Author name: Prasanna

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

Haryana State Board HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त Important Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न :

प्रश्न 1.
सिद्ध कीजिए कि वृत्त के किसी बिंदु पर स्पर्श रेखा स्पर्श बिंदु से जाने वाली त्रिज्या पर लंब होती है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 1
दिया है – एक वृत्त C (O, R) के बिंदु P पर AB एक स्पर्श रेखा है ।
सिद्ध करना है – OP ⊥ AB
रचना – स्पर्श रेखा AB पर P के अलावा अन्य कोई बिंदु Q लेकर इसे वृत्त के केंद्र O से मिलाओ ।
प्रमाण – हम जानते हैं कि किसी बिंदु 0 से किसी रेखा AB की न्यूनतम दूरी, रेखा AB पर लंब की लंबाई के बराबर होगी । अतः यह सिद्ध करने के लिए कि OP ⊥ AB है, हमें केवल यह सिद्ध करना ही पर्याप्त होगा कि OP, बिंदु O से रेखा AB पर स्थित अन्य किसी भी बिंदु को मिलाने वाले रेखाखंडों में से सबसे छोटा है ।
आकृति अनुसार,
OP = OR (वृत्त की त्रिज्या )
OQ = OR + RQ
⇒ OQ > OR
⇒ OQ > OP [∵ OR = OP]
⇒ OP < OQ
अतः वृत्त के केंद्र O से रेखा AB पर स्थित किसी भी अन्य बिंदु को मिलाने वाला रेखाखंड OP से बड़ा होगा ।
OP, बिंदु O से AB की न्यूनतम दूरी है ।
OP ⊥ AB (इति सिद्धम्)

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 2.
सिद्ध कीजिए कि किसी वृत्त पर, इसके किसी बाह्य बिंदु से खींची गई दोनों स्पर्श रेखाएँ समान लंबाई की होती हैं।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 2
दिया है- O केंद्र के वृत्त के बाह्य बिंदु P से PA और PB दो स्पर्श रेखाएँ खींची गई हैं।
सिद्ध करना है – PA = PB
रचना – OP, OA, OB को मिलाओ ।
प्रमाण – PA वृत्त की स्पर्श रेखा है और OA त्रिज्या है ।
∴ ∠OAP = 90°
इसी प्रकार, ∠OBP = 90°
अब, दो समकोण ΔPAO और ΔPBO में,
कर्ण OP = कर्ण OP (उभयनिष्ठ)
OA = OB (एक ही वृत्त की त्रिज्याएँ)
∴ ΔPAO ≅ ΔPBO (समकोण – कर्ण – भुजा सर्वांगसमता के नियम से)
इस प्रकार, PA = PB [इति सिद्धम्]

प्रश्न 3.
सिद्ध कीजिए कि किसी वृत्त की दो समांतर स्पर्श रेखाओं के स्पर्श बिंदुओं को मिलाने वाला रेखाखंड वृत्त का व्यास होता है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 3
दिया है-माना दो समांतर स्पर्श रेखाएँ AB और CD एक वृत्त जिसका
केंद्र O है को P और Q पर स्पर्श करती हैं ।
सिद्ध करना है – PQ वृत्त का व्यास है ।
रचना – केंद्र O से OE || AB खींचो |
प्रमाण – क्योंकि PA || OE (रचना से)
∴ ∠APO + ∠EOP = 180° (तिर्यक रेखा के एक ओर बने कोण) ……………..(i)
परंतु हम जानते हैं कि स्पर्श रेखा और वृत्त की त्रिज्या के बीच बना कोण समकोण होता है-
∴ ∠APO = 90°
समीकरण (i) से,
90° + ∠EOP = 180°
या ∠EOP = 180° – 90° = 90° ……………..(ii)
इसी प्रकार हम सिद्ध कर सकते हैं कि
∠EOQ = 90° ……………..(iii)
समीकरण (ii) व (iii) से,
∠EOP + ∠EOQ = 90° + 90° = 180°
अतः POQ एक सरल रेखा है ।
अर्थात् POQ वृत्त का व्यास है । [इति सिद्धम्]

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 4.
3 cm त्रिज्या वाले वृत्त के केंद्र से 5 cm दूर स्थित एक बिंदु से स्पर्श रेखा की लंबाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 4
वृत्त की त्रिज्या (AO) = 3cm
वृत्त के केंद्र से बिंदु की दूरी (OB) = 5cm
स्पर्श रेखा (AB) की लंबाई = ?
∠OAB = 90°
[∵ वृत्त के किसी बिंदु पर स्पर्श रेखा स्पर्श बिंदु से होकर जाने वाली त्रिज्या पर लंब होती है ।]
∴ ΔBAO एक समकोण त्रिभुज है । अतः पाइथागोरस प्रमेय से,
OB2 = OA2 + AB2
या (5)2 = (3)2 + (AB)2
या 25 – 9 = (AB)2
या AB = \(\sqrt{16}\)
या AB = 4 cm
∴ स्पर्श रेखा की लंबाई = 4 cm

प्रश्न 5.
सिद्ध कीजिए कि दो संकेंद्रीय वृत्तों में बड़े वृत्त की जीवा जो छोटे वृत्त को स्पर्श करती है, स्पर्श बिंदु पर समद्विभाजित होती है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 5
दिया है – केंद्र O वाले दो संकेंद्रीय वृत्त C1 और C2 हैं। इनमें बड़े वृत्त C1 की जीवा AB छोटे वृत्त C2 को बिंदु P पर स्पर्श करती है ।
सिद्ध करना है – AP = BP
रचना – OP को मिलाएँ ।
प्रमाण – वृत्त C2 के स्पर्श बिंदु P पर AB एक स्पर्श रेखा है और OP एक त्रिज्या है।
∴ OP ⊥ AB
अब AB वृत्त C1 की एक जीवा है और OP ⊥ AB है। अतः OP जीवा AB को समद्विभाजित करेगी क्योंकि केंद्र से जीवा पर खींचा गया लंब उसे समद्विभाजित करता है ।
⇒ AP ⊥ BP (इति सिद्धम्)

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 6.
दो संकेंद्रीय वृत्तों में सिद्ध कीजिए कि बाह्य वृत्त की वे सभी जीवाएँ, जो आंतरिक वृत्त को स्पर्श करती हैं, समान लंबाई की होती हैं ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 6
दिया है- दो संकेंद्रीय वृत्त जिनका केंद्र 0 है तथा बाह्य वृत्त की त्रिज्या a और आंतरिक वृत्त की त्रिज्या b है | AB बाह्य वृत्त की एक जीवा है ।
सिद्ध करना है – बाह्य वृत्त की सभी जीवाएँ जो आंतरिक वृत्त को स्पर्श करती हैं, समान लंबाई की होती हैं ।
रचना – OM ⊥ AB तथा बाह्य वृत्त की त्रिज्या OA खींचो ।
प्रमाण – समकोण ΔOAM में,
AM = \(\sqrt{O A^2-O M^2}\) = \(\sqrt{a^2-b^2}\) (पाइथागोरस प्रमेय द्वारा)
अतः AB = 2 AM = 2\(\sqrt{a^2-b^2}\)
जोकि स्थिर है क्योंकि वृत्त की त्रिज्याएँ दी हुई हैं और बदल नहीं सकती ।
अतः इस प्रकार बाह्य वृत्त की सभी जीवाओं की लंबाइयाँ जो अंतःवृत्त को स्पर्श करती हैं, बराबर होती हैं।

प्रश्न 7.
केंद्र O वाले वृत्त पर बाह्य बिंदु T से दो स्पर्श रेखाएँ TP तथा TQ खींची गई हैं । सिद्ध कीजिए कि ∠PTQ = 2 ∠OPQ है |
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 7
दिया है – केंद्र O वाला एक वृत्त, एक बाह्य बिंदु T तथा वृत्त पर दो स्पर्श रेखाएँ TP और TQ, जहाँ P, Q स्पर्श बिंदु हैं ।
सिद्ध करना है – ∠PTQ = 2∠OPQ.
प्रमाण – माना ∠PTQ = θ
हम जानते हैं कि वृत्त के किसी बाह्य बिंदु से खींची गई स्पर्श रेखाएँ समान होती हैं।
∴ TP = TQ
अतः TPQ एक समद्विबाहु त्रिभुज है ।
∴ ∠TPQ = ∠TQP = \(\frac {1}{2}\) (180° – θ)
= 90°- \(\frac {θ}{2}\)
परंतु त्रिज्या और स्पर्श रेखा के बीच बना कोण 90° होता है ।
∴ ∠OPT = 90°
इसी प्रकार,
∠OPQ = ∠OPT – ∠TPQ
= 90° – (90° – \(\frac {θ}{2}\))
= \(\frac {θ}{2}\) = \(\frac {1}{2}\)∠PTQ
⇒ ∠PTQ = 2∠OPQ [इति सिद्धम्]

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 8.
एक रेखा l दो संकेंद्रीय वृत्तों को जिनका केंद्र O है, A, B, C और D पर प्रतिच्छेदित करती है (देखिए संलग्न आकृति) । सिद्ध कीजिए कि AB = CD है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 8
दिया है – O केंद्र वाले दो संकेंद्रीय वृत्तों को रेखा l बिंदु A, B, C तथा D पर प्रतिच्छेद करती है।
सिद्ध करना है – AB = CD
रचना – OM ⊥ l खींचों ।
प्रमाण – हम जानते हैं कि वृत्त के केंद्र से जीवा पर डाला गया लंब जीवा समद्विभाजित करता है ।
⇒ AM = MD …………..(i)
तथा BM = MC …………..(ii)
समीकरण (ii) को (i) में से घटाने पर,
AM – BM = MD – MC
⇒ AB = CD (इति सिद्धम्)

प्रश्न 9.
सिद्ध कीजिए कि चक्रीय चतुर्भुज के सम्मुख कोणों के किसी भी युग्म का योग 180° होता है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 9
दिया है – एक चक्रीय चतुर्भुज ABCD है।
सिद्ध करना है- ∠BAD + ∠BCD = 180°
तथा ∠ADC + ∠CBA = 180°
रचना-माना कि शीर्षों A, B, C और D से जाने वाले वृत्त का केंद्र O है । OB और OD को मिलाइए ।
प्रमाण-
∠BAD = \(\frac {1}{2}\)∠BOD
= \(\frac {1}{2}\)x ……….(i)
(∵ किसी चाप द्वारा वृत्त के शेष भाग पर बना कोण केंद्र पर बने कोण का आधा होता है ।)
और ∠BCD = \(\frac {1}{2}\)∠BOD
= \(\frac {1}{2}\)y ……….(ii)
समीकरण (i) और (ii) को जोड़ने पर,
∠BAD + ∠BCD = \(\frac {1}{2}\)x + \(\frac {1}{2}\)y
= \(\frac {1}{2}\)(x + y)
= \(\frac {1}{2}\) × 360° = 180° ( x + y = 360°)
∵ चतुर्भुज के कोणों का योग 360° है,
∠ADC + ∠CBA = 360° – (∠BAD + ∠BCD)
= 360° – 180° = 180°
अतः चक्रीय चतुर्भुज के सम्मुख कोणों के किसी युग्म का योग 180° होता है । [इति सिद्धम्]

प्रश्न 10.
दो वृत्त एक बिंदु P पर बाह्यतः स्पर्श करते हैं । P पर खींची गई स्पर्श रेखा के एक बिंदु T से वृत्तों पर स्पर्श रेखाएँ TQ तथा TR खींची जाती हैं, जहां Q, R क्रमशः स्पर्श बिंदु हैं । सिद्ध कीजिए कि TQ = TR है ।
हल :
दिया है- वृत्त C’ केंद्र O’ तथा वृत्त C केंद्र 0 परस्पर बिंदु P पर बाह्यतः स्पर्श करते हैं । P पर दोनों वृत्तों की उभयनिष्ठ स्पर्श रेखा है। उभयनिष्ठ स्पर्श रेखा m के किसी बिंदु T से स्पर्श रेखा TQ वृत्त C’ पर तथा TR वृत्त C पर खींची गई है।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 10
सिद्ध करना है – TQ =TR
प्रमाण – बाह्य बिंदु T से, TP तथा TQ, C’ पर स्पर्श रेखाएँ हैं,
∴ TP = TQ …………..(i)
इसी प्रकार, TP तथा TR बाह्य बिंदु T से वृत्त C पर स्पर्श रेखाएँ हैं,
∴ TP = TR …………..(ii)
समीकरण (i) और (ii) से,
TQ = TR [इति सिद्धम्]

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 11.
एक बिंदु P वृत्त के केंद्र से 13 cm की दूरी पर है। P से वृत्त पर खींची गई स्पर्श रेखा की लंबाई 12 cm है। वृत्त की त्रिज्या ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 11
वृत्त के केंद्र 0 से बिंदु P की दूरी (OP) = 13 cm
स्पर्श रेखा (PA) की लंबाई = 12 cm
वृत्त की त्रिज्या (OA) = ?
∠OAP = 90° [∵ वृत्त के किसी बिंदु पर स्पर्श रेखा स्पर्श बिंदु से होकर जाने वाली त्रिज्या पर लंब होती है]
अब समकोण ΔOAP में पाइथागोरस प्रमेय से, OA = \(\sqrt{(\mathrm{OP})^2-(\mathrm{PA})^2}\) = \(\sqrt{(13)^2-(12)^2}\) cm = \(\sqrt{169-144}\) cm
= \(\sqrt{25}\) = 5 cm
अतः वृत्त की त्रिज्या (OA) = 5 cm

प्रश्न 12.
5 सें०मी० त्रिज्या के वृत्त की 8 सें०मी० लम्बी एक जीवा PQ है । P और Q पर स्पर्श रेखाएँ परस्पर एक बिन्दु T पर प्रतिच्छेद करती हैं । TP की लम्बाई ज्ञात कीजिए, यदि वृत्त का केन्द्र O है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 12
माना संलग्न आकृति में, TP = x व TR =y
समकोण ΔPRO में,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 13

प्रश्न 13.
एक बिंदु से वृत्त पर खींची गई स्पर्श रेखा की लंबाई ज्ञात कीजिए जहाँ पर बिंदु की केंद्र से 25 cm की दूरी है । वृत्त की त्रिज्या 7 cm दी हुई है।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 14
यहाँ पर वृत्त की त्रिज्या (OA) = 7 cm
वृत्त के केंद्र से बिंदु की दूरी (OB) = 25 cm
स्पर्श रेखा (AB) की लंबाई = ?
∠OAB = 90°
[∵ वृत्त के किसी बिंदु पर स्पर्श रेखा स्पर्श बिंदु से होकर जाने वाली त्रिज्या पर लंब होती है ]
अब समकोण ΔOAB में पाइथागोरस प्रमेय से,
AB = \(\sqrt{(\mathrm{OB})^2-(\mathrm{OA})^2}=\sqrt{(25)^2-(7)^2}\) cm
= \(\sqrt{625-49}\) = \(\sqrt{576}\) = 24 cm
अतः स्पर्श रेखा की लंबाई = 24 cm

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
वृत्त के किन्हीं दो बिंदुओं को मिलाने वाले रेखाखंड को कहा जाता है-
(A) वृत्त की त्रिज्या
(B) वृत्त की जीवा
(C) वृत्त की चाप
(D) वृत्त का केंद्र
हल :
(B) वृत्त की जीवा

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 2.
वृत्त का व्यास उसकी त्रिज्या से ……………. होता है
(A) दो गुना
(B) तीन गुना
(C) आधा
(D) एक तिहाई
हल :
(A) दो गुना

प्रश्न 3.
वृत्त की सबसे बड़ी जीवा होती है-
(A) त्रिज्या
(B) दीर्घ चाप
(C) लघु चाप
(D) व्यास
हल :
(D) व्यास

प्रश्न 4.
किसी वृत्त की कितनी अधिकतम स्पर्श रेखाएँ हो सकती हैं?
(A) केवल एक
(B) दो
(C) अपरिमित
(D) कोई स्पर्श रेखा नहीं
हल :
(C) अपरिमित

प्रश्न 5.
एक चाप …………… होता है जब इसके सिरे एक व्यास के सिरे हों ।
(A) अर्धव्यास
(B) अर्धवृत्त
(C) लघु वृत्तखंड
(D) दीर्घ वृत्तखंड
हल :
(B) अर्धवृत्त

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 6.
दो वृत्त सर्वांगसम होते हैं यदि उनकी ……………. बराबर हैं ।
(A) त्रिज्याएँ
(B) जीवाएँ
(C) चाप
(D) लंब रेखाएँ
हल :
(A) त्रिज्याएँ

प्रश्न 7.
सर्वांगसम वृत्तों की बराबर …………… उनके केंद्रों पर बराबर कोण अंतरित करती हैं।
(A) त्रिज्याएँ
(B) जीवाएँ
(C) अर्धव्यास
(D) लंब रेखाएँ

(B) जीवाएँ

प्रश्न 8.
आकृति में, रेखा PQ को निम्नलिखित में से किस नाम से पुकारते हैं?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 15
(A) छेदक रेखा
(B) प्रतिच्छेदी रेखा
(C) स्पर्श रेखा
(D) व्यास
हल :
(A) छेदक रेखा

प्रश्न 9.
यदि एक बिंदु P से O केन्द्र वाले किसी वृत्त पर PA, PB स्पर्श रेखाएँ परस्पर 60° के कोण पर झुकी हों, तो ∠POA बराबर है-
(A) 100°
(B) 90°
(C) 80°
(D) 60°
हल :
(D) 60°

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 10.
एक वृत्त के केंद्र से एक जीवा को समद्विभाजित करने के लिए खींची गई रेखा जीवा पर ………….. कोण बनाती है।
(A) 180°
(B) 60°
(C) 120°
(D) 90°
हल :
(D) 90°

प्रश्न 11.
केन्द्र 0 वाले वृत्त पर दो स्पर्श रेखाएँ PQ और PR हैं। यदि ∠QPR = 46°, तो ∠QOR हैं :
(A) 160°
(B) 150°
(C) 135°
(D) 134°
हल :
(D) 134°

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है ?
(A) वृत्त की बराबर जीवाएँ केंद्र पर बराबर कोण अंतरित करती हैं
(B) वृत्त के केंद्र से किसी जीवा पर खींचा गया लंब जीवा को समद्विभाजित करता है
(C) तीन असरेख बिंदुओं से होकर एक और केवल ही एक वृत्ताता है
(D) उपरोक्त सभी
हल :
(D) उपरोक्त सभी

प्रश्न 13.
संलग्न आकृति में एक रेखा l दो संकेंद्रीय वृत्तों को जिनका केंद्र O है, A, B, C और D पर प्रतिच्छेदित करती है तो, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 16
(A) AB = BC
(B) AB = BD
(C) AB = CD
(D) AB = MD
हल :
(C) AB = CD

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 14.
वृत्त की किसी चाप द्वारा केंद्र पर अंतरित कोण उस चाप द्वारा वृत्त के शेष भाग पर स्थित किसी बिंदु पर अंतरित कोण का ………….. होता है ।
(A) तीन गुना
(B) दो गुना
(C) आधा
(D) एक-तिहाई
हल :
(B) दो गुना

प्रश्न 15.
संलग्न आकृति में, यदि 0 वृत्त का केंद्र हो तो निम्नलिखित में से कौन-सा संबंध सही है ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 17
(A) ∠AOB = ∠ACB
(B) ∠AOB = \(\frac {1}{2}\)∠ACB
(C) ∠AOB = 2∠ACB
(D) ∠AOB = \(\frac {1}{3}\)∠ACB
हल :
(C) ∠AOB = 2∠ACB

प्रश्न 16.
अर्धवृत्त में बना कोण ……………. होता है ।
(A) दो समकोण
(B) अर्ध-समकोण
(C) पूर्ण-कोण
(D) समकोण
हल :
(D) समकोण

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 17.
आकृति में, 5 सेमी त्रिज्या वाले एक वृत्त के बिन्दु P पर स्पर्श रेखा PQ केन्द्र O से जाने वाली एक रेखा से बिन्दु Q पर इस प्रकार मिलती है कि OQ = 13 सेमी है, PQ की लम्बाई है:
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 18
(A) 12 सेंमी०
(B) 9 सेंमी ०
(C) \(\sqrt{194}\) सेंमी०
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) 12 सेंमी०

प्रश्न 18.
चक्रीय चतुर्भुज के सम्मुख कोणों के किसी युग्म का योग ……………… होता है।
(A) 180°
(B) 90°
(C) 360°
(D) 120°
हल :
(A) 180°

प्रश्न 19.
संलग्न आकृति में, यदि O वृत्त का केंद्र हो तो ∠x का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 19
(A) 17\(\frac {1}{2}\)°
(B) 35°
(C) 70°
(D) 52\(\frac {1}{2}\)°
हल :
(C) 70°

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 20.
आकृति में, O केन्द्र वाले वृत्त पर TP तथा TQ दो स्पर्श रेखाएँ इस प्रकार हैं कि ∠POQ = 115° है, तो ∠PTQ का मान है :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 20
(A) 80°
(B) 85°
(C) 75°
(D) 65°
हल :
(D) 65°

प्रश्न 21.
संलग्न आकृति में, यदि O वृत्त का केंद्र हो तो ∠x का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 21
(A) 140°
(B) 70°
(C) 35°
(D) 105°
हल :
(C) 35°

प्रश्न 22.
एक बाह्य बिन्दु T से TP तथा TQ, केन्द्र O वाले किसी वृत्त पर दो स्पर्श रेखाएँ इस प्रकार हैं कि ∠OPQ = 70° है, तो ∠PTQ का मान है :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 22
(A) 140°
(B) 35°
(C) 110°
(D) 90°
हल :
(C) 110°

प्रश्न 23.
संलग्न आकृति में A, B, C एक वृत्त पर तीन बिंदु हैं। यदि ∠AOB = 70° तथा ∠AOC = 130°, तो ∠BAC का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 23
(A) 80°
(B) 120°
(C) 160°
(D) 130°
हल :
(C) 160°

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 24.
वह रेखा जो वृत्त को केवल एक बिंदु पर स्पर्श करती है उसे वृत्त की कहा जाता है-
(A) छेदक रेखा
(B) लंब रेखा
(C) स्पर्श रेखा
(D) अस्पर्श रेखा
हल :
(C) स्पर्श रेखा

प्रश्न 25.
वह रेखा जो वृत्त को दो भिन्न-भिन्न बिंदुओं पर प्रतिच्छेदित करती है उसे कहा जाता है-
(A) छेदक रेखा
(B) लंब रेखा
(C) स्पर्श रेखा
(D) प्रमुख रेखा
हल :
(A) छेदक रेखा

प्रश्न 26.
वृत्त की स्पर्श रेखा स्पर्श बिंदु से होकर जाने वाली ……………. पर लंब होती है ।
(A) चाप
(B) त्रिज्या
(C) जीवा
(D) त्रिज्याखंड
हल :
(B) त्रिज्या

प्रश्न 27.
वृत्त के बाहर स्थित बिंदु से वृत्त पर …………………. स्पर्श रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
(A) केवल एक
(B) केवल दो
(C) केवल तीन
(D) कोई नहीं
हल :
(B) केवल दो

प्रश्न 28.
वृत्त के ऊपर स्थित बिंदु से वृत्त पर ………………….. स्पर्श रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
(A) केवल एक
(B) केवल दो
(C) केवल तीन
(D) कोई नहीं
हल :
(A) केवल एक

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 29.
वृत्त के व्यास के छोर पर खींची गई स्पर्श रेखाएँ ……………. होती हैं ।
(A) लंबवत्
(B) छेदक
(C) समांतर
(D) असमांतर
हल :
(C) समांतर

प्रश्न 30.
वृत्त के अभ्यंतर में स्थित बिंदु से वृत्त पर …………… स्पर्श रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
(A) शून्य
(B) केवल एक
(C) दो
(D) तीन
हल :
(A) शून्य

प्रश्न 31.
वृत्त का केंद्र दो स्पर्श रेखाओं के बीच के कोण के ……………….. पर स्थित होता है ।
(A) समत्रिभाजक
(B) समद्विभाजक
(C) समचतुर्भाजक
(D) असमद्विभाजक
हल :
(B) समद्विभाजक

प्रश्न 32.
किसी बाह्य बिंदु से किसी वृत्त पर खींची गई स्पर्श रेखाओं की …………….. बराबर होती हैं-
(A) चौड़ाइयाँ
(B) ऊँचाइयाँ
(C) लंबाइयाँ
(D) (A) व (B) दोनों
हल :
(C) लंबाइयाँ

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 33.
संलग्न आकृति में, AB और CD वृत्त की दो जीवाएँ बिंदु P पर प्रतिच्छेद करती हैं । निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य सही होगा ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 24
(A) PC.AC = PD.DB
(B) AC.DB = PA.PB
(C) PA.PC = PD.PB
(D) PA.PB = PC.PD
हल :
(D) PA.PB = PC.PD

प्रश्न 34.
संलग्न आकृति में, यदि PAB किसी वृत्त की एक छेदक रेखा हो जो इसे A तथा B पर प्रतिच्छेद करती है तथा PT एक स्पर्श रेखा हो तो PA.PB बराबर होगी-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 25
(A) PA2
(B) PO2
(C) PB2
(D) PT2
हल :
(D) PT2

प्रश्न 35.
एक वृत्त एक चतुर्भुज ABCD की सभी भुजाओं को स्पर्श करता हो तो वृत्त के केंद्र पर सम्मुख भुजाओं द्वारा अंतरित कोण होंगे-
(A) संपूरक
(B) पूरक
(C) शून्य
(D) पूर्ण
हल :
(A) संपूरक

प्रश्न 36.
यदि वृत्त के बाहर किसी बिन्दु P से वृत्त के ऊपर खींची गई स्पर्श रेखा की लम्बाई 15 cm हो और वृत्त की त्रिज्या 8 cm हो, तो बिन्दु P की वृत्त के केन्द्र से दूरी है :
(A) 7 cm
(B) 23 cm
(C) 17 cm
(D) 7.5 cm
हल :
(C) 17 cm

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 37.
यदि एक बिंदु P से O केंद्र वाले किसी वृत्त पर PA, PB स्पर्श रेखाएँ परस्पर 80° के कोण पर झुकी हों, तो ∠POB बराबर है :
(A) 100°
(B) 80°
(C) 70°
(D) 50°
हल :
(D) 50°

प्रश्न 38.
वृत्त के किसी बिंदु पर स्पर्श रेखा स्पर्श बिंदु से जाने वाली त्रिज्या के बीच का कोण होगा-
(A) 45°
(B) 90°
(C) 180°
(D) 60°
हल :
(B) 90°

प्रश्न 39.
एक बिंदु A वृत्त के केंद्र से 5 cm दूर स्थित है। A से वृत्त पर खींची गई स्पर्श रेखा की लंबाई 4 cm है । वृत्त की त्रिज्या होगी-
(A) 3 cm
(B) 4 cm
(C) 5 cm
(D) 8 cm
हल :
(A) 3 cm

प्रश्न 40.
दो वृत्त एक बिंदु P पर बाह्यतः स्पर्श करते हैं । P पर खींची गई स्पर्श रेखा के एक बिंदु T से वृत्तों पर स्पर्श रेखाएँ TQ तथा TR खींची जाती हैं, जहाँ Q, R क्रमशः स्पर्श बिंदु हैं, तो निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य होगा ?
(A) TQ = TR
(B) TQ = 2 TR
(C) TR = 2 TQ
(D) TQ = \(\frac {1}{2}\)TR
हल :
(A) TQ = TR

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त

प्रश्न 41.
यदि किसी बिन्दु P की वृत्त के केन्द्र से दूरी 13 cm है और वृत्त की त्रिज्या 5cm है, तो P से वृत्त पर खींची गई स्पर्श रेखा की लम्बाई है :
(A) 8 cm
(B) 6.5 cm
(C) 9 cm
(D) 12 cm
हल :
(D) 12 cm

प्रश्न 42.
एक वृत्त पर समांतर स्पर्श रेखाओं की अधिकतम संख्या है :
(A) 1
(B) 2
(C) 3
(D) 4
हल :
(B) 2

प्रश्न 43.
संलग्न आकृति में, यदि TP, TQ केन्द्र O वाले किसी वृत्त पर दो स्पर्श रेखाएँ इस प्रकार हैं कि ∠POQ = 110° है तो ∠PTQ बराबर है-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 10 वृत्त - 26
(A) 90°
(B) 80°
(C) 70°
(D) 60°
हल :
(C) 70°

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HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी

Haryana State Board HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी


(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

नीचे दिये गये प्रश्नों के उत्तर देने के लिए चार विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

1. गुडहल में पुष्प के पुंमंग के लिए प्रयुक्त तकनीकी शब्द है-
(A) एक संघी
(B) द्विसंघी
(C) बहुसंघी
(D) बहुपुमंगी
उत्तर:
(C) बहुसंघी

2. एकल अण्डप युक्त एककोष्ठकीय अण्डाशय में बीजाण्डन्यास होता है-
(A) सीमान्त
(B) आधारीय
(C) मुक्त केन्द्रीय
(D) अक्षीय
उत्तर:
(D) अक्षीय

3. किसमें ड्रूप का निर्माण होता है-
(A) गेहूँ
(B) मटर
(C) टमाटर
(D) आम
उत्तर:
(C) टमाटर

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी

4. मिर्च का सही पुष्प सूत्र है-
(A) K(s) C(s) A5 G(2)
(B) K(5) C(5) A(5) G2
(C) K5 C5 A(5) G2
(D) K(5) C(5) A(5) G(2)
उत्तर:
(C) K5 C5 A(5) G2

5. आलू के कन्द में आँखें होती है-
(A) पुष्प कलिकाएँ
(B) प्ररोह कलिकाएँ
(C) कक्षीय कलिकाएँ
(D) मूल कलिकाएँ
उत्तर:
(A) पुष्प कलिकाएँ

6. ध्वजिक विन्यास किस कुल का अभिलक्षण है-
(A) फेबेसी
(C) सोलेनेसी
(B) ऐस्टरेसी
(D) बेसिकेसी
उत्तर:
(A) फेबेसी

7. निम्नलिखित में से कौन सही सुमेलित है ?
(A) प्याज-कंद
(B) अदरक – सकर
(C) क्लेमाइडोमोनास कोनीडिया
(D) यीस्ट – चल बीजाणु
उत्तर:
(D) यीस्ट – चल बीजाणु

8. टमाटर तथा नींबू में पाया जाने वाला बीजाण्डन्यास है-
(A) भित्तीय
(B) मुक्त केन्द्रीय
(C) सीमान्त
(D) अक्षीय
उत्तर:
(C) सीमान्त

9. किसमें बीजावरण पतला तथा झिल्लीनुमा होता है ?
(A) मक्का
(B) नारियल
(C) मूँगफली
(D) चना
उत्तर:
(B) नारियल

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी

10. किसमें एक्ल्यूमिनरहित बीज निर्मित होते हैं ?
(A) मक्का
(B) अरण्डी
(C) गेहूँ
(D) मटर।
उत्तर:
(C) गेहूँ

11. खाने योग्य भूमिगत तने का उदाहरण है-
(A) गाजर
(B) मूँगफली
(C) शकरकन्द
(D) आलू।
उत्तर:
(B) मूँगफली

12. किसमें पुष्प एकलिंगी होते हैं ?
(A) गाजर
(B) मूँगफली
(C) शकरकन्द
(D) आलू
उत्तर:
(A) गाजर

13. किसमें पुष्प एकलिंगी होते हैं ?
(A) मटर
(B) खीरा
(C) गुड़हल
(D) प्याज
उत्तर:
(B) खीरा

14. पद बहुसंधी सम्बिन्धित है ?
(A) जायांग से
(B) पुमंग से
(C) दल पुंज से
(D) केलिक्स से
उत्तर:
(D) केलिक्स से

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15. निम्न में से कौन तने का रूपान्तरण नहीं है-
(A) नींबू के कंटक
(B) खीरा के प्रतान
(C) नागफनी की चपटी संरचनाएँ
(D) घटपर्णी का घट
उत्तर:
(C) नागफनी की चपटी संरचनाएँ

16. तना जो चपटी, हरी संरचनाओं में परिवर्तित होता है जो पत्तियों का कार्य करती है कहलाता है-
(A) फिल्लोड
(B) फिल्लोक्लेड
(C) शल्क
(D) क्लेडोड
उत्तर:
(B) फिल्लोक्लेड

17. पेपिलियोनेसी कुल में दल होते है-
(A) पेरीस्पर्म
(B) बीजपत्र
(C) भ्रूणपोष
(D) पेरीकार्प
उत्तर:
(A) पेरीस्पर्म

18. नारियल के खाये जाने वाले भाग की आकारिकीय प्रकृति है-
(A) पेरीस्पर्म
(B) बीजपत्र
(C) भ्रूणपोष
(D) पेरीकार्य
उत्तर:
(C) भ्रूणपोष

19. बन्दगोभी का खाने योग्य भाग है-
(A) अनुपर्ण
(B) अयस्थानिक जड़े
(C)
(D)
उत्तर:
(C)

(B) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सरसों के पौधे का वानस्पतिक नाम लिखिए।
उत्तर:
ब्रेसिका केम्पेस्ट्रिस (Brassica campestris)।

प्रश्न 2.
फैबेसी कुल के दलपुंज की विशेषता लिखिए।
उत्तर:
फैबेसी उपकुल में 5 दल 1 + 2 + (2) बैक्सीलरी क्रम में व्यवस्थित होते हैं। ये पीपैलियोनेसियस कहलाते हैं।

प्रश्न 3.
गेहूँ एवं चावल के फल को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
कैरिओप्सिस (Caryopsis)।

प्रश्न 4.
बहुसंधी पुंकेसर किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जब पुंकेसरों के पुंतन्तु अनेक समूहों में जुड़े रहते हैं तब इसे बहुसंघी (polyadelphous ) पुंकेसर कहते हैं।

प्रश्न 5.
गुड़हल में पुष्पक्रम का प्रकार क्या है ?
उत्तर:
एकल कक्षस्थ या एकल शीर्षस्थ।

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प्रश्न 6.
जब परागकोष में परागकण नहीं बनते तो ऐसे पुंकेसर क्या कहलाते हैं ?
उत्तर:
स्टैमिनोड (staminode)।

प्रश्न 7.
कनेर में किस प्रकार का पर्ण विन्यास पाया जाता है ?
उत्तर:
चक्राकार (Whorled)

प्रश्न 8.
गुड़हल में किस प्रकार के पुंकेसर होते हैं ?
उत्तर:
एकसंघी (Monoadelphous)।

प्रश्न 9.
अण्डप के तीन भाग कौन से हैं ?
उत्तर:

  1. अण्डाशय
  2. वर्तिका तथा
  3. वर्तिकाम।

प्रश्न 10.
फल किसे कहते हैं ?
उत्तर:
निषेचन के पश्चात् अण्डाशय से बनने वाली संरचना को फल कहते हैं।

प्रश्न 11.
मूसला जड़ तथा अपस्थानिक जड़ में एक अन्तर लिखिए।
उत्तर:
मूसला जड़ का निर्माण मूलांकुर (radicle) से होता है जबकि अपस्थानिक जड़ मूलांकुर को छोड़कर किसी अन्य भाग से बनती हैं।

प्रश्न 12.
झकड़ा जड़ किसे कहते हैं ?
उत्तर:
मूसला जड़ के नष्ट होने के बाद धागे के समान बनी जड़ें झकड़ा जड़ कहलाती हैं।

प्रश्न 13.
मूलगोप का क्या कार्य है ?
उत्तर:
मूलगोप मूलशीर्ष में स्थित प्रविभाजी प्रदेश (meristematic Zone) की रक्षा करता है।

प्रश्न 14.
किसी ऐसी जड़ के दो उदाहरण लिखिए जिनमें प्रजनन कलिकाएँ पायी जाती हैं ?
उत्तर:
शकरकन्द (sweet potato) तथा शीशम ( sisoo )।

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प्रश्न 15.
ऐसे दो पौधों के नाम लिखिए जिनमें पत्तियाँ कायिक प्रजनन में भाग लेती हैं ?
उत्तर:
अजूबा (Bryophyllum), बिगोनिया (Bigonia)।

प्रश्न 16.
ऐसे दो पौधों के नाम लिखिए जिनमें श्वसन मूल (pneumatophore) पाये जाते हैं।
उत्तर:
राइजोफोरा ( Rhizophora ), एबीसीनिया (Abiscinia )।

प्रश्न 14.
किसी ऐसी जड़ के दो उदाहरण लिखिए जिनमें प्रजनन कलिकाएँ पायी जाती हैं ?
उत्तर:
शकरकन्द (sweet potato) तथा शीशम ( sisoo )।

प्रश्न 15.
ऐसे दो पौधों के नाम लिखिए जिनमें पत्तियाँ कायिक प्रजनन में भाग लेती हैं ?
उत्तर:
अजूबा (Bryophyllum ), बिगोनिया (Bigonia)।

प्रश्न 16.
ऐसे दो पौधों के नाम लिखिए जिनमें श्वसन मूल (pneumatophore) पाये जाते हैं।
उत्तर
राइजोफोरा (Rhizophora ), एबीसीनिया (Abiscinia)।

प्रश्न 17.
मूसला जड़ तथा अपस्थानिक जड़ का एक-एक उदाहरण लिखिए। है ?
उत्तर:
मूसला जड़-मूली।
अपस्थानिक जड़ – शकरकन्द।

प्रश्न 18.
अंगूर के प्रतान किस संरचना का रूपान्तरण है ?
उत्तर:
तने का रूपान्तरण।

प्रश्न 19.
प्याज शल्ककन्द है इसके किस भाग में भोजन संचित रहता
उत्तर:
माँसल शल्क पत्रों (succulent scaly leaves) में।

प्रश्न 20.
एकल पुष्प तथा पुंजफल में एक प्रमुख अन्तर लिखिए।
उत्तर:
एकल फल एकण्डपी या बहुअण्डपी, युक्ताण्डपी अण्डाशय से बनते हैं, जबकि पुंजफल बहुअण्डपी तथा पृथक्काण्डपी अण्डाशय से बनते हैं।

प्रश्न 21.
संग्रथित फल किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जब सम्पूर्ण पुष्पक्रम विकसित होकर एक फल बनाता है तो इसे संप्रथित फल कहते हैं।

प्रश्न 22.
कूट फल क्या है ?
उत्तर:
जब बल के निर्माण में सम्पूर्ण पुष्पासन भाग लेता है तो इसे असत्य या कूट फल (false fruit) कहते हैं।

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प्रश्न 23.
बीजाण्डासन क्या है ?
उत्तर:
अण्डाशय में मृदूतकीय संरचना जिस पर बीजाण्ड लगे होते हैं बीजाण्डासन (placenta ) कहलाती हैं।

प्रश्न 24.
आम के फल के खाया जाने वाले भाग का नाम लिखिए।
उत्तर:
मध्यफल भित्ति (mesocarp)।

प्रश्न 25.
रेशेदार अष्ठिफल का एक उदाहरण तथा इसके खाने योग्य भाग का नाम लिखिए। है ?
उत्तर:
नारियल (coconut) भूणपोष ।

प्रश्न 26.
मटर का पुष्प सूत्र लिखिए।
उत्तर:
Br % K(5) C1+2+(2)  A(9)+1  G(1)

प्रश्न 27.
सोलेनेसी कुल के दो पौधों के वानस्पतिक नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. आलू (Solanum tuberosumn)।
  2. बैंगन (Solanum melongina)।

प्रश्न 28.
लीची के फल में खाये जाने वाले भाग का नाम लिखिए।
उत्तर:
मांसल बीज चोल।

प्रश्न 29.
धँसे हुए रन्ध्र (Sunken stomata) किन पौधों की विशेषता
उत्तर:
मरुद्भिदी पादपों (xerophytes ) की।

प्रश्न 30.
लौंग पौधे का कौन-सा भाग है ?
उत्तर:
लौंग बिना खिली कली है।

(C) लघु उत्तरीय प्रश्न – I

प्रश्न 1.
मूसला मूल तन्त्र किसे कहते हैं ?
उत्तर:
अधिकांश द्विबीजपत्री पौधों में मूलांकुर (redicle) के लम्बे होने से प्राथमिक मूल बनती है। इसमें पाश्र्वय मूल होती है जिन्हें द्वितीयक या तृतीयक मूल कहते हैं। प्राथमिक मूल तथा इसकी शाखाएँ मिलकर मूसला मूलतन्त्र (tap root system) कहलाता है। जैसे- सरसों ।

प्रश्न 2.
झकड़ा मूल तत्र किसे कहते हैं ?
उत्तर:
एकबीजपत्री पौधों में प्राथमिक मूल अल्पकालिक (ephimeral) होती है और इसके स्थान पर अनेक मूल निकल आती हैं। ये मूल तने के आधार से निकलती हैं। इन्हें झकड़ा मूल तन्त्र (fibrous root system) कहते हैं; जैसे— गेहूँ ।

प्रश्न 3.
अपस्थानिक मूल तन्त्र किसे कहते हैं ?
उत्तर:
कुछ पौधों जैसे घास तथा बरगद में मूल मूलांकुर की बजाय पौधे के किसी अन्य भाग से निकलती हैं। इन्हें अपस्थानिक मूल कहते हैं तथा एक स्थान से निकली सभी अपस्थानिक जड़ों को अपस्थानिक मूल तन्त्र (adventitious root system) कहते हैं। जैसे-दूब घास ।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी

प्रश्न 4.
मूसला जड़ तन्त्र रेशेदार मूल तन्त्र का केवल नामांकित चित्र
उत्तर:
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 32

प्रश्न 5.
वैसीकेसी तथा सोलेनेसी कुल के दो-दो आर्थिक महत्व के पौधों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सोलेनेसी –

  • टमाटर – (Lycopersicum esculentum)
  • बैंगन (Solanum melongina)

ब्रैसिकेसी –

  • सरसों – ( Brassica campestris)
  • मूली – ( Raphanus sativa)

प्रश्न 6.
प्रकृति के आधार पर कलिकाएँ कितने प्रकार की होती हैं ?
उत्तर:
प्रकृति के आधार पर कलिकाएँ तीन प्रकार की होती है-

  • कायिक कलिकाएँ (Vegetative buds) – ये कलिकाएँ पत्र प्ररोह बनाती हैं।
  • पुष्पीय कलिकाएँ (Floral buds) – ये कलिकाएँ पुष्पों को जन्म देती
  • मिश्रित कलिकाएँ (Mixed buds) – ये कायिक भाग व पुष्प बनाती

प्रश्न 7.
भ्रूण तथा बीज में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
भ्रूण तथा बीज में अन्तर (Differences between Embryo and Seed) –

निषेचन से पूर्व बीजाu्ड (Ovule)निषेष्न के पर्जात् बीज (Seed)
बाह्म अध्यावरण (Outer integument)बाद बीजचोल (testa)
अन्त: अध्यावरण (Inner integument)अन्त: बीजचोल (tegmen)
बीजाण्ड वृन्त (Funiculus)नष्ट हो जाता है
बीजाण्डकोष (Nucellus)नष्ट हो जाता है या परिश्रूणपोष (perisperm) बनाता है
अण्डकोशिका (Egg cell)भूण (embryo)

प्रश्न 8.
सत्य फल तथा कूट फल में भेद कीजिए।
उत्तर:

  1. सत्य फल (True Fruits) – जब फल का निर्माण केवल अण्डाशय से निषेचन के पश्चात् होता है तो इसे सत्य फल कहते हैं । जैसे – आम, पपीता।
  2. असत्य फल (False Fruits) – जब पुष्प का निर्माण अण्डाशय के अतिरिक्त पुष्प के अन्य भागों तथा पुष्पासन से मिलकर होता है तो इसे कूट या असत्य फल कहते हैं। जैसे-सेब, नाशपाती।

प्रश्न 9.
शिराविन्यास किसे कहते हैं ? इसके प्रकार लिखिए।
उत्तर:
शिराविन्यास (Veination ) – पत्ती पर शिरा तथा शिरिकाओं के विन्यास को शिराविन्यास कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है-

  • जालिकावत् शिराविन्यास (Reticulate veination ) – जब सिरिकाएँ पत्ती पर जाल जैसी रचना बनाती है; जैसे- द्विबीजपत्री पौधों में।
  • समान्तर शिरा विन्यास (Parallel veination) – जब सिरिकाएँ पत्ती पर समानान्तर रूप से फैली होती हैं; जैसे-एकबीजपत्री पौधों में।

प्रश्न 10.
स्पैडिक्स तथा कैटकिन पुष्पक्रम में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
स्पैडिक्स तथा कैटकिन पुष्पक्रम में अन्तर (Differences between Spadix and Catkin inflorescence)

भ्रूण (Embryo):बीज (Seed):
(i) यह बीजाण्ड की अण्डकोशिका से बनता है।निषेचनोपरान्त बीजाण्ड बीज बनाता है।
(ii) भ्रूण बीजपत्र या भ्रूणपोष में सुरक्षित रहता है।बीज दो पर्तों से बने बीज कवच में सुरक्षित रहता है।
(iii) भ्रूण बीज में पाया जाता है।बीज फल में पाया जाता है।

प्रश्न 11.
युक्तकोशी तथा संयुक्त पुंकेसरीय पुंकेसरों में अन्तर लिखिए। उत्तर- युक्तकोषी तथा संयुक्त पुंकेसरीय पुंकेसरों में अन्तर (Differences stamens between Syngenesious and Synaondrous)
उत्तर:

स्पैडिक्स (Spadix)कैटकिन (Catkin)
पुष्पावली वृन्त स्थूल एवं माँसल होती है।पुष्पावली वृन्त, मुलायम, कमजोर तथा लटकने वाली होती है।
सम्पूर्ण पुष्पक्रम पर अनेक या एक बड़ी प्राय: रंगीन, आकर्षक सहपत्र होती हैं। इसे स्पैथ कहते हैं।सभी पुष्पों की अपनी-अपनी सहपत्र होती हैं। पुष्प प्रायः एकलिंगी होते हैं।
उदाहरण-केला।उदाहरण-शहतूत।

प्रश्न 12.
श्वसन मूल तथा कवक मूल क्या होती हैं ?
उत्तर:
श्वसन मूल (Respiratory roots Pneumatophore) – दलदली स्थानों में उगने वाले पौधों में कुछ जड़ें वायवीय हो जाती हैं जिन्हें श्वसन मूल कहते हैं। ये जड़ों के लिए ऑक्सीजन उपलब्ध कराती हैं जैसे- राइजोफोरा। कवक मूल (Mycorrhiza ) कुछ उच्च पौधों की जड़ों तथा कवकों के बीच पारस्परिक सहजीविता को कवक मूल (Mycorrhiza ) कहते हैं। जैसे-चीड़ के पौधे में।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित पौधों के प्रमुख संचयी भागों के नाम लिखिए –
(i) आलू
(ii) शकरकन्द
(iii) प्याज
(iv) मटर
(v) अदरक
(vi) मूली
(vii) गन्ना
(viii) शलजम
उत्तर:

(i) आलूभूमिगत कन्द
(ii) शकरकन्दकंदिल अपस्थानिक जड़
(iii) प्याजमाँसल शल्क पत्र
(iv) मटरबीज
(v) अदरकभूमिगत प्रकन्द
(vi) मूलीमूसला जड़
(vii) xन्नातना
(viii) शलजममूसला जड़।

(घ) लघु उत्तरीय प्रश्न-II

प्रश्न 1.
जड़ की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
जड़ की विशेषताएँ –

  • जड़ की उत्पत्ति प्रायः भ्रूण के मुलांकुर से होती है।
  • जड़ें धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती तथा ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती होती हैं।
  • जड़ों के शीर्ष पर मूलगोप (root cap) पायी जाती है।
  • जड़ों पर पर्व, पर्वसन्धियों तथा कलिकाओं का अभाव होता है।
  • जड़ों पर एककोशिकीय मूलरोम (root hairs) पाये जाते हैं।
  • जड़ की शाखाएँ अन्तर्जात (endogenous) होती हैं।

प्रश्न 2.
तने की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
तने की विशेषताएँ-

  • तने की उत्पत्ति भ्रूण के प्रांकुर (Plumule) से होती है।
  • तने की शीर्ष पर अमस्थ कलिका (apical bud ) तथा पत्तियों के कक्ष में कक्षस्थ कलिका ( axillary bud) पायी जाती है।
  • तने पर शाखाएँ, पत्तियाँ, पुष्प व फल उत्पन्न होते हैं।
  • तने पर पर्व एवं पर्व सन्धियाँ (nodes and internodes) पाये जाते
  • पर्वसन्धियों पर सामान्य पत्तियाँ या शल्क पत्र पाये जाते हैं।
  • तने पर बहुकोशिकीय रोम पाये जाते हैं।
  • तने की शाखाएँ बहिर्जात (exogenous) होती हैं।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी

प्रश्न 3.
किसी पुष्पी पादप का उसके विभिन्न भागों को दर्शाते हुए नामांकित चित्र बनाइए ।
उत्तर:
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 15

प्रश्न 4.
मूसला जड़ तथा अपस्थानिक जड़ में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
मूसला जड़ तथा अपस्थानिक जड़ में अन्तर –

मूस्ला मूल (Tap Root)अवस्थानिक्ज मूल (Adventitious Root)
यह मूल भूण के मूलाकुर (Radicle) भाग से निकसित होती है।यह मूल मूलाकुर (radicle) से विकसित न होकर पौधे के दूसरे भाग से विकसित होता है।
इनमें प्राथमिक मूल (Primary root) कभी नह नहीं छोता। यह हमेशा भूमिगत (undegraund) होती है। इनमें मुख्य मूल एक ही होती है।इनमें प्राथमिक मूल बहुत अल्पजीवी (ephimeral) होती है।
यह सामान्यतः भूमि में बहुत गहराई तक जाती हैं।यह भूमिगत तथा वायवीय (aerial) दोनों प्रकार की हो सकती है।
इसमें मुख्य मूल बहुत मोटी होती है बाकी जड़ें उतनी मोटी नहीं होती हैं। इनमें प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक जड़ें निकलती है।इनमें बहुत सारी जड़ें छुष्ड में निकलती हैं। यह भूमि में बहुत गहराई तक नहीं जाती हैं।
यह द्विबीजपत्री पौधों (dicotyledons) में पायी जाती है।सारी जड़ें रेशेदार (fibrous) होती हैं।
यह मूल भूण के मूलाकुर (Radicle) भाग से निकसित होती है।इनकी जड़ों में इस प्रकार का विभेदन नहीं पाया जाता।

प्रश्न 5.
जटामूल तथा स्तम्भ मूल में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
जटामूल तथा स्तम्भमूल में अन्तर (Differences between Stilt root and Prop roots)-

जटामूल (Stilt roots)सतम्भमूल (Prop roots)
ये तने के आधारीय भाग से निकलती हैं।ये तने के ऊपरी भाग से निकलती हैं।
ये छोटी होती हैं।ये लम्बी होती हैं।
ये आर्द्रताप्राही नहीं होती हैं।ये आर्द्रताम्राही होती हैं।
ये अपेक्षाकृत कम मोटी तथा ऊपर से नीचे तक समान होती हैं।ये इतनी मोटी हो जाती हैं कि
ये तिरछी वृद्धि करती हैं।इन्हें जड़ कहना कठिन होता है।
उद्टरण-गन्ना, मक्का।ये ऊपर मोटी तथा नीचे पतली होती हैं।
उदाइरण-बरगद।

प्रश्न 6.
परजीवी मूल तथा वायवीय मूल में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
परजीवी मूल तथा वायवीय मूल में अन्तर (Differences between Parasitic root and Aerial root):

परजीवी मूलवाय्वीय मूल
परजीवी पादपों जैसे- अमरबेल आदि में पायी जाती हैं।उपरिरोही पौधों जैसेआर्किड्स में पायी जाती हैं।
छोटी होती हैं जो पोषक के सम्पर्क में आने पर बनती हैं।लम्बी तथा स्वतः बनती हैं।
पोषक के संवहन ऊतक में प्रवेश कर भोजन अवशोषित करती हैं।वायु में लटककर आर्द्रता ग्रहण करती हैं।

प्रश्न 7.
प्रन्थिमय जड़ें क्या हैं ? ये किन पौधों में पायी जाती हैं ?
उत्तर:
ग्रन्थिमय जड़ें (Nodulated or Tuberculate roots) – इस प्रकार की जड़ें लैग्यूमिनोसी कुल के सदस्यों जैसे—मूंग, मटर, चना आदि में पायी जाती हैं। इन जड़ों पर अनियमित आकार की गुलिकाएँ या मन्थियाँ (nodules) पायी जाती हैं। प्रारम्भ में इनका रंग पीला-गुलाबी होता है बाद में भूरा हो जाता है। इन गुलिकाओं में भारी संख्या में राइजोबियम (Rhizobium) नामक जीवाणु पाये जाते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 1
ये जीवाणु पौधे की जड़ों के साथ सहजीविता प्रदर्शित करते हैं। ये वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को ग्रहण करके इसे यौगिक रूप में बदल देते हैं जिसे पौधे ग्रहण कर लेते हैं। पौधे जीवाणुओं को आश्रय तथा भोजन प्रदान करते हैं।

प्रश्न 8.
पर्णकाय स्तम्भ तथा पर्णाभ वृन्त में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
पर्णकाय (पर्णाभ) स्तम्भ तथा पर्णायित (पर्णाभ) वृन्त में अन्तर-

पर्णकाय रतमम्भ (Phylloclade)पर्णाभ ধृत्त (Phyllode)
यह स्तम्भ का रूपान्तरण है।यह पर्णवृन्त का रूपान्तरण है। पर्णफलक (lamina) की भाँति हरा व चपटा होता है जो मुख्यत्याः प्रकाश संश्लेषण करता है।
इसमें स्तम्भ चपटा, हरा, सामान्यतः माँसल होता है अत: प्रकाश संश्लेषण के साथ-साथ भोजन संग्रह भी करता है।इसके कक्ष में कलिका होती है जिससे शाखा बनती है।
यहु स्वयं पत्ती के कक्ष में स्थित होता है।पर्वसन्धियाँ, कलिकाएँ या पुष्प धारण नहीं करता है।
यह पर्वसन्धियाँ, कलिकाएँ, पत्तियौँ तथा पुष्प धारण करता है। पत्तियाँ प्राय: काँटों या शल्कों में बदल जाती हैं।उंसाहरण-ऑस्ट्रेलियन बबूल।

प्रश्न 9.
सिलिकुआ तथा सिलिकुला की तुलना कीजिए ।
उत्तर:
सिलिकुआ तथा सिलिकुला की तुलना (Comparison between Siliqua and Silicula) – दोनों ही फल द्विअण्डपी (Bicarpellary), संयुक्त (Syncarpous ) तथा ऊर्ध्ववर्ती ( Superior) अण्डाशय से विकसित होते हैं। ये प्रारम्भ में एककोष्ठी (unilocular) तथा भित्तिय बीजाण्डन्यास (parietal placentation) वाले होते हैं। बाद में कूटपट (raplum) बन जाने के कारण अण्डाशय द्विवेश्मी हो जाता है। परिपक्व होने पर फल भित्ति आधार से क्रमशः अप्रभाग की ओर स्फुटित होती है। बीज कूटपट (replum) पर ही लगे रह जाते हैं। कूटपट ऐंठकर बीजों को प्रकीर्णित कर देता है। दोनों कुल क्रूसीफेरी (Cruciferae or Brassicaceae) कुल के लाक्षणिक है। इनमें सिलिकुआ अधिक लम्बा तथा संकरा होता है जैसे-सरसों, मूली आदि। सिलिकुला अपेक्षाकृत छोटा होता है इसकी लम्बाई-चौड़ाई लगभग बराबर होती है, जैसे- कैप्सेला ( Capsella), कैण्डीटफट (Iberis sp.) आदि।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 2

प्रश्न 10.
पुष्पीय पौधों की एक सामान्य पत्ती की संरचना समझाइए ।
उत्तर:
पत्ती (Leaf) पत्ती हरी, प्रकाश संश्लेषी उपांग है जो तने की पर्वसन्धियों तथा शाखाओं से बाहर की ओर निकलती है एक प्रारूपिक पत्ती के निम्नलिखित भाग होते हैं-
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1. पर्णाधार (Leaf base ) – यह पत्ती का वह भाग है जो तने के साथ जुड़ता है। कुछ पौधों में पर्णाधार पर विशेष संरचनाएं होती हैं जिन्हें अनुपर्ण ( stipules) कहते हैं। ये छोटी-सी कक्षस्थ कलिका की सुरक्षा करते हैं। जब पर्णाधार पर अनुपर्ण उपस्थित होते हैं तब पत्ती को अनुपर्णी (stipulate) कहते हैं तथा अनुपर्णरहित पत्ती को अननुपर्णी ( exstipulate) कहते हैं।

2. पर्णवृन्त (Petiole ) – यह पत्ती का डण्ठल है। यह पत्ती को पर्णाधार से जोड़कर वायु तथा प्रकाश के लिए साधे रखता है। वृन्त सहित पत्ती को सवृन्त (petiolate) तथा वृन्तरहित पत्ती को अवृन्त (sessile ) कहते हैं।

3. पर्णफलक (Leaf blade or Lamina ) – यह पत्ती का प्रमुख भाग है। यह प्रायः चपटा, तथा हरा भाग है। पर्णफलक की दो सतह अध्यक्ष (adaxial) तथा अपाक्ष (abaxial) होती हैं। प्रायः अलग-अलग पौधों की पत्तियों में आकार आकृति की भिन्नता होती है। पर्णफलक पर शिराओं का विन्यास होता है। फलक एक शीर्ष में समाप्त होता है। पर्णफलक का कार्य प्रकाश संश्लेषण, वाष्पोत्सर्जन तथा श्वसन है।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी

प्रश्न 11.
फैबेसी तथा सोलेनेसी कुल के आर्थिक महत्व के कुछ पौधों तथा उनके आर्थिक महत्व को लिखिए।
उत्तर:
फैबेसी कुल का महत्व –

  • सोयाबीन (Glycine soja) इससे सोया मिल्क प्राप्त किया जाता है।
  • मटर (Pisum sativum) – दाल के रूप में प्रयोग किया जाता है।
  • मूँगफली (Arachis hypogea ) – इससे वनस्पति घी बनाया जाता है।

सोलेनेसी कुल का महत्व –

  • एट्रोपा (Atropa belladona) से एट्रोपीन नामक औषधि प्राप्त होती
  • तम्बाकू (Nicotiana tabacum) से निकोटिन प्राप्त होती है।
  • बैंगन (Solanum melongina) सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 12.
जड़ तथा तने में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
जड़ तथा तने में अन्तर (Differences between Root and Stem)

(Root)(Stem)
मूलांकुर (radicle) से विकसित होती है।प्रांकुर (plumule) से विकसित होती है।
धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती, तथा ऋणात्मक प्रकाशनुवर्ती होती है।ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती तथा धनात्मक प्रकाशानुवर्ती होता है।
इस पर पर्व एवं पर्वसन्धियाँ, पत्तियाँ आदि नहीं पाये जाते हैं।पर्व एवं पर्वसन्धियाँ, पत्तियाँ, फल, पुष्प पाए जाते हैं।
एककोशिकीय मूल रोम पाये जाते हैं।बहुकोशिकीय रोम पाये जाते हैं।
मूलगोप उपस्थित होती है।मूलगोप उपस्थित नहीं होती है।
प्रकाश संश्लेषण नहीं करती।कुछ कोमल तने प्रकाश संश्लेषण करते हैं।

प्रश्न 13.
सरल तथा संयुक्त पत्ती में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
सरल एवं संयुक्त पत्ती में अन्तर (Differences between Simple and Compound Leaf)

सरल प्ती (Simple Leaf)संयुक्त पती (Compound Leaf)
सम्पूर्ण पर्णफलक एक ही होता है ।फलक छोटे-छोटे भागों में विभाजित होकर पर्णक (leaflet) बनाता है।
एक से अधिक सतहों में व्यवस्थित होती हैं।सारे पत्रक एक सतह पर विकसित होते हैं।
पत्तियाँ अम्राभिसारी क्रम में निकलती हैं।पत्ती के सभी पत्रकों का विकास समकालीन होता है।
पत्ती के आधार पर अनुपर्ण होते हैं।पत्रकों के आधार पर अनुपर्ण नहीं होते हैं। वे संयुक्त पत्ती के आधार पर स्थिर होते हैं।
सरल पत्ती के आधार में कलिका होती है।एकक पत्रक के कक्षक में कलिका नहीं होती बल्कि सम्पूर्ण संयुक्त पत्ती के कक्ष में होती है।

प्रश्न 14.
फलों का वर्गीकरण करते हुए विभिन्न प्रकार के फलों के नाम लिखिए।
उत्तर:
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प्रश्न 15.
मुण्डक तथा पुष्पछत्र पुष्पक्रमों में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
मुण्डक और पुष्प छत्र पुष्पक्रमों में अन्तर (Differences between Capitulum and Umbel inflorescence):

मुण्डक (Capitulum)पुप्षुत्र (Umbel)
यह एक असीमाक्षी (cymose) प्रकार का पुष्पक्रम है जिसमें मातृ अक्ष या पुष्पावली वृन्त प्रायः चपटा होता है।यह एक असीमाक्षी (cymose) प्रकार का पुष्पक्रम है जिसमें पुष्पाक्ष छोटा या संघनित होता है।
इसमें छोटे-छोटे तथा अवृन्त पुष्पक चपटे पुष्पाक्ष पर लगे रहते हैं।पुष्प सवृन्त तथा पुष्पवृन्त लगभग समान लम्बाई के होते हैं।
अनेक सहपत्र मिलकर आशय को बाहर से घेरे होते हैं इनको सहपत्र चक्र कहते हैं।मातु अक्ष पर अनेक सहपत्र चक्र में लगे प्रतीत होते हैं।
पुष्प प्राय: दो प्रकार के होते हैं-रश्मि पुष्पक (ray flarets) तथा विम्ब पुष्पक (dise florete)।सभी पुष्प एक जैसे होते हैं।

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प्रश्न 16.
अष्ठिफल तथा पेपो में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
अस्फिल तथा पेपों में अन्तर (Differences between Drupe and Pepo)

अष्ठिफल (Drupe)पेपो (Pepo)
यह बहुअण्डपी, संयुक्त एवं ऊर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होता है।यह द्विअण्डपी संयुक्त एवं अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होता है।
यह प्राय: एककोष्ठी तथा एकबीजी होता है।यह प्राय: एककोष्ठी तथा बहुबीजी होता है।
बाह्य फलभित्ति छिलका, मध्य फलभित्ति प्रायः माँसल या रेशेशदार, किन्तु अन्तःफलभित्ति काष्ठीय या कठोर होती है।बाह्य फलभित्ति छिलका बनाती है। मध्य तथा अन्त: फलभित्ति माँसल व सरस होती है।
जैसे-आम, बेर आदि।जैसे-लौकी, खीरा आदि।

प्रश्न 17.
ड्रप तथा बैरी में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
अपिठफल तथा बैरी में अन्तर (Differences between Drupe and Berry)

अज्ठिल (Drupe)बैरी (Berry)
यह बहुअण्डपी, संयुक्त, ऊर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होता है।यह बहुअण्डपी, संयुक्त, ऊध्ध्ववर्ती या अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होता है।
फल प्राय: एककोष्ठीय तथा एकबीजी होते हैं।फल एककोष्ठी या बहुकोष्ठी तथा प्राय: बहुबीजी होता है।
बाह्य फलभित्ति छिलका, मध्य फलभित्ति गूदेदार (या रेशेदार) तथा अन्त फलभित्ति कठोर या काष्ठीय होती है।बाह़ फलभिति छिलका बनाती है। मध्य तथा अन्तक्फलित्ति माँसल होती है ।अन्त.फलभित्ति झिल्लीनुमा भी हो सकती है।
उदाहरण-आम तथा बेर।उदाहरण-टमाटर, अमरूद, केला आदि।

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प्रश्न 18.
बीजों के अंकुरण कितने प्रकार के होते हैं ? समझाइए ।
उत्तर:
बीजों का अंकुरण (Germination of Seeds) – उचित ताप, नमी एवं ऑक्सीजन की उपस्थिति तथा प्रकाश की अनुपस्थिति में बीज अंकुरण करके नवोद्भिद् (seedling) का निर्माण करते हैं जिससे पादप बनता है। बीजों का अंकुरण तीन प्रकार का होता है।
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चित्र – सेम में उपरिभूमिक अंकुरण चने में अधोभूमिक अंकुरण
(i) उपरिभूमिक (Epigeal)-sइसमें बीजपत्राधार (hypocotyl) में वृद्धि के कारण बीजपत्र भूमि के ऊपर आ जाते हैं। जैसे- अरण्डी, सेम आदि ।

(ii) अधोभूमिक (Hypogeal) इसमें बीजपत्र अंकुरण के समय भूमि के अन्दर ही रहते हैं। इसमें एपीकोटाइल (epicotyl ) की वृद्धि अधिक होने के कारण प्रांकुर भूमि से बाहर आते हैं जैसे-चना, मटर आदि ।

(iii) सजीव प्रजता (Vivipary) – इसमें बीजों का अंकुरण फल के अन्दर तथा पौधे पर लगी हुई स्थिति में ही हो जाता है। ऐसा लवणोद्भिदों में देखने को मिलता है; जैसे-राइजोफोरा में शिशुपौधा फल से विलग होकर भूमि में गिरकर नये पौधे का निर्माण करता है।
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प्रश्न 19.
मुण्डक अथवा शीर्ष पुष्पक्रम का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुण्डक अथवा शीर्ष (Capitulum or head ) – इसमें मुख्य वृन्त चपटा उत्तल या अवतल डिस्क के आकार का होता है। इसकी ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे अवृन्त पुष्प तथा पुष्पक (florets) लगे होते हैं। युवा पुष्प केन्द्र की ओर तथा पुराने पुष्प परिधि की ओर स्थित होते. हैं। सम्पूर्ण पुष्पक्रम सहपत्र चक्र के एक या एक से अधिक चक्रों से घिरा रहता है। प्रत्येक पुष्प के आधार पर भी सहपत्रों (Bracts) की उपस्थिति सम्भव। है।
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पुष्पक दो प्रकार के होते हैं नलिकाकार तथा जीभिकाकार। इसमें जिव्हाकार रश्मिपुष्पक परिधि की ओर तथा नलिकाकार बिम्ब पुष्पक केन्द्र की ओर स्थित होते हैं। उदाहरण- गेंदा, सूर्यमुखी, एस्टर आदि।

प्रश्न 20.
पर्णाभ वृन्त तथा पर्णाभ में अन्तर कीजिए।
उत्तर:
पर्णाभ वृन्त तथा पर्णाभपर्व में अन्तर (Differences between phylloclade and Cladode)

पर्णाभ वृन्तपर्णाभपर्व
यह तने का रूपान्तरण है।यह वृन्त का रूपान्तर है जिसमें प्राक्ष हो भी सकता है और नहीं भी।
वृद्धि अनिश्चित होती है।वृद्धि निश्चित होती है।
पर्वसन्धि तथा पर्व भिन्नित रहते हैं।ये रचनाएँ अनुपस्थित होती हैं।
पर्णाभ वृन्तों पर पत्तियाँ, शाखाएँ, पुष्प तथा फल लगे होते हैं।ये रचनाएँ अनुपस्थित ह़ोती हैं।
यह पत्ती के कक्ष से विकसित होता है ।यह कक्षस्थ रचना नहीं है।
कक्षस्थ कलिका अनुपस्थित होती है जबकि इसका विकास कक्षस्थ कलिका द्वारा होता है।कक्षस्थ कलिका उपस्थित होती है।
इनकी दिशा उर्ध्व या क्षैतिज होती है।इनकी वृद्धि दिशा उर्ध्वाधर होती है।
ये जल, भोजन, श्लेष्म तथा टेटेक्स संग्रहित करते हैं।इनमें संमहण नहीं होता।
कायिक गुणन में सहायक है।इस प्रकार का कार्य नहीं होता।

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प्रश्न 21.
कुम्भीरूपी तथा तर्कुरूपी जड़ में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
कुम्भीरूप तथा तर्करूप में अन्तर
(Differences between Napiform and Fusiform Roots)

कुम्भीरूप (Napiform)तर्करूप (Fusiform)
यह लट्टू के आकार का दिखता है।इसका आकार तर्कु के समान है।
शीर्ष अचानक पतला हो जाता है।शीर्ष क्रमानुसार पतला होता है।
आधारीय भाग सबसे मोटा होता है।मध्य भाग सबसे मोटा होता है.
संमाहक जड़ का आधे से अधिक भाग बीजपत्राधार से बना होता है।बीजपत्राधार द्वारा संग्राहक जड़ का आधे से कम बाग बनता है।
शलगम में मूसला जड़ पतली किन्तु चुकन्दर में थोड़ी मोटी होती है।मूसला जड़ संम्राहक जड़ का भाग है।
शीर्ष भाग पर पतली धागे सदृश रचनाएँ पायी जाती हैं।पतली द्वितीयक जड़ें निकलती हैं

प्रश्न 22.
पत्र प्रतान तथा स्तम्भ प्रतान में अन्तर लिखिए। पत्र प्रतान तथा स्तम्भ प्रतान में अन्तर
उत्तर:

पत्र प्रतान (Leaf Tendril)संष्य प्रतान (Stem Tendril)
ये प्राय: अशाखित होते हैं।ये शाखित या अशाखित होते हैं।
ये प्राय: हरे होते हैं।ये हरे या भूरे होते हैं।
शल्क पत्र अनुपस्थित होते हैं।शाखाओं के क्षेत्र में शल्क पत्र होते हैं।
कलिकाएँ अनुपस्थित होती हैं।शल्क पत्रों के कक्ष में कक्षस्थ कलिका होती हैं।
सम्पूर्ण पत्ती या पत्ती के किसी भाग से प्रतान बनते हैं।तने की शाखा या कलिका द्वारा प्रतान विकसित होते हैं।

(E) निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पत्तियाँ कितने प्रकार की होती हैं ? संयुक्त पत्ती के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पर्ण के प्रकार (Types of Leaf) – पर्ण दो प्रकार की होती है – सरल (simple) व संयुक्त पर्ण (compaund leaf)।
(1) सरल पर्ण (Simple Leaf) जब पत्ती की पर्ण फलक (lamina) अछिन्न होती है या कटी हुई लेकिन कटाव मध्यशिरा तक नहीं पहुँच पाता तरह की पर्ण को सरल पर्ण या सरल पत्ती कहते हैं। उदाहरण – पीपल की पत्ती के पर्णफलक अछिन्न कोर वाला होता है अर्थात् पर्णफलक में कोई कटाव नहीं होता। मूली व पपीते की पत्तियों के कई कटाव (incisions) पाये जाते हैं पर यह कटाव मध्यशिरा या पर्णवृन्त तक नहीं पहुँच पाते हैं। अतः पर्णफलक (Lamina) अविभाजित होता है व इसे सरल पर्ण कहते हैं।

(2) संयुक्त पर्ण (Compound Leaf) – इस तरह की पत्तियों में पर्णफलक में कटाव मध्य शिरा या पर्णवृन्त तक पहुँच जाते हैं व पर्णफलक कई खण्डों या भागों में बंट जाता है व प्रत्येक खण्ड पर्णफलक का भाग होता है व उसी के समान दिखाई देता है। अतः उसे पर्णक (leaflet) कहते हैं व पर्णकोयुक्त पसी को संयुक्त पर्ण (compound leaf) कहते हैं। संयुक्त पर्ण दो प्रकार के होते हैं –

(i) पिच्छाकार संयुक्त पर्ण (Pinnate Compound Leaf) इस प्रकार के संयुक्त पर्ण में पत्ती की मध्यशिरा को पिच्छाक्ष (rachis) कहते हैं व पिच्छाक्ष (rachis) के दोनों ओर पार्श्व में कई पर्णक लगे रहते हैं। उदाहरण- इमली, गुलाब, नीम आदि।

यह निम्न प्रकार की होती है –
(अ) एकपिच्छकी संयुक्त पर्ण (Uniptnnate compound leaf)-इसमें पर्णफलक एक ही बार विभाजित होता है व पिच्छाक्ष (rachis) अविभाजित होता है व पर्णक दोनों ओर पार्श्व में लगे रहते हैं। अगर पर्णक सम संख्या में होते हैं तो उसे समपिच्छकी (उदाहरण— अमलतास) और जब पर्णकों की संख्या विषम होती है तो पत्ती को विषमपिच्छकी कहते हैं। उदाहरण – गुलाब।

(ब) द्विपिच्छकी संयुक्त पर्ण (Bipinnate compound leaf) इस तरह की संयुक्त पर्ण में पर्णफलक दो बार विभाजित होता है अर्थात् पर्णक (leaflet) जो पहले पिच्छाक्ष (rachis) पर लगते हैं वह अपनी मध्यशिरा की ओर कटावों द्वारा द्वितीयक पर्णकों में बँट जाता है। ऐसी संयुक्त पत्ती को द्विपिच्छकी कहते हैं। उदाहरण-बबूल और गुलमोह।

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(स) त्रिपिच्छकी संयुक्त पर्ण (Tripinnate compound leaf) – इसमें द्विपिच्छकी पर्ण के फलकों का कटान अपनी मध्यशिरा की ओर हो जाता है व प्रत्येक द्वितीयक पर्णक कई तृतीय (tertiary) पर्णकों में बंट जाता है। पर्णफलक की मध्यशिरा या पिच्छाक्ष (rachis) प्राथमिक अक्ष ( main axis) बनाती है व इस पर द्वितीयक अक्ष लगे रहते हैं व इस पर तृतीयक अक्ष लगे रहते हैं व इसके दोनों ओर पर्णक लगे रहते हैं। उदाहरण- शहजन (Moringa) ।
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(द) बहुपिच्छकी संयुक्त पर्ण ( Multipinnate compound leaf) – पर्णफलक का कटान क्रमशः तीन से अधिक बार हो जाता है व पर्णफलक अनेक पर्णकों (leaflets) में बँट जाता है। उदाहरण- धनिया, गाजर, कॉसमोस आदि।

(य) हस्ताकार संयुक्त पर्ण (Palmate compound leaf) इस तरह की संयुक्त पर्ण में पर्णफलक के कटान पर्णवृन्त तक पहुँच जाते हैं व पर्णफलक कई पर्णकों (leaflets) में विभक्त हो जाता है व पर्णक पर्णवृन्त (petiole ) के अगले सिरे तक लगे रहते हैं। इसे हस्ताकार संयुक्त पर्व कहते हैं क्योंकि इनका -आकार हथेली की अंगुलियों की तरह होता है।

इस पर्ण में पर्णकों की संख्या के आधार पर निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है –
(i) एक पर्णकी (Unifoliate) – इसमें पर्णवृन्त के अगले सिरे से केवल एक ही पर्णक संचित रहता है। उदाहरण- नींबू नारंगी आदि।

(ii) द्विपर्णकी (Bifoliate) – इसमें दो पर्णक पर्णवृन्त क अगले सिरे से जुड़े रहते हैं। उदाहरण-हार्डविकिया।

(iii) त्रिपर्णकी (Trifoliate) – इस प्रकार के हस्ताकार संयुक्त पर्ण में पर्णवृन्त पर तीन पर्णक लगे रहते हैं। उदाहरणं—बेलपत्र, खट्टी, बूटी।

(iv) चतुपर्णकी (Quadrifoliate) – इस प्रकार के हस्ताकार संयुक्त पर्ण में पर्णवृन्त के अगले सिरे पर चार पर्णक लगे रहते हैं। उदाहरण- मार्सिलिया । अगले सिरे पर चार से अधिक पर्णक लगे रहते हैं। उदाहरण- बॉम्बेक्स, क्लिोम आदि।

(v) बहुपर्णकी ( Multifoliate) – इसमें पर्णवृन्त के सरल तथा संयुक्त पत्ती में अन्तर –
(Differences between Simple and Compound Leaf)

सरल प्ती (Simple Leaf)संयुक्त फ्ती (Compound Leaf)
सरल पत्ती में एक ही पर्णक (leaflet) होता है जिस पर शिराएँ फैली रहती हैं।पत्ती का किनारा दो या दो से अधिक पर्णकों (leaflets) में बँटा होता है ।
सरल पत्तियाँ एक से अधिक सतहों में व्यवस्थित होती हैं।संयुक्त पत्तियाँ में सभी पत्रक एक सतह पर विकसित होते हैं।
पत्तियों का विकास अप्राभिसारी क्रम में होता है।संयुक्त पत्ती के सभी पत्रकों का विकास समकालीन होता है।
पत्ती के आधार पर अनुपर्ण (stipules) हो सकते हैं।पत्रकों के आधार पर अनुपर्ण (stipules) नहीं होते हैं। परन्तु वे संयुक्त पत्ती के आधार पर स्थित होते हैं.
पत्ती के कक्ष में कलिका होती है।एकक पत्र के कक्ष में कलिका नहीं होती है बल्कि सम्पूर्ण पत्ती के कक्ष में होती है।
उदाहरण-पीपल, बरगद, गुड़हल, बेंगन।उदाहरण-नीबू, गुलाब, बबूल, धनियाँ।

प्रश्न 2.
शिराविन्यास किसे कहते हैं ? पत्तियों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के शिराविन्यास का सचित्र वर्णन कीजिए। इनका महत्व बताइये।
उत्तर:
शिराविन्यास (Venation) – पर्णफलक में मध्यशिरा, शिराओं व शिरिकाओं (midrib, veins and veinlets) का एक जाल बन जाता है। शिरां व शिरिकाओं से बने इस जाल को शिराविन्यास (venation) कहते हैं।

शिराविन्यास मुख्यतः दो प्रकार का होता है –
(अ) जालिकारूपी शिराविन्यास (Reticulate venation)
(ब) समान्तर शिराविन्यास (Parallel venation)

(अ) जालिका रूपी शिराविन्यास (Reticulate venation ) – इस प्रकार के शिराविन्यास में शिराएँ कई बार शाखित होकर अनेक शिरिकाएँ बनाती हैं। यह पर्णफलक में विभिन्न दिशाओं में फैली रहती है। यह जालिकारूपी शिराविन्यास अधिकतर द्विबीजपत्री (dicotyledons) पौधों में पाया जाता है। किन्तु ब्रायोफिल्म में समान्तर शिराविन्यास मिलता है।
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जालिकारूपी शिराविन्यास मुख्यतः दो प्रकार का होता है –
1. एकशिरीय या पिच्छाकार,
2. बहुशिरीय या हस्ताकार।

1. एकशिरीय या पिच्चाकार शिराविन्यास (Pinnate reticulate venation ) – इस प्रकार के शिराविन्यास में पर्णफलक के मध्य शिरा से कई पार्श्व शिराएँ निकलकती हैं जो फलक कोर (Lmina margin) व फलक शिखाम की ओर फैली रहती हैं व पूरे फलक में जाल बन जाता है। इसे पिच्छाकार शिराविन्यास (pinnate venation) कहते हैं। इसमें मध्यशिरा से पार्श्व शिराएँ उसी प्रकार निकलती हैं जैसे चिड़ियाँ के पर के मध्य कठोर भाग में असंख्य कोमल रोम निकले रहते हैं। उदाहरण-आम, अमरूद, पीपल, जामुन आदि।

2. बहुशिरीय या हस्ताकार जालिकारूपी शिराविन्यास (Palmate reticulate venation):
इस शिराविन्यास में पर्णवृन्त के अगले सिरे से कई प्रमुख शिराएँ निकलती हैं। कक्षीय कालिका जो क्रमशः फलक कोर तथा फलक शिखाम तक चली जाती हैं। यह दो प्रकार का होता है – (Auxillary bud)

(i) बहुशिरीय अभिसारी (Multicostate convergent or polmale venation ) – पूर्णवृत्त के अगले सिरे से कई प्रमुख शिराएँ निकलती हैं। पर्णफलक के आधार भाग में यह एक-दूसरे के निकट होती है और फलक के मध्य भाग में एक-दूसरे से दूर हो जाती हैं व फलक के शीर्ष भाग में पुनः एक-दूसरे के निकट हो जाती है। इस क्रम को अभिसारी कहते हैं। उदाहरण-कपूर, दाल चीनी, तेजपात बेर आदि।

(ii) बहुशिरीय अपसारी या हस्ताकार (Multicastate divergent ) – पर्णवृन्त के अगले सिरे पर प्रमुख शिराएँ, एक-दूसरे के निकट होती हैं लेकिन जैसे-जैसे यह फलक कोर तथा फलक शिखाम (apex) की ओर बढ़ती जाती है, यह एक-दूसरे से क्रमशः दूर होती चली जाती है। इस क्रम को अपसारी (divergent) कहते हैं। एकबीजपत्री पौधे जैसे कि स्माइलेक्स, डाइओस्कोरिया आदि में अपवाद के रूप में जालिका रूपी शिराविन्यास (reticulatevenation) पाया जाता है।

(ब) समान्तर शिराविन्यास (Parallel Venation) – इस प्रकार के शिराविन्यास में मध्यशिरा या पर्णवृन्त के अगले सिरे से, पर्णफलक (lamina) में कई (divergent) कहत है। शिराएँ एक-दूसरे के लगभग समान्तर फैली रहती हैं। समान्तर शिराविन्यास (venation) अधिकतर एकबीजपत्री पौधों (monocotyledons) में मिलता है। कुछ एकबीजपत्री पौधे जैसे कि स्माइलेक्स, डाइओस्कोरिया आदि में अपवाद के रूप में जालिका रूपी शिराविन्यास (reticulate venation) पाया जाता है।

यह मुख्यतः दो प्रकार का होता है –
1. एकशिरीय या पिच्छाकार समान्तर शिराविन्यास (Unicostate parallel venation)-पर्णफलक में एक मध्यशिरा होती है। इस मध्यशिरा से कई पार्श्व शिराएँ एक-दूसरे के समान्तर निकलती हैं जो क्रमशः फलक कोर (leaf margin) और फलक शिखाग्र तक चली जाती है। यह पार्श्व शिराएँ शिरिकाओं में शाखित नहीं होती है अतः शिरिकाओं का जाल नहीं बनता है। उदाहरण-केना, केला, अदरक व हल्दी।
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2. बहुशिरीय समान्तर शिराविन्यासपर्णवृन्त के अगले सिरे से कई प्रमुख शिराएँ निकलती हैं जो फलक-कोर (Leaf margin) था फलक शिखाम तक चली जाती है। यह दो प्रकार का होता है।

(i) बहुशिरीय अपसारी या हसतकारी अपसारी (Muticostate divergent) पर्णवृन्त के अगले सिरे से कई प्रमुख शिराएँ निकलती हैं जो फलक कोर तथा फलक शिखाप्र की ओर अपसारित होती जाती हैं। उदाहरण-ताड़, खजूर, नारियल।
(ii) बहुशिरीय अभ्सिरी (Muticostate convergent)-पर्णवृन्त के अगले सिरे से कई प्रमुख शिराएँ निकलती हैं जो पर्णफलक के समान्तर वक्रित रेखाओं के समान फैली रहती हैं और फलक के शीर्ष भाग में एक-दूसरे के निकट आ जाती हैं। उदकरणण-धान, गेहूँ, गन्ना, बाँस व घास आदि।

प्रश्न 3.
जड़ के सामान्य कार्य क्या हैं? जड़ों में पाये जाने वाले विशेष प्रकार के जैविक कार्यों को करने के लिए रूपान्तरणों का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मूल के वृद्धि क्षेत्र (Growing Regions of Root) – मूल या जड़ के अन्तिम छोर से कुछ मिमी. से लेकर कुछ सेमी. तक का भाग वृद्धिशील होता है व इसे मूल या जड़ का वृद्धि प्रदेश (growing Region) कहते हैं। मूल का यह भाग मूलगोप (root cap) से ढका रहता है जो टोपीनुमा रचना होती है। यह (मूलगोप), मूल के शीर्ष (root apex ) भाग की भूमि में वृद्धि करते समय नष्ट होने से रक्षा करता है।

मूल के वृद्धि प्रदेश को तीन भागों में विभक्त किया जाता है। यह तीन भाग निम्नलिखित होते हैं –
(i) विभज्योतकी क्षेत्र (Meristematic region)
(ii) दीर्घीकरण क्षेत्र (Region of elongation)
(iii) परिपक्वन क्षेत्र ( Region of maturation )

2. विभज्योतकी क्षेत्र (Meristematic Region ) – यह क्षेत्र मूल के सिरे से ऊपर की ओर एक मिलीमीटर या केवल कुछ ही मिलीमीटर तक होता है। इस क्षेत्र का अधिकांश भाग मूलगोप (root cap) से ढका रहता है। इस क्षेत्र की कोशिकाएँ छोटी ओर पतली कोशिकाभित्ति वाली होती हैं व जीवद्रव्य (protaplam) सघन होता है। यह कोशिकाएँ लगातार विभाजन कर कोशिकाओं की संख्या को बढ़ाती हैं जिससे मूल की वृद्धि होती है।
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3. दीर्घीकरण क्षेत्र (Region of elongation) – यह क्षेत्र, विभज्योतकी (meristematic) क्षेत्र के ऊपर 1-5 मिमी. तक फैला होता है। विभज्योतक (meristem) क्षेत्र में बनी नई कोशिकाएं इस क्षेत्र की लम्बाई में वृद्धि करती हैं। विभज्योतकी तथा दीर्धीकरण क्षेत्रों में होने वाली इन क्रियाओं के कारण मूल लम्बाई में वृद्धि करती है।

4. परिपक्वम क्षेत्र (Region of maturation ) – दीर्भीकरण क्षेत्र के ऊपर परिपक्वन क्षेत्र होता है। यह कुछ मिमी. से कुछ सेमी. तक हो सकता है। इस क्षेत्र में कोशिकाएं अपना पूर्ण आकार प्राप्त कर विभिन्न प्रकार के ऊतकों में विभेदित होने लगती है। यह क्षेत्र बाहर से आसानी से पहचाना जा सकता है क्योंकि इस क्षेत्र में असंख्य मूलरोम (root hairs) होते हैं। मूलरोम (root hairs) जल अवशोषण क्रिया के मुख्य अंग होते हैं। यह भूमि से जल तथा जल में घुले हुए लवणों का अवशोषण (absorprion) करते हैं। यह मूल के चारों ओर लगभग 2 सेमी. क्षेत्र में मूलरोमों (root hairs) पर चिपके रहते हैं।
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मूल के रूपान्तरण (Modifications of Roots ):
मूसला जड़ के रूपान्तरण (Modificaitons of tap roots) पादपों के रूप तथा शरीर में होने वाले वे विशेष परिवर्तन जिनके द्वारा वे विशिष्ट कार्यों का सम्पादन करते हैं या स्वयं को पर्यावरण के प्रति अनुकूल बनाते हैं, रूपान्तरण कहलाते हैं। मुसला जड़ें (Top roots) भोजन संग्रहण के लिए, जीवाणु सहजीवन (symbiosis) के लिए, धारी तनों को सहारा प्रदान करने के लिए या लवणीय भूमि में गैसों के आदान-प्रदान के लिए विभिन्न रूपों में रूपान्तरित होती हैं।

2. प्रथमय जड़ें (Nodulated or Tuberculated Roots ) – लेग्यूमिनोसी कुल के पौधों, जैसे-चना, मटर, सोयाबीन, अरहर आदि की मूसला जड़ों पर गोल या अनियमित संरचनाएँ बन जाती हैं जिन्हें मूल गुलिकाएँ (root nodules) कहते हैं। इन मन्थियों में राइजोबियम (Rhizobium) नामक सहजीवी जीवाणु पाये जाते हैं। ये जीवाणु मृदा में उपस्थित पुश्ता नाइट्रोजन को इसके यौगिकों में परिवर्तित कर देते हैं। इन नाइट्रोजनी यौगिकों को पौधे की जड़ों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। ऐसी जड़ें ग्रन्थिमय मूल कहलाती हैं।
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3. पुस्ता जड़ें (Buttress roots) – ये क्षैतिज जड़ें हैं जो तने के आधार पर से विकसित होती हैं। ये पौधे को अतिरिक्त सहारा प्रदान करती हैं। इन्हें प्लैंक जड़ें (plank roots) भी कहा जाता है। कभी-कभी ये पार्श्व से दबी होती हैं। जैसे-बरगद, पीपल, बादाम।
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4. श्वसन मूलें (Respiratory roots or pneumatophores) – इस प्रकार की जड़ें दलदली या अत्यधिक लवणीय मृदा में उगने वाले कुछ पौधों जैसे— राइजोफोरा, सोनेरेशिया, एवीसीनिया, हेरिटिएरा आदि में पायी जाती हैं। इन पौधों को मैंगूव (mangrove) भी कहते हैं। ऐसी भूमि में पौधों की जड़ों को श्वसन के लिए वायु उपलब्ध नहीं होती हैं। अतः मैंप्रूव पादपों की जड़ों से कुछ जड़ें वायवीय होकर भूमि की सतह से ऊपर आ जाती हैं। इन जड़ों श्वसन मूल (pneumetophores) कहते हैं। इन पर सूक्ष्म छिद्र पाये जाते हैं, जो वातावरण से गैसों का आदान-प्रदान करते हैं।
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5. मूसला जनन मूल (Reproductive tap roots ) – कुछ पौधों में मूसला जड़ या इनकी शाखाओं पर अपस्थानिक कलिकाएँ उत्पन्न होती हैं जिमसे नये पौधे का निर्माण होता है। जैसे-शीशम।
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अपस्थानिक जड़ों के रूपान्तरण (Modifications of Adventitious roots):
मूसला जड़ों के समान ही अपस्थानिक जड़ों के भी रूपान्तरण पाये जाते हैं। ये रूपान्तरण, संचयन, आरोहण, सहारे अथवा जनन के लिए होते हैं। अपस्थानिक जड़ों के रूपान्तरण निम्न प्रकार हैं –
1. कन्द गुच्छ (Tuberous or fasciculated) – जड़ों में भोजन संचित होने पर यह फूल जाती है व गुच्छे बना लेती है। उदाहरण-शकरकन्द (Sweet potato) व एस्पेरागस (Asparagus) आदि।

2. रेशेदार (Fibrous ) – जड़ें बहुत पतली व तन्तु के समान होती हैं। जैसे-गेहूँ।

3. ग्रन्थिमय (Nodulated)- इनमें जड़ों के सिरे फूल जाते हैं। उदाहरण-मेलीलोटस ( Melilotus), मटर।

4. मणिरूपाकार (Beaded or Moniliform )-जब जड़ बीच-बीच में से निश्चित अन्तर के पश्चात् मोती के समान फूलती है, उसे मणिरूपाकार कहते हैं। उदाहरण-वाइटिस (Vitius)।

5. जटा मूल (Stilt roots)-जब पर्व सन्धियों (Nodes) पर से जड़ें निकलती हैं और भूमि की ओर बढ़ती हैं व भूमि में घुसकर रस्सीनुमा संरचना बना लेती हैं उसे जटा मूल कहते हैं। जैसे-मक्का (Zea mays)।

6. उपरिरोही जड़ें (Epiphytic roots)-अधिपादपों में वायवीय जड़ें निकलती हैं। इन जड़ों में वेलामन ( velamen) ऊतक पाया जाता है। यह ऊतक हवा से नमी सोख लेता है, जैसे- आर्किड की जड़ें (Orchid roots)

7. पर्णिल जड़ें (Foliar roots )-जब पत्तियों से जड़ें निकलती हैं तो पर्णिल जड़ें कहलाती हैं। जैसे-पत्थर चटा (Bryo- phylumn)।
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8. परजीवी जड़ें (Sucking or haustorial roots ) – परजीवी पौधों में जड़ें पोषक तने में घुसकर भोजन का चूषण करती हैं जैसे— डेन्ड्रोप्थी (Dendrophthoe)

9. स्तम्भ मूल (Prop roots) – जब जड़ें शाखाओं से निकलती हैं और भूमि में चली जाती हैं। पेड़ को स्तम्भ की तरह दृढ़ता प्रदान करती हैं, स्तम्भ मूल कहलाती हैं। उदाहरण- बरगद।

10. आरोही मूल (Climbing roots ) – यह जड़ें पर्व सन्धियों (nodes) पर निकलती हैं और आरोही (climber ) को चढ़ने में मदद करती हैं। उदाहरण – मनीप्लाण्ट, मोन्स्टेरा (Monstera) आदि।

11. वलयाकार (Annulated) – कुछ पौधों की जड़ों में वलयाकार रचनाएँ पायी जाती हैं। जैसे- आर्किड (Orchid)।.

