Class 12

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

HBSE 12th Class Sanskrit विद्ययाऽमृतमश्नुते Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तरं लिखत
(क) ईशावास्योपनिषद् कस्याः संहितायाः भागः?
(ख) जगत्सर्वं कीदृशम् अस्ति?
(ग) पदार्थभोगः कथं करणीयः?
(घ) शतं समाः कथं जिजीविषेत्?
(ङ) आत्महनो जनाः कीदृशं लोकं गच्छन्ति?
(च) मनसोऽपि वेगवान् कः?
(छ) तिष्ठन्नपि कः धावतः अन्यान् अत्येति?
(ज) अन्धन्तमः के प्रविशन्ति?
(ङ) धीरेभ्यः ऋषयः किं श्रुतवन्तः?
(च) अविद्यया किं तरति?
(ट) विद्यया किं प्राप्नोति?
उत्तरम्:
(क) ईशावास्योपनिषद् ‘यजुर्वेद-संहितायाः’ भागः ।
(ख) जगत्सर्वम् ईशावास्यम् अस्ति।
(ग) पदार्थभोगः त्यागभावेन करणीयः।
(घ) शतं समाः कर्माणि कुर्वन् एव जिजीविषेत्।
(ङ) आत्महनो जनाः ‘असुर्या’ नामकं लोकं गच्छन्ति।
(च) मनसोऽपि वेगवान् आत्मा अस्ति।
(छ) तिष्ठन्नपि परमात्मा धावतः अन्यान् अत्येति।
(ज) ये अविद्याम् उपासते ते अन्धन्तमः प्रविशन्ति।
(ङ) धीरेभ्यः ऋषयः इति श्रुतवन्तः यत् विद्यया अन्यत् फलं भवति अविद्यया च अन्यत् फलं भवति।
(च) अविद्यया मृत्युं तरति।
(ट) विद्यया अमृतं प्राप्नोति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

2. ‘ईशावास्यम्…….कस्यस्विद्धनम्’ इत्यस्य भावं सरलसंस्कृतभाषया विशदयत
उत्तरम्:
(संस्कृतभाषया भावार्थः)
अस्मिन् सृष्टिचक्रे यत् किमपि जड-चेतनादिकं जगत् अस्ति, तत् सर्वम् ईश्वरेण व्याप्तम् अस्ति। ईश्वरः संसारे व्यापकः अस्ति, सः एव च संसारस्य सर्वेषां पदार्थानाम् ईशः = स्वामी। अतः त्यागभावेन एव सांसारिक-पदार्थानाम् उपभोगः करणीयः। कदापि कस्य अपि धने लोभ: न करणीयः।

3. ‘अन्धन्तमः प्रविशन्ति…….विद्यायां रताः’ इति मन्त्रस्य भावं हिन्दीभाषया आंग्लभाषया वा विशदयत
उत्तरम्:
पञ्चममन्त्रस्य भावार्थं पश्यत।

4. ‘विद्यां चाविद्यां च…….ऽमृतमश्नुते’ इति मन्त्रस्य तात्पर्यं स्पष्टयत
उत्तरम्:
सप्तममन्त्रस्य भावार्थं पश्यत।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

5. रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) इदं सर्वं जगत् ………………..।
(ख) मा गृधः …………………..!
(ग) शतं समाः ………………….. जिजीविषेत्।
(घ) असुर्या नाम लोका ………………….. आवृताः ।
(ङ) आवद्योपासकाः ………………….. प्रविशन्ति।
उत्तरम्:
(क) इदं सर्वं जगत् ईशावास्यम्।
(ख) मा गृधः कस्यस्वित् धनम्।
(ग) शतं समाः कर्माणि कुर्वन् एव जिजीविषेत्।
(घ) असुर्या नाम लोका अन्धेनतमसा आवृताः ।
(ङ) अविद्योपासकाः अन्धन्तमः प्रविशन्ति।

6. अधोलिखितानां सप्रसंग हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
(क) तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः।
(ख) न कर्म लिप्यते नरे।
(ग) तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति।
(घ) अविद्यया मृत्युं ती| विद्ययाऽमृतमश्नुते।
(ङ) एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति।
(च) तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः।
(छ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनदेवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
उत्तरम्:
(क) तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः। (त्यागपूर्वक भोग कर)
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशावास्य-उपनिषद्’ से संगृहीत ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ पाठ के ‘ईशावास्यम्……….’ मन्त्र से लिया गया है। इसमें त्यागपूर्वक भोग करने का उपदेश दिया गया है।

व्याख्या-परमेश्वर सब जड़-चेतन पदार्थों में व्यापक है। वही संसार के सभी पदार्थों का स्वामी है। मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन पदार्थों को त्यागपूर्वक ग्रहण करे। इनके उपयोग में लोभकदापि न करे, क्योंकि लोभवश पदार्थों का उपभोग करने से प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ जाता है और मनुष्य का अपना शरीर भी रोगी हो जाता है। प्रकृति के संरक्षण में ही अपनी सुरक्षा छिपी है। इस मन्त्रांश में सन्तुलित एवं स्वस्थ जीवन का रहस्य छिपा है

पदार्थ + त्यागभाव = भोजन, पदार्थ + लोभवृत्ति = भोग। भोजन से शरीर को ऊर्जा मिलती है और भोग करने में रोग का भय रहता है-‘भोगे रोगभयम्’।

(ख) न कर्म लिप्यते नरे।
(मनुष्य में कर्मों का लेप नहीं होता है)
प्रसंगः-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशावास्योपनिषद्’ से संगृहित ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ पाठ के दूसरे मन्त्र से लिया गया है। इसमें बताया गया है कि निष्काम कर्म बन्धन का कारण नहीं होते।

व्याख्या-मन्त्रांश का अर्थ है-‘मनुष्य में कर्मों का लेप नहीं होता है।’ वे कौन से कर्म हैं, उन कर्मों की क्या विधि है, जिनसे कर्म मनुष्य के बन्धन का कारण नहीं बनते। पूरे मन्त्र में इस भाव को अच्छी प्रकार स्पष्ट किया गया है। मन्त्र में कहा गया है कि मनुष्य अपनी पूर्ण इच्छाशक्ति से जीवन भर कर्म करे, निठल्ला-कर्महीन-अकर्मण्य बिल्कुल न रहे, पुरुषार्थी बने। जिन पदार्थों को पाने के लिए हम कर्म करते हैं, उनका वास्तविक स्वामी सर्वव्यापक ईश्वर है। वही प्रतिक्षण हमारे अच्छे बुरे कर्मों को देखता है। अतः यदि मनुष्य पदार्थों के ग्रहण में त्याग भाव रखते हुए, ईश्वर को सर्वव्यापक समझते हुए कर्तव्य भाव से (अनासक्त भाव से) कर्म करता है तो ऐसे निष्काम कर्म मनुष्य को सांसारिक बन्धन में नहीं डालते अपितु उसे जीवन्मुक्त बना देते हैं।

(ग) तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति। (उसी में वायु जलों को धारण करता है)
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशावास्योपनिषद्’ से संगृहीत ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ पाठ में संकलित मन्त्र से लिया गया है। इसमें वायु को जलों का धारण करने वाला कहा गया है।

व्याख्या-मन्त्र में परमात्मा का स्वरूप वर्णन करते हुए उसे अचल, एक तथा मन से भी गतिशील बताते कहा गया है कि इस संसार में ईश्वर-व्यवस्था निरन्तर कार्य कर रही है। उसी के नियम से वायु बहती है, सूर्य-चन्द्र चमकते हैं, पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, फल-फूल-वनस्पतियाँ पैदा होती हैं। यहाँ तक कि वायु = गैसों से जल का निर्माण भी ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन ही होता है। मित्र-वरुण नामक दो वायुतत्त्व (गैसें) हैं, इन्हें विज्ञान की भाषा में हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन कह सकते हैं, इनके मेल से (H2 ,O) से जल का निर्माण होता है। ‘अप:’ का अर्थ जल के अतिरिक्त कर्म भी होता है। सभी प्राणी ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन होकर अपने-अपने कर्म फलों को प्राप्त करते हैं। यह भी मन्त्रांश का भाव है।

(घ) अविद्यया मृत्युं तीा विद्ययाऽमृतमश्नुते।
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशावास्य-उपनिषद्’ से संकलित ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ में संगृहीत मन्त्र से उद्धृत है। इस मन्त्रांश में व्यावहारिक ज्ञान द्वारा मृत्यु को जीतकर अध्यात्म ज्ञान द्वारा अमरत्व प्राप्ति का रहस्य उद्घाटित किया गया है।

व्याख्या-प्रस्तुत मन्त्रांश की व्याख्या के लिए सप्तम मन्त्र के भावार्थ का उपयोग करें।

(ङ) एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति।
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशोपनिषद्’ से सम्पादित विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ में संकलित मन्त्र से उद्धत है। इस मन्त्रांश में उस मार्ग की ओर संकेत किया गया है, जिस मार्ग पर चलकर मनुष्य कर्मबन्धन में नहीं पड़ता।

व्याख्या-मन्त्रांश का सामान्य अर्थ है-‘इस प्रकार तुझ में (कर्म का लेप नहीं होता), इससे भिन्न कोई मार्ग नहीं। यह मन्त्रांश ईशोपनिषद् के पहले दो मन्त्रों के उपदेश की ओर पाठक का ध्यान केन्द्रित करता है। साधारण रूप से कर्म के सम्बन्ध में यह धारणा है कि कर्म चाहे अच्छा हो या बुरा-मनुष्य कर्मबन्धन में अवश्य बँधता है। परन्तु इन दो मन्त्रों में एक ऐसा मार्ग बताया गया है, जिसके अनुसार कर्म करने/जीवन यापन करने पर मनुष्य कर्मबन्धन में नहीं पड़ता। वह मार्ग है ईश्वर को सदा सर्वत्र व्यापक मानते हुए आसक्ति छोड़कर कर्तव्य भाव से कर्म करने का मार्ग। अनासक्त भाव से किया गया कर्म सदा शुभ ही होता है, अतः ऐसे कर्म मनुष्य के बन्धन का कारण नहीं होते अपितु उसे जीवन्मुक्त बना देते हैं। इस मार्ग को छोड़कर जीवन्मुक्त होने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

(च) ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः।
प्रसंग-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ में संगृहीत मन्त्र से उद्धृत है। इस मन्त्रांश में आत्मा का तिरस्कार करने वाले मनुष्यों की मरण-उपरान्त गति के बारे में बताया गया है।

व्याख्या-प्रस्तुत मन्त्रांश की व्याख्या के लिए तृतीय मन्त्र के भावार्थ का उपयोग करें।

(छ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशोपनिषद्’ से सम्पादित ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ में संगृहीत मन्त्र से उद्धृत है। इस मन्त्रांश में आत्मा के स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है।

व्याख्या-‘अनेजत्’ का अर्थ है-कम्पन से रहित, अचल, स्थिर। परमात्मा अनेजत्-अर्थात् कम्पन रहित है, वह अपने स्वरूप में सदा स्थिर बना रहता है। परमात्मा के स्वरूप की दूसरी विशेषता है कि वह एक अर्थात् अद्वितीय है। वह स्थिर होकर भी मन से अधिक वेग वाला है। उसका वेग इतना अधिक है कि देव अर्थात् प्रकाशक इन्द्रियाँ उसको पकड़ ही नहीं पाती क्योंकि परमात्मा सूक्ष्म से सूक्ष्म है और इन्द्रियाँ केवल स्थूल वस्तु का ही ज्ञान कर पाती हैं। परमात्मा सर्वव्यापक है अतः वह ‘पूर्वम् अर्षत्’-सभी जगह पहले से पहुँचा हुआ रहता है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

7. उपनिषन्मन्त्रयोः अन्वयं लिखत.
(क) अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥
(ख) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥
उत्तरम्:
उपर्युक्त दोनों मन्त्रों का अन्वय पाठ में दिया जा चुका है।

8. प्रकृति प्रत्ययं च योजयित्वा पदरचनां कुरुत
त्यज् + क्तः; कृ + शत; तत् + तसिल्
उत्तरम्:
(क) त्यज् + क्त = त्यक्तः
(ख) कृ + शतृ = कुर्वन्
(ग) तत् + तसिल् = ततः

9. प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम्
प्रेत्य, तीर्खा, धावतः, तिष्ठत्, जवीयः
उत्तरम्:
(क) प्रेत्य = प्र + इ + ल्यप्
(ख) तीर्त्वा = √तृ + क्त्वा
(ग) धावतः = √धाव् + शतृ (नपुंसकलिङ्गम्, षष्ठी-एकवचनम्)
(घ) तिष्ठत् = (स्था + शतृ (नपुंसकलिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(ङ) जवीयः = जव + ईयसुन् > ईयस् (नपुंसकलिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)

10. अधोलिखितानि पदानि आश्रित्य वाक्यरचनां कुरुत
जगत्याम्, धनम्, भुञ्जीथाः, शतम्, कर्माणि, तमसा, त्वयि, अभिगच्छन्ति, प्रविशन्ति, धीराणाम्, विद्यायाम्, भूयः, समाः ।
उत्तरम्:
(वाक्यरचना)
(i) जगत्याम्-जगत्याम् अनेके ग्रहाः उपग्रहाः च सन्ति ।
(ii) धनम्-कस्य अपि धनं मा गृधः ।
(iii) भुञ्जीथा:-जगतः भोगान् त्यागभावेन भुञ्जीथाः।
(iv) शतम्-कर्माणि कुर्वन् एवं शतं वर्षाणि जिजीविषेत्।
(v) कर्माणि-सदा शुभानि कर्माणि एव कुर्यात्।
(vi) तमसा-एतत् कूपं तमसा आवृतम् अस्ति।
(vii) त्वयि-त्वयि कः स्निहयति ?
(viii) अभिगच्छन्ति-छात्राः पठनाय गुरुम् अभिगच्छन्ति।
(ix) प्रविशन्ति-अविद्यायाः उपासकाः अन्धन्तमः प्रविशन्ति।
(x) धीराणाम्-धीराणाम् उपदेशः धैर्येण श्रोतव्यः।
(xi) विद्यायाम्-प्रायः योगिनः विद्यायाम् एव रताः भवन्ति ।
(xii) भूयः (पुनः)-सः आगत्य भूयः अगच्छत्।
(xiii) समाः (वर्षाणि)-सदाचारिणः जनाः शतं समाः जीवन्ति।

11. सन्धि/सन्धिच्छेदं वा कुरुत
उत्तरम्:
(क) ईशावास्यम् – ईश + आवास्यम्
(ख) कुर्वन्नेवेह – कुर्वन् + एव + इह
(ग) जिजीविषेत् + शतं – जिजीविषेच्छतम्
(घ) तत् + धावतः – तद्धावतः
(ङ) अनेजत् + एकं – अनेजदेकम्
(च) आहुः + अविद्यया – आहुरविधया
(छ) अन्यथेतः – अन्यथा + इतः
(ज) ताँस्ते – तान् + ते।

12. अधोलिखितानां समुचितं योजनं कुरुत
धनम् – वायुः
समाः – आत्मानं ये घ्नन्ति
असुर्याः – श्रुतवन्तः स्म
आत्महनः – तमसाऽऽवृताः
मातरिश्वा – वर्षाणि शुश्रुम
अमरतां अमृतम् – वित्तम्
उत्तरम्:
धनम् – वित्तम्
समाः – वर्षाणि
असुर्याः – तमसाऽऽवृताः
आत्महनः – आत्मानं ये जन्ति
मातरिश्वा – वायुः
शुश्रुम – श्रुतवन्तः स्म
अमृतम् – अमरताम्

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13. अधोलिखितानां पदानां पर्यायपदानि लिखत
नरे, ईशः, जगत, कर्म, धीराः, विद्या, अविद्या
उत्तरम्:
(पर्यायपदानि)
नरे = मनुष्ये
ईशः = ईश्वरः
जगत् = संसारः
कर्म = कार्यम्
धीराः = विद्वांसः, पण्डिताः
विद्या = अध्यात्मज्ञानम्
अविद्या = अध्यात्मेतरविद्या, व्यावहारिकज्ञानम्

14. अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि लिखत
एकम्, तिष्ठत्, तमसा, उभयम्, जवीयः, मृत्युम्
उत्तरम्:
(विलोमपदानि)
एकम् – अनेकम्
तिष्ठत् – धावत्
तमसा – प्रकाशन
उभयम् – एकम्
जवीयः – शनैश्चरम्, तिष्ठत्
मृत्युम् – अमृतम्

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योग्यताविस्तारः
समग्रेऽस्मिन् विश्वे ज्ञानस्याद्यं स्रोतो वेदराशिरिति सुधियः आमनन्ति। तादृशस्य वेदस्य सार: उपनिषत्सु समाहितो वर्तते। उपनिषदां ‘ब्रह्मविद्या’ ‘ज्ञानकाण्डम्’ ‘वेदान्तः’ इत्यपि नामान्तराणि विद्यन्ते। उप-नि इत्युपसर्गसहितात् सद् (षद्लु) धातोः क्विप् प्रत्यये कृते उपनिषत्-शब्दो निष्पद्यते, येन अज्ञानस्य नाशो भवति, आत्मनो ज्ञानं साध्यते, संसारचक्रस्य दुःखं शिथिलीभवति तादृशो ज्ञानराशिः उपनिषत्पदेन अभिधीयते । गुरोः समीपे उपविश्य अध्यात्मविद्याग्रहणं भवतीत्यपि कारणात् उपनिषदिति पदं सार्थकं भवति।

प्रसिद्धासु 108 उपनिषत्स्वपि 11 उपनिषदः अत्यन्तं महत्त्वपूर्णाः महनीयाश्च । ताः ईश-केन-कठ-प्रश्न-मुण्डकमाण्डूक्य-ऐतरेय-तैत्तिरीय-छान्दोग्य-बृहदारण्यक-श्वेताश्वतराख्याः वेदान्ताचार्याणां टीकाभिः परिमण्डिताः सन्ति।

आद्यायाम् ईशावास्योपनिषदि ‘ईशाधीनं जगत्सर्वम्’ इति प्रतिपाद्य भगवदर्पणबुद्ध्या भोगो निर्दिश्यते। ईशोपनिषदि ‘जगत्यां जगत्’ इति कथनेन समस्तब्रह्माण्डस्य या गत्यात्मकता निरूपिता सा आधुनिकगवेषणाभिरपि सत्यापिता। सततं परिवर्तमाना ब्रह्माण्डगता चलनस्वभावा या सृष्टि:-पशूनां प्राणिनां, तेजः पुञ्जानां, नदीनां, तरङ्गाणां वायोः वा; या च स्थिरत्वेन अवलोक्यमाना सृष्टि:-पर्वतानां, वृक्षाणां, भवनादीनां वा सा सर्वा अपि सृष्टिः ईश्वराधीना सती चलत्स्वभावा एव। ईश्वरस्य विभूत्या सर्वा अपि सृष्टिः परिपूर्णा चलत्स्वभावा च चकास्ते। तदुक्तं भगवद्गीतायाम्

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ॥ इति ॥ भगवद्गीता-10.41

उपनिषत्प्रस्थानरहस्यं विद्याया अविद्यायाश्च समन्वयमुखेन अत्र उद्घाटितमस्ति। ये जना अविद्यापदवाच्येषु यज्ञयागादिकर्मसु, भौतिक-शास्त्रेषु, लौकिकेषु ज्ञानेषु दैनन्दिनसुखसाधन-सञ्चयनार्थं संलग्नमानसा भवन्ति ते लौकिकीम् उन्नतिं प्राप्नुवन्त्येव; किन्तु तेषां तेषां जनानाम् आध्यात्मिकं बलम्, अन्तरसत्त्वं वा निस्सारं भवति। ये तु विद्यापदवाच्ये आत्मज्ञाने एव केवलं संलग्नमनसः भवन्ति, भौतिकज्ञानस्य साधनसामग्रीणां च तिरस्कारं कुर्वन्ति ते जीवननिर्वाहे, लौकिकेऽभ्युदये च क्लेशमनुभवन्ति।

अत एव अविद्यया भौतिकज्ञानराशिभिः मानवकल्याणकारीणि जीवनयात्रासम्पादकानि वस्तूनि सम्प्राप्य विद्यया आत्मज्ञानेन-ईश्वरज्ञानेन जन्ममृत्युदुःखरहितम् अमृतत्वं प्राप्नोति । विद्याया अविद्यायाश्च ज्ञानेन एव इहलोके सुखं परत्र च अमृतत्वमिति कल्याणी वाचम् उपदिशति उपनिषत् ‘अविद्यया मृत्युं तीा विद्ययाऽमृतमश्नुते’ इति।

पाठ्यांशेन सह भावसाम्यं पर्यालोचयत
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायोऽह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥ भगवद्गीता-3.8
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥ कठोपनिषत्-3.15

कठोपनिषदि प्रतिपादितं श्रेयं प्रेयश्च अधिकृत्य सङ्ग्रणीत-दिङ्मानं यथा

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श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ
संपरीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमात् वृणीते॥ कठोपनिषत्-2.2

विविधासु उपनिषत्सु प्रतिपादिताम् आत्मप्राप्तिविषयकजिज्ञासां विशदयत
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष
आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ।। कठोपनिषत्-2.23

वैदिकस्वराः
वैदिकमन्त्रेषु उच्चारणदृष्ट्या त्रिविधानां ‘स्वराणां’ प्रयोगो भवति। मन्त्राणाम् अर्थमधिकृत्य चिन्तनं, प्रकृतिप्रत्यययोः योगं, समासं वाश्रित्य भवति। तत्र अर्थनिर्धारणे स्वरा महत्त्वपूर्णा भवन्ति। ‘उच्चैरुदात्त:’ ‘नीचैरनुदात्तः’ ‘समाहारः स्वरितः’ इति पाणिनीयानुशासनानुरूपम् उदात्तस्वर: ताल्वादिस्थानेषु उपरिभागे उच्चारणीयः, अनुदात्तस्वरः ताल्वादीनां नीचैः स्थानेषु, उभयोः स्वरयोः समाहाररूपेण (समप्रधानत्वेन)स्वरित उच्चारणीय इति उच्चारणक्रमः। वैदिकशब्दानां निर्वचनार्थं प्रवृत्ते निरुक्ताख्ये ग्रन्थे पाणिनीयशिक्षायां च स्वरस्य महत्त्वम् इत्थमुक्तम्

मन्त्रो हीनस्स्वरतो वर्णतो वा
मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति
यथेन्द्रशत्रुस्स्वरतोऽपराधात्॥

मन्त्राः स्वरसहिताः उच्चारणीया इति परम्परा। अतः स्वरितस्वरः अक्षराणाम् उपरि चिह्नन, अनुदात्तस्वरः अक्षराणां नीचैः चिह्नन उदात्तस्वरः किमपि चिह्न विना च मन्त्राणां पठन-सौकर्यार्थं प्रदर्श्यते।

निष्कर्षः
वैदिक मन्त्रों के उच्चारण में तीन प्रकार के स्वरों का प्रयोग होता है-1. उदात्तस्वर, 2. अनुदात्तस्वर और 3. स्वरितस्वर। स्वरों के परिवर्तन से कभी-कभी अर्थ-परिवर्तन भी हो जाता है। अतः मन्त्रों के सस्वर पाठ की प्राचीन परम्परा रही है। लेखन में अक्षर के ऊपर स्वरितस्वर के लिए खड़ी रेखा (इति), अनुदात्तस्वर के लिए नीचे पड़ी रेखा (ततः) लगाई जाती है। उदात्तस्वर के लिए किसी चिह्न का प्रयोग नहीं होता है; जैसे-(यः)।

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HBSE 9th Class Sanskrit विद्ययाऽमृतमश्नुते Important Questions and Answers

1. समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) ईशावास्योपनिषद् कस्याः संहितायाः भागः ?
(A) ऋग्वेदसंहितायाः
(B) यजुर्वेदसंहितायाः
(C) सामवेदसंहितायाः
(D) अथर्ववेदसंहितायाः।
उत्तराणि:
(B) यजुर्वेदसंहितायाः

(ii) जगत्सर्वं कीदृशम् अस्ति ?
(A) वास्यम्
(B) आवास्यम्
(C) सर्वम्
(D) ईशावास्यम्।
उत्तराणि:
(D) ईशावास्यम्

(iii) पदार्थभोगः कथं करणीयः ?
(A) त्यागभावेन
(B) लोभवृत्त्या
(C) साधुवृत्त्या
(D) भोगभावेन।
उत्तराणि:
(A) त्यागभावेन

(iv) आत्महनो जनाः कीदृशं लोकं गच्छन्ति ?
(A) सूर्यलोकम्
(B) चन्द्रलोकम्
(C) असुर्यालोकम्
(D) ब्रह्मलोकम्।
उत्तराणि:
(C) असुर्यालोकम्

(v) मनसोऽपि वेगवान् कः ?
(A) वायुः
(B) आत्मा
(C) आत्मीयः
(D) वायव्यः।
उत्तराणि:
(B) आत्मा

(vi) तिष्ठन्नपि कः धावतः अन्यान् अत्येति ?
(A) परमात्मा
(B) दुरात्मा
(C) अश्वः
(D) मनः।
उत्तराणि:
(A) परमात्मा

(vii) अविद्यया किं तरति ?
(A) अमृतम्
(B) वित्तम्
(C) ऋतम्
(D) मृत्युम्।
उत्तराणि:
(D) मृत्युम्

(vii) विद्यया किं प्राप्नोति ?
(A) अमृतम्
(B) धनम्
(C) यशः
(D) मृत्युम्।
उत्तराणि:
(A) अमृतम्।

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितम् पदं चित्वा लिखत
(i) इदं सर्वं जगत् ईशावास्यम्
(A) कः
(B) कीदृशम्
(C) कति
(D) कस्मात्।
उत्तराणि:
(B) कीदृशम्

(ii) शतं समाः कर्माणि कुर्वन् एव जिजीविषेत्।
(A) कस्य
(B) केषाम्
(C) किम्
(D) कुत्र।
उत्तराणि:
(C) किम्

(iii) असुर्या नाम लोका अन्धेन तमसा आवृताः।
(A) केन
(B) कस्य
(C) कस्मै
(D) कस्याम्।
उत्तराणि:
(A) केन

(iv) अविद्योपासकाः अन्धन्तमः प्रविशन्ति।
(A) कः
(B) को
(C) काः
(D) के।
उत्तराणि:
(D) के।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

विद्ययाऽमृतमश्नुते पाठ्यांशः

1. शावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य॑ स्विद्धनम्॥1॥

अन्वयः-इदं सर्वं यत् किं च जगत्यां जगत् (तत्) ईशावास्यम्, तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः, कस्यस्वित् धनं मा गृधः ।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में परमात्मा की सर्वव्यापकता तथा त्यागपूर्वक भोग का उपदेश दिया गया है।

सरलार्थ:-यह सब जो कुछ सृष्टि में चराचर जगत् है, वह सब परमेश्वर से व्याप्त है। इसीलिए त्याग भाव से सृष्टि के पदार्थों का उपभोग कर। किसी के भी धन का लालच मत कर।

भावार्थ:-इस सृष्टि में जो भी जड़-चेतन पदार्थ दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उन सबमें एकरस होकर परमात्मा व्यापक त्यागभाव से ही सृष्टि के पदार्थों का उपभोग करना चाहिए। किसी के भी धन पर गृद्ध दृष्टि नहीं रखनी चाहिए क्योंकि अन्ततः यह धन किसी का भी नहीं। त्यागपूर्वक भोग शरीर के लिए भोजन (शरीर की शक्ति) बन जाता है और आसक्ति/लालच से किसा गया भोग विषय-भोग बन जाता है। ऐसा आसक्तिमय भोग ही रोग का कारण होता है-‘भोगे रोगभयम्’।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च

ईशावास्यम् = ईश के रहने योग्य अर्थात् ईश्वर से व्याप्त। ईशस्य ईशेन वा आवास्याम्। जगत्याम् = जगती अर्थात् ब्रह्माण्ड/सृष्टि में। सप्तमी एकवचन। जगत् = सतत परिवर्तनशील संसार। गच्छति इति जगत्। सततं परिवर्तमानः प्रपञ्चः । भुञ्जीथाः = भोग करो। विषय वस्तु का ग्रहण करो। भोगं कुरु। ।भुज् (पालने अभ्यवहारे च), आत्मनेपदी, विधिलिङ् मध्यम पुरुष, एकवचन। मा गृधः = लोलुप मत हो। लोभ मत करो। लोलुपः मा भव। गध (अभिकांक्षायाम) लङ् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन में ‘अगृधः’ रूप बनता है। व्याकरण के नियमानुसार निषेधार्थक ‘माङ्’ अव्यय के योग में ‘अगृधः’ के आरम्भ में विद्यमान ‘अ’ कार का लोप हो जाता है। कस्यस्विद् = किसी का। इसके समानार्थक पद हैं-कस्यचित्, कस्यचन। अव्यय।।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

2. कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
वं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥2॥

अन्वयः-इह कर्माणि कुर्वन् एव शतं समाः जिजीविषेत् । एवं त्वयि नरे कर्म न लिप्यते। इतः अन्यथा (मार्गः) न अस्ति। __ प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में कर्तव्य भाव से कर्म करने की प्रेरणा दी गई है।

सरलार्थः-इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करे। इस प्रकार तुझ मनुष्य में कर्मों का लेप/बन्धन नहीं होता। इससे अन्य दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

भावार्थ:-उपनिषद् के पहले मन्त्र में त्यागपूर्वक भोग की बात कही गई है। इस मन्त्र में कर्म करते हुए-पुरुषार्थी बनकर ही सौ वर्षों के दीर्घजीवन का संकल्प प्रकट किया गया है। दोनों मन्त्रों का समन्वित भाव यह है कि मनुष्य को संसार में अनासक्त भाव से कर्म करते हुए स्वाभिमान पूर्वक जीवन यापन करना चाहिए। लोभ/आसक्ति के कारण ही मनुष्य पाप कर्म करता है-‘लोभः पापस्य कारणम्’। कर्तव्य भाव से किए गए कर्म सदा शुभ होते हैं। अतः ऐसे निष्काम कर्म मनुष्य को कर्म-बन्धन में नहीं बाँधते अपितु उसे मुक्त जीवन प्रदान करते है। श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग का मूल स्रोत उपनिषद् के ये वचन ही हैं।

प्रस्तुत मन्त्र का यह सारगर्भित सन्देश है कि मनुष्य को निठल्ले रहकर नहीं अपितु जीवन भर पुरुषार्थी बनकर कर्तव्य भाव से शुभ कर्म करते हुए ही अपना जीवन यापन करना चाहिए। जीवन्मुक्त होने का यही एक उपाय है, इससे भिन्न कोई उपाय नहीं है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
कुर्वन्नेव = करते हुए ही। कृ + शत, पुंल्लिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन। कुर्वन् + एव। जिजीविषेत् = जीने की इच्छा करें। जीवितुम् इच्छेत्। Vजीव् (प्राणधारणे), इच्छार्थक सन् प्रत्यय से विधिलिङ्। जीव + सन् + विधिलिङ् प्रथमपुरुष, एकवचन। शतं समाः = सौ वर्ष; शतं वर्षाणि। कर्म न लिप्यते = कर्म लिप्त नहीं होता। लिप् (उपदेहे), लट्, कर्मणि प्रयोग। ‘कर्म नरे न लिप्यते-यह एक विशिष्ट वैदिक प्रयोग है। तुलना कीजिए–’लिप्यते न स पापेन।’ – (भगवद्गीता-5.10)।

पन्थाः = मार्ग, उपाय। पथिन्, पुंल्लिग, प्रथमा-एकवचन। अन्यथा इतः = इससे भिन्न।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

3. असुर्या ना ते लोकाऽन्धेसाऽऽवृताः।
ताँस्ते प्रेत्यापिं गच्छन्ति ये के चात्मनो जनाः ॥3॥

अन्वयः-असुर्याः नाम ते लोकाः, (ये) अन्धेन तमसा आवृताः (सन्ति), ये के च आत्महनः जनाः (भवन्ति), ते प्रेत्य तान् अभिगच्छन्ति।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में आत्मस्वरूप का तिरस्कार करने वाले को आत्महन्ता कहा गया है।

सरलार्थः-असुरों अर्थात् केवल प्राणपोषण में लगे हुए लोगों के वे प्रसिद्ध लोक (योनियाँ) हैं, जो गहरे अज्ञानअन्धकार से ढके हुए हैं। जो कोई लोग आत्मा के हत्यारे (आत्मा के विरुद्ध अधर्म का आचरण करने वाले) होते हैं, वे मरकर उन अज्ञान के अन्धकार से युक्त योनियों को प्राप्त करते हैं।

भावार्थ:-आत्मा अमर है, यह कभी नहीं मरता। आत्मा के विरुद्ध अधर्म का आचरण करना तथा आत्मा की सत्ता को स्वीकार न करना ही आत्महत्या है। आत्मा के दो रूप हैं-परमात्मा और जीवात्मा। परमात्मा सम्पूर्ण जड-चेतन में व्यापक होकर उसे अपने शासन में रखता है। जीवात्मा शरीर में व्यापक होकर उसे अपने नियन्त्रण में रखता है। जो लोग आत्मा के इस स्वरूप का तिरस्कार करते हैं तथा अपने प्राणपोषण के लिए आसक्तिपूर्वक सृष्टि के पदार्थों का भोग करते हैं, वे असुर हैं। ऐसे राक्षसवृत्ति लोगों को मरने के पश्चात् उन ‘असुर्या’ नामक अन्धकारमयी योनियों में जन्म मिलता है, जहाँ ज्ञान का प्रकाश नहीं होता।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
असुर्याः = प्रकाशहीन। अथवा असुर सम्बन्धी। अविद्यादि दोषों से युक्त, प्राणपोषण में निरत। असुषु प्राणेषु रमते यः सः असुरः। असुर + यत् = असुर्य। प्रथमा विभक्ति बहुवचन। अन्धेन तमसा = अज्ञान रूपी घोर अन्धकार से। ‘तमः’ शब्द अज्ञान का बोधक। आवृताः = आच्छादित। आ +/ वृ (वरणे) + क्त। प्रेत्य = मरणं प्राप्य, मरण प्राप्तकर। इण (गतौ) धातु। प्र + इ + ल्यप्। आत्महनः = आत्मानं ये घ्नन्ति । आत्मा की व्यापकता को जो स्वीकार नहीं करते। ‘आत्मानं = ईशं सर्वतः पूर्ण चिदानन्दं घ्नन्ति = तिरस्कुर्वन्ति (शाकरभाष्ये)’।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

4. अनेदेकं मनसो जवीयो नैनदेवा आप्नुन् पूर्वमर्शत्।
तद्धावतोऽन्यानत्यति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मारिश्वा दधाति॥4॥

अन्वयः-अनेजत्, एकम् मनसः जवीयः। देवाः एनत् न आप्नुवत्। पूर्वम् अर्षत्। तत् तिष्ठत् धावतः अन्यान् अत्येति। तस्मिन् मातरिश्वा अपः दधाति।।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में सर्वव्यापक परमात्मा के स्वरूप का निरूपण किया गया है।

सरलार्थ:-(वह परमात्मा) निश्चल, एक, मन से भी अधिक वेग वाला है। देव (इन्द्रियाँ) उस तक नहीं पहुँच पाते हैं। (यह सर्वव्यापक होने से सब जगह) पहले से ही पहुँचा हुआ है। इसीलिए वह परमात्मा अपने स्वरूप में स्थिर रहते हुए दौड़ने वाले दूसरे ग्रह-उपग्रह आदि का अतिक्रमण कर जाता है। उसी परमात्मा के नियम से वायु जलों को धारण करता है अथवा यह जीवात्मा कर्मों को धारण करता है।

भावार्थ:-वह परमात्मा अचल, एक, मन से भी अधिक वेगवान् तथा इन्द्रियों की पहुँच से परे है। परमात्मा की व्यवस्था से ही मित्र और वरुण नामक वायु मिलकर जल का रूप (H2,O) धारण करते हैं अथवा परमात्मा की व्यवस्था में ही सभी जीवात्माएँ अपने-अपने कर्मों को धारण करती हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अनेजत् = कम्पन रहित। विकार रहित, स्थिर, अचल। √ एज़ (कम्पने)। न + √ एज् + शतृ। नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन। जवीयः = अधिक वेगवाला। अतिशयेन जववत्। जव + ईयस्। नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन। देवाः = इन्द्रियाँ । न आप्नुवन् = प्राप्त नहीं किया। /आप्लु (व्याप्तौ), लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन। अर्षत् = गच्छत्। गमनशील। √ ऋषी (गतौ)। शतृ प्रत्यय, नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन। अथवा √ऋ (गतौ), लेट् लकार। तिष्ठत् = स्थिर रहने वाला। परिवर्तन रहित। (स्था + शतृ, नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन। अपः = जल, कर्म । मातरिश्वा = वायु , प्राणवायु। मातरि – अन्तरिक्षे श्वयति – गच्छति इति मातरिश्वा। नकारान्त पुंलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

5. न्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
तो भूय इ ते तमो य उ विद्याया रताः॥

अन्वयः-ये अविद्याम् उपासते, (ते) अन्धन्तमः प्रविशन्ति। ततः भूयः इव ते तमः (प्रविशन्ति), ये उ विद्यायां रताः ।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽ-मृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में बताया गया है कि केवल अविद्या = भौतिक विद्या अथवा केवल विद्या = अध्यात्म विद्या में लगे रहना अन्धकार में पड़े रहने के समान है।

सरलार्थः-जो लोग केवल अविद्या अर्थात् भौतिक साधनों की प्राप्ति कराने वाले ज्ञान की उपासना करते हैं, वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं। परन्तु उनसे भी अधिक घोर अन्धकारमय जीवन उन लोगों का होता है, जो केवल विद्या अर्थात् अध्यात्म ज्ञान प्राप्त करने में ही लगे रहते हैं।

भावार्थ:-अविद्या और विद्या वेद के विशिष्ट शब्द हैं। ‘अविद्या’ से तात्पर्य है शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता करने वाला ज्ञान। ‘विद्या’ का अर्थ है, आत्मा के रहस्य को प्रकट करने वाला अध्यात्म ज्ञान। वेद मन्त्र का तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति केवल भौतिक साधनों को जुटाने का ज्ञान ही प्राप्त करता है और ‘आत्मा’ के स्वरूपज्ञान को भूल जाता है तो बहुत बड़ा अज्ञान है, उसका जीवन अन्धकारमय है। परन्तु जो व्यक्ति केवल अध्यात्म ज्ञान में ही मस्त रहता है, उसकी दुर्दशा तो भौतिक ज्ञान वाले से भी अधिक दयनीय होती है। क्योंकि भौतिक साधनों के अभाव में शरीर की रक्षा भी कठिन हो जाएगी। अत: वेदमन्त्र का स्पष्ट संकेत है कि भौतिक ज्ञान तथा अध्यात्म ज्ञान से युक्त सन्तुलित जीवन ही सफल और आनन्दित जीवन है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अन्धन्तमः = घोर अन्धकार। प्रविशन्ति= प्रवेश करते हैं। प्र + विश् (प्रवेशने) लट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन। उपासते = उपासना करते हैं। उप + आसते। आस् (उपवेशने) धातु लट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन। आस्ते आसाते आसते। ततो भूय इव = उससे अधिक। तीनों पद अव्यय हैं। ततः + भूयः + इव। रताः = रमण करते हैं। निरत हैं। रिम् (क्रीडायाम्) + क्त प्रथमा विभक्ति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

6. न्यदेवाहुर्विद्यया न्याहुरविद्यया।
इति शुश्रु धीराणां ये स्तद्विचचक्षिरे॥6॥

अन्वयः-विद्यया अन्यत् एव (फलम्) आहुः । अविद्यया अन्यत् एव (फलम् आहुः) इति धीराणां (वचांसि) शुश्रुम, ये नः तत् विचचक्षिरे।

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में विद्या और अविद्या के अलग-अलग फल की चर्चा की गई है।

सरलार्थ:-अविद्या अर्थात् व्यावहारिक ज्ञान का अलग प्रकार का फल होता है और विद्या अर्थात् अध्यात्मज्ञान का अलग प्रकार का फल होता है। इस प्रकार से हमने उन विद्वान् ज्ञानी पुरुषों के वचनों को सुना है, जिन विद्वानों ने उस विद्या और अविद्या के रहस्य को हमारे लिए स्पष्ट उपदेश किया है।

भावार्थ:-व्यावहारिक ज्ञान से सांसारिक सुख-साधनों की प्राप्ति तथा शरीर की भूख-प्यास दूर होती है। अध्यात्मज्ञान आत्मा को अपने स्वरूप में स्थिर बनाता है। इस प्रकार दोनों प्रकार का ज्ञान अलग-अलग उद्देश्य को सिद्ध करता है। जिन विद्वान् लोगों ने अविद्या और विद्या के इस रहस्य को हमारे कल्याण के लिए समझाया है, उन्हीं से हमने ऐसा सुना

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
आहुः = कहते हैं। ब्रूञ् (व्यक्तायां वाचि), लट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन । शुश्रुम = सुन चुके हैं। √श्रु (श्रवणे), लिट् लकार उत्तम पुरुष बहुवचन। विचचक्षिरे = स्पष्ट उपदेश किए थे। वि + √चक्षिङ् (आख्याने), लिट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन। चचक्षे चचक्षाते चचक्षिरे। विद्या = ज्ञान, अध्यात्म ज्ञान। । √विद् (ज्ञाने) + क्यप् + टाप् । यहाँ ‘अध्यात्म विद्या’ के अर्थ में ‘विद्या’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इस चराचर जगत् में सर्वत्र व्याप्त आत्मस्वरूप ईश्वर के ज्ञान को तथा शरीर में व्याप्त आत्मस्वरूप जीव के ज्ञान को ‘अध्यात्मविद्या’ की संज्ञा दी गई है। यह यथार्थ ज्ञान ‘विद्या’ है। इसे ही ‘मोक्ष विद्या’ नाम से भी जाना जाता है। अविद्या = अध्यात्मेतर विद्या, व्यावहारिक विद्या। अध्यात्म ज्ञान से भिन्न सभी ज्ञान। न + विद्या ‘न’ का अर्थ है ‘इतर’ अथवा ‘भिन्न’। अर्थात् ‘आत्मविद्या से भिन्न’ जो भी ज्ञानराशि है; जैसे-सृष्टिविज्ञान, यज्ञविद्या, भौतिक विज्ञान, आयुर्विज्ञान, प्रौद्योगिकी, सूचना-तन्त्र-ज्ञान आदि अविद्या पद में समाहित

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

7. विद्यां चाविद्यां यस्तद्वेदोभयं ह।
अविद्यया मृत्युं तीर्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥7॥

अन्वयः-यः विद्यां च अविद्यां च उभयं सह वेद, (सः) अविद्यया मृत्यु तीा विद्यया अमृतम् अश्नुते।

प्रसंगः-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में अध्यात्मज्ञान तथा व्यावहारिक ज्ञान द्वारा सन्तुलित जीवन यापन करने का आदेश दिया है।

सरलार्थः-जो मनुष्य विद्या अर्थात् अध्यात्मज्ञान तथा अविद्या अर्थात् अध्यात्म ज्ञान से भिन्न सभी प्रकार का व्यावहारिक ज्ञान, दोनों को एक साथ जानता है। वह व्यावहारिक ज्ञान द्वारा मृत्यु को पारकर अध्यात्म ज्ञान द्वार। जन्ममृत्यु के दुःख से रहित अमरत्व को प्राप्त करता है।

