में यह प्रतिकृतिकरण कोशिका चक्र की अन्तरालवस्था (interphase) की S-प्रावस्था (synthesis phase) में होती है । प्रतिकृतिकरण की क्रिया केन्द्रक के अन्दर होती है।

3. DNA का प्रतिकृतिकरण तीन प्रकार से हो सकता है-परिक्षेपी (Dispersive), संरक्षी (Conservative) तथा अर्ध-संरक्षी (Semi-conservative) । परन्तु DNA का प्रतिकृतिकरण अर्ध-संरक्षी विधि से ही होता है, इसके अनेक साक्ष्य प्राप्त किये जा चुके हैं।

4. अर्ध-संरक्षी विधि में DNA के दोनों रज्जुक अलग होकर सांचे (Templete) के रूप में कार्यकर नये पूरक रज्जुकों का निर्माण करते हैं। प्रतिकृति के पूर्ण होने पर जो DNA अणु बनता है उसमें एक पैतृक व एक नई निर्मित लड़ी रज्जुक होती है।

प्रायोगिक प्रमाण (Experimental evidence)-
1. यह सिद्ध हो चुका है कि DNA का अर्ध-संरक्षी विधि से प्रतिकृति होती है। इस सम्बन्ध में सर्वप्रथम जानकारी इस्चेरिचिया कोलाई (Escherichia coli) से प्राप्त हुई।

2. मैथ्यू मेसेल्सन व फ्रेंकलिन स्टाल (Mathew Meselson and Franklin Stahl) ने 1958 में जीवाणु ई.कोलाई (E.coli) में DNA द्विगुणन की पुष्टि की थी। जबकि टेलर (Taylor) ने 1957 में यूकेरियोटिक DNA के अर्ध-संरक्षी द्विगुणन को सर्वप्रथम बताया था।
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वाटसन तथा क्रिक (Watson and Crick) ने DNA के द्विरज्जुक (Double helix ) का मॉडल प्रस्तुत करते समय यह स्पष्ट कर दिया था कि DNA का द्विगुणन या प्रतिकृतिकरण अर्द्ध संरक्षी होगा।

मेसेल्सन व स्टाल का प्रयोग (Experiments of Meselson and Stahl) –
1. इन्होंने मानव की आन्त्र में पाये जाने वाले ई-कोलाई को ऐसे संवर्धन माध्यम में विकसित किया जिसमें 15NH4 CI (15N नाइट्रोजन का भारी समस्थानिक है, यह सामान्य 14N नाइट्रोजन अणु से भारी होता है। नाइट्रोजन का स्रोत होता है। इसी संवर्धन माध्यम में इन जीवाणुओं को कई पीढ़ियों तक पुनरुत्पादन करने दिया गया।

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2. जब इन जीवाणुओं के DNA का अध्ययन किया गया तो यह पाया गया कि इनके प्यूरीन्स तथा पिरीमिडिन्स ( Purine and Pyrimidines) में 14N के स्थान पर 15N नाइट्रोजन के आइसोटोप या समस्थानिक थे।

3. इस भारी DNA (15N युक्त) अणु को सामान्य DNA (14N) से सोडियम क्लोराइड के घनत्व प्रवणता में अपकेंद्रीकरण (Cen trifugation) करने से अलग कर सकते हैं। इसके बाद तत्कालीन जीवाणु संतति (15N) को उस माध्यम में स्थानान्तरित कर दिया गया जिसमें नाइट्रोजन स्रोत में नाइट्रोजन का
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सामान्य आइसोटोप 14N उपस्थित था। इस आइसोटोप का घनत्व 15N से कम होता है। तदुपरान्त DNA को विलगित करके आल्ट्रासेन्ट्रीफ्यूगेशन द्वारा (सीजियम क्लोराइड घनत्व प्रवणता पर) उसका घनत्व ज्ञात किया तो यह पाया गया कि प्रथम विभाजन चक्र के बाद संकर DNA अणु को व्यक्त करने वाली केवल एक ही घनत्व की पट्टी प्राप्त हुई थी जिसमें एक श्रृंखला 14N नाइट्रोजन द्वारा तथा दूसरी 15N नाइट्रोजन द्वारा अंकित थी ।

4. इसी प्रकार दूसरे विभाजन चक्र के बाद (ई. कोलाई 20 मिनट में विभाजित होता है, प्रत्येक 20 मिनट बाद नई पीढ़ी बनती है DNA को व्यक्त करने के लिये दो घनत्व पट्टियाँ दिखाई दीं। पहली में दो DNA द्विक कुण्डलों में 15N नाइट्रोजन तथा दूसरी दो में संकर DNA अणु के लिये थी ।

5. संकर DNA अणु में उन्होंने पाया कि दोनों श्रृंखलाओं में परिणामस्वरूप इस अणु का घनत्व 15N वाले DNA तथा 14N वाले DNA अणु के घनत्व के बीच का था। इस प्रयोग द्वारा उन्होंने सिद्ध किया कि DNA की प्रतिकृति अर्ध-संरक्षी विधि से होती है।
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6. इसी प्रकार का प्रयोग टेलर (Taylor) व उनके सहयोगियों ने 1958 में विसिया फाबा (Vicia faba) की मूलाग्र कोशिकाओं पर रेडियोएक्टिव थाइमीडिन का प्रयोग करके किया था । इन्होंने सिद्ध किया कि DNA अर्ध-संरक्षी विधि द्वारा प्रतिकृत होता है।

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DNA द्विगुणन की कार्य प्रणाली व एंजाइम (Mechanism of DNA duplication and Enzymes)-
द्विगुणन प्रक्रिया में प्रत्येक रज्जुक (Strand) का निर्माण 53′ दिशा में बढ़ता है। अतः अलग होने वाले दोनों रज्जुओं पर विपरीत दिशा में नये रज्जुओं के बनने की विधि भिन्न-भिन्न होती है-
(i) 3→5′ दिशा वाले रज्जुक पर श्रृंखला का सतत निर्माण (continuous synthesis) होता है।

