Class 12

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 7 तृतीयक और चतर्थ क्रियाकलाप

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 7 तृतीयक और चतर्थ क्रियाकलाप Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 7 तृतीयक और चतर्थ क्रियाकलाप

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्नलिखित में से कौन-सा एक तृतीयक क्रियाकलाप है?
(A) खेती
(B) बुनाई
(C) व्यापार
(D) आखेट
उत्तर:
(C) व्यापार

2. निम्नलिखित क्रियाकलापों में से कौन-सा एक द्वितीयक सेक्टर का क्रियाकलाप नहीं है?
(A) इस्पात प्रगलन
(B) वस्त्र निर्माण
(C) मछली पकड़ना
(D) टोकरी बुनना
उत्तर:
(C) मछली पकड़ना

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 7 तृतीयक और चतर्थ क्रियाकलाप

3. निम्नलिखित में से कौन-सा एक सेक्टर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में सर्वाधिक रोज़गार प्रदान करता है?
(A) प्राथमिक
(B) द्वितीयक
(C) पर्यटन
(D) सेवा
उत्तर:
(D) सेवा

4. वे काम जिनमें उच्च परिमाण और स्तर वाले अन्वेषण सम्मिलित होते हैं, कहलाते हैं-
(A) द्वितीयक क्रियाकलाप
(B) पंचम क्रियाकलाप
(C) चतुर्थक क्रियाकलाप
(D) प्राथमिक क्रियाकलाप
उत्तर:
(B) पंचम क्रियाकलाप

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 7 तृतीयक और चतर्थ क्रियाकलाप

5. निम्नलिखित में से कौन-सा क्रियाकलाप चतुर्थक सेक्टर से संबंधित है?
(A) संगणक विनिर्माण
(B) विश्वविद्यालयी अध्यापन
(C) कागज़ और कच्ची लुगदी निर्माण
(D) पुस्तकों का मुद्रण
उत्तर:
(B) विश्वविद्यालयी अध्यापन

6. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक सत्य नहीं है?
(A) बाह्यस्रोतन दक्षता को बढ़ाता है और लागतों को घटाता है।
(B) कभी-कभार अभियांत्रिकी और विनिर्माण कार्यों की भी बाह्यस्रोतन की जा सकती है।
(C) बी०पी०ओज़ के पास के०पी०ओज़ की तुलना में बेहतर व्यावसायिक अवसर होते हैं।
(D) कामों के बाह्यस्रोतन करने वाले देशों में काम की तलाश करने वालों में असंतोष पाया जाता है।
उत्तर:
(D) कामों के बाह्यस्रोतन करने वाले देशों में काम की तलाश करने वालों में असंतोष पाया जाता है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
फुटकर व्यापार सेवा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ये वे व्यापारिक क्रियाकलाप हैं जो उपभोक्ताओं की वस्तुओं के प्रत्यक्ष विक्रय से संबंधित हैं। अधिकांश फुटकर व्यापार केवल विक्रय के लिए तय दुकानों और भंडारों में संपन्न होते हैं। उदाहरणतया फेरी, रेहड़ी, ट्रक, द्वार से द्वार डाक आदेश, दूरभाष, इंटरनेट, फुटकर बिक्री आदि।

प्रश्न 2.
चतुर्थ सेवाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चतुर्थ सेवाएँ अनुसंधान एवं विकास पर केंद्रित होती हैं और विशिष्टीकृत ज्ञान प्रौद्योगिक कुशलता और प्रशासकीय सामर्थ्य से संबद्ध सेवाओं के उन्नत नमूने के रूप में देखी जाती हैं। उच्च कोटि के बौद्धिक व्यवसायों को चतुर्थ सेवाओं के अंतर्गत रखा जाता है। अध्यापन, चिकित्सा, वकालत, अनुसंधान, सूचना आधारित ज्ञान आदि चतुर्थ सेवाओं के उदाहरण हैं।

प्रश्न 3.
विश्व में चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्रों में तेजी से उभरते हुए देशों के नाम लिखिए।
उत्तर:
विश्व में चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्रों में तेजी से उभरते हुए देशों में भारत तेजी से उभर रहा है। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में उभरते हुए देश हैं थाइलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस आदि।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 7 तृतीयक और चतर्थ क्रियाकलाप

प्रश्न 4.
अंकीय विभाजन क्या है?
उत्तर:
सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित विकास से मिलने वाले अवसरों का वितरण पूरे ग्लोब पर असमान रूप से वितरित है। देशों में विस्तृत आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। विकसित देश, सामान्य रूप से इस दिशा में आगे बढ़ गए हैं जबकि विकासशील देश पिछड़ गए हैं। यही अंकीय विभाजन कहलाता है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आधुनिक आर्थिक विकास में सेवा सेक्टर की सार्थकता और वृद्धि की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक युग में आर्थिक विकास के लिए सेवाओं का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। कुछ वर्ष पूर्व सेवाओं की अपेक्षा वस्तुओं के उत्पादन पर अधिक बल दिया जाता था लेकिन विकसित अर्थव्यवस्था में सेवाओं पर आधारित विकास में तेजी आई है। आधुनिक आर्थिक विकास में सेवा सेक्टर की सार्थकता के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं

  • सेवा सेक्टर में फुटकर बिक्री और परिवहन के साधन सम्मिलित हैं जो विक्रेताओं एवं उपभोक्ताओं को जोड़ते हैं।
  • सेवा सेक्टर कच्चे माल को कारखाने तक और निर्मित माल को कारखाने से बाजार तक ले जाने में सहायता करते हैं।
  • सेवा सेक्टर वाणिज्यिक सेवा कम्पनियों की उत्पादकता एवं क्षमता में वृद्धि लाते हैं।

आधुनिक आर्थिक विकास में सेवा सेक्टर की वृद्धि – विकसित देशों के सेवा क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। विकासशील देशों में भी विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में सेवा क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है लेकिन इन देशों में बहुत-से लोग असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जिनका लेखा-जोखा अच्छी तरह से नहीं रखा जाता।

अधिकतर देशों में विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। पहले प्राथमिक क्षेत्र का वर्चस्व होता है, उसके बाद द्वितीयक क्षेत्र का महत्त्व बढ़ने लगता है। अंतिम अवस्थाओं में तृतीयक और चतुर्थक क्रियाकलाप महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं। बहुत-से देशों में विनिर्माण उद्योगों में रोज़गार के अवसर घटते जा रहे हैं तथा सकल घरेलू उत्पाद में उनका अनुपात कम होता जा रहा है। आधुनिक आर्थिक विकास में सेवाओं का महत्त्व इतना बढ़ गया है कि उन्हें उत्पादक कार्यों की श्रेणी में रखा जाने लगा है। सेवाएँ अब निर्यातक बन गई हैं। कुछ देश; जैसे स्विट्ज़रलैंड तथा यूनाइटिड किंगडम सेवा क्षेत्र में उद्योगों से आगे निकल गए हैं।

प्रश्न 2.
परिवहन और संचार सेवाओं की सार्थकता को विस्तारपूर्वक स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परिवहन सेवाएँ परिवहन एक ऐसी सेवा है जिससे व्यक्तियों, विनिर्मित माल तथा संपत्ति को भौतिक रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है। मनुष्य के एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने, उसकी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यह एक संगठित उद्योग है। आधुनिक समाज वस्तुओं के उत्पादन, वितरण और उपभोग में सहायता देने के लिए तीव्र और सक्षम परिवहन व्यवस्था चाहते हैं। परिवहन दूरी को किलोमीटर दूरी, समय दूरी और लागत दूरी के रूप में मापा जा सकता है। परिवहन के साधन के चयन में समय अथवा लागत के संदर्भ में एक निर्णायक कारक है। परिवहन की माँग जनसंख्या के आकार से प्रभावित होती है। जनसंख्या का आकार जितना बड़ा होगा, परिवहन की माँग उतनी ही अधिक होगी।

संचार सेवाएँ-संचार सेवाओं में शब्दों, संदेशों, तथ्यों तथा विचारों को भेजना शामिल रहता है। लेखन के आविष्कार ने संदेशों संचार को परिवहन के साधनों पर निर्भर करने में सहायता की। जहाँ परिवहन जाल तंत्र सक्षम होता है वहाँ संचार का फैलाव सरल होता है। मोबाइल फोन और उपग्रहों जैसे कुछ विकासों ने संचार को परिवहन से मुक्त कर दिया है। उदाहरणतया दूरसंचार का प्रयोग विद्युतीय प्रौद्योगिकी के विकास से जुड़ा है। संदेशों के भेजे जाने की गति के कारण संचार जगत में क्रांति आ गई है। रेडियो और दूरदर्शन भी जनसंचार माध्यम के रूप में विकसित हैं।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 7 तृतीयक और चतर्थ क्रियाकलाप

तृतीयक और चतर्थ क्रियाकलाप HBSE 12th Class Geography Notes

→ तृतीयक क्रियाकलाप (Tertiary Activities) : ये बुद्धि तथा कुशलता से जुड़ी सेवाएँ हैं जिनका उत्पादन अमूर्त होता है।

→ चतुर्थक क्रियाकलाप (Quarternary Activities) : उच्च बौद्धिक व्यवसाय जो चिंतन तथा शोध के लिए विचार देते हैं। इनका उत्पादन भी अमूर्त होता है।

→ सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology) : सूचनाओं, ज्ञान तथा आँकड़ों के एकत्रीकरण, संग्रहण, संपादन तथा प्रसारण की ऐसी तकनीक जिसमें कंप्यूटर, सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिकी, दूरसंचार, प्रसारण तथा आप्ट्रो इलेक्ट्रॉनिक्स इत्यादि विज्ञान शामिल हैं।

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HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. आकार के आधार पर उद्योग कितने प्रकार के होते हैं?
(A) 2
(B) 3
(C) 4
(D) 5
उत्तर:
(B) 3

2. निम्नलिखित में कौन-सा लौह धातु उद्योग है?
(A) तांबे पर आधारित उद्योग
(B) पेट्रोकेमिकल्स इद्योग
(C) ऐलुमिनियम पर आधारित उद्योग
(D) कृषि औजार उद्योग
उत्तर:
(D) कृषि औजार उद्योग

3. निम्नलिखित में आधारभूत उद्योग कौन-सा है?
(A) वस्त्र निर्माण उद्योग
(B) लौह-इस्पात उद्योग
(C) औषधि निर्माण उद्योग
(D) सीमेंट उद्योग
उत्तर:
(B) लौह-इस्पात उद्योग

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

4. निम्नलिखित में कृषि आधारित उद्योग कौन-सा है?
(A) कागज उद्योग
(B) फर्नीचर उद्योग
(C) चीनी उद्योग
(D) औषधि निर्माण उद्योग
उत्तर:
(C) चीनी उद्योग

5. पेट्रो-रसायन उद्योग में कौन-सा देश अग्रणी है?
(A) रूस
(B) सऊदी अरब
(C) भारत
(D) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर:
(D) संयुक्त राज्य अमेरिका

6. निम्नलिखित में कौन-सा उद्योगों की अवस्थिति में अभौगोलिक कारक है?
(A) उच्चावच
(B) जलवायु
(C) कच्चा माल
(D) सरकारी नीतियाँ
उत्तर:
(D) सरकारी नीतियाँ

7. ऊर्जा स्रोत के निकट स्थापित होने वाला उद्योग कौन-सा है?
(A) चीनी उद्योग
(B) कागज उद्योग
(C) ऐलुमिनियम उद्योग
(D) चाय उद्योग
उत्तर:
(C) ऐलुमिनियम उद्योग

8. निम्नलिखित में से कौन-सा उपभोक्ता उद्योग के अंतर्गत आता है?
(A) लौह-इस्पात उद्योग
(B) टेलीविजन उद्योग
(C) चीनी उद्योग ।
(D) कागज उद्योग
उत्तर:
(B) टेलीविजन उद्योग

9. हल्के उद्योग का सर्वोत्तम उदाहरण है
(A) कागज उद्योग
(B) चाय उद्योग
(C) इलैक्ट्रॉनिक उद्योग
(D) प्लास्टिक उद्योग
उत्तर:
(C) इलैक्ट्रॉनिक उद्योग

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

10. सिलिकन घाटी कहाँ स्थित है?
(A) केरल
(B) कैलिफोर्निया
(C) टोकियो
(D) मास्को
उत्तर:
(B) कैलिफोर्निया

11. बड़े पैमाने के उत्पादन तथा श्रम के अत्यधिक विभाजन के मॉडल को कहा जाता है
(A) पोस्ट फोर्डिज्म
(B) फोर्डिज्म
(C) लोचयुक्त उत्पादन
(D) लोचयुक्त विशिष्टिकरण
उत्तर:
(B) फोर्डिज्म

12. निम्नलिखित में से कौन-सा लौह अयस्क क्षेत्र नहीं है?
(A) अमेरिका में महान् झीलों का क्षेत्र
(B) रूहर
(C) छोटा नागपुर
(D) सिलिकन घाटी
उत्तर:
(D) सिलिकन घाटी

13. सार्वजनिक उद्योग वह होता है, जिसका
(A) प्रबंधन राजकीय सरकार के हाथ में होता है
(B) मालिक एक व्यक्ति होता है
(C) स्वामित्व सहकारी संस्थाओं के हाथ में होता है
(D) प्रबंध कार्पोरेशन करती है
उत्तर:
(A) प्रबंधन राजकीय सरकार के हाथ में होता है

14. सर्वाधिक लौह-अयस्क के भंडार किस देश में हैं?
(A) ब्राजील
(B) भारत
(C) चीन
(D) फ्रांस
उत्तर:
(C) चीन

15. विश्व में तांबे का सबसे बड़ा उत्पादक देश कौन-सा है?
(A) इंडोनेशिया
(B) भारत
(C) मैक्सिको
(D) चिली
उत्तर:
(D) चिली

16. ऐलुमिनियम किस अयस्क से प्राप्त किया जाता है?
(A) हैमेटाइट
(B) बॉक्साइट
(C) मैग्नेटाइट
(D) लिमोनाइट
उत्तर:
(B) बॉक्साइट

17. निम्नलिखित में कौन-सा अधात्विक खनिज है?
(A) चांदी
(B) सोना
(C) तांबा
(D) गंधक
उत्तर:
(D) गंधक

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

18. निम्नलिखित में कौन-सा धात्विक खनिज है?
(A) चांदी
(B) कोयला
(C) नमक
(D) गंधक
उत्तर:
(A) चांदी

19. निम्नलिखित में से कौन द्वितीयक क्रियाकलाप से संबंधित नहीं है?
(A) विनिर्माण
(B) संग्रहण
(C) प्रसंस्करण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) संग्रहण

20. …………….. का अभिप्राय किसी भी वस्तु के उत्पादन से है-
(A) बाजार
(B) आखेट
(C) विनिर्माण
(D) संग्रहण
उत्तर:
(C) विनिर्माण

21. कौन-से उद्योग सरकार के नियंत्रण में होते हैं?
(A) कुटीर उद्योग
(B) सार्वजनिक उद्योग
(C) निजी उद्योग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) सार्वजनिक उद्योग

22. किन क्रियाओं द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का मूल्य बढ़ जाता है?
(A) प्राथमिक क्रियाओं द्वारा
(B) द्वितीयक क्रियाओं द्वारा
(C) तृतीयक क्रियाओं द्वारा
(D) चतुर्थक क्रियाओं द्वारा
उत्तर:
(B) द्वितीयक क्रियाओं द्वारा

23. उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाला कारक है-
(A) बाजार
(B) श्रम आपूर्ति
(C) कच्चा माल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. वन आधारित उद्योग का उदाहरण है-
(A) फर्नीचर उद्योग
(B) कागज उद्योग
(C) लाख उद्योग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

25. किन उद्योगों पर व्यक्तिगत निवेशकों का स्वामित्व होता है?
(A) सार्वजनिक उद्योग
(B) सरकारी उद्योग
(C) निजी उद्योग
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) निजी उद्योग

26. कृषि आधारित उद्योग का उदाहरण है-
(A) चीनी उद्योग
(B) वस्त्र उद्योग
(C) इस्पात उद्योग
(D) (A) व (B) दोनों
उत्तर:
(D) (A) व (B) दोनों

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

27. हथकरघा क्षेत्र की विशेषता है-
(A) अधिक श्रमिकों की आवश्यकता
(B) कम पूँजी निवेश की आवश्यकता
(C) अर्द्धकुशल श्रमिकों को रोजगार
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

28. सहर औद्योगिक क्षेत्र का संबंध किस देश से है?
(A) जर्मनी से
(B) इंग्लैण्ड से
(C) फ्रांस से
(D) चीन से
उत्तर:
(A) जर्मनी से

29. विनिर्माण की सबसे छोटी इकाई कौन-सा उद्योग है?
(A) कुटीर उद्योग
(B) लघु उद्योग
(C) सार्वजनिक उद्योग
(D) निजी उद्योग
उत्तर:
(A) कुटीर उद्योग

30. सिलिकॉन घाटी किस उद्योग के लिए प्रसिद्ध है?
(A) इस्पात उद्योग
(B) लोहा उद्योग
(C) सॉफ्टवेयर
(D) रसायन उद्योग
उत्तर:
(C) सॉफ्टवेयर

B. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में दीजिए

प्रश्न 1.
रूहर औद्योगिक प्रदेश किस देश में है?
उत्तर:
रूहर औद्योगिक प्रदेश जर्मनी में है।

प्रश्न 2.
पेट्रो-रसायन उद्योग में कौन-सा देश अग्रणी है?
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 3.
बड़े पैमाने के उत्पादन तथा श्रम के अत्यधिक विभाजन के मॉडल को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
फोर्डिज्म।

प्रश्न 4.
सिलिकन घाटी कहाँ स्थित है?
उत्तर:
अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में।

प्रश्न 5.
महान् झीलों का लोहा-इस्पात क्षेत्र कहाँ स्थित है?
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका में।

प्रश्न 6.
सूती वस्त्र उद्योग किसका उदाहरण है?
उत्तर:
विनिर्माण उद्योग का।

प्रश्न 7.
कुशल श्रमिक प्रधान उद्योगों के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. अलीगढ़ का ताला उद्योग
  2. मेरठ का कैंची उद्योग।

प्रश्न 8.
किस उद्योग को आधारभूत उद्योग कहते है?
उत्तर:
लौह-इस्पात को।

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प्रश्न 9.
कौन-सी अर्थव्यवस्था में उत्पादन का स्वामित्व व्यक्तिगत होता है?
उत्तर:
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में।

प्रश्न 10.
जापान का कौन-सा औद्योगिक प्रदेश घना बसा है?
उत्तर:
जापान का टोक्यो प्रदेश औद्योगिक दृष्टिकोण से घना बसा है। यह जापान के होन्शू द्वीप पर बसा हुआ है।

प्रश्न 11.
किन गतिविधियों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों या प्राथमिक उत्पादों का मूल्य बढ़ जाता है?
उत्तर:
द्वितीयक गतिविधियों द्वारा।

प्रश्न 12.
सभी आर्थिक गतिविधियों का क्या कार्य-क्षेत्र है?
उत्तर:
संसाधनों की प्राप्ति और उनके उपभोग का अध्ययन करना।

प्रश्न 13.
जहाँ कम जनसंख्या निवास करती है, उसे क्या कहते हैं?
उत्तर:
दूरस्थ क्षेत्र।

प्रश्न 14.
कुटीर या घरेलू उद्योग का कोई एक उदाहरण दें।
उत्तर:
कलाकृति।

प्रश्न 15.
कृषि आधारित उद्योगों के कोई दो उदाहरण या उत्पाद दें।
उत्तर:

  1. चीनी
  2. वनस्पति तेल।

प्रश्न 16.
खनिज आधारित उद्योगों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. ताँबा
  2. आभूषण।

प्रश्न 17.
रसायन आधारित उद्योगों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. प्लास्टिक
  2. पेट्रो रसायन।

प्रश्न 18.
पशु आधारित उद्योगों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. ऊन
  2. चमड़ा।

प्रश्न 19.
उपभोक्ता सामान के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. बिस्कुट
  2. कपड़ा।

प्रश्न 20.
सीमेंट और मिट्टी के बर्तन आदि उद्योगों में किन खनिजों का प्रयोग होता है?
उत्तर:
अधात्विक खनिजों का।।

प्रश्न 21.
अफ्रीका का एक खनिज क्षेत्र बताइए जहाँ घनी जनसंख्या है।
उत्तर:
नाइजीरिया।

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प्रश्न 22.
जर्मनी के कोई दो औद्योगिक प्रदेशों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. रूहर औद्योगिक प्रदेश
  2. बेवरिया औद्योगिक प्रदेश।

प्रश्न 23.
रूस के कोई दो औद्योगिक प्रदेशों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. मॉस्को औद्योगिक प्रदेश
  2. यूराल औद्योगिक प्रदेश।

प्रश्न 24.
ब्रिटेन के कोई दो औद्योगिक प्रदेशों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. दक्षिणी वेल्स औद्योगिक प्रदेश
  2. मिडलैंड औद्योगिक प्रदेश।

प्रश्न 25.
प्राथमिक गतिविधियों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. आखेट
  2. पशुचारण।।

प्रश्न 26.
द्वितीयक गतिविधियों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. कपास द्वारा सूती वस्त्र बनाना
  2. लौह अयस्क से मशीनों का निर्माण।

प्रश्न 27.
भोजन प्रसंस्करण के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. डिब्बा बंद भोजन
  2. क्रीम उत्पादन।

प्रश्न 28.
धातु उद्योग कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
दो प्रकार के-

  1. लौह धातु उद्योग
  2. अलौह धातु उद्योग।

प्रश्न 29.
अधातु उद्योग के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. कोयला
  2. गंधक।

प्रश्न 30.
धातु उद्योग के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. लोहा
  2. इस्पात।

प्रश्न 31.
‘विनिर्माण’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
हस्त एवं मशीनों से बनाना।

प्रश्न 32.
किन उद्योगों को ‘शिल्प उद्योग’ भी कहा जाता है?
उत्तर:
कुटीर उद्योगों को।

प्रश्न 33.
औद्योगिक क्रांति के समय विश्व की जनसंख्या कितनी थी?
उत्तर:
50 करोड़।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्माण उद्योग किसे कहते हैं?
उत्तर:
कच्चे और अर्ध-निर्मित माल को हाथ अथवा मशीनों की सहायता से उपयोगी निर्मित माल में बदलने वाले उद्योग निर्माण उद्योग कहलाते हैं।

प्रश्न 2.
उद्योगों के वर्गीकरण के आधार क्या हैं?
उत्तर:
उद्योगों को अनेक आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है; जैसे-

  1. आकार के आधार पर
  2. कार्य के आकार एवं उत्पादों के स्वरूप के आधार पर
  3. कच्चे माल की प्रवृत्ति के आधार पर
  4. निर्मित माल की प्रकृति के आधार पर
  5. स्वामित्व एवं प्रबंधन के आधार पर।

प्रश्न 3.
आधारभूत एवं उपभोक्ता उद्योगों के दो-दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
लौह-इस्पात निर्माण तथा विद्युत उत्पादन आधारभूत उद्योगों के उदाहरण हैं जबकि कागज़ निर्माण तथा टेलीविज़न निर्माण उपभोक्ता उद्योगों के उदाहरण हैं।

प्रश्न 4.
लौह-इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
लौह-इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग इसलिए कहा जाता है क्योंकि अन्य सभी उद्योगों की मशीनें व परिवहन के साधन इसी से बनाए गए इस्पात से बनते हैं।

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प्रश्न 5.
संयुक्त राज्य अमेरिका में पेट्रो-रसायन संकल अधिकतर तटों पर क्यों स्थित होते हैं?
उत्तर:
आयातित खनिज तेल पर आधारित होने के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका के पेट्रो-रसायन उद्योग तटों पर स्थित हैं। अगर ये आंतरिक भागों में होते तो परिवहन की लागत तो बढ़ती ही साथ ही सामान और समय दोनों का अपव्यय भी होता।

प्रश्न 6.
प्रौद्योगिक-ध्रुव किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रौद्योगिक-ध्रुव एक सीमांकित क्षेत्र के भीतर नई प्रौद्योगिकी व उद्योगों से संबंधित उत्पादन के लिए नियोजित विकास है। इसके अंतर्गत विज्ञान व प्रौद्योगिकी पार्क, विज्ञान नगर तथा अन्य उच्च तकनीकी औद्योगिक संकुल शामिल किए जाते हैं।

प्रश्न 7.
उपभोक्ता उद्योग क्या है?
उत्तर:
जिन उद्योगों में वस्तुओं का निर्माण सीधे उपभोग या उपभोक्ता के लिए किया जाता है; जैसे बेकरी उद्योग जिसमें निर्मित ब्रैड तथा बिस्कुट सीधे उपयोग के काम आ

प्रश्न 8.
कुटीर उद्योग किसे कहते हैं? उदाहरण दें।
उत्तर:
कुटीर उद्योग वस्तुओं के निर्माण का प्रारंभिक रूप है जो बहुत प्राचीन है। इसमें दक्षता के आधार पर वस्तुओं का निर्माण होता है। ये उद्योग मानवीय श्रम पर आधारित होते हैं। मिट्टी के बर्तन बनाना, टोकरियाँ बनाना, चमड़े के जूते बनाना आदि इस उद्योग के उदाहरण हैं।

प्रश्न 9.
लघु उद्योग किसे कहते हैं? उदाहरण दें।
उत्तर:
लघु उद्योगों में उत्पादकों का निर्माण करने के लिए छोटी-छोटी मशीनों का प्रयोग किया जाता है अर्थात् इसमें मानवीय श्रम के साथ-साथ छोटी मशीनों का भी प्रयोग किया जाता है। कागज बनाना, कपड़े बनाना, फर्नीचर बनाना आदि इस उद्योग के उदाहरण हैं।

प्रश्न 10.
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिन उद्योगों का प्रबंध एवं स्वामित्व केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार के अधीन होता है, उन्हें सार्वजनिक उद्योग कहते हैं; जैसे भारत में रेल उद्योग।

प्रश्न 11.
निजी उद्योग किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिन उद्योगों का स्वामित्व एवं प्रबंधन व्यक्ति या व्यक्तियों के हाथ में होता है, उन्हें निजी उद्योग कहते हैं; जैसे जमशेदपुर का लौह-इस्पात उद्योग।

प्रश्न 12.
भार हासमान पदार्थ क्या है?
उत्तर:
जिस कच्चे पदार्थ का भार निर्माण की प्रक्रिया में कम हो, उसे भार ह्रासमान पदार्थ कहते हैं।

प्रश्न 13.
यूरोप के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  1. ब्रिटेन के औद्योगिक प्रदेश
  2. फ्रांस के औद्योगिक प्रदेश
  3. जर्मनी के औद्योगिक प्रदेश
  4. नार्वे के औद्योगिक प्रदेश।

प्रश्न 14.
संयुक्त राज्य अमेरिका के कोई चार लोहा-इस्पात केन्द्रों/क्षेत्रों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  1. शिकागो गैरी क्षेत्र
  2. पिट्सबर्ग-यंग्सटाउन क्षेत्र
  3. ईरी झील तटीय क्षेत्र
  4. मध्य अटलांटिक तटीय क्षेत्र।

प्रश्न 15.
विनिर्माण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, “विनिर्माण जैविक अथवा अजैविक पदार्थों का एक नए उत्पाद के रूप में यांत्रिक एवं रासायनिक परिवर्तन है। चाहे यह कार्य स्वचालित मशीन द्वारा सम्पन्न होता है अथवा हाथ द्वारा, चाहे यह कार्य कारखाने में किया जाता है अथवा कामगारों के घर में तथा उत्पाद चाहे थोक में बेचे जाएँ अथवा फुटकर में।”

प्रश्न 16.
द्वितीयक क्रियाओं का क्या महत्त्व है? अथवा द्वितीयक गतिविधियाँ क्यों महत्त्वपूर्ण होती हैं?
उत्तर:
द्वितीयक क्रियाओं या गतिविधियों का महत्त्व इसलिए है क्योंकि इन क्रियाओं द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का मूल्य बढ़ जाता है और ये अधिक मूल्यवान एवं उपयोगी हो जाती हैं।

प्रश्न 17.
धातु उद्योग से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जिन उद्योगों में विभिन्न प्रकार की धातुओं को कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाता है, तो उन्हें धातु उद्योग कहते हैं।

प्रश्न 18.
भोजन प्रसंस्करण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
भोजन प्रसंस्करण उद्योग वर्तमान में तेजी से बढ़ रहा है। इसमें डिब्बाबन्द भोजन, क्रीम उत्पादन, फल प्रसंस्करण एवं मिठाइयाँ सम्मिलित की जाती हैं। भोजन को सुरक्षित रखने की अनेक विधियाँ प्राचीन समय से अपनाई जा रही हैं; जैसे अनाज को सुखाकर रखना, आचार बनाना आदि। औद्योगिक क्रांति के बाद ये विधियाँ कम ही अपनाई जा रही हैं, क्योंकि इनमें अधिक समय लगता है। पारम्परिक खाद्य संरक्षण की विधियों का स्थान अब मशीनों ने ले लिया है। इस प्रक्रिया में भोजन प्रसंस्करण का बहुत अधिक योगदान है।

प्रश्न 19.
औद्योगिक प्रदेश या औद्योगिक संकुल किसे कहते हैं?
उत्तर:
विश्व में कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिल जाती हैं और वहाँ कई उद्योग स्थापित हो जाते हैं। धीरे-धीरे वहाँ उद्योगों का जमघट या पुंज बन जाता है, इसे ही औद्योगिक प्रदेश या संकुल कहते हैं।

प्रश्न 20.
कुटीर उद्योगों की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  1. इन उद्योगों का व्यापारिक महत्त्व अधिक नहीं होता।
  2. ये विनिर्माण की सबसे छोटी इकाई होते हैं।

प्रश्न 21.
लघु उद्योगों की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  1. इन उद्योगों में स्थानीय कच्चे माल का उपयोग होता है।
  2. इन उद्योगों से स्थानीय लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि होती है।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

प्रश्न 22.
कुटीर उद्योग एवं लघु उद्योग में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कुटीर उद्योग एवं लघु उद्योग में निम्नलिखित अंतर हैं-

कुटीर उद्योगलघु उद्योग
1. कुटीर उद्योगों में स्थानीय कच्चे माल का प्रयोग किया जाता है।1. लघु उद्योगों में स्थानीय कच्चे माल के साथ-साथ बाहर से भी कच्चा माल मँंगवाया जाता है।
2. अधिकांश तैयार उत्पाद घर में ही खप जाते हैं।2. समस्त तैयार उत्पाद बाजारों में बेचे जाते हैं।
3. इन उद्योगों में दस्तकार परिवार के सदस्य ही होते हैं।3. इन उद्योगों में श्रमिकों एवं मशीनों द्वारा कार्य किया जाता है।

प्रश्न 23.
आधुनिक समय में बड़े पैमाने पर होने वाले विनिर्माण की कोई चार विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  1. कौशल या उत्पादन की विधियों का विशिष्टीकरण।
  2. मशीनीकरण या यंत्रीकरण।
  3. प्रौद्योगिक नवाचार।
  4. संगठनात्मक ढाँचा एवं स्तरीकरण।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारी उद्योग तथा हल्के उद्योग में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भारी उद्योग तथा हल्के उद्योग में निम्नलिखित अंतर हैं-

भारी उद्योगहल्के उद्योग
1. ये उद्योग प्राय: खनिज संसाधनों पर आधारित होते हैं।1. ये उद्योग खनिज संसाधनों तथा कृषि पर आधारित होते हैं।
2. इनमें बड़े पैमाने पर मशीनें तथा यंत्र बनाए जाते हैं।2. इनमें प्राय: दैनिक प्रयोग की वस्तुओं का निर्माण होता है।
3. इनमें अधिक पूँजी की जरूरत होती है।3. इनमें कम पूँजी की जरूरत होती है।
4. ये उद्योग प्रायः विकसित देशों में स्थापित किए जाते हैं।4. ये उद्योग विकासशील देशों में स्थापित होते हैं।

प्रश्न 2.
मूलभूत उद्योग एवं उपभोग वस्तु विनिर्माण उद्योग में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
मूलभूत उद्योग एवं उपभोग वस्तु विनिर्माण उद्योग में निम्नलिखित अंतर हैं-

मूलभूत उद्योगउपभोग वस्तु विनिर्माण उद्योग
1. इन उद्योगों के उत्पादों का प्रयोग अन्य प्रकार के उत्पादन प्राप्त करने के लिए किया जाता है।1. इन उद्योगों के उत्पादों को प्रत्यक्ष रूप से उपभोग के लिए प्रयोग किया जाता है।
2. ये उद्योग उत्पादन प्रक्रम के अगले चरण में सहायक हैं। ये औद्योगिक क्रांति में सहायक हैं।2. इनके उत्पाद प्रयोग के पश्चात् समाप्त हो जाते हैं।
3. लौह-इस्पात उद्योग इसका प्रमुख उदाहरण है।3. खाने के तेल, चाय, कॉफी, ब्रेड, बिस्कुट, रेडियो, टेलीविज़न आदि उद्योग इनके प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रश्न 3.
उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए।
अथवा
विभिन्न आधारों पर उद्योगों को कितने वर्गों में बाँटा जाता है?
उत्तर:
HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ 1

प्रश्न 4.
कृषि उद्योग और भारी उद्योगों में क्या अंतर हैं?
उत्तर:
कृषि उद्योग और भारी उद्योगों में निम्नलिखित अंतर हैं-

कृषि उद्योगभारी उद्योग
1. ये उद्योग कृषि फसलों से कच्चा माल प्राप्त करते हैं।1. ये उद्योग विभिन्न खनिज पदार्थों पर आधारित होते हैं।
2. ये प्राथमिक उद्योग होते हैं।2. ये गौण उद्योग होते हैं।
3. इनमें मानवीय श्रम के साथ-साथ मशीनों का भी प्रयोग किया जाता है।3. ये पूर्ण रूप से ऊर्जा चलित भारी मशीनों पर आधारित होते हैं।
4. इन उद्योगों में श्रम की प्रधानता होती है।4. इन उद्योगों में पूँजी की प्रधानता होती है।
5. इनमें लघु तथा मध्यम वर्ग के उद्योग स्थापित किए जाते हैं।5. इन उद्योगों में भारी उद्योग स्थापित किए जाते हैं।
6. चीनी उद्योग, पटसन उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, चाय उद्योग, बनस्पति घी उद्योग आदि इनके प्रमुख उदाहरण हैं।6. लौह-इस्पात उद्योग, जलयान उद्योग, वायुयान उद्योग आदि भारी उद्योगों के प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रश्न 5.
उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
अथवा
उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों की संकल्पना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. इन उद्योगों के उत्पाद अत्यंत परिष्कृत होते हैं जिनका विकास गहन वैज्ञानिक शोध पर आधारित होता है।
  2. इन उद्योगों में उच्च कुशलता प्राप्त श्रमिकों को नौकरी पर रखा जाता है।
  3. ये उद्योग बाज़ार की बदलती माँग के अनुसार अपने उत्पादों में तेजी से सुधार करते हैं।
  4. इन उद्योगों में श्रम की गतिशीलता बहुत अधिक होती है क्योंकि ये उद्योग योग्यता, अनुभव, अधिक आय, बेहतर सुविधा – व सामाजिक स्तर के प्रति संवेदनशील होते हैं।
  5. इन उद्योगों को स्वच्छंद उद्योग कहते हैं क्योंकि अवस्थिति का चुनाव करने में ये उद्योग अपेक्षाकृत स्वतंत्र होते हैं।

प्रश्न 6.
लघु उद्योग तथा बड़े पैमाने के उद्योग में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लघु उद्योग तथा बड़े पैमाने के उद्योग में निम्नलिखित अंतर हैं-

लघु उद्योगबड़े पैमाने के उद्योग
1. इन उद्योगों में उत्पादन छोटे पैमाने पर होता है।1. इन उद्योगों में उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है।
2. इनमें ऊर्जा से चलने वाली छोटी व साधारण मशीनों का प्रयोग किया जाता है।2. इनमें ऊर्जा से चलने वाली बड़ी-बड़ी जटिल मशीनों का प्रयोग किया जाता है।
3. इनमें कम पूँजी व कम श्रम की आवश्यकता होती है।3. इनमें भारी पूँजी व हज़ारों श्रमिकों की आवश्यकता होती है।
4. इनमें उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता का कोई विशेष ध्यान नहीं रखा जाता।4. इनमें उत्पादन की गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा जाता है।
5. लघु उद्योगों की प्रबंध प्रणाली साधारण होती है।5. बड़े उद्योगों का प्रबंध जटिल होता है।

प्रश्न 7.
स्वच्छंद उद्योगों की प्रमुख विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
स्वच्छंद उद्योगों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. स्वच्छंद उद्योग हल्के उद्योग होते हैं।
  2. इन उद्योगों में कम लोग ही कार्यरत होते हैं।
  3. ये उद्योग स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त होते हैं।
  4. ये उद्योग संसाधन एवं बाजार उन्मुख नहीं होते।
  5. इन उद्योगों के उत्पाद छोटे और आसानी से परिवहन के योग्य होते हैं।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