प्रश्न 4.
एक प्रारूपिक जड़ के विभिन्न स्रोतों का संक्षिप्त तथा सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मूल या जड़ ( Root):
मूल या जड़ पौधों का एक महत्वपूर्ण अंग होता है। यह सूर्य के प्रकाश से दूर तथा पृथ्वी के गुरुत्व केन्द्र की ओर वृद्धि करता है, अतः मूल को धनात्मक गुरुत्वानुर्वी (positive geotropic) एवं ऋणात्मक प्रकाशानुक्ती (negative phototropic) कहा जाता है। मूल सदैव जल स्रोत की ओर भी वृद्धि करती हैं अतः इन्हें धनात्मक उलानुवर्ती (positive hydrotropic) भी कहा जाता है।

मूल को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –
“मूल पौधे का वह अंग है जो प्रकाश स्वोत के विपरीत एवं भूमि के गुरुत्व केन्द्र व जल स्रोत की ओर वृद्धि करता है।” मूल की उत्पत्ति बीज में उपस्थित भ्रूण के मूलांकुर (radicle) से होती है। द्विबीजपत्री पादपों (dicotyledons) में मूलांकर (radicle) ही वृद्धि करके मुख्य या प्राथमिक मूल (primary root) बनाता है। एकबीजपत्री पादपों में

2. Fंख्रा या रेशेषार मूल तन्त (Fibrous Root System)एकबीजपत्री (monocot) पौर्धों में मूलांकुर से परिवर्धित प्राथमिक मूल अल्पजीवी होती है और शीच्र नष्ट हो जाती है इसके स्थान पर तने के आधार भाग से अनेक पतली रेशे के समान जड़ें उत्पन्न हो जाती हैं जिसे आकाता या रेशेषार (fibrous root system) मूल तन्त्र कहते हैं। उदाहरण-गेहूँ।
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3. अप्त्थानिक मूल (Adventitious Root) – जब मूल या जड़ मूलांकर से विकसित न छोकर पौषे के किसी अन्य भाग से जैसे-स्तम्भ, शाखा तथा पत्ती से परिवर्धित छोती है तो उसे अपस्थानिक मूल (adventitious root) मूल कहते हैं। उदाहरण-घास तथा बरगद। एकबीजपत्री पौधों में मिलने वाला झकड़ा मूल तन्त्र (fibrous root system) अपस्थानिक मूल तन्त्र (adventitious roots system) होता है। प्याज में चपटे तश्तरी के समान स्तम्भ की निचली सतह से झकड़ा जड़ें निकलती हैं।

भूमि की सतह पर वृद्धि करने वाले उपरिभूस्तारी (runner) तनों और शाखाओं की पर्ष सन्धियों (modes) से भूमिगत अपस्थानिक मूलान्त परिवर्धित छोता है। ऐसा मूलतन्त घास की अनेक जातियों में भी पाया जाता है। बाँस, गन्ना, मक्षा एवं अन्य सीधे खड़े स्तम्म वाले एकबीजपत्रियों में भूमि की निकटवर्ती पर्वसन्धियों (node) से अपस्थानिक जड़ें (advantitious roots) निकलती हैं जो भूमि में प्रवेश करके सामान्य जड़ों की भाँति कार्य करती हैं।

प्रश्न 5.
लिलिएसी कुल का अर्द्धतकनीकी भाषा में वर्णन किसी प्रतिनिधि सदस्य द्वारा कीजिए। इस पौधे का पुष्प चित्र बनाइये तथा पुष्प सूत्र लिखिए। इस कुल का आर्थिक महत्व लिखिए।
उत्तर:
लिलिएसी कुल ( Family Liliaceas):
आवास एवं स्वभाव (Habit and Habitat ) – प्रायः बहुवर्षीय शाक (perinnial herbs) कुछ पौधे झाड़ी जैसे-रसकस (Ruscus), आरोही जैसे – स्माइलेक्स (Smilax) या छोटे वृक्ष; जैसे- यक्का (Yucca) होते हैं।
जड़ तन्त्र (Root System) – प्रायः तन्तुरूप झकड़ा, अपस्थानिक (adventitious) जड़ें।
तना (Stem)-वायवीय (aerial), सीधा या आरोही (climber), पुष्पीय शाखा स्केप (scape) के रूप में शाखामय कभी-कभी जैसे – पर्णाभ पर्व (cladode); जैसे- रसकस, सतावर (Asparagus) या शल्क्रकन्द (Bulb); जैसे-प्याज (Allium cepa) में रूपान्तरित हो जाता है। पत्तियाँ (Leaves) मूलीय (radicle) या स्तम्भीय (cauline), अनमुपर्णी ( exstipulate ), सरल, प्रायः समानान्तर शिराविन्यास। स्माइलेक्स में अनुपर्णी ( stipulate) तथा अनुपर्ण प्रतान (Tendril) में रूपान्तरित होते हैं।

पुष्पक्रम (Inflorescence) – असीमाक्षी या ससीमाक्षी मुण्डक (cymose head); कभी-कभी एकल पुष्प। पुष्प (Flower) प्रायः सहपत्री (bracteate ), सवृन्त (pedicellate ), पूर्ण (complete), उभयलिंगी (hermaphrodite ), प्रायः त्रिज्यासममित (actinomorphic), जायांगाधर (hypogynous), त्रितयी (trimerous।

परिदलपुंज (Perianth) – परिदल – पत्र (tepals) 6, तीन-तीन के दो चक्रों में, पृथक् या संयुक्त परिदली (poly or gamophyllous) दोनों चक्र एक-दूसरे से एकान्तरित, कोरस्पर्शी या कोरछादी ( valvate or imbricate), दलाभ ( petalloid), बाह्यदलाभ ( sepalloid) एक-दूसरे से भिन्नित अथवा अभिन्नित। पुमंग (Androecium)-पुंकेसर 6, तीन-तीन के दो चक्रों में, पृथक् पुंकेसर (polyandrous ), परिदललग्न (epiphyllous ), आधारलग्न या मुक्तदोली (basifixed or versatile), परागकोष द्विकोष्ठी (dithecous ), अन्तर्मुखी (introrse), अनुलम्ब स्फुटन (dehiscence longitudinal), पुतन्तु आधार पर चपटे तथा फैले हुए।

जायांग (Gynoecium) – त्रिअण्डपी (tricarpellary), युक्ताण्डपी ( syncarpous ), ऊर्ध्ववर्ती (superior), त्रिकोष्ठीय (trilocular) अण्डाशय, बीजाण्डन्यास (placentation) स्तम्भीय (axile), वर्तिकाम त्रिशाखित (trifid)। फल (Fruit) – बेरी (berry) या सम्पुट (capsule)।
पुष्प सूत्र (Floral formula) –
Br, ⊕, P(3 + 3 ) Or 3 +3 A9 +3 G(3)
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आर्थिक महत्त्व के पौधे (Plants of Economic Importance):
लिलिएसी कुल के कुछ पौधे अत्यन्त उपयोगी हैं। कुछ पौधों के नाम निम्नलिखित हैं-
(1) भोजन के लिए (For Food)
(i) प्याज (Onion = Allium cepa)
(ii) लहसुन (Garlic = Allium sativum)

(2) सजावटी पौधे (Ornamental Plants)
(iii) लिली (Lily = Lilium bulbiferum)
(iv) यक्का (Dragon plant = Yucca aloifolia)।

प्रश्न 6.
सरल या एकल फलों का संक्षिप्त विवरण कीजिए।
उत्तर:
फलों के प्रकार (Types of Fruits) – साधारणतयाः फल तीन प्रकार के होते हैं –
I. एकल फल (Simple Fruits)
II. पुंजफल (Aggregate Fruits)
III. संमथित फल (Composite Fruits) ।

I. सरस या एकल फल (Simple Fruits) – ये फल एकअण्डपी अथवा बहुअण्डपी युक्ताण्डपी अण्डाशय (unicarpalary or multicarpalary syncarpous ovary) से विकसित होते हैं। अण्डाशय मध्यवर्ती या अधोवर्ती (inferior) होता है। ये फल दो प्रकार के होते है-
(अ) शुष्क फल
(ब) सरस फल।

(अ) शुष्ठ का (Dry fruits)-इसकी फलभित्ति (Pericarp) शुक्क, कठोर, चीमड़, काष्ठीय या श्रिल्लीदार होती है। ये फल तीन प्रकार के होते हैं –
1. स्फोटी
2. अस्फोटी तथा
3. भिदुर फल।

1. स्फोटी फल (Dehiscent Fruit)- ये पकने पर फट जाते हैं। ये निम्न प्रकार के होते है –
(i) फली (Legume or pod) – ये एकाण्डपी ऊर्ष्व अण्डाशय (Monocarpalary superiou ovary) से विकसित होते हैं। परिपक्व फल पकने पर दो सीवनी द्वारा फटता है। जैसे-सेम, मटर आदि।
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(ii) फालिकल (Follicle)-इनमें केवल एक सीवनी (suture) द्वारा स्फुटन (dehiscence) होता है। शेष गुण फली के समान होते हैं। जैसे-आक, चम्पा आदि।

(iii) सिलिकुआ (Siliqua) – यह फल द्विअण्डपी, संयुक्त, ऊर्ष्व अण्डाशय (bicapalary, compound superior ovary) से विकसित होता है। आरम्भ में अण्डाशय एककोष्ठी किन्तु बाद में कूट पट (replum) बन जाने से द्विकोष्ठी दिखाई देता है, जैसे-सरसों।

(iv) सिलिक्युला (Silicula)- यह पूर्णत: सिलिक्यूआ के समान होता है। परन्तु यह लम्बाई व चौड़ाई में समान होता है। जैसे-कैपसल्ला।

(v) सम्पुट (Capsule)- ये फल बहुअण्डपी, संयुक्त, ऊर्ष्व अण्डाशय तथा कभी-कभी अधो अण्डाशय से विकसित होते हैं। ये विभिन्न विधियों द्वारा स्फुटित होते हैं। जैसे- कपास, पोस्त, भिण्डी आदि।

2. अस्फोटी या एकीनियल (Indihiscent or Achenial)- ये फल पकने पर फटते नहीं। इनके बीज फल के सड़ने पर ही प्रकीर्णित होते हैं। ये फल निम्न प्रकार के होते हैं-
(i) एकीन (Achene)- ये फल एकाण्डपी, ऊर्ष्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनमें फलधित्ति बीज चोल से अलग होती है। जैसे-क्लीमेटिस, रेनकुलस आदि।

(ii) कैरिऑफिस (Caryopsis) – ये एकाण्डपी ऊर्ष्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनमें फलभित्ति बीजचोल से संगलित होते हैं। जैसे-ोोहँ, मक्का।

(iii) सिप्सेला (Cypsella)-ये द्विअण्डपी, संयुक्त, अधो अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनमें चिरलग्न रोमगुच्छ पाया जाता है। जैसे-सूर्यमुखी, गैंदा आदि।

(iv) नट (Nut)-यह फल एककोष्ठीय, व एकबीजी होते हैं और द्वि या बहुअण्डपी संयुक्त ऊर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। जैसे—काजू, लीची, सिंघाड़ा।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 19
3. फिद्र फल (Schizocarpic fruit)- ये बहुवीजी होते हैं, परिपक्व होने पर ये छोटे-छोटे फलाशुकों (mericarp) में टूट जाते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 20

(i) लोमेट् (Lomentum) – ये फल एकाण्डपी ऊर्ष्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इसमें फलभित्ति संकीर्णित होकर फल को एकबीजी फलाशुकों में बाँट देती है। जैसे-इमली, बबूल आदि।

(ii) क्रीमोकार्प (Cremocarp)- ये फल द्विकोष्ठीय तथा द्विबीजी होते हैं। और द्विअण्डपी अधो अण्डाशय से विकसित होते हैं। जैसे-धनिया, जीरा आदि।

(iii) कासेंससस (Carcerulus)-ये फल कर्श्व द्विअण्डपी खीकेसर से विकसित होते हैं। प्रत्येक अण्डाशय एक फलांशक में बैंट जाता है जैसे तुलसी, साल्विया आदि।

(iv) रेग्मा (Regma)- ये फल बहुअण्डपी खीकेसर से विकसित और पकने पर एकबीजी इकाइयों कोकाई में बैंट जाते हैं। जैसे-अरण्ड में।

(ब) सरस फल (Succulent fruits) – ये फल अफुटन शील होते हैं तथा इनकी फलभित्ति गूदेदार होती है। इन फलों की फलभित्ति तीन भागों- बाह्य फल (epicarp) मध्यफलंभित्ति (mesocarp) तथा अन्त: फलभित्ति (endocarp) में बंटी होती हैं। ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
1. अस्ठिफल (Drupe)-ये फल एकाण्डपी या बहुअण्डपी, संयुक्त, ऊर्ष्व अण्डा शप से विकसित होते हैं। इनकी बाह्य फल भित्ति पतली होती है जो छिलका बनाती है।मध्य फलभित्ति गूदेदार या रेशेदार तथा अतः फलभित्ति काष्ठीय कठोर होती हैं। औैसे-आम, नारियल।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 21
2. बेरी (Berry)- ये फल एक या बहुअण्डपी, संयुक्त अण्डाशय से विकसित होते हैं। बाह्म फल भित्ति पतली होती है। बीज मध्यफल भित्ति में धंसे
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 22
होते हैं, अन्तः फलभित्ति झिल्लीनुमा या गूदेदार होती है। जैसे-टमाटर, केला, अमरुद आदि।

3. पेपो (Pepo) – ये फल बहुत कुछ बेरी के समान होते हैं। परन्तु ये भित्तिय बीजाण्डन्यास (parietal placentation) युक्त अधो अण्डाशय से विकसित होते हैं। औसे-खीरा, ककड़ी आदि।

4. पोम (Pome)- यह कूट फल (False fruit) है। फल का खाने योग्य भाग माँसल पुस्पासन (thalamus) होता है। यह संयुक्त अधोअण्डाशय (Inferior ovary) के चारों ओर पुस्पासन फैलने से बनता है। औसे-सेब, नाशपाती ।

5. हैस्पीरीडियम (Hesperi- dium)-ये फल बहुअण्डपी, ऊर्ष्व अण्डाशय (superior ovary) से विकसित होते हैं। बाह फलभित्ति चर्मिल व तेल प्रन्थि युक्त, मध्य फलभित्ति रेशेदार व पतली, तथा अत: फलभित्तिनुमा होती है जिससे सरस प्रन्थिल रोम लगे होते हैं जो खाए जाते हैं। औसे-संतरा, नींबू ।

6. बालोस्टा (Balausta)-इन फलों की फलभित्ति कठोर होती है। बीज बीजाण्डासन (placenta) पर अनियमित रूप से लगे रहते हैं। अन्तः फल भिति कठोर व चीमड़ होती हैं। सरस बीज चोलक खाये जाते हैं। जैसे-अनार।

7. ऐम्फीसरका (Amphisarca)-इनकी बाह्य फलभित्ति काष्ठीय (woody) होती है। मध्य तथा अन्त:फलभित्ति तथा बीजाण्डासन (placenta) गूदेदार होता है जो खाया जाता है। औैसे-बेल, कैथ आदि।

II. पुंज फल या समूह फल (Aggregate fruits or Etaerio Fruits) वास्तव में इस प्रकार के फल, फलों के समूह हैं जो बहुअण्डपी पृथक अण्डपी (Multicarpellary appocarpous) अण्डाशय (ovary) से विकसित होते हैं। ये सभी एक साथ पकते हैं इसीलिए इन्हें पुंज फल कहते हैं। ये अनेक लघु फलों से मिलकर बनते हैं। पुंज फल निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –

1. एकीनो का पुंज ( Etaerio of Achenes )-इनमें इकाई फल (fruitlets) एकीन होते हैं। स्ट्रॉबेरी में एकील गूदेदार पुष्पासन (flashy thalamus) पर लगे होते हैं। नारवेलिया, क्लीमेटिस आदि में एकीन में रोमयुक्त (feathery) चिरलग्न (persistent) वर्तिका ( style) होती है
2. फालिकिलों का पुंज (Etaerio of follicles) इनमें लघु इकाई फॉलिकिल होती हैं इसमें दो या अधिक फॉलिकिल जुड़े रहते हैं जैसे—मदार, एकोनाइटम, स्टरक्यूलिया आदि ।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 23
3. बेरी का पुंज (Etaerio of Berries) इनमें लघु इकाई बेरी होती हैं। ये सरस फल आपस में बिना जुड़े पुंजफल बनाते हैं, जैसे कंटीली चम्पा अथवा आपस में जुड़कर एक फल बनाते हैं जैसे शरीफा। शरीफा में एक सामूहिक छिलका बन जाता है।

4. अष्ठिफल का पुंज (Etaerio of Drups) इसमें कुछ लघुफल, डुप (drupe) आपस में मिलकर एक पुंज बनाते हैं। जैसे रसभरी ।

III. संग्रथित फल (Composite or Multiple fruits) संमधित फलों का निर्माण सम्पूर्ण पुष्पक्रम (inflorescence) से होता है। पुष्पक्रम (Inflorescence) के अनेक भाग जैसे- सहपत्र (bracts), पुस्पाक्ष (peduncle) तथा परिदल (tapals) आदि मिलकर फल के भागों में परिवर्तित हो जाते हैं अतः ये कूटफल (false fruits) कहलाते हैं। ये मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –
1. सोरोसिस (Sorosis)-ये फल मंजरी (catkin), स्थूल मंजरी (spadix) शूकी (spike) आदि पुष्पक्रमों (Inflorescence) से विकसित होते हैं। A जैसे – शहतूत (Mulberry) में वास्तविक फल तो ऐकीन (achene) होती हैं किन्तु इसमें पुष्पक्रम के सभी भाग मिलकर फल को प्रदर्शित करते हैं। कटहल (jack fruit) अनन्नास ( pineap मिलकर छिलका (rind) बनाते हैं जबकि पुष्पक्रम के अन्य भाग सरस एवं मांसल होकर फल के गूदे को प्रदर्शित करते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 24

2. साइकोनस (Syconus)-ये फल हायपैन्थोडियम (hypanthodium) पुष्पक्रम से विकसित होते हैं। इसमें पुष्पक्रम का पुष्पाक्ष ( peduncle) या. पुष्पावलि वृन्त (mother axis) रूपान्तरित होकर एक कप जैसी रचना आशय बना लेता है। आशय (receptacle) परिपक्व होकर मांसल (fleshy) हो जाता है जो फल का खाने योग्य भाग है। आशय के अन्दर असंख्य पुष्पों से अलग-अलग लघु फल बनते हैं, जो एकीन (achene ) होते हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-
(क) संप्रथिल फल
(ख) पुंज फल।
उत्तर:
II. पुंज फल या समूह फल (Aggregate fruits or Etaerio Fruits) वास्तव में इस प्रकार के फल, फलों के समूह हैं जो बहुअण्डपी पृथक अण्डपी (Multicarpellary appocarpous) अण्डाशय (ovary) से विकसित होते हैं। ये सभी एक साथ पकते हैं इसीलिए इन्हें पुंज फल कहते हैं। ये अनेक लघु फलों से मिलकर बनते हैं। पुंज फल निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –

1. एकीनो का पुंज ( Etaerio of Achenes )-इनमें इकाई फल (fruitlets) एकीन होते हैं। स्ट्रॉबेरी में एकील गूदेदार पुष्पासन (flashy thalamus) पर लगे होते हैं। नारवेलिया, क्लीमेटिस आदि में एकीन में रोमयुक्त (feathery) चिरलग्न (persistent) वर्तिका ( style) होती है
2. फालिकिलों का पुंज (Etaerio of follicles) इनमें लघु इकाई फॉलिकिल होती हैं इसमें दो या अधिक फॉलिकिल जुड़े रहते हैं जैसे—मदार, एकोनाइटम, स्टरक्यूलिया आदि ।
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3. बेरी का पुंज (Etaerio of Berries) इनमें लघु इकाई बेरी होती हैं। ये सरस फल आपस में बिना जुड़े पुंजफल बनाते हैं, जैसे कंटीली चम्पा अथवा आपस में जुड़कर एक फल बनाते हैं जैसे शरीफा। शरीफा में एक सामूहिक छिलका बन जाता है।

4. अष्ठिफल का पुंज (Etaerio of Drups) इसमें कुछ लघुफल, डुप (drupe) आपस में मिलकर एक पुंज बनाते हैं। जैसे रसभरी ।

III. संग्रथित फल (Composite or Multiple fruits) संमधित फलों का निर्माण सम्पूर्ण पुष्पक्रम (inflorescence) से होता है। पुष्पक्रम (Inflorescence) के अनेक भाग जैसे- सहपत्र (bracts), पुस्पाक्ष (peduncle) तथा परिदल (tapals) आदि मिलकर फल के भागों में परिवर्तित हो जाते हैं अतः ये कूटफल (false fruits) कहलाते हैं। ये मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –
1. सोरोसिस (Sorosis)-ये फल मंजरी (catkin), स्थूल मंजरी (spadix) शूकी (spike) आदि पुष्पक्रमों (Inflorescence) से विकसित होते हैं। A जैसे – शहतूत (Mulberry) में वास्तविक फल तो ऐकीन (achene) होती हैं किन्तु इसमें पुष्पक्रम के सभी भाग मिलकर फल को प्रदर्शित करते हैं। कटहल (jack fruit) अनन्नास ( pineap मिलकर छिलका (rind) बनाते हैं जबकि पुष्पक्रम के अन्य भाग सरस एवं मांसल होकर फल के गूदे को प्रदर्शित करते हैं।
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2. साइकोनस (Syconus)-ये फल हायपैन्थोडियम (hypanthodium) पुष्पक्रम से विकसित होते हैं। इसमें पुष्पक्रम का पुष्पाक्ष ( peduncle) या. पुष्पावलि वृन्त (mother axis) रूपान्तरित होकर एक कप जैसी रचना आशय बना लेता है। आशय (receptacle) परिपक्व होकर मांसल (fleshy) हो जाता है जो फल का खाने योग्य भाग है। आशय के अन्दर असंख्य पुष्पों से अलग-अलग लघु फल बनते हैं, जो एकीन (achene ) होते हैं।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में अन्तर लिखिए-
(क) प्रकन्द एवं घनकन्द
(ख) उपरिस्तरी एवं भूस्तारी
(ग) पुंज फल तथा संग्रथित फल।
उत्तर:
तने के रूपान्तरण (Modifications of Stem):
1. अर्धवायवीय रूपान्तरण (Sub-aerial modifications):
(अं) उपरिभूस्तारी (Runner ) – इनका तना कमजोर तथा पतला होता है। यह भूमि की सतह पर फैलकर अनेक शाखाएँ उत्पन्न करता है। इनकी पर्व सन्धियों (nodes) से ऊपर की ओर पत्तियाँ, शाखाएँ व कलिकाएँ (buds) उत्पन्न होती हैं व भूमि की ओर अपस्थानिक जड़ें (advontitious roots) उत्पन्न होती हैं। उदाहरण दूबघास (Cynodon) खट्टी बूटी (Oxalis) आदि।

(ब) भूस्तारी (Stolon ) – इसमें शाखाएँ छोटी एवं तने संघनित होकर सभी दिशाओं में निकलती हैं। इसमें भूमिगत तने की पर्वसन्धि (Node) से कक्षस्थ कलिका (axillary bud) विकसित होकर शाखा बनाती हैं। यह शाखा प्रारम्भ में सीधे ऊपर की ओर वृद्धि करती है परन्तु बाद में झुककर क्षैतिज हो जाती है। इसकी पर्व सन्धियों से कक्षस्य कलिकाएँ तथा अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं उदाहरण – अरबी (Calocacia ), स्ट्रोबेरी आदि।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 29
(स) अन्तः भूस्तारी ( Sucker ) इनमें मुख्य तना भूमि के भीतर रहता है व इनके आधारीय पर्व सन्धियों पर स्थित कक्षस्थ कलिकाएँ वृद्धि करके नये वायवीय भाग का निर्माण करती हैं। प्रारम्भ में यह क्षैतिज वृद्धि करती है, फिर तिरछे होकर भूमि से बाहर आकार वायवीय शाखाओं की भाँति वृद्धि करती है। इनकी पर्व सन्धियों से अपस्तानिक जड़ें निकलकर जमीन में प्रवेश कर जाती हैं। जैसे— पोदीना (Mentha), गुलदाऊदी (Chrysanthemum) आदि।

(द) भूस्तारिका (Offset) – यह जलीय पौधों में पाया जाने वाला उपरिभूस्तारी तरह का रूपान्तरित तना होता है। इसके मुख्य तने से पार्श्व शाखाएँ निकलती हैं जिन पर पर्व सन्धियाँ होती हैं। पर्व सन्धियों से वायवीय पत्तियाँ तथा जलीय अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं। पर्व के रूपान्तरित तना होता है। इसके मुख्य तने से पार्श्व शाखाएँ निकलती हैं जिन पर पर्व सन्धियाँ होती हैं। पर्व सन्धियों से वायवीय पत्तियाँ तथा जलीय अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं। पर्व के टूटने से नये पौधे स्वतन्त्र हो जाते हैं जैसे-जलकुम्भी (Echomnia), पिस्टिया (Pistia ) आदि।

2. भूमिगत रूपान्तरण (Underground modifications):
भूमिगत रूपान्तरण मुख्यतः भोजन संचयन (food storage) या वर्षी प्रजनन (vegetative propagation) के लिए होता है। यह निम्न प्रकार का होता

(अ) तना कन्द (Stem tuber) – यह भूमिगत शाखाओं के अन्तिम शिरों के भोजन संचय के कारण फूलने से बनते हैं। इनका आकार अनियमित होता है। कन्द पर पर्व व पर्व सन्धियाँ (intemnodes and nodes) होती हैं जो अधिक भोजन संचय के कारण स्पष्ट नहीं होती है। इन पर अनेक आँखें (eyes) होती है जिनमें कलिकाएँ तथा शल्क पत्र (scale leave) होते हैं। कलिकाएँ (buds ) वृद्धि करके नये प्ररोह को जन्म देती हैं। उदाहरण-आलू।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 30

(ब) शल्क कन्द (Bulbs ) – यह भूमिगत संघनित प्ररोह (condensed shoot) है। यह शंक्वाकार या गोलाकार होते हैं। इनका तना लेमन्स या डिस्क के आकार का होता है जिस पर अनेक माँसल शल्क पत्र तथा एक शीर्षस्थ कलिका (apical bud) होती है। ह (reduced) तने के नीचे से असंख्य अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं, जैसे- प्याज (Alium), लहसुन (Garlic), लिली (Lily ) आदि।

(स) प्रकन्द (Rhizome ) – यह एक भूमिगत, बहुवर्षीय, मांसल, अनियमित आकार का भूमिगत तना है जो अनुकूल समय में वायवीय प्ररोह (aerial shoot) या पर्ण समूह उत्पन्न करता है व प्रतिकूल मौसम में यह प्रसुप्तावस्था (dormancy) दर्शाता है। इस पर पर्व एवं पर्व सन्धियाँ, शल्क पत्र तथा कक्षस्थ कलिकाएँ (axilary buds) पायी जाती हैं व निचली सतह से अपस्थानिक जड़ें (adventitious roots) निकलती हैं। उदाहरण- अदरक (ginger), केला (banana ), हल्दी (termaric) आदि।

(द) घनकन्द (Corn) – यह लगभग गोलाकार, मोटा फूला हुआ भूमिगत तना है जो जमीन में ऊर्ध्वाधर (Vertical) वृद्धि करता है। यह प्रकन्द का सघनतम रूप माना जाता है। इसके आधार से अनेक अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं तथा शीर्ष पर पर्णयुक्त वायवीय प्ररोह होता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में वायवीय प्ररोह सूख जाता है। इस पर गोलाकार पर्वसन्धियाँ (nodes) होती हैं जिन पर नई कलिकाएँ उत्पन्न होती हैं। उदाहरण- अरबी, क्रोकस (Crocus)

3. वायवीय रूपान्तरण (Aerial Modifications):

(अ) पर्णाभ स्तम्भ (Phylloclade ) – जिन पौधों में तना मांसल पत्ती (Flashy leaf) के रूप में परिवर्तित होकर चपटा, हरा होकर पत्ती की तरह कार्य करता है इस तरह के रूपान्तरित तने को पर्णाभ स्तम्भ (Phylloclade) कहते हैं। इन पौधों में पत्तियाँ सामान्यतः काँटों में परिवर्तित हो जाती हैं। प्रत्येक पर्णाभ में पर्व तथा पर्व सन्धियाँ पायी जाती हैं। प्रत्येक पर्व से पत्तियाँ निकलती हैं जो शीघ्र ही कांटों में बदल जाती हैं। उदाहरण-नागफनी (Opuntia), केक्टस (Cactus), यूफोर्बिया (Euphorbia), कोकोलोबा (Cocoloba) आदि।

(ब) पर्णाभ पर्व (Cladode) इनमें कक्षस्थ कलिका के स्थान पर निश्चित वृद्धि वाली हरी पत्ती के समान रचना पायी जाती है व इनमें शाखा केवल एक पर्व की तरह रह जाती है। पत्ती शल्क पत्र के समान होती है। उदाहरण — एस्पेरागस (Asperagus)।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 31
(स) स्तम्भीय तन्तु या स्तम्भ प्रतान (Stem tendrils) – लम्बी, पतली धागे के समान रचनाएँ प्रतान (tendrils) कहलाती हैं। तने के रूपान्तरण से बनने वाले प्रतान स्तम्भ, प्रतान कहलाते हैं। यह आधार पर मोटे तथा शीर्ष की ओर उत्तरोत्तर (successive) पतले होते जाते हैं। इन पर पर्व व पर्व सन्धियाँ हो सकती हैं। कभी-कभी पुष्प भी उत्पन्न होते हैं। मुख्यतः यह कक्षस्य कलिका से व कभी-कभी अप्रस्थ कलिका से बनते हैं। उदाहरण- अंगूर ( Vitis), झुमकलता (Passiflora) आदि ।

(द) स्तम्भ कंटक (Stem thor) – कक्षस्थ या अग्रस्थ कलिकाओं से बने हुए कांटे स्तम्भ कंटक कहलाते हैं। यह कठोर, नुकीली, आधार पर मोटी तथा शीर्ष पर नुकीली संरचनाएँ होती हैं। यह पौधों की सुरक्षा के साथ-साथ वाष्पोत्सर्जन (transpiration) को कम करते हैं व कभी-कभी पौधे के आरोहण (climbing) में भी सहायता करते है। यह मुख्यतः मरुभिपौधों (Xerophytes) में पाये जाते हैं। उदाहरण- बोगेनविलिया (Baugainvillea ), बेल (Aegle )।

(य) पत्र प्रकलिकाएँ (Bulbils) पत्र प्रकलिकाओं द्वारा भोजन संचय के कारण बनते हैं। इनका प्रमुख कार्य कायिक प्रवर्धन (vegetative propagation) करना है। उदाहरण- रतालू (Dioscoria), केवड़ा (Agave), खट्टी बूटी (Oxalis) आदि।

फलों के प्रकार (Types of Fruits) – साधारणतयाः फल तीन प्रकार के होते हैं –
I. एकल फल (Simple Fruits)
II. पुंजफल (Aggregate Fruits)
III. संमथित फल (Composite Fruits) ।

I. सरस या एकल फल (Simple Fruits) – ये फल एकअण्डपी अथवा बहुअण्डपी युक्ताण्डपी अण्डाशय (unicarpalary or multicarpalary syncarpous ovary) से विकसित होते हैं। अण्डाशय मध्यवर्ती या अधोवर्ती (inferior) होता है। ये फल दो प्रकार के होते है-
(अ) शुष्क फल
(ब) सरस फल।

(अ) शुष्ठ का (Dry fruits)-इसकी फलभित्ति (Pericarp) शुक्क, कठोर, चीमड़, काष्ठीय या श्रिल्लीदार होती है। ये फल तीन प्रकार के होते हैं –
1. स्फोटी
2. अस्फोटी तथा
3. भिदुर फल।

1. स्फोटी फल (Dehiscent Fruit)- ये पकने पर फट जाते हैं। ये निम्न प्रकार के होते है –
(i) फली (Legume or pod) – ये एकाण्डपी ऊर्ष्व अण्डाशय (Monocarpalary superiou ovary) से विकसित होते हैं। परिपक्व फल पकने पर दो सीवनी द्वारा फटता है। जैसे-सेम, मटर आदि।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 18
(ii) फालिकल (Follicle)-इनमें केवल एक सीवनी (suture) द्वारा स्फुटन (dehiscence) होता है। शेष गुण फली के समान होते हैं। जैसे-आक, चम्पा आदि।

(iii) सिलिकुआ (Siliqua) – यह फल द्विअण्डपी, संयुक्त, ऊर्ष्व अण्डाशय (bicapalary, compound superior ovary) से विकसित होता है। आरम्भ में अण्डाशय एककोष्ठी किन्तु बाद में कूट पट (replum) बन जाने से द्विकोष्ठी दिखाई देता है, जैसे-सरसों।

(iv) सिलिक्युला (Silicula)- यह पूर्णत: सिलिक्यूआ के समान होता है। परन्तु यह लम्बाई व चौड़ाई में समान होता है। जैसे-कैपसल्ला।

(v) सम्पुट (Capsule)- ये फल बहुअण्डपी, संयुक्त, ऊर्ष्व अण्डाशय तथा कभी-कभी अधो अण्डाशय से विकसित होते हैं। ये विभिन्न विधियों द्वारा स्फुटित होते हैं। जैसे- कपास, पोस्त, भिण्डी आदि।

2. अस्फोटी या एकीनियल (Indihiscent or Achenial)- ये फल पकने पर फटते नहीं। इनके बीज फल के सड़ने पर ही प्रकीर्णित होते हैं। ये फल निम्न प्रकार के होते हैं-
(i) एकीन (Achene)- ये फल एकाण्डपी, ऊर्ष्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनमें फलधित्ति बीज चोल से अलग होती है। जैसे-क्लीमेटिस, रेनकुलस आदि।

(ii) कैरिऑफिस (Caryopsis) – ये एकाण्डपी ऊर्ष्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनमें फलभित्ति बीजचोल से संगलित होते हैं। जैसे-ोोहँ, मक्का।

(iii) सिप्सेला (Cypsella)-ये द्विअण्डपी, संयुक्त, अधो अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनमें चिरलग्न रोमगुच्छ पाया जाता है। जैसे-सूर्यमुखी, गैंदा आदि।

(iv) नट (Nut)-यह फल एककोष्ठीय, व एकबीजी होते हैं और द्वि या बहुअण्डपी संयुक्त ऊर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। जैसे—काजू, लीची, सिंघाड़ा।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 19
3. फिद्र फल (Schizocarpic fruit)- ये बहुवीजी होते हैं, परिपक्व होने पर ये छोटे-छोटे फलाशुकों (mericarp) में टूट जाते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 20

(i) लोमेट् (Lomentum) – ये फल एकाण्डपी ऊर्ष्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इसमें फलभित्ति संकीर्णित होकर फल को एकबीजी फलाशुकों में बाँट देती है। जैसे-इमली, बबूल आदि।

(ii) क्रीमोकार्प (Cremocarp)- ये फल द्विकोष्ठीय तथा द्विबीजी होते हैं। और द्विअण्डपी अधो अण्डाशय से विकसित होते हैं। जैसे-धनिया, जीरा आदि।

(iii) कासेंससस (Carcerulus)-ये फल कर्श्व द्विअण्डपी खीकेसर से विकसित होते हैं। प्रत्येक अण्डाशय एक फलांशक में बैंट जाता है जैसे तुलसी, साल्विया आदि।

(iv) रेग्मा (Regma)- ये फल बहुअण्डपी खीकेसर से विकसित और पकने पर एकबीजी इकाइयों कोकाई में बैंट जाते हैं। जैसे-अरण्ड में।

(ब) सरस फल (Succulent fruits) – ये फल अफुटन शील होते हैं तथा इनकी फलभित्ति गूदेदार होती है। इन फलों की फलभित्ति तीन भागों- बाह्य फल (epicarp) मध्यफलंभित्ति (mesocarp) तथा अन्त: फलभित्ति (endocarp) में बंटी होती हैं। ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
1. अस्ठिफल (Drupe)-ये फल एकाण्डपी या बहुअण्डपी, संयुक्त, ऊर्ष्व अण्डा शप से विकसित होते हैं। इनकी बाह्य फल भित्ति पतली होती है जो छिलका बनाती है।मध्य फलभित्ति गूदेदार या रेशेदार तथा अतः फलभित्ति काष्ठीय कठोर होती हैं। औैसे-आम, नारियल।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 21
2. बेरी (Berry)- ये फल एक या बहुअण्डपी, संयुक्त अण्डाशय से विकसित होते हैं। बाह्म फल भित्ति पतली होती है। बीज मध्यफल भित्ति में धंसे
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 22
होते हैं, अन्तः फलभित्ति झिल्लीनुमा या गूदेदार होती है। जैसे-टमाटर, केला, अमरुद आदि।

3. पेपो (Pepo) – ये फल बहुत कुछ बेरी के समान होते हैं। परन्तु ये भित्तिय बीजाण्डन्यास (parietal placentation) युक्त अधो अण्डाशय से विकसित होते हैं। औसे-खीरा, ककड़ी आदि।

4. पोम (Pome)- यह कूट फल (False fruit) है। फल का खाने योग्य भाग माँसल पुस्पासन (thalamus) होता है। यह संयुक्त अधोअण्डाशय (Inferior ovary) के चारों ओर पुस्पासन फैलने से बनता है। औसे-सेब, नाशपाती ।

5. हैस्पीरीडियम (Hesperi- dium)-ये फल बहुअण्डपी, ऊर्ष्व अण्डाशय (superior ovary) से विकसित होते हैं। बाह फलभित्ति चर्मिल व तेल प्रन्थि युक्त, मध्य फलभित्ति रेशेदार व पतली, तथा अत: फलभित्तिनुमा होती है जिससे सरस प्रन्थिल रोम लगे होते हैं जो खाए जाते हैं। औसे-संतरा, नींबू ।

6. बालोस्टा (Balausta)-इन फलों की फलभित्ति कठोर होती है। बीज बीजाण्डासन (placenta) पर अनियमित रूप से लगे रहते हैं। अन्तः फल भिति कठोर व चीमड़ होती हैं। सरस बीज चोलक खाये जाते हैं। जैसे-अनार।

7. ऐम्फीसरका (Amphisarca)-इनकी बाह्य फलभित्ति काष्ठीय (woody) होती है। मध्य तथा अन्त:फलभित्ति तथा बीजाण्डासन (placenta) गूदेदार होता है जो खाया जाता है। औैसे-बेल, कैथ आदि।

II. पुंज फल या समूह फल (Aggregate fruits or Etaerio Fruits) वास्तव में इस प्रकार के फल, फलों के समूह हैं जो बहुअण्डपी पृथक अण्डपी (Multicarpellary appocarpous) अण्डाशय (ovary) से विकसित होते हैं। ये सभी एक साथ पकते हैं इसीलिए इन्हें पुंज फल कहते हैं। ये अनेक लघु फलों से मिलकर बनते हैं। पुंज फल निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –

1. एकीनो का पुंज ( Etaerio of Achenes )-इनमें इकाई फल (fruitlets) एकीन होते हैं। स्ट्रॉबेरी में एकील गूदेदार पुष्पासन (flashy thalamus) पर लगे होते हैं। नारवेलिया, क्लीमेटिस आदि में एकीन में रोमयुक्त (feathery) चिरलग्न (persistent) वर्तिका ( style) होती है

2. फालिकिलों का पुंज (Etaerio of follicles) इनमें लघु इकाई फॉलिकिल होती हैं इसमें दो या अधिक फॉलिकिल जुड़े रहते हैं जैसे—मदार, एकोनाइटम, स्टरक्यूलिया आदि ।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 23
3. बेरी का पुंज (Etaerio of Berries) इनमें लघु इकाई बेरी होती हैं। ये सरस फल आपस में बिना जुड़े पुंजफल बनाते हैं, जैसे कंटीली चम्पा अथवा आपस में जुड़कर एक फल बनाते हैं जैसे शरीफा। शरीफा में एक सामूहिक छिलका बन जाता है।

4. अष्ठिफल का पुंज (Etaerio of Drups) इसमें कुछ लघुफल, डुप (drupe) आपस में मिलकर एक पुंज बनाते हैं। जैसे रसभरी ।

III. संग्रथित फल (Composite or Multiple fruits) संमधित फलों का निर्माण सम्पूर्ण पुष्पक्रम (inflorescence) से होता है। पुष्पक्रम (Inflorescence) के अनेक भाग जैसे- सहपत्र (bracts), पुस्पाक्ष (peduncle) तथा परिदल (tapals) आदि मिलकर फल के भागों में परिवर्तित हो जाते हैं अतः ये कूटफल (false fruits) कहलाते हैं। ये मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –
1. सोरोसिस (Sorosis)-ये फल मंजरी (catkin), स्थूल मंजरी (spadix) शूकी (spike) आदि पुष्पक्रमों (Inflorescence) से विकसित होते हैं। A जैसे – शहतूत (Mulberry) में वास्तविक फल तो ऐकीन (achene) होती हैं किन्तु इसमें पुष्पक्रम के सभी भाग मिलकर फल को प्रदर्शित करते हैं। कटहल (jack fruit) अनन्नास ( pineap मिलकर छिलका (rind) बनाते हैं जबकि पुष्पक्रम के अन्य भाग सरस एवं मांसल होकर फल के गूदे को प्रदर्शित करते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी - 24

2. साइकोनस (Syconus)-ये फल हायपैन्थोडियम (hypanthodium) पुष्पक्रम से विकसित होते हैं। इसमें पुष्पक्रम का पुष्पाक्ष ( peduncle) या. पुष्पावलि वृन्त (mother axis) रूपान्तरित होकर एक कप जैसी रचना आशय बना लेता है। आशय (receptacle) परिपक्व होकर मांसल (fleshy) हो जाता है जो फल का खाने योग्य भाग है। आशय के अन्दर असंख्य पुष्पों से अलग-अलग लघु फल बनते हैं, जो एकीन (achene ) होते हैं।

प्रश्न 9.
बीज किसे कहते हैं ? इसकी सामान्य रचना का वर्णन कीजिए। एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री में भेद कीजिए।
उत्तर:
बीच्च (Seed)-निषेचन के पश्चात् बीज्राण्ड (Ovule) एक विशेष संरषना बनाता है जिसे बीज (seed) कहते हैं। जित्र 5.54. कटछल का सोरोसिस बीज में भूण (embryo) पाया जाता है जो अंकुरण (germination) करके नये पौधे को अन्म देता है। बीजाम्ड की ओर (Sorosis of Jack Fruit) के आवरण (integuments) सूख जाते हैं। बाह्य आवरण सख व चपटा होकर बीज के बाह्म कवच (Testa) का निर्माण करता है। अन्तःआवरण अम्तकवच (tegmen) बनाता है। एक स्थान पर जहाँ बीज फल से जुड़ा रहता है, बाह़ कवच पर एक चिद्ध के रूप में वृन्सक होता है।
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पष्ष की संरचनाएँ जो बीज बनाती हैं।

निषेचन से पूर्व बीओ ज्ड (Ovule)निषेष्न के पश्वात् बीज (Seed)
बाझ अध्यावरण (Quter integument)बाह बीजचोल (testa)
अन्त: अध्यावरण (Inner integument)अन्त: बीजचोल (tegmen)
बीजाण्ड वृन्त (Funiculus)नष्ट हो जाता है
बीजाण्डकोष (Nucellus)नष्ट हो जाता है या परिश्रूणपोष (perisperm) बनाता है
अण्डकोशिका (Egg cell)भूण (embryo)

बीज के श्रूण में एक मूलांकर (rádicle), एक श्रूणीय तथा एक बीजपत्र (गेहँ, मक्का) या दो बीज पत्र (चना, मटर) होते हैं।

बीजों के प्रकार (Types of Seeds):
प्रूणकोष के आधार पर बीज तीन प्रकार के होते हैं –
1. भ्भूजवोपी बीज (Éndospermic seeds)-जब बीज में भ्रूण (endosperm) परिवर्धन के दोरान भ्रणणयोष (endosperm) का कुछ भाग बचा रहता है तो ऐसे भूणपोष युक्त्र बीजों को भूणपोषी बीज कहते हैं। यह भ्रूणपोष संचित भोजन के रूप में बीज से नवोद्भिद् (seedlings) के विकास में काम आता हैं। जैसे-अरण्डी, नारियल, गेहूँ एवं अन्य एक बीजपत्री पादपों के बीज आदि।

2. अश्रुणोोोी बीज (Non-endospermic seeds)- सामान्यत: द्विबीजपत्री पादपों के बीजों में परिकक्वन क्रिया के दौरान सम्पूर्ण भ्रुणकोष समाप्त हो जाता है। अतः ऐसे बीज अप्रूणपोषी कहलाते हैं। जैसे-चना, मटर, सेम आदि। ऐसे बीजों में बीजपत्र खाद्य संचित कर मोटे एवं मांसल हो जाते हैं।

3 परिणणपोषी बीज (Perispermic seeds)-इस प्रकार के बीजों में बीजाण्ड (ovule) का बीजाण्डकाय (nucellus) पतली झिल्ली के रूप में ऐेष रह जाता है जिसे परिप्रणपोप (perisperm) कहते हैं तथा बीज परिभ्रुणपोषी कहलाते हैं। उदाहरण-कालीमिर्ष ।

बीजपत्रों की उपस्थिति के आधार पर बीज दो प्रकार के होते हैं –

  • द्विबीजपत्री बीज
  • एकबीजपत्री बीज।

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HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

Haryana State Board HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत


(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. मछलियों के हृदय में कोष्ठों की संख्या होती है –
(A) 4
(B) 3
(C) 2
(D) 1
उत्तर:
(C) 2

2. केंकड़ा में कौन-सी सममिति पायी जाती है ?
(A) अरीय सममिति
(B) द्विपार्श्व सममिति
(C) असममिति
(D) गोलीय सममिति
उत्तर:
(B) द्विपार्श्व सममिति

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

3. किस जन्तु में शरीर खण्डीय नहीं होता है ?
(A) ऐस्केरिस व तारा मछली
(B) मिलीपीड
(C) फीताकृमि
(D) केंचुआ
उत्तर:
(A) ऐस्केरिस व तारा मछली

4. अगुहीय प्राणी किस संघ का लक्षण है ?
(A) आर्थोपोडा
(B) प्लेटीहेल्मिन्थीज
(C) ऐनेलिडा
(D) मोलस्का
उत्तर:
(B) प्लेटीहेल्मिन्थीज

5. सतही खण्डीभवन पाया जाता है –
(A) केंचुए में
(B) कॉकरोच में
(C) टीनिया सोलियम में
(D) ऑक्टोपस में
उत्तर:
(C) टीनिया सोलियम में

6. पुर्तगीज मैन ऑफ वार कहा जाने वाला जन्तु किस संघ से सम्बन्धित है –
(A) मौलस्का
(B) आर्थोपोडा
(C) निडेरिया
(D) कार्डेटा
उत्तर:
(A) मौलस्का

7. निम्न में से कौन-सा अण्डे देने वाला जन्तु है –
(A) प्लेटीपस
(B) फ्लाइंग फाक्स (चमगादड़ )
(C) हाथी
(D) व्हेल।
उत्तर:
(A) प्लेटीपस

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8. पक्षी व स्तनधारी निम्न में से कौन-सा लक्षण साझा करते हैं ?
(A) वर्णकी त्वचा
(B) कुछ रूपान्तरणों वाली आहारनाल
(C) जरायुजता
(D) समतापी।
उत्तर:
(D) समतापी।

9. ज्वाला कोशिकाएँ पायी जाती हैं –
(A) केंचुए में
(B) फीताकृमि में
(C) ऐस्केरिस में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(B) फीताकृमि में

10. रेतीजिल्हा (रेडूला) पाया जाता है –
(A) ऐनेलिडा में
(B) आर्थ्रोपोडा में
(C) मोलस्का में
(D) इकाइनोडर्मेटा में
उत्तर:
(C) मोलस्का में

11. जल- संवहन तन्त्र किस संघ की विशिष्टता है ?
(A) मोलस्का
(B) इकाइनोडर्मेटा
(C) वर्टीब्रेटा
(D) रेप्टीलिया
उत्तर:
(B) इकाइनोडर्मेटा

12. निम्न में जरायुज प्राणी है –
(A) मेंढक
(B) सर्प
(C) कंगारू
(D) बन्दर।
उत्तर:
(C) कंगारू

13. ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में साँस ले सकता है –
(A) अमीबा
(C) यूग्लीना
(B) फीताकृमि
(D) हाइड्रा
उत्तर:
(B) फीताकृमि

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14. निम्न में से कौन-सा एक सीलेण्ट्रेटस है –
(A) समुद्री अनि
(B) समुद्री घोड़ा
(C) समुद्री पेन
(D) समुद्री खीरा।
उत्तर:
(C) समुद्री पेन

15. पैरिप्लेनेटा अमेरिका के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से सही कथन का चुनाव कीजिए-
(A) इसमें पृष्ठीय तंत्रिका तंत्र होता है, जिसमें खण्डीय रूप से व्यवस्थित तंत्रिका गुच्छक लम्बवत् संयोजकों के एक युग्म द्वारा जुड़े होते हैं।
(B) नर में एक जोड़ी छोटे, धागे नुमा गुद शूक पाए जाते हैं
(C) इसमें मध्यांत्र तथा पश्चांत्र के जोड़ पर 16 अत्यधिक लम्बी मैल्पीषियन ट्यूबल्स पायी जाती है।
(D) भोजन को पीसने का कार्य केवल मुखांगों द्वारा ही किया जाता है।
उत्तर:
(B) नर में एक जोड़ी छोटे, धागे नुमा गुद शूक पाए जाते हैं

16. कॉलम 1 में दिए जन्तुओं को कॉलम II में दी गई इनकी विशिष्टताओं और कॉलम III में दिए गए उनके फाइलम / क्लास से सही-सही मिलान कीजिए –

कॉलम Iकॉलम IIकॉलम III
(A)  पेट्रोमाइजॉनबाह्स परजीवीसाइक्लोस्टोमेटा
(B) इथियोफिसस्थलीयरेप्टीलिया
(C) लिमुलसशरीर पर काइटनी बाह्य कंकालपिसीज
(D) एडेक्सिया, अरीय सममितिपॉरीफेरा

उत्तर:

17. निम्नलिखित जन्तुओं में से किस समूह का वर्गीकरण सही है ?
(A) उड़न मछली, कटल फिश, सिल्वर फिश – पिसीज
(B) सेंटीपीड, मिलीपीड, मकड़ी, बिच्छू कीट (इन्सेक्टा)
(C) घरेलू मक्खी, तितली, सेटसी फ्लाई, सिल्वर फिश – कीट ( इन्सेक्टा)
(D) शूली चींटीखोर (स्पाइनी एंटईटर), समुद्री आर्चिन, समुद्री कुकम्बर– इकाइनोडर्मेटा
उत्तर:
(C) घरेलू मक्खी, तितली, सेटसी फ्लाई, सिल्वर फिश – कीट ( इन्सेक्टा)

18. निम्नलिखित जन्तु समूहों में से कौन सा एक ही फाइलम के अन्तर्गत आते हैं ?
(A) मलेरिया, परजीवी, अमीबा, मच्छर
(B) केंचुआ, पिनवर्म, फीताकृमि (टेपवर्म)
(C) झींगा, बिच्छू, लोकस्ट (टिड्डी)
(D) स्पंज, समुद्री एनीमोन, स्टारफिश।
उत्तर:
(C) झींगा, बिच्छू, लोकस्ट (टिड्डी)

19. निम्नलिखित में से कौन सा जन्तु फाइलम आर्थोपोडा के अन्तर्गत आता है ?
(A) कटल फिश
(B) सिल्वर फिश
(C) फर फिश
(D) उड़न मछली।
उत्तर:
(B) सिल्वर फिश

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20. ???? उच्च क्षमता पायी जाती है। –
(A) कायान्तरण
(B) पुर्नजनन
(C) पीढ़ी एकान्तरण
(D) जैव प्रदीप्तिता
उत्तर:
(B) पुर्नजनन

21. कायान्तरण संदर्भित करता है-
(A) विभिन्न काय रूपों की उपस्थिति
(B) जीव की अलैंगिक तथा लैंगिक प्रावस्थाओं में पीढ़ी एकान्तरण F
(C) पश्च भ्रूणीय विकास में परिवर्तनों की उपस्थिति
(D) खण्डित शरीर तथा जनन की अनिषेक विधि
उत्तर:
(B) जीव की अलैंगिक तथा लैंगिक प्रावस्थाओं में पीढ़ी एकान्तरण F

22. घरेलू मक्खी के वर्गीकरण के लिए स्तंभ I तथा II का मिलान कीजिए तथा नीचे दिए गए कूटों से सही विकल्प का चयन कीजिए –

संभ Iस्तंभ II
(a) फेमिली1. डिपेरा
(b) ऑर्डर2. ऑर्थोपोडा
(c) क्लास3. म्यूसिडी
(d) फाइलम4. इनसेक्टा

उत्तर:

abcd
(a)2314
(b)3241
(c)4321
(d)4213

23. निम्न में से कौन-सा अभिलक्षण ऑर्थोपोडा में नहीं पाया जाता है ?
(A) मेटामोरिक खण्डीभवन
(B) पेरापोडिया
(C) संन्धियुक्त उपांग
(D) काइटिनी बाह्यकंकाल
उत्तर:
(B) पेरापोडिया

24. निम्न में से कौन-सा अभिलक्षण पक्षियों तथा स्तनधारियों द्वारा स्त्रावित नहीं होता है ?
(A) फेफड़ों द्वारा श्वसन
(B) जरायुजता
(C) गर्म रक्त प्रकृति
(D) अश्थिल अन्तःकंकाल
उत्तर:
(B) जरायुजता

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

25. पोरोफेरा में स्पंजगुहा कशाभित कोशिकाओं से आस्तरित रहती है उन्हें कहते हैं –
(A) आस्टिया
(B) ऑस्कुलम
(C) कोएनोसाइट्स
(D) मोसेनकाइमा कोशिकाएँ
उत्तर:
(C) कोएनोसाइट्स

(B) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्गीकरण के आधारभूत लक्षण लिखिए।
उत्तर:
वर्गीकरण के आधारभूत लक्षण निम्न हैं – कोशिका व्यवस्था, शारीरिक सममिति, शरीर योजना, प्रगुहा की प्रकृति, पाचन तन्त्र, परिसंचरण तन्त्र, जनन तन्त्र की रचना एवं पृष्ठीय रज्जु की उपस्थिति आदि।

प्रश्न 2.
अरीय सममिति किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जब किसी भी केन्द्रीय अक्ष से गुजरने वाली रेखा प्राणी के शरीर को दो समरूप भागों में विभाजित करती है तो इसे अरीय सममिति (radial symmetry) कहते हैं।

प्रश्न 3.
खुला रुधिर परिसंचरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
खुले परिसंचरण तन्त्र में रुधिर खुले स्थानों (open spaces a sinuses) में बहता है, रुधिर वाहिकाओं में नहीं। शरीर के अंग व ऊतक रक्त (हीमोलिम्फ) में डूबे रहते हैं। पर्याप्त दाब व बहाव का नियन्त्रण सम्भव नहीं होता।

प्रश्न 4.
बन्द रुधिर परिसंचरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब रुधिर का परिसंचरण बन्द नलिकाओं ( धमनियों, शिराओं व केशिकाओं) में होकर बहता है तो उसे बन्द परिसंचरण (closed circulation) कहते हैं।

प्रश्न 5.
मेटाजेनेसिस का क्या अर्थ है? इसको प्रदर्शित करने वाला एक उदाहरण दीजिए। (Exemplar Problem NCERT)
उत्तर:
मेटाजेनेसिस ( Metagenesis)-नीडेरियन जन्तुओं का पीढ़ी एकान्तरण ( alternation of generation ) जिसमें पॉलिप अलैंगिक जनन द्वारा मेड्यूला बनाता है तथा मेड्यूला लैंगिक जनन द्वारा पॉलिप उत्पन्न करता है, मेटाजेनेसिस कहलाता है।
उदाहरण – ओबेलिआ (Obelia)।

प्रश्न 6.
मिलान कीजिए –

जन्तुप्रचलन अंग
(a) आक्टोपस(i) पाद
(b) क्रोकोडाइल(ii) काम्ब प्लेट
(c) कटला(iii) रेक्टेकिल
(d) टीनोप्लेना(iv) फिन

उत्तर:

जन्तुप्रचलन अंग
(a) आक्टोपस(iii) रेक्टेकिल
(b) क्रोकोडाइल(i) पाद
(c) कटला(iv) फिन
(d) टीनोप्लेना(ii) काम्ब प्लेट

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

प्रश्न 7.
किन प्राणियों में केन्द्रीय जठर संवहनी गुहा पायी जाती है ?
उत्तर:
सीलेन्ट्रेटा (नीडेरिया) संघ के प्राणियों में केन्द्रीय जठर संवहनी गुहा (gastrovascular cavity) पायी जाती है।

प्रश्न 8.
सीलेन्ट्रेटा संघ के किस सदस्य के जीवन में पॉलिप तथा मेड्यूसा दोनों अवस्थाएँ पायी जाती हैं ? इसे क्या कहते हैं ?
उत्तर:
ओबेलिया में पॉलिप तथा मेड्यूसा दोनों अवस्थाएँ पायी जाती हैं। इसे पीढ़ी एकान्तरण (metagenesis) कहते हैं।

प्रश्न 9.
दंश कोशिकाएँ किस संघ के सदस्यों की विशेषता है ?
उत्तर:
देश कोशिकाओं (nemotoblasts) की उपस्थिति सीलेन्ट्रेटा संघ के सदस्यों की विशेषता है।

प्रश्न 10.
जीव संदीप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर:
प्राणी के द्वारा प्रकाश उत्सर्जन करने को जीव संदीप्ति (bioluminiscence) कहते हैं।

प्रश्न 11.
ज्वाला कोशिकाओं की उपस्थिति किस संघ की विशेषता है ?
उत्तर:
ज्वाला कोशिकाओं (Flame cells) की उपस्थिति प्लेटीहेल्मिन्थीज संघ की विशेषता है।

प्रश्न 12.
ऐस्केल्पिन्थी संघ के दो परजीवी जन्तुओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • एस्केरिस
  • बुचेरेरिया (फाइलेरिया कृमि)।

प्रश्न 13.
एनिलिडा संघ के प्राणियों के उत्सर्जी अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
एनिलिडा संघ के प्राणियों के उत्सर्जी अंग वृक्कक (nephridia )

प्रश्न 14.
आर्थोपोड जन्तुओं में किस प्रकार का परिसंचरण तन्त्र पाया जाता है ?
उत्तर:
आर्थ्रोपोड जन्तुओं में खुले प्रकार का परिसंचरण तन्त्र पाया जाता

प्रश्न 15.
जल-संवहन तन्त्र किस संघ की विशेषता है ? इसका कार्य बताइए।
उत्तर:
जल संवहन तन्त्र इकाइनोडर्मेटा संघ की विशेषता है। यह चलन (गमन), भोजन पकड़ने में तथा श्वसन में सहायक है।

प्रश्न 16.
हेमीकॉर्डेटा संघ के दो प्राणियों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
बैलेनोग्लॉसस तथा सैकोग्लॉसस।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

प्रश्न 17.
कॉर्डेटा (रज्जुकी) संघ की तीन प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • पृष्ठ रज्जु
  • पृष्ठ खोखली तन्त्रिका रज्जु
  • ग्रसनीय क्लोम छिद्र की उपस्थिति।

प्रश्न 18.
कॉईंटा संघ को किन तीन उपसंघों में बाँटा गया है ?
उत्तर:
कॉर्बेटा संघ को तीन उपसंघों में बाँटा गया है –

  • यूरोकॉर्डेटा
  • सेफैलोकॉर्डेटा तथा
  • वर्टीब्रेटा।

प्रश्न 19.
यूरोकॉडेंटा तथा सेफैलोकडिंटा का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
यूरोकॉर्डेटा – एसिडिया, सैल्फ।
सेफैलोकॉडेंटा- ऐम्फी ऑक्सस।

प्रश्न 20.
साइक्लोस्टोमेटा के दो जन्तुओं के नाम बताइए।
उत्तर:
पेट्रोमाइजोन (लैम्प्रे) तथा मिक्सीन (हैगफिश 1)

प्रश्न 21.
साइक्लोस्टोमेटा वर्ग की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • साइक्लोस्टोमेटा वर्ग के जन्तु समुद्री होते हैं, किन्तु जनन के लिए अलवणीय जल में प्रवास करते हैं।
  • ये प्रायः मछलियों के बाह्य परजीवी होते हैं।

प्रश्न 22.
उपास्थिल मछलियों के वर्ग का नाम बताइए तथा दो मछलियों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
उपास्थिल मछलियों को कॉन्ड्रिक्थीज वर्ग में रखा गया है। स्कोलियोडोन (डॉगफिश), प्रीस्टिस (सॉनफिश), ट्राइगोन (व्हेलशार्क) इनके उदाहरण हैं।

प्रश्न 23.
समुद्री घोड़ा किस वर्ग का प्राणी है ?
उत्तर:
समुद्री घोड़ा एक प्रकार की मछली है, जो मत्स्य वर्ग का प्राणी है।

प्रश्न 24.
वर्ग ऑस्टिक्थीज की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • चार जोड़ी क्लोम छिद्र दोनों ओर प्रच्छद (आस्कुलम) से ढँके हुए होते हैं
  • अन्त:कंकाल अस्थियों का बना होता है। उदाहरण – रोहू, कतला, मांगुर आदि मछलियाँ।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

प्रश्न 25.
उड़न मछली किस वर्ग की सदस्य है ? उसका वैज्ञानिक नाम लिखिए।
उत्तर:
उड़न मछली ऑस्टिक्थीज वर्ग की सदस्य है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘एक्सोसीटस’ है।

प्रश्न 26.
उभयचर प्राणियों के हृदय में कितने कोष्ठ होते हैं ?
उत्तर:
उभयचर प्राणियों का हृदय त्रिकोष्ठीय होता है।

प्रश्न 27.
सरीसृप वर्ग के किस प्राणी का हृदय चार कोष्ठीय होता है ?
उत्तर:
सरीसृप वर्ग के ‘मगरमच्छ’ का हृदय चार कोष्ठीय होता है।

प्रश्न 28.
पक्षियों की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • मुख के आगे चोंच होती है
  • अग्रपाद पंखों में रूपान्तरित होते हैं।

प्रश्न 29.
न उड़ सकने वाले दो पक्षियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
ऐमू, शुतुरमुर्ग तथा पेंग्विन न उड़ सकने वाले पक्षी हैं।

प्रश्न 30.
अण्डे देने वाले स्तनधारी का नाम लिखिए।
उत्तर:
डकबिल्ड प्लेटीपस अण्डे देने वाला स्तनधारी प्राणी है।

प्रश्न 31.
अविकसित शिशु को जन्म देने वाले प्राणी का नाम लिखिए।
उत्तर:
मादा कंगारू अविकसित शिशु को जन्म देती है। यह इसे पूर्ण परिपक्व होने तक ‘मार्सपियम’ नामक पेट के आगे थैली में रखती है जिसमें स्तन होते हैं।

प्रश्न 32.
उड़ने वाले स्तनधारी का नाम लिखिए।
उत्तर:
चमगादड़ एक उड़ने वाला स्तनधारी है।

प्रश्न 33.
पृथ्वी पर सबसे विशालकाय जीवित प्राणी का नाम लिखिए।
उत्तर:
ब्लू ह्वेल (Blue whale) पृथ्वी पर सबसे बड़ा जीवित प्राणी है। इसकी लम्बाई लगभग 32 मीटर तथा वजन 150 टन तक होता है।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

(C) लघु उत्तरीय एवं निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सममिति किसे कहते हैं ? जन्तुओं में सममिति कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर:
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 3 जीव जगत का वर्गीकरण - 2

प्रश्न 2.
इकाइनोडर्मेटा संघ के कोई चार विशेष लक्षण लिखिये।
उत्तर:
इकाइनोडर्मेटा संघ के चार विशेष लक्षण –

  •  इस संघ के सभी सदस्य समुद्री जल में पाये जाते हैं।
  • इनकी खुरदरी, दृढ़, चीमड़ देहभित्ति में कैल्सियम युक्त कंटक पाये जाते हैं।
  • गमन के लिये विशेष प्रकार के छोटे-छोटे नाल- पाद (tube feets) पाये जाते हैं।
  • विशिष्ट प्रकार का जल परिवहन तन्त्र (water vascular system) पाया जाता है, जो भोजन ग्रहण, संवेदना ग्रहण तथा श्वसन में सहायक होता है। उदाहरण- तारामछली (एस्टेरियस), एकाइनस, एन्टीडोन, सी- कुकम्बर, ओफीयूरा (ब्रिटिल स्टार) आदि।

प्रश्न 3.
कूटगुहीय संघ के चार विशेष लक्षण लिखिये।
उत्तर:
कूटगुहीय संघ – निमेटहेल्मिन्थीज के विशेष लक्षण-

  • इनका शरीर पतला, लम्बा, बेलनाकार तथा कृमि के समान होता है।
  • शरीर खण्डविहीन, द्विपार्श्व सममित तथा त्रिस्तरीय (triploblastic ) होता है।
  • शरीर पर मोटा क्यूटिकल (cuticle) का आवरण पाया जाता है।
  • इनकी देहगुहा, कूटगुहा (pseudocoelom) प्रकार की होती है तथा मीसोडर्म से आस्तरित नहीं रहती है।
    उदाहरण – एस्केरिस, वुचेरेरिया, एनसाइक्लोस्टोमा आदि।

प्रश्न 4.
हेमीकॉर्डेटा के प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर:
हेमीकॉर्डेटा के प्रमुख लक्षण – अनुच्छेद 4.11 संघ हेमीकॉर्डेटा का अवलोकन करें।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 3 जीव जगत का वर्गीकरण - 3

प्रश्न 5.
अरज्जुकी (नॉन कॉर्बेटा) एवं रज्जुकी (कॉडिंटा) के विशिष्ट लक्षणों की तुलना कीजिए।
उत्तर:

अरज्जुकी (नॉन-कॉर्बेटा)रज्जुकी (कॉर्बेटा)
पृष्ठ रज्जु अनुपस्थित होता है।1. पृष्ठ रज्जु उपस्थित होता है।
केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र अधर तल में, ठोस एवं दोहरा होता है।2. केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र पृष्ठीय एवं खोखला तथा एकल होता है।
क्लोम छिद्र अनुपस्थित होते हैं।3. क्लोम छिद्र प्रसनी में पाये जाते हैं।
हृदय पृष्ठ भाग में होता है (यदि उपस्थित है तो)।4. हृदय अधर भाग में होता है।
गुदा-पश्च पुच्छ अनुपस्थित होती है।5. एक गुदा पश्च पुच्छ उपस्थित होती है।

प्रश्न 6.
वर्टीब्रेटा के वर्गीकरण की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

प्रश्न 7.
साइक्लोस्टोमेटा के प्रमुख लक्षण बताइए।
उत्तर:
साइक्लोस्टोमेटा के प्रमुख लक्षण-

  •  इस वर्ग के प्राणी कुछ मछलियों के बाह्य परजीवी होते हैं।
  • शरीर लम्बा होता है, जिसमें श्वसन के लिए 6-15 जोड़ी क्लोम छिद्र होते हैं।
  • साइक्लोस्टोम में बिना जबड़ों का चूषक ( sucker ) तथा वृत्ताकार मुख होता है।
  • शल्क तथा युग्मित पख का अभाव होता है।
  • कपाल तथा मेरुदण्ड उपस्थित होता है।
  • परिसंचरण तन्त्र बन्द प्रकार का होता है।
  • साइक्लोस्टोम समुद्री होते हैं, किन्तु प्रजनन के लिए अलवणीय जल में प्रवास करते हैं। जनन के कुछ दिन बाद वे मर जाते हैं।
  • इसके लार्वा कायान्तरण (Metamorphosis) के बाद समुद्र में लौट जाते हैं।
    उदाहरण – पेट्रोमाइजोन (लैम्प्रे), मिक्सीन (हैगफिश)।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

प्रश्न 8.
एग्नेथा तथा नैथोस्टोमेटा में चार अन्तर लिखिए।
उत्तर:
एग्नेथा तथा नैथोस्टोमेटा में अन्तर (Differences between Agnatha and Gnathostomato)

ऐमनेथा (Agnatha)नैथोस्टोमेटा (Gnathostomata)
1. मुखगुहा में वास्तविक जबड़े अनुपस्थित होते हैं।वास्तविक जबड़े उपस्थित होते हैं।
2. उपांग तथा जनन वाहिनियाँ अनुपस्थित होती हैं।उपांग तथा जनन वाहिनियाँ उपस्थित होती हैं।
3. अल्पविकसित कशेरुकाएँ पायी जाती हैं।विकसित कशेरुकाएँ पायी जाती हैं।
4. अन्तकर्ण में दो अर्ध्ध वर्तुल्यकुल्याएँ पायी जाती हैं।अन्तकर्ण में तीन अर्द्ध वर्तुल्यकुल्याएँ (Semi-circular canal) पायी जाती हैं।

प्रश्न 9.
उभयचर तथा सरीसृप में अन्तर बताइये।
उत्तर:
उभयचर तथा सरीसृप में अन्तर (Differences between Ambhibia and Reptilia)

उभयचर (Amphibia)सरीसुप (Reptilia)
1. इस वर्ग के प्राणी जल और स्थल दोनों जगह पर रहते हैं।ये प्रायः स्थल पर रहते हैं (कछुआ, मगर, कुछ साँपों को छोड़कर)।
2. बाह्य निषेचन होता है। भूणीय झिल्ली अनुपस्थित होता है।आन्तरिक निषेचन होता है। भूणीय झिल्ली एम्नियान पायी जाती है।
3. मादा सदैव जल में अण्डे देती है।मादा स्थल पर अण्डे देती है।
4. बाह्य कंकाल के रूप में कोई रचना नहीं होती है।शल्कों या प्लेटों के रूप में बाह्य कंकाल पाया जाता है।
5. त्वचा नम लचीली तथा पतली होने से श्वसन में सहायक होती है।त्वचा सदैव शुष्क होती है और इनमें त्वचीय श्वसन नहीं होता है।
6. उत्सर्जी पदार्थ प्रमुखतः यूरिया।उत्सर्जी पदार्थ यूरिया अम्ल। हृदय में दो अलिन्द और निलय अपूर्ण रूप से दो कोष्ठों में विभाजित होते हैं।
7. हृदय में तीन कोष्ठ होते हैं : दो अलिन्द व एक निलय। उदाहरण : मेंढक, टोड।उदाहरण : छिपकली, गिरगिट, कछुआ, सर्प, मगरमच्छ।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 4 प्राणि जगत

प्रश्न 10.
एस्केरिस (गोलकृमि) के परजीवी अनुकूलन लिखिए।
उत्तर:
एस्केरिस के परजीवी अनुकूलन (Parasitic adoptations of Ascaris)

  • इनका शरीर पतला, लम्बा, बेलनाकार तथा दोनों सिरों पर नुकीला होता है।
  • शरीर पर क्यूटीकल (cuticle) का मजबूत मोटा आवरण होता है। इस पर पाचक एन्जाइमों का प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए इनका रासायनिक पाचन नहीं होता।
  • अभासी देहगुहा (pseudocoelom) में उपस्थित तरल द्रव स्थैतिक (hydrostatic) कंकाल का कार्य करता है। इससे इनका यान्त्रिक पाचन नहीं हो पाता है
  • शरीर के अग्र सिरे पर अनेक रासायनिक संवेदांग होते हैं।
  • यह पोषक से पचा हुआ भोज्य पदार्थ ग्रहण करता है। इसलिए इसकी आहारनाल सीधी सरल नलिका होती है।
  • इसमें अनॉक्सी श्वसन (anaerobic respiration) होता है।
  • जनन क्षमता अत्यधिक होती है। अण्डे प्रतिकूल परिस्थितियों को लम्बे समय तक सहन करने में समर्थ होते हैं।

प्रश्न 11.
कॉन्ड्रिक्थीज मछलियों के प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर:
कॉन्ड्रिक्थीज मछलियों के प्रमुख लक्षण (Main characteristics of chondrichthese fishes)
1. इस वर्ग के अधिकांश सदस्य समुद्री जल में पाये जाते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 3 जीव जगत का वर्गीकरण - 1

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HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

Haryana State Board HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण


(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. निम्नलिखित में से किस प्रकार की जीवाणु कोशिका के दोनों सिरों पर कशाभ उपस्थित होते हैं ?
(A) एक कशाभीय
(B) उभय कशाभीय
(C) गुच्छ कशाभीय
(D) परिरोमी
उत्तर:
(A) एक कशाभीय

2. नील हरित शैवाल होते हैं-
(A) प्रोकैरियोटिक
(B) यूकैरियोटिक
(C) एकबीजपत्री
(D) द्विबीजपत्री।
उत्तर:
(A) प्रोकैरियोटिक

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

3. निम्नलिखित में से किसमें झिल्लीबद्ध कोशिकांग अनुपस्थित होते हैं –
(A) सैकेरोमाइसिस
(B) स्ट्रेप्टोकोकस
(C) क्लेमाइडोमोनास
(D) प्लाज्मोडियम।
उत्तर:
(B) स्ट्रेप्टोकोकस

4. विषाणु का आवरण कहलाता है –
(A) कैप्सिड
(B) विरियॉन
(C) न्यूक्लियोप्रोटीन
(D) कोर।
उत्तर:
(A) कैप्सिड

5. नाइट्रीकारी जीवाणु है –
(A) स्वयं पोषी
(B) रसायन स्वपोषी
(C) परपोषी
(D) प्रकाश पोषी।
उत्तर:
(B) रसायन स्वपोषी

6. पाँच जगत वाले वर्गीकरण में –
(A) मोनेरा के अन्तर्गत
(B) प्रोटिस्टा के अन्तर्गत
(C) कवकों के अन्तर्गत
(D) एनीमेलिया के अन्तर्गत।
उत्तर:
(B) प्रोटिस्टा के अन्तर्गत

7. हेटरोसिस्ट पायी जाती है –
(A) रिक्सिया में
(B) यूलोथ्रिक्स में
(C) एल्ब्यूगो में
(D) नॉस्टोक में।
उत्तर:
(D) नॉस्टोक में।

8. गर्म पानी के स्रोतों में अनेक नील हरित शैवाल पाए जाते हैं। इन शैवालों में ताप सहने की शक्ति निम्नलिखित कारण से होती है-
(A) कोशिका भित्ति की संरचना
(B) आधुनिक कोशिकीय संगठन
(C) माइटोकॉण्ड्रिया की संरचना
(D) प्रोटीनों में होमोपॉलीमर बन्धों की उपस्थिति।
उत्तर:
(D) प्रोटीनों में होमोपॉलीमर बन्धों की उपस्थिति।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

9. कवक तंतुओं के शीर्ष पर बाह्य रूप से उत्पन्न कवक बीजाणु कहलाते
(A) कोनीडिया
(C) एप्लानोबीजाणु
(B) ऑइडिया
(D) बीजाणुधानीधर।
उत्तर:
(A) कोनीडिया

10. पाँच जगत वाले वर्गीकरण के अनुसार, डायएटम्स को वर्गीकृत किया गया है –
(A) मोनेरा में
(B) प्रोटिस्टा में
(C) कवक में
(D) पादप (प्लांटी) में।
उत्तर:
(B) प्रोटिस्टा में

11. सायनो बैक्टिरिया को कहा जाता है-
(A) प्रोटिस्ट्स
(B) सुनहरी शैवाल
(C) स्लाइम मोल्डस
(D) नीली हरी शैवाल।
उत्तर:
(D) नीली हरी शैवाल।

12. धान के खेतों में एजोला के साथ पाप्य जाने वाले नाइट्रोजन स्थिरीकारक सूक्ष्मजीव है-
(A) स्पाइरूलिना
(B) एनाबीना
(C) फ्रेंकिया
(D) टॉलियोथ्रिक्स
उत्तर:
(B) एनाबीना

13. नील हरित शैवाल (सायनो बैक्टीरिया) धान के खेतों के अलावा किसके कायिक भाग के अन्दर भी पाये जाते हैं ?
(A) पाइनस
(B) साइकस
(C) इक्वीसीटम
(D) साइलोटम।
उत्तर:
(B) साइकस

14. साइनोबैक्टीरिया के कुछ झिल्लीदार प्रसार वाले वर्णक क्या हैं ?
(A) हेटेऐसिस्ट
(B) आधारकाय
(C) श्वसनमूल
(D) वर्णकी लवक।
उत्तर:
(D) वर्णकी लवक।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

15. निम्नलिखित में से किसकी गहरे समुद्र जल में पाये जाने की सम्भावना है?
(A) आर्कीबैक्टीरिया
(B) यूबैक्टीरिया
(C) नीलहरित शैवाल
(D) मृतजीवी कवक।
उत्तर:
(A) आर्कीबैक्टीरिया

16. अधिकतम पोषण विविधता किस समूह में पायी जाती है ?
(A) कवक
(B) ऐनीमेलिया
(C) मोनेरा
(D) प्लाण्टी
उत्तर:
(C) मोनेरा

17. यूवैक्टीरिया में उपस्थित कोशिकीय अवयव जो यूकैरियोटिक कोशिकाओं के समान होता है-
(A) केन्द्रक
(B) राइबोसोम
(C) कोशिका भित्ति
(D) जीवद्रव्य कला।
उत्तर:
(D) जीवद्रव्य कला।

18. निम्नलिखित में से कौन गहरे समुद्र में पाया जाता है ?
(A) आर्किसैनटीरिया
(B) यूवैक्टीरिया
(C) नील हरित शैवाल
(D) मृतोपजीवी कवक।
उत्तर:
(A) आर्किसैनटीरिया

19. निम्न में से कौन वलयित RNA रज्जुक तथा कैप्सोमीयर्स प्रदर्शित करता है ?
(A) पोलियो विषाणु
(B) टोवेको मोजेक विषाणु (TMV)
(C) चेचक विषाणु
(D) रिट्रोविषाणु
उत्तर:
(B) टोवेको मोजेक विषाणु (TMV)

20. कुछ जीवाणुओं में पायी जाने वाली संरचना जो उन्हें चट्टानों / पोषक कोशिकाओं से चिपकने में सहायता प्रदान करती है-
(A) राइजोप्रड्स
(B) फिम्बी
(C) मीसोसोम
(D) होल्डफास्ट।
उत्तर:
(B) फिम्बी

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21. मेथेनोजेन किस वर्ग से सम्बन्धित है ?
(A) यूबैक्टीरिया
(B) आर्किवैक्टीरिया
(C) डाइनोफ्लेजिलेट्स
(D) स्लाइम गोल्ड
उत्तर:
(B) आर्किवैक्टीरिया

22. निम्न में से कौन-सा कथन गलत है ?
(A) गोल्डन शैवाल डेस्मिड्स भी कहलाते हैं।
(B) यूवैक्टीरिया कूटवैक्टीरिया भी कहलाते हैं।
(C) फाइकोमाइसिटीज शैवाल कवक भी कहलाते हैं।
(D) सायनोवैक्टीरिया नील हरित शैवाल भी कहलाते हैं।
उत्तर:
(B) यूवैक्टीरिया कूटवैक्टीरिया भी कहलाते हैं।

23. वाइरोइड्स के सम्बन्ध में कौन-सा कथन गलत है ?
(A) ये विषाणुओं से होते होते हैं
(B) ये संक्रमण उत्पन्न करते हैं।
(C) इनका RNA उच्च अणुभार युक्त होता है।
(D) इनमें प्रोटीन आवरण का अभाव होता है।
उत्तर:
(C) इनका RNA उच्च अणुभार युक्त होता है।

24. निम्नलिखित में से कौन अत्यधिक क्षारीय परिस्थितिओं में पाया जाता है?
(A) आर्किबैक्टीरिया
(B) यूवैक्टीरिया
(C) सायनोबैक्टीरिया
(D) माइकोबैक्टीरिया।
उत्तर:
(A) आर्किबैक्टीरिया

25. वाइरोइड्स विषाणुओं से किसमें भिन्न होते हैं ?
(A) प्रोटीन आवरण युक्त DNA अणु
(B) प्रोटीन आवरण रहित DNA अणु
(C) प्रोटीन आवरण युक्त RNA अणु
(D) प्रोटीन आवरण रहित RNA अणु ।
उत्तर:
(D) प्रोटीन आवरण रहित RNA अणु ।

(B) अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर सर्वप्रथम कौनसे जीव उत्पन्न हुए ?
उत्तर:
नील हरित शैवाल (Blue green algae)।

प्रश्न 2.
कौनसा जीवाणु दूध से दही बनाने में सहायक है ?
उत्तर:
लैक्टोबैसीलस (Lactobacillus )।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

प्रश्न 3.
प्रोटिस्टा भी मोनेरा की तरह एक कोशिकीय होते हैं, फिर भी इन्हें एक अलग जगत में रखा गया है। क्यों ?
उत्तर:
प्रोटिस्टा में वास्तविक केन्द्रक ( true nucleus ) होता है।

प्रश्न 4.
कैप्सिड क्या है ? यह किस पदार्थ का बना होता है ?
उत्तर:
विषाणु का बाह्य आवरण कैप्सिड कहलाता है। यह प्रोटीन इकाइयों कैप्सोमीयर्स का बना होता है।

प्रश्न 5.
किसी आंशिक परजीवी पादप का नाम लिखिए।
उत्तर:
चन्दन (Santalum ) ।

प्रश्न 6.
जन्तुओं में किस प्रकार का पोषण पाया जाता है ?
उत्तर:
जन्तुसम या होलोजोइक (holozoic)।

प्रश्न 7.
प्रिओन्स क्या हैं ?
उत्तर:
संक्रामक प्रोटीन्स (infectious proteins)।

प्रश्न 8.
गेहूँ का काला किट्ट रोग का कारक क्या है ?
उत्तर:
पक्सीनिया प्रेमिनिस ट्रिटिसाई (Puccinia graminis tritici) कवक ।

प्रश्न 9.
दो खाद्य कवकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मोर्केला (Morchella), एगेरिकस (Agaricus) ।

प्रश्न 10.
उस कवक का नाम लिखिए जिसका जैवरासायनिकी तथा आनुवंशिकी में व्यापक प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर:
न्यूरोस्पोरा ((Neurospora ) ।

प्रश्न 11.
दो चल अथवा अचल युग्मकों के प्रोटोप्लाज्म के संलयन को. क्या कहते हैं ?
उत्तर:
प्लाज्मोगेमी (Plasmogamy)।

प्रश्न 12.
पैनीसिलियम से कौन-सा प्रतिजैविक प्राप्त होता है ?
उत्तर:
पैनिसिलीन (penicillin)

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प्रश्न 13.
एनाबीना तथा नोस्टोक किस रचना की सहायता से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं ?
उत्तर:
हिटरोसिस्ट द्वारा (by heterocyst)।

प्रश्न 14.
मटरकुल के पौधों की जड़ों में कौन-सा जीवाणु पाया जाता
उत्तर:
राइजोबियम (Rhizobium)।

प्रश्न 15.
डायनोफ्लैजिलेट किस समूह का जीव
उत्तर:
जगत – प्रोटिस्टा (protista) का ।

प्रश्न 16.
उस जीव का नाम बताइए जिसमें जन्तु तथा पादप दोनों के लक्षण होते हैं।
उत्तर:
युग्लीना (Euglena)

प्रश्न 17.
निद्रालु रोग किसके द्वारा होता है ?
उत्तर:
ट्रिपेनोसोमा (Trypanosoma) द्वारा।

प्रश्न 18.
दो लाभदायक तथा दो हानिकारक कवकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
लाभदायक कवक –
(i) मोर्केला,
(ii) यीस्ट । हानिकारक
कवक –
(i) पक्सीनिया,
(ii) एल्ब्यूगो ।

प्रश्न 19.
ट्रिपेनोसोमा (Trypanosoma) का कौन-सा अवलोकनीय लक्षण आपको इसे प्रोटिस्टा में वर्गीकृत करने के लिए कहता है ?
उत्तर:
ट्रिपेनोसोमा एक यूकैरियोटिक तथा एककोशिकीय जीव है। सभी यूकैरियोटिक एककोशिकीय जीवों को प्रोटिस्टा में वर्गीकृत किया गया है।

(C) लघु उत्तरीय प्रश्न – 1

प्रश्न 1.
जन्तुओं को उपभोक्ता क्यों कहते हैं ?
उत्तर:
जन्तु अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते। ये अपने भोजन के लिये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पौधों पर निर्भर रहते हैं । इसीलिए जन्तुओं को उपभोक्ता (consumers) कहते हैं।

प्रश्न 2.
कुछ कवकों को अपूर्ण कवक क्यों कहते हैं ? इन्हें किस समूह में रखा जाता है ?
उत्तर:
कुछ कवकों में कायिक तथा अलैंगिक अवस्था का ही पता लगा है। लैंगिक अवस्था को जीव की पूर्ण (perfect) अवस्था माना जाता है चूँकि इनमें लैंगिक अवस्था का ज्ञान नहीं है अतः इन्हें अपूर्ण कवक या फंजाई इम्परफैक्टाई कहते हैं और ये वर्ग ड्यूटेरोमाइसिटीज में रखे गये हैं।

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प्रश्न 3.
पादपों को उत्पादक क्यों कहते हैं ?
उत्तर:
सभी हरे पौधे स्वपोषी होते हैं। ये प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। साथ ही धरा के अन्य सभी जीवधारी प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से इन्हीं हरे पौधों से भोजन प्राप्त करते हैं। इसीलिए इन्हें उत्पादक (producers) कहा जाता है।

प्रश्न 4.
पादपों के दो विषाणु रोगों तथा दो जीवाणु रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पादपों के विषाणु रोग –

  • बैंगन का लघु पर्ण रोग
  • टमाटर का पर्ण बेल्लन रोग ।

प्रश्न 5.
खेती में फसल सुधार हेतु सानोबैक्टीरिया के प्रयोग का क्या
उत्तर:
साएनोबैक्टीरिया जैसे नास्टॉक एनाबीना की हेटेरोसिस्ट में वायुमण्डलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता होती है। खेत में लगे हरे पौधे स्वयं ऐसा नहीं कर पाते। अतः इनके प्रयोग में नाइट्रोजन की आपूर्ति हो जाने के कारण उत्पादन बढ़ जाता है

प्रश्न 6.
डायटम्स को समुद्र के मोती (Pearls of ocean) कहा जाता है, क्यों ? डायटोमेसियस का अर्थ क्या है ?
उत्तर:
डायटम्स की कोशिका भित्ति सेल्यूलोज के साथ सिलिका की उपस्थिति के कारण दृढ़ होती है। इसकी बाह्य सतह पर अत्याधिक सुन्दर डिजाइन व पैटर्न बने होते हैं। सिलिका के कारण इनकी भित्ति समय के साथ खराब नहीं होती तथा सूक्ष्मदर्शी से देखने पर यह डिजाइन आकर्षक दिखाई देते हैं। इसी कारण इन्हें समुद्र का मोती कहा जाता है। सिलिका इन्हें नष्ट होने से बचाती है। इस प्रकार मृत डायटम्स अपने परिवेश में कोशिका भित्ति के असंख्य अवशेष छोड़ जाते हैं। लाखों में जमा हुए इस अवशेष को डायटोसयिस (diatomaceous) कहा जाता है।

प्रश्न 7.
किसी प्रोटोजोआन प्राणी का नामांकित रेखाचित्र खींचिए ।
उत्तर:
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प्रश्न 8.
किसी ऐसे जीव का नाम लिखिये जिसमें पौधों एवं जन्तुओं दोनों के लक्षण पाये जाते हैं ? एक-एक लक्षण लिखिए।
उत्तर:
युग्लीना (Euglena)। इसमें पौधों व जन्तुओं दोनों के लक्षण पाये जाते हैं। हरितलवक की उपस्थिति पादप लक्षण है तथा सूक्ष्म कीटों का भक्षण, कोशिका भित्ति का अभाव जन्तु लक्षण है।

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(D) लघु उत्तरीय प्रश्न-II

प्रश्न 1.
जीवाणु कोशिका का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
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प्रश्न 2.
माइकोप्लाज्मा क्या है ?
उत्तर:
माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma) ये बहुआकृतिक (polymorphic), प्रोकैरियोटिक, सूक्ष्मदर्शीय, कोशिका भित्ति रहित जीव है। यह सबसे छोटी कोशिका है। इनका आकार 0.1 से 0.54 होता है माइकोप्लाज्मा कोशिका के चारों ओर लाइपोप्रोटीन से बनी कोशिका कला पायी जाती है। कोशिका द्रव्य में कलाबद्ध कोशिकांगों का अभाव होता है।

इनमें आद्य केन्द्रक (incipient nucleus) पाया जाता है। यह पशुओं में निमोनिया रोग उत्पन्न करता है। मनुष्य में यह तन्त्रिकीय रोग, श्वसन रोग तथा मूत्रल रोग उत्पन्न करता है । माइकोप्लाज्मा को प्लूरो निमोनिया लाइक ऑर्गेनिज्म (Pleuro Pneumonia Like Organism; PPLO) भी कहते हैं ।

प्रश्न 3.
जीवाणुओं की दो लाभदायक तथा दो हानिकारक अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर:
लाभदायक क्रियाएँ –

  • जीवाणुओं का प्रयोग दूध से दही बनाने में किया जाता है, जैसे- लैक्टोबैसीलस।
  • कुछ जीवाणु भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं । जैसे-एजोटोबैक्टर।

हानिकारक क्रियाएँ –

  • अनेक जीवाणु खाद्य पदार्थों को नष्ट कर देते हैं। जैसे–क्लॉस्ट्रीडियम ।
  • अनेक जीवाणु मवेशियों एवं मनुष्य में रोग उत्पन्न करते हैं, जैसे – क्षय रोग – माइकोबैक्टीरियम ।

प्रश्न 4.
जगत् प्रोटिस्टा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए तथा इसके कुछ उदाहरण बताइए।
उत्तर:
प्रोटिस्टा की विशेषताएँ (Characteristics of Protista) –

  • ये एककोशिकीय तथा सुकेन्द्रकीय जीव होते हैं ।
  • अधिकांश सदस्य जलीय, परन्तु कुछ स्थलीय, नम आवासों में पाये जाते हैं। कुछ सदस्य परजीवी होते हैं।
  • अधिकांश सदस्य प्रकाश-संश्लेषी होते हैं, कुछ सदस्य परजीवी भी होते हैं।
  • कोशिकाओं में संगठित केन्द्रक एवं कलाबद्ध कोशिकांग (membrane bounded cell organelles) पाये जाते हैं।
  • कुछ सदस्यों में कशाभ (flagella ), पक्ष्माभ (cilia ) या कूटपाद ( pseudopodia) पाये जाते हैं जो प्रचलन एवं पोषण में सहायक होते हैं
  • ये अलैंगिक या लैंगिक प्रजनन करते हैं।

    उदाहरण:
    डाएटम्स (Diatoms), डेस्मिड्स ( Dasmids), युग्लीना (Euglena), अमीबा (Amoeba), पैरामीशियम (Paramaecium) आदि।

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प्रश्न 5.
मोनेरा जगत के प्रमुख लक्षण तथा कुछ उदाहरण लिखिए । उत्तर – मोनेरा जगत् के प्रमुख लक्षण (Characteristic features of kingdom Monera)

  • ये सूक्ष्मदर्शीय (microscopic ), सामान्यतया एककोशिकीय जीव होते हैं, परन्तु कुछ सदस्य कोशिकाओं के आपस में जुड़ जाने के कारण बहुकोशिकीय होते हैं।
  • इनकी कोशिका में सुसंगठित ( well organised) केन्द्रक का अभाव होता है, अर्थात् केन्द्रक कला एवं केन्द्रिका अनुपस्थित होते हैं। अतः ये प्रोकैरियोटिक (prokaryotic) कहलाते हैं।
  • इनमें विकसित एवं कलाबद्ध कोशिकांग जैसे गॉल्जीकाय. माइटोकॉण्ड्रिया, अन्तः प्रद्रव्यी जालिका (endoplasmic reticulum) आदि नहीं पाये जाते हैं।
  • कोशिकाभित्ति पायी जाती है, परन्तु इसमें सेल्युलोस का अभाव होता
  • अधिकांश सदस्य विषमपोषी किन्तु कुछ स्वपोषी होते हैं। उदाहरण-जीवाणु (bacteria), आद्यबैक्टीरिया (Archaebacteria), सायनोबैक्टीरिया (नीले हरे शैवाल : Blue green algae)।

प्रश्न 6.
सायनोबैक्टीरिया क्या होते हैं ? किसी तन्तुमय सायनोबैक्टीरिया का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
सायनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria) – इन्हें नीले-हरे शैवाल (Blue-green algae) भी कहा जाता था। ये स्वपोषी, एककोशिकीय, निवही ( colonial) या तन्तुरूपी ( filamentous ), जलीय या स्थलीय शैवाल होते हैं। इन्हें जगत् मोनेरा में रखा गया है।
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उदाहरण:
नॉस्टोक (Nostoc), एनाबीना ( Anabaena) आदि ।

प्रश्न 7.
किसी पक्ष्माभी प्रोटोजोआ का नामांकित चित्र बनाइए तथा यह बताइए कि इस जीव में पक्ष्माभ क्या कार्य करते हैं ?
उत्तर:
पक्ष्माथ के कार्य –
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  • इनकी लयबद्ध गति से प्रचलन होता है।
  • इनकी गति से भोजन कण कोशिका मुख में खींचे जाते हैं।
  • इनके द्वारा लैंगिक कोशिकाएँ आपस में चिपकती हैं।

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प्रश्न 8.
जीवाणु कोशिका किस प्रकार विभाजित होती है ? चित्र बनाकर समझाइए।
उत्तर:
जीवाणु कोशिका में द्विखण्डन (Binary fission in bacterial cell) – अनुकूल वातावरणीय दशाओं में जीवाणु कोशिका एक अनुप्रस्थ भित्ति (transverse wall) द्वारा दो संतति कोशिकाओं में (daughter cells) विभाजित हो जाती है। इस क्रिया को द्विखण्डन (binary fissions) कहते हैं। विखण्डन से पूर्व जीवाणु कोशिका लम्बाई में वृद्धि करती है। कोशिका का केन्द्रक एवं अन्तर्वस्तुएँ दो भागों में बँटने लगते हैं। इसके पश्चात् कोशिका के मध्य संकीर्णन (Constriction) होता है जो धीरे-धीरे गहरा प्रारम्भ होकर मातृ कोशिका को दो संतति कोशिकाओं में बाँट देता है।
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प्रश्न 9.
पोषण के आधार पर जीवाणुओं का वर्गीकरण कीजिये।
जीवाणु कोशिका द्विखण्डन (Binary Fission )
उत्तर:
पोषण के आधार पर जीवाणु दो प्रकार के होते हैं –
I. स्वपोषी जीवाणु, तथा II. परपोषी जीवाणु।

  • स्वपोषी जीवाणु (Autotrophic Bacteria) – ये अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं-
  • प्रकाश संश्लेषी जीवाणु (Photosynthetic bacteria) – इनमें विभिन्न वर्णक पाये जाते हैं जो प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाते है; जैसे – क्लोरोबियम।
  • रसायन संश्लेषी जीवाणु ( Chemosynthetic bacteria) – ये विभिन्न रासायनिक क्रियाओं द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं । जैसे-बैगिआटोआ।

II. विषमपोषी जीवाणु (Heterotrophic Bacteria) – ये निम्न प्रकार के होते हैं-

  • परजीवी जीवाणु (Parasitic bacteria) – ये दूसरे जीवों से भोजन प्राप्त करते हैं और परजीवी कहलाते हैं। जैसे-माइकोबैक्टीरियम।
  • मृतोपजीवी जीवाणु (Saprobiotic bacteria) – ये सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों से भोजन प्राप्त करते हैं। जैसे-बैसिलस माइकोइडिस।
  • सहजीवी जीवाणु (Symbiotic bacteria) – ये उच्च पादपों के साथ सहजीवी सम्बन्ध बनाते हैं। जैसे-राइजोबियम।

प्रश्न 10.
सहजीवन किसे कहते हैं ? एक उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर:
सहजीवन (Symbiosis) – सहजीवन दो विभिन्न जीवधारियों का ऐसा सम्बन्ध है जिसमें दोनों जीवधारी एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं।
उदाहरण:
लैग्युमिनोसी कुल (मटर कुल) के पौधों की जड़ों में मूल गुलिकाएँ (Root nodules) पायी जाती हैं। इन गुलिकाओं में राइजोबियम लैग्युमिनोसेरम (Rhizobium leguminoserum) नामक जीवाणु पाये जाते हैं। पौधा इन जीवाणुओं को आश्रय एवं भोजन उपलब्ध कराता है, जबकि जीवाणु नाइट्रोजन स्थिरीकरण करके पौधे को नाइट्रोजनी पदार्थ उपलब्ध कराते हैं। इस प्रकार ये एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं।

प्रश्न 11.
डायनोफ्लैजिलेट्स क्या होते हैं ?
उत्तर:
डायनोफ्लैजिलेट्स ( Dianoflagellates ) – ये मुख्यतः समुद्री और प्रकाश संश्लेषी प्रोटिस्ट होते हैं। ये एककोशिकीय तथा प्रौकेरियोटिक संरचना वाले जीव होते हैं। वर्णकों की उपस्थिति के आधार पर ये पीले, हरे, भूरे, नीले या लाल दिखाई देते हैं। इनकी कोशिका भित्ति पर सेल्युलोस की कठोर पट्टियाँ पायी जाती हैं। अधिकांश डायनोफ्लैजिलेट्स में दो कशाभिकाएँ होती हैं जो एक-दूसरे के लम्बवत् होती हैं। उदाहरण-गोनियालैक्स।

प्रश्न 12.
कक्कों के प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर:
कवकों के लक्षण (Characteristics of Fungi)

  • कवक सर्वव्यापी हैं जो जल, स्थल एवं वायु में पाये जाते हैं।
  • कवकों का शरीर (थैलस) शाखित एवं तन्तुमय कवक-तन्तुओं (hyphae) से बना होता है। कवक तन्तुओं की सघन वृद्धि से एक जाल जैसी रचना बनती है जिसे कवक जाल (mycelium) कहते हैं।
  • इनमें कोशिकाभित्ति सेल्युलोस एवं काइटिन की बनी होती हैं।
  • इनमें पर्णहरिम (chlorophyll) का अभाव होता है ।
  • कवक परजीवी (parasite) या मृतोपजीवी (saprophyte) होते हैं।
  • कोशिकीय संरचना यूकैरियोटिक होती है।
  • संग्रहीत भोजन ग्लाइकोजन ( glycogen) होता है।
  • प्रजनन, वर्धी, अलिंगी एवं लिंगी विधियों से होता है।

उदाहरण:
यीस्ट (Yeast), छत्रक (मशरूम), कुकुरमुत्ता (टोडस्टूल ) पैनीसिलियम, पक्सीनिया आदि ।

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प्रश्न 13.
फाइकोमाइसिटीज वर्ग के कवकों के लक्षण लिखिए। म्यूकर के कवक जाल का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
फाइकोमाइसिटीज वर्ग के लक्षण-

  • ये कवक जलीय आवासों, सड़ी-गली लकड़ी, नम तथा सीलन वाले स्थानों अथवा पौधों पर अविकल्पी परजीवी के रूप में पाये जाते हैं।
  • कवक जाल पट्टरहित ( aseptate) तथा बहुकेन्द्रकी (multinucleate) होता है ।
  • अलैंगिक जनन चल बीजाणु (zoospores) बीजाणु या अचल (Aplanospores) द्वारा होता है। इनका निर्माण अन्तर्जातीय (endo- genous) होता है।
  • दो युग्मकों (gametes) के संलयन से युग्माणु (zygospore) बनते
  • युग्मकी आकारिकी समयुग्मकी, असमयुग्मकी अथवा विषमयुग्मकी हो सकती हैं।
  • उदाहरण-म्यूकर (Mucor), राइजोपस (Rhizopus)।

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प्रश्न 14.
ऐस्कोमाइसिटीज वर्ग के सदस्यों के प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर:
ऐस्कोमाइसिटीज के प्रमुख लक्षण characteristics of Ascomyates):

  • इन्हें थैली या सैक (sac) कवक भी कहते हैं।
  • अधिकांश सदस्य स्थलीय किन्तु कुछ जलीय होते हैं।
  • ये मृतजीवी, अपघटक, परजीवी (caprophilous) होते हैं। (Important) अथवा शंमलरागी हैं।
  • यीस्ट (एककोशिकीय) को छोड़कर सभी सदस्य बहुकोशिकीय कवक जाल बनाते हैं।
  • कवक जाल पटयुक्त होते हैं। प्रायः एक कोशिका में केवल एक केन्द्रक पाया जाता है।
  • कोशिका भित्तिकाइटिन की बनी होती है। इसमें सेल्युलोस भी पाया जाता है।
  • वर्धी, अलैंगिक तथा लैंगिक प्रजनन होता है।
  • अलैंगिक प्रजनन कोनीडिया, क्लेमाइडोस्पोर या ओइडिया द्वारा होता है।
  • लैंगिक जनन युग्मक धानियों के सम्पर्क ( gametangial contact) द्वारा होता है।
  • फलन काय (fruting body) एस्कस (ascus) कहलाते हैं जिनमें एस्कोस्पोर बनते हैं।

उदाहरण:
यीस्ट (Saccharonysis), पैनीसिलियम (penicillium). एस्परजिलस ((Aspergillus ) आदि ।

प्रश्न 15.
शैवाल और कवक में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
शैवाल तथा कवक में अन्तर (Differences between Algae and Fungi)