(ii) 5’→3′ दिशा वाले रज्जुक पर यह निर्माण असतत तथा छोटे-छोटे भागों में होता है।

इन छोटे-छोटे टुकड़ों को ओकाजाकी खण्ड (Okazaki segments) कहते हैं। बाद में ये खण्ड फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध ( Phosphodiester bond) बनाकर DNA लाइगेज (DNA ligase) एन्जाइम की उपस्थिति में आपस में मिलकर सूत्र बनाते हैं। उपरोक्त क्रियाओं के प्रत्येक चरण को चलाने के लिये निश्चित प्रोटीन्स तथा एन्जाइम होते हैं। सभी एन्जाइम एक एन्जाइम तन्त्र के रूप में होते हैं। इसे रेप्लीसोम ( Replisome) कहते हैं। DNA द्विगुणन अग्र चरणों में होता है-

(i) समारम्भन बिन्दु का अभिज्ञान ( Recognition of initiation point)-जिस स्थान से DNA द्विगुणन का प्रारम्भ होता है, उस स्थान को प्रारम्भन का स्थान (Initiation site) कहते हैं। प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं में द्विगुणन प्रारम्भ होने का केवल एक ही बिन्दु होता है, जबकि यूकेरियोटिक कोशिकाओं में DNA अणु में अनेक स्थानों पर एक साथ द्विगुणन प्रारम्भ होता है।

(ii) दोहरे हेलिक्स का खुलना (Unwinding of double helix)-एन्जाइम हेलीकेज (Helicase) DNA के रज्जुकों को खोलने का कार्य करता है। जब रज्जुक खुल जाते हैं, तब एन्जाइम 5 टोपो आइसोमरेज (Topoisomerase) या DNA गाइरेज की सहायता से रज्जुक कट जाता है जिससे कुण्डलित DNA का तनाव समाप्त हो जाता है।

हेलिक्स डीस्टैबिलाइजिंग प्रोटीन (Helix destabilizing protein) अलग हुए रज्जुकों को अलग ही बनाए रखने में सहायक होता है। दोहरे हेलिक्स के खुलने के कारण एक Y के आकार की प्रतिकृति द्विशाख (Replication fork) जैसी रचना बन जाती है।

(iii) न्यूक्लियोसाइड्स का सक्रियकरण (Activation of nucleosides)-केन्द्रकद्रव्य में उपस्थित न्यूक्लियोसाइड फॉस्फोरिलेज (Phosphorylase) एन्जाइम तथा ATP की उपस्थिति में सक्रिय हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को फॉस्फोरिलेशन ( Phosphorylation) कहते हैं।

(iv) R.N.A. प्राइमर का निर्माण (Formation of RNA Primer) – DNA टेम्पलेट ( DNA Template) पर पहले RNA का एक छोटा टुकड़ा स्थित होता है। इसे RNA प्राइमर कहते हैं। RNA प्राइमर का निर्माण प्राइमेज (Primase) एन्जाइम या RNA पॉलीमरेज (RNA Polymerase) की सहायता से होता है।

(v) DNA श्रृंखला का निर्माण तथा लम्बा होना (Formation of DNA Chain and elongation of Chain)- DNA पॉलीमरेज III (DNA Polymerase III) या रेप्लिकेज ( Replicase) एन्जाइम R. N.A. प्राइमर में 5→3′ दिशा में नए क्षारकों को जोड़ता है। इन क्षारकों का क्रम DNA टेम्प्लेट के अनुसार होता है। DNA के दोनों रज्जुक प्रति समानान्तर होते हैं अर्थात् एक रज्जुक की दिशा 5→3′ होती है और दूसरे रज्जुक की दिशा 3’5′ होती है।
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एन्जाइम DNA पॉलीमरेज III क्षारकों को केवल 5→3′ दिशा में ही जोड़ सकता है; अतः 3→5 दिशा वाले रज्जुक (टेम्पलेट) पर DNA श्रृंखला का सतत् निर्माण होता है। जिस रज्जुक का निर्माण सतत् होता है, उसे अग्रक रज्जुक (Leading Strand) कहते हैं। जिस रज्जुक का निर्माण 3’5′ दिशा में होता है अर्थात् 5’3′ दिशा वाले पितृ रज्जुक (टेम्पलेट) पर होता है, यह लगातार नहीं होता।

छोटे-छोटे टुकड़ों का निर्माण होता है जिन्हें ओकाजाकी खण्ड (Okazaki segments) कहते हैं। इन टुकड़ों को एन्जाइम DNA लाइगेज (Ligase) की सहायता से जोड़ा जाता है। इस प्रकार 35′ दिशा वाले रज्जुक का निर्माण असतत् (Discontinuous ) होता है। इस रज्जुक को पश्चगामी पुत्री रज्जुक (Lagging daughter strand) कहते हैं। DNA द्विगुणन के साथ ही DNA अणु का दोहरा कुण्डल आगे की ओर खुलता चला जाता है।

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(vi) RNA प्राइमर का हटना ( Removal of RNA Primer)-DNA श्रृंखला की लम्बाई बढ़ जाने के बाद RNA प्राइमर श्रृंखला से हट जाता है। एन्जाइम आर. एन. ऐज एच (R.N. Aas H) की सहायता से RNA प्राइमर को DNA श्रृंखला से हटाया जाता है। RNA प्राइमर के हटने से उत्पन्न रिक्त स्थान को भरने में एन्जाइम DNA पॉलीमरेज I सहायता करता है।

