Class 12

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Pathit Avbodhanam पठित-अवबोधनम् Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

(क) श्लोकस्य हिन्दीभाषायां व्याख्या

अधोलिखितश्लोकस्य हिन्दीभाषायां व्याख्या कार्या

1. अधोलिखितश्लोकस्य हिन्दीभाषया सरलार्थं कार्यम्
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शाश्वती द्वितीयो भागः’ के ‘कर्मगौरवम्’ नामक पाठ से लिया गया है। यह श्लोक महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित ‘श्रीमदभगवद्गीता’ से संकलित है। इसमें कर्म के गौरव को प्रतिपादित किया गया है।

सरलार्थ-हे अर्जुन! बुद्धियुक्त अर्थात् समत्व बुद्धि को प्राप्त मनुष्य, इस संसार में पुण्य और पाप दोनों प्रकार के कार्यों में आसक्ति को छोड़ देता है। इसलिए तू समत्व योग के लिए प्रयत्न कर । कर्मों में कुशलता का नाम ही योग (अनासक्तिनिष्काम योग) है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

2. तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं लब्धं कुबेरादभियास्यमानात्।
दिदेश कौत्साय समस्तमेव पादं सुमेरोरिव वज्रभिन्नम्॥

व्याख्या-प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘रघुकौत्ससंवाद:’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग से सम्पादित किया गया है। प्रस्तुत श्लोक में वर्णन किया गया है कि कुबेर ने राजा रघु के आक्रमण के भय से उसके खजाने को सुवर्ण मुद्राओं से भर दिया।

राजा रघु ने आक्रमण किए जाने वाले कुबेर से प्राप्त, वज्र के द्वारा टुकड़े किए गए सुमेरु पर्वत के चतुर्थ भाग के समान प्रतीत हो रही, उन चमकती हुई समस्त सुवर्ण मुद्राओं को कौत्स के लिए दे दिया।

भावार्थ यह है कि कुबेर ने रघु के आक्रमण के भय से उसके खजाने को सुवर्ण मुद्राओं से भर दिया। वे सुवर्ण मुद्राएँ परिमाण में इतनी अधिक थी कि ऐसा लगता था मानो सुमेरु पर्वत को ही वज्र से काटकर उसका चौथा हिस्सा खजाने में रख दिया। महाराज रघु ने कुबेर से प्राप्त हुई सभी सुवर्ण मुद्राएँ याचक कौत्स को प्रदान कर दी अर्थात् चौदह करोड़ ही न देकर पूरा खजाना ही कौत्स को सौंप दिया।

3. तथेति तस्यावितथं प्रतीतः प्रत्यग्रहीत्सङ्गममग्रजन्मा।
गामात्तसारां रघुरप्यवेक्ष्य निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्॥

व्याख्या- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘रघुकौत्ससंवादः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग से सम्पादित किया गया है। प्रस्तुत श्लोक में वर्णन किया गया है कि राजा रघु ने कौत्स की याचना को पूर्ण करने के लिए धन के स्वामी कुबेर पर आक्रमण कर उसका धन हरण कर लेने की इच्छा की।

ब्राह्मण कौत्स ने प्रसन्न होकर उस राजा रघु के सत्यवचन / प्रतिज्ञा को ‘ठीक है’ यह कहकर स्वीकार किया। रघु ने भी पृथिवी को प्राप्तधन वाली देखकर कुबेर से धन छीन लेने की इच्छा की।

भावार्थ यह है कि याचक कौत्स और दाता रघु दोनों को परस्पर विश्वास है। कौत्स ने रघु के वचनों को सत्य प्रतिज्ञा के रूप में ग्रहण किया। रघु ने कौत्स की याचना के पूर्ण करने हेतु धन के स्वामी कुबेर पर आक्रमण कर उसका धन हरण कर लेने की इच्छा की।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

4. निर्बन्धसञ्जातरुषार्थकार्यमचिन्तयित्वा गुरुणाहमुक्तः।
वित्तस्य विद्यापरिसंख्यया मे कोटीश्चतस्रो दश चाहरेति॥

व्याख्या-प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘रघुकौत्ससंवादः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग से सम्पादित किया गया है। प्रस्तुत श्लोक में ऋषि वरतन्तु ने शिष्य कौत्स को चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा में समर्पित करने का आदेश दिया है।

कौत्स महाराज रघु से शेष वृत्तान्त निवेदन करते हुए कहता है-“मेरे बार-बार प्रार्थना (जिद्द) करने से क्रोधित हुए गुरु जी ने मेरी निर्धनता का विचार किए बिना मुझे कहा कि चौदह विद्याओं की संख्या के अनुसार तुम चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ ले आओ।”

भावार्थ यह है कि गुरुदेव वरतन्तु को न धन का लोभ था, न विद्या का अभिमान। परन्तु शिष्य कौत्स की बार-बार जिद्द ने उन्हें क्रोधित कर दिया और उन्होंने कौत्स को पढ़ाई गई चौदह विद्याओं के प्रतिफल में चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा में समर्पित करने का आदेश दे दिया।

5. अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः॥

प्रसंगः-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽ-मृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में बताया गया है कि केवल अविद्या = भौतिक विद्या अथवा केवल विद्या = अध्यात्म विद्या में लगे रहना अन्धकार में पड़े रहने के समान है।

व्याख्या-जो लोग केवल अविद्या अर्थात् भौतिक साधनों की प्राप्ति कराने वाले ज्ञान की उपासना करते हैं, वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं। परन्तु उनसे भी अधिक घोर अन्धकारमय जीवन उन लोगों का होता है, जो केवल विद्या अर्थात् अध्यात्म ज्ञान प्राप्त करने में ही लगे रहते हैं।

अविद्या और विद्या वेद के विशिष्ट शब्द हैं। ‘अविद्या’ से तात्पर्य है शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता करने वाला ज्ञान। ‘विद्या’ का अर्थ है, आत्मा के रहस्य को प्रकट करने वाला अध्यात्म ज्ञान। वेद मन्त्र का तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति केवल भौतिक साधनों को जुटाने का ज्ञान ही प्राप्त करता है और ‘आत्मा’ के स्वरूपज्ञान को भूल जाता है तो बहुत बड़ा अज्ञान है, उसका जीवन अन्धकारमय है। परन्तु जो व्यक्ति केवल अध्यात्म ज्ञान में ही मस्त रहता है, उसकी दुर्दशा तो भौतिक ज्ञान वाले से भी अधिक दयनीय होती है। क्योंकि भौतिक साधनों के अभाव में शरीर की रक्षा भी कठिन हो जाएगी। अतः वेदमन्त्र का स्पष्ट संकेत है कि भौतिक ज्ञान तथा अध्यात्म ज्ञान से युक्त सन्तुलित जीवन ही सफल और आनन्दित जीवन है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

6. स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से संगृहीत है। इस पद्य के रचयिता महाकवि भर्तृहरि हैं। इस पद्य में मौन का महत्त्व बताया गया है।
व्याख्या-विधाता ने स्वतन्त्र, अद्वितीय गुण वाला, अज्ञान को ढकने वाला मौन नामक गुण बनाया है। विशेष रूप से विद्वानों की सभा में तो यह मौन मूों का आभूषण बन जाता है।

“एक चुप सो सुख’ हिन्दी की इस कहावत का मूल भाव इस पद्य में है। यह मौन अद्वितीय विशेषताओं वाला है। यह अज्ञान को ढक देता है। विद्वानों की सभा में यदि कोई मूर्ख मनुष्य बैठा हो और वह वहाँ बैठकर चुप रहे तब यह मौन उस मूर्ख का आभूषण बन जाता है और दूसरे लोग इस चुप रहने वाले मूर्ख को विद्वान् ही समझते हैं।

7. विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्यु तीा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥

प्रसंग-प्रस्तुत मन्त्र हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ ‘ईशोपनिषद्’ से संकलित है। इस मन्त्र में अध्यात्मज्ञान तथा व्यावहारिक ज्ञान द्वारा सन्तुलित जीवन यापन करने का आदेश दिया है।

व्याख्या-जो मनुष्य विद्या अर्थात् अध्यात्मज्ञान तथा अविद्या अर्थात् अध्यात्म ज्ञान से भिन्न सभी प्रकार का व्यावहारिक ज्ञान, दोनों को एक साथ जानता है। वह व्यावहारिक ज्ञान द्वारा मृत्यु को पारकर अध्यात्म ज्ञान द्वारा जन्ममृत्यु के दुःख से रहित अमरत्व को प्राप्त करता है।

‘विद्या’ और ‘अविद्या’-ये दोनों शब्द विशिष्ट वैदिक प्रयोग हैं। ‘विद्या’ शब्द का प्रयोग यहाँ ‘अध्यात्म ज्ञान’ के अर्थ में हुआ है। इस जड़-चेतन जगत् में सर्वत्र व्याप्त परमात्मा तथा शरीर में व्याप्त जीवात्मा के ज्ञान को अध्यात्म ज्ञान कहा जाता है। यह मोक्षदायी यथार्थ ज्ञान ही ‘विद्या’ है। इससे भिन्न सभी प्रकार के ज्ञान को ‘अविद्या’ नाम दिया गया है।

अध्यात्म ज्ञान से भिन्न सृष्टिविज्ञान, यज्ञविज्ञान, भौतिकविज्ञान, आयुर्विज्ञान, गणितविज्ञान, अर्थशास्त्र, प्रौद्योगिकी, सूचनातन्त्र आदि सभी प्रकार का ज्ञान ‘अविद्या’ शब्द में समाहित हो जाता है। यह अध्यात्मेतर ज्ञान मनुष्य को मृत्यु दुःख से छुड़वाता है और इसी अध्यात्म ज्ञान द्वारा मनुष्य फिर अमरत्व अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है। इस प्रकार यह दोनों प्रकार का ज्ञान ही मनुष्य के लिए आवश्यक है, तभी वह इहलोक तथा परलोक दोनों को सिद्ध कर सकता है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

8. तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं निःशेषविश्राणितकोषजातम्।
उपात्तविद्यो गुरुदक्षिणार्थी कौत्सः प्रपेदे वरतन्तुशिष्यः॥

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘रघुकौत्ससंवादः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह श्लोक महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग से सम्पादित किया गया है। यह श्लोक ऋषि वरतन्तु के शिष्य कौत्स तथा महाराजा रघु के बीच हुए संवाद का अंश है।

व्याख्या-‘विश्वजित्’ नामक यज्ञ में अपनी सम्पूर्ण धनराशि दान कर चुके उस राजा रघु के पास वरतन्तु ऋषि का विद्यासम्पन्न शिष्य कौत्स गुरुदक्षिणा देने की इच्छा से धनयाचना करने के लिए पहुँचा।।

प्राचीन काल में राजा लोग ‘विश्वजित्’ यज्ञ करते थे। राजा रघु ने भी यह यज्ञ किया और अपना सम्पूर्ण खजाना (राजकोष-धनधान्य) दान कर दिया। तभी वरतन्तु का शिष्य कौत्स भी राजा के पास इस आशा में पहुँचा कि वह अपने गुरु को गुरुदक्षिणा में देने के लिए चौदह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ राजा रघु से माँग लेगा।

9. न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘कर्मगौरवम्’ नामक पाठ से लिया गया है। यह श्लोक महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ से संकलित है। इसमें कर्म के गौरव को प्रतिपादित किया गया है।

व्याख्या-हे अर्जुन ! कोई भी पुरुष कभी भी थोड़ी देर के लिए भी, बिना कर्म किए नहीं रहता है। नि:संदेह सब लोग प्रकृति से उत्पन्न हुए (स्वभाव अनुसार) गुणों द्वारा विवश होकर कर्म करते हैं।

कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। जब मनुष्य शरीर से कर्म नहीं करता, निठल्ला पड़ा रहता है, तब भी वह मन से तो कार्य करता ही है। अतः पूर्ण चेतना से निष्काम कर्म ही करना चाहिए। निठल्ले कभी नहीं रहना चाहिए।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

(ख) गद्यांशस्य हिन्दीभाषायां व्याख्या
अधोलिखित गद्यांशस्य हिन्दीभाषायां व्याख्या कार्या

1. राजवचनमनुगच्छति जनो भयात्।उपदिश्यमानमपि ते न शृणवन्ति।
अवधीरयन्तः खेदयन्ति हितोपदेशदायिनो गुरून्।

व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शाश्वती’ द्वितीयो भागः’ के शुकनासो पदेश: नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट की प्रसिद्ध रचना ‘कादम्बरी’ से सम्पादित है। प्रस्तुत अंश में मन्त्री शुकनास युवराज चन्द्रापीड को उपदेश करते हुए कहते हैं कि- हे राजकुमार चन्द्रापीड, लोग प्रायः भय के कारण राजा के वचनों का ही अनुसरण करते हैं। उपदेश देते हुए (विद्वान्) को भी वे सुनते नहीं हैं। हितकारी उपदेश करने वाले गुरुओं का तिरस्कार करते हुए उन्हें खिन्न कर देते हैं।

2. यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालन-निर्मलापि
कालुष्यमुपयाति बुद्धिः। नाशयति च पुरुषमत्यासङ्गो विषयेषु।

व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक शाश्वती द्वितीयो भाग का ‘शुकनासो पदेशः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट की सुप्रसिद्ध रचना ‘कादम्बरी’ से सम्पादित है। प्रस्तुत अंश में मन्त्री शुकनास युवराज चन्द्रापीड को उपदेश देते हुए कहते हैं कि-युवावस्था के आरम्भ में मनुष्य की बुद्धि शास्त्ररूपी जल में घुलने के कारण स्वच्छ होती हुई भी प्रायः दोषपूर्ण हो जाती है और विषयों में अति आसक्ति मनुष्य का विनाश कर देती है।

3. तदतिकुटिलचेष्टादारुणे राज्यतन्त्रे, अस्मिन् महामोहकारिणि च यौवने कुमार। तथा प्रयतेथाः यथा नोपहस्यसे जनैः, न निन्द्यसे साधुभिः, न धिविक्रयसे गुरुभिः, नोपालभ्यसे सुहृद्भिः, न वञ्च्यसे धूतैः।

व्याख्या-प्रस्तुत पाठ्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘शुकनाशोपदेशः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट की प्रसिद्ध रचना ‘कादम्बरी’ से सम्पादित है। प्रस्तुत अंश में मन्त्री शुकनास युवराज चन्द्रापीड को उपदेश करते हुए कहते हैं कि हे राजकमार चन्द्रापीड ! इसीलिए अत्यन्त कुटिल चेष्टाओं से युक्त इस कठोर राज्यतन्त्र में और इस महामूर्छा पैदा करने वाली युवावस्था में तुम वैसा प्रयत्न करना जिससे तुम जनता की हँसी के पात्र न बनो। सज्जन तुम्हारी निन्दा न करें। गुरु लोग तुम्हें धिक्कार न कहें। मित्र लोग तुम्हें उपालम्भ (लाम्भा, उलाहना) न दें। धूर्त तुम्हें ठग न सकें। अर्थात् तुम राजसुख में डूब कर अपने कर्तव्य से कभी विमुख मत होना।

4. अपरे तु स्वार्थनिपादनपरैः दोषानपि गुणपक्षमध्यारोपयद्भिः प्रतारणकुशलैयूं तैः प्रतार्यमाणा वित्तमदमत्तचित्ता सर्वजनोपहास्यतामुपयान्ति। न मानयन्ति मान्यान्, जरावैक्लव्यप्रलपितमिति पश्यन्ति वृद्धोपदेशम्।

व्याख्या-प्रस्तुत पाठ्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘शुकनाशोपदेशः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट की प्रसिद्ध रचना ‘कादम्बरी’ से सम्पादित है। प्रस्तुत अंश में मन्त्री शुकनास युवराज चन्द्रापीड को उपदेश करते हुए कहते हैं कि हे राजकमार चन्द्रापीड ! कुछ राजा लोग तो स्वार्थ सिद्ध करने में तत्पर, दोषों में गुणों को आरोपित करने वाले, ठग-विद्या में अतिनिपुण, धूर्तबुद्धि लोगों के द्वारा ठगे जाते हुए धन के मद से उन्मत्त चित्त वाले होकर सब लोगों की हँसी के पात्र बनते हैं। वे मानवीय लोगों का सम्मान नहीं करते। वृद्धों के उपदेश को, यह मानकर देखते हैं कि यह तो उनका बुढ़ापे में बड़बड़ाना है।
भाव यह है कि राजा को अपने विवेक से ही प्रजा के हित में कार्य करने चाहिए तथा स्वार्थी मन्त्रियों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

5. गर्भेश्वरत्वमभिनवयौवनत्वम् अप्रतिमरूपत्वममानुषंशक्तित्वञ्चेति महतीयं खल्वनर्थपरम्परा। यौवनारम्भे घ प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः। नाशयति च पुरुषमत्यासङ्गो विषयेषु।

व्याख्या-प्रस्तुत पाठ्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘शुकनाशोपदेशः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट की प्रसिद्ध रचना ‘कादम्बरी’ से सम्पादित है। प्रस्तुत अंश में मन्त्री शुकनास युवराज चन्द्रापीड को उपदेश करते हुए अनर्थ के चार कारणों की ओर ध्यान दिला रहे हैं। मन्त्री शुकनास कहते हैं कि अनर्थ की परम्परा के चार कारण हैं
(i) जन्म से ही प्रभुता
(ii) नया यौवन
(iii) अति सुन्दर रूप
(iv) अमानुषी शक्ति।
इन चारों में से मनुष्य का विनाश करने के लिए कोई एक कारण भी पर्याप्त होता है। जिसके जीवन में ये चारों ही कारण उपस्थित हों, उसके बिनाश को कौन रोक सकता है ? इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को घोर अनर्थ से बचने के लिए उक्त चारों वस्तुएँ पाकर से कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। युवावस्था के प्रारम्भ में मनुष्य की बुद्धि शास्त्ररूपी जल से धुलने के कारण स्वच्छ होती हुई भी प्राय: दोषपूर्ण हो जाती है। और विषयों में अति आसक्ति मनुष्य का विनाश कर देती है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

6. एवं समतिक्रामत्सु दिवसेषु राजा चन्द्रापीडस्य यौवराज्याभिषेकं चिकीर्षुः प्रतीहारानुपकरण सम्भारसंग्रहार्थमादिदेश। समुपस्थितयौवराज्याभिषेकं च तं कदाचिद् दर्शनार्थमागतमारूढविनयमपि विनीततरमिच्छन् कर्तुं शुकनासः सविस्तरमुवाच।

प्रसंग-प्रस्तुत पाठ्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘शुकनाशोपदेशः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट की प्रसिद्ध रचना ‘कादम्बरी’ से सम्पादित है। इस पाठ में राजा तारापीड का अनुभवी मन्त्री राजकुमार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक से पूर्व हितैषी भाव से उपदेश देते हैं। वे उसे युवावस्था में रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक दोषों के विषय में सावधान कर देना अपना कर्तव्य समझते हैं।

व्याख्या-इस प्रकार कुछ दिन बीत जाने पर राजा तारापीड ने राजकुमार चन्द्रापीड को राजतिलक करने की इच्छा से द्वारपालों को आवश्यक सामग्री-समूह के संग्रह करने के लिए आदेश दिया। जिसके राजतिलक समय निकट ही आ चुका था, जो कदाचित् मन्त्री शुकनास का दर्शन करने के लिए आया था-ऐसे उस विनयसम्पन्न (विशेष नीति से युक्त) राजकुमार चन्द्रापीड को और भी अधिक विनयवान् बनाने की इच्छा वाले शुकनास ने विस्तारपूर्वक कहा।

7 भवादृशा एव भवन्ति भाजनान्युपदेशानाम्। अपगतमले हि मनसि विशन्ति सुखेनोपदेशगुणाः। हरति अतिमलिनमपि दोषजातं गुरूपदेशः गुरूपदेशश्च नाम अखिलमलप्रक्षालनक्षमम् अजलं स्नानम्। विशेषेण तु राज्ञाम्। विरला हि तेषामुपदेष्टारः।

प्रसंग-प्रस्तुत पाठ्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘शुकनाशोपदेशः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट की प्रसिद्ध रचना ‘कादम्बरी’ से सम्पादित है। इस पाठ में राजा तारापीड का अनुभवी मन्त्री राजकुमार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक से पूर्व हितैषी भाव से उपदेश देते हैं। वे उसे युवावस्था में रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक दोषों के विषय में सावधान कर देना अपना कर्तव्य समझते हैं।

व्याख्या-मन्त्री शुकनास राजकुमार चन्द्रापीड से कहते हैं-हे बेटा, चन्द्रापीड! आप जैसे व्यक्ति ही उपदेशों के पात्र होते हैं। निर्दोष मन में ही उपदेश के गुण सुखपूर्वक प्रवेश करते हैं। गुरु का उपदेश अत्यन्त मलिन दोषसमूह को भी दूर कर देता है। गुरु का उपदेश सम्पूर्ण मलों को धोने में समर्थ जलरहित स्नान है। (अर्थात् जैसे पानी से स्नान करने पर बाहर के सब मैल धुल जाते हैं, वैसे ही गुरु के उपदेश से सब आन्तरिक दोष दूर हो जाते हैं।) ये उपदेश राजाओं के लिए तो विशेष रूप से लाभकारी होते है; क्योंकि उन्हें उपदेश देने वाले बहुत कम लोग होते हैं।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

8. आलोकयतु तावत् कल्याणाभिनिवेशी लक्ष्मीमेव प्रथमम्। न ह्येवं-विधमपरिचितमिह जगति किञ्चिदस्ति यथेयमनार्या। लब्धापि खलु दुःखेन परिपाल्यते। परिपालितापि प्रपलायते। न परिचयं रक्षति। नाभिजनमीक्षते। न रूपमालोकयते। न कुलक्रममनुवर्तते। न शीलं पश्यति। न वैदग्ध्यं गणयति। न श्रुतमाकर्णयति। न धर्ममनुरुध्यते। न त्यागमाद्रियते।

प्रसंग-प्रस्तुत पाठ्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘शुकनाशोपदेशः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट की प्रसिद्ध रचना ‘कादम्बरी’ से सम्पादित है। इस पाठ में राजा तारापीड का अनुभवी मन्त्री राजकुमार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक से पूर्व हितैषी भाव से उपदेश देते हैं। वे उसे युवावस्था में रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक दोषों के विषय में सावधान कर देना अपना कर्तव्य समझते हैं।

व्याख्या-हे चन्द्रापीड ! तुम कल्याण (मंगल) के लिए प्रयत्नशील हो, इसलिए पहले लक्ष्मी को ही विचार कर देखो। इस जैसी अपरिचित इस संसार में अन्य कोई वस्तु नहीं जैसी यह अनार्या लक्ष्मी है। इस लक्ष्मी को प्राप्त कर लेने पर भी, इसका महाकष्ट से पालन (रक्षण) करना पड़ता है और यह लक्ष्मी न परिचय की परवाह करती है, न कुलीन की ओर देखती है, न सौन्दर्य (रूप) को देखती है, न कुल-परम्परा का अनुगमन करती है। न सच्चरित्र को देखती है, न कुशलता (पाण्डित्य) की परवाह करती है। न शास्त्रज्ञान को सुनती है, न धर्म से रोकी जाती है, न त्याग (दान) को आदर देती है।

9. जनकः अये, शिष्टानध्याय इत्यस्खलितं खेलतां वटूनां कोलाहलः।
कौसल्याः सुलभसौख्यमिदानी बालत्वं भवति।
अहो, एतेषां मध्ये क एष रामभद्रस्य मुग्धललितैरङ्गैर्दारकोऽस्माकं लोचने
शीतलयति ?

प्रसंग-प्रस्तुत अंश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘बालकौतुकम्’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् नाटककार भवभूति के प्रसिद्ध नाटक ‘उत्तररामचरितम्’ के चतुर्थ अंक से सम्पादित किया गया है।

व्याख्या-वाल्मीकि आश्रम में अतिथि के रूप में, राजा जनक, महारानी कौशल्या तथा वशिष्ठ की पत्नी अरुन्धति आए हैं। वे आश्रम में बालकों के क्रीड़ा कौतूहल को देख रहे हैं। उन बालकों में सीता का पुत्र लव भी है, जिसका उन्हें पता नहीं है। यह अंश उनके वार्तालाप का ही है।

जनक कौशल्या से कहते हैं-अरे, बड़े लोगों के आने पर पढ़ाई में अवकाश होने के कारण, बेरोकटोक खेलते हुए छात्र-ब्रह्मचारियों का यह शोर है अर्थात् छुट्टी होने के कारण, सभी ब्रह्मचारी अनियन्त्रित होकर खेल रहे हैं।

कौसल्या जनकसे कहती हैं-इस बचपन में सुख सुलभ होता है अर्थात् बाल्यकाल में क्रीड़ा आदि सामान्य साधनों से ही सुख मिल जाता है। ओह, इन बालकों के बीच में यह कौन बालक, रामचन्द्र के समान सुन्दर और कोमल अंगों से हमारी आँखों को ठण्डा कर रहा है अर्थात् बाल्यावस्था में जैसा सुन्दर और कोमल रामभद्र था, वैसी ही आकृति वाला यह कौन बालक हमें आनन्द दे रहा है ?

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

10. लवः (प्रविश्य, स्वगतम्) अविज्ञातवय:-क्रमौचित्यात् पूज्यानपि सतः कथमभिवादयिष्ये ? (विचिन्त्य) अयं पुनरविरुद्धप्रकार इति वृद्धेभ्यः श्रूयते। (सविनयमुपसृत्य) एष वो लवस्य शिरसा प्रणामपर्यायः।

प्रसंग-प्रस्तुत अंश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘बालकौतुकम्’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् नाटककार भवभूति के प्रसिद्ध नाटक ‘उत्तररामचरितम्’ के चतुर्थ अंक से सम्पादित किया गया है।

व्याख्या-वाल्मीकि आश्रम में अतिथि के रूप में, राजा जनक, महारानी कौशल्या तथा वशिष्ठ की पत्नी अरुन्धति आए हैं। वे आश्रम में बालकों के क्रीड़ा कौतूहल को देख रहे हैं। उन बालकों में सीता का पुत्र लव भी है, जिसका उन्हें पता नहीं है। यह अंश उनके वार्तालाप का ही है।

लव प्रवेश करके अपने मन में ही कहता है-आयु क्रम अर्थात् आयु में छोटे-बड़े का क्रम और उचितता का ज्ञान न होने से, पूजनीय होते हुए भी इनको मैं कैसे प्रणाम करूँ अर्थात् इनमें कौन वयोवृद्ध है और किसे प्रथम प्रणाम करना चाहिए ? यह मैं नहीं जानता, तो इन्हें कैसे प्रणाम करूँ? (सोच विचारकर) यह प्रणाम की विरोधहीन पद्धति है। ऐसा गुरुजनों से सुना जाता है। विनयपूर्वक राजा जनक तथा महारानी कौशल्या के पास जाकर कहता है कि यह आपको ‘लव’ का औचित्य क्रम के अनुसार प्रणाम है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

(ग) पद्यांशं/पठित्वा-आधारितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि

अधोलिखितश्लोकं पठित्वा एतदाधारितानाम् प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतपूर्णवाक्येन लिखत
1. कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः|
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।
प्रश्ना:
(क) शतं समाः कथं जिजीविषेत् ?
(ख) अस्ति’ इति पदस्य कः पदपरिचयः ?
उत्तराणि
(क) शतं समाः कर्माणि कुर्वन् एव जिजी विषेत।
(ख) ‘अस्ति’ इतिपदस्य पद परिचयः-अस्धातु लटलकार प्रथमपुरुष एकवचने।

2. अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः।
प्रश्ना:
(क) के अन्धन्तमः प्रविशन्ति ?
(ख) ‘विद्यायाम्’ इति पदे कः शब्दः का विभक्तिश्च ?
उत्तराणि
(क) येऽविद्यामुपासते ते अन्धन्तमः प्रविशन्ति।।
(ख) ‘विद्यायाम्’ इति पदे – ‘विद्या’ शब्दः, ‘सप्तमी’ विभक्तिश्च ।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

3. विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।
प्रश्नाः
(क) महात्मनाम् प्रकृतिसिद्धं किं भवति ?
(ख) ‘यशसि’ इति पदे का विभक्तिः कः शब्दश्च ?
उत्तराणि
(क) विपदि धैर्यम् महात्मनाम् प्रकृतिसिद्धं भवति ।
(ख) ‘यशसि’ इति पदे – ‘यशस्’ शब्दः, ‘सप्तमी’ विभक्तिश्च ।

4. स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥
प्रश्नाः
(क) अपण्डितानां विभूषणं किम् ?
(ख) ‘विधात्रा’ – इति पदे कः शब्दः का विभक्तिश्च ?
उत्तराणि
(क) अपण्डितानां विभूषणं मौनम् ।
(ख) ‘विधात्रा’ – इति पदे – ‘विधातृ’ शब्दः, ‘तृतीया’ विभक्तिश्च ।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

5. ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
(क) जगत्सर्वं कीदृशम् अस्ति?
(ख) सर्वम्’ इति पदे कः शब्दः का विभक्तिश्च ?
उत्तराणि:
(क) जगत्सर्वम् ईशावास्यम् अस्ति।
(ख) ‘सर्वम्’ – सर्व शब्दः प्रथमा विभक्तिश्च।

6. तदन्यतस्तावदनन्यकार्यो गुर्वर्थमाहर्तुमहं यतिस्ये।
स्वस्त्यस्तु ते निर्गलिताम्बुग) शरद्घनं नादति चातकोऽपि।
(क) चातकोऽपि कं न याचते ?
(ख) अहम्’ इति पदे का विभक्तिः किं वचनञ्च ?
उत्तराणि
(क) चातकोऽपि शरद्घनं न याचते।
(ख) ‘अहम्’ – प्रथमा विभक्तिः एकवचनञ्च।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

7. कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।
(क) शतं समाः कथं जिजीविषेत् ?
(ख) त्वयि’ पदे कः शब्दः का विभक्तिश्च ?
उत्तराणि
(क) शतं समाः कर्माणि कुर्वन् एव जिजीविषेत् ।
(ख) ‘त्वयि’ – युष्मद् शब्दः सप्तमी विभक्तिश्च। ।

8. बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥
(क) बुद्धियुक्तः के जहाति?
(ख) तस्मात्’ इति पदे कः शब्दः का विभक्तिश्च?
उत्तराणि
(क) बुद्धियुक्तः सुकृतदुष्कृते जहाति।
(ख) ‘तस्मात्’ – तद् शब्द: पञ्चमी विभक्तिश्च।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

9. पापान्निवारयति योजयते हिताय गुह्यं निगृहति गुणान् प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥
(क) सन्मित्रं कस्मात् निवारयति ?
(ख) कः गुणान् प्रकटीकरोति ?
उत्तराणि
(क) सन्मित्रं पापात् निवारयति।
(ख) सन्मित्रं गुणान् प्रकटीकरोति ।

10. केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं द्वारा न चन्द्रोण्वलाः
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥
(क) पुरुषं का एका समलङ्करोति ?
(ख) कीदृशं भूषणं न क्षीयते ?
उत्तराणि
(क) एका संस्कृता वाणी पुरुषं समलङ्करोति ।
(ख) वाग्भूषणं न क्षीयते।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

11. सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
(क) परमापदां पदं कः ?
(ख) सम्पदः कं वृणते ?
उत्तराणि
(क) परमापदां पदम् अविवेकः ।
(ख) सम्पदः विमृश्यकारिणं वृणते।

12. कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि।।
(क) जनकादयः केन सिद्धिम् आस्थिता ?
(ख) संपश्यन् किम् कर्तुम् अर्हसि ?
उत्तराणि
(क) जनकादयः कर्मणा सिद्धिम् आस्थिताः ।
(ख) लोसंग्रहं पश्यन् कर्म कर्तुम् अर्हसि।

(घ) पठित गद्यांश पर आधारित प्रश्नोत्तर
अधोलिखित गद्यांशं पठित्वा एतदाधारितानाम् प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतपूर्णवाक्येन लिखत

1. कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूरः ‘किन्तुः’मुखस्य कवलमप्याच्छिनत्ति।स्वल्पदिनानामेव वर्तास्ति।आयुर्वेदमार्तण्डस्य श्रीमतः स्वामिमहाभगस्य औषधिं निषेव्य अधुनैवाहं नीरोगोऽभवम्।
प्रश्ना:
(क) ‘किन्तुः’ कं आच्छिनत्ति ?
(ख) कस्य औषधि निषेव्य अधुनैवाह नीरोगोऽभवम् ?
उत्तराणि:
(क) ‘किन्तुः’ मुखस्य कवलमपि आच्छिन्नत्ति।
(ख) श्रीमतः स्वामिमहाभागस्य औषधिं निषेव्य अघुनैवाहं निरोगोऽभवत्।

2. अहं देशसेवां कर्तुं गृहान बहिरभवम्। मया निश्चितमासीत् ‘एतावन्ति दिनानि स्वोदरसेवायै क्लिष्टोऽभवम्। इदानीं कियन्तं कालं देशसेवायामपि लक्ष्यं ददामि।
प्रश्ना:
(क) किमर्थं बहिरभवम् ?
(ख) किमर्थं क्लिष्टोऽभवम् ?
उत्तराणि
(क) देशसेवां कर्तुं बहिरभवम्।
(ख) स्वोदरसेवायै क्लिष्टोऽभवम्।

3. मनुष्याणां हिंसावृत्तिस्तु निरवधिः । पशुहत्या तु तेषाम् आक्रीडनम्। केवलं विक्लान्तचित्तविनोदाय महारण्यम् उपगम्य ते यथेच्छं निर्दयं च पशुघातं कुर्वन्ति।
प्रश्ना:
(क) हिंसावृत्तिः कीदृशी ?
(ख) तेषाम् आक्रीडनं का ?
उत्तराणि
(क) हिंसावृत्तिः निरवधिः।
(ख) तेषाम् आक्रीडनं पशुहत्या।

4. एवं चतुर्णां परस्परं विवादो लग्नः। ततो ब्राह्मणो राजसमीपमागत्य चतुर्णां विवादवृत्तान्तमकथयत्। राजापि तच्छ्रुत्वा तस्मै ब्राह्मणाय चत्वार्यपि रत्नानि ददौ।
प्रश्नाः
(क) केषां विवादो लग्न: ?
(ख) रत्नानि कः ददौ ?
उत्तराणि
(क) चतुर्णां विवादो लग्नः।
(ख) रत्नानि राजा ददौ।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

5. अस्माभिः पर्वताः शंकवः कृताः। एतेषां सप्तद्वीपानां प्रत्येकमावेष्टनरूपाः सप्तसमुद्राः।
(क) सप्तसमुद्राः केषाम् आवेष्टनरूपाः सन्ति ?
(ख) ‘अस्माभिः’ इति पदे कः शब्दः का विभक्तिश्च ?
उत्तराणि
(क) सप्तसमुद्राः सप्तद्वीपानाम् आवेष्टनरूपाः सन्ति।
(ख) ‘अस्माभिः’ – अस्मद् शब्दः तृतीया विभक्तिश्च ।

6. इत्येवं विचार्य सर्वस्वदक्षिणं यज्ञं कर्तुमुपक्रान्तवान्। ततः शिल्पिभिरतीव मनोहरो मण्डपः कारितः। सर्वापि यज्ञसामग्री समहता। देवमुनिगन्धर्वयक्षसिद्धादयश्च समाहूताः।
(क) यज्ञे के के समाहूताः ?
(ख) सर्वा इति पदे कः शब्दः का विभक्तिश्च ?
उत्तराणि
(क) यज्ञे देवमुनिगन्धर्वयक्षसिद्धादयश्च समाहूताः ।
(ख) सर्वा – सर्व शब्दः प्रथमा विभक्तिश्च ।

7. श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां विविधसमस्यानामपि समाधानं जातम्। स्वकार्यं त्यक्त्वा अपरस्य सहकारस्तस्य परमधर्मः।
(क) श्रीनायारस्य परमधर्मः कः आसीत् ?
(ख) ‘तस्य’ इति पदे का विभक्तिः किं वचनञ्च ?
उत्तराणि
(क) श्रीनायारस्य परमधर्मः अपरस्य सहकारः आसीत् ।
(ख) ‘तस्य’ – षष्ठी विभक्तिः एकवचनञ्च ।

8. मनुष्याणां हिंसावृत्तिस्तु निरवधिः। पशुहत्या तु तेषाम् आक्रीडनम्। केवलं विक्लान्तचित्तविनोदाय महारण्यम् उपगम्य ते यथेच्छं निर्दयं च पशुघातं कुर्वन्ति।
(क) पशुहत्या केषाम् आक्रीडनम्?
(ख) ‘ते’ इति पदे का विभक्तिः किं वचनञ्च ?
उत्तराणि
(क) पशुहत्या मनुष्याणाम् आक्रीडनम्।
(ख) ‘ते’ – प्रथमा विभक्तिः बहुवचनञ्च ।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

9. श्रीनायारस्य दायित्वग्रहणस्य एकमासाभ्यन्तरे बहुदिनेभ्यः स्थगितानां विविध-समस्यानामपि समाधानं जातम्। स्वकार्यं त्यक्त्वा अपरस्य सहकारस्तस्य परमधर्मः।
(क) अयं गद्यांशः कस्मात् पाठात् सङ्कलितः ?
(ख) श्रीनायारस्य परमधर्मः कः?
उत्तराणि
(क) अयं गद्यांशः दीनबन्धुः श्रीनायारः’ इति पाठात् सङ्कलितः ।
(ख) श्रीनायारस्य परमधर्मः अपरस्य सहकारः।

10. मासोऽयमाषाढः, अस्ति च सायं समयः, अस्तं जिगमिषुर्भगवान् भास्करः सिन्दूर-द्रव-स्नातानामिव वरुणदिगवलम्बिनामरुण-वारिवाहानामभ्यन्तरं प्रविष्टः।
(क) अयं गद्यांशः कस्मात् पाठात् संकलितः ?
(ख) सायं समये भगवान् भास्करः कुत्र जिगमिषुः भवति?
उत्तराणि
(क) अयं गद्यांश: ‘कार्यं वा साधयेयं देहं वा पातयेयम्’ इति पाठात् संकलितः?
(ख) सायं समये भगवान् भास्करः कुत्र जिगमिषुः भवति?

11. तस्मै राज्ञे व्याया) रत्नचतुष्टयं दास्यामि। एतेषां महात्म्यम्-एक रत्तं यद्वस्तु स्मर्यते तद्ददाति। द्वितीयरत्नेन भोजनादिकममृततुल्यमुत्पद्यते। तृतीयरत्नाच्चतुरङ्गबलं भवति। चतुर्थादत्लादिव्याभरणानि जायन्ते।
(क) अयं गद्यांशः कस्मात् पाठात् संकलित:?
(ख) चतुर्थाद् रत्नात् कानि जायन्ते ?
उत्तराणि
(क) अयं गद्यांश: ‘विक्रमस्यौदार्यम्’ इति पाठात् संकलितः।
(ख) चतुर्थाद् रत्नात् दिव्याभरणानि जायन्ते। …

12. अहो असारोऽयं संसारः, कदा कस्य किं भविष्यतीति न ज्ञायते। यच्चोपार्जितानां वित्तं तदपि दानभोगैर्विना सफलं न भवति।
(क) अयं संसारः कीदृशः ?
(ख) दानभोगैर्विना किं सफलं न भवति ?
उत्तराणि
(क) अयं संसारः असारः।
(ख) दानभोगै विना उपार्जितानां वित्तं सफलं न भवति।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

(ङ) सूक्तीनां हिन्दीभाषायां व्याख्या

1. कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
(मनुष्य इस संसार में कर्तव्य कर्म करता हुआ ही सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करे) एवं त्वमि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे। (मनुष्य में कर्मों का लेप नहीं होता है, इसे छोड़कर कोई दूसरा रास्ता नहीं है।)

प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशावास्योपनिषद्’ से संगृहीत ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ पाठ के दूसरे मन्त्र से लिया गया है। इसमें बताया गया है कि निष्काम कर्म बन्धन का कारण नहीं होते।

भावार्थ:-मन्त्रांश का अर्थ है-‘मनुष्य में कर्मों का लेप नहीं होता है’, इसे छोड़कर कोई दूसरा रास्ता नहीं है। वे कौन से कर्म हैं, उन कर्मों की क्या विधि है, जिनसे कर्म मनुष्य के बन्धन का कारण नहीं बनते। पूरे मन्त्र में इस भाव . को अच्छी प्रकार स्पष्ट किया गया है। मन्त्र में कहा गया है कि मनुष्य अपनी पूर्ण इच्छाशक्ति से जीवन भर कर्म करे, निठल्ला-कर्महीन-अकर्मण्य बिल्कुल न रहे, पुरुषार्थी बने। जिन पदार्थों को पाने के लिए हम कर्म करते हैं, उनका वास्तविक स्वामी सर्वव्यापक ईश्वर है। वही प्रतिक्षण हमारे अच्छे बुरे कर्मों को देखता हैं। अतः यदि मनुष्य पदार्थों के ग्रहण में त्याग भाव रखते हुए, ईश्वर को सर्वव्यापक समझते हुए कर्तव्य भाव से (अनासक्त भाव से) कर्म करता है तो ऐसे निष्काम कर्म मनुष्य को सांसारिक बन्धन में नहीं डालते अपितु उसे जीवन्मुक्त बना देते हैं।

2. अविद्यया मृत्युं तीा विद्ययाऽमृतमश्नुते।
प्रसंग:-प्रस्तुत मन्त्रांश ‘ईशोवास्य-उपनिषद्’ से संकलित ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’ नामक पाठ में संगृहीत मन्त्र से उद्धृत है। इस मन्त्रांश में व्यावहारिक ज्ञान द्वारा मृत्यु को जीतकर अध्यात्म ज्ञान द्वारा अमरत्व प्राप्ति का रहस्य उद्घाटित किया गया है।

भावार्थ:-‘विद्या’ और ‘अविद्या’-ये दोनों शब्द विशिष्ट वैदिक प्रयोग हैं। ‘विद्या’ शब्द का प्रयोग यहाँ ‘अध्यात्म ज्ञान’ के अर्थ में हुआ है। इस जड़-चेतन जगत् में सर्वत्र व्याप्त परमात्मा तथा शरीर में व्याप्त जीवात्मा के ज्ञान को अध्यात्म ज्ञान कहा जाता है। यह मोक्षदायी यथार्थ ज्ञान ही ‘विद्या’ है। इससे भिन्न सभी प्रकार के ज्ञान को ‘अविद्या’ नाम दिया गया है। अध्यात्म ज्ञान से भिन्न सृष्टिविज्ञान, यज्ञविज्ञान, भौतिकविज्ञान, आयुर्विज्ञान, गणितविज्ञान, अर्थशास्त्र, प्रौद्योगिकी, सूचनातन्त्र आदि सभी प्रकार का ज्ञान ‘अविद्या’ शब्द में समाहित हो जाता है। यह अध्यात्मेतर ज्ञान मनुष्य को मृत्यु दुःख से छुड़वाता है और इसी अध्यात्म ज्ञान द्वारा मनुष्य फिर अमरत्व अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, जन्ममरण के चक्र से छूट जाता है। इस प्रकार यह दोनों प्रकार का ज्ञान ही मनुष्य के लिए आवश्यक है, तभी वह इहलोक तथा परलोक दोनों को सिद्ध कर सकता है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

3 कोटीश्चतस्त्रो दश चाहर।
प्रसंग:-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ से ‘रघुकौत्ससंवादः’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ कविकुलशिरोमणि महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्यम्’ के पञ्चम सर्ग में से सम्पादित किया गया है। इसमें महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्स का गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह, बार-बार के आग्रह से क्रोधित ऋषि द्वारा पढ़ाई गई चौदह विद्याओं की संख्या के अनुरूप चौदह करोड़ मुद्राएँ देने का आदेश, सर्वस्वदान कर चुके राजा रघु से कौत्स की धनयाचना ‘रघु के द्वार से’ याचक खाली हाथ लौट गया-इस अपकीर्ति के भय से रघु का कुबेर पर आक्रमण का विचार तथा भयभीत कुबेर द्वारा रघु के खजाने में धन वर्षा करने को संवाद रूप में वर्णित किया गया है।

भावार्थ:-महर्षि वरतन्तु मन्त्रद्रष्टा ऋषि थे। न उनमें विद्या का अभिमान था, न गुरुदक्षिणा में धन का लोभ । कौत्स नामक एक शिष्य ने ऋषि से चौदह विद्याएँ अत्यन्त भक्ति भाव से ग्रहण की। विद्याप्राप्ति के पश्चात् कौत्स ने गुरुदक्षिणा स्वीकार करने का आग्रह किया। ऋषि ने कौत्स के भक्तिभाव को ही गुरुदक्षिणा मान लिया। परन्तु कौत्स गुरुदक्षिणा देने के लिए जिद्द करता रहता रहा और इस जिद्द से रुष्ट होकर कवि ने उसे पढ़ाई गई एक विद्या के लिए एक करोड़ सुवर्णमुद्राओं के हिसाब से चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ भेंट करने का आदेश दे दिया-‘कोटीश्चतस्रो दश चाहर’।

4.
(i) मा भूत्परीवादनवावतारः।
(किसी निन्दा का नया प्रादुर्भाव न हो जाए।)
(ii) द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढुमर्हन्।
(हे पूजनीय ! दो-तीन तक आप मेरे पास ठहर जाएँ।)
(iii) निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्।
(रघु ने कुबेर से धन ग्रहण करने की इच्छा की।)
(iv) दिदेश कौत्साय समस्तमेव।
(रघु ने कुबेर से प्राप्त सारा धन कौत्स के लिए दे दिया।)
उत्तरम्:
(i), (ii), (iii) तथा (iv) के लिए संयुक्त भावार्थ

भावार्थ:-महर्षि वरतन्तु का शिष्य कौत्स राजा रघु के पास गुरुदक्षिणार्थ धन याचना के लिए आता है। रघु विश्वजित् यज्ञ में सर्वस्व दान कर चुके हैं, अत: वे सुवर्णपात्र के स्थान पर मिट्टी के पात्र में जल आदि लेकर कौत्स का स्वागत करते हैं। कौत्स मिट्टी का पात्र देखकर अपने मनोरथ की पूर्ति में हताश हो जाता है और वापस लौटने लगता है। राजा रघु खाली हाथ लौटते हुए कौत्स को रोकते हैं क्योंकि सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से बढ़कर होता है अत: उन्हें भय यह है कि कहीं प्रजा में यह निन्दा न फैल जाए कि कोई याचक रघु के पास आया था और खाली हाथ लौट गया था। वे कौत्स से उसका मनोरथ पूछते हैं।

कौत्स सारा वृत्तान्त सुनाते हुए कहता है कि गुरु के आदेश के अनुसार चौदह करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ गुरुदक्षिणा में भेंट करनी हैं। रघु कौत्स से दो-तीन के लिए आदरणीय अतिथि के रूप में ठहरने का अग्रह करते हैं, जिससे उचित धन का प्रबन्ध किया जा सके। कौत्स राजा की प्रतिज्ञा को सत्य मानकर ठहर जाता है। रघु भी उसकी याचना पूर्ति के लिए धन के स्वामी कुबेर पर आक्रमण, का विचार करते हैं। कुबेर रघु के पराक्रम से भयभीत होकर रघु के खजाने में सुवर्ण वृष्टि कर देते हैं। उदार रघु यह सारा धन कौत्स को दे देते हैं, परन्तु निर्लोभी कौत्स उनमें से केवल 14 करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ लेकर लौट जाता है।

दाता सम्पूर्ण धनराशि देकर अपनी उदारता प्रकट करते हैं और याचक आवश्यकता से अधिक एक कौड़ी भी ग्रहण न करके उत्तम याचक का आदर्श उपस्थित करते हैं। इस प्रकार दोनों ही यशस्वी हो जाते हैं।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

5. सर्वक्षत्रपरिभावी महान् उत्कर्षनिकषः।
प्रसंग:- प्रस्तुत पंक्ति ‘बालकौतुकम्’ पाठ से संकलित है। वाल्मीकि आश्रम में ‘लव’ के साथ ब्रह्मचारी-सहपाठी खेल रहे हैं। इसी समय कुछ बटुगण आकर, लव को आश्रम के निकट अश्वमेध घोड़े की सूचना देते हैं। यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा रक्षकों से घिरा हुआ है। लव उस अश्वमेध यज्ञ के महत्त्व को अपने मन में विचार करता हुआ कहता है

भावार्थ:-यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा है । यह क्षत्रियों की शक्ति का सूचक होता है। क्षत्रिय राजा, अपने बलवान् शत्रु राजा पर अपनी विजय की धाक जमाने के लिए इसे छोड़ता है। वास्तव में यह घोड़ा सभी शत्रुओं पर प्रभाव डालने वाले उत्कर्ष श्रेष्ठपन का सूचक होता है।

6. सुलभं सौख्यम् इदानीं बालत्वं भवति।
प्रसंग:-प्रस्तुत पंक्ति ‘बालकौतुकम्’ पाठ से उद्धृत है। वाल्मीकि आश्रम में अतिथि के रूप में जनक, कौशल्या और अरुन्धती आए हुए हैं। उनके आने से आश्रम में अवकाश कर दिया गया है और सभी छात्रगण खेलते हुए शोर मचा रहे हैं। इस शोर को सुनकर, कौशल्या जनक को बता रही हैं

भावार्थ:-बाल्यकाल में सुख के साधन सुलभ होते हैं। बच्चों को मजा लेने के लिए किसी खिलौने आदि की आवश्यकता नहीं होती। वे तो साधारण से खेल-कूद और हँसी-मजाक द्वारा ही सुख प्राप्त कर लेते हैं। सुख प्राप्ति के लिए उन्हें बड़े बहुमूल्य क्रीडा-साधनों की आवश्यकता नहीं होती। ये ब्रह्मचारी अपने बचपन का आनन्द ले रहे हैं।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

7. योगः कर्मसु कौशलम्
भावार्थ:- यह सूक्ति कर्मगौरवम्’ पाठ से ली गई है। गीता की इस सूक्ति में कहा गया है कि जो कार्य लोकहित की दृष्टि से किया जाता है तथा पूरी निष्ठा से किया जाता है, वही सही कर्म है, यही कर्मों की कुशलता है तथा यही योग है। प्रत्येक कार्य को अनासक्तेिभावना से तथा पूरी तत्परता से करना ही योग है।

8. विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्।
(समाज में मौन मूरों का आभूषण बन जाता है)
भावार्थ:-प्रस्तुत पंक्ति कवि भर्तृहरि द्वारा रचित ‘नीतिशतकम्’ से ली गई है। इसमें मौन के महत्त्व के बारे में बताया गया है लोग प्रायः आवश्यक्ता से अधिक बोलकर न केवल गंभीर से गंभीर बात का महत्त्व कम कर देते हैं अपितु कई बार तो उपहास का पात्र भी बन जाते हैं। हिन्दी में एक कहावत प्रसिद्ध है। ‘एक चुप सौ सुख’ ये कहावत

भी मौन के महत्त्व को दर्शाती है। विद्वानों की सभा में यदि कोई मूर्ख बैठा हो और कुछ भी न बोले तो लोग उसे विद्वान् ही समझते हैं। इस तरह से उस मूर्ख का मौन रहना उसका आभूषण बन जाता है। परन्तु जैसे ही वह मूर्ख अपना मौन तोड़कर कुछ बात कहेगा तो उसकी मूर्खता उजागर हो जाएगी। इसीलिए तो मौन को मूों का आभूषण कहा गया है।

9. हरति अतिमलिनमपि दोषजातं गुरूपदेशः।
भावार्थ:–प्रस्तुत पंक्ति शुकनासोपदेश नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट द्वारा रचित कादम्बरी से लिया गया है। प्रस्तुत पंक्ति में शुकनास युवराज चन्द्रापीड को गुरु के उपदेश का महत्त्व समझा रहे हैं। मन्त्री शुकनास कहते हैं कि गुरु का उपदेश मनुष्य के जीवन में बहुत अधिक उपयोगी तथा हितकारी होता है। मनुष्य में यदि अत्यधिक गहरे दोषों का समूह हो तो गुरु का उपदेश उन गहरे से गहरे दोषों को भी दूर कर देता है और उन दोषों के स्थान पर अति उत्तम गुण प्रवेश कर जाते हैं। मनुष्य का जीवन उज्वल हो जाता है। सब जगह ऐसे व्यक्ति का यश फैलता है, इसीलिए गुरु का उपदेश प्रत्येक मनुष्य के लिए परम कल्याणकारी तथा आवश्यक है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

10. सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
अथवा
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से उद्धृत है। इसके रचयिता महाकवि भारवि हैं। कवि ने इस श्लोक में सोच-विचार कर ही कार्य करने के लिए प्रेरित किया है।

भावार्थ:-मनुष्यों को अचानक ही (बिना सोचे-विचारे) कोई कार्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि विवेकहीनता घोर विपत्तियों का स्थान होती है। सम्पत्तियाँ गुणों की लोभी होती हैं; अतः सोच-विचार कर कार्य करने वाले मनुष्य को वे स्वयं ही चुन लेती है।

‘बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताए’ हिन्दी की इस कहावत का मूल भाव इस सूक्ति में है। मनुष्य को सोचविचार कर ही प्रत्येक कार्य करना चाहिए। बिना सोचे-समझे कार्य करने से घोर विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। मनुष्य सम्पत्ति पाने के लिए कार्य करता है, सम्पत्तियाँ गुणों के पीछे चलती हैं । गुणवान् मनुष्य विवेकपूर्वक कार्य करता है और सम्पत्तियाँ भी ऐसे विचारशील मनुष्य के पास स्वयं दौड़कर चली आती हैं।

11. ‘पश्येह मधुकरीणां सञ्चितमर्थं हरन्त्यन्ये’
(देखो, इस संसार में मधुमक्खियों के एकत्रित शहद को दूसरे लोग चुरा कर ले जाते हैं।

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति ‘विक्रमस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से उधत है। यह पाठ ‘सिंहासनद्वात्रिशशिंका’ नामक कथासंग्रह से संकलित है। इस पाठ में राजा विक्रम की उदारता को दर्शाया गया है। राजा विक्रम की मान्यता है कि व्यक्ति के पास जो भी धन होता है, यदि उसकी सच्चे अर्थों में रक्षा करनी हो तो उसका एक ही उपाय है कि परोपकार के कार्यों के लिए उस धन का त्याग अर्थात् दान कर देना चाहिए। क्योंकि संसार में देखा जाता है कि जो लोग धन को केवल इकट्ठा ही करते हैं उसका दान या भोग नहीं करते उनका धन या तो तिजौरियों में ही नष्ट हो जाता है, या उसे चोर आदि चुरा ले जाते हैं। मधुमक्खियाँ अपने छत्तों में शहद इकट्ठा करती हैं, न वे किसी को देती हैं और न स्वयं ही उसका भोग करती हैं। इस शहद को पाने के लिए दूसरे लोग आकर मक्खियों को उड़ा देते हैं और सारा शहद चुरा कर ले जाते हैं। अतः सञ्चित धन का सदुपयोग उस धन का परोपकार के कार्यों में खर्च कर देना ही है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

12. तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्।।
उत्तरम्

प्रसंग:-प्रस्तुत पंक्ति विक्रमस्यौदार्यम् नामक पाठ से ली गई है। यह कथा किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ कथा संग्रह से संकलित है। प्रस्तुत अंश में धन के दान को ही धन का सच्चा संरक्षण कहा गया है।

व्याख्या-मनुष्य जो भी धन अपने परिश्रम से इकट्ठा करता है। उसका संरक्षण खजाना भरकर नहीं हो सकता। अपितु असहायों की सहायता के लिए उस धन को दान कर देना ही उसकी सच्ची रक्षा है। तालाब में जल भरा होता है यदि वह जल तालाब में ही पड़ा रहे और किसी के काम न आएँ तो वह जल व्यर्थ है अपितु तालाब में ही पड़ेपड़े वह जल दुर्गन्धयुक्त हो जाता है, इसीलिए तालाब के जल को बाहर निकाल दिया जाता है, नया जल आ जाता है और उसका पानी उपयोगी बना रहता है। इसी प्रकार धन का दान करना ही धन का सच्चा उपयोग है।

13. षड्विधं प्रीतिलक्षणम्।
उत्तरम्:
प्रसंगः-प्रस्तुत पङ्क्ति ‘विक्रमस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से ली गई है। यह कथा किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ कथासंग्रह से संकलित है। प्रस्तुत अंश में समुद्र ने ब्राह्मण को मित्रता का लक्षण बताया है।
व्याख्या-सच्ची मित्रता की पहचान के छह सूत्र हैं
1. मित्र मित्र को धन आदि प्रदान करता है।
2. मित्र मित्र से धन आदि स्वीकार करता है।
3. अपनी गोपनीय (छिपाने योग्य) बात मित्र को बताता है।
4. मित्र की गोपनीय बात उससे पूछता है।
5. मित्र के साथ बैठकर भोजन करता है।
6. मित्र को भोजन खिलाता है।
जिन दो मित्रों के बीच उक्त छ: प्रकार के आचरण बिना किसी औपचारिकता के सम्पन्न होते हैं उन्हीं में सच्ची मित्रता समझनी चाहिए।

14. दूरस्थितानां मैत्री नश्यति समीपस्थानां च वर्धते इति न वाच्यम्।
(दूर रहने वालों की मित्रता नष्ट हो जाती है और पास रहने वालों की मित्रता बढ़ती है- यह करना उचित नहीं)
‘यो यस्य मित्रं नहि तस्य दूरम्’
(जो जिसका मित्र होता है, वह दूर होकर भी दूर नहीं होता)
व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति ‘विक्रमस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से उदधृत है। यह पाठ ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ नामक कथासंग्रह से लिया गया है। प्रस्तुत पंक्ति में बताया गया है स्थान सम्बन्धी दूरी मित्रता में बाधक नहीं होती। जो जिसका मित्र होता है, वह दूर होकर भी दूर नहीं होता।

मित्रता के इस रहस्य को हम सरलता से अनुभव कर सकते हैं। बरसात के दिनों में बादल आकाश में गरजते हैं और उसके गर्जन को सुनकर धरती पर बादल के मित्र मोर खुशी से नाचने लगते हैं। इसी प्रकार आकाश में सूर्य उदित होता है। उसके उदय होते ही उसके मित्र कमल सरोवरों में खिल उठते हैं। अतः यह कहना उचित नहीं कि दूर रहने वालों की मित्रता नष्ट हो जाती है और समीप रहने वालों की मित्रता बढ़ती है।

15. ‘अद्यैव परोपकारविचाराणाम् इतिश्रीरभूत्’
(आज ही परोपकार के विचारों की इतिश्री हो गई)

व्याख्या–प्रस्तुत पंक्ति ‘किन्तोः कुटिलता’ नामक पाठ से ली गई है। इस पाठ में लेखक श्री भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने नित्य-प्रति के जीवन में ‘किन्तु’ की कुटिलता पर कठोर व्यंग्य किया है।

एक बार लेखक देशसेवा करने के विचार से घर बाहर चला गया और उसने दृढ़ निश्चय किया कि अपना पेट पालने की स्वार्थवृत्ति से ऊपर उठकर आज से यह जीवन देशसेवा में अर्पित कर दूंगा परन्तु मार्ग में उसके बचपन के अध्यापक मिल गये और उन्होंने लेखक से कहा कि देशसेवा का विचार तो उत्तम है किन्तु अपने घर-परिवार पर भी ध्यान देना चाहिए जिनके भरण-पोषण का भार तुम पर है और इस प्रकार ‘किन्तु’ ने बीच में टपक कर लेखक के परोपकार के विचार की इतिश्री कर दी।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

16. ‘शूरं कृतज्ञं दृढ़साहसं च लक्ष्मी: स्वयं वाञ्छति वासहेतोः
(शूरवीर, कृतज्ञ और दृढ़ साहस रखने वाले मनुष्यों के पास स्वयं ही स्थायी रूप से रहने के लिए आ जाती है)

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति ‘विक्रमस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’ नामक कथा संग्रह से संकलित है। इस पाठ में पुत्तलिका के माध्यम से राजा विक्रम की उदारता और शूरवीरता का वर्णन है।

प्रस्तुत अंश में बताया गया है कि लक्ष्मी कभी भी कृतघ्न, कमज़ोर, कायर या ढुलमुल नीति वाले लोगों के पास नहीं रहती अपितु जो लोग शूरवीर, साहसी दृढनिश्चयी तथा कृतज्ञ होते हैं उन्हीं के पास रहती है। उनके पास रहती ही नहीं है अपितु स्वयं उनके पास रहने के लिए खिंची चली जाती है क्योंकि लक्ष्मी शूरवीरता, साहस, दृढ़निश्चय तथा कृतज्ञता को पसन्द करती है और कायर-डरपोक लोगों से घृणा करती है।

17. ‘श्वापदानां हिंसाकर्म किल जठरानलनिवार्णमात्रप्रयोजकम्’
(पशुओं का हिंसाकर्म केवल अपना पेट भरने के लिए होता है)
व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति ‘उद्भिज्जपरिषद्’ नामक पाठ से ली गई है। इस पाठ में लेखक पं० हृषीकेश भट्टाचार्य ने मनुष्यों की हिंसक प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है।

सिंह आदि कुछ पशु भी हिंसक होते हैं, परन्तु उनकी हिंसा उनकी पेट पूर्ति तक सीमित रहती है, भूख मिटाने का साधन मात्र है, यही उनकी हिंसा की सीमा है। परन्तु मनुष्यों की हिंसा तो उनके मनोविनोद का साधन है और इस मनोविनोद का कोई अन्त नहीं। अतः वनस्पति सभा के सभापति अवश्त्थ देव (बड़ का वृक्ष) के मल में हिंसा की दृष्टि मनुष्य इस सृष्टि में पशुओं से भी निकृष्ट है। लेखक का तात्पर्य इस निरर्थक पशुहिंसा को रोकने के लिए युवा पीढ़ी को प्रेरित करना है।

18. कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्
उत्तरम्
(कार्य सिद्ध करूँगा या शरीर त्याग दूंगा) प्रस्तुति सूक्ति पं० अम्बिकादत्त व्यास द्वारा रचित ‘शिवराजविजयम्’ नामक संस्कृत के उपन्यास से ली गई है। जिसमें शिवाजी का एक गुप्तचर भारी आंधी-बरसात होने पर शिवाजी के पास पहुँचने के लिए प्रस्तुत सूक्ति द्वारा अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा प्रकट करता है।

भावार्थ-संसार में बिना दृढ़ संकल्प लिए कोई महान् कार्य नहीं किया जा सकता। संकल्प में ही वह शक्ति है, जिसके बल पर एक सैनिक मौत को गले लगा लेता है, साधारण मनुष्य भी तूफान से टक्कर ले लेता है। बिना दृढ़ संकल्प लिए सफलता के ऊँचे आकाश में उन्मुक्त उड़ान नहीं भरी जा सकती। संकल्प ने ही मनुष्य को चाँद पर पहुँचा दिया है। मनुष्य का संकल्प जितना प्रबल होता है, उसकी बुद्धि उतनी ही तीव्रता से काम करने लगती है। प्रभु भी दृढ़ संकल्पी के ही सहायी होते हैं।

शिवाजी के गुप्तचर का भी दृढ़ संकल्प है-‘कार्य की सिद्धि या मौत’। वह इन दोनों में से केवल एक को चुनता है। उसे न आँधी की परवाह है, न तूफानी बरसात की। वह आकाश में चमकती हुई बिजली के प्रकाश में ही अपना रास्ता ढूँढता हुआ घोड़े पर सवार होकर ऊबड़-खाबड़ रास्तों से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ा जा रहा है। एक सच्चे वीर की यही पहचान है। इस दृढ़ संकल्प ने ही शिवाजी के गुप्तचर को उसके लक्ष्य तक पहुंचा दिया था।

19. उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
उत्तरम्:
(अर्जित धन की रक्षा उस धन के त्याग से ही होती है)

प्रस्तुत पंक्ति ‘विक्रमस्यौदार्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है। यह पाठ ‘सिंहासनद्वात्रिशशिंका’ नामक कथासंग्रह से संकलित है। इस पाठ में राजा विक्रम की उदारता को दर्शाया गया है। राजा विक्रम की मान्यता है कि व्यक्ति के पास जो भी धन होता है, यदि उसकी सच्चे अर्थों में रक्षा करनी हो तो उसका एक ही उपाय है कि परोपकार के कार्यों के लिए उस धन का त्याग अर्थात् दान कर देना चाहिए। क्योंकि परोपकार के कार्यों में जब धन को खर्च कर दिया जाता है तो उससे मनुष्य का यश चारों ओर फैलता है और जिसका यश होता है संसार में वस्तुतः वही मनुष्य युग-युगों तक जीवित रहता है। भामाशाह ने राष्ट्रहित के लिए महाराणा प्रताप को अपना सारा धन दान में दिया था, आज भी लोग धनी और परोपकारी व्यक्ति को ‘भामाशाह’ कहकर पुकारते हैं। सूक्ति का भाव यही है कि धन का वास्तविक उपयोग धन का परोपकार के लिए दान कर देना ही है।

20. ‘उपभोक्तृणामपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे।
प्रसंगः-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘दीनबन्धुः श्रीनायार:’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

भावार्थ:-प्रस्तुत पंक्ति में दीनबन्धु श्रीनायार की सत्यनिष्ठा एवं कर्तव्यनिष्ठा के फलस्वरूप खाद्य-आपूर्ति विभाग के विरोध में उपभोक्ताओं की ओर से किसी प्रकार के अभियोग न होने का उल्लेख किया गया है।

श्रीनायार एक सत्यनिष्ठ तथा मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी थे। उड़ीसा सरकार के खाद्यआपूर्ति विभाग के सचिव पद को सम्भालते ही इस विभाग का कायाकल्प हो गया। खाद्यान्न में मिलावट या हेरा-फेरी नाममात्र रह गई, अत: श्रीनायार के कार्यकाल में उपभोक्ताओं को विभाग पर किसी प्रकार का अभियोग चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। श्रीनायार के आने से विभाग की न केवल सक्रियता बढ़ी अपितु ईमानदारी से काम करने का भी वातावरण बना। परिणामतः उपभोक्ता विभाग की कार्यप्रणाली से सन्तुष्ट हुए और कोर्ट-कचहरी के विवादों से विभाग मुक्त हो गया। इस पंक्ति से श्रीनायार की कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदारी का संकेत मिलता है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

21. सर्वे अथूलहृदयैः सौप्रस्थानिकी ज्ञापितवन्तः।
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती द्वितीयो भागः’ के ‘दीनबन्धुःश्रीनायार:’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

भावार्थ:–‘सभी ने आँसु भरे हृदय से श्रीनायार को विदाई दी’ प्रस्तुतपंक्ति का सम्बन्ध श्रीनायार के जीवन के उस क्षण से है, जब केरल राज्य में श्रीनायार द्वारा स्थापित अनाथ आश्रम की संचालिका सुश्री मेरी ने श्रीनायार को एक पत्र लिखा कि अब उनका अन्तिम समय आ चुका है और उन्हें स्वयं यह आश्रम सँभाल लेना चाहिए।

एक दिन श्रीनायार अपने कार्यालय में बैठे एक पत्र पढ़ रहे थे, उनकी आँखों से अश्रुधारा बह रह थी, जिससे पत्र भी भीग चुका था। उसी क्षण श्रीनायार के क्लर्क श्रीदास का प्रवेश हुआ और उन्होंने श्रीदास को कहा कि अब उनका छुट्टी लेकर चले जाने का समय आ गया है। यदि मुझसे कोई रूखा व्यवहार किसी के साथ अनजाने में हुआ हो तो उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। श्रीनायार का व्यवहार विभाग के सभी सहकर्मियों के साथ पूर्णतया मानवीय, मित्रतापूर्ण तथा अत्यन्त मधुर था। विभाग के सभी लोग श्रीनायार के स्वभाव और व्यवहार से सन्तुष्ट थे। आज जब श्रीनायार केरल वापस जाने लगे तो सहकर्मियों के हृदय को चोट पहुँची और न चाहते हुए भी उन्हें भीगी पलकों से विदाई की।

इस पंक्ति से विभाग के लोगों का श्रीनायार के प्रति सच्चा आदर-भाव तथा श्रीनायार की सद्-व्यवहारशीलता प्रकट होती है।

22. त्वया निर्मितोऽयं क्षुद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणतः।
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती द्वितीयो भागः’ के ‘दीनबन्धुःश्रीनायारः’ नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ उड़िया के प्रख्यात साहित्यकार श्री चन्द्रशेखरदास वर्मा द्वारा रचित ‘पाषाणीकन्या’ नामक कथासंग्रह के संस्कृत अनुवाद से संकलित है। यह संस्कृत अनुवाद डॉ० नारायण दाश ने किया है।

भावार्थः-प्रस्तुत पंक्ति सुश्री मेरी के उस पत्र की है, जो श्रीनायार के केरल वापस चले जाने के बाद उनके क्लर्क श्रीदास ने खोलकर पढ़ा था।
श्रीनायार ने एक अनाथ आश्रम की स्थापना केरल राज्य में की थी। जिसका संचालन सुश्री मेरी किया करती थी। मेरी अब मृत्यु के निकट थी, अतः उसने श्रीनायार को

स्वयं यह अनाथ आश्रम सँभालने तथा अन्तिम क्षणों में श्रीनायार के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी। मेरी ने इस पत्र में यह भी बताया था कि यह आश्रम कभी बहुत छोटे रूप में था परन्तु आज यह बहुत बड़े वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। अब इसमें सौ से भी अधिक अनाथ शिशु पल रहे हैं। श्रीनायार इसी आश्रम के संचालन के लिए अपने वेतन का आधे से भी अधिक भाग प्रतिमास की एक तारीख को ही मनीआर्डर द्वारा सुश्री मेरी के पास भेज दिया करते थे। इस घटना से श्रीनायार का दीनों के प्रति सच्चा दया-भाव प्रकट होता है। इसीलिए पाठ का नाम भी ‘दीनबन्धु श्रीनायार’ उचित ही दिया गया है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

23. मनुष्याणां हिंसावृत्तिस्तु निरवधिः। (मनुष्यों की हिंसावृत्ति की कोई सीमा नहीं) मानवा नाम सृष्टि धारायु निकृष्ट धारासु निकृष्टतम सृष्टिः
(इस सृष्टि मानव नामक दृष्टि सबसे निकट हैं)
उत्तरम्:
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘उद्भिज्ज-परिषद्’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ पण्डित हृषीकेश भट्टाचार्य के निबन्धसंग्रह ‘प्रबन्ध-मञ्जरी’ से संकलित है। इस निबन्ध में वृक्षों की सभा के सभापति पीपल ने मनुष्य की हिंसक प्रवृत्ति के प्रति तीखा व्यंग्य-प्रहार किया गया है।

भावार्थ: – हिंसा के दो प्रमुख रूप हैं-
(1) स्वाभाविक भूख की शान्ति के लिए हिंसा
(2) मन बहलाने के लिए हिंसा। मांस मनुष्य का स्वाभाविक भोजन नहीं है।

परन्तु सिंह-व्याघ्र आदि पशुओं का स्वाभाविक भोजन मांस ही है। अतः ऐसे पशुओं को न चाहते हुए भी केवल पेट की भूख शान्त करने हेतु पशुवध करना पड़ता है। परन्तु इन पशुओं की यह विशेषता भी है कि भूख शान्त होने पर पास खड़े हुए हिरण आदि का भी ये वध नहीं करते। पशुओं का पशुवध भूख शान्ति तक ही सीमित होता है। परन्तु मनुष्य की पशुहिंसा असीम है। क्योंकि वह तो अपने बेचैन मन की प्रसन्नता के लिए ही पशुवध करता है। ‘मानव’ नामक सृष्टिः को सबसे निकृष्ट कहा गया है।

(च) कथनानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणम्

1. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः स चपलः दृश्यते ?
(ख) कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
उत्तराणि:
(क) केन दूरमतिक्रान्तः स चपलः दृश्यते।
(ख) किं ज्यायो हि अकर्मणः।।

2. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) विस्फारितशरासनाः आयुधीयश्रेणयः कुमारं तर्जयन्ति।
(ख) कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
उत्तराणि:
(क) विस्फारितशरासनाः आयुधीय श्रेणयः कं तर्जयन्ति?
(ख) केन हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।

3. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क)अश्वमेध इति नाम क्षत्रियाणां महान् उत्कर्षनिकषः।
(ख)बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
उत्तराणि:
(क) अश्वमेध इति नाम केषां महान उत्कर्षनिकषः?
(ख) बुद्धियुक्तो जहातीह के सुकृतदुष्कृते?

4. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क)निपुणं निरुध्यमाण: लवः मुखचन्द्रेण सीतया संवदत्येव ।
(ख)नाशयति च पुरुषस्यासङ्गो विषयेषु
उत्तराणि:
(क) निपुणं निरुध्यमाणः लव: मुखचन्द्रेण कया संवदत्येव ?
(ख) नाशयति च पुरुषस्यासङ्गो केषु ?

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

5. रेखांकितपद्माधृत्य प्रश्ननिर्माण कुरुत
(क) शब्दैः प्रतीयते यद् गृहे चौरः अस्ति।
(ख) पशुहत्या तु तेषाम् आक्रीडनम्।
उत्तराणि:
(क) कैः प्रतीयते यद् गृहे चौरः अस्ति?
(ख) का तु तेषाम् आक्रीडनम्?

6. रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) स्वर्गभूमिं कुर्शीति वदन्ति।
(ख) असौ शिववीरचरः निजकार्यात् न विरमति।
उत्तराणि:
(क) कां कुर्शीति वदन्ति?
(ख) असौ शिववीरचरः कस्मात् न विरमति?

7. रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) पृथिव्याः सप्तभेदाः।
(ख) दिदेश कौत्साय समस्तमेव।
उत्तराणि:
(क) कस्याः सप्तभेदाः?
(ख) दिदेश कस्मै समस्तमेव?

8. रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क)निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कुबेरात्
(ख) अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः।
उत्तराणि:
(क) निष्क्रष्टुमर्थं चकमे कस्मात्
(ख) कथं दूरमतिक्रान्तः?

9. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) दीर्घग्रीवः स भवति।
(ख) लोक स्तदनुवर्तते।
उत्तराणि:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) कीदृशः स भवति?
(ख) कः तदनुवर्तते?

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

10. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) प्राज्ञः खलु कुमारः।।
(ख) कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
उत्तराणि:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) कः खलु कुमारः?
(ख) किं ज्यायो ह्यकर्मणः?

11. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) जीवने नियतं कर्म कुरु।
(ख) लवः मुखचन्द्रेण सीतया संवदत्येव।
उत्तराणि:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) जीवने नियतं किं कुरु?
(ख) लव: मुखचन्द्रेण कया संवदत्येव?

12. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) उत्पथैः मम मनः पारिप्लवं धावति।
(ख) रामभद्रस्य एष दारकः अस्माकं लोचने शीतलयति।
उत्तराणि:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) उत्पथैः कस्य मनः पारिप्लवं धावति ?
(ख) कस्य एष दारक: अस्माकं लोचने शीतलयति ?

13. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य-प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) विस्फारितशरासनाः आयुधीयश्रेणयः कुमारं तर्जयन्ति।
(ख) योगः कर्मसु कौशलम्।
उत्तराणि:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) विस्फारितशरासनाः आयुधीयश्रेणयः कं तर्जयन्ति ?
(ख) कः कर्मसु कौशलम् ?

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम्

14. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य-प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) अश्वमेध इति नाम क्षत्रियाणाम् महान् उत्कर्षनिकषः।
(ख) अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः स चपलः दृश्यते।
उत्तराणि:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) अश्वमेधः इति नाम केषां महान् उत्कर्षनिकषः ?
(ख) अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः सः कीदृशः दृश्यते ?

15. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) तस्याः दार्शनिकैः सप्तधा विभागः कृतः।
(ख) अयं सादी न स्वकार्याद् विरमति।
उत्तराणि:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) तस्याः कैः सप्तधा विभागः कृतः?
(ख) अयं सादी न कस्माद् विरमति?

16. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) सः धनं धनादेशेन प्रेषयति स्म।
(ख) मनुष्याणां हिंसावृत्तिस्तु निरवधिः ।
उत्तराणि:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) सः धनं केन प्रेषयति स्म?
(ख) केषां हिंसावृत्तिस्तु निरवधिः?

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् पठित-अवबोधनम् Read More »

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

HBSE 12th Class Sanskrit सूक्तिसुधा Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया प्रश्नोत्तराणि लिखत
(क) सर्वत्र कीदृशं नीरम् अस्ति ?
(ख) मरालस्य मानसं कं विना न रमते।
(ग) विद्वान् कम् अपेक्षते ?
(घ) सत्कविः कौ द्वौ अपेक्षते ?
(ङ) यः यस्य प्रियः सः तस्य कृते किं भवति ?
(च) सहसा किं न विदधीत ?
(छ) विधात्रा किं विनिर्मितम् ?
(ज) अपण्डितानां विभूषणं किम् ?
(झ) महात्मनां प्रकृतिसिद्धं किं भवति ?
(ब) पापात् कः निवारयति ?
(ट) सन्तः कान् पर्वतीकुर्वन्ति ?
(ठ) कीदृशं भूषणं न क्षीयते ?.
(ड) कूपखननं कदा न उचितम् ?
उत्तरम्:
(क) सर्वत्र नीरजराजितं नीरम् अस्ति।
(ख) मरालस्य मानसं मानसं विना न रमते।
(ग) विद्वान् दैष्टिकतां पौरुषं च अपेक्षते।
(घ) सत्कविः शब्दार्थों द्वौ अपेक्षते।
(ङ) यः यस्य प्रियः सः तस्य कृते प्रियः भवति।
(च) सहसा क्रियां न विदधीत।
(छ) विधात्रा अज्ञानस्य आच्छादनं मौनं विनिर्मितम्।
(ज) अपण्डितानां विभूषणं मौनम्।
(झ) विपदि धैयम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, यशसि अभिरुचिः श्रुतौ व्यसनं च महात्मनां प्रकृतिसिद्धं भवति।
(ञ) पापात् सन्मित्रं निवारयति।
(ट) सन्तः परगुणपरमाणून पर्वतीकुर्वन्ति ?
(ठ) वाग्-भूषणं न क्षीयते ?
(ड) कूपखननं प्रोद्दीप्ते भवने न उचितम् ?

