HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 14 एक कहानी यह भी

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 14 एक कहानी यह भी Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 14 एक कहानी यह भी

HBSE 10th Class Hindi एक कहानी यह भी Textbook Questions and Answers

एक कहानी यह भी के प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 1.
लेखिका के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा?
उत्तर-लेखिका की इस रचना को पढ़कर पता चलता है कि उनके व्यक्तित्व पर उनके पिता जी और प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का प्रभाव पड़ा था। लेखिका के व्यक्तित्व में अच्छी-बुरी आदतें उनके पिता जी के जीवन से आई हैं। उन्होंने लेखिका की तुलना उनकी बड़ी बहिन के साथ करके हीन भावना पैदा की जिसकी शिकार वह आज तक है। उन्होंने उन्हें शक्की व विद्रोही बनाया। लेखिका को देश-प्रेमी और समाज के प्रति जागरूक बनाने में भी उनके पिता का सहयोग रहा है। उन्होंने उसे रसोई के कार्यों से दूर रखकर एक प्रबुद्ध एवं निडर व्यक्ति बनाया। अतः लेखिका के व्यक्तित्व पर उनके पिता का प्रभाव स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है।

लेखिका अपनी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल के जीवन से भी अत्यधिक प्रभावित रही है। लेखिका को अध्ययनशील, क्रांतिकारी व आंदोलनकारी बनाने में शीला अग्रवाल का भी योगदान रहा है। शीला अग्रवाल ने लेखिका को महान साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़ने के लिए उपलब्ध करवाईं, जिससे उसके मन में साहित्य के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ। आगे चलकर वे स्वयं एक महान् लेखिका बनीं। उन्होंने अपनी जोशीली बातों से लेखिका के व्यक्तित्व में जोश और क्रांति के शोले भड़का दिए।

एक कहानी यह भी पाठ के प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 2.
इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भटियारखाना’ कहकर क्यों संबोधित किया है?
उत्तर-
भटियारखाना’ का शाब्दिक अर्थ है वह स्थान जहाँ सदा भट्टी जलती रहती है अथवा जहाँ चूल्हा जलता रहता है। दूसरा अर्थ है भटियारे का घर, जहाँ पर लोग भट्टी पर आकर जमा हो जाते हैं और खूब शोरगुल मचाते हैं। पाठ के संदर्भ में पहला अर्थ अधिक उचित प्रतीत होता है। रसोई घर में हर समय कुछ-न-कुछ पकाया जाता है। लेखिका के पिता स्वयं एक विद्वान, लेखक, समाज-सुधारक और देश-भक्त थे। वे अपने बच्चों को घर-गृहस्थी तक सीमित नहीं रखना चाहते थे, विशेषकर लड़कियों को। वे उन्हें उदार हृदय, विचारवान, जागरूक नागरिक व देश-भक्त बनाना चाहते थे। इसलिए वह रसोईघर के कामों को उपेक्षा व हीनभाव से देखते थे और इसी संदर्भ में उन्होंने रसोई को भटियारखाने की संज्ञा दी है।

Ek Kahani Yah Bhi Solution HBSE 10th Class प्रश्न 3.
वह कौन-सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर?
उत्तर-
लेखिका के कॉलेज के प्रिंसिपल ने उनके पिता के नाम पत्र लिखा था कि उन्हें उसके (लेखिका के) विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी होगी। इस संबंध में उनके पिता जी को कॉलेज बुलाया गया था। पिता जी पत्र देखकर आग-बबूला हो उठे। उन्हें लगा कि पाँच बच्चों में से लेखिका उनका नाम मिट्टी में मिला देगी। उसी भावना से वे कॉलेज पहुँचे। पिता जी के जाने के बाद लगा कि पाँच बच्चों में से लेखिका उनका नाम मिट्टी में मिला देगी। उसी भावना से वे कॉलेज पहुँचे। पिता जी के जाने के बाद लेखिका पड़ोस में जाकर बैठ गई ताकि पिता जी के लौटने पर उनके क्रोध से बचा जा सके। किंतु जब वे कॉलेज से घर लौटे तो बहुत प्रसन्न थे। उनका चेहरा गर्व से चमक रहा था। वे घर आकर बोले कि उसका (लेखिका का) कॉलेज की लड़कियों पर पूरा रोब है। पूरा कॉलेज उसके इशारे पर खाली हो गया था। पिता जी को उस पर गर्व था कि वह समय के अनुसार देश के साथ कदम मिलाकर चल रही है। इसलिए उसे रोकना असंभव है। यह सुनकर लेखिका को न अपने कानों पर विश्वास हुआ न आँखों पर, किंतु यह सच्चाई थी।

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Ek Kahani Yeh Bhi Question Answers HBSE 10th Class प्रश्न 4.
लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
लेखिका के पिता के व्यक्तित्व और विचारधारा में विरोधाभास स्पष्ट रूप में देखा जा सकता था। एक ओर वे आधुनिकता के समर्थक थे। वे औरतों को रसोई तक या घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं देखना चाहते थे। उनके अनुसार औरतों को अपनी प्रतिभा और क्षमता का प्रयोग घर के बाहर के कार्यों में भी करना चाहिए। इससे उन्हें यश व सम्मान मिलेगा। किंतु साथ ही वे यह भी सहन नहीं करते थे कि लड़कियाँ लड़कों के साथ मिलकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लें। वे नारी की स्वतंत्रता को घर की चारदीवारी से दूर नहीं देखना चाहते थे। किंतु लेखिका के लिए पिता जी की सीमाओं में बँधना बहुत कठिन था। इसलिए लेखिका की अपने पिता जी से वैचारिक टकराहट रहती थी।

Ek Kahani Yah Bhi Question Answer HBSE 10th Class प्रश्न 5.
इस आत्मकथ्य के आधार पर स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्रण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका को रेखांकित कीजिए।
उत्तर-
लेखिका के विद्यार्थी जीवन का समय देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के आंदोलनों की प्रगति का समय था। सन् 1946-47 के दिन थे। उस समय किसी के लिए भी घर में चुप बैठना असंभव था। चारों ओर प्रभात – फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस, भाषणबाजी हो रही थी। हर युवा, बच्चा और बूढ़ा अपनी क्षमता के अनुसार स्वाधीनता प्राप्ति के आंदोलनों में भाग ले रहा था। लेखिका देश की राजनीति और समाज के प्रति जागरूक थी। कॉलेज की हिंदी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल के जोश भरे विचारों से लेखिका के मन में जोश के साथ कार्य करने का उन्माद भर गया था। लेखिका ने राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले आंदोलनों व हड़तालों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। प्रभात फेरियाँ निकालीं, कॉलेज में हड़ताल करवाई, छात्र/छात्राओं को इकट्ठा करके जुलूस के रूप में सड़कों पर निकलना, भाषणों से भीड़ में जोश भर देना आदि कार्य किए। उस समय उनकी रगों में आज़ादी प्राप्ति का जोश रूपी लावा बह रहा था। इस जोश ने उसके अंदर के डर को समाप्त कर दिया था। अतः स्पष्ट है कि लेखिका ने यथाशक्ति एवं योग्यता के अनुसार स्वाधीनता आंदोलन में अपना योगदान दिया था।

रचना और अभिव्यक्ति

Ek Kahani Yeh Bhi Class 10 Question Answers HBSE प्रश्न 6.
लेखिका ने बचपन में अपने भाइयों के साथ गिल्ली डंडा तथा पतंग उड़ाने जैसे खेल भी खेले, किंतु लड़की होने के कारण उनका दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था। क्या आज भी लड़कियों के लिए स्थितियाँ ऐसी ही हैं या बदल गई हैं, अपने परिवेश के आधार पर लिखिए।
उत्तर-
लेखिका ने भले ही अपने भाइयों के साथ लड़कों जैसे खेल-खेले हों। किंतु लड़की होने के कारण उसकी सीमाएँ घर की चारदीवारी तक ही थीं। वह लड़कों की भाँति घर के बाहर खेलने नहीं जा सकती थी। किंतु समय के अनुसार लड़कियों की स्थिति भी बदली है। लड़कियों को जीवन में विकास करने के समान अवसर प्रदान किए जाने लगे हैं। लड़कियाँ हर क्षेत्र में लड़कों के समान आगे बढ़ रही हैं। अब उनके कार्य की सीमाएँ घर की चारदीवारी तक ही सीमित नहीं रहीं। अब वे आत्म-निर्भर बन गई हैं और अपनी रक्षा और दूसरों की सहायता करने में भी सक्षम हैं। लड़कियों को जीवन में विकास करने हेतु माता-पिता से भी भरपूर सहयोग दिया जा रहा है। आज के युग में लड़कियाँ हर क्षेत्र में लड़कों से आगे निकल रही हैं। वे समाज व राष्ट्र के प्रति भी जागरूक हैं। अब लड़के व लड़कियों के कार्य क्षेत्र व कार्य क्षेत्र की सीमाओं में भेद नहीं रह गया है।

Class 10 Hindi Ek Kahani Yeh Bhi Question Answers HBSE प्रश्न 7.
मनुष्य के जीवन में आस-पड़ोस का बहुत महत्त्व होता है। परंतु महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः ‘पड़ोस-कल्चर’ से वंचित रह जाते हैं। इस बारे में अपने विचार लिखिए। .
उत्तर-
निश्चय ही मनुष्य के जीवन में आस-पड़ोस का अत्यधिक महत्त्व होता है। आस-पड़ोस का मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास में सहयोग रहता है। आस-पड़ोस से बच्चों में निर्भयता, आत्मीयता और अपनेपन के भाव का विकास होता है। किंतु बड़े शहरों में रहने वाले लोग प्रायः ‘पड़ोस-कल्चर’ के इस सुख से वंचित रह जाते हैं। वहाँ यह कल्वर उत्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि वहाँ सब लोग अपने तक सीमित रहते हैं। यही कारण है कि वहाँ लोग पड़ोस-कल्चर से अनभिज्ञ रहते हैं। आस-पड़ोस के सहयोग से बच्चों का पालन-पोषण भी समुचित रूप से होता है। बच्चे का समाज से परिचय आस-पड़ोस के माध्यम से ही होता है।

आस-पड़ोस के लोगों से मिलजुल कर रहने की भावना का विकास होता है। आगे चलकर ऐसे बच्चों का समाज में भी समायोजन अच्छी प्रकार हो सकता है। आस-पड़ोस के लोग आपस में सुख – दुःख बाँटते हैं। अच्छे-बुरे की पहचान भी बच्चे आस-पड़ोस से ही करते हैं। आस-पड़ोस के कारण ही व्यक्ति दुःख के समय अपने आपको अकेला अनुभव नहीं करता। किंतु बड़े शहरों में व्यक्ति घर में तो अकेला होता ही है किंतु आस-पड़ोस में भी परिचय न होने के कारण वह बाहर भी अकेला ही अनुभव करता है। सभी लोग अपने जीवन को अपने ढंग से जीना पसंद करते हैं। इसलिए वहाँ के लोग एकाकीपन के कारण असुरक्षा, असहाय और मानसिक तनाव के शिकार हो जाते हैं इसलिए मानव जीवन में आस-पड़ोस का होना अति अनिवार्य है। परंतु महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः इस सुख से वंचित रह जाते हैं।