(vii) DNA द्विगुणन का अन्त (Termination of DNA Replication)-जब DNA निर्माण पूर्ण हो जाता है, तब एक टर्मिनेशन बाइंडिंग प्रोटीन (Termination binding protein) एन्जाइम DNA हेलीकेज (DNA Helicase) की क्रिया को रोक देता है। DNA द्विगुणन का अन्त टर्मिनेशन जोन (Termination Zone) में पहुँचने पर या दूसरी ओर के द्विगुणन बिन्दु से मिलने पर होता है ।

प्रश्न 21.
पुनरावृत्ति DNA किसे कहते हैं ? अल्फ्रेड हर्षे तथा मार्थांचेज के प्रयोग को सचित्र समझाइये कि DNA एक आनुवंशिक पदार्थ है’।
उत्तर:
DNA फिंगरप्रिन्ट के लिये DNA अनुक्रम में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में विभिन्नता का पता लगाते हैं। इन स्थानों पर DNA का छोटा भाग कई बार पुनरावृत्त (repeated) होता है। उसे पुनरावृत्ति DNA कहते हैं।
आनुवंशिक पदार्थ DNA है (DNA is Genetic material)-
ए.डी. हर्षे (A.D. Hershey) तथा एम.जे. चेज (M.J. Chase) ने सन् 1952 में विषाणु T2 भोजी (बेक्टिरियोफेज; Bacteriophage) पर प्रयोग करके यह परिणाम निकाला कि DNA आनुवंशिक पदार्थ है, क्योंकि इस क्रिया में संक्रमण करने वाले भोजी का केवल DNA अंश ही परपोषी जीवाणु कोशिका में प्रवेश करता है। वही आनुवंशिक सूचनाओं का वहन करता है जिससे नई भोजी सन्तानें बनती हैं।
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– इन वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों में रेडियोएविटव सल्फर S35 तथा रेडियोएक्टिव फॉस्फोरस P32 बुक्त माध्यम पर उगाकर जीवाणुभोजी DNA को रेडियोएक्टिव बना दिया, क्योंकि जीवाणुभोजी कणों के प्रोटीन में फॉस्फोरस नहीं होता है, किन्तु DNA में फॉस्फोरस होता है इसलिए केवल DNA ही रेडियोएक्टिव फॉस्फोरस द्वारा अंकित होता है।

इसी प्रकार जीवाणुभोजी प्रोटीन में ही सल्फर पाया जाता है। जिसे उन्होंने रेडियोएक्टिव सल्फर (S35) द्वारा अंकित कर दिया। इस प्रकार के विभेदी अंकन द्वारा जीवाणुभोजी के DNA व प्रोटीन घटकों को बिना किसी रासायनिक परीक्षण के सरलता से अलग-अलग पहचानना सम्भव हो पाया।

हर्षे व चेज ने इन अंकित जीवाणुभोजी कणों से अलग-अलग जीवाणु कोशिकाओं को संक्रमित कराया तो, उन्ह्रोंने पाया कि केवल रेडियोएक्टिव (P32) ही जीवाणवीय कोशिकाओं के साथ सम्बद्ध था, किन्तु रेंयोएक्टिव S35 का नहीं था, इन प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हुआ कि जीवाणवीय कोशिका में केवल DNA ही प्रवेश करता है न कि प्रोटीन।

प्रोटीन आवरण परपोषी के बाहर ही रह जाता है तथा DNA ही प्रवेश करने के बाद अपने समान नये जीवाणुभोजी कणों का संश्लेषण करता है। हर्षें तथा चेज के इस प्रयोग द्वारा और अधिक स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो गया कि DNA ही आनुवंशिक पदार्थ है।

आनुवंशिक पदार्थ के गुण (Characteristics of Genetic material)-
(i) उपरोक्त प्रयोगों से यह स्पष्ट है कि DNA आनुवंशिक पदार्थ के रूप में कार्य करता है परन्तु कुछ विषाणुओं में RNA आनुवंशिक पदार्थ होता है, उदाहरण-टोबैको मोजेक वाइरस (TMV), क्यूबीटा बैक्टिरियोफेज आदि।

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(ii) वह अणु जो आनुवंशिक पदार्थ के रूप में कार्य करता है वह निम्न मापदंडों को निश्चित रूप से पूरा करता है-
(क) यह अपनी प्रतिकृति बनाने में सक्षम होता है।
(ख) इसे संरचना व रासायनिक संगठन के आधार पर स्थिर होना चाहिए।
(ग) इसमें धीमी गति से उत्परिवर्तन होते हैं, यह विकास हेतु आवश्यक है।
(घ) इसे स्वयं ‘मेंडल के लक्षण’ के अनुरूप अभिव्यक्त होना चाहिए।

(iii) सजीव तंत्र में जितने अणु पाये जाते हैं उनमें प्रतिकृति की क्षमता नर्हीं होती है परन्तु दोनों न्यूक्लिक अम्लों (DNA \& RNA) में यह क्षमता होती है।

(iv) आनुवंशिक पदार्थ स्थायी होता है, जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं में आने वाले परिवर्तनों का इस पर कोई प्रभाव नहीं होता है जैसे प्रिफिथ के ‘रूपान्तरित कारक’ से स्पष्ट है कि ताप से जीवाणु की मृत्यु हो जाती है परन्तु आनुर्वंशिक पदार्थ की कुछ विशेष्ताएँ नष्ट नहीं हो पाती हैं।

(v) DNA के दोनों रू्जुक एक-दूसरे के पूरक होते हैं जो गर्म करने पर एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं परन्तु पुन: उचित परिस्थिति के आने पर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। RNA के प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड पर 2 -हाइड्राक्सिल समूह मिलता है। यह एक क्रियाशील समूह है जिसके कारण RNA अस्थिर व आसानी से विखंडित हो जाता है। इस कारण DNA रासायनिक संगठन की दृष्टि से कम सक्रिय व संरचनात्मक दृष्टि से अधिक स्थायी होता है। अतः दोनों प्रकार के न्यूक्लिक अम्लों में से DNA एक अच्च्छा आनुर्वंशिक पदार्थ है।