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

2. अधोलिखितपद्यांशानां सप्रसङ्ग हिन्दीभाषया व्याख्या विधेया
(क) वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः।
(ख) क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्।
(ग) प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः।
उत्तरम्:
व्याख्या के लिए श्लोक संख्या 6, 11 तथा 12 के प्रसंग तथा भावार्थ का उपयोग करें।

3. रिक्तस्थानपूर्तिः क्रमशः करणीया
(क) सत्कविरिव विद्वान् शब्दार्थों …………….. अपेक्षते।
(ख) सन्तः …………….. प्रवदन्ति ।
उत्तरम्:
(क) सत्कविरिव विद्वान् शब्दार्थों द्वयम् अपेक्षते।
(ख) सन्तः सन्मित्रलक्षणं प्रवदन्ति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

4. निम्नलिखितश्लोकयोः अन्वयं लिखत
यथा-यद्यपि नीरज-राजितं नीरं सर्वत्र अस्ति।
(परं) मरालस्य मानसं मानसं विना न रमते।
(क) नीरक्षीरविवेके …………..।
(ख) विपदि धैर्यमथाभ्युदये …………..
उत्तरम्:
दूसरे तथा सातवें श्लोक का अन्वय देखें।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

5. निम्नलिखितशब्दानाम् अर्थ लिखित्वा वाक्यप्रयोगं कुरुत
नीरजम्, रसालः, पौरुषः, विमृश्यकारिणः, जरा।
उत्तरम:
(क) नीरजम् = कमलम् (कमल)-सरसि नीरजं शोभते।
(ख) रसालः = आम्रवृक्षः (आम का वृक्ष)-प्राङ्गणे रसालः शोभते।
(ग) पौरुषः = पुरुषार्थः (परिश्रम, कर्म)-सदा पौरुषः कर्तव्यः।
(घ) विमृश्यकारिणः = विचिन्त्यकारिणः (विचार कर कार्य करने वाले)विमश्यकारिणः कदापि पश्चात्तापं न प्राप्नुवन्ति।
(ङ) जरा = वृद्धत्वम् (बुढ़ापा)-यावत् जरा न आयाति तावत् आत्महितं कुरु ।

6. निम्नलिखितशब्दानां सार्थकं मेलनं क्रियताम्
(क) मरालस्य (i) आश्रयते
(ख) अवलम्बते (ii) ब्रह्मणा
(ग) अधुना (iii) विशदीकृत्य
(घ) विधात्रा (iv) हंसस्य
(ङ) पर्वतीकृत्य (v) साम्प्रतम्
(च) नीरजम् (vi) आम्रः
(छ) रसालः (vii) विभूतयः
(ज) सम्पदः (viii) कमलम्
(झ) यशसि (ix) कीर्ती
उत्तरम्:
(क) मरालस्य (iv) हंसस्य
(ख) अवलम्बते (i) आश्रयते
(ग) अधुना (v) साम्प्रतम्
(घ) विधात्रा (ii) ब्रह्मणा
(ङ) पर्वतीकृत्य (iii) विशदीकृत्य
(च) नीरजम् (viii) कमलम्
(छ) रसालः (vi) आम्रः
(ज) सम्पदः (vii) विभूतयः
(झ) यशसि (ix) कीर्ती

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

7. अधोलिखितशब्दानां पाठात् विलोमपदं चित्वा लिखत
(क) मूर्खः ………………….
(ख) अप्रियः ………………….
(ग) पुण्यात् ………………….
(घ) यौवनम् ………………….
(ङ) उपेक्षते ………………….
उत्तरम्:
(क) मूर्खः – विद्वान्
(ख) अप्रियः – प्रियः
(ग) पुण्यात् – पापात्
(घ) यौवनम् – जरा
(ङ) उपेक्षते – अपेक्षते

8. सन्धिच्छेदः क्रियताम्
उत्तरसहितम्:
(क) नालम्बते = न + आलम्बते
(ख) विश्वस्मिन्नधुनान्यः = विश्वस्मिन् + अधुना + अन्यः
(ग) कोऽपि = कः + अपि
(घ) चाभिरुचिर्व्यसनं = च + अभिरुचिः + व्यसनम्
(ङ) चन्द्रोज्ज्वलाः = चन्द्र + उज्ज्वला:

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

9. (अ) अधोलिखितशब्दानां समासविग्रहः कार्य:
यथा-नीरज-राजितम् = नीरजैः राजितम्।
उत्तरसहितम्:
(क) अलिमालः = अलीनां माला यस्मिन् सः (बहुव्रीहिः)
(ख) वाक्पटुता = वाचि पटुता (सप्तमी-तत्पुरुषः)
(ग) चन्द्रोज्ज्वला: = चन्द्रः इव उज्ज्वलः यः, ते (बहुव्रीहिः)
(घ) अप्रतिहता = न प्रतिहता (अव्ययीभावः)
(ङ) वाग्भूषणम् = वाग् एव आभूषणम् (कर्मधारयः)
(आ) अधोलिखित-विग्रहपदानां समस्तपदानि रचयत
यथा-कुलस्य व्रतं ………. -कुलव्रतम् ।
उत्तरसहितम्:
(क) वनस्य अन्तरे -वनान्तरे (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ख) गुणानां लुब्धाः -गुणलुब्धाः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ग) प्रकृत्या सिद्धम् -प्रकृतिसिद्धम् (तृतीया-तत्पुरुषः)
(घ) उपकारस्य श्रेणिभिः -उपकारश्रेणिभिः (षष्ठी-तत्पुरुषः)
(ङ) आत्मनः श्रेयसि -आत्मश्रेयसिः (सप्तमी-तत्पुरुषः)

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

10. अधोलिखितशब्देषु प्रकृतिप्रत्ययानां विभागः करणीयम्
यथा-राजितम् – राज् + क्त
उत्तरसहितम्:
(क) दैष्टिकताम् – दैष्टिक + तल्
(ख) कुर्वाणः – √कृ + शानच् (आत्मनेपदे)
(ग) पटुता – पटु + तल्
(घ) सिद्धम् – √सिध् + क्त
(ङ) विमृश्य – वि √मृश् + ल्यप्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

11. अधोलिखितश्लोकेषु छन्दो निर्दिश्यताम्
यथा-अस्ति यद्यपि …………… ॥ अनुष्टुप् छन्दः।
उत्तरसहितम्
(क) तावत् कोकिल …………… समुल्लसति ॥ – आर्या-छन्दः।
(ख) स्वायत्तमेकान्त ………………. मौनमपण्डितानाम्॥ – उपजाति-छन्दः।
(ग) विपदिधैर्यमथा …………. महात्मनाम्॥ द्रुतविलम्बित-छन्दः।
(घ) पापान्निवारयति ………………….. प्रवदन्ति सन्तः॥ – वसन्ततिलका-छन्दः।
(ङ) केयूराणि न …………… भूषणम्॥ शार्दूलविक्रीडित-छन्दः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

12. अधोलिखितपंक्तिषु कोऽलङ्कारः ? लिख्यताम्
उत्तरसहितम्
(क) शब्दार्थौ सत्कविरिव द्वयं विद्वानपेक्षते। – ‘उपमा’ – अलङ्कारः।
(ख) वाग्भूषणं भूषणम्। ‘रूपक’ – अलङ्कारः।
(ग) निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः। ‘अनुप्रास’ – अलङ्कारः।
(घ) रमते न मरालस्य मानसं मानसं विना। “यमक’ – अलङ्कारः।
(ङ) यावन्मिलंदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति। – ‘अनुप्रास’ – अलङ्कारः।

योग्यताविस्तारः

(अ) समानार्थकश्लोकाः-
1. हंसः श्वेतो बकः श्वेतः को भेदो बकहंसयोः।
नीरक्षीरविवेके तु हंसो हंसो बको बकः॥

2. महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः।
पद्मपत्रस्थितं वारि धत्ते मुक्ताफलश्रियम्।

3. आत्मार्थे जीवलोकेऽस्मिन् को न जीवति मानवः।
परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति॥

4. अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि तं नरं न रञ्जयति॥

5. यावत्स्वस्थो हयं देहो यावन्मृत्यश्च दूरतः।
तावदात्महितं कुर्यात् प्राणान्ते किं करिष्यति॥

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

(ब) छन्दसां लक्षणोदाहरणानि
1. शार्दूलविक्रीडितम्
लक्षणम्-“सूर्याश्वैर्मसजास्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्’।
उदाहरणम्
(i) केयूराणि न भूषयन्ति….. ।
(ii) यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहम्……।

2. अनुष्टुप् छन्दः
लक्षणम् – “श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विःचतुष्पादयोर्हस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥”
उदाहरणम्
अस्ति यद्यपि सर्वत्र नीरं नीरजमण्डितम्……।

3. वसन्ततिलका
लक्षणम्–“उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।”
उदाहरणम्
पापान्निवारयति योजयते हिताय।

4. उपजातिः-इन्द्रवज्रा उपेन्द्रवज्रा इति वृत्तयोः संयोगेन उपजाति: वृत्तं भवति।
लक्षणम् – “स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः।
उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ॥”
उदाहरणम्
स्वायत्तमेकान्तगुणं ………….

5. मालिनी
लक्षणम्-“ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।”
उदाहरणम्
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा…।

6. आर्या
लक्षणम्-“यस्याः प्रथमे पादे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश साऽऽर्या॥”
उदाहरणम्:
(i) नीरक्षीर विवेक …..।
(ii) तावत् कोकिल …..।

आर्याच्छन्दसि विशिष्टः लयः गेयता च भवति।
तदनुसारेण आर्यायाः गानस्य अभ्यास: कार्यः।

(स) अधोलिखितानां हिन्दीभाषायाः आभाणकानां समानार्थकाः संस्कृत
पक्तयः अन्वेष्टव्या:
1. आग लगने पर कुआँ खोदना
2. सबसे भली चुप ।
3. दूध का दूध पानी का पानी
उत्तरम:
1. प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः।
2. विभूषणं मौनमपण्डितानाम् (मौनं सर्वार्थसाधनम्)।
3. नीरक्षीरविवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

HBSE 9th Class Sanskrit सूक्तिसुधा Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) सर्वत्र कीदृशं नीरम् अस्ति ?
(A) मलिनम्
(B) अपगतमलिनम्
(C) नीरजराजितम्
(D) कमलभूषितम्।
उत्तराणि:
(A) नीरजराजितम्

(ii) मरालस्य मानसं कं विना न रमते।
(A) मनः
(B) मानसम्
(C) सरोवरम्
(D) पुण्यतालम्।
उत्तराणि:
(B) मानसम्

(iii) कीदृशं भूषणं न क्षीयते ?
(A) स्वर्णभूषणम्
(B) ताम्रभूषणम्
(C) रजतभूषणम्
(D) वाग्भूषणम्।
उत्तराणि:
(D) वाग्भूषणम्

(iv) पापात् कः निवारयति ?
(A) सन्त्रिमम्
(B) कुमित्रम्
(C) राजपुरुषः
(D) महाबलिः
उत्तराणि:
(A) सन्मित्रम्

(v) सत्कविः कौ द्वौ अपेक्षते ?
(A) शब्दौ
(B) अर्थों
(C) शब्दार्थों
(D) स्वरव्यञ्जने
उत्तराणि:
(C) शब्दार्थों

(vi) सहसा किं न विदधीत ?
(A) भोजनम्
(B) पठनम्
(C) क्रियाम्
(D) शय्याम्।
उत्तराणि:
(C) क्रियाम्

(vii) अपण्डितानां विभूषणं किम् ?
(A) धनम्
(B) मौनम्
(C) कलङ्कः
(D) दोषः।
उत्तराणि:
(B) मौनम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) विद्वान् दैष्टिकतां पौरुषं च अपेक्षते।
(A) कान्
(B) कः
(C) कस्य
(D) केषाम्।
उत्तराणि:
(A) कान्

(ii) सम्पदः विमृश्यकारिणं स्वयं वृणुते।।
(A) केषाम्
(B) कस्याम्
(C) कस्यै
(D) कम्।
उत्तराणि:
(D) कम्

(iii) विपदि धैर्य महात्मनां प्रकृतिसिद्धम्।।
(A) कः
(B) केषाम्
(C) कम्
(D) काम्।
उत्तराणि:
(B) केषाम्

(iv) केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषम्।
(A) कानि
(B) किम्
(C) कः
(D) कम्
उत्तराणि:
(A) कानि

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

सूक्तिसुधा पाठ्यांशः

1. अस्ति यद्यपि सर्वत्र नीरं नीरज-राजितम्।
रमते न मरालस्य मानसं मानसं विना॥ 1 ॥ (पण्डितराजजगन्नाथः)

अन्वयः-यद्यपि सर्वत्र नीरज-राजितं नीरम् अस्ति, (परन्तु) मरालस्य मानसं मानसं विना न रमते।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य पण्डितराज जगन्नाथ द्वारा रचित तथा ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ में संकलित है, जिसमें हंस के बहाने से यह बताया गया है कि ऊँची सोच के लोगों (सज्जनों) का मन तुच्छ वस्तुओं में आनन्दित नहीं होता।

सरलार्थः-यद्यपि सभी जगह कमलों से सुशोभित जल (सरोवर) होते हैं, परन्तु हंस का मन मानसरोवर के बिना कहीं नहीं रमता।

भावार्थ:-सरोवरों में जल भी होता है और कमलपुष्प भी। परन्तु उन सरोवरों का जल बरसात में गन्दा हो जाता है, जबकि मानसरोवर का जल सदा ही निर्मल-स्वच्छ रहता है। अतः हंस मानसरोवर में ही क्रीड़ा करना चाहता है, साधारण सरोवरों में नहीं। यह अन्योक्ति है। जिसके द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि ऊँची सोच के लोग तुच्छ वस्तुओं में आनन्दित नहीं होते। विशेष:-इस पद्य में ‘अनुष्टुप्’ छन्द है। ‘अन्योक्ति’ तथा ‘यमक’ अलंकार हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
नीरम् =जलम् (सरः); जल (सरोवर)। मरालस्य = हंसस्य; हंस का। नीरजराजितम् = कमलशोभितम, कमलों से सुशोभित । मानसम् = मनः मानसरोवरं वा; मन/ मानसरोवर । रमते = प्रसीदति; आनन्दित होता है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

2. नीरक्षीरविवेके हंसालस्य त्वमेव तनुषे चेत्।
विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः ॥2॥ (पण्डितराजजगन्नाथः)

अन्वयः-(हे) हंस! चेत् त्वम् एव नीरक्षीरविवेके आलस्यं तनुषे (तर्हि) विश्वस्मिन् अधुना अन्यः कः कुलव्रतं पालयिष्यति।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ में संकलित है जिसके रचयिता पण्डितराज जगन्नाथ हैं। इस अन्योक्ति में हंस के माध्यम से यह बताया गया है कि यदि विद्वान् लोग ही अपने कर्तव्य का पालन नहीं करेंगे तो कौन करेगा ?

सरलार्थ:-हे हंस! यदि दूध का दूध और पानी का पानी करने में तुम ही आलसी हो जाओगे तो संसार में अब दूसरा कौन है, जो कुल-परम्परा का पालन करेगा ? अर्थात् कोई नहीं।

भावार्थ:-हंस के बारे में यह प्रसिद्ध है कि वह पानी मिले हुए दूध में से केवल दूध को ही पीता है और पानी छोड़ देता है। हंस को विद्वान् का प्रतीक माना गया है क्योंकि वह भी दूध का दूध और पानी का पानी करने में समर्थ होता है अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्य और सत्य-असत्य का निर्णय विद्वान् ही कर सकता है। यदि विद्वान् भी लोभ के वशीभूत होकर विवेकहीन आचरण करने लगेंगे तो संसार का मार्गदर्शन कौन करेगा ?

विशेषः-‘इस पद्य में ‘आर्या’ छन्द है तथा ‘अन्योक्ति’ अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च नीरक्षीरविवेके = दूध का दूध पानी का पानी करने में। हंसालस्यम् = हंस + आलस्यम्। तनुषे = विस्तृत कर रहे हो, विस्तारयसि, तिन् + आत्मनेपदे लट् मध्यमपुरुषः, एकवचनम्। विश्वस्मिन्नधुनान्यः = विश्वस्मिन् + अधुना + अन्यः ।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

3. तावत् कोकिल विरसान् यापय दिवसान् वनान्तरे निवसन्।
यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति ॥ 3 ॥ (पण्डितराजजगन्नाथः)

अन्वयः-हे कोकिल वनान्तरे निवसन् तावत् विरसान् दिवसान् यापय यावत् कोऽपि मिलदलिमालः रसालः समुल्लसति।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से लिया गया है इस पद्य के रचयिता पण्डितराज जगन्नाथ हैं। इस अन्योक्ति में कोयल के माध्यम से उचित अवसर की प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया है।

सरलार्थ:-हे कोयल ! इस वन में निवास करते हुए तब तक रसहीन रूखे सूखे दिन व्यतीत करो। जब तक कोई आम का वृक्ष, जिस पर झुण्ड बने हुए भौरों का समूह मँडराता हुआ हो, (आम्रमंजरी से) सुशोभित होता है।

भावार्थ:-कोयल की मधुर कूक सुनने के लिए सभी के कान आतुर रहते हैं, परन्तु कोयल हर समय नहीं कूकती। वसन्त ऋतु आती है, आम के पौधे सुगन्धित आम्र-मंजरी से झूम उठते हैं। उनकी सुगन्ध से आकृष्ट होकर भौरों का समूह गुंजार करता है। कोयल कूक उठती है। यह कोयल के जीवन की स्वाभाविक घटना है, परन्तु कवि का उद्देश्य इस प्रकृति वर्णन से नहीं है, अपितु इस वर्णन के बहाने कवि कहना चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई स्वाभाविक गुण होता है। परन्तु उस गुण के प्रकट होने, फलने-फूलने के लिए उचित वातावरण की आवश्यकता होती है, जिसकी प्रतीक्षा मनुष्य को बड़े धैर्य के साथ करनी चाहिए। जैसे आम के पौधे पर बेर आने की प्रतीक्षा कोयल किया करती है और बसन्त ऋतु के आने पर जब आम का वृक्ष आम्र-मंजरी से महक उठता है तो कोयल भी अपने स्वाभाविक कूह-कूह के स्वर से सारे वातावरण को मदमस्त कर देती है।

विशेषः-प्रस्तुत पद्य में ‘आर्या’ छन्द है। अन्योक्ति’ तथा ‘अनुप्रास’ अलंकार हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च विरसान् = रसरहित (शुष्क); रसरहितान्। यापय = व्यतीत करो; व्यतीतं कुरु। निवसन् = निवास करते हुए; वासं कुर्वन् नि = √वस् + शतृ। मिलदलिमालः (मिलत् + अलिमालः) = झुण्ड बनाते हुए भ्रमरों का समूह, जिस वृक्ष पर है, ऐसा वृक्ष (‘रसालः’ पद का विशेषण)। रसालः = आम का वृक्ष; आम्रपादपः। समुल्लसति = सुशोभित होता है, सुशोभते, (सम् + उत् + √लस् + लट्लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन)।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

4. नालम्बते दैष्टिकतां न निषीदति पौरुषे।
शब्दार्थों सत्कविरिव द्वयं विद्वानपेक्षते॥ 4 ॥ (माघः-शिशुपालवधम्)

अन्वयः-विद्वान् दैष्टिकतां न आलम्बते न पौरुषे (अपितु) सत्कविः इव शब्दार्थों द्वयम् अपेक्षते।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से संग्रहीत है। जिसके रचयिता महाकवि माघ हैं। प्रस्तुत श्लोक में कवि ने भाग्य और पुरुषार्थ दोनों का समान रूप से आश्रय लेने की बात कही है।

सरलार्थ:-विद्वान् मनुष्य न तो भाग्य का ही सहारा लेता है और न पुरुषार्थ के भरोसे ही रहता है। वह तो दोनों का आश्रय लेता है, जिस प्रकार कोई श्रेष्ठ कवि शब्द और अर्थ दोनों का आश्रय लेकर सुन्दर कविता रचता है।

भावार्थ:-अकेले शब्द अथवा अकेले अर्थ को ध्यान में रखकर कभी भी सुन्दर कविता रची नहीं जा सकती। श्रेष्ठ कविता वही होती है जिसमें शब्द और अर्थ दोनों का सामञ्जस्य हो, कोमल अर्थ के लिए कोमल शब्दों का प्रयोग तथा कठोर अर्थ को प्रकट करने के लिए कठोर शब्दों का प्रयोग ही श्रेष्ठ कवि की पहचान है। इसी प्रकार भाग्य और पुरुषार्थ दोनों के सुन्दर सामञ्जस्य से ही जीवन सुन्दर बनता है। इसीलिए विद्वान् लोग अकेले भाग्य या अकेले पुरुषार्थ के भरोसे अपना जीवन नहीं चलाते। .

विशेषः-प्रस्तुत पद्य में ‘अनुष्टुप्’ छन्द है तथा ‘उपमा’ अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च दैष्टिकताम् = भाग्यत्व को; भाग्यत्वम्, निषीदति = आश्रय लेता है; अवलम्बते, पौरुषे = पुरुषार्थ/कर्म में; पुरुषार्थे। सत्कविरिव (सत्कविः + इव) = श्रेष्ठकवि की भाँति। अपेक्षते = अपेक्षा करता है, आश्रम लेता है; आश्रयते।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

5. न किञ्चिदपि कुर्वाणः सौख्यैर्दुःखान्यपोहति।
तत्तस्य किमपि द्रव्यं यो हि यस्य प्रियो जनः॥ 5 ॥ (भवभूतिः)

अन्वयः- यः हि यस्य प्रियः जनः, तत् तस्य किमपि द्रव्यम् (सः) किञ्चित् अपि न कुर्वाणः (उपस्थितिमात्रेण) सौख्यैः दुःखानि अपोहति।

प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से उद्धृत है, जिसके रचयिता महाकवि भवभूति हैं। इस पद्य में प्रियजन की उपस्थितिमात्र को दुःख दूर करने वाला बताया गया है।

सरलार्थ:-जो जिसका प्रियजन होता है, वह उसके लिए कोई (बहुमूल्य) वस्तु होता है। वह कुछ भी न करता . हुआ (अपनी उपस्थितिमात्र से) सुखों के द्वारा दुःखों को दूर कर देता है। भावार्थ:-प्रियजन बहुमूल्य वस्तु के समान होता है, जो अपनी उपस्थितिमात्र से ही दुःखों को दूर कर देता है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च कुर्वाणः = करते हुए; कुर्वन् (√कृ + शानच्) । सौख्यैः = सुखों के द्वारा; सुखपूर्वकैः । अपोहति = दूर करता है; दूरीकरोति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

6. सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥ 6 ॥ (भारविः-किरातार्जुनीयम्)

अन्वयः-सहसा क्रियां न विदधीत, (यतः) अविवेकः परमापदां पदं (भवति)। सम्पदः गुणलुब्धाः (भवन्ति, अतः) स्वयमेव हि विमृश्यकारिणं वृणते।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से उद्धृत है। इसके रचयिता महाकवि भारवि हैं। कवि ने इस श्लोक में सोच-विचार कर ही कार्य करने के लिए प्रेरित किया है।

सरलार्थः-मनुष्यों को अचानक ही (बिना सोचे-विचारे) कोई कार्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि विवेकहीनता घोर विपत्तियों का स्थान होती है। सम्पत्तियाँ गुणों की लोभी होती हैं; अतः सोच-विचार कर कार्य करने वाले मनुष्य को वे स्वयं ही चुन लेती है।

भावार्थ:-‘बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताए’ हिन्दी की इस कहावत का मूल भाव इस सूक्ति में है। मनुष्य को सोच-विचार कर ही प्रत्येक कार्य करना चाहिए। बिना सोचे-समझे कार्य करने से घोर विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। मनुष्य सम्पत्ति पाने के लिए कार्य करता है, सम्पत्तियाँ गुणों के पीछे चलती हैं । गुणवान् मनुष्य विवेकपूर्वक कार्य करता है और सम्पत्तियाँ भी ऐसे विचारशील मनुष्य के पास स्वयं दौड़कर चली आती हैं। विशेष:-इस पद्य में ‘आर्या’ छन्द है तथा ‘अर्थान्तरन्यास’ अलंकार है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
विदधीत = करो ; कुर्वीत, (वि उपसर्ग + √डुधाञ् (धा) विधिलिङ् प्रथम पुरुष एकवचन)। वृणते = वरण करती है ; वरणं कुर्वन्ति। विमृश्यकारिणम् = विचार कर कार्य करने वाले को ; विचिन्त्यकारिणम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

7. स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥7॥ (भर्तृहरिः नीतिशतकम्)

अन्वयः विधात्रा स्वायत्तम्, एकान्तगुणम्, अज्ञतायाः छादनं मौनं विनिर्मितम्। विशेषतः सर्वविदां समाजे (एतत् मौनम्) अपण्डितानां विभूषणम् (अस्ति)।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से संगृहीत है। इस पद्य के रचयिता महाकवि भर्तृहरि हैं। इस पद्य में मौन का महत्त्व बताया गया है।

सरलार्थ:-विधाता ने स्वतन्त्र, अद्वितीय गुण वाला, अज्ञान को ढकने वाला मौन नामक गुण बनाया है। विशेष रूप से विद्वानों की सभा में तो यह मौन मूल् का आभूषण बन जाता है।

भावार्थ:-‘एक चुप सो सुख’ हिन्दी की इस कहावत का मूल भाव इस पद्य में है। यह मौन अद्वितीय विशेषताओं वाला है। यह अज्ञान को ढक देता है। विद्वानों की सभा में यदि कोई मूर्ख मनुष्य बैठा हो और वह वहाँ बैठकर चुप रहे तब यह मौन उस मूर्ख का आभूषण बन जाता है और दूसरे लोग इस चुप रहने वाले मूर्ख को विद्वान् ही समझते हैं। विशेष:-इस पद्य में उपजाति छन्द है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च स्वायत्तम् = स्वयं के अधीन ; निजाधीनम्। विधात्रा = ब्रह्मा के द्वारा ; ब्रह्मणा। छादनम् = आवरण ; आवरणम्। सर्वविदाम् = सर्वज्ञानाम् ; सर्वज्ञों के।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

8. विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धिमिदं हि महात्मनाम्॥ 8 ॥ (भर्तृहरिः-नीतिशतकम्)

अन्वयः-विपदि धैर्यम्, अथ अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि च अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनम्, इदं हि महात्मनां प्रकृतिसिद्धम्।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से संगृहीत है। इस पद्य के रचयिता महाकवि भर्तृहरि हैं। इस पद्य में महापुरुषों के स्वाभाविक गुणों की चर्चा की गई है। –

सरलार्थः-विपत्ति के समय धीरता, अधिक समृद्धि होने पर क्षमा (सहनशीलता) सभा में बोलने की चतुराई, संग्राम में पराक्रम, यश प्राप्त करने में इच्छा एवं वेदादिशास्त्रों में आसक्ति-ये सभी गुण महापुरुषों में स्वभाव से ही होते हैं।

भावार्थ:-महापुरुषों के ये स्वाभाविक गुण हैं कि वे विपत्ति में व्याकुल नहीं होने, उन्नति होने पर भी सब को क्षमा करते हैं, सभा में अपनी वचन-कुशलता से सबको मोहित कर लेते हैं, युद्ध में डर कर नहीं भागते, यश के लिए प्रयत्नशील रहते हैं तथा ज्ञान अर्जित करने में निरन्तर प्रवृत्त रहते हैं। विशेष:-इस पद्य में द्रुतविलम्बित छन्द है।।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च अभ्युदये = उन्नति में ; उन्नतौ (अभि + उदये, यण् सन्धि)। सदसि = सभा में ; सभायाम् (सदस् शब्द नपुंसकलिंग सप्तमी विभक्ति एकवचन)। वाक्पटुता = वाणी में कुशलता ; वाचि पटुता, युधि = युद्ध में ; युद्धे।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

9. पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्यं निगृहति गुणान् प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥ १ ॥ (भर्तृहरिः-नीतिशतकम्)

अन्वयः-पापात् निवारयति, हिताय योजयते, गुह्यं निगृहति, गुणान् प्रकटीकरोति, आपद्गतं च न जहाति, काले ददाति। सन्तः इदं सन्मित्रलक्षणं प्रवदन्ति।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से संगृहीत है। इस पद्य के रचयिता महाकवि भर्तृहरि हैं। इस . पद्य में श्रेष्ठ मित्र के लक्षण बताए गए हैं।

सरलार्थः-जो पाप करने से मित्र को रोकता है, हितकर्म (अच्छे काम) में लगाता है, मित्र की गुप्त बात को छिपाता है, उसके गुणों को प्रकट कर देता है, आपत्ति में पड़े हुए को भी नहीं छोड़ता, समय पड़ने पर (धन आदि से) सहायता प्रदान करता है। सज्जन लोग इसे ही अच्छे मित्र का लक्षण बतलाते हैं।

भावार्थ:-सुमित्र वही है जो मित्र को हानिकारक कर्म से हटाकर कल्याण मार्ग में लगाए, उसके दोषों को छिपाकर गुणों को प्रकाशित करे, विपत्ति में भी उसका साथ न छोड़े तथा यथाशक्ति धनादि से उसकी सहायता करे।

विशेषः- इस पद्य में वसन्ततिलका छन्द है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च निवारयति = रोकता है। गुह्यम् = गुप्त बात। योजयते = लगाता है। आपद्गतम् = आपत्ति में पड़ा हुआ। जहाति = छोड़ता है; त्यजति। काले = समय पड़ने पर। निगृहति = छिपाता, आच्छादयति। प्रवदन्ति = कहते हैं।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

10. मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णाः
त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं,
निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः॥ 10 ॥ (भर्तृहरिः-नीतिशतकम्)

अन्वयः-मनसि वचसि काये पूण्यपीयूषपूर्णाः, उपकारश्रेणिभिः त्रिभुवनं प्रीणयन्तः परगुण-परमाणून् पर्वतीकृत्य निजहदि विकसन्तः कियन्तः सन्तः सन्ति ?

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से संगृहीत है। इस पद्य के रचयिता महाकवि भर्तृहरि हैं। इस पद्य में बताया गया है कि दूसरों के छोटे से गुण को अपने हृदय में ग्रहण करके उसका बहुत अधिक विस्तार करने वाले लोग बहुत कम होते है।

सरलार्थ:-जिनके मन, वाणी और शरीर में पुण्य रूपी अमृत भरा हो, जो अपने उपकारों से तीनों लोकों को प्रसन्न करते हों और दूसरों के परमाणु-समान अति सूक्ष्म गुणों को सदा पर्वत के समान बहुत बढ़ा-चढ़ा कर अपने हृदय में उनका विकास करते हों, ऐसे सज्जन इस संसार में कितने हैं अर्थात् ऐसे लोग विरले ही होते हैं।

भावार्थ:-सत्पुरुष अपने तन, मन और वचन से सदा परोपकार में लगे रहते हैं। वे दूसरे मनुष्यों के छोटे से छोटे गुण को भी अपने हृदय में धारण कर उसे पर्वत के समान अति विस्तृत रूप देकर बड़े सन्तुष्ट रहते हैं। ऐसे पुरुषरत्न धरती पर विरले ही होते हैं। विशेषः-इस पद्य में ‘मालिनी’ छन्द है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च वचसि = वाणी में ; वाचि (वचस्-सप्तमी विभक्ति एकवचन)। प्रीणयन्तः = प्रसन्न करते हुए ; प्रसन्नं कुर्वन्तः। परगुणपरमाणून् = दूसरों के अति सूक्ष्मगुणों को ; अन्येषाम् अतिसूक्ष्मान् गुणान्। पर्वतीकृत्य = बढ़ा-चढ़ा कर ; विशालतां नीत्वा। हृदि = हृदय में ; हृदये (हृत् शब्द सप्तमी विभक्ति एकवचन)। विकसन्तः = खिलते हुए ; विकासं कुर्वन्तः। सन्तः = सज्जन ; विकासं कुर्वन्तः (‘सत्’ शब्द प्रथमा विभक्ति बहुवचन)।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

11. केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः,
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलड्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते,
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥ 11 ॥ (भर्तृहरिः नीतिशतकम्)

अन्वयः-पुरुषं केयूराणि न भूषयन्ति । न चन्द्रोज्ज्वला: हाराः (भूषयन्ति)। न स्नानम्, न विलेपनम्, न कुसुमम्, न अलंकृताः मूर्धजा: भूषयन्ति । एका वाणी या संस्कृता धार्यते (सा एव) पुरुषं समलकरोति। भूषणानि खलु सततं क्षीयन्ते, वाग्भूषणं भूषणम्।

प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से संगृहीत है। इस पद्य के रचयिता कवि भर्तृहरि हैं। इस पद्य में सभ्यता पूर्ण वाणी को मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण बताया गया है।

सरलार्थः-मनुष्य को बाजू-बन्ध सुशोभित नहीं करते हैं। चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार भी सुशोभित नहीं करते। न स्नान करने से, न चन्दन आदि का लेप करने से, न पुष्पमाला धारण करने से और न ही सिर के सजे-धजे बालों से मनुष्य शोभायमान होता है। एक वाणी ही, जो संस्कारपूर्वक (सभ्यतापूर्ण ढंग से) धारण की गई हो, मनुष्य को सुशोभित करती है। संसार के अन्य सभी आभूषण समय के प्रवाह से नष्ट हो जाते हैं, केवल वाणी का आभूषण ही सच्चा आभूषण है, जो सदा बना रहता है।

भावार्थः-शरीर के बाह्य आभूषण मनुष्य की थोड़ी देर के लिए ही शोभा बन पाते हैं। बाद में ये आभूषण नष्ट हो जाते हैं। परन्तु शिष्टाचार पूर्ण सुसंस्कृत वाणी सदैव मनुष्य की शोभा बढ़ाती रहती है, इसीलिए वाणी को ही सच्चा आभूषण कहा गया है। विशेषः-‘इस पद्य में ‘शार्दूलविक्रीडित’ छन्द है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
केयूराणि = बाजूबन्ध, भुजबन्ध ; विशिष्टाभूषणानि। मूर्धजाः = सिर के बाल ; केशाः । क्षीयन्ते = नष्ट हो जाते हैं ; विनश्यन्ते। संस्कृता = शुद्ध, परिष्कृत, संस्कारयुक्त, शिष्टाचारपूर्ण।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

12. यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा,
यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्,
प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ॥ 12॥ (भर्तृहरिः)

अन्वयः-यावत् इदं कलेवरगृहं स्वस्थम्, यावत् च जरा दूरे (तिष्ठति), यावत् च इन्द्रियशक्तिः अप्रतिहता (अस्ति), यावत् आयुषः, क्षयः न (अस्ति), तावत् विदुषा आत्मश्रेयसि महान् प्रयत्नः कार्यः। प्रोद्दीप्ते च भवने कूपखननं प्रति उद्यमः कीदृशः।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य ‘सूक्ति-सुधा’ नामक पाठ से उद्धृत है। इस पद्य के रचयिता भर्तृहरि हैं। इस पद्य में बताया गया है कि आत्मकल्याण के लिए युवा अवस्था में ही प्रयत्नशील होना चाहिए तथा विपत्ति के आने से पहले ही उसका उपाय खोज लेना चाहिए।

सरलार्थ:-जब तक मनुष्य का यह शरीर रूपी घर स्वस्थ है, जब तक बुढ़ापा इससे दूर है, जब तक इन्द्रियों की शक्तिपूर्ण रूप से बनी हुई है, जब तक आयु क्षीण नहीं हुई है-उससे पूर्व ही विद्वान् मनुष्य को आत्मकल्याण के लिए महान् प्रयास करना चाहिए। घर में आग लग जाने पर कुआँ खोदने के परिश्रम का क्या लाभ है ?

भावार्थ:-कवि भर्तृहरि के कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य को आत्मकल्याण के लिए युवा अवस्था में ही प्रयत्न करना चाहिए। बुढ़ापा आने पर तो शरीर ही साथ नहीं देता, उसकी सारी शक्ति क्षीण हो जाती है। फिर अध्यात्मसाधना नहीं हो सकती। जो लोग बुढ़ापा आने पर प्रभु भजन का प्रयास करते हैं, वे तो मानो ऐसे प्रयास में लगे हैं जैसे घर में आग लग जाने पर कोई मूर्ख मनुष्य पानी के लिए कुआँ खोदने का प्रयास करता है। विशेष:-इस पद्य में ‘शार्दूलविक्रीडित’ छन्द है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च कलेवरगृहम् = शरीर ; शरीरम् एव गृहम् (कर्मधारय समास)। जरा = बुढ़ापा ; वृद्धत्वम्। प्रोद्दीप्ते = जलने पर ; प्रज्ज्वलिते। उद्यमः = मेहनत ; परिश्रम।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

सूक्तिसुधा (सुन्दर वचन रूपी अमृत) Summary in Hindi

सूक्तिसुधा पाठ परिचय

संस्कृत साहित्य में सूक्तियों एवं सदुपदेशों का समृद्ध भण्डार है। इनमें भारतीय संस्कृति एवं जीवन के उदात्त मूल्यों का सन्देश प्राप्त होता है। अभ्युदय, सौख्य, शान्ति, समरसता, सामञ्जस्य आदि विषयों के अचूक मोती इनमें पिरोए गए हैं। सूक्ति का अर्थ है सुन्दर वचन, सुधा का अर्थ है अमृत, ‘सूक्तिसुधा’ का अर्थ है ‘सुन्दर वचन रूपी अमृत’। इस पाठ में पण्डितराज जगन्नाथ, महाकवि माघ, भारवि, प्रसिद्ध नाटककार भवभूति तथा महाकवि भर्तृहरि की सूक्तियाँ संकलित हैं। ये सूक्तियाँ आज भी हमारे जीवन के लिए बहुमूल्य, उपयोगी एवं पथप्रदर्शक हैं। विभिन्न विषयों से सम्बद्ध सूक्तियाँ निश्चित रूप से छात्रों का मार्गदर्शन करेंगी।

सूक्तिसुधा पाठस्य सारः

‘सूक्तिसुधा’ पाठ में संस्कृत साहित्य की सूक्तियाँ संकलित की गई हैं। जीवनप्रद सुभाषितों का जैसा समृद्ध भण्डार संस्कृत वाङ्मय में मिलता है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इस पाठ में पण्डितराज जगन्नाथ, माघ, भारवि, भवभूति तथा भर्तृहरि की सूक्तियाँ संगृहीत की गई हैं। ये सूक्तियाँ आज भी हमारे जीवन के लिए बहुमूल्य, प्रेरणाप्रद, उपयोगी तथा मार्गदर्शक हैं।

प्रथम पद्य में महाकवि पण्डितराज जगन्नाथ ने हंस के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि ऊँची सोच के लोगों (सज्जनों) का मन तुच्छ वस्तुओं में नहीं लगता, जैसे हंस सामान्य सरोवरों को छोड़कर मानस सरोवरों में ही आनन्दित रहता है।

द्वितीय श्लोक में महाकवि पण्डितराज जगन्नाथ ने हंस के माध्यम से यह बताया है कि विद्वान् लोगों को अपनी विवेकशक्ति का उपयोग अवश्य करना चाहिए क्योंकि वे ही समाज के पथप्रदर्शक होते हैं।

तृतीय पद्य में कोयल के माध्यम से महाकवि पण्डितराज जगन्नाथ ने यह बताने का प्रयास किया है कि व्यक्ति को अपने स्वाभाविक गुणों के विकास के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा करनी चाहिए। जैसे कोयल मधुर कूहकूह के लिए आम्रवृक्षों पर बोर आने की प्रतीक्षा करती है।
चतुर्थ श्लोक में महाकवि माघ ने जीवन में भाग्य और पुरुषार्थ दोनों का सामञ्जस्य करके जीवन को आनन्दमय बनाने का सन्देश दिया है। जैसे श्रेष्ठकवि शब्द और अर्थ दोनों के सुन्दर सामञ्जस्य से श्रेष्ठ कविता का सृजन करता

पञ्चम श्लोक में महाकवि भवभूति ने प्रियजन को ऐसी अमूल्य वस्तु बताया है जो कुछ न करते हुए भी मनुष्य को सुखों से भर देता है और दुःखों को दूर करता है।
छठे श्लोक में महाकवि भारवि ने प्रत्येक कार्य को सोच-विचार कर करने के लिए प्रेरित किया है और अविवेकपूर्ण कार्य की विपत्तियों का घर बताया है।

‘सूक्तिसुधा’ पाठ के अन्तिम छः श्लोक महाकवि भर्तृहरि के गीतिकाव्यों से संगृहीत हैं। एक श्लोक में मौन का महत्त्व समझाते हुए मौन को अज्ञानता का ढकने वाला तथा मूर्यों का आभूषण कहा गया है। एक श्लोक में विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में सहनशीलता, सभा में वाक्चातुर्य, युद्ध में पराक्रम, यश अर्जित करने में तत्परता, शास्त्र-ज्ञान

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा

अर्जित करने की आदत को महापुरुषों का स्वाभाविक गुण बताया है। . अन्य श्लोक में सच्चे मित्र की पहचान के छ: सूत्र बताए हैं। पाप से रोकना, हित में लगाना, गुप्त बात को छिपाना, गुणों को प्रकट करना, विपत्ति में साथ न छोड़ना, समय पर धन आदि से सहायता करना-ये श्रेष्ठ मित्र के छह लक्षण हैं।
एक सुभाषित में भर्तृहरि ने बताया है कि संसार में उन लोगों की संख्या बहुत कम होती है, जो दूसरों के गुणों को अपने अन्दर ग्रहण करते हैं और उस गुण का विस्तार करते हैं।

एक सुभाषित में शिष्टाचारपूर्ण सुसंस्कृत वाणी को मनुष्य का सच्चा और सदा रहने वाला आभूषण बताया है, क्योंकि शेष सभी आभूषण तो समय के प्रवाह के साथ अपनी चमक खो देते हैं और नष्ट हो जाते हैं।

अन्तिम सुभाषित में भर्तृहरि ने इस बात पर बल दिया है, की मनुष्य को आत्मकल्याण के लिए प्रयत्न युवावस्था में स्वस्थ रहते हुए ही कर लेना चाहिए। बुढ़ापे में आत्मकल्याण का प्रयत्न घर में आग लगने पर कुआँ खोदने जैसा निरर्थक है।

इस प्रकार ये सूक्तियाँ जीवन के लिए उपयोगी तथा महत्त्वपूर्ण हैं। इनके अनुसार आचरण करने से हमारा जीवन सफल एवं सुन्दर बन सकता है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 6 सूक्तिसुधा Read More »

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

HBSE 12th Class Sanskrit शुकनासोपदेशः Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम्
(क) लक्ष्मीमदः कीदृशः ?
(ख) चन्द्रापीडं कः उपदिशति ?
(ग) अनर्थपरम्परायाः किं कारणम् ?
(घ) कीदृशे मनसि उपदेशगुणाः प्रविशन्ति ?
(ङ) लब्धापि दुःखेन का परिपाल्यते ?
(च) केषाम् उपदेष्टारः विरलाः सन्ति ?
(छ) लक्ष्म्या परिगृहीताः राजानः कीदृशाः भवन्ति ?
(ज) वृद्धोपदेशं ते राजानः किमिति पश्यन्ति ?
उत्तरम्:
(क) लक्ष्मीमदः अपरिणामोपशमः दारुणः अस्ति।
(ख) चन्द्रापीडं मन्त्री शुकनासः उपदिशति ?
(ग) अनर्थपरम्परायाः कारणानि-गर्भेश्वरत्वम्, अभिनवयौवनत्वम्, अप्रतिम-रूपत्वम्, अमानुषशक्तित्वं चेति।
(घ) अपगतमले मनसि उपदेशगुणाः प्रविशन्ति।
(ङ) लब्धापि दुःखेन लक्ष्मीः परिपाल्यते।
(च) राज्ञाम् उपदेष्टारः विरलाः सन्ति ?
(छ) लक्ष्म्या परिगृहीताः राजानः विक्लवाः भवन्ति ?
(ज) वृद्धोपदेशं ते राजानः जरावैक्लव्यप्रलपितम् इति पश्यन्ति ?

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

2. विशेषणानि विशेष्यैः सह योजयत
विशेषणम् – विशेष्यम्
(क) समतिक्रामत्सु – ते
(ख) अधीतशास्त्रस्य – विद्वांसम्
(ग) दारुणो – दिवसेषु
(घ) गहनं तमः – दोषजातम्
(ङ) अतिमलिनम् – लक्ष्मीमदः
(च) सचेतसम् – यौवनप्रभवम्
उत्तरम्:
(क) समतिक्रामत्सु – दिवसेषु
(ख) अधीतशास्त्रस्य – ते
(ग) दारुणो – लक्ष्मीमदः
(घ) गहनं तमः – यौवनप्रभवम्
(ङ) अतिमलिनम् – दोषजातम्
(च) सचेतसम् – विद्वांसम्

3. अधोलिखितपदानि स्वरचित-संस्कृत-वाक्येषु प्रयुग्ध्वम्
संग्रहार्थम्, समुपस्थितम्, विनयम्, परिणमयति, शृण्वन्ति, स्पृशति।
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगः)
(क) संग्रहार्थम्-सद्गुणानां संग्रहणार्थं सदा यत्नः करणीयः।
(ख) समुपस्थितम्-राजा समुपस्थितं सेवकं शस्त्रम् आनेतुम् आदिशत्।
(ग) विनयम्-विद्या विनयं ददाति।
(घ) परिणमयति-लक्ष्मीमदः सज्जनम् अपि दुष्टभावेषु परिणमयति।
(ङ) शृण्वन्ति-अहंकारिणः राजानः गुरूपदेशान् न शृण्वन्ति।
(च) स्पृशति-लक्ष्मी: गुणवन्तं न स्पृशति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

4. अधोलिखितानां पदानां सन्धिच्छेदं कुरुत
उत्तरसहितम्:
(क) एवातिगहनम् = एव + अतिगहनम्
(ख) गर्भेश्वरत्वम् = गर्भ + ईश्वरत्वम्
(ग) गुरूपदेशः = गुरु + उपदेशः
(घ) ह्येवम् = हि + एवम्
(ङ) नाभिजनम् = न + अभिजनम्
(च) नोपसर्पति = न + उपसर्पति

5. प्रकृति-प्रत्ययविभागः क्रियताम्
उत्तरसहितम्
HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः img-2

6. समासविग्रहं कुरुत
उत्तरसहितम्:
(क) अमानुषशक्तित्वम् – न मानुषशक्तित्वम् (नञ्-तत्पुरुषः)
(ख) अत्यासाः अतिशयेन आसङ्गः (उपपद-तत्पुरुषः)
(ग) अनार्या न आर्या (नञ्-तत्पुरुषः)
(घ) स्वार्थनिष्पादनपरैः – स्वार्थस्य निष्पादने परैः (तत्परैः) तत्पुरुषः
(ङ) अहर्निशम् – निशायां निशायाम् (अव्ययीभावः)
(च) वृद्धोपदेशम् – वृद्धानाम् उपदेशम् (षष्ठी-तत्पुरुषः)

7. रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) लक्ष्मी : …………………. न रक्षति।
(ख) ………………. दुःस्वप्नमिव न स्मरति।
(ग) सरस्वतीपरिगृहीतं ……………….
(घ) उपदिश्यमानमपि ………………… न शृण्वन्ति।
(ङ) अवधीरयन्तः ………………….. हितोपदेशदायिनो गुरून्।
(च) तथा प्रयतेथाः ……………… नोपहस्यसे जनैः।
(छ) चन्द्रापीड: प्रीतहृदयो ………………… आजगाम।
उत्तरम्:
(क) परिचयम्
(ख) दातारम्
(ग) नालिङ्गति
(घ) राजानः
(ङ) खेदयन्ति
(च) यथा
(छ) स्वभवनम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

8. सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
(क) गर्भेश्वरत्वभिनवयौवनत्वमप्रतिमरूपत्वममानुषशक्तित्वञ्चेति महतीयं खल्वनर्थपरम्परा।
(ख) हरति अतिमलिनमपि दोषजातं गुरूपदेशः ।
(ग) विद्वांसमपि सचेतसमपि, महासत्त्वमपि, अभिजातमपि, धीरमपि, प्रयत्नवन्तमपि पुरुषं दुर्विनीता खलीकरोति
लक्ष्मीरिति। उत्तरम् -(व्याख्या)
(क) गर्भेश्वरत्वभिनवयौवनत्वमप्रतिमरूपत्वममानुषशक्तित्वज्येति महतीयं खल्वनर्थपरम्परा।

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति शुकनासोपदेश नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट द्वारा रचित कादम्बरी से लिया गया है। प्रस्तुत पंक्ति में मन्त्री शुकनास युवराज चन्द्रापीड को उपदेश करते हुए अनर्थ के चार कारणों की ओर ध्यान दिला रहे हैं। मन्त्री शुकनास कहते हैं कि अनर्थ की परम्परा के चार कारण हैं… (i) जन्म से ही प्रभुता
(ii) नया यौवन
(iii) अति सुन्दर रूप
(iv) अमानुषी शक्ति।

इन चारों में से मनुष्य का विनाश करने के लिए कोई एक कारण भी पर्याप्त होता है। जिसके जीवन में ये चारों ही कारण उपस्थित हों, उसके विनाश को कौन रोक सकता है ? इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को घोर अनर्थ से बचने के लिए उक्त चारों वस्तुएँ पाकर भी कभी अहंकार नहीं करना चाहिए।

(ख) हरति अतिमलिनमपि दोषजातं गुरूपदेशः।
व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति शुकनासोपदेश नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट द्वारा रचित कादम्बरी से लिया गया है। प्रस्तुत पंक्ति में शुकनास युवराज चन्द्रापीड को गुरु के उपदेश का महत्त्व समझा रहे हैं । मन्त्री शुकनास कहते हैं कि गुरु का उपदेश मनुष्य के जीवन में बहुत अधिक उपयोगी तथा हितकारी होता है। मनुष्य में यदि अत्यधिक गहरे दोषों का समूह हो तो गुरु का उपदेश उन गहरे से गहरे दोषों को भी दूर कर देता है और उन दोषों के स्थान पर अति उत्तम गुण प्रवेश कर जाते हैं। मनुष्य का जीवन उज्ज्वल हो जाता है। सब जगह ऐसे व्यक्ति का यश फैलता है, इसीलिए गुरु का उपदेश प्रत्येक मनुष्य के लिए परम कल्याणकारी तथा आवश्यक है।

(ग) विद्वांसमपि सचेतसमपि, महासत्त्वमपि, अभिजातमपि, धीरमपि, प्रयत्न-वन्तमपि पुरुषं दुर्विनीता खलीकरोति लक्ष्मीरिति।
व्याख्या-प्रस्तुत पंक्ति शुकनासोपदेश नामक पाठ से ली गई है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट द्वारा रचित कादम्बरी से लिया गया है। प्रस्तुत पंक्ति में मन्त्री शुकनास लक्ष्मी अर्थात् धन के गुणों पर प्रकाश डाल रहे हैं।

मन्त्री शुकनास कहते हैं कि लक्ष्मी इतनी शक्तिशाली होती है कि अत्यन्त जागरूक रहने वाले विद्वान्, महान् बलशाली, उच्चकुल में उत्पन्न, धैर्यशील तथा अत्यन्त परिश्रमी मनुष्य को भी यह लक्ष्मी दुष्ट आचरण वाला बना देती है। शुकनास के कहने का तात्पर्य है कि जिस मनुष्य के पास धन होता है, वह धन के अहंकार में कर्तव्य-अकर्तव्य के विवेक को खो बैठता है और कुमार्गगामी हो जाता है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

योग्यताविस्तारः
‘उप’ उपसर्गपूर्वकात् अतिसर्जनार्थकात् ‘दिश्’ धातोः ‘घञ्’ प्रत्यये उपदेशशब्दः निष्पद्यते। समुचितकार्येषु मित्रं, बन्धु, आश्रितजनं, विद्यार्थिनं वा सन्मार्गे प्रवर्तयितुं केनचित् हितचिन्तकेन सुहृद्वरेण ज्ञानिना वा दीयमानः परामर्शः मार्गनिर्देशः हितवचनं वा ‘उपदेश’ इति उच्यते। संस्कृतवाङ्मये लोकप्रबोधकानि सदाचारप्रतिपादकानि च सूत्राणि नानाग्रन्थेषु, काव्येषु सुभाषितेषु च समुपलभ्यन्ते। तानि उपदेशसूत्राणि बालकान्, युवकान्, प्रौढान्, वृद्धान विविधेषु क्षेत्रेषु कार्याणि कुर्वतः च अधिकृत्य सामान्येन प्रकारेण प्रणीतानि सन्ति।

अत्र उद्धृते भागे शुकनासोपदेशाख्ये राजकुमारं चन्द्रापीडं प्रति शुकनासस्य उपदेशः संगृहीतः। तथाहि-ऐश्वर्य, यौवनं, सौन्दर्य, शक्तिश्चेति प्रत्येकं अनर्थकारणमिति मत्त्वा चन्द्रापीडम् उपदेष्टुं प्रक्रान्तः शुकनासः । यद्यपि चन्द्रापीडः विनीतः गृहीतविद्यश्च तथापि ऐश्वर्यादिभिः अस्य मनः खलीकृतं न भवेत् इति धिया शुकनासः चन्द्रापीडम् उपदिशति। अत: उपदेशोऽयं न केवलं चन्द्रापीडं प्रति अपितु तन्माध्यमेन सर्वेषां जनानां कृतेऽपि।

पञ्चतन्त्रेऽपि यत्र-तत्र ईदृश एव हृदयङ्गमः उपदेशः प्राप्यते। यौवनादिकारणैः सम्भाव्यमानमनर्थं पञ्चतन्त्रम् एवमुल्लिखति

यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥

महाभारतस्य उद्योगपर्वणः भागे विदुरनीतौ अपि एवमभिहितमस्ति
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति
प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च॥
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च
दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
न क्रोधिनोऽर्थो न नृशंसमित्रं
क्रूरस्य न स्त्री सुखिनो न विद्या।
न कामिनो ह्रीरलसस्य न श्रीः
सर्वं तु न स्यादनवस्थितस्य॥

अन्यत्रापि हितोपदेश-नीतिशतकादौ च एवमुपदिष्टम् अस्ति। तत्र-तत्रापि योग्यता विस्तरार्थमवश्यं पठनीयम्।
1. बाणभट्टस्य रीतिः पाञ्चाली रीतिरिति कथ्यते । तस्याः लक्षणम् “शब्दार्थयोः समो गुम्फः पाञ्चालीरीतिरिष्यते।”
2. बाणभट्टस्य गद्ये या लयात्मकता वर्तते, पाठपुरस्सरं तस्याः सन्धानं कार्यम्।

बाणविषयकसूक्तयः प्रशस्तयश्च
1. बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्।

2. केवलोऽपि स्फुरन् बाणः करोति विमदान् कवीन्।
किं पुनः क्लृप्तसन्धानः पुलिन्दकृतसन्निधिः॥ (धनपालः-तिलकमञ्जरी)

3. सुबन्धुर्बाणभट्टश्च कविराज इतित्रयः।
वक्रोक्तिमार्गनिपुणाश्चतुर्थो विद्यते न वा॥ (मङ्खक:-श्रीकण्ठचरितम्)

4. श्लेषे केचन शब्दगुम्फविषये केचिद्रसे चापरेऽ
लड़कारे कतिचित्सदर्थविषये चान्ये कथावर्णने।
आः सर्वत्र गभीरधीरकविताविन्ध्याटवी चातुरी
सञ्चारी कविकुम्भिकुम्भभिदुरां बाणस्तु पञ्चाननः॥ (चन्द्रदेवः-शार्ङ्गधरपद्धतिः)

5. शब्दार्थयोः समो गुम्फः पाञ्चालीरीतिरिष्यते।
शीलाभारिकावाचि बाणोत्तिषु च सा यदि॥ (राजशेखर-कल्हण-सूक्तिमुक्तावली)

6. रुचिरस्वरवर्णपदा रसभावती जगन्मनो हरति।
सा किं तरुणी ? नहि नहि वाणी बाणस्य मधुरशीलस्य॥ (धर्मदासः-विदग्धमुखमण्डनम्)

7. बाणः कवीनामिह चक्रवर्ती चकास्ति यस्योज्ज्वलवर्णशोभम्।
एकातपत्रं भुवि पुण्यभूमिवंशाश्रयं हर्षचरित्रमेव॥ (सोड्ढलः)

8. हृदि लग्नेन बाणेन यन्मन्दोऽपि पदक्रमः।
भवेत्कविकुरगणां चापलं तत्र कारणम्॥ (त्रिलोचनः-शार्ङ्गधरपद्धतिः)

9. यस्याश्चौरश्चिकुरनिकरः कर्णपूरो मयूरो
भासो हासः कविकुलगुरुः कालिदासो विलासः।
हर्षो हर्षो हृदयवसतिः पञ्चबाणस्तु बाणः
केषां नैषा कथय कविताकामिनी कौतुकाय॥(जयदेवः-प्रसन्नराघवः)

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

HBSE 9th Class Sanskrit शुकनासोपदेशः Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) लक्ष्मीमदः कीदृशः ?
(A) उपशमः
(B) अपरिणामः
(C) अपरिणामोपशमः
(D) सुखावहः।
उत्तराणि:
(B) अपरिणामोपशमः

(ii) चन्द्रापीडं कः उपदिशति?
(A) शुकनासः
(B) शुकः
(C) तारापीडः
(D) बृहस्पतिः।
उत्तराणि:
(A) शुकनासः

(iii) कीदृशे मनसि उपदेशगुणाः प्रविशन्ति।
(A) मलिने
(B) अपगतमले
(C) छलयुक्ते
(D) छलान्विते।
उत्तराणि:
(B) अपंगतमले

(iv) लब्धापि दुःखेन का परिपाल्यते?
(A) लक्ष्मीः
(B) विद्या
(C) गौः
(D) स्त्री।
उत्तराणि:
(A) लक्ष्मी

(v) केषाम् उपदेष्टारः विरलाः सन्ति ?
(A) गुरूणाम्
(B) शठानाम्
(C) राज्ञाम्
(D) अल्पज्ञानाम्।
उत्तराणि:
(C) राज्ञाम्

(vi) लक्ष्म्या परिगृहीताः राजानः कीदृशाः भवन्ति?
(A) प्रसन्नाः
(B) विक्लवाः
(C) सुप्ताः
(D) यशस्विनः।
उत्तराणि:
(B) विक्लवाः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

II. रेखाकितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) लक्ष्मीः लब्धाऽपि खलु दुःखेन परिपाल्यते।
(A) कथम्
(B) काः
(C) कः
(D) किम्।

(ii) अधीतसर्वशास्त्रस्य नाल्पमपि उपदेष्टव्यम् अस्ति।
(A) कम्
(B) कस्मात्
(C) कस्य
(D) कः।
(B) कस्मै

(iii) अपरिणामोपशमः लक्ष्मीमदः।
(A) कीदृशः
(B) किम्
(C) काः
(D) कस्मैः

(iv) लक्ष्मीः शूरं कण्टकमिव परिहरति।
(A) कः
(C) कस्य
(D) कम्।

(v) राजानः कुप्यन्ति हितवादिने
(A) कस्य
(B) कस्मै
(C) कस्मात्
(D) केषाम्।
उत्तराणि
(A) कथम्
(C) कस्य
(A) कीदृशः
(D) कम्
(B) कस्मै।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

शुकनासोपदेशः पाठ्यांशः
1. एवं समतिक्रामत्सु दिवसेषु राजा चन्द्रापीडस्य यौवराज्याभिषेकं चिकीर्षुः प्रतीहारानुपकरण सम्भारसंग्रहार्थमादिदेश। समुपस्थितयौवराज्याभिषेकं च तं कदाचिद् दर्शनार्थमागतमारूढविनयमपि विनीततरमिच्छन् कर्तुं शुकनासः सविस्तरमुवाच
HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः img-1
“तात! चन्द्रापीड! विदितवेदितव्यस्याधीतसर्वशास्त्रस्य ते नाल्पमप्युपदेष्टव्यमस्ति। केवलं च निसर्गत एवातिगहनं तमो यौवनप्रभवम्। अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः। अप्रबोधा घोरा च राज्यसुखसन्निपातनिद्रा भवति, इत्यतः विस्तरेणाभिधीयसे।”

प्रसंग:-प्रस्तुत पाठ्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘शुकनाशोपदेशः’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ संस्कृत के महान् गद्यकार बाणभट्ट की प्रसिद्ध रचना ‘कादम्बरी’ से सम्पादित है। इस पाठ में राजा तारापीड का अनुभवी मन्त्री राजकुमार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक से पूर्व हितैषी भाव से उपदेश देते हैं। वे उसे युवावस्था में रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक दोषों के विषय में सावधान कर देना अपना कर्तव्य समझते हैं।

हिन्दी-अनुवादः
इस प्रकार कुछ दिन बीत जाने पर राजा तारापीड ने राजकुमार चन्द्रापीड को राजतिलक करने की इच्छा से द्वारपालों को आवश्यक सामग्री-समूह के संग्रह करने के लिए आदेश दिया। जिसके राजतिलक समय निकट ही आ चुका था, जो कदाचित् मन्त्री शुकनास का दर्शन करने के लिए आया था-ऐसे उस विनयसम्पन्न (विशेष नीति से युक्त) राजकुमार चन्द्रापीड को और भी अधिक विनयवान् बनाने की इच्छा वाले शुकनास ने विस्तारपूर्वक कहा-हे बेटा, चन्द्रापीड! जो कुछ विषय जानना चाहिए, वह सब तुम जानते हो। तुम वेदादि सब शास्त्रों को पढ़े हुए हो, इसलिए तुम्हें थोड़ी भी उपदेश देने की आवश्यकता नहीं है। केवल यही कहना है कि जवानी में स्वभाव से ही जो अन्धकार पैदा होता है, वह अन्धकार अत्यन्त घना (घोर) होकर रहता है। धनसम्पत्ति का (नशा) मद ऐसा भयानक होता है कि वह आयु के परिणाम अर्थात् वृद्धावस्था में भी शान्त नहीं होता। राज्यसुख रूपी सन्निपात ज्वर से उत्पन्न निद्रा इतनी गहरी होती है कि प्रबोध (जागरण) ही नहीं हो पाता-इसीलिए तुम्हें विस्तारपूर्वक कहा जा रहा है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
चिकीर्षुः = करने की इच्छावाला, कर्तुमिच्छु:, √कृ + सन् + उ, प्रथमा विभक्ति एकवचन। विनयम् आरुढः = विशिष्ट नय (नीति) से सम्पन्न, विशेष रूप से नीतिमान् । प्रतीहारान् = द्वारपालों को। उपकरणसम्भारसंग्रहार्थम् = आवश्यक सामग्री-समूह के संग्रह के लिए, उपक्रियन्ते एभिः इति उपकरणानि, उपकरणानाम् सम्भारः = उपकरणसम्भारः (षष्ठी-तत्पुरुष) उपकरणसम्भारस्य संग्रहार्थम्। उप + कृ + ल्युट् = उपकरणम्, सम्भारः = सम् + √भृ + घञ्। अधीतसर्वशास्त्रस्य = जिसने सभी शास्त्रों का अध्ययन कर लिया है। अधीतं सर्वं शास्त्रं येन सः, तस्य (बहुब्रीहि समास)। निसर्गतः= स्वाभाविक रूप से। यौवनप्रभवम् = युवावस्था के कारण उत्पन्न। यौवनेन प्रभवम् (तृतीयातत्पुरुष)। अपरिणामोपशमः = वृद्धावस्था में भी न शान्त होने वाला। परिणामे उपशम: परिणामोपशमः । न परिणामोपशम: अपरिणामोपशमः (नञ् तत्पुरुष)। विदितवेदितव्यस्य = जिसने ज्ञातव्य को जान लिया है। विदितं वेदितव्यं येन असौ विदितवेदितव्यः तस्य (बहुव्रीहि), √विद् + क्त = विदितम्, √विद् + तव्यत् = वेदितव्यम्।

2. गर्भेश्वरत्वमभिनवयौवनत्वम्, अप्रतिमरूपत्वममानुषशक्तित्वञ्चेति महतीयं खल्लवनर्थ-परम्परा। यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालन-निर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः। नाशयति च पुरुषमत्यासगो विषयेषु। भवादृशा एव भवन्ति भाजनान्युपदेशानाम्। अपगतमले हि मनसि विशन्ति सुखेनोपदेशगुणाः। हरति अतिमलिनमपि दोषजातं गुरूपदेशः गुरूपदेशश्च नाम अखिलमलप्रक्षालनक्षमम् अजलं स्नानम्। विशेषेण तु राज्ञाम्। विरला हि तेषामुपदेष्टारः। राजवचनमनुगच्छति जनो भयात्। उपदिश्यमानमपि ते न शृण्वन्ति।अवधीरयन्तः खेदयन्ति हितोपदेशदायिनो गुरून्।

हिन्दी-अनुवादः
जन्म से ही अधिकार सम्पन्नता, नया यौवन, अनुपम सौन्दर्य और अमानुषी शक्ति का होना-यह महान् अनर्थ की परम्परा (शंखला) है। युवावस्था के प्रारम्भ में मनुष्य की बुद्धि शास्त्ररूपी जल से धुलने के कारण स्वच्छ होती हुई भी प्रायः दोषपूर्ण हो जाती है। और विषयों में अति आसक्ति मनुष्य का विनाश कर देती है।
आप जैसे व्यक्ति ही उपदेशों के पात्र होते हैं। निर्दोष मन में ही उपदेश के गुण सुखपूर्वक प्रवेश करते हैं। गुरु का उपदेश अत्यन्त मलिन दोषसमूह को भी दूर कर देता है। गुरु का उपदेश सम्पूर्ण मलों को धोने में समर्थ जलरहित स्नान है। (अर्थात् जैसे पानी से स्नान करने पर बाहर के सब मैल धुल जाते हैं, वैसे ही गुरु के उपदेश से सब आन्तरिक दोष दूर हो जाते हैं।) ये उपदेश राजाओं के लिए तो विशेष रूप से लाभकारी होते है; क्योंकि उन्हें उपदेश देने वाले बहुत कम लोग होते हैं। लोग प्राय: भय के कारण राजा के वचनों का ही अनुकरण करते हैं। उपदेश देते हुए (विद्वान्) को भी वे सुनते नहीं हैं। वे हितकारी उपदेश करने वाले गुरुओं का तिरस्कार करते हुए उन्हें खिन्न कर देते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
गर्भेश्वरत्वम् = जन्म से प्राप्त प्रभुत्व। गर्भतः एव ईश्वरः = गर्भेश्वरः तस्य भावः गर्भेश्वरत्वम्। भवादृशाः = आप जैसे ही, भवत् + दृश् + क्विप्, प्रथमा विभक्ति । शास्त्रजलप्रक्षा-लननिर्मला = शास्त्ररूपी जल द्वारा धोने से निर्मल। शास्त्रमेव जलं शास्त्रजलम्, तेन प्रक्षालनेन निर्मला। अपगतमले = दोषरहित होने पर, अपगतः मलः यस्मात् तत् अपगतमलम् तस्मिन् अपगतमले (पञ्चमी तत्पुरुष)। उपदेष्टारः = उपदेश देने वाले, उप + दिश् + तृच् प्रथमा विभक्ति बहुवचन। अवधीरयन्तः =तिरस्कृत करते हुए, अव + धीर + णिच् + शतृ प्रथमा विभक्ति बहुवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

3. आलोकयतु तावत् कल्याणाभिनिवेशी लक्ष्मीमेव प्रथमम्। न ह्येवं-विधमपरिचितमिह जगति किञ्चिदस्ति यथेयमनार्या। लब्धापि खलु दुःखेन परिपाल्यते। परिपालितापि प्रपलायते। न परिचयं रक्षति । नाभिजनमीक्षते। न रूपमालोकयते। न कुलक्रममनुवर्तते। न शीलं पश्यति। न वैदग्ध्यं गणयति। न श्रुतमाकर्णयति। न धर्ममनुरुध्यते। न त्यागमाद्रियते।न विशेषज्ञतां विचारयति। नाचारं पालयति। न सत्यमवबुध्यते। पश्यत एव नश्यति। सरस्वतीपरिगृहीतं नालिगति जनम्। गणवन्तं न स्पशति। सुजनं न पश्यति। शूरं कण्टकमिव परिहरति। दातारं दुःस्वप्नमिव न स्मरति। विनीतं नोपसर्पति। तृष्णां संवर्धयति। लघिमानमापादयति। एवंविधयापि चानया कथमपि दैववशेन परिगृहीताः विक्लवाः भवन्ति राजानः, सर्वाविनयाधिष्ठानतां च गच्छन्ति।

हिन्दी-अनुवादः
हे चन्द्रापीड ! तुम कल्याण (मंगल) के लिए प्रयत्नशील हो, इसलिए पहले लक्ष्मी को ही विचार कर देखो। इस जैसी अपरिचित इस संसार में अन्य कोई वस्तु नहीं जैसी यह अनार्या लक्ष्मी है। इस लक्ष्मी को प्राप्त कर लेने पर भी, इसका महाकष्ट से पालन (रक्षण) करना पड़ता है और यह लक्ष्मी न परिचय की परवाह करती है, न कुलीन की ओर देखती है, न सौन्दर्य (रूप) को देखती है, न कुल-परम्परा का अनुगमन करती है। न सच्चरित्र को देखती है, न कुशलता (पाण्डित्य) की परवाह करती है। न शास्त्रज्ञान को सुनती है, न धर्म से रोकी जाती है, न त्याग (दान) को आदर देती है। न विशेष ज्ञान का विचार करती है। न सदाचार का पालन करती है। न सत्य को जानती है। यह देखते ही देखते नष्ट हो जाती है। सरस्वती से युक्त (विद्यावान्, विद्वान्) मनुष्य को यह ईर्ष्यावश ही मानो आलिंगन (स्वीकार) नहीं करती है। शौर्य आदि गुणों वाले व्यक्ति का स्पर्श नहीं करती है। सज्जन की ओर यह देखती भी नहीं है। शूरवीर को काँटे के समान छोड़ देती है। दानी का, दुःस्वप्न के समान स्मरण भी नहीं करती है। विनम्र व्यक्ति के पास फटकती भी नहीं है। यह तृष्णा (= लालसा) को बढ़ाती है। मनुष्य को छोटा (तुच्छ) बना देती है। ऐसी दुराचारिणी इस लक्ष्मी द्वारा जैसे-तैसे भाग्य के कारण, पकड़े गए (जकड़े गए) राजा लोग, अत्यन्त व्याकुल बने रहते हैं और सब प्रकार के दुराचारों (दुष्कृत्यों) के निवास स्थान को प्राप्त कर लेते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्य
कल्याणाभिनिवेशी = मङ्गल के अभिलाषी, कल्याणे अभिनिवेष्टुं शीलं यस्य सः (बहुब्रीहि)। परिपाल्यते = रखी जा सकती है, परि + /पाल् + कर्मणि यक् + लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन। प्रपलायते = भाग जाती है। वैदग्धयम् = पाण्डित्य को, विदग्धस्य भावो वैदग्ध्यम्, विदग्ध + ष्यञ्। अनुरुध्यते = अनुरोध करती है, अनु + /रुध् + लट्, प्रथम पुरुष एकवचन। अवबुध्यते = जानी जाती है, पहचानी जाती है। नोपसर्पति = समीप नहीं जाती, पार्वे न गच्छति।

संवर्धयति = बढ़ाती है। लघिमानमापादयति = निम्नता प्रदान करती है, लघिमानम् = लघोर्भावः लघिमा (लघु + इमनिच्) तम् आपादयति = आ + Vपद् + णिच् + लट् प्रथम पुरुष एकवचन। विक्लवाः = विह्वल-विकल। सर्वाविनयाधिष्ठानताम् = सभी प्रकार के अविनयों (दुष्कृत्यों, दुष्ट आचरणों) के निवास स्थान को सर्वेषाम् अविनयानाम् अधिष्ठानताम् (षष्ठी-तत्पुरुष)।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

4. अपरे तु स्वार्थनिष्पादनपरैः दोषानपि गुणपक्षमध्यारोपयद्भिः प्रतारणकुशलैधूर्तेः प्रतार्यमाणा वित्तमदमत्तचित्ता सर्वजनोपहास्यतामुपयान्ति। न मानयन्ति मान्यान्, जरावैक्लव्यप्रलपितमिति पश्यन्ति वृद्धोपदेशम्। कुप्यन्ति हितवादिने। सर्वथा तमभिनन्दन्ति, तं संवर्धयन्ति, तस्य वचनं शृण्वन्ति, तं बहु मन्यन्ते योऽहर्निशम् अनवरतं विगतान्यकर्तव्यः स्तौति, यो वा माहात्म्यमुद्भावयति। 

हिन्दी-अनुवादः
कुछ राजा लोग तो स्वार्थ सिद्ध करने में तत्पर, दोषों में गुणों को आरोपित करने वाले, ठग-विद्या में अतिनिपुण, धूर्तबुद्धि लोगों के द्वारा ठगे जाते हुए धन के मद से उन्मत्त चित्त वाले होकर सब लोगों की हँसी के पात्र बनते हैं। वे मानवीय लोगों का सम्मान नहीं करते। वृद्धों के उपदेश को, यह मानकर देखते हैं कि यह तो उनका बुढ़ापे में बड़बड़ाना है। हितकारी वचन बोलने वाले पर क्रोध करते हैं। सभी प्रकार से उसका वे अभिनन्दन करते हैं, उसे ही सहायता करके बढ़ाते हैं; उसका ही वचन (कहना) सुनते हैं, उसी का बहुत आदर करते हैं, जो दिन-रात निरन्तर अन्य सब काम छोड़कर, उनकी प्रशंसा करता है अथवा, जो उनकी महिमा को प्रकट करता है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अध्यारोपयद्भिः = आरोपित करने वाले। प्रतारणकुशलैः = ठगने में कुशल-निपुण, प्रतारणासु कुशलाः प्रतारणकुशलाः तैः, सप्तमी तत्पुरुष। प्रतार्यमाणाः = ठगे गए, प्र + √तु + कर्मणि यक् + शानच् + प्रथमा विभक्ति एकवचन। जरावैक्लव्यप्रलपितम् = वृद्धावस्था की विकलता से निरर्थक वचन के रूप में, जरसः वैक्लव्यं = जरावैक्लव्यम् (षष्ठी तत्पुरुष) तेन प्रलपितम्। विगतान्यकर्तव्यः = अन्य सब कर्तव्य कर्मों को छोड़कर। विगतम् अन्यकर्तव्यं यस्य सः (बहुव्रीहि)। अहर्निशम् = दिन-रात । उद्भावयति = प्रकट करता है। उद् + √भू + णिच् + लट्, प्रथम पुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

5. तदतिकुटिलचेष्टादारुणे राज्यतन्त्रे, अस्मिन् महामोहकारिणि च यौवने कुमार! तथा प्रयतेथाः यथा नोपहस्यसे जनैः, न निन्द्यसे साधुभिः, न धिक्क्रियसे गुरुभिः, नोपालभ्यसे सुहृद्भिः, न वञ्च्यसे धूर्तेः, न विडम्ब्यसे लक्ष्या, नाक्षिप्यसे विषयैः, नापहयिसे सुखेन।

हिन्दी-अनुवादः
हे राजकमार चन्द्रापीड ! इसीलिए अत्यन्त कुटिल चेष्टाओं से युक्त इस कठोर राज्यतन्त्र में और इस महामूर्छा पैदा करने वाली युवावस्था में तुम वैसा प्रयत्न करना जिससे तुम जनता की हँसी के पात्र न बनो। सज्जन तुम्हारी निन्दा न करें। गुरु लोग तुम्हें धिक्कार न कहें। मित्र लोग तुम्हें उपालम्भ (लाम्भा, उलाहना) न दें। धूर्त तुम्हें ठग न सकें। लक्ष्मी तुम्हारे साथ धोखा न कर सके। विषयों से तुम आक्षिप्त न हो जाओ अर्थात् तुम विषयासक्त न बन सको। सुख तुम्हारा अपहरण न कर ले अर्थात् तुम राजसुख में डूब कर कर्तव्य से विमुख न हो जाओ।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
महामोहकारिणि = अत्यन्त मोह रूप अज्ञान अन्धकार को पैदा करने वाले, ‘यौवने’ पद का विशेषण। प्रयतेथाः = प्रयत्न कीजिए। प्र + √यत् + विधिलिङ् मध्यमपुरुष एकवचन। विडम्ब्यसे = धोखे में न डाले जा सको। उपालभ्यसे = उपालम्भ / उलाहना न दिए जा सको। उप + आ + √लभ् (कर्मवाच्य) + लट्, मध्यमपुरुष, एकवचन। नोपहस्यसे जनैः = लोगों के द्वारा उपहास के पात्र न बनो, उप + √हिस् + यक् + लट्, मध्यम पुरुष एकवचन, यहाँ ‘उपहस्यसे’ क्रिया में कर्मणि यक् प्रत्यय हुआ है। अतः ‘जनाः’ कर्ता के अनुक्त होने से अनुक्त कर्ता ‘कर्तृकर्मणोस्तृतीया’ से तृतीया विभक्ति हो गई है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

6. इदमेव च पुनः पुनरभिधीयसे-विद्वांसमपि सचेतसमपि, महासत्त्वमपि, अभिजातमपि, धीरमपि, प्रयत्लवन्तमपि पुरुषं दुर्विनीता खलीकरोति लक्ष्मीरित्येता-वदभिधायोपशशाम। चन्द्रापीडस्ताभिरुपदेशवाग्भिः प्रक्षालित इव, उन्मीलित इव, स्वच्छीकृत इव, पवित्रीकृत इव, उद्भासित इव, प्रीतहृदयो स्वभवनमाजगाम।

हिन्दी-अनुवादः
यही उपदेश बार-बार दोहराया (कहा) जाता है कि विद्वान् को भी, ज्ञानवान् को भी, महाबलवान् को भी, कुलीन को भी, धैर्यवान् को भी और पुरुषार्थी मनुष्य को भी यह दुराचारिणी लक्ष्मी दुष्ट बना देती है। इतना कहकर वे (मन्त्री शुकनास) शान्त (चुप) हो गए।

राजकुमार चन्द्रापीड इन उपदेश वचनों के कारण मानो पूर्णतया धुला हुआ-सा, मानो नींद से खुली हुई आँखों वालासा, मानों स्वच्छ किया हुआ-सा, मानो पवित्र किया हुआ-सा, मानो चमकाया हुआ-सा तथा प्रसन्नहृदय होकर अपने भवन की ओर आ गया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
अभिजातम् = कुलीन को, अभि + √जन् + क्त, द्वितीया विभक्ति, एकवचन। प्रशस्तं जातं यस्य स अभिजातः तम् अभिजातम्, (बहुव्रीहि समास)। अभिधीयसे = हा जा रहा है। अभि + √धा + यक् + लट्, मध्यमपुरुष एकवचन। खलीकरोति = दुष्ट बना देती है। न खलम् अखलम्, अखलं खलं करोति इति, खल + च्चि + √कृ + लट्, प्रथमपुरुष एकवचन। उपशशाम = चुप हो गए, उप + √शम् + लिट्, प्रथमपुरुष एकवचन। प्रक्षालित इव = पूर्णतया धोए हुए। प्र + √क्षाल् + क्त्, प्रथमपुरुष एकवचन। आजगाम = आ गया। आ + / गम् + लिट्, प्रथमपुरुष एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः

शुकनासोपदेशः (शुकनास का उपदेश) Summary in Hindi

शुकनासोपदेशः पाठ परिचय

महाकवि बाणभट्ट संस्कृत के सर्वाधिक प्रतिभाशाली गद्यकार हैं। इन्होंने कान्यकुब्ज (कन्नौज) के राजा हर्षवर्धन के जीवन पर ‘हर्षचरितम्’ लिखा है। हर्षवर्द्धन का राज्यकाल 606 ई० से 648 ई० तक रहा। अतः बाणभट्ट का भी यही समय होना चाहिए। इनकी दो रचनाएँ सुप्रसिद्ध हैं-हर्षचरितम् और कादम्बरी।

‘हर्षचरितम्’ बाणभट्ट की प्रथम गद्य कृति है। स्वयं बाणभट्ट ने इसे आख्यायिका कहा है। ‘हर्षचरितम्’ में एक ऐतिहासिक तथ्य को अलंकृत शैली में बाण ने प्रस्तुत किया है। हर्ष के समकालीन युग की सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के अध्ययन के लिए ‘हर्षचरितम्’ से उत्तम अन्य कोई ग्रन्थ नहीं है। कादम्बरी संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट गद्य काव्य है। यह ‘कथा’ श्रेणी का काव्य है। चन्द्रापीड-कादम्बरी तथा पुण्डरीकमहाश्वेता के प्रणय का चित्रण करने वाली कथा ‘कादम्बरी’ के दो भाग हैं। पूर्वार्ध तथा उत्तरार्ध इसका कथानक जटिल होते हुए भी मनोरम है। इसमें कथा का प्रारम्भ राजा शूद्रक के वर्णन से होता है। शूद्रक के यहाँ चाण्डालकन्या वैशम्पायन नामक शुक को लेकर पहुंचती है। शुक सभा में आत्म-वृत्तान्त सुनाता है। इस ग्रन्थ में तीन-तीन जन्मों की घटनाएँ गुम्फित हैं।

कादम्बरी संस्कृत साहित्य का सर्वोत्तम उपन्यास है। यद्यपि इसका कथानक जटिल है। परन्तु इसके वर्णन इतने सजीव हैं कि पाठक को कथाप्रवाह के विच्छेद का आभास ही नहीं हो पाता और वह वह उन वर्णनों में ही आनन्दित होने लगता है। यह काव्य रसिकों को मस्त कर देने वाली मदिरा के समान है। इसका रसास्वादन करने वालों को भोजन भी अच्छा नहीं लगता

‘कादम्बरी रसज्ञानामाहारोऽपि न रोचते’।

शुकनासोपदेशः पाठस्य सारः
महाकवि बाणभट्ट संस्कृत साहित्य के सर्वाधिक समर्थ गद्यकार हैं। कादम्बरी उनका प्रसिद्ध गद्यकाव्य है। ‘शुकनासोपदेशः’ यह पाठ कादम्बरी से ही लिया गया है। इस अंश का नायक राजकुमार चन्द्रापीड है। जो शूरवीर तथा विनयशील है। चन्द्रापीड के पिता तारापीड युवराज चन्द्रापीड का राजतिलक कर देना चाहते हैं। सेवकों को आवश्यक सामग्री इकट्ठी करने का आदेश दे दिया गया है। राजा तारापीड का एक अनुभवी मन्त्री शुकनास है। राजतिलक से पहले युवराज चन्द्रापीड मन्त्री शुकनास का दर्शन करने के लिए जाता है। शुकनास स्नेह भाव से उसे समय के अनुकूल उपदेश करते हैं। उसी उपदेश का संक्षेप प्रस्तुत पाठ में है।

मन्त्री शुकनास चन्द्रापीड को उपदेश करते हुए कहते हैं-“पुत्र चन्द्रापीड ! यद्यपि तुम सभी जानने योग्य बातें जानते हो, तुमने सभी शास्त्रों को पढ़ा है। तुम्हें किसी उपदेश की आवश्यकता नहीं। लेकिन युवा अवस्था में स्वभाव से ही जवानी के कारण अज्ञान बढ़ जाता है। धन का नशा बुढ़ापा आने पर भी शान्त नहीं होता। राज्य सुख ऐसे ज्वर के समान होता है, जिसकी नींद खुलने में नहीं आती। जीवन में चार वस्तुएँ अनर्थ करने वाली होती हैं
(i) जन्म से ही प्रभुता होना
(ii) नया यौवन
(iii) अति सुन्दर रूप
(iv) अमानुषी शक्ति

जवानी में शास्त्र के जल से पवित्र हुई बुद्धि भी दोषपूर्ण हो जाती है। मनुष्य विषयों में फँस जाता है और उसका नाश हो जाता है। तुम्हारे जैसे कुछ विरले लोग होते हैं, जो उपदेश के अधिकारी होते हैं। तुम्हारा मन पवित्र है इसलिए

आसानी से उपदेश ग्रहण कर सकते हो। गुरु के उपदेश में बहुत गुण होते हैं। राजाओं को तो उपदेश की और भी आवश्यकता होती है। परन्तु राजा को उपदेश देने वाले भी विरले होते हैं और गुरु का उपदेश सुनने वाले राजा भी विरले होते हैं। प्रायः राजा लोग गुरु के उपदेश का तिरस्कार ही करते हैं।

अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को सबसे पहले लक्ष्मी के विषय में विचार करना चाहिए यह लक्ष्मी बड़ी अनर्थकारी होती है। बड़ी कठिनता से धन इकट्ठा होता है और इसकी सँभाल के लिए भी दुःख उठाना पड़ता है। लक्ष्मी चंचल है। यह किसी के पास स्थायी रूप में नहीं ठहरती। यह मनुष्य के परिचय, उच्च कुल, सुन्दर रूप, सदाचार, चतुराई, विद्या, धर्म आदि श्रेष्ठ गुणों की ओर कोई ध्यान नहीं देती। राजा लोग इस लक्ष्मी के कारण ही व्याकुल रहते हैं और सभी प्रकार के दुर्गुणों और दुर्व्यसनों का शिकार हो जाते हैं।

कुछ स्वार्थी लोग ऐसे भी होते हैं जो राजा के दोषों को गुण बताया करते हैं, ऐसे धूर्त लोग धन के नशे में चूर राजा को धोखा दिया करते हैं और ऐसे राजा सारी जनता के उपहास का पात्र बन जाते हैं। ऐसे घमंडी राजा वृद्धों के उपदेशों को बुढ़ापे की बड़बड़ाहट कहते हैं। उन्हें हितचिन्तकों की पहचान नहीं होती, अत: उन पर क्रोध करते हैं। चापलूसों को अपने अंग-संग रखते हैं। हे राजकुमार ! इसीलिए भयंकर मोह को पैदा करने वाली इस युवावस्था में कुटिल राजतन्त्र की बागडोर सँभालकर तुम ऐसा आचरण करना कि लोग तुम्हारी हँसी न उड़ाएँ, सज्जन निन्दा न करें, गुरु तुम्हें धिक्कार न दे, धूर्त लोग तुम्हें ठग न सकें, लक्ष्मी का मद तुम्हें डावाँडोल न कर दे, विषयसुख तुम्हारे जीवन को नरक न बना दें।”

