Class 12

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 12 खनिज पोषण

Haryana State Board HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 12 खनिज पोषण Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Biology Important Questions Chapter 12 खनिज पोषण


(A) वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

1. फॉस्फोरस किसके लिए संरचनात्मक तत्व है ?
(A) न्यूक्लिक अम्ल
(B) कार्बोहाइड्रेट
(C) प्रोटीन्स
(D) लिपिड
उत्तर:
(A) न्यूक्लिक अम्ल

2. निम्न में से महापोषक शृंखला है-
(A) Mg, Mn, Mo
(B) N, P,K
(C) N, P, B
(D) B, C, H
उत्तर:
(B) N, P,K

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3. मक्के का श्वेत कलिका रोग किसकी कमी से होता है ?
(A) बोरॉन
(B) आयरन
(C) जिंक
(D) मैग्नीज
उत्तर:
(C) जिंक

4. चुकन्दर का अन्तः विगलन (Heart rot) रोग किसकी कमी से होता है ?
(A) बोरॉन
(C) लौह
(B) जिंक
(D) मैग्नीज
उत्तर:
(A) बोरॉन

5. निम्न में से विटामिन B12 का एक घटक तत्व है-
(A) Ni
(B) Cu
(C) Hg
(D) Co
उत्तर:
(D) Co

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6. चाय के पौधों में पीली बीमारी होती है-
(A) सल्फर की कमी से
(B) सल्फर की अधिकता से
(C) नाइट्रोजन की कमी से
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) सल्फर की कमी से

7. मृदा से प्राप्त पोषक तत्व कहलाते हैं-
(A) खनिज लवण
(B) अखनिज तत्व
(C) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) खनिज लवण

8. वृहत् पोषक तत्व है-
(A) नाइट्रोजन
(B) Cd
(C) Ni
(D) Mo
उत्तर:
(D) Mo

9. रन्धों के खुलने एवं बन्द होने में किस तत्व की महत्वपूर्ण भूमिका है ?
(A) ऑक्सीजन
(B) नाइट्रोजन
(C) पोटैशियम
(D) कैल्शियम
उत्तर:
(C) पोटैशियम

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10. पादप कोशिका की मे पटलिका का प्रमुख तत्व है-
(A) Ca
(B) Mg
(C) Co
(D) Mn
उत्तर:
(B) Mg

11. किसकी कमी से ‘Dle back’ रोग होता है ?
(A) K.
(C) B
(B) Cu
(D) Fe
उत्तर:
(A) K.

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12. नाइट्रोजन उपापचय हेतु आवश्यक तत्व है-
(a) K
(B) Mo
(C) Mg
(D) Fe
उत्तर:
(B) Mo

13. किस तत्व की पूर्ति के लिए कीटभक्षी पौधे कीटों को पकड़ते हैं ?
(A) O
(B) C
(C) K
(D) N
उत्तर:
(D) N

14. I सूची के तत्वों को सूची II में न्यूनता से होने वाले लक्षणों से सुमेलित कीजिए तथा सही कूट बुनिए-

III
1. N(a) पत्तियों का ताम्रवर्णी होना
2. Mg(b) अपरिपक्व पत्तियों का गिरना
3. B(c) अन्तरशिरीय हरिमाहीनता
4. P(d) चितकबरी हरिमाहीनता तथा ऊतक क्षरण

(A) 1. (a) 2. (b) 3. (c) 4. (d)
(B) 1. (d) 2. (c) 3. (a) 4. (b)
(C) 1. (b) 2. (c) 3. (d) 4. (a)
(D) 1. (d) 2. (c) 3. (b) 4. (a)
उत्तर:
(B) 1. (d) 2. (c) 3. (a) 4. (b)

15. पौधों में सर्वाधिक पाया जाने वाला तत्व है-
(A) Mg
(B) Ne
(C) C
(D) Fe
उत्तर:
(C) C

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16. जौ में भूरे धव्यों का कारण है-
(A) Zn
(B) Mo
(C) Cu
(D) Fe
उत्तर:
(B) Mo

17. अनिवार्यता की कसौटी प्रतिपादित की-
(A) मार्गन ने
(B) आर्नन ने
(C) लैंग ने
(D) स्मिथ ने
उत्तर:
(B) आर्नन ने

18. कौन-सा खनिज तत्व आवश्यक नहीं है ?
(A) Co
(B) Ni
(C) Mo
(D) Cd
उत्तर:
(D) Cd

19. सूक्ष्म पोषक पदार्थ-
(A) दीर्घ पोषक पदार्थों के समान महत्वपूर्ण हैं परन्तु कम मात्रा में उपयोग होते हैं।
(B) दीर्घ पोषक पदार्थों से कम महत्वपूर्ण हैं।
(C) सूक्ष्म कहलाते हैं क्योंकि ये पादप उपापचय में सूक्ष्म भूमिका अदा करते हैं।
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।

20. लेग्यूम (फलीदार) पौधे पर्यावरण हेतु महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि वे-
(A) N, स्थिरीकरण में सहायक हैं।
(B) उपरोक्त सभी।
(C) मृदा की उर्वरता बढ़ाते हैं।
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(C) मृदा की उर्वरता बढ़ाते हैं।

21. माइकोराइजा सहायक है-
(A) श्वसन में
(B) जल अवशोषण में
(C) पोषक पदार्थ अवशोषण में
(D) फॉस्फेट अवशोषण में
उत्तर:
(C) पोषक पदार्थ अवशोषण में

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22. दिये गये तत्वों में से कौन-सा पादप वृद्धि के लिए आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व है?
(A) मैग्नीशियम
(C) कॉपर
(B) जिंक
(D) कैल्शियम
उत्तर:
(D) कैल्शियम

23. पौधे को मैग्नीशियम की आवश्यकता होती है-
(A) कोशिकाओं को जोड़ने में
(B) प्रोटीन संश्लेषण में
(C) पर्णहरित संश्लेषण में
(D) कोशिका भित्ति विकास में
उत्तर:
(C) पर्णहरित संश्लेषण में

24. एनस की मूल गुलिकाओं में नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है-
(A) ब्रेडीराइजोबियम द्वारा
(B) क्लोस्ट्रीडियम द्वारा
(C) किया द्वारा
(D) एजोराइजोबियम द्वारा
उत्तर:
(C) किया द्वारा

25. मैगनीज आवश्यक होता है-
(A) न्यूक्लिक अम्ल के संश्लेषण हेतु
(B) पादप कोशिका भित्ति के निर्माण हेतु
(C) प्रकाश संश्लेषण के दौरान जल प्रकाश अपघटन हेतु
(D) पर्णहरिम के संश्लेषण हेतु
उत्तर:

26. नाइट्रोजन स्थिरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला तत्व है-
(A) मोलिब्डेनम (Mo)
(B) कॉपर (Cu)
(C) मैगनीज (Mn)
(D) जिंक (Zn)
उत्तर:
(A) मोलिब्डेनम (Mo)

27. एनास्ट्रोसायनिन में उपस्थित होता है-
(A) Cu
(B) Fe
(C) Ca
(D) K.
उत्तर:
(A) Cu

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28. रन्धों के खुलने एवं बंद होने में सहायक आयन है-
(A) Mn+
(B) Mg+
(C) Ca2+
(D) K+
उत्तर:
(D) K+

29. निम्नलिखित में से कौन पौधों द्वारा मृदा से फॉस्फोरस के अवशोषण में सहायता करता है-
(A) राइजोबियम
(B) फ्रेंकिया
(C) एनाबीना
(D) ग्लोमस
उत्तर:
(D) ग्लोमस

30. किस तत्व के बाहर निकलने से मध्य पटलिका मुलायम हो जाती है?
(A) कैल्शियम
(C) पोटैशियम
(B) मैग्नीशियम
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) मैग्नीशियम

31. निम्नलिखित में से कौन एक सूक्ष्म पोषक तत्व है-
(A) Mg
(C) S
(B) Ca
(D) Cu
उत्तर:
(D) Cu

32. निम्नलिखित कथनों में से कौन असत्य है ?
(A) एनाबीना तथा नास्टॉक स्वतंत्रजीवी अवस्था में भी नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने में सक्षम है।
(B) जड़ मन्यिकाओं का निर्माण करने वाले नाइट्रोजन स्थिरीकारक जीव स्वतंत्रजीवी दशाओं में वायवीय जीवों की भाँति रहते हैं।
(C) फॅस्फोरस कोशिका कलाओं, कुछ न्यूक्लिक अम्लों तथा सभी प्रोटीनों का एक संघटक है।
(D) नाइट्रोसोमोनास तथा नाइट्रोबैक्टर रसायन स्वपोषी होते हैं।
उत्तर:
(C) फॅस्फोरस कोशिका कलाओं, कुछ न्यूक्लिक अम्लों तथा सभी प्रोटीनों का एक संघटक है।

33. सबसे प्रचुर अन्तरकोशिकीय धनायन कौन-सा है?
(A) Na+
(B) CO2+
(C) H+
(D) K+.
उत्तर:
(D) K+.

34. निम्नलिखित में से कौन-सा मानदण्ड संसाधित अभिगमन से सम्बन्ध नहीं रखता है ?
(A) विशिष्ट कला प्रोटीन की आवश्यकता
(B) उच्च चयनता
(C) अभिगमन संतृप्तता
(D) ऊर्ध्व अभिगमन ।
उत्तर:
(D) ऊर्ध्व अभिगमन ।

35. फॉस्फोरस का प्राकृतिक भण्डार कौन-सा है ?
(A) समुद्री जल
(B) प्राणि अस्थियाँ
(C) शैल
(D) जीवाश्म ।
उत्तर:
(C) शैल

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36. नाइट्रोजन और पोटैशियम की कमी के लक्षण सर्वप्रथम कहाँ दिखते हैं?
(A) तरुण पत्तियों में
(B) जड़ों में
(C) कलियों में
(D) जीर्णमान पत्तियों में।
उत्तर:
(D) जीर्णमान पत्तियों में।

(B) अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions )

प्रश्न 1.
खनिज पोषण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
पौधों की वृद्धि एवं परिवर्धन के लिए आवश्यक खनिज तत्वों को ग्रहण करना खनिज पोषण (Mineral nutrition) कहलाता है।

प्रश्न 2.
बालू संवर्धन (sand culture) क्या है?
उत्तर:
शुद्ध बालू में पौधों को उगाते हैं। बालू में पोषक विलयन डालते रहते हैं। है?

प्रश्न 3.
किस पादप हॉर्मोन के लिए संश्लेषण हेतु जिंक (Zn) आवश्यक
उत्तर:
IAA इण्डोल ऐसीटिक अम्ल ।

प्रश्न 4.
पौधों की वृद्धि एवं परिवर्धन हेतु आवश्यक पोषक तत्वों की संख्या कितनी होती है?
उत्तर:
17.

प्रश्न 5.
पादप शरीर का प्राधार या अंश तत्व किसे कहते हैं?
उत्तर:
-C, H तथा O को प्राधार तत्व (frame work elements ) कहते हैं।

प्रश्न 6.
पर्णहरित का संघटक पोषक तत्व कौन-सा है?
उत्तर:
Mg (मैग्नीशियम)।

प्रश्न 7.
सेब के फलों में आन्तरिक कार्क (Internal cork) नामक रोग किस तत्व की कमी से होता है?
उत्तर:
बोरॉन (B)।

प्रश्न 8.
क्रान्तिक तत्व (critical elements) कौन-से तत्व होते हैं?
उत्तर:
-N, P तथा K.

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प्रश्न 9.
ऑक्सिन संश्लेषण में कौन-सा पोषक तत्व आवश्यक होता है?
उत्तर:
जिंक (Zinc)!

प्रश्न 10.
उत्प्रेरक कार्य तत्व किसे कहते हैं?
उत्तर:
Mg, Cu आदि एन्जाइम के सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं। इनकी अनुपस्थिति में एन्जाइम क्रियाशील नहीं होते। अतः इन्हें उत्प्रेरक कार्य तत्व कहते हैं।

प्रश्न 11.
डाल्टन ने किस नये तत्व को आवश्यक तत्व के रूप में माना?
उत्तर:
निकिल ( nickle)

प्रश्न 12.
लौह का एक प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर:
लौह श्वसन विकर सायटोक्रोम (cytochrome) का मुख्य घटक होता है।

प्रश्न 13.
जल संवर्धन क्या है?
उत्तर:
मृदारहित पोषक विलयन के घोल में पौधों को उगाना जल संवर्धन (Hydroponics) कहलाता है।

प्रश्न 14.
नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले नीले हरे शैवाल के दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
एनाबीना ( Anabaena), नास्टॉक ( Nostoc)

प्रश्न 15.
प्रकाश संश्लेषण में जल के प्रकाश अपघटन में कौन-से तत्व भाग लेते हैं?
उत्तर:
क्लोरीन तथा मैंगनीज ।

प्रश्न 16.
खनिज तत्वों की अनिवार्यता की कसौटियाँ (criteria of essentiality) किसने प्रस्तावित की थी?
उत्तर:
आर्नन (Arnon; 1938) ने।

प्रश्न 17.
उस लक्षण को क्या कहते हैं, जिसमें पत्तियों के पर्णहरित के ह्रास से पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं?
उत्तर:
हरिमाहीनता ( chlorosis)।

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प्रश्न 18.
जीवद्रव्यी तत्व किसे कहते हैं?
उत्तर:
नाइट्रोजन, सल्फर, फॉस्फोरस को जीवद्रव्यी तत्व कहा जाता है, क्योंकि ये C, H तथा के साथ मिलकर जीवद्रव्य का प्रमुख भाग बनाते हैं।

प्रश्न 19.
राइजोबियम जीवाणु की विशेषता लिखिए।
उत्तर:
राइजोबियम जीवाणु स्वतन्त्र अवस्था में ऑक्सी (aerobic) तथा मन्थिकाओं में अनॉक्सी (anaerobic) होता है।

प्रश्न 20.
अनॉक्सी नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणु का नाम लिखिए।
उत्तर:
रोडोस्पाइरिलियम (Rhodospirillium)।

प्रश्न 21.
नाइट्रोजिनेस एन्जाइम की सुरक्षा कौन करता है?
उत्तर:
लेगहीमोग्लोबिन (leghaemoglobin, Ib)।

प्रश्न 22.
सर्वाधिक गतिशील तत्व तथा अगतिशील तत्व का नाम लिखिए।
उत्तर:
सर्वाधिक गतिशील तत्व = पोटैशियम (K)
सर्वाधिक अगतिशील तत्व = आयरन (Fe)

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(C) लघु उत्तरीय प्रश्न-1 (Short Answer type Questions-1)

प्रश्न 1.
उत्प्रेरक प्रभाव उत्पन्न करने वाले खनिजों के नाम लिखिए।
उत्तर:
उत्प्रेरक प्रभाव (Catalytic Effect ) – लोहा (Fe), कॉपर (Cu), जिंक (Zn) आदि तत्व कुछ विकरों के प्रास्थेटिक समूह (prosthetic groups ) का कार्य करते हैं। इसके विपरीत मैगनीज (Mn), मैग्नीशियम (Mg), कोबाल्ट (Co) आदि के आयन्स अनेक विकरों की क्रियाओं के लिए सक्रियकारक या रोधक का कार्य करते हैं।

प्रश्न 2.
पौधों का ताजा भार तथा शुष्क भार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
पौधे या उसके किसी भाग का वजन करें तो इसे उसका ताजा भार (fresh weight) कहते हैं। यदि पौधे या उसके किसी भाग को 100°C ताप पर सुखाकर शेष बचे भाग का वजन करें तो इसे उसका शुष्क भार (dry weight) कहते हैं।

प्रश्न 3.
आर्नन की अनिवार्यता की कसौटियाँ क्या हैं?
उत्तर:
आर्जन (Arnon, 1938) के अनुसार अनिवार्य तत्व वे हैं-
(i) जो उपापचय में सीधे भाग लेते हैं।
(ii) जिनकी कमी या अभाव में विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
(iii) जिनकी कमी का निदान उसी तत्व की पूर्ति से सम्भव है।

प्रश्न 4.
विनाइट्रीकरण क्या है? इसके लिए कौन-सी परिस्थितियाँ उपयुक्त होती हैं?
उत्तर:
कुछ जीवाणुओं द्वारा मृदा में उपस्थित नाइट्रेट को स्वतन्त्र नाइट्रोजन में बदल दिया जाता है। इसे विनाइट्रीकरण (denitrification) कहते हैं। जैसे— स्यूडोमोनास (Pseudomonas), थायोबैसीलस (Thiobacillus ) आदि । विनाइट्रीकरण के लिए प्रायः अनॉक्सी परिस्थितियाँ उपयुक्त हैं।

प्रश्न 5.
नाइट्रीकरण क्या है? दो नाइट्रीकारी जीवाणुओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
अमोनिया का नाइट्रेट में बदला जाना नाइट्रीकरण (nitrification) कहलाता है।
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दो नाइट्रीकारी जीवाणु नाइट्रोसोमोनास ( Nitrosomonas ) तथा नाइट्रोवैक्टर (Nitrobacter) हैं।

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प्रश्न 6.
अन्य पौधों की तुलना में लैग्यूम (दाब कुल) के पौधों में प्रोटीन की मात्रा अधिक क्यों होती है?
उत्तर:
लैग्यूमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन स्थित जीवाणु उपस्थित होते हैं जो वायु नाइट्रोजन को नाइट्राइट एवं नाइट्रेट में परिवर्तित कर देते हैं जिससे पौधे नाइट्रोजन को पर्याप्त मात्रा में संचित कर लेते हैं। चूँकि नाइट्रोजन का मुख्य घटक है। इस कारण इस कुल के पौधों में प्रोटीन की प्रचुर मात्रा होती है।

(D) लघु उत्तरीय प्रश्न- II ( Short Answer Type Questions-II)

प्रश्न 1.
नॉप के पोषक विलयन के संघटक लिखिए।
उत्तर:
नॉप का पोषक विलयन (Knop’s Nutrient Solution)

1. कैल्शियम नाइट्रेट0-8 g/L
2. मैग्नीशियम सल्फेट0-2 g/L
3. पोटैशियम नाइट्रेट0-2 g/L
4. पोटैशियम डाइहाइड्रोजन फॉस्फेट0-2 g/L
5. फेरस सल्फेट0-2 g/L
6. फेरस टारट्रेटसूक्ष्म मात्रा में।

प्रश्न 2.
पौधों में नाइट्रोजन व पोटैशियम का क्या क्या कार्य है?
उत्तर:
नाइट्रोजन (Nitrogen):
पौधे मृदा से नाइट्रोजन को NOT NH, NH के रूप में अवशोषित करते हैं नाइट्रोजन, प्रोटीन, कोएन्जाइम, न्यूक्लिक अम्ल (DNA, RNA) तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण के लिए आवश्यक होता है। यह जीवद्रव्य व पर्णहरित का मुख्य भाग है। रन्धों के खुलने व बन्द होने, जल की गति एवं सन्तुलन में नाइट्रोजन सहायक होती है।

पोटैशियम (Potassium):
यह विभज्योतक (meristematic) कोशिकाओं की वृद्धि, पत्तियों की वृद्धि एवं द्वितीयक जड़ों के निर्माण में महत्वपूर्ण होता है। यह जीवद्रव्य की जैविकता को बनाये रखने के लिए आवश्यक है । रन्धों के खुलने व बन्द होने में इनकी विशेष भूमिका होती है। यह एन्जाइम्स का सहकारक होता है।

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प्रश्न 3.
सहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकारक के कुछ उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
सहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकारक (Symbiotic Nitrogen Fixers)
1. मटर, चना, बाकला, सेम आदि की प्रन्थिकामय जड़ों में पाया जाने वाला राइजोबियम जीवाणु ।
2. एनस की जड़ मन्थियों में पाया जाने वाला फ्रैंकिया सूक्ष्म जीव । 3. सायकस की कोरेलॉयड जड़ में नॉस्टॉक (Nastoc), एनाबीना (Anabaena) |
4. एजोला (Azolla) फर्न की पत्तियों में एनाबीना ।
5. लाइकेन (Lichens) के सूकाय ( thalloid) में नीले हरे शैवाल या सायनोबैक्टीरिया ।

प्रश्न 4.
पोटैशियम तथा नाइट्रोजन के अभाव में उगने वाले पौधों में उत्पन्न लक्षण लिखिए।
उत्तर:
(i) पोटैशियम की कमी से पत्तियों पर निर्जीव धब्बे ( necrosis ) बन जाते हैं प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया मन्द हो जाती है रोगों के लिए प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। यान्त्रिक ऊतक कम विकसित होता है। पौधे झाड़ीनुमा (bushy) हो जाते हैं।

(ii) नाइट्रोजन की कमी से पत्तियाँ पीली हो जाती हैं। कोशिका विभाजन, श्वसन क्रिया प्रोटीन संश्लेषण मन्द हो जाता है। पौधों की वृद्धि रुक जाती है। पुष्पन विलम्ब से होता है। अनाज के दाने सिकुड़ जाते हैं।

प्रश्न 5
खनिज तत्वों के सामान्य कार्य लिखिए।
उत्तर:
(1) खनिज तत्व पादप शरीर के निर्माणक तत्व (framework elements) हैं, जैसे -C, H तथा O शरीर का ढाँचा बनाते हैं।
(2) जीवद्रव्यी तत्व (Protoplasmic Elements), जैसे-N, S, P आदि ये C H तथा ) के साथ मिलकर जीवद्रव्य बनाते हैं।
(3) उत्प्रेरक तत्व (Catalytic Elements) Mg, Cu आदि एन्जाइम के सहकारक का कार्य करते हैं। इनके अभाव में एन्जाइम क्रियाशील नहीं होते।
(4) सन्तुलन तत्व (Balancing Elements) – Cu, Mg K आदि अन्य खनिजों के विषैले प्रभाव को समाप्त करते हैं।

प्रश्न 6.
सामान्य पोषक विलयन की आवश्यक परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मृदा रहित पोषक विलयन तैयार करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि विलयन में सभी अनिवार्य पोषक तत्व उपस्थित हों। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित परिस्थितियाँ आवश्यक हैं-
(i) सभी अनिवार्य तत्व घुलित अवस्था में हों।
(ii) विलयन तनु हो तथा इसे समय-समय पर बदलते रहने की व्यवस्था
(iii) विलयन में वातायन की उचित व्यवस्था हो ।
(iv) विलयन का pH निश्चित रहे ।

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प्रश्न 7.
जल संवर्धन क्या है ? इसका क्या महत्व है?
उत्तर:
जल संवर्धन (Hydroponics): यह वह तकनीक है जिसमें पौधे को मृदाविहीन माध्यम अर्थात् जलीय विलयन में उगाया जाता है। इसके लिए
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पोषक विलयन संवर्धन के लिए एक आदर्श अवस्था का आरेख
काँच का बना अक्रिय पात्र लेकर इसमें सन्तुलित पोषक युक्त विलयन भर दिया जाता है। इस विलयन के ऊपर जाली लगाकर नवोद्भिद् (seedling) पौधे की जड़ को विलयन में डुबो दिया जाता है तथा प्ररोह ऊपर रखा जाता है। विलयन में वातायन (aeration) की उचित व्यवस्था रखी जाती है।

महत्व:
जल संवर्धन विधि द्वारा तत्वों की कमी या पौधों में प्रभाव का अध्ययन किया जा सकता है। इसके द्वारा कुछ शाकीय पौधे उगाये जा सकते हैं तथा कायिक जनन कराया जा सकता है।

प्रश्न 8.
पौधे मृदा से फॉस्फोरस को किस रूप में ग्रहण करते हैं? फॉस्फोरस का पौधों में कहाँ उपयोग होता है? फॉस्फोरस की कमी के दो लक्षण लिखिए।
उत्तर:
पौधे फॉस्फोरस को मुख्यतया फॉस्फेट आयन (PO)” ) तथा डाइहाइड्रोजन फॉस्फेट H, PO, आयन के रूप में ग्रहण करते हैं। फॉस्फोरस का उपयोग कोशिका कला, पत्तियों के निर्माण, जड़ों की वृद्धि आदि में होता है। फॉस्फोरस प्रोटीन, न्यूक्लिओप्रोटीन्स, न्यूक्लिओटाइड आदि के संश्लेषण में प्रयुक्त होता है।
फॉस्फोरस की कमी से पत्तियों पर एन्थोसायनिन ( anthocyanin ) के धब्बे प्रकट हो जाते हैं और पत्तियाँ शीघ्र गिर जाती हैं।

प्रश्न 9.
असहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण सूक्ष्म जीवों के उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
स्वतन्त्रजीवी या असहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण सूक्ष्मजीवी प्रायः ऑक्सीजीवी (aerobes) या अनॉक्सीजीवी (Anaerobes) होते हैं। उदाहरण रोडोस्पाइरिलम (Rhodospirillium), अनॉक्सीजीवी तथा एजोटोबैक्टर (Azotobacter), विजेरन्किया (Beijemikia) आदि आक्सीजीवी जीवाणु हैं। स्वतन्त्रजीवी नीले हरे शैवाल (Blue green algae) जैसे – एनाबीना (Anabaena), नास्टॉक (Nostoc), टोलीपोथ्रिक्स (Tolypothrix) आदि हैं। यीस्ट की प्रजातियाँ भी नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायक होती हैं।

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प्रश्न 10.
हीमोग्लोबिन तथा लैगहीमोग्लोबिन में अन्तर लिखिए।
उत्तर:
हीमोग्लोबिन (Leghaemoglobin) में अन्तर

हीमोग्लोजिन (Haemoglobin)लैगहीमोम्लोबिन (Leghaemoglobin)
यह जन्तुओं, मुख्यतः कशेरुकियों में पाया जाता है।यह फलीदार फसलों की जड़ों में मूल गुलिकाओं (root nodules) में पाया जाता है।
यह लाल चमकीला होता है।यह भूरा तथा धुँधला होता है।
यह ऑक्सीजन वाहक का कार्य करता है।यह ऑक्सीजन से तेजी से संयुक्त होता है तथा नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायक है।
यह श्वसन में भाग लेता है।यह नाइट्रोजिनेज (nitrogenase) विकर की सुरक्षा करता है।

(E) निबन्धात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions )

प्रश्न 1.
प्रकृति में नाइट्रोजन चक्र का आरेख सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle)
नाइट्रोजन, (N2) कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के बाद पौधों में पाया जाने वाले प्रमुख तत्व हैं। यह ऐमीनो अम्ल, न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन्स, पर्णहरित, विटामिन्स, पादप हॉर्मोन्स आदि का प्रमुख संघटक हैं। पौधे नाइट्रोजन को मृदा से नाइट्रेट, नाइट्राइट आदि रूप में मूण करते हैं। वायुमण्डल में लगभग 78% नाइट्रोजन पायी जाती है।

पौधे वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाइट्रोजन (free nitrogen) का उपयोग सीधे ही नहीं कर पाते। अत: इसे विभिन्न यौगिकों के रूप में ही पहुण किया जा सकता है। पृथ्वी तथा वायुमण्डल में नाइट्रोजन का अनुपात स्थिर बना रहता है जो कि नाइट्रोजन चक्र (nitrogen cycle) द्वारा सम्भव होता है। नाइट्रोजन चक्र निम्न पदों में पूर्ण होता है-
1. अऔव नाइट्टोजन स्थिरीकरण (Non-biological Nitrogen Fixation)बिजली के तड़कने से वायुमण्डलीय नाइट्रोजन ऑक्सीजन से संयोग करके नाइट्रोजन पर-ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड तथा नाइट्रक अम्ल बनाती हैं। ये पानी में घुलकर वर्षा के साथ भूमि पर आ जाते हैं और मृदा में पहुँचकर नाइट्रेट्स तथा नाइट्राइट्स बनाते हैं।

2. औविक नाझ्ट्रोजन स्थिरीकरण (Biological Nitrogen Fixation)स्वतन्त्रजीवी, सहजीवी जीवाणुओं (symbiotic bacteria) तथा नीले हरे शैवालों (blue green algae) द्वारा वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाइट्रोजन को इसके यौगिकों में बदल दिया जाता है। जैसे-एजोटोबैक्टर (Azotobacter), रोडोस्पाइरिलम (Rhodospirillium), क्लॉस्टरीडियम (Clostridium) आदि जीवाणु तथा नास्टॉक (Nostoc), एनाबीना (Anabaena) आदि स्वतन्त्रजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकारी सूक्ष्म जीव हैं।

मटर कुल के पौर्धों की जड़ों की मूल गुलिकाओं (Root nodules) में पाये जाने वाले जीवाणु राइजोबियम (Rhizobium) सहजीवी के रूप में पाये जाते हैं। ये स्वतन्त्र नाइट्रोजन को अमोनिया में बदल देवे हैं।

3. अमोनीकरण (Ammonification)-मृत जीव- जन्तुओं तथा पौधों में उपस्थित नाइट्रोजनी कार्बनिक पदार्थों का अमोनिया में अपघटन अमोनीकरण (ammonification) कहललाता है। मुक्त अमोनिया जल, मृदा या वातावरण में मुक्त हो जाती है।

4. नाइड्थीकरण (Nitrification) – अमोनीकरण के द्वारा मुक्त अमोनिया मृदा में उपस्थित जीवाणुओं द्वारा नाइट्राइट तथा नाइट्रेट में बदल दी जाती है जो पौधों के लिए प्राप्त होती है।
नाइट्रोसोमोनास (Nitrosomonas), नाइट्रोकोकस (Nitrococcus) आदि जीवाणु भी अमोनिया को नाइट्राइड में बदल देते हैं। नाइट्रोबैक्टर (Nitrobacter) नाइट्राइट को नाइट्रेट में बदल देता है जो घुलित अवस्था में जड़ों द्वारा अवशोषित कर ली जाती है।

5. विनाइट्रीकरण (Denitrification)- मृदा में उपस्थित कुछ जीवाणु जैसे-थायोबैसीलस, स्यूडोमोनास आदि नाइट्रोजनी यौगिकों का अपघटन करके स्वतन्त नाइट्रोजन में बदल देते हैं। यह क्रिया विनाइट्रीकरण (denitrification) कहलाती है। नाइट्रोजन चक्र का महत्व (Importance of Nitrogen Cycle)
(i) इसके द्वारा वायुमण्डल में नाइट्रोजन का सन्तुलन बना रहता है।
(ii) नाइट्रोजन ऑक्सीजन की सक्रियता को कम करने में सहायक है।
(iii) नाइट्रोजन चक्रीकरण से पौधों को तथा जन्तुओं को नाइट्रोजन उपलब्य हो पाता है।
(iv) जीव-जन्तुओं के अपशिष्टों के विषटन से नाइट्रोजन वायुमण्डल में पहुँचती है।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 12 खनिज पोषण 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित तत्वों के कार्य व न्यूनता के लक्षण लिखिए- (क) Ca (ख) Mg (ग) Fe (घ) P (ङ) SI
उत्तर:
नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle)
नाइट्रोजन, (N2) कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के बाद पौधों में पाया जाने वाले प्रमुख तत्व हैं। यह ऐमीनो अम्ल, न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन्स, पर्णहरित, विटामिन्स, पादप हॉर्मोन्स आदि का प्रमुख संघटक हैं। पौधे नाइट्रोजन को मृदा से नाइट्रेट, नाइट्राइट आदि रूप में मूण करते हैं। वायुमण्डल में लगभग $78 \%$ नाइट्रोजन पायी जाती है।

पौधे वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाइट्रोजन (free nitrogen) का उपयोग सीधे ही नहीं कर पाते। अत: इसे विभिन्न यौगिकों के रूप में ही पहुण किया जा सकता है। पृथ्वी तथा वायुमण्डल में नाइट्रोजन का अनुपात स्थिर बना रहता है जो कि नाइट्रोजन चक्र (nitrogen cycle) द्वारा सम्भव होता है। नाइट्रोजन चक्र निम्न पदों में पूर्ण होता है-

1. अऔव नाइट्टोजन स्थिरीकरण (Non-biological Nitrogen Fixation)बिजली के तड़कने से वायुमण्डलीय नाइट्रोजन ऑक्सीजन से संयोग करके नाइट्रोजन पर-ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड तथा नाइट्रक अम्ल बनाती हैं। ये पानी में घुलकर वर्षा के साथ भूमि पर आ जाते हैं और मृदा में पहुँचकर नाइट्रेट्स तथा नाइट्राइट्स बनाते हैं।

2. औविक नाझ्ट्रोजन स्थिरीकरण (Biological Nitrogen Fixation)स्वतन्त्रजीवी, सहजीवी जीवाणुओं (symbiotic bacteria) तथा नीले हरे शैवालों (blue green algae) द्वारा वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाइट्रोजन को इसके यौगिकों में बदल दिया जाता है। जैसे-एजोटोबैक्टर (Azotobacter), रोडोस्पाइरिलम (Rhodospirillium), क्लॉस्टरीडियम (Clostridium) आदि जीवाणु तथा नास्टॉक (Nostoc), एनाबीना (Anabaena) आदि स्वतन्त्रजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकारी सूक्ष्म जीव हैं।
मटर कुल के पौर्धों की जड़ों की मूल गुलिकाओं (Root nodules) में पाये जाने वाले जीवाणु राइजोबियम (Rhizobium) सहजीवी के रूप में पाये जाते हैं। ये स्वतन्त्र नाइट्रोजन को अमोनिया में बदल देवे हैं।

3. अमोनीकरण (Ammonification)-मृत जीव- जन्तुओं तथा पौधों में उपस्थित नाइट्रोजनी कार्बनिक पदार्थों का अमोनिया में अपघटन अमोनीकरण (ammonification) कहललाता है। मुक्त अमोनिया जल, मृदा या वातावरण में मुक्त हो जाती है।

4. नाइड्थीकरण (Nitrification) – अमोनीकरण के द्वारा मुक्त अमोनिया मृदा में उपस्थित जीवाणुओं द्वारा नाइट्राइट तथा नाइट्रेट में बदल दी जाती है जो पौधों के लिए प्राप्त होती है।
नाइट्रोसोमोनास (Nitrosomonas), नाइट्रोकोकस (Nitrococcus) आदि जीवाणु भी अमोनिया को नाइट्राइड में बदल देते हैं। नाइट्रोबैक्टर (Nitrobacter) नाइट्राइट को नाइट्रेट में बदल देता है जो घुलित अवस्था में जड़ों द्वारा अवशोषित कर ली जाती है।
5. विनाइट्रीकरण (Denitrification)- मृदा में उपस्थित कुछ जीवाणु जैसे-थायोबैसीलस, स्यूडोमोनास आदि नाइट्रोजनी यौगिकों का अपघटन करके स्वतन्त नाइट्रोजन में बदल देते हैं। यह क्रिया विनाइट्रीकरण (denitrification) कहलाती है। नाइट्रोजन चक्र का महत्व (Importance of Nitrogen Cycle)
(i) इसके द्वारा वायुमण्डल में नाइट्रोजन का सन्तुलन बना रहता है।
(ii) नाइट्रोजन ऑक्सीजन की सक्रियता को कम करने में सहायक है।
(iii) नाइट्रोजन चक्रीकरण से पौधों को तथा जन्तुओं को नाइट्रोजन उपलब्य हो पाता है।
(iv) जीव-जन्तुओं के अपशिष्टों के विषटन से नाइट्रोजन वायुमण्डल में पहुँचती है।
HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 12 खनिज पोषण 1

प्रश्न 3.
विभिन्न पोषक तत्वों की कमी से उत्पन्न प्रभावों को कैसे ज्ञात करते हैं? समझाइए।
उत्तर:
पौधों में पोषक तत्वों की कमी से उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन जब हम किसी विशेष पोषक तत्व की उपयोगिता का अध्ययन या तत्व की कमी से उत्पन्न प्रभाव का अध्ययन करते हैं तो इसके लिए पौधों हेतु जलीय माध्यम प्रयोग में लाया जाता है। इसके लिए हम कई बोतलों में जलीय संवर्धन माध्यम तैयार (aquatic culture medium) करते हैं। इनमें से एक में सभी आवश्यक तत्वों को उचित अनुपात में मिलाया जाता है। अन्य बोतलों में उस तत्व की कमी रखी जाती है जिसका अध्ययन करना होता है। अब पौधों को वृद्धि करने के लिए छोड़ दिया जाता है। कुछ समय बाद पौधों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं। पौधे में उत्पन्न प्रभाव किसी विशेष तत्व की कमी का लक्षण होता है।

तत्वों के प्रभाव के अध्ययन के लिए तालिका
संवर्धन घोल में तत्व की कमीप्रभाव (लक्षण)
सामान्य पोषक विलयन (Control)पौधे की सामान्य वृद्धि।
मैग्नीशियम का अभाव (Deficency of Mg)कम वृद्धि, पत्तियाँ पीली।
कैल्शियम का अभाव (Deficency of Ca)कमजोर पौधा, जड़ें अविकसित, पत्तियों पर धब्बे।
आयरन का अभाव (Deficency of Fe)पत्तियाँ सफेद-पीली, कम वृद्धि।
पोटैशियम का अभाव (Deficency of K)कम वृद्धि, पत्तियाँ भूरी, पौधा शीघ्र मर जाता है।
फॉस्फोरस का अभाव (Deficency of P)जड़ों की वृद्धि प्रभावित होने से पौधा मर जाता है।
नाइट्रोजन का अभाव (Deficency of N)वृद्धि कम, पत्तियाँ पीली, कमजोर पौधा।

प्रश्न 4.
जड़ों द्वारा खनिज तत्वों के अवशोषण को समझाइए। खनिज तत्वों का अवशोषण
उत्तर:
(Absorption of Mineral Element )
अधिकांश खनिज तत्व जल में घुलित अवस्था में मूलरोमों द्वारा अवशोषित होते हैं। ये खनिज मूल की बाह्य त्वचा (epiblema) एवं बल्कुट (cortex) में से विसरित होते हुए अन्तस्त्वचा (Endodermis ) तक पहुँचते हैं। अन्तस्त्वचा में कैस्पेरियन पट्टियाँ (casparian strips) पायी जाती हैं जो खनिज लवणों व जल के विसरण में रुकावट पैदा करती हैं।

HBSE 11th Class Biology Important Questions Chapter 12 खनिज पोषण

बटलर (Butler, 1953) तथा एप्सटीन (Epstein, 1955) के अनुसार वल्कुट (cortex) की कोशिकाएँ जीवित होती हैं तथा इनमें लवणों के अभिगमन के लिए उपापचयी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसे सक्रिय अवशोषण कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि कोशिकाद्रव्य का एक भाग प्रत्यक्ष स्वतन्त्र सतह द्वारा घिरा रहता है। अतः आयनों का स्थानान्तरण कोशिका भित्ति तथा कोशिकाद्रव्यी तन्तुओं (plasmodesmata) द्वारा अन्तस्त्वचा तक होता है। अतः आयन जाइलम में प्रवेश करा दिये जाते हैं। इसे आयन ग्रहण सरल विधि कहा जाता है।

अन्तस्त्वचा (endodermis ) से जाइलम की निर्जीव कोशिकाओं तक आयनों का सक्रिय स्थानान्तरण होता है। जड़ों की वल्कुट कोशिकाएँ श्वसन द्वारा उत्पादित ऊर्जा का प्रयोग करके आयनों को मृदा से खींचती हैं और जाइलम (xylem) में पहुँचा देती हैं। इस क्रिया को सक्रिय स्थानान्तरण कहते हैं। लवणों का जाइलम में प्रवेश होने के बाद यह वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (transpiration pull) द्वारा तथा संसंजन बल द्वारा जल के साथ ऊपर की ओर चढ़ते हैं। गन्तव्य तक पहुँचकर इनका उपयोग कर लिया जाता है।

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HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही विकल्प चुनिए

1. एकाधिकार में-
(A) वस्तु के कई निकट स्थानापन्न होते हैं
(B) वस्तु का कोई निकट स्थानापन्न नहीं होता
(C) वस्तु विभेद पाया जाता है
(D) कीमत विभेद नहीं होता
उत्तर:
(B) वस्तु का कोई निकट स्थानापन्न नहीं होता

2. एकाधिकारी फर्म को अल्पकाल संतुलन में-
(A) न्यूनतम हानि हो सकती है
(B) असामान्य लाभ हो सकते हैं
(C) सामान्य लाभ हो सकते हैं ।
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार

3. दीर्घकाल में एकाधिकार फर्म को-
(A) हानि होती है
(B) असामान्य लाभ मिलते हैं
(C) सामान्य लाभ मिलते हैं
(D) पूर्ण प्रतिस्पर्धा की तुलना में कम हानि होती है
उत्तर:
(B) असामान्य लाभ मिलते हैं

4. एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की अवस्था में फर्म को अल्पकाल में संतुलन की स्थिति में-
(A) अधिकतम लाभ प्राप्त होते हैं
(B) न्यूनतम हानि होती है
(C) सामान्य लाभ प्राप्त होते हैं
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में दीर्घकाल में फर्म को संतुलन की अवस्था में केवल-
(A) सामान्य लाभ प्राप्त होते हैं
(B) असामान्य लाभ प्राप्त होते हैं
(C) न्यूनतम हानि प्राप्त होती है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) सामान्य लाभ प्राप्त होते हैं

6. एकाधिकार में कीमत-
(A) सीमांत लागत से अधिक होती है
(B) सीमांत लागत के बराबर होती है
(C) सीमांत लागत से कम होती है
(D) सीमांत लागत से कम या अधिक होती रहती है
उत्तर:
(A) सीमांत लागत से अधिक होती है

7. एकाधिकार में किस समय अवधि में फर्म को केवल असामान्य लाभ प्राप्त होते हैं?
(A) अति अल्पकाल में
(B) अल्पकाल में
(C) दीर्घकाल में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) दीर्घकाल में

8. एकाधिकार के अंतर्गत फर्म के माँग वक्र का स्वरूप क्या है?
(A) पूर्ण लोचदार
(B) पूर्ण बेलोचदार
(C) कम लोचदार
(D) अधिक लोचदार
उत्तर:
(C) कम लोचदार

9. एकाधिकारी प्रतियोगिता में किस समय-अवधि में फर्म को केवल असामान्य लाभ प्राप्त होते हैं?
(A) अल्पकाल में
(B) अति-अल्पकाल में
(C) दीर्घकाल में
(D) अति-दीर्घकाल में
उत्तर:
(A) अल्पकाल में

10. निम्नलिखित में से एकाधिकारी बाज़ार की विशेषता नहीं है
(A) फर्मों के प्रवेश व निकासी की स्वतंत्रता
(B) निकटतम स्थानापन्न का अभाव
(C) एक विक्रेता
(D) कीमत विभेद की संभावना
उत्तर:
(A) फर्मों के प्रवेश व निकासी की स्वतंत्रता

11. वस्तु विभेद किस बाज़ार की प्रमुख विशेषता है?
(A) एकाधिकार की
(B) पूर्ण प्रतिस्पर्धा की
(C) एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार

12. गैर-कीमत प्रतियोगिता सर्वाधिक पाई जाती है
(A) एकाधिकार में
(B) पूर्ण प्रतिस्पर्धा में
(C) एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में ..
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में

13. अपूर्ण प्रतिस्पर्धा में बाज़ार की कौन-सी अवस्था हो सकती है?
(A) एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा
(B) अल्पाधिकार
(C) द्वि-अधिकार
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

14. किस बाज़ार के लिए फर्म के लिए कीमत रेखा क्षैतिज सरल रेखा होती है?
(A) एकाधिकारी
(B) पूर्ण प्रतिस्पर्धा
(C) एकाधिकारी प्रतियोगिता
(D) अल्पाधिकार
उत्तर:
(B) पूर्ण प्रतिस्पर्धा

15. किस बाज़ार में विक्रय लागतों का बहुत अधिक महत्त्व होता है?
(A) पूर्ण प्रतियोगी बाज़ार में
(B) अल्पाधिकार बाज़ार में
(C) अपूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) अपूर्ण प्रतियोगिता बाज़ार में

16. एकाधिकार में सीमांत संप्राप्ति वक्र का आकार कैसा होता है?
(A) धनात्मक ढलान वाला
(B) OX-अक्ष के समानांतर
(C) OY-अक्ष के समानांतर
(D) ऋणात्मक ढलान वाला
उत्तर:
(D) ऋणात्मक ढलान वाला

17. अल्पकाल में एकाधिकार के संतुलन की अवस्था में निम्नलिखित में से कौन-सी अवस्था हो सकती है?
(A) असामान्य लाभ
(B) सामान्य लाभ
(C) न्यूनतम हानि
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

18. एकाधिकार होता है
(A) कीमत-निर्धारक
(B) कीमत स्वीकार करने वाला
(C) (A) तथा (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) कीमत-निर्धारक

B. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए

1. पूर्ण प्रतियोगिता में वस्तुएँ ……………… होती हैं। (भिन्न, समरूप)
उत्तर:
समरूप

2. एकाधिकारी बाज़ार में एकाधिकारी कीमत …………… होता है। (निर्धारक, स्वीकारक)
उत्तर:
निर्धारक

3. विज्ञापन लागते ……………. में अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं। (एकाधिकार, एकाधिकारी प्रतियोगिता)
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतियोगिता

4. ……………… एकाधिकार बाज़ार की मुख्य विशेषता होती है। (वस्तु विभेद, कीमत विभेद)
उत्तर:
कीमत विभेद

5. ‘अल्पाधिकार’ में ………………… विक्रेता पाए जाते हैं। (बहुत अधिक, कुछ)
उत्तर:
कुछ

6. ‘एकाधिकार’ की तुलना में ‘एकाधिकारी प्रतियोगिता’ में AR तथा MR वक्र सापेक्षिक ……………… लोचदार होते हैं। (कम, अधिक)
उत्तर:
अधिक

7. एकाधिकारी प्रतियोगिता (प्रतिस्पर्धा) में AR तथा MR वक्र एक-दूसरे के ……………….. होते हैं। (बराबर, भिन्न)
उत्तर:
भिन्न

8. द्वयाधिकार बाज़ार में वस्तु के ……………. विक्रेता पाए जाते हैं। (एक, दो)
उत्तर:
दो

9. विक्रय लागते ……………. बाज़ार में अधिक उपयोगी होती हैं। (एकाधिकार, एकाधिकारी प्रतियोगिता)
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतियोगिता

10. गैर-कीमत प्रतियोगिता सर्वाधिक ………………. में पाई जाती है। (पूर्ण प्रतियोगिता, एकाधिकारी प्रतियोगिता)
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतियोगिता

11. एकाधिकारी प्रतियोगिता में एक फर्म दीर्घकाल में …………. लाभ प्राप्त करती है। (सामान्य, असामान्य)
उत्तर:
सामान्य

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C. बताइए कि निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत-

  1. सर्वाधिक गैर कीमत प्रतियोगिता एकाधिकारी प्रतियोगिता में पाई जाती है।
  2. एकाधिकारी कीमत सदैव ऊँची होती है।
  3. एकाधिकार के अंतर्गत कीमत 10 रु० होगी यदि सीमांत लागत 10 रु० है।
  4. एकाधिकारी प्रतियोगिता में फर्मों के आने व छोड़कर जाने की स्वतंत्रता नहीं होती।
  5. एकाधिकार में कीमत, सीमान्त लागत के समान होती है।
  6. एक एकाधिकारी प्रतियोगी फर्म को दीर्घकाल में असामान्य लाभ प्राप्त होंगे।
  7. एकाधिकारी दीर्घकाल में असामान्य लाभ प्राप्त नहीं कर सकता।
  8. एकाधिकार में औसत आगम (AR) वक्र तथा सीमांत आगम (MR) वक्र एक-समान होते हैं।
  9. पूर्ण प्रतियोगिता में औसत आगम (AR) वक्र तथा सीमांत आगम (MR) वक्र एक-दूसरे के बराबर नहीं होते।
  10. एकाधिकारी बाजार में एकाधिकारी कीमत निर्धारक होता है।
  11. एकाधिकार में कीमत विभेद संभव होता है।
  12. एकाधिकारी प्रतियोगिता में AR तथा MR वक्र एक-दूसरे के भिन्न होते हैं।
  13. अल्पाधिकार में दो विक्रेता पाए जाते हैं।
  14. द्वयाधिकार बाज़ार में वस्तु के दो विक्रेता पाए जाते हैं।
  15. विज्ञापन लागतें एकाधिकारी प्रतियोगिता में अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं।

उत्तर:

  1. सही
  2. गलत
  3. गलत
  4. गलत
  5. गलत
  6. गलत
  7. गलत
  8. गलत
  9. गलत
  10. सही
  11. गलत
  12. सही
  13. गलत
  14. सही
  15. सही।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बाज़ार किसे कहते हैं?
उत्तर:
बाज़ार का अर्थ किसी विशेष स्थान से नहीं है बल्कि किसी वस्तु की मात्रा के क्रय-विक्रय से है।

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प्रश्न 2.
बाज़ार के मुख्य रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  • पूर्ण प्रतियोगिता
  • एकाधिकार
  • एकाधिकारी प्रतियोगिता
  • अल्पाधिकार।

प्रश्न 3.
एकाधिकार (Monopoly) क्या है?
उत्तर:
एकाधिकार बाज़ार की वह स्थिति है जिसमें वस्तु का एक ही विक्रेता होता है और उस वस्तु का कोई निकट स्थानापन्न नहीं होता।

प्रश्न 4.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा (Monopolistic Competition) क्या है?
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा बाज़ार की वह स्थिति है जिसमें वस्तु के बहुत-से विक्रेता लगभग एक-जैसी विभेदीकृत वस्तुओं (Differentiated Goods) के रूप में बेचने की प्रतिस्पर्धा करते हैं।

प्रश्न 5.
गठबंधन प्रतियोगिता और गैर-गठबंधन प्रतियोगिता में अंतर बताहए।
अथवा
गठबंधन अल्पाधिकार तथा गैर-गठबंधन अल्पाधिकार से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
गठबंधन प्रतियोगिता या अल्पाधिकार-गठबंधन प्रतियोगिता अल्पाधिकार बाजार की वह स्थिति है जिसमें सभी फर्मे एक-दूसरे के सहयोग से अपनी वस्तुओं की कीमतों को निर्धारित करती हैं। ये एक-दूसरे से किसी भी प्रकार की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं करतीं। गैर-गठबंधन प्रतियोगिता या अल्पाधिकार-गैर-गठबंधन प्रतियोगिता अल्पाधिकार बाजार की वह स्थिति है जिसमें सभी फर्मे स्वतंत्र रूप से अपनी वस्तुओं की कीमतों को निर्धारित करती हैं और इनमें प्रतिस्पर्धा होती है।

प्रश्न 6.
अल्पाधिकार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
अल्पाधिकार बाज़ार की वह स्थिति है जिसमें वस्तु के कुछ उत्पादक होते हैं। वाटसन के अनुसार, “अल्पाधिकार वह बाजार अवस्था है जिसमें समरूप अथवा विभेदीकृत वस्तुएँ बेचने वाली थोड़ी-सी फर्मे होती हैं।”

प्रश्न 7.
कीमत विभेद किसे कहते हैं?
उत्तर:
एक ही वस्तु को विभिन्न क्रेताओं को भिन्न-भिन्न कीमतों पर बेचना कीमत विभेद कहलाता है।

प्रश्न 8.
विभेदीकृत उत्पादों (Differentiated Products) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विभेदीकृत उत्पादों से अभिप्राय उन उत्पादों से है जिनकी प्रकृति एक-समान होती है, परंतु जिन्हें ब्रांड नाम, आकार, रंग, डिज़ाइन, गुण, सेवा आदि के आधार पर अन्य वस्तुओं से विभेदित किया जाता है।

प्रश्न 9.
वस्तु विभेद (Product Differentiation) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वस्तु विभेद से अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जिसके अंतर्गत एक-समान स्वभाव वाली वस्तुओं को विज्ञापन, पैकिंग, ब्रांड आदि के आधार पर अन्य वस्तुओं से भिन्न बनाया जाता है।

प्रश्न 10.
विक्रय लागते (Selling Costs) क्या होती हैं?
उत्तर:
विक्रय लागतों से अभिप्राय उन लागतों से है जिन्हें फर्म की बिक्री बढ़ाने के लिए व्यय किया जाता है।

प्रश्न 11.
विज्ञापन लागतें क्या होती हैं?
उत्तर:
विज्ञापन लागतें वे लागतें होती हैं जो एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा फर्मे अपनी-अपनी वस्तुओं के प्रचार पर बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से व्यय करती हैं।

प्रश्न 12.
पेटेंट अधिकार क्या होते हैं?
उत्तर:
पेटेंट अधिकार वे अधिकार हैं जिनमें धारक को ही एक विशेष उत्पादन विधि या नए उत्पाद का प्रयोग करने का अधिकार होता है और अन्य किसी भी उत्पादक को धारक से लाइसेंस पाए बिना इसके उत्पादन या प्रयोग करने का अधिकार नहीं होता।

प्रश्न 13.
संगुट विरोधी (Anti Trust) कानून क्या होते हैं?
उत्तर:
संगुट विरोधी कानून ऐसे कानून हैं जो उन सभी प्रकार के विलय (Merger), अधिग्रहण (Acquisition) और व्यावसायिक गतिविधियों को सीमित करते हैं जिनके कारण दक्षता में नाममात्र की वृद्धि परंतु बाज़ार पर नियंत्रण की संभावना अधिक होती है।

प्रश्न 14.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में दीर्घकाल में फर्म असामान्य लाभ अर्जित क्यों नहीं कर पाती?
उत्तर:
क्योंकि दीर्घकाल में अन्य फळं बाजार में प्रवेश करके असामान्य लाभ को सामान्य लाभ में बदल देती हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एकाधिकार बाज़ार की कोई चार विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
एकाधिकार बाज़ार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. एक विक्रेता-एकाधिकार बाज़ार में वस्तु का केवल एक ही विक्रेता होता है। अतः इस बाज़ार में फर्म तथा उद्योग का अंतर समाप्त हो जाता है।
  2. निकट स्थानापन्न का न होना-एकाधिकार बाजार जिस वस्तु का उत्पादन या विक्रय करता है, उसका कोई निकट स्थानापन्न नहीं होता।
  3. प्रवेश पर प्रतिबंध-एकाधिकार बाजार में नई फर्मों के प्रवेश पर प्रतिबंध होता है। इसलिए एकाधिकारी का कोई प्रतियोगी नहीं होता।
  4. पूर्ति पर प्रभावी नियंत्रण वस्तु की पूर्ति पर एकाधिकारी बाज़ार का पूर्ण नियंत्रण होता है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार

प्रश्न 2.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की कोई चार विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. फर्मों की अधिक संख्या एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्मों की संख्या अधिक होती है। इस प्रकार विक्रेताओं में प्रतिस्पर्धा पाई जाती है।

2. वस्तु विभेद-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में अनेक फर्मे मिलती-जुलती वस्तुओं का उत्पादन करती हैं। उन वस्तुओं में रंग, रूप, आकार, डिज़ाइन, पैकिंग, ब्रांड, ट्रेडमार्क, सुगंध आदि के आधार पर वस्तु विभेद (Product Variation) किया जाता है; जैसे पेप्सोडेंट, कोलगेट, फोरहन्स, क्लोज़अप आदि टूथपेस्ट। इन पदार्थों में एकरूपता तो नहीं होती, लेकिन वे एक-दूसरे के निकट स्थानापन्न (Close Substitutes) होते हैं।

3. फर्मों के निर्बाध प्रवेश और बहिर्गमन-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा बाज़ार में नई फर्मों के बाज़ार में प्रवेश करने और पुरानी फर्मों को बाजार छोडने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है।

4. विक्रय लागतें-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा बाज़ार में प्रत्येक फर्म को अपनी वस्तु का प्रचार करने के लिए विज्ञापनों पर बहुत व्यय करना पड़ता है। अतः एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्मों में अपनी-अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए कीमत प्रतियोगिता तो नहीं पाई जाती, बल्कि गैर-कीमत प्रतिस्पर्धा (Non-Price Competition) पाई जाती है।

प्रश्न 3.
उन कारकों की व्याख्या करें जिनके कारण एकाधिकार बाज़ार अस्तित्व में आया।
उत्तर:
एकाधिकार बाज़ार के अस्तित्व में आने के कारण निम्नलिखित हैं
1. सरकारी प्रतिबंध कई बार किसी क्षेत्र विशेष में अन्य किसी फर्म के प्रवेश करने पर सरकार प्रतिबंध लगा देती है। उदाहरण के लिए, रेल परिवहन के क्षेत्र में भारत सरकार ने अन्य किसी के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। अतः रेलवे परिवहन पर सरकार का एकाधिकार है।

2. लाइसेंस-सरकार द्वारा केवल एक कंपनी को किसी वस्तु या सेवा के उत्पादन का लाइसेंस देना किसी क्षेत्र या उद्योग में एकाधिकार फर्म को जन्म दे सकता है।

3. पेटेंट अधिकार-पेटेंट अधिकार के कारण भी एकाधिकार स्थापित हो सकता है। जब किसी एक फर्म अथवा उत्पादक को यह सरकारी मान्यता मिल जाती है कि उसके अलावा अन्य कोई भी फर्म उस वस्तु का उत्पादन अथवा उस तकनीक का प्रयोग नहीं कर सकती, जिसका विकास अथवा आविष्कार इस फर्म ने किया है तो इसे पेटेंट अधिकार कहते हैं। यह फर्मों को अन्वेषण एवं विकास के कार्य करते रहने हेतु प्रोत्साहित करने और जोखिम की पूर्ति के लिए दिया जाता है।

4. व्यापार गुट (कार्टेल) कभी-कभी किसी एक विशेष वस्तु के उत्पादक अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखते हुए अधिकतम लाभ कमाने के लिए एकत्रित होकर एक संगठन बना लेते हैं, इसे व्यापार गुट (कार्टेल) कहा जाता है। वे इस संस्था के माध्यम से एकाधिकारी की तरह ही अपनी उत्पादन एवं कीमत नीति को लागू करते हैं।

प्रश्न 4.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धी फर्म का माँग वक्र अधिक लोचदार क्यों रहता है?
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धी फर्म द्वारा उत्पादित वस्तु की कई निकट प्रतिस्थापक वस्तुएँ बाज़ार में उपलब्ध होती हैं। जिस वस्तु की जितनी अधिक प्रतिस्थापक वस्तुएँ उपलब्ध होंगी उस वस्तु की माँग उतनी ही अधिक लोचदार होगी। इसलिए एक एकाधिकारी प्रतिस्पर्धी फर्म का माँग वक्र अधिक लोचदार रहता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।
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प्रश्न 5.
एकाधिकार और एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में से किस बाज़ार में फर्म का माँग वक्र अधिक लोचशील होता है और क्यों?
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा और एकाधिकार दोनों ही अवस्थाओं में फर्मों का माँग वक्र अथवा औसत आगम वक्र दाईं ओर नीचे को झुका हुआ होता है। इसका अर्थ यह है कि दोनों प्रकार की फर्मों को अधिक मात्रा में वस्तु बेचने के लिए कीमत कम करनी पड़ती है। लेकिन एक एकाधिकारी फर्म का माँग वक्र कम लोचशील होता है क्योंकि इस अवस्था में वस्तु की कोई निकट स्थानापन्न वस्तु नहीं होती। इसके विपरीत, एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में एक फर्म का माँग वक्र अधिक लोचशील होता है क्योंकि उस वस्तु की कई निकट स्थानापन्न वस्तुएँ बाज़ार में उपलब्ध होती हैं। एकाधिकार और एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्म के माँग वक्र को निम्नांकित रेखाचित्रों द्वारा दिखाया जाता है
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प्रश्न 6.
बताइए कि एकाधिकारी फर्म का सीमांत आगम औसत आगम से कम क्यों रहता है?
उत्तर:
एकाधिकारी फर्म पूरे बाज़ार में एकमात्र वस्तु का अकेला विक्रेता होता है। एकाधिकारी फर्म का वस्तु की पूर्ति पर पूर्ण नियंत्रण होता है। लेकिन उसका वस्तु की माँग पर कोई नियंत्रण नहीं होता। अतः एकाधिकारी फर्म अधिक लाभ कमाने के लिए वस्तु को अधिकतम मूल्य पर बेचने का प्रयास करेगी। विक्रेता को वस्तु की अधिकाधिक इकाइयाँ बेचने के लिए कीमत कम करनी पड़ती है। इसलिए फर्म का सीमांत आगम औसत आगम से कम रहता है। सीमांत आगम और औसत आगम दोनों वक्रों का ढाल ऊपर से नीचे की ओर होता है लेकिन सीमांत आगम औसत आगम से सदैव कम होता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।
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प्रश्न 7.
माँग की कीमत लोच और सीमांत आगम के बीच संबंध को एक | रेखाचित्र से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
माँग की कीमत लोच (eD) और सीमांत संप्राप्ति (आगम) (MR) के बीच निकट संबंध रहता है। जैसे कि
(i) जब MR धनात्मक है तो कीमत लोच 1 से अधिक होती है।

(ii) जब MR शून्य होती है तो कीमत लोच 1 के बराबर होती है।

(iii) जब MR ऋणात्मक होता है तो कीमत लोच 1 से कम होती है। यह संबंध संलग्न रेखाचित्र द्वारा दर्शाया गया है।
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प्रश्न 8.
द्वि-अधिकार बाज़ार की कोई चार विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
द्वि-अधिकार बाज़ार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें केवल दो ही उत्पादक होते हैं।
  2. दोनों लगभग समान वस्तु का विक्रय करते हैं।
  3. दोनों ही अपने उत्पादन कार्य में स्वतंत्र होते हैं तथा दोनों ही वस्तुएँ एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती हैं।
  4. प्रत्येक प्रतिस्पर्धी को स्वयं अपनी नीति का निर्धारण करने में दूसरे प्रतिस्पर्धी की नीति को ध्यान में रखना आवश्यक होता है।

प्रश्न 9.
शून्य उत्पादन लागत वाली एकाधिकार फर्म के संतुलन को रेखाचित्र की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
कभी-कभी एक एकाधिकारी फर्म की लागत शून्य होती है, क्योंकि उसे उत्पाद के लिए कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती। ऐसी स्थिति में फर्म का संतुलन उस बिंदु पर होगा जहाँ MC =MR है। एक फर्म की संतुलन स्थिति को हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं
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संलग्न रेखाचित्र में, X-अक्ष ही औसत व सीमांत लागत वक्र है, क्योंकि लागत शून्य है। E बिंदु पर MR=MC है इसलिए यह संतुलन बिंदु है, जहाँ फर्म को OPAE लाभ प्राप्त हो रहा है जो अधिकतम लाभ है। चूँकि हम जानते हैं कि जब MR = 0 होता है, तो TR अधिकतम होता है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार

प्रश्न 10.
एकाधिकार फर्म के लिए माँग वक्र ही संरोध (Con-straint) कैसे बन जाता है?
उत्तर:
एकाधिकार फर्म पूरे बाज़ार में एकमात्र वस्तु का विक्रेता होता है। एकाधिकार फर्म का बाज़ार में वस्तु की पूर्ति पर पूरा नियंत्रण होता है। लेकिन कीमत प्रक्रिया के दूसरे पहलू माँग पर फर्म का कोई नियंत्रण नहीं होता क्योंकि माँग उपभोक्ताओं द्वारा की जाती है। एक फर्म अधिक लाभ कमाने के लिए वस्तु को अधिकतम कीमत पर बेचने का प्रयास करती है परंतु अधिकतम कीमत पर माँग कम होगी। अतः वस्तु की अधिक मात्रा बेचने के लिए फर्म को कीमत कम करनी पड़ती है। इस प्रकार फर्म के लिए माँग वक्र ही संरोध बन जाता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार 6
संलग्न रेखाचित्र में हम देखते हैं कि OP कीमत पर वस्तु की माँग केवल OQ है। OQ1 मात्रा बेचने के लिए फर्म को वस्तु की कीमत OP से कम करके OP1 करनी पड़ेगी।

प्रश्न 11.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा क्या होती है? क्या ऐसे बाज़ार में एक विक्रेता कीमत को प्रभावित कर सकता है? समझाइए।
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा बाज़ार की वह स्थिति है जिसमें एक बड़ी संख्या में फर्मे लगभग एक जैसी किंतु विभेदीकृत वस्तुओं को बेचने की प्रतिस्पर्धा करती हैं।

एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में यहाँ एक ओर फर्मों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है वहीं दूसरी ओर फर्मों को वस्तु विभेद के कारण कुछ सीमा तक एकाधिकारी शक्ति भी प्राप्त होती है। इसलिए एक विक्रेता कीमत को प्रभावित कर सकता है। यहाँ एक विक्रेता कीमत निर्धारक होता है, कीमत स्वीकारक नहीं।

प्रश्न 12.
एकाधिकार व एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में औसत संप्राप्ति (AR) तथा सीमांत संप्राप्ति (MR) वक्र बनाइए।
उत्तर:
एकाधिकार तथा एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की अवस्थाओं में फर्म अपनी स्वतंत्र कीमत नीति अपना सकती है। फर्म कीमत को कम करके अधिक माल बेच सकती है तथा कीमत में वृद्धि करने पर फर्म का कम माल बिकेगा। अतः इन दोनों स्थितियों में औसत संप्राप्ति वक्र तथा सीमांत संप्राप्ति (आगम) वक्र गिरते हुए होते हैं और जब औसत संप्राप्ति गिर रही होती है तो सीमांत संप्राप्ति औसत संप्राप्ति से कम रहती है अर्थात् इन दोनों में मुख्य अंतर यह है कि एकाधिकार में आगम वक्र कम लोचदार (Less Elastic) और एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में अधिक लोचदार (More Elastic) होते हैं।
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इसका अभिप्राय यह है कि यदि एकाधिकारी फर्म कीमत बढ़ा देती है, तो फर्म की कुल माँग पर कम प्रभाव पड़ता है क्योंकि एकाधिकार में वस्तु के स्थानापन्न (Substitutes) उपलब्ध नहीं होते जबकि एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा वाली फर्म यदि वस्तु की कीमत बढ़ा देती है तो उसकी माँग पर अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में वस्तु के स्थानापन्न उपलब्ध होते हैं।

प्रश्न 13.
एक प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार में सीमांत संप्राप्ति (आगम) तथा कुल संप्राप्ति (आगम) का संबंध तालिका व रेखाचित्र की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
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एक प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार के कुल संप्राप्ति और सीमांत संप्राप्ति के संबंध को निम्न तालिका व रेखाचित्र से दिखा सकते हैं-

बेची गई इकाइयाँप्रति इकाई कीसतकुल आगमसीमांत आगम
1101010
29188
38246
47284
56302
65300
7428-2
8324-4

तालिका तथा रेखाचित्रों से यह स्पष्ट होता है कि कुल आगम उस समय तक बढ़ता है जब तक कि सीमांत आगम धनात्मक अर्थात् शून्य से ऊपर है। कुल आगम वहाँ अधिकतम है जहाँ सीमांत आगम शून्य है। कुल आगम उस समय घटने लगता है जब सीमांत आगम ऋणात्मक अर्थात् शून्य से कम होता है। उपर्युक्त तालिका से यह स्पष्ट है कि सीमांत आगम पाँचवीं इकाई तक धनात्मक है।

अतः कुल आगम बढ़ रहा है। छठी इकाई पर कुल आगम अधिकतम है क्योंकि सीमांत आगम शून्य है। छठी इकाई के पश्चात् सीमांत आगम ऋणात्मक होने लगता है और कुल आगम घटने वाले होते हैं।

प्रश्न 14.
कुल संप्राप्ति (आगम) (TR) तथा सीमांत संप्राप्ति (MR) में संबंध तालिका एवं रेखाचित्र की सहायता से बताइए।
उत्तर:
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बेची गई इकाइयाँTRMR
110
2188
3246
4284
5302
6300
728– 2

(i) जब MR धनात्मक होता है तो TR बढ़ता है।
(ii) जब MR शून्य होता है, तो TR अधिकतम होता है।
(iii) जब MR ऋणात्मक होता है, तो TR गिरना शुरू कर देता है।
(iv) TR बढ़ती दर से बढ़ता है, जब तक MR बढ़ता है तथा TR घटती दर से बढ़ता है, जब तक MR गिरता है।

प्रश्न 15.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत कुल संप्राप्ति, औसत संप्राप्ति और सीमांत संप्राप्ति के बीच संबंध बताइए। रेखाचित्र का प्रयोग कीजिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार 10
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में एक फर्म कीमत निर्धारक होती है। एक फर्म अपनी वस्तु की बिक्री को तभी बढ़ा सकती है जब वह वस्तु की कीमत में कमी करे। इसलिए फर्म के AR और MR वक्र गिरते हुए सीधी रेखा के रूप में होते हैं। कुल संप्राप्ति वक्र का आकार उल्टे ‘U’ आकार का होता है, क्योंकि कुल संप्राप्ति पहले बढ़ती है, बाद में कम होती है। यह वस्तु की मात्रा संलग्न रेखाचित्र में दर्शाया गया है।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
द्वि-अधिकार (Duopoly) की परिभाषा दीजिए। इसकी विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
द्वि-अधिकार का अर्थ-द्वि-अधिकार से अभिप्राय बाजार की उस स्थिति से है जिसमें किसी एक ही सर्वथा समान अथवा लगभग समान वस्तु के दो उत्पादक होते हैं। दोनों ही अपने उत्पादन कार्य में स्वतंत्र होते हैं एवं दोनों की वस्तुएँ एक-दूसरे से पर्धा करती हैं। यदि एक विक्रेता अपनी उपज तथा कीमत संबंधी नीति में परिवर्तन करता है तो दूसरे की ओर से इसकी बलशाली प्रतिक्रिया होती है। इस प्रकार दोनों विक्रेताओं में से कोई भी बिना दूसरे की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखे उत्पादन की मात्रा अथवा कीमत को निश्चित नहीं कर सकता।

द्वि-अधिकार बाजार की विशेषताएँ-द्वि-अधिकार बाजार की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं-

  • यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें केवल दो ही उत्पादक होते हैं।
  • दोनों सर्वथा समान अथवा लगभग समान वस्तु का विक्रय करते हैं।
  • दोनों ही अपने उत्पादन कार्य में स्वतंत्र होते हैं तथा दोनों ही वस्तुएँ एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती हैं।
  • अतः प्रत्येक प्रतिस्पर्धी को स्वयं अपनी नीति का निर्धारण करने में दूसरे प्रतिस्पर्धी की नीति को ध्यान में रखना आवश्यक होता है।

द्वि-अधिकार आवश्यक रूप से अपूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति नहीं होती, क्योंकि यदि दोनों विक्रेता परस्पर मिलकर उत्पादन करने लगे, तब द्वि-अधिकार की स्थिति समाप्त हो जाएगी। इसके विपरीत, यह भी संभव है कि कंठ-छेदी प्रतिस्पर्धा (Cut-throat competition) के कारण पूर्ण प्रतिस्पर्धा की सी दशाएँ उत्पन्न हो जाएँ।

प्रश्न 2.
कुल संप्राप्ति (TR) और कुल लागत (TC) वक्रों की सहायता से एक एकाधिकारी फर्म (Monopoly Firm) के संतुलन को समझाइए।
उत्तर:
कुल संप्राप्ति (आगम) तथा कुल लागत विधि द्वारा एकाधिकारी फर्म का संतुलन-एकाधिकार वस्तु की उस मात्रा को बेचकर अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकता है जिस पर कुल संप्राप्ति (आगम) (Total Revenue) तथा कुल लागत (Total Cost) का अंतर अधिकतम होता है। एकाधिकार वस्तु की विभिन्न कीमतें निर्धारित करके अथवा वस्तु की पूर्ति में परिवर्तन लाकर यह जानने का प्रयास करता है कि उत्पादन के किस स्तर पर कुल संप्राप्ति (TR) तथा कुल लागत (TC) का अंतर अधिकतम है। उत्पादन की उस मात्रा पर जिसके उत्पादन से एकाधिकार को अधिकतम लाभ प्राप्त होंगे, एकाधिकार संतुलन की स्थिति में होगा। इसे संलग्न रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

रेखाचित्र में TC कुल लागत वक्र है, जो उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ लागत में स्थिर दर से होने वाली वृद्धि को दर्शाता है। TR कुल संप्राप्ति वक्र है जो आरंभ में ऊपर की ओर बढ़ता है, बाद में चपटा (Flat) होता है और अंत में नीचे की ओर गिरता है जो एक निश्चित बिंदु के पश्चात कुल प्राप्तियों में गिरावट का प्रतीक है। TP कुल लाभ की रेखा है। यह Rबिंद से आरंभ होती है जो यह दर्शाती है कि प्रारंभिक स्थिति में फर्म को ऋणात्मक लाभ (Negative Profits) मिलते हैं। रेखाचित्र से यह स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे फर्म उत्पादन बढ़ाती है वैसे-वैसे कुल संप्राप्ति TR बढ़ती जाती है। आरंभ में TR < TC है। परिणामस्वरूप TR वक्र का RC भाग यह दिखाता है कि फर्म को हानि हो रही है। K बिंदु पर TR = TC है जो यह स्पष्ट करती है कि फर्म को न लाभ है और न ही हानि। जैसाकि TP के C बिंदु से स्पष्ट हो रहा है।
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K बिंदु ‘समविच्छेद बिंदु’ (Break Even Point) कहलाता है। जब फर्म K बिंदु से अधिक उत्पादन करती है तो TR > TC है। C बिंदु के बाद TP वक्र भी दाएँ ऊपर की ओर बढ़ता है। यह इस बात का प्रतीक है कि फर्म लाभ प्राप्त कर रही है। जब TP वक्र अपने उच्चतम बिंदु E पर पहुँचता है तब फर्म अधिकतम लाभ कमा रही होती है। इसलिए OQ उत्पादन की मात्रा संतुलन मात्रा कहलाती है। यदि फर्म संतुलन मात्रा से अधिक उत्पादन करती है तो TR और TC वक्रों का अंतर कम होता जाता है जो कि दोबारा K1 बिंदु पर एक-दूसरे को काटते हैं। पुनः TR = TC हो जाते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि फर्म के लाभ घटते जाते हैं और D बिंदु पर फर्म को न लाभ न हानि होती है। इस प्रकार बिंदु K1 भी ‘समविच्छेद बिंदु’ (Break Even Point) कहलाता है। यदि फर्म इससे भी अधिक मात्रा का उत्पादन करती है तो TR < TC हो जाता है और फर्म को हानि होने लगती है।

सारांश में फर्म E बिंदु पर अधिकतम लाभ प्राप्त करेगी। अधिकतम लाभ का अनुमान लगाने के लिए TR और TC वक्रों पर दो स्पर्श रेखाएँ (Tangents) खींची गई हैं। जिन बिंदुओं पर स्पर्श रेखाएँ समानांतर (Parallel) हैं, वहीं TR और TC का अंतर अधिकतम होता, है। जैसाकि रेखाचित्र में A और B बिंदुर चूँकि स्पर्श रेखाएँ परस्पर समानांतर हैं, इसलिए यहाँ TR और TC का अंतर अधिकतम है। इसी स्थिति में फर्म को अधिकतम लाभ प्राप्त होता है जो TP वक्र के E बिंदु से स्पष्ट है और E बिंदु ही फर्म का संतुलन बिंदु है।

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प्रश्न 3.
सीमांत संप्राप्ति (MR) और सीमांत लागत (MC) विधि द्वारा एक एकाधिकारी फर्म की संतुलन स्थिति को समझाइए।
अथवा
एक एकाधिकारी किस प्रकार अपनी कीमत और मात्रा निर्धारित करता है? रेखाचित्र द्वारा समझाइए।
उत्तर:
सीमांत संप्राप्ति (आगम) तथा सीमांत लागत विधि द्वारा एकाधिकारी फर्म की संतुलन स्थिति-एकाधिकार की स्थिति उत्पादन तथा संतुलन स्थिति का निर्धारण सीमांत आगम और सीमांत लागत विधि द्वारा भी कर सकती है। इस विधि के अनुसार एकाधिकारी उस समय संतुलन स्थिति में होता है जहाँ निम्नलिखित दो शर्ते पूरी होंगी

  • सीमांत संप्राप्ति (आगम) (MR) = सीमांत लागत (MC) हो
  • सीमांत लागत (MC) वक्र सीमांत संप्राप्ति (MR) वक्र को नीचे से काटता हो।

एकाधिकार में कीमत, उत्पादन तथा संतुलन निर्धारण दिए गए रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया गया है रेखाचित्र में औसत लागत, तथा सीमांत लागत वक्र को माँग (औसत संप्राप्ति) वक्र तथा सीमांत संप्राप्ति वक्र के साथ दर्शाया गया है। रेखाचित्र से स्पष्ट है कि q0 के नीचे उत्पादन स्तर पर सीमांत संप्राप्ति स्तर सीमांत लागत स्तर से ऊँचा है। तात्पर्य यह है कि वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के विक्रय से प्राप्त कुल संप्राप्ति में वृद्धि उस अतिरिक्त इकाई की उत्पादन लागत में वृद्धि से अधिक होती है। इसका अर्थ यह है कि उत्पादन की एक अतिरिक्त इकाई से अतिरिक्त लाभ का सृजन होगा। चूँकि लाभ में परिवर्तन = कुल संप्राप्ति में परिवर्तन – कुल लागत में परिवर्तन। अतः यदि फर्म q0 से कम स्तर पर वस्तु का उत्पादन कर रही है, तो वह अपने उत्पादन में वृद्धि लाना चाहेगी, क्योंकि इससे उसके लाभ में बढ़ोतरी होगी। जब तक सीमांत संप्राप्ति (MR) वक्र सीमांत लागत (MC) वक्र के ऊपर स्थित है, तब तक उपर्युक्त D = AR तर्क का अनुप्रयोग होगा। अतः फर्म अपने उत्पादन में वृद्धि करेगी। इस प्रक्रम में तब रुकावट आएगी, जब उत्पादन का स्तर q0 पर प. प. पहुँचेगा, क्योंकि इस स्तर पर सीमांत संप्राप्ति (MR) और सीमांत उत्पादन (निर्गत) MR लागत (MC) दोनों समान होंगे और उत्पादन में वृद्धि से लाभ में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं होगी।
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दूसरी ओर, यदि फर्म q0 से अधिक मात्रा में वस्तु का उत्पादन करती है तो सीमांत लागत (MC) सीमांत संप्राप्ति से अधिक होती है। अभिप्राय यह है कि उत्पादन की एक इकाई कम करने से कुल लागत में जो कमी होती है, वह इस कमी के कारण कल संप्राप्ति में हुई हानि से अधिक होती है। अतः फर्म के लिए यह उपयुक्त है कि वह उत्पादन में कमी लाए। यह तर्क तब तक ठीक साबित होगा जब तक सीमांत लागत (MC) वक्र सीमांत संप्राप्ति वक्र के ऊपर स्थित होगा और फर्म अपने उत्पादन में कमी को जारी रखेगी। एक बार उत्पादन स्तर के q0 पर पहुँचने पर सीमांत लागत (MC) और सीमांत संप्राप्ति (MR) के मूल्य समान हो जाएँगे और फर्म अपने उत्पादन में कमी को रोक देगी।

वार्य रूप से उत्पादन स्तर पर पहुँचती है, इसलिए इस स्तर को उत्पादन का संतुलन स्तर कहते हैं। चूंकि उत्पादन के उस संतुलन स्तर पर सीमांत संप्राप्ति (MR) सीमांत लागत के बराबर होती है तथा सीमांत लागत (MC) वक्र सीमांत संप्राप्ति वक्र को नीचे से काट रही है और इस बिंदु पर एकाधिकार फर्म की संतुलन की शर्ते पूरी हो रही हैं।

q0 उत्पादन के स्तर पर औसत लागत dq0 है। चूंकि कुल लागत, औसत लागत और उत्पादित मात्रा q0 के गुणनफल के बराबर होती है, इसलिए इसे आयंत Oq0dc के द्वारा दर्शाया गया है।

रेखाचित्र में कीमत बिंदु a द्वारा दर्शायी गई है जहाँ q0 से शुरू होकर उदग्र रेखा बाजार माँग वक्र D से मिलती है।। इससे aq0 की ऊँचाई द्वारा दर्शाई गई कीमत प्राप्त होती है। चूंकि फर्म द्वारा प्राप्त कीमत उत्पादन की प्रति इकाई संप्राप्ति होती है, अतः यह फर्म के लिए औसत संप्राप्ति है। कुल संप्राप्ति, औसत संप्राप्ति और उत्पादन q0 के स्तर का गुणनफल होती है, इसलिए इसे आयत Oq0ab के क्षेत्रफल के रूप में दर्शाया गया है। आरेख से स्पष्ट है कि आयत Oq0ab का क्षेत्रफल आयत Oq0dc के क्षेत्रफल से बड़ा है अर्थात् कुल संप्राप्ति कुल लागत से अधिक है। आयत cdab का क्षेत्रफल इनके बीच का अंतर है अतः लाभ = कुल संप्राप्ति – कुल लागत को cdab के क्षेत्रफल से प्रदर्शित किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
शून्य लागत की स्थिति में एक एकाधिकारी फर्म के संतुलन स्थिति को रेखाचित्र की सहायता से सुस्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शून्य लागत की स्थिति में एकाधिकार फर्म का संतुलन कभी-कभी एक एकाधिकार फर्म की वस्तु की उत्पादन लागत शून्य होती है, क्योंकि उसे अपने उत्पाद के लिए कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ती। ऐसी स्थिति में भी एक फर्म का संतुलन उस बिंदु पर होगा, जहाँ MC = MR है और चूँकि हमने माना है कि MC = 0 है तो संतुलन की शर्त होगी (MR = MC = 0)। हम यह भी जान चुके हैं कि जब MR = 0 होता है तो TR अधिकतम होता है। एक फर्म की संतुलन स्थिति को हम निम्नलिखित उदाहरण व संलग्न रेखाचित्र की सहायता से स्पष्ट कर सकते हैं

उदाहरण (Example) मान लीजिए कि कोई गाँव अन्य गाँवों से काफी दूरी पर स्थित है। इस गाँव में एक ही कुआँ है जिसमें पानी उपलब्ध होता है। सभी निवासी जल की आवश्यकता के लिए पूर्ण रूप से इसी कुएँ पर निर्भर हैं। कुएँ का स्वामी एक ऐसा व्यक्ति है जो अन्य लोगों को कुएँ से जल निकालने के लिए रोकने में समर्थ है सिवाय इसके कि कोई जल का क्रय करे। इस कुएँ से जल का क्रय करने वाले स्वयं ही जल निकालते हैं। हम इस एकाधिकार की स्थिति का विश्लेषण बिक्री जहाँ लागत शून्य है इस जल की मात्रा और उसकी कीमत जिस पर बेची जाती है, का निर्धारण करने के लिए करेंगे।

रेखाचित्र में कुल संप्राप्ति (TR), औसत संप्राप्ति (AR) और सीमांत संप्राप्ति (MR) वक्रों को दर्शाया गया है। फर्म का लाभ कुल संप्राप्ति – कुल लागत के बराबर होता है अर्थात
π = TR – TC.