Class 10 Hindi Chapter Ek Kahani Yeh Bhi Question Answers HBSE प्रश्न 8.
लेखिका द्वारा पढ़े गए उपन्यासों की सूची बनाइए और उन उपन्यासों को अपने पुस्तकालय में खोजिए।
उत्तर-
लेखिका ने ‘सुनीता’, ‘शेखरः एक जीवनी’, ‘नदी के द्वीप’, ‘त्यागपत्र’ एवं ‘चित्रलेखा’ उपन्यासों के अतिरिक्त शरत्, प्रेमचंद, जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा के अनेक उपन्यास पढ़े थे। विद्यार्थी इन उपन्यासों को अपने पुस्तकालय में देखें।

Ek Kahani Yah Bhi Summary HBSE 10th Class प्रश्न 9.
आप भी अपने दैनिक अनुभवों को डायरी में लिखिए।
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है। छात्र स्वयं करें।

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भाषा-अध्ययन-

एक कहानी यह भी HBSE 10th Class प्रश्न 10.
इस आत्मकथ्य में मुहावरों का प्रयोग करके लेखिका ने रचना को रोचक बनाया है। रेखांकित मुहावरों को ध्यान में रखकर कुछ और वाक्य बनाएँ
उत्तर-
(क) इस बीच पिता जी के एक निहायत दकियानूसी मित्र ने घर आकर अच्छी तरह पिता जी की लू उतारी।
(ख) वे तो आग लगाकर चले गए और पिता जी सारे दिन भभकते रहे।
(ग) बस अब यही रह गया है कि लोग घर आकर थू-थू करके चले जाएँ।
(घ) पत्र पढ़ते ही पिता जी आग-बबूला।
उत्तर-
लू उतारी-अवसर मिलते ही मैंने अपने घमंडी पड़ोसी की खूब लू उतारी। आग लगाना मेरे स्वार्थी मित्रों ने प्राचार्य के कार्यालय में मेरे विरुद्ध खूब आग लगाई और अपना स्वार्थ सिद्ध किया। थू-थू करना-जब एक चोर अंधी बुढ़िया के पैसे छीनता हुआ पकड़ा गया तो लोगों ने उस पर थू-थू की। आग-बबूला होना-विद्यालय के प्रांगण में शोर मचाते हुए लड़कों को देखकर प्रिंसिपल साहब आग-बबूला हो उठे।

पाठेतर सक्रियता

इस आत्मकथ्य से हमें यह जानकारी मिलती है कि कैसे लेखिका का परिचय साहित्य की अच्छी पुस्तकों से हुआ। आप इस जानकारी का लाभ उठाते हुए अच्छी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने का सिलसिला शुरू कर सकते हैं। कौन जानता है कि आप में से ही कोई अच्छा पाठक बनने के साथ-साथ अच्छा रचनाकार भी बन जाए।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

लेखिका के बचपन के खेलों में लँगड़ी टाँग, पकड़म-पकड़ाई और काली-टीलो आदि शामिल थे। क्या आप भी यह खेल खेलते हैं। आपके परिवेश में इन खेलों के लिए कौन-से शब्द प्रचलन में हैं। इनके अतिरिक्त आप जो खेल खेलते हैं, उन पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी रही है। उनके बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए और उनमें से किसी एक पर प्रोजेक्ट तैयार कीजिए। उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

HBSE 10th Class Hindi एक कहानी यह भी Important Questions and Answers

विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

Class 10th Hindi Ek Kahani Yah Bhi Question Answer HBSE प्रश्न 1.
लेखिका के कुंठित होने तथा हीन भावना से ग्रसित होने के क्या कारण थे?
उत्तर-
लेखिका बचपन से ही शारीरिक दृष्टि से कमज़ोर और काले रंग की थी। जबकि लेखिका की बड़ी बहिन, जो उससे दो वर्ष बड़ी थी, स्वस्थ व गोरे रंग की थी। लेखिका के पिता दोनों बहिनों की तुलना करते और उनकी बड़ी बहिन की तारीफ करते। इसका लेखिका के व्यक्तित्व पर बुरा असर पड़ा।
इसी कारण उसके जीवन में हीन भावना की ग्रंथि अथवा कुंठा का समावेश हो गया था जिससे लेखिका आजीवन उभर नहीं सकी थी।

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प्रश्न 2.
लेखिका किन साहित्यकारों के साहित्य को पढ़कर उनसे प्रभावित हुई थी?
उत्तर-
लेखिका के कॉलेज की हिंदी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से जब उनका परिचय हुआ और उनके संपर्क में आई तो उन्होंने लेखिका को प्रेमचंद, जैनेंद्र, अज्ञेय, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल आदि साहित्यकारों की प्रमुख रचनाएँ पढ़ने को दी। लेखिका इन सब का साहित्य पढ़कर इनसे प्रभावित हुए बिना न रह सकी। किंतु लेखिका जैनेंद्र की लेखन शैली से विशेष रूप से प्रभावित हुई। उनकी छोटे-छोटे वाक्यों से युक्त भाषा-शैली लेखिका को बहुत पंसद आई थी। उनका ‘सुनीता’ उपन्यास भी उन्हें बहुत अच्छा लगा था। अज्ञेय जी का ‘शेखर : एक जीवनी’ और ‘नदी के द्वीप’ उपन्यासों को पढ़कर लेखिका उनकी मनोवैज्ञानिक शैली पर मुग्ध हुई थी। जब लेखिका स्वयं साहित्यकार बनी तो इन सबकी शैलियों का प्रभाव उनकी कथात्मक रचनाओं में किसी-न-किसी रूप में देखा जा सकता है।

प्रश्न 3.
अजमेर में आने से पहले लेखिका का परिवार कहाँ रहता था? उनकी आर्थिक दशा कैसी थी?
उत्तर-
अजमेर में आने से पहले लेखिका का परिवार इंदौर में रहता था। उस समय उनके परिवार की आर्थिक दशा ठीक थी। नगर में उनके परिवार का पूरा सम्मान एवं प्रतिष्ठा थी। लेखिका के पिता समाज-सुधारक थे और कांग्रेस पार्टी के साथ भी जुड़े हुए थे। धन-धान्य से संपन्न होने के कारण इनके पिता जी अत्यंत उदार स्वभाव के व्यक्ति थे। गरीब बच्चों की सहायता करने में वे सबसे आगे रहते थे।

प्रश्न 4.
किस कारण लेखिका के पिता उसे अपने साथ रखने के इच्छुक थे?
उत्तर-
लेखिका की बड़ी बहिन सुशीला का विवाह हो गया था और उसके दोनों बड़े भाई पढ़ने के लिए बाहर चले गए थे। उसके अकेले रह जाने के कारण पिता जी का ध्यान उन पर गया। वे उन्हें घर के कामों में लगाने की अपेक्षा देश व समाज के कार्यों में लगाना चाहते थे। वे औरतों की प्रतिभा को रसोईघर में नष्ट करने के पक्ष में नहीं थे। इसलिए उनके पिता घर में होने वाली राजनैतिक बैठकों व सभाओं में लेखिका को अपने साथ रखते थे ताकि वह देश व समाज की वस्तुस्थिति से अवगत हो सके। यद्यपि उस समय लेखिका बहुत छोटी थी फिर भी उसे देश पर कुर्बान होने वाले लोगों की कहानियाँ और उनके विचार बहुत अच्छे लगते थे।

प्रश्न 5.
लेखिका बचपन में कौन-कौन से खेल खेलती थी?
उत्तर-
लेखिका बचपन में अपनी बड़ी बहिन सुशीला के साथ मिलकर सतेलिया, लंगड़ी-टाँग, पकड़म-पकड़ाई, काली-टीलो आदि खेल-खेलती थी। उसने अपनी अन्य सहेलियों के साथ गुड्डे-गुड़ियों के विवाह रचाने के खेल भी खेले थे। इसके अतिरिक्त भाइयों के साथ मिलकर पतंग भी उड़ाई थी।

प्रश्न 6.
लेखिका के पिताजी की सबसे बड़ी कमजोरी क्या थी?
उत्तर-
यश-लिप्सा लेखिका के पिता जी की सबसे बड़ी कमजोरी थी। वह चाहते थे कि सब लोग उनकी प्रशंसा करें। वह विशिष्ट बनकर जीना चाहते थे। उनका मत था कि मनुष्य को ऐसे काम करने चाहिए कि समाज में उसका नाम हो। उसकी प्रतिष्ठा बढ़े। उसकी एक विशेष पहचान बन जाए।

प्रश्नन 7.
लेखिका के दूसरे बहिन-भाई अपनी माँ के प्रति कैसा व्यवहार करते थे?
उत्तर-
लेखिका और उसके दूसरे बहिन-भाई माँ को अत्यंत सरल एवं भोली मानते थे। वे उसके प्रति सहानुभूति रखते थे, किंतु उससे अपनी उचित-अनुचित हर प्रकार की माँग पूरी करवा लेते थे। वह भी सबकी इच्छाएँ यथाशक्ति पूरी कर देती थी। इसलिए सबका माँ के प्रति गहरा लगाव था। जब माँ पिता के क्रोध का शिकार बनती थी तो सबकी सहानुभूति माँ के प्रति ही रहती थी।

प्रश्न 8.
‘पड़ोस-कल्चर’ समाप्त होने के कारण मनुष्य को क्या-क्या हानियाँ उठानी पड़ रही हैं?
उत्तर-
लेखिका का मत है कि ‘पड़ोस-कल्चर’ से समाज व व्यक्ति दोनों को बहुत लाभ होते हैं। इससे हमें अधिक सुरक्षा, अपनेपन का भाव अथवा आत्मीयता का भाव मिलता है। ‘पड़ोस-कल्चर’ के कारण ही हम पूरे पड़ोस व मोहल्ले को अपना घर समझते हैं तथा बिना हिचक के एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं। किंतु आज के भौतिकवादी व प्रतियोगिता के युग में फ्लैट-कल्चर के विकास के कारण ‘पड़ोस-कल्चर’ समाप्त हो गया। इससे हम अकेलेपन, असुरक्षा, असहायता की भावना से ग्रस्त हो गए हैं। ‘पड़ोस-कल्चर’ के अभाव का बच्चों के मन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 9.
परंपराओं को लेकर लेखिका ने क्या कहा है?
उत्तर-
परंपराओं के विषय में लेखिका ने कहा है कि हमारी परंपराएँ हमारा आसन्न भूतकाल बनकर हमारा पीछा नहीं छोड़तीं। वे हमारे जीवन के साथ-साथ चली आती हैं। उनकी अभिव्यक्ति भी भिन्न रूपों में होती है। समय के बदलने पर परंपरा के प्रति विद्रोह की भावना भी व्यक्त होती है। परंपराएँ समय के अनुकूल घटती व जुड़ती रहती हैं। लेखिका अच्छी परंपराओं का पालन करने के पक्ष में और जीवन के विकास में बाधा बनने वाली परंपरा को छोड़ देने में ही लाभ देखती हैं।

प्रश्न 10.
लेखिका के जीवन में बनी हीन भावना की ग्रंथि का क्या कुप्रभाव पड़ा?
उत्तर-
लेखिका के जीवन में बहिन की अपेक्षा कम सुंदर एवं कमज़ोर होने के कारण हीन-भावना की ग्रंथि ने घर कर लिया था। वे इस भावना से कभी मुक्त नहीं हो सकी। उनका व्यक्तित्व इस भावना से दबकर रह गया था। वह स्वयं को हीन-समझती थी। इसका सबसे बड़ा कुप्रभाव यह पड़ा कि यदि उसने जीवन में कोई उपलब्धि प्राप्त भी की तो वह इसे तुक्का या बाइचांस ही समझती थी। उसे अपनी योग्यता का परिणाम नहीं मानती थी।