मन्त्री शुकनास के इस उपदेश को सुनकर चन्द्रापीड का चित्त धुल-सा गया था। उसकी आँखें ज्ञान के प्रकाश से खुल गई थी। उसका हृदय पवित्रता के प्रकाश से भर गया था। इस सारगर्भित उपदेश को पाकर चन्द्रापीड अत्यन्त प्रसन्न एवं सन्तुष्ट होकर राजभवन की ओर लौट गया। शुकनास का यह उपदेश जवानी की दहलीज़ पर पाँव रखने वाले हर नवयुवक के लिए ग्रहण करने योग्य है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 5 शुकनासोपदेशः Read More »

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

HBSE 12th Class Sanskrit कर्मगौरवम् Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तरत
(क) अयं पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलित: ?
(ख) अकर्मणः किं ज्यायः ?
(ग) जनकादयः केन सिद्धिम् आस्थिताः ?
(घ) लोकः कम् अनुवर्तते ?
(ङ) बुद्धियुक्तः अस्मिन् संसारे के जहाति ?
(च) केषाम् अनारम्भात् पुरुषः नैष्कर्म्यं न प्राप्नोति ?
उत्तरम्:
(क) भगवद्गीता’ ग्रन्थात् सङ्कलितः।
(ख) अकर्मणः कर्म ज्यायः।
(ग) जनकादयः कर्मणा एव सिद्धिम् आस्थिताः ।
(घ) यद् यद् आचरति श्रेष्ठ: लोकः तत् अनुवर्तते।
(ङ) बुद्धियुक्तः अस्मिन् संसारे सुकृतदुष्कृते जहाति।
(च) कर्मणाम् अनारम्भात् पुरुषः नैष्कर्म्यं न प्राप्नोति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

2. नियतं कुरु कर्म त्वं …. प्रसिद्ध्येदकर्मणः अस्य श्लोकस्य आशयं हिन्दीभाषया स्पष्टीकुरुत।
उत्तरम्:
द्वितीय श्लोक के सरलार्थ एवं भावार्थ का उपयोग करें।

3. ‘यद्यदाचरति ……. लोकस्तदनुवर्तते’ अस्य श्लोकस्य अन्वयं लिखत।
उत्तरम्:
सप्तम श्लोक का अन्वय देखें।

4. अधोलिखितानां शब्दानां विलोमान् पाठात् चित्वा लिखतयथा
वशः – अवशः
उत्तरसहितम्
(क) बुद्धिहीनः – बुद्धियुक्तः
(ख) दुष्कृतम् – सुकृतम्
(ग) अकौशलम् – कौशलम्
(घ) न्यूनः – ज्यायः
(ङ) कर्मणः – अकर्मणः
(च) दुर्गुणैः — गुणैः
(छ) कदाचित् – सततम्
(ज) निकृष्टः – श्रेष्ठः

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

5. अधोलिखितेषु पदेषु सन्धिच्छेदं कुरुत
जहातीह, ह्यकर्मणः, शरीरयात्रापि, पुरुषोऽश्नुते, तिष्ठत्यकर्मकृत्, प्रकृतिजैर्गुणैः, कर्मणैव, लोकस्तदनुवर्तते, जनयेदज्ञानाम्
(क) जहातीह = जहाति + इह
(ख) ह्यकर्मणः = हि + अकर्मणः
(ग) शरीरयात्रापि = शरीरयात्रा + अपि
(घ) पुरुषोऽश्नुते = पुरुषः + अश्नुते
(ङ) तिष्ठत्यकर्मकृत् = तिष्ठति + अकर्मकृत्
(च) प्रकृतिजैर्गुणैः = प्रकृतिजैः + गुणैः
(छ) कर्मणैव = कर्मणा + एव
(ज) लोकस्तदनुवर्तते = लोकः + तत् + अनुवर्तते
(झ) जनयेदज्ञानाम् = जनयेत् + अज्ञानाम्

6. अधोलिखितक्रियापदानां लकारपुरुषवचननिर्देशं कुरुत
जहाति, युज्यस्व, कुरु, अश्नुते, समधिगच्छति, तिष्ठति, आप्नोति, अनुवर्तते, जनयेत्, जोषयेत्। उत्तरम्
(i) जहाति – (√हा) लट्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
(ii) युज्यस्व – (√युज्) लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
(iii) कुरु – (√कृ) लोट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
(iv) अश्नुते – (√अश्) लट्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
(v) समधिगच्छति (सम् + अधि√गम्) लट्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
(vi) तिष्ठति – (√स्था) लट्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
(vii) आप्नोति – (√आप) लट्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
(viii) अनुवर्तते – (अनु √वृत्) लट्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
(ix) जनयेत् – (√जन्) विधिलिङ्, प्रथम पुरुष, एकवचन।
(x) जोषयेत् । – (√जुष्) विधिलिङ् , प्रथम पुरुष, एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

7. अधोलिखतवाक्येषु रेखाङ्कितपदानां विभक्तीनां निर्देशं कुरुत
(क) योगः कर्मसु कौशलम्।
(ख) जीवने नियतं कर्म कुरु।
(ग) कर्मणा एव जनकादयः संसिद्धिम् आस्थिताः ।
(घ) अकर्मणः कर्म ज्यायः ।
(ङ) कर्मणाम् अनारम्भात् पुरुषः नैष्कर्म्यं न अश्नुते ।
उत्तरम्:
(क) कर्मसु – कर्मन्, षष्ठी-विभक्तिः , एकवचनम्।
(ख) कर्म – कर्मन्, द्वितीया-विभक्तिः, एकवचनम्।
(ग) कर्मणा – कर्मन्, तृतीया-विभक्तिः , एकवचनम्।
(घ) अकर्मणः – अकर्मन्, पञ्चमी-विभक्तिः , एकवचनम्।
(ङ) कर्मणाम् – कर्मन्, षष्ठी-विभक्तिः, एकवचनम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

8. प्रदत्तमञ्जूषायाः समुचितपदानां चयनं कृत्वा अधोदत्तशब्दानां प्रत्येकपदस्य त्रीणि समानार्थकपदानि लिखन्तु
अनारतम्, मनीषा, गात्रम्, दुष्कर्म, प्राज्ञः, कलुषम्, शेमुषी, अविरतम्, कोविदः, कायः, मतिः, पातकम् , देहः, मनीषी, अश्रान्तम्।
उत्तरसहितम्

(क) विद्वान्प्राज्ञ:कोविद:मनीषी
(ख) शरीरम्गात्रम्काय:देह:
(ग) बुद्धि:मनीषाशेमुषीमति:
(घ) सततम्अनारतम्अविरतम्अश्रान्तम्
(ङ) दुष्कृतम्दुष्कर्मकलुषम्पातकम्

9. कर्म आश्रित्य संस्कभाषायां पञ्च वाक्यानि लिखत
उत्तरम्
(i) अकर्मणः कर्म ज्यायः भवति।
(ii) अकर्मणः शरीरयात्रा अपि न सम्भवति।
(iii) अतः असक्तः सततं कर्तव्यं कर्म समाचरेत।
(iv) जनकादयः कर्मणा एव संसिद्धिम् आस्थिताः।
(v) योगः कर्मसु कौशलम्।

10. पाठे प्रयुक्तस्य छन्दसः नाम लिखत
उत्तरम्
‘अनुष्टुप्’ छन्दः।

11. जनः कीदृशैः गुणैः कार्यं करोति ? अधोलिखितं श्लोकमाधृत्य लिखत
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
उत्तरम्
जनः प्रकृतिजैः गुणैः कार्यं करोति। अतः कश्चित् अपि क्षणमपि अकर्मकृत् न तिष्ठति।

योग्यताविस्तारः

अधोलिखितानां सूक्तीनामध्ययनं कृत्वा प्रस्तुतपाठेन भावसाम्यम् अवधत्त
(1) गच्छन् पिपीलको याति योजनानां शतान्यपि।
अगच्छन्वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति॥

(2) उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रवशन्ति मुखे मृगाः॥ पज्चतन्त्रम् / मित्रसम्प्राप्ति: – 129

(3) कर्मणा जायते सर्वं, कर्मैव गतिसाधनम्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन, साध कर्म समाचरेत्॥ विष्णुपुराण:- 1/18/32

(4) चरन्वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुमुदम्बरम्।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं, यो न तन्द्रयते चरन्॥ ऐतरेयब्राहमणम् – 33.3.5

(5) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥ चाणक्यनीति: – 12/22

(6) दुष्कराण्यपि कार्याणि, सिध्यन्ति प्रोद्यमेन वै।
शिलापि तनुतां याति, प्रपातेनार्णसो मुहुः॥ बुद्धचरितम् – 26/63

(7) कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति, न कर्म लिप्यते नरे॥ यजुर्वेद: 40 / 27

अधोनिर्मिततालिकां दृष्ट्वा समस्तपदैः सह विग्रहान् मेलयत
HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम् img-2
विग्रहा: – उत्तरम्
(1) बुद्ध्या युक्त: (तृतीया तत्पुरुष) – बुद्धियुक्तः
(2) न वशः (नज्ञ् तत्पुरुष समास) – अवशः
(3) बुद्धै: भेदम् (षष्ठी तत्पुरुष समास) – बुद्धिभेदम्
(4) सर्वाणि कर्माणि (कर्मधारय समास) – सर्वकर्माणि
(5) कर्मणि रतः (सप्तमी तत्पुरुष समास) – कर्मरतः
(6) (अ) न कर्मण: (नज् तत्पुरुष) – अकर्मण:
(ब) न आरम्भात् (नज् तत्पुरुष) – अनारमभात्
(7) कर्मफलस्य हेतु: (षष्ठी तत्पुरुष समास) – कर्मफलहेतु:
(8) शरीरस्य यात्रा (षष्ठी तत्पुरुष समास) – शरीरयात्रा
(9) लोकाय संग्रहम् (चतुर्थी तत्पुरुष समास) – लोकसंग्रहम्
(10) (अ) न सक्तः (नञ् तत्पुरुष) – असक्तः
(ब) न ज्ञानानाम् (नञ् तत्पुरुष) – अज्ञानानाम्
(11) न चरन् (नञ् तत्पुरुष) – अचरन्
(12) कर्मसु सङ्गिनाम् (सप्तमी तत्पुरुष) – कर्मसङ्गिनाम्
(13) सुकृतं दृष्कृतं च (द्वन्द्व समास) – सुकृतदुष्कृते।

अधोलिखितादर्शवाक्यानि सम्बद्धसंस्थाभिः योजयत
आदर्शवाक्यम् – संस्था
(क) सत्यमेव जयते – राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्
(ख) विद्ययाऽमृतमश्नुते – भारतसर्वकारः
(ग) असतो मा सद्गमय – कतिपयविद्यालयेषु
(घ) सा विद्या या विमुक्तये – केन्द्रीयमाध्यमिक शिक्षा परिषद्
(ङ) योगः कर्मसु कौशलम् – राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्
(च) गुरुः गुरुतमो धामः – भारतीय प्रशासनिक सेवा अकादमी, मसूरी
(छ) तत्त्वं पूषन्नपावृणु – डाकतारविभागः
(ज) अहर्निशं सेवामहे – केन्द्रीय विद्यालय संगठन
(झ) श्रम एव जयते – भारतस्य सर्वोच्च न्यायालयः
(ञ) यतो धर्मस्ततो जयः

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

श्रममन्त्रालयः

श्रीमद्भगवद्गीता श्रीमद्भगवद्गीता महाभारतस्य भीष्मपर्वणि विद्यते । अत्र सप्तशतश्लोकाः अष्टादशाध्यायेषु उपनिबद्धाः सन्ति। युद्धभूमौ विषादग्रस्तार्जुनाय निष्कामकर्मणः उपदेशं प्रयच्छता भगवता श्रीकृष्णेन अत्र ज्ञान-भक्ति-कर्मणां समन्वयः प्रस्तुतः। ।

पूर्ववर्तिनो अनेके मनीषिण: जीवने उदात्तगुणानां विकासार्थं गीताशास्त्रेण प्रेरणां प्राप्तवन्तः । तेषु विद्वत्सु लोकमान्यतिलक: महर्षि अरविन्दः, महात्मागान्धी, विनोबाभावे इत्यादयः प्रमुखाः सन्ति। एतैः विद्धद्भिः गीताशास्त्रस्य स्वभावाभिव्यक्तिस्वरूपाः व्याख्या: विलिखिताः। गीताशास्त्रस्य ज्ञान-भक्ति-कर्मयोगान् स्वजीवने अवतारयन्तः उन्नतादर्शान् उदात्तजीवनमूल्यान् एते मनीषिणः चरितार्थयन्ति स्म।

श्रीमद्भगवद्गीतायाः केचन अन्येऽपि श्लोका उद्धरणीयाः। तद्यथा
अनाश्रित्य कर्मफलं कार्यं कर्म करोतिः यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥ 6.1
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥ 2.38
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥ 4.22
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ।। 6.29
अनेकैः कविभिः गीतायाः महत्त्वं प्रतिपादितम्। तन्महत्त्वं यत्र-तत्र अध्येतव्यम्। उदाहरणार्थम्
मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने।
सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम्॥
अधोलिखितानां पदानामाशयोऽन्वेष्टव्यः
लोकसंग्रहम्, नैष्कर्म्यम्, प्रकृतिजः, सन्न्यसनम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

HBSE 9th Class Sanskrit कर्मगौरवम् Important Questions and Answers

I. समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) अकर्मणः किं ज्यायः
(A) कर्म
(B) विकर्म
(C) सत्कर्म
(D) कुकर्म।
उत्तराणि
(A) कर्म

(ii) जनकादयः केन सिद्धिम् आस्थिताः?
(A) अकर्मणा
(B) विकर्मणा
(C) कर्मणा
(D) सत्कर्मणा।
उत्तराणि
(C) कर्मणा

(iii) बुद्धियुक्तः अस्मिन् संसारे के जहाति?
(A) सुकृते
(B) दुष्कृते
(C) अकर्मणी
(D) सुकृतदुष्कृते।
उत्तराणि
(D) सुकृतदुष्कृते

(iv) केषाम् अनारम्भात् पुरुषः नैष्कर्म्यं न प्राप्नोति?
(A) निष्कर्मताम्
(B) कर्मणाम
(C) निष्कर्मणाम्
(D) स्वार्थकर्मणाम्।
उत्तराणि
(B) कर्मणाम्

(v) कैः गुणैः सर्वः अवशः कर्म कार्यते?
(A) प्रकृतिजैः
(B) पूर्वसञ्चितैः
(C) प्रारब्धैः
(D) सुसंस्कारैः।
उत्तराणि
(A) प्रकृतिजैः

II. रेखाकितपदम् आधृत्य प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) अस्माकम् कर्मणि अधिकारः वर्तते।
(A) केषाम्
(B) कस्य
(C) कस्मिन्
(D) कस्याः ।
उत्तराणि:
(C) कस्मिन

(ii) अकर्मणः कर्म ज्यायः।
(A) केषाम्
(B) कस्मात्
(C) कुत्र
(D) केन।
उत्तराणि:
(B) कस्मात्

(iii) जनकादयः कर्मणा एव सिद्धिम् आस्थिताः।
(A) केन
(B) कस्मात्
(C) कस्यै
(D) कस्मै।
उत्तराणि:
(A) केन

(iv) योगः कर्मसु कौशलम्।
(A) कः
(B) किम्
(C) केषु
(D) कम्।
उत्तराणि:
(C) केषु

(v) जीवने नियतं कर्म कुरु।
(A) कीदृशम्
(B) किम्
(C) कुत्र
(D) कुतः।
उत्तराणि:
(A) कीदृशम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

कर्मगौरवम् पाठ्यांशः
1. बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥1॥

अन्वयः – बुद्धियुक्तः सुकृतदुष्कृते उभे इह जहाति, तस्मात् योगाय युज्यस्व, कर्मसु कौशलं योगः।

सरलार्थ: – हे अर्जुन ! बुद्धियुक्त अर्थात् समत्व बुद्धि को प्राप्त मनुष्य, इस संसार में पुण्य और पाप दोनों प्रकार के कर्मों में आसक्ति को छोड़ देता है। इसलिए तू समत्व योग के लिए प्रयत्न कर। कर्मों में कुशलता का नाम ही योग (अनासक्ति-निष्काम योग) है।

भावार्थ: – जिसे अनासक्ति योग की बुद्धि प्राप्त हो गई, वह पुण्य के बाधक दुष्कृत और सुकृत इन दोनों को छोड़ देता है। शास्त्रीय गुत्थी को सुलझाने का नाम योग नहीं है, किन्तु जीवन में लोकहित के लिए, कौन-सा कर्म त्याज्य है, तथा कौन-सा स्वीकार्य है-इस धर्म के तत्त्व निरूपण में कुशलता का नाम ही योग है। यह बुद्धियोग अनासक्ति के बिना प्राप्त नहीं हो सकता।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च बुद्धियुक्तः = समत्वबुद्धि से युक्त पुरुष। सुकृत-दुष्कृते = पुण्य और पाप। उभे = दोनों को। इह = इस लोक में। जहाति = छोड़ देता है, अर्थात् उनमें लिप्त नहीं होता। हा + लट्, प्रथम पुरुष एकवचन। तस्मात् = इसलिए। योगाय = समत्वबुद्धि योग के लिए। युज्यस्व = प्रयत्न कर। युज् (आत्मनेपद) + लोट्, मध्यम पुरुष, एकवचन । कर्मसु = कर्मो में। कौशलम् = चतुरता है, अर्थात् कर्मबन्धन से छूटने का मार्ग है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

2. नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥2॥

अन्वयः-त्वं नियतं कर्म कुरु; हि अकर्मणः कर्म ज्यायः। अकर्मणः ते शरीरयात्रा अपि च न प्रसिद्ध्येत्।

सरलार्थ: – हे अर्जुन ! तुम अपने क्षत्रिय धर्म के अनुसार क्षत्रियोचित कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। बिना कर्म किए हुए तुम्हारे लिए, शरीर निर्वाह (लौकिक-व्यवहार) भी सिद्ध नहीं होगा।

भावार्थ: – भाव यह है कि तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। शस्त्र छोड़कर, निठल्ला होकर बैठने से काम नहीं चलेगा। तुम्हारे लिए युद्ध करना ही श्रेष्ठ है। .
शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च नियतम् = निश्चित, क्षत्रिय के लिए उचित। कुरु = करो, कृ + लोट, मध्यम पुरुष, एकवचन। ज्यायः = प्रशस्य + ईयसुन्, नपुं०; प्रथमा एकवचन = श्रेष्ठ। हि अकर्मणः = क्योंकि कर्म न करने से। शरीरयात्रा अपि = लौकिक व्यवहार भी, शरीर निर्वाह भी। प्रसिद्ध्येदकर्मणः = प्रसिद्ध्येत् + अकर्मणः, कर्म न करने से सिद्ध नहीं होगा।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

3. न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च सन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥3॥

अन्वयः-पुरुषः, न कर्मणाम् अनारम्भात् नैष्कर्म्यम् अश्नुते, न च संन्यसनात् एव सिद्धिम् समधिगच्छति।

सरलार्थः- मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किए बिना निष्कर्मता को प्राप्त करता है, और न कर्मों को त्यागने मात्र से ही भगवत् साक्षात्कार रूप सफलता को प्राप्त करता है।

भावार्थ:-भाव यह है कि कर्मों का बिल्कुल ही न करना अथवा मध्य में ही छोड़ देना, दोनों ही स्थितियाँ उचित नहीं हैं; अपितु कर्तव्य कर्म अनासक्ति भाव से अवश्य करना चाहिए।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च अनारम्भात् = आरम्भ किए बिना, आरम्भ न करने से। नैष्कर्म्यम् = निष्कर्मता को।अश्नुते = प्राप्त करता है। अश् + लट्, प्रथम पुरुष, एकवचन । संन्यसनात् = छोड़ देने से। सिद्धिम् = सफलता को। समधिगच्छति = प्राप्त करता है। सम् + अधि + गम् + लट्, प्रथम पुरुष, एकवचन।।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

4. न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ 4 ॥

अन्वयः-हि कश्चित् जातु क्षणम् अपि अकर्मकृत् न तिष्ठति, हि सर्वः प्रकृतिजैः गुणैः अवशः कर्म कार्यते।

सरलार्थ:-हे अर्जुन ! कोई भी पुरुष कभी भी थोड़ी देर के लिए भी, बिना कर्म किए नहीं रहता है। निःसंदेह सब लोग प्रकृति से उत्पन्न हुए (स्वभाव अनुसार) गुणों द्वारा विवश होकर कर्म करते हैं।

भावार्थ:-कर्म करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। जब मनुष्य शरीर से कर्म नहीं करता, निठल्ला पड़ा रहता है, तब भी वह मन से तो कार्य करता ही है। अत: पूर्ण चेतना से निष्काम कर्म ही करना चाहिए। निठल्ले कभी नहीं रहना चाहिए।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
हि = क्योंकि, निःसन्देह, निश्चय से। कश्चित् = कोई भी। जातु = कभी भी। क्षणम् = थोड़ी देर के लिए। अकर्मकृत् = बिना कर्म किए। सर्वः = सब लोग। अवशः = पराधीन होकर । कार्यते = करते हैं-कराया जाता है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

5. तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥5॥

अन्वयः-तस्मात् असक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर, हि असक्तः पुरुषः कर्म आचरन् परम् आप्नोति।

सरलार्थ:-इसलिए, हे अर्जुन ! तुम अनासक्त होकर निरन्तर अपने कर्तव्य कर्म का अच्छी प्रकार भली-भाँति आचरण करो। क्योंकि अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ, परमात्मा को प्राप्त करता है।

भावार्थ:-निष्काम कर्मयोग ही परमात्मा की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
असक्तः = अनासक्त होकर, न सक्तः। सङ्ग् + क्त, न सक्तः असक्त । नञ् तत्पुरुष । सततम् = निरन्तर, लगातार। कार्यम् = कर्तव्य, स्वधर्म रूप। समाचर = भली-भाँति करो। सम् + आ + /चर्, लोट् मध्यम-पुरुष, एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

6. कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोक सङ्ग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥6॥

अन्वयः-जनक-आदयः कर्मणा एव संसिद्धिम् आस्थिताः, हि लोकसङ्ग्रहम् संपश्यन् अपि कर्तुम् एव अर्हसि।

सरलार्थः-राजा जनक आदि राजर्षि भी (अनासक्त होकर) कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं। निश्चय ही तुम भी लोक कल्याण को देखते हुए ही कर्म करने के योग्य हो।

भावार्थ:-जैसे जनक आदि ने अनासक्ति भाव से अपने कर्तव्यों का पालन किया, ऐसे ही तुम्हें भी आचरण करना चाहिए । इससे तुम्हें सफलता प्राप्त होगी।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
संसिद्धिम् = परम सफलता को। आस्थिताः = प्राप्त हुए थे। आ + स्था + क्त पुंल्लिंग प्रथमा, बहुवचन। लोकसङ्ग्रहम् = लोक कल्याण को। अर्हसि = योग्य हो। अर्ह + लट् प्रथम पुरुष, एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

7. यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥7॥

अन्वयः-श्रेष्ठ: यत् आचरति, इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति), सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते।

सरलार्थ:-श्रेष्ठ व्यक्ति जो जो आचरण करता है। दूसरा व्यक्ति भी उस-उस ही कर्म को करता है, अर्थात् वैसा ही अनुसरण दूसरे लोग भी करते हैं। वह व्यक्ति, जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसके अनुसार आचरण करते हैं।

भावार्थ:-भाव यह है कि प्रजाजन, श्रेष्ठ व्यक्तियों के आचरण को आदर्श मानकर, उसके अनुसार ही व्यवहार करते हैं। अत: तुम्हें भी श्रेष्ठ लोगों के आचरण का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च यत् यत् = जो जो कर्म। यत् शब्द नपुं० द्वितीया, एकवचन। आचरति = आचरण करता है। आ + √चर् + लट् प्रथम पुरुष, एकवचन। प्रमाणम् = प्रमाण को, आदर्श को। इतरः = अन्य लोग, सब लोग । अनुवर्तते = अनुसरण करता है। अनु + √वृत् + लट् प्रथम पुरुष + एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

8. न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥8॥

अन्वयः-विद्वान् कर्मसङगिनाम् अज्ञानां बुद्धिभेदं न जनयेत्, (किन्तु) युक्तः सर्वकर्माणि समाचरन् जोषयेत्।

सरलार्थ:-विद्वान् मनुष्य को चाहिए कि वह कर्म में आसक्ति रखने वाले अज्ञानी मनुष्यों में, कर्मों के प्रति अश्रद्धा . उत्पन्न न करे किन्तु स्वयं धर्मरूप कर्म में स्थित होकर सब कर्तव्य कर्मों का पालन भली-भाँति करता हुआ, दूसरों से भी वैसा ही कराए।

भावार्थ:-भाव यह है कि मनुष्य को, कर्तव्य कर्म करके समाज के प्रति एक उदाहरण बनना चाहिए। वह स्वयं भी विधिपूर्वक कर्तव्य कर्म करे तथा दूसरों को भी वैसे ही कर्म में प्रवृत्त करे।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
बुद्धिभेदम् = कर्तव्यबोध में अश्रद्धा। विद्वान् = ज्ञानवान् पुरुष। कर्मसङ्गिनाम् = कर्म में आसक्त लोगों के। अज्ञानाम् = अज्ञानियों के। युक्तः = अपने कर्तव्य कर्म में स्थित, निष्काम कर्म में लगा हुआ। समाचरन् = भली-भाँति आचरण करता हुआ। जोषयेत् = कराए, करवाना चाहिए, लगाना चाहिए। /जुष् + णिच् + विधिलिङ् प्रथम पुरुष, एकवचन।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम्

कर्मगौरवम् (कर्म का महत्व) Summary in Hindi

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम् img-1

कर्मगौरवम् पाठ परिचय

‘कर्मयोगः’ यह पाठ ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के दूसरे एवं तीसरे अध्याय से संकलित है। श्रीमद्भगवद्गीता विश्व का सुप्रसिद्ध ग्रन्थ है। ‘गीता’ महाभारत के ‘भीष्मपर्व’ से उद्धृत है। इसमें 18 अध्याय हैं, 700 श्लोक हैं। तथा 18 प्रकार के योग का वर्णन है। समस्त योगों में कर्मयोग श्रेष्ठ है। मनुष्य कर्म करने के लिए संसार में आया है। किन्तु निष्काम कर्म करना ही मनुष्य को बन्धन से मुक्त करता है। सभी प्रकार की कामनाओं और फल की इच्छा से रहित कर्म ही निष्काम कर्म कहलाता है। इसी को ‘अनासक्ति’ कहा गया है। प्राणिमात्र का अधिकार केवल कर्म करने में निहित है, फल में नहीं। गीता के दूसरे-तीसरे अध्याय में इसी कर्मयोग की विस्तृत चर्चा है। .

श्रीकृष्ण ने गीता में, अर्जुन को इसी निष्काम कर्मयोग की शिक्षा प्रदान की है। श्रीकृष्ण ने युद्धक्षेत्र में, विषाद में पड़े हुए अर्जुन को स्व-क्षत्रियोचित कर्तव्य का उपदेश देकर धर्मयुद्ध के लिए उद्यत किया था। अर्जुन के माध्यम से मानवमात्र को निष्काम कर्म का उपदेश दिया गया है।

‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ यह गीता का संदेश है।

कर्मगौरवम् पाठस्य सारः
श्री कृष्ण अर्जुन को कर्म का रहस्य समझाते हुए कहते हैं कि कर्म करने तक ही मनुष्य का अधिकार है अर्थात् कर्म को करने-न करने या उलट करने की स्वतन्त्रता है। फल पाने में ऐसी स्वतन्त्रता नहीं क्योंकि शुभ-अशुभ जैसा भी कर्म किया है, उसका फल तो ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन होकर अवश्य ही भोगना पड़ता है। कर्तव्य बुद्धि से आसक्ति रहित होकर कर्म में कुशलता प्राप्त करने का नाम ही निष्काम कर्मयोग है।

जो जीवन में शास्त्र-प्रोक्त कर्म हैं, उन्हें छोड़ना नहीं हैं, क्योंकि कर्म करना, न कर्म करने की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है। बिना कर्म किए तो शरीर यात्रा भी नहीं हो सकती।

मनुष्य प्रकृति के अधीन है, अत: वह कर्म किए बिना क्षणभर भी नहीं रह सकता। अनासक्ति भावना से कर्म करने वाला पुरुष ही भगवान् को प्राप्त करता है।

जनक आदि महापुरुष इस कर्तव्य-कर्म करने से ही जीवन में सफलता को प्राप्त हुए हैं। हे अर्जुन! तुम्हें भी उन्हीं के समान, कर्तव्य कर्म निभाना चाहिए और अन्यायियों से युद्ध करना चाहिए। क्योंकि जैसे आचरण श्रेष्ठ लोग करते हैं, वैसे ही आचरण उन्हें देखकर सामान्य लोग भी करते हैं।

अत: पाप-पुण्य की चिन्ता किए बिना कर्म में आसक्त लोगों का तुम्हें आचरण नहीं करना चाहिए। हे अर्जुन ! फलासक्ति छोड़कर नि:संग भाव से तुम्हें सर्वहित कार्य में लगना चाहिए।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 4 कर्मगौरवम् Read More »

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

HBSE 12th Class Sanskrit बालकौतुकम् Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तराणि लिखत
(क) ‘उत्तररामचरितम्’ इति नाटकस्य रचयिता कः ?
(ख) नेपथ्ये कोलाहलं श्रुत्वा जनक: किं कथयति ?
(ग) लवः कौशल्यां रामभद्रं च कथमनुसरति ?
(घ) बटवः अश्वं कथं वर्णयन्ति ?
(ङ) लवः कथं जानाति यत् अयम् आश्वमेधिकः अश्वः?
(च) राजपुरुषस्य तीक्ष्णतरा आयुधश्रेण्यः किं न सहन्ते ?
उत्तरम्:
(क) भवभूति: ‘उत्तररामचरितम्’ इति नाटकस्य रचयिता।
(ख) नेपथ्ये कोलाहलं श्रुत्वा जनकः कथयति-“शिष्टानध्यायः इति क्रीडतां वटूनां कोलाहलः”।
(ग) लवः कौशल्यां रामभद्रं च देहबन्धनेन स्वरेण च अनुसरति।
(घ) बटवः अश्वं भूतविशेषं वर्णयन्ति।
(ङ) लवः अश्वमेध-काण्डेन जानाति यत् अयम् आश्वमेधिकः अश्वः ।
(च) राजपुरुषस्य तीक्ष्णतराः आयुधश्रेण्यः दृप्तां वाचं न सहन्ते।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

2. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) अश्वमेध इति नाम क्षत्रियाणां महान् उत्कर्षनिकषः।
(ख) हे बटवः! लोष्ठैः अभिघ्नन्तः उपनयत एनम् अश्वम्।
(ग) रामभद्रस्य एषः दारकः अस्माकं लोचने शीतलयति।
(घ) उत्पथैः मम मनः पारिप्लवं धावति।
(ङ) अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः स चपल: दृश्यते ।
(च) विस्फारितशरासनाः आयुधश्रेण्यः कुमारं तर्जयन्ति।
(छ) निपुणं निरूप्यमाणः लवः मुखचन्द्रेण सीतया संवदत्येव ।
उत्तरम्:
(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) अश्वमेध इति नाम केषां महान् उत्कर्ष-निकषः ?
(ख) हे बटवः ! कथं अभिघ्नन्त: उपनयत एनम् अश्वम् ?
(ग) रामभद्रस्य एष दारकः अस्माकं किं शीतलयति ?
(घ) उत्पथैः कस्य मनः पारिप्लवं धावति ?
(ङ) अतिजवेन दूरम् अतिक्रान्तः सः कथं दृश्यते ?
(च) विस्फारित-शरासनाः आयुधश्रेण्यः कं तर्जयन्ति ?
(छ) निपुणं निरुप्यमाणः लवः मुखचन्द्रेण कया संवदति एव ?

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

3. सप्रसङ्ग-व्याख्यां कुरुत
(क) सर्वक्षत्रपरिभावी महान् उत्कर्षनिकषः।
(ख) किं व्याख्यानैव्रजति स पुनर्दूरमेह्यहि याम।
(ग) सुलभसौख्यमिदानी बालत्वं भवति
(घ) झटिति कुरुते दृष्टः कोऽयं दृशोरमृताञ्जनम् ?
उत्तरम्:
(क) सर्वक्षत्रपरिभावी महान् उत्कर्षनिकषः।
प्रसंग:-प्रस्तुत पंक्ति ‘लवकौतुकम्’ पाठ से संकलित है। वाल्मीकि आश्रम में ‘लव’ के साथ ब्रह्मचारी-सहपाठी खेल रहे हैं। इसी समय कुछ बटुगण आकर, लव को आश्रम के निकट अश्वमेध घोड़े की सूचना देते हैं। यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा रक्षकों से घिरा हुआ है। लव उस अश्वमेध यज्ञ के महत्त्व को अपने मन में विचार करता हुआ कहता है

व्याख्या-यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा है । यह क्षत्रियों की शक्ति का सूचक होता है। क्षत्रिय राजा, अपने बलवान् शत्रु राजा पर अपनी विजय की धाक जमाने के लिए इसे छोड़ता है। वास्तव में यह घोड़ा सभी शत्रुओं पर प्रभाव डालने वाले उत्कर्ष श्रेष्ठपन का सूचक होता है।

(ख) किं व्याख्यानैव्रजति स पुन(रमेयेहि यामः।
प्रसंग:-प्रस्तुत पंक्ति ‘लवकौतुकम्’ पाठ से संकलित है। वाल्मीकि आश्रम के निकट राम के अश्वमेध का घोड़ा घूमते-घूमते आ गया है। वहाँ खेलते हुए ब्रह्मचारी उस विशेष प्राणी को देखकर भागते हुए आश्रम में आते हैं और ‘लव’ के सामने उसका वर्णन करते हैं

व्याख्या-यह प्राणिविशेष लम्बी पूँछ को बारबार हिला रहा है। घास खाता है, लीद करता है, लम्बी गर्दन है, चार खुरों वाला है। अधिक कहने का समय नहीं है, यह जन्तु तेजी से आश्रम से दूर भागा जा रहा है, चलो आओ हम भी उसे देखते हैं। भाव यह है कि उसे बताने की अपेक्षा उसे देखना अधिक आनन्ददायक होगा।

(ग) सुलभं सौख्यम् इदानीं बालत्वं भवति।
प्रसंग:-प्रस्तुत पंक्ति लवकौतुकम्’ पाठ से उद्धृत है। वाल्मीकि आश्रम में अतिथि के रूप में जनक, कौशल्या और अरुन्धती आए हुए हैं। उनके आने से आश्रम में अवकाश कर दिया गया है और सभी छात्रगण खेलते हुए शोर मचा रहे हैं। इस शोर को सुनकर, कौशल्या जनक को बता रही हैं

व्याख्या-बाल्यकाल में सुख के साधन सुलभ होते हैं। बच्चों को मजा लेने के लिए किसी खिलौने आदि की आवश्यकता नहीं होती। वे तो साधारण से खेल-कूद और हँसी-मजाक द्वारा ही सुख प्राप्त कर लेते हैं। सुख प्राप्ति के लिए उन्हें बड़े बहुमूल्य क्रीडा-साधनों की आवश्यकता नहीं होती। ये ब्रह्मचारी अपने बचपन का आनन्द ले रहे हैं।

(घ) झटिति कुरुते दृष्टः कोऽयं दृशोः अमृताञ्जनम्।
प्रसंग:-प्रस्तुत पंक्ति ‘लवकौतुकम्’ पाठ से संकलित है। वाल्मीकि आश्रम में, राम के पुत्र ‘लव’ को देखकर, अरुन्धती (वशिष्ठ की पत्नी) अत्यन्त प्रभावित है। वह उसके रूप सौन्दर्य को देखकर, राम के बचपन को स्मरण करती हुई जनक तथा कौशल्या से कहती है

व्याख्या-यह बालक मेरे हृदय में अत्यन्त स्नेहभाव पैदा कर रहा है। इसे देखकर मुझे ऐसा लग रहा है, जैसे कि बचपन के राम को देख रही हूँ। यह प्रिय बालक देखने पर मुझे इतना आकृष्ट कर रहा है, मानो मेरी आँखों में अमृत का अंजन लगा दिया है। इसे देखकर मुझे अत्यन्त तृप्ति मिल रही है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

4. अधोलिखितानि कथनानि कः कं कथयति ?
उत्तरसहितम्

कथनानिकःकं प्रति
(क) अस्ति ते माता ? स्मरसि वा तातम् ?कौसल्यालवम्
(ख) दिष्ट्या न केवलम् उत्सड्ग: मनोरथोऽपि मे पूरितः ।अरुन्धतीलवम्
(ग) वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावस्मिन्नभिव्यज्यते।जनक:कौशल्याम्
(घ) सोऽयमधुनाइस्माभि: स्वयं प्रत्यक्षीकृतः।बटल:लवम्
(ङ) इतोडन्यतो भूत्वा प्रेक्षामहे तावत् पलायमानं दीर्घायुषम्।कौशल्याअरुन्तीम्
(च) धिक् चपल ! किमुक्तवानसि ?राजपुरुष:लवम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

5. अधोलिखितवाक्यानां रिक्तस्थानपूर्ति निर्देशानुसारं कुरुत
(क) क एषः ……. रामभद्रस्य मुग्धललितैरङ्गैरिकोऽस्माकं लोचने ……. । (क्रियापदेन)
(ख) एष …………. मे सम्मोहनस्थिरमपि मनः हरति। (कर्तृपदेन)
(ग) …………….! इतोऽपि तावदेहि ! (सम्बोधनेन)
(घ) ‘अश्वोऽश्व’ ………… नाम पशुसमाम्नाये सामामिके च पठ्यते। (अव्ययेन)
(ङ) युष्माभिरपि तत्काण्डं ….. ……………….. एव हि। (कृदन्तपदेन)
(च) एष वो लवस्य …………….. प्रणामपर्यायः । (करणपदेन)
उत्तरम्:
(क) क एषः अनुसरति रामभद्रस्य मुग्धललितैरङ्गैर्दारकोऽस्माकं लोचने शीतलयति।
(ख) एष बलवान् मे सम्मोहनस्थिरमपि मनः हरति।
(ग) जात! इतोऽपि तावदेहि !
(घ) ‘अश्वोऽश्व’ इति नाम पशुसमाम्नाये साङ्ग्रामिके च पठ्यते।
(ङ) युष्माभिरपि तत्काण्डं पठितम् एव हि।
(च) एष वो लवस्य शिरसा प्रणामपर्यायः ।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

6. अधः समस्तपदानां विग्रहाः दत्ताः। उदाहरणमनुसृत्य समस्तपदानि रचयत, समासनामापि च लिखतउदाहरणम्-पशूनां समाम्नायः, तस्मिन् पशुसमाम्नाये- षष्ठीतत्पुरुषः. उत्तरसहितम्:

(क) विनयेन शिशिर:विनयशिशिर:तृतीयातत्युरुष:
(ख) अयस्कान्तस्य (धातो:) शकल:अयस्कान्तशकलःषष्ठीतत्पुरुष:
(ग) दीर्घा ग्रीवा यस्य स:दीर्घग्रीव:बहुव्रीहि:
(घ) मुखम् एव पुण्डरीकम्मुखपुण्डरीकम्कर्मधारयः
(ङ) पुण्य: चासौ अनुभाव:पुण्यानुभाव:कर्मधारय:
(च) न स्खलितम्असखलितम्नअ्तत्पुरुष:

7. अधोलिखित पारिभाषिक शब्दानां समुचितार्थेन मेलनं कुरुत
(क) नेपथ्ये (क) प्रकटरूप में
(ख) आत्मगतम् (ख) देखकर
(ग) प्रकाशम् (ग) पर्दे के पीछे
(घ) निरूप्य (घ) अपने मन में
(ङ) उत्सङ्गे गृहीत्वा (ङ) प्रवेश करे
(च) प्रविश्य (च) अपने मन में
(छ) सगर्वम् (छ) गोद में बिठा कर
(ज) स्वगतम् (ज) गर्व के साथ
उत्तरम्:
(क) नेपथ्ये – पर्दे के पीछ
(ख) आत्मगतम् – अपने मन में
(ग) प्रकाशम् – प्रकट रूप में
(घ) निरूप्य – देखकर
(ङ) उत्सङ्गे गृहीत्वा – गोद में बिठा कर
(च) प्रविश्य – प्रवेश करके
(छ) सगर्वम् – गर्व के साथ
(ज) स्वगतम् – अपने मन में

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

8. पाठमाश्रित्य हिन्दीभाषया लवस्य चारित्रिकवैशिष्ट्यं लिखत
उत्तरम्-(बालक लव का चरित्र चित्रण)
लव महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पालित-पोषित, राजा राम द्वारा निर्वासित भगवती सीता के जुड़वा पुत्रों में से एक है। वह आकृति में बिल्कुल राम जैसा है, उसकी आँखों में राम की आँखों जैसी चमक है। यही कारण है कि जब महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में राजर्षि जनक, कौशल्या और अरुन्धती अतिथि के रूप में पधारते हैं; तब खेलते हुए बालकों के बीच कौशल्या बालक लव को देखकर राम के बचपन की याद में खो जाती है। तीनों की बातचीत से पता लगता है कि लव का मुख सीता के मुखचन्द्र की भाँति है। उसका मांसल और तेजस्वी शरीर राम के तुल्य है। उसका स्वर बिल्कुल राम से मिलता-जुलता है।

लव शिष्टाचार में कुशल है। वह गुरुजनों का आदर करना जानता है और जनक आदि के आश्रम में पधारने पर उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम करता है। लव ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा प्राप्त की है। इसीलिए जब चन्द्रकेतु द्वारा रक्षित राजा राम का अश्वमेधीय अश्व आश्रम में प्रवेश करता है; तब लव इस घोड़े को देखते ही पहचान जाता है कि यह अश्वमेधीय अश्व है, क्योंकि उसने युद्धशास्त्र तथा पशु-समाम्नाय में इस अश्व के बारे में पढ़ा हुआ है।

लव स्वभाव से वीर है, उसका स्वाभिमान क्षत्रियोचित है। इसीलिए अश्व के रक्षक सैनिकों के द्वारा जब अश्व के सम्बन्ध में गर्वपूर्ण शब्दावली का प्रयोग किया जाता है; तब वह उन सैनिकों को ललकारता है और अपने साथी बालकों को आदेश करता है कि पत्थर मार मारकर इस घोड़े को पकड़ लो, यह भी हमारे हिरणों के बीच रहकर घास चर लिया करेगा। इतना ही नहीं वह विजयपताका को छीनने की घोषणा करता है। अन्य बालक युद्ध के लिए चमकते हुए अस्त्रों को देखकर आश्रम में भाग जाना चाहते हैं परन्तु लव उनका सामना करने के लिए धनुष पर बाण चढ़ा लेता है।

इस प्रकार लव राम और सीता की आकृति से मेल रखता हुआ, गंभीर स्वर वाला, शिष्टाचार में निपुण, वीर, .. स्वाभिमानी, और तेजस्वी बालक है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

9. अधोलिखितेषु श्लोकेषु छन्दोनिर्देशः क्रियताम्
(क) महिम्नामेतस्मिन् विनयशिशिरो मौग्ध्यमसृणो।
(ख) वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावमिस्मन्नभिव्यज्यते।
(ग) पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजस्रम्।
उत्तरम्:
(क) शिखरिणी छन्दः।
(ख) शार्दूलविक्रीडितम् छन्दः ।
(ग) मन्दाक्रान्ता छन्दः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

10. पाठमाश्रित्य उत्प्रेक्षालड्कारस्य उपमालकारस्य च उदाहरणं लिखत
उत्तरम्:
(क) उत्प्रेक्षालकारस्य उदाहरणम्
वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावस्मिन्नभिव्यज्यते,
संवृत्तिः प्रतिबिम्बितेव निखिला सैवाकृतिः सा द्युतिः।
(ख) उपमालकारस्य उदाहरणम्
मनो मे संमोहस्थिरमपि हरत्येष बलवान्,
अयोधातुर्यद्वत्परिलघुरयस्कान्तशकलः॥

योग्यताविस्तारः

(क) भवभूतिः संस्कृतसाहित्यस्य प्रमुखो महाकविरासीत्।
“कविर्वाक्पतिराज श्रीभवभूत्यादिसेवितः।
जितो ययौ यशोवर्मा तद्गुणस्तुतिवन्दिताम्॥”
इति कल्हणरचितराज-तरङ्गिणीस्थश्लोकेन परिज्ञायते यदयम् अष्टमशताब्द्यां वर्तमानस्य कान्यकुब्जेश्वरस्य यशोवर्मणः समसामयिक आसीत्।

अनेन महाकविना त्रीणि नाटकानि रचितानि
मालतीमाधवम्, महावीरचरितम् उत्तररामचरितं च।
उत्तररामचरितं भवभूतेः सर्वोत्कृष्टा रचनास्तीति विद्वत्समुदाये इयमुक्तिः प्रसिद्धा वर्तते –
“उत्तरे रामचरिते भवभूतिविशिष्यते।”

अस्य नाटकस्य कथावस्तु रामयाणाधारितमस्ति। अत्र श्रीरामस्य राज्याभिषेकानन्तरमुत्तरं चरितं वर्णितम्, पूर्वचरितन्तु भवभूतिविरचिते महावीरचरिते प्रतिपादितम्। अत एव उत्तरं रामस्य चरितं यस्मिन् तत् उत्तररामचरितम्। अथवा उत्तरम् = उत्कृष्टं रामस्य चरितं यस्मिन् तत् उत्तररामचरितम् इति नाटकस्य नामकरणं समीचीनं वर्तते। सीतापरित्यागेनात्र रामस्योत्कृष्टराज्यधर्मपालनव्रतत्वं सूच्यते।

यद्यपि भवभूतिः करुणरसस्याभिव्यक्तये सविशेष प्रशस्यते, परन्तु प्रस्तुते नाट्यांशे वात्सल्यस्य भावः मर्मस्पृशं प्रकटितः । तथैव हास्यरसस्यापि रुचिरा अभिव्यक्तिरत्र सञ्जाता।

(ख) अश्वमेधः-अश्वमेधयज्ञः प्राचीनकाले राज्यविस्ताराय राष्ट्र-समृद्धये च करणीयः यज्ञः आसीत्। अस्मिन् यज्ञे राज्ञां बलस्य पराक्रमस्य च परीक्षा भवति स्म। यज्ञकर्ता नृपः स्वराष्ट्रियप्रतीकमश्वं च सैन्यबलैः सह भूमण्डल-भ्रमणाय प्रेषयति स्म। यो नृपः स्वराज्ये समागतमश्वं निर्बाधं गन्तु प्रादिशत, स यज्ञकर्ड राज्ञे करदेयतां स्वीकरोति स्म। यः तमश्वमरुणत् स आश्वमेधिक-नृपस्याधीनतां नाङ्गीकरोति स्म। तदा उभयोर्बलयोर्मध्ये युद्धं भवति स्म तत्रैव च नृपाणां पराक्रमः परीक्ष्यते स्म। शतपथब्राह्मणे ‘अश्वः’ इति पदं राष्ट्रार्थे प्रयुक्तम् ‘राष्ट्रं वै अश्वः ‘ इति.

(ग) ‘बालकौतुकम्’ इतिपाठस्य साभिनयं नाट्यप्रयोगं कुरुत।

(घ) गुरुकुलपरम्परायां बालकानां कृते गुरून् प्रति अभिवानदस्य कीदृशः शिष्टाचारः अत्र चित्रितः इति निरूप्यताम्। तथैव गुरवः कथम् आशीर्वचांसि अयच्छन्, इत्यपि ज्ञेयम्।

(ङ) वार्तालापार्थं संस्कृतभाषायाः सुचारुप्रयोगस्य उदाहरणानि पाठात् अन्वेष्टव्यानि।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

HBSE 9th Class Sanskrit बालकौतुकम् Important Questions and Answers

I. समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) ‘उत्तररामचरितम्’ इति नाटकस्य रचयिता कः ?
(A) भासः
(B) कालिदासः
(C) भवभूतिः
(D) अश्वघोषः।
उत्तराणि:
(B) कालिदासः

(ii) बटवः अश्वं कथं वर्णयन्ति ?
(A) भूतविशेषम्
(B) भूतम्
(C) राजाश्वम्
(D) विशेषम्।
उत्तराणि:
(A) भूतविशेषम्

(iii) लवः कथं जानाति यत् अयम् आश्वमेधिकः अश्वः ?
(A) उत्तरकाण्डेन
(B) युद्धकाण्डेन
(C) पूर्वकाण्डेन
(D) अश्वमेधकाण्डेन।
उत्तराणि:
(D) अश्वमेधकाण्डेन

(iv) राजपुरुषस्य तीक्ष्णतरा आयुधश्रेण्यः कीदृशीं वाचं न सहन्ते ?
(A) दृप्ताम्
(B) सुप्ताम्
(C) मधुराम्
(D) असत्ययुक्ताम्।
उत्तराणि:
(A) दृप्ताम्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

II. रेखाकितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) अश्वमेध इति नाम क्षत्रियाणां महान् उत्कर्षनिकषः।
(A) कः
(B) केषाम्
(C) कस्मै
(D) कस्मात्।
उत्तराणि:
(B) केषाम्

(ii) हे बटवः ! लोष्ठैः अभिजन्तः उपनयत एनम् अश्वम्।
(A) काः
(B) कस्मात्
(C) कुत्र
(D) कैः।
उत्तराणि:
(D) कैः

(iii) रामभद्रस्य एषः दारकः अस्माकं लोचने शीतलयति।
(A) के
(B) कैः
(C) कस्मिन्
(D) कथम्।
उत्तराणि:
(A) के

(iv) उत्पथैः मम मनः पारिप्लवं धावति।
(A) कस्य
(B) कस्मै
(C) कस्याम्
(D) किम्।
उत्तराणि:
(A) कस्य

(v) अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः स चपलः दृश्यते।
(A) केन
(B) कम्
(C) कः
(D) काः
उत्तराणि:
(C) कः

(vi) विस्फारितशरासनाः आयुधश्रेण्यः कुमारं तर्जयन्ति।
(A) किम्
(B) कथम्
(C) केन
(D) कम्।
उत्तराणि:
(D) कम्

(vii) निपुणं निरूप्यमाणः लवः मुखचन्द्रेण सीतया संवदत्येव।
(A) कस्मात्
(B) कस्याः
(C) कया
(D) कस्याम्।
उत्तराणि:
(C) कया।

बालकौतुकम्पा ठ्यांशः
1. (नेपथ्ये कलकलः । सर्वे आकर्णयन्ति)
जनकः अये, शिष्टानध्याय इत्यस्खलितं खेलतां वटूनां कोलाहलः।
कौसल्याः सुलभसौख्यमिदानीं बालत्वं भवति।
अहो, एतेषां मध्ये क एष रामभद्रस्य मुग्धललितैरङ्गैर्दारकोऽस्माकं लोचने शीतलयति ?
अरुन्धती
कुवलयदल-स्निग्धश्यामः शिखण्डक-मण्डनो,
वटुपरिषदं पुण्यश्रीकः श्रियैव सभाजयन्।
पुनरपि शिशुभूतो वत्सः स मे रघुनन्दनो,
झटिति कुरुते दृष्टः कोऽयं दशोरमृताञ्जनम्॥1॥

अन्वयः-कुवलयदल-स्निग्धश्यामः शिखण्डक-मण्डनः, पुण्यश्रीकः श्रिया वटुपरिषदं सभाजयन् एव, पुनः शिशुः भूत्वा स मे वत्सः रघुनन्दन इव कः अयम् दृष्टः झटिति दृशोः अमृत-अञ्जनं कुरुते ?

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

जनकः (चिरं निर्वर्ण्य) भोः किमप्येतत् !
महिम्नामेतस्मिन् विनयशिशिरो मौग्ध्यमसृणो,
विदग्धैर्निर्ग्राह्यो न पुनरविदग्धैरतिशयः।
मनो मे संमोहस्थिरमपि हरत्येष बलवान्,
अयोधातुर्यद्वत्परिलघुरयस्कान्तशकलः ॥ 2 ॥

अन्वयः-एतस्मिन्, विनय-शिशिरः, मौग्ध्यमसृणः, महिम्नाम् अतिशयः, विदग्धै : निर्ग्राह्यः, अविदग्धैः न, (निर्ग्राह्यः) बलवान् एषः, संमोह-स्थिरम् अपि मे मनः हरति। यद्वत् परिलघुः अयस्कान्तशकल: अयोधातुः (हरति)।

लवः (प्रविश्य, स्वगतम्) अविज्ञातवय:-क्रमौचित्यात् पूज्यानपि सतः कथमभिवादयिष्ये ? (विचिन्त्य) अयं पुनरविरुद्धप्रकार इति वृद्धेभ्यः श्रूयते। (सविनयमुपसृत्य) एष वो लवस्य शिरसा प्रणामपर्यायः।

हिन्दी-अनुवादः

प्रसंगः- वाल्मीकि आश्रम में अतिथि के रूप में, राजा जनक, महारानी कौशल्या तथा वशिष्ठ की पत्नी अरुन्धति आए हैं। वे आश्रम में बालकों के क्रीड़ा कौतूहल को देख रहे हैं। उन बालकों में सीता का पुत्र लव भी है, जिसका उन्हें पता नहीं है। उनके वार्तालाप से पाठ का प्रारम्भ है (नेपथ्य में कोलाहल होता है। सब सुनते हैं।)

जनक – अरे, बड़े लोगों के आने पर पढ़ाई में अवकाश होने के कारण, बेरोकटोक खेलते हुए छात्रब्रह्मचारियों का यह शोर है अर्थात् छुट्टी होने के कारण, सभी ब्रह्मचारी अनियन्त्रित होकर खेल रहे

कौसल्या – इस बचपन में सुख सुलभ होता है अर्थात् बाल्यकाल में क्रीड़ा आदि सामान्य साधनों से ही सुख मिल जाता है। ओह, इन बालकों के बीच में यह कौन बालक, रामचन्द्र के समान सुन्दर और कोमल अंगों से हमारी आँखों को ठण्डा कर रहा है अर्थात् बाल्यावस्था में जैसा सुन्दर और कोमल रामभद्र था, वैसी ही आकृति वाला यह कौन बालक हमें आनन्द दे रहा है ?

अरुन्धती – नीलकमल के समान कोमल (चिकना) तथा श्याम रंग वाला, घुघराले बालों से अलंकृत, अलौकिक (पुण्य) शोभायुक्त, अपने शरीर की कान्ति से ही, ब्रह्मचारियों के समूह को अलंकृत करने वाला, यह कौन है ? जो कि देखने पर फिर से वह शिशु रूपधारी राम की भाँति मेरी आँखों में झट से अमृतयुक्त काजल का लेप-सा कर रहा है ? भाव यह है कि इस बालक को देखने से मैं प्रिय शिशु राम को ही फिर से बालक के रूप में देख रही हूँ॥1॥

जनक – (बहुत देर तक देखकर) ओह, यह क्या (अपूर्व-सा अनुभव) है ? इस बालक में, विनय के कारण शीतलता तथा भोले स्वभाव के कारण कोमलता विद्यमान है। यह अतिशय महिमावाला है और यह विवेकियों (सूक्ष्मबुद्धि मनुष्यों) के द्वारा ही ग्राह्य है, स्थूलबुद्धि अविवेकियों के द्वारा ग्राह्य नहीं है। यह बलवान् बालक, जैसे चुम्बक का छोटा-सा टुकड़ा लोहे को अपनी ओर खींच लेता है, वैसे ही मेरे सीता निर्वासन के कारण शोकाघात से संज्ञा-शून्य जड़ (स्थिर) हृदय को अपनी ओर खींच रहा है। भाव यह है कि यह इतना प्रभावशाली बालक कौन है ॥ 2 ॥

लव – (प्रवेश करके, अपने मन में ही) आयु क्रम (आयु में छोटे-बड़े का क्रम) और उचितता का ज्ञान न होने से, पूजनीय होते हुए भी इनको मैं कैसे प्रणाम करूँ अर्थात् इनमें कौन वयोवृद्ध है और किसे प्रथम प्रणाम करना चाहिए ? यह मैं नहीं जानता (तो इन्हें कैसे प्रणाम करूँ) ? (सोच विचारकर) यह प्रणाम की विरोधहीन पद्धति है। ऐसा गुरुजनों से सुना जाता है। (विनयपूर्वक पास जाकर) यह आपको ‘लव’ का औचित्य क्रम के अनुसार प्रणाम है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
शिष्टानध्यायः = शिष्टेषु (आप्तेषु) अनध्यायः । बड़े लोगों के आने पर अध्ययन से अवकाश। अस्खलितम् = अनियन्त्रितम्; बेरोकटोक। सुलभ-सौख्यम् = सुलभं सौख्यम् अस्मिन् । इसमें (बाल्यकाल में) सुख सुलभ होता है। मुग्ध-ललितैः = सुन्दर और कोमल। कुवलयदल-स्निग्ध-श्यामः = नील कमल के पत्र के समान कोमल और श्याम। कुवलय-दलम् इव स्निग्धः श्यामः च । शिखण्डक-मण्डनः = काकपक्ष-शोभितः । घुघराले बालों से अलंकृत । पुण्यश्रीकः = पुण्य-अलौकिक शोभा वाला। पुण्या श्रीः यस्य सः। दृशोः = आँखों के अथवा आँखों में। अमृताञ्जनम् = अमृतमयकाजल। विनय-शिशिरः = विनयेन शिशिरः शीतल:- विनय के कारण शीतल। विनय के कारण क्रोध न आने से स्वभाव में शीतलता रहती है। महिम्नाम् अतिशयः का विशेषण है (अत्यधिक महिमा वाला)। मौग्ध्य-मसृणः = मौग्ध्येन-मधुर स्वभाव (अथवा भोलेपन) के कारण मसृणः-कोमल। मुग्ध + ण्यत्। विदग्धैः = सूक्ष्मबुद्धि विद्वानों; विवेकियों द्वारा। सम्मोह-स्थिरम् = सम्मोहेन- शोकाघातेन स्थिरम्-जडीभूतम्-सीता निर्वासन के कारण शोक के प्रहार से संज्ञाशून्य-सा, जड़। अयस्कान्तशकलः = अयस्कान्तधातो:- चुम्बकस्य, शकल:-अवयवः (खण्डः) चुम्बक का छोटा-सा टुकड़ा। अविज्ञातवयः-क्रम-औचित्यात् = आयु में छोटे-बड़े के क्रम की उचितता का ज्ञान न होने से। अविज्ञातं वयः क्रमौचित्यम् तस्मात्। अवस्था, ज्येष्ठता एवं औचित्य का क्रमज्ञान न होने से। प्रणामपर्यायः = औचित्यक्रम के अनुसार प्रणाम। अविरुद्धप्रकारः = निर्विरोध पद्धति।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

2. अरुन्धतीजनको : कल्याणिन् ! आयुष्मान् भूयाः।
कौसल्या : जात ! चिरं जीव।
अरुन्धती : एहि वत्स ! (लवमुत्सङ्गे गृहीत्वा आत्मगतं दिष्ट्या न केवलमुत्सङ्गश्चिरान्मनोरथोऽपि मे पूरितः)
कौसल्या : जात ! इतोऽपि तावदेहि । (उत्सङ्गे गृहीत्वा) अहो, न केवलं मांसलोज्ज्वलेन देहबन्धनेन, कलहंसघोषघर्घ-रानुनादिना स्वरेण च रामभद्रमनुसरति। जात ! पश्यामि ते मुखपुण्डरीकम्। (चिबुकमुन्नमय्य, निरूप्य, सवाष्पाकूतम्) राजर्षे ! किं न पश्यसि ? निपुणं निरूप्यमाणो वत्साया मे वध्वा मुखचन्द्रेणापि संव-दत्येव।

हिन्दी-अनुवादः
अरुन्धती और जनक-हे कल्याण सम्पन्न ! चिरंजीव होओ। कौशल्या-बेटा ! दीर्घजीवी बनो। अरुन्धती-आओ बेटा । (लव को गोद में लेकर अपने मन में, सौभाग्य से केवल मेरी गोद ही नहीं अपितु मेरा बहुत दिनों का मनोरथ भी पूरा हो गया।) ।

कौशल्या-बेटा, इधर (मेरी गोद में) भी आओ। (गोद में लेकर) ओह, यह केवल बलिष्ठ और तेजस्वी शरीर के गठन से ही नहीं, अपितु मधुर कण्ठ वाले हंस के स्वर का अनुसरण करने वाले स्वर से भी ‘रामभद्र ‘ का अनुसरण कर रहा है। बेटा ! ज़रा तुम्हारा मुख कमल तो देखू ? (ठोड़ी को ऊपर उठाकर, देखकर, आँसुओं सहित अभिप्रायपूर्वक देखकर) हे राजर्षे जनक ! क्या आप नहीं देखते कि ध्यान से देखने पर इस बालक का मुख मेरी प्रिय वधू सीता के मुख-चन्द्र से भी मिल रहा है?

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
कल्याणिन् = हे कल्याण वाले। भूयाः = होओ, बनो। जात = वत्स, बेटा। उत्सङ्गे = गोद में। दिष्ट्या = सौभाग्य से। पूरितः = पूरा हो गया। एहि = आओ। मांसल-उज्ज्वलेन = मांसलेन-बलवता, उज्ज्वलेन-तेजस्विना बलवान् और तेजस्वी। देहबन्धनेन = शरीर के गठन से। कलहंस-घोष-घर्घर-अनुनादिना = कलहंसस्य घोषस्य अनुनादिना-अनुकारिणा। मधुर कण्ठ वाले हंस के स्वर का अनुसरण करने वाले (स्वर से)। मुखपुण्डरीकम् = श्वेत कमल के समान मुख को।चिबुकम् = ठोड़ी को।उन्नमय्य = ऊपर उठाकर । सवाष्प-आकूतम् = आँसुओं के साथ अभिप्रायपूर्वक।निरूप्य = देखकर।निरूप्यमाण: = देखा गया। निपुणम् = ध्यान से। वध्वा = बहू सीता से। संवदति = मिलता है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

3. जनकः पश्यामि, सखि ! पश्यामि (निरूप्य)
वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावस्मिन्नभिव्यज्यते,
संवृत्तिः प्रतिबिम्बितेव निखिला सैवाकृतिः सा द्युतिः।
सा वाणी विनयः स एव सहजः पुण्यानुभावोऽप्यसौ
हा हा देवि किमुत्पथैर्मम मनः पारिप्लवं धावति॥3॥

अन्वयः-अस्मिन् शिशौ, वत्साया: रघूद्वहस्य च संवृत्तिः प्रतिबिम्बिता इव अभिव्यज्यते, सा एव निखिला आकृतिः, सा धुतिः, सा वाणी, स एव सहजः विनयः, (स एव) असौ पुण्यानुभावः अपि, हा हा देवि ! मम मनः पारिप्लवं (सत्) उत्पथैः किं धावति ?
कौसल्या – जात ! अस्ति ते माता ? स्मरसि वा तातम् ?
लवः – नहि।
कौसल्या – ततः कस्य त्वम् ?
लवः – भगवतः सुगृहीतनामधेयस्य वाल्मीकेः।
कौसल्या – अयि जात ! कथयितव्यं कथय।
लवः – एतावदेव जानामि। (प्रविश्य सम्भ्रान्ताः)

हिन्दी-अनुवादः
जनक- देख रहा हूँ सखि (कौशल्ये), देख रहा हूँ।
इस बालक में बेटी सीता एवं रघुकुल-श्रेष्ठ राम का (पवित्र) सम्बन्ध प्रतिबिम्बित हो रहा है, और वही सारी शक्ल, वही कान्ति, वही वाणी, वही स्वाभाविक विनम्रता तथा पवित्र प्रभाव भी ठीक वैसा ही है। हा हा देवि ! (इसको देखकर) मेरा मन, चंचल होकर उन्मार्गों से (उबड़खाबड़ रास्तों से) क्यों दौड़ रहा है ? (यह सीता और राम का ही पुत्र है, ऐसी कल्पना क्यों कर रहा है ?)

कौसल्या – वत्स ! क्या तुम्हारी माता है? क्या तुम अपने पिता को याद करते हो ?
लव – नहीं
कौसल्या – तब, तुम किसके (पुत्र) हो ?
लव – स्वनामधन्य भगवान् वाल्मीकिके।
कौशल्या – प्यारे पुत्र ! कहने योग्य बात कहो अर्थात् आजन्म ब्रह्मचारी भगवान् वाल्मीकि तुम्हारे पिता कैसे हो सकते हैं ?
लव – मैं तो इतना ही जानता हूँ। (प्रवेश करके, घबराए हुए ब्रह्मचारीगण)

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
वत्सायाः = बेटी सीता का। रघूद्वहस्य = रघुवंश को वहन करने वाले राम का। शिशौ अस्मिन् = इस बालक में। अभिव्यज्यते = प्रकट हो रही है। अभि + वि + √अ०्ज् + लट् (कर्मवाच्य) प्रथम पुरुष, एकवचन । संवृत्तिः = सम्पर्क: सम्बन्ध। सम् + √वृत् + क्तिन्। निखिला = सम्पूर्ण । आकृतिः = शक्ल, रूप। द्युतिः = कान्ति। सहजः = स्वाभाविक। पुण्य-अनुभावः = पवित्र प्रभाव (माहात्म्य) वाला। उत्पथैः = उन्मार्गों से । पारिप्लवम् = चंचलता युक्त। परि + √प्लु + अच् परिप्लवम् एव पारिप्लवम्। परिप्लव + स्वार्थिक अण् प्रत्यय। सुगृहीत-नामधेयः = स्वनामधन्य। सुगृहीतं नामधेयं यस्य सः । कथयितव्यम् = कहने योग्य को, √कथ् + णिच् + तव्यत्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

4. बटवः कुमार ! कुमार! अश्वोऽश्व इति कोऽपि भूतविशेषो जनपदेष्व-नुश्रूयते, सोऽयमधुनाऽस्माभिः स्वयं प्रत्यक्षीकृतः।
लव: – ‘अश्वोऽश्व’ इति नाम पशुसमाम्नाये साङ्ग्रामिके च पठ्यते, तद् ब्रूत-कीदृशः ?
बटतः – अये, श्रूयताम्
‘पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजत्रम्
दीर्घग्रीवः स भवति, खुरास्तस्य चत्वार एव।
शष्याण्यत्ति, प्रकिरति शकृत्-पिण्डकानाम्र-मात्रान्।
किं व्याख्यानैव्रजति स पुनर्दूरमेयेहि याम॥
अन्वयः- पश्चात् विपुलं पुच्छं वहति, तत् च अजस्रं धूनोति। सः दीर्घग्रीवः भवति, तस्य खुराः चत्वारः एव। (सः) शष्पाणि अत्ति, आम्र-मात्रकान् शकृत्-पिण्डकान् प्रकिरति। किं व्याख्यानैः सः दूरं व्रजति। एहि एहि, याम। (इत्यजिने हस्तयोश्चाकर्षति)
लवः – (सकौतुकोपरोधविनयम्।) आर्याः ! पश्यत। एभिर्नीतोऽस्मि। (इति त्वरितं परिक्रामति।)

हिन्दी-अनुवादः
बटुगण (ब्रह्मचारी)-कुमार, कुमार, जनपदों में जो ‘घोड़ा-घोड़ा’ नामक कोई प्राणी विशेष सुना जाता है, अब हमने उसे स्वयं प्रत्यक्ष देख लिया है।
लव – ‘घोड़ा-घोड़ा’ यह पशु-शास्त्र तथा संग्राम शास्त्र में पढ़ा जाता है। तो बतलाओ-वह कैसा है ?
बटुगण – अरे, सुनिए!
उसकी पिछली ओर बहुत लम्बी पूँछ लटकती है और वह उसे निरन्तर हिलाता रहता है। उसकी गर्दन लम्बी और उसके खुर भी चार ही हैं। वह घास खाता है और आम्र-फलों जैसा, मलत्याग (लीद) करता है। अब अधिक वर्णन करने की आवश्यकता नहीं-वह घोड़ा दूर निकला जा रहा है। आओ, आओ। चलें ॥ 4 ॥
(ऐसा कहकर उस लव के हाथ और मृगचर्म पकड़कर खींचते हैं)
लव – (बटुकों के आग्रह और विनय के साथ) हे आर्य लोगो ! देखिए ! मैं इनके द्वारा ले जाया जा रहा हूँ। (ऐसा कहकर शीघ्रता से घूमता है)

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
भूतविशेषः = विशेष प्राणी। जनपदेषु = नगरों में। अनुसूयते = सुना जाता है। पशुसमाम्नाये = पशु-शास्त्र में पशुप्रतिपादित-शब्दकोश में। सम् + आ + √म्ना + घञ्। साङ्ग्रामिके = संग्रामशास्त्र में। युद्धशास्त्र धनुर्वेद में। अजस्त्रम् = निरन्तर । पुच्छम् = पूँछ । वहति = धारण करता है। विपुलम् = अत्यधिक। धूनोति = हिला रहा है। √धूञ् + लट् प्रथम पुरुष, एकवचन। दीर्घग्रीवः = लम्बी गर्दन वाला। दीर्घा ग्रीवा यस्य सः = बहुव्रीहि समास।शष्याणि = घास को। अत्ति = खाता है। √अद् + लट् + प्रथमा पुरुष, एकवचन। प्रकिरति = बिखेरता है। प्र + √कृ+ लट् (श विकरण) लट् । प्रथम पुरुष, एकवचन। शकृत् = लीद को, मल को। पिण्डकान् = समूहों को। आममात्रान् = आम्र-फल के आकार वाले, आम्रफलों जैसा। सकौतुक-उपरोध-विनयम् = कौतुकेन, उपरोधेन विनयेन च सहितम् । कौतूहल, आग्रह और विनय के साथ। याम = चलें। √या + लोट् – उत्तम पुरुष, बहुवचन। अजिने = मृगचर्म, द्वितीया द्विवचन। नीतः = ले जाया गया। त्वरितम् = शीघ्र।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

5. अरुन्धतीजनको : महत्कौतुकं वत्सस्य।
कौसल्या : अरण्यगर्भेरुपालापै!यं तोषिता वयं च। भगवति ! जानामि तं पश्यन्ती वञ्चितेव। तस्मादितोऽन्यतो भूत्वा प्रेक्षामहे तावत् पलायमानं दीर्घायुषम्।
अरुन्धती : अतिजवेन दूरमतिक्रान्तः स चपलः कथं दृश्यते ? (प्रविश्य)
बटव: : पश्यतु कुमारस्तावदाश्चर्यम्।
लवः : दृष्टमवगतं च। नूनमाश्वमेधिकोऽयमश्वः।
बटवः : कथं ज्ञायते ?
लवः : ननु मूर्खा: ! पठितमेव हि युष्माभिरिपि तत्काण्डम्। किं न पश्यथ ? प्रत्येकं शतसंख्याः कवचिनो दण्डिनो निषडगिणश्च रक्षितारः। यदि च विप्रत्ययस्तत्पृच्छत।

हिन्दी-अनुवादः
अरुन्धती और जनक : बालक को (घोड़ा देखने का) बड़ा कौतूहल है।
कौशल्या : वनवासी बालकों के रूप और बातचीत से आप और हम लोग बड़े सन्तुष्ट हुए हैं। भगवति अरुन्धती ! मुझे तो ऐसा लगता है कि, मानो मैं उसे देखती हुई ठगी-सी रह गई हूँ। इसलिए यहाँ से दूसरी ओर होकर, इस भागते हुए दीर्घायु बालक को देखें।
अरुन्धती : अत्यन्त वेग से दूर निकलने वाला वह चंचल (बालक) कैसे देखा जा सकता है ? (प्रवेश कर)
बटुगण : (आप) कुमार, इस आश्चर्य को देखें।
लव : देख लिया और समझ भी लिया। निश्चय ही यह ‘अश्वमेध’ यज्ञ का घोड़ा है।
बटुगण : कैसे जानते हो ?
लव : अरे मूर्यो ! तुम लोगों ने भी वह काण्ड’ (अश्वमेध-प्रतिपादक वेद का अध्याय) पढ़ा ही है। फिर क्या तुम सैंकड़ों की संख्या में कवचधारी दण्डधारी तथा तरकसधारी सैनिकों को नहीं देखते ? और यदि तुम्हें विश्वास नहीं होता, तो (इन अनुयायी रक्षकों से) पूछ लो।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
कौतुकम् = कौतूहल। अरण्यगर्भेरुपालापैः = अरण्यगर्भाणां-वनवासिनाम्-बालकानाम् उपालापैः । वनवासी बालकों की बातचीत से। तोषिताः = सन्तुष्ट हो गए। वञ्चिताः इव = मानो ठगी गई (हूँ)। अन्यतः भूत्वा = दूसरी ओर होकर (जाकर)। प्रेक्षामहे = देखते हैं, देखें। प्र + √ईक्ष् + लक्ष् + उत्तम पुरुष, बहुवचन । पलायमानम् = दौड़ते (भागते)
हुए को, परा + √अय् + लट् + शानच्। दीर्घायुषम् = दीर्घम् आयुः यस्य सः-दीर्घजीवी को। अतिजवेन = अत्यन्त वेग से। अवगतम् = समझ लिया। काण्डम् = अध्याय को। कवचिनः = कवच वाले। दण्डिनः = दण्ड (डंडे, लाठी) लिए हुए। निषङ्गिणः = तरकस लिए हुए. निषड्गाः सन्ति येषां ते। प्रथमा बहुवचन। विप्रत्ययः = अविश्वास, संदेह । वि + प्रति + √इण् + अच्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

6. बटवः : भो भोः! किंप्रयोजनोऽयमश्वः परिवृतः पर्यटति ?
लवः : (सस्पृहमात्मगतम्) ‘अश्वमेध’ इति नाम विश्व-विजयिनां क्षत्रियाणामूर्जस्वल: सर्वक्षत्रपरिभावी महान् उत्कर्षनिकषः। (नेपथ्ये) योऽयमश्वः पताकेयमथवा वीरघोषणा। सप्तलोकैकवीरस्य दशकण्ठकुलद्विषः॥5॥
अन्वयः- यः अयं अश्वः, इयं पताका अथवा वीरघोषणा (अस्ति) (सः) सप्तलोक एकवीरस्य दशकण्ठकुलद्विषः (रामस्य) अस्ति।
लवः : (सगर्वम्) अहो ! सन्दीपनान्यक्षराणि।
बटवः : किमुच्यते ? प्राज्ञः खलु कुमारः।
लवः : भो भोः! तत्किमक्षत्रिया पृथिवी ? यदेवमुद्घोष्यते ?
(नेपथ्ये) रे, रे, महाराज प्रति कः क्षत्रियः ?

हिन्दी-अनुवादः
बटु-गण : अरे ! रक्षकों (सैनिकों) से घिरा हुआ यह घोडा, क्यों घूम रहा है ?
लवः : (अभिलाषापूर्वक, मन में) ‘अश्वमेध यज्ञ’ यह विश्व को जीतने वाले क्षत्रियों की शक्तिशाली तथा समस्त (शत्रु) राजाओं को पराजित करने वाली श्रेष्ठता की कसौटी है।
(नेपथ्य में) यह जो घोड़ा (दिखाई दे रहा है) वह सातों लोकों में, एकमात्र वीर रावण के कुल के शत्रु, (भगवान् राम) की विश्व विजय-पताका है अथवा वीर घोषणा है ।। 5 ।
लवः : (गर्व के साथ) ओह, ये शब्द तो बहुत क्रोध पैदा करने वाले हैं।
बटुगण : क्या कह रहे हो (कि यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा है) तब तो कुमार बहुत जानकार हैं।
(क्योंकि बिना पूछे ही समझ लिया था कि यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा है।)
लव : अरे, अरे, सैनिको ! तो क्या पृथ्वी क्षत्रिय-शून्य है ? जो इस प्रकार घोषणा कर रहे हो ? (नेपथ्य में) अरे, रे, महाराज के सामने कौन क्षत्रिय है ? अर्थात् ऐसा कौन-सा क्षत्रिय है, जो कि भगवान् राम की तुलना में आ सकता है ?