(vi) DNA में यूरेसील के स्थान पर थाइमीन होने से उसमें. अधिक स्थायित्व होता है।

(vii) दोनों प्रकार के न्यूक्लिक अम्ल उत्परिवर्तित हो सकते हैं। RNA अस्थायी व तीव्र गति से उत्परिवर्तित होता है। यही कारण है कि विषाणुओं में RNA होने से इनकी जीवन अवधि छोटी व तेजी से उत्परिवर्तित होने वाली होती है।

(viii) RNA प्रोटीन संश्लेषण के लिये सीधे कूटलेखन करते हैं, इसी कारण वे आसानी से लक्षण व्यक्त करते हैं। जबकि DNA प्रोटीन संश्लेषण के लिये RNA पर निर्भर है।

(ix) अत: DNA व RNA दोनों अनुर्वंशिक पदार्थ के रूप में कार्य करते हैं। DNA के अधिक स्थायी होने से वह आनुर्वंशिक सूचनाओं के संचय हेतु अधिक उपयोगी है तथा RNA आनुवंशिक सूचनाओं के स्थानान्तरण हेतु डपयुक्त है।

प्रश्न 22.
द्विकुंडली DNA की संरचना की कोई चार मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
(i) यह दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं का बना होता है जिसका आधार शर्करा- फॉस्फेट का बना होता है व क्षार भीतर की ओर प्रक्षेपी होते हैं।

(ii) दोनों श्रृंखलाएँ प्रति समानांतर ध्रुवणता रखती हैं। इसका मतलब एक श्रृंखला की ध्रुवणता 5 से 3′ की ओर हो तो दूसरी की ध्रुवणता 3′ से 5′ की तरह होगी।

(iii) दोनों रज्जुकों के क्षार आपस में हाइड्रोजन बंध द्वारा युग्मित होकर क्षार युग्मक बनाते हैं। एडेनिन व थाइमिन जो विपरीत रज्जुकों में होते हैं, आपस में दो हाइड्रोजन बंध बनाते हैं। ठीक इसी तरह से ग्वानीन, साइटोसीन से तीन हाइड्रोजन बंध द्वारा बंधा रहता है जिसके फलस्वरूप सदैव प्यूरीन के विपरीत दिशा में पिरिमीडीन होता है। इससे कुंडली के दोनों रज्जुकों के बीच लगभग समान दूरी बनी रहती है ।

(iv) दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिणवर्ती कुंडलित होती हैं। कुंडली का पिच 3.4 नैनोमीटर व प्रत्येक घुमाव में लगभग 10 क्षार युग्मक मिलते हैं। परिणामस्वरूप एक कुंडली में एक क्षार युग्मक के बीच लगभग 0.34 नैनोमीटर की दूरी होती है ।

प्रश्न 23.
न्यूक्लियोसोम किसे कहते हैं? डीएनए कुंडली का पैकेजिंग समझाइए। न्यूक्लियोसोम का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
यदि DNA द्विकुंडली की लम्बाई की गणना की जाए तो यह लम्बाई काफी अधिक होती है परन्तु जीवों में DNA कुंडली का विशेष पैकेजिंग होता है जो न्यूक्लियोसोम के रूप में होता है। यूकैरियोटिक गुणसूत्रों में 50% अधिक प्रोटीन होती है जो DNA तथा RNA के संश्लेषण से सम्बन्धित होती है परन्तु इनमें से एक बड़ा भाग हिस्टोन का होता है।

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हिस्टोन्स धनात्मक आवेशित क्षारीय प्रोटीन का समूह होता है। हिस्टोन्स में क्षारीय एमीनो अम्लीय लाइसीन व आरजीनीन अधिक मात्रा में मिलते हैं। दोनों एमीनो अम्ल की पार्श्व श्रृंखलाओं पर धनात्मक आवेश होता है। हिस्टोन व्यवस्थित होकर आठ हिस्टोन अणुओं की एक इकाई बनाता है जिसे हिस्टोन अष्टक कहते हैं।

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धनात्मक आवेशित हिस्टोन अष्टक चारों तरफ से ऋणात्मक आवेशित DNA से सटा होता है जिसे न्यूक्लियोसोम कहते हैं। एक प्रारूपी न्यूक्लियोसोम 200 क्षार युग्म की DNA कुंडली होती है । प्रत्येक हिस्टोन अष्टक में H2A, H2B, H3 तथा H के दो-दो अणु होते हैं। न्यूक्लियोसोम संयोजक DNA (linker DNA)

द्वारा एक- दूसरे से जुड़े होते हैं तथा क्रोमेटीन डोरी पर लगभग छ: न्यूक्लियोसोम मिलकर सोलेनायड का निर्माण करते हैं। केन्द्रक में मिलने वाला क्रोमेटीन एक धागे के जैसा होता है तथा इस डोरी पर धूक्लियोसोम गोल मणियों के जैसे दिखाई देते हैं ।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
आनुवंशिक कूट क्या हैं? इनकी चार विशेषताएँ लिखिए। tRNA का चित्र बनाइए ।
उत्तर:
सजीवों की कोशिकाओं में विभिन्न 20 प्रकार के अमीनो अम्ल होते हैं। प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया में अमीनो अम्लों का निश्चित क्रम m. RNA पर उपस्थित चार नाइट्रोजनी क्षारकों (A, G, C, U) के क्रम पर निर्भर रहता है। अतः m. RNA के चार क्षारकों के क्रम व 20 अमीनो अम्लों के बीच आनुवंशिक सूचना के संचरण को ही आनुवंशिक कूट कहते हैं। आनुवंशिक कूट के विषय में जानकारी देने का श्रेय