रेखाचित्र से स्पष्ट है कि जब कुल उत्पादन OQ है, तो कुल लागत शून्य है। चूंकि इस स्थिति में कुल लागत शून्य है, जब कुल संप्राप्ति सर्वाधिक है। लाभ सर्वाधिक है तो जैसा कि हमने पहले देखा है कि यह स्थिति तब होती है, जब उत्पादन मात्रा OQ इकाइयाँ हों। यह स्तर तब प्राप्त होता है जब MR शून्य के बराबर होती है। लाभ का परिणाम ‘a’ से समस्तरीय अक्ष तक के उदग्र रेखा की लंबाई के द्वारा स्पष्ट है।

जिस कीमत पर उत्पाद की इस मात्रा का विक्रय होगा जिसे उपभोक्ता समग्र रूप से भुगतान करने को तैयार होंगे। इसे बाजार माँग वक्र D द्वारा दिया गया है। OQ इकाई के उत्पादन के स्तर पर कीमत P रु० है। चूँकि एकाधिकार फर्म के लिए बाजार माँग वक्र ही औसत संप्राप्ति (AR) वक्र है, इसलिए फर्म के द्वारा प्राप्त औसत संप्राप्ति P है। उत्पादन (निर्गत) Q MR कुल संप्राप्ति को औसत संप्राप्ति और बिक्री मात्रा के गुणनफल अर्थात् Px OQ इकाइयाँ = OQRP के द्वारा दिखाया गया है। यह छायांकित आयत के द्वारा चित्रित किया गया है।

पूर्ण प्रतिस्पर्धा से तुलना-उपरोक्त स्थिति में एकाधिकारी फर्म को अधिसामान्य लाभ प्राप्त होंगे। अब यदि हम यह मान लें कि बाजार में पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति है और गाँव में जल के अनगिनत कुएँ हैं, जिनके स्वामी भी अलग-अलग हैं, तब उनमें परस्पर प्रतिस्पर्धा होगी। दूसरे स्वामी कीमत को कम करेंगे और कीमत असीमित रूप से नीचे की ओर गिरेगी और तब तक गिरेगी जब तक शन्य न हो जाए और लाभ भी शून्य न हो जाए। अतः इस प्रकार पूर्ण प्रतिस्पर्धा लाभ के कारण कम कीमत पर अधिक मात्रा की बिक्री होती है तथा लाभ AR सामान्य (शून्य) होते हैं।
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प्रश्न 5.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्म के अल्पकालीन संतुलन की स्थिति समझाइए। MC, MR विधि का प्रयोग करें।
उत्तर:
अल्पकालीन संतुलन (Short Run Equilibrium) अल्पकाल समय की वह अवधि है, जिसमें माँग के बढ़ने पर उत्पादन उत्पादन (निर्गत) को केवल वर्तमान क्षमता (Existing Capacity) तक ही बढ़ाया जा सकता है। उत्पादन के स्थिर साधनों; जैसे मशीनरी, प्लांट आदि में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इस समय अवधि में एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा फर्म का संतुलन तो उसी बिंदु पर निर्धारित होता है, जिस पर MC = MR हो तथा MC, MR को नीचे से काटे, परंतु संतुलन की अवस्था में फर्म को उत्पादन करने में (i) असामान्य लाभ, (ii) सामान्य लाभ या (iii) हानि उठानी पड़ सकती है। इनका विवरण दिए गए रेखाचित्रों की सहायता से किया जा सकता है।

1. असामान्य लाभ-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्म को असामान्य लाभ (Supermormal Profit) उस समय होते हैं, जब फर्म की औसत संप्राप्ति (आगम) (AR) औसत लागत से अधिक होती है (AR > AC)। संलग्न रेखाचित्र में संतुलन बिंदु E है, जिस पर MC = MR है तथा MC वक्र, MR वक्र को नीचे से काट रहा है। इस स्थिति में संतुलन उत्पादन OQ है तथा संतुलन कीमत QP = OP1 है। OQ उत्पादन की प्रति इकाई कीमत (QP) औसत लागत (OC) से अधिक है। इसलिए फर्म को PP1C1C छाया वाले भाग के बराबर असामान्य लाभ प्राप्त होते हैं।
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2. सामान्य लाभ-अल्पकाल में एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्म को सामान्य लाभ उस समय प्राप्त होते हैं, जब औसत संप्राप्ति (आगम) (AR) तथा औसत लागत (AC) एक-दूसरे के बराबर होती है। (AR = AC)। संलग्न रेखाचित्र में संतुलन बिंदु .E है, जिस पर MC = MR है तथा MC वक्र, MR वक्र को नीचे से काट रहा है। अतः संतुलन उत्पादन OQ है तथा संतुलन कीमत qP = OP1 निर्धारित होती है। OQ संतुलन उत्पादन की औसत संप्राप्ति (AR) तथा औसत लागत (AC) बराबर है (OP = QP1)। अतः फर्म को केवल सामान्य लाभ (Normal Profit) प्राप्त हो रहे हैं।
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3. न्यूनतम हानि-अल्पकाल में एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में उत्पादन (निर्गत) काम कर रही फर्म को हानि भी हो सकती है। हानि उस समय होती है जब फर्म की औसत संप्राप्ति (AR) औसत (AC) से कम होती है अर्थात् जब AR1 निर्धारित होती है। औसत लागत QC है, जो कि कीमत अथवा औसत संप्राप्ति से अधिक है। इसलिए फर्म को PC प्रति इकाई हानि हो रही है, परंतु संतुलन उत्पादन की कीमत औसत परिवर्ती लागत (AVC) के बराबर है, क्योंकि बिंदु P पर AR वक्र AVC वक्र को छू रहा है। इस स्थिति में उत्पादन (निर्गत) x फर्म को कुल हानि CC1P1P के बराबर हो रही है, जो कि बँधी लागत के बराबर है, इसलिए P बिंदु उत्पादन बंद बिंदु (Shut-down Point) है।

प्रश्न 6.
अल्पाधिकार क्या है? अल्पाधिकार में कीमत निर्धारण की समस्या की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अल्पाधिकार (Oligopoly) से अभिप्राय बाजार की उस स्थिति से है, जब उद्योग में समरूप वस्तु का उत्पादन करने वाली अथवा निकट स्थानापन्न वस्तुओं का उत्पादन करने वाली फर्मों की संख्या अल्प (3, 4, 5……) परंतु बहुत अधिक नहीं होती।
अल्पाधिकार में कीमत निर्धारण की समस्याएँ (Problems of Price Determination Under Oligopoly)-अल्पाधिकार में कीमत तथा उत्पादन निर्धारण की समस्या वास्तव में एक गंभीर समस्या है। इस समस्या का समाधान सरल व निश्चित नहीं है।
अल्पाधिकार में कीमत तथा उत्पादन निर्धारण की समस्या से सम्बन्धित निम्नलिखित पहलू महत्त्वपूर्ण हैं-
1. एक सामान्य सिद्धांत की रचना कठिन-अल्पाधिकार विभिन्न प्रकार की बाजार स्थितियाँ हो सकती हैं। अल्पाधिकार की गैर-लचीली अवस्था (Tight Oligopoly) भी हो सकती है, जिसमें दो या तीन फर्मे सारे बाजार को नियंत्रित करती हैं। लचीली अवस्था (Loose Oligopoly) भी हो सकती है, जिसमें छह या सात फर्मे बाजार के अधिक भाग को नियंत्रित करती हैं। इसके अंतर्गत वस्तु-विभेदीकरण (Product Differentiation) अथवा समरूप उत्पाद (Homogeneous Product) भी पाए जा सकते हैं। इसमें फर्मों का गठबंधन. (Collusion) अथवा गैर-गठबंधन (Non-Collusion) भी हो सकता है। इसलिए अर्थशास्त्र में ऐसा कोई सर्वमान्य सिद्धांत नहीं है, जो सभी प्रकार की अल्पाधिकार स्थितियों में कीमत तथा उत्पादन निर्धारण की व्याख्या कर सके।

2. अल्पाधिकार में माँग वक्र का अनिश्चित होना अल्पाधिकार में कीमत तथा उत्पादन के अनिर्धारण का एक अन्य कारण माँग का अनिर्धारित होना है। अल्पाधिकार में एक फर्म के निर्णय दूसरी फर्मों के निर्णयों पर निर्भर करते हैं। इसलिए अल्पाधिकारी फर्म की माँग वक्र का निर्धारण संभव नहीं होता, क्योंकि प्रतिद्वन्द्वियों की क्रियाओं के फलस्वरूप उसका खिसकाव होता रहता है। अतः प्रतिद्वन्द्रियों की क्रियाएँ तथा प्रतिक्रियाएँ अल्पाधिकारी माँग वक्र को अनिर्धारित बना देती हैं।

3. अल्पाधिकारी फर्म का उद्देश्य केवल अधिकतम लाभ प्राप्त करना ही नहीं होता-अल्पाधिकारी का उद्देश्य केवल लाभों को अधिकतम करना नहीं होता। चूंकि पूर्ण प्रतिस्पर्धा तथा एकाधिकार की स्थिति में फर्मों का उद्देश्य लाभ को अधिकतमं करना होता है। फलस्वरूप, ऐसे बाजारों में उत्पादन की कीमतें तथा मात्रा निर्धारित करना संभव हो जाता है, परंतु अल्पाधिकार में फर्मों के कई अन्य उद्देश्य जैसे बिक्री को अधिकतम करना अथवा दीर्घकाल तक उचित मात्रा में स्थायी लाभों को प्राप्त करना आदि हो सकते हैं। इन विभिन्न उद्देश्यों के कारण भी अल्पाधिकार में कीमत तथा उत्पादन मात्रा अनिर्धारित रह जाती है।

4. व्यवहार में भिन्नता अल्पाधिकार में परस्पर निर्भरता के फलस्वरूप फर्मों के व्यवहार में भिन्नता पाई जाती है। जैसे कि-
(i) एक तो यह कि फर्मे आपस में मिल-जुलकर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने का निर्णय कर सकती हैं अथवा दूसरी सीमा यह है कि वे जीवन-पर्यंत एक-दूसरे से लड़ते रहें। यदि वे आपस में समझौते भी करते हैं तो ये कुछ शीघ्र ही टूट जाते हैं।
(ii) दूसरा, फर्मे अपने में से एक को नेता चुनकर कीमत तथा उत्पादन निर्धारण कर सकती हैं, परंतु इस अवस्था में भी कोई ऐसा सरल समाधान नहीं है कि जिससे यह पता चले कि फर्म अपनी कीमत व उत्पादन का निर्धारण किस प्रकार से करेगी। अतः स्पष्ट है कि अल्पाधिकार में कीमत तथा उत्पादन-निर्धारण संबंधी समस्या का कोई निश्चित समाधान नहीं है। इसका कारण प्रतिस्पर्धी फर्मों की प्रतिक्रिया में अनिश्चितता है।

अतः अल्पाधिकार में, परस्पर निर्भरता के फलस्वरूप फर्मों के व्यवहार में विभिन्नता संभव होती है। प्रतिद्वन्द्वी फर्मे परस्पर सहयोग भी कर सकती हैं अथवा स्वतन्त्र रहकर प्रतिस्पर्धा भी कर सकती हैं। वे समझौते कर सकती हैं या समझौते तोड़ सकती हैं। अतएव अल्पाधिकार में फर्मों के व्यवहार संबंधी इतनी अनिश्चितताएँ होती हैं जिस कारण से उनके बारे में कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया जा सकता। कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार, अल्पाधिकारियों में प्रतिस्पर्धा की तुलना ‘ताश के खेल’ (Playing Cards) से की जा सकती है। जिस प्रकार ताश के खेल का परिणाम अनिश्चित होता है, उसी प्रकार अल्पाधिकार में उत्पादन की कीमत तथा मात्रा निर्धारण का कोई समाधान नहीं होता, इसलिए उन्हें अनिर्धारित कहा जाता है।

यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना अनिवार्य है कि यद्यपि अल्पाधिकार में, कीमत तथा उत्पादन निर्धारण की समस्या महत्त्वपूर्ण है। इन बाधाओं के होते हुए भी अल्पाधिकार की स्थिति में कीमत निर्धारण की दो मुख्य विशेषताएँ हैं-
1. अल्पाधिकार में कीमतें दृढ़ होती हैं इस स्थिति में बाजार की अन्य अवस्थाओं; जैसे पूर्ण प्रतिस्पर्धा, एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की तुलना में कीमतों में बहुत कम परिवर्तन होता है।
2. यदि अल्पाधिकार की स्थिति में, कीमतों में परिवर्तन होता है तो सभी फर्मों की कीमतों में परिवर्तन होगा, जिससे एक प्रकार का कीमत युद्ध (Price War) सा छिड़ जाता है। यह विशेषता भी अन्य बाजारों में नहीं पाई जाती।

इस प्रकार उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अल्पाधिकार में कीमत तथा उत्पादन-निर्धारण का कोई निश्चित समाधान नहीं है।

प्रश्न 7.
द्वि-अधिकार क्या है? द्वि-अधिकार में फर्म की कीमत तथा उत्पादन मात्रा निर्धारण संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
द्वि-अधिकार का अर्थ-जब बाज़ार में किसी वस्तु का उत्पादन या विक्रय करने वाली केवल दो फर्मे होती हैं, तो उसे द्वि-अधिकार कहते हैं।
द्वि-अधिकार के अंतर्गत कीमत तथा उत्पादन-मात्रा निर्धारण (Price and Output Determination under Duopoply) यद्यपि द्वि-अधिकार के अंतर्गत कीमत तथा उत्पादन मात्रा के निर्धारण की समस्या अत्यंत जटिल होती है तथापि द्वि-अधिकार में कीमत निर्धारण की संभावित दशाओं का विश्लेषण निम्नलिखित प्रकार किया जा सकता है-
(1) समझौता हो जाने पर यदि दोनों विक्रेता आपस में समझौता करके बाज़ारों का बँटवारा कर लेते हैं तो दोनों विक्रेता अपने-अपने बाज़ारों में एकाधिकारी के समान कीमत निश्चित करने की स्थिति में हो जाते हैं। बाज़ारों का बँटवारा हो जाने के पश्चात् दोनों विक्रेता स्वतंत्र रूप से अपने-अपने क्षेत्रों में लागत-स्थितियों तथा माँग के अनुसार समायोजन करके कीमत निश्चित कर लेते हैं। यदि दोनों एकाधिकारियों की लागत-स्थितियाँ समान हों तथा दोनों की वस्तुओं की माँग की लोच समान हो तो दोनों बाज़ारों में कीमत भी समान होगी अन्यथा उनमें अंतर होने की संभावना बनी रहेगी।

(2) प्रतिस्पर्धा की स्थिति में यदि दोनों फर्मों के बीच कोई समझौता नहीं है तो उनमें प्रतिस्पर्धा रहेगी और कीमत युद्ध (Price War) छिड़ने की संभावना रहेगी। प्रत्येक विक्रेता अपने उत्पाद की कीमत घटाकर दूसरे विक्रेता के ग्राहकों को अपनी ओर खींचने का प्रयत्न करेगा तथा यह कीमत घटाने का क्रम तब तक चलेगा जब तक कि दोनों विक्रेताओं की कीमत उनकी सीमांत लागत के बराबर नहीं हो जाती है। यदि दोनों विक्रेताओं की वस्तुएँ समरूप नहीं हैं तो दोनों की कीमत में अंतर बना रह सकता है। व्यवहार में द्वि-अधिकारी फर्मे कीमत-युद्ध से बचने के लिए मूल्य नेतृत्व और आपसी समझौते का सहारा लेती हैं। इसलिए कहा जाता है कि द्वि-अधिकार का अंतिम हल कीमत नेतृत्व एवं गुटबंदी में निहित होता है।

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प्रश्न 8.
बाजार संरचना (Market Structure) का अर्थ बताते हए इसको निर्धारित करने वाले कारकों का वर्णन करें।
उत्तर:
बाज़ार संरचना का अर्थ बाज़ार संरचना से अभिप्राय उद्योग में काम कर रही फर्मों की संख्या, फर्मों के बीच प्रतियोगिता का स्वरूप और वस्तु की अपनी प्रकृति से है।
बाज़ार संरचना को निर्धारित करने वाले कारक-बाज़ार संरचना को निर्धारित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-
1. वस्तु के क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या-क्रेताओं और विक्रेताओं की अधिक संख्या होने का अर्थ यह है कि कोई भी क्रेता या विक्रेता अपने स्वतंत्र व्यवहार से बाजार कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। पूर्ण प्रतिस्पर्धा बाजार की यह पहली शर्त य है जिसमें प्रत्येक विक्रेता और क्रेता कुल उत्पादन का एक सूक्ष्म भाग बेचता या खरीदता है। बाज़ार में केवल एक विक्रेता होने को एकाधिकार बाज़ार कहते हैं जबकि अधिक विक्रेता होने को एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा बाज़ार कहते हैं, क्योंकि वे अपनी वस्तु के ट्रेडमार्क व ब्रांड आदि से कीमत को प्रभावित करते हैं।

2. वस्तु की प्रकृति यदि बाज़ार में बेची जाने वाली वस्तु समरूप व मानकीकृत है अर्थात् उसमें भेद नहीं किया जा सकता तो वस्तु की कीमत एक (या समान) रहेगी। कोई भी विक्रेता ऐसी वस्तु को अधिक कीमत पर नहीं बेच सकता। यह पूर्ण प्रतिस्पर्धा बाज़ार की दूसरी शर्त या विशेषता है। यदि वस्तु; जैसे टूथपेस्ट में नाम, ब्रांड, आकृति, गुण आदि के आधार पर भेद किया जा सकता है तो फर्म अपने ब्रांड की वस्तु की कीमत अधिक वसूल कर सकती है। ऐसी स्थिति एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा बाज़ार में पाई जाती है।

3. फर्मों का निर्बाध प्रवेश व बहिर्गमन-इससे अभिप्राय है कि फर्म को उद्योग में आने या इससे बाहर जाने की पूर्ण स्वतंत्रता है या नहीं। यदि किसी उद्योग में अधिक लाभ के आकर्षण के कारण नई फर्मों को प्रवेश करने की स्वतंत्रता है तो उस उद्योग में असामान्य लाभ समाप्त हो जाएंगे। इसी प्रकार यदि उद्योग में घाटा उठाने वाली फर्मों को उद्योग छोड़ने की पूरी छूट है तो घाटा (Loss) भी समाप्त हो जाएगा। संक्षेप में फर्मों के निर्बाध प्रवेश व बहिर्गमन से पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति बन जाएगी। यह भी देखना होगा कि वस्तुओं और साधनों (जैसे श्रम, पूँजी उद्यम आदि) की गतिशीलता है या नहीं अर्थात् वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने ले जाने या साधनों को एक धंधे से दूसरे धंधे में जाने की पूरी स्वतंत्रता है या नहीं।

उपर्युक्त कारकों के आधार पर बाज़ार को प्रायः चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है-(i) पूर्ण प्रतिस्पर्धा, (ii) एकाधिकार, (iii) एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा और (iv) अल्पाधिकार। अंतिम तीन श्रेणियाँ अपूर्ण प्रतिस्पर्धा के रूप हैं।

प्रश्न 9.
एकाधिकार की परिभाषा दीजिए। इसकी मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

एकाधिकार बाज़ार का अर्थ-एकाधिकार बाज़ार (Monopoly Market) बाज़ार की वह अवस्था है जिसमें वस्तु का केवल एक ही विक्रेता होता है तथा उसका वस्तु की पूर्ति पर पूर्ण नियंत्रण होता है। एकाधिकार उस वस्तु का उत्पादन करता है, जिसका कोई निकट स्थानापन्न नहीं होता।
एकाधिकार बाज़ार की विशेषताएँ एकाधिकार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. एक विक्रेता-एकाधिकार बाज़ार में वस्तु का केवल एक ही विक्रेता होता है। अतः इस बाज़ार में फर्म तथा उद्योग का अंतर समाप्त हो जाता है।

2. निकट स्थानापन्न का न होना-एकाधिकार बाज़ार जिस वस्तु का उत्पादन या विक्रय करता है, उसका कोई निकट स्थानापन्न नहीं होता।

3. प्रवेश पर प्रतिबंध एकाधिकार बाज़ार में नई फर्मों के प्रवेश पर प्रतिबंध होता है। इसलिए एकाधिकारी का कोई प्रतियोगी नहीं होता।

4. पूर्ति पर प्रभावी नियंत्रण-वस्तु की पूर्ति पर एकाधिकारी बाज़ार का पूर्ण नियंत्रण होता है।

5. स्वतंत्र कीमत नीति-एकाधिकार बाज़ार का वस्तु की कीमत पर पूर्ण नियंत्रण होता है। वह स्वतंत्र कीमत नीति अपना सकता है। वह अपनी इच्छानुसार वस्तु की कीमत में वृद्धि या कमी कर सकता है। वह कीमत निर्धारण करने वाला होता है, न कि कीमत स्वीकार करने वाला। अतः क्रेताओं को वह कीमत देनी पड़ती है, जो एकाधिकारी तय करता है और चूँकि एकाधिकारी को वस्तु का मूल्य निर्धारण करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है, इसलिए उसे असामान्य लाभ प्राप्त होते हैं।

6. कीमत विभेद-एकाधिकारी अपनी वस्त की विभिन्न क्रेताओं से तथा विभिन्न बाज़ारों में विभिन्न कीमतें ले सकता है।

7. विभिन्न औसत एवं सीमांत आगम वक्र-एकाधिकार में औसत और सीमांत आगम वक्र अलग-अलग होते हैं; जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दिखाए गए हैं। एकाधिकार उत्पादन (निर्गत) फर्म का औसत आगम (AR) वक्र अथवा माँग-वक्र बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुकते हैं जो यह बताते हैं कि कम कीमत पर अधिक और अधिक कीमत पर कम वस्तु बेची जा सकती है। सीमांत आगम (MR) वक्र भी औसत आगम (AR) की तरह नीचे को ढालू होता है और औसत आगम (AR) वक्र के नीचे रहती है।
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प्रश्न 10.
अल्पाधिकार में कीमत अनम्यता क्या है? इसके कारण पर प्रकाश डालें। रेखाचित्र का प्रयोग करें।
उत्तर:
अल्पाधिकार में कीमत अनम्यता अथवा कीमत-दृढ़ता का अर्थ-जैसाकि पहले भी स्पष्ट किया जा चुका है, अल्पाधिकार में चूँकि सभी विक्रेताओं को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है तथा उनके समक्ष सदैव कीमत की अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है, इसलिए प्रायः सभी विक्रेता कीमत के ऐसे संतोषजनक स्तर को स्वीकार कर लेते हैं जो सभी के लिए लाभदायक हो। इस कीमत-स्तर को स्वीकार करके प्रायः सभी फर्मे इस कीमत-स्तर को बनाए रखने का प्रयास करती हैं जिससे इस बाज़ार-स्थिति में कीमत में स्थिरता पाई जाती है। इसका एक कारण और भी होता है कि यदि कोई फर्म अपनी कीमत कम करती है तो सभी फर्मे अपनी कीमतें कम करती हैं, लेकिन यदि कोई फर्म कीमत में वृद्धि करती है तो अन्य फर्मों द्वारा कीमत में वृद्धि आवश्यक नहीं है। परिणामस्वरूप कीमत में दृढ़ता अथवा स्थिरता दिखाई पड़ती है तथा एक फर्म की माँग रेखा विकुंचित (Kinked) हो जाती है अर्थात् अल्पाधिकार के अंतर्गत वस्तु के माँग वक्र में एक कोना होता है जो वर्तमान मूल्य से संबंधित होता है। उसी बिंदु पर कीमतें स्थिर रहती हैं, न घटती हैं, न बढ़ती हैं। अतः अल्पाधिकार के अंतर्गत कीमतों में स्थिरता होती है।

कीमत अनम्यता/कीमत-दृढ़ता के कारण-कीमत अनम्यता के कारण निम्नलिखित हैं-
अल्पाधिकारी, चूँकि वर्तमान स्तर से कीमत घटाकर माँग में अधिक वृद्धि नहीं कर सकता और वर्तमान स्तर से कीमत बढ़ाने पर उसकी बिक्री बहुत कम हो जाने पर वह वर्तमान कीमत में परिवर्तन लाने का इच्छुक नहीं होगा। अन्य शब्दों में, चूँकि वर्तमान कीमत को बदलने में कोई लाभ नहीं है, इसलिए अल्पाधिकारी वर्तमान कीमत पर ही अपनी वस्तु को बेचता रहेगा। इस प्रकार दृढ़ कीमतों की विकुंचित माँग वक्र सिद्धांत की सहायता से व्याख्या की जा सकती है। रेखाचित्र में वर्तमान कीमत MP है जिस पर माँग वक्र DD विकुंचित है। बाज़ार में MP कीमत स्थिर या दृढ़ रहेगी, क्योंकि अल्पाधिकारी स्थिति में कोई भी उत्पादक कीमत को कम अथवा अधिक करने से लाभान्वित नहीं होगा। इस पर ध्यान देना चाहिए कि यदि वर्तमान कीमत MP कीमत अन्मयता MP औसत लागत से अधिक होगी तो उत्पादकों को जो लाभ प्राप्त होंगे, वे सामान्य लाभ से अधिक होंगे। इस स्थिति में कीमत में-
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  • प्रतियोगी विक्रेताओं की प्रतिक्रियाओं की अनिश्चितताओं के कारण कोई भी फर्म कीमत को कम करने को तैयार नहीं होती है।
  • फर्मे यह निष्कर्ष निकाल चुकी होती हैं कि कीमत-युद्ध से कोई उत्पादन लाभ नहीं है।
  • फर्मे गैर-कीमत प्रतिस्पर्धा को अधिक पसंद करने लगती हैं।
  • यदि फर्मों को ऐसा आभास हो कि कीमत कम करने से पारस्परिक समझौते भंग हो जाएँगे और फर्म को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।

इन कारणों से कीमत में स्थिरता तथा दृढ़ता पाई जाती है तथा एक फर्म का माँग वक्र मोड़दार हो जाता है। इस प्रकार कोमेदार माँग कीमत-स्थिरता के कारणों पर प्रकाश डालती है परंतु यह स्थिर-कीमत किस प्रकार निश्चित की जाती है, इसके संबंध में कोनेदार माँग प्रकाश नहीं डालती। साथ-ही-साथ इसके द्वारा इस बात पर भी प्रकाश नहीं पड़ता कि नई कीमत पर नया कोना कैसे बनता है?

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प्रश्न 11.
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की परिभाषा दीजिए। इसकी मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा का अर्थ एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा (Monopolistic Competition) बाज़ार की उस अवस्था को कहते हैं जिसमें बहुत-सी फर्मे मिलती-जुलती वस्तुओं का उत्पादन व विक्रय कर रही होती हैं। ये वस्तुएँ बिल्कुल एक जैसी (Exactly Identical) तो नहीं होतीं, किंतु मिलती-जुलती (Similar) अवश्य होती हैं अर्थात् इनका प्रयोग एक-जैसा होता है तथा ये एक-दूसरे के निकट स्थानापन्न (Close Substitutes) होती हैं और इनमें ब्रांड, ट्रेडमार्क, गुण, रंग, रूप, सुगन्ध आदि के अंतर के कारण वस्तु विभेद (Product Differentiation) पाया जाता है; जैसे लक्स, हमाम, रेक्सोना, लिरिल आदि नहाने के साबुनों (Toilet Soaps) का उत्पादन करने वाली अनेक फळं एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की उदाहरण हैं।

संक्षेप में, एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा बाज़ार की वह अवस्था होती है जहाँ छोटे-छोटे अनेक विक्रेता पाए जाते हैं जो विभेदीकृत परंतु निकट प्रतिस्थापन्न वस्तुएँ बेचते हैं।

एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की विशेषताएँ-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. फर्मों की अधिक संख्या-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्मों की संख्या अधिक होती है। इस प्रकार विक्रेताओं में प्रतिस्पर्धा पाई जाती है।

2. वस्तु विभेद-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में अनेक फर्मे मिलती-जुलती वस्तुओं का उत्पादन करती हैं। उन वस्तुओं में रंग, रूप, आकार, डिज़ाइन, पैकिंग, ब्रांड, ट्रेडमार्क, सुगंध आदि के आधार पर वस्तु विभेद (Product Variation) किया जाता है; जैसे पेप्सोडेंट, कोलगेट, फोरहन्स, क्लोज़अप आदि टूथपेस्ट। इन पदार्थों में एकरूपता तो नहीं होती, लेकिन वे एक-दूसरे के निकट स्थानापन्न (Close Substitutes) होते हैं।

3. फर्मों के निर्बाध प्रवेश और बहिर्गमन-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में नई फर्मों के बाज़ार में प्रवेश करने और पुरानी फर्मों को बाज़ार छोड़ने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है।

4. विक्रय लागतें-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा बाज़ार में प्रत्येक फर्म को अपनी वस्तु का प्रचार करने के लिए विज्ञापनों पर बहुत व्यय करना पड़ता है। अतः एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्मों में अपनी-अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए कीमत प्रतियोगिता तो नहीं पाई जाती, बल्कि गैर-कीमत प्रतिस्पर्धा (Non-Price Competition) पाई जाती है।

5. प्रत्येक फर्म अपनी वस्तु के लिए एकाधिकारी है प्रत्येक फर्म का अपनी वस्तु पर एकाधिकार होता है अर्थात् उस नाम की वस्तु कोई अन्य फर्म नहीं बना सकती; जैसे लक्स (Lux) साबुन के उत्पादन पर हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड का एकाधिकार है। इस बाज़ार में उपभोक्ता भी कुछ विशेष वस्तुओं के लिए अपनी-अपनी पसंद रखते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग ब्रुक ब्राड चाय अधिक पसंद करते हैं, जबकि कुछ ताज चाय। ऐसे क्रेताओं के लिए उत्पादक एकाधिकारी ही होता है।

6. उद्योग व ग्रुप में अंतर-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में अनेक फर्मे एक समान वस्तुओं का उत्पादन नहीं करती, अपितु मिलती-जुलती वस्तुओं का उत्पादन करती हैं। ऐसी विभिन्न फर्मों के समूह को उद्योग न कहकर ग्रुप (Group) कहा जाता है।

7. आगम (संप्राप्ति) वक्र या माँग वक्र-एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में हर फर्म की अपनी कीमत नीति होती है। इसमें फर्म के औसत तथा सीमांत संप्राप्ति वक्र एकाधिकारी बाज़ार की तरह दाईं ओर नीचे को झुके हुए होते हैं, जैसाकि संलग्न रेखाचित्र में दिखाया गया है। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक फर्म को अधिक वस्तु बेचने के लिए कीमत कम करनी पड़ती है। फर्म का औसत संप्राप्ति (AR) वक्र ही फर्म का माँग वक्र होता है। ध्यान रहे कि एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में माँग वक्र पूर्ण प्रतिस्पर्धा की भाँति समस्तरीय (पूर्ण लोचदार) भी नहीं होता क्योंकि एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में किसी विशेष फर्म के उत्पाद के प्रति निष्ठावान होते हुए भी यदि मिलती-जुलती वस्तुओं की कीमत में अंतर अधिक हो जाए तो उपभोक्ता सस्ते ब्रांड की ओर शिफ्ट होंगे क्योंकि इस बाज़ार में वस्तुएँ निकट स्थानापन्न होती हैं। इसलिए माँग उत्पादन (निर्गत) अथवा औसत आगम वक्र एकाधिकार की तुलना में, अधिक लोचदार होता है।
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प्रश्न 12.
अल्पाधिकार (Oligopoly) परिभाषित कीजिए। इसकी मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
अल्पाधिकार का अर्थ-अपूर्ण प्रतिस्पर्धा का यह एक महत्त्वपूर्ण रूप है जहाँ चंद (कुछ) फर्मों में प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) होती बाजार में अल्प अर्थात कछ ही फर्मों का अधिकार होता है। इस प्रकार यह एकाधिकार (जिसमें केवल एक विक्रेता होता है) और एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा (जिसमें अधिक फमें होती हैं) के बीच की स्थिति प्रकट करती है।
अल्पाधिकार की विशेषताएँ-अल्पाधिकार बाज़ार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. कुछ बड़ी फर्मे फर्मों का अल्प या कम होना इसकी प्रमुख विशेषता है। अल्प होने का अर्थ यह है कि फर्म कीमत और उत्पादन की मात्रा का निर्णय लेते समय प्रतियोगी फर्मों की प्रतिक्रिया (Reaction) को ध्यान में रखती हैं। इस दृष्टि से फर्मे अंतर्निभर (Interdependent) होती हैं, क्योंकि प्रत्येक फर्म द्वारा कुल उत्पादन का एक बड़ा भाग पैदा किया व बेचा जाता है जिससे वस्तु की कीमत निश्चित रूप से प्रभावित होती है। प्रत्येक फर्म अपनी क्रिया से दूसरी फर्म को प्रभावित करती है।

2. समरूप व विभेदीकृत पदार्थ-अल्पाधिकार बाज़ार में बिकने वाले पदार्थ समरूप भी हो सकते हैं; जैसे इस्पात, उर्वरक आदि और विभेदीकृत पदार्थ भी हो सकते हैं जिन्हें ब्रांड, आकार, गुण, रंग, पैकिंग आदि के आधार पर विभेदीकृत भी किया जा सकता है; जैसे कारें, टी०वी० सेट, मोटर साइकिल, स्कूटी आदि।

3. नई फर्मों का प्रवेश कठिन-एक ही वस्तु का निर्माण करने व बेचने वाली फर्मे कुछ (जैसे पाँच या सात) ही होती हैं जो आपसी मेल-जोल व सामूहिक व्यवहार से नई फर्म का प्रवेश रोकने का भरसक प्रयास करती हैं। इसके अतिरिक्त फर्मों में परस्पर निर्भरता पाई जाती है।

4. बिक्री लागते-चाहे फर्मों की संख्या सीमित होती हो फिर भी वे अपनी वस्तु लोकप्रिय बनाने व बिक्री बढ़ाने के लिए समाचार पत्रों व रेडियो, टी.वी. आदि पर विज्ञापन, मुफ्त नमूने बाँटने व सेल्समैन आदि रखने पर व्यय करती हैं जिन्हें बिक्री लागते कहते हैं।

5. माँग वक्र की अनिश्चितता-यहाँ कीमत अधिकतर अपरिवर्तित रहती है, क्योंकि कोई भी फर्म ग्राहकों से वंचित होने के डर से कीमत नहीं बढ़ाती और न ही कीमत कम करती है कि कहीं दूसरी फर्मे कीमत ज्यादा गिराकर ग्राहक आकर्षित न कर लें। इसलिए किसी भी फर्म को यह अनुमान नहीं होता कि कीमत बढ़ाने या घटाने से माँग पर क्या प्रभाव पड़ेगा। फलस्वरूप माँग वक्र का स्वरूप अनिश्चित होता है।

प्रश्न 13.
पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार में अंतर बताइए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार में निम्नलिखित अंतर हैं-

अंतर का आधारपूर्ण प्रतियोगिताएकाधिकार
1. फर्मों की संख्यापूर्ण प्रतियोगिता में फर्मों की संख्या बहुत अधिक होती है।एकाधिकार में केवल एक ही फर्म बाज़ार में होती है।
2. वस्तु की प्रकृतिपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु समरूप होती है।एकाधिकार में वस्तुएँ समरूप अथवा विभेदीकृत हो सकती हैं।
3. माँग वक्रपूर्ण प्रतियोगिता में फर्म का माँग वक्र पूर्णतया लोचदार होता है। माँग वक्र X-अक्ष के समानांतर सीधी रेखा होती है।एकाधिकार में फर्म का माँग वक्र लोचदार होता है। माँग वक्र ऊपर से नीचे गिरता हुआ अर्थात् ऋणात्मक ढाल वाला होता है।
4. कीमतपूर्ण प्रतियोगिता में पूरे बाज़ार में वस्तु की एक ही कीमत पाई जाती है।एकाधिकारी फर्म विभिन्न क्रेताओं से एक-समान कीमत अथवा विभिन्न कीमतें वसूल कर सकती है।
5. स्वतंत्रतापूर्ण प्रतियोगिता में फर्मों के प्रवेश तथा बहिर्गमन की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।एकाधिकार में नई फर्मों के प्रवेश पर प्रतिबंध होता हैं।
6. विक्रय लागतेंपूर्ण प्रतियोगिता में विक्रय लागतें नहीं होती।एकाधिकार में मामूली-सी विक्रय लागतें हो सकती है।

प्रश्न 14.
पूर्ण प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) और एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में अंतर बताइए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतिस्पर्धा और एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में निम्नलिखित अंतर हैं-