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
परिवृतः = (रक्षकों से) घिरा हुआ। पर्यटति = घूम रहा है। उर्जस्वलः = शक्तिशाली, बलवान् । सर्वक्षत्रपरिभावी = सारे (शत्रु) राजाओं को पराजित करने वाली। उत्कर्ष-निकषः = श्रेष्ठता की कसौटी। सप्त-लोक-एकवीरस्य = सातों लोकों में एकमात्र वीर। दशकण्ठ-कुलद्विषः = रावण के कुल के शत्रु-दशकण्ठस्य कुलं द्वेष्टि इति तस्य। सन्दीपनानि = भड़काने वाले, क्रोध पैदा करने वाले। प्राज्ञः = बुद्धिमान, विज्ञ।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

7. लवः : धिग् जाल्मान्।
यदि नो सन्ति सन्त्येव केयमद्य विभीषिका।
किमुक्तैरेभिरधुना, तां पताकां हरामि वः॥6॥
अन्वयः – यदि (क्षत्रियाः) नो सन्ति, सन्ति एव, अद्य इयं विभीषिका का ? अधुना एभिः उक्तैः किम् ? (अहम्) वः तां पताकां हरामि॥ हे बटवः ! परिवृत्य लोष्ठैरभिजन्त उपनयतैनमश्वम्। एष रोहितानां मध्येचरो भवतु। (प्रविश्य सक्रोधः)
पुरुष: : धिक् चपल ! किमुक्तवानसि ? तीक्ष्णतरा ह्यायुधश्रेणयः शिशोरपि दृप्तां वाचं न सहन्ते। राजपुत्रश्चन्द्रकेतुर्दुर्दान्तः, सोऽप्यपूर्वारण्यदर्श-नाक्षिप्तहृदयो न यावदायाति, तावत् त्वरितमनेन तरुगहनेनापसर्पत।
बटव: : कुमार ! कृतं कृतमश्वेन। तर्जयन्ति विस्फारित-शरासनाः कुमारमायुधश्रेण्यः। दूरे चाश्रमपदम्। इतस्तदेहि। हरिणप्लुतैः पलायामहे।
लवः : किं नाम विस्फुरन्ति शस्त्राणि ? (इति धनुरारोपयति)

हिन्दी-अनुवादः
लवः : तुम, नीचों को धिक्कार है। यदि क्षत्रिय नहीं हैं, (ऐसा कहते हो तो) मैं कहता हूँ कि वे क्षत्रिय हैं ही। फिर यह व्यर्थ का भय क्यों दिखा रहे हो ? अब इन बातों को कहने से क्या लाभ ? मैं तुम्हारी उस पताका का हरण कर रहा हूँ (यदि तुममें शक्ति हो तो मुझे रोको) ॥6॥ अरे बटुको ! इस घोड़े को घेरकर ढेलों से मारते हुए (आश्रम में) ले आओ। यह घोड़ा भी मृगों के बीच विचरण करे। (मृगों के साथ ही यह भी घास खाया करे)।

पुरुष : चुप, चपल बालक ! क्या कह रहे हो ? “तीखे शस्त्र बच्चे की भी गर्वीली वाणी नहीं सहते। (अर्थात् हमारे शस्त्रधारी तुम्हारी कटु गर्वभरी वाणी नहीं सहन करते)। राजकुमार चन्द्रकेतु बड़े दुःसाहसी (दुर्दमनीय) हैं। वह परम रमणीय वन की शोभा देखने में उत्सुक (आकर्षित हुए), जब तक नहीं आते हैं, तब तक तुम इन सघन (घने) वृक्षों में छिपकर भाग जाओ।” बटुगण कुमार ! घोड़े को रहने दो। धनुष ताने हुए शस्त्रधारियों के समूह तुम्हें धमका रहे हैं और आश्रम यहाँ से दूर है। अतः आओ, हरिणों की भाँति कूद-कूद कर भाग चलें। लव

बटुगण : क्या (अश्व रक्षकों के) शस्त्र चमक रहे हैं ? (अपना धनुष चढ़ाता है)

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च
जाल्मान् = नीचों को। विभीषिका = भय। वः = तुम्हारी। युष्माकम्-षष्ठी बहुवचनस्य विकल्पे शब्दः। परिवृत्य = . घेरकर। लोष्ठैः = ढेलों से। अभिनन्तः = मारते हुए। उपनयत= ले आओ। रोहितानाम् = हरिणों के। चपल = चंचल ! आयुध-श्रेण्यः = शस्त्र समूह। शस्त्रधारी लोग। दृप्ताम् = गर्वीली को, कटु। दुर्दान्तः = दुर्दमनीय। अपूर्व-अरण्यदर्शनआक्षिप्त-हृदयः = अपूर्वम् अरण्यस्य दर्शनेन आक्षिप्तं हृदयं यस्य सः। बहुब्रीहि समास। अपूर्व वन की शोभा देखने में संलग्न मन वाला। त्वरितम् = शीघ्र।अपसर्पत = भाग जाओ। अप + √सृप् + लोट् + मध्यम पुरुष, बहुवचन । कृतं कृतम् = रहने दो, बस करो। तर्जयन्ति = धमका रहे हैं, डाँट रहे हैं। विस्फारित शरासनाः = धनुषों को ताने हुए। विस्फारितानि शर-आसनानि यैः ते। बहुव्रीहि समास। इतः = यहाँ से। एहि = आओ। हरिणप्लुतैः = हरिणों सी छलांगों से। हरिणानां प्लुतैः इव। पलायामहे = (हम) भाग जाएँ। भाग चलें । परा (पला) + √अय् + लट् + उत्तम पुरुष, बहुवचन । विस्फुरन्ति = चमक रहे हैं। वि + √स्फुर् + लट् + प्रथम पुरुष, बहुवचन। आरोपयति = (धनुष) चढ़ाता है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम्

बालकौतुकम् (बालकों की उत्सुकता) Summary in Hindi

बालकौतुकम् पाठ परिचय

प्रस्तुत नाट्यांश ‘बालकौतुकम्’ संस्कृत के महान् नाटककार भवभूति के प्रसिद्ध नाटक ‘उत्तररामचरितम्’ के चतुर्थ अंक से सम्पादित किया गया है।

संस्कृत के नाटककारों में भवभूति को कालिदास जैसा गौरव प्राप्त है। भवभूति पद्मपुर के निवासी थे तथा उदुम्बरकुल के ब्राह्मण थे। इनके पितामह का नाम भट्ट गोपाल था, जो स्वयं एक महाकवि थे। इनके पिता का नाम नीलकण्ठ तथा माता का नाम जतुकर्णी था। भवभूति का दूसरा नाम ‘श्रीकण्ठ’ था। भवभूति शिव के उपासक थे, इनके गुरु का नाम ज्ञाननिधि था। भवभूति का स्थितकाल कतिपय पुष्ट प्रमाणों के आधार पर 700 ई० के आस-पास माना जाता है।

रचनाएँ-भवभूति की तीन रचनाएँ (नाटक) उपलब्ध होती हैं
1. मालतीमाधवम्
2. महावीरचरितम् तथा
3. उत्तररामचरितम् ।

मालतीमाधवम्-यह 10 अंकों का नाटक है। इसमें नाटक की नायिका मालती तथा नायक माधव के प्रेम और विवाह की कल्पित कथा चित्रित है। यह एक शृंगार प्रधान रचना है। मालतीमाधव में पाठकों की उत्सुकता जगाए रखने के पूरी चेष्टा की गई है, जिसमें भवभूति सफल हुए हैं। रोचक कथानक यथार्थ चित्रण तथा प्रभावपूर्ण भाषा के कारण यह नाटक प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ है। पाँचवें अंक में शमशान का वर्णन तथा नौवें अंक में वन का वर्णन दर्शनीय है। पत्नी के आदर्श सम्बन्ध का वर्णन भी अद्वितीय है। काव्य की दृष्टि से मालतीमाधव एक उत्कृष्ट कृति कही जा सकती

महावीरचरितम्-यह सात अंकों का नाटक है। इसमें राम के विवाह से लेकर राम के राज्याभिषेक की कथा को नाटकीय रूप दिया गया है। कवि ने रामायण की कथा को रोचक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है और उसे अधिकाधिक नाटकीय बनाने के लिए कथा में स्वेच्छा से परिवर्तन भी किया गया है। नाटकीय तत्त्वों के अभाव तथा लम्बे संवादों के कारण यह नाटक सामाजिकों की ओर आकृष्ट नहीं कर सका। महावीरचरितम् में मुख्य रूप से वीररस का परिपाक हुआ है।

उत्तररामचरितम्-उत्तररामचरित भवभूति का अन्तिम और सवश्रेष्ठ नाटक है। यह कृति भवभूति के जीवन के प्रौढ़ अनुभवों की देन है। कवि के अन्य दोनों नाटकों की अपेक्षा उत्तररामचरित की कथावस्तु तथा नाटकीय कौशल अधिक प्रौढ़ हैं। भवभूति की अत्यधिक भावुकता ने इस ‘उत्तररामचरितम्’ को नाटक के स्थान पर गीति नाट्य बना दिया है। इसमें कुल सात अंक हैं। राम के उत्तरकालीन जीवन की कथा पर जितने भी ग्रन्थ लिखे गए हैं, उनमें उत्तररामचरित जैसी प्रसिद्धि किसी भी ग्रन्थ को नहीं मिल पाई।

यद्यपि उत्तररामचरित का मूल आधार वाल्मीकि रामायण है परन्तु भवभूति ने इसमें अनेक मौलिक परिवर्तन किए हैं। उत्तररामचरित का प्रमुख रस करुण है। करुण रस की अभिव्यंजना में भवभूति इतने सिद्धहस्त हैं कि मनुष्य तो क्या निर्जीव पत्थर भी रो पड़ते हैं। भवभूति की स्थापना है कि एक करुण रस ही है, अन्य शृंगार आदि तो उसी के निमित्त रूप है-‘एको रसः करुण एवं निमित्तभेदात्’। ‘उत्तररामचरितम्’ के तीसरे अंक में करुण रस की जो अजस्र धारा बही है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। करुण रस की इस अद्भुत अभिव्यजंना के कारण ही ये उक्तियाँ प्रसिद्ध हो गई है

‘कारुण्यं भवभूतिरेव तनुते’
उत्तरे रामचरिते भवभूतिः विशिष्यते।

बालकौतुकम् पाठस्य सारः
‘लवकौतुकम्’ यह पाठ ‘भवभूति’ द्वारा रचित ‘उत्तररामचरितम्’ नाटक से लिया गया है। उत्तररामचरितम् के चौथे अंक से यह अंश उद्धृत है। भवभूति के तीनों नाटकों-‘मालतीमाधवम्’ ‘महावीरचरितम्’ तथा ‘उत्तररामचरितम्’ में उत्तररामचरित सर्वोत्कृष्ट रचना है। इसमें काव्य और नाट्य दोनों का संगम हुआ है। श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद का (उत्तरकाल का) चरित्र इसमें वर्णित है, अतः इसका नाम ‘उत्तररामचरितम्’ रखा गया है। यह नाटक करुणरस से ओतप्रोत है। इसमें कवि ने करुणरस से पत्थरों को भी रुला दिया है। श्रीराम के त्याग और वियोग से पूर्ण यह नाटक, नाट्यकला की चरमोत्कर्ष रचना है।

राजा बनने पर, श्रीराम ने सीता का वन में निर्वासन कर दिया। निर्वासिता सीता, महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रह रही है। वहीं पर ही उसके दो जुड़वाँ पुत्र लव-कुश उत्पन्न होते हैं। उनका पालन-पोषण भी आश्रम में ही हो रहा है। उन्हें शस्त्रों और शास्त्रों की विधिवत् शिक्षा दी जा रही है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा स्वयं रचित रामायण का सस्वर गान उन्हें सिखाया गया

एक बार वाल्मीकि आश्रम में, अतिथि के रूप में राजर्षि जनक, कौशल्या तथा अरुन्धती पधारते हैं। वहाँ खेलते हुए बालकों में उन्हें, एक बालक में राम और सीता की छाया दिखाई पड़ती है। वे बालक को गोद में बिठाकर अपने स्नेह को प्रकट करते हैं। इसी मध्य राजा राम का अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा आश्रम में प्रवेश कर जाता है, जिसकी रक्षा स्वयं चन्द्रकेतु (लक्ष्मण-पुत्र) कर रहे हैं। उस शहरी घोड़े को देखने की उत्सुकता आश्रम के बालकों में जागती है और वे उसे देखने के लिए अपने साथ लव को भी बुला लेते हैं। लव पहचान जाता है कि यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा है। सामान्य अश्व नहीं है। घोड़े के रक्षक सैनिक घोषणा द्वारा सबको भयभीत कर रहे हैं कि यह राम का घोड़ा है, इसे पकड़ने का साहस मत करना। लव कुमार इस घोषणा को सुनकर, उस घोड़े को आश्रम में बाँधने का आदेश देते हैं। इस प्रसंग का अत्यन्त मार्मिक चित्रण पाठ में प्रस्तुत है।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 3 बालकौतुकम् Read More »

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

पाठयपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. क्रेताओं तथा विक्रेताओं की बहुत बड़ी संख्या पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या बहुत बड़ी होती है। प्रत्येक क्रेता या विक्रेता कुल बिक्री का बहुत ही छोटा भाग खरीदता अथवा बेचता है।

2. समरूप वस्तु पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में सभी फर्मे एक प्रकार की वस्तु का ही उत्पादन करती हैं। सभी विक्रेताओं द्वारा बेची गई वस्तुएँ, गुण, आकार व रंग-रूप से एक-समान होती हैं।

3. पूर्ण स्वतंत्रता पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार के अंतर्गत किसी भी फर्म को उद्योग में प्रवेश करने तथा उसे छोड़कर बाहर जाने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। जब उद्योग में लाभ हो रहे हों, तो नई फर्मे उद्योग में प्रवेश कर सकती हैं और जब हानि की अवस्था हो, तो कुछ फर्मे उद्योग छोड़कर जा सकती हैं।

4. एक-समान कीमत–पूर्ण प्रतिस्पर्धा बाज़ार में सभी फर्मे मूल्य स्वीकारक होती हैं। अतः समग्र बाज़ार में उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत ही प्रचलित रहती है। एक क्रेता या विक्रेता कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता।

5. पूर्ण ज्ञान-पूर्ण प्रतिस्पर्धा बाज़ार में क्रेताओं और विक्रेताओं को बाज़ार का पूर्ण ज्ञान होता है।

6. विक्रय लागत का अभाव-पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में वस्तुएँ समरूप होती हैं, इसलिए एक फर्म को वस्तु के प्रचार, विज्ञापन आदि पर व्यय करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अतः पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में बिक्री और परिवहन लागतें शून्य होती हैं।

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

प्रश्न 2.
एक फर्म की संप्राप्ति, बाज़ार कीमत तथा उसके द्वारा बेची गई मात्रा में क्या संबंध है?
उत्तर:
एक फर्म की संप्राप्ति, बाज़ार कीमत तथा उसके द्वारा बेची गई मात्रा का गुणनफल है। अर्थात्
फर्म की कुल संप्राप्ति = बिक्री की मात्रा – बाज़ार कीमत
अथवा
TR = q x p
यहाँ TR = कुल संप्राप्ति, q = बिक्री की मात्रा तथा p = कीमत।

प्रश्न 3.
कीमत रेखा क्या है?
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 1
कीमत रेखा से अभिप्राय पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में एक फर्म के माँग वक्र से है जो x-अक्ष के समानांतर एक सीधी रेखा होती है। जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दिखाया गया है। रेखाचित्र में PD रेखा वस्तु की माँग रेखा है। रेखाचित्र से स्पष्ट है कि OP कीमत पर माँग की मात्रा OQ या OQ1 कुछ भी हो सकती है। अन्य शब्दों में, पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में फर्म Q Q1 की औसत व सीमांत संप्राप्ति वक्र OX-अक्ष के समानांतर होती है।

प्रश्न 4.
एक कीमत-स्वीकारक फर्म का कुल संप्राप्ति वक्र, ऊपर की ओर प्रवणता वाली सीधी रेखा क्यों होता है? यह वक्र उद्गम से होकर क्यों गुजरता है?
उत्तर:
एक कीमत-स्वीकारक फर्म का कुल संप्राप्ति वक्र ऊपर की ओर प्रवणता वाली सीधी रेखा इसलिए होता है क्योंकि बाज़ार कीमत स्थिर होती है अर्थात् कुल संप्राप्ति समान दर से बढ़ती है। कुल संप्राप्ति वक्र उद्गम से होकर इसलिए गुजरता है क्योंकि शून्य बिक्री की मात्रा पर कुल संप्राप्ति भी शून्य होती है और बाद में AR = P स्थिर रहने के कारण कुल संप्राप्ति में वृद्धि समान दर पर होती है।
जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दर्शाया गया है।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 2

प्रश्न 5.
एक कीमत-स्वीकारक फर्म का बाज़ार कीमत तथा औसत संप्राप्ति में क्या संबंध है?
उत्तर:
एक कीमत-स्वीकारक फर्म की बाज़ार कीमत तथा औसत संप्राप्ति सदैव बराबर होती है क्योंकि बेची गई प्रत्येक इकाई के मूल्य में कोई परिवर्तन नहीं होता। अर्थात्
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 3

प्रश्न 6.
एक कीमत-स्वीकारक फर्म की बाज़ार कीमत तथा सीमांत संप्राप्ति में क्या संबंध है?
उत्तर:
एक कीमत-स्वीकारक फर्म की बाज़ार कीमत तथा सीमांत संप्राप्ति एक-दूसरे के बराबर होते हैं क्योंकि बेची गई हर अतिरिक्त इकाई की कीमत एक-समान होती है।
अर्थात्
सीमांत संप्राप्ति = औसत संप्राप्ति = कीमत

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

प्रश्न 7.
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म की सकारात्मक उत्पादन करने की क्या शर्ते हैं?
उत्तर:
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म की सकारात्मक उत्पादन करने की शर्ते निम्नलिखित हैं-

  • बाज़ार कीमत (p) = अल्पकालीन सीमांत लागत।
  • अल्पकालीन दीर्घकालीन सीमांत लागत घट नहीं रही है।
  • बाज़ार कीमत ≥ औसत परिवर्ती लागत अथवा दीर्घकालीन औसत लागत।

प्रश्न 8.
क्या प्रतिस्पर्धी बाज़ार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म जिसकी बाज़ार कीमत सीमांत लागत के बराबर नहीं है, उसका निर्गत का स्तर सकारात्मक हो सकता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रतिस्पर्धी बाज़ार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म जिसकी बाज़ार कीमत सीमांत लागत के बराबर नहीं है, उसके निर्गत का स्तर सकारात्मक नहीं हो सकता है, यदि बाज़ार कीमत सीमांत लागत और औसत परिवर्ती लागत से कम है। यदि बाज़ार कीमत सीमांत लागत से कम है, लेकिन औसत परिवर्ती लागत से अधिक है तो उसके निर्गत का स्तर सकारात्मकं हो सकता है। ऐसा इसलिए होता है कि फर्म का उद्देश्य हानि को न्यूनतम करना भी होता है। यदि बाजार कीमत सीमांत लागत और औसत परिवर्ती लागत से कम है तो उत्पादन व बिक्री से हानि अधिक होगी। इसलिए उत्पादन बंद करना अधिक लाभदायक होगा। यदि बाजार कीमत सीमांत लागत से कम, लेकिन औसत परिवर्ती लागत से अधिक है तो उत्पादन जारी रखने पर फर्म को हानि कम होगी। एक फर्म का अधिकतम लाभ तभी होगा जब बाज़ार कीमत (p) सीमांत लागत (MC) के बराबर होगी।

प्रश्न 9.
क्या एक प्रतिस्पर्धी बाज़ार में कोई लाभ-अधिकतमीकरण फर्म सकारात्मक निर्गत स्तर पर उत्पादन कर सकती है, जब सीमांत लागत घट रही हो? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 4
एक प्रतिस्पर्धी बाज़ार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म सकारात्मक स्तर पर उत्पादन कर सकती है यदि सीमांत लागत घट रही हो। अधिकतम लाभ की आवश्यक शर्त यह है कि बाज़ार कीमत (p) सीमांत लागत (MC) से अधिक हो या बराबर हो। इस प्रकार बाज़ार कीमत के MC से कम होने पर लाभ नहीं होगा। यदि एक फर्म बाज़ार कीमत की तुलना में घटती हुई सीमांत लागत पर उत्पादन करती है तो फर्म को लाभ होगा. परंत अधिकतम लाभ नहीं होगा। अधिकतम लाभ के लिए यह आवश्यक है कि बाज़ार कीमत (p) और सीमांत लागत (MC) बराबर हो। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।

संलग्न रेखाचित्र में फर्म की सीमांत लागतं E1 और E के बीच बाज़ार कीमत से कम है जो लाभ की स्थिति दर्शाता है, परंतु फर्म को अधिकतम लाभ E बिंदु पर प्राप्त होगा।

प्रश्न 10.
क्या अल्पकाल में प्रतिस्पर्धी बाज़ार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म सकारात्मक स्तर पर उत्पादन कर सकती है? यदि बाज़ार कीमत न्यूनतम औसत परिवर्ती लागत से कम है, व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 5
अल्पकाल में प्रतिस्पर्धी बाज़ार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म सकारात्मक स्तर पर उत्पादन नहीं करेगी, क्योंकि बाज़ार कीमत न्यूनतम औसत परिवर्ती लागत से कम है। यदि फर्म ऐसी स्थिति में उत्पादन बंद कर देती है, तो उसकी हानि स्थिर लागत के बराबर होगी। यदि फर्म उत्पादन जारी रखती है, तो उसकी हानि स्थिर लागत और कीमत पर औसत परिवर्ती लागत के आधिक्य के योग के बराबर होगी। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।

संलग्न रेखाचित्र में औसत परिवर्ती लागत की तुलना में कीमत कम है फिर भी फर्म उत्पादन करेगी क्योंकि B बिंदु पर उसकी हानि स्थिर लागत के बराबर है। अन्य किसी बिंदु पर फर्म की हानि A, B, E, P से अधिक होगी।

प्रश्न 11.
क्या दीर्घकाल में स्पर्धी बाज़ार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म सकारात्मक स्तर पर उत्पादन कर सकती है? यदि बाज़ार कीमत न्यूनतम औसत लागत से कम है, व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि बाज़ार कीमत न्यूनतम औसत लागत से कम है तो दीर्घकाल में प्रतिस्पर्धी बाज़ार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म सकारात्मक स्तर पर उत्पादन नहीं करेगी। यदि एक फर्म इस स्तर पर उत्पादन करती है तो उसकी कुल लागत कुल संप्राप्ति से अधिक होगी, जिसके फलस्वरूप फर्म को हानि उठानी पड़ेगी। इसलिए दीर्घकाल में फर्म की कीमत औसत लागत के बराबर या अधिक होनी चाहिए। दीर्घकाल में एक फर्म बाज़ार छोड़कर जा सकती है। अतः वह हानि उठाना पसंद नहीं करेगी।

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

प्रश्न 12.
अल्पकाल में एक फर्म का पूर्ति वक्र क्या होती है?
उत्तर:
अल्पकाल में, एक फर्म का पूर्ति वक्र उसके अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र का न्यूनतम औसत परिवर्ती लागत (AVC) से ऊपर को उठता हुआ भाग होता है तथा न्यूनतम औसत परिवर्ती लागत से कम सभी कीमतों पर निर्गत स्तर शून्य होता है।

अल्पकालीन पूर्ति वक्र-हम जानते हैं कि अल्पकाल में AVC की भरपाई होनी अनिवार्य है अन्यथा उत्पादन बंद हो जाएगा। हम यह भी जानते हैं कि अल्पकाल में कीमत, सीमांत लागत के बराबर होती है। इसलिए SMC वक्र ही फर्म का पूर्ति वक्र होता है। तथापि SMC वक्र का केवल उठता हुआ भाग ही पूर्ति वक्र होता है, इसका सारा भाग नहीं।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 6
SMC के बढ़ते हुए भाग का केवल वही हिस्सा किसी फर्म का पूर्ति वक्र है जो AVC के ऊपर स्थित है। इसलिए जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में मोटी रेखा द्वारा दिखाया गया है। SMC, E बिंदु के पहले से ही बढ़ना शुरू कर देती है, परंतु पूर्ति वक्र केवल बिंदु E, AVC का न्यूनतम बिंदु से आरंभ होता है। यदि यह बिंदु F से आरंभ हो, तो SMC का FE हिस्सा पूर्ति वक्र का हिस्सा नहीं हो सकता, क्योंकि यह AVC से कम है।

प्रश्न 13.
दीर्घकाल में एक फर्म का पूर्ति वक्र क्या होता है?
उत्तर:
दीर्घकाल में, एक फर्म का पूर्ति वक्र उसके दीर्घकालीन सीमांत लागत वक्र का न्यूनतम दीर्घकालीन औसत लागत से ऊपर को उठता हुआ भाग होता है तथा न्यूनतम दीर्घकालीन औसत लागत से कम सभी कीमतों पर निर्गत का स्तर शून्य होता है।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 7
दीर्घकालीन पूर्ति वक्र दीर्घकालीन पूर्ति वक्र, अल्पकालीन पूर्ति वक्र से अलग होता है। दीर्घकाल में कोई स्थिर लागतें नहीं होती। इसलिए सारी लागत परिवर्ती है तथा इसकी भरपाई होनी अनिवार्य है। यदि कीमत LAC की भरपाई नहीं करती, उत्पादन बंद हो जाएगा। इसलिए पूर्ति वक्र LMC का वह हिस्सा है जो LAC के न्यूनतम स्तर से ऊपर है। जैसाकि रेखाचित्र में दिखाया गया है, LMC का मोटा हिस्सा दीर्घकालीन पूर्ति वक्र है।

प्रश्न 14.
प्रौद्योगिकीय प्रगति एक फर्म के पूर्ति वक्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 8
प्रौद्योगिकीय प्रगति एक फर्म के पूर्ति वक्र को प्रभावित करती है। यदि प्रौद्योगिकी में सुधार होता है तो उन्हीं पूर्ववत संसाधनों से अधिक इकाइयों का उत्पादन संभव हो जाता है। फलस्वरूप उत्पादन लागत में कमी आती है और पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाता है। जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दिखाया गया है। आरंभ में OP कीमत पर पूर्ति PE है, प्रौद्योगिकी प्रगति के बाद समान कीमत पर पूर्ति बढ़कर PE, हो जाती है। प्रौद्योगिकीय प्रगति से वस्तु की पूर्ति में वृद्धि के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं

  • कंप्यूटरों के प्रयोग से लागत में कमी आना।
  • स्वचालित मशीनों से वस्तु का अधिक उत्पादन।

प्रश्न 15.
इकाई कर लगाने से एक फर्म का पूर्ति वक्र किस प्रकार प्रभावित होता है?
उत्तर:
इकाई कर लगने से वस्तु की प्रति इकाई (औसत) व सीमांत लागत में भी वृद्धि होती है। फलस्वरूप वस्तु की पूर्ति कम हो जाती है और पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाता है। जैसाकि संलग्न रेखाचित्र द्वारा दर्शाया गया है। आरंभ में OP कीमत पर उत्पादक PE मात्रा की पूर्ति करने को तैयार था। इकाई कर के लगने के पश्चात् वह प्रचलित कीमत पर केवल PE1 मात्रा की पूर्ति ही करता है। पूर्ति वक्र अब S1S1 से पीछे को खिसककर SMS बन जाता है।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 9

प्रश्न 16.
किसी आगत की कीमत में वृद्धि एक फर्म के पूर्ति वक्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
सामान्यतया वस्तु की पूर्ति और लागत में ऋणात्मक संबंध होता है। आगतों (Inputs) की कीमत में वृद्धि (जैसे कच्चे माल की कीमत में वृद्धि, श्रमिकों। की मजदूरी में वृद्धि) से वस्तु की लागत में वृद्धि होने के फलस्वरूप वस्तु की पूर्ति। कम हो जाएगी और पूर्ति वक्र बाईं ओर खिसक जाता है। जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दर्शाया गया है। रेखाचित्र में SS प्रारंभिक पूर्ति वक्र है। आगत में वृद्धि होने पर यह बाईं ओर खिसककर S1S1 हो जाता है।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 10

प्रश्न 17.
बाज़ार में फर्मों की संख्या में वृद्धि, बाज़ार पूर्ति वक्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
बाज़ार में फर्मों की संख्या में वृद्धि से बाज़ार पूर्ति में वृद्धि होगी क्योंकि बाज़ार पूर्ति बाज़ार में पाई जाने वाली फर्मों द्वारा की गई पूर्ति का योगफल है। फर्मों की संख्या में वृद्धि से बाज़ार पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 11
संलग्न रेखाचित्र में प्रारंभिक पूर्ति वक्र SS है, जिस पर OP कीमत पर OQ1 पूर्ति है। फर्मों की संख्या में वृद्धि से पूर्ति वक्र S1S1 हो जाता है जिससे उसी कीमत OP पर पूर्ति बढ़कर OQ1 हो जाती है।

प्रश्न 18.
पूर्ति की कीमत लोच का क्या अर्थ है? हम इसे कैसे मापते हैं?
उत्तर:
पूर्ति की कीमत लोच का अर्थ-अन्य बातें समान रहते हुए, वस्तु की कीमत में परिवर्तन के परिणामस्वरूप वस्तु की पूर्ति की मात्रा में जिस दर से परिवर्तन होता है, उसे पूर्ति की कीमत लोच कहते हैं।
पूर्ति की कीमत लोच को मापने की निम्नलिखित विधियाँ हैं-
1.प्रतिशत विधि-प्रतिशत विधि के अंतर्गत पूर्ति की कीमत लोच को मापने के लिए पूर्ति की गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन को कीमत में प्रतिशत परिवर्तन से भाग दिया जाता है। सूत्र के रूप में,
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 12
इस विधि को हम एक उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं। माना कि आम की कीमत 10 रु० प्रति किलोग्राम है और इस कीमत पर आम की 600 किलोग्राम है। यदि आम की कीमत बढ़कर 12 रु० प्रति किलोग्राम हो जाती है तो आम की पूर्ति बढ़कर 800 किलोग्राम हो जाती है। इस उदाहरण में आम की पूर्ति की कीमत लोच होगी।
आम की पूर्ति की कीमत लोच = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
इस उदाहरण में, P0 = 10, Ap = 2, q0 = 600, ∆q = 200
= \(\frac{200}{2} \times \frac{10}{600}\)
= 1.67
अर्थात् es >1 है। अतः पूर्ति अधिक लोचदार है।

2. ज्यामितीय विधि-ज्यामितीय विधि के अंतर्गत पूर्ति की कीमत लोच की गणना पूर्ति वक्र को उद्गम बिंदु (Point of origin) अर्थात् अक्ष केंद्र की ओर विस्तार करके किया जाता है। पूर्ति वक्र को अक्ष केंद्र.से विस्तार करने पर निम्नलिखित स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं

  • यदि पूर्ति वक्र y-अक्ष को पार कर x-अक्ष के ऋणात्मक पक्ष पर पहुँचता है तो पूर्ति की कीमत लोच का मान एक से अधिक होगा।
  • यदि पूर्ति वक्र x-अक्ष के धनात्मक अंश पर पहुँचता है तो पूर्ति की कीमत लोच का मान एक से कम होगा।
  • यदि पूर्ति वक्र अक्ष केंद्र को स्पर्श करता है तो पूर्ति की कीमत लोच का मान एक के बराबर होगा।

ज्यामितीय विधि को हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित कर सकते हैं।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 13

  • वस्तु-A की पूर्ति वक्र इकाई से कम लोचदार है अर्थात् e < 1
  • वस्तु-B की पूर्ति वक्र इकाई के बराबर है अर्थात् e = 1
  • वस्तु-C की पूर्ति वक्र इकाई से अधिक लोचदार है अर्थात् es > 1

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

प्रश्न 19.
निम्न तालिका में कुल संप्राप्ति, सीमांत संप्राप्ति तथा औसत संप्राप्ति का परिकलन कीजिए। वस्तु की प्रति इकाई बाज़ार कीमत 10 रु० है।

बेची गई मात्राकुल संप्राप्तिसीमांत संप्राप्तिऔसत संप्राप्ति
0
1
2
3
5
6

हल:
(i) कुल संप्राप्ति = बेची गई मात्रा x प्रति इकाई कीमत
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 14
प्रयोग किए गए सूत्र-
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 15

प्रश्न 20.
निम्न तालिका में एक प्रतिस्पर्धी फर्म की कुल संप्राप्ति तथा कुल लागत सारणियों को दर्शाया गया है। प्रत्येक उत्पादन स्तर के लाभ की गणना कीजिए। वस्तु की बाज़ार कीमत भी निर्धारित कीजिए।

बेची गई मात्राकुल संप्राप्ति (र०)कुल लागत (रु०)लाभ (रु०)
005
157
21010
31512
52015
62523
73033

हल:
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 16
प्रयोग किए गए सूत्र-
(i) लाभ = कुल संप्राप्ति – कुल लागत
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 17

प्रश्न 21.
निम्न तालिका में एक प्रतिस्पर्धी फर्म की कुल लागत सारणी को दर्शाया गया है। वस्तु की कीमत 10 रु० दी हुई है। प्रत्येक उत्पादन स्तर पर लाभ की गणना कीजिए। लाभ-अधिकतमीकरण निर्गत स्तर ज्ञात कीजिए।

उत्पादनकुल लागत (इकाई) रु०
0 5
115
222
327
431
538
649
763
881
9101
10123

हल:

उत्पादनकीमत (रु०)कुल संप्राप्ति (रु०)कुल लागत (रु०)लाभ (रु०)
01005-5
1101015-5
2102022-2
3103027+3
4104031+9
5105038+12
6106049+11
7107063+7
8108081-1
91090101-11
1010100123-23

प्रयोग किए गए सूत्र

  • कुल संप्राप्ति = उत्पादन x कीमत
  • लाभ = कुल संप्राप्ति – कुल लागत।

प्रश्न 22.
दो फर्मों वाले एक बाज़ार को लीजिए। निम्न तालिका दोनों फर्मों के पूर्ति सारणियों को दर्शाती है। SS1, कालम में फर्म-1 की पूर्ति सारणी, कालम SS2 में फर्म-2 की पूर्ति सारणी है। बाज़ार पूर्ति अनुसूची सारणी का परिकलन कीजिए।

कीमतSS1 इकाइयाँSS2 इकाइयाँ
000
100
210
3– 11
422
533
644

हल:

कीमतSS1
इकाइयाँ
SS2
इकाइयाँ
MSS
(इकाइयाँ)
0000
1000
2100
3– 112
4224
5336
6448

नोट-बाज़ार पूर्ति (MSS) (इकाइयाँ) = SS1 (इकाइयाँ) + SS2 (इकाइयाँ)

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

प्रश्न 23.
दो फर्मों वाले एक बाज़ार को लीजिए। निम्न तालिका में कालम SS1 तथा कालम SS2 क्रमशः फर्म-1 तथा फर्म-2 के पूर्ति सारणियों को दर्शाते हैं। बाज़ार पूर्ति सारणी का परिकलन कीजिए।

कीमतSS1 इकाइयाँSS2 इकाइयाँ
000
100
200
310
420.5
531
641.5
752
862.5

हल:

कीमतSS1 इकाइयाँSS2 इकाइयाँMSS(इकाइयाँ)
0000
1000
2000
3101
420.52.5
5314
641.55.5
7527
862.58.5

नोट-बाज़ार पूर्ति (MSS) = SS1 (किलो) + SS2 (किलो)

प्रश्न 24.
एक बाज़ार में 3 समरूपी फर्मे हैं। निम्नलिखित तालिका फर्म-1 की पूर्ति सारणी दर्शाती है। बाज़ार पूर्ति सारणी का परिकलन कीजिए।

कीमत (रु०)SS1 (इकाई)
00
10
22
34
46
58
610
712
814

हल:
चूँकि तीनों फ समरूप हैं, हम बाज़ार पूर्ति अनुसूची को फर्म-1 की अनुसूची को 3 से गुणा करके प्राप्त कर सकते हैं।

कीमत (रु०)SS1 (इकाई)MSS(इकाई)
000
100
226
3412
4618
5824
61030
71236
81442

वैकल्पिक विधि-
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 18
नोट-बाज़ार पूर्ति (MSS) = SS1 + SS2 + SS3

प्रश्न 25.
10 रु० प्रति इकाई बाज़ार कीमत पर एक फर्म की संप्राप्ति 50 रु० है। बाज़ार कीमत बढ़कर 15 रु० हो जाती है और अब फर्म को 150 रु० की संप्राप्ति होती है। पूर्ति वक्र की कीमत लोच क्या है?
हल:
कुल संप्राप्ति = 50 रु०
वस्तु की पुरानी कीमत = 10 रु०
वस्तु की बेची गई पुरानी इकाइयाँ = \(\frac{50}{10}\) = 5 इकाइयाँ
वस्तु की नई कीमत = 15 रु०
वस्तु की कुल संप्राप्ति = 150 रु०
वस्तु की बेची गई नई इकाइयाँ = \(\frac{150}{15}\) = 10 इकाइयाँ
पूर्ति की कीमत लोच (es) = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
= p0 = 10, ∆p = 15 – 10 = 5, q0 = 5, ∆q = 10 – 5 = 5
= \(\frac{5}{5} \times \frac{10}{5}\)
= \(\frac{50}{25}\)
= 2 उत्तर

प्रश्न 26.
एक वस्तु की बाज़ार कीमत 5 रु० से बदलकर 20 रु० हो जाती है। फलस्वरूप फर्म पूर्ति की मात्रा 15 इकाई बढ़ जाती है। फर्म के पूर्ति वक्र की कीमत लोच 0.5 है। फर्म का आरंभिक तथा अंतिम निर्गत स्तर ज्ञात करें।
हल:
पूर्व कीमत (p0) = 5 रु०
वर्तमान कीमत (p1) = 20 रु०
कीमत में परिवर्तन (Ap) = 20 – 5 = 15 रु०
पूर्ति में परिवर्तन (Aq) = 15 इकाइयाँ
पूर्ति की कीमत लोच (e) = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
0.5 = \(\frac{15}{q^{0}} \times \frac{5}{15}\)
0.5 = \(\frac{75}{15 q^{0}}\)
0.5 = \(\frac{5}{q^{0}}\)
q0 = 10
इस प्रकार, पुरानी पूर्ति (q0) = 10
नई पूर्ति (q1) = 10 + 15 = 25
फर्म का आरंभिक निर्गत स्तर = 10
फर्म का अंतिम निर्गत स्तर = 25 उत्तर

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

प्रश्न 27.
10 रु० बाज़ार कीमत पर एक फर्म निर्गत की 4 इकाइयों की पूर्ति करती है। बाज़ार कीमत बढ़कर 30 रु० हो जाती है। फर्म की पूर्ति की कीमत लोच 1.25 है। नई कीमत पर फर्म कितनी मात्रा की पूर्ति करेगी?
हल:
p0 = 10 रु०
q0 = 4 इकाइयाँ
p1 = 30 रु०
पूर्ति की कीमत लोच (es) = 1.25
125 = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
125 = \(\frac{\Delta q}{30-10} \times \frac{10}{4}\)
125 = \(\frac{\Delta q}{20} \times \frac{10}{4}\)
125 = \(\frac{\Delta q}{8}\)
∆q = 10
पूर्ति की नई मात्रा = पूर्ति की पुरानी मात्रा + पूर्ति में परिवर्तन
= 4+ 10 = 14 इकाइयाँ उत्तर

पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत HBSE 12th Class Economics Notes

→ पूर्ण प्रतिस्पर्धा-पूर्ण प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) उस बाज़ार को कहते हैं जिसमें असंख्य क्रेता तथा समरूप वस्तु के असंख्य विक्रेता होते हैं और वस्तु की कीमत का निर्धारण उद्योग द्वारा किया जाता है। बाज़ार में केवल एक ही कीमत प्रचलित होती है और सभी फर्मों को अपनी वस्तु इसी प्रचलित कीमत पर बेचनी होती है।

→ एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में फर्म कीमत-स्वीकारक होती है। * फर्म की कुल संप्राप्ति (आगम), फर्म की कुल निर्गत बाज़ार कीमत का गुणनफल होती है।
TR = P.Q.
अथवा
उत्पादन की सभी इकाइयों के MR को जोड़कर भी TR प्राप्त हो जाता है। अतः
TR = ∑MR

→ औसत संप्राप्ति (आगम) औसत संप्राप्ति से अभिप्राय है उत्पादक को प्रति इकाई उत्पादन बेच कर प्राप्त होने वाली मौद्रिक राशि।
AR = \(\frac { TR }{ Q }\)

→ कीमत-स्वीकारक फर्म की औसत संप्राप्ति (AR) बाज़ार कीमत के बराबर होती है।

→ सीमांत संप्राप्ति-सीमांत संप्राप्ति (MR) से अभिप्राय है किसी वस्तु की एक इकाई अधिक बेचने से कुल संप्राप्ति (आगम) में होने वाला परिवर्तन।
MR = \(\frac { ∆TR }{ ∆Q }\); TRn – TR-1

→ कीमत स्वीकारक फर्म के लिए सीमांत संप्राप्ति बाज़ार कीमत के बराबर होती है।

→ पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में फर्म की माँग वक्र पूर्णतया लोचदार होती है। यह बाज़ार कीमत पर एक सीधी समस्तरीय रेखा होती है।

→ औसत संप्राप्ति वक्र फर्म की माँग वक्र है-AR वक्र फर्म के माँग वक्र को प्रदर्शित करता है, क्योंकि AR को Y-अक्ष पर और उत्पादन/बिक्री को X-अक्ष पर दिखाया जाता है। हम जानते हैं कि AR = कीमत, अतएव AR वक्र वस्तु की कीमत (Y-अक्ष पर) और वस्तु की बिक्री या माँग (X-अक्ष पर) के बीच संबंध को प्रकट करता है।

→ पूर्ण प्रतिस्पर्धा में AR वक्र पड़ी सीधी रेखा और AR तथा MR बराबर होती है-यह इसलिए क्योंकि पूर्ण प्रतिस्पर्धा में एक फर्म कीमत स्वीकारक (Price-Taker) होती है, जिसका अर्थ है कि फर्म के उत्पादन के समस्त स्तरों के लिए AR समान होती है। पूर्ण प्रतिस्पर्धा की अवस्था में दी हुई कीमत पर फर्म वस्तु की जितनी भी मात्रा चाहे बेच सकती है।

→ फर्म का लाभ, कुल आगम जो वह अर्जित करती है तथा कुल लागत जो वह उठाती है, इनके बीच का अंतर होता है।
π (लाभ) = कुल आगम – कुल लागत

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

→ यदि अल्पकाल में किसी फर्म के लाभ का अधिकतमीकरण निर्गत के किसी धनात्मक स्तर पर होता है, तो उस निर्गत स्तर पर तीन शर्ते पूरी होनी चाहिए
(i) p = अल्पकालीन सीमांत लागत
(ii) अल्पकालीन सीमांत लागत घट नहीं रही है
(iii) p > औसत परिवर्ती लागत

→ किसी फर्म अल्पकालीन पूर्ति वक्र, अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र का न्यूनतम औसत परिवर्ती लागत तथा उससे ऊपर उठता हुआ भाग होता है तथा न्यूनतम औसत परिवर्ती लागत से कम सभी कीमतों पर निर्गत स्तर शून्य होता है।

→ किसी फर्म का दीर्घकालीन पूर्ति वक्र, दीर्घकालीन सीमांत लागत वक्र का न्यूनतम दीर्घकालीन सीमांत लागत तथा – उससे ऊपर, उठता हुआ भाग होता है तथा न्यूनतम दीर्घकालीन सीमांत लागत से कम, सभी कीमतों पर निर्गत स्तर शून्य होता है।

→ प्रौद्योगिकीय प्रगति से फर्म का पूर्ति वक्र दाहिनी ओर शिफ्ट हो जाती है।

→ आगतों की कीमतों में वृद्धि (कमी) से फर्म का पूर्ति वक्र बायीं (दाहिनी) ओर शिफ्ट हो जाती है।

→ प्रति इकाई कर लगाने से फर्म का पूर्ति वक्र बायीं ओर शिफ्ट हो जाती है।

→ बाज़ार में फर्मों की संख्या में वृद्धि से बाज़ार पूर्ति वक्र दाहिनी ओर शिफ्ट हो जाती है।

→ बाज़ार पूर्ति वक्र सभी व्यक्तिगत फर्मों के पूर्ति वक्रों के समस्तरीय योग द्वारा प्राप्त होता है।

→ वस्तु की पूर्ति की कीमत लोच वस्तु की बाज़ार कीमत में एक प्रतिशत परिवर्तन के फलस्वरूप पूर्ति की गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन है।

→ पर्ति की कीमत लोच (es) = HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत 19

→ लाभ-अलाभ-किसी फर्म का समविच्छेद बिंदु (Break Even Point) तब होता है जब TR = TC (कुल संप्राप्ति (आगम) = कुल लागत)। इस स्थिति में उत्पादक के लाभ तथा हानि दोनों शून्य होते हैं। पूर्ति वक्र के जिस बिंदु पर एक फर्म साधारण लाभ अर्जित करती है, वह फर्म का लाभ-अलाभ बिंदु कहलाता है। अतः न्यूनतम औसत लागत का वह बिंदु जिस पर पूर्ति वक्र LRAC (अल्पकाल में SRAC) को काटता है फर्म का लाभ-अलाभ बिंदु कहलाता है। दीर्घकाल में एक फर्म को इस बिंदु को अवश्य प्राप्त करना चाहिए।

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत Read More »

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए

1. किसी वस्तु की अतिरिक्त इकाई की उपयोगिता को क्या कहते हैं?
(A) कुल उपयोगिता
(B) सीमांत उपयोगिता
(C) प्रारंभिक उपयोगिता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) सीमांत उपयोगिता

2. सीमांत उपयोगिता से आशय है-
(A) कुल उपयोगिता-औसत उपयोगिता
(B) एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से कुल उपयोगिता में हुई वृद्धि की मात्रा
(C) कुल उपयोगिता-कुल वस्तुओं की मात्रा
(D) पहली इकाई से प्राप्त उपयोगिता
उत्तर:
(B) एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से कुल उपयोगिता में हुई वृद्धि की मात्रा

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

3. सीमांत उपयोगिता वक्र की आकृति होती है-
(A) X. अक्ष के समानांतर
(B) Y- अक्ष के समानांतर
(C) ऋणात्मक ढाल वाली
(D) धनात्मक ढाल वाली
उत्तर:
(C) ऋणात्मक ढाल वाली

4. कुल उपयोगिता अधिकतम होती है जब-
(A) सीमांत उपयोगिता शून्य होती है
(B) सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक होती है
(C) सीमांत उपयोगिता धनात्मक होती है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) सीमांत उपयोगिता शून्य होती है

5. जैसे-जैसे उपभोक्ता किसी वस्तु की उत्तरोतर इकाई का उपभोग करता है, तो-
(A) सीमांत उपयोगिता बढ़ती जाती है
(B) सीमांत उपयोगिता घटती जाती है
(C) कुल उपयोगिता बढ़ती जाती है।
(D) कुल उपयोगिता घटती जाती है
उत्तर:
(B) सीमांत उपयोगिता घटती जाती है

6. एक उपभोक्ता का संतुलन उस बिंदु पर होता है जहाँ पर-
(A) सीमांत उपयोगिता = कीमत
(B) सीमांत उपयोगिता > कीमत
(C) सीमांत उपयोगिता < कीमत
(D) कुल उपयोगिता = कीमत
उत्तर:
(A) सीमांत उपयोगिता = कीमत

7. सीमांत उपयोगिता धनात्मक होने पर कुल उपयोगिता-
(A) घटती है
(B) बढ़ती है।
(C) ऋणात्मक होती है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) बढ़ती है

8. कुल उपयोगिता घटनी कब प्रारंभ होती है?
(A) सीमांत उपयोगिता के धनात्मक होने पर
(B) सीमांत उपयोगिता के ऋणात्मक होने पर
(C) सीमांत उपयोगिता के शून्य होने पर
(D) सीमांत उपयोगिता की संतुष्टि होने पर
उत्तर:
(B) सीमांत उपयोगिता के ऋणात्मक होने पर

9. यदि उपभोक्ता अपनी आय को X और Y पर व्यय करता है, तो उसे अधिकतम संतुष्टि प्राप्त होगी जब-
(A) MUX = MUY
(B) MUX > MUY
(C) MUX ÷ MUY
(D) MUX + MUY
उत्तर:
(A) MUX = MUY

10. सीमांत उपयोगिता हो सकती है-
(A) धनात्मक
(B) ऋणात्मक
(C) शून्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

11. उपयोगिता विश्लेषण के संदर्भ में, दो वस्तुओं के लिए उपभोक्ता संतुलन की शर्त है-
(A) \(\frac{M U_{x}}{P_{x}}=\frac{M U_{y}}{P_{y}}=M U_{m}\)
(B) \(\frac{\mathrm{MU}_{\mathrm{x}}}{\mathrm{P}_{\mathrm{x}}}=\mathrm{MU}_{\mathrm{m}}\)
(C) \(\frac{\mathrm{MU}_{\mathrm{x}}}{\mathrm{MU}_{\mathrm{m}}}\)
(D) \(\frac{M U_{x}}{P_{x}}+\frac{M U_{y}}{P_{y}}=M U_{m}\)
उत्तर:
(A) \(\frac{M U_{x}}{P_{x}}=\frac{M U_{y}}{P_{y}}=M U_{m}\)

12. उपभोग की इकाइयाँ 1 व 2 हैं तथा कुल उपयोगिता 10 व 18 हैं, सीमांत उपयोगिता क्या होगी?
(A) 6
(B) 8
(C) 9
(D) 12
उत्तर:
(B) 8

13. सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक होने पर कुल उपयोगिता
(A) घटती है
(B) बढ़ती है
(C) शून्य होती है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) घटती है

14. कुल उपयोगिता से सीमांत उपयोगिता का आकलन किया जाता है
(A) MU = TU
(B) MU x TU
(C) MU = \(\frac{\Delta \mathrm{TU}}{\Delta \mathrm{X}}\)
(D) MU ÷ TU
उत्तर:
(C) MU = \(\frac{\Delta \mathrm{TU}}{\Delta \mathrm{X}}\)

15. अनधिमान/तटस्थता वक्र प्रदर्शित करता है
(A) दो वस्तुओं के ऐसे बंडल जिन्हें उपभोक्ता खरीद सकता है
(B) दो वस्तुओं के ऐसे बंडल जिन्हें उपभोक्ता पसंद करता है
(C) दो वस्तुओं के ऐसे विभिन्न बंडल (संयोग) जिन पर संतुष्टि समान होती है
(D) उपभोक्ता का संतुलन
उत्तर:
(C) दो वस्तुओं के ऐसे विभिन्न बंडल (संयोग) जिन पर संतुष्टि समान होती है

16. अनधिमान (तटस्थता) वक्र
(A) बायें से दायें एवं नीचे की ओर मुड़ता है
(B) दायें से बायें एवं ऊपर की ओर मुड़ता है
(C) दायें से बायें किंतु X-अक्ष के समानांतर होता है
(D) नीचे से ऊपर की ओर किन्तु Y. अक्ष के समानांतर होता है
उत्तर:
(A) बायें से दायें एवं नीचे की ओर मुड़ता है

17. अनधिमान वक्र-
(A) मूल बिंदु से नतोदर होते हैं
(B) मूल बिंदु से उन्नतोदर होते हैं
(C) एक सीधी रेखा की भांति होते हैं
(D) कोई निश्चित आकृति नहीं होती
उत्तर:
(B) मूल बिंदु से उन्नतोदर होते हैं

18. अनधिमान वक्र प्रत्येक बिंदु पर-
(A) घटती हुई संतुष्टि बताता है
(B) समान संतुष्टि बताता है
(C) असमान संतुष्टि बताता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) समान संतुष्टि बताता है

19. अनधिमान वक्र प्राथमिकता विश्लेषण पर आधारित है जिसका दृष्टिकोण
(A) क्रमवाचक है
(B) संख्यात्मक है
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) क्रमवाचक है

20. दायीं ओर का अनधिमान वक्र संतुष्टि के
(A) समान स्तर को बताता है
(B) ऊँचे स्तर को बताता है
(C) निम्न स्तर को बताता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) ऊँचे स्तर को बताता है

21. एक उपभोक्ता जब अनधिमान वक्र पर दायें नीचे की ओर चलता है, तो X वस्तु की सीमांत प्रतिस्थापन दर Y वस्तु के लिए
(A) घटती है
(B) बढ़ती है
(C) समान रहती है
(D) उपर्युक्त कोई भी नहीं
उत्तर:
(A) घटती है

22. कुछ घटिया वस्तुओं (Inferior Goods) की कीमत गिराने पर प्रायः उनकी माँग बढ़ने के बजाय घटती है, इसका कारण है-
(A) माँग का नियम
(B) गिफ्फन का विरोधाभास
(C) आय प्रभाव
(D) प्रतिस्थापन प्रभाव
उत्तर:
(B) गिफ्फन का विरोधाभास

23. वस्तु की कीमत तथा उसकी माँग के बीच विपरीत संबंध का कारण है-
(A) सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम
(B) आय प्रभाव
(C) प्रतिस्थापन प्रभाव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. माँग का नियम बताता है-
(A) माँग, कीमत से विपरीत रूप से संबंधित होती है
(B) कीमत, माँग से विपरीत रूप से संबंधित होती है
(C) कीमत, पूर्ति से विपरीत रूप से संबंधित होती है
(D) पूर्ति, कीमत से विपरीत रूप से संबंधित होती है
उत्तर:
(A) माँग, कीमत से विपरीत रूप से संबंधित होती है

25. माँग में विस्तार एवं संकुचन में-
(A) माँग वक्र में परिवर्तन हो जाता है
(B) माँग वक्र में स्थान परिवर्तन हो जाता है
(C) माँग वक्र ऊपर की ओर स्थानांतरित हो जाता है
(D) माँग वक्र नीचे की ओर स्थानांतरित हो जाता है
उत्तर:
(B) माँग वक्र में स्थान परिवर्तन हो जाता है

26. आय एवं माँग के बीच सामान्यतया-
(A) विपरीत संबंध होता है
(B) सीधा संबंध होता है
(C) कोई संबंध नहीं होता है
(D) उपर्युक्त तीनों कथन गलत हैं
उत्तर:
(B) सीधा संबंध होता है

27. निम्नलिखित में से कौन-सा माँग वक्र के नीचे की ओर झुके होने का कारण है?
(A) घटती सीमांत उपयोगिता का नियम
(B) आय प्रभाव
(C) प्रतिस्थापन प्रभाव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

28. गिफ्फन के विरोधाभास (Giffen’s Paradox) से अभिप्राय है-
(A) माँग वक्र का ढाल ऋणात्मक होना
(B) माँग वक्र का ढाल धनात्मक होना
(C) माँग वक्र का OX-अक्ष के समानांतर होना
(D) माँग वक्र का OY-अक्ष के समानांतर होना
उत्तर:
(B) माँग वक्र का ढाल धनात्मक होना

29. निम्नलिखित में से कौन-सा माँग के नियम का अपवाद नहीं है?
(A) प्रतिष्ठासूचक वस्तु
(B) गिफ्फन पदार्थ
(C) अज्ञानता
(D) सामान्य वस्तु
उत्तर:
(D) सामान्य वस्तु

30. निम्नकोटि की वस्तुओं से क्या अभिप्राय है?
(A) कीमत बढ़ने पर माँग कम होती है।
(B) कीमत कम होने पर माँग कम होती है
(C) कीमत में परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(D) कीमत कम होने से माँग बढ़ती है
उत्तर:
(B) कीमत कम होने पर माँग कम होती है

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

31. कीमत में कमी होने से माँग के बढ़ने को कहा जाता है
(A) माँग का विस्तार
(B) माँग का संकुचन
(C) माँग में वृद्धि
(D) माँग में कमी
उत्तर:
(A) माँग का विस्तार

32. पूरक वस्तु की कीमत में कमी होने पर वस्तु की माँग पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
(A) माँग बढ़ेगी
(B) माँग घटेगी
(C) माँग वही रहेगी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) माँग बढ़ेगी

33. माँग में वृद्धि की स्थिति में-
(A) माँग वक्र में नीचे बाईं ओर खिसकाव होता है
(B) माँग वक्र में ऊपर दाईं ओर खिसकाव होता है
(C) माँग वक्र पर नीचे की ओर चलन होता है
(D) माँग वक्र पर ऊपर की ओर चलन होता है
उत्तर:
(B) माँग वक्र में ऊपर दाईं ओर खिसकाव होता है

34. बाज़ार माँग व्यक्त करती है-
(A) बहुत-से व्यक्तियों की माँग को
(B) सभी व्यक्तियों की माँग को
(C) दो व्यक्तियों की माँग को
(D) एक व्यक्ति की माँग को
उत्तर:
(B) सभी व्यक्तियों की माँग को

35. माँग का नियम संबंध व्यक्त करता है-
(A) माँग और कीमत में
(B) माँग और आय में
(C) माँग और अन्य वस्तुओं की कीमत में
(D) माँग और व्यय राशि में
उत्तर:
(A) माँग और कीमत में

36. किन वस्तुओं की माँग आय के साथ प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होती है?
(A) अनिवार्य वस्तुओं की।
(B) निकृष्ट वस्तुओं की
(C) विलासिता की वस्तुओं की
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) अनिवार्य वस्तुओं की

37. माँग वक्र के ऋणात्मक ढलान का कारण है-
(A) घटती सीमांत उपयोगिता का नियम
(B) आय प्रभाव
(C) प्रतिस्थापन प्रभाव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) घटती सीमांत उपयोगिता का नियम

38. माँग में परिवर्तन किससे होता है?
(A) उपभोक्ता की आय से
(B) संबंध अथवा अन्य वस्तुओं की कीमत से
(C) अभिरुचियों एवं कीमत संभावना से
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

39. माँगी गई मात्रा में परिवर्तन का कारण है-
(A) वस्तु की अपनी कीमत में परिवर्तन
(B) आय में परिवर्तन
(C) जनसंख्या में परिवर्तन
(D) अन्य वस्तु की कीमत में परिवर्तन
उत्तर:
(A) वस्तु की अपनी कीमत में परिवर्तन

40. किन वस्तुओं पर माँग का नियम लागू होता है?
(A) गिफ्फन वस्तुओं पर
(B) सामान्य वस्तुओं पर
(C) स्थानापन्न वस्तुओं पर
(D) प्रतिष्ठासूचक वस्तुओं पर
उत्तर:
(B) सामान्य वस्तुओं पर

41. सामान्य वस्तुओं के माँग वक्र का ढलान कैसा होता है?
(A) धनात्मक
(B) ऋणात्मक
(C) स्थिर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) ऋणात्मक

42. यदि आय वृद्धि के परिणामस्वरूप X वस्तु की माँग बढ़ जाती है, तो वस्तु का स्वरूप बताइए
(A) घटिया वस्तु
(B) सामान्य वस्तु
(C) स्थानापन्न वस्तु
(D) पूरक वस्तु
उत्तर:
(B) सामान्य वस्तु

43. माँग में कमी का कारण है
(A) स्थानापन्न वस्तु की कीमत में कमी
(B) पूरक वस्तु की कीमत में कमी
(C) उपभोक्ता की आय में वृद्धि
(D) निकट भविष्य में कीमत में वृद्धि की संभावना
उत्तर:
(A) स्थानापन्न वस्तु की कीमत में कमी

44. यदि x वस्तु की कीमत में वृद्धि के कारण Y वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है, तो इन वस्तुओं के बीच किस प्रकार का संबंध है?
(A) स्थानापन्न वस्तुओं का
(B) पूरक वस्तुओं का
(C) सामान्य वस्तुओं का
(D) घटिया वस्तुओं का
उत्तर:
(A) स्थानापन्न वस्तुओं का

45. गिफ्फन वस्तु के लिए माँग वक्र का ढलान कैसा होता है?
(A) सामान्य
(B) ऋणात्मक
(C) धनात्मक
(D) स्थिर
उत्तर:
(C) धनात्मक

46. माँग की कीमत लोच से अभिप्राय है-
(A) कीमत में परिवर्तन के कारण माँग में परिवर्तन
(B) माँग में परिवर्तन
(C) वास्तविक आय में परिवर्तन
(D) कीमत में परिवर्तन
उत्तर:
(A) कीमत में परिवर्तन के कारण माँग में परिवर्तन

47. एक ऐसा माँग वक्र जो X-अक्ष के समानांतर होता है। यह किस प्रकार की लोच प्रदर्शित करता है?
(A) अनंत
(B) इकाई से कम
(C) शून्य
(D) बेलोचदार माँग
उत्तर:
(A) अनंत

48. कीमत लोच गुणांक की गणना के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है-
(A) \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
(B) \(\frac{\Delta p}{\Delta q} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
(C) \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{q^{0}}{p^{0}}\)
(D) \(\frac{\Delta p}{\Delta q} \times \frac{p^{0}}{p^{0}}\)
उत्तर:
(A) \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)

49. यदि कीमत में कमी के परिणामस्वरूप माँग में परिवर्तन न हो तो लोच गुणांक निम्नलिखित होगा
(A) शून्य
(B) अनंत
(C) इकाई के बराबर
(D) इकाई से अधिक
उत्तर:
(A) शून्य

50. निम्नलिखित सूत्र में-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 1
रिक्त-स्थान में लिखा जाएगा-
(A) माँग में परिवर्तन
(B) मूल कीमत
(C) माँगी गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन
(D) मूल माँग
उत्तर:
(C) माँगी गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन

51. यदि माँग में प्रतिशत परिवर्तन कीमत में प्रतिशत परिवर्तन से कम हो तो माँग की लोच ……………. होगी।
(A) इकाई
(B) इकाई से अधिक
(C) इकाई से कम
(D) शून्य
उत्तर:
(C) इकाई से कम

52. माँग की लोच प्रदर्शित करती है-
(A) माँगी गई मात्रा में परिवर्तन
(B) माँगी गई मात्रा में परिवर्तन की दर
(C) कीमत में परिवर्तन
(D) आय में परिवर्तन
उत्तर:
(B) माँगी गई मात्रा में परिवर्तन की दर

53. माँग की कीमत लोच की श्रेणियाँ कितनी होती हैं?
(A) सात
(B) पाँच
(C) बारह
(D) दो
उत्तर:
(B) पाँच

54. माँग की मूल्य लोच से अभिप्राय है
(A) कीमत तथा माँग में होने वाले परिवर्तन का अनुपात
(B) कीमत तथा आय में होने वाले परिवर्तन का अनुपात
(C) कीमत तथा संबंधित वस्तु की माँग में होने वाले परिवर्तन का अनुपात
(D) कीमत के बढ़ने से माँग में होने वाले परिवर्तन का अनुपात
उत्तर:
(A) कीमत तथा माँग में होने वाले परिवर्तन का अनुपात

55. जो वस्तुएँ बहुत सस्ती तथा महँगी होती हैं, उनकी माँग होती है-
(A) लोचदार
(B) पूर्ण लोचदार
(C) पूर्ण बेलोचदार
(D) बेलोचदार
उत्तर:
(D) बेलोचदार

56. ‘कार तथा पेट्रोल की माँग’ कहलाती है-
(A) पूरक
(B) स्थानापन्न
(C) इकाई
(D) शून्य
उत्तर:
(A) पूरक

57. जब वस्तु की 50 रुपए प्रति इकाई कीमत पर माँग 1,000 इकाइयाँ हैं तथा 30 रुपए कीमत पर माँग बढ़कर 4,000 इकाइयाँ हो जाती हैं, तो आनुपातिक विधि द्वारा माँग की मूल्य सापेक्षता होगी-
(A) 7.5 (> 1)
(B) 1/2 (< 1)
(C) 0 (शून्य)
(D) 1 (= 1)
उत्तर:
(A) 7.5 (> 1)

58. नीचे एक रेखाचित्र दिखाया गया है, जिसमें माँग वक्र AB बिंदु विधि द्वारा माँग की मूल्य सापेक्षता की मात्राएँ लिखी गई हैं, इनमें से कौन-सी गलत है?
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 2
(A) C
(B) D
(C) E
(D) B
उत्तर:
(B) D

59. संलग्न रेखाचित्र व्यक्त करता है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 3
(A) कम लोचदार माँग
(B) अधिक लोचदार माँग
(C) पूर्णतया लोचदार माँग
(D) इकाई लोचदार माँग
उत्तर:
(C) पूर्णतया लोचदार माँग

60. एक सरल माँग वक्र के मध्य-बिंदु पर माँग की लोच होगी-
(A) 2
(B) 1/2
(C) 1
(D) 4
उत्तर:
(C) 1

61. जब माँग वक्र OY-अक्ष के समानांतर होता है, तो इससे प्रकट होता है-
(A) माँग की इकाई लोच
(B) पूर्णतया लोचदार माँग
(C) पूर्णतया बेलोचदार माँग
(D) अपेक्षाकृत अधिक लोचदार माँग
उत्तर:
(C) पूर्णतया बेलोचदार माँग

62. पूर्णतया बेलोचदार माँग वक्र पर माँग की कीमत लोच क्या होगी?
(A) अनंत
(B) इकाई
(C) शून्य
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) शून्य

63. माँग की कीमत लोच मापने की कौन-सी विधि है?
(A) प्रतिशत विधि
(B) कुल व्यय विधि
(C) ज्यामितीय विधि
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

64. निम्नलिखित में से कौन-सी जोड़ी प्रतिस्थापन वस्तुओं का उदाहरण है?
(A) कार और पेट्रोल
(B) कॉफी और दूध
(C) लिम्का, पेप्सी कोला
(D) ये सभी
उत्तर:
(C) लिम्का, पेप्सी कोला

B. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. तटस्थता वक्र मूल बिंदु की ओर ……………. होता है। (नतोदर/उन्नतोदर)
उत्तर:
उन्नतोदर

2. सीमांत उपयोगिता वक्र की आकृति …….. ढाल वाली होती है। (ऋणात्मक/धनात्मक)
उत्तर:
ऋणात्मक

3. कुल उपयोगिता अधिकतम होती है, जब सीमांत उपयोगिता ………… होती है। (धनात्मक/शून्य)
उत्तर:
शून्य

4. जैसे-जैसे उपभोक्ता किसी वस्तु की उत्तरोत्तर इकाई का उपभोग करता है, तो ……… घटती जाती है। (कुल उपयोगिता/सीमांत उपयोगिता)
उत्तर:
सीमांत उपयोगिता

5. किसी वस्तु की अतिरिक्त इकाई की उपयोगिता को …………….. कहते हैं। (कुल उपयोगिता/सीमांत उपयोगिता)
उत्तर:
सीमांत उपयोगिता

6. तटस्थता वक्र तकनीक का प्रतिपादन …………. द्वारा किया गया। (हिक्स/मार्शल)
उत्तर:
हिक्स

7. बजट रेखा को …………….. रेखा कहा जाता है। (लागत कीमत)
उत्तर:
कीमत

8. आय एवं माँग के बीच सामान्यतया ………… संबंध होता है। (विपरीत/सीधा)
उत्तर:
सीधा

9. जब सीमांत उपयोगिता (MU) घट रही होती है, तब कुल उपयोगिता…… दर से बढ़ती है। (घटती हुई/बढ़ती हुई)
उत्तर:
घटती हुई

10. जब माँग वक्र Ox-अक्ष के समानान्तर होती है, तब माँग की लोच ………… होती है। (शून्य/अनन्त)
उत्तर:
अनन्त

C. बताइए कि निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत

  1. किसी वस्तु की मात्रा और उसके तुष्टिगुण में सीधा संबंध होता है।
  2. किसी वस्तु की जितनी अधिक मात्रा हमारे पास होती है उतनी ही हम उसकी कम मात्रा प्राप्त करना चाहते हैं।
  3. माँग के विस्तार में चलन एक माँग वक्र से दूसरे माँग वक्र पर होता है।
  4. माँगी गई मात्रा में परिवर्तन और माँग में परिवर्तन एक नहीं होता।
  5. माँग की कीमत लोच (eD) = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
  6. जब माँग पूर्णतया लोचदार होती है तो लोच का गुणांक शून्य होता है।
  7. जब कीमत के कम होने पर कुल व्यय बढ़ता है तो माँग की लोच इकाई से अधिक कहलाती है।
  8. घटती सीमांत उपयोगिता का नियम मुद्रा पर लागू नहीं होता।
  9. घटती सीमांत उपयोगिता का नियम प्रगतिशील कर-प्रणाली का आधार है।
  10. बजट रेखा को सम-उत्पाद रेखा भी कहते हैं।
  11. तटस्थता वक्र पर उपयोगिता समान रहती है।
  12. उपयोगिता विचारधारा को गणनावाचक विचारधारा (Cardinal Approach) भी कहते हैं।
  13. तटस्थता वक्र वह वक्र है जिसके विभिन्न बिंदु अधिकतम सन्तुष्टि व्यक्त करते हैं।
  14. गिफ्फन वस्तु माँग के नियम का अपवाद है।
  15. स्थानापन्न वस्तु की कीमत में वृद्धि माँग में वृद्धि का कारण होती है।
  16. हमें अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त होती है जब कुल उपयोगिता बराबर होती है।
  17. गणनावाचक तुष्टिगुण विश्लेषण का संबंध घटते सीमांत तुष्टिगुण से है।
  18. दो तटस्थता वक्र एक-दूसरे को काट सकते हैं।
  19. किसी वस्तु की अतिरिक्त इकाइयों का उपभोग करने से यदि कुल उपयोगिता स्थिर रहती है तो सीमांत उपयोगिता शून्य होगी।
  20. गिफ्फन वस्तुओं पर माँग का नियम लागू होता है।

उत्तर:

  1. गलत
  2. सही
  3. गलत
  4. सही
  5. सही
  6. गलत
  7. सही
  8. गलत
  9. सही
  10. गलत
  11. सही
  12. सही
  13. गलत
  14. सही
  15. सही
  16. गलत
  17. सही
  18. गलत
  19. सही
  20. गलत।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
माँग का नियम क्या है?
उत्तर:
अन्य बातें समान रहने पर, माँग का नियम, वस्तु की कीमत और उसकी माँग में विपरीत संबंध बताता है।

प्रश्न 2.
माँग वक्र पर चलने का क्या अर्थ है?
उत्तर:
माँग वक्र पर चलने का अर्थ यह है कि एक उपभोक्ता की माँग में होने वाले परिवर्तनों को उसी माँग वक्र पर दिखाया जाता है।

प्रश्न 3.
माँग वक्र के खिसकने का क्या अर्थ है?
उत्तर:
माँग वक्र के खिसकने का अर्थ यह है कि एक उपभोक्ता की माँग में होने वाले परिवर्तनों को दूसरे माँग वक्र पर दिखाया जाता है।

प्रश्न 4.
माँग की मूल्य लोच से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप माँग की मात्रा में होने वाले परिवर्तन के माप को माँग की मूल्य लोच कहते हैं।

‘प्रश्न 5.
माँग के विस्तार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
माँग के विस्तार का अर्थ माँग में होने वाली उस बढ़ोतरी से है, जो उस वस्तु की कीमत में कमी के फलस्वरूप होती है।

प्रश्न 6.
माँग का अर्थ बताइए।
उत्तर:
माँग वस्तु की वह मात्रा है जिसे विशेष कीमत व विशेष समय में क्रेता खरीदने को तैयार होता है।

प्रश्न 7.
व्यक्तिगत मॉग से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यक्तिगत माँग से अभिप्राय वस्तु की विभिन्न कीमतों पर एक व्यक्ति विशेष द्वारा माँगी गई विभिन्न मात्राओं से है।

प्रश्न 8.
उपभोक्ता का संतुलन क्या है?
उत्तर:
उपभोक्ता का संतुलन वह स्थिति है जहाँ एक उपभोक्ता को एक दी हुई निश्चित आय और वस्तुओं की दी हुई कीमत परं अधिकतम संतुष्टि प्राप्त होती है और जहाँ से वह हटना नहीं चाहता।

प्रश्न 9.
बजट रेखा क्या है?
उत्तर:
बजट रेखा वह रेखा है जो दो वस्तुओं के ऐसे विभिन्न बंडलों को दिखाती है, जिन्हें उपभोक्ता दी हई कीमतों और दी हुई आय पर खरीद सकता है।

प्रश्न 10.
एक बजट सेट कब परिवर्तित होता है?
उत्तर:

  • जब दो वस्तुओं में से किसी एक या दोनों वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन होता है।
  • जब उपभोक्ता की आय में परिवर्तन हो।

प्रश्न 11.
बजट रेखा की प्रवणता (ढाल) क्या मापती है?
उत्तर:
बजट रेखा की प्रवणता (ढाल) उस दर को मापती है जिस पर उपभोक्ता X-वस्तु के बदले Y-वस्तु खरीदता है, जबकि वह अपनी पूरी आय व्यय कर देता है।

प्रश्न 12.
कुल उपयोगिता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
वस्तु की कुल इकाइयों के उपभोग से प्राप्त सीमांत उपयोगिताओं के योग को कुल उपयोगिता कहते हैं। सूत्र के रूप में-
कुल उपयोगिता = सीमांत उपयोगिताओं का जोड़

प्रश्न 13.
सीमांत उपयोगिता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से प्राप्त उपयोगिता को सीमांत उपयोगिता कहते हैं। वैकल्पिक रूप में इसे ऐसे भी परिभाषित कर सकते हैं-वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से कुल उपयोगिता में होने वाली वृद्धि को सीमांत उपयोगिता कहते हैं। सूत्र के रूप में-
सीमांत उपयोगिता = अतिरिक्त इकाई के उपभोग से प्राप्त उपयोगिता

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

प्रश्न 14.
सीमांत उपयोगिता से कुल उपयोगिता का आकलन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
कुल उपयोगिता = सीमांत उपयोगिताओं का जोड़ अर्थात्
TU = ∑ MU. 378121
TU = MU1 + MU2 + MU3 + ……….. + MUn

प्रश्न 15.
किसी वस्तु की कीमत में 7% कमी के कारण उसकी माँग में 3.5% वृद्धि हो गई, उस वस्तु की माँग की लोच के बारे में आप किस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे?
उत्तर:
मांग की लोच (eD)= IMGG
अतः वस्तु की माँग की लोच इकाई से कम है।

प्रश्न 16.
ह्रासमान सीमांत उपयोगिता का नियम क्या है?
उत्तर:
ह्रासमान सीमांत उपयोगिता का नियम, “अन्य बातें स्थिर रहने पर जैसे-जैसे किसी वस्तु की अतिरिक्त इकाइयों का उपभोग किया जाता है, वैसे-वैसे उनसे प्राप्त होने वाली सीमांत उपयोगिता क्रमशः घटती जाती है।”

प्रश्न 17.
तटस्थता (अनधिमान) वक्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
तटस्थता वक्र से अभिप्राय उस वक्र से है जो दो वस्तुओं के विभिन्न बंडलों को प्रदर्शित करते हैं, जो बराबर संतुष्टि प्रदान करते हैं और जिनके बीच उपभोक्ता चयन करते समय तटस्थ रहता है।

प्रश्न 18.
तटस्थता वक्र की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • तटस्थता वक्र सदैव मूल बिंदु की ओर उन्नतोदर होता है।
  • इसका ढलान ऋणात्मक होता है।

प्रश्न 19.
एकदिष्ट अधिमान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एकदिष्ट अधिमान का अर्थ यह है कि एक उपभोक्ता दो वस्तुओं के विभिन्न बंडलों में से उस बंडल को अधिमान देता है, जिसमें इन वस्तुओं में से कम-से-कम एक वस्तु की अधिक मात्रा हो और दूसरे बंडल की तुलना में दूसरी वस्तु की मात्रा भी कम न हो।

प्रश्न 20.
स्थानापन्न वस्तु से क्या अभिप्राय है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर उसकी स्थानापन्न वस्तु की माँग भी बढ़ जाती है और कीमत कम होने पर स्थानापन्न वस्तु की माँग घट जाती है। उदाहरण के लिए, चाय और कॉफी, कार और स्कूटर, कोका कोला और लिम्का आदि स्थानापन्न वस्तुएँ हैं।

प्रश्न 21.
प्रतिस्थापन की सीमांत दर (MRS) क्या है?
उत्तर:
प्रतिस्थापन की सीमांत दर ‘Y’ वस्तु की वह मात्रा है जिसे उपभोक्ता ‘X’ वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई पाने के लिए छोड़ने को तैयार है। संक्षेप में,
MRS = (-) \(\frac { ∆Y }{ ∆Y }\)
प्रतिस्थापन की सीमांत दर (MRS) की प्रवृत्ति सदैव ऋणात्मक होती है।

प्रश्न 22.
निम्न कोटि या घटिया वस्तुएँ क्या होती हैं?
उत्तर:
निम्नस्तरीय या निम्न कोटि वस्तुएँ (Inferior Goods) ऐसी वस्तुओं को कहा जाता है जिनके लिए माँग उपभोक्ता की आय के विपरीत दिशा में जाती है। उपभोक्ता की आय बढ़ने पर इनकी माँग घटती है और आय घटने पर इनकी माँग बढ़ती है। उदाहरण के लिए, मोटे अनाज, मोटा कपड़ा, घटिया मार्क वाली वस्तुएँ, टोंड दूध आदि।

प्रश्न 23.
माँग फलन किसे कहते हैं?
उत्तर:
माँग फलन किसी वस्तु की माँग और उसको निर्धारित करने वाले विभिन्न कारकों के बीच संबंध को व्यक्त करने का गणितीय रूप है। दूसरे शब्दों में, माँग फलन से अभिप्राय है कि किसी वस्तु की माँगी गई मात्रा किन-किन कारकों का फल है अर्थात किन-किन तत्त्वों पर निर्भर करती है।

प्रश्न 24.
बजट रेखा की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. बजट रेखा एक उपभोक्ता द्वारा दो वस्तुओं की दी हुई कीमतों पर और उपभोक्ता की निश्चित आय पर दोनों वस्तुओं के ऐसे बंडलों या संयोगों को दर्शाता है, जिन्हें उपभोक्ता खरीद सकता है।
  2. बजट रेखा को कीमत रेखा भी कहा जाता है। यह बाएँ से दाएँ झुकती हुई एक सीधी रेखा होती है। वस्तुओं की कीमत में परिवर्तन या उपभोक्ता की आय में परिवर्तन से कीमत रेखा की स्थिति अथवा ढाल बदलती है।।

प्रश्न 25.
“यदि वस्तु की कीमत बढ़ती है तो परिवार को उस पर व्यय बढ़ाना ही पड़ेगा।” पक्ष या विपक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
वस्तु की कीमत बढ़ने पर परिवार का वस्तु पर व्यय बढ़ भी सकता है और कम भी हो सकता है। व्यय उस स्थिति में बढ़ेगा, जब वस्तु की eD < 1 हो, लेकिन जब वस्तु की eD > 1 हो तो वस्तु की कीमत बढ़ने के फलस्वरूप परिवार का व्यय कम होगा। अतः वस्तु की कीमत बढ़ने के फलस्वरूप परिवार का व्यय आवश्यक रूप से नहीं बढ़ेगा।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उपयोगिता क्या है? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
उपयोगिता का अर्थ-किसी वस्तु या सेवा में मानव-आवश्यकता को संतुष्ट करने की शक्ति को उपयोगिता कहते हैं। अन्य शब्दों में, पदार्थ का वह गुण जिससे किसी मानवीय आवश्यकता की संतुष्टि होती है, अर्थशास्त्र में उपयोगिता कहलाती है; जैसे रोटी में भूख मिटाने का गुण, पानी में प्यास बुझाने का गुण एवं अध्यापक में पढ़ाने का गुण उपयोगिता कहलाते हैं अर्थात् वस्तु या सेवा की आवश्यकतापूरक शक्ति को उपयोगिता कहते हैं।

उपयोगिता की विशेषताएँ-उपयोगिता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • उपयोगिता व्यक्तिगत है अर्थात् व्यक्ति द्वारा अनुभव किया जाने वाला संतुष्टि गुण है।
  • वस्तु की उपयोगिता उपभोग की तीव्रता पर निर्भर करती है; जैसे प्यासे व्यक्ति के लिए पानी की उपयोगिता बहुत अधिक है, जबकि प्यास-रहित व्यक्ति के लिए पानी की उपयोगिता न के बराबर है।
  • उपयोगिता हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होती है।

प्रश्न 2.
उपभोक्ता संतुलन का क्या अर्थ है? एक वस्तु की स्थिति में इसकी शर्त बताइए।
उत्तर:
उपभोक्ता संतुलन का अर्थ-उपभोक्ता संतुलन से अभिप्राय उस स्थिति से है जहाँ उपभोक्ता को अपनी निश्चित आय से अधिकतम संतुष्टि प्राप्त हो और वह उपभोग के इस तरीके में कोई परिवर्तन नहीं लाना चाहता हो।

एक वस्तु की स्थिति में उपभोक्ता संतुलन की शर्त-उपयोगिता विश्लेषण के अनुसार एक ही वस्तु की स्थिति में एक उपभोक्ता उस समय संतुलन पर होगा, जब वस्तु की सीमांत उपयोगिता का मौद्रिक मान और वस्तु की कीमत में समानता हो। अन्य शब्दों में, उपभोक्ता की संतुलन स्थिति में उसकी कुल उपयोगिता का मौद्रिक मान और कुल व्यय का अंतर अधिकतम होना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित शर्त पूरी होनी चाहिए-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 4

प्रश्न 3.
तालिका की सहायता से माँग के नियम की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
माँग का नियम वस्तु की कीमत तथा वस्तु की माँगी गई मात्रा के बीच विपरीत अर्थात् ऋणात्मक संबंध (Inverse or Negative Relationship) को व्यक्त करता है। माँग के नियम के अनुसार यदि अन्य बातें समान रहें तो नीची कीमत पर वस्तु की माँग अधिक होगी और ऊँची कीमत पर वस्तु की माँग कम होगी। इसे हम निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं-

सेबों की कीमत (रु०) मेंसेबों की माँग (कि०ग्रा०) में
15200
14300
13500
12800
111200

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि जब सेबों की कीमत 15 रुपए प्रति किलोग्राम है, तो बाज़ार में सेबों की माँग 200 किलोग्राम है। यदि सेबों की कीमत घटकर 14 रुपए प्रति किलोग्राम हो जाती है, तो बाज़ार में सेबों की माँग 300 किलोग्राम हो जाती है।

प्रश्न 4.
माँग के कोई तीन निर्धारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
माँग के तीन निर्धारक तत्त्व निम्नलिखित हैं-
1. वस्तु की कीमत-साधारणतया ‘अन्य बातें समान रहने पर’ वस्तु की कम कीमत पर अधिक माँग तथा अधिक कीमत पर कम माँग की जाती है।

2. संबंधित वस्तुओं की कीमतें-एक वस्तु विशेष की माँग अन्य संबंधित वस्तुओं की कीमतों पर भी निर्भर करती है। संबंधित वस्तुएँ दो प्रकार की होती हैं-(1) पूरक वस्तुएँ तथा (2) स्थानापन्न या प्रतियोगी वस्तुएँ। पूरक वस्तुएँ वे हैं, जिनकी माँग एक साथ की जाती है; जैसे पेट्रोल तथा कार की माँग। इनका संबंध इस प्रकार का होता है कि एक की कीमत में वृद्धि से दूसरे की माँग कम हो जाती है तथा एक की कीमत में कमी होने से दूसरे की माँग बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए, यदि कारों की कीमत कम हो जाती है तो पेट्रोल की माँग बढ़ जाती है। स्थानापन्न या प्रतियोगी वस्तुएँ वे हैं, जो कि एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग की जा सकती हैं; जैसे चाय के स्थान पर कॉफी। ऐसी दशा में यदि एक वस्तु की कीमत बढ़ जाती है तो इसकी प्रतियोगी वस्तु की माँग बढ़ जाती है।

3. उपभोक्ताओं की रुचि तथा प्राथमिकताएँ-उपभोक्ताओं की रुचि, फैशन, आदत (Taste, Fashion and Habits) आदि का माँग पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जिन वस्तुओं के लिए उपभोक्ताओं की रुचि बढ़ जाती है उनकी माँग बढ़ जाती है। इसके विपरीत रुचि कम होने पर माँग कम हो जाती है। यदि लोग चाय की अपेक्षा कॉफी पसंद करने लगते हैं तो कॉफी की माँग बढ़ जाएगी और चाय की माँग कम हो जाएगी। इसी प्रकार फैशन में परिवर्तन होने पर पुराने डिज़ाइन वाले कपड़ों की माँग कम हो जाती है और नए डिज़ाइन वाले कपड़ों की मांग बढ़ जाती है।

प्रश्न 5.
माँग के संकुचन तथा माँग में कमी में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
माँग के संकुचन तथा माँग में कमी में अंतर निम्नलिखित हैं

माँग का संकुचनमाँग में कमी
1. यह वस्तु की अपनी कीमत में वृद्धि होने के कारण होता है।1. यह वस्तु की अपनी कीमत के अतिरिक्त अन्य तत्त्वों/कारकों; जैसे उपभोक्ता की आय में कमी, स्थानापन्न वस्तुओं की कीमत में कमी, पूरक वस्तुओं की कीमत में वृद्धि तथा उपभोक्ता की वस्तु के लिए रुचि तथा प्राथमिकता में कमी आदि के कारण होती है।
2. रेखाचित्रीय दृष्टिकोण से यह एक ही माँग वक्र के नीचे वाले बिंदु से ऊपर वाले बिंदु की ओर संचलन द्वारा प्रकट होता है।2. रेखाचित्रीय दृष्टिकोण से यह माँग वक्र के पीछे या बाईं ओर खिसकाव द्वारा प्रकट होती है।

प्रश्न 6.
माँग के विस्तार तथा माँग में वृद्धि में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
माँग के विस्तार तथा माँग में वृद्धि में अंतर निम्नलिखित हैं-

माँग का विस्तारमाँग में वृद्धि
1. यह केवल वस्तुं की अपनी कीमत में कमी होने के कारण होता है।1. यह वस्तु की अपनी कीमत के अतिरिक्त अन्य तत्त्वों/कारकों; जैसे कि उपभोक्ता की आय में वृद्धि, स्थानापन्न वस्तुओं की कीमत में वृद्धि, पूरक वस्तुओं की कीमत में कमी तथा उपभोक्ता की वस्तु के लिए रुचि तथा प्राथमिकता में वृद्धि आदि के कारण होती है।
2. रेखाचित्रीय दृष्टिकोण से यह माँग वक्र के दाईं या आगे की ओर खिसकाव द्वारा व्यक्त होती है।2. रेखाचित्रीय दृष्टिकोण से यह एक माँग वक्र के ऊपर के बिंदु से नीचे के बिंदु की ओर संचलन द्वारा व्यक्त होता है।

प्रश्न 7.
माँग के विस्तार तथा संकुचन और माँग में वृद्धि तथा कमी में अंतर बताइए।
उत्तर:
माँग के विस्तार तथा संकुचन और माँग में वृद्धि तथा कमी में अंतर निम्नलिखित हैं-

माँग का विस्तार तथा संकुचनमाँग में वृद्धि तथा कमी
1. कीमत में परिवर्तन के कारण होता है।1. कीमत की अपेक्षा अन्य तत्त्वों; जैसे आय, फैशन, रीति-रिवाज, मौसम, जनसंख्या आदि में परिवर्तन के कारण होती है।
2. इसे ‘माँगी गई मात्रा में परिवर्तन’ कहते हैं।2. इसे ‘माँग में परिवर्तन’ कहते हैं।
3. चलन एक ही माँग वक्र पर होता है।3. माँग वक्र में खिसकाव होता है अर्थात चलन भिन्न माँग वक्र पर होता है।

प्रश्न 8.
माँग में वृद्धि के मुख्य कारण बताइए।
उत्तर:
माँग में वृद्धि के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-