शैवाल (Algae)कवक (Fungi)
ये पर्णहरिम युक्त होते हैं।ये पर्णहरिम रहित होते हैं।
ये प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। अतः स्वपोषी हैं।ये अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते। अतः ये विषमपोषी न अवशोषी (heterotrophic and absorptive) हैं।
कोशिका भित्ति सैल्युलोज (cellulose) की बनी होती है।कोशिका भित्ति कवक काइटिन (chitin) की बनी होती है।
भोजन मण्ड (starch) के रूप में संचित होता है।भोजन ग्लाइकोजन के रूप में संचित होता है।
जल या गीली भूमि पर पाये जाते हैं।ये सड़े-गले पदार्थों अथवा जीवित जीवों पर पाये जाते हैं।

प्रश्न 16.
लाइकेन क्या है ? इनके प्रकारों को उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर:
लाइकेन (Lichen ) – लाइकेन कवक तथा शैवाल का सहजीवी संगठन है। इनमें कवक तथा शैवाल साथ-साथ रहकर एक विशिष्ट पादप संरचना बनाते हैं। कवकांश (mycobiont) लाइकेन को जल व खनिज उपलब्ध कराता है, जबकि शैवालांश (phycobiont) लाइकेन को भोजन उपलब्ध कराता है।

लाइकेन के प्रकार-ये दो प्रकार के होते हैं –

  • ऐस्कोलाइकेन (Ascolichens) – इनमें कवकांश (mycobiont ) ऐस्कोमाइसिटीज वर्ग के सदस्य होते हैं। जैसे-पारमेलिया।
  • बैसीडियोलाइकेन कवकांश (mycobiont) – बैसीडियोमाइसिटीज वर्ग के सदस्य होते हैं। जैसे-कोरेला ।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

प्रश्न 17.
ह्रीटेकर ने जीवों को कौन-कौन से जगतों में बाँटा ? इनके वर्गीकरण के प्रमुख मानदण्ड क्या थे ?
उत्तर:
ह्रीटेकर ने जीवधारियों को पाँच जगतों में बाँटा-

  • मोनेरा (Monera)
  • प्रोटिस्टा (Protista)
  • फंजाई (Fungi)
  • प्लांटी (Plantae)
  • एनीमेलिया ( Anemalia)

ह्रीटेकर द्वारा अपनाये गये मानदण्ड निम्न प्रकार हैं-

  • कोशिका संरचना
  • शारीरिक संगठन
  • कोशिका भित्ति
  • पोषण विधि
  • प्रचलन
  • पारिस्थितिक भूमिका
  • प्रजनन तथा
  • जातिवृत्तीय सम्बन्ध

प्रश्न 18.
क्लासीकल टैक्सोनॉमी तथा मॉर्डन टैक्सोनोमी में भेद कीजिये।
उत्तर:
‘पुराना वर्गीकरण एवं आधुनिक वर्गीकरण में भेद (Differences between classical classification and modern classification)

पुराना वर्गीकरण (Classical Classification)आधुनिक वर्गीकरण (Modern Classification)
एक जाति की व्याख्या करने के लिये उस जाति के एक या कुछ जीवों का अध्ययन किया गया।अनगिनत जीवधारियों का अध्ययन किया गया।
यह उपजातियों पर अधिक प्रकाश नहीं डालता है।यह विभिन्न जनसंख्याओं, विभिन्न प्रकारों, उपजातियों आदि का अध्ययन करता है।
जातियों का स्थिरीकरण केवल बाह्य आकारिकीय लक्षणों पर आधारित होता है।यह जातियों का स्थिरीकरण करने के लिये अध्ययन के सभी क्षेत्रों से सूचनाएँ एकत्र करता है।
जाति अचल या स्थिर एन्टिटी जानी जाती है।जाति उद्विकास का उत्पाद मानी जाती है।

प्रश्न 19.
विषाणु तथा जीवाणु में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
विषाणु तथा जीवाणु में अन्तर (Differences between Virus and Bacteria)

विषाणु (Virus)जीवाणु (Bacteria)
ये प्राय: 10 से 300 μ आकार के होते हैं।ये प्राय 2 μ से 10 μ आकार के होते हैं।
इनमें सजीव तथा निर्जीव के लक्षण होते हैं।ये सजीवों के लक्षण दर्शाते हैं।
इनमें कोशिकीय संरचना नहीं होती है।इनमें कोशिकीय संरचना होती है।
इनमें जीवद्रव्य एवं अन्य कोशिकांग नहीं होते हैं।इनमें जीवद्रव्य एवं अन्य कोशिकांग होते हैं।
इनमें आनुवंशिक पदार्थ DNA या RNA होता है।इनमें DNA तथा RNA दोनों होते हैं।
ये सदैव रोगकारी होते हैं।ये लाभदायक व हानिकारक दोनों होते हैं।
ये केवल जीवित कोशिका में ही सक्रिय रहते हैं।ये स्वतन्त्रजीवी, परजीवी या मृतोपजीवी होते हैं।

(E) विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (निबन्धात्मक प्रश्न)

प्रश्न 1.
पाँच जगत् वर्गीकरण के गुणों एवं कमियों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:
पाँच जगत् वर्गीकरण के गुण (Merits of Five Kingdom System):
द्विजगत वर्गीकरण में प्रोकैरियोटिक जीवाणुओं को यूकैरियोटिक पादपों के साथ ही रखा गया था। साथ ही विषमपोषी, अवशोषी (heterotrophic absorptive) कवकों को स्वपोषी पादपों के साथ रखा गया था। एक कोशिकीय तथा बहुकोशिकीय जीवों को एक साथ या तो जन्तु जगत या पादपं जगत में रखा गया था। इन सभी कमियों को ह्विटेकर का पाँच जगत वर्गीकरण दूर करता है। इसमें जातिवृत्तीयता ( phylogeny ) भी परिलक्षित होती है। यूग्लीना जैसे जीवों की स्थिति भी विवादास्पद है।

  • इस वर्गीकरण में प्रोकैरियोट्स को अलग जगत् मोनेरा में रखा गया है, क्योंकि ये यूकैरियोटिक से, संरचना, कार्यिकी तथा प्रजनन विधियों में भिन्न होते हैं। इस प्रकार यह द्विजगत वर्गीकरण की इस कमी को समाप्त कर देता है।
  • यह वर्गीकरण अंग संगठन के स्तरों एवं पोषण की विधि पर आधारित है और बाद में उद्विकास के दौरान जल्दी स्थापित हो जाता है।
  • यह जैविक संसार में जातिवृत्तीयता (phylogeny ) स्थापित करता है।
  • अधिकांश यूकैरियोटिक एककोशिकीय जीवों को बहुकोशिकीय जीवों से पृथक् करके जगत् प्रोटिस्टा में रखा गया है।
  • कवकों को पादप जगत् से पृथक् करके नये जगत् फंजाई (fungi) में रखा गया है।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

पाँच जगत् वर्गीकरण की कमियाँ या दोष (Demerits of Five Kingdom System):

  • मोनेरा तथा प्रोटिस्टा जगतों में स्वपोषी तथा परपोषी दोनों प्रकार के जीवधारियों को सम्मिलित किया गया है।
  • निम्न कोटि के जीवधारियों में जातिवृत्तीय सम्बन्ध स्पष्ट नहीं होता है। 3. एक समान लक्षणों वाले अनेक जीवधारी समूह विभिन्न जगतों में शामिल हुए हैं। जैसे-एक कोशिकीय शैवाल प्रोटिस्टा में और बहुकोशिकीय शैवालों को प्लान्टी जगत् में रखा गया है।
  • प्रोस्टिस्टा जगत् में बहुत अधिक विविधता होने के कारण यह एक स्वाभाविक समूह न होकर कृत्रिम प्रतीत होता है।
  • एककोशिकीय कवक (Yeast) को बहुकोशिकीय परपोषी – अवशोषी कवक जगत् में रखा गया है।
  • लाइकेन (Lichens) को कहीं वर्गीकृत नहीं किया गया है।
  • आधुनिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि प्रोकैरियोट आर्किया, यूकैरियोट्स के अधिक निकट हैं न कि वैक्टीरिया के।

प्रश्न 2.
आकार एवं कशाभिकाओं के आधार पर जीवाणुओं के प्रकार लिखिए।
उत्तर:
आकार के आधार पर कोहन (Cohn ) ने जीवाणुओं को निम्न प्रकारों में बाँटा –
1. कोकस या गोलाणु ( Spherical or coccus) ये गोलाकार या दीर्घवृत्तीय जीवाणु होते हैं। ये शूक रहित (atrichrous) रहित तथा अचल होते हैं, ये निम्न प्रकार के होते हैं।
(a) डिप्लोकोकस (Diplococcus) – जब कोकस जोड़े में पाये जाते हैं। तो डिप्लोकोकस कहलाते हैं। जैसे- डिप्लोकोकस निमोनी।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण - 7
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण - 8
(b) स्रैप्टोकोकस (Streptococcus) – जब कोकस एक-दूसरे से जुडकर एक लड़ी जैसी रचना बनाते हैं, स्ट्रेप्टोकोकस कहलाते हैं। जैसे-स्ट्रेप्टोकोकस लैक्टिस।

(c) टैट्टाकोकस (Tetracoccus)-जब कोकस चार-चार के समूह में पाये जाते हैं तो टेट्राकोकाई कहलाते हैं। जैसे-नीसेरिया।

(d) स्टैफाइलोकोकस (Staphylococcus)- जब कोकस गुच्छे के रूप में पाये जाते हैं, स्टैफाइलोकोकस कहलाते हैं। जैसे-स्टैफाइलोकोकस।

(e) सासनी (Sarcinae ) – जब कोकस घनाभ के रूप में होते हैं। जैसे- सार्सीना।

2. बैसीलस (Bacillus ) – ये जीवाणु छड़नुमा, बेलनाकार तथा चल होते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं-
(a) डिप्लोबैसीलस (Diplob – acillus ) – जब बैसीलस जोड़े में पाये जाते हैं, डिप्लोबैसीलस कहलाते हैं। जैसे- कोरीनेबैक्टीरियम डिफ्थीरी।
(b) स्ट्रेप्टोबैसीलस (Streptobacillus ) – जब बैसीलस एक लड़ी के रूप में पाये जाते हैं, स्ट्रेप्टोबैसीलस कहलाते हैं। जैसे-स्ट्रेप्टोबैसीलस।

3. कुण्डलित या सर्पिल जीवाणु (Helical or Spiral Bacteria) – ये जीवाणु कुण्डलित या सर्पिलाकार होते हैं। जैसे-विब्रियो, स्पाइरिलम आदि। कशाभिकाओं के आधार पर जीवाणु निम्न प्रकार के होते हैं-

  • अशूकी (Atrichous) – ये कशाभिक रहित एवं अचल होते हैं। जैसे- लैक्टोबैसीलस।
  • मोनोट्राइकस (Monotrichous) – इनमें केवल एक सिरे पर केवल एक ही कशाभिका होती है। जैसे-बिब्रियो कॉलेरी।
  • एम्फीट्राइकस (Amphitrichous ) – जब जीवाणु कोशिका के दोनों सिरों पर कम-से-कम एक कशाभिका अवश्य होती है। जैसे-नाइट्रोसोमोनास।
  • लोफोट्राइकस या सिफेलोट्राइकस (Lophotrichous or Cephalotrichous)-इन जीवाणुओं के एक सिरे पर अनेक कशाभिकाओं का गुच्छा होता है। जैसे-स्यूडोमोनास ।
  • पेरीट्राइकस (Peritrichous)-इनमें जीवाणु की सम्पूर्ण सतह पर कशाभिकाएँ पायी जाती हैं। जैसे-बैसीलस टाइफोसस।

प्रश्न 3.
जीवाणुभोजी की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिये।
उत्तर:
जीवाणुभोजी (Bacteriophage)-ऐसे विषाणु जो जीवाणुओं के ऊपर परजीवी होते हैं, जीवाणुभोजी कहलाते हैं। एफ. ट्आर्ट (F. Twart 1915) तथा एफ. डी. हेरेल (F. D. Herelle 1917) ने जीवाणुभोजी की खोज की थी। जीवाणुभोजी की आकृति टेडपोल (tadpole) के समान होती है जो सिर (head), प्रीवा (neck) तथा पूँछ ( Tail) में विभक्त होता है।

सिर बहुभुजी 90-95 mu लम्बा तथा 60-65 mu चौड़ा होता है। पूँछ बेलनाकार लगभग 100mpa लम्बी तथा 20-25 mu चौड़ी होती है। सिर एवं पूँछ के बीच बहुत छोटी ग्रीवा (neck) होती है। सिर का खोल प्रोटीन का बना होता है जिसमें DNA का एक केन्द्रीय कोड ( central code) होता है।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

पूँछ के अन्तिम भाग में एक प्लेट होती है जिसे पुच्छ प्लेट या आधार प्लेट (basal plate) कहते हैं । इस प्लेट से नीचे की ओर छः पुच्छ-तन्तु जुड़े होते हैं। पुच्छ तन्तु जीवाणुभोजी को पोषक कोशिका से चिपकाने तथा लयनकारी विकरों (Lytic enzymes ) के त्रावण में भाग लेते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण - 9

प्रश्न 4.
कवकों में लैंगिक जनन किस प्रकार होता है ? सचित्र वर्णन कीजिये।
उत्तर:
कवकों में लैंगिक प्रजनन (Sexual Reproduction in Fungi) – कवकों में लैंगिक प्रजनन निम्न पदों में पूर्ण होता है –
(A) कोशिका द्रव्य संलयन (Plasmogamy) – इसमें विपरीत विभेद (strain) के युग्मकों या जनन संरचनाओं का कोशिका द्रव्य परस्पर संलयित (fuse) होता है।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण - 10
(B) केन्द्रक संलयन (Karyogamy) – इसमें कोशिकाद्रव्य संलयन द्वारा समीप लाये गये केन्द्रक मिलकर द्विगुणित युग्मनज ( diploid zygote) बनाते हैं।

(C) अर्द्धसूत्रण (Meiosis) – इसमें युग्मनज में अर्द्धसूत्री विभाजन होता है जिससे अगुणित अवस्था स्थापित होती है।

कवकों में लैंगिक प्रजनन निम्नलिखित प्रकार से होता है –
(A) चलयुग्मकी संयुग्मन (Planogametic Conjugation) – इसमें चल युग्मकों का संयोजन (fusion) होता है। चलयुग्मकों की संरचना एवं कार्यिकी के आधार पर संयुग्मन तीन प्रकार का होता है –
(i) समयुग्मकी ( Isogamous ) – इसमें संयुजन करने वाले युग्मक आकार एवं आकृति में समान किन्तु कार्यिकी में भिन्न होते हैं जैसे – सिनकाइट्रियम (Synchytrium) में।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण - 11
(ii) असमयुग्मकी (Anisogamous) – इसमें संयुजन करने वाले युग्मक आकृति में समान किन्तु आकार एवं कार्यिकी में भिन्न होते हैं । जैसे- एलोमाइसिस (Allomyces) ।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

(iii) विषमयुग्मकी (Oogamous) – इसमें युग्मक, आकृति, आकार एवं कार्यिकी में भिन्न होते हैं। नर युग्मक छोटा व चल तथा मादा युग्मक बड़ा तथा अचल होता है। जैसे – मोनोब्लीफेरस (Monoblepharis)

(B) युग्मकधानीय सम्पर्क ( Gametangial contact ) – इसमें नर युग्मकधानी से नर युग्मक सीधे ही मादा युग्मकधानी में चला जाता है, जैसे – सिस्टोपस (Cystopus) ।

(C) युग्मकधानीय संयुग्मन ( Gametangial conjugation) – इसमें युग्मकधानी के युग्मकों का सम्पूर्ण रूप से संयोजन होता है। जैसे—म्यूकर (Mucor), राइजोपस (Rhizopus)।
तथा

(D) काययुग्मन (Somatogamy) – ऐस्कोमाइसिटीज बैसडरोमाइसिटीज वर्ग के सदस्यों में लैंगिक जनन सामान्य कोशिकाओं के केन्द्रकों से संयोजन से होता है। इसे काय युग्मन (sematogamy) कहते हैं।

(E) अचल पुमणु युग्मन ( Spermatization ) – एस्कोमाइसिटीज तथा बेसीडियोमाइसिटीज वर्ग के सदस्यों में नर जननांग से अचल पुमणु बनते हैं जो ग्राही सूत्र (receptive hyphae) द्वारा मादा युग्मकधानी के सम्पर्क में आते हैं। इसे अचल पुमणु युग्मन (spermatization) कहते हैं। जैसे- पक्सीनिया (Puccinia) |

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HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

Haryana State Board HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी Important Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न :

प्रश्न 1.
किसी स्कूल की कक्षा X के 30 विद्यार्थियों द्वारा गणित के एक पेपर में, 100 में से प्राप्त किए गए अंक नीचे एक सारणी में दिए गए हैं। इन विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त अंकों का माध्य ज्ञात कीजिए ।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 1
हल :
यहाँ पर,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 2

प्रश्न 2.
निम्नलिखित बारंबारता बंटन का माध्य ज्ञात कीजिए-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 3
हल :
यहाँ पर,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 4

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 3.
यदि निम्नलिखित बारंबारता बंटन का माध्य 15 हो तो p का मान ज्ञात करो –
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 5
हल :
यहाँ पर,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 6
⇒ 15 (27 + p) = 445 + 10p
⇒ 405 + 1.5p = 445 + 10p
⇒ 15p – 10p = 445 – 405
⇒ 5p = 40
⇒ P = \(\frac {40}{5}\) = 8

प्रश्न 4.
कल्पित माध्य विधि से निम्नलिखित आँकड़ों की माध्य मजदूरी ज्ञात कीजिए-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 7
हल :
माना कल्पित माध्य (a) = 900
तो di = xi – a = xi – 900
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 8
अतः दिए गए आँकड़ों की माध्य मजदूरी = 891.20 रु०

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 5.
निम्नलिखित सारणी में ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में महिला शिक्षकों के प्रतिशत बंटन को दर्शाती है। महिला शिक्षकों का माध्य प्रतिशत ज्ञात कीजिए :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 9
हल :
यहाँ पर,
माना कल्पित माध्य (a) = 50
तथा वर्ग-माप (h) = 10 तो u1 = \(\frac{x_i-a}{h}=\frac{x_i-50}{10}\)
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 10

प्रश्न 6.
किसी परीक्षा के 140 विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त अंक निम्नलिखित सारणी में दर्शाए गए हैं-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 11
तीनों विधियों अर्थात् प्रत्यक्ष विधि, कल्पित माध्य विधि और पग- विचलन विधि के द्वारा माध्य अंकों का परिकलन कीजिए ।
हल :
(i) प्रत्यक्ष विधि :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 12

(ii) कल्पित माध्य विधि : माना कल्पित माध्य (a) = 25 तो di = xi – a = xi – 25
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 13

(iii) पग-विचलन विधि : कल्पित माध्य (a) = 25, h = 10 तो ui = \(\frac{x_i-a}{h}=\frac{x_i-25}{10}\)
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 14

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 7.
निम्नलिखित आंकड़ों से माध्य ज्ञात कीजिए-

अंकविद्यार्थियों की संख्या
10 से कम
20 से कम
30 से कम
40 से कम
50 से कम
60 से कम
70 से कम
80 से कम
90 से कम
100 से कम
5
9
17
29
45
60
70
78
83
85

हल :
माना कल्पित माध्य (a) = 45, h = 10 तो ui = \(\frac{x_i-a}{h}=\frac{x_i-45}{10}\)
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 15

प्रश्न 8.
वर्ष 2000-2001 के लिए किसी नगर के साप्ताहिक निर्वाह खर्च सूचकांक निम्नानुसार हैं-

निर्वाह खर्च सूचकांकसप्ताहों की संख्या
140-150
150-160
160-170
170-180
180-190
190-200
5
10
20
9
6
2
योग52

माध्य साप्ताहिक निर्वाह खर्च सूचकांक का परिकलन कीजिए ।
हल :
माना कल्पित माध्य (a) = 175, h = 10 तो ui = \(\frac{x_i-a}{h}=\frac{x_i-175}{10}\)
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 16
मध्य (\(\bar{x}\)) = a + \(\frac{\sum f_i u_i}{\sum f_i}\) × h = 175 + \(\frac {-45}{52}\) × 10 = 175 – 8.7 = 166.3 (लगभग)

प्रश्न 9.
निम्नलिखित बारंबारता बंटन में वर्ग – अंतराल (40-50) की बारंबारता अज्ञात है । यह ज्ञात है कि बंटन का माध्य 52 है। अज्ञात बारंबारता ज्ञात कीजिए ।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 17
हल :
माना अज्ञात बारंबारता = f, माध्य (\(\bar{x}\)) = 52
कल्पित माध्य (a) = 45, h = 10
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 18

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 10.
निम्नलिखित वर्गीकृत बारंबारता बंटन का बहुलक ज्ञात कीजिए-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 19
हल :
यहाँ पर अधिकतम वर्ग बारंबारता 23 है तथा इस बारंबारता का संगत वर्ग : 12-15 है।
⇒ बहुलक वर्ग = 12-15
बहुलक वर्ग की निम्न सीमा (l) = 12
वर्ग-माप = 3
बहुलक वर्ग की बारंबारता (f1) = 23
बहुलक वर्ग से ठीक पहले वाले वर्ग की बारंबारता (f0) = 10
बहुलक वर्ग के ठीक बाद में आने वाले वर्ग की बारंबारता (f2) = 21
अब बहुलक = l + (\(\frac{f_1-f_0}{2 f_1-f_0-f_2}\)) × h
= 12 + (\(\frac{23-10}{2(23)-10-21}\)) × 3
= 12 + \(\frac {13}{15}\) × 3 = 12 + 2.6 = 14.6

प्रश्न 11.
निम्नलिखित बारंबारता बंटन का बहुलक ज्ञात कीजिए-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 20
हल :
यहाँ पर बहुलक ज्ञात करने के लिए आँकड़ों को सतत वर्ग-अंतरालों में बदलना पड़ेगा क्योंकि सूत्र में वर्ग-अंतरालों को सतत माना गया है जो निम्नलिखित होंगे-

वर्ग-अंतरालबारंबारता (f)
0.5-4.5
4.5-8.5
8.5-12.5
12.5-16.5
16.5-20.5
20.5-24.5
24.5-28.5
28.5-32.5
32.5-36.5
36.5-40.5
2
5
8
9
12
14
14
15
11
13

यहाँ पर अधिकतम वर्ग बारंबारता 15 है तथा इस बारंबारता का संगत वर्ग 28.5 -32.5 है।
⇒ बहुलक वर्ग = 28.5 – 32.5
बहुलक वर्ग की निम्न सीमा (l) = 28.5
वर्ग-माप (h) = 4
बहुल वर्ग की बारंबारता (f1) = 15
बहुलक वर्ग से ठीक पहले वाले वर्ग की बारंबारता (f0) = 14
बहुलक वर्ग के ठीक बाद में आने वाले वर्ग की बारंबारता (f2) = 11
अब बहुलक = l + (\(\frac{f_1-f_0}{2 f_1-f_0-f_2}\)) × h
= 28.5 + (\(\frac{15-14}{2(15)-14-11}\)) × 4
= 28.5 × \(\frac {1}{5}\) × 4
= 28.5 + 0.8
= 29.3

प्रश्न 12.
निम्नलिखित आँकड़ों का माध्यक 525 है। यदि बारंबारताओं का योग 100 है, तो x और y का मान ज्ञात कीजिए।

वर्ग-अंतरालबारंबारता (f)
0-100
100-200
200-300
300-400
400-500
500-600
600-700
700-800
800-900
900-1000
2
5
x
12
17
20
Y
9
7
4

हल :
यहाँ पर,

वर्ग-अंतरालबारंबारता (f)संचयी बारंबारता (cf)
0-100
100-200
200-300
300-400
400-500
500-600
600-700
700-800
800-900
900-1000
2
5
X
12
17
20
Y
9
7
4
2
7
7 + x
19 + x
36 + x
56 + x
56 + x + y
65 + x + y
72 + x + y
76 + x + y

प्रश्नानुसार, n = 100 ⇒ \(\frac{n}{2}=\frac{100}{2}\) = 50 जो कि वर्ग-अंतराल 500-600 में आता है
⇒ 76 + x + y = 100 ⇒ x + y = 24 ………………(i)
क्योंकि, माध्यक 525 है, जो वर्ग 500-600 में स्थित है ।
अतः, l = 500, f = 20, cf = 36 + x, h = 100
अब माध्यक = l + (\(\frac{\frac{n}{2}-c f}{f}\)) × h
⇒ 525 = 500 + (\(\frac{50-36-x}{20}\)) × 100
या 525 – 500 = (14 – x) × 5
या 25 = 70 – 5x
या 5x = 70 – 25 = 45
अतः x = 9
समीकरण (i) 9 + y = 24
⇒ y = 24 – 9 = 15
अतः x = 9 व y = 15

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 13.
किसी स्कूल की कक्षा X की 51 लड़कियों की ऊँचाइयों का एक सर्वेक्षण किया गया और निम्नलिखित आँकड़े प्राप्त किए गए-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 21
माध्यक ऊँचाई ज्ञात कीजिए ।
हल :

ऊँचाई (cm में)बारम्बारता (f)संचयी बारम्बारता (cf)
140 से कम
140-145
145-150
150-155
155-160
160-165
4
7
18
11
06
05
4
11
29
40
46
51

यहाँ n = 51
⇒ \(\frac{n}{2}=\frac{51}{2}\) = 25.5 जोकि वर्ग अन्तराल 145 – 150 में आता है।
अतः माध्यक वर्ग = 145 – 150
अब माध्यक वर्ग की निम्न सीमा (l) = 145
वर्गमाप (h) = 5
माध्यक वर्ग से ठीक पहले वाले वर्ग की संचयी बारम्बारता (cf) = 11
माध्यक वर्ग की बारम्बारता (f) = 18
अब माध्यक = l + (\(\frac{\frac{n}{2}-c f}{f}\)) × h
= 145 + (\(\frac{25.5-11}{18}\)) × 5
= 145 + \(\frac {72.5}{18}\)
= 145 + 4.03
= 149.03 cm

प्रश्न 14.
एक प्रवेश परीक्षा में 230 विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त अंकों की बारंबारता बंटन निम्नलिखित है-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 22
एक ही अक्ष पर ‘से कम’ तथा ‘से अधिक’ विधि द्वारा संचयी बारंबारता वक्र बनाएँ तथा माध्यक ज्ञात कीजिए ।
हल :
दी गई बारंबारता बंटन का एक कम प्रकार की संचयी बारंबारता बंटन सारणी व ‘से अधिक’ प्रकार की संचयी बारंबारता बंटन सारणी निम्नलिखित प्राप्त होगी-

प्राप्तांकसंचयी बारंबारता
450 से कम
500 से कम
550 से कम
600 से कम
650 से कम
700 से कम
750 से कम
800 से कम
2
55 (20 + 35)
95 (55 + 40)
127 (95 + 32)
151 (127 + 24)
178(151 + 27)
196(178 + 18)
230(196 + 34)
प्राप्तांकसंचयी बारंबारता
400 से अधिक
450 से अधिक
500 से अधिक
550 से अधिक
600 से अधिक
650 से अधिक
700 से अधिक
750 से अधिक
230
210
175
135
103
79
52
34

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 23
अब ग्राफ पेपर पर बिन्दुओं (450, 20), (500, 55), (550, 95), (600, 127), (650, 151), (700, 178), (750, 196) व (800, 230) को आलेखित कर मुक्त हस्त से मिलाकर ‘से कम’ प्रकार का तोरण खींचिए।

इसी प्रकार बिन्दुओं (400, 230), (450, 210), (500, 175), (550, 135), (600, 103), (650, 79), (700, 52) व (750, 34) को आलेखित कर मुक्त हस्त से मिलाकर ‘से अधिक’ प्रकार का तोरण खींचिए।

दोनों तोरणों का कटाव बिन्दु P माध्यक 581 (लगभग) प्रदान करता है ।

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 15.
निम्नलिखित बारंबारता बंटन के लिए ‘से कम’ प्रकार का तोरण खींचिए –
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 24
हल :
दी गई बारंबारता बंटन सारणी को एक कम प्रकार की संचयी बारंबारता बंटन सारणी में बदलने पर प्राप्त होगा-

अंकसंचयी बारंबारता
10 से कम
20 से कम
30 से कम
40 से कम
50 से कम
60 से कम
7
17 (7+10)40 (17+23)
91 (40+51)
97 (91+6)
100 (97 +3)

अब बिन्दुओं A(10, 7), B(20, 17), C (30, 40), D(40, 91), E(50, 97) व F (60, 100) को आलेखित कर मुक्त हस्त से मिलाकर ‘से कम’ प्रकार का तोरण निम्नलिखित होगा –
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 25

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा केन्द्रीय प्रवृत्ति का माप नहीं है-
(A) माध्य
(B) माध्यक
(C) बहुलक
(D) मानक विचलन
हल :
(D) मानक विचलन

प्रश्न 2.
यदि प्रेक्षणों
x1, x2, x3 ………………… xn की बारंबारताएँ क्रमशः f1, f2, f3 ……………. fn हों तो इनका माध्य होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 26
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 27

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 3.
किसी महाविद्यालय के दस विद्यार्थियों के प्रतिदिन के जेब खर्च (रुपयों में) क्रमशः निम्नलिखित हैं-
26, 27, 20, 29, 21, 23, 25, 30, 28, 21
माध्य प्रतिदिन जेब खर्च होगा-
(A) 25 रु०
(B) 24 रु०
(C) 26 रु०
(D) 25.50 रु०
हल :
(A) 25 रु०

प्रश्न 4.
किसी पाठशाला की दसवीं कक्षा के 10 विद्यार्थियों का भार (कि०ग्रा० में) निम्नलिखित है-
38, 42, 43, 40, 47, 45, 55, 39, 41, 50 इनका माध्य होगा-
(A) 42 कि०ग्रा०
(B) 43 कि०ग्रा०
(C) 44 कि०ग्रा०
(D) 45 कि०ग्रा०
हल :
(C) 44 कि०ग्रा०

प्रश्न 5.
दसवीं कक्षा के एक विद्यार्थी के छः भिन्न-भिन्न विषयों में प्राप्त अंक निम्नानुसार हैं-
70, 76, 82, 78, 83 और 85
इनका माध्य होगा-
(A) 78
(B) 79
(C) 77
(D) 80
हल :
(B) 79

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 6.
दसवीं कक्षा के पाँच विद्यार्थियों की मध्यमान ऊँचाई 161 सें०मी० है । यदि उनमें से चार विद्यार्थियों की ऊँचाई (सें०मी० में) 165, 159, 156 और 162 हो तो पाँचवें विद्यार्थी की ऊँचाई होगी-
(A) 163 cm
(B) 164 cm
(C) 162 cm
(D) 161 cm
हल :
(A) 163 cm

प्रश्न 7.
संचयी बारंबारता सारणी निम्न में से क्या ज्ञात करने के लिए बनाई जाती है ?
(A) माध्य
(B) माध्यक
(C) बहुलक
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(B) माध्यक

प्रश्न 8.
प्रथम 7 सम संख्याओं का माध्य होगा-
(A) 8
(B) 7
(C) 6
(D) 4
हल :
(A) 8

प्रश्न 9.
9 प्रेक्षणों का माध्य 35 ज्ञात किया गया। बाद में पता चला कि एक प्रेक्षण 81 को गलती से 18 पढ़ लिया गया था। इन प्रेक्षणों का सही माध्य होगा-
(A) 42
(B) 41
(C) 40
(D) 39
हल :
(A) 42

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 10.
किसी वर्ग – अंतराल की ऊपरी तथा निचली वर्ग सीमाओं का औसत क्या कहलाता है ?
(A) बारंबारता
(C) संचयी बारंबारता
(B) वर्ग चिह्न
(D) माध्यक
हल :
(B) वर्ग चिह्न

प्रश्न 11.
वर्ग – अंतराल 20-25 का वर्ग चिह्न होगा-
(A) 22.0
(B) 22.5
(C) 23.0
(D) 23.5
हल :
(B) 22.5

प्रश्न 12.
वर्ग- अंतराल 40-55 का वर्ग चिह्न होगा-
(A) 43.5
(B) 45.5
(C) 47.5
(D) 49.5
हल :
(C) 47.5

प्रश्न 13.
वर्ग- अंतराल 20-60 का वर्ग चिह्न होगा-
(A) 42
(B) 45
(C) 35
(D) 40
हल :
(D) 40

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 14.
प्रथम 6 सम संख्याओं का माध्य क्या है ?
(A) 8
(B) 7
(C) 6
(D) 12
हल :
(B) 7

प्रश्न 15.
प्रथम 6 विषम संख्याओं का माध्य क्या होगा ?
(A) 8
(B) 7
(C) 6
(D) 4
हल :
(C) 6

प्रश्न 16.
किसी भी बारंबारता बंटन के लिए माध्य से विचलनों का बीजगणितीय योग होता है-
(A) सदैव धनात्मक
(B) शून्य
(C) सदैव ऋणात्मक
(D) एक शून्येत्तर संख्या
हल :
(B) शून्य

प्रश्न 17.
वर्गीकृत आँकड़ों का माध्य ज्ञात करने की विधि है –
(A) प्रत्यक्ष – विधि
(B) कल्पित- माध्य विधि
(C) पग-विचलन विधि
(D) उपरोक्त तीनों
हल :
(D) उपरोक्त तीनों

प्रश्न 18.
निम्नलिखित बारंबारता बंटन का माध्य क्या होगा ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 28
(A) 6
(B) 7
(C) 8
(D) 9
हल :
(D) 9

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 19.
निम्नलिखित बारंबारता. बंटन का माध्य क्या होगा ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 29
(A) 6
(B) 7
(C) 8
(D) 9
हल :
(A) 6

प्रश्न 20.
निम्नलिखित बारंबारता बंटन का माध्य क्या होगा ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 30
(A) 50
(B) 52.5
(C) 55
(D) 60
हल :
(C) 55

प्रश्न 21.
अध्ययन का वह क्षेत्र जिसमें आँकड़ों के प्रस्तुतिकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन पर विचार किया जाता है, उसे कहा जाता है-
(A) सांख्यिकी
(B) क्षेत्रमिति
(C) त्रिकोणमिति
(D) ज्यामिति
हल :
(A) सांख्यिकी

प्रश्न 22.

वर्ग – अंतरालबारंबारता
0-5
5-10
10-15
15-20
20-25
25-30
30-35
5
12
11
8
1
1
2
कुल40

प्रत्येक वर्ग- अंतराल की माप है-
(A) 10
(B) 5
(C) 35
(D) 12
हल :
(B) 5

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 23.
प्रश्न नं० 22 की सारणी में चौथे वर्ग-अंतराल की निम्न वर्ग सीमा है-
(A) 15
(B) 20
(C) 17.5
(D) 8
हल :
(A) 15

प्रश्न 24.
प्रश्न नं० 22 की सारणी में अंतिम वर्ग – अंतराल की उच्च वर्ग सीमा है-
(A) 30
(B) 32.5
(C) 35
(D) 2
हल :
(C) 35

प्रश्न 25.
प्रश्न नं० 22 की सारणी में तीसरे वर्ग – अंतराल का वर्ग चिह्न है-
(A) 10
(B) 15
(C) 11
(D) 12.5
हल :
(D) 12.5

प्रश्न 26.
प्रश्न नं० 22 की सारणी में अधिकतम बारंबारता वाला वर्ग- अंतराल है-
(A) 0-5
(B) 5-10
(C) 10-15
(D) 15-20
हल :
(B) 5-10

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 27.
नीचे की सारणी में 400 नियॉन लैंपों के जीवनकाल दिए गए हैं-

जीवनकाल (घंटों में)लैंपों की संख्या
300-400
400-500
500-600
600-700
700-800
800-900
900-1000
14
56
60
86
74
62
48

उपरोक्त सारणी में 700 घंटों से अधिक जीवनकाल वाले लैंपों की संख्या है-
(A) 74
(B) 136
(C) 184
(D) 110
हल :
(D) 110

प्रश्न 28.
प्रथम 7 प्राकृत संख्याओं का माध्य क्या है ?
(A) 8
(B) 7
(C) 4
(D) 3
हल :
(C) 4

प्रश्न 29.
निम्नलिखित आँकड़ों का बहुलक क्या है ?
12, 16, 8, 12, 8, 12, 16, 10, 12, 16, 18, 16, 8, 16
(A) 12
(B) 16
(C) 8
(D) 10
हल :
(B) 16

प्रश्न 30.
प्रथम पाँच प्राकृत संख्याओं का माध्य होगा-
(A) 3
(B) 3.5
(C) 4.0
(D) 4.5
हल :
(A) 3

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 31.
5 संख्याओं का माध्य 20 है। यदि इनमें से एक संख्या निकाल दी जाए, तो शेष संख्याओं का माध्य 23 हो जाता है । निकाली गई संख्या होगी-
(A) 8
(B) 7
(C) 6
(D) 5
हल :
(A) 8

प्रश्न 32.
यदि परीक्षा पूरी करने में किसी विशेष समूह द्वारा लिया गया समय मिनटों में क्रमशः 17, 19, 20, 22, 24, 24, 28, 30, 30, 36 हो तथा इनका माध्य 25 हो तो कितने विद्यार्थियों ने माध्य से अधिक समय लिया ?
(A) तीन
(B) चार
(C) पाँच
(D) छह
हल :
(B) चार

प्रश्न 33.
…………………. दिए हुए प्रेक्षणों में वह मान है जो सबसे अधिक बार आता है ?
(A) माध्य
(B) माध्यक
(C) बहुलक
(D) (A) व (B) दोनों
हल :
(C) बहुलक

प्रश्न 34.
किसी गेंदबाज़ द्वारा 10 क्रिकेट मैचों में लिए गए विकेटों की संख्याएँ निम्नलिखित हैं-
2 6 4 5 0 2 1 3 2 3
इन आँकड़ों का बहुलक होगा-
(A) 1
(B) 2
(C) 3
(D) 4
हल :
(B) 2

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 35.
निम्नलिखित आँकड़ों का बहुलक क्या होगा ?
3, 2, 3, 4, 0, 3, 1, 3
(A) 2
(B) 3
(C) 4
(D) 1
हल :
(B) 3

प्रश्न 36.
निम्नलिखित आँकड़ों का बहुलक क्या होगा ?
2.5, 2.3, 2.2, 2.2, 2.4, 2.7, 2.6, 2.5, 2.3, 2.2, 2.5, 2.2
(A) 2.5
(B) 2.4
(C) 2.3
(D) 2.2
हल :
(D) 2.2

प्रश्न 37.
निम्नलिखित आँकड़ों का माध्यक क्या है ?
34, 32, 48, 38, 24, 30, 27, 21, 35
(A) 24
(B) 32
(C) 21
(D) 48
हल :
(B) 32

प्रश्न 38.
निम्नलिखित बारम्बारता सारणी में बहुलक वर्ग होगा :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 31
(A) 0 – 10
(B) 20 – 30
(C) 50 – 60
(D) 40 – 50
हल :
(D) 40 – 50

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 39.
निम्नलिखित आँकड़ों का बहुलक वर्ग क्या होगा ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 32
(A) 6 – 12
(B) 0 – 6
(C) 24 – 30
(D) 12 – 18
हल :
(D) 12 – 18

प्रश्न 40.
निम्नलिखित आँकड़ों का बहुलक क्या है ?
10, 8, 16, 10, 16, 13, 10, 19, 9, 10
(A) 19
(B) 10
(C) 16
(D) 8
हल :
(B) 10

प्रश्न 41.
निम्नलिखित आँकड़ों का बहुलक होगा-
25, 29, 24, 25, 29, 25, 34, 35, 25, 39
(A) 25
(B) 29
(C) 35
(D) 39
हल :
(A) 25

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 42.
निम्नलिखित बारंबारता बंटन का बहुलक वर्ग होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 33
(A) 20-40
(B) 40-60
(C) 60-80
(D) 80-100
हल :
(B) 40-60

प्रश्न 43.
निम्नलिखित बारंबारता बंटन का बहुलक वर्ग होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 34
(A) 1 – 3
(B) 3 – 5
(C) 5 – 7
(D) 7 – 9
हल :
(B) 3 – 5

प्रश्न 44.
बहुलक ज्ञात करने का सूत्र है-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 35
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 36

प्रश्न 45.
माध्यक ज्ञात करने का सूत्र है-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 37
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 38

प्रश्न 46.
बारंबारता बंटन के माध्य, माध्यक व बहुलक के बीच उचित संबंध है-
(A) बहुलक = 3 माध्यक – माध्य
(B) बहुलक = 2 माध्यक – माध्य
(C) बहुलक = माध्यक – 2 माध्य
(D) बहुलक = 3 माध्यक – 2 माध्य
हल :
(D) बहुलक = 3 माध्यक – 2 माध्य

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 47.
एक कक्षा के 9 विद्यार्थियों के अंक निम्नलिखित हों तो माध्यक होगा-
21, 24, 27, 30, 32, 34, 35, 38, 48
(A) 30
(B) 32
(C) 34
(D) 33
हल :
(B) 32

प्रश्न 48.
निम्नलिखित आँकड़ों से 10 श्रमिकों के प्रतिदिन की मजदूरी (रुपयों में) का माध्यक होगा-
8, 9, 11, 14, 15, 17, 18, 20, 22, 25
(A) 15
(B) 17
(C) 16
(D) 17.5
हल :
(C) 16

प्रश्न 49.
नीचे किसी लड़ाकू जहाज के मशीन के पुर्जों के 15 टुकड़ों का जीवनकाल (घंटों में) दिया है। इसका माध्यक होगा-
694, 696, 699, 705, 710, 712, 715, 716, 719, 724, 725, 728, 729, 734, 745
(A) 716
(B) 715.5
(C) 717.5
(D) 719
हल :
(A) 716

प्रश्न 50.
निम्नलिखित आँकड़ों का माध्यक वर्ग क्या होगा ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 39
(A) 10-30
(B) 30-60
(C) 60-80
(D) 0-10
हल :
(B) 30-60

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 51.
निम्नलिखित आँकड़ों का माध्यक वर्ग क्या होगा ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 40
(A) 135-140
(B) 140-145
(C) 145-150
(D) 150-155
हल :
(C) 145-150

प्रश्न 52.
प्रथम 7 विषम संख्याओं का माध्य क्या है ?
(A) 13
(B) 11
(C) 9
(D) 7
हल :
(D) 7

प्रश्न 53.
निम्नलिखित आँकड़ों का माध्यक वर्ग होगा :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी - 41
(A) 0-10
(B) 30-40
(C) 40-50
(D) 20-30
हल :
(C) 40-50

प्रश्न 54.
आलेखीय विधि से माध्यक ज्ञात करने के लिए उचित ग्राफ होता है ?
(A) बारंबारता वक्र
(B) तोरण
(C) बारंबारता बहुभुज
(D) आयत चित्र
हल :
(B) तोरण

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 14 सांख्यिकी

प्रश्न 55.
किसी बारंबारता बंटन का बहुलक किस आलेखीय विधि से ज्ञात किया जाता है?
(A) बारंबारता बहुभुज
(B) बारंबारता वक्र
(C) आयत चित्र
(D) तोरण
हल :
(C) आयत चित्र

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HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

Haryana State Board HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज Important Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न :

प्रश्न 1.
यदि आकृति (i) और (ii) में, PQ || BC हो, तो (i) में QC और (ii) में AQ ज्ञात कीजिए-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 1
हल :
(i) आकृति अनुसार
AP = 1.5 cm, PB = 3 cm, AQ = 1.3 cm, QC = ?
ΔABC में, ∵ PQ || BC (दिया है)
∴ \(\frac{\mathrm{AP}}{\mathrm{PB}}=\frac{\mathrm{AQ}}{\mathrm{QC}}\)
⇒ \(\frac{1.5}{3.0}=\frac{1.3}{\mathrm{QC}}\)
या 1.5 × QC = 1.3 × 3.0
या QC = \(\frac{1.3 \times 3.0}{1.5}\) = 2.6 cm
अतः QC = 2.6 cm

(ii) आकृति अनुसार
AP = 3 cm, PB = 6 cm, AQ = ?, QC = 5.3 cm
ΔABC में, ∵ PQ || BC (दिया है)
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 2

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 2.
ABCD एक समलंब है जिसमें AB || DC है। असमांतर भुजाओं AD और BC पर क्रमशः बिंदु E और F इसे प्रकार स्थित हैं कि EF भुजा AB के समांतर है (देखिए संलग्न आकृति) । दर्शाइए कि \(\frac{\mathbf{A E}}{\mathbf{E D}}=\frac{\mathbf{B F}}{\mathbf{F C}}\) है।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 3
सिद्ध कीजिए कि समलंब की समांतर भुजाओं के समांतर कोई रेखा, उन भुजाओं को जो समांतर नहीं हैं, आनुपातिकता (अर्थात् समान अनुपात) में विभाजित करती है।
हल :
दिया है : एक समलंब चतुर्भुज ABCD जिसमें AB || CD तथा EF इनके समांतर खींची गई रेखा है। जो AD और BC को क्रमशः E व F पर मिलती है।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 4
सिद्ध करना है :
\(\frac{\mathbf{A E}}{\mathbf{E D}}=\frac{\mathbf{B F}}{\mathbf{F C}}\)
रचना : विकर्ण AC खींचिए जो रेखा EF को ‘O’ पर काटता है
प्रमाण : ΔADC में, EO || DC, अतः थेल्स प्रमेय से,
\(\frac{\mathbf{A E}}{\mathbf{E D}}=\frac{\mathbf{A O}}{\mathbf{O C}}\) ………..(i)
अब ΔABC में, OF || AB, अतः थेल्स प्रमेय से
\(\frac{\mathbf{A O}}{\mathbf{O C}}=\frac{\mathbf{B F}}{\mathbf{F C}}\) ………..(ii)
समीकरण (i) व (ii) से,
\(\frac{\mathbf{A E}}{\mathbf{E D}}=\frac{\mathbf{B F}}{\mathbf{F C}}\) [इति सिद्धम]

प्रश्न 3.
यदि तीन या अधिक समांतर रेखाएँ दो तिर्यक रेखाओं से प्रतिच्छेदित होती हों, तो सिद्ध कीजिए कि उनके द्वारा तिर्यक रेखाओं पर काटे गए अंतः खंड (intercepts) आनुपातिक होते हैं ।
[टिप्पणी : इस परिणाम को सामान्यतः आनुपातिकता अंतः खंड गुणधर्म कहते हैं ।]
हल :
दिया है : तीन समांतर रेखाएँ ‘l’, ‘m’ तथा ‘n’ जिनको दो तिर्यक रेखाएँ p तथा q क्रमश: A, B, C, F, E तथा D पर काटती हैं। जैसा कि आकृति में दिखाया गया है।
सिद्ध करना है : \(\frac{\mathbf{A B}}{\mathbf{B C}}=\frac{\mathbf{E F}}{\mathbf{E D}}\)
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 4
रचना : CF को मिलाइए जो रेखा BE को O पर काटती है ।
प्रमाण : ΔACF में, AF || BO अतः आधारभूत आनुपातिक प्रमेय से,
\(\frac{\mathbf{A B}}{\mathbf{B C}}=\frac{\mathbf{F O}}{\mathbf{O C}}\) ………….(i)
इसी प्रकार ΔFCD में, OE || CD, अतः आधारभूत आनुपातिक प्रमेय से,
\(\frac{\mathbf{F O}}{\mathbf{O C}}=\frac{\mathbf{F E}}{\mathbf{E D}}\) ………….(ii)
समीकरण (i) व (ii) से,
\(\frac{\mathbf{A B}}{\mathbf{B C}}=\frac{\mathbf{F E}}{\mathbf{E D}}\) [इति सिद्धम]

प्रश्न 4.
एक रेखाखंड AB 10 cm लंबाई का खींचिए और उसको 3 : 4 के आंतरिक अनुपात में विभाजित कीजिए ।
हल :
दिया है : एक रेखाखंड AB जिसकी लंबाई 10cm है ।
सिद्ध करना है : AB पर एक बिंदु P ऐसा जो इसे 3 : 4 के आंतरिक अनुपात में विभाजित करता हो ।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 6
रचना के चरण :

  1. 10 cm लंबाई वाला रेखाखंड AB खींचो।
  2. A से न्यून कोण ∠BAY बनाते हुए एक रेखा AY खींचो ।
  3. AY पर समान दूरी पर सात बिंदु A1, A2, A3, A4, A5, A6 और A7 अंकित करो अर्थात् AA1 = A1A2 = A2A3 = ………………. A6A7.
  4. A7B को मिलाओ ।
  5. A3 से A3P || A7B खींचो जोकि AB को P पर प्रतिच्छेद करे । अब बिंदु P रेखा AB पर अभीष्ट बिंदु है जो इसे 3 : 4 के आंतरिक अनुपात में विभाजित करता है अर्थात् AP : PB = 3 : 4

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 5.
संलग्न आकृति में EF || AB || DC है । सिद्ध कीजिए कि \(\frac{\mathbf{A E}}{\mathbf{E D}}=\frac{\mathbf{B F}}{\mathbf{F C}}\)
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 7
ΔADC से, हम पाते हैं,
EP || DC [∵ EF || DC (दिया है)]
∴ \(\frac{\mathbf{A E}}{\mathbf{E D}}=\frac{\mathbf{A P}}{\mathbf{P C}}\) ………(i)
साथ ही ΔCAB से, हमें मिलता है,
FP || BA [∵ EF || AB (दिया है)]
∴ \(\frac{\mathbf{B F}}{\mathbf{F C}}=\frac{\mathbf{A P}}{\mathbf{P C}}\) ………(ii)
समीकरण (i) और (ii) से,
\(\frac{\mathbf{A E}}{\mathbf{E D}}=\frac{\mathbf{B F}}{\mathbf{F C}}\) [इति सिद्धम]

प्रश्न 6.
संलग्न आकृति में यदि EB = 2 cm; AE = 5cm AF = x; FC = x – 1 तथा EF || BC, तो x का मान ज्ञात कीजिए।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 8
क्योंकि त्रिभुज ABC में EF || BC
∴ \(\frac{\mathbf{A E}}{\mathbf{E B}}=\frac{\mathbf{A F}}{\mathbf{F C}}\)
परंतु, AE = 5 cm, EB = 2 cm
AF = x, FC = x – 1
⇒ \(\frac{5}{2}=\frac{x}{x-1}\)
या 5(x – 1) = 2x
या 5x – 5 = 2x
या 5x – 2x = 5
या 3x = 5
या x = \(\frac {5}{3}\)

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 7.
संलग्न आकृति में, ΔEDC ~ ΔEBA, ∠BEC = 115° और ∠EDC = 70° है। ∠DEC, ∠DCE, ∠EAB, ∠AEB और ∠EBA ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 9
आकृति अनुसार,
∠BEC = 115°, ∠EDC = 70°
∠DEC + ∠BEC = 180° (सरल रैखिक युग्म)
या ∠DEC + 115° = 180° [∵ ∠BEC = 115°]
या ∠DEC = 180° – 115° = 65°
अब ΔDEC में,
∠DEC + ∠EDC + ∠DCE = 180° (त्रिभुज के कोण )
⇒ 65° + 70° + ∠DCE = 180°
या 135° + ∠DCE = 180°
या ∠DCE = 180° – 135° = 45°
परंतु ΔEDC ~ ΔEBA (दिया है)
इसलिए
∠EAB = ∠DCE = 45°
∠AEB = ∠DEC = 65°
∠EBA = ∠EDC = 70°
अतः ∠DEC = 65°, ∠DCE = 45°, ∠EAB = 45°, ∠AEB = 65°, ∠EBA = 70°

प्रश्न 8.
संलग्न आकृति में, यदि PS || QR है, तो सिद्ध कीजिए कि ΔPOS ~ ΔROQ है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 10
दिया है : आकृति में PS || QR
सिद्ध करना है : ΔPOS ~ ΔROQ
प्रमाण : ΔPOS और ΔROQ में
∠POS = ∠QOR (शीर्षाभिमुख कोण)
∠PSO = ∠RQO (एकांतर कोण)
∠SPO = ∠QRO (एकांतर कोण)
∴ ΔPOS ~ ΔROQ (कोण-कोण समरूपता नियम) [इति सिद्धम]

प्रश्न 9.
दो समरूप त्रिभुजों के परिमाप क्रमशः 30 cm और 20 cm हैं। यदि पहले त्रिभुज की एक भुजा 12 cm हो, तो दूसरे त्रिभुज की संगत भुजा ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 11
माना ΔDEF और ΔABC अभीष्ट त्रिभुज हैं जिनके परिमाप क्रमशः 30 cm व 20 cm हैं।
माना भुजा EF = 12 cm
तो ΔABC की संगत भुजा BC = ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 12
अतः दूसरे त्रिभुज की संगत भुजा = 8 cm

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 10.
संलग्न आकृति में, \(\frac{O A}{O C}=\frac{O D}{O B}\) है । सिद्ध कीजिए कि ∠A = ∠C और ∠B = ∠D है।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 13
हल :
दिया है : \(\frac{O A}{O C}=\frac{O D}{O B}\)
सिद्ध करना है : ∠A = ∠C और ∠B = ∠D
प्रमाण : ΔAOD और ΔBOC में,
∠AOD = ∠BOC (शीर्षाभिमुख कोण)
एवं \(\frac{O A}{O C}=\frac{O D}{O B}\) (दिया है)
अतः ΔAOD ~ ΔBOC (∴ भुजा – कोण – भुजा समरूपता गुणधर्म से)
अतः ∠A = ∠C
व ∠D = ∠B
(यदि त्रिभुजें समरूप हों, तो संगत कोण समान होते हैं ।) [इति सिद्धम]

प्रश्न 11.
CM और RN क्रमशः ΔABC और ΔPQR की माध्यिकाएँ हैं यदि ΔABC ~ ΔPQR है, तो सिद्ध कीजिए कि ΔAMC ~ ΔPNR
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 14
दिया है : CM और RN क्रमशः ΔABC और ΔPQR की
माध्यिकाएँ हैं तथा ΔABC ~ ΔPQR है ।
सिद्ध करना है : ΔAMC ~ ΔPNR
प्रमाण : क्योंकि ΔABC ~ ΔPQR
∴ \(\frac{A B}{P Q}=\frac{B C}{Q R}=\frac{C A}{R P}\) …………..(i)
तथा ∠A = ∠P, ∠B = ∠Q व ∠C = ∠R …………..(ii)
परन्तु AB = 2AM तथा PQ = 2PN [∵ CM और RN माध्यिकाएँ हैं] …. (iii)
समीकरण (i) व (iii) की तुलना से
\(\frac{2 A M}{2 P N}=\frac{C A}{R P}\)
⇒ \(\frac{\mathrm{AM}}{\mathrm{PN}}=\frac{\mathrm{CA}}{\mathrm{RP}}\) ………(iv)
तथा ∠MAC = ∠NPR ……… (v)
समीकरण (iv) व (v) से हमें प्राप्त होता है ।
ΔAMC ~ ΔPNR (इति सिद्धम्)

प्रश्न 12.
संलग्न आकृति में, ∠A = ∠B और AD = BE है | सिद्ध कीजिए कि DE || AB है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 15
दिया है : ∠A = ∠B और AD = BE
सिद्ध करना है : DE || AB
प्रमाण : ∠A = ∠B ………..(दिया है)
⇒ AC = BC (समान कोणों की सम्मुख भुजाएँ)
या (DC + DA) = (EC + EB) …………(i)
परंतु AD = BE …….. (दिया है) …………..(ii)
समीकरण (i) और (ii) से,
DC + BE = EC + BE
या DC = EC …………..(iii)
समीकरण (iii) को (ii) से भाग करने पर
\(\frac{\mathrm{DC}}{\mathrm{AD}}=\frac{\mathrm{EC}}{\mathrm{BE}}\)
अतः DE || BC (थेल्स प्रमेय के विलोम से) [इति सिद्धम]

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 13.
संलग्न आकृति में, XY || AC और XY त्रिभुजीय क्षेत्र ABC को दो बराबर क्षेत्रफल वाले भागों में विभाजित करता है । \(\frac {AX}{AB}\) ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 16
दिया है : ΔABC में XY || AC
ΔABC का क्षेत्रफल = 2 × ΔBXY का क्षेत्रफल
सिद्ध करना है :
\(\frac {AX}{AB}\) = ?
अब : ΔABC और ΔXBY में,
∠B = ∠B (उभयनिष्ठ)
\(\frac{\mathrm{BA}}{\mathrm{BC}}=\frac{\mathrm{BX}}{\mathrm{BY}}\)
∴ ΔABC ~ ΔXBY
हम जानते हैं कि समरूप त्रिभुजों के क्षेत्रफलों का अनुपात उनकी संगत भुजाओं के वर्गों के अनुपात के बराबर होता है ।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 17

प्रश्न 14.
एक सीढ़ी दीवार पर इस प्रकार टिकी हुई है कि इसका निचला सिरा दीवार से 2.5 मी की दूरी पर है तथा इसका ऊपरी सिरा भूमि से 6 मी की ऊँचाई पर बनी खिड़की तक पहुँचता है। सीढ़ी की लम्बाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 18
यहाँ पर,
खिड़की की ऊँचाई (BC) = 6 मी
सीढ़ी के निचले सिरे की दीवार से दूरी (AC) = 2.5 मी
माना सीढ़ी की लम्बाई (AB) = x मी
समकोण ΔABC में
AB2 = AC2 + BC2 (पाइथागोरस प्रमेय)
⇒ x2 = (2.5)2 + (6)2
या x2 = 6.25 + 36
या x2 = 42.25
या x2 = \(\sqrt{42.25}\) = 6.5 मी
अतः सीढ़ी की लम्बाई = 6.5 मी

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 15.
पृथ्वी से 15m ऊँचाई पर भवन की एक खिड़की तक 17 m लम्बाई की एक सीढ़ी पहुँचती है। सीढ़ी के पाद से भवन की दूरी ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 19
यहाँ पर,
खिड़की की ऊँचाई (BC) = 15m
सीढ़ी की लम्बाई (AB) = 17 m
माना सीढ़ी के निचले सिरे की भवन की दीवार से दूरी (AC) = x m
समकोण ΔABC में पाइथागोरस प्रमेय से
AB2 = AC2 + BC2
⇒ (17)2 = x2 + (15)2
⇒ 289 = x2 + 225
⇒ x2 = 289 – 225
⇒ x = \(\sqrt{64}\) = 8 m
अतः सीढ़ी के निचले सिरे (पाद) की भवन की दीवार से दूरी = 8m

प्रश्न 16.
एक व्यक्ति पूरब की ओर 10m और फिर उत्तर की ओर 30m जाता है। प्रारंभिक बिंदु से उसकी दूरी ज्ञात कीजिए ।
हल :
यहाँ पर व्यक्ति O बिंदु से पूर्व की ओर 10m दूरी तय कर A बिंदु पर पहुँचता तथा वहाँ से उत्तर की ओर 30 m दूरी तय करके B बिंदु पर पहुँचता है । व्यक्ति की दूरी OB ज्ञात करनी है ।
अर्थात्
OA = 10m
AB = 30m
OB = ?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 20
अतः व्यक्ति की प्रारंभिक बिंदु से दूरी = 31.62 m

प्रश्न 17.
90 सें०मी० की लम्बाई वाली एक लड़की बल्ब लगे एक खम्भे के आधार से परे 1.2 मी० / सेकण्ड की चाल से चल रही है। यदि बल्ब भूमि से 3.6 मी० की ऊँचाई पर है, तो 4 सेकण्ड बाद उस लड़की की छाया की लम्बाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 21
माना आकृति में AB एक खम्भा है जिस पर बल्ब लगा हुआ है तथा CD एक लड़की है जो खम्भे से 4 सेकण्ड चलने के पश्चात् दर्शाई गई है। माना DE लड़की की छाया है जिसे हमें ज्ञात करना है 1
लड़की द्वारा B से D तक 4 सेकण्ड में तय दूरी (BD)
= 1.2 × 4 = 4.8 मी०
समरूप त्रिभुजों ABE और CDE में (∵ ∠E = ∠E, ∠B = ∠D)
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 22

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 18.
आयत ABCD के अभ्यंतर में कोई बिंदु O है । सिद्ध कीजिए कि OB2 + OD2 = OC2 + OA2 है।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 23
दिया है : एक आयत ABCD, इसके अभ्यंतर में कोई बिंदु O है । OA, OB, OC और OD को मिलाया गया है ।
सिद्ध करना है : OB2 + OD2 = OC2 + OA2
रचना : O से EOF || BC और BC || AD खींचो।
प्रमाण :
∵ EOF || BC और BC || AD है,
∴ AD || EOF || BC
∵ AD ⊥ AB ……….. (ABCD आयत है)
∴ EF ⊥ AB
इसी प्रकार EF ⊥ DF
∴ AEFD भी एक आयत है ⇒ AE = DF ………..(i)
इसी प्रकार, BEFC एक आयत है
⇒ EB = FC ………(ii)
∠1 = ∠2 = ∠3 = ∠4= 90°
समकोण ΔOBE में, OB2 = OE2 + EB2 = OE2 + FC2 ….[(ii) से] …….(iii)
समकोण ΔODF में,
OD2 = OF2 + DF2 = OF2 + AE2 ….[(i) से] …….(iv)
समीकरण (iii) और (iv) को जोड़ने पर,
OB2 + OD2 = OE2 + FC2 + OF2 + AE2 ……..(v)
परंतु समकोण ΔOFC में,
OF2 + FC2 = OC2 ………..(vi)
और समकोण ΔOAE में, OE2 + AE2 = OA2 ……….(vii)
(v), (vi) और (vii) से,
OB2 + OD2 = OC2 + OA2

प्रश्न 19.
यदि आकृति में दिए हुए ΔABC में AB = 5 cm, AC = 10 cm, BD = 1.5 cm और CD = 3.5 cm हो तो जाँच कीजिए कि क्या AD, ∠A का समद्विभाजक है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 24

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 20.
दो खंभे एक समतल भूमि पर खड़े हैं । निम्नलिखित स्थितियों के लिए खंभों के ऊपरी सिरों के बीच की दूरी ज्ञात कीजिए :
(i) खंभों की ऊँचाई = 6 मी, 12 मी; खंभों के निचले सिरों के बीच की दूरी = 8 मी
(ii) खंभों की ऊँचाई = 7 मी, 12 मी; खंभों के निचले सिरों के बीच की दूरी = 12 मी
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 25
(i) दिया है-दो खंभे AB और CD क्रमशः 6 मी और 12 मी लम्बे हैं तथा उनके निचले सिरों के बीच की दूरी BD = 8 मी है। ज्ञात करना है-खंभों के ऊपरी सिरों के बीच की दूरी (AC) = ?
AB = 6 मी
CD = 12 मी
DE = AB = 6 मी
∴ CE = CD – DE
= (12 – 6) मी = 6 मी
AE = BD = 8 मी
अब समकोण त्रिभुज ACE में,
AC2 = AE2 + CE2
= (8)2 + (6)2
= 64 + 36 = 100
या AC = \(\sqrt{100}\) = 10 मी
अतः दोनों खंभों के ऊपरी सिरों के बीच की दूरी = 10 मी

(ii) दिया है- दो खंभे AB और CD क्रमशः 7 मी और 12 मी लम्बे हैं तथा उनके निचले सिरों के बीच की दूरी BD = 12 मी है।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 26
ज्ञात करना है – खंभों के ऊपरी सिरों के बीच की दूरी (AC) = ?
AB = 7 मी
CD = 12 मी
DE = AB = 7 मी
∴ CE = CD – DE
= (12 – 7) मी = 5 मी
AE = BD = 12 मी
अब समकोण त्रिभुज ACE में,
AC2 = AE2 + CE2
= (12)2 + (5)2
= 144 + 25 = 169
या AC = \(\sqrt{169}\) = 13 मी
अतः दोनों खंभों के ऊपरी सिरों के बीच की दूरी = 13 मी

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 21.
ΔABC एक समद्विबाहु समकोण त्रिभुज है । यदि ∠ACB = 90° तथा AB = 5\(\sqrt{2}\) cm, तो AC मान ज्ञात कीजिए।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 27
दिया है : ΔABC एक समद्विबाहु समकोण त्रिभुज है ।
जिस कारण AC = BC तथा ∠ACB = 90° व AB = 5\(\sqrt{2}\)cm
ज्ञात करना है : AC = ?
अब : समकोण ΔACB में,
AC2 + BC2 = AB2
या AC2 + AC2 = (5\(\sqrt{2}\))2 (∵ AC = BC दिया है)
या 2AC2 = 50
या AC2 = \(\frac {50}{2}\) = 25
या AC = 5 cm

प्रश्न 22.
एक चतुर्भुज ABCD का विकर्ण BD, ∠B और ∠D को समद्विभाजित करता है । सिद्ध कीजिए कि \(\frac{A \mathbf{B}}{B C}=\frac{D A}{C D}\) है ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 28
दिया है : एक चतुर्भुज ABCD का विकर्ण BD, ∠B और ∠D को समद्विभाजित करता है।
सिद्ध करना है :
\(\frac{\mathrm{AB}}{\mathrm{BC}}=\frac{\mathrm{DA}}{\mathrm{CD}}\)
रचना : A और C को मिलाइए जो BD को O पर मिलाता है ।
प्रमाण : ΔABC में BO, ∠B का समद्विभाजक है।
∴ \(\frac{\mathrm{AB}}{\mathrm{BC}}=\frac{\mathrm{DA}}{\mathrm{CD}}\) ………(i)
इसी प्रकार ΔADC में ∠O, ∠D का समद्विभाजक है।
∴ \(\frac{\mathrm{AD}}{\mathrm{DC}}=\frac{\mathrm{AO}}{\mathrm{OC}}\) ………(ii)
समीकरण (i) व (ii) की तुलना से,
\(\frac{\mathrm{AB}}{\mathrm{BC}}=\frac{\mathrm{AD}}{\mathrm{DC}}\) [इति सिद्धम]

प्रश्न 23.
दो समरूप त्रिभुजों ABC और PQR के क्षेत्रफल क्रमशः 36 cm2 तथा 64 cm2 हैं। यदि BC = 4.2 cm हो तो QR ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 29

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
यदि दो समान संख्या वाली भुजाओं वाले बहुभुजों में संगत कोण बराबर हों तथा उनकी संगत भुजाओं की लम्बाइयाँ समानुपाती हों तो उन्हें कहा जाता है-
(A) समरूप बहुभुज
(B) सर्वांगसम बहुभुज
(C) समान बहुभुज
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
हल :
(A) समरूप बहुभुज

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 2.
यदि किसी त्रिभुज की एक भुजा के समान्तर अन्य दो भुजाओं को काटते हुए कोई रेखा खींचे तो वह त्रिभुज की अन्य दोनों भुजाओं को समान अनुपात में विभाजित करती है । इस प्रमेय को कहा जाता है-
(A) पाइथागोरस प्रमेय
(B) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय
(C) पाइथागोरस प्रमेय का विलोम
(D) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय का विलोम
हल :
(B) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय

प्रश्न 3.
यदि कोई रेखा किसी त्रिभुज की किन्हीं दो भुजाओं को समान अनुपात में विभाजित करती हो, तो यह रेखा तीसरी भुजा के समान्तर होती है, इसे कहा जाता है-
(A) पाइथागोरस प्रमेय
(B) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय
(C) पाइथागोरस प्रमेय का विलोम
(D) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय का विलोम
हल :
(D) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय का विलोम

प्रश्न 4.
संलग्न आकृति में यदि ST || QR हो तो PS का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 30
(A) 3.0 cm
(B) 4.0 cm
(C) 4.5 cm
(D) 6.0 cm
हल :
(C) 4.5 cm

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 5.
संलग्न आकृति में यदि PQ || BC हो तो QC का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 31
(A) 2.6 cm
(B) 1.3 cm
(C) 3.9 cm
(D) 3.0 cm
हल :
(A) 2.6 cm

प्रश्न 6.
संलग्न आकृति में यदि PQ || BC हो तो AQ का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 32
(A) 5.3 cm
(B) 2.65 cm
(C) 4.5 cm
(D) 1.65 cm
हल :
(B) 2.65 cm

प्रश्न 7.
त्रिभुज की किसी भुजा के मध्य – बिन्दु से दूसरी भुजा के समान्तर खींची गई रेखा तीसरी भुजा को …………. करती है।
(A) त्रिभाजित
(B) चतुर्भाजित
(C) समद्विभाजित
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
हल :
(C) समद्विभाजित

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 8.
सभी वृत्त ………….. होते हैं ।
(A) सर्वांगसम
(B) दोनों
(C) (A) व (B) दोनों
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
हल :
(B) समरूप

प्रश्न 9.
ΔABC में, AB तथा AC पर क्रमशः D तथा E बिन्दु इस प्रकार हैं कि DE || BC, यदि AD = 6 सेमी., DB = 9 सेमी. और AE = 8 सेमी., तो निम्न से AC का मान ज्ञात कीजिए-
(A) 12 सेमी.
(B) 16 सेमी.
(C) 20 सेमी.
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(C) 20 सेमी.

प्रश्न 10.
सभी ……….. त्रिभुज समरूप होते हैं ।
(A) विषमबाहु
(B) समद्विबाहु
(C) समबाहु
(D) समकोण
हल :
(C) समबाहु

प्रश्न 11.
भुजाओं की समान संख्या वाले दो बहुभुज समरूप होते हैं यदि उनके संगत कोण ……………… हों तथा उनकी संगत भुजाएँ ……………… हों ।
(A) बराबर ; समानुपाती
(B) असमान; समानुपाती
(C) समान; विषमपाती
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
हल :
(A) बराबर; समानुपाती

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 12.
दी गई आकृति में DE || BC, तो EC का मान है :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 33
(A) 2.7 सेमी
(B) 1.5 सेमी
(C) 2.4 सेमी
(D) 3 सेमी
हल :
(C) 2.4 सेमी

प्रश्न 13.
दी गई आकृति में DE || BC, तो DB का मान है :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 34
(A) 2.4 सेमी
(B) 4.8 सेमी
(C) 1.8 सेमी
(D) 3.6 सेमी
हल :
(D) 3.6 सेमी

प्रश्न 14.
ΔABC में, AB तथा AC पर क्रमश: D तथा E बिन्दु इस प्रकार हैं कि DE || BC, यदि \(\frac {AD}{DB}\) = \(\frac {3}{4}\) तथा AC = 15 सेमी. निम्नलिखित में से AE का मान ज्ञात कीजिए-
(A) 6.43 सेमी.
(B) 6.34 सेमी.
(C) 4.63 सेमी.
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) 6.43 सेमी.

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 15.
किसी त्रिभुज की दो भुजाओं के मध्य-बिन्दुओं को मिलाने वाली रेखा होती है-
(A) तीसरी भुजा के लम्बवत्
(B) तीसरी भुजा के समान्तर
(C) तीसरी भुजा के असमान्तर
(D) तीसरी भुजा के बराबर
हल :
(B) तीसरी भुजा के समान्तर

प्रश्न 16.
संलग्न आकृति ΔABC में, DE || BC तथा \(\frac{\mathrm{AD}}{\mathrm{DB}}=\frac{3}{5}\) यदि AC = 4.8 cm हो तो AE का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 35
(A) 1.8cm
(B) 2.7 cm
(C) 3.0cm
(D) 3.6 cm
हल :
(A) 1.8.cm

प्रश्न 17.
त्रिभुजों के युग्मों में से कौन-सा युग्म समरूप नहीं है?
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 36
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 37

प्रश्न 18.
दी गई आकृति में ΔODC ~ ΔOAB, ∠BOC = 125°, ∠ODC = 70°, तो ∠OAB का मान है :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 38
(A) 70°
(B) 35°
(C) 50°
(D) 55°
हल :
(A) 70°

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 19.
दो समरूप त्रिभुजों के परिमाप क्रमशः 30 cm और 20 cm हैं। यदि पहले त्रिभुज की एक भुजा 12 cm हो, तो दूसरे त्रिभुज की संगत भुजा होगी-
(A) 12 cm
(B) 10 cm
(C) 8 cm
(D) 6 cm
हल :
(C) 8 cm

प्रश्न 20.
संलग्न आकृति में, यदि EB = 2 cm, AE = 5 cm, AF = x, FC = x – 1 तथा EF || BC, तो x का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 39
(A) \(\frac {5}{3}\)cm
(B) \(\frac {5}{2}\)cm
(C) \(\frac {5}{4}\)cm
(D) \(\frac {3}{5}\)cm
हल :
(A) \(\frac {5}{3}\)cm

प्रश्न 21.
यदि दो समरूप त्रिभुजों की भुजाओं का अनुपात 3 : 5 है, तो इन त्रिभुजों के क्षेत्रफलों का अनुपात ……………… है ।
(A) 3 : 5
(B) 9 : 25
(C) 5 : 3
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(B) 9 : 25

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 22.
दो समरूप त्रिभुजों के क्षेत्रफलों का अनुपात 64 : 121 है, तो उनकी भुजाओं में अनुपात होगा-
(A) 8 : 11
(B) 11 : 8
(C) 64 : 121
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) 8 : 11

प्रश्न 23.
कुछ त्रिभुजों की भुजाएँ नीचे दी गई हैं-
(i) 3 cm, 6 cm, 8 cm
(ii) 5 cm, 12 cm, 13 cm
(iii) 5 cm, 8 cm, 10cm
इनमें से कोई नहीं
इनमें से समकोण त्रिभुज है-
(A) (i)
(B) (ii)
(C) (iii)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(B) (ii)

प्रश्न 24.
यदि दो त्रिभुजें ABC और DEF इस प्रकार हैं कि \(\frac{\mathbf{A B}}{\mathrm{DE}}=\frac{\mathrm{BC}}{\mathrm{EF}}=\frac{\mathbf{C A}}{\mathbf{F D}}=\frac{2}{5}\) हो तो ar (ΔABC) : ar (ΔDEF) होगा-
(A) 4 : 25
(B) 2 : 5
(C) 8 : 125
(D) 4 : 10
हल :
(A) 4 : 25

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 25.
यदि दो समरूप त्रिभुजों की भुजाओं का अनुपात 2 : 3 है, तो उनके क्षेत्रफलों का अनुपात है :
(A) \(\sqrt{2}\) : \(\sqrt{3}\)
(B) 2 : 3
(C) 4 : 9
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(C) 4 : 9

प्रश्न 26.
दो समरूप त्रिभुजों के क्षेत्रफलों का अनुपात बराबर होता है-
(A) संगत भुजाओं के अनुपात के
(B) संगत भुजाओं के वर्गों के अनुपात के
(C) संगत भुजाओं के घनों के अनुपात के
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(B) संगत भुजाओं के वर्गों के अनुपात के

प्रश्न 27.
किसी वर्ग की एक भुजा पर निर्मित समबाहु त्रिभुज का क्षेत्रफल, उसके विकर्ण पर बने समबाहु त्रिभुज के क्षेत्रफल का ………….. होता है ।
(A) दुगुना
(B) तीन गुना
(C) एक-तिहाई
(D) आधा
हल :
(D) आधा

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 28.
मान लीजिए ΔABC ~ ΔDEF है और इनके क्षेत्रफल क्रमशः 64 cm2 और 121 cm2 हैं । यदि EF = 15.4 cm, तो BC का मान है-
(A) 11.2 cm
(B) 11.4 cm
(C) 12.4 cm
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) 11.2 cm

प्रश्न 29.
यदि दो समरूप त्रिभुजों की भुजाओं का अनुपात 3 : 2 है, तो उनके क्षेत्रफलों का अनुपात है-
(A) \(\sqrt{3}\) : \(\sqrt{2}\)
(B) 2 : 3
(C) 9 : 4
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(C) 9 : 4

प्रश्न 30.
त्रिभुज ABC और DEF समरूप हैं। यदि ΔABC का क्षेत्रफल = 16 cm2, ΔDEF का क्षेत्रफल = 25 cm 2 और BC = 2.3 cm,
तो EF है-
(A) 2.875 cm
(C) 2.578 cm
(B) 2.758cm
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) 2.875 cm

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 31.
समकोण त्रिभुज में कर्ण का वर्ग अन्य दोनों भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर होता है। इस प्रमेय को कहा जाता है-
(A) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय
(B) पाइथागोरस प्रमेय
(C) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय का विलोम
(D) पाइथागोरस प्रमेय का विलोम
हल :
(B) पाइथागोरस प्रमेय

प्रश्न 32.
किसी त्रिभुज में यदि एक भुजा का वर्ग अन्य दोनों भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर हो तो पहली भुजा के सामने का कोण समकोण होता है । यह है-
(A) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय
(B) पाइथागोरस प्रमेय
(C) आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय का विलोम
(D) पाइथागोरस प्रमेय का विलोम
हल :
(D) पाइथागोरस प्रमेय का विलोम

प्रश्न 33.
त्रिभुज ABC और DEF समरूप हैं। यदि AC = 19cm और DF = 8 cm, तो दोनों त्रिभुजों के क्षेत्रफलों का अनुपात है-
(A) \(\frac {19}{8}\)
(B) \(\frac {361}{64}\)
(C) \(\frac {38}{65}\)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(B) \(\frac {361}{64}\)

प्रश्न 34.
एक सीढ़ी इस प्रकार रखी है कि उसका निचला सिरा किसी दीवार से 5m दूर है और उसका ऊपरी सिरा एक खिड़की तक पहुँचता है, जो भूमि से 12m ऊँचाई पर है। सीढ़ी की लंबाई होगी-
(A) 13m
(B) 14m
(C) 15m
(D) 17 m
हल :
(A) 13m

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 35.
यदि एक समबाहु त्रिभुज ABC इस प्रकार है कि AD ⊥ BC है तो AD2 =
(A) 2 CD2
(B) 3 CD2
(C) 4 CD2
(D) \(\sqrt{3}\) CD2
हल :
(B) 3 CD2

प्रश्न 36.
एक सीढ़ी किसी दीवार पर इस प्रकार टिकी हुई है कि इसका निचला सिरा दीवार से 2.5 m की दूरी पर है तथा इसका ऊपरी सिरा भूमि से 6m की ऊँचाई पर बनी एक खिड़की तक पहुँचता है। सीढ़ी की लंबाई होगी-
(A) 8.5m
(B) 7.5m
(C) 6.5m
(D) 11.0m
हल :
(C) 6.5m

प्रश्न 37.
20m लंबी एक सीढ़ी एक भवन की खिड़की पर पहुँचती है, जो भूमि से 16m की ऊँचाई पर है । भवन से सीढ़ी के निचले सिरे की दूरी होगी-
(A) 13m
(B) 12m
(C) 14m
(D) 15m
हल :
(B) 12 m

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 38.
दो समरूप त्रिभुजों के क्षेत्रफलों का अनुपात 4 : 5 है, तो उनकी संगत भुजाओं का अनुपात है :
(A) 4 : 5
(B) 16 : 25
(C) 2 : \(\sqrt{5}\)
(D) 5 : 4
हल :
(C) 2 : \(\sqrt{5}\)

प्रश्न 39.
कुछ त्रिभुजों की भुजाएँ नीचे दी गई हैं-
(i) 5 cm, 12 cm, 15 cm
(ii) 5 cm, 6 cm, 8 cm
(iii) 8 cm, 15 cm, 17 cm
इनमें से समकोण त्रिभुज है-
(A) (i)
(B) (ii)
(C) (iii)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(C) (iii)

प्रश्न 40.
एक आदमी उत्तर की ओर 7m जाता है और फिर पूर्व की ओर 24m जाता है । बताइए कि वह प्रारंभिक बिंदु से कितनी दूरी पर है ?
(A) 25m
(B) 17m
(C) 31m
(D) 24 m
हल :
(A) 25m

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 41.
एक सीढ़ी सड़क के एक ओर 12m ऊँची खिड़की पर पहुँचती है। सीढ़ी के निचले सिरे को हटाए बिना वह सीढ़ी सड़क के दूसरी ओर 9m ऊँची खिड़की तक पहुँचती है। यदि सीढ़ी की लंबाई 15m हो, तो सड़क की चौड़ाई होगी-
(A) 3 m
(B) 21 m
(C) 27 m
(D) 24 m
हल :
(B) 21m

प्रश्न 42.
एक व्यक्ति एक निश्चित बिंदु से प्रथम पूर्व की ओर कुछ दूर चलता है तदोपरांत 12 m उत्तर की ओर जाता है और इस प्रकार वह अपनी प्रथम स्थिति से 13m की दूरी पर पहुँचता है। उसके द्वारा पूर्व दिशा में चली दूरी होगी-
(A) 25m
(B) 1m
(C) 5m
(D) 7m
हल :
(C) 5m

प्रश्न 43.
6m और 11 m लंबे दो खंभे समतल मैदान में गड़े हैं। यदि उनके निचले सिरों की दूरी 12m हो तो उनके ऊपरी सिरों के बीच की दूरी होगी-
(A) 17m
(B) 11m
(C) 12 m
(D) 13m
हल :
(D) 13m

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 44.
5 m तथा 8 m ऊँचाई के दो खंभे एक समान तल पर खड़े हुए हैं। यदि उनके निचले सिरों के मध्य की दूरी 4 m हो तो उनके ऊपरी सिरों के बीच की दूरी ज्ञात कीजिए ।
(A) 5m
(B) 4m
(C) 3m
(D) 8m
हल :
(A) 5m

प्रश्न 45.
ΔABC एक समद्विबाहु समकोण त्रिभुज है । यदि ∠ACB = 90° तथा AB = 5 √2 cm हो तो AC का मान होगा-
(A) 4 cm
(B) 5 cm
(C) 10 cm
(D) 7.5 cm
हल :
(B) 5 cm

प्रश्न 46.
किसी समबाहु त्रिभुज में उसकी एक भुजा के वर्ग का तीन गुना उसके शीर्षलम्ब के वर्ग के …………….. गुने के बराबर होता है ।
(A) दुगुने
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
हल :
(C) चार

प्रश्न 47.
ABC और BDE दो समबाहु त्रिभुज इस प्रकार हैं कि D भुजा BC का मध्य-बिन्दु है । त्रिभुजों ABC और BDE के क्षेत्रफलों का अनुपात है-
(A) 1 : 4
(B) 1 : 2
(C) 2 : 1
(D) 4 : 1
हल :
(D) 4 : 1

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 48.
ΔABC में AD, ∠BAC का समद्विभाजक है। यदि AB = 6 cm, AC = 5 cm व BD = 3 cm हो तो DC का मान होगा-
(A) 11.3 cm
(B) 2.5 cm
(C) 3.0 cm
(D) 5.5 cm
हल :
(B) 2.5 cm

प्रश्न 49.
यदि आकृति में AD, ∠A को समद्विभाजित करता है तथा AB = 12 cm, AC = 20 cm और BD = 5 cm हो, तो CD का मान होगा-
(A) 5.33 cm,
(B) 6.33 cm
(C) 7.33 cm
(D) 8.33 cm
हल :
(D) 8.33 cm

प्रश्न 50.
निम्नांकित आकृति में AD, ∠A का अर्द्धक है। यदि BD = 4 cm, DC = 3 cm और AB = 6 cm हो, तो AC का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 40
(A) 4.5 cm
(B) 6.0 cm
(C) 9.0 cm
(D) 3.0 cm
हल :
(A) 4.5 cm

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज

प्रश्न 51.
दो समरूप त्रिभुजों के क्षेत्रफलों का अनुपात 5:3 है, तो उनकी संगत भुजाओं का अनुपात है : [ 2018 (Set-A)]
(A) 5 : 3
(B) 3 : 5
(C) \(\sqrt{5}\) : \(\sqrt{3}\)
(D) \(\sqrt{3}\) : \(\sqrt{5}\)
हल :
(C) \(\sqrt{5}\) : \(\sqrt{3}\)

प्रश्न 52.
कुछ त्रिभुजों की भुजाएँ नीचे दी गई हैं-
(i) 3 cm, 4 cm, 6 cm
(ii) 5 cm, 12 cm, 16 cm
(iii) 8 cm, 15 cm, 17 cm
इनमें से समकोण त्रिभुज है-
(A) (i)
(B) (ii)
(C) (iii)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(C) (iii)

प्रश्न 53.
ΔABC में AD, ∠BAC का समद्विभाजक है। यदि AB = 10cm, AC = 14 cm व BD = 2.5 cm हो तो DC की लंबाई होगी-
(A) 7.0 cm
(B) 14.0 cm
(C) 3.5 cm
(D) 28.0 cm
हल :
(C) 3.5 cm

प्रश्न 54.
दो समरूप त्रिभुजों की संगत माध्यिकाओं का अनुपात 4 : 9 है, तो त्रिभुजों के क्षेत्रफलों का अनुपात है-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 6 त्रिभुज - 41
(A) 2 : 3
(B) 4 : 9
(C) 16 : 81
(D) 81 : 16
हल :
(C) 16 : 81

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HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

Haryana State Board HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

(A) बहुविकल्पीय प्रश्न (Objective Type Questions)

1. शरीर में समन्वय किसके द्वारा होता है ?
(A) रुधिर परिवहन तन्न्र
(B) तन्त्रिका तन्त्र
(C) अन्तवी तन्त्र
(D) तन्त्रिका तन्त्र एवं अन्तख्तावी तन्त्र।
उत्तर:
(D) तन्त्रिका तन्त्र एवं अन्तख्तावी तन्त्र।

2. मनुष्य के मस्तिष्क में ताप नियन्त्रक केन्द्र होतात है-
(A) पीयूष ग्रन्थि
(B) डाइऐनसेफेलॉन
(C) हाइपोथेलेमस
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) हाइपोथेलेमस

3. परिधीय तन्त्रिका तत्र में होती है-
(A) कपालीय तथा मेरु तन्त्रिकाएँ
(B) मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु
(C) अनुकम्पी तथा परानुकम्पी तन्त्रिकाएँ
(D) माइलिनेटेड तथा नॉन-माइलिनेटेड तन्त्रिकाएँ
उत्तर:
(A) कपालीय तथा मेरु तन्त्रिकाएँ

4. परानुकम्पी तन्रिका तन्त्र का एक कार्य है-
(A) नेत्रों की पुतली का फैलना
(B) यकृत में शर्करा का स्राव
(C) हृदय की धड़कन तेज करना
(D) लार स्रावण का उत्तेजन
उत्तर:
(D) लार स्रावण का उत्तेजन

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

5. तत्रिका तन्त्र की सरखनाभक एवं क्रियातक क्राई है-
(A) न्याहान
(B) स्नीमीयर
(C) बण्डा
(D) रनादु का संक्ता है ?
उत्तर:
(A) न्याहान

6. मान्व के तन्रिका तन्र (Nervous system) को कितने भागों में बाँटा जा सकता है ?
(A) 2
(B) 3
(C) 4
(D) 5
उत्तर:
(B) 3

7. घपनुकमी चनिका क्षा ज्ञा –
(A) उदय की घार्न बह चाती है
(B) दिय घी धहक्त बह बाही है
(C) इदय की पड़फल कारम्य हो जाती है
उत्तर:
(B) दिय घी धहक्त बह बाही है

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

8. प्रतिबनित क्षांक्रो जिया का प्रदर्शतन संख्राण किसने बिया ?
(A) पाबहोच
(B) एक्ले
(C) चेहबन
(D) संर्टिबन।
उत्तर:
(A) पाबहोच

9. प्रािजन्रो किषा का नियक्षण क्षेता है –
(A) केग्रीय तनिद्यि वन्त हारा
(B) परिपीय वन्दिका वन्ब हारा
(C) स्वाप्त व्भिष तन्ब छार
(D) ानमे से को नात्रा। होता है ?
उत्तर:
(A) केग्रीय तनिद्यि वन्त हारा

10. कशेखिकी उनुओं में वेशीय चलन का तालमेल किरके द्रारा होता है ?
(A) प्रमस्तिष्क
(B) अनुमस्तिष्क
(C) पीयूष म्रन्थि
(D) थायरॉइड म्रन्थि
उत्तर:
(B) अनुमस्तिष्क

11. तन्तिका तुुु की सताद पर निश्चित दूरी पर संकुचित धाग करलना है ?
(A) श्वान के नोड
(B) श्वान कोशिकाएँ
(C) रेनवियर के नोड्ज
(D) निसल्स कण
उत्तर:
(C) रेनवियर के नोड्ज

12. स्वांत तनिता तन्त में द्वाजी है –
(A) कपालीय एवं रीक तन्त्रिकाएँ
(B) मस्तिक एवं गैळुरज़ु
(C) अनुकम्पी एवं परानुकम्पी तन्त्रिकाएँ
(D) माझस्तियेट्ड व नान्ननादलियेटे लन्बिकाष्य
उत्तर:
(C) अनुकम्पी एवं परानुकम्पी तन्त्रिकाएँ

13. मेक कम्किजां बी संख्या दोगी है-
(A) 31 जोड़ी
(B) 34 बोक्षी
(C) 37 कोड़ी
(D) 39 जोड़ी
उत्तर:
(A) 31 जोड़ी

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

14. सेनवियत का येड कहत्त सिक्ता होंा है ?
(A) माइटोन
(B) नेख्रॉन
(C) एक्ष्मोन
(D) टीलोफैंज्द्या
उत्तर:
(C) एक्ष्मोन

15. कारम्त कीजाहल कितें जोक्ता है ?
(A) दो सेरिकल गोलार्द
(B) दो अं।द्धक विन्द
(C) दो पन धिन्द
(D) घंडिष्टक बोरेक्षा
उत्तर:
(A) दो सेरिकल गोलार्द

16. किस भाग के धंतिभर्त हो जने से स्परण-शंक्त कम हों जयेगी ?
(A) अनुमस्ति
(B) प्रमक्तिक
(C) प्तापोित्तेनह
(D) बेद्यला
उत्तर:
(B) प्रमक्तिक

17. स्वाप्त काजिका का जदाहरतण है-
(A) ओंजन निजकरा
(B) नेत्र के तारे का संकुन
(C) आान्तीय क्रमाकुंन
(D) पुटने घश घंका
उत्तर:
(B) नेत्र के तारे का संकुन

18. कर्ण असिख्य मैक्सयत्त का अलक्षार कोता है-
(A) हृदाषे के जैसा
(B) होहे की नाल यैसा
(C) बोडे की जीन की रकाष कैसा
(D) अण्डायार
उत्तर:
(A) हृदाषे के जैसा

19. अन्दकर्ण में सुुून स्बापित करते चाला भाज है-
(A) अर्द्ववालाभार नाए
(B) कारोसिश्य एणं सेचिना
(C) सेचिना प्तें सैव्युलस
(D) सैक्युक्तस, पृर्टीकलस, अर्षवृत्राकार नलिका
उत्तर:
(D) सैक्युक्तस, पृर्टीकलस, अर्षवृत्राकार नलिका

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

20. सुने के लिए उदिक्न कात अंतम्ब क्षेता है ?
(A) जचण तजिका
(B) कर्ग बटह
(C) कर्ग असिखयाँ
(D) कीक्तिया
उत्तर:
(D) कीक्तिया

21. नेच्छ में प्रकास कर्जो का परिकर्वन होता है-
(A) रासायनिक उत्जा
(B) यानिय कर्जा
(C) भौनतक ऊर्गा
(D) विद्युलौय कर्बा
उत्तर:
(A) रासायनिक उत्जा

22. फल्टि श्रें का कार्ष है-
(A) श्रवंग, सानुलन
(B) अन्षक्त में दीवान
(C) एक नेत्र दृष्टि बनाये रखना
(D) तेज प्रकाश में दृष्टि ज्ञान तथा रंगों का विभेदन
उत्तर:
(D) तेज प्रकाश में दृष्टि ज्ञान तथा रंगों का विभेदन

23. मध्य कर्ण में कर्ण पद्ठ से स्ी कर्णास्थि का नाम है-
(A) इन्कस
(B) मैलियस
(C) स्टैपीज
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) मैलियस

24. आँख की पुत्री के चारों ओर पायी जने वाली पेशियाँ होती हैं-
(A) रेखित ऐच्चिक
(B) अरेखित ऐच्चिक
(C) रेखित अनैच्छिक
(D) अरेखित अनैच्छिक
उत्तर:
(D) अरेखित अनैच्छिक

25. औँख की पुंत्री का संदुग्न किसके कारण होता है ?
(A) अधिक तापमान से
(B) तीव्र प्रकाश से
(C) अँघेरा छोने पर
(D) हल्की रोशनी से
उत्तर:
(B) तीव्र प्रकाश से

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

26. कौम-सी परा आईरिस का निर्माण करती है ?
(A) एक्लीरॉटिक परत
(B) दृष्टि पटल
(C) रक्तक पटल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) रक्तक पटल

27. अनक्षर्ण में कन्रुन्त स्वाधित काने बाते घाग है-
(A) अध्षवृत्ताक नसिकायँ
(B) अर्थाताका नतिकाप, यदीकुलत, सैस्युत्ता
(C) हेखिना तथा सैक्युलक्त
(D) ओंटेहिय पव्वे क्षेकिना
उत्तर:
(B) अर्थाताका नतिकाप, यदीकुलत, सैस्युत्ता

28. बांत्यो के अंग कास सिक्त क्षोते है ?
(A) बतनियर नलिका में
(B) अर्षचृत्ताकार नीक्षिक्यों। में
(C) सैक्तुलक मे
(D) यद्रीकुलस में
उत्तर:
(A) बतनियर नलिका में

29. नेर्र में क्रकात के प्रयेश ब्र निख्न करती है-
(A) कॉक्लियर नलिका में
(B) अर्धवृत्ताकार नलिकाओं में
(C) सैक्युलस में
(D) यूट्रीकुलस में
उत्तर:
(A) कॉक्लियर नलिका में

29. नेत्र में प्रकाश के प्रवेश का नियमन करती है-
(A) तारा
(B) परितारिका
(C) कंजक्टाइवा
(D) कॉर्निया
उत्तर:
(D) कॉर्निया

30. नेत्र के जिस भाग में प्रतिबिम्ब बनता है, उसे कातो हैं-
(A) दढ़ पटल
(B) रक्तक पटल
(C) कॉर्निया
(D) दृष्टि पटल
उत्तर:
(D) दृष्टि पटल

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

31. दृष्टि शलकाओं घ्रा ज्ञान प्राप्त होता है-
(A) अन्धकार का
(B) प्रकाश का
(C) रंग का
(D) अन्धकार व प्रकाश दोनों का
उत्तर:
(D) अन्धकार व प्रकाश दोनों का

32. काला गढन किस जबती क्रा में पाया खाता है ?
(A) नाक में
(B) कान में
(C) नेत्र में
(D) मीित्युज में
उत्तर:
(B) कान में

33. अन्तकर्ण तथा मध्य कर्ण को जोड़े वाला जित्र है-
(A) यद्रीढुलस
(B) सैक्युतर
(C) केनेस्द्धा ओबेलिय
(D) हुम्बला
उत्तर:
(C) केनेस्द्धा ओबेलिय

34. नेम्र का कौन-या धाग समापोलान में साकायता करहा है ?
(A) लेन्ष का आकार बदलक
(B) बानगया बा अाकास घदलबन
(C) ‘अं तथा ‘ब’ बोनों
(D) करों नाता
उत्तर:
(A) लेन्ष का आकार बदलक

35. तीज हननि तरंगो से कार्य की घन्ति निम्न में से चित्रा क्वारा सेकी काति है?
(A) कर्ण पटह द्वारा
(B) टेक्टोहिद्त द्विस्ती क्षाता
(C) कर्ग अस्थियों हारा
(D) यूस्टेकियन बहिका छारा
उत्तर:
(D) यूस्टेकियन बहिका छारा

36. रेटिना पर घना श्रतिबिम्ब होता हैं-
(A) बास्तबिक उस्टा
(B) वास्वविक सीधा
(C) अवास्तबिक उाच्या
(D) अवारतविक सीधा
उत्तर:
(A) बास्तबिक उस्टा

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

37. दृष्टि शंकु किसका बोध कराते हैं ?
(A) प्रका
(B) अन्थकार
(C) रंग
(D) अन्कलार तथा प्रकारा दोनो
उत्तर:
(C) रंग

38. संध्टि कंकु कबा शालाएँ सिख्त होने हैं-
(A) आाहित्र में
(B) सेन्स्म में
(C) रेटिना में
(D) निमेषक पटत्त में
उत्तर:
(C) रेटिना में

39. काषित्या नापष औं पाखा क्ता है-
(A) श्रोणि मेखाता में
(B) कानिया में
(C) कता गबन में
(D) नस्तिक मे
उत्तर:
(C) कता गबन में

40. कीजिया नामक और पाया जता है-
(A) गय्ष (हतग) से
(B) घबन (घनि) से
(C) स्वाद से
(D) सन्दुलन से
उत्तर:
(B) घबन (घनि) से

41. ने का अन्ष किन्दु कखष स्थित केता है ?
(A) हाने के बौच में
(B) लेन्द्ध के बैंत्र में
(C) यहज रेटिना से तहि वान्तिका निकलती है
(D) फोबिचा सेम्ट्रेतिस में
उत्तर:
(C) यहज रेटिना से तहि वान्तिका निकलती है

42. III, VI कंवा XI की कपात कंजियाएँ है-
(A) आरिक, के सिपस ब स्पाइनल
(B) आक्युलोमोटर, ट्राइजेमिनल व स्पाइनल
(C) दूत्बेंमनल, एइएकूमेना व बेगस
(D) आक्युलोमोटर, एब्डूसेन्स व स्पाइनल अतिरिक्त
उत्तर:
(A) आरिक, के सिपस ब स्पाइनल

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

43. कौन-सी त्रतिका कर्दी के अं को सुख्ता पाँचाजी है –
(A) ज्रबंण
(B) घान
(C) द्रोक्लिखर
(D) बेना
उत्तर:
(A) ज्रबंण

44. सिप्रैंटिक तंस्रिका तंत्र प्रेरित करता है-
(A) ह्दय निस्पंदन
(B) बीर्च का ल्वाषण
(C) सार का स्रावण
(D) वावक रहों का स्रावण
उत्तर:
(A) ह्दय निस्पंदन

45. श्द चात्क तंशिका है –
(RPMT)
(A) आल्क्षर्री
(B) आंड्डिक
(C) एम्बयूत्रेन्भ
(D) बेनस्त
उत्तर:
(C) एम्बयूत्रेन्भ

46. मेक्ष में केनिय्न कत्रिजाओं की संड्या है –
(A) x जोह़ी
(B) IX कोड़ी
(C) XII बोड़ी
(D) इनमें से बोऱ्े नहीं
उत्तर:
(A) x जोह़ी

47. कत्रिका तत्र का उद्य क्षेता है –
(A) मध्य अन्तः त्वं से
(B) मप्य त्वचा से
(C) अन्नं: कचा से
(D) बाल वचचा से
उत्तर:
(D) बाल वचचा से

(B) अनिसघुन्तरात्मक प्रश्न (Very Shart Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
तर्चिका त्रत्य बा निर्वाण किस पृणीय स्तर से क्षेता है ?
उत्तर:
वनिक्रा तन (Nervous system) का निर्माण एक्येडर्म (Ectoderm) भ्णीय जनन स्तर से होता है।

प्रत्व 2.
कविका कर्म को कितने भागों वें विकक्त किया गया है ?
उत्तर:
सन्विका तन्द को तौन भागो में विभक्त किषदा गया है –
(i) क्षित्दीय (Peripheral nervous system) तथा
(ii) स्थायन्त हत्बिका तन्ब (Autonomic nervous system)।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

प्रश्न 3.
मनुष्य के मस्तिकावरण में पाये जने वाली झिलिखियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मनुष्य का मस्तिष्कावरण तीन झिल्लियों से मिलकर बनता है-(1) दृढ़-तानिका (duramater), (2) जालतानिका (arachnoid) तथा (3) मृदुतानिका (piamater) !