अंतर का आधारपूर्ण प्रतिस्पर्धाएकाधिकारी प्रतिस्पर्धा
1. फर्मों की संख्यापूर्ण प्रतिस्पर्धा में फर्मों की संख्या बहुत अधिक होती है।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्मों की संख्या सीमित होती है।
2. कीमतपूर्ण प्रतिस्पर्धा बाज़ार में एक ही कीमत पाई जाती है।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में वस्तु की विभिन्न कीमतें पाई जाती हैं।
3. वस्तु की प्रकृतिपूर्ण प्रतिस्पर्धा में वस्तुएँ समरूप होती हैं। अर्थात् विभिन्न फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तुओं में कोई अंतर नहीं होता।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में विभिन्न फर्मों द्वारा उत्पादित वस्तुओं में वस्तु विभेद पाया जाता है।
4. बाज़ार का ज्ञानपूर्ण प्रतिस्पर्धा में क्रेताओं और विक्रेताओं को बाज़ार की स्थिति का ज्ञान होता है।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में क्रेताओं और विक्रेताओं को बाज़ार की स्थिति का पर्याप्त ज्ञान नहीं होता।
5. मूल्य सापेक्षतापूर्ण प्रतिस्पर्धा में माँग की पूर्ण मूल्य सापेक्षता पाई जाती है।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में माँग की मूल्य सापेक्षता कम होती है
6. विक्रय लागतेपूर्ण प्रतिस्पर्धा में विक्रय लागतों का अभाव पाया जाता है।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में फर्मों की विक्रय लागते अधिक होती हैं।

प्रश्न 15.
एकाधिकार और एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में अंतर बताइए।
उत्तर:
एकाधिकार और एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में निम्नलिखित अंतर हैं-

अंतर का आधारएकाधिकारएकाधिकारी प्रतिस्पर्धा
1. विक्रेताओं की संख्याएकाधिकार में वस्तु का केवल एक विक्रेता होता है।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में वस्तुओं की संख्या अधिक होती है।
2. वस्तु की किस्मएकाधिकार में एक ही किस्म की वस्तु का विक्रय किया जाता है और उस वस्तु का कोई निकट स्थानापन्न नहीं होता।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में वस्तु विभेद के कारण वस्तु की अनेक किस्में पाई जाती हैं।
3. फर्म का माँग वक्रएकाधिकार में फर्म का माँग वक्र सामान्यतया बेलोचदार या कम लोचदार होता है।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में एक फर्म का माँग वक्र अधिक लोचदार होता है।
4. कीमतएकाधिकार में एक विक्रेता होता है जिसके कारण वस्तु की कीमत सामान्यतया ऊँची होती है।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में अनेक विक्रेता होते हैं और उनकी आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण वस्तु की कीमत सामान्यतया कम होती है।
5. लाभएकाधिकार में एक फर्म को असामान्य लाभ प्राप्त होते हैं।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में केवल अल्पकाल में ही फर्म को असामान्य लाभ प्राप्त होते हैं।
6. फर्मों का प्रवेशएकाधिकार में नई फर्मों के प्रवेश पर अनेक रुकावटें पाई जाती हैं।एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा में नई फर्मों को बाज़ार में प्रवेश की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।

संख्यात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
नीचे दी गई जानकारी के आधार पर संतुलन वाले उत्पादन स्तर का निर्धारण कीजिए। सीमांत लागत (MC), सीमांत आगम (MR) विधि का प्रयोग करें। सकारण उत्तर दीजिए।
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार 20
हल:
HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार 21
उत्पादन की संतुलन स्थिति उत्पादन की छठी इकाई में प्राप्त होती है क्योंकि उत्पादन के इस स्तर पर उत्पादन की संतुलन दशा को संतुष्ट करने वाली निम्नलिखित दो शर्ते पूरी हो जाती हैं
(i) सीमांत लागत (7 रुपए) सीमांत आगम (7 रुपए) के बराबर है।
(ii) इस स्तर पर उत्पादन के बाद MC >MR हैं अर्थात् सीमांत आगम संप्राप्ति से अधिक आती है।

HBSE 12th Class Economics Important Questions Chapter 6 प्रतिस्पर्धारहित बाज़ार

प्रश्न 2.
दी गई सारणी में एक एकाधिकारी प्रतिस्पर्धी फर्म की कुल लागत एवं कुल आगम सारणी दी गई है। संतुलन उत्पादन की मात्रा ज्ञात कीजिए-

इकाइयाँकुल लागत (रु०)कुल संप्राप्ति (रु०)
1810
21519
32127
42834
53640
64545
75549

हल:

इकाइयाँकुल लागत (रु०)कुल संप्राप्ति (रु०)कुल लाभ (रु०)
181010 – 8 = 2
2151919 – 15 = 4
3212727 – 21 = 6
4283434 – 28 = 6
5364040 – 36 = 4
6454545 – 45 = 0
7554949 – 55 = -6

उपर्युक्त तालिका के अनुसार एकाधिकारी फर्म का कुल लाभ = 6 प्रतिस्पर्धा फर्म के संतुलन उत्पादन की मात्रा 4 इकाइयाँ हैं चूंकि इस स्थिति में फर्म का कुल लाभ = 6 सर्वाधिक है।

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HBSE 12th Class Chemistry Important Questions and Answers

Haryana Board HBSE 12th Class Chemistry Important Questions and Answers

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions in Hindi Medium

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions in English Medium

  • Chapter 1 The Solid State Important Questions
  • Chapter 2 Solutions Important Questions
  • Chapter 3 Electrochemistry Important Questions
  • Chapter 4 Chemical Kinetics Important Questions
  • Chapter 5 Surface Chemistry Important Questions
  • Chapter 6 General Principles and Processes of Isolation of Elements Important Questions
  • Chapter 7 The p-Block Elements Important Questions
  • Chapter 8 d-and f-Block Elements Important Questions
  • Chapter 9 Coordination Compounds Important Questions
  • Chapter 10 Haloalkanes and Haloarenes Important Questions
  • Chapter 11 Alcohols, Phenols and Ehers Important Questions
  • Chapter 12 Aldehydes, Ketones and Carboxylic Acids Important Questions
  • Chapter 13 Amines Important Questions
  • Chapter 14 Biomolecules Important Questions
  • Chapter 15 Polymers Important Questions
  • Chapter 16 Chemistry in Everyday Life Important Questions

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HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन

बहुविकल्पीय प्रश्न 

1. निम्नलिखित में से कौनसा पदार्थ दर्द निवारक (पीड़ाहारी) है?
(अ) ऐस्प्रिन
(स) इण्डिगो
(ब) पेनिसिलिन
(द) सैकरीन
उत्तर:
(अ) ऐस्प्रिन

2. निम्नलिखित में से कौनसा पदार्थ पूतिरोधी है ?
(अ) पैरासिटैमॉल
(ब) ल्यूमीनल
(स) डेटॉल
(द) प्रोथजिन
उत्तर:
(स) डेटॉल

3. सोडियम बेन्जोएट है-
(अ) खाद्य रंग
(ब) खाद्य परिरक्षक
(स) कृत्रिम मधुरक
(द) प्रति-ऑक्सीकारक
उत्तर:
(ब) खाद्य परिरक्षक

4. सैकरीन है-
(अ) खाद्य परिरक्षक
(ब) खाद्य रंग
(स) प्रति आक्सीकारक
(द) कृत्रिम मधुरक
उत्तर:
(द) कृत्रिम मधुरक

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन

5. अपमार्जक होते हैं-.
(अ) प्राकृतिक पदार्थ
(ब) क्षारीय
(स) संश्लेषित पदार्थ
(द) दुर्बल अम्ल तथा प्रबल क्षार का लवण
उत्तर:
(स) संश्लेषित पदार्थ

6. पैरासिटैमॉल का सही संरचना सूत्र निम्नलिखित में से कौनसा है?
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 1
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 2

7. निम्नलिखित में से कौनसा पदार्थ लक्ष्य- अणु अथवा औषध-लक्ष्य है?
(अ) कार्बोहाइड्रेट
(ब) प्रोटीन
(स) न्यूक्लीक अम्ल
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

8. निम्नलिखित में से कौनसा पदार्थ कृत्रिम मधुरक है?
(अ) ऐस्पार्टेम
(ब) ऐलिटेम
(स) सूक्रालोस
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

9. निम्नलिखित में से अपमार्जक का सूत्र कौनसा है?
(अ) (C17H35COO)2Ca
(ब) CH3(CH2)10CH2O SO3 Na
(स) C17H35COONa
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(ब) CH3(CH2)10CH2O SO3 Na

10. निम्नलिखित में से कौनसा पदार्थ पूतिरोधी तथा विसंक्रामक दोनों की भाँति कार्य करता है?
(अ) आयोडीन
(ब) फीनॉल
(स) क्लोरीन
(द) सोफ्रामाइसिन
उत्तर:
(ब) फीनॉल

11. साबुन तथा अपमार्जक होते हैं-
(अ) पृष्ठ अक्रिय
(ब) जल विरोधी
(स) पृष्ठ सक्रिय
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) पृष्ठ सक्रिय

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12. निम्नलिखित में से कौनसी औषध प्रतिजैविक नहीं है?
(अ) क्लॉरैम्फेनिकॉल
(ब) सल्फा औषध
(स) पेनिसिलिन
(द) बाइथायोनल
उत्तर:
(द) बाइथायोनल

13. 2-ऐसिटॉक्सी बेन्जोइक अम्ल है-
(अ) प्रतिरोधी
(ब) ज्वरनाशी
(स) प्रतिअम्ल
(द) प्रतिजैविक
उत्तर:
(ब) ज्वरनाशी

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न 

प्रश्न 1.
एन्जाइम संदमक किसे कहते हैं ?
उत्तर:
वे औषध जो एन्जाइम के उत्प्रेरक कार्य में अवरोध उत्पन्न करती हैं, उन्हें एन्जाइम संदमक कहते हैं।

प्रश्न 2.
रासायनिक संदेशवाहक किन्हें कहते हैं ?
उत्तर:
वे रसायन जो दो तंत्र कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) और तंत्र कोशिकाओं तथा पेशी के मध्य संदेश का संचार करते हैं, उन्हें रासायनिक संदेशवाहक कहते हैं।

प्रश्न 3.
प्रतिहिस्टैमिन के दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
संश्लिष्ट औषध, ब्रोमफेनिरामिन तथा टरफेनाडीन (सेलडेन) प्रतिहिस्टैमिन का कार्य करते हैं।

प्रश्न 4.
पीड़ाहारी के दो प्रकार बताइए ।
उत्तर:
पीड़ाहारी (i) अस्वापक (अनासक्त) या नॉन एडिक्टिव तथा (ii) स्वापक (नारकोटिक) प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 5.
जनन नियंत्रण गोलियों में प्रयुक्त प्रोजेस्टेरोन व्युत्पन्न का नाम बताइए ।
उत्तर:
नॉरएथिनड्रान संश्लिष्ट प्रोजेस्टेरोन व्युत्पन्न है जिसे जनन नियंत्रण गोलियों में प्रयुक्त किया जाता है।

प्रश्न 6.
दर्द को कम करने के लिए प्रयुक्त मुख्य स्वापक पीड़ाहारी वर्ग कौनसा होता है?
उत्तर:
मार्फीन एक महत्त्वपूर्ण स्वापक पीड़ाहारी वर्ग है।

प्रश्न 7.
फेनैसिटीन किस बीमारी के इलाज के लिए प्रयुक्त किया जाता है?
उत्तर:
फेनैसिटीन एक ज्वरनाशी औषध होती है।

प्रश्न 8.
प्रभावी प्रतिअम्लों के उदाहरण बताइए।
उत्तर:
सिमेटिडीन तथा रेनिटिडीन (जैनटेक) प्रभावी प्रतिअम्ल हैं।

प्रश्न 9.
प्रशांतक क्या होते हैं?
उत्तर:
वे औषध जो बिना नींद के मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाती हैं तथा जिनका उपयोग तनाव तथा मानसिक बीमारियों में किया जाता है उन्हें प्रशान्तक कहते हैं।

प्रश्न 10.
पीड़ाहारी औषध क्या होते हैं?
उत्तर:
वे औषध जो तंत्रिका तंत्र में बाधा उत्पन्न किए बिना दर्द को कम अथवा समाप्त कर देती हैं, उन्हें पीड़ाहारी औषध कहते हैं।

प्रश्न 11.
प्रतिसूक्ष्म जैविक औषध क्या होते हैं?
उत्तर:
वे औषध जो जीवाणु, कवक, वायरस या परजीवियों को चयनित करके उनका विनाश करती हैं या उनकी वृद्धि को रोकती हैं अथवा सूक्ष्मजीवियों के परजीवी प्रभाव को रोकती हैं, उन्हें प्रतिसूक्ष्म जैविक औषध कहते हैं।

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प्रश्न 12.
आँखों के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले पूतिरोधी का नाम बताइए।
उत्तर:
बोरिक अम्ल (H3BO3)

प्रश्न 13.
प्रतिजनन क्षमता औषध क्या होती है? इसके दो उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर:
वे औषध जो जीव की जनन क्षमता में कमी करती हैं उन्हें प्रतिजनन क्षमता औषध कहते हैं। उदाहरण- नारएथिनड्रान तथा एथाइनिलएस्ट्राडाइऑल (नोवएस्ट्रॉल)।

प्रश्न 14.
जैव निम्ननीकृत अपमार्जक में किस प्रकार की शृंखलाएँ होती हैं?
उत्तर:
जैव निम्ननीकृत अपमार्जक में अशाखित श्रृंखलाएँ होती हैं।

प्रश्न 15.
खाद्य पदार्थों में परिरक्षक क्यों मिलाए जाते हैं?
उत्तर:
खाद्य पदार्थों में सूक्ष्म जीवों की वृद्धि को रोकने के लिए परिरक्षक मिलाए जाते हैं ताकि वे खराब न हों।

प्रश्न 16.
कृत्रिम मधुरक सैकरीन का संरचना सूत्र लिखिए।
उत्तर:
सैकरीन का संरचना सूत्र अग्रलिखित है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 2a

प्रश्न 17.
अनआयनिक अपमार्जक किन यौगिकों से मिलकर बनता है?
उत्तर:
अनआयनिक अपमार्जक स्टीऐरिक अम्ल तथा पॉलिएथिलीन ग्लाइकॉल की अभिक्रिया से बनता है।

प्रश्न 18.
धनायनी अपमार्जक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
सेटिल ट्राइमेथिल अमोनियम ब्रोमाइड, एक धनायनी अपमार्जक है।

प्रश्न 19.
किसी औषध के लिए आण्विक लक्ष्य के चयन का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
किसी औषध के वांछित चिकित्सकीय प्रभाव को प्राप्त करने के लिए आण्विक लक्ष्य का चयन किया जाता है।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित रोगों के इलाज में कौनसा ऐल्केलॉयड उपयोग किया जाता है ?

  1. मलेरिया बुखार
  2. हाइपर टेंशन
  3. दर्द

उत्तर:

  1. क्विनीन
  2. रेसर्पिन
  3. मॉर्फीन।

लघूत्तरात्मक प्रश्न 

प्रश्न 1.
औषधों का वर्गीकरण किन-किन मापदंडों के अनुसार किया जाता है ?
उत्तर:
औषधों का वर्गीकरण निम्नलिखित मापदंडों के आधार पर किया जाता है-

  • भेषजगुणविज्ञानीय (फार्माकोलोजिकल) प्रभाव
  • औषध का प्रभाव
  • रासायनिक संरचना
  • लक्ष्य अणु।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित व्यापारिक नाम युक्त औषधियों में उपस्थित रसायनों का नाम बताइए-
(a) (i) क्रोसीन, (ii) डिस्प्रिन।
(b) साबुन में पूतिरोधी गुण उत्पन्न करने के लिए कौनसा यौगिक मिलाया जाता है?
उत्तर:
(a) (i) क्रोसीन – पेरासिटैमॉल, (ii) डिस्प्रिन – ऐसिटिल-सैलिसिलिक अम्ल।
(b) साबुन में पूतिरोधी गुण उत्पन्न करने के लिए बाइथायोनॉल मिलाया जाता है।

प्रश्न 3.
बाइथायोनॉल तथा क्लोरैम्फेनिकॉल की संरचना बताइए।
उत्तर:
(i) डेटॉल, क्लोरोजाइलिनॉल टर्पीनिऑल तथा परिशुद्ध ऐल्कोहॉल का मिश्रण होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 3

(ii) बाइथायोनॉल (बाइथायोनैल) को साबुन में पूतिरोधी गुण उत्पन्न करने के लिए मिलाया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 4

(iii) आयोडोफॉर्म (CHl3) को घावों पर पूतिरोधी के रूप में प्रयोग करते हैं क्योंकि यह विघटित होकर आयोडीन देता है।

(iv) बोरिक अम्ल (H3BO3) का तनु जलीय विलयन आँखों के लिए दुर्बल पूतिरोधी होता है।

(v) आयोडीन एक प्रबल पूतिरोधी है तथा इसके ऐल्कोहॉल-जल मिश्रण में 2-3% विलयन को आयोडीन का टिंक्चर कहते हैं। इसे घाव पर लगाया जाता है।

(vi) अनेक कार्बनिक रंजकों में बैक्टीरियाई कोशिका के केन्द्रक में उपस्थिति क्रोमेटिन से जुड़कर उसे निष्क्रिय कर देने की क्षमता होती है जिससे बैक्टीरिया निष्प्रभावी हो जाते हैं। उदाहरण- मेथिलीन ब्लू, मर्क्युरोक्रोम तथा जेन्शियन वायलेट।

(vii) पूतिरोधियों को टूथपेस्ट, माउथवाश, फेस पाउडर तथा साबुन को दुर्गन्धरहित करने के लिए भी मिलाया जाता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित औषधों का वर्गीकरण उनके उपयोग के आधार पर कीजिए –
(a) फीनॉल, बाइथॉयोनॉल, क्लोरोजाइलिनॉल तथा ऐम्पिसिलिन
(b) इक्वेनिल, ल्यूमिनल, फेनैसिटीन तथा वेरोनल।
उत्तर:
(a) पूतिरोधी – फीनॉल, बाइथॉयोनॉल, क्लोरोजाइलिनॉल, प्रतिजैविक – ऐम्पिसिलिन।
(b) प्रशान्तंक – इक्वेनिल, ल्यूमिनल तथा वेरोनल फेनैसिटीन – ज्वरनाशी।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन

प्रश्न 5.
प्रतिअम्ल (एन्ट – एसिड) क्या होते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
मनुष्य द्वारा अत्यधिक मात्रा में चाय, कॉफी, अचार तथा ऐलोपेथी दवाइयों इत्यादि के सेवन से आमाशय में अम्ल का उत्पादन बढ़ जाता है जिससे अत्यधिक पीड़ा होती है तथा कभी-कभी आमाशय में घाव (अल्सर) भी हो जाते हैं। आमाशय की इस अम्लता को कम करने के लिए प्रतिअम्ल प्रयुक्त किए जाते हैं। अतः वे रासायनिक पदार्थ जो आमाशय की

अम्लता को कम करने के लिए प्रयुक्त होते हैं उन्हें प्रतिअम्ल कहते हैं।

प्रारम्भ में अम्लता का उपचार सोडियम हाइड्रोजनकार्बोनेट (NaHCO3) या ऐलुमिनियम तथा मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड। Al(OH)3 तथा Mg(OH)2] द्वारा किया जाता था लेकिन NaHCO3 की अधिक मात्रा के कारण आमाशय क्षारीय हो जाता है जिसके कारण अम्ल का उत्पादन अधिक होता है। अतः धात्विक हाइड्रॉक्साइड अच्छे प्रतिअम्ल माने जाते हैं क्योंकि ये अविलेय होते हैं जिससे pH का मान 7 (उदासीन) से अधिक नहीं हो पाता है। इनोफ्रूटसाल्ट भी एक सामान्यतः प्रयुक्त किए जाने वाला प्रतिअम्ल है जिसे जल के साथ प्रयुक्त किया जाता है। उपरोक्त सभी प्रतिअम्लों से रोग का कारण ठीक नहीं होता, केवल रोग के लक्षण नियंत्रित होते हैं, अतः अत्यधिक मात्रा में अल्सर होना प्राणघातक भी हो सकता है। इस कारण पहले आमाशय के रोगयुक्त भाग को ही निकाल दिया जाता था।

आजकल पुदीन हरा जैसे हर्बल प्रतिअम्ल भी प्रयोग में लिए जाते हैं। आगे के शोध से ज्ञात हुआ कि सिमेटिडीन तथा रैनिटिडीन (ज़ैनटेक) प्रभावी प्रतिअम्ल हैं। हिस्टैमिन, आमाशय की दीवारों में स्थित ग्राही के साथ क्रिया करता है जिससे आमाशय में पेप्सिन तथा हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का उत्पादन बढ़ जाता है जिसे रोकने के लिए सिमेटिडीन औषध का प्रयोग किया जाता है। लेकिन आजकल रेनिटिडीन को प्रतिअम्ल के रूप में सर्वाधिक मात्रा में उपयोग में लिया जाता है। वर्तमान में ओमेप्रेजॉल तथा लैन्सोप्रेजॉल को भी प्रतिअम्ल के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है।
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प्रश्न 6.
ग्राही (Receptors) किस प्रकार औषध लक्ष्य की तरह कार्य करते हैं? समझाइए।
उत्तर:
शरीर की संचार व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाने वाले प्रोटीनों को ग्राही कहते हैं। इनमें से अधिकतर प्रोटीन, कोशिका झिल्ली (कला) में पाए जाते हैं तथा ये ग्राही प्रोटीन, कोशिका झिल्ली में इस प्रकार स्थित होते हैं कि उनकी सक्रिय सतह वाला छोटा भाग कोशिका झिल्ली के बाहरी क्षेत्र की और खुलता है।

शरीर में दो न्यूरॉन्स (तंत्र कोशिका) एवं न्यूरॉन तथा पेशी (Muscle) के मध्य संदेश का संचार कुछ रसायनों द्वारा होता है उन्हें रासायनिक संदेशवाहक (Chemical Messengers) कहा जाता है। ये रसायन ग्राही की बंधनी सतह द्वारा ग्रहण किए जाते हैं। ग्राही के आकार में परिवर्तन होने से संदेशवाहक, ग्राही के साथ समायोजित हो जाता है जिससे संदेश कोशिका तक पहुँच जाता है। इस प्रकार रासायनिक संदेशवाहक कोशिका में प्रवेश किए बिना ही संदेश को कोशिका के अन्दर पहुँचा देते हैं। रासायनिक संदेशवाहक दो प्रकार के होते हैं : (i) हॉर्मोन तथा (ii) तत्त्रिकीय संदेशवाहक।
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प्रश्न 7.
हिस्टैमिन तथा प्रतिहिस्टैमिन क्या होते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
प्रतिहिस्टैमिन, वे रासायनिक पदार्थ हैं जो त्वचा (Skin) पर उत्पन्न खुजली तथा जल इत्यादि के प्रभाव को कम करते हैं। हिस्टैमिन एक वाहिका विस्फारक (वैसोडाइलेटर) पदार्थ है जो कि श्वास नलिकाओं तथा आहार नली की पेशियों को संकुचित करता है एवं रुधिर वाहिकाओं की दीवारों को नरम (Relax) करता है। जुकाम के कारण होने वाला नासिक संकुलन (Nasal congestion) तथा परागकणों के कारण उत्पन्न एलर्जी भी हिस्टैमिन के कारण ही होती है। प्रतिहिस्टैमिन, हिस्टैमिन के प्राकृतिक कार्यों में बाधा उत्पन्न करते हैं।

प्रतिहिस्टैमिन, ग्राही की उस बंधनी सतह पर जुड़ती है जिस पर हिस्टैमिन अपना प्रभाव डालती है अर्थात् इस बंधनी सतह के लिए हिस्टैमिन तथा प्रतिहिस्टैमिन में प्रतिस्पर्धा होती है। ब्रोमफेनिरामिन (डाइमेटेप) तथा टरफेनाडीन (सेलडेन ) नामक संश्लिष्ट औषध, प्रतिहिस्टैमिन का कार्य करती हैं। प्रतिहिस्टैमिन, आमाशय के अम्ल स्रवण पर प्रभाव नहीं डालती क्योंकि प्रतिएलर्जी तथा प्रति-अम्ल औषध भिन्न-भिन्न ग्राहियों पर कार्य करती है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 7

प्रश्न 8.
स्वापक पीड़ाहारी क्या होते हैं? समझाइए।
उत्तर:
स्वापक (नारकोटिक या ऐनाल्जेसिक) पीड़ाहारी-ये पीड़ाहारी दर्द को कम करते हैं लेकिन इनसे नींद तथा बेहोशी आती है। इनकी अधिक मात्रा के सेवन से भावशून्यता (Stupor), कोमा में आना (सम्मूच्छा ) तथा मरोड़ (Convulsions) जैसे प्रभाव उत्पन्न होते हैं तथा अन्त में मृत्यु भी हो सकती है।

मॉर्फीन एक महत्वपूर्ण स्वापक पीड़ाहारी वर्ग है, इन्हें ओपिएट्स (अहिफेनी) भी कहते हैं क्योंकि ये पोस्त (ओपियम पौपी) से प्राप्त किए जाते हैं। ये पीड़ाहारी मुख्यतः हृदय के दर्द, ऑपरेशन (शल्य चिकित्सा) के बाद होने वाले दर्द, प्रसव पीड़ा तथा कैंसर की अन्तिम अवस्था में होने वाले दर्द से आराम देने के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। इन पीड़ाहारियों के प्रयोग से मनुष्य इनका आदी हो जाता है। हेरोइन तथा कोडीन भी महत्वपूर्ण स्वापक पीड़ाहारी होती हैं। हेरोइन को मॉर्फीन के ऐसिटिलीकरण द्वारा बनाया जाता है तथा यह एक शक्तिशाली पीड़ाहारी है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 8

प्रश्न 9.
प्रतिजैविक (एन्टिबायोटिक) क्या होते हैं ? उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रतिजैविक (ऐन्टिबॉयोटिक) या प्रतिजीवाणु-प्रतिजैविक वे औषध हैं, जो सूक्ष्म जीवों (Micro organisms) जैसे जीवाणु (वायरस) तथा कवक (फफूँदी) द्वारा उत्पन्न होते हैं तथा ये अन्य सूक्ष्मजीवों के उपापचयी प्रक्रमों में अवरोध उत्पन्न करके उनकी वृद्धि को रोकते हैं या उनका विनाश करते हैं। प्रतिजैविक, पूर्ण अथवा आंशिक रासायनिक संश्लेषण द्वारा प्राप्त की जाती हैं।

इन्हें कम सान्द्रता में प्रयुक्त किया जाता है तथा ये कम विषैली होती हैं अतः इन्हें संक्रमण (Infections) के उपचार हेतु प्रयोग में लिया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी में ऐसे रसायनों की खोज हुई जो आक्रमणकारी जीवाणुओं पर तो प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, लेकिन परपोषी (होस्ट) पर इनका कोई प्रभाव नहीं होता। प्रतिजैविकों के उदाहरण निम्नलिखित हैं-
1. आर्सेनिक आधारित औषध आर्सफेनेमीन (सैल्वरसैन) सिफलिस के उपचार के लिए प्रयुक्त होती है, जिसकी खोज पॉल एर्लिश ने की थी। सैल्वरसैन मनुष्य के लिए विषैली होती है, लेकिन इसका प्रभाव मनुष्य की अपेक्षा सिफलिस उत्पन्न करने वाले जीवाणु (स्पाइरोकीट) पर अधिक होता है।

2. प्रॉन्टोसिल एक प्रतिजीवाणु है जो शरीर में सल्फैनिलऐमाइड में बदल जाता है जो कि वास्तविक असरकारक सल्फा औषध है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 9

3. सल्फा औषधों में सल्फापिरिडीन सर्वाधिक प्रभावकारी प्रतिजैविक होती है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 10

4. सल्फोनैमाइडों की सफलता के बाद 1929 में ऐलेक्जेन्डर फ्लैमिंग ने पेनिसिलियम नोटेटम नामक फफूँदी से एक प्रतिजैविक औषधि पेनिसिलिन की खोज की, जिसका सामान्य सूत्र निम्नलिखित है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 11
पेनिसिलिन देने से पहले इसके प्रतिएलर्जी का परीक्षण करना आवश्यक होता है। प्रतिजैविक, सूक्ष्म जीवों को नष्ट करते हैं अथवा उनकी वृद्धि को रोकते हैं। कुछ जीवाणुनाशी (Bactericidal) तथा जीवाणुरोधी (Bacteriostatic) प्रतिजैविकों के उदाहरण निम्नलिखित हैं-

जीवाणुनाशीजीवाणुरोधी
पेनिसिलिनएरिश्रोमाइसिन
ऐमीनोग्लाइकोसाइडटेट्रासाइक्लीन
ऑफ्लोक्सासिनक्लौरैम्फेनिकॉल

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन

प्रश्न 10.
प्रतिजनन क्षमता औषध क्या होती हैं? समझाइए।
उत्तर:
वे औषध जो जीव की जनन क्षमता में कमी करती हैं, उन्हें प्रतिजननक्षमता औषध कहते हैं। जनन नियंत्रण गोलियों में संशिलष्ट एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्टेरोन व्युत्पन्नों का मिश्रण होता है। ये दोनों ही हार्मोन होते हैं। प्रोजेस्टेरोन अंडोत्सर्ग को निरोधित करता है। संश्लेषित प्रोजेस्टेरोन व्युत्पन्न प्राकृतिक प्रोजेस्टेरोन की तुलना में अधिक प्रभावशाली होते हैं। नॉरएथिनड्रान एक संशिलष्ट प्रोजेस्टेरोन व्युत्पन्न है जिसे मुख्य रूप से जनन नियंत्रण गोलियों में प्रयुक्त किया जाता है। एथाइनिलएस्ट्राडाइऑल (नोवएस्ट्रॉल) एक एस्ट्रोजन व्युत्पन्न है जिसे प्रोजेस्टेरोन व्युत्पन्न के साथ जनन नियंत्रण गोलियों में प्रयुक्त किया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 12
वे यौगिक जो गर्भधारण में रुकावट डालते हैं उन्हें गर्भ निरोधक पदार्थ (Contraceptive Substances) कहते हैं तथा वे रसायन जिनसे सन्तानोत्पत्ति की क्षमता नष्ट हो जाती है उन्हें रसोबन्ध्यक (Chemosterilants) कहा जाता है।

उदाहरण-
(i) मटर के तेल से प्राप्त m-जाइलोहाइड्रोक्विनोन चूहों में गर्भ धारण क्षमता को कम कर देता है तथा इसका महिलाओं की गर्भधारण क्षमता पर भी काफी प्रभाव होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 13
(ii) डैनैजॉल नामक रसायन से पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या में प्रभावी कमी आ जाती है।

(iii) बिनौले के तेल से प्राप्त गोसिपॉल नामक ऐरोमैटिक हेक्साहाइड्रॉक्सीडाइऐल्डिहाइड पुरुषों के लिए सर्वाधिक प्रभावी प्रतिनिषैची (प्रतिजनन क्षमता) कर्मक होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 16 दैनिक जीवन में रसायन 14

प्रश्न 11.
सैकरीन के संश्लेषण में प्रयुक्त अभिक्रिया अनुक्रम लिखिए।
उत्तर:
वे पदार्थ जो शर्करा (Sugar) के स्थान पर मधुरक (Sweetening agent) के रूप में प्रयोग में लिए जाते हैं लेकिन उनका कोई पोषण मान (Nutritional value) नहीं होता, उन्हें कृत्रिम मधुरक कहते हैं।

प्राकृतिक मधुरक जैसे सूक्रोस इत्यादि ग्रहण की गई कैलोरी मान को बढ़ाते हैं। अतः आजकल बहुत से व्यक्ति कृत्रिम मधुरकों का प्रयोग करने लगे हैं। सैकरीन एक प्रथम अधिक प्रचलित कृत्रिम मधुरक है जिसकी खोज 1879 में हुई थी। यह सूक्रोस से लगभग 550 गुना अधिक मीठी होती है तथा इसका रासायनिक नाम आर्थोसल्फो-बेन्जीनीमाइड है तथा यह एक श्वेत क्रिस्टलीय ठोस है।

सैकरीन के प्रयोग का लाभ यह है कि इसका शरीर में पाचन नहीं होता तथा यह अपरिवर्तित रूप में ही मूत्र के साथ उत्सर्जित हो जाती है क्योंकि यह पूर्णतः अक्रिय होता है तथा इससे कोई हानि भी नहीं होती। इसी कारण इसे मधुमेह के रोगियों के लिए आसानी से प्रयोग में लाया जा सकता है।

सैकरीन जल में अविलेय होती है लेकिन इसका सोडियम लवण जल में विलेय होता है। सैकरीन का संश्लेषण निम्नलिखित प्रकार से किया जाता है-
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सैकरीन के अतिरिक्त ऐस्पार्टेम सूक्रालोस तथा ऐलिटेम भी महत्वपूर्ण कृत्रिम मधुरक हैं।
(i) ऐस्पार्टेम-यह एक व्यापक रूप से प्रयुक्त किए जाने वाला कृत्रिम मधुरक है। यह एस्पार्टिक अम्ल तथा फेनिलऐलानिन से बने डाइपेप्टाइड का मेथिल एस्टर है। यह सूक्रोस की तुलना में लगभग 100 गुना अधिक मीठा होता है। एस्पार्टेम का प्रयोग केवल ठंडे खाद्य एवं पेय पदार्थों को मीठा करने के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है क्योंकि इसे खाना बनाने के ताप तक गर्म करने पर यह विघटित हो जाता है। इसकी संरचना निम्नलिखित है-
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(ii) सूक्रालोस-यह सूक्रोस का ट्राइक्लोरो व्युत्पन्न है। शर्करा के समान यह भी क्रिस्टलीय ठोस होता है लेकिन यह सूक्रोस की तुलना में लगभग 600 गुना मीठा होता है। यह खाना पकाने के तापमान पर स्थायी होता है तथा इससे कोई कैलोरी प्राप्त नहीं होती है। सूक्रालोस संरचना निम्नलिखित है-
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(iii) ऐलिटेम-यह एक प्रबल कृत्रिम मधुरक है तथा ऐस्पार्टेम की तुलना में अधिक स्थायी होता है। यह सूक्रोस से लगभग 2000 गुना अधिक मीठा होता है तथा इसकी मिठास को नियंत्रित करना कठिन होता है। इसकी संरचना निम्नलिखित है-
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प्रश्न 12.
एक अच्छे खाद्य परिरक्षक के गुण बताइए।
उत्तर:
खाद्य पदार्थों को पड़ा रखने पर उनमें सूक्ष्म जीव उत्पन्न हो जाते हैं जिसके कारण ये खराब हो जाते हैं। अतः वे पदार्थ जिन्हें खाद्य पदार्थों को खराब होने से बचाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। उन्हें खाद्य परिरक्षक कहते हैं।

कुछ सामान्य परिक्षक निम्नलिखित हैं-साधारण नमक, चीनी, वनस्पति तेल, सोडियम बेन्जोएट (C6H5COONa), सॉर्बिक अम्ल तथा प्रोपेनॉइक अम्ल के लवण।

सोडियम बेन्जोएट का प्रयोग सीमित मात्रा में किया जाता है क्योंकि यह शरीर द्वारा उपापचयित हो जाता है।

एक अच्छे खाद्य परिरक्षक में निम्नलिखित गुण होने चाहिये-

  • खाद्य पदार्थों पर इनका लम्बे समय तक असर रहना चाहिए।
  • ये स्वादहीन होने चाहिए।
  • इन्हें अल्प मात्रा में ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए।
  • इनकी खाद्य पदार्थों से कोई क्रिया नहीं होनी चाहिए।
  • इनके प्रयोग से जलन, अम्लता, एलर्जी, गैस तथा पित्त नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न 13.
साबुन क्या होते हैं तथा इन्हें किस प्रकार बनाया जाता है ?
उत्तर:
दीर्घ श्रृंखलायुक्त वसा अम्लों के सोडियम तथा पोटैशियम लवणों को साबुन कहते हैं। संतृप्त तथा असंतृप्त मोनोकार्बोक्सिलिक अम्लों को वसा अम्ल (Fatty Acids) कहते हैं। जैसे स्टिऐरिक अम्ल (C17H35COOH), पामिटिक अम्ल (C15H31COOH) तथा ओलीक अम्ल (C17H33COOH)। ये प्रकृति में प्रमुखता से पाये जाते हैं।

वसा अम्लों के सेडियम लवणों को सोडियम साबुन अथवा कठोर साबुन (Hard Soaps) अथवा धावन साबुन (Washing Soaps) कहते हैं, जबकि पोटैशियम साबुन को नहाने के साबुन (Bathing Soaps) अथवा मृदु साबुन (Soft Soaps) कहते हैं।

साबुन बनाना – वसा (वसा अम्लों के ग्लिसरिल एस्टर) को सोडियम हाइड्रॉक्साइड के जलीय विलयन के साथ गर्म करने पर साबुन प्राप्त होता है तथा साबुन बनाने की इस प्रक्रिया को साबुनीकरण ( Saponification) कहते हैं। इस अभिक्रिया में वसा अम्लों के एस्टर का जल अपघटन होता है तथा प्राप्त साबुन कोलॉइडी अवस्था में होता है। इसे विलयन में सोडियम क्लोराइड (NaCl) डालकर अवक्षेपित कर लेते हैं। साबुन को पृथक् कर लेने के बाद बचे हुए विलयन में ग्लिसरॉल रह जाता है जिसे प्रभाजी आसवन के द्वारा प्राप्त किया जाता है।
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आठ से अठारह कार्बन परमाणु युक्त साबुन की गुणवत्ता अच्छी होती है । अठारह से अधिक कार्बन होने पर इनकी जल में विलेयता कम होती है तथा अठारह से कम कार्बन होने पर इनकी शोधन शक्ति (Cleansing Power) कम हो जाती है। सोडियम तथा पोटेशियम साबुन जल में विलेय होते हैं तथा इन्हें सफाई के लिए प्रयुक्त किया जाता है। पोटेशियम साबुन मृदु होते हैं अतः इस प्रकार के साबुन त्वचा के लिए कोमल होते हैं। पोटेशियम साबुन बनाने के लिए NaOH के विलयन के स्थान पर KOH का विलयन लिया जाता है।

साबुन के प्रकार (Types of Soaps ) साबुनों के उपयोगों के आधार पर ये अग्रलिखित प्रकार के होते हैं-
(i) प्रसाधन साबुन (Toilet Soap ) – ये अच्छे वसा एवं तेलों से बनाए जाते हैं तथा इनसे क्षार के आधिक्य को निकाल लिया जाता है। इन्हें आकर्षक बनाने के लिए इनमें रंग तथा सुगंध मिलाते हैं।

(ii) पानी में तैरने वाले साबुन (Floating Soap ) – तैरने वाले साबुन बनाने के लिए इनके कठोर होने से पहले इनमें वायु के छोटे-छोटे बुलबुले विस्पंदित (प्रवाहित ) किए जाते हैं।

(iii) पारदर्शी साबुन (Transparent Soap ) – साबुन को एथेनॉल में मोलकर और फिर विलायक के आधिक्य को वाष्पित करने से पारदर्शी साबुन बनते हैं।

(iv) औषध ‘साबुन (Medicated Soap ) – इनमें औषधीय गुण वाले पदार्थ मिलाए जाते हैं। कुछ साबुनों में गंधहारी (Deodorants) पदार्थं भी मिलाए जाते हैं।

(v) दाढ़ी बनाने का साबुन (Shaving Soap ) – दाढ़ी बनाने साबुन बनाने के लिए इसमें रोजिन नामक गोंद मिलायी जाती है जिससे सोडियम रोजिनेट बनता है जो झाग बनाने में मदद करता है तथा इसे जल्दी सूखने से बचाने के लिए इसमें ग्लिसरॉल भी मिलाया जाता है।

धुलाई के साबुन में सोडियम रोजिनेट, सोडियम कार्बोनेट, सोडियम सिलिकेट तथा बोरेक्स जैसे पूरक (Fillers) भी मिलाए जाते हैं तथा साबुन की छीलन ( Soap Chips) बनाने के लिए ठंडे सिलिंडर पर साबुन की पतली परत चढ़ाकर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में खुरच लिया जाता है। दानेदार साबुन (Soap Granules) सूखे हुए साबुन के छोटे-छोटे बुलबुले होते हैं।