  1. उपभोक्ता की आय में वृद्धि
  2. स्थानापन्न वस्तु की कीमत में वृद्धि
  3. पूरक वस्तु की कीमत में कमी
  4. वस्तु के लिए उपभोक्ता की पसंद तथा प्राथमिकता में वृद्धि
  5. क्रेताओं की संख्या में वृद्धि
  6. भविष्य में कीमत वृद्धि की संभावना
  7. भविष्य में उपभोक्ता की आय बढ़ने की संभावना।

प्रश्न 9.
“माँग वक्र जितना चपटा होगा, माँग की लोच उतनी ही अधिक होगी।” समझाइए।
उत्तर:
जब माँग वक्र एक ही बिंदु से निकल रही हो, तब माँग वक्र जितना चपटा होगा, माँग की लोच उतनी ही अधिक होगी। इस स्थिति को संलग्न रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 4a
रेखाचित्र में एक ही बिंदु P से निकल रही माँग वक्र D2 चपटी है इसलिए माँग वक्र D1 की तुलना में अधिक लोचदार है। यह इसलिए होता है कि यदि वस्तु की कीमत OP से कम होकर OP1 हो जाती है, तब माँग वक्र D1 शून्य (Zero) से OQ1 तक माँग की मात्रा में वृद्धि को दर्शाता है। जबकि माँग वक्र D2 शून्य से OQ2 माँग की मात्रा में वृद्धि को दर्शाता है। इसका अभिप्राय यह है कि कीमत में दिए हुए परिवर्तन के कारण D1 की तुलना में D2 में परिवर्तन D2 माँग की मात्रा अधिक है। अतः माँग वक्र D2 माँग वक्र D1 की तुलना में अधिक लोचदार है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

प्रश्न 10.
सीमांत उपयोगिता ह्रासमान नियम को तालिका व रेखाचित्र द्वारा संक्षेप में समझाएँ।
उत्तर:
सीमांत उपयोगिता हासमान नियम के अनुसार जैसे-जैसे किसी व्यक्ति द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तु की इकाइयों में वृद्धि होती जाती है, वैसे-वैसे उसकी सीमांत उपयोगिता घटती जाती है। इसे निम्नांकित तालिका एवं रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया गया है-
तालिका : सीमांत उपयोगिता हासमान नियम

उपभोग की गईकुल उपयोगिता
(TU)
सीमांत उपयोगिता
(MU)
188
2146
3184
4202
5200
618-2

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 5
रेखाचित्र में ox-अक्ष पर वस्तु की इकाइयों को तथा 0Y-अक्ष पर उपयोगिता को दर्शाया गया है। MU वक्र सीमांत उपयोगिता को प्रकट करता है। यह वक्र बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुका है। इसका तात्पर्य यह है कि अगली इकाई की सीमांत उपयोगिता (MU) घटती जाती है।।

प्रश्न 11.
अनधिमान मानचित्र से क्या अभिप्राय है? रेखाचित्र की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
संतुष्टि के विभिन्न स्तरों को व्यक्त करने वाले अनधिमान वक्रों के समूह को अनधिमान (तटस्थता) मानचित्र कहते हैं। प्रत्येक अनधिमान वक्र विभिन्न संतुष्टि स्तर को दर्शाता है। इस प्रकार यह अनधिमान वक्रों का एक ऐसा परिवार है जो उपभोक्ता की दो वस्तुओं की संतुष्टि की पूर्ण तस्वीर पेश करता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 5a
संलग्न रेखाचित्र में दो वस्तुओं के विभिन्न बंडलों (संयोगों) की सहायता से तीन अनधिमान वक्र IC1, IC2, IC3 बनाए गए हैं। तीनों अनधिमान वक्रों को संयुक्त रूप से एक-साथ दर्शाने वाला रेखाचित्र अनधिमान मानचित्र कहलाएगा। इस संबंध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि सबसे ऊँचा अनधिमान वक्र (जैसे कि रेखाचित्र में वक्र IC3) सर्वाधिक संतुष्टि का स्तर दर्शाता है, जबकि सबसे नीचा अनधिमान वक्र (जैसेकि रेखाचित्र में वक्र IC1) सबसे कम संतुष्टि स्तर को दर्शाता है। दूसरे शब्दों में, अनधिमान वक्र उद्गम बिंदु O से जैसे-जैसे दूर होता जाएगा वैसे-वैसे उनका संतुष्टि स्तर बढ़ता जाएगा क्योंकि ऊँचे वक्र पर वस्तु-X और वस्तु-Y की इकाइयों का उपभोग अधिक हो रहा है।

प्रश्न 12.
किसी वस्तु की आवश्यकता और माँग के बीच अंतर बताइए।
उत्तर:
किसी वस्तु की आवश्यकता से अभिप्राय यह होता है कि एक व्यक्ति उस वस्तु को प्राप्त करने का इच्छुक है। वस्तु की आवश्यकता के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उस व्यक्ति के पास उस वस्तु को खरीदने के लिए क्रय-शक्ति भी हो। एक वस्तु की माँग से अभिप्राय यह है कि एक व्यक्ति उस वस्तु को प्राप्त करने का इच्छुक है, जिसे खरीदने के लिए उसके पास पर्याप्त क्रय-शक्ति है तथा खरीदने के लिए वह क्रय-शक्ति का त्याग करने के लिए तैयार है। इस प्रकार वस्तु की आवश्यकता माँग को जन्म देती है, परंतु आवश्यकता वस्तु की माँग नहीं बनाती।
वस्तु की माँग = वस्तु की आवश्यकता + व्यक्ति के पास समुचित क्रय-शक्ति होना + क्रय-शक्ति के त्याग की तत्परता

प्रश्न 13.
माँग वक्र का स्थानांतरण या माँग वक्र का खिसकाव या माँग में परिवर्तन क्या है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
माँग वक्र के खिसकाव से अभिप्राय है कि माँग वक्र प्रारंभिक माँग वक्र के ऊपर या नीचे खिसक जाती है। इस प्रकार का परिवर्तन तब आता है जब कीमत के अतिरिक्त अन्य कारकों; जैसे आय, फैशन आदि में परिवर्तन होने से माँग कम या अधिक हो जाती है। इसे माँग के स्तर में होने वाला परिवर्तन कहा जाता है। इन तत्त्वों में परिवर्तन आने से माँग के घटने को माँग में कमी तथा माँग के बढ़ने को माँग में वृद्धि कहा जाता है।

प्रश्न 14.
एक वस्तु के माँग वक्र के दाईं ओर खिसकने के कोई तीन कारण बताइए।
उत्तर:
एक वस्तु के माँग वक्र के दाईं ओर खिसकने के तीन कारण निम्नलिखित हैं-
1. आय में वृद्धि-जब किसी उपभोक्ता की आय में वृद्धि होती है, तो उसकी क्रय-शक्ति पहले की तुलना में अधिक हो जाती है। फलस्वरूप वह बाज़ार में अधिक मात्रा में वस्तु की माँग करेगा। इस प्रकार घटिया वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का माँग वक्र भी दाईं ओर खिसक जाता है।

2. रुचि और प्राथमिकता-जब उपभोक्ताओं की रुचि और प्राथमिकताओं में परिवर्तन किसी वस्तु के पक्ष में होता है, तो उस वस्तु की माँग बढ़ जाती है, जिसके कारण माँग वक्र दाईं ओर खिसक जाता है।

3. संबंधित वस्तुओं की कीमतें-यदि एक वस्तु की प्रतिस्थापन वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है, तो उस वस्तु का माँग वक्र दाईं ओर खिसक जाएगा। यदि एक पूरक वस्तु की कीमत में गिरावट होती है, तो भी उस वस्तु का माँग वक्र दाईं ओर खिसक जाएगा।

प्रश्न 15.
रेखाचित्रों की सहायता से माँग का संकुचन तथा माँग में कमी को समझाइए।
उत्तर:
माँग का संकुचन-जब कीमत में वृद्धि के कारण वस्तु की माँग में गिरावट आती है, तो इसे माँग का संकुचन कहते हैं। माँग के संकुचन में उसी माँग वक्र पर नीचे से ऊपर की ओर संचलन होता है; जैसे कि संलग्न रेखाचित्र (i) में दश कि जब वस्तु की कीमत OP से बढ़कर OP1 हो जाती है, तो वस्तु की माँग OQ से कम होकर OQ1 रह जाती है। अतः QQ1 वस्तु की माँग में संकुचन है।

माँग में कमी-जब वस्तु की कीमत में वृद्धि के अतिरिक्त अन्य कारणों से वस्तु की माँग में गिरावट होती है, तो इसे माँग , में कमी कहते हैं। माँग में कमी से माँग वक्र बाईं ओर खिसक जाता है; जैसे कि संलग्न रेखाचित्र (ii) में दर्शाया गया है माँग में कमी को संलग्न रेखाचित्र (ii) द्वारा स्पष्ट किया गया है। रेखाचित्र में, हम देखते हैं कि माँग वक्र बाईं ओर खिसककर D1D1 हो गया है अर्थात् माँग OQ से घटकर OQ1 हो गई है। अतः QQ1 माँग में कमी है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 6

प्रश्न 16.
एक वस्तु के माँग वक्र के बाईं ओर खिसकने के कोई तीन कारण बताइए।
उत्तर:
एक वस्तु के माँग वक्र के बाईं ओर खिसकने के तीन कारण निम्नलिखित हैं
1. आय में कमी-जब किसी उपभोक्ता की आय में कमी होती है, तो उसकी क्रय-शक्ति पहले की तुलना में कम हो जाती है। फलस्वरूप वह बाज़ार में कम मात्रा में वस्तु की माँग करेगा। इस प्रकार घटिया वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का माँग वक्र भी बाईं ओर खिसक जाता है।

2. रुचि और प्राथमिकता-जब उपभोक्ताओं की रुचि और प्राथमिकताओं में परिवर्तन किसी वस्तु के विरोध में होता है, तो उस वस्तु की माँग घट जाती है, जिसके कारण माँग वक्र बाईं ओर खिसक जाता है।

3. संबंधित वस्तुओं की कीमतें यदि एक स्थानापन्न वस्तु की कीमत में कमी होती है, तो उस वस्तु का माँग वक्र बाईं ओर खिसक जाएगा। यदि एक पूरक वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है, तो भी उस वस्तु का माँग वक्र बाईं ओर खिसक जाएगा।

प्रश्न 17.
यदि दो माँग वक्र एक-दूसरे को काटते हैं, तो कटाव (प्रतिच्छेदन) बिंदु पर किस वक्र की लोच अधिक होगी?
उत्तर:
जब दो माँग वक्र एक-दूसरे को काटते हैं, तो कटाव बिंदु पर कम ढाल वाले माँग वक्र की लोचशीलता अधिक होगी। इसे संलग्न रेखाचित्र द्वारा समझा जा सकता है। रेखाचित्र में DD तथा D1D1 दो माँग वक्र हैं और ये C बिंदु पर काट रहे हैं। इस बिंदु के अनुरूप कीमत P0 और दोनों वक्रों पर माँग की मात्रा Q0 है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 7
जब कीमत बढ़कर P1 हो जाती है तो कम ढाल वाले माँग वक्र DD पर माँग की मात्रा में गिरावट Q0Q2 के बराबर आती है जबकि अधिक ढाल वाले माँग वक्र D1D1 पर गिरावट Q0Q0 है। अतः दोनों माँग वक्रों के लिए कीमत में प्रतिशत वृद्धि तो समान है, परंतु माँग की मात्रा में गिरावट कम ढाल वाले माँग वक्र पर अधिक है। स्पष्ट है कि कम ढाल वाले माँग वक्र के प्रतिच्छेदन (कटाव) बिंदु पर लोचशीलता अधिक होती है।

प्रश्न 18.
नीचे ढालू सीधी माँग-वक्र पर कीमत लोच Y-अक्ष पर (∞) से आरंभ होकर X-अक्ष पर शून्य (0) हो जाती है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
माँग की लोच को मापने का सूत्र है- \(e_{\mathrm{D}}=\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 8
नीचे दाईं ओर ढालू माँग वक्र का ढाल (Slope) \(\frac { ∆p }{ ∆q }\) के समान है और यह सारी माँग वक्र पर एक समान रहता है। इसका ये भी अर्थ है कि ढाल का उल्टा (Reciprocal of the Slope) अर्थात् \(\frac { ∆q }{ ∆p }\) भी समान रहेगा। इसलिए, माँग की लोच \(\frac { p }{ q }\) में परिवर्तन को में परिवर्तन के आधार पर जाना जा सकता है। जैसा कि रेखाचित्र में दर्शाया गया है, जहाँ DD रेखा Y-अक्ष पर मिलती है वहाँ माँग (q) शून्य है, इसलिए \(\frac { p }{ q }\)(∞) के समान है। इसके विपरीत जहाँ DD रेखा X-अक्ष पर मिलती है, वहाँ कीमत शून्य (0) है, इसलिए \(\frac { p }{ q }\) शून्य (0) के समान है।

प्रश्न 19.
अनधिमान वक्र के ऊपर तथा नीचे स्थित बिंदु क्या स्पष्ट करते हैं?
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 9
अनधिमान वक्र के ऊपर तथा नीचे स्थित बिंदु अनधिमान वक्र के ऊपर के बिंदु उन बंडलों को दर्शाते हैं, जिन्हें अनधिमान वक्र पर स्थित बिंदुओं द्वारा प्रदर्शित बंडलों की अपेक्षा अधिमानता (Preference) दी गई है। अनधिमान वक्र पर स्थित बिंदओं द्वारा प्रदर्शित बंडलों को अनधिमान वक्र के नीचे स्थित बिंदओं द्वारा प्रदर्शित बंडलों की तलना में अधिमानता दी जाती है।

प्रश्न 20.
एक तालिका की सहायता से एक व्यक्ति की माँग और बाज़ार माँग के बीच भेद कीजिए।
उत्तर:
एक व्यक्ति की माँग अर्थात् व्यक्तिगत माँग से अभिप्राय वस्तु की विभिन्न कीमतों पर एक व्यक्ति विशेष द्वारा माँगी गई विभिन्न मात्राओं से है, जबकि बाज़ार माँग से अभिप्राय एक वस्तु की विभिन्न कीमतों पर बाज़ार के सभी व्यक्तिगत उपभोक्ताओं द्वारा माँगी गई विभिन्न मात्राओं से है। इस प्रकार सभी व्यक्तियों की माँग का जोड़ बाज़ार माँग है। इसे हम निम्नलिखित तालिका द्वारा व्यक्त कर सकते हैं-
तालिका

आइसक्रीम की कीमत (रु०)अजय की माँगरोहित की माँगगौरव की माँगबाज़ार की माँग
170150130350
260100100260
3506080190
4403070140
5301060100
620005070

प्रश्न 21.
माँग का नियम बताइए और इसकी मान्यताएँ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
माँग का नियम वस्तु की कीमत तथा वस्तु की माँगी गई मात्रा के बीच विपरीत संबंध (Inverse Relationship) को व्यक्त करता है। माँग का नियम बतलाता है कि यदि ‘अन्य बातें समान रहें’ तो वस्तु की कीमत बढ़ने पर उसकी माँग घट जाती है और वस्तु की कीमत घटने पर उसकी माँग बढ़ जाती है। इस प्रकार वस्तु की कीमत और माँग में विपरीत अर्थात् ऋणात्मक संबंध होता है।

मान्यताएँ माँग के नियम की परिभाषा में ‘अन्य बातें समान रहें’ वाक्यांश का प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ यह है कि माँग का नियम कुछ मान्यताओं पर आधारित है; जैसे-

  • उपभोक्ताओं की आय में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  • उपभोक्ताओं की प्राथमिकताओं अर्थात् रुचि, फैशन तथा आदत आदि में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  • वस्तु की निकट भविष्य में कीमत परिवर्तन की संभावना नहीं होती।
  • संबंधित वस्तुओं जैसे स्थानापन्न तथा पूरक वस्तुओं की कीमतों में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  • वस्तु सामान्य (Normal Goods) होनी चाहिए।

प्रश्न 22.
एक माँग वक्र की सहायता से माँग के नियम की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
माँग का नियम वस्तु की कीमत तथा वस्तु की माँगी गई मात्रा के बीच के संबंध को प्रदर्शित करता है। माँग के नियम के अनुसार, यदि अन्य बातें समान रहें, तो नीची कीमत पर वस्तु की माँग अधिक होगी और ऊँची कीमत पर वस्तु की माँग कम होगी। इस प्रकार माँग का नियम वस्तु की कीमत और माँग में विपरीत अथवा ऋणात्मक संबंध व्यक्त करता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 10
इस चित्र में वस्तु की OP कीमत पर वस्तु की माँग OQ है। जब कीमत घटकर OP1 हो जाती है, तो वस्तु की माँग बढ़कर OQ1 हो जाती है।

प्रश्न 23.
माँग वक्र दाहिनी ओर ढलवाँ क्यों होता है?
उत्तर:
माँग वक्र दाहिनी ओर ढलवाँ होता है जो वस्तु की कीमत और वस्तु की माँग के ऋणात्मक संबंध को प्रदर्शित करता है। माँग वक्र के दाहिनी ओर ढलवाँ होने का मुख्य कारण ह्रासमान सीमांत उपयोगिता नियम है। ह्रासमान सीमांत उपयोगिता के अनुसार जैसे-जैसे व्यक्ति एक वस्तु की इकाइयों का उपभोग करता है, वैसे-वैसे उसकी सीमांत उपयोगिता घटती जाती है। एक उपभोक्ता वस्तु की उतनी ही इकाइयाँ खरीदेगा जितनी इकाइयाँ खरीदने पर उस वस्तु की सीमांत उपयोगिता का मौद्रिक मान तथा वस्तु की कीमत बराबर हो। परिणामस्वरूप उपभोक्ता वस्तु की अधिक मात्रा तभी खरीदेगा, जब उसकी कीमत कम होकर सीमांत उपयोगिता के बराबर हो जाए। चूँकि सीमांत उपयोगिता वक्र भी दाहिनी ओर ढलवाँ होता है और माँग वक्र भी दाहिनी ओर ढलवाँ होता है।

प्रश्न 24.
माँग के नियम के अपवाद. बताइए।
उत्तर:

  1. माँग का नियम गिफ्फन वस्तुओं पर लागू नहीं होता। गिफ्फन वस्तुएँ निकृष्ट वस्तुएँ होती हैं; जैसे मोटा अनाज, मोटा कपड़ा, डालडा घी, इमली आदि।
  2. माँग का नियम जीवनोपयोगी वस्तुओं (रोटी, नमक) आदि पर लागू नहीं होता।
  3. माँग का नियम उस समय लागू नहीं होगा जब उपभोक्ताओं को भविष्य में कीमत बढ़ने या घटने की आशंका हो।
  4. माँग का नियम दिखावे और प्रतिष्ठा वाली वस्तुओं पर लागू नहीं होता।

प्रश्न 25.
उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर वस्तु की माँग पर पड़ने वाले प्रभाव बताइए।
उत्तर:
उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर वस्त की माँग पर पड़ने वाले प्रभाव की निम्नलिखित स्थितियाँ हो सकती हैं
(1) अनिवार्य वस्तुएँ वे हैं जो मानव जीवन के लिए अति आवश्यक हैं; जैसे भोजन, वस्त्र, मकान आदि। आय में वृद्धि होने पर कुछ समय तक तो इनकी माँग बढ़ेगी और उसके पश्चात् स्थिर हो जाएगी।

(2) आरामदायक और विलासिताओं में उन वस्तुओं को शामिल किया जाता है जो हमारे जीवन को आनंदमय बनाती हैं। आय में वृद्धि होने के साथ ऐसी वस्तुओं की माँग बढ़ती है।

(3) निकृष्ट अथवा घटिया वस्तुएँ वे हैं जिनको उपभोग के क्रम में सबसे निम्न स्थान मिलता है; जैसे मोटा कपड़ा, मोटा अनाज आदि । उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर निकृष्ट वस्तुओं की माँग में कमी आएगी, क्योंकि वह इन वस्तुओं का प्रतिस्थापन उत्कृष्ट वस्तुओं से करना चाहेगा।

प्रश्न 26.
संबंधित वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन का वस्तु की माँग पर क्या प्रभाव पड़ता है? समझाइए।
उत्तर:
एक परिवार द्वारा एक वस्तु की माँग व अन्य वस्तुओं की कीमतों के बीच संबंधों को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) यदि वस्तुएँ एक-दूसरे की स्थानापन्न हैं, तो अन्य वस्तु की कीमत में गिरावट परिवार की वस्तु विशेष की माँग को कम करती है। उदाहरण के लिए, कॉफी की कीमत में कमी चाय की माँग को अपनी ओर आकर्षित कर चाय की माँग को कम कर देगी। इसी प्रकार कॉफी की कीमत में बढ़ोत्तरी से चाय की माँग में बढ़ोत्तरी होगी।

(2) यदि वस्तुएँ एक-दूसरे की पूरक हैं, तो अन्य वस्तुओं की कीमत में गिरावट परिवार की वस्तु विशेष की माँग को आकर्षित करती है। उदाहरण के लिए, पेन की कीमत में कमी के कारण उसकी माँग और साथ ही साथ स्याही की मांग भी बढ़ जाएगी।

(3) यदि वस्तुएँ असंबंधित हैं, तो अन्य वस्तुओं की कीमत में गिरावट या बढ़ोत्तरी परिवार की वस्तु विशेष की माँग को प्रभावित नहीं कर पाती। उदाहरण के लिए, कपड़ों की कीमत में कमी से बॉल पेनों की माँग अप्रभावित रहेगी।

प्रश्न 27.
कॉफी की कीमत में वृद्धि का चाय की माँग पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
कॉफी और चाय स्थानापन्न (Substitute) वस्तुएँ हैं। कॉफी की कीमत में वृद्धि से कॉफी की माँग चाय की ओर जाने की प्रवृत्ति को जन्म देगी, जिसके कारण चाय की माँग में वृद्धि होगी। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 11
रेखाचित्र से स्पष्ट है कि जब कॉफी की कीमत OP से बढ़कर OP1 हो चाय की माँग जाती है, तो चाय की माँग OQ से बढ़कर OQ1 हो गई। इस प्रकार कॉफी की कीमत और चाय की माँग में धनात्मक संबंध होता है।

प्रश्न 28.
चाय की कीमत में वृद्धि का चीनी की माँग पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 12
चाय और चीनी पूरक (Complementary) वस्तुएँ हैं। चाय की कीमत में वृद्धि से चाय की माँग कम हो जाएगी। फलस्वरूप चाय की माँग में कमी से चीनी की मांग भी कम हो जाएगी, क्योंकि चाय और चीनी दोनों पूरक वस्तुएँ हैं। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं। – रेखाचित्र से स्पष्ट है कि जब चाय की कीमत OP से बढ़कर OP1 हो जाती है, तो चीनी की माँग OQ से घटकर OQ1 रह जाती है। इस प्रकार चाय की कीमत और पूरक वस्तु चीनी की माँग में ऋणात्मक संबंध होता है।

प्रश्न 29.
सामान्य वस्तुओं और घटिया वस्तुओं के अर्थ समझाइए।
उत्तर:
सामान्य वस्तुओं अथवा श्रेष्ठ वस्तुओं से अभिप्राय उन वस्तुओं से है जिनकी माँग और उपभोक्ता की आय में सीधा संबंध होता है। घटिया (निकृष्ट) वस्तुओं से अभिप्राय उन वस्तुओं से है जिनकी माँग और उपभोक्ता की आय में विपरीत संबंध होता है। सामान्य वस्तुओं तथा घटिया वस्तुओं के आय माँग वक्र निम्नलिखित हैं-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 13
आय में वृद्धि से सामान्य और अच्छी वस्तुओं की माँग में वृद्धि होती है, लेकिन घटिया वस्तुओं की माँग में कमी होती है। घटिया वस्तु का आय-माँग वक्र नीचे दायीं ओर ढाल वाला होता है, जबकि सामान्य/श्रेष्ठ वस्तु का आय-माँग वक्र बाएं से दाएं ऊपर की ओर ढाल वाला होता है।

प्रश्न 30.
मान लीजिए कि वस्तु A वस्तु Bकी स्थानापन्न है। Bकी कीमत में वृद्धि का Aकी माँग वक्र पर क्या प्रभाव B की कीमत में वृद्धि होगा?
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 14
वस्तु A, वस्तु B की स्थानापन्न है जिसका अर्थ यह है कि वस्तु A और B दोनों एक ही प्रकार की आवश्यकता की संतुष्टि करते हैं अर्थात् वस्तु A को वस्तु B के स्थान पर D(नई माँग वक्र वस्तु A) प्रयोग में लाया जा सकता है। जब वस्तु B की कीमत में वृद्धि होती है, तो वह वस्तु A की तुलना में महँगी हो जाती है। उपभोक्ता वस्त B के स्थान पर वस्त A की ओर आकर्षित A की माँग होंगे। परिणामस्वरूप वस्तु B की कीमत में वृद्धि से वस्तु A का माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाएगा। इसे हम संलग्न रेखाचित्र वृद्धि द्वारा दिखा सकते हैं।

प्रश्न 31.
वस्तु A तथा वस्तु B के उपभोग में पूरकता है। A की कीमत में वृद्धि का B के माँग वक्र पर प्रभाव समझाइए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 15
वस्तु A तथा वस्तु B पूरक वस्तुएँ हैं जिसका अर्थ यह है कि वस्तु A और वस्तु B दोनों का उपभोग साथ-साथ किया जाता है। जब वस्तु A की कीमत में वृद्धि होती है, तो वस्तु A की माँग में कमी होना स्वाभाविक है। वस्तु A की माँग में कमी से वस्तु B की मांग भी हो जाएगी। परिणामस्वरूप वस्तु B का माँग वक्र बाईं ओर खिसक जाएगा।

प्रश्न 32.
रेखाचित्र की सहायता से माँग के विस्तार को समझाइए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 16
माँग का विस्तार-किसी वस्तु की कीमत में कमी होने से यदि वस्तु की माँग पहले से अधिक हो जाती है, तो इसे माँग का विस्तार कहते हैं। माँग के विस्तार की स्थिति में उपभोक्ता उसी माँग वक्र पर ऊपर से नीचे दायीं ओर संचलन करता है, जैसे कि संलग्न रेखाचित्र में दर्शाया गया है कि जब वस्तु की कीमत OP से घटकर OP1 हो जाती है, तो वस्तु की माँग OQ से बढ़कर OQ1 हो जाती है। QQ1 माँग का विस्तार है।

प्रश्न 33.
माँग में कमी के कारण बताइए।
उत्तर:
माँग में कमी के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-

  1. उपभोक्ता की आय में कमी
  2. स्थानापन्न वस्तु की कीमत में कमी
  3. पूरक वस्तु की कीमत में वृद्धि
  4. वस्तु के लिए उपभोक्ता की पसंद व प्राथमिकता में कमी
  5. क्रेताओं की संख्या में कमी
  6. भविष्य में कीमत के कम होने की संभावना
  7. भविष्य में उपभोक्ता की आय कम होने की संभावना।

प्रश्न 34.
एक वक्रीय माँग वक्र के किन्हीं दो बिंदुओं पर माँग की लोच की गणना करके दर्शाएँ।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 17a
संलग्न रेखाचित्र में DD एक वक्रीय माँग वक्र है। यदि हम वक्रीय माँग वक्र पर स्थित किसी बिंदु पर माँग की लोच ज्ञात करते हैं, तो उस बिंदु को स्पर्श करती हुई एक स्पर्श रेखा (Tangent line) खींचेंगे। अब माँग की लोच निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करके आसानी से निकाली जा सकती है
सूत्र के रूप में-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 17
स्पर्श रेखा का ऊपरी भाग रेखाचित्र में DD एक वक्रीय माँग वक्र है, जिस पर दो बिंदु P और P1 स्थित हैं।
अब हम इन बिंदुओं को स्पर्श करती हुई दो सीधी रेखाएँ AB व A1B1 खींचते हैं। AB स्पर्श रेखा माँग वक्र DD पर स्थित P बिंदु को स्पर्श करती है, जबकि A1B1 रेखा P1 बिंदु को स्पर्श करती है। अब रेखा के निचले भाग को ऊपरी भाग से (\(\frac { PB }{ PA }\)) विभाजित करने पर P1 बिंदु पर माँग की लोच इकाई से अधिक प्राप्त होगी। इसी प्रकार P, बिंदु पर भी माँग की लोच ज्ञात की जा सकती है

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बजट रेखा की अवधारणा समझाइए। किन परिस्थितियों में बजट रेखा खिसक जाती है? रेखाचित्रों का प्रयोग कीजिए।
उत्तर:
बजट रेखा का अर्थ-बजट रेखा दो वस्तुओं के उन सभी बंडलों या संयोगों (Combinations) को दर्शाती है जिन्हें उपभोक्ता निश्चित आय और कीमतों पर अपनी समस्त आय से खरीद सकता है। दूसरे शब्दों में, बजट रेखा एक उपभोक्ता द्वारा दी हुई कीमतों और आय के आधार पर दो वस्तुओं पर व्यय की सभी संभावनाएँ दर्शाती है। इस प्रकार बजट रेखा उन संभावनाओं को प्रकट करती है जिन्हें एक उपभोक्ता अपनी दी हुई आय से खरीद सकता है। बजट रेखा का समीकरण निम्नलिखित है
P1x1 + P2 x2 = M
उदाहरण-उदाहरण के लिए, मान लो एक उपभोक्ता की आय (या बजट) 40 रु० है जिसे वह संतरों और सेबों के उपभोग पर व्यय करना चाहता है, जबकि सेब और संतरे की प्रति इकाई कीमत 10 रु० है। दी हुई आय और
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 18
कीमतों के आधार पर उपभोक्ता दो वस्तुओं के निम्नलिखित पाँच बंडलों या संयोगों को खरीद सकता है (0, 4), (1,3), (2, 2), (3, 1), (4,0) जिन पर व्यय, उसकी आय (40 रु०) के बराबर है।

जब ऐसे सभी बंडलों या संयोगों को ग्राफ पर अंकित कर जो बिंदु प्राप्त होते हैं उनको मिलाने से बजट रेखा निकल आती है; जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दर्शाया गया है। उपभोक्ता बजट रेखा सीमा पर या इसके भीतर ही खरीद सकता है बाहर नहीं क्योंकि बजट रेखा उपभोक्ता के बजट (आय) से नियन्त्रित होती है। उपभोक्ता की आय या वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर बजट रेखा का ढाल (Slope) या स्थिति बदल .. जाती है। ध्यान से देखें तो उक्त संयोजनों में सेबों की इकाइयाँ घटाकर ही संतरों की इकाइयाँ बढ़ाई गई हैं। इसे हम रेखाचित्र में । संतरों को X-अक्ष पर और सेबों को Y-अक्ष पर मापकर दिखा सकते हैं। दो वस्तुओं के विभिन्न बंडलों/संयोगों के प्रतीक A, B, C, D, E बिंदुओं को मिलाने से एक सरल रेखा बन गई है जिसे बजट रेखा कहते हैं। ध्यान रहे बजट रेखा को कीमत रेखा (Price Line) या आय रेखा भी कहा जाता है।

बजट रेखा में खिसकाव-बजट रेखा में खिसकाव निम्नलिखित दो कारकों पर निर्भर करता है-

  • उपभोक्ता की आय
  • दोनों वस्तुओं की कीमतें।

जब उपर्युक्त दोनों कारकों अथवा उनमें से किसी एक कारक में कोई परिवर्तन होता है, तो बजट रेखा खिसक जाती है। उपभोक्ता की आय में कमी होने पर बजट रेखा बाईं ओर और उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर बजट रेखा दाईं ओर खिसक जाती है। इसे हम निम्नांकित रेखाचित्र (i) द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं।

जब उपभोक्ता की आय स्थिर है लेकिन X-वस्तु की कीमत में गिरावट आती है, तो बजट रेखा में परिवर्तन होगा क्योंकि. अब उपभोक्ता X-वस्तु की अधिक इकाइयाँ खरीद सकेगा। इसी प्रकार यदि X-वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है, तो बजट रेखा .. में परिवर्तन होगा क्योंकि अब उपभोक्ता X-वस्तु की कम इकाइयाँ खरीद सकेगा। इसे हम निम्नांकित रेखाचित्र (ii) द्वारा दिखा सकते हैं
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 19

प्रश्न 2.
यह समझाइए कि उपभोक्ता संतुलन वहीं क्यों होता है जहाँ उसकी किसी वस्तु से प्राप्त सीमांत उपयोगिता का मौद्रिक मान वस्तु की बाज़ार कीमत के समान है?
अथवा
एक ही वस्तु की स्थिति में, उपयोगिता तालिका (अनुसूची) की सहायता से उपभोक्ता के संतुलन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
उपभोक्ता के संतुलन से अभिप्राय उस स्थिति से है जहाँ उपभोक्ता को अपनी दी हुई आय से अधिकतम संतुष्टि प्राप्त हो। उपयोगिता विश्लेषण के अनुसार, एक ही वस्तु की स्थिति में एक उपभोक्ता उस समय संतुलन की स्थिति में होगा जब सीमांत उपयोगिता (Marginal Utility – MU) का मौद्रिक मान और वस्तु की कीमत में समानता होगी। उपभोक्ता के संतुलन की स्थिति में उसकी कुल उपयोगिता का मौद्रिक मान और कुल व्यय का अंतर अधिकतम होना चाहिए। इसके लिए अग्रलिखित शर्त पूरी होनी चाहिए-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 20
एक रुपए की सीमांत उपयोगिता और वस्तु की कीमत को स्थिर तथा दिया हुआ मान लिया जाता है, लेकिन वस्तु की सीमांत उपयोगिता घटती हुई होती है। उपभोक्ता संतुलन की स्थिति में उनकी कुल उपयोगिता का मौद्रिक मान और कुल व्यय का अंतर अधिकतम होना चाहिए। यदि वस्तु की कीमत गिरती है, तो उपभोक्ता को प्राप्त उपयोगिता अधिक होगी और उपभोक्ता उस समय तक उपभोग करता रहेगा जब तक कि सीमांत उपयोगिता का मौद्रिक मान वस्तु की कीमत के बराबर न हो।

उपभोक्ता के संतुलन को एक उदाहरण द्वारा भी समझाया जा सकता है। एक शीतल पेय की बोतल की कीमत 5 रुपए है – और 1 रुपए की सीमांत उपयोगिता 4 है। मोहिनी एक उपभोक्ता है जिसकी उपयोगिता तालिका निम्नलिखित है-

शीतल पेय की बोतलसीमांत उपयोगिता
160
240
320
410
500
610

मोहिनी तीसरी बोतल पर संतुलन की स्थिति में है और वह चौथी बोतल का उपयोग नहीं करेगी। तीसरी बोतल पर उपर्युक्त शर्त पूरी होती है। इस प्रकार,
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 21

प्रश्न 3.
माँग की कीमत लोच से आप क्या समझते हैं? माँग की कीमत लोच की विभिन्न श्रेणियों की चित्र सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
माँग की कीमत लोच का अर्थ-अन्य बातें समान रहते हुए, वस्तु की कीमत में परिवर्तन के परिणामस्वरूप वस्तु की माँग की मात्रा में जिस अनुपात या दर से परिवर्तन होता है, उसे माँग की कीमत लोच कहते हैं।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 22
संक्षेप में, कीमत में परिवर्तन के प्रति माँग की प्रतिक्रिया का माप माँग की लोच कहलाती है। माँग की लोच के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि माँग की लोच सदैव ऋणात्मक होती है क्योंकि कीमत और माँग में विपरीत संबंध पाया जाता है। किंतु इसके लिए व्यवहार में ऋणात्मक चिह्न (-) का प्रयोग नहीं किया जाता।
माँग की कीमत लोच की श्रेणियाँ माँग की कीमत लोच की मुख्य रूप से निम्नलिखित पाँच श्रेणियाँ हैं-
1. पूर्णतया लोचदार माँग-जब किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन हुए बिना अथवा नाममात्र का परिवर्तन होने पर उस वस्तु की माँग में बहुत अधिक परिवर्तन हो जाए, तो वस्तु की माँग पूर्णतया लोचदार कहलाती है। गणित की भाषा में इसे e = ∞ कहते हैं। इस स्थिति में माँग वक्र OX-अक्ष के समानांतर होता है। जैसाकि चित्र में दर्शाया गया है कि DD माँग वक्र पर OP कीमत में परिवर्तन हुए बिना कभी माँग बढ़कर OQ1 और कभी घटकर OQ2 हो जाती है। इस प्रकार की स्थिति पूर्ण प्रतियोगिता (Perfect Competition) में देखने को मिलती है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 24
2. पूर्णतया बेलोचदार माँग-जब किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर उसकी माँगी जाने वाली मात्रा में कोई परिवर्तन न हो, तो वस्तु की माँग पूर्णतया बेलोचदार कहलाती है। गणित की भाषा में इसे e= 0 कहते हैं। इस स्थिति में माँग वक्र OY-अक्ष के समानांतर होता है। जैसाकि चित्र में दर्शाया गया है कि, DD माँग वक्र पर जब कीमत OP से बढ़कर OP1 या घटकर OP2 हो जाती है, तो माँग OQ ही रहती है। ऐसी स्थिति व्यवहार में बहुत कम देखने को मिलती है, हाँ यदि किसी वस्तु की माँग अत्यधिक आवश्यक हो; जैसे किसी विशेष दुर्लभ दवाई (Rare Medicine) की माँग अथवा किसी अत्यधिक व्यसनी की किसी अवांछनीय पदार्थ जैसे अफीम (Opium) आदि की माँग के लिए माँग वक्र उदग्र (Vertical) हो सकता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 25
3. इकाई लोचदार माँग-जब किसी वस्तु की माँग में ठीक उसी अनुपात में परिवर्तन होता है जिस अनुपात में वस्तु की कीमत में परिवर्तन हुआ है, तो उसे वस्तु की इकाई लोचदार माँग कहा जाता है। यदि किसी वस्तु की कीमत में 25% परिवर्तन होने पर उसकी माँग में भी 25% परिवर्तन आता है, तो उसे इकाई लोचदार माँग कहा जाएगा। गणित की भाषा में इसे e = 1 कहा जाता है। इस स्थिति में माँग वक्र 45° का कोण बनाता हुआ होता है। जैसाकि चित्र में दर्शाया गया है कि कीमत में होने वाला परिवर्तन PP1, माँग में होने वाले परिवर्तन QO1 के बराबर है अर्थात् ∆ P = ∆Q।
कीमत
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 26
माँग में % परिवर्तन = कीमत में % परिवर्तन
साधारणतया सुविधाओं (Comforts) के संदर्भ में माँग आनुपातिक लोचदार होती है।

4. अधिक लोचदार माँग-जब किसी वस्तु की कीमत में थोड़ा परिवर्तन होने से वस्तु की माँग में अधिक परिवर्तन होता है, तो उस वस्तु की माँग अधिक लोचदार कहलाती है। गणित की भाषा में इसे e > 1 कहते हैं। इस स्थिति में माँग वक्र अर्थ लेटी (Semi-Horizontal) अवस्था में होता है। जैसाकि चित्र में दर्शाया गया है कि कीमत में होने वाला परिवर्तन PP, थोड़ा है तथा माँग में होने वाला परिवर्तन QQ. अधिक है अर्थात् ∆P < ∆ Q। माँग में % परिवर्तन > कीमत में % परिवर्तन
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 27
साधारणतया विलासिताओं (Luxuries) के संदर्भ में माँग अधिक लोचदार होती है।

5. कम लोचदार माँग-जब किसी वस्तु की कीमत में अधिक परिवर्तन आने से वस्तु की माँग में थोड़ा परिवर्तन होता है, तो उस वस्तु की माँग कम लोचदार कहलाती है। गणित की भाषा में इसे e < 1 कहते हैं। इस स्थिति में माँग वक्र अर्ध-उदग्र (Semi-Vertical) सा होता है। जैसाकि चित्र में दर्शाया गया है कि कीमत में होने वाला परिवर्तन PP1 अधिक है जबकि माँग में होने वाला परिवर्तन QQ1 कम है अर्थात् ∆P > ∆Q1
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 28
माँग में % परिवर्तन < कीमत में %
परिवर्तन – साधारणतया अनिवार्यताओं (Necessaries) के संबंध में माँग कम लोचदार होती है।

प्रश्न 4.
माँग की कीमत लोच को प्रभावित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
माँग की कीमत लोच को प्रभावित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक माग निम्नलिखित हैं-
1. वस्तु की प्रकृति-किसी वस्तु की माँग की लोच अधिक होगी या कम, यह वस्तु विशेष की प्रकृति पर निर्भर करता है। यदि वस्तु अनिवार्य है; जैसे गेहूँ, तो उसकी कीमत में बहुत अधिक परिवर्तन आने से भी माँग में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आता। अतः अनिवार्य वस्तु की माँग कम लोचदार होती है। इसके विपरीत, विलासिता की वस्तुओं; जैसे एयरकंडीशन की माँग प्रायः अधिक लोचदार होती है। जैसे ही विलासिता की वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन होता है, उनकी माँग में कीमत में परिवर्तन के अनुपात से अधिक परिवर्तन होता है।

2. स्थानापन्न वस्तुओं की उपलब्धता-किसी वस्तु की यदि स्थानापन्न वस्तुएँ उपलब्ध हैं, तो उसकी माँग अधिक लोचदार होगी। उदाहरण के लिए, यदि ब्रुक बांड चाय की कीमत बढ़ जाती है, तो उपभोक्ता लिप्टन चाय का प्रयोग करना आरंभ कर देंगे तथा ब्रुक बांड चाय की माँग में काफी कमी आ जाएगी। दूसरी ओर, यदि एक वस्तु की स्थानापन्न वस्तु उपलब्ध नहीं है; जैसे कि नमक, तो इसकी माँग बेलोचदार या कम लोचदार होगी।

3. वस्तु के कई उपयोग-यदि किसी वस्तु का एक ही उपयोग संभव हो तो उसकी कीमत में परिवर्तन होने से उसकी माँग में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होगा। अतः इसकी माँग बेलोचदार या कम लोचदार होगी। दूसरी ओर, जिस वस्तु के कई उपयोग हैं; जैसे बिजली का उपयोग रोशनी के लिए, कमरा गर्म करने के लिए और भोजन पकाने के लिए किया जाता है, तो ऐसी वस्तु की कीमत के बढ़ने से माँग काफी कम हो जाती है तथा कीमत कम होने से माँग बढ़ जाती है। अतः इसकी माँग अधिक लोचदार मानी जाएगी।

4. उपभोग का स्थगित होना-यदि किसी वस्तु के उपभोग को कुछ समय के लिए स्थगित किया जाए तो उसकी माँग अधिक लोचदार होगी। गर्म कपड़े, टेलीविज़न, जूते आदि अनेक वस्तुओं के उपभोग को कुछ समय के लिए स्थगित करना संभव होता है। इन वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होने से इनकी माँग कम हो जाएगी क्योंकि उपभोक्ता कुछ समय के लिए इन वस्तुओं को नहीं खरीदेगा। फलस्वरूप इनकी माँग लोचदार होगी, लेकिन अनिवार्य वस्तुओं; जैसे अनाज, नमक, दवाइयाँ इत्यादि का उपभोग कुछ समय के लिए स्थगित करना संभव नहीं होता। अतः इनकी माँग बेलोचदार होती है।

5. कीमतें-किसी वस्तु की माँग की लोच उस वस्तु की कीमत द्वारा भी प्रभावित होती है, जिन वस्तुओं की कीमतें बहुत अधिक या बहुत कम होती हैं; जैसे डायमंड तथा माचिस । इनकी माँग सामान्यतः बेलोचदार या कम लोचदार होती है। इन वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन आने से इनकी माँग में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आता। सामान्य कीमत वाली वस्तुओं; जैसे बिजली का पंखा आदि की माँग लोचदार होती है क्योंकि इनकी कीमत में होने वाले परिवर्तनों का माँग पर अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव पड़ता है।

6. वस्तु पर व्यय की जाने वाली आय का अनुपात-माँग की लोच इस बात से भी प्रभावित होती है कि उपभोक्ता अपनी कुल आय का कितना भाग वस्तु पर व्यय करता है। जिन वस्तुओं पर उपभोक्ता की आय का बहुत थोड़ा भाग व्यय होता है; जैसे माचिस, ब्लेड, साबुन आदि, तो इनकी माँग बेलोचदार या कम लोचदार होती है। इसका कारण यह है कि इन वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन आने से उपभोक्ता द्वारा व्यय किए जाने वाले अनुपात में परिवर्तन नहीं आता और वस्तुओं की मांग भी कम नहीं होती। इसके विपरीत, जिन वस्तुओं पर उपभोक्ता अपनी आय का अधिक भाग व्यय करता है; जैसे मकान का किराया, कपड़ों पर व्यय आदि, तो उनकी माँग अधिक लोचदार होती है।

7. आदतें माँग की लोच उपभोक्ता की आदतों पर भी निर्भर करती है। जिन वस्तुओं के उपभोग की उपभोक्ता को आदत पड़ जाती है; जैसे पान, सिगरेट, चाय इत्यादि तो इनकी माँग बेलोचदार या कम लोचदार होती है क्योंकि आदत संबंधी वस्तुओं की कीमत में कितनी भी वृद्धि होने पर माँग में कोई विशेष कमी नहीं आती।

8. समयावधि-माँग की लोच पर समयावधि का भी प्रभाव पड़ता है। अल्पकाल में वस्तु की माँग प्रायः कम लोचदार होती है, जबकि दीर्घकाल में माँग अधिक लोचदार होती है। इसका कारण यह है कि दीर्घकाल में वस्तु की माँग को कीमत के अनुरूप ढालने का काफी समय मिल जाता है, जबकि अल्पकाल में समय इतना कम होता है कि वस्तु की माँग को कीमतों के अनुरूप नहीं ढाला जा सकता।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

प्रश्न 5.
एक वस्तु की माँग संबंधित वस्तुओं की कीमत में परिवर्तनों से कैसे प्रभावित होती है? रेखाचित्रों की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
एक वस्तु की माँग और संबंधित वस्तुओं की कीमतों के संबंध को हम निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं-
1. स्थानापन्न अथवा प्रतियोगी वस्तुएँ-यदि वस्तुएँ एक-दूसरे की स्थानापन्न हैं तो अन्य वस्तु की कीमत में गिरावट परिवार की वस्तु विशेष की माँग को कम करती है। उदाहरण के लिए, कॉफी की कीमत में कमी चाय की माँग को अपनी ओर आकर्षित कर चाय की माँग को कम कर देगी। इसी प्रकार कॉफी की कीमत में बढ़ोतरी से चाय की मांग में भी बढ़ोतरी होगी।

इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं- रेखाचित्र में दर्शाया गया है कि जब कॉफी की कीमत OP से बढ़कर OP1 हो जाती है तो चाय की माँग OQ से बढ़कर OQ1 हो गई। इस प्रकार कॉफी की कीमत और चाय की माँग में धनात्मक संबंध होता है।।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 29

2. पूरक वस्तुएँ यदि वस्तुएँ एक-दूसरे की पूरक हैं तो अन्य वस्तुओं की | कीमत में गिरावट परिवार की वस्तु विशेष की माँग को आकर्षित करती है। उदाहरण के लिए, कार की कीमत में कमी के कारण उसकी माँग और साथ-ही-साथ पेट्रोल की माँग भी बढ़ जाएगी। इसी प्रकार चाय की कीमत में वृद्धि के कारण चाय की माँग में कमी से चीनी की माँग भी कम हो जाएगी, क्योंकि चाय और चीनी दोनों पूरक वस्तुएँ हैं। इसे हम संलग्न रेखाचित्रों स्पष्ट कर सकते हैं
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 30
रेखाचित्र (i) से स्पष्ट है कि जब कार की कीमत OP से घटकर OP1 हो जाती है, तो पेट्रोल की माँग OQ से बढ़कर OQ1 हो जाती है। इसी प्रकार रेखाचित्र (ii) से स्पष्ट है कि जब चाय की कीमत OP से बढ़कर OP1 हो जाती है, तो चीनी की माँग OQ से घटकर OQ1 हो जाती है। इस प्रकार चाय की कीमत और चीनी की माँग में ऋणात्मक संबंध है।

प्रश्न 6.
उदाहरण की सहायता से माँग की कीमत लोच को मापने की कुल व्यय विधि बताइए।
उत्तर:
कुल व्यय विधि के अनुसार, माँग की लोच का माप वस्तु की कीमत में परिवर्तन के परिणामस्वरूप वस्तु पर किए गए कुल व्यय में होने वाले परिवर्तन के आधार पर किया जाता है। कुल व्यय की गणना वस्तु की कीमत को उसकी माँग की मात्रा से गुणा करके की जाती है अर्थात् TE = P x D । कुल व्यय विधि के अनुसार, माँग की लोच को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-
1. इकाई से अधिक लोच-यदि कीमत के घटने से वस्तु पर किया गया कुल व्यय बढ़ जाए और कीमत के बढ़ने से वस्तु पर किया गया कुल व्यय घट जाए, तो माँग की लोच इकाई से अधिक होती है। सांकेतिक रूप में
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 31

2. इकाई के बराबर लोच-यदि वस्तु की कीमत घटने अथवा बढ़ने से वस्तु पर किया गया कुल व्यय स्थिर रहता है, तो माँग की लोच इकाई के बराबर होती है। सांकेतिक रूप में
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 32

3. इकाई से कम लोच यदि वस्तु की कीमत के घटने से वस्तु पर किया गया कुल व्यय घट जाए और कीमत के बढ़ने से कुल व्यय बढ़ जाए तो माँग की लोच इकाई से कम होती है। सांकेतिक रूप में
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 33
कुल व्यय विधि को निम्नलिखित तालिका द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता है
तालिका
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 34
तालिका में स्पष्ट किया गया है कि जब कीमत 10 रुपए प्रति इकाई है तो वस्तु पर कुल व्यय 10 रुपए किया जाता है, परंतु जब कीमत कम होकर 9 रुपए हो जाती है तो इस वस्तु पर कुल व्यय बढ़कर 18 रुपए तथा जब कीमत 8 रुपए हो जाती है तो – कुल व्यय 24 रुपए हो जाता है। अतः माँग की कीमत लोच (मूल्य सापेक्षता) इकाई से अधिक है। जब कीमत 6 रुपए प्रति इकाई से कम होकर 5 रुपए हो जाती है तो कुल व्यय 30 रुपए ही रहता है। अतः माँग की.

कुल व्यय वक्र कीमत लोच (मूल्य सापेक्षता) इकाई के बराबर है। जब कीमत 4 रुपए से 3 रुपए तथा 3 रुपए से 2 रुपए हो जाती है, तो कुल व्यय 28 रुपए से कम होकर 24 रुपए तथा फिर 18 रुपए हो जाता है। अतः माँग की कीमत लोच (मूल्य सापेक्षता) इकाई से कम है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 35
कल व्यय विधि को रेखाचित्र द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता है। रेखाचित्र में OX-अक्ष पर कुल व्यय तथा OY-अक्ष पर कीमत मापी गई है। ABCD कुल व्यय रेखा है। इसका AB भाग इकाई से अधिक कीमत लोच (मूल्य सापेक्षता) को प्रकट करता है, क्योंकि इस स्थिति में कीमत के कम होने से कुल व्यय बढ़ता है। कुल व्यय रेखा का BC भाग इकाई लोचदार माँग को व्यक्त करता है, कुल व्यय क्योंकि कीमत परिवर्तन से कुल व्यय में कोई परिवर्तन नहीं होता। CD भाग इकाई से कम लोचदार माँग को व्यक्त करता है, क्योंकि इस अवस्था में कीमत के कम होने से कुल व्यय भी कम हो जाता है।

प्रश्न 7.
अनधिमान वक्र की सहायता से उपभोक्ता के इष्टतम चयन को समझाइए। रेखाचित्र का प्रयोग कीजिए।
अथवा
अनधिमान/तटस्थता वक्र की सहायता से उपभोक्ता तटस्थता की इष्टतम या संतुलन स्थिति को समझाइए।
उत्तर:
उपभोक्ता संतुलन की अवस्था को तब प्राप्त करता है, जब वह दी हुई आय और वस्तुओं की दी हुई कीमतों पर अपनी संतुष्टि को अधिकतम करता है। यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण बात दो वस्तुओं के उस संयोग (Combination) का चयन करना है जो उपभोक्ता को अधिकतम संतुष्टि प्रदान करता है। इसके लिए तीन जानकारियाँ जरूरी हैं-(i) उपभोक्ता की आय, (ii) वस्तुओं की कीमतें (इन दोनों सूचनाओं का प्रतिनिधित्व बजट रेखा करती है) और (iii) अधिमान सारणी (Preference Schedule) जिसे अनधिमान (तटस्थता) मानचित्र दर्शाता है। उपभोक्ता का संतुलन उस बिंदु पर होता है जहाँ बजट रेखा उच्चतम प्राप्य (Highest attainable) अनधिमान (तटस्थता) वक्र को स्पर्श करती है अर्थात् स्पर्श रेखा (Tangent) बन जाती है। इस बिंदु पर अनधिमान (तटस्थता) वक्र का ढाल (Slope) बजट रेखा के ढाल के बराबर होता है।

संलग्न अनधिमान (तटस्थता) मानचित्र (Indifference Map) में हम बजट रेखा (कीमत रेखा) M खींचते हैं। उपभोक्ता का लक्ष्य अनधिमान (तटस्थता) मानचित्र में सबसे ऊँचा वह बंडल (संयोग) (Combination) उपभोक्ता संतुलन प्राप्त करना है जो बजट रेखा के अंतर्गत संभव हो। वह केवल उस बिंदु प संतुलन प्राप्त करेगा जो बजट रेखा और सर्वोच्च प्राप्य अनधिमान (तटस्थता) वक्र में साझा (Common) बिंदु हो। दूसरे शब्दों में, जिस बिंदु पर बजट रेखा ऊँचे-से-ऊँचे अनधिमान (तटस्थता) वक्र को स्पर्श करती है वही संतुलन बिंदु होगा। रेखाचित्र में बिंदु P संतुलन बिंदु है जहाँ बजट रेखा M उच्चतम प्राप्य (Attainable) वक्र IC2 को स्पर्श करती है। अनधिमान (तटस्थता) वक्र IC3 पर स्थित बंडल (संयोग) बजट रेखा की सीमा से बाहर (ऊपर) होने के कारण अप्राप्य है, जबकि IC1 वक्र पर बंडल (संयोग) वक्र IC2 के बंडल (संयोग) से निश्चित रूप से घटिया है। अतः आदर्शतम या इष्टतम (Optimum) बंडल (संयोग) उस बिंदु पर स्थित है जिस पर बजट रेखा अनधिमान (तटस्थता) वक्र IC2 को स्पर्श (Tangent) करती है। यहाँ वह बिंदु P है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 36
संक्षेप में, उपभोक्ता संतुलन की दो शर्ते हैं-
(i) बजट रेखा को अनधिमान (तटस्थता) वक्र पर स्पर्श रेखा (Tangent) होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, अनधिमान (तटस्थता) वक्र का ढाल = बजट रेखा का ढाल।
(ii) संतुलन बिंदु (यहाँ बिंदु P) पर अनधिमान (तटस्थता) वक्र उद्गम (Origin) बिंदु O की ओर उन्नतोदर (Convex) होना चाहिए अर्थात् सीमांत प्रतिस्थापन दर (Marginal Rate of Substitution) घटती हुई होनी चाहिए।

प्रश्न 8.
माँग वक्र क्या है? माँग वक्र का ढलान किन परिस्थितियों में धनात्मक होता है?
अथवा
माँग के नियमों के अपवादों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
माँग वक्र-माँग वक्र एक ऐसा वक्र होता है जो किसी वस्तु की विभिन्न कीमतों पर माँगी जाने वाली विभिन्न मात्राएँ दर्शाता है। कई विशेष परिस्थितियों में माँग का नियम लागू नहीं होता अर्थात् कीमत और माँग में विपरीत संबंध देखने को नहीं मिलता। इन परिस्थितियों में कीमत बढ़ने पर माँग बढ़ती है और कीमत कम होने पर माँग कम हो जाती है। माँग के नियम के अपवाद की स्थिति में माँग वक्र का ढाल दाईं ओर ऊपर उठता हुआ होता है। जैसा कि संलग्न चित्र में दिखाया गया है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 37
माँग के नियम के अपवाद अथवा माँग वक्र के धनात्मक ढलान के कारण-माँग के नियम के कुछ महत्त्वपूर्ण अपवाद अथवा सीमाएँ निम्नलिखित हैं-
1. अनिवार्य वस्तुएँ -बेन्हम (Benham) के अनुसार जीवन की अनिवार्य वस्तुओं; जैसे गेहूँ, चावल, दालें, घी, आटा, नमक, चीनी, तेल, साबुन आदि पर यह नियम लागू नहीं होता। आटे की कीमत चाहे अधिक हो या कम, फिर भी उपभोक्ता उसकी माँग पहले जितनी ही करता है।

2. वस्तुओं की दुर्लभता का डर-बेन्हम (Benham) के अनुसार जब किसी वस्तु की आने वाले समय में (आपात्कालीन स्थिति; जैसे युद्ध, अकाल आदि) के कारण कमी (Scarcity) हो जाने का डर हो, तो वर्तमान में उसकी कीमत बढ़ने पर भी उसकी माँग बढ़ती जाती है; जैसे भारत में मिट्टी का तेल, डीजल, सीमेंट, रासायनिक खाद, कोयला आदि वस्तुओं की दुर्लभता का डर प्रत्येक समय बना रहता है। यदि इन वस्तुओं की कीमत बढ़ जाए, तो भी इनकी माँग बढ़ जाती है।

3. गिफ्फन वस्तुएँ सर रॉबर्ट गिफ्फन (Sir Robert Giffen) के अनुसार गिफ्फन वस्तुओं (Giffen Goods) पर माँग का नियम लागू नहीं होता। गिफ्फन वस्तुओं की कीमतें बढ़ने पर उनकी अधिक माँग और कीमत गिरने पर उनकी कम माँग की जाती है। उदाहरण के लिए, यदि ज्वार, बाजरा आदि मोटे अनाज की कीमतें कम हो जाती हैं तो आवश्यक नहीं कि उ अधिक मात्रा खरीदें। कीमत कम होने से उपभोक्ता की वास्तविक आय बढ़ जाती है, जिसका वह उत्तम अनाज-गेहूँ, चावल, आदि खरीदने में उपयोग करता है, जिससे मोटे अनाज की माँग कम हो जाएगी। इस प्रकार घटिया वस्तुओं पर यह नियम लागू नहीं होता।

भी घटिया वस्तुएँ माँग के नियम का अपवाद नहीं हैं अर्थात सभी घटिया वस्तुएँ गिफ्फन वस्तएँ नहीं हैं। वे सभी वस्तुएँ घटिया होती हैं जिनका आय प्रभाव ऋणात्मक होता है अर्थात् आय में परिवर्तन होने से जिनकी माँग में विपरीत दिशा में परिवर्तन होता है। परंतु माँग का नियम केवल उन घटिया वस्तुओं पर लागू नहीं होता जिनका धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव, ऋणात्मक आय-प्रभाव से कम है। जिन घटिया वस्तुओं का ऋणात्मक आय प्रभाव धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव से कम है, उन पर माँग का नियम लागू होता है।

4. उपभोक्ता की अज्ञानता-उपभोक्ता की अज्ञानता के कारण भी यह नियम लागू नहीं होता। कभी-कभी उपभोक्ता अज्ञानता के कारण यह सोचता है कि महँगी वस्तुएँ श्रेष्ठ और सस्ती वस्तुएँ निम्नकोटि की होती हैं। ऐसी स्थिति में वे कीमतें बढ़ने पर ही वस्तु की अधिक माँग करते हैं; जैसे क्रीम, पाउडर, लिपस्टिक आदि कॉस्मेटिक्स की बिक्री ऊँची कीमत के आधार पर होती है। सस्ती कीमत पर उपभोक्ता इन्हें घटिया समझकर नहीं खरीदता, परंतु महँगी कीमतों पर वह इन्हें बढ़िया समझकर खरीद लेता है।

5. प्रतिष्ठासूचक वस्तुएँ यह नियम मिथ्या आकर्षण (Snob Appeal) वाली वस्तुओं पर भी लागू नहीं होता। कुछ वस्तुएँ; जैसे आयातित कार, बहुमूल्य हीरे-जवाहरात, कीमती कालीन इत्यादि ऐसी होती हैं जो केवल दिखावे के लिए प्रयोग की जाती हैं और जिन्हें धनी व्यक्ति केवल मान-सम्मान पाने के लिए अपने पास रखना चाहते हैं। जैसे-जैसे इन वस्तुओं की कीमतें बढ़ती जाती हैं, उनकी माँग घटने के स्थान पर अधिक हो जाती है।

प्रश्न 9.
माँग वक्र क्या है? माँग वक्र का ढलान नीचे की ओर क्यों झुका होता है?
अथवा
माँग का नियम क्या है? यह नियम क्यों लागू होता है?
उत्तर:
माँग का नियम अर्थशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण नियम है। माँग का नियम कीमत तथा माँग में विपरीत संबंध (Inverse Relationship) व्यक्त करता है। माँग का नियम बतलाता है कि यदि ‘अन्य बातें समान रहें’ तो वस्तु की कीमत बढ़ने पर उसकी माँग घट जाती है और वस्तु की कीमत घटने पर उसकी माँग बढ़ जाती है। सांकेतिक रूप में माँग का नियम स्पष्ट करता है कि
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 38
माँग के नियम को निम्नलिखित समीकरण द्वारा भी व्यक्त किया जा सकता है
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 39
इसे ऐसे भी पढ़ा जाता है कि X वस्तु की माँग X वस्तु की कीमत का फलन है जबकि संबंधित वस्तुओं की कीमत (P1), उपभोक्ता की आय (Y) तथा रुचि (T) आदि स्थिर रहते हैं अर्थात् किसी वस्तु की कीमत और माँग में विपरीत फलनात्मक संबंध (Inverse Functional Relationship) पाया जाता है। वस्तु की कीमत में कमी होने पर वस्तु की अधिक मात्रा और वस्तु की कीमत बढ़ने पर वस्तु की कम मात्रा खरीदी जाती है।

माँग के नियम को निम्नांकित तालिका व रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
तालिका

चीनी की कीमत
प्रति किलो
(र० में)
चीनी की माँग
(किलो में)
50100
40120
30150
20200
10300

रेखाचित्र-माँग के नियम को संलग्न रेखाचित्र द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता है।

रेखाचित्र में DD वस्तु का बाज़ार माँग वक्र है जो तालिका में दिए गए आँकड़ों के आधार पर खींचा गया है। DD माँग वक्र बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुक रहा है, जो यह स्पष्ट करता है कि वस्तु की कम कीमत पर अधिक माँग और अधिक कीमत पर कम माँग की जाती है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 40
माँग वक्र माँग वक्र एक ऐसा वक्र होता है जो किसी वस्तु की विभिन्न कीमतों पर माँगी जाने वाली विभिन्न मात्राएँ दर्शाता है।

माँग के नियम के लागू होने के कारण अथवा माँग वक्र के दाईं ओर झुकने के कारण-माँग के नियम के लागू होने अथवा माँग वक्र के माँग (किलोग्राम में) दाईं ओर नीचे झुकने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-
1.हासमान सीमांत उपयोगिता का नियम-इस नियम के अनुसार जैसे-जैसे किसी व्यक्ति के पास एक विशेष वस्तु का स्टॉक बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे उसकी सीमांत उपयोगिता घटती जाती है, क्योंकि u = f (s)। उपयोगिता (u) स्टॉक (s) का फलन होती है। एक उपभोक्ता वस्तु की उतनी इकाइयाँ खरीदता है जितनी इकाइयाँ खरीदने से उस वस्तु की सीमांत उपयोगिता तथा कीमत बराबर हो जाए। परिणामस्वरूप उपभोक्ता वस्तु की अधिक मात्रा तभी खरीदेगा जब उसकी कीमत कम होकर सीमांत उपयोगिता के बराबर हो जाए। इसलिए कम कीमत पर अधिक माँग और अधिक कीमत पर कम माँग की जाती है।

2. आय प्रभाव आय प्रभाव के कारण भी माँग का नियम लागू होता है। एक वस्तु की कीमत में परिवर्तन का उपभोक्ता की वास्तविक आय (Real Income) पर जो प्रभाव पड़ता है, उसे आय प्रभाव कहते हैं। जब वस्तु की कीमत गिरती है, तो उपभोक्ता की वास्तविक आय (अर्थात् मौद्रिक आय की क्रय-शक्ति) बढ़ती है क्योंकि अब उपभोक्ता को पहले जितनी वस्तु की मात्रा खरीदने के लिए कम खर्च करना पड़ता है और इसी बची हुई राशि से उसके लिए अधिक मात्रा खरीदना संभव हो जाता है। अतः कीमत के गिरने से आय प्रभाव द्वारा वस्तु की माँग बढ़ेगी और कीमत के बढ़ने से आय प्रभाव द्वारा वस्तु की माँग गिरेगी।

3. स्थानापन्न प्रभाव-स्थानापन्न प्रभाव का संबंध दो वस्तुओं की सापेक्षिक कीमतों (Relative Prices) में परिवर्तन का वस्तु की माँग पर पड़ने वाले प्रभाव से है; जैसे चाय और कॉफी में से किसी एक वस्तु जैसे कॉफी की कीमत बढ़ जाने पर, जो लोग कॉफी के स्थान पर चाय की जितनी अधिक मात्रा खरीदेंगे, उसे प्रतिस्थानापन्न प्रभाव कहते हैं। जब दो संबंधित वस्तुओं की कीमत में ऐसा परिवर्तन होता है कि एक वस्तु सस्ती और दूसरी महँगी होती है, तो उपभोक्ता सस्ती वस्तु को महँगी वस्तु के लिए प्रतिस्थापित करेगा क्योंकि सस्ती वस्तु महँगी वस्तु की तुलना में अधिक मूल्य आकर्षक (Price Attractive) हो जाती है। परिणामस्वरूप जिस वस्तु की कीमत गिरती है, उसकी माँग बढ़ जाती है। अतः स्थानापन्न प्रभाव के कारण कम कीमत वाली वस्तु की अधिक माँग और अधिक कीमत वाली वस्तु की कम माँग की जाती है।

4. विभिन्न प्रयोग कुछ वस्तुओं के विभिन्न प्रयोग होते हैं। ऐसी वस्तु की कीमत गिरने से उसकी माँग अधिक होगी। उदाहरण के लिए, यदि बिजली की कीमत प्रति यूनिट गिर जाए तो लोग बिजली को अनेक प्रयोगों; जैसे प्रैस करने, कपड़े धोने की मशीन चलाने, पानी गर्म करने, हीटर जलाने इत्यादि में प्रयुक्त करेंगे। इससे बिजली की माँग बढ़ेगी। यदि बिजली महँगी हो तो लोग केवल रोशनी करने और पंखा चलाने में ही बिजली का प्रयोग करेंगे। इससे बिजली की माँग घटेगी। अतः विभिन्न प्रयोगों वाली । वस्तुओं की कीमत गिरने पर अधिक माँग और कीमत बढ़ने पर कम माँग की जाती है।

5. बाज़ार में नए उपभोक्ताओं का प्रवेश-किसी वस्तु की कीमत कम होने पर कई नए उपभोक्ता, जो पहले उस वस्तु को नहीं खरीद रहे थे, खरीदने लगते हैं और वस्तु की माँग बढ़ जाती है। मान लीजिए जब अंगूर रु० 50 प्रति किलो होता है तो केवल कुछ धनी व्यक्ति ही अंगूर खरीदेंगे और अंगूर की माँग कम होगी। यदि अंगूर की कीमत कम होकर रु० 10 प्रति किलो हो जाती है, तो कुछ नए उपभोक्ता भी अंगूर की माँग करने लगते हैं और अंगूर की माँग बढ़ जाती है। इसके विपरीत, वस्तु की कीमत बढ़ने पर पुराने उपभोक्ता भी उसे खरीदना बंद कर देते हैं और वस्तु की माँग कम हो जाती है।

प्रश्न 10.
माँग की कीमत लोच के माप की प्रतिशत विधि अथवा आनुपातिक विधि को उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
इस विधि के द्वारा माँग की लोच का माप वस्तु की माँग में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन को वस्तु की कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन से भाग देकर किया जाता है। इसके लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 41
यदि प्रतिशत परिवर्तन के स्थान पर आनुपातिक परिवर्तन ले लिए जाए तो भी माँग की कीमत लोच को मापा जा सकता है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 42
[यहाँ q0 = वस्तु की आरंभिक माँग, q1 = वस्तु की नई माँग, p0 = वस्तु की आरंभिक कीमत, p1 = वस्तु की नई कीमत, ∆q = q1 – q0 (माँग में परिवर्तन), ∆p = p1 – p0 (कीमत में परिवर्तन) ∆ = डेल्टा (परिवर्तन का चिह्न)]
or eD = \(\frac{\Delta q}{q^{0}} \div \frac{\Delta p}{p^{0}}=\frac{\Delta q}{q^{0}} \times \frac{p^{0}}{\Delta p}\)
or eD = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
प्रतिशत और आनुपातिक विधियाँ दोनों एक हैं। यह निम्नलिखित विश्लेषण से स्पष्ट है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 43
इस प्रकार इस विधि के अनुसार, माँग की लोच को मापने का सूत्र है- eD = \(\frac{\mathrm{p}^{0}}{\mathrm{q}^{0}} \times \frac{\Delta \mathrm{q}}{\Delta \mathrm{p}}\)

उदाहरण 

मान लीजिए चीनी की कीमत 10 रुपए प्रति किलोग्राम है, तो चीनी की माँग 100 किलोग्राम है। यदि चीनी की कीमत बढ़कर 11 रुपए प्रति किलोग्राम हो जाती है, तो माँग घटकर 80 किलोग्राम रह जाती है। इस उदाहरण में माँग की कीमत लोच … क्या है?
हल:

चीनी की कीमत माँग
(प्रति किलोग्राम)।
माँग
(किलोग्राम में)
10 रु०100
11 रु०80

(यहाँ, p0 = 10, p1 = 11, ∆p = 11 – 10 = 1
q0 = 100, q1 = 80, ∆q = 80 – 100 = – 20)
eD = \(\frac{\Delta \mathrm{q}}{\Delta \mathrm{p}} \times \frac{\mathrm{p}^{0}}{\mathrm{q}^{0}}=\frac{-20}{1} \times \frac{10}{100}\)
इस उदाहरण में माँग की लोचशीलता -2 है, (-) ऋणात्मक चिह्न हम छोड़ देते हैं। यह केवल कीमत और माँग में विपरीत संबंध का प्रतीक है। अतः माँग की लोच इकाई से अधिक है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

प्रश्न 11.
माँग की कीमत लोच के माप की ज्यामितीक विधि समझाइए।
अथवा
माँग की मूल्य लोच के माप की बिंदु विधि को सुस्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बिंदु लोच विधि अथवा ज्यामितीक विधि-माँग की लोच को मापने की बिंदु विधि को रेखा गणितीय विधि (Geometrical Method) भी कहा जाता है। जब किसी वस्तु की कीमत एवं माँग में बहुत सूक्ष्म परिवर्तन हो तो ऐसी स्थिति में माँग वक्र के किसी एक विशेष बिंदु पर माँग की लोच ज्ञात की जाती है। इस विधि के अनुसार माँग वक्र पर स्थित किसी बिंदु पर माँग की लोच का माप निम्नलिखित सूत्र की सहायता से ज्ञात किया जाता है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 44
यदि Lower Sector > Upper Sector हो तो e > 1 होगी।
यदि Lower Sector < Upper Sector हो तो e < 1 होगी।
यदि Lower Sector = Upper Sector हो तो e = 1 होगी।

इस सूत्र के द्वारा माँग की कीमत लोच का माप निम्न स्पष्ट है- संलग्न चित्र में AB एक सीधी रेखा है। इस माँग वक्र के P बिंदु पर माँग की लोच =\(\frac { PB }{ PA }\) होगी। यहाँ चूंकि PB = PA है इसलिए माँग की लोच इकाई के बराबर अर्थात् e = 1 है।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 45
बिंदु विधि की सहायता से माँग वक्र के विभिन्न बिंदुओं पर माँग की लोच को मापा जा सकता है। जैसा कि चित्र से स्पष्ट है।

चित्र में AB माँग वक्र की लंबाई मान लो 4″ है। माँग वक्र पर तीन बिंदु N, M, L एक-दूसरे से एक-एक इंच की दूरी पर हैं। अतः

M बिंदु पर माँग की लोच = \(\frac{\mathrm{MB}}{\mathrm{MA}}=\frac{2^{\prime \prime}}{2^{\prime \prime}}\) अर्थात् e = 1 होगी।

N बिंदु पर माँग की लोच = \(\frac{\mathrm{NB}}{\mathrm{NA}}=\frac{3^{\prime \prime}}{1^{\prime \prime}}\) अर्थात् e > 1 होगी।

L बिंदु पर माँग की लोच = \(\frac{\mathrm{LB}}{\mathrm{LA}}=\frac{1^{\prime \prime}}{3^{\prime \prime}}\) अर्थात् e < 1 होगी।

बिंदु A पर माँग का निचला हिस्सा AB होगा तथा ऊपर का शून्य होगा, इसलिए
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 46
e = \(\frac{\mathrm{AB}}{0}=\frac{4^{\prime \prime}}{0}\)
अर्थात् e = ∞ (अनंत होगी)।
B बिंदु पर निचला हिस्सा शून्य है तथा ऊपर का हिस्सा AB है। इसलिए e = \(\frac{0}{\mathrm{AB}}=\frac{0}{4^{\prime \prime}}\) अर्थात् e = 0 होगी।
संक्षेप में, सीधी माँग वक्र के मध्य-बिंदु पर माँग की कीमत लोच इकाई के बराबर होगी। मध्य-बिंदु के बाईं ओर के बिंदुओं पर यह इकाई से अधिक होगी, जबकि उसके दाईं ओर स्थित बिंदुओं पर कीमत लोच इकाई से कम होगी। जिस बिंदु पर माँग वक्र OX-अक्ष को स्पर्श करता है, उस बिंदु पर कीमत लोच शून्य होगी, जबकि माँग वक्र के OY-अक्ष पर स्पर्शीय बिंदु पर कीमत लोच अनंत होगी।
संख्यात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी उपभोक्ता की कुल उपयोगिता सूची निम्नांकित तालिका में दिखाई जा रही है। उसकी सीमांत उपयोगिता सची की रचना करें।

उपभोग की इकाइयाँ012345
कुल उपयोगिता (TU)01025384855

हल:

उपभोग की इकाइयाँकुल उपयोगिता (TU)सीमांत उपयोगिता (MU)
000
11010 – 0 = 10
22525 – 10 = 15
33838 – 25 = 13
44848 – 38 = 10
55555 – 48 = 7

प्रश्न 2.
निम्नांकित तालिका में एक उपभोक्ता की सीमांत उपयोगिता सूची दी गई है। यदि शून्य उपभोग की दशा में कुल उपयोगिता भी शून्य हो तो उसकी कुल उपयोगिता सूची की रचना करें।

उपभोग की इकाइयाँ123456
सीमांत उपयोगिता (MU)7108630

हल:

उपभोग की इकाइयाँसीमांत उपयोगिता (MU)कुल उपयोगिता (TU)
000
177
2107 + 10 = 17
3817 + 8 = 25
4625 + 6 = 31
5331 + 3 = 34
6034 + 0 = 34

प्रश्न 3.
निम्नांकित तालिका को पूरा करें-

उपयुक्त इकाइयाँसीमांत उपयोगिता (MU)कुल उपयोगिता (TU)
15050
290?
3?30
4140?
5150?