प्रश्न 4,
कौरसं कीलोस किसे कछा हैं ?
उत्तर:
प्रनीस्तक (cerebrum) दो भागो में बैंद होता है बिन्दे प्रमक्जिक कहत्ताती है।

प्रश्न 5.
प्राण मसित्रिक क्या है ?
उत्तर:
प्रमस्तिष्क गोलाद्धों के वे सभी क्षेत्र जो घाण सम्बन्धी अनुक्रियाओं से सम्बद्ध होते हैं, संयुक्त रूप से घ्राण मस्तिष्क या राइनेन्सेफेलॉन (rhinencephalon) कहलाते हैं।

प्रश्न 6.
मछ्य मरिलब किन धागों से सिकबर क्ता है ?
उत्तर:
चध्य मस्तिक हो धागों से निलक्र बनता है –

  • प्रमधिक्षिक्ष यन्तक या कुत सेखिजाइ (cerebral pedubcles or crura cerebri), तबा
  • पिय्ड बतुद्धि या काफेंता क्वाहुीजिमिना (corpora quadrigemina) ।

प्रश्न 7.
प्रतिक्ती जिया किसे ब्धाते है ?
उत्तर:
खवेदी अंगों वाता बहुन किये गये उद्दीष्नों को संबेदी तन्दिकाओं दारा पेकियो, ऊर्से या औरों में लाकर उसको उत्तेजित करने की किया को

प्रश्न 8.
मनुय्य में कुल किजनी कायातीय कािकाएँ पाखी बादी हैं ?
उत्तर:
यनुष्य में कुल 12 योड़ी काषातीय वील्तकाएं (cranial nerves) घायौ जाती है ?

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

प्रश्न 9.
तन्त्रिका तन्त की संरचनात्पक एवं क्रियाकक इकाई क्या होती है ?
उत्तर:
वन्रिका तन्य (nervous system) की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई (structural and lunctional unit) त्रान्बका कोरिका अथबा न्युर्रन (neuron) होती है।

प्रश्न 10.
तान्यिक्छ कोसिकाषं किकने प्रकार की दोती है। ?
उत्तर:
निन्रका कोशिकापे (Neurons) चा की प्रकार की होती हैं –

  1. अधुवीय तन्विका कोशिका (nonpolar aeuron)
  2. एकमुबौय (unipolar) तन्विका कोत्रिका
  3. सिणुवीय (bipolar) वनिक्या को किका न्या
  4. बहुपुवीय (multipolar) तनिका कोशिका।

प्रश्न 11.
संकेदी तत्तिका कोशिकाएँ किसे काहते हैं ?
उत्तर:
शरीर के विभिन्न संवेदी अंगों (sensory organs) से प्राप्त संवेदी तन्त्रिका आवेगों या उत्तेजनाओं को केन्द्रीय तन्त्रिका अंगों तक ले जाने वाली तन्त्रिका कोशिकाएँ, संवेदी तन्त्रिका कोशिकाएँ (sensory neurons) कहलाती हैं।

प्रश्न 12.
चालक तन्रिका कोशिकाएँ किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जो तन्त्रिका कोशिकाएँ (neurons) प्रेरक आवेगों को केन्द्रीय तन्त्रिका अंगों से कार्यकारी अंगों तक पहुँचाती है, चालक तन्त्रिका कोशिकाएँ (motor neurons) कहलाती हैं। ये प्रेरक कोशिकाएँ भी कहलाती हैं।

प्रश्न 13.
सार्टेटोरियल आवेग संवरण किसे कहोे हैं?
उत्तर:
गायलिन (myelin) खोलदुक्त तनिका कोशिकाओं में वन्यिक आवेग (nerve impulse) केवल वर्ष सन्यि (node) से पर्च संन्थि पर है संघरिव होते है। अता इनमें त्वल्बफीय कावेगों का संचरण लगषन 10 गुना अधिक तीन गत्ति से छोता है, ऐसे प्रसारण को वली प्रसारन या सात्टेटोरियल भावेग संच्रण (saltatorial trensmission) कहले हैं।

प्रश्न 14.
कॉड़ा एकिषना क्या है ?
उत्तर:
मेरुज्दु (spinal cord) का अन्तिम भाग एक पतले सूत्र के रूप में होता है। यह कर्ड तन्त्रिकाओं के साथ मिलकर अश्व पुच्छ रूप (horse tail) के समान रचना बना लेता है जिसे कॉडा एक्विना (cauda equina) कहते हैं।

प्रश्न 15.
अनुकम्पी तन्त्रिकाएँ नेत्र की आइरिस पर क्या प्रभाव डालती हैं ?
उत्तर:
अनुकम्पी तन्त्रिकाएँ (sympathetic nerves) के प्रभाव से नेत्र की आइरिस का विस्तारण हो जाता है अर्थात् फैल जाती है।

प्रश्न 16.
मनुष्य में प्रतिवर्ती क्रियाओं को कौन नियन्त्रित करता है ?
उत्तर:
मनुष्य में प्रतिवर्ती क्रियाओं (reflex actions) को मेरुरज्जु (spinal cord) नियन्त्रित करता है।

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प्रश्न 17.
सिनैप्स किसे कहते हैं ?
उत्तर:
एक तन्त्रिका कोशा के अन्तिम छोर पर उपस्थित साइनेप्टिक बटन्स (synaptic buttons) दूसरी तन्त्रिका कोशा के डेड्रान्स (dendrons) शीर्ष पर उपस्थित बटनों से कार्यकारी सम्बन्ध स्थापित करते हैं, इन्हीं को सिनैप्स (synapse) कहते हैं।

प्रश्न 18.
तन्त्रिका उद्दीपन के सम्बन्ध में देहली उद्दीपन किसे कहते हैं ?
उत्तर:
वह न्यूनतम उद्दीपन शक्ति, जिसे तन्त्रिका तन्तु (nerve fibre ) को उद्दीपित किया जा सकता है, देहली उद्दीपन (threshold stimulus ) कहलाती है।

प्रश्न 19.
मध्य कर्ण में उपस्थित अस्थियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मध्य कर्ण में तीन अस्थियाँ पायी जाती है –

  • मैलियस (malleus)
  • इनकस (incus) तथा
  • स्टैपीज (stapes )।

प्रश्न 20.
नेत्र में पाये जाने वाले शलाका एवं शंकु कोशिका कार्य बताइए।
उत्तर:
नेत्र में पाये जाने वाले शलाका ( rods) प्रकाश तथा अन्धकार के भेद तथा शंकु (cones) विभिन्न प्रकार के रंगों को पहचानती है।

प्रश्न 21.
मनुष्य के कर्ण को कितने भागों में विभक्त किया गया है ?
उत्तर;
मनुष्य के कर्ण को तीन भागों में विभक्त किया गया है –

  • बाह्य कर्ण (external ear)
  • मध्य कर्ण (middle ear) तथा
  • आन्तरिक कर्ण (internal ear) ।

प्रश्न 22.
कर्ण द्वारा शरीर के सन्तुलन की क्रिया कौन-सी रचना द्वारा किया जाता है ?
उत्तर:
कर्ण द्वारा शरीर के सन्तुलन की क्रिया युट्रीकुलस (utriculus), सैक्युलस (sacculus ) तथा तीनों अर्धवृत्ताकार नलिकाओं (semicircular canals) द्वारा की जाती है।

प्रश्न 23.
नेत्र में रंग पहचानने की क्या व्यवस्था होती है ?
उत्तर:
नेत्र में रंग पहचानने के लिए दृष्टि पटल (रेटिना) के तन्त्रिका संवेदी स्तर में दृष्टि शंकु (optic cones) नामक कोशिकाएँ होती हैं। इनके बाहरी भाग में रंगों की पहचान हेतु आइडोप्सिन (idopsin) नामक वर्णक होता है।

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प्रश्न 24.
कला गहन के बाहर तथा अन्दर उपस्थित द्रवों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कला गहन (membranous labyrinth ) के बाहर श्रवण कोष में उपस्थित द्रव परिलसिका द्रव या पैरीलिम्फ (perilymph) तथा कला गहन के भीतर भरे द्रव को अन्तः लसिका द्रव या एण्डोलिम्फ (endolymph) कहते हैं।

प्रश्न 25.
कला गहन के दो वेश्मों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कला गहन के दो वेश्म –

  • युट्रीकुलस (utriculus) तथा
  • सैक्युलस (sacculus) कहलाते हैं।

प्रश्न 26.
सैक्युलस से जुड़ी कुण्डलित रचना क्या कहलाती है ?
उत्तर:
सैक्युलस (Sacculus) से जुड़ी कुण्डलित नलिका कॉक्लिया (cochlea) कहलाती है।

प्रश्न 27.
कण्ठ-कर्ण नलिका या यूस्टेकियन द्यूब्ब का क्या कार्य होता है ?
उत्तर:
कण्ठ-कर्ण नलिका या यूस्टेकियन ट्यूष कर्ण पटह के अन्दर तथा बाहर वायु का समान दबाव बनाये रखती है जिससे कर्ण पटह फटने से बची रहती है।

प्रश्न 28.
सेलूमिनस प्रन्थियाँ किस अंग में उपस्थित कोती हैं ?
उत्तर:
सेरूमिनस प्रन्थियाँ (ceruminous glands) बाहा कर्ण कुछर (external auditory meatus) में उपस्थित होती हैं।

प्रश्न 29.
नेत्र के कॉनिया को चिकना बनाये रखने का कार्य कौन-सी व्रच्चि करती है ?
उत्तर:
नेत्र के कॉर्निया को चिकना बनाये रखने का कार्य मीबोमियन पन्थियाँ (meibomian glands) करती हैं।

प्रश्न 30.
हृंद्धि क्टल के चार सतरों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • रंगा का वर्णकी स्तर
  • तन्त्रिका संवेंदी स्तर
  • दृधि शलाका एवं दृधि शंकु स्तर
  • गुच्छकीय स्तर।

प्रश्न 31.
ऑटोकॉनिया नामक कण कहाँ पाये जाते हैं?
उत्तर:
ऑटोकोर्निया (otocornea) कण कला गहन के अन्दर उपस्थित एण्डोलिम्फ में पाये जाते हैं।

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प्रश्न 32.
तंत्रिका कोशिका कला का विश्रामावस्था विथव कितना कोता है ?
उत्तर:
तंत्रिका कोशिका कला का विश्रामावस्था विभव -70mV होता है।

प्रश्न 33.
अन्य बिन्दु क्या होता है ?
उत्तर:
रेटिना में जिस स्थान से दृष्टि तंत्रिका बाहर निकलती है, वहाँ प्रतिबिम्ब नहीं बनता है। उस स्थान को अंघ बिन्दु कहते हैं।

प्रश्न 34.
नेत्र में पीत बिन्दु का क्या कार्य है ?
उत्तर:
नेत्र में पीत बिन्दु पर किसी वस्तु का सबसे स्पष्ट व उल्टा प्रतिबिम्ब बनता है।

प्रश्न 35.
ऐसीटिलकोलीन क्या है ? यदि यहु शरीर में न रहे तो क्या होगा ?
उत्तर:
ऐसीटिलकोलीन एक विशिष्ट रसायन है। यह सिनैप्स पर आवेग को विद्युत तरंग के रूप में स्थापित करता है। इसके अभाव में तंत्रिका आवेग का संचरण नहीं हो सकेगा।

(C) लघूत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
मस्तिष्क के विभिन्न भागों एवं उपभागों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मानव मस्तिष्क (brain) अन्य सभी जन्तुओं के मस्तिष्क से अधिक विकसित होता है। एक औसत व्यक्ति के मस्तिष्क का भार लगभग 1.4 kg होता है। यह अस्थियों (bones) से बनी करोटि (cranium) में बन्द रहता है। करोटि बाहा आघातों से मस्तिष्क की रक्षा करती है। मस्तिष्क के प्रमख भाग तथा उपभाग निम्नानुसार होते हैं-

प्रमुख भाग (Major divisions)उपभाग (Sub-divisions)
1. अम्म मस्तिक्क या प्रोसेनसेफेलॉन (Forebrain or Prosencephalon)(i) प्रमस्तिष्क या सेरीब्रम (Cerebrum)

(ii) अप्रमस्विष्कपश्च या डाइऐनसेफेलॉन (Diencephalon)

2. मध्यमस्तिष्क मीसेनसेफेलॉन (Midbrain or Mesencephalon)(i) प्रमस्तिष्क वृन्तक या क्रूरा सेरिबाइ (Cerebral peduncles or Crura cerebri)

(ii) पिण्ड चतुष्टि या कॉपोंरा क्वाड्रीजेमिना (Corpora quadrigemina)

3. पश्च मस्तिक्क रॉम्बेनसेफेलॉन (Hindbrain or Rhombencephalon)(i) अनुमस्तिष्क या सेरीबेल (Cerebellum)

(ii) पोन्स वेरोलाई (Pons varolli)

(iii) मेडुला ऑष्लांगेटा (Medulla oblongata)

प्रश्न 2.
मसिंक्क के उसर से मस्तिकाबरण हटा दिया जये तो क्या प्रथाब पक्षेता ?
उत्तर:
मस्तिष्क (brain) चारों ओर से तन्तुमय संयोजी ऊतक (Connective tissues) से बनी झिल्लियों (membranes) से घिरा रहता है। इन झिल्लियों को मस्तिष्कावरण (cranial meninges) कहते हैं। मस्तिक्कावरण विभिन्न चोटों, दुर्घटना एवं बाहरी आघातों से सुरक्षा प्रदान करती है। इनमें उपस्थित सीरमी द्रव (serous fluid) दो परतों को नम तथा चिकना बनाने का कार्य करता है। मस्तिष्कावरण में विद्यमान रक्त जालक (choroid plexuses) द्वारा प्रमस्तिक्क मेरद्रव्य या सेरिख्रोस्पाइनल फ्लूड (cerebrospinal fluid, CSF) का स्रावण किया जाता है, इसमें प्रोटीन (protein), ग्लूकोस (glucose), क्लोराइड्स (chlorides) के अलावा सोडियम, पोटैशियम, कैल्सियम के बाइकार्बोनेट, सल्फेट आदि पाये जाते हैं जो मस्तिष्क को पोषण प्रदान करते हैं। प्रमस्तिष्क मेरुद्रव्य रुधिर एवं मस्तिष्क कोशिकाओं के बीच उपापचयी पदार्थों का आदान-प्रदान करता है। अतः मस्तिष्कावरण (Cranial meninges) को हटा देने पर इन सभी क्रियाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा ।

प्रश्न 3.
मध्बमसित्धक के कार्य लिखिए।
उत्तर:
मध्यमस्तिष्क (midbrain) मस्तिष्क का छोटा-सा भाग होता है, जो अपमस्तिष्क पश्च या डाइएनसेफेलॉन (Diencephalon) के पीछे, प्रमस्तिष्क या सेरेख्रम (Cerebrum) के नीचे तथा पश्चमस्तिष्क (Hindbrain) के ऊपर स्थिर होता है।

इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है –
(i) प्रमस्तिक्क वृन्तक या क्रूरा सेरिब्राइ (cerebral peduncle or crura cerebri) तथा
(ii) पिण्ड चतुष्हि या कॉर्पोरा क्वाह्रीजेमिना (corpora quadrigemina) !
मध्यमस्तिष्क के प्रमस्तिष्क वृन्तक या कूरा सेरिजाइ (crura cerebri) पेशी गतियों (muscular movements) के लिए समन्वय केन्द्रों का कार्य करते हैं। पिण्ड चतुष्टि (corpora quadrigemina) के ऊपरी उभार दृष्टि सम्बन्धी (visual) प्रतिवर्त (reflex) केन्द्र की तरह तथा निचले उभार श्रवण सम्बन्थी (auditory) प्रतिवर्त केन्द्रों (reflex centers) की तरह कार्य करते हैं।

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प्रश्न 4.
मान्व के अनुमसिस्षक्क को नट्ट करने पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर:
मानव का अनुमस्तिष्क या सेरीबेलम (Cerebellum) मस्तिक्क का दूसरा सबसे बड़ा भाग होता है। यह् ऐच्छिक गतियों के लिए आवश्यक पेशियों में समन्वय स्थापित करता है। यह कंकाल पेशियों के समुचित संकुचन द्वारा चलने फिरने, दौड़ने लिखने इत्यादि क्रियाओं को आसान बनाता है। यह शरीर को सन्तुलित बनाये रखता है तथा साम्यावस्था का नियमन करता है। यदि अनुमस्तिक्क या सेरीबेलम (cerebellum) को नष्ट कर दिया जाये तो ऐच्छिक पेशियों का समन्वय नहीं हो पायेगा जिससे ऐच्छिक पेशियों के तनाव का नियमन नहीं होगा फलस्वरूप शरीर की गतियाँ अनियन्त्रित होने लगेंगी।

प्रश्न 5.
मेरुज्यु (Spinal cord) पर संद्रिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
मेरुज्जु (spinal cord) मेहुला (medulla) का ही प्रसार है, जो कशेरुक दण्ड की तन्त्रिका नाल में स्थित होती है। यह प्रथम कशेरुक से प्रारम्भ होकर कटि प्रदेश तक फैली रहती है। मनुष्य में यह लगभग 45 सेमी लम्बी, खोखली बेलनाकार रचना होती है, जो अप्र तथा पश्च पादों के संगत भागों के जोड़ों पर फूलकर बाहु उत्फलन (brachial swelling) एवं कटि उत्फलन (lumber swelling) बनाती है। इसका अन्तिम भाग एक पतले सूत्र के रूप में होता है जिसे अन्त्य सूत्र या फाइलम टर्मिनल (filum terminal) कहते हैं।

यह कई तन्त्रिकाओं से मिलकर अश्व पुच्छ (horse tail) जैसी रचना बना लेता है जिसे कोडा एक्विना (cauda equina) कहते हैं। मस्तिक्क के समान मेरुरज्जु पर भी तीन झिल्लियों का आवरण होता है। इनके मध्य खाली स्थानों में प्रमस्तिष्क मेरुख्य (cerebrospinal fluid) भरा रहता है। इसके भीतर की ओर धूसर द्रव्य (gray matter) तथा बाहर की ओर श्वेत द्रव्य (white matter) का स्तर होता है।

धूसर द्रव्य दोनों ओर पार्श्व में पंखनुमा पाश्व धूसर भृंग (lateral horns) बनाता है। पृष्ठ तल की ओर पृष्ठ भृंग (dorsal horns) तथा अधर तल की ओर उभार अधर भृंग (ventral horns) कहलाते हैं। पृष्ठ भृंग में केवल संवेद्षे तन्क्रका तन्यु (sensory nerve fibres) एवं अधर शंग में केवल प्रेरक तन्तिका तन्बु (motor nerve fibres) पाये जाते हैं। मेरुरज्जु (Spinal cord) प्रतिवर्ती क्रियाओं (Reflex action) का मुख्य केन्द्र होता है। यह शरीर के विभिन्न भागों एवं मस्तिष्क में तन्त्रिकाओं द्वारा समन्वय रखता है।

प्रश्न 6.
मेलुला और्लांगेटा के कार्यों को लिखिए।
उत्तर:
मेदुला ऑब्लांगेटा (medulla oblongata) मस्तिष्क का सबसे निचला भाग बनाता है। इसमें अधिकांश संवेदी तन्तु एक ओर से दूसरी ओर क्रॉस करते हैं।। इस प्रकार बायाँ सेरीबल गोलाई शरीर के दाहिने भाग को तथा दाहिना गोलार्द्ध शरीर के बायें भाग को नियन्त्रित करता है। मेडुला के फर्श पर धूसर पदार्थ के क्षेत्र होते हैं, जिनमें न्यूरॉन्स (Neurons) होते हैं।

इन्हें के न्द्रक (nuclei) कहते हैं। मेडुला का निचला सिरा मेरुख्जु में समाप्त होता है। मेहुला (medulla) सभी अनेच्छिक क्रियाओं जैसे-उदय स्पन्दन (heart beating), श्वसन दर (respiration rate) तथा आहार नाल की पेशियों के संकुचन का नियन्त्रण करता है। इसमें श्वसन केन्द्र, कार्डियक केन्द्र तथा वासामोटर केन्द्र होते हैं। मेहुला में निगलने, वमन करने, खाँसने व छींकने की क्रियाओं के केन्द्र भी होते हैं।

प्रश्न 7.
वत्रिका आवेग से क्या समझत्ते हैं ? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जब किसी अंग में स्थित संवेदी कोशिकाएँ (sensory neurons) किसी बाहरी उद्दीपन से उत्तेजित होती हैं तो उद्दीपनों को सम्बन्धित तन्त्रिका तन्तुओं में प्रेरित कर देती हैं। तन्त्रिका तन्तुओं का उद्दीपन ही तन्त्रिका आवेग (nerve impulses) कहलाता है। तन्त्रिका बन्तुओं में आवेग का संचरण एक विं्युत रासायनिक (electro-chemical) घटना है। जिसमें विद्युत-रासायनिक परिवर्तन की एक लहर-सी उठती है जो कि तन्त्रिका तन्तु की लम्बाई में संचारित होती है।

तन्त्रिका तन्तुओं में आवेग का संचरण केवल एक दिशा में ही होता है, संवेदी तनिकाकाओं (sensory neurons) में इसकी दिशा मस्तिष्क की ओर तथा चालक तन्त्रिकाओं (motor nerves) में इसकी दिशा मस्तिष्क से कार्यकारी अंग की ओर होती है। तन्त्रिकाओं में थकावट नहीं होती परन्तु इन्हें लगातार ऑक्सीजन मिलते रहना आवश्यक है। मनुष्य में सामान्य परिस्थिति में तन्त्रिकीय आवेग का संचरण 45 मीटर/सेकण्ड से होता है। माइलिन आच्छद (myelin sheath) तन्तुओं में संचरण अधिक तीव्र होता है। इसे साल्टेटोरियल आवेग संचरण (saltatorial transmission) कहते हैं।

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प्रश्न 8.
मस्तिष्कावरण (Meninges) पर टिपणी लिखिए।
उत्तर:
मस्तिष्क एक कोमल एवं नाजुक अंग है। यह अस्थियों से बनी करोटि (cranium) में बन्द रहता है। मस्तिष्क चारों ओर से तन्तुमय संयोजी ऊतकों से बनी झिल्लियों द्वारा घिरा होता है, जिन्हें मस्तिष्कावरण (cranial meninges) कहते हैं।

यह निम्नलिखित आवरणों का बना होता है –
(1) दुक्षानिक या ड्यूरामेटर (Duramater) – यह सबसे बाहरी झिल्ली है। यह कड़ी (rigid) और मोटी होती है। यह कपाल की अस्थियों के निकट स्थित होती है। कपाल की अस्थियाँ एवं दृढ़तानिका के बीच सँकरे स्थान को एपिड्यूरल अवकाश (epidural space) कहते हैं।

(2) जसतानिका या ऐक्नॉइड (Arachnoid) – यह स्तर दढ़्तानिका की तुलना में कम मोटा होता है। इसमें रुधिर केशिकाओं का जाल-सा फैला रहता है। दृढ़तानिका एवं जालतानिका के बीच का खाली स्थान सबड्यूरल अवकाश (subdural space) कहलाता है। इसमें सीरमी प्रव (serous fluid) भरा रहता है।

(3) मृदुतानिका या पायामेटर (Plamater) – यह सबसे भीतरी परत है, जो मस्तिक्क एवं मेरुरज्जु से चिपकी रहती है। जालतानिका एवं मृदुतानिका के बीच की गुहा को अवजालतानिका अवकाश (subarchnoid space) कहते हैं तथा इसमें प्रमस्तिक्क मेरु द्रव (cerebro spinal fluid) भरा रहाता है। यह दो स्थान पर सूक्षम उभारों के रूप में मस्तिक्क की गुहा में लटकी रहती है, इन क्षेत्रों को रक्तक जालक (choroid plexus) कहते हैं। इन स्थानों पर प्रमस्तिक्क मेरु द्रव (cerebro spinal fluid) रिस-रिसकर मस्तिक्क गुहा में पहुँचता रहता है।

प्रश्न 9.
प्रमसिष्ति मेरु द्रच या सेरीजोस्पाइनल फ्लूड (CSF) के कार्यों को लिखिए।
उत्तर:
यस्तिथ्कावरण (Cranial meninges) की मुदुतानिका में स्थित अम एवं पश्च रक्तक जालिकाओं (choroid plexuses) से लसिका के समान द्रव हावित होकर बाहर निकलता रहता है यह द्रव प्रमस्तिष्क मेहु द्रव या सेरीज्याप्पनल फ्लूड (cerebro-spinal fluid, CFS) कहलाता है। एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य के मस्तिष्क में इसकी मात्रा लगभग 150ml पायी जाती है। प्रमस्तिष्क मेरु द्रव में प्रोटीन, ग्लूकोज, युरिया तथा क्सोराइड के अलावा पोटैशियम, सोडियम, केल्सियम के बाइकार्बोनेट, सल्फेट, क्रिएटिनिन तथा यूरिक अम्ल भी सूक्ष मात्रा में पाये जाते हैं। यह आगे से पीछे की ओर बढ़कर अधोजालतानिका (sub-arachnoid space) में होता हुआ अन्त में दृक्तानिका (duramater) के रक्त पात्रों के माध्यम से वापस रक्त में जाता रहता है।

प्रमस्तिष्क मेरुद्रव निम्नलिखित कार्य करता है –

  • यह मस्तिष्क (brain) तथा मेरुरज्जु की बाहरी आधातों से सुरक्षा करता है।
  • यह तन्त्रिकीय कोशिकाओं से पोषक पदार्थो, वर्ज्य पदार्थों, श्वसन गैसों तथा अन्य पदारों के लिए एक माध्यम का कार्य करता है।
  • यह कपाल के अन्दर एक स्थिर दाब बनाये रखता है तथा तन्त्रिका कोशिकाओं की सुचारु कार्यिकी के लिए एक स्थायी दशा का निर्माण करता है।
  • यह मस्तिष्क तथा मेरुर्जु (spinal cord) को नम रखता है।
  • यह हानिकारक रोगाणुओं से मस्तिष्क एवं मेरुरज्जु की सुरक्षा तथा मस्तिष्क की बीमारियीं के निदान (diagnosis) में सढायता करता है।

प्रश्न 10.
हाइपोबैलेमस पर टिपणी लिखिए।
उत्तर:
यह डाइऐनसेफेलॉन की पार्श्व दीवारों का निचला भाग तथा तृतीय निलय का फर्श बनाता है। इसे मस्तिष्क के अधर तल से ही देखा जा सकता है। इसमें तन्त्रिका कोशिकाओं के बड़े-बड़े के न्द्रक होते हैं। छाइपोधैलेमस (hypothalamus) को अग चार भागों में बाँटा जा सकता है –

  • चुन्रकाथ काय या मैमिलरी बॉड़ी भाग (Mamillary Body)-यह मध्यमस्तिष्क के निकट पिछला भाग है, जिसमें दो छोटे गोल उभार होते हैं।
  • केन्द्रीय भाग (Tuberal Region) – यह हाइपोथैलेमस का सबसे चौड़ा मध्य का भाग होता है। यह भाग पीयूष प्रन्थि को हाइपोथैलमस को जोड़ता है।
  • अधिद्दुक् भाग (Supraoptic Region) – यह द्क् काऐज्मा (optic chiasma) के ठीक ऊपर स्थित होता है जहाँ तन्त्रिका कोशिकाओं के अक्ष तन्तु पश्च पीयूष मन्थि में जाते हैं।
  • पूर्क्दृक्क थाग (Preoptic Region)-यह अधिद्क् भाग (supraoptic region) के आगे स्थित होता है।

हाइपोधैलेमस के कार्य (functions of hypothalamus):

  1. यह तन्तिका तन्त्र एवं अन्त्रावी तन्त्र (endocrine system) में सम्बन्ध स्थापित रखता है।
  2. इसमें स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र के उच्च्व केन्द्र होते हैं जो भूख, प्यास, नींद, तृप्ति, क्रोध, प्रसन्नता, सन्तुष्टि आदि पर नियन्त्रण रखते हैं।
  3. यह ताप तथा समस्थापन (homeostasis) का नियन्त्रण रखता है।
  4. यह पीयूष प्रन्थि (pituitary gland) के स्राव पर नियन्त्रण रखता है।

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प्रश्न 11.
एकन्रीय दृट तथा हिन्रीय कृष्टि से आप क्या समझाते हैं?
उत्तर:
एक्तनीय द्रि (Monocular Vision)-अधिकाश जन्तुओं; जैसे-मेंढक, खरगोश आदि में नेत्र सिर के पार्व भागों में स्थित होते हैं, इससे जन्तु को दोनों ओर का विस्तृत क्षेत्र दिखाई देता है। दोनों ही नेत्रों में अपनी-अपनी ओर के भिन्न-भिन्न प्रतिबिम्ब बनते हैं। दोनों नेत्रों को एक साथ किसी वस्तु पर केन्द्रित नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार की दृधि को एकनेत्रीय दृधि (monocular vision) कहते हैं। एकनेत्रीय दृष्टि वाले जीवों को किसी वस्तु की गहराई का ज्ञान नहीं हो पाता है।

fिलेख्राय नृष्टि (Binocular Vision)-अधिक विकसित प्राणियों; जैस-बन्दर, मानव तथा अधिकतर मांसाहारी प्राणियों में दोनों नेत्र सामने की ओर पास-पास स्थित होते हैं। इससे जन्तु को केवल सामने का क्षेत्र दिखाई देता हैं तथा दोनों नेत्रों को एक साथ किसी वस्तु पर केन्द्रित किया जा सकता है। ऐसी दृष्टि को द्विनेत्रीय दृष्टि (binocular vision) कहते हैं। विकसित क्विनेत्रीय द्षि से प्राणी को गहराई का श्ञान हो जाता है। इस प्रकार की दृष्टि को स्टीरियास्थोषिक सृष्टि (stereoscopic vision) भी कहते हैं।

प्रश्न 12.
क्या कारण है कि तीज्र प्रकाश से यकायक अधरे स्बान में जाने पर कुतु बी दिखाइ नकी देवा है ?
उत्तर:
नेन्न गोलक के सबसे भीतर स्तर दुष्ट ष्टल (retina) में उपस्थित दिधि शलाकाओं में बाहरी सिरों पर प्रकाश संवेदी रसायन (वर्णक) रोओ ब्सिन छोता है। रोडोप्तिन में दो यौगिक होते हैं –
(i) ऑप्तिन तथा
(ii) रेटिनी।

जब तेज प्रकाश की किरणें दृष्टि पटल पर पड़ती हैं तो रोडोप्सिन ओप्सिन तथा रेटिनीन में विघटित हो जाता है। अँधेरे स्थान या कम प्रकाश में ऑप्सिन तथा रेटिनीन से रोडोप्सिन का पुनः संश्लेषण हो जाता है और यह शलाकाओं में संगुह्कीत हो जाता है। अतः जब तेज प्रकाश से अचानक (यकायक) अँधेरे में जाते हैं तो कुछ देर के लिए कुछ भी दिखाई नहीं देता है। यही वह समय है जिसमें ओप्तन तथा रेटिनीन में रोडोप्सिन का संश्लेषण होता है। जैसे-जैसे रोडोष्सिन का संश्लेषण होता जाता है, धीरे-धीरे दिखाई भी देने लगता है।

प्रश्न 13.
सूत्र संदुत्मन् या युम्मानुबन्यन संचार तन्त में ऐसीदाइल कोलीनेस्टर्य के अथाव में क्या होगा ?
उत्तर:
ऐसीटाइल कोलीनेस्टेज नामक एन्जाइम का निर्माण दो तन्त्रिका कोशिकाओं के मध्य सूत्र युग्मन या युग्मानुबन्धन (synapse) के ऊतक में होता है। तन्त्रिका आवेग एक तन्त्रिका कोशिका के एक्सॉन में होकर जब युग्मानुबन्थन में पहाँचता है तो सिनेप्टिक घुण्डियों में ऐसीटायलकोलीन नामक पदार्थ थर जाता है। यह पदार्थ प्रेरणा को युग्मानुबन्धन के पार ले जाता है। ठीक इसी समय ऐसीटाइल कोलीनेस्टरजज एन्जाइम उतक में बनता है और यह पेसीटायकोलीन को कोलीन तथा ऐसीटेट में विघटित कर देता है। इससे पुनः नई प्रेरणा इस युग्मानुबन्धन से एक ही दिशा में संचारित होती है। अतः ऐसीटाइल कोलीनेस्टरज के अभाव में प्रेरणा एक तन्त्रिका कोशिका (न्यूरॉन) से दूसरी तन्त्रिका कोशिका में नहीं पहुँच पाएगी।

प्रश्न 14.
न्दूरीलेमा के बाहर सोडियम आयन (Na+) समाप्त कर दिए जाएँ तो तन्रिका आवेग के संचारण पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर:
वन्त्रिका कोशिका की न्यूरीलेमा के बाहर ऊतक द्रव्य में सोडियम आयन (Na+) पर्याप्त मात्रा में संचित होते हैं, जबकि तन्त्रिका के ऐक्सोप्लाउन में पोटैशियम आयन (K+)संचित रहते हैं। जब कोई उद्दीपन तन्त्रिका पर पहुँचता है तो सोडियम आयन (Na+)न्यूरीलेमा से होते हुए ऐक्सोप्लाज्म में प्रवेश करते हैं और बदले में पोटेशियम आयन (K+)ऐक्सोप्लाज्म से निकलकर ऊतक द्रव्य में जाने लगते हैं। इसी से तन्त्रिका आवेग का संचारण होता है। अतः न्यूरीलेमा के बाहर सोडियम आयन (Na+) समाप्त कर दिए जाने पर तन्त्रिका से तन्त्रिका आवेग प्रसारित (संचारित) नहीं होगा और तन्त्रिका कार्य नहीं करेगी।

प्रश्न 15.
यदि उपतारा (आइरिस) की वर्मुल पेशियाँ गतितीन हो जाएँ तो जनु पर इसका क्या प्रथाव पड़ेगा ?
उत्तर:
नेत्र में उपतारा (आइरिस) की वर्तुल पेशियाँ (circular muscles) प्रकाश की मात्रा के अनुसार अर्थात् प्रकाश की मात्रा की आवश्यकतानुसार तारा या पुतली (pupil) के व्यास को कम (छ)टा) या अधिक (बड़ा) करती रहती है। यदि उपतारा (iris) की वर्तुल पेशियाँ गतिहीन हो जाएँ तो वारा (पुतली) का व्यास सदैव समान बना रहेगा।

इसके फलस्वरूप धीमे या मन्द प्रकाश में नेत्र के अन्दर आवश्यकता से कम प्रकाश जाएगा और पीतबिन्दु पर वस्तु का धुँधला प्रतिबिम्ब बनेगा। इसके विपरीत, तेज प्रकाश में नेत्र के अन्दर आवश्यकता से अधिक प्रकाश पहुँचेगा, जिससे पीतबिन्दु पर वस्तु का बहुत चमकीला प्रतिबिम्ब बनेगा और जन्तु को अधिक चकाचाध लगेगा और वह दोनों ही स्थितियों में वस्तु को भली-भाँति नहीं देख पाएगा।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

प्रश्न 16.
क्या कारण है कि बाुुत तेज ध्वानि या घमाका सुतने पर मुख एकाएक संत्रा ही सुल जता है ?
उत्तर:
जब कमी कहीं बहुत तेज ध्वनि होती है या धमाका होता है तब उसकी ध्वनि तरंगें कर्णकुहर से होती हुई अन्तकर्ण में स्थित कलागहन (membranous labyrinth) के कौफित्या (cochlea) तथा षर्जी के अंग (organ of corti) पर पहुँचती हैं। यहाँ पर श्रवण संवेदना (उद्दीपन) की प्रेरणा स्थापित हो जाती है।

कॉकित्रिर तनिका से यह प्रेरणा क्रिण तन्रिका (auditory nerve) में पहुँचती है तथा श्रवण तन्त्रिका इन्हें मरित्का तक पहुँचा देती हैं। मस्तिष्क से मुख के जबड़ों को अनुकूल प्रतिक्रिया (या प्रेरणा अथवा आदेश) भेज दी जाती है। कण्ठकर्ण नलिका (eustachian canal) द्वारा कर्णष्ट (tympanum) के बाहर (बाहा कर्ण गुहा) तथा भीतर (प्रसनी की गुहा) में वायु के दबाव को सन्तुलित बनाए रखने के लिए प्रतिवर्ती क्रिया के रूप में मुख एकाएक खुल जाता है।

प्रश्न 17.
श्रवणेन्द्रियों में ऑटोकोनिया का क्या कार्य है ? यदि एण्डोलिम्क में इनका अभाव हो जए तो जनु पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर:
अन्तक्रण में स्थित कलागहन की खोखली गुहा व इसकी अर्द्धवृत्ताकार नलिकाओं में लसदार व दृधिया रंग का अन्तर्लसिका या एण्डोलिम्फ (endolymph) नामकं द्रव भरा होता है। इस द्रव्य में कैल्सियम काबोंनेट CaCO3 के कण उतराते रहते हैं, जिन्हें औटोकोनिया (autoconia) कहते हैं। ऑटोकोनिया के कारण श्रवणकूट के संवेदी रोमों में संवेदना उत्पन्न होती है, जिससे जन्तु को अपने शरीर का सन्तुलन ठीक (सही) बनाए रखने में सहायता मिलती है।

जन्तु का शरीर असन्तुलित होते समय ऑटोकोनिया अर्द्धवृत्ताकार नलिकाओं में विपरीत दिशा में एकत्रित होकर श्रवणकुटी के संवेदी रोमों को उत्तेजित करते हैं। यह संवेदना श्रकण तन्रिका द्वारा मस्तिष्क को पहुँचती है, जिससे जन्तु शीष्र ही अपने शरीर का सन्तुलन ठीक कर लेता है। यदि एण्डोलिम्फ में ऑटोकोनिया का अभाव हो जाए तो श्रवणकूटों के संवेदी रोमों में संवेदना उत्पन्न नहीं होगी और जन्तु के शरीर का सन्तुलन ठीक (सही) नहीं रह पाएगा।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए –
(अ) सरल प्रतिवर्ती क्रियाओं एवं प्रतिखन्यित प्रतिकर्ती क्रियाओं में।
(ब) एड्रुनेर्जिक एवं कोलीनेर्जिक तन्तिका तन्रु में।
(स) अनुकम्पी एवं परानुकम्पी तत्रिका तन्त्र के कार्यों में।
उत्तर:
(अ) सरल प्रतिवती एवं प्रतिबन्धित प्रतिवर्ती क्रियाओं में अन्तर-

सरल प्रतिवर्ती कियाएँ (Simple Reflex Actions)प्रतिक्जित्यित प्रतिकर्बी ज्रियाएँ (Controled Reflex Actions)
1. ये क्रियाएँ वंशानुगत या आनुवंशिक होती हैं।ये क्रियाएँ वंशानुगत नहीं होती हैं। इनको प्राणी अपने जीवन काल में अर्जित करता है।
2. ये जन्मजात होती हैं।ये पूर्व अनुभव प्रशिक्षण एवं सीखने आदि पर निर्भर होती हैं।
3. ये प्राकृतिक मल प्रवृत्ति के अन्तर्गत आती हैं।ये प्राणी को सिखाई जाती हैं।
4. इन्हें जन्तु बिना किसी पूर्व अनुभव के करते है। उबाइखण्रचनन, प्रणय निवेदन, घौसला बनाना, पधियों का हेशान्तरण आदि।इन्हें जन्तु पूर्व अनुभव के आधार पर करते हैं। उदाधरणन्नाचंना, गाना, बजाना, साइकिल चलाना, जल में तैरना आदि।

(ब) एदिनेतिक एवं कोलीनेजिक त्रिक्रिका तन्तुओं में अन्तर-

एंग्रीजिक्ष तम्रिका तन्दु (Arenergic Nerve Fibres)छोलीनिजिक तन्तिका तनु (Cholinergic Nerve Fibres)
इन तन्त्रिका तन्तुओं के सिरे पर नॉरएड्रीनेलिन (noradrenaline) का सावण होता है।इन तन्त्रिका तन्तुओं के सिरों पर ऐसीटिं (acetylcholine) का सावण होता है।
अनुकंपी तन्त्रिका तंत्र के पश्चगुच्छीय तन्तु एूीनिर्जिक तन्तु होते हैं।केन्द्रीय तन्न्रिका तंत्र, परानुकंपी तन्त्रिका तंत्र एवं अनुर्कपी तन्त्रिका तंतु के पूर्वगुच्छीय तंतु कोलीनेर्रिक तंतु होते हैं।
ये तंतु सामान्यतः अंगों को आकस्मिकता से निपटने के लिए उद्वीपित करते हैं।ये तंतु प्राय: अंगों की क्रियाएँ वर्धी या सामान्य स्तर पर रखते हैं।

(स) अनकम्यी एवं परानकम्पी तन्तिका तंत्र के कार्यो में अन्तर-

आन्तरागों के नाम (Name of Internal organs)अनुफम्पी तन्त्र के कार्य (Sympathetic System)परानुकम्मी तन्र के कार्य (Parasympa-thetic System)
1. समस्त शरीरक्रोध, भय तथा पीड़ा का अनुभव कराना।शारीरिक आराम व सुख की स्थितियाँ उत्पन करना।
2. नेत्रों की पुतलियाँपुतलियों को फैलाता है।पुतलियों को संकुचित करता है।
3. अश्रु म्रन्थियाँअश्रुस्राव में वृद्धि करता है।अश्रुस्ताव को कम करता है।
4. लार ग्रन्थियाँलार के स्राव को कम करता है।लार के स्राव में वृद्धि करता है।
5. स्वेद प्रन्थियाँपसीने के स्राव को बढ़ाता है।पसीने के स्राव को कम करता है।
6. फेफड़े, वायुनाल तथा श्वसनीअधिकाधिक एवं सुगम श्वसन हेतु इन अंगों को प्रसारित करता है।साधारण श्वसन क्रिया में इन अंगों को संकुचित करता है।
7. हृदयइसकी स्पंदन दर को बढ़ाता है।इसकी स्पंदन दर को कम करता है।
8. रुधिर वाहिनियाँधमनियों की गुहा को संकुचित करता है जिससे रुधिर दाब बढ़ जाता है।धमनियों की गुहा को फैलाकर रुधिर दाब को कम करता है।
9. आहारनालपेशियों का शिधिलन करके क्रमाकुंचन गतियों को कम करता है।क्रमाकुंचन गति की दर को बढ़ाता है।
10. यकृत अग्न्याशयइनके साव को कम करता है तथा रक्त में ग्लूकोज की मात्रा में वृद्धि करता है।इन्सुलिन के स्नाव को उत्तेजित करके रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को नियन्त्रित करता है।
11. अधिवृक्क मन्थिइसके हॉमोंन्स स्राव को उत्तेजित करता है।इसके हॉर्मोन्स स्राव को कम करता है।
12. मूत्राशयइसकी पेशियों को शिथिल करता है।इसकी पेशियों का संकुचित करता है।
13. गुदा संकोचक पेशीइन पेशियों को सिकोड़कर (मलद्वार) को गुदा करता है।इन पेशियों को शिधिल करके गुदा को खोलता है।
14. रोमों की पेशियाँइन्हें सिकोड़कर रोमों (बालों) को खड़ा करता है।इन्हें शिथिल करके रोमों को गिराता है।
15. बाह्य जननांगइन्हें उत्तेजित होने से रोकता है।इन्हें उत्तेजित करता है।
16. ऊर्जाऊर्जा व्यय एवं वातावरण की प्रतिकूल दशाओं में शरीर की सरक्षा करता है।ऊर्जा संरक्षण में सहायता करता है।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित पर टिप्पणियों लिखिये –
(अ) दृष्टि वैषम्य (ऐस्टिगमैटिज्म)
(ब) सबलबाय (ग्लूकोमा)
(स) मोतियाबिन्द (कैटरेक्ट)
(द) भेंगापन (स्ट्बिस्पस)
(य) जीरोप्थैस्मिया
(र) रतौंधी
(ल) वर्णांधता।
उत्तर:
(अ) दृष्टि वैषम्य या ऐस्टिगमैटिज्म (Astigmatism) – मनुष्य में दृष्टि वैषम्य दोष कॉर्निया की आकृति असामान्य हो जाने से हो जाता है। इस दोष के कारण मनुष्य को धुँधला और अधूरा दिखाई देता है। इस नेत्र दोष को दूर करने के लिए बेलनाकार लेन्स (cylindrical lens) का चश्मा लगाया जाता है।

(ब) सबलबाय या ग्लूकोमा (Glucoma) – नेत्र गोलक की दीवार सामान्य तेजोजल (ऐक्वस ह्यूमर) तथा काचाभ जल (विट्रिअस ह्युमर) के दबाव से सधी रहती है। यदि श्लेष्म की नाल में अवरोध आ जाये तो नेत्र कक्ष में दबाव बढ़ जाता है, जिससे रेटिना क्षतिप्रस्त हो जाती है। इसे सबलबाय या म्लूकोमा रोग कहते हैं। इससे रोगी को दिखाई देना बंद हो जाता है।

(स) मोतियाबिन्द या कैटरेक्ट (Cataract) – यह रोग वृद्धावस्था में, लेन्स का लचीलापन कम हो जाने तथा लेन्स की दोनों सतहों के कम उत्तल हो जाने से हो जाता है। इस स्थिति में लेन्स घना-भूरा तथा अपारदर्शी (opaque) हो जाता है, तब इस अवस्था को मोतियाबिन्द कहते हैं। इस नेत्र-दोष को दूर करने के लिए शल्य क्रिया (ऑपरेशन) करके दोषपूर्ण लेन्स को निकाल दिया जाता है और उपयुक्त लेन्स का चश्मा दिया जाता है।

(द) भेंगापन या स्ट्बेब्सम (Strabismus) – यह नेत्र रोग नेत्र गोलक की पेशियों के बड़ी या छोटी हो जाने के कारण नेत्र गोलक के एक ओर झुक जाने से हो जाता है।

(घ) जीरॉफ्यैस्मिया (Xerophthalmia) – यह नेत्र दोष कजक्टाइवा पर्त में किरेटिन (keratin) संचित हो जाने से घनी हो जाने के कारण हो जाता है। यह नेत्र रोग भोजन में विटामिन A की कमी से होता है।

(र) रतौधी (Nightblindness) – यह नेत्र रोग भोजन में विटामिन A (Retinol) की कमी से हो जाता है। विटामिन $\mathrm{A}$ की कमी से रोडोप्सिन (Rhodopsin) का पर्याप्त मात्रा में संश्लेषण नहीं हो पाता है। इससे व्यक्ति को मन्द प्रकाश में साफ दिखाई नहीं देता है।

(ल) वर्णान्यता (Colourblindness) – यह एक आनुवंशिक नेत्र रोग है, जो ‘X ‘ लिंग गुणसूत्र से संलग्न जीन के द्वारा सन्तान में स्थानान्तरित हो जाने से होता है। इस दोष के कारण व्यक्ति हरे व लाल रंगों में पहचान नहीं कर पाता है।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

(D) निबन्धात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
प्रमस्तिक्क की संरचना एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(I) प्रमस्तिक्क या सेरीब्रम (Cerebrum) यह सर्वाधिक विकसित एवं पूरे मस्तिष्क का लगभग $80 \%$ भाग होता है। यह दाहिने एवं बार्यें प्रमस्तिष्क गोलाह्धो (Cerebral hemispheres) का बना होता है। दोनों गोलार्द्ध तन्त्रिका तन्तुओं की एक पड्टी द्वारा एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं, जिसे कॉर्पस कैलोसम (corpus callosum) कहते हैं।

प्रत्येक प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध तीन गहरी दरारों द्वारा चार पालियों में बँटा रहता है –
(a) अंग्रलाट या प्रप्टल पालि (Frontal Lobe) – यह आगे की ओर तथा सबसे बड़ी होती है। यह सिल्वियन विदर द्वारा शंख पाली से पृथक रहता है तथा यह़ बोलने की क्रिया को नियंत्रित करता है।
(b) भि्तिय या पैराइटल पाली (Parietal Lobe) – यह फ्रन्टल पालि के पीछे की ओर स्थित होती है। यह रोलेन्डो के विदर (Fissure of Rolendo) के द्वारा अप्रललाट पालि से पथक रहती है।
(c) शंख या टेम्पोरल पालि (Temporal Lobe) – यह भित्तीय पालि के नीचे तथा सामने की ओर होती है। यह पार्श्व सेरीव्रल विदर या शिल्वियन विदर (sylvian cleft) द्वारा अप्रललाट पालि से पृथक् रहती है।
(d) अनुकपाल या ऑक्सीपिटल पालि (Occipital lobe) – यह अपेक्षाकृत छोटी तथा सबसे पीछे की ओर स्थित होती है। यह कपाल के महारन्य (Foramen of Magnum) के चारों ओर मस्तिक्क में पायी जाती है। यह पैराइटो ऑक्सीपीटल विदर द्वारा भित्तीय पाली से पृथक रहती है।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय - 1

प्रमस्तिक्क की आन्तरिक संरचना (Internal Structure of Cerebrum) – प्रमस्तिष्क का बाहरी भाग प्रमस्तिष्क बल्कुट (Cerebral cortex) कहलाता है जो धूसर द्रव (grey matter) का बना होता है। इसकी भित्ति $2-4$ सेमी मोटी होती है। प्रमस्तिष्क गोलार्ध की सतह पर उभारों को गाइरी (Gyri) तथा खाँचों को सर्काई (Sulci) कहते हैं। ये वलन प्रमस्तिक्क गोलार्ध की सतह का क्षेत्रफल तीन गुना बढ़ा देते हैं।

घ्राण मस्तिष्क को बेरने वाली भित्ति को आध्य प्रावार (आर्कपिलियम) तथा शेष भाग को घेरने वाली भित्ति को नव प्रवार (मियोपेलियम) कहते हैं। बल्कुट में प्रेरक क्षेत्र व संवेदी भाग के बड़े भाग होते हैं, जो न तो स्पष्ट रुप से प्रेरक होते हैं न ही संवेदी। ये सहभागी क्षेत्र कहलाते हैं। प्रमस्तिष्क के भीतरी भाग को प्रमस्तिष्क मैड्यूला कहते हैं। प्रमस्तिक्क गोलार्धों में पायी जाने वाली गुहा को पार्श्व निलय (Lateral Ventricle) या पेरासील (Paracoel) कहते हैं।

प्रमस्तिष्क के कार्य (Function of Cerebrum):
(1) संवेदन कार्य (Sensory functions) – ये मस्तिष्क के संवेदी क्षेत्र द्वारा नियन्त्रित होते हैं जो कि केन्द्रीय विदर के पीछे की ओर स्थित होता है। ये शरीर के विभिन्न भागों से ताप, स्पर्श, चुभन, दाब, दर्द आदि की संवेदनाओं को ग्रहण करता है।

प्रमस्तिक्क के पिण्डों के अनुसार –

  • फ्रन्टल पिण्ड क्रियात्मक विचारों (creative idea) को नियन्त्रित करता है।
  • टैम्पोरल पिण्ड श्रवण संवेदनाओं को प्राप्त करता है।
  • ऑक्सीपीटल पिण्ड दृष्टि संवेदनाओं को प्राप्त करता है।
  • पैराइटल पिण्ड बोध अनुभव (feeling) जैसे-स्पर्श, गर्म, ठण्डा, दर्द, चुभन आदि की संवेदनाएँ म्रहण करता है।

(2) प्रेरक कार्य (Motor functions)-इनका नियंत्रण प्रमस्तिष्क में उपस्थित प्रेरक केन्द्र द्वारा होता है जो फ्रन्टल पालि के अम्र भाग में केन्द्रीय विदर के समीप स्थित होता है। इसी भाग में पायी जाने वाली पिरेमिड कोशिकाएँ शरीर की सभी ऐच्छिक पेशियों की क्रियाओं को नियन्त्रित करती हैं। इसके अविरिक्त यह मस्तिष्क का सबसे महत्वपूर्ण भाग है जो समस्त उच्चतम क्रियाओं को नियन्त्रित करता है जैसे खुद्धिमत्ता (Intelligence), याददाश्त (Memory), अनुभव (Experience), चेतना (Consciousness), वाणी (Speech), तर्कशक्ति (Reasoning), योजना (planning), संवेदना जैसे रोना, हैसना आदि। प्रमस्तिक्क में संवेदनाओं, प्रेरणाओं व समन्वय (coordination) के लिये भी विशिष्ट क्षेत्र पाये जाते हैं।

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2. घ्राण मस्तिष्क या राइन्स्सिलेलॉन (Rhinenlcephalon)-ये छोटे पिण्ड हैं जो फ्रंटल लोब के अग्र भाग में धँसे होते हैं। इनमें दो स्पष्ट भाग होते हैं।
(i) घ्राण पिण्ड तथा
(ii) घ्राणमार्ग या घ्राण क्षेत्र।
यह भाग गंध (घ्राण) से संबंधित क्रियाओं को नियंत्रित करता है।

3. अप्रमस्तिक पश्च या डाइऐनसेफेलॉन (Diencephalon)-यह मस्तिष्क का पिछला भाग है जो प्रमस्तिष्क (Cerebrum) तथा मध्य मस्तिष्क (Midbrain) के बीच स्थित होता है। इसमें पायी जाने वाली गुहा डायोसील (Diocoel) या तृतीय निलय कहलाती है।

इसके तीन भाग होते हैं –
(a) अधिवेतक या एपीधैलेमस (Epithalamus) – यह तृतीय गुहा की छत बनाता है। इसमें एक रक्तक जालक (choroid plexus) होता है। इसके मध्य रेखा में एक छोटे से वृन्त पर पीनियल श्रन्बि (pineal gland) होती है।
(b) चेतक या थैलेमस (Thalamus) – यह डाइऐनसेफेलॉन की पार्श्व दीवारों का ऊपरी भाग बनाता है। यह अण्डाकार एवं दो मोटे पिप्डकों के रूप में होता है।

थैलेमस के निम्न कार्य है –

  • यह दृष्टि, स्पर्श, ताप, दबाव, पीड़ा, श्रवण, स्वाद आदि की संवेदनाओं का प्रसारण केन्द्र है।।
  • यह उपरोक्त संवेदनाओं की व्याख्या करता है।
  • इसके कुछ केन्द्र प्रेम, घृणा भावुकता, बोध, ज्ञान व स्मृति से संबंधित कार्य को नियंत्रित करते हैं।

(c) अधश्चेतक या हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) – यह डाइऐनसेफेलॉन की पार्श्व दीवारों का निचला भाग तथा डायोसील का फर्श बनाता है। इसमें तन्त्रिका कोशिकाओं के लगभग एक दर्जन बड़े-बड़े केन्द्रक होते हैं। इसमें एक दृक किआज्या (optic chaisma) होता है।

यह चार भागों में बना होता है –

  • मेमिलरी काय (Mammilary body) – ये पीनियल काय के पीछे एवं पिटट्यूटरी म्रन्थि के समीप पायी जाने वाली दो गोल संरचनाएँ हैं। ये घ्राण संवेदनाओं की प्रतिवर्ती क्रियाओं के लिए प्रसारण केन्द्र का काम करती हैं।
  • केन्द्रीय भाग (Tuberal region) – वह हाइ़ोथैलमस का सबसे चौड़ा भाग है। यहाँ ग्रे मैटर का बना ट्यूबर साइनेरियम तथा कीचक (infundibulum) नामक वृन्त पाया जाता है जिससे पिट्टयूटरी प्रन्थि का हाइपोफाइसिस भाग हाइपोथैलेमस से जुड़ा होता है।
  • अधि दुक् भाग (Supraoptic region) – यह दृक किआज्मा (optic chiasma) के ऊपरी भाग में स्थित होता है। यहाँ पाए जाने वाले न्यूरॉन के एक्सॉन पिट्टयूटरी ग्रन्थि तक जाते हैं।
  • पूर्व दृक् भाग (Preoptic region) – यह अधि दृक् भाग के आगे की ओर स्थित होता है।

हाइपोथेलेमस के कार्य (Function of Hypothalamus) –

  1. यह पीयूष म्रन्थि से जुड़ा होने के कारण तन्त्रिका तन्न्र को अन्तझावी तन्त से जोड़ने का कार्य करता है।
  2. इसकी तन्त्रिका स्नावी कोशिकाएँ मोचन (Releasing) व निरोधी (Inhibitory) न्यूरोहॉॅॉोंन का स्रावण करती है, जो पीयूष मन्थि की स्रावण क्रिया को नियन्त्रित करते हैं।
  3. इसकी तन्त्रिका स्रावी कोशिकाएँ वेसोप्रेसिन ADH व ऑक्सीटोसीन नामक हारोन का निर्माण करती हैं जो पीयूष मन्थि से रक्त से संचरित होते हैं।
  4. इसमें स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र के केन्द्र पाये जाते हैं जो भूख, प्यास, प्रेम, घृणा, नींद, सन्तुष्टि, भावनाओं, वृत्ति, क्रोध, सम्भोग, प्रसन्नता आदि को नियन्त्रित करते हैं।
  5. यह शरीर के ताप को नियन्त्रित करता है।
  6. यह शरीर में समस्थापन (Homeostatis) की स्थिति को बनाये रखता है।
    नोट-पीयूष मन्थि पर नियन्त्रण के कारण हाइपोथैलेमस को अन्तख्रावी नियमन का सवोंच्च कमाण्डर या प्रधान म्रन्थि का भी नियंन्नक (Master of Master gland) कहते हैं।

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प्रश्न 2.
तंत्रिका कोशिका अथवा न्यूरॉन का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र की इकाई-न्यूरॉन की संरचना (Unit of Nervous System-Structure of Neuron):
तन्त्रिका कोशिका अथवा न्यूरॉन (nerve cell or neuron) तन्त्रिका तन्न (nervous system) की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक (structural and functional) इकाई होती है। ये श्रूणीय बाहात्वचा (ectoderms) से व्युत्पन्न होती हैं। ये वातावरणीय परिवर्तनों को उद्दीपनों के रूप में ग्रहण करके, उन्हें विद्युतनरासायनिक आवेगों (electro-chemical impulses) के रूप में प्रसारित करती हैं।

तन्त्रिका कोशिका या न्यूरॉन के निम्नलिखित तीन भाग होते हैं –
(1) कोशिकाकाय या साइ्टोन (Cyton or Cell Body) – यढ़ तन्त्रिका कोशिका का गोल या अण्डाकार भाग है। इसमें एक केन्द्रक (nucleus) तथा अनिश्चित आकार के असंख्य निस्सल कण (Nissl’s granules) पाये जाते हैं। तन्त्रिका कोशिका या न्यूर्रोन (neuron) के कोशिकाद्रव्य को न्यूरोप्लाउन (neuroplasm) तथा इसमें पाये जाने वाले महीन तन्तुओं को न्यूरोफाइक्रिल्स (neurofibrils) कहते हैं।

(2) वृक्षिका या डेष्डॉस्स (Dendrons) – तन्त्रिका कोशिका के कोशिकाकाय (cyton) से अनेक सुक्ष्म बहुशाखी प्रवर्ष निकले रहते हैं, इन्हें डेण्ड्रान्स (dendrons) कहते हैं। प्रत्येक ड्डेण्ड्रॉन से भी अनेक छोटे-छोटे पदार्थ निकले रहते हैं जिन्हें वृक्षिकान्त या डेष्ड्राइट्स (dendrites) कहते हैं। इनके द्वारा तन्त्रिका कोशिका अन्य तन्त्रिका कोशिका से जुड़ी रहती है।

(3) तन्तिकाई या ऐक्सोंन (Axon) – साइटोन (cyton) से निकले कई प्रवर्धों में से एक प्रवर्ध अपेक्षाकृत लम्बा, मोटा तथा बेलनाकार होता है। यह प्रवर्ध ऐक्सॉन (axon) कहलाता है। इसकी मोटाई 1-20 तक होती है। ऐक्सॉन के अन्तिम छोर पर घुण्डी के समान रचनाएँ दिखायी देती हैं जिन्हें साइनेष्टिक घुण्डियाँ या बटन्स (synaptic buttons) कहते हैं। ये साइनेप्टिक बटन्स दूसरी तन्त्रिका कोशिका के डेण्ञान (Dendrons) से कार्यकारी सम्बन्ध बनाते हैं जिन्हें सिनैप्स (synapse) कहते हैं। एक्सॉन में उपस्थित कोशिकाद्रव्य एक्सोप्लाज्म कहलाता है।

ऐक्सॉन का बाहरी आवरण न्यूरीलेमा (neurilemma) कहलाता है। परिधीय तन्न्रिका तन्त्र की कोशिकाओं पर श्वान कोशिकाओं (Schwann cells) का बना आवरण होता है। न्यूरीलेमा के अन्दर वसा की एक परत होती है जिसे मेड्यूलरी शीथ (medullary sheath) कहते हैं। यह स्थान-स्थान पर अन्दर की ओर धँसी रहती हैं। इन स्थानों को रेनवीयर की पर्वसन्यि (node of ranvier) कहते हैं। दो पर्वसन्धियों के बीच का स्थान पर्व (internode) कहलाता है। माइलिन आच्छद (myelin sheath) से युक्त तन्तु माइलीनेटेड तन्तु (myelinated fibres) तथा माइलिन आच्छद से रहित तन्तिका तन्तु नॉन-माइलीनेटेड तन्तु (non-myelinated fibres) कहलाते हैं।

डेन्ड्राइट्स तथा एक्सॉन की संरचना में तो अन्तर होता ही है किन्तु इनके कार्य अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। डेन्डाइट आवेगों को संवेदी कोशिकाओं तथा अन्य न्यूरॉंस्स से पहाण करके साइटॉन में लाते हैं। साइटॉन भी अन्य न्यूरॉॅ्स से आवेगों को सीधे ही महण कर सकते हैं। इसके विपरीत ऐक्सॉन आवेगों को साइटान से अन्य न्यूरॉन या कार्यकर कोशिकाओं, उत्तकों (पेशियों, मान्थियों) आदि को ले जाने का काम करते हैं। इसीलिए डेन्ड्राइट को अभिवाही (afferent) तथा एक्सॉन को अपवाही (efferent) प्रवर्ध भी कहते हैं। इसमें स्पष्ट है कि डेंड्राट्स तथा साइटॉन आवेगों को उत्पन्न करते हैं, जबकि एक्सॉन आवेगों के संचारण के लिए विशिष्टीकृत होते हैं। डेन्द्राइट केन्द्रीय तंत्रिका तंग्र एवं स्वायत्त तंत्रिका तंत्र में होते है, जबकि एक्सान पूरे तंत्रिका तंत्र में फैले रहते हैं।
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प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action):
वातावरण में होने वाले परिवर्तनों से उत्पन्न उद्दीपनों के प्रति प्राणियों में प्रायः दो प्रकार की शारीरिक क्रियाएँ होती हैं –
1. ऐच्छिक क्रिया (Voluntary actions) -ये क्रियाएँ प्राणी की चेतना एवं इच्छनुसार, सुनियोजित एवं उद्देश्यपूर्ण होती हैं; जैसे -किसी वस्तु को ह्याथ में पकड़ना, शत्रु से बचकर भागना आदि। इन क्रियाओं पर प्रमस्तिक्क (cerebrum) का नियन्त्रण रहता है।

2. अनैछ्छक क्रियाएँ (Involuntary actions) – ये क्रियाएँ प्राणी की चेतना या इच्छाशक्ति के अधीन नहीं होती हैं और न ही इनका नियन्त्रण प्रमस्तिष्क द्वारा होता है। ये क्रियाएँ भी दो प्रकार की होती हैं –

(क) प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Reflex actions) – बाह्म उद्दीपनों के फलस्वरूप शरीर में होने वाली अनैच्छिक क्रियाओं को प्रतिवरी क्रियाएँ कहते हैं। इनका नियन्नण (या नियमन) मेरुज्जु (सुषुम्ना-Spinal cord) द्वारा किया जाता है। इन क्रियाओं के संचालन में मस्तिक्क (Brain) भाग नहीं लेता है। ये क्रियाएँ यन्न्रवत् सम्पन्न हो जाती हैं; जैसे -काँटा चुभ जाने पर पर का तुरन्त हट जाना, गर्म वस्तु का स्पर्श होते ही हाथ का तुरन्त हट जाना, तीव्र प्रकाश में नेत्रों की पुतलियों का सिकुड़ जाना, पकवान की सुगन्ध के फलस्वरूप मुख में लार (पानी) का आ जाना, खाँसना, छींकना, उबासी आना आदि।

(ख) स्वायत्त क्रियाएँ (Autonomic actions) – आन्तरांगों की अनैच्छिक पेशियों एवं मन्थियों से सम्बन्धित समस्त अनैच्चिक क्रियाओं का नियन्त्रण केन्द्र प्रमस्तिक्ष में न होकर मस्तिषक के हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) में होता है; जैसे – ठदय का स्चन्दन (धड़कना), सामान्य श्वास क्रिया, शारीरिक ताप का नियमन, आहारनाल का क्रमाकुंचन, जठर रसों का स्रावण, होमिओस्टैसिस आदि स्वायत्त अनैच्छिक क्रियाएँ हैं।

प्रतिवर्ती क्रिया की कार्य-विधि (Mechanism of Reflex Action):
मेरुज्जु (spinal cord) से निकलने वाली तन्तिकाओं को मेरु तन्त्रिकाएँ या सुषुम्नीय तत्रिकाएँ (Spinal nerves) कहते हैं। प्रत्येक मेरु तन्त्रिका का निर्माण पृष्ठ मूल (dorsal root) तथा अधर मूल (ventral root) से मिलकर होता है। पृष्ठ मूल में संवददी तन्त्रिका तनु (sensory nerve fibres) तथा अधर मूल में चालक या प्रेक तन्रिका तन्तु (motor nerve fibres) होते हैं। पृष्ठमूल में स्थित संवेदी तन्चिका तन्तु संवेदनाओं (stimulus) की लहर को संवेदी अंगों प्ष्ठ मूल गुच्छक (dorsal root ganglion) में स्थित तन्तिका कोशिका (यूरॉन) के कोशिकाकाय (साइटॉन) में प्रसारित करते हैं। यह संवेदना अब न्यूरॉन के एक्सॉन में होती हुई मेरूज्जु के धूसरद्रव्य (gray matter) में पहुँचती है।

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धूसर द्रव्य संवेदनाओं को आदेश में परिवर्तित कर युग्मानुबन्धन (सुत्र-युग्मन-Synapses) द्वारा प्रेरणा (Impulses) को मेरुरज्जु की अधरमूल में स्थित प्रेरक या चालक तन्तिका तन्तु के डेन्ट्राइट्स, साइटॉन तथा एक्सॉन में होकर प्रेरणा कार्यकारी अंग की पेशियों में पहुँचाता है। इसी प्रेरणा द्वारा उस अंग की पेशियाँ तुर्त्त क्रियाशील होकर अंग को गति प्रदान करती हैं और अंग तदनुसार प्रतिक्रिया (या अनुक्रिया) करता है। इस सम्पूर्ण क्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex action) कहते हैं जो अत्यन्त तीव्र गति से होती है और जन्तु को इसका आभास तक नहीं होता है।

प्रतिवर्ती क्रिया में संवेदनाओं का संवेदी अंगों से संवेदी तन्त्रिका तन्तुओं द्वारा मेरूरज्जु तक आने और मेरुरज्जु से प्रेरणा के रूप में अनुक्रिया करने वाले अंगों (कार्यकारी अंगों) की मांसपेशियों तक पहुँचने में एक चापवत् तन्त्रिकीय प्रेरणा परिपथ (nerveimpulse path) स्थापित हो जाता है। इसी परिपथ को प्रतिवर्तीं चाप (reflex arch) कहते हैं।

प्रतिवर्ती चाप के घटक निम्नवत् होते हैं –
संवेदांग → संवेदी तन्त्रिका कोशिका (न्यूरॉन) का वृक्षिकान्त (डेन्ड्राइट) → संवेदी कोशिका का तन्त्रिका काय (Cell body) → संवेदी कोशिका का तन्त्रिकाक्ष (एक्सॉन) → प्रेरक (चालक) त्रत्रिका कोशिका के वृक्षिकान्त (Dendrites) → प्रेरक (चालक) तन्न्रिका कोशिका का तन्त्रिका काय → प्रेरक तन्त्रिका कोशिका का
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प्रश्न 4.
त्वचा में पाए जाने वाले संवेदांगों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
त्वक् संवेदना या त्वचा (Cutaneous Receptor or Skin):
वैसे तो त्वचा को स्पर्शग्राही (tactile receptor) माना जाता है, किन्तु इसकी डर्मिस में अनेक प्रकार के ग्राही अंग होते हैं और त्वचा स्पर्श, दबाव, सर्दी, गर्मी व दर्द के उद्दीपन को प्रहण करती है, सभी त्वक् ग्राही संरचना में सरल होते हैं। कुछ त्वक् ग्राही बहुकोशिकीय व कुछ एक कोशिकीय होते हैं तथा कुछ में तंत्रिका सूत्रों के अन्तिम सिरे ही आवेग प्रहण करते हैं।

त्वचा में पाँच प्रकार के ग्राही अंग पाए जाते हैं –
(1) पीड़ा ग्राही (Pain receptor) – त्वचा की एपीडर्मल कोशिकाओं के बीच में पाए जाने वाले डेन्ड्राइटल यांत्रिक, रासायनिक तापीय एवं विद्युतीय उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया प्रदर्शित करते हैं। ये समस्त शरीर में फैले रहते हैं।

(2) स्पर्शग्राही (Tactoreceptor) – त्वचा की एपीडर्मिस के ठीक नीचे डर्मिस में स्पर्श प्राही उपस्थित होते हैं। इनमें तान्त्रिक सूत्र के अन्तिम सिरे बहुत सी शाखाओं में विभाजित हो जाते हैं। संयोजी ऊतक इनके चारों ओर एक सम्पुट जैसी संरचना बनाता है। ये एपीडर्मिस के मैल्पीपियन स्तर में छोटे-छोटे उभार से बना लेते हैं। इनको मीसनर्स कणिकाएँ (Meissner’s corpuscles) कहते हैं। इनके अतिरिक्त त्वचा में मक्केल्स बिम्ब (Merckel’s dise) भी होते हैं।

(3) दबावग्राही (Pressure receptor)-ये त्वचा की डर्मिस में अधिक गहराई पर स्थित होते हैं। इनमें अशाखित तंत्रिका सूत्र के चारों ओर संयोजी ऊतक की कई परतें सम्पुट बनाती हैं। इन्हें पोसीनियन कणिका (Pocinian corpuscles) कहते हैं।
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(4) ऊष्माग्राही (Heat receptor) – ये त्वचा की एपीर्डर्मिस के ठीक नीचे स्थित होते हैं और बहुशाखित तंत्रिका सूत्रों के बने होते हैं। ये बल्ब के समान दिखाई देते हैं। इन्हें क्राउस के अन्त बर्ब (end bulb of Krause) कहते हैं।

(5) शीतग्राही (Cold receptor)- ये भी एपीडर्मिल के नीचे स्थित होते हैं। इनके तंत्रिका सूत्र शाखित नहीं होते हैं । ये सर्दी के उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया करते हैं। इन्हें रुफिनी के शीर्ष अंग (Ruffinis end organs) कहते हैं।

स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomic Nervous System):
स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomic nervous system) अन्तरांगों की क्रिया का नियमन एवं नियन्त्रण करता है। यह हृदय (heart), रुधिर वाहिनियों (blood vessels), आमाशय (stomach), गर्भाशय (uterus), मूत्राशय (urinary bladder), वृक्क (kidney), फेफड़ों (lungs), स्वेद प्रन्थियों (sweat glands), यकृत (liver), अग्याशय (pancreas), विशिष्ट अन्न:स्रावी प्रन्थियों (endocrine glands) तथा अन्य अंगों की सक्रियता का नियन्न्रण करत्र है। इन अंगों की क्रियाएँ हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करती हैं।
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संरचना व कार्यिकी के आधार पर स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र दो प्रकार का होता है –
(1) अनुकम्पी या सिम्पैथेटिक तन्त्रिका तन्त्र (Sympathetic Nervous System)- यह मेरुरज्जु (spinal cord) के वक्ष (thoracic) तथा कटि प्रदेश (lumbar region) के धूसर द्रव्य से निकलती है। अनुकम्पी गुच्छिकाओं के 22 जोड़े पाये जाते हैं।

(2) परानुकम्पी य्र पैरासिम्पथेटिक तन्त्रिका तन्त्र (Parasympathetic Nervous System)- परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र मस्तिष्क से निकलने वाली III, VII, IX एवं X कपालीय तथा मेरुरज्जु की II, III तथा IV तन्त्रिकाओं में उपस्थित तन्तुओं से बना होता है। इस तन्त्र को कपाल त्रिक् अर्थात क्रेनियो-सेक्रल बहिर्गमन (Cranio-Sacral Outflow) भीं कहते हैं। इस तन्त्र द्वारा ऐसी सभी क्रियाओं को सन्तुलन में रखा जाता है, जिससे शरीर का आन्तरिक वातावरण अखण्ड बना रहे। इस तन्त्र में अनुकम्पी (sympathetic) तथा परानुकम्पी (parasympathetic) तन्त्र एक-दूसरे के विपरीत प्रभाव दर्शाते हुए कार्य करते हैं।

जैसे –

  1. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र नेत्रों की पुतली को फैलाता है तथा परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पुतली को सिकोड़ता है।
  2. परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र अश्रु स्रावण को कम करता है, परन्तु अनुकम्पी तन्त्रिका अश्रु स्वावण को उत्तेजित करता है।
  3. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र के प्रभाव से लार स्रावण में कमी आती है, जबकि परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र लार स्रावण को उत्तेजित करता है।
  4. हृदय स्पन्दन अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र के प्रभाव से बढ़ता है तथा परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र हृदय स्पन्दन की दर में कमी लाता है।
  5. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र फेफड़ों तथा वायुनाल का फैलाव करता है, जबकि परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र इनको सिकोड़ता है।
  6. अनुकम्पी तन्त्र रुधिर वाहिनियों को सिकोड़कर रक्त दाब बढ़ाता है तथा परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र रुधिर वाहिनियों का वितरण कर रक्त दाब घटाता है।
  7. परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र आहारनाल की क्रमाकुंचन गति को बढ़ाता है, जबकि अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पेशियों में शिथिलन करके गति की दर को कम करता है।
  8. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र अधिवृक्क ग्रन्थि (Adrenal gland) के स्रावण को बढ़ाता है, जबकि परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र स्रावण में कमी लाता है।
  9. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पसीने के स्रावण को बढ़ाता है, परन्तु परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पसीने के स्रावण को कम करता है।
  10. पेशियों के संकुचन से अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र रोमों (hair) को खड़ा करता है, परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पेशियों में शिथिलन उत्पन्न करके बालों को गिराता है।

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तालिका : अनुकंपी तथा परानुकंपी तन्त्रिका तंत्रों में संरचनात्मक अंतर –

अनुकंपी तन्रिका तंत्र(Sympathetic nervous system)परानुकंपी तन्रिका तंत्र (Parasympathetic nervous system)
इसमें अनुकंपी तन्त्रिका तन्त्र तथा प्रिबर्टिबल गुच्छक होते हैं।इसमें अंतस्थ गुच्छक होते हैं।
गेनिलया या गुच्छक केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के समीप किन्तु विसरल कार्य कर होते हैं।गैंग्लिया विसरल कार्य करों के निकट या भीतर होते हैं।
प्रत्येक प्रिगैंग्लिओनिक हेतु अनेक पोस्ट गैंग्लिओनिक न्यूरॉन से सिनैप्स करता है तथा ये विसरल कार्यकारी हो जाते हैं।प्रत्येक प्रिर्गैंग्लिनिक तंतु एक ही विसरल कार्यकर को जाने वाले चार या पाँच पोस्ट गैंग्लिओनिक न्यूरॉन से सिनैप्स करता है।
यह समस्त शरीर एवं त्वचा पर फैला रहता है।इसका वितरण केवल सिर तथा वक्ष, उदर एवं श्रोणि प्रदेश के आंतरांगों तक सीमित होतां है।

तालिका : अनुकंपी एवं परानुकम्पी तन्त्रिका तंत्र के कार्यों में अन्तर (Difference between Functions of Sympathetic and Parasympathetic Nervous System)

आन्तरांगों के नाम (Name of Internal organs)अनुकम्पी तन्न के कार्य (Sympathetic System)परानुकम्पी तन्न्र के कार्य (Parasympa-thetic System)
1. समस्त शरीरक्रोध, भय तथा पीड़ा का अनुभव कराना।शारीरिक आराम व सुख की स्थितियाँ उत्पन्न करना। पुतलियों को संकुचित करता है।
2. नेत्रों की पुतलियाँपुतलियों को फैलाता है।अश्रुस्राव को कम करता है।
3. अश्रु ग्रन्थियाँअश्रुसाव में वृद्धि करता है।लार के स्राव में वृद्धि करता है।
4. लार प्रन्थियाँलार के स्राव को कम करता है।पसीने के स्राव को कम करता है।
5. स्वेद प्रन्थियाँपसीने के स्राव को बढ़ाता है।साधारण श्वसन क्रिया में इन अंगों को संकुचित करता है।
6. फेफड़े, वायुनाल तथा श्वसनीअधिकाधिक एवं सुगम श्वसन हेतु इन अंगों को प्रसारित करता है।इसकी स्पंदन दर को कम करता है।
7. हुदयइसकी स्पंदन दर को बढ़ाता है।धमनियों की गुहा को फैलाकर रुधिर दाब को कम करता है।
8. रुधिर वाहिनियाँधमनियों की गुहा को संकुचित करता है जिससे रुधर दाब बढ़ जाता है।क्रमाकुंचन गति की दर को बढ़ाता है।
9. आहारनालपेशियों का शिथिलन करके क्रमाकुंचन गतियों को कम करता है। इनके स्राव को कम करता है तथा रक्त में ग्लूकोज की मात्रा में वृद्धि करता है।इन्सुलिन के स्नाव को उत्तेजित करके रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को नियन्त्रित करता है।
10. यकृत एवं अग्याशयइसके हॉर्मोन्स स्राव को उत्तेजित करता है।इसके हॉर्मोन्स स्राव को कम करता है।
11. अधिवृक्क ग्रन्थिइसकी पेशियों को शिथिल करता है।इसकी पेशियों का संकुचित करता है।
12. मूत्राशयइन पेशियों को सिकोड़कर गुदा (मलद्वार) को बन्द करता है।इन पेशियों को शिथिल करके गुदा को खोलता है।
13. गुदा संकोचक पेशीइन्हें सिकोड़कर रोमों (बालों) को खड़ा करता है।इन्हें शिथिल करके रोमों को गिराता है।
14. रोमों की पेशियाँइन्हें उत्तेजित होने से रोकता है।इन्हें उत्तेजित करता है।
15. बाह्य जननांगऊर्जा व्यय एवं वातावरण की प्रतिकूल दशाओं में शरीर की सुरक्षा करता है।ऊर्जा संरक्षण में सहायता करता है।
16. ऊर्जाअनुकम्पी तन्न के कार्य (Sympathetic System)परानुकम्पी तन्न्र के कार्य (Parasympa-thetic System)

प्रश्न 6.
अकशेरुकी प्राणियों में तत्रिकीय समन्वय समझाइए।
उत्तर:
अकशेरुकी प्राणियों में तंत्रिका समन्वय (Nervous Coordination in Invertebrates):
1. प्रोटोजोअन्स तथा पोरीफेरा में तंत्रिका तंत्र का अभाव होता है। ये प्राणी उद्दीपनों (stimuli) के प्रति प्रतिक्रिया हेतु प्लाज्मा कला की उत्तेजनशीलता तथा उसके कोशिकीय सतह के पार संचलित होने पर आश्रित होते हैं। तंत्रिका तंत्र का उद्भव संघ सीलेन्ट्रेटा या नीडेरिया (हाइड्रा) से माना गया है। ये तंत्रिकाएँ बाह्यचर्म तथा जठरचर्म (gastodermis) के मध्य परस्पर जुड़कर एक तंत्रिका जाल का निर्माण करती हैं। ये सभी तंत्रिका कोशिकाएँ तंत्रिका आवेग का संचरण केन्द्र से सभी दिशा में करती हैं। इन कोशिकाओं के बीच-बीच युग्मानुबंधन (synapsis) भी पाया जाता है। हाइड्रा में तंत्रिका जाल तो पाया जाता है किन्तु मस्तिष्क का अभाव होता है।
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2. फीताकृमि (Flatworm)-चपटे कृमियों, जैसे-फीताकृमि, यकृतकृमि आदि में तंत्रिका कोशिकाओं के दो अम्र गुच्छिका (ganglia) होते हैं। जिनसे दो पाश्र्वीय अनुदुर्ध्य तंत्रिका रज्जु (lateral longitudinal nerve cords) निकलकर पश्च सिरे तक जाते हैं जिनमें निकली पार्श्व शाखाएँ शरीर के विभिन्न अंगों तक जाती हैं। यहीं से केन्द्रीय तथा परिधीय तंत्रिका तंत्र की शुरुआत हुई। यहीं से रेखीय प्रकार के तंत्रिका तंत्र की उत्पत्ति हुई।

3. गोलकृमि (Roundworm) – गोल कृमियों में भी तंत्रिका तंत्र का प्रारूप चपटे कृमियों के समान ही रहा परन्तु संवेदी या अभिवाही (sensory or afferent) तथा प्रेरक या अपवाही (motor or efferent) तंत्रिका कोशिकाओं के प्रारम्भिक विभेदन का प्रारम्भ प्राणियों के इसी वर्ग से हुआ।

4. केंचुआ (Earthworm) – केंचुए में विकसित प्रकार का तंत्रिका तंत्र पाया जाता है। केंचुए में तंत्रिका रज्जु होती है जो अग्र सिरे से पश्च अन्त तक फैली होती है। इसके तीसरे खण्ड में ग्रसनी भाग के चारों ओर तंत्रिका वलय (nerve ring) पायी जाती हैं जिसकी उत्पत्ति एक जोड़ी अधिग्रसनी गुच्छिका (supra-pharyngeal connective) तथा एक जोड़ी अधोप्रसनी गुच्छिकां (sub-pharyngeal ganglia) से होता है।
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तंत्रिका रज्जु शरीर के प्रत्येक खण्ड में फूलकर गुच्छक (ganglia) का निर्माण करती है। प्रत्येक खण्डीय गुच्छक से तीन जोड़ी पाशर्वीय तंत्रिकाएँ निकलती हैं। इन तंत्रिकाओं में संवेदी तथा प्रेरक दोनों प्रकार के तंत्रिका तंतु पाए जाते हैं। अर्थात् ये मिश्रित प्रकार की होती है।
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5. कोंरोच (Cockroach) – यह संघ आर्थोपोडा का सदस्य है। इसमें निम्न वर्ग के जन्तुओं से अधिक विकसित प्रकार का तंत्रिका तंत्र पाया जाता है। यह केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) में मस्तिक्क तथा अधरीय तंत्रिका रज्जु (ventral nerve cord) से मिलकर बना होता है। मस्तिष्क शीर्ष भाग में पाया जाता है। जिसका निर्माण एक जोड़ी अधिग्रसिका, गुच्छिका, एक जोड़ी अधोमसिका गुच्छिका तथा एक जोड़ी परिमसिका संयोजक के समेकन से होता है। अधरीय तंत्रिका रज्जु पर प्रथम तीन वक्षीय गुच्छक (thoracic ganglia) तथा शेष 6 उदरीय गुच्छक (abdominal ganglia) पाए जाते हैं। इन गुच्छकों से निकली तंत्रिकाएँ शरीर के विभिन्न भागों से जुड़ी होती हैं। वक्षीय व उदरीय गुच्छकों से निकली तंत्रिकाएँ कॉकरोच के परिधीय तंत्रिका तंत्र का निर्माण करती हैं।

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प्रश्न 7.
तंत्रिका आवेग के संचरण की विधि बताइए।
उत्तर:
तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का ध्रुवीकरण (Polarisation of the Nerve fibre Membrane):
तन्त्रिका तन्तु के ऐक्सोप्लाज्म में सोडियम आयन (Na+) की संख्या काफी कम किन्तु ऊतक तरल में लगभग बारह गुना अधिक होती है। ऐक्सोप्लाज्म में पोटेशियम आयन (K+) की संख्या ऊतक तरल की तुलना में लगभग 30 गुना अधिक होती है। विसरण अनुपात के अनुसार Na+ की ऊतक तरल से ऐक्सोप्लाज्म में एवं K+ के ऐक्सोप्लाज्म से ऊतक तरल में विसरित होने की प्रवृत्ति होती है। किन्तु तंत्रिकाच्छद (neurilemma) Na+ के लिए कम तथा K+ के लिए अधिक पारगम्य होती है।

विश्राम अवस्था में ऐक्सोप्लाज्म में – ve आयनों और ऊतक तरल में +ve आयनों का आधिक्य रहता है। तन्त्रिकाच्छद की बाहरी सतह पर +ve आयनों और भीतरी सतह पर ve आयनों का जमाव रहता है। तन्त्रिकाच्छद की बाहरी सतह पर +ve और भीतरी सतह पर 70 mV (मिली वोल्ट) का – ve आवेश रहता है। इस स्थिति में तन्त्रिकाच्छद विद्युत आवेशी या ध्रुवण अवस्था में बनी रहती है। तन्त्रिकाच्छद के इधर-उधर विद्युतावेशी अन्तर के कारण तन्त्रिकाच्छद में बहुत-सी विभव ऊर्जा संचित रहती है। यही ऊर्जा विश्राम कला विभव या सुप्त कला विभव (resting membrane potential ) कहलाती है। इसी ऊर्जा का उपयोग प्रेरणा संचारण में होता है।
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तन्त्रिका तन्तु की झिल्ली का विधुवीकरण (Depolarisation of the Nerve fibre Membrane):
जब तन्त्रिका तन्तु उद्दीपित होता है तो तन्त्रिकाच्छद (न्यूरीलेमा) की पारगम्यता परिवर्तित हो जाती है। यह सोडियम आयन (Na+ ) के लिए अधिक पारगम्य एवं पोटैशियम आयन (K+) के लिए अपारगम्य हो जाती है। इसलिए तन्त्रिका तन्तु विश्राम कला विभव (resting membrane potential) की ऊर्जा का प्रेरणा संचरण के लिए उपयोग करने में सक्षम होते हैं ।

तन्त्रिका तन्तु के उद्दीपित होने पर इसके विश्राम कला विभव की ऊर्जा एक विद्युत प्रेरणा के रूप में तन्तु के क्रियात्मक कला विभव (action membrane potential) या प्रेरण क्षमता में परिवर्तित हो जाती है। यह विद्युत प्रेरणा तन्त्रिकीय प्रेरणा होती है। सोडियम आयन ( Na+) ऐक्सोप्लाज्म में द्रुत गति से प्रवेश करने लगते हैं, इसके परिणामस्वरूप तन्त्रिका तन्तु का विधुवीकरण होने लगता है। विध्रुवीकरण के कारण तन्त्रिकाच्छद की भीतरी सतह पर +ve और बाहरी सतह पर – ve विद्युत आवेश स्थापित हो जाता है। यह स्थिति विश्राम अवस्था के विपरीत होती है।

तंत्रिका तंतु की झिल्ली का पुनर्धुवण (Repolarisation of the Nerve fibre membrane)
तन्त्रिका तन्तु के बाहर + 30 mV विभव पहुँचते ही सोडियम आयनों (Na+) का आवागमन बन्द हो जाता है तथा पोटैशियम आयनों (K+) का आवागमन आरम्भ हो जाता है। सोडियम आयन (Na+) बाहर की ओर तथा पोटैशियम आयन (K+) अन्दर की ओर तेजी से विस्थापित होते हैं। जिससे तन्त्रिका तन्तु कला पुनः अपनी विश्रान्ति अवस्था (polarised stage) में पहुँच जाती है। इस क्रिया को पुनर्धुवण (repolarisation) कहते हैं। इस सम्पूर्ण क्रिया में 1-5 मिली सेकण्ड का समय लगता है।

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इस प्रकार न्यूरॉन पर ध्रुवीकरण, विध्रुवीकरण तथा पुनः ध्रुवीकरण क्रमबद्ध रूप से चलता रहता है और तंत्रिका कोशिका विराम अवस्था (resting stage) में आने के बाद नये आवेग को ग्रहण करने के लिए पुनः तैयार हो जाती है। माइलिन आच्छद युक्त तन्त्रिका कोशिका में आवेग का संचरण अधिक तीव्र गति से होता है, क्योंकि ऐसे न्यूरॉन की वसा युक्त परत जैविक इन्सुलेटर की तरह कार्य कर विद्युत अवरोध उत्पन्न करती है।

ऐसे न्यूरॉन्स पर बीच-बीच में रेनवीयर्स की पर्वसन्धियाँ पायी जाती हैं जिन पर आयन विनियम तथा विध्रुवण की क्रिया भी तेज होती है, फलस्वरूप तन्त्रिका आवेग उछल उछल कर एक पर्वसन्धि से दूसरी पर्वसन्धि पर पहुँचता है। इसलिए आवेग की गति 20 गुना अधिक होती है। इस प्रकार के संचरण को उच्छलित संचरण या साल्टेटोरियल संचरण (Sultatorial conduction) कहते हैं। इस संचरण में ATP ऊर्जा की आवश्यकता भी कम होती है। मनुष्य में तंत्रिका आवेग संचरण की सामान्य दर 100-120 मीटर/सेकण्ड होता है।

प्रश्न 8.
रासायनिक सिनेप्स द्वारा तंत्रिका आवेगों का संवहन किस प्रकार होता है। समझाइए।
उत्तर:
रासायानिक सिनैप्स द्वारा तन्त्रिका आवेगों का संवहन (Transmission of a Nerve Impulse across a Chemical Synapse) तत्रिका तन्त्र एक अविच्छिन्न संचार तन्त (contineous transmission system) होता है। इसकी अरबों पृथक् ज्यूरॉंस्स के प्रत्येक न्यूरॉन का ऐक्सॉन स्वतन्त सिरे पर अनेक नन्हींनन्हीं शाखाओं में बंटा होता है जो समीपवर्ती न्यूरॉॅन्स के साइटॉन और डेन्र्राइड्टस व प्रन्थियों पर फैली रहती हैं। इन शाखाओं के सिरों पर सिनेट्टिक धुष्डियाँ होती हैं। इनके और इनसे सम्बन्धित रचनाओं के मध्य तरल पदार्थ से भरा सिनैट्टिक विद्धर (synaptic buttons) होता है। इस प्रकार के अनेक स्थान होते हैं जिन्हें युग्मानुबन्थन या सिनैभ्सिस (synapses) कहते हैं।
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तन्तिका आवेग का प्रसारण एक तन्त्रिका से दूसरी तन्त्रिका में युम्मानुबन्यन द्वारा होता है जो एक रासायनिक प्रक्रिया है। सिनेप्टिक घुण्डी के नीचे सिनेप्टिक थैलियों में रासायनिक संचारी पदार्थ ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) भरा रहता है, जो प्रेरणा को सिनेष्टिक विद्धर के पार ले जाता है। जैसे ही प्रेरणा ऐक्सॉन से होकर सिनेष्टिक घुण्डी में पहुँचती है, Ca+ आयन ऊतक द्रव्य से घुण्डी में प्रसारित होते हैं, जिनके प्रभाव से ऐसीटिलकोलीन मुक्त होकर पश्च सिनेष्टिक न्युरॉन की कला की पारगम्यता को प्रभावित करके प्रेरणा का पुन: विद्युत सम्प्रेषण प्रेरित करता है। इसके बाद सिनेष्टिक क्दिर में उपस्थित एन्जाइम ऐसीटिलकोलीन का विघटन कर देता है। इसलिए प्रेरणा का संचारण एक दिशात्मक होता है ।

(ऐक्सान → नन्हीं शाखाएँ → टीलोडेन्ड्रिया → सिनैप्टिक घुण्डी → युग्मानुबन्धन (सिनैप्सिस) → डेन्ड्राइट → दूसरा न्यूरॉन)। अधिकांश तन्जिका कोशिकाएँ (न्यूरॉन्स) संवेदी और चालक होती हैं। संवेदी तन्तिकाएँ प्रेरणाओं को संवेदी अंगों से केन्द्रीय तन्त्रिका तन्न्र में ले जाती हैं और चालक तन्त्रिकाएँ प्रेरणाओं को केन्र्रीय तन्तिका तन्त्र से प्रतिक्रिया करने वाले क्रियात्मक अंगों में पहँचाती हैं जो उद्दीपनों के अनसार शरीर की प्रतिक्रियाओं को सम्पादित करते हैं।

तालिका-रासायनिक युग्मानुबंधन तथा विध्युतीय युग्मानुबंधन में अन्तर (Difference between Chemical Synapse and electric synapse)

लक्षणरासायनिक युगमानुबंधनविद्युतीय युग्मानुबंधन
सूचना स्थानान्तरण का माध्यमन्यूरोट्रांसमीटर एवं रसायन ग्राही होते हैंविद्युत आयन तथा सक्रिय विभव होते हैं।
सिनैप्टिक विदर10-20 नैनोमीटर होता है।0.2 नैनोमीटर होता है।
सिनैप्टिक पुटिकाउपस्थित होती है।अनुपस्थित होती है।
माइटोकॉन्ड्रियाअत्यधिक होते हैं।कम होते हैं।
रसायनम्राहीपश्च सिनैप्टिक कला पर।अनुपस्थित होते हैं।
गतिमध्यम होती है।तीव होती है।

तंत्रिका आवेग की विशेषताएँ (Characteristics of Nerve Impulse):

  1. तंत्रिका आवेग भौतिक व रासायनिक क्रियाओं द्वारा सम्पन्न होने वाली एक जटिल प्रक्रिया है।
  2. तंत्रिका आवेग के प्रारम्भन एवं संचरण के लिए एक न्यूनतम उद्दीपन की आवश्यकता होती है जिसे देहली उद्दीपन (threshold stimulus) कहते हैं।
  3. तंत्रिका आवेग का संचरण जैव विद्युतीय व जैव रासायनिक विभिन्नताओं के कारण संचरित होता है।
  4. तंत्रिका आवेग का संचरण संपूर्ण अथवा बिल्कुल नहीं (All or None) के नियम का पालन करता है। अर्थात् आवेग संचरण या तो पूर्ण शक्ति से होता है या फिर प्रारम्भ ही नहीं होता है।
  5. एक युग्मानुबंधन (synapse) के बाद दूसरे युग्मानुबंधन की क्रिया तंत्र तक स्थगित रहती है जब तक कि एक्सोन की अन्तिम घुंडी में न्यूरोट्रांसमीटर्स एकत्रित हो जाए। इस अंतराल को सिनैप्टिक धकान (synaptic fatigue) कहा जाता है।
  6. दो तंत्रिका आवेगों के मध्य निश्चित समयान्तराल होता है। यदि पहले आवेग के तुरंत बाद कोई अन्य प्रभावी आवेग न आ जाए तो वे संयुक्त हो जाते हैं इसे समेशन (Summation) कहते हैं।
  7. तंत्रिका आवेग की दर मनुष्य में 100-120 m/s होती है जबकि मेढ़क में यह 50-70 m/s होती है।