नीरेनबर्ग (Nirenberg, 1961 ) व उनके सहयोगियों को है। आनुवंशिक कूट की विशेषताएँ-

1. कोड के अक्षर ( Code letters) – m. RNA पर चार क्षार होते हैं अतः ये अक्षर A, G, U, C हैं।

2. कोड शब्द (Code words ) – A, G, U, C चार अक्षरों से त्रिक कोड अनुसार 64 शब्द बनते हैं, इन्हें कोडोन (Codon) कहते हैं। गैमो (Gammow, 1959 ) के अनुसार आनुवंशिक कोड तीन अक्षरों का होता है। कुल 64 कोडोनों में 61 कोड तो 20 अमीनो अम्लों को कोडित करने तथा शेष 03 किसी भी अमीनो अम्ल को कोडित नहीं करते। अतः ये निरर्थक कोडोन (nonsense codon) होते हैं।

3. पठन दिशा (Reading Direction ) – m. RNA के ऊपर आनुवंशिक कोड का पठन 5 से 3′ दिशा की ओर होता है।

4. प्रारम्भी कोडोन (Initiation Codon ) – प्राय m. RNA के प्रारम्भ में 5′ सिरे पर AUG कोडोन पाया जाता है, इसे प्रारम्भी कोडोन कहते हैं। यह कोड मेथियोनीन अमीनो अम्ल को कोडित करता है।

प्रश्न 2.
मानव जीनोम परियोजना क्या है? मानव जीनोम परियोजना की विशेषताएँ लिखिए। मानव जीनोम परियोजना का निरूपक आरेख दीजिए।
उत्तर:
मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project HGP) को जानने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि जीनोम क्या है। किसी भी जीव की जीनी संरचना उसका जीनोम कहलाता है और क्योंकि जीन गुणसूत्रों पर पाये जाते हैं इसलिये गुणसूत्रों के एक अगुणित समुच्चयी (Haploid set ) को जीनोम कहते हैं।

सन्तान को अपने जनकों (Parents) से जो गुणसूत्र प्राप्त होते हैं उनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंश DNA है। इस DNA के एक खण्ड को जिसमें आनुवंशिक कूट निहित होता है, उसे वैज्ञानिक ‘जीन’ कहते हैं। अतः किसी भी जीव की आनुवंशिक व्यवस्था उसके DNA में मिलने वाले अनुक्रम से निर्धारित होती है।

दो विभिन्न व्यक्तियों में मिलने वाला DNA अनुक्रम कुछ जगहों पर भिन्न-भिन्न होता है। सन् 1990 में मानव जीनोम के अनुक्रमों को ज्ञात करने के लिए यह योजना प्रारम्भ की गई। – मानव जीनोम परियोजना मानव जीनोम की मुख्य विशेषताएँ-
में निम्न मुख्य विशेषताएँ हैं-

  • मानव जीनोम में 3164.7 करोड़ न्यूक्लियोटाइड क्षार हैं।
  • औसतन जीन में 3000 क्षार होते हैं परन्तु इनके आकार में विभिन्नताएँ मिलती हैं। मानव में ज्ञात सबसे बड़ी जीन डिस्ट्रॉफिन (Dystrophin) में 24 करोड़ क्षार होते हैं।
  • कुछ जीनों की संख्या 30,000 होती है तथा लगभग सभी व्यक्तियों में मिलने वाले न्यूक्लियोटाइड क्षार एकसमान होते हैं।
  • दो प्रतिशत से कम जीनोम प्रोटीन का कूटलेखन करते हैं।
  • मानव जीनोम के बहुत बड़े भाग का निर्माण पुनरावृत्ति अनुक्रम द्वारा होता है।
  • पुनरावृत्ति अनुक्रम डीएनए के फैले हुए भाग हैं जिनकी कभी-कभी सौ से हजार बार पुनरावृत्ति होती है। जिनके बारे में यह विचार है कि इनका सीधा कूटलेखन में कोई कार्य नहीं है लेकिन इनसे गुणसूत्र की संरचना, गतिकीय व विकास के बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।
  • गुणसूत्र | में सर्वाधिक जीन (2968) व Y गुणसूत्र में सबसे कम जीन (231) मिलते हैं।
  • वैज्ञानिकों ने मानव में लगभग 14 करोड़ जगहों पर अलग इकहरा क्षार (SNPs – एकल न्यूक्लियोटाइड बहुरूपता; सिंगल न्यूक्लियोटाइड पॉलीमारफीजम; जिसे ‘स्निप्स’ कहा जाता है) का पता लगाया । उपरोक्त जानकारी से गुणसूत्रों में उन जगहों जो रोग आधारित अनुक्रम मानव इतिहास का पता लगाने में सहायक हैं, के विषय में जानकारी एकत्र करने में अधिक सहयोग प्रदान किया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

1. ट्रांसलेशन (अनुवादन/ स्थानान्तरण) की प्रथम अवस्था कौनसी होती है ? (NEET-2020)
(अ) डी. एन. ए. अणु की पहचान
(ब) tRNA का एमीनोएसीलेशन
(स) एक एन्टी-कोडॉन की पहचान
(द) राइबोसोम से mRNA का बंधन
उत्तर:
(ब) tRNA का एमीनोएसीलेशन

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

2. निम्नलिखित में से कौनसा कथन सही है (NEET 2020 )
(अ) एडीनीन एक H-बंध के द्वारा थायमीन के साथ युग्म बनाता है।
(ब) एडीनीन तीन H-बंधों के द्वारा थायमीन के साथ युग्म बनाता है
(स) एडीनीन थायमीन के साथ युग्म नहीं बनाता है
(द) एडीनीन दो H-बंधों के द्वारा थायमीन के साथ युग्म बनाता है।
उत्तर:
(द) एडीनीन दो H-बंधों के द्वारा थायमीन के साथ युग्म बनाता है।