हल:
कुल उपयोगिता (TU) : 50, 90, 120, 140, 150
सीमांत उपयोगिता (MU) : 50, 40, 30, 20, 10

प्रश्न 4.
निम्नांकित तालिका को पूरा करें-

उपयुक्त इकाइयाँकुल उपयोगिता (TU)सीमांत उपयोगिता (MU)
19
2
36
427
52
627

हल:
कुल उपयोगिता (TU) : 9, 16, 27, 27, 29, 27
सीमांत उपयोगिता (MU) : 9, 7, 6, 5, 2, -2

प्रश्न 5.
नीचे एक उपभोक्ता की वस्तु-X के लिए उपयोगिता तालिका दी हुई है। वस्तु-X की कीमत 6 रु० है। अपनी संतुष्टि को अधिकतम करने के लिए वह कितनी इकाइयों का उपभोग करेगा? (यह मान लीजिए कि उपयोगिता यूटिल्स में मापी जाती है और 1 यूटिल = 1 रु०) अपने उत्तर के लिए कारण दें।

उपयुक्त इकाइयाँकुल उपयोगिता
(यूटिल्स)
सीमांत उपयोगिता
(यूटिल्स)
11010
2188
3257
4316
5343
6340

हल:
उपभोक्ता संतुलन प्राप्त करता है जब-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 47
उपभोक्ता अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करने के लिए 4 इकाइयाँ खरीदेगा।

प्रश्न 6.
एक आइसक्रीम 20 रु० की बेची जाती है। रोहन जिसे आइसक्रीम पसंद है, 7 आइसक्रीम का उपभोग कर चुका है। उसके 1 रु० की सीमांत उपयोगिता 7 है। क्या वह आइसक्रीम का और उपभोग करेगा या उपभोग बंद कर देगा ?
हल:
एक उपभोक्ता संतुलन प्राप्त करता है जब
\(\frac{\mathrm{MU}_{\mathrm{X}}}{\mathrm{P}_{\mathrm{X}}}=\mathrm{MU}_{\mathrm{M}}\)
अथवा
\(\frac{\mathrm{MU}_{\mathrm{X}}}{\mathrm{MU}_{\mathrm{M}}}=\mathrm{P}_{\mathrm{X}}\)
यदि रोहन के लिए 1 रु० मूल्य की संतुष्टि 7 है तो वह 7वीं आइसक्रीम के उपभोग से 140 (=20 x 7) इकाइयों के बराबर संतुष्टि प्राप्त करेगा। अन्यथा वह आइसक्रीम नहीं खरीदेगा। मान लीजिए कि आइसक्रीम की 7वीं इकाई से रोहन को 140 इकाइयों की संतुष्टि प्राप्त होती है तब-
\(\frac{\mathrm{MU}_{\mathrm{X}}}{\mathrm{MU}_{\mathrm{M}}}=\mathrm{P}_{\mathrm{X}}=\frac{140}{7}=20\)
जो यह दर्शाता है कि संतुलन प्राप्त हो चुका है। अतः रोहन को और आइसक्रीम का उपभोग नहीं करना चाहिए। परंतु यदि MUx > 140, तो वह और अधिक आइसक्रीम का उपभोग करेगा तथा आइसक्रीम का उपभोग तब बंद करेगा जब MUx = 140।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित व्यक्ति-A की कुल उपयोगिता तालिका है
(यह मान लो कि शून्य इकाइयों के उपभोग की कुल उपयोगिता शून्य है)

उपभोग की इकाइयाँकुल उपयोगिता (TU)
1150
2280
3380
4430
5430
6370

(i) सीमांत उपयोगिता तालिका ज्ञात करें।
(ii) व्यक्ति-A का उपभोग स्तर ज्ञात करें जिस पर वह पूर्ण संतुष्टि/तृप्ति बिंदु पर पहुँचता है।
(iii) क्या इस स्थिति में व्यक्ति-A के लिए 6वीं इकाई का उपभोग उचित है।।
उत्तर:
(i) सीमांत उपयोगिता : 150, 130, 100, 50, 0, -60।

(ii) वस्तु की 5वीं इकाई के उपभोग पर व्यक्ति-A पूर्ण संतुष्टि/तृप्ति बिंदु पर पहुँचता है, चूंकि यहाँ पर सीमांत उपयोगिता शून्य है और कुल उपयोगिता अधिकतम है।

(iii) व्यक्ति-A 6वीं इकाई का उपभोग नहीं करेगा, चूँकि व्यक्ति-A को 6वीं इकाई से ऋणात्मक सीमांत उपयोगिता प्राप्त होती है।

प्रश्न 8.
मान लीजिए एक शीतल पेय की बोतल की कीमत 5 रु० है और 1 रु० की सीमांत उपयोगिता 4 है। निधि एक उपभोक्ता है, जिसकी उपयोगिता तालिका निम्नलिखित है-

शीतल पेय की बोतलसीमांत उपयोगिता (MU)
160
240
320
410
50
6-10

बताइए की निधि शीतल पेय की कौन-सी बोतल पर संतुलन अवस्था में होगी?
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 48

प्रश्न 9.
मान लो वस्तु Y की कीमत (P) 10 रुपये प्रति इकाई है। यह भी मान लो कि मुद्रा की सीमांत उपयोगिता (MUM) 8 है (और स्थिर है)। उपभोक्ता की निम्नलिखित सीमांत उपयोगिता तालिका का प्रयोग करते हुए उपभोक्ता के उपभोग का संतुलन स्तर तथा वस्तु Y पर होने वाला कुल व्यय ज्ञात करें।

उपभोग की इकाइयाँसीमांत उपयोगिता (MU)
1170
2130
3110
480
530
60

हल:
उपभोक्ता संतुलन की शर्त है
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 49
(i) यहाँ उपभोग का संतुलन स्तर, वस्तु Y की 4 इकाइयाँ हैं-
\(\frac { 80 }{ 10 }\) = 8 अथवा \(\frac { 80 }{ 8 }\) = 10

(ii) वस्तु Y पर कुल व्यय 10×4 = 40 रुपए होगा।

प्रश्न 10.
एक उपभोक्ता के पास वस्तु X तथा वस्तु Y पर खर्च करने के लिए 200 रु० हैं। x की कीमत 10 रु० तथा Yकी कीमत 20 रु० है। दी हुई आय से x तथा Y के खरीदे जाने वाले संभावित संयोगों का ग्राफ बनाइए।
हल:
(0, 10), (2,9), (4,8), (6, 7), (8,6), (10,5), (12, 4), (14,3), (16, 2), (18, 1),(20,0)

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

प्रश्न 11.
मान लीजिए कि उपभोक्ता दो ऐसी वस्तुओं का उपभोग करना चाहता है जो केवल पूर्णांक इकाइयों में उपलब्ध हैं। दोनों वस्तुओं की कीमत 10 रु० के बराबर है तथा उपभोक्ता की आय 40 रु० है।
(i) वे सभी बंडल लिखिए जो उपभोक्ता के लिए उपलब्ध हैं।
(ii) जो बंडल उपभोक्ता के लिए उपलब्ध हैं उनमें से वे बंडल कौन-से हैं जिन पर उपभोक्ता के पूरे 40 रु० व्यय हो जाएँगे?
हल:
(i) जो बंडल उपभोक्ता खरीद सकता है, वे हैं-(0, 0), (0, 1), (0, 2), (0, 3), (0, 4), (1, 0), (1, 1), (1, 2), (1,3), (2,0), (2, 1), (2, 2) (3,0), (3, 1) तथा (4,0)।
(ii) वे बंडल जिन पर उपभोक्ता के पूरे 40 रु० व्यय होंगे, वे हैं-(0,4), (1,3), (2, 2), (3, 1), (4,0)।

प्रश्न 12.
मान लीजिए बाज़ार में अनार फल के लिए चार उपभोक्ता हैं। वे हैं-A, B, C, और D । अनार फल के लिए उनके माँग वक्र निम्नलिखित तालिका में दिए गए हैं। बाज़ार माँग वक्र बनाइए।

कीमत (रु०‘A’ द्वारा माँगी गई मात्रा‘B’ द्वारा

माँगी गई मात्रा

‘C’ द्वारा

माँगी गई मात्रा

‘D’ द्वारा

माँगी गई मात्रा

1167158
2116126
37594
44462
52330
61200

हल:

कीमत (रु०‘A’ द्वारा माँगी
गई मात्रा
‘B’ द्वारा

माँगी गई मात्रा

‘C’ द्वारा

माँगी गई मात्रा

‘D’ द्वारा

माँगी गई मात्रा

बाज़ार

माँग

116715846
211612635
3759425
4446216
5233008
6120003

चारों उपभोक्ताओं द्वारा माँगी गई मात्रा को जोड़कर हम बाज़ार माँग का निर्माण करते हैं और विभिन्न कीमतों पर बाज़ार माँग को चित्र में DM वक्र द्वारा दर्शाया जा सकता है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 50

प्रश्न 13.
मान लीजिए कि एक बाज़ार विशेष में तीन उपभोक्ता हैं- X, Y और Z। उनकी माँग अनुसूची निम्नलिखित तालिका में दी गई है

कीमत (रु०)‘x’ द्वारा मांगी गई मात्रा‘y’ द्वारा माँगी गई मात्रा,‘Z’ द्वारा माँगी गई मात्रा
1605524
2504013
340255
430100
52000

(a) बाज़ार माँग अनुसूची बनाइए तथा बाज़ार माँग वक्र खींचिए।
(b) मान लीजिए, ‘Y’ बाज़ार से हट जाता है तब बाज़ार अनुसूची बनाइए।
(c) मान लीजिए, ‘Y’ बाज़ार में टिका रहता है और अन्य व्यक्ति ‘K’ बाज़ार में प्रवेश करता है, जिसके द्वारा माँगी गई मात्रा किसी विशेष कीमत पर ‘x’ की आधी है। नया बाज़ार माँग वक्र बनाइए।
हल:
(a)

कीमत (रु०)‘x’ द्वारा मांगी गई मात्रा‘y’ द्वारा माँगी गई मात्रा,‘Z’ द्वारा माँगी गई मात्राबाज़ार माँग
1605524139
2504013103
34025570
43010040
5200020

बाज़ार माँग वक्र (Market Demand Curve)
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 51

(b) जब ‘Y’ इस बाज़ार को छोड़ जाता है तो नयी बाज़ार अनुसूची निम्नलिखित होगी

कीमत (रु०)‘x’ की माँग‘Z’ की माँगबाजार माँग
1602484
2501363
340545
430030
520020

(c) जब नया ग्राहक ‘K’ बाज़ार में आता है तो नई बाजार अनुसूची निम्नलिखित होगी-

कीमत (रु०)‘X’ द्वारा माँगी गई मात्रा,‘y’ द्वारा माँगी गई मात्रा,‘Z’ द्वारा माँगी गई मात्रा‘K’ द्वारा माँगी गई मात्राबाज़ार माँग
160552430169
250401325128
3402552090
4301001555
520001030

नया बाज़ार मांग वक्र (New Market Demand Curve)
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 52

प्रश्न 14.
चॉकलेट के लिए मोहिनी के माँग वक्र को निम्नांकित चित्र में दर्शाया गया है। कीमत 5 रु०, 8 रु० तथा 10 रु० पर चॉकलेट की माँगी गई मात्रा का निर्धारण करें।
हल:
माँग वक्र DD के अनुसार कीमत तथा मात्रा के संयोग निम्नलिखित हैं-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 53
10 रु० पर 2 इकाइयाँ
9 रु० पर 4 इकाइयाँ
8 रु० पर 6 इकाइयाँ
7 रु० पर 8 इकाइयाँ
6 रु० पर 10 इकाइयाँ
5 रु० पर 12
इकाइयाँ इस प्रकार कीमत 5 रु०, 8 रु०, 10 रु० पर चॉकलेट की माँगी गई मात्रा क्रमशः 12, 6 एवं 2 इकाइयाँ है।

प्रश्न 15.
यदि मूल्य 2 रुपए प्रति इकाई से 3 रुपए हो जाए और माँगी गई मात्रा 300 इकाइयाँ प्रति सप्ताह से कम होकर 270 इकाइयाँ हो जाए तो माँग की कीमत लोच क्या होगी?
हल:
माँग की लोच(eD) = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
यहाँ p0 = 2 ∆p = 3 – 2 = 1
q0 = 300 ∆q = 300 – 270 = 30
∴ = \(\frac{30}{1} \times \frac{2}{300}\) = \(\frac { 60 }{ 300 }\) = 0.2
इस उदाहरण में माँग की लोच 0.2 या इकाई से कम (eD < 1) या कम लोचदार है।

प्रश्न 16.
कीमत में 40% की वृद्धि होती है, जिसके फलस्वरूप माँग 70 इकाइयों से घटकर 35 इकाइयाँ रह जाती है, माँग की कीमत लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 54
\(\frac{\frac{35}{70} \times 100}{40}\) = \(\frac { 50 }{ 40 }\) = 1.25
इस उदाहरण में माँग की कीमत लोच इकाई से अधिक (eD > 1) है।

प्रश्न 17.
एक उपभोक्ता उस वस्तु की 10 इकाइयाँ क्रय करता है जब उसकी कीमत 5 रु० प्रति इकाई थी। जब उस वस्तु की कीमत 4 रु० प्रति इकाई हो गई तो उसने उस वस्तु की 12 इकाइयाँ खरीदीं। उस वस्तु की उस कीमत पर माँग की लोचक्या है ?
हल:
माँग की लोच (eD) = \((-) \frac{p^{0}}{q^{0}} \times \frac{\Delta q}{\Delta p}\)
P0 = 5, p1 = 4, ∆p = 4 – 5 = -1
q0 = 10, q1 = 12, ∆q = 12 – 10 = 2
eD = (-) \(\frac { 5 }{ 10 }\) × \(\frac { 2 }{ -1 }\) = 1 (इकाई)
माँग की लोच इकाई है।

प्रश्न 18.
एकं वस्तु की कीमत 4 रु० प्रति इकाई होने पर एक उपभोक्ता उस वस्तु की 50 इकाइयाँ क्रय करता है। कीमत 25 प्रतिशत गिर जाने पर माँग बढ़कर 100 इकाइयाँ हो जाती है। माँग की कीमत लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
प्रारंभिक कीमत (p0) = 4 रु०
कीमत में कमी = 4 × \(\frac { 25 }{ 100 }\) = 1 रु०
नई कीमत (p1) = 4 रु० – 1 रु० = 3 रु०
कीमत में परिवर्तन (∆p) = p1 – p0 = 3 रु० – 4 रु० = -1 रु०
प्रारंभिक माँग (q0) = 50, नई माँग (q1) = 100,
माँग में परिवर्तन (∆q) = q1 – q0
= 100 – 50 = 50
माँग की लोच (eD) = (-) \(\frac { p^0 }{ q^0 }\) × \(\frac { ∆q }{ ∆p }\) = (-) \(\frac { 4 }{ 50 }\) × \(\frac { 50 }{ -1 }\) = \(\frac { 4 }{ 1 }\) = 4
माँग की लोच = 4 (इकाई से अधिक)

प्रश्न 19.
कीमत 18 रुपए प्रति इकाई से घटकर 12 रुपए प्रति इकाई रह जाती है जिसके कारण माँग 30 इकाइयों से बढ़कर 45 इकाइयाँ हो जाती है। माँग की लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
माँग की लोच (eD) = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
p0 = 18, ∆p = 6, q0 = 30, ∆q = 15
eD = \(\frac{15}{6} \times \frac{18}{30}=\frac{3}{2}\) = 1.5
माँग की लोच इकाई से अधिक है।

प्रश्न 20.
कीमत में 5 रुपए प्रति इकाई की वृद्धि होने से कीमत बढ़कर 20 रुपए प्रति इकाई हो गई जिसके फलस्वरूप माँग में 12 इकाइयों की कमी हुई और घटकर 52 इकाइयाँ हो गई। माँग की लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
माँग की लोच (eD) = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
p0 = 15, ∆p = 5, q0 = 64, ∆q = 12
∴ \(\frac{12}{5} \times \frac{15}{64}=\frac{9}{16}\) = 0.562
माँग की लोच इकाई से कम है।

प्रश्न 21.
एक वस्तु की कीमत 10 प्रतिशत गिर जाने से इसकी माँग 100 इकाइयों से बढ़कर 120 इकाइयाँ हो जाती है। माँग की लोच ज्ञात कीजिए।
हल:
कीमत में प्रतिशत परिवर्तन = 10%
माँग में प्रतिशत परिवर्तन = (\(\frac { 120-100 }{ 100 }\) × 100)
= \(\frac { 20 }{ 100 }\) × 100 = 20%
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 55
माँग की लोच = 2 (इकाई से अधिक)

प्रश्न 22.
यदि किसी वस्तु की कीमत 10 रु० से घटकर 8 रु० हो जाती है, परिणामस्वरूप इसकी माँग 80 इकाई से बढ़कर 100 इकाई हो जाती है। कुल व्यय विधि के आधार पर इसकी कीमत माँग लोच के बारे में क्या कह सकते हैं?
हल:

कीमतमाँगकुल व्यय
10 रु०80800 रु०
8 रु०100800 रु०

क्योंकि कुल व्यय में कोई परिवर्तन नहीं आया, इसलिए माँग की लोच इकाई है।

प्रश्न 23.
एक उपभोक्ता किसी वस्तु पर 80 रु० व्यय करता है, जब उसकी कीमत 1 रु० प्रति इकाई है तथा 96 रु० व्यय करता है, जब उसकी कीमत 2 रु० प्रति इकाई है। वस्तु की माँग की कीमत लोच ज्ञात करें।
हल:

कीमत (रु०)कुल व्यय (रु०)माँग की लोच
180
296इकाई से कम

चूँकि कीमत के बढ़ने से कुल व्यय बढ़ जाता है, इसलिए माँग की लोच इकाई से कम है।

प्रश्न 24.
एक वस्तु की कीमत 5% गिर जाने के कारण उसकी माँग में 12% की वृद्धि हो जाती है। माँग की कीमत लोच ज्ञात कीजिए और बताइए कि माँग लोचदार है या बेलोचदार।
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 56

माँग की लोच इकाई से अधिक 2.4 है अर्थात् माँग लोचदार है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत

प्रश्न 25.
एक वस्तु की कीमत 10 रु० प्रति इकाई से बढ़कर 12 रु० प्रति इकाई हो गई। परिणामस्वरूप उसकी माँग 120 इकाइयों से घटकर 100 इकाइयाँ रह जाती है। माँग की कीमत लोच निकालिए।
हल:
माँग की लोच (eD) = \(\frac{p^{0}}{q^{0}} \times \frac{\Delta q}{\Delta p}\)
p0 = 10, p1 = 12, ∆p = 12 – 10 = 2
q0 = 120, q1 = 100, ∆q = 120 – 100 = 20
माँग की लोच (eD) = \(\frac{10}{120} \times \frac{20}{64}=\frac{5}{6}\)
माँग की लोच इकाई से कम है।

प्रश्न 26.
निम्नलिखित तालिका में तीन वस्तुओं की कीमतें और उन पर कुल व्यय के आँकड़े दिए गए हैं। कुल व्यय विधि के अनुसार उनकी कीमत माँग की लोच ज्ञात कीजिए।

कीमत प्रति किलोग्राम (रुपयों में)कुल व्यय (रुपयों में)
वस्तु ‘अ’वस्तु ‘ब’वस्तु ‘स’
4121212
6121014
812816

हल:
(i) वस्तु ‘अ’ की कीमत में वृद्धि होने पर कुल व्यय अपरिवर्तित रहता है, इसलिए माँग की लोच इकाई के समान है।
(ii) वस्तु ‘ब’ की कीमत में वृद्धि होने से कुल व्यय में कमी होती है, इसलिए माँग की लोच इकाई से अधिक है।
(iii) वस्तु ‘स’ की कीमत में वृद्धि होने से कुल व्यय में वृद्धि होती है, इसलिए माँग की लोच इकाई से कम है।

प्रश्न 27.
वस्तु X और Y की माँग सारणियाँ नीचे दी गई हैं। कुल व्यय विधि के अनुसार X और Y वस्तुओं की माँग की लोच ज्ञात कीजिए।

वस्तु Xवस्तु Y
कीमतमात्राकीमतमात्रा
100 रु०1000200 रु०1000
102 रु०900198 रु०1010

दिए गए उदाहरण में माँग की लोच के अनुमान के लिए कुल व्यय को ज्ञात कीजिए।
हल:

कीमत (रु०)मात्राकुल व्यय (रु०)माँग लोच
वस्तु X 1001000100000इकाई से अधिक
10290091800
वस्तु Y 2001000200000इकाई से कम
1981010199980

प्रश्न 28.
एक वस्तु की कीमत 4 रु० से बढ़कर 5 रु० हो जाती है। परिणामस्वरूप, उसकी माँग 50 इकाइयों से घटकर 40 इकाइयाँ रह जाती है। प्रतिशत विधि द्वारा माँग की कीमत लोच ज्ञात करें।
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 57
= 20/25 = 0.8 अर्थात् बेलोचदार माँग

प्रश्न 29.
निम्नलिखित सूचना के आधार पर माँग की लोच ज्ञात कीजिए-

कीमत (रु०)वस्तु की माँग (किलोग्राम)
1020
2015

हल:
इसमें प्रतिशत विधि का प्रयोग करते हुए माँग की मूल्य सापेक्षता निम्नलिखित प्रकार से ज्ञात की जा सकती है-
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 58

[यहाँ माँग की लोच इकाई से कम है अर्थात् eD < 1]

प्रश्न 30.
नीचे दी गई सूचना से (i) कुल व्यय विधि तथा (ii) प्रतिशत विधि का प्रयोग करते हुए माँग की लोच ज्ञात करें-

कीमत (रुपए)कुल व्यय (रुपए)
101000
81200

हल:
(i) कुल व्यय विधि-इस विधि के अनुसार, यहाँ माँग की लोच इकाई से अधिक है, क्योंकि कीमत में कमी होने पर कुल व्यय में वृद्धि हुई है अर्थात् कीमत एवं कुल व्यय में विपरीत संबंध पाया जाता है। अतः यहाँ eD > 1 है।

(ii) प्रतिशत विधि-यहाँ हमें सर्वप्रथम कुल व्यय को कीमत से भाग देकर माँगी गई मात्रा ज्ञात करनी होगी-

कीमत (रु०) (p)माँगी गई मात्रा q = TE/Pकुल व्यय (रु०) TE
101001000
81501200

eD = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}=\frac{50}{2} \times \frac{10}{100}\) = 2.5
[ep = 2.5 अर्थात् eD > 1 है।]

प्रश्न 31.
माँग की कीमत लोच 2 है। कीमत में प्रतिशत परिवर्तन 5% रहा है। माँग की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन का आकलन करें।
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 59
माँग की मात्रा में % परिवर्तन = कीमत लोच गुणांक × कीमत में % परिवर्तन
= 2 × 5 = 10
अतः माँग की मात्रा में % परिवर्तन = 10 है।

प्रश्न 32.
माँग की कीमत लोच 0.5 है। माँग की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन 4 है। कीमत में प्रतिशत परिवर्तन क्या होगा?
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 60
अतः कीमत में प्रतिशत परिवर्तन = 8% है।

प्रश्न 33.
जब मूंगफली के पैकटों की कीमत में 5% की वृद्धि होती है तो मूंगफली के पैकटों की माँग में 8% की कमी होती है। मूंगफली के पैकटों की माँग की लोच क्या है?
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 61
माँग की लोच इकाई से अधिक है अर्थात् (eD > 1).

प्रश्न 34.
जब एक पदार्थ की कीमत में 7% की कमी होती है, तो इस पदार्थ पर किए जाने वाले कुल व्यय में 3.5% की वृद्धि होती है। हम इस पदार्थ की माँग की लोच के संबंध में क्या कहेंगे?
हल:
जैसा कि यहाँ पर कीमत एवं कुल व्यय में विपरीत संबंध पाया जाता है, तो वस्तु की माँग की लोच इकाई से अधिक होगी।
P ↓17% कुल व्यय ↑ 3.5%
∴ eD > 1 अर्थात् माँग की लोच इकाई से अधिक है।

प्रश्न 35.
फूलगोभी की बाज़ार कीमत 8% बढ़ती है तथा एक परिवार द्वारा फूलगोभी पर किए जाने वाले कुल व्यय में भी 8% वृद्धि होती है। हम इस परिवार की फूलगोभी की माँग की लोच के बारे में क्या कहेंगे?
हल:
फूलगोभी की कीमत के बढ़ने के फलस्वरूप परिवार का कुल व्यय भी बढ़ा है, अतः यहाँ माँग की लोच इकाई से कम होगी (अर्थात् e < 1)। क्योंकि यहाँ कीमत वृद्धि और कुल व्यय वृद्धि में सीधा संबंध पाया जाता है।

प्रश्न 36.
एक दांतों का डॉक्टर दांतों की सफाई के लिए 300 रुपए लेता था और वह प्रतिमास 30,000 रुपए की आय प्राप्त करता था। उसने पिछले महीने से दांतों की सफाई का रेट 350 रुपए कर दिया है। परिणामस्वरूप अब दांतों की सफाई के लिए कुछ कम ग्राहक आने लगे हैं। लेकिन अब उसकी कुल आय 33,250 रुपए है। इस उदाहरण से हम डॉक्टर की दांतों की सफाई सेवा की माँग की लोच के बारे में क्या निष्कर्ष निकालेंगे?
हल:

दांत सेवा की कीमत (रुपए)ग्राहकों का कुल व्यय (रुपए)ग्राहकों की संख्या TE/P
30030,000100
35033,25095

यद्यपि ग्राहकों की संख्या में (100 से 95) कमी आई है, लेकिन डॉक्टर की फीस बढ़ने पर ग्राहकों के कुल व्यय में (30,000 से 33250 रु० की) वृद्धि हो जाती है। इसलिए, चूँकि हमारे उदाहरण में कीमत में वृद्धि से कुल व्यय में वृद्धि हुई है, अतः यहाँ माँग की लोचशीलता इकाई से कम है।

प्रश्न 37.
मान लो, शुरु में 10 रु० कीमत पर किसी वस्तु की 1000 इकाइयाँ बिक रही थीं। कीमत 14 रु० होने पर उपभोक्ता केवल 500 इकाइयाँ खरीद रहे हैं। माँग की कीमत लोच ज्ञात करें।
हल:
माँग की लोच (eD) = \(\frac{\Delta q}{\Delta p} \times \frac{p^{0}}{q^{0}}\)
p0 = 10 रुपए
p1 = 14 रुपए

q0 = 1000 इकाइयाँ
q1 = 500 इकाइयाँ

∆p = p1 – p0
= 14–10 = 4 रुपए

∆q = q1 – q0 इकाइयाँ
= 500 – 1000 = – 500
\(\frac{-500}{4} \times \frac{10}{1000}=\frac{-5000}{4000}=\frac{-5}{4}=-1.25\)
ऋणात्मक चिह्न (-) छोड़ देने पर माँग की कीमत लोच इकाई से अधिक होगी।

प्रश्न 38.
एक वस्तु की कीमत में 10% की वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप इसकी माँग 4% गिर जाती है। माँग की कीमत लोच ज्ञात कीजिए। माँग लोचदार है या बेलोचदार?
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत 62
अर्थात् माँग कम लोचदार है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत Read More »

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

HBSE 12th Class Hindi सिल्वर बैंडिग Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों?
उत्तर:
यशोधर बाबू और उनकी पत्नी दोनों ही आधुनिक सोच से दूर हैं, परंतु यशोधर बाबू की पत्नी अपने बच्चों का पक्ष लेते-लेते आधुनिक बन गई है। जब वह विवाह के बाद ससुराल में आई थी, तो उस समय यशोधर बाबू का परिवार संयुक्त परिवार था। घर में ताऊ जी एवं ताई जी की चलती थी। इसलिए उनकी पत्नी के मन में एक बहुत बड़ा दुख था। वह समझती थी कि उसे आचार-विचार के बंधनों में रखा जाता है। मानो वह जवान न होकर बूढ़ी औरत हो। जो नियम बुढ़िया ताई पर लागू होते थे, वे सभी उस पर भी लागू होते थे। इसलिए वह अपनी अतप्त इच्छाओं को पूरा करना चाहती है। इसलिए वह अपने पति से कहती है कि-“तुम्हारी ये बाबा आदम के जमाने की बातें, मेरे बच्चे नहीं मानते तो इसमें उनका कोई कसूर नहीं। मैं भी इन बातों को उसी हद तक मानूंगी जिस हद तक सुभीता हो। अब मेरे कहने से वह सब ढोंग-ढकोसला हो नहीं सकता-साफ बात।” ।

इसलिए यशोधर बाबू की पत्नी इस उम्र में भी बिना बाँह का ब्लाऊज पहनती है। होंठों पर लाली लगाती है और सिल्वर वैडिंग में खुलकर भाग लेती है। परंतु यशोधर बाबू एक परंपरावादी व्यक्ति हैं। वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को चाय पान के लिए तीस रुपये तो दे देते हैं परंतु वे आयोजन में भाग नहीं लेते। वे पूजा के लिए मंदिर जाते हैं। सुख-दुख में संयुक्त परिवार के लोगों से मिलना चाहते हैं। परंतु किसी अच्छे मकान में रहने के लिए नहीं जाते। यहाँ तक कि वे डी०डी०ए० का फ़्लैट लेने का भी प्रयास नहीं करते। जब उनके लड़के घर पर उनकी सिल्वर वैडिंग का आयोजन करते हैं, तो वे उससे भी बचने की कोशिश करते हैं। वे अपने आदर्श किशनदा के संस्कारों का ही अनुसरण करते हैं। परिणाम यह होता है कि वे परिस्थितियों के आगे झुक तो जाते हैं, परंतु उनका मन पुरानी परंपराओं से ही चिपका हुआ है। वे नए जमाने की सुविधाओं; जैसे गैस, फ्रिज आदि को अच्छा नहीं समझते। फिर भी वे सोचते हैं कि ये चीजें हैसियत बढाने वाली हैं। सच्चाई तो यह है कि वे समय के साथ ढल नहीं पाते और बार-बार किशनदा के संस्कारों को याद कर उठते हैं।

प्रश्न 2.
पाठ में ‘जो हुआ होगा’ वाक्य की आप कितनी अर्थ छवियाँ खोज सकते/सकती हैं?
उत्तर:
‘जो हुआ होगा’ वाक्य का पाठ में अनेक बार प्रयोग हुआ है। पहली बार इसका तब प्रयोग होता है, जब यशोधर बाबू ने किशनदा के किसी जाति भाई से उनकी मृत्यु का कारण पूछा था। उत्तर में उसने कहा था ‘जो हआ होगा’ अर्थात पता नहीं क्या हुआ और किस कारण से उनकी मृत्यु हुई। किशनदा ने विवाह नहीं किया था। इसलिए उनके बच्चे नहीं थे। इसलिए जाति भाई उनके प्रति उदासीन थे। उन्होंने यह आवश्यक नहीं समझा कि किशनदा की मृत्यु के कारणों का पता लगाया जाए। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मानव के लिए विवाह संस्कार आवश्यक है। बाल-बच्चों से ही वृद्धावस्था में सुरक्षा हो सकती है। यदि किशनदा की संतान होती, तो उनके रिश्तेदार उनकी मृत्यु के कारणों की जानकारी रखते और उनके प्रति इतने उदासीन न होते।

किशनदा ने भी इस वाक्य का प्रयोग किया है। अपनों से मिली उपेक्षा के लिए, वे इस वाक्य का प्रयोग करते हैं। किशनदा भी जन इसी ‘जो हुआ होगा’ से मरते हैं, गृहस्थ हों, ब्रह्मचारी हों, अमीर हों, गरीब हों, मरते ‘जो हुआ होगा’ से ही हैं। हाँ-हाँ, शुरू में और आखिर में, सब अकेले ही होते हैं। अपना कोई नहीं ठहरा दुनिया में, बस अपना नियम अपना हुआ। यहाँ इस वाक्य का अर्थ अन्य संदर्भ में देखा जा सकता है अर्थात् किसी-न-किसी कारण से ही सबकी मृत्यु होती है। पाठ के आखिर में जब बच्चे यशोधर बाबू पर व्यंग्य करते हैं, तो उनको यह निश्चय हो गया कि किशनदा की मृत्यु ‘जो हुआ होगा’ से ही हुई होगी। भाव यह है कि बच्चे जब अपने माता-पिता की उपेक्षा करने लगते हैं, तो उनके प्राण जल्दी निकल जाते हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

प्रश्न 3.
‘समहाउ इंप्रापर’ वाक्यांश का प्रयोग यशोधर बाबू लगभग हर वाक्य के प्रारंभ में तकिया कलाम की तरह करते हैं। इस वाक्यांश का उनके व्यक्तित्व और कहानी के कथ्य से क्या संबंध बनता है?
उत्तर:
‘समहाउ इंप्रापर’ यशोधर बाबू का तकिया कलाम है। जिसका अर्थ यह है कि फिर भी यह अनुचित है। इस पाठ में एक दर्जन से अधिक बार इस वाक्यांश का प्रयोग हुआ है। इससे यशोधर बाबू का व्यक्तित्व झलकता है। वस्तुतः वे सिद्धांत प्रिय व्यक्ति हैं। जब उन्हें कोई बात अनुचित लगती है, तब उनके मुख से यह वाक्य निकल पड़ता है। उदाहरण के रूप में सर्वप्रथम ‘सिल्वर वैडिंग’ के लिए, वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को तीस रुपये चाय पान के लिए देते हैं, परंतु इसे ‘समहाउ इंप्रापर’ कहते हैं। यही नहीं, वे अपने साधारण पुत्र को असाधारण वेतन मिलना भी ‘समहाउ इंप्रापर’ कहते हैं।

अन्यत्र उन्होंने अपनों से परायेपन का व्यवहार मिलने, डी०डी०ए० के फ्लैट के लिए पैसे न चुकाने, अपनी वृद्धा पत्नी द्वारा आधुनिका का स्वरूप धारण करने, बेटे द्वारा अपने पिता को वेतन न देने, संपन्नता में सगे-संबंधियों की उपेक्षा करने, बेटी द्वारा विवाह का निर्णय न लेने आदि को भी ‘समहाउ इंप्रापर’ कहा है। इसी प्रकार जब उसकी बेटी जींस तथा सैंडो ड्रैस पहनती है, घर में गैस, फ्रिज लाया जाता है। सिल्वर वैडिंग पर भव्य पार्टी दी जाती है। छोटा साला ओछापन दिखाता है और केक काटा जाता है, तब भी वे इसी वाक्यांश का प्रयोग करते हैं। वस्तुतः यशोधर बाबू किशनदा से प्रभावित होने के कारण सिद्धांतों पर चलने वाले व्यक्ति हैं। यही नहीं, वे भारतीय मूल्यों और मान्यताओं में विश्वास रखते हैं। लगभग ऐसे ही विचार आजकल के बुजुर्गों के हैं।

वाक्यांश कहानी के मूल कथ्य से जुड़ा हुआ है। लेखक यह दिखाना चाहता है कि आज पुरानी और नई पीढ़ी में एक खाई उत्पन्न हो चुकी है। प्रत्येक पुरानी पीढ़ी नवीन परिवर्तनों को अनुचित मानती है। इस नकारात्मक दृष्टिकोण के कारण ही उनके बच्चे तथा परिजन उनकी उपेक्षा करने लगते हैं, परंतु उनकी पत्नियाँ नए ज़माने के साथ स्वयं को अनुकूल बना लेती हैं। यही कारण है कि ‘समहाउ इंप्रापर’ एक प्रश्न चिह्न बनकर रह गया है। लेखक इस पाठ द्वारा यह कहना चाहता है कि यदि वृद्ध लोगों को अपने बच्चों के साथ सम्मानपूर्वक जीना है तो उन्हें नए परिवर्तनों को स्वीकार करना पड़ेगा, अन्यथा उनकी हालत यशोधर बाबू जैसी हो जाएगी।

प्रश्न 4.
यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आपके जीवन को दिशा देने में किसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा और कैसे?
उत्तर:
यशोधर बाबू का जीवन किशनदा और उनके सिद्धांतों से प्रभावित रहा है। वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के प्रति जो व्यवहार करते थे, वह किशनदा के ही समान था। भारतीय मूल्यों में आस्था, सादी जीवन-प्रणाली तथा धन-दौलत के प्रति अनासक्ति आदि प्रवृत्तियाँ किशनदा से ही प्रभावित हैं। हर आदमी जीवन में किसी-न-किसी से प्रेरणा अवश्य प्राप्त करता है। मेरे जीवन को प्रेरणा देने वाली मेरी अपनी माँ है। वे आज महाविद्यालय की एक सफल प्राध्यापिका हैं। उन्होंने प्रत्येक क की थी। इसके साथ-साथ वे बहुपठित एवं बहुश्रुत भी हैं। अपने विषय में प्रवीण होने के साथ-साथ उन्होंने अन्य विषयों का भी गहन अध्ययन किया है।

वे निरंतर मुझे पढ़ने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहती हैं। परंतु मेरी माता जी का रहन-सहन बड़ा सादा और सरल है। वे बाहरी ताम-झाम में विश्वास नहीं करतीं। फलस्वरूप मैं आरंभ से ही पढ़ने-लिखने में ठीक हूँ। दसवीं की परीक्षा में मैंने नगर में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए थे। यही नहीं, मैं विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर भाग लेता हूँ और अपने गुरुजनों का हमेशा आदर करता हूँ। मैं उच्च शिक्षा प्राप्त करके किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद प्राप्त करना चाहता हूँ। यदि ईश्वर की कृपा रही और मेरी माँ की मुझे नियमित प्रेरणा मिलती रही, तो मैं निश्चय से ही इस लक्ष्य को प्राप्त करूँगा।

प्रश्न 5.
वर्तमान समय में परिवार की संरचना, स्वरूप से जुड़े आपके अनुभव इस कहानी से कहाँ तक सामंजस्य बिठा पाते हैं?
उत्तर:
आधुनिक युग में संयुक्त परिवार प्रथा लगभग समाप्त हो चुकी है। भले ही यशोधर बाबू अपने ताऊ और ताई के साथ रहे हों। परंतु आज भौतिकवादी युग के कारण लोगों की आकांक्षाएँ बढ़ती जा रही हैं। प्रायः परिवार छोटे बनते जा रहे हैं। बेटा अपनी आय को स्वयं खर्चना चाहता है और अपनी पत्नी के साथ अलग रहना चाहता है। इधर पत्नी भी अपने पति की सलाह को नहीं मानती। बच्चे भी अपने कैरियर के बारे में माँ-बाप की सलाह को नहीं मानते हैं। इधर बेटियाँ भड़कीले वस्त्र पहनकर अपने मित्रों के साथ घूमना चाहती हैं। उनके पहनावे को देखकर माँ-बाप और बड़े बुजुर्गों को शर्म आती है। प्रत्येक लड़की अपने विवाह का निर्णय स्वयं लेना चाहती है। फलस्वरूप घर में गृहस्वामी की उपेक्षा की जाती है। इस प्रकार पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच एक दरार उत्पन्न हो गई है।

परंतु सामंजस्य के द्वारा हम इस समस्या का हल निकाल सकते हैं। पुराने लोगों को थोड़ा आधुनिक बनना पड़ेगा और नए लोगों को थोड़ा पुराना। हमारे मूल्य आज भी हमारी धरोहर हैं, उनमें बहुत-सी ऐसी बातें हैं जो हमारे समाज के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं। घर की साग-सब्जी, दूध, राशन आदि लाने में घर के सभी लोगों को सहयोग करना होगा। यदि आज के बच्चे आधुनिक युग की सुख-सुविधाओं को पाना चाहते हैं तो उन्हें यशोधर बाबू जैसे पिता को अपमानित नहीं करना चाहिए। पत्नी का भी कर्त्तव्य बनता है कि वह अपने पति की सलाह को मानती हुई अपनी संतान की देखभाल करे, बल्कि वह एक माँ के रूप में अपने पति और बच्चों के बीच सेतु का काम कर सकती है। इसके साथ-साथ यशोधर बाबू के समान अधिक परंपरावादी बनना भी अच्छा नहीं है।

इधर घर की बेटियों और नारियों का यह कर्त्तव्य बनता है कि वे शालीनता का ध्यान रखते हुए वस्त्र धारण करें। अधिक मॉड बनने के दुष्परिणाम तो हम हर रोज़ देखते ही रहते हैं। इस कहानी में यशोधर बाबू ने तीस रुपये देकर, घर में गैस एवं फ्रिज के प्रति नरम रुख रखकर, केक काटकर तथा मेहमानों का स्वागत करके सामंजस्य स्थापित करने का प्रयत्न किया है। घर के अन्य लोगों का भी कर्त्तव्य बनता है कि वे यशोधर बाबू जैसे गृहस्वामियों की भावनाओं को समझें। दोनों पक्षों में सामंजस्य स्थापित करने से ही आधुनिक युग को सफल बनाया जा सकता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से किसे आप कहानी की मूल संवेदना कहेंगे/कहेंगी और क्यों? (क) हाशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य (ख) पीढ़ी का अंतराल (ग) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव
उत्तर:
इस कहानी में मानवीय मूल्यों को हाशिए पर धकेले जाते हुए ही दिखाया गया है। उदाहरण के रूप में यशोधर बाबू के बच्चे, भाईचारा एवं रिश्तेदारी का ध्यान नहीं रखते और न ही बुजुर्गों का उचित सम्मान करते हैं। इस कहानी में पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव भी देखा जा सकता है। यशोधर बाबू के बच्चे तो आधुनिक बनना ही चाहते हैं, परंतु उनकी पत्नी भी आधुनिका बनी हुई है, और वह अपने पति को आधुनिक रंग-ढंग में देखना चाहती है।

परंतु यदि गहराई से इस कहानी का अध्ययन किया जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कहानी की मूल संवेदना पीढ़ी का अंतराल है। यशोधर बाबू पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले पात्र हैं। वे भारतीय संस्कृति को मानते हैं। पूजा-पाठ करते हैं। रामलीला देखने जाते हैं। रिश्तेदारी को निभाने का प्रयास करते हैं और सादा तथा सरल जीवन व्यतीत करना चाहते हैं, परंतु उनके बच्चे तथा पत्नी आधुनिक रंग-ढंग में ढल गए हैं। इस कहानी का कथानक इसी द्वंद्व पर टिका हुआ है। पीढ़ी-अंतराल के कारण जो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं, उसका शिकार यशोधर बाबू बनते हैं। वे अपने-आप में किशनदा से प्रभावित होने के कारण पुरानी व्यवस्था को अपनाते हैं।

यही नहीं, वह पुरानी परंपराओं को सही तथा नई परंपराओं को ‘समहाउ इंप्रापर’ कहते हैं। इसीलिए सर्वत्र उपेक्षा होती है। घर के बच्चे उनकी वेशभूषा, चाल-ढाल, आचार-विचार आदि का विरोध करते हैं। उनका विचार है कि उनके पिता की सादगी वस्तुतः फटीचरी है। यही नहीं, उनके विचारानुसार रिश्तेदारी निभाना घाटे का सौदा है। धीरे-धीरे यशोधर बाबू उपेक्षित होते चले जाते हैं। बच्चे उनके लिए नया गाउन इसलिए लाते हैं कि ताकि वे फटा हुआ पुलओवर पहनकर समाज में उनकी बेइज्जती न कराएं। बच्चों को अपने मान-सम्मान की तो चिंता है, परंतु वे अपने पिता की मनःस्थिति को नहीं समझ पाते। अतः पीढ़ी अंतराल की समस्या ही इस कहानी की मुख्य समस्या है।

प्रश्न 7.
अपने घर और विद्यालय के आस-पास हो रहे उन बदलावों के बारे में लिखें जो सुविधाजनक और आधुनिक होते हुए भी बुजुर्गों को अच्छे नहीं लगते। अच्छा न लगने के क्या कारण होंगे?
उत्तर:
आज का युग वैज्ञानिक युग है। प्रतिदिन नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। प्रायः अधिकांश आविष्कार मानव को सुख-सुविधाएँ देने में अत्यधिक सहायक हैं। जहाँ तक हमारे देश का प्रश्न है, यहाँ पिछले कुछ दशकों में वैज्ञानिक प्रगति हुई है। आज प्रत्येक घर में बिजली के पंखे, ए०सी०, रसोई गैस के चूल्हे, टेलीफोन, इंटरनेट आदि अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो लोगों के जीवन को सुविधाजनक बना रही हैं। लेकिन हमारे बड़े-बूढ़े अभी तक पुरानी बातों को याद कर उठते हैं।

वे प्रायः कहते रहते हैं कि चूल्हे की रोटी का कोई मुकाबला नहीं है। इसी प्रकार उनका कहना है कि फ्रिज के कारण हम बासी भोजन करते हैं, टी०वी० अश्लीलता फैला रहा है और मोबाइल का अधिक प्रयोग लड़के-लड़कियों को बिगाड़ रहा है। इसी प्रकार इंटरनेट के प्रयोग के कारण युवक-युवतियाँ अश्लील फिल्में देखते हैं और वे चरित्रहीन बन रहे हैं। यद्यपि सच्चाई है कि बुजुर्गों के विचार पुराने हो सकते हैं, परंतु आधुनिक सुविधाओं का अधिक प्रयोग हमारी जीवन-शैली को जटिल बनाता जा रहा है, परंतु सुविधाओं की ऐसी आँधी बुजुर्गों के रोकने पर रुकने वाली नहीं है।

प्रश्न 8.
यशोधर बाबू के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? दिए गए तीन कथनों में से आप जिसके समर्थन में हैं, अपने अनुभवों और सोच के आधार पर उसके लिए तर्क दीजिए
(क) यशोधर बाबू के विचार पूरी तरह से पुराने हैं और वे सहानुभूति के पात्र नहीं हैं।
(ख) यशोधर बाबू में एक तरह का द्वंद्व है जिसके कारण नया उन्हें कभी-कभी खींचता तो है पर पुराना छोड़ता नहीं। इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की ज़रूरत है।
(ग) यशोधर बाबू एक आदर्श व्यक्तित्व है और नयी पीढ़ी द्वारा उनके विचारों का अपनाना ही उचित है।
उत्तर:
ऊपर जो तीन कथन दिए गए हैं, उनमें से दूसरा कथन ही मुझे उचित लगता है। यशोधर बाबू एक द्वंद्व ग्रस्त व्यक्ति हैं। कभी नया उन्हें अपनी ओर खींचता है, परंतु पुराना उन्हें छोड़ नहीं पाता। वे स्वयं यह निर्णय नहीं कर पाते कि उन्हें नवीन मूल्यों को अपनाना चाहिए अथवा पुराने मूल्यों से चिपका रहना चाहिए। इसलिए हमें उनके बारे में सहानुभूतिपूर्वक सोचना चाहिए। मेरे दादा जी प्रायः नई वस्तुओं की आलोचना करते रहते हैं। एक बार हमने घर पर ए०सी० लगवाया। दादा जी ने इस सुविधा की न केवल आलोचना की, बल्कि इसका विरोध भी किया। यहाँ तक की उन्होंने मेरे पिता जी को डाँटते हुए कहा कि तुम आधुनिक चीज़ों पर पैसा खराब करते रहते हो, परंतु अगले दिन वे ए०सी० की ठंडी हवा में काफी देर तक सोते रहे। जब मैंने उन्हें चाय के लिए गाया तो वे मुझे कहने लगे–“बेटे ए०सी० पर खर्चा तो बहुत आ गया, परंतु इसकी ठंडी हवा बहुत सुख देती है। मैं तो गहरी नींद में सो गया था।”

इस प्रकार हम देखते हैं कि यशोधर बाबू का द्वंद्व स्वाभाविक है। वे पिछड़े हुए ग्रामीण क्षेत्र से महानगर में आए हैं। अभी तक उनके मन पर ग्रामीण अंचल का प्रभाव बना पड़ा है, परंतु उनके बच्चे दिल्ली महानगर में जन्मे एवं पले हैं। वे आधुनिक परिवेश से अत्यधिक प्रभावित हैं। वे अपने घर में सब प्रकार की आधुनिक सुविधाएँ चाहते हैं। ये नयापन यशोधर बाबू को भी यदा-कदा आकर्षित करता है। उदाहरण के रूप में गैस तथा फ्रिज के बारे में उनकी सोच अथवा भूषण से हाथ मिलाना, अतिथियों को अंग्रेज़ी में अपना परिचय देना आदि नएपन के सूचक हैं। ऐसी स्थिति में यशोधर बाबू के प्रति सहानुभूति का व्यवहार करना उचित होगा। यदि यशोधर बाबू के परिवार के लोग उन्हें पहले से ही सिल्वर वैडिंग की सूचना दे देते तो वे समय पर घर आते और अतिथियों का भरपूर स्वागत करते। इसके साथ-साथ हमें यह भी देखना चाहिए कि घर के बड़े बुजुर्गों के साथ सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करना चाहिए। उनकी उपेक्षा कभी नहीं की जानी चाहिए।

HBSE 12th Class Hindi सिल्वर बैंडिग Important Questions and Answers

बोधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के आधार पर यशोधर बाबू की चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भले ही यशोधर बाबू ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के प्रमुख पात्र हैं, परंतु वे एक परंपरावादी व्यक्ति होने के कारण आधुनिक परिवेश में मिसफिट दिखाई देते हैं। वे किशनदा के आदर्श व्यक्तित्व से कुछ प्रभावित हैं। वे पुराने संस्कारों को छोड़ नहीं पाते और नए परिवेश को ग्रहण करके उसकी आलोचना करते हैं। उनके व्यक्तित्व की चार प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(क) कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्ति-यशोधर बाब एक कर्त्तव्यपरायण व्यक्ति हैं। वे प्रतिदिन समय पर कार्यालय जाते हैं और दिन-भर मेहनत से काम करते हैं। वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को ईमानदारी से काम करने की प्रेरणा देते हैं तथा प्रतिदिन का काम पूरा करके ही लौटते हैं।

(ख) एक संस्कारवान व्यक्ति-किशनदा से प्रभावित होने के कारण यशोधर बाबू प्रतिदिन मंदिर जाकर प्रवचन सुनते हैं और सुबह-शाम घर पर पूजा करते हैं। यही नहीं, वे अपने घर पर ‘जन्यो-पुन्यू’ तथा रामलीला शिक्षा का काम भी समाज-सेवा के रूप में करते हैं। यही नहीं, वे यह भी चाहते हैं कि सगे-संबंधियों की सुख-दुख में सहायता करनी चाहिए। वे सरल वेशभूषा पहनते हैं और समय पर घूमने जाते हैं और सुबह जल्दी उठ जाते हैं।

(ग) सफल गहस्थी-उनको हम एक सफल गहस्थी कह सकते हैं। वे प्रतिदिन घर का राशन और साग-सब्जी खरीदकर लाते हैं तथा बच्चों का मन देखकर साइकिल छोड़कर पैदल जाते हैं। अनाथ होते हुए भी उन्होंने संयुक्त परिवार परंपरा को निभाया।

(घ) आधुनिकता के आलोचक-यशोधर बाबू आधुनिकता के नाम पर मनमानी करना, कम कपड़े पहनना, नए उपकरणों का प्रयोग करना यह सब पसंद नहीं करते हैं। विवाह की रजत जयंती मनाने को एक अनावश्यक खर्च मानते हैं। इसी प्रकार वे अपनी बेटी और पत्नी द्वारा आधुनिक कपड़ों को अपनाने का भी विरोध करते हैं। वस्तुतः किशनदा से अत्यधिक प्रभावित होने के बाद वे नवीन मूल्यों को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते। फिर भी यशोधर बाबू ने पिता के कर्त्तव्य को अच्छी तरह निभाया। अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दी और उन्हें मानवीय मूल्यों तथा समाज संस्कृति से यथासंभव जोड़ने का प्रयास किया। लेकिन उनके बच्चे नए ज़माने से अत्यधिक प्रभावित हुए।

प्रश्न 2.
किशनदा के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
इस कहानी में किशनदा के चरित्र का वर्णन पृष्ठभूमि के रूप में किया गया है। इस कहानी के प्रत्येक संदर्भ में वे हस्तक्षेप करते दिखाई देते हैं। भले ही उनकी मृत्यु हो चुकी है, परंतु वे अपने मानस पुत्र यशोधर बाबू के रूप में अब भी जिंदा हैं। यशोधर बाबू के व्यक्तित्व पर उनका गहरा प्रभाव है। वे हर समय उनकी विशेषताएँ याद करते रहते हैं।

किशनदा एक सरल हृदय व्यक्ति हैं जो कुमाऊँ क्षेत्र से दिल्ली आकर सरकारी नौकरी करते हैं। उन्होंने कई पहाड़ी युवकों को अपने यहाँ शरण देकर उन्हें नौकरी प्राप्त करने में सहायता की। वे आजीवन कुँवारे रहे। यशोधर बाबू को उन्होंने न केवल नौकरी दिलवाने में सहायता की, बल्कि अनेक बार उन पर अपनी जेब से पैसे भी खर्च किए। किशनदा एक संस्कारवान तथा ग्रामीण संस्कृति से जुड़े व्यक्ति हैं।

यशोधर बाबू के व्यक्तित्व का निर्माण करने में उनका अत्यधिक सहयोग रहा। उन्होंने ही यशोधर बाबू को सुबह सैर पर जाने, सवेरे-शाम पूजा-पाठ करने, रामलीला वालों को एक कमरे की सुविधा देने तथा पहाड़ी क्षेत्रों की परंपराओं का निर्वाह करने की आदत डाल दी। यही कारण है कि यशोधर बाबू किशनदा की मृत्यु के बाद भी उनके द्वारा बताए गए संस्कारों का पालन करते रहे।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

प्रश्न 3.
यशोधर बाबू की पत्नी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
यशोधर बाबू की पत्नी मुख्यतः पुराने संस्कारों वाली होते हुए भी किन कारणों से आधुनिका बन गई?
उत्तर:
यशोधर बाबू की पत्नी एक सामान्य भारतीय नारी है। वह पहले पुराने संस्कारों को मानती थी, परंतु बदलते वक्त के साथ-साथ उसने अपने-आपको भी बदल दिया। इसका कारण यह है कि वह समय की गति को अच्छी प्रकार से जानती है।

उसका विवाह एक अनचाहे संयुक्त परिवार में हुआ। घर के बड़ों की शर्म के कारण वह न तो मन चाहा ओढ़-पहन सकी और न ही खा सकी। वह स्वच्छंद होकर जीवन को जीना चाहती थी। परंतु संयुक्त परिवार में होने के कारण ऐसा नहीं कर पाई। इसलिए एक स्थल पर वह अपने पति को कहती भी है-“किशनदा तो थे ही जन्म के बूढ़े, तुम्हें क्या सुर लगा कि जो उनका बुढ़ापा खुद ओढ़ने लगे हो?” वह आधुनिक रंग-ढंग से जीना चाहती थी। इसलिए अधेड़ अवस्था में आते ही उसने होंठों पर लाली तथा बालों में खिज़ाब लगाना आरंभ कर दिया। उसने अपनी बेटी पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई तथा उसे जींस तथा टॉप पहनने की खुली छूट दी।

यही नहीं, वह एक ऐसी नारी है जो आधुनिक सुविधाओं की दीवानी है। अपने पति के प्रति उसके मन में कोई सहानुभूति नहीं है। उसका मानना है कि उसका पति समय से पहले बूढ़ा हो गया है। इसलिए वह पूर्णतः आधुनिकता के रंग में रंगे बच्चों का साथ देने लगती है।

प्रश्न 4.
किशनदा का बुढ़ापा सुख से क्यों नहीं बीता? संक्षेप में उत्तर दीजिए।
उत्तर:
किशनदा ने आजीवन विवाह नहीं किया और वे सदैव समाज सेवा करते रहे। उनके साथियों ने दिल्ली की पॉश कॉलोनियों में ज़मीन लेकर अपने मकान बनवाए, लेकिन उन्होंने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। सेवानिवृत्त होने तक तो वे सरकारी क्वार्टर में रहे, बाद में कुछ समय के लिए किराए के क्वार्टर में भी रहे। अन्ततः वे अपने गाँव लौट गए। वहीं कुछ समय बाद उनका देहांत हो गया। यह किसी को नहीं पता कि उनकी मृत्यु कैसे हुई। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि गाँव में उनकी कोई सेवा गा। इस कहानी के आधार पर कहा जा सकता है कि किशनदा एकाकी और बेघर रहते हुए सबकी सेवा करते रहे। परंतु उन्होंने अपने भविष्य के बारे में कभी नहीं सोचा।

प्रश्न 5.
यशोधर बाबू का अपने बच्चों के प्रति कैसा व्यवहार था? ‘सिल्वर वैडिंग’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू लोकतंत्रीय मूल्यों पर विश्वास करते थे। उन्होंने अपने बच्चों पर कोई बात थोपने का प्रयास नहीं किया। उनका कहना था कि बच्चे उनके कहे को पत्थर की लकीर न माने। उन्होंने अपने बच्चों को अपनी इच्छानुसार काम करने की आज़ादी दी। उनका मानना था कि आज के बच्चों को अधिक ज्ञान है, लेकिन अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता। उनकी केवल यही छोटी-सी इच्छा थी कि बच्चे कुछ भी करने से पहले उनसे पूछ लें, भले ही हम यशोधर बाबू को एक परंपरावादी पात्र कहें, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को हमेशा स्वतंत्र जीवन जीने दिया।

प्रश्न 6.
‘सिल्वर वैडिंग’ पार्टी में यशोधर बाबू का व्यवहार क्या आपको उचित लगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘सिल्वर वैडिंग’ पार्टी में यशोधर बाबू का व्यवहार बड़ा ही विचित्र था। उन्होंने इस पार्टी को इंप्रापर कहा। क्योंकि उनका मानना था कि यह सब अंग्रेज़ों के चोंचले हैं। यही नहीं, उन्होंने पत्नी तथा बेटी के कपड़ों पर भी प्रश्न चिह्न लगाया। उन्होंने यह सोचकर केक नहीं खाया कि इसमें अंडा होता है। हालांकि वे पहले मांसाहारी रह चुके थे। उन्होंने लड्ड भी इसलिए नहीं खाया, क्योंकि उन्होंने शाम की पूजा नहीं की। वे शाम की पूजा में अधिक देर तक इसलिए बैठे रहे, ताकि मेहमान वहाँ से चले जाएँ। यशोधर बाबू की अधिकांश हरकतें अनुचित ही लगती हैं। यदि वे परिवार के साथ थोड़ा-बहुत समझौता करके चलते तो शायद यह अधिक अच्छा होता।

प्रश्न 7.
यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
यशोधर बाबू किशनदा के मानस-पुत्र हैं। आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर:
इस कहानी को पढ़ने से यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि यशोधर बाबू का जीवन किशनदा से अत्यधिक प्रभावित रहा है। वे दिल्ली में आकर किशनदा की छत्र-छाया में रहने लगे थे। इसलिए उनके आदर्शों का अनुकरण करते हुए वे ऑफिस के कर्मचारियों के साथ वैसा ही व्यवहार करते थे जैसा किशनदा करते थे। वे किशनदा के समान मंदिर जाते थे और घंटा भर बैठकर प्रवचन सुनते थे। किशनदा ने जीवन भर यदि मकान नहीं बनाया तो यशोधर बाबू ने भी डी०डी०ए० फ्लैट के पैसे जमा नहीं करवाए। उन्होंने किशनदा के इस वाक्य को हमेशा याद रखा कि मूर्ख घर बनाते हैं और बुद्धिमान उसमें रहते हैं। किशनदा के समान वे जन्यो-पुन्यूं, रामलीला आदि के धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते रहें। सही अर्थों में यशोधर बाबू किशनदा के सकते हैं। संध्या-पूजा करते समय उन्हें भगवान के स्थान पर किशनदा के ही दर्शन होते हैं। वस्तुतः यशोधर बाबू ने शुरू से ही किशनदा को अपना गुरु, माता-पिता और मार्गदर्शक माना तथा जीवन भर उनके आदर्शों का अनुकरण करते रहे।

प्रश्न 8.
‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के कथ्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘सिल्वर वैडिंग’ मनोहर श्याम जोशी की एक उल्लेखनीय लंबी कहानी है। इसका अपना भाषिक अंदाज है। लेखक यहाँ पर यह कहना चाहता है कि आधुनिकता की ओर अग्रसर होता हमारा समाज नवीन उपलब्धियों को समेट लेना चाहता है, परंतु हमारे मानवीय मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं।

यशोधर बाबू के जीवन में ‘जो हुआ होगा’ तथा ‘समहाउ इंप्रापर’ वाक्यांशों का अधिक महत्त्व है। पहले में तो यथा स्थिति वाद की सोच है, दूसरे में अनिर्णय की स्थिति। यहाँ लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि आधुनिकता के कारण जो बदलाव आ रहा है, उसे बड़े-बुजुर्ग लोग स्वीकार करने में द्वंद्व ग्रस्त दिखाई देते हैं। लगभग यही स्थिति यशोधर बाबू की है जो अ तरक्की से खुश होते हैं और इसे ‘समहाउ इंप्रापर’ भी कहते हैं। लेखक यशोधर बाबू बुजुर्ग लोगों के द्वंद्व को रेखांकित करना चाहता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

प्रश्न 9.
‘यशोधर बाबू सहज, सरल तथा सादगीपूर्ण जीवन के पक्षधर हैं।’ सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
किशनदा के आदर्शों से प्रभावित होने के कारण यशोधर बाबू सहज, सरल तथा सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। उनके मन में आधुनिक साधनों और उपकरणों के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं है। ऑफिस जाते समय वे साइकिल का प्रयोग करते हैं और फटा हुआ पुलओवर पहनकर दूध लेने जाते हैं। ऐसा करने से उन्हें कोई दुविधा नहीं होती। वे दहेज़ में मिली घड़ी से ही काम चला लेते हैं और अपने सरकारी क्वार्टर को छोड़कर किसी आलीशान मकान में नहीं जाना चाहते। यही कारण है कि उन्होंने डी०डी०ए० फ़्लैट के लिए पैसे नहीं भरे। वे अपनी वर्तमान परिस्थिति से पूर्णतया संतुष्ट हैं। वे अपने बेटों के काम-काज में अधिक हस्तक्षेप नहीं करते।

प्रश्न 10.
यशोधर बाबू सामाजिक और पारिवारिक जीवन-शैली जीना चाहते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विवाह के बाद यशोधर बाबू संयुक्त परिवार में रहते थे। दूसरा, किशनदा ने उनकी जीवन-शैली को अत्यधिक प्रभावित किया था। इसलिए वह न केवल अपने परिवार के लोगों से, बल्कि अन्य रिश्तेदारों से भी मिलना-जुलना चाहते हैं। वे हर माह अपनी बहन के पास कुछ पैसे भेजते रहते हैं। वे अपने बीमार जीजा का पता करने के लिए अहमदाबाद जाना चाहते हैं। उनकी यह भी इच्छा है कि उनके बच्चे सभी रिश्तेदारों का मान करें। रिश्तेदारों से जुड़ने में उन्हें विशेष प्रसन्नता प्राप्त होती है। परंतु उनकी पत्नी तथा बच्चे इसे एक मूर्खतापूर्ण कार्य कहते हैं। वे यह भी चाहते हैं कि उनकी पत्नी तथा बच्चे हर बात में उनकी सलाह लें और अपनी कमाई लाकर पिता के हाथों में रखें। इससे स्पष्ट होता है कि यशोधर बाबू की अपने परिवार के प्रति गहरी आसक्ति है।

प्रश्न 11.
यशोधर बाबू का व्यवहार आपको कैसा लगा? ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू भले ही नए ज़माने के व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन वे ज़माने की चाल को अवश्य पहचानते हैं। वे सरल और सादी जिंदगी जीना चाहते हैं। साथ ही अधेड़ आयु होने के कारण उनमें शिथिलता आ चुकी है, परंतु फिर भी वे मजबूर होकर नए परिवर्तन को अपना लेते हैं। ऐसा करने से उनके पुराने संस्कार ट जाते हैं। नई चीज को अपनाने में वे हमेशा सं परंतु वे उसका विरोध भी नहीं करते हैं। कारण यह है कि उनकी आयु अब ढल चुकी है। हमारे विचार में यशोधर बाबू जैसे व्यक्ति से थोड़े-बहुत परिवर्तन की ही आशा की जा सकती है।

प्रश्न 12.
यशोधर बाबू अपने ही घर में बेचारे तथा असहाय बन चुके हैं। सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
इसमें दो मत नहीं हैं कि यशोधर बाबू अपने घर में ही बेचारे, मजबूर और असहाय-से लगते हैं। उनके बच्चे उनका कहना नहीं मानते। वे न तो अपने पिता का सम्मान करते हैं, न ही उनसे कोई सलाह लेते हैं और न ही उनसे अधिक बात करते हैं। घर के सभी लोग उन्हें उपेक्षा तथा तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं। मजबूर होकर वे साइकिल चलाना छोड़ देते हैं। फ्रिज और गैस को अपना लेते हैं। उपहार में मिले गाउन को पहन लेते हैं। अब उनमें बच्चों का विरोध करने की शक्ति नहीं रही। उनकी अपनी बेटी उनका अपमान करती है और उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर बच्चों के साथ मिल जाती है। ऐसा लगता है कि वे अपने बच्चों से हार चुके हैं। यही कारण है कि उनके मन में ‘जो हुआ होगा’ वाक्यांश बार-बार उभरकर आता है।

प्रश्न 13.
एक सैक्शन आफिसर के रूप में यशोधर बाबू का दफ्तर में कैसा व्यवहार था?
उत्तर:
यशोधर बाबू एक सरकारी कार्यालय में सैक्शन आफिसर हैं वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर पूरा नियंत्रण रखते हैं। वे समय पर कार्यालय पहुँचते हैं और साढ़े पाँच बजे तक वहाँ कार्य करते हैं। मजबूर होकर अन्य कर्मचारियों को भी साढ़े पाँच बजे तक बैठना पड़ता है। अधीनस्थ कर्मचारियों से वे प्रायः सख्ती से निपटते हैं। परंतु आफिस से प्रस्थान करते समय वे एकाध चुटीली बात कहकर माहौल के तनाव को कम कर देते हैं। वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से थोड़ी-बहुत दूरी बनाए रखते हैं और उनके साथ अधिक घुलते-मिलते नहीं हैं। यही कारण है कि वे अपनी सिल्वर वैडिंग पार्टी के लिए तीस रुपये तो देते हैं, लेकिन उसमें शामिल नहीं होते। जब चड्डा उनके साथ बदतमीज़ी का व्यवहार करता है तो वे उसकी बात को मज़ाक में उड़ा देते हैं। इससे यह पता चलता है कि वे एक व्यवहार कुशल व्यक्ति हैं।

प्रश्न 14.
यशोधर बाबू अपनी भाषा में कार्यालयी मुहावरों का प्रयोग करते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू की भाषा पर दफ़्तर की भाषा का अत्यधिक प्रभाव है। वे प्रायः बोलते समय सरकारी दफ्तरों में बोली जाने वाली अंग्रेजी भाषा के वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं। इस पाठ से दो-एक उदाहरण देखिए-
(i) आप लोग चाय पीजिए’ दैट’. तो ‘आई ड नाट माइंड’ लेकिन जो हमारे लोगों में ‘कस्टम’ नहीं है, उस पर ‘इनसिस्ट’ करना दैट’ मैं ‘समहाउ इंप्रॉपर फाइंड करता हूँ।

(ii) “मुझे तो वे ‘समहाउ इंप्रापर’ ही मालूम होते हैं। ‘एनीवे’ मैं तुम्हें ऐसा करने से रोक नहीं रहा। देयरफोर तुम लोगों को भी मेरे जीने के ढंग पर कोई एतराज नहीं होना चाहिए।”

प्रश्न 15.
‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में चड्डा का यशोधर बाबू के प्रति कैसा व्यवहार है और क्यों?
उत्तर:
चड्ढा यशोधर बाबू का अधीनस्थ कर्मचारी है। वह असिस्टेंट ग्रेड की परीक्षा पास करके नया-नया कर्मचारी नियुक्त हुआ है। उसमें अपनी योग्यता का घमंड है और वह हर बात में यशोधर बाबू को नीचा दिखाना चाहता है। वह यशोधर बाबू की पुरानी घड़ी को चूनेदानी अथवा बाबा आदम के ज़माने की घड़ी बताता है। वह यशोधर बाबू को डिजीटल घड़ी खरीदने के लिए कहता है। जब यशोधर बाबू अपना हाथ उससे मिलाने के लिए आगे बढ़ाते हैं तो वह उनका अपमान कर देता है। यही नहीं, यशोधर बाबू की सिल्वर वैडिंग की पार्टी के लिए उनसे तीस रुपये ले लेता है। इससे पता चलता है कि उसमें न तो गरिमा है, और न ही अपने से बड़ों की इज्जत करने की सभ्यता है। उसमें धृष्टता देखी जा सकती है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

प्रश्न 16.
यशोधर बाबू के बच्चों का उज्ज्वल पक्ष कौन-सा है?
उत्तर:
यशोधर बाबू के बच्चे बड़े प्रतिभाशाली और मेहनती हैं। वे अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर आगे बढ़े हैं। बड़ा लड़का एक विज्ञापन कंपनी में पंद्रह सौ रुपये पर काम कर रहा है। दूसरा लड़का एलाइड सर्विसेज़ में चुना गया है। लेकिन वह और अच्छी नौकरी पाने के लिए दोबारा पढ़ रहा है। तीसरा लड़का स्कॉलरशिप लेकर पढ़ने के लिए अमरीका गया है। उनकी बेटी डॉक्टरी अमरीका जाना चाहती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सभी बच्चे उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। वे अपने घर में गैस, फ्रिज, सोफा, कालीन आदि सुविधाएँ जुटाना चाहते हैं।

प्रश्न 17.
यशोधर बाबू के बच्चों का पक्ष मलिन कौन-सा है?
उत्तर:
भले ही यशोधर बाबू के बच्चे बड़े ही प्रतिभाशाली और मेहनती हैं। लेकिन उनका व्यवहार अधिक अच्छा नहीं है। वे न तो पिता का मान करते हैं, न रिश्तेदारी का और न ही धर्म और समाज का। बल्कि वे बात-बात पर अपने पिता का अपमान करते हैं। वे पिता की सलाह लिए बिना ही उनकी सिल्वर वैडिंग की पार्टी का आयोजन कर देते हैं। साथ ही वे चाहते हैं कि उनके पिता हर बात में उनका सहयोग करें। भूषण अच्छी नौकरी पाकर भी घर में कुछ नहीं देता। वह हमेशा अपने घर में अपने पैसों की धौंस जमाता रहता है। वह पिता को अपमानित करते हुए कहता है कि वह घर में कोई नौकर रख लें, जिसका वेतन वह स्वयं देगा।

उपहार के रूप में एक गाउन देकर वह कहता है कि उनके पिता फटा हुआ गाउन पहनकर दूध लेने न जाएँ। इसी प्रकार उनकी लड़की स्वयं बेढंगे कपड़े पहनती है और पिता द्वारा टोकने पर उसे झिड़क देती है। यही नहीं, बच्चों के मन में अपने रिश्तेदारों और सगे-संबंधियों के प्रति भी कोई लगाव नहीं है। बुआ को पैसे भेजने के बारे में वे आनाकानी करते हैं और धर्म तथा समाज के कामों में भाग नहीं लेते। उनमें न तो अच्छे संस्कार हैं और न ही मानव मूल्य। उनके मन में केवल पद, प्रतिष्ठा और पैसे का ही मोह है।

प्रश्न 18.
यशोधर बाबू की पत्नी अपने पति से प्रतिकूल व्यवहार क्यों करती है?
उत्तर:
आरंभ में यशोधर बाबू की पत्नी को संयुक्त परिवार के बंधन में रहना पड़ा था। वह न तो जीवन के सुखों को भोग सकी और न ही जीवन का आनंद ले सकी। यशोधर बाबू ने अपनी बूढ़ी ताई के समान उसे भी अच्छा खाने-पहनने को नहीं दिया। वह अपने यौवन को खुलकर नहीं भोग पाई। इसलिए वह अपने पति के परंपरावादी विचारों का विरोध करती है। उसे इस बात का दुख है कि उसका पति बूढ़ों जैसी बातें करने लग गया है। एक स्थल पर वह उसे कहती भी है कि ‘तुम शुरू में तो ऐसे नहीं थे, शादी के बाद मैंने तुम्हें देख जो क्या नहीं रखा है! हफ्ते में दो-दो सिनेमा देखते थे। गज़ल गाते थे गज़ल! इस प्रकार हम देखते हैं कि यशोधर की पत्नी आधुनिक सुख-सुविधाओं को भोगना चाहती है और यशोधर पुराने मूल्यों से चिपका हुआ है। अतः वह अपने पति का विरोध करती है।

प्रश्न 19.
‘सिल्वर वैडिंग’ पाठ के यशोधर बाबू समय के साथ ढल सकने में असफल रहते हैं, ऐसा क्यों?
उत्तर:
यशोधर बाबू आजीवन किशनदा के आदर्शों का अनुसरण करते रहे। वे अपने परिवार को भी उन्हीं संस्कारों में ढालना चाहते थे, परंतु वे सच्चाई को भूल गए कि अब ज़माना बदल गया है। उनकी पत्नी तथा बच्चे नए ज़माने के अनुसार चलना चाहते यशोधर बाबू अपने पुराने संस्कारों तथा प्रौढावस्था के कारण नए जमाने का स्वागत नहीं करते। उन्हें लगता है कि आधनिक पहनावा पश्चिमी रंग-ढंग से प्रभावित है। इसलिए वे समय के साथ ढल सकने में असमर्थ रहते हैं।

प्रश्न 20.
‘सिल्वर वैडिंग’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है।
उत्तर:
यशोधर बाबू की पत्नी अपने यौवनकालीन जीवन से असंतुष्ट रही है। उसे संयुक्त परिवार के बंधनों में रहना पड़ा था। वह न तो मनमर्जी का खा सकी थी और न पहन सकी थी। उसका कोई शौक पूरा नहीं हुआ था। इसलिए जब उसके बच्चे नए ज़माने की ओर अग्रसर होते हैं तो वह भी उनके सुर में सुर मिलाना शुरू कर देती है। वह अपने सफेद बालों में खिज़ाब लगाती है। होंठों पर लाली लगाती है और ऊँची एड़ी के सैंडिल पहनती है। इस प्रकार वह समय के अनुसार ढल जाती है। यहाँ तक कि घर के सभी बच्चे भी उसका साथ देते हैं।

प्रश्न 21.
क्या पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव को ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी की मूल संवेदना कहा जा सकता है। तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
निश्चय से इस कहानी में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव को चित्रित किया गया है। लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि पश्चिमी सभ्यता का अंधा अनुकरण करने के कारण हम भारतवासी अपनी संस्कृति को त्याग चुके हैं। हमारे लिए रिश्तेदारी, परंपरा, भारतीय वेशभूषा तथा तीज-त्योहार का कोई मूल्य नहीं है। यही नहीं, मंदिर जाना या संध्या वंदना करना आदि भी हम पसंद नहीं करते। इसके स्थान पर हम सिल्वर वैडिंग पार्टी करना, केक काटना, जींस और टॉप पहनना आदि उचित मानते हैं, परंतु यशोधर बाबू अभी भी भारतीय संस्कृति का पक्ष लेते हैं और पाश्चात्य परंपरा का विरोध करते हैं। प्रस्तुत कहानी में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से उत्पन्न संघर्ष को दर्शाया गया है। अतः यह भी कहानी की मूल संवेदना हो सकती है।

प्रश्न 22.
क्या पीढ़ी के अंतराल को सिल्वर वैडिंग की मूल संवेदना कहा जा सकता है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
वस्तुतः पीढ़ी का अंतराल ही इस कहानी की मूल संवेदना है। यशोधर बाबू पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके बच्चे नई पीढ़ी का। यशोधर बाब परानी परंपराओं का निर्वाह करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि होली, रामलीला, रिश्तेदारी आदि को निभाया जाए। वे सादा और सरल जीवन जीना चाहते हैं और बच्चों से यह चाहते हैं कि वे भी अपने बड़ों का सम्मान करें।

इसके विपरीत नई पीढ़ी भौतिकता को महत्त्व देती है। वह रिश्तेदारी की अपेक्षा आर्थिक विकास को श्रेयस्कर कर मानती है। उनके लिए पुराने संस्कार और परंपराएँ व्यर्थ हैं। यहाँ तक कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को भी अपने रंग-ढंग में ढालना चाहती है। अतः सिल्वर वैडिंग में इन दो पीढ़ियों के संघर्ष का सजीव वर्णन किया गया है।

प्रश्न 23.
सिल्वर वैडिंग के कथानायक यशोधर बाबू एक आदर्श व्यक्तित्व हैं और नई पीढ़ी द्वारा उनके विचारों को अपनाना ही उचित है-इस कथन के पक्ष या विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
किसी भी दृष्टि से यशोधर बाबू का व्यक्तित्व आदर्श नहीं है। वे भले ही पुराने संस्कारों एवं परंपराओं से चिपके हुए तो उनकी पत्नी उनकी बात सुनती है और न ही उनके बच्चे। यहाँ तक कि वे अपने घर-परिवार, दफ्तर तथा समाज में अकेले पड़ जाते हैं। वे किशनदा के आदर्शों पर चलना चाहते हैं और नए युग के तौर-तरीकों को अपनाने में पूर्णतया असमर्थ रहते हैं। वस्तुतः उनका आचरण और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली नहीं है कि वे अपने बच्चों में अपनी सोच को भर सकें। वे समय से पिछड़ चुके हैं और प्राचीन तथा नवीन में सामंजस्य नहीं बैठा सके। यदि वे ऐसा करने में सफल होते तो फिर यशोधर बाबू एक आदर्श कथानायक कहलाते।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

प्रश्न 24.
यशोधर बाबू की वाहन से सम्बद्ध विचारधारा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू सदा ही दिखावे की दुनिया से दूर रहे और सहज जीवन जीने के पक्षधर रहे। वाहन के प्रति भी उनका यही दृष्टिकोण रहा है। यशोधर बाबू सवारी पर अधिक खर्च नहीं करते थे। जहाँ तक हो सकता था, वे पैदल चलना पसन्द करते थे। वे अपने क्वार्टर गोल मार्केट से सेक्रेट्रिएट तक पैदल ही आते-जाते थे। वे साग-सब्जी लेने भी पैदल ही जाते थे। आरम्भ में वे कार्यालय में साइकिल पर जाते थे, किन्तु अब उनके बच्चे युवा हो गए थे। उन्हें लगता था कि साइकिल तो चपरासी भी चलाते हैं। बच्चे चाहते थे कि उनके पिता जी अब स्कूटर ले लें। किन्तु उनका मानना था कि स्कूटर तो एक बेहूदा सवारी है और कार जब अफोर्ड नहीं कर सकते, तब उसकी बात सोचना ही क्यों?