प्रश्न 11.
लेखिका के व्यक्तित्व का विकास कब और कैसे हुआ?
उत्तर-
लेखिका की बहिन सुशीला विवाहोपरांत ससुराल चली गई और भाई पढ़ने हेतु बाहर चले गए। तब इनके पिता ने इनकी ओर विशेष ध्यान दिया। इनके व्यक्तित्व के विकास का यही सही अवसर था। इनके पिता इन्हें घर में होने वाली बैठकों में अपने साथ रखते। इससे उन्हें देश और समाज की दशा को समझने का अवसर मिला। इसके कारण ही इनके मन में देश व समाज के प्रति जागरूकता का विकास हुआ। आगे चलकर इनका संपर्क हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से हुआ। उन्होंने इन्हें विभिन्न साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़ने को दी। इससे उनके मन में साहित्य को समझने व लिखने का उत्साह हुआ। शीला अग्रवाल की जोशीली बातों ने इनके जीवन को क्रांतिकारी बना दिया। अतः स्पष्ट है कि पिता के संपर्क और सहयोग तथा शीला अग्रवाल की संगति और जोशीली बातों से लेखिका के व्यक्तित्व का विकास हुआ।

प्रश्न 12.
डॉ. अंबालाल ने लेखिका की किस रूप में सहायता की थी?
उत्तर-
डॉ. अंबालाल लेखिका के पिता के गहरे मित्र थे। उन्होंने नगर के चौराहे पर लेखिका का भाषण सुना। उससे वे अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने लेखिका को ऐसे भाषण के लिए न केवल शाबाशी ही दी अपितु उनके पिता के सामने उसकी खूब जमकर प्रशंसा भी की। बेटी की तारीफ सुनकर पिता का हृदय गर्व से फूला नहीं समाया था। इससे लेखिका पिता की डाँट खाने से बची और पिता ने उन्हें ऐसे कार्यों में भाग लेने के लिए कभी मना नहीं किया।

प्रश्न 13.
कॉलेज की प्रिंसिपल मन्नू से क्यों दुःखी थी?
उत्तर-
उस समय देश में स्वाधीनता आंदोलन पूरे जोरों पर चल रहे थे। संपूर्ण देश जोश और उत्साह से भरा हुआ था। मन्नू भी इन आंदोलनों में पूरे जोश और उत्साहपूर्वक भाग लेती थी। वह प्रभात-फेरियाँ निकालती। जुलूसों व हड़तालों में भी भाग लेती। उसके भाषण बड़े जोशीले होते थे। उसकी एक आवाज़ पर कॉलेज की छात्राएँ कॉलेज से बाहर आकर एकत्रित हो जाती थीं। वह स्वाधीनता के प्रश्न को लेकर कई बार कॉलेज में हड़ताल भी करवा चुकी थी। प्रिंसिपल के लिए कॉलेज चलाना कठिन हो गया था। मन्नू की इन हरकतों के कारण प्रिंसिपल महोदया परेशान थीं। उन्होंने मन्नू के पिता को कॉलेज बुलाया था ताकि उसके विरुद्ध अनुशासनहीनता फैलाने के लिए कार्रवाई की जा सके।

प्रश्न 14.
शीला अग्रवाल और लेखिका के विरुद्ध कॉलेज प्रशासन ने क्या कार्रवाई की और उसका परिणाम क्या निकला?
उत्तर-
शीला अग्रवाल और लेखिका को कॉलेज में अनुशासन-हीनता फैलाने के अपराध हेतु और लड़कियों को भड़काने के अपराध में कॉलेज से निकालने का नोटिस दे दिया था। यह प्रिंसिपल की आंदोलन को दबाने की चाल थी। किंतु लेखिका व अन्य छात्र नेत्रियों ने कॉलेज से बाहर ऐसा आंदोलन चलाया कि कॉलेज में थर्ड इयर की कक्षा चलानी पड़ी और शीला अग्रवाल तथा लेखिका को भी कॉलेज में ले लिया गया।

विचार/संदेश संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न 15.
‘एक कहानी यह भी’ नामक पाठ का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर-
“एक कहानी यह भी’ नामक आत्मकथ्य में लेखिका ने बताया है कि स्वतंत्रता प्राप्त करने का अधिकार केवल पुरुषों का नहीं, अपितु स्त्रियों का भी है और स्त्रियों को अपने इस अधिकार का उपयोग करना चाहिए। इस पाठ को पढ़कर लड़कियों को देश के विकास के कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
इस पाठ से हमें यह संदेश मिलता है कि हमें अपनी यथाशक्ति देश के कार्यों में भाग लेकर देश को उन्नति की डगर पर ले जाना चाहिए। हमें अपने पूर्वजों का आदर करना चाहिए, यदि वे हमारे कार्यों में किसी प्रकार की बाधा बनते हैं तो हमें सीधी टक्कर लेने की अपेक्षा उन्हें समझा-बुझाकर अपना काम करते रहना चाहिए। इस पाठ का यह भी संदेश है कि हमें अच्छी परंपराओं का पालन करना चाहिए और अतीत की भूलों को ध्यान में रखकर वर्तमान व भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहिए।

प्रश्न 16.
लेखिका की माँ कैसी महिला थी? वह लेखिका का आदर्श क्यों नहीं बन सकी?
उत्तर-
लेखिका की माँ एक शांत स्वभाव वाली नारी थी। वह अनपढ़ और घरेलू नारी थी। वह धैर्यशील और सहनशील भी थी। उसका सारा जीवन और सोच अपने पति व बच्चों के इर्द-गिर्द घूमता था। वह हर समय बच्चों और पति की सेवा के लिए तत्पर रहती थी और बिना बात के पति के क्रोध का भाजन बनती थी। उसने कभी किसी के प्रति कोई शिकायत या मन-मुटाव नहीं किया। उनका जीवन घर-रसोई तक सीमित था। उन्होंने आजीवन किसी से कुछ नहीं माँगा और पति के क्रोध के आगे थर-थर काँपती रहती थी। उसने सदा दूसरों को दिया ही है, माँगा कुछ नहीं। इतने उच्च विचार होने पर भी वह लेखिका का आदर्श इसलिए नहीं बन सकी क्योंकि लेखिका का स्वभाव क्रांतिकारी था। वह आंदोलन करके सब कुछ प्राप्त करना चाहती थी। संघर्ष में उसका विश्वास था।

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प्रश्न 17.
गरीबी का जीवन पर कुप्रभाव पड़ता है। कैसे?
उत्तर-
गरीबी का मानव-जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। गरीबी से मनुष्य के जीवन की खुशियाँ छिन जाती हैं। वह निराशा में डूब जाता है। उसे सदा अपने परिवार के पालन-पोषण की चिंता सताती रहती है। उसकी उदारता, सदाशयता आदि भावनाएँ भी नष्ट हो जाती हैं। वह कंजूस एवं शक्की भी बन जाता है। वह क्षुब्ध एवं कुंठित हो जाता है। उसमें काम करने का साहस भी धीमा पड़ जाता है। कभी-कभी उसका जीवन क्रोध और भय जैसे नकारात्मक भावों से भर जाता है। पठित पाठ में लेखिका के पिता को अमीरी से गरीबी के दिन देखने पड़े थे। वह अपनों के द्वारा धोखा दिए जाने पर गरीब हो गया। उसके जीवन में गरीबी ने नकारात्मक भाव भर दिए थे।

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अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘एक कहानी यह भी’ पाठ की लेखिका का क्या नाम है?
उत्तर-
‘एक कहानी यह भी’ पाठ की लेखिका मन्नू भंडारी हैं।

प्रश्न 2.
मन्नू भंडारी ने किस वर्ष अपनी दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की थी?
उत्तर-
मन्नू भंडारी ने सन् 1945 में अपनी दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की थी।

प्रश्न 3.
मन्नू भंडारी को किस रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हुई?
उत्तर-
मन्नू भंडारी को उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

प्रश्न 4.
मन्नू भण्डारी को जैनेन्द्र कुमार का कौन-सा उपन्यास बहुत अच्छा लगा?
उत्तर-
सुनीता’।

प्रश्न 5.
मन्नू भण्डारी की यादों का सिलसिला किस शहर से शुरू होता है?
उत्तर-
मन्नू भण्डारी की यादों का सिलसिला अजमेर शहर से शुरू होता है।

प्रश्न 6.
मन्नू भण्डारी की माताजी किस कक्षा तक पढ़ी थीं?
उत्तर-
मन्नू भण्डारी की माता जी अनपढ़ थीं।

प्रश्न 7.
लेखिका ने अपने पिता के शक्की स्वभाव का क्या कारण बताया?
उत्तर-
लेखिका ने अपने पिता के शक्की स्वभाव का कारण अपनों द्वारा विश्वासघात बताया।

प्रश्न 8.
अज्ञेय का कौन-सा उपन्यास मन्नू भण्डारी की समझ के सीमित दायरे में समा नहीं पाया?
उत्तर-
‘नदी के द्वीप’।

प्रश्न 9.
जैनेन्द्र का कौन-सा उपन्यास लेखिका को पसंद आया था?
उत्तर-
जैनेन्द्र का ‘सुनीता’ उपन्यास लेखिका को पसंद आया था।

प्रश्न 10.
लेखिका और उनके पिता के बीच टकराव का क्या कारण था?
उत्तर-
लेखिका और उनके पिता के बीच विचारों की भिन्नता के कारण टकराव था।

प्रश्न 11.
मन्नू भण्डारी का जन्म कहाँ हुआ?
उत्तर-
मन्नू भण्डारी का जन्म जिला मंदसौर (मध्य प्रदेश) के गाँव भानपुरा में हुआ था।

प्रश्न 12.
लेखिका की हिन्दी प्राध्यापिका का क्या नाम था?
उत्तर-
लेखिका की हिन्दी प्राध्यापिका का नाम श्रीमती शीला अग्रवाल था।

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बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मन्नू भंडारी ने किसके जीवन को वर्णित किया है?
(A) पिता
(B) चाचा
(C) चाची
(D) बुआ
उत्तर-
(A) पिता

प्रश्न 2.
मन्नू भंडारी ने किस विषय में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की थी?
(A) हिंदी
(B) संस्कृत
(C) अंग्रेज़ी
(D) इतिहास
उत्तर-
(A) हिंदी

प्रश्न 3.
मन्नू भंडारी की माध्यमिक शिक्षा राजस्थान के किस शहर में संपन्न हुई?
(A) जोधपुर
(B) बीकानेर
(C) अजमेर
(D) जयपुर
उत्तर-
(C) अजमेर

प्रश्न 4.
मन्नू भंडारी की रचना ‘आपका बंटी’ किस विधा के अन्तर्गत आती है?
(A) एकांकी
(B) उपन्यास
(C) कहानी.
(D) निबन्ध
उत्तर-
(B) उपन्यास

प्रश्न 5.
मन्नू भंडारी की सम्माननीय/पसंदीदा प्राध्यापिका का क्या नाम था?
(A) शीला अग्रवाल
(B) मनीषा यादव
(C) शालिनी गुप्ता
(D) ज्योति गोयल
उत्तर-
(A) शीला अग्रवाल

प्रश्न 6.
लेखिका के पति कौन थे?
(A) हरेन्द्र
(B) धर्मेन्द्र
(C) राजेन्द्र
(D) सुरेन्द्र
उत्तर-
(C) राजेन्द्र

प्रश्न 7.
लेखिका ने दसवीं कक्षा कब पास की?
(A) सन् 1940 में
(B) सन् 1945 में
(C) सन् 1942 में
(D) सन् 1947 में
उत्तर-
(B) सन् 1945 में