प्रश्न 8.
उत्पाद के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण करें। अथवा आधारभूत उद्योग तथा उपभोक्ता उद्योग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
उत्पाद के आधार पर उद्योगों को दो वर्गों में बाँटा गया है-

  • आधारभूत या मूलभूत उद्योग
  • उपभोक्ता उद्योग।

(i) आधारभूत या मूलभूत उद्योग-जिन उद्योगों में उत्पादित वस्तुएँ दूसरे उद्योग के लिए निर्मित होती हैं, उन्हें आधारभूत उद्योग कहते हैं; जैसे लौह-इस्पात उद्योग। लौह-इस्पात उद्योग में जो मशीनें बनती हैं उनका प्रयोग अन्य उद्योगों में वस्तुओं के उत्पादन के लिए किया जाता है। अतः लौह-इस्पात उद्योग मूलभूत या आधारभूत उद्योग है जो अन्य उद्योगों के लिए मशीनें बनाता है।

(ii) उपभोक्ता उद्योग-जिन उद्योगों में वस्तुओं का निर्माण सीधे उपभोग या उपभोक्ता के लिए किया जाता है; जैसे बेकरी उद्योग-जिसमें निर्मित ब्रैड तथा बिस्कुट सीधे उपयोग के काम आते हैं। तेल उद्योग, वस्त्र उद्योग, चाय एवं काफी उद्योग, रेडियो या टेलीविज़न उद्योग आदि ऐसे ही उद्योग हैं।

प्रश्न 9.
निरौधोगीकरण तथा पुनरोद्योगीकरण में क्या अंतर हैं?
उत्तर:
निरौद्योगीकरण और पुनरौद्योगीकरण में निम्नलिखित अंतर हैं-

निरौद्योगीकरणपुनरौद्योगीकरण
1. विनिर्माण उद्योगों के ह्मास को निरौद्योगीकरण कहा जाता है।1. नए उद्योगों के कुछ खंडों का विकास करना जहाँ परंपरागत उद्योगों का ह्रास हुआ पुनरौद्योगीकरण कहलाता है।
2. मनुष्य के स्थान पर मशीन तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में औद्योगिक उत्पादों में प्रतिस्पर्धा से निरौद्योगीकरण हुआ।2. उच्च प्रौद्योगिकी तथा उच्च वैज्ञानिक शोध एवं विकास पर आधारित उन्नत उत्पादों के कारण पुनरौद्योगीकरण हुआ।

प्रश्न 10.
संयुक्त राज्य अमेरिका में पेट्रो-रसायन संकुल अधिकतर तटों पर क्यों स्थित हैं?
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका में पेट्रो-रसायन संकुलों के तटीय क्षेत्रों में स्थित होने के निम्नलिखित कारण हैं-

  1. यहाँ जल विद्युत का पूर्ण रूप से विकास हुआ है।
  2. खनिज तेलों का परिवहन बड़े-बड़े टैंकरों तथा पाइपलाइनों द्वारा देश के आंतरिक भागों तक किया जाता है।
  3. यहाँ आयात और निर्यात की सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में मिलती हैं।

प्रश्न 11.
द्वितीयक क्रियाकलापों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
द्वितीयक गतिविधियों या क्रियाकलापों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का मूल्य बढ़ जाता है। प्रकृति में पाए जाने वाले कच्चे माल का रूप बदलकर ये उसे मूल्यवान बना देती हैं। जैसे कपास से वस्त्र बनाना, लौह अयस्क से लौह-इस्पात बनाना। इस प्रकार निर्मित वस्तुएँ अधिक मूल्यवान हो जाती हैं। खेतों, वनों, खदानों एवं समुद्रों से प्राप्त वस्तुओं के बारे में भी यही बात लागू होती है। इस प्रकार द्वितीयक क्रियाएँ विनिर्माण, प्रसंस्करण और निर्माण उद्योग से संबंधित हैं। सभी निर्माण उद्योग-धंधे गौण व्यवसाय हैं। गौण व्यवसायों पर भौतिक तथा सांस्कृतिक वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। संसार के विकसित देशों; जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ, ग्रेट ब्रिटेन, पश्चिमी जर्मनी तथा जापान में अभूतपूर्व मूल्यवृद्धि हुई है।

प्रश्न 12.
ब्रिटेन के औद्योगिक प्रदेशों पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
ब्रिटेन में निम्नलिखित प्रमुख औद्योगिक प्रदेश स्थित हैं-
1. मिडलैंड औद्योगिक प्रदेश यह इंग्लैंड का महत्त्वपूर्ण औद्योगिक प्रदेश है, जिसका केंद्र बर्किंघम है। यहाँ छोटी-सी सूई से लेकर वायुयान तथा जलयान तक निर्मित होते हैं। यहाँ मोटरगाड़ी, लौह-इस्पात, इंजीनियरिंग, बिजली का सामान तथा हौजरी के औद्योगिक प्रतिष्ठान विकसित अवस्था में हैं। यहाँ लीड्स, बैडफोर्ड, नाटिंघम आदि सूती वस्त्र उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं। लौह-इस्पात का बर्किंघम एक बड़ा एवं विकसित केंद्र है। कावेंट्री मोटरगाड़ियों के उद्योगों के लिए प्रसिद्ध है।

2. स्कॉटलैंड ग्लासगो क्षेत्र इस क्षेत्र में ग्लासगो नगर जलयान निर्माण के लिए विश्वविख्यात है। अन्य उद्योगों में लौह-इस्पात, इंजीनियरिंग तथा वस्त्र उद्योग प्रमुख हैं। ग्लासगो के अतिरिक्त एडिनबरा तथा एबरडीन यहाँ के प्रमुख औद्योगिक केंद्र हैं।

3. लंदन औद्योगिक प्रदेश-लंदन ब्रिटेन की राजधानी होने के साथ-साथ एक प्रमुख औद्योगिक नगर भी है। इसके आसपास अनेक उद्योग स्थापित हैं, जिनमें छपाई, सीमेंट, तेल शोधन, इंजीनियरिंग, वस्त्र निर्माण, फर्नीचर, विद्युत उपकरण, खाद्य परिष्करण तथा शृंगार प्रसाधन प्रमुख हैं।

4. दक्षिणी वेल्स औद्योगिक प्रदेश इस क्षेत्र के मुख्य औद्योगिक नगर कारडिफ, न्यूपोर्ट तथा स्वानसी हैं। यहाँ लौह-इस्पात, रसायन, तेल शोधन तथा कृत्रिम रेशे आदि उद्योग विकसित हैं।
उपर्युक्त क्षेत्रों के अतिरिक्त ब्रिटेन में नाटिंघमशायर, यार्कशायर, डर्बीशायर, लंकाशायर आदि अन्य औद्योगिक केंद्र हैं।

प्रश्न 13.
फ्रांस के औद्योगिक प्रदेशों पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
फ्राँस में निम्नलिखित प्रमुख औद्योगिक प्रदेश स्थित हैं-
1. पेरिस औद्योगिक प्रदेश-पेरिस यूरोप के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में गिना जाता है। यहाँ कोयले की कमी है इसलिए भारी उद्योगों की स्थापना कम हो पाई है। यहाँ रसायन उद्योग, कागज उद्योग, मुद्रण उद्योग, काँच की वस्तुएँ, आभूषण आदि के उद्योग विकसित हैं। पेरिस शहर फैशन के लिए विश्वविख्यात है। इसे विश्व का फैशन केंद्र कहा जाता है। यहाँ आमोद-प्रमोद एवं फैशन की अनेक वस्तुएँ निर्मित होती हैं।

2. लॉरेन सार प्रदेश-यह प्रदेश लौह-इस्पात का प्रमुख केंद्र है। यहाँ सार बेसिन में कोयले की उपलब्धता के कारण लौह-इस्पात उद्योग विकसित हुआ है। लौह-इस्पात के अतिरिक्त रासायनिक उर्वरक, वस्त्र उद्योग तथा काँच उद्योग यहाँ के प्रमुख उद्योग-धंधे हैं।

प्रश्न 14.
जर्मनी के औद्योगिक प्रदेशों पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
जर्मनी में निम्नलिखित प्रमुख औद्योगिक प्रदेश स्थित हैं-
1. रूहर औद्योगिक प्रदेश यह औद्योगिक प्रदेश विश्व के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों में गिना जाता है। रूहर क्षेत्र में कोयला पर्याप्त मात्रा में मिलता है, जिसके कारण भारी उद्योगों की स्थापना में सहायता मिली है। यहाँ लौह-इस्पात तथा भारी इंजीनियरिंग उद्योग विकसित अवस्था में हैं। इनके अतिरिक्त यहाँ वस्त्र उद्योग तथा रसायन उद्योग भी स्थापित हैं। इस क्षेत्र के प्रमुख औद्योगिक केंद्र राइन, बोचम, डलसडर्फ, डारमण्ड तथा आखेन हैं।

2. बेवरिया औद्योगिक प्रदेश-इस क्षेत्र में हल्के उद्योग; जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स का सामान, घड़ी, हौजरी, रसायन पदार्थ, शराब, खाद्य-सामग्री तथा औषधियों से संबंधित उद्योग हैं।

3. सार प्रदेश-यह प्रदेश सार नदी के बेसिन में फैला है। यहाँ भारी इंजीनियरिंग, लौह-इस्पात, काँच का सामान, चीनी-मिट्टी के बर्तन तथा चमड़े के सामान बनाने के केंद्र हैं। यह क्षेत्र फ्रांस तथा जर्मनी की सीमा पर लगा औद्योगिक केंद्र है।

प्रश्न 15.
स्वामित्व एवं प्रबंध के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
उद्योगों को स्वामित्व एवं प्रबंधन की व्यवस्था के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र, सहकारी क्षेत्र तथा बहु-राष्ट्रीय । उद्योग आदि वर्गों में बांटा जा सकता है-
1. सार्वजनिक उद्योग-वे उद्योग जिनका प्रबंध एवं स्वामित्व केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार के अधीन होता है, उन्हें सार्वजनिक उद्योग कहते हैं; जैसे भारत के भिलाई, दुर्गापुर तथा राऊरकेला में लौह-इस्पात उद्योग के केंद्र तथा भारतीय रेल सार्वजनिक उद्योग के उदाहरण हैं।

2. निजी क्षेत्र के उद्योग-वे उद्योग जिनका स्वामित्व या प्रबंध व्यक्ति या व्यक्तियों अथवा फर्म या कंपनी के पास होता है, उन्हें निजी उद्योग कहते हैं; जैसे जमशेदपुर का लौह-इस्पात उद्योग (TISCO)।

3. सहकारी उद्योग-किसी निगम अथवा कुछ लोगों के संघ द्वारा जो उद्योग संचालित किए जाते हैं, उन्हें सहकारी उद्योग कहते हैं; जैसे उत्तर प्रदेश सहकारी चीनी मिल, हरियाणा राज्य सहकारी चीनी मिल, आनंद डेयरी सहकारी समिति आदि।

4. सम्मिलित उद्योग-ऐसे उद्योग जिनका संचालन राज्य सरकारों, कुछ लोगों तथा निजी फर्मों द्वारा किया जाता है, उन्हें सम्मिलित उद्योग कहते हैं। इनका स्वामित्व तथा प्रबंध सम्मिलित रूप से होता है।

5. बहु-राष्ट्रीय उद्योग-जब कोई उद्योग या कंपनी अथवा उद्यम किसी दूसरे राष्ट्र के सहयोग से चलाए जाते हैं तो उन्हें बहु-राष्ट्रीय उद्योग कहते हैं। इनमें पूँजी तथा तकनीक विदेशों की होती है तथा कच्चा माल, श्रम तथा बाजार की सुविधा उस देश द्वारा दी जाती है, जहाँ ये स्थापित किए जाते हैं।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

प्रश्न 16.
लौह-अयस्क के चार प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लौह-अयस्क के चार प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-
1. मैग्नेटाइट-यह उत्तम कोटि का लौह-अयस्क माना जाता है। इसमें 70% से 75% लोहे की मात्रा मिलती है। इसका रंग काला होता है। यह आग्नेय तथा रूपांतरित चट्टानों में पाया जाता है। इसमें कुछ चुंबकीय लक्षण होते हैं। इस प्रकार का लोहा स्वीडन तथा रूस के यूरोप क्षेत्र में अधिक पाया जाता है।

2. हैमेटाइट-इस लोहे में लोहांश की मात्रा 50% से 65% के मध्य पाई जाती है। इसका रंग प्रायः लाल होता है तथा यह लोहा अवसादी चट्टानों में पाया जाता है। संसार में यह लौह-अयस्क विस्तृत क्षेत्र में पाया जाता है। यह लौह-अयस्क संयुक्त राज्य अमेरिका के सुपीरियल झील क्षेत्र स्पेन तथा ब्राजील में अधिक पाया जाता है।

3. लिमोनाइट-इस लोहे में 40% के लगभग लोहांश पाया जाता है। इस अयस्क का रंग भूरा होता है। यह भी तलछटी चट्टानों में पाया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के अल्बामा क्षेत्र, फ्रांस के लारेन प्रदेश तथा इंग्लैंड में पाया जाता है।

4. सिडेराइट-इस लौह-अयस्क में 20%-30% तक लोहा पाया जाता है। इसमें अशुद्धियों की मात्रा अधिक होती है। इसका रंग राख की तरह अथवा भूरा होता है। इसके प्रधान क्षेत्र नार्वे, स्वीडन तथा इंग्लैंड हैं।

प्रश्न 17.
खनिजों की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अभी तक वैज्ञानिकों ने लगभग 2000 खनिजों का पता लगाया है लेकिन उपयोग में केवल 200 खनिज ही आते हैं। सभी खनिजों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। सामान्यतया सभी खनिजों में कुछ विशेषताएँ एक जैसी होती हैं जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं

  1. खनिजों का जमाव सीमित क्षेत्रों में मिलता है तथा इनका वितरण भी असमान है।
  2. सभी खनिज पदार्थ समाप्य या अनवीकरण योग्य संसाधन हैं।
  3. खनिजों का दोहन जनसंख्या की वृद्धि एवं औद्योगीकरण के कारण बढ़ता जा रहा है।
  4. आर्थिक विकास में खनिजों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
  5. सभी खनिजों का दोहन प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है।
  6. खनिजों का उत्पादन बाजार की माँग पर निर्भर करता है।
  7. कोई भी देश खनिजों के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं है।

प्रश्न 18.
कोयला कितने प्रकार का होता है? प्रत्येक प्रकार के कोयले के मुख्य लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर:
कोयले में कार्बन की मात्रा के अनुसार उसकी ऊर्जा की क्षमता भिन्न-भिन्न होती है। गुणों के आधार पर कोयला निम्नलिखित चार प्रकार का होता है-
1. एन्ट्रासाइट कोयला यह उत्तम कोटि का कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 90% होती है। इसमें ताप अधिक तथा धुआँ कम होता है। इसका रंग काला तथा चमकदार है।

2. बिटुमिनस कोयला इसमें कार्बन की मात्रा 70% से 90% होती है। यह कोयला जल्दी आग पकड़ता है तथा इसकी लौ पीली होती है। यह जलते समय धुआँ अधिक देता है तथा अधिक मात्रा में राख छोड़ता है। बिटुमिनस कोयले के भंडार विश्व में सबसे अधिक हैं।

3. लिग्नाइट कोयला इसमें कार्बन की मात्रा 45% से 70% तक होती है। यह भूरे रंग का होता है तथा जलते समय धुएँदार लंबी लपटें छोड़ता है। इसमें वनस्पति का अंश होता है। इसमें नमी की मात्रा अधिक होती है।

4. पीट कोयला यह नवीनतम कोयला है। इसमें नमी की मात्रा अधिक होने के कारण यह सुखाने पर ही जलता है। इसमें कार्बन की मात्रा 30% से 60% तक होती है। यह घरों में जलाने के काम लाया जाता है। इसका रंग भूरा होता है। यह सबसे घटिया होता है।

प्रश्न 19.
ऊर्जा के संसाधन के रूप में खनिज तेल कोयले से बेहतर क्यों है?
उत्तर:
खनिज तेल कोयले से बेहतर ऊर्जा का संसाधन माना जाता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं-

  1. खनिज तेल का निष्कर्षण कोयले की अपेक्षा सरल और सस्ता है।
  2. खनिज तेल का परिवहन पाइप लाइनों द्वारा आसानी से दूर-दूर तक किया जा सकता है।
  3. खनिज तेल कोयले की अपेक्षा कम स्थान घेरता है।
  4. खनिज तेल द्वारा विभिन्न उद्योगों का विकेंद्रीकरण संभव है, जबकि कोयले पर आधारित उद्योग कोयला क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं।

प्रश्न 20.
कोयले का निर्माण किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
कोयला मुख्य रूप से अवसादी चट्टानों में पाया जाता है। यह एक जीवाश्म ईंधन है जो वनस्पति के गलने-सड़ने तथा अपघटित होने से बना है। आज से 30 करोड़ वर्ष पूर्व कार्बोनिफेरस युग में पृथ्वी के अधिकांश निम्न स्थलीय वन प्रदेश पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के कारण नीचे दब गए। वायु की अनुपस्थिति में तथा उच्च ताप और दाब के कारण यह वनस्पति गल-सड़ कर अपघटित (Decomposed) हो गई और बाद में कोयले में परिवर्तित हो गई। प्राकृतिक वनस्पति से कोयला बनने में लाखों वर्ष लगे तथा यह परिवर्तन बहुत ही धीमी गति से हुआ।

प्रश्न 21.
खनन क्या है? इसको प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन करें।
उत्तर:
खनन (Mining) – खानों से खनिजों को निकालने की क्रिया को खनन कहते हैं। मनुष्य भूपर्पटी से प्राचीनकाल से ही खनिजों का दोहन करता आया है और आज यह एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक क्रिया है।
खनन को प्रभावित करने वाले कारक मानव ज्ञान, प्रयास, प्रौद्योगिकी और अत्यधिक पूँजी से ही खनन क्रिया को आर्थिक क्रिया में बदला जा सकता है। खनन को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं

  1. धरातल के नीचे खनिज निक्षेपों की गहराई, आकार और मात्रा
  2. खनिज अयस्कों में मिलने वाली धातु की मात्रा
  3. उपयोग के स्थान से खनिजों की दूरी
  4. खनन कार्य के लिए आवश्यक पूँजी
  5. उन्नत प्रौद्योगिकी व तकनीकी ज्ञान
  6. परिवहन के साधन
  7. खनिजों की माँग।

प्रश्न 22.
खनिजों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वैज्ञानिक अनुसंधान एवं तकनीकी विकास के साथ वर्तमान युग में खनिज पदार्थों का महत्त्व बढ़ गया है। खनिज प्रकृति का अमूल्य उपहार है। आज के युग में इस व्यवसाय की अत्यधिक महत्ता है। खनिजों पर समस्त निर्माण उद्योग आधारित हैं। खनिजों में ऊर्जा के संसाधन के रूप में कोयला, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम, यूरेनियम तथा प्लेटिनियम का मुख्य स्थान है। इसी प्रकार लौह इस्पात उद्योग किसी भी देश की औद्योगिक प्रगति के लिए रीढ़ की हड्डी का काम करता है। इसके लिए लौह अयस्क, चूना पत्थर, मैग्नीशियम, मैंगनीज, निकल, कार्बन आदि धात्विक व अधात्विक खनिजों की आवश्यकता पड़ती है। रासायनिक खाद के निर्माण में जिप्सम तथा चूना पत्थर आदि खनिजों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ऐलुमिनियम, तांबा, जस्ता, सीसा तथा टिन आदि अन्य धातुएँ हैं जिनका खनन आज के युग में आवश्यक है।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
अथवा
उद्योगों की स्थापना को कौन-कौन से कारक प्रभावित करते हैं? वर्णन करें।
अथवा
उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले पाँच कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
किसी क्षेत्र में उद्योगों की अवस्थिति या स्थापना में निम्नलिखित कारक प्रभावी होते हैं-
1. कच्चा माल-कच्चा माल विनिर्माण उद्योगों के लिए एक मूलभूत आवश्यकता है। अतः उद्योगों की स्थापना प्रायः कच्चे माल के क्षेत्रों के निकट होती है। भारी उद्योग जैसे लौह-इस्पात को प्रायः कोयला तथा लोहे की खानों के निकट स्थापित किया जाता है अन्यथा परिवहन लागत में वृद्धि हो जाती है तथा वस्तुएँ प्रतिस्पर्धा में नहीं रहतीं। यही कारण है कि विश्व के अधिकांश भारी उद्योग कच्चे माल की आपूर्ति के निकट स्थापित हैं। भारत का लौह-इस्पात उद्योग छोटा नागपुर के पठार के आसपास ही स्थापित है, क्योंकि लौह-अयस्क तथा कोयला वहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

इसी प्रकार संयुक्त राज्य अमेरिका में लौह-इस्पात उद्योग महान झीलों के आसपास, जर्मनी में रूहर क्षेत्र में स्थापित है। कागज, दियासलाई तथा फर्नीचर उद्योग वनों के आसपास, चीनी उद्योग गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में स्थापित किया जाता है। कुछ उद्योग ऐसे हैं जिनका कच्चा माल हल्का होता है, परिवहन व्यय कम आता है इसलिए उनको कहीं भी स्थापित किया जा सकता है; जैसे घड़ी बनाने का उद्योग, इलैक्ट्रॉनिक्स उद्योग तथा सूती वस्त्र उद्योग जैसे ब्रिटेन में सूती वस्त्र उद्योग मिस्र से आयातित कपास से चलाया जाता है लेकिन भारत में अधिकांश सूती वस्त्र मिलें कपास उत्पादक क्षेत्रों के आसपास ही स्थित हैं।

2. ऊर्जा-उद्योगों में मशीनों को संचालित करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा के साधनों में कोयला, पेट्रोलियम, जल विद्युत्, प्राकृतिक गैस, परमाणु ऊर्जा प्रमुख हैं। लौह-इस्पात उद्योग में कोयला शक्ति का प्रमुख साधन है, इसलिए विश्व के अधिकांश लौह-इस्पात उद्योग कोयला क्षेत्रों के निकट ही स्थापित हैं; जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में अप्लेशियन कोयला क्षेत्र के निकट महान झील औद्योगिक प्रदेश, भारत में जमशेदपुर स्टील प्लांट, झरिया और रानीगंज के कोयला क्षेत्रों पर तथा ब्रिटेन में दक्षिणी वेल्स, मिडलैंड और लंकाशायर के उद्योग आदि। एल्यूमिनियम उद्योग में जल विद्युत् की अधिक आवश्यकता होती है, इसलिए इसे जल विद्युत् ऊर्जा के क्षेत्रों में स्थापित किया जाता है। वर्तमान समय में पारंपरिक ऊर्जा के अनेक विकल्प निकाले जा रहे हैं, जिनसे उद्योगों को संचालित करने तथा उन्हें समाप्य ऊर्जा प्रदान करने के लिए ऊर्जा के संसाधनों पर अधिक निर्भर न रहना पड़े।

3. श्रम-कुछ उद्योगों में बहुत कुशल तथा अधिक संख्या में श्रमिकों की आवश्यकता होती है; जैसे पटसन उद्योग, कांच उद्योग, चाय उद्योग आदि। यद्यपि आजकल मशीनी युग में संचालित मशीनों तथा कंप्यूटरों का प्रयोग आरंभ हो गया है जिसने श्रम शक्ति के प्रभाव को कम कर दिया है लेकिन फिर भी कई उद्योगों में मानवीय श्रम का आज भी महत्त्व है। श्रमिकों की दक्षता एवं कुशलता भी उद्योगों में आवश्यक है; जैसे इलैक्ट्रॉनिक घड़ी निर्माण उद्योग आदि भारत में बिहार तथा बंगाल में अधिक जनसंख्या के कारण हुगली तथा छोटा नागपुर के पठार के औद्योगिक प्रदेशों के लिए सस्ता एवं कुशल श्रम उपलब्ध होने के कारण उद्योगों के संचालन में कोई समस्या नहीं आती हैं।

4. परिवहन तथा संचार के साधन-विश्व के जिन देशों में यातायात तथा संचार वाहनों के साधनों का विकास नहीं हुआ है, वे औद्योगिक रूप से पिछड़े हुए हैं। दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका के देशों में परिवहन के साधनों के अभाव से उद्योग स्थापित नहीं हो पाए हैं। यातायात के साधन उद्योगों के लिए धमनियों की तरह कार्य करते हैं। उद्योगों के लिए जल यातायात, सड़क परिवहन तथा रेल यातायात का विकास होना आवश्यक है। ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में यातायात के साधनों के विकास के कारण औद्योगिक विकास को गति मिली है।

जापान में कच्चे माल की कमी होते हुए भी परिवहन के साधनों के विकास ने औद्योगीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत में कोलकाता, मुंबई (बंबई), अहमदाबाद तथा दिल्ली के आसपास औद्योगिक विकास का कारण परिवहन की सुविधाएँ हैं। वर्तमान समय में उद्योगपति टेलीफोन, फैक्स, पेजर आदि के प्रयोग से कच्चे माल तथा निर्मित माल को घर बैठे ही मंगवा लेते हैं। कच्चे माल को उद्योगों तक पहुंचाने तथा निर्मित माल को बाजार तक पहुंचाने के लिए परिवहन के सभी साधनों (सड़क, जल यातायात, रेल परिवहन, वायु परिवहन आदि) की सुविधाएँ आवश्यक हैं।

5. बाजार-उद्योग-धंधों में निर्मित माल की आपूर्ति के लिए बाजार का होना आवश्यक है जहाँ उसकी मांग तथा खपत हो सके। उद्योगों का बड़े नगरों या उसके आसपास केंद्रित होने का कारण बाजार की निकटता है। शीघ्र खराब होने वाली वस्तुएँ; जैसे सब्जी, दूध, फल, मांस आदि का विकास महानगरों तथा औद्योगिक नगरों के निकट विकसित होने के कारण उन वस्तुओं की अधिक मांग है।

6. पूँजी उद्योग चाहे छोटा हो या बड़ा, उसके संचालन के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। उद्योगों के लिए कच्चा माल, मशीनें, श्रम आदि के लिए पूँजी आवश्यक है। आज जो बड़े पैमाने के उद्योग-धंधे स्थापित किए जाते हैं, उनमें करोड़ों रुपए की पूँजी की आवश्यकता होती है। यूरोप तथा अमेरिका के धनी देशों में पूँजी का अभाव नहीं है इसलिए वहाँ औद्योगिक विकास उन्नत अवस्था में है।

एशिया तथा अफ्रीका के निर्धन देश पूँजी के अभाव में औद्योगिक विकास नहीं कर पाए। प्राकृतिक संसाधनों के रूप में कच्चा माल, श्रम के रूप में अधिक जनसंख्या तथा बाजार की उपलब्धता होने के बावजूद भी यह देश औद्योगिक विकास में पिछड़े हुए हैं। भारत में पूँजीपति बड़े-बड़े नगरों में रहते हैं इसलिए वे अपनी पूँजी बड़े-बड़े नगरों में उद्योगों के केंद्रीयकरण पर लगाते हैं।

7. बैंकिंग सुविधा उद्योगों की स्थापना के लिए बैंकिंग सुविधा का होना आवश्यक है। उद्योगपतियों को प्रतिदिन लाखों रुपयों का लेन-देन करना पड़ता है जिससे पैसे जमा करवाने तथा निकालने एवं पूँजी की सुरक्षा के लिए बैंकों का होना आवश्यक है। कई उद्योगों को स्थापित करने के लिए सरकार सस्ते ब्याज की दर पर बैंकों के द्वारा ऋण की सुविधा देती है।

8. जलवायु-कुछ उद्योगों के लिए जलवायु एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है; जैसे सूती वस्त्र उद्योग के लिए नम एवं आर्द्र जलवायु आवश्यक है जिससे उसका धागा टूटता नहीं है। शुष्क जलवायु में कृत्रिम नमी पैदा की जाती है जिससे उत्पादन व्यय बढ़ता है। दूसरा श्रमिकों एवं इंजीनियरों के स्वास्थ्य के लिए अनुकूल जलवायु आवश्यक है। कठोर शीत तथा झुलसने वाली गर्मी में श्रमिकों की कार्यक्षमता कम हो जाती है।

9. राजनीतिक स्थिरता-राजनीतिक स्थिरता का उद्योगों की स्थापना पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। जहाँ सरकारें अस्थिर होती हैं तथा जहाँ आतंकवाद का प्रभाव होता है, वहाँ कोई भी उद्योगपति उद्योग लगाना नहीं चाहता। जहाँ राजनीतिक रूप से बार-बार सरकारें बदलती हैं वहाँ भी उद्योगपति उद्योग नहीं लगाते। 1980 के दशक में पंजाब में आतंकवाद के कारण कोई भी उद्योगपति वहाँ उद्योग लगाने को सहमत नहीं था, बल्कि वहाँ से उद्योगों का पलायन दिल्ली, जयपुर तथा मुंबई (बंबई) में हुआ लेकिन शांति-व्यवस्था कायम हो जाने पर अब दोबारा से उद्योगपति वहाँ आकर्षित हो रहे हैं। यही स्थिति आज जम्मू-कश्मीर की है।

वहाँ आतंकवाद के प्रभाव के कारण कोई भी उद्योगपति उद्योग लगाना पसंद नहीं करता। इसी प्रकार सरकार की नीति का भी उद्योगों की स्थापना पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जो सरकारें उद्योगों पर अधिक कर लगाती हैं तथा सुविधाएँ नहीं देतीं, वहाँ उद्योगपति आकर्षित नहीं होते। वहाँ विदेशी कंपनियाँ भी अपना उद्योग स्थापित नहीं करती। जिन देशों में सरकारें उद्योगों को विभिन्न रियायतें एवं सुविधाएँ प्रदान करती हैं, वहाँ अधिकतर उद्योग आकर्षित होते हैं और औद्योगिक विकास की दर बढ़ती है।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

प्रश्न 2.
विश्व के विभिन्न लौह-इस्पात उद्योग के वितरण का वर्णन करें।
अथवा
एशिया के विभिन्न लौह-इस्पात उद्योगों का विवरण दें।
उत्तर:
लौह-इस्पात उद्योग औद्योगिक विकास की धुरी है। किसी भी देश के औद्योगिक विकास के लिए सर्वप्रथम लौह-इस्पात उद्योग को विकसित किया जाना आवश्यक है। एक सुई से लेकर विशाल आकार के जलयानों का निर्माण लौह-इस्पात द्वारा ही होता है। भारत तथा चीन में औद्योगिक विकास लौह-इस्पात उद्योग के विकास के बाद ही संभव हुआ।

ईसा से 400 वर्ष पूर्व लोहा गलाने की कला विकसित हुई थी। उस समय लकड़ी की आंच या कोयले में लोहा गलाकर कृषि के यंत्र बनाए जाते थे। धीरे-धीरे कोयले का प्रयोग किया जाने लगा। 19वीं शताब्दी में लोहा गलाने की परिवर्तन आए। कुकिंग कोयले का प्रयोग लोहे को गलाने के लिए किया जाने लगा। लौह-इस्पात बनाने के लिए लौह-अयस्क, कोक कोयला, मैगनीज़ तथा चूना पत्थर आदि मिलाकर भट्टी में गलाने के लिए ऑक्सीजन, गर्म हवा तथा तेल के तीव्र झोंकों द्वारा भट्टी में डाला जाता है इसलिए इन आधुनिक भट्टियों को झोंका भट्टी (Blast Furnace) कहते हैं।

विश्व में लौह-इस्पात उत्पन्न करने वाले देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जापान, भारत, जर्मनी, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस आदि प्रमुख देश हैं।
(क) संयुक्त राज्य अमेरिका – संयुक्त राज्य अमेरिका में लौह-इस्पात उद्योग का संकेंद्रण देश के पूर्वी भार्ग में हुआ है। यह देश विश्व का 15% लौह-इस्पात उत्पन्न कर विश्व में प्रथम स्थान पर है। देश के पूर्वी भाग में इस उद्योग की स्थापना में यहाँ की अनुकूल सुविधाओं का होना है जो निम्नलिखित हैं

  • अप्लेशियन का कोयला क्षेत्र
  • सुपीरियर झील के दक्षिण-पश्चिम में लोहे की खानें हैं
  • महान् झीलों का सस्ता एवं सुलभ यातायात उपलब्ध है
  • सड़कों तथा रेल-मार्गों का इस क्षेत्र में पर्याप्त विकास हुआ है
  • विकसित बाजार जिससे खपत बनी रहती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रमुख लौह-इस्पात के निम्नलिखित केंद्र हैं-
1. शिकागो गैरी क्षेत्र-यह संयुक्त राज्य अमेरिका का महत्त्वपूर्ण एवं बड़ा इस्पात क्षेत्र है जो फ्रांस के कुल इस्पात उत्पादन से भी अधिक उत्पन्न करता है। इस क्षेत्र में कोयले तथा लोहे के पर्याप्त भंडार हैं। झील का सस्ता परिवहन, मिशिगन राज्य से चूना पत्थर तथा शिकागो देश के विभिन्न भागों से रेलों तथा सड़कों द्वारा जुड़ा है जिससे निर्मित माल को भेजने की व्यवस्था है। यह क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका का 35% इस्पात तैयार करता है।

2. पिट्सबर्ग-यंग्सटाउन क्षेत्र-यहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका का एक-तिहाई इस्पात तैयार होता है। पिट्सबर्ग क्षेत्र में इस्पात के केंद्र पश्चिम तथा दक्षिण में विकसित हुए हैं जिनमें जोहंसटाउन, कारनेगी, हिंगस्टन तथा ब्रडोक आदि प्रमुख हैं।

3. ईरी झील तटीय क्षेत्र-इस क्षेत्र में लौह-अयस्क के पर्याप्त भंडार हैं लेकिन कोयला खाने दूर स्थित हैं। लौह-अयस्क से लदे जलपोत भट्टियों में लोहा उतारते हैं और कोयला रेलमार्गों द्वारा पहुँचाया जाता है। इस क्षेत्र में बफैलो, क्लीवलैंड, डेट्राइट, ईरी तथा लारेन प्रमुख केंद्र हैं।

4. मध्य अटलांटिक तटीय क्षेत्र-न्यू इंग्लैंड राज्य बर्जीनिया तक फैला है। इस क्षेत्र में कोयला तथा चूना पत्थर के अलावा यातायात की सर्वोत्तम व्यवस्था तथा यातायात के साधन सभी सुलभ हैं। इस क्षेत्र में लौह-अयस्क की कमी है जो चिली, लैब्रेडोर तथा वेनेजुएला से आयात किया जाता है। मुख्य केंद्र फिलाडेलफिया तथा दूरस्टर हैं।
HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ 2

5. दक्षिणी इस्पात क्षेत्र यहाँ लौह-इस्पात की सभी सुविधाएँ लौह-अयस्क, कोयला, चूना पत्थर, मैगनीज़ तथा यातायात के साधन आदि उपलब्ध हैं। बकिंघम संयुक्त राज्य अमेरिका के महत्त्वपूर्ण इस्पात केंद्रों में गिना जाता है।

(ख) यूरोपीय देशों में लौह-इस्पात उद्योग-यूरोपीय देशों के अंतर्गत निम्नलिखित देशों में लौह-इस्पात उद्योग स्थापित हैं
1. ग्रेट ब्रिटेन-ब्रिटेन में रोमन साम्राज्य काल से ही लकड़ी से लोहा पिघलाने की कला विकसित थी लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद मांग बढ़ने के कारण आधुनिक मशीनों तथा भट्टियों द्वारा लौह-इस्पात का निर्माण आरंभ हुआ। 19वीं शताब्दी में 50 वर्षों तक ब्रिटेन विश्व का प्रमुख लौह-इस्पात उत्पादक देश रहा है। यहाँ लौह-इस्पात के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं

  • दक्षिणी वेल्स-कार्डिफ, स्वानसी, लानेले, पोर्ट टालबट, न्यूपोर्ट।
  • उत्तरी-पूर्वी तटीय क्षेत्र-रेडकार, मिडिल्सबरो, डालिंगटन तथा कॉनसैट।
  • दक्षिणी यार्कशायर-चेस्टरफील्ड और फ्रोडिंन्धम।
  • मध्य स्कॉटलैंड-ग्लासगो, कैरन, कोटब्रिज, मदरवैल विशौ।
  • मिडलैंड-बर्किंघम, विल्सटन, राउंड ओक आदि।

2. जर्मनी-जर्मनी का रूहर क्षेत्र कोयले के लिए विश्वविख्यात है लेकिन लौह-अयस्क की देश में कमी है जिसकी पूर्ति फ्रांस, स्वीडन तथा स्पेन से आयात करके की जाती है। रूहर क्षेत्र देश का आधे से अधिक लौह-इस्पात का निर्माण करता है। इस क्षेत्र के प्रमुख केंद्र बोखम तथा आखेन हैं। फ्रेंकफर्ट, स्टटगार्ड तथा बूशन अन्य केंद्र हैं। जर्मनी में लौह-अयस्क की कमी के बावजूद भी यातायात की सुविधाओं के कारण लौह-इस्पात उद्योग विकसित अवस्था में है।