साबुन का पाउडर तथा मार्जन साबुन में कुछ साबुन, मार्जक (अपघर्षी) जैसे झामक चूर्ण ( Powdered Pumice) या बारीक रेत तथा सोडियम कार्बोनेट (Na2CO3) एवं ट्राइसोडियम फॉस्फेट (Na3PO4) जैसे बिल्डर मिले होते हैं। बिल्डर से साबुन की क्रियाशीलता बढ़ जाती है।

साबुन की शोधन क्रिया (Cleansing Action of Soaps) – साबुन की शोधन क्रिया में पायसीकरण ( इमल्सीकरण ) होता है। इस प्रक्रिया में साबुन, कपड़े पर लगे ग्रीस तथा मिट्टी के कणों का जल के साथ इमल्सन (पायस) बनाने में मदद करता है।

स्पष्टीकरण (Explanation ) – साबुन के अणु में अध्रुवीय जल विरोधी तथा ध्रुवीय जलस्नेही भाग होता है। कपड़े की सतह पर मिट्टी के कण, ग्रीस या तेल द्वारा चिपके रहते हैं। ग्रीस या तेल जल में अविलेय होता है अतः मिट्टी के कणों को केवल जल द्वारा नहीं हटाया जा सकता। जब साबुन का प्रयोग किया जाता है तो इसका अध्रुवीय एल्किल समूह तेल की बूंदों में विलेय होता है जबकि ध्रुवीय – COON+a समूह जल में विलेय होता है अतः तेल की प्रत्येक बूँद के चारों ओर ऋणावेश आ जाता है इससे इमल्सन बन जाता है तथा मिट्टी के कण युक्त तेल की बूँदें जल द्वारा साफ हो जाती हैं।
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साबुन केवल मृदु जल (Soft Water) में ही कार्य करते हैं। कठोर जल में नहीं, क्योंकि कठोर जल में Ca2+ तथा Mg2+ आयन होते हैं इसलिए सोडियम अथवा पोटैशियम साबुन को कठोर जल में घोलने पर वह अघुलनशील कैल्सियम तथा मैग्नीशियम साबुन में परिवर्तित हो जाता है।
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ये अघुलनशील साबुन, मलफेन (Scum) की भाँति जल से पृथक् हो जाते हैं तथा शोधन अभिकर्मक के रूप में उपयुक्त नहीं रहते। ये अच्छी धुलाई में रुकावट डालते हैं क्योंकि यह अवक्षेप कपड़ों पर चिपक जाता है। कठोर जल से धुले बाल इसी चिपचिपे पदार्थ के कारण ही चमकदार नहीं होते हैं। कठोर जल और साबुन से धुले कपड़ों में इस चिपचिपे पदार्थ के कारण रंजक भी एकसमान रूप से अवशोषित नहीं होता है।

प्रश्न 14.
अपमार्जकों के संश्लेषण की विधियों के समीकरण लिखिए।
उत्तर:
अपमार्जकों का संश्लेषण (Synthesis of Detergents) – अपमार्जकों को निम्नलिखित विधियों द्वारा संश्लेषित किया जाता है-
(i)
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(ii) रीड अभिक्रिया द्वारा (By Reed Reaction)
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साबुन तथा अपमार्जक में अन्तर (Difference between Soaps and Detergents)
(i) उच्चतर (दीर्घ श्रृंखला युक्त) मोनोकार्बोक्सिलिक अम्लों का सोडियम अथवा पोटैशियम लवण साबुन कहलाता है, जबकि उच्चतर ऐल्केन सल्फोनिक अम्ल अथवा ऐल्केन हाइड्रोजनसल्फेट के सोडियम लवणों को अपमार्जक कहते हैं। अर्थात् साबुन तथा अपमार्जक के ध्रुवीय सिरे में रासायनिक भिन्नता होती है।

(ii) साबुन दुर्बल अम्ल (RCOOH) तथा प्रबल क्षार के लवण होते हैं; जबकि अपमार्जक, प्रबल अम्ल (RSO3H अथवा RSO4H ) तथा प्रबल क्षार के लवण होते हैं। इसी कारण कठोर जल में उपस्थित Ca2+ तथा Mg2+ आयन साबुन के साथ क्रिया करके कैल्सियम तथा मैग्नीशियम लवण बनाते हैं, जो कि सहसंयोजी होने के कारण जल में अविलेय होते हैं। अपमार्जक कठोर जल में भी शोधन करते हैं क्योंकि इनके कैल्सियम तथा मैग्नीशियम आयनिक प्रकृति के होने के कारण जल में विलेय होते हैं।

(iii) साबुन जल अपघटित होकर क्षारीय विलयन देते हैं, जबकि अपमार्जक का जलीय विलयन उदासीन होता है। इसी कारण अपमार्जकों को ऊनी, रेशमी तथा अन्य कोमल वस्त्रों को धोने के काम में लेते हैं, लेकिन साबुन द्वारा इन कोमल वस्त्रों का शोधन नहीं किया जा सकता है।
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बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से सम्भावित महत्त्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पदार्थ क्या होते हैं? प्रत्येक का एक- एक उदाहरण दीजिए-
(i) धनायनी अपमार्जक
(ii) एन्जाइम
(iii) स्वीटनिंग कर्मक या मिठासकारक (मधुरक)।
उत्तर:
(i) धनायनी अपमार्जक ऐमीनो के ऐसीटेट, क्लोराइड या ब्रोमाइड आयनों के साथ बने चतुष्क अमोनियम लवण होते हैं। उदाहरण- सेटिलट्राइमेथिल अमोनियमब्रोमाइड।

(ii) जैव रासायनिक अभिक्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करने वाले प्रोटीन युक्त पदार्थों को एन्जाइम अथवा जैव उत्प्रेरक कहते हैं। उदाहरण- यूरिऐस।

(iii) वे पदार्थ जो शर्करा के स्थान पर मधुरक के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं, उन्हें कृत्रिम मधुरक कहते हैं। उदाहरण- सैकरीन।

प्रश्न 2.
प्रत्येक स्थिति में एक-एक उदाहरण सहित निम्नलिखित पदों की व्याख्या कीजिए-
(i) खाद्य परिरक्षक
(ii) अपमार्जक
(iii) एन्टासिड (Antacid)।
उत्तर:
(i) खाद्य परिरक्षक- वे पदार्थ जो खाद्य पदार्थों को खराब होने से बचाने के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं उन्हें खाद्य परिरक्षक कहते हैं। उदाहरण- सोडियम बेन्जोएट।

(ii) अपमार्जक – वे शोधन अभिकर्मक जिनमें साबुन के सभी गुण पाए जाते हैं लेकिन रासायनिक दृष्टि से ये साबुन नहीं होते हैं उन्हें अपमार्जक कहते हैं। उदाहरण- सेटिल ट्राइमेथिल अमोनियम ब्रोमाइड।

(iii) एन्टासिड (प्रतिअम्ल) वे औषध होती हैं जो आमाशय में उत्पन्न अधिक अम्ल के प्रभाव को समाप्त करके पीड़ा से बचाती हैं। जैसे- रैनिटिडीन।

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प्रश्न 3.
रोगाणुनाशी और पूतिरोधी पदार्थों के बीच अंतर कीजिए।
उत्तर:
पूतिरोधी तथा विसंक्रामी (संक्रमणहारी) ऐसे रसायन होते हैं जो या तो सूक्ष्मजीवियों को मार देते हैं अथवा उनकी वृद्धि को रोकते हैं।

पूतिरोधियों (Antiseptic) को सजीव ऊतकों, जैसे-घाव, चोट तथा अल्सर पर लगाया जाता है। फ्यूरासिन तथा सोफ्रामाइसिन इसके मुख्य उदाहरण हैं।

संक्रमणहारी (रोगाणुनाशी) (Disinfectant) भी सूक्ष्मजीवियों को नष्ट करते हैं तथा इनका प्रयोग निर्जीव वस्तुओं जैसे-फ़र्श, नालियाँ तथा यंत्रों को रोगाणुमुक्त करने में प्रयुक्त किया जाता है। उदाहरण-फ़ीनॉल का एक प्रतिशत विलयन।

प्रश्न 4.
(i) ऋणायनिक एवं धनायनिक अपमार्जक किसे कहते हैं? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण भी लिखिए।
(ii) निम्नलिखित के संरचना सूत्र लिखिए-
(A) बाईथायोनल
(B) सैकरीन।
अथवा
(i) साबुन किसे कहते हैं? साबुनीकरण की अभिक्रिया लिखिए। साबुन के दो प्रकारों का वर्णन कीजिए।
(ii) स्वापक व अस्वापक पीड़ाहारी में दो अन्तर लिखिए।
उत्तर:
(i) संश्लिष्ट अपमार्जक (Synthetic Detergents) – संश्लिष्ट अपमार्जक वे शोधन अभिकर्मक (Cleansing Agents) होते हैं जिनमें साबुन के सभी गुण पाए जाते हैं लेकिन रासायनिक दृष्टि से ये साबुन नहीं होते हैं। अतः इन्हें साबुन रहित साबुन या सिन्डेट्स भी कहा जाता है।

अपमार्जक कठोर जल में भी झाग बनाते हैं अतः इन्हें कठोर तथा मृदु दोनों प्रकार के जल में उपयोग में लिया जा सकता है।

संश्लिष्ट अपमार्जक तीन प्रकार के होते हैं-
(a) धनायनी अपमार्जक
(b) ऋणायनी अपमार्जक
(c) अनआयनिक अपमार्जक।
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(a) धनायनी अपमार्जक (Cationic Detergents)-धनायनी अपमार्जक एमीनों के ऐसीटेट, क्लोराइड या ब्रोमाइड आयनों के साथ बने चतुष्क अमोनियम लवण होते हैं। इनमें धनात्मक भाग में लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला तथा नाइट्रोजन परमाणु पर धन आवेश होता है। अतः इन्हें धनायनी अपमार्जक कहते हैं। उदाहरण-सेटिलट्राइमेथिल अमोनियम ब्रोमाइड।

धनायनी अपमार्जकों को बालों के कन्डीशनरों में प्रयुक्त किया जाता है तथा इनमें जीवाणुनाशक गुण पाया जाता है। महंगे होने के कारण इनका उपयोग सीमित मात्रा में होता है।

(b) ऋणायनी अपमार्जक (Anionic Detergents)-ऋणायनी अपमार्जक लम्बी श्रंखलायुक्त सल्फोनीकृत ऐल्कोहॉलों अथवा हाइड्रोकार्बनों के सोडियम लवण होते हैं। जैसे-सोडियम p-ऐल्किल बेन्जीन सल्फ्रेनेट तथा सोडियम लॉरिल सल्फोनेट या सल्फेट। दीर्घ शृंखला वाले ऐल्कोहॉलों की सांद्र सल्प्यूरिंक अम्ल (H2SO4 के साथ अभिक्रिया कराने पर पहले ऐल्किल हाइड्रोजन सल्फेट बनते हैं जिनकी क्रिया क्षार से कराने पर ऋणायनी अपमार्जक बनते हैं। इसी प्रकार ऐल्किल बेन्जीन सल्फोनेट, ऐल्किल बेन्जीन सल्फोनिक अम्लों की क्षार के साथ क्रिया से प्राप्त होते हैं।
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ऐल्किल बेन्जीन सल्फोनेटों के सोडियम लवण महत्त्वपूर्ण ऋणायनी अपमार्जक होते हैं। ऋणायनी अपमार्जकों में इनका ऋणात्मक भाग शोधन (Cleansing) क्रिया में भाग लेता है। ये सामान्यतः घरेलू उपयोग में आते हैं। ऋणायनी अपमार्जक दंतमंजन में भी प्रयुक्त किए जाते हैं।

(c) अनआयनिक अपमार्जक (Non-Ionic Detergents) अनायनिक अपमार्जकों में कोई आयन नहीं होता है, अतः इसे अनआयनिक अपमार्जक कहते हैं। उदाहरण-(i) स्टिऐरिक अम्ल तथा पॉलीएथिलीन ग्लाइकॉल की अभिक्रिया से बना अपमार्जक।
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(ii) संरचना सूत्र
(A) बाईथायोनल
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(B) सैकरीन
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प्रश्न 5.
(अ) साबुन व संश्लेषित अपमार्जक में दो अन्तर दीजिए।
(ब) निम्नलिखित को कृत्रिम मधुरक, परिरक्षक, साबुन, अपमार्जक में वर्गीकृत कीजिए-
सोडियम पॉमिटेट, सुक्रालोस, सार्बिक अम्ल का लवण, सेटिल ट्राइमेथिल अमोनियम ब्रोमाइड ।
अथवा
(अ) पूतिरोधी व विसंक्रामी में दो अन्तर दीजिए।
(ब) निम्नलिखित को प्रतिहिस्टैमिन, प्रतिअम्ल, प्रशांतक, प्रतिजैविक औषधि में वर्गीकृत कीजिए-
पेनिसिलीन, मेप्रोबमेट, टरफेनाडीन, रैनिटिडीन।
उत्तर:
(अ) (i) साबुन कठोर जल में कार्य नहीं करते जबकि संश्लेषित अपमार्जक कठोर जल में भी कार्य करते हैं।
(ii) साबुन को मृदु कपड़ों (Soft cloths) जैसे ऊन, रेशम आदि को धोने में प्रयुक्त नहीं किया जाता है जबकि अपमार्जकों द्वारा इन्हें धोया जा सकता है।

(ब) कृत्रिम मधुरक- सुक्रालोस
परिरक्षक-सार्विक अम्ल का लवण
साबुन- सोडियम पॉमिटेट
अपमार्जक सेटिल ट्राइमेथिल अमोनियम ब्रोमाइड।
अथवा
(अ) पूतिरोधी तथा विसंक्रामी (संक्रमणहारी) ऐसे रसायन होते हैं जो या तो सूक्ष्मजीवों का विनाश करते हैं अथवा उनकी वृद्धि को रोकते हैं। पूतिरोधियों (Antiseptic) को सजीव ऊतकों, जैसे- घाव, चोट तथा अल्सर पर लगाया जा सकता है। उदाहरण- फ्यूरासिन तथा सोफ्रामाइसिन।

संक्रमणहारी (Disinfectant) का प्रयोग निर्जीव वस्तुओं, जैसे- फर्श, नालियों तथा यंत्रों पर किया जाता है। उदाहरण- फीनॉल का एक प्रतिशत विलयन सान्द्रता परिवर्तन से वही पदार्थ पूतिरोधी अथवा विसंक्रामी का कार्य कर सकता है।

(ब) प्रतिहिस्टैमिन – टरफेनाडीन
प्रतिअम्ल – रैनिटिडीन
प्रशांतक – मेप्रोबमेट
प्रतिजैविक – पेनिसिलीन

प्रश्न 6.
(अ) मधुमेह के रोगियों को कृत्रिम मधुरकों की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
(ब) एक खाद्य परिरक्षक का नाम लिखिए। यह खाद्य परिरक्षण किस प्रकार करता है?
(स) ऋणायनी अपमार्जक का नाम एवं सूत्र लिखिए।
उत्तर:
(अ) प्राकृत मधुरक जैसे सूक्रोस ग्रहण की गई कैलोरीमान बढ़ाते हैं अतः मधुमेह के रोगियों को कृत्रिम मधुरकों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि कृत्रिम मधुरक अपरिवर्तित रूप में ही मूत्र के साथ उत्सर्जित हो जाते हैं तथा ये पूर्णतः अक्रिय होते हैं एवं इनसे कोई हानि नहीं होती। ये कैलोरी में भी वृद्धि नहीं करते हैं।

(ब) सोडियम बेन्जोएट एक खाद्य परिरक्षक है। खाद्य पदार्थों में सूक्ष्म जीवों की वृद्धि होती है जिसके कारण ये खराब हो जाते हैं। खाद्य परिरक्षक इन सूक्ष्म जीवों की वृद्धि को रोकते हैं जिससे खाद्य पदार्थ खराब नहीं होते हैं।

(स) सोडियम लॉरिल सल्फेट [CH3(CH2)10CH2OSO2Na+] एक ऋणायनी अपमार्जक है।

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प्रश्न 7.
(i) रैनिटिडीन किस वर्ग की औषध है?
(ii) यदि जल में Ca2+ आयन घुले हुए हैं तो कपड़ों को साफ
करने के लिए आप साबुन तथा अपमार्जक में से किसे प्रयुक्त करेंगे?
(iii) निम्नलिखित में से कौनसा पूतिरोधी है ?
0.2% फीनॉल, 1% फीनॉल
उत्तर:
(i) रैनिटिडीन एक प्रतिअम्ल है क्योंकि यह आमाशय की अम्लता को दूर करती है।

(ii) जल में Ca2+ आयन घुले हुए हैं अतः यह कठोर जल है। इसलिए कपड़ों को साफ करने के लिए साबुन की तुलना में अपमार्जकों को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि अपमार्जकों के कैल्सियम लवण जल में विलेय होते हैं जबकि साबुन के कैल्सियम लवण जल में अविलेय होते हैं अतः अधिक साबुन बेकार चला जाता है।

(iii) 0.2% फीनॉल, पूतिरोधी की भांति व्यवहार करता है जबकि 1% फीनॉल रोगाणुनाशी होता है।

प्रश्न 8.
(i) दो वृहत अणुओं के उदाहरण बताइए जिन्हें औषध लक्ष्य की तरह चुना जाता है।
(ii) पूतिरोधी क्या होते हैं ? एक उदाहरण दीजिए।
(iii) ऐस्पार्टेम का प्रयोग ठंडे खाद्य तथा पेय पदार्थों तक ही क्यों सीमित है ?
उत्तर:
(i) न्यूक्लिक अम्ल तथा प्रोटीन ऐसे वृहत अणु हैं जिन्हें औषध लक्ष्य की तरह चुना जाता है।

(ii) पूतिरोधी वे रसायन हैं जो सूक्ष्मजीवियों को मार देते हैं अथवा उनकी वृद्धि को रोक देते हैं लेकिन जिनका ऊतकों पर कोई प्रभाव नहीं होता है। उदाहरण-बोरिक अम्ल का तनु विलयन

(iii) ऐस्पार्टेम खाना बनाने के ताप तक गर्म करने पर यह विघटित हो जाता है अतः इसका प्रयोग ठंडे खाद्य एवं पेय पदार्थों तक ही सीमित है।

प्रश्न 9.
निम्न को समझाइए –
(अ) पूतिरोधी
(ब) कृत्रिम मधुरक
(स) प्रतिअम्ल।
अथवा
निम्न को समझाइए – (अ) विसंक्रामी (ब) खाद्य परिरक्षक (स) प्रशांतक ।
उत्तर:
(अ) पूतिरोधी-वे रसायन होते हैं जो सूक्ष्मजीवियों को मार देते हैं अथवा उनकी वृद्धि को रोक देते हैं। पूतिरोधियों को सजीव ऊतकों जैसे घाव, चोट तथा अल्सर पर लगाया जा सकता है। उदाहरण-सोफ्रामाइसिन, डेटॉल, आयोडोफार्म तथा बोरिक अम्ल इत्यादि।

(ब) कृत्रिम मधुरक-वे पदार्थ जो शर्करा (Sugar) के स्थान पर मधुरक (Sweetening agent) के रूप में प्रयोग में लिए जाते हैं लेकिन उनका कोई पोषण मान (Nutritional value) नहीं होता, उन्हें कृत्रिम मधुरक कहते हैं।
उदाहरण सैकरीन (आर्थों सल्फोबेन्जीनीमाइड), सूकालोस तथा ऐलिटेम।

(स) प्रतिअम्ल-रासायनिक पदार्थ जो आमाशय की अम्लता को कम करने के लिए प्रयुक्त होते हैं उन्हें प्रतिअम्ल कहते हैं।
उदाहरण-धात्विक हाइड्रॉक्साइड जैसे Mg(OH)2। इसके अतिरिक्त सिमेटिडीन तथा रैनिटिडीन प्रभावी प्रतिअम्ल होते हैं।
अथवा
(अ) विसंक्रामी – वे रसायन होते हैं जो सूक्ष्मजीवियों को नष्ट करते हैं परन्तु जैव ऊतकों पर इनका उपयोग सुरक्षित नहीं होता है। अतः इन्हें निर्जीव वस्तुओं जैसे फर्श, नालियाँ तथा यंत्रों इत्यादि को रोगाणुमुक्त करने के काम में लिया जाता है। उदाहरण क्लोरीन, सल्फरडाइऑक्साइड।

(ब) खाद्य परिरक्षक-खाद्य पदार्थों को पड़ा रखने पर उनमें सूक्ष्म जीव उत्पन्न हो जाते हैं जिसके कारण ये खराब हो जाते हैं। अतः वे पदार्थ जो खाद्य पदार्थों को खराब होने से बचाने के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं उन्हें खाद्य परिरक्षक कहते हैं। उदाहरण साधारण नमक, चीनी, वनस्पति तेल तथा सोडियम बेन्जोएट।

(स) प्रशांतक वे औषध जो बिना नींद के मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाती हैं उन्हें प्रशांतक कहते हैं। अतः प्रशांतकों का उपयोग तनाव तथा मानसिक बीमारियों में किया जाता है। उदाहरण-इप्रोनाइजिड तथा फिनल्जिन (नारडिल)।

प्रश्न 10.
(अ) अस्वापक पीड़ाहारी किसे कहते हैं? एक उदाहरण लिखिए।
(ब) ठण्डे पेय एवं खाद्य पदार्थों में ही कृत्रिम मधुरक एस्पार्टेम का उपयोग क्यों किया जाता है?
(स) पूतिरोधी व रोगाणुनाशी में कोई एक अंतर लिखिए।
अथवा
(अ) ऋणायनी अपमार्जक किसे कहते हैं ? एक उदाहरण लिखिए।
(ब) खाद्य पदार्थों में रसायन क्यों मिलाये जाते हैं ? कोई दो कारण लिखिए।
(स) विस्तृत स्पेक्ट्रम व संकीर्ण स्पेक्ट्रम प्रतिजीवाणु में कोई एक अंतर लिखिए।
उत्तर:
(अ) वे पीड़ाहारी जो दर्द को कम करते हैं लेकिन इनकी आदत नहीं पड़ती अर्थात् व्यक्ति इनका आदी नहीं होता उन्हें अस्वापक पीड़ाहारी कहते हैं। उदाहरण – ऐस्पिरिन।

(ब) (i) न्यूक्लिक अम्ल तथा प्रोटीन ऐसे वृहत अणु हैं जिन्हें औषध लक्ष्य की तरह चुना जाता है।

(ii) पूतिरोधी वे रसायन हैं जो सूक्ष्मजीवियों को मार देते हैं अथवा उनकी वृद्धि को रोक देते हैं लेकिन जिनका ऊतकों पर कोई प्रभाव नहीं होता है।
उदाहरण-बोरिक अम्ल का तनु विलयन

(iii) ऐस्पार्टेम खाना बनाने के ताप तक गर्म करने पर यह विघटित हो जाता है अतः इसका प्रयोग ठंडे खाद्य एवं पेय पदार्थों तक ही सीमित है।

(स) पूतिरोधी व रोगाणुनाशी दोनों ही सूक्ष्मजीवियों को मार देते हैं अथवा उनकी वृद्धि को रोकते हैं लेकिन पूतिरोधी को सजीव ऊतकों, जैसे-घाव, चोट तथा अल्सर पर लगाया जाता है जबकि रोगाणुनाशी का प्रयोग निर्जीव वस्तुओं, जैसे- फर्श तथा नालियों को रोगाणुमुक्त करने में किया जाता है परन्तु जैव ऊतकों पर इनका उपयोग सुरक्षित नहीं होता है।

अथवा

(अ) वे अपमार्जक जिनमें यौगिक का ऋणायनिक भाग अपमार्जन का कार्य करता है उन्हें ऋणायनी अपमार्जक कहते हैं। ऋणायनी अपमार्जक लम्बी श्रृंखलायुक्त सल्फोनीकृत ऐल्कोहॉलों अथवा हाइड्रोकार्बनों के सोडियमलवण होते हैं। जैसे- सोडियम p- ऐल्किल बेन्जीन सल्फोनेट तथा सोडियम लॉरिल सल्फेट।

(ब) खाद्य पदार्थों में रसायन मिलाने के निम्न कारण हैं-

  • खाद्य पदार्थों का परिरक्षण तथा
  • खाद्य पदार्थों की पौष्टिक गुणवत्ता बढ़ाना।

(स) संकीर्ण स्पेक्ट्रम प्रतिजीवाणु मुख्यतः ग्रैम ग्राही या ग्रैम अग्राही जीवाणुओं पर ही अपना प्रभाव डालते हैं, जबकि विस्तृत स्पेक्ट्रम प्रतिजीवाणु ग्रैम ग्राही तथा ग्रैम अग्राही दोनों प्रकार के जीवाणुओं के विस्तृत परास को नष्ट करते हैं या उनका निरोध करते हैं। पेनिसिलिन जी संकीर्ण स्पेक्ट्रम प्रतिजीवाणु है जबकि ऐम्पिसिलिन एक विस्तृत स्पेक्ट्रम प्रतिजीवाणु है।

प्रश्न 11.
जवान बच्चों में मधुमेह और अवसाद (उदासी) की बढ़ती संख्या को देखकर, एक प्रसिद्ध स्कूल के प्रिंसिपल श्री लुगानी ने एक सेमिनार का आयोजन किया जिसमें अन्य प्रिंसिपलों और बच्चों के माता-पिताओं को आमंत्रित किया। यह निर्णय लिया गया कि स्कूलों में सड़े खाने (Junk Food) की वस्तुएँ बन्द की जाएँ और स्वास्थ्यवर्धक वस्तुएँ, जैसे सूप, लस्सी, दूध आदि उपलब्ध कराई जाएँ।

उन्होंने यह भी निर्णय लिया कि स्कूलों में रोज प्रात:काल की ऐसेम्बली के साथ बच्चों को आधा घण्टे का शारीरिक व्यायाम अनिवार्य रूप से कराया जाए। छः माह पश्चात्, श्री लुगानी ने अधिकतर स्कूलों में फिर स्वास्थ्य परीक्षण कराया और बच्चों के स्वास्थ्य में अनुपम सुधार पाया गया।

उपर्युक्त विवरण को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
(i) श्री लुगानी द्वारा किन मूल्यों (कम-से-कम दो) को प्रदर्शित किया गया?
(ii) एक विद्यार्थी के रूप में, आप इस विषय में कैसे जागरूकता फैलाएँगे?
(iii) प्रति-अवसादक (ऐन्टिडीप्रीसेन्ट) ड्रग्स क्या हैं? एक उदाहरण दीजिए।
(iv) एक मधुमेह के रोगी के लिए मिठाई बनाने के लिए जो मीठाकारी अभिकर्मक (मधुकर) प्रयुक्त होता है, उसका नाम दीजिए।
उत्तर:
(i) श्री लुगानी द्वारा अपने कर्त्तव्य तथा बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को प्रदर्शित किया गया।

(ii) एक विद्यार्थी के रूप में, मैं समाज तथा अपने निवास स्थान के आसपास भी सड़ा खाना नहीं खाना तथा शारीरिक व्यायाम के बारे में जागरूकता फैलाऊँगा, इसके लिए सभाओं का आयोजन करूँगा।

(iii) जब नॉरएड्रीनेलिन की मात्रा कम हो जाती है तो व्यक्ति अवसादग्रस्त हो जाता है तो इसके लिए प्रयुक्त ड्रग को प्रति अवसादक कहते हैं। ये ड्रग नॉरएड्रीनेलिन का निम्नीकरण करने वाले एन्जाइम को संदमित करती है। उदाहरण-फिनल्जिन।

(iv) सैकरीन एक मीठाकारी अभिकर्मक (मधुकर) है।

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HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 14 जैव-अणु

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 14 जैव-अणु Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Solutions Chapter 14 जैव-अणु

प्रश्न 14.1.
मोनोसैकैराइड क्या होते हैं?
उत्तर:
वे कार्बोहाइड्रेट जिनको पॉलिहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड अथवा टोन के और अधिक सरल यौगिकों में जल अपघटित नहीं कर सकते, उन्हें मोनोसैकैराइड कहते हैं। लगभग 20 मोनोसैकैराइड प्रकृति में ज्ञात हैं। जैसे- ग्लूकोस, फ्रक्टोस, राइबोस आदि ।

प्रश्न 14.2.
अपचायी शर्करा क्या होती है?
उत्तर:
वे कार्बोहाइड्रेट जो टॉलेन अभिकर्मक या फेलिंग विलयन को अपचयित करते हैं उन्हें अपचायी शर्करा कहते हैं। इनमें स्वतंत्र ऐल्डिहाइड या समूह होता है। जैसे-ग्लूकोस, फ्रक्टोस, माल्टोस तथा लैक्टोस ।

प्रश्न 14.3.
पौधों में कार्बोहाइड्रेटों के दो, मुख्य कार्यों को कीटोन लिखिए।
उत्तर:

  • कार्बोहाइड्रेट, वनस्पतियों में स्टार्च के रूप में पाए जाते हैं।
  • पौधों की कोशिका भित्ति सेलुलोस से बनी होती है जो कि एक कार्बोहाइड्रेट है।

प्रश्न 14.4.
निम्नलिखित को मोनोसैकैराइड तथा डाइसैकैराइड में वर्गीकृत कीजिए – राइबोस, 2 – डीऑक्सीराइबोस, माल्टोस, गैलैक्टोस, फ्रक्टोस तथा लैक्टोस ।
उत्तर:
मोनोसैकैराइड – राइबोस, 2 – डीऑक्सीराइबोस, गैलैक्टोस तथा फ्रक्टोस ।
डाइसैकैराइड – माल्टोस तथा लैक्टोस।

प्रश्न 14.5.
ग्लाइकोसाइडी बंध से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
ओलिगोसैकैराइडों तथा पॉलिसैकैराइडों में दो मोनोसैकैराइड इकाई ऑक्साइड या ईथर बंध द्वारा जुड़ी होती हैं जो कि जल के एक अणु के निष्कासन से बनता है, इसे ग्लाइकोसाइडी बंध कहते हैं। इस प्रकार दो मोनोसैकैराइडों के मध्य ऑक्सीजन परमाणु से बने बन्ध को ग्लाइकोसाइडी बंध कहते हैं।

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प्रश्न 14.6.
ग्लाइकोजन क्या होता है तथा यह स्टार्च से किस प्रकार भिन्न है ?
उत्तर:
प्राणियों के शरीर में कार्बोहाइड्रेट, ग्लाइकोजन के रूप में संग्रहित रहता है। इसकी संरचना ऐमिलोपेक्टिन के समान होती है, अतः इसे प्राणी स्टार्च भी कहते हैं लेकिन यह ऐमिलोपेक्टिन से अधिक शाखित होता है। यह यकृत, मांसपेशियों तथा मस्तिष्क में उपस्थित होता है। जब शरीर को ग्लूकोस की आवश्यकता होती है, एन्जाइम, ग्लाइकोजन को ग्लूकोस में तोड़ देते हैं। ग्लाइकोजन यीस्ट तथा कवक में भी मिलता है।

स्टार्च के दो घटक होते हैं – एमिलोस तथा ऐमिलोपेक्टिन । एमिलोस, α-D- ग्लूकोस का रेखीय बहुलक है जबकि ऐमिलोपेक्टिन α-D-ग्लूकोस का शाखित बहुलक है।

प्रश्न 14.7.
(अ) सूक्रोस तथा (ब) लैक्टोस के जल अपघटन से कौनसे उत्पाद प्राप्त होते हैं?
उत्तर:
(अ) सूक्रोस के जल अपघटन से α-D- ग्लूकोस तथा ß-D- फ्रक्टोस बनते हैं।
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(ब) लैक्टोस के जल अपघटन से ß-D-ग्लूकोस तथा ß-D-गैलैक्टोस प्राप्त होते हैं।
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प्रश्न 14.8.
स्टार्च तथा सेलुलोस में मुख्य संरचनात्मक अंतर क्या है?
उत्तर:
स्टार्च -ग्लूकोस का बहुलक है तथा इसमें दो घटक ऐमिलोस तथा ऐमिलोपेक्टिन होते हैं । ऐमिलोस 200-1000 α-D (+) – ग्लूकोस इकाइयों की अशाखित श्रृंखला होती है जो कि C1 – C4 ग्लाइकोसाइडी बंध द्वारा जुड़ी होती हैं।

ऐलोपेक्टिन में α-D-ग्लूकोस इकाइयों से बनी शाखित श्रृंखला होती है, जिसमें C1-C4 ग्लाइकोसाइडी बंध होते हैं तथा शाखन C1 – C6 ग्लाइकोसाइडी बंध द्वारा होता है जबकि सेलुलोस, ß-D-ग्लूकोस से बना रेखीय शृंखलायुक्त पॉलिसैकैराइड है जिसमें एक ग्लूकोस इकाई के C1 तथा दूसरी ग्लूकोस इकाई के C4 के मध्य ग्लाइकोसाइडी बंध बनता है।

प्रश्न 14.9.
क्या होता है जब D – ग्लूकोस की अभिक्रिया निम्नलिखित अभिकर्मकों से करते हैं?
(i) HI
(ii) ब्रोमीन जल
(iii) HNO3
उत्तर:
(i) HI से अभिक्रिया – ग्लूकोस को HI के साथ लंबे समय तक गरम करने पर यह अपचयित होकर n – हैक्सेन देता है। इससे सिद्ध होता है कि इसमें सभी छः कार्बन परमाणु एक सीधी श्रृंखला में होते हैं।
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(ii) ब्रोमीन जल से अभिक्रिया – ग्लूकोस ब्रोमीन जल द्वारा ऑक्सीकृत होकर ग्लूकोनिक अम्ल बनाता है। इससे सिद्ध होता है कि ग्लूकोस का कार्बोनिल समूह ऐल्डिहाइड समूह के रूप में होता है ।
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(iii) HNO3 से अभिक्रिया – ग्लूकोस का नाइट्रिक अम्ल द्वारा ऑक्सीकरण कराने पर एक डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल, सैकैरिक अम्ल बनता है। इससे ग्लूकोस में प्राथमिक ऐल्कोहॉलिक समूह की उपस्थिति की पुष्टि होती है ।
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प्रश्न 14.10.
ग्लूकोस की उन अभिक्रियाओं का वर्णन कीजिए जो इसकी विवृत श्रृंखला ( खुली श्रृंखला) संरचना के द्वारा नहीं समझाई जा सकतीं।
उत्तर:
ग्लूकोस की निम्नलिखित अभिक्रियाएँ इसकी विवृत श्रृंखला संरचना द्वारा नहीं समझाई जा सकती-

  • ऐल्डिहाइड समूह उपस्थित होते हुए भी ग्लूकोस 2,4-DNP परीक्षण तथा शिफ परीक्षण नहीं देता। यह NaHSO के साथ भी क्रिया नहीं करता।
  • ग्लूकोस पेन्टाऐसीटेट, हाइड्रॉक्सिलऐमीन के साथ अभिक्रिया नहीं करता जो मुक्त -CHO समूह की अनुपस्थिति को दर्शाता है।
  • ग्लूकोस दो भिन्न क्रिस्टलीय रूपों में पाया जाता है जिन्हें o तथा B ग्लूकोस कहते हैं।

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प्रश्न 14.11.
आवश्यक तथा अनावश्यक ऐमीनो अम्ल क्या होते हैं? प्रत्येक प्रकार के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वे ऐमीनो अम्ल जो हमारे शरीर में संश्लेषित हो जाते हैं, उन्हें अनावश्यक ऐमीनो अम्ल कहते हैं; जैसे-ग्लाइसीन तथा ऐलानिन एवं वे ऐमीनो अम्ल जो हमारे शरीर में संश्लेषित नहीं होते तथा जिनको भोजन में लेना आवश्यक होता है, उन्हें आवश्यक ऐमीनो अम्ल कहते हैं; जैसे-वैलीन तथा ल्यूसीन आवश्यक ऐमीनो अम्लों की संख्या दस होती है।

प्रश्न 14.12.
प्रोटीन के संदर्भ में निम्नलिखित को परिभाषित कीजिए-
(i) पेप्टाइड बंध
(ii) प्राथमिक संरचना
(iii) विकृतीकरण
उत्तर:
(i) पेप्टाइड बंध- वह बन्ध जिसके द्वारा विभिन्न – ऐमीनो अम्ल आपस में जुड़कर प्रोटीन बनाते हैं, उसे पेप्टाइड बंध कहते हैं। पेप्टाइड बंध को – CONH से दर्शाते हैं जो कि – ऐमीनो अम्ल के एक अणु के – COOH समूह तथा दूसरे अणु के – NH2 समूह से जल के निकलने से बनता है।

(ii) प्रोटीन की प्राथमिक संरचना- प्रोटीनों में एक या अधिक पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएं उपस्थित होती हैं किसी प्रोटीन के प्रत्येक पॉलिपेप्टाइड में ऐमीनो अम्ल एक विशिष्ट तथा निश्चित क्रम में जुड़े होते हैं। ऐमीनो अम्लों के इस विशिष्ट क्रम को ही प्रोटीनों की प्राथमिक संरचना कहते हैं। प्राथमिक संरचना में किसी भी प्रकार का परिवर्तन होने पर अर्थात् ऐमीनो अम्लों के क्रम में परिवर्तन से भिन्न प्रोटीन बनते हैं।

(iii) प्रोटीन का विकृतीकरण – जैविक तंत्र में पायी जाने वाली विशिष्ट त्रिविम संरचना तथा जैविक सक्रियता वाले प्रोटीन, प्राकृतिक प्रोटीन कहलाते हैं। जब प्राकृतिक प्रोटीन के ताप तथा pH में परिवर्तन (भौतिक या रासायनिक परिवर्तन) किया जाता है तो हाइड्रोजन बन्धों की व्यवस्था बिगड़ जाती है जिसके कारण प्रोटीन की गोलिका (ग्लोब्यूल) खुल जाती है तथा हैलिक्स अकुंडलित हो जाती है इससे प्रोटीन अपनी जैविक सक्रियता को खो देता है, इसे प्रोटीन का विकृतीकरण कहते हैं उबालने पर अंडे की सफेदी का स्कंदन विकृतीकरण का एक उदाहरण है तथा दूध का जमकर दही बनना भी विकृतीकरण है जो कि दूध में उपस्थित बैक्टीरिया द्वारा लैक्टिक अम्ल उत्पन्न होने के कारण होता है।

प्रश्न 14.13.
प्रोटीन की द्वितीयक संरचना के सामान्य प्रकार क्या हैं?
उत्तर:
प्रोटीन की द्वितीयक संरचना इनकी आकृति से सम्बन्धित होती है जिसमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएं उपस्थित होती हैं ये दो प्रकार की संरचनाओं में पायी जाती है-
(i) α-हैलिक्स तथा

(ii) प्रोटिन α-ऐमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं जो आपस में पेप्यइड बंध द्वारा जुड़े ह्रेते हैं। ऐमीनो अम्लों के एक अणु के -COOH तथा दूसरे अणु के NH2 समूह के मध्य अभिक्रिया होकर जल के अणु से निकलने से बने बन्ध को पेप्टाइड बन्ध कहते हैं जिसे -CONH- द्वार दर्शाया जाता है।
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प्रोटीनों में α-ऐमीनो अम्ल समान तथा भिन्न भी हो सकते हैं। जब बनने वाला उत्पाद दो ऐमीनो अम्लों से बनता है तो इसे डाइपेप्टाइड कहते हैं। उदाहरण, ग्लाइसीन का कार्बोक्सिल समूह, ऐलानीन के ऐमीनो समूह के साथ क्रिया करता है तो एक डाइपेप्टाइड, ग्लाइसिलऐलानिन बनता है। अतः डाइपेप्टइड में एक पेप्यइड बन्ध होता है।

जब तीसरा ऐमीनो अम्ल, डाइपेप्टाइड के साथ क्रिया करता है तो बने उत्पाद को ट्राइपेप्टाइड कहते हैं। अतः एक ट्राइपेप्टाइड में तीन ऐमीनो अम्ल दो पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े होते हैं। इसी प्रकार चार, पाँच तथा छः ऐमीनो अम्लों के आपस में जुड़ने से बने उत्पादों को टेट्रापेप्टाइड पेन्टापेप्टाइड तथा हेक्सापेप्टाइड कहते हैं। बहुत से ऐमीनो अम्लों ( 10 से अधिक) के आपस में संघनन द्वारा बने पेप्टाइडों को पॉलिपेप्टाइड कहते हैं।