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प्रश्न 9.
मनुष्य के मध्य मस्तिक्क की संरचना बताइए।
उत्तर:
मध्य मस्तिष्क (Mid brain or Mesencephalon):
यह मस्तिष्क का अपेक्षाकृत छोटा भाग है जो डाइऐनसेफेलॉन के पीछे, प्रमस्तिष्क के नीचे तथा पश्च-मस्तिष्क के ऊपर स्थित होता है। इसकी गुहा अत्यधिक संकरी होती है, जिसे आइटर (Iter) अथवा सिल्वियस की एक्वीडक्ट (Aqueduct or sylvius) कहते हैं।

मध्य मस्तिष्क को दो भागों में बाँटा जा सकता है –
(a) प्रमस्तिष्क वृन्तक या सेरिब्रल पिडंकल या क्रूरा सेरिब्राइ (Cerebral Peduncles or Crura Cerebri)-ये अधर सतह पर माइलिनेटेड (myelinated) तन्त्रिका तन्तुओं से बने डण्ठलनुमा वृन्त हैं। ये प्रमस्तिष्क (cerebrum) को पश्चमस्तिष्क तथा मेरुरज्जु (spinal cord) से जोड़ते हैं।

(b) पिण्ड चतुष्ट्रि या कॉर्पोरा क्वाड्रीजेमिना (Corpora Quadrigemina)-ऐक्वीडक्ट (Aqueduct) के पीछे कुछ भाग धूसर पदार्थ के चार गोल से उभारों का बना होता है। प्रत्येक उभार को कोलिकुलस (Colliculus) कहते हैं तथा चारों उभारों को सम्मिलित रूप से कोर्पोरा क्वाड़रजेमिना या पिण्ड चतुष्टि (Corpora Quadrigemina) कहते हैं। मध्य मस्तिष्क के ऊपरी दृढ़ पिण्ड (Superior caolliculi) दृष्टि से संबंधित प्रतिवर्ती केन्द्र हैं जबकि निचले दृक् पिण्ड (Inferior colliculi) श्रवण संबंधी प्रतिवर्ती केन्द्र है।

प्रश्न 10.
पश्च मस्तिष्क के विभिन्न भागों तथा उनके कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पश्च मस्तिष्क (Hind Brain or Rhombencephalon)
इसमें निम्न तीन प्रमुख भाग होते हैं –
(a) अनुमस्तिष्क (Cerebellum)
(b) पॉन्स (Pons) तथा
(c) मैड्युला ऑब्लोंगेटा (Medulla oblongata)

(a) अनुमस्तिष्क (Crebellum) – यह स्तनधारियों के मस्तिष्क का सबसे अधिक विकसित तथा दूसरा बड़ा भाग है। इसका बाहरी भाग ग्रे मैटर से बना होता है जो अनुमस्तिष्क बल्कुट कहलाता है। अनुमस्तिष्क में तीन पिण्ड पाए जाते हैं। मध्य पिण्ड को वर्मिस (Vermis) कहते हैं। जो श्वेत द्रव्य का बना होता है। इसके दोनों पार्श्व भागों में दो बड़े पार्श्व पिण्ड पाए जाते हैं। जिन्हें अनुमस्तिक्कीय गोलार्ध (Cerebral Hemisphere) कहते हैं।

इन गोलार्धों की बाह्म सतह पर अत्यधिक बलन पाए जाते हैं जिनकी खाँचों में श्वेत द्रव्य से निर्मित संरचनाएँ जुड़कर वृक्ष जैसी रचना बनाती हैं जिसे प्राण वृक्ष (Arbor vitae) कहते हैं। इसकी शाखाएँ धूसर द्रव्य में धँसी होती है। प्रत्येक अनुमस्तिष्क गोलार्ध श्वेत द्रव्य से बना तीन अनुमस्तिष्कीय वृन्तों के द्वारा मस्तिष्क स्तम्भ के भागों क्रमशः मध्य मष्तिस्क, पोन्स व मेड्यूला से जुड़ा रहता है।

ये निम्न प्रकार के होते हैं –

  1. ऊर्ध्व अनुमस्तिष्क वृन्त-अनुमस्तिष्क के मध्य मस्तिष्क से जोड़ता है।
  2. मध्य अनुमस्तिष्क वृन्त-यह अनुमस्तिष्क को पोन्स से जोड़ता है।
  3. अधो अनुमस्तिष्क वृन्त-अनुमस्तिष्क मेड्यूला व मेरुरज्जु से जोड़ता है।

प्रश्न 11.
मानव में पायी जाने वाली विभिन्न कपालीय तंत्रिकाओं के नाम व कार्य लिखिए।
उत्तर:
परिधीय तंत्रिका तंत्र (Peripheral Nervous System):
मस्तिष्क एवं मेरुरज्जु से निकलने वाली तंत्रिकाएँ मिलकर परिधीय तंत्रिका तंत्र बनाती हैं। ये तंत्रिकाएँ दो प्रकार की होती है-
2. कपालीय या क्रेनियल तंत्रिकाएँ (Cranial Nerve) – मस्तिष्क के विभिन्न भागों से निकलने वाली तंत्रिकाओं को कपालीय तंत्रिकाएँ कहते हैं। स्तनियों में 12 जोड़ी कपालीय तंत्रिकाएँ (cranial nerves) पायी जाती हैं, जिनके नाम एवं संख्या निश्चित होते हैं। ये कार्य की प्रकृति के आधार पर तीन प्रकार की होती है –

  1. संवेदी तंत्रिकाएँ (Sensory Nerves) – ये अंगों से संवेदना या उद्दीपनों को मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं। इनकी संख्या 3 जोड़ी होती है। इन्हें प्रथम, द्वितीय तथा 20 वीं तंत्रिकाएँ कहते हैं।
  2. चालक या प्रेरक तंत्रिका (Motor Nerves)-ये संवेदना को केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से अपवाहक अंगों तक पहुँचाती हैं। इनकी संख्या पाँच जोड़ी होती है। जैसे-तीसरी, चौथी, छठी, ग्यारहवीं तथा बारहवीं क्रेनियल तंत्रिकाएँ।
  3. मिश्रित तंत्रिकाएँ (Mixed Nerves)-ये संवेदी तथा प्रेरक दोनों प्रकार के कार्य करती हैं। इनकी संख्या 4 जोड़ी होती है। जैसे—पाचवीं, सातवी, नौवीं तथा 10 वीं जोड़ी की तंत्रिकाएँ।

तालिका : मनुष्य की क्रेनियल तत्रिकाओं का संक्षिप्त विवरण (Brief Descrintion of Human’s Cranial Nerves)
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय - 11

2. मेरु या स्पाइनल तंत्रिकाएँ (Spinal Nerve):
मेरुरज्जु से निकलने वाली तंत्रिकाओं को मेरुतंत्रिकाए या स्पाइनल तंत्रिकाएँ कहते हैं।
मनुष्य में 31 जोड़ी स्पाइनल तंत्रिकाएँ पायी जाती हैं जबकि खरगोश में उन जोड़ी स्पाइनल तंत्रिकाएँ पायी जाती हैं मनुष्य में खरगोश के समान 6 जोड़ी पुच्छ तंत्रिकाएं नहीं पायी जाती हैं। सभी स्पाइनल तंत्रिकाए मिश्रित प्रकार की होती हैं क्योंकि मेरुरज्जु के पृष्ठ श्रंंग से निकलने वाली तंत्रिकाएँ संवेदी व अधर श्रंग से निकलने वाली तंत्रिकाएँ चालक (प्रेरक) प्रकार की होती हैं और दोनों मिलकर संयुक्त तंत्रिका बनाती है, जो मेरुदण्ड (Vertebral column) की कशेरुकाओं की बर्टीबेट्रियल कैनाल से बाहर निकल कर तीन शाखाओं में बंट जाती हैं। ये शाखाएँ हैं-

  1. पृष्ठ शाखा (Ramus dorsales)
  2. अधर शाखा (Ramus ventralis)
  3. संबन्धक शाखा (Ramus communicans)

मनुष्य की मेरु तंत्रिकाओं को पाँच समूहों में बाँटा जा सकता है।

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ये निम्न प्रकार हैं –

  • ग्रीवा या सर्विकल तंत्रिकाएँ (Cervical Nerves)
  • वक्ष या थोरेसिक तंत्रिकाएँ (Thoracic Nerves) -8 जोड़ी (1 से 8)
  • कटि या लम्बर तंत्रिकाएँ (Lumbar Nerves) -12 जोड़ी (9 से 20)
  • त्रिक या सैक्रस तंत्रिकाएँ (Sacral Nerves) -5 जोड़ी (21 से 25)
  • पुच्छी या कोकजियल तंत्रिकाएँ (Coccygeal Nerve) -5 जोड़ी (26 से 30) -1 जोड़ी (31वी)

कायिक तंत्रिका तंत्र (Somatic Nervous System)
यह तंत्रिका तंत्र उद्दीपनों को वातावरण से ग्रहण कर शरीर के केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से अनैच्छिक अंगों व चिकनी अरेखित पेशियों तक पहुँचाता है।
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प्रश्न 12.
स्वायन्त तंत्रिका तंत्र से आप क्या समझते हैं ? इसके कार्य लिखिए।
उत्तर:
स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomic Nervous System)
स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomic nervous system) अन्तरांगों की क्रिया का नियमन एवं नियन्त्रण करता है। यह हृदय (heart), रुधिर वाहिनियों (blood vessels), आमाशय (stomach), गर्भाशय (uterus), मूत्राशय (urinary bladder), वृक्क (kidney), फेफड़ों (lungs), स्वेद प्रन्थियों (sweat glands), यकृत (liver), अग्याशय (pancreas), विशिष्ट अन्न:स्रावी प्रन्थियों (endocrine glands) तथा अन्य अंगों की सक्रियता का नियन्न्रण करत्र है। इन अंगों की क्रियाएँ हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करती हैं।
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संरचना व कार्यिकी के आधार पर स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र दो प्रकार का होता है-
(1) अनुकम्पी या सिम्पैथेटिक तन्त्रिका तन्त्र (Sympathetic Nervous System)- यह मेरुरज्जु (spinal cord) के वक्ष (thoracic) तथा कटि प्रदेश (lumbar region) के धूसर द्रव्य से निकलती है। अनुकम्पी गुच्छिकाओं के 22 जोड़े पाये जाते हैं।

(2) परानुकम्पी य्र पैरासिम्पथेटिक तन्त्रिका तन्त्र (Parasympathetic Nervous System)- परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र मस्तिष्क से निकलने वाली III, VII, IX एवं X कपालीय तथा मेरुरज्जु की II, III तथा IV तन्त्रिकाओं में उपस्थित तन्तुओं से बना होता है। इस तन्त्र को कपाल त्रिक् अर्थात क्रेनियो-सेक्रल बहिर्गमन (Cranio-Sacral Outflow) भीं कहते हैं। इस तन्त्र द्वारा ऐसी सभी क्रियाओं को सन्तुलन में रखा जाता है, जिससे शरीर का आन्तरिक वातावरण अखण्ड बना रहे। इस तन्त्र में अनुकम्पी (sympathetic) तथा परानुकम्पी (parasympathetic) तन्त्र एक-दूसरे के विपरीत प्रभाव दर्शाते हुए कार्य करते हैं।

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जैसे –

  1. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र नेत्रों की पुतली को फैलाता है तथा परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पुतली को सिकोड़ता है।
  2. परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र अश्रु स्रावण को कम करता है, परन्तु अनुकम्पी तन्त्रिका अश्रु स्वावण को उत्तेजित करता है।
  3. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र के प्रभाव से लार स्रावण में कमी आती है, जबकि परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र लार स्रावण को उत्तेजित करता है।
  4. हृदय स्पन्दन अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र के प्रभाव से बढ़ता है तथा परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र हृदय स्पन्दन की दर में कमी लाता है।
  5. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र फेफड़ों तथा वायुनाल का फैलाव करता है, जबकि परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र इनको सिकोड़ता है।
  6. अनुकम्पी तन्त्र रुधिर वाहिनियों को सिकोड़कर रक्त दाब बढ़ाता है तथा परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र रुधिर वाहिनियों का वितरण कर रक्त दाब घटाता है।
  7. परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र आहारनाल की क्रमाकुंचन गति को बढ़ाता है, जबकि अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पेशियों में शिथिलन करके गति की दर को कम करता है।
  8. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र अधिवृक्क ग्रन्थि (Adrenal gland) के स्रावण को बढ़ाता है, जबकि परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र स्रावण में कमी लाता है।
  9. अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पसीने के स्रावण को बढ़ाता है, परन्तु परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पसीने के स्रावण को कम करता है।
  10. पेशियों के संकुचन से अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र रोमों (hair) को खड़ा करता है, परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र पेशियों में शिथिलन उत्पन्न करके बालों को गिराता है।

तालिका : अनुकंपी तथा परानुकंपी तन्त्रिका तंत्रों में संरचनात्मक अंतर –

अनुकंपी तन्रिका तंत्र(Sympathetic nervous system)परानुकंपी तन्रिका तंत्र (Parasympathetic nervous system)
इसमें अनुकंपी तन्त्रिका तन्त्र तथा प्रिबर्टिबल गुच्छक होते हैं।इसमें अंतस्थ गुच्छक होते हैं।
गेनिलया या गुच्छक केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के समीप किन्तु विसरल कार्य कर होते हैं।गैंग्लिया विसरल कार्य करों के निकट या भीतर होते हैं।
प्रत्येक प्रिगैंग्लिओनिक हेतु अनेक पोस्ट गैंग्लिओनिक न्यूरॉन से सिनैप्स करता है तथा ये विसरल कार्यकारी हो जाते हैं।प्रत्येक प्रिर्गैंग्लिनिक तंतु एक ही विसरल कार्यकर को जाने वाले चार या पाँच पोस्ट गैंग्लिओनिक न्यूरॉन से सिनैप्स करता है।
यह समस्त शरीर एवं त्वचा पर फैला रहता है।इसका वितरण केवल सिर तथा वक्ष, उदर एवं श्रोणि प्रदेश के आंतरांगों तक सीमित होतां है।

तालिका : अनुकंपी एवं परानुकम्पी तन्त्रिका तंत्र के कार्यों में अन्तर (Difference between Functions of Sympathetic and Parasympathetic Nervous System)

आन्तरांगों के नाम (Name of Internal organs)अनुकम्पी तन्न के कार्य (Sympathetic System)परानुकम्पी तन्न्र के कार्य (Parasympa-thetic System)
1. समस्त शरीरक्रोध, भय तथा पीड़ा का अनुभव कराना।शारीरिक आराम व सुख की स्थितियाँ उत्पन्न करना। पुतलियों को संकुचित करता है।
2. नेत्रों की पुतलियाँपुतलियों को फैलाता है।अश्रुस्राव को कम करता है।
3. अश्रु ग्रन्थियाँअश्रुसाव में वृद्धि करता है।लार के स्राव में वृद्धि करता है।
4. लार प्रन्थियाँलार के स्राव को कम करता है।पसीने के स्राव को कम करता है।
5. स्वेद प्रन्थियाँपसीने के स्राव को बढ़ाता है।साधारण श्वसन क्रिया में इन अंगों को संकुचित करता है।
6. फेफड़े, वायुनाल तथा श्वसनीअधिकाधिक एवं सुगम श्वसन हेतु इन अंगों को प्रसारित करता है।इसकी स्पंदन दर को कम करता है।
7. हुदयइसकी स्पंदन दर को बढ़ाता है।धमनियों की गुहा को फैलाकर रुधिर दाब को कम करता है।
8. रुधिर वाहिनियाँधमनियों की गुहा को संकुचित करता है जिससे रुधर दाब बढ़ जाता है।क्रमाकुंचन गति की दर को बढ़ाता है।
9. आहारनालपेशियों का शिथिलन करके क्रमाकुंचन गतियों को कम करता है। इनके स्राव को कम करता है तथा रक्त में ग्लूकोज की मात्रा में वृद्धि करता है।इन्सुलिन के स्नाव को उत्तेजित करके रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को नियन्त्रित करता है।
10. यकृत एवं अग्याशयइसके हॉर्मोन्स स्राव को उत्तेजित करता है।इसके हॉर्मोन्स स्राव को कम करता है।
11. अधिवृक्क ग्रन्थिइसकी पेशियों को शिथिल करता है।इसकी पेशियों का संकुचित करता है।
12. मूत्राशयइन पेशियों को सिकोड़कर गुदा (मलद्वार) को बन्द करता है।इन पेशियों को शिथिल करके गुदा को खोलता है।
13. गुदा संकोचक पेशीइन्हें सिकोड़कर रोमों (बालों) को खड़ा करता है।इन्हें शिथिल करके रोमों को गिराता है।
14. रोमों की पेशियाँइन्हें उत्तेजित होने से रोकता है।इन्हें उत्तेजित करता है।
15. बाह्य जननांगऊर्जा व्यय एवं वातावरण की प्रतिकूल दशाओं में शरीर की सुरक्षा करता है।ऊर्जा संरक्षण में सहायता करता है।
16. ऊर्जाअनुकम्पी तन्न के कार्य (Sympathetic System)परानुकम्पी तन्न्र के कार्य (Parasympa-thetic System)

प्रश्न 13.
अनुकम्पी तथा परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र में भेद्द कीजिए।
उत्तर:
प्रकाश संवेदांग-नेत्र (Photoreceptor-Eye):
स्तनियों में एक जोड़ी नेत्र सिर पर पृष्ठ पार्श्व में स्थित होते हैं। ये गोलाकार व कुछकुछ गेंद सरीखे होते हैं। ये खोपड़ी के मध्य भाग में. अस्थिल गड्ढों में स्थित होते हैं। इन गड़ों को नेत्र कोटर (orbits) कहते हैं। आँख का लगभग 4 / 5 भाग नेत्र मोटर में धँसा रहता है। नेत्र गोलक के इस उभरे हुए भाग को कार्निया (cornea) कहते हैं। प्रत्येक भाग के साथ पलकें तथा कुछ म्रन्थियाँ भी होती हैं।

1. नेत्र पलकें (Eye lids) – दोनों नेत्रों पर त्वचा के वलन से बनी दो गतिशील पलके (eyelids) पायी जाती हैं जो नेत्र गोलक को सुरक्षा प्रदान करती हैं। जिनके किनारे पर लम्बे रोम उपस्थित होते हैं, जिन्हें बरौनियाँ (eye lashes) कहते हैं। ये धूल व मिट्टी के कणों को नेत्र में जाने से रोकती हैं। इनके अतिरिक्त नेत्र गोलक के अन्दर की ओर एक पेशीविहीन पलक और पायी जाती है जिसे निमेषक पटल या निक्टेटिंग झिल्ली (nictitating membrane) कहते हैं। खरगोश में यह समय-समय पर कॉनिर्या पर फैलकर उसे साफ करने का कार्य करती है। मनुष्य में यह एक अवशेषी अंग (vestigeal organ) के रूप में पायी जाती है। इसे पलीका सेमीन्यूलेरिस (Plica seminularis) भी कहते हैं।

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2. नेत्र श्रन्धियाँ (Eye Glands) – स्तनधारियों के नेत्रों में निम्नलिखित नेत्र प्रन्थियाँ पायी जाती हैं –
(i) माइबोमियन प्रन्बियाँ (Meibomian glands) – ये सिबेसियस ग्रन्थियों का रूपान्तरण होती हैं जो कि पलकों के किनारों पर समकोण पर लगी होती हैं। इनका स्नाव कॉर्निया को नम तथा चिकना बनाता है तथा आँसुओं को सीधे गाल पर गिरने से रोकता है।

(ii) जाइस की ग्रन्थियाँ (Zeis’s glands) – ये रूपान्तरित सिबेसियस (तेल) ग्रन्थियाँ होती हैं जो बरोनियों की पुटिकाओं में पायी जाती हैं। ये कोर्निया को चिकना बनाती हैं।

(iii) हारडिरियन ग्रन्थियाँ (Harderian glands) – ये ग्रन्थियाँ मानव में अनुपस्थित होती हैं परन्तु क्छेल, चूहों व छछुन्दरों में पायी जाती हैं। ये निमेषक झिल्ली को चिकना व नम बनाती हैं।

(iv) अश्रुप्रन्थियाँ (Lachrymal glands) -ये आँख के बाहरी कोण पर स्थित होती है और जल सदृश द्रव स्नावित करती हैं। गैस, धुआँ धूल या तिनका आदि आँख में गिर जाने पर अथवा बहुत भावुक हो उठने पर इन ग्रन्थियों के स्राव से आँखें गीली हो जाती हैं जिन्हें अश्रु कहते हैं। ऊपरी पलक के झपकने से ये स्राव पूरी आँख में फैल जाता है और धूल आदि कण घुल जाते हैं। जन्म के लगभग चार माह बाद मानव शिशु में अश्रु ग्रन्थियाँ सक्रिय होती हैं।
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3. नेत्र कोटर की पेशियाँ (Eye Muscles) – नेत्र कोटर में नेत्र गोलक को इधर-उधर घुमाने के लिये छः नेत्र पेशी समूह पाये जाते हैं जिनमें चार रेक्टस पेशियाँ व दो तिरछी (oblique) पेशियाँ होती हैं।

  1. बाह्य या पार्श्व रैक्टस पेशी (External or lateral rectus muscle) – ये नेत्र गोलक को नेत्र कोटर से बाहर की ओर लाती हैं।
  2. अन्त या मध्य रैक्टस पेशी (Internal or medial rectus muscle)- ये नेत्र गोलक को अन्दर की ओर ले जाती हैं।
  3. उत्तर रेक्टस पेशी (Superior Rectus Muscle)-ये नेत्र गोलक को ऊपर की ओर गति कराती हैं।
  4. अधो रेक्टस पेशी (Inferior Rectus Muscle)-ये नेत्र गोलक को नीचे की ओर गति कराती हैं।
  5. उत्तर तिरछी पेशी (Superior oblique muscle) – ये नेत्र गोलक को नीचे की ओर व बाहर की तरफ खींचती हैं।
  6. अधो तिरछी पेशी (Inferior oblique muscle) – ये नेत्र गोलक को ऊपर की ओर व बाहर की तंरफ खींचती हैं।

इन सभी पेशियों की लम्बाई स्थिर होती है। यदि कोई पेशी छोटी या बड़ी हो जाये तो नेत्र गोलक की स्थिति बिगड़ जाती है और वह एक ओर झुका हुआ सा दिखाई देता है, इससे बेंगापन (Squint or strabismus) उत्पन्न हो जाता है।

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4. कंजैक्टिवा (Conjuctiva) – नेत्र की दोनों पलकों की आन्तरिक अधिचर्म अन्दर की ओर कॉर्निया पर फैलकर एक पतले व पारदर्शी स्तर का निर्माण करती है। यह कंजैक्टिवा कहलाती है। यह अधिचर्म शरीर की सबसे पतली अधिचर्म होती है। यह पारदर्शी होती है।
नेत्रगोलक की आन्तरिक संरचना (Internal structure of Eye ball)-कॉर्निया को छोड़कर शेष नेत्र गोलक की दीवार में तीन स्तर होते हैं –
(1) श्वेत पटल या स्केलरा या स्क्लेरोटिक (Sclerotic) – यह सबसे बाहरी स्तर होता है। नेत्र गोलक (Eye ball) का बाहरी उभरा हुआ पारदर्शक भाग कॉर्निया कहलाता है। यह दृढ़ तन्तुमय संयोजी ऊतकों का बना होता है। यह नेत्र गोलक का आकार बनाये रखता है।

(2) रक्तक पटल या कोरॉयड (Choroid) – यह कोमल संयोजी ऊतकों का बना नेत्र गोलक का मध्य स्तर है। इसकी कोशिकाओं में रंग कणिकाएँ होती हैं, इनके कारण ही आँखों में रंग दिखायी देता है। इस स्तर में रक्त केशिकाओं का सघन जाल पाया जाता है। नेत्र के अगले भाग में यह निम्नलिखित रचनाएँ बनाता है –

(अ) उपतारा या आइरिस (Iris)-कॉर्निया के आधार पर यह भीतर की ओर गोल रंगीन पर्दा बनाता है जिसे उपतारा या आइरिस (Iris) कहते हैं। आइरिस के बीचोंबीच में एक छिद्र होता है, इसको पुतली या तारा (Pupil) कहते हैं। आइरिस पर अरेखित अरीय प्रसारी पेशियाँ फैली रहती हैं जिसके संकुचन से पुतली का व्यास बढ़ता है तथा वर्तुल स्फिक्टर पेशियाँ संकुचन द्वारा पुतलीक के व्यास को कम करती हैं।

(ब) सिलियरी काय (Ciliary body)-रक्तक पटल के आइरिस का भीतरी भाग कुछ मोटा होता है। यह सिलियरी बॉडी कहलाता है। सिलियरी काय संकुचनशील होता है। इससे अनेक महीन एवं लचीले निलम्बन रज्जु निकलते हैं, जो लेन्स (lens) से संलग्न रहते हैं।

(3) मूर्तिपटल या दृष्ट्पिपटल या रेटिना (Retina) – यह नेत्र गोलक का सबसे भीतरी स्तर होता है। यह पतला कोमल संवेदी स्तर होता है। इसमें तन्न्रिका सूत्र, संयोजी ऊतक व वर्णक कोशिकाएँ पायी जाती हैं। दृष्टिपटल में दो स्तर होते हैं-

(अ) वर्णकी स्तर (Pigment layer) – यह स्तर चपटी एवं कणिका युक्त एपीथिलियमी कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है।

(ब) तन्न्रिका संवेदी स्तर (Neuro Sensory layer) – यह वर्णकी स्तर के ठीक नीचे स्थित होता है जो कि दृष्टि शलाका (rods) तथा दृष्टि शंकु (cones) से बनी होती है। दृष्टि शलाका लम्बी कोशिकाएँ होती हैं जो अन्धकार तथा प्रकाश में भेद करती हैं तथा दृष्टि शंकु छोटी तथा मोटी कोशिकाएँ होती हैं, जिनके द्वारा रंगों की पहचान होती है। ये द्विध्रुवीय (bipolar) तन्त्रिका कोशिकाओं से जुड़े रहते हैं।
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द्विध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाओं के तत्रिकार्ष (axons) लम्बे होते हैं, जो आपस में मिलकर दृष्टि तन्रिका (optic nerve) बनाते हैं, जो दृष्टि छिद्र से निकलकर मस्तिष्क को जाती है। दृष्टि तन्त्रिका के बाहर निकलने वाले स्थान पर प्रतिबिम्ब नहीं बनता है, इसे अन्ध बिन्दु (blind spot) कहते हैं। इससे थोड़ा ऊपर पीत बिन्दु (yellow spot) होता है। जहाँ वस्तु का प्रतिबिम्ब सबसे स्पष्ट बनता है। इस बिन्दु का रंग पीला-सा होता है। पीत बिन्दु को मैक्यूला ल्यूटिया (Macula lutea) भी कहते हैं। इसके केन्द्र में एक गर्त होता है जिसे फोविया सेट्रेलिस (Fovea centralis) कहते हैं। लेन्स (Lens) – उपतारा (pupil) के पीछे नेत्रगोलक (eye ball) की गुहा में एक बड़ा रंगहीन, पारदर्शक एवं उभयोतल (biconvex) लेन्स होता है।

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भागों में विभक्त करता है-
(i) जलीय वेश्म या ऐक्वस चैम्बर (Aquous chamber) – लेन्स (lens) तथा कॉर्निया के बीच स्वच्छ पारदर्शक जल सदृश द्रव भरा रहता है। इसे तेजो जल या ऐक्वस ह्यमर (aquous humor) कहते हैं।

(ii) काचाभ द्रव्य वेश्म या विट्रिस चैम्बर (Vitreous chamber)-लेन्स (lens) तथा रेटिना (retina) के बीच गाढ़ा पारदर्शक जैली सदृश द्रव्य भरा रहता है जिसे काचाभ द्रव्य (vitreous humor) कहते हैं। ये दोनों ही द्रव नेत्र गुहा में निश्चित दबाव बनाये रखते हैं जिससे दृष्टिपटल (retina) तथा अन्य नेत्र पटल अपने यथास्थान बने रहते हैं। रेटिना (Retina) की संरचना दृष्टि पटल (रेटिना) नेत्र गोलक (eye ball) का सबसे भीतरी स्तर है। यह पतला, कोमल संवेदी स्तर होता है। यह कॉर्निया (Cornea) को छोड़कर शेष नेत्र गोलक के तीन-चौथाई भाग में फैला रहता है।

दृष्टि पटल दो प्रमुख स्तरों का बना होता है –
(1) रंगा या वर्णकी स्तर (Pigment layer)-यह रक्तपटल से चिपका एक कोशिकीय स्तर होता है जो सिलीयरी काय एवं आइरिस (Iris) की भीतरी सतह पर भी फैला रहता है लेकिन सिलीयरी काय वाले भाग में रंगा कण नहीं पाये जाते हैं।

(2) तत्त्रिका संवेदी स्तर (Neuro sensory layer)-वर्णकी स्तर के ठीक नीचे भीतर की ओर मोटा और जटिल तन्त्रिका संवेदी स्तर होता है। यह केवल सीलियरी काय तक फैला रहता है। इस भाग में तन्त्रिका एवं संवेदी कोशिकाओं के तीन स्तर होते हैं-

(A) दृक् शलाका एवं शंकु स्तर (Layer of Rods and Cones)-इस स्तर में लम्बी-लम्बी रूपान्तरित तन्त्रिका संवेदी कोशिकाएँ होती हैं। ये वर्णक युक्त कोशिकाएँ होती हैं। इसमें दो प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं-
(i) दृष्टि शलाकाएँ (Rods) – ये पतली, लम्बी तथा बेलनाकार कोशिकाएँ होती हैं। ये संख्या में अधिक होती हैं। इनकी लम्बाई शंकु कोशिकाओं (Cones) से अधिक होती हैं। इनमें रोडोप्सिन (rhodopsin) नामक वर्णक उपस्थित होता है। दृष्टि शलाकाएँ प्रकाश तथा अन्धकार का ज्ञान कराती हैं।

(ii) दृष्टि शंकु (Cones) – ये छोटी, मोटी तथा मुग्दराकार कोशिकाएँ होती हैं। इनके सिरे नुकीले नहीं होते हैं। ये संख्या में अपेक्षाकृत कम होती हैं। इनमें आइडप्सिन (Iodopsin) वर्णक उपस्थित होता है। ये तीव्र प्रकाश में वस्तुओं तथा विभिन्न रंगों का ज्ञान कराती हैं। दृष्टि शलाकाओं तथा शंकुओं के भीतरी सिरों से निकले हुए पतले तन्त्रिका सूत्रों से द्विध्रुवीय (bipolar) तन्त्रिका कोशिकाओं के डेण्ड्राइट्स प्रवर्धों के साथ पुग्मानुबन्धनों द्वारा सम्बन्धित रहते हैं।
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(B) द्विधुवीय तन्त्रिका कोशिका परत (Bipolar neuronic layer) – इस स्तर में अनेक द्विध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ होती हैं। इनके डेण्ड्राइट्स दृष्टि शलाकाओं तथा दृष्टि शंकुओं के एक्मॉन्न के साथ युग्मानुबन्यन बनाते हैं। इस स्तर की तन्त्रिकाएँ गुच्छकीय स्तर की कोशिकाओं से जुड़कर युग्मानुबन्धन (synapse) बनाते हैं।

(C) गुच्छकीय स्तर (Ganglionic layer) – इस स्तर में बड़े आकार की द्विध्रुवीय कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें गुच्छकीय कोशिकाएँ (ganglionic cells) भी कहते हैं। इन कोशिकाओं के तन्तिकाद्ध (axon) लम्बे होते हैं जो परस्पर मिलकर दृष्टि तत्तिका बनाते हैं।

देखने की प्रक्रिया (Process of Vision):
हमारे नेत्र कैमरे के समान कार्य करते हैं। ये प्रकाश की 380 से 760 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य (wavelength) की किरणों की ऊर्जा को ग्रहण करके इसे तन्त्रिका तन्तु के क्रिया विभव में परिवर्तित कर देते हैं।

नेत्र की क्रियाविधि (Working of Eye) – जब उचित आवृत्ति की प्रकाश तरंग कॉनिया पर पड़ती हैं तब कॉर्निया तथा तेजोजल (aqueous humor) प्रकाश किरणों का अपवर्तन (refraction) कर देते हैं। ये किरणें तारे (pupil) से होकर लेन्स (lens) पर पड़ती हैं। लेन्स इनका पूर्ण अपवर्तन कर देता है। इससे रेटिना के पीत बिन्दु पर वस्तु का उल्टा और वास्तविक प्रतिबिम्ब बन जाता है। उपतारा (आइरिस) तारे (पुतली-pupil) को छोटा या बड़ा करके प्रकाश की मात्रा को नियन्त्रित करता है। तेज प्रकाश में तारा सिकुड़ जाता है और कम प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है। कम प्रकाश में तारा फैल जाता है और अधिक प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है।
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नेत्र द्वारा समायोजन (Accommodation by Eye) – सीलियरी बॉडी तथा निलम्बन स्नायु लेन्स के फोकस में अन्तर लाकर वस्तु के प्रतिबिम्ब को रेटिना पर केन्द्रित करते हैं। सामान्य स्थिति में सीलियरी बाँडी की पेशियाँ शिथिल रहती हैं जिस कारण इससे लगे निलम्बन स्नायु तनी हुई अवस्था में रहते हैं, जिससे लेन्स चपटा हो जाता हैं तथा लेन्स की फोकस दूरी बढ़ जाती है।

ऐसी स्थिति में दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है। जब निकट की वस्तु को देखना होता है तो सीलियरी काय की पेशियों में संकुचन होता है जिससे यह काय खिंचकर चोड़ी हो जाती है जिससे निलम्बन स्नायु ढीले हो जाते हैं तथा लेन्स तनाव कम हो जाने के कारण अधिक उत्तल हो जाता है जिससे लेन्स की फोकस दूरी कम हो जाती है तथा निकट की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।

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प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन (Photo-chemical Changes) – जब विशिष्ट तरंगदैर्ध्य वाली प्रकाश की किरणें रेटिना पर पड़ती हैं, तब ये दृष्टि शलाकाओं एवं दृष्टि शंकुओं में उपस्थित रसायनों में परिवर्तन करती हैं।
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जब प्रकाश की किरणें शलाकाओं के रोड्डिप्सिन (rhodopsin) पर पड़ती हैं, तब यह रेटिनीन (retinene) तथा आप्सिन (opsin) में टूट जाता है।. अन्धकार में शलाकाओं में एन्जाइम्स की सहायता से रेटिनीन एवं आप्सिन मिलकर रोडोप्सिन संश्लेषण करते हैं। इसीलिए जब हम तेज प्रकाश से अन्धकार में जाते हैं, तब हमें तत्काल (तुरन्त) कुछ दिखाई नहीं देता है, किन्तु धीर-धीरे दिखाई देने लगता है। शंकुओं में आयोडोप्सिन (Iodopsin) नामक वर्णक उपस्थित होता है।

इसमें वर्णक घटक रेटिनीन तथा प्रोटीन घटक फोटोप्सिन (Photopsin) होता है। शंकु तीन प्रारम्भिक रंगों को-लाल, हरा, व नीले को कहते हैं। इन्हीं तीन प्रकार के शंकुओं के विभिन्न मात्राओं में उद्दीपनों के मिश्रणों से प्रारस्भिक रंमों के मिश्रणों-सफेद नारंगी, पीले, बैंगनी आदि का हमें ज्ञान हो जाता है। मानव एवं अन्य प्राइमेट्स में दोनों नेत्रों द्वारा एक ही प्रतिबिम्ब बनता है। इस प्रकार की दृष्टि को द्विनेत्रीय दृष्टि (binocular vision) कहते हैं। विकसित द्विनेत्रीय दृष्टि से हमें वस्तु का गहराई से ज्ञान हो जाता है।
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दृष्टि दोष (Defects of Vision):
एक सामान्य नेत्र 20 इंच से 20 फीट तक की दूरी की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकता है। ऐसे नेत्र को एमेट्रोपिक नेत्र (Ammetropic eye) कहते हैं। कभी-कभी नेत्रों में कुछ दोष उत्पन्न हो जाते हैं।

प्रमुख दृष्टि दोष अग्ग प्रकार है –
1. निकट दृष्टि दोष (Myopia) – इस दोष में व्यक्ति समीप की वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है किन्तु दूर की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाता है। ऐसा नेत्र गोलक के व्यास के अधिक होने या नेत्र लैंस की फोकस दूरी के कम हो जाने के कारण होता है। इसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना से पहले ही बन जाता है। इस दोष का निवारण अवतल लैंस युक्त चश्मा पहन कर किया जा सकता है।

2. दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia) – इस दृष्टि दोष में व्यक्ति को दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती हैं किन्तु समीप की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है। ऐसा नेत्र गोलक के व्यास कम हो जाने या नेत्र लैंस की फोकस दूरी बढ़ जाने के कारण होता है। इसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटना के बाहर बनता है। इस दोष का निवारण चश्मे में उत्तल लैंस (convex lens) लगाकर किया जा सकता है।

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3. जरा दृष्टि दोष (Presbiopia) – इस प्रकार के दृष्टि दोष में व्यक्ति को समीप व दूर की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई नहीं देती हैं। यह दोष वृद्धावस्था में होता

4. दृष्टि वैषम्य या ऐस्टिगमैटिज्म (Astigmatism) – मनुष्य में दृष्टि वेषम्य दोष कानिया की आकृति असामान्य हो जाने से हो जाता है। इस दोष के कारण मनुष्य को धुँधला और अधूरा दिखाई देता है। इस नेत्र दोष को दूर करने के लिए बेलनाकार लेन्स (Cylindrical lens) का चश्मा लगाया जाता है।

5. सबलबाय या ग्लूकोमा (Glucoma)- नेत्र गोलक की दीवार सामान्य तेजोजल (ऐक्वस ह्यूमर) तथा काचाभ जल (विट्रिस ह्यूमर) के दबाव से सधी रहती है। यदि श्लेष्म की नाल में अवरोध आ जाये तो नेत्र कक्ष में दबाव बढ़ जाता है, जिससे रेटिना क्षतिम्रस्त हो जाती है। इसे सबलबाय या ग्लूकोमा रोग कहते हैं। इससे रोगी को दिखाई देना बंद हो जाता है।

6. मोतियाबिन्द या कैटारेक्ट (Cataract) – यह रोग वृद्धावस्था में, लेन्स का लचीलापन कम हो जाने तथा लेन्स की दोनों सतहों के कम उत्तल हो जाने से हो जाता है। इस स्थिति में लेन्स घना-भूरा तथा अपारदर्शी (Opaque) हो जाता है तब इस अवस्था को मोतियाबिन्द कहते हैं। इस नेत्र-दोष को दूर करने के लिए शल्य क्रिया (ऑपरेशन) करके दोषपूर्ण लेन्स को निकाल दिया जाता है और उपयुक्त लेन्स का चश्मा दिया जाता है।
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7. थेंगापन या स्ट्रेबिस्मस (Strabismus) – यह नेत्र रोग नेत्र गोलक की पेशियों के बड़ी या छोटी हो जाने के कारण नेत्र गोलक के एक ओर झुक जाने से हो जाता है।

8. जीरॉप्यैल्भिया (Xerophthalmia) – यह नेत्र दोष कंजक्टाइवा पर्त में किरेटिन (Keratin) संचित हो जाने से घनी हो जाने के कारण हो जाता है। यह नेत्र रोग भोजन में विटामिन A की कमी से होता है।

9. रतौंधी (Nightblindness) – यह नेत्र रोग भोजन में विटामिन A (retinol) की कमी से हो जाता है। विटामिन A की कमी से रोडोप्सिन (rhodopsin) का पर्याप्त मात्रा में संश्लेषण नहीं हो पाता है। इससे व्यक्ति को मन्द प्रकाश में साफ दिखाई नहीं देता है।

10. वर्णान्थता (Colourblindness) – यह एक आनुवंशिक नेत्र रोग है, जो ‘X’ लिंग गुणसूत्र से संलग्न जीन के द्वारा सन्तान में स्थानान्तरित हो जाने से होता है। इस दोष के कारण व्यक्ति हरे व लाल रंगों में पहचान नहीं कर पाता है।

प्रश्न 14.
मानव आँख की संरचना का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रकाश संवेदांग-नेत्र (Photoreceptor-Eye):
स्तनियों में एक जोड़ी नेत्र सिर पर पृष्ठ पार्श्व में स्थित होते हैं। ये गोलाकार व कुछकुछ गेंद सरीखे होते हैं। ये खोपड़ी के मध्य भाग में. अस्थिल गड्ढों में स्थित होते हैं। इन गड़ों को नेत्र कोटर (orbits) कहते हैं। आँख का लगभग 4 / 5 भाग नेत्र मोटर में धँसा रहता है। नेत्र गोलक के इस उभरे हुए भाग को कार्निया (cornea) कहते हैं। प्रत्येक भाग के साथ पलकें तथा कुछ म्रन्थियाँ भी होती हैं।

1. नेत्र पलकें (Eye lids) – दोनों नेत्रों पर त्वचा के वलन से बनी दो गतिशील पलके (eyelids) पायी जाती हैं जो नेत्र गोलक को सुरक्षा प्रदान करती हैं। जिनके किनारे पर लम्बे रोम उपस्थित होते हैं, जिन्हें बरौनियाँ (eye lashes) कहते हैं। ये धूल व मिट्टी के कणों को नेत्र में जाने से रोकती हैं। इनके अतिरिक्त नेत्र गोलक के अन्दर की ओर एक पेशीविहीन पलक और पायी जाती है जिसे निमेषक पटल या निक्टेटिंग झिल्ली (nictitating membrane) कहते हैं। खरगोश में यह समय-समय पर कॉनिर्या पर फैलकर उसे साफ करने का कार्य करती है। मनुष्य में यह एक अवशेषी अंग (vestigeal organ) के रूप में पायी जाती है। इसे पलीका सेमीन्यूलेरिस (Plica seminularis) भी कहते हैं।

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2. नेत्र श्रन्धियाँ (Eye Glands) – स्तनधारियों के नेत्रों में निम्नलिखित नेत्र प्रन्थियाँ पायी जाती हैं –
(i) माइबोमियन प्रन्बियाँ (Meibomian glands) – ये सिबेसियस ग्रन्थियों का रूपान्तरण होती हैं जो कि पलकों के किनारों पर समकोण पर लगी होती हैं। इनका स्नाव कॉर्निया को नम तथा चिकना बनाता है तथा आँसुओं को सीधे गाल पर गिरने से रोकता है।

(ii) जाइस की ग्रन्थियाँ (Zeis’s glands) – ये रूपान्तरित सिबेसियस (तेल) ग्रन्थियाँ होती हैं जो बरोनियों की पुटिकाओं में पायी जाती हैं। ये कोर्निया को चिकना बनाती हैं।

(iii) हारडिरियन ग्रन्थियाँ (Harderian glands) – ये ग्रन्थियाँ मानव में अनुपस्थित होती हैं परन्तु क्छेल, चूहों व छछुन्दरों में पायी जाती हैं। ये निमेषक झिल्ली को चिकना व नम बनाती हैं।

(iv) अश्रुप्रन्थियाँ (Lachrymal glands) -ये आँख के बाहरी कोण पर स्थित होती है और जल सदृश द्रव स्नावित करती हैं। गैस, धुआँ धूल या तिनका आदि आँख में गिर जाने पर अथवा बहुत भावुक हो उठने पर इन ग्रन्थियों के स्राव से आँखें गीली हो जाती हैं जिन्हें अश्रु कहते हैं। ऊपरी पलक के झपकने से ये स्राव पूरी आँख में फैल जाता है और धूल आदि कण घुल जाते हैं। जन्म के लगभग चार माह बाद मानव शिशु में अश्रु ग्रन्थियाँ सक्रिय होती हैं।
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3. नेत्र कोटर की पेशियाँ (Eye Muscles) – नेत्र कोटर में नेत्र गोलक को इधर-उधर घुमाने के लिये छः नेत्र पेशी समूह पाये जाते हैं जिनमें चार रेक्टस पेशियाँ व दो तिरछी (oblique) पेशियाँ होती हैं।

  • बाह्य या पार्श्व रैक्टस पेशी (External or lateral rectus muscle) – ये नेत्र गोलक को नेत्र कोटर से बाहर की ओर लाती हैं।
  • अन्त या मध्य रैक्टस पेशी (Internal or medial rectus muscle)- ये नेत्र गोलक को अन्दर की ओर ले जाती हैं।
  • उत्तर रेक्टस पेशी (Superior Rectus Muscle)-ये नेत्र गोलक को ऊपर की ओर गति कराती हैं।
  • अधो रेक्टस पेशी (Inferior Rectus Muscle)-ये नेत्र गोलक को नीचे की ओर गति कराती हैं।
  • उत्तर तिरछी पेशी (Superior oblique muscle) – ये नेत्र गोलक को नीचे की ओर व बाहर की तरफ खींचती हैं।
  • अधो तिरछी पेशी (Inferior oblique muscle) – ये नेत्र गोलक को ऊपर की ओर व बाहर की तंरफ खींचती हैं।

इन सभी पेशियों की लम्बाई स्थिर होती है। यदि कोई पेशी छोटी या बड़ी हो जाये तो नेत्र गोलक की स्थिति बिगड़ जाती है और वह एक ओर झुका हुआ सा दिखाई देता है, इससे बेंगापन (Squint or strabismus) उत्पन्न हो जाता है।

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4. कंजैक्टिवा (Conjuctiva) – नेत्र की दोनों पलकों की आन्तरिक अधिचर्म अन्दर की ओर कॉर्निया पर फैलकर एक पतले व पारदर्शी स्तर का निर्माण करती है। यह कंजैक्टिवा कहलाती है। यह अधिचर्म शरीर की सबसे पतली अधिचर्म होती है। यह पारदर्शी होती है।
नेत्रगोलक की आन्तरिक संरचना (Internal structure of Eye ball)-कॉर्निया को छोड़कर शेष नेत्र गोलक की दीवार में तीन स्तर होते हैं-
(1) श्वेत पटल या स्केलरा या स्क्लेरोटिक (Sclerotic) – यह सबसे बाहरी स्तर होता है। नेत्र गोलक (Eye ball) का बाहरी उभरा हुआ पारदर्शक भाग कॉर्निया कहलाता है। यह दृढ़ तन्तुमय संयोजी ऊतकों का बना होता है। यह नेत्र गोलक का आकार बनाये रखता है।

(2) रक्तक पटल या कोरॉयड (Choroid) – यह कोमल संयोजी ऊतकों का बना नेत्र गोलक का मध्य स्तर है। इसकी कोशिकाओं में रंग कणिकाएँ होती हैं, इनके कारण ही आँखों में रंग दिखायी देता है। इस स्तर में रक्त केशिकाओं का सघन जाल पाया जाता है। नेत्र के अगले भाग में यह निम्नलिखित रचनाएँ बनाता है-

(अ) उपतारा या आइरिस (Iris)-कॉर्निया के आधार पर यह भीतर की ओर गोल रंगीन पर्दा बनाता है जिसे उपतारा या आइरिस (Iris) कहते हैं। आइरिस के बीचोंबीच में एक छिद्र होता है, इसको पुतली या तारा (Pupil) कहते हैं। आइरिस पर अरेखित अरीय प्रसारी पेशियाँ फैली रहती हैं जिसके संकुचन से पुतली का व्यास बढ़ता है तथा वर्तुल स्फिक्टर पेशियाँ संकुचन द्वारा पुतलीक के व्यास को कम करती हैं।
(ब) सिलियरी काय (Ciliary body)-रक्तक पटल के आइरिस का भीतरी भाग कुछ मोटा होता है। यह सिलियरी बॉडी कहलाता है। सिलियरी काय संकुचनशील होता है। इससे अनेक महीन एवं लचीले निलम्बन रज्जु निकलते हैं, जो लेन्स (lens) से संलग्न रहते हैं।

(3) मूर्तिपटल या दृष्ट्पिपटल या रेटिना (Retina) – यह नेत्र गोलक का सबसे भीतरी स्तर होता है। यह पतला कोमल संवेदी स्तर होता है। इसमें तन्न्रिका सूत्र, संयोजी ऊतक व वर्णक कोशिकाएँ पायी जाती हैं। दृष्टिपटल में दो स्तर होते हैं-
(अ) वर्णकी स्तर (Pigment layer) – यह स्तर चपटी एवं कणिका युक्त एपीथिलियमी कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है।

(ब) तन्न्रिका संवेदी स्तर (Neuro Sensory layer) – यह वर्णकी स्तर के ठीक नीचे स्थित होता है जो कि दृष्टि शलाका (rods) तथा दृष्टि शंकु (cones) से बनी होती है। दृष्टि शलाका लम्बी कोशिकाएँ होती हैं जो अन्धकार तथा प्रकाश में भेद करती हैं तथा दृष्टि शंकु छोटी तथा मोटी कोशिकाएँ होती हैं, जिनके द्वारा रंगों की पहचान होती है। ये द्विध्रुवीय (bipolar) तन्त्रिका कोशिकाओं से जुड़े रहते हैं।
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द्विध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाओं के तत्रिकार्ष (axons) लम्बे होते हैं, जो आपस में मिलकर दृष्टि तन्रिका (optic nerve) बनाते हैं, जो दृष्टि छिद्र से निकलकर मस्तिष्क को जाती है। दृष्टि तन्त्रिका के बाहर निकलने वाले स्थान पर प्रतिबिम्ब नहीं बनता है, इसे अन्ध बिन्दु (blind spot) कहते हैं। इससे थोड़ा ऊपर पीत बिन्दु (yellow spot) होता है। जहाँ वस्तु का प्रतिबिम्ब सबसे स्पष्ट बनता है। इस बिन्दु का रंग पीला-सा होता है। पीत बिन्दु को मैक्यूला ल्यूटिया (Macula lutea) भी कहते हैं। इसके केन्द्र में एक गर्त होता है जिसे फोविया सेट्रेलिस (Fovea centralis) कहते हैं। लेन्स (Lens) – उपतारा (pupil) के पीछे नेत्रगोलक (eye ball) की गुहा में एक बड़ा रंगहीन, पारदर्शक एवं उभयोतल (biconvex) लेन्स होता है।

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भागों में विभक्त करता है –
(i) जलीय वेश्म या ऐक्वस चैम्बर (Aquous chamber) – लेन्स (lens) तथा कॉर्निया के बीच स्वच्छ पारदर्शक जल सदृश द्रव भरा रहता है। इसे तेजो जल या ऐक्वस ह्यमर (aquous humor) कहते हैं।

(ii) काचाभ द्रव्य वेश्म या विट्रिस चैम्बर (Vitreous chamber)-लेन्स (lens) तथा रेटिना (retina) के बीच गाढ़ा पारदर्शक जैली सदृश द्रव्य भरा रहता है जिसे काचाभ द्रव्य (vitreous humor) कहते हैं। ये दोनों ही द्रव नेत्र गुहा में निश्चित दबाव बनाये रखते हैं जिससे दृष्टिपटल (retina) तथा अन्य नेत्र पटल अपने यथास्थान बने रहते हैं। रेटिना (Retina) की संरचना दृष्टि पटल (रेटिना) नेत्र गोलक (eye ball) का सबसे भीतरी स्तर है। यह पतला, कोमल संवेदी स्तर होता है। यह कॉर्निया (Cornea) को छोड़कर शेष नेत्र गोलक के तीन-चौथाई भाग में फैला रहता है।

दृष्टि पटल दो प्रमुख स्तरों का बना होता है –
(1) रंगा या वर्णकी स्तर (Pigment layer)-यह रक्तपटल से चिपका एक कोशिकीय स्तर होता है जो सिलीयरी काय एवं आइरिस (Iris) की भीतरी सतह पर भी फैला रहता है लेकिन सिलीयरी काय वाले भाग में रंगा कण नहीं पाये जाते हैं।
(2) तत्त्रिका संवेदी स्तर (Neuro sensory layer)-वर्णकी स्तर के ठीक नीचे भीतर की ओर मोटा और जटिल तन्त्रिका संवेदी स्तर होता है। यह केवल सीलियरी काय तक फैला रहता है। इस भाग में तन्त्रिका एवं संवेदी कोशिकाओं के तीन स्तर होते हैं-

(A) दृक् शलाका एवं शंकु स्तर (Layer of Rods and Cones)-इस स्तर में लम्बी-लम्बी रूपान्तरित तन्त्रिका संवेदी कोशिकाएँ होती हैं। ये वर्णक युक्त कोशिकाएँ होती हैं। इसमें दो प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं-
(i) दृष्टि शलाकाएँ (Rods) – ये पतली, लम्बी तथा बेलनाकार कोशिकाएँ होती हैं। ये संख्या में अधिक होती हैं। इनकी लम्बाई शंकु कोशिकाओं (Cones) से अधिक होती हैं। इनमें रोडोप्सिन (rhodopsin) नामक वर्णक उपस्थित होता है। दृष्टि शलाकाएँ प्रकाश तथा अन्धकार का ज्ञान कराती हैं।

(ii) दृष्टि शंकु (Cones) – ये छोटी, मोटी तथा मुग्दराकार कोशिकाएँ होती हैं। इनके सिरे नुकीले नहीं होते हैं। ये संख्या में अपेक्षाकृत कम होती हैं। इनमें आइडप्सिन (Iodopsin) वर्णक उपस्थित होता है। ये तीव्र प्रकाश में वस्तुओं तथा विभिन्न रंगों का ज्ञान कराती हैं। दृष्टि शलाकाओं तथा शंकुओं के भीतरी सिरों से निकले हुए पतले तन्त्रिका सूत्रों से द्विध्रुवीय (bipolar) तन्त्रिका कोशिकाओं के डेण्ड्राइट्स प्रवर्धों के साथ पुग्मानुबन्धनों द्वारा सम्बन्धित रहते हैं।
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(B) द्विधुवीय तन्त्रिका कोशिका परत (Bipolar neuronic layer) – इस स्तर में अनेक द्विध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ होती हैं। इनके डेण्ड्राइट्स दृष्टि शलाकाओं तथा दृष्टि शंकुओं के एक्मॉन्न के साथ युग्मानुबन्यन बनाते हैं। इस स्तर की तन्त्रिकाएँ गुच्छकीय स्तर की कोशिकाओं से जुड़कर युग्मानुबन्धन (synapse) बनाते हैं।

(C) गुच्छकीय स्तर (Ganglionic layer) – इस स्तर में बड़े आकार की द्विध्रुवीय कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें गुच्छकीय कोशिकाएँ (ganglionic cells) भी कहते हैं। इन कोशिकाओं के तन्तिकाद्ध (axon) लम्बे होते हैं जो परस्पर मिलकर दृष्टि तत्तिका बनाते हैं।

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देखने की प्रक्रिया (Process of Vision):
हमारे नेत्र कैमरे के समान कार्य करते हैं। ये प्रकाश की 380 से 760 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य (wavelength) की किरणों की ऊर्जा को ग्रहण करके इसे तन्त्रिका तन्तु के क्रिया विभव में परिवर्तित कर देते हैं।

नेत्र की क्रियाविधि (Working of Eye) – जब उचित आवृत्ति की प्रकाश तरंग कॉनिया पर पड़ती हैं तब कॉर्निया तथा तेजोजल (aqueous humor) प्रकाश किरणों का अपवर्तन (refraction) कर देते हैं। ये किरणें तारे (pupil) से होकर लेन्स (lens) पर पड़ती हैं। लेन्स इनका पूर्ण अपवर्तन कर देता है। इससे रेटिना के पीत बिन्दु पर वस्तु का उल्टा और वास्तविक प्रतिबिम्ब बन जाता है। उपतारा (आइरिस) तारे (पुतली-pupil) को छोटा या बड़ा करके प्रकाश की मात्रा को नियन्त्रित करता है। तेज प्रकाश में तारा सिकुड़ जाता है और कम प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है। कम प्रकाश में तारा फैल जाता है और अधिक प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है।
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नेत्र द्वारा समायोजन (Accommodation by Eye) – सीलियरी बॉडी तथा निलम्बन स्नायु लेन्स के फोकस में अन्तर लाकर वस्तु के प्रतिबिम्ब को रेटिना पर केन्द्रित करते हैं। सामान्य स्थिति में सीलियरी बाँडी की पेशियाँ शिथिल रहती हैं जिस कारण इससे लगे निलम्बन स्नायु तनी हुई अवस्था में रहते हैं, जिससे लेन्स चपटा हो जाता हैं तथा लेन्स की फोकस दूरी बढ़ जाती है।

ऐसी स्थिति में दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है। जब निकट की वस्तु को देखना होता है तो सीलियरी काय की पेशियों में संकुचन होता है जिससे यह काय खिंचकर चोड़ी हो जाती है जिससे निलम्बन स्नायु ढीले हो जाते हैं तथा लेन्स तनाव कम हो जाने के कारण अधिक उत्तल हो जाता है जिससे लेन्स की फोकस दूरी कम हो जाती है तथा निकट की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।

प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन (Photo-chemical Changes) – जब विशिष्ट तरंगदैर्ध्य वाली प्रकाश की किरणें रेटिना पर पड़ती हैं, तब ये दृष्टि शलाकाओं एवं दृष्टि शंकुओं में उपस्थित रसायनों में परिवर्तन करती हैं।
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जब प्रकाश की किरणें शलाकाओं के रोड्डिप्सिन (rhodopsin) पर पड़ती हैं, तब यह रेटिनीन (retinene) तथा आप्सिन (opsin) में टूट जाता है।. अन्धकार में शलाकाओं में एन्जाइम्स की सहायता से रेटिनीन एवं आप्सिन मिलकर रोडोप्सिन संश्लेषण करते हैं। इसीलिए जब हम तेज प्रकाश से अन्धकार में जाते हैं, तब हमें तत्काल (तुरन्त) कुछ दिखाई नहीं देता है, किन्तु धीर-धीरे दिखाई देने लगता है। शंकुओं में आयोडोप्सिन (Iodopsin) नामक वर्णक उपस्थित होता है।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

इसमें वर्णक घटक रेटिनीन तथा प्रोटीन घटक फोटोप्सिन (Photopsin) होता है। शंकु तीन प्रारम्भिक रंगों को-लाल, हरा, व नीले को कहते हैं। इन्हीं तीन प्रकार के शंकुओं के विभिन्न मात्राओं में उद्दीपनों के मिश्रणों से प्रारस्भिक रंमों के मिश्रणों-सफेद नारंगी, पीले, बैंगनी आदि का हमें ज्ञान हो जाता है। मानव एवं अन्य प्राइमेट्स में दोनों नेत्रों द्वारा एक ही प्रतिबिम्ब बनता है। इस प्रकार की दृष्टि को द्विनेत्रीय दृष्टि (binocular vision) कहते हैं। विकसित द्विनेत्रीय दृष्टि से हमें वस्तु का गहराई से ज्ञान हो जाता है।
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दृष्टि दोष (Defects of Vision):
एक सामान्य नेत्र 20 इंच से 20 फीट तक की दूरी की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकता है। ऐसे नेत्र को एमेट्रोपिक नेत्र (Ammetropic eye) कहते हैं। कभी-कभी नेत्रों में कुछ दोष उत्पन्न हो जाते हैं।

प्रमुख दृष्टि दोष अग्ग प्रकार है –
1. निकट दृष्टि दोष (Myopia) – इस दोष में व्यक्ति समीप की वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है किन्तु दूर की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाता है। ऐसा नेत्र गोलक के व्यास के अधिक होने या नेत्र लैंस की फोकस दूरी के कम हो जाने के कारण होता है। इसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना से पहले ही बन जाता है। इस दोष का निवारण अवतल लैंस युक्त चश्मा पहन कर किया जा सकता है।

2. दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia) – इस दृष्टि दोष में व्यक्ति को दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती हैं किन्तु समीप की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है। ऐसा नेत्र गोलक के व्यास कम हो जाने या नेत्र लैंस की फोकस दूरी बढ़ जाने के कारण होता है। इसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटना के बाहर बनता है। इस दोष का निवारण चश्मे में उत्तल लैंस (convex lens) लगाकर किया जा सकता है।

3. जरा दृष्टि दोष (Presbiopia) – इस प्रकार के दृष्टि दोष में व्यक्ति को समीप व दूर की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई नहीं देती हैं। यह दोष वृद्धावस्था में होता

4. दृष्टि वैषम्य या ऐस्टिगमैटिज्म (Astigmatism) – मनुष्य में दृष्टि वेषम्य दोष कानिया की आकृति असामान्य हो जाने से हो जाता है। इस दोष के कारण मनुष्य को धुँधला और अधूरा दिखाई देता है। इस नेत्र दोष को दूर करने के लिए बेलनाकार लेन्स (Cylindrical lens) का चश्मा लगाया जाता है।

5. सबलबाय या ग्लूकोमा (Glucoma)- नेत्र गोलक की दीवार सामान्य तेजोजल (ऐक्वस ह्यूमर) तथा काचाभ जल (विट्रिस ह्यूमर) के दबाव से सधी रहती है। यदि श्लेष्म की नाल में अवरोध आ जाये तो नेत्र कक्ष में दबाव बढ़ जाता है, जिससे रेटिना क्षतिम्रस्त हो जाती है। इसे सबलबाय या ग्लूकोमा रोग कहते हैं। इससे रोगी को दिखाई देना बंद हो जाता है।

6. मोतियाबिन्द या कैटारेक्ट (Cataract) – यह रोग वृद्धावस्था में, लेन्स का लचीलापन कम हो जाने तथा लेन्स की दोनों सतहों के कम उत्तल हो जाने से हो जाता है। इस स्थिति में लेन्स घना-भूरा तथा अपारदर्शी (Opaque) हो जाता है तब इस अवस्था को मोतियाबिन्द कहते हैं। इस नेत्र-दोष को दूर करने के लिए शल्य क्रिया (ऑपरेशन) करके दोषपूर्ण लेन्स को निकाल दिया जाता है और उपयुक्त लेन्स का चश्मा दिया जाता है।
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7. थेंगापन या स्ट्रेबिस्मस (Strabismus) – यह नेत्र रोग नेत्र गोलक की पेशियों के बड़ी या छोटी हो जाने के कारण नेत्र गोलक के एक ओर झुक जाने से हो जाता है।

8. जीरॉप्यैल्भिया (Xerophthalmia) – यह नेत्र दोष कंजक्टाइवा पर्त में किरेटिन (Keratin) संचित हो जाने से घनी हो जाने के कारण हो जाता है। यह नेत्र रोग भोजन में विटामिन A की कमी से होता है।

9. रतौंधी (Nightblindness) – यह नेत्र रोग भोजन में विटामिन A (retinol) की कमी से हो जाता है। विटामिन A की कमी से रोडोप्सिन (rhodopsin) का पर्याप्त मात्रा में संश्लेषण नहीं हो पाता है। इससे व्यक्ति को मन्द प्रकाश में साफ दिखाई नहीं देता है।

10. वर्णान्थता (Colourblindness) – यह एक आनुवंशिक नेत्र रोग है, जो ‘X’ लिंग गुणसूत्र से संलग्न जीन के द्वारा सन्तान में स्थानान्तरित हो जाने से होता है। इस दोष के कारण व्यक्ति हरे व लाल रंगों में पहचान नहीं कर पाता है।

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प्रश्न 15.
मानव नेत्र द्वारा देखने की क्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

प्रकाश संवेदांग-नेत्र (Photoreceptor-Eye):
स्तनियों में एक जोड़ी नेत्र सिर पर पृष्ठ पार्श्व में स्थित होते हैं। ये गोलाकार व कुछकुछ गेंद सरीखे होते हैं। ये खोपड़ी के मध्य भाग में. अस्थिल गड्ढों में स्थित होते हैं। इन गड़ों को नेत्र कोटर (orbits) कहते हैं। आँख का लगभग 4 / 5 भाग नेत्र मोटर में धँसा रहता है। नेत्र गोलक के इस उभरे हुए भाग को कार्निया (cornea) कहते हैं। प्रत्येक भाग के साथ पलकें तथा कुछ म्रन्थियाँ भी होती हैं।

1. नेत्र पलकें (Eye lids) – दोनों नेत्रों पर त्वचा के वलन से बनी दो गतिशील पलके (eyelids) पायी जाती हैं जो नेत्र गोलक को सुरक्षा प्रदान करती हैं। जिनके किनारे पर लम्बे रोम उपस्थित होते हैं, जिन्हें बरौनियाँ (eye lashes) कहते हैं। ये धूल व मिट्टी के कणों को नेत्र में जाने से रोकती हैं। इनके अतिरिक्त नेत्र गोलक के अन्दर की ओर एक पेशीविहीन पलक और पायी जाती है जिसे निमेषक पटल या निक्टेटिंग झिल्ली (nictitating membrane) कहते हैं। खरगोश में यह समय-समय पर कॉनिर्या पर फैलकर उसे साफ करने का कार्य करती है। मनुष्य में यह एक अवशेषी अंग (vestigeal organ) के रूप में पायी जाती है। इसे पलीका सेमीन्यूलेरिस (Plica seminularis) भी कहते हैं।

2. नेत्र श्रन्धियाँ (Eye Glands) – स्तनधारियों के नेत्रों में निम्नलिखित नेत्र प्रन्थियाँ पायी जाती हैं –
(i) माइबोमियन प्रन्बियाँ (Meibomian glands) – ये सिबेसियस ग्रन्थियों का रूपान्तरण होती हैं जो कि पलकों के किनारों पर समकोण पर लगी होती हैं। इनका स्नाव कॉर्निया को नम तथा चिकना बनाता है तथा आँसुओं को सीधे गाल पर गिरने से रोकता है।

(ii) जाइस की ग्रन्थियाँ (Zeis’s glands) – ये रूपान्तरित सिबेसियस (तेल) ग्रन्थियाँ होती हैं जो बरोनियों की पुटिकाओं में पायी जाती हैं। ये कोर्निया को चिकना बनाती हैं।

(iii) हारडिरियन ग्रन्थियाँ (Harderian glands) – ये ग्रन्थियाँ मानव में अनुपस्थित होती हैं परन्तु क्छेल, चूहों व छछुन्दरों में पायी जाती हैं। ये निमेषक झिल्ली को चिकना व नम बनाती हैं।

(iv) अश्रुप्रन्थियाँ (Lachrymal glands) -ये आँख के बाहरी कोण पर स्थित होती है और जल सदृश द्रव स्नावित करती हैं। गैस, धुआँ धूल या तिनका आदि आँख में गिर जाने पर अथवा बहुत भावुक हो उठने पर इन ग्रन्थियों के स्राव से आँखें गीली हो जाती हैं जिन्हें अश्रु कहते हैं। ऊपरी पलक के झपकने से ये स्राव पूरी आँख में फैल जाता है और धूल आदि कण घुल जाते हैं। जन्म के लगभग चार माह बाद मानव शिशु में अश्रु ग्रन्थियाँ सक्रिय होती हैं।
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3. नेत्र कोटर की पेशियाँ (Eye Muscles) – नेत्र कोटर में नेत्र गोलक को इधर-उधर घुमाने के लिये छः नेत्र पेशी समूह पाये जाते हैं जिनमें चार रेक्टस पेशियाँ व दो तिरछी (oblique) पेशियाँ होती हैं।

  • बाह्य या पार्श्व रैक्टस पेशी (External or lateral rectus muscle) – ये नेत्र गोलक को नेत्र कोटर से बाहर की ओर लाती हैं।
  • अन्त या मध्य रैक्टस पेशी (Internal or medial rectus muscle)- ये नेत्र गोलक को अन्दर की ओर ले जाती हैं।
  • उत्तर रेक्टस पेशी (Superior Rectus Muscle)-ये नेत्र गोलक को ऊपर की ओर गति कराती हैं।
  • अधो रेक्टस पेशी (Inferior Rectus Muscle)-ये नेत्र गोलक को नीचे की ओर गति कराती हैं।
  • उत्तर तिरछी पेशी (Superior oblique muscle) – ये नेत्र गोलक को नीचे की ओर व बाहर की तरफ खींचती हैं।
  • अधो तिरछी पेशी (Inferior oblique muscle) – ये नेत्र गोलक को ऊपर की ओर व बाहर की तंरफ खींचती हैं।

इन सभी पेशियों की लम्बाई स्थिर होती है। यदि कोई पेशी छोटी या बड़ी हो जाये तो नेत्र गोलक की स्थिति बिगड़ जाती है और वह एक ओर झुका हुआ सा दिखाई देता है, इससे बेंगापन (Squint or strabismus) उत्पन्न हो जाता है।

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4. कंजैक्टिवा (Conjuctiva) – नेत्र की दोनों पलकों की आन्तरिक अधिचर्म अन्दर की ओर कॉर्निया पर फैलकर एक पतले व पारदर्शी स्तर का निर्माण करती है। यह कंजैक्टिवा कहलाती है। यह अधिचर्म शरीर की सबसे पतली अधिचर्म होती है। यह पारदर्शी होती है।
नेत्रगोलक की आन्तरिक संरचना (Internal structure of Eye ball)-कॉर्निया को छोड़कर शेष नेत्र गोलक की दीवार में तीन स्तर होते हैं-
(1) श्वेत पटल या स्केलरा या स्क्लेरोटिक (Sclerotic) – यह सबसे बाहरी स्तर होता है। नेत्र गोलक (Eye ball) का बाहरी उभरा हुआ पारदर्शक भाग कॉर्निया कहलाता है। यह दृढ़ तन्तुमय संयोजी ऊतकों का बना होता है। यह नेत्र गोलक का आकार बनाये रखता है।

(2) रक्तक पटल या कोरॉयड (Choroid) – यह कोमल संयोजी ऊतकों का बना नेत्र गोलक का मध्य स्तर है। इसकी कोशिकाओं में रंग कणिकाएँ होती हैं, इनके कारण ही आँखों में रंग दिखायी देता है। इस स्तर में रक्त केशिकाओं का सघन जाल पाया जाता है। नेत्र के अगले भाग में यह निम्नलिखित रचनाएँ बनाता है-

(अ) उपतारा या आइरिस (Iris)-कॉर्निया के आधार पर यह भीतर की ओर गोल रंगीन पर्दा बनाता है जिसे उपतारा या आइरिस (Iris) कहते हैं। आइरिस के बीचोंबीच में एक छिद्र होता है, इसको पुतली या तारा (Pupil) कहते हैं। आइरिस पर अरेखित अरीय प्रसारी पेशियाँ फैली रहती हैं जिसके संकुचन से पुतली का व्यास बढ़ता है तथा वर्तुल स्फिक्टर पेशियाँ संकुचन द्वारा पुतलीक के व्यास को कम करती हैं।

(ब) सिलियरी काय (Ciliary body)-रक्तक पटल के आइरिस का भीतरी भाग कुछ मोटा होता है। यह सिलियरी बॉडी कहलाता है। सिलियरी काय संकुचनशील होता है। इससे अनेक महीन एवं लचीले निलम्बन रज्जु निकलते हैं, जो लेन्स (lens) से संलग्न रहते हैं।

(3) मूर्तिपटल या दृष्ट्पिपटल या रेटिना (Retina) – यह नेत्र गोलक का सबसे भीतरी स्तर होता है। यह पतला कोमल संवेदी स्तर होता है। इसमें तन्न्रिका सूत्र, संयोजी ऊतक व वर्णक कोशिकाएँ पायी जाती हैं। दृष्टिपटल में दो स्तर होते हैं-
(अ) वर्णकी स्तर (Pigment layer) – यह स्तर चपटी एवं कणिका युक्त एपीथिलियमी कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है।

(ब) तन्न्रिका संवेदी स्तर (Neuro Sensory layer) – यह वर्णकी स्तर के ठीक नीचे स्थित होता है जो कि दृष्टि शलाका (rods) तथा दृष्टि शंकु (cones) से बनी होती है। दृष्टि शलाका लम्बी कोशिकाएँ होती हैं जो अन्धकार तथा प्रकाश में भेद करती हैं तथा दृष्टि शंकु छोटी तथा मोटी कोशिकाएँ होती हैं, जिनके द्वारा रंगों की पहचान होती है। ये द्विध्रुवीय (bipolar) तन्त्रिका कोशिकाओं से जुड़े रहते हैं।
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द्विध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाओं के तत्रिकार्ष (axons) लम्बे होते हैं, जो आपस में मिलकर दृष्टि तन्रिका (optic nerve) बनाते हैं, जो दृष्टि छिद्र से निकलकर मस्तिष्क को जाती है। दृष्टि तन्त्रिका के बाहर निकलने वाले स्थान पर प्रतिबिम्ब नहीं बनता है, इसे अन्ध बिन्दु (blind spot) कहते हैं। इससे थोड़ा ऊपर पीत बिन्दु (yellow spot) होता है।

जहाँ वस्तु का प्रतिबिम्ब सबसे स्पष्ट बनता है। इस बिन्दु का रंग पीला-सा होता है। पीत बिन्दु को मैक्यूला ल्यूटिया (Macula lutea) भी कहते हैं। इसके केन्द्र में एक गर्त होता है जिसे फोविया सेट्रेलिस (Fovea centralis) कहते हैं। लेन्स (Lens) – उपतारा (pupil) के पीछे नेत्रगोलक (eye ball) की गुहा में एक बड़ा रंगहीन, पारदर्शक एवं उभयोतल (biconvex) लेन्स होता है।

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भागों में विभक्त करता है-
(i) जलीय वेश्म या ऐक्वस चैम्बर (Aquous chamber) – लेन्स (lens) तथा कॉर्निया के बीच स्वच्छ पारदर्शक जल सदृश द्रव भरा रहता है। इसे तेजो जल या ऐक्वस ह्यमर (aquous humor) कहते हैं।

(ii) काचाभ द्रव्य वेश्म या विट्रिस चैम्बर (Vitreous chamber)-लेन्स (lens) तथा रेटिना (retina) के बीच गाढ़ा पारदर्शक जैली सदृश द्रव्य भरा रहता है जिसे काचाभ द्रव्य (vitreous humor) कहते हैं। ये दोनों ही द्रव नेत्र गुहा में निश्चित दबाव बनाये रखते हैं जिससे दृष्टिपटल (retina) तथा अन्य नेत्र पटल अपने यथास्थान बने रहते हैं। रेटिना (Retina) की संरचना दृष्टि पटल (रेटिना) नेत्र गोलक (eye ball) का सबसे भीतरी स्तर है। यह पतला, कोमल संवेदी स्तर होता है। यह कॉर्निया (Cornea) को छोड़कर शेष नेत्र गोलक के तीन-चौथाई भाग में फैला रहता है।

दृष्टि पटल दो प्रमुख स्तरों का बना होता है –
(1) रंगा या वर्णकी स्तर (Pigment layer)-यह रक्तपटल से चिपका एक कोशिकीय स्तर होता है जो सिलीयरी काय एवं आइरिस (Iris) की भीतरी सतह पर भी फैला रहता है लेकिन सिलीयरी काय वाले भाग में रंगा कण नहीं पाये जाते हैं।

(2) तत्त्रिका संवेदी स्तर (Neuro sensory layer)-वर्णकी स्तर के ठीक नीचे भीतर की ओर मोटा और जटिल तन्त्रिका संवेदी स्तर होता है। यह केवल सीलियरी काय तक फैला रहता है। इस भाग में तन्त्रिका एवं संवेदी कोशिकाओं के तीन स्तर होते हैं-

(A) दृक् शलाका एवं शंकु स्तर (Layer of Rods and Cones)-इस स्तर में लम्बी-लम्बी रूपान्तरित तन्त्रिका संवेदी कोशिकाएँ होती हैं। ये वर्णक युक्त कोशिकाएँ होती हैं। इसमें दो प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं-
(i) दृष्टि शलाकाएँ (Rods) – ये पतली, लम्बी तथा बेलनाकार कोशिकाएँ होती हैं। ये संख्या में अधिक होती हैं। इनकी लम्बाई शंकु कोशिकाओं (Cones) से अधिक होती हैं। इनमें रोडोप्सिन (rhodopsin) नामक वर्णक उपस्थित होता है। दृष्टि शलाकाएँ प्रकाश तथा अन्धकार का ज्ञान कराती हैं।

(ii) दृष्टि शंकु (Cones) – ये छोटी, मोटी तथा मुग्दराकार कोशिकाएँ होती हैं। इनके सिरे नुकीले नहीं होते हैं। ये संख्या में अपेक्षाकृत कम होती हैं। इनमें आइडप्सिन (Iodopsin) वर्णक उपस्थित होता है। ये तीव्र प्रकाश में वस्तुओं तथा विभिन्न रंगों का ज्ञान कराती हैं। दृष्टि शलाकाओं तथा शंकुओं के भीतरी सिरों से निकले हुए पतले तन्त्रिका सूत्रों से द्विध्रुवीय (bipolar) तन्त्रिका कोशिकाओं के डेण्ड्राइट्स प्रवर्धों के साथ पुग्मानुबन्धनों द्वारा सम्बन्धित रहते हैं।
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(B) द्विधुवीय तन्त्रिका कोशिका परत (Bipolar neuronic layer) – इस स्तर में अनेक द्विध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ होती हैं। इनके डेण्ड्राइट्स दृष्टि शलाकाओं तथा दृष्टि शंकुओं के एक्मॉन्न के साथ युग्मानुबन्यन बनाते हैं। इस स्तर की तन्त्रिकाएँ गुच्छकीय स्तर की कोशिकाओं से जुड़कर युग्मानुबन्धन (synapse) बनाते हैं।

(C) गुच्छकीय स्तर (Ganglionic layer) – इस स्तर में बड़े आकार की द्विध्रुवीय कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें गुच्छकीय कोशिकाएँ (ganglionic cells) भी कहते हैं। इन कोशिकाओं के तन्तिकाद्ध (axon) लम्बे होते हैं जो परस्पर मिलकर दृष्टि तत्तिका बनाते हैं।

देखने की प्रक्रिया (Process of Vision):
हमारे नेत्र कैमरे के समान कार्य करते हैं। ये प्रकाश की 380 से 760 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य (wavelength) की किरणों की ऊर्जा को ग्रहण करके इसे तन्त्रिका तन्तु के क्रिया विभव में परिवर्तित कर देते हैं।

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नेत्र की क्रियाविधि (Working of Eye) – जब उचित आवृत्ति की प्रकाश तरंग कॉनिया पर पड़ती हैं तब कॉर्निया तथा तेजोजल (aqueous humor) प्रकाश किरणों का अपवर्तन (refraction) कर देते हैं। ये किरणें तारे (pupil) से होकर लेन्स (lens) पर पड़ती हैं। लेन्स इनका पूर्ण अपवर्तन कर देता है। इससे रेटिना के पीत बिन्दु पर वस्तु का उल्टा और वास्तविक प्रतिबिम्ब बन जाता है। उपतारा (आइरिस) तारे (पुतली-pupil) को छोटा या बड़ा करके प्रकाश की मात्रा को नियन्त्रित करता है। तेज प्रकाश में तारा सिकुड़ जाता है और कम प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है। कम प्रकाश में तारा फैल जाता है और अधिक प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है।
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नेत्र द्वारा समायोजन (Accommodation by Eye) – सीलियरी बॉडी तथा निलम्बन स्नायु लेन्स के फोकस में अन्तर लाकर वस्तु के प्रतिबिम्ब को रेटिना पर केन्द्रित करते हैं। सामान्य स्थिति में सीलियरी बाँडी की पेशियाँ शिथिल रहती हैं जिस कारण इससे लगे निलम्बन स्नायु तनी हुई अवस्था में रहते हैं, जिससे लेन्स चपटा हो जाता हैं तथा लेन्स की फोकस दूरी बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है। जब निकट की वस्तु को देखना होता है तो सीलियरी काय की पेशियों में संकुचन होता है जिससे यह काय खिंचकर चोड़ी हो जाती है जिससे निलम्बन स्नायु ढीले हो जाते हैं तथा लेन्स तनाव कम हो जाने के कारण अधिक उत्तल हो जाता है जिससे लेन्स की फोकस दूरी कम हो जाती है तथा निकट की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।

प्रकाश-रासायनिक परिवर्तन (Photo-chemical Changes) – जब विशिष्ट तरंगदैर्ध्य वाली प्रकाश की किरणें रेटिना पर पड़ती हैं, तब ये दृष्टि शलाकाओं एवं दृष्टि शंकुओं में उपस्थित रसायनों में परिवर्तन करती हैं।
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जब प्रकाश की किरणें शलाकाओं के रोड्डिप्सिन (rhodopsin) पर पड़ती हैं, तब यह रेटिनीन (retinene) तथा आप्सिन (opsin) में टूट जाता है।. अन्धकार में शलाकाओं में एन्जाइम्स की सहायता से रेटिनीन एवं आप्सिन मिलकर रोडोप्सिन संश्लेषण करते हैं। इसीलिए जब हम तेज प्रकाश से अन्धकार में जाते हैं, तब हमें तत्काल (तुरन्त) कुछ दिखाई नहीं देता है, किन्तु धीर-धीरे दिखाई देने लगता है। शंकुओं में आयोडोप्सिन (Iodopsin) नामक वर्णक उपस्थित होता है।

इसमें वर्णक घटक रेटिनीन तथा प्रोटीन घटक फोटोप्सिन (Photopsin) होता है। शंकु तीन प्रारम्भिक रंगों को-लाल, हरा, व नीले को कहते हैं। इन्हीं तीन प्रकार के शंकुओं के विभिन्न मात्राओं में उद्दीपनों के मिश्रणों से प्रारस्भिक रंमों के मिश्रणों-सफेद नारंगी, पीले, बैंगनी आदि का हमें ज्ञान हो जाता है। मानव एवं अन्य प्राइमेट्स में दोनों नेत्रों द्वारा एक ही प्रतिबिम्ब बनता है। इस प्रकार की दृष्टि को द्विनेत्रीय दृष्टि (binocular vision) कहते हैं। विकसित द्विनेत्रीय दृष्टि से हमें वस्तु का गहराई से ज्ञान हो जाता है।
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दृष्टि दोष (Defects of Vision):
एक सामान्य नेत्र 20 इंच से 20 फीट तक की दूरी की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकता है। ऐसे नेत्र को एमेट्रोपिक नेत्र (Ammetropic eye) कहते हैं। कभी-कभी नेत्रों में कुछ दोष उत्पन्न हो जाते हैं।

प्रमुख दृष्टि दोष अग्ग प्रकार है –
1. निकट दृष्टि दोष (Myopia) – इस दोष में व्यक्ति समीप की वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है किन्तु दूर की वस्तुओं को स्पष्ट नहीं देख पाता है। ऐसा नेत्र गोलक के व्यास के अधिक होने या नेत्र लैंस की फोकस दूरी के कम हो जाने के कारण होता है। इसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना से पहले ही बन जाता है। इस दोष का निवारण अवतल लैंस युक्त चश्मा पहन कर किया जा सकता है।

2. दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia) – इस दृष्टि दोष में व्यक्ति को दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती हैं किन्तु समीप की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है। ऐसा नेत्र गोलक के व्यास कम हो जाने या नेत्र लैंस की फोकस दूरी बढ़ जाने के कारण होता है। इसमें वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटना के बाहर बनता है। इस दोष का निवारण चश्मे में उत्तल लैंस (convex lens) लगाकर किया जा सकता है।

3. जरा दृष्टि दोष (Presbiopia) – इस प्रकार के दृष्टि दोष में व्यक्ति को समीप व दूर की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई नहीं देती हैं। यह दोष वृद्धावस्था में होता

4. दृष्टि वैषम्य या ऐस्टिगमैटिज्म (Astigmatism) – मनुष्य में दृष्टि वेषम्य दोष कानिया की आकृति असामान्य हो जाने से हो जाता है। इस दोष के कारण मनुष्य को धुँधला और अधूरा दिखाई देता है। इस नेत्र दोष को दूर करने के लिए बेलनाकार लेन्स (Cylindrical lens) का चश्मा लगाया जाता है।

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5. सबलबाय या ग्लूकोमा (Glucoma)- नेत्र गोलक की दीवार सामान्य तेजोजल (ऐक्वस ह्यूमर) तथा काचाभ जल (विट्रिस ह्यूमर) के दबाव से सधी रहती है। यदि श्लेष्म की नाल में अवरोध आ जाये तो नेत्र कक्ष में दबाव बढ़ जाता है, जिससे रेटिना क्षतिम्रस्त हो जाती है। इसे सबलबाय या ग्लूकोमा रोग कहते हैं। इससे रोगी को दिखाई देना बंद हो जाता है।

6. मोतियाबिन्द या कैटारेक्ट (Cataract) – यह रोग वृद्धावस्था में, लेन्स का लचीलापन कम हो जाने तथा लेन्स की दोनों सतहों के कम उत्तल हो जाने से हो जाता है। इस स्थिति में लेन्स घना-भूरा तथा अपारदर्शी (Opaque) हो जाता है तब इस अवस्था को मोतियाबिन्द कहते हैं। इस नेत्र-दोष को दूर करने के लिए शल्य क्रिया (ऑपरेशन) करके दोषपूर्ण लेन्स को निकाल दिया जाता है और उपयुक्त लेन्स का चश्मा दिया जाता है।
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7. थेंगापन या स्ट्रेबिस्मस (Strabismus) – यह नेत्र रोग नेत्र गोलक की पेशियों के बड़ी या छोटी हो जाने के कारण नेत्र गोलक के एक ओर झुक जाने से हो जाता है।

8. जीरॉप्यैल्भिया (Xerophthalmia) – यह नेत्र दोष कंजक्टाइवा पर्त में किरेटिन (Keratin) संचित हो जाने से घनी हो जाने के कारण हो जाता है। यह नेत्र रोग भोजन में विटामिन A की कमी से होता है।

9. रतौंधी (Nightblindness) – यह नेत्र रोग भोजन में विटामिन A (retinol) की कमी से हो जाता है। विटामिन A की कमी से रोडोप्सिन (rhodopsin) का पर्याप्त मात्रा में संश्लेषण नहीं हो पाता है। इससे व्यक्ति को मन्द प्रकाश में साफ दिखाई नहीं देता है।

10. वर्णान्थता (Colourblindness) – यह एक आनुवंशिक नेत्र रोग है, जो ‘X’ लिंग गुणसूत्र से संलग्न जीन के द्वारा सन्तान में स्थानान्तरित हो जाने से होता है। इस दोष के कारण व्यक्ति हरे व लाल रंगों में पहचान नहीं कर पाता है।

प्रश्न 16.
मानव कर्ण की संरचना का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्रवण संतुलन अंग-कण (Statoaucaustic organ-Ear):
मनुष्य में कान सुनने की क्रिया के साथ-साथ सन्तुलन बनाये रखने का भी कार्य करते हैं। मनुष्य के सिर पर दोनों ओर पार्श्व में एक जोड़ी कान होते हैं। मनुष्य के कर्ण में/तीन भाग होते हैं –
(1) बाह्य कर्ण (External ear)
(2) मध्य कर्ण (Middle ear) तथा
(3) आन्तरिक कर्ण (Internal ear)।

(1) बाह्य कर्ण (External Ear)- बाह्य कर्ण के दो भाग होते हैं –

  • कर्ण पल्लव या पिन्ना (Pinna) तथा
  • बाह्य कर्ण कुहर (External auditory meatus)।

कर्ण पल्लव या पिन्ना सबसे बाहरी भाग होता है जो लचीले उपास्थि (cartilage) ऊतकों का बना होता है। यह बाह्य ध्वनि तरंगों को एकत्रित करके बाह्य कर्ण कुहर में भेजने का कार्य करता है। बाह्य कर्ण कुहर 2.5 से 3.0 सेमी लम्बा होता है। इसे भीतरी सिरे पर एक मजबूत झिल्ली होती है जिसे कर्ण पटह (Tympanic membrane) कहते हैं। बाह्य कर्ण कुहर ध्वनि तरंगों को कर्ण पटह तक पहुँचाने का कार्य करता हैं।

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(2) मध्य कर्ण (Middle Ear)-यह कर्ण पटह (tym-panic membrane) से लगा हुआ छोटा-सा कक्ष होता है। इसको कर्ण पटह गुहा (tympanic cavity) भी कहते हैं। कर्ण पटह गुहा एक नलिका द्वारा मुख प्रसनी में खुलती है जिससे कर्ण पटह के बाहर तथा भीतर समान वायुदाब बनाये रखा जाता है। मध्य कर्ण की गुहा दो छोटे-छोटे छिद्रों द्वारा आन्तरिक कर्ण की गुहा से भी सम्बन्धिंत रहती है। ऊपर की ओर स्थित छिद्र अण्डाकार गवाक्ष या फेनेस्ट्रा ओवेलिस (Fenestra Ovalis) तथा नीचे वाला छिद्र वर्तुल गवाक्ष या फेनेस्ट्रा रोटण्डस (Fenestra Rotundus) कहलाते हैं।
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मध्य कर्ण में तीन छोटी-छोटी अस्थियाँ भी पायी जाती हैं। बाहर से भीतर की ओर इन्हें क्रमशः मैलियस (Malleus), इनकस (Incus) तथा स्टैयीज (Stapes) कहते हैं ।

(3) अन्त्रकर्ण (Internal Ear)-यह कान का सबसे भीतरी हिस्सा होता है तथा इसे भी दो भागों में बाँटा जा सकता है –
(i) अस्थिल गहन्न (Bony Labyrinth) तथा
(ii) कला गंद्न (Membranous Labyrinth)।
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(i) अस्थिल गहन (Bony labyrinth) – यह सम्पूर्ण कला गहन को घेरे रहता है। कला गहन (Membranous labyrinth) तथा अस्थिल गहन (Bony labyrinth) के बीच संकरी गुहा होती है जिसमें परिलिका (Perilymph) भरा रहता है। यह भाग मध्य कर्ण गुहा से सम्बन्धित रहता है।
(ii) कला गहन (Membranous labyrinth)-यह कोमल अर्क्थ-पारदर्शी झिल्ली की बनी रचना होती है। इसमें दो थैली जैसे वेश्म होते हैं, जिनें युर्रीपुलतस (Utriculus) एवं सैक्युलक (Sacculus) कहते हैं। दोनों वेश एक महीन नलिका द्वारा आपस में सम्बन्धित रहते हैं। इसे सैक्यूलो युर्रीकुलर नलिका (Sacculo-utricular tubule) कहते हैं।

युट्रीकुलस में तीन अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएँ होती हैं। इन्हें अम्र अर्धन्ताकार नलिका (Anterior semicircular tubule), पश्च अर्धव्याकार नलिका (Posterior semicirċular tubule) तथा बाइ अर्धन्तांका नलिका (External semicircular tubule) कहते हैं। अम्र तथा पश्च नलिकाएँ एक ही स्थान से निकलती हैं तथा कुछ दूरी तक जुड़ी रहती हैं। इस स्थान को क्रस कम्यून (cruss commune) कहते हैं। ये अपने दूरस्थ सिरे से फूली रहती हैं। फूला हुआ भाग तुम्बिका या ए्मुला (ampulla) कहलाता है।

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सैक्युल्स (sacculus) का पिछला सिरा लम्बा एवं सिंम की तरह कुण्डलित होता है। इसको छॉक्तियर नलिंका (cochlear duct) कहते हैं। यह नलिका अपने चारों ओर के अस्थिकोष से इस प्रकार जुड़ी रहती हैं कि अस्थिकोष की गुहा दो भागों में बँट जाती है-(a) कौक्लिया नलिका के ऊपर का कक्ष स्केला वेस्टीछुलाई (Scala vestibuli) तथा (b) कॉक्लिया नलिका के नीचे का कक्ष मध्य कर्ण सोपान या स्केला टिप्पेाइं (Scala tympani) अथवा टिम्पेनिक कली कहलाता है। दोनों के मध्य की गुहा स्केता मीडिया (Scala media) कहलाती है।

स्केला वेस्टीबुलाई तथा स्केला टिम्पेनाई में पेरीलिएक (perilymph) भरा रहता है, जबकि स्केला मीडिया में एण्डोलिम्फ (endolymph) भरा होता है। स्केला मीडिया तथा स्केला वेस्टीुुलाई के मध्य रैसर्जस कला (Reissner’s membrane) तथा स्केला मीडिया तथा स्केला टिम्पेनाई के मध्य बेसीलर कला (Basilar membrane) उपस्थित होती है। बेसीलर कला की मध्य रेखा पर लम्बे संवेदी आयाम उभार के रूप में फैले रहते हैं। इन उभारों को करर्टी के अंग (Organ of corti) क्रहते हैं। इन्हीं पर संवेदी रोम युक्त संवेदी कोशिकाएँ पायी जाती हैं। इन कोशिकाओं के आधार भाग से तन्त्रिका तन्तु निकलकर श्रवण तन्त्रिका की कॉक्लियर शाखा बनाते हैं।

भ्रवण की प्रक्रिया (Process of Hearing):
सुनने का प्रमुख कार्य कर्टाई के अंग करते हैं। वायु में फैली ध्वनि की तरंगें कर्ण पल्लवों से टकराकर कर्ण कुहर में होती हुई कर्णप्टह (Tympanum)
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से टकराकर इसमें कम्पन उत्पन्न कर देती हैं। ये ही कम्पन क्रमशः तीनों कर्ण अस्थियों से होता हुआ अण्धकार कबाहा (फेनेस्ट्र ओवेलिस) पर मढ़ी झिल्ली में पहुँचता है। कर्ण अस्थियों की विशिष्ट स्थिति के कारण कर्णपटह से फेनेस्ट्रा ओवेलिस तक पहुँचते-पहुँचते कम्पन तरंगें कम विस्तुत किन्तु अधिक प्रबल हो जाती हैं। फेनेस्ट्रा ओवेलिस की झिल्ली में कम्पन से कॉंक्लियर नलिका के पृष्ठ तल पर स्थित संकैला वेस्टीदुलाई में भरा पेरीलिम्फ कम्पित होने लगता है।

कम्पन की ये तरंगें जब रीसर्न्स कला एवं संकला मीडिया के एण्डोलिए्क के माध्यम से कौंस्लिया के सिरे पर छिद्र हललीकोट्रीमा से होती हुई स्कैला टिम्पैनाई के पैरीलिम्म के माध्यम से बेसीलर काल में पहुँचती हैं तो कॉर्टी के अंग में भी कम्पन होता है। यहाँ पर कॉर्टी के अंग की संवेदी कोशिकाओं के रोम टेक्टोरल कला से टकराते हैं, जिससे श्रवण संवेदना की प्रेरणा स्थापित हो जाती है। कॉक्लियर तन्रिका इसी प्रेरणा को श्रवण तन्रिका में और फिर श्रवण तन्त्रिका इसे मसित्क में पहुँचाती है, जिससे हमें ध्वनि सुनने का ज्ञान होता है। ध्वनि की तीव्रता संवेदी रोमों

के कम्पन की तीव्रता से जात होती है। संवेदी रोमों के किस भाग में कम्पन हो रहा है, इसके द्वारा आवाज को पहचाना जाता है। मस्तिक से अनुकूल प्रतिक्रिया की प्रेरणा उपयुक्त प्रभावी अंगों को भेज दी जाती है। कांक्लिया में उत्पन्न तरंगें स्कैला टिम्यैनाई के पैरीलिम्फ में होती हुई फेनेस्द्रा रोटेडस पर मढ़ी झिल्ली पर पहुँचकर समाप्त हो जाती है। कुछ ध्वनि तरंगें छोटे-से छ्रिं हेलीकोट्रीमा से निकलते समय भी समाप्त हो जाती हैं।

सुनने की क्रिया को संक्षेप में निम्न रेखाचित्र द्वारा दिखाया जा सकता है –
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय - 24

प्रश्न 17.
घ्राण संखेदांग कहाँ पाए जाते हैं ? घ्राण संवेदांगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
घ्राण संबेदांग-नाक (Olfacto Receptor : Nose)
मनुष्य में गंध का ज्ञान नासिका में उपस्थित गंकीजी या घाण संबेदागों द्वारा होता है। नासिका के अन्दर दो लम्बी कीपाकार नासा गुहाएँ पायी जाती हैं जो एक महीन नासापह्ट के द्वारा पृथक् रहती हैं। दोनों नासा गुहिकाएँ बाहर की ओर बाद्य नासा छिद्रों के द्वारा खुलती हैं।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

प्रत्येक नासा गुहा निम्न तीन भागों से बनी होती है –
1. बेस्टीक्यू (Vestibule)-यह नासा छिद्रों के ठीक पीके का भाग होता है जो रोम युक्त सामान्य त्वचा से ढका रहता है।
2. श्वास भाग (Respiratory Region) – नासा गुहा के इस भाग में टरबाइनल अस्ट्यियाँ पायी जाती हैं। इसका भीतरी स्तर श्लेषा झिल्ली, चूषक कोशिकाओं तथा रोमाभी स्तंभी उपकला द्रा आस्तरित होता है। इस स्तर को श्वसन उपकला भी कहते हैं। इसके दारा स्वित श्लेषा श्वसन के दौरान आयी कुछ वायु को नम करता है।
3. घ्राण थाग (Olfactory Region) – यह नासा वेश्म या नासा गुहा का पश्च भाग है। इस भाग में ऐथमॉइड अस्थि के कुण्डलित उभार मिलते हैं। इसके भीतरी स्तर पर पक्ष्माभ रहित, श्लेषा युक्त्त श्निंरेयन कला (Schneiderian Membrane) पायी जाती है, जो मुख्य ष्राण संवेदांग हैं।