भावार्थ:-‘विद्या’ और ‘अविद्या’-ये दोनों शब्द विशिष्ट वैदिक प्रयोग हैं। ‘विद्या’ शब्द का प्रयोग यहाँ अध्यात्म ज्ञान’ के अर्थ में हुआ है। इस जड़-चेतन जगत् में सर्वत्र व्याप्त परमात्मा तथा शरीर में व्याप्त जीवात्मा के ज्ञान को अध्यात्म ज्ञान कहा जाता है। यह मोक्षदायी यथार्थ ज्ञान ही ‘विद्या’ है। इससे भिन्न सभी प्रकार के ज्ञान को ‘अविद्या’ नाम दिया गया है। अध्यात्म ज्ञान से भिन्न सृष्टिविज्ञान, यज्ञविज्ञान, भौतिकविज्ञान, आयुर्विज्ञान, गणितविज्ञान, अर्थशास्त्र प्रौद्योगिकी, सूचनातन्त्र आदि सभी प्रकार का ज्ञान ‘अविद्या’ शब्द में समाहित हो जाता है। यह अध्यात्मेतर ज्ञान मनुष्ट को मृत्यु दुःख से छुड़वाता है और इसी अध्यात्म ज्ञान द्वारा मनुष्य फिर अमरत्व अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, जन्ममरण के चक्र से छूट जाता है। इस प्रकार यह दोनों प्रकार का ज्ञान ही मनुष्य के लिए आवश्यक है, तभी वह इहलोक तथा परलोक दोनों को सिद्ध कर सकता है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
वेद = जानता है। विद् (ज्ञाने), लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन । उभयम् = दोनों। तीर्वा =पार जाकर, तरणकर। √तृ (प्लवनतरणयोः) + क्त्वा। अव्यय। अमृतम् = अमरता को। जन्म-मृत्यु के दुःख से रहित अमरत्व को। अश्नुते = प्राप्त करता है। अश् (भोजने) भोजनार्थक धातु इस सन्दर्भ में प्राप्ति के अर्थ में है। (अश्नुते प्राप्तिकर्मा; निघण्टुः 2.18)

विद्ययाऽमृतमश्नुते (अध्यात्मज्ञान से अमरता प्राप्त होती है) Summary in Hindi

विद्ययाऽमृतमश्नुते पाठ-परिचय

“सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान का आदिस्रोत ‘वेद’ ही हैं”-ऐसा विद्वानों का मत है। वेदों का सार उपनिषदों में निहित है। उपनिषदों को ‘ब्रह्मविद्या’, ‘ज्ञानकाण्ड’ अथवा ‘वेदान्त’ नाम से भी जाना जाता है। ‘उप’ तथा ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक सद् (षद्ल) धातु से ‘क्विप्’ प्रत्यय होकर ‘उपनिषद्’ शब्द निष्पन्न होता है-उप + नि + √सद् + क्विप् > 0 = उपनिषद् जिससे अज्ञान का नाश होता है, आत्मा का ज्ञान सिद्ध होता है, संसार चक्र का दुःख छूट जाता है; वह ज्ञानराशि ‘उपनिषद्’ कही जाती है। गुरु के समीप बैठकर अध्यात्मविद्या ग्रहण की जाती है-इस कारण भी ‘उपनिषद्’ शब्द सार्थक है।

‘उपनिषद्’ नाम से 200 से भी अधिक ग्रन्थ मिलते हैं। परन्तु प्रामाणिक दृष्टि से उन में 11 उपनिषद् ही महत्त्वपूर्ण हैं और इन्हीं पर आचार्य शकर का भाष्य भी मिलता है। इनके नाम इस प्रकार हैं-1. ईशावास्य 2. केन, 3. कठ, 4. प्रश्न, 5. मुण्डक, 6. माण्डूक्य, 7. तैत्तिरीय, 8. ऐतरेय, 9. छान्दोग्य, 10. बृहदारण्यक तथा 11. श्वेताश्वतर। • इनमें भी ‘ईशावास्य-उपनिषद्’ सबसे अधिक प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण है। ‘यजुर्वेद’ का अन्तिम चालीसवाँ अध्याय ही ‘ईशोपनिषद्’ के नाम से प्रसिद्ध है, इसमें कुल 17 मन्त्र हैं।

इस उपनिषद् में ‘समस्त जगत् ईश्वाराधीन है’- यह प्रतिपादित करके भगवद्-अर्पणबुद्धि से जगत् के पदार्थों का उपभोग करने का निर्देश किया गया है। ‘जगत्यां जगत्”ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है, सब जगत् अर्थात् गतिमय है’-उपनिषद् के इस सिद्धान्त की पुष्टि आधुनिक विज्ञान एवं आधुनिक खोज द्वारा भी होती है। निरन्तर परिवर्तन तथा निरन्तर गतिमयता ब्रह्माण्ड के समस्त सूर्य + चन्द्र + पृथ्वी आदि ग्रह-उपग्रहों का स्वभाव है।

इस उपनिषद् में ‘विद्या’ ‘अविद्या’ दो विशिष्ट वैदिक पदों का प्रयोग हुआ है। जो लोग ‘अविद्या’ शब्द द्वारा कहे जाने वाले यज्ञयाग, भौतिकशास्त्र आदि सांसारिक ज्ञान में दैनिक सुख-साधनों की प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील रहते हैं; उनकी सांसारिक उन्नति तो बहुत होती है, परन्तु उनका अध्यात्म पक्ष निर्बल रह जाता है। जो लोग केवल अध्यात्म ज्ञान में ही लीन रहते हैं और भौतिक ज्ञान की साधन सामग्री की अवहेलना करते हैं, वे सांसारिक जीवन के निर्वाह तथा सांसारिक उन्नति में पिछड़ जाते हैं।

इसीलिए अविद्या अर्थात् भौतिकज्ञान द्वारा जीवन की सुख-साधन सामग्री अर्जित कर विद्या अर्थात् अध्यात्मज्ञान द्वारा जन्म-मरण के दुःख से रहित अमृतपद को प्राप्त करने का सारगर्भित उपदेश इस उपनिषद् में दिया गया है-‘अविद्यया मृत्युं तीा विद्ययाऽमृतमश्नुते’। श्रीमद्भगवद्गीता में ईशोपनिषद् के ही दार्शनिक विचारों का विस्तार से व्याख्यान किया गया है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 1 विद्ययाऽमृतमश्नुते

विद्ययाऽमृतमश्नुते पाठस्य सारः

प्रस्तुत पाठ ‘ईशावास्योपनिषद्’ से संकलित है। ‘ईशावास्यम्’ पद से आरम्भ होने के कारण इसे ‘ईशावास्योपनिषद्’ नाम दिया गया है। इसे ही ‘ईशोपनिषद्’ के नाम से भी जाना जाता है। यह उपनिषद् यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है, जिसमें 18 मन्त्र हैं।

इस पाठ के पहले दो मन्त्रों में ईश्वर की सर्वत्र विद्यमानता को दर्शाते हुए, कर्तव्य भावना से कर्म करने एवं त्यागपूर्वक संसार के पदार्थों का उपयोग एवं संरक्षण करने का उल्लेख है। तीसरे मन्त्र में उन लोगों को अज्ञानी तथा आत्महन्ता कहा गया है जो लोग परमात्मा की व्यापकता को स्वीकार नहीं करते हैं। चतुर्थ मन्त्र में चैतन्य स्वरूप, स्वयं प्रकाश एवं विभु सर्वव्यापक आत्म तत्त्व का निरूपण है। पञ्चम एवं षष्ठ मन्त्रों में अविद्या अर्थात् व्यावहारिक ज्ञान एवं विद्या अर्थात् आध्यात्मिक ज्ञान पर सूक्ष्म चिन्तन किया गया है। अन्तिम मन्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि व्यावहारिक ज्ञान से लौकिक अभ्युदय एवं अध्यात्मज्ञान से अमरता की प्राप्ति होती है।

इस पाठ में संकलित मन्त्रों में परमात्मा की सर्वव्यापकता, त्यागपूर्वक भोग, स्वाभिमान से पूर्ण कर्मनिष्ठ जीवन का उपदेश देते हुए यह सारगर्भित सन्देश दिया गया है कि लौकिक एवं अध्यात्म विद्या एक-दूसरे की पूरक हैं तथा मानव जीवन की परिपूर्णता और उसके सर्वांगीण विकास में समान रूप से महत्त्व रखती हैं।

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Bhag 2 Haryana Board

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HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए

1. उत्पादन फलन होते हैं
(A) केवल अल्पकालीन
(B) केवल दीर्घकालीन
(C) अल्पकालीन व दीर्घकालीन दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) अल्पकालीन व दीर्घकालीन दोनों

2. अल्पकाल में उत्पादन कारक होते हैं
(A) स्थिर
(B) परिवर्ती
(C) स्थिर भी और परिवर्ती भी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) स्थिर भी और परिवर्ती भी।

3. दीर्घकाल में उत्पादन के सभी कारक होते हैं
(A) स्थिर
(B) परिवर्ती
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई भी नहीं
उत्तर:
(B) परिवर्ती

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

4. एक निश्चित अवधि में उत्पादित की गई वस्तुओं व सेवाओं की समान मात्रा क्या कहलाती है?
(A) औसत उत्पाद (AP)
(B) सीमांत उत्पाद (MP)
(C) कुल उत्पाद (TP)
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) कुल उत्पाद (TP)

5. श्रम तथा पूँजी की एक अधिक इकाई का प्रयोग करने से प्राप्त अतिरिक्त उत्पाद कहलाता है-
(A) औसत उत्पाद
(B) कुल उत्पाद
(C) सीमांत उत्पाद
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सीमांत उत्पाद

6. श्रम की दो इकाइयाँ लगाने से कुल उत्पाद 38 इकाइयाँ हैं। तीसरी इकाई लगाने से कुल उत्पाद में 16 इकाइयों की वृद्धि होती है। इसलिए तीन इकाइयों की औसत उत्पाद है-
(A) 16
(B) 18
(C) 22
(D) 54
उत्तर:
(B) 18

7. जब सीमान्त उत्पादन शून्य होता है, तो कुल उत्पादन होगा-
(A) शून्य
(B) ऋणात्मक
(C) अधिकतम
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) अधिकतम

8. क्या औसत उत्पाद वक्र Ox-अक्ष को छू सकता है?
(A) हमेशा
(B) कभी-कभी
(C) कभी नहीं
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) कभी नहीं

9. MPP तथा APP का आकार कैसा होता है?
(A) U-आकार जैसा
(B) V-आकार जैसा
(C) L-आकार जैसा
(D) उल्टे-U (∩) आकार जैसा
उत्तर:
(D) उल्टे-U (∩) आकार जैसा

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

10. परिवर्ती अनुपातों के नियम को जिस दूसरे नाम से पुकारा जाता है, वह है
(A) ह्रासमान प्रतिफल का नियम
(B) पैमाने का ह्रासमान प्रतिफल नियम
(C) वर्धमान प्रतिफल का नियम
(D) पैमाने का वर्धमान प्रतिफल नियम
उत्तर:
(A) ह्रासमान प्रतिफल का नियम

11. वर्धमान प्रतिफल के नियम के अनुसार परिवर्ती कारक की मात्रा बढ़ाने पर उत्पादन निर्गत किस अनुपात में परिवर्तित होता है?
(A) बढ़ते हुए अनुपात में
(B) घटते हुए अनुपात में
(C) समान अनुपात में
(D) परिवर्ती अनुपात में
उत्तर:
(A) बढ़ते हुए अनुपात में

12. यदि श्रम की एक अतिरिक्त इकाई लगाने से सीमांत भौतिक उत्पाद घटता है तो यह स्थिति कहलाएगी-
(A) कारक का ह्रासमान प्रतिफल
(B) पैमाने का ह्रासमान प्रतिफल
(C) कारक का वर्धमान प्रतिफल
(D) कारक का स्थिर प्रतिफल
उत्तर:
(A) कारक का ह्रासमान प्रतिफल

13. पैमाने का प्रतिफल विश्लेषण निम्नलिखित में से किस मान्यता पर आधारित है?
(A) एक कारक स्थिर तथा दूसरा कारक परिवर्ती
(B) उत्पादन के अन्य सभी कारक स्थिर किंतु एक कारक परिवर्ती
(C) सभी कारकों में परिवर्तन किंतु उनके अनुपात में भी अंतर
(D) सभी कारकों के परस्पर अनुपात को स्थिर रखते हुए उनके पैमाने में परिवर्तन
उत्तर:
(D) सभी कारकों के परस्पर अनुपात को स्थिर रखते हुए उनके पैमाने में परिवर्तन

14. पैमाने में वृद्धि का अर्थ है
(A) सभी कारकों को एक ही अनुपात में बढ़ाना
(B) सभी कारकों को भिन्न-भिन्न अनुपातों में बढ़ाना
(C) एक कारक को स्थिर रखकर अन्य साधनों को बढ़ाना
(D) केवल एक कारक को बढ़ाना
उत्तर:
(A) सभी कारकों को एक ही अनुपात में बढ़ाना

15. अनुपात का संबंध है-
(A) अति अल्पकाल से
(B) अल्पकाल से
(C) दीर्घकाल से
(D) अति दीर्घकाल से
उत्तर:
(B) अल्पकाल से

16. पैमाने का संबंध है-
(A) अति अल्पकाल से
(B) अल्पकाल से
(C) दीर्घकाल से
(D) अति दीर्घकाल से
उत्तर:
(C) दीर्घकाल से

17. जब साधनों में 10% वृद्धि होने पर उत्पादन/निर्गत में 10% से अधिक वृद्धि हो जाए, तो ऐसी अवस्था को कहेंगे-
(A) पैमाने के स्थिर प्रतिफल की अवस्था
(B) पैमाने के वर्धमान प्रतिफल की अवस्था
(C) पैमाने के ह्रासमान प्रतिफल की अवस्था
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) पैमाने के वर्धमान प्रतिफल की अवस्था

18. यदि उत्पादन के सभी साधनों को दुगुना करने से उत्पादन दुगुने से अधिक हो जाता है तो यह कहलाएगा-
(A) पैमाने का स्थिर प्रतिफल
(B) कारक का वर्धमान प्रतिफल
(C) पैमाने का वर्धमान प्रतिफल
(D) कारक का स्थिर प्रतिफल
उत्तर:
(C) पैमाने का वर्धमान प्रतिफल

19. निम्नलिखित में से कौन-सी बाहरी बचते हैं?
(A) तकनीकी बचतें
(B) प्रबन्धकीय बचतें
(C) जोखिम संबंधी बचतें
(D) सूचना संबंधी बचतें
उत्तर:
(D) सूचना संबंधी बचतें

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

20. आंतरिक तथा बाह्य बचतों का संबंध है-
(A) परिवर्ती कारकों के प्रतिफलों से
(B) पैमाने के प्रतिफलों से
(C) (A) और (B) दोनों से
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) पैमाने के प्रतिफलों से

21. अधिकतम लाभ कमाने की इच्छुक फर्म परिवर्ती अनुपात के नियम के कौन-से चरण में उत्पादन करना चाहेगी?
(A) पहले चरण में
(B) दूसरे चरण में
(C) तीसरे चरण में
(D) उपरोक्त किसी में भी नहीं
उत्तर:
(B) दूसरे चरण में

22. यदि 2L + 2K से 1000 इकाइयों का उत्पादन होता है तथा 3L + 3K से 2000 इकाइयों का उत्पादन होता है, तो बताइए कौन-से प्रतिफल प्राप्त हो रहे हैं?
(A) पैमाने के वर्धमान प्रतिफल
(B) पैमाने के ह्रासमान प्रतिफल
(C) पैमाने के स्थिर (समान) प्रतिफल
(D) पैमाने के ऋणात्मक प्रतिफल
उत्तर:
(A) पैमाने के वर्धमान प्रतिफल

23. उत्पादन लागत है
(A) किसी वस्तु के उत्पादन में किया गया समस्त व्यय
(B) साहसी का लाभ
(C) पूँजी का ब्याज
(D) विक्रय मूल्य
उत्तर:
(A) किसी वस्तु के उत्पादन में किया गया समस्त व्यय

24. फैक्टरी का किराया तथा लाइसेंस फीस निम्नलिखित में से किन लागतों में शामिल की जाएगी?
(A) परिवर्ती लागतों में
(B) सीमांत लागतों में
(C) स्थिर (बँधी) लागतों में ।
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) स्थिर (बँधी) लागतों में

25. जब उत्पादन का स्तर शून्य होता है, तब स्थिर लागत होती है-
(A) धनात्मक
(B) ऋणात्मक
(C) शून्य
(D) परिवर्तनशील लागत के बराबर
उत्तर:
(A) धनात्मक

26. अल्पकाल में उत्पादन शून्य होने पर कौन-सी लागत शून्य हो जाती है?
(A) परिवर्ती लागत
(B) सीमांत लागत
(C) स्थिर (बँधी) लागत
(D) अवसर लागत
उत्तर:
(A) परिवर्ती लागत

27. अल्पकाल में कुल लागत में स्थिर लागत के साथ किस अन्य लागत को शामिल किया जाता है?
(A) स्पष्ट लागत
(B) औसत लागत
(C) सीमांत लागत
(D) परिवर्ती लागत
उत्तर:
(D) परिवर्ती लागत

28. यदि हम कुल स्थिर लागत एवं कुल परिवर्ती लागत को जोड़ दें तो हमें
(A) औसत लागत मालूम होगी
(B) सीमांत लागत मालूम होगी
(C) कुल लागत मालूम होगी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) कुल लागत मालूम होगी

29. औसत स्थिर लागत के प्रत्येक बिंदु से यदि X-अक्ष एवं Y-अक्ष पर लंब डाला जाए तो जो आयत बनेंगे, उन सभी का क्षेत्रफल-
(A) अलग-अलग होगा
(B) समान होगा
(C) जैसे-जैसे उत्पादन की मात्रा बढ़ेगी क्षेत्रफल घटेगा
(D) जैसे-जैसे उत्पादन की मात्रा बढ़ेगी क्षेत्रफल बढ़ेगा
उत्तर:
(B) समान होगा।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

30. जैसे-जैसे उत्पादन की मात्रा बढ़ेगी AC और AVC के बीच की दूरी-
(A) बढ़ेगी
(B) घटेगी
(C) स्थिर रहेगी
(D) दोनों समानांतर होगी
उत्तर:
(B) घटेगी

31. किसको मालूम करता है?
(A) AC
(B) TC
(C) MC
(D) AVC
उत्तर:
(C) MC

32. अंशकालिक या मौसमी रोज़गार प्राप्त श्रमिकों की मजदूरी पर किया गया व्यय-
(A) स्थिर लागत है
(B) परिवर्ती लागत है
(C) अवसर लागत है
(D) अल्पकालीन लागत है
उत्तर:
(B) परिवर्ती लागत है

33. स्थिर लागत वक्र सदैव-
(A) बाएँ से दाएँ व नीचे की ओर झुकता है
(B) सीधी रेखा X-अक्ष के समानांतर होता है
(C) सीधी रेखा Y-अक्ष के समानांतर होता है
(D) “U’ आकृति वक्र होता है
उत्तर:
(B) सीधी रेखा X-अक्ष के समानांतर होता है

34. MC वक्र, AC वक्र को उस स्थिति में काटता है, जब-
(A) AC वक्र नीचे की ओर गिर रहा होता है
(B) AC वक्र ऊपर की ओर उठ रहा होता है
(C) AC वक्र न्यूनतम होता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) AC वक्र न्यूनतम होता है

35. अल्पकाल में एक फर्म अधिक से अधिक कितनी हानि उठाने को तत्पर हो जाती है?
(A) कुल लागत के बराबर
(B) परिवर्ती लागत के बराबर
(C) स्थिर लागत के बराबर
(D) सीमांत लागत के बराबर
उत्तर:
(C) स्थिर लागत के बराबर

36. लागत वक्रों की आकृति निम्नलिखित में से किन पर निर्भर करती है?
(A) माँग वक्र पर
(B) उत्पत्ति के नियमों पर
(C) बाजार की दशाओं पर
(D) साधनों के प्रतिफल पर
उत्तर:
(B) उत्पत्ति के नियमों पर

37. अल्पकाल में
(A) कुल उत्पाद लागत = कुल स्थिर लागत + कुल परिवर्ती लागत
(B) कुल उत्पाद लागत = कुल स्थिर लागत x कुल परिवर्ती लागत
(C) कुल उत्पाद लागत = कुल स्थिर लागत – कुल परिवर्ती लागत
(D) कुल उत्पाद लागत = कुल स्थिर लागत
उत्तर:
(A) कुल. उत्पाद लागत = कुल स्थिर लागत + कुल परिवर्ती लागत

38. कौन-सा वक्र ‘U’ आकार का होता है?
(A) अनधिमान (तटस्थता) वक्र
(B) समान मात्रा
(C) औसत लागत वक्र
(D) पूर्ति वक्र
उत्तर:
(C) औसत लागत वक्र

39. उत्पादन के कारकों (साधनों) पर किया जाने वाला व्यय क्या कहलाता है?
(A) आगत
(B) लागत
(C) आय/संप्राप्ति
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) लागत

40. कुल लागत का सूत्र है-
(A) AC xq
(B) AFC + AVC
(C) (A) एवं (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) एवं (B) दोनों

41. सीमांत लागत के घटने पर कुल लागत-
(A) घटती है
(B) बढ़ती है
(C) स्थिर रहती है
(D) बढ़ती दर पर बढ़ती है
उत्तर:
(A) घटती है

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

42. यदि कुल लागत 1200 रु० है, कुल स्थिर लागत 500 रु० है तो कुल परिवर्ती लागत कितनी होगी?
(A) 500
(B) 1700
(C) 700
(D) 600
उत्तर:
(C) 700

43. अल्पकाल में कौन-सी स्थिर लागत होती है?
(A) स्थायी कर्मचारियों का वेतन
(B) मशीन की घिसावट तथा ह्रास
(C) स्थायी पूँजी पर ब्याज
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी

44. औसत लागत (AC) = ….
(A) \(\frac { TC }{ q }\)
(B) TC x q
(C) \(\frac{\Delta \mathrm{TC}}{\Delta q}\)
(D) \(\frac{\Delta \mathrm{TC}}{q}\)
उत्तर:
(A) \(\frac { TC }{ q }\)

45. औसत लागत वक्र ‘U’ आकार की क्यों होती है?
(A) परिवर्ती प्रतिफल के कारण
(B) स्थिर प्रतिफल के कारण
(C) लाभ के कारण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) परिवर्ती प्रतिफल के कारण

46. कौन-सा वक्र ATC वक्र को उसके निम्नतम बिंदु पर प्रतिच्छेदित करता है?
(A) AVC ash
(B) AFC वक्र
(C) MC वक्र
(D) TC वक्र
उत्तर:
(C) MC वक्र

47. दिए गए सूत्र को पूरा करें : ……….
(A) AC
(B) MC
(C) AVC
(D) AFC
उत्तर:
(A) AC

48. निम्नलिखित में से किस लागत वक्र का आकार आयताकार अतिपरवलय (रेक्टैंगुलर हाईपरबोला) होता है-
(A) MC वक्र
(B) AC ash
(C) AFC वक्र
(D) AVC वक्र
उत्तर:
(C) AFC वक्र

49. MC की गणना संबंधी कौन-सा सूत्र सही है?
(A) MC = TCn – TCn-1
(B) MC = TVCn – TVCn-1
(C) MC = \(\frac{\Delta \mathrm{TC}}{\Delta q}\)
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

50. LAC वक्र-
(A) गिरता है जब LMC वक्र गिरता है
(B) बढ़ता है जब LMC वक्र बढ़ता है
(C) गिरता है जब LMC कम है LAC से तथा बढ़ता है जब LMC अधिक है LAC से
(D) उपर्युक्त सभी असत्य
उत्तर:
(C) गिरता है जब LMC कम है LAC से तथा बढ़ता है जब LMC अधिक है LAC से

51. जब सीमांत उत्पादन घटता है, तब कुल उत्पादन की क्या अवस्था होती है?
(A) अधिकतम
(B) स्थिर
(C) घटती दर से बढ़ता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) घटती दर से बढ़ता है

52. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है
(A) LAC और LMC दोनों वक्र ‘U’ आकार के होते हैं
(B) LMC वक्र LAC वक्र को नीचे से, LAC के न्यूनतम बिंदु पर काटता है
(C) LAC और LMC दोनों SAC और SMC की भाँति ‘U’ आकार के होते हैं, परंतु ये कम उग्र और अधिक चपटे होते हैं
(D) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं

B. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. …………………… में स्थिर और परिवर्ती उत्पादन कारक होते हैं। (अल्पकाल/दीर्घकाल)
उत्तर:
अल्पकाल

2. दीर्घकाल में उत्पादन के सभी कारक ……………………. होते हैं। (स्थिर/परिवर्ती)
उत्तर:
परिवर्ती

3. एक निश्चित अवधि में उत्पादित की गई वस्तुओं व सेवाओं की समान मात्रा ……………………. कहलाती है। (औसत उत्पाद/कुल उत्पाद)
उत्तर:
कुल उत्पाद

4. श्रम तथा पूँजी की एक अधिक इकाई का प्रयोग करने से प्राप्त अतिरिक्त उत्पाद …………………… कहलाता है। (औसत उत्पाद/सीमांत उत्पाद)
उत्तर:
सीमांत उत्पाद

5. जब कुल उत्पाद अधिकतम होता है, तो सीमांत उत्पाद ………… होता है। (शून्य/अधिकतम)
उत्तर:
शून्य

6. वर्धमान प्रतिफल के नियम के अनुसार परिवर्ती कारक की मात्रा बढ़ाने पर उत्पादन ……………………. अनुपात में परिवर्तित होता है। (बढ़ते हुए/घटते हुए)
उत्तर:
बढ़ते हुए

7. किसी वस्तु के उत्पादन में किया गया समस्त व्यय …………………… कहलाता है। (उत्पादन लागत/सीमांत लागत)
उत्तर:
उत्पादन लागत

8. अल्पकाल में उत्पादन शून्य होने पर …………………… लागत शून्य नहीं होती। (परिवर्ती स्थिर)
उत्तर:
स्थिर

9. अल्पकाल में उत्पादन शून्य होने पर …………………… लागत शून्य हो जाती है। (परिवर्ती स्थिर)
उत्तर:
परिवर्ती

10. जब सीमान्त उत्पाद शून्य होता है तो …………………… उत्पाद अधिकतम होता है। (कुल/सीमान्त)
उत्तर:
कुल

11. जब कुल उत्पाद बढ़ती दर से बढ़ता तो …………………… भी बढ़ती दर से बढ़ता है। (कुल उत्पाद/सीमान्त उत्पाद)
उत्तर:
सीमान्त उत्पाद।

12. सीमान्त उत्पाद का सामान्य आकार …………………… आकृति का होता है। (‘U’/’V’)
उत्तर:
‘U’।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

C. बताइए कि निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत

  1. उत्पादन प्रक्रिया आगत तथा निर्गत का संबंध है।
  2. सीमांत लागत वक्र औसत घटते-बढ़ते लागत वक्र को न्यूनतम बिंदु पर काटता है।
  3. औसत लागत वक्र ‘U’ आकार का होता है।
  4. औसत उत्पाद वक्र का आकार उल्टे ‘U’ जैसा होता है।
  5. अल्पकालीन औसत लागत वक्र औसत परिवर्तनशील लागत तथा सीमांत लागत का जोड़ होता है।
  6. घटते प्रतिफल का नियम तब लागू होता है जब सभी साधन (कारक) परिवर्तनशील होते हैं।
  7. परिवर्तनशील आनुपातिक प्रतिफल का नियम तब लागू होता है जब कम-से-कम एक साधन स्थिर रहता है।
  8. घटते प्रतिफल का नियम केवल कृषि पर लागू नहीं होता है।
  9. आंतरिक बचतें संपूर्ण उद्योग के विस्तार के कारण उत्पन्न होती हैं।
  10. यदि AC स्थिर है तो MC गिर रही होती है।
  11. आदर्श उत्पाद वह उत्पाद है जिस पर सीमांत आय सीमांत लागत के बराबर होती है।
  12. यदि सीमांत उत्पादन शून्य होता है तो कुल उत्पादन अधिकतम होता है।
  13. बंधी व घटती-बढ़ती लागत का अंतर अल्पकाल में पाया जाता है।
  14. परिवर्तनशील अनुपात के नियम का संबंध उपभोग से है।
  15. जब अल्पकाल में उत्पादन का स्तर शून्य हो, तो स्थिर लागतें भी शून्य होती हैं।
  16. किसी उद्योग का विस्तार होने से उसकी सभी फर्मों को प्राप्त होने वाली बचतें बाहरी बचतें कहलाती हैं।
  17. पैमाने के प्रतिफल दीर्घकाल में लागू होते हैं।
  18. अल्पकाल में उत्पादन के सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं।
  19. परिवर्तनशील अनुपात के नियम अल्पकाल में लागू होते हैं।
  20. औसत बंधी लागत उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर बढ़ती रहती है।
  21. कुल लागत = कुल बँधी लागत + कुल परिवर्तनशील लागत।

उत्तर:

  1. सही
  2. सही
  3. सही
  4. सही
  5. गलत
  6. गलत
  7. सही
  8. सही
  9. गलत
  10. गलत
  11. सही
  12. सही
  13. सही
  14. गलत
  15. गलत
  16. सही
  17. सही
  18. गलत
  19. सही
  20. गलत
  21. सही।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्पादन की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
उत्पादन का अर्थ निर्गत (output) की उस मात्रा से है जिसे दी हुई तकनीक और दिए हुए आगतों (inputs) की मात्रा से प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
आगत अथवा उत्पादन कारक का क्या अर्थ है? आगतों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
किसी वस्तु के उत्पादन के लिए जिन विभिन्न मदों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें आगत अथवा उत्पादन कारक कहते हैं। उदाहरण के लिए, (i) श्रम (ii) कच्चा माल (iii) मशीन।

प्रश्न 3.
आगतों का अनुकूलतम मिश्रण क्या है?
उत्तर:
आगतों का अनुकूलतम मिश्रण से अभिप्राय विभिन्न आगतों के उस मिश्रण से है जिससे अधिकतम उत्पादन प्राप्त होता है।

प्रश्न 4.
निर्गत का क्या अर्थ है?
उत्तर:
निर्गत उत्पादन प्रक्रिया का अंतिम परिणाम है। अन्य शब्दों में, निर्गत आगत का फलन है।
निर्गत = f (आगत)

प्रश्न 5.
उत्पादन प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:
उत्पादन प्रक्रिया वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत आगतों का रूपांतरण निर्गत में किया जाता है।

प्रश्न 6.
उत्पादक या उत्पादन इकाई की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
उत्पादक या उत्पादन इकाई से अभिप्राय उस व्यक्ति या संस्था से है जो आगतों को जुटाकर उत्पादन प्रक्रिया संभव बनाता है।

प्रश्न 7.
उत्पादन फलन के समीकरण को व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
q = f (x1, x2)

प्रश्न 8.
उत्पादन फलन की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
उत्पादन फलन से अभिप्राय किसी उत्पादन की इकाई के भौतिक आगतों और निर्गतों के बीचे कार्यात्मक संबंध से है।

प्रश्न 9.
दो प्रकार के उत्पादन फलन के नाम बताइए।
उत्तर:

स्थिर अनुपात में आदानों का मिश्रण।
परिवर्ती अनुपात में आदानों का मिश्रण।

प्रश्न 10.
आदानों का अनुकूलतम मिश्रण क्या है?
उत्तर:
आदानों का अनुकूलतम मिश्रण से अभिप्राय विभिन्न आदानों के उस मिश्रण से है जिससे अधिकतम उत्पादन प्राप्त होता है।

प्रश्न 11.
उत्पादन के स्थिर कारकों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
उत्पादन के स्थिर कारकों से हमारा अभिप्राय उन उत्पादन कारकों से है जिनकी पूर्ति स्थिर है अर्थात् जिनकी मात्रा को अल्पकाल में बदला नहीं जा सकता।

प्रश्न 12.
उत्पादन के परिवर्ती कारकों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उत्पादन के परिवर्ती कारकों से अभिप्राय उन उत्पादन कारकों से है जिनकी पूर्ति को बदला जा सकता है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 13.
अल्पकाल तथा दीर्घकाल की संकल्पनाओं को समझाइए।
उत्तर:
अल्पकाल समय की वह अवधि है जिसमें उत्पाद के कुछ कारक स्थिर होते हैं और कुछ कारक परिवर्ती होते हैं जिनके फलस्वरूप उत्पादन में परिवर्तन एक सीमा में ही किया जा सकता है। दीर्घकाल समय की वह अवधि है जिसमें उत्पादन के सभी कारक परिवर्ती होते हैं जिसके फलस्वरूप उत्पादन में परिवर्तन वाँछित मात्रा में किया जा सकता है।

प्रश्न 14.
सीमांत उत्पाद की परिभाषा दीजिए। इसका गणना सूत्र भी लिखें।
उत्तर:
सीमांत उत्पाद से अभिप्राय एक परिवर्ती आगत की अतिरिक्त इकाई में परिवर्तन करने से कुल भौतिक उत्पाद में होने वाले परिवर्तन से है। सीमांत उत्पाद की गणना का सूत्र निम्नलिखित है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 1

प्रश्न 15.
सीमांत उत्पाद वक्र का सामान्य आकार कैसा होता है? एक सीमांत उत्पाद वक्र खींचिए।
उत्तर:
सीमांत उत्पाद वक्र का सामान्य आकार उल्टा ‘U’ आकृति का होता है। जैसाकि रेखाचित्र में दर्शाया गया है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 2

प्रश्न 16.
औसत उत्पाद वक्र का सामान्य आकार कैसा होता है? एक औसत उत्पाद वक्र खींचिए।
उत्तर:
औसत उत्पाद वक्र का सामान्य आकार उल्टा ‘U’ आकार का होता है। जैसाकि रेखाचित्र में दर्शाया गया है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 3

प्रश्न 17.
औसत उत्पाद और सीमांत उत्पाद वक्र का आकार उल्टा ‘U’ आकार का क्यों होता है? एक कुल उत्पाद वक्र खींचिए।
उत्तर:
औसत उत्पाद और सीमांत उत्पाद वक्र का आकार उल्टा ‘U’ इसलिए होता है क्योंकि परिवर्ती अनुपातों के नियम के अनुसार उत्पादन पहले बढ़ता है और बाद में घटता है। एक कुल उत्पाद वक्र को निम्न रेखाचित्र द्वारा दर्शाया गया है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 4

प्रश्न 18.
परिवर्ती अनुपात का नियम क्या है? यह किस अवधि में लागू होता है?
उत्तर:
परिवर्ती अनुपात का नियम यह बताता है कि जब स्थिर कारकों के साथ परिवर्ती कारक की मात्रा में है, तो पहले औसत तथा सीमांत उत्पाद एक सीमा तक बढ़ेंगे और उसके पश्चात् घटने लगेंगे। परिवर्ती अनुपात का नियम अल्पकाल – में लागू होता है।

प्रश्न 19.
परिवर्ती अनुपातों के नियम का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
परिवर्ती अनुपातों के नियम का मुख्य कारण स्थिर कारकों का अनुकूलतम उपभोग है। आरंभ में अधूरे उपयोग में लाए जाने वाले स्थिर कारक जैसे मशीन पर परिवर्ती कारक की इकाइयाँ बढ़ाने से कारक-मिश्रण आदर्श होता जाने से कारकों का श्रेष्ठ व पूर्ण उपयोग होने लगता है। फलस्वरूप उत्पाद बढ़ती दर से प्राप्त होता है। परंतु अनुकूलतम बिंदु प्राप्त होने के बाद भी परिवर्ती कारक की मात्रा बढ़ाने पर कारकों का आदर्श मिश्रण टूट जाता है, जिसमें ह्रासमान प्रतिफल शुरू हो जाता है।

प्रश्न 20.
परिवर्ती अनुपातों के नियम की तीन अवस्थाएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:

  1. कुल उत्पाद में वृद्धिमान दर से वृद्धि।
  2. कुल उत्पाद में ह्रासमान दर से वृद्धि।
  3. कुल उत्पाद में कमी।

प्रश्न 21.
अधिकतम लाभ कमाने की इच्छुक फर्म परिवर्ती अनुपात के कौन-से चरण में उत्पादन करना चाहेगी?
उत्तर:
अधिकतम लाभ कमाने की इच्छुक फर्म परिवर्ती अनुपात के दूसरे चरण में उत्पादन करना चाहेगी।

प्रश्न 22.
पैमाने का प्रतिफल क्या होता है?
उत्तर:
पैमाने का प्रतिफल वह उत्पादन फलन है जो यह बताता है कि यदि उत्पादन के सभी साधनों की इकाइयों को एक साथ बढ़ाया जाए, तो कुल उत्पादन पर इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी। दूसरे शब्दों में, पैमाने के प्रतिफल यह स्पष्ट करते हैं कि किसी निर्दिष्ट पैमाना रेखा पर यदि सभी साधनों में आनुपातिक वृद्धि की जाए तो उत्पादन में किस अनुपात में वृद्धि होगी।

प्रश्न 23.
पैमाने के प्रतिफल किस समय अवधि में लागू होते हैं। पैमाने के प्रतिफल के तीन प्रकार बताइए।
उत्तर:
पैमाने के प्रतिफल दीर्घकाल में लागू होते हैं। इसके तीन प्रकार हैं (i) पैमाने के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल, (ii) पैमाने के स्थिर प्रतिफल, (iii) पैमाने के ह्रासमान (घटते) प्रतिफल।

प्रश्न 24.
पैमाने के वर्धमान प्रतिफल का अर्थ बताइए।
उत्तर:
पैमाने के वर्धमान प्रतिफल से हमारा अभिप्राय उत्पादन फलन की उस स्थिति से है जिसमें कुल उत्पाद में उसी अनुपात से अधिक वृद्धि होती है, जिस अनुपात में आगत के कारकों को बढ़ाया जाता है।

प्रश्न 25.
पैमाने के स्थिर प्रतिफल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पैमाने के स्थिर प्रतिफल से हमारा अभिप्राय उस स्थिति से है जिसमें आगत (input) के सभी कारकों को निश्चित अनुपात में बढ़ाए जाने पर उत्पादन निर्गत में भी उसी अनुपात में वृद्धि होगी।

प्रश्न 26.
पैमाने के हासमान प्रतिफल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पैमाने के ह्रासमान प्रतिफल से हमारा अभिप्राय उस स्थिति से है जिसके अंतर्गत आगत (input) के सभी कारकों को एक निश्चित अनुपात में बढ़ाने पर उत्पादन/निर्गत में उस अनुपात से कम वृद्धि होगी।

प्रश्न 27.
दीर्घकाल में पैमाने के वर्धमान प्रतिफलों के लिए उत्तरदायी दो कारक बताइए।
उत्तर:

  1. श्रम विभाजन
  2. विशिष्ट मशीनों का उपयोग।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 28.
श्रम विभाजन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
श्रम विभाजन से अभिप्राय उस कार्य पद्धति से है जिसके अंतर्गत श्रमिकों को उनकी योग्यता व क्षमता के अनुसार कार्य दिया जाता है।

प्रश्न 29.
अधिक खरीददारी पर कटौती (Volume Discount) क्या होती है?
उत्तर:
बड़ी मात्रा में एक साथ खरीददारी करने पर कीमत में जो कटौती या छूट (Discount) मिलती है, उसे अधिक खरीददारी पर कटौती या थोक की छूट कहते हैं।

प्रश्न 30.
समान मात्रा (iso-quant) की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
समान मात्रा दो आगतों के उन सभी संभावित कारकों को प्रकट करती है जो एक-समान कुल उत्पाद प्रदान करते हैं।

प्रश्न 31.
एक समान मात्रा वक्र ऋणात्मक ढाल वाला वक्र क्यों होता है?
उत्तर:
एक समान मात्रा वक्र ऋणात्मक ढाल वाला वक्र इसलिए होता है क्योंकि दो आगतों की मात्राओं में परिवर्तन विपरीत दिशा में होते हैं।

प्रश्न 32.
समान मात्रा मानचित्र (Iso-quant Map) क्या है? रेखाचित्र बनाकर दर्शाएँ।
उत्तर:
समान मात्रा वक्रों के समूह या परिवार को समान मात्रा मानचित्र कहते हैं। इसका रेखाचित्र नीचे दिया गया है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 5

प्रश्न 33.
उत्पादन की लागत से आपका क्या अभिप्राय है? उत्पादन की लागत के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
उत्पादन की लागत से हमारा अभिप्राय उन व्ययों से है जिनका संबंध एक वस्तु के उत्पादन से होता है। उत्पादन की लागत के दो उदाहरण निम्नलिखित हैं-(i) मजदूरी, (ii) कच्चे माल की लागत।

प्रश्न 34.
स्थिर लागतों से आपका क्या अभिप्राय है? स्थिर लागतों के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
स्थिर लागतों से हमारा अभिप्राय उन लागतों से है जो उत्पादन में परिवर्तन के परिणामस्वरूप परिवर्ती नहीं होतीं। स्थिर लागतें विभिन्न उत्पादन स्तरों पर एक समान रहती हैं। स्थिर लागतों के दो उदाहरण हैं-(i) भवन का किराया, (ii)बीमा किश्त।

प्रश्न 35.
एक फर्म का स्थिर लागत (FC) वक्र खींचिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 6

प्रश्न 36.
परिवर्ती लागतों से आपका क्या अभिप्राय है? इसके दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
परिवर्ती लागतों से हमारा अभिप्राय उन लागतों से है जो उत्पादन में परिवर्तन के साथ परिवर्तित होती हैं। उदाहरण के लिए, (i) कच्चे माल की लागत, (ii) बिजली-शक्ति पर व्यय।

प्रश्न 37.
कुल परिवर्ती लागत वक्र (TVC) खींचिए।
उत्तर:
TVC वक्र उल्टे S आकार जैसा होता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 7

प्रश्न 38.
स्थिर और परिवर्ती लागतों में भेद करें।
उत्तर:
स्थिर लागतें वे लागतें होती हैं जो उत्पादन की मात्रा घटाने-बढ़ाने पर घटती-बढ़ती नहीं है, बल्कि स्थिर रहती हैं। परिवर्ती लागतें वे लागतें होती हैं जो उत्पादन की मात्रा बढ़ाने पर बढ़ती हैं, उत्पादन की मात्रा घटाने पर घटती हैं और उत्पादन बंद होने पर बंद हो जाती हैं।

प्रश्न 39.
औसत लागत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
औसत लागत से अभिप्राय उत्पादन (निर्गत) की प्रति इकाई कुल लागत से है। कुल लागत को उत्पादन की मात्रा से भाग देने पर औसत लागत प्राप्त होती है। सूत्र के रूप में,
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 8

प्रश्न 40.
सीमांत लागत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सीमांत लागत से अभिप्राय किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन (निर्गत) करने की लागत से है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 9

प्रश्न 41.
औसत स्थिर लागत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
औसत स्थिर लागत से अभिप्राय प्रति इकाई स्थिर लागत से है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 10

प्रश्न 42.
औसत स्थिर लागत (AFC) वक्र खींचिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 11