वे पॉलिपेप्टाइड जिनमें असंख्य ( 100 से अधिक) भिन्न-भिन्न ऐमीनो अम्ल होते हैं तथा जिनका आण्विक द्रव्यमान 10,000 µ से अधिक होता है, उन्हें प्रोटीन कहते हैं। यद्यपि पॉलिपेप्टाइड तथा प्रोटीन में विभेद अधिक स्पष्ट नहीं है। 100 से कम ऐमीनो अम्लों वाले पॉलिपेप्यइडों को भी प्रोटीन कहा जाता है यदि उनमें प्रोटीन जैसा स्पष्ट संरूपण (conformation) हो। उदाहरण-इन्सुलिन 51 ऐमीनो अम्लों से मिलकर बना होता है।

प्रोटीनों के सामान्य गुण:

  • प्रोटीन रंगहीन तथा अक्रिस्टलीय होते हैं लेकिन इन्सुलिन क्रिस्टलीय होती है।
  • प्रोटीन के गंलनांक तथा क्वथनांक अनिश्चित होते हैं।
  • प्रोटीन सामान्यतः जल, ऐल्कोहॉल तथा ईथर इत्यादि में अविलेय होते हैं।
  • प्रोटीन, बहुलक होते हैं जिनका आण्विक द्रव्यमान अधिक होता है, अतः ये जल में कोलाइडों के रूप में पाए जाते हैं।
  • प्रोटीन उभयधर्मी होते हैं जिनके समविभव बिन्दु निश्चित होते हैं।

प्रश्न 14.14.
प्रोटीन की α-हैलिक्स संरचना के स्थायीकरण में कौनसे आबंध सहायक होते हैं?
उत्तर:
प्रोटीन की α-हैलिक्स संरचना में प्रत्येक ऐमीनो अम्ल का – NH समूह, कुंडली के अगले मोड़ पर स्थितHBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 14 जैव-अणु 6 समूह के साथ हाइड्रोजन बंध बनाता है जो इनके स्थायीकरण में सहायक होता है।

प्रश्न 14.15.
रेशेदार तथा गोलिकाकार (Globular) प्रोटीन को विभेदित कीजिए।
उत्तर:

  • रेशेदार प्रोटीन में पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएं समानांतर होती हैं तथा हाइड्रोजन एवं डाइसल्फाइड बंधों द्वारा जुड़कर रेशों जैसी संरचना बनाती हैं जबकि गोलिकाकार प्रोटीन में पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएं कुंडली बनाकर गोलाकार आकृति बना लेती हैं।
  • रेशेदार प्रोटीन जल में अविलेय होते हैं जबकि गोलिकाकार प्रोटीन जल में विलेय होते हैं।
  • रेशेदार प्रोटीन के उदाहरण किरेटिन (बाल, ऊन तथा रेशम में उपस्थित) तथा मायोसिन (मांसपेशियों में उपस्थित) हैं तथा गोलिकाकार प्रोटीन के उदाहरण इन्सुलिन व ऐल्यूमिन हैं।

प्रश्न 14.16.
ऐमीनो अम्लों की उभयधर्मी प्रकृति को आप कैसे समझाएंगे ?
उत्तर:
ऐमीनो अम्ल लवण के समान व्यवहार करते हैं क्योंकि इनके एक ही अणु में अम्लीय (कार्बोक्सिल समूह) तथा क्षारकीय ( ऐमीनो समूह ) समूह होते हैं। जलीय विलयन में कार्बोक्सिल समूह एक प्रोटॉन दान कर सकता है जबकि ऐमीनो समूह एक प्रोटॉन ग्रहण कर सकता है जिसके कारण एक द्विध्रुवीय आयन बनता है जिसे ज्विटर आयन अथवा उभयाविष्ट आयन या आन्तरिक लवण कहते हैं। यह उदासीन होता है लेकिन इसमें धनावेश तथा ऋणावेश दोनों ही उपस्थित होते हैं।
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उभयाविष्ट आयन के रूप में ऐमीनो अम्ल उभयधर्मी प्रकृति दर्शाते हैं क्योंकि ये अम्लों तथा धारकों दोनों के साथ अभिक्रिया करते हैं।
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प्रश्न 14.17.
एन्जाइम क्या होते हैं?
उत्तर:
सजीवों में होने वाली जैव रासायनिक अभिक्रियाओं में प्रयुक्त होने वाले जैव उत्प्रेरकों को एन्जाइम कहते हैं। एन्जाइम प्रोटीनयुक्त पदार्थ होते हैं।

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प्रश्न 14.18.
प्रोटीन की संरचना पर विकृतीकरण का क्या प्रभाव होता है?
उत्तर:
प्रोटीन के विकृतीकरण से इसकी प्राथमिक संरचना प्रभावित नहीं होती लेकिन द्वितीयक तथा तृतीयक संरचनाएँ नष्ट हो जाती हैं, विकृत प्रोटीन की जैविक सक्रियता नष्ट हो जाती है। जैसे अण्डे को उबालने पर विलेय गोलिकाकार प्रोटीन का स्कंदन होकर वह अविलेय रेशेदार प्रोटीन में परिवर्तित हो जाती है।

प्रश्न 14.19.
विटामिनों को किस प्रकार वर्गीकृत किया गया है? रक्त के थक्के जमने के लिए जिम्मेदार विटामिन का नाम दीजिए।
उत्तर:
विटामिनों का वर्गीकरण- जल तथा वसा में विलेयता के आधार पर विटामिनों को दो समूहों में वर्गीकृत किया जाता है-

  • वसा विलेय विटामिन
  • जल में विलेय विटामिन

(i) वसा विलेय विटामिन- ये विटामिन वसा तथा तेल में विलेय होते हैं लेकिन जल में अविलेय होते हैं। ये विटामिन A, D, E तथा K हैं। ये यकृत तथा ऐडिपोस (वसा को संग्रहित करने वाला) ऊतक में संग्रहित रहते हैं।

(ii) जल में विलेय विटामिन B वर्ग के विटामिन तथा विटामिन C जल में विलेय होते हैं। जल में विलेय विटामिनों की पूर्ति हमारे आहार में नियमित रूप से तथा पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए क्योंकि ये मूत्र के साथ आसानी से उत्सर्जित हो जाते हैं। इस कारण ये हमारे शरीर में (विटामिन B12 के अतिरिक्त) संचित नहीं हो पाते हैं।

रक्त का थक्का जमने के लिए विटामिन K जिम्मेदार होता है।

प्रश्न 14.20.
विटामिन A व C हमारे लिए आवश्यक क्यों हैं? उनके महत्वपूर्ण स्त्रोत दीजिए।
उत्तर:
विटामिन A की कमी से रतौंधी (रात्रि अंधता) तथा ज़िॲपिथेमिया (आँख के कॉर्निया का कठोर होना) नामक रोग हो जाते हैं। तथा विटामिन C की कमी से स्कर्वी (मसूड़ों से रक्तस्राव) तथा दंत क्षय रोग हो जाता है अतः विटामिन A व C हमारे लिए आवश्यक हैं।

विटामिन A के स्रोत – गाजर, पालक, पपीता, मक्खन, दूध, मछली के यकृत का तेल तथा अंडे की जर्दी।

विटामिन C के स्रोत सिट्रस फल ( नींबू, संतरा, मौसमी), आँवला, हरे पत्तेदार सब्जियाँ, अमरूद, टमाटर तथा बेर।

प्रश्न 14.21.
न्यूक्लिक अम्ल क्या होते हैं? इनके दो महत्त्वपूर्ण कार्य लिखिए।
उत्तर:
न्यूक्लिक अम्ल, न्यूक्लिओटाइडों की लम्बी श्रृंखलायुक्त बहुलक होते हैं जो एक धारक, एक पेन्टोस शर्करा तथा फॉस्फेट से मिलकर बनते हैं। ये वे जैव अणु हैं जो प्रोटीन के साथ मिलकर क्रोमोसोम बनाते हैं। न्यूक्लिक अम्ल, जनक से संतति में गुणों के स्थानान्तरण के लिए जिम्मेदार होते हैं। न्यूक्लिक अम्ल के कार्य न्यूक्लिक अम्ल के दो महत्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं-

  • स्वप्रतिकृति तथा
  • प्रोटीन संश्लेषण पर नियंत्रण।

प्रश्न 14.22.
न्यूक्लिओसाइड तथा न्यूक्लिओटाइड में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
किसी क्षारक (प्यूरीन या पिरीमिडीन) के पेन्टोस शर्करा की 1′ स्थिति से जुड़ने पर बनी इकाई को न्यूक्लिओसाइड कहते हैं तथा न्यूक्लिओसाइड जब शर्करा की 5′ स्थिति पर फॉस्फोरिक अम्ल से जुड़ता है तो न्यूक्लिओटाइड बनता है। अतः न्यूक्लिओसाइड में केवल पेन्टोस शर्करा तथा क्षारक होता है जबकि न्यूक्लिओटाइड में इनके अतिरिक्त फॉस्फेट समूह भी होता है।

प्रश्न 14.23.
DNA के दो रज्जुक (Strands) समान नहीं होते, अपितु एक-दूसरे के पूरक (Complimentary) होते हैं। समझाइए |
उत्तर:
DNA की द्विकुंडलनी संरचना होती है। इसमें न्यूक्लिक अम्ल की दो श्रृंखलाएं आपस में कुंडलित होती हैं तथा क्षारक युग्मों के मध्य हाइड्रोजन बंध द्वारा आपस में जुड़ी रहती हैं। दोनों रज्जुक श्रृंखलाएं एक-दूसरे की पूरक होती हैं क्योंकि धारकों के विशिष्ट युग्मों के मध्य ही हाइड्रोजन बंध बनते हैं जैसे- ऐडेनीन, थायमीन के साथ तथा साइटोसीन, ग्वानीन के साथ हाइड्रोजन बंध बनाता है। अतः DNA के दो रज्जुक समान नहीं होते बल्कि एक-दूसरे के पूरक होते हैं।

प्रश्न 14.24.
DNA तथा RNA में महत्वपूर्ण संरचनात्मक एवं क्रियात्मक अंतर लिखिए।
उत्तर:
DNA तथा RNA में संरचनात्मक अंतर निम्नलिखित हैं-

  • DNA कोशिका के नाभिक में स्थित क्रोमोसोम में पाया जाता है जबकि RNA मुख्यतः कोशिका द्रव्य में पाया जाता है।
  • DNA में B-D-डीऑक्सीराइबोस शर्करा होती है जबकि RNA में B-D राइबोस शर्करा होती है।
  • पिरीमिडीन क्षारक, थायमीन केवल DNA में होता है जबकि यूरेसिल केवल RNA में होता है।
  • DNA की द्विकुंडलनी संरचना होती है जबकि RNA की एकल कुंडलनी संरचना होती है।

DNA तथा RNA में क्रियात्मक अन्तर – DNA में स्वप्रतिकरण का गुण होता है तथा यह आनुवांशिक गुणों के स्थानान्तरण को नियंत्रित करता है, जबकि RNA प्रोटीन संश्लेषण को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 14.25.
कोशिका में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के RNA कौनसे हैं ?
उत्तर:
कोशिका में पाए जाने वाले RNA तीन प्रकार के होते हैं जिनके कार्य भिन्न-भिन्न हैं। संदेशवाहक RNA (m-RNA), राइबोसोमल RNA (r-RNA) तथा अंतरण या स्थानान्तरण RNA (t-RNA) हैं।

HBSE 12th Class Chemistry जैव-अणु Intext Questions

प्रश्न 14.1.
ग्लूकोस तथा सूक्रोस जल में विलेय हैं जबकि साइक्लोहैक्सेन अथवा बेन्जीन (सामान्य छः सदस्यीय वलय युक्त यौगिक) जल में अविलेय होते हैं। समझाइए।
उत्तर:
ग्लूकोस तथा सूक्रोस के अणुओं में -OH समूह उपस्थित होने के कारण ये जल के साथ अन्तराअणुक हाइड्रोजन बन्ध बना लेते हैं अतः ये जल में विलेय हैं जबकि साइक्लोहैक्सेन तथा बेन्जीन हाइड्रोकार्बन हैं तथा ये अध्रुवीय यौगिक हैं अतः ये जल के साथ हाइड्रोजन बन्ध नहीं बना सकते इसलिये ये जल में अविलेय होते हैं।

प्रश्न 14.2.
लैक्टोस के जल अपघटन से किन उत्पादों के बनने की अपेक्षा करते हैं?
उत्तर:
लैक्टोस के जल अपघटन से D-(+) गेलेक्टेस तथा D-(+) ग्लूकोस बनते हैं। यह जल अपघटन तनु HCl या एन्जाइम की उपस्थिति में किया जात्म है।
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प्रश्न 14.3.
D-ग्लूकोस के पेन्टाऐसीटेट में आप ऐल्डिहाइड समूह की अनुपस्थिति को कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
D-ग्लूकोस के पेन्ट्राऐसीटेट में ऐल्डिहाइड समूह स्वतंत्र न होकर हेमीऐसिटैल के रूप में होता है। इसी कारण ग्लूकोस पेन्टाऐसीटेट हाइड्रोंक्सिल ऐमीन के साथ क्रिया नहीं करता।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 14 जैव-अणु

प्रश्न 14.4.
ऐमीनो अम्लों के गलनांक एवं जल में विलेयता सामान्यतः संगत हैलो अम्लों की तुलना में अधिक होती है। समझाइए।
उत्तर:
ऐमीनो अम्लों में एक ही अणु में अम्लीय तथा क्षारीय दोनों समूह उपस्थित होने के कारण ये ज्विटर आयन (NH3CHRCOO)के रूप में पाए जाते हैं अतः ये क्रिस्टलीय ठोस के समान व्यवहार करते हैं, इसलिए इनका गलनांक उच्च होता है तथा इनकी ध्रुवीय प्रकृति के कारण ये जल के साथ अंतराअणुक हाइड्रोजन बन्ध बना लेते हैं अतः ये जल में अत्यधिक विलेय भी होते हैं जबकि हैलो अम्लों में ज्विटर आयन नहीं बनते इसलिए इनके गलनांक तथा जल में विलेयता ऐमीनो अम्लों से कम होती है।

प्रश्न 14.5.
अंडे को उबालने पर उसमें उपस्थित जल कहाँ चला जाता है?
उत्तर:
अंडे को उबालने पर उसमें उपस्थित गोलाकार प्रोटीन विकृत हो जाती है। इस प्रक्रिया में जल का अवशोषण होता है अतः इसमें उपस्थित जल गायब हो जाता है।

प्रश्न 14.6.
हमारे शरीर में विटामिन C संचित क्यों नहीं होता?
उत्तर:
विटामिन C जल में विलेय होता है। अतः यह जलीय विलयन के रूप में हमारे शरीर से बाहर निकल जाता है। इस कारण यह हमारे शरीर में संचित नहीं होता।

प्रश्न 14.7.
यदि DNA के थायमीन युक्त न्यूक्लिओटाइड का जल अपघटन किया जाए तो कौन-कौनसे उत्पाद बनेंगे?
उत्तर:
DNA के थायमीनयुक्त न्यूक्लिओटाइड का जल अपघटन करने पर पेन्टोस शर्करा (β-D-2 डिऑक्सीराइबोस) फॉस्फोरिक अम्ल तथा थायमीन क्षारक ( नाइट्रोजनयुक्त विषमचक्रीय यौगिक ) प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 14.8.
जब RNA का जल अपघटन किया जाता है तो प्राप्त क्षारकों की मात्राओं के मध्य कोई संबंध नहीं होता। यह तथ्य RNA की संरचना के विषय में क्या संकेत देता है?
उत्तर:
RNA की संरचना में विभिन्न क्षारक युग्मों के मध्य निश्चित हाइड्रोजन बन्ध नहीं होता है तथा RNA की संरचना में कुण्डलनी केवल एक स्ट्रेण्ड से ही बनी होती है। अतः इसके जल अपघटन से प्राप्त क्षारकों की मात्राओं के मध्य कोई संबंध नहीं होता।

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HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन Textbook Exercise Questions and Answers.

प्रश्न 13.1.
निम्नलिखित यौगिकों को प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीनों में वर्गीकृत कीजिए तथा इनके आईयूपीएसी नाम लिखिए-
(i) (CH3),CHNH2
(ii) CH3(CH2)2NH2
(iii) CH3NHCH(CH3)2
(iv) (CH3)3CNH2
(v) C6H5NHCH3
(vi) (CH3CH2)2NCH3
(vii) HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 1
उत्तर:
(i) प्रोपेन 2-ऐमीन (1°)
(ii) प्रोपेन- 1- ऐमीन (1°)
(iii) N मेथिल प्रोपेन-2-ऐमीन (2°)
(iv) 2- मेथिल प्रोपेन 2- ऐमीन (1°)
(v) N-मेथिलबेन्जीनेमीन या N – मेथिलऐनिलीन (2°)
(vi) N. एथिल – N मेथिलएथेनेमीन (3°)
(vii) 3 ब्रोमोऐनिलीन या 3 – ब्रोमोबेन्जीनेमीन (1°)

प्रश्न 13.2.
निम्नलिखित युगलों के यौगिकों में विभेद के लिए एक रासायनिक परीक्षण दीजिए-
(i) मेथिलऐमीन एवं डाइमेथिलऐमीन
(ii) द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीन
(iii) ऐथिलऐमीन एवं ऐनिलीन
(iv) ऐनिलीन एवं बेन्जिलऐमीन
(v) ऐनिलीन एवं N मेथिलऐनिलीन ।
उत्तर:
(i) मेथिलऐमीन CH3-NH2 (1°) हिन्सबर्ग अभिकर्मक (C6H5 SO2Cl) से क्रिया करता है तथा बना उत्पाद क्षार में विलेय होता है। जबकि डाइमेथिलऐमीन CH3-NH-CH3(2°) की हिन्सबर्ग अभिकर्मक (बेन्जीन सल्फोनिल क्लोराइड) से क्रिया द्वारा बना उत्पाद धार में अविलेय होता है।

(ii) द्वितीयक ऐमीन (R2NH) हिन्सवर्ग अभिकर्मक से क्रिया करते हैं तथा बना उत्पाद धार में अविलेय होता है जबकि तृतीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक से क्रिया नहीं करते।

(iii) ऐथिलऐमीन बेन्जीन डाइएजोनियम क्लोराइड से क्रिया करके ऐजो रंजक (Azo dye) नहीं बनाता जबकि ऐनिलीन, बेन्जीन डाइएजोनियम क्लोराइड से क्रिया करके एजोरंजक (पीला) बनाती है।

(iv) ऐनिलीन, बेन्जीन डाइएजोनियम क्लोराइड (C6H5N2Cl) से क्रिया करके एजोरंजक बनाती है लेकिन बेन्जिलऐमीन ऐसा नहीं करती।

(v) ऐनिलीन (1°), CHCl3 तथा क्षार के साथ कार्बिलऐमीन परीक्षण देता है जबकि N मेथिल ऐनिलीन (2°) कार्बिल ऐमीन परीक्षण नहीं देती।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन

प्रश्न 13.3.
निम्नलिखित के कारण बताइए-
(i) ऐनिलीन का pKb मेथिलऐमीन की तुलना में अधिक होता
(ii) ऐथिलऐमीन जल में विलेय है जबकि ऐनिलीन नहीं।
(iii) मेथिलऐमीन फेरिक क्लोराइड के साथ जल में अभिक्रिया करने पर जलयोजित फेरिक ऑक्साइड का अवक्षेप देता है।
(iv) यद्यपि ऐमीनों समूह इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में आर्थों एवं पैरा निर्देशक होता है फिर भी ऐनिलीन नाइट्रोकरण द्वारा यथेष्ट मात्रा में मेटानाइट्रोऐनीलीन देती है।
(v) ऐनिलीन फ्रिडेल क्राफ्ट्स अभिक्रिया प्रदर्शित नहीं करती।
(vi) ऐरोमैटिक ऐमीनों के डाइऐजोनियम लवण ऐलीफैटिक ऐमीनों से प्राप्त लवण से अधिक स्थायी होते हैं।
(vii) प्राथमिक ऐमीन के संश्लेषण में गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण को प्राथमिकता दी जाती है।
उत्तर:
(i) मेथिल ऐमीन (CH3-NH2) में मैथिल समूह के +I प्रभाव (इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी प्रभाव ) के कारण नाइट्रोजन परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है अतः इसकी इलेक्ट्रॉन देने की प्रवृत्ति अधिक होती है।

इसलिए इसका क्षारीय गुण अधिक होता है जबकि ऐनिलीन HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 2 में नाइट्रोजन का एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेन्जीन वलय के साथ अनुनाद (+M प्रभाव) करता है जिससे इसके नाइट्रोजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है अतः इसकी इलेक्ट्रॉन देने की प्रवृत्ति कम हो जाती है इसलिए इसका क्षारीय गुण कम होता है। इसी कारण ऐनिलीन का pKb मेथिलऐमीन की तुलना में अधिक होता है क्योंकि क्षारीय गुण ∝ \(\frac{1}{\mathrm{pK}_{\mathrm{b}}} \propto \mathrm{K}_{\mathrm{b}}\) (क्षार वियोजन स्थिरांक)

(ii) ऐथिलऐमीन (C2H5NH2) जल के साथ हाइड्रोजन बन्ध बनाती है जबकि ऐनिलीन के C.H, समूह (अध्रुवीय) के बड़े आकार के कारण इसमें जल के साथ हाइड्रोजन बन्ध बनाने की प्रवृत्ति नहीं होती अतः ऐथिलऐमीन जल में विलेय है जबकि ऐनिलीन नहीं।

(iii) मैथिलऐमीन जलीय विलयन में OH आयन देता है जो FeCl3 (जलीय) के साथ क्रिया करके पहले हाइड्रॉक्साइड तथा वह फिर जलयोजित ऑक्साइड का अवक्षेप देता है। अभिक्रियाएँ निम्न प्रकार होती हैं-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 3

(iv) ऐमीनों समूह इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के लिए ऑर्थो तथा पैरा निर्देशी होता है लेकिन ऐनिलीन के नाइट्रीकरण में यथेष्ट मात्रा में मेटानाइट्रोऐनिलीन बनती है क्योंकि प्रबल अम्लीय माध्यम में ऐनिलीन प्रोटॉन ग्रहण करके ऐनिलीनियम आयन बनाती है जो कि मेटा निर्देशक है (-I प्रभाव के कारण)।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 4
इस अभिक्रिया में पैरा 51% तथा आर्थो उत्पाद (2%) भी बनते हैं।

(v) ऐनिलीन फ्रिडेल क्राफ्ट्स अभिक्रिया प्रदर्शित नहीं करती क्योंकि इस अभिक्रिया में प्रयुक्त उत्प्रेरक AlCl3 (ऐलुमिनियम क्लोराइड) लुइस अम्ल है अतः यह ऐनिलीन (लुईस क्षार) के साथ लवण बना लेता है। लवण बनने के कारण ऐनिलीन का नाइट्रोजन, धन आवेश प्राप्त कर लेता है जो कि प्रबल विसक्रियणकारी समूह है अतः इसकी क्रियाशीलता कम हो जाती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 5a

(vi) ऐरोमैटिक ऐमीनों के डाइएजोनियम लवण, ऐलीफैटिक ऐमीनों से प्राप्त लवण से अधिक स्थायी होते हैं क्योंकि इनमें अनुनाद के कारण स्थायित्व आ जाता है। C6H5N2+ की अनुनादी संरचनाएँ निम्न प्रकार होती हैं-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 5
ऐरीन डाइएजोनियम लवण विलयन में निम्न ताप पर (273-278K) कुछ समय के लिए ही स्थायी होते हैं।

(vii) गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण में R X से R-NH2 बनता है जिसमें शुद्ध प्राथमिक ऐमीन बनती है तथा अन्य कोई सहउत्पाद प्राप्त नहीं होते क्योंकि अभिक्रिया से प्राप्त थैलिक अम्ल पुनः प्रयुक्त हो जाता है जबकि अन्य अभिक्रियाओं में उत्पादों का मिश्रण बनता है। अतः प्राथमिक ऐमीन के संश्लेषण में गैब्रिएल थैलिमाइड अभिक्रिया को प्राथमिकता दी जाती है।

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प्रश्न 13.4.
निम्नलिखित को क्रम में लिखिए-
(i) pK, मान के घटते क्रम में-
C2H5NH2, C6H5NHCH3, (C2H5)2NH एवं C6H5NH2
(ii) क्षारकीय प्राबल्य के घटते क्रम में-
C6H5NH2, C6H5N(CH3)2, (C2H5)2NH एवं CH3NH2
(iii) क्षारकीय प्राबल्य के बढ़ते क्रम में-
(क) ऐनिलीन, पैरा-नाइट्रोऐनिलीन एवं पैरा-टॉलूडीन
(ख) C6H5NH2, C6H5NHCH3, C6H5CH2NH2
(iv) गैस अवस्था में घटते हुए क्षारकीय प्राबल्य के क्रम में-
C2H5NH2, (C2H5)2NH, (C2H5)3N एवं NH3
(v) क्वथनांक के बढ़ते क्रम में-
C2H5OH, (CH3)2NH, C2H5NH2
(vi) जल में विलेयता के बढ़ते क्रम में-
C6H5NH2, (C2H5)2NH, C2H5NH2
उत्तर:
(i) C6H5NH2 > (C6H5NHCH3 > C2H5NH2 > (C2H5)2NH (pKb मान का घटता क्रम अर्थात् क्षारीय प्रबलता का बढ़ता क्रम)

(ii) (C2H5)2NH > CH3-NH2 > C6H5N (CH3)2 > CH, NH (क्षारीय प्रबलता (प्राबल्य) का घटता क्रम )

(iii) (क) p-नाइट्रोऐनिलीन < ऐनिलीन < p-टॉलूडीन (क्षारीय प्रबाल्य का बढ़ता क्रम )
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 6a

(ख) C6H5NH2 < C6H5NHCH3 < C6H5CH2NH2

(iv) (C2H5)3N > (C2H5)2NH > C2H5NH2 > NH3
(गैसीय अवस्था में शारकीय प्राबल्य का घटता क्रम )

(v) (CH3)2NH < C2H5NH<sub2 < C2H5OH ( क्वथनांक का बढ़ता क्रम )

(vi) C6H5NH2 < (C2H5)2NH < C2H5NH2 (जल में विलेयता का बढ़ता क्रम)

प्रश्न 13.5.
इन्हें आप कैसे परिवर्तित करेंगे-
(i) एथेनॉइक अम्ल को मेथेनेमीन में
(ii) हैक्सेननाइट्राइल को 1- ऐमीनापेन्टेन में
(iii) मेथेनॉल को एथेनॉइक अम्ल में
(iv) एथेनेमीन को मेथेनेमीन में
(v) एथेनॉइक अम्ल को प्रोपेनॉइक अम्ल में
(vi) मेथेनेमीन को एथेनेमीन में
(vii) नाइट्रोमेथेन को डाइमेथिलऐमीन में
(viii) प्रोपेनॉइक अम्ल को एथेनॉइक अम्ल में ?
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 6

प्रश्न 13.6.
प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीनों की पहचान की विधि का वर्णन कीजिए। इन अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण भी लिखिए।
उत्तर:
प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीनों की पहचान निम्नलिखित विधियों से की जाती है-
कार्बिलऐमीन अभिक्रिया – ऐलिटिक तथा ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीनों को क्लोरोफ़ार्म तथा एथेनॉलिक पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड के साथ गर्म करने पर तीक्ष्ण दुर्गंधयुक्त पदार्थ आइसोसायनाइड अथवा कर्बिलऐमीन बनता है। द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीन में यह अभिक्रिया नहीं होती ।
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प्रश्न 13.7.
निम्न पर लघु टिप्पणी लिखिए-
(i) कार्बिलऐमीन अभिक्रिया
(ii) डाइऐजोकरण (डाइऐजोटीकरण).
(iii) हॉफमान ब्रोमाइड अभिक्रिया
(iv) युग्मन अभिक्रिया
(v) अमीनो अपघटन
(vi) ऐसीटिलन
(vii) गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण।
उत्तर:
(i) कार्बिलऐमीन अभिक्रिया – ऐलिटिक तथा ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीनों को क्लोरोफ़ार्म तथा एथेनॉलिक पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड के साथ गर्म करने पर तीक्ष्ण दुर्गंधयुक्त पदार्थ आइसोसायनाइड अथवा कर्बिलऐमीन बनता है। द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीन में यह अभिक्रिया नहीं होती ।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 7

(ii) डाइऐजोकरण या डाइऐजोटीकरण (Diazotisation ) – 273-278 K (निम्न ताप) ताप पर प्राथमिक ऐरोमैटिक ऐमीन की NaNO, तथा HCI से अभिक्रिया कराने पर एरीन डाइएजोनियम लवण बनते हैं। इस अभिक्रिया को डाइऐजोटीकरण कहते हैं।
ऐनीलीन की अभिक्रिया से बेन्जीन डाइऐजोनियम क्लोराइड बनता है। यह अस्थायी होता है अतः इसका प्रयोग तुरन्त कर लिया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 8
(iii) हॉफमान ब्रोमेमाइड अभिक्रिया (Hoffmann Bromamide Rcaction ) इस अधिक्रिया में किसी ऐमाइड की NaOH या KOH के जलीय अथवा ऐथेनॉलिक विलयन में ग्रोमीन से अभिक्रिया करते हैं तो प्राथमिक ऐमीन प्राप्त होती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 9

(iv) युग्मन अभिक्रिया ( Coupling Reaction ) – बेन्जीन डाइरजोनियम क्लोराइड, फ़ीनॉल से अभिक्रिया करके इसकी पैरा स्थिति पर युग्मित होकर पैरा हाइड्रॉक्सीऐजोबेन्जीन देता है। इस अभिक्रिया को युग्मन अभिक्रिया कहते हैं। इसी प्रकार डऐजोनियम लवण की ऐनोलीन से अभिक्रिया द्वारा पैशाऐमीनोऐजोबेन्जीन बनती है। यह एक इलेक्ट्रॉननेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया है। प्राप्त यौगिक रंगीन होते हैं तथा ये ऐजो रंजक होते हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 10

(v) अमोनी अपघटन (Ammonolysis ) – 373 K ताप पर एक बन्द नली में ऐल्किल अथवा बेन्जिल हैलाइडों की क्रिया एथ्रेनॉलिक अमोनिया के साथ करवाने पर हैलोजन परमाणु का प्रतिस्थापन ऐमीनों समूह द्वारा हो जाता है तथा प्राथमिक ऐमीन प्राप्त होता है। यह एक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया है। अमोनिया द्वारा ऐल्किल हैलाइड के कार्बन हैलोजन बन्ध के विखण्डन की इस प्रक्रिया को अमोनी अपघटन कहा जाता है। इस अभिक्रिया में प्राप्त प्राथमिक ऐमीन पुनः ऐल्किल हैलाइड से क्रिया करके 2° तथा 3° ऐमीन एवं अन्त में चतुष्क अमोनियम लवण बना देती है अतः यहाँ यौगिकों का मिश्रण बनता है। इस अभिक्रिया के लिए ऐल्किल हैलाइडों की क्रियाशीलता का क्रम निम्न प्रकार होता है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 10a
अभिक्रिया द्वारा प्राप्त ऐमीन, HX के साथ क्रिया करके लवण बना देती है जिसकी क्रिया प्रबल क्षार के साथ करवाने पर पुनः ऐमीन प्राप्त हो जाती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 10b
(i) इस अभिक्रिया द्वारा मुख्य उत्पाद के रूप में प्राथमिक ऐमीन प्राप्त करने के लिए अमोनिया को आधिक्य में लिया जाना चाहिए।

(ii) इस अभिक्रिया द्वारा ऐनिलीन बनाना मुश्किल होता है क्योंकि क्लोरो बेन्जीन में +M प्रभाव के कारण कार्बन क्लोरीन बन्ध में द्विबन्ध के गुण आ जाते हैं अतः इसकी क्रियाशीलता कम हो जाती है। इस कारण ऐनिलीन बनाने के लिए निम्नलिखित विशिष्ट विधियों का प्रयोग किया जाता है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 10c
(vi) ऐसिलीकरण – ऐलीफैटिक तथा ऐरोमैटिक प्राथमिक एवं ऐसिलीकरण-द्वितीयक ऐमीन, ऐसिड क्लोराइड तथा एसिड एनहाइड्राइड के साथ नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया करते हैं तो इसे ऐसिलीकरण अभिक्रिया कहते हैं। इस अभिक्रिया में -NH2 अथवा > NH समूह में उपस्थित हाइड्रोजन परमाणु का ऐसिल समूह द्वारा प्रतिस्थापन होता है। इस अभिक्रिया में CH3COCl लेने पर इसे ऐसिटिलीकरण (Acetylation) कहते हैं तथा यह अभिक्रिया पिरौडीन की उपस्थिति में की जाती है जिससे प्राप्त HCI का अवशोषण होकर साम्य अग्र दिशा में विस्थापित हो जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 10d
जब ऐमीनों की अभिक्रिया बेन्जॉयल क्लोराइड से करवाते हैं तो इस अभिक्रिया को बेन्जॉयलीकरण ( Benzoylation) कहते हैं तथा वैज्ञानिक के नाम के आधार पर इसे शॉटन बॉमन अभिक्रिया कहा जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 10e
ऐमीन कमरे के ताप पर कार्बोक्सिलिक अम्लों के साथ क्रिया करके लवण बनाती हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 10f

(vii) गैब्रिल थैलिमाइड संश्लेषण द्वारा (By Gabriel Pthallimide Synthesis) – ऐलिफैटक ऐमीन बनाने की यह एक उत्तम विधि है। इस विधि में थैलिमाइड की क्रिया एथेनॉलिक KOH से करवाते हैं तो इसका पोटैशियम लवण बनता है जिसे ऐल्किल हैलाइड के साथ गरम करके क्षारीय जल अपघटन कराने पर प्राथमिक ऐमीन बनते हैं। इस अभिक्रिया द्वारा ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीन, जैसे ऐनिलीन, सुगमता से नहीं बनती, क्योंकि ऐरिल हैलाइडों की क्रियाशीलता ऐल्किल हैलाइडों से कम होती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 11a

प्रश्न 13.8.
निम्न परिवर्तन निष्पादित कीजिए-
(i) नाइट्रो बेन्जीन से बेन्ज़ोइक अम्ल
(ii) बेन्जीन से m ब्रोमोफ़ीनॉल
(iii) बेन्जोइक अम्ल से ऐनिलीन
(iv) ऐनिलीन से 2,4, 6- ट्राइब्रोमोफ्लुओरोबेन्जीन
(v) बेन्जिल क्लोराइड से 2 फ्रेनिलएथेनेमीन
(vi) क्लोरोबेन्ज़ीन से p-क्लोरोऐनिलीन
(vii) ऐनिलीन से p-ब्रोमोऐनिलीन
(viii) बेन्ज़एमाइड से टॉलुईन
(ix) ऐनीलीन से बेन्ज़ाइल ऐल्कोहॉल।
उत्तर:
(i) नाइट्रोबेन्जीन से बेन्जोइक अम्ल-
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(ii) बेन्जीन से m ब्रोमोफ़ीनॉल
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(iii) बेन्जोइक अम्ल से ऐनिलीन
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 13
(iv) ऐनिलीन से 2,4, 6- ट्राइब्रोमोफ्लुओरोबेन्जीन
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 14
(v) बेन्जिल क्लोराइड से 2 फ्रेनिलएथेनेमीन
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 15
(vi) क्लोरोबेन्ज़ीन से p-क्लोरोऐनिलीन
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(vii) ऐनिलीन से p-ब्रोमोऐनिलीन
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(viii) बेन्ज़एमाइड से टॉलुईन
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 18
(ix) ऐनीलीन से बेन्ज़ाइल ऐल्कोहॉल।
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प्रश्न 13.9.
निम्न अभिक्रियाओं में A, B तथा C की संरचना दीजिए-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 20
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 21

प्रश्न 13.10.
एक ऐरोमैटिक यौगिक ‘A’ जलीय अमोनिया के साथ गरम करने पर यौगिक ‘B’ बनाता है जो Br, एवं KOH के साथ गरम करने पर अणु सूत्र C. H, N वाला यौगिक ‘C’ बनाता है। A, B एवं C यौगिकों की संरचना एवं इनके आईयूपीएसी नाम लिखिए।
उत्तर:
अभिक्रिया तथा A, B, C व उनके नाम अग्र प्रकार हैं-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 22

प्रश्न 13.11.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए-
(i) C6H5NH2 + CHCl3 + ( ऐल्कोहॉली) KOH →
(ii) C6H5N2Cl + H3PO2 + H2O →
(iii) C6H5NH2 + H2SO4 सांद्र
(iv) C6H5N2Cl + C2H5OH →
(v) C6H5NH2 + Br2 (aq) →
(vi) C6H5NH2 + (CH3CO)2 O
(vii) C6H5N2Cl HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 23
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 24

प्रश्न 13.12.
एैरोमैटिक प्राथमिक ऐमीन को गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण से क्यों नहीं बनाया जा सकता?
उत्तर:
ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीन को गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण से नहीं बना सकते क्योंकि ऐरिल हैलाइड में अनुनाद (+M प्रभाव) के कारण कार्बन हैलोजन आंबन्ध में द्विआबन्ध के गुण आ जाते हैं अतः वह प्रबल हो जाता है। इस कारण ऐरिल हैलाइड थैलिमाइड से प्राप्त ऋणायन के साथ नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया नहीं कर पाते हैं।

प्रश्न 13.13.
ऐलिफैटिक एवं ऐरोमैटिक ऐमीनों की नाइट्रस अम्ल से अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
ऐलिफैटिक प्राथमिक ऐमीन नाइट्रस अम्ल के साथ अभिक्रिया’ द्वारा मुख्यतः ऐल्कोहॉल देते हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 25
ऐरोमैटिक अम्ल नाइट्रस अम्ल (NaNO2 + HCl) से क्रिया करके डाइएजोनियम लवण बनाते हैं।
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प्रश्न 13.14.
निम्नलिखित में प्रत्येक का संभावित कारण बताइए-
(i) समतुल्य अणु द्रव्यमान वाले ऐमीनों की अम्लता ऐल्कोहॉलों से कम होती है।
(ii) प्राथमिक ऐमीनों का क्वथनांक तृतीयक ऐमीनों से अधिक होता है।
(iii) ऐरोमैटिक ऐमीनों की तुलना में ऐलीफैटिक ऐमीन प्रबल क्षारक होते हैं।
उत्तर:
(i) समतुल्य अणु द्रव्यमान वाले ऐमीनों की अम्लता ऐल्कोहॉलों से कम होती है क्योंकि ऐमीनों में – NH बन्ध की ध्रुवता ऐल्कोहॉलों के – O-H बन्ध की ध्रुवता से कम होती है क्योंकि ऑक्सीजन की विद्युतऋणता, नाइट्रोजन से अधिक है अतः ऐमीनों में ऐल्कोहॉलों की तुलना में H देने की प्रवृत्ति कम होती है।

(ii) प्राथमिक ऐमीनों में नाइट्रोजन पर दो हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित हैं जिनके कारण इनमें प्रबल अन्तराआण्विक हाइड्रोजन बन्ध होता है जिससे
आण्विक सगुणन (Molecular association) अधिक होता है जबकि तृतीयक ऐमीन में नाइट्रोजन पर हाइड्रोजन परमाणु नहीं होने के कारण हाइड्रोजन बन्ध नहीं बनता अतः प्राथमिक ऐमीनों का क्वथनांक तृतीयक ऐमीनों से अधिक होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 27

(iii) ऐलिफैटिक ऐमीन में ऐल्किल समूह के + I प्रभाव (इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी प्रभाव) के कारण नाइट्रोजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है अतः – NH2 समूह की इलेक्ट्रॉन युग्म देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है अतः ये अधिक क्षारीय होते हैं जबकि ऐरोमैटिक ऐमीन में – NH2 के नाइट्रोजन परमाणु का एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेन्जीन वलय के साथ अनुनाद करता है (+M प्रभाव) जिससे इस पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है तथा इसकी इलेक्ट्रॉन युग्म देने की प्रवृत्ति कम हो जाती है अतः ये कम क्षारीय होते हैं।