3. यदि दो लगातार क्षार युग्मों के बीच की दूरी 0.34 nm है और एक स्तनपायी कोशिका की DNA द्विकुण्डली में क्षार युग्मों की कुल संख्या 6.6 x 10 bp है। (NEET-2020)
(अ) 2.5 मीटर
(ब) 2.2 मीटर
(स) 2.7 मीटर
(द) 2.0 मीटर
उत्तर:
(ब) 2.2 मीटर

4. अनुलेखन के समय डी.एन.ए. की कुण्डली को खोलने में कौनसा एंजाइम मदद करता है? (NEET-2020)
(अ) डी.एन.ए. . हैलीकेज
(ब) डी. एन. ए. पॉलिमरेज
(स) आर. एन. ए. पॉलिमरेज
(द) डी.एन.ए. लाइगेज
उत्तर:
(स) आर. एन. ए. पॉलिमरेज

5. डी.एन.ए. एवं आर. एन. ए. दोनों में पाये जाने वाले प्यूरीन कौनसे हैं ? (NEET-2019)
(अ) साइटोसिन और थाईमीन
(ब) एडेनीन और थाईमीन
(स) ऐडेनीन और ग्वानीन
(द) ग्वानीन और साइटोसीन
उत्तर:
(स) ऐडेनीन और ग्वानीन

6. व्यक्त अनुक्रम घुंडी (ई.एस.टी.) का क्या तात्पर्य है? (NEET-2019)
(अ) नूतन डी.एन.ए. अनुक्रम
(ब) आर. एन. ए. रूप में जीनों का अभिव्यक्त होना
(स) पॉलिपेप्टाइड अभिव्यक्ति
(द) डी. एन. ए. बहुरूपता ।
उत्तर:
(ब) आर. एन. ए. रूप में जीनों का अभिव्यक्त होना

7. बहुत से राइबोसोम एक mRNA से संबद्ध होकर एक साथ पॉलिपेप्टाइड की प्रतियाँ बनाते हैं। राइबोसोम की ऐसी श्रृंखलाओं को क्या कहते हैं?(NEET-2018)
(अ) प्लस्टिडोम
(स) बहुसूत्र
(ब) बहुतलीय पिण्ड
(द) केन्द्रिकाय
उत्तर:
(स) बहुसूत्र

8. डी.एन.ए. एक आनुवंशिक पदार्थ है? इसका अंतिम प्रमाण किसके प्रयोग से आया ? (NEET-2017)
(अ) ग्रिफिथ
(ब) हर्शे और चेस
(स) अवरी मैकलॉड और मैककार्टी
(द) हरगोविन्द खुराना
उत्तर:
(ब) हर्शे और चेस

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9. निम्नलिखित में से कौन संरचनात्मक जीन के समान है ? (NEET-2016)
(अ) ओपेरॉन
(ब) रिकॉन
(स) म्यूटान
(द) सिस्टॉन
उत्तर:
(द) सिस्टॉन

10. निम्नलिखित में से कौनसा RNA पर लागू नहीं होता ? (NEET-2015)
(अ) 5 फास्फोरिल और 3 हाइड्रोक्सिल सिरे
(ब) विषम चक्रीय नाइट्रोजीनी बेस
(स) चारगॉफ नियम
(द) सम्पूरक बेस युग्मन
उत्तर:
(स) चारगॉफ नियम

11. दिया गया आलेख DNA के आनुवांशिक विचार को महत्त्वपूर्ण संकल्पना दर्शाता है। रिक्त स्थानों (A से लेकर C तक) की पूर्ति कीजिए- (NEET-2013)
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 17
(अ) A – अनुलेखन B – प्रतिकृतिय C – इरविन चारगॉफ
(ब) A – ट्रांसलेशन B – अनुलेखन C – इरविन चारगॉफ
(स) A – अनुलेखन B – ट्रांसलेशन C – फ्रांसिस क्रिक
(द) A – ट्रांसलेशन B – विस्तार C – रोजेलिन फ्रैंकलिन
उत्तर:
(ब) A – ट्रांसलेशन B – अनुलेखन C – इरविन चारगॉफ

12. यदि DNA के एक रज्जुक के नाइट्रोजनी क्षारकों का अनुक्रम ATCTG है तो उसके पूरक RNA रज्जुक में क्या अनुक्रम होगा? (NEET-2012)
(अ) TTAGU
(ब) UAGAC
(स) AACTG
(द) ATCGU
उत्तर:
(स) AACTG

13. जीव विज्ञान के इतिहास में मानव जीनोम प्रोजेक्ट के अधीन किसका विकास किया गया ? (Mains-2011)
(अ) बायोस्टिमेटिक
(ब) जैव प्रौद्योगिक
(स) बायोमॉनिटरिंग
(द) जैव सूचनिकी
उत्तर:
(द) जैव सूचनिकी

14. निम्नलिखित में से कौनसा एक है जिसमें आण्विक जीवविज्ञान के सेन्ट्रल-डोरमा का अनुसरण नहीं होता? (NEET-2010)
(अ) म्यूकर
(ब) स्लेमाइडोमोनास
(स) HIV
(द) मटर
उत्तर:
(अ) म्यूकर

15. DNA की अर्धसंरक्षी प्रतिकृति सर्वप्रथम किसमें प्रदर्शित की गयी थी? (NEET-2009)
(अ) साल्मोनेला टाइफीमुरिम
(ब) ड्रोसोफिला मैलेनोगेस्टर
(स) एशरिशिचया कोलाई
(द) स्ट्रेप्टोकॉकस न्यूमोनी
उत्तर:
(स) एशरिशिचया कोलाई