प्रश्न 43.
औसत परिवर्ती लागत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
औसत परिवर्ती लागत से अभिप्राय प्रति इकाई परिवर्ती लागत से है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 12
AVC = \(\frac { TVC }{ q }\)

प्रश्न 44.
औसत परिवर्ती लागत (AVC) वक्र खींचिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 13

प्रश्न 45.
सीमांत लागत (MC) सारणी से कुल परिवर्ती लागत (TVC) कैसे निकाली जाती है?
उत्तर:
सीमांत लागतों को जोड़कर कुल परिवर्ती लागत (TVC) निकाली जाती है।
TVC = ∑MC

प्रश्न 46.
सीमांत लागत (MC) वक्र से आप कुल परिवर्ती लागत (TVC) कैसे ज्ञात करेंगे?
उत्तर:
कुल परिवर्ती लागत सीमांत लागत वक्र तथा क्षैतिज अक्ष के बीच के क्षेत्रफल के समान होती है अर्थात् कुल परिवर्ती लागत सीमांत लागत वक्र के नीचे का क्षेत्रफल होती है। अन्य शब्दों में, MC वक्र के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल को मापकर TVC ज्ञात की जाती है।

प्रश्न 47.
AFC वक्र का सामान्य आकार कैसा होता है?
उत्तर:
AFC वक्र का सामान्य आकार ऊपर से नीचे की ओर ढलवाँ होता है। AFC वक्र आयताकार अतिपरवलय आकार का होता है।

प्रश्न 48.
जब औसत लागत बढ़ रही हो तो क्या औसत लागत सीमांत लागत से कम हो सकती है?
उत्तर:
हाँ, जब औसत लागत बढ़ रही हो तो औसत लागत सीमांत लागत से कम हो सकती है।

प्रश्न 49.
क्या ATC तथा AVC वक्र प्रतिच्छेदन करते हैं?
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 14
ATC तथा AVC वक्र कभी भी एक-दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करते। कारण
ATC = AFC + AVC
ATC > AVC. (चूँकि AFC >0)
अर्थात् ATC सदैव AVC से अधिक होती है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अल्पकालीन उत्पादन फलन तथा दीर्घकालीन उत्पादन फलन में भेद कीजिए। परिवर्ती अनुपात उत्पादन फलन तथा समान/स्थिर अनुपात उत्पादन फलन में अंतर बताइए।
अथवा
उत्तर:

अल्पकालीन (परिवर्ती अनुपात) उत्पादन फलनदीर्घकालीन (समान/स्थिर अनुपात) उत्पादन फलन
1. इस उत्पादन फलन में, उत्पादन के स्तर में परिवर्तन के साथ-साथ कारक आगत अनुपात में परिवर्तन होता है।1. इस उत्पादन फलन में, उत्पादन के स्तर में परिवर्तन के साथ-साथ कारक आगत अनुपात समान/स्थिर रहता है।
2. इसमें कुछ कारकों के स्थिर रहते हुए, केवल कुछ कारकों में परिवर्तन करके ही उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है।2. इसमें सभी कारक आगतों की मात्रा में वृद्धि करके उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है।
3. इसमें उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन होने से उत्पादन के पैमाने में परिवर्तन नहीं होता।3. इसमें उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन होने के साथ-साथ उत्पादन के पैमाने में भी परिवर्तन होता है।

प्रश्न 2.
MP वक्र AP वक्र को उसके उच्चतम बिंदु पर काटता है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि, जब AP में वृद्धि होती है, तब MP > AP होता है। जब AP में गिरावट आती है तब MP < AP होता है। जब AP अपने उच्चतम बिंदु पर स्थिर होता है, तब MP = AP होता है। अतः MP वक्र AP वक्र को उसके उच्चतम बिंदु पर काटता है।

प्रश्न 3.
सीमांत भौतिक उत्पादन में परिवर्तन आने पर कुल भौतिक उत्पादन में कैसे परिवर्तन आते हैं?
उत्तर:
सबसे पहले सीमांत भौतिक उत्पादन (MPP) बढ़ता है, जिसके कारण TPP कुल भौतिक उत्पाद (TPP) बढ़ती दर से बढ़ता है। इसके बाद जब MPP घटती दर से बढ़ता है तो TPP घटती दर पर बढ़ता है। उसके बाद MPP कम होता हुआ शून्य पर पहुँच जाता है तो TPP घटती दर पर बढ़ते हुए अधिकतम बिंदु पर पहुँचता है तथा स्थिर हो जाता है। इसके बाद जब MPP ऋणात्मक हो जाता है। तब TPP घटना आरंभ हो जाता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 15

प्रश्न 4.
TP और MP में संबंध बताइए।
उत्तर:

  1. जब TP बढ़ती दर से बढ़ता है, तो MP बढ़ता है।
  2. जब TP घटती हुई दर से बढ़ता है, तो MP घटता है।
  3. जब TP अधिकतम होता है, तो MP शून्य (zero) होता है।
  4. जब TP घट रहा होता है, तो MP ऋणात्मक (-) होता है।

प्रश्न 5.
AP और MP में संबंध बताइए।
उत्तर:

  1. AP तब तक बढ़ता है, जब MP > AP होता है।
  2. AP तब अधिकतम होता है, जब MP = AP होता है।
  3. AP तब गिरता है, जब MP < AP होता है।
  4. AP कभी भी शून्य नहीं होता, जबकि MP शून्य भी हो सकता है और ऋणात्मक भी।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 6.
एक कारक (साधन) के प्रतिफल का क्या अर्थ है? एक कारक के वर्धमान या बढ़ते प्रतिफल किस कारण से प्राप्त होते हैं?
उत्तर:
एक कारक (साधन) के प्रतिफल से हमारा अभिप्राय एक परिवर्ती कारक की एक इकाई में परिवर्तन करने से कुल भौतिक उत्पादन में होने वाले परिवर्तन से है, यदि अन्य सभी कारकों की इकाइयों को पूर्ववत (अपरिवर्तित) रखा जाए। उदाहरण के लिए, अन्य कारकों को स्थिर रखते हुए यदि श्रमिकों की इकाइयों में वृद्धि की जाती है तो कुल उत्पादन में होने वाली वृद्धि श्रम का प्रतिफल होगा।

एक कारक के बढ़ते प्रतिफल निम्नलिखित कारणों से होते हैं-
1. स्थिर कारकों का अनुकूलतम उपयोग-एक कारक के बढ़ते प्रतिफल का मुख्य कारण यह है कि परिवर्ती कारक की इकाइयों में वृद्धि से अविभाज्य स्थिर कारकों का अनुकूलतम व प्रभावी उपयोग होने लगता है।

2. श्रम विभाजन श्रम विभाजन से आशय उस कार्यपद्धति से है जिसके अंतर्गत श्रमिकों को उनकी योग्यता व क्षमता के अनुसार कार्य दिया जाता है।

3. थोक मात्र की कटौती-जब कच्चे माल को बड़ी मात्रा में क्रय किया जाता है तो क्रेता को अनेक बचतें व कटौतियाँ प्राप्त होती हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित उत्पादन संबंधी आँकड़ों की सहायता से परिवर्ती अनुपात के नियम के विभिन्न चरणों की पहचान करें-

परिवर्ती आगत (इकाइयाँ)कुल उत्पाद
(इकाइयाँ)
00
18
220
328
428
520

उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 16

प्रश्न 8.
परिवर्ती अनुपात के नियम की तीन अवस्थाएँ रेखाचित्र द्वारा समझाइए। अथवा
दिए गए रेखाचित्र की सहायता से उत्पादन की तीन अवस्थाओं का स्पष्टीकरण कीजिए जब एक कारक आगत परिवर्तनीय हो।
उत्तर:
(i) प्रथम अवस्था-TP बढ़ती हुई दर से बढ़ता है। दूसरे शब्दों में, MP बढ़ता जाता है। यह अवस्था आरंभ से लेकर बिंदु क है जहाँ AP अधिकतम है AP=MP । इस अवस्था में AP और MP दोनों बढ़ते हैं। कुल उत्पाद (TP) बढ़ती हुई दर से बढ़त है। रेखाचित्र में TP वक्र A से B तक बढ़ता है। यह वर्धमान प्रतिफल की अवस्था कहलाती है।

(ii) द्वितीय अवस्था-TP घटती दर से बढ़ता है। दूसरे शब्दों में, MP गिरता जाता है। यह अवस्था बिंदु R से लेकर S तक जाता है। इस अवस्था में TP बढ़ता तो है, परंतु घटती दर से जैसाकि रेखाचित्र में B से C तक दिखाया गया है। इस अवस्था में AP और MP दोनों गिरते हैं और TP जब अधिकतम होता है तो MP शून्य होता है। यह ह्रासमान प्रतिफल की अवस्था कहलाती है और इस अवस्था में फर्म उत्पादन करना चाहेगी।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 17

(iii) तृतीय अवस्था इस अवस्था में TP गिरना शुरू हो जाता है अर्थात् दूसरे शब्दों में MP ऋणात्मक हो जाता है। यह शून्य से शुरू होकर वहाँ तक जाती है, जहाँ MP ऋणात्मक होता है। यहाँ TP घटना शुरू हो जाता है। यह ऋणात्मक प्रतिफल की अवस्था है।

प्रश्न 9.
हासमान सीमांत प्रतिफलों का नियम समझाइए। किसी कारक (साधन) का प्रयोग बढ़ाने पर उसका सीमांत उत्पाद कम क्यों होता है?
उत्तर:
अल्पकाल में उत्पादन के कछ कारक स्थिर होते हैं और कुछ कारक परिवर्ती। जब स्थिर कारकों के साथ परिवर्ती कारकों की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो पहले प्रतिफल बढ़ने लगते हैं, परंतु एक अवस्था के पश्चात् प्रतिफल घटने लगते हैं। इस अवस्था को हम घटते प्रतिफल के सिद्धांत के कारण प्राप्त करते हैं। यह अवस्था परिवर्ती अनुपातों के नियम की अंतिम और आवश्यक अवस्था है। इस अवस्था में सीमांत प्रतिफल घटती दर से मिलता है जिसके कारण कुल प्रतिफल में वृद्धि घटती दर से या ऋणात्मक दर से होती है। जैसे ही एक उत्पादक संसाधनों के इष्टतम समायोजन की स्थिति प्राप्त कर लेता है, उसका कुल उत्पाद अधिकतम होता है। इस स्थिति के बाद यदि चल साधनों की मात्रा में वृद्धि होगी तो घटते प्रतिफल का सिद्धांत लागू होगा।

प्रश्न 10.
परिवर्ती अनुपात के नियम को कुल उत्पाद में होने वाले परिवर्तनों के रूप में समझाइए।
उत्तर:
परिवर्ती अनुपात का नियम (Law of Variable Proportions) – अल्पकाल में, अन्य कारकों को स्थिर रखते हुए जब परिवर्ती कारक (श्रम) की इकाइयाँ बढ़ाई जाती हैं, तो पहले कुल भौतिक उत्पाद (TPP) में बढ़ती दर से वृद्धि होती है। परंतु एक सीमा के बाद TPP में घटती दर से वृद्धि होती है। अन्ततः TPPघटने लगता है। TPP द्वारा प्रदर्शित इस व्यवहार को ‘परिवर्ती अनुपात का नियम’ कहा जाता है। इसे निम्न तालिका द्वारा सुस्पष्ट किया गया है-
उत्पादन तालिका
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 18

प्रश्न 11.
परिवर्ती अनुपात के नियम को सीमांत उत्पाद में होने वाले परिवर्तनों के रूप में समझाइए।
उत्तर:
परिवर्ती अनुपात का नियम (Law of Variable Proportions)-अल्पकाल में, अन्य कारकों को स्थिर रखते हुए जब परिवती कारक (श्रम) की इकाइयाँ बढ़ाई जाती हैं, तो पहले सीमांत भौतिक उत्पाद (MPP) में वृद्धि होती है। फिर MPP घटने लगता है लेकिन धनात्मक रहता है और शून्य तक पहुँच जाता है और अंत में MPPऋणात्मक हो जाता है। MPP द्वारा प्रदर्शित इसी व्यवहार को ‘परिवर्ती अनुपात का नियम’ कहा जाता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 19

प्रश्न 12.
पैमाने के वर्धमान प्रतिफल के अर्थ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पैमाने के वर्धमान प्रतिफल (Increasing returns to scale)-पैमाने के वर्धमान प्रतिफल से हमारा अभिप्राय उस स्थिति से है जिसके अंतर्गत पैमाने में परिवर्तन की तुलना में उत्पादन में अधिक दर से परिवर्तन होता है। यह स्थिति पैमाने के प्रतिफल की पहली अवस्था है। पैमाने के वर्धमान प्रतिफल उत्पादन की मितव्ययिताओं के कारण होते हैं। इसे हम निम्न उदाहरण से समझा सकते हैं-

क्रम संख्याआगत्तों का पैमानाकुल उत्पाद (इकाइयाँ)सीमांत उत्पाद (इकाइयाँ)
12 श्रमिक + 1 मशीन200200
24 श्रमिक + 2 मशीन500300
36 श्रमिक + 3 मशीन900400
48 श्रमिक + 4 मशीन1,400500

प्रश्न 13.
पैमाने के प्रतिफल की विभिन्न अवस्थाओं को उत्पाद अनुसूची की सहायता से दिखाइए।
उत्तर:
पैमाने के प्रतिफल की निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ हैं-

  • पैमाने के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल (Increasing returns to scale)
  • पैमाने के स्थिर प्रतिफल (Constant returns to scale)
  • पैमाने के ह्रासमान (घटते) प्रतिफल (Decreasing returns to scale)

पैमाने के प्रतिफल (Returns to scale) की अवस्थाएँ निम्नलिखित उत्पाद अनुसूची में दर्शायी गई हैं

उत्पादन के पैमाने में वृद्धिकुल उत्पाद में वृद्धिपैमाने के प्रतिफल
की अवस्था
10 %15 %वर्धमान प्रतिफल
10 %10 %स्थिर प्रतिफल
10 %5 %हासमान प्रतिफल

प्रश्न 14.
पैमाने के वर्धमान प्रतिफल के कारण बताइए। अथवा
आंतरिक तथा बाह्य बचतें कौन-कौन सी होती हैं ?
उत्तर:
पैमाने के वर्धमान प्रतिफल के कारण पैमाने के वर्धमान प्रतिफल दीर्घकाल में, आंतरिक व बाह्य बचतों के कारण संभव होते हैं। ये बचतें छोटे पैमाने से बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से उत्पन्न होती हैं।
I. आंतरिक बचतें-एक फर्म को अपने उत्पादन का पैमाना बढ़ाने के फलस्वरूप जो बचतें प्राप्त होती हैं, उन्हें आंतरिक बचतें कहते हैं। बिना उत्पादन बढ़ाए ये बचतें प्राप्त नहीं होती। ये वे बचतें होती हैं जो किसी फर्म विशेष को अपने निजी प्रयत्नों के फलस्वरूप प्राप्त होती हैं। ये बचतें अन्य फर्मों को प्राप्त नहीं होतीं, बल्कि केवल विशेष फर्म को प्राप्त होती हैं जिसके उत्पादन के
आकार में वृद्धि हुई है। मुख्य आंतरिक बचतें (Internal Economies) निम्नलिखित हैं

  • श्रम संबंधी बचतें बड़े पैमाने के उत्पादन से श्रम विभाजन से बचतें प्राप्त होती हैं।
  • तकनीकी बचतें तकनीकी उन्नति के कारण बचतें उपलब्ध होती हैं।
  • बाज़ार संबंधी बचतें बड़े पैमाने पर क्रय-विक्रय संबंधी बचतें मिलने लगती हैं।
  • प्रबंध संबंधी बचतें-उत्तम प्रबंध संबंधी बचतें प्राप्त होती हैं।
  • बड़ी मशीन संबंधी बचतें बड़ी मशीनों की अविभाज्यता के कारण भी बचतें प्राप्त होती हैं।

II. बाह्य बचतें बाह्य बचतें वे होती हैं जो समस्त उद्योग के विकसित होने व एक स्थान विशेष में केंद्रित सब फर्मों को उत्पादन का पैमाना बढ़ाने से प्राप्त होती हैं। एक क्षेत्र में उद्योगों के स्थानीयकरण (localisation) या केंद्रित होने से फर्मों को ये बाहरी बचतें (External Economies) प्राप्त होती हैं; जैसे

  • उत्तम परिवहन एवं संचार सुविधाओं की उपलब्धि
  • सहायक उद्योगों की स्थापना
  • बैंक तथा अन्य वित्त संस्थाओं की उपलब्धि
  • श्रमिकों के प्रशिक्षण केंद्र स्थापित होना
  • एक क्षेत्र का एक विशेष उद्योग के लिए प्रसिद्ध होना
  • चालक शक्ति का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना
  • विशेष प्रकार के श्रमिकों का केंद्र बन जाना
  • कच्चे माल का सुगमता से उपलब्ध होना।

प्रश्न 15.
पैमाने के हासमान प्रतिफल के कारण बताइए। अथवा
आंतरिक तथा बाह्य अवबचतें कौन-कौन-सी होती हैं?
उत्तर:
पैमाने के हासमान (घटते) प्रतिफल के कारण (Causes of Diminishing Returns to Scale)-पैमाने के ह्रासमान (घटते) प्रतिफल दीर्घकाल में आंतरिक व बाह्य अवबचतों (Internal and External Diseconomies) के कारण प्राप्त होते हैं।
I. आंतरिक अवबचतें आंतरिक अवबचतें वे हानियाँ हैं जो किसी विशेष फर्म के एक निश्चित सीमा से अधिक आकार बढ़ने के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं। इसका प्रभाव सारे उद्योग पर नहीं पड़ता। कुछ महत्त्वपूर्ण आंतरिक हानियाँ (Internal Diseconomies) निम्नलिखित हैं
1. प्रबंध की कठिनाइयाँ फर्म के अत्यधिक विस्तार से प्रबंध की देखभाल (Supervision) कठिन हो जाती है जिससे प्रबंधकीय कुशलता (Operational Efficiency) में गिरावट आती है।

2. तकनीकी हानियाँ-प्रत्येक मशीन की एक अनुकूलतम क्षमता (Optimum Capacity) होती है। फर्म का बहुत बड़ा आकार होने पर मशीन का अत्यधिक प्रयोग होने के कारण अनेक तकनीकी दोष पैदा होने लगते हैं।

3. लालफीताशाही-लालफीताशाही के कारण फर्म संबंधी निर्णय लेने में देरी होती है।

4. बाज़ार संबंधी हानियाँ-दूरस्थ स्थानों से कच्चे माल लाने और तैयार माल को दूर की मंडियों में बेचने का यातायात व्यय काफी बढ़ जाता है।

5. श्रम-संघ-फर्म या उद्योग का विस्तार होने से श्रमिकों की संख्या बढ़ जाने से श्रमिक अपनी माँगें मनवाने के लिए अपने श्रम-संघ बना लेते हैं जिससे औद्योगिक झगड़े शुरू हो जाते हैं।

II. बाह्य अवबचतें-बाह्य अवबचतें वे हानियाँ हैं जो किसी उद्योग के एक निश्चित सीमा से अधिक आकार बढ़ने के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं। इनका प्रभाव उद्योग की सभी फर्मों पर पड़ता है। कुछ महत्त्वपूर्ण बाहरी अवबचतें (External Diseconomies) निम्नलिखित हैं-

  • कच्चे माल का न मिलना।
  • विद्युत शक्ति का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना।
  • यातायात की कठिनाइयाँ।
  • वित्त मिलने में कठिनाइयाँ।
  • औद्योगिक केंद्रों पर गंदी बस्तियों (Slums) तथा झुग्गी-झोंपड़ी कॉलोनियों (J.J. Colonies) का बन जाना आदि।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 16.
कारक/साधन के प्रतिफल और पैमाने के प्रतिफल में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

कारक/परिवर्ती साधन के प्रतिफलपैमाने के प्रतिफल
1. अन्य साधनों को स्थिर रखते हुए किसी परिवर्ती साधन (जैसे श्रम) की इकाइयाँ बढ़ाने से कुल भौतिक उत्पाद (TPP) में हुई वृद्धि को ‘साधन के प्रतिफल’ कहते हैं।1. उत्पादन के सभी साधनों की इकाइयों में समान अनुपात में वृद्धि करने से कुल भौतिक उत्पाद (TPP) में हुई वृद्धि को ‘पैमाने के प्रतिफल’ कहते हैं।
2. अन्य साधनों को स्थिर रखते हुए जब केवल एक ही साधन की इकाइयों में परिवर्तन किया जाता है तो परिवर्ती कारक और स्थिर कारकों का अनुपात बदल जाता है।2. उत्पादन के सभी साधनों में समान अनुपात में वृद्धि होने से साधनों का अनुपात स्थिर रहता है।
3. साधन के प्रतिफल अल्पकाल में लागू होते हैं।3. पैमाने के प्रतिफल दीर्घकाल में लागू होते हैं।

प्रश्न 17.
संख्यात्मक उदाहरण की सहायता से ‘एक कारक/साधन के प्रतिफल’ और ‘पैमाने के प्रतिफल’ में अंतर बताइए।
अथवा साधन के प्रतिफल और पैमाने के प्रतिफल में क्या अंतर है?
उत्तर:
कारक (साधन) के प्रतिफल से अभिप्राय उत्पादन के परिवर्ती कारक की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से प्राप्त होने वाली अतिरिक्त उत्पादन की मात्रा से है जैसाकि निम्नांकित तालिका से स्पष्ट होता है-

साधन/कारक (इकाइयाँ)कुल उत्पादसीमांत उत्पाद
3 श्रम +1 मशीन100
4 श्रम +1 मशीन12525
5 श्रम +1 मशीन14015

सीमांत उत्पाद साधन के प्रतिफल को व्यक्त करते हैं।
दीर्घकाल में ‘उत्पादन के पैमाने’ में वृद्धि संभव होती है। दीर्घकाल में सभी कारकों की मात्रा को समान अनुपात में बढ़ाया जाता है। इसके परिणामस्वरूप कुल उत्पाद पर जो प्रभाव होता है उसे पैमाने के प्रतिफल कहते हैं। निम्नांकित तालिका में इन्हें प्रस्तुत किया गया है। स्पष्ट है कि उत्पादन का पैमाना बढ़ाने से उत्पादन का स्तर बढ़ जाता है।

कारक (इकाइयाँ)कुल उत्पादसीमांत उत्पाद
3 श्रम + 1 मशीन100100
6 श्रम + 1 मशीन200110

प्रश्न 18.
नतिपरिवर्तक बिंदु (Point of Inflexion) क्या है?
अथवा
नीतिपरिवर्तक बिंदु के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
नतिपरिवर्तक बिंदु वह है, जहाँ TPP के ढाल में परिवर्तन होता है। इस बिंदु तक TPP बढ़ती दर से बढ़ती है। इस बिंदु के पश्चात् भी TPP में वृद्धि होती है किंतु घटती दर से। यह वह बिंदु है जहाँ उत्पादन की पहली अवस्था का अंत होता है। क्योंकि इस बिंदु पर MPP का बढ़ना रुक जाता है अथवा यह वह बिंदु है जो उत्पादन की दूसरी अवस्था के आरंभ (Beginning) को दर्शाता है, क्योंकि इस बिंदु के पश्चात् MPP घटने लगता है। संलग्न रेखाचित्र में K बिंदु को नतिपरिवर्तक बिंदु (Point of Inflexion) दर्शाया गया है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 20

प्रश्न 19.
कुल भौतिक उत्पाद अनुसूची की सहायता से पैमाने के वर्धमान (बढ़ते) और हासमान (घटते) प्रतिफल की अवधारणा को सुस्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कुल भौतिक उत्पाद अनुसूची (TPP)-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 21
पैमाने के प्रतिफल (Returns to Scale) – सभी कारकों को एक ही अनुपात में बढ़ाए जाने की दशा में होने वाली उत्पादन में वृद्धि ही पैमाने का प्रतिफल है। पैमाने के ये प्रतिफल निम्नलिखित तीन प्रवृत्ति वाले होते हैं
(i) पैमाने के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल (IRS)-जैसा कि उपर्युक्त तालिका से सुस्पष्ट है, आगत संयोग 1 K + 2L, 2K+4 L तथा 3K +6L एक निश्चित अनुपात में बढ़ाए जा रहे हैं अर्थात् उत्पादन कारकों में शत-प्रतिशत वृद्धि हो रही है, लेकिन उत्पादन वृद्धि का अनुपात अधिक है, तात्पर्य यह है कि इन तीन संयोगों की तुलना में उत्पादन वृद्धि का अनुपात अधिक है (100% : 120%) तथा (50% : 63.63%)। इन प्रतिफलों को पैमाने के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल (IRS) कहा जाता है।

(ii) पैमाने के स्थिर प्रतिफल (CRS) उपर्युक्त तालिका में आगत संयोग या कारक एक निश्चित अनुपात से ही बढ़ रहे हैं अर्थात् 4K +8L तथा 5K + 10L लेकिन इसमें उत्पादन का अनुपात साम्यावस्था में आ गया है अर्थात् कारकों के अनुपात में ही बढ़ रहा है। (33.3%: 33.3%)। ऐसे प्रतिफल पैमाने के स्थिर प्रतिफल कहे जाते हैं। उक्त दो संयोगों में समान अनुपात में उत्पादन
बढ़ रहा है।

(ii) पैमाने के ह्रासमान (घटते) प्रतिफल (DRS)-जब सभी कारक एक दिए हुए अनुपात में बढ़ाए जा रहे हों, लेकिन उत्पादन वृद्धि का अनुपात कम होने लगता है तो ऐसे प्रतिफलों को पैमाने के हासमान (घटते) प्रतिफल कहा जाता है। तालिका से स्पष्ट है कि आगत संयोग लगातार बढ़ रहे हैं अर्थात् (6K + 12L) तथा (7K+14L) लेकिन उत्पादन 16.6% एवं 14.28% तक ही बढ़ पा रहा है, जबकि इससे पहले के आगत संयोग में यह 25% तथा 33% था, दूसरे शब्दों में, TPP में वृद्धि 35 से 40 हो रही है, लेकिन उत्पादन वृद्धि का अनुपात 16.6% और 14.28% है।

प्रश्न 20.
स्थिर लागतों तथा परिवर्ती लागतों में अंतर बताइए। प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
स्थिर लागतों से हमारा अभिप्राय उन लागतों से है जो उत्पादन की इकाइयों में परिवर्तन के परिणामस्वरूप परिवर्तित नहीं होतीं। इसके विपरीत परिवर्ती लागतों से हमारा अभिप्राय उन लागतों से है जो उत्पादन की इकाइयों में परिवर्तन के परिणामस्वरूप परिवर्तित होती हैं। स्थिर लागत वक्र X-अक्ष के समानांतर एक सीधी रेखा होता है, जबकि परिवर्ती लागत वक्र नीचे शून्य से शुरू होकर ऊपर उठता हुआ होता है अर्थात् शून्य उत्पादन पर VC शून्य होती है और उत्पादन की मात्रा जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, VC वक्र भी ऊँचा उठता जाता है। चूँकि शुरू में VC वक्र घटती दर से और बाद में बढ़ती दर से उठता है, इसलिए यह उल्टे ‘S’ आकार का होता है। इसे हम निम्नांकित रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 22
स्थिर लागतों के दो उदाहरण-

  • भवन का किराया।
  • बीमा किश्त।

परिवर्ती लागतों के दो उदाहरण-

  • कच्चे माल की लागत।
  • उत्पादन में लगे श्रमिकों की मज़दूरी।

प्रश्न 21.
उत्पादन के शून्य स्तर पर (उत्पादन बंद करने) पर भी स्थिर लागत शून्य नहीं होती, क्यों?
उत्तर:
चूँकि स्थिर कारकों को उत्पादन के आरंभ से पहले खरीद लिया जाता है, इसलिए स्थिर या बँधी लागत उत्पादन के शून्य होने पर अथवा उत्पादन के बंद होने पर भी ज्यों-की-त्यों बनी रहती है।

प्रश्न 22.
उत्पादन की प्रारंभिक अवस्था में कुल परिवर्ती लागत (TVC) में घटती दर पर वृद्धि होती है, क्यों? कारण बताइए।
उत्तर:
एक फर्म के उत्पादन की प्रारंभिक अवस्था में कारक के वर्धमान प्रतिफल लागू होते हैं। यह वह अवस्था है जिसमें परिवर्ती कारक का सीमांत उत्पाद (MP) बढ़ने की प्रवृत्ति रखता है। बढ़ती सीमांत उत्पादकता का अर्थ है, घटती लागत। अतः जब अतिरिक्त इकाई उत्पन्न करने की लागत घट रही होती है, तब TVC में वृद्धि घटती दर पर ही होती है।

प्रश्न 23.
एक उपयुक्त रेखाचित्र की सहायता से TC, TFC और TVC के संबंध समझाइए।
उत्तर:
TC = TVC + TFC
TC कुल स्थिर लागत (TFC)X-अक्ष के समानांतर है। उत्पादन के स्तर में परिवर्तन होने पर भी यह लागत परिवर्तित नहीं होती अर्थात् स्थिर रहती है। जबकि कुल परिवर्ती लागत (TVC) उत्पादन के स्तर में वृद्धि होने से बढ़ती जाती है। जब उत्पादन का स्तर शून्य होता है तो TVC भी शून्य होती है। जबकि TFC उत्पादन के शून्य होने पर TFC शून्य नहीं होती। कुल लागत (TC) भी उत्पादन के स्तर में वृद्धि होने पर बढ़ती है। उत्पादन के शून्य स्तर पर कुल लागत TFC के बराबर होती है क्योंकि
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 23
TC = TVC + TFC
TC = 0+ TFC या TC = TFC
अतः उत्पादन के शून्य स्तर पर TC = TFC होती है। किंतु जब उत्पादन के बढ़ने पर TVC बढ़ती है तो TC भी TVC के साथ-साथ बढ़ती जाती है और TC वक्र TVC वक्र के समानांतर रहती है तथा TC और TVC का अंतर TFC के बराबर होता है।

प्रश्न 24.
AFC वक्र आयताकार अतिपरवलय (Rectangular Hyperbola) आकार का होता है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
AFC वक्र आयताकार अतिपरवलय (रक्टैंगुलर हाइपरबोला) है। इसका कारण यह है कि यदि हम उत्पादन के किसी भी स्तर Q.Q1 आदि को उससे संबंधित औसत स्थिर लागत (AFC) से गुणा करते हैं, तब हम सदैव एक स्थिर (समान) कुल स्थिर लागत प्राप्त करते हैं।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 24
रेखाचित्र में, AFC वक्र आयताकार अतिपरवलय है क्योंकि उत्पादन के स्तर पर आयत OQCF तथा उत्पादन के Q1 स्तर पर उत्पादन (निर्गत) आयत OQ1C1F1 हमें कुल स्थिर लागत के क्षेत्रफल देते हैं। ये दोनों क्षेत्रफल समान हैं।

प्रश्न 25.
क्या ATC तथा AVC वक्र एक-दूसरे को प्रतिच्छेदन करते हैं? अपने उत्तर के कारण बताइए।
उत्तर:
औसत कुल लागत (ATC) तथा औसत परिवर्ती लागत (AVC) कभी एक-दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करते हैं। इसका कारण यह है कि ATC = AFC + AVC
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 25
AFC कभी भी शून्य नहीं होती, उत्पादन के शून्य स्तर पर भी यह .. शून्य नहीं होती जबकि AVC उत्पादन के शून्य स्तर पर शून्य होती है। AFC के कभी शून्य न होने के कारण ATC सदैव AVC से अधिक होती है। चूंकि AVC सदैव ATC से कम होती है इसलिए ATC वक्र तथा AVC वक्र कभी एक-दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करते हैं।

प्रश्न 26.
सिद्ध करें कि MC की गणना TC अथवा TVC द्वारा किस प्रकार की जा सकती है?
उत्तर:
सीमांत लागत (MC) अतिरिक्त लागत होती है और अतिरिक्त लागत कभी स्थिर (बँधी) लागत नहीं हो सकती, यह सदा परिवर्ती लागत ही होती है। अतः निम्नलिखित सूत्र की सहायता से MC का अनुमान लगाया जा सकता है
MC = TCn – TCn-1
या
सीमांत लागत = ‘n’ इकाइयों की कुल लागत – ‘n-1’ इकाइयों की कुल लागत
या
MC = TVCn – TVCn-1
या
सीमांत लागत = ‘n’ इकाइयों की कुल परिवर्ती लागत – ‘n-1’ इकाइयों की कुल परिवर्ती लागत
प्रमाण (Proof):
MC = TCn – TCn-1
= (TFCn + TVCn) – (TFCn-1 + TVCn-1) (∵ TC = TFC + TVC)
= (TFCn + TVCn) – (TFCn-1 + TVCn-1)
= TVCn – TFCn-1
[TFCn = TFCn-1 क्योंकि TFC स्थिर (Constant) रहती है]

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 27.
अल्पकालीन MC वक्र ” आकार का क्यों होता है?
उत्तर:
अल्पकाल में MC वक्र ‘U’ आकार का इसलिए होता है क्योंकि शुरू में बढ़ते प्रतिफल का नियम लागू होता है जिससे MC घटती है। फिर स्थिर प्रतिफल का नियम लागू होने पर MC भी स्थिर रहती है। इसके पश्चात् MC बढ़ना शुरू करती है। अतः उत्पादन के आरंभ में सीमांत लागत कम हो रही है तथा इसके पश्चात् बढ़ रही है जिसके कारण MC वक्र ‘U’ आकार का होता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 26

प्रश्न 28.
एक रेखाचित्र की सहायता से दिखाइए कि MC वक्र के नीचे का क्षेत्रफल कुल परिवर्ती लागत (TVC) के बराबर होता है।
अथवा
उत्पादन के किसी निश्चित स्तर पर MC वक्र के नीचे का कुल क्षेत्र, उत्पादन के उस स्तर के TVC को मापता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 27
सीमांत लागत केवल परिवर्ती लागत होती है क्योंकि MC निर्गत की एक अतिरिक्त इकाई उत्पन्न करने की एक अतिरिक्त लागत होती है। परिभाषा से ही सीमांत (अतिरिक्त) लागत स्थिर लागत नहीं हो सकती, यह केवल परिवर्ती लागत ही हो सकती है। इसके अनुसार, उत्पादन की विभिन्न इकाइयों के अनुरूप (1 से n इकाइयों तक) सीमांत लागत का कुल जोड़ TVC (कुल परिवर्ती लागत) हो जाता है। अतएव
\(\sum_{i=1}^{n}\)MC – TVC
ज्यामितीय दृष्टि से, उत्पादन के किसी भी स्तर के अनुरूप MC के नीचे का कुल क्षेत्र, उत्पादन के उस स्तर के TVC को मापता है। जैसे कि संलग्न रेखाचित्र यह प्रकट करता है कि उत्पादन के OQ स्तर के लिए, TVC = क्षेत्र OQCK =Oसे Q के बीच के उत्पादन की सभी इकाइयों के लिए ZMC है।

प्रश्न 29.
औसत लागत (AC) और सीमांत लागत (MC) के बीच संबंध बताइए।
उत्तर:
(1) औसत लागत (AC) और सीमांत लागत (MC) दोनों ही कुल लागत (TC) से ज्ञात की जा सकती हैं।
AC = \(\frac { TC }{ q }\) = तथा MC = TCn – TCn-1
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 28

(2) जब AC घटती है तो MC औसत लागत से कम होती है।

(3) जब AC बढ़ती है तब MC औसत लागत से अधिक होती है।

(4) MC वक्र AC वक्र को उसके न्यूनतम बिंदु पर काटता है।

(5) जब AC घट रही होती है तो MC बढ़ सकती है। ऐसा तब तक होता है, जब तक MC < AC हो।

प्रश्न 30.
सीमांत लागत और औसत परिवर्ती लागत के बीच क्या संबंध
उत्तर:
सीमांत लागत से अभिप्राय किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने की लागत से है। सूत्र के रूप में,
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 29
सीमांत लागत और औसत परिवर्ती लागत में घनिष्ठ संबंध होता है। दोनों ही लागत वक्र ‘U’ आकार के होते हैं। संलग्न रेखाचित्र को देखने से यह स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक अवस्था में औसत परिवर्ती लागत वक्र और सीमांत लागत वक्र नीचे गिरता हुआ होता है परंतु सीमांत लागत वक्र E बिंदु के बाद ऊपर उठने लगता है और औसत परिवर्ती लागत वक्र को उसके न्यूनतम बिंदु B पर काटता हुआ जाता है। इस प्रकार सीमांत लागत वक्र की गिरने और उठने की दर अधिक है।

प्रश्न 31.
एक लागत तालिका की सहायता से सीमांत लागत और औसत लागत के बीच संबंध समझाइए।
उत्तर:
सीमांत लागत तथा औसत लागत दोनों ही कुल लागत पर आधारित हैं। इसलिए सीमांत लागत और औसत लागत के बीच घनिष्ठ संबंध है। अग्रलिखित तालिका से हमें औसत लागत और सीमांत लागत के बीच संबंध का पता चलता है

उत्पादन इकाइयाँकुल लागत
(रुपए)
औसत लागत
(रुपए)
सीमांत लागत
(रुपए)
1120120120
220010080
32408040
43208080
545090130
6600100150

प्रारंभिक अवस्था में दोनों ही लागतें गिरती हुई होती हैं, लेकिन सीमांत लागत औसत लागत की तुलना में तेजी से गिरती है। जैसे-जैसे उत्पादन इकाइयों में वृद्धि होती है, दोनों ही लागतें बढ़ने लगती हैं परंतु सीमांत लागत औसत लागत से अधिक दर से बढ़ती है। औसत लागत सीमांत लागत के बाद ऊपर उठती है। सीमांत लागत चौथी उत्पादन इकाई से ऊपर उठती है, जबकि औसत लागत पाँचवीं इकाई से।

प्रश्न 32.
रेखाचित्र की सहायता से समझाइए कि फर्म के औसत लागत वक्र और सीमांत लागत वक्र के बीच क्या संबंध है। अथवा
स्पष्ट कीजिए कि जब औसत लागत गिर रही हो तो क्या सीमांत लागत बढ़ सकती है?
उत्तर:
औसत लागत वक्र तथा सीमांत लागत वक्र को कुल लागत वक्र से ज्ञात किया जाता है। इसलिए औसत लागत वक्र और सीमांत लागत वक्र में घनिष्ठ संबंध होता है। दोनों ही लागत वक्र उत्पादन फलन के कारण ‘U’ आकार के होते हैं। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 30
रेखाचित्र से यह स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक अवस्था में औसत लागत वक्र और सीमांत लागत वक्र दोनों ही नीचे गिरते हुए होते हैं, लेकिन सीमांत लागत वक्र औसत लागत की तुलना में तेजी से गिरता है। सीमांत लागत वक्र औसत लागत वक्र की तुलना में अधिक ऊपर उठता है। ऊपर उठते हुए सीमांत लागत वक्र औसत लागत वक्र को उसके न्यूनतम बिंदु पर काटता है। जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ता जाता है, दोनों ही वक्र ऊपर उठते हैं परंतु सीमांत लागत वक्र तेजी से ऊपर उठता है।

प्रश्न 33.
TC और MC में संबंध बताइए।
उत्तर:

  1. सीमांत लागत की गणना निर्गत (उत्पादन) की दो अनुक्रमी इकाइयों की कुल लागत के अंतर द्वारा किया जाता है। अर्थात् MC = TCn – TCn-1
  2. जब TC घटती दर से बढ़ता है तो MC गिरता है।
  3. जब TC में वृद्धि दर गिरना बंद हो जाता है तो MC अपने न्यूनतम बिंदु पर होता है।
  4. जब TC बढ़ती दर से बढ़ता है, तो MC बढ़ता है।

प्रश्न 34.
एक रेखाचित्र की सहायता से ATC, AVC तथा MC: वक्रों के संबंध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
संलग्न रेखाचित्र ATC, AVC तथा MC वक्रों के संबंध स्पष्ट करता है। तीनों लागत वक्र ‘U’ आकार के होते हैं। AVC, ATC तथा MC वक्र एक बिंदु तक तीनों गिरते हैं और उसके पश्चात् ऊपर उठते हैं।
(i) MC वक्र AVC वक्र की तुलना में तेजी से गिरता भी है और उठता भी है।

(ii) MC वक्र AVC वक्र और ATC वक्र को उनके न्यूनतम बिंदुओं B तथा C पर काटता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 31

प्रश्न 35.
“पैमाने के वर्धमान एवं ह्रासमान प्रतिफल ही क्रमशः दीर्घकालीन औसत लागत वक्र (LAC) के नीचे की ओर गिरते और ऊपर उठते हुए हिस्सों का कारण होते हैं।” इस कथन के पक्ष या विपक्ष में तर्क
LMC दीजिए।
उत्तर:
पैमाने के वर्धमान प्रतिफल दीर्घकालीन औसत लागत वक्र के नीचे की ओर तथा पैमाने के ह्रासमान प्रतिफल दीर्घकालीन औसत लागत वक्र के ऊपर की ओर उठते हुए दिखाए जाते हैं। यह कथन सही है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 32
रेखाचित्र में दीर्घकालीन सीमांत लागत (LMC) वक्र दीर्घकालीन औसत लागत (LAC) वक्र को उसके न्यूनतम बिंदु E पर काटता है। उत्पादन के 0 से लेकर Q तक के स्तर में LAC घट रही है अर्थात् जिस प्रतिशत से उत्पादन बढ़ रहा है, उस प्रतिशत से कम औसत लागत बढ़ रही उत्पादन (निर्गत) है जो पैमाने के वर्धमान प्रतिफल को प्रकट कर रही है। Q से आगे उत्पादन का स्तर बढ़ने पर दीर्घकालीन लागत वक्र ऊपर की ओर उठ रहा है अर्थात् जिस अनुपात से उत्पादन का स्तर बढ़ रहा है उससे अधिक अनुपात में औसत लागत बढ़ रही है जो पैमाने के ह्रासमान प्रतिफल को प्रकट करती है।

प्रश्न 36.
LAC वक्र के ‘U’ आकार होने के कारण बताइए।
उत्तर:
LAC वक्र का U आकार होने के कारण-संलग्न रेखाचित्र में LAC वक्र के तीन भाग अर्थात् शुरू में A बिंदु तक नीचे गिरने, फिर A बिंदु पर टिकने और अंत में ऊपर उठने के कारण क्रमशः पैमाने के वर्धमान, स्थिर और ह्रासमान प्रतिफल हैं। ध्यान रहे पैमाने के वर्धमान प्रतिफल का अर्थ है-औसत लागत में गिरावट आना, जबकि पैमाने के ह्रासमान प्रतिफल का अर्थ है औसत लागत में वृद्धि होना।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 33
(a) आरंभ में जब कोई फर्म छोटे पैमाने से बड़े पैमाने पर उत्पादन करती है तो उसे वर्धमान या बढ़ते हुए प्रतिफल प्राप्त होते हैं। इसके मुख्य कारण बड़े पैमाने के उत्पादन से प्राप्त होने वाली बचतें (Economies of large scale) हैं। दो अति महत्त्वपूर्ण बचतें श्रम विभाजन (Division of Labour) और थोक की छूट (Volume Discount) हैं।
(i) फर्म द्वारा श्रमिकों में उनकी विशेष योग्यताओं के अनुसार कार्यों का बँटवारा, श्रम विभाजन कहलाता है। श्रम विभाजन से श्रमिकों की कार्यकुशलता बढ़ती है, समय और उपकरणों की बचत इष्टतम उत्पादन होती है और मशीनरी का अधिक उपयोग होता है जिसके फलस्वरूप फर्म की उत्पादन लागत गिर जाती है,