3. फ्रांस-फ्रांस का लारेन क्षेत्र संपूर्ण यूरोप का एक बृहत् तथा महत्त्वपूर्ण लौह-इस्पात उत्पादक क्षेत्र है। यहाँ उच्चकोटि का लौह-अयस्क प्राप्त है। 90% लौह-अयस्क इसी क्षेत्र से प्राप्त होता है। कोयला जर्मनी के रूहर क्षेत्र से मंगवाया जाता है। जो जहाज लोहा लेकर जर्मनी जाते हैं, वे वापसी में कोयला लाते हैं इसलिए परिवहन लागत अधिक नहीं आती। कुछ कोयला सार क्षेत्र से प्राप्त हो जाता है। फ्रांस के लारेन क्षेत्र के प्रमुख केंद्र मेट्ज़, ब्रिये, नांसी, थयोनविले तथा लोंगवे हैं। लारेन क्षेत्र के अतिरिक्त साम्ब्रेयूज तथा सार बेसिन अन्य उत्पादक क्षेत्र हैं।

4. यूक्रेन यूक्रेन का डोनबास क्षेत्र सोवियत रूस के सबसे बड़े लौह-इस्पात क्षेत्रों में गिना जाता है लेकिन यूक्रेन के पृथक्कीकरण से यह क्षेत्र यूक्रेन में स्थित है। इस देश में लौह-अयस्क क्रिवोई राग तथा कर्च प्रायद्वीप से मिलता है। कोयला डोनेत्ज बेसिन से तथा चूना पत्थर समीप ही स्थित है। कच्चे तथा तैयार माल को लाने व ले जाने के लिए यातायात की सुविधाएँ हैं। बाजार की सुविधाओं के रूप में चारों ओर बड़े-बड़े नगर हैं जिसके कारण यूक्रेन का लौह-इस्पात उद्योग विकसित अवस्था में है।

(ग) एशिया में लौह-इस्पात उद्योग – जापान का लौह-इस्पात के उत्पादन में विश्व में तीसरा स्थान है। पिछले चार दशकों में इसने फ्रांस, जर्मनी तथा ब्रिटेन को पीछे छोड़ दिया है। यहाँ पर लौह अयस्कों तथा कोयले की कमी के बावजूद भी लौह-इस्पात का तीव्र गति से विकास हुआ है। यहाँ सस्ती जल विद्युत् तथा यातायात के साधनों के विकास ने औद्योगिक वृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। जापान लौह-अयस्क कोरिया, भारत, वेनेजुएला, पेरू तथा ब्राज़ील से आयात करता है। यहाँ लौह-इस्पात के केंद्र समुद्र तटवर्ती भागों में स्थापित हुए हैं क्योंकि कच्चे माल को सुगमता से जलयानों द्वारा केंद्रों तक पहुँचाया जा सकता है। यहाँ यावाता-तोबाता, मौजी, शिमोनोसेकी तथा नागासाकी प्रमुख लौह-इस्पात के केंद्र हैं। ओसाका तथा कोबे आंतरिक सागर के पूर्वी सिरे पर हैं। एशिया में लौह-इस्पात उद्योग के प्रमुख केंद्र निम्नलिखित हैं
1. चीन-पिछले 20 वर्षों में चीन में लौह-इस्पात के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई है। सन् 1935 में चीन का उत्पादन बहुत कम था जो सन् 1973 में बढ़कर जर्मनी तथा फ्रांस से अधिक हो गया है। चीन में उच्चकोटि का एंथ्रासाइट कोयला शेंसी शासी क्षेत्र से तथा लौह-अयस्क मंचूरिया से प्राप्त होता है। मंचूरिया क्षेत्र देश का प्रमुख लौह-इस्पात क्षेत्र है जो लगभग एक-तिहाई उत्पादन करता है। मंचूरिया क्षेत्र में अन्शान, फुथुन और मुकडेन प्रमुख लौह-इस्पात केंद्र हैं। यांगटीसिक्यांग की घाटी में शंघाई मनशान, हैंकाऊ तथा तामेह हैं। शांसी में पाओटाऔ, टिटसिन, टानशान तथा शिट्टचिंगसांग लौह-इस्पात केंद्र हैं।

2. भारत में यह उद्योग अत्यंत प्राचीन है। इतिहास इस बात का प्रमाण है कि दमिश्क की तलवारों के लिए लोहा भारत से जाता था। दिल्ली में स्थित कुतुबमीनार के निकट लौह स्तंभ इस बात का प्रमाण है कि भारत में इस्पात बनाने की कला कितनी उन्नत थी, क्योंकि अभी तक भी इस पर जंग नहीं लगा। भारत के प्रभुत्व उद्योगों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं
(i) टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी यह केंद्र बिहार राज्य में जमशेदपुर में 1907 ई० में स्थापित किया गया। यह आधुनिक लौह-इस्पात का पहला कारखाना है। इस केंद्र को निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध हैं

  • उच्चकोटि का हैमेटाइट लोहा बिहार की सिंहभूम तथा उड़ीसा के मयूरभंज से प्राप्त होता है।
  • कोयला झरिया तथा रानीगंज की खानों से मिलता है।
  • मैगनीज़, नोआमंडी से तथा चूना पत्थर सुंदरगढ़ से प्राप्त होता है।
  • कोलकाता-नागपुर रेलमार्ग यहाँ से गुजरता है जो यातायात की सुविधा प्रदान करता है।

(ii) इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी इस कंपनी के कारखाने पश्चिमी बंगाल में कुल्टी, बर्नपुर तथा हीरापुर में हैं। कुल्टी के कारखाने में इस्पात पिंड तथा हीरापुर में लौह-पिंड और बर्नपुर में तैयार इस्पात बनाया जाता है। इन केंद्रों में निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध हैं

  • इस कंपनी को लोहा बिहार की सिंहभूम तथा उड़ीसा की मयूरभंज बादाम पहाड़ियों से प्राप्त होता है।
  • इस कंपनी के लिए कोयला निकटवर्ती झरिया एवं रानीगंज की खानों से मंगवाया जाता है।
  • इस कंपनी को चूने का पत्थर पाराघाट तथा गंगापुर से उपलब्ध हो जाता है।
  • इस कंपनी को दामोदर नदी से जल की सुविधा प्राप्त है।
  • इस कंपनी को बिहार एवं पश्चिमी बंगाल से सस्ता श्रम उपलब्ध है।
  • इस कंपनी को यातायात की सुविधा आसनसोल जंक्शन से प्राप्त है।

(iii) विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील वर्क्स कर्नाटक राज्य में भद्रावती के किनारे 1923 ई० में मैसूर आयरन एंड स्टील कंपनी के नाम से एक कारखाने की स्थापना हुई, लेकिन अब यह संयुक्त उपक्रम है, जिसका संचालन केंद्र सरकार तथा कर्नाटक सरकार करती है। इस क्षेत्र में उद्योग के लिए अग्रलिखित सुविधाएँ प्राप्त हैं

  • इस क्षेत्र को लोहा (अयस्क) कादूर जिले के बाबाबूदान की पहाड़ियों से प्राप्त होता है।
  • इस क्षेत्र को कोयले की सुविधा उपलब्ध नहीं है, लेकिन समीपवर्ती क्षेत्रों से लकड़ी (ईंधन) का प्रयोग किया जाता है, लेकिन अब शिमला विद्युत्-केंद्र से शक्ति के रूप में विद्युत् भी प्राप्त है।
  • इस क्षेत्र में माल लाने तथा ले जाने के लिए यातायात के साधन, विशेषकर रेल यातायात उपलब्ध है।

प्रश्न 3.
पेट्रो-रसायन उद्योगों के विश्व वितरण का विवरण दीजिए।
उत्तर:
जो उद्योग पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस पर आधारित होते हैं, उन्हें पेट्रो-रसायन उद्योग कहते हैं। इन उद्योगों की स्थापना तेल शोधन शालाओं (Oil Refineries) के निकट की जाती है। इनमें प्लास्टिक, कृत्रिम रेशे, खाद, कृत्रिम रबड़ तथा विस्फोटक (Explosive) सम्मिलित हैं। पेट्रो-रसायन उद्योगों के प्रमुख केंद्र निम्नलिखित हैं
1. संयुक्त राज्य अमेरिका संयुक्त राज्य अमेरिका में पिछले तीन दशकों में इस उद्योग ने काफी प्रगति की है। यहाँ यह उद्योग विदेशों से आयातित खनिज तेल पर आधारित है। इस उद्योग के अधिकांश केंद्र तटवर्ती भागों में स्थापित किए गए हैं। मैक्सिको की खाड़ी के आसपास तेल परिष्करण के अनेक प्लांट लगे हैं जहाँ मध्यपूर्व के देशों से खनिज तेल लाकर परिष्कृत किया जाता है इसलिए यहाँ पेट्रो-कैमिकल्स उद्योगों की स्थापना की गई है। पूर्वी तटीय भाग तथा महान् झील के आसपास के क्षेत्रों में भी अनेक परिष्करणशालाएँ कार्यरत हैं इसलिए यहाँ भी संयुक्त राज्य अमेरिका के 15% पेट्रो-रसायन उद्योग केंद्रित हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में पेट्रो-रसायन उद्योग के प्रमुख केंद्र फिलाडेलफिया, डेलवियर, शिकागो, टोलेडो, लॉस एंजिल्स, डेट्राइट, सैंट लुहस पोर्टलैंड आदि हैं।

2. यूरोप के पेट्रो-रसायन उद्योग-यूरोप में पेट्रो-रसायन उद्योग मुख्य रूप से ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस तथा नीदरलैंड में स्थापित हैं। इन देशों में खनिज तेल की कमी के बावजूद भी यह उद्योग स्थापित हैं। जर्मनी में पेट्रो-रसायन उद्योग रूहर क्षेत्र में स्थापित है। ब्रिटेन में इंग्लिश चैनल के तटीय भागों में पेट्रो-कैमिकल्स उद्योगों का केंद्रीयकरण हुआ है। ब्रिटेन में साउथहैंपटन, नीदरलैंड में रॉटरड्रम, बेल्जियम में एंटवर्प में तथा फ्रांस में सोन नदी की घाटी में ये उद्योग स्थापित हुए हैं। यूरोपीय देशों में पेट्रो-रसायन से निर्मित पदार्थों की माँग अधिक है।

रूस में पेट्रो-रसायन उद्योग वोल्गा, यूराल तथा ग्रोजनी क्षेत्रों में अधिक विकसित है। यहाँ खनिज तेल तथा कोयला पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। यहाँ के प्रमुख पेट्रो-रसायन उद्योग के केंद्र मास्को, गोर्की, लेनिनग्राड तथा बाक हैं।

3. दक्षिण-पश्चिमी एशिया दक्षिण-पश्चिमी एशिया में खनिज तेल के अपार भंडारों के बावजूद भी यहाँ पेट्रो-रसायन उद्योग का विकास नहीं हो पाया है। इसका कारण यहाँ इस उद्योग के उत्पादनों की मांग नहीं है। तटीय क्षेत्रों में जो पेट्रो-रसायन उद्योग स्थापित किए गए हैं, उनके उत्पाद विदेशों को निर्यात किए जाते हैं। लेबनान तथा अन्य देशों में तेल शोधनशालाएँ स्थापित होने के कारण भी इस उद्योग के विकास को प्रोत्साहन नहीं मिल पाया है। यहाँ अदनान (ईरान) सऊदी अरब में रास तनूरा तथा कुवैत में मिना-अल-अहमदी प्रमुख पेट्रो-रसायन उद्योग के केंद्र हैं।

4. भारत-भारत में पेट्रो-रसायन उद्योगों का आरंभ कुछ दशक पूर्व ही हुआ। सर्वप्रथम यूनियन कार्बाईड द्वारा इस क्षेत्र में उद्योग स्थापित किया गया। सार्वजनिक क्षेत्र में इंडियन कैमिकल्स लिमिटेड की स्थापना से पेट्रो-रसायन उद्योगों की स्थापना में सहयोग मिला। गुजरात में कोयली ब्रटेल परिष्करणशाला के विकास के कारण बड़ौदरा के निकट जवाहरनगर में पेट्रो-कैमिकल्स की स्थापना की गई। पेट्रो-कैमिकल्स का दूसरा सार्वजनिक क्षेत्र का कारखाना असम में बोगाईगांव में है। हल्दिया और बरौनी कारखानों की स्थापना का उद्देश्य भी पेट्रो-कैमिकल्स तैयार करना है। जगदीशपुर, बिजयपुर, सवाई माधोपुर में गैस पर आधारित उर्वरक के कारखाने लगाए जा रहे हैं। तीन परिष्करणशालाएँ हरियाणा में पानीपत, कर्नाटक में मंगलौर तथा असम में नूमालीगढ़ में बनाई गईं हैं, जिससे उनके आसपास के क्षेत्रों में पेट्रो-रसायन उद्योग भी स्थापित हो सकेंगे।

दक्षिणी महाद्वीपों में इन उद्योगों का कोई विशेष विस्तार नहीं हुआ। ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में ब्रिसवेन, सिडनी, मेलबोर्न, पर्थ तथा एडीलेड में पेट्रो-रसायन उद्योग स्थापित हैं। दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका महाद्वीप में पेट्रो-रसायनों के क्षेत्र में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई है। कुछ गिने-चुने उद्योग दक्षिणी अफ्रीका तथा ब्राज़ील में हैं।
HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ 3

प्रश्न 4.
आकार के आधार पर उद्योगों के वर्गीकरण की व्याख्या।
अथवा
आकार पर आधारित उद्योग कौन-कौन से हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
उद्योगों को उनके आकार के आधार पर निम्नलिखित तीन वर्गों में रखा जाता है-

  • कुटीर उद्योग (Cottage Industry)
  • लघु उद्योग या छोटे पैमाने के उद्योग (Small Scale Industry)
  • बड़े पैमाने के उद्योग (Large Scale Industry)

1. कुटीर उद्योग-यह वस्तुओं के निर्माण का प्रारंभिक रूप है, जो प्राचीनतम भी है। इसमें न्यूनतम पूँजी का निवेश तथा कभी-कभी यह केवल मानवीय श्रम द्वारा भी लगाया जाता है। इसमें वस्तुओं का निर्माण स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल के आधार पर घरों में ही किया जाता है। इसलिए इन्हें घरेलू या ग्राम उद्योग भी कहा जाता है। इनमें अधिकांश कार्य हाथ से किए जाते हैं, इसलिए इन्हें हस्तशिल्प उद्योग भी कहा जाता है। यह उद्योग ग्रामीण किसानों द्वारा खाली समय में किया जाता है।

किसानों को जब खेत के काम से फुरसत मिलती है तो उस समय ये उद्योग संचालित किए जाते हैं। इन उद्योगों में मिट्टी के बर्तन बनाना, मूर्तियां बनाना, चटाइयां बनाना, टोकरियां बनाना, सूत कातना, चमड़े से जूते बनाना, रस्सी बनाना, ईंट बनाना, धातुओं से सजावट का सामान तथा हथियार बनाना, लकड़ी से फर्नीचर तथा इमारती सामान बनाना आदि कार्य सम्मिलित हैं। आज के विकसित तथा विकासशील देशों में कुटीर उद्योग जीवित हैं, लेकिन विकसित देशों में उद्योगों को पुनर्जीवित करने तथा प्रोत्साहन देने के लिए सरकारें अनेक रियायतें दे रही हैं, जिससे प्राचीन संस्कृति को संजोए रखा जा सके।

2. लघु उद्योग या छोटे पैमाने के उद्योग-ये उद्योग-धंधे कुटीर उद्योगों का ही विस्तृत रूप है। मानवीय आवश्यकताओं में वृद्धि के फलस्वरूप कुटीर उद्योग जब सभी आवश्यकताओं को पूरी करने में असक्षम रहे, तब कुशल कारीगरों एवं छोटी मशीनों के द्वारा उत्पादन में वृद्धि करनी पड़ी। इन उद्योगों में कम पूँजी, कुशल श्रमिकों तथा मशीनों से कार्य होता है। इन उद्योगों में दूर-दूर के क्षेत्रों से कच्चा माल मंगवाया जाता है तथा निर्मित वस्तुएँ भी दूर-दूर तक बेची जाती हैं।

ये उद्योग अधिक लोगों को रोजगार की सुविधा प्रदान करते हैं, क्योंकि इन उद्योगों में श्रमिकों की अधिक आवश्यकता होती है। विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में इन उद्योगों का विशेष योगदान है। लघु उद्योगों में कागज बनाना, कपड़े बनाना, बर्तन, फर्नीचर, बिजली तथा इलैक्ट्रॉनिक्स का सामान बनाना, धातु के द्वारा बर्तन बनाना, तेल की पिराई, साबुन बनाना, पुस्तकें, छापना आदि सम्मिलित हैं।

3. बड़े पैमाने के उद्योग-बड़े पैमाने के उद्योग-धंधे औद्योगिक क्रांति की देन हैं। इसमें बड़ी-बड़ी मशीनें तथा बड़ी मात्रा में पूँजी का निवेश किया जाता है। मशीनों के आविष्कार ने मानव का कार्य आसान कर दिया। इन उद्योगों में मशीनी शक्ति को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। कम समय में अधिक वस्तुओं का उत्पादन बड़े उद्योगों के कारण ही संभव हुआ है। बड़े पैमाने के उद्योगों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • इन उद्योगों में बड़ी मात्रा में पूँजी लगती है।
  • इन उद्योगों के संचालन के लिए ऊर्जा की अधिक आवश्यकता होती है।
  • इन उद्योगों में श्रमिकों की संख्या अधिक तथा श्रमिक कुशल होते हैं।
  • इन उद्योगों के लिए दूर-दूर से कच्चा माल मंगवाया जाता है।
  • इन उद्योगों में उत्पादित माल का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार होता है।
  • उन उद्योगों में वस्तुओं की गुणवत्ता तथा किस्म पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

बड़े पैमाने के उद्योग आज अधिकांशतः विकसित देशों में स्थापित हैं, जिसके कारण उनका औद्योगिक एवं आर्थिक विकास का स्तर ऊँचा है। अमेरिका, जापान, रूस तथा यूरोपीय देशों में बड़े पैमाने के उद्योग, विद्युत् उपकरण, चीनी, वस्त्र तथा विभिन्न रासायनिक उद्योग आते हैं। भारत में स्वतंत्रता के बाद बड़े उद्योगों का विकास तथा विस्तार किया गया।

प्रश्न 5.
कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
कच्चे माल पर आधारित उद्योगों का वर्गीकरण पाँच शीर्षकों के अंतर्गत किया जाता है-

  • कृषि आधारित उद्योग
  • खनिज आधारित उद्योग
  • रसायन आधारित उद्योग
  • वन आधारित उद्योग
  • पशु आधारित उद्योग

1. कृषि आधारित उद्योग जो उद्योग-धंधे कृषि की फसलों पर आधारित होते हैं या कृषि की फसलों से कच्चा माल प्राप्त करते हैं, उन्हें कृषि आधारित उद्योग कहते हैं। कृषि या खेतों से प्राप्त कच्चे माल को विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा तैयार करके बाजारों में भेजा जाता है; जैसे चीनी, शक्कर, आचार, फलों के रस, मसाले, तेल, रबड़, वस्त्र आदि।

2. खनिज आधारित उद्योग-ऐसे उद्योग जिनमें खनिजों को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, खनिज आधारित उद्योग कहलाते हैं। कुछ उद्योग लौह अंश वाले धात्विक खनिजों; जैसे लौह इस्पात का इस्तेमाल करते हैं, तो कुछ उद्योग अलौह धात्विक खनिजों; जैसे ताँबा, एल्युमीनियम का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रकार खनिज आधारित उद्योग दो प्रकार के होते हैं

  • लौह धात उद्योग-लौह धात उद्योग ऐसी धातुओं पर आधारित होते हैं जिनमें लौहांश की मात्रा विद्यमान होती है। लौह-इस्पात उद्योग, मशीन व औजार उद्योग, तेल इंजन, मोटरकार, कृषि उपकरण उद्योग आदि इसके उदाहरण हैं।
  • अलौह धातु उद्योग-अलौह धातु उद्योग ऐसी धातुओं पर आधारित होते हैं जिनमें लौहांश विद्यमान नहीं होता। ताँबा, ऐल्युमीनियम, जवाहरात उद्योग आदि इसके उदाहरण हैं।

3. रसायन आधारित उद्योग-रसायन उद्योगों में विभिन्न प्रकार के रासायनिक खनिजों का उपयोग होता है; जैसे पेट्रो रसायन उद्योग में खनिज तेल या पैट्रोलियम का उपयोग होता है। रसायन उद्योगों में नमक, पोटाश, गंधक, कोयला व पेट्रोलियम आदि का उपयोग किया जाता है।

4. वन आधारित उद्योग-वनों पर आधारित उद्योगों को कच्चा माल वनों से प्राप्त होता है। फर्नीचर उद्योग के लिए इमारती लकड़ी, कागज उद्योग के लिए लकड़ी तथा लाख उद्योग के लिए लाख वनों से ही प्राप्त होती है।

5. पशु आधारित उद्योग-पशु आधारित उद्योगों को कच्चा माल पशुओं से ही प्राप्त होता है; जैसे चमड़ा उद्योग के लिए चमड़ा एवं ऊन उद्योग के लिए ऊन पशुओं से ही प्राप्त होती है।

6. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक सत्य नहीं है?
(A) बाह्यस्रोतन दक्षता को बढ़ाता है और लागतों को घटाता है।
(B) कभी-कभार अभियांत्रिकी और विनिर्माण कार्यों की भी बाह्यस्रोतन की जा सकती है।
(C) बी०पी०ओज़ के पास के०पी०ओज़ की तुलना में बेहतर व्यावसायिक अवसर होते हैं।
(D) कामों के बाह्यस्रोतन करने वाले देशों में काम की तलाश करने वालों में असंतोष पाया जाता है।
उत्तर:
(D) कामों के बाह्यस्रोतन करने वाले देशों में काम की तलाश करने वालों में असंतोष पाया जाता है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
फुटकर व्यापार सेवा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ये वे व्यापारिक क्रियाकलाप हैं जो उपभोक्ताओं की वस्तुओं के प्रत्यक्ष विक्रय से संबंधित हैं। अधिकांश फुटकर व्यापार केवल विक्रय के लिए तय दुकानों और भंडारों में संपन्न होते हैं। उदाहरणतया फेरी, रेहड़ी, ट्रक, द्वार से द्वार डाक आदेश, दूरभाष, इंटरनेट, फुटकर बिक्री आदि।

प्रश्न 2.
चतुर्थ सेवाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चतुर्थ सेवाएँ अनुसंधान एवं विकास पर केंद्रित होती हैं और विशिष्टीकृत ज्ञान प्रौद्योगिक कुशलता और प्रशासकीय सामर्थ्य से संबद्ध सेवाओं के उन्नत नमूने के रूप में देखी जाती हैं। उच्च कोटि के बौद्धिक व्यवसायों को चतुर्थ सेवाओं के अंतर्गत रखा जाता है। अध्यापन, चिकित्सा, वकालत, अनुसंधान, सूचना आधारित ज्ञान आदि चतुर्थ सेवाओं के उदाहरण हैं।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

प्रश्न 3.
विश्व में चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्रों में तेजी से उभरते हुए देशों के नाम लिखिए।
उत्तर:
विश्व में चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्रों में तेजी से उभरते हुए देशों में भारत तेजी से उभर रहा है। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में उभरते हुए देश हैं-थाइलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस आदि।

प्रश्न 4.
अंकीय विभाजन क्या है?
उत्तर:
सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित विकास से मिलने वाले अवसरों का वितरण पूरे ग्लोब पर असमान रूप से वितरित है। देशों में विस्तृत आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। विकसित देश, सामान्य रूप से इस दिशा में आगे बढ़ गए हैं जबकि विकासशील देश पिछड़ गए हैं। यही अंकीय विभाजन कहलाता है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आधुनिक आर्थिक विकास में सेवा सेक्टर की सार्थकता और वृद्धि की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक युग में आर्थिक विकास के लिए सेवाओं का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। कुछ वर्ष पूर्व सेवाओं की अपेक्षा वस्तुओं के उत्पादन पर अधिक बल दिया जाता था लेकिन विकसित अर्थव्यवस्था में सेवाओं पर आधारित विकास में तेजी आई है। आधुनिक आर्थिक विकास में सेवा सेक्टर की सार्थकता के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं

  • सेवा सेक्टर में फुटकर बिक्री और परिवहन के साधन सम्मिलित हैं जो विक्रेताओं एवं उपभोक्ताओं को जोड़ते हैं।
  • सेवा सेक्टर कच्चे माल को कारखाने तक और निर्मित माल को कारखाने से बाजार तक ले जाने में सहायता करते हैं।
  • सेवा सेक्टर वाणिज्यिक सेवा कम्पनियों की उत्पादकता एवं क्षमता में वृद्धि लाते हैं।

आधुनिक आर्थिक विकास में सेवा सेक्टर की वृद्धि – विकसित देशों के सेवा क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। विकासशील देशों में भी विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में सेवा क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है लेकिन इन देशों में बहुत-से लोग असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जिनका लेखा-जोखा अच्छी तरह से नहीं रखा जाता।

अधिकतर देशों में विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। पहले प्राथमिक क्षेत्र का वर्चस्व होता है, उसके बाद द्वितीयक क्षेत्र का महत्त्व बढ़ने लगता है। अंतिम अवस्थाओं में तृतीयक और चतुर्थक क्रियाकलाप महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं। बहुत-से देशों में विनिर्माण उद्योगों में रोज़गार के अवसर घटते जा रहे हैं तथा सकल घरेलू उत्पाद में उनका अनुपात कम होता जा रहा है। आधुनिक आर्थिक विकास में सेवाओं का महत्त्व इतना बढ़ गया है कि उन्हें उत्पादक कार्यों की श्रेणी में रखा जाने लगा है। सेवाएँ अब निर्यातक बन गई हैं। कुछ देश; जैसे स्विट्ज़रलैंड तथा यूनाइटिड किंगडम सेवा क्षेत्र में उद्योगों से आगे निकल गए हैं।

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HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् समास प्रकरणम्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Samas Prakaranam समास प्रकरणम् Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit व्याकरणम् समास प्रकरणम्

परिभाषा – संक्षेप करने के लिए पदों के बीच में विभक्ति का लोप करके दो या दो से अधिक शब्दों के एक बन जाने को समास कहते हैं, जैसे –
राज्ञः पुत्रः = राजपुत्रः।
समास में विग्रह – जब समस्त पद का अर्थ स्पष्ट करने के लिए उसमें प्रयुक्त शब्दों के आगे विभक्ति लगा दी जाती है तो वह समस्त पद का विग्रह कहलाता है, जैसे –
‘राजपुत्रः’ इस पद के मध्य कोई विभक्ति नहीं है, लेकिन इसका अर्थ है ‘राजा का पुत्र’। इसी अर्थ को जब हम प्रत्येक। के सामने विभक्ति रखकर प्रकट करते हैं तो वह अवस्था ‘विग्रह अवस्था’ कहलाती है; जैसे-राज्ञः पुत्रः = राजपुत्रः। समास के प्रकार-संस्कृतभाषा में मुख्यतया चार प्रकार के समास होते हैं –
1. अव्ययीभाव समास
3. बहुब्रीहि समास
2. तत्पुरुष समास
4. द्वन्द्व समास

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् समास प्रकरणम्

1. अव्ययीभाव समास :

अव्ययीभाव उस समास को कहते हैं जिसमें पूर्वपद अव्यय हो। इसमें अव्यय या उपसर्ग के साथ संज्ञा का समास होता है; जैसे –
दिनम् दिनम् इति प्रतिदिनम्।
अव्ययीभाव समास में अव्ययों का निम्न अर्थों में समास होता है –

(i) विभक्ति (किसी विभक्ति के अर्थ में); जैसे –
हरौ इति = अधिहरि।
आत्मनि इति = अध्यात्मम्।
नगरे इति = अधिनगरम्।
ग्रामे इति = अधिग्रामम्।

ऊपर के उदाहरणों में विग्रह वाक्य में ‘अधि’ इस अव्यय का प्रयोग सप्तमी विभक्ति के अर्थ में किया गया है।

(ii) सामीप्य (समीपता); जैसे –
कृष्णस्य समीपम् = उपकृष्णम्,
कूलस्य समीपम् = उपकूलम्।
नद्याः समीपम् = उपनदि।
देवस्य समीपम् = उपदेवम्।

(iii) समृद्धि (सौभाग्य); जैसे –
मद्राणां समृद्धिः = सुमद्रम्।
[समृद्धि अर्थ में ‘सु’ अव्यय का समास]

(iv) अर्थाभाव (किसी वस्तु का अभाव) जैसे –
मक्षिकाणामभावः = निर्मक्षिकम् [अभाव’ अर्थ में ‘निर्’ उपसर्ग का समास]

(v) पश्चात् (पीछे ), जैसे –
विष्णो पश्चात् = अनुविष्णु। [‘पश्चात्’ अर्थ में ‘अनु’ उपसर्ग का समास]

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् समास प्रकरणम्

(vi) योग्यता, जैसे – रूपस्य योग्यम् = अनुरूपम्। गुणस्य योग्यम् = अनुगुणम्। ‘योग्यता’ अर्थ में ‘अनु’ उपसर्ग का समास’

(vii) वीप्सा (द्विरावृत्ति), जैसे –
अर्थमर्थम् = प्रत्यर्थम्। एकमेकम् = प्रत्येकम्।
अहनि अहनि = प्रत्यहम्। दिनम् दिनम् = प्रतिदिनम्।

(viii) सादृश्य (समानता) जैसे-हरे: सादृश्यम् = सहरि
[सादृश्यम् अर्थ में सह अव्यय का प्रयोग करके फिर सह को स बना कर समास]

(ix) अनतिवृत्ति (किसी पदार्थ की सीमा का उल्लङ्घन न करना, अर्थात् उसके अनुसार ही कार्य करना), जैसे –
विधिम् अनतिक्रम्य = यथाविधि।
शक्तिमनतिक्रम्य = यथाशक्ति।
उक्तमनतिक्रम्य = यथोक्तम्।
नियमनतिक्रम्य = यथानियमम्।
[‘अनतिक्रम्य’ अर्थ में ‘यथा’ अव्यय का समास]

(x) आनूपूर्व्य = (अनुक्रम, क्रम से), जैसे –
ज्येष्ठस्य आनुपूर्येण-अनुज्येष्ठम्। [‘आनुपूर्व्य’ अर्थ में अनु’ उपसर्ग का समास]

(xi) युगपद् (साथ, समकाल में), जैसे –
चक्रेण युगपद् = सचक्रम्। [‘युगपत्’ अर्थ में सह = ‘स’ अव्यय का समास]

(xii) मर्यादा (सीमा), जैसे –
आ मुक्तेः = आमुक्ति।
आ समुद्रात् = आसमुद्रम्।
आ बालेभ्यः = आबालम्।
आ नगरात् = आनगरम्।
[मर्यादा’ अर्थ में ‘आ’ उपसर्ग का समास]

(xiii) प्रति, पर और अनु इनके साथ अक्षि’ शब्द का अव्ययीभाव समास करने पर इसके अन्तिम ‘इ’ को ‘अ’ हो जाता है, जैसे –
अक्ष्णोः अभिमुखम् = प्रत्यक्षम्।
अक्ष्णोः परम् = परोक्षम्।
अक्ष्णोः योग्यम् = समक्षम्।
अक्ष्णोः पश्चात् = अन्वक्षम्।

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2. तत्पुरुष समास :

तत्पुरुष समास ऐसे दो पदों में होता है, जिनमें से पहला पद दूसरे का निर्धारण अथवा व्यवस्था करे। इसमें उत्तरपद का अर्थ प्रधान होता है और पूर्वपद प्रथमा के अतिरिक्त सभी विभक्तियों में प्रयुक्त होता है।

तत्पुरुष समास के निम्नलिखित भेद हैं –

1. द्वितीयातत्पुरुष समास – इनमें विग्रह वाक्य में पूर्व पद द्वितीया विभक्ति का होता है, जैसे –
ग्रामं गतः = ग्रामगतः।
शरणमापन्नः शरणापन्नः।
दुःखमतीतः = दुःखातीतः।
स्वर्ग प्राप्तः = स्वर्गप्राप्तः।
कृष्णं श्रितः = कृष्णाश्रितः।
नरकं पतितः = नरकपतितः।

2. तृतीयातत्पुरुष समास-इसमें पूर्वपद तृतीयान्त होता है और तृतीया विभक्ति का अर्थ देता है, जैसे –
नखैः भिन्नः = नखभिन्नः।
असिना छिन्नः = असिछिन्नः।
मासेन पूर्वः = मासपूर्वः।
शकुलया खण्डः = शकुलाखण्डः।
लोकैः पूजितः = लोकपूजितः।
अहिना दष्टः = अहिदष्टः।
धान्येन अर्थः = धान्यार्थः।
हरिणा त्रातः = हरित्रातः।
मात्रा सदृशः = मातृसदृशः।

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3. चतुर्थीतत्पुरुष समास – इसमें विग्रहवाक्य का पूर्वपद चतुर्थी विभक्त्यन्त होता है, जैसे –

द्विजाय अयम् = द्विजार्थः सूपः।
भूतेभ्यः बलिः = भूतबलिः।
द्विजाय इदम् = द्विजार्थं पयः।
कुण्डलाय हिरण्यम् = कुण्डलहिरण्यम्।
यूपाय दारु = यूपदारु।
द्विजाय इयम् = द्विजार्थयवागूः।
गवे हितम् = गोहितम्।
गवे सुखम् = गोसुखम्।

4. पञ्चमीतत्पुरुष समास-इस समास के पञ्चम्यन्त पूर्वपद का भय, भीत, भीति, अपेत, मुक्त, पतित आदि शब्दों के साथ समास हो जाता है, जैसे –

चोराद् भयम् = चोरभयम्।
सुखात् अपेतः = सुखोपेतः।
चोराद् भीतः = चोरभीतः।
स्वर्गात् पतितः = स्वर्गपतितः।
दुःखात् मुक्तः = दुःखमुक्तः।
सिंहाद् भीतः = सिंहभीतः।
संसारात् मुक्तः = संसारमुक्तः।
वृकात् भीतः = वृकभीतः।

5. षष्ठीतत्पुरुष समास – इस समास में षष्ठ्यन्त (षष्ठी विभक्ति वाले) पूर्वपद का किसी समर्थपद के साथ समास हो जाता है, जैसे –

राज्ञः पुत्रः = राजपुत्रः।
राज्ञः पुरुषः = राजपुरुषः।
रामस्य सेवकः = रामसेवकः।
राज्ञः पुरोहितः = राजपुरोहितः।
रत्नानाम् आकरः = रत्नाकरः।
विद्यायाः सागरः = विद्यासागरः।

अपवाद-‘त’ और ‘अक’ प्रत्ययान्त कर्तृवाची सुबन्त शब्दों का षष्ठ्यन्त पद के साथ समास नहीं होता है, जैसे –
नस्य पाचकः, अपां स्रष्टा, वेदस्य रक्षिता। लेकिन याचक, पूजक, स्नातक, परिचारक, अध्यापक, भर्त, होतृ इत्यादि शब्दों का षष्ठ्यन्त शब्द के साथ समास हो जाता है, जैसे –
ब्राह्मणानां याचकः = ब्राह्मणयाचकः।
राज्ञः परिचारकः =राजपरिचारकः।
देवानां पूजकः = देवपूजकः।
गुरुकुलस्य स्नातकः = गुरुकुलस्नातकः।
अग्नेः होता = अग्निहोता।

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6. सप्तमीतत्पुरुष समास-इस समास में पूर्वपद में सप्तमी विभक्ति होती है और इसका धूर्त, प्रवीण, पण्डित, कुशल, सिद्ध, शुष्क, पक्व, बन्ध आदि शब्दों के साथ समास हो जाता है, जैसे –
कार्ये कुशलः = कार्यकुशलः।
रणे कुशलः = रणकुशलः।
सभायां पण्डितः = सभापण्डितः।
अक्षेषु कुशलः = अक्षकुशलः।
अक्षेषु शौण्डः = अक्षशौण्डः।
चक्रे बन्धः = चक्रबन्धः।
पाशे बन्धः = पाशबन्धः।
स्थाल्यां पक्वः = स्थालीपक्वः।
आतपे शुष्कः = आतपशुष्कः।
वाचि पटुः = वाक्पटुः।