इस झिल्ली में निम्न तीन प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती है –
(i) प्यल्ली या संद्यी कोशिकाएँ (Sensory cells)-गंष की संवेदना को मङण करने के लिए रुपान्तरित कोशिकाएँ होती हैं। ये अपेक्षाकृत लम्बी एवं सँकरी होती हैं। इन पर सूक्ष्म संवेदी रोम होते हैं। जो पतले होकर तन्तुओं का निर्माण करते हैं। ये ततु परस्पर मिलकर घ्राण तंत्रिकाएँ (Olfactory nerve) बनाते हैं। ये तंत्रिकाएँ मस्तिष्क के घ्राण पिण्डों में सूचनाएँ पहुँचाती है।

(ii) अवसंन कोशिंकाएँ (Supporting cells)-संवेदी कोशिकाओं के निकट लम्बी व बेलनाकार कोशिकाओं को अवलम्बन कोशिकाएँ कहते हैं। इनके स्वतंत्र सिरे पर छोटे-छोटे सूक्ष्मांकुर (Microvilli) पाये जाते हैं।

(iii) आधारी कोशिकाएँ (Basal cells)-संवेदी तथा अवलम्बन कोशिकाओं के आधार भाग में बीच-बीच में छोटी शंकु आकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं, जिन्हें आधारी कोशिकाएँ कहते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय - 25
घ्राण भाग के मोटे श्लेष्मा स्तर में विशिष्ट प्रकार की बोमेन प्रन्थियाँ (Bowman Glands) पायी जाती हैं। इनके द्वारा सावित श्लेष्मा वायु के साथ आए गंध कणों को स्वयं के साथ घोलकर गंध का ज्ञान कराता है। मनुष्य के घ्राण भाग में 120 लाख से भी अधिक घ्राण कोशिकाएँ (Olfactory cells) पायी जाती हैं। मानव की मुख गुहा में नेसोपैलेटाइन में जैकब्सन अंग पाया जाता है, जो भोजन की गंध का ज्ञान कराता है।

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HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 8 कोशिका : जीवन की इकाई

Haryana State Board HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 8 कोशिका : जीवन की इकाई Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Biology Important Questions Chapter 8 कोशिका : जीवन की इकाई

(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. प्लाज्मा झिल्ली (जीवद्रव्य कला) मुख्यतः निर्मित होता है-
(A) फॉस्फोलिपिड्स प्रोटीन द्विस्तर में धंसे रहते हैं
(B) प्रोटीन फॉस्फोलिपिड द्विस्तर में धंसी रहती है।
(C) प्रोटीन ग्लूकोस अणुओं के बहुलक में धंसे रहते है।
(D) प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट परत में धँसी रहती है।
उत्तर:
(B) प्रोटीन फॉस्फोलिपिड द्विस्तर में धंसी रहती है।

2. निम्न में से कौन-सी संरचना दो परिवहन मार्ग है ?
(A) प्लाज्मोडेमेटा समीपस्थ कोशिकाओं के मध्य प्रभावी
(B) प्लास्टोक्विनोन
(C) इण्डोप्लाज्मिक रेटीकुलम
(D) प्लाज्मालेमा
उत्तर:
(A) प्लाज्मोडेमेटा समीपस्थ कोशिकाओं के मध्य प्रभावी

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3. कोशिका में विभिन्न गतिविधियों का केन्द्र है ?
(A) प्लाज्मा झिल्ली
(B) माइटोकॉण्ड्रिया
(C) कोशिका द्रव्य
(D) नाभिक
उत्तर:
(C) कोशिका द्रव्य

4. निम्न में से किसमें स्वयं का DNA होता है ?
(A) माइटोकॉण्ड्रिया
(B) डिक्टियोसोम
(C) लाइसोसोम
(D) परऑक्सीसोम
उत्तर:
(A) माइटोकॉण्ड्रिया

5. कोशिका के अन्दर पेप्टाइड संश्लेषण किसमें होता है ?
(A) माइटोकॉण्ड्यिा
(B) वर्गीलवक
(C) राइबोसोम
(D) हरित लवक
उत्तर:
(C) राइबोसोम

6. निम्न में से कौन जीवाणु कोशिका में उत्प्रेरक का कार्य भी करता है ?
(A) sn-RNA
(C) 23 s-r RNA
(B) hn-RNA
(D) 5 sr RNA
उत्तर:
(C) 23 s-r RNA

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7. ग्लाकोप्रोटीन तथा ग्लाकोलिपिड के निर्माण का प्रमुख स्थल है-
(A) गॉल्जी उपकरण
(C) लाइसोसोम
(B) लवक
(D) रिक्तका
उत्तर:
(A) गॉल्जी उपकरण

8. निम्न में से कौन-सा जीवधारी यूकोरियोटिक कोशिका का उदाहरण नहीं है ?
(A) ईश्चेरिथिया कोलाई
(C) प्लाज्मोडियम बाइवैक्स
(B) युग्लीना विडिस
(D) पैरामीशियम कॉडेटम
उत्तर:
(A) ईश्चेरिथिया कोलाई

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9. कोशिका कला का मॉडल किस में दिया जाता है ?
(A) NOT तथा K+ आयन सक्रिय परिवहन द्वारा
(B) प्रोटीन कोशिका कला का 60 से 70% भाग बनाते हैं।
(C) कोशिका कला में लिपिड द्विस्तर के रूप में व्यवस्थित रहते हैं जिसमें ध्रुवीय शीर्ष अन्दर की ओर होते हैं।
(D) कोशिका कला का तरल मोजेक मॉडल सिंगर तथा निकोलसन ने दिया था।
उत्तर:
(D) कोशिका कला का तरल मोजेक मॉडल सिंगर तथा निकोलसन ने दिया था।

10. राइबोसोम के बारे में क्या सत्य है ?
(A) प्रोकैरियोटिक राइबोसोम 80s होते हैं जहाँ s अवसादन गुणांक है।
(B) ये RNA तथा प्रोटीन्स से बने होते हैं।
(C) ये केवल यूकॉरियोटिक कोशिकाओं में पाए जाते हैं।
(D) ये कुछ RNA के स्वप्रतिकृत इन्ट्रान्स होते हैं।
उत्तर:
(B) ये RNA तथा प्रोटीन्स से बने होते हैं।

11. राइबोसोमल RNA सहियतः किसमें संश्लेषित होता है ?
(A) लाइसोसोम
(B) केन्द्रिक
(C) न्यूक्लियोप्लाका
(D) राइबोसोम
उत्तर:
(B) केन्द्रिक

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12. लिपिड्स के संश्लेषण का मुख्य स्थल है-
(A) RER
(B) SER
(C) सिमलास्ट
(D) न्यूक्लियोप्लाज्म
उत्तर:
(B) SER

13. निम्न का मिलान करके सही उत्तर का चयन कीजिए-

स्तंभ Iस्तंभ II
1. माइटोकॉडिया के अन्तर्बलन(A) तारककेन्द्र
2. थायलेकॉइड(B) क्लोरोफिल
3. केन्द्रकीय अम्ल(C) क्रिस्वी
4. पक्ष्माभ या कशाभ के आधार काय(D) राइबोजाइम

कूट-

abcd
(A)4213
(B)1243
(C)1324
(D)4312

उत्तर:
(C) 1 3 2 4

14. ठोस रेखित कोशिका कंकाल तन्त्र जिसका व्यास 5 mm होता है-
(A) सूक्ष्मनलिकाएँ
(B) सूक्ष्मतंतुक
(C) मध्यवर्ती तन्तु
(D) सैमिन्ली
उत्तर:
(B) सूक्ष्मतंतुक

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15. कलाओं युक्त कोशिकीय अवयव है-
(A) केन्द्रक, राइबोसोम तथा माइटोकॉन्ड्रिया
(B) गुणसूत्र, राइबोसोम तथा एण्डोप्लाज्मिक रेटीकुलम
(C) एण्डोप्लाज्मिक रेटीकुलम, राइबोसोम, केन्द्रक
(D) लाइसोसोम, गॉल्जीकाय तथा माइटोकॉन्ड्रिया
उत्तर:
(D) लाइसोसोम, गॉल्जीकाय तथा माइटोकॉन्ड्रिया

16. निम्न में से कौन कलाबद्ध नहीं होता है ?
(A) रिक्तकाएँ
(B) राइबोसोम
(C) लाइसोसोम
(D) मीसोसोम
उत्तर:
(B) राइबोसोम

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17. स्तंभों का मिलान कर सही विकल्प का चयन कीजिए-

स्तंभ Iस्तंभ II
a. थाइलेकॉयड1. गॉल्जी उपकरण में डिस्क के समान कोश
b. क्रिस्टी2. DNA की संघनित संरचना
c. सिस्टर्नी3. स्ट्रोमा के समान झिल्लीमय चपटे आशय
d. क्रोमेटिन4. माइटोकॉण्ड्रिया अन्तर्वलन

कूट:

abcd
(A)4312
(B)3412
(C)3412
(D)3421

उत्तर:
(B) 3 4 1 2

18. निम्न में से कौन-सी संरचना प्रोकॉरियोटिक कोशिका में नहीं पायी जाती है?
(A) नाभिकीय आवरण
(C) मीसोसोम
(B) राइबोसोम
(D) जीवद्रव्य कला
उत्तर:
(A) नाभिकीय आवरण

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19. गक्त सुमेलित का चयन कीजिए-
(A) गैस रिक्तिकाएँ-हरी जीवाणु कोशिकाएँ
(B) बड़ी केन्द्रीय रिक्तिका-जन्तु कोशिकाएँ
(C) प्रोटिस्ट-यूकैरियोट
(D) मेथेनोजन्स-प्रोकैरियोट्स
उत्तर:
(B) बड़ी केन्द्रीय रिक्तिका-जन्तु कोशिकाएँ

20. गलत कथन का चयन कीजिए-
(A) जीवाणु कोशिका पेप्टिडोग्लाइकन की बनी होती है।
(B) पिलाई तथा फिम्बी मुख्यतः जीवाणु कोशिका की गतिशीलता में भाग लेते हैं।
(C) सायनोबैक्टीरिया में कशाभयुक्त कोशिकाएँ नहीं पायी जाती है।
(D) माइकोप्लाज्मा भित्ति रहित शुक्ष्मजीव है।
उत्तर:
(B) पिलाई तथा फिम्बी मुख्यतः जीवाणु कोशिका की गतिशीलता में भाग लेते हैं।

21. निम्न में से कौन-सा कोशिकांग एकल कला द्वारा घिरा रहता है ?
(A) हरितलवक
(C) केन्द्रक
(B) लाइसोसोम
(D) माइटोकॉण्ड्यिा
उत्तर:
(A) हरितलवक

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22. पादप कोशिका रिक्तकाओं में पाया जाने वाला जल में विलेय वर्णक
(A) क्लोरोफिल
(C) एन्थोसायनिन
(B) माइटोकॉण्ड्यिा
(D) जैन्योफिल
उत्तर:
(C) एन्थोसायनिन

23. निम्न में कौन-सा कोशिकांग कार्बोहाइड्रेट्स से ऊर्जा निष्कासित करके ATP निर्माण के लिए उत्तरदायी होता है ?
(A) लाइसोसोम
(C) क्लोरोप्लास्ट
(B) राइबोसोम
(D) माइटोकॉण्ड्रिया
उत्तर:
(D) माइटोकॉण्ड्रिया

24. निम्न में से कौन-सा अवयव जीवाणु कोशिका को चिपकने वाला लक्षण प्रदान करता है ?
(A) कोशिका मिति
(C) जीवद्रव्य कला
(B) केन्द्रक कला
(D) ग्लाइकोकैलिक्स
उत्तर:
(D) ग्लाइकोकैलिक्स

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25. निम्न कोशिकागों के युग्म में किसमें DNA नहीं होता ?
(A) लयनकाय एवं रसधानियाँ
(B) केन्द्रक आवरण एवं सूत्रकणिका
(C) सूत्रकणिका एवं लयनकाय
(D) क्लोरोप्लास्ट एवं रसधानियाँ
उत्तर:
(A) लयनकाय एवं रसधानियाँ

(B) अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सबसे छोटी कोशिका का नाम लिखिए।
उत्तर:
माइकोप्लाज्मा गैलीसेप्टिकम (Mycoplasma gallisepticum; 0.1μ)

प्रश्न 2.
कोशिका सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया ?
उत्तर:
श्लाइडेन तथा श्वान ने।

प्रश्न 3.
सबसे बड़े एक कोशिकीय पादप का नाम लिखिए।
उत्तर:
ऐसीटाबुलेरिया (Acetabularia) नामक शैवाल

प्रश्न 4.
सबसे बड़ी जन्तु कोशिका का नाम लिखिए।
उत्तर:
शुतुर्मुर्ग ( Osrich ) का अण्डा ।

प्रश्न 5.
थाइलेकॉइड कहाँ पाये जाते हैं ?
उत्तर:
हरित लवक (chloroplast) के प्रेना. (granna) में।

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प्रश्न 6.
गुणसूत्र को सर्वप्रथम किसने देखा ?
उत्तर:
स्ट्रासबर्गर (Strasburger; 1875 ) ने।

प्रश्न 7.
प्रोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक कोशिका में एक अन्तर बताइए ।
उत्तर:
प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic cell) में केन्द्रक कला का अभाव होता है; जबकि यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic cell) में केन्द्रक कला उपस्थित होती है।

प्रश्न 8.
दो प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
जीवाणु कोशिका तथा सायनोबैक्टीरिया ।

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प्रश्न 9.
किसी एककोशिकीय यूकैरियोटिक पादप का नाम लिखिए।
उत्तर:
क्लेमाइडोमोनास (Chlamydomonas )।

प्रश्न 10.
ऑक्सीसोम्स कहाँ पाये जाते हैं ?
उत्तर:
माइटोकॉण्ड्रिया की क्रिस्टी (cristae) पर।

प्रश्न 11.
फ्रेस्ट क्या होते हैं ?
उत्तर:
दो मेना को जोड़ने वाली लैमेली को फ्रेस्ट (freste) कहते हैं।

प्रश्न 12.
प्लाज्मोडेस्मेटा क्या है ?
उत्तर:
दो संलग्न कोशिकाओं के बीच स्थित जीवद्रव्य तन्तु (protoplasmic fibre) ।

प्रश्न 13.
प्लाज्मोडेस्मेटा क्या कार्य करते हैं ?
उत्तर:
दो संलग्न कोशिकाओं के बीच पदार्थों का आदान-प्रदान ।

प्रश्न 14.
दो ऐसे कोशिकांगों के नाम लिखिए जिनमें 70 S राइबोसोम्स पाये जाते हैं ?
उत्तर:
(i) माइटोकॉण्ड्रिया
(ii) हरित लवक।

प्रश्न 15.
कोशिका के दो अर्द्धस्वायत्त संस्थानों के नाम लिखिए।
उत्तर:
माइटोकॉण्ड्रिया तथा हरित लवक।

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प्रश्न 16.
प्रोटीनोप्लास्ट क्या है तथा ये कहाँ अधिक पाये जाते हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन संचय करने वाले ल्यूकोप्लास्ट। ये दलहनी बीजों में अधिकता में पाये जाते हैं।

प्रश्न 17.
एमाइलोप्लास्ट क्या हैं ? ये कहाँ पाये जाते हैं ?
उत्तर:
मण्ड का संचय करने वाले ल्यूकोप्लास्ट (leucoplast)। ये आलू कन्द, अन्न वाले बीजों आदि में अधिकता में पाये जाते हैं।

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प्रश्न 18.
खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका खुरदरी क्यों प्रतीत होती है ?
उत्तर:
इसकी सतह पर राइबोसोम्स (ribosomes ) उपस्थित होने के कारण ।

प्रश्न 19.
जीन्स कहाँ स्थित होते हैं ?
उत्तर:
गुणसूत्रों (chromosomes) पर।

प्रश्न 20.
यूक्रोमेटिन क्या होता है ?
उत्तर:
केन्द्रक के अन्दर क्रोमेटिन जाल जो हल्का स्टेन ( light stain ) लेता है यूक्रोमेटिन कहलाता है।

प्रश्न 21.
हिटरोक्रोमेटिन क्या होता है ?
उत्तर:
केन्द्रक के अन्दर क्रोमेटिन जाल (chromatin net) जो गहरा स्टेन लेता है हिटरोक्रोमेटिन ( heterochromatin) कहलाता है।

प्रश्न 22.
केन्द्रिका ( neucleolus) का क्या कार्य है ?
उत्तर:
RNA का संश्लेषण तथा राइबोसोम्स का निर्माण करना ।

प्रश्न 23.
एकक कला की विचारधारा किसने और कब प्रस्तुत की थी ?
उत्तर:
जे. डेविड रॉबर्टसन (J. David Robertson) ने 1959 में ।

प्रश्न 24.
प्लाज्मा झिल्ली की मोटाई कितनी होती है ?
उत्तर:
75 A ।

प्रश्न 25.
स्पाइरोगाइरा में किस प्रकार का क्लोरोप्लास्ट पाया जाता है ?
उत्तर:
फीते के आकर का ( ribbon shaped )।

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प्रश्न 26.
क्लोरोफिल में कौन-सी धातु उपस्थित होती है ?
उत्तर:
मैग्नीशियम (magnesium)।

प्रश्न 27.
पॉलीराइबोसोम क्या होते हैं ?
उत्तर:
लड़ी के रूप में व्यवस्थित राइबोसोम्स

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प्रश्न 28.
कोशिका की ऊर्जा मुद्रा का नाम लिखिए।
उत्तर:
एडिनोसिन ट्राइफास्फेट ( ATP)।

प्रश्न 29.
गुणसूत्र किन पदार्थों के बने होते हैं ?
उत्तर:
DNA, RNA तथा प्रोटीन्स के।

प्रश्न 30.
कौन-सा नाइट्रोजनी क्षार है जो DNA में पाया जाता है किन्तु RNA में नहीं पाया जाता है ?
उत्तर:
थायमीन (T)

प्रश्न 31.
डिक्टियोसोम्स क्या है ?
उत्तर:
पादप कोशिकाओं में गॉल्जीकाय को डिक्टियोसोम कहते हैं।

प्रश्न 32.
कौन-सा कोशिकांग ऐसा है जो बहुरूपता प्रदर्शित करता है ?
उत्तर:
लाइसोसोम (lysosome)।

प्रश्न 33.
पायरीनॉइड क्या होता है ?
उत्तर:
शैवालों में पायी जाने वाली रचना जिसमें प्रोटीन के चारों ओर मण्ड कण (starch grain) पाए जाते हैं।

(C) लघु उत्तरीय प्रश्न – I

प्रश्न 1.
प्रोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक कोशिका में दो अन्तर लिखिए।
उत्तर:
(i) प्रोकैरियोटिक कोशिका में हिस्टोन का अभाव होता है, जबकि यूकैरियोटिक कोशिका में उपस्थित होता है ।
(ii) प्रोकैरियोटिक कोशिका में कलाबद्ध कोशिकांग अनुपस्थित होते हैं, जबकि यूकैरियोटिक कोशिका में उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 2.
कोशिका के किन्हीं चार जीवित अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(i) केन्द्रक
(ii) माइटोकॉन्ड्रिया
(iii) लवक
(iv) गॉल्जीकाय।

प्रश्न 3.
पादप कोशिका में दो संचित तथा दो स्रावी पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
संचित पदार्थ –
(i) कार्बोहाइड्रेट
(ii) वसा ।

स्त्रावी पदार्थ –
(i) एन्जाइम
(ii) मकरन्द।

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प्रश्न 4.
पादप कोशिका के किन्हीं चार उत्सर्जी पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(i) एल्केलॉइड (Alkaloids)
(ii) टेनिन्स (Tannins)
(iii) रेजिन्स (Rasins)
(iv) गोंद (Gum )।

प्रश्न 5.
माइक्रोसोम क्या होते हैं ?
उत्तर:
माइक्रोसोम (Microsome ) – सेन्ट्रीफ्यूज द्वारा अलग किया हुआ कोशा का वह भाग जिसमें कुछ कलाएँ (विशेष रूप से ER के टूटे भाग) और राइबोसोम होते हैं, माइक्रोसोम (microsome) कहलाता है । पूर्ण कोशा के किसी भाग अथवा अंग के लिए यह शब्द प्रयोग नहीं किया जाता है

प्रश्न 6.
लोमासोम क्या होते हैं ?
उत्तर:
लोमासोम (Lomasome) – ये छोटी थैली के आकार की रचनाएँ हैं जो पादप कोशिकाओं में प्लाज्मालेमा (plasmalemma) तथा कोशिकाभित्ति के बीच पायी जाती है। ये सम्भवतः कोशिका भित्ति के विस्तार में सहायता करती हैं।

प्रश्न 7.
पिनोसाइटोसिस तथा फेगोसाइटोसिस से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
कोशिका, कोशिका कला से होकर अपने बाहरी वातावरण से भोजन ग्रहण करती है। ये भोज्य पदार्थ ठोस या तरल रूप में होते हैं। जब कोशिका कला द्वारा तरल पदार्थों को ग्रहण किया जाता है तो इसे पिनोसाइटोसिस (pinocytosis) कहते हैं तथा जब कोशिका कला द्वारा ठोस कणों को ग्रहण किया जाता है तो इसे फैगोसाइटोसिस (phagocytosis) कहते हैं।

प्रश्न 8.
स्रावी पदार्थ क्या होते हैं ?
उत्तर:
स्त्रावी पदार्थ (Secretory Substances ) – पादपों में कुछ उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप कुछ ऐसे पदार्थ बनते हैं जिनका पोषण एवं वृद्धि से सम्बन्ध नहीं होता है। ये स्रावी पदार्थ ( secretory substances) कहलाते हैं। ये पदार्थ कुछ आशयों या ग्रन्थियों में पाये जाते हैं। जैसे-मकरन्द, एन्जाइम, गोंद आदि ।

प्रश्न 9.
संरचनात्मक कार्बोहाइड्रेट्स कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
संरचनात्मक कार्बोहाइड्रेट्स तीन प्रकार के होते हैं –

  • मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides )-जैसे-ट्रायोजेस, टेट्रोजेस, पेंटोजेस, हेक्सोजेस आदि।
  • औलिगोसैकेराइड्स माल्टोस, लैक्टोस, रेफिनोसे आदि (Oligosaccharides )-जैसे-सुक्रोस,
  • पॉलीसेकेराइड्स (Polysaccharides )-जैसे-सेल्युलोस, स्टार्च, ग्लाइकोजन आदि।

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प्रश्न 10.
सैट गुणसूत्र क्या होते हैं ?
उत्तर:
सैट गुणसूत्र ( Sat chromosome) : कुछ विशेष गुणसूत्रों पर एक द्वितीय संकीर्णन (secondary constriction) भी होता है। इसके ऊपर का घुण्डीनुमा भाग सैटेलाइट कहलाता है और सैटेलाइट युक्त गुणसूत्र को सैट गुणसूत्र (Sat-chromosome) कहते हैं ।

प्रश्न 11.
विषम पिक्नोसिस किसे कहते हैं ?
उत्तर:
विषम पिक्नोसिस (Heteropycnosis) – क्षारीय अभिरंजन से क्रोमेटिन पदार्थ के दो स्पष्ट क्षेत्र होने की घटना को विषम पिक्नोसिस कहते हैं। कोशिका विभाजन की अन्तरावस्था (interphase) में हल्के अभिरंजित क्षेत्र यूक्रोमेटिन (euchromatin) तथा गहरे अभिरंजित क्षेत्र हिटरोक्रोमेटिन (heterochromatin) बनते हैं।

प्रश्न 12.
न्यूक्लियो प्लाज्मिक इण्डेक्स किसे कहते हैं ?
उत्तर:
केन्द्रक एवं कोशिका द्रव्य के आयतन में एक निश्चित अनुपात होता है, जिसे न्यूक्लियोप्लाज्मिक इण्डैक्स ( neucleoplasmic index) कहते हैं।
हर्टविग ने इसे निम्न सूत्र से प्रदर्शित किया-
\(N P=\frac{V n}{V c-V n}\)
यहाँ NP = केन्द्रकद्रव्यी सूचकांक
Vn = केन्द्रक का आयतन
Vc कोशिका द्रव्य का आयतन

(D) लघु उत्तरीय प्रश्न – II

प्रश्न 1.
कोशिका सिद्धान्त क्या है तथा इसे किसने प्रतिपादित किया ?
उत्तर:
कोशिका सिद्धान्त (Cell theory):
श्लाइडेन तथा श्वान नामक वैज्ञानिकों ने कोशिका की संरचना तथा उत्पत्ति के सम्बन्ध में अपने कुछ तथ्य प्रस्तुत किए जिन्हें कोशिका सिद्धान्त कहते हैं इनके अनुसार –

  • सभी जीवधारियों के शरीर का निर्माण कोशिकाओं से होता है।
  • कोशिका शरीर की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है।
  • नयी कोशिकाओं की उत्पत्ति पूर्ववर्ती जीवित कोशिकाओं से होती है प्रत्येक जीवधारी प्रारम्भ में एक कोशिकीय होता है (जैसे-युग्मनज ) परन्तु इसके विकास से जीवधारी बहुकोशिकीय हो जाता है।

प्रश्न 2.
रॉबर्टसन द्वारा प्रस्तुत कोशिका झिल्ली का एकक कला (Unit membrane) मत पर सचित्र टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
एकक कला मत (Unit membrane theory): कोशिका कला की संरचना के इस मत को रॉबर्टसन ( roberson) ने सन् 1959 में प्रस्तुत चित्र – कोशिका कला – एकक कला (Unit membrane) रॉबर्टसन का मॉडल किया। इस मत के अनुसार कला की मोटाई 75 Å होती है, जो तीन परतों की बनी होती है। बाहरी दोनों परतें प्रोटीन (protein) की तथा प्रत्येक की मोटाई 20 A होती है। मध्य परत लिपिड (lipids ) की बनी होती है जिसकी मोटाई 35 A होती है। यह एकक कला सभी कोशिकांगों में समान रूप से पायी जाती है।
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प्रश्न 3.
कोशिका कला की संरचना के तरल मोजेक मॉडल का संक्षेप में सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तरल मोजेक मॉडल (Fluid mosaic model ) – यह मॉडल सिंगर तथा निकोल्सन (Singer and Nicolson) ने सन् 1974 में प्रस्तुत किया। इसके अनुसार कोशिका कला लिपिड की बनी द्विआण्विक परत (bimolecular layer) होती है। लिपिड की दोनों परतों के बाहर की ओर बाह्य प्रोटीन की एक-एक परत पायी जाती है जिसे बाह्य प्रोटीन (extrinsic protein) कहते हैं। लिपिड परत में कुछ प्रोटीन अन्दर तक धँसी रहती है। इन्हें अन्त: प्रोटीन (intrinsic protein) कहते हैं। लिपिड परत में स्थित फॉस्फोलिपिड अणुओं के दो छोर होते हैं-
(I) जल रागी शीर्ष (hydrophilic head) जो प्रोटीन परत की ओर होता है।

(ii) जल विरागी पुच्छ (hydrophobic tail) जो कला के केन्द्र की ओर होता है।
दोनों प्रोटीन परतों की मोटाई 20-20 Å तथा फॉस्फोलिपिड द्विपरत (phospholipid bilayer) की मोटाई 35 होती है। इस प्रकार प्रोटीन लिपिड द्विपरत-प्रोटीन संरचना प्रदर्शित करती है। आन्तरिक प्रोटीन लिपिड परत में हिलडुल सकते हैं इसलिए इसे तरल मोजेक मॉडल (fluid mosaic model) कहते हैं।
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प्रश्न 4.
प्रोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक कोशिकाओं में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
प्रोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक कोशिकाओं में अन्तर
(Differences between Prokaryotic and Eukaryotic cells)

पूर्वकेन्द्रीय कोशिका (Prokaryotic cells)सुकेन्द्रकीय कोशिका (Eukaryotic cells)
1. केन्द्रक कला, अनुपस्थित होने के कारण आनुवंशिक पदार्थ (genetic material) कोशा द्रव्य में नग्न पड़ा रहता है। इसे असत्य केन्द्रक कहते हैं।केन्द्रक कला उपस्थित होने से आनुवंशिक पदार्थ (genetic material) कला के अन्दर व्यवस्थित होता है। इसे सत्य केन्द्रक कहते हैं।
2. आनुवंशिक पदार्थ (genetic material) हिस्टोन रहित होता है।आनुवंशिक पदार्थ (genetic material) हिस्टोन युक्त होता है।
3. केवल एक गुणसूत्र (chromosome) पाया जाता है।एक अधिक गुणसूत्र (chromosomes) पाए जाते हैं। कलाबद्ध कोशिकांग उपस्थित होते हैं।
4. कलाबद्ध कोशिकांग जैसे लवक, माइटोकॉन्ड्रिया ER आदि अनुपस्थित होते हैं।इनमें 80 S राइबोसोम्स (ribosomes) पाए जाते हैं मीसोसोम्स (mesosomes ) नहीं पाए जाते है।
5. इसमें 70 S (ribosomes) पाए जाते हैं।अपेक्षाकृत बड़े आकार की होती है।
6. कला के वलनों में मीसोसोम (mesosomes ) पाए जाते हैं।सुकेन्द्रकीय कोशिका (Eukaryotic cells)
7. आकार में अपेक्षाकृत छोटे आकार की होती है।केन्द्रक कला उपस्थित होने से आनुवंशिक पदार्थ (genetic material) कला के अन्दर व्यवस्थित होता है। इसे सत्य केन्द्रक कहते हैं।

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प्रश्न 5.
पादप कोशिका भित्तियों में विभिन्न प्रकार के स्थूलनों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कोशिका भित्ति के विभिन्न प्रकार के स्थूलन:
(Various types of Thickening of cell wall)
पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ति पायी जाती है जो मुख्य रूप से सैलुलोस की बनी होती है। इसका प्रमुख कार्य कोशिका को निश्चित आकार तथा दृढ़ता प्रदान करना होता है। यह कोशिका की सुरक्षा तथा जल अवशोषण भी करती है। कोशिका भित्ति पर जीवद्रव्य से स्रावित विभिन्न पदार्थों जैसे- लिग्निन, क्यूटिन, सुबेरिन आदि का जमाव होता रहता है।

जिसके कारण कोशिका भित्ति अनेक स्थानों पर स्थूलित हो जाती है। ये स्थूलन कोनों पर अधिक होते हैं। जाइलम वाहिनिकाओं (xylem tracheids) में लिग्निन के एकत्र होने से स्थूलन होता है। स्थूलन विभिन्न प्रकार के होते हैं। जैसे– छल्लेदार (Annular), सीढ़ीनुमा ( Sclariform ), जालिकावत (Raticulate), सर्पिल (Spiral), गर्तमय (Pitted) इत्यादि। मरुद्भिदी पादपों की बाह्य त्वचा कोशिकाओं पर क्यूटिन का स्थूलन, कार्क कोशिकाओं की भित्तियों पर सुबेरिन का स्थूलन पाया जाता है। इसके कारण कोशिकाएँ जल के लिए अपारगम्य हो जाती हैं।

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प्रश्न 6.
पादप तथा जन्तु कोशिका में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
पादप कोशिका एवं जन्तु कोशिका में अन्तर
(Differences between Plant cell and Animal cell)

पादप कोशिका (Plant cell )जन्तु कोशिका (Animal cell)
1. दृढ़ कोशिका (rigid cell wall) भित्ति उपस्थित होती है ।कोशिका भित्ति (cell wall) का अभाव होता है।
2. कोशिका भित्ति के अन्दर तथा जीवद्रव्य के बाहर की ओर प्लाज्मा कला होती है।प्लाज्मा कला जीवद्रव्य के ऊपर सबसे बाहरी आवरण बनाती है।
3. लवक (plastids ) पाए जाते हैं।लवकों (plastids ) का अभाव होता है।
4. बड़ी-बड़ी रिक्तिकाएँ (vacuoles) पायी जाती हैं।रिक्तिकाएँ ( vacuoles) या तो बहुत छोटी या अनुपस्थित होती हैं ।
5. इनमें तारक काय का अभाव होता है।इनमें केन्द्रक के समीप तारक काय पाया जाता है।
6. इनमें डिक्टियोसोम मिलते हैं।इनमें गॉल्जीकाय मिलते हैं।
7. कोशिका विभाजन मध्य पट्ट होता है।कोशिका विभाजन खाँच विधि से होता है।

प्रश्न 7.
केन्द्रक के महत्व को बताने के लिए हेमरलिंग के प्रयोग को समझाइए ।
उत्तर:
केन्द्रक के महत्व के लिए हेमरलिग का प्रयोग (Experiment of Hammerling for importance of necleus):
जे. हेमरलिंग (J. Hammerling) ने 1953 में केन्द्रक के महत्व को समझाने के लिए ऐसीटाबुलेरिया (Acetabularia) नामक एककोशिकीय शैवाल (unicellular algae) पर अपने प्रयोग किये। ऐसीटाुलेरिया पौधे को तीन भागों में विभेदित किया जा सकता है-टोपी (cap), वृन्त तथा शाखित पाद (stalk)। ऐसीटाबुलुलेरिया क्रनुलेटी (A. cranulate) में टोपी का आकार छाताकार होता है तथा ए. मेडीटेरेनिया (A. mediterranea) में टोपी का आकार गुच्छित होता है।

यदि इस शैवाल के तीनों भागों को काटकर अलग कर दिया जाय तथा पहली जाति के वृन्त को दूसरी जाति के पाद पर तथा दूसरी जाति के वृन्त को पहली जाति के पाद पर खखा जाए तो दोनों जातियों में पुनर्निर्मित टोपियाँ एक दूसरी में उलर-पुलट जाती हैं अर्थात् पहली जाति में छाताकार टोपी तथा दूसरी जाति में गच्छित टोपी उत्पन्न होती है। इससे सिद्ध होता है कि टोपी के आकार का नियंत्रण पाद में स्थित केन्द्रक (nucleus) द्वारा किया जाता है।

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प्रश्न 8.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-
(क) परऑक्सीसोम
(ख) स्फीरोसोम ।
उत्तर:
पर ऑक्सीसोम (Peroxysome ) – ये सूक्ष्म गोलाकार कण हैं जो एक परत वाली झिल्ली से ढंके होते हैं। ये उन पौधों में पाये जाते हैं जिनमें प्रकाश श्वसन की क्रिया होती है। जन्तु कोशिओं में ये जिगर एवं गुरदे में तथा प्रोटोजोन्स (protozoans) में पाये जाते हैं। इनमें सूक्ष्म कणिकाओं वाली आधात्री ( matrix ) होती है जिसके केन्द्र में एक समांग तथा अपारदर्शी कोर होती है। सम्भवतः इनका निर्माण अन्तः प्रद्रव्यी जालिका (ER ) से होता है। इनमें ग्लाइकोलिक अम्ल, ऑक्सीडेज, परऑक्सीडेज केटालेज, डी अमीनो अम्ल ऑक्सीडेज अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इनकी खोज टोलबर्ट (Tolbert ) ने की थी।

(ख) स्फीरोसोम (Spherosome ) – ये सूक्ष्म गोलाकार कण हैं जिनका व्यास 0.244 तक होता है। सम्भवतः इनका निर्माण अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के टूटने से होता है। इनमें हाइड्रोलेज, प्रोटीएज, रिबोन्यूक्लिएज, फास्फोटेज एवं ईस्टरेज विकर पाये जाते हैं। ये केवल पादप कोशिकाओं में पाए जाते हैं और जन्तु कोशिकाओं के लाइसोसोम (lysosome) की तरह होते हैं। डेनजियर्ड ने इन्हें स्फीरोसोम नाम दिया।

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प्रश्न 9.
प्लाज्मोडेमेटा पर सचित्र टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
प्लाज्मोडेस्पेटा (Plasmodesmata) – पादप कोशिकाओं में मध्य पटलिका (middle lamella) तथा कोशिका भित्तियों के बीच छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। इन छिद्रों से होकर कोशिका का जीवद्रव्य समीपवर्ती कोशिकाओं में जीवद्रव्य से निरंतरता बनाए रखता है। इस संरचना को प्लाज्मोडेस्मेटा (plasmodemata) कहते हैं। इनके बारे में स्ट्रास वर्गर ने सर्वप्रथम बताया था। ये एक कोशिका के पदार्थों का दूसरी कोशिका में आवागमन का कार्य करते हैं।
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प्रश्न 10.
विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
कोशिकाएँ (Cells) आमाप, आकृति एवं कार्य की दृष्टि से अत्यधिक विभिन्नता प्रदर्शित करती हैं। माइकोप्लाज्मा (PPLO) की कोशिकाएँ आकार में सबसे छोटी (0-14m से 0.3m) होती हैं। जीवाणु कोशिकाएँ सामान्यतया 3 से 5m आकार की होती हैं। ऐसीटाबुलेरिया नामक शैवाल सबसे बड़ा एक कोशिकीय शैवाल है। शतुर्मुर्ग ( Ostrich ) का अण्डा सबसे बड़ी जन्तु कोशिका है, जबकि तंत्रिका कोशिका सबसे लम्बी जन्तु कोशिका है। कोशिकाएँ गोलाकार, अण्डाकार, चपटी, बहुभुजीय, बिम्बाकार, घनाकार आदि आकार की हो सकती हैं।
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प्रश्न 11.
सिस्टोलिथ क्या होते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
सिस्टोलिथ (Cystolith) – कुछ पौधों जैसे – बरगद, रबर, कनेर आदि की बहुस्तरीय बाह्य त्वचा की कोशिकाएँ आकार में बड़ी हो जाती हैं। जिनमें कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO) के कण क्रिस्टल या गुच्छों के रूप में पाए जाते हैं। ऐसी कोशिका की कोशिका भित्ति में सेलुलोस का एक वृन्त होता है जिस पर ये क्रिस्टल अंगूर के गुच्छे की भाँति लगे होते हैं। सिस्टोलिथ इन्हें (cystolith) कहते सिस्टोलिथ हैं । जिस HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 8 कोशिका जीवन की इकाई - 35

प्रश्न 12.
रेफाइड्स तथा इन्युलिनं पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
रेफाइड्स (Raphides ) – ये अकार्बनिक अपशिष्ट पदार्थ हैं, जो कैल्शियम ऑक्सेलेट (calcium oxalate) के क्रिस्टलों के रूप में कुछ पौधों की पत्तियों में पाए जाते हैं; जैसे- समुद्रसोख (Echomnia), अरबी, गुलमेंहदी आदि में। अरबी / नागफनी (Opuntia) आदि में रेफाइड्स समूह में न होकर सितारे के आकार की संरचना बनाते हैं जो स्फिरेफाइड्स कहलाते हैं।
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इन्युलिन ( Inulin) – यह घुलनशील पॉलीसेकेराइड्स है। डहेलिया (Dahelia) की कन्दिल जड़ों में इन्युलिन (insulin crystal) भोज्य पदार्थ के रूप में संचित रहता है । इन्युलिन एल्कोहॉल या ग्लिसरीन में अघुलनशील है। ऐसे पौधों की जड़ों को काटकर एल्कोहॉल या ग्लिसरीन में रखने से ये अवक्षेपित होकर पंखनुमा क्रिस्टल बना लेता है। यह मण्ड के समान पदार्थ होता है।
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प्रश्न 13.
सक्रिय परिवहन से आप क्या समझते हैं ? सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सक्रिय परिवहन ( Active transport ) – सक्रिय परिवहन में आयन या अणुओं का परिवहन कोशिका कला से होकर सान्द्रता प्रवणता के विपरीत होता है अर्थात् निम्न सान्द्रता वाले स्थान से उच्च सान्द्रता वाले स्थान की ओर होता है। यह ऊर्जा निर्भर प्रक्रिया है जो वाहक प्रोटीन (carrier protein) द्वारा सम्पन्न होती है। ऊर्जा निर्भर प्रक्रिया में कोशिका में कोशिका कला से अणुओं या आयन्स को ले जाने के लिए आयन्स या अणुवाहक (carriers ) ऊर्जा का व्यय करते हैं। यह क्रिया एन्ज़ाइम की उपस्थिति में होती है तथा ATP ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं।
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प्रश्न 14.
मीसोसोम्स क्या है ? ये कहाँ मिलते हैं ? मीसोसोम की संरचना का चित्र बनाकर इसके कार्य लिखिए।
उत्तर:
मीसोसोम्स (Mesosomes ) – मीसोसोम जीवाणु कोशिका (barcterial cell) में कोशिका कला के अन्तर्वलन (infold) से बनी नालवत (tubular) या थैली (vesicular) संरचनाएँ हैं। ये अधिकांशतः ग्राम ऋणात्मक जीवाणुओं में पायी जाती हैं। इनमें श्वसन के विकर पाए जाते हैं और सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं के माइटोकॉन्ड्रिया के समरूप हैं अर्थात् श्वसन क्रिया में भाग लेते हैं। कोशिका विभाजन एवं एण्डोस्पोर (endospore) बनते समय कोशिका भित्ति के बनने में भी सहायता करते हैं।
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प्रश्न 15.
न्यूक्लिओसोम पर सचित्र टिपणी लिखिए।
उत्तर:
न्यूक्लिओसोम (Neucleosome)-वुङकोक (Woodcock) नामक वैज्ञानिक ने सन् 1973 में क्रोमेटिन (chromatin) की संरचना का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्र्शी की सहायता से विश्लेषण किया तथा बताया कि प्रत्येक क्रोमेटिन पर मोतीनुमा क्रोमेटिन पर मोतीनुमा (beaded) रचनाएँ होती है जिन्हं न्यूक्सियोसोम (nucleosome) कहते हैं। प्रत्येक न्यूक्लियोसोम हिस्टोन प्रोटीन्स तथा DNA की बनी अर्द्ध-बेलनाकार संरचना है। इसके मध्य का भाग हिस्टोन से बना कोर (core) होता है। कोर में हिस्टोनप्रोटीन H2 A, H2 B, H3 तथा H4 के दो-दो अणु होते हैं इसे अष्टक दो-दो अणु होते हैं इसे अष्टक कहते हैं। इस कोर के चारों ओर DNA की कुण्डली मिलती है। इसमें लगभग 166 पॉली न्यूक्लिओटाइड (nucleotides) मिलते हैं। दो न्यूक्लिओसोम (nucleosome) को जोड़ने वाले DNA को लिंकर DNA कहते हैं।
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H1 प्रोटीन न्यूक्लिओटाइड को कसने का कार्य करती हैं। छ: न्यूक्लिओसोम पुन: कुण्डलित होकर एक सोलेनाइड (solenoid) बनाते हैं। बहुत से सोलेनाइड कुण्डलित होकर एक क्रोमेटिन तन्तु बनाते हैं। क्लुग (Klug 1982) को सोलेनॉइड की संरचना बताने के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।

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प्रश्न 16.
पक्ष्पाभिका तथा कशाभिका में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
पक्ष्माभिका एवं कशाभिका में अन्तर (Differences between Cilia and Flagella)

पक्ष्माभिका (Cilia)कशाभिका (Flagella)
ये संख्या में अधिक होते हैं।इनकी संख्या कम होती है।
(ii) ये कम लम्बे 0.5-1.0μ होते हैं।ये अधिक लम्बे (1μ-4μ) होते हैं।
(iii) पक्ष्माभिकाएँ समूह में गति करती है ।कशाभिका एकल तथा स्वतंत्र रूप से गति कर सकती है।
(iv) इनकी गति घड़ी के पेण्डुलम की भाँति होती है।इसकी गति लहरदार होती हैं।
(v) ये कोशिका के चारों ओर पाये जाते हैं।ये प्रायः कोशिका में एक या दो ओर पाये जाते हैं।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये-
(अ) क्वाण्टासोम
(ब) जीन।
उत्तर:
(अ) क्वाण्टासोम (Quantasome)-पादप कोशिकाओं में हरित लवक (plastid) के स्ट्रोमा में पटलिकाएँ (lamellae) पायी जाती हैं। ये पटलिकाएँ सिक्कों के ढेर के समान व्यवस्थित होती हैं, इस ढेर को प्रेनम (granum) कहते हैं। पटलिकाओं पर असंख्य सूक्ष्म कण पाये जाते हैं। इन कणों को पार्क एवं पॉन (Park and Pon, 1961) ने क्वाण्टासोम (quantasome) नाम दिया। प्रत्येक क्वांटासोम लगभग 230 पर्णहरित अणु (chlorophyll molecules) धारण करता है। क्वांण्टासोम (Quantasomes) को प्रकाश संश्लेषण के केन्द्र कहते हैं।

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(ब) जीन (Gene)-जीन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम जोहान्सन (Johanson) ने किया। जीन किसी लक्षण (Character) की आनुवंशिकी को नियंत्रित करने वाली इकाई होते हैं। विषाणुओं को छोड़कर सभी जीवों में जीन DNA का एक विशेष खण्ड होता है। जीन्स के विषय में अनेक धारणाएँ हैं। गुणसूत्र के क्रोमोमीयर्स (chromomeres) पर इनकी उपस्थिति समूह अथवा एकल रूप में सर्वमान्य है। लैम्पबुश गुणसूत्रों (lampbrush chromsome) में लूप तथा अक्ष दोनों में इनकी उपस्थिति स्पष्ट है।

आधुनिक विचारधारा के अनुसार जीन को कार्यात्मक इकाई सिस्ट्रॉन (cistron), उत्परिवर्तनात्मक इकाई म्यूटॉन (muton) तथा पुनर्सयोजन की इकाई रीकोन (recon) का समूह माना जाता है। जीन प्रोटीन संश्लेषण द्वारा लक्षणों का निर्धारण करते हैं।

प्रश्न 18.
विभिन्न प्रकार के मण्ड कणों पर सचित्र टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
मण्ड कण (Starch grains) – हरे पादपों में भोज्य पदार्थ प्रायः मण्ड (starch) के रूप में संचित होता है। संचित मण्ड अवर्णी लवकों (leucoplasts) में मिलते हैं और इन्हें एमाइलोप्लास्ट (amyloplast) कहते हैं। मण्ड कण विभिन्न प्रकार के जैसे-अण्डाकार (आलू), गोलाकार (मटर), चपटे (गेहुँ), अथवा मुग्दाकार (club shaped)-एवं बहुभुजी (polygonal) होते हैं। कैना (Canna) के मण्ड कण बड़े जबकि चावल के मण्ड कण लम्बे व छोटे होते हैं। मण्ड कण की उत्पत्ति का केन्द्र नाभिक (hilum) कहलाता है, जिसके ऊपर मण्ड परतें बनाता हुआ होता है।

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नाभिक की स्थिति के अनुसार मण्ड कण दो प्रकार के होते हैं –
1. संकेन्द्री (Concentric)-इसमें नाभिक केन्द्र में स्थित होता है। जैसे-गेहूँ, मटर, सेम आदि में।

2. उाकेन्द्री (Ecentric)-इसमें नाभिक एक ओर स्थित होता है, जैसे-आलू, चावल आदि में।

कभी-कभी मण्ड कणों में एक से अधिक नाभिक मिलते हैं ये संयुक्त मण्ड कण कहलाते हैं, जैसे चावल एवं शकरकन्द। मण्ड जल एवं एल्कोहॉल में अघुलनशील हैं। चावल में 70-80 गेहूँ में 70 मक्का में 68 तथा आलू में 20 मण्ड मिलता है।

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प्रश्न 19.
परासरण से आप क्या समझते हैं ? अन्त: परासरण एवं बाहा परासरण में अन्तर लिखिये।
उत्तर:
परासरण (Osmosis) – किसी अर्द्धपारगम्य कला से होकर विलायक के अणुओं का उनकी अधिक सान्द्रता से कम सान्द्रता की ओर विसरण की क्रिया परासरण (osmosis) कहलाती है। यह क्रिया तब तक चलती है जब तक कि कला के दोनों ओर साम्यावस्था स्थापित नहीं हो जाती।

अन्त: परासरण तथा बाउ परासरण में अन्तर (Differences between endosmosis and exoemosis) –

अन्त: परासरण (Endosmosis)बंड परासरण (Exosmosis)
इसमें परासरण बाह्य माध्यम से अन्दर की ओर होता है।इसमें परासरण अन्दर से बाह्य माध्यम की ओर होता है।
इसमें विलायक अणु सान्द्र घोल की ओर गति करते हैं।इसमें तनु घोल अन्दर होता है जिसमें विलायक (solvent) अणु बाहर की ओर गति करते हैं।

प्रश्न 20.
परासरण एवं विसरण में अन्तर लिखिये।
उत्तर:
परासरण एवं विसरण में अन्तर (Differences between osmosis and diffusion)

परासरण (Osmosis)विसरण (Diffusion)
इसमें विलायक के अणु अर्द्धपारगम्य (semipermeable membrane) से होकर विसरित होते हैं ।इसमें अर्द्धपारगम्य झिल्ली (Semipermeable) आवश्यकता नहीं होती। अणु स्वतंत्र रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान को गति करते हैं।
इसमें विलायक के अणुओं का प्रवाह परासरण दाब (OP) पर निर्भर करता है ।इसमें अणुओं का प्रवाह विसरण दाब (diffusion pressure) पर निर्भर करता है।
विलायक के प्रवाह की दर घोल की सान्द्रता पर निर्भर करती है।विसरण की दर पदार्थ के वाष्प घनत्व पर निर्भर करती है।

प्रश्न 21.
कोशिका के दो अर्द्धस्वायत्त संस्थानों के नाम लिखिये। इन्हें यह नाम क्यों दिया गया है ? संक्षेप में समझाइये।
उत्तर:
माइटोकॉष्ट्रिया (Mitochondria) तथा हरित लवक (Chborophylc) को कोशिका के अर्ध्ध स्वायत्त संस्थान (autonomous body) कहा जाता है। माइटोकॉण्डिया तथा हरित लवक दोनों में ही DNA की थोड़ी-सी मात्रा उपस्थित होती है। इसकी उपस्थिति के कारण ये दोनों कोशिकांग स्वतंत्र रूप से विभाजन करके अपनी संख्या बढ़ा सकते हैं। इन दोनों कोशिकांगों में 70 S प्रकार के राइबोसोम्स भी होते हैं। जिनकी सहायता से ये आवश्यक प्रोटीन का संश्लेषण DNA के नियंत्रण द्वारा कर सकते हैं। इसीलिए इन्हें अर्द्ध-स्वायत्त संस्थान कहते हैं।

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प्रश्न 22.
अवर्णी लवक तथा वर्णी लवक में अन्तर लिखिये। उत्तर-अवर्णी लवक तथा वर्णी लवक में अन्तर (Differences between Leucoplants and Chromoplasts)

अवर्णी लवक (Leucoplast)वर्णी लवक (Chromoplast)
ये प्राय: पौधे के भूमिगत भागों जैसे-प्रकन्द (rhizome), घनकन्द (corn) शल्क कन्द (bulb) तथा-अन्य संचयी भागों में पाया जाता है।ये पौधे के वायवीय भागों जैसे-पुष्प की पंखुड़ियाँ, फलों के छिलके आदि में पाये जाते हैं।
यह रंगहीन होता है परन्तु प्रकाश मिलने पर हरे या रंगीन हो सकते हैं।ये विभिन्न रंगों के होते हैं और अन्य लवकों (plasticls) में परिवर्तित हो सकते हैं।
ये भोज्य पदार्थों का संचय करते हैं।ये भोज्य पदार्थों का संचय नहीं करते। परन्तु पौधों के विभिन्न भागों को विशिष्ट रंग प्रदान करते हैं।

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प्रश्न 23.
साइटोपंजर क्या होता है ? समझाइये।
उत्तर:
साइटोपंजर (Cytoskeletal Structure) – प्रोटीनयुक्त जालिकावत् तन्तु जो कोशिका द्रव्य में मिलते हैं साइटोपंजर कहलाते हैं। इनमें तीन प्रकार के तन्तु होते हैं –
(i) सूक्ष्म तन्तुक (microfilaments)
(ii) सूक्ष्मनलिका (microtubules) तथा
(iii) मध्यस्थ तन्तु (intermediate filaments) I
माइक्रोफिलामेण्ट लगभग 8 nmव्यास के होते हैं। जो बिखरे हुए या समान्तर समूहों में व्यवस्थित होकर कोशिका की अधात्री (matrix) में पड़े रहते हैं। इनका निर्माण एक्टिन सदृश प्रोटीन्स से होता है। साइटोपंजर (cytoskeleton) कोशिका को यांत्रिक दृढ़ता तथा कोशिका के आकार तथा गति को बनाये रखता है।

प्रश्न 24.
खुदरी तथा चिकनी अन्त: प्रद्रव्यी जालिका में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
खुरदरी अन्त:प्रद्रष्यी जालिका तथा चिकनी अन्त: प्रद्रव्यमी जालिका (Differences between rough endoplasmic reticulum and smooth endoplasmic reticulum)

खुरदरी अन्त:प्रद्रव्यी जालिका (Rough Endoplasmic Reticulum)चिकनी अन्त:प्रद्रव्यी जालिका (Smooth Endoplasmic Reticulum)
इनकी सतह पर राइबोसोम (ribosomes) होते हैं जिनके कारण यह खुरदरी (rough) प्रतीत होती हैं।इनकी सतह पर राइबोसोम्स का अभाव होता है।
ये प्रोटीन्स, एन्जाइम के संश्लेषण में भाग लेती है।ये लिपोप्रोटीन्स, ग्लाइकोजन्स, ग्लिसराइड्स, स्टीरॉइड्स, हार्मोन्स आदि के संश्लेषण में भाग लेती है।

प्रश्न 25.
प्राम धनात्मक तथा ग्राम ऋणात्मक जीवाणुओं में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
भाम धनात्मक तथा ग्राम ऋणात्मक जीवाणुओं में अन्तर (Differences between Gram positive and Gram negative Bacteria)-
प्राम धनात्पक जीवाणु (Gram + ve Bacteria)

प्राम धनात्पक जीवाणु (Gram + ve Bacteria)ग्राम ऋणात्मक जीवाणु (Gram -ve Bacteria)
1. कोशिका भित्ति पतली 100-200 होती हैं।कोशिका भित्ति मोटी 70-120  होती है।
2. इनमें मीसोसोम्स (mesosomes) पाए जाते हैं।इनमें मीसोसोम्स अनुपस्थित या अल्पविकसित होते हैं।
3. इनमें रोम या पिलाई (pili) अनुपस्थित होते हैं।इनमें रोम या पिलाई उपस्थित होते हैं।
4. ये प्रति जैविकों के लिए कम प्रतिरोधी होते हैं।ये प्रतिजैविकों के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं।
5. क्रिस्टल वायलेट तथा आयोडीन का स्टेन एथिल ऐल्कोहॉल से धोने के बाद भी बैंगनी रह जाता है।क्रिस्टल वायलेट (crystgal violet) स्टेन एथिल ऐल्कोहॉल से धोने से धुलकर रंगहीन हो जाते हैं।

प्रश्न 25.
जन्तु कोशिका का नामांकित चित्र बनाइये।
उत्तर:
कोशिका का समग्र अवलोकन (Overall review of Cell)
प्याज की झिल्ली में देखी गयी कोशिका जो एक प्रारूपी पादप कोशिका है, जिसकी बाहरी सतह पर एक स्पष्ट कोशिका भित्ति व इसके ठीक नीचे कोशिका कला होती है। मनुष्य के गाल की कोशिका के संगठन में बाहर की ओर केवल एक कलावत् संरचना दिखाई देती है। दोनों ही कोशिकाओं के अन्दर दोहरी कला से घिरी एक संरचना होती है जिसे केन्द्रक (nucleus) कहते हैं। केन्द्रक के अन्दर गुणसूत्र होते हैं जिनमें आनुवंशिक पदार्थ डी. एन. ए. होता है। ऐसी कोशिकाएँ जिनमें कलायुक्त केन्द्रक होतां है। यूकरियोटिक कोशिकाएँ (eukaryotic cells) कहलाती हैं। ऐसी कोशिकाएँ जिनमें कलाबद्ध केन्द्रक नहीं मिलता है उन्हें प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ (prokaryotic cell) कहते हैं।

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प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिकाओं में इसके आयतन को घेरे हुए एक अर्द्धतरल द्रव मिलता है जिसे कोशिका द्रव्य कहते हैं। पादप एवं जन्तु कोशिकाओं दोनों में कोशिकीय क्रियाओं के लिए कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) एक प्रमुख स्थल होता है। कोशिका की जैविक अवस्था सम्बन्धी विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाएँ यहीं सम्पन्न होती हैं।

कोशिका-आकृति माप एवं आयतन (Cell : Shape, Size and Volume) आकृति (Shape)-जीवधारियों की कोशिकाएँ आकृति में अत्यधिक विविधता दर्शाती हैं। कोशिकाएँ गोल (Spherical), चपटी, (flat) अण्डाकार (ovate), नलिकाकार (tubular), ताराकृत (starshaped), तर्कुआकार (spindle shaped) अथवा अनियमित आकार की हो सकती हैं। इनकी आकृति स्थाई होती है।
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माप (Size) -कोशिका सामान्यतः 1-2 mu m से 100 mके व्यास की होती हैं। माइकोप्लाज्मा गैलीसैप्टिकम (Mycoplasma gallisepticum = Pleuro Pneumania Like Organism – PPLO) अब तक देखी गयी सबसे छोटी कोशिका है 1.0 एक जीवाणु का 10 भाग)। प्राणियों में सबसे लम्बी कोशिका, तंत्रिका कोशिका (लम्बाई 90 सेमी) तथा प्राणियों की सबसे बड़ी व्यास वाली कोशिका शुतुरमुर्ग (Ostrich) का अण्डा 170 155 mm है। ऐसीटाबुलेरिया (Acetabularia) जो एक कोशिकीय शैवाल है, की लम्बाई 10 सेमी. तक होती है तथा दूसरे एक कोशिकीय शैवाल कौलर्पा (Caulerpa) की कुछ जातियों की लम्बाई एक मीटर तक होती है। बोहमेरिया निविया (Bochmeria nivia) पौधे की कोशिकाओं में रेमी (Rami) के रेशों की लम्बाई 55 सेमी तक होती है। राइजोपस (Rhizopus) नामक कवक बहुकेन्द्री परन्तु एक कोशिकीय होता है। इनकी लम्बाई 90 सेमी तक होती है।

आयतन (Volume) -एक कोशिकीय जीव को सभी क्रियाएँ जैसे गैस विनिमय, पोषण, अवशोषण तथा उपापचयी क्रियाएँ (metabolic activities) आदि एक ही कोशिका में सम्पन्न करने होते हैं। इन सभी कार्यों के लिए अधिक स्थान (space) की आवश्यकता होती है। यदि सतही क्षेत्र (surface area) में वृद्धि होती है तो साथ-साथ आयतन (volume) भी बढ़ता है परन्तु समान अनुपात में नहीं। जैविक क्रियाओं के लिए यह अति आवश्यक है। आयतन के अनुसार ही कोशिका की रासायनिक क्रिया इकाई समय में तय होती है तथा सतही क्षेत्र के अनुसार कोशिका द्वारा पदार्थों का अवशोषण व उत्सर्जन तय होता है।

कोशिकाओं के प्रकार (Types of Cells)
समस्त जीवधारियों में दो प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं –

  • प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ (Prokaryotic cells)
  • यूकैरियोटिक कोशिकाएँ (Eukaryotic cells)

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प्रश्न 26.
कशाभिका की संरचना को चित्र द्वारा समझाइए।
उत्तर:
कशाभिका (Flagella) – ये जीवाणुओं, कुछ जन्तुओं तथा कुछ पादपों की कोशिकाओं या युग्मकों (gametes) में पायी जाने वाली चाबुकनुमा संरचना है। ये फ्लैजिन नामक प्रोटीन के बने होते हैं। इनका निर्माण अनेक तंतुओं के सर्पिलाकार क्रम (spirally) में व्यवस्थित होने से होता है। इनमें मिलने वाली छोटी-छोटी उप-इकाइयों का व्यास 40-50 होता है। यूकैरियोटिक फ्लैजिला में तन्तुओं का विन्यास 9+2 होता है, जबकि जीवाणु फ्लैजिला में ऐसा विन्यास नहीं होता है। फ्लैजिला के तीन भाग होते हैं –
(i) आधार कण (basal granule)
(ii) अंकुश (hook) तथा
(iii) मुख्य तन्तु (main filament)।
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(E) निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पादप कोशिका का इलेक्टॉन सूक्षमदर्शीय चित्र बनाकर संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पादप कोशिका (Plant cell) – पादप कोशिका जन्तुओं से मुख्यतया कोशिका भित्ति, लवक (Plastids) तथा बड़ी-बड़ी रिक्तिकाओं (vacuoles) की उपस्थिति के कारण तथा जीवाणुओं से कलाबद्ध कोशिकांगों (membrane bound cell organells) एवं केन्द्रक की संरचना के कारण भिन्न होती है। एक प्रारूपिक पादप कोशिका के निम्नलिखित भाग होते हैं –
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कोशिका भिति एवं कलाएँ (Cell Wall and Membranes) – कोशिका भित्ति (cell wall) पादप कोशिका की बाह्म चार दीवारी है जो प्राय: त्रिस्तरीय होती है। यह मुख्यतया सेलुलोस की बनी होती है। कोशिका भित्ति के ठीक अन्दर लाइपोप्रोटीन की बनी कोशिका कला (plasma membrane) होती हैं। रिक्तिका (vacuole) को घेरने वाली झिल्ली टोनोप्लास्ट (tonoplast) कहलाती हैं जो जीवद्रव्य को रिक्तिका रस से. पृथक् करती है। कोशिका भित्ति कोशिका को सुरक्षा व आकृति प्रदान करती हैं, जबकि कलाएँ पदार्थों के आवागम्न पर नियंत्रण करती हैं।

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कोशा द्रव्य (Cytoplasm) – कोशिका द्रव्य एक कोलाइडी तंत्र (colloidal system) होता है। इसमें जीवित कोशिकांग; जैसेमाइटोकॉन्ड्रिया, अन्तं्रद्रव्यी जालिका, लवक, गॉल्जीकाय, राइबोसोम्स, लाइसोसोम्स तारककाय एवं अन्य सूक्ष्मकाय निलम्बित रहते हैं। इसमें, प्रोटीन्स, वसा, कार्बोहाइड्रेट आदि कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थ पाए जाते हैं अतः कोशिका द्रव्य एक जटिल मिश्रण होता है। कोशिका द्रव्य में विभिन्न प्रकार के उपापचयी निफ्क्रिय पदार्थ भी मिलते हैं। संचित फदार्थ जैसे-वसा, तेल, शर्कराएँ, प्रोटीन्स आदि स्रावी पदार्थ जैसे-मकरन्द, वर्णक, एन्जाइम आदि तथा उत्सर्जी पदार्थ जैसे-लैटेक्स, गोंद, टैनिन्स, एल्केलॉइड आदि।
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केन्द्रक (Nucleus) – यह कोशिका का प्रमुख भाग है। यह दोहरी कला से घिरा होता है जिसके अन्दर केन्द्रक द्रव्य एवं इसमें केन्द्रिका तथा क्रोमेटिन निलंबित रहता है। केन्द्रक कोशिका की समस्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं समन्वय करता है। विभाजन के समय केन्द्रक में स्थित क्रोमेटिन टूटकर गुणसूत्र बनाता है जो आनुवंशिक लक्षणों नयी कोशिका या नई पीढ़ी में पहुँचाने का कार्य करते हैं। जन्तु एवं पादप कोशिकाओं में कुछ भिन्नता पायी जाती है। जन्तु कोशिका में कोशिका भित्ति का अभाव होता है। केवल प्लाज्मामेम्ब्रेन कोशिका का बाह्य आवरण बनाती है। इनमें बड़ी-बड़ी रिक्तिकाओं तथा लवकों का भी अभाव होता है। जन्तु कोशिकाओं में तारक काय पाए जाते हैं। जिनका पादप कोशिका में अभाव होता है। विभिन्न जीवों या ऊतकों में कोशिकाओं का आकार एवं आकृति भिन्न-भिन्न हो सकती हैं।

प्रश्न 2.
पदिप कोशिका भिति की संरचना एवं कार्य लिखिए।
उत्तर:
कोशिका भित्ति (Cell wall):
पादप कोशिकाओं में प्लाज्मा मेम्ब्रेन (plasmamembrane) के बाहर एक कठोर एवं दृढ़ भित्ति (rigid wall) होती है। जन्तुओं में कोशिका भित्ति (cell wall) का अभाव होता है। इसकी उपस्थिति एवं अनुपस्थिति के आधार पर पादप एवं जन्तु कोशिकाओं में अन्तर किया जाता है। राबर्ट हुक (Robert Hooke, 1665) ने प्रथम बार कार्क कोशिका का निरीक्षण किया था वास्तव में वे केवल कोशिका भित्तियों के कोष्ठक ही थे। नेशिका भित्ति (cellwall) मुख्यतः सेल्युलोस की बनी होती है परन्तु इसमें हेमीसेलुलोस (hemicelluase) तथा कभी-कभी लिगिनन आदि पदार्थ भी उपस्थित होते हैं। कोशिका भित्ति के निर्माण के समय सबसे पहले मध्य-पटलिका (middle lamella) का निर्माण होता है। इसके बाद इस पर क्रमश: प्राथमिक, द्वितीयक एवं ततीयक भित्तियों का निर्माण होता है।
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मध्य पटलिका (Middle lamellae):
मध्य पटलिका दो संलग्न कोशिकाओं के बीच सीमेण्ट का कार्य करती है और इसका निर्माण कोशिका विभाजन के पश्चात् दो पुत्री कोशिकाओं के बनते समय होता है। यह मुख्यतः कैल्शियम पेक्टेट तथा कुछ मात्रा में मैग्नीशियम पैक्टेट की बनी होती है। फलों के पकने पर यह घुलनशील अवस्था में आ जाती है। मध्यपटलिका (middle lamellae) के दोनों ओर ही प्राथमिक एवं द्वितीय भित्तियों का निर्माण होता है।

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प्राथमिक भित्ति (Primary wall):
मध्य पटलिका के ऊपर जीवद्रव्य अनेक पदार्थ जमा करता है जिससे एक कोमल, पतली, सुघट्य भित्ति बनती है जिसे प्राथमिक कोशिका भित्ति कहते हैं। इसमें पैक्टिक पदार्थ (गैलेक्टोस, अरेबिनोस व गैलेक्टूरोनिक अम्ल का मिश्रण), हेमीसेलुलोस (मेनोज, ग्लूकोनिक अम्ल का मिश्रण) तथा सेलूलोज सूक्ष्म तन्तुक (cellulose microfibrils) होते हैं।
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द्वितीयक भित्ति (Secondary wall):
कोशिका वृद्धि के समय प्राथमिक कोशिकाभित्ति अधिक से अधिक खिंच जाती है। समय के साथ-साथ प्राथमिक भित्ति पर लिग्निन क्यूटिन एवं सुबेरिन आदि जमा होने लगते हैं जिससे द्वितीयक कोशिका भित्ति (secondary cell wall) बनती है। यद्यपि आरम्भ में बनी द्वितीयक कोशिका में कुछ पेक्टोज भी होता है परन्तु मुख्य रूप से हैमीसेल्युलोस और सेलुलोस की बनी होती हैं।

तृतीयक कोशिका भित्ति (Tertiary cell wall):
अधिकांश कोशिकाओं में द्वितीयक कोशिका भित्ति तीन परत की बनी होती हैं। इसमें बीच की परत सबसे मोटी होती है। कुछ बाद में बनी कोशा भित्ति जो आरम्भ में बनी तृतीयक कोशा भित्ति के ऊपर बनती हैं केवल सेलुलोस की बनती है। कुछ वैज्ञानिक बाद में बनी इस द्वितीयक भित्ति को तृतीयक भित्ति कहते हैं। प्रायः द्वितीयक और तृतीयक भित्तियों को मिलाकर द्वितीय स्थूलन (secondary thicking) भी कहा जाता है।

कोशिका भित्ति की परा संरचना (Ultrastructure of cell wall):
इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपिक अध्ययन से ज्ञात होता है कि पादप कोशिका भित्ति सूक्ष्म तन्तुओं (microfibrils) की बनी होती है जो विभिन्न लम्बाई व व्यास के होते हैं। इनका व्यास $100-200 होता है। एक तन्तुक (fibril) 250 सूक्ष्म तन्तुओं (microfibrils) से बनता है। प्रत्येक सूक्ष्म तन्तुक 20 मिसेल (micelle) का बनता है तथा प्रत्येक मिसेल में सेलुलोस अणुओं की 100 भृृंखलाएँ होती हैं।

सेल्युलोस के साथ कुछ पेक्टिक पदार्थ-हेमी सेल्यूलोज और दूसरे पालीसैकेराइड उपस्थित होते हैं। मध्य पटलिका (middle lamellae) मुख्य रूप से कैल्शियम पेक्टेट या मैग्नीशियम पैक्टेट की बनती है। प्राथमिक और द्वितीयक भित्तियाँ मुख्य रूप से सेल्युलोस की बनी होती हैं। कोशिका भित्ति का निरीक्षण यदि इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (electron microscope) से किया जाए तो इसमें पेक्टिन एवं हेमीसेल्यूलोस की अधात्रि में अनेक सूक्ष्म तन्तु पाए जाते हैं ।ये सूक्ष्म तन्तु सेल्यूलोस के बने होते हैं और अधात्री में लिग्निन, क्यूटिन, सुबेरिन, गोंद, टेनिन तथा अल्प मात्रा में खनिज पदार्थ जैसे-सिलिका, कैल्शियम ऑक्सलेट, कैल्शियम कार्बोनेट इत्यादि पाए जाते हैं।

कोशिका भित्ति की उत्पत्ति (Origin of cell wall):
कोशिका भित्ति के निर्माण की शुरूआत कोशिका विभाजन की अन्त्यावस्था (telophase) में ही हो जाती है। इस अवस्था में ही फ्रेम्मोप्लास्ट के द्वारा कोशिका प्लेट का निर्माण होता है जिससे मध्य पटलिका बनती है। मध्य पटलिका पर धीरे-धीरे प्राथमिक भित्ति एवं द्वितीयक भित्रियों का निक्षेपण होता है।

कोशिका भित्ति के कार्य-कोशिका भित्ति के निम्नलिखित कार्य हैं –

  • यह कोशिका को निश्चित आकृति एवं आकार प्रदान करती है।
  • यह पौधों को दृढ़ता प्रदान करती है।
  • यह कोशिका से विभिन्न पदार्थों के आवागमन में सहायक है।
  • यह बाहरी वातावरण से एवं रोगाणुओं (pathogens) से कोशिका की रक्षा करती है।

प्रश्न 3.
अन्तर्रम्रक्यी जालिका की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए तथा इसके कार्य लिखिए।
उत्तर:
अंतःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum = ER)
पोर्टर एवं सहयोगियों (Porter et. al.) ने सन् 1945 में कोशिका द्रव्य में महीन एवं शाखित, दोहरी झिल्लीदार नलिकाओं का एक अनियमित जाल देखा जिसमें थैलेनुमा रचनाएँ भी थीं। ये रचनाएँ केन्द्रक कला से लेकर कोशिका कला तक फैलकर एक जटिल जाल बनाती हैं। पोर्टर ने इनकी स्थिति अन्तंप्रद्रव्यी होने के कारण इन्हें अंत: प्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) कहा। प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं (prokaryotic cells) में तथा स्तनियों (mammals) की लाल रुधिर कणिकाओं में अन्तप्रद्रव्यी जालिका (ER) का अभाव होता है।

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परासंरचना (Ultrastructure):
यह कोशिका कला से केन्द्रक कला तक फैला हुआ नलिकाओं का जाल है। इसकी नलिकाओं की चौड़ाई $50-60 तक होती है। नलिकाएँ एकक कला (unit membrane) की बनी होती हैं।

कभी-कभी ये नलिकाएँ अधिक चौड़ी होकर टूट जाती हैं जिससे आशय (vescicles) बनते हैं। आकृति के आधार पर यह तीन प्रकार की रचनाओं से मिलकर बनती हैं –

  • सिस्टर्नी (Cisternae)
  • थैलियाँ (Vescicles)
  • नलिकाएँ (Tubules)

(i) सिस्टर्नी (Cisternae):
ये 40-50 लम्बी व चपटी नलिकाएँ हैं जो कि केन्द्रक (nucleus) के चारों ओर समानान्तर पट्टियों के रूप में व्यवस्थित होती हैं। इनकी सतह पर राइबोसोम्स (ribosomes) पाए जाते हैं।

(ii) थैलियाँ या आशय (Vescicles):
ये 20-500 व्यास की गोलाकार या अण्डाकार संरचनाएँ हैं।

(iii) नलिकाएँ (Tubules) इनकी आकृति एवं व्यवस्था अनियमित होती है। इनका व्यास 50-100 होता है। ये चिकनी सतह युक्त शाखित होती हैं। ये अन्तः स्रावी कोशिकाओं में अधिकता से पायी जाती हैं।
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अन्त:्रद्रव्यी जालिका (ER) दो प्रकार की होती हैं –
1. चिकनी भित्ति वाली अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Smooth walled Endoplasmic Reiticulum or SER):
इनकी सतह सपाट या चिकनी (smooth) होती है। ये उन कोशिकाओं में अधिकता से पायी जमती है जिनमें स्टीराइड एवं वसा का संश्लेषण होता है। जैसे-वृक्क (kidney) की नलिका कोशिकाएँ, आंत्र कोशिकाएँ, ग्लाइकोजन संग्रह कोशिकाएँ आदि।

2. खुरदरी भित्ति वाली अन्त:प्रद्रव्यी जालिका (Rough walled Endoplasmic Reticulum or RER):
इनकी सतह पर राइबोसोम्स (ribosomes) लगे रहने के कारण, खुरदरी प्रतीत होती हैं। ये प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) करने वाली कोशिकाओं में अध्धिकता से पायी जाती हैं। कोशिका की उपापचयी क्रियाओं के अनुसार SER, RER में बदल सकती हैं। क्योंकि प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) के समय राइबोफोरिन (ribophorin) प्रोटीन की उपस्थिति में राइबोसोम SER से जुड़कर RER बनाते हैं तथा इस कार्य के समाप्त होने पर पुनः अलग होकर फिर से SER बन जाती हैं। रासायनिक संगठन (Chemical Composition)-अन्त्रप्रव्यव्यी जालिका (ER) मुख्यतः फॉस्फोलिपिड की बनी होती है। इसमें $70 \%$ तक फास्फोलिपिड होते हैं जिसमें 30-50\% तक लिपिड होते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें लेसिथिन (lecithin), सिफेलिन (cephalin), नॉसिटाल (nosital) आदि भी होते हैं। कार्य (Functions)

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1. प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis): RER की सतह पर प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया होती है। प्रोटीन संश्लेषण राइबोसोम्स द्वारा सम्पन्न होता है और बनने वाली प्रोटीन ER में चली जाती है। इसके बाद प्रोटीन नलिकाओं से होकर गाल्जी तंत्र में चली जाती है जहाँ से आशय तथा रिक्तिका (vacuole) के रूप में यह कोशिका रस में स्रावित कर दिए जाते हैं। फाइब्रोल्लास्ट कोशिकाओं में कौलेजन RER से सीधे ही व आशयों से होकर कोशिका से बाहर स्रावित होते हैं इसमें गॉल्जी तंत्र (golgi system) की भागीदारी नहीं होती है।

2. ग्लाइकोजन संश्लेषण तथा संचयन (Glycogen Synthesis and Storage) -चहे की यकृत कोशिकाओं की SER में ग्लूकोज 6-फॉस्फेट मिलता है। ऐसा माना जाता है कि ER में ग्लाइकोजिनोलाइसिस (glycogenolysis) की क्रिया होती है। यह ग्लाइकोजन का संय्रह भी करती है।

3. अंन्तः प्रद्रव्यी (ER) जाल द्वारा कोशिका के कोलाइडी तंत्र को अधिक शक्ति मिलती है।

4. यह अभिगमन तंत्र (transport system) का कार्य भी करती है। इसी के द्वारा अनेक पदार्थों एवं संदेश वाहक आर. एन. ए. (m RNA) केन्द्रक से कोशिका द्रव्य में पहुँचते हैं।

5. इनकी उपस्थिति के कारण कोशिका को आन्तरिक शक्ति प्रदान होती है जिससे कोशिका (Cell) पिचकती नहीं है

6. यह ग्लिसरॉल, कोलेस्ट्रॉल आदि पदार्थों के संश्लेषण के लिए स्थान प्रदान करती है।

7. यह अन्य कलाओं के निर्माण में भी सहायक है।

8. यह कोशिका विभाजन के दौरान केन्द्रक आवरण बनाने में सहायक होती है।

प्रश्न 4.
गॉल्जीकाय संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए तथा इसके कार्य लिखाए।
उत्तर:
गॉल्जीकाय (Golgi Body):
पादप कोशिकाओं में इन्हें डिक्टियोसोम (Dictyosomes) या लाइपोकॉन्ड्रिया (Lipochondria) कहते हैं। इनकी खोज सर्वप्रथम कैमीलियो गॉल्जी (Camilio Golgi) ने 1898 में की थी। यह विभिन्न प्रकार की चपटी तथा कुछ मुढ़ी हुई थैलियों का समूह होता है। प्रत्येक समूह में 4-10 थैलियाँ होती हैं जो कहीं-कहीं एण्डोप्लाज्मिक जालिका (ER) से जुड़ी होती हैं इन थैलियों की झिल्ली दोहरी परत वाली होती है। प्रत्येक चपटी थैली (cisternae) किनारे पर कुछ मुड़ी हुई होती है जिसके कारण यह उत्तलोअवतल (biconcave) दिखाई देती है।

उत्तल (convex) सतह को फॉर्मिंग या सिस फेस (forming or cis face) कहते हैं तथा अवतल (concave) सतह को मेचुरिंग फेस अथवा ट्रांस फेस (maturing or trans face) कहते हैं। फॉर्मिंग फेस सदैव केन्द्रक और ER की ओर होता है। मेचुरिंग फेस (maturing face) प्लाज्मा कला की ओर होता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि केन्द्रक कला एवं ER से छोटी थैलियों (vesicles) का निर्माण होता है जो गॉल्जीतंत्र के फार्मिग फेस (forming face) से जुड़ती है। मेचुरिंग फेस की ओर स्थित बड़ी थैलियाँ अन्त में प्लाज्मा कला से जुड़ जाती हैं। तरुण कोशिकाओं में गॉल्जीकाय की छोटी गोलाकार थैलियों की संख्या कम होती है परन्तु वृद्धि और विकास की अवस्था में इनकी संख्या बढ़ जाती है।

रासायनिक संगठन (Chemical composition):
इनमें लिपोप्रोटीन, लैसीथिन, कैरोटीन, सिफेलिन, RNA, विकर तथा विटामिन E आदि मुख्य रूप से मिलते हैं। कार्य (Functions)-इनका कार्य अभी ठीक से ज्ञात नहीं है परन्तु ऐसा माना जाता है कि कोशा में किसी प्रकार के संश्लेषण से सम्बन्धित होते हैं।
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1. स्रावण (Secretion) – इनकी गुहाओं में पॉलीसैकेराइड सल्फोसायलो म्यूसिन और म्यूकोपॉलीसैकेराइड पायी जाती है। बहुत से विकर (enzymes), न्यूक्लियोसाइड्स फास्फोटेज, थायमीन पाइरो फास्फेट, एसिड फॉस्फेटेज और परऑक्सीडेज भी इनमें पाए जाते हैं। कुछ विभिन्न प्रकार के प्रोटीन्स भी इनमें संचित होते हैं इन प्रोटीन्स का निर्माण ER पर स्थित राइबोसोम्स (ribosomes) में होता है। ये प्रोटीन्स ER से बहुत-सी ट्रॉजीशन थैलियों के द्वारा गॉल्जीकाय में प्रवेश करती हैं गॉल्जीकाय के आशयों (vescules) से छोटी मुकुलों (buds) के रूप में सावी कण उत्पन्न होकर कोशिका की सतह पर बाहर निकलते रहते हैं।

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2. कोशापट्ट निर्माण (Cell plate farmation) – कोशा विभाजन के समय गॉल्जी तंत्र के आशय कटकर नये कोशा पटट का निर्माण करते हैं।

3. कोशा भित्ति का निर्माण (Formation of cell wall) – गॉल्जी तंत्र ऐसे पदार्थों का स्रावण करता है जो कोशा भित्ति (cell wall) का निर्माण करते हैं। सम्भवतः यह पदार्थ हेमी सेल्युलोस है।

4. शुक्र जनन के अन्तर्गत अग्रपिण्डक का निर्माण (Formation of Acrosome) – जिस समय जन्तुओं में शुक्राणु परिपक्व होता है तो गॉल्जी तंत्र उसमें अग्रपिण्ड (acrosome) बनाता है।

5. हॉर्मोन का उत्पाद (production of hormose) – जन्तुओं की अन्त:स्रावी कोशाओं में गॉल्जी तंत्र हारमोन के स्रावण में सहायक होता है।

प्रश्न 5.
गुणसूत्र क्या है ? इसकी जैव-रसायनिक संरचना का वर्णन चित्र द्वारा कीजिए।
उत्तर:
गुणसूत्र (Chromosome) गुणसूत्र क्रोमेटिन जाल (chromatin network) से बने छोटे एवं संघनित टुकड़े होते हैं और कोशिका विभाजन की मध्यावस्था (metaphase) में स्पष्ट दिखाई देते हैं। किसी की जाति में गुणसूत्रों (chromosomes) की संख्या निश्चित होती है। क्रोमेटिन (chromatin) के कुछ भाग विभाजनान्तराल अवस्था के समय केन्द्रक के अन्दर गहरा स्टेन लेते हैं और विभाजन के समय हल्का स्टेन (stain) लेते हैं। कोशिका विभाजन के समय क्रोमेटिन जाल (chromatin network) के ये धागे छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में स्पष्ट हो जाते हैं।

इन टुकड़ों को ही गुणसूत्र (chromosomes) कहते हैं। क्रोमोसोम (chromosomes) की खोज स्ट्रासबर्गर (Strasburger) ने की तथा वाल्डेयर (Waldeyer) ने इन्हें क्रोमोसोम (chromosome) नाम दिया। सटन तथा वाबेरी (Sutton and Wobery) ने इनके महत्व को समझाया। गुणसूत्र छड़ाकार धागेनुमा पतली, कुण्डलित रचनाएँ होती हैं। इनकी लम्बाई 0.1-30 तथा व्यास 0.2 से 2 तक होता है। मक्का (maize) के गुणसूत्र की लम्बाई 12 तक होती है।

गुणसूत्र के निम्नलिखित भाग होते हैं –
1. पेलिकल (Pelicle) – यह कणिका विहीन पतला बाह्य आवरण होता है जो गुणसूत्र (chromosome) पर एक पतला आवरण बनाता है।

2. क्रोमोनिमेटा (Chromonemata) – प्रत्येक गुणसूत्र (chromosome) में दो समान गुणों वाली धागेनुमा रचनाएँ होती हैं, इन्हें अर्द्धगुण सूत्र (chromatids) कहते हैं। प्रत्येक क्रोमेटिड में अनेक धागे समान पतले क्रोमोनिमेटा पाए जाते हैं। ये संघनित होकर क्रोमेटिड कहलाते हैं। क्रोमोनीमा (chromenema) कुण्डलित होते हैं। कुण्डलन पैरानेमिक या प्लेक्टोनेमिक हो सकती है।

3. अधात्री (Matrix) – पेलिकल (pelicle) के अन्दर का समांगी पदार्थ जिसमें क्रोमोनिमेटा निलम्बित रहते हैं, आधात्री कहलाता है।

4. गुणसूत्र बिन्दु (Centromere) – यह गुणसूत्र का महत्वपूर्ण भाग होता है जिस पर गुणसूत्र (Chromosome) के दो अर्द्धगुण सूत्र (chromatids) आपस में जुड़े होते हैं। इसे प्राथमिक संकीर्णन कहते है। प्रायः एक गुणसूत्र पर एक ही गुणसूत्र (chromosome) बिन्दु होता है और यह मोनोसेन्ट्रिक (monocentric) कहलाता है। कभी-कभी एक गुणसूत्र पर द्वो केन्द्र बिन्दु (Dicentric) या तीन केन्द्र बिन्दु (tricentric) भी पाए जाते हैं।
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गुणसूत्र पर केन्द्र बिन्दुओं की स्थिति के आधार पर ये निम्न प्रकार के होते हैं –
(i) अन्त:केन्द्री (Telocentric) – जब गुणसूत्र बिन्दु (chromosome) गुणसूत्र के एक छोर पर स्थित होता है। ऐसा गुणसूत्र एक भुजीय होता है।

(ii) अम्रकेन्द्री (Acrocentric) – जब गुणसूत्र (chromosome) बिन्दु गुणसूत्र के एक छोर से कुछ हटकर होता है। इसमें गुणसूत्र की एक भुजा बहुत बड़ी तथा दूसरी बहुत छोटी होती है।

(iii) उपमध्यकेन्द्री (Submetacentric) – जब गुणसूत्र (chromosome) बिन्दु गुणसूत्र के मध्य भाग से कुछ हटकर होता है। इस स्थिति में गुणसूत्र V के आकार का होता है।

(iv) मध्य केन्द्री (Metacentric) – जब गुणसूत्र (chromosome) बिन्दु गुणसूत्र के ठीक मध्य में स्थित होता है। ऐसी स्थिति में गुणसूत्र की दोनों भुजाएँ बराबर होती हैं। कभी-कभी गुणसूत्र केन्द्र-बिन्दु रहित होता है इसे ऐसेन्ट्रिक (acentric) कहते हैं और यह कुछ समय में ही नष्ट हो जाता है।

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5. क्रोमोमीयर अथवा जीन्स (Chromomeres or genes) गुणसूत्र के क्रोमोनिमेटा (chromonemata) पर उभरे हुए मोती की माला के समान दाने क्रोमोमीयर या जीन्स (genes) कहलाते हैं। जोहन्सन ने इन दानों के लिए सर्वप्रथम जीन (Genes) शब्द का प्रयोग किया। ये जीवधारियों के लक्षणों का निर्धारण करते हैं।

6. टीलोमीयर (Telomere) – गुणसूत्र के छोरो को टीलोमीयर (telomeres) जुड़ने से रोकते हैं।
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7. सैटेलाइट (Satellite) – गुणसूत्र पर कभी-कभी द्वितीय संकीर्णन (secondary constriction) बनने से एक घुण्डीनुमा संरचना बनती है जिसे सैटेलाडट कहते हैं और ऐसे गुणस्त्र सैट-क्रोमोसोम (sat-chromo-somes) कहलाते हैं। रासायनिक सघटन (Chemical composition) – गुणसूत्र मुख्यतया न्यूक्लियो प्रोटीन के बने होते हैं। इसमें हिस्टोन प्रोटीन लगभग 11 सरल प्रोटीन, लगभग 14 अम्लीय प्रोटीन लगभग65 DNA 10 तथा RNA 2-3 होता है।
कार्य (Functions) – गुणसूत्र के निम्नलिखित कार्य हैं –
1. गुणस्त्र पर जीन्स पाए जाते हैं जो किसी भी जीवधारी के लक्षणों का निर्धारण करते हैं।
2. प्रजनन के समय गुणसूत्र ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जीन्स का वहन करते हैं।
3. गुणसूत्र का DNA जीवों में विभिन्न उपापचयी क्रियाओं (metabolic reactions) का नियंत्रण करता है।
4. गुणसूत्रों की संख्या एवं संरचना में परिवर्तन से उत्परिवर्तन (mutations) उत्पन्न होते हैं जो वंशागत होते हैं।
5. गुणसूत्रों के हिटरोक्रोमेटिन (heterocheromatin) भाग केन्द्रिका के निर्माण में भाग लेते हैं।
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प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्रणी लिखिए-
(अ) केन्द्रिका
(ब) लैम्पबुश गुणसूत्र
(स) पॉलीटीन गुणसूत्र
उत्तर:
(अ)  केन्द्रक के चारों ओर 10-50 मोटी दोहरी झिल्ली की बनी केन्द्रक कला (nuclear membrane) होती है। केन्द्रक कला पर असंख्य सुक्ष्म छिद्र होते हैं, इन्हें केन्द्रक छिद्र (nuclear pore) कहते हैं। प्रत्येक छिद्र का व्यास लगभग 400-500 होता है। प्रत्येक छिद्र की संरचना जटिल होती है जो अष्टकोणीय सममिति दर्शाता है। दोनों कलाओं के बीच एक केन्द्रीय छिद्र (nuclear pore) होता है जो 8 गोलाभ कणों से घिरा होता है। केन्द्रीय छिद्र तथा कणों के बीच के स्थान को एन्युली (annuli) कहते हैं।
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कार्य (Functions) – केन्द्रक के अन्दर निर्मित mRNA इन्हीं छिद्रों से होकर कोशिका द्रव्य में पहुँचता है। इसके अतिरिक्त केन्द्रिका में निर्मित राइबोसोम की सब-यूनिटें केन्द्रक छिद्रों से होकर कोशिका द्रव्य में आती हैं।

केन्द्रिका (Nucleolus) – केन्द्रक में एक छोटा गोल भाग होता है जिसे केन्द्रिका कहते हैं। कभी-कभी एक केन्द्रक में दो या इससे अधिक केन्द्रिकाएँ (nucleoli) भी पायी जाती हैं। केन्द्रिका में 10 RNA, 85 प्रोटीन एवं 5 DNA होता है। केन्द्रिका के चारों ओर कोई कला नहीं होती हैं।

एक केन्द्रिका के चार भाग होते हैं –
(a) एमोरफस मैट्टिक्स (Amorphous matrix)-एक समांगी भाग जिसमें प्रोटीन कण एवं धागे बिखरे रहते हैं। इसे पार्स एमोर्फा (pars amorpha) कहते हैं।
(b) दानेदार भाग (Granular portion) – यह प्रोटीन एवं RNA का बना होता है। इन्हें न्यूक्लियोलर राइबोसोम भी कहते हैं।
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(d) क्रोमेटिन (Chromatin)- यह फ्यूल्जिन पॉजीटिव (fulgin positive) होता है। ये दो प्रकार के होते हैं-केन्द्रिका को घेरने वाला भाग पेरीन्यूक्लिओलर क्रोमेटिन (perinucleolar chromatin) तथा नलिकाएँ जो केन्द्रिका के अन्दर की ओर जाती है, इड्टान्यूक्लिओलर क्रोमेटिन (intranuclear chromation)। कार्य (Function)-केन्द्रिका राइबोसोम्स की विभिन्न उपइकाइयों का निर्माण करती हैं।

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(ब) विशेष प्रकार के गुणसूत्र (Special Type of Chromosomes)
1. लेम्पबुश गुणसूत्र (Lampbrush Chromosomes) – इनकी खोज रुकर्ट (Ruckert) ने 1882 में की थी। लैम्पबुश गुणसूत्र (lampbrush chromosome) कशेरकियों (vertibrates) के ऊसाइट (oocyte) में पाए जाते हैं। ये आकार में अत्यधिक बड़े होते हैं। इन गुणसूत्रों में एक मुख्य धागे जैसी रचना मुख्य अक्ष (main axis) होती है। यह RNA की बनी होती है जिससे अनेक स्थानों पर बहुत से गोलाकार लूप (Loops) निकलते हैं। लूप्स के मध्य DNA तथा अधात्रि के रूप में RNA एवं प्रोटीन्स होते हैं। लूप्स की संख्या के कारण ही ये गुणसूत्र बोतल साफ करने वाले बुश जैसे दिखाई देते हैं। कार्य (Functions) -इनका प्रमुख कार्य RNA संश्लेषण प्रोटीन संश्लेषण तथा पीतक (yolk) का निर्माण करना है।
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2. लार ग्रन्थि या पॉलीटीन गुणसूत्र (Salivary gland or Polytene chromosome)- इनकी खोज बालबियानी ने काइरोनोमस (Chironomus) कीट की लार ग्रन्थियों में की थी। फलमक्खी एवं अन्य डिप्टेरन के लार्वा की लार ग्रन्थियों (Salivary gland) में अत्यधिक लम्बे व चौड़े दैत्याकार गुणसूत्र पाए जाते हैं इन्हें पालीटीन गुणसूत्र (polytene chromosome) कहते हैं। इन गुणसूत्रों पर गहरी काली एवं हल्की पट्टी पायी जाती हैं। काली पट्टियों पर यूक्रोमेटिन होता है तथा हल्के रंग की पट्टियों में हिटरोक्रोमेटिन होता है। ये गुणसूत्र

कुछ स्थानों पर अधिक फूले हुए दिखाई देते हैं जिन्हें पफ्स (puffs) कहते हैं। काली पह्टियों से कुछ loops बन जाते है जिन्हे बाल्वीनी छत्ले (balbini rings) कहते हैं। इन स्थानों पर m-RNA बनता है।

कार्य (Functions) – सम्भवतः ये प्रोटीन संश्लेषण से सम्बन्धित होते हैं।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-
(अ) राइपोसोम
(ब) लाइसोसोम
उत्तर:
(अ) गाबलोसोम (Ribosomes) – क्लाउड (Clowd; 1943) ने कोशिका के समांगी मिश्रण का परानिश्यन्दन (ultra filtration) करके कुछ क्षाररागी (basophilic) कण प्राप्त किए और इन्हें माइक्रोप्रभाज नाम दिया। पैलाडे (Palade, 1955) ने जन्तु कोशिकाओं में इनकी खोज की और राइबोसोम (ribsomes) कहा। इनमें RNA की अत्यधिक मात्रा होती है।
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संरचना (Structure) – राइबोसोम (ribosome) मुख्यतया RNA तथा प्रोटीन के बने होते हैं। इनका व्यास लगभग 150 होता है। प्रत्येक राइबोसोम दो उपइकाइयों से मिलकर बनता है। एक बड़ी तथा दूसरी छोटी उप-इकाई, बड़ी उप-इकाई में वृन्त केन्द्रीय उभार, खांच या धारी तथा परिधीय उभार भाग होते हैं। छोटी उपइकाई में आधार, शीर्ष, क्लैफ्ट तथा प्लेटफार्म भाग होते हैं। प्रौकेरियोटिक कोशाओं तथा यूकैरियोटिक कोशाओं के माइटोकॉन्डिया एवं प्लास्टिडडस में 70 s प्रकार के राइबोसोम्स पाए जाते यूकैरियोटिक कोशिकाओं में 80 s प्रकार के राइबोसोम्स पाए जाते हैं। 70 s राइबोसोम की दो उपइकाइयों में बड़ी उपइकाई 50 की तथा छोटी उपडकाई 30s की होती है। 80 s राइबोसोम की दोनों उप इकाइयों में बड़ी 60 s यूकैरियोटिक कोशिकाओं में 80 s प्रकार के राइबोसोम्स पाए जाते हैं।
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70s राइबोसोम की दो उपइकाइयों में बड़ी उपइकाई 50 s की तथा छोटी उपइकाई 30 s की होती है। 80 s राइबोसोम की दोनों उप इकाइयों में बड़ी 60 s की तथा छोटी 40 s की होती है। Mg++ की सान्द्रता बढ़ने पर दो राइबोसोम जुड़कर डायमर बनाते हैं तथा और अधिक सान्द्रता पर पॉली राइब्रोसोम (polyribosome) बनाते हैं। Mg++ की सान्द्रता में अत्यधिक कमी होने से दोनों उपइकाइयाँ पृथक् हो जाती है।
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की तथा छोटी 40 s की होती है। Mg ++ की सान्द्रता बढ़ने पर दो राइबोसोम जुड़कर डायमर बनाते हैं तथा और अधिक सान्द्रता पर पॉली राइबोसोम (polyribosome) बनाते हैं। Mg ++ की सान्द्रता में अत्यधिक कमी होने से दोनों उपइकाइयाँ पृथक् हो जाती है। अवसादन गणांक (Sedimentation coefficient = Svedberg unit)-राइबोसोम के अध्ययन के लिये एक यन्त्र प्रयोग किया जाता है जिसे अल्ट्रासेण्ट्रीफ्यूज (ultracentrifuge): कहते हैं। इसमें कुछ विशष प्रकार का नालकाय लगा होती हैं जिनमें हम राइबोसोम को एक विशेष प्रकार के घोल में लेकर रख लेते हैं। इस यन्त्र को विद्युत द्वारा एक निश्चित तेज रफ्तार से घुमाने पर एक विशेष प्रकार के राइबोसोम्स नलिका की तली पर बैठ (sediment) जाते हैं, जबकि दूसरे प्रकार के राइबोसोम्स एक-दूसरी निश्चित रफ्तार पर बैठते हैं। इस निश्चित रफ्तार को अवसादन गुणांक (sedimentation coefficient) कहते हैं। अवसादन गुणांक (sedimentation coefficient) को Svedberg unit S में मापा जाता है। उदाहरण के लिए, जो राइबोसोम्स 80 Sपर बैठते हैं। उन्हे 80 S राइबोसोम्स कहा जाता है।

राइबोसोम्स (Ribosomes) के दो भाग होते हैं जिन्हें Mg 2+ आयन की सान्द्रता घटाने पर दो छोटे भागों (subunits) में विभक्त किया जा सकता है। यदि इन दो भागों वाले मिश्रण को फिर से यन्त में रखकर घुमाया जाये तो 80 S राइबोसोम्स का एक भाग 60 S पर बैठता है तथा दूसरा भाग 40 S पर जिन्हें क्रमशः 60 S व 40 S राइबोसोम्स कहते हैं। (इन संख्याओं को 60 S 40 S 100 S वाली गणित की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए।) कार्य (Function) राइबोसोम का निर्माण केन्द्रिका (Nuclealus) में होता है तथा इनका क्रिया-स्थल कोशिका द्रव्य है। राइबोसोम विभिन्न प्रकार के RNA की सहायता से प्रोटीन निर्माण में भाग लेते हैं।