(ii) बड़ी मात्रा में एक साथ खरीदारी करने पर कीमत में जो कटौती या छूट (discount) मिलती है, उसे थोक की छूट कहते हैं। दूसरे शब्दों में, कच्चे माल की थोक या बड़े पैमाने पर खरीद, कम कीमत पर की जा सकती है। इससे भी फर्म की उत्पादन लागत कम हो जाती है। इन दो बचतों के अतिरिक्त बड़े पैमाने पर उत्पादन की अन्य बचतें हैं तकनीकी बचतें, प्रबंध संबंधी बचतें, वित्त संबंधी बचतें आदि।

(b) वर्धमान प्रतिफल के परिणामस्वरूप जब औसत लागत (AC) न्यूनतम हो जाती है तो फर्म को कुछ समय के लिए पैमाने के स्थिर प्रतिफल (Constant Returns) प्राप्त होते हैं; जैसे रेखाचित्र में A बिंदु पर स्थिति दर्शायी गई है। इस स्थिति में उत्पादन को, सबसे अधिक कुशलतापूर्वक किए जाने वाला उत्पादन माना जाता है, क्योंकि तब औसत लागत न्यूनतम होती है।

(c) फर्म जब A बिंदु से अधिक उत्पादन करती है तो उसे अवबचतों (diseconomies) के कारण ह्रासमान प्रतिफल प्राप्त होने लगते हैं जिससे लागत बढ़ती जाती है और औसत लागत वक्र ऊपर उठता जाता है। बड़े पैमाने के उत्पादन से अवबचतों के उदाहरण हैं प्रबंध की कठिनाइयाँ, विद्यत शक्ति का पर्याप्त मात्रा में न मिलना, यातायात व वित्त की कठिनाइयाँ. इन उपरोक्त कारणों से LAC वक्र ‘U’ आकार के होते हैं।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 37.
अल्पकालीन और दीर्घकालीन वक्रों की प्रकृति में अंतर बताइए।
उत्तर:
(i) जहाँ अल्पकाल में परिवर्ती अनुपात का नियम लागत वक्रों के आकार को निर्धारित करता है, वहाँ दीर्घकाल में पैमाने के प्रतिफलों का स्वरूप (Pattern) लागत वक्रों के ‘U’ आकार का निर्धारण करता है।

(ii) जहाँ परिवर्ती कारक के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल की अवस्था के कारण SAC वक्र पहले गिरती है, फिर समान प्रतिफल के कारण SAC स्थिर रहती है, अंततः ह्रासमान (घटते) प्रतिफल के कारण SAC बढ़ती है। फलस्वरूप SAC वक्र ‘U’ आकार का हो जाता है। वहाँ बड़े पैमाने की बचतों (Economies of Scale) के कारण LAC वक्र पहले गिरता है और कुछ समय स्थिर रहने के बाद अवबचतों (Diseconomies) के कारण फिर ऊपर उठ जाता है। फलस्वरूप LAC वक्र ‘U’ आकार का हो जाता है।

(iii) LAC के ‘U’ आकार के कारण LMC भी ‘U’ आकार का हो जाता है अर्थात् LMC का ‘U’ आकार LAC के ‘U’ आकार के कारण बनता है जबकि अल्पकाल में स्थिति विपरीत रहती है, क्योंकि अल्पकाल में AC का ‘U’ आकार MC के ‘U’ आकार के कारण बनता है।

(iv) LAC वक्र SAC वक्र की तुलना में कम ढाल वाला अथवा अधिक चपटा (More Flatter) होता है।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एक तालिका व रेखाचित्र की सहायता से TP, MP और AP में संबंध को स्पष्ट कीजिए। AP और MP में संबंध बताइए।
अथवा
उपयुक्त रेखाचित्र की सहायता से औसत उत्पाद तथा सीमांत उत्पाद के बीच संबंध की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
TP, AP और MP के परस्पर संबंध को निम्न तालिका व रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है TP, AP, MP की काल्पनिक तालिका

भूभि व पूँजी
(स्थिर कारक)
श्रम की इकाइयाँ
(परिवर्ती कारक)
TPAPMP
10O00
11222
12634
131246
142058
152555
16294.84
17314.42
18 313.90
19293.2-2

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 34
TP और MP में संबंध-

  • जब TP बढ़ती दर से बढ़ता है, तो MP बढ़ता है।
  • जब TP घटती हुई दर से बढ़ता है, तो MP घटता है।
  • जब TP अधिकतम होता है, तो MP शून्य होता है।
  • जब TP घट रहा होता है, तो MP ऋणात्मक (-) होता है।

AP और MP में संबंध-

  • जब AP बढ़ता है, तो MP, AP से अधिक होता है (तालिका की चौथी इकाई तक)।
  • AP उस समय अधिकतम होता है, जब MP, AP के बराबर होता है। (तालिका की 5वीं इकाई पर)।
  • AP तब गिरता है, जब MP, AP से कम होता है।
  • MP शून्य व ऋणात्मक हो सकता है, परंतु AP शून्य नहीं हो सकता।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पर नोट लिखिए (क) उत्पादन के स्थिर कारक (Fixed Factors) व परिवर्ती कारक (Variable Factors)। (ख) अल्पकाल तथा दीर्घकाल (Short Period and Long Period)।
उत्तर:
(क) उत्पादन के स्थिर व परिवर्ती कारक हम जानते हैं कि उत्पादन (निर्गत) कारकों के संयुक्त प्रयत्नों का परिणाम होता है। इन कारकों को हम अग्रलिखित दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं-

  • स्थिर कारक तथा
  • परिवर्ती कारक।

1. स्थिर कारक-स्थिर कारक वे हैं जिनकी मात्रा अल्पकाल में स्थिर रहती है। अतः उत्पादन में परिवर्तन करने के लिए इनकी पूर्ति स्थिर रहती है। इसके अंतर्गत भूमि, उद्यमी तथा प्लांट आदि को शामिल किया जाता है, परंतु दीर्घकाल में इन कारकों को आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है।

2. परिवर्ती कारक परिवर्ती कारकों से अभिप्राय, उन कारकों से है जिन्हें उत्पादन प्रक्रिया में आवश्यकतानुसार परिवर्तित किया जा सकता है। इसके अंतर्गत श्रम, कच्चा माल, बिजलीशक्ति आदि को शामिल किया जाता है। वे उत्पा ल बिजलीशक्ति आदि को शामिल किया जाता है। वे उत्पादन के स्तर के अनसार घटाए-बढ़ाए जा सकते हैं। उत्पादन बंद होने पर परिवर्ती कारकों का प्रयोग समाप्त हो जाता है।

किसी वस्त का उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्पादन के कारकों की मात्रा बढ़ाई जाती है, इससे उस वस्तु का उत्पादन किस मात्रा में बढ़ता है, उसे उत्पादन के नियम (Laws of Production) कहा जाता है। यह ध्यान रहना चाहिए कि अल्पकाल (Short Period) में हम केवल परिवर्ती कारकों में परिवर्तन करके ही उत्पादन में परिवर्तन ला सकते हैं, जबकि दीर्घकाल में उत्पादन के सभी कारकों में परिवर्तन लाया जा सकता है।।

अतः दीर्घकाल में उत्पादन के पैमाने को कम या अधिक किया जा सकता है। इस प्रकार दीर्घकाल में पैमाने के प्रतिफल तथा अल्पकाल में कारक के प्रतिफल लागू होते हैं।

(ख) अल्पकाल तथा दीर्घकाल
1. अल्पकाल-अल्पकाल समय की वह अवधि होती है जिसमें उत्पादन का कम-से-कम एक या कुछ कारक स्थिर रहते हैं तथा बाकी के कारक परिवर्ती (Variable) होते हैं। अतः अल्पकाल में स्थिर तथा परिवर्ती दोनों प्रकार के कारक होते हैं। अल्पकाल में परिवर्ती कारक की मात्रा में परिवर्तन लाकर ही उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन लाया जा सकता है; जैसे यदि उत्पादक अल्पकाल में उत्पादन में वृद्धि करना चाहते हैं तो वे वर्तमान इमारत, प्लांट, मशीनों और उपकरणों के साथ कच्चे माल, श्रम आदि का अधिक मात्रा में प्रयोग करके ही कर सकते हैं। इसके विपरीत, यदि वे अल्पकाल में उत्पादन में कमी लाना चाहते हैं तो वे कम श्रमिकों और कच्चे माल का कम मात्रा में प्रयोग करके ऐसा कर सकते हैं, परंतु वे कारखाने की इमारत और प्लांट आदि में तुरंत परिवर्तन नहीं कर सकते।

2. दीर्घकाल-दीर्घकाल समय की वह अवधि होती है जिसमें उत्पादन के सभी कारक परिवर्ती होते हैं। दीर्घकाल में कोई कारक स्थिर नहीं होता, सभी कारक परिवर्ती होते हैं। दीर्घकाल में फैक्टरी, बिल्डिंग, प्लांट, मशीनरी आदि सभी में परिवर्तन लाकर उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन लाया जा सकता है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 3.
कारक/साधन के हासमान/घटते प्रतिफल के नियम को तालिका व रेखाचित्र की सहायता से समझाएँ।
अथवा
ह्रासमान सीमांत प्रतिफल का नियम क्या है? इस नियम के लागू होने के कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
हासमान सीमांत प्रतिफल का नियम-हासमान सीमांत प्रतिफल का नियम यह बताता है कि, “अन्य कारकों का प्रयोग स्थिर रहने पर, यदि एक परिवर्ती कारक के प्रयोग में वृद्धि की जाती है, तो एक स्तर के बाद सीमांत भौतिक उत्पाद में कमी आने लगती है।” वास्तव में, केवल परंपरावादी अर्थशास्त्री ही इसे अलग नियम का रूप देते हैं अन्यथा आधुनिक अर्थशास्त्री इसे परिवर्ती अनुपात के प्रतिफल के नियम की मात्र एक अवस्था (घटते ह्रासमान प्रतिफल की अवस्था) मानते हैं। चूँकि परिवर्ती अनुपात के नियम में ह्रासमान प्रतिफलों की प्रधानता रहती है। इसीलिए इसे ह्रासमान प्रतिफल के नियम के रूप में प्रतिबिंबित किया जाता है। वास्तव में, एक उद्योग में वर्धमान प्रतिफल का नियम प्रकट हो या न हो, ह्रासमान प्रतिफल का नियम अन्ततः अवश्य प्रकट होता है।
हासमान सीमांत प्रतिफल का नियम
तालिका व रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शन-इस नियम को दी गई तालिका एवं रेखाचित्र की सहायता से अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। मान लो, भूमि पर खेती करने में जब श्रम व पूँजी की मात्रा (इकाइयाँ) बढ़ाई जाती हैं तो कुल उत्पाद घटती दर से बढ़ता है अर्थात् सीमांत उत्पाद निरंतर घटता जाता है। तालिका का चित्रीकरण करने से MP वक्र के ढलान से स्पष्ट हो जाता है कि जैसे-जैसे पूँजी व श्रम की इकाइयाँ बढ़ाई जाती हैं वैसे-वैसे सीमांत उत्पाद (MP) गिरता जाता है और वक्र बाएँ से दाईं ओर नीचे गिरता है।
तालिका : हासमान प्रतिफल का नियम

स्थिर कारक (भूमि)श्रम व पूँजी की इकाइयाँकुल उत्पाद (TP)सीमांत उत्पाद (MP)
x15050
x29040
x312030
x414020

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 35

नियम लागू होने के कारण इस नियम के लागू होने के निम्नलिखित कारण हैं-
1. इष्टतम उत्पादन प्रत्येक स्थिर कारक का एक इष्टतम अथवा आदर्श बिंदु होता है जिस पर उसका श्रेष्ठतम उपयोग होता है। इस इष्टतम बिंदु के आ जाने के बाद जब स्थिर कारक के साथ परिवर्ती कारक (Variable Factor) की इकाई को बढ़ाया जाता है, तो सीमांत प्रतिफल कम होने लगते हैं।

2. अपूर्ण स्थानापन्न घटते हुए प्रतिफल का दूसरा मुख्य कारण साधनों की पूर्ण स्थानापन्नता का अभाव (Lack of Perfect Substitution) है; जैसे भूमि के स्थान पर श्रम व पूँजी का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।

3. उत्पादन के कुछ स्थिर कारक होते हैं इस नियम के लागू होने का एक कारण यह है कि उत्पादन का एक या कुछ कारक स्थिर रखे जाते हैं और इसके साथ परिवर्ती कारकों की मात्रा बढ़ाई जाती है, तो स्थिर कारक का अनुपात परिवर्ती कारकों की तुलना में कम हो जाता है। फलस्वरूप एक सीमा के बाद सीमांत उत्पाद घटने लगता है।

प्रश्न 4.
अल्पकालीन औसत लागत वक्र ‘U’ के आकार की क्यों होती है?
उत्तर:
अल्पकालीन औसत लागत वक्र ‘U’ आकार की होती है। पहले बाएँ से दाएँ नीचे की ओर गिरती है फिर एक न्यूनतम बिंदु पर पहुँचने के बाद बढ़ने लगती है। जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दर्शाया गया है।
अल्पकालीन औसत लागत वक्र के ‘U’ के आकार की होने के निम्नलिखित दो कारण होते हैं
1. औसत स्थिर लागत व औसत परिवर्ती लागत का व्यवहार (Behaviour of AFC and AVC) – औसत लागत, AFC और AVC का जोड़ होती है। उत्पादन में जैसे-जैसे वृद्धि होती जाती है, वैसे-वैसे AFC घटती जाती है और आरंभ में AVC भी घटती है। अतः आरंभ में AC भी घटती है। बाद में AFC के गिरने की दर कम हो जाती है और AVC तीव्रता से बढ़ने लगती है। परिणामस्वरूप AC भी बढ़ने लगती है। इसलिए औसत लागत वक्र ‘U’ के आकार की हो जाती है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 36

2. परिवर्ती अनुपात के नियम का लागू होना (Due to Operation of the Law of Variable Proportions) – आरंभ में स्थिर कारक के साथ जब परिवर्ती कारक की मात्रा बढ़ाई जाती
है तो स्थिर कारक का अधिक कुशलतापूर्वक प्रयोग होने के कारण AC कम होने लगती है। G बिंदु पर AC न्यूनतम हो जाती है। यह बिंदु आदर्श उत्पादन का बिंदु है। इसका अर्थ यह है कि स्थिर कारक का कुशलतम उपयोग हो रहा है। इसके बाद जब स्थिर कारक के साथ परिवर्ती कारक की मात्रा बढ़ाई जाती है तो इसकी कार्यकुशलता कम हो जाती है और इसके फलस्वरूप औसत लागत बढ़ने लगती है तथा ‘U’ के आकार की बन जाती है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 37

प्रश्न 5.
परिवर्ती अनुपात के नियम (Law of Variable Proportions) को तालिका व रेखाचित्र द्वारा समझाइए।
अथवा
परिवर्ती अनुपात के नियम की तालिका एवं रेखाचित्र सहित व्याख्या करें। एक फर्म (उत्पादक) के लिए नियम की किस अवस्था में उत्पादन करना उपयुक्त होगा?
अथवा
परिवर्ती अनुपात का नियम क्या है? यह नियम किन कारणों से लागू होता है?
उत्तर:
परिवर्ती अनुपात का नियम यह बतलाता है कि, “अल्पकाल में, जब अन्य कारकों को स्थिर रखते हुए एक परिवर्ती कारक की इकाइयाँ बढ़ाई जाती हैं, तो पहले कुल भौतिक उत्पाद (TPP) बढ़ती दर से बढ़ता है, एक सीमा के बाद कुल उत्पाद में वृद्धि घटती दर से होती है और अंततः कुल उत्पाद घटने लगता है अर्थात् पहले सीमांत भौतिक उत्पाद (MPP) बढ़ता है, फिर कम होने लगता है लेकिन धनात्मक रहता है और अंत में ऋणात्मक हो जाता है।”

परिवर्ती अनुपात का नियम
तालिका व रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शन-उपरोक्त नियम को निम्नांकित तालिका व रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
मान लो, जब स्थिर कारकों (जैसे 2 एकड़ भूमि या पूँजी की दो इकाइयों) पर किसी परिवर्ती कारक (जैसे श्रम) की इकाइयाँ बढ़ाई जाती हैं, तो कुल उत्पाद, औसत उत्पाद तथा सीमांत उत्पाद निम्नलिखित प्रकार से परिवर्तन होगा-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 38
परिवर्ती अनुपात के नियम की अवस्थाएँ-ऊपर दी गई तालिका व संलग्न रेखाचित्र से इस नियम की निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ या चरण स्पष्ट होते हैं
1. पहली अवस्था-तालिका से स्पष्ट है कि आरंभ में जब श्रम की अधिकाधिक इकाइयाँ स्थिर कारक भूमि पर लगाई जाती हैं, तो श्रम की तीसरी इकाई तक सीमांत उत्पाद (MP) बढ़ता जाता है इस स्थिति में कल उत्पाद (TP) बढ़ती दर से बढ़ता है। कारक के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल की है। रेखाचित्र में यह अवस्था उत्पादन स्तर O बिंदु से शुरू कर Q1 बिंदु पर समाप्त हो जाती है। इस अवस्था में कुल उत्पाद (TP) बढ़ती दर से बढ़ता है जैसाकि अग्रांकित रेखाचित्र में TP वक्र O से M तक बढ़ती दर से बढ़ रहा है। इस अवस्था को बढ़ते प्रतिफल की अवस्था कहा जाता है।

2. दूसरी अवस्था दूसरी अवस्था में, श्रम की चौथी इकाई पर ह्रासमान सीमांत प्रतिफल की स्थिति आरंभ हो जाती है। सीमांत उत्पाद (MP) घटने लगता है तथा कुल उत्पाद (TP) घटती दर से बढ़ता है। सीमांत उत्पाद घटते-घटते शून्य हो जाता है। जब सीमांत उत्पाद शून्य होता है तो कुल उत्पाद अधिकतम (30) हो जाता है। रेखाचित्र में (TP) वक्र बिंदु M से बिंदु N तक घटती दर से बढ़ता हुआ अपने अधिकतम बिंदु N पर स्थिर हो जाता है। इस अवस्था में MP गिरना शुरू कर देता है और घटते-घटते बिंदु Q2 पर शून्य हो जाता है। रेखाचित्र में दूसरी अवस्था उत्पादन स्तर के Q1 बिंदु से शुरू होकर Q2 पर समाप्त होती है। इस क्षेत्र को परिवर्ती अनुपात के नियम की ह्रासमान प्रतिफल की अवस्था कहा जाता है। कोई भी फर्म दूसरी अवस्था में ही कार्यशील होने का

नतिपरिवर्तक बिंदु-यह वह बिंदु है जहाँ TP के ढाल में परिवर्तन होता है। इस बिंदु तक TP बढ़ती दर से बढ़ता है और इसके बाद TP घटती दर से बढ़ता है। यह बिंदु पहली अवस्था के अंत को और दूसरी अवस्था के आरंभ को बताता है। रेखाचित्र में M बिंदु नतिपरिवर्तक बिंदु दिखाया गया है।

3. तीसरी अवस्था इस अवस्था में MP ऋणात्मक हो जाता है। MP के ऋणात्मक होने पर TP गिरना शुरू हो जाता है जैसाकि तालिका में 7वीं इकाई लगाने पर TP 30 से कम होकर 28 हो गया बिन्दु N है। फलस्वरूप TP वक्र नीचे की ओर ढलना शुरू हो जाता है। जैसाकि रेखाचित्र में TP वक्र बिंदु N से नीचे गिरता हुआ दिखाई देता है। MP ऋणात्मक (-) हो जाता है और MP वक्र X-अक्ष के नीचे चला जाता है। इस अवस्था को ऋणात्मक प्रतिफल की अवस्था कहते हैं।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 39
फर्म कौन-सी अवस्था में उत्पादन करेगी? कोई भी फर्म दूसरी अवस्था में उत्पादन करना चाहेगी। पहली अवस्था में फर्म आदर्श कारक आगत मिश्रण की ओर बढ़ने के कारण उत्पादन बंद करने की बजाए परिवर्ती कारक की इकाइयाँ बढ़ाती जाएगी। तीसरी अवस्था में आदर्श मिश्रण टूट जाने से सीमांत उत्पाद ऋणात्मक होने व कुल उत्पाद गिरने के कारण फर्म उत्पादन नहीं करेगी। अतः कोई भी सनझदार फर्म दूसरी अवस्था में अपने उत्पादन की मात्रा का निर्णय लेगी।

नियम लागू होने के कारण इस नियम के अंतर्गत पहले बढ़ते हुए प्रतिफल और बाद में घटते हुए प्रतिफल प्राप्त होने के कारण निम्नलिखित हैं
1.स्थिर कारकों (जैसे मशीनरी) का अनुकूलतम उपयोग-आरंभ में अधूरे उपयोग में लाए जाने वाले स्थिर कारक जैसे मशीन पर परिवर्ती कारक (साधन) की इकाइयाँ बढ़ाने से कारक-मिश्रण आदर्श हो जाने से कारकों का बेहतर व पूर्ण उपयोग होने लगता है। फलस्वरूप उत्पादन बढ़ती दर से प्राप्त होता है। परंतु अनुकूलतम बिंदु प्राप्त होने के बाद भी परिवर्ती कारक की मात्रा बढ़ाने पर कारकों का आदर्श मिश्रण टूट जाता है जिससे ह्रासमान (घटते) प्रतिफल शुरू हो जाता है।

2. श्रम विभाजन व विशिष्टीकरण-जैसे-जैसे श्रम की इकाइयाँ बढ़ाई जाती हैं वैसे-वैसे श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण बढ़ता जाता है जिससे शुरू में बढ़ते प्रतिफल प्राप्त होते हैं, परंतु एक सीमा के बाद कुशलता गिरने लगती है जिससे घटते प्रतिफल आने लगते हैं।

3. थोक पर छूट-यह बड़ी मात्रा में एक साथ कच्चा माल आदि की खरीद पर कीमत में मिलने वाली छूट है जो वर्धमान प्रतिफल प्राप्त होने में सहायक होती है। संक्षेप में, कारकों का आदर्श मिश्रण प्राप्त होना और फिर छूट जाना ही परिवर्ती अनुपात के नियम लागू होने का मुख्य कारण है।

उल्लेखनीय है कि यद्यपि परिवर्ती अनुपात के प्रतिफल के अंतर्गत हमने तीन अवस्थाएँ वर्धमान, ह्रासमान और ऋणात्मक बतलाई हैं। परंतु परिवर्ती अनुपात के नियम को प्रायः ह्रासमान प्रतिफल का नियम कहा जाता है क्योंकि परिवर्ती अनुपात के नियम में मुख्य बात घटता हुआ (ह्रासमान) प्रतिफल है।

प्रश्न 6.
औसत लागत और सीमांत लागत की परिभाषा दीजिए। सीमांत लागत और औसत लागत के बीच संबंध बताइए।
अथवा
औसत लागत और सीमांत लागत से आप क्या समझते हैं? औसत लागत और सीमांत लागत के बीच पाए जाने वाले संबंध को तालिका एवं रेखाचित्र की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
औसत लागत औसत लागत से अभिप्राय उत्पादन (निर्गत) की प्रति इकाई कुल लागत से है। कुल लागत को उत्पादन की मात्रा से भाग देने पर औसत लागत प्राप्त होती है। सूत्र के रूप में,
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 40
सीमांत लागत-सीमांत लागत से अभिप्राय किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन (निर्गत) करने की लागत से है। सूत्र के रूप में,
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 41
औसत तथा सीमांत लागत में संबंध-औसत और सीमांत लागत में घनिष्ठ संबंध पाया जाता है, जिसे निम्नलिखित प्रकार – से स्पष्ट किया गया है
(1) दोनों औसत लागत और सीमांत लागत की गणना कुल लागत से की जाती है जैसे कि
AC = \(\frac { TC }{ q }\) और MCn = TCn – TCn-1
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 42

(2) जब औसत लागत घटती है, तो सीमांत लागत भी घटती है। इस अवस्था में सीमांत लागत औसत लागत से कम होती है।

(3) जेब औसत लागत स्थिर रहती है तो सीमांत लागत औसत लागत के बराबर होती है।

(4) जब औसत लागत बढ़ती है, तो सीमांत लागत भी बढ़ती है। इस अवस्था में सीमांत लागत औसत लागत से अधिक रहती है।
AC और MC के बीच पाए जाने वाले दूसरे, तीसरे तथा चौथे संबंध को संलग्न रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 43

(5) सीमांत लागत का न्यूनतम बिंदु औसत लागत के न्यूनतम बिंदु से पहले आता है। जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दिखाया गया है-

(6) जब औसत लागत पहले गिर रही हो तथा बाद में बढ़ रही हो तो सीमांत लागत वक्र औसत लागत वक्र के न्यूनतम बिंदु से गुजरता है अर्थात् सीमांत लागत वक्र औसत लागत वक्र को उसके न्यूनतम बिंदु पर नीचे से काटता हुआ ऊपर को चला जाता है।
औसत और सीमांत लागत के बीच पाए जाने वाले संबंध को निम्नांकित तालिका एवं रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
तालिका

उत्पादन मात्रा (इकाइ) (Q)कुल लागत
(TC)
औसत लागत
(AC) = (TC + Q)
सीमांत लागत
(MC)
1202020
228148
33411.36
4389.54
5428.44
64886
75688
872916

तालिका से स्पष्ट है कि आरंभ में औसत तथा सीमांत लागत दोनों गिर रही हैं। उत्पादन की छठी इकाई तक औसत लागत गिर रही है तो सीमांत लागत औसत लागत से कम है। उत्पादन की 7वीं इकाई पर औसत लागत स्थिर है तो सीमांत लागत औसत लागत के बराबर है। 8वीं इकाई पर औसत लागत बढ़ रही है तो सीमांत लागत औसत लागत से अधिक है। तालिका से यह भी स्पष्ट है कि औसत लागत का न्यूनतम बिंदु 8वीं इकाई पर है, जबकि सीमांत लागत का न्यूनतम बिंदु 5वीं इकाई पर है। औसत व सीमांत लागत के संबंध को रेखाचित्र द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 44

रेखाचित्र में AC औसत लागत वक्र तथा MC सीमांत लागत वक्र है। स्पष्ट है कि जब औसत लागत वक्र नीचे की ओर गिर रहा है तो सीमांत लागत वक्र औसत लागत वक्र के नीचे रहता है। जब औसत लागत स्थिर है तो सीमांत लागत वक्र इसके बराबर होता हुआ इसके न्यूनतम बिंदु पर नीचे से काटता है और जब औसत लागत वक्र ऊपर की ओर उठ रहा है तो सीमांत लागत वक्र के ऊपर रहता है।

प्रश्न 7.
पैमाने के प्रतिफल के नियम से आप क्या समझते हैं? इसकी अवस्थाओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
उदाहरण देकर पैमाने के प्रतिफल के नियम को समझाइए। यह किन कारणों से लागू होता है?
उत्तर:
पैमाने के प्रतिफल का अर्थ-पैमाने के प्रतिफल का संबंध सभी कारकों/ साधनों की मात्रा में एक ही अनुपात से परिवर्तन करने के फलस्वरूप कुल उत्पादन में होने वाले परिवर्तन से है। अन्य शब्दों में, उत्पादन के सभी कारकों की इकाइयों में समान अनुपात में वृद्धि करने से कुल भौतिक उत्पाद (TPP) में हुई वृद्धि को ‘पैमाने के प्रतिफल’ कहते हैं। यह एक दीर्घकालीन धारणा है। पैमाने को प्रतिफल इसलिए कहा जाता है क्योंकि उत्पादन के सभी कारकों को बढ़ाने से उत्पाद का पैमाना (Scale of Production) ही बदल जाता है अर्थात् उत्पादन छोटे पैमाने से बड़े पैमाने पर होने लगता है। संक्षेप में, पैमाने के प्रतिफल बताते हैं कि सभी कारकों को एक निश्चित अनुपात में बढ़ाने से कुल उत्पाद पर क्या प्रभाव पड़ता है।

पैमाने के प्रतिफल के नियम की अवथाएँ-पैमाने के प्रतिफल में उत्पादन की तीन अवस्थाएँ देखने को मिलती हैं-
1. पैमाने के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल-माना कि उत्पादन के दो ही कारक (साधन) हैं श्रम (L) तथा मशीन (K)। सभी कारकों का प्रयोग एक ही अनुपात में बढ़ाए जाने पर यदि कुल उत्पाद में उस अनुपात से अधिक वृद्धि होती है तो यह पैमाने के वर्धमान प्रतिफल की अवस्था होगी। कुल भौतिक उत्पाद (TPP) में बढ़ती दर से वृद्धि होती है अर्थात् सीमांत भौतिक उत्पाद (MPP) क्रमशः बढ़ता जाता है। सभी कारकों की इकाइयों को दुगुना करने से उत्पाद दुगुने से भी अधिक हो जाता है।

2. पैमाने के स्थिर (समानुपाती) प्रतिफल-सभी कारकों का प्रयोग एक ही अनुपात में बढ़ाए जाने पर यदि उत्पादन भी उसी अनुपात में बढ़े जिस अनुपात में सभी कारकों के प्रयोग में वृद्धि की गई है, तो यह पैमाने के स्थिर प्रतिफल की स्थिति होगी। TPP में स्थिर दर से वृद्धि होती है और MPP समान रहता है। यह संक्रमणकालीन अवस्था होती है जो वर्धमान प्रतिफल की समाप्ति और ह्रासमान प्रतिफल के आरंभ के बीच में पाई जाती है। कारकों को दुगुना करने पर उत्पादन भी दुगुना हो जाता है।

3. पैमाने के हासमान (घटते) प्रतिफल-सभी कारकों का प्रयोग एक ही अनुपात में बढ़ाए जाने पर यदि उत्पादन में उस अनुपात से कम वृद्धि हो तो पैमाने के ह्रासमान प्रतिफल की अवस्था होगी। TPP में घटती दर से वृद्धि होती है तथा MPP घटता है। कारकों को दुगुना करने पर उत्पादन दुगुने से कम होता है।
पैमाने के प्रतिफलों की तीनों अवस्थाओं को निम्नलिखित तालिका द्वारा भी स्पष्ट किया गया है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 45
1. तालिका के कॉलम (3) में दर्शाए गए साधनों (श्रम तथा पूँजी) में होने वाली % वृद्धि की गणना निम्नलिखित विधि द्वारा की गई है
पूँजी में % वृद्धि = \(\frac { 2-1 }{ 1 }\) x 100 = 100% ; = \(\frac { 3-2 }{ 2 }\) 100 = 50%
इसी प्रकार श्रम में प्रतिशत वृद्धि की गणना की गई है।
श्रम में % वृद्धि = \(\frac { 4-2 }{ 2 }\) x 100 = 100% ; = \(\frac { 6-4 }{ 4 }\) x 100 = 50%
यह स्पष्ट है कि श्रम तथा पूँजी में होने वाला % परिवर्तन एक-दूसरे के बराबर है, क्योंकि इन दोनों में समान अनुपात में परिवर्तन होता है।

2. तालिका के कॉलम (4) में प्रकट किए गए कुल भौतिक उत्पाद के % परिवर्तन की गणना निम्नलिखित विधि द्वारा की गई है-
= \(\frac { 30-10 }{ 10 }\) x 100 = 200%; = \(\frac { 60-30 }{ 30 }\) x 100 = 100%
तालिका से स्पष्ट है कि पैमाने की तीसरी वृद्धि तक उत्पादन में वृद्धि कारकों के अनुपात में हुई वृद्धि से अधिक है। यह पैमाने के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल की स्थिति है। पैमाने की चौथी तथा पाँचवीं वृद्धि से स्पष्ट है कि उत्पादन में वृद्धि कारकों के अनुपात में होने वाली वृद्धि के बराबर है। यह पैमाने के समान प्रतिफल का प्रतीक है। पैमाने की 6वीं, 7वीं और 8वीं वृद्धि से स्पष्ट है कि उत्पादन में वृद्धि कारकों के अनुपात में होने वाली वृद्धि से कम है जो कि पैमाने के ह्रासमान (घटते) प्रतिफल को दर्शाती है।

पैमाने के प्रतिफल के कारण – पैमाने के प्रतिफल वास्तव में बचतों (किफायतों) और अवबचतों के कारण प्राप्त होते हैं। यहाँ तक कि पैमाने के वर्धमान प्रतिफल का दूसरा नाम पैमाने की बचतें (Economies of Scale) हैं और घटते हुए प्रतिफल का दूसरा नाम पैमाने की अवबचतें (Diseconomies of Scale) हैं।

संख्यात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तालिका को पूरा कीजिए-

श्रम की इकाइयाँकुल उत्पाद
(TP)
औसत उत्पाद
(AP)
सीमांत उत्पाद
(MP)
150
290
3120
4140
5150
6150
7140
8120

हल:

श्रम की इकाइयाँकुल उत्पाद
(TP)
औसत उत्पाद
(AP)
सीमांत उत्पाद
(MP)
1505050
2904540
31204030
41403520
51503010
6150250
714020-10
812015-20

प्रश्न 2.
निम्नलिखित तालिका को पूरा कीजिए-

श्रम की इकाइयाँकुल उत्पाद
(TP)
औसत उत्पाद
(AP)
सीमांत उत्पाद
(MP)
120
216
312
48
54
60
7-4
820

हल:

श्रम की इकाइयाँकुल उत्पाद
(TP)
औसत उत्पाद
(AP)
सीमांत उत्पाद
(MP)
1202020
2361816
3481612
456148
560124
660100
7568-4

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 3.
निम्नलिखित तालिका एक कारक (साधन) की APP को दर्शाती है। ऐसा मालूम है कि रोजगार के शून्य स्तर पर TPP शून्य होती है तथा MPP तालिका का निर्धारण कीजिए।

रोजगार का स्तर123456
APP504845423935

हल:

कारक (साधन) के
रोजगार का स्तर
APPTPPMPP
1505050
2489646
34513539
44216833
53919527
63521015

प्रश्न 4.
निम्नलिखित तालिका में कुल भौतिक उत्पाद (TPP) सारणी दी गई है। औसत भौतिक उत्पाद (APP) तथा सीमांत भौतिक उत्पाद (MPP) का आकलन करें-

कारक (साधन)01234567
TPP05122028354042

हल :

कारक (साधन)TPPAPPMPP
0000
1555
21267
3206.668
42878
53577
6406.665
74262

प्रश्न 5.
निम्नलिखित तालिका में एक कारक की MPP की जानकारी दी जा रही है। हम जानते हैं कि यदि कारक प्रयोग शून्य हो तो TPP भी शून्य रहता है। TPP तथा APP सारणियों की रचना करें-

कारक (साधन) रोजगार स्तर123456
MPP20221816146

हल:

कारक (साधन) रोजगार स्तरMPPTPPAPP
1202020
2224221
3186020
4167619
5149018
669616

प्रश्न 6.
निम्न तालिका को पूरा कीजिए

कारक (इकाइयाँ)कुल उत्पाद (₹)औसत उत्पादसीमांत उत्पाद
120
218
316
414
512
610

हल :

कारक (इकाइयाँ)कुल उत्पाद (₹)औसत उत्पादसीमांत उत्पाद
1202020
2381918
3541816
4681714
5801612
6901510

प्रश्न 7.
निम्नलिखित तालिका में एक फर्म की सकल लागत सारणी दी गई है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 45a
(क) इस फर्म की कुल स्थिर लागत (TFC) क्या है?
(ख) फर्म की AFC,AVC, ATC तथा MC सारणियाँ बनाइए।
हल :
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 45b

प्रश्न 8.
निम्नलिखित तालिका उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर एक फर्म की सीमांत लागत दर्शाती है। इसकी TFC 120 रु० है। उत्पादन के प्रत्येक स्तर की ATC तथा AVC ज्ञात कीजिए।

उत्पादन (इकाई में)123
MC (रुपए में)403026

हल :
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 45c

प्रश्न 9.
नीचे दी गई तालिका उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर फर्म की कुल लागत दर्शाती है। उत्पादन के प्रत्येक स्तर पर MC और AVC निकालिए।

उत्पादन (इकाइयों में)01234
TC (रुपयों में)100160212280356

हल :
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 45d

प्रश्न 10.
नीचे दी गई कुल लागत अनुसूची से औसत लागत और सीमांत लागत ज्ञात कीजिए-

उत्पादन की मात्रा (इकाइयों में)012
TC (रुपए में)101522

हल:
AC तथा MC की गणना
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 46

प्रश्न 11.
निम्नलिखित तालिका को पूरा कीजिए
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 47
हल :
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 48
[संकेत : TFC = TC (उत्पादन के शून्य स्तर पर)]

प्रश्न 12.
नीचे दिए गए फर्म के लागत फलन से निम्नलिखित के मान निकालिए (a) कुल स्थिर लागत, (b) कुल परिवर्ती लागत, (c) औसत स्थिर लागत, (a) औसत कुल लागत, (e) औसत परिवर्ती लागत, (f) सीमांत लागत।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 49
हल :
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 50

प्रश्न 13.
नीचे दी गई तालिका से सीमांत लागत निकालिए-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 51
हल : सीमांत लागत की गणना

उत्पादन की मात्रा
(कि०ग्रा०)
औसत परिवर्ती लागत
(AVC)
(रु०)
कुल परिवर्ती लागत
(TVC)
(रु०)
सीमांत लागत
(MC)
(रु०)
16060
2408020
3309010
426.2510515
52814035
63521070

[संकेत : सीमांत लागत की गणना TVC की सहायता से की जा सकती है।]

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 14.
एक फर्म की नीचे दी गई लागत अनुसूची से उसके उत्पादन के कुल लागत (TC) और औसत परिवर्ती लागत (AVC) का परिकलन कीजिए।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 54a
हल :
उत्पादन के प्रत्येक स्तर पर TFC (q x AFC) स्थिर रहती है और TVC = EMCs.
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 53

प्रश्न 15.
निम्नलिखित तालिका को पूरा कीजिए-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 54
हल :
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 55

प्रश्न 16.
एक फर्म की कुल स्थिर लागत 10 रुपए है और उसकी लागत अनुसूची नीचे दी गई है। कुल परिवर्ती लागत (TVC) तथा ‘कुल लागत’ (TC) का परिकलन कीजिए।

उत्पादन (इकाइयों में)1234
सीमांत लागत (रुपयों में)6546

हल:

उत्पादन की इकाइयाँसीमांत लागत
(MC) (रु०)
कुल परिवर्ती लागत (TVC) (रु०)कुल स्थिर लागत (TFC) (रु०)कुल लागत
(TC) (रु०)
1661016
25111021
34151025
46211031

सूत्रों का प्रयोग (i) कुल परिवर्ती लागत = MC1 + MC2 + ………….
(ii) कुल लागत = कुल परिवर्ती लागत + कुल स्थिर लागत।

प्रश्न 17.
दिए गए आँकड़ों की सहायता से कुल बंधी लागत तथा कुल परिवर्तनशील लागत ज्ञात कीजिए

उत्पादन (इकाइयाँ)0123456
कुल लागत (ऊ०)100120140182198208232

हल :

उत्पादन (इकाइयाँ)कुल लागत
(रु०)
कुल बंधी लागत
(रु०)
कुल परिवर्तनशील
लागत (रु०)
01001000
112010020
214010040
318210082
419810098
5208100108
6232100132

प्रश्न 18.
एक फर्म के बारे में निम्नलिखित सूचनाएँ दी गई हैं। इस सूचना के आधार पर ज्ञात कीजिए
(i) 3 इकाइयाँ उत्पादित करने की AFC
(ii) 4 इकाइयाँ उत्पादित करने की AVC
(ii) न्यूनतम औसत लागत (AC) का उत्पादन स्तर
(iv) पाँचवीं इकाई उत्पादित करने की MC
(v) 6 इकाइयाँ उत्पादित करने की कुल परिवर्ती लागत (TVC)
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 56
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 57

  1. 3 इकाइयाँ उत्पादित करने की AFC = 50 रु०
  2. 4 इकाइयाँ उत्पादित करने की AVC = 160 रु०
  3. न्यूनतम AC का उत्पादन स्तर = 4 इकाई
  4. पाँचवीं इकाई उत्पादित करने की MC = 210 रु०
  5. 6 इकाइयाँ उत्पादित करने की TVC = 1110 रु०

प्रश्न 19.
यदि स्थिर लागत 20 रु० हो तो निम्नलिखित तालिका से TVC तथा TC का परिकलन कीजिए।

उस्पादन (इकाइयाँ)0123
सीमांत जागत (र०० में)0101525

हल :

उत्पादन (इकाइयाँ)FC (रु०)MC (रु०)TVC (रु०)TC(FC+TVC) (रु०)
0200020
120101030
220152545
320255070

प्रश्न 20.
उत्पादन के दिए गए प्रत्येक स्तर पर निम्नलिखित तालिका से TVC और MC का परिकलन कीजिए।

उस्पादन (इकाइयाँ)01234
कुल लागत (रु०)40607897124

हल:

उत्पादन (इकाइयाँ)TC (रु०)TFC (रु०)TVC (रु०)MC (रु०)
04040
160402020
278403818
397405719
4124408427

प्रश्न 21.
एक फर्म की TFC 12 रु० है। इसकी तालिका नीचे दी गई है। उत्पादन के प्रत्येक स्तर पर TC और AVC ज्ञात कीजिए।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 58
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 59

प्रश्न 22.
निम्नलिखित तालिका उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर एक फर्म की सीमांत लागत (MC) दर्शाती है। इसकी कुल स्थिर लागत (TFC) 120 रु० है। उत्पादन के प्रत्येक स्तर की औसत कुल लागत (ATC) और औसत परिवर्ती लागत (AVC) ज्ञात कीजिए।

उस्पादन (इकाइयाँ)123
सीमांत जागत (र०)403026

हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 60

प्रश्न 23.
निम्नलिखित तालिका उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर एक फर्म की कुल लागत (TC) दर्शाती है। उत्पादन के प्रत्येक स्तर पर औसत परिवर्ती लागत (AVC) और सीमांत लागत (MC) ज्ञात कीजिए।

उस्पादन (इकाइयाँ)0123
कुल लागत (रुपये)60100130150

हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 61

प्रश्न 24.
निम्नलिखित तालिका को पूरा कीजिए-

उत्पदनकुल परिवर्ती लागतऔसत परिवर्ती लागतसीमांत लागत
112
220
1010
440

हल:

उत्पदनकुल परिवर्ती लागतऔसत परिवर्ती लागतसीमांत लागत
1121212
220108
3301010
4401010

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 25.
एक फर्म 20 इकाइयों का उत्पादन कर रही है। इस उत्पादन स्तर पर उसके ATC तथा AVC क्रमशः 40 रुपए तथा 37 रुपए हैं। फर्म की कुल स्थिर लागतें ज्ञात करें।
हल :
उत्पादन इकाइयों की संख्या = 20
ATC = 40 रुपए
AVC = 37 रुपए
TC = 20 x 40 = 800 रुपए
TVC = 20 x 37 = 740 रुपए
फर्म की कुल स्थिर लागत = TC – TVC
= 800 – 740 = 60 रुपए
वैकल्पिक हल
AFC = ATC – AVC
= 40 – 37 = 3 रुपए
कुल स्थिर लागत = उत्पादन इकाइयाँ x AFC
= 20 x 3 = 60 रुपए