प्रश्न 25.
यशोधर पंत के स्वभाव को रेखांकित कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू सहज, सरल तथा सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। उनके मन में आधुनिक साधनों और उपकरणों के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं है। ऑफिस जाते समय वे साइकिल का प्रयोग करते हैं और फटा हुआ पुलओवर पहनकर दूध लेने जाते हैं। ऐसा करने से उन्हें कोई दुविधा नहीं होती। वे दहेज़ में मिली घड़ी से ही काम चला लेते हैं और अपने सरकारी क्वार्टर को छोड़कर किसी आलीशान मकान में नहीं जाना चाहते। यही कारण है कि उन्होंने डी०डी०ए० फ़्लैट के लिए पैसे नहीं भरे। वे अपनी वर्तमान परिस्थिति से पूर्णतया संतुष्ट हैं। वे अपने बेटों के कामकाज में अधिक हस्तक्षेप नहीं करते।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भूषण बुआ को पैसे भेजने से मना क्यों करता है?
उत्तर:
यशोधर के अतिरिक्त घर के किसी सदस्य का अपने रिश्तेदारों से कोई लगाव नहीं है। विशेषकर भूषण यह समझता है कि बुआ उसके पिता की बहन है। इसलिए उसे पैसे भेजना उसका दायित्व नहीं है। वह इसे अनावश्यक संबंध मानता है।

प्रश्न 2.
यशोधर बाबू अपने घर देर से क्यों आते हैं?
उत्तर:
घर का कोई भी सदस्य यशोधर बाबू का आदर-मान नहीं करता, बल्कि सभी उनकी उपेक्षा एवं तिरस्कार करते हैं। छोटी-छोटी बातों पर उनका अपनी पत्नी से मतभेद हो जाता है। इसलिए जितना हो सकता है, वे घर से दूर ही रहते हैं।

प्रश्न 3.
यशोधर बाबू को अपने बड़े बेटे की बड़ी नौकरी पसंद क्यों नहीं थी?
उत्तर:
भले ही यशोधर सेक्शन आफिसर थे, लेकिन वे भी डेढ़ हज़ार के मासिक वेतन तक नहीं पहुँच पाए थे। उनके बेटे को छोटी आयु में ही इतना बड़ा वेतन मिल रहा था। वे सोचते थे कि इसमें कोई-न-कोई गड़बड़ अवश्य है। वे बेटे की नौकरी के रहस्य को नहीं समझ पाए। इसलिए उनको अपने बड़े बेटे की बड़ी नौकरी पसंद नहीं थी।

प्रश्न 4.
उपहार में मिले यशोधर के ड्रेसिंग गाउन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू की सिल्वर वैडिंग के अवसर पर घर पर परिवार के सदस्यों ने एक पार्टी का आयोजन किया था। बच्चों ने उन्हें अनेक उपहार दिए थे। उनके एक बेटे ने उन्हें ड्रेसिंग गाउन उपहार में दिया था। यशोधर बाबू ने कभी गाउन का प्रयोग नहीं किया था, किन्तु उपहार में दिए गए गाउन को स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने उसे अपने कमीज-पाजा पर पहन लिया था।

प्रश्न 5.
किशनदा की मृत्यु का कारण क्या रहा होगा?
उत्तर:
किशनदा रिटायर होकर दिल्ली छोड़कर अपने गाँव चले गए। वहाँ भी उन्हें उपेक्षा और तिरस्कार प्राप्त हुआ। वृद्धावस्था में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। इस कारण शायद उनकी मृत्यु शीघ्र हो गई होगी।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

प्रश्न 6.
यशोधर ने किशनदा को अपने घर पर आश्रय क्यों नहीं दिया?
उत्तर:
यशोधर बाबू का क्वार्टर बहुत छोटा था। उसमें केवल दो कमरे थे, जिसमें तीन परिवार रहते थे। इसलिए यशोधर बाबू किशनदा को अपने घर आश्रय नहीं दे पाए।

प्रश्न 7.
यशोधर बाबू ने आजीवन अपना मकान क्यों नहीं बनाया?
उत्तर:
किशनदा से प्रभावित होने के कारण यशोधर बाबू भी मानते थे कि मूर्ख लोग मकान बनाते हैं और सयाने उनमें रहते हैं। वे आजीवन सरकारी क्वार्टर में रहे। फिर उन्हें यह भी उम्मीद थी कि जब उनका बेटा सरकारी नौकरी पर लग जाएगा तो उनके रिटायर होने के बाद यह क्वार्टर उन्हें फिर से मिल जाएगा। इस कारण यशोधर बाबू ने आजीवन अपना मकान नहीं बनाया।

प्रश्न 8.
यशोधर बाबू का प्रवचन में मन क्यों नहीं लगा?
उत्तर:
पहली बात तो यह है कि यशोधर अधिक धार्मिक तथा कर्मकांडी नहीं है। वे केवल किशनदा के कहने पर प्रवचन सुनने के लिए जाते हैं। दूसरा, घर से मिली उपेक्षा और तिरस्कार उनको चैन से जीने नहीं देती। धार्मिक प्रवचन सुनकर भी उनके मन की बेचैनी दूर नहीं होती। इसलिए यशोधर बाबू का प्रवचन में मन नहीं लगा।

प्रश्न 9.
यशोधर बाबू की सामाजिकता को उनकी पत्नी और बच्चे पसंद क्यों नहीं करते?
उत्तर:
यशोधर की पत्नी तथा बच्चे नहीं चाहते थे कि ‘जन्यो पुन्यूं की परंपरा का निर्वाह करने के लिए लोगों को घर पर बुलाया जाए और रामलीला की तैयारी के लिए घर का एक कमरा दिया जाए। इससे एक तो धन भी खर्च होता है तथा दूसरा समय भी नष्ट होता है। इन परंपराओं में बच्चों का कोई विश्वास नहीं था।

प्रश्न 10.
यशोधर बाबू को ऐसा क्यों लगा कि उनके क्वार्टर पर अब उनके बेटे का अधिकार हो गया है?
उत्तर:
यशोधर बाबू ने अनुभव किया कि उनका बेटा उनके क्वार्टर में मन माना परिवर्तन कर रहा है। वह घर के लिए पर्दे, कालीन, सोफा, डबल बेड और टी०वी० ले आया। फिर उसने यह भी निर्देश जारी कर दिया कि उसके टी०वी० को कोई हाथ न लगाए। इन बातों से यशोधर बाबू को यह महसूस हुआ कि उसके बेटे ने उसके ही क्वार्टर पर अधिकार जमा लिया है।

प्रश्न 11.
यशोधर बाबू गिरीश को बिगडैल क्यों कहते हैं?
उत्तर:
गिरीश यशोधर का साला है। वह महत्त्वाकांक्षी होने के साथ येन-केन-प्रकारेण उन्नति प्राप्त करने में विश्वास करता है। वह लड़कों को शार्ट-कट द्वारा तरक्की प्राप्त करने के उपाय बताता रहता है। यह सब यशोधर बाबू के सिद्धांतों के विरुद्ध है। अतः वे उसे बिगडैल कहते हैं।

प्रश्न 12.
यशोधर बाबू और उनकी पत्नी की ड्रेस के बारे में अलग-अलग राय क्यों है?
उत्तर:
यशोधर बाबू किशनदा से प्रभावित होने के कारण एक परंपरावादी व्यक्ति हैं। वे सरल और साधारण वेशभूषा पहनने में विश्वास करते हैं, लेकिन उनकी पत्नी नए ज़माने से प्रभावित होने के कारण बालों में खिज़ाब लगाती है, ऊँची एड़ी के सैंडल पहनती है और होंठों पर लाली लगाती है। वह अपनी बेटी को भी जींस, पतलून तथा बिना बाँह का ब्लाऊज पहनाती है।

प्रश्न 13.
किशनदा ने यशोधर बाबू की सहायता किस प्रकार से की?
उत्तर:
यशोधर. बाबू रेम्जे स्कूल अल्मोड़ा से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करके नौकरी की तलाश में दिल्ली आए थे। उस समय उनकी आयु नौकरी के लायक नहीं थी। ऐसी दशा में किशनदा ने उन्हें मैस का रसोइया बनाकर रख लिया। यही नहीं, किशनदा ने यशोधर बाबू को पचास रुपये उधार भी दिए ताकि वह अपने लिए कपड़े बनवा सके और गाँव पैसा भिजवा सके। बाद में किशनदा ने अपने ही ऑफिस में नौकरी दिलवाई और दफ्तरी जीवन में भी मार्ग-दर्शन किया।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

प्रश्न 14.
यशोधर बाबू ने अपनी सिल्वर वैडिंग पर केक क्यों नहीं खाया?
उत्तर:
भले ही यशोधर बाबू पहले यदा कदा माँस खा लेते थे। लेकिन इस समय वे पूर्णतया निरामिष भोजी थे। उन्होंने यह सोचकर केक नहीं खाया कि उसमें अंडा होता है। दूसरा वे विलायती परंपरा को भी नहीं निभाना चाहते थे।

प्रश्न 15.
घर बनाने के विषय में यशोधर बाबू के दृष्टिकोण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू घर बनाने के विषय में ‘मूरख लोग मकान बनाते हैं और सयाने उनमें रहते हैं’ कहावत से सहमत है। उसका मत है कि जब तक सरकारी नौकरी में है तो सरकारी क्वार्टर। फिर बच्चों में से किसी की सरकारी नौकरी लग गई तो उसे सरकारी क्वार्टर मिल जाएगा। उसमें रह लेंगे। यशोधर बाबू ने कभी भी मकान बनाने के विषय में गम्भीरता से सोचा ही नहीं था।

प्रश्न 16.
किशनदा और यशोधर पंत की मित्रता की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
किशनदा और यशोधर पंत की मित्रता ही नहीं थी, अपितु दोनों में गहरा सम्बन्ध भी था। यशोधर पंत को किशनदा का मानस पुत्र कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। किशनदा और यशोधर बाबू दोनों अच्छे मित्र थे। दोनों एक-दूसरे के काम आते थे अर्थात् एक-दूसरे का सहयोग करके अपनी अच्छी मित्रता का प्रमाण भी देते थे। किशनदा का यशोधर पंत के व्यक्तित्व निर्माण में अत्यधिक सहयोग रहा है। यशोधर पंत को किशनदा की मृत्यु के समाचार से बहुत शौक हुआ था। इन सब तथ्यों से पता चलता है कि दोनों में गहन मित्रता थी।

प्रश्न 17.
क्या यशोधर बाबू द्वारा बैठक में गमछा पहनकर आना उचित कहा जा सकता है?
उत्तर:
यशोधर बाबू का यह कार्य सर्वथा अनुचित कहा जाएगा। भारतीय अथवा विलायती दोनों परंपराओं की दृष्टि से इसे हम उचित नहीं कह सकते।

प्रश्न 18.
यशोधर बाब की बेटी की आधुनिकता का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू की बेटी परम्परागत जीवन जीना पसन्द नहीं करती थी। वह हमेशा जींस और बगैर बाँह का टॉप पहने रहती है। वह अपने पिता की 25वीं वर्षगाँठ के समय इसी ड्रैस में मेहमानों को विदाई देती है। यशोधर बाबू भी उसे कई बार ऐसी ड्रैस न पहनने के लिए कह चुके थे। किन्तु उस पर उनकी बात का कोई असर नहीं हुआ। यशोधर बाबू की पत्नी बेटी का पक्ष लेती है वह स्वयं भी आधुनिक बनने व दिखने के पक्ष में है। किन्तु यशोधर बाबू को उनकी बात पसन्द नहीं थी।

सिल्वर बैंडिग Summary in Hindi

सिल्वर बैंडिग लेखक-परिचय

प्रश्न-
श्री मनोहर श्याम जोशी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री मनोहर श्याम जोशी का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-श्री मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में हुआ। वे हिंदी साहित्य में एक कथाकार, व्यंग्यकार, संपादक, पत्रकार तथा दूरदर्शन धारावाहिक लेखक के रूप में प्रसिद्ध हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने विज्ञान में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने ‘दिनमान’ पत्रिका के सहायक संपादक के रूप में साहित्य जगत् में प्रवेश किया। बाद में वे ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ पत्रिका का संपादन करने लगे। सन् 1984 में उन्होंने दूरदर्शन से प्रसारित होने वाले ‘हम लोग’ धारावाहिक का लेखन किया। आम लोगों में यह धारावाहिक अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। उनके द्वारा लिखित पटकथाओं पर ‘बुनियाद’, ‘हमराही’, ‘कक्का जी कहिन’, ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’ आदि लोकप्रिय धारावाहिक बने। सन् 2006 में इस साहित्यकार का निधन हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ इनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं

  • कहानी-संग्रह-‘कुरू कुरू स्वाहा’, ‘कसम’, ‘हरिया’, ‘हरक्यूलीज़ की हैरानी’, ‘हमजाद’, ‘क्याप’ आदि।
  • व्यंग्य-संग्रह ‘एक दुर्लभ व्यक्तित्व’, ‘कैसे किस्सागो’, ‘मंदिर घाट की पौड़ियाँ’, ‘ट-टा प्रोफेसर षष्ठी वल्लभ पंत’, ‘नेताजी कहिन’, ‘इस देश का यारो क्या कहना’ आदि।
  • साक्षात्कार-संग्रह ‘बातों बातों में’, ‘इक्कीसवीं सदी’।
  • संस्मरण-संग्रह-‘लखनऊ मेरा लखनऊ’, ‘पश्चिमी जर्मनी पर एक उड़ती नज़र’।
  • दूरदर्शन धारावाहिक ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’, ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’। सन् 2005 में ‘क्याप’ के लिए उनको ‘साहित्य अकादमी’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-मनोहर श्याम जोशी एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। उन्होंने असंख्य कहानियाँ, संस्मरण, व्यंग्य लेख, साक्षात्कार तथा दूरदर्शन के लिए धारावाहिक लिखे। वे मूलतः आधुनिक युग बोध के साहित्यकार थे। उन्होंने आज की पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा नैतिक समस्याओं पर अपने मौलिक विचार व्यक्त किए। ‘हम लोग’ तथा ‘बुनियाद’ जैसे धारावाहिकों में उन्होंने समाज की नब्ज़ को पकड़ने का सफल प्रयास किया है। उदाहरण के रूप में ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में लेखक ने पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच उत्पन्न खाई की ओर संकेत किया है जिसके फलस्वरूप आज संयुक्त परिवार टूटकर बिखर रहे हैं। अपने व्यंग्यात्मक लेखों में उन्होंने आज के राजनीतिज्ञों, तथाकथित साहित्यकारों एवं सामाजिक नेताओं पर करारे व्यंग्य किए हैं। उनकी कुछ कहानियाँ सामाजिक समस्याओं का उद्घाटन करती हैं और पाठकों को बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं। उनकी अधिकांश रचनाएँ शिक्षा जगत् के लिए काफी उपयोगी हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

4. भाषा-शैली-मनोहर श्याम जोशी ने प्रायः साहित्यिक हिंदी भाषा का ही प्रयोग किया है, जिसमें अंग्रेज़ी तथा उर्दू शब्दों का मिश्रण खुलकर देखा जा सकता है। कहीं-कहीं तो वे अंग्रेजी भाषा के पूरे वाक्य का ही प्रयोग कर देते हैं। वस्तुतः उनकी भाषा पात्रानुकूल तथा प्रसंगानुकूल कही जा सकती है। आवश्यकतानुसार वे पंजाबी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों का भी प्रयोग कर लेते हैं। ‘दिनमान’ तथा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ पत्रिकाओं में उन्होंने पूर्णतया साहित्यिक हिंदी भाषा का ही प्रयोग किया है।

इसके साथ-साथ उनकी शैली साहित्यिक विधा के अनुसार बदल जाती है। व्यंग्य लेखों में उनका व्यंग्य बड़ा ही तीखा और चुभने वाला है। इस पाठ से उनकी भाषा-शैली का एक उदाहरण देखिए “अपनी सिल्वर वैडिंग की यह भव्य पार्टी भी यशोधर बाबू को समहाउ इंप्रापर ही लगी तथापि उन्हें इस बात से संतोष हुआ कि जिस अनाथ यशोधर बाबू के जन्मदिन पर कभी लह नहीं आए, जिसने अपना विवाह भी कोऑपरेटिव से दो-चार हज़ार कर्जा निकालकर किया बगैर किसी खास धूमधाम के, उसके विवाह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ पर केक, चार तरह की मिठाई, चार तरह की नमकीन, फल, कोल्डड्रिंक्स, चाय सब कुछ मौजूद है।”

सिल्वर बैंडिग पाठ का सार

प्रश्न-
श्री मनोहर श्याम जोशी द्वारा रचित ‘सिल्वर वैडिंग’ पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
सिल्वर वैडिंग’ पाठ के रचयिता श्री मनोहर श्याम जोशी हैं। इसमें लेखक ने यशोधर पंत की 25वीं वर्षगाँठ का सजीव वर्णन किया है। यशोधर बाबू अपने विभाग के सेक्शन आफिसर के पद पर नियुक्त थे। वे अपने कार्यालय में एक निश्चित समय तक काम करते थे। दिनभर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ उनका व्यवहार प्रायः रूखा था। लेकिन अपने गुरु कृष्णानंद (किशनदा) की परंपरा का अनुसरण करते हुए वे प्रायः सांयकाल को दफ्तर से जाते समय अपने कर्मचारियों के साथ हल्का-फुलका मज़ाक भी कर लेते थे। कभी-कभी वे अपने अधीनस्थ असिस्टेंट ग्रेड के लिपिक चड्डा की धृष्टता की भी अनदेखी कर देते थे।

एक बार यशोधर बाबू को अपने पूर्ववर्ती अधिकारी किशनदा की याद आ गई। वे उनके साथ बिताए हुए कुछ क्षणों की याद में डूब से गए। चड्ढा द्वारा पुनः बोलने पर उनके मुख से अचानक निकल पड़ा “नाव लैट मी सी, आई वॉज़ मैरिड ऑन सिक्स्थ फरवरी नाइंटिन फोर्टी सेवन।” आफिस के एक अन्य बाबू ने तत्काल हिसाब लगाकर कहा-“मैनी हैप्पी रिटर्नुस आफ द डे सर! आज तो आपका सिल्वर वैडिंग है। शादी को पूरा पच्चीस साल हो गया।” परंतु यशोधर बाबू सिल्वर वैडिंग को गोरे साहबों का चोंचला मानते थे। इधर चड्डा तथा मेनन ने चाय-मट्ठी तथा लड्डु की माँग प्रस्तुत की। यशोधर बाबू ने इसे ‘समहाउ इंप्रॉपर’ कहकर दस रुपये दे दिए। सारे सेक्शन के कहने पर भी वे इस दावत में शामिल नहीं हुए। हाँ, उन्होंने दस-दस के दो नोट और अवश्य दे दिए।

यशोधर बाबू ‘बॉय सर्विस से उन्नति प्राप्त करके सेक्शन ऑफिसर बने। किशनदा हमेशा उनके आदर्श बने रहे। वे उनके पूर्ववर्ती अधिकारी थे। इसलिए वे हमेशा उन्हीं का अनुकरण करते रहे और तरक्की करते हुए सेक्शन ऑफिसर बन गए। यशोधर बाबू किशनदा के समान सिद्धांतों के पक्के हैं। ऑफिस से छुट्टी मिलने के बाद हर रोज़ बिड़ला मंदिर जाते, प्रवचन सुनते और स्वयं ध्यान भी लगाते। वहाँ से निकलकर वे पहाड़गंज से साग-सब्जी खरीद कर लाते थे। इसी समय में वे लोगों से मिल-जुल लेते थे। वे पैदल घर से ऑफिस और ऑफिस से घर आते थे। यद्यपि ऑफिस से पाँच बजे छुट्टी मिल जाती थी, परंतु वे रात के आठ बजे ही घर पहुँचते थे। आज जब यशोधर बाबू बिड़ला मंदिर जा रहे थे, तो उन्होंने तीन बैडरूम वाले उस क्वार्टर को देखा, जिसमें किशनदा रहते थे। अब वह क्वार्टर नहीं रहा था। वहाँ पर एक छह मंजिला मकान खड़ा था। एक मंज़िल के क्वार्टर को तोड़कर छह मंजिला मकान बनाना यशोधर बाबू को अच्छा नहीं लगा।

भले ही उन्हें पद के अनुसार एंड्रयूज़गंज, लक्ष्मीबाई नगर, पंडारा रोड पर डी-2 टाइप का अच्छा क्वार्टर मिल रहा था। परंतु उन्होंने स्वीकार नहीं किया। जब उनका अपना क्वार्टर तोड़ा जाने लगा तब उन्होंने बचे क्वार्टरों में से एक क्वार्टर अपने नाम अलाट करवा लिया। इसका कारण यह था कि वे किशनदा की यादों को मन में लिए वहीं रहना चाहते थे। किशनदा को याद करते-करते वे मन-ही-मन सोचने लगे। अच्छा तो यह होता कि वह भी किशनदा के समान शादी न करता और जीवन भर समाज की सेवा करता।

फिर उन्हें याद आया कि किशनदा का बढ़ापा ठीक से व्य हुआ। जब सेवानिवृत्त होने के बाद किशनदा को क्वार्टर खाली करना पड़ा, तो किसी ने भी उन्हें आश्रय नहीं दिया। स्वयं यशोधर बाबू उन्हें अपने यहाँ रहने के लिए नहीं कह पाए। क्योंकि उस समय उनका विवाह हो गया था और उनके दो कमरों वाले क्वार्टर में तीन परिवार रह रहे थे। किशनदा कुछ साल राजेंद्र नगर में किराए का क्वार्टर लेकर रहे। किंतु मजबूर होकर वे अपने गाँव लौट गए और साल भर बाद स्वर्ग सिधार गए। यशोधर बाबू ने किशनदा से जो कुछ सीखा था, वह सब यशोधर बाबू को याद था।

यशोधर बाबू को याद आया कि हर रोज़ भ्रमण करने के बाद लौटते समय किशनदा अपने इस मानस पुत्र यशोधर बाबू के घर आते थे। किशनदा ने उन्हें जल्दी उठना सिखाया था। किशनदा ने ‘अरली टू बैड एंड अरली टू राइज मेक्स ए मैन हैल्दी एंड वाइज़!’ का मंत्र यशोधर बाबू को दिया था। इसलिए वे भी जल्दी उठने और सैर करने जाने लगे। आज भी यशोधर बाबू उस दृश्य को नहीं भूला पाते, जब किशनदा कुरते-पजामे में सैर को निकलते थे।

वे कुर्ते-पजामे के ऊपर ऊनी गाऊन पहनते थे, सिर पर गोल विलायती टोपी और पाँव में देसी खड़ाऊँ तथा छड़ी हाथ में लेकर चलते थे। यही कारण है कि जब तक किशनदा दिल्ली में रहे, तब तक यशोधर बाबू उनके शिष्य बने रहे। उन्होंने अपने बीवी-बच्चों की नाराज़गी की परवाह नहीं की। किशनदा से उन्होंने यह सीखा कि अपने घर पर होली गवाई जाए, जनेऊ बदलने के लिए कुमाऊँ वासियों को घर पर बुलाया जाए और रामलीला वालों को क्वार्टर का एक कमरा दिया जाए।

सिद्धांतों का पालन करने वाले यशोधर बाबू की पिछले कुछ वर्षों से अपनी पत्नी तथा बच्चों से छोटी-छोटी बात पर तकरार होती रहती थी। इसलिए शायद वे घर जल्दी लौटकर नहीं आते। उन्हें यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि उनकी पत्नी आधुनिक नारी बने। यह उनके मूल संस्कारों के विरुद्ध था। जबकि यशोधर बाबू की पत्नी अपने बच्चों का साथ देते हुए ‘मॉड’ बन गई थी। यशोधर बाबू को इस बात का दुख है कि संयुक्त परिवार में रहते हुए उसकी पत्नी ने उसका साथ नहीं दिया। कारण यह था कि यशोधर बाबू परंपरावादी थे और उनके बच्चे आधुनिकवादी थे। पत्नी पुरानी परंपराओं को ढकोसला मानती थी और बच्चों का साथ देती थी। अपनी पत्नी के शृंगार को देखकर मज़ाक करते हुए कहते थे-शानयल बुढ़िया, चटाई का लहँगा, बूढ़ी मुँह मुँहासे, लोग करें तमासे’।

जब उनका बड़ा बेटा एक विज्ञापन संस्था में डेढ़ हज़ार रुपये मासिक का कर्मचारी बन गया, तो उन्हें ऐसा लगा कि उनके साधारण पत्र को असाधारण वेतन वाली नौकरी मिल गई है। उन्हें इस बात का भी दुख था कि उनका मंझला पुत्र ‘एलाइड सर्विसेज़’ में नहीं गया और बेटी विवाह के लिए तैयार न हुई, परंतु उन्हें अपने बच्चों की बातें उचित भी लगीं। उदाहरण के रूप में डी०डी०ए० के फ्लैट में पैसा न भरना, उन्होंने अपनी भूल ही मानी। उनके बच्चे बात-बात पर तर्क देते थे। उन्होंने यह भी सोचा कि पुश्तैनी घर में जाकर मरम्मत की जिम्मेवारी लेने से बेकार का झगड़ा लेना पड़ेगा। वे हमेशा किशनदा की बात को याद रखते थे कि मूर्ख लोग मकान बनाते हैं, सयाने उनमें रहते हैं। उनका सोचना था जब तक सरकारी नौकरी है, तब तक क्वार्टर है। बाद में गाँव का पुश्तैनी घर है। उनका यह विचार भी था कि उनके रिटायर होने से पहले उनके बेटे को सरकारी नौकरी मिल जाएगी और यह सरकारी क्वार्टर उन्हीं के पास रहेगा।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

आज प्रवचन सुनने में यशोधर बाबू का मन नहीं लगा। वे मन से न धार्मिक हैं, न कर्मकांडी। वे तो केवल अपने आदर्श किशनदा की परंपरा का पालन कर रहे थे। जैसे उनकी उम्र ढलने लगी तो वे किशनदा के समान मंदिर जाने लगे। गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तकें पढ़ने लगे और संध्या वंदना करने लगे, परंतु उनका मन कहीं टिकता नहीं था। कभी-कभी यह भी सोचते कि उन्हें आसक्ति को छोड़कर परलोक के बारे में सोचना चाहिए। अचानक प्रवचन में जनार्दन शब्द सुनकर उन्हें अपने जीजा जनार्दन जोशी की याद आ गई। उनकी तबीयत बहुत खराब थी और उनका हाल-चाल जानने के लिए उन्हें अहमदाबाद जाना होगा। परंतु उनके बीवी और बच्चे इसका विरोध करेंगे, जबकि यशोधर बाबू सुख अथवा दुख में सगे-संबंधियों के यहाँ जाना आवश्यक समझते थे। वस्तुतः यशोधर बाबू की पत्नी को उनका परंपरावादी होना बिल्कुल पसंद नहीं था।

उसका कहना था कि उसके पति ने स्वयं कुछ नहीं देखा। माँ के मरने के बाद यशोधर बाबू को अपनी विधवा बुआ के पास रहना पड़ा, जिसका लंबा-चौड़ा परिवार नहीं था। जब मैट्रिक करके दिल्ली पहुंचे तो किशनदा की छत्रछाया में रहने लगे। किशनदा के पास केवल गवई लोगों का ज्ञान था। जबकि यशोधर बाबू की पत्नी बगैर बाँह का ब्लाऊज पहनती थी, रसोई से बाहर दाल-भात खाती थी और ऊँची हील की सैंडल पहनती थी। यशोधर बाबू इसे ‘समहाउ इंप्रापर’ कहते थे। यशोधर बाबू चाहते थे कि समाज उन्हें एक आदरणीय बुजुर्ग समझे, बच्चे उनका आदर करें और उनसे सलाह लें। उनका यह भी विचार था कि बच्चे उनकी हर बात को पत्थर की लकीर न समझें, परंतु वे मनमानी तो न करें। वे चाहते थे कि बच्चे उनसे कहें कि बब्बा अब दूध लाना, सब्जी लाना, दालें लाना, राशन लाना, दवा लाना, कोयला लाना आदि सब काम छोड़ दें। उनकी यह इच्छा थी कि उनका बेटा वेतन लाकर उन्हीं को दे। लेकिन घर का कोई सदस्य उनकी इच्छाओं की ओर ध्यान नहीं देता था।

यशोधर बाबू टूटी-फूटी सड़कों से गुजरते हुए हाथ में सब्जी का झोला लटकाए जब घर पहुँचते हैं तो उनकी दशा द्वारका से लौटे सुदामा की तरह प्रतीत हो रही थी। घर के बाहर नेम प्लेट पर उनका अपना ही नाम वाई.डी. पंत लिखा है, परंतु उन्हें लगता ही नहीं कि यह घर उनका है। उनके क्वार्टर के बाहर एक कार, कुछ स्कूटर और मोटर-साइकिलें खड़ी थीं। लोग एक-दूसरे को विदा ले-दे रहे थे। उनके घर के बाहर गुब्बारे और कागज़ से बनी रंगीन झालरें और रंग-बिरंगी रोशनियों वाली लाइटें लगी हुई थीं। उनके बड़े बेटे भूषण को कार में बैठा व्यक्ति हाथ मिलाकर कह रहा था-“गिव माई वार्म रिगार्ड्स टू योर फादर।” यशोधर बाबू को यह सब देखकर कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि बाहर क्या हो रहा है? यशोधर बाबू ने देखा कि उसकी पत्नी एवं बेटी कुछ मेहमानों को विदा कर रही हैं।

लड़की ने जींस और बगैर बाँह का टॉप पहना हआ था और पत्नी ने बालों में खिजाब और होंठों पर लाली लगा रखी थी। यशोधर बाबू को यह सब ‘समहाउ इंप्रापर’ लगा। जब वे घर पहुँचे तो बड़े बेटे ने झिड़कते हुए कहा-“बब्बा, आप भी हद करते हैं। “सिल्वर वैडिंग के दिन साढ़े आठ बजे घर पहुंच रहे हैं। अभी तक मेरे बॉस आपकी राह देख रहे थे।” इस पर यशोधर बाबू ने कहा कि-“हम लोगों के यहाँ सिल्वर वैडिंग कब से होने लगी है।” तब यशोधर बाबू के भांजे चंद्रदत्त तिवारी ने कहा कि जब से आपका बेटा डेढ़ हज़ार रुपये महीना कमाने लगा है।

यशोधर बाबू को सिल्वर वैडिंग का आयोजन ठीक नहीं लगा, जिसमें केक, चार तरह की मिठाई, चार तरह की नमकीन, फल, कोल्डड्रिंक्स, चाय आदि सर्व की जा रही थी। उनको इस बात का दुख है कि आफिस जाते समय उन्हें किसी बात की सूचना नहीं दी गई थी। यही कारण है कि उनके पुत्र भूषण ने अपने मित्रों तथा सहयोगियों से अपने पिता का परिचय करवाया तो उन्होंने केवल बैंक्यू कहकर सबका जवाब दिया। आखिर बच्चों ने केक काटने का आग्रह किया। बेटी के आग्रह पर उन्होंने केक तो काटा पर साथ यह भी कहा “समहाउ आई डोंट लाइक आल दिस।” वे केक खाने को भी राजी नहीं हुए, क्योंकि उसमें अंडा होता है। उन्होंने अन्य सब लोगों को खाने के लिए कहा और खुद पूजा करने चले गए।

आज यशोधर बाबू ने संध्याकालीन पूजा में अधिक समय लगाया। वे चाहते थे कि अधिकांश मेहमान चले जाएँ, तो वे अपनी पूजा को समाप्त करेंगे। पूजा करते समय उन्हें किशनदा दिखाई दिए। यशोधर बाबू ने उनसे पूछा कि ‘जो हुआ होगा’ से आप कैसे मर गए। किशनदा ने उत्तर दिया-“भाऊ सभी जन इसी ‘जो हुआ होगा’ से मरते हैं।” शुरू और आखिर में सब अकेले ही होते हैं। वे चाहते थे कि काश किशनदा उनका आज भी मार्ग दर्शन करते। इसी बीच यशोधर बाबू की पत्नी ने आकर उन्हें डाँटा, तो वे आसन से खड़े हो गए।

सब रिश्तेदारों के जाने की बात मालूम होने पर यशोधर बाबू गमछा पहने ही बैठक में आ गए। यह देखकर उनकी बेटी क्रोधित हो उठी। तब यशोधर बाबू ने उसकी जींस पर व्यंग्य किया। अन्ततः यशोधर बाबू को प्रेजेंट खोलने के लिए कहा गया परंतु उन्होंने बच्चों से कहा कि तुम ही इसे खोलो और इसका इस्तेमाल करो। इस पर उनके बेटे भूषण ने प्रेजेंट को खोला और कहा कि यह ऊनी ड्रेसिंग गाउन है, मैं आपके लिए लाया हूँ। जब आप सवेरे दूध लेने जाएँ तो फटे हुए पुलोवर के स्थान पर इसे पहनकर जाएँ। उनकी बेटी कुर्ता-पजामा ले आई, तब यशोधर बाबू ने कुर्ता-पजामा पहन कर गाउन धारण कर लिया। परंतु यह निर्णय करना बड़ा कठिन है कि भूषण द्वारा कही गई दूध लाने की बात उन्हें चुभी या गाउन पहनकर उन्हें किशनदा बनना पसंद आया। परंतु इतना निश्चित था कि यशोधर बाबू की आँखें नम हो गईं।

कठिन शब्दों के अर्थ

सिल्वर वैडिंग = विवाह की रजत जयंती जो कि विवाह के पच्चीस वर्ष बाद मनाई जाती है। निगाह = दृष्टि। सुस्त = धीमी। मातहत = अधीन। जूनियर = अधीन काम करने वाला। शुष्क = रूखा। निराकरण = समाधान । छोकरा = लड़का। पतलून = पैंट। बदतमीज़ी = अभद्र व्यवहार। चूनेदानी = पान खानों वालों द्वारा चूना रखने का बर्तन । धृष्टता = अशिष्टता। करेक्ट = सही। बाबा आदम का ज़माना = पुराना समय। नहले पर दहला = जैसे को तैसा, जवाब देना। दाद = प्रशंसा। वक्ता = बोलने वाले। ठठाकर = ज़ोर से हँसते हुए। ठीक-ठिकाना = सही व्यवस्था। चोंचले = बनावटी व्यवहार। इनसिस्ट = आग्रह। चुग्गे भर = पेट भरने योग्य । जुगाड़ = अस्थायी व्यवस्था। नगण्य = महत्त्वहीन। सेक्रेट्रिएट = सचिवालय। नागवार = अनुचित।

निहायत = सर्वथा, एकदम। बेहूदा = अनुचित। अफोर्ड करना = सहन करना। इसरार = आग्रह। गप्प-गप्पाष्टक = बेकार की बातें। प्रवचन = धार्मिक व्याख्यान। रीत = प्रणाली। सिद्धांत के धनी = विचारों के पक्के। फिकरा = वाक्यांश। वजह = कारण । मदद = सहायता। पेंच = कारण। स्कॉलरशिप = छात्रवृत्ति। वर = विवाह के योग्य युवक। तरक्की = उन्नति। खुशहाली = संपन्नता। उपेक्षा = तिरस्कार का भाव। दिलासा देना = सांत्वना देना। तरफदारी करना = पक्ष लेना। मातृसुलभ = माताओं की स्वाभाविक मनोदशाएँ। मॉड = आधुनिक। गज़ब = आश्चर्यजनक। ताई = पिता के बड़े भाई की पत्नी। ढोंग-ढकोसला = आडंबरपूर्ण व्यवहार। अनदेखा करना = ध्यान न करना।

कुल = वंश। परंपरा = मान्यताएँ। निःश्वास = लंबी साँस । डेडीकेट = समर्पित। रिटायर = सेवानिवृत्त। विरासत = उत्तराधिकार। उपकृत = जिस पर उपकार किया गया है। प्रस्ताव = पेशकश। बिरादर = जाति भाई। किस्म = तरह। खुराफात = विघ्न डालने वाले काम। सर = सिर। दुनियादारी = सांसारिकता। पुश्तैनी = पैतृक। बिरादरी = जाति। बाध्य करना = मजबूर करना। कर्मकांडी = पूजा-पाठ करने वाला। राजपाट = राजसिंहासन। बाट = पगडंडी। जनार्दन = ईश्वर। तबीयत खराब होना = अस्वस्थ होना। एकतरफा लगाव = एक तरफ की आसक्ति। गम = दुख। गवाई = गाँव के। निभ = निर्वाह करना। बुजुर्गियत = वृद्धावस्था का बड़प्पन । बुढ़याकाल = वृद्धावस्था। एनीवे = किसी तरह। प्रवचन = भाषण। इरादा = निश्चय । लहजा = ढंग, तरीका। हाज़िरी = उपस्थिति।

भाऊ = बच्चा। अनुरोध = आग्रह। पट्टशिष्य = प्रिय शिष्य। निष्ठा = विश्वास, आस्था। जन्यो पुन्यूं = जनेऊ परिवर्तित करने वाली पूर्णिमा। कुमाउँनियों = कुमायूँ क्षेत्र के निवासियों। सख्त नापसंद = अत्यधिक अप्रिय लगना। बदतर = बुरी हालत। दुराग्रह = अनुचित हठ। बुजुर्ग = वृद्ध व्यक्ति। हरगिज़ = बिल्कुल। एक्सपीरिएंस = अनुभव। सबस्टीट्यूट = विकल्प। कुहराम = कोलाहल । नुक्ताचीनी = आलोचना। कारपेट = फर्श की दरी। कारोबार = धंधा। चौपट = नष्ट होना। कई मर्तबा = अनेक बार। इंप्रापर = अनुचित। तरफदारी करना = पक्ष लेना। खिजाब = सफेद बालों को काला करने वाला द्रव्य । एल.डी.सी. = लोअर डिवीजन क्लर्क। कदम = डग। माह = मासिक। नए दौर = नया युग। मिसाल = उदाहरण। भव्य = सुंदर। चचेरा भाई = चाचे का पुत्र। संपन्न = धनवान। हरचंद = बहुत अधिक। जताना = बताना, परिचित कराना। अनमनी = उदासी से भरा हुआ। आखिर = अंत। रवैया = व्यवहार। आमादा = तैयार। खिलाफ = विरुद्ध । लिमिट = सीमा। प्रेजेंट = तोहफा। इस्तेमाल = प्रयोग।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग Read More »

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Hindi Apathit Bodh Apathit Gadyansh अपठित गद्यांश Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

अपठित गद्यांश

निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

[1] हमारी संस्कृति में नारी की बड़ी महत्ता रही है। हमारी संस्कृति मातृसत्ता की रही है। हमारे यहाँ ज्ञान और विवेक की अधिष्ठात्री सरस्वती, शक्ति की अधिष्ठात्री दुर्गा और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री लक्ष्मी मानी गई हैं। स्त्री को इन तीनों रूप में रखकर भारतीय मनीषियों ने पूरी संस्कृति को बाँध दिया है।
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत अवतरण का सार लिखिए।
(ii) प्रस्तुत अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
(iii) भारतीय संस्कृति में नारी की क्या स्थिति रही है ?
(iv) भारतीय चिंतकों ने नारी को किन-किन रूपों में माना है ?
उत्तर:
(i) भारतीय संस्कृति में नारी का बहुत महत्त्व है। सरस्वती को ज्ञान और विवेक की दुर्गा को शक्ति की और लक्ष्मी को ऐश्वर्य की देवी माना गया है। भारतीय विद्वानों ने संपूर्ण संस्कृति को इन तीनों रूपों में संगठित कर दिया है।
(ii) शीर्षक-नारी का महत्त्व।
(iii) भारतीय संस्कृति में नारी को अत्यंत आदर की दृष्टि से देखा जाता है। उसकी माता और देवी के रूप में पूजा की जाती है।
(iv) भारतीय चिंतकों ने नारी को सरस्वती, दुर्गा और लक्ष्मी के रूप में माना है।

[2] भारत एक विशाल देश है। यहाँ पर धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर चलकर ही एकता बनाए रखी जा सकती है। यदि प्रशासन अपने नागरिकों को समभाव से नहीं देखता, उनमें भेदभाव करता है, तो साम्प्रदायिक द्वेष बढ़ेगा ही। तुष्टिकरण की नीति राष्ट्र के लिए घातक है। साम्प्रदायिकता बहुसंख्यक वर्ग की हो अथवा अल्पसंख्यक वर्ग की, दोनों से कठोरतापूर्वक निपटा जाना चाहिए। कुछ लोग बहुसंख्यक समाज की साम्प्रदायिकता को तो कुचलने की बात करते हैं परंतु अल्पसंख्यकों की साम्प्रदायिकता को साम्प्रदायिकता ही नहीं मानते। इस प्रकार का दृष्टिकोण राष्ट्र-निर्माण में सहायक नहीं हो सकता। धर्मनिरपेक्षता को सुदृढ़ करने की दृष्टि से यह आवश्यक है कि धर्म और राजनीति को अलग किया जाए। भारत का अधिकतर मतदाता अशिक्षित है जो धार्मिक अपील में बहकर ही प्रायः मतदान करता है। यह स्वस्थ राजनीति का लक्षण नहीं है।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ii) भारत में किस प्रकार के सिद्धांत पर चलकर एकता बनाए रखी जा सकती है ?
(iii) साम्प्रदायिकता से क्यों कठोरतापूर्वक निपटा जाना चाहिए ?
(iv) धर्मनिरपेक्षता को सुदृढ़ करने के लिए क्या करना होगा ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-धर्म और राजनीति।
(ii) भारतवर्ष में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर चलकर ही एकता बनाए रखी जा सकती है।
(iii) साम्प्रदायिकता की भावना से देश कमज़ोर होता है, इसलिए इससे कठोरता से निपटा जाना चाहिए।
(iv) धर्मनिरपेक्षता को सुदृढ़ करने के लिए धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[3] लोगों ने धर्म को धोखे की दुकान बना रखा है। वे उसकी आड़ में स्वार्थ सिद्ध करते हैं। बात यह है कि लोग धर्म को छोड़कर सम्प्रदाय के जाल में फंस रहे हैं। सम्प्रदाय बाह्य कृत्यों पर जोर देते हैं। वे चिह्नों को अपनाकर धर्म के सार तत्त्व को मसल देते हैं। धर्म मनुष्य को अंतर्मुखी बनाता है। उसके हृदय के किवाड़ों को खोलता है, उसकी आत्मा को विशाल, मन को उदार तथा चरित्र को उन्नत बनाता है। सम्प्रदाय संकीर्णता सिखाते हैं, जाति-पाँति, रूप-रंग तथा ऊँच-नीच के भेदभावों से ऊपर नहीं उठने देते।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) लोगों ने धर्म को क्या बना रखा है ?
(iii) धर्म किसके किवाड़ों को खोलता है ?
(iv) सम्प्रदाय क्या सिखाता है ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-धर्म और सम्प्रदाय।
(ii) लोगों ने धर्म को धोखे की दुकान बना रखा है क्योंकि उसकी आड़ में वे अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं।
(iii) धर्म हृदय के किवाड़ों को खोलता है।
(iv) सम्प्रदाय ऊँच-नीच, जाति-पाँति का भेदभाव सिखाता है।

[4] जो शिव की सेवा करना चाहता है, उसे पहले उसकी संतानों की और इस संसार के सारे जीवों की सेवा करनी चाहिए। शास्त्रों ने कहा है कि जो भगवान के सेवकों की सहायता करते हैं, वे भगवान के सबसे बड़े सेवक हैं। निःस्वार्थता ही धर्म की कसौटी है जिसमें निःस्वार्थता की मात्रा अधिक है, वह अधिक आध्यात्मिकता-संपन्न है और शिव के अधिक निकट है। यदि कोई स्वार्थी है तो उसने फिर चाहे सारे मंदिरों के ही दर्शन क्यों न किए हों, सारे तीर्थों में ही क्यों न घूमा हो, अपने को चीते के समान क्यों न रंग डाला हो, फिर भी वह शिव से बहुत दूर है। जो शिव को दीन-हीन में, दुर्बल में और रोगी में देखता है, वही वास्तव में शिव की उपासना करता है और जो शिव को केवल मूर्ति में देखता है, उसकी उपासना तो केवल प्रारंभिक है।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) शिव को मूर्ति में देखने वाले कैसे उपासक होते हैं ?
(ii) शिव की सेवा करने वाले को क्या करना चाहिए ?
(iv) भगवान का सबसे बड़ा सेवक कौन है ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-शिव का सच्चा सेवक।
(ii) शिव को मूर्ति में देखने वाले केवल आरंभिक शिव-उपासक होते हैं।
(iii) शिव की सेवा करने वाले को पहले शिव की संतानों की सेवा करनी चाहिए।
(iv) भगवान के सेवकों की सहायता करने वाला भगवान का सबसे बड़ा सेवक होता है।

[5] आतंकवाद मस्तिष्क का फितूर है जिसकी चपेट में कोई भी विवेकहीन व्यक्ति आ सकता है। इसको दूर करना एक माह या एक साल का काम नहीं है। निरंतर कोशिशों से ही इसे मिटाया जा सकता है। इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता राष्ट्रीय एकता की है। समस्त व्यक्तिगत, जातिगत, धर्मगत, नीतिगत स्वार्थों को त्यागकर राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को सुदृढ़ बनाने में प्रत्येक व्यक्ति को रचनात्मक सहयोग देना होगा।
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत अवतरण का सार लिखिए।
(ii) प्रस्तुत अवतरण का उचित शीर्षक लिखिए।
(iii) आतंकवाद का शिकार आसानी से कौन हो जाता है?
(iv) आतंकवाद को समाप्त कैसे किया जा सकता है?
उत्तर:
(i) आतंकवाद मानव-मस्तिष्क का जुनून है। कोई भी विवेकहीन व्यक्ति इसकी पकड़ में आ जाता है। आतंकवाद को मिटाने के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे। सभी व्यक्तियों को अपनी जातिगत, धार्मिक एवं नीतिगत स्वार्थों को छोड़कर राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने में सहयोग देना होगा।
(ii) आतंकवाद और राष्ट्रीय एकता।
(iii) कोई भी विवेकहीन व्यक्ति आसानी से इसका शिकार हो जाता है।
(iv) आतंकवाद को समाप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जातिगत, धर्मगत और नीतिगत स्वार्थों का त्याग करना होगा और राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को सुदृढ़ बनाने में अपना सहयोग देना होगा।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[6] स्वतंत्र भारत का संपूर्ण दायित्व आज विद्यार्थियों के ही ऊपर है क्योंकि आज जो विद्यार्थी हैं, वे ही कल स्वतंत्र भारत के नागरिक होंगे। भारत की उन्नति और उसका उत्थान उन्हीं की उन्नति और उत्थान पर निर्भर करता है। अतः विद्यार्थियों को चाहिए कि वे अपने भावी जीवन का निर्माण बड़ी सतर्कता और सावधानी के साथ करें। उन्हें प्रत्येक क्षण अपने राष्ट्र, अपने समाज, अपने धर्म, अपनी संस्कृति को अपनी आँखों के सामने रखना चाहिए ताकि उनके जीवन से राष्ट्र को कुछ बल प्राप्त हो सके। जो विद्यार्थी राष्ट्रीय दृष्टिकोण से अपने जीवन का निर्माण नहीं करते, वे राष्ट्र और समाज के लिए भारस्वरूप हैं।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) कैसे विद्यार्थी राष्ट्र और समाज के लिए भारस्वरूप हैं ?
(iii) स्वतंत्र भारत का दायित्व किस पर है ?
(iv) विद्यार्थियों को भारत की उन्नति के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-राष्ट्र-निर्माण में विद्यार्थियों की भूमिका।
(ii) जो विद्यार्थी राष्ट्रीय दृष्टिकोण से अपने जीवन का निर्माण नहीं करते, वे राष्ट्र और समाज के लिए भारस्वरूप हैं।
(iii) स्वतंत्र भारत का दायित्व विद्यार्थियों पर है।
(iv) विद्यार्थियों को भारत की उन्नति के लिए अपने भावी जीवन का निर्माण बड़ी सावधानी एवं सतर्कता से करना चाहिए।

[7] राष्ट्र के पुनर्निर्माण का कार्य युवकों द्वारा ही संभव है। राष्ट्रीय एकता और अखंडता को चुनौती देने वाली शक्तियों का सामना करने के लिए युवकों का पहला कर्तव्य है कि शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक दृष्टि से मज़बूत बनें। स्वामी विवेकानंद सौ-दो सौ कर्तव्यनिष्ठ युवकों के सहारे पूरे विश्व को बदलने का स्वप्न देखते रहे। युवक नशों के शिकार न हों, वे संयम और सदाचार को अपनाएँ तथा स्वास्थ्य का ध्यान रखें तो देश के काम आ सकते हैं। मानसिक रूप से यदि वे तेज़ हैं, समस्याओं को समझते हैं, उन पर विचार करते हैं तो वे अवसरवादी नेताओं, राष्ट्र विरोधी तत्त्वों की चालों को समझ सकेंगे। स्वस्थ लोकमत का निर्माण कर पाएँगे। भावात्मक अथवा आत्मिक दृष्टि से यदि वे उदार हैं, सर्वधर्म समभाव के आदर्श से प्रेरित हैं, मानव मात्र की एकता के समर्थक हैं और भारतमाता से प्यार करते हैं तो वे राष्ट्र की एकता और अखंडता में साधक हो सकते हैं। पश्चिम की भौतिकवादी-भोगवादी सभ्यता का विरोध युवकों को करना चाहिए।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) राष्ट्र का पुनर्निर्माण किनके द्वारा संभव है ?
(iii) युवकों का पहला कर्तव्य क्या होना चाहिए ?
(iv) युवकों में किन-किन गुणों का समावेश होना चाहिए ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-राष्ट्र का पुनर्निर्माण एवं युवक।
(ii) राष्ट्र के पुनर्निर्माण का कार्य युवकों द्वारा ही संभव है।
(iii) युवकों का पहला कर्तव्य है कि वे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक दृष्टि से अपने आपको मज़बूत बनाएँ।
(iv) युवकों में नशे की आदत नहीं होनी चाहिए। वे संयमशील, उदार, विचारवान तथा देशप्रेमी होने चाहिएँ।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[8] एक पत्रकार के लिए निष्पक्ष होना बहुत जरूरी है। उसकी निष्पक्षता से ही उसके समाचार संगठन की साख बनती है। यह साख तभी बनती है जब समाचार संगठन बिना किसी का पक्ष लिए सच्चाई सामने लाते हैं। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। इसकी राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में अहम भूमिका है। लेकिन निष्पक्षता का अर्थ तटस्थता नहीं है। इसलिए पत्रकारिता सही
और गलत, अन्याय और न्याय जैसे मसलों के बीच तटस्थ नहीं हो सकती, बल्कि यह निष्पक्ष होते हुए भी सही और न्याय के साथ होती है।
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत अवतरण का सार लिखिए।
(ii) प्रस्तुत अवतरण का उचित शीर्षक लिखिए।
(iii) निष्पक्षता से क्या तात्पर्य है?
(iv) पत्रकारिता की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) एक पत्रकार को सदैव निष्पक्ष रहकर सच्चाई को सामने लाना चाहिए तभी उसके समाचार संगठन की साख बनती है। पत्रकारिता राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में अहम भूमिका निभाती है। एक पत्रकार को तटस्थता छोड़कर सही और न्याय का साथ देना चाहिए।
(ii) पत्रकार की निष्पक्षता।
(iii) निष्पक्षता से तात्पर्य है कि बिना किसी का पक्ष लिए सच्चाई को सामने लाना।
(iv) पत्रकारिता का लोकतंत्र से सीधा संबंध है। यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में यह सदैव सही और न्याय के साथ होती है।

[9] देशभक्त अपनी मातृभूमि को सच्चे हृदय से प्रेम करता है। यदि एक ओर उसे अपने अतीत के गौरव का गर्व है, तो दूसरी ओर वह अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहता है। वह सदैव समाज में क्रांति चाहता है किंतु वह क्रांति न विशृंखला कही जा सकती है और न नागरिकता के प्रतिकूल। समाज में प्रचलित रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों तथा उन परंपराओं एवं परिपाटियों के विरुद्ध वह क्रांति करता है, जो देश की उन्नति के पथ की बाधाएँ हैं। लोगों में एकता, प्रेम और सहानुभूति उत्पन्न करना, उनमें राष्ट्रीय, सामाजिक एवं नैतिक चेतना जागृत करना, उन्हें कर्तव्यपरायणता और अध्यवसायी बने रहने के लिए प्रोत्साहित करना ही देशभक्ति है।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) सच्चा देशभक्त कौन है ?
(iii) देश की उन्नति के लिए क्या बाधक है ?
(iv) सच्ची देशभक्ति क्या है ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-सच्चा देशभक्त।
(ii) जो व्यक्ति अपनी मातृभूमि को सच्चे हृदय से प्रेम करता है वही सच्चा देशभक्त होता है।
(iii) अंध-विश्वास, रूढ़िगत परंपराएँ एवं परिपाटियाँ देश की उन्नति में बाधक हैं।
(iv) लोगों में एकता, प्रेम, जागृति, सहानुभूति उत्पन्न करना तथा लोगों को उनके कर्तव्य के प्रति प्रोत्साहित करना सच्ची देशभक्ति है।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[10] मनुष्य की मानसिक शक्ति उसकी इच्छाशक्ति पर निर्भर होती है। जिस मनुष्य की इच्छाशक्ति जितनी बलवती होगी, उसका मन उतना ही दृढ़ और संकल्पवान होगा। इसी इच्छाशक्ति के द्वारा मनुष्य वह दैवी शक्ति प्राप्त कर लेता है, जिसके आगे करोड़ों व्यक्ति नतमस्तक होते हैं। प्रबल इच्छाशक्ति के द्वारा मानव एक बार मृत्यु के क्षणों को भी टाल सकता है। विघ्न-बाधाएँ, मार्ग की रुकावटें सभी के मार्ग में व्यवधान बनकर आती हैं, चाहे वह साधारण व्यक्ति हो या महान। अंतर केवल इतना है कि साधारण मनुष्य का मन विपत्तियों को देखकर जल्दी हार मान लेता है जबकि महान एवं प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने मानसिक बल के आधार पर उन पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। विषम परिस्थितियाँ और उन पर दृढ़तापूर्वक विजय-प्राप्ति ही मनुष्य को महान बनाती हैं।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) मनुष्य दैवी शक्ति कैसे प्राप्त कर सकता है ?
(iii) मन की दृढ़ता तथा संकल्पशक्ति किस पर निर्भर करती है ?
(iv) जीवन में आने वाली बाधाओं पर कौन और कैसे विजय प्राप्त कर लेते हैं ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-दृढ़ इच्छाशक्ति।
(ii) बलवान इच्छाशक्ति से मानव दैवी शक्ति प्राप्त कर सकता है।
(iii) मन की दृढ़ता तथा संकल्पशक्ति उसकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है।
(iv) जीवन में आने वाली बाधाओं पर प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने मानसिक बल के द्वारा विजय प्राप्त कर सकता है।

[11] लोकतंत्र की सफलता का एक मापदंड यह भी है कि हर नागरिक को न्याय मिले और उसके साथ समता का व्यवहार हो। जिस व्यवस्था में मनुष्य की गरिमा खंडित होती हो, मानवीय अधिकारों का हनन होता हो, उसे लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता।

लोकतंत्र वही सफल है, जहाँ सबको न्याय पाने का अधिकार है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। जहाँ मनुष्य के साथ उसकी जाति, लिंग, रंग अथवा आर्थिक दशा के आधार पर भेदभाव किया जाता हो, वहाँ लोकतंत्र असफल है। जहाँ मनुष्य को मनुष्य के नाते विकास के साधन प्राप्त न हों, वहाँ लोकतंत्र असफल है। शिक्षित व्यक्ति ही ऐसे अधिकारों के प्रति जागरूक होता है और उनकी माँग कर सकता है। शिक्षित व्यक्ति न्याय पाने के लिए संघर्ष करने में अधिक सक्षम होता है।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) लोकतंत्र की सफलता का एक मापदंड बताइए।
(iii) असफल लोकतंत्र की क्या पहचान है ?
(iv) व्यक्ति का शिक्षित होना क्यों ज़रूरी है ?
उत्तर:
(i) शीर्षक लोकतंत्र।
(ii) लोकतंत्र की सफलता का मापदंड यह है कि वहाँ प्रत्येक नागरिक को न्याय मिले व सबके साथ समानता का व्यवहार हो।
(iii) जहाँ व्यक्ति के अधिकारों का हनन हो, उसके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाए, मनुष्य को विकास के साधन उपलब्ध न हों, वही असफल लोकतंत्र की मुख्य पहचान है।
(iv) व्यक्ति का शिक्षित होना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि शिक्षित व्यक्ति ही न्याय पाने के लिए संघर्ष करने में अधिक सक्षम हो सकता है।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[12] भाषणकर्ता के गुणों में तीन गुण श्रेष्ठ माने जाते हैं सादगी, असलियत और जोश। यदि भाषणकर्ता बनावटी भाषा में बनावटी बातें करता है, तो श्रोता तत्काल ताड़ जाते हैं। इस प्रकार के भाषणकर्ता का प्रभाव समाप्त होने में देर नहीं लगती। यदि वक्ता में उत्साह की कमी हो तो भी उसका भाषण निष्प्राण हो जाता है। उत्साह से ही किसी भी भाषण में प्राणों का संचार होता है। भाषण को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए उसमें उतार-चढ़ाव, तथ्य और आँकड़ों का समावेश आवश्यक है। अतः उपर्युक्त तीनों गुणों का समावेश एक अच्छे भाषणकर्ता के लक्षण हैं तथा इनके बिना कोई भी भाषणकर्ता श्रोताओं पर अपना प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकता।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) भाषणकर्ता के प्रमुख गुण कौन-से हैं ?
(iii) श्रोता किसे तत्काल ताड़ जाते हैं ?
(iv) कैसे भाषण का प्रभाव देर तक नहीं रहता ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-भाषणकर्ता के गुण।
(ii) सादगी, असलियत और जोश भाषणकर्ता के तीन श्रेष्ठ गुण हैं।
(iii) भाषणकर्ता की बनावटी भाषा में बनावटी बातों को श्रोता तत्काल ताड़ जाते हैं।
(iv) बनावटी भाषा में असत्य पर आधारित भाषण का प्रभाव देर तक नहीं रहता।

[13] सुव्यवस्थित समाज का अनुसरण करना अनुशासन कहलाता है। व्यक्ति के जीवन में अनुशासन का बहुत महत्त्व है। अनुशासन के बिना मनुष्य अपने चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता। अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए भी मनुष्य का अनुशासनबद्ध होना अत्यंत आवश्यक है। विद्यार्थी जीवन मनुष्य के भावी जीवन की आधारशिला होती है। अतः विद्यार्थियों के लिए अनुशासन में रहकर जीवन-यापन करना आवश्यक है।
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
(ii) अनुशासन किसे कहा जाता है ?
(ii) मनुष्य किसके बिना अपने चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता ?
(iv) विद्यार्थी जीवन किसकी आधारशिला है ?
उत्तर:
(i) शीर्षक अनुशासन।
(ii) सुव्यवस्थित समाज का अनुसरण करना अनुशासन कहलाता है।
(iii) अनुशासन के बिना मनुष्य अपने चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता।
(iv) विद्यार्थी जीवन मनुष्य के भावी जीवन की आधारशिला है।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[14] मैंने देखा कि बेडौल अक्षर होना अधूरी शिक्षा की निशानी है। अतः मैंने पीछे से अपना खत सुधारने की कोशिश भी की परंतु पक्के घड़े पर कहीं मिट्टी चढ़ सकती है ? जवानी में जिस बात की अवहेलना मैंने की, उसे मैं फिर आज तक न सुधार सका। अतः हरेक नवयुवक मेरे इस उदाहरण को देखकर चेते और समझे कि सुलेख शिक्षा का एक आवश्यक अंग है। सुलेख के लिए चित्रकला आवश्यक है। मेरी तो यह राय बनी है कि बालकों को आलेखन कला पहले सिखानी चाहिए। जिस प्रकार पक्षियों और वस्तुओं आदि को देखकर बालक याद रखता है और उन्हें आसानी से पहचान लेता है, उसी प्रकार अक्षरों को भी पहचानने लगता है और जब आलेखन या चित्रकला सीखकर चित्र इत्यादि निकालना सीख जाता है, तब यदि अक्षर लिखना सीखे तो उसके अक्षर छापे की तरह हो जाएँ।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) गांधी जी की दृष्टि में सुलेख के लिए क्या आवश्यक है ?
(iii) बेडौल अक्षर किसकी निशानी हैं ?
(iv) ‘पक्के घड़े पर मिट्टी न चढ़ने’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) शीर्षक-सुलेख और शिक्षा।
(ii) गांधी जी की दृष्टि में सुलेख के लिए चित्रकला आवश्यक है।
(iii) बेडौल अक्षर अधूरी शिक्षा की निशानी हैं।
(iv) ‘पक्के घड़े पर मिट्टी न चढ़ने’ का भाव यह है कि परिपक्व होने पर व्यक्ति की आदतों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।

[15] वर्तमान शिक्षा-प्रणाली ने भारतवासियों को कहीं का न छोड़ा। पिता अपने पुत्र को विद्यालय इसलिए भेजता है कि वह शिक्षित होकर सभ्य बने किंतु वह बनता है-पढ़ा-लिखा बेकार। इतना ही नहीं, वह भ्रष्ट होकर समय खराब करता है। किसान का पुत्र शिक्षित होकर कृषि से नाता तोड़ लेता है। बढ़ई का पुत्र स्कूल में पढ़कर बढ़ईगिरि को भूल जाता है। कर्मकांडी पंडित का पुत्र विश्वविद्यालयी शिक्षा प्राप्त करके अपने पिता को ही पाखंडी की उपाधि देने लगता है। देश में शिक्षित बेरोज़गारों की संख्या सुरसा के मुँह की भाँति फैल रही है। नैतिक भावना से विहीन शिक्षा विद्यार्थियों में श्रद्धा और आस्था के भाव उत्पन्न नहीं कर पाती। वर्तमान युग में छात्रों की उच्छंखलता और अराजकता की स्थिति नैतिकता रूपी बीज से उत्पन्न वृक्ष के कटु और शुष्क फल हैं।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) पिता पुत्र को विद्यालय किस उद्देश्य से भेजता है ?
(ii) किसान का बेटा शिक्षित होकर क्या करता है ?
(iv) वर्तमान युग में छात्रों की कैसी स्थिति है ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-वर्तमान दूषित शिक्षा-प्रणाली।
(ii) पिता पुत्र को विद्यालय में पढ़-लिखकर सभ्य बनने के लिए भेजता है।
(iii) किसान का बेटा शिक्षित होकर कृषि से नाता तोड़ लेता है।
(iv) वर्तमान युग में छात्र नैतिक शिक्षा के अभाव में उच्छृखलता की स्थिति में पहुंच गए हैं।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[16] विश्व के किसी कोने में घटित घटना का प्रभाव तत्काल अन्य देशों पर पड़ता है, आज सभी देश एक-दूसरे के सहयोग पर निर्भर हैं। यदि विकसित राष्ट्रों के पास ज्ञान, विज्ञान और तकनीक है तो विकासशील और अविकसित राष्ट्रों के पास कच्चा माल और सस्ता श्रम। आज सभी विकासात्मक कार्यों और समस्याओं की व्याख्या विश्व स्तर पर होती है, इसलिए विश्व-बन्धुत्व की भावना को बढ़ावा मिल रहा है।
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत अवतरण का सार लिखिए।
(ii) प्रस्तुत अवतरण का उचित शीर्षक लिखिए।
(ii) विकसित एवं विकासशील राष्ट्रों में क्या अंतर है?
(iv) संसार में भाईचारे की भावना क्यों बढ़ रही है?
उत्तर:
(i) सभी राष्ट्र परस्पर सहयोगी हैं क्योंकि किसी के पास ज्ञान, विज्ञान और तकनीक है तो किसी के पास कच्चा माल और सस्ता श्रम है। सभी राष्ट्रों की समस्याओं और विकासात्मक कार्यों का विश्व स्तर पर प्रभाव पड़ता है।
(ii) विश्व-बन्धुत्व।
(iii) विकसित राष्ट्रों के पास ज्ञान, विज्ञान और तकनीक है और विकासशील राष्ट्रों के पास कच्चा माल और सस्ता श्रम है।
(iv) आजकल सभी विकासात्मक कार्यों और समस्याओं की व्याख्या विश्व स्तर पर होती है इसलिए भाईचारे की भावना बढ़ रही है।

[17] आज के प्रगतिशील संसार में मनुष्य, समाज और राष्ट्र के अस्तित्व का विकास करने वाली जो वस्तुएँ-सुविधाएँ उपलब्ध हैं वे सभी विज्ञान की ही देन हैं। यह विज्ञान की ही देन है कि आज सारा संसार सिमट आया है। कोई देश, समाज अब एक-दूसरे से बहुत दूर नहीं रह गया है। रेल, मोटर तथा वायुयान जैसे अनेक साधन उपलब्ध हैं जिनसे हम कम समय में बहुत दूर की यात्रा सुविधापूर्वक कर सकते हैं।
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत अवतरण का सार लिखिए।
(ii) प्रस्तुत अवतरण का उचित शीर्षक लिखिए।
(iii) संसार के सिमटने से क्या तात्पर्य है?
(iv) यातायात के साधनों से क्या लाभ हुआ है?
उत्तर:
(i) आधुनिक युग में उपलब्ध सभी सुख-सुविधाएँ विज्ञान की देन हैं। सारा संसार छोटा हो गया है। यातायात के विकसित साधनों द्वारा कम समय में बहुत दूर की यात्रा की जा सकती है।
(ii) विज्ञान का सुख।
(iii) आज घर बैठे ही सारे संसार की खबरों का मिनटों में पता लगाया जा सकता है। विज्ञान की उन्नति से सारा संसार सिमट गया है।
(iv) यातायात के साधनों से कम समय में बहुत दूर की यात्रा आसानी से की जा सकती है।

[18] जल जीवन का आधार है। मनुष्य बिना भोजन के कुछ दिन, बिना जल के कुछ घंटे तथा बिना वायु के कुछ मिनटों तक ही जीवित रह सकता है। मनुष्य के जीवन में जल का विशेष महत्त्व है। जल की उपयोगिता अनेक हैं-घरेलू कामों, सिंचाई और औद्योगिक कामों में इसकी विशेष भूमिका रहती है। जल प्रदूषित न हो-इसके प्रति हम सभी को कठोरता से सचेत और जागरूक रहना चाहिए।
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत अवतरण का सार लिखिए।
(ii) प्रस्तुत अवतरण का उचित शीर्षक लिखिए।
(iii) जीवन में जल का क्या महत्त्व है?
(iv) जल के प्रति हमें सचेत रहना क्यों जरूरी है?
उत्तर:
(i) मानव-जीवन में जल का बहुत महत्त्व है। जल के बिना मनुष्य का जीवन असम्भव है। जल का प्रयोग घरेलू कामों के अतिरिक्त सिंचाई और औद्योगिक कार्यों में भी किया जाता है। अतः हमें जल को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए।
(ii) शीर्षक-जल ही जीवन है।
(iii) जल हमारे घरेलू कार्यों के अलावा कृषि, उद्योग-धंधों एवं जैविक क्रियाओं में भी महत्त्वपूर्ण सहयोग देता है। अतः जीवन में जल का अत्यंत महत्त्व है।
(iv) जल के प्रति हमें सचेत रहना इसलिए अनिवार्य है क्योंकि जल का प्रयोग हमारे दैनिक कार्यों के अतिरिक्त सिंचाई और औद्योगिक कार्यों में भी किया जाता है।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[19] विद्यार्थियों में अनेक बुराइयाँ कुसंगति के प्रभाव से ही उत्पन्न होती हैं। विद्यार्थी पहले पढ़ाई में खूब रुचि लेता था किंतु अब वह सिनेमा देखने में मस्त रहता है, निश्चित ही यह कुसंगति का प्रभाव है। शुरू में उसे कोई विद्यार्थी सिनेमा दिखाना प्रारंभ करता है, बाद में उसे सिनेमा देखने की आदत पड़ जाती है। यही हालत धूम्रपान करने वालों की होती है। जब उन्हें धूम्रपान करने की आदत पड़ जाती है तो छूटने का नाम तक नहीं लेती। प्रारंभ में कुछ लोग शौकिया तौर पर बीड़ी-सिगरेट पीना आरंभ कर देते हैं। अंत में उसके आदी बन जाते हैं और लाख यत्न करने पर भी उससे पीछा नहीं छुड़ा पाते। इसलिए तो पं० रामचंद्र शुक्ल ने कहा है कि कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। वह न केवल मान-मर्यादा का विनाश करता है बल्कि सात्विक चित्तवृत्ति को भी नष्ट कर देता है। जो भी कभी कुसंग के चक्र में फँसा है, नष्ट हुए बिना नहीं रहा। कुमार्गगामी दूसरे को अपने जैसा बना लेता है।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) विद्यार्थी जीवन में बुराइयाँ उत्पन्न होने का प्रमुख कारण क्या हो सकता है ?
(iii) कुसंग के ज्वर से क्या-क्या नष्ट हो जाता है ?
(iv) “कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है।” ये शब्द किसके द्वारा कहे गए हैं ?
उत्तर:
(i) शीर्षक कुसंगति का प्रभाव।
(ii) कुसंगति के कारण विद्यार्थियों में अनेक बुराइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
(iii) कुसंग का ज्वर मान-मर्यादा एवं सात्विक चित्तवृत्ति को नष्ट कर देता है।
(iv) ये शब्द पं० रामचंद्र शुक्ल ने कहे हैं।

[20] संसार में धर्म की दुहाई सभी देते हैं। पर कितने लोग ऐसे हैं, जो धर्म के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हैं। धर्म कोई बुरी चीज नहीं है। धर्म एक ऐसी विशेषता है, जो मनुष्य को पशुओं से भिन्न करती है। अन्यथा मनुष्य और पशु में अन्तर ही क्या है। धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने की आवश्यकता है। त्याग और कर्तव्यपरायणता में ही धर्म का वास्तविक रूप निहित है। त्याग एक से लेकर प्राणि-मात्र के लिए भी हो सकता है। इसी से भेद की सारी दीवारें चकनाचूर हो जाती हैं।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) धर्म की क्या विशेषता है?
(iii) धर्म का वास्तविक स्वरूप किसमें निहित है ?
(iv) भेद की सारी दीवारें कब ध्वस्त हो जाती हैं ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-धर्म का महत्त्व।
(ii) धर्म ही मनुष्य को पशुओं से अलग करता है।
(iii) त्याग और कर्तव्यपरायणता में धर्म का वास्तविक स्वरूप निहित है।
(iv) त्याग से भेद की सारी दीवारें ध्वस्त हो जाती हैं।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[21] नारी नर की शक्ति है। वह माता, बहन, पत्नी और पुत्री आदि रूपों में पुरुष में कर्त्तव्य की भावना सदा जगाती रहती है। वह ममतामयी है। अतः पुष्प के समान कोमल है किन्तु चोट खाकर जब वह अत्याचार के लिए सन्नद्ध हो जाती है, तो वज्र से भी ज्यादा कठोर हो जाती है। तब वह न माता रहती है, न प्रिया, उसका एक ही रूप होता है और वह है दुर्गा का। वास्तव में नारी सृष्टि का ही रूप है, जिसमें सभी शक्तियाँ समाहित हैं।
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
(ii) नारी को फूल-सी कोमल क्यों कहा गया है?
(iii) नारी दुर्गा का रूप कब बन जाती है?
(iv) नारी किन-किन रूपों में कर्तव्य की भावना जगाती है ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-नारी की शक्ति।
(ii) नारी ममता की भावना से भरी हुई है, इसलिए उसे फूल-सी कोमल कहा गया है।
(iii) जब नारी के आत्म-सम्मान पर आघात होता है या उस पर अत्याचार होता है तो वह दुर्गा का रूप धारण कर लेती है।
(iv) नारी माता, बहिन, पत्नी आदि रूपों में कर्तव्य की भावना जगाती है।

[22] मनोरंजन का मानव जीवन में विशेष महत्त्व है। दिन भर की दिनचर्या से थका-मांदा मनुष्य रात को आराम का साधन खोजता है। यह साधन है-मनोरंजन। मनोरंजन मानव-जीवन में संजीवनी-बूटी का काम करता है। यही आज के मानव के थके हारे शरीर को आराम सुविधा प्रदान करता है। यदि आज के मानव के पास मनोरंजन के साधन न होते तो उसका जीवन नीरस बनकर रह जाता। यह नीरसता मानव जीवन को चक्की की तरह पीस डालती और मानव संघर्ष तथा परिश्रम करने के योग्य भी नहीं रहता।
प्रश्न-
(i) प्रस्तुत अवतरण का उचित शीर्षक दीजिए।
(ii) मनोरंजन क्या है?
(iii) यदि मनुष्य के पास मनोरंजन के साधन न होते तो उसका जीवन कैसा होता?
(iv) नीरस मानव जीवन की सबसे बड़ी हानि क्या होती है?
उत्तर:
(i) शीर्षक-मनोरंजन।
(ii) काम करने के पश्चात् जब मनुष्य दिनभर थका-मांदा रात को आराम के साधन खोजता है, उसे मनोरंजन कहते हैं।
(ii) यदि मनुष्य के पास मनोरंजन के साधन नहीं होते तो उसका जीवन नीरस बनकर रह जाता।
(iv) नीरसता मानव-जीवन को चक्की की भाँति पीस डालती है और वह संघर्ष तथा परिश्रम करने के योग्य नहीं रहता।

[23] आधुनिक मानव-समाज में एक ओर विज्ञान को भी चकित कर देने वाली उपलब्धियों से निरंतर सभ्यता का विकास हो रहा है तो दूसरी ओर मानव-मूल्यों का ह्रास होने की समस्या उत्तरोतर गूढ़ होती जा रही है। अनेक सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का शिकार आज का मनुष्य विवेक और ईमानदारी को त्यागकर भौतिक स्तर से ऊँचा उठने का प्रयत्न कर रहा है। वह सफलता पाने की लालसा में उचित और अनुचित की चिंता नहीं करता। उसे तो बस साध्य के पाने की प्रबल इच्छा रहती है। ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए भयंकर अपराध करने में भी संकोच नहीं करता। वह इनके नित नए-नए रूपों की खोज करने में अपनी बुद्धि का अपव्यय कर रहा है। आज हमारे सामने यह प्रमुख समस्या है कि इस अपराध-वृद्धि पर किस प्रकार रोक लगाई जाए। सदाचार, कर्तव्यपरायणता, त्याग आदि नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर समाज के सुख की कामना करना स्वप्न मात्र है।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) आज के मानव की प्रबल इच्छा क्या है ?
(iii) आधुनिक समाज में कौन-सी समस्या बढ़ रही है ?
(iv) आज के मानव की समस्याओं का क्या कारण है ?
उत्तर:
(i) शीर्षक-आधुनिक सभ्यता।
(ii) आज के मानव की प्रबल इच्छा साध्य प्राप्त करने की है।
(iii) आधुनिक समाज में मानव-मूल्यों का हास होने की समस्या निरंतर बढ़ रही है।
(iv) विवेक और ईमानदारी को त्यागकर भौतिक स्तर को ऊँचा उठाने की कामना ही मानव की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं का कारण है।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश

[24] विज्ञान ने मनुष्य को अधिक बुद्धिमान बना दिया है। अब वह अपने समय का हर क्षण पूरी तरह भोग लेना चाहता है। विज्ञान ने मनुष्य को बतलाया कि असली सुख तो सुविधाओं को जुटाने में है और सुविधाएँ पैसे से इकट्ठी की जा सकती हैं। पैसा कमाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है। आज का मनुष्य आत्मकेंद्रित, सुखलिप्सू, सुविधाभोगी और आलसी हो गया है। विज्ञान ने उसे निकम्मा बना दिया। अब गृहिणी के पास करने के लिए कोई काम नहीं बचा। जब विज्ञान ने अपेक्षाकृत कम प्रगति की थी, तब लोग प्रायः सरल जीवन व्यतीत करते थे। वे अधिक भावनासंपन्न थे। लोग परोपकार, सेवा, संयम, त्याग आदि गुणों का सम्मान करते थे परंतु अब तो ऐसा प्रतीत होता है कि जीवन-संगीत विज्ञान की आँच में सूख गया है।
प्रश्न-
(i) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(ii) आज का मनुष्य कैसा बन गया है ?
(iii) विज्ञान ने मनुष्य को किस प्रकार बुद्धिमान बनाया है ?
(iv) विज्ञान की आँच में जीवन-संगीत क्यों सूख गया है ?
उत्तर-
(i) शीर्षक-विज्ञान और मानव-जीवन।
(ii) आज का मनुष्य आलसी, आत्मकेंद्रित और सुविधाभोगी बन गया है।
(iii) विज्ञान ने मनुष्य को बताया है कि असली सुख तो सुविधाओं को जुटाने में है और सुविधाएँ पैसे से प्राप्त की जा सकती हैं।
(iv) वैज्ञानिक उन्नति के कारण मानव-जीवन में से सेवा, त्याग, परोपकार आदि की भावना समाप्त हो गई है। इसलिए ऐसा लगता है कि विज्ञान की आँच में जीवन-संगीत सूख गया है।

[25] श्रीराम, श्रीकृष्ण, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोबिन्द सिंह आदि जितने भी महापुरुष हुए हैं उनको सुयोग्य तथा वीर बनाने का श्रेय किनको है ? उनकी माताओं को। अमर रहने वाली संतान माताओं के शुभ संस्कारों द्वारा ही बनती हैं। आज सब यह चाहते हैं कि दोनों स्त्री-पुरुष कमाएँ। घर में नौकर-चाकर हों। बच्चों के लिए आया हो, परंतु इससे संतान को श्रेष्ठ बनाने के लिए जितना समय माँ को देना चाहिए, वह नहीं दे सकेगी। स्त्री का सर्वोत्तम कार्य-क्षेत्र तो घर ही है। भारत का कल्याण तभी हो सकता है जबकि नर-नारी निज कर्त्तव्य का पालन करते हुए अपनी भारतीय सभ्यता, मान, मर्यादा तथा संस्कृति की रक्षा के लिए अग्रसर हों। स्त्री ऊँची से ऊँची शिक्षा प्राप्त करे। इसमें कोई बुराई नहीं, पर अपने असली उद्देश्य से विचलित न हो।
प्रश्न-
(i) महापुरुषों को सुयोग्य तथा वीर बनाने का श्रेय किनको है ?
(ii) स्त्री का सर्वोत्तम कार्य-क्षेत्र कौन-सा है ?
(iii) भारत का कल्याण कैसे हो सकता है ?
(iv) नारी का असली उद्देश्य क्या है ?
उत्तर:
(i) महापुरुषों को सुयोग्य तथा वीर बनाने का श्रेय उनकी माताओं को है।
(ii) स्त्री का सर्वोत्तम कार्य-क्षेत्र उनका घर ही है।
(iii) भारत का कल्याण तभी हो सकता है जबकि नर-नारी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपनी भारतीय सभ्यता, मान, मर्यादा तथा संस्कृति की रक्षा के लिए अग्रसर हों।
(iv) नारी का असली उद्देश्य यह है कि वह ऊँची-से-ऊँची शिक्षा प्राप्त करके अपने कर्त्तव्य का पालन करें।

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध अपठित गद्यांश Read More »

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Alankar अलंकार Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

अलंकार

प्रश्न 1.
अलंकार किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अलंकार शब्द का अर्थ है-आभूषण या गहना। जिस प्रकार स्त्री के सौंदर्य-वृद्धि में आभूषण सहायक होते हैं, उसी प्रकार काव्य में प्रयुक्त होने वाले अलंकार शब्दों एवं अर्थों में चमत्कार उत्पन्न करके काव्य-सौंदर्य में वृद्धि करते हैं; जैसे-
“खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा।
किसलय का आँचल डोल रहा।”
साहित्य में अलंकारों का विशेष महत्त्व है। अलंकार प्रयोग से कविता सज-धजकर सुंदर लगती है। अलंकारों का प्रयोग गद्य और पद्य दोनों में होता है। अलंकारों का प्रयोग सहज एवं स्वाभाविक रूप में होना चाहिए। अलंकारों को जान-बूझकर लादना नहीं चाहिए।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

प्रश्न 2.
अलंकार के कितने भेद होते हैं ? सबका एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
साहित्य में शब्द और अर्थ दोनों का महत्त्व होता है। कहीं शब्द-प्रयोग से तो कहीं अर्थ-प्रयोग के चमत्कार से और कहीं-कहीं दोनों के एक साथ प्रयोग से काव्य-सौंदर्य में वृद्धि होती है। इस आधार पर अलंकार के तीन भेद माने जाते हैं-
1. शब्दालंकार,
2. अर्थालंकार,
3. उभयालंकार।

1. शब्दालंकार-जहाँ शब्दों के प्रयोग से काव्य-सौंदर्य में वृद्धि होती है, वहाँ शब्दालंकार होता है; जैसे.
“चारु चंद्र की चंचल किरणें,
खेल रही हैं जल-थल में।”

2. अर्थालंकार-जहाँ शब्दों के अर्थों के कारण काव्य में चमत्कार एवं सौंदर्य उत्पन्न हो, वहाँ अर्थालंकार होता है; जैसे
“चरण-कमल बंदौं हरि राई।”

3. उभयालंकार-जिन अलंकारों का चमत्कार शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित होता है, उन्हें उभयालंकार कहते हैं; जैसे
“नर की अरु नल-नीर की, गति एकै कर जोइ।
जेतौ नीचौ है चले, तेतौ ऊँचौ होइ ॥”

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

प्रमुख अलंकार-

1. अनुप्रास

प्रश्न 3.
अनुप्रास अलंकार किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जहाँ व्यंजनों की बार-बार आवृत्ति के कारण चमत्कार उत्पन्न हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है; यथा-
(क) मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत बुलाए।
यहाँ ‘मुदित’, ‘महीपति’ तथा ‘मंदिर’ शब्दों में ‘म’ व्यंजन की और ‘सेवक’, ‘सचिव’ तथा ‘सुमंत’ शब्दों में ‘स’ व्यंजन की आवृत्ति है। अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

(ख) भगवान भक्तों की भूरि भीति भगाइए।

यहाँ ‘भगवान’, ‘भक्तों’, ‘भूरि’, ‘भीति’ तथा ‘भगाइए’ में ‘भ’ व्यंजन की आवृत्ति के कारण चमत्कार उत्पन्न हुआ है।
(ग) कल कानन कुंडल मोरपखा उर पै बिराजति है।

(घ) जौं खग हौं तो बसेरो करौं मिलि-
कालिंदी कूल कदंब की डारनि।

यहाँ दोनों उदाहरणों में ‘क’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण शब्द-सौंदर्य में वृद्धि हुई, अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
(ङ) “कंकन किंकन नूपुर धुनि सुनि।
कहत लखन सन राम हृदय गुनि ॥”
यहाँ ‘क’ तथा ‘न’ वर्गों की आवृत्ति के कारण शब्द-सौंदर्य में वृद्धि हुई है, अतः अनुप्रास अलंकार है।

(च) तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
इसमें ‘त’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

2. यमक

प्रश्न 4.
यमक अलंकार किसे कहते हैं ? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
जहाँ किसी शब्द या शब्दांश का एक से अधिक बार भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग हो, वहाँ यमक अलंकार होता है; जैसे
(क) कनक कनक तैं सौ गुनी, मादकता अधिकाइ।
उहिं खायें बौरातु है, इहिं पाएँ बौराई ॥
इस दोहे में ‘कनक’ शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है। एक ‘कनक’ का अर्थ है-सोना और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ है-धतूरा। एक ही शब्द का भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग होने के कारण यहाँ यमक अलंकार है।

(ख) माला फेरत युग गया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ॥
इस दोहे में ‘फेर’ और ‘मनका’ शब्दों का भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग हुआ है। ‘फेर’ का पहला अर्थ है-माला फेरना और दूसरा अर्थ है-भ्रम। इसी प्रकार से ‘मनका’ का अर्थ है-हृदय और माला का दाना। अतः यमक अलंकार का सुंदर प्रयोग है।

(ग) काली घटा का घमंड घटा।
यहाँ ‘घटा’ शब्द की आवृत्ति भिन्न-भिन्न अर्थ में हुई है।
घटा = वर्षा काल में आकाश में उमड़ने वाली मेघमाला
घटा = कम हआ।

(घ) कहैं कवि बेनी बेनी व्याल की चुराई लीनी।
इस पंक्ति में ‘बेनी’ शब्द का भिन्न-भिन्न अर्थों में आवृत्तिपूर्वक प्रयोग हुआ है। प्रथम ‘बेनी’ शब्द कवि का नाम है और दूसरा ‘बेनी’ (बेणी) चोटी के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

(ङ) गुनी गुनी सब कहे, निगुनी गुनी न होतु।
सुन्यो कहुँ तरु अरक तें, अरक समानु उदोतु ॥
‘अरक’ शब्द यहाँ भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। एक बार अरक के पौधे के रूप में तथा दूसरी बार सूर्य के अर्थ के रूप में प्रयुक्त हुआ है, अतः यहाँ यमक अलंकार सिद्ध होता है।

(च) ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी,
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती है।
यहाँ ‘मंदर’ शब्द के दो अर्थ हैं। पहला अर्थ है-भवन तथा दूसरा अर्थ है-पर्वत, इसलिए यहाँ यमक अलंकार है।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

3. श्लेष

प्रश्न 5.
श्लेष अलंकार का लक्षण लिखकर उसके उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर:
जहाँ एक शब्द के एक ही बार प्रयुक्त होने पर दो अर्थ निकलें, उसे श्लेष अलंकार कहते हैं; जैसे-
1. नर की अरु नल-नीर की, गति एकै कर जोय।
जेते नीचो है चले, तेतो ऊँचो होय ॥
मनुष्य और नल के पानी की समान ही स्थिति है, जितने नीचे होकर चलेंगे, उतने ही ऊँचे होंगे। अंतिम पंक्ति में बताया गया सिद्धांत नर और नल-नीर दोनों पर समान रूप से लागू होता है, अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।

2. मधुवन की छाती को देखो,
सूखी कितनी इसकी कलियाँ।
यहाँ ‘कलियाँ’ शब्द का प्रयोग एक बार हुआ है किंतु इसमें अर्थ की भिन्नता है।
(क) खिलने से पूर्व फूल की दशा।
(ख) यौवन पूर्व की अवस्था।

3. रहिमन जो गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय ॥
इस दोहे में ‘बारे’ और ‘बढ़े’ शब्दों में श्लेष अलंकार है।

4. उपमा

प्रश्न 6.
उपमा अलंकार की परिभाषा देते हुए उसके दो उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर:
जहाँ किसी वस्तु, पदार्थ या व्यक्ति के गुण, रूप, दशा आदि का उत्कर्ष बताने के लिए किसी लोक-प्रचलित या लोक-प्रसिद्ध व्यक्ति से तुलना की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
1. ‘उसका हृदय नवनीत सा कोमल है।’
इस वाक्य में ‘हृदय’ उपमेय ‘नवनीत’ उपमान, ‘कोमल’ साधारण धर्म तथा ‘सा’ उपमावाचक शब्द है।

2. लघु तरण हंसिनी-सी सुंदर,
तिर रही खोल पालों के पर ॥
यहाँ छोटी नौका की तुलना हंसिनी के साथ की गई है। अतः ‘तरण’ उपमेय, ‘हंसिनी’ उपमान, ‘सुंदर’ गुण और ‘सी’ उपमावाचक शब्द चारों अंग हैं।

3. हाय फूल-सी कोमल बच्ची।
हुई राख की थी ढेरी ॥
यहाँ ‘फूल’ उपमान, ‘बच्ची’ उपमेय और ‘कोमल’ साधारण धर्म है। ‘सी’ उपमावाचक शब्द है, अतः यहाँ पूर्णोपमा अलंकार है।

4. यह देखिए, अरविंद से शिशुवृंद कैसे सो रहे।
इस पंक्ति में ‘अरविंद से शिशुवृंद’ में साधारण धर्म नहीं है, इसलिए यहाँ लुप्तोपमा अलंकार है।

5. नदियाँ जिनकी यशधारा-सी
बहती हैं अब भी निशि-वासर ॥
यहाँ ‘नदियाँ’ उपमेय, ‘यशधारा’ उपमान, ‘बहना’ साधारण धर्म और ‘सी’ उपमावाचक शब्द है, अतः यहाँ उपमा अलंकार है।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

5. रूपक

प्रश्न 7.
रूपक अलंकार किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जहाँ अत्यंत समानता दिखाने के लिए उपमेय और उपमान में अभेद बताया जाता है, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे-
1. चरण कमल बंदौं हरि राई।
उपर्युक्त पंक्ति में ‘चरण’ और ‘कमल’ में अभेद बताया गया है, अतः यहाँ रूपक अलंकार का प्रयोग है।

2. मैया मैं तो चंद-खिलौना लैहों।
यहाँ भी ‘चंद’ और ‘खिलौना’ में अभेद की स्थापना की गई है।

3. बीती विभावरी जाग री।
अंबर पनघट में डुबो रही।
तारा-घट ऊषा नागरी।
इन पंक्तियों में नागरी में ऊषा का, अंबर में पनघट का और तारों में घट का आरोप हुआ है, अतः रूपक अलंकार है।

4. मेखलाकार पर्वत अपार,
अपने सहस्र दृग सुमन फाड़,
अवलोक रहा था बार-बार,
नीचे जल में निज महाकार।
यहाँ दृग (आँखों) उपमेय पर फूल उपमान का आरोप है, अतः यहाँ रूपक अलंकार है।

प्रश्न 8.
उपमा और रूपक अलंकार का अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उपमा अलंकार में उपमेय और उपमान में समानता दिखाई जाती है जबकि ‘रूपक’ में उपमेय में उपमान का आरोप करके दोनों में अभेद स्थापित किया जाता है।
उदाहरण-
पीपर पात सरिस मनं डोला (उपमा)
यहाँ ‘मन’ उपमेय तथा ‘पीपर पात’ उपमान में समानता बताई गई है। अतः उपमा अलंकार है।

उदाहरण-
चरण कमल बंदौं हरि राई।” (रूपक)
यहाँ उपमेय ‘चरण’ में उपमान ‘कमल’ का आरोप है। अतः यहाँ रूपक अलंकार है।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

6. उत्प्रेक्षा

प्रश्न 9.
उत्प्रेक्षा अलंकार किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जहाँ समानता के कारण उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाती है; जैसे-
1. सोहत ओ पीतु पटु, स्याम सलौनै गात।
मनौ नीलमणि सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात ॥
यहाँ श्रीकृष्ण के साँवले रूप तथा उनके पीले वस्त्रों में प्रातःकालीन सूर्य की धूप से सुशोभित नीलमणि पर्वत की संभावना होने के कारण उत्प्रेक्षा अलंकार है।

2. उस काल मारे क्रोध के, तनु काँपने उनका लगा।
मानो हवा के जोर से, सोता हुआ सागर जगा ॥
यहाँ क्रोध से काँपता हुआ अर्जुन का शरीर उपमेय है तथा इसमें सोए हुए सागर को जगाने की संभावना की गई है।

3. लंबा होता ताड़ का वृक्ष जाता।
मानो नभ छूना चाहता वह तुरंत ही ॥
यहाँ आँसुओं से पूर्ण उत्तरा के नेत्र उपमेय है जिनमें कमल की पंखुड़ियों पर पड़े हुए ओस के कणों की कल्पना की गई है, अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।

7. मानवीकरण

प्रश्न 10.
मानवीकरण अलंकार की सोदाहरण परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
जहाँ जड़ प्रकृति पर मानवीय भावनाओं तथा क्रियाओं का आरोप हो, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है; जैसे-
“लो यह लतिका भी भर लाई
मधु मुकुल नवल रस गागरी।”
यहाँ लतिका में मानवीय क्रियाओं का आरोप है, अतः लतिका में मानवीय अलंकार सिद्ध है। मानवीकरण अलंकार के कुछ। अन्य उदाहरण हैं

(i) दिवावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही
संध्या सुंदरी परी-सी धीरे-धीरे,

(ii) “मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।”