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प्रश्न 8.
अजमेर से पहले लेखिका के पिता जी कहाँ रहते थे?
(A) दिल्ली
(B) आगरा
(C) पटना
(D) इन्दौर
उत्तर-
(D) इन्दौर

प्रश्न 9.
लेखिका के पिता जी इन्दौर से अजमेर क्यों आ गए थे?
(A) आर्थिक झटका
(B) ट्रांसफर
(C) व्यापार
(D) पारिवारिक कलह
उत्तर-
(A) आर्थिक झटका

प्रश्न 10.
लेखिका के पिता का शब्दकोश था-
(A) शब्दवार
(B) घटनावार
(C) विषयवार
(D) मुहावरावार
उत्तर-
(C) विषयवार

प्रश्न 11.
उस मनोवैज्ञानिक तत्त्व का नाम लिखें जिसके बीच मन्नू भण्डारी के पिता जीते थे-
(A) अन्तर्विरोध
(B) स्थैर्य
(C) शीलता
(D) अनुशासन
उत्तर-
(A) अन्तर्विरोध

प्रश्न 12.
लेखिका महानगरों में किसकी कमी को महसूस करती है-
(A) पड़ोस संस्कृति
(B) परिवार
(C) पानी
(D) बिजली
उत्तर-
(A) पड़ोस संस्कृति

प्रश्न 13.
लेखिका मन्नू भंडारी के मन में कौन-सी हीन भावना ग्रंथि बन गई थी?
(A) काले रंग की होना
(B) आँखों पर चश्मा लगा होना
(C) छोटे कद की होना
(D) पढ़ाई में कमजोर होना
उत्तर-
(A) काले रंग की होना

प्रश्न 14.
लेखिका के पिता जी अजमेर के कौन-से मोहल्ले में रहते थे?
(A) भानपुरा
(B) माडल टाऊन
(C) कैम्प
(D) ब्रह्मपुरी
उत्तर-
(D) ब्रह्मपुरी

प्रश्न 15.
लेखिका के पिता जी की सबसे बड़ी दुर्बलता थी-
(A) धन-लिप्सा
(B) क्रोध
(C) यश-लिप्सा
(D) अहंकार
उत्तर-
(C) यश-लिप्सा ।

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प्रश्न 16.
लेखिका के पिता जी की पुस्तकों का साम्राज्य रहता था-
(A) व्यवस्थित
(B) अव्यवस्थित
(C) संवरा हुआ
(D) कटा-फटा सा
उत्तर-
(B) अव्यवस्थित

प्रश्न 17.
लेखिका के पिता ने रसोईघर को नाम दिया-
(A) भटियार खाना
(B) भंडारशाला
(C) पाठशाला
(D) गऊशाला
उत्तर-
(A) भटियार खाना

प्रश्न 18.
अजमेर का पूरा विद्यार्थी-वर्ग भाषणबाज़ी के लिए कहाँ इकट्ठा हुआ था?
(A) मुख्य बाज़ार
(B) चौपड़
(C) रेलवे स्टेशन
(D) कॉलेज के बाहर
उत्तर-
(B) चौपड़

प्रश्न 19.
लेखिका का उसी के घर किस सम्मानित व्यक्ति ने बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया था?
(A) अंबा लाल
(B) अंबिका लाल
(C) अंबा देव
(D) श्री कृष्णलाल
उत्तर-
(A) अंबा लाल

प्रश्न 20.
मन्नू भण्डारी की माता का सबसे बड़ा गुण था-
(A) शिक्षा-दीक्षा
(B) लेखन
(C) अमीरी
(D) सहनशक्ति
उत्तर-
(D) सहनशक्ति

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(1) पर यह सब तो मैंने केवल सुना। देखा, तब तो इन गुणों के भग्नावशेषों को ढोते पिता थे। एक बहुत बड़े आर्थिक झटके के कारण वे इंदौर से अजमेर आ गए थे, जहाँ उन्होंने अपने अकेले के बल-बूते और हौसले से अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश (विषयवार) के अधूरे काम को आगे बढ़ाना शुरू किया जो अपनी तरह का पहला और अकेला शब्दकोश था। इसने उन्हें यश और प्रतिष्ठा तो बहुत दी, पर अर्थ नहीं और शायद गिरती आर्थिक स्थिति ने ही उनके व्यक्तित्व के सारे सकारात्मक पहलुओं को निचोड़ना शुरू कर दिया। सिकुड़ती आर्थिक स्थिति के कारण और अधिक विस्फारित उनका अहं उन्हें इस बात तक की अनुमति नहीं देता था कि वे कम-से-कम अपने बच्चों को तो अपनी आर्थिक विवशताओं का भागीदार बनाएँ। नवाबी आदतें, अधूरी महत्वाकांक्षाएँ, हमेशा शीर्ष पर रहने के बाद हाशिए पर सरकते चले जाने की यातना क्रोध बनकर हमेशा माँ को कँपाती-थरथराती रहती थीं। अपनों के हाथों विश्वासघात की जाने कैसी गहरी चोटें होंगी वे जिन्होंने आँख मूंदकर सबका विश्वास करने वाले पिता को बाद के दिनों में इतना शक्की बना दिया था कि जब-तब हम लोग भी उसकी चपेट में आते ही रहते। [पृष्ठ 93-94]

प्रश्न (क) पाठ एवं लेखिका का नाम लिखिए।
(ख) लेखिका के पिता का इंदौर से अजमेर आने का क्या कारण था ?
(ग) ‘भग्नावशेषों को ढोते पिता’ का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
(घ) लेखिका की माँ के डरी रहने का क्या कारण था?
(ङ) लेखिका के पिता को शब्दकोश लिखने का क्या लाभ हुआ ?
(च) लेखिका के पिता के शक्की स्वभाव का क्या कारण था?
(छ) ‘हाशिए पर सरकना’ के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
(ज) लेखिका के पिता के क्रोध का क्या कारण था ?
(झ) प्रस्तुत गद्यांश के आधार पर लेखिका के पिता के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
(ञ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-एक कहानी यह भी। लेखिका का नाम मन्नू भंडारी।

(ख) लेखिका के पिता मूलतः इंदौर के रहने वाले थे, किंतु वहाँ उनकी आर्थिक स्थिति इतनी अस्त-व्यस्त हो गई थी कि उन्हें इंदौर छोड़कर अजमेर आना पड़ा था।

(ग) ‘भग्नावशेषों को ढोते पिता’ का अर्थ है कि उनके पिता की पहले आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। उनका परिवार धन-वैभव से परिपूर्ण था। उनके पिता को इसका अहंकार था। किंतु अब उनकी आर्थिक दशा अस्थिर हो गई थी। अब वे अपने पुराने वैभव की यादों के सहारे जीते थे अर्थात् वे अपनी जिंदगी जैसे-तैसे काट रहे थे।

(घ) वस्तुतः लेखिका की माँ बहुत साधारण एवं सहज स्वभाव वाली नारी थी। वह उनके पिता की आज्ञाकारी सेविका थी।
हो गए थे, उन्हें बात-बात पर गुस्सा आता था। उनका यह गुस्सा अपनी पत्नी पर ही उतरता था। इसलिए वह सदा डरी-डरी रहती थी कि न जाने कब वह पति के क्रोध का भाजन बन जाए।

(ङ) लेखिका के पिता ने हिंदी-अंग्रेज़ी के अत्यंत सफल शब्दकोश की रचना की। इस शब्दकोश से उन्हें खूब यश प्राप्त हुआ। किंतु धन प्राप्त नहीं हुआ। धन के बिना उनके परिवार की स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं आया।

(च) लेखिका के पिता घमंडी व अहंकारी स्वभाव के थे, किंतु अपनों के द्वारा धोखा दिए जाने पर उनकी आर्थिक स्थिति डाँवाडोल हो गई थी। इसलिए अपनों से धोखा खाने पर उनका स्वभाव शक्की हो गया था।

(छ) ‘हाशिए पर सरकना’ का अभिप्राय है कि पहले की अपेक्षा महत्त्वहीन होना। मुख्यधारा या प्रधान स्थान से हटकर किनारे पर आ जाना। लेखिका के पिता की आर्थिक स्थिति अस्त-व्यस्त होने के कारण उनकी पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं रही। इसलिए वे मुख्य स्थान से हट गए और उन्हें इंदौर छोड़कर अजमेर आना पड़ा।

(ज) लेखिका के पिता के क्रोधी होने का कारण था, उनकी बिगड़ती आर्थिक दशा। पुरानी नघाबी आदतें और अधूरी महत्वाकांक्षाएँ, चोटी पर या शिखर पर होने पर भी उनके महत्त्व का घटना आदि उनके क्रोधी होने के कारण थे।

(झ) इस गद्यांश को पढ़ने से पता चलता है कि लेखिका के पिता अत्यंत महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति थे। उनकी आदतें भी नवाबी थीं अर्थात् वे खुले दिल से खर्च करने वाले थे। वे दूसरों पर आँख मूंद कर विश्वास करते थे, इसी कारण उन्हें अपने ही लोगों से धोखा खाना पड़ा। विपरीत परिस्थितियों में पड़ने के कारण उनका स्वभाव भी क्रोधी हो गया था। इतना कुछ होने पर भी वे अहंकार नहीं छोड़ सके। इसलिए परिवार वालों को कदम-कदम पर उनका विरोध व तनाव भी सहन करना पड़ता था।

(ञ) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखिका ने अपने पिता की गिरती आर्थिक दशा से उत्पन्न मनोदशा का सजीव चित्रण किया है। लेखिका ने अपने जीवन में जो कुछ अपने परिवार व पिता के विषय में देखा, उसके विषय में यहाँ बताया है। लेखिका का कथन है कि आर्थिक हानि के कारण पिता जी इंदौर से अजमेर आ गए थे। वहाँ उन्होंने अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश लिखा। इससे उन्हें प्रसिद्धि तो बहुत प्राप्त हुई, किंतु आर्थिक लाभ नहीं। गिरती हुई आर्थिक दशा ने उनके पिता के व्यक्तित्व के सभी सकारात्मक पहलुओं को कुंठित कर दिया। यहाँ तक कि वे अपने बच्चों को भी अपनी आर्थिक विवशताओं का भागीदार बनाए बिना न रह सके। अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाओं तथा हमेशा महत्त्वपूर्ण स्थान पर रहने के कारण अब हाशिए पर आने के कारण उनका क्रोध बढ़ गया। उनका यह क्रोध लेखिका की माता पर ही प्रकट होता था। अपनों के द्वारा विश्वासघात होने के कारण वे अब सब पर यहाँ तक कि अपने बच्चों पर भी शक करने लगे थे। कहने का भाव है कि लेखिका के परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ने के कारण उनके पिता की मनोदशा कुंठित हो गई थी।

(2) पर यह पित-गाथा मैं इसलिए नहीं गा रही कि मुझे उनका गौरव-गान करना है, बल्कि मैं तो यह देखना चाहती हूँ कि उनके व्यक्तित्व की कौन-सी खूबी और खामियाँ मेरे व्यक्तित्व के ताने-बाने में गुंथी हुई हैं या कि अनजाने-अनचाहे किए उनके व्यवहार ने मेरे भीतर किन ग्रंथियों को जन्म दे दिया। मैं काली हूँ। बचपन में दुबली और मरियल भी थी। गोरा रंग पिता जी की कमजोरी थी सो बचपन में मुझसे दो साल बड़ी, खूब गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन सुशीला से हर बात में तुलना और फिर उसकी प्रशंसा ने ही, क्या मेरे भीतर ऐसे गहरे हीन-भाव की ग्रंथि पैदा नहीं कर दी कि नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावजूद आज तक मैं उससे उबर नहीं पाई? [पृष्ठ 94]