प्रश्न 26.
एक फर्म के उत्पादन विभाग के एक सप्ताह के आँकड़े निम्नलिखित प्रकार हैं

सेवायोजित श्रमिकों की संख्या50
उत्पादन इकाइयों की संख्या100
प्रत्येक श्रमिक की साप्ताहिक मज़दूरी200 रुपए
शेड का साप्ताहिक किराया400 रुपए
प्रयुक्त कच्चा माल1,600 रुपए
शक्ति300 रुपए

कुल लागत एवं औसत परिवर्ती लागत का अनुमान कीजिए।
हल:
1. श्रमिकों का वेतन = 200 x 50 = 10,000 रुपए
2. साप्ताहिक शेड का किराया = 400 रुपए
3. कच्चा माल = 1,600 रुपए
4. शक्ति = 300 रुपए
कुल लागत = 1 + 2 + 3 + 4
= 12,300 रुपए
कुल परिवर्ती लागत = 1 + 3 + 4 = 11,900 रुपए
इसलिए औसत परिवर्ती लागत = \(\frac { 11,900 }{ 100 }\) = 119 रुपए

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HBSE 12th Class Economics Important Questions and Answers

Haryana Board HBSE 12th Class Economics Important Questions and Answers

HBSE 12th Class Economics Important Questions in Hindi Medium

HBSE 12th Class Economics Important Questions व्यष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय

HBSE 12th Class Economics Important Questions समष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय

HBSE 12th Class Economics Important Questions in English Medium

HBSE 12th Class Economics Important Questions: Microeconomics

  • Chapter 1 Micro Economics: An Introduction Important Questions
  • Chapter 2 Theory of Consumer Behaviour Important Questions
  • Chapter 3 Production and Costs Important Questions
  • Chapter 4 Theory of the Firm Under Perfect Competition Important Questions
  • Chapter 5 Market Equilibrium Important Questions
  • Chapter 6 Non-Competitive Markets Important Questions

HBSE 12th Class Economics Important Questions: Macroeconomics

  • Chapter 1 Macro Economics: An Introduction Important Questions
  • Chapter 2 National Income Accounting Important Questions
  • Chapter 3 Money and Banking Important Questions
  • Chapter 4 Determination of Income and Employment Important Questions
  • Chapter 5 Government Budget and The Economy Important Questions
  • Chapter 6 Open Economy: Macro Economics Important Questions

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HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए

1. व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध है
(A) व्यक्तिगत इकाइयों से
(B) सामूहिक कार्यों से
(C) एक फ़र्म से
(D) एक उद्योग से
उत्तर:
(A) व्यक्तिगत इकाइयों से

2. उत्पादन के संसाधनों पर सरकार का स्वामित्व किस अर्थव्यवस्था में होता है?
(A) बाज़ार अर्थव्यवस्था में
(B) योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में
(C) बंद अर्थव्यवस्था में
(D) खुली अर्थव्यवस्था में
उत्तर:
(B) योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में

3. यदि एक देश में साधनों की कार्यकुशलता बढ़ जाए तो उत्पादन संभावना वक्र (PPC) की क्या स्थिति होगी?
(A) उत्पादन संभावना वक्र दायीं ओर ऊपर को खिसक जाएगा
(B) उत्पादन संभावना वक्र बायीं ओर नीचे को खिसक जाएगा
(C) उत्पादन संभावना वक्र में कोई परिवर्तन नहीं होगा
(D) उपर्युक्त सभी ठीक हैं
उत्तर:
(A) उत्पादन संभावना वक्र दायीं ओर ऊपर को खिसक जाएगा

4. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का अध्ययन किसमें होता है? .
(A) व्यष्टि अर्थशास्त्र में
(B) समष्टि अर्थशास्त्र में
(C) लोक प्रशासन में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) समष्टि अर्थशास्त्र में

5. उत्पादन संभावना वक्र मूल बिंदु की ओर होता है
(A) उन्नतोदर
(B) नतोदर.
(C) सीधी रेखा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) नतोदर

6. यदि उत्पादन संभावना वक्र एक सीधी रेखा है तो यह बताती है
(A) वस्तुओं की स्थिर सीमांत प्रतिस्थापन दर को
(B) वस्तुओं की बढ़ती हुई सीमांत प्रतिस्थापन दर को
(C) वस्तुओं की घटती हुई सीमांत प्रतिस्थापन दर को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) वस्तुओं की स्थिर सीमांत प्रतिस्थापन दर को

7. निम्नलिखित में से कौन-सा व्यष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन है?
(A) राष्ट्रीय आय
(B) समग्र माँग
(C) व्यापार चक्र
(D) माँग का सिद्धान्त
उत्तर:
(D) माँग का सिद्धान्त

8. किस अर्थव्यवस्था में आर्थिक निर्णय कीमत-तंत्र द्वारा लिए जाते हैं?
(A) केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में
(B) बाज़ार अर्थव्यवस्था में
(C) पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में
(D) बंद अर्थव्यवस्था में
उत्तर:
(B) बाज़ार अर्थव्यवस्था में

9. ‘क्या होना चाहिए’ की विषय-वस्तु है-
(A) वास्तविक विज्ञान
(B) आदर्शात्मक विज्ञान
(C) प्राकृतिक विज्ञान
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) आदर्शात्मक विज्ञान

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

10. आवश्यकताएँ होती हैं-
(A) असीमित
(B) सीमित
(C) शून्य
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) असीमित

11. साधन होते हैं-
(A) असीमित
(B) नगण्य
(C) सीमित
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सीमित

12. यदि एक देश में साधनों की कार्यकुशलता घट जाए तो उत्पादन संभावना वक्र (PPC) की क्या स्थिति होगी?
(A) उत्पादन संभावना वक्र बायीं ओर नीचे को खिसक जाएगा।
(B) उत्पादन संभावना वक्र दायीं ओर ऊपर को खिसक जाएगा।
(C) उत्पादन संभावना वक्र में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
(D) उपर्युक्त सभी ठीक हैं।
उत्तर:
(A) उत्पादन संभावना वक्र बायीं ओर नीचे को खिसक जाएगा।

13. निम्नलिखित में से कौन-सा समष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन है?
(A) व्यापार चक्र
(B) उपभोक्ता संतुलन
(C) फर्म का संतुलन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) व्यापार चक्र

14. अवसर लागत का अर्थ है
(A) अगले वैकल्पिक प्रयोग की लागत
(B) वास्तविक लागत
(C) कुल लागत
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) अगले वैकल्पिक प्रयोग की लागत

15. आर्थिक समस्या का संबंध है-
(A) गरीबी से
(B) बेरोजगारी से
(C) काले धन से
(D) सीमित साधनों के चुनाव से
उत्तर:
(D) सीमित साधनों के चुनाव से

B. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. आर्थिक समस्या के उत्पन्न होने का प्रमुख कारण संसाधनों का …………………. होना है। (सीमित/असीमित)
उत्तर:
सीमित

2. उत्पादन संभावना वक्र की आकृति मूल बिंदु की ओर …………………. होती है। (उन्नतोदर/नतोदर)
उत्तर:
नतोदर

3. दुर्लभता का अर्थ …………………. (माँग > पूर्ति/पूर्ति > माँग)
उत्तर:
माँग > पूर्ति

4. यदि समूचे चीनी उद्योग की जाँच की जाए तो यह …………………. विश्लेषण कहलाएगा।(व्यष्टिपरक/समष्टिपरक)
उत्तर:
समष्टिपरक

5. सूती वस्त्र उद्योग का अध्ययन …………………. का अध्ययन है। (समष्टि अर्थशास्त्र/व्यष्टि अर्थशास्त्र)
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र

6. व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध …………………. इकाइयों से है। (सामूहिक/व्यक्तिगत)
उत्तर:
व्यक्तिगत

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

C. बताइए कि निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत

  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र आय प्रमुख है जबकि समष्टि अर्थशास्त्र कीमत प्रमुख है।
  2. व्यष्टि अर्थशास्त्र मजदूरी दर निर्धारण से संबंधित है।
  3. उत्पादन सम्भावना वक्र को उत्पादन सीमा वक्र नहीं कहा जा सकता।
  4. उत्पादन सम्भावना वक्र मूल बिंदु की ओर उन्नतोदर (Convex) होती है।
  5. अंग्रेज़ी भाषा का ‘Micro’ शब्द ग्रीक के माइक्रोस (Mikros) से लिया गया है।
  6. साधन कीमत के सिद्धांत का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।
  7. आय तथा रोज़गार का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।
  8. ‘चयन की समस्या’ अथवा ‘निर्णय लेने की समस्या आर्थिक समस्या कहलाती है।
  9. आर्थिक समस्या का मुख्य कारण आवश्यकताओं की सीमितता है।
  10. एक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्याओं का समाधान केंद्रीय अधिकारी द्वारा किया जाता है।
  11. “क्या उत्पादन किया जाए तथा कितना उत्पादन किया जाए” यह वितरण से संबंधित समस्या है।
  12. एक उद्योग का विश्लेषण व्यष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत आता है।
  13. व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध व्यक्तिगत अर्थव्यवस्था से है।
  14. समष्टि अर्थशास्त्र का संबंध रोज़गार के स्तर से है।।
  15. उत्पादन संभावना वक्र का आकार सीधी रेखा होता है।
  16. ‘Principles of Economics’ 1896 में प्रकाशित हुई थी।

उत्तर:

  1. गलत
  2. सही
  3. गलत
  4. गलत
  5. सही
  6. गलत
  7. सही
  8. सही
  9. गलत
  10. सही
  11. गलत
  12. सही
  13. सही
  14. सही
  15. गलत
  16. गलत।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थव्यवस्था क्या है? अर्थव्यवस्था के मुख्य प्रकार बताएँ।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था लोगों के समूह अर्थात् किसी राज्य या देश की वह व्यवस्था है जिसमें आर्थिक समस्याओं का समाधान किया जाता है। (1) केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था, (2) बाज़ार अर्थव्यवस्था तथा (3) मिश्रित अर्थव्यवस्था आदि अर्थव्यवस्था के मुख्य प्रकार हैं।

प्रश्न 2.
व्यष्टि अर्थशास्त्र (Micro Economics) क्या है?
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र (Micro Economics) आर्थिक सिद्धांत की वह शाखा हैं जिसमें अर्थव्यवस्था की व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 3.
बाज़ार अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
बाज़ार अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसके अंतर्गत सभी आर्थिक क्रियाकलापों का निर्धारण बाज़ार की स्थितियों के अनुसार होता है। इसमें केंद्रीय समस्याओं का हल कीमत-तंत्र द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 4.
केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसके अंतर्गत सरकार उस अर्थव्यवस्था की सभी महत्त्वपूर्ण क्रियाओं को पूरा करती है। इसमें केंद्रीय समस्याओं का हल केंद्रीय अधिकारी अथवा नियोजन-तंत्र द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 5.
चयन की समस्या क्या होती है?
उत्तर:
हमारी आवश्यकताएँ अनंत हैं किंतु उनकी संतुष्टि के साधन सीमित हैं जिसके कारण हमें यह चयन करना पड़ता है कि किस आर्थिक आवश्यकता की संतुष्टि करें और किस आवश्यकता का त्याग करें या स्थगित कर दें। अतः चयन दुर्लभता का प्रतिफल है। चयन से अभिप्राय उपलब्ध सीमित विकल्पों में से चुनने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 6.
‘क्या उत्पादन किया जाए?’ की समस्या का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘क्या उत्पादन किया जाए’ की समस्या के अंतर्गत यह पता चलता है कि उत्पादन प्रक्रिया में किन वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन हो, जिससे लोगों की अधिकतम आवश्यकताओं को संतुष्ट किया जा सके।

प्रश्न 7.
‘कैसे उत्पादन किया जाए?’ की समस्या में किस प्रकार का चुनाव निहित है?
उत्तर:
कैसे उत्पादन किया जाए’ की समस्या में उत्पादन तकनीक (श्रम-प्रधान तकनीक अथवा पूँजी-प्रधान तकनीक) का चुनाव निहित है।

प्रश्न 8.
‘किसके लिए उत्पादन किया जाए?’ की समस्या से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसके लिए उत्पादन किया जाए’ की समस्या से अभिप्राय उस केंद्रीय समस्या से है जिसके अंतर्गत यह निर्णय किया जाता है कि उत्पादन को उत्पादन के साधनों में किस प्रकार वितरित किया जाए।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

प्रश्न 9.
सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण से हमारा अभिप्राय उस अध्ययन से है जिसका संबंध वास्तविक आर्थिक घटनाओं से होता है। सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण के अंतर्गत हम यह अध्ययन करते हैं कि विभिन्न कार्यविधियाँ किस प्रकार कार्य करती हैं। सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण ‘साध्य’ के प्रति तटस्थ होता है।

प्रश्न 10.
संसाधन क्या होते हैं?
उत्तर:
संसाधनों से अभिप्राय उन वस्तुओं या सेवाओं से है, जो किसी वस्तु का उत्पादन करने में प्रयोग में लाए जाते हैं; जैसे श्रम, भूमि, पूँजी तथा उद्यमी।।

प्रश्न 11.
अवसर लागत क्या होती है?
उत्तर:
किसी वस्तु की अवसर लागत अगले उत्तम विकल्प त्यागने के मूल्य के बराबर मानी जाती है। एक वस्तु (X) की अवसर लागत दूसरी वस्तु (Y) की वह मात्रा है जिसे X वस्तु की एक इकाई उत्पन्न करने के लिए त्यागना पड़ता है।

प्रश्न 12.
सीमांत अवसर लागत को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
उत्पादन संभावना वक्र पर कार्यरत किसी वस्तु की सीमांत अवसर लागत, दूसरी वस्तु की वह मात्रा है जो पहली वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई उत्पन्न करने के लिए त्यागी जाती है।

प्रश्न 13.
वस्तुओं से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वस्तुओं से अभिप्राय उन भौतिक अथवा मूर्त पदार्थों से है जिनका उपयोग लोगों की इच्छाओं तथा आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए किया जाता है; जैसे खाद्य पदार्थ, वस्त्र आदि।

प्रश्न 14.
सेवाओं से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सेवाओं से अभिप्राय उन अभौतिक अथवा अमूर्त वस्तुओं से है जिनमें मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करने की शक्ति निहित होती है; जैसे एक चिकित्सक द्वारा किया गया उपचार, एक अध्यापक का अध्यापन कार्य ।

प्रश्न 15.
उत्पादन संभावना वक्र (PPC) क्या होती है?
उत्तर:
उत्पादन संभावना वक्र दो वस्तुओं के उन विभिन्न संयोगों को दर्शाती है जिन्हें दिए गए निश्चित साधनों तथा तकनीकों उत्पन्न किया जा सकता है। इस वक्र से हमें उत्पादन की अधिकतम सीमाओं का भी पता चलता है। इसलिए इसे उत्पादन संभावना सीमा भी कहा जाता है।

प्रश्न 16.
सामूहिक आवश्यकताएँ क्या होती हैं?
उत्तर:
सामूहिक आवश्यकताएँ ऐसी वस्तुओं के लिए होती हैं जो वस्तुएँ अनेक उपयोगों में एक साथ प्रयुक्त हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, बिजली की आवश्यकता सामूहिक आवश्यकता कहलाएगी क्योंकि बिजली की आवश्यकता घर में रोशनी करने, पंखा चलाने, टी.वी. चलाने, कारखाने चलाने, रेलगाड़ी चलाने, ट्यूबवैल चलाने आदि अनेक उपयोगों के लिए होती है। अतः बिजली की आवश्यकता सामूहिक आवश्यकता कहलाएगी।

प्रश्न 17.
अर्थशास्त्र की धन संबंधी परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जिसमें हम धन का अध्ययन करते हैं। एडम स्मिथ के अनुसार, “अर्थशास्त्र राष्ट्रों के धन की प्रकृत्ति तथा कारणों की खोज है।”

प्रश्न 18.
संसाधनों की वृद्धि के दो उदाहरण दें।
उत्तर:

नई व बेहतर तकनीक का उपलब्ध होना और
प्रशिक्षित व साधारण श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होना।

प्रश्न 19.
किन कारकों से PP वक्र का स्थान परिवर्तित हो सकता है?
उत्तर:

  1. उपलब्ध संसाधनों में परिवर्तन होने से
  2. दी हुई तकनीक में परिवर्तन होने से PP वक्र का स्थान परिवर्तित हो सकता है।

प्रश्न 20.
तकनीकी प्रगति या संसाधनों की संवृद्धि के कारण PP वक्र दाहिनी ओर क्यों खिसक जाता है?
उत्तर:
क्योंकि इनसे उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है और फलस्वरूप अर्थव्यवस्था के कुल उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 21.
PP वक्र दाईं नीचे की ओर क्यों ढालू होता है?
उत्तर:
क्योंकि संसाधनों के पूर्ण उपयोग की स्थिति में एक वस्तु का उत्पादन बढ़ाने के लिए दूसरी वस्तु की कुछ मात्रा का उत्पादन घटाना (या त्यागना) पड़ता है।

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प्रश्न 22.
PP वक्र मूल बिंदु की ओर अवतल/नतोदर (Concave) क्यों दिखाई देता है?
उत्तर:
बढ़ती हुई सीमांत अवसर लागत के कारण अर्थात् एक वस्तु की अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने के लिए दूसरी वस्तु की बढ़ती हुई इकाइयों का त्याग करना पड़ता है।

प्रश्न 23.
PP वक्र का दाईं ओर (या ऊपर) खिसकाव क्या दर्शाता है?
उत्तर:
यह संसाधनों में वृद्धि या उत्पादन तकनीक में सुधार से उत्पादकता में वृद्धि दर्शाता है।

प्रश्न 24.
PP वक्र के नीचे किसी बिंदु पर उत्पादन क्या दर्शाता है?
उत्तर:
PP वक्र के नीचे किसी बिंदु पर उत्पादन संसाधनों का अल्प या अकुशल उपयोग दर्शाता है।

प्रश्न 25.
किसी PP वक्र पर बढ़ती हुई सीमांत अवसर लागत का क्या अर्थ है?
उत्तर:
इसका अर्थ है दूसरी वस्तु की त्याग की दर बढ़ती जा रही है जिसके फलस्वरूप PP वक्र का आकार नतोदर (Concave) होता जाता है।

प्रश्न 26.
क्या उत्पादन PP वक्र पर ही होता है?
उत्तर:
यह जरूरी नहीं कि उत्पादन सदैव उत्पादन संभावना वक्र पर ही हो। यह तभी संभव होता है जब अर्थव्यवस्था में संसाधनों का पूर्ण तथा कुशलतापूर्वक उपयोग हो रहा हो। इसके विपरीत, जब संसाधनों का अपूर्ण व अकुशल उपयोग हो रहा हो, तो उत्पादन क्षमता कम हो जाने से उत्पादन PP वक्र के नीचे होगा।

प्रश्न 27.
सीमांत अवसर लागत क्यों बढ़ती है?
उत्तर:
सीमांत अवसर लागत इसलिए बढ़ती है, क्योंकि दूसरी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन के लिए वस्तु की किए जाने वाले त्याग की मात्रा भी बढ़ती है।

प्रश्न 28.
अर्थशास्त्र की दुर्लभता सम्बन्धी परिभाषा दें।
उत्तर:
अर्थशास्त्र की दुर्लभता संबंधी परिभाषा रोबिन्स ने 1932 में अपनी प्रकाशित पुस्तक “An Essay on the Nature and Significance of Economic Science” में दी है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रोबिन्स के अनुसार, “अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो विभिन्न उपयोगों वाले सीमित साधनों तथा उद्देश्यों से संबंध रखने वाले मानवीय व्यवहार का अध्ययन करता है।”

प्रश्न 29.
अर्थशास्त्र की भौतिक कल्याण सम्बन्धी परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
भौतिक कल्याण संबंधी परिभाषा डॉ० मार्शल ने 1890 में अपनी प्रकाशित पुस्तक ‘Principles of Economics’ में दी है। इस परिभाषा के अनुसार अर्थशास्त्र में उन कार्यों का अध्ययन किया जाता है जिन्हें सामाजिक मनुष्य अपना कल्याण बढ़ाने वाले भौतिक पदार्थों को प्राप्त करने तथा उनका उपयोग करने के लिए करते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एक सामान्य अर्थव्यवस्था (Simple Economy) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था वह प्रणाली है जिसमें लोग अपनी जीविका (रोज़ी) कमाते हैं और आवश्यकताओं की संतुष्टि करते हैं। लोग रोजी या आय इसलिए कमाते हैं ताकि वे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं व सेवाओं को खरीद सकें। इन से होता है। अतः अर्थव्यवस्था एक ऐसी प्रणाली है जो (i) वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सहायक होती है और (ii) लोगों को वस्तुएँ और सेवाएँ खरीदने के लिए आय कमाने के अवसर प्रदान करती है। अन्य शब्दों में, रोज़गार देने वाली या उत्पादन करने वाली सभी संस्थाओं का सामूहिक नाम अर्थव्यवस्था है। इसमें वे सभी उत्पादन इकाइयाँ आती हैं, जो बाज़ार में बिक्री के लिए उत्पादन करती हैं; जैसे खेत-खलिहान, कल-कारखाने, बैंक, दुकानें, दफ़्तर, सिनेमा, रेल, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल आदि। यहाँ लोग उत्पादन में योगदान देते हैं और रोज़ी कमाते हैं। इस प्रकार अर्थव्यवस्था एक निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र में स्थित सब उत्पादन इकाइयों का समूह है; जैसे भारत की अर्थव्यवस्था से अभिप्राय भारत की घरेलू सीमा में स्थित समस्त उत्पादन इकाइयों के समूह से है। पुनः जिस अर्थव्यवस्था का अन्य देशों या शेष संसार से संबंध नहीं होता, उसे बंद अर्थव्यवस्था (Closed Economy) कहते हैं, जबकि जिस अर्थव्यवस्था का अन्य देशों से आर्थिक संबंध होता है, उसे खुली अर्थव्यवस्था (Open Economy) कहते हैं।

प्रश्न 2.
एक उदाहरण की सहायता से “क्या उत्पादन किया जाए?” की समस्या समझाइए।
उत्तर:
प्रत्येक अर्थव्यवस्था में संसाधनों के बँटवारे से संबंधित पहली प्रमुख समस्या यह है कि कौन-कौन-सी वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन किया जाए, जिससे लोगों की अधिकतम आवश्यकताओं को संतुष्ट किया जा सके। इस संबंध में यह निर्णय लेना पड़ता है कि उपभोक्ता वस्तुओं; जैसे चीनी, कपास, गेहूँ, घी आदि का अधिक उत्पादन किया जाए अथवा पूँजीगत वस्तुओं; जैसे मशीनों, ट्रैक्टरों आदि का। उपभोक्ता वस्तुओं का अधिक उत्पादन करने के लिए पूँजीगत वस्तुओं का त्याग करना पड़ेगा, क्योंकि उत्पादन के साधन सीमित हैं। इस समस्या का एक पहलू यह भी है कि कौन-सी वस्तुओं का कितनी मात्रा में उत्पादन किया जाए?

उदाहरण के लिए, एक अर्थव्यवस्था में उपलब्ध साधनों से गेहूँ और कपास के निम्नलिखित मिश्रणों का उत्पादन किया जा सकता है

उत्पादन संभावनाएँगेहूँ का उत्पादनकपास का उत्पादन
a0150
b10140
c20120
d30100
e4050
f500

अर्थव्यवस्था को इन संभावनाओं में से ही किसी एक संभावना का चुनाव करना होगा।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

प्रश्न 3.
‘उत्पादन कैसे किया जाए?’ की समस्या को समझाइए। यह समस्या क्यों उत्पन्न होती है?
उत्तर:
प्रत्येक अर्थव्यवस्था की एक मुख्य समस्या यह है कि उत्पादन कैसे किया जाए? इसका अर्थ यह है कि उत्पादन के लिए कौन-सी तकनीक को अपनाया जाए? जिससे कम-से-कम समय तथा लागत में अधिकतम उत्पादन हो सके। उत्पादन की सामान्यतया दो तकनीकें होती हैं

  • श्रम-प्रधान तकनीक
  • पूँजी-प्रधान तकनीक।

श्रम-प्रधान तकनीक वह तकनीक है जिसमें उत्पादन करने में श्रम-शक्ति का प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाता है, जबकि पूँजी-प्रधान तकनीक में पूँजी का अधिक मात्रा में उपयोग किया जाता है। वास्तव में तकनीक के चुनाव की समस्या का साधनों की उपलब्ध मात्रा तथा पहली समस्या “क्या उत्पादन किया जाए?” के साथ संबंध है। यदि देश में पूँजी की अधिकता है तो पूँजी-प्रधान तकनीक को अपनाया जाएगा और यदि देश में श्रम की अधिकता है तो श्रम-प्रधान तकनीक को अधिक अपनाया जाएगा। इसके अतिरिक्त यदि उत्पादक पदार्थों के उत्पादन का निर्णय लिया जाता है, तो अधिकतर पूँजी-प्रधान तकनीक को अपनाया जाएगा।

परंतु यदि उपभोक्ता पदार्थ उत्पन्न करने का निर्णय लिया जाता है, तो श्रम-प्रधान तकनीक को अपनाया जाएगा। ‘कैसे उत्पादन किया जाए?’ की समस्या इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि एक अर्थव्यवस्था में संसाधनों की मात्रा मानवीय आवश्यकताओं की तुलना में सीमित है। यदि संसाधन सीमित या दुर्लभ नहीं होते तो उत्पादन के लिए कौन-सी तकनीक को अपनाया जाए? यह प्रश्न ही नहीं उठता।

प्रश्न 4.
‘किसके लिए उत्पादन किया जाए?’ की केंद्रीय समस्या को उदाहरण के साथ समझाइए।
उत्तर:
किसके लिए उत्पादन किया जाए?’ की केंद्रीय समस्या का संबंध राष्ट्रीय आय के वितरण से है। इस समस्या के दो पहलू हैं-

  • व्यक्तिगत वितरण
  • कार्यात्मक वितरण।

जहाँ तक व्यक्तिगत वितरण का प्रश्न है, समस्या यह है कि समाज में विभिन्न वर्गों के बीच राष्ट्रीय उत्पादन का वितरण किस प्रकार किया जाए? जहाँ तक कार्यात्मक वितरण का प्रश्न है, समस्या यह है कि राष्ट्रीय उत्पादन को उत्पादन के साधनों; जैसे भूमि, श्रम, पूँजी व उद्यम में किस प्रकार वितरित किया जाए। किसके लिए उत्पादन किया जाए? समस्या का समाधान अधिकतम सामाजिक कल्याण के संदर्भ में किया जाता है।

प्रश्न 5.
बाज़ार अर्थव्यवस्था के गुणों तथा दोषों की गणना कीजिए।
उत्तर:
बाज़ार अर्थव्यवस्था के गुण-

  • कीमत-तंत्र द्वारा केंद्रीय समस्याओं का स्वतः समाधान
  • उत्पादन की न्यूनतम लागत
  • नव-प्रवर्तन और अनुसंधान को प्रोत्साहन
  • पूँजी निर्माण को प्रोत्साहन
  • लोकतांत्रिक स्वरूप
  • उद्यम की भावना को बढ़ावा।

बाज़ार अर्थव्यवस्था के दोष-

  • आय की असमानताएँ
  • कीमतों में उतार-चढ़ाव
  • अमीरों द्वारा गरीबों का शोषण
  • बेरोज़गारी
  • एकाधिकार की प्रवृत्ति।

प्रश्न 6.
केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के गुणों तथा दोषों की गणना कीजिए।
उत्तर:
केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के गुण-

  • समाज का संतुलित विकास
  • आय का न्यायपूर्ण वितरण
  • व्यापार चक्रों और आर्थिक अस्थिरता का निराकरण
  • वर्ग-संघर्ष का निराकरण
  • सामाजिक सुरक्षा
  • संसाधनों का पूर्ण उपयोग।

केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के दोष-

  • उपभोक्ताओं की संप्रभुता का ह्रास
  • प्रेरणा का अभाव
  • व्यावसायिक स्वतंत्रता का अभाव
  • आर्थिक प्रणाली का केंद्रीयकरण
  • अफ़सरशाही के दोष
  • उत्पादन क्षमता व उत्पादकता का ह्रास।

प्रश्न 7.
मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताओं को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की उपस्थिति-मिश्रित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक व निजी क्षेत्र का सह-अस्तित्व पाया जाता है। निजी क्षेत्र लाभ के लिए कार्य करता है और सार्वजनिक क्षेत्र सामाजिक कल्याण के लिए कार्य करता है।

2. कीमत-तंत्र-मिश्रित अर्थव्यवस्था में कीमत-तंत्र कार्य करता है, परंतु यह कीमत-तंत्र सरकार द्वारा नियंत्रित होता है।

3. नियोजन मिश्रित अर्थव्यवस्था में आर्थिक नियोजन का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। सरकार निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देकर नियोजन के उद्देश्यों को पूरा कराती हैं।

4. वैयक्तिक स्वतंत्रता सामान्यतया लोगों को उपभोग और व्यवसाय करने की स्वतंत्रता होती है।

प्रश्न 8.
व्यष्टि अर्थशास्त्र (Micro Economics) क्या है? इसके एक-दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र (Micro Economics) व्यष्टि अर्थशास्त्र आर्थिक सिद्धांत की वह शाखा है जिसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था की व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन किया जाता है, जैसे व्यक्तिगत उपभोक्ता, व्यक्तिगत उत्पादक या उद्योग, व्यक्तिगत वस्तु या साधन का कीमत-निर्धारण, व्यक्तिगत आय आदि का अध्ययन। वैकल्पिक रूप में यूँ भी कह सकते हैं कि व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध उपभोक्ता व उत्पादक जैसी आर्थिक इकाई को पेश आने वाली दुर्लभता (Scarcity) और चयन (Choice) की समस्याओं के विश्लेषण से है। यह चयन के पीछे कार्यरत सिद्धांतों का विवेचन करता है। इस प्रकार व्यष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों की समस्याओं का अध्ययन किया जाता है यथा उपभोक्ता का संतुलन, फर्म व उद्योग का संतुलन आदि।

एक उपभोक्ता अपनी सीमित आय से कैसे अधिकतम संतुष्टि प्राप्त कर सकता है अथवा एक फर्म (उत्पादक) कैसे अपना लाभ अधिकतम कर सकती है या श्रमिक की मजदूरी कैसे निर्धारित होती है; जैसे प्रश्नों का विश्लेषण व्यष्टि अर्थशास्त्र का विषय है। चूँकि कीमत-निर्धारण इसका महत्त्वपूर्ण अंग है, इसलिए व्यष्टि अर्थशास्त्र को कभी-कभी ‘कीमत सिद्धांत’ भी कहा जाता है। व्यष्टि अर्थशास्त्र ‘क्या, कैसे, किसके लिए उत्पादन’ की केंद्रीय समस्याओं का अध्ययन करता है। व्यष्टि आर्थिक अध्ययन के उदाहरण हैं व्यक्तिगत आय, व्यक्तिगत बचत, एक फर्म का उत्पाद, व्यक्तिगत व्यय, वस्तु की कीमत का निर्धारण, साधन की कीमत का निर्धारण आदि। उपमा देनी हो तो व्यष्टि अर्थशास्त्र संपूर्ण आर्थिक वन का अध्ययन करने की बजाय इसके वृक्षों अर्थात् व्यक्तिगत अंगों का अध्ययन करता है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

प्रश्न 9.
आर्थिक समस्या से आप क्या समझते हैं?
अथवा
आर्थिक समस्या किस प्रकार की चयन की समस्या से उत्पन्न होती है? अथवा “अर्थशास्त्र का संबंध दुर्लभता की अवस्था में चयन करने से है।” समझाइए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र दुर्लभता (Scarcity) की स्थिति में चयन (Choice) से संबंधित व्यवहार का अध्ययन है। कैसे? संसार में मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साधनों व चीज़ों का अभाव है। साधनों की दुर्लभता के कारण चयन करने की समस्या पैदा होती है कि कैसे सीमित साधनों से असीमित आवश्यकताओं को पूरा किया जाए। यदि साधन प्रचुर मात्रा (Plenty) में उपलब्ध होते तो चयन की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि तब जो भी चीज़ चाहते मिल जाती। परंतु वास्तविक जीवन में यह सच नहीं है।

संसार में अमीर-से-अमीर व्यक्ति को भी किसी-न-किसी कमी (या अभाव) का सामना करना पड़ता है और कुछ नहीं तो व्यक्ति, जिसे अनेक काम करने होते हैं, के पास समय की कमी तो रहती ही है और उसे भी समय का चयन करना पड़ता है। इसी प्रकार प्रत्येक देश में रोटी, कपड़ा, मकान, पेयजल, शिक्षा व चिकित्सा जैसी अनेक वस्तुओं व सेवाओं की पूर्ति सीमित है। साधनों की कमी या दुर्लभता के कारण चयन करने को हमें मजबूर होना पड़ता है। दूसरे शब्दों में, दुर्लभता और चयन का संबंध अटूट है, क्योंकि चयन की समस्या पैदा ही तब होती है जब साधनों व चीज़ों की कमी का अभाव होता है। इन्हीं चयन संबंधी समस्याओं से जुड़े व्यवहार का अध्ययन ही अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु है।

संक्षेप में, “अर्थशास्त्र दुर्लभता जनित चयन की समस्याओं से संबंधित व्यवहार का अध्ययन है।” यह चयन संबंधी व्यवहार चाहे व्यक्तिगत या सामाजिक स्तर पर हो अथवा राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो अर्थशास्त्र किसी-न-किसी सिद्धांत के रूप में वहाँ उपस्थित हो जाता है।

प्रश्न 10.
आर्थिक समस्या किसे कहते हैं? इसके कारणों की व्याख्या कीजिए।
अथवा
आर्थिक समस्या को उत्पन्न करने वाले तीन कारकों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आर्थिक समस्या (Economic Problem) मानवीय आवश्यकताएँ असीमित हैं, साधन सीमित हैं जिनके वैकल्पिक प्रयोग संभव हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को चुनाव करना पड़ता है। यह चुनाव की समस्या मुख्य रूप से आर्थिक समस्या है। लेफ्टविच (Leftwitch) के अनुसार, “आर्थिक समस्या का संबंध मनुष्य की वैकल्पिक आवश्यकताओं के लिए सीमित साधनों के उपयोग से है।” – आर्थिक समस्या को उत्पन्न करने वाले तीन कारक/कारण निम्नलिखित हैं
(i) असीमित आवश्यकताएँ-मानवीय आवश्यकताएँ अनंत हैं और आवश्यकताएँ संतुष्ट होने के बाद पुनः उत्पन्न हो जाती हैं। एक दिए गए समय पर मनुष्यों की आवश्यकताएँ असंतुष्ट रहती हैं।

(ii) सीमित साधन-मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के साधन सीमित हैं।

(iii) साधनों के वैकल्पिक प्रयोग-साधनों के वैकल्पिक प्रयोग संभव हैं जिससे चयन की समस्या उत्पन्न होती है।

प्रश्न 11.
किसी अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्याएँ कौन-सी हैं? ये क्यों उत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
एक अर्थव्यवस्था की तीन केंद्रीय समस्याएँ निम्नलिखित हैं
1. क्या उत्पादन किया जाए और कितनी मात्रा में?-संसाधन दुर्लभ है अतः उनके वैकल्पिक प्रयोग किए जा सकते हैं। इसलिए पहली केंद्रीय समस्या यह है कि क्या उत्पादन किया जाए और कितनी मात्रा में?

2. उत्पादन कैसे किया जाए?-साधारणतया वस्तुओं का उत्पादन एक से अधिक तरीकों से किया जा सकता है। इसलिए दूसरी केंद्रीय समस्या यह है कि उत्पादन कैसे करें। उत्पादन तकनीक पूँजी-प्रधान हो सकती है अथवा श्रम-प्रधान।

3. किसके लिए उत्पादन किया जाए?-उत्पादन के बाद वस्तुओं का वितरण उत्पादन के साधनों में किस प्रकार किया जाए, यह भी अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्या है। इसे क्रियात्मक वितरण का सिद्धांत कहते हैं।

ये समस्याएँ मानवीय आवश्यकताओं की तुलना में साधनों की कमी के कारण उत्पन्न होती हैं। मानव की आवश्यकताएँ अनंत हैं पर इन आवश्यकताओं की संतुष्टि के साधन सीमित हैं। इसलिए समाज के सामने आवश्यकताओं के चयन और उनकी पूर्ति के लिए साधनों के चयन की समस्या उत्पन्न होती है। इस प्रकार साधनों की दुर्लभता या सीमितता से ये केंद्रीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

प्रश्न 12.
एक उत्पादन संभावना वक्र खींचिए और इसकी परिभाषा दीजिए। उत्पादन संभावना वक्र अक्ष केंद्र की ओर नतोदर (Concave) क्यों दिखाई देता है?
उत्तर:
एक उत्पादन संभावना वक्र निम्नलिखित प्रकार से खींचा जाता है-
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एक उत्पादन संभावना वक्र से अभिप्राय उस वक्र से है जो अर्थव्यवस्था में उपलब्ध संसाधनों से प्राप्त होने वाली दो वस्तुओं की उत्पादन संभावनाओं को दिखाता है। एक अर्थव्यवस्था अपने दिए हुए साधनों और उत्पादन तकनीक की सहायता से वस्तुओं और सेवाओं को एक निश्चित मात्रा में ही उत्पादन कर सकती है। यदि अर्थव्यवस्था में किसी एक वस्तु विशेष का उत्पादन अधिक किया जाता है तो उसे दूसरी वस्तु के उत्पादन में कमी करनी होगी। त्याग की गई मात्रा की दर हर अतिरिक्त इकाई के साथ बढ़ती रहती है। इस कारण उत्पादन संभावना वक्र अक्ष के केंद्र की ओर नतोदर दिखाई देता है।

प्रश्न 13.
एक रेखाचित्र में, उत्पादन संभावना वक्र की सहायता से निम्नलिखित स्थितियाँ दर्शाइए-
(i) संसाधनों का पूर्ण उपयोग
(ii) संसाधनों का अल्प उपयोग तथा
(iii) संसाधनों का विकास।
उत्तर:
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(i) उत्पादन संभावना वक्र PP संसाधनों का पूर्ण उपयोग दर्शाता विकास है। (X-बिंदु)

(ii) उत्पादन संभावना वक्र P0P0 संसाधनों का अल्प उपयोग दर्शाता है। (Y-बिंदु)

(iii) उत्पादन संभावना वक्र PP, संसाधनों का विकास प्रदर्शित करता है। (Z-बिंदु)

प्रश्न 14.
एक उत्पादन संभावना वक्र बनाइए। इस वक्र के नीचे कोई बिंदु क्या दर्शाता है?
अथवा
एक अर्थव्यवस्था में संसाधनों के अकुशल और कुशल प्रयोग की स्थितियाँ एक रेखाचित्र की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
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एक उत्पादन संभावना वक्र दो वस्तुओं के अधिकतम उत्पादन के उन विभिन्न संयोगों को दर्शाती है जिनका उत्पादन अर्थव्यवस्था में दिए गए साधनों से किया जा सकता है। अर्थव्यवस्था को अपनी उत्पादन संभावना वक्र अकुशल प्रयोग पर स्थित दो वस्तुओं के विभिन्न संयोगों के बीच चुनाव करना पड़ता है। यदि एक अर्थव्यवस्था इन संयोगों में से किसी एक संयोग बिंदु पर कार्य कर रही है तो इसे हम संसाधनों के कुशल प्रयोग की स्थिति कहेंगे। यदि एक अर्थव्यवस्था वस्तु-X किसी ऐसे संयोग का उत्पादन करती है जो उसकी उत्पादन संभावना वक्र के नीचे बाईं ओर स्थित है तो इसे हम. संसाधनों के अकुशल प्रयोग की स्थिति कहेंगे। निम्नलिखित रेखाचित्र में K बिंदु अकुशल प्रयोग की स्थिति में और a, b, c,d,e,f बिंदु कुशल प्रयोग की स्थिति दिखाते हैं।

प्रश्न 15.
संसाधनों के विकास और संसाधनों (या उत्पादन क्षमता) में गिरावट के तीन-तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
संसाधनों  के विकास के तीन उदाहरण निम्नलिखित हैं-

  • नए उपकरणों व मशीनरी की प्राप्ति
  • साधारण व प्रशिक्षित श्रमिकों की संख्या में वृद्धि
  • उत्पादन की नई व बेहतर तकनीक की उपलब्धि।

संसाधनों में गिरावट के तीन उदाहरण निम्नलिखित हैं-

  • मशीनरी की टूट-फूट व चलन से बाहर हो जाना
  • उत्पादन तकनीक का पुराना या अप्रचलित हो जाना
  • किसी प्राकृतिक संसाधन का समाप्त हो जाना।

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प्रश्न 16.
उत्पादन संभावना वक्र की मान्यताएँ बताइए।
उत्तर:
उत्पादन संभावना वक्र की मान्यताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. संसाधनों की मात्रा दी हुई है
  2. संसाधनों का पूर्ण तथा कुशलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है
  3. उत्पादन तकनीक स्थिर और अपरिवर्तित है
  4. संसाधन सब प्रकार की वस्तुओं के उत्पादन में एक समान कुशल नहीं हैं।

प्रश्न 17.
‘अर्थव्यवस्थाएँ सदैव उत्पादन संभावना वक्र पर कार्य करती हैं, इसके भीतर नहीं’ पक्ष या विपक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
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एक उत्पादन संभावना वक्र (PPC) उत्पादन की केवल विभिन्न संभावनाओं को प्रकट करता है। यह इस बात को स्पष्ट नहीं करता कि एक अर्थव्यवस्था किस बिंदु पर उत्पादन करेगी। यदि एक अर्थव्यवस्था उत्पादन संभावना वक्र पर कार्य करती है तो इसका अर्थ यह है कि संसाधनों का पूर्ण एवं कुशल उपयोग हो रहा है। यह एक आदर्श स्थिति है। एक अर्थव्यवस्था का PPC पर ही उत्पादन करना या इसके भीतर उत्पादन करना व्यक्तियों की रुचि और पसंद पर निर्भर करता है। यदि एक अर्थव्यवस्था में बेरोज़गारी हो अथवा संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो रहा हो अथवा हड़ताल के कारण उत्पादन बंद हो रहा हो तो ऐसी स्थिति में उत्पादन PPC के भीतर किसी बिंदु पर होगा। जैसाकि रेखाचित्र में बिंदु ‘K’ द्वारा दिखाया गया है।

प्रश्न 18.
तकनीकी प्रगति या संसाधनों की संवृद्धि के कारण उत्पादन संभावना वक्र दाहिनी ओर क्यों खिसक जाता है?
उत्तर:
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उत्पादन संभावना वक्र की यह मान्यता है कि तकनीकी प्रगति और अर्थव्यवस्था में उपलब्ध संसाधन स्थिर व दिए हए हैं लेकिन तकनीकी प्रगति या संसाधनों की संवृद्धि से वर्तमान उत्पादन संभावना वक्र अपने दायीं ओर खिसक जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि तकनीकी प्रगति या संसाधनों की संवृद्धि के फलस्वरूप अर्थव्यवस्था में दोनों वस्तुओं का उत्पादन पहले से अधिक हो सकता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।