7. अलुक्तत्पुरुष समास-जिन समस्त पदों के पूर्वपद की विभक्ति का लोप न हो उन्हें ‘अलुक् तत्पुरुष’ समास कहते हैं।
(i) तृतीया-अलुक् तत्पुरुष – इसमें तृतीया विभक्ति का लोप नहीं होता –
पुंसा अनुजः = पुंसानुजः,
जनुषा अन्धः = जनुषान्धः।

(ii) चतुर्थी अलुक् तत्पुरुष – इसमें चतुर्थी विभक्ति का लोप नहीं होता – आत्मने पदम् आत्मनेपदम्। परस्मै पदम् परस्मैपदम्।

(iii) पञ्चमी अलुक तत्पुरुष – इसमें चतुर्थी विभक्ति का लोप नहीं होता –
स्तोकात् मुक्तः स्तोकान्मुक्तः।
दूरात् आयातः दूरादायातः।

(iv) षष्ठी-अलुक तत्पुरुष – इसमें षष्ठी विभक्ति का लोप नहीं होता वाचः पति-वाचस्पतिः, दास्यः पुत्र दास्याः पुत्रः, पश्यतः हरः पश्यतोहरः।

(v) सप्तमी-अलुक् तत्पुरुष – इसमें सप्तमी विभक्ति का लोप नहीं होता-युधि स्थिरः युधिष्ठिरः, कर्णे जपः कर्णेजपः, सरसि जायते इति सरसिजम्, अन्ते वसति इति अन्तेवासी।

8. न तत्पुरुष – जिसमें किसी पद के साथ निषेधार्थक ‘न’ के साथ समास किया जाता है, उसे नञ् तत्पुरुष समास कहते हैं।
(क) यदि ‘न’ से परे कोई ऐसा शब्द हो जिसके आदि में कोई व्यञ्जन हो तो ‘न’ को ‘अ’ हो जाता है, जैसे –

न पण्डितः = अपण्डितः।
न ब्राह्मणः = अब्राह्मणः।
न क्षत्रियः = अक्षत्रियः।
न उदारः = अनुदारः।
न न्यायः = अन्यायः।
न विद्वान् = अविद्वान्।
न हिंसा: अहिंसा।
न चिरात् = अचिरात्।
न साधुः = असाधुः।

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(ख) यदि ‘न’ से परे कोई ऐसा शब्द हो जिसके आदि में कोई स्वर हो तो ‘न’ को ‘अन्’ हो जाता है, जैसे –

न अश्वः = अनश्वः।
न उपकारः = अनुपकारः।
न आदि = अनादिः।
न अर्थः = अनर्थः।
न उपस्थितः = अनुपस्थितः।

9. कर्मधारय तत्पुरुष – इसमें पूर्वपद विशेषण और उत्तरपद विशेष्य होता है, जैसे –

कृष्णश्चासौ सर्पः = कृष्णसर्पः।
परमः राजा = परमराजः।
नीलमुत्पलम् = नीलोत्पलम्।
मूर्खश्चासौ पुरुषः = मूर्खपुरुषः।
महान् चासौ पुरुषः = महापुरुषः।
कृष्णा चतुर्दशी = कृष्णचतुर्दशी।
श्वेतम् कमलम् = श्वेतकमलम्।
महती प्रिया = महाप्रिया।
कृष्णः सखा = कृष्णसखा।
कृष्ण सर्पः = कृष्णसर्पः।
सुकेशी भार्या = सुकेशभार्या।
पुण्यम् अहः = पुण्याहः।
घन इव श्यामः = घनश्यामः।
वानर इव चञ्चलः = वानरचञ्चलः।
मुखम् इन्द्रः इव = मुखेन्द्रः।
पुरुषः व्याघ्र इव = पुरुषव्याघ्रः।
ब्राह्मणी भार्या = ब्राह्मणभार्या।
महती मधुरा = महामधुरा।

10. उपपद तत्पुरुष समास-इस समास में उत्तरपद किसी धातु से निष्पन्न विशेष पद होता है और पूर्व पद का कर्मकारक यदि उत्तरपद के धातु से बनने वाले शब्द के साथ किसी कारक के रूप में सम्बन्ध रखता है तो वह समस्तपद उपपद समास कहलाता है। जैसे –

कुम्भं करोतीति = कुम्भकारः।
विश्वं जयतीति = विश्वजित्।
इन्द्रं जयतीति = इन्द्रजित्।
धनं ददातीति = धनदः।
उष्णं भुङ्क्ते इति = उष्णभोजी।

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11. द्विगु तत्पुरुष समास – जहाँ समाहार (समूह) का बोध होता है और पूर्वपद संख्यावाची हो, उसे द्विगु तत्पुरुष समास कहते हैं।
(क) इस समास में समस्तपद प्रायः एकवचन तथा नपुंसकलिंग होता है, जैसे –

त्रयाणां भुवनानां समाहारः = त्रिभुवनम्।
पञ्चानां तन्त्राणां समाहारः = पञ्चतन्त्रम्।
पञ्चानां पात्राणां समाहारः = पञ्चपात्रम्।
सप्तानां दिनानां समाहारः = सप्तदिनम्।

(ख) जिस द्विगु समास में उत्तरपद अकारान्त हो उसमें समस्तपद स्त्रीलिङ्ग होता है, जैसे –

पञ्चानां मूलानां समाहारः = पञ्चमूली।
अष्टानामध्यायानां समाहारः = अष्टाध्यायी।
नवानामध्यायानां समाहारः = नवाध्यायी।
पञ्चानां वटानां समाहारः = पञ्चवटी।
त्रयाणां लोकानां समाहारः = त्रिलोकी।
सप्तानां शतानां समाहारः = सप्तशती।
शतानां अब्दानां समाहारः = शताब्दी।

3. बहुब्रीहि समास :

बहुब्रीहि समास उन दो या दो से अधिक पदों में होता है जो मिलकर किसी अन्य नाम का विशेषण बन जाते हैं ; जैसे चक्रं पाणौ यस्य सः-चक्रपाणिः। बहुब्रीहि समास दो प्रकार का होता है –
(क) समानाधिकरण बहुब्रीहि और
(ख) व्यधिकरण बहुब्रीहि।

(क) समानाधिकरण बहुब्रीहि समानाधिकरण बहुब्रीहि में विग्रहवाक्य में सभी पद प्रथम-विभक्त्यन्त होते हैं, जैसे –

(i) पीतानि अम्बराणि यस्य सः-पीताम्बरः।
(ii) चित्रा गावो यस्य सः-चित्रगुः।
(iii) विमला बुद्धिः यस्य सः-विमलबुद्धिः।
(iv) श्वेतानि अम्बराणि यस्य सः-श्वेताम्बरः।

(ख) व्यधिकरण बहुब्रीहि व्यधिकरण बहुब्रीहि समास में पूर्वपद तथा उत्तरपद दोनों में भिन्न-भिन्न विभक्तियाँ आती हैं, जैसे –

(i) कण्ठे कालः यस्य सः-कण्ठकालः।
(ii) चक्रं पाणौ यस्य सः-चक्रपाणिः।

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4. द्वन्द्व समास :

उभयपदार्थ-प्रधानो द्वन्द्वः – जिस समास में दोनों पदों के अर्थ की प्रधानता हो उसे ‘द्वन्द्व समास कहते हैं। जब दो या दो से अधिक संज्ञाएँ इस तरह जुड़ी रहती हैं कि उनके मध्य ‘च’ छिपा रहे तब ‘द्वन्द्व समास होता है। जैसे –
कृष्णश्च अर्जुनश्च = कृष्णार्जुनौ।

यह द्वन्द्व समास प्रधानतया तीन प्रकार का होता है –

1. इतरेतरद्वन्द्व
2. समाहारद्वन्द्व
3. एकशेषद्वन्द्व।

1. इतरेतरद्वन्द्व – इस समास में दो पदों के समास के साथ द्विवचन और दो से अधिक पदों के समास के साथ बहुवचन आता है। इसमें लिङ्ग का विधान अन्तिम पद के लिङ्ग के अनुसार होता है। जैसे –

माता च पिता च = मातापितरौ।
कन्दञ्च मूलं च फलञ्च = कन्दमूलफलानि।
कुक्कुटश्च मयूरी च = कुक्कुटमयूर्यो।

2. समाहारद्वन्द्व – इस समास में समाहार (समूह) का बोध होता है। समस्तपद में नपुंसकलिङ्ग का एकवचन आता है। जैसे –

पाणी च पादौ च एतेषां समाहारः = पाणिपादम्।
दधि च घृतं च अनयोः समाहारः = दधिघृतम्।
अहश्च रात्रिश्च = अहोरात्रम्।
गौश्च महिषी च = गोमहिषम्।

3. एकशेष द्वन्द्व – इस समास में विग्रह, में प्रयुक्त अनेक पदों में से एक ही पद शेष रह जाता है और अर्थ के अनुसार वचन का प्रयोग होता है। जैसे

माता च पिता च = पितरौ।
पुत्रश्च पुत्री च = पुत्रौ।
स च स च = तौ।
रामश्च रामश्च = रामौ।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् समास प्रकरणम्

पाठ्यपुस्तक से समास/विग्रह के उदाहरण –

पाठ्यपुस्तक से उदाहरण –

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् समास प्रकरणम् 1

पाठ्यपुस्तक से उदाहरण –

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् समास प्रकरणम् 2

V. द्वन्द्वसमासस्य परिभाषां सोदाहरणं हिन्दीभाषायां लिखत।
उत्तरम् :
जब दो या दो से अधिक संज्ञाएँ इस तरह जुड़ती हैं कि उनके मध्य ‘च’ छिपा रहे, तब द्वन्द्व समास होता है। जैसे – कृष्ण चः अर्जुनः च = कुष्णार्जुनौ
यह समास तीन प्रकार का होता है –
1. इतरेतर द्वन्द्व-माता च पिता च = मातापितरौ।
2. समाहारद्वन्द्व-पाणी च पादौ च एतेषां समाहारः = पाणिपादम्।
3. एकशेष द्वन्द्व माता च पिता च = पितरौ।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् समास प्रकरणम्

VI. अव्ययीभावसमासस्य परिभाषां सोदाहरणं लिखत।
उत्तरम् :
अव्ययीभावसमास – विभक्ति आदि अर्थों में अव्ययीभाव समास होता है। इसमें अव्यय या उपसर्ग के साथ संज्ञा पद का समास होता है। इसका पूर्वपद कोई अव्यय होत है।
उदाहरण :
दिनम् दिनम् इति प्रतिदिनम्।
कृष्णस्य समीपम् उपकृष्णम्।
रूपस्य योग्यम् अनुरूपम्।

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 9 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 9 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 9 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. संसार के अधिकांश महान पत्तन इस प्रकार वर्गीकृत किए गए हैं
(A) नौसेना पत्तन
(B) विस्तृत पत्तन
(C) तैल पत्तन
(D) औद्योगिक पत्तन
उत्तर:
(B) विस्तृत पत्तन

2. निम्नलिखित महाद्वीपों में से किस एक से विश्व व्यापार का सर्वाधिक प्रवाह होता है?
(A) एशिया
(B) यूरोप
(C) उत्तरी अमेरिका
(D) अफ्रीका
उत्तर:
(C) उत्तरी अमेरिका

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 9 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

3. दक्षिण अमरीकी राष्ट्रों में से कौन-सा एक ओपेक का सदस्य है?
(A) ब्राज़ील
(B) वेनेजुएला
(C) चिली
(D) पेरू
उत्तर:
(B) वेनेजुएला

4. निम्न व्यापार स से भारत किसका एक सह-सदस्य है?
(A) साफ्टा (SAFTA)
(B) आसियान (ASEAN)
(C) ओइसीडी (OECD)
(D) ओपेक (OPEC)
उत्तर:
(A) साफ्टा (SAFTA)

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
विश्व व्यापार संगठन के आधारभूत कार्य कौन-से हैं?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन एकमात्र ऐसा अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जो राष्ट्रों के मध्य वैश्विक नियमों का व्यवहार करता है। यह विश्वव्यापी व्यापार तंत्र के लिए नियमों को नियत करता है और इसके सदस्य देशों के बीच विवादों का निपटारा करते हैं।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 9 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 2.
ऋणात्मक भुगतान संतुलन का होना किसी देश के लिए क्यों हानिकारक होता है?
उत्तर:
यदि किसी देश में निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की अपेक्षा आयात की जाने वाली वस्तुओं का मूल्य ज्यादा होता है तो उस देश का व्यापार संतुलन ऋणात्मक कहा जाता है। इसे विलोम व्यापार संतुलन या प्रतिकूल व्यापार संतुलन कहते हैं। इससे देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 3.
व्यापारिक समूहों के निर्माण द्वारा राष्ट्रों को क्या लाभ प्राप्त होते हैं?
उत्तर:
प्रादेशिक व्यापार समूह व्यापार की मदों में भौगोलिक समीपता, समरूपता और पूरकता के साथ देशों के बीच व्यापार को बढ़ाने एवं विकासशील देशों के व्यापार पर लगे प्रतिबंध को हटाने के उद्देश्य से विकसित हुए हैं। ये व्यापारिक समूह राष्ट्रों में . व्यापार शुल्क को हटा देते हैं तथा मुक्त व्यापार को बढ़ावा देते हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पत्तन किस प्रकार व्यापार के लिए सहायक होते हैं? पत्तनों का वर्गीकरण उनकी अवस्थिति के आधार पर कीजिए।
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में पत्तन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हीं पत्तनों द्वारा जहाज़ी माल तथा यात्री विश्व के एक भाग से दूसरे भाग को जाते हैं। पत्तन जहाज़ के लिए गोदी लादने, उतारने तथा भंडारण के लिए सुविधाएँ प्रदान करते हैं तथा पत्तन आयात और निर्यात करने के क्षेत्र हैं। ये अपने पृष्ठ क्षेत्र से यातायात के साधनों द्वारा जुड़े होते हैं। यहाँ स्थल मार्गों द्वारा विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ आती हैं जिन्हें सागरीय मार्ग द्वारा दूसरे देशों में भेजा जाता है व अन्य देशों से आयात किया गया माल इन पत्तनों द्वारा ही पृष्ठ देश में भेजा जाता है।

अवस्थिति के आधार पर पत्तनों का वर्गीकरण-अवस्थिति के आधार पर पत्तनों के प्रकार निम्नलिखित हैं-

  1. अंतर्देशीय पत्तन-ये पत्तन समुद्री तट से दूर अवस्थित होते हैं। ये समुद्र से एक नदी अथवा नहर द्वारा जुड़े होते हैं। ऐसे पत्तन चौरस तल वाले जहाज़ द्वारा ही गम्य होते हैं। उदाहरणतया मानचेस्टर, कोलकाता।
  2. बाह्य पत्तन-ये गहरे जल के पत्तन हैं जो वास्तविक पत्तन से दूर बने होते हैं। ये उन जहाज़ों, जो अपने बड़े आकार के कारण उन तक पहुँचने में असमर्थ हैं, को ग्रहण करके पैतृक पत्तनों को सेवाएं प्रदान करते हैं।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 9 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 2.
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से देश कैसे लाभ प्राप्त करते हैं?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का लाभ सभी व्यापारी देशों को मिलता है-

  1. इससे श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण के सभी लाभ प्राप्त होते हैं।
  2. व्यापार के लिए वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाना होता है। परिणामस्वरूप वस्तुओं का उपभोग बढ़ता है और इससे लोगों . का कल्याण अर्थात् जीवन स्तर बढ़ता है।
  3. विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं की विश्वव्यापी उपलब्धता के कारण कीमतों और वेतन का समानीकरण होता है।
  4. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रवेश करने से पहले निष्क्रिय, भूमि, श्रम व अन्य संसाधनों का प्रयोग अधिक उत्पादन के लिए किया जाता है।
  5. विदेशी व्यापार के माध्यम से हर देश अपनी सर्वश्रेष्ठ वस्तु को बाजार में उतारता है। आयात और निर्यात से अन्य आर्थिक क्रियाओं का विकास होता है।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार HBSE 12th Class Geography Notes

→ अंतर्देशीय या प्रादेशिक या देशी व्यापार (Inland or Regional Trade) : देश के विभिन्न राज्यों और केन्द्र-शासित प्रदेशों के बीच होने वाला व्यापार।

→ सीमाप्रांतीय व्यापार (Overland Trade) : किसी देश का अपने उन पड़ोसी देशों के साथ व्यापार जिनकी स्थलीय सीमा उस देश को स्पर्श करती है; जैसे भारत का बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल व सिक्किम इत्यादि से व्यापार।

→ तटीय व्यापार (Coastal Trade) : एक ही देश के बंदरगाहों के बीच होने वाला व्यापार।

→ पुनः निर्यात व्यापार (Entrepot Trade) : किसी वस्तु का आयात करके उसे पुनः उन देशों को निर्यात कर देना जिनके पास समुद्री तट की सुविधा नहीं है।

→ विदेशी मुद्रा विनिमय (Foreign Exchange) : यह एक प्रणाली है जिसके अंतर्गत एक देश की मुद्रा का दूसरे देश की मुद्रा से अदल-बदल किया जाता है।

→ व्यापार का संघटन या संरचना (Composition of Trade): व्यापार में वस्तुओं और सेवाओं के प्रकार।

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्न में से कौन-सा कथन असत्य है?
(A) हुगली के सहारे जूट के कारखाने सस्ती जल यातायात की सुविधा के कारण स्थापित हुए।
(B) चीनी, सूती वस्त्र एवं वनस्पति तेल उद्योग स्वच्छंद उद्योग हैं।
(C) खनिज तेल एवं जलविद्युत शक्ति के विकास ने उद्योगों की अवस्थिति कारक के रूप में कोयला शक्ति के महत्त्व को कम किया है।
(D) पत्तन नगरों ने भारत में उद्योगों को आकर्षित किया है।
उत्तर:
(B) चीनी, सूती वस्त्र एवं वनस्पति तेल उद्योग स्वच्छंद उद्योग हैं।

2. निम्न में से कौन-सी एक अर्थव्यवस्था में उत्पादन का स्वामित्व व्यक्तिगत होता है?
(A) पूँजीवाद
(B) मिश्रित
(C) समाजवाद
(D) कोई भी नहीं
उत्तर:
(A) पूँजीवाद

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

3. निम्न में से कौन-सा एक प्रकार का उद्योग अन्य उद्योगों के लिए कच्चे माल का उत्पादन करता है?
(A) कुटीर उद्योग
(B) छोटे पैमाने के उद्योग
(C) आधारभूत उद्योग
(D) स्वच्छंद उद्योग
उत्तर:
(C) आधारभूत उद्योग

4. निम्न में से कौन-सा एक जोड़ा सही मेल खाता है?
(A) स्वचालित वाहन उद्योग … लॉस एंजिल्स
(B) पोत निर्माण उद्योग … लूसाका
(C) वायुयान निर्माण उद्योग … फलोरेंस
(D) लौह-इस्पात उद्योग … पिट्सबर्ग
उत्तर:
(D) लौह-इस्पात उद्योग … पिट्सबर्ग

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग
(ii) विनिर्माण
(iii) स्वच्छंद उद्योग।
उत्तर:
(i) उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग-निर्माण क्रियाओं में उच्च प्रौद्योगिकी नवीनतम पीढ़ी है। इसमें उन्नत वैज्ञानिक एवं इंजीनियरिंग उत्पादकों का निर्माण गहन शोध एवं विकास के प्रयोग द्वारा किया जाता है। उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग में यंत्र, कंप्यूटर आधारित डिजाइन तथा निर्माण, धातु पिघलाने एवं शोधन के इलैक्ट्रोनिक नियंत्रण एवं नए रासायनिक व औषधीय उत्पाद प्रमुख स्थान रखते हैं।. .

(ii) विनिर्माण-वे प्रतिक्रियाएँ जिनके द्वारा कच्चे पदार्थों के स्वरूप को परिवर्तित करके तैयार माल का रूप देकर अधिक उपयोगी बनाया जाता है, उसे विनिर्माण अथवा निर्माण उद्योग कहते हैं। यह मानव का गौण अथवा द्वितीयक व्यवसाय है। उदाहरण के लिए गन्ने से चीनी बनाना, कपास से धागा तथा कपड़ा तैयार करना आदि। विनिर्माण उद्योग में कच्चे माल को मशीनों की सहायता से या विभिन्न उपकरणों की सहायता से तैयार सामग्री के रूप में बदला जाता है तथा उसकी उपयोगिता के मूल्यों में वृद्धि हो जाती है। सुई से लेकर विशाल जलयानों, वायुयानों तथा उपग्रहों तक का निर्माण करना विनिर्माण उद्योग के अंतर्गत आता है।

(iii) स्वच्छंद उद्योग-स्वच्छंद उद्योग व्यापक विविधता वाले स्थानों में स्थित होते हैं। ये उद्योग किसी विशिष्ट कच्चे माल के भार में कमी हो रही है अथवा नहीं, पर निर्भर नहीं रहते हैं। ये उद्योग संघटक पुों पर निर्भर रहते हैं जो कहीं से भी प्राप्त किए जा सकते हैं। इसमें उत्पादन कम मात्रा में होता है एवं श्रमिकों की कम आवश्यकता होती है। ये उद्योग प्रदूषण नहीं फैलाते।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
प्राथमिक एवं द्वितीयक गतिविधियों में क्या अंतर है?
उत्तर:
प्राथमिक एवं द्वितीयक गतिविधियों में निम्नलिखित अंतर हैं-

प्रायमिक गतिविधियाँद्वितीयक गतिविधियाँ
1. प्राथमिक गतिविधियाँ वे होती हैं जो सीधे पर्यावरण पर निर्भर होती हैं। ये प्राकृतिक पर्यावरण से प्राप्त संसाधनों के विकास से संबंधित हैं।1. द्वितीयक गतिविधियों के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों में परिवर्तन करके उन्हें और अधिक मूल्यवान एवं उपयोगी बनाया जाता है।
2. इनके अंतर्गत प्रकृति से प्राप्त संसाधनों का उपभोग बिना प्रसंस्करण के उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है।2. इनके अंतर्गत प्रकृति से प्राप्त या प्राथमिक संसाधनों को मशीनीकृत प्रक्रियाओं द्वारा प्रसंस्कृत करने के बाद उपभोक्ताओं द्वारा उपयोग किया जाता है।
3. इन गतिविधियों के माध्यम से उद्योगों को कच्चा माल प्राप्त होता है।3. इन गतिविधियों के माध्यम से कच्चे माल का परिष्करण होता है। इनके द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का मूल्य बढ़ जाता है।
4. इन गतिविधियों में विषम जलवायविक एवं भौगोलिक दशाओं को अधिक महत्त्व दिया जाता है।4. इन गतिविधियों में भौगोलिक दशाओं का अधिक महत्त्व नहीं रहता।
5. उदाहरण-आखेट, संग्रहण, पशुचारण, खनन, मछलीपकड़ना, लकड़ी काटना, कृषि आदि।5. उदाहरण-विनिर्माण, कुटीर उद्योग, डेयरी या दुग्ध उद्योग आदि।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

प्रश्न 2.
विश्व के विकसित देशों के उद्योगों के संदर्भ में आधुनिक औद्योगिक क्रियाओं की मुख्य प्रवृत्तियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
विश्व में कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिल जाती हैं और वहाँ कई उद्योग स्थापित हो जाते हैं और धीरे-धीरे उद्योगों का जमघट (पुंज) बन जाता है, जिसे औद्योगिक प्रदेश या औद्योगिक संकुल कहते हैं। उद्योगों के लिए अनकल क्षेत्र में एक या अनेक प्रकार के उद्योगों की एक कड़ी-सी बन जाती है जिसमें कई नगरों के उद्योग सम्मिलित हो जाते हैं। उद्योगों की स्थापना के लिए विशेष भौगोलिक कारक उत्तरदायी होते हैं। इन्हीं अनुकूल भौगोलिक कारकों के कारण वे क्षेत्र नए-नए उद्योगों को अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं। उद्योगों के जमघट में अनुकूल उत्तरदायी कारकों के अंतर्गत कच्चे माल की सुविधा, श्रमिकों की उपलब्धता, ऊर्जा के पर्याप्त संसाधन, जलवायु तथा परिवहन सुविधाएँ आदि हैं। कई बार सरकार की नीति भी उद्योगों की स्थापना में सहायक सिद्ध होती है। विश्व में प्रमुख औद्योगिक प्रदेश निम्नलिखित हैं

  • यूरोप के औद्योगिक प्रदेश
  • उत्तरी अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश
  • दक्षिणी अमेरिका के औद्योगिक प्रदेश
  • रूस के औद्योगिक प्रदेश
  • एशिया के औद्योगिक प्रदेश
  • अफ्रीका के औद्योगिक प्रदेश
  • आस्ट्रेलिया के औद्योगिक प्रदेश।

विश्व के विकसित देशों में उद्योगों में आधुनिक औद्योगिक क्रियाओं की मुख्य प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं
1. कौशल या श्रम का विशिष्टीकरण-शिल्प तरीकों से कारखानों व फैक्ट्रियों में सीमित मात्रा में ही सामान उत्पादित किया जाता है, जोकि आदेशानुसार ही तैयार किया जाता है। अतः इस पर अधिक लागत आती है। अधिक. उत्पादन के लिए प्रत्येक कारीगर निरंतर एक ही तरह का कार्य करे जिसमें उसकी विशिष्टता है।

2. प्रौद्योगिकीय नवाचार-प्रौद्योगिकीय नवाचार में शोध एवं विकासमान युक्तियों द्वारा विनिर्माण की गुणवत्ता को नियंत्रित करने, प्रदूषण को नियंत्रित करने और दक्षता को विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

3. यंत्रीकरण यंत्रीकरण से अभिप्राय किसी कार्य को पूर्ण करने के लिए मशीनों या उपकरणों के इस्तेमाल से है। यंत्रीकरण की विकसित एवं उत्तम अवस्था स्वचालित है। स्वचालित मशीनों ने लोगों की सोच को विकसित किया है।

4. संगठनात्मक ढाँचा एवं स्तरीकरण-आधुनिक औद्योगिक क्रियाओं के निर्माण की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • एक जटिल प्रौद्योगिकी यंत्र
  • अत्यधिक विशिष्टीकरण व श्रम विभाजन द्वारा अल्प लागत से अधिक उत्पादन करना
  • बड़े संगठन एवं प्रशासकीय अधिकारी वर्ग
  • अधिक पूँजी निवेश करना

5. अनियमित भौगोलिक वितरण-विश्व के कुल स्थलीय भाग के 10% से कम भू-भाग पर इनका विस्तार है, किन्तु फिर भी ये क्षेत्र आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति के केंद्र बन गए हैं। यहाँ हजारों बेरोजगारों को रोजगार भरण-पोषण अच्छे से हो रहा है।

प्रश्न 3.
अधिकतर देशों में उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग प्रमुख महानगरों के परिधि क्षेत्रों में ही क्यों विकसित हो रहे हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
उच्च प्रौद्योगिकी पर आधारित उद्योग तेजी से विकसित हो रहे हैं। इन उद्योगों में वैज्ञानिक अनुसंधान एवं विकास के बल पर अत्यधिक परिष्कृत उत्पादों का निर्माण किया जाता है। इन उद्योगों पर पारंपरिक कारकों का कोई विशेष प्रभाव नहीं होता। आज अधिकतर देशों में उच्च प्रौद्योगिक उद्योग प्रमुख महानगरों की परिधि में विकसित हो रहे हैं। इनके स्थानीयकरण में कुछ नए कारकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है जो निम्नलिखित हैं

  • ये हल्के उद्योग होते हैं जो अधिकतर कच्चे माल की जगह उत्पादन के लिए अर्ध-निर्मित अथवा संसाधित वस्तुओं का उपयोग करते हैं।
  • वैज्ञानिक और तकनीकी दक्षता पर निर्भर रहने के कारण ये उद्योग प्रायः विश्वविद्यालयों तथा शोध संस्थाओं के निकट स्थापित किए जाते हैं।
  • इन उद्योगों के लिए ऊर्जा की आपूर्ति बिजली द्वारा होती है जो मुख्यतः राष्ट्रीय ग्रिड से प्राप्त होती हैं।
  • इन उद्योगों के लिए अनुकूल जलवायु वाले महानगरीय क्षेत्र अधिक अनुकूल साबित होते हैं। महानगरों की सामाजिक, सांस्कृतिक व वैज्ञानिक गतिविधियाँ इन उद्योगों को अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग देती हैं।
  • इन उद्योगों का अंतिम उत्पाद छोटा किंतु परिष्कृत होता. है। अतः इन्हें सड़क मार्गों के निकट प्रदूषण-रहित आवासीय क्षेत्रों में लगाया जा सकता है।
  • परिवहन और संचार के अति आधुनिक साधनों के बिना ये उद्योग जीवित ही नहीं रह सकते। उपभोक्ताओं, वित्तीय संस्थाओं, सरकारी विभागों से तत्काल संपर्क बनाने तथा शोध के विभिन्न चरणों की सफलता के लिए महानगरीय व परिवहन के साधन जरूरी हैं।

प्रश्न 4.
अफ्रीका में अपरिमित प्राकृतिक संसाधन हैं फिर भी औद्योगिक दृष्टि से यह बहत पिछड़ा महाद्वीप है। समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
उद्योगों को हर जगह स्थापित नहीं किया जा सकता, उद्योग वहीं पर स्थापित किए जाते हैं जहाँ पर इनके निर्माण में कम-से-कम लागत आए व ज्यादा-से-ज्यादा लाभ हो। उद्योगों की अवस्थिति में कई भौगोलिक व गैर-भौगोलिक कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं; जैसे-कच्चा माल, बाजार, पूँजी, बैंकिंग व्यवस्था, श्रम, ऊर्जा के स्रोत आदि। दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित अफ्रीका महाद्वीप प्राकृतिक संसाधन में उन्नत है। इस महाद्वीप का मध्य भाग उष्ण कटिबंधीय वर्षा वनों से आच्छादित है। इसके पठारी भागों में खनिज के अपार भंडार निक्षेपित हैं जिनमें खनिज तेल, यूरेनियम, ताँबा, लौह अयस्क, कोयला, जस्ता, बॉक्साइट आदि महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ की अनेक सदानीरा नदियों में जलविद्युत पैदा करने की असीम संभावनाएँ हैं। एक अनुमान के अनुसार लगभग 40% जलविद्युत अफ्रीका की नदियों में विद्यमान है। इतना होने के बावजूद भी इस क्षेत्र में उद्योग विकसित नहीं हुए। यह महाद्वीप औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  • विषम जलवायु, अधिक तापमान व गर्म पवनें।
  • उच्च प्रौद्योगिकी की अनुपलब्धता।
  • कुशल श्रम का अभाव।
  • परिवहन व संचार के साधनों का अभाव।
  • पूँजी का अभाव।

इनके अतिरिक्त इसके अधिकांश भू-भाग यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियों के अधीन रहे। इन साम्राज्यवादी शक्तियों ने यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का खूब दोहन किया। इन शक्तियों के कारण यहाँ की अर्थव्यवस्था पिछड़ी रही। इसी कारण यहाँ आज तक आधारभूत प्रौद्योगिकी विकास नहीं हो पाया है। अतः स्पष्ट है कि संसाधनों की बहुलता होते हुए भी अफ्रीका महाद्वीप औद्योगिक दृष्टि से आज भी पिछड़ा हुआ है।

द्वितीयक क्रियाएँ HBSE 12th Class Geography Notes

→ उद्योग (Industry) : लाभदायक अथवा उत्पादी उद्यमों का एक वर्ग, जिसमें उत्पादन के समान प्रौद्योगिकीय तकनीकों का उपयोग किया जाता है और जिससे उपयोगी सामान, सेवाएँ अथवा आय के साधन उपलब्ध होते हैं, उद्योग कहलाते हैं।

→ औद्योगिक जड़त्व (Industrial Inertia) : किसी उद्योग की उस स्थान पर अपनी क्रिया बनाए रखने की प्रवृत्ति, जहाँ पर उसके स्थापित होने के कारण महत्त्वहीन हैं या समाप्त हो चुके हैं, औद्योगिक जड़त्व कहलाता है।

→ औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) : यूरोपीय इतिहास में सन् 1750 से आधुनिक समय तक का काल जिसमें महत्त्वपूर्ण आविष्कारों के परिणामस्वरूप अधिकाधिक औद्योगिक विकास हुआ है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 6 द्वितीयक क्रियाएँ

→ भार हासमान पदार्थ (Weight-Loosing Items) : ऐसा कच्चा माल, जिसके कुल भार में से निर्मित माल बहुत थोड़ा बन पाए (जैसे 10 टन गन्ना केवल एक टन चीनी बनाता है) भार ह्रासमान पदार्थ कहलाता है।

→ शुद्ध कच्चा माल (Pure Raw Material) : ऐसे पदार्थ जिनके कुल भार के बराबर या थोड़ा-सा कम निर्मित माल बनता है (जैसे एक टन पिंजी हुई रूई से लगभग एक टन सूत ही बनता है) ‘शुद्ध कच्चा माल’ कहलाते हैं।

→ औद्योगिक समूहन (Industrial Cluster) : अनुकूल दशाओं के कारण जब एक ही स्थान पर अनेक प्रकार के उद्योग स्थापित हो जाएँ तो उसे ‘औद्योगिक समूहन’ कहा जाता है।

→ औद्योगिक प्रदेश (Industrial Region) : स्थानीयकरण की विशिष्ट सुविधाओं के कारण किसी विशेष प्रदेश में ‘ उद्योगों का व्यापक रूप से विकास होता है तो उस प्रदेश को औद्योगिक प्रदेश की संज्ञा दी जाती है।

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 1 जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या निम्नलिखित में से कितनी थी?
(A) 102.8 करोड़
(B) 328.7 करोड़
(C) 318.2 करोड़
(D) 121 करोड़
उत्तर:
(D) 121 करोड़

2. निम्नलिखित राज्यों में से किस एक में जनसंख्या का घनत्व सर्वाधिक है?
(A) पश्चिमी बंगाल
(B) उत्तर प्रदेश
(C) केरल
(D) पंजाब
उत्तर:
(A) पश्चिमी बंगाल

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

3. सन 2011 की जनगणना के अनुसार निम्नलिखित में से किस राज्य में नगरीय जनसंख्या का अनुपात सर्वाधिक था?
(A) तमिलनाडु
(B) केरल
(C) महाराष्ट्र
(D) गोआ
उत्तर:
(D) गोआ

4. निम्नलिखित में से कौन-सा एक समूह भारत में विशालतम भाषाई-
(A) चीनी-तिब्बती
(B) आस्ट्रिक
(C) भारतीय-आर्य
(D) द्रविड़
उत्तर:
(C) भारतीय-आर्य

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
भारत के अत्यंत उष्ण एवं शुष्क तथा अत्यंत शीत व आर्द्र प्रदेशों में जनसंख्या का घनत्व निम्न है। इस कथन के दृष्टिकोण से जनसंख्या के वितरण में जलवायु की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जनसंख्या के वितरण में जलवायु महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत के अत्यंत उष्ण व शुष्क क्षेत्रों और अत्यन्त शीत व आर्द्र प्रदेशों में जलवायु क्रमशः प्रतिकूल होती है। इन क्षेत्रों में गर्मियों में अधिक गर्मी व सर्दियों में अधिक सर्दी होती है। राजस्थान का थार क्षेत्र उष्णता व शुष्कता के कारण, जम्मू व कश्मीर का क्षेत्र अति शीत के कारण, मेघालय का क्षेत्र अति आर्द्रता के कारण कम घने बसे हैं।

प्रश्न 2.
भारत के किन राज्यों में विशाल ग्रामीण जनसंख्या है? इतनी विशाल ग्रामीण जनसंख्या के लिए उत्तरदायी एक कारण को लिखिए।
उत्तर:
2001 की जनगणना के अनसार हिमाचल प्रदेश में ग्रामीण जनसंख्या का अनुपात सर्वाधिक (90.21%) था। भारत की लगभग 68.84% जनसंख्या गाँवों में रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार हिमाचल प्रदेश में ग्रामीण जनसंख्या का अनुपात सर्वाधिक (89.96%) है। इसके बाद बिहार (88.70%), असम (85.92%), ओडिशा (83.32%), मेघालय (79.92%), उत्तर प्रदेश (77.72%), अरुणाचल प्रदेश (77.33%) आदि हैं। उच्चतम ग्रामीण अनुपात का उत्तरदायी कारण हमारी अर्थव्यवस्था का कृषि पर निर्भर होना है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

प्रश्न 3.
भारत के कुछ राज्यों में अन्य राज्यों की अपेक्षा श्रम सहभागिता ऊँची क्यों है?
उत्तर:
भारत के कुछ राज्यों में श्रम सहभागिता दर ऊँची इसलिए है क्योंकि इन राज्यों में अधिकतर जनसंख्या कार्यशील है। श्रम सहभागिता दर में वृद्धि से अभिप्राय अर्थव्यवस्था में सुधार, रोजगार के अवसरों में वृद्धि तथा श्रम के साथ जुड़ी सामाजिक सोच वाली मानसिकता में बदलाव का परिचायक है।