राइबोसोम पर प्रोटीन संश्लेषण की क्रियाविधि (Mechanism of protein synthesis at ribosomes):
(i) गुणसूत्र के DNA में न्यूक्लियोटाइड्स (nucleotides) के क्षारों की व्यवस्था प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) का संकेत देती है।

(ii) DNA कोड की नकल mRNA के निर्माण द्वारा प्रदान की जाती है जिसमें थायमीन के स्थान पर यूरसिल (uresil) आ जाती है।

(iii) mRNA केन्द्रक से निकलकर कोशाद्रव्य में राइबोसोम पर स्थित होकर सांचा बनाती है। m RNA पर तीन न्यूक्लियोहाइड्स एक विशेष अमीनो अम्ल के लिए संकेत देते हैं। इसे त्रिक संकेत कहते हैं।

(iv) विशेष प्रकार की अमीनो अम्ल, ATP द्वारा सक्रिय अवस्था में आकर एक विशेष प्रकार के sRNA (t RNA) से प्रक्रिया करते हैं।

(v) s RNA + अमीनो अम्ल पर अपना प्रतिकूट होता है जो m -RNA पर स्थित प्रकूट (codon) पर आकर मिलता है।

(vi) एमीनो अम्ल एक-दूसरे से पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़कर पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ (uresil) बनाते हैं।

(vii) एमीनो अम्लों की इस प्रकार की श्रृंखला अलग होकर प्रोटीन अणु का निर्माण करती है। इस सम्पूर्ण क्रिया को प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis)
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(ब) लाइसोसोम (Lysosome):
लयनकाय या लाइसोसोम (Lysosome) की खोज सर्वप्रथम क्रिश्चियन डी. डबे (C. de Duve) ने 1949 में की थी। ये केवल जन्तु कोशिकाओं में पाए जाते हैं। ये अनेक प्रकार के जल अपघटनीय (hydrolytic) विकरों से भरी थैलियाँ हैं। इनके फटने पर कोशिका में ये विकर मुक्त होकर कोशिकांगों का पाचन कर लेते हैं। अतः इन्हें पाचक थैलियाँ (digestive vesicle) या कोशिका की आत्पघाती थैलियाँ (suicidal bags) कहते हैं। ये जन्तुओं के अग्न्याशय (pancreas), यकृत (liver) प्लीहा, मस्तिष्क तथा गुर्दे (kidney) की कोशिकाओं में पाए जाते हैं। लाइसोसोम गोल या अनियमित आकार की रचनाएँ हैं जिनका व्यास 0.6 होता है। इसके ऊपर इकहरी एकक कला पायी जाती है। लाइसोसोम बहुरूपता (polymorphism) प्रदर्शित करते हैं।
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लाइसोसोम चार प्रकार के होते हैं –
(a) प्राथमिक लाइसोसोम (Primary Lysosome) – ये गॉल्जी काय से उत्पन्न संचय कण एवं स्रावी पुटिकाएँ हैं।
(b) द्वितीयक लाइसोसोम (Secondary Lysosome) – इनमें पाचक विकर भरे होते हैं और प्राथमिक लाइसोसोम्स (primary lysosomes) से बनते हैं
(c) अवशिष्ट काय (Residual bodies) – द्वितीयक लाइसोसोम जब बाह्य पदार्थों का अपूर्ण पाचन करता है तब इन्हें अवशिष्ट काय (residual body) कहते हैं।
(d) ऑटोफैजिक रिक्तिकाएँ (Autophagic vacuoles)-इन्हें साइटोलाइसोसोम या ऑटोफेगोसोम (autophagosome) कहते हैं। इनमें लयनकारी विकर (lytic enzyme) होते हैं।

कार्य (Functions):
(i) कोशिका में आये बाहरी पदार्थों का पाचन करके कोशिका की सुरक्षा।
(ii) क्षतिप्रस्त कोशिकांगों का पाचन।
(iii) मृत कोशिकाओं या निक्रिय कोशिकाओं का पाचन।

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प्रश्न 8.
प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिका में अन्तर लिखिए।
उत्तर:

सक्षण (Characters)श्रोकैजियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell)यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell)
1. कोशिका द्रव्य (Cytoplasm)पूर्ण कोरिका में क्षिता रहत्ता है।केन्द्रक एवं कोशिका कला के बीच सीमित रहता है।
2. केन्ट्रक (Nucleus)आद्ध (incipient) अविकसित केन्द्रक होता है जिसे केन्द्रकाभ (nucleoid) कहते हैं। इसमें –
(i) केन्द्रक कत्ता अनुपस्थित होती है।
(ii) केन्रिका (nucleolus) अनुपस्थित होती है।
(iii) DNA के तन्तुओं (जो सभी एक प्रकार के होते है) के साय ग्रोटीन (हिस्टोन) नहीं जुड़ी रहती हैं।
पूर्ण विकसित सत्य (true) केन्द्रक होता है। इसमें-

(i) केन्द्रक कला उपस्थित होती है।

(ii) केन्द्रिका (nucleolus) उपस्थित होती है।

(iii) DNA के बहुत से सूत्रों के साथ हिस्टोन प्रोटीन जुड़ी रहती हैं। इन्हें गुणसूत्र (chromosomes) कहते हैं।

3. गाल्जीकास, अन्त क्रद्रव्यी जालिका, लवक तथा माइडोकींच्द्रियाअनुपस्थित होते हैं।उपस्थित होते हैं।
4. माइट्टोसिस तथा मीओसिस कोशिका विभाजन (Cell divisions)नहीं होता है।होता है।
5. श्वसन तन्त (Respiralory system)जीचद्धव्य कला में उपस्थित होता है।माइटोकॉण्ड्रया में उपस्थित होता है।
6. श्रक्ारा संश्लेषी तंत्र (Photosynthetic sysiem)आन्तरिक द्विल्लियों में होता है, हरित शवक अनुषस्थित होते हैं।हरित लवकों में होता है। जन्तुओं में अनुपस्थित
7. कोशिका भिति (Cell wall)पतली होती है।मोटी होती है।
8. कोशिकाइव्यी गति (Cytoplasmic movement)स्पष्ट नहीं होती है।स्पष्ट होती है।
9. राइबोसोम (Ribosome)70 s प्रकार के होते हैं।80 S प्रकार के होते हैं।
10. कराभिका (Flagellum)कशाभिका में सूक्ष्म तन्तु होते हैं परन्तु (9 + 2) व्यवस्था नहीं होती है।कशाभाकाओं में सूक्ष्म नलिकाओं की $(9+2)$ व्यवस्था स्पष्ट होती है।
11. रिक्तिका (Vacuole)अनुपस्यित होती हैं।पादपों में उपस्थित जन्तुओं में अल्पर्वर्धित या अनुपस्थित
12. लाइसोसोम (Lysosome)अनुपस्यित होती हैं।जन्तु कोशिका में उपस्थित किन्तु पादप कोशिका में अनुपस्थित।
13. नारककाय (Centrosome)अनुपस्यित होती हैं।पादप कोशिका में अनुपस्थित, जन्तु कोशिका में उपस्थित
14. सम्मुट (Capsule)हो सक्ता है।नहीं होता ।
15. प्लाबिम्ड (Plasmid)उपस्थित हो सकते हैं।अनुपस्थित होते हैं।
16. लिगी बनन (Sexual Reprodction) उदाहाण (Examples)अनुपस्थित वा कम विकसित जीवाणु, नीली हरी शैवास, माइकोप्ताज्मा।पूर्ण विकसित शैवाल, कवक, ब्रायोफाइटा एवं उच्च पौधे एवं प्रोटोजोआ से कॉर्डेटा तक के सभी प्राणी।

प्रश्न 9.
पादप कोशिका एवं जन्तु कोशिका में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
पादप एवं प्राणी कोशिका-सभी यूकैरियोटिक कोशिकाएँ भी समान प्रकार की नहीं होती हैं। पादप एवं प्राणी कोशिकाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ति, लवण एवं बड़ी-बड़ी एक या अधिक रिक्तिकाएँ (vacuoles) उपस्थित होती हैं। प्राणी कोशिकाओं में ये अनुपस्थित होते हैं। इसके अलावा जहाँ प्राणी कोशिकाओं में तारककाय (Centrosome) एवं लयनकाय (lysosome) उपस्थित होते हैं जो पादप कोशिकाओं में नहीं पाए जाते हैं। यद्यपि अन्य कोशिकाओं की संरचना एवं कार्धिकी में दोनों प्रकार की कोशिकाएँ समानताः प्रदर्शित करती हैं।
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लक्षणपादप कोशिकाजन्तु कोशिका
1. कोशिका भित्ति (Cell wall)उपस्थित, सेल्युलोस मुख्यतः (cellulose) की बनी होती है।अनुपस्थित।
2. लवक (Plastids)कोशिका द्रव्य में तीन प्रकार के लवक पाए जाते हैं-अवर्णी लवक, वर्णी लवक व हरित लवक (Leucoplast, chromoplast and chloroplast) 1लवक (plastids) अनुपस्थित होते हैं।
3. रिक्तिका (Vacuoles)प्रारम्भ में छोटी किन्तु प्रौढ़ कोशिका में एक बड़ी रिक्तिका उपस्थित। इसमें कोशिका रस भरा रहता है।रिक्तिकाएँ अनुपस्थित होती हैं।
4. तारककाय (Centrosome)कुछ शैवालों एवं कवकों को छोड़कर पादप कोशिकाओं में तारककाय अनुपस्थित होते हैं।लगभग सभी प्राणी कोशिकाओं में तारककाय (centrosome). उपस्थित होते हैं।
5. लयनकाय (Lysosome)कुछ पौधों को छोड़कर अधिकांश पादप कोशिकाओं में अनुपस्थित।सामान्यतया उपस्थित।
6. सूक्ष्म रसांकुर (Microvilli)अनुपस्थित।उपस्थित।
7. कोशिकाद्रव्य विभाजन (division of cytoplasm)कोशिका विभाजन के समय दो संतति कोशिकाओं के बीच कोशिका की मध्य प्लेट पर नई मध्य पटलिका का निर्माण प्रारम्भ होकर किनारों की ओर बढ़ता है।संतति कोशिकाओं के बीच बाहर से एक खांच बनती है जो अन्दर की ओर बढ़ती हुई दोनों संतति कोशिकाओं को पृथक् कर देती हैं।
8. संचित खाद्य पदार्थ (Reserved Food Material)कार्बोहाइड्रेट, सेल्यूलोस, व मण्ड के रूप में संचित होता हैं।कार्बोहाइड्रेट अधिकतर ग्लाइकोजन, तथा वसा के रूप में संचित होता है।

प्रश्न 10.
हृरित लवक का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हरित लवक (Chloroplasts)-ये हरे रंग के लवक होते हैं। इनकी खोज शिम्पर (1885) ने की थी। इ्रनमें हरे रंग का वर्णक पर्णहरिम (chlorophyll) होता है जिसके कारण पत्तियाँ एवं कुछ अन्य भाग हर दिखाई देते हैं। उच्च श्रेणी के पौधों में विशेषकर उनकी पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं (mesophyll cells) में तथा तनों के हरित ऊतकों में हरित लवक पाए जाते हैं।
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बहुत सी शैवाल कोशिकाओं में केवल एक हरितलवक (Chloraplasts) होता है, परन्तु अधिक विकसित पौधों की एक कोशिका में 20 से 50 तक हरित लवक (chloraplast) हो सकते हैं। विभिन्न वर्ग के पौधों में इनकी रचना और आकार भिन्न होते हैं। शैवालों की कोशिकाओं में मेखलाकार (girdle shaped-यूलोध्रिक्स में), टिकियाकार (disc like – प्लूरोसिग्मा में) प्यालाकार (cup shaped-क्लैमाइडोमोनस में), पद्टीकार (ribon shaped-स्पाइोगाइा में), ताऱाकार (stellate- जिगिनया में) अथवा जालिकामय (reticulate- ऊडोगोनियम में) पाए जाते हैं। आमाप, परिमाप एवं संख्या-उच्च पादपों के लवक (chloraplasts) गोल, अण्डाकार या चपटे व दीर्घ वृत्ताकार होते हैं। सामान्यतः इनकी लम्बाई 2.5 तथा चौड़ाई 3-4 तक होती है। प्रतिकोशिका इनकी संख्या 20-40 तक हो सकती है।

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परासंरचना (Ultrastructure) – उच्च वर्ग के पादपों के हहरित लवक जटिल संरचना वाले होते हैं। प्रत्येक लवक दोहरी इकाई झिल्ली से घिरा होता है। प्रत्येक झिल्ली (unit membrane) की मोटाई 50 होती है। दोनों झिल्लियों के बीच 10 A-30 चौड़ा पेरीप्लास्टिडल स्थान (periplastidal space) होता है। झिल्लियों के अन्दर एक तरल दानेदार पदार्थ भरा होता है जिसे स्ट्रोमा (stroma) कहते हैं। स्ट्रोमा के अन्दर दोहरी कलाओं की बनी असंख्य संरचनाएँँ पायी जाती हैं जिन्हें थाइलेकॉइड (thylakoid) कहते हैं तथा थाइलेकॉइड के द्वारा बने सिक्कों के समान एक ढेर को प्रेनम (granum) कहते हैं। ऐसे अनेक प्रेनम स्ट्रोमा में पाए जाते हैं। एक प्रेनम दूसरे प्रेनम से स्ट्रोमा लैमेली (stroma lamellae) द्वारा जुड़े रहते हैं।
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थाइलैकाइड को ग्रेना की इकाई कहते हैं। थाइलैकाइड पर क्वांटासोम (quantasomes) पाए जाते हैं और प्रत्येक क्वांटासोम (quantasomes) पर लगभग 230 पर्णहरिम कण (chlorophyll particles) पाए जाते हैं। स्ट्रोमा के अन्दर कुछ मात्रा में DNA, RNA स्टार्च कण (starch grains) आदि भी पाए जाते हैं। रासायनिक संगठन (Chemical Composition) – प्रत्येक हरित लवक में 40-50  प्रोटीन, 23-25 फास्फोलिपिड, 3-10 पर्णहरिम (जिसमें 75 पर्णहरिमम a तथा 25 पर्णहरिम b), 5 RNA, 0.01-0.02 DNA; 1-2 कैरोटिन जैन्थोफिल, विकर, विटामिन तथा धातुएँ जैसे- Mg,Fe,Cu,Zn,Mn आदि होते हैं।

कार्य (Functions) – हरित लवक (choroplast) का प्रमुख कार्य प्रकाश संश्लेषण (nhotosunthesis) क्रिया सम्पन्न करना है। हरित लवक (chloroplast) के ग्रेना में प्रकाशीय अभिक्रिया तथा स्ट्रोमा में अन्धकार अभिक्रिया होती है। प्रकाश अभिक्रिया में जल का प्रकाशीय अपघटन होकर NADP.2H तथा ATP का निर्माण होता है, जिससे O2 उपउत्पाद के रूप में उत्पन्न होती है। अन्धकार अभिक्रिया में ATP तथा NADP. 2 H का प्रयोग करके CO2 का स्थिरीकरण किया जाता है और विभिन्न शर्कराओं का निर्माण होता है। इसलिए हरितलवक को कोशिका का रसोईघर (kitchen) कहते हैं।

प्रश्न 11.
कोशिका कला के तरल मोलेज मॉडल का सचित्र वर्पन
कोशिका झिल्ली (Cell membrane):
कोशिका झिल्ली या कोशिका कला (cell membrane or plasma membrane), एक लचीली, अल्पपारदर्शी तथा चयनात्मक पारगम्यकला (selectively permeamble Membrane) है जो पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ति के ठीक नीचे तथा जन्तु कोशिकाओं में सबसे बाहर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाती है। यह जीवद्रव्य का ही एक अंश होती है तथा स्तरीय रासायनिक परिवर्तनों के कारण बनती है। जीवद्रव्य की इस बाह्यपरत को कोशिका कला (cell membrane) नाम नगेली एवं क्रेमर (Naggeli and Cremer, 1855) ने दिया। प्लावे (Plowe; 1931) ने इसे प्लाज्मालेमा (Plasmalemma) नाम दिया।

संरचना (Structure) – सभी जन्तु कोशिकाओं में कोशिका कला बाह्य रूप में देखी जा सकती है। पादप कोशिकाओं एवं जीवाणु कोशिकाओं में यह कोशिका भित्ति के ठीक नीचे पायी जाती है। सभी प्राणी एवं पादपों की कोशिका कलाओं की संरचना लगभग समान होती है। यह मुख्य रूप से प्रोटीन तथा फास्फोलिपिड की बनी होती है जिसकी मोटाई 75 होती है। इसमें लगभग 3.5 व्यास के अनेक छिद्र पाए जाते हैं।
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कोशिका कला की संरचना के लिए विभिन्न वैज्ञानिकों ने समय-समय पर अपने मत प्रस्तुत किए हैं जिनमें से कुछ प्रमुख मत निम्न प्रकार हैं –
1. कोशिका कला का सेंडविच या त्रिस्तरीय मॉडल (Sandwitch or trilamella model of plasma membrane): इस मॉडल को डेनियल एवं डॉसन (1935) ने प्रस्तुत किया। इसके अनुसार कोशिका कला प्रोटीन तथा फास्फोलिपिड के अणुओं की बनी हुई एक त्रिस्तरीय (triple layerd) कला होती है जिसमें 40 प्रोटीन्स तथा 60 फास्फोलिपिड्स पाए जाते हैं। इस मॉडल में फास्फोलिपिड अणु प्रोटीन्स द्वारा ठीक उसी प्रकार आस्तरित होते हैं जैसे सेंडविच में डबल रोटी एवं भरावन की व्यवस्था होती है। अर्थात् फास्फोलिपिड की द्विस्तरीय परत प्रोटीन की दो परतों से घिरी होती है।

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एकक कला मत (Unit membrane theory) – कोशिका कला की संरचना के इस मत को रॉबर्टसन (Robertson) ने सन् 1959 में प्रस्तुत किया। इस मत के अनुसार कला की मोटाई 75 होती है, जो तीन परतों की बनी होती है। बाहरी दोनों परर्ते प्रोटीन की तथा प्रत्येक की मोटाई 20 AA होती है। मध्य परत लिपिड की बनी होती है जिसकी मोटाई 35 होती है। यह एकक कला सभी कोशिकांगों में समान रूप से पायी जाती है।
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तरल मोजेक मॉडल (Fluid mosaic model) – यह मॉडल सिंगर तथा निकोल्सन (Singer and Nicolson) ने सन् 1974 में प्रस्तुत किया। इसके अनुसार कोशिका कला लिपिड की बनी द्विआण्विक परत (bimolecular layer) होती है। लिपिड की दोनों परतों के बाहर की ओर बाह्य प्रोटीन की एक-एक परत पायी जाती है जिसे बाह्य प्रोटीन (extrinsic protein) कहते हैं। लिपिड परत में कुछ प्रोटीन अन्दर तक धँसी रहती है। इन्हें अन्त:प्रोटीन (intrinsic protein) कहते हैं।

लिपिड परत में स्थित फॉस्फोलिपिड अणुओं के दो छोर होते हैं –
(i) जल रागी शीर्ष (Hydrophilic head) जो प्रोटीन परत की ओर होता है।
(ii) जल विरागी पुच्छ (Hydrophobic tail) जो कला के केन्द्र की ओर होता है।

दोनों प्रोटीन परतों की मोटाई 20-20 तथा फॉस्फोलिपिड द्विपरत (phospholipid bilayer) की मोटाई 35 होती है। इस प्रकार प्रोटीन लिपिड द्विपरत-प्रोटीन संरचना प्रदर्शित करती है। आन्तरिक प्रोटीन (intrinsic protein) लिपिड परत में हिलडुल सकते हैं इसलिए इसे तरल मोजेक मॉडल (mosoaic model) कहते हैं।

जैव कला का रासायनिक संगठन (Chemical Composition of Plasma membrane):
प्लाज्मा मेंम्ब्बेन (plasma membrane) या कोशिका कला मुख्यतः प्रोटीन व फास्फोलिपिड्स की बनी होती है यद्यपि इसमें अल्प मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स भी उपस्थित होते हैं। कोशिका कला में कार्बोंहाइड्रेट स्वतन्त्र अवस्था में न रहकर दो संयोजी रूपों में पाया जाता है। यह लिपिड के साथ ग्लाइकोलिपिड तथा प्रोटीन के साथ ग्लाइकोप्रोटीन के रूप में पाया जाता है। ये दोनीं पदार्थ कोशिका को समान कोशिकाओं की पहचान की क्षमता प्रदान करते हैं।
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कोशिका कला में इन पदार्थों का अनुपात निम्न प्रकार है –
प्रोटीन – 60-80 %
लिपिड – 20-40
काबोंहाइड्रेट – लगभग – 5 %
प्राणियों (animals) के यकृत (livar) तथा लाल रुधिराणुओं (RBCs) की जैव-कलाओं में हैक्सोस, हैक्सोस एमीन, फ्रक्टोस, कारोंहाइड्रेट तथा सियालिक अम्ल, प्रोटीन्स के साथ पाए जाते हैं।

प्लाज्मा कला के रूपान्तरण (Modifications of Plasma membrane):
प्लाज्मा कला कभी-कभी कोशिकाओं में कुछ विशेष कार्यों के लिए रूपान्तरित हो जाती है। इसके कुछ रूपान्तरण निम्न प्रकार है –
1. सूक्ष्मांकुर (Microvilli) – प्राणी कोशिकाओं में प्लाज्मा मेम्ब्रेन (plasma membrane) पर कभी-कभी अंगुली के समान उभार निकल आते हैं इन्हें सुक्ष्मांकुर (microvilli) कहते हैं। ये प्लाज्मा मेम्बेने के सतही क्षेत्रफल को बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए आंत्र (intestine) में पायी जाने वाली उपकला कोशिकाएँ।

2. डेस्मोसोम (Desmosomes) – संलग्न कोशिकाओं के आसंजन स्थलों पर प्लाज्मा कला से अनेक पतों वाली धागे जैसी कुछ संरचनाएँ बनती हैं। इस स्थल को डेस्पोसोम (desmosomes) कहते हैं तथा धागे जैसी संरचनाओं को टोनोफाइबिल्स (tonofibrils) कहते हैं। इनका प्रमुख कार्य कोशिका को आन्तरिक रूप से यांत्रिक शक्ति (Mechanical suport) प्रदान करता है साथ ही ये कोशिकाओं को परस्पर जोड़ने का भी कार्य करती हैं।

3. इंटरडिजिटेशन (Interdigitations) – कभी-कभी प्राणी कोशिकाओं में संलग्न स्थलों पर कुछ प्रवर्ध निकलकर कोशिकाओं को बाँधे रखने का कार्य करते हैं। इन्हें इंटरडिजिटेशन (interdigitations) कहते हैं।

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प्लाज्मा कला के कार्य (Functions of Plasma Membrane):
कोशिका कला या प्लाज्मा मैम्बेन (plasma membrane) के निम्नलिखित कार्य हैं-
1. यह कोशिका को एक निश्चित आकार प्रदान करती है।
2. यह विभिन्न पदार्थों के आयनों तथा अणुओं के कोशिका के अन्दर-बाहर आने-जाने का नियंत्रण करती है। अर्थात् यह चयनात्मक पारगम्य (selectively permeable) कला का कार्य करती है।
3. यह रक्षण, अवलम्बन तथा यांत्रिक शक्ति प्रदान करती है।
4. इसके द्वारा विभिन्न पदार्थों का परिवहन होता है। यह दो प्रकार का होता है-
(i) सक्रिय परिवहन (Passive Transport) – प्लाज्मा कला से होकर अनेक प्रकार के आयन्स (ions) अपने अधिक सान्द्रता के क्षेत्र से कम सान्द्रता के क्षेत्र की ओर साधारण रूप से विसरित हो जाते हैं। इसमें किसी प्रकार की ऊर्जा का व्यय नहीं होता है। इसे निक्रिय परिवहन (passive transport) कहते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 8 कोशिका जीवन की इकाई - 26
(ii) सक्रिय परिवहन (Active transport) – सक्रिय परिवहन में आयन या अणुओं का परिवहन कोशिका कला से होकर सान्द्रता प्रवणता (concentration gradient) के विपरीत होता है अर्थात निम्न सान्द्रता वाले स्थान से उच्च सान्द्रता वाले स्थान की ओर होता है। यह ऊर्जा निर्भर प्रक्रिया है जो वाहक प्रोटीन (carrier protein) द्वारा सम्पन्न होती है। ऊर्जा निर्भर प्रक्रिया में कोशिका में कोशिका कला से अणुओं या आयन्स को ले जाने के लिए आयन्स या अणुवाहक (carriers) ऊर्जा का व्यय करते हैं। यह क्रिया एन्जाइम की उपस्थिति में होती है तथा ATP ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं।
5. कोशिका कला के द्वारा ठोस एवं तरल पदार्थों का अन्तप्रम्णण भी किया जाता है, इस क्रिया को एण्डोसाइटोसिस (endocytosis) भी कहते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 8 कोशिका जीवन की इकाई - 27
पदार्थों की प्रकृति के अनुसार यह क्रिया दो प्रकार की होती है –
(i) कोशिका पायन (Pinocytosis) -प्लाज्मा कला से होकर कोशिका द्वारा तरल पदार्थों के अर्न्तग्रहण की क्रिया कोशिकापायन (Pinocytosis) कहलाती है। अधिक आण्विक भार वाले पदार्थ जैसे -प्रोटीन आदि को परासरण (osmosis) द्वारा कोशिका कला से होकर कोशिका में नहीं पहुँचाया जा सकता है। ऐसे पदार्थों को कोशिका पायन (pinocytosis) द्वारा प्रहण किया जाता है। इस क्रिया में प्लाज्मा कला (plasma membrane) में एक आशय बनता है जिसमें द्रव पदार्थों की बूदें बहकर आ जाती हैं। इसके पश्चात् यह आशय पृथक् होकर कोशिका के अन्दर आ जाता है। लाइसोसोम द्वारा इन आशयों का पाचन कर लिया जाता है। ऐसे पदार्थों के निष्षासन के लिए उपरोक्त क्रिया विपरीत हो जाती है। थाइाइड प्रन्थि (thyroid gland) में इस क्रिया को देखा जा सकता है।

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(ii) भक्षकाणु क्रिया (Phagocytosis) – प्लाज्मा-कला से होकर कोशिका द्वारा ठोस पदार्थों के अर्त्तप्रहण की क्रिया भक्षकाणु (phagocytosis) क्रिया कहलाती है। प्रोटोजोआ संघ के अनेक प्राणी इसी विधि द्वारा खाद्य पदार्थों को प्रहण करते हैं। श्वेत रुधिर कणिकाएँ रोगाणओं का इसी प्रकार भक्षण करके रोगों से रक्षा करती हैं। इस विधि में जब कोई ठोस पदार्थ प्लाज्मा मेम्ब्रेन (plasmam embrane) के सम्पर्क में आता है तो प्लाज्मा मेम्बेन अन्तर्वलित होकर इसे अन्दर ले लेती है और पृथक् होकर जीवद्रव्य (protoplasm) में समाहित हो जाती है बाद में लाइसोसोम (lysosome) से मिलकर इसके पदार्थ का पाचन हो जाता है। अपचित पदार्थ पुनः प्लाज्मा मेम्ब्रेन से बाहर कर दिया जाता है। कोशिका पायन (pinocytosis) तथा भक्षकाणु (phagocytosis) क्रिया दोनों ही क्रियाएँ समान होती हैं और दोनों में ही ऊर्जा व्यय होती है।

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HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन

Haryana State Board HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन

(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

1. तन्तुक विसर्पण सिद्धान्त के अनुसार पेशी संकुचन के समय पेशी की लम्बाई कम करने के लिए गति करने वाला अणु है-
(A) कोलैजन
(B) एक्टिन
(C) मायोसिन
(D) टायटिन।
उत्तर:
(B) एक्टिन

2. कोहनी की सन्धि का प्रकार है-
(A) अचल सन्धि
(B) कब्जा सन्धि
(C) दृढ़ सन्धि
(D) धुरा सन्धि।
उत्तर:
(B) कब्जा सन्धि

3. संकुचनशील प्रोटीन है-
(A) ट्रोपोनिन
(B) मायोसिन
(C) ट्रोपोमायोसिन
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(B) मायोसिन

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4. मानव के पश्चपाद में अस्थियों की संख्या होती है –
(A) 14
(C) 26
(B) 24
(D) 30
उत्तर:
(D) 30

5. पेशियों का अनॉक्सी संकुचन किसके संचयन के कारण पीड़ादायक होता है?
(A) कैल्सियम आयन
(B) मायोसि
(C) लैक्टिक अम्ल
(D) क्रियेटिन फॉस्फेट।
उत्तर:
(C) लैक्टिक अम्ल

6. अनुप्रस्थ सेतुओं के बन्धन के लिए कौन-से आयन की उपस्थिति आवश्यक है?
(A) कैल्सियम
(C) लौह
(B) सोडियम
(D) पोटैशियम।
उत्तर:
(A) कैल्सियम

7. अस्थियों को परस्पर जोड़ने वाला तन्तुकीय ऊतक होता है –
(A) वसा ऊतक
(B) कण्डरा
(C) स्नायु
(D) पेशी ऊतक।
उत्तर:
(C) स्नायु

8. पेशी संकुचन के लिए आवश्यक ऊर्जा का स्रोत है –
(A) एक्टिन
(B) ATP
(C) एक्टोमायोसिन
(D) मायोसिन।
उत्तर:
(B) ATP

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9. मनुष्य में सबसे दृढ़ पेशी होती है –
(A) हाथों की
(B) जबड़ों की
(D) पीठ की।
(C) जाँघों की
उत्तर:
(B) जबड़ों की

10. कण्डरा (tendon) जोड़ती है –
(A) पेशी को पेशी से
(B) हड्डी को हड्डी से
(C) पेशी को हड्डी से
(D) तन्त्रिका को पेशी से।
उत्तर:
(C) पेशी को हड्डी से

11. मनुष्य की पेशियाँ किसकी सुरक्षा करती हैं?
(A) हृदय की
(B) फेफड़ों की
(C) हृदय एवं फेफड़ों की
(D) आमाशय की।
उत्तर:
(C) हृदय एवं फेफड़ों की

12. ग्लीनॉइड गुहा किसमें पायी जाती है?
(A) अंसमेखला में
(B) श्रोणि मेखला में
(C) करोटि में
(D) हृदय में।
उत्तर:
(A) अंसमेखला में

13. श्रोणि के साथ फीमर की सन्धि होती है –
(A) धुराम
(B) कब्जा
(C) सैडल
(D) कन्दुक खल्लिका।
उत्तर:
(D) कन्दुक खल्लिका।

14. मानव की दायीं भुजा में हड़ियों की कुल संख्या होती है –
(A) 20
(B) 34
(C) 30
(D) 32
उत्तर:
(C) 30

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15. मनुष्य तथा अन्य स्तनियों में ग्रीवा कशेरुकाओं की आदर्श संख्या है –
(A) 7
(B) 12
(C) 10
(D) 11
उत्तर:
(A) 7

16. मनुष्य की श्रोणि मेखला की तीन अस्थियाँ हैं –
(A) प्यूबिस, ऐसीटाबुलम, इस्वियम
(B) इलियम, इस्वियम, सैक्रम
(C) इस्वियम, इलियम, प्यूबिस
(D) इलियम, प्यूबिस ऐसीटाबुलम।
उत्तर:
(C) इस्वियम, इलियम, प्यूबिस

17. मनुष्य की अंसमेखला की प्रमुख अस्थि है –
(A) स्कैपुला
(B) इलियम
(C) प्यूबिस
(D) कोरैकोएड।
उत्तर:
(A) स्कैपुला

18. मनुष्य में एक्रोमियन प्रवर्ध होता है –
(A) अंसमेखला में
(B) श्रोणि मेखला में
(C) रेडियो- अल्ना में
(D) अंसफलक में।
उत्तर:
(D) अंसफलक में।

19. लम्बी हड्डियों के सिरों पर स्थित लचीली रचनाएँ होती हैं –
(A) कण्डराएँ
(C) स्नायु
(B) पेशियाँ
(D) उपास्थियाँ।
उत्तर:
(D) उपास्थियाँ।

20. अक्षीय कंकाल के निर्माण में भाग नहीं लेती हैं –
(A) करोटि की अस्थियाँ
(B) रेडियो अल्ना का
(C) स्टर्नम की अस्थियाँ
(D) टीबियो फीबुला का।
उत्तर:
(D) टीबियो फीबुला का।

21. श्रोणि मेखला की ऐसीटाबुलम गुहिका में शीर्ष फिट रहता है –
(A) ह्यूमरस का
(C) फीमर का
(B) कशेरुक दण्ड की अस्थियाँ
(D) पैक्टोरल गर्डिल की अस्थियाँ।
उत्तर:
(A) ह्यूमरस का

22. श्रोणि मेखला (Pelvic girdle) के साथ फीमर की सन्धि होती है –
(A) धुराम
(B) सैडल
(C) कन्दुक- खल्लिका
(D) कब्जा।
उत्तर:
(C) कन्दुक- खल्लिका

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23. महारन्ध्र होता है –
(A) करोटि के आधार में
(B) कशेरुक दण्ड के शिखर पर
(C) मस्तिष्क के आधार में
(D) मैड्यूला के आधार में।
उत्तर:
(A) करोटि के आधार में

24. मनुष्य की अंसमेखला की प्रमुख हड्डी है –
(A) स्कैपुला
(B) इलियम
(C) प्यूबिस
(D) कोराकॉयड।
उत्तर:
(A) स्कैपुला

25. कलाई की अस्थियाँ कहलाती हैं –
(A) टार्सल्स
(B) मैटाटार्सल्स
(C) मैटाकार्पल्स
(D) कार्पल्स।
उत्तर:
(D) कार्पल्स।

26. अंसमेखला का घटक है –
(A) इलियम
(B) ग्लीनॉयड गुहा
(C) ऐसीटाबुलम
(D) स्टर्नम।
उत्तर:
(B) ग्लीनॉयड गुहा

27. अँगूठी के आकार की कशेरुका होती है –
(A) एटलस
(B) प्रारूपी प्रीवा
(C) एक्सिस
(D) थोरेसिक।
उत्तर:
(A) एटलस

28. टिम्पैनिक हड्डी पायी जाती है –
(A) नाक में
(B) कान में
(C) गर्दन में
(D) पैर में।
उत्तर:
(B) कान में

29. निम्न में अग्रपाद की हड्डी
(A) ह्यमरस
(C) टीबिया
(B) फीमर
(D) फीबुला।
उत्तर:
(A) ह्यमरस

30. मेटाकार्पल्स पायी जाती है –
(A) हथेली में
(B) कपाल में
(C) गर्दन में
(D) पीठ में।
उत्तर:
(A) हथेली में

31. मानव शरीर में अस्थियों की कुल संख्या होती है –
(A) 260
(B) 206
(C) 360
(D) 306
उत्तर:
(B) 206

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32. कण्डरा एवं स्नायु विशिष्ट प्रकार के –
(A) तन्त्रिका ऊतक हैं
(B) उपकला ऊतक हैं
(C) पेशीय ऊतक हैं
(D) तन्तुमय संयोजी ऊतक हैं।
उत्तर:
(C) पेशीय ऊतक हैं

33. ओब्ट्यूरेटर फोरामेन पाया जाता है –
(A) खरगोश की अंसमेखला में
(B) मेढक की अंसमेखला में
(C) खरगोश की श्रोणि मेखला में
(D) मेढक की श्रोणि मेखला में।
उत्तर:
(C) खरगोश की श्रोणि मेखला में

34. त्रिकोणाकार कटक (deltoid ridge) पाया जाता है –
(A) ह्यमरस में
(B) टीबियो फीबुला में
(C) रेडियो अल्ना में
(D) फीमर में।
उत्तर:
(C) रेडियो अल्ना में

35. न्यूरल केनाल उपस्थित होती है-
(A) ह्यमरस में
(B) टीबियो फीबुला में
(C) कशेरुक दण्ड में
(D) कपाल अस्थि में।
उत्तर:
(C) कशेरुक दण्ड में

32. कण्डरा एवं स्नायु विशिष्ट प्रकार के –
(A) तन्त्रिका ऊतक हैं
(B) उपकला ऊतक हैं
(C) पेशीय ऊतक हैं
(D) तन्तुमय संयोजी ऊतक हैं।
उत्तर:
(C) पेशीय ऊतक हैं

33. ओब्ट्यूरेटर फोरामेन पाया जाता है –
(A) खरगोश की अंसमेखला में
(B) मेढक की अंसमेखला में
(C) खरगोश की श्रोणि मेखला में
(D) मेढक की श्रोणि मेखला में।
उत्तर:
(C) खरगोश की श्रोणि मेखला में

34. त्रिकोणाकार कटक (deltoid ridge) पाया जाता है –
(A) ह्यमरस में
(B) टीजियो फीबुला में
(C) रेडियो अल्ना में
(D) फीमर में।
उत्तर:
(C) रेडियो अल्ना में

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35. न्यूरल केनाल उपस्थित होती है-
(A) ह्यमरस में
(B) टीबियो फीबुला में
(C) कशेरुक दण्ड में
(D) कपाल अस्थि में।
उत्तर:
(C) कशेरुक दण्ड में

36. मुर्गे की सिन सेक्रम बना होता है –
(A) 29 कशेरुकाओं का
(B) 3 कशेरुकाओं का
(C) 16 कशेरुकाओं का
(D) एक कशेरुका का।
उत्तर:
(C) 16 कशेरुकाओं का

37. एक क्रिकेट खिलाड़ी मैदान में तेजी से गेंद का पीछा कर रहा है। इस क्रिया के लिए निम्न में से अस्थियों का कौन-सा समूह सीधा उत्तरदायी है-
(A) फीमर, मेलियस, टीबिया, मेटाटार्सल
(B) पेल्विस, अल्ना, पैटेला, टार्सल
(C) स्टर्नम, फीमर, टीबियो, फीबुला
(D) टार्सल, फीमर, मेटाटार्सल, टीबिया।
उत्तर:
(D) टार्सल, फीमर, मेटाटार्सल, टीबिया।

(B) अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
अमीबीय गति किस प्राणी में पायी जाती है ?
उत्तर:
अमीबीय गति अमीबा में पायी जाती है।

प्रश्न 2.
पैरामीशियम में किस प्रकार की गति पायी जाती है ?
उत्तर:
पैरामीशियम में पक्ष्माभी गति (ciliary movement) पायी जाती

प्रश्न 3.
कोशिका भक्षण में कौन-सी गति काम आती है ?
उत्तर:
कोशिका भक्षण में अमीबीय गति काम आती है।

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प्रश्न 4.
अनैच्छिक एवं रेखित लक्षणों वाली पेशी का नाम लिखिए।
उत्तर:
हृदय पेशियाँ (cardiac muscles)।

प्रश्न 5.
पेशी की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई बताइये।
उत्तर:
सार्कोमीयर ( sarcomere)।

प्रश्न 6.
पेशी किसके द्वारा अस्थि से जुड़ती है ?
उत्तर:
कण्डराओं (tendons) द्वारा।

प्रश्न 7.
अस्थि से अस्थि किसके द्वारा जुड़ती है ?
उत्तर:
स्नायुओं ( ligaments) द्वारा।

प्रश्न 8.
प्रेरक तन्त्रिका एवं पेशी के मध्य कौन-सा तन्त्रिकाप्रेषी रसायन स्त्रावित होता है ?
उत्तर:
ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) ।

प्रश्न 9.
अनुप्रस्थ सेतु का निर्माण कौन-सी प्रोटीन द्वारा होता है ?
उत्तर:
एक्टिन द्वारा।

प्रश्न 10.
मनुष्य के त्रिक का निर्माण कितने कशेरुक करते हैं ?
उत्तर:
पाँच कशेरुकाएँ।

प्रश्न 11.
मनुष्य में करोटि का निर्माण कितनी अस्थियों से होता है ?
उत्तर:
28 अस्थियाँ ।

प्रश्न 12.
किस रसायन के कारण पेशियों में थकावट उत्पन्न होती है ?
उत्तर:
लैक्टिक अम्ल (lactic acid) के कारण।

प्रश्न 13.
मनुष्य में पायी जाने वाली कर्णास्थियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मनुष्य में मैलियस, इन्कस तथा स्टेपीज नामक कर्ण अस्थियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 14.
चल सन्धियों में पाये जाने वाले स्नेहन का नाम लिखिए।
उत्तर:
चल सन्धियों में सायनोवियल तरल (Synovial fluid) स्नेहन के रूप में पाया जाता हैं।

प्रश्न 15.
कन्दुक खल्लिका सन्धि का एक उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
श्रोणि सन्धि (Hip joint)।

प्रश्न 16.
मेखलाओं का कंकाल में क्या कार्य है ?
उत्तर:
मेखलाएँ उपांगीय कंकाल को सन्धान एवं सहारा प्रदान करती हैं।

प्रश्न 17.
एक वयस्क मनुष्य के कशेरुक दण्ड में कुल कितनी कशेरुकाएँ होती हैं ?
उत्तर:
एक वयस्क मनुष्य के कशेरुक दण्ड में कुल 26 कशेरुकाएँ होती

प्रश्न 18.
मनुष्य में कितनी जोड़ी वास्तविक पसलियाँ पायी जाती हैं ?
उत्तर:
मनुष्य में 7 जोड़ी वास्तविक पसलियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 19.
मनुष्य के शरीर की सबसे लम्बी अस्थि कौन-सी होती है ?
उत्तर:
मनुष्य के शरीर की सबसे लम्बी अस्थि फीमर होती है।

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प्रश्न 20.
मनुष्य के शरीर की सबसे छोटी अस्थि का नाम लिखिए।
उत्तर;
मनुष्य के अन्तः कर्ण में पायी जाने वाली स्टेपीज (Stapes) नामक अस्थि सबसे छोटी होती है।

प्रश्न 21.
मानव शरीर की ऐसी अस्थि का नाम बताइए जो कि किसी अन्य अस्थि से नहीं जुड़ती है ?
उत्तर:
हाय ऑयड अस्थि (Hyoid bone)

प्रश्न 22.
कलाई की हड्डियाँ क्या कहलाती हैं ?
उत्तर:
कार्पल्स (Carpals)।

प्रश्न 23.
स्कैपुला अस्थि (Scapula) किसमें पायी जाती है।
उत्तर:
अंसमेखला में।

प्रश्न 24.
पेशियों में आकुंचन के समय कौन-सा पदार्थ बनता है ?
उत्तर:
पेशियों में आकुंचन के समय एक्टोमायोसिन बनता है।

प्रश्न 25.
क्रिएटिन फॉस्फेट का कार्य लिखिए।
उत्तर:
पेशी संकुचन के समय क्रिएटिन फॉस्फेट ADP को ATP में बदलकर ऊर्जा प्रदान करता है।

प्रश्न 26.
मनुष्य के अक्षीय कंकाल में कितनी अस्थियाँ होती हैं ?
उत्तर:
मनुष्य के अक्षीय कंकाल में 80 अस्थियाँ होती हैं।

प्रश्न 27.
पेशी तन्तु में संकुचन कौन-सी छड़ों के कारण होता है ?
उत्तर:
एक्टिन छड़ें मायोसिन छड़ों के ऊपर फिसलती हैं। इससे पेशी खण्डों के छोटे हो जाने से पेशी तन्तुक सिकुड़ते हैं।

प्रश्न 28.
पेशी संकुचन के लिए आवश्यक ऊर्जा कहाँ से प्राप्त होती
उत्तर:
पेशी संकुचन के लिए आवश्यक ऊर्जा ATP तथा क्रिएटिन फॉस्फेट से प्राप्त होती है।

प्रश्न 29.
पेशी संकुचन के लिए कौन-सा अकार्बनिक आयन आवश्यक होता है ?
उत्तर:
पेशी संकुचन के लिए कैल्सियम आयन (Ca+) आवश्यक होता है

प्रश्न 30.
पेशी तन्तु संकुचन का छड़ विसर्पण सिद्धान्त ( सर्पी तन्तु सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया था ?
उत्तर:
पेशी तन्तु का छड़ विसर्पण सिद्धान्त H. E. हक्सले ने प्रस्तुत किया था।

प्रश्न 30.
पेशी तन्तु संकुचन का छड़ विसर्पण सिद्धान्त ( सर्पी तन्तु सिद्धान्त) किसने प्रस्तुत किया था ?
उत्तर:
पेशी तन्तु का छड़ विसर्पण सिद्धान्त H. E. हक्सले ने प्रस्तुत किया था।

प्रश्न 31.
पेशी संकुचन के समय पेशी तन्तु की कौन-सी पट्टी की लम्बाई कम होती है ?
उत्तर:
पेशी संकुचन के समय ‘ पट्टी (I-band) की लम्बाई कम हो जाती है।

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प्रश्न 32.
पेशियों के विशेष गुण बताइए।
उत्तर:
पेशियों के विशेष गुण होते हैं-उत्तेजनशीलता, संकुचनशीलता, प्रसारण एवं प्रत्यास्थता ।

(C) लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions )

प्रश्न 1.
अस्थियों के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
अस्थियों के निम्नलिखित कार्य हैं –

  • अस्थियाँ शरीर को निश्चित आकार (Shape) प्रदान करती हैं।
  • ये गति, चलन आदि क्रियाओं में सहायक होती हैं।
  • ये आन्तरिक तथा कोमल अंगों को सुरक्षा (Protection) तथा आलम्बन ( Support ) प्रदान करती हैं।

प्रश्न 2.
स्नायु तथा कण्डरा में भेद लिखिए।
उत्तर:
स्नायु एवं कण्डरा में भेद

स्नायु (Ligaments )कण्डरा (Tendon )
1. स्नायु प्रत्यास्थ होता है।1. यह अप्रत्यास्थ होता है।
2. यह पट्टी के रूप में दो अस्थियों के बीच में सन्धि स्थल पर स्थित होता है।2. यह पेशी एवं अस्थि को जोड़ता है।
3. स्नायु अस्थियों को अपने स्थान से हटने से रोकता है।3. यह गति में सहायक होता है।
4. यह दो अस्थियों के आवरण के बीच स्थित होता है।4. यह पेशी तथा अस्थि आवरण के बीच स्थित होता है।

प्रश्न 3.
संकुचन के लिए पेशी किस प्रकार उत्तेजित होती है ?
उत्तर:
तन्त्रिका आवेग के कारण तन्त्रिका पेशी सन्धि पर तन्त्रिका के सिरों द्वारा मुक्त ऐसीटिलकोलीन नामक तन्त्रिकाप्रेषी रसायन पेशी की प्लाज्मा झिल्ली को Na+ के प्रति पारगम्यता को बढ़ा देता है जिससे Na+ पेशी कोशिका में प्रवेश करते हैं और प्लाज्मा झिल्ली की आन्तरिक सतह पर धनात्मक विभव उत्पन्न हो जाता है। यह विभव पूरी प्लाज्मा झिल्ली पर संचरित होकर सक्रिय विभव (Action potentia) उत्पन्न करता है। यही अवस्था पेशी कोशिका की उत्तेजन अवस्था कहलाती है।

प्रश्न 4.
मनुष्य की भुजा की सभी सन्धियाँ अचल हो जायें तो क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर:
मनुष्य की भुजा की सभी सन्धियों के अचल होने पर पेशीय संकुचन अप्रभावी हो जायेगा तथा भुजा में किसी भी प्रकार की गति सम्भव नहीं हो पायेगी।

प्रश्न 5.
ओस्टियोपोरोसिस किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यह एक अस्थि रोग होता है। इसमें अस्थि के द्रव्यमान की क्षति हो जाती है। अस्थि पतली, कमजोर तथा कम प्रत्यास्थ हो जाती है जिससे इसकी मजबूती घट जाती है। फलतः मामूली सी चोट लगने पर अस्थि टूट जाती है। ओस्टियोपोरोसिस एस्ट्रोजन हॉर्मोन की कमी के कारण वृद्ध महिलाओं में अधिक होता है। कैल्सियमयुक्त सन्तुलित आहार एवं नियमित व्यायाम से इस रोग से बचा जा सकता है।

प्रश्न 6.
पेशी संकुचन के लिए ऊर्जा स्रोत क्या है ?
उत्तर:
पेशी संकुचन के लिए ऊर्जा ATP द्वारा मिलती है। संकुचन के समय ADP को क्रिएटिन फॉस्फेट पुनः ATP में परिवर्तित कर देता है। पेशी में ATP का निर्माण संचित ग्लाइकोजन तथा वसीय अम्लों के ऑक्सीकरण के द्वारा होता है।

प्रश्न 7.
यदि कंकाल पेशी को जाने वाली तन्त्रिका को काट दिया जाये तो संकुचन पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर:
कंकाल पेशी को जाने वाली तन्त्रिका को काट देने पर तन्त्रिकाप्रेषी रसायन ऐसीटिलकोलीन का स्त्रावण नहीं होगा फलतः पेशी प्लाज्मा झिल्ली की Na++ के प्रति पारगम्यता नहीं बढ़ेगी और सोडियम आयन के पेशी कोशिका में प्रवेश न कर पाने के कारण झिल्ली की आन्तरिक सतह पर धनात्मक विभव उत्पन्न नहीं होगा और पेशी का उत्तेजन नहीं होगा। परिणामस्वरूप पेशी संकुचन नहीं होगा।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन

प्रश्न 8.
शरीर में कंकाल के कार्यों का वर्णन कीजिए। उत्तर-जन्तुओं के शरीर में कंकाल के निम्नलिखित प्रमुख कार्य होते हैं-

  1. कंकाल शरीर को दृढ़ता तथा निश्चित आकृति प्रदान करता है।
  2. शरीर के अनकों कोमल अंगों जैसे—हृदय, यकृत, फेफड़े, प्लीहा, मस्तिष्क आदि की रक्षा करता है।
  3. कंकाल पेशियों को जुड़ने के लिए आधार प्रदान करता है।
  4. पेशियों के गति करने में सहायक होता है।
  5. अस्थियों की अस्थि मज्जा (Bone marrow) में R.B.C. का निर्माण होता है।
  6. जन्तु को गति, प्रचलन, श्रवण, जनन आदि क्रियाओं में सहयोग प्रदान करता है।
  7. पसलियाँ श्वसन क्रिया में सहायक होती हैं।
  8. कर्ण अस्थियाँ सुनने की क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

प्रश्न 9.
शरीर में कशेरुक दण्ड (Vertebral Column) के कार्य बताइए ।
उत्तर:
कशेरुक दण्ड के निम्नलिखित प्रमुख कार्य होते हैं-

  1. अक्ष कंकाल के रूप में प्राणी को एक निश्चित आकृति प्रदान करती
  2. कशेरुक दण्ड के अगले सिरे पर खोपड़ी लगी होती है।
  3. देहगुहा में स्थित अन्तरंगों का सन्धान करती है।
  4. अनेकों कोमल अन्तरंगों को सुरक्षा प्रदान करती है 1
  5. मेरु रज्जु (Spinal cord) को सुरक्षा प्रदान करती है।
  6. यह मेखलाओं को सहारा देती है तथा गमन में सहायक होती है।
  7. श्वसन क्रिया में सहायता करती है।
  8. कशेरुकाओं के सभी प्रवर्ध बड़ी-बड़ी पेशियों को सन्धि स्थल प्रदान करते हैं।

प्रश्न 10.
मनुष्य के कंकाल तन्त्र में पायी जाने वाली समस्त अस्थियों की गणना कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य के कंकाल तन्त्र में कुल 206 अस्थियाँ पायी जाती हैं, जो निम्न प्रकार हैं-
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन 1

प्रश्न 11.
उपास्थि और अस्थि में अन्तर बताइए।
उत्तर:
डत्तर- उपास्थि तथा अस्थि में अन्तर

उपास्थि (Cartilage)अस्थि (Bone)
1. यह लचीली तथा कोमल होती है।1. यह मजबूत, दृढ़ तथा कठोर होती है।
2. उपास्थि का मैट्रिक्स कॉण्ड़रन (Chondrin) का बना होता है।2. इनका मैट्रिक्स ओसीन (Ossein) का बना होता है।
3. इनका मैट्रिक्स अर्द्ध ठोस होता है।3. इनका मैट्रिक्स ठोस होता है।
4. इनकी कोशिकाएँ अर्द्धगोल होती हैं।4. इनकी कोशिकाएँ अनियमित होती हैं।
5. उपास्थि कोशिकाओं की संख्या उनके विभाजन से बढ़ती है ।5. अस्थि कोशिकाएँ सदैव ओस्टियोब्लास्ट (Osteoblast) के विभाजन से बढ़ती हैं।
6. हैवर्सियन तन्त्र (Haversian system) का निर्माण नहीं होता है।6. हैवर्सियन तन्त्र (Haversian system) का निर्माण होता है।
7. इनमें R.B.C. नहीं बनती हैं।7. इनमें R.B.C. बनती हैं।

प्रश्न 12.
अरेखित तथा रेखित पेशियों में अन्तर बताइए।
उत्तर:
अरेखित तथा रेखित पेशियों में अन्तर

अरेखित पेशी (Unstriped muscle)रेखित पेशी (Striped muscle)
1. इनकी कोशिकाएँ तर्कुरूप होती हैं।1. इनकी कोशिकाएँ बेलनाकार तथा पेशीचोल नामक झिल्ली से स्तरित होती हैं।
2. कोशिकाओं में केवल एक केन्द्रक होता है।2. कोशिका एवं झिल्ली के बीच अनेक केन्द्रक स्थित होते हैं।
3. इनमें पट्टियों का अभाव होता है।3. इसमें गहरी एवं हल्की पट्टियाँ होती हैं।
4. ये निश्चित क्रम में स्वतः फैलती एवं सिकुड़ती हैं।4. ये जीव की इच्छानुसार फैलती, सिकुड़ती या हिलती-डुलती हैं।
5. इनमें थकान का अनुभव कभी नहीं होता है।5. इनमें थकान का अनुभव होता है।

प्रश्न 13.
अरेखित पेशी एवं ह्द् पेशी की तुलना कीजिए।
उत्तर:
अरेखित पेशी एवं हृद् पेशी की तुलना (अन्तर)

अरेखित पेशी (Unstriped Muscleहद्द पेशी (Cardiac Muscles)
1. ये हृदय को छोड़कर शेष आन्तरांगों में मिलती हैं।1. ये केवल हृदय की भित्तियों में ही मिलती हैं।
2. इसकी कोशिकाएँ तर्कुरू होती हैं।2. इसकी कोशिकाएँ जाल सदृश होती हैं।
3. कोशिकाओं में केवल एक केन्द्रक स्थित होता है।3. प्रत्येक खण्ड में एक केन्द्र होता है।
4. इनमें पद्धियों का अभाव होल है।4. इनमें अनुप्रस्थ पट्टियाँ होत हैं।
5. ये स्वतः फैलती व सिकुड़ती अतः अनैच्छिक होती हैं।5. ये निश्चित क्रम में स्व फैलती व सिकुड़ती हैं औ इच्छा पर निर्भर नहीं करती हैं
6. धीमी गति से सिकुड़ती हैं औ थकान का अनुभव नहीं होत है।6. ये जीवनपर्यन्त निरन्तर का करती हैं, फिर भी थकान क अनुभव नहीं होता है।

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प्रश्न 14.
निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिए-
(क) माइस्थेनियाप्रेविस,
(ख) पेशीय दुष्पोषण,
(ग) अपतानिका
(घ) सन्धिशोध
(ङ) अस्थिसुषिरता
(च) गाउट ।
उत्तर:
(क) माइस्थेनियाप्रेविस (Myastheniagravis) यह एक स्वप्रतिरक्षा विकार है जो तन्त्रिका पेशी सन्धि को प्रभावित करता है। इससे कमजोरी और कंकाली पेशियों का पक्षाघात होता है।
(ख) पेशीय दुष्पोषण (Muscular dystrophy ) – इसमें विकारों के कारण कंकालीय पेशी का अनुक्रमित अपह्रासन हो जाता है।
(ग) अपतानिका – शरीर में कैल्सियम आयनों (Ca+) की कमी से पेशी में तीव्र ऐंठन को ‘अपतानिका’ कहते हैं ।
(घ) सन्धिशोथ (Arthritis) – इस रोग में सन्धि झिल्ली में सूजन आ जाने से झिल्ली मोटी हो जाती है तथा सन्धि तरल का स्राव बढ़ जाता है। इस कारण सन्धि पर दबाव बढ़ता है तथा दर्द होने लगता है।
(ङ) अस्थि सुषिरता (Ostcoporosis) – यह वृद्धावस्था में होने वाला रोग है। इस रोग में सन्धि (जोड़) क्षतिमस्त हो जाती है। इससे अस्थि के पदार्थों में कमी आ जाने से अस्थि भंग की प्रबल सम्भावना रहती है। एस्ट्रोजन स्तर में कमी इसका सामान्य कारण है।
(च) गाउट (Gout) – जोड़ों में यूरिक अम्ल कणों के एकत्र होने के कारण जोड़ों में शोथ (सूजन आ जाने को गाउट (सन्धिशोथ) कहते हैं।

(D) निबन्धात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
मनुष्य की करोटि का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य की करोटि (Human Skull)
मनुष्य की करोटि या खोपड़ी का कंकाल 18 अस्थियों का बना होता है। करोटि की अस्थियाँ अन्य अस्थियों से अधिक सुदृढ़ होती हैं। इसमें निम्नलिखित भाग होते हैं –

  1. कपाल की अस्थियाँ तथा
  2. चेहरे की अस्थियाँ ।

1. कपाल का क्रेनियम (Cranium) इसमें मस्तिष्क सुरक्षित रहता है। इसमें कुल 8 अस्थियाँ होती हैं-
ललाटिका (Frontal) – 1, भित्तिकास्थि (Parietal) – 2,
अनुकपाल (Occipital) – 1 टेम्पोरल (Temporal ) – 2,
जत्रुक (Sphenoid) – 1, झर्झरिका (Ethmoid) – 1
कपाल की सभी अस्थियाँ टेढ़ी-मेढ़ी सीवनों से दृढ़तापूर्वक जुड़ी रहती हैं। सीवन सिर पर लगे आघात को कम करते हैं । कपाल के नीचे की ओर एक महारन्ध्र (Foramen magnum) होता है। इसमें से होकर मस्तिष्क मेरुरज्जु (Spinal cord) से जुड़ा रहता है। महारन्ध्र के दोनों ओर एक-एक अनुकपाल अस्थिकन्द (Occipital condyle) होता है जो एटलस कशेरुका से जुड़कर सन्धि बनाते हैं।

2. चेहरे की अस्थियाँ (Facial Bones) – इनकी संख्या 14 होती है। ये चेहरे का कंकाल बनाती हैं और संवेदी अंगों की रक्षा करती हैं। ये अस्थियाँ हैं-
नासास्थियाँ (Nasals) – 2, तालाब अस्थि (Palatines ) – 2,
लैक्राइमल (Lacrimals) – 2,
वोमर (Vomer) – 1,
जम्भका (Maxielary ) – 2
स्क्वैमोजल या जाइगोमेटिक
(Squamosals or Zygomatic ) – 2,
मैक्सिली (Maxillae ) – 2,
मैण्डीबल (Mandible) – 1

जीभ को सहारा देने के लिए एक हाऑइड (Hyoid) भी मनुष्य में पायी जाती है। इनके अतिरिक्त 3 जोड़ी (6) कर्ण अस्थियाँ भी होती हैं-

  • मेलियस -2,
  • इन्कस – 2 तथा
  • स्टेपीज – 2 1

करोटि के कार्य-

  1. मस्तिष्क की सुरक्षा करना ।
  2. नेत्र, श्रवण कोषों, घ्राण कोषों की रक्षा करना ।
  3. चेहरे की कुछ अस्थियाँ मुख को अवलम्बन प्रदान करने हेतु जबड़ा बनाती हैं।
  4. आहार नाल तथा श्वसन पथ के अगले भाग को अवलम्बन प्रदान करना ।
  5. कण्ठिका (Hyoid ) द्वारा जीभ को सहारा देना ।

निचला जबड़ा एक ही अस्थि मैण्डीबल का बना होता है।

प्रश्न 2.
मनुष्य के कशेरुक दण्ड का संक्षेप में वर्णन कीजिए और उसके कार्य बताइए ।
उत्तर:
मनुष्य का कशेरुक दण्ड (Human Vertebral Column)
कशेरुक दण्ड पीठ के मध्य रेखा में सिर से धड़ के पश्च सिरे तक फैली एक छड़नुमा रचना है, जिसमें छोटे-छोटे छल्लों जैसी कशेरुक होती है। इसे रीढ़ की हड्डी भी कहते हैं। मनुष्य के कशेरुक अगर्ती (Acoelour) होते हैं। सभी कशेरुक उपास्थियों की डिस्क से जुड़े रहते हैं, जिनसे कशेरुक दण्ड लचीला बना रहता है तथा ये बाहरी आघातों को भी सोख लेते हैं। सभी कशेरुक 5 भागों में बँटे रहते हैं-
(1) गर्दन में ……………. ग्रीवा कशेरुकाएँ – 7
(2) वक्ष भाग ……………. वक्षीय कशेरुकाएँ – 12
(3) कटि भाग में ……………. कटि कशेरुकाएँ-5
(4) त्रिक भाग में ……………. त्रिकास्थि -1 ( शिशुओं में 4)
(5) श्रोणि भाग में ……………. अनुत्रिक – 1 (शिशुओं में 5)
वयस्कों में इनकी संख्या 26 तथा शिशुओं में 33 होती है।

कशेरुक दण्ड के कार्य –
(1) खोपड़ी को साधना,
(2) मेरुरज्जु की रक्षा करना,
(3) खड़ी स्थिति के लिए गर्दन व धड़ को सामर्थ्य प्रदान करना,
(4) पसलियों तथा उरोस्थि को अवलम्बन प्रदान करना,
(5) गर्दन को इधर-उधर घूमने की क्षमता प्रदान करना।

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प्रश्न 3.
मनुष्य के वक्षीय कंकाल का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य का वक्षीय कंकाल (Human Thoracic Skeleton )
मनुष्य के वक्ष भाग में 12 वक्ष कशेरुक, उरोस्थि (Sternum) तथा 10 जोड़ी पसलियाँ मिलकर वक्षीय कंकाल बनाती हैं। वक्षीय कंकाल हृदय, फेफड़ों और उदर गुहा के ऊपरी अंगों की रक्षा करती हैं। मनुष्य में 7 जोड़ी वास्तविक पसलियाँ (True ribs) होती हैं, ये एक ओर वक्ष कशेरुकाओं से तथा दूसरी ओर उरोस्थि से जुड़ी होती हैं ये साँस लेने में सहायता करती हैं। इसके बाद की तीन जोड़ी पसलियों आपस में जुड़ी होती हैं जिन्हें मिथ्या पसलियाँ (False ribs) कहते हैं। अन्तिम दो जोड़ी पसलियों के अन्तिम सिरे खाली पड़े रहते हैं, इन्हें अपूर्ण या मुक्त पसलियाँ (Floating ribs) कहते हैं। सीने की हड्डी उरोस्थि (Sternum) के तीन भाग होते हैं-

  • सबसे ऊपर की ओर छोटी हस्तक (Manubrium),
  • मध्य में सबसे बड़ी उरोस्थिकाय (Mesosternum) तथा
  • नीचे की छोटी सबसे जीफॉइड (Xiphoid)।

प्रश्न 4.
मनुष्य के अप्रपाद की अस्थियों का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य के अग्रपाद की अस्थियाँ-मनुष्य के अग्रपाद में तीन भाग होते हैं-

  1. ऊपरी बाहु,
  2. अग्र बाहु,
  3. हाथ। इसमें निम्नलिखित अस्थियाँ होती हैं-

1.  ऊमरी बाहु (Upperarm)-मनुष्य की ऊपरी बाहु में केवल एक लम्बी, बेलनाकार व खोखली अस्थि प्रगण्डिका या त्रामरस (humerus) होती है। ये कन्धे और कोहनी के मध्य स्थित होती है। इसका ऊपरी गोले सिरा अंसमेखला की ग्लीनॉइड कैविटी में फँसा रहता है। निचला सिरा अग्रबाहु की दो अस्थियों-रेडियस तथा अल्ना (radio-ulna) से जुड़ा रहता है। ह्यामरस की गुहा (cavity of humerus) में चिकना एवं वसीय पदार्थ भरा होता है, जिसे अंस्थि मज्जा कहते हैं, जो रुधिर कणिकाओं का निर्माण करती है।

2. अग्र बाहु (Fore arm) -कोहनी से कलाई तक के भाग-अम्र बाहु में दो अस्थियाँ होती हैं-

  • बहि-प्रकोष्ठिका या रेडियस (radius),
  • अन्तप्रकोष्ठिका या अल्ना (ulna) इनमें अँगूठे की ओर वाली अस्थि रेडियस तथा कनिष्ठा की ओर वाली अस्थि अल्ना होती है।

3. हाथ (Hand)-इस भाग में कलाई, हथेली व अँगुलियों की अस्थियाँ होती हैं-

  • कलाई (Wrist) -इसमें 8 छोटी-छोटी अस्थियाँ 4-4 की दो पंक्तियों में जुड़ी रहती हैं। इनको मणिबन्धिकाएँ (carpals) कहते हैं। ये अस्थियाँ लचीली उपास्थि द्वारा जुड़ी होने के कारण सरलता से घुमायी जा सकती हैं।
  • हथेली (palm)-मणिबन्धिकाओं से 5 लम्बी करभास्थियाँ (metacarpals) जुड़ी होती हैं जो हथेली का निर्माण करती हैं।
  • अंगुलास्थियाँ (Phalanges)-करभास्थियों से अंगुलास्थियाँ (Phalanges) जुड़ी होती हैं। प्रत्येक अँगुली में 3-3 तथा अँगूठे में 2 अंगुलास्थियाँ होती हैं। इस प्रकार पाँचों अँगुलियों में कुल 14 अंगुलास्थियाँ होती हैं।

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प्रश्न 5.
मनुष्य के पश्च पाद की अस्थियों का सचित्र वर्णन करो।
उत्तर:
मनुष्य के पश्चपाद्र की अस्थियाँ (Bones of Hind Limb of Man)
मनुष्य के अग्रपाद में तीन भाग होते हैं-

  1. ऊपरी बाहु,
  2. अप्र बाहु,
  3. हाथ। इसमें निम्नलिखित अस्थियाँ होती हैं-

1. जाँघ (Thigh)-मनुष्य की जाँघ में अस्थि उर्वरका या फीमर (femur) होती है। यह कूल्हे और घटने के मध्य स्थित होती है। यह शरीर की सबसे लम्बी एवं मजबूत अस्थि है। इसका ऊपरी गोल
सिरा श्रोणि मेखला के श्रोणि उलूखल में फँसा रहता है। पश्च भाग या निचला सिरा पगदण्ड की दो अस्थियों-टीबिया तथा फीबुला से जुड़ा रहता है। घुटने में एक गोल-तिकोनी छोटी-सी अस्थि होती है, जिसे पटेला (knee cap) कहते हैं। यह घुटने के जोड़ को ढके रहती है और गति में सहायक होती है। इसकी सहायता से घुटना आसानी से मोड़ा जा सकता है।

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2. पगदण्ड (Leg rod) -घुटने से टखने तक के भाग पगदण्ड में दो अस्थियाँ होती हैं-

  • अन्तःजंघिका या टीबिया (Tibia),
  • बहिःजंघिका या फीबुला (Fibula) । इनमें टीबिया अस्थि मोटी तथा अन्दर की ओर होती है एवं फीबुला पतली और कमजोर तथा बाहर की ओर होती है।

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3. पैर (Foot) -इस भाग में गुल्क, तलवा तथा अँगुलियों की अस्थियाँ होती हैं।

  • गुल्फ (Ankle)-टीबिया तथा फीबुला से सात छोटी-छोटी अस्थियाँ जुड़ी रहती हैं, जिनको गुल्फास्थियाँ (टार्सल्स-tarsals) कहते हैं। ये एड़ी व टखने का निर्माण करती हैं।
  • तलवा (Sole)-गुल्फास्थियों से 5 लम्बी और पतली अस्थियाँ जुड़ी होती हैं, जिन्हें प्रपदिका (मेटाटार्सल्स-metatarsals) कहते हैं। ये पैर से तलवे का निर्माण करती हैं।
  • अंगुलास्थियाँ (Phalanges)-मेटाटार्सल से अंगुलास्थियाँ जुड़ी रहती हैं। प्रत्येक अँगुली में 3-3 तथा अँगूठे में 2 अंगुलास्थियाँ होती हैं। इस प्रकार पाँचों अँगुलियों में कुल 14 अंगुलास्थियाँ होती हैं।

प्रश्न 6.
कंकाल सन्धियों का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कंकाल सन्धियाँ (Skeletal Joints)
सन्थि (Joint) – सन्धि दो या दो से अधिक अस्थियों या अस्थि एवं उपास्थि के मिलने का स्थल होती है अर्थात् जहाँ अस्थियाँ या उपास्थियाँ परस्पर जुड़ती हैं उस स्थल को सन्धि कहते हैं। कशेरुकियों में सन्धियों के कारण ही गति सम्भव होती है। शरीर के विभिन्न भागों में अनेकों सन्धियाँ पायी जाती हैं। सन्धियों की गति के आधार पर ये निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं-

  1. अचल सन्धि,
  2. चल सन्धि,
  3. आंशिक चल सन्धि।

1. अचल सन्धि या स्थिर सन्घि (Fixed Joints) – इस प्रकार की सन्धियों में गति सम्भव नहीं होती तथा ये अस्थियाँ परस्पर संयोजी ऊतक द्वारा जुड़ी रहती हैं। अस्थियों के मध्य कोई स्थान नहीं होता; जैसे -करोटि की अस्थियाँ, दाँत तथा मेक्सिला (maxilla) के मध्य की सन्धियाँ।

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2. चल सन्धि (Movable Joints) – इस प्रकार की सन्धियों में अस्थियाँ एक या अधिक दिशाओं में स्वतन्त्रतापूर्वक गति करती हैं। इस प्रकार की सन्धियों की अस्थियों के मध्य अवकाश या स्थान पाया जाता है। इस स्थान को सन्धि कोटर (synovial cavity) कहते हैं। इस केविटी में एक म्यूसिन युक्त तरल (synovial fluid) भरा होता है जो कि सन्धि को स्नेहन (lubrication) प्रदान करता है। चल सन्धि को पुन: निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित कर सकते हैं-

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(क) कन्नुक खस्तिका सन्यि (Ball and Socket Joint)- इस प्रकार की सन्धि में सभी दिशाओं में गति सम्भव है तथा यह सबसे अधिक गतिशील होती हैं जैसे – स्कन्ध सन्धि (shoulder Joint) एवं श्रोणि सन्धि (hip joint)।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन 6(ख) कक्या सन्धि (Hinge Joint)-इस प्रकार सन्धियों में गति केवल एक ही तल में सम्भव होती है। यह सन्धि दीवार में लगे हुए दरवाजे के समान कार्य करती है; जैसे -कोहिनी की सन्धि (elbow joint) एवं घुटने की सन्धि (knee joint)।
(ग) दीर्घकृतज सन्धि (Ellipsoidal Joint) – इस प्रकार की सन्धि में गति दो तलों में सम्भव है; जैसे-बहिप्रकोष्ठिका (radius) तथा मणिबन्ध (carpus) की सन्धियाँ।

3. आंशिक चल सन्धि (Slightly Movable Joint or Imperfect Joint) – इन सन्धियों में सीमित गति सम्भव होती है। इनकी अस्थियों के सिरे तन्तुमय उपास्थि द्वारा जुड़े रहते हैं। ऐसे जोड़ को सन्धान (symphysis) कहते हैं; जैसे-जघन सन्धान (Pubic symphysis) की सन्धि। यह दो प्रकार की होती है-

(क) धुराप्र सन्यि (Pivot Joint) – इस प्रकार की सन्धि में पार्श्व गति सम्भव है। इसमें गोल या नुकीला सिरा दूसरी अस्थि के हल्के गड्दे में स्थित होता है; जैसे-एटलस तथा एक्सिस के मध्य सन्धि।

(ख) विसर्थी सन्धि (Gliding Joint)-यह सरलतम प्रकार की सन्धि होती है। इसमें एक अस्थि दूसरी पर स्वतन्न्तापूर्वक गति करती है। सन्धि की दोनों अस्थियों के मध्य चपटे सन्धि तल होते हैं जो परस्पर विसर्पण करते हैं; जैसे-कलाई सन्धि (wrist joint)।

प्रश्न 7.
मनुष्य के कंकाल एवं पेशियों से सम्बन्धित रोग लिखिए।
उत्तर:
अस्थियों के रोग (Disorders of Bone)
1. सन्धि शोथ (Arthritis) – यह रोग जोड़ों या सन्धियों की झिल्लियों में सूजन या शोथ के कारण होता है। यह निम्न प्रकार का होता है-
(i) गाउटी सन्धि शोथ
(ii) रूमैटी सन्धि शोथ तथा
(iii) अस्थि सन्धि शोथ।

(i) गाउटी सन्धिशोथ या गाडट (Gouti Arthritis)-इसमें साइनोवियल संधि पर यूरिक अम्ल के क्रिस्टलों की मात्रा बढ़ जाती है क्योंकि यह अम्ल पूरी तरह उत्सर्जित नहीं हो पाता है। इससे बचने के लिए मांसाहारी भोजन को कम कर देना चाहिए। इसे सामान्यतः गठिया भी कहते हैं।

(ii) सूमेटी सन्धिशोथ (Rheumatoid Arthritis) – इसमें रूमेटी कारक इम्यूनोग्लोबिन Igm की मात्रा साइनोवियल झिल्ली पर बढ़ जाती है जिससे झिल्ली मोटी हो जाती है और उस पर साइनोवियल द्रव का दाब बढ़ जाता है। जो कि तीव्र दर्द उत्पन्न करता है। कुछ समय बाद साइनोवियल झिल्ली पैनस नामक असामान्य कणों का स्राव करती है, जो उपास्थि टोपी पर एकत्र हो उसे कठोर बनाते हैं और संधि अचल हो जाती है। जिससे पीड़ा और अधिक बढ़ जाती है। यह रोग अधिकतर अधिक उम्र के व्यक्तियों में होता है। इसके उपचार में व्यायाम, ऊष्मा सेक उपचार आदि प्रभावी है। इसके अतिरिक्त दवा, भौतिक चिकित्सा एवं शल्य क्रिया भी कारगर हैं।

(iii) अस्थि सन्यिशोध (Oste0-arthritis) – इसमें अस्थियों के शीर्ष पर उपस्थित टोपी की उपास्थि विघटित होने लगती है। जिससे संधि तल पर उपास्थि नहीं रहती और साइनोवियल द्रव का स्नेहक (lubricant) प्रभाव भी समाप्त हो जाता है और अस्थि में वृद्धि होने लगती है, जिससे संधि अंचल हो जाती है और तीव्र पीड़ादायक होती है। संधि उपास्थि का पतली व कमजोर हो जाना, जोड़ के बीच स्थान कम रह जाना, सन्धि का क्षतिम्त होना एवं नयी अस्थि का निर्माण हो जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। रोग के उपचार हेतु दर्द निवारक दवा दी जाती है। स्थिति अधिक खराब हो जाने पर धातु एवं प्लास्टिक से बने अवयवों द्वारा संधि को प्रतिस्थापित किया जाता है।

2. अस्थि सुसिरता या ओस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) – यह वृद्धावस्था में होने वाला एक सामान्य अस्थि रोग है। इसमें अस्थि निर्माण की क्रियाओं के घटने के कारण अस्थि से Ca+तथा PO4- आयन बाहर निकल जाते हैं जिससे अस्थि का घनत्व कम हो जाता है और अस्थि भंगुर हो जाती है। इससे अस्थियाँ इतनी कमजोर हो जाती हैं कि मामूली चोट पर ये टूट सकती हैं। इस रोग के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-

  • भोजन में कैल्शियम व विटामिन C व D की कमी से।
  • स्तियों में रजनोनिवृत्ति के बाद एस्ट्रोजन हारमोन की मात्रा के कम होने के कारण।
  • कॉर्टिसोल के लम्बे समय तक उपचार के रूप में सेवन करने से।
  • आयु बढ़ने के साथ-साथ GH (वृद्धि हारमोन्स) के स्रावण में कमी से।
  • अस्थि निर्माण व अस्थिभवन की क्रियाओं के आयु के साथ कम होने के कारण।
  • केल्सिटोनिन, ग्लूकोकोर्टिकॉयड, लिंग हारमोन के असंतुलन के कारण।

3. माइस्थेनिया श्रेविस (Myasthenis gravis) – यह व्यक्ति के स्वयं के प्रतिरक्षा तन्त्र के कारण उत्पन्न रोग है। इनमें तन्त्रिका पेशी सन्धि स्थल प्रभावित होता है। इसमें कंकाली पेशियों का पक्षाघात (paralysis) भी हो सकता है।

4. पेशीय दुषोषण (Muscular dystrophy) – अन्य रोगों के कारण कंकाल पेशियों का अनुक्रमित उपशासन हो जाता है।

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5. अफ्तान्रिका (Tetany) – यह Ca+आयनों की कमी से होने वाला रोग है। इसमें पेशियों में तीव्र ऐंठन होती है इसे सामान्यतः धनुषबाण भी कहा जाता है

6. मोच (Sprain) – सन्धि सम्पुट से जुड़े हुए कंडरा (tendons) या स्नायु (Ligaments) के खिंचने या फटने को मोच कहते हैं। इससे उस स्थान पर सूजन आ जाती है और दर्द होता है।

प्रश्न 8.
विभिन्न प्रकार की जैविक गतियों को समझाइए ।
उत्तर:
गतियों के प्रकार (Types of Movements)
जन्तुओं में मुख्यतः चार प्रकार की गतियाँ होती हैं-

  1. कोशिका द्रव्यी अंगों द्वारा गति (Movement by cellular organelles)
  2. शरीर के उपांगों द्वारा गति (Movements by body appandages)
  3. आन्तरिक अंगों द्वारा गति (Movements by Internal Organs)
  4. कंकालीय पेशियों द्वारा गति (Movements by Skeletal Muscles)

उपर्युक्त में से पहले दो प्रकार की गतियाँ अपेक्षीय गतियाँ कहलाती हैं, क्योंकि इनमें किसी भी प्रकार की पेशीय संरचना गति में भाग नहीं लेती है।

1. कोशिकाद्रव्यी अंगों द्वारा गति (Movements by Cellular Organelles) – इस प्रकार की गति प्राय: उन जन्तुओं में पायी जाती है जिनमें शरीर संगठन कोशिकीय स्तर का होता है। इस प्रकार की गति को पुन: निम्न प्रकारों में बाँटा जा सकता है-
(i) अमीबीय गति (Amoeboid Movement) – इस प्रकार की गति सभी सार्कोडीन (Sarcodine), मैस्टिगोफोर (Mastigophore) तथा स्पोरोजोअन (Sporozoan) प्रोटोजोअन प्राणियों की विशेषता है।

इनके अतिरिक्त यह उन्च जन्तुओं की श्रमणशील कोशिकाओं, जैसे-श्वेत रुधिर कोशिकाओं, ध्रूणीय मीसेनकाइम कोशिकाओं तथा अन्य अनेक कोशिकाओं जो ऊतकीय अन्तरालों में गति करती हैं, में भी पायी जाती हैं। यह नग्न जीवद्रव्य (protoplasm) की विसर्पी गति होती है।

इस प्रकार की गति जीवद्रव्य द्वारा एक ओर से कुछ प्रवर्ध (outgrowth) बढ़ाकर व दूसरी ओर से खिंचकर होती है। यह गति अमीबा की गति के समान होती है इसलिए इसे अमीबीय गति कहते हैं। अमीबा के बाह्य जीवद्रव्य (actoplasm) में एक्टिन एवं मायोसिन नामक प्रोटीन्स के बने सूक्ष्म तन्तुक पाए जाते हैं। इन्हीं में संकुचन एवं शिथिलन से अमीबीय गति होती है। यह अमीबा में गमन तथा भोजन प्रहण करने के काम आती है।

(ii) कशाभिकीय गति (Flagellar Movements) – मैस्टिगोफोर प्रोटोजोअन (जैसे-युग्लीना, ट्रिपेनोसोमा), स्पंजों तथा शुक्राणुओं में कशाभी गति पायी जाती है। कशाभ (flagella), कोशिका की सतह से निकले चाबुक की तरह (whiplike) संरचनाएँ होती हैं। कशाभ केवल द्रव माध्यम में ही गति करते हैं।

द्रव माध्यम में कशाभ प्रभावी (effective) तथा प्रतिप्राप्त (recovery) चरणों (strokes) की सहायता से गति करते हैं। प्रभावी चरण में दृढ़ता से पीछे की ओर जाता है तथा प्रतिप्राप्त चरण में यह वक्रित होकर आगे की ओर आ जाता है। इस प्रकार क्रमिक प्रभावी एवं प्रतिप्राप्त चरणों की क्रिया द्वारा कशाभी गति सम्पन्न होती है। इसे क्षेपणी गति (paddle movement) भी कहते हैं।

(iii) पक्ष्माभिकी गति (Ciliary Movement) – पक्ष्माभ (cilia) अत्यन्त गतिशील, छोटे-छोटे बहिद्रव्यीय प्रवर्ध (ectopolasmic projection) होते हैं जो अनेक जन्तुओं की कोशिकीय सतह पर विस्तारित होते हैं। ये पक्ष्माभी प्रोटोजोअन प्राणियों की विशेषता है। बड़े जन्तुओं में ये पक्ष्माभी उपकला पर विभिन्न द्रवों एवं पदार्थों को ढकेलने का कार्य करते हैं।

ये पैरामीशियम, ओपेलाइना आदि में गमन व यूनियो में भोजन प्रहणण करने में सहायक होते हैं। मानव की शुक्रवाहिनी, अण्डवाहिनी, ट्रेकिया आदि में भी इनकी गति पायी जाती है। पक्ष्माभी गति के समय प्रत्येक पक्ष्माभ लोलक (pendulum) की तरह दोलन करता है। प्रत्येक दोलन दो स्ट्रॉक्स में पूर्ण होता है जिसमें प्रथम तीव्र प्रथावी स्ट्रोक तथा उसके बाद दूसरा मंद प्रतित्राप्त स्ट्रोक होता है।

(iv) साइक्लोसिस (Cyelosis) – यह प्रोटोजोअन्स के कुछ जन्तुओं के जीवद्रव्य में पायी जाने वाली चक्राकार गति है, जिससे भोजन आदि का वितरण किया जाता है। यह कुछ स्पंजों में भी पायी जाती है।

2. शारीरिक उपांगों द्वारा गति (Movements by Body Appendages) – यह गति शरीर में पाये जाने वाले उपांगों के द्वारा होती है। यह निम्न प्रकार की होती है-

  • शूक एवं पैरापोडिया (Setae and Parapodia)-संघ एनीलिडा के प्राणियों, जैसे-केंचुआ में शूकों द्वारा तथा नेरीस में पैरापोडिया के द्वारा गति होती है।
  • स्पर्शक द्वारा (By Tantacle)-संघ सीलेन्ट्रेटा के प्राणियों (जैसे-हाइड्रा, फाइसेलिया आदि) प्राणियों के मुख के चारों ओर स्पर्शक पाए जाते हैं। ये इन प्राणियों की गति में सहायक होते हैं।
  • सन्धियुक्त उपांग (Jointed Appendages) – संघ आथोंपोडा के प्राणियों में गमन के लिए सन्धियुक्त उपांग पाए जाते हैं। सन्धियुक्त उपांगों की उपस्थिति इस संघ का लाक्षणिक गुण है। ये उपांग भोजन पकड़ने में भी सहायक होते हैं।
  • नलिकाकार पाद (Tube Feet) – संघ इकाइनोडमेंटा के प्राणियों में नलिकाकार पाद पाए जाते हैं। ये समुद्र की सतह पर चलने में सहायता करते हैं।
  • पंख (Fins)-मछलियों में गति के लिए पंख पाए जाते हैं। ये नाव के चपुओं की तरह कार्य करते हैं।

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3. आन्तरिक अंगों द्वारा गति (Movement by Internal Organs) – इस प्रकार की गति लगभग सभी प्राणियों में पायी जाती है तथा विभिन्न क्रियाओं को सरल बनाती है। इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार हैं-

  • वक्षीय एवं उदरीय गति अर्थात् डायाफ्राम व पसलियों की पेशीय गति जिसके कारण फेफड़े फूलते व पिचकते हैं व श्वासोच्छ्वास सम्पन्न होता है।
  • आहारनाल की क्रमाकुंचन गति जिससे भोजन आमाशय में खिसकता है।
  • हृदय व रुधिर वाहनियों के संकुचन व शिधिलन के कारण होने वाली स्पंदन गति।
  • मूत्र जनन वाहनियों में होने वाली गतियाँ।
  • नेत्र के गोलक में विभिन्न पेशियों के कारण होने वाली गति।

4. कंकालीय पेशियों द्वारा गति (Movement by Skeletal Muscle)-विभिन्न प्रकार की पेशियाँ जो अस्थियों से जुड़ी होती हैं और अस्थियों की गति में सहायता करती हैं। कंकालीय पेशियाँ कहलाती हैं। इनमें होने वाली संकुचन व शिथिलन गति के कारण जन्तुओं में विभिन्न अंगों में गतियाँ होती हैं और इनकी समन्वित गति के कारण जन्तुओं में प्रचलन (locomotion) होता है। पेशीय संकुचन के कारण उपांगों की अस्थियों में गति उत्पन्न होती है। अस्थियों (bones) तथा पेशियों (muscles) की समन्वित गति के फलस्वरूप चलन सम्भव होता है। अतः पेशियों की कंकाल की गति महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रश्न 9.
रेखित पेशियों की संरचना एवं कार्य लिखिए
उत्तर:
रेखित (कंकाल) पेशी के संकुचन की कार्यविधि (Contraction Mechanism of Striated Muscie)
रेखित पेशियाँ तन्निकीय उत्तेजन पर संकुचित होती हैं। पेशियों में जाने वाले तन्त्रिका तन्तु अपने सिरों पर ऐसिटिलकोलीन (acetylcholine) नामक पदार्थ स्रावित करके संकुचन की प्रेरणाओं को पेशियों में पहुँचाते हैं। प्रत्येक पेशी तन्तु के अन्दर इन प्रेणाओं को तन्तुओं तक प्रसारित करने का काम सारकोप्लार्भिक आल करता है।

हक्सले के पेशी संकुचन सर्पी सिद्धान्त के अनुसार, पेशी संकुचन के समय ‘ A ‘ पहियों की लम्बाई तो यथावत् बनी रहती है किन्तु इसके दोनों ओर की ‘ T ‘ पट्टियों के अर्द्धांों की एक्टिन छड़ें मायोसिन छड़ों के कंटकों पर शीष्वतापूर्वक बनते-बिगड़ते आड़े रासायनिक सेतु बन्यनों की सहायता से साकोंमियर के मध्य की ओर खिसककर ‘M’ रेखा तक पहुँच जाते हैं या इनके सिरे एक-दूसरे पर चढ़ जाते हैं। इस प्रकार पेशीय खण्डों या साकोंमियर्स के छोटे हो जाने से पेशी तन्तु सिकुड़े हैं।

प्रेरणास्थान से प्रारम्भ होकर पेशी तन्नु में दोनों ओर संकुचन की लहर-सी दौड़ जाती है, किन्तु संकुचन एक ही दिशा की ओर होता है, जिस ओर सम्बन्धित पेशी किसी अचल अस्थि से लगी होती है। अधिकतम संकुचन में दोनों ओर की ‘ Z ‘ रेखाएँ ‘ A ‘ पट्टियों की मायोसिन छड़ों को छूने लगती हैं, अर्थात् ‘T’ पट्टियाँ और ‘H’ क्षेत्र अन्तर्धान हो जाते हैं और पेशी तन्तु की लम्बाई घटकर 2/3 रह जाती है। शिथिलन (relaxation) में एक्टिन तथा मायोसिन छड़ों को जोड़ने वाले सेतु बन्य सब खुल जाते हैं।

अतः प्रत्येक पेशीखण्ड (साकोंमियर) की सब एक्टिन छड़ें वापस अपनी सामान्य स्थिति में आ जाती हैं और पेशी संकुचन समाप्त हो जाता है। कार्यविधि के लिए ऊर्जा की आपूर्ति (Energy Supply to muscle contractíon)-पेशी संकुचन के लिए ऊर्जा की आपूर्ति ATP द्वारा होती है। ATP प्राप्ति का स्रोत ग्लाइकोजन है। इसके अपचय (या विघटन) के फलस्वरूप ATP का निर्माण होता है।

पेशी संकुचन के समय ATP के जल अपघटन से ऊर्जा की प्राप्ति होती है। पेशियों में क्रिएटिन फोस्फेट नामक एक उच्च ऊर्जा यौगिक उपस्थित होता है। यह भी ATP निर्माण में प्रयुक्त होता है। विश्रामावस्था में ATP द्वारा फिर से क्रिएटिन फॉस्फेट बन जाता है। इस प्रकार पेशी में क्रिएटिन फॉस्फेट का भण्डार बना रहता है, जो आवश्यकता पड़ने पर ATP प्रदान कर सकता है।
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प्रश्न 10.
अरेखित पेशियों की संरचना एवं कार्य लिखिए।
उत्तर:
अरेखित या अनैच्छिक पेशी ऊतक (Unstriped or Smooth Muscle Tissue)
स्थिति (Location)-ये पेशियाँ कभी भी अस्थियों से जुड़ी हुई नहीं पायी जाती हैं। इसीलिए इन्हें अकंकालीय पेशियाँ भी कहते हैं। ये आहारनाल, मूत्राशय, गर्भाशय, योनि, पित्ताशय, पित्तवाहिनी, श्वासनली, रुधिर वाहनियों एवं नेत्र आदि की भित्तियों में पायी जाती हैं।

ये आंतरागी पेशियाँ (visceral muscle) एवं चिकनी पेशियाँ भी कहलाती हैं। संरच्रा (Structure) – अरेखित पेशी ऊतक लम्बी, सँकरी एवं तर्कुरूपी (spindle shaped) पेशी कोशिकाओं या पेशी तन्तुओं का बना होता है। ये तन्तु झिल्ली सदृश अधात्री (matrix) द्वारा परस्पर सटे रहते हैं। प्रत्येक तन्तुवत् कोशिका लम्बाई में 120 सेमी तथा चौड़ाई में 160 मिमी होती है।

इसके दोनों सिरे नुकीले या कभी-कभी शाखान्वित होते हैं। बीच के चौड़े़ भाग में एक बड़ा व लम्बा-सा केन्द्रक होता है। केन्द्रक के चारों ओर स्थित थोड़ा-सा कोशिकाद्रव्य तरल अवस्था में होता है और यह साकोंप्लाज्म (sarcoplasm) कहलाता है। इसके बाहर की ओर पेशी तन्तु के शेष भाग में असंख्य छोटे-छोटे व महीन पेशी तन्नु (myofibrils) निलम्बित रहते हैं।

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पेशी कोशिका की छोटे-छोटे व महीन पेशी तन्तु (myofibrils) निलम्बित रहते हैं। पेशी कोशिका की संकुचनशीलता इन्हीं पेशी तन्तुओं की उपस्थिति के कारण होती है अर्थात् पेशी तन्तुओं में फैलने व सिकुड़ने की अपार क्षमता होती है। पेशी कोशिका का जीवद्रव्य एक महीन आवरण में बन्द रहता है। जो सारकोलेमा (sarcolemma) कहलाता है। अरेखित पेशी तन्तु अलग-अलग या बण्डलों में बँधे होते हैं। प्रायः बहुत-से पेशी तन्तु संयोजी ऊतक द्वारा बँधकर पतली एवं चपटी पद्विकाएँ या शीथ बनाते हैं जो पुनः मिलकर बेलनाकार पेशी बण्डल बनाते हैं।

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कार्य (Functions) – इनके आकुंचन पर जीव की इच्छा का कोई नियन्त्रण नहीं होता है, इसी कारण इन पेशियों को अनैच्छिक पेशियाँ (involuntary muscles) कहते हैं। इनका कार्य गुहाओं को चौड़ा करना तथा छिद्रों को खोलना तथा बन्द करना है। छिद्र के चारों ओर स्थित ये पेशियाँ संवरणी (sphincter) बनाती हैं।

प्रश्न 11.
पेशी संकुचन की क्रिया-विधि लिखिए।
उत्तर:
पेशी संकुचन की क्रियाविधि (Mechanism of Muscle Contraction)
पेशी संकुचन की क्रियाविधि को समझाने के लिए हक्सले (Huxley, 1965) ने सर्थी तन्तु सिद्धान्त (sliding filament theory) प्रस्तुत किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार, पेशीय रेशों का संकुचन पतले तन्तुओं (एक्टिन तन्तुओं) के मोटे तन्तुओं (माइसिन तन्तुओं) के ऊपर विसर्पण (खिसकने) से होता है।

रेखित (ककाल) पेशी के संकुचन की कार्यविधि (Contraction Mechanism of Striated Muscie)
रेखित पेशियाँ तन्त्रिकीय उत्तेजन पर संकुचित होती हैं। पेशियों में जाने वाले तन्त्रिका तन्तु अपने सिरों पर ऐसिटिलकोलीन (acetylcholine) नामक पदार्थ स्रावित करके संकुचन की प्रेरणाओं को पेशियों में पहुँचाते हैं। प्रत्येक पेशी तन्तु के अन्दर इन प्रेरणाओं को तन्तुओं तक प्रसारित करने का काम सारकोप्लारिमक जाल करता है।

हक्सले के पेशी संकुचन सर्पी सिद्धान्त के अनुसार, पेशी संकुचन के समय ‘A’ पट्टियों की लम्बाई तो यथावत् बनी रहती है किन्तु इसके दोनों ओर की ‘I’ पट्टियों के अर्द्धाशों की एक्टिन छड़ें, मायोसिन छड़ों के कंटकों पर शीघ्रतापूर्वक बनते-बिगड़ते आड़े रासायनिक सेतु बन्धनों की सहायता से साकरोंमियर के मध्य की ओर खिसककर ‘M’ रेखा तक पहुँच जाते हैं या इनके सिरे एक-दूसरे पर चढ़ जाते हैं।

इस प्रकार पेशीय खण्डों या सार्कोमियर्स के छोटे हो जाने से पेशी तन्तु सिकुड़ते हैं। प्रेरणास्थान से प्रारम्भ होकर पेशी तन्तु में दोनों ओर संकुचन की लहर-सी दौड़ जाती है, किन्तु संकुचन एक ही दिशा की ओर होता है, जिस ओर सम्बन्धित पेशी किसी अचल अस्थि से लगी होती है। अधिकतम संकुचन में दोनों ओर की ‘ Z ‘ रेखाएँ ‘ A ‘ पट्टियों की मायोसिन छड़ों को छूने लगती हैं, अर्थात् ‘ T ‘ पट्टियाँ और ‘ H ‘ क्षेत्र अन्तर्धान हो जाते हैं और पेशी तन्तु की लम्बाई घटकर 2/3 रह जाती है।

शिधिलन (relaxation) में एक्टिन तथा मायोसिन छड़ों को जोड़ने वाले सेतु बन्ध सब खुल जाते हैं। अतः प्रत्येक पेशीखण्ड (साकौमियर) की सब एक्टिन छड़ें वापस अपनी सामान्य स्थिति में आ जाती हैं और पेशी संकुचन समाप्त हो जाता है। कार्यविधि के लिए ऊर्जा की आपूर्ति (Energy Supply to muscle contraction) पेशी संकुचन के लिए ऊर्जा की आपूर्ति ATP द्वारा होती है।

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ATP प्राप्ति का स्रोत ग्लाइकोजन है। इसके अपचय (या विघटन) के फलस्वरूप ATP का निर्माण होता है। पेशी संकुचन के समय ATP के जल अपघटन से ऊर्जा की प्राप्ति होती है। पेशियों में क्रिएटिन फोस्फेट नामक एक उच्च ऊर्जा यौगिक उपस्थित होता है। यह भी ATP निर्माण में प्रयुक्त होता है। विश्रामावस्था में ATP द्वारा फिर से क्रिएटिन फॉस्फेट बन जाता है। इस प्रकार पेशी में क्रिएटिन फॉस्फेट का भण्डार बना रहता है, जो आवश्यकता पड़ने पर ATP प्रदान कर सकता है।

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पेशी संकुचन के प्रमुख चरण (Main Steps of Muscle Contractions)
पेशी संकुचन की क्रियाविधि को सर्पीतनुु या छड़ विसर्पण सिद्धान्त (sliding filament theory) द्वारा अच्छी तरह समझाया जा सकता है, जिसके अनुसार पेशीय रेशों का संकुचन पतले तन्तुओं के मोटे तन्तुओं के ऊपर सरकने या विसर्पण से होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार पेशी संकुचन चार चरणों में पूरा होता है-