प्रश्न 19.
‘क्या उत्पादन किया जाए?’ की समस्या को एक उत्पादन संभावना वक्र की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
उत्पादन संभावना वक्र उन विभिन्न संभावनाओं को बताता है जिसमें एक अर्थव्यवस्था अपने सीमित साधनों से उत्पादन कर सकती है। निम्नलिखित तालिका में X वस्तु और Y वस्तु की विभिन्न उत्पादन संभावनाओं को दिखाया गया है-

उत्पादन संभावनाएँवस्तु-X का उत्पादनवस्तु-Y का उत्पादन
a015
b510
c107
d135
e153
f160

‘क्या उत्पादन किया जाए?’ की समस्या के अंतर्गत प्रत्येक अर्थव्यवस्था को उत्पादन संभावना वक्र पर दिए गए विभिन्न बिंदुओं में से किसी एक का चुनाव करना पड़ेगा। यह अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं की तीव्रता पर निर्भर करेगा कि वह X वस्तु अथवा Y वस्तु में से किसका अधिक मात्रा में उत्पादन करेगी।
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यदि अर्थव्यवस्था में उपलब्ध समस्त संसाधनों का प्रयोग Y वस्तु के निर्माण के लिए किया जाता है तो अर्थव्यवस्था में X वस्तु का उत्पादन बिल्कुल नहीं होगा। इसी प्रकार यदि अर्थव्यवस्था में उपलब्ध समस्त संसाधनों का प्रयोग X वस्तु के लिए किया जाता है तो Y वस्तु का उत्पादन बिल्कुल नहीं होगा। सामान्यतया अर्थव्यवस्था b, c,d और e बिंदुओं में से किसी एक पर उत्पादन करेगी।

प्रश्न 20.
बाज़ार अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
बाज़ार अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. निजी स्वामित्व उत्पादन संसाधनों पर लोगों का स्वामित्व होता है। लोगों को उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त होता है।
    उद्यम की स्वतंत्रता-लोगों को अपना व्यवसाय चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।
  2. उपभोग की स्वतंत्रता-बाज़ार अर्थव्यवस्था में एक उपभोक्ता “राजा” होता है। उत्पादन की सभी क्रियाएँ उपभोक्ता की इच्छा के अनुकूल ही चलती हैं।
  3. कीमत-तंत्र-बाज़ार अर्थव्यवस्था में सभी आर्थिक निर्णय कीमत-तंत्र (प्रक्रिया) द्वारा लिए जाते हैं। कीमत-तंत्र सभी आर्थिक समस्याओं का समाधान करता है।
  4. लाभ का उद्देश्य-बाज़ार अर्थव्यवस्था में सभी आर्थिक क्रियाओं का उद्देश्य अपने निजी लाभ को अधिकतम करना होता है।

प्रश्न 21.
एक केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
एक केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था वह नियोजित अर्थव्यवस्था है जिसमें उत्पादन, उपभोग व वितरण संबंधी सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय सरकार या केंद्रीय सत्ता द्वारा आर्थिक योजना के अनुसार लिए जाते हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था में प्रमुख विचार या उद्देश्य सामाजिक कल्याण (Social Welfare) होता है। नियोजित अर्थव्यवस्था में सभी केंद्रीय समस्याएँ योजना-तंत्र द्वारा हल की जाती हैं।

प्रश्न 22.
केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की किन्हीं चार विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. उत्पादन संसाधनों का सरकारी स्वामित्व केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में उत्पादन संसाधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है। उत्पादन संसाधनों पर निजी स्वामित्व नहीं होता।
  2. नियोजन केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में सरकार केंद्रीकृत रूप से निर्णय लेने के लिए आर्थिक नियोजन तकनीक अपनाती है। नियोजन में बाज़ार शक्तियों के स्थान पर सरकार की प्राथमिकताओं के आधार पर आर्थिक कार्यक्रम बनाए जाते हैं।
  3. सामाजिक कल्याण केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में निजी लाभ के स्थान पर सामाजिक कल्याण का स्थान सर्वोपरि होता है।
    आर्थिक समानताएँ-केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में आय और संपत्ति की असमानताएँ बहुत कम होती हैं।

प्रश्न 23.
बाज़ार अर्थव्यवस्था में केंद्रीय समस्याओं का समाधान कैसे होता है?
उत्तर:
बाज़ार अर्थव्यवस्था में केंद्रीय समस्याओं का समाधान कीमत-तंत्र द्वारा होता है। वस्तु की बाज़ार कीमत ही यह निर्धारित करती है कि क्या, कैसे व किसके लिए उत्पादन किया जाए? एक उत्पादक उन्हीं वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करेगा जिसका लाभ उत्पादक को सबसे अधिक होगा। उपभोक्ताओं की प्राथमिकताएँ भी कीमत-तंत्र में दिखाई पड़ती हैं। कीमत-तंत्र की सहायता से संसाधनों के उपयोग को नियंत्रित किया जाता है। कीमत-तंत्र ही साधन-सेवाओं की कीमत का निर्धारण करती है।

प्रश्न 24.
एक योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में केंद्रीय समस्याओं का समाधान किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
एक योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में आर्थिक संसाधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है। सरकार आर्थिक नियोजन द्वारा यह निर्णय लेती है कि इन संसाधनों का उपयोग किस प्रकार किया जाए। आर्थिक नियोजन में बाज़ार शक्तियों का कोई स्थान नहीं होता। क्या उत्पादन करना है, कितनी मात्रा में करना है, किन संसाधनों की सहायता से करना है आदि निर्णय अर्थव्यवस्था के व्यापक सर्वेक्षण तथा सामाजिक कल्याण के आधार पर किया जाता है। आर्थिक नियोजन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता व लाभ का अभाव होता है।

प्रश्न 25.
एक मिश्रित अर्थव्यवस्था में केंद्रीय समस्याओं का समाधान किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था बाज़ार अर्थव्यवस्था और योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था का मिश्रण है। इसलिए मिश्रित अर्थव्यवस्था में केंद्रीय समस्याओं का समाधान आर्थिक नियोजन तथा कीमत-तंत्र के मिश्रण से किया जाता है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के लिए उत्पादन और निवेश के लक्ष्य निर्धारित करती है। निजी क्षेत्र के उद्यम अपने निर्णय स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं लेकिन सरकार मौद्रिक, राजकोषीय व अन्य उपायों द्वारा निजी क्षेत्र के निर्णयों को प्रभावित कर सकती है। इस प्रकार मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र नियंत्रित कीमत-तंत्र के अंतर्गत कार्य करते हैं।

प्रश्न 26.
सकारात्मक (वास्तविक) आर्थिक विश्लेषण (Positive Economic Analysis) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सकारात्मक (वास्तविक) आर्थिक विश्लेषण में ‘जैसा है वैसा’ (As itis) का विश्लेषण किया जाता है। यह ‘वास्तविक अर्थात् यथार्थ’ का अध्ययन करता है, न कि ‘ऐसा होना चाहिए’ का अध्ययन। इसमें क्या था? (What was ?) व क्या है? (What is ?) या क्या होगा? (What would be ?) जैसे वास्तविक कथनों का विश्लेषण सत्यता के आधार पर किया जाता है कि कथन कहाँ तक ठीक या गलत है। अन्य शब्दों में, यह विश्लेषण किसी भी आर्थिक घटना के कारण-परिणाम की निष्पक्ष जाँच करता है परंतु उसकी अच्छाई-बुराई के पचड़े में नहीं पड़ता। ऐसे विश्लेषण के उदाहरण हैं भारत में जनसंख्या विस्फोट की स्थिति है, भारत मुद्रास्फीति (कीमतों में निरन्तर वृद्धि) से ग्रस्त है, देश में गरीबी व बेरोज़गारी बढ़ रही है आदि।

प्रश्न 27.
आदर्शक आर्थिक विश्लेषण (Normative Economic Analysis) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
आदर्शक आर्थिक विश्लेषण में ‘क्या होना चाहिए?’ (What ought to be?) से संबंधित विश्लेषण किया जाता है। यह सुझाता है कि कोई आर्थिक समस्या कैसे हल की जानी चाहिए। यह आर्थिक निर्णयों के गलत-ठीक, उचित-अनुचित होने की परख करता है और लक्ष्य निर्धारित करने के साथ-साथ उन्हें प्राप्त करने के सुझाव भी देता है। उदाहरण के लिए देश में से आय की असमानताओं को दूर करने के उद्देश्य से अमीर लोगों पर अधिक कर (Tax) लगाने चाहिएँ, गरीबों को मुफ्त शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध की जानी चाहिएँ, निर्धन किसानों को ब्याज मुक्त ऋण दिया जाना चाहिए आदि।

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प्रश्न 28.
सकारात्मक (वास्तविक) आर्थिक विश्लेषण और आदर्शक आर्थिक विश्लेषण में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
केंद्रीय आर्थिक समस्याओं के समाधान की विभिन्न कार्यविधियाँ (Mechanism) हैं जिनके परिणाम भी विभिन्न हो सकते हैं। संभावित परिणामों का विश्लेषण दो तरीकों सकारात्मक(वास्तविक) आर्थिक विश्लेषण या आदर्शक आर्थिक विश्लेषण से किया जा सकता है। पहली कार्यविधि के अंतर्गत होने वाले कार्यों (Functions) का पता लगाया जाता है, जबकि दूसरी कार्यविधि में मूल्यांकन (Evaluation) पर जोर दिया जाता है। सकारात्मक (वास्तविक) आर्थिक विश्लेषण में ‘जैसा है वैसा’ (As it is) का अर्थात् ‘क्या है’, ‘क्या था’ या ‘क्या होगा’ आदि का विश्लेषण किया जाता है, जबकि आदर्शक आर्थिक विश्लेषण में ‘क्या होना चाहिए?’ (What ought to be ?) से संबंधित विश्लेषण किया जाता है।

सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण के अंतर्गत हम यह अध्ययन करते हैं कि विभिन्न क्रियाविधियाँ किस प्रकार कार्य करती हैं, जबकि आदर्शक आर्थिक विश्लेषण में हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि ये विधियाँ हमारे अनुकूल हैं भी या नहीं। सकारात्मक तथा आदर्शक विषय केंद्रीय आर्थिक समस्याओं के अध्ययन में निहित वे सकारात्मक और आदर्शक प्रश्न हैं जो एक-दूसरे से अत्यंत निकटता से संबंधित हैं तथा इनमें से किसी की पूर्णतया उपेक्षा करके दूसरे को ठीक से समझ पाना संभव नहीं है। वास्तव में, अर्थशास्त्र में दोनों प्रकार के विश्लेषण की आवश्यकता है तभी अधिकतम सामाजिक कल्याण का उद्देश्य पूरा हो सकता है।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्पादन संभावना वक्र क्या है? इसकी मान्यताएँ क्या हैं?
उत्तर:
उत्पादन संभावना वक्र (Production Possibility Curve)-एक PP वक्र केंद्रीय समस्या क्या उत्पादन करना है? को स्पष्ट करने की रेखाचित्रिय विधि है? यह निर्णय लेने के लिए कि क्या उत्पादन करना है और कितनी मात्रा में करना है, पहले यह जानना आवश्यक है कि क्या प्राप्य (Obtainable) है। PP वक्र प्राप्य संभावना को प्रदर्शित करता है।

मान्यताएँ-प्राप्य क्या है? निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-

  • उपलब्ध संसाधनों की मात्रा स्थिर एवं दी हुई है।
  • उत्पादन तकनीक स्थिर और अपरिवर्तित है।
  • संसाधनों का पूर्ण तथा कुशलतम उपयोग किया जा रहा है।
  • संसाधन सभी प्रकार की वस्तुओं के उत्पादन में एक-समान कुशल नहीं है।

चित्रमय प्रदर्शन उत्पादन संभावना वक्र को प्रो० सैम्युअलसन के एक प्रसिद्ध उदाहरण (बंदूकें तथा मक्खन) द्वारा स्पष्ट किया गया है- कल्पना कीजिए कि अर्थव्यवस्था में उत्पादन के साधनों (भूमि, श्रम, पूँजी) की कुछ मात्रा है (जिसमें परिवर्तन संभव नहीं) जिनकी सहायता से दो वस्तुओं मक्खन या बंदूकों का उत्पादन किया जा सकता है। बंदूकें रक्षा-सामग्री की प्रतीक हैं, जबकि मक्खन उपभोक्ता वस्तु का प्रतीक है। इन साधनों के प्रयोग से दोनों वस्तुओं की विभिन्न उत्पादन संभावनाओं को निम्नांकित तालिका द्वारा दर्शाया गया है।

उत्पादन संभावना तालिका

उत्पादन संभावनाएँमक्खन का उत्पादन
(हजार किलोग्राम)
बंदूकों का उत्पादन
(हज़ार (000) में)
परिवर्तन की सीमांत दर = ∆बंदूक/∆ मक्खन
a0 +10___
b1 +91 मक्खन : 1 बंदूक
c2 +71 मक्खन : 2 बंदूक
d3 +41 मक्खन : 3 बंदूक
e4 +01 मक्खन : 4 बंदूक

उपरोक्त तालिका में 5 उत्पादन संभावनाएँ हैं जो उत्पादन साधनों के विभिन्न प्रयोग करके प्राप्त होती हैं। पहली व पाँचवीं चरम सीमा की संभावनाएँ हैं जिनसे केवल एक ही वस्तु प्राप्त होती है, दूसरी नहीं। बाकी तीन अन्य संभावनाएँ हैं जिनमें दोनों वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। जैसे-जैसे हम मक्खन का उत्पादन बढ़ाते जाते हैं तो बंदूकों के उत्पादन में तेजी के साथ कमी होती जाती है। दूसरी अवस्था में, मक्खन का उत्पादन 1 हज़ार किलो बढ़ाने पर बंदूकों का उत्पादन 1 हज़ार गिरता है। तीसरी संभावना में 2 हज़ार तथा चौथी संभावना में 3 हज़ार और अंतिम संभावना में बंदूकों का उत्पादन 4 हज़ार गिरता है।

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि जैसे-जैसे हम एक संभावना से दूसरी संभावना पर आते हैं, वैसे-वैसे बंदूकों के स्थान पर मक्खन प्राप्त नहीं करते, बल्कि उत्पादन के साधनों को बंदूकों के उत्पादन से हटाकर मक्खन के उत्पादन में लगाते हैं। यदि कोई साधन एक वस्तु से हटाकर दूसरी वस्तु में लगाया जाता है तो कुशलता गिर जाती है और लागत बढ़ जाती है। परिवर्तन की सीमांत दर (Marginal Rate of Transformation) इस लागत का माप है। जैसे-जैसे मक्खन का उत्पादन बढ़ता है, यह दर बढ़ती चली जाती है।

परिवर्तन की सीमांत दर-एक वस्तु की अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने पर दूसरी वस्तु की जितनी मात्रा का त्याग करना पड़ता है, वह परिवर्तन की सीमांत दर कहलाती है। बंदूक और मक्खन के हमारे उदाहरण के अनुसार, यह मक्खन की एक अतिरिक्त इकाई प्राप्त करने के लिए बंदूकों की त्यागी गई मात्रा का अनुपात है। सूत्र के रूप में,
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हमारे उदाहरण में इस दर में वृद्धि हो रही है। इसका अर्थ है कि हर बार मक्खन की एक अतिरिक्त इकाई प्राप्त करने के लिए बंदूकों का त्याग बढ़ती दर से करना पड़ता है।

उत्पादन संभावना वक्र:
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उत्पादन संभावना तालिका को चित्रित करने पर उत्पादन संभावना वक्र प्राप्त हो जाता है। यह उत्पादन संभावना वक्र दो वस्तुओं के उन विभिन्न संयोगों को दर्शाती है जिन्हें दिए गए निश्चित साधनों तथा तकनीकों की. सहायता से उत्पन्न किया जा सकता है। रेखाचित्र में X-अक्ष पर मक्खन और Y-अक्ष पर बंदूकों के उत्पादन को दर्शाया गया है। a, b, c,d,e विभिन्न बिंदु हैं जो विभिन्न उत्पादन संभावनाओं को बताते हैं। इन विभिन्न बिंदुओं को मिलाने से जो वक्र बनता है, उसे उत्पादन संभावना वक्र कहते हैं। इस वक्र से पता चलता है कि दिए गए साधनों तथा तकनीकी ज्ञान से अर्थव्यवस्था में दो वस्तुओं के उत्पादन की विभिन्न संभावनाएँ क्या हैं?

इस वक्र से हमें उत्पादन की अधिकतम सीमाओं का भी पता चलता है। इसलिए इसे उत्पादन संभावना सीमा (Production Possibility Frontier or Boundary) भी कहा जाता है। रेखाचित्र के अनुसार अर्थव्यवस्था में अधिकाधिक संभव उत्पादन ae वक्र तक ही हो सकता है। यदि अर्थव्यवस्था ae के बाहर के बिंदु (जैसा कि ‘T’ बिंदु) को प्राप्त करना चाहे तो वह केवल दो दशाओं में ही इसे प्राप्त कर सकती है। (i) साधनों में वृद्धि होने से तथा (ii) तकनीकी विकास या कार्यकुशलता में वृद्धि होने से। इसके अतिरिक्त यदि उत्पादन किसी ऐसे बिंदु पर किया जाता है जो वक्र के अंदर है (जैसे कि बिंदु ‘U’) तो इसका अर्थ होगा कि अर्थव्यवस्था में या तो साधनों या जा रहा है या अर्थव्यवस्था में साधन बेरोज़गार हैं। इस अवस्था में बिना साधनों में वृद्धि किए दोनों वस्तुओं के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।

उत्पादन संभावना वक्र की विशेषताएँ-उत्पादन संभावना वक्र की दो मुख्य विशेषताएँ हैं
1. बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुकती है-उत्पादन संभावना वक्र इस बात को स्पष्ट करता है कि समाज को यदि किसी वस्तु की अतिरिक्त मात्रा चाहिए तो उसे दूसरी वस्तु का उत्पादन कम करना होगा।

2. मूल बिंदु की ओर नतोदर-PP वक्र के मूल बिंदु की ओर नतोदर होने का कारण परिवर्तन की सीमांत दर (MRT) का निरंतर बढ़ना है अथवा बढ़ती हुई सीमांत अवसर लागत है।

प्रश्न 2.
सीमांत अवसर लागत से क्या अभिप्राय है? इसके बढ़ने के कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
सीमांत अवसर लागत का अर्थ उत्पादन संभावना वक्र पर कार्यरत किसी वस्तु की सीमांत अवसर लागत दूसरी वस्तु की वह मात्रा है जिसका पहली वस्त की एक अतिरिक्त इकाई उत्पन्न करने के लिए त्याग किया जाता है। गेहँ और दाल के संदर्भ में सीमांत अवसर लागत (MOC) को हम यूँ भी परिभाषित कर सकते हैं कि किसी वस्तु (जैसे गेहूँ) की सीमांत अवसर लागत दूसरी वस्तु (जैसे दालों) की त्याग की मात्रा है जब पहली वस्तु का उत्पादन बढ़ाया जाता है। त्याग की यह दर बढ़ाई गई वस्तु की सीमांत अवसर लागत (Marginal Opportunity Cost) कहलाती है।

सीमांत अवसर लागत को निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया गया है-
तालिका : उत्पादन संभावना वक्र पर कार्यरत सीमांत अवसर लागत

उत्पादन संभावनाएँ (संयोजन)गेहूँ (लाख टन में)दालें (लाख टन में)गेहूँ की सीमांत अवसर लागत (दालों में)
a015___
b11415 – 14 = 1
c21214 – 12 = 2
d3912 – 9 = 3
e459 – 5 = 4
f505 – 0 = 5

दी गई तालिका में एक निष्कर्ष स्पष्ट है कि जैसे-जैसे गेहूँ का उत्पादन बढ़ाया जाता है, वैसे-वैसे गेहूँ की सीमांत अवसर लागत दर दालों में कमी के रूप में बढ़ती जाती है, जैसाकि अंतिम कॉलम से स्पष्ट है। यथा संयोजन (Combination) a से संयोजन b में जाने पर 1 लाख टन गेहूँ का उत्पादन करने के लिए 1 लाख टन दालों का उत्पादन त्यागना पड़ता है अर्थात् 1 लाख टन गेहूँ की सीमांत अवसर लागत (MOC) 1 लाख टन दालें हैं। इसी प्रकार संयोजन c में 1 लाख टन गेहूँ का अतिरिक्त उत्पादन करने के लिए 2 (14-12) लाख टन दालों का उत्पादन छोड़ना पड़ता है अर्थात् 1 लाख टन गेहूँ की MOC अब 2 लाख टन दालें हैं। इसी रीति से संयोजन d,e,f में 1 लाख टन अतिरिक्त गेहूँ का उत्पादन करने की सीमांत अवसर लागत (MOC) क्रमशः 3, 4 और 5 लाख टन दालें हैं।

संक्षेप में, अतिरिक्त गेहूँ उत्पादन करने के लिए दालों के रूप में सीमांत अवसर लागत क्रमशः बढ़ती जाती है। बढ़ती हुई सीमांत अवसर लागत के फलस्वरूप उत्पादन संभावना वक्र का आकार मूल बिंदु की तरफ नतोदर (Concave) हो जाता है।

सीमांत अवसर लागत बढ़ने के कारण-सीमांत अवसर लागत बढ़ने के कारण हैं-
(1) PP वक्र ह्रासमान प्रतिफल नियम (अर्थात् वर्धमान लागत नियम) पर आधारित है। इसके अनुसार जब किसी वस्तु का उत्पादन बढ़ाया जाता है तो इसे उत्पादित करने वाले साधनों की सीमांत उत्पादकता कम होती जाती है। फलस्वरूप वस्तु का उत्पादन बढ़ाने के लिए साधन की अधिक इकाइयाँ जुटानी पड़ती हैं अर्थात् उत्पादन लागत बढ़ती जाती है। इसे हम यूँ भी कह सकते हैं कि एक वस्तु का उत्पादन बढ़ाने के लिए दूसरी वस्तु की अधिक इकाइयों का त्याग करना पड़ता है।

(2) सीमांत अवसर लागत तब भी बढ़ जाती है जब एक विशेष वस्तु (जैसे दालों) के उत्पादन में लगे निपुण साधनों (श्रमिकों) को हटाकर दूसरी वस्तु (जैसे गेहूँ) के उत्पादन में स्थानांतरित किया जाता है जहाँ के लिए वे इतने योग्य नहीं होते। इसका अर्थ है दूसरी वस्तु की अतिरिक्त इकाइयों के उत्पादन के लिए स्थानांतरित साधनों का अधिक मात्रा में प्रयोग करना अर्थात् उत्पादन लागत का अप्रत्यक्ष बढ़ना।

संख्यात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित PP अनुसूची से वस्तु-X की रूपांतरण की सीमांत दर (MRT) की गणना कीजिए।

उत्पादन संभावनाएँabcde
वस्तु-X का उत्पादन (इकाइयाँ)01234
वस्तु-Y का उत्पादन (इकाइयाँ)14131183

हल :
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय 9

वस्तु-X (इकाइयाँ)वस्तु-Y (इकाइयाँ)MRT = ∆Y/∆X
014__
1131 : 1 (1-0 = 1, 14-13 = 1)
2111 : 1
382 : 1
433 : 1

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

प्रश्न 2.
मान लो कि एक अर्थव्यवस्था अपने संसाधनों और उपलब्ध प्रौद्योगिकी से दो वस्तुओं मशीनों और गेहूँ का उत्पादन करती है। अग्रलिखित तालिका में मशीनों तथा गेहूँ की उत्पादन संभावनाओं को दिखाया गया है। भिन्न-भिन्न संयोगों पर मशीनों की सीमांत अवसर लागत ज्ञात करें।

उत्पादन संभावनामशीनों का उत्पादन
(हज़ार)
गेहूँ का उत्पादन
(लाख टन)
a075
b170
c262
d350
e430
f50

हल :
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय 10

उत्पादन संभावनामशीनों का उत्पादन (हज़ार)गेहूँ का उत्पादन
(लाख टन)
मशीनों की सीमांत अवसर लागत (लाख टन)
a075___
b1705 वृद्धिमान
c2628 सीमांत
d35012 अवसर
e43020 लागत
f5030

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HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Solutions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय

पाठयपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्याओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
किसी अर्थव्यवस्था की तीन केंद्रीय समस्याएँ निम्नलिखित हैं-
1. क्या उत्पादन किया जाए और कितनी मात्रा में? संसाधन दुर्लभ हैं और उनके वैकल्पिक प्रयोग किए जा सकते हैं। इसलिए पहली केंद्रीय समस्या यह है कि क्या उत्पादित किया जाए और कितनी मात्रा में?

2. उत्पादन कैसे किया जाए? साधारणतया वस्तुओं का उत्पादन एक से अधिक तरीकों से किया जा सकता है। इसलिए . दूसरी केंद्रीय समस्या यह है कि उत्पादन कैसे किया जाए?

3. किसके लिए उत्पादन किया जाए?-उत्पादन के बाद इन वस्तुओं का वितरण उत्पादन के साधनों में किस प्रकार किया जाए? यह भी अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्या है।

प्रश्न 2.
अर्थव्यवस्था की उत्पादन संभावनाओं से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था की उत्पादन संभावनाओं से हमारा अभिप्राय वस्तुओं और सेवाओं के उन संयोगों से है, जिन्हें अर्थव्यवस्था में उपलब्ध संसाधनों की मात्रा तथा उपलब्ध प्रौद्योगिकीय ज्ञान के द्वारा उत्पादित किया जा सकता है।

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प्रश्न 3.
सीमांत उत्पादन संभावना वक्र क्या है?
उत्तर:
सीमांत उत्पादन संभावना वक्र से अभिप्राय उस वक्र से है जो एक वस्तु (जैसे गेहूँ) की किसी निश्चित मात्रा के बदले दूसरी वस्तु (जैसे गन्ना) की अधिकतम संभावित उत्पादित मात्रा तथा दूसरी वस्तु (जैसे गन्ना) के बदले गेहूँ की मात्रा दर्शाता है। उदाहरण के लिए, एक किसान के पास 50 एकड़ कृषि योग्य भूमि है।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 1 व्यष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय 1
वह इस पर गेहूँ या गन्ना या फिर दोनों की खेती कर सकता है। एक एकड़ भूमि पर 2.5 टन गेहूँ या फिर 80 टन गन्ने का उत्पादन हो सकता है। गेहूँ का अधिकतम उत्पादन (2.5 x 50) 125 टन होगा 1000 2000 जबकि गन्ने का अधिकतम उत्पादन (80 x 50) 4,000 टन होगा। गन्ना (टनों में) गेहूँ और गन्ने की अधिकतम उत्पादन मात्राओं को जोड़कर सीमांत उत्पादन संभावना वक्र को प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु आर्थिक इकाइयों का आर्थिक व्यवहार है जो वे व्यक्तिगत रूप में अथवा समूहों के रूप में करती हैं। अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है

  • व्यष्टि अर्थशास्त्र
  • समष्टि अर्थशास्त्र।

व्यष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है; जैसे एक उपभोक्ता, एक गृहस्थ, एक उत्पादक तथा एक फर्म आदि। समष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों की अपेक्षा संपूर्ण अर्थव्यवस्था अथवा अर्थव्यवस्था के आर्थिक समूहों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है; जैसे राष्ट्रीय आय, रोज़गार, सामान्य कीमत-स्तर आदि।

व्यष्टि अर्थशास्त्र और समष्टि अर्थशास्त्र में अध्ययन किए जाने वाले विषयों को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है

व्यष्टि अर्थशास्त्र की विषय-वस्तुसमष्टि अर्थशास्त्र की विषय-वस्तु
1. उपभोक्ता का व्यवहार अर्थात् माँग सिद्धांत।1. आय और रोजगार निर्धारण सिद्धांत।
2. उत्पादन अर्थात पूर्ति सिद्धांत।2. विकास सिद्धांत।
3. बाज़ार संरचना।3. मौद्रिक तथा राजकोषीय नीति।
4. साधन सेवाओं का मूल्य निर्धारण।4. भुगतान शेष।

प्रश्न 5.
केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था तथा बाज़ार अर्थव्यवस्था के भेद को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था तथा बाज़ार अर्थव्यवस्था में मुख्य भेद निम्नलिखित हैं

अंतर का आधारकेंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्थाबाज़ार अर्थव्यवस्था
1. उत्पादन साधनों का स्वामित्वइस अर्थव्यवस्था में सभी उत्पादन साधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है।इस अर्थव्यवस्था में उत्पादन साधनों पर व्यक्तियों का स्वामित्व होता है। अर्थव्यवस्था में व्यक्तियों को संपत्ति रखने व उत्तराधिकार का अधिकार होता है।
2. उद्देश्यसभी आर्थिक क्रियाओं का उद्देश्य सामाजिक कल्याण है। अर्थव्यवस्था में उत्पादन की वे गतिविधियाँ होती हैं जो समाज की आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।सभी आर्थिक क्रियाओं का उद्देश्य सभी आर्थिक क्रियाओं का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ कमाना है। आर्थिक गतिविधियों से सामाजिक कल्याण का  होना आवश्यक नहीं है।
3. स्वतंत्रताइसमें लोगों को उपभोग और व्यवसाय के चुनाव की स्वतंत्रता नहीं होती।इसमें लोगों को उपभोग और व्यवसाय के चुनाव की स्वतंत्रता होती है।
4. केंद्रीय समस्याओं का हलइसमें केंद्रीय समस्याओं का हल आर्थिक नियोजन द्वारा किया जाता है।इसमें केंद्रीय समस्याओं का हल कीमत तंत्र द्वारा स्वतः ही हो जाता है।

प्रश्न 6.
सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण से हमारा अभिप्राय उस अध्ययन से है जिसका संबंध वास्तविक आर्थिक घटनाओं से होता है। सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण के अंतर्गत हम यह अध्ययन करते हैं कि विभिन्न कार्यविधियाँ किस प्रकार कार्य करती हैं। सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण ‘साध्य’ के प्रति तटस्थ होता है।

प्रश्न 7.
आदर्शक आर्थिक विश्लेषण से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आदर्शक आर्थिक विश्लेषण से हमारा अभिप्राय उस अध्ययन से है जिसका संबंध आदर्शों से होता है। आदर्शक आर्थिक विश्लेषण के अंतर्गत हम यह अध्ययन करते हैं कि विभिन्न कार्यविधियाँ हमारे अनुकूल हैं या नहीं। आदर्शक आर्थिक विश्लेषण ‘साध्य’ के प्रति तटस्थ नहीं होता।

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प्रश्न 8.
व्यष्टि अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र में निम्नलिखित अंतर हैं-

अंतर का आधारव्यष्टि अर्थशास्त्रसमष्टि अर्थशास्त्र
1. अध्ययन-सामग्रीइसके अंतर्गत व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों का अध्ययन किया जाता है।इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था के आर्थिक समूहों का अध्ययन किया जाता है।
2. उद्देश्यइसका उद्देश्य संसाधनों का कुशलतम उपयोग करना है।इसका उद्देश्य पूर्ण रोज़गार की स्थिति प्राप्त करना है।
3. उपकरणइसके उपकरण माँग और पूर्ति हैं।इसके उपकरण समग्र माँग और समग्र पूर्ति हैं।
4. क्षेत्रइसका क्षेत्र सीमित है। इसमें महत्त्वपूर्ण नीतियों एवं समस्याओं जैसे राजस्व नीति या मौद्रिक नीति आदि का अध्ययन नहीं किया जा सकता।इसका क्षेत्र विस्तृत है। इसमें महत्त्वपूर्ण आर्थिक नीतियों एवं समस्याओं का संपूर्ण अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से अध्ययन किया जा सकता है।

व्यष्टि अर्थशास्त्र : एक परिचय HBSE 12th Class Economics Notes

→ अर्थव्यवस्था अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस प्रणाली से है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी आजीविका कमाते हैं और अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि करते हैं।

→ व्यष्टि अर्थशास्त्र व्यष्टि अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र की वह शाखा है जिसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था की व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन किया जाता है; जैसे व्यक्तिगत उपभोक्ता, व्यक्तिगत उत्पादक (फम), व्यक्तिगत उद्योग, व्यक्तिगत वस्तु या साधन की कीमत निर्धारण, व्यक्तिगत आय आदि का अध्ययन।

→ आर्थिक समस्या आर्थिक समस्या मूलतः चुनाव की आवश्यकता के कारण उत्पन्न होने वाली समस्या है। यह सीमित साधनों के वैकल्पिक प्रयोगों में से चुनाव करने की समस्या है। यह साधनों के कुशल प्रबंधन की समस्या है।

→ केंद्रीय समस्याएँ क्यों उत्पन्न होती हैं?-केंद्रीय समस्या चुनाव की समस्या है। इसके उत्पन्न होने के दो मुख्य कारण हैं-

  • वैकल्पिक प्रयोगों वाले सीमित साधन और
  • असीमित आवश्यकताएँ।

→ अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्याएँ अर्थव्यवस्था की मुख्य तीन केंद्रीय समस्याएँ हैं-

  • क्या उत्पादन किया जाए और कितनी मात्रा में?
  • कैसे उत्पादन किया जाए?
  • किसके लिए उत्पादन किया जाए?

→ उत्पादन संभावना वक्र-यह वक्र दो वस्तुओं के संभावित संयोगों को प्रकट करता है। यह दो मुख्य मान्यताओं पर आधारित है-

  • स्थिर तकनीक
  • स्थिर साधन।

→ उत्पादन संभावना वक्र का ढलान सीमांत अवसर लागत को दर्शाता है उत्पादन संभावना वक्र का ढलान बढ़ता है (क्योंकि उत्पादन संभावना वक्र मूल बिंदु की ओर नतोदर (concave) है)। इसी कारण, जब साधनों को एक उपयोग से हटाकर दूसरे उपयोग में लगाया जाता है, तो सीमांत अवसर लागत में बढ़ने की प्रवृत्ति पाई जाती है।

→ उत्पादन संभावना वक्र केंद्रीय समस्याओं की व्याख्या करता है उदाहरण-

  • उत्पादन संभावना वक्र पर कोई भी बिंदु यह प्रकट करता है कि वस्तु-X तथा वस्तु-Y की कितनी मात्रा का उत्पादन किया जा रहा है।
  • उत्पादन संभावना वक्र पर कोई भी बिंदु संसाधनों के पूर्ण प्रयोग को दर्शाता है जबकि इस वक्र के अंदर कोई भी बिंदु संसाधनों के अपूर्ण (अकुशल) प्रयोग को दर्शाता है।

→ सीमांत अवसर लागत-सीमांत अवसर लागत से अभिप्राय Y-वस्तु के उत्पादन की मात्रा में होने वाली उस कमी से है जो कि X-वस्तु की एक अधिक इकाई के उत्पादन के फलस्वरूप होती है जबकि उत्पादन के साधन तथा तकनीक स्थिर रहते हैं।

→ बाज़ार अर्थव्यवस्था बाजार अर्थव्यवस्था के अंतर्गत सभी आर्थिक क्रियाकलापों का निर्धारण बाज़ार की स्थितियों के अनुसार होता है। इसमें केंद्रीय समस्याओं का हल कीमत-तंत्र द्वारा किया जाता है।

→ केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था केंद्रीकृत योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसके अंतर्गत सभी आर्थिक क्रियाकलापों का निर्धारण सरकार द्वारा किया जाता है। इसमें केंद्रीय समस्याओं का हल केंद्रीय अधिकारी अथवा नियोजन तंत्र द्वारा किया जाता है।

→ सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण-सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण से अभिप्राय उस अध्ययन से है जिसका संबंध वास्तविक। आर्थिक घटनाओं से है। इसके अंतर्गत हम यह अध्ययन करते हैं कि विभिन्न कार्यविधियाँ किस प्रकार कार्य करती हैं। सकारात्मक आर्थिक विश्लेषण ‘साध्य’ के प्रति तटस्थ होता है।

→ आदर्शक (आदर्शात्मक) आर्थिक विश्लेषण-आदर्शक (आदर्शात्मक) आर्थिक विश्लेषण से अभिप्राय उस अध्ययन से है जिसका संबंध आदर्शों से होता है। इसके अंतर्गत हम यह अध्ययन करते हैं कि विभिन्न कार्यविधियाँ हमारे अनुकूल हैं या नहीं। आदर्शक आर्थिक विश्लेषण ‘साध्य’ के प्रति तटस्थ नहीं होता।

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HBSE 12th Class Hindi Vyakaran संधि-प्रकरण

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Sandhi-Prakaran संधि-प्रकरण Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Vyakaran संधि-प्रकरण

सन्धि-प्रकरण

संधि का सामान्य अर्थ है जोड़ या मिलाप। हिंदी भाषा में जब दो ध्वनियाँ आपस में मिलती हैं और मिलने से जो एक नया रूप धारण कर लेती हैं, उसे संधि कहते हैं। संधि की परिभाषा इस प्रकार से दी जा सकती है
परिभाषा:
दो वर्गों के परस्पर समीप आने से या उनमें मेल होने से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे संधि कहते हैं; जैसे-
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
जगत् + ईश = जगदीश
परि + ईक्षा = परीक्षा।

प्रथम उदाहरण में (आ + अ) के समीप आने पर दोनों का ‘आ’ रूप में विकार हुआ है। दूसरे उदाहरण में ‘त् + ई’ के परस्पर समीप आने से त् का द् हो गया है। तीसरे उदाहरण में ‘इ + ई’ के परस्पर समीप आने से ‘ई’ रूप में विकार उत्पन्न हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran संधि-प्रकरण

संधि के भेद

प्रश्न 1.
संधि के कितने भेद होते हैं ? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
संधि के तीन भेद होते हैं
1. स्वर संधि
विद्या + आलय = विद्यालय
सदा + एव = सदैव

2. व्यंजन संधि
सत् + आचार = सदाचार
अभि + सेक = अभिषेक

3. विसर्ग संधि
यशः + दा = यशोदा
निः + चित = निश्चित

1. स्वर संधि

प्रश्न 2.
स्वर संधि की परिभाषा लिखते हुए उसके भेदों का सोदाहरण वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दो स्वरों के परस्पर समीप आने से उनमें जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं; जैसे-
रवि + इंद्र = (इ + इ = ई) रवींद्र
रमा + ईश = (आ + ई = ए) रमेश

स्वर संधि के पाँच भेद होते हैं-
(i) दीर्घ संधि
(ii) गुण संधि
(iii) वृद्धि संधि
(iv) यण संधि
(v) अयादि संधि।

प्रश्न 3.
दीर्घ संधि की सोदाहरण परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
यदि दो सवर्ण स्वर (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ) पास-पास आ जाएँ तो दोनों को मिलाकर एक ही दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ) हो जाता है। अर्थात अ, आ के सामने आ जाए अथवा आ, अ के सामने आ जाए तो दोनों को मिलाकर एक दीर्घ ‘आ’ बन जाएगा। इसी प्रकार इ, ई और ई, इ को मिलाकर दीर्घ ‘ई’ हो जाएगी तथा उ, ऊ और ऊ, उ को मिलाने पर दीर्घ ‘ऊ’ बनेगा; जैसे- . कारा + आवास = (आ + आ) = कारावास
रजनी + ईश = (ई + ई) = रजनीश
विद्या + अर्थी = (आ + अ) = विद्यार्थी
परि + ईक्षा = (इ + ई) = परीक्षा
मुख्य + अध्यापक = (अ + अ) = मुख्याध्यापक
गुरु + उपदेश = (उ + उ) = गुरूपदेश
कवि + इंद्र = (इ + इ) = कवींद्र
वधू + उत्सव = (ऊ + उ) = वधूत्सव

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran संधि-प्रकरण

प्रश्न 4.
गुण संधि की सोदाहरण परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
जब ‘अ’ एवं ‘आ’ के सामने ‘इ’ अथवा ‘ई’ आ जाए तो दोनों से मिलकर ‘ए’ हो जाता है। इसी प्रकार ‘अ’ एवं ‘आ’ के सामने ‘उ’ अथवा ‘ऊ’ आ जाने पर दोनों से मिलकर ‘ओ’ हो जाता है। ‘अ’ या ‘आ’ के सामने ‘ऋ’ आ जाने पर ‘अर्’ बन जाता है; जैसे-
धर्म + इंद्र = (अ + इ) = धर्मेंद्र
सूर्य + उदय = (अ + उ) = सूर्योदय
गण + ईश = (अ + ई) = गणेश
महा + उत्सव = (आ + उ) = महोत्सव
भारत + इन्दु = (अ + इ) = भारतेंदु
महा + ऋषि = (आ + ऋ) = महर्षि
महा + ईश्वर = (आ + ई) = महेश्वर
सप्त + ऋषि = (अ + ऋ) = सप्तर्षि
प्रश्न + उत्तर = (अ + उ) = प्रश्नोत्तर

प्रश्न 5.
वृद्धि संधि की परिभाषा एवं उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
‘अ’, ‘आ’ के आगे ‘ए’ हो तो दोनों मिलकर ‘ऐ’ बन जाते हैं। इसी प्रकार ‘अ’, ‘आ’ के आगे यदि ‘ओ’ अथवा ‘औ’ हो तो दोनों मिलकर ‘औ’ रूप बन जाते हैं; जैसे-
सदा + एव = (आ + ए) = सदैव
मत + ऐक्य = (अ + ऐ) = मतैक्य
तथा + एव = (आ + ए) = तथैव
वन + औषधि = (अ + औ) = वनौषधि
लठ + ऐत = (अ + ऐ) = लठैत
महा + औषध = (आ + औ) = महौषध

प्रश्न 6.
यण संधि किसे कहते हैं ? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
इ, ई, उ, ऊ तथा ऋ के आगे भिन्न जाति का कोई (असवण) स्वर आ जाए तो इ, ई के स्थान पर ‘य’ विकार हो जाता है। उ, ऊ के स्थान पर ‘व्’ तथा ऋ के स्थान पर ‘र’ विकार हो जाता है; जैसे-
अति + अंत = (इ + अ) = अत्यंत
प्रति + उत्तर = (इ + उ) = प्रत्युत्तर
अति + आवश्यक = (इ + आ) = अत्यावश्यक
सु + अल्प = (उ + अ) = स्वल्प
यदि + अपि = (इ + अ) = यद्यपि
अनु + एषण = (उ + ए) = अन्वेषण
इति + आदि = (इ + आ) = इत्यादि
मातृ + आज्ञा = (ऋ + आ) = मात्राज्ञा
प्रति + एक + (इ + ए) = प्रत्येक
अति + आचार = (इ + आ) = अत्याचार
सु + आगत = (उ + आ) = स्वागत
नि + ऊन = (इ + ऊ) = न्यून

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran संधि-प्रकरण

प्रश्न 7.
अयादि संधि की सोदाहरण परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
जब ए, ऐ, ओ, औ के आगे उनसे भिन्न जाति का कोई स्वर आ जाता है तो ए के स्थान पर ‘अय्’, ऐ के स्थान ‘आय’, ओ के स्थान ‘अव्’ और औ के स्थान पर ‘आव्’ हो जाता है; जैसे-
नै + अन = (ऐ + अ) = नयन
नै + अक = (ऐ + अ) = नायक
गै + अक = (ऐ + अ) = गायक
पो + अन = (ओ + अ) = पवन
नौ + इक = (औ + इ) = नाविक
भो + अन = (ओ + अ) = भवन
भौ + उक = (औ + उ) = भावुक