प्रश्न 4.
“कृषि सेक्टर में भारतीय श्रमिकों का सर्वाधिक अंश संलग्न है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
देश की श्रम-शक्ति का बहुत बड़ा भाग खेती या कृषि सेक्टर में संलग्न है क्योंकि सन् 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ की 68.84% आबादी गाँवों में निवास करती है। भारत की कुल श्रमजीवी जनसंख्या का लगभग 58.3 प्रतिशत कृषक एवं कृषि श्रमिक हैं, जबकि 4.2 प्रतिशत श्रमिक घरेलू उद्योगों में और 37.6 प्रतिशत श्रमिक अन्य विनिर्माण, व्यापार व वाणिज्य सेवाओं में कार्यरत हैं। अधिकांश ग्रामीण लोग कृषि तथा कृषि से सम्बन्धित व्यवस्थाओं से जीविका कमाते हैं। अतः आँकड़ों के आधार पर स्पष्ट है कि भारतीय श्रमिकों का सर्वाधिक अंश कृषि सेक्टर में संलग्न है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
भारत में जनसंख्या के घनत्व के स्थानिक वितरण की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत में जनसंख्या के घनत्व में राज्य स्तर तथा जिला स्तर पर जनसंख्या के घनत्व में क्षेत्रीय विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। भारत में जनसंख्या का घनत्व धरातल, मिट्टी, वर्षा, जलवायु, उद्योग तथा नगरीकरण पर निर्भर करता है। भारत की जनसंख्या के घनत्व को अग्रलिखित प्रकार से विभाजित किया जा सकता है
1. अति न्यून घनत्व क्षेत्र (Very Low Density Areas) – इस वर्ग में वे क्षेत्र आते हैं जहाँ जनसंख्या का घनत्व 75 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० या इससे कम है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और अरुणाचल प्रदेश में जनसंख्या घनत्व 50 व्यक्ति प्रति कि०मी० से कम पाया जाता है। राजस्थान के पश्चिमी कोना, सिक्किम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर के उत्तर व दक्षिण में न्यून जनसंख्या घनत्व मिलता है। भारतीय पठार में न्यून घनत्व सरगोजा, शहडोल, मंडला की पहाड़ी, बस्तर और चंद्रपुर के वुन प्रदेश में मिलता है। उत्तर:पूर्वी पर्वतीय भाग में दर्गम पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण न्यून घनत्व पाया जाता है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में जलवायु मानव स्वास्थ्य के लिए अनुकूल न होने के कारण न्यून जनसंख्या घनत्व है।

2. न्यून मध्यम घनत्व क्षेत्र (Low Medium DensityAreas) – न्यून मध्यम घनत्व वाले क्षेत्रों में 76 से 200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० जनसंख्या घनत्व होता है। इस वर्ग में उत्तराखण्ड (189 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), राजस्थान (200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), मेघालय (132 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), जम्मू कश्मीर (124 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), हिमाचल प्रदेश (123 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), मणिपुर (122 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०) दक्षिणी आंध्र प्रदेश का भीतरी भाग, ओडिशा की नवचंद्राकार पेटी आदि प्रमुख क्षेत्र हैं। इसके अन्य क्षेत्र गंगानगर, शिमला, सिरमौर, अल्मोड़ा, सुरेंद्र सागर, जामनगर आदि जिले हैं। राजस्थान में रेगिस्तानी इलाके तथा मध्य प्रदेश में उबड़-खाबड़ पहाड़ियों के कारण न्यून जनसंख्या घनत्व मिलता है। इसी तरह मेघालय तथा मणिपुर में दुर्गम पहाड़ियों के कारण कम जनसंख्या घनत्व होता है।

3. मध्यम घनत्व क्षेत्र (Medium Density Areas) – इस वर्ग में 151 से 350 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० जनसंख्या घनत्व मिलता है। हमारे देश में लगभग एक-तिहाई भाग में मध्यम घनत्व पाया जाता है। उत्तरी आंध्र प्रदेश, असम, दक्षिणी कर्नाटक तथा में मध्यम घनत्व मिलता है। इसका दूसरा क्षेत्र गंगा की ऊपरी घाटी के दक्षिणी सीमांत के सहारे तथा पश्चिम में अरावली श्रेणी, पश्चिमी हरियाणा और दक्षिणी-पंजाब है। कर्नाटक में (319 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), गुजरात (308 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), ओडिशा (269 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), त्रिपुरा (350 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०) मध्यम जनसंख्या घनत्व मिलता है।

4. उच्च मध्यम घनत्व क्षेत्र (High Medium Density Areas) – उच्च मध्यम घनत्व के संयुक्त खंड में दादर नगर हवेली, तमिलनाडु, झारखंड, पंजाब, गोआ, हरियाणा के 351 से 700 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० वाले क्षेत्र सम्मिलित हैं। गंगा सतलुज का मैदान उपजाऊ होने के कारण यहाँ उच्च मध्यम घनत्व का क्षेत्र है। इसी तरह तमिलनाडु की तटीय भूमि उपजाऊ होने के कारण उच्च मध्यम घनत्व मिलता है।

5. उच्च घनत्व क्षेत्र (High Density Areas) – इस वर्ग में 701 से 1200 व्यक्ति प्रति कि०मी० जनसंख्या घनत्व पाया जाता है। पश्चिमी बंगाल, केरल, बिहार, उत्तर प्रदेश में उच्च घनत्व क्षेत्र पाए जाते हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र के उपजाऊ डेल्टा के कारण पश्चिमी बंगाल व इसके निकटवर्ती क्षेत्रों में उच्च घनत्व मिलता है।

6. अति उच्च घनत्व क्षेत्र (Very High Density Areas) – इस प्रकार के क्षेत्रों में 1200 व्यक्ति प्रति कि०मी० से ज्यादा जनसंख्या घनत्व पाया जाता है। दिल्ली (11,297 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), लक्षद्वीप (2013 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), चण्डीगढ (9252 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), पुद्दचेरी (2598 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०), कोलकाता, हावड़ा, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई तथा कानपुर में औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण यहाँ अति उच्च घनत्व मिलता है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

भारत में जनसंख्या घनत्व (2011 की जनगणना के अनुसार) को तालिका में दर्शाया गया है।

राज्य/केंद्र-शासित प्रदेशघनत्वकोटि-क्रम
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली11,2971
चंडीगढ़9,2522
पुद्देचे2,5983
दमन तथा दीव2,1694
लक्षद्वीप2,0135
बिहार1,1026
पश्चिम बंगाल1,0297
केरल8598
उत्तर प्रदेश8289
दादरा व नगर हवेली69810
हरियाणा57311
तमिलनाडु55512
पंजाब55013
झारखंड41414
अंध्र प्रदेश39815
असम39716
गोआ39417
महाराष्ट्र36518
त्रिपुरा35019
कर्नाटक31920
गुजरात30821
ओडिशा26922
मध्य प्रदेश23623
राजस्थान20124
उत्तराखंड18925
छत्तीसगढ़18926
मेघालय13227
ज़म्मू कश्मीर12428
हिमाचल प्रदेश12329
मणिपुर12230
नगालैंड11931
सिक्किम8632
मिजोरम5233
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह4634
अरुणाचल प्रदेश1735

प्रश्न 2.
भारत की जनसंख्या के व्यावसायिक संघटन का विवरण दीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक संघटन-अपनी आजीविका या रोजी-रोटी कमाने के लिए व्यक्ति जो व्यवसाय करता है उसे ही व्यक्ति का व्यावसायिक संघटन कहा जाता है। व्यावसायिक संघटन को चार मुख्य वर्गों में बाँटा गया है

  • प्राथमिक व्यवसाय – इन व्यवसायों में आखेट, मत्स्यपालन, फल संग्रहण, कृषि संग्रहण, कृषि तथा वानिकी इत्यादि आते हैं।
  • द्वितीयक व्यवसाय – इन व्यवसायों में विनिर्माण उद्योग तथा शक्ति उत्पादन इत्यादि आते हैं।
  • तृतीयक व्यवसाय – इन व्यवसायों के अंतर्गत परिवहन, संचार, व्यापार, सेवाएँ आदि शामिल किए जाते हैं।
  • चतुर्थक व्यवसाय – इनके अंतर्गत चिंतन, शोध योजना तथा विचारों के विकास से जुड़े अत्यधिक बौद्धिकतापूर्ण व्यवसायों को रखा जाता है।

भारत में श्रम-शक्ति का सेक्टर-वार संघटन, 2011

संवर्गजनसंख्या
प्राथमिकव्यक्तिकुल श्रमिकों का प्रतिशतपुरुषमहिला
द्वितीयक26,30,22,47354.616,54,47,0759,75,75,398
तृतीयक1,83,36,3073.897,75,63585,60,672
संवर्ग20,03,84,53141.615,66,43,2204,37,41,311

सन् 2011 के व्यावसायिक संघटन (संरचना) से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं-

  • सन् 1991 में देश में कृषिकों की श्रम-शक्ति 38.41% थी, जबकि 2011 में यह मात्र 41.6% रह गई।
  • कृषि मजदूरों की प्रतिशत मात्रा में कोई गिरावट नहीं आई, बल्कि इनकी संख्या थोड़ी बहुत बढ़ी है।
  • किसानों और कृषीय मजदूरों की संयुक्त भागीदारी 58.2% यह साबित करती है कि व्यावसायिक संरचना में कृषि का प्रभुत्व है जो धीरे-धीरे कम हो रहा है।
  • खेती में रोजगार न पा सकने वाले कामगारों को द्वितीयक क्षेत्रों के व्यवसायों में भी ज्यादा काम नहीं मिल पाया।
  • लगभग 9 करोड़ स्त्रियाँ कृषि कार्यों में अर्थात् प्राथमिक क्रियाओं में लगी हुई हैं जबकि पुरुष लगभग 16 करोड़ हैं।
  • लगभग 28% स्त्रियाँ गैर-कृषि कार्यों में लगी हुई हैं, जबकि परुषों का प्रतिशत लगभग 47.74% है।
  • घरेलू उद्योगों में कामगारों की संख्या लगभग 4.07% है।
  • विभिन्न व्यवसायों में लगे कामगारों के अनुपात में अत्यधिक क्षेत्रीय विषमता पाई जाती है। उदाहरणतया नगालैंड में मुख्य कामगारों में किसान लगभग 63.23% हैं, जबकि चंडीगढ़ में यह केवल लगभग 0.47% है।

जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन HBSE 12th Class Geography Notes

→ जनसंख्या (Population) : 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 102.8 करोड़ थी जो विश्व की आबादी का 16.7 प्रतिशत थी। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 121 करोड़ से अधिक है।

→ जनसंख्या घनत्व (Population Density) : 2001 की जनगणना के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व 325 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है जो 17.54 प्रतिशत दशकीय वृद्धि को दर्शाता है।

→ साक्षरता (Literacy) : ऐसी जनसंख्या जो पढ़-लिख सकती हो और जिसमें समझ के साथ अंकगणितीय गणना करने की योग्यता हो, साक्षरता कहलाती है।

→ जनसंख्या संघटन (Population Structure) : जनसंख्या की भौतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को जनसंख्या की संरचना या संघटन या संयोजन कहा जाता है। जनसंख्या का संयोजन लिंग, आयु, श्रम-शक्ति, आवास, इकाइयों, धर्म, भाषा, वैवाहिक स्थिति, साक्षरता, शिक्षा और व्यावसायिक संरचना से होता है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 जनसंख्या : वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

→ लिंगानुपात (Sex Ratio) : जनसंख्या का लिंग-संयोजन अक्सर एक अनुपात के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, जिसे कहते हैं। इसे ‘भारत में प्रति हजार पुरुषों के पीछे कितनी स्त्रियाँ हैं’ के द्वारा दर्शाया जाता है। प्रति हजार पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या का अनुपात लिंगानुपात कहलाता है। भारत में लिंगानुपात लगातार कम हो रहा है। उदाहरण के लिए सन् 1901 में यह लिंगानुपात 972 था जो सन् 2011 में घटकर 943 हो गया।

→ 2001 व 2011 की जनगणना के मुख्य आँकड़े (Main Data of census of 2001 and 2011) :

2001 की जनगणना2011 की जनगणना
कुल जनसंख्यालगभग 102.8 करोड़लगभग 121.01 करोड़
पुरुष जनसंख्यालगभग 53.2 करोड़लगभग 62.3 करोड़
महिला जनसंख्यालगभग 49.6 करोड़लगभग 58.6 करोड़
ग्रामीण जनसंख्यालगभग 743 लाख (72.2%)लगभग 834(68.85%)
शहरी/नगरीय जनसंख्यालगभग 286 लाख (27.8%)लगभग 377(31.15%)
सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्यउत्तर प्रदेश (लगभग 16.6 करोड़)उत्तर प्रदेश (लगभग 19.9 करोड़)
न्यूनतम जनसंख्या वाला राज्यसिक्किम (लगभग 540851)सिक्किम (607688)
सर्वाधिक जनसंख्या वालाराष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्लीराष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली
केन्द्र-शासित प्रदेश(लगभग 1.38 करोड़)(लगभग 1.67 करोड़)
जनसंख्या वृद्धि21.54 %(1991-2001)17.64%(2001-2011)
न्यूनतम जनसंख्या वाला केन्द्र-शासित प्रदेशलक्षद्वीप (60650)लक्षद्वीप (64429)
जनसंख्या घनत्व325 प्रति वर्ग कि०मी०382 प्रति वर्ग कि०मी०
सवाधिक जनसंख्या घनत्व वाल्ता राज्यपं० बंगाल (903 प्रति वर्ग कि०मी०)बिहार (1102 प्रति वर्ग कि०मी०)
न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाला राज्यअरुणाचल प्रदेश (13 प्रति वर्ग कि०मी०)अरुणाचल प्रदेश (17 प्रति वर्ग कि०मी०)
सर्बाधिक जनसंख्या घनत्व वाता केन्द्र-शासित प्रदेशराष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (9340 प्रति वर्ग कि०मी०)राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (11297 प्रति वर्ग कि०मी०)
न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाला केन्म-शासित प्रदेशअंडमान व निकोबार द्वीप समूह (43 प्रति वर्ग कि०मी०)अंडमान व निकोबार द्वीप समूह (46 प्रति वर्ग कि०मी०)
साक्षरता दर64.84%74.04 %
पुरुष साक्षरता दर75.26%82.14 %
महिला साक्षरता दर53.6%65.46 %
सर्वायिक साष्षरता दर बाला राज्यकेरल (90.86%)केरल (93.91%)
न्यूनतम साक्षरता दर वाला राज्यबिहार (47%)बिहार (69.72%)
सर्वाधिक साकरता दर वाला केन्द्र-शासित प्रदेशलक्षद्वीप (86.66%)लक्षद्वीप (92.28 %)
न्यूनतम साक्षरता दर बाला केन्म्शासित प्रदेशदादर व नगर हवेली (57.63%)दादर व नगंर हवेली(77.05%)
लिंगानुपात/स्ती-पुरुष अनुपात933 महिलाएँ प्रति हजार पुरुष943 महिलाएँ प्रति हजार पुरुष
सर्वाघिक लिंगानुपात बाला राज्यकेरल (1058)केरल (1084)
न्यूनतम लिंगानुपात वाला राज्यहरियाणा (861)हरियाणा (877)
सर्वाधिक लिंगानुपात वाला केन्द्र-शासित प्रदेशपुद्चेरी (1001)पुद्धचेरी (1038)
न्यूनतम लिंगानुपात वाला केन्म-शासित प्रदेशदमन व दीव (710)दमन व दीव (618)

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राथमिक क्रियाएँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राथमिक क्रियाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राथमिक क्रियाएँ

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्नलिखित में से कौन-सी रोपण फसल नहीं है?
(A) कॉफी
(B) गन्ना
(C) गेहूँ
(D) रबड़
उत्तर:
(C) गेहूँ

2. निम्नलिखित देशों में से किस देश में सहकारी कृषि का सफल परीक्षण किया गया है?
(A) रूस
(B) डेनमार्क
(C) भारत
(D) नीदरलैंड
उत्तर:
(B) डेनमार्क

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राथमिक क्रियाएँ

3. फूलों की कृषि कहलाती है-
(A) ट्रक फार्मिंग
(B) कारखाना कृषि
(C) मिश्रित कृषि
(D) पुष्पोत्पादन
उत्तर:
(D) पुष्पोत्पादन

4. निम्नलिखित में से कौन-सी कृषि के प्रकार का विकास यूरोपीय औपनिवेशिक समूहों द्वारा किया गया?
(A) कोलखोज़
(B) अंगूरोत्पादन
(C) मिश्रित कृषि
(D) रोपण कृषि
उत्तर:
(D) रोपण कृषि

5. निम्नलिखित प्रदेशों में से किसमें विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि नहीं की जाती है?
(A) अमेरिका एवं कनाडा के प्रेयरी क्षेत्र
(B) अर्जेंटाइना के पंपास क्षेत्र
(C) यूरोपीय स्टैपीज़ क्षेत्र
(D) अमेजन बेसिन
उत्तर:
(D) अमेजन बेसिन

6. निम्नलिखित में से किस प्रकार की कृषि में खट्टे रसदार फलों की कृषि की जाती है?
(A) बाजारीय सब्जी कृषि
(B) भूमध्यसागरीय कृषि
(C) रोपण कृषि
(D) सहकारी कृषि
उत्तर:
(B) भूमध्यसागरीय कृषि

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राथमिक क्रियाएँ

7. निम्नलिखित कृषि के प्रकारों में से कौन-सा प्रकार कर्तन-दहन कृषि का प्रकार है?
(A) विस्तृत जीवन-निर्वाह कृषि
(B) आदिकालीन निर्वाहक कृषि
(C) विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि
(D) मिश्रित कृषि
उत्तर:
(B) आदिकालीन निर्वाहक कृषि

8. निम्नलिखित में से कौन-सी एकल कृषि नहीं है?
(A) डेयरी कृषि
(B) मिश्रित कृषि
(C) रोपण कृषि
(D) वाणिज्य अनाज कृषि
उत्तर:
(B) मिश्रित कृषि

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
स्थानांतरी कृषि का भविष्य अच्छा नहीं है। विवेचना कीजिए।
उत्तर:
स्थानांतरी कृषि प्राचीन तथा आदिम कालीन पद्धति है। यह उष्ण-आर्द्र वन प्रदेशों में आदिम जातियों द्वारा की गई कृषि है। इस कृषि में लोग अपने भोजन की पूर्ति के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर कृषि करते हैं। इस कृषि से पर्यावरण का विनाश होता है। इस कृषि में मृदा अपरदन की समस्या गंभीर है तथा भूमि की उपजाऊ शक्ति का ह्रास होता है। इसलिए आधुनिक युग में स्थानांतरी कृषि का क्षेत्र कम हो रहा है। भविष्य में इस कृषि को स्थानबद्ध करने के प्रयत्न किए जा रहे हैं। इसलिए स्थानांतरी कृषि का भविष्य उज्ज्वल नहीं है।

प्रश्न 2.
बाज़ारीय सब्जी कृषि नगरीय क्षेत्रों के समीप ही क्यों की जाती है?
उत्तर:
इस प्रकार की कृषि में अधिक कीमत मिलने वाली फसलें उगाई जाती हैं जिनकी माँग नगरीय क्षेत्रों में अधिक होती है। इस कृषि में खेतों का आकार छोटा होता है एवं खेत अच्छे यातायात के साधनों द्वारा नगरीय केंद्रों से जुड़े होते हैं।

प्रश्न 3.
विस्तृत पैमाने पर डेयरी कृषि का विकास यातायात के साधनों एवं प्रशीतकों के विकास के बाद ही क्यों संभव हो सका है?
उत्तर:
डेयरी उत्पाद तथा ट्रक कृषि के उत्पाद; जैसे-सब्जियाँ, फल और फूल शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुएँ हैं। इन्हें शीघ्रता से मांग वाले क्षेत्रों में पहुंचाना आवश्यक है। इसलिए सब्जियों तथा फलों को शहरों में पहुंचाने के लिए तीव्र गति से चलने वाले यातायात के साधनों का प्रयोग किया जाता है। इन वस्तुओं को खराब होने से बचाने के लिए कई देशों में ट्रक प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रकार इस कृषि की सफलता तथा उपयोगिता तीव्र गति से चलने वाले यातायात के साधनों पर निर्भर करती है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
चलवासी पशुचारण और वाणिज्य पशुधन पालन में अंतर कीजिए।
उत्तर:
चलवासी तथा व्यापारिक पशुपालन में निम्नलिखित अंतर हैं-

चलवासी पशुचारणव्यापारिक पशुपालन
1. चलवासी पशुचारण में चरवाहे चारे तथा जल की तलाश में इधर-उधर घूमते हैं।1. व्यापारिक पशुपालन में चारे तथा जल की समुचित व्यवस्था की जाती है तथा चरवाहे स्थायी तौर पर एक ही स्थान पर पशुओं के साथ रहते हैं।
2. चलवासी चरवाहे अविकसित तथा प्राचीन पद्धति से पशुपालन करते हैं।2. व्यापारिक पशुपालन में आधुनिक पद्धति से पशुपालन किया जाता है।
3. चलवासी पशुपालन एक जीवन-निर्वाह पद्धति है।3. व्यापारिक पशुपालन में दूध, मांस, खाल, ऊन आदि का उत्पादन होता है जिसका अन्य देशों के साथ व्यापार किया जाता है। अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से उत्पादन किया जाता है।
4. चलवासी पशुचारण में विभिन्न प्रकार के पशुओं को रखा जाता है।4. व्यापारिक पशुपालन में पशुओं को अनुकूल दशाओं के अनुसार रखा जाता है अर्थात् जिस पशु के लिए भौगोलिक दशा अनुकूल हो उनको वहीं रखा जाता है।
5. चलवासी पशुपालन में चारा प्राकृतिक रूप से विकसित होता है।5. व्यापारिक पशुपालन में पशुओं के लिए चारा फार्म में उगाया जाता है।
6. इसमें पशुओं के प्रजनन तथा नस्ल सुधार के प्रयास नहीं किए जाते।6. इस पद्धति में पशुओं के प्रजनन तथा नस्ल सुधार के प्रयास किए जाते हैं।
7. चलवासी पशुचारण में पशुओं के स्वास्थ्य की जांच तथा उपचार की व्यवस्था नहीं होती है।7. व्यापारिक पशुपालन में पशुओं के स्वास्थ्य तथा बीमारियों की रोकथाम तथा उपचार की व्यवस्था होती है।
8. चलवासी पशुचारण अर्धशुष्क प्रदेशों की कठोर जलवायु में होता है।8. व्यापारिक पशुपालन शीतोष्ण घास के मैदानों में सम जलवायु में होता है।
9. चलवासी पशुचारण के मुख्य क्षेत्र सहारा, दक्षिणी-पश्चिमी व मध्य एशिया, यूरेशिया में टुंड्रा का दक्षिणी सीमांत व दक्षिणी पश्चिमी अफ्रीका हैं।9. व्यापारिक पशुपालन के मुख्य क्षेत्र उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी, दक्षिणी अमेरिका के लानोस व पम्पास, दक्षिणी अफ्रीका के वेल्ड, ऑस्ट्रेलिया के डाऊन्स व न्यूज़ीलैंड के घास स्थल हैं।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राथमिक क्रियाएँ

प्रश्न 2.
रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ बतलाइए एवं भिन्न-भिन्न देशों में उगाई जाने वाली कुछ प्रमुख रोपण फसलों के नाम बतलाइए।
उत्तर:
रोपण कृषि-रोपण कृषि में कृषि क्षेत्र का आकार बहुत बड़ा होता है। इसमें अधिक पूँजी, उन्नत तकनीक व वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए अधिक श्रम व विकसित यातायात के साधनों की आवश्यकता होती है।

रोपण कृषि की विशेषताएँ-रोपण कृषि की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • रोपण कृषि के अंतर्गत एक फसली कृषि का विशिष्टीकरण किया जाता है।
  • बागानी उपजों को फार्मों पर ही संसाधित करके निर्यात हेतु उपलब्ध कराया जाता है।
  • इस कृषि व्यवस्था का आरंभ कम जनसंख्या घनत्व वाले देशों में हुआ था।
  • इन फार्मों पर मशीनों, उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं व रोगनाशक रसायनों का प्रयोग किया जाता है।
  • इन बागानों की प्रमुख उपजें रबड़, चाय, कॉफी, कोको, कपास, गन्ना, केले, अनानास, गरी, पटसन है।
  • रोपण कृषि के क्षेत्रों की विकसित यातायात व्यवस्था एवं बाजार है।
  • तटीय भागों से कृषि उपजों को सस्ते समुद्री परिवहन द्वारा विदेशों में निर्यात किया जाता है।
  • यह एक आधुनिक, संगठित एवं व्यवस्थित कृषि है।
  • इस कृषि की तुलना विनिर्माण उद्योग से की जा सकती है।
  • बागानों पर श्रमिकों की पूर्ति स्थानीय मजदूरों, बाहर से लाए गए मजदूरों द्वारा की जाती है।

मुख्य फसलें – यूरोपीय लोगों ने विश्व के अनेक भागों का औपनिवेशीकरण किया तथा कृषि के कुछ अन्य रूप जैसे-रोपण कृषि की शुरुआत की। रोपण कृषि की मुख्य फसले हैं-चाय, कॉफी, कोको, रबड़, गन्ना, कपास, केला एवं अनानास।

प्राथमिक क्रियाएँ HBSE 12th Class Geography Notes

→ चरवाही जीवन (Foraging) : जंतुओं को पालतू बनाए बिना उनका शिकार करके और पौधों को स्वयं उगाए बिना उन्हें काटकर भोजन के रूप में प्रयोग करना।

→ संग्रहण (Gathering) : आदिकालीन मानव द्वारा भोजन के लिए वनों से पौधों की जड़ें, पत्तियाँ, छाल, नट व बीज और फल इत्यादि एकत्र करना।

→ ऋतु-प्रवास (Transhumance) : चरवाहे कबीलों द्वारा ऋतु अनुसार अपने पशुओं के साथ प्रवास।

→ खनिज ईंधन (Mineral Fuel): ऐसे खनिज जिनका उपयोग ऊर्जा पैदा करने के लिए ईंधन के रूप में किया जाता है; जैसे कोयला तथा पेट्रोलियम। इन खनिजों की संरचना में कार्बनिक तत्त्वों का योगदान होता है।

→ खनिकूप (Shaft Mine) : गहराई में दबे खनिजों तक पहुँचने के लिए भूपर्पटी में किया गया बड़ा व गहरा छिद्र।

→ कृषि-अवसंरचना (Agricultural Infrastructure) : किसी उद्यम के लिए आधारभूत सुविधाएँ और संरचना; जैसे सड़कें, रेलमार्ग, विद्युत उत्पादक केंद्र, सिंचाई, उर्वरक-उत्पादक केंद्र, मंडियाँ, बैंक इत्यादि।

→ संस्थागत वित्त (Institutional Finance) : ऐसा वित्त या धन जो बैंकों, सहकारी बैंकों, सहकारी समितियों द्वारा उपलब्ध कराया जाए, न कि साहूकारों द्वारा।

→ शस्यावर्तन (Crop Rotation) : फसलों को एक ही खेत में हेर-फेर करके बोने की वैज्ञानिक प्रणाली।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राथमिक क्रियाएँ

→ खाद्य शस्य (Food Cropping) : दालें, तिलहन, चना, फल व सब्जियाँ आदि जो मानव का मुख्य भोजन न होकर कभी-कभी प्रयुक्त होती हों।

→ गहन कृषि (Intensive Agriculture) : उत्तम बीज, अधिक श्रम, वैज्ञानिक उपकरणों तथा रासायनिक खाद आदि के प्रयोग से प्रति इकाई क्षेत्र अधिक उत्पादन देने वाली खेती को गहन कृषि कहा जाता है।

→ विस्तृत कृषि (Extensive Agriculture) : कम जनसंख्या वाले प्रदेशों में बहुत बड़े भूखंड पर श्रम, पूंजी और वैज्ञानिक साधनों को बढ़ाए बिना की जाने वाली कृषि विस्तृत कृषि कहलाती है।

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 2 विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि

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Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 2 विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्नलिखित में से किस महाद्वीप में जनसंख्या वृद्धि सर्वाधिक है?
(A) अफ्रीका
(B) एशिया
(C) दक्षिण अमेरिका
(D) उत्तर अमेरिका
उत्तर:
(A) अफ्रीका

2. निम्नलिखित में से कौन-सा एक विरल जनसंख्या वाला क्षेत्र नहीं है?
(A) अटाकामा
(B) भूमध्यरेखीय प्रदेश
(C) दक्षिण-पूर्वी एशिया
(D) ध्रुवीय प्रदेश
उत्तर:
(C) दक्षिण-पूर्वी एशिया

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3. निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्रतिकर्ष कारक नहीं है?
(A) जलाभाव
(B) बेरोज़गारी
(C) चिकित्सा/शैक्षणिक सुविधाएँ
(D) महामारियाँ
उत्तर:
(C) चिकित्सा/शैक्षणिक सुविधाएँ

4. निम्नलिखित में से कौन-सा एक तथ्य नहीं है?
(A) विगत 500 वर्षों में मानव जनसंख्या 10 गुणा से अधिक बढ़ी है
(B) विश्व जनसंख्या में प्रतिवर्ष 8 करोड़ लोग जुड़ जाते हैं
(C) 5 अरब से 6 अरब तक बढ़ने में जनसंख्या को 100 वर्ष लगे
(D) जनांकिकीय संक्रमण की प्रथम अवस्था में जनसंख्या वृद्धि उच्च होती है
उत्तर:
(C) 5 अरब से 6 अरब तक बढ़ने में जनसंख्या को 100 वर्ष लगे

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले तीन भौगोलिक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक कारक-धरातलीय स्वरूप, जलवायु, मृदा, प्राकृतिक वनस्पति।
  2. आर्थिक कारक-खनिज, नगरीकरण, औद्योगिक विकास, परिवहन।
  3. सामाजिक-सांस्कृतिक कारक-विस्थापन, श्रम का विकास।

प्रश्न 2.
विश्व में उच्च जनसंख्या घनत्व वाले अनेक क्षेत्र हैं। ऐसा क्यों होता है?
उत्तर:
200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों को उच्च (घनी) जनसंख्या वाले क्षेत्र कहते हैं। विश्व के जिन क्षेत्रों की जलवायु मानव एवं मानवीय क्रियाओं के अनुकूल है, भूमि उपजाऊ एवं समतल है और खनिज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं वहाँ जनसंख्या का उच्च घनत्व पाया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका व कनाडा के पूर्वी भाग, पश्चिमी यूरोप और दक्षिण-पूर्वी एशिया में उच्च जनसंख्या घनत्व के यही कारण हैं। ये सभी क्षेत्र उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित हैं, इसलिए ऐसा है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 2 विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि

प्रश्न 3.
जनसंख्या परिवर्तन के तीन घटक कौन-से हैं?
उत्तर:
जनसंख्या परिवर्तन के तीन घटक निम्नलिखित हैं-

  1. जन्म-दर-इसको प्रति हजार स्त्रियों पर जन्मे जीवित बच्चों की गणना करके ज्ञात करते हैं।
  2. मृत्यु-दर-इसको किसी वर्ष विशेष के दौरान प्रति हजार जनसंख्या पर मृतकों की गणना करके ज्ञात करते हैं।
  3. प्रवास इसके अंतर्गत लोग प्रतिवर्ष कारकों के कारण एक स्थान को छोड़ देते हैं तथा अपकर्ष कारकों के कारण दूसरे स्थान पर जाकर बस जाते हैं।

अंतर स्पष्ट कीजिए

प्रश्न 1.
जन्म-दर और मृत्यु-दर
उत्तर:
जन्म-दर और मृत्यु-दर में निम्नलिखित अंतर हैं-

जन्म-दरजन्म-दर
1. किसी देश में एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्तियों पर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या जन्म-दर कहलाती है।1. किसी देश में एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्तियों पर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या जन्म-दर कहलाती है।
2. यह दर प्रति हुजार में व्यक्त होती है।2. यह दर प्रति हुजार में व्यक्त होती है।

प्रश्न 2.
प्रवास के प्रतिकर्ष कारक और अपकर्ष कारक
उत्तर:
प्रवास के प्रतिकर्ष कारक और अपकर्ष कारक में निम्नलिखित अंतर हैं-

प्रतिकर्ष कारकअपकर्ष कारक
1. जब लोग जीविका के साधन उपलब्ध न होने के कारण गरीबी तथा बेरोज़गारी के कारण नगरों की ओर प्रवास करते हैं तो इसे प्रतिकर्ष कारक (Push Factors) कहा जाता है।1. नगरीय सुविधाओं तथा आर्थिक परिस्थितियों के कारण जब लोग नगरों की ओर प्रवास करते हैं तो इसे अपकर्ष कारक (Pull Factors) कहा जाता है।
2. प्रतिकर्ष कारक के कारण लोग अपने उद्गम स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाते हैं।2. अपकर्ष कारक के कारण लोग गन्तव्य स्थान को आकर्षक बनाते हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
विश्व में जनसंख्या के वितरण और घनत्व को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
विश्व में जनसंख्या के वितरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बड़ा असमान तथा अव्यवस्थित है। अनुमान है कि विश्व की 90% जनसंख्या पृथ्वी के केवल 10% भाग पर निवास करती है, जबकि केवल 10% जनसंख्या धरातल का 90% भाग घेरे हुए है। मानचित्र को देखने से पता चलेगा कि विश्व की कुल जनसंख्या का केवल 10% भाग ही दक्षिणी गोलार्द्ध में बसा हुआ है। शेष 90% उत्तरी गोलार्द्ध में निवास करता है। विश्व की 80% जनसंख्या 20° उत्तरी अक्षांश से 60° उत्तरी अक्षांश तक ही सीमित है।

जनसंख्या के वितरण और घनत्व को प्रभावित करने वाले कारक-किसी भी देश अथवा प्रदेश की जनसंख्या के वितरण को अग्रलिखित कारक प्रभावित करते हैं-
(क) भौगोलिक कारक (Geographical Factors)-
1. धरातल (Surface) – जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने में धरातल की विभिन्नता सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। ऊबड़-खाबड़ तथा ऊंचे पर्वतीय प्रदेशों में जनसंख्या कम आकर्षित होती है। वहाँ जनसंख्या विरल पाई जाती है क्योंकि वहाँ पर मानव निवास की अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध नहीं होती, कृषि के लिए उपजाऊ मिट्टी का अभाव होता है, यातायात के साधनों का विकास आसानी से नहीं हो पाता, कृषि फसलों के लिए वर्धनकाल (Growing Period) छोटा होता है, जलवायु कठोर होती है। भारत के हिमालय पर्वतीय प्रदेश, उत्तरी अमेरिका के रॉकीज़ पर्वतीय प्रदेश तथा दक्षिणी अमेरिका के एंडीज़ पर्वतीय प्रदेशों में जनसंख्या के कम पाए जाने का यही कारण है। इसी प्रकार मरुस्थलीय भू-भागों में जलवायु कठोर तथा जीवन-यापन के पर्याप्त साधन न होने के कारण जनसंख्या कम पाई जाती है। थार मरुस्थल, सहारा मरुस्थल तथा अटाकामा मरुस्थल आदि में इसी कारण जनसंख्या कम है।

इसके विपरीत मैदानी भागों में जनसंख्या सघन पाई जाती है। विश्व की लगभग 90% जनसंख्या मैदानों में रहती है। वहाँ कृषि के लिए उपजाऊ मिट्टी, यातायात एवं संचार के साधनों का विकास तथा उद्योग-धंधों की स्थिति जनसंख्या को आकर्षित करती प्रारंभ में मनुष्य ने अपना निवास-स्थान इन्हीं नदियों की घाटियों में बनाया। वहाँ उसके लिए जल की आपूर्ति तथा कृषि करने के लिए उपजाऊ मिट्टी मिल जाती थी। यही कारण है कि नदियों की घाटियों में ही विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ विकसित हुई हैं। इन्हें सभ्यता का पालना भी कहा जाता है। भारत में सतलुज गंगा के मैदान, म्यांमार में इरावती के मैदान, चीन में यांग-टी-सीक्यांग के मैदान, ईरान-इराक में दज़ला फरात तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में मिसीसिपी के मैदानों में जनसंख्या सघन मिलती है।

2. जलवायु (Climate) – जलवायु का जनसंख्या के वितरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अनुकूल तथा आरामदेय जलवायु में कृषि, उद्योग तथा परिवहन एवं व्यापार का विकास अधिक आसानी से होता है। विश्व में मध्य अक्षांश (शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र का) जलवायु की दृष्टि से अनुकूल है। इसलिए विश्व की अधिकांश जनसंख्या इन्हीं प्रदेशों में निवास करती है। इसके विपरीत अत्यधिक ठंडे प्रदेश जैसे ध्रुवीय प्रदेश मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। इसलिए शीत प्रदेशों में जनसंख्या विरल पाई जाती है। इसी प्रकार शुष्क मरुस्थलीय प्रदेशों की जलवायु ग्रीष्म ऋतु में झुलसाने वाली होती है तथा शीत ऋतु में ठिठुराने वाली। यही कारण है कि विश्व के मरुस्थलों; जैसे सहारा, थार, कालाहारी, अटाकामा तथा अरब के मरुस्थलों में जनसंख्या विरल है।