HBSE 12th Class Chemistry ऐमीन Intext Questions

प्रश्न 12.1.
निम्न यौगिकों की संरचना लिखिए-
(i) α-मेथॉक्सीप्रोप्रिऑनऐल्डिहाइड
(ii) 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनैल
(iii) 2-हाइड्रॉक्सीसाइक्लोपेन्टेन कार्बैल्डिहाइड
(iv) 4-ऑक्सोपेन्टेनैल
(v) डाइ-द्वितीयकब्यूटिल कीटोन
(vi) 4-क्लोरोऐसीटोफीनॉन
उत्तर:
उपरोक्त यौगिकों की संरचना निम्नलिखित है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 28

प्रश्न 12.2
निम्न अभिक्रियाओं के उत्पादों की संरचना लिखिए-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 29
उत्तर:
उपरोक्त अभिक्रियाओं के उत्पादों की संरचना अग्र प्रकार है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 30

प्रश्न 12.3.
निम्नलिखित यौगिकों को उनके क्वथनांकों के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
CH3CHO, CH3CH2OH, CH3OCH3, CH3CH2CH3
उत्तर:
CH3-CH3-CH3 < CH3-O-CH3 < CH3-CHO< CH3-CH2-OH
क्वथनांकों का बढ़ता क्रम

प्रश्न 12.4.
निम्नलिखित यौगिकों को नाभिकरागी योगात्मक (Addition) अभिक्रियाओं में उनकी बढ़ती हुई अभिक्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
(क) एथेनैल, प्रोपेनैल, प्रोपेनोन, ब्यूटेनोन
(ख) बेन्जैल्डिहाइ ड, p-टॉलू ऐल्डिहाइ ड, p-नाइट्रोबेन्जैल्डिहाइड, ऐसीटोफीनोन।
संकेत-त्रिविम प्रभाव व इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव को ध्यान में रखें।
उत्तर:
उपर्युक्त यौगिकों की नाभिकरागी योगात्मक अभिक्रियाओं में बढ़ती हुई क्रियाशीलता का क्रम निम्न प्रकार है-
(क) ब्यूटेनोन < प्रोपेनोन < प्रोपेनैल < एथेनैल
(ख) ऐसीटोफ़ीनोन <p-टॉलूऐल्डिहाइड < बेन्जैल्डिहाइड <p-नाइट्रोबेन्जैल्डिहाइड।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन

प्रश्न 12.5.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के उत्पादों को पहचानिए-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 31
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 32

प्रश्न 12.6.
निम्नलिखित यौगिकों के आईयूपीएसी नाम दीजिए-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 33
उत्तर:
उपरोक्त यौगिकों के आईयूपीएसी नाम निम्न प्रकार हैं-
(i) 3-फेनिलप्रोपेनॉइक अम्ल
(ii) 3-मेथिलब्यूट-2-इनोइक अम्ल
(iii) 2-मेथिलसाइक्लोपेन्टेनकार्बोक्सिलिक अम्ल
(iv) 2,4,6-ट्राईनाइट्रोबेन्जोइक अम्ल

प्रश्न 12.7.
निम्नलिखित यौगिकों को बेन्जोइक अम्ल में कैसे परिवर्तित किया जा सकता है?
(i) एथिलबेन्जीन
(ii) ऐसीटोफीनोन
(iii) ब्रोमोबेन्जीन
(iv) फेनिलएथीन (स्टाइरीन)।
उत्तर:
उपर्युक्त यौगिकों को बेन्जोइक अम्ल में निम्न प्रकार परिवर्तित किया जा सकता है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 34

प्रश्न 12.8.
नीचे प्रदर्शित अम्लों के प्रत्येक युग्म में कौनसा अम्ल अधिक प्रबल है ?
(i) CH3CO2H अथवा CH2FCO2H
(ii) CH2FCO2H अथवा CH2ClCO2H
(iii) CH2FCH2CH2CO2H अथवा CH2CHFCH2CO2H
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 35
उत्तर:
उपर्युक्त युग्मों में से अधिक प्रबल अम्ल निम्नलिखित हैं-
(i) CH2FCOOH
(ii) CH2FCOOH
(iii) CH2CHFCH2COOH
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 13 ऐमीन 36

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HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

Haryana State Board HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Economics Solutions Chapter 13 उत्पादन तथा लागत

पाठयपुस्तक के प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्पादन फलन की संकल्पना को समझाइए।
उत्तर:
उत्पादन फलन से अभिप्राय भौतिक आगतों और अधिकतम संभावित निर्गत के तकनीकी संबंध से है। अर्थात् उत्पादन फलन (q) = f (L, K)
यहाँ f = फलन
L = श्रम की भौतिक इकाइयाँ
K = पूँजी की भौतिक इकाइयाँ
उत्पादन फलन दो प्रकार के हो सकते हैं-

  • आगतों का स्थिर अनुपात उत्पादन फलन
  • आगतों का परिवर्ती अनुपात उत्पादन फलन

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 2.
एक आगत का कुल उत्पाद क्या होता है?
उत्तर:
एक आगत (Input) का कुल उत्पाद उस आगत की सभी इकाइयों से प्राप्त कुल निर्गत (Output) है यदि अन्य आगतों को स्थिर रखा जाता है। अन्य शब्दों में, उत्पादन प्रक्रिया में प्रयोग हुई परिवर्ती कारक की प्रत्येक इकाई के उत्पादन का योग कुल उत्पाद है। अर्थात्
TP = \(\sum_{i=1}^{n} \mathrm{MP}\)
एक परिवर्ती कारक की सभी इकाइयों के सीमांत उत्पाद (MP) को जोड़कर हम कुल उत्पाद (TP) प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 3.
एक आगत का औसत उत्पाद क्या होता है?
उत्तर:
एक आगत का औसत उत्पाद उस आगत के कुल उत्पाद को परिवर्ती आगत की इकाइयों से विभाजित करने से प्राप्त उत्पाद है। इस प्रकार,
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 1

प्रश्न 4.
एक आगत का सीमांत उत्पाद क्या होता है?
उत्तर:
एक आगत का सीमांत उत्पाद उस आगत की अतिरिक्त इकाई में परिवर्तन करने से कुल उत्पाद में होने वाला परिवर्तन है। इस प्रकार,
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 2

प्रश्न 5.
एक आगत के सीमांत उत्पाद तथा कुल उत्पाद के बीच संबंध समझाइए।
उत्तर:
परिवर्ती अनुपातों के नियम के अनुसार सीमांत उत्पाद और कुल उत्पाद में महरा संबंध है और सीमांत उत्पाद के कारण ही कुल उत्पाद में परिवर्तन होता है। सीमांत उत्पाद और कुल उत्पाद तीन अवस्थाओं से गुजरता है-

  • प्रथम अवस्था में, जब सीमांत उत्पाद बढ़ता है तो कुल उत्पाद अधिक दर से बढ़ता है।
  • द्वितीय अवस्था में, जब सीमांत उत्पाद घटता है तो कुल उत्पाद घटती हुई दर से बढ़ता है।
  • तृतीय अवस्था में, जब सीमांत उत्पाद ऋणात्मक होता है तो कुल उत्पाद भी घटता है।

इस संबंध को हम निम्न तालिका द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं-

श्रमिकों की संख्यासीमांत उत्पादकुल उत्पाद
1100100
2120220
3130350
4100450
560510
620530
700530
8-10520

प्रश्न 6.
अल्पकाल तथा दीर्घकाल की संकल्पनाओं को समझाइए।
उत्तर:
अल्पकाल समय की वह अवधि है जिसमें उत्पादन के कुछ कारक स्थिर और कुछ परिवर्ती होते हैं, जिनके फलस्वरूप उत्पादन में परिवर्तन एक सीमा में ही किया जा सकता है। दीर्घकाल समय की वह अवधि है जिसमें उत्पादन के सभी कारक परिवर्ती होते हैं, जिसके फलस्वरूप उत्पादन में परिवर्तन वांछित मात्रा में किया जा सकता है।

प्रश्न 7.
हासमान सीमांत उत्पाद का नियम क्या है?
उत्तर:
हासमान सीमांत उत्पाद का नियम यह बताता है कि जब स्थिर कारकों (Constant Factors) के साथ परिवर्ती कारक (Variable Factors) की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो एक सीमा के पश्चात् कुल उत्पाद घटती दर से प्राप्त होते हैं।

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 8.
परिवर्ती अनुपात का नियम क्या है?
उत्तर:
परिवर्ती अनुपात का नियम यह बताता है कि जब स्थिर आगतों के साथ परिवर्ती आगत की मात्रा में वृद्धि की जाती है, तो पहले औसत तथा सीमांत उत्पाद एक सीमा तक बढ़ेंगे और उसके पश्चात् घटने लगेंगे।

प्रश्न 9.
एक उत्पादन फलन स्थिर पैमाने के प्रतिफल को कब संतुष्ट करता है?
उत्तर:
एक उत्पादन फलन स्थिर पैमाने के प्रतिफल को उस समय संतुष्ट करता है, जब सभी आगतों की इकाइयों में निश्चित अनुपात में वृद्धि करने से कुल उत्पाद में भी उसी अनुपात में वृद्धि हो।

प्रश्न 10.
एक उत्पादन फलन वर्धमान पैमाने के प्रतिफल को कब संतुष्ट करता है?
उत्तर:
एक उत्पादन फलन वर्धमान पैमाने के प्रतिफल को उस समय संतुष्ट करता है, जब कुल उत्पाद में उस अनुपात से अधिक वृद्धि होती है जिस अनुपात में आगतों को बढ़ाया जाता है।

प्रश्न 11.
एक उत्पादन फलन ह्रासमान पैमाने के प्रतिफल को कब संतुष्ट करता है?
उत्तर:
एक उत्पादन फलन ह्रासमान पैमाने के प्रतिफल को उस समय संतुष्ट करता है, जब कुल उत्पाद में उस अनुपात से कम वृद्धि होती है जिस अनुपात में आगतों को बढ़ाया जाता है।

प्रश्न 12.
लागत फलन की संकल्पनाओं को संक्षिप्त में समझाइए।
उत्तर:
लागत फलन एक निर्गत स्तर और उसकी न्यूनतम लागत के संबंध को दर्शाता है। लागत फलन को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है
C = f(Q, P, T, K………) यहाँ C = कुल लागत, f= फलन, Q = निर्गत, P = आगतों की कीमतें, T = उत्पादन तकनीक, K = मशीनरी।

प्रश्न 13.
एक फर्म की कुल स्थिर लागत, कुल परिवर्ती लागत तथा कुल लागत क्या हैं? वे किस प्रकार संबंधित हैं?
उत्तर:
कुल स्थिर लागत से हमारा अभिप्राय उन लागतों से है जो विभिन्न उत्पादन स्तरों पर एक-समान रहती हैं। कुल परिवर्ती लागत से हमारा अभिप्राय उन लागतों से है जो उत्पादन में परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तित होती हैं। कुल लागत से हमारा अभिप्राय उन सभी लागतों से है जिसका संबंध एक वस्तु के उत्पादन से है। कुल लागत, कुल स्थिर लागत और कुल परिवर्ती लागत का जोड़ है। इस प्रकार,
कुल लागत = कुल स्थिर लागत + कुल. परिवर्ती लागत

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 14.
एक फर्म की औसत स्थिर लागत, औसत परिवर्ती लागत तथा औसत लागत क्या है, वे किस प्रकार संबंधित हैं?
उत्तर:
औसत स्थिर लागत से अभिप्राय प्रति इकाई स्थिर लागत से है। कुल स्थिर लागत को उत्पादन की मात्रा (इकाइयों) से भाग देने पर औसत स्थिर लागत प्राप्त होती है। अर्थात्
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 3
औसत परिवर्ती लागत से अभिप्राय प्रति इकाई परिवर्ती लागत से है। कुल परिवर्ती लागत को उत्पादन की मात्रा (इकाइयों) से भाग देने पर औसत परिवर्ती लागत प्राप्त होती है। अर्थात्
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 4
औसत लागत से अभिप्राय प्रति इकाई उत्पादन लागत से है। कुल लागत को उत्पादन की मात्रा (इकाइयों) से भाग देने पर औसत लागत प्राप्त होती है। अर्थात्
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 5
इस प्रकार औसत लागत, औसत स्थिर लागत और औसत परिवर्ती लागत का योग है।

प्रश्न 15.
क्या दीर्घकाल में कुछ स्थिर लागत हो सकती है? यदि नहीं तो क्यों?
उत्तर:
दीर्घकाल में कोई भी लागत स्थिर नहीं हो सकती, क्योंकि दीर्घकाल वह अवधि है जिसमें सभी आगत परिवर्ती हो जाते हैं।

प्रश्न 16.
औसत स्थिर लागत वक्र कैसा दिखता है? यह ऐसा क्यों दिखता है?
उत्तर:
औसत स्थिर लागत वक्र एक आयताकार अतिपरवलय (Rectangular Hyperbola) होता है। यदि हम निर्गत (उत्पादन) के किसी भी मूल्य को उससे संबंधित औसत स्थिर लागत से गुणा करते हैं, तब हम कुल स्थिर लागत प्राप्त करते हैं। औसत स्थिर लागत वक्र को संलग्न रेखाचित्र द्वारा दर्शाया गया है। औसत स्थिर लागत वक्र का आकार आयताकार अतिपरवलय होता है क्योंकि इस वक्र के विभिन्न बिंदुओं पर वक्र के नीचे कुल क्षेत्रफल समान रहता है।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 6

प्रश्न 17.
अल्पकालीन सीमांत लागत, औसत परिवर्ती लागत तथा अल्पकालीन औसत लागत वक्र कैसे दिखाई देते हैं?
उत्तर:
अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र, औसत परिवर्ती लागत वक्र और अल्पकालीन औसत लागत वक्र-ये तीनों वक्र U आकार के होते हैं, परंतु इनका यह आकार एक-समान नहीं होता। ऐसा परिवर्ती अनुपातों के नियम के लागू होने के कारण होता है। इन लागत वक्रों को संलग्न रेखाचित्र द्वारा दर्शाया गया है। संलग्न रेखाचित्र से यह स्पष्ट है कि एक सीमा तक ये तीनों वक्र नीचे गिरते हैं और फिर ऊपर उठने लगते हैं। अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र तेजी से नीचे गिरता है और तेजी से ऊपर उठता है। ऊपर उठते हुए यह वक्र औसत परिवर्ती लागत वक्र और अल्पकालीन औसत लागत वक्र को उनके न्यूनतम बिंदुओं पर काटता है।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 7
औसत परिवर्ती लागत और अल्पकालीन औसत परिवर्ती लागत वक्र धीरे-धीरे गिरते हैं और फिर धीरे-धीरे ऊपर उठते हैं। प्रारंभिक अवस्था में तीनों वक्रों में अधिक अंतर होता है लेकिन बाद में यह अंतर कम होता जाता है परंतु ये वक्र कभी-भी एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते।

प्रश्न 18.
क्यों अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र औसत परिवर्ती लागत वक्र को काटता है, औसत परिवर्ती लागत वक्र के न्यूनतम बिंदु पर?
उत्तर:
अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र और औसत परिवर्ती लागत वक्र दोनों ही ‘U’ आकार के होते हैं क्योंकि परिवर्ती अनुपातों का नियम लागू होता है। प्रारंभिक अवस्था में दोनों वक्र नीचे गिरते हुए होते हैं और एक सीमा के बाद दोनों ऊपर उठते हुए होते हैं। लेकिन सीमांत लागत के बढ़ने और घटने की दर औसत परिवर्ती लागत के बढ़ने और घटने की दर से अधिक होती है। इसलिए सीमांत लागत वक्र प्रारंभ में औसत परिवर्ती लागत वक्र से नीचे होता है और कुछ सीमा के बाद उठते हुए औसत लागत वक्र को न्यूनतम स्तर पर काटते हुए ऊपर उठता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 8

प्रश्न 19.
किस बिंदु पर अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र अल्पकालीन औसत लागत वक्र को काटता है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण बताइए।
उत्तर:
अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र अल्पकालीन औसत लागत वक्र को उसके न्यूनतम बिंदु पर काटता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं। रेखाचित्र से यह स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक अवस्था में अल्पकालीन औसत लागत वक्र और अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र दोनों ही नीचे गिरते हुए होते हैं, लेकिन अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र अल्पकालीन औसत लागत वक्र की तुलना में तेजी से गिरता है। अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र अल्पकालीन औसत लागत वक्र की तुलना में अधिक ऊपर उठता है। ऊपर उठते हुए अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र, अल्पकालीन औसत लागत वक्र को उसके न्यूनतम बिंदु पर काटता है। जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ता जाता है, दोनों ही वक्र ऊपर उठते हैं परंतु अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र तेजी से ऊपर उठता है।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 9

प्रश्न 20.
अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र ‘U’ आकार का क्यों होता
उत्तर:
अल्पकालीन सीमांत लागत (MC) वक्र ‘U’ आकार का इसलिए होता है क्योंकि अल्पकाल में परिवर्ती अनुपातों का नियम लागू होता है। परिवर्ती अनुपातों के नियम के कारण सीमांत उत्पाद प्रारंभ में तेजी से बढ़ता है और एक सीमा के बाद सीमांत उत्पाद गिरने लगता है। सीमांत उत्पाद वक्र उल्टे ‘U’ आकार का होता है। जबकि अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र का आकार ‘U’ की तरह होता है जो यह दर्शाता है कि प्रारंभिक अवस्था में सीमांत लागत गिरती है और बाद में उठती है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 10

प्रश्न 21.
दीर्घकालीन सीमांत लागत तथा औसत लागत वक्र कैसे दिखते हैं?
उत्तर:
दीर्घकाल में एक फर्म के सीमांत लागत वक्र और औसत लागत वक्र पैमाने के प्रतिफल पर निर्भर करते हैं। पैमाने के प्रतिफल की तीन अवस्थाएँ होती हैं-वर्धमान प्रतिफल, स्थिर प्रतिफल और ह्रासमान प्रतिफल। इन अवस्थाओं के कारण दीर्घकाल में औसत लागत वक्र और सीमांत लागत वक्र ‘U’ आकार का होता है, लेकिन अल्पकालीन औसत लागत वक्र और सीमांत लागत वक्र की तुलना में दीर्घकालीन औसत लागत व सीमांत लागत वक्र कम गहरे अर्थात् अधिक चपटे होते हैं। दीर्घकालीन औसत लागत वक्र तश्तरी (Dish) का आकार भी ग्रहण कर सकता है। इसे हम संलग्न रेखाचित्र द्वारा दिखा सकते हैं।
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 11

प्रश्न 22.
निम्नलिखित तालिका श्रम का कुल उत्पादन अनुसूची देती है। तदनुरूप श्रम का औसत उत्पाद तथा सीमांत उत्पाद अनुसूची निकालिए।

L012345
कुल उत्पाद01535504048

हल
औसत उत्पाद तथा सीमांत उत्पाद अनुसूची

श्रम की इकाइयाँ (L)कुल उत्पादऔसत उत्पादसीमांत उत्पाद
0000
1151515
23517.520
35016.6715
4401010
5489.68

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 12

प्रश्न 23.
नीचे दी हुई तालिका श्रम का औसत उत्पाद अनुसूची बताती है। कुल उत्पाद तथा सीमांत उत्पाद अनुसूची निकालिए, जबकि श्रम प्रयोगता के शून्य स्तर पर यह दिया गया है कि कुल उत्पाद शून्य है।

L123456
कुल उत्पाद2344.2543.5

हल
कुल उत्पाद तथा सीमांत उत्पाद अनुसूची

श्रम की इकाइयाँ (L)औसत उत्पादकुल उत्पादसीमांत उत्पाद
0000
1222
2364
34126
44.25175
54203
63.5211

सूत्रों का प्रयोग : (i) कुल उत्पाद = औसत उत्पाद x श्रम की इकाइयाँ
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 13

प्रश्न 24.
निम्नलिखित तालिका श्रम का सीमांत उत्पादं अनुसूची देती है। यह भी दिया गया है कि श्रम का कुल उत्पाद शून्य है। प्रयोग के शून्य स्तर पर श्रम के कुल उत्पाद तथा औसत उत्पाद अनुसूची की गणना कीजिए।

L123456
सीमांत उत्पाद357531

हल
कुल उत्पाद तथा औसत उत्पाद अनुसूची

श्रम की इकाइयाँ (L)सीमांत उत्पादकुल उत्पादऔसत उत्पाद
0000
1333
2584
37155
45205
53234.6
60244

सूत्रों का प्रयोग:
(i) कुल उत्पाद = सीमांत उत्पाद1 + सीमांत उत्पाद2 + ………+ सीमांत उत्पादn
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 14

प्रश्न 25.
नीचे दी गई तालिका एक फर्म की कुल लागत अनुसूची दर्शाती है। इस फर्म का कुल स्थिर लागत क्या है? फर्म के कुल परिवर्ती लागत, कुल स्थिर लागत, औसत परिवर्ती लागत, अल्पकालीन औसत लागत तथा अल्पकालीन सीमांत लागत अनुसूची की गणना कीजिए।

Q0123456
कुल उत्पाद103045557090120

हल:
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 15
सूत्रों का प्रयोग-
(i) कुल स्थिर लागत = शून्य उत्पादन पर कुल लागत

(ii) कुल परिवर्ती लागत = कुल लागत कुल स्थिर लागत
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 16

प्रश्न 26.
निम्नलिखित तालिका एक फर्म के लिए कुल लागत अनुसूची देती है। यह भी दिया गया है कि औसत स्थिर लागत निर्गत की 4 इकाइयों पर 5 रुपए है। कुल परिवर्ती लागत, कुल स्थिर लागत, औसत परिवर्ती लागत, औसत स्थिर लागत, अल्पकालीन औसत लागत, अल्पकालीन सीमांत लागत अनुसूची फर्म के निर्गत के तदनुरूप मूल्यों के लिए निकालिए।

Qकुल लागत
150
265
375
495
5130
6185

हल:
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 17
सूत्रों का प्रयोग
(i) कुल स्थिर लागत = शून्य उत्पादन पर कुल लागत

(ii) कुल परिवर्ती लागत = कुल लागत-कुल स्थिर लागत
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 18

प्रश्न 27.
एक फर्म की अल्पकालीन सीमांत लागत अनुसूची निम्नलिखित तालिका में दी गई है। फर्म की स्थिर लागत 100 रुपए है। फर्म के कुल परिवर्ती लागत, कुल लागत, औसत परिवर्ती लागत तथा अल्पकालीन औसत लागत अनुसूची निकालिए।

Qअल्पकालीन सीमांत लागत
0
1500
2300
3200
4300
5500
6800

हल:
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 19
सूत्रों का प्रयोग
(i) कुल परिवर्ती लागत = अल्पकालीन सीमांत लागत1 + अल्पकालीन सीमांत लागत2 +…….. + अल्पकालीन सीमांत लागतn

(ii) कुल लागत = कुल परिवर्ती लागत + कुल स्थिर लागत
HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत 20

प्रश्न 28.
मान लीजिए, एक फर्म का उत्पादन फलन है, q = \(5 \mathrm{~L}^{\frac{1}{2}} \mathrm{~K}^{\frac{1}{2}}\) 100 इकाइयाँ L तथा 100 इकाइयाँ K द्वारा अधिकतम संभावित निर्गत निकालिए, जिसका उत्पादन फर्म कर सकती है।
हल:
उत्पादन फलन
q = \(5 \mathrm{~L}^{\frac{1}{2}} \mathrm{~K}^{\frac{1}{2}}\) = 100
यहाँ,
L = 100
K = 100
इस प्रकार,
q = \(5 \times 100^{\frac{1}{2}} \times 100^{\frac{1}{2}}\)
q = 5 x 10 x 10
= 500
अधिकतम संभावित निर्गत = 500 उत्तर

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

प्रश्न 29.
मान लीजिए, एक फर्म का उत्पादन फलन है, q = 2L²K² 5 इकाइयाँ L तथा 2 इकाइयाँ K द्वारा अधिकतम संभावित निर्गत ज्ञात कीजिए, जिसका फर्म उत्पादन कर सकती है। शून्य इकाई L तथा 10 इकाई K द्वारा अधिकतम संभावित निर्गत क्या है, जिसका फर्म उत्पादन कर सकती है?
हल:
उत्पादन फलन-
q = 2L²K²
यहाँ,
L = 5
K = 2
इस प्रकार,
q = 2 x 5² x 2²
= 2 x 5 x 5 x 2 x 2
अधिकतम संभावित निर्गत = 200
यदि,
L = 0
K = 10
इस प्रकार,
q = 2L²K²
= 2 x 0 x 10²
= 2 x 0 x 0 x 10 x 10
= शून्य
अधिकतम संभावित निर्गत = शून्य उत्तर

प्रश्न 30.
एक फर्म के लिए शून्य इकाई L तथा 10 इकाइयाँ K द्वारा अधिकतम संभावित निर्गत निकालिए, जब इसका उत्पादन फलन है-q = 5L x 2K
हल:
उत्पादन फलन
q = 5L x 2K
यहाँ,
L = 0
K = 10
इस प्रकार,
q = 5 x 0 x 2 x 10
= शून्य
अधिकतम संभावित निर्गत = शून्य उत्तर

उत्पादन तथा लागत HBSE 12th Class Economics Notes

→ उत्पादन फलन-एक फर्म का उत्पादन फलन उपयोग में लाए गए आगतों तथा फर्म द्वारा उत्पादित निर्गतों के मध्य का संबंध है। उपयोग में लाए गए आगतों की विभिन्न मात्राओं के लिए यह निर्गत की अधिकतम मात्रा प्रदान कर सकता है, जिसका उत्पादन किया जा सकता है। उत्पादन फलन को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है
q = f(x1 + x2)
यह बताता है कि हम कारक 1 की x1 मात्रा तथा कारक 2 की x2 मात्रा का प्रयोग कर वस्तु की अधिकतम मात्रा q का उत्पादन कर सकते हैं।

→ कुल उत्पाद-किसी विशेष अवधि में कारकों की किसी विशेष मात्रा में फर्म द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की कुल .. मात्रा को कुल उत्पाद (TP) कहा जाता है।

→ औसत उत्पाद औसत उत्पाद निर्गत की प्रति इकाई परिवर्ती आगत के रूप में परिभाषित किया जाता है।

→ सीमांत उत्पाद-निर्गत के एक स्थिर कारक पर परिवर्ती कारक की एक अतिरिक्त इकाई लगाने से कुल उत्पाद में जो वृद्धि होती है, उसे सीमांत उत्पाद कहा जाता है।

→ परिवर्ती अनुपातों का नियम-परिवर्ती अनुपात का नियम बताता है कि जैसे-जैसे स्थिर कारक के साथ एक परिवर्ती कारक की अधिक-से-अधिक इकाइयों का प्रयोग किया जाता है तो एक स्थिति ऐसी अवश्य आ जाती है जब परिवर्ती कारक का अतिरिक्त योगदान अर्थात् परिवर्ती कारक का सीमांत उत्पादन कम होने लगता है।

→ कारक के प्रतिफल-यदि उत्पादक उत्पादन में परिवर्तन अन्य कारकों को स्थिर रखकर उत्पादन के केवल एक ही कारक में वृद्धि अथवा कमी के द्वारा करता है तथा इसके फलस्वरूप उत्पादन के कारकों के मिश्रण का अनुपात बदलता है तो उत्पादन और उत्पादन के कारकों के इस संबंध को कारक के प्रतिफल या परिवर्ती अनुपात का नियम कहते हैं।

→ उत्पादन की तीन अवस्थाएँ होती हैं-

प्रथम अवस्था बढ़ते (वर्धमान) प्रतिफल की है जब परिवर्ती कारक का सीमांत उत्पाद (MP) बढ़ रहा होता है।
दूसरी अवस्था घटते (हासमान) प्रतिफल की है जब परिवर्ती कारक का सीमांत उत्पाद (MP) घट रहा (किंतु धनात्मक) होता है।
तीसरी अवस्था ऋणात्मक प्रतिफल की है जब परिवर्ती कारक का सीमांत उत्पाद (MP) ऋणात्मक होता है। उत्पादक केवल दूसरी अवस्था में ही उत्पादन करेगा, प्रथम और तीसरी अवस्थाओं में नहीं।

HBSE 12th Class Economics Solutions Chapter 3 उत्पादन तथा लागत

→ कारक के प्रतिफल या परिवर्ती अनुपात के नियम की अवस्थाएँ-

  • कारक के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल
  • कारक के समान प्रतिफल
  • कारक के ह्रासमान (घटते) प्रतिफल।

→ पैमाने के प्रतिफल पैमाने के प्रतिफल का संबंध सभी कारकों के समान अनुपात में होने वाले परिवर्तनों के फलस्वरूप कुल उत्पाद में होने वाले परिवर्तन से है।

→ पैमाने के प्रतिफल की तीन अवस्थाएँ-

  • पैमाने के वर्धमान (बढ़ते) प्रतिफल
  • पैमाने के ह्रासमान (घटते) प्रतिफल
  • पैमाने के स्थिर (समान) प्रतिफल।

→ औसत लागत-औसत लागत से अभिप्राय प्रति इकाई लागत से है।
या

→ औसत लागत औसत परिवर्ती लागत तथा औसत स्थिर लागत का जोड़ है। अर्थात्
AC = AVC + AFC
ध्यान रहे कि, AFC वक्र नीचे की ओर प्रवणता वाली होती है, जबकि AVC वक्र ‘U’ आकार की होती है।

→ सीमांत लागत-सीमांत लागत से अभिप्राय है एक इकाई का अधिक या कम उत्पादन करने से कुल लागत में होने वाला परिवर्तन।
MC = \(\)

→ अल्पकालीन सीमांत लागत, औसत परिवर्ती लागत तथा अल्पकालीन औसत लागत वक्र ‘U’ आकार के होते हैं।

→ अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र, औसत परिवर्ती लागत वक्र को नीचे से औसत परिवर्ती लागत के न्यूनतम बिंदु पर काटता है।

→ अल्पकालीन सीमांत लागत वक्र, अल्पकालीन औसत लागत वक्र को नीचे से अल्पकालीन औसत लागत के न्यूपर काटता है।

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HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन

प्रश्न 10.1
निम्नलिखित हैलाइडों के नाम आईयूपीएसी ( IUPAC ) पद्धति से लिखिए तथा उनका वर्गीकरण ऐल्किल, ऐलिलिक, बेन्ज़िलिक (प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक) वाइनिल अथवा ऐरिल हैलाइड के रूप में कीजिए –
(i) (CH3)2CHCH(Cl)CH3
(ii) CH3CH2CH(CH3)CH(C2H5)Cl
(iii) CH3CH2C(CH3)2CH2I
(iv) (CH3)3CCH2CH(Br)C6H5
(v) CH3CH(CH3)CH(Br)CH3
(vi) CH3C(C2H5)CH2Br
(vii) CH3C(Cl)(C2H5)CH2CH3
(viii) CH3CH = C(Cl)CH2CH(CH3)2
(ix) CH3CH = CHC(Br)(CH3)2
(x) p-ClCH6CH4CH(CH3)2
(xi) m-ClCH2C6H4CH2C(CH3)3
(xii) o-Br-C6H4CH(CH3)CH2CH3
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 1

प्रश्न 10.2
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम दीजिए –
(i) CH3CH(Cl) CH(Br)CH3
(ii) CHF2CBrClF
(iii) ClCH2C≡CCH2Br
(iv) (CCl3)3CCl
(v) CH3C(p-ClC6H4)2CH(Br)CH3
(vi) (CH3)3CCH=CClC6H4I-P
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 2

प्रश्न 10.3
निम्नलिखित कार्बनिक हैलोजन यौगिकों की संरचना दीजिए-
(i) 2 – क्लोरो – 3 – मेथिलपेन्टेन
(ii) p-ब्रोमोक्लोरो बेन्जीन
(iii) 1 – क्लोरो-4 – एथिलसाइक्लोहेक्सेन
(iv) 2 – ( 2 – क्लोरोफेनिल) – 1 – आयोडोऑक्टेन
(v) 2 – ब्रोमोब्यूटेन
(vi) 4 – तृतीयक – ब्यूटिल – 3 – आयोडोहेप्टेन
(vii) 1- ब्रोमो – 4 – द्वितीयक ब्यूटिल – 2- मेथिल बेन्जीन
(viii) 1, 4-डाइब्रोमोब्यूट – 2 – ईन।
उत्तर:
उपरोक्त यौगिकों की संरचना निम्न प्रकार है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 3

प्रश्न 10.4
निम्नलिखित में से किसका द्विध्रुव आघूर्ण सर्वाधिक
(i) CH2Cl2
(ii) CHCl3
(iii) CCl4
उत्तर:
CH2Cl2, CHCl3 तथा CCl4 में से CH2Cl2 का द्विध्रुव आघूर्ण सर्वाधिक होगा क्योंकि CCl4 की चतुष्फलकीय ज्यामिति होने के कारण इसका द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है तथा CHCl3, का द्विध्रुव आघूर्ण CH2Cl2 से कम है क्योंकि इसमें तीसरे C-Cl बन्ध का बन्ध आघूर्ण, शेष दो C-Cl बन्धों के परिणामी बन्ध आघूर्ण के विपरीत होता है। अतः उसे कुछ मात्रा में निरस्त कर देता है।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन

प्रश्न 10.5
एक हाइड्रोकार्बन C5H10 अंधेरे में क्लोरीन के साथ अभिक्रिया नहीं करता परन्तु सूर्य के तीव्र प्रकाश में केवल एक मोनोक्लोरो यौगिक C,H,CI देता है। हाइड्रोकार्बन की संरचना क्या है?
उत्तर:
यह हाइड्रोकार्बन केवल एक मोनो क्लोरो यौगिक C5H9Cl बनाता है। अतः इसके सभी हाइड्रोजन परमाणु समान हैं। इसलिए यह हाइड्रोकार्बन साइक्लोपेन्टेन है।
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प्रश्न 10.6
C4H9Br सूत्र वाले यौगिक के सभी समावयवी लिखिए।
उत्तर:
C4H9Br, ब्यूटेन का मोनोब्रोमो व्युत्पन्न है। अतः इसके चार समावयवी होंगे क्योंकि ब्यूटेन के एक संयोजी मूलकों की संख्या चार होती
है। ये समावयवी निम्नलिखित हैं-
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प्रश्न 10.7
निम्नलिखित से 1- आयोडोब्यूटेन प्राप्त करने के लिए समीकरण दीजिए-
(i) 1- ब्यूटेनॉल
(ii) 1 – क्लोरोब्यूटेन
(iii) ब्यूट – 1- ईन
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 5

प्रश्न 10.8
उभयदंती नाभिकरागी ( नाभिकस्नेही ) क्या होते हैं? एक उदाहरण की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
सायनाइड (:\(\overline{C}\)≡N) तथा नाइट्राइट (NO2) जैसे आयनों में दो नाभिकस्नेही केन्द्र होते हैं अतः इन्हें उभयदंती नाभिकस्नेही कहा जाता है | सायनाइड समूह दो अनुनादी संरचनाओं का संकर होता है। अतः यह दो भिन्न प्रकार के नाभिकरागी के रूप में कार्य करता है। HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 6अर्थात् कार्बन परमाणु से जुड़ने पर यह ऐल्किल सायनाइड तथा नाइट्रोजन परमाणु से जुड़ने पर आइसोसायनाइड देता है। इसी प्रकार नाइट्राइट आयन भी उभयदंती नाभिकरागी HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 7होता है। ऑक्सीजन के द्वारा जुड़ने पर यह ऐल्किल नाइट्राइट तथा नाइट्रोजन के द्वारा जुड़ने से नाइट्रोऐल्केन देता है।

इस प्रकार -CN तथा – NO2 उभयदंती नाभिकस्नेही होते हैं।
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प्रश्न 10.9
निम्नलिखित प्रत्येक युगलों (युग्मों) में से कौनसा यौगिक OH- के साथ SN2 अभिक्रिया में अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करेगा?
(i) CH3Br अथवा CH3I
(ii) (CH3)3CCI अथवा CH3Cl
उत्तर:
(i) CH3I, CH3Br की तुलना में OH के साथ SN2 अभिक्रिया अधिक तीव्रता से करेगा क्योंकि C – I बन्ध में I के बड़े आकार के कारण C – Br बन्ध की तुलना में यह जल्दी टूट जाता है।

(ii) (CH3)3C-Cl की तुलना में CH3-Cl में OH के साथ SN2 अभिक्रिया अधिक तीव्रता से होगी क्योंकि इसमें हैलोजन से जुड़े कार्बन परमाणु पर त्रिविम विन्यासी बाधा नहीं है।

प्रश्न 10.10
निम्नलिखित हैलाइडों के एथेनॉल में सोडियम हाइड्रॉक्साइड द्वारा विहाइड्रोहैलोजनन (विहाइड्रोहैलोजेनीकरण) के फलस्वरूप बनने वाली सभी ऐल्कीनों की संरचना लिखिए। इसमें से मुख्य ऐल्कीन कौनसी होगी ?
(i) 1- ब्रोमो -1 – मेथिलसाइक्लोहेक्सेन
(ii) 2 – क्लोरो-2 – मेथिलब्यूटेन
(iii) 2,2,3 – ट्राइमेथिल – 3 – ब्रोमोपेन्टेन।
उत्तर:
(i) HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 9
इनमें मुख्य उत्पाद (b) है क्योंकि 1°H की तुलना में 2°H का निकलना आसान है इसका कारण हाइड्रोजन की क्रियाशीलता है जिसका क्रम निम्न प्रकार होता है – 1° < 2° < 3°
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प्रश्न 10.11
निम्नलिखित परिवर्तन आप कैसे करेंगे?
(i) एथेनॉल से ब्यूट- 1 – आइन
(ii) एथीन से ब्रोमोएथेन
(iii) प्रोपीन से 1- नाइट्रोप्रोपेन
(iv) टॉलूईन से बेन्जिल ऐल्कोहॉल
(v) प्रोपीन से प्रोपाइन
(vi) एथेनॉल से एथिल फ्लुओराइड
(vii) ब्रोमोमेथेन से प्रोपेनोन
(viii) ब्यूट-1-ईन से ब्यूट – 2 – ईन
(ix) 1- क्लोरोब्यूटेन से n – ऑक्टेन
(x) बेन्जीन से बाइफेनिल
उत्तर:
(i) एथेनॉल से ब्यूट- 1 – आइन
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(ii) एथीन से ब्रोमोएथेन
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(iii) प्रोपीन से 1- नाइट्रोप्रोपेन
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(iv) टॉलूईन से बेन्जिल ऐल्कोहॉल
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(v) प्रोपीन से प्रोपाइन
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(vi) एथेनॉल से एथिल फ्लुओराइड
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(vii) ब्रोमोमेथेन से प्रोपेनोन
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(viii) ब्यूट-1-ईन से ब्यूट – 2 – ईन
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(ix) 1- क्लोरोब्यूटेन से n – ऑक्टेन
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(x) बेन्जीन से बाइफेनिल
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प्रश्न 10.12
समझाइए क्यों –
(i) क्लोरोबेन्जीन का द्विध्रुव आघूर्ण साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड तुलना में कम होता है?
(ii) ऐल्किल हैलाइड ध्रुवीय होते हुए भी जल में अमिश्रणीय हैं?
(iii) ग्रीन्यार अभिकर्मक का विरचन निर्जलीय अवस्थाओं में करना चाहिए ?
उत्तर:
(i) क्लोरोबेन्जीन में क्लोरीन का – I प्रभाव (इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रभाव) बेन्जीन वलय की तरफ अनुनाद (+ M प्रभाव) (इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षी प्रभाव) के द्वारा कुछ मात्रा में संतुलित हो जाता है। जबकि साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड में केवल – I प्रभाव है अतः क्लोरोबेन्जीन का C-CI बन्ध साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड के – C-CI बन्ध की तुलना में कम ध्रुवीय है। इसी कारण क्लोरोबेन्जीन का द्विध्रुव आघूर्ण, साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड की तुलना में कम होता है।