2. व्यंजन संधि

प्रश्न 8.
व्यंजन संधि किसे कहते हैं ? व्यंजन संधि के नियमों का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
व्यंजन के आगे स्वर या व्यंजन के आ जाने पर उसमें जो विकार या परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं; जैसे-
जगत् + ईश = जगदीश।
सम् + चय = संचय।

व्यंजन संधि के निम्नलिखित नियम हैं-
(1) यदि वर्ण के प्रथम अक्षर (क्, च्, ट्, त्, प) के आगे वर्ग का तीसरा, चौथा वर्ण य, र, ल, व तथा कोई स्वर आ जाए तो उस प्रथम अक्षर के स्थान पर उसी अक्षर के वर्ग का तीसरा अक्षर हो जाएगा; जैसे-
सत् + आचार = (त् + आ) = सदाचार
उत् + योग = (तु + य) = उद्योग
दिक् + गज = (क् + ग) = दिग्गज
जगत् + ईश = (त् + ई) = जगदीश
उत् + ज्वल = (त् + ज्) = उज्ज्व ल
षट् + आनन = (ट् + आ) = षडानन

(2) यदि वर्ग के प्रथम अक्षर के सामने वर्ग का पाँचवाँ अक्षर अर्थात अनुनासिक वर्ण आ जाए तो उस प्रथम अक्षर के स्थान पर उसी वर्ग का पाँचवाँ अक्षर हो जाता है।
यथासत् + मति = (त् + म) = सन्मति
तत् + मय = (त् + म) = तन्मय
उत् + मूलन = (त् + म) = उन्मूलन
सत् + मार्ग = (त् + म) = सन्मार्ग

(3) ‘त्’ एवं ‘द्’ के सामने यदि च, ज, द, ड और ल आ जाएँ तो ‘त्’ एवं ‘द्’ सामने वाले अक्षरों में बदल जाते हैं। यथा-
शरत् + चंद्र = (त् + च) = शरच्चंद्र
उत् + चारण = (त् + च) = उच्चारण
जगत् + जननी = (तु + ज) = जगज्जननी
उत् + लास = (त् + ल) = उल्लास

(4) ‘त्’ अक्षर के सामने ‘श’ आने पर ‘श’ का ‘छ’ और ‘त्’ का ‘च’ हो जाता है। यथा-
उत् + शृंखल = (त् + श) = उच्छृखल
उत् + श्वास = (त् + श्) = उच्छ्वास
उत् + शिष्ट = (त् + श) = उच्छिष्ट
सत् + शास्त्र = (त् + श) = सच्छास्त्र

(5) त् अक्षर के सामने ‘ह’ आने पर ‘ह’ का ‘ध’ और ‘त्’ का ‘द्’ हो जाता है। यथा-
उत् + हार = उद्धार
तत् + हित = तद्धित

(6) ‘छ’ अक्षर के सामने ‘स्व’ हृस्व आ जाने पर उसका रूप ‘च्छ’ बन जाता है। यथा-
स्व् + छन्द = स्वच्छन्द
वि + छेद = विच्छेद

(7) म् अक्षर के सामने स्पर्श अक्षर (पाँच वर्गों के सभी वर्ग) होने पर ‘म्’ के स्थान पर ‘अनुस्वार’ (‘) या उसी वर्ग का अंतिम अक्षर (ङ्, ञ, ण, न, म्) हो जाता है; जैसे-
सम् + कल्प = (म् + क) = सङ्कल्प या संकल्प
सम् + गम् = (म् + ग) = संगम या सङ्गम
सम् + चय = (म् + च) = संचय या सञ्चय
सम् + पूर्ण = (म् + प) = संपूर्ण या संपूर्ण
सम् + तोष = (म् + त) = संतोष या संतोष
सम् + देह = (म् + द) = संदेह या संदेह

(8) म् अक्षर के सामने या उक्त पाँचों से भिन्न कोई अक्षर, य, र, ल, व, श, ष, स, ह, आ जाए तो म् का केवल अनुस्वार () ही होता है; जैसे-
सम् + यम = (म् + य) = संयम
सम् + हार = (म् + ह) = संहार
सम् + वाद = (म् + व) = संवाद
सम् + लग्न = (म + ल) = संलग्न
सम् + शय = (म् + श) = संशय
सम् + सार = (म् + स) = संसार
सम् + रक्षक = (म् + र) = संरक्षक

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran संधि-प्रकरण

अपवाद:
सम् उपसर्ग के आगे यदि कृत, कृति, कार, करण आ जाए तो म् का ‘स्’ हो जाता है; जैसे-
सम् + कृति = संस्कृति
सम् + करण = संस्करण
सम् + कार = संस्कार

(9) यदि ‘र’ के बाद ‘र’ आ जाए तो पूर्व ‘र’ का लोप होकर उसमें पहले स्वर को दीर्घ कर दिया जाता है; जैसे-
निर् + रोग = नीरोग
निर् + रस = नीरस
निर् + रव = नीरव
निर् + रज = नीरज

(10) यदि ऋ, र, ष अक्षरों के बाद ‘न’ आ जाए तो उसका ‘ण’ कर दिया जाता है; जैसे-
अर्प. + न = अर्पण
ऋ + न = ऋण
भूष + न = भूषण

(11) स से पूर्व अ, आ को छोड़ कोई अन्य स्वर आ जाए तो ‘स’ का ‘ष’ हो जाता है; जैसे-
नि + सेध = निषेध
वि + सय = विषय
अभि + सेक = अभिषेक
वि+सम = विषम
अपवाद: निम्नलिखित शब्दों में ‘स्’ का ‘ष’ नहीं होता-विस्मरण, विस्मृति, विस्मय, विसर्ग आदि।

3.विसर्ग संधि

प्रश्न 9.
विसर्ग संधि किसे कहते हैं ? उदाहरण देकर समझाइए तथा उसके नियमों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विसर्ग के बाद स्वर या व्यंजन के आने से उसमें जो परिवर्तन या विकार उत्पन्न होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं; जैसे-
मनः + स्थिति = मनोस्थिति
निः + मल = निर्मल

विसर्ग संधि के निम्नलिखित प्रमुख नियम हैं
(1) विसर्ग से पूर्व यदि ‘अ’ हो और विसर्ग के बाद ‘ऊ’ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है यथा-
अतः + एव = अतएव
ततः + एव = ततएव

(2) यदि विसर्ग से पूर्व ‘अ’ हो और विसर्ग के बाद वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण एवं य, र, ल, व, ह में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग का ‘ओ’ हो जाता है-
यथामनः + रथ = मनोरथ
मनः + विज्ञान = मनोविज्ञान
यशः + दा = यशोदा
मनः + रंजन = मनोरंजन
पुराः + हित = पुरोहित

(3) यदि विसर्ग से पहले अ, आ को छोड़कर कोई स्वर हो तथा विसर्ग के बाद वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ अक्षर या य, र, ल, व, ह आ जाए तो विसर्ग का ‘र’ हो जाता है।
यथानिः + धन = निर्धन
निः + आकार = निराकार
निः + झर = निर्झर
निः + दयी = निर्दयी

(4) यदि विसर्ग से पूर्व इ या उ हो और उसके आगे क, प, फ, आ जाए तो विसर्ग का ‘ष’ हो जाता है। यथा-
निः + कपट = निष्कपट
निः + पाप = निष्पाप
निः + फल = निष्फल

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran संधि-प्रकरण

(5) विसर्ग से पूर्व यदि हृस्व अ हो और बाद में ‘क’ या ‘प’ हो तो विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है। यथा-
नमः + कार = नमस्कार
वाचः + पति = वाचस्पति
तिरः + कार = तिरस्कार

(6) विसर्ग के सामने श, ष, स् आ जाने से विसर्ग का विकल्प से विसर्ग या क्रमशः श, ष, स् हो जाता है। यथा-
निः + संदेह = निस्संदेह
निः + शस्त्र = निस्शस्त्र
निः + शंक = निस्शंक

(7) विसर्ग के सामने यदि च, छ आ जाएँ तो विसर्ग का ‘श्’ हो जाता है। ‘ट’, ‘ठ’ आ जाए तो ‘ए’ और यदि त्, थ, आ जाए तो ‘स्’ हो जाता है।
यथा-
निः + चित = निश्चित
निः + ठा = निष्ठा
निः + तेज = निस्तेज
निः + छल = निश्छल
दुः + ट = दुष्ट

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अभ्यासार्थ कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran संधि-प्रकरण 1
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HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Vakya-Shodhan वाक्य-शोधन Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन

वाक्य-शोधन

भाषा के द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों के सामने प्रकट करता है और दूसरों के विचारों को भाषा द्वारा ही ग्रहण करता है, लेकिन यदि भाषा शुद्ध होगी तभी हम विचारों का सही आदान-प्रदान कर सकेंगे। भाषा के लिखित रूप का शुद्ध होना तो नितांत आवश्यक है। मौखिक भाषा की अशुद्धियाँ इतनी नहीं खलती जितनी कि लिखित भाषा की। मौखिक भाषा में यदि कोई अशुद्ध उच्चारण करता है तो भी हम उसके विचार को समझ जाते हैं, परंतु अशुद्ध वर्तनी के प्रयोग से सही अर्थ की प्रतीती नहीं हो पाती। भाषा में इसी को हम अशुद्धि-शोधन भी कह सकते हैं। इसके अंतर्गत हम शब्दों तथा वाक्यों दोनों की अशुद्धियाँ दूर करने का प्रयास करते हैं। नीचे कुछ शब्द-शोधन और वाक्य-शोधन के उदाहरण दिए जा रहे हैं। विद्यार्थियों को इन्हें ध्यान से पढ़ना चाहिए और शुद्ध भाषा लिखने का अभ्यास करना चाहिए।

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(क) शब्द-शोधन

1. स्वर अथवा मात्रा संबंधी अशुद्धियाँ

(i) ‘अ’ तथा ‘आ’ संबंधी अशुद्धियाँ
अशुद्ध शब्द – शुद्ध शब्द
अध्यात्मिक – आध्यात्मिक
आधीन – अधीन
अगामी – आगामी
अकांक्षा – आकांक्षा

(ii) ‘इ’ तथा ‘ई’ संबंधी अशुद्धियाँ
अभिष्ट – अभीष्ट
तिथी – तिथि
अती – अति
भक्ती – भक्ति
अनीती – अनीति
प्राप्ती – प्राप्ति
अतिथी – अतिथि
परिक्षा – परीक्षा
इत्यादी – इत्यादि
निरिक्षण – निरीक्षण
उक्ती – उक्ति
श्रीमति – श्रीमती
उपाधी – उपाधि
निरस – नीरस
चित्कार – चीत्कार
विपत्ती – विपत्ति
प्रतिनिधी – प्रतिनिधि
व्याधी – व्याधि
मूर्ती – मूर्ति
नागरीक – नागरिक

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन

(ii) ‘उ’ तथा ‘ऊ’ संबंधी अशुद्धियाँ
आयु – आयू
गुरू – गुरू
आँसु – आँसू
हिंदूस्तान – हिंदुस्तान
स्तूति – स्तुति
परंतू – परंतु
वायू – वायु
धूआँ – धुआँ

(iv) ‘ए’ तथा ‘ऐ’ संबंधी अशुद्धियाँ
एक्य – ऐक्य
भाषायें – भाषाएँ
एश्वर्य – ऐश्वर्य
एकाहार – ऐकाहार

(v) ‘ई’ तथा ‘यी’ संबंधी अशुद्धियाँ
कयी – कई
विजई – विजयी
अन्याई – अन्यायी
विषई – विषयी
प्रणई – प्रणयी
स्थाई – स्थायी

(vi) ‘ओ’, ‘औ’, ‘अव’ तथा ‘आव’ संबंधी अशुद्धियाँ
अलोकिक – अलौकिक
औछाई – ओछाई
ओषधि – औषधि
औद्योगिक – ओद्योगिक
औचित्य – ओजस्वी
औजस्वी – ओचित्य

(vii) ‘ऋ’ संबंधी अशुद्धियाँ
द्रश्य – दृश्य
बृज – ब्रज
कृया – क्रिया
मातृभूमि – मात्रभूमि

(vii) अनुस्वार (ं) संबंधी अशुद्धियाँ
भडार – भंडार
अधकार – अंधकार
अगार – अंगार
अश – अंश

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(ix) अनुनासिक (ँ) संबंधी अशुद्धियाँ
संवारना – सँवारना
अंगीठी – अँगीठी
लंगोटी – लँगोटी
आंख – आँख
हंसमुख – हँसमुख
महंगा – महँगा

(x) विसर्ग (:) संबंधी अशुद्धियाँ
अता – अतः
अतःएव – अतएव
अंतकरण – अंतःकरण
स्वता – स्वतः

(xi) स्वर संयोग संबंधी अशुद्धियाँ

ज्ञानीन्द्र – ज्ञानेन्द्र
लड़कीयाँ – लड़कियाँ
हिंदूओं – हिंदुओं
हुये – हुए

2. व्यंजन संबंधी अशुद्धियाँ

(i) ‘न’ तथा ‘ण’ संबंधी अशुद्धियाँ

आक्रमन – आक्रमण
वर्न – वर्ण
प्रनाम – प्रणाम
स्मरन – स्मरण
चन्डिका – चण्डिका
शरन – शरण
जीर्न – जीर्ण
ग्रहन – ग्रहण
भाषन – भाषण

(ii) ‘ड’, ‘ड’ तथा ‘ढ’ संबंधी अशुद्धियाँ
पड़ना – पढ़ना
गड़ना – गढ़ना
बड़ना – बढ़ना
चिड़ना – चिढ़ना
साढ़ी – साड़ी
सीड़ी – सीढ़ी
सूँढ़ – सूँड
कुढ़ – कुंड

(iii) ‘ब’ तथा ‘व’ संबंधी अशुद्धियाँ
बृक्ष – वृक्ष
बेश्या – वेश्या
बधू – वधू
बन – वन
ब्रत – व्रत
वृहस्पति – बृहस्पति

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(iv) ‘श’, ‘ष’ तथा ‘स’ संबंधी अशुद्धियाँ
विशय – विषय
श्मसान – श्मशान
सिखर – शिखर
वैदेषिक – वैदेशिक
विस – विष
निश्फल – निष्फल
वेस – वेष
भविस्य – भविष्य

(v) ‘क्ष’ तथा ‘छ’ संबंधी अशुद्धियाँ
छत्री – क्षत्री
छितिज – क्षितिज
छीर – क्षीर
छन – क्षण
छुधा – क्षुधा
छेम – क्षेम

(vi) रेफा संबंधी अशुद्धियाँ
स्वरग -स्वर्ग
पवितर – पवित्र
शिरोधारय – शिरोधार्य
परजा – प्रजा
धरम – धर्म
संगराम – संग्राम
निष्करष – निष्कर्ष
पूरण – पूर्ण

(vii) ‘ष्ट’ तथा ‘ष्ठ’ संबंधी अशुद्धियाँ
कनिष्ट – कनिष्ठ
घनिष्ट – घनिष्ठ
निष्टा – निष्ठा
कष्टा – कष्ठ
इष्ठ – इष्ट
जेष्ट – जेष्ठ

(viii) ‘य’ के साथ संयोग से होने वाली अशुद्धियाँ
उपलक्ष – उपलक्ष्य
जादा – ज्यादा
राजाभिषेक – राज्याभिषेक
व्यक्तिक – वैयक्तिक

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(ix) ‘अक्षर लोप’ से होने वाली अशुद्धियाँ
द्वंद्व – द्वंद्व
स्वस्थ – स्वास्थ्य
स्वावलंबन – स्वालंबन
सप्ता – सप्ताह

(x) ‘ज्ञ’ तथा ‘ग्य’ संबंधी अशुद्धियाँ
भाज्ञवान – भाग्यवान
भोज्ञ – भोग्य
अनभिग्य – अनभिज्ञ
प्रतिग्या – प्रतिज्ञा
आरोग्य – आग्या

(xi) पंचम अक्षर संबंधी अशुद्धियाँ
अन्गूर – अंगूर
कुन्डली – कुंडली
कन्ठ – कंठ
जन्ता – जनता
घन्टा – घण्टा
चन्चल – चंचल

(xii) हल् चिह्न संबंधी अशुद्धियाँ
जगत – जगत्
मूल्यवान – मूल्यवान
पश्चात – पश्चात्
भगवान – भगवान
श्रीमान – श्रीमान
परम् पद – परम् पद

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3. प्रत्यय संबंधी अशुद्धियाँ

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4. संधि संबंधी अशुद्धियाँ

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5. समास संबंधी अशुद्धियाँ

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन 3

6. हलन्त संबंधी अशुद्धियाँ
बुद्धिमान – बुद्धिमान्
सच्चित – सच्चित्
विद्वान – विद्वान्
भाग्यवान – भाग्यवान्

7. चंद्रबिंदु तथा अनुस्वार संबंधी अशुद्धियाँ । अंगना
अँगना । मुंह
आंख – आँख
तांत – ताँत
गांधी – गाँधी
कांच – काँच
चांद – चाँद
पहुंच – पहुँच

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8. अहिंदी भाषियों की अशुद्धियाँ सब्द

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(ख) वाक्य-शोधन

1. शब्द-क्रम संबंधी
शुद्ध भाषा के लिए शुद्ध वाक्य-रचना होना अनिवार्य है। वाक्यगत अनेक प्रकार की होती है; जैसे संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रिया-विशेषण, वचन, लिंग, विभक्ति, प्रत्यय-उपसर्ग आदि।

अशुद्ध वाक्य
(1) बच्चे को दूध नहलाकर पिलाओ।
(2) मोहन को काटकर फल खिलाओ।
(3) मुझे एक दूध का गिलास दो।
(4) उसे चाय का गर्म प्याला दे दो।
(5) एक पानी का तालाब भरा है।
(6) एक सेब की पेटी ले आना।

शुद्ध वाक्य
(1) बच्चे को नहलाकर दूध पिलाओ।
(2) मोहन को फल काटकर खिलाओ।
(3) मुझे एक गिलास दूध का दो।
(4) उसे गर्म चाय का प्याला दे दो।
(5) पानी का एक तालाब भरा है।
(6) सेब की एक पेटी ले आना

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2. संज्ञा संबंधी दोष
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3. परसर्ग संबंधी अशुद्धियाँ
HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन 6

4. सर्वनाम संबंधी दोष
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5. लिंग संबंधी दोष
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6. विशेषण संबंधी दोष
HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन 9

7. वचन संबंधी दोष
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8. कारक की विभक्तियों संबंधी दोष
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9. क्रिया संबंधी दोष
HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन 12

10. मुहावरे संबंधी दोष
HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन 13

11. क्रिया-विशेषण संबंधी दोष
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12. अव्यय संबंधी दोष
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13. वाक्य-प्रयोग संबंधी दोष
HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन 16

14. एक भाषा पर दूसरी भाषा के प्रभाव से होने वाले दोष
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15. अनावश्यक एवं गलत शब्दों के प्रयोग संबंधी दोष
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16. विराम चिहून सबधी दोष
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17. अनुचित शब्दों संबंधी दोष

(1) विद्या प्राप्त करके मैं नौकरी करूँगा।(1) शिक्षा समाप्त करके मैं नौकरी करूँगा।
(2) स्वामी दयानंद आजन्म ब्रह्मचारी रहे।(2) स्वामी दयानंद आजीवन ब्रह्मचारी रहे।
(3) सुन्दरतापन प्रशंसनीय है।(3) सौंदर्य प्रशंसनीय है।
(4) वह मिठाई खाने के लिए सत्याग्रह कर रहा है।(4) वह मिठाई खाने की हठ कर रहा है।
(5) मैं आपका उपकार आजन्म नहीं भूलूँगा।(5) मैं आपका उपकार आजीवन नहीं भूलूँगा।

18. उपसर्ग संबंधी दोष

(1) आशा है सभी सकुशल होंगे।(1) आशा है सब सकुशल होंगे।
(2) गंगा का उतगम गंगोत्री है।(2) गंगा का उद्गम गंगोत्री है।
(3) उस बच्चे को दृष्टि लग गई है।(3) उस बच्चे को नजर लग गई है।
(4) यह मुँह और चने की दाल।(4) यह मुँह और मसूर की दाल ।
(5) उस पर घड़ों पानी फिर गया।(5) उस पर घड़ों पानी पड़ गया।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन

19. पुनरुक्ति संबंधी दोष

(1) तुम बेफिजूल बोल रहे हो।(1) तुम फिजूल बोल रहे हो।
(2) बादल पानी बरसते हैं।(2) बादल बरसते हैं।
(3) मैं वहाँ कदापि न जाऊँगा।(3) मैं वहाँ कदापि नहीं जाऊँगा।
(4) उसके भय से डरो मत।(4) उससे डरो मत।
(5) कृपया मेरे प्रश्न का उत्तर देने की कृपा करो।(5) मेरे प्रश्न का उत्तर देने की कृपा करो।
(6) मैंने गुनगुने गर्म पानी से स्नान किया।(6) मैंने गुनगुने पानी से स्नान किया।

20. संधि संबंधी दोष

(1) महार्षि दयानंद पाखंड के विरुद्ध थे।(1) महर्षि दयानंद पाखंड के विरुद्ध थे।
(2) मोहन का अंतष्करण पवित्र है।(2) मोहन का अंतःकरण पवित्र है।
(3) अब वह निरोग हो गया है।(3) अब वह नीरोग हो गया है।
(4) वह अत्याधिक खुश था।(4) वह अत्यधिक खुश था।

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अभ्यासार्थ कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran वाक्य-शोधन 20

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HBSE 12th Class Hindi कैसे लिखें कहानी

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions कैसे लिखें कहानी Questions and Answers, Notes.

Haryana Board 12th Class Hindi कैसे लिखें कहानी

प्रश्न 1.
कहानी के स्वरूप एवं परिभाषा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कहानी हमारे जीवन से अत्यधिक जुड़ी हुई है, बल्कि यह हमारे जीवन का अविभाज्य अंग है। जीवन में प्रत्येक व्यक्ति कहानी सुनता भी है और सुनाता भी है। हो सकता है उसके द्वारा सुनी या सुनाई गई कहानी का स्वरूप कुछ अलग हो। जब कोई व्यक्ति किसी बात को घुमा फिराकर कहता है तो सुनने वाला व्यक्ति कहता है कि मुझे कहानी मत सुनाओ। मुझे असली बात बताओ। जहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक होगा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभवों को बाँटना चाहता है और दूसरों के अनुभवों को सुनना चाहता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि हम सब अपनी बातें अपने साथियों को सुनाना चाहते हैं और उनकी बातों को सुनना चाहते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति में कहानी लिखने का भाव विद्यमान है। कुछ लोग इस भाव का विकास कर लेते हैं और कुछ नहीं कर पाते। अतः कहानी मानव मन की जिज्ञासा, उत्सुकता और कौतूहल को शांत करने में सहायक होती है।

आज भी कहानी साहित्य की लोकप्रिय विधा कही जा सकती है। कहानी की कहानी बहुत पुरानी है। विश्व की प्रत्येक भाषा में हमें कहानी साहित्य प्राप्त होता है। उदाहरण के रूप में भारत में पंचतंत्र की कहानियाँ काफी लोकप्रिय हैं। कहानी किसी एक की नहीं होती, कहानी कहने वालों और सुनने वालों की होती है। अकसर नानी, दादी से हम कहानियाँ सुनते रहते हैं परंतु कहानी क्या है? इसके बारे में विद्वानों ने अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं। कहानी के बारे में कोई सर्वसम्मत परिभाषा नहीं दी जा सकती। यहाँ एक-दो परिभाषाएँ दी जा रही हैं। एडगर एलियन के अनुसार-A short story is a narrative short enough to be read in a single sitting written to make an impression on the reader excluding all that does not forward that impression complete and final in itself. अर्थात् कहानी एक संक्षिप्त तथा प्रभावशाली आख्यान है। इसमें सीमित तथा प्रभावपूर्ण कथानक होता है और यह एक सीमित समय में पढ़ा जाता है।

हिंदी कहानीकार मुंशी प्रेमचंद के अनुसार-“गल्प ऐसी रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा-विन्यास सब उस एक भाव को पुष्ट करता है।”

संक्षेप में, हम कह सकते हैं “किसी घटना, पात्र या समस्या का क्रमबद्ध ब्योरा जिसमें परिवेश हो, द्वंद्वात्मकता हो, कथा का क्रमिक विश्वास हो, चरम उत्कर्ष का बिंदु हो, उसे कहानी कहा जा सकता है।” अन्य शब्दों में, हम कह सकते हैं

  1. कहानी में एकतथ्यता होती है जिसका संबंध घटना से होता है।
  2. घटना का स्थान अनुभूति भी ले सकती है।
  3. कहानी मनोरंजन करती है परंतु वह भावों को जागृत भी करती है।
  4. कहानी घटना-प्रधान भी हो सकती है और चरित्र-प्रधान भी।
  5. कहानी में तीव्रता और ताज़गी होनी चाहिए।
  6. कहानी की भाषा सहज, सरल तथा बोधगम्य होनी चाहिए।

HBSE 12th Class Hindi कैसे लिखें कहानी

प्रश्न 2.
कहानी के इतिहास का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
कहानी का इतिहास बहुत पुराना है। यह उतना ही पुराना है जितना कि मानव का इतिहास। कारण यह है कि कहानी मानव-स्वभाव और प्रकृति का अंग है। कहानी कहने की कला प्राचीनकाल से चली जा रही है। धीरे-धीरे इस कला का विकास होने लगा। प्राचीनकाल में कथावाचक कहानियाँ सुनाते थे। अकसर किसी घटना अथवा युद्ध, प्रेम या बदले की भावना के किस्से या कहानियाँ सुनाई जाती थीं। परंतु कहानी सुनाने वाला अब घटनाओं पर आधारित कहानी सुनाता था तो उसमें वह अपनी कल्पना का भी मिश्रण कर देता था। अकसर यह देखने में आया है कि मनुष्य वही कुछ सुनना चाहता है जो उसे प्रिय लगता है। उदाहरण के रूप में, हम यह मान लें कि हमारा नायक युद्ध में हार गया, परंतु हम यह सुनना चाहते हैं कि वह नायक बड़ी वीरता से लड़ा और उसने एक महान उद्देश्य के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए तो कथावाचक अपनी कल्पना का प्रयोग करते हुए नायक की वीरता का बखान करेगा।

वह तथ्यता में कल्पना का मिश्रण करेगा। ऐसा करने से श्रोता न केवल कथावाचक की प्रशंसा करेंगे, बल्कि उसे इनाम भी देंगे। मौखिक कहानी की परंपरा हमारे देश में प्राचीनकाल से चली आ रही है। यह परंपरा देश के अनेक भागों में भी विद्यमान है। विशेषकर राजस्थान में मौखिक कहानी की परंपरा लंबे काल से चली आ रही है। प्राचीनकाल में मौखिक कहानियाँ काफी लोकप्रिय होती थीं। इसका प्रमुख कारण यह था कि उस समय संचार का कोई ओर माध्यम नहीं था। यही कारण है कि धर्म प्रचारकों ने अपने सिद्धांतों तथा विचारों का प्रचार करने के लिए कहानी का आश्रय लिया। यही नहीं, शिक्षा देने के लिए भी कहानी का सहारा लिया गया। उदाहरण के रूप में पंचतंत्र में शिक्षाप्रद कहानियाँ लिखी गई हैं। अतः हम कह सकते हैं कि आदिकाल में ही कहानी के साथ उद्देश्य जुड़ गया। आगे चलकर उद्देश्य कहानी का एक अनिवार्य तत्त्व बन गया।

प्रश्न 3.
कहानी के केंद्रीय बिंदु ‘कथानक’ पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
वस्तुतः कथानक कहानी का केंद्र-बिंदु कहा जा सकता है। इसे हम कथावस्तु भी कहते हैं। एक परिभाषा के अनुसार कथानक वह तत्त्व है जिसमें कहानी का वह संक्षिप्त रूप जिसमें आरंभ से अंत तक कहानी की सभी घटनाओं और पात्रों का प्रयोग किया गया हो, उसे कथानक कहते हैं। कथानक कहानी का अनिवार्य तत्त्व है। इसके बिना कहानी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कहानीकार किसी एक मौलिक भाव या समस्याओं के लिए घटनाओं की योजना करता है।

इसी को हम कथानक कहते हैं। एक विद्वान ने कथानक को कहानी का प्रारंभिक नक्शा कहा है। जिस प्रकार मकान बनाने से पहले कागज़ पर एक नक्शा बनाया जाता है उसी प्रकार कहानी लिखने से पहले लेखक अपने मन में किसी घटना की जानकारी, अनुभव आदि का नक्शा तैयार कर लेता है। कभी तो कहानीकार पूरे कथानक की जानकारी पा लेता है और कभी कथानक के केवल एक सूत्र को ही प्राप्त कर पाता है।

उदाहरण के रूप में यदि कहानीकार को एक छोटा-सा प्रसंग या पात्र भा जाता है तो वह उसी को विस्तार देने में जुड़ जाता है। इसके लिए वह अपनी मौलिक कल्पना का प्रयोग करता है। पात्र कहानी की कल्पना कोरी कल्पना नहीं होती। यह ऐसी कल्पना नहीं होती जो असंभव हो बल्कि यह संभव कल्पना होती है। कल्पना का विस्तार करने के लिए कहानीकार के पास जो सूत्र होता है उसी के द्वारा वह कथानक को आगे बढ़ाता है। परिवेश, पात्र तथा समस्या से कहानीकार को यह सूत्र मिलता है।

इन तीनों के समन्वित आधार पर लेखक संभावनाओं के बारे में विचार करता है और एक संभव काल्पनिक ढाँचा तैयार करता है, लेकिन यह भी आवश्यक है कि लेखक का काल्पनिक ढाँचा उसके उद्देश्यों से मेल खाता हो। यहाँ एक मरीज का उदाहरण दिया जा सकता है जो पिछले एक सप्ताह से लगातार अस्पताल में आ रहा है परंतु डॉक्टर से मिलने के लिए उसकी बारी नहीं आती। यह सूत्र मिलने के बाद लेखक अस्पताल, वहाँ की व्यवस्था तथा पात्रों की गतिविधियों के बारे में सोचने लग जाएगा और साथ ही अपने उद्देश्य का भी निर्णय कर लेगा। यहाँ दो-तीन बातें हो सकती हैं। पहली बात यह है कि लेखक अस्पताल पर कहानी लिखना चाहता है अथवा वह मरीज की पीड़ा को आप तक पहुँचाना चाहता है अथवा वह मानवीय त्रासदी को सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ना चाहता है।

HBSE 12th Class Hindi कैसे लिखें कहानी

प्रश्न 4.
कथानक में आरंभ, मध्य और अंत के महत्त्व को स्पष्ट करें।
उत्तर:
कथानक को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-आरंभ, मध्य और अंत, इन तीनों के समन्वित रूप को हम कथानक कह सकते हैं। कथानक का आरंभ आकर्षक होना चाहिए। मध्य स्वाभाविक और कुतूहलवर्धक होना चाहिए और अंत आकस्मिक होने पर भी अप्रत्याशित नहीं होना चाहिए। एक पाश्चात्य विद्वान ने कथानक की तुलना रेस कोर्स के घोड़े के साथ की हैं जिसमें आरंभ और अंत का विशेष महत्त्व है जो कहानी को रोचक बनाता है। द्वंद्व का मतलब है-बाधा अर्थात् कहानी में परिस्थितियाँ इस प्रकार उपस्थित होती हैं कि उनके रास्ते में बाधा उत्पन्न हो जाती है जिससे द्वंद्व की उत्पत्ति उत्पन्न होती है। कथानक की पूर्णता तभी होगी जब कहानी नाटकीय ढंग से अपने उद्देश्य को पूरा करके समाप्त हो जाएगी, परंतु कहानी में अंत तक रोचकता बनी रहनी चाहिए। द्वंद्व के कारण भी रोचकता बनी रह सकती है।

प्रश्न 5.
कहानी में देशकाल, स्थान और परिवेश का क्या महत्त्व है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
कहानी की प्रत्येक घटना, पात्र और समस्या का अपना देशकाल, स्थान और परिवेश होता है। जब कहानी के कथानक का स्वरूप बनकर तैयार हो जाता है तब कहानीकार कथानक के देशकाल और स्थान को अच्छी प्रकार समझ लेता है। यहाँ इस बात का उल्लेख करना उचित होगा कि कहानी को प्रामाणिक तथा रोचक बनाने के लिए देशकाल और स्थान का विशेष महत्त्व होता है। उदाहरण के लिए, जब किसी सरकारी कार्यालय से कथानक लिया जाता है तो उस कार्यालय के पूरे परिवेश, ध्वनियों, कार्य-व्यापार, वहाँ के लोग, उनके आपसी संबंध, नित घटने वाली घटनाओं की जानकारी जरूरी होती है। लेखक जब कथानक को आधार बनाकर कहानी का विकास करने लगता है तब ये जानकारियाँ उसके लिए सहायक होती हैं। अतः प्रत्येक कहानी में देशकाल अथवा वातावरण का अपना महत्त्व है। यह कहानी का आवश्यक तत्त्व माना गया है।

प्रश्न 6.
कहानी में पात्रों के चरित्र-चित्रण का क्या महत्त्व है?
अथवा
कहानी में पात्रों की भूमिका को स्पष्ट करें।
उत्तर:
पात्रों का चरित्र-चित्रण कहानी में दूसरा तत्त्व माना गया है। कहानीकार कथावस्तु की योजना पात्र के चरित्र विकास की दृष्टि से करता है। कहानी में प्रत्येक पात्र का अपना स्वरूप, स्वभाव तथा उद्देश्य होता है। कभी तो उसके चरित्र का विकास होता है तो कभी उसका चरित्र बदलता है। पात्रों का स्वरूप स्पष्ट होना चाहिए। यदि स्वरूप स्पष्ट होगा तो पात्रों का चरित्र-चित्रण सहज हो सकेगा और संवाद लिखने में भी सुविधा होगी। यही कारण है कि कहानीकार ने पात्रों के चरित्र-चित्रण को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया है। इस तत्त्व के अंतर्गत पात्रों के आपसी संबंधों पर विचार करना जरूरी है। कहानीकार को इस बात का समुचित ज्ञान होना चाहिए कि किस स्थिति में किस पात्र की क्या प्रतिक्रिया होगी। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि कहानीकार और उसकी कहानी के पात्रों में समीपस्थ संबंध होना चाहिए।

पात्रों का चरित्र-चित्रण करने और उन्हें अधिक प्रभावशाली ढंग से लाने के अनेक तरीके हैं। चरित्र-चित्रण का सर्वाधिक सरल तरीका है कि कहानीकार स्वयं पात्रों के गुणों का वर्णन करे । जैसे-“मोहन बड़ा वीर सैनिक है, उसने युद्ध क्षेत्र में अनेक बार अपनी वीरता का परिचय दिया। वह अपनी जान की परवाह नहीं करता तथा शत्रुओं का डटकर सामना करता है।” परंतु यह तरीका प्रभावहीन होने के साथ-साथ पुराना पड़ चुका है। एक दूसरा तरीका भी है।

पात्रों का चरित्र-चित्रण उनके क्रियाकलापों, उनके संवादों तथा दूसरे लोगों द्वारा बोले गए संवादों से प्रभावशाली बन सकता है। उदाहरण देखिए-“मोहन ने युद्ध क्षेत्र में अपने एक जख्मी साथी को कँधे पर उठाकर सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया और उसके बाद वह पुनः शत्रुओं पर गोलियाँ बरसाने लगा। बाद में पता चला कि उसके साथी की जान बच गई थी।” इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि पात्र ने जो काम किया है, उससे उसके चरित्र का पता चलता है।

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कभी-कभी जब अन्य पात्र किसी चरित्र का वर्णन करते हुए संवादों का जो प्रयोग करते हैं उससे भी पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं का पता चलता है। जैसे-मोहन के बारे में एक सैनिक ने ग्रुप कमांडर को कहा, “सर! यह तो मोहन ही था जिसने अपनी जान की परवाह न करके बुरी तरह से घायल मुरलीधर को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया और फिर पुनः युद्ध में शत्रुओं पर गोलियाँ बरसाने लगा।”

कभी-कभी पात्रों की अभिरुचियों द्वारा भी उनका चरित्र-चित्रण किया जाता है। उदाहरण के रूप में, कोई पात्र नदी में तैरने का बड़ा शौकीन है। वह उभरती नदी को एक किनारे से दूसरे किनारे तैरकर पार कर लेता है। इससे पता चलता है कि वह एक साहसी व्यक्ति है। एक अन्य पात्र है जो बात-बात पर झूठ बोलता है। मौका लगने पर चोरी भी कर लेता है। कर्ज़ वापिस नहीं करता। रिश्वत भी लेता है। इस प्रकार के पात्र का स्वरूप अलग ही प्रकार का होगा।

प्रश्न 7.
कहानी में संवादों का क्या महत्त्व है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
कहानी में पात्रों के संवादों का विशेष महत्त्व है। संवाद के बिना पात्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कहानी में संवाद दो प्रकार के कार्य करते हैं। एक तो पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालते हैं दूसरा संवाद कथानक को गति प्रदान करते हैं, उसे आगे बढ़ाते हैं। कहानीकार जिस घटना अथवा प्रतिक्रिया को स्वयं नहीं दिखा पाता, वह उसे संवादों के माध्यम से दिखाता है। इसलिए संवाद कहानी के लिए अनिवार्य हैं, परंतु संवाद पात्रों के स्वभाव तथा उनकी पृष्ठभूमि के अनुकूल होने चाहिएँ।

यही नहीं, संवाद पात्रों के विश्वासों, आदर्शों तथा स्थितियों के अनुकूल भी होने चाहिएँ। कहानी में कहानीकार कभी सामने नहीं आता। संवादों के माध्यम से वह अपनी बात कहता है। जब कोई पात्र संवाद बोलता है तो उससे पात्र का परिचय मिल जाता है। उदाहरण के लिए, जब कोई शिक्षक संवाद बोलेगा तो संवादों को सुनकर ही उसके व्यवसाय का पता चल जाएगा। संक्षेप में, संवाद संक्षिप्त, स्वाभाविक और उद्देश्य से संबंधित होने चाहिएँ। अनावश्यक लंबे-लंबे दुरूह संवाद कहानी को जटिल बना देते हैं।

प्रश्न 8.
कहानी में चरम उत्कर्ष (क्लाइमेक्स) का क्या महत्त्व है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रत्येक कहानी का एक चरम उत्कर्ष होता है, जिसे अंग्रेज़ी में Climax कहते हैं। कहानी में क्लाइमेक्स की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब कहानी में वर्णित समस्या का उद्देश्य चरम-सीमा तक पहुँच जाता है। परंतु चरम उत्कर्ष का वर्णन बड़े ध्यान से करना चाहिए। चरम उत्कर्ष भावों तथा पात्रों से जुड़ा होना चाहिए। इस संदर्भ में एक विद्वान ने लिखा है, “सर्वोत्तम यह होता है कि चरम उत्कर्ष पाठक को स्वयं सोचने और लेखकीय पक्षधर की ओर आने के लिए प्रेरित करें लेकिन पाठक को यह भी लगे कि उसे स्वतंत्रता दी गई है और उसने जो निर्णय निकाले हैं, वे उसके अपने हैं।”

प्रश्न 9.
कथानक में द्वंद्व का क्या योगदान है?
उत्तर:
कथानक में मूलभूत तत्त्वों में द्वंद्व का विशेष महत्त्व होता है, क्योंकि द्वंद्व ही कथानक को गति प्रदान करता है। उदाहरण के रूप में यदि दो आदमियों के बीच किसी बात को लेकर कोई सहमति है तो उनके बीच कोई द्वंद्व नहीं होगा। इसका अभिप्राय यह हुआ कि उनकी बातचीत अब आगे नहीं बढ़ सकती। द्वंद्व दो विरोधी तत्त्वों के बीच टकराव या किसी की खोज में आने वाली बाधाओं, अंतर्द्वद्व आदि के कारण उत्पन्न होता है। यदि कहानीकार अपनी कहानी में द्वंद्व को स्पष्ट करेगा तो वह कहानी सफल मानी जाएगी।

अंत में कहानी लिखना भी एक कला है और इस कला को सीखने का सीधा एवं सरल उपाय है कि अच्छी कहानियाँ पढ़ी जाएँ और उनका विश्लेषण किया जाए। इससे कहानी लिखना सहज और कारगर होगा।

जब मैंने पहली कहानी लिखी:
चाहिए तो यह था कि मेरी पहली कहानी प्रेम-कहानी होती। उम्र के एतबार से भी यही मुनासिब था और अदब के एतबार से भी। पर प्रेम के लिए (और प्रेम कहानी के लिए भी) अनुकूल परिस्थितियाँ हों तब काम बने।

मैंने वही लिखा जो मेरे जैसे माहौल में पलने वाले सभी भारतीय युवक लिखते हैं-अबला नारी की कहानी। हिंदी के अधिकांश लेखकों का तो साहित्य में पदार्पण अबला नारी की कहानी से ही होता है और यह दुखांत होनी चाहिए। मैंने भी वैसा ही किया। बड़ी बेमतलब, बेतुकी कहानी थी, न सिर, न पैर और शुरू से आखिर तक मनगढ़ंत, पर चूँकि अबला नारी के बारे में थी और दुखांत थी, इसलिए वानप्रस्थी जी को भी कोई एतराज नहीं हो सकता था, और पिताजी को भी नहीं, इसलिए कहानी, कालिज पत्रिका में स्थान पा गई।

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पर इसके कुछ ही देर बाद एक प्रेम कहानी सचमुच कलम पर आ ही गई। नख-शिख से प्रेम-कहानी ही थी, पर किसी दूसरी दुनिया की कहानी, जिससे मैं परिचित नहीं था। तब मैं कालिज छोड़ चुका था, और पिताजी के व्यापार में हाथ बँटाने लगा था। कालिज के दिन पीछे छूटते जा रहे थे, और आगे की दुनिया बड़ी ऊटपटाँग और बेतुकी-सी नज़र आ रही थी।

हर दूसरे दिन कोई-न-कोई अनूठा अनुभव होता। कभी अपने घुटने छिल जाते, कभी किसी दूसरे को तिरस्कृत होते देखता। मन उचट-उचट जाता। तभी एक दिन बाज़ार में….मुझे दो प्रेमी नज़र आए। शाम के वक्त, नमूनों का पुलिंदा बगल में दबाए मैं सदर बाज़ार से शहर की ओर लौट रहा था, जब सरकारी अस्पताल के सामने, बड़े-से नीम के पेड़ के पास मुझे भीड़ खड़ी नज़र आई। भीड़ देखकर मैं यों भी उतावला हो जाया करता था, कदम बढ़ाता पास जा पहुँचा। अंदर झाँककर देखा तो वहाँ दो प्रेमियों का तमाशा चल रहा था। टिप्पणियाँ और ठिठोली भी चल रही थी। घेरे के अंदर एक युवती खड़ी रो रही थी और कुछ दूरी पर एक युवक ज़मीन पर बैठा, दोनों हाथों में अपना सिर थामे, बार-बार लड़की से कह रहा था, “राजो, दो दिन और माँग खा। मैं दो दिन में तंदुरुस्त हो जाऊँगा। फिर मैं मजूरी करने लायक हो जाऊँगा।”
और लड़की बराबर रोए जा रही थी। उसकी नीली-नीली आँखें रो-रोकर सूज रही थीं।
“मैं कहाँ से माँगूं? मुझे अकेले में डर लगता है।”
दोनों प्रेमी, आस-पास खड़ी भीड़ को अपना साक्षी बना रहे थे।
“देखो बाबूजी, मैं बीमार हूँ। इधर अस्पताल में पड़ा हूँ। मैं कहता हूँ दो दिन और माँग खा, फिर मैं चंगा हो जाऊगा।”
लड़की लोगों को अपना साक्षी बनाकर कहती, “यहाँ आकर बीमार पड़ गया, बाबूजी मैं क्या करूँ? इधर पुल पर मजूरी करती रही हूँ, पर यहाँ मुझे डर लगता है।”
इस पर लड़का तड़पकर कहता, “देख राजो, मुझे छोड़कर नहीं जा। इसे समझाओ बाबूजी, यह मुझे छोड़कर चली जाएगी तो इसे मैं कहाँ ढूंदूंगा।”
“यहाँ मुझे डर लगता है। मैं रात को अकेली सड़क पर कैसे रहूँ?”
पता चला कि दोनों प्रेमी गाँव से भागकर शहर में आए हैं, किसी फकीर ने उनका निकाह भी करा दिया है, फटेहाल गरीबी के स्तर पर घिसटने वाले प्रेमी! शहर पहुँचकर कुछ दिन तक तो लड़के को मज़दूरी मिलती रही। पास ही में एक पुल था। वह पुल के एक छोर से सामान उठाता और दूसरे छोर तक ले जाता, जिस काम के लिए उसे इकन्नी मिलती। कभी किसी की साइकल तो कभी किसी का गट्ठर। हनीमून पूरे पाँच दिन तक चला। दोनों ने न केवल खाया-पिया, बल्कि लड़के ने अपनी कमाई में से जापानी छींट का एक जोड़ा भी लड़की को बनवा कर दिया, जो उन दिनों अढ़ाई आने गज़ में बिका करती थी।

दोनों रो रहे थे और तमाशबीन खड़े हँस रहे थे। कोई लड़की की नीली आँखों पर टिप्पणी करता, कोई उनके ऐसे-वैसे’ प्रेम पर, और सड़क की भीड़ में खड़े लोग केवल आवाजें ही नहीं कसते, वे इरादे भी रखते हैं। और एक मौलवी जी लड़की की पीठ सहलाने लगे थे और उसे आश्रय देने का आश्वासन देने लगे थे। और प्रेमी बिलख-बिलख कर प्रेमिका से अपने प्रेम के वास्ते डाल रहा था।

तभी, पटाक्षेप की भाँति अँधेरा उतरने लगा था और पीछे अस्पताल की घंटी बज उठी थी जिसमें प्रेमी युवक भरती हुआ था, और वह गिड़गिड़ाता, चिल्लाता, हाथ बाँधता, लड़की से दो दिन और माँग खाने का प्रेमालाप करता अस्पताल की ओर सरकने लगा और मौलवी जी सरकते हुए लड़की के पास आने लगे, और घबराई, किंकर्तव्यविमूढ़ लड़की, मृग-शावक की भाँति सिर से पैर तक काँप रही थी…….