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

16. DNA अणु के भीतर- (NEET-2008)
(अ) थाइमीन के प्रति ऐडेनीन का अनुपात अलग-अलग जीव में अलग-अलग होता है।
(ब) दो रज्जुक होते हैं जो एक-दूसरे के प्रति समान्तर चलते हैं। एक 53 दिशा में तथा दूसरा 35 दिशा में ।
(स) प्यूरीन न्यूक्लियोटाइडों तथा पाइरिमिडिन न्यूक्लियोटाइडों की सकल मात्रा सदैव बराबर नहीं होती ।
(द) दो रज्जुक होते हैं जो 53 दिशा में समानान्तर चलते हैं।
उत्तर:
(ब) दो रज्जुक होते हैं जो एक-दूसरे के प्रति समान्तर चलते हैं। एक 53 दिशा में तथा दूसरा 35 दिशा में ।

17. DNA के खंडों को जोड़ने का कार्य करने वाला एंजाइम है- (Kerala PMT-2005, 09)
(अ) DNA पॉलीमरेज- I
(स) DNA लाइगेज
(ब) DNA पॉलीमरेज – III
(द) एण्डोन्यूक्लिएज
उत्तर:
(स) DNA लाइगेज

18. लैक ऑपेरॉन परिकल्पना में संरचनात्मक जीन का अनुक्रम होता है- (Karnataka CET-2007)
(अ) Lac-a, Lac-Z, Lac – Y
(ब) Lac-Y, Lac-Z, Lac-a
(स) Lac-a, Lac -Y, Lac Z
(द) Lac Z, Lac -Y, Lac-a
उत्तर:
(द) Lac Z, Lac -Y, Lac-a

19. लैक- ऑपेरॉन मॉडल में रिप्रेशर प्रोटीन किस स्थान से जुड़ता है-
(अ) आपरेटर
(ब) प्रमोटर
(स) रेग्यूलेटर
(द) संरचनात्मक जीन
उत्तर:
(अ) आपरेटर

20. श्रृंखला समापन कोडॉन (Stop Codons) हैं- (Bihar CECE -2006; DPMT-2006)
(अ) AGT, TAG UGA
(ब) GAT, AAT, AGT
(स) TAG TAA, TGA
(द) UAG, UGA, UAA
उत्तर:
(द) UAG, UGA, UAA

21. DNA की प्रतिकृति (replication) होता है- (Haryana PMT-2005)
(अ) 25 दिशा में
(ब) 35 दिशा में
(स) 35 व 53 दोनों दिशाओं में
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) 35 व 53 दोनों दिशाओं में

22. RNA में अनुपस्थित तत्व है- (AMU-2005)
(अ) नाइट्रोजन
(ब) सल्फर
(स) ऑक्सीजन
(द) हाइड्रोजन
उत्तर:
(ब) सल्फर

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23. RNA का कौन-सा सर्वाधिक हेटरोजीनस होता है? (Haryana PMT-2005)
(अ) t.RNA
(स) r.RNA
(ब) m. RNA
(द) hn. RNA
उत्तर:
(द) hn. RNA

24. यदि एडिनिन का प्रतिशत 30 है तो ग्वानिन का क्या प्रतिशत होगा- (Haryana PMT-2005)
(अ) 10%
(स) 30%
(ब) 20%
(द) 40%
उत्तर:
(ब) 20%
नोट- क्योंकि A+ G का प्रतिशत 50% के बराबर होता है, प्रकार ग्वानिन का प्रतिशत 20% होता है।

25. ओकाजाकी खण्ड का एक सही क्रम में जुड़ते हैं- (Kerala PMT-2005)
(अ) DNA पॉलीमरेज द्वारा
(ब) DNA लाइगेज द्वारा
(स) RNA पॉलीमरेज द्वारा
(द) प्राइमेज द्वारा
उत्तर:
(द) प्राइमेज द्वारा

नोट- अन्तिम चरण में फास्फोडाईएस्टर बंध के द्वारा ओकाजाकी खण्ड को जोड़ने के लिए लेगिंग स्ट्रेन्ड (lagging strand) के पूर्ण संश्लेषण की आवश्यकता होती है जो DNA लाइगेज के द्वारा पूर्ण होती है।

26. ई. कोलाई DNA के रेप्लीकेशन की विधि होती है- (CPMT-2005)
(अ) संरक्षी और एकदिशीय
(ब) अर्द्धसंरक्षी और एकदिशीय
(स) संरक्षी और द्विदिशीय
(द) अर्द्धसंरक्षी और द्विदिशीय
उत्तर:
(द) अर्द्धसंरक्षी और द्विदिशीय

27. निम्न में से कौन-सा सही नहीं है? (DPMT-2003; Haryana PMT 2005 )
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 21
(ब) A+ T = G+ C
(स) A+G = C + T
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) A+ T = G+ C

28. निम्न में से कौन DNA संश्लेषण हेतु RNA का टेम्पलेट के रूप में प्रयोग होता है- (CBSE PMT-2005)
(अ) रिवर्स ट्रॉन्सक्रिप्टेज
(ब) DNA डिपेन्डेन्ट RNA पॉलीमरेज
(स) DNA पॉलीमरेज
(द) RNA पॉलीमरेज
उत्तर:
(अ) रिवर्स ट्रॉन्सक्रिप्टेज
नोट- टेमिन ओर बाल्टीमोर द्वारा यह ज्ञात किया गया कि RNA टेम्पलेट पर DNA का निर्माण या RNA से भी DNA का निर्माण होता है, इसे रिवर्स ट्रान्सक्रिप्सन या टेमिनिज्म कहते हैं। यह रिवर्स ट्रान्सक्रिप्सन, रिवर्स ट्रान्सक्रिप्टेज एन्जाइम के प्रभाव से होता है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