3. मृदा (Soil) – मनुष्य की पहली आवश्यकता है-भोजन। भोजन हमें मिट्टी से मिलता है। मिट्टी में ही विभिन्न कृषि फसलें पैदा होती हैं। इसलिए विश्व के जिन क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी है, वहाँ जनसंख्या अधिक पाई जाती है। भारत में सतलुज गंगा के मैदान, संयुक्त राज्य अमेरिका में मिसीसिपी के मैदान, पाकिस्तान में सिंध के मैदान, मिस्र में नील नदी के मैदान आदि में उपजाऊ मिट्टी की परतें हैं जिससे अधिकांश लोग वहाँ आकर बस गए हैं।

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4. वनस्पति (Vegetation) – वनस्पति भी जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करती है। उदाहरणार्थ, भूमध्य-रेखीय क्षेत्रों में सघन वनस्पति (सदाबहारी वनों) के कारण यातायात के साधनों का विकास कम हुआ है। आर्द्र जलवायु के कारण मानव-जीवन अनेक रोगों से ग्रसित रहता है इसलिए यहाँ की जनसंख्या वेरल है। इसके विपरीत जिन क्षेत्रों में वनस्पति आर्थिक उपयोग वाली होती है वहाँ मानव लकड़ी से संबंधित अनेक व्यवसाय आरंभ कर देता है; जैसे टैगा के वनों का आर्थिक महत्त्व है इसलिए वहाँ जनसंख्या अधिक पाई जाती है। वनस्पति विहीन क्षेत्रों (मरुस्थलों) में भी जनसंख्या विरल है।

(ख) मानवीय कारक (Human Factors)
1. कृषि (Agriculture) – विश्व में जो क्षेत्र कृषि की दृष्टि से अनुकूल हैं, वहाँ जनसंख्या का अधिक आकर्षण होता है। वहाँ लोग प्राचीन समय से ही अधिक संख्या में निवास करते आ रहे हैं। प्रेयरीज़ तथा स्टेपीज़ प्रदेश कृषि के लिए उपयुक्त हैं इसलिए उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा पंजाब में जनसंख्या का घनत्व अधिक है। इसी प्रकार चीन में यांग-टी-सीक्यांग की घाटी कृषि के लिए सर्वोत्तम वातावरण उपलब्ध कराती है इसलिए यहाँ जनसंख्या का केंद्रीकरण अधिक हुआ है।

2. नगरीकरण (Urbanization) – नगर जनसंख्या के लिए चुंबक का कार्य करते हैं। बीसवीं शताब्दी में नगरीकरण की प्रवृत्ति के कारण नगरों की जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। नगरों में रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, व्यापार आदि की अधिक सुविधाएँ सुलभ हैं इसलिए जनसंख्या का जमघट नगरों में अधिक देखने को मिलता है। न्यूयार्क, लंदन, मास्को, बीजिंग, शंघाई, सिडनी, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि नगरों में जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हो रही है। कई नगरों में जनसंख्या की विस्फोटक स्थिति के कारण मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डालने वाली समस्याएँ (Health Hazards) उत्पन्न हो रही हैं।

3. औद्योगीकरण (Industrialization) – जिन क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना अधिक हुई है तथा औद्योगिक विकास तीव्र हुआ है, वहाँ जनसंख्या का आकर्षण बढ़ा है। जापान, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका का उत्तरी-पूर्वी भाग, जर्मनी का रूहर क्षेत्र तथा यूरोपीय देशों में औद्योगिक विकास के कारण जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई है। भारत में पिछले दो दशकों से दिल्ली, मुंबई तथा हुगली क्षेत्र में औद्योगिक विकास के कारण जनसंख्या बड़ी तेजी से बढ़ी है।

4. परिवहन (Transportation) – परिवहन की सुविधाओं का भी जनसंख्या के वितरण पर अत्यधिक प्रभाव पड़त में यातायात की अधिक सुविधाएँ हैं, वहाँ जनसंख्या का अधिक आकर्षण होता है। महासागरीय यातायात के विकास के कारण कई बंदरगाह विश्व के बड़े नगर बन चुके हैं। वहाँ अन्य यातायात के साधन भी विकसित हो जाते हैं। सिंगापुर, शंघाई, सिडनी, मुंबई, न्यूयार्क आदि बंदरगाहों के रूप में विकसित हुए थे, लेकिन आज इन नगरों में रेल, सड़क तथा वायु यातायात की सभी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

5. राजनीतिक कारक (Political Factors) – राजनीतिक कारक भी कुछ सीमा तक जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करते हैं। सरकार की जनसंख्या नीति मानव के बसाव को अनुकूल तथा प्रतिकूल बना सकती है। रूस सरकार साइबेरिया में जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहित करके उनको पारितोषिक देती है। फ्रांस में जनसंख्या वृद्धि के लिए करों में रियायतें दी जाती हैं जबकि चीन, भारत तथा जापान में जनसंख्या की विस्फोटक स्थिति है। चीन में एक बच्चा होने के बाद सरकार ने दूसरे बच्चे के जन्म देने पर प्रतिबंध लगा रखा है। भारत में भी जनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन पिछले एक दशक से चीन की जनसंख्या में वृद्धि-दर निरंतर कम हो रही है जबकि भारत में वृद्धि-दर 2 प्रतिशत से भी अधिक है। वह दिन निकट ही है जब भारत की जनसंख्या विश्व में सबसे अधिक हो जाएगी।

(ग) आर्थिक कारक (Economic Factors)-जिन क्षेत्रों में खनिज पदार्थों के भंडार मिलते हैं, वहाँ खनन व्यवसाय तथा उद्योगों की स्थापना के कारण जनसंख्या अधिक आकर्षित होती है। ब्रिटेन में पेनाइन क्षेत्र, जर्मनी में रूहर क्षेत्र, संयुक्त राज्य अमेरिका में अप्लेशियन क्षेत्र, रूस के डोनेत्स बेसिन तथा भारत के छोटा नागपुर के पठार में जनसंख्या का केंद्रीकरण वहाँ की खनिज संपदा की ही देन है।

प्रश्न 2.
जनांकिकीय संक्रमण की तीन अवस्थाओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत का उपयोग किसी क्षेत्र की जनसंख्या के वर्णन तथा भविष्य की जनसंख्या के पूर्वानुमान के लिए किया जा सकता है। यह सिद्धांत हमें बताता है कि जैसे ही समाज ग्रामीण अशिक्षित अवस्था से उन्नति करके नगरीय औद्योगिक और साक्षर बनता है तो किसी प्रदेश की जनसंख्या उच्च जन्म-दर और उच्च मृत्यु-दर से निम्न जन्म-दर व निम्न मृत्यु दर में बदल जाती है। ये परिवर्तन तीन अवस्थाओं में होते हैं
1. प्रथम अवस्था (First Stage) – उच्च प्रजननशीलता में उच्च मर्त्यता होती है क्योंकि लोग महामारियों और भोजन की अनिश्चित आपूर्ति से पीड़ित थे। जीवन-प्रत्याशा निम्न होती है, अधिकांश लोग अशिक्षित होते हैं और उनके प्रौद्योगिकी स्तर निम्न होते हैं।

2. द्वितीय अवस्था (Second Stage) – द्वितीय अवस्था के प्रारंभ में प्रजननशीलता ऊँची बनी रहती है किंतु यह समय के साथ घटती जाती है। स्वास्थ्य संबंधी दशाओं व स्वच्छता में सुधार के साथ मर्त्यता में कमी आती है।

3. तीसरी अवस्था (Third Stage) – तीसरी अवस्था में प्रजननशीलता और मर्त्यता दोनों घट जाती हैं। जनसंख्या या तो स्थिर . हो जाती है या मंद गति से बढ़ती है। जनसंख्या नगरीय और शिक्षित हो जाती है व उसके पास तकनीकी ज्ञान होता है। ऐसी जनसंख्या विचारपूर्वक परिवार के आकार को नियंत्रित करती है।

विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि HBSE 12th Class Geography Notes

→ जनगणना (Census) : किसी निश्चित अवधि में किसी क्षेत्र की जनसंख्या संबंधी विभिन्न आँकड़ों का एकत्रीकरण।

→ जनसंख्या घनत्व (Population Density) : किसी क्षेत्र में प्रति वर्ग किलोमीटर में पाई जाने वाली जनसंख्या। इसमें उस क्षेत्र की कुल जनसंख्या को वहाँ के क्षेत्रफल से भाग दिया जाता है। (D = P/A)।

→ जनसंख्या परिवर्तन अथवा वृद्धि (Population Change or Growth) : एक क्षेत्र विशेष में किसी समय रह रहे लोगों की संख्या में परिवर्तन। यह परिवर्तन नकारात्मक (Negative) भी हो सकता है और सकारात्मक (Positive) भी।

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HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Important Questions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. भूगोल की प्रकृति निम्नलिखित में से किस प्रकार की है?
(A) अंतर्विषयक
(B) समन्वय
(C) आंतरिक एवं समन्वय
(D) गत्यात्मक
उत्तर:
(C) आंतरिक एवं समन्वय

2. भूगोल की दो मुख्य शाखाएँ हैं-
(A) भौतिक भूगोल और मानव भूगोल
(B) क्रमबद्ध भूगोल और प्रादेशिक भूगोल
(C) जनसंख्या भूगोल और नगरीय भूगोल
(D) आर्थिक भूगोल और मानव भूगोल
उत्तर:
(A) भौतिक भूगोल और मानव भूगोल

3. ‘यूनिवर्सल ज्यॉग्राफी’ पुस्तक किसने लिखी?
(A) हंबोल्ट
(B) वेरेनियस
(C) बॅकल
(D) क्लूवेरियस
उत्तर:
(D) क्लूवेरियस

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

4. ‘ज्यॉग्राफिया जनरेलिस’ (सामान्य भूगोल) किसने लिखा?
(A) बर्नार्ड वेरेनियस
(B) हंबोल्ट
(C) चार्ल्स डार्विन
(D) कार्ल रिटर
उत्तर:
(A) बर्नार्ड वेरेनियस

5. ‘ज्यॉग्राफिया जनरेलिस’ नामक पुस्तक के दो प्रमुख भाग थे-
(A) भौतिक भूगोल और प्राकृतिक भूगोल
(B) सामान्य और विशिष्ट भूगोल
(C) क्रमबद्ध और प्रादेशिक भूगोल
(D) भौतिक भूगोल और मानव भूगोल
उत्तर:
(B) सामान्य और विशिष्ट भूगोल

6. ‘ओरिजन ऑफ स्पीशीज’ पुस्तक, जो डार्विन की प्रमुख रचना है, कब प्रकाशित हुई?
(A) सन् 1870 में
(B) सन् 1859 में
(C) सन् 1856 में
(D) सन् 1854 में
उत्तर:
(B) सन् 1859 में

7. ‘ओरिजन ऑफ स्पीशीज’ (Origin of Species) नामक पुस्तक किसने लिखी?
(A) बॅकल
(B) चार्ल्स डार्विन
(C) डिमांज़िया
(D) ब्लाश
उत्तर:
(B) चार्ल्स डार्विन

8. ‘हिस्ट्री ऑफ सिविलाइजेशन ऑफ इंग्लैंड’ (History of Civilization of England) नामक पुस्तक किसने लिखी?
(A) बॅकल
(B) डार्विन
(C) डिमांज़िया
(D) ब्लाश
उत्तर:
(A) बॅकल

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

9. ‘किताब-अल-हिन्द’ नामक ग्रंथ किसने लिखा?
(A) अलबेरूनी
(B) कार्ल रिटर
(C) जीन बूंश
(D) विडाल-डी-ला ब्लाश
उत्तर:
(A) अलबेरूनी

10. आधुनिक मानव भूगोल का जनक किसे कहा जाता है?
(A) कार्ल रिटर
(B) रेटज़ेल
(C) जीन बूंश
(D) विडाल-डी-ला ब्लाश
उत्तर:
(B) रेटज़ेल

11. अर्ड-कुडे (Erd Kunde) नामक पुस्तक किसने लिखी?
(A) रेटजेल
(B) डिमांज़िया
(C) कार्ल रिटर
(D) क्लूवेरियस
उत्तर:
(C) कार्ल रिटर

12. ‘प्रिंसिपल्स डी ज्यॉग्राफी हयूमन’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक किसने लिखी?
(A) बर्नार्ड वेरेनियस
(B) विडाल-डी-ला ब्लाश
(C) जीन बूंश
(D) एलन सेंपल
उत्तर:
(B) विडाल-डी-ला ब्लाश

13. भूगोल के अध्ययन के लिए ‘मानव भूगोल’ कब एक विशेष शाखा के रूप में उभरा?
(A) उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में
(B) उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में
(C) पन्द्रहवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक
(D) इक्कीसवीं शताब्दी में
उत्तर:
(B) उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में

14. ‘मानव भूगोल, क्रियाशील मानव और अस्थिर पृथ्वी के परिवर्तनशील संबंधों का अध्ययन है।’ यह किसने कहा?
(A) रेटजेल
(B) हंटिग्टन
(C) कुमारी सेंपल
(D) कार्ल रिटर
उत्तर:
(C) कुमारी सेंपल

15. मानव भूगोल का उद्भव कब भौगोलिक अध्ययन की एक विशेष शाखा के रूप में हुआ? …
(A) पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में
(B) प्रारंभिक काल में
(C) बीसवीं शताब्दी में
(D) उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में
उत्तर:
(D) उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में

16. निम्नलिखित में से कौन-सा मानव भूगोल का उपक्षेत्र नहीं है?
(A) व्यावहारिक भूगोल
(B) सामाजिक भूगोल
(C) राजनीतिक भूगोल
(D) भौतिक भूगोल
उत्तर:
(D) भौतिक भूगोल

17. मानव भूगोल एक मुख्य शाखा है-
(A) क्रमबद्ध भूगोल की
(B) प्रादेशिक भूगोल की
(C) भौतिक भूगोल की
(D) पर्यावरण भूगोल की
उत्तर:
(A) क्रमबद्ध भूगोल की

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

18. “मनुष्य प्रकृति का दास है” यह कथन भूगोल की किस विचारधारा से संबंधित है?
(A) निश्चयवाद
(B) संभावनावाद
(C) संभववाद
(D) व्यवहारदाद
उत्तर:
(A) निश्चयवाद

19. निश्चयवाद के प्रबल समर्थक थे-
(A) जर्मन भूगोलवेत्ता
(B) फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता
(C) अमेरिकन भूगोलवेत्ता
(D) रोमन भूगोलवेत्ता
उत्तर:
(A) जर्मन भूगोलवेत्ता

20. नव नियतिवाद के प्रवर्तक थे-
(A) हंबोल्ट
(B) विडाल-डी-ला ब्लाश
(C) ग्रिफिथ टेलर
(D) रेटजेल
उत्तर:
(C) ग्रिफिथ टेलर

21. मानव भूगोल का अध्ययन करने के लिए लूसियन फ्रेबने और विडाल-डी-ला ब्लाश ने किस विचारधारा का अनुसरण किया था?
(A) निश्चयवाद
(B) संभावनावाद
(C) संभववाद
(D) प्रत्यक्षवाद
उत्तर:
(C) संभववाद

22. किस तत्त्व को ‘माता प्रकृति’ कहते हैं?
(A) भौतिक पर्यावरण
(B) सांस्कृतिक पर्यावरण
(C) राजनीतिक पर्यावरण
(D) औद्योगिक पर्यावरण
उत्तर:
(A) भौतिक पर्यावरण

23. व्यवहारवाद किसने प्रतिपादित किया?
(A) ग्रिफिथ टेलर
(B) जीन बूंश
(C) गेस्टाल्ट संप्रदाय
(D) डिमांज़िया
उत्तर:
(C) गेस्टाल्ट संप्रदाय

24. निम्नलिखित में से कौन प्रत्यक्षवाद के समर्थक नहीं थे?
(A) बी. जे. एल. बैरी
(B) विलियम बंग
(C) हंटिंग्टन
(D) डेविड हार्वे
उत्तर:
(C) हंटिंग्टन

25. कल्याणपरक विचारधारा के समर्थक थे-
(A) बैरी, विलियम बंग
(B) गेस्टाल्ट संप्रदाय
(C) डी. एम. स्मिथ, डेविड हार्वे
(D) ईसा बोमेन
उत्तर:
(C) डी. एम. स्मिथ, डेविड हार्वे

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26. ‘कौन, कहाँ, क्या पाता है और कैसे?’ यह वाक्य किस विचारधारा का मूलबिंदु है?
(A) निश्चयवाद
(B) प्रत्यक्षवाद
(C) कल्याणपरक
(D) व्यवहारवाद
उत्तर:
(C) कल्याणपरक

B. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में दीजिए

प्रश्न 1.
‘यूनिवर्सल ज्यॉग्राफी’ पुस्तक किसने लिखी?
उत्तर:
क्लूवेरियस ने।

प्रश्न 2.
‘ओरिजन ऑफ स्पीशीज’ पुस्तक, जो डार्विन की प्रमुख रचना है, कब प्रकाशित हुई?
उत्तर:
वर्ष 1859 में।

प्रश्न 3.
‘एंथ्रोपोज्यॉग्राफी’ नामक ग्रंथ किसने लिखा?
उत्तर:
जर्मनी के रेटजेल ने।

प्रश्न 4.
निश्चयवाद के प्रबल समर्थक कौन थे?
उत्तर:
फ्रेडरिक रेटज़ेल।

प्रश्न 5.
‘Principles de Geographie Humaine’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक किसने लिखी?
उत्तर:
विडाल-डी-ला ब्लाश ने।

प्रश्न 6.
मानव भूगोल किसकी मुख्य शाखा है?
उत्तर:
क्रमबद्ध भूगोल।

प्रश्न 7.
व्यवहारवाद किसने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
गेस्टाल्ट संप्रदाय ने।

प्रश्न 8.
‘कौन, कहाँ, क्या पाता है और कैसे?’ यह वाक्य किस विचारधारा का मूल-बिंदु है?
उत्तर:
कल्याणपरक विचारधारा का।

प्रश्न 9.
“मनुष्य प्रकृति का दास है।” यह कथन भूगोल की किस विचारधारा से संबंधित है?
उत्तर:
निश्चयवाद विचारधारा से।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

प्रश्न 10.
आधुनिक मानव भूगोल का जनक अथवा संस्थापक किसे कहा जाता है?
उत्तर:
फ्रेडरिक रेटज़ेल को।

प्रश्न 11.
नव-निश्चयवाद के प्रवर्तक कौन थे?
उत्तर:
ग्रिफ़िथ टेलर।

प्रश्न 12.
रेटज़ेल कहाँ के भूगोलवेत्ता थे?
उत्तर:
जर्मनी के।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव भूगोल क्या है?
अथवा
रेटज़ेल द्वारा दी गई मानव भूगोल की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
मानव भूगोल वह विषय है जो प्राकृतिक, भौतिक एवं मानवीय जगत् के बीच संबंध, मानवीय परिघटनाओं का स्थानिक वितरण तथा उनके घटित होने के कारण एवं विश्व के विभिन्न भागों में सामाजिक एवं आर्थिक भिन्नताओं का अध्ययन करता है। रेटज़ेल के अनुसार, “मानव भूगोल मानव समाजों और धरातल के बीच संबंधों का संश्लेषित अध्ययन है।”

प्रश्न 2.
कुमारी एलन चर्चिल सेम्पल के अनुसार मानव भूगोल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कुमारी एलन चर्चिल सेम्पल के अनुसार, “मानव भूगोल अस्थिर पृथ्वी और क्रियाशील मानव के बीच परिवर्तनशील संबंधों का अध्ययन है।”

प्रश्न 3.
आर्थिक भूगोल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आर्थिक भूगोल में मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा प्राकृतिक वातावरण आदि के साथ मनुष्य के सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। संसार के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव समुदाय जीवन-यापन के लिए भिन्न-भिन्न साधन अपनाता है; जैसे लकड़ी काटना, मछली पकड़ना, आखेट, कृषि, खनन, भोज्य पदार्थ, व्यवसाय आदि।

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प्रश्न 4.
फ्रेडरिक रेटजेल की पुस्तक एंथ्रोपोज्यॉग्राफी का प्रकाशन एक युगांतकारी घटना क्यों कहलाती है?
उत्तर:
इस पुस्तक ने भूगोल में मानव केन्द्रित विचारधारा को स्थापित किया। रेटज़ेल ने मानव भूगोल को मानव समाज और पृथ्वी के धरातल के पारस्परिक संबंधों के संश्लेषणात्मक अध्ययन के रूप में परिभाषित किया।

प्रश्न 5.
प्रौद्योगिक स्तर मनुष्य व प्रकृति के आपसी संबंधों को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर:
जब मनुष्य उपकरणों व तकनीकों की सहायता से निर्माण कार्य करता है तो वह प्रौद्योगिकी कहलाती है। प्रकृति के नियमों को ठीक प्रकार से समझकर व प्रौद्योगिकी का विकास करके मानव निर्माण का कार्य करता है; जैसे तेज गति से चलने वाले यान वायुगति के नियमों पर आधारित होते हैं।

प्रश्न 6.
भौतिक भूगोल किसे कहते हैं?
उत्तर:
भौतिक भूगोल पृथ्वी तल पर पाए जाने वाले भौतिक पर्यावरण के तत्त्वों का अध्ययन करता है अर्थात् इसमें स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल व जैवमंडल आदि का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 7.
प्रौद्योगिकी को विकसित करने में प्रकृति का ज्ञान क्यों अनिवार्य है?
उत्तर:
क्योंकि सभी उपकरणों की कार्यविधि और तकनीकों को हम प्रकृति से सीखते हैं।

प्रश्न 8.
मानव का प्रकृतिकरण अथवा प्राकृतिक मानव से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी-विहीन आदिम लोगों द्वारा जीवन जीने के लिए प्रकृति पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण निर्भरता मानव का प्रकृतिकरण कहलाती है।

प्रश्न 9.
प्रकृति के मानवीकरण अथवा मानवकृत प्रकृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अपनी बुद्धि और कौशल इत्यादि के बल पर विकसित प्रौद्योगिकी के द्वारा मनुष्य का प्रकृति पर छाप छोड़ना प्रकृति का मानवीकरण कहलाता है।

प्रश्न 10.
अध्ययन की विधि के आधार पर भूगोल की कौन-सी दो शाखाएँ हैं?
उत्तर:

  1. क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography)
  2. प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography)।

प्रश्न 11.
फ्रांस के किन्हीं चार मानव भूगोलवेत्ताओं के नाम बताएँ।
उत्तर:

  1. विडाल-डी-ला ब्लाश
  2. जीन बूंश
  3. हम्बोल्ट
  4. कार्ल रिटर।

प्रश्न 12.
भौतिक पर्यावरण के प्रमुख तत्त्व कौन-से हैं?
उत्तर:
भौतिक पर्यावरण के प्रमुख तत्त्व-मृदा, जलवायु, भू-आकृति, जल, प्राकृतिक वनस्पति, विविध प्राणी-जातियाँ तथा वनस्पति-जातियाँ आदि हैं।

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प्रश्न 13.
राजनीतिक भूगोल के उपक्षेत्र बताइए।
उत्तर:

  1. निर्वाचन भूगोल
  2. सैन्य भूगोल।

प्रश्न 14.
आर्थिक भूगोल के उपक्षेत्र बताइए।
उत्तर:

  1. संसाधन भूगोल
  2. कृषि भूगोल
  3. उद्योग भूगोल
  4. विपणन भूगोल
  5. पर्यटन भूगोल
  6. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का भूगोल।

प्रश्न 15.
समायोजन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र की प्राकृतिक दशाओं और संसाधनों के अनुसार मानव द्वारा चयनित व्यवसाय को प्रकृति के साथ समायोजन कहते हैं।

प्रश्न 16.
पर्यावरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पर्यावरण शब्द हिन्दी के दो पदों परि + आवरण के मेल से बना है। ‘परि’ का अर्थ है-‘चारों ओर से’ तथा आवरण का अर्थ है-‘ढके हुए’ अर्थात् पर्यावरण वह सब कुछ है जो हमें चारों ओर से ढके हुए है।

प्रश्न 17.
पर्यावरणीय निश्चयवाद क्या है?
उत्तर:
पर्यावरणीय निश्चयवाद के अनुसार प्रकृति अथवा पर्यावरण सर्वशक्तिमान है और प्राकृतिक शक्तियों के सामने मनुष्य तुच्छ, शक्तिहीन एवं निष्क्रिय होता है।

प्रश्न 18.
निश्चयवाद क्या है?
उत्तर:
मानव-शक्तियों की अपेक्षा प्राकृतिक शक्तियों की प्रधानता स्वीकार करने वाला दर्शन निश्चयवाद कहलाता है। इस विचारधारा के अनुसार मानव-जीवन और उसके व्यवहार को विशेष रूप से भौतिक वातावरण के तत्त्व प्रभावित और यहाँ तक कि निर्धारित करते हैं।

प्रश्न 19.
मानव-पर्यावरण सम्बन्धों की व्याख्या करने वाली तीन अवधारणाओं के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. नियतिवाद या पर्यावरणीय निश्चयवाद
  2. सम्भववाद
  3. नव-निश्चयवाद।

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प्रश्न 20.
मानव भूगोल के दो प्रमुख उद्देश्य कौन-से हैं?
उत्तर:
मानव भूगोल यह जानने का प्रयत्न करता है कि-

  1. मानव ने किन-किन प्रदेशों में क्या-क्या विकास किया है-रचनात्मक या विध्वंसात्मक।
  2. मानव और वातावरण के बीच ऐसे कौन-से संबंध हैं जिनके फलस्वरूप समस्त विश्व एक पार्थिव एकता के रूप में दृष्टिगोचर होता है।

प्रश्न 21.
भूगोल पृथ्वी तल पर विस्तृत किन दो प्रकार के तत्त्वों का अध्ययन करता है?
उत्तर:
भूगोल पृथ्वी तल पर पाए जाने वाले सभी तत्त्वों को दो वर्गों में बाँटता है-

  • भौतिक तत्त्व
  • मानवीय तत्त्व।

भौतिक तत्त्वों की रचना प्रकृति करती है। इनकी रचना में मनुष्य का कोई हाथ नहीं होता। मानवीय तत्त्वों का निर्माण स्वयं मनुष्य करता है, लेकिन उनका आधार भौतिक तत्त्व ही होते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव भूगोल एक गत्यात्मक विषय कैसे है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मानव भूगोल एक गत्यात्मक विषय है। जिस प्रकार तकनीक के विकास के साथ मनुष्य और पर्यावरण का सम्बन्ध बदलता जा रहा है, उसी प्रकार मानव भूगोल की विषय-वस्तु में भी समय के साथ विस्तार होता जा रहा है। उदाहरणतया बीसवीं सदी के आरंभ में मानव भूगोल में सांस्कृतिक और आर्थिक पक्षों पर विशेष ध्यान दिया जाता था किंतु बाद में नई समस्याओं और चुनौतियों के आने पर उन्हें भी विषय-वस्तु का अंग बना लिया गया। वर्तमान में मानव भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में राजनीतिक आयाम, सामाजिक संबद्धता, लिंग असमानता, जन-नीति, नगरीकरण तथा नगर प्रणाली, स्वास्थ्य व सामाजिक सुविधाएँ इत्यादि प्रकरणों को शामिल किया गया।

प्रश्न 2.
जीन बूंश द्वारा बताए गए मानव भूगोल के आवश्यक तत्त्वों का उल्लेख करें।
उत्तर:
जीन बूंश ने मानव भूगोल की विषय-वस्तु को पाँच प्रकार के आवश्यक तथ्यों के अध्ययन के रूप में विभाजित किया है जो इस प्रकार हैं-

  1. मृदा के अनुत्पादक व्यवसाय से संबंधित तथ्य; जैसे मकान और सड़कें
  2. वनस्पति और जीव-जगत् पर मानव विजय से संबंधित तथ्य; जैसे कृषि
  3. पशुपालन
  4. पशुपालन और मृदा के विनाशकारी उपयोग से संबंधित तथ्य; जैसे पौधों और पशुओं का विनाश
  5. खनिजों का अवशोषण।

प्रश्न 3.
मानव भूगोल की विषय-वस्तु अथवा अध्ययन क्षेत्र में सम्मिलित किन्हीं चार प्रमुख तथ्यों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मानव भूगोल की विषय-वस्तु के अंतर्गत मोटे तौर पर निम्नलिखित चार तथ्यों का अध्ययन किया जाता है-

  1. मानव का उद्गम, उसकी प्रजातियाँ तथा भूमंडल पर मानव प्रजातियों का देशकालीन (Spatio-temporal) स्थापन।
  2. जनसंख्या का वितरण, वृद्धि, घनत्व, जनांकिकीय विशेषताएँ तथा प्रवास एवं मिश्रण।
  3. मानव की नितांत आवश्यकताएँ-भोजन, वस्त्र और मकान।
  4. भू-आकारों, जलवायु, मृदा, वनस्पति, जल, जीवों व खनिजों से संबंध व समायोजन।

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प्रश्न 4.
निश्चयवाद का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
मानव-शक्तियों की अपेक्षा प्राकृतिक शक्तियों की प्रधानता स्वीकार करने वाला दर्शन निश्चयवाद कहलाता है। इस विचारधारा के अनुसार मानव-जीवन और उसके व्यवहार को विशेष रूप से भौतिक वातावरण के तत्त्व प्रभावित व निर्धारित करते हैं अर्थात मानवीय क्रियाओं पर वातावरण का नियन्त्रण होता है। इसके अनुसार किसी सामाजिक वर्ग की सभ्यता, इतिहास, संस्कृति, रहन-सहन तथा विकासात्मक पक्ष भौतिक कारकों द्वारा नियन्त्रित होते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मानव एक क्रियाशील कारक नहीं है। इस विचारधारा को यूनानी तथा रोमन विद्वानों हिप्पोक्रेटस, अरस्तु, हेरोडोटस तथा स्ट्रेबो ने प्रस्तुत किया। इसके बाद अल-मसूदी, अल-अदरीसी, काण्ट, हम्बोल्ट तथा रेटज़ेल आदि ने इस पर विशेष कार्य किया। अमेरिका में कुमारी एलन चर्चिल सेम्पल तथा ए० हंटिंग्टन ने इस विचारधारा को लोकप्रिय बनाया।

प्रश्न 5.
क्रमबद्ध भूगोल और प्रादेशिक भूगोल में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
क्रमबद्ध भूगोल और प्रादेशिक भूगोल में निम्नलिखित अंतर हैं-

क्रमबद्ध भूगोलप्रादेशिक भूगोल
1. क्रमबद्ध भूगोल में किसी एक विशिष्ट भौगोलिक तत्त्व का अध्ययन होता है।1. प्रादेशिक भूगोल में किसी एक प्रदेश का सभी भौगोलिक तत्त्चों के संदर्भ में एक इकाई के रूप में अध्ययन किया जाता है।
2. क्रमबद्ध भूगोल अध्ययन का एकाकी (Isolated) रूप प्रस्तुत करता है।2. प्रादेशिक भूगोल अध्ययन का समाकलित (Integrated) रूप प्रस्तुत करता है।
3. क्रमबद्ध भूगोल में अध्ययन राजनीतिक इकाइयों पर आधारित होता है।3. प्रादेशिक भूगोल में अध्ययन भौगोलिक इकाइयों पर आधारित होता है।
4. क्रमबद्ध भूगोल किसी तत्च विशेष के क्षेत्रीय वितरण, उसके कारणों और प्रभावों की समीक्षा करता है।4. प्रादेशिक भूगोल किसी प्रदेश विशेष के सभीं भौगोलिक तत्त्वों का अध्ययन करता है।
5. क्रमबद्ध भूगोल में किसी घटक; जैसे जलवायु, मिट्टी, प्राकृतिक वनस्पति या वर्षा की मात्रा के आधार पर विभिन्न प्रकार और उप-प्रकार निर्धारित किए जाते हैं।5. ‘प्रादेशिक भूगोल में प्राकृतिक तत्त्चों के आधार पर प्रदेशों का निर्धारण किया जाता है। निर्धारण की यह प्रक्रिया प्रादेशीकरण (Regionalisation) कहलाती है।

प्रश्न 6.
भौतिक भूगोल और मानव भूगोल में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भौतिक भूगोल और मानव भूगोल में निम्नलिखित अंतर हैं

भौतिक भूगोलमानव भूगोल
1. भौतिक भूगोल पृथ्वी तल पर पाए जाने वाले भौतिक पर्यावरण के तत्त्वों का अध्ययन करता है।1. मानव भूगोल पृथ्वी तल पर फैली मानव-निर्मित परिस्थितियों का अध्ययन करता है।
2. भौतिक भूगोल में स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल व जैवमंडल का अध्ययन किया जाता है।2. मानव भूगोल में मनुष्य के सांस्कृतिक परिवेश का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 7.
सांस्कृतिक भूगोल से आप क्या समझते हैं?
अथवा
सामाजिक भूगोल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भूगोल के अन्तर्गत मनुष्य के सांस्कृतिक पहलुओं; जैसे मानव का आवास, सुरक्षा, भोजन, रहन-सहन, भाषा, धर्म, रीति-रिवाज, पहनावा आदि का अध्ययन किया जाता है। भिन्न-भिन्न मानव समुदायों की कला, तकनीकी उन्नति और विज्ञान के विभिन्न स्तरों पर अवस्थित होना मोटे तौर पर उनके भौगोलिक पर्यावरण की देन है। कुछ भूगोलवेत्ता सांस्कृतिक भूगोल को सामाजिक भूगोल भी कहते हैं। सामाजिक भूगोल में मानव को एकाकी रूप में न लेते हुए मानव समूहों और पर्यावरण के सम्बन्धों की व्याख्या की जाती है। सांस्कृतिक भूगोल में भिन्न-भिन्न मानव समुदायों के सांस्कृतिक विकास तथा उसके पर्यावरण के आपसी सम्बन्धों की व्याख्या की जाती है।

प्रश्न 8.
निश्चयवाद और संभववाद में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
निश्चयवाद और संभववाद में निम्नलिखित अंतर हैं-

निश्चयवादसंभववाद
1. निश्चयवाद के अनुसार मनुष्य के समस्त कार्य पर्यावरण द्वारा निर्धारित होते हैं।1. संभववाद के अनुसार मानव अपने पर्यावरण में परिवर्तन करने का सामर्थ्य रखता है।
2. इस विचारधारा के समर्थक रेटज़ेल, हम्बोल्ट व हंटिंग्टन थे।2. इस विचारधारा के समर्थक विडाल-डी-ला ब्लाश और फ्रैबवे थे।
3. यह एक जर्मन विचारधारा है।3. यह एक फ्रांसीसी विचारधारा है।

प्रश्न 9.
कृषि भूगोल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मानव भूगोल की इस शाखा या उपक्षेत्र में कृषि सम्बन्धी सभी तत्त्वों; जैसे कृषि भूमि, सिंचाई, कृषि उत्पादन तथा पशुपालन व पशु उत्पादों का अध्ययन किया जाता है। कृषि से मनुष्य की मूलभूत जरूरत ‘भोजन’ की आपूर्ति होती है। इसलिए मानव भूगोल की यह शाखा या उपक्षेत्र सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। इन शाखाओं के अतिरिक्त मानव भूगोल की कई अन्य उपशाखाएँ; जैसे नगरीय भूगोल (Urban Geography), अधिवास भूगोल (Settlement Geography), चिकित्सा भूगोल (Medical Geography), व्यापारिक भूगोल (Commercial Geography), ग्रामीण भूगोल (Rural Geography), औद्योगिक भूगोल (Industrial Geography) तथा व्यावहारिक भूगोल (Applied Geography) आदि हैं।

प्रश्न 10.
संभववाद से आप क्या समझते हैं?
अथवा
संभववाद का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
सम्भववाद की विचारधारा का जन्म और विकास फ्रांस में हुआ था। इसलिए इसे फ्रांसीसी विचारधारा भी कहते हैं। इस विचारधारा के प्रमुख प्रतिपादक पॉल विडाल-डी-ला ब्लाश थे। उनके पश्चात् अन्य भूगोलवेत्ताओं ब्रूश, डिमांजियां आदि ने भी इस विचारधारा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सम्भववाद शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम क्रैबवे ने किया था जो ब्लाश के दृष्टिकोण पर आधारित था।