(1) उत्तेजन (Excitation)-यह पेशी संकुचन का प्रथम चरण है। उत्तेजन में तन्न्किका आवेग के कारण तत्रिकाक्ष (axon) के सिरों द्वारा ऐसीटिलकोलीन (एक तन्त्रिका प्रेषी रसायन), तन्त्रिका पेशी सन्धि पर मुक्त होता है। यह ऐसीटिलकोलीन पेशी-प्लाज्मा की Na+के प्रति पारगम्यता को बढ़ावा देता है, जिसके फलस्वरूप प्लाज्मा झिल्ली की आन्तरिक सतह पर धनात्मक विभव उत्पन्न हो जाता है। यह विभव (active potential) पूरी प्लाज्मा झिल्ली पर फैलकर सक्रिय विभव उत्पन्न कर देता है और पेशी कोशिका उत्तेजित हो जाती है।

(2) उन्तेजन-संकुचन युग्म (Excitation-Contraction Coupling)-इस चरण में सक्रिय विभव पेशी कोशिका में संकुचन प्रेरित करता है। यह विभव पेशी प्रद्रव्य में तीव्रता से फैलता है और Ca++ मुक्त होकर ट्रोपोनिन-सी से जुड़ जाते हैं और ट्रोपोनिन अणु के संरूपण में परिवर्तन हो जाते हैं। इन परिवर्तनों के कारण एक्टिन के सक्रिय स्थल पर उपस्थित ट्रोपोमायोसिन एवं ट्रोपोनिन दोनों वहाँ से पृथक् हो जाते हैं। मुक्त सक्रिय स्थल पर तुरन्त मायोसिन तन्तु के अनुप्रस्थ सेतु इनसे जुड़ जाते हैं और संकुचन क्रिया प्रारम्भ हो जाती है।

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(3) संकुचन (Contraction) – एक्टिन तन्तु के सक्रिय स्थल से जुड़ने से पूर्व सेतु का सिरा एक ATP से जुड़ जाता है। मायोसिन के सिरे के ATPase एन्जाइम द्वारा ATP, ADP तथा Pi में टूट जाते हैं किन्तु मायोसिन के सिर पर ही लगे रहते हैं। इसके उपरान्त मायोसिन का सिर एक्टिन तन्तु के सक्रिय स्थल से जुड़ जाता है। इस बन्धन के कारण मायोसिन के सिर में संरूपण परिवर्तन होते हैं और इसमें झुकाव

उत्पन्न हो जाता है जिसके फलस्वरूप एक्टिन तन्तु साकोंमियर के केन्द्र की ओर खींचा जाता है। इसके लिए ATP के विदलन से प्राप्त ऊर्जा काम आती है और सिर के झुंकाव के कारण इससे जुड़ा ADP तथा Pi भी मुक्त हो जाते हैं। इसके मुक्त होते ही नया ATP अणु सिर से जुड़ जाता है। ATP के जुड़ते ही सिर एक्टिन से पृथक् हो जाता है। पुनः ATP का विदलन होता है। मायोसिन सिर नये सक्रिय स्थल पर जुड़ता है तथा पुनः यही क्रिया दोहाई जाती हैं जिससे एक्टिन तन्तुक खिसकते हैं और संकुचन हो जाता है।

(4) शिथिलन (Relaxation)-पेशी उत्तेजन समाप्त होते ही Ca++पेशी प्रद्रव्यी जालिका में चले जाते हैं। जिससे टोपोनिन-सी Ca++ से मुक्त हो जाती है और एक्टिन तन्नुक के सक्रिय स्थल अवरुद्ध हो जाते हैं। पेशी तन्तु अपनी सामान्य स्थिति में आ जाते हैं तथा पेशीय शिथिलन हो जाता है।

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प्रश्न 12.
पेशियों की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
पेशियों की विशेषताएँ (Characteristics of Muscles)

(1) उत्तेजनशीलता (Irritabilitv) – पेशियाँ किसी यान्त्रिक, तन्त्रिकीय, रासायनिक, विद्युत या तापीय उद्दीपन के प्रति उत्तेजनशीलता प्रकट करती हैं।

(2) संकुव्वनशीलता (Contractibility) – उद्दीपन पाकर पेशियाँ संकुचित हो जाती हैं तथा कुछ समय बाद पुनः शिथिल हो जाती हैं।

(3) संवहनशीलता (Conductibility) – पेशी के एक सिरे पर दिया गया उद्दीपन संप्रहित होकर क्षणभर में सभी दिशाओं में फैल जाता है।

(4) देहलीज उद्दीपन (Threshold Stimulus) – उद्दीपन की वह न्यूनतम मात्रा जो पेशीय संकुचन या प्रतिक्रिया के लिए आवश्यक है उसे देहलीज उद्दीपन कहते हैं।

(5) प्रत्यास्थता (Elasticity) – सभी पेशियों में निश्चित मात्रा में फैलने तथा पुनः अपना पूर्व आकार प्रहण कर लेने की क्षमता होती है।

(6) सभी या कोई नहीं नियम (All or None Law) – पेशी का संकुचन उद्दीपन के प्रति समानुपाती होता है। उद्दीपन प्राप्त होते ही पेशी या तो पूर्ण क्षमता से संकुचित होती है या संकुचित नहीं होती है। इसे ऑल और नन लौ या बोवड्टिच का नियम कहते हैं।

(7) पेशीय श्रान्ति (Muscle Fatigue) – लगातार उद्दीपन देते रहने से पेशी में संकुचन की क्षमता कम होती जाती है और कुछ समय पश्चात् पेशी नए उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया अथवा संकुचन नहीं कर पाती। इस अवस्था को पेशीय श्रान्ति कहते हैं। ऐसा पेशियों में लैक्टिक अम्ल के बनने से होता है।

(8) संकलन (Summation) – जब एक पेशी सूत्र को जोकि संकुचन अवस्था में है, दूसरा उद्दीपन दिया जाता है तो इस द्वितीय उद्दीपन का प्रभाव भी प्रथम उद्दीपन के प्रभाव के साथ संकलित हो जाता है और पेशी संकुचन बना रहता है।

(9) एकल पेशी स्कुरण (Single muscle twitch)-जब पेशी को एक पृथक् उद्दीपन दिया जाये तो उसके एक पेशी तन्तु में होने वाले संकुचन व शिथिलन को एकल पेशी स्फुरण कहते हैं। इसमें तीन अवस्थाएँ होती हैं। मेढ़क के एक पेशी स्फुरण का मान 0.1 सेकण्ड है।

  • गुप्त काल (Latent Phase) – उद्दीपन देने व संकुचन होने के बीच के समय को गुप्त काल (latent period) कहते हैं। इसमें 0.01 सेकण्ड का समय लगता है।
  • संकुचन काल (Contraction Phase) – इस काल में पेशी अधिकतम संकुचन प्रदर्शित करती है। इसमें लगभग 0.04 सैकण्ड का समय लगता है।
  • विश्रान्ति काल (Relaxation Phase) – इसमें पेशी पुनः अपनी सामान्य स्थिति में लौटती है, इसमें 0.05 सेकण्ड का समय लगता है।

(10) उत्तेजन/अनुत्तेजन अवधि (Refractory Period) – यह वह समयन्तराल है जिसमें तन्तु द्वितीय उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया नहीं कर पाता है। अर्थात् एक देहलीज उद्दीपन के फलस्वरूप संकुचन करने के पश्चात् तथा दूसरे देहलीज उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया दर्शाने से पहले एक निश्चित विश्रामावधि आवश्यक होती है। यह रेखित पेशी के लिए 0.002 से 0.005 सैकण्ड व हद्य पेशी के लिए 0.1-0.2 सैकण्ड होता है।

(11) बलवर्धि (Tonicity) – एक शिथिल पेशी के कुछ पेशी तन्तु सदैव संकुचन व शिथिलन करते रहते हैं और इससे पेशी का स्वास्थ्य सही बना रहता है, इसे पेशी टोनस (muscle tonus) भी कहते हैं।

(12) टिटेनस (Tetanus)-यह एक निलम्बित संकुचन की अवस्था है, जो निरन्तर तन्त्रिकीय उद्दीपनों के प्राप्त होने से उत्पन्न होती है। इसमें पेशियाँ लगातार संकुचन करती हैं।

(13) समतानी तथा समलम्बाक्षीय या सममितीय संकुचन (Isotonic and Isometric Contraction)-वह पेशी संकुचन जिसमें पेशी पेशीय तन (पेशी टोनस) समान बना रहता है परन्तु पेशी की लम्बाई कम हो जाती है। उसे समतानी संकुचन कहते हैं। इसी के कारण पेशी कार्य करती हैं। वह पेशी संकुचन जिसमें पेशी की लम्बाई समान बनी रहती है लेकिन पेशी टोनस बढ़ जाता है। उस समलम्बाक्षी संकुचन कहते हैं। इसमें पेशी कार्य नहीं करती है।

(14) मृत कठोरता (Rigor Mortis) – मृत्यु के पश्चात् पेशियों में ATP की अनुपस्थिति में एक्टोमायोसिन से एक्टिन एवं मायोसिन अलग-अलग नहीं हो पाते हैं और शरीर कठोर हो जाता है। इसे ही मृत कठोरता कहते हैं।

प्रश्न 13.
पेशी तन्तुओं के प्रकार लिखिए तथा लाल पेशी तन्तु एवं श्वेत पेशी तन्तुओं में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
पेशी तन्तुओं के प्रकार (Types of Muscle Fibres)
रंग के आधार पर पेशी तन्तु दो प्रकार के होते हैं-
(1) श्वेत पेशी तन्तु (White Muscle Fibres) – इनमें मायोग्लोबिन (myoglobin) अनुपस्थित होता है जो कि पेशियों को लाक्षणिक लाल रंग प्रदान करता है। इन तन्तुओं में माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria) की संख्या कम होती है। इनमें तीव्र संकुचन पाया जाता है जिससे ऑक्सीजन की आवश्यकता बढ़ जाती है और ऑक्सीजन की कमी होने पर इनमें अवायवीय श्वसन होता है जिसके फलस्वरूप लैक्टिक अम्ल बनता है। पेशियों में लैक्टिक अम्ल के संचयन के कारण ही थकान (fatigue) उत्पन्न होती है। उदाहरण-नेत्र गोलक की पेशियाँ।

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(2) लाल पेशी तन्तु (Red Muscle Fibre)-ये पेशी तन्तु मायोग्लोबिन की उपस्थिति के कारण लाल रंग के दिखाई देते हैं। इसमें माइटोकॉष्ड्रिया की संख्या अधिक होती है। लाल पेशी तन्तुओं में धीमी गति से संकुचन होते हैं। इन पेशियों में वायवीय श्वसन होता है जिसके कारण इनमें लैक्टिक अम्ल (lactic acid) का संचय नहीं होता है। इसलिए इन पेशी तन्तुओं में थकान नहीं होती है। इन पेशी तन्तुओं में ऑक्सीजन संग्रहित रहती है। इसीलिए अवायवीय श्वसन नहीं होता है।

लाल और श्वेत पेशियों में अन्तर:

लाल पेशीय तन्तु (Red muscle fibres)श्वेत पेशीय तन्तु (White muscle fibres)
1. ये पतले, गहरे, लाल रंग के होते हैं।1. ये मोटे, चौड़े व हल्के रंग के होते हैं।
2. इनमें मायोग्लोबिन अधिक मात्रा में उपस्थित होता है।2. इनमें मायोग्लोबिन कम मात्रा में पाया जाता है।
3. इनमें माइटोकॉण्डिया अधिक संख्या में होते हैं।3. इनमें ‘माइटोकॉष्ड्रिया’ कम संख्या में होते हैं।
4. इनमें ऑक्सीश्वसन द्वारा ऊर्जा प्राप्त होती है।4. इनमें अनॉक्सीश्वसन द्वारा ऊर्जा प्राप्त होती है।
5. इनमें सार्कोप्लाज्ञिक जालिका कम होती है।5. इनमें साकोप्लाखिमक जालिका अधिक होती है।
6. इनमें रुधिर केशिकाएँ अपेक्षाकृत अधिक संख्या में होती हैं।6. इनमें रुधिर केशिकाएँ अपेक्षाकृत कम संख्या में होती हैं।
7. इन पेशी तन्तुओं में थकावट नहीं होती है।7. ये पेशी तन्तु शीघ्र ही थक जाते हैं।
8. ये लम्बे समय के लिए धीमा रुका हुआ संकुचन करते हैं।8. ये कम समय के लिए तेज व भारी संकुचन करते हैं।
9. ये धीरे से संकुचित होते हैं एवं धीरे से मूच्छित हो जाते हैं।9. ये लेक्टिक अम्ल के कारण शीघ्र ही संकुचित हो जाते हैं एवं शीघ्र ही मूर्च्छित हो जाते हैं।
10. इनमें लेक्टिक अम्ल नहीं जमता है।10. इनमें लेक्टिक अम्ल जम जाता है।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-
(a) प्रारूपी प्रीया कशेरुका
(b) उरोस्थि
(c) कण्ठ उपकरण
(d) एटलस कशेरुका
उत्तर:
(a) प्रारूपी प्रीया कशेरुका
कशेरुक दण्ड (Vertebral Column):
कशेरुक दण्ड छोटी-छोटी अस्थियों की बनी एक भृंखला होती है जिन्हें कशेरुकाएँ कहते हैं। मनुष्य के कशेरुक दण्ड में 33 कशेरुकाएँ पायी जाती हैं, परन्तु वयस्क में कुछ कशेरुकाओं में समेकन के कारण इनकी संख्या 26 रह जाती है।

मानव कशेरुकाओं की विशेषताएँ –

  • इनका कशेरुकाय (centrum) उभयपट्टित या अगर्ती प्रकार का होता है।
  • दो कशेरुकाओं के बीच अन्तरा कशेरुक डिस्क पायी जाती है जो तन्तुमय उपास्थि की बनी होती है।
  • सेण्ट्रम के प्रत्येक सिरे पर कशेरुका की एपिफाइसिस नामक अस्थि की प्लेट जुड़ी होती है।
  • दो कशेरुकाओं में से एक के अग्र दूसरी के पश्च योजी प्रवर्ध आपस में जुड़कर कशेरुक दण्ड को झुकने की क्षमता प्रदान करते हैं।
  • कशेरुकाओं में तन्त्रिका नाल पायी जाती है जिसमें मेरुरज्जु सुरक्षित रहता है।
  • अन्तरा कशेरुक बिम्ब एवं स्नायुओं की उपस्थिति से कशेरुक दण्ड लचीला बना रहता है।

कशेरुक दण्ड को अग्र पाँच भागों में बाँटा जा सकता है –

  • ग्रीवा भाग (Cervical Vertebrae) (7)
  • वक्षीय भाग (Thoracic Vertebrae) (12)
  • कटि भाग (Lumber Vertebrae) (5)
  • त्रिक भाग (Sacral Vetebrae) (5 या 1)
  • पुच्छीय भाग (Caudal Vertebrae) (4 या 1)

(1) ग्रीवा कशेरककाएँ-मनुष्य एवं अन्य सभी स्तनियों के ग्रीवा भाग में
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन - 1
सात ग्रीवा कशेरुकाएँ होती हैं जिनमें प्रथम म्रीवा कशेरुका एटलस, द्वितीय एक्सिस तथा 3 से 7 वीं तक की ग्रीवा कशेरुकाएँ प्रारूपी कशेरुकाएँ कहलाती हैं। (नोट-समुद्री गाय या मेन्टीज में 6 तथा स्लॉथ में 9 ग्रीवा कशेरुकाएँ होती हैं।)
(i) एटलस (Atlas) – यह प्रथम ग्रीवा कशेरुका है जो अँगूठी के आकार की होती है। यह अग्रभाग में करोटि से तथा पश्च भाग में एक्सिस से जुड़ी होती है। इसमें सेन्ट्रम अनुपस्थित होता है। न्यूरल केनाल बड़ी होती है तथा अनुप्रस्थ लिगामेंट की उपस्थिति के कारण दो भागों में विभाजित होती है।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन - 2
इसका तत्त्रिका प्रवर्ध (nural Spine) छोटा होता है तथा जाइगोफाइसिस (zygophysis) अनुपस्थित होता है। अनुप्रस्थ प्रवर्ध चपटे होते हैं। इसके अग्र भाग में दो गड्डे पाए जाते हैं। जिसमें करोटि के अस्थि कन्द फिट रहते हैं।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन

(ii) एक्सि (Axis) – यह द्वितीय ग्रीवा कशेरुका है। इसी के द्वारा सिर कशेरुक दण्ड पर घूम पाता है। इसमें अग्र सेन्ट्रम (centrum) कंटक के समान होता है जिसे आडॉन्टाइड प्रवर्ध (odontoid process) या दन्ताभ प्रवर्ध कहते हैं। यह एटलस से सन्धि करता है। एक्सिस का तत्त्रिका प्रवर्ध चपटा व आगे की ओर झुका होता है तथा अनुप्रस्थ प्रवर्ध छोटे होते हैं। इसमें प्री जाइगोफाइसिस पाए जाते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन - 3

(iii) प्रारूपी प्रीवा कशेरुका (Typical Cervical Vertebrae) – तीसरी से सातवीं तक की प्रीवा कशेरुकाएँ प्रारूपी प्रीवा कशेरुकाएँ कहलाती हैं। इसमें सेन्ट्रम पाया जाता है तथा प्रीजाइगोफाइसिस तथा पोस्ट जाइगोफाइसिस पूर्ण विकसित होते हैं। इनका तन्त्रिका कंटक छोटा किन्तु नुकीला होता है। इनके अनुप्सस्थ प्रवर्ध कम विकसित होते हैं। इनमें न्यूरल केनाल के दोनों ओर दो सूक्ष्म कशेरुक धमनी नाल पायी जाती है। इनमें द्विशाखित पसलियाँ सन्धि बनाती हैं।

(2) वक्षीय कशेरुकाएँ (Thoracic vertebrae) – ये संख्या में 12 होती हैं, इनमें कंटिका प्रवर्ध (न्यूरल स्पाइन) अधिक लम्बा एवं नुकीला होता है। इनमें तन्त्रिकीय नाल एवं तन्निकीय चाप पाए जाते हैं। ये भी पसलियों से जुड़ी होती हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन - 4
प्रथम वक्षीय कशेरुका आगे की ओर अन्तिम प्रारूपी म्रीवा कशेरुका से सन्धि बनाती है जबकि अन्तिम वक्षीय कशेरुका प्रथम कटि कशेरुका से सन्धि करती है।

(3) कटि कशेरुकाएँ (Lumber Vertebrae) – ये अधिक बड़ी व मजबूत होती हैं। इनकी संख्या 5 होती है, इनमें सेन्द्रम विकसित होता है। कंटिका प्रवर्ध आगे की ओर झुके हए होते हैं। डनमें एक-एक जोडी मैक्सिलरी प्रवर्ध (maxillary process) पाए जाते हैं। ये कशेरुकाएँ सबसे बड़ी होती हैं, क्योंकि शरीर का अधिकतम भार इन पर होता है। इनके कंटक प्रवर्ध कुल्हाड़ी के आकार के होते हैं और कमर को सहारा देने वाली पेशी से जुड़े होते हैं।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन - 5

(4) सेक्रल या त्रिक कशेरुकाएँ (Secral Vertebrae) – शिशु में इनकी संख्या 5 होती है, किन्तु वयस्क होने तक ये आपस में समेकित होकर केवल एक संयुक्त संरचना सेक्रम (sacrum) बनाती है। यह श्रोणि मेखला के (pelvic girdle) के पीछे नीचे की ओर निकलकर कमर वक्र (backward curve) बनाती है। इसका अधर भाग चौड़ा व अन्तिम भाग सँकरा होता है। अन्तिम भाग पर यह काँक्सिस से सन्धि बनाती हैं। मेरु नाल से तन्त्रिकाओं का एक गुच्छा निकला होता है, जिसे कोडे इक्वीना (cauda equina) कहते हैं।

(5) कॉक्सिस या पुच्छ कशेरुकाएँ (Coccyx or Caudal Vertebrae) – इनकी शिशु में संख्या चार होती है जो वयस्क में एक साथ जुड़कर छोटी कॉक्सिक्स (coccyx) बनाती है। यह पूँछ का अवशेषी भाग बनाती है। वयस्क मनष्य में कशेरुक दण्ड में 26 व बच्चे में 33 कशेरकाएँ होती हैं।

(b) उरोस्थि (Sternum) – मनुष्य की उरोस्थि में सात छड़ाकार अस्थियाँ पायी जाती हैं। जिन्हें तीन समूहों में विभेदित किया गया है-

(a) प्रथम समूह – इसमें प्रथम उरोस्थि आती है जिसे प्रीस्टर्नम (presternum) कहते हैं। इससे प्रथम जोड़ी पसलियाँ व अंश मेखला की क्लैविकल अस्थियाँ जुड़ी होती हैं, इसे मैनुब्रियम (manubrium) भी कहते हैं।

(b) द्वितीय समूह-इसमें दूसरी से छठी उरोस्थियाँ आती हैं जिन्हें मीसोस्टरनम (mesosternum) या ग्लेडियोलस (Gladiolus) या मध्यकाय कहते हैं।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन

(c) तृतीय समूह-इसमें सातवीं (अन्तिम) उरोस्थि आती है, इसे मेटार्स्टन्दम (metasternum) या जिफीर्स्टन्नम उरोस्थि प्रवर्ध कहते हैं।
इन सातों उरोस्थियों को सम्मिलित रूप से स्टेने़ी (sternebrae) भी कहते हैं। इन सातों स्टनेबबीयो से प्रथम सात जोड़ी पसलियाँ (ribs) जुड़ी रहती हैं। उरोस्थि को जुड़ने के लिए स्थल प्रदान करती है तथा हुदय व फेफड़ों को सुरक्षा प्रदान करती है। यह वक्षीय कटघरे का भी निर्माण करती है।
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(c) कण्ठ उपकरण:
अक्षीय कंकाल (Axial Skeleton)
कपाल या खोपड़ी या करोटि (Skull) – यह सिर भाग का कंकाल बनाती है। स्तनियों की करोटि की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं-

  • स्तनियों की करोटि पूर्णतः अस्थियों की बनी होती है।
  • करोटि द्विकन्दीय (dicondylic) होती है।
  • क्रेनियल गुहा (cranial cavity) बड़ी होती है।
  • करोटि के पार्श्व में गंड चाप (zygometic arch) पायी जाती है।
  • मैक्सिला तथा पेलेटाइन अस्थियों से बना तालु पाया जाता है जो भोजन एवं स्वास मार्ग को पृथक् करता है।
  • नासा मार्ग में घुमावदार टरबाइनल अस्थियाँ पायी जाती हैं।
  • टिम्पैनिक बुल्ला पाया जाता है, जिसमें तीन कर्ण अस्थियाँ होती हैं।
  • निचला जबड़ा केवल एक अस्थि का बना होता है जिसे डेन्टरी अस्थि कहते हैं।
  • जबड़ों का निलम्बन (Jaw suspension) क्रेनियोस्टाइलिक होता है।
  • दाँत विषमदन्ती, गर्तदन्ती तथा द्विबारदन्ती होते हैं।

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मानव करोटि में कुल 29 अस्थियाँ होती हैं। ये सभी सीवनों (bony sutures) द्वारा परस्पर संधित रहती हैं। करोटि की अस्थियों को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है-

  1. कपाल की अस्थियाँ
  2. चेहरे की अस्थियाँ
  3. कण्ठिका उपकरण
  4. कर्ण की अस्थियाँ

1. कपाल की अस्थियाँ (Cranial Bones) – ये निम्न प्रकार हैं-

  • ऑक्सीपीटल 01
  • पैराइटल 02
  • फ्रन्टल 01
  • टेम्पोरल 02
  • स्फीनॉइड 01

(i) ऑक्सीपीटल खण्ड (Occipital Segment) – यह कपाल का पश्च भाग है जो महारन्ध्र (foraman magnum) के चारों ओर चार उपास्थि जात अस्थियों (cartilagenous bones) का बना होता है। इसमें महारन्ध्र के ऊपर की ओर एक सुप्रा-ओक्सी-पीटल (supra occipital) अस्थि, नीचे की ओर एक बेसीऑक्सीपीटल अस्थि तथा पाश्वों में दो एक्सो ऑक्सीपीटल (exo-occipital) अस्थियाँ पायी जाती हैं।

दोनों ऑक्सीपीटल अस्थियों पर एक-एक उभार पाया जाता है जिसे ऑक्सीपीटल कॉण्डाइल कहते हैं। अर्थात् मनुष्य में दो ऑक्सीपीटल कॉण्डाइल पाए जाते हैं। इन्हीं से प्रथम ग्रीवा कशेरुका एटलस (atlas) जुड़ी होती है। रुधिर पहुँचाने वाली धमनियों के लिए छिद्र होते हैं जबकि अशुद्ध रुधिर वापस लाने के लिए एक बड़ा छिद्र पाया जाता है।

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(ii) पैराइटल (Parietal) – इसमें दो चपटी अस्थियाँ पायी जाती हैं जो कपाल के किनारे की छत बनाती हैं। इनके आन्तरिक स्तर पर मस्तिष्क को शुद्ध रुधिर पहुँचाने वाली धमनियों के लिए छिद्र होते हैं जबकि अशुद्ध रुधिर वापस लाने के लिए एक बड़ा छिद्र पाया जाता है।
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(iii) फ्रन्टल (Frontal) – यह एक चपटी अस्थि है जो कपाल की छत बनाती है। इसमें दो गुहाएँ होती हैं, इनमें हवा भरी होती है और ये फ्रन्टल शिराएँ कहलाती हैं। ये शिराएँ फ्रन्टल को हल्का बनाती हैं और ध्वनि वेश्मों के समान कार्य करके ध्वनि को गुंजित करती हैं। माथा व कोटर के बन्ध पर ऑर्बिटल हॉशिया पाया जाता है, जिसके ऊपर मेहराब पाया जाता है।

(iv) टेम्पोरल (Temporal) – ये दो अनियमित आकार की अस्थियाँ होती हैं जो कपाल के आधार व पार्श्व में भित्ति बनाती हैं।

इसमें निम्नलिखित पाँच भाग होते हैं –

  • शल्की भाग (Temporal squama) -यह कनपटी (Tample) बनाता है।
  • पेट्स भाग (Petrous) -इसमें अन्तः कर्ण पाया जाता है।
  • टिम्यैनिक भाग (Tympanic)-इसमें मध्य कर्ण की टिम्पैनिक गुहा पायी जाती है।
  • मैस्टाइड भाग (Mastaid) -इसमें शंक्वाकार मेस्टाइड प्रवर्ध पाया जाता है।
  • जाइगोमेटिक भाग (Zygomatic)-यह कपोल अस्थि के साथ मिलकर गंड चाप बनाते हैं।

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(v) स्पीनॉइड (Sphenoid) – यह कपाल के अधर तल के मध्य में पायी जाने वाली छैनी के आकार की अस्थि है। इसके मध्य में सेला टर्सिका (sella turcica) नामक गर्त होता है जिसमें पीयूष प्रन्थि का हाइपोपाइसिस (hypophysis) भाग लटका रहता है।

(vi) एथमॉइड (Ethmoid) – यह अनियमित आकार की भंगुर अस्थि है जो दो कोटरों के बीच नाक की छत बनाती है। इसके तीन भाग होते हैं-

  • चालनी पट्ट (Sieve septum) -इसके छिद्रों से गन्ध तन्निकाएँ निकलती हैं।
  • लम्बवत् प्लेट (Longitudinal plate) -वह दोनों नासा गुहाओं के मध्य खड़े सममतल पट्ट का निर्माण करती है।
  • स्पंजी भाग (Spongy part) -यह अति छिद्रल होता है।
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(2) चेहरे की अस्थियाँ (Facial Bone) – इसमें कुल 14 अस्थियाँ होती हैं और चेहरे का निर्माण करती हैं। ये निम्न प्रकार हैं-

  • नेजल (Nasal) – ये संख्या में दो होती हैं। ये आयताकार होती हैं तथा आपस में जुड़ी होती हैं। ये फन्टल से जुड़ी होती हैं।
  • वोमर (Vomer) – एक होती है और नासा गुहाओं के बीच पही बनाती है।
  • टखाइनल (Terbinal) – दो होती हैं और नासागुहा में घुमावदार मार्ग का निर्माण करती हैं।
  • लैक्राइमल (Lacrimal) – दो होती हैं और बहुत छोटी होती हैं। ये लेक्राइमल कोष का निर्माण करती हैं।
  • जाइगोमेटिक (Zygomatic) – दो होती हैं और चेहरे के पार्श्व में पायी जाती हैं। ये कपोल अस्थि बनाती हैं।
  • पैलेटाइन (Palatine)-ये एक जोड़ी होती हैं और नासा गुहाओं के पीछे की ओर पायी जाती हैं।
  • डेनेरी या मैन्डिबल (Mandible) – यह एक बड़ी अस्थि होती है और निचले जबड़े का निर्माण करती है। यह कपाल की एकमात्र अस्थि है जो गतिशील होती है। इसके कप्स (Theca) में ही निचले जबड़े के दाँत पाए जाते हैं। इसीलिए इसे दन्तिकास्थि (Dentary bone) भी कहते हैं।

मैक्सिला (Maxilla) – इसमें दो अस्थियाँ होती हैं जो मध्य रेखा पर जुड़कर दोनों ऊपरी जबड़ों का निर्माण करती हैं। इसी पर ऊपरी दन्त स्थित होते हैं। ये मुखगुहा की छत, अधरतल बनाने में भी भाग लेती हैं।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 20 गमन एवं संचलन - 11
(3) कंठिका उपकरण या हाइओइड (Hyoid) – यह $U$ के आकार के अस्थि है जो मेंडिबल तथा कंठ के बीच जीभ के नीचे स्थित होती है। अक्षीय कंकाल की यही एकमात्र अस्थि है जो किसी अन्य अस्थि से सन्धि नहीं करती, केवल स्नायुओं (ligament) तथा पेशियों द्वारा टेम्पोरल के स्टाइलॉइड प्रवर्धों से जुड़ी होती है। यह जीभ को सहारा देती है। हाइऑइड में एक क्षैतिज काय (body) होती है। इससे दोनों ओररएक-एक जोड़ी शृंग (horns) निकले रहते हैं। प्रत्येक ओर एक बड़ा शृंग तथा एक छोटा कार्नु (cornu) होता है।

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(4) कर्ण अस्थिकाएँ (Ear Ossicles) – ये प्रत्येक ओर के मध्य कर्ण में एक-दूसरे से जुड़ी तीन छोटी-छोटी अस्थियाँ हैं। ये बाहर से अन्दर की ओर क्रमशः मैलियस (malleus), इन्कस (incus) तथा स्टैपीज (stapes) हैं।
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(d) प्रारूपी प्रीया कशेरुका कशेरुक दण्ड (Vertebral Column):
कशेरुक दण्ड छोटी-छोटी अस्थियों की बनी एक भृंखला होती है जिन्हें कशेरुकाएँ कहते हैं। मनुष्य के कशेरुक दण्ड में 33 कशेरुकाएँ पायी जाती हैं, परन्तु वयस्क में कुछ कशेरुकाओं में समेकन के कारण इनकी संख्या 26 रह जाती है।

मानव कशेरुकाओं की विशेषताएँ –

  • इनका कशेरुकाय (centrum) उभयपट्टित या अगर्ती प्रकार का होता है।
  • दो कशेरुकाओं के बीच अन्तरा कशेरुक डिस्क पायी जाती है जो तन्तुमय उपास्थि की बनी होती है।
  • सेण्ट्रम के प्रत्येक सिरे पर कशेरुका की एपिफाइसिस नामक अस्थि की प्लेट जुड़ी होती है।
  • दो कशेरुकाओं में से एक के अग्र दूसरी के पश्च योजी प्रवर्ध आपस में जुड़कर कशेरुक दण्ड को झुकने की क्षमता प्रदान करते हैं।
  • कशेरुकाओं में तन्त्रिका नाल पायी जाती है जिसमें मेरुरज्जु सुरक्षित रहता है।
  • अन्तरा कशेरुक बिम्ब एवं स्नायुओं की उपस्थिति से कशेरुक दण्ड लचीला बना रहता है।

कशेरुक दण्ड को अग्र पाँच भागों में बाँटा जा सकता है –

  • ग्रीवा भाग (Cervical Vertebrae) (7)
  • वक्षीय भाग (Thoracic Vertebrae) (12)
  • कटि भाग (Lumber Vertebrae) (5)
  • त्रिक भाग (Sacral Vetebrae) (5 या 1)
  • पुच्छीय भाग (Caudal Vertebrae) (4 या 1)

(1) ग्रीवा कशेरककाएँ-मनुष्य एवं अन्य सभी स्तनियों के ग्रीवा भाग में
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सात ग्रीवा कशेरुकाएँ होती हैं जिनमें प्रथम म्रीवा कशेरुका एटलस, द्वितीय एक्सिस तथा 3 से 7 वीं तक की ग्रीवा कशेरुकाएँ प्रारूपी कशेरुकाएँ कहलाती हैं। (नोट-समुद्री गाय या मेन्टीज में 6 तथा स्लॉथ में 9 ग्रीवा कशेरुकाएँ होती हैं।)
(i) एटलस (Atlas) – यह प्रथम ग्रीवा कशेरुका है जो अँगूठी के आकार की होती है। यह अग्रभाग में करोटि से तथा पश्च भाग में एक्सिस से जुड़ी होती है। इसमें सेन्ट्रम अनुपस्थित होता है। न्यूरल केनाल बड़ी होती है तथा अनुप्रस्थ लिगामेंट की उपस्थिति के कारण दो भागों में विभाजित होती है।
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इसका तत्त्रिका प्रवर्ध (nural Spine) छोटा होता है तथा जाइगोफाइसिस (zygophysis) अनुपस्थित होता है। अनुप्रस्थ प्रवर्ध चपटे होते हैं। इसके अग्र भाग में दो गड्डे पाए जाते हैं। जिसमें करोटि के अस्थि कन्द फिट रहते हैं।

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(ii) एक्सि (Axis) – यह द्वितीय ग्रीवा कशेरुका है। इसी के द्वारा सिर कशेरुक दण्ड पर घूम पाता है। इसमें अग्र सेन्ट्रम (centrum) कंटक के समान होता है जिसे आडॉन्टाइड प्रवर्ध (odontoid process) या दन्ताभ प्रवर्ध कहते हैं। यह एटलस से सन्धि करता है। एक्सिस का तत्त्रिका प्रवर्ध चपटा व आगे की ओर झुका होता है तथा अनुप्रस्थ प्रवर्ध छोटे होते हैं। इसमें प्री जाइगोफाइसिस पाए जाते हैं।
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(iii) प्रारूपी प्रीवा कशेरुका (Typical Cervical Vertebrae) – तीसरी से सातवीं तक की प्रीवा कशेरुकाएँ प्रारूपी प्रीवा कशेरुकाएँ कहलाती हैं। इसमें सेन्ट्रम पाया जाता है तथा प्रीजाइगोफाइसिस तथा पोस्ट जाइगोफाइसिस पूर्ण विकसित होते हैं। इनका तन्त्रिका कंटक छोटा किन्तु नुकीला होता है। इनके अनुप्सस्थ प्रवर्ध कम विकसित होते हैं। इनमें न्यूरल केनाल के दोनों ओर दो सूक्ष्म कशेरुक धमनी नाल पायी जाती है। इनमें द्विशाखित पसलियाँ सन्धि बनाती हैं।

(2) वक्षीय कशेरुकाएँ (Thoracic vertebrae) – ये संख्या में 12 होती हैं, इनमें कंटिका प्रवर्ध (न्यूरल स्पाइन) अधिक लम्बा एवं नुकीला होता है। इनमें तन्त्रिकीय नाल एवं तन्निकीय चाप पाए जाते हैं। ये भी पसलियों से जुड़ी होती हैं।
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प्रथम वक्षीय कशेरुका आगे की ओर अन्तिम प्रारूपी म्रीवा कशेरुका से सन्धि बनाती है जबकि अन्तिम वक्षीय कशेरुका प्रथम कटि कशेरुका से सन्धि करती है।

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(3) कटि कशेरुकाएँ (Lumber Vertebrae) – ये अधिक बड़ी व मजबूत होती हैं। इनकी संख्या 5 होती है, इनमें सेन्द्रम विकसित होता है। कंटिका प्रवर्ध आगे की ओर झुके हए होते हैं। डनमें एक-एक जोडी मैक्सिलरी प्रवर्ध (maxillary process) पाए जाते हैं। ये कशेरुकाएँ सबसे बड़ी होती हैं, क्योंकि शरीर का अधिकतम भार इन पर होता है। इनके कंटक प्रवर्ध कुल्हाड़ी के आकार के होते हैं और कमर को सहारा देने वाली पेशी से जुड़े होते हैं।
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(4) सेक्रल या त्रिक कशेरुकाएँ (Secral Vertebrae) – शिशु में इनकी संख्या 5 होती है, किन्तु वयस्क होने तक ये आपस में समेकित होकर केवल एक संयुक्त संरचना सेक्रम (sacrum) बनाती है। यह श्रोणि मेखला के (pelvic girdle) के पीछे नीचे की ओर निकलकर कमर वक्र (backward curve) बनाती है। इसका अधर भाग चौड़ा व अन्तिम भाग सँकरा होता है। अन्तिम भाग पर यह काँक्सिस से सन्धि बनाती हैं। मेरु नाल से तन्त्रिकाओं का एक गुच्छा निकला होता है, जिसे कोडे इक्वीना (cauda equina) कहते हैं।

(5) कॉक्सिस या पुच्छ कशेरुकाएँ (Coccyx or Caudal Vertebrae) – इनकी शिशु में संख्या चार होती है जो वयस्क में एक साथ जुड़कर छोटी कॉक्सिक्स (coccyx) बनाती है। यह पूँछ का अवशेषी भाग बनाती है। वयस्क मनष्य में कशेरुक दण्ड में 26 व बच्चे में 33 कशेरकाएँ होती हैं।

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HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

Haryana State Board HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण Important Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न :

प्रश्न 1.
जाँच कीजिए कि समीकरण (2x + 1) (3x + 2) = 6(x – 1) (x – 2) द्विघात है अथवा नहीं?
हल :
यहाँ पर
(2x + 1) (3x + 2) = 6 (x – 1) (x – 2)
या 6x2 + 4x + 3x + 2 = 6(x2 – 2x – x + 2)
या 6x2 + 7x + 2 = 6x2 – 18x + 12
या 6x2 + 7x + 2 – 6x2 + 18x – 12 = 0
या 25x – 10 = 0
∵ इस समीकरण की घात एक है
∵ दिया गया समीकरण द्विघात नहीं है ।

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प्रश्न 2.
जाँच कीजिए कि x = – 1 व x = – 5 दिए गए समीकरण x2 + 6x + 5 = 0 के हल हैं अथवा नहीं?
हल :
यहाँ पर दिया गया समीकरण है-
x2 + 6x + 5 = 0
x = – 1 समीकरण में रखने पर,
बायां पक्ष
= x2 + 6x + 5
= (-1)2 + 6 (-1) + 5
= 1 – 6 + 5 = 6 – 6 = 0 = दायां पक्ष
∴ x = – 1 दिए गए समीकरण का हल है ।
अब x = – 5 समीकरण में रखने पर,
बायां पक्ष = x2 + 6x + 5
= (-5)2 + 6(-5) + 5
= 25 – 30 + 5 = 30 – 30 = 0 = दायां पक्ष
∴ x = – 5 भी दिए गए समीकरण का हल है
अतः x = – 1 व x = – 5 दिए गए समीकरण के हल हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित स्थितियों को द्विघात समीकरणों के रूप में निरूपित कीजिए –
(i) एक आयत की एक भुजा उसकी दूसरी भुजा से 2cm बड़ी है । यदि आयत का क्षेत्रफल 195cm2 हो तो आयत की भुजाएँ ज्ञात करनी हैं ।
(ii) तीन क्रमागत धनात्मक पूर्णांक ऐसे हैं कि प्रथम के वर्ग तथा अन्य दो के गुणनफल का योग 154 है । वे पूर्णांक ज्ञात करने हैं।
हल :
(i) माना आयत की पहली भुजा = x cm
तो आयत की दूसरी भुजा = (x + 2) cm
आयत का क्षेत्रफल = 195 cm2
प्रश्नानुसार,
x(x + 2) = 195
⇒ x2 + 2x – 195 = 0
अतः आयत की भुजाएँ ज्ञात करने के उचित समीकरण है – x2 + 2x – 195 = 0

(ii) माना तीन क्रमागत धनात्मक पूर्णांक = x,x + 1 व x + 2
प्रश्नानुसार,
(x)2 + (x + 1)(x + 2) = 154
⇒ x2 + x2 + 3x + 2 – 154 = 0
⇒ 2x2 + 3x – 152 = 0
अतः तीन पूर्णांक ज्ञात करने के लिए उचित समीकरण है – 2x2 + 3x – 152 = 0

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 4.
गुणनखंडन विधि से निम्न द्विघात समीकरणों के मूल ज्ञात कीजिए-
(i) ax2 – 2abx = 0
(ii) \(\frac {1}{9}\)x2 – \(\frac {2}{3}\)x + 1 = 0
हल :
(i) यहाँ पर ax2 – 2abx = 0
या ax(x – 2b) = 0
⇒ ax = 0
⇒ x = \(\frac {0}{a}\)
⇒ x = 0
अतः अभीष्ट हल x = 0 x = 2b

(ii) यहाँ पर
\(\frac {1}{9}\)x2 – \(\frac {2}{3}\)x + 1 = 0
या x2 – 6x + 9 = 0
या x2 – 3x – 3x + 9 = 0
या x (x – 3) – 3(x – 3) = 0
या (x – 3) (x – 3) = 0
⇒ (x – 3)2 = 0
⇒ x – 3 = 0
⇒ x = 3
अतः अभीष्ट हल x = 3

प्रश्न 5.
गुणनखंडन विधि से निम्नलिखित द्विघात समीकरणों के मूल ज्ञात कीजिए-
(i) 8x2 – 22x – 21 = 0
(ii) abx2 + (b2 – ac) x – bc = 0
हल :
(i) यहाँ पर 8x2 – 22x – 21 = 0
या 8x2 – 28x + 6x – 21 = 0
या 4x (2x – 7) + 3 (2x – 7) = 0
या (2x – 7) (4x + 3) = 0
⇒ 2x – 7 = 0 या 4x + 3 = 0
⇒ 2x = 7 या 4x = – 3
⇒ x = \(\frac {7}{2}\) या x = \(\frac {-3}{4}\)
अतः अभीष्ट हल x = \(\frac {7}{2}\), \(\frac {-3}{4}\)

(ii) यहाँ पर abx2 + (b2 – ac) x – bc = 0
या abx2 + xb2 – acx – bc = 0
या bx (ax + b) – c (ax + b) = 0
या (bx – c) (ax + b) = 0
⇒ bx – c = 0 या ax + b = 0
⇒ bx = c या ax = – b
⇒ x = \(\frac {c}{b}\) या x = \(\frac {-b}{a}\)
अतः अभीष्ट हल x = – \(\frac {-b}{a}\), \(\frac {c}{b}\)

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 6.
दो क्रमागत सम धनात्मक पूर्णांक ज्ञात कीजिए जिनके वर्गों का योग 100 है।
हल :
माना पहला सम धन पूर्णांक = 2x
तो दूसरा सम धन पूर्णांक = 2x + 2
प्रश्नानुसार, (2x)2 + (2x + 2)2 = 100
या 4x2 + 4x2 + 4 + 8x = 100
या 8x2 + 8x + 4 – 100 = 0
या 8x2 + 8x – 96 = 0
या x2 + x – 12 = 0
या x2 + 4x – 3x – 12 = 0
या x (x + 4) – 3 (x + 4) = 0
या (x + 4) (x – 3) = 0
⇒ x + 4 = 0 या x – 3 = 0
⇒ x = – 4 या x = 3
परंतु x = – 4 संभव नहीं है ।
∴ x = 3
∴ पहला समधन पूर्णांक = 2 × 3 = 6
∴ दूसरा समधन पूर्णांक = 2 × 3 + 2 = 8

प्रश्न 7.
विक्रम तीन लकड़ी की छड़ों से एक समकोण त्रिभुज बनाना चाहता है । समकोण त्रिभुज का कर्ण उसके आधार से 2 सें०मी० तथा शीर्षलंब से 4 सें०मी० बड़ा होना चाहिए। उसे लकड़ी की छड़ें कितनी लंबी लेनी चाहिएँ ?
हल :
माना समकोण त्रिभुज का कर्ण = x सें०मी०
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण - 1
तो आधार = (x – 2) सें०मी०
शीर्षलंब = (x – 4) सें०मी०
∴ पाइथागोरस प्रमेय द्वारा
(कर्ण)2 = (आधार)2 + (लंब)2
⇒ (x)2 = (x – 2)2 + (x – 4)2
या (x)2 = (x)2 – 4x + 4 + (x)2 – 8x + 16
या (x)2 = 2x2 – 12x + 20
या 2x2 – 12x + 20 – x2 = 0
या (x)2 – 12x + 20 = 0
या (x)2 – 2x – 10x + 20 = 0
या x (x – 2 ) – 10 (x – 2) = 0
या (x – 10) (x – 2) = 0
⇒ x – 10 = 0 या x – 2 = 0
⇒ x = + 10 या x = 2
परंतु x = 2 नहीं हो सकता क्योंकि इस अवस्था में x – 2 = 2 – 2 = 0 होगा ।
∴ x = 10
तो कर्ण = 10 सें०मी०
आधार = 10 – 2 = 8 सें०मी०
शीर्षलंब = 10 – 4 = 6 सें०मी०
अतः लकड़ी की छड़ों की लंबाई = 6 सें०मी०; 8 सें०मी०; 10 सें०मी०

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 8.
एक समकोण त्रिभुज की समकोण बनाने वाली एक भुजा दूसरी से 17 सें०मी० कम है । यदि कर्ण की लम्बाई 25 सें०मी० है, तो दोनों भुजाओं की लम्बाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
माना समकोण त्रिभुज की एक भुजा तो समकोण त्रिभुज की दूसरी भुजा = x सें०मी०
तो समकोण त्रिभुज =(x – 17) सें०मी०
कर्ण की लम्बाई = 25 सें०मी०.
प्रश्नानुसार,
या (x)2 + (x – 17)2 = (25)2
या x2 + x2 + 289 – 34x = 625
या 2x2 – 34x + 289 – 625 = 0
या 2x2 – 34x – 336 = 0
या x2 – 17x – 168 = 0 (दोनों ओर 2 से भाग करने पर)
या x2 – 24x + 7x – 168 = 0
या (x – 24) + 7 (x – 24) = 0
(x – 24 ) (x + 7) = 0
⇒ x – 24 = 0 या x + 7 = 0
⇒ x = 24 या x = – 7 ( सम्भव नहीं है )
अतः समकोण त्रिभुज की भुजाएँ = 24 सें०मी० व (24 – 17) सें०मी०
= 24 सें०मी० व 7 सें०मी०

प्रश्न 9.
दो ऐसे क्रमागत विषम धनात्मक पूर्णांक ज्ञात कीजिए, जिनके वर्गों का योग 290 हो ।
हल :
माना दो क्रमागत विषम धनात्मक पूर्णांक = x व x + 2
प्रश्नानुसार
(x)2 + (x + 2)2 = 290
⇒ x2 + x2 + 4x + 4 – 290 = 0
⇒ 2x2 + 4x – 286 = 0
⇒ x2 + 2x – 143 = 0 (दोनों ओर 2 से भाग करने पर)
⇒ x2 + 13x – 11x – 143 = 0
⇒ x(x + 13) – 11 (x + 13) = 0
⇒ (x + 13) (x – 11) = 0
⇒ x + 13 = 0 या x – 11 = 0
⇒ x = – 13 या x = 11
परन्तु x एक धनात्मक विषम पूर्णांक है अतः x ≠ – 13
∴ x = 11
अतः क्रमागत विषम धनात्मक पूर्णांक = 11 व 13

प्रश्न 10.
एक किसान 100 मी०2 क्षेत्रफल वाला आयताकार सब्जी का बगीचा बनाना चाहता है। क्योंकि उसके पास घेराबंदी के लिए 30 मी० लंबाई का काँटेदार तार है, इसलिए वह आयताकार बगीचे की तीन भुजाओं की घेराबंदी इस तार से करता है तथा चौथी भुजा की घेराबंदी के लिए अपने सहन की दीवार का उपयोग करता है । बगीचे की विमाएँ (dimensions) ज्ञात कीजिए ।
हल :
माना पहली भुजा की लंबाई = x मी०
तो दूसरी भुजा की लंबाई = (30 – 2x) मी०
प्रश्नानुसार,
या x(30 – 2x) = 100
या 30x – 2x2 = 100
या – 2x2 + 30x – 100 = 0
या x2 – 15x + 50 = 0
या x2 – 10x – 5x + 50 = 0
या x (x – 10) – 5 (x – 10) = 0
या (x – 10) (x – 5) = 0
⇒ x – 10 = 0 या x – 5 = 0
⇒ x = 10 या x = 5
परंतु x = 10 संभव नहीं है क्योंकि इससे बाग वर्गाकार हो जाएगा।
∴ x = 5
∴ पहली भुजा की लंबाई = 5 मी०
तथा दूसरी भुजा की लंबाई = 30 – 2x = 30 – 2 × 5 = 20 मी०

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 11.
ज्ञात कीजिए कि क्या द्विघात समीकरण 3x2 – 5x + 2 = 0 के मूल वास्तविक हैं? यदि हैं तो उन्हें ज्ञात कीजिए ।
हल :
यहाँ पर
3x2 – 5x + 2 = 0
a = 3, b = – 5, c = 2
विविक्तकर b2 – 4ac
= (-5)2 – 4(3)(2)
= 25 – 24 = 1 > 0
अतः समीकरण के वास्तविक मूल हैं
अब द्विघाती सूत्र के उपयोग से,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण - 2

प्रश्न 12.
पूर्ण वर्ग बनाकर समीकरण 5x2 – 6x – 2 = 0 के मूल ज्ञात कीजिए।
हल :
यहाँ पर, 5x2 – 6x – 2 = 0
दोनों ओर 5 से गुणा करने पर
⇒ 25x2 – 30x – 10 = 0
⇒ (5x)2 – 2 × 5x × 3 + (3)2 – (3)2 – 10 = 0
⇒ (5x – 3)2 = 19
⇒ 5x – 3 = ± \(\sqrt{19}\)
⇒ x = \(\frac{3 \pm \sqrt{19}}{5}\)
अतः दी गई समीकरण के अभीष्ट मूल = \(\frac{3+\sqrt{19}}{5}\) व \(\frac{3-\sqrt{19}}{5}\)

प्रश्न 13.
P के वे मान ज्ञात कीजिए जिनके लिए द्विघात समीकरण px2 – 6x – 2 = 0 के मूल वास्तविक हों ।
हल :
दिया गया समीकरण px2 – 6x – 2 = 0
यहाँ पर a = p, b = – 6, c = – 2
∴ विविक्तकर = b2 – 4ac
= (-6)2 – 4(p)(-2) = 36 + 8p
वास्तविक मूल के लिए D ≥ 0 होना चाहिए ।
⇒ 36 + 8p ≥ 0
या 8p ≥ – 36
या p ≥ \(\frac {-36}{8}\)
या p ≥ \(\frac {-9}{2}\)

प्रश्न 14.
समीकरण 3x2 – 2x + \(\frac {1}{3}\) = 0 का विविक्तकर ज्ञात कीजिए और फिर मूलों की प्रकृति ज्ञात कीजिए। यदि वे वास्तविक हैं, तो उन्हें ज्ञात कीजिए ।
हल :
यहाँ पर 3x2 – 2x + \(\frac {1}{3}\) = 0
⇒ a = 3, b = – 2, c = \(\frac {1}{3}\)
∴ विविक्तकर = b2 – 4ac
= (-2)2 – 4(3)(\(\frac {1}{3}\))
= 4 – 4 = 0
∴ द्विघात समीकरण के दो बराबर वास्तविक मूल हैं ।
अब द्विघाती सूत्र के उपयोग से,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण - 3

प्रश्न 15.
एक नाव को, जिसकी शांत जल में चाल 15 कि०मी० / घंटा है, धारा की दिशा में 30 कि०मी० जाने तथा फिर धारा की दिशा के विपरीत लौटने में कुल 4 घंटे 30 मिनट का समय लगता है । धारा की चाल ज्ञात कीजिए ।
हल :
शांत जल में नाव की चाल = 15 कि०मी० / घंटा
माना जल की धारा की चाल = x कि०मी० / घंटा
पहली अवस्था में जब नाव जल की धारा की दिशा में जाएगी
कुल तय की गई दूरी = 30 कि०मी० / घंटा
जल की धारा की दिशा में नाव की चाल = (15 + x) कि०मी० / घंटा
जल की धारा की दिशा में 30 कि०मी० दूरी तय तरने में
लिया गया समय = \(\frac{30}{(15+x)}\) घंटा
दूसरी अवस्था में जब नाव जल की धारा के विपरीत दिशा में जाएगी
कुल तय की गई दूरी = 30 कि०मी० / घंटा
विपरीत दिशा में नाव की चाल = (15 – x) कि०मी० / घंटा
जल की धारा की विपरीत दिशा में 30 कि०मी० दूरी तय तरने में
लिया गया समय = \(\frac{30}{(15- x)}\) घंटा
प्रश्नानुसार,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण - 4

प्रश्न 16.
दो स्टेशनों के बीच 168 किमी यात्रा करने में एक एक्सप्रेस रेलगाड़ी, सवारी गाड़ी से 1 घंटा कम समय लेती है ( स्टेशनों पर ठहरने का समय ध्यान में न लिया जाए) यदि एक्सप्रेस गाड़ी की चाल सवारी गाड़ी से 14 किमी / घण्टा अधिक है, तो दोनों रेलगाड़ियों की औसत चाल ज्ञात कीजिए ।
हल :
माना सवारी गाड़ी की औसत चाल = x किमी / घंटा
तो एक्सप्रेस गाड़ी की औसत चाल = (x + 14) किमी / घंटा
सवारी गाड़ी द्वारा 168 किमी दूरी तय करने में लिया गया समय = \(\frac {168}{x}\) घंटे
एक्सप्रेस गाड़ी द्वारा 168 किमी दूरी तय करने में लिया गया समय = \(\frac{168}{(x+14)}\) घंटे
प्रश्नानुसार,
\(\frac{168}{x}-\frac{168}{x+14}\) = 1
⇒ 168 (x + 14) – 168x = x(x + 14) (दोनों ओर x (x + 14) से गुणा करने पर)
⇒ 168x + 2352 – 168x = x2 + 14x
या x2 + 14x – 2352 = 0
या x2 + 56x – 42x – 2352 = 0
या x(x + 56) – 42(x + 56) = 0
⇒ (x + 56)(x – 42) = 0
⇒ x + 56 = 0 या x – 42 = 0
⇒ x = – 56 या x = 42
परंतु x = – 56 असंभव है, क्योंकि चाल ऋणात्मक नहीं हो सकती,
अतः सवारी गाड़ी की औसत चाल = 42 किमी / घंटा
तथा एक्सप्रेस गाड़ी की औसत चाल = (42 + 14) = 56 किमी / घंटा

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 17.
एक रेलगाड़ी एकसमान चाल से 180 किमी की दूरी चलती है । यदि उसकी चाल 6 किमी / घण्टा अधिक हो, तो उसे उतनी ही दूर जाने में 1 घंटा कम समय लगता है। गाड़ी की चाल ज्ञात कीजिए ।
हल :
माना रेलगाड़ी की सामान्य चाल रेलगाड़ी की बढ़ी हुई चाल = x किमी / घंटा
रेलगाड़ी द्वारा चली गई कुल दूरी = x + 6 किमी / घंटा
रेलगाड़ी द्वारा चली गई कुल दूरी = 180 किमी
रेलगाड़ी द्वारा सामान्य चाल से 180 किमी दूरी तय करने में लिया गया समय = \(\frac {180}{x}\) घंटे
रेलगाड़ी द्वारा बढ़ी हुई चाल से 180 किमी दूरी तय करने में लिया गया समय = \(\frac{180}{x+6}\) घंटे
प्रश्नानुसार,
\(\frac{180}{x}-\frac{180}{x+6}\) = 1
⇒ 180(x + 6) – 180x = x(x + 6) (दोनों ओर x (x + 6) से गुणा करने पर)
⇒ 180x + 1080 – 180x = x2 + 6x
⇒ x2 + 6x – 1080 = 0
⇒ x2 + 36x – 30x – 1080 = 0
⇒ x(x + 36) – 30(x + 36) = 0
⇒ (x + 36) (x – 30) = 0
⇒ x + 36 = 0 या x – 30 = 0
⇒ x = – 36 या x = 30
परंतु x = – 36 असंभव है, क्योंकि चाल ऋणात्मक नहीं हो सकती,
अतः रेलगाड़ी की सामान्य चाल 30 किमी / घंटा

प्रश्न 18.
बहुपद p(x) = x4 – 3x2 + 4x + 5 को बहुपद g (x) = x2 – x + 1 से भाग कीजिए। भागफल तथा शेषफल ज्ञात कीजिए ।
हल :
यहाँ पर,
p(x) = x4 – 3x2 + 4x + 5
g(x) = x2 – x + 1
क्योंकि p(x) की घात 4 तथा g (x) की घात 2 है ।
इसलिए भागफल q(x) की घात = 4 – 2 = 2 तथा शेषफल की घात 2 से कम होगी ।
माना q(x) = ax2 + bx + c (भागफल)
तथा r(x) = dx + e (भागफल)
विभाजन एल्गोरिथ्म के प्रयोग से
p(x) = g (x) × q (x) + r (x)
⇒ x4 – 3x2 + 4x + 5 = (x2 – x + 1) × (ax2 + bx + c) + (dx + e)
⇒ x4 + 0.x3 – 3x2 + 4x + 5 = ax4 + bx3 + cx2 – ax3 – bx2 – cx + ax2 + bx + c + dx + e
⇒ x4 + 0.x3 – 3x2 + 4x + 5 = ax4 +(b – a)x3 + (c – b + a)x2 + (b – c + d)x + (c + e)
दोनों ओर x की समान घातों के गुणांकों को बराबर करने पर
a = 1 (i)
b – a = 0 ⇒ b = a = 1 (ii)
c – b + a = – 3 ⇒ c – 1 + 1 = – 3 या c = – 3 (iii)
b – c + d = 4 ⇒ 1 – (-3) + d = 4 ⇒ 4 + d = 4 या d = 4 – 4= 0 (iv)
c+ e = 5 ⇒ – 3 + e = 5 या ⇒ = 5 + 3 = 8
a, b, c, d व e के मान प्रतिस्थापित करने पर
भागफल = q(x) = ax2 + bx + c
= x2 + x – 3
शेषफल = r(x) = dx + e = 0.x + 8 = 8

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 19.
पूर्ण वर्ग बनाने की विधि से समीकरण 4x2 + 3x + 5 = 0 के वास्तविक मूल ज्ञात कीजिए ।
हल :
यहाँ पर
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण - 5
\(\frac {-71}{64}\) अर्थात् R.H.S. ऋणात्मक है।
(x + \(\frac {3}{8}\))2, x के किसी भी वास्तविक मान के लिए ऋणात्मक नहीं हो सकता है।
अतः दिए गए समीकरण के कोई वास्तविक मूल नहीं है।

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी समीकरण द्विघात है ?
(A) x3 – 6x2 + 2x – 1 = 0
(B) x2 + \(\frac{1}{x^2}\) = 2(x ≠ 0)
(C) (2x + 1)(3x + 2) = 6 (x – 1)(x – 2)
(D) 16x2 – 3 = (2x + 5) (5x – 3)
हल :
(D) 16x2 – 3 = (2x + 5) (5x – 3)

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सी समीकरण द्विघात नहीं है ?
(A) (x – 2) (x + 3) + 1 = 0
(B) x + \(\frac {1}{x}\) = x2 (x ≠ 0)
(C) 7x = 2x2
(D) (x + 1) (x + 3) = 0
हल :
(B) x + \(\frac {1}{x}\) = x2 (x ≠ 0)

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सी समीकरण द्विघात है ?
(A) 3x2 – 4x + 2 = 2x2 – 2x + 4
(B) x + \(\frac {3}{x}\) = 5x2
(C) x3 + 5x2 + x – 5 = 0
(D) (x + 4)(x – 4) = x (x + 2) + 8
हल :
(A) 3x2 – 4x + 2 = 2x2 – 2x + 4

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सी समीकरण द्विघात नहीं है ?
(A) x2 – 6x – 4 = 0
(B) 6 – x (x2 + 2) = 0
(C) 3x2 – 4 = 0
(D) x2 + \(\sqrt{2}\)x – 4 = 0
हल :
(B) 6 – x (x2 + 2) = 0

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 5.
किन्हीं दो क्रमागत धनात्मक पूर्णांकों का गुणनफल 306 है । इसके लिए उचित द्विघात समीकरण होगी-
(A) x2 + x – 306 = 0
(B) x2 – x + 306 = 0
(C) x2 + x + 306 = 0
(D) – x2 + x – 306 = 0
हल :
(A) x2 + x – 306 = 0

प्रश्न 6.
एक आयताकार भूखंड का क्षेत्रफल 528m2 है । यदि क्षेत्र की लंबाई (मीटरों में) चौड़ाई x मी० के दुगुने से एक अधिक है। इसके लिए उचित द्विघात समीकरण होगी-
(A) 2x2 – x – 528 = 0
(B) 2x2 + x – 528 = 0
(C) 2x2 + x + 528 = 0
(D) 2x2 – x + 528 = 0
हल :
(B) 2x2 + x – 528 = 0

प्रश्न 7.
समीकरण (x + 1)2 = 2 (x – 3) कैसी समीकरण है?
(A) एकल घात
(B) त्रिघात
(C) द्विघात
(D) शून्य घात
हल :
(C) द्विघात

प्रश्न 8.
द्विघात समीकरण (x – 2)2 – 25 = 0 के हल होंगे-
(A) -7, 3
(B) -7, – 3
(C) 7, – 3
(D) 7, 3
हल :
(C) 7, – 3

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 9.
द्विघात समीकरण 5x2 – 30 = 0 के …………….. हल होंगे।
(A) ± \(\sqrt{6}\)
(B) ± 6
(C) ± \(\sqrt{5}\)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) ± \(\sqrt{6}\)

प्रश्न 10.
यदि a, b तथा c धनात्मक वास्तविक संख्याएँ हों तो चर में द्विघात समीकरण का व्यापक रूप होगा-
(A) ay2 + c = 0
(B) ay2 + by + c = 0
(C) ay2 = 0
(D) ay2 + by = 0
हल :
(B) ay2 + by + c = 0

प्रश्न 11.
द्विघात समीकरण 6x2 – 5x – 21 = 0 के हल होंगे-
(A) \(\frac{3}{2}, \frac{-7}{3}\)
(B) \(\frac{-3}{2}, \frac{7}{3}\)
(C) \(\frac{-3}{2}, \frac{-7}{3}\)
(D) \(\frac{3}{2}, \frac{7}{3}\)
हल :
(B) \(\frac{-3}{2}, \frac{7}{3}\)

प्रश्न 12.
k का मान जिसके लिए, द्विघात समीकरण 2x2 – kx + 5 = 0 के दोनों मूल बराबर हैं, वह है-
(A) 0
(B) ± 2\(\sqrt{10}\)
(C) 40
(D) 10
हल :
(B) ± 2\(\sqrt{10}\)

प्रश्न 13.
x2 – 10x + 21 = 0 के मूल हैं-
(A) 7, 3
(B) – 7, – 3
(C) – 7, 3
(D) 7, – 3
हल :
(A) 7, 3

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प्रश्न 14.
द्विघात समीकरण 2x2 + 2\(\sqrt{3}\)x + 3 = 0 के मूलों की प्रकृति निम्न में से किस प्रकार की है ?
(A) दो भिन्न-भिन्न, वास्तविक मूल
(B) दो बराबर वास्तविक मूल
(C) कोई वास्तविक मूल नहीं
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(C) कोई वास्तविक मूल नहीं

प्रश्न 15.
द्विघात समीकरण y2 – 8y + 16 = 0 का अभीष्ट हल होगा-
(A) y = 4
(B) y = – 4
(C) y = 2
(D) y = – 2
हल :
(A) y = 4

प्रश्न 16.
द्विघात समीकरण x2 – 4qx + 4q2 = 0 का अभीष्ट हल होगा –
(A) – 2q
(B) 2q
(C) q
(D) – 9
हल :
(B) 2q

प्रश्न 17.
द्विघात समीकरण 25x2 – 30x + 9 = 0 का अभीष्ट हल होगा-
(A) \(\frac {3}{5}\)
(B) \(\frac {-3}{5}\)
(C) \(\frac {5}{3}\)
(D) \(\frac {-5}{3}\)
हल :
(A) \(\frac {3}{5}\)

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 18.
द्विघात समीकरण 2x2 – 5x + 3 = 0 के मूल होंगे-
(A) – 1 व \(\frac {-3}{2}\)
(B) – 1 व \(\frac {3}{2}\)
(C) 1 व \(\frac {3}{2}\)
(D) 1 व \(\frac {-3}{2}\)
हल :
(C) 1 व \(\frac {3}{2}\)

प्रश्न 19.
द्विघात समीकरण 3x2 – 2x – 1 = 0 के दो मूलों का गुणनफल होगा-
(A) \(\frac {-1}{3}\)
(B) \(\frac {1}{3}\)
(C) \(\frac {2}{3}\)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) \(\frac {-1}{3}\)

प्रश्न 20.
द्विघात समीकरण x2 – 3x – 10 = 0 के मूल होंगे-
(A) – 2 व 5
(B) 2 व – 5
(C) – 2 व – 5
(D) 2 व 5
हल :
(A) – 2 व 5

प्रश्न 21.
द्विघात समीकरण x2 + 6x + 5 = 0 के दो मूलों का गुणनफल निम्नलिखित में से ज्ञात कीजिए-
(A) – 5
(B) 5
(C) \(\frac {1}{5}\)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) – 5

प्रश्न 22.
द्विघात समीकरण 3x2 + 2x – 5 = 0 के दो मूलों का गुणनफल होगा-
(A) \(\frac {-5}{3}\)
(B) \(\frac {5}{3}\)
(C) \(\frac {3}{5}\)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) \(\frac {-5}{3}\)

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 23.
द्विघात समीकरण 8x2 – 22x – 21 = 0 के हल होंगे-
(A) \(\frac{7}{2}, \frac{3}{4}\)
(B) \(\frac{-7}{2}, \frac{3}{4}\)
(C) \(\frac{7}{2}, \frac{-3}{4}\)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(C) \(\frac{7}{2}, \frac{-3}{4}\)

प्रश्न 24.
k का मान जिसके लिए, द्विघांत समीकरण 3x2 – kx + 5 = 0 के दोनों मूल बराबर हैं, वह है-
(A) 0
(B) 60
(C) ± 2\(\sqrt{15}\)
(D) 15
हल :
(C) ± 2\(\sqrt{15}\)

प्रश्न 25.
x2 – 5x + 6 = 0 के मूल हैं-
(A) 5, – 6
(B) 2, 3
(C) 6, – 1
(D) -2, – 3
हल :
(B) 2, 3

प्रश्न 26.
द्विघात समीकरण x2 + 4x + 1 = 0 का विविक्तकर क्या होगा ?
(A) 12
(B) 14
(C) 16
(D) -12
हल :
(A) 12

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 27.
द्विघात समीकरण 4x2 – ax + 2 = 0 का विविक्तकर ……………………. होगा ।
(A) a2 – 32
(B) a2 + 32.
(C) a2 = 32
(D) a2 = – 32
हल :
(A) a2 – 32

प्रश्न 28.
\(\sqrt{3}\)x2 – 2\(\sqrt{2}\)x – 2\(\sqrt{3}\) = 0 का विविक्तकर होगा-
(A) 8
(B) 16
(C) 32
(D) 24
हल :
(C) 32

प्रश्न 29.
निम्नलिखित में से किस समीकरण के मूल वास्तविक हैं ?
(A) 2x2 + x – 1 = 0
(B) 3x2 + 2x – 1 = 0
(C) x2 + 4x + 4 = 0
(D) 2x2 + 5x + 5 = 0
हल :
(D) 2x2 + 5x + 5 = 0

प्रश्न 30.
किस भारतीय गणितज्ञ ने सर्वप्रथम व्यापक द्विघात समीकरण के मूलों के लिए सूत्र प्रतिपादित किया ?
(A) आर्यभट्ट
(B) ब्रह्मगुप्त
(C) महावीर
(D) श्री धराचार्य
हल :
(D) श्री धराचार्य

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 31.
निम्नलिखित में से किस समीकरण के मूल वास्तविक हैं ?
(A) x2 + x + 1 = 0
(B) x2 + 4x + 4 = 0
(C) 2x2 + 5x + 5 = 0
(D) उपरोक्त सभी के
हल :
(B) x2 + 4x + 4 = 0

प्रश्न 32.
k के किस मान के लिए द्विघात समीकरण kx2 + 4x + 1 = 0 के दो मूल बराबर हैं-
(A) – 4
(B) 4
(C) 16
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(B) 4

प्रश्न 33.
दो क्रमागत धनात्मक पूर्णांकों का गुणनफल 306 हो, तो वे पूर्णांक हैं-
(A) 18 तथा 19
(B) 12 तथा 13
(C) 16 तथा 17
(D) 17 तथा 18
हल :
(D) 17 तथा 18

प्रश्न 34.
p के किस मान के लिए द्विघात समीकरण 3x2 – 5x + p = 0 के मूल बराबर होंगे ?
(A) p = \(\frac {25}{12}\)
(B) p = \(\frac {-25}{12}\)
(C) p = \(\frac {12}{25}\)
(D) p = \(\frac {-12}{25}\)
हल :
(A) p = \(\frac {25}{12}\)

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 35.
द्विघात समीकरण 4x2 + kx + 9 = 0 में k के किस मान के लिए उसके दो मूल बराबर है-
(A) ± 4
(B) ± 6
(C) ± 12
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(C) ± 12

प्रश्न 36.
p के किस मान के लिए द्विघात समीकरण 2x2 + px + 18 = 0 के मूल वास्तविक होंगे ?
(A) p ≥ 13
(B) p ≤ 18
(C) p ≥ 18
(D) p ≥ 12
हल :
(D) p ≥ 12

प्रश्न 37.
द्विघात समीकरण जिसके मूलों का योग 5 तथा गुणनफल 6 है होगी-
(A) x2 – 5x + 6 = 0
(B) x2 – 5x – 6 = 0
(C) x2 + 5x + 6 = 0
(D) x2 + 5x – 6 = 0
हल :
(A) x2 – 5x + 6 = 0

प्रश्न 38.
एक हॉल की लंबाई उसकी चौड़ाई से 5 मी० अधिक है । यदि हॉल के फर्श का क्षेत्रफल 84 वर्ग मी० हो
तो हॉल की लंबाई होगी-
(A) 12 मी०
(B) 7 मी०
(C) 14 मी०
(D) 6 मी०
हल :
(A) 12 मी०

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प्रश्न 39.
12 को दो ऐसे भागों में विभक्त कीजिए जिनके वर्गों का योग 74 है-
(A) 8, 4
(B) 7, 5
(C) 9, 3
(D) 10, 2
हल :
(B) 7, 5

प्रश्न 40.
19 को दो ऐसे भागों में विभक्त करें जिनके वर्गों का योग 193 है
(A) 14, 5
(B) 12, 7
(C) 13, 6
(D) 11, 8
हल :
(B) 12, 7

प्रश्न 41.
द्विघात समीकरण x2 – kx + 9 = 0 में k के किस मान के लिए उसके दो मूल बराबर हैं-
(A) ± 5
(C) ± 4
(B) ± 6
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(B) ± 6

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 42.
निम्नलिखित में से क्रमागत सम धनात्मक पूर्णांक जिनके वर्गों का योग 100 है-
(A) 4, 6
(B) 5, 7
(C) 6, 8
(D) 8, 10
हल :
(C) 6, 8

प्रश्न 43.
दो क्रमागत विषम प्राकृत संख्याएँ जिनके वर्गों का योग 202 हो तो इन संख्याओं का योग होगा-
(A) 22
(B) 9
(C) 11
(D) 20
हल :
(D) 20

प्रश्न 44.
3 से आरंभ करके n क्रमागत विषम प्राकृत संख्याओं के योग का सूत्र S = n (n + 2) होता है । यदि S = 168 हो तो n का मान होगा-
(A) 16
(B) 14
(C) 13
(D) 12
हल :
(D) 12

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 4 द्विघात समीकरण

प्रश्न 45.
प्रथम n क्रमागत सम प्राकृत संख्याओं का योग S निम्नलिखित संबंध द्वारा दर्शाया जाता है- S = n (n + 1) यदि योग 420 हो, तो n का मान-
(A) 18
(B) 19
(C) 20
(D) 21
हल :
(C) 20

प्रश्न 46.
यदि द्विघात समीकरण 5x2 – 8x + 4k = 0 के मूल समान हों, तो k का मान होगा-
(A) \(\frac {5}{4}\)
(B) \(\frac {1}{2}\)
(C) \(\frac {4}{5}\)
(D) 2
हल :
(C) \(\frac {4}{5}\)

प्रश्न 47.
x2 – 7x + 12 = 0 के मूल हैं-
(A) -3, -4
(B) 3, 4
(C) 6, 2
(D) -6, 2
हल :
(B) 3, 4

प्रश्न 48.
द्विघात समीकरण 2x2 – 2\(\sqrt{3}\)x – 3 = 0 के मूलों की प्रकृति निम्न में से किस प्रकार की है ?
(A) दो भिन्न-भिन्न, वास्तविक मूल
(B) दो बराबर वास्तविक मूल
(C) कोई वास्तविक मूल नहीं
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(A) दो भिन्न-भिन्न, वास्तविक मूल

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प्रश्न 49.
समीकरण 3x2 – 2x + \(\frac {1}{3}\) = 0 के मूल हैं-
(A) 3 तथा 2
(B) \(\frac {1}{3}\) तथा \(\frac {1}{3}\)
(C) \(\frac {1}{3}\) तथा \(\frac {1}{2}\)
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(B) \(\frac {1}{3}\) तथा \(\frac {1}{3}\)

प्रश्न 50.
द्विघात समीकरण 2x2 – 2\(\sqrt{2}\)x + 1 = 0 के मूल होंगे-
(A) वास्तविक तथा भिन्न
(B) वास्तविक तथा समान
(C) वास्तविक तथा शून्य
(D) इनमें से कोई नहीं
हल :
(B) वास्तविक तथा समान

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HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

Haryana State Board HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग Important Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न :

प्रश्न 1.
1.5 m लम्बा एक आदमी एक चिमनी से 28.5m की दूरी पर है। उसकी आँखों से चिमनी के शिखर का उन्नयन कोण 45° है । चिमनी की ऊँचाई बताइए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 1
माना AB एक चिमनी है तथा CD एक आदमी है जिसकी ऊँचाई 1.5 m है जो चिमनी से 28.5m की दूरी पर खड़ा है । इस प्रकार उन्नयन ∠ADE = 45° है ।
अब समकोण त्रिभुज ADE में, \(\frac {AE}{DE}\) = tan 45°
⇒ \(\frac {AE}{CB}\) = 1
⇒ AE = 28.5 × 1
= 28.5 m
अतः चिमनी की ऊँचाई (AB) = AE + BE
= AE + CD
= (28.5 + 1.5) m
= 30m

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 2.
मीनार के आधार से 40m की दूरी पर भूमि पर एक बिंदु से मीनार की चोटी का उन्नयन कोण 30° है और मीनार की चोटी पर रखी पानी की टंकी के ऊपरी सिरे का उन्नयन कोण 45° है। ज्ञात कीजिए-
(i) मीनार की ऊँचाई ।
(ii) टंकी की गहराई ।
हल :
मान लो, AB (= h) मीनार की ऊँचाई, BC पानी की टंकी की गहराई है, पानी की टंकी से उन्नयन कोण 30° वनता है और टंकी के ऊपरी सिरे से 45° का कोण बनता है ।
समकोण ΔAOB में,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 2
समकोण ΔCAO में,
\(\frac {CA}{AO}\) = tan 45°
या \(\frac {CA}{40}\) = 1
या AC = 40 m
∴ BC = AC – AB
= 40 – 23.1
= 16.9 m
∴ मीनार की ऊँचाई = 23.1 m
पानी की टंकी की गहराई =16.9m

प्रश्न 3.
100 m ऊँचे एक प्रकाश स्तंभ की चोटी से एक प्रेक्षक समुद्र में एक जहाज को ठीक अपनी ओर आते हुए देखता है । यदि जहाज का अवनमन कोण 30° से बदलकर 45° हो जाता है, तो प्रेक्षण की इस अवधि में जहाज द्वारा तय की गई दूरी ज्ञात कीजिए ।
हल :
मान लीजिए, A और B जहाज की दो स्थितियाँ हैं। मान लीजिए प्रेक्षण की अवधि में जहाज द्वारा तय की गई दूरी d m है, अर्थात् AB = d m है।
मान लीजिए, प्रेक्षक बिंदु O पर है ( आकृति में) स्पष्टतः OC = 100 m है।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 3
माना B से C की दूरी km है। बिंदु O से A और B के अवनमन कोण क्रमशः 30° और 45° ज्ञात हैं
अतः ∠AOP = 30°, ∠BOP = 45°
⇒ ∠AOP = ∠OAC = 30°
तथा ∠POB = ∠OBC = 45°
समकोण ΔOCB में,
\(\frac {k}{100}\) = cot 45° = 1
या k = 100
समकोण ΔOCA में,
\(\frac{d+k}{100}\) = cot 30° = \(\sqrt{3}\)
∴ d + k = 100\(\sqrt{3}\)
या d + 100 = 100\(\sqrt{3}\)
या d = 100\(\sqrt{3}\) – 100 = 100(\(\sqrt{3}\) – 1) = 100(1.732 – 1)
= 100 × 0.732 = 73.2 m
अतः जहाज द्वारा A से B तक तय की गई दूरी 73.2m है ।

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 4.
भूमि के बिन्दु P से एक 10 मी ऊँचे भवन के शिखर का उन्नयन कोण 30° है। भवन के शिखर का उन्नयन कोण 45° है। ध्वज की लम्बाई और बिन्दु P से भवन की दूरी ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 4
यहाँ पर,
AB एक 10 मी ऊँचा भवन है जिसके शिखर A पर AC ध्वज लगा है ।
अब भवन की ऊँचाई (AB) = 10 मी
माना ध्वज की लंबाई (AC) = h मी
तथा बिन्दु P से B की दूरी = x मी
समकोण ΔABP में,
\(\frac {AB}{PB}\) = tan 30°
⇒ \(\frac{10}{x}=\frac{1}{\sqrt{3}}\) मी
या x = 10\(\sqrt{3}\)
समकोण ΔCBP में,
\(\frac {BC}{PB}\) = tan45°
⇒ \(\frac{h+10}{x}\) = 1
या x = h + 10
10\(\sqrt{3}\) = h + 10 (समीकरण (i) से)
h = 10\(\sqrt{3}\) – 10
h = 10(\(\sqrt{3}\) – 1) मी
अतः ध्वज की लंबाई = 10(\(\sqrt{3}\) – 1) मी
बिन्दु P से भवन की दूरी = 10\(\sqrt{3}\) मी

प्रश्न 5.
एक समतल जमीन पर खड़ी मीनार की छाया उस स्थिति में 40 मी अधिक लम्बी हो जाती है जबकि सूर्य का उन्नयन कोण 60° से घटकर 30° हो जाता है। मीनार की ऊँचाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 5
माना AB = h मी मीनार की ऊँचाई है। जब सूर्य का उन्नयन कोण 30° है तो मीनार की छाया DB है और जब सूर्य का उन्नयन कोण 60° है तो मीनार की छाया CB है ।
अतः DC = 40 मी
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प्रश्न 6.
आँधी चलने से दो भागों में टूटे हुए एक वृक्ष का ऊपरी भाग भूमि से 30° का कोण बनाता है। वृक्ष का ऊपरी सिरा जिस स्थान पर भूमि को छूता है वह स्थान वृक्ष के आधार – बिंदु से 10m की दूरी पर है | वृक्ष ऊँचाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 7
मान लीजिए AB = h m वृक्ष की ऊँचाई है । AC टूटे हुए वृक्ष का एक भाग है।
तब ∠COB = 30° तथा OB = 10m
समकोण ΔCOB में,
tan 30° = \(\frac {CB}{OB}\)
या \(\frac{1}{\sqrt{3}}\) = \(\frac {CB}{10}\)
या \(\sqrt{3}\)CB = 10
या CB = \(\frac{10}{\sqrt{3}}\) ………………(i)
इसी प्रकार, समकोण ΔCOB में,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 8

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 7.
एक सड़क, 50m ऊँची मीनार के आधार तक, सीधी जाती है। मीनार की चोटी से सड़क पर खड़ी दो कारों के अवनमन कोण क्रमश: 30° और 60° हैं। दोनों कारों के बीच की दूरी ज्ञात कीजिए और बताइए कि प्रत्येक कार मीनार के आधार से कितनी दूरी पर है ?
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 9
मान लीजिए, AB (= 50m) मीनार की ऊँचाई है तथा C और D सड़क पर खड़ी दो कारों की स्थिति है ।
∠CAX = 30° तथा ∠DAX = 60°
⇒ ∠CAX = ∠CAB = 30°
तथा ∠DAX = ∠ADB = 60°
समकोण ΔACB में,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 10
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 11
अब, CB = CD + DB
= 57.74 + 28.87 = 86.61 m
अतः दोनों कारों के बीच की दूरी = 57.74m
पहली कार की मीनार के आधार से दूरी = 86.61 m
दूसरी कार की मीनार के आधार से दूरी = 28.87 m

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प्रश्न 8.
एक बिजली मिस्त्री को एक 5 m ऊँचे खंभे पर आ गई खराबी की मरम्मत करनी है। मरम्मत का काम करने के लिए उसे खंभे के शिखर से 1.3m नीचे एक बिन्दु तक पहुँचने के लिए प्रयुक्त सीढ़ी की लम्बाई कितनी होनी चाहिए जिससे कि क्षैतिज से 60° के कोण पर झुकने से वह अपेक्षित स्थिति तक पहुँच जाये और यह भी बताइए कि खंभे का पाद-बिन्दु कितनी दूरी पर सीढ़ी के पाद-बिन्दु से होना चाहिए ? (\(\sqrt{3}\) = 1.73)
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 12
आकृति अनुसार बिजली मिस्त्री को खम्भे AD पर बिन्दु B तक पहुँचना है।
अतः BD = AD – AB
= (5 – 1.3) m = 3.7 m
यहाँ पर BC सीढ़ी को प्रकट करता है । हमें इसकी लम्बाई अर्थात् समकोण ΔBDC का कर्ण ज्ञात करना है।
अब समकोण ΔBDC में
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 13
अतः उसे सीढ़ी के पाद को खम्भे से 2.14 m की दूरी पर रखना चाहिए ।

प्रश्न 9.
नदी के पुल पर एक बिंदु से, नदी के सम्मुख किनारों पर अवनमन कोण क्रमशः 30° व 45° हैं । यदि पुल की ऊँचाई किनारों से 3m हो, तो नदी की चौड़ाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
आकृति में, A और B नदी के सम्मुख किनारों के बिंदुओं को प्रकट करते हैं, जिससे कि AB नदी की चौड़ाई है। 3 m की ऊँचाई पर बने पुल पर एक बिंदु P है अर्थात् DP = 3m है। हम नदी की चौड़ाई ज्ञात करना चाहते हैं जो कि ΔAPB की भुजा AB की लंबाई है।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 14
अब AB = AD + DB
समकोण ΔAPD में ∠A = 30°
∴ tan 30° = \(\frac {PD}{AD}\)
या \(\frac{1}{\sqrt{3}}\) = \(\frac {3}{AD}\)
या AD = 3\(\sqrt{3}\) m
अब समकोण ΔPBD में ∠B = 45° है ।
tan 45° = \(\frac {PD}{DB}\)
या 1 = \(\frac {3}{DB}\)
या DB = 3m
अतः AB = AD + BD = (3\(\sqrt{3}\) + 3) m = 3 (\(\sqrt{3}\) + 1) m
इस प्रकार, नदी की चौड़ाई = 3 (\(\sqrt{3}\) + 1) m

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 10.
दो मीनारों के बीच की क्षैतिज दूरी 140 m है। दूसरी मीनार की चोटी से पहली मीनार की चोटी का उन्नयन कोण 30° है। यदि दूसरी मीनार की ऊँचाई 60m है, तो पहली मीनार की ऊँचाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 15
माना AB और CD दो मीनारें हैं ।
दूसरी मीनार की ऊँचाई (CD) = 60 m
और दोनों मीनारों के बीच की दूरी,
DB = 140 m
माना AE = h m
अब CE = DB = 140 m
EB = CD = 60 m
तो पहली मीनार की ऊँचाई (AB) = (60 + h) m
समकोण ΔAEC में,
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 16
अतः पहली मीनार की ऊँचाई = 60 + h
= 60 + 80.83 = 140.83 m

प्रश्न 11.
धरती पर एक मीनार ऊर्ध्वाधर खड़ी हैं। धरती के एक बिन्दु से, जो मीनार के पाद-बिन्दु से 15m दूर है, मीनार के शिखर का उन्नयन कोण 60° है। मीनार की ऊँचाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 17
माना मीनार AB का शिखर A तथा पाद- बिन्दु B है जिसकी ऊँचाई hm है। बिन्दु C मीनार के पाद-बिन्दु B से 15 m की दूरी पर है।
प्रश्नानुसार
AB = hm
BC = 15m
∠ACB = 60°
समकोण ΔABC में
\(\frac {AB }{BC}\) = tan 60°
⇒ \(\frac {h}{15}\) = \(\sqrt{3}\)
⇒ h = 15\(\sqrt{3}\)m
अतः मीनार की ऊँचाई (AB) = \(\sqrt{3}\)m.

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 12.
एक हवाई जहाज से जो कि 200m की ऊँचाई पर है, एक नदी के दोनों तटों पर आमने-सामने के दो बिंदुओं के अवनमन कोण क्रमशः 45° तथा 60° हैं। नदी की चौड़ाई ज्ञात कीजिए ।
हल :
माना हवाई जहाज बिंदु P पर स्थित है जिसकी भूमि के स्थित बिंदु M से ऊँचाई 200m है।
माना बिंदु A और B नदी के किनारों पर विपरीत दिशाओं में स्थित दो बिंदु हैं जिनके अवनमन कोण 60° व 45° हैं।
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 18
माना AM = x m
तथा BM = y m
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 19

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
sin θ° का मान होता है-
(A) शून्य
(B) \(\frac {1}{2}\)
(C) \(\frac{1}{\sqrt{2}}\)
(D) \(\frac{\sqrt{3}}{2}\)
हल :
(A) शून्य

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 2.
sin 45° का मान होता है-
(A) शून्य
(B) \(\frac {1}{2}\)
(C) \(\frac{1}{\sqrt{2}}\)
(D) \(\frac{\sqrt{3}}{2}\)
हल :
(C) \(\frac{1}{\sqrt{2}}\)

प्रश्न 3.
sin 90° का मान होता है-
(A) शून्य
(B) \(\frac {1}{2}\)
(C) \(\frac{\sqrt{3}}{2}\)
(D) 1
हल :
(D) 1

प्रश्न 4.
θ के किस मान के लिए cosθ = \(\frac {1}{2}\) होगा ?
(A) 30°
(B) 45°
(C) 60°
(D) 90°
हल :
(C) 60°

प्रश्न 5.
θ के किस मान के लिए tan θ और cot θ का मान बराबर होगा-
(A) 30°
(C) 60°
(B) 45°
(D) 90°
हल :
(B) 45°

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 6.
ΔABC में, ∠B समकोण है, AB = 12 cm और ∠A = 30° है आकृति अनुसार BC का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 20
(A) 4\(\sqrt{3}\)cm
(B) 8\(\sqrt{m}\) cm
(C) 2\(\sqrt{m}\) cm
(D) \(\sqrt{m}\) cm
हल :
(A) 4\(\sqrt{3}\) cm

प्रश्न 7.
प्रश्न 6 की त्रिभुज में AC का मान होगा-
(A) 4\(\sqrt{3}\) cm
(B) 2\(\sqrt{3}\) cm
(C) 8\(\sqrt{3}\) cm
(D) 3\(\sqrt{3}\) cm
हल :
(C) 8\(\sqrt{3}\) cm

प्रश्न 8.
समकोण ΔABC में ∠C = 90°, ∠A = 30° तथा AB = 10 cm हो तो BC का मान होगा-
(A) 10 cm
(B) 5\(\sqrt{3}\) cm
(C) 5\(\sqrt{2}\) cm
(D) 5 cm
हल :
(D) 5 cm

प्रश्न 9.
समकोण ΔABC में ∠C = 90°, ∠A = 30° तथा AB = 10 cm हो तो AC का मान होगा-
(A) 10 cm
(B) 5\(\sqrt{3}\) cm
(C) 5\(\sqrt{2}\) cm
(D) 5 cm
हल :
(B) 5\(\sqrt{3}\) cm

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 10.
एक मीनार भूमि पर ऊर्ध्वाधर खड़ी है। भूमि पर मीनार के आधार से 20m दूरी पर स्थित एक बिंदु से उसकी चोटी का उन्नयन कोण 60° है। मीनार की ऊँचाई होगी-
(A) 20\(\sqrt{3}\) m
(B) 20\(\sqrt{2}\) m
(C) \(\frac{20 \sqrt{3}}{3}\)
(D) \(\frac{20 \sqrt{2}}{2}\)
हल :
(A) 20\(\sqrt{3}\) m

प्रश्न 11.
एक सीढ़ी एक दीवार पर इस प्रकार टिकी है कि उसका ऊपरी सिरा दीवार के शिखर को छूता है। सीढ़ी का निचला सिरा दीवार से 2m की दूरी पर है। सीढ़ी भूमि के साथ 60° का कोण बनाती है। दीवार की ऊँचाई होगी-
(A) \(\frac{2 \sqrt{3}}{3}\)
(B) 2\(\sqrt{2}\) m
(C) 2\(\sqrt{3}\) m
(D) \(\sqrt{2}\) m
हल :
(C) 2\(\sqrt{3}\) m

प्रश्न 12.
भूमि पर स्थिर एक ऊर्ध्वाधर बाँस के ऊपरी सिरे से एक तनी हुई रस्सी बांधी गई है और रस्सी का दूसरा सिरा भूमि पर स्थिर किया गया है । सर्कस का एक कलाकार भूमि से रस्सी पर चढ़ रहा है। बांस की ऊँचाई 12 m है और रस्सी भूमि से 30° का कोण बनाती है । कलाकार द्वारा बाँस के ऊपरी सिरे पर पहुँचने में तय की गई दूरी होगी-
(A) 6m
(B) 12m
(C) 18m
(D) 24 m
हल :
(D) 24 m

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 13.
संलग्न आकृति में x का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 21
(A) \(\frac{20 \sqrt{3}}{3}\) m
(B) 20\(\sqrt{3}\) m
(C) \(\frac{10 \sqrt{3}}{3}\) m
(D) 10\(\sqrt{3}\) m
हल :
(A) \(\frac{20 \sqrt{3}}{3}\) m

प्रश्न 14.
संलग्न त्रिभुज में x का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 22
(A) \(\frac{1.5 \sqrt{3}}{3}\) m
(B) 1.5\(\sqrt{3}\) m
(C) 3\(\sqrt{3}\) m
(D) \(\frac{1.5 \sqrt{3}}{3}\) m
हल :
(B) 1.5\(\sqrt{3}\) m

प्रश्न 15.
संलग्न त्रिभुज ABC में AC का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 23
(A) \(\frac{10 \sqrt{2}}{3}\) m
(B) \(\frac{10 \sqrt{3}}{3}\) m
(C) 10\(\sqrt{2}\) m
(D) 5\(\sqrt{2}\) m
हल :
(C) 10\(\sqrt{2}\) m

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 16.
संलग्न त्रिभुज AOB में h का मान होगा-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 24
(A) \(\frac{215 \sqrt{2}}{2}\) m
(B) \(\frac{215 \sqrt{2}}{3}\) m
(C) \(\frac{215 \sqrt{3}}{3}\) m
(D) \(\frac{215 \sqrt{3}}{2}\) m
हल :
(D) \(\frac{215 \sqrt{3}}{2}\) m

प्रश्न 17.
सूर्य का उन्नयन कोण क्या होगा जब किसी ऊर्ध्वाधर खंभे की छाया की लंबाई खंभे की ऊँचाई के बराबर हो —
(A) 45°
(B) 30°
(C) 60°
(D) 90°
हल :
(A) 45°

प्रश्न 18.
किसी मीनार के आधार से a और b की दूरियों पर एक ही रेखा में स्थित दो बिंदुओं क्रमशः P और Q से देखने पर, मीनार के ऊपरी सिरे के उन्नयन कोण पूरक पाए जाते हैं। मीनार की ऊँचाई होगी-
(A) ab
(B) \(\sqrt{ab}\)
(C) \(\frac {a}{b}\)
(D) \(\sqrt{\frac{a}{b}}\)
हल :
(B) \(\sqrt{ab}\)

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 19.
एक छड़ तथा उसकी छाया के बीच 1 : \(\sqrt{3}\) का अनुपात है, सूर्य का उन्नयन कोण होगा-
(A) 30°
(B) 45°
(C) 60°
(D) 90°
हल :
(A) 30°

प्रश्न 20.
संलग्न त्रिभुज ABC में AB की लंबाई होगी-
HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग - 25
(A) 6 cm
(B) 6\(\sqrt{3}\) cm
(C) 3 cm
(D) 3\(\sqrt{3}\) cm
हल :
(C) 3 cm

प्रश्न 21.
एक मीनार 100\(\sqrt{3}\)m ऊँची है। इसके आधार से 100m दूर स्थित किसी बिंदु से इसके शिखर का उन्नयन कोण होगा-
(A) 30°
(B) 45°
(C) 60°
(D) 90°
हल :
(C) 60°

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 22.
एक पतंग की डोर 100 m लंबी है तथा यह आसमान में उड़ते समय क्षैतिज तल से 60° का कोण बनाती है। यह मानते हुए कि पतंग की डोर बिल्कुल सीधी तनी हुई है। पतंग की क्षैतिज से ऊँचाई होगी-
(A) 50\(\sqrt{3}\) m
(B) 100\(\sqrt{3}\) m
(C) \(\frac{100 \sqrt{3}}{3}\) m
(D) \(\frac{50 \sqrt{3}}{3}\) m
हल :
(A) 50\(\sqrt{3}\) m

प्रश्न 23.
एक दीवार के सहारे खड़ी एक सीढ़ी का उन्नयन कोण दीवार से 9.5m दूर जमीन पर स्थित एक बिंदु से 60° है। सीढ़ी की लंबाई होगी-
(A) 9.5m
(B) 19m
(C) 9.5\(\sqrt{3}\) m
(D) 9.5\(\sqrt{2}\) m
हल :
(B) 19m

प्रश्न 24.
बिजली का एक खंभा 10m ऊँचा है। खंभे को सीधा लंबवत् रखने के लिए स्टील के तार का एक सिरा खंभे की चोटी से बँधा है और दूसरा, भूमि पर स्थिर किया गया है । यदि स्टील का तार खंभे के आधार बिंदु से होकर जाने वाले क्षैतिज के साथ 45° का कोण बनाए, तो बिजली के खंभे के आधार से कितनी दूरी पर भूमि पर स्थिर बिंदु है?
(A) 10\(\sqrt{3}\) m
(B) 20\(\sqrt{3}\) m
(C) 10m
(D) 20m
हल :
(C) 10m

प्रश्न 25.
एक मीनार जमीन पर सीधी खड़ी है। मीनार के आधार से 50m की दूरी पर जमीन पर स्थित एक बिंदु से मीनार की चोटी का उन्नयन कोण 60° है। मीनार की ऊँचाई होगी-
(A) \(\frac{50}{\sqrt{3}}\) m
(B) 100 m
(C) 100\(\sqrt{3}\) m
(D) 50\(\sqrt{3}\) m
हल :
(D) 50\(\sqrt{3}\) m

HBSE 10th Class Maths Important Questions Chapter 9 त्रिकोणमिति का अनुप्रयोग

प्रश्न 26.
दो खंभों जिनकी ऊँचाई 25 m और 19m हैं, के शीर्ष एक तार से जुड़े हैं । यदि तार क्षैतिज के साथ 30° का कोण बनाती हो तो तार की लंबाई होगी-
(A) 6m
(B) 12 m
(C) 8m
(D) 10m
हल :
(B) 12 m

प्रश्न 27.
धरती पर एक मीनार ऊर्ध्वाधर खड़ी है। धरती के एक बिंदु से जो मीनार के पाद- बिंदु से 15m दूर है, मीनार के शिखर का उन्नयन कोण 60° हो तो मीनार की ऊँचाई होगी-
(A) 15 \(\sqrt{3}\) m
(B) 15m
(C) \(\frac{15}{\sqrt{3}}\)
(D) 30 \(\sqrt{3}\) m
हल :
(A) 15 \(\sqrt{3}\) m

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