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प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखिका का नाम लिखिए।
(ख) लेखिका अपने पिता के विषय में क्यों बताना चाहती है?
(ग) लेखिका ने अपने पिता के व्यक्तित्व की किन खुबियों का वर्णन किया है?
(घ) लेखिका के पिता के जीवन में क्या-क्या कमियाँ र्थी?
(ङ) लेखिका के व्यक्तित्व पर पिता के जीवन का क्या प्रभाव पड़ा?
(च) लेखिका के व्यक्तित्व में हीन-भावना की ग्रंथि क्यों उत्पन्न हो गई थी?
(छ) लेखिका के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
(ज) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-एक कहानी यह भी। लेखिका का नाम-मन्नू भंडारी।

(ख) लेखिका ने अपने पिता के विषय में इसलिए चर्चा की है ताकि यह अनुमान लगाया जा सके कि उनके व्यक्तित्व के किन-किन गुणों-अवगुणों की झलक उसके व्यक्तित्व में भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में आ गई है। उसके व्यक्तित्व को पिता के व्यक्तित्व ने किन-किन रूपों में प्रभावित किया है।

(ग) लेखिका ने अपने पिता के विषय में बताया है कि उनके पिता एक प्रतिष्ठित विद्वान थे। वे सदा पढ़ने-लिखने में लगे रहते थे। वे एक अच्छे समाज-सुधारक भी थे। वे कांग्रेस के द्वारा चलाए गए राष्ट्रीय आंदोलनों से भी जुड़े रहते थे। वे शिक्षा के प्रचार-प्रसार में भी पूर्ण सहयोग देते थे। उन्होंने अनेक गरीब विद्यार्थियों की सहायता भी की थी।

(घ) उनके पिता की नवाबी आदतें और अहंकारी स्वभाव था। आर्थिक स्थिति के डगमगा जाने के कारण उनके मन में गुस्सा एवं झुंझलाहट रहती थी।

(ङ) लेखिका के पिता के व्यक्तित्व का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था। उनके पिता के अनजाने व अनचाहे व्यवहार ने उनके व्यक्तित्व में हीन भाव की ग्रंथियाँ उत्पन्न कर दी थीं। .

(च) लेखिका काली और पतली-दुबली थी। जबकि उसकी बड़ी बहिन सुशीला गोरी, स्वस्थ और हंसमुख थी। उसके पिता सदा ही उसकी प्रशंसा किया करते। हर बात में तुलना करने के कारण उसके भीतर हीन भावना की ग्रंथि उत्पन्न हो गई थी। वह ग्रंथि आजीवन बनी रही।

(छ) इन पक्तियों में बताया गया है कि लेखिका एक साधारण बालिका थी। वह अन्य लड़कियों की अपेक्षा कमज़ोर थी। उसका रंग भी काला था। पिता के भेद-भावपूर्ण व्यवहार ने उसके व्यक्तित्व में हीन-भावना की ग्रंथि उत्पन्न कर दी थी। इसलिए वह नाम और सम्मान पाने के पश्चात् भी उस हीन भावना से उभर नहीं सकी थी। उसे लगता था कि वह अपनी बहिन के मुकाबले में हीन है।।

(ज) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखिका ने अपने व्यक्तित्व के गुण-दोषों का आकलन करते हुए देखना चाहा है कि उनके पिता के व्यक्तित्व की कौन-कौन-सी कमियाँ उनके व्यक्तित्व में अनायास ही आ गई हैं। लेखिका ने यहाँ स्पष्ट किया है कि उनके पिता के व्यक्तित्व के गुण-दोषों में से कौन-कौन-सी खूबियाँ या खामियाँ उसके अपने व्यक्तित्व में आई हैं और उनके किस व्यवहार ने लेखिका के जीवन में हीन-भावना की ग्रंथियों को जन्म दिया है। उसके पिता को गोरा रंग बहुत पसंद था। जबकि वह बचपन से काले रंग की एवं कमजोर थी। उसकी बड़ी बहन गोरी और स्वस्थ थी। बात-बात में उसके पिता उसे उसकी इस कमी को अनुभव करवा देते थे। उसके जीवन में काले रंग की होने की हीन-भाव की ग्रंथि बन गई थी। अब इतनी प्रसिद्धि प्राप्त होने पर भी वह अपनी इस हीन-भाव की ग्रंथि से उबर नहीं सकी।

(3) पिता जी के जिस शक्की स्वभाव पर मैं कभी भन्ना-भन्ना जाती थी, आज एकाएक अपने खंडित विश्वासों की व्यथा के नीचे मुझे उनके शक्की स्वभाव की झलक ही दिखाई देती है…बहुत ‘अपनों के हाथों विश्वासघात की गहरी व्यथा से उपजा शक। होश सँभालने के बाद से ही जिन पिता जी से किसी-न-किसी बात पर हमेशा मेरी टक्कर ही चलती रही, वे तो न जाने कितने रूपों में मुझमें हैं… कहीं कुंठाओं के रूप में, कहीं प्रतिक्रिया के रूप में तो कहीं प्रतिच्छाया के रूप में। केवल बाहरी भिन्नता के आधार पर अपनी परंपरा और पीढ़ियों को नकारने वालों को क्या सचमुच इस बात का बिल्कुल अहसास नहीं होता कि उनका आसन्न अतीत किस कदर उनके भीतर जड़ जमाए बैठा रहता है! समय का प्रवाह भले ही हमें दूसरी दिशाओं में बहाकर ले जाए. ..स्थितियों का दबाव भले ही हमारा रूप बदल दे, हमें पूरी तरह उससे मुक्त तो नहीं ही कर सकता! . [पृष्ठ 94]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखिका का नाम लिखिए।
(ख) लेखिका के शक्की स्वभाव होने का क्या कारण है?
(ग) लेखिका द्वारा किए गए पिता के साथ संघर्ष उसके जीवन को कैसे प्रभावित करते रहे?
(घ) क्या परंपरा और पुरानी पीढ़ियों के प्रभाव को अनदेखा किया जा सकता है?
(ङ) हमारा अतीत किस-किस रूप में प्रकट हो सकता है?
(च) लेखिका के विश्वासों को कैसे आघात पहुँचा?
(छ) ‘आसन्न अतीत’ का प्रयोग किस संदर्भ में हुआ है?
(ज) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-एक कहानी यह भी। लेखिका का नाम मन्नू भंडारी।

(ख) लेखिका के पिता को उनके अपने भाई-बंधुओं ने धोखा दिया था। इसलिए उनका स्वभाव शक्की बन गया था। अब वे अपने परिवार के सभी सदस्यों पर शक करने लगे थे। लेखिका पिता के शक्की स्वभाव का विरोध करती थी, किंतु हुआ इसके विपरीत अर्थात् समय के बीतने के साथ पिता के व्यक्तित्व का यह अवगुण उनके व्यक्तित्व में आ गया।

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(ग) लेखिका और उनके पिता जी के विचार भिन्न थे। इसलिए दोनों में विचारों को लेकर टक्कर होती थी। उनके वे संघर्ष अर्थात् संघर्ष करने का स्वभाव आज भी उनके जीवन में विविध रूपों में विद्यमान है।

(घ) हम अपनी परंपरा और पुरानी पीढ़ी के प्रभाव को चाहते हुए भी अनदेखा नहीं कर सकते। इसका प्रभाव हमारे जीवन में गहराई से व्याप्त रहता है। हम ऊपरी तौर पर या किसी के बहकावे में आकर भले ही विरोध करते रहें किंतु वे परंपराएँ और उनका प्रभाव हमारे स्वभाव का अभिन्न अंग बन चुकी होती हैं इसलिए उनको नकारना या उन्हें अनदेखा करना संभव नहीं है। जैसे लेखिका ने अपने पिता के शक्की स्वभाव का विरोध किया, किंतु वह उनके स्वभाव में समाता ही चला गया।

(ङ) लेखिका ने अतीत के विषय में लिखा है कि वह कभी प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्त होता है। कभी वह कुंठाओं के रूप में और कभी-कभी वह प्रतिबिंब के रूप में व्यक्त होता है। कहने का अभिप्राय है कि पिछले संस्कारों के कारण हम वर्तमान को झुंझलाहट के रूप में अपनाते हैं तो कभी उस पर अपना असंतोष व्यक्त करते हैं। इस प्रकार अतीत भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता है।

(च) लेखिका को भी उनके अपनों ने ही चोट पहुंचाई। वह जिन पर पूर्ण विश्वास करती थी उन्होंने ही उसे धोखा दिया, उसके साथ विश्वासघात किया। इसी कारण उसके विश्वास खंडित हो गए थे।

(छ) आसन्न अतीत’ का अर्थ है-वह अतीत जो अभी-अभी बीता है। लेखिका ने इसका प्रयोग अपने अभी-अभी बीते अतीत को व्यक्त करने के लिए किया है। वह अतीत हमारी आदतों में ढला हुआ होता है। हम वैसे ही बन जाते हैं जैसा कि हम अपने साथ घटित होते देखते हैं। यथा लेखिका के साथ विश्वासघात हुआ तो वह शक्की स्वभाव की बन गई।

(ज) आशय/व्याख्या इस गद्यांश में लेखिका ने अपने शक्की स्वभाव होने के कारणों और बदलती हुई परिस्थितियों में अपने स्वभाव के निर्माण के विषय में बताया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि समय का बहाव हमें भले ही विपरीत या दूसरी दिशाओं में ले जाए, किंतु हम अपने मूल स्वभाव से पूर्ण रूप से कभी मुक्त नहीं हो सकते।

लेखिका अपने पिता के शक्की स्वभाव पर क्रोधित हो जाती थी। किंतु अब उसकी समझ में आ गया है कि मूलतः उनका शक्की स्वभाव नहीं था बल्कि अपनों के विश्वासघात ने ही उन्हें शक्की स्वभाव वाला बना दिया था। पिता और लेखिका के बीच किसी-न-किसी बात को लेकर तकरारबाजी होती रहती थी। इसलिए लेखिका के व्यक्तित्व में भी पिता के जीवन के गुण-दोष दोनों कुंठाओं के रूप में, प्रतिक्रिया व्यक्त करने के रूप में व प्रतिछाया के रूप में विद्यमान हैं। लेखिका मानती है कि अपनी परंपरा और पुरानी पीढ़ी के प्रभाव को चाहते हुए भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। समय का परिवर्तन भले ही उन्हें दूसरी दिशा में ले जाए, परिस्थितियों का दबाव भले ही उनका रूप भी बदल दे, किंतु उन्हें अपने मूल स्वभाव से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं कर सकता। कहने का भाव है कि व्यक्ति के मूल स्वभाव का अंश कहीं-न-कहीं अवश्य दिखाई पड़ जाता है।