इस विचारधारा के अनुसार, प्रकृति के द्वारा कुछ सम्भावनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं जिनके अन्दर मानव की छाँट द्वारा किसी क्षेत्र के साथ मानव समाज अपना सामंजस्य स्थापित करता है। इन भूगोलवेत्ताओं ने प्रादेशिक अध्ययन के द्वारा फ्रांस में तथा संसार के अन्य देशों में भी मानव द्वारा निर्मित सांस्कृतिक भू-दृश्य का वर्णन करते हुए दर्शाया कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति के लिए मानवीय छाँट ही महत्त्वपूर्ण होती है। किसी प्रदेश की स्थिति और जलवायु से अधिक महत्त्वपूर्ण मानव होता है और मानव प्रकृति द्वारा प्रस्तुत की गई सम्भावनाओं का स्वामी होता है तथा उनके प्रयोग का निर्णायक भी होता है।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

प्रश्न 11.
नव-निश्चयवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
ग्रिफिथ टेलर ने नव-निश्चयवाद को समझाने के लिए “रुको तथा जाओ” वाक्यांश का प्रयोग किया। उनके अनुसार, मनष्य पर प्रकति का प्रभाव पड़ता है परन्त मनुष्य में भी अपने बद्धि-कौशल तथा प्रौद्योगिकी के दम पर प्रकृति को बदलने की क्षमता होती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मनुष्य अपनी जरूरतों के मुताबिक प्रकृति का उपयोग भी कर सकता है। इसी विचारधारा को नव-निश्चयवाद कहा जाता है।

प्रश्न 12.
नियतिवाद या वातावरण निश्चयवाद पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
नियतिवाद के सिद्धांत का जन्म और विकास जर्मनी में हुआ। हम्बोल्ट, रिटर और रेटजेल इस विचारधारा के मुख्य प्रतिपादक थे। इस सिद्धांत के अनुसार, मानव का विकास उसके वातावरण के द्वारा होता है। रेटजेल के अनुसार, मानव अपने वातावरण की उपज है। वातावरण ही मानव के जीवन-यापन के ढंग अर्थात् भोजन, वस्त्र, मकान और सांस्कृतिक स्वरूप को निर्धारित करता है। मनुष्य केवल वातावरण के साथ समायोजन करके स्वयं को वहाँ रहने योग्य बनाता है।

टुंड्रा के एस्किमो, जायरे बेसिन के पिग्मी व कालाहारी मरुस्थल के बुशमैन आदि कबीलों ने आखेट द्वारा जीवन-यापन को स्वीकार कर भौतिक परिवेश में समायोजित हो गए। हम्बोल्ट के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कॉसमॉस’ में वातावरण के प्रभावों का स्पष्ट आभास मिलता है। उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों के प्रभावों को मानव जातियों के शारीरिक लक्षणों पर और मनुष्यों के रहन-सहन पर स्पष्टतः प्रदर्शित किया था।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव भूगोल को परिभाषित करते हुए इसकी प्रकृति का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानव भूगोल से आपका क्या अभिप्राय है? मानव भूगोल की प्रकृति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मानव भूगोल का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Human Geography)-विभिन्न विद्वानों ने मानव भूगोल को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। मानव भूगोल की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
1. फ्रेडरिक रेटजेल के अनुसार, “मानव भूगोल मानव समाज और धरातल के बीच सम्बन्धों का संश्लेषित अध्ययन है।”

2. कुमारी सेम्पल के अनुसार, “मानव भूगोल अस्थिर पृथ्वी और क्रियाशील मानव के बीच परिवर्तनशील सम्बन्धों का अध्ययन है।”

3. पॉल विडाल-डी-ला ब्लाश के अनुसार, “हमारी पृथ्वी को नियन्त्रित करने वाले भौतिक नियमों तथा इस पर रहने वाले जीवों के मध्य सम्बन्धों के अधिक संश्लेषित ज्ञान से उत्पन्न संकल्पना को मानव भूगोल कहते हैं।”

4. एल्सवर्थ हंटिंग्टन के अनुसार, “मानव भूगोल भौगोलिक वातावरण और मानव के क्रियाकलापों एवं गुणों के सम्बन्ध . के स्वरूप और वितरण का अध्ययन है।”

5. जीन बूंश के अनुसार, “मानव भूगोल उन सभी वस्तुओं का अध्ययन है जो मानव क्रियाकलाप द्वारा प्रभावित है और जो हमारी पृथ्वी के धरातलीय पदार्थों की एक विशेष श्रेणी के अन्तर्गत रखे जा सकते हैं।”

6. कैकिले वैलो के अनुसार, “मानव भूगोल वह विज्ञान है जो विस्तृत अर्थों में प्राकृतिक पर्यावरण के साथ मानव समूहों के अनुकूलन का अध्ययन करता है।”

7. ए० डिमांजियां के अनुसार, “मानव भूगोल समुदायों तथा समाज के भौतिक वातावरण से सम्बन्धों का अध्ययन है।”
अतः मानव भूगोल के अन्तर्गत यह अध्ययन किया जाता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में बसा मानव अपने वातावरण से किस प्रकार अनुकूलन और सामंजस्य स्थापित कर उसमें आवश्यकतानुसार संशोधन करता है। मानव भूगोल एक दर्शनशास्त्र के समान है। मनुष्य की विचारधारा और जीवन-दर्शन पर किसी स्थान की भौगोलिक परिस्थितियों का गहरा प्रभाव पड़ता है। मानव भूगोल मनुष्य तथा उस पर वातावरण के प्रभाव का अध्ययन नहीं है। इस प्रकार निष्कर्ष तौर पर हम कह सकते हैं कि मानव भूगोल वह विज्ञान है, जिसमें भूतल के विभिन्न भागों के रहने वाले मानव समूहों तथा उनसे उत्पन्न तथ्यों या भू-दृश्यों का अध्ययन किया जाता है।

मानव भूगोल की प्रकृति (Nature of Human Geography):
मानव भूगोल वह विज्ञान है जिसमें मनुष्य तथा वातावरण के बीच पारस्परिक कार्यात्मक सम्बन्धों (Functional Relations) का अध्ययन किया जाता है। मानव भूगोल की प्रकृति को उसके अर्थ तथा परिभाषाओं के द्वारा जाना जाता है। पिछले कुछ वर्षों से मानव भूगोल का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। मानव भूगोल में भौतिक परिवेश की पृष्ठभूमि में पृथ्वी पर फैली मानव सभ्यता द्वारा निर्मित परिस्थितियों तथा लक्षणों का अध्ययन किया जाता है। घर, खेत, गाँव, नहरें, पुल, सड़कें, नगर, कारखाने, बाँध व स्कूल इत्यादि मानवीय लक्षणों के उदाहरण हैं।

वास्तव में, फ्रांस के पॉल विडाल-डी-ला ब्लाश (Paul Vidal-de-la Blache) तथा जीन बूंश (Jean Brunches) ने मानव भूगोल को अत्यधिक महत्त्व देकर उसे उच्च शिखर पर बिठा दिया है। प्राकृतिक दशाओं के आधार पर मानव भूगोल के तत्त्वों को आसानी से समझा भी जा सकता है। मानव भूगोल मानव वर्गों और उनके वातावरण की शक्तियों, प्रभावों तथा प्रतिक्रियाओं के पारस्परिक कार्यात्मक सम्बन्धों का प्रादेशिक आधार पर किया जाने वाला अध्ययन है। मानव भूगोल में मानव और प्रकृति के बीच सतत् परिवर्तनशील क्रिया से उत्पन्न सांस्कृतिक लक्षणों की स्थिति एवं वितरण की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
भूगोल का मानव एवं वातावरण के साथ संबंध का दो प्रमुख उपागमों के अंतर्गत वर्णन कीजिए।
अथवा
मानव भूगोल के अध्ययन के दो प्रमुख उपागमों-नियतिवाद और संभववाद का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भौगोलिक अध्ययन के कई पक्ष होते हैं, परंतु भूगोल में मानव और वातावरण के संबंधों को लेकर दो पृथक विचारधाराएँ विकसित हुईं। 19वीं शताब्दी में जर्मनी में मानव और वातावरण के सम्बन्धों का विस्तृत अध्ययन किया गया जिसमें वातावरण को सर्वप्रमुख माना गया। तत्पश्चात् इस विचारधारा में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने मानवीय पक्ष को प्रधानता दी। ये विचारधाराएँ निम्नलिखित हैं
1. नियतिवाद या वातावरण निश्चयवाद (Environmental Determinism) – नियतिवाद के सिद्धांत का जन्म और विकास जर्मनी में हुआ। हम्बोल्ट, रिटर और रेटज़ेल इस विचारधारा के मुख्य प्रतिपादक थे। इस सिद्धांत के अनुसार, मानव का विकास उसके वातावरण के द्वारा होता है। रेटजेल के अनुसार, मानव अपने वातावरण की उपज है। वातावरण ही मानव के जीवन-यापन के ढंग अर्थात् भोजन, वस्त्र, मकान और सांस्कृतिक स्वरूप को निर्धारित करता है। मनुष्य केवल वातावरण के साथ समायोजन करके स्वयं को वहाँ रहने योग्य बनाता है। टुंड्रा के एस्किमो, जायरे बेसिन के पिग्मी व कालाहारी मरुस्थल के बुशमैन आदि कबीलों ने आखेट द्वारा जीवन-यापन को स्वीकार कर भौतिक परिवेश में समायोजित हो गए। हम्बोल्ट के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कॉसमॉस’ में वातावरण के प्रभावों का स्पष्ट आभास मिलता है। उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों के प्रभावों को मानव जातियों के शारीरिक लक्षणों पर और मनुष्यों के रहन-सहन पर स्पष्टतः प्रदर्शित किया था।

आलोचना (Criticism) – यह बात सत्य है कि वातावरण मनुष्य को प्रभावित करता है परंतु मनुष्य भी वातावरण में परिवर्तन कर सकता है। यह पारस्परिक क्रिया इतनी गहन है कि यह जानना कठिन होता है कि किस समय एक क्रिया का प्रभाव बंद होता है और दूसरी क्रिया का प्रभाव आरंभ होता है। समान भौतिक परिवेश वाले क्षेत्रों में विकास के स्तर में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। पृथ्वी तल पर जनसंख्या के वितरण में जो विषमताएँ पाई जाती हैं उनका कारण केवल वातावरण ही नहीं है। बहुत-से भू-दृश्य जो हमें प्राकृतिक प्रतीत होते हैं वे वास्तव में मानव द्वारा निर्मित होते हैं। अतः नियतिवाद की इस आधार पर आलोचना की गई कि जहाँ पर्यावरण मानव को प्रभावित करता है, वहाँ मानव भी पर्यावरण को परिवर्तित करने में सक्षम है।

2. संभववाद (Possibilism)-संभववाद की विचारधारा का जन्म और विकास फ्रांस में हुआ था। इसलिए इसे फ्रांसीसी विचारधारा भी कहते हैं। इस विचारधारा के प्रमुख प्रतिपादक विडाल-डी-ला ब्लाश थे। उनके पश्चात् अन्य भूगोलवेत्ताओं जीन ब्रश, डिमांजियां आदि ने भी इस विचारधारा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। संभववाद शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम क्रॅबवे ने किया
था जो ब्लाश के दृष्टिकोण पर आधारित था।

इस विचारधारा के अनुसार, प्रकृति के द्वारा कुछ संभावनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं जिनके अंदर मानव की छाँट (Human Choice) द्वारा किसी क्षेत्र के साथ मानव समाज अपना सामंजस्य स्थापित करता है। इन भूगोलवेत्ताओं ने प्रादेशिक अध्ययन के द्वारा फ्रांस में तथा संसार के अन्य देशों में भी मानव द्वारा निर्मित सांस्कृतिक भू-दृश्य का वर्णन करते हुए दर्शाया कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ते के लिए मानवीय छाँट ही महत्त्वपूर्ण होती है। किसी प्रदेश की स्थिति और जलवायु से अधिक महत्त्वपूर्ण मानव होता है और मानव प्रकृति द्वारा प्रस्तुत की गई संभावनाओं का स्वामी होता है तथा उनके प्रयोग का निर्णायक होता है।

निष्कर्ष (Conclusion) – यद्यपि प्रकृति का मनुष्य पर पूर्ण नियंत्रण नहीं है फिर भी प्रभाव अवश्य है और मानव उस प्रकृति की सीमाओं के अंदर ही विकास कर सकता है। वास्तव में, न तो प्रकृति का ही मनुष्य पर पूरा नियंत्रण है और न ही मनुष्य प्रकृति का विजेता है। दोनों का एक-दूसरे से क्रियात्मक सम्बन्ध है। मानव उन्नति के लिए आवश्यक है कि मनुष्य प्रकृति के साथ सहयोगी बनकर रहे।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

प्रश्न 3.
“द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात, मानव भूगोल ने मानव समाज की समकालीन समस्याओं और चुनौतियों के समाधान प्रस्तुत किए।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
अथवा
मानव भूगोल के अध्ययन की विभिन्न विधियों या उपागमों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् भूगोल में विशेषीकरण की प्रवृत्ति आ गई। इस समय भूगोल के अंतर्गत बस्तियाँ, नगर, बाजार, मनोरंजन, सैन्य भूगोल, प्रादेशिक असमानता, गरीबी, लिंग भेद, निरक्षरता आदि संवेदनशील उपविषय पढ़े जा रहे हैं। ये सभी विषय मूल रूप से मानव भूगोल के अंतर्गत आते हैं लेकिन समकालीन मुद्दों और समस्याओं को समझने तथा उनका समाधान ढूँढने में पारंपरिक विधियां असमर्थ हैं। फलस्वरूप मानव भूगोल ने समय-समय पर अनेक नई विधियों को अपनाया जो समकालीन समस्याओं और चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करती हैं। इस उद्देश्य के लिए मानव भूगोल में अपनाई गई विधियाँ अग्रलिखित हैं-
1. प्रत्यक्षवाद (Positivism) इसमें मात्रात्मक विधियों पर अधिक बल दिया गया जिससे भौगोलिक विश्लेषण वस्तुनिष्ठ बनाया जा सके। इस विचारधारा की प्रमुख कमी यह थी कि इसमें मानवीय गुणों; जैसे धैर्य, क्षमता, विश्वास आदि का विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

2. व्यवहारवाद (Behaviouralism)-इस विचारधारा के अनुसार, संपूर्ण अपने अंश अथवा अवयवों से महत्त्वपूर्ण होता है। अतः परिस्थिति का समग्र रूप में प्रत्यक्षीकरण किया जाना चाहिए। इस विधि में मानव अपनी शक्तियों का उचित उपयोग करके समस्याओं का बौद्धिक हल ढूँढ सकता है।

3. कल्याणपरक विचारधारा (Welfare Approach) विश्व में व्याप्त विभिन्न प्रकार की असमानताओं की प्रतिक्रियास्वरूप मानव भूगोल में कल्याणपरक प्रतिक्रिया का जन्म हुआ। इसमें निर्धनता, बेरोज़गारी, प्रादेशिक असंतुलन, नगरीय झुग्गी-झोंपड़ियाँ तथा आर्थिक असमानता जैसे विषयों को मुख्य रूप से सम्मिलित किया गया।

4. मानवतावाद (Humanism)-मानवतावाद मनुष्य की सूजन शक्ति पर आधारित मानव भूगोल की एक नवीन विचारधारा है। इसमें मानव जागृति, मानव संसाधन तथा उसकी सृजनात्मकता के संदर्भ में मनुष्य की सक्रिय भूमिका का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 4.
मानव भूगोल की विभिन्न शाखाओं या उपक्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानव भूगोल का अध्ययन क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। मानव भूगोल की शाखाएँ या उपक्षेत्र निम्नलिखित हैं-
1. आर्थिक भूगोल (Economic Geography) – आर्थिक भूगोल मानव भूगोल की सबसे प्रमुख शाखा है। आर्थिक भूगोल में मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा प्राकृतिक वातावरण आदि के साथ मनुष्य के सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। संसार के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव समुदाय जीवन-यापन के लिए भिन्न-भिन्न साधन अपनाता है; जैसे लकड़ी काटना, मछली पकड़ना, आखेट, कृषि, खनन, भोज्य पदार्थ, व्यवसाय आदि। आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं का अध्ययन करता है। आर्थिक क्रियाओं पर वातावरण के विभिन्न तत्त्वों; जैसे मिट्टी, भूमि, प्राकृतिक वनस्पति,. खनिज संसाधन, जनसंख्या तथा घनत्व आदि का प्रभाव पड़ता है।

2. सांस्कृतिक भूगोल (Cultural Geography) – मानव भूगोल की इस शाखा के अन्तर्गत मनुष्य के सांस्कृतिक पहलुओं; जैसे मानव का आवास, सुरक्षा, भोजन, रहन-सहन, भाषा, धर्म, रीति-रिवाज, पहनावा आदि का अध्ययन किया जाता है। भिन्न-भिन्न मानव समुदायों की कला, तकनीकी उन्नति और विज्ञान के विभिन्न स्तरों पर अवस्थित होना मोटे तौर पर उनके भौगोलिक पर्यावरण
की देन है। कुछ भूगोलवेत्ता सांस्कृतिक भूगोल को सामाजिक भूगोल भी कहते हैं। सामाजिक भूगोल में मानव को एकाकी रूप न लेते हुए मानव समूहों और पर्यावरण के सम्बन्धों की व्याख्या की जाती है। सांस्कृतिक भूगोल में भिन्न-भिन्न मानव समुदायों के सांस्कृतिक विकास तथा उसके पर्यावरण के आपसी सम्बन्धों की व्याख्या की जाती है।

3. ऐतिहासिक भूगोल (Historical Geography) – मानव भूगोल की इस शाखा में ऐतिहासिक घटनाओं का अध्ययन किया जाता है। किसी क्षेत्र में एक समय से दूसरे समय में होने वाले भौगोलिक परिवर्तनों के अध्ययन को ऐतिहासिक भूगोल कहते हैं। ऐतिहासिक भूगोल विश्लेषण करता है कि किस प्रकार धरातल, स्थिति, भौगोलिक एकान्तता, प्राकृतिक बाधाएँ तथा राज्य का विस्तार
आदि किसी राष्ट्र का भाग्य निर्धारित करती है। हार्टशान के अनुसार, “ऐतिहासिक भूगोल भूतकाल का भूगोल है।”

4. राजनीतिक भूगोल (Political Geography) – मानव भूगोल की इस शाखा के अन्तर्गत राष्ट्रों या राज्यों की सीमाएँ, विस्तार, स्थानीय प्रशासन, प्रादेशिक नियोजन आदि आते हैं। राजनीतिक भूगोल में प्रादेशिक व राष्ट्रीय नियोजन का अध्ययन किया जाता है। राजनीतिक भूगोल मानवीय समूहों की राजनीतिक परिस्थितियों, समस्याओं व क्रियाओं से भूगोल के महत्त्व को प्रदर्शित करता है। राजनीतिक भूगोल राज्यों का भूगोल है और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की भौगोलिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।

5. सैन्य भूगोल (Military Geography) – मानव भूगोल की इस शाखा के अन्तर्गत स्थल तथा समुद्र के भौगोलिक चरित्र का युद्ध की घटनाओं पर पड़ने वाले प्रभावों को उजागर करना है। इस भूगोल में युद्ध के स्थानों के निर्धारण के लिए सम्बन्धित क्षेत्र की भौगोलिक दशाओं, स्थिति, जलाशयों, उच्चावच, जंगली भूमि आदि की जानकारी आवश्यक होती है। इस भूगोल में अध्ययन के लिए मानचित्रों तथा स्थलाकृतिक मानचित्रों की आवश्यकता पड़ती है।

6. कृषि भूगोल (Agricultural Geography) – मानव भूगोल की इस शाखा या उपक्षेत्र में कृषि सम्बन्धी सभी तत्त्वों; जैसे कृषि भूमि, सिंचाई, कृषि उत्पादन तथा पशुपालन व पशु उत्पादों का अध्ययन किया जाता है। कृषि से मनुष्य की मूलभूत जरूरत ‘भोजन’ की आपूर्ति होती है। इसलिए मानव भूगोल की यह शाखा या उपक्षेत्र सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। इन शाखाओं के अतिरिक्त मानव भूगोल की कई अन्य उपशाखाएँ; जैसे नगरीय भूगोल, अधिवास भूगोल, चिकित्सा भूगोल, व्यापारिक भूगोल, ग्रामीण भूगोल, औद्योगिक भूगोल तथा व्यावहारिक भूगोल आदि हैं।

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक भूगोल का वर्णन नहीं करता?
(A) समाकलनात्मक अनुशासन
(B) मानव और पर्यावरण के बीच अंतर्संबंधों का अध्ययन
(C) द्वैधता पर आश्रित
(D) प्रौद्योगिकी के विकास के फलस्वरूप आधुनिक समय में प्रासंगिक नहीं
उत्तर:
(D) प्रौद्योगिकी के विकास के फलस्वरूप आधुनिक समय में प्रासंगिक नहीं

2. निम्नलिखित में से कौन-सा एक भौगोलिक सूचना का स्रोत नहीं है?
(A) यात्रियों के विवरण
(B) प्राचीन मानचित्र
(C) चंद्रमा से चट्टानी पदार्थों के नमूने
(D) प्राचीन महाकाव्य
उत्तर:
(D) प्राचीन महाकाव्य

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3. निम्नलिखित में कौन-सा एक लोगों और पर्यावरण के बीच अन्योन्यक्रिया का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक है?
(A) मानव बुद्धिमता
(B) प्रौद्योगिकी
(C) लोगों के अनुभव
(D) मानवीय भाईचारा
उत्तर:
(B) प्रौद्योगिकी

4. निम्नलिखित में से कौन-सा एक मानव भूगोल का उपगमन नहीं है?
(A) क्षेत्रीय विभिन्नता
(B) मात्रात्मक क्रांति
(C) स्थानिक संगठन
(D) अन्वेषण और वर्णन
उत्तर:
(B) मात्रात्मक क्रांति

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
मानव भूगोल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
मानव भूगोल वह विषय है जो प्राकृतिक, भौतिक एवं मानवीय जगत् के बीच संबंध, मानवीय परिघटनाओं का स्थानिक वितरण तथा उनके घटित होने के कारण एवं विश्व के विभिन्न भागों में सामाजिक एवं आर्थिक भिन्नताओं का अध्ययन करता है। रेटजेल के अनुसार, “मानव भूगोल मानव समाजों और धरातल के बीच संबंधों का संश्लेषित अध्ययन है।”

प्रश्न 2.
मानव भूगोल के कुछ उप-क्षेत्रों के नाम बताइए।
उत्तर:
मानव भूगोल के उप-क्षेत्र हैं-व्यवहारवादी भूगोल, सामाजिक कल्याण का भूगोल, विपणन भूगोल, उद्योग भूगोल, संसाधन भूगोल, जनसंख्या भूगोल, ऐतिहासिक भूगोल, आर्थिक भूगोल, सांस्कृतिक भूगोल, सैन्य भूगोल, चिकित्सा भूगोल, कृषि भूगोल आदि।

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प्रश्न 3.
मानव भूगोल किस प्रकार अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंधित है?
उत्तर:
भौतिक भूगोल की तरह मानव भूगोल भी स्वयं में एक स्वतंत्र विज्ञान नहीं है। अपनी विषय-वस्तु तथा उसके विश्लेषण के लिए मानव भूगोल अनेक सामाजिक विज्ञानों पर निर्भर करता है। यह दूसरे विषयों को क्षेत्रीय संदर्भ (Regional Perspective) प्रदान करता है जिसकी उनमें कमी होती है। उदाहरणतया

  • आर्थिक क्रियाओं व जनसंख्या की विशेषताओं के अध्ययन के लिए मानव भूगोल अर्थशास्त्र व जनांकिकी (Demography) की सहायता लेता है।
  • भूगोल स्थान का और इतिहास समय का ज्ञाता होने के कारण ये न केवल एक-दूसरे से अंतर्संबंधित हैं बल्कि एक-दूसरे के पूरक भी हैं।
  • फसलों के वितरण और उन्हें निर्धारित करने वाली भौगोलिक दशाओं तथा भूमि-उपयोग के अध्ययन के लिए मानव भूगोल कृषि विज्ञान का सहारा लेता है।
  • मानव समुदायों, उनके सामाजिक संगठन, परिवार-प्रणाली, श्रम-विभाजन, रीति-रिवाज़, लोक-नीति, प्रथाओं व जनजातियों के अध्ययन के लिए मानव भूगोल समाजशास्त्र की ओर देखता है।

इनके अतिरिक्त अन्य अनेक सामाजिक विज्ञानों के साथ-साथ मानव भूगोल का संबंध विभिन्न प्राकृतिक विज्ञानों से भी है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
मानव के प्राकृतिकरण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य अपनी सांस्कृतिक विरासत से प्राप्त तकनीक और प्रौद्योगिकी की सहायता से अपने भौतिक पर्यावरण से अन्योन्यक्रिया करता है। महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं है कि मनुष्य क्या उत्पन्न एवं निर्माण करता है बल्कि यह है कि वह किन उपकरणों एवं तकनीकों की सहायता से उत्पादन एवं निर्माण करता है। प्रौद्योगिकी से किसी समाज के सांस्कृतिक विकास की सूचना मिलती है। मनुष्य प्रकृति के नियमों को बेहतर ढंग से जानने के बाद ही प्रौद्योगिकी का विकास कर पाया है।

उदाहरणतया-

  • तीव्रतर यान विकसित करने के लिए हम वायुगतिकी के नियमों का पालन करते हैं।
  • घर्षण एवं ऊष्मा की संकल्पनाओं ने अग्नि के आविष्कार में हमारी सहायता की।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि सभी विज्ञानों का जन्म प्रकृति से हुआ है। आरंभिक मानव ने स्वयं को प्रकृति के आदेशों के अनुसार ढाल लिया था। क्योंकि उस समय मानव का सामाजिक-सांस्कृतिक विकास आरंभिक अवस्था में था तथा प्रौद्योगिकी न के बराबर थी। सतत् पोषण के लिए मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है। ऐसे में वह पर्यावरण को माता-प्रकृति (The Goddess of Nature) का नाम देते हैं। समय के साथ-साथ.सामाजिक और सांस्कृतिक विकास हुआ और मनुष्य प्रौद्योगिकी का विकास करने लगा। पर्यावरण से प्राप्त संसाधनों से वे अनेक संभावनाओं को जन्म देने लगा। मानवीय क्रियाओं की छाप हर जगह दिखाई देने लगी जैसे; ऊँचे पर्वतों पर सड़कें बनाना, नगरीय प्रसार, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी-पठारी भूमि पर रेलमार्ग विकसित करना इत्यादि।
(1) पहले के विद्वानों ने इसे संभववाद का नाम दिया। विद्वानों ने बताया कि कैसे मनुष्य अपनी बुद्धि, कौशल, संकल्प शक्ति इत्यादि के बल पर प्रकृति का मानवीकरण करता है और अपने प्रयासों की छाप प्रकृति पर छोड़ने लगता है।

(2) परन्तु कुछ अन्य भूगोलवेत्ताओं ने एक नई संकल्पना प्रस्तुत की, जो पर्यावरणीय निश्चयवाद तथा संभववाद की चरम सीमाओं के बीच का दर्शन करवाती है। इसे “नव निश्चयवाद” कहा जाता है।

इसका अर्थ है कि मानव प्रकृति का आज्ञापालक बनकर ही इस पर विजय प्राप्त कर सकता है। उन्हें लाल संकेतों पर प्रत्युत्तर देना होगा और जब प्रकृति रूपांतरण की स्वीकृति दे तो वे अपने विकास के प्रयत्नों में आगे बढ़ सकते हैं।

निष्कर्ष – नवनिश्चयवाद संकल्पनात्मक ढंग से एक संतुलन बनाने का प्रयास करता है जो सम्भावनाओं के बीच अपरिहार्य चयन द्वैतवाद को निष्फल करता है।

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प्रश्न 2.
मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
मानव भूगोल का विषय-क्षेत्र-मानव भूगोल का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत तथा व्यापक है। भौगोलिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में मानव के उद्यम द्वारा बनाए गए सांस्कृतिक दृश्य-भूमि का अध्ययन ही मानव भूगोल की विषय-वस्तु है। इसमें मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं के अतिरिक्त मनुष्यों की अन्य क्रियाएँ; जैसे जनसंख्या और उसका वितरण, नगर व उनके आकार तथा प्रकार, मनुष्य की संस्कृति आदि भी सम्मिलित हैं अर्थात् मनुष्य एक स्वतन्त्र भौगोलिक कारक है।

इस कारण वह भौतिक पर्यावरण के संसाधनों का उपयोग करते हुए खेत, घर और गाँव बनाता है। वह सड़क, नहर, रेलमार्ग, नगर, हवाई अड्डे और बन्दरगाह आदि बनाता है। मनुष्य कहीं पर बाढ़ को रोकता है तो कहीं पर रेगिस्तान को, कहीं पर मनुष्य समुद्र की छाती को भेदकर तेल निकालता है और कहीं पर संचार-तन्त्र का विकास करता है। मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र में पदार्थ, कर्म, विचार आदि तत्त्व शामिल होते हैं। ये सभी तत्त्व मनुष्य तथा पर्यावरण से प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं।

पॉल विडाल-डी-ला ब्लाश ने अपनी पुस्तक ‘Principles de Geographie Humaine’ में जनसंख्या तथा बस्तियों के विश्व तरण तथा सभ्यता को प्रभावित करने वाले कारकों के विकास का विवेचन किया है। ब्लाश ने मानव भूगोल की विषय-सामग्री को तीन भागों में बाँटा है

  • जनसंख्या इसमें जनसंख्या का वितरण, उसका घनत्व एवं प्रभाव, प्रमुख जन-समूह, जीविका के साधन, जनसंख्या वृद्धि के कारण, प्रवास तथा मानव प्रजातियों को सम्मिलित किया जाता है।
  • सांस्कृतिक कारक-इसमें पौधों, पशुओं, कच्चा माल तथा औजार आदि आजीविका के साधन, विनिर्माण की सामग्री आदि सम्मिलित किए जाते हैं।
  • परिवहन-इसमें गाड़ियाँ, सड़कें, रेलें तथा समुद्री परिवहन आदि को सम्मिलित किया जाता है।

इसके अतिरिक्त मानव जातियों और नगरों का वर्णन करना मानव भूगोल का अध्ययन क्षेत्र है।

प्रो० जीन बूंश के अनुसार, मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र को तीन भागों में बाँटा जा सकता है जो निम्नलिखित हैं-

  • मिट्टी के गैर-कृषि उत्पादक व्यवसाय; जैसे मकान तथा सड़क।
  • जीव-जगत् पर मानव की जीत से सम्बन्धित तत्त्व; जैसे कृषि करना तथा पशुपालन आदि।
  • मिट्टी का ह्रासमयी प्रयोग; जैसे पौधों को काटना तथा विभिन्न खनिज पदार्थों का अवशोषण आदि।

एल्सवर्थ हंटिंग्टन द्वारा वर्णित मानव भूगोल का विषय-क्षेत्र बहुत ही व्यापक और विशाल है। इनके अनुसार भौतिक अवस्थाओं का सामूहिक प्रभाव जीवन के विभिन्न रूपों; जैसे मानव, पेड़-पौधों इत्यादि पर होता है। जीवन के ये सभी रूप आपस में एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। हंटिंग्टन ने मानव भूगोल के इन तत्त्वों को तीन निम्नलिखित भागों में बाँटा है-
1. भौतिक दशाएँ इनके अन्तर्गत पृथ्वी की ग्लोबीय स्थिति अर्थात् पृथ्वी का स्वरूप, आकार, मिट्टी, खनिज तथा जलवायु इत्यादि को शामिल किया जाता है।

2. जीवन के रूप-जीवन के रूप के अन्तर्गत पौधे, पशु और मनुष्य सम्मिलित किए गए हैं।

3. मानवीय अनुक्रियाएँ-इस श्रेणी के अन्तर्गत-

  • भौतिक आवश्यकताएँ; जैसे जल, वस्त्र, औजार आदि आते हैं
  • मौलिक व्यवसाय; जैसे परिवहन के साधन, आखेट, कृषि, पशुचारण आदि आते हैं।

कुछ दशकों से मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र में बहुत अधिक विस्तार हुआ है और यह विस्तार अभी भी जारी है। मानव भूगोल एक गत्यात्मक विज्ञान है। जिस तरह तकनीक के विकास के साथ मनुष्य और पर्यावरण का सम्बन्ध बदलता जा रहा है उसी प्रकार मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र में भी समय के साथ-साथ वृद्धि और विस्तार होता जा रहा है। नई समस्याओं तथा चुनौतियों का अध्ययन करने के लिए मानव भूगोल की अनेक नई शाखाओं का विकास हुआ है। इस प्रक्रिया में मानव भूगोल में एकीकरण तथा अन्तर्विषयक गुणों को समाहित किया है।

आधुनिक समय में मानव भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में कई नए प्रकरणों को शामिल किया गया है-राजनीतिक आयाम, सामाजिक सम्बद्धता, लिंग असमानता, जन-नीति, नगरीय प्रणाली इत्यादि। मानव भूगोल ने सामाजिक विज्ञानों में आवश्यक आयाम या क्षेत्र सम्बन्धी विचारों को समाहित करने का कार्य किया है। वे सामाजिक विज्ञान मानव भूगोल के उपक्षेत्रों के रूप में जाने जाते हैं; जैसे व्यावहारिक भूगोल, राजनीतिक भूगोल, आर्थिक भूगोल तथा सामाजिक भूगोल इत्यादि। मानव भूगोल का सम्बन्ध सामाजिक विज्ञानों के साथ-साथ प्राकृतिक विज्ञानों से भी है।

मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र HBSE 12th Class Geography Notes

→ निश्चयवाद (Determinism) : मानव-शक्तियों की अपेक्षा प्राकृतिक शक्तियों की प्रधानता स्वीकार करने वाला दर्शन। इस विचारधारा के अनुसार मानव-जीवन और उसके व्यवहार को विशेष रूप से भौतिक वातावरण के तत्त्व प्रभावित और यहाँ तक कि निर्धारित करते हैं।

→ संभववाद (Possibilism) : प्राकृतिक शक्तियों की अपेक्षा मानव-शक्तियों की प्रधानता स्वीकार करने वाला दर्शन, जिसके अनुसार वातावरण मानव क्रियाओं को नियंत्रित तो करता है किंतु उन सीमाओं में कुछ संभावनाएँ और अवसर प्रस्तुत करता है जिसमें मानवीय छांट महत्त्वपूर्ण होती है।

→ कार्य-कारण संबंध (Cause and Effect Relationship) : मानव द्वारा किया गया कोई उद्यम और उसके द्वारा उत्पन्न प्रभाव या परिणाम के बीच संबंधों का होना। उदाहरणतया, अर्जित शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के व्यवहार, सामाजिक व आर्थिक स्तर में होने वाले परिवर्तन में शिक्षा कारण है और बदलाव कार्य है। इसी प्रकार सिंचाई व्यवस्था होने से कृषि क्षेत्र में होने वाला सकारात्मक आर्थिक बदलाव कार्य-कारण का उदाहरण है।

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→ क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) : भूगोल की वह शाखा, जिसके अंतर्गत भौगोलिक तत्त्वों की क्षेत्रीय विषमताओं का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है।

→ प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) : भू-पृष्ठ पर विभिन्न प्राकृतिक प्रदेशों; जैसे मानसून प्रदेश, टुंड्रा प्रदेश आदि का भौगोलिक अध्ययन।

→ सामान्य भूगोल (General Geography) : भूगोल की वह शाखा जिसमें संपूर्ण पृथ्वी को एक इकाई मानकर इसके लक्षणों का विवेचन किया जाता है।

→ विशिष्ट भूगोल (Special Geography) : भूगोल की वह शाखा जिसमें अलग-अलग प्रदेशों की संरचना के अध्ययन पर बल दिया जाता है।

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HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् उपपद विभक्ति

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Upapad Vibhakti उपपद विभक्ति Exercise Questions and Answers.