नायक भी था, नायिका भी थी, खलनायक भी था, भाव भी था, विरह भी कहानी का अंत अनिश्चय के धुंधलके में खोया हुआ भी था।

मैं यह प्रेम कहानी लिखने का लोभ संवरण नहीं कर सका। लुक-छिपकर लिख ही डाली, जो कुछ मुद्दत बाद ‘नीली आँखें शीर्षक से, अमृतरायजी के संपादकत्व में ‘हंस’ में छपी, इसका मैंने आठ रुपये मुआवज़ा भी वसूल किया जो आज के आठ सौ रुपये से भी अधिक था।

पाठ से संवाद

प्रश्न 1.
चरित्र-चित्रण के कई तरीके होते हैं ‘ईदगाह’ कहानी में किन-किन तरीकों का इस्तेमाल किया गया है? इस कहानी में आपको सबसे प्रभावशाली चरित्र किसका लगा और कहानीकार ने उसके चरित्र-चित्रण में किन तरीकों का उपयोग किया है?
उत्तर:
पात्रों का चरित्र-चित्रण कहानी का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। कथानक की आवश्यकतानुसार पात्र चरित्र-चित्रण के अनेक तरीके हैं। चरित्र-चित्रण का सबसे सरल तरीका तो यह है कि कहानीकार स्वयं किसी पात्र के गुणों का बखान करे, परंतु कहानी में यह तरीका प्रभावहीन और पुराना हो चुका है। इस पद्धति से कहानी प्रभावशाली नहीं होती। दूसरा तरीका यह है कि पात्रों का चरित्र-चित्रण उनके क्रिया-कलापों, संवादों तथा दूसरे लोगों के द्वारा बोले गए संवादों द्वारा करें। यह तरीका बड़ा प्रभावशाली व सफल माना गया है। उदाहरण के रूप में, “मुरलीधर ने एक गरीब आदमी को सरदी से ठिठुरते हुए देखा तो अपनी शाल उसे दे दी या। मुरलीधर का दोस्त स्कूल में फीस जमा कराने के लिए लाइन से बाहर निकल आया क्योंकि उसके पास पूरे पैसे नहीं थे। मुरलीधर ने दोस्त को बताए बिना फीस जमा करा दी।”

तीसरा तरीका है अन्य पात्र किसी पात्र का अपने संवादों के माध्यम से चरित्र-चित्रण करें। उदाहरण के रूप में, सदानंद अपने और मुरलीधर के मित्र कृष्ण से कहता है, “यार इतनी बड़ी प्रॉब्लम तो मुरलीधर ही ‘सॉल्व कर सकता है। चलो उसी के पास चलें।” जहाँ तक ‘ईदगाह’ कहानी का प्रश्न है वहाँ इसका चरित्र-चित्रण करते समय दूसरे और तीसरे तरीके का प्रयोग किया गया है, यद्यपि इस कहानी में अमीना, हामिद, महमूद, मोहसिन, नूरे, सम्मी आदि अनेक पात्र हैं, लेकिन इनमें हामिद का चरित्र सर्वाधिक प्रभावशाली हैं। उसका चरित्र-चित्रण करने में कहानीकार ने दूसरे और तीसरे तरीके का समन्वित प्रयोग किया है।

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प्रश्न 2.
संवाद कहानी में कई महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाता है। महत्त्व के हिसाब से क्रमवार संवाद की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संवाद कहानी का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इसे कथोपकथन या वार्तालाप भी कहते हैं। कहानीकार कथानक की घटनाओं को गति प्रदान करने के लिए संवादों का प्रयोग करता है तथा वह पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं के लिए भी संवादों का प्रयोग करता है। संवादों का महत्त्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि कहानीकार स्वयं परोक्ष रहकर कहानी के पात्रों के माध्यम से अपनी बात कहता है, परंतु कहानी के संवादों में सरलता, स्वाभाविकता, प्रसंगानुकूलता तथा रोचकता होनी चाहिए। लंबे-लंबे और आलंकारिक संवाद कथा की गति और रोचकता में बाधा पहुँचाते हैं। कहानी के संवाद बोधगम्य एवं पात्रानुकूल होने चाहिएँ। यदि संवाद क्रमवार होंगे तो उनकी भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण होगी।

संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि संवाद सरल, स्पष्ट और सरस होने चाहिएँ। उल्लेखनीय बात यह है कि संवाद पात्रानुकूल और प्रसंगानुकूल होने चाहिएँ, तभी वे अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाएंगे।

प्रश्न 3.
नीचे दिए गए चित्रों के आधार पर चार छोटी-छोटी कहानियाँ लिखें।
HBSE 12th Class Hindi कैसे लिखें कहानी 1उत्तर:
नोट-शिक्षक की सहायता से विद्यार्थी स्वयं लिखें।

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प्रश्न 4.
एक कहानी में कई कहानियाँ छिपी होती हैं। किसी कहानी को किसी खास मोड़ पर रोककर नई स्थिति में कहानी को नया मोड़ दिया जा सकता है। नीचे दी गई परिस्थिति पर कहानी लिखने का प्रयास करें सिद्धेश्वरी ने देखा कि उसका बड़ा बेटा रामचंद्र धीरे-धीरे घर की तरफ आ रहा है। रामचंद्र माँ को बताता है कि उसे अच्छी नौकरी मिल गई। आगे की कहानी आप लिखिए।
उत्तर:
रामचंद्र के मुख से यह सुनकर कि उसे अच्छी नौकरी मिल गई है सिद्धेश्वरी की खुशी का ठिकाना न रहा। उसे लगा कि गरीबी के दिन अब लद गए हैं। वह घर के सभी प्राणियों को अब ठीक से खाना परोस सकेगी। दूसरा बेटा पढ़ाई को पूरा कर सकेगा और छोटे बेटे का ठीक से इलाज हो सकेगा। इस पर सिद्धेश्वरी ने अपने बेटे से पूछा, “बेटा! वेतन कितना मिलेगा।” रामचंद्र ने उत्तर दिया कि माँ मुझे पाँच सौ रुपए मासिक मिलेगा।

सिद्धेश्वरी-बेटा, यह तो बड़ी खुशी की बात है, हमारे सारे कष्ट दूर हो जाएँगे। तुम्हारे पिता मुंशी चंद्रिका प्रसाद को भरपेट भोजन मिलेगा। मोहन अपनी पढ़ाई पूरी कर सकेगा और अब मैं प्रमोद का पूरा इलाज करवाऊँगी।

यह सुनकर रामचंद्र ने अपनी माँ के हाथ में सौ रुपए रख दिए। माँ ने पूछा कि यह पैसे कहाँ से आए। रामचंद्र-माँ, यह सौ रुपए मुझे पेशगी में मिले हैं। मेरी मिल का मालिक बड़ा ही दयालु व्यक्ति है, उसने मेरी योग्यता देखकर ही मुझे नौकरी दी है। माँ ये सब आपके और पिताजी के आशीर्वाद का परिणाम है।

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HBSE 12th Class Hindi Vyakaran समास-प्रकरण

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Samas-Prakaran समास-प्रकरण Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Vyakaran समास-प्रकरण

समास-प्रकरण

वर्गों के मेल से जहाँ संधि होती है, वहाँ शब्दों के मेल से समास बनता है। अन्य शब्दों में, दो या दो से अधिक शब्दों के मिलने से जो एक नया स्वतंत्र पद बनता है, उसे समास कहते हैं।

परिभाषा:
आपस में संबंध रखने वाले दो शब्दों के मेल को समास कहते हैं; जैसे राजा का महल = राजमहल । विधि के अनुसार = यथाविधि। समास करते समय परस्पर संबंध दिखाने वाले विभक्ति चिह्नों का लोप हो जाता है; जैसे ‘गंगा का जल’ = गंगाजल में का विभक्ति का लोप हो गया।

प्रश्न 1.
संधि और समास में क्या अंतर है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समास शब्दों (पद) में होता है, जबकि संधि वर्णों (अक्षरों) में होती है। समास करते समय विभक्तियाँ या संबंधबोधक शब्दों का लोप होता है। संधि में वर्गों का लोप नहीं होता केवल रूप बदल जाता है। समास का विग्रह करते समय नए शब्दों का आगम या कभी-कभी शब्दों का लोप भी हो जाता है; जैसे विद्या + आलय में वर्ण (आ + आ) रहते हैं किंतु प्रतिकूल (समास) में ‘कूल के विरुद्ध’ में प्रति का लोप और ‘के’ का आगम है।

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प्रश्न 2.
‘समस्त पद’ से क्या अभिप्राय है? सोदाहरण उत्तर दीजिए। उत्तर-समास द्वारा दो शब्दों को मिलाकर बनाए गए नए शब्द को समस्त पद कहते हैं; जैसे दीनबंधु, राजकुमार, महापुरुष। प्रश्न 3. ‘समास-विग्रह’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
समस्त पद या सामासिक शब्दों के बीच के संबंध को स्पष्ट करना समास-विग्रह कहलाता है। दीनबंधु, राजकुमार, महापुरुष।

प्रश्न 3.
‘समास-विग्रह’, किसे कहते हैं?
उत्तर:
समस्त पद या सामासिक शब्दों के बीच के संबंध को स्पष्ट करना समास-विग्रह कहलाता है। यथा-
शक्ति = शक्ति के अनुसार।
तुलसीकृत = तुलसी के द्वारा कृत।

समास के भेद

प्रश्न 4.
समास के कितने भेद होते हैं? प्रत्येक का सोदाहरण उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
समास के निम्नलिखित चार भेद होते हैं-
(1) अव्ययीभाव समास
(2) तत्पुरुष समास
(3) द्वंद्व समास
(4) बहुब्रीहि समास।

1. अव्ययीभाव समास

प्रश्न 1.
अव्ययीभाव समास किसे कहते हैं? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
जिस समास में पहला पद अव्यय हो तथा दूसरे शब्द से मिलकर पूरे समस्त पद को ही अव्यय बना दे, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं; जैसे-
यथाशक्ति – शक्ति के अनुसार
रातों-रात – रात ही रात में
यथाविधि – विधि के अनुसार
घर-घर – घर ही घर
यथामति – मति के अनुसार
द्वार-द्वार – द्वार ही द्वार
हरसाल – साल-साल
मन-मन – मन ही मन
हररोज – रोज-रोज
बीचों-बीच – बीच ही बीच
बेकाम – काम के बिना
दिनों-दिन – दिन ही दिन
बेशक – शक के बिना
धीरे-धीरे – धीरे ही धीरे
बेमतलब – मतलब के बिना
आजन्म – जन्म-पर्यन्त
निडर – बिना डर के
आजीवन – जीवन पर्यन्त

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2. तत्पुरुष समास

प्रश्न 1.
तत्पुरुष समास किसे कहते हैं? इसके कितने भेद होते हैं? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
जिस समास में दूसरा पद प्रधान हो, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। इस समास में कर्ता और संबोधन कारकों को छोड़कर शेष सभी कारकों के विभक्ति चिह्न लुप्त हो जाते हैं। जिस कारक की विभक्ति प्रयुक्त होती है, उसी के नाम पर तत्पुरुष समास का नामकरण होता है। विभक्तियों के अनुसार तत्पुरुष के छह उपभेद होते हैं; जैसे-
(i) कर्म तत्पुरुष
(ii) करण तत्पुरुष
(iii) संप्रदान तत्पुरुष
(iv) अपादान तत्पुरुष
(v) संबंध तत्पुरुष
(vi) अधिकरण तत्पुरुष।

(i) कर्म तत्पुरुष:
जिस समास में दो शब्दों के मध्य से कर्म-विभक्ति के चिह्नों का लोप होता है, उसे कर्म तत्पुरुष समास कहते हैं; जैसे परलोकगमन-परलोक को गमन, ग्रामगत ग्राम को (गमन) गत, शरणागत-शरण को आगत (आया हुआ) आदि।

(ii) करण तत्पुरुष-जिस समास में करण कारक का लोप हो, उसे ‘करण तत्पुरुष’ समास कहते हैं; जैसे-
रेखांकित – रेखा से अंकित
दईमारा – देव से मारा
तुलसीकृत – तुलसी द्वारा कृत
मुंहमांगा – मुँह से माँगा
हस्तलिखित – हाथ से लिखित
हृदयहीन – हृदय से हीन
रेलयात्रा – रेल द्वारा यात्रा
गुणयुक्त – गुणों से युक्त
मदांध – मद से अंध
मनमानी – मन से मानी

(iii) संप्रदान तत्पुरुष-जब समास करते समय संप्रदान कारक चिह्न ‘के लिए’ का लोप हो तो वह ‘संप्रदान तत्पुरुष’ कहलाता है; जैसे-
हथकड़ी – हाथों के लिए कड़ी
राज्यलिप्सा – राज्य के लिए लिप्सा
क्रीडाक्षेत्र – क्रीड़ा के लिए क्षेत्र
पाठशाला – पाठ के लिए शाला
रसोईघर – रसोई के लिए घर
मालगोदाम – माल के लिए गोदाम
सत्याग्रह – सत्य के लिए आग्रह
राहखर्च – राह के लिए खर्च
देशार्पण – देश के लिए अर्पण
युद्धभूमि – युद्ध के लिए भूमि

(iv) अपादान तत्पुरुष-जिस समास में अपादान कारक चिह्नों ‘से’ (जुदाई) का लोप हो तो उसे ‘अपादान तत्पुरुष समास’ कहते हैं; जैसे-
ऋणमुक्त – ऋण से मुक्त
देशनिकाला – देश से निकाला
भयभीत – भय से भीत
गुणहीन – गुण से हीन
पथभ्रष्ट – पथ से भ्रष्ट
धनहीन – धन से हीन
धर्मविमुख – धर्म से विमुख
जन्मांध – जन्म से अंधा

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(v) संबंध तत्पुरुष-समास करते समय जब संबंध कारक चिह्नों (का, के, की आदि) का लोप हो तो वहाँ ‘संबंध तत्पुरुष समास’ होता है; जैसे-
विश्वासपात्र – विश्वास का पात्र
राष्ट्रपति – राष्ट्र का पति
घुड़दौड़ – घोड़ों की दौड़
जन्मभूमि – जन्म की भूमि
माखनचोर – माखन का चोर
राजपुत्र – राजा का पुत्र
रामकहानी – राम की कहानी
राजसभा – राजा की सभा
राजकन्या – राजा की कन्या
रामदरबार – राम का दरबार
बैलगाड़ी – बैलों की गाड़ी
शासनपद्धति – शासन की पद्धति
सेनापति – सेना का पति
पनचक्की – पानी की चक्की

(vi) अधिकरण तत्पुरुष-जिस समास में अधिकरण कारक के विभक्ति चिह्नों का लोप किया जाता है, उसे अधिकरण तत्पुरुष समास कहते हैं; जैसे-
आपबीती – अपने पर बीती
घुड़सवार – घोड़े पर सवार
सिरदर्द – सिर में दर्द
रसमग्न – रस में मग्न
शरणागत – शरण में आगत
धर्मवीर – धर्म में वीर
दानवीर – दान में वीर
व्यवहारकुशल – व्यवहार में कुशल

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तत्पुरुष समास के कुछ अन्य उपभेद

प्रश्न 1.
तत्पुरुष समास के कुछ अन्य उपभेद कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
तत्पुरुष समास के कुछ अन्य उपभेद निम्नलिखित हैं-
(1) नञ् तत्पुरुष
(2) अलुक् तत्पुरुष
(3) उपपद तत्पुरुष
(4) कर्मधारय तत्पुरुष
(5) द्विगु तत्पुरुष ।

(क) नञ् तत्पुरुष

प्रश्न 2.
नञ् तत्पुरुष समास किसे कहते हैं? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
जब अभाव अथवा निषेध अर्थ को व्यक्त करने के लिए व्यंजन से पूर्व ‘अ’ तथा स्वर से पूर्व ‘अन्’ लगाकर समास बनाया जाता है तो उसे नञ् तत्पुरुष समास का नाम दिया जाता है; जैसे-
अहित – न हित
अस्थिर – न स्थिर
अपूर्ण – न पूर्ण
अनादि – न आदि
अनागत – न आगत
अज्ञान – न ज्ञान
अभाव – न भाव
अन्याय – न न्याय
असंभव – न संभव
अधर्म – न धर्म
अनंत – न अंत
अकर्मण्य – न कर्मण्य

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(ख) अलुक् तत्पुरुष

प्रश्न 3.
अलुक् तत्पुरुष समास की सोदाहरण परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
अलुक् का अर्थ है लोप न होना। संस्कृत में कुछ विशेष नियमों के अनुसार कुछ ऐसे शब्द हैं जिनमें तत्पुरुष समास होते हुए भी दोनों शब्दों के मध्य की विभक्ति का लोप नहीं होता, ऐसे शब्दों को अलुक् समास माना जाता है। ये सभी शब्द संस्कृत के हैं और हिंदी भाषा में ज्यों के त्यों प्रयुक्त होते हैं; जैसे-
मनसिज (काम-भावना) – मन में उत्पन्न
मृत्युंजय (शिव) – मृत्यु को जीतने वाला
वाचस्पति (विद्वान) – वाच (वाणी) का पति
खेचर (पक्षी) – आकाश में विचरने वाला
युधिष्ठिर – युद्ध में स्थिर

(ग) उपपद तत्पुरुष

प्रश्न 4.
उपपद समास किसे कहते हैं? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
जिस समस्त पद के दोनों शब्दों अथवा पदों के मध्य में से कोई पद लुप्त हो, उसे उपपद समास कहते हैं; जैसे-
रेलगाड़ी – रेल पर चलने वाली गाड़ी
बैलगाड़ी – बैलों से खींची जाने वाली गाड़ी
पनचक्की – पानी से चलने वाली चक्की
गोबर-गणेश – गोबर से बना गणेश
दही बड़ा – दही में डूबा हुआ बड़ा
पर्ण-कुटीर – पर्ण से बना कुटीर

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(घ) कर्मधारय तत्पुरुष

प्रश्न 5.
कर्मधारय तत्पुरुष समास की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
कर्मधारय तत्पुरुष, तत्पुरुष समास का ही एक भेद है। जिस समास में उत्तर पद प्रधान हो किंतु पूर्व पद एवं उत्तर पद में उपमान-उपमेय या विशेषण-विशेष्य का संबंध हो, उसे कर्मधारय तत्पुरुष समास कहते हैं; जैसे-
उपमान-उपमेय संबंध वाले उदाहरण-
चंद्रमुख – चंद्रमा के समान मुख
चरण कमल – कमल के समान चरण
मुखचंद्र – मुख रूपी चंद्र
कर कमल – कमल के समान कर
देहलता – देह रूपी लता
नरसिंह – सिंह के समान है जो नर
कनकलता – कनक की-सी लता
कमल नयन – कमल के समान नयन

विशेषण-विशेष्य संबंध के उदाहरण-
नीलगाय – नीली है जो गाय
पीतांबर – पीत (पीला) अंबर
नीलगगन – नीला है जो गगन
काली मिर्च – काली है जो मिर्च
नीलकमल – नीला है जो कमल
नरोत्तम – नर में (जो) उत्तम

(ङ) द्विगु

प्रश्न 6.
द्विगु समास की सोदाहरण परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
द्विगु समास वस्तुतः कर्मधारय समास का ही एक भेद है। इसमें पूर्व पद संख्यावाची होता है और दोनों में विशेषण-विशेष्य का संबंध होता है। यह समास समूहवाची भी होता है; जैसे-
त्रिलोकी – तीनों लोकों का स्वामी
चौराहा – चार राहों का समाहार
दोपहर – दो पहरों का समाहार
नवरत्न – नौ रत्नों का समूह
चौमासा – चार मासों का समाहार
सप्तर्षि – सात ऋषियों का समूह
नवरात्र – नौ रात्रियों का समाहार
अठन्नी – आठ आनों का समूह
शताब्दी – शत् (सौ) अब्दों (वर्षों) का समाहार
त्रिभुवन – तीन भवनों का समूह
पंचवटी – पाँच वटों का समाहार
पंचमढ़ी – पाँच मढ़ियों का समूह

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran समास-प्रकरण

3. द्वंद्व समास

प्रश्न 7.
द्वंद्व समास किसे कहते हैं? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
जिस समास में दोनों पद समान रूप से प्रधान हो, उसे द्वंद्व समास कहते हैं। समास बनाते समय ‘तथा’ या ‘और’ समुच्चयबोधक शब्दों का लोप हो जाता है; जैसे
गंगा-यमुना – गंगा और यमुना
रात-दिन – रात और दिन
जल-थल – जल और थल
गुण-दोष – गुण और दोष
माता-पिता – माता और पिता
नर-नारी – नर और नारी
धनी-मानी – धनी और मानी
दाल-रोटी – दाल और रोटी
तीन-चार – तीन और चार
घी-शक्कर – घी और शक्कर
छात्र-छात्राएँ – छात्र और छात्राएँ
राजा-रंक – राजा और रंक
पृथ्वी-आकाश – पृथ्वी और आकाश
बच्चे-बूढ़े – बच्चे और बूढ़े

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran समास-प्रकरण

4. बहुब्रीहि समास

प्रश्न 8.
बहुब्रीहि समास की सोदाहरण परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
जब समस्त पद के दोनों पदों में से कोई भी पद प्रधान न हो तथा कोई बाहर का पद प्रधान हो तो उसे बहुब्रीहि समास कहते हैं। बहुब्रीहि समास का समस्त पद अन्य पद के लिए विशेषण का कार्य करता है; जैसे-
बारहसिंगा – बारह सींगों वाला
चतुर्भुज – चार भुजाओं वाला
महात्मा – महान आत्मा वाला
पतझड़ – जिसमें पत्ते झड़ जाते हैं
गिरिधर – गिरि को धारण करने वाला
पतिव्रता – एक पति का व्रत लेने वाली
दशानन – दस हैं आनन जिसके (रावण)
विशाल हृदय – विशाल है हृदय जिसका
जितेंद्रिय – इंद्रियों को जीतने वाला
कनफटा – फटे कानों वाला
चंद्रमुखी – चंद्र जैसे मुख वाली
पीतांबर – पीले हैं अंबर जिसके (श्रीकृष्ण)
नीलकंठ – नीला है कंठ जिसका (शिव)
सुलोचना – सुंदर हैं लोचन जिसके (स्त्री विशेष)
चक्रपाणि – चक्र है पाणि (हाथ) में जिसके (विष्णु)
लंबोदर – लंबे उदर वाला (गणेश जी)
दुरात्मा – दुष्ट (बुरी) आत्मा वाला
धर्मात्मा – धर्म में आत्मा लीन है जिसकी

परीक्षोपयोगी कुछ महत्त्वपूर्ण समास

निम्नलिखित समस्त पदों का विग्रह करके समास का नाम लिखें-
HBSE 12th Class Hindi Vyakaran समास-प्रकरण - 1
HBSE 12th Class Hindi Vyakaran समास-प्रकरण - 2
HBSE 12th Class Hindi Vyakaran समास-प्रकरण - 3

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HBSE 12th Class Hindi नाटक लिखने का व्याकरण

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions नाटक लिखने का व्याकरण Questions and Answers, Notes.

Haryana Board 12th Class Hindi नाटक लिखने का व्याकरण

प्रश्न 1.
नाटक और अन्य विधाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
साहित्य में अनेक विधाएं हैं। प्राचीन काल में इंद्रियों के आधार पर काव्य के दो भेद किए थे-दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य। दृश्य काव्य का संबंध नाटक से है और श्रव्य काव्य का संबंध कविता, कहानी, उपन्यास आदि से है। संस्कृत में तो दृश्य काव्य को श्रव्य काव्य से उत्कृष्ट माना गया है। संस्कृत में कहा भी गया है

“काव्येषु नाटकम् रम्यम्”

नाटक अपनी कुछ निजी विशेषताओं के कारण दूसरों से सर्वथा अलग है। जहाँ नाटक देखने के लिए लिखा जाता है, वहीं अन्य सभी विधाएँ पढ़ने के लिए होती हैं। नाटक को यदि हम अलग कर दें तो श्रव्य काव्य के भी पद्य और गद्य दो भेद किए जा सकते हैं।

पद्य के अंतर्गत महाकाव्य, खंडकाव्य, गीतिकाव्य, मुक्तक काव्य आदि की चर्चा की जाती है। गद्य के अंतर्गत उपन्यास, कहानी, निबंध, आलोचना, रेखाचित्र, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत आदि विभिन्न विधाओं की चर्चा की जाती है। परंतु इन सभी विधाओं में नाटक को अधिक महत्त्व दिया जाता है। अन्य विधाएँ अपने लिखित रूप में एक निश्चित और अंतिम रूप को प्राप्त कर लेती हैं। नाटक अपने लिखित रूप में एक आयामी होता है। रंगमंच पर अभिनीत होने पर नाटक पूर्णता को प्राप्त करता है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि साहित्य की अन्य विधाएँ पढ़ने या सुनने के लिए होती हैं। परंतु नाटक पढ़ने व सुनने के साथ-साथ मंच पर अभिनीत करने के लिए होते हैं।

HBSE 12th Class Hindi नाटक लिखने का व्याकरण

प्रश्न 2.
“नाटक में समय का बंधन होता है-” इसका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जब नाटककार नाटक लिखने बैठता है तो उसे समय की सीमा का ध्यान रखना होता है। इसी को हम समय का बंधन कहते हैं। नाटक रंगमंच पर दो से ढाई घंटे की अवधि में अभिनीत किया जाना चाहिए। दर्शकों के पास इतना समय नहीं होता कि वे नाटक को लंबे समय तक देख सकें। यही कारण है कि नाटककार समय सीमा का ध्यान रखकर ही नाटक की रचना करता है। नाटककार नाटक लिखते समय भले ही भूतकाल एवं भविष्यत्काल से विषय का चयन करे परंतु उसे अपने नाटक को वर्तमान काल में ही संयोजित करना होता है।

यही कारण है कि नाटक के मंच निर्देश वर्तमान काल में ही लिखे जाते हैं। जहाँ तक उपन्यास, कहानी, कविता आदि का प्रश्न है, वे चाहे किसी ऐतिहासिक या पौराणिक घटना से संबंधित हों, वे वर्तमान में बिना किसी बाधा के पढ़े जा सकते हैं। परंतु नाटक में सभी घटनाएँ एक विशेष स्थान पर, विशेष समय तथा वर्तमान काल में घटित होना चाहिए। हम अतीत की घटनाओं को नाटक में पुनः घटित होने देखना चाहते हैं।

नाटक में समय के बंधन के बारे में एक और तथ्य का उल्लेख करना आवश्यक है। साहित्य की अन्य विधाओं-कहानी, उपन्यास, कविता को हम पढ़ते-पढ़ते अथवा सुनते हुए किसी कारणवश छोड़ सकते हैं और बाद में वहीं से आरंभ कर सकते हैं परंतु नाटक में ऐसा संभव नहीं है। यदि कोई दर्शक अभिनीत किए जाने वाले नाटक को बीच में छोड़कर चला जाता है तो वह पुनः नाटक के उस भाग को नहीं देख सकता।

नाटककार को इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि दर्शक कितने समय तक अपने सामने नाटक के कथानक को घटित होते हुए देख सकता है। नाटक में जिस चरित्र का निर्माण किया गया है उसका पूरा विकास भी होना चाहिए। इसलिए नाटक में समय का बंधन आवश्यक है। नाटक में प्रायः तीन अंक होते हैं। इसलिए नाटककार को समय का ध्यान रखते हुए अंकों का विभाजन करना होता है। भरत द्वारा रचित नाट्यशास्त्र ने प्रत्येक को यह निर्देश दिया गया है कि वह नाटक के प्रत्येक अंक की समय सीमा 48 मिनट रखे।

प्रश्न 3.
नाटक के तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
जहाँ तक नाटक के तत्त्वों का प्रश्न है, भारतीय विद्वानों में नाटक के केवल तीन तत्त्व माने हैं-वस्तु, नेता तथा रस। परंतु नाटक के अंतर्गत उन्होंने वृत्ति का विवेचन भी किया है और अभिनय को नाटक का मूल तत्त्व माना है। इस रूप में कथावस्तु पात्रों का चरित्र-चित्रण, रस तथा अभिनय, वृत्ति नाटक के पाँच तत्त्व कहे जाते हैं। परंतु पश्चिम आचार्यों ने नाटक के छः तत्त्व माने हैं। ये हैं

  1. कथावस्तु
  2. पात्र और चरित्र-चित्रण
  3. संवाद (कथोपकथन)
  4. उद्देश्य
  5. भाषा-शैली
  6. देशकाल

परंतु सातवाँ तत्त्व अभिनेयता भी आवश्यक है।
(1) कथावस्तु-यह नाटक का प्रथम महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। सर्वप्रथम नाटककार को नाटक का कथ्य किसी कहानी के रूप में किसी शिल्प अथवा फोरम द्वारा प्रस्तुत करना होता है। यदि नाटककार को शिल्प या संरचना की समुचित जानकारी होगी तभी वह यह कार्य संपन्न कर पाएगा। उसे इस बात का हमेशा ध्यान रखना होता है कि नाटक मंच पर अभिनीत होना है। ऐसी स्थिति में घटनाओं स्थितियों (दृश्यों) का चुनाव करता है फिर उसे क्रमानुसार नियोजित करता है। उसे शून्य से शिखर तक की यात्रा पूरी करनी होती है। तभी वह नाटक की कथावस्तु का सही ढंग से निर्माण कर सकता है।

(2) संवाद-नाटक का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व संवाद है। अन्य विधाओं में संवाद उतना आवश्यक नहीं है जितना कि नाटक के लिए। नाटक में तनाव, उत्सुकता, रहस्य, रोमांच, उपसंहार आदि स्थितियों का होना नितांत आवश्यक है और इसके लिए परस्पर विरोधी विचारधाराओं के संवाद नाटक को चार चाँद लगा देते हैं। यही कारण है कि भारतीय और पाश्चात्य नाट्यशास्त्रियों ने नायक, की परिकल्पना की थी। यदि संवाद क्रियात्मक और दृश्यात्मक होंगे तो वे अधिक प्रभावशाली सिद्ध होंगे। जिस नाटक में इस तत्त्व की प्रधानता होती है वही नाटक अधिक सफल सिद्ध होता है। यदि संवाद असंख्य संभावनाओं को उजागर करते हैं तो वे बड़े ही सशक्त माने जाते हैं। हैमलेट और स्कन्दगुप्त के दो उदाहरण देखिए- हैमलेट-टू बी और नॉट टू बी, स्कन्दगुप्त-अधिकार सुख कितना मादक और सारहीन है।

(3) पात्र और चरित्र चित्रण-नाटक में जितना संवादों का महत्त्व है उतना ही पात्रों का भी है। पात्रों की उपस्थिति से ही संवादों की संभावना उत्पन्न होती है। जब भी दो चरित्र आपस में मिलते हैं तो उनमें विचारों की टकराहट अवश्य उत्पन्न होती है। यही कारण है कि रंगमंच को प्रतिरोध का सशक्त माध्यम माना गया है। पात्र यथा स्थिति को स्वीकार नहीं करता। उसमें अस्वीकार की स्थिति बनी रहती है। कोई भी जीता-जागता संवेदनशील प्राणी संतुष्ट नहीं रह सकता। यदि नाटक में असंतुष्टि, प्रतिरोध और अस्वीकार जैसे नकारात्मक तत्त्व होंगे तो वह निश्चय ही सफल नाटक सिद्ध होगा।

जो नाटक व्यवस्था य समर्थन के लिए लिखे जाते हैं वे अधिक लोकप्रिय नहीं होते। यही कारण है कि ये हमारे नाटककार राम की अपेक्षा रावण, प्रह्लाद की अपेक्षा हिरण्यकश्यप, कृष्ण की अपेक्षा कंस आदि पात्रों की ओर अधिक आकर्षित हुए हैं। नाटकों के पात्र, सपाट, सतही और टाइप्ड नहीं होने चाहिए अर्थात् वे कठपुतली पात्र न होकर गतिशील होने चाहिए। पात्रों को स्थितियों के अनुसार अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए। नाटक के पात्र हाड़-माँस से बने हुए जीवन्त होने चाहिए। कविता, कहानी अथवा उपन्यास के शाब्दिक पात्र नहीं होने चाहिए।

(4) उद्देश्य उद्देश्य भी नाटक का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। वस्तुतः नाटककार कथानक तथा संवादों के माध्यम से नाटक के उद्देश्य को अभिव्यक्त करता है। नाटक के शिल्प और संरचनाओं द्वारा ही नाटककार अपने कथ्य को व्यंजित करता है। नाटक का उद्देश्य आज के जटिल जीवन से ही संबंधित होना चाहिए। वह जीवन की विभिन्न समस्याओं तथा कठिन परिस्थितियों से भी संबंधित होना चाहिए।

(5) शिल्प-शिल्प नाटक की वह तकनीक है जिसके द्वारा नाटककार अपना कथ्य प्रस्तुत करता है। शिल्प की दृष्टि से हमारे नाटक के सामने अनेक विकल्प विद्यमान हैं। संस्कृत नाटकों में शास्त्रीय शिल्प का विधान है। लोक नाटकों का शिल्प लिखित रूप में नहीं है। यह मौखिक रचना प्रक्रिया के माध्यम से घटित होता है पारसी नाटकों का एक अलग प्रकार का शिल्प है जिसमें शेरो-शायरी, गीत-संगीत और अतिरंजित संवादों द्वारा नाटक अभिनीत किया जाता है। इब्सन का अनुसरण करते हुए यथार्थवादी नाटकों में प्रायः गद्य का ही प्रयोग किया जाता है। इसके साथ-साथ नुक्कड़ नाटकों का एक अलग प्रकार का शिल्प है। नाटककार को इनमें से एक शिल्प का चयन करना होता है।

इस प्रकार भाषा-शैली, देशकाल आदि अन्य तत्त्व इसी शिल्प में ही समाहित हो जाते हैं।

HBSE 12th Class Hindi नाटक लिखने का व्याकरण

पाठ से संवाद

प्रश्न 1.
“नाटक की कहानी बेशक भूतकाल या भविष्यकाल से संबद्ध हो, तब भी उसे वर्तमान काल में ही घटित होना पड़ता है”-इस धारणा के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर:
नाटक में कुछ ऐसे भी कथानक होते हैं जिनका संबंध भूतकाल से होता है अथवा भविष्यकाल से होता है। लेकिन नाटककार को दोनों स्थितियों में अपने नाटक को वर्तमान काल में संयोजित करना पड़ता है। यही कारण है कि नाटक में रंगमंच के संकेत हमेशा लिखे रहते हैं और इनका संबंध वर्तमानकाल से होता है। हम वर्तमानकाल में किसी विशेष समय अथवा विशेष घटना को नाटक द्वारा प्रस्तुत कर सकते हैं। नाटक में उसका कथानक और कथ्य दर्शकों की आँखों के सामने घटित होता जान पड़ेगा, तभी दर्शक नाटक पर विश्वास कर सकेगा। उसे देखकर आनन्द प्राप्त कर सकेगा।

प्रश्न 2.
“संवाद चाहे कितने भी तत्सम और क्लिष्ट भाषा में क्यों न लिखे गए हों, स्थिति और परिवेश की माँग के अनुसार यदि वे स्वाभाविक जान पड़ते हैं तो उनके दर्शक तक संप्रेषित होने में कोई मुश्किल नहीं है। क्या आप इससे सहमत हैं? पक्ष या विपक्ष में तर्क दें।।
उत्तर:
हम इस कथन से सहमत हैं कि संवाद चाहे कितने भी तत्सम और क्लिष्ट भाषा में क्यों न लिखे गए हों, स्थिति व परिवेश की माँग के अनुसार यदि वे स्वाभाविक जान पड़ते हों तो उनके दर्शक तक संप्रेषित होने में कोई मुश्किल नहीं होती। कारण यह है कि संवाद हमेशा स्थिति और परिवेश के अनुसार ही लिखे जाने चाहिए। उदाहरण के रूप में यदि किसी पौराणिक आख्यान पर नाटक लिखा गया हो तो स्थिति और परिवेश का संबंध पौराणिक काल से ही होगा।

पात्रों की वेशभूषा उसी काल की होगी और दर्शक भी उसी स्थिति और परिवेश से जुड़ जाएगा। ऐसी स्थिति में तत्सम तथा क्लिष्ट भाषा में लिखे संवाद भी दर्शकों को समझ में आने लगेंगे। परंतु यदि आधुनिक स्थिति और परिवेश से जुड़ा नाटक अभिनीत किया जाएगा तो सहज, सरल और स्वाभाविक हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए और उसमें आवश्यकतानुसार अंग्रेज़ी तथा उर्दू के शब्दों का मिश्रण भी किया जा सकता है। नाटक तथा उसके संवाद स्थिति और परिवेश पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 3.
समाचार पत्र के किसी कहानीनुमा समाचार से नाटक की रचना करें।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

HBSE 12th Class Hindi नाटक लिखने का व्याकरण

प्रश्न 4.
(क) अध्यापक और शिक्षक के बीच गृह-कार्य को लेकर पाँच-पाँच संवाद लिखिए।
(ख) एक घरेलू महिला एवं रिक्शा चालक को ध्यान में रखते हुए पाँच-पाँच संवाद लिखिए।
उत्तर:
(क)

  • अध्यापक मोहन! तुम बसंत ऋतु पर निबंध लिखकर क्यों नहीं लाए?
  • मोहन-श्रीमान ! मुझे रात को बुखार हो गया था।
  • अध्यापक-यदि तुम्हें बुखार था तो आज स्कूल कैसे आ गए?
  • मोहन-सुबह उठते ही मेरा बुखार उतर गया था। इसलिए मैं स्कूल पढ़ने के लिए आ गया।
  • अध्यापक-तुम झूठ बोल रहे हो। ऐसा नहीं हो सकता कि कल रात तुम्हें बुखार हो गया और तुम आज स्कूल आ गए।
  • मोहन-नहीं, श्रीमान! मैं ठीक कह रहा हूँ। मुझे कल रात बुखार हो गया था।
  • अध्यापक-यदि ऐसी बात है तो अपने पिता जी को कल सुबह अपने साथ लाना। मैं उनसे बात करूँगा।
  • मोहन श्रीमान! पिता जी क्या आवश्यकता है? उन्हें दफ्तर जाना होता है।
  • अध्यापक-तुम पिछले कई दिनों से ठीक से पढ़ाई नहीं कर रहे हो। तुम कई बार कक्षा में अनुपस्थित भी रहते हो।
  • मोहन (सिर झुकाए हुए)-श्रीमान क्षमा कर दीजिए आगे से ऐसा नहीं करूँगा।
  • अध्यापक-यदि तुम कल अपने पिता जी को नहीं लाए तो स्कूल से तुम्हारा नाम काट दिया जाएगा।
  • मोहन-श्रीमान ऐसा न करना। कल मैं पिता जी को साथ लेकर आऊँगा।

(ख)

  • घरेलू महिला-अरे भई, रिक्शा वाले यहाँ से पुराने हाउसिंग बोर्ड तक कितने पैसे लोगे?
  • रिक्शा चालक-बीबी जी! बीस रुपये लगेंगे।
  • घरेलू महिला-देखो भई। ये तो बहुत ज्यादा पैसे हैं।
  • रिक्शा चालक-इतनी धूप पड़ रही है, इतनी दूर तक रिक्शा चलाना आसान नहीं है।
  • घरेलू महिला-नहीं भइया। ये तो बहुत अधिक पैसे हैं। मैं तुम्हें दस रुपए दे सकती हूँ।
  • रिक्शा चालक-नहीं बीबी जी। भगवान ने पेट हमारे साथ भी लगा रखा है और ऊपर से महँगाई ने मारा।
  • घरेलू महिला-नहीं भइया! बीस रुपये तो अधिक हैं। महँगाई तो हमारे साथ भी है।
  • रिक्शा चालक-अच्छा बीबी जी आप मुझे पंद्रह रुपए दे देना।
  • घरेलू महिला-पंद्रह रुपए भी अधिक हैं परंतु घर तो जाना ही है, चलो।
  • रिक्शा चालक-ठीक है बीबी जी पंद्रह रुपए ही दे देना।

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