(4) पिता के ठीक विपरीत थीं हमारी बेपढ़ी-लिखी माँ। धरती से कुछ ज़्यादा ही धैर्य और सहनशक्ति थी शायद उनमें। पिता जी की हर ज़्यादती को अपना प्राप्य और बच्चों की हर उचित-अनुचित फरमाइश और ज़िद को अपना फर्ज समझकर बड़े सहज भाव से स्वीकार करती थीं वे। उन्होंने जिंदगी भर अपने लिए कुछ माँगा नहीं, चाहा नहीं… केवल दिया ही दिया। हम भाई-बहिनों का सारा लगाव (शायद सहानुभूति से उपजा) माँ के साथ था लेकिन निहायत असहाय मजबूरी में लिपटा उनका यह त्याग कभी मेरा आदर्श नहीं बन सका…न उनका त्याग, न उनकी सहिष्णुता। खैर, जो भी हो, अब यह पैतृक-पुराण यहीं समाप्त कर अपने पर लौटती हूँ। [पृष्ठ 94]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखिका का नाम लिखिए।
(ख) लेखिका की माँ का स्वभाव कैसा था?
(ग) लेखिका ने माँ को धरती से भी अधिक धैर्यवान क्यों कहा?
(घ) लेखिका ने अपनी माँ की क्या विशेषताएँ बताईं?
(ङ) लेखिका अपने व अपने भाई-बहिनों का माँ के प्रति लगाव का क्या कारण बताती है?
(च) लेखिका के लिए माँ का त्याग आदर्श क्यों नहीं बन सका?
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-एक कहानी यह भी। लेखिका का नाम-मन्नू भंडारी।

(ख) लेखिका की माँ एक साधारण गृहिणी थी। उसका स्वभाव अत्यंत सहनशील एवं शांत था। वह अत्यंत त्यागशील नारी थी।

(ग) लेखिका की माँ अपने साथ होने वाली हर प्रकार की ज़्यादती को सहन करती थी। लेखिका का पिता अहंकारी एवं गुस्से में रहने वाला व्यक्ति था। वह बात-बात पर उसे प्रताड़ित करता रहता था। वह उनकी हर बात सहन करती थी। बच्चों की भी उचित-अनुचित फरमाइश को अपना कर्त्तव्य समझ बड़े सहज भाव से स्वीकार कर लेती थी। इसीलिए लेखिका ने उन्हें धरती से भी अधिक धैर्यवान बताया है।

(घ) लेखिका ने अपनी माँ के व्यक्तित्व की अनेक विशेषताओं की ओर संकेत किया है। वह त्यागशील नारी थी। वह सदा अपने परिवार के लिए काम करती थी। परिवार के सुख के लिए अपना सुख-चैन सब कुछ त्याग दिया था। सहनशीलता उसके जीवन की प्रमुख विशेषता थी। पिता के क्रोध के कारण तो वह सदा डरी-डरी सी रहती थी।

(ङ) माँ के प्रति उनके लगाव का कारण शायद उनके प्रति सहानुभूति अथवा उनकी विवशता थी।

(च) लेखिका एक सजग नारी थी। वह बात को सोच-समझकर और तर्क की तुला पर तोलकर स्वीकार करने के पक्ष में थी। जबकि उनकी माता निहायत असहाय और मजबूरी की स्थिति में जीवन व्यतीत करती थी। उनका त्याग भी मजबूरी और उनकी असहाय अवस्था के कारण था। इसलिए माँ का यह त्याग लेखिका का आदर्श नहीं बन सका था।

(छ) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखिका ने अपनी माँ के स्वभाव एवं गुणों का उल्लेख किया है। लेखिका की माता अनपढ़ स्त्री थी। वह अत्यंत सहनशील थी। वह अपने पति की हर गलत बात को भी मान लेती थी और अपने बच्चों की फरमाइश को तथा उनकी जिद्द को अपना कर्त्तव्य समझकर उन्हें पूरा करती थी। उसने आजीवन अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उसके परिवार के लिए उसका त्याग महान् था। लेखिका का सहानुभूति से युक्त लगाव माँ के प्रति था। लेखिका को माँ का यह त्याग कभी पसंद नहीं था। इसलिए माँ के इस रूप को वह कभी अपना आदर्श न बना सकी। शायद इसीलिए लेखिका पढ़ी-लिखी आधुनिक नारी थी।

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(5) हाँ, इतना ज़रूर था कि उस ज़माने में घर की दीवारें घर तक ही समाप्त नहीं हो जाती थीं बल्कि पूरे मोहल्ले तक फैली रहती थीं इसलिए मोहल्ले के किसी भी घर में जाने पर कोई पाबंदी नहीं थी, बल्कि कुछ घर तो परिवार का हिस्सा ही थे। आज तो मुझे बड़ी शिद्दत के साथ यह महसूस होता है कि अपनी जिंदगी खुद जीने के इस आधुनिक दबाव ने महानगरों के फ्लैट में रहने वालों को हमारे इस परंपरागत ‘पड़ोस-कल्चर’ से विच्छिन्न करके हमें कितना संकुचित, असहाय और असुरक्षित बना दिया है। मेरी कम-से-कम एक दर्जन आरंभिक कहानियों के पात्र इसी मोहल्ले के हैं जहाँ मैंने अपनी किशोरावस्था गुज़ार अपनी युवावस्था का आरंभ किया था। एक-दो को छोड़कर उनमें से कोई भी पात्र मेरे परिवार का नहीं है। बस इनको देखते-सुनते, इनके बीच ही मैं बड़ी हुई थी लेकिन इनकी छाप मेरे मन पर कितनी गहरी थी, इस बात का अहसास तो मुझे कहानियाँ लिखते समय हुआ। [पृष्ठ 95]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखिका का नाम लिखिए।
(ख) घर की दीवारों का ‘पूरे मोहल्ले तक फैलने’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) आज का महानगरीय जीवन कैसा है?
(घ) वर्तमान फ्लैट-कल्वर में हम कैसे असुरक्षित हैं?
(ङ) ‘परंपरागत पड़ोस-कल्चर’ से क्या तात्पर्य है?
(च) लेखिका को पड़ोस के वातावरण ने कैसे प्रभावित किया?
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-एक कहानी यह भी। लेखिका का नाम-मन्नू भंडारी।

(ख) लेखिका के इस कथन का आशय है कि लेखिका के बचपन के दिनों में घर केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं होता था अपितु सारा मोहल्ला ही घर होता था। सारे मोहल्ले के लोगों में आत्मीयता का भाव होता था। कोई बच्चा किसी के भी घर आ-जा सकता था। सब लोग एक-दूसरे से स्नेह के साथ मिलते थे।

(ग) आज का महानगरीय जीवन वैसा आत्मीयतापूर्ण नहीं रह गया जैसाकि लेखिका के बचपन में था। आज हर व्यक्ति अपने-अपने काम में व्यस्त है। उसे इतनी भी फुर्सत नहीं मिलती कि वह अपने आस-पड़ोस के विषय में जाने और दूसरों के सुख-दुःख में सम्मिलित हो। अतः आज का महानगरीय जीवन अत्यंत संकीर्ण एवं आत्मकेंद्रित हो गया है।

(घ) वर्तमान फ्लैट-कल्चर में हम अपने तक सीमित होकर रह गए हैं। हम आस-पड़ोस के कल्चर से कल्चर की भाँति हम एक-दूसरे से परिचित नहीं हैं और हममें अपनेपन की भावना नहीं है। मन में अजनबीपन की भावना घर करती जा रही है। इसलिए हम फ्लैट-कल्चर में सकुंचित, असहाय एवं असुरक्षित अनुभव करने लगे हैं।

(ङ) ‘परंपरागत पड़ोस-कल्चर’ से अभिप्राय है कि हम अपने पड़ोस को अपना आत्मीय समझकर उसके साथ समरस होकर जीएँ। हम अपने आस-पड़ोस के लोगों के सुख-दुःख में भागीदार हों। अपने पड़ोसियों को अपनापन अनुभव कराना व अपनेपन की भावना अनुभव करना। पड़ोस-कल्चर से मनुष्य स्वयं को अधिक प्रसन्न, उदार, विस्तृत, खुला और सुरक्षित अनुभव करता है।

(च) लेखिका पड़ोस के वातावरण से बहुत प्रभावित हुई थी। इसका प्रभाव इतना गहरा था कि वहाँ के लोगों का जीवन उनके मन में छाया रहता। उन्होंने जब कहानियाँ व उपन्यास लिखे तो उनमें बहुत-से पात्र वे ही बने जो पड़ोस में रहते थे। इस प्रकार लेखिका के मन पर पड़ोस के वातावरण का गहन प्रभाव था।

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(छ) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखिका ने अपने बचपन की मोहल्ले की संस्कृति तथा महानगरों के फ्लैट में रहने वाले लोगों की संकुचित एवं संकीर्ण संस्कृति के अंतर को स्पष्ट किया है लेखिका का मत है कि उसके बचपन के समय में घर केवल चारदीवारी तक ही सीमित नहीं होता था, अपितु पूरा मोहल्ला ही घर होता था। मोहल्ले के लोगों में आपस में आत्मीयता की भावना होती थी। सभी लोग व बच्चे एक-दूसरे के घर आते-जाते थे तथा एक-दूसरे से स्नेह से मिलते थे। दूसरी ओर लेखिका ने आज के महानगरीय जीवन के विषय में बताते हुए कहा है कि उसमें आत्मीयता की भावना नहीं रह गई है। आज के महानगरों में लोग फ़्लैटों में रहते हैं। अत्यधिक व्यस्तता के कारण लोग आत्मकेंद्रित हो गए हैं। आज का महानगरीय जीवन अत्यंत संकीर्ण हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति में अजनबीपन की भावना घर कर गई है तथा अब व्यक्ति अपने आप को असुरक्षित अनुभव करता है। लेखिका ने अपनी आरंभिक कहानियों के पात्र अपने मोहल्ले से ही चुने हैं। लेखिका के मन पर उस वातावरण की गहरी छाप पड़ी हुई है जिसमें उसने बचपन बिताया था। इस बात को उसने अपनी कहानियाँ लिखते समय अनुभव किया।

एक कहानी यह भी Summary in Hindi

एक कहानी यह भी लेखिका-परिचय

प्रश्न-
मन्नू भंडारी का जीवन-परिचय एवं उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय-श्रीमती मन्नू भंडारी का नाम आधुनिक कथाकारों, उपन्यासकारों एवं नाटककारों में बड़े आदर के साथ लिया जाता है। इन्होंने अनेक कहानी-संग्रह लिखकर कहानी विधा को समृद्ध किया है। श्रीमती मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल, 1931 को जिला मंदसौर (मध्य प्रदेश) के भानपुरा नामक गाँव में हुआ। इनका बचपन अजमेर में व्यतीत हुआ। इनके घर का वातावरण पूर्णतः साहित्यिक था। इनके पिता श्री सुख संपत राय भंडारी साहित्य और कला-प्रेमी थे। पिता के जीवन का प्रभाव इनके व्यक्तित्व पर पड़ना स्वाभाविक था। शिक्षा के विकास के साथ-साथ इनकी साहित्यिक अभिरुचियों का भी विकास होता गया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करते समय इनका संपर्क महान साहित्यकारों से हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से इन्होंने एम०ए० (हिंदी) की परीक्षा पास की। तत्पश्चात् इन्होंने अध्यापन को अपनी आजीविका का साधन बना लिया तथा प्राध्यापिका बनकर कलकत्ता विश्वविद्यालय में चली गईं। उन्हीं दिनों मन्नू भंडारी की कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। इनकी कहानियों को पाठक वर्ग ने काफी सम्मान दिया। कलकत्ता रहते हुए ही इनका विवाह सन् 1959 में गद्यकार श्री राजेंद्र यादव से हुआ, किंतु इन्होंने अपने जिस नाम से (मन्नू भंडारी) साहित्य जगत् में प्रसिद्धि प्राप्त की थी, वही नाम बनाए रखा। कलकत्ता से मन्नू भंडारी दिल्ली के ‘मिरांडा हाऊस’ नामक कॉलेज में आकर अध्यापन कार्य करने लगीं तथा सेवा निवृत्ति तक वहीं रहीं। एक सच्ची साधिका की भाँति वे निरंतर साहित्य निर्माण में लगी रहीं। इन्होंने कहानियों के साथ-साथ उपन्यास, नाटक और बाल-साहित्य की भी रचना की। इनके उपन्यास तथा कहानियों पर फिल्में भी बनी हैं और उनका नाट्य रूपांतर भी हुआ है।