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उपपद विभक्ति ज्ञान

कर्ता, कर्म, करण आदि कारकों से प्रथमा, द्वितीया, तृतीया आदि विभक्तियों का निर्देश पहले बताया गया है। संस्कृत में कुछ ऐसे अव्यय एवं निपात हैं, जिनके योग से विशेष विभक्ति का प्रयोग होता है। भाव यह है कि उसमें साधारण विभक्ति न होकर विशेष विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। उन शब्दों को ‘उपपद’ कहते हैं और उसमें निर्दिष्ट होने वाली विभक्ति को ‘उपपद विभक्ति’ कहते हैं। जैसे ‘रामः ग्रामे वसति’ यहाँ गाँव में अधिकरण कारक होने से सप्तमी विभक्ति है, किन्तु यदि यहाँ वस्’ धातु से पूर्व ‘उप’ का प्रयोग किया जाए, तो पद में सप्तमी विभक्ति न हो कर द्वितीया विभक्ति हो जाती है. रामः ग्रामम् उपवसति। यहां कुछ प्रमुख उप पद विभक्तियों का विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रथमा उपपद विभक्ति

‘इति’ शब्द के साथ प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है। जैसे –
(क) ‘संस्कृत भाषा देवभाषा’ इति कथयन्ति।
(ख) दशरथस्य ज्येष्ठपुत्रः राम इति नामधेयः आसीत्।
(ग) अमुं नारदः इति अबोधि। (उनको नारद ऐसा जाना)।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् उपपद विभक्ति

द्वितीया उपपद विभक्ति

सूत्र (i) अधिशीस्थासां कर्म – अधि उपसर्ग से युक्त शीङ् स्था और आस् धातु का आधार कर्मकारक होता है। यथा –
हरिः वैकुण्ठम् अधिशेते (हरि वैकुण्ठ में सोते हैं)।
हरिः वैकुण्ठम् अधितिष्ठति (हरि वैकुण्ठ में रहते हैं)।
हरिः वैकुण्ठम् अध्यास्ते (हरि वैकुण्ठ में बैठते हैं)।

सूत्र (ii) अभिनिविशश्च-अभि + नि-पूर्वक विश् धातु का भी आधार कर्म होता है। यथा – स अभिनिविशते सन्मार्गम् (वह अच्छे मार्ग में प्रवेश करता है।)
सूत्र (iii) उपान्वध्याड्वसः – उप, अनु, अधि और आङ् उपसर्ग से युक्त वसु धातु का आधार कर्मकारक होता है। यथा –

हरि वैकुण्ठम् उपवसति (हरि वैकुण्ठ में रहते हैं)।
हरि वैकुण्ठम् उपवसति (अनुवसति हरि वैकुण्ठ में रहते हैं)।
हरि वैकुण्ठम् उपवसति (अधिवसति हरि वैकुण्ठ में रहते हैं) ।
हरि वैकुण्ठम् उपवसति (आवसति हरि वैकुण्ठ में रहते हैं)।

यदि ‘उप + वस्’ का उपवास करना अर्थ हो तो आधार कर्म नहीं अधिकरण होता है और अधिकरण में सप्तमी होती है। यथा-तपस्वी वने उपवसति (तपस्वी वन में उपवास करता है)। गाँधी कारायाम् उपावसत् (गाँधी जी ने जेल में उपवास किया था)।

सूत्र (iv) गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ – निम्न धातुओं के अण्यन्त कर्ता ण्यन्त में कर्मकारक बन जाते हैं –

(i) गत्यर्थक धातु – माता पुत्रं गृहं गमयति (माता पुत्र को घर भेजती है)।
(ii) बुद्धयर्थक धातु – गुरुः शिष्यं धर्मं बोधयति (गुरु शिष्य को धर्म बतलाता है)।
(iii) प्रत्यवसानार्थक (भक्षणार्थक) धातु – माता पुत्रम् ओदनम् आशयति (माता पुत्र को भात खिलाती है)।
(iv) शब्दकर्मक धातु – गुरुः छात्रं वेदम् अध्यापयति (गुरु छात्र को वेद पढ़ाते हैं)।
(v) अकर्मक धातु – माता शिशुं शाययति (माता शिशु को सुलाती है)।

सूत्र (v) कर्मज्ञप्रवचनीयुक्ते द्वितीया – जो उपसर्ग कर्मप्रवचनीयसंज्ञक होते हैं, उनके योग में द्वितीया विभक्ति होती है। यथा-जपम् अनु प्रावर्षत् मेघः (जप करने के बाद मेघ बरसा)। जप के कारण वर्षा हुई।
रामम् अनुगतः लक्ष्मणः वनम् (राम के पीछे लक्ष्मण वन गये)। राम के कारण लक्ष्मण वन गये।

सूत्र (vi) कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे (अत्यन्तसंयोगे द्वितीया) – अत्यन्त संयोग में काल और मार्ग के वाचक शब्दों में द्वितीया होती है। यथा – स मासम् अधीते वेदम् (वह महीना भर वेद पढ़ता है)। पुरा द्वादशवर्षाणि व्याकरणं पठन्ति स्म (पहले लगातार बारह साल तक व्याकरण पढ़ते थे)। क्रोशं कुटिला नदी वर्तते (लगातार कोस भर नदी टेढ़ी है)।

क्रिया की पूर्णता में तृतीया होती है (अपवर्गे तृतीया) – मासेन वेदम् अध्यैत (महीने भर में वेद पढ़ लिया)। क्रोशेन श्लोकान् अस्मरत् (कोस भर में श्लोकों को याद कर लिया)।

सूत्र (vii)
उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु।
द्वितीयानेडितान्तेषु ततोऽन्यत्रापि दृश्यते।

निम्नलिखित शब्दों के योग में द्वितीया होती है –
(i) उभयत: – प्रयागम् उभयत: नद्यौ स्तः (प्रयाग के दोनों ओर दो नदियाँ हैं)।
(ii) सर्वतः – विद्यालयं सर्वतः वृक्षाः सन्ति (विद्यालय के सब ओर पेड़ हैं)।
(ii) धिक् – धिक् तं पापकारिणम् (उस पापकारी को धिक्कार है)।
(iv) उपर्यपरि – मेघम् उपर्युपरि विमानं गतम् (मेघ के ऊपर-ऊपर हवाई जहाज गया)
(v) अध्यधि – वनम् अध्यधि मार्ग: गतः (वन के बीचोबीच राह गयी है)
(vi) अधोऽधः – मेघम् अधोऽधः गच्छति विमानम् (मेघ के नीचे-नीचे हवाई जहाज जाता है।
सूत्र (viii) अभितः-परितः समया-निकषा-हा-प्रति-योगेऽपि-अभितः आदि के योग में भी द्वितीया होती है।

यथा –
(i) अभित: – विद्यालयम् अभितः वृक्षाः सन्ति (विद्यालय के सब ओर पेड़ हैं)।
(ii) परितः – विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति (विद्यालय के चारों ओर पेड़ हैं)।
(iii) समया – नगरं समया पर्वतः वर्तते। (शहर के पास पहाड़ है।)
(iv) निकषा – नगरं निकषा पर्वतः वर्तते (शहर के पास पहाड़ है।)
(v) हा – हा नास्तिकम् (नास्तिक पर अफसोस है)।
(vi) प्रति – दीनं प्रति कुरु दयाम् (गरीब पर दया करो)।
सत्र (ix) अन्तरा अन्तरेण यक्त – अन्तरा और अन्तरेण के योग में द्वितीया होती है। यथा-त्वां मां च अन्तरा विष्णुः (तेरे और मेरे बीच में विष्णु है)। अन्तरेण ज्ञानं न सुखम् (बिना ज्ञान के सुख नहीं मिलता)।
सूत्र (x) क्रियाविशेषणे द्वितीया – क्रियाविशेषण में द्वितीया होती है। वैसे क्रिया विशेषण अव्यय होते हैं, किन्तु अन्य शब्द भी जब क्रियाविशेषण के समान प्रयुक्त होते हैं तो वे भी अव्यय कम बन जाते हैं किन्तु उनमें द्वितीया विभक्ति लगती है और शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। ये सभी क्रियाविशेषण सदा एक ही रूप में रहते हैं। यथा –
मन्दधी: सुखं स्वपिति (मूर्ख मौज से सोता है)।
मधुरं गायति सा बाला (वह लड़की मधुर गाती है)।
अधिकं शब्दायतेऽ? घटः (आधा भरा घड़ा अधिक शोर करता है)।

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तृतीया उपपद विभक्ति

कारक में तृतीया विभक्ति होती है।
सूत्र (i) गम्यमानाऽपि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका – क्रिया यदि स्पष्टतः न कही भी गई हो किन्तु उसका भाव प्रतीत होता हो तो भी कारकों की विभक्तियाँ हो जाया करती हैं। यथा-अलं महीपाल ! तव श्रमेण (हे राजन् ! बस कीजिए, आपके परिश्रम से कुछ होना-जाना नहीं है)। यहाँ तव श्रमेण’ के बाद ‘न किञ्चित् साध्यम्’ यह बात बिना कहे भी समझ में आ जाती है, अत: ‘साध्य’ के साधन ‘श्रम’ में करण-कारक की तृतीया लगी है।

सूत्र (ii) प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् – प्रकृति आदि शब्दों में तृतीया विभक्ति होती है। यथा –
प्रकृत्या चारु: अयं बालक: (यह लड़का स्वभाव से सुन्दर है)।
गोत्रेण गार्ग्य: अयं ब्राह्मणः (यह ब्राह्मण गोत्र से गार्य है)।
नाम्ना यज्ञदत्तः अयं छात्रः (यह छात्र नाम से यत्रदत्त है)।
अहं वर्णेन ब्राह्मणः (मैं वर्ण से ब्राह्मण हूँ)।
मम सुखेन याति कालः (सुख से मेरा समय बीतता है)।

सूत्र (ii) अपवर्गे तृतीया – अपवर्ग में – क्रिया की सिद्धि में कालवाचक और मार्गवाचक शब्दों में अत्यन्तसंयोग रहने पर तृतीया विभक्ति होती है। यथा –
स मासेन  अधीतवान् (उसने महीने-भर में व्याकरण पढ़ लिया)। अयं चतुर्भि: वर्षेः गृहं निर्मितवान् (इसने
चार वर्षों में घर बना लिया)। योजनेन भवान् कथां समाप्तवान् (आपने योजन-भर में कथा समाप्त की)।
सूत्र (iv) सहयुक्तेऽप्रधाने (सहार्थे तृतीया)-‘सह’ के अर्थ वाले शब्दों के योग में अप्रधान में तृतीया विभक्ति होती है। यथा –

पुत्रेण सह आगतः पिता (पुत्र के साथ पिता आया)।
छात्रेण समं गतः गुरु: (छात्र के साथ गुरुजी गये)।

गुरुणा सार्धम् एकासने न आसीत् (गुरु के साथ एक आसन पर कोई न बैठे)। मया साकं तिष्ठ (मेरे साथ ठहरो)।

सूत्र (v) येनाङ्गविकार: – जिस अंग के विकृत होने से अंगी में विकार ज्ञात हो उस अंग के वाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है। यथा –

अक्ष्णा काणः सः (वह आँख से काना है)।
कर्णेन बधिरः त्वम् (तुम कान से बहरे हो)।
अयं पादेन खञ्जः (यह पैर से लंगड़ा है)।

सूत्र (vi) इत्थंभूतलक्षणे – जिस चिह्न के कारण कोई व्यक्ति किसी विशेष प्रकार का लगता हो, उस चिह्न के वाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है। यथा –
अयं जटाभिः तापसः प्रतीयते (यह जटाओं से तपस्वी लगता है।)
सः पुस्तकेन छात्रः (वह पुस्तक से छात्र है)।

सूत्र (vii) हेतौ (हेतो तृतीया) – हेतु में अर्थात् किसी भी कार्य के कारण या प्रयोजन तृतीया होती है। यथा –
दण्डेन घटः भवति (दण्ड से घड़ा होता है)।
श्रमेण धनं भवति (श्रम से धन होता है)।
पुण्येन सुखं मिलति (पुण्य से सुख मिलता है)।
विद्यया बुद्धिः वर्धते (विद्या से बुद्धि बढ़ती है)।
अध्ययनेन वसति (अध्ययन के निमित्त रहता है)।

सूत्र (viii) ऊन-वारण-प्रयोजनार्थश्च – ऊनार्थक, वारणार्थक और प्रयोजनार्थक शब्दों के योग में तृतीया होती है। यथा –
(क) ऊनार्थक-एकेन ऊनं शतम् (एक कम सौ)।
धनेन हीनः सः (वह धन से हीन है)।
गर्वेण शून्यः भव (गर्व से शून्य होओ)।
क्रोधेन रहितः सुखी भवति (क्रोध से रहित सुखी होता है)।

(ख) वारणार्थक – अलं विवादेन (विवाद न करो)।
अलं कलहेन (कलह मत करो)।

(ग) प्रयोजनार्थक – धनेन किं प्रयोजनम् (धन से क्या मतलब) ?
नास्ति मम सेवकेन प्रयोजनम् (मुझे सेवक से प्रयोजन नहीं है)।
कोऽर्थः पुत्रेण (पुत्र से क्या लाभ) ?

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् उपपद विभक्ति

चतुर्थी उपपद विभक्ति

सूत्र (i) दाने चतुर्थी – जिसे कोई वस्तु दी जाए, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा-विप्राय गां ददाति।
सूत्र (ii) अशिष्टव्यवहारे दाणः प्रयोगे चतुर्थ्यर्थे तृतीया-अशिष्ट-व्यवहार के लिए दाण् धातु के प्रयोग में चतुर्थी के अर्थ में तृतीया होती है। यथा –
दास्या संयच्छते कामुकः (कामी पुरुष दासी को देता है)। शिष्ट-व्यवहार में-भार्यायै संयच्छति (पत्नी को देता है)।
सूत्र (ii) रुच्यर्थानां प्रीयमाण:-‘रुचना’ अर्थ वाले धातुओं के योग में जिसे कोई वस्तु रुचती है वह सम्प्रदानकारक होता है। उस सम्प्रदान में चतुर्थी होती है। यथा –
हरये रोचते भक्तिः (हरि को भक्ति अच्छी लगती है)।
मह्यं रोचते संस्कृतम् (मुझे संस्कृत अच्छी लगती है)।
सूत्र (iv) धारेरुत्तमर्ण:-धारि धातु के योग में उत्तमर्ण (साहूकार) में सम्प्रदानकारक होता है। उसमें चतुर्थी होती है। यथा – देवदत्ताय शतं धारयति सः (वह देवदत्त के लिए सौ रुपए धारता है)।
सूत्र (v) स्पृहेरीप्सतः-स्पृह धातु के योग में ईप्सित (अभीष्ट वस्तु) सम्प्रदान होता है। यथा पुष्पेभ्य स्पृह्यति मालाकारः (माली फूलों को चाहता है)। अहं संस्कृतस्य प्रचाराय स्पृह्यामि (मैं संस्कृत का प्रचार चाहता हूँ)।
सूत्र (vi) क्रुद्रुहेासूयार्थानां यं प्रति कोप:-क्रुध्, द्रुह, ईर्ष्या और असूया अर्थ वाले धातुओं के योग में जिसके प्रति क्रोध आदि भाव होते हैं वह सम्प्रदानकारक होता है। यथा –
कृष्णाय क्रुध्यति कंसः (कंस कृष्ण पर क्रोध करता है)। कृष्णाय द्रुह्यति कंसः (कंस कृष्ण से द्रोह करता है)। कृष्णाय ईय॑ति कंसः (कंस कृष्ण से ईर्ष्या करता है)। कृष्णाय असूयति कंसः (कंस कृष्ण से असूया करता है)।
सूत्र (vii) क्रुधद्रुहोरुपसृष्टयोः कर्म-क्रुध और द्रुह्य धातु यदि उपसर्ग से युक्त हों, उसके प्रति क्रोध हो वह कर्मकारक होता है। कर्म में द्वितीया होती है। यथा –
कृष्णम् अभिक्रुध्यति कंसः (कंस कृष्ण पर क्रोध करता है)। कृष्णम् अभिद्रुह्यति कंसः (कंस कृष्ण से विद्रोह करता है)।
सूत्र (vii) तादर्थ्य चतुर्थी वाच्या-जिस प्रयोजन के लिए कोई क्रिया की जाती है, कोई वस्तु होती है उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा –
मुक्तये हरि भजति (मुक्ति के लिए हरि को भजता है)। भवति काव्यं यशसे (काव्यं यश के लिए होता है)। कुण्डलाय सुवर्णम् (कुण्डल के लिए सोना है)। मोदकाय क्रन्दति बाल: (बच्चा लड्डू के लिए रोता है)।
सूत्र (ix) नमः स्वस्ति-स्वाहा-स्वधालं-वषड्योगाच्च-नमः, स्वस्ति आदि शब्दों के चतुर्थी होती है। यथा नमः-तस्मै श्रीगुरवे नमः (उस श्रीगुरु को नमः है)। स्वस्ति-अस्तु स्वस्ति प्रजाभ्यः (प्रजा का कल्याण हो।) स्वाहा-अग्नये स्वाहा (अग्नि को स्वाहा है)। स्वधा-पितृभ्यः स्वधा (पितरों को समर्पित है)। अलम्-अलं मल्लो मल्लाय (यह पहलवान उस पहलवान के लिए काफी) निषेध में तृतीया-अलं विवादेन। वषड्-वषड् इन्द्राय (इन्द्र को अर्पित है)।
सूत्र (x) उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी – उपपदविभक्ति से कारक विभक्ति बलवती होती है। इसलिए कारक विभक्ति उपपदविभक्ति को रोकती है।
नमस्करोति देवान् भक्तः (भक्त देवों को नमस्कार करता है)। इस वाक्य में कर्मणि द्वितीया से कर्मकारक में होने वाली द्वितीया विभक्ति नमः, स्वस्ति से होने वाली उपपदविभक्ति चतुर्थी को रोक देती है।
सूत्र (xi) निम्नलिखित शब्दों के योग में भी चतुर्थी विभक्ति होती है –

(i) हितम्-भवतु लोकाय हितम् (लोक के लिए कल्याण हो)।
(ii) सुखम्-अस्तु लोकाय हितम् (लोक के लिए सुख हो)।
(iii) स्वागतम्-स्वागतं रामाय (राम के लिए स्वागत है)।
(iv) कुशलम्-तुभ्यं भूयात् कुशलम् (तेरा कुशल हो)। आदि।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् उपपद विभक्ति

पञ्चमी उपपद विभक्ति

सूत्र (i) जुगुप्सा – विराम-प्रमादार्थानामुपसंख्यानम्-जुगुप्सा (घृणा), विराम और प्रमाद (लापरवाही) अर्थ वाले धातुओं के योग,में पञ्चमी विभक्ति होती है जैसे –
पापात् जुगुप्सते (पाप से घृणा करता है)।
अधर्मात् विरमति (अधर्म से विरत होता है)।
धर्मात् प्रमाद्यति (धर्म से प्रमाद करता है)।
सूत्र (ii) भीत्रार्थानां भयहेतुः – भय और त्राण अर्थ वाले धातुओं के योग में अपादान कारक होता है यथा-व्याघ्रात् बिभेति (बाघ से डरता है) सात् त्रायते (साँप से बचता है)।
सूत्र (iii) पराजेरसोढः – परा उपसर्गपूर्वक जि धातु के योग में असोढ (जो सहने योग्य न हो, जेता) अपादानकारक होता है। यथा-रामात् रावणः पराजयते (राम से रावण हारता है)।
सूत्र (vi) आख्यातोपयोगे – उपयोग (नियमपूर्वक साथ रहकर विद्या पढ़ने) से आख्याता राम पढ़ाने वाला) अपादानकारक होता है। यथा-आचार्यात् अधीते रामः (आचार्य से राम पढ़ता है)।
सूत्र (v) जनिकर्तुः प्रकृतिः – जन् धातु के कर्ताकारक की प्रकृति अपादान कारक होती है। यथा-ब्राह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते (ब्रह्मा से प्रजा उत्पन्न होती है)। क्रोधाद् भवति संमोहः (क्रोध से मोह उत्पन्न होता है)।
सूत्र (vi) भुवः प्रभवः – भू धातु ने कर्ता का प्रभव (उत्पत्ति-स्थान) अपादानकारक होता है। यथा-हिमवतः गङ्गा प्रभवति। (हिमवान् से गङ्गा प्रकट होती है।) लोभात् क्रोधः प्रभवति (लोभ से क्रोध प्रकट होता है)।
सूत्र (vii) पञ्चमी विभक्तेः – विभाग करने में, किसी को अच्छा-बुरा धनी-गरीब आदि बताने में इससे भेद बताया जाये उसमें पंचमी होती है। यथा –
माथुराः पाटलिपुत्रकेभ्यः आढ्यतराः (मथुरा के लोग पटनावालों से अधिक धनी हैं)। रामः श्यामात् सुन्दरतरः (राम श्याम से अधिक सुन्दर है)। मौनात् सत्यं विशिष्यते (चुप रहने से सत्य बोलना अच्छा है)। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी (माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बड़ी है)। धनाद् विद्या गरीयसी (धन से विद्या बड़ी है)।
सूत्र (viii) अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तपदाजाहि युक्त – अन्य आदि शब्दों के योग में पंचमी होती है।

यथा –
(i) अन्य: – रामचन्द्रात् अन्य: बलरामः आसीत् (रामचन्द्र से दूसरे (भिन्न) थे बलराम)।
(ii) आरात् – आरात् वनाद् ग्रामः (वन से गाँव निकट है)। देहली आरात् पाटलिपुत्रात् (दिल्ली पटना से निकट है)।
(iii) इतर, भिन्न, अतिरिक्त आदि –
श्रीहर्षात् इतरः (भिन्नः, अतिरिक्तः वा) आसीत् श्रीहर्षवर्धनः(श्रीहर्ष से भिन्न था श्रीहर्षवर्धन)।
(iv) ऋते – ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः (ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती)।
(v) दिक्शब्द – बिहारात् पूर्वः असमः (बिहार से पूरब है आसाम)। चैत्रात् पूर्वः फाल्गुनः (चैत से पहले फाल्गुन पड़ता है)।
(vi) अञ्चुत्तरपद – प्राक् सोमः भौमात् (मंगल से पहले है सोमवार)।
(vii) आच् (प्रत्यय) – दक्षिणा ग्रामात् पाठशाला (गाँव से दक्षिण ओर पाठशाला है)।
(viii) आहि (,,) – दक्षिणाहि भारतात् समुद्रः (समुद्र भारत के दक्षिण ओर है)।
सूत्र (ix) प्रभृत्यादियोगे पंचमी – प्रभृति आदि शब्दों के योग में पंचमी होती विभक्ति है। यथा –
(i) प्रभृति – शैशवात् प्रभृति (वचपन से आज तक)।
(ii) आरभ्य – ज्येष्ठात् आरभ्य (बड़े से लेकर)।
(iii) बहिः – सः ग्रामाद् बहिष्कार्यः (वह गाँव से बाहर करने योग्य है)।
(iv) अनन्तरम् – अध्ययनात् अनन्तरं ग्रामं गतः (पढ़ने के बाद गाँव चला गया)।
(v) परम् – अस्मात् परं किं जातम् (इसके बाद क्या हुआ)।
(vi) ऊर्ध्वम् – को जानीते क्षणाद् ऊर्ध्व किं भावि (कौन जानता है कि क्षणभर के बाद क्या होगा?

सूत्र (x) पृथग-विना-नानाभिस्तृतीयान्यतरस्याम्-पृथक, विना और नाना शब्दों के योग में द्वितीया, तृतीया और पंचमी विभक्तियाँ होती हैं। यथा –
(i) पृथक्-आत्मानम् पृथक् (आत्मना पृथक् अथवा आत्मनः पृथक्) नास्ति परमात्मा (आत्मा से अलग परमात्मा नहीं है)।
(ii) विना-धर्म विना (धर्मेण विना अथवा धर्मात् विना) सुखं न मिलति (धर्म के बिना सुख नहीं मिलता)।
(iii) नाना-नाना नारी निष्फला लोकयात्रा (नारी के बिना लोक-जीवन व्यर्थ है)।
नाना फलैः फलति कल्पलतेव विद्या (विद्या कल्पलता के समान अनेक फल देती है)।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् उपपद विभक्ति

षष्ठी उपपद विभक्ति
(सम्बन्ध)

सूत्र (i) षष्ठी शेषे – प्रथमा से सप्तमी तक ही कही गई सभी विभक्तियों से शेष अर्थ में अर्थात् सम्बन्ध में (क्योंकि सम्बन्ध में कोई विभक्ति नहीं बताई गई है)। षष्ठी विभक्ति होती है। यथा-राज्ञः पुरुषः (राजा का पुरुष)। पितुः पुत्रः (पिता का पुत्र) । स्वामिनः भृत्यः (मालिक का नौकर)। वसिष्ठस्य पत्नी (वसिष्ठ की पत्नी)।
कूपस्य जलम् (कुएँ का पानी)। तस्य धनम् (उसका धन)।

सूत्र (ii) षष्ठी हेतु-प्रयोगे हेतु शब्द के प्रयोग में कारण या प्रयोजन और हेतु, दोनों में षष्ठी होती है। यथा –
कस्य हेतोः वसति (किसलिए रहता है)?
अध्ययनस्य हेतोः वसति (पढ़ने के लिए रहता है)।
अल्पस्य हेतोः बहु न त्यज (थोड़े के लिए बहुत मत छोड़ो)।

सूत्र (iii) अधीगर्थदयेशां कर्मणि-अधीगर्त (अधि + इक् + अर्थ, अधिपूर्वक, ‘इक्’ धातु के अर्थ वाले अर्थात् स्मरण अर्थ वाले) धातु, दय, और ईश् धातु के कर्मकारक में षष्ठी विभक्ति होती है। यथा –
मातुः स्मरति कृष्णः (माता को कृष्णजी याद करते हैं)।
दीनानां दयते रामः (राम गरीबों पर दया करते हैं)।
गात्राणामनीशोऽस्मि संवृत्तः (मैं अङ्गों से असमर्थ हो गया हूँ-अंग मेरे वश में नहीं हैं)।

सूत्र (iv) कर्तृकर्मणोः कृति-कृदन्त शब्दों के योग में अनुक्त कर्ता और कर्म में षष्ठी विभक्ति होती है। यथा ईश्वरः जगतः कर्ता (ईश्वर जगत् का कर्ता है)। शाकुन्तलम् कालिदासस्य कृतिः (शाकुन्तल कालिदास की कृति है)। अहम् पुस्तकस्य पाठकः (मैं पुस्तक को पढ़ने वाला हूँ)।

सूत्र (v) तुल्यार्थरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम् (तुल्यार्थे तृतीया षष्ठी च)-तुला और उपमा शब्दों को छोड़कर सभी तुल्यार्थक शब्दों के योग में तृतीया और षष्ठी विभक्तियाँ होती हैं। यथा –
आसीद् भरतः रामेण समः (भरत राम के समान थे)।
आसीद् भरतः रामस्य समः (भरत राम के समान थे)।
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः (धर्म से हीन लोग पशुओं के जैसे हैं)।
धर्मेण हीनाः पशूनां समानाः (धर्म से हीन लोग पशुओं के जैसे हैं)।

सूत्र (vi) यतश्च निर्धारणम् (निर्धारणे षष्ठी सप्तमी च)-समुदाय से किसी की पृथक् विशिष्टता आने में जिससे वह विशिष्ट हो उसमें षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं। यथा –
नृणां विप्रः श्रेष्ठः (नरों में विप्र श्रेष्ठ है)।
नृषु विप्रः श्रेष्ठः (नरों में विप्र श्रेष्ठ है)।
गवां कृष्णा बहुक्षीरा (गायों में काली गाय विशेष दूधवाली है)।
गोषु कृष्णा बहुक्षीरा (गायों में काली गाय विशेष दूधवाली है)।
कवीनां कालिदासः श्रेष्ठः (कवियों में कालिदास श्रेष्ठ है)।
कविषु कालिदासः श्रेष्ठः। (कवियों में कालिदास श्रेष्ठ है)

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् उपपद विभक्ति

सप्तमी उपपद विभक्ति
(अधिकरणकारक)

सूत्र (i) सप्तम्यधिकरणे च – अधिकरणकारक में और दूर तथा अन्तिक अर्थवाले शब्दों में सप्तमी विभक्ति होती है। यथा –
(i) अधिकरण-वने वसति सिंहः (शेर वन में रहता है)।
(ii) दूरार्थक-ग्रामस्य दूरे नदी (गाँव से दूर है नदी)।
(iii) अन्तिकार्थक-ग्रामस्य अन्तिके विपणिः (गाँव के पास बाज़ार है)।
सूत्र (ii) अधिकरणे सप्तमी – अधिकरणकारक में सप्तमी होती है। यथा-सिंह: वने वसति (सिंह वन में रहता है)।

सूत्र (iii) आधारोऽधिकरणम् – कर्ता या कर्म कारक के द्वारा क्रिया का आधार अधिकरणकारक होता है। उस अधिकरण में सप्तमी होती है। आधार तीन प्रकार का होता है।
(क) औपश्लेपिक (ऊपर से आधार), यथा-कटे आस्ते मुनिः (मुनि चटाई पर बैठता है)।
(ख) अभिव्यापक (भीतर से आधार), यथा-पात्रे वर्तते जलम् (जल पात्र में है)।
(ग) वैषयिक (विषय के आधार, , यथा-मोक्षं इच्छास्ति (मोक्ष में मेरी चाह है)।

सूत्र (iv) साध्वसाधुप्रयोगे च-साधु और असाधु शब्दों के प्रयोग में सप्तमी होती है। यथा –
साधुः कृष्णो मातरि (कृष्णजी माता के लिए अच्छे थे)।
असाधुः कृष्णो मातुले (कृष्णजी मामा (कंस) के लिए बुरे थे)।

सूत्र (v) निमित्तात् कर्मयोगे – जिस निमित्त के लिए कर्मकारक से युक्त क्रिया की जाती है, उसमें सप्तमी होती है। यथा –
चर्मणि द्वीपिनं हन्ति (चाम के लिए चीते को मारता है)।
दन्तयोः हन्ति कुञ्जरम् (दाँतो के लिए हाथी को मारता है)।
केशेषु चमरी हन्ति (केशों के लिए चमरी (चँवरी गाय) को मारता है।
सीम्नि पुष्कलक: हतः (अण्डकोष के लिए कस्तूरीमृग मारा गया)।

सूत्र (vi) यस्य च भावे भावलक्षणम् (भावे सप्तमी) – जिसकी क्रिया से दूसरी क्रिया जाती जाय, उसमें सप्तमी विभक्ति होती है। यथा –
गोषु दुह्यमानासु गतः (वह गौवों को दुहते समय गया)।
अस्तंगते सूर्ये छात्राः गताः (सूर्य के डूब जाने पर छात्र गए)।
रामे वनं गते-मृतो दशरथ: (राम के वन जाने पर दशरथ मर गए)।

सूत्र (vii) षष्ठी चानादरे (अनादरे षष्ठी-सप्तम्यौ) – जिसकी क्रिया से दूसरी क्रिया जानी जाय और वहाँ अनादर का भाव हो तो उसमें षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं। यथा-रुदतः पुत्रस्य पिता वनं गतः (रोते पुत्र का अनादर कर पिता वन चला गया)। अथवा-रुदति पुत्रे पिता वनं गतः।

पितरि निवारयति अपि पुत्रः त्यक्तवान् अध्ययनम्, पितुः निवारयतः अपि पुत्रः त्यक्तवान् अध्ययनम् (पिता के मना करते रहने पर भी पुत्र ने पढ़ना छोड़ दिया)।

सूत्र (viii) आयुक्त कुशलाभ्यां चासेवायाम् आयुक्त (काम में संलग्न) तथा कुशल शब्द के योग में षष्ठी और सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे –
(i) छात्रः पठने आयुक्तः (संलग्नः)
(ii) भक्तः हरिपूजने आसक्तः।
(iii) छात्रः अध्ययने कुशलः।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् उपपद विभक्ति

अभ्यासार्थम् :

निर्देश: – अधोलिखितेषु वाक्येषु कोष्ठकान्तर्गतेषु शब्देषु उपपदविभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत –

1. उपार्जितानां वित्तं ….. ….. बिना सफलं न भवति। (दानभोग)
2. तस्मै …………….. व्ययार्थं रत्नचतुष्टयं दास्यामि। (राजन्)
3. त्वम् एतेषां रत्नानां मध्ये यत् ……………… रोचते तद् गृहाण। (युष्मद्)
4. दृढसङ्कल्पोऽयम् अश्वारोही …………….. न विरमति। (स्वकार्य)
5. श्रीनायारः स्वराज्यं ……………… प्रति गमनाय इच्छां न प्रकटितवान्। (केरल)
6. तस्य ……………. सह कश्चित् सम्पर्कः अस्ति। (राज्य)
7. न स्वल्पमपि ……………. बिभ्यति। (पापाचार)
8. …………… मुखेन कथमेतत् कथयितुं शक्नुमः। (अस्मद्)
उत्तराणि :
1. दानभोगैः
2. राजे
3. तुभ्यं
4. स्वकार्यात्
5. केरलं
6. राज्येन
7. पापाचारेभ्यः
8. वयं।

बोर्ड की परीक्षा में पूछे गए प्रश्न –

प्रश्न I.
कर्ताकारकस्य परिभाषां सोदाहरणं लिखत।
उत्तरम् :
कर्ता कारक – क्रिया का प्रधानभूत कारक कर्ता कहलाता है अर्थात् जो क्रिया के सम्पादन में प्रधान होता है, उसे कर्ता कारक कहते हैं। कर्ता का अर्थ है-करने वाला। वाक्य में क्रिया को करने में जो स्वतन्त्र होता है, वह कर्ता होता है। कर्तृवाच्य के कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है।
उदाहरण – देवदत्तः पठति। यहाँ पढ़ने की क्रिया का प्रधानभूत । स्वतन्त्र कारक देवदत्त है, अतः वह कर्ता है।

प्रश्न II.
करणकारकस्य परिभाषां सोदाहरणं हिन्दीभाषायां लिखत।
उत्तरम् :
करणकारक – वाक्य में कर्ता अपने कार्य की सिद्धि के लिए जिसकी सबसे अधिक सहायता लेता है, उसे करणकारक कहते हैं। करणकारक में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण – गौरवः कलमेन लिखति। यहाँ गौरव कर्ता है, कलम करण है और लिखति क्रिया है। गौरव लिखने के लिए कलम की सबसे अधिक सहायता लेता है, अतः कलम करणकारक है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् उपपद विभक्ति

प्रश्न III.
अपादानकारकस्य परिभाषां सोदाहरणं हिन्दीभाषायां लिखत।
उत्तरम् :
अपादानकारक – अलग होने में स्थिर या अचल कारक को अपादान कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जब दो वस्तुओं का अलगाव हो, तब जो वस्तु अपने स्थान पर स्थिर रहती है, उसी को अपादान कहते हैं। अपादान में पञ्चमी विभक्ति होती है।
उदाहरण –
(i) गौरवः ग्रामात् आयाति (गौरवः गांव से आता है)-यहाँ गांव अपने स्थान पर स्थिर रहता है। अतः वह अपादान कारक है।
(ii) धावतः अश्वात् बालकः पतति (दौड़ते हुए घौड़े से बालक गिरता है)-यहाँ पतन क्रिया में अश्व स्थिर है, अतः अपादान कारक है।

प्रश्न IV.
सम्प्रदानकारकस्य परिभाषां सोदाहरणं हिन्दीभाषायां लिखत।
उत्तरम् :
सम्प्रदानकारक – दान के कर्म द्वारा कर्ता जिसे सन्तुष्ट करना चाहता है, वह पदार्थ सम्प्रदान कहा जाता है। तात्पर्य यह है कि दान क्रिया जिसके लिए होती है, उसे सम्प्रदान कहते हैं। सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण – विप्राय गां ददाति (ब्राह्मण को गाय देता है)-यहाँ गोदान रूपी कर्म के द्वारा कर्ता विप्र से सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है अतः विप्र सम्प्रदान कारक है।

प्रश्न V.
कर्मकारकस्य परिभाषां सोदाहरणं लिखत।
उत्तरम् :
कर्मकारक – कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिसे विशेष रूप से प्राप्त करना चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण –
दिनेश: ग्रामं गच्छति। (दिनेश गाँव जाता है) – यहाँ कर्ता दिनेश जाने की क्रिया द्वारा ग्राम को प्राप्त करना चाहता है इसीलिए वाक्य में ग्राम कर्म है।
हरीशः फलं खादति। (हरीश फल खाता है) – यहाँ कर्ता हरीश खाने की क्रिया द्वारा फल को प्राप्त करना चाहता है इसीलिए वाक्य में फल कर्म है।

HBSE 12th Class Sanskrit व्याकरणम् उपपद विभक्ति

प्रश्न VI.
अधिकरण-कारकस्य परिभाषां सोदाहरणं लिखत।
उत्तरम् :
अधिकरण-कारक- वाक्य में क्रिया या कर्म के आधार को अधिकरण कारक कहा जाता है। यह आधार तीन प्रकार का होता है – 1. औपश्लेषिक, 2. वैषयिक, 3. अभिव्यापक।
अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है।

उदाहरण –
आसने तिष्ठति। (आसन पर बैठता है) – यहाँ बैठने की क्रिया का आधार आसन है इसीलिए वाक्य में आसन अधिकरण है। यह औपश्लेषिक (भौतिक संयोग वाला) आधार है। मोक्षे इच्छा अस्ति। (मोक्ष में इच्छा है) – यहाँ क्रिया का आधार मोक्ष है इसीलिए वाक्य में मोक्ष अधिकरण है। यह वैषयिक (बौद्धिक संयोग वाला) आधार है।
तिलेषु तैलम्। (तिलों में तेल है।) – यहाँ तेल का आधार तिल है इसीलिए वाक्य में तिलअधिकरण है। तेल पूरे तिल में व्यापक है इसीलिए यह अभिव्यापक आधार है।

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