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

8. अतिशयोक्ति

प्रश्न 11.
अतिशयोक्ति अलंकार किसे कहते हैं ? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जहाँ किसी वस्तु का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है; जैसे-
1. हनुमान की पूँछ में, लग न पाई आग।
लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भाग ॥
हनुमान की पूँछ में अभी आग लगी भी नहीं थी कि सारी लंका जल गई और सारे राक्षस वहाँ से भाग गए। यहाँ हनुमान की वीरता का वर्णन लोक-सीमा से भी अधिक बढ़कर है, अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग है।

2. आगे नदिया बड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार ॥
यहाँ सोचने की क्रिया की पूर्ति होने से पहले ही घोड़े का नदी के पार पहुँचना लोक-सीमा का अतिक्रमण है, अतः अतिशयोक्ति अलंकार है।

3. देख लो साकेत नगरी है यही।
स्वर्ग से मिलने गगन को जा रही ॥
यहाँ कवि ने साकेत नगरी की सुख-सुविधाओं का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया है, अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है।

4. वह शर इधर गांडीव गुण से भिन्न जैसे ही हुआ।
धड़ से जयद्रथ का उधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ।
यहाँ कारण और कार्य के बीच के अंतर को मिटा देने के कारण अतिशयोक्ति अलंकार है। अर्जुन के धनुष से बाण छूटते ही जयद्रथ का सिर धड़ से अलग हो गया। ऐसा होना असंभव है।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

9. अन्योक्ति

प्रश्न 12.
अन्योक्ति अलंकार की परिभाषा उदाहरण सहित दीजिए।
उत्तर:
जहाँ उपमान (अप्रस्तुत) के वर्णन के माध्यम से उपमेय (प्रस्तुत) का वर्णन किया जाए, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण-
1. जिन दिन देखे वे कुसुम, गई सु बीति बहार।
अब अलि रही गुलाब में, अपत कँटीली डार ॥
यहाँ अलि के माध्यम से एक ऐसे गुणी की ओर संकेत किया गया है, जिसका आश्रयदाता पत्रहीन शाखा (धनहीन) गुलाब जैसा रह गया हो।

2. नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं विकासु इहिं काल।
अली कली ही सौं बंध्यौ, आनें कौन हवाल ॥
प्रस्तुत दोहे में अप्रस्तुत अर्थ कली और भ्रमर के वर्णन से प्रस्तुत अर्थ राजा जयसिंह और उनकी नवोढ़ा रानी की प्रतीति कराई गई है, अतः यह अन्योक्ति अलंकार का सुंदर उदाहरण है।

10. पुनरुक्ति प्रकाश

प्रश्न 13.
पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार की परिभाषा उदाहरण सहित दीजिए।
उत्तर:
जब कवि एक शब्द की आवृत्ति काव्य में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए करता है, तो वहाँ पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार होता है।

पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार के उदाहरण-
1. “किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत।”
2. “कवि-करि प्रतिपद प्रतिमनि वसुधा कमल बैठकी साजती।”
3. झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर!
राग अमर! अंबर में भर निज रोर!
4. ‘हौले हौले जाती मुझे बाँध निज माया से’।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

अभ्यासार्थ कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण-

1. शब्द के अंकुर फूटे।
उत्तर:
रूपक

2. मृदु मंद-मंद मंथर मंथर, लघु तरणि हंस-सी सुंदर।
प्रतिघट-कटक कटीले कोते कोटि-कोटि।
उत्तर:
अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश

3. हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार।
उत्तर:
मानवीकरण

4. नृत्य करने लगी डालियाँ।
उत्तर:
मानवीकरण

5. रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरें, मोती मानुस चून ॥
उत्तर:
श्लेष

6. तारों की सी छाँह साँवली।
उत्तर:
रूपक

7. वह इष्ट देव के मंदिर की पूजा-सी,
वह दीप शिखा-सी शांत भाव में लीन
वह टूटे तरन की छूटी लता-सी दीन,
दलित भारत की विधवा है।
उत्तर:
उपमा

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

8. सोहत ओढ़े पीत पट स्याम सलोने गात।
मनौ नीलमणि शैल पर आतप पर्यो प्रभात ॥
उत्तर:
उत्प्रेक्षा

9. राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस।
बरषत बारिद बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास ॥
उत्तर:
अनुप्रास

10. पच्छी परछीने ऐसे परे परछीने वीर,
तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के।
उत्तर:
अनुप्रास और यमक

11. बढ़त-बढ़त संपति-सलिल, मन सरोज बढ़ जाई।
घटत-घटत सु न फिरि घटे, बरु समूल कुम्हिलाई ॥
उत्तर:
रूपक

12. चारु कपोल लोल लोचन, गोरोचन तिलक दिए।
लट-लटकनि मनु मत्त मधुपगन, मादक मधुहिं पिए ॥
उत्तर:
उत्प्रेक्षा, अनुप्रास एवं रूपक

13. कौसिक सुनहु मंद येहु बालकु। कुटिल काल बस निज कुल घालकु।
भानु बंस-राकेस-कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू ॥
उत्तर:
अनुप्रास

14. यों तो ताशों के महलों सी मिट्टी की वैभव बस्ती क्या?
भू काँप उठे तो ढह जाए, बाढ़ आ जाए, बह जाए ॥
उत्तर:
उपमा

15. या अनुराग चित की, गति समुझै नहिं कोइ।
ज्यौं-ज्यौं बूडै स्याम रंग, त्यौं-त्यौं उज्जलु होइ ॥
उत्तर:
श्लेष

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

16. मेरे अंतर में आते हो देव, निरंतर,
कर जाते हो व्यथा भार लघु,
बार-बार कर कंज बढ़ाकर।
उत्तर:
रूपक एवं यमक

17. भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उत्तर:
अनुप्रास
यमक

18. पी तुम्हारी मुख बात तरंग
आज बौरे भौंरे सहकार।
उत्तर:
यमक

19. माला फेरत युग गया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।
उत्तर:
यमक

20. मुदित महीपति मंदिर आए।
सेवक सचिव सुमंत बुलाए ।
उत्तर:
अनुप्रास

21. कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए।
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए ॥
उत्तर:
उत्प्रेक्षा

22. ऊँचा कर सिर, ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल।
उत्तर:
अनुप्रास

23. थर-थर काँपहिं नर-नारी।
उत्तर:
पुनरुक्ति प्रकाश

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

24. सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार ॥
उत्तर:
यमक

25. रघुपति राघव राजा राम।
उत्तर:
अनुप्रास

26. तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।
उत्तर:
अनुप्रास

27. मैया मैं तो चंद-खिलौना लैहों।
उत्तर:
रूपक

28. यह तेरी रण-तरी।
उत्तर:
रूपक

29. भव-सागर तरने को नाव बनाए।
उत्तर:
रूपक

30. संसार की समरस्थली में धीरता धारण करो।
उत्तर:
अनुप्रास

31. जेहि विधि तबहिं ताहि लइ आवा।
उत्तर:
अनुप्रास

32. बार-बार गर्जन,
वर्षण है मूसलाधार।
उत्तर:
पुनरुक्ति प्रकाश

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार

33. भजन कह्यो तातें, भज्यों ने एकहुँ बार।
दूर भजन जाते कयो, सो तू भज्यो गँवार ॥
उत्तर:
यमक

34. महा महा जोधा संघारे।
उत्तर:
पुनरुक्ति प्रकाश

35. ऐ जीवन के पारावार।
उत्तर:
उपमा।

HBSE 12th Class Hindi Vyakaran अलंकार Read More »

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

HBSE 12th Class Hindi श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
उत्तर:
लेखक जाति-प्रथा को श्रम विभाजन का एक रूप इसलिए नहीं मानता क्योंकि यह विभाजन स्वाभाविक नहीं है। पुनः यह मानव की रुचि पर भी आधारित नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें व्यक्ति की क्षमता और योग्यता की उपेक्षा की जाती है। यह माता-पिता के सामाजिक स्तर को ध्यान में रखकर ही बनाई जाती है। जन्म से पूर्व ही मनुष्य के लिए श्रम विभाजन करना पूर्णतया अनुचित है। जाति-प्रथा आदमी को आजीवन एक ही व्यवसाय से जोड़ देती है जोकि सर्वथा अनुचित है। जाति-प्रथा के कारण मनुष्य को उचित तथा अनुचित किसी भी व्यवसाय को अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यहाँ तक कि यदि मनुष्य को भूखा मरना पड़ा तो भी वह अपना पेशा नहीं बदल सकता। यह स्थिति समाज के लिए बड़ी भयावह है।

प्रश्न 2.
जाति-प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?
उत्तर:
जाति-प्रथा किसी भी आदमी को अपनी रुचि के अनुसार पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती। उसे केवल पैतृक पेशा ही अपनाना पड़ता है। वह किसी अन्य पेशे को नहीं अपना सकता। भले ही वह उस पेशे में पारंगत क्यों न हो। आज उद्योग-धंधों की प्रक्रिया और तकनीक में लगातार विकास हो रहा है, जिससे कभी-कभी भयानक परिवर्तन उत्पन्न हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को पेशा बदलने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसी स्थिति में यदि मनुष्य को पेशा न बदलने दिया जाए तो वह बेरोज़गारी और भुखमरी का शिकार हो जाएगा।

आज भले ही समाज में भयंकर जाति-प्रथा है, लेकिन उसके बाद भी कोई ऐसी मजबूरी नहीं है कि वह अपने पैतृक व्यवसाय को छोड़कर नए पेशे को न अपना सके। आज जो लोग पैतृक व्यवसाय से जुड़े हैं वे अपनी इच्छा से जुड़े हुए हैं अथवा किसी अन्य व्यवसाय में योग्यता की कमी के कारण पैतृक व्यवसाय को अपनाए हुए हैं।

प्रश्न 3.
लेखक के मत से ‘दासता’ की व्यापक परिभाषा क्या है?
उत्तर:
लेखक का कहना है कि ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कह सकते। दासता की एक अन्य स्थिति यह भी है जिसके अनुसार कुछ लोगों को अन्य लोगों द्वारा निर्धारित किए गए व्यवहार और कर्तव्यों का पाल होना पड़ता है। कानूनी पराधीनता न होने पर भी समाज में इस प्रकार की दासता देखी जा सकती है। उदाहरण के रूप में जाति-प्रथा के समान समाज में ऐसे लोगों का वर्ग भी संभव है जिन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी पेशे को अपनाना पड़ सकता है। उदाहरण के रूप में सफाई करने वाले कर्मचारी इसी प्रकार के कहे जा सकते हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

प्रश्न 4.
शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर ‘समता’ को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?
उत्तर:
डॉ० आंबेडकर यह जानते हैं कि शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक परंपरा की दृष्टि से लोगों में असमानता हो सकती है, परंतु फिर भी वे क्षमता के व्यवहार्य सिद्धांत को अपनाने की सलाह देते हैं। इस संदर्भ में लेखक का यह तर्क है कि यदि हमारा समाज अपने सदस्यों का अधिकतम प्रयोग प्राप्त करना चाहता है, तो इसे समाज के सभी लोगों को आरंभ से ही समान अवसर और समान व्यवहार प्रदान करना होगा। विशेषकर हमारे राजनेताओं को सब लोगों के साथ एक-समान व्यवहार करना चाहिए। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने का उचित अवसर मिलना चाहिए। लेखक का यह भी तर्क है कि जन्म लेना या सामाजिक परंपरा प्राप्त करना व्यक्ति के अपने वश में नहीं है। अतः इस आधार पर किसी के व्यवसाय का निर्णय करना उचित नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 5.
सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है; जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?
उत्तर:
इस बात को लेकर हम लेखक से पूरी तरह सहमत हैं। कारण यह है कछ लोग किसी उच्च वंश में उत्पन्न होने के फलस्वरूप उत्तम व्यवहार के अधिकारी बन जाते हैं। यदि हम गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि इसमें उनका कोई अपना योगदान नहीं है। सामाजिक परिवेश व्यक्ति को सम्मान प्रदान कर सकता है लेकिन उस व्यक्ति के सामर्थ्य का मूल्यांकन नहीं कर सकता है। मनुष्य के कार्यों तथा उसके प्रयत्नों के फलस्वरूप ही उसकी महानता का निर्णय होना चाहिए और आदमी के प्रयत्नों की सही जाँच तब हो सकती है जब सभी को समान अवसर प्राप्त हों। उदाहरण के रूप में गाँव के विद्यालयों तथा सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों का पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के साथ मुकाबला नहीं किया जा सकता। अतः समय की माँग यह है कि जातिवाद का उन्मूलन किया जाए और सभी को समान भौतिक स्थितियाँ और सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। तब उनमें जो श्रेष्ठ व्यक्ति सिद्ध होता है, वही उत्तम व्यवहार का अधिकारी हो सकता है।

प्रश्न 6.
आदर्श समाज के तीन तत्त्वों में से एक ‘भ्रातृता’ को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं? आप इस ‘भ्रातता’ शब्द से कहाँ तक सहमत हैं? यदि नहीं तो आप क्या शब्द उचित समझेंगे/समझेंगी।
उत्तर:
आदर्श समाज के तीसरे तत्त्व (भ्रातृता) भाईचारे पर विचार करते समय लेखक ने अलग से स्त्रियों का उल्लेख नहीं किया, परंतु लेखक ने समाज की बात कही है और स्त्रियाँ समाज से अलग नहीं होतीं, बल्कि स्त्री और पुरुष दोनों के मिलने से समाज बनता है। अतः यह कहना कि आदर्श समाज में स्त्रियों को सम्मिलित किया गया है अथवा नहीं; यह सोचना ही व्यर्थ है। समाज में स्त्रियाँ स्वतः सम्मिलित हैं। भ्रातृता भले ही संस्कृतनिष्ठ शब्द है परंतु यह अधिक प्रचलित नहीं है। अतः यदि इसके स्थान पर भाईचारा शब्द का प्रयोग होता तो वह उचित होता।

पाठ के आसपास

प्रश्न 1.
आंबेडकर ने जाति-प्रथा के भीतर पेशे के मामले में लचीलापन न होने की जो बात की है, उस संदर्भ में शेखर जोशी की कहानी ‘गलता लोहा’ पर पुनर्विचार कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से इस कहानी को स्वयं पढ़ें और विचार करें।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

प्रश्न 2.
‘कार्य कुशलता’ पर जाति-प्रथा का प्रभाव विषय पर समूह में चर्चा कीजिए। चर्चा के दौरान उभरने वाले बिंदुओं को लिपिबद्ध कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से इस कहानी को स्वयं पढ़ें और विचार करें।

इन्हें भी जानें

आंबेडकर की पुस्तक जातिभेद का उच्छेद और इस विषय में गांधी जी के साथ उनके संवाद की जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

हिंद स्वराज नामक पुस्तक में गांधी जी ने कैसे आदर्श समाज की कल्पना की है, उसे भी पढ़ें।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

HBSE 12th Class Hindi श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
प्रस्तुत पाठ में लेखक ने जाति-प्रथा की किन-किन बुराइयों का वर्णन किया है?
उत्तर:
जाति-प्रथा द्वारा किया गया श्रम विभाजन स्वाभाविक नहीं है क्योंकि यह श्रमिकों में भेद उत्पन्न करती है और उनमें ऊँच-नीच की भावना पैदा करती है। पुनः जाति-प्रथा पर आधारित श्रम विभाजन श्रमिकों की रुचि के अनुसार नहीं होता। जाति-प्रथा के फलस्वरूप श्रम विभाजन माँ के गर्भ में ही तय हो जाता है। जन्म लेने के बाद व्यक्ति की रुचि और क्षमता की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यही नहीं, जाति-प्रथा मनुष्य को हमेशा के लिए एक ही व्यवसाय से जोड़ देती है। यदि विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाएँ तो भी व्यक्ति अपना व्यवसाय नहीं छोड़ सकता जिससे उसे भूखों मरना पड़ सकता है। जाति-प्रथा के कारण कुछ काम घृणित माने गए हैं, जो लोग मजबूरी में इन कार्यों को करते हैं उन्हें लोग हीन समझते हैं।

प्रश्न 2.
आदर्श समाज के बारे में लेखक ने क्या विचार व्यक्त किए हैं?
उत्तर:
लेखक जिस आदर्श समाज की बात करता है वह स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे पर आधारित होगा। लेखक का कहना है कि आदर्श समाज में जो परिवर्तन होगा उसका लाभ सभी को होगा किसी एक को नहीं। इस प्रकार के समाज में अनेक प्रकार के हितों में सभी लोगों की भागीदारी होगी। यही नहीं, सभी लोग समाज के कल्याण के लिए जागरूक रहेंगे। ऐसी स्थिति में सामाजिक जीवन में सबको निरंतर संपर्क के अनेक साधन और अवसर प्राप्त होंगे। समाज में भाईचारा इस प्रकार का होगा जैसे दूध और पानी का मिश्रण होता है। अतः आदर्श समाज समाज के सभी लोगों के लिए उपयोगी होगा।

प्रश्न 3.
लोकतंत्र से लेखक का क्या आशय है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
लेखक का विचार है कि लोगों में जो दूध-पानी के मिश्रण के समान भाईचारा विकसित होगा वही तो लोकतंत्र है। इसमें समाज के सभी लोगों में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की भावना विकसित होगी। लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है, बल्कि लोकतंत्र सामूहिक जीवन-चर्या की एक नीति है। समाज के सम्मिलित अनुभवों का आदान-प्रदान ही लोकतंत्र है। इस प्रकार के लोकतंत्र की स्थापना होने से लोगों को अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव उत्पन्न होगा।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

प्रश्न 4.
लेखक के अनुसार मनुष्य की क्षमता किन बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
लेखक का कहना है कि मनुष्यों की क्षमता शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार और मनुष्य के अपने प्रयत्नों पर निर्भर करती है। शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार जन्मजात होते हैं। ये दोनों मनुष्य के वश में नहीं हैं। अतः इनके आधार पर किसी का वर्ग और कार्य निश्चित नहीं किया जाना चाहिए और न ही जन्म के कारण किसी को श्रेष्ठ या निम्न मानना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य के प्रयत्न उसके अपने वश में हैं। अतः सभी मनुष्यों को प्रयत्न करने के समान अवसर दिए जाने चाहिएँ। प्रयत्न करने पर जो मनुष्य उत्तम है, उसे उत्तम ही कहेंगे।

प्रश्न 5.
जाति-प्रथा भारतीय समाज में बेरोज़गारी और भुखमरी का एक कारण कैसे रही है? भीमराव आंबेडकर के विचारों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जाति-प्रथा भारतीय समाज के लिए एक कलंक है। यह हमेशा बेरोज़गारी और भुखमरी का कारण बनती रही है। जब समाज किसी व्यक्ति को जाति के आधार पर एक विशेष पेशे से जोड़ देता है और यदि वह पेशा उस आद अथवा अपर्याप्त होता है तो उसके समक्ष भुखमरी की स्थिति उपस्थित हो जाती है। जाति-प्रथा उस व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती अथवा उसे पेशा बदलने की स्वतंत्रता नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में उसके सामने भूखों मरने के सिवाय और कोई चारा नहीं होता। भारतीय समाज हमेशा व्यक्ति को पैतृक पेशा अपनाने को मजबूर करता है। भले ही वह उसे पेशे में प्रवीण हो अथवा नहीं। पेशा बदलने की अनुमति न देना बेरोज़गारी का प्रमुख कारण बनता है। परंतु स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद इस स्थिति में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। जाति-प्रथा के बावजूद आज व्यक्ति को अपना पेशा चुनने अथवा बदलने का पूरा अधिकार है। सरकार द्वारा लागू की गई आरक्षण नीति से भी इस स्थिति में काफी परिवर्तन आया है।

प्रश्न 6.
‘जाति-प्रथा’ के आधार पर श्रम विभाजन को स्वाभाविक क्यों नहीं माना गया?
उत्तर:
जाति-प्रथा श्रम का जो विभाजन करती है वह मनुष्य की रुचियों तथा उसकी क्षमताओं पर आधारित नहीं होता, बल्कि यह विभाजन जन्म और जाति के आधार पर किया जाता है। जाति-प्रथा द्वारा किया गया श्रम विभाजन अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें व्यक्ति बंधनों में जकड़ लिया जाता है। सही श्रम विभाजन वही हो सकता है जिसमें मानव की रुचियों और क्षमताओं का ध्यान रखा जाए। रोज़गार के उचित अवसर सभी को प्राप्त होने चाहिएँ । दुःख की बात तो यह है कि जाति-प्रथा के आधार पर किया गया श्रम विभाजन ऊँच-नीच और छोटे-बड़े के भेदभाव को उत्पन्न करता है। यह विभाजन पूर्णतया अस्वाभाविक है।

प्रश्न 7.
जाति-प्रथा आर्थिक विकास के लिए किस प्रकार हानिकारक है?
उत्तर:
आर्थिक विकास के लिए यह जरूरी है कि लोगों को उनकी रुचि, क्षमता तथा योग्यता के अनुसार पेशा अपनाने और श्रम करने की स्वतंत्रता हो, बल्कि सभी को समान अवसर भी मिलने चाहिएँ। जाति-प्रथा सबको समान अवसर देने से रोकती है। वह व्यक्ति की अपनी रुचि, क्षमता और इच्छा की ओर कोई ध्यान नहीं देती। जो लोग जन्मजात पेशे को अपनाने के लिए मजबूर किए जाते हैं वे न चाहते हुए मजबूर होकर काम करते हैं। पेशे में न उनका दिल लगता है, न दिमाग। वे अपनी शक्तियों और क्षमताओं का समुचित प्रयोग नहीं कर पाते जिससे आर्थिक विकास अवरुद्ध हो जाता है।

प्रश्न 8.
आंबेडकर ने किसके लिए दासता शब्द का प्रयोग किया है और क्यों?
उत्तर:
आंबेडकर ने जाति-प्रथा के आधार पर पेशा अपनाने की परंपरा को ‘दासता’ की संज्ञा दी है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मनुष्य इस परंपरा के कारण अपनी इच्छानुसार पेशा नहीं चुन सकता। उसे वही काम करना पड़ता है जो जन्म से उसके लिए निर्धारित कर दिया जाता है। उसकी अपनी इच्छा की परवाह नहीं की जाती। जाति-प्रथा के कारण समाज उसके लिए जो काम निर्धारित कर लेता है, आजीवन उसे वही काम करना पड़ता है। भले ही उसमें उसकी अपनी रुचि हो या न हो। ऐसा जीवन ‘दासता’ नहीं तो और क्या कहा जाएगा।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

प्रश्न 9.
जन्मजात धंधों में लगे हुए लोग कार्यकुशल क्यों नहीं बन पाते?
उत्तर:
जिन लोगों को जाति-प्रथा के कारण जन्मजात धंधों को अपनाना पड़ता है, उनमें कभी भी कार्य-कुशलता नहीं आ पाती। उस कार्य में उनकी रुचि नहीं होती लेकिन फिर भी उन्हें मजबूर होकर वह काम करना पड़ता है। यही नहीं, ऐसा व्यक्ति दुर्भावना से ग्रस्त हो जाता है। वह काम करने की बजाय टाल-मटोल की नीति को अपनाता है। जाति-प्रथा द्वारा निर्धारित काम में उसका दिल और दिमाग नहीं लगता, जिसके फलस्वरूप वह अपनी क्षमता की अपेक्षा बहुत कम काम करता है।

प्रश्न 10.
लेखक ने किस आधार पर असमान व्यवहार को उचित माना और क्यों?
उत्तर:
लेखक का कहना है कि असमान प्रयत्न के आधार पर असमान व्यवहार उचित है। कहने का भाव यह है कि यदि कोई आदमी अपनी इच्छा से बहुत थोड़ा प्रयत्न करता है और ठीक से काम नहीं करता तो उसे कम सम्मान मिलना चाहिए। जो व्यक्ति अधिक प्रयत्न करता है उसे अधिक सम्मान मिलना चाहिए। इस प्रकार से व्यक्ति को प्रोत्साहित करना या दंडित करना सर्वथा उचित है। ऐसा करने से मनुष्य अपनी क्षमताओं का विकास कर सकेगा और अयोग्य लोगों को योग्य स्थानों पर काम करने को नहीं मिलेगा।

प्रश्न 11.
लेखक ने आदर्श समाज के बारे में क्या कहा है?
अथवा
आदर्श समाज की कल्पना का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
लेखक आदर्श समाज की चर्चा करते हुए कहता है कि उसका आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित होगा। यह किसी प्रकार से भी गलत नहीं है। भाईचारे में किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती। आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता अवश्य होनी चाहिए कि समाज में किया गया कोई भी परिवर्तन सर्वत्र व्याप्त हो जाए। ऐसे समाज में सार्वजनिक हितों में सबकी भागीदारी होनी चाहिए। सामाजिक जीवन में निरंतर संपर्क के अनेक साधन और अवसर सभी को प्राप्त होने चाहिएँ। लेखक इस तुलना दूध और पानी के मिश्रण से करता है। इसी को लोकतंत्र कहा जाता है। लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है, बल्कि सामूहिक जीवन-चर्या की एक नीति है जिसमें सभी को अनुभवों का आदान-प्रदान करने का अवसर प्राप्त होता है।

प्रश्न 12.
लेखक ने समता को काल्पनिक वस्तु क्यों माना है? फिर भी वह समता क्यों चाहता है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार लोगों के बीच में समता प्राकृतिक नहीं है। उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म से ही सामाजिक स्तर से अपने प्रयत्नों के कारण असमान होता है। सभी एक-समान नहीं हो सकते। अतः पूर्ण समता एक काल्पनिक वस्तु है। फिर भी लेखक का कहना है कि समाज के सभी लोगों को पढ़ने-लिखने और फलने-फूलने के बराबर अवसर मिलने चाहिएँ। किसी प्रकार का भेदभाव मानव के विकास में बाधा का काम करता है और उसकी कार्य-कुशलता को हानि पहुँचाता है। भले ही समाज विविध प्रकार का है और विशाल भी है, लेकिन फिर भी सभी मनुष्य समान होने चाहिएँ। तभी हमारा समाज वर्गहीन, जातिहीन और श्रेणीहीन होगा।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ के लेखक का नाम क्या है?
(A) डॉ० भीमराव आंबेडकर
(B) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(C) विष्णु खरे
(D) धर्मवीर भारती
उत्तर:
(A) डॉ० भीमराव आंबेडकर

2. डॉ० भीमराव आंबेडकर का जन्म कब हुआ?
(A) 14 अप्रैल, 1890 को
(B) 12 अप्रैल, 1891 को
(C) 14 अप्रैल, 1891 को
(D) 14 अप्रैल, 1881 को
उत्तर:
(C) 14 अप्रैल, 1891 को

3. भीमराव आंबेडकर का जन्म कहाँ पर हुआ?
(A) महू में
(B) मेद्या में
(C) बहू में
(D) भाण्डू में
उत्तर:
(A) महू में

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

4. महू किस राज्य में स्थित है?
(A) उत्तरप्रदेश में
(B) राजस्थान में
(C) हरियाणा में
(D) मध्यप्रदेश में
उत्तर:
(D) मध्यप्रदेश में

5. डॉ० भीमराव का जन्म किस परिवार में हुआ?
(A) ब्राह्मण परिवार में
(B) क्षत्रिय परिवार में
(C) अस्पृश्य परिवार में
(D) वैश्य परिवार में
उत्तर:
(C) अस्पृश्य परिवार में

6. डॉ० भीमराव ने आरंभिक शिक्षा कहाँ प्राप्त की?
(A) पाकिस्तान में
(B) भारत में
(C) श्रीलंका में
(D) जापान में
उत्तर:
(B) भारत में

7. उच्चतर शिक्षा के लिए सर्वप्रथम वे कहाँ गए?
(A) न्यूयार्क में
(B) लंदन में
(C) पेरिस में
(D) हांगकांग में
उत्तर:
(A) न्यूयार्क

8. न्यूयॉर्क के बाद भीमराव ने कहाँ पर उच्च शिक्षा प्राप्त की?
(A) वाशिंगटन में
(B) दिल्ली में
(C) मुंबई में
(D) लंदन में
उत्तर:
(D) लंदन में

9. किन विश्वविद्यालयों ने डॉ. आंबेडकर को विधि, अर्थशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान में डिग्रियाँ प्रदान की?
(A) पंजाब विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ने
(B) कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इक्नॉमिक्स ने
(C) कोलकाता विश्वविद्यालय और मुंबई विश्वविद्यालय ने
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय और मेरठ विश्वविद्यालय ने
उत्तर:
(B) कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इक्नॉमिक्स ने

10. किस समाज से डॉ० आंबेडकर का मोह भंग हो गया?
(A) हिंदू समाज से
(B) ब्राह्मण समाज से
(C) जैन समाज से
(D) वैश्य समाज से
उत्तर:
(A) हिंदू समाज से

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

11. डॉ० आंबेडकर कब बौद्ध धर्म के मतानुयायी बने?
(A) 12 अक्तूबर, 1952 को
(B) 14 अक्तूबर, 1956 को
(C) 12 अक्तूबर, 1955 को
(D) 16 अक्तूबर, 1957 को
उत्तर:
(B) 14 अक्तूबर, 1956 को

12. डॉ. आंबेडकर के साथ और कितने लोग बौद्ध धर्म के मतानुयायी बने?
(A) 2 लाख
(B) 3 लाख
(C) 5 लाख
(D) 7 लाख
उत्तर:
(C) 5 लाख

13. डॉ. आंबेडकर किस महान कवि से प्रभावित हुए थे?
(A) गुरुनानक देव से
(B) कबीरदास से
(C) रविदास से
(D) धर्मदास से
उत्तर:
(B) कबीरदास से

14. डॉ० भीमराव आंबेडकर का देहांत कब हुआ?
(A) 6 दिसंबर, 1956 को
(B) 5 दिसंबर, 1955 को
(C) 12 दिसंबर, 1956 को
(D) 6 दिसंबर, 1951 को
उत्तर:
(A) 6 दिसंबर, 1956 को

15. डॉ० भीमराव आंबेडकर ने किसके निर्माण में योगदान दिया?
(A) हिंदू समाज
(B) दलित समाज
(C) भारतीय संविधान
(D) भारतीय समाज
उत्तर:
(C) भारतीय संविधान

16. भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय ने बाबा साहेब आंबेडकर के संपूर्ण वाङ्मय को कितने खंडों में विभाजित किया है?
(A) 22
(B) 23
(C) 24
(D) 21
उत्तर:
(D) 21

17. बाबा भीमराव की रचना ‘जेनेसिस एंड डवेलपमेंट’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1927 में
(B) सन् 1928 में
(C) सन् 1917 में
(D) सन् 1930 में
उत्तर:
(C) सन् 1917 में

18. ‘द अनटचेबल्स, हू आर दे? का प्रकाशन किस वर्ष में हुआ?
(A) सन् 1945 में
(B) सन् 1946 में
(C) सन् 1947 में
(D) सन् 1948 में
उत्तर:
(D) सन् 1948 में

19. बाबा भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित ‘बुद्धा एंड हिज़ धम्मा’ कब प्रकाशित हुई?
(A) सन् 1957 में
(B) सन् 1958 में
(C) सन् 1959 में
(D) सन् 1960 में
उत्तर:
(A) सन् 1957 में

20. ‘हू आर द शूद्राज़’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1947 में
(B) सन् 1946 में
(C) सन् 1950 में
(D) सन् 1951 में
उत्तर:
(B) सन् 1946 में

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

21. ‘थॉट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1950 में
(B) सन् 1951 में
(C) सन् 1955 में
(D) सन् 1960 में
उत्तर:
(C) सन् 1955 में

22. बाबा भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित ‘द प्रॉबल्म ऑफ़ द रुपी’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1919 में
(B) सन् 1920 में
(C) सन् 1922 में
(D) सन् 1923 में
उत्तर:
(D) सन् 1923 में

23. ‘द राइज़ एंड फॉल ऑफ द हिंदू वीमैन’ कब प्रकाशित हुई?
(A) सन् 1965 में
(B) सन् 1960 में
(C) सन् 1921 में
(D) सन् 1930 में
उत्तर:
(A) सन् 1965 में

24. ‘एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ कब प्रकाशित हुई?
(A) सन् 1930 में
(B) सन् 1936 में
(C) सन् 1920 में
(D) सन् 1940 में
उत्तर:
(B) सन् 1936 में

25. डॉ. आंबेडकर द्वारा रचित ‘लेबर एंड पार्लियामेंट्री डैमोक्रेसी’ किस वर्ष प्रकाशित हुई?
(A) सन् 1941 में
(B) सन् 1942 में
(C) सन् 1943 में
(D) सन् 1950 में
उत्तर:
(C) सन् 1943 में

26. सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान को लेखक ने क्या कहा है?
(A) स्वतंत्रता
(B) तानाशाही
(C) दासता
(D) लोकतंत्र
उत्तर:
(D) लोकतंत्र

27. जाति-प्रथा व्यक्ति को जीवन भर के लिए किससे बाँध देती है?
(A) एक ही व्यवसाय से
(B) अनेक व्यवसायों से
(C) व्यवसाय बदलने से
(D) व्यवसाय छोड़ने से
उत्तर:
(A) एक ही व्यवसाय से

28. लेखक ने भारतीय समाज में बेरोज़गारी और भुखमरी का क्या कारण बताया है?
(A) गरीबी
(B) पूँजीवाद
(C) जाति-प्रथा
(D) सांप्रदायिकता
उत्तर:
(C) जाति-प्रथा

29. आंबेडकर ने दूध और पानी के मिश्रण की तुलना किससे की है?
(A) स्वतंत्रता से
(B) समता से
(C) भाईचारे से
(D) सम्पन्नता से
उत्तर:
(C) भाईचारे से

30. लेखक ने काल्पनिक जगत की वस्तु किसे कहा है?
(A) राजनीति को
(B) सिद्धांत को
(C) समता को
(D) जातिवाद को
उत्तर:
(C) समता को

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

31. लेखक के अनुसार हिन्दू धर्म की जाति-प्रथा व्यक्ति को कौन-सा पेशा चुनने की अनुमति देती है?
(A) पैतृक पेशा
(B) स्वतंत्र पेशा
(C) कर्मानुसार
(D) कार्य-कुशलता के अनुसार
उत्तर:
(A) पैतृक पेशा

32. कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए मजबूर करना क्या कहलाता है?
(A) स्वतंत्रता
(B) आज्ञा पालन
(C) दासता
(D) गरीबी
उत्तर:
(C) दासता

33. कौन-सा धर्म व्यक्ति को जाति-प्रथा के अनुसार पैतृक-काम अपनाने को मजबूर करता है?
(A) हिन्दू
(B) मुस्लिम
(C) सिक्ख
(D) ईसाई
उत्तर:
(A) हिन्दू

34. स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित समाज को आंबेडकर ने कैसा समाज कहा है?
(A) अच्छा
(B) महत्त्वपूर्ण
(C) आदर्श
(D) स्वीकार्य
उत्तर:
(C) आदर्श

35. लेखक के अनुसार इस युग में किसके पोषकों की कमी नहीं है?
(A) श्रमवाद
(B) जातिवाद
(C) धर्मवाद
(D) राजनीति
उत्तर:
(B) जातिवाद

36. माता-पिता के आधार पर श्रम विभाजन करना किसकी देन है?
(A) धर्म की
(B) समाज की
(C) जाति-प्रथा की
(D) बेरोज़गारी की
उत्तर:
(C) जाति-प्रथा की

37. आदर्श समाज की विशेषता है
(A) विघटन
(B) अलगाव
(C) गतिशीलता
(D) विद्वेष
उत्तर:
(C) गतिशीलता

38. इस युग में ‘जातिवाद’ क्या है ?
(A) गुण
(B) विडम्बना
(C) श्रेष्ठ व्यवस्था
(D) ईश-विधान
उत्तर:
(B) विडम्बना

39. बाबा साहेब आंबेडकर ने किस प्रकार के समाज की कल्पना की है?
(A) स्वतंत्र समाज की
(B) समान समाज की
(C) आदर्श समाज की
(D) गतिशील समाज की
उत्तर:
(C) आदर्श समाज की

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

40. लेखक ने भाईचारे के वास्तविक रूप को किसके मिश्रण की भाँति बताया है?
(A) आटा-नमक
(B) दूध-पानी
(C) दूध-घी
(D) घी-शक्कर
उत्तर:
(B) दूध-पानी

41. लेखक के अनुसार दासता का संबंध किससे नहीं है?
(A) समाज से
(B) कानून से
(C) शिक्षा से
(D) धन से
उत्तर:
(B) कानून से

42. किस क्रांति में ‘समता’ शब्द का नारा लगाया गया था?
(A) रूसी क्रांति में
(B) फ्रांसीसी क्रांति में
(C) जर्मन क्रांति में
(D) जापानी क्रांति में
उत्तर:
(B) फ्रांसीसी क्रांति में

43. बाबा साहेब के अनुसार किसके आधार पर समानता अनुचित है?
(A) वंश-परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा के
(B) रोज़गार और धन के
(C) जाति और धर्म के
(D) धर्म और शिक्षा के
उत्तर:
(A) वंश-परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा के

44. जाति-प्रथा के पोषक लोग किन जातियों से संबंधित हैं?
(A) छोटी जातियों से
(B) उच्च जातियों से
(C) राजनेताओं से
(D) धार्मिक नेताओं से
उत्तर:
(B) उच्च जातियों से

45. आर्थिक विकास के लिए जाति-प्रथा का परिणाम कैसा है?
(A) हानिकारक
(B) लाभकारी
(C) उपयोगी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) हानिकारक

46. श्रम के परंपरागत तरीकों में किस कारण से परिवर्तन हो रहा है?
(A) शिक्षा के कारण
(B) गरीबी के कारण
(C) बेरोज़गारी के कारण
(D) आधुनिक तकनीक के कारण
उत्तर:
(D) आधुनिक तकनीक के कारण

47. पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में किसका प्रमुख एवं प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है?
(A) मजदूरी का
(B) बेरोजगारी का
(C) असमानता का
(D) छुआछूत का
उत्तर:
(B) बेरोजगारी का

48. आधुनिक युग में विडम्बना की बात क्या है?
(A) साम्यवाद
(B) जातिवाद
(C) अद्वैतवाद
(D) प्रयोगवाद
उत्तर:
(B) जातिवाद

49. लेखक के अनुसार किस पहलू से जाति-प्रथा हानिकारक प्रथा है?
(A) राजनैतिक
(B) धार्मिक
(C) सामाजिक
(D) आर्थिक
उत्तर:
(D) आर्थिक

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

50. जाति-प्रथा मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा-रुचि व आत्म-शक्ति को दबाकर उसे क्या बना देती है?
(A) निष्क्रिय
(B) सक्रिय
(C) कर्मशील
(D) गतिशील
उत्तर:
(A) निष्क्रिय

51. आधुनिक सभ्य समाज कार्य-कुशलता के लिए किसे आवश्यक मानता है?
(A) जाति-प्रथा
(B) शिक्षा
(C) श्रम-विभाजन
(D) प्रोत्साहन
उत्तर:
(C) श्रम-विभाजन

52. फ्रांसीसी क्रांति के नारे में कौन-सा शब्द विवाद का विषय रहा है?
(A) राजतंत्र
(B) समता
(C) स्वतंत्रता
(D) श्रम-विभाजन
उत्तर:
(B) समता

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

[1] यह विडंबना की ही बात है, कि इस युग में भी ‘जातिवाद’ के पोषकों की कमी नहीं है। इसके पोषक कई आधारों पर इसका समर्थन करते हैं। समर्थन का एक आधार यह कहा जाता है, कि आधुनिक सभ्य समाज ‘कार्य-कुशलता’ के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है और चूँकि जाति-प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है। इस तर्क के संबंध में पहली बात तो यही आपत्तिजनक है, कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है। श्रम विभाजन, निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है, परंत किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती। भारत की जाति-प्रथा की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता [पृष्ठ-153]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से उद्धृत है। इसके लेखक,भारतीय संविधान के निर्माता ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता तथा बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। इस गद्यांश में लेखक यह कहना चाहता है कि जाति-प्रथा को श्रम विभाजन से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि हमारे लिए बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आधुनिक युग में लोग जातिवाद का समर्थन करते हैं। जातिवाद का समर्थन करने वाले इसके लिए अनेक आधारों को खोजने की कोशिश करते हैं। उनके द्वारा जातिवाद का समर्थन करने का एक आधार यह बताया जाता है कि आज हमारा समाज सभ्य हो चुका है और कार्य-कुशलता के लिए श्रम का विभाजन नितांत आवश्यक है। जहाँ तक जाति-प्रथा का प्रश्न है यह श्रम विभाजन का ही एक अन्य रूप है। अतः जाति-प्रथा में कोई बुराई नज़र नहीं आती। भाव यह है कि जाति-प्रथा का समर्थन करने वाले लोग जाति-प्रथा को श्रम विभाजन से जोड़ने का प्रयास करते हैं। परंतु लेखक ने उनके इस मत के बारे में अनेक विपत्तियाँ उठाई हैं।

उनका कहना है कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का रूप ले चुकी है। जहाँ तक श्रम विभाजन का प्रश्न है यह सभ्य समाज के लिए नितांत आवश्यक है परंतु संसार के किसी भी सभ्य समाज में श्रम के विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों के भिन्न-भिन्न वर्गों में बनावटी विभाजन नहीं करती। हमारे लिए दुःख की बात है कि जाति-प्रथा को हम श्रम विभाजन का आधार मान चुके हैं। यह समाज के लिए घातक है। भारत में प्रचलित जाति-प्रथा की एक अन्य विशेषता यह है कि यह न केवल श्रमिकों का अस्वाभाविक रूप से विभाजन करती है, बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे के मुकाबले में ऊँचा और नीचा घोषित कर देती है। परंतु ऊँच-नीच की यह प्रथा संसार के किसी भी समाज में प्रचलित नहीं है। केवल हमारे देश में ही श्रमिकों को विभिन्न वर्गों में बाँटकर ऊँच-नीच की खाई पैदा कर दी जाती है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि हमारे देश में जाति-प्रथा को ही श्रम विभाजन का आधार माना गया है जो कि सर्वथा अनुचित है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. गंभीर विवेचनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक ने किस बात को विडंबना कहा है?
(ग) किस कारण से लोग जातिवाद का समर्थन करते हैं?
(घ) श्रम विभाजन का क्या अर्थ है?
(ङ) क्या जाति-प्रथा एक बुराई है?
(च) भारत में ऐसी कौन-सी व्यवस्था है जो दूसरे देशों से अलग है?
उत्तर:
(क) पाठ का नाम–‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’, लेखक का नाम-बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ।

(ख) लेखक ने इस बात को विडंबना कहा है कि आज के वैज्ञानिक युग में हमारे देश में जातिवाद का समर्थन करने वालों की कमी नहीं है। वे लोग कार्य-कुशलता के लिए जाति-प्रथा को आवश्यक मानते हैं।

(ग) लोगों का विचार है कि कार्य-कुशलता के लिए जातिवाद आवश्यक है। उनका कहना है कि जातियाँ कर्म के आधार पर बनाई गई हैं और ये कर्म का विभाजन करती हैं। अतः श्रम विभाजन के लिए जाति-प्रथा आवश्यक है।

(घ) श्रम विभाजन का अर्थ है-मानव के लिए उपयोगी कामों का वर्गीकरण करना अर्थात प्रत्येक काम को कशलता से करने के लिए काम-धंधों का विभाजन करना । जैसे कोई खेती करता है, मजदूरी करता है, कोई फैक्ट्री चलाता है, कोई चिकित्सा करता है।

(ङ) निश्चय ही जाति-प्रथा एक बुराई है क्योंकि यह श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिकों का भी विभाजन करती है। जाति-प्रथा मानव को जन्म से ही किसी व्यवसाय से जोड़ देती है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि मानव अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार काम नहीं कर पाता। यह इसलिए भी बुराई है क्योंकि इससे समाज में ऊँच-नीच का भेद-भाव उत्पन्न हो जाता है।

(च) जन्म के आधार पर काम-धंधा तय करना, केवल भारत में ही प्रचलित है। यह व्यवस्था ऊँच-नीच को जन्म देती है। भारत के अतिरिक्त यह पूरे संसार में कहीं भी प्रचलित नहीं है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

[2] जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व एकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है? हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है। [पृष्ठ-153-154]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता तथा बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। यहाँ लेखक स्पष्ट करता है कि जाति-प्रथा मानव को जीवन भर के लिए एक ही पेशे से बाँध देती है।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि जाति-प्रथा मनुष्य के पेशे का दोषपूर्ण निर्धारण पहले से ही निश्चित कर देती है और वह आजीवन उस पेशे से बँध जाता है। भले ही वह पेशा उसके लिए उचित न हो, पर्याप्त न हो। यह भी संभव है कि वह व्यक्ति उस पेशे के कारण भूखा मर जाए। आज के युग में यह स्थिति अकसर देखी जाती है। कारण यह है कि देश में उद्योग-धंधों और तकनीक का या तो लगातार विकास होता रहता है अथवा कभी उसमें अचानक बदलाव आ जाता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य को मजबूर होकर अपना पेशा बदलना पड़ता है। इसके विपरीत हालातों में भी मनुष्य को अपना व्यवसाय बदलने की आज़ादी न हो तो उसके पास भूखा मरने की बजाय कोई अन्य रास्ता नहीं रह जाता। हिंदू धर्म में जाति-प्रथा का बोल-बाला है। किसी भी आदमी को ऐसा पेशा चुनने की आजादी नहीं दी जाती जो उसे पिता से प्राप्त न हुआ हो। भले ही वह उस पेशे में कितना भी प्रवीण क्यों न हो फिर भी वह उस पेशे को नहीं अपना सकता। जब जाति-प्रथा व्यक्ति को पेशा बदलने की आज्ञा नहीं देती तो भारत में बेरोजगारी तो बढ़ेगी ही। अतः जाति-प्रथा भारत में बढ़ती बेरोज़गारी का एक प्रमुख कारण है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने जाति-प्रथा की आलोचना इसलिए की है क्योंकि वह व्यक्ति को एक पेशे से बाँध देती है।
  2. जाति-प्रथा बेरोज़गारी फैलाने का एक प्रमुख कारण है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) जाति-प्रथा में लेखक को क्या दोष दिखाई देता है?
(ख) मानव को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता कब और क्यों पड़ती है?
(ग) पेशा बदलने की आज़ादी न मिलने के क्या परिणाम होते हैं?
(घ) कौन-सा धर्म मनुष्य को पैतृक पेशे के अतिरिक्त अन्य किसी पेशे को चुनने की आज़ादी नहीं देता?
(ङ) जाति-प्रथा बेरोजगारी का प्रमुख कारण कैसे है?
उत्तर:
(क) जाति-प्रथा में लेखक को अनेक दोष दिखाई देते हैं। पहली बात यह है कि जाति-प्रथा जन्म से मनुष्य के पेशे को निर्धारित कर देती है और वह जीवन-भर उस पेशे से बँध जाता है। यदि पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त हो तो मनुष्य भूखा भी मर सकता है।

(ख) जब उद्योग-धंधों की प्रक्रिया या तकनीक में अचानक परिवर्तन आ जाए या उसका विकास अवरुद्ध हो जाए तो मनुष्य को अपना पेशा बदलना पड़ सकता है।

(ग) यदि मनुष्य को पेशा बदलने की आज़ादी न हो और उसके पेशे की माँग में कमी आ जाए तो उसे भूखा मरना पड़ सकता है।

(घ) हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी मनुष्य को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती जो उसका पैतृक पेशा न हो। यह व्यवस्था सर्वथा अनुचित है।

(ङ) भारत में जाति-प्रथा मनुष्य को पेशा परिवर्तन की अनुमति नहीं देती। अतः यह जाति-प्रथा बेरोज़गारी को बढ़ावा देती है और यह बेरोज़गारी का प्रमुख कारण भी है।

[3] श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जाति-प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। जाति-प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं रहता। मनुष्य की व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत रुचि का इसमें कोई स्थान अथवा महत्त्व नहीं रहता। ‘पूर्व लेख’ ही इसका आधार है। इस आधार पर हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी यह कि बहुत से लोग ‘निर्धारित’ कार्य को ‘अरुचि’ के साथ केवल विवशतावश करते हैं। ऐसी स्थिति स्वभावतः मनुष्य को दुर्भावना से ग्रस्त रहकर टालू काम करने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में जहाँ काम करने वालों का न दिल लगता हो न दिमाग, कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है। [पृष्ठ-154]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से अवतरित है। इसके लेखक भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता तथा बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। यहाँ लेखक स्पष्ट करता है कि श्रम विभाजन की दृष्टि से जाति-प्रथा में अनेक दोष देखे जा सकते हैं क्योंकि जाति-प्रथा के द्वारा बनाया गया श्रम विभाजन मनुष्य की इच्छा व रुचि को नहीं देखता।

व्याख्या-लेखक पुनः कहता है कि जहाँ तक श्रम विभाजन का प्रश्न है, इसकी दृष्टि से भी जाति-प्रथा में अनेक गंभीर दोष देखे जा सकते हैं। जाति-प्रथा जो श्रम का विभाजन करती है, उसमें मनुष्य की इच्छा को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। मनुष्य के अपने निजी विचार क्या हैं; उसकी अपनी रुचि किस काम में है? इसके बारे में जाति-प्रथा में किया गया श्रम विभाजन कुछ नहीं करता। भाव यह है कि मनुष्य की व्यक्तिगत भावनाओं और रुचियों को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता, बल्कि जाति-प्रथा पूर्व जन्म य में लिखे हए को अधिक महत्त्व देती है। लेखक पनः कहता है कि आज हमारे देश में उद्योगों में गरीबी और शोषण इतनी गंभीर समस्या नहीं है जितनी कि अनेक लोगों को मजबूर होकर ऐसे काम करने पड़ते हैं जिनमें उनकी रुचि नहीं है और ये काम समाज द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।

इन हालातों में मनुष्य में बुरी भावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। वह या तो टाल-मटोल करता है या बहुत कम काम,करता है। इन हालातों में काम करने वालों का न तो उस काम में दिल लगता है और न ही वे दिमाग लगाकर काम करते हैं। अतः वे अपने काम में प्रवीणता प्राप्त नहीं कर सकते। इसमें दो मत नहीं हो सकते कि जाति-प्रथा आर्थिक दृष्टि से समाज के लिए घातक है। कारण यह है कि जाति-प्रथा मनुष्य की स्वाभाविक बढ़ावा देने वाली रुचि और अंदर की शक्ति को दबा देती है और मानव अस्वाभाविक नियमों में बँध जाता है और वह बेकार हो जाता है। अतः जाति-प्रथा समाज के लिए सबसे बड़ी हानिकारक प्रथा है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने श्रम विभाजन की दृष्टि से जाति-प्रथा को दोषयुक्त घोषित किया है। क्योंकि जाति-प्रथा मनुष्य की व्यक्तिगत भावना और व्यक्तिगत रुचि को कोई महत्त्व नहीं देती।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लेखक ने श्रम विभाजन की दृष्टि से जाति-प्रथा को दोषपूर्ण क्यों माना है?
(ख) पूर्व लेख के आधार पर श्रम विभाजन का तात्पर्य क्या है?
(ग) लेखक के अनुसार श्रम के क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या कौन-सी है?
(घ) कार्य निर्धारित होने के दुष्परिणाम क्या हैं?
(ङ) कार्य-कुशलता कैसे बढ़ायी जा सकती है?
(च) क्या आर्थिक दृष्टि से जाति-प्रथा हानिकारक है?
उत्तर:
(क) श्रम विभाजन की दृष्टि से जाति-प्रथा निश्चय से दोषपूर्ण है। पहली बात तो यह है कि मनुष्य की इच्छा और रुचि को न देखकर पूर्व लेख के आधार पर उसके पेशे को निर्धारित करती है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि मनुष्य इस काम में कोई रुचि नहीं लेता और काम को अनावश्यक बोझ समझता है।

(ख) पूर्व लेख के आधार पर श्रम विभाजन का अभिप्राय है कि जन्म के आधार पर मनुष्य के पेशे का निर्णय करना अर्थात् यह सोचना कि मनुष्य को पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर ही प्रतिफल मिलना चाहिए।

(ग) श्रम के क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोगों को अपनी इच्छा व रुचि के अनुसार काम नहीं दिया जाता। उन्हें मजबूर होकर वह काम करना पड़ता है जो वे नहीं करना चाहते। इससे काम की उत्पादक शक्ति घट जाती है।

(घ) कार्य निर्धारित होने का सबसे बुरा परिणाम यह होता है कि श्रमिक काम में रुचि नहीं लेता। वह काम को बोझ समझता है इसलिए काम के प्रति उसके मन में दुर्भावना उत्पन्न हो जाती है। वह टाल-मटोल की नीति को अपनाता है तथा दिल-दिमाग से उस काम को नहीं करता।

(ङ) कार्य-कुशलता को बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि प्रत्येक मनुष्य को उसकी रुचि के अनुसार काम दिया जाए बल्कि उसे अपनी इच्छा से व्यवसाय ढूँढने का मौका दिया जाए।

(च) आर्थिक दृष्टि से जाति-प्रथा अत्यधिक हानिकारक है। इस प्रथा के फलस्वरूप लोगों को पैतृक काम-धंधा करना पड़ता है जिसमें उनकी रुचि नहीं होती। वे दिल और दिमाग से उस काम को नहीं करते, जिससे न तो कार्य में कुशलता आ सकती है और न ही उत्पादकता बढ़ सकती है।

[4] मेरा आदर्श-समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित होगा। क्या यह ठीक नहीं है, भ्रातृता अर्थात भाईचारे में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? किसी भी आदर्श-समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविधि हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। तात्पर्य यह है कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इनमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो। [पृष्ठ-154-155]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से उद्धृत है। इसके लेखक भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। इस लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता तथा बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। इस गद्यांश में लेखक ने आदर्श समाज की चर्चा की है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि मेरा आदर्श समाज ऐसा होगा जिसमें स्वतंत्रता, समानता और आपसी भाई-चारा होगा। लेखक का विचार है कि भाई-चारे में किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह कुछ सीमा तक उचित भी है। आदर्श समाज में इतनी अधिक गतिशीलता होनी चाहिए ताकि उसमें आवश्यक परिवर्तन समाज के एक किनारे से दूसरे किनारे तक व्याप्त हो सके अर्थात् गतिशीलता से ही समाज में परिवर्तन आता है। इस प्रकार के आदर्श समाज के अनेक प्रकार के लाभों में सबको योगदान देना चाहिए। सभी को उन लाभों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में बिना किसी बाधा के आपसी संबंध होने चाहिएँ।

इसके लिए सभी को साधन और अवसर प्राप्त होने चाहिएँ। भाव यह है कि भाईचारा दूध और पानी की तरह होना चाहिए। सच्चा भाईचारा ऐसा ही होता है। इसे हम लोकतंत्र भी कहते हैं। लेखक का कहना है कि लोकतंत्र शासन की एक व्यवस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र सामाजिक जीवन जीने की एक पद्धति है और समाज के सभी अनुभवों के आदान-प्रदान का तरीका है। परंतु इसमें यह भी जरूरी है कि इसमें लोगों की अपने मित्रों के प्रति श्रद्धा और आदर की भावना भी उत्पन्न हो। नहीं तो भाईचारा सफल नहीं हो पाएगा और न ही लोकतंत्र।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने आदर्श समाज की व्याख्या करते हुए भाईचारे की भावना को विकसित करने पर बल दिया है।
  2. लेखक ने लोकतंत्र पर समुचित प्रकाश डाला है।
  3. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग किया गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लेखक ने किस समाज को आदर्श समाज माना है?
(ख) लेखक ने समाज में किस प्रकार के भाईचारे का समर्थन किया है?
(ग) लेखक ने लोकतंत्र की क्या परिभाषा बताई है?
(घ) समाज में किस प्रकार की गतिशीलता की बात की गई है?
(ङ) गतिशीलता, अबाध संपर्क तथा दूध-पानी के मिश्रण में कौन-सी समानता है?
उत्तर:
(क) लेखक ने उस समाज को आदर्श माना है जिसमें स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा हो। उसमें इस प्रकार की गतिशीलता होनी चाहिए कि सभी आवश्यक परिवर्तन संपूर्ण समाज में व्याप्त हो जाएँ।

(ख) लेखक समाज में इस प्रकार का भाईचारा चाहता है जिसमें लोगों के बीच बिना बाधा के संपर्क हो। उस भाईचारे में न तो कोई बंधन हो, न जड़ता और न ही रूढ़िवादिता, बल्कि गतिशीलता होनी चाहिए। जैसे दूध और पानी मिलकर एक हो जाते हैं वैसे लोगों को मिलकर एक हो जाना चाहिए।

(ग) लेखक भाईचारे का दूसरा नाम लोकतंत्र को मानता है। उसका विचार है कि लोकतंत्र केवल शासन पद्धति नहीं है, बल्कि सामूहिक जीवन जीने का ढंग है। सच्चा लोकतंत्र वही है जिसमें लोग परस्पर अनुभवों का आदान-प्रदान करते हैं और दूसरे का उचित सम्मान करते हैं।

(घ) लेखक ने समाज में गतिशीलता का मत यह लिया है कि लोगों में परस्पर निर्बाध संपर्क हो, सहभागिता हो और सबकी रक्षा करने की जागरूकता हो। लोग दूध-पानी के समान मिले हुए हों और एक-दूसरे के प्रति श्रद्धा तथा सम्मान का भाव रखते हों।

(ङ) गतिशीलता, अबाध संपर्क तथा दूध-पानी के मिश्रण में सबसे बड़ी समानता यह है कि लोगों में उदारतापूर्वक मेल-मिलाप हो। जिस प्रकार दूध और पानी मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार लोग जाति-पाँति के बंधनों को त्यागकर गतिशील रहते हुए परस्पर संपर्क करें और एक-दूसरे का सम्मान करें।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

[5] जाति-प्रथा के पोषक, जीवन, शारीरिक-सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को तो स्वीकार कर लेंगे, परंतु मनुष्य के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए जल्दी तैयार नहीं होंगे, क्योंकि इस प्रकार की स्वतंत्रता का अर्थ होगा अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता किसी को नहीं है, तो उसका अर्थ उसे ‘दासता’ में जकड़कर रखना होगा, क्योंकि ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। ‘दासता’ में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी पाई जा सकती है। उदाहरणार्थ, जाति-प्रथा की तरह ऐसे वर्ग होना संभव है, जहाँ कुछ लोगों की अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं। [पृष्ठ-155]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से अवतरित है। इसके लेखक भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता, बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। यहाँ लेखक कहता है कि जाति-प्रथा के पोषक जीवन, शारीरिक सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार को तो स्वीकार कर लेंगे, परंतु मानव की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करेंगे।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि जो लोग जाति-प्रथा का समर्थन करते हैं, वे जीवन की शारीरिक-सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को तो प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लेंगे। इस प्रवृत्ति के प्रति उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन मानव के समर्थ तथा प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए वे आसानी से तैयार नहीं होंगे अर्थात् जाति-प्रथा के पोषक यह कदापि नहीं मानेंगे कि प्रत्येक व्यक्ति को मानव समझकर उसे स्वतंत्रता का प्रभावशाली प्रयोग करने दिया जाए। कारण यह है कि इस प्रकार की स्वतंत्रता का मतलब यह है कि अपना व्यवसाय चुनने की आजादी किसी को नहीं है, बल्कि इसका मतलब है समाज के छोटे वर्ग को गुलामी में जकड़कर रखना।

लेखक का कथन है कि केवल कानूनी पराधीनता को दासता नहीं कहा जा सकता । दासता में वो स्थिति भी शामिल है जिसमें कुछ लोगों को अन्य लोगों के द्वारा निश्चित किए गए व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। भाव यह है कि समाज का उच्च वर्ग निम्न वर्ग के लिए व्यवहार को निर्धारित करने और कुछ कार्यों का पालन करने के लिए मजबूर करे तो यह भी दासता ही कही जाएगी। समाज में इस प्रकार की स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी समाज में उपलब्ध हो सकती है।।

उदाहरण के रूप में जाति-प्रथा के समाज में लोगों का ऐसा वर्ग भी हो सकता है जिन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे को अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने दासता अर्थात गुलामी की विभिन्न स्थितियों का गंभीर विवेचन किया है और जाति-प्रथा का खंडन – किया है।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) जाति-प्रथा का पोषण करने वाले क्या स्वीकार करते हैं और क्या अस्वीकार करते हैं?
(ख) दासता का क्या अर्थ है?
(ग) कानूनी पराधीनता न होने पर भी लोगों को इच्छा के विरुद्ध पेशे क्यों अपनाने पड़ते हैं?
(घ) जाति-प्रथा का पोषण करने वाले लोग किस स्वतंत्रता का विरोध करते हैं और क्यों?
उत्तर:
(क) जाति-प्रथा का पोषण करने वाले लोग शारीरिक सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को तो स्वीकार कर लेते हैं, परंतु मनुष्य के सक्षम और प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करते।

(ख) कुछ लोगों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए मजबूर करना ही दासता कहलाता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि जाति-प्रथा के आधार पर जो कर्त्तव्य लोगों के निर्धारित किए जाते हैं वे दासता के ही लक्षण हैं।

(ग) जाति-प्रथा के कारण समाज में कुछ ऐसे वर्ग भी हैं जिन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं, परंतु यह कानूनी पराधीनता न होकर भी सामाजिक पराधीनता तो अवश्य है। उदाहरण के रूप में सफाई कर्मचारियों को सफाई का काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें कोई और काम नहीं दिया जाता।

(घ) जाति-प्रथा का पोषण करने वाले लोग मानव को पेशा (व्यवसाय) चुनने की स्वतंत्रता देने के विरुद्ध हैं। विशेषकर उच्च जाति के लोग इसका निरंतर विरोध करते रहते हैं। वे स्वयं तो ऊँचे कार्य करना चाहते हैं और समाज में श्रेष्ठ कहलाना चाहते हैं, परंतु छोटी जातियों को ऊपर उठने का अवसर प्रदान नहीं करते।

[6] ‘समता’ का औचित्य यहीं पर समाप्त नहीं होता। इसका और भी आधार उपलब्ध है। एक राजनीतिज्ञ पुरुष का बहुत बड़ी जनसंख्या से पाला पड़ता है। अपनी जनता से व्यवहार करते समय, राजनीतिज्ञ के पास न तो इतना समय होता है न प्रत्येक के विषय में इतनी जानकारी ही होती है, जिससे वह सबकी अलग-अलग आवश्यकताओं तथा क्षमताओं के आधार पर वांछित व्यवहार अलग-अलग कर सके। वैसे भी आवश्यकताओं और क्षमताओं के आधार भिन्न व्यवहार कितना भी आवश्यक तथा औचित्यपूर्ण क्यों न हो, ‘मानवता’ के दृष्टिकोण से समाज दो वर्गों व श्रेणियों में नहीं बाँटा जा सकता। ऐसी स्थिति में, राजनीतिज्ञ को अपने व्यवहार में एक व्यवहार्य सिद्धांत की आवश्यकता रहती है और यह व्यवहार्य सिद्धांत यही होता है, कि सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए। राजनीतिज्ञ यह व्यवहार इसलिए नहीं करता कि सब लोग समान होते, बल्कि इसलिए कि वर्गीकरण एवं श्रेणीकरण संभव होता। [पृष्ठ-156]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से उद्धृत है। इसके लेखक भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता, बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। यहाँ लेखक ने समता के औचित्य पर समुचित प्रकाश डाला है।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि समता का औचित्य बहुत व्यापक है। यह यहीं पर समाप्त नहीं हो जाता। इसके अन्य आधार भी देखे जा सकते हैं। एक राजनेता को असंख्य लोगों से मिलना पड़ता है। अपने हलके के लोगों से मिलते समय, व्यवहार करते समय.उसके पास इतना अधिक समय नहीं होता कि वह प्रत्येक व्यक्ति के विषय की जानकारी प्राप्त करे। न ही वह सबकी अलग-अलग आवश्यकताओं और क्षमताओं को जान सकता है और न ही सबके साथ अलग-अलग आवश्यक व्यवहार कर सकता है। यदि गहराई से देखा जाए तो लोगों की आवश्यकताओं और क्षमताओं को आधार बनाकर भिन्न-भिन्न व्यवहार करना उचित नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा करने से हम मानवता की दृष्टि से समाज को दो वर्गों तथा श्रेणियों में विभक्त कर देंगे जोकि किसी भी प्रकार से सही नहीं कहा जा सकता।

ऐसी स्थिति में राजनेता को अपने व्यवहार में एक ऐसे सिद्धांत को अपनाना होता है जो सबके लिए उपयोगी और व्यवहार्य हो और वह सिद्धांत यही है कि एक क्षेत्र के सभी लोगों के साथ एक-सा व्यवहार किया जाए। राजनेता यह व्यवहार इसलिए नहीं करता कि सभी लोग समान होते हैं, बल्कि इसलिए करता है कि उसके लिए लोगों का वर्गीकरण तथा श्रेणीकरण संभव होता है। लेखक के कहने का भाव यह है कि राजनेता को अपने सभी मतदाताओं के साथ एक-सा व्यवहार करना चाहिए, उसे किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने समता के औचित्य पर विशेष बल दिया है।
  2. लेखक ने सिद्धांत और व्यवहार को व्यवहार्य कहा है।
  3. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) समता के कौन-से औचित्य पर बल दिया गया है?
(ख) राजनीतिज्ञ को सबके साथ समान व्यवहार क्यों करना पड़ता है?
(ग) लेखक ने किस सिद्धांत और व्यवहार को व्यवहार्य कहा है?
(घ) राजनीतिज्ञ सब मनुष्यों के साथ एक समान व्यवहार क्यों नहीं कर पाता?
उत्तर:
(क) समता के औचित्य पर बल देने से लेखक का अभिप्राय यह है कि असंख्य लोगों की अलग-अलग आवश्यकताओं को जानकर उनके साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। अतः मनुष्य को सबके साथ एक-समान व्यवहार करना चाहिए।

(ख) राजनीतिज्ञ को सबके साथ इसलिए समान व्यवहार करना पड़ता है क्योंकि उसका संपर्क असंख्य लोगों के साथ होता है। उसके लिए सबकी क्षमताओं और आवश्यकताओं को जान पाना संभव नहीं है। इसलिए उसे मजबूर होकर सबके साथ एक-जैसा व्यवहार करना पड़ता है।

(ग) सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार को ही लेखक ने व्यवहार्य कहा है क्योंकि इस सिद्धांत के द्वारा वह सबके साथ एक जैसा व्यवहार कर सकता है।

(घ) राजनीतिज्ञ सबके साथ एक-समान व्यवहार इसलिए नहीं कर पाता क्योंकि सभी लोग समान नहीं होते, बल्कि उनमें वर्गीकरण और श्रेणीकरण की संभावना बनी रहती है।

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Summary in Hindi

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज लेखिका-परिचय

प्रश्न-
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-डॉ० भीमराव का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्यप्रदेश के महू ज़िले में हुआ। आरंभिक शिक्षा उन्होंने भारत में प्राप्त की। क्योंकि उनका जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार में हुआ था, इसलिए उन्हें आजीवन हिंदू धर्म की वर्ण-व्यवस्था तथा भारतीय समाज की जाति व्यवस्था के विरुद्ध लंबा संघर्ष करना पड़ा। बड़ौदा नरेश के प्रोत्साहन पर वे पहले उच्चतर शिक्षा के लिए न्यूयार्क गए। बाद में लंदन चले गए। उन्होंने वैदिक साहित्य को अनुवाद के माध्यम से पढ़ा और सामाजिक क्षेत्र में मौलिक कार्य किया। परिणामस्वरूप वे एक इतिहास-मीमांसक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् तथा धर्म-दर्शन के व्याख्याता बनकर उभरे। कुछ समय तक उन्होंने अपने देश में वकालत की और अछूतों, स्त्रियों तथा मजदूरों को मानवीय अधिकार तथा सम्मान दिलाने के लिए लंबा संघर्ष किया। स्वयं दलित होने के कारण उन्हें सामाजिक समता पाने के लिए भी लंबा संघर्ष करना पड़ा। भारत लौटकर उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया। आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इक्नॉमिक्स से अनेक डिग्रियाँ भी प्राप्त की।

डॉ० आंबेडकर ने अपने चिंतन तथा रचनात्मकता के लिए बुद्ध एवं कबीर से प्रेरणा प्राप्त की। जातिवाद से संघर्ष करते हुए उनका हिंदू समाज से मोह-भंग हो गया। अतः 14 अक्तूबर, 1956 को अपने पाँच लाख अनुयायियों के साथ वे बौद्ध धर्म के मतानुयायी बन गए। वे भारतीय संविधान के निर्माता थे। यही कारण है कि उनको ‘भारत रत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 6 दिसंबर, 1956 को दिल्ली में इस महान समाजशास्त्री का देहांत हो गया।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

2. प्रमुख रचनाएँ-‘दें कास्ट्स इन इंडिया’, ‘देयर मेकेनिज्म’, ‘जेनेसिस एंड डेवलपमेंट’ (1917, प्रथम प्रकाशित कृति), ‘द अनटचेबल्स’, ‘हू आर दे?’ (1948), ‘हू आर द शूद्राज़’ (1946), ‘बुद्धा एंड हिज़ धम्मा’ (1957), ‘थाट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स’ (1955), ‘द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी’ (1923), ‘द एबोलुशन ऑफ़ प्रोविंशियल फायनांस इन ब्रिटिश इंडिया’ (पीएच.डी. की थीसिस, 1916), ‘द राइज़ एंड फॉल ऑफ़ द हिंदू वीमैन’ (1965), ‘एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ (1936), ‘लेबर एंड पार्लियामेंट्री डैमोक्रेसी’ (1943), ‘बुद्धिज्म एंड कम्युनिज्म’ (1956), (पुस्तकें व भाषण) ‘मूक नायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘जनता’ (पत्रिका-संपादन), हिंदी में उनका संपूर्ण वाङ्मय भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय से बाबा साहब आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय नाम से 21 खंडों में प्रकाशित हो चुका है।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-डॉ० भीमराव आंबेडकर लोकतंत्रीय शासन-व्यवस्था के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपने साहित्य के द्वारा भारतीय समाज में व्याप्त जाति-प्रथा तथा छुआछूत का उन्मूलन करने का भरसक प्रयास किया। यही नहीं, उन्होंने जाति-प्रथा का विरोध करते हुए समाज में व्याप्त शोषण का भी विरोध किया। अछूतों के प्रति उनके मन में अत्यधिक सहानुभूति की भावना थी। वे आजीवन समाज के निचले तबके के लोगों के हक के लिए संघर्ष करते रहे।

महात्मा बुद्ध, संत कबीर और ज्योतिबा फुले ने उनकी विचारधारा को अत्यधिक प्रभावित किया। वस्तुतः वे इस प्रकार के लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते थे जिसमें न तो जाति-पाँति का भेदभाव हो और न ही कोई छोटा-बड़ा हो, बल्कि सभी समान हों। यही कारण है कि उन्होंने अपनी रचनाओं में समकालीन समाज की विसंगतियों, विडंबनाओं, छुआछूत, जाति-प्रथा का यथार्थ वर्णन किया। प्रस्तुत निबंध ‘श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा’ उनकी निबंध-कला का श्रेष्ठ उदाहरण है जिसमें उन्होंने जाति-प्रथा जैसे विषय को स्वतंत्रता, समता और भाईचारे से जोड़कर देखने का प्रयास किया है।

4. भाषा-शैली-डॉ० आंबेडकर ने अंग्रेज़ी तथा हिंदी दोनों भाषाओं में उच्चकोटि के साहित्य का निर्माण किया है। जहाँ तक हिंदी भाषा का प्रश्न है उसमें उन्होंने तत्सम एवं तद्भव शब्दों के अतिरिक्त उर्दू, फारसी तथा अंग्रेज़ी के शब्दों का भी सुंदर मिश्रण किया है। उनकी भाषा सहज, सरल तथा बोधगम्य है। जहाँ कहीं वे गंभीर विषय का वर्णन करते हैं, वहाँ उनकी भाषा भी गंभीर बन जाती है। शब्द-चयन एवं वाक्य-विन्यास पूर्णतया भावानुकूल तथा प्रसंगानुकूल है। उन्होंने प्रायः विचारात्मक, वर्णनात्मक, चित्रात्मक तथा व्यंग्यात्मक शैलियों का प्रयोग किया है। जहाँ कहीं वे सामाजिक विसंगतियों का खंडन करते हैं, वहाँ उनका व्यंग्य तीखा और चुभने वाला बन गया है।

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज पाठ का सार

प्रश्न-
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ नामक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ जातिवाद के आधार पर की जाने वाली असमानता का वर्णन है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अनेक तर्क देकर इस जातिवाद का विरोध करते हैं। आधुनिक युग में भी अनेक लोग जातिवाद का समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि कार्य-कुशलता के आधार पर श्रम-विभाजन जरूरी है। परंतु दुःख इस बात का है कि जातिवाद श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन भी करता है जो कि लेखक को स्वीकार्य नहीं है। किसी भी सभ्य समाज में श्रम-विभाजन तो होना चाहिए, परंतु भारत में जाति-प्रथा का प्रचलन श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करता है और वर्गभेद के कारण लोगों को ऊँच-नीच घोषित करता है। यदि हम जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का कारण मान लें तो भी यह मानव की रुचि पर आधारित नहीं है। एक विकसित और सक्षम समाज को व्यक्तियों को अपनी-अपनी रुचि के अनुसार व्यवसाय चुनने के योग्य बनाना चाहिए परंतु हमारे समाज में ऐसा नहीं हो रहा। लोग आज भी जाति-प्रथा में विश्वास रखते हैं और जाति के आधार पर मनुष्य को माता-पिता के सामाजिक स्तर पर पेशा अपनाने के लिए मजबूर करते हैं जो कि गलत है।

बसे बडा दोष यह है कि यह लोगों को एक पेशे से जोड देती है। इसके कारण यदि किसी उद्योग-धंधे में तकनीकी विकास के कारण परिवर्तन हो जाता है तो लोगों को भूखा मरना पड़ता है समाज में पेशा न बदलने के कारण बेरोज़गारी की समस्या उत्पन्न होती है। जाति-प्रथा के आधार पर जो श्रम-विभाजन किया जाता है, वह स्वेच्छा पर निर्भर नहीं होता। न ही इसमें व्यक्ति की रुचि को देखा जाता है, बल्कि माता-पिता के सामाजिक स्तर और पूर्व लेख को महत्त्व दिया जाता है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि लोगों को मजबूर होकर वे काम करने पड़ते हैं जिनमें उनकी रुचि नहीं होती। ऐसे लोगों में टालू मानसिकता उत्पन्न हो जाती है। जो काम उनकी रुचि के अनुसार नहीं होता उसमें उनका दिल-दिमाग नहीं लगता। इसलिए हम कह सकते हैं कि जाति-प्रथा मनुष्य की प्रेरणा, रुचि को दबाती है और उन्हें निष्क्रिय बनाती है।

बाबा साहेब एक आदर्श समाज की कल्पना करते हैं। वे ऐसा समाज विकसित करना चाहते हैं जिसमें स्वतंत्रता, समता तथा भ्रातृभाव हो। भ्रातभाव में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हमारा समाज गतिशील होना चाहिए ताकि वांछित परिवर्तन समाज में तत्काल व्याप्त हो जाएँ। इस प्रकार के समाज में सभी लोगों का सभी कार्यों में समभाग होना चाहिए। ऐसा होने पर सब सबके प्रति सजग होंगे और सबको सामाजिक साधन और अवसर प्राप्त होंगे। लेखक का कहना है कि भाईचारा दूध और पानी की तरह मिला होना चाहिए। इसी को वे लोकतंत्र का नाम देते हैं। उनका विचार है कि लोकतंत्र शासन की पद्धति नहीं है, बल्कि सामूहिक जीवनचर्या और अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम ही लोकतंत्र है। इसमें अपने साथी मनुष्यों के प्रति सम्मान तथा श्रद्धा की भावना होनी चाहिए।

यह आदान-प्रदान जीवन और शारीरिक सुरक्षा का विरोध नहीं करता। हम संपत्ति अर्जित कर सकते हैं, आजीविका के लिए औजार बना सकते हैं तथा घर के लिए जरूरी सामान रख सकते हैं। इस अधिकार पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। दुःख इस बात का है कि मानव को सुखी बनाने के लिए प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के अधिकार के लिए सभी लोग तैयार नहीं होते। क्योंकि इसी के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता मिल जाती है। यदि यह स्वतंत्रता नहीं मिलती तो मनुष्य अभावों के कारण दास बन जाता है। दासता का संबंध कानून से नहीं है। यदि मनुष्य को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार तथा कर्तव्यों का पालन करना पड़े तो वह भी दासता कही जाएगी। जाति-प्रथा का सबसे बड़ा दोष यह है कि मनुष्य को अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशा अपनाना पड़ता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

फ्रांसीसी क्रांति में ‘समता’ शब्द का नारा लगाया गया था। परंतु यह शब्द काफी विवादास्पद रहा है। जो लोग समता की आलोचना करते हैं कि सभी मनुष्य एक-समान नहीं होते भले ही यह एक सच्चाई है, परंतु यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। समता भले ही असंभव सिद्धांत है, लेकिन यह एक नियामक सिद्धांत भी है। मनुष्य की क्षमता शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार तथा मनुष्य के अपने प्रयत्नों पर निर्भर है। इन तीनों दृष्टियों से मनुष्य समान नहीं होते। यदि ऐसी स्थिति है तो भी समाज को ऐसे लोगों के साथ असमान व्यवहार नहीं करना चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता विकसित करने के लिए नए प्रयास करने चाहिएँ।

बाबा साहेब का यह भी कहना है कि वंश-परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर असमानता अनुचित है। यदि यह असमानता की जाएगी तो उसमें केवल सुविधाभोगी लोगों को ही लाभ पहुँचेगा। ‘प्रयत्न’ मानव के अपने वश में हैं। परंतु वंश-परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा उसके हाथ में नहीं है। इसलिए वंश-परम्परा और सामाजिक उत्तराधिकार के नाम पर असमान व्यवहार करना सरासर गलत है। अन्य शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि समाज के सभी सदस्यों को अपनी-अपनी योग्यतानुसार अवसर प्राप्त होने चाहिएँ और समान अवसरों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। जहाँ तक राजनेताओं का प्रश्न है, उनका वास्ता अनेक लोगों से पड़ता है, परंत उनके पास इतना समय नहीं होता कि वे सबके बारे में जानकारी प्राप्त करें तथा आवश्यकताओं और क्षमताओं को जानें। राजनेताओं के लिए यह व्यवहार्य सिद्धांत उपयोगी है कि वे मानवता का पालन करते हुए समाज को दो वर्गों और श्रेणियों में विभाजित न करें। उन्हें सबके साथ समान व्यवहार करना चाहिए, परंतु व्यवहार में ऐसा हो नहीं पाता। राजनीतिज्ञों को सबके साथ एक-सा व्यवहार इसलिए करना चाहिए क्योंकि वर्गीकरण तथा श्रेणीकरण करने में न केवल उनकी व्यक्तिगत हानि है, बल्कि समाज की भी हानि है। भले ही समता एक काल्पनिक वस्तु है फिर भी राजनीतिज्ञ को सभी परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए समता का पालन करना चाहिए। यह व्यावहारिक भी है और उसके व्यवहार की एकमात्र कसौटी भी है।

कठिन शब्दों के अर्थ

श्रम-विभाजन = मानवकृत कामों के लिए अलग-अलग श्रेणियाँ बनाना। विडंबना = दुर्भाग्य । पोषक = पुष्ट करने वाला। अस्वाभाविक = कृत्रिम (बनावटी)। श्रमिक = मज़दूर। समर्थन = सहमति। करार देना = घोषित करना। सक्षम = समर्थ । पेशा = धंधा। अनुपयुक्त = जो उचित नहीं है। प्रतिकूल = विपरीत। दूषित = दोषपूर्ण। प्रशिक्षण = शिक्षण देना। निर्विवाद = बिना किसी विवाद के। निजी = अपना। स्तर = श्रेणी (अवस्था)। निर्धारित करना = तय करना। निष्क्रिय = क्रियाहीन । प्रक्रिया = पद्धति। अकस्मात = अचानक। अनुमति = सहमति। पैतक = पिता से प्राप्त। प्रत्यक्ष = आँखों के समक्ष । स्वेच्छा = अपनी इच्छा से। पूर्वलेख = जन्म से पहले भाग में लिखा हुआ। उत्पीड़न = शोषण। दुर्भावना = बुरी भावना। प्रेरणा = रुचि (बढ़ावा देने वाली रुचि)। खेदजनक = दुखदायी। नीरस गाथा = उबाने वाली कथा या प्रसंग। भ्रातृता = भाईचारा। छोर = किनारा । गतिशीलता = आगे बढ़ने की प्रवृत्ति । बहुविध = अनेक प्रकार का। हित = स्वार्थ। सजग = सचेत। अबाध = बिना किसी बाधा के। पद्धति = तरीका। जीवनचर्या = जीवन जीने की पद्धति । गमनागमन = आना-जाना। स्वाधीनता = स्वतंत्रता। जीविकोपार्जन = जीवन के साधन जुटाना। समक्ष = सामने। पराधीनता = गुलामी। तथ्य = सच्चाई। नियामक सिद्धांत = दिशा देने वाला विचार। उत्तराधिकार = पूर्वजों से मिला अधिकार। ज्ञानार्जन = ज्ञान प्राप्त करना। निःसंदेह = बिना शक के। बाजी मार लेना = विजय प्राप्त करना। उत्तम = श्रेष्ठ । कुल = परिवार । ख्याति = प्रसिद्धि । पैतृक संपदा = पिता से प्राप्त संपत्ति। व्यावसायिक प्रतिष्ठा = व्यवसाय सम्बन्धी सम्मान। निष्पक्ष निर्णय = बिना पक्षपात के फैसला। तकाज़ा = आवश्यकता। व्यवहार्य = व्यावहारिक। वर्गीकरण = वर्गों में विभक्त करना। कसौटी = जाँच का आधार।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Read More »