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2. प्रमुख रचनाएँ श्रीमती मन्नू भंडारी ने विविध विधाओं की रचना पर अपनी लेखनी सफलतापूर्वक चलाई है। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं
(i) कहानी संग्रह ‘तीन निगाहों की तस्वीर’, ‘एक प्लेट सैलाब’, ‘त्रिशंकु’, ‘यही सच है’, ‘मैं हार गई’, ‘आँखों देखा झूठ’ आदि।
(ii) उपन्यास ‘महाभोज’, ‘आपका बंटी’, ‘एक इंच मुस्कान’, ‘स्वामी’ आदि।
(iii) नाटक-‘बिना दीवारों के घर’ ।
(iv) बाल-साहित्य-‘आसमाता’ और ‘कलवा’ आदि।

3. साहित्यिक विशेषताएँ श्रीमती मन्नू भंडारी मूलतः कथाकार हैं। वे सर्वप्रथम कहानी-लेखिका के रूप में प्रसिद्ध हुई थीं। कहानी के क्षेत्र में इन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई थी। आज भी इन्हें अधिकतर मान्यता कहानी-लेखिका के रूप में प्राप्त है। मन्नू भंडारी आज भी हिंदी कहानी में एक ऐसा विशिष्ट नाम है जिन्होंने हिंदी कहानी को नई दिशा दी है। इन्होंने जीवन से जुड़ी समस्याओं को अपने अनुभव के रंग में रंगकर कहानियों में स्थान दिया है।
इनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जिंदगी को सीधे समझने और जाँचने वाली, बेबाक और प्रेरणादायी हैं। श्रीमती मन्नू भंडारी की कहानियों के कथानक रोचक, जिज्ञासा से युक्त, सरल एवं मौलिक हैं। कथानक अत्यंत गतिशील बने रहते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं।

श्रीमती मन्नू भंडारी की कहानियों में पात्रों की संख्या कम है जिससे पाठक शीघ्र ही उनसे परिचित हो जाता है और उनसे तादात्म्य स्थापित कर लेता है। सभी पात्र सजीव एवं जीवन की विभिन्न समस्याओं से जूझते हुए पाए जाते हैं। वातावरण निर्माण की कला में भी उनका कोई मुकाबला नहीं है। वातावरण की सजीवता ही इनकी कहानियों की मौलिकता एवं विश्वसनीयता बनाए रखती है।

विषय-निरूपण अर्थात् उद्देश्य की दृष्टि से भी श्रीमती मन्नू भंडारी की कहानियाँ सफल सिद्ध हुई हैं। इनकी कहानियों में जीवन की विविध समस्याओं को उद्घाटित किया गया है। कहानी को बदलती हुई परिस्थितियों के साथ जोड़कर कहानी को नया रूप प्रदान किया गया है। स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय जीवन-शैली में आए परिवर्तन से हमारे संस्कारों पर प्रभाव पड़ा है। पुरानी पीढ़ी के लोग पुराने संस्कारों से चिपके हुए हैं और वे उनमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं चाहते, जबकि नई पीढ़ी के लोग उन संस्कारों को सहन नहीं करते। इसलिए नए-पुराने संस्कारों की जो टकराहट की स्थिति बनी हुई है, उसका यथार्थ चित्रण श्रीमती भंडारी की कहानियों में देखा जा सकता है।

4. भाषा-संवादों की सफल योजना से श्रीमती मन्नू भंडारी ने पात्रों के चरित्रों के रहस्य उद्घाटन के साथ-साथ, वातावरण निर्माण और कथानक को गतिशील बनाया है। इन्होंने अपनी कहानियों में पात्रानुकूल एवं प्रसंगानुकूल सरल एवं सार्थक भाषा का प्रयोग किया है।
अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि श्रीमती मन्नू भंडारी की कहानियाँ भाव एवं कला दोनों ही दृष्टियों से सफल सिद्ध हुई हैं। उन्होंने अपनी कहानियों के लेखन द्वारा हिंदी कहानी विधा के विकास में जो योगदान दिया है, वह सदा स्मरणीय रहेगा।

एक कहानी यह भी पाठ का सार

प्रश्न-
“एक कहानी यह भी’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
यह पाठ सुप्रसिद्ध कहानी लेखिका मन्नू भंडारी द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने उन व्यक्तियों और घटनाओं का ओजस्वी भाषा में वर्णन किया है, जिनका संबंध लेखकीय जीवन से रहा है। संकलित अंश में मन्नू भंडारी के किशोर जीवन से जुड़ी घटनाओं के साथ उनके पिता जी और उनकी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का व्यक्तित्व विशेष रूप में उभरकर सामने आया है, जिन्होंने आगे चलकर उनके लेखकीय जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं। यहाँ लेखिका ने अपनी किशोरावस्था में घटित घटनाओं का सजीव चित्रण किया है। साथ ही तत्कालीन वातावरण का भी सजीव चित्रण किया है। सन् 1946-47 के आंदोलनों की गरमाहट इस पाठ में पूर्ण रूप से अनुभव की जा सकती है। पाठ का सार इस प्रकार है

लेखिका का जन्म मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में हुआ था। किंतु उनका बचपन राजस्थान के अजमेर नगर के एक मुहल्ले में बीता। उनका घर दो-मंजिला था। नीचे पूरा परिवार रहता था, किंतु ऊपर की मंजिल पर उनके पिता का साम्राज्य था। अजमेर आने से पहले वे इंदौर में रहते थे। वहाँ उनके परिवार की गिनती प्रतिष्ठित परिवारों में होती थी। उनके पिता जी शिक्षा में गहन रुचि रखते थे। कमज़ोर छात्रों को तो घर बुलाकर पढ़ाते थे। उनके पढ़ाए हुए छात्र आज बड़े-बड़े पदों पर काम कर रहे हैं। उनके पिता उदार हृदय, कोमल स्वभाव, संवेदनशील होने के साथ-साथ क्रोधी और अहंकारी स्वभाव वाले भी थे। एक बहुत बड़े आर्थिक झटके ने उन्हें अंदर तक हिलाकर रख दिया। इसीलिए वे इंदौर से अजमेर आए थे। यहाँ आकर उन्होंने हिंदी-अंग्रेजी कोश तैयार किया। वह अपनी तरह का पहला शब्द-कोश था। उससे उन्हें ख्याति तो खूब मिली, किंतु धन नहीं। कमजोर आर्थिक स्थितियों के कारण उनका सकारात्मक स्वभाव दबकर रह गया। वे अपनी गिरती आर्थिक स्थिति में अपने बच्चों को भागीदार नहीं बनाना चाहते थे। आरंभ से अच्छा-ही-अच्छा देखने वाले उनके पिता जी के लिए ये दिन देखने बड़े ही कष्टदायक लगते थे। इससे उनका स्वभाव संदेहशील बन गया था। ऐसी मनोदशा में हर किसी को संदेह की दृष्टि से देखते थे।

लेखिका ने अपने पिता की अच्छी और बुरी आर्थिक दशा का उल्लेख करने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व के गुणों और अवगुणों की ओर भी संकेत किया है। नवाबी आदतों, अधूरी महत्त्वाकांक्षाओं और सदा शीर्ष पर रहने के बाद नीचे उतरने की पीड़ा सदा क्रोध के रूप में उनकी पत्नी पर बरसती रहती थी। अपने बहुत निकट के लोगों से विश्वासघात मिलने के कारण वे बड़े शक्की स्वभाव के हो गए थे। उनके उस शक के लपेटे में अकसर लेखिका और उसके भाई-बहिन भी आ जाते थे।

लेखिका ने अपने विषय में कहा है कि वह काली और दुबली-पतली थी। लेखिका की उससे दो वर्ष बड़ी बहिन खूब गोरी, हँसमुख और स्वस्थ थी। पिता की कमज़ोरी गोरा रंग था। अतः हर बात में उसकी प्रशंसा और उससे तुलना ने लेखिका में एक ऐसी हीन-भावना भर दी कि वे आजीवन उससे उभर न सकीं। किंतु माँ का स्वभाव पिता के ठीक विपरीत था। लेखिका ने उनमें धरती से भी कहीं अधिक धैर्य और सहनशक्ति को देखा था। किंतु असहाय और विवशता में लिपटा उनका यह त्याग कभी उनके बच्चों के लिए आदर्श नहीं बन सका।

लेखिका ने अपने से दो वर्ष बड़ी बहिन सुशीला के साथ बचपन में हर प्रकार का खेल खेला था। लेखिका के दो बड़े भाई पढ़ने हेतु बाहर चले गए थे। किंतु बचपन में वह उनके साथ भी खेलती थी। पतंग उड़ाना, मांजा सूतना, यहाँ तक कि गुल्ली डंडा खेलना भी उसके खेलों में सम्मिलित था। किंतु उसकी सीमा अपने घर या फिर मोहल्ले-पड़ोस तक ही होती थी। उन दिनों पड़ोस को तो घर का ही हिस्सा माना जाता था। उन दिनों की तुलना में आज महानगरों के फ्लैटों का जीवन अत्यधिक संकुचित हो गया है। लेखिका की कहानियों के अधिकांश पात्र उनके मुहल्ले से हैं। यहाँ तक कि ‘दा’ साहब भी मौका मिलते ही ‘महाभोज’ नामक उपन्यास में प्रकट हो गए। तब लेखिका को पता चला कि बचपन की याद कितनी गहरी होती है।

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सन् 1944 में बड़ी बहिन सुशीला का विवाह हो गया, बड़े भाई पढ़ने के लिए बाहर चले गए। तब उनके पिता जी ने मन्नू की पढ़ाई की ओर ध्यान दिया। पिता जी को यह पसंद नहीं था कि उसे पढ़ाई के साथ-साथ रसोई में भी कुशल बनाया जाए। उनके अनुसार रसोई का काम लड़कियों की प्रतिभा व क्षमता को नष्ट करता है। रसोई का काम उनकी दृष्टि में भटियारखाना था। वे चाहते थे कि लेखिका उनके साथ राजनीतिक बहसों में शामिल हो। उनके घर में आए दिन किसी-न-किसी राजनीतिक पार्टी की मीटिंग होती रहती थी। कभी कांग्रेस, कभी सोशलिस्ट तो कभी कम्युनिस्ट पार्टी और कभी आर.एस.एस. के लोग आते थे। पिता जी चाहते .थे कि वह देश की गतिविधियों के विषय में भी जानकारी रखें। किंतु लेखिका का बालक मन पचड़ों को नहीं समझता था। वह क्रांतिकारियों और उनके महान् बलिदानों से जरूर रोमांचित हो उठती थी।

लेखिका ने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् कॉलेज में प्रवेश लिया। तभी उनका परिचय कॉलेज की हिंदी विषय की प्राध्यापिका श्रीमती शीला अग्रवाल से हुआ। शीला अग्रवाल ने उन्हें कुछ महान् साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़ने के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर लेखिका ने शरत्चंद्र, प्रेमचंद, जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा आदि के उपन्यास पढ़े और अपनी प्राध्यापिका से उन पर चर्चा परिचर्चा भी की। लेखिका जैनेंद्र की लेखन-शैली से बहुत प्रभावित हुई। ‘सुनीता’, ‘शेखर : एक जीवन’, ‘नदी के द्वीप’ जैसे उपन्यासों के पढ़ने से लेखिका के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ। जीवन मूल्य भी बड़ी तेज़ गति से बदल रहे थे। पुरानी मान्यताएँ टूट रही थीं और नई धारणाओं का निर्माण हो रहा था।