29. सुपर कोइल्ड ( Super coiled) DNA पाया जाता है- (Wardha-2005)
(अ) प्रोकैरियोट्स व यूकैरियोट्स में
(ब) केवल यूकैरियोट्स में
(स) केवल प्रोकैरियोट्स में
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) प्रोकैरियोट्स व यूकैरियोट्स में

30. गर्म करने के बाद DNA के विघटन ( Degeneration) का अध्ययन निम्न में से किसकी तुलना करके किया जा सकता है- (Wardha-2005)
(अ) AT अनुपात
(ब) G C अनुपात
(स) शर्करा : फॉस्फेट
(द) न्यूक्लियोटाइड्स की संख्या
उत्तर:
(द) न्यूक्लियोटाइड्स की संख्या

31. जीन का वह भाग जो अनुलेखित (transcript) होता है परन्तु उसका अनुलिपिकरण ( translation) नहीं होता, वह है- (CPMT-2005)
(अ) एक्सॉन
(ब) इन्ट्रॉन
(स) सिस्ट्रॉन
(द) कोडोन
उत्तर:
(ब) इन्ट्रॉन

32. किस RNA का क्लोवर लीफ मॉडल होता है? (CBSE, PMT-2004)
(अ) t.RNA
(ब) r.RNA
(स) hn. RNA
(द) m. RNA
उत्तर:
(अ) t.RNA

33. अनुलेखन के दौरान, यदि DNA में न्यूक्लियोटाइडों का क्रम ATACG है तब m.RNA में न्यूक्लियोटाइडों का क्रम होगा- (CBSE PMT-2004)
(अ) UAUGC
(स) TATGC
(ब) UATGC
(द) TCTGG
उत्तर:
(अ) UAUGC

34. DNA रिपेयरिंग (Repairing) किसके द्वारा की जाती है- (Kerala CET-2002; AFMC-2004; Orissa JEE-2004)
(अ) लाइगेज
(स) DNA पालिमरेज
(ब) DNA पालिमरेज III
(द) DNA पालिमरेज I
उत्तर:
(अ) लाइगेज

35. DNA स्ट्रैण्ड की दिशा से सम्बन्धित सही कथन चुनिए- (MHCET-2004; BVP-2004)
(अ) टेम्पलेट स्ट्रेण्ड पर 5→3
(ब) नए स्ट्रेण्ड पर 3→5
(स) लीडिंग स्ट्रेण्ड पर 5→3
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) लीडिंग स्ट्रेण्ड पर 5→3

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

36. वाटसन और क्रिक के डबल हैलिक्स मॉडल को किसके द्वारा जाना जाता है- (CPMT-2004)
(अ) C-DNA
(ब) B-DNA
(स) Z-DNA
(द) D-DNA
उत्तर:
(ब) B-DNA

37. ऑपेरॉन अवधारणा में रेग्यूलेटर जीन किस तरह कार्य करता है- (KCET-2004)
(अ) रिप्रेसर (Represser )
(ब) रेग्यूलेटर ( Regulator)
(स) इनहीबीटर (Inhibitor)
(द) सभी
उत्तर:
(अ) रिप्रेसर (Represser )

38. वह एन्जाइम जो DNA के अणु को खण्डों में काटता है, उसे कहते हैं- (Orissa PMT-2002; Kerala CET-2003)
(अ) DNA पॉलीमरेज
(ब) DNA लाइगेज
(स) रेस्ट्रिक्शन एन्जाइम
(द) DNA जाइरेज
उत्तर:
(स) रेस्ट्रिक्शन एन्जाइम

39. निम्न में से कौन-सा चित्र DNA रेप्लीकेशन की सही विधि को दर्शाता है- (AIIMS 2003)
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 18
उत्तर:
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 22

40. DNA पॉलीमरेज एन्जाइम के खोजकर्त्ता थे- (Kerala CET 2003; Kerala PMT 2003)
(अ) ओकाजाकी
(ब) कॉर्नबर्ग
(स) वाट्सन-क्रिक
(द) जैकब-मोनॉड
उत्तर:
(ब) कॉर्नबर्ग

41. यूकैरियोटिक RNA पॉलीमरेज III किसके संश्लेषण को उत्प्रेरित करता है- (Kerala CET 2003)
(अ) m.RNA
(ब) t.RNA
(स) 18.5 r.RNA
(द) इन्ट्रॉन्स
उत्तर:
(ब) t.RNA

42. निम्न में से कौन-सा कोडोन UGC के समान सूचना को कोड करता है- (AIIMS 2003)
(अ) UGU
(ब) UGA
(स) UAG
(द) UGG
उत्तर:
(अ) UGU

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

45 RNA पॉलीमरेज का सम्बन्ध किससे है- (CPMT 2003)
(अ) ट्रांसलेशन
(ब) ट्रांसक्रिप्सन
(स) ट्रांसलोकेशन
(द) रेप्लीकेशन
उत्तर:
(ब) ट्रांसक्रिप्सन

44. निम्न में से किस RNA की आयु न्यूनतम होती है- (MP PMT 2002)
(अ) m. RNA
(ब) r.RNA
(स) r.RNA
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) m. RNA

45. प्रोटीन संश्लेषण का सेन्ट्रल डोग्मा होता है- (MHCET 2002)
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 19
उत्तर:
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 20

46. DNA टेम्पलेट पर नये स्ट्रेण्ड का प्रारम्भन किया जाता है- (MHCET 2002)
(अ) RNA पॉलीमरेज
(ब) DNA पॉलीमरेज
(स) DNA लाइगेज
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं

47. यदि दिये गये DNA खण्ड में ग्वानिन के न्यूक्लियोटाइड्स की संख्या 75 और थाइमिन के 75 हैं तो उस खण्ड में कुल उपस्थित न्यूक्लियोटाइड्स की संख्या होगी -(MHCET 2002)
(अ) 75
(ब) 750
(स) 225
(द) 300
उत्तर:
(द) 300

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