उन दिनों स्वतंत्रता आंदोलन अपने पूरे जोरों पर था। सब ओर जलसे जुलूस, प्रभात – फेरी, हड़ताल, भाषण आदि का बोलबाला था। हर युवक इस ओजस्वी माहौल में शामिल था। भला ऐसे में लेखिका कैसे चैन से बैठ सकती थी। शीला अग्रवाल की जोशीली बातों ने लेखिका की रग-रग में लावा भर दिया था। लेखिका सड़कों पर घूम-घूम कर हड़ताल करवाती, भाषण देती। उसने अब सारी वर्जनाओं को तोड़कर खुलेआम भाषण देने आरंभ कर दिए थे। लेखिका और उनके पिता के विचारों में टकराहट उत्पन्न हो गई थी। विवाह के विषय में भी विरोध चलता रहा। एक बार तो कॉलेज की प्राचार्या ने भी उनकी गतिविधियों के सिलसिले में उनके पिता जी को बुला भेजा था।

प्राचार्या ने उनसे कहा, क्यों न आपकी बेटी की गतिविधियों को लेकर उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। यह सुनकर वे आग – बबूला हो उठे। बोले, न जाने यह लड़की मुझे कैसे-कैसे दिन दिखलाएगी। गुस्से में भरकर कॉलेज पहुँचे। वापिस आए तो लेखिका डर गई और पड़ोस के घर में छुपकर बैठ गई। सोचा कि जब पिता जी का गुस्सा ठंडा पड़ जाएगा तो घर चली आएगी। किंतु कॉलेज से वे बहुत खुश लौटे। पता चला कि पिता जी उन पर बहुत गर्व कर रहे थे। उन्हें पता चला कि सारा कॉलेज उनकी बेटी के इशारों पर चलता है। प्रिंसिपल के लिए कॉलेज चलाना कठिन हो रहा था। पिता जी ने कहा कि यह आंदोलन तो पूरे देश में चल रहा है। यह समय की पुकार है। भला इसे कौन रोक सकता है?
लेखिका के पिता जी अपनी प्रतिष्ठा के प्रति बहुत ही सावधान रहते थे।

उन दिनों आज़ाद हिंद फौज के मुकद्दमे को लेकर देश भर में हड़तालें चल रही थीं। दिनभर विद्यार्थियों के साथ घूम-घूमकर लेखिका भी हड़ताल करवाती रही और संध्या के समय बाज़ार के चौराहे पर एकत्रित विद्यार्थियों ने भाषण बाज़ी की। लेखिका ने भी जोशीला भाषण दिया जिसे सुनकर लोग बहुत प्रभावित हुए। पिता जी के किसी दकियानूसी मित्र ने लेखिका के प्रति उनके कान भर दिए और फिर क्या था कि उनका क्रोध भड़क उठा। उन्होंने लेखिका को घर से बाहर न निकलने की चेतावनी दे डाली। किंतु तभी नगर के प्रतिष्ठित डॉक्टर श्री अंबालाल ने लेखिका को देखते ही उसके जोशीले भाषण की खूब तारीफ की, जिससे पिता जी की छाती गर्व से फूल उठी। इस प्रकार लेखिका पिता जी के क्रोध से बच गई।

बात यह थी, लेखिका के पिता जी अंतर्विरोधमय जीवन जी रहे थे। वे नगर में विशिष्ट भी बनना चाहते थे और सामाजिक छवि के बारे में भी जागरूक रहते थे। वे दोनों चीजें एक साथ प्राप्त करना चाहते थे।

सन् 1947 में मई मास में कॉलेज प्रबंधक समिति ने प्राध्यापिका अग्रवाल को लड़कियों को भड़काने के आरोप में कॉलेज से नोटिस भेज दिया। उधर थर्ड इयर की कक्षाएँ बंद कर दी गईं। लेखिका और उसकी दो सहेलियों को भी कॉलेज से निकाल दिया गया। किंतु लेखिका ने कॉलेज से बाहर रहकर भी आंदोलन जारी रखा और अंततः कॉलेज को थर्ड इयर खोलना पड़ा। लेखिका को खुशी मिली। किंतु 15 अगस्त, 1947 में इससे भी बड़ी खुशी पूरे देश को मिली जब भारत आज़ाद हुआ।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-93) साम्राज्य = राज्य चलाने का अधिकार, शासन। अव्यवस्थित = व्यवस्था रहित। डिक्टेशन = मुँह से बोलकर लिखवाना। सदैव = सदा के लिए। चर्चे = बातें। प्रतिष्ठा = सम्मान, आदर। बेहद = सीमा रहित, अत्यधिक। संवेदनशील = भावुक। अहंवादी = घमंडी। भग्नावशेष = टूटे हुए अंश। आर्थिक झटका = धन की हानि होना। बल-बूते = शक्ति। यश = प्रसिद्धि। अर्थ = धन। सकारात्मक पहलू = अच्छे गुणों वाला भाग। विस्फारित = फैला हुआ। अहं = घमंड। अनुमति = स्वीकृति। विवशता = मज़बूरी। नवाबी आदतें = फिजूलखर्च करने की आदत । महत्त्वाकांक्षाएँ = महत्त्व प्राप्ति की इच्छा। यातना = पीड़ा। शीर्ष = सबसे ऊपर। हाशिए पर = महत्त्वहीन स्थान पर। विश्वासघात = धोखा देना। आँख मूंदकर = बिना सोचे-समझे।

(पृष्ठ-94) चपेट में आना = प्रभावित होना। पितृ-गाथा = पिताजी की कहानी। गौरव-गान = यश संबंधी वर्णन। खूबी = अच्छाई। खामियाँ = कमियाँ। गुंथी होना. = रची हुई व बँधी हुई होना। ग्रंथि = मन की उलझन, गाँठ। दुबली = कमज़ोर । हीन-भाव = छोटा होने का भाव। उबर पाना = मुक्त होना। लेखकीय उपलब्धि = लेखक के रूप में सफलता पाना। गड़ने-गड़ने को हो आना = शर्म में बहुत अधिक संकोच करना। अचेतन = मन की सुप्त अवस्था। तुक्का = भाग्य से प्राप्त। भन्ना जाना = क्रोध करना। खंडित विश्वास = टूटे हुए विश्वास। व्यथा = दुःख। झलक = प्रकाश। उपजा = पैदा हुआ। होश संभालना = समझदार होना। टक्कर चलना = संघर्ष होना। कुंठा = मन में दबी और रुकी भावना। प्रतिच्छाया = किसी चीज की छाया पड़ना। भिन्नता = अलगाव। परंपरा = पीछे से चली आती हुई आदतें। नकारना = मना करना, इंकार करना। अहसास = अनुभव। अतीत = बीता हुआ समय। जड़ जमाना = अंदर तक पैठना। प्रवाह = बहाव। विपरीत = उलटी। ज़्यादती = अत्याचार । प्राप्य = भाग्य, मिलने योग्य वस्तु । फरमाइश = इच्छा। फर्ज = कर्तव्य । सहानुभूति = दया, किसी के दुःख में दुःखी होना। असहाय = जिसकी सहायता करने वाला कोई न हो, मजबूर। सहिष्णुता = सहनशीलता। पैतृक-पुराण = पिता से संबंधित कहानियाँ।

(पृष्ठ-95) धुंधली = हल्की। माँजा सूतना = पतंग की डोर तैयार करना। दायरा = सीमा, घेरा। पाबंदी = मनाही। शिद्दत = कष्ट। आधुनिक दबाव = नए युग की कामनाएँ। फ्लैट = ऊपर-नीचे बने मकान। पड़ोस-कल्वर = पड़ोस में रहने के रीति-रिवाज़। विच्छिन्न = अलग-अलग होना। असुरक्षित = जो सुरक्षित नहीं है। किशोरावस्था = जवानी और बचपन के बीच की अवस्था। युवावस्था = जवानी। छाप = प्रभाव । अंतराल = फासला, दूरी। अभिव्यक्ति = प्रकट करना। वजूद = सत्ता, जीवन। सुखद = सुख देने वाला। आश्चर्य = हैरानी। सुघड़ गृहिणी = कुशल स्त्री। पाक – शास्त्री = भोजन बनाने की कला को जानने वाला विद्वान। नुस्खे = ढंग। आग्रह = अनुरोध । भटियारखाना = भटियार के रहने का स्थान। प्रतिभा = बुद्धि, गुण। क्षमता = शक्ति। भट्टी में झोंकना = नष्ट कर देना। जमाव होना = देर-देर तक बैठकें करना।

(पृष्ठ-96) नीतियाँ = नियम। मतभेद = मतों में अंतर, विचारों की भिन्नता। रोमानी आकर्षण = रोमांचित करने वाला खिंचाव। कुर्बानी = बलिदान । परिचित = जानकार। आक्रांत = जिस पर हमला किया गया हो। बाकायदा = नियमानुसार/सीमित। दायरा = छोटी-सी दुनिया। मूल्य = नियम/सिद्धांत। मंथन करना = सोच-विचार करना। ध्वस्त = टूटा-फूटा हुआ। संदर्भ = प्रसंग। भागीदारी = भाग लेना। प्रभात फेरी = सुबह के समय गीत गाकर लोगों को जगाना। दमखम = शक्ति। जोश-खरोश = उत्साह। उन्माद = नशा। लावा = ज्वालामुखी पर्वत से निकलने वाली पिघली हुई आग।

(पृष्ठ-97) सड़कें नापना = सड़कों पर इधर-उधर घूमना। बर्दाश्त = सहन करना। वर्जना = मनाही। कामना = इच्छा। यश-लिप्सा = यश पाने का लाभ। दुर्बलता = कमज़ोरी। धुरी = केंद्र। सिद्धांत = नियम। विशिष्ट = खास। वर्चस्व = अधिकार। अनुशासनात्मक कार्रवाई = अनुशासन भंग करने के विरुद्ध उठाया गया कदम। आग-बबूला = अत्यधिक गुस्सा आना। कहर बरपना = मुसीबत आना। गुबार निकालना = गुस्सा निकालना।गर्व = अभिमान । अवाक् = मौन। हकीकत= सच्चाई। आहान = बुलावा।

(पृष्ठ-98) दकियानूसी = पुराने विचारों वाला। मत मारी जाना = बुद्धि नष्ट होना। आबरू = इज्जत। आग लगाना = भड़काना। भभकना = गुस्सा होना। थू-थू करना = अपमान करना। बेखबर = अनजान बने रहना। अंतरंग = अत्यंत समीपता, आत्मीयता। प्रतिष्ठित = सम्मानित । गर्मजोशी = उत्साह सहित। यू हैव मिस्ड समथिंग = तुमने कुछ खो दिया है।

(पृष्ठ-99) राहत की साँस लेना = सुख अनुभव करना। झिझक = डर, संकोच। मूल = असली। अंतर्विरोध = परस्पर विरोध। प्रबल = तेज़। लालसा = इच्छा। सजगता = जागरूकता।

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(पृष्ठ-100) नोटिस थमा देना = नौकरी से निकालने की सूचना देना। थर्ड इयर = तीसरा वर्ष। निषिद्ध = मनाही। चिर प्रतीक्षित = जिसकी लंबे समय से प्रतीक्षा थी। बिला जाना = गायब हो जाना। शताब्दी = सौ वर्ष।

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