(ii) ऐल्किल हैलाइड (हैलोऐल्केन) ध्रुवीय होते हुए भी जल में अमिश्रणीय (लगभग अविलेय) होते हैं, क्योंकि हैलोऐल्केन को जल में घोलने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जिससे कि हैलोऐल्केन के अणुओं के मध्य आकर्षण बल को तथा जल के अणुओं के मध्य हाइड्रोजन आबंध को तोड़ा जा सके। लेकिन हैलोऐल्केन तथा जल के अणुओं के मध्य नए आकर्षण बल के कारण उत्सर्जित ऊर्जा कम होती है, क्योंकि ये आकर्षण बल जल के उपस्थित हाइड्रोजन आबंधों की तुलना में दुर्बल होते हैं अतः हैलोऐल्केन की जल में विलेयता नगण्य होती है अर्थात् ये जल में अमिश्रणीय हैं।

(iii) ग्रीन्यार अभिकर्मक जल से क्रिया करके विघटित हो जाता है तथा हाइड्रोकार्बन बनाता है अतः ग्रीन्यार अभिकर्मक का निर्माण निर्जलीय अवस्था में ही करना चाहिए।
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प्रश्न 10.13
फ्रेओन – 12, DDT, कार्बनटेट्राक्लोराइड तथा आयोडोफॉर्म के उपयोग दीजिए।
उत्तर:
फ्रेऑन (Freons) या CFC (क्लोरोफ्लुओरोकार्बन) (Chlorofluorocarbon) – फ्रेऑन ऐल्केन के क्लोरोफ्लुओरो व्युत्पन्न होते हैं।

विरचन-SbCl5 की उपस्थिति में CCl4 तथा C2Cl6 की क्रिया HF से कराने पर विभिन्न प्रकार के फ्रेऑन प्राप्त होते हैं।
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गुण- फ्रेऑन अत्यधिक स्थायी, निष्क्रिय तथा निर्विष (नॉन-टॉक्सिक) असंक्षारक (नॉन-कोरोसिव) गैस होते हैं तथा ये आसानी से द्रवित हो जाते हैं। ये रंगहीन व गंधहीन होते हैं तथा इनका क्वथनांक बहुत कम होता है।

उपयोग – फ्रेऑन ऐरोसोल प्रणोदक, प्रशीतक तथा वायु के शीतलन में प्रयुक्त किए जाते हैं। फ्रेऑन वायुमण्डल से होते हुए क्षोभमण्डल में विसरित हो जाते हैं, जहाँ पर ये मूलक श्रृंखला अभिक्रिया प्रारम्भ करके प्राकृतिक ओजोन संतुलन को अनियन्त्रित कर देते हैं।

फ्रेऑन अक्रिय विलायक के रूप में उपयोग में लिए जाते हैं। फ्रेऑन- 12(CF2Cl2) उद्योगों में सबसे अधिक मात्रा में प्रयुक्त किया जाता है।

p, p1-डाइक्लोरो डाइफेनिल ट्राइक्लोरोएथेन (p, p1-Dichloro Diphenyl Trichloroethane) (DDT)- विरचन – क्लोरोबेन्जीन तथा क्लोरैल के मिश्रण को सान्द्र H2SO4 की अल्प मात्रा के साथ गर्म करने पर DDT प्राप्त होता है।
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उपयोग – DDT एक प्रथम क्लोरीनीकृत कार्बनिक कीटनाशी है अतः इसे मुख्यतः मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों तथा टाइफस वाहक जुओं को समाप्त करने में प्रयुक्त किया जाता था। लेकिन DDT के अत्यधिक स्थायित्व, वसा में विलेयता तथा शीघ्र उपापचयन नहीं होने के कारण यह वसीय ऊतकों में एकत्रित तथा संग्रहित हो जाती है। कीटों की अनेक प्रजातियों में DDT के प्रति-प्रतिरोधकता विकसित हो गयी है तथा यह मछलियों के लिए अत्यधिक विषैली है । अतः इसके उपयोग को आजकल प्रतिबन्धित कर दिया गया है । लेकिन विश्व में अनेक स्थानों पर आज भी इसका उपयोग हो रहा है।

कार्बन टेट्राक्लोराइड (टेट्राक्लोरोमेथेन) (Carbon tetrachloride (Tetrachloromethane) (CCl4) –
(i) कार्बन टेट्राक्लोराइड को मुख्यतः प्रोपेन के क्लोरीनी अपघटन से बनाया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 24

(ii) CCl4 एक रंगहीन, रुचिकर गंधयुक्त, अज्वलनशील तथा भारी द्रव है। यह जल में अविलेय तथा कार्बनिक विलायकों में विलेय होता है।

(iii) CCl4 के भापीय जल अपघटन से फॉस्जीन बनती है।
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(iv) जलीय KOH से जल अपघटन कराने पर यह पोटेशियम कार्बोनेट देता है।
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(v) राइमर टीमान कार्बोक्सिलीकरण – CCl4 की क्रिया फीनॉल तथा क्षार के साथ करवाने पर सैलिसिलिक अम्ल प्राप्त होता है।
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(vi) उपयोग – कार्बन टेट्राक्लोराइड को प्रशीतक तथा ऐरोसॉल प्रणोदक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यह एक अच्छा विलायक है अतः यह उद्योगों में ग्रीस को साफ करने तथा घरों में दाग-धब्बे हटाने में भी प्रयुक्त होता है। यह औषधि तथा फ्रेऑन के निर्माण में भी काम में आता है। CCl4 एक अग्निशामक भी होता है।

(vii) CCl4 के दुष्प्रभाव – CCl4 के सम्पर्क से तंत्रिका तंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिसके कारण चक्कर आना, उल्टी आना आदि प्रभाव होते हैं। इसकी अधिक मात्रा के कारण मनुष्य बेहोश हो जाता है, तथा मृत्यु हो सकती है। CCl4 के उद्भासन से हृदयगति अनियमित हो सकती है अथवा रुक जाती है। इसकी वाष्प के सम्पर्क के कारण आँखों में जलन उत्पन्न होती है। CCl4, यकृत का कैंसर भी उत्पन्न करता है।

कार्बनटेट्राक्लोराइड वायु में जाने पर ऊपरी वायुमण्डल में पहुँच कर ओजोन परत को विरल बना देती है। ओजोन परत के विरलीकरण से मनुष्यों का पराबैंगनी किरणों से उद्भासन बढ़ जाता है जिससे त्वचा का कैंसर, आँखों की बीमारियाँ तथा विकार उत्पन्न होते हैं। इससे प्रतिरक्षा प्रणाली भी कमजोर हो जाती है।

आयोडोफॉर्म (ट्राइआयोडो मेथेन) Iodoform (Trilodo-methane) CHl3

आयोडोफॉर्म का विरचन – एथेनॉल या एसीटोन की क्रिया आयोडीन तथा क्षार से करवाने पर पीले रंग का आयोडोफॉर्म प्राप्त होता है। इसे आयोडोफार्म परीक्षण कहते हैं।
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गुण- यह एक विशिष्ट गन्धयुक्त पीला क्रिस्टलीय ठोस है। यह जल अविलेय तथा कार्बनिक विलायकों में विलेय होता है। अन्य हैलोफॉर्म (CHCl3, CHBr3) से कम स्थायी होता है। इसका कारण आयोडीन का बड़ा आकार है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 29
इसी कारण आयोडोफॉर्म, AgNO3 विलयन के साथ, AgI का पीला अवक्षेप देता है जबकि शुद्ध अवस्था में CHCl3 की AgNO3 विलयन के साथ कोई क्रिया नहीं होती ।

उपयोग – CHI3 का उपयोग पूतिरोधी (एन्टीसेप्टिक) के रूप में किया जाता है। इसका यह गुण वास्तव में इसके विघटन से मुक्त आयोडीन के कारण ही होता है। आयोडोफॉर्म की अरुचिकर गंध के कारण अब इसके स्थान पर आयोडीन युक्त अन्य दवाओं का उपयोग किया जाने लगा है।

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प्रश्न 10.14
निम्नलिखित प्रत्येक अभिक्रिया में बनने वाले मुख्य कार्बनिक उत्पाद की संरचना लिखिए-
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उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 31

प्रश्न 10.15
निम्नलिखित अभिक्रिया की क्रियाविधि लिखिए-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 32
उत्तर:
यह एक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया है। n-BuBr-(n-ब्यूटिल ब्रोमाइड) प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड है अतः यह अभिक्रिया SN² क्रियाविधि से होगी तथा यह एक पद में ही सम्पन्न होती है एवं इसमें काल्पनिक संक्रमण अवस्था मानी जाती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 33

प्रश्न 10.16.
SN² प्रतिस्थापन के प्रति अभिक्रियाशीलता के आधार पर इन यौगिकों के समूहों को क्रमबद्ध कीजिए-
(i) 2 – ब्रोमो – 2 – मेथिलब्यूटेन, 1- ब्रोमोपेन्टेन, 2 – ब्रोमोपेन्टेन
(ii) 1-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन, 2 – ब्रोमो – 2 – मेथिलब्यूटेन, 2- ब्रोमो – 3 – मेथिलब्यूटेन
(iii) 1- ब्रोमोब्यूटेन, 1- ब्रोमो-2, 2 – डाइमेथिलप्रोपेन, 1- ब्रोमो- 2- मेथिलब्यूटेन, 1- ब्रोमो – 3 – मेथिलब्यूटेन
उत्तर:
विभिन्न ऐल्किल हैलाइडों में SN² अभिक्रिया के लिए क्रियाशीलता का क्रम निम्न प्रकार होता है- \(\stackrel{\circ}{1}>\stackrel{\circ}{2}>\stackrel{\circ}{3}\) तथा जब ऐल्किल हैलाइड समान प्रकार के होते हैं तो वह ऐल्किल हैलाइड जिसमें हैलोजनयुक्त कार्बन पर बड़ा समूह जुड़ा होता है तो वह त्रिविम विन्यासी बाधा उत्पन्न करता है जिससे उसकी क्रियाशीलता कम हो जाती है। क्योंकि स्थूल (बड़ा) समूह आक्रमणकारी नाभिकरागी के लिए अवरोध उत्पन्न करता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 34

प्रश्न 10.17.
C6H5CH2Cl तथा IMG में से कौनसा यौगिक जलीय KOH से शीघ्रता से जल अपघटित होगा?
उत्तर:
C6H5CH2Cl तथा HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 35 में से HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 36 का जलीय KOH से शीघ्रता से जल अपघटन होगा क्योंकि इसके जल अपघटन में बनने वाला मध्यवर्ती कार्बधनायन अधिक स्थायी होता है, क्योंकि इसमें दो बेन्जीन वलय के कारण अनुनाद अधिक होगा जबकि C6H5CH2Cl से बने कार्बधनायन में केवल एक बेन्जीनवलय ही अनुनाद में भाग लेती है।
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प्रश्न 10.18.
o- तथा m- समावयवियों की तुलना में p – डाइक्लोरोबेन्जीन का गलनांक उच्च होता है। विवेचना कीजिए।
उत्तर:
p- डाइक्लोरोबेन्जीन की सममित संरचना के कारण इसके क्रिस्टल जालक में अणुओं का संकुलन सघन होता है अर्थात् इसमें अन्तराअणुक आकर्षण प्रबल होता है। अतः p-डाइक्लोरोबेन्जीन का गलनांक o- तथा m- समावयवियों की तुलना में उच्च होता है।
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प्रश्न 10.19.
निम्नलिखित परिवर्तन कैसे सम्पन्न किए जा सकते हैं?
(1) प्रोपीन से प्रोपेन- 1- ऑल
(2) एथेनॉल से ब्यूट- 1 – आइन
(3) 1- ब्रोमोप्रोपेन से 2 – ब्रोमोप्रोपेन
(4) टॉलूईन से बेन्जिल ऐल्कोहॉल
(5) बेन्जीन से 4 – ब्रोमोनाइट्रोबेन्जीन
(6) बेन्जिल ऐल्कोहॉल से 2 – फेनिल एथेनॉइक अम्ल
(7) एथेनॉल से प्रोपेन नाइट्राइल
(8) ऐनिलीन से क्लोरोबेन्जीन
(9) 2 – क्लोरोब्यूटेन से 3, 4 – डाइमेथिलहेक्सेन
(10) 2 – मेथिल – 1- प्रोपीन से 2- क्लोरो-2 – मेथिलप्रोपेन
(11) एथिल क्लोराइड से प्रोपेनॉइक अम्ल
(12) ब्यूट – 1 – ईन से n – ब्यूटिल आयोडाइड
(13) 2 – क्लोरोप्रोपेन से 1- प्रोपेनॉल
(14) आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल से आयोडोफार्म
(15) क्लोरोबेन्जीन से p- नाइट्रोफीनॉल
(16) 2 – ब्रोमोप्रोपेन से 1- ब्रोमोप्रोपेन
(17) क्लोरोएथेन से ब्यूटेन
(18) बेन्जीन से डाइफेनिल
(19) तृतीयक – ब्यूटिल ब्रोमाइड से आइसो- ब्यूटिल ब्रोमाइड
(20) ऐनिलीन से फेनिल आइसोसायनाइड।
उत्तर:
उपर्युक्त परिवर्तन निम्न प्रकार सम्पन्न किए जाते हैं-
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प्रश्न 10.20
ऐल्किल क्लोराइड की जलीय KOH से अभिक्रिया द्वारा ऐल्कोहॉल बनती है लेकिन ऐल्कोहॉलिक KOH की उपस्थिति में ऐल्कीन मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। समझाइए |
उत्तर:
जब किसी ऐल्किल हैलाइड की क्रिया किसी नाभिकस्नेही या क्षार से करवाते हैं तो प्रतिस्थापन तथा विलोपन अभिक्रिया में प्रतिस्पर्धा होती है। इसमें कम ध्रुवीय विलायक जैसे ऐल्कोहॉल की उपस्थिति में विलोपन अभिक्रिया होकर मुख्य उत्पाद ऐल्कीन प्राप्त होती है क्योंकि ऐल्कोहॉल की कम ध्रुवता के कारण नाभिकस्नेही की सान्द्रता कम होगी। अतः ऐल्किल क्लोराइड से प्रोटोन (H+) तथा हैलोजन का विलोपन होकर ऐल्कीन बनती है जबकि अधिक ध्रुवीय विलायक जैसे जल में नाभिकस्नेही (\(\overline{O}\)H) की सान्द्रता अधिक होगी। अतः मुख्यतः प्रतिस्थापन होकर मुख्य उत्पाद ऐल्कोहॉल बनता है।

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विलोपन अभिक्रिया-
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प्रतिस्थापन अभिक्रिया-
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प्रश्न 10.21.
प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड C4H9Br (क), ऐल्कोहॉलिक KOH में अभिक्रिया द्वारा यौगिक (ख) देता है। यौगिक ‘ख’ HBr के साथ अभिक्रिया से यौगिक ‘ग’ देता है जो कि यौगिक ‘क’ का समावयवी है। जब यौगिक ‘क’ की अभिक्रिया सोडियम धातु से होती है तो यौगिक ‘घ’ C8H18 बनता है, जो n – ब्यूटिल ब्रोमाइड की सोडियम से अभिक्रिया द्वारा बने उत्पाद से भिन्न है । यौगिक ‘क’ का संरचना सूत्र दीजिए तथा सभी अभिक्रियाओं के समीकरण दीजिए।.
उत्तर:
अणुसूत्र C4H9Br से दो प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड संभव हैं।
CH3-CH2-CH2-CH2 – Br (n – ब्यूटिल ब्रोमाइड) तथा HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 42 (आइसोब्यूटिल ब्रोमाइड)। प्रश्नानुसार, यौगिक ‘क’ n – ब्यूटिल ब्रोमाइड नहीं है अतः यह आइसोब्यूटिल ब्रोमाइड होगा।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 43
अभिक्रियाओं के समीकरण-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 44

प्रश्न 10.22.
तब क्या होता है जब-
(i) n – ब्यूटिल क्लोराइड को ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ अभिकृत किया जाता है?
(ii) शुष्क ईथर की उपस्थिति में ब्रोमोबेन्जीन की अभिक्रिया मैग्नीशियम से होती है ?
(iii) क्लोरोबेन्जीन का जलअपघटन किया जाता है ?
(iv) एथिल क्लोराइड की अभिक्रिया जलीय KOH से होती है ?
(v) शुष्क ईथर की उपस्थिति में मेथिल ब्रोमाइड की अभिक्रिया सोडियम से होती है?
(vi) मेथिल क्लोराइड की अभिक्रिया KCN से होती है ?
उत्तर:
(i) n – ब्यूटिल क्लोराइड को ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ अभिकृत कराने पर ß – विलोपन द्वारा ब्यूट- 1 – ईन बनती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 45

(ii) शुष्क ईथर की उपस्थिति में ब्रोमोबेन्जीन की अभिक्रिया मैग्नीशियम से कराने पर फेनिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड (ग्रीन्यार अभिकर्मक) बनता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 46

(iii) क्लोरोबेन्जीन के जलअपघटन से फीनॉल बनता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 47

(iv) एथिल क्लोराइड की अभिक्रिया जलीय KOH से होने पर नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया द्वारा एथिलऐल्कोहॉल बनता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 48

(v) शुष्क ईथर की उपस्थिति में मेथिल ब्रोमाइड की क्रिया सोडियम से होने पर एथेन बनती है ( वुर्ज अभिक्रिया)।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 49

(vi) मेथिल क्लोराइड की KCN से अभिक्रिया होने पर मेथिल सायनाइड बनाता है (नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन ) ।
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HBSE 12th Class Chemistry हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन Intext Questions

प्रश्न 10.1.
निम्नलिखित यौगिकों की संरचनाएँ लिखिए-
(i) 2-क्लोरो-3-मेथिलपेन्टेन
(ii) 1-क्लोरो-4-एथिलसाइक्लोहेक्सेन
(iii) 4-तृतीयक-ब्यूटिल-3-आयोडोहेप्टेन
(iv) 1, 4-डाइब्रोमोब्यूट-2-ईन
(v) 1-ब्रोमो-4-द्वितीयक-ब्यूटिल-2-मेथिलबेन्जीन।
उत्तर:
उपर्युक्त वौगिकों की संरचनाएँ अग्रलिखित हैं-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 50

प्रश्न 10.2.
ऐल्कोहॉल तथा KI की अभिक्रिया में सल्फ्यूरिक अम्ल का उपयोग क्यों नहीं करते?
उत्तर:
ऐल्कोहॉल के ऐल्किल आयोडाइड में परिवर्तन के लिए ऐल्कोहॉल तथा KI की अभिक्रिया में H2SO4 का प्रयोग नहीं किया जा सकता, क्योंक पहले यह KI से क्रिया करके उसे HI में परिवर्तित कर देता है, इसके बाद HI को I2 में आक्सीकृत कर देता है क्योंकि यह आक्सीकारक होता है।

प्रश्न 10.3.
प्रोपेन के विभिन्न डाइहैलोजन व्युत्पन्नों की संरचना लिखिए।
उत्तर:
प्रोपेन के डाइहैलोजन व्युत्पन्न चार होते हैं जिनकी संरचना निम्न प्रकार होती है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 51

प्रश्न 10.4.
C5H12 अणुसूत्र वाले समावयवी ऐल्केनों में से उसको पहचानिए जो प्रकाश रासायनिक क्लोरीनन (क्लोरीनीकरण) पर देता है-
(i) केवल एक मोनो क्लोराइड
(ii) तीन समावयवी मोनो क्लोराइड
(iii) चार समावयवी मोनो क्लोराइड।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 52
क्योंकि इसमें सभी हाइड्रोजन परमाणु समान हैं, अतः इसके क्लोरीनीकरण से केवल एक मोनोक्लोराइड बनेगा।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 53
इसमें तीन प्रकार के  हाइड्रोजन परमाणु है जिन्हें a, b, c से दर्शाया गया है। अतः इन हाइड्रोजन परमाणुओं के प्रतिस्थापन से तीन समावयवी मोनोक्लोराइड बनेंगे।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 54
इसमें चार प्रकार के हाइड्रोज़न परमाणु हैं जिन्हें a, b, c तथा d से दर्शाया गया है, अतः इसके क्लोरीनीकरण से चार समावयवी मोनोक्लोराइड बनते हैं।

प्रश्न 10.5.
निम्नलिखित प्रत्येक अभिक्रिया के मुख्य मोनोहैलो उत्पाद की संरचना बनाइए।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 55
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 56

प्रश्न 10.6.
निम्नलिखित यौगिकों को क्वथनांकों के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
(i) ब्रोमोमेथेन, ब्रोमोफॉर्म, क्लोरोमेथेन, डाइब्रोमोमेथेन
(ii) 1-क्लोरोप्रोपेन, आइसोप्रोपिल क्लोराइ ड, 1-क्लोरोक्यूटन।
उत्तर:
उपर्युक्त यौगिकों के क्वथनांक का बढ़ता क्रम निम्न प्रकार है-
(i) क्लोरोमेथेन < ब्रोमोमेथेन < डाइब्रोमोमेथेन < ब्रोमोफार्म
क्योंकि अणुभार बढ़ने पर क्वथनांक बढ़ता है।
(ii) आइसोप्रोपिल क्लोराइड < 1-क्लोरोप्रोपेन < 1-क्लोरोब्यूटेन शाखित होने के कारण आइसोप्रोपिल क्लोराइड का क्वथनांक 1-क्लोरेप्रोपेन से कम होता है।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन

प्रश्न 10.7.
निम्नलिखित युगलों (युग्मों) में से आप कोनसे ऐल्किल हैलाइड द्वारा SN2 क्रियाविधि से अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करने की अपेक्षा करते हैं? अपने उत्तर को समझाइए।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 57
उत्तर:
(i) CH3CH2CH2CH2Br, यह प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड होने के कारण इसमें त्रिविम बाधा नहीं होती।
(ii) HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 58
क्योंक द्वितीयक ऐल्किल हैलाइड, तृतीयक ऐल्किल हैलाइड की तुलना में अधिक तीव्रता से SN2 अभिक्रिया करता है।
(iii) HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 59
इसमें प्रतिस्थापी मेथिल समूह के हैलाइड से दूर होने के कारण त्रिविम बाधा कम होगी अतः SN2 अभिक्रिया का वेग अधिक होगा।

प्रश्न 10.8.
हैलोजन यौगिकों के निम्नलिखित युगलों में से कौनसा यौगिक तीव्रता से SN1 अभिक्रिया करेगा?
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 60
उत्तर:
(i) HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 61 क्योंक तृतीयक कार्बोकैटायन का स्थायित्व अधिक होने के कारण तृतीयक ऐल्किल हैलाइड की अभिक्रियाशीलता SN1 अभिक्रिया के लिए द्वितीयक ऐल्किल हैलाइड से अधिक होती है।
(ii) HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 62 क्योंकि प्राथमिक कार्बोकैटायन की तुलना में द्वितीयक कार्बोकैटायन का स्थायित्व अधिक होने के कारण इसमें SN1 अभिक्रिया अधिक तीव्रता से होगी।

प्रश्न 10.9.
निम्नलिखित में A, B, C, D, E, R तथा R1 को पहचानिए-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 63
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 10 हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन 64

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HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 7.1.
वर्ग 15 के तत्वों के सामान्य गुणधर्मों की उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्था, परमाण्विक आकार, यथैी तथा विद्युत्ऋणात्मकता के संदर्भ में विवेचना कीजिए ।
उत्तर:
वर्ग 15 के तत्वों के सामान्य गुणधर्म निम्नलिखित हैं-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 1
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास – वर्ग 15 के तत्वों का संयोजकता कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ns2np3 होता है। इन तत्वों के s कक्षक पूर्णतया भरे होते हैं तथा p कक्षक अर्धपूरित (Half filled) होते हैं, जिससे इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास अधिक स्थायी होता है।

(ii) ऑक्सीकरण अवस्था – वर्ग 15 के तत्वों की सामान्य ऑक्सीकरण अवस्थाएँ – 3 +3 तथा +5 हैं। परमाणु आकार तथा धातु गुणों में वृद्धि के कारण वर्ग में नीचे जाने पर 3 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाने की प्रवृत्ति कम होती है । वर्ग में नीचे जाने पर +5 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व घटता है।

बिस्मथ [V] का एक ही यौगिक BiF5 ज्ञात है । वर्ग में नीचे की ओर +5 ऑक्सीकरण अवस्था के स्थायित्व में कमी के साथ-साथ ऑक्सीकरण अवस्था ( अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण) के स्थायित्व में होती है। ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया से बने यौगिकों में नाइट्रोजन +1, +2, +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी दर्शाती है। फॉस्फोरस भी कुछ ऑक्सो अम्लों में, +1 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाता है।

नाइट्रोजन की अधिकतम सहसंयोजकता 4 हो सकती है; क्योंकि केवल 4 कक्षक (एक s तथा तीन p) ही बंधन के लिए उपलब्ध हैं। भारी तत्वों के बाह्यतम कोश में रिक्त d कक्षक पाए जाते हैं, जो बंध बनाने के लिए प्रयुक्त किए जा सकते हैं, अतः उनकी सहसंयोजकता बढ़ जाती है। जैसे PF6 में फॉस्फोरस की संयोजकता 6 है।

(iii) परमाण्विक आकार – वर्ग 15 में नीचे जाने पर परमाणु आकार (सहसंयोजी त्रिज्या) में वृद्धि होती है। N से P तक त्रिज्या में पर्याप्त वृद्धि होती है जबकि As से Bi तक त्रिज्या में वृद्धि अपेक्षाकृत कम होती है। इसका कारण भारी तत्वों में पूर्ण भरे d और / या f कक्षकों की उपस्थिति है।

(iv) आयनन एन्थैल्पी – वर्ग 15 के तत्वों की आयनन एन्थैल्पी, वर्ग 14 तथा वर्ग 16 के संगत तत्वों की आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है क्योंकि इन तत्वों में अर्धपूरित स्थायी विन्यास (np3) होता है। सामान्यतः आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है क्योंकि परमाणु आकार कम होता है तथा प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ता है।

अतः बाह्यतम इलेक्ट्रॉन अधिक आकर्षण बल से बंधे होते हैं जिन्हें पृथक् करने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। वर्ग में नीचे की ओर जाने पर आयनन एन्थैल्पी का मान कम होता है क्योंकि परमाणु आकार में वृद्धि होती है। इन तत्वों के लिए विभिन्न आयनन एल्पियों का क्रम निम्न प्रकार होता है-
iH1 < △iH2 < △iH3
अर्थात् एक इलेक्ट्रॉन निकालने के बाद द्वितीय तथा तृतीय इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

(v) विद्युतऋणात्मकता – सामान्यतः वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार में वृद्धि के कारण विद्युतॠणात्मकता का मान घटता है, लेकिन भारी तत्वों में यह अंतर बहुत कम होता है।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 7.2.
नाइट्रोजन की क्रियाशीलता फॉस्फोरस से भिन्न क्यों है?
उत्तर:
नाइट्रोजन की क्रियाशीलता फॉस्फोरस से भिन्न होती है। इसके निम्नलिखित कारण हैं-
(i) नाइट्रोजन का आकार बहुत छोटा होता है तथा इसकी विद्युतॠणता एवं आयनन एन्थैल्पी, फॉस्फोरस की तुलना में बहुत अधिक है।
(ii) नाइट्रोजन के संयोजी कोश में रिक्त d कक्षक उपलब्ध नहीं हैं जबकि फॉस्फोरस के संयोजी कोश में रिक्त d कक्षक होते हैं।
(iii) नाइट्रोजन में pπ -pπ अतिव्यापन द्वारा त्रिआबन्ध बनाने की प्रवृत्ति होती है अतः इसकी बन्ध एन्थैल्पी बहुत अधिक होती है जिसके कारण यह बहुत कम क्रियाशील होती है जबकि फॉस्फोरस में pπ – pπ अतिव्यापन नहीं होता।

प्रश्न 7.3.
वर्ग 15 के तत्वों की रासायनिक क्रियाशीलता की प्रवृत्ति की विवेचना कीजिए ।
उत्तर:
वर्ग 15 के तत्वों की रासायनिक क्रियाशीलता में बहुत अन्तर होता है। नाइट्रोजन की बन्ध एन्थैल्पी का मान बहुत उच्च होने के कारण यह लगभग अक्रिय होती है। फॉस्फोरस का एक अपररूप, श्वेत फॉस्फोरस बहुत अधिक क्रियाशील होता है जिसका कारण P4 की संरचना में कोणीय तनाव ( angular strain) है। यह वायु में तेजी से आग पकड़कर P4O10 बनाता है जिसके श्वेत धूम बनते हैं। लाल फॉस्फोरस कमरे के ताप पर वायु में स्थायी होता है लेकिन गर्म करने पर क्रिया करता है।

As, Sb तथा Bi (भारी तत्व) कम क्रियाशील होते हैं। आर्सेनिक शुष्क वायु में स्थायी होता है लेकिन इसे वायु में गर्म करने पर यह 615°C पर ऊर्ध्वपातित होकर As4O6 बनाता है । एन्टिमनी वायु तथा जल के प्रति स्थायी होता है लेकिन वायु में गर्म करने पर यह Sb4O6, Sb4O8 या Sb4O10 बनाता है। Bi को वायु में गर्म करने पर यह Bi2O3 बनाता है।

प्रश्न 7.4.
NH3 हाइड्रोजन बंध बनाती है परन्तु PH3 नहीं बनाती। क्यों ?
उत्तर:
नाइट्रोजन के छोटे आकार तथा उच्च विद्युतॠणता के कारण N-H बन्ध, अधिक ध्रुवीय होता है अतः NH3 हाइड्रोजन बंध बनाती है जबकि फॉस्फोरस का आकार बड़ा होता है तथा इसकी विद्युतॠणता भी कम होती है अतः P-H बन्ध लगभग अध्रुवीय होता है इसलिए PH3 में हाइड्रोजन बन्ध नहीं बनता ।

प्रश्न 7.5.
प्रयोगशाला में नाइट्रोजन कैसे बनाते हैं? सम्पन्न होने वाली अभिक्रिया के रासायनिक समीकरणों को लिखिए।
उत्तर:
(i) प्रयोगशाला में नाइट्रोजन बनाने के लिए अमोनियम क्लोराइड के जलीय विलयन की सोडियम नाइट्राइड के साथ अभिक्रिया कराई जाती है-
NH4Cl(aq) + NaNO2(aq) → N2(g) + 2H2O(l) + NaCl(aq)
इस अभिक्रिया में थोड़ी मात्रा में NO तथा HNO3 भी बनते हैं; इन अशुद्धियों को दूर करने के लिए गैस को पोटैशियम डाइक्रोमेट युक्त सल्फ्यूरिक अम्ल के जलीय विलयन में से प्रवाहित किया जाता है।

(ii) अमोनियम डाइक्रोमेट के ताप अपघटन से भी नाइट्रोजन गैस प्राप्त होती है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 2

(iii) बेरियम ऐजाइड के ताप अपघटन से अति शुद्ध नाइट्रोजन प्राप्त होती है-
Ba(N3)2 → Ba + 3N2

प्रश्न 7.6.
अमोनिया का औद्योगिक उत्पादन कैसे किया जाता है ?
उत्तर:
अमोनिया का औद्योगिक निर्माण हाबर प्रक्रम द्वारा किया जाता है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 3
अमोनिया के अधिक निर्माण के लिए आवश्यक शर्तें – अमोनिया के निर्माण की अभिक्रिया उत्क्रमणीय तथा ऊष्माक्षेपी होती है। इसके साथ ही अभिक्रिया के कारण आयतन में कमी होती है अतः ले शातैलिए के सिद्धान्त के आधार पर उच्च दाब अमोनिया के अधिक निर्माण में सहायक होगा। अतः अमोनिया के निर्माण के लिए अनुकूलतम शर्तें निम्नलिखित हैं-
(i) लगभग 200 वायुमंडलीय दाब ( 200 × 105 Pa )
(ii) लगभग 700K ताप
(iii) K2O तथा Al2O3 युक्त आयरन ऑक्साइड उत्प्रेरक
(iv) शुद्ध N2 तथा H2 का प्रयोग |
अमोनिया में उपस्थित नमी को CaO द्वारा दूर कर लिया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 20

प्रश्न 7.7.
उदाहरण देकर समझाइए कि कॉपर धातु HNO3 के साथ अभिक्रिया करके किस प्रकार भिन्न उत्पाद दे सकती है?
उत्तर:
कॉपर धातु की HNO3 के साथ अभिक्रिया ताप तथा सांद्रता पर निर्भर करती है तथा इन अभिक्रियाओं में कॉपर का ऑक्सीकरण होता है-
(i) कॉपर की तनु तथा ठंडे HNO3 से क्रिया कराने पर कॉपर नाइट्रेट तथा नाइट्रिक ऑक्साइड बनते हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 4

(ii) कॉपर की सान्द्र तथा गर्म HNO3 से क्रिया कराने पर कॉपर नाइट्रेट तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्राप्त होते हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 5

प्रश्न 7.8.
NO2 तथा N2O5 की अनुनादी संरचनाओं को लिखिए।
उत्तर:
NO2 तथा N2O5 की अनुनादी संरचनाएँ अग्र हैं-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 6

प्रश्न 7.9.
HNH कोण का मान, HPH, HASH तथा HSH कोणों की अपेक्षा अधिक क्यों है ?
उत्तर:
NH3 में HNH कोण का मान वर्ग के अन्य हाइड्राइडों की तुलना में अधिक होता है क्योंकि NH3 में N पर sp3 संकरण तथा एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होने के कारण बन्ध कोण लगभग 107.8° होता है जबकि वर्ग नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने तथा विद्युतॠणता कम होने के कारण sp3 संकरण का प्रभाव कम होता जाता है अर्थात् M-H बन्ध बनाने में M के शुद्ध p कक्षक हाइड्रोजन के s कक्षक के साथ अतिव्यापन करते हैं, अतः बन्ध कोण कम होता जाता है।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 7.10.
R3P = O पाया जाता है जबकि R3N = O नहीं | क्यों ? (R = ऐल्किल समूह)
उत्तर:
नाइट्रोजन के संयोजकता कोश में रिक्त d कक्षक नहीं होता अतः इसकी अधिकतम संयोजकता 4 होती है तथा यह dπ – pπ बन्ध नहीं बना सकता अतः R3N = O नहीं पाया जाता जबकि फॉस्फोरस के संयोजकता कोश में रिक्त d कक्षक होने के कारण यह dπ – pπ अतिव्यापन द्वारा R3P = O बना लेता है जिसमें फॉस्फोरस की संयोजकता 5 है। (अष्टक का प्रसार)

प्रश्न 7.11.
समझाइए कि क्यों NH3 क्षारकीय है जबकि BiH3 केवल दुर्बल क्षारक है।
उत्तर:
वर्ग 15 के तत्वों के हाइड्राइडों में केन्द्रीय परमाणु पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होने के कारण ये लुइस क्षार होते हैं क्योंकि इनमें इलेक्ट्रॉन युग्म दान करने की प्रवृत्ति होती है। NH3 में नाइट्रोजन के छोटे आकार के कारण इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक होता है अतः इसकी इलेक्ट्रॉन युग्म देने की प्रवृत्ति अधिक होती है इसलिए यह अधिक क्षारीय है जबकि BiH3 में Bi के बड़े आकार के कारण इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है अतः इसकी इलेक्ट्रॉन युग्म देने की प्रवृत्ति कम होती है इसलिए यह बहुत ही दुर्बल क्षारक है।

प्रश्न 7.12.
नाइट्रोजन द्विपरमाणुक अणु के रूप में पाया जाता है तथा फॉस्फोरस P4 के रूप में। क्यों ?
उत्तर:
नाइट्रोजन द्विपरमाणुक अणु के रूप में पाया जाता है क्योंकि नाइट्रोजन परमाणु के छोटे आकार तथा d कक्षकों की अनुपस्थिति के कारण इसमें बहुल आबन्ध बनाने की प्रवृति होती है जबकि फॉस्फोरस P4 के रूप में पाया जाता है क्योंकि बड़े आकार के कारण इसमें बहुल आबन्ध बनाने की प्रवृत्ति नहीं होती तथा आन्तरिक अबन्धित इलेक्ट्रॉनों के बीच प्रतिकर्षण होता है। इसमें P-P-P बन्ध कोण 60° होता है अतः pπ – pπ बन्ध संभव नहीं है।

प्रश्न 7.13.
श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों की मुख्य भिन्नताओं को लिखिए।
उत्तर:
श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों में मुख्य भिन्नताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) श्वेत फॉस्फोरस एक पारभासी मोम जैसा श्वेत ठोस होता है जबकि लाल फॉस्फोरस लोहे जैसी धूसर (grey) चमक वाला होता है।
(ii) श्वेत फॉस्फोरस विषैला होता है जबकि लाल फॉस्फोरस गन्धहीन तथा अविषैला होता है।
(iii) श्वेत फॉस्फोरस जल में अविलेय लेकिन कार्बन-डाइ- सल्फाइड में विलेय होता है लेकिन लाल फॉस्फोरस जल तथा कार्बन-डाइ- सल्फाइड दोनों में अविलेय होता है ।
(iv) रासायनिक रूप से लाल फॉस्फोरस श्वेत फॉस्फोरस की तुलना बहुत कम क्रियाशील होता है।
(v) श्वेत फॉस्फोरस अंधेरे में दीप्त होता है, लाल फॉस्फोरस दीप्त नहीं होता !
(vi) श्वेत फॉस्फोरस विविक्त चतुष्फलकीय P4 अणुओं से बना होता है जबकि लाल फॉस्फोरस बहुलकी होता है जिसमें P4 चतुष्फलक श्रृंखला के रूप में एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं ।

प्रश्न 7.14.
फॉस्फोरस की तुलना में नाइट्रोजन श्रृंखलन गुणों को कम प्रदर्शित करता है, क्यों?
उत्तर:
नाइट्रोजन परमाणु के छोटे आकार के कारण एक N-N. बन्ध, एक P-P बन्ध की तुलना में दुर्बल होता है क्योंकि N-N बन्ध में अबन्धी इलेक्ट्रॉनों (एकाकी इलेक्ट्रॉनयुग्मों) के मध्य प्रतिकर्षण अधिक होता है। अतः फॉस्फोरस की तुलना में नाइट्रोजन में श्रृंखलन की प्रवृत्ति कम होती है।

प्रश्न 7.15.
H3PO3 की असमानुपातन अभिक्रिया दीजिए।
उत्तर:
H3PO3 को 473K ताप पर गर्म करने पर इसका असमानुपातन होकर फॉस्फोरिक अम्ल (आर्थोफॉस्फोरिक अम्ल) तथा फॉस्फीन बनती है।
4H3PO3 → 3H3PO4 + PH3

प्रश्न 7.16.
क्या PCl5 ऑक्सीकारक और अपचायक दोनों कार्य कर सकता है ? तर्क दीजिए ।
उत्तर:
PCl5 में P की ऑक्सीकरण अवस्था +5 है जो कि उच्चतम है, अतः यह अपनी ऑक्सीकरण अवस्था कम करके ऑक्सीकारक का कार्य कर सकता है लेकिन अपचायक का नहीं।
उदाहरण – PCl5 + 2Ag → 2AgCl + PCl3

प्रश्न 7.17.
O, S, Se, Te तथा Po को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्था तथा हाइड्राइड निर्माण के संदर्भ में आवर्त सारणी के एक ही वर्ग में रखने का तर्क दीजिए ।
उत्तर:
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास – O, S, Se, Te तथा Po 16वें वर्ग के तत्व हैं। इन सभी का बाह्यतम इलेक्ट्रानिक विन्यास समान है जो कि ns2np4 है अर्थात् इनके बाह्यतम कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं। अतः इन्हें एक ही वर्ग में रखा जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 7
(ii) ऑक्सीकरण अवस्था- ये सभी तत्व – 2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं। (Po के अलावा) तथा ऑक्सीजन के अलावा सभी तत्व +2, +4, +6 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करते हैं, ऑक्सीजन केवल +2 अवस्था दर्शाती है। अतः इन्हें एक ही वर्ग में रखा गया है।

(iii) हाइड्राइड निर्माण- सभी तत्व H2E (E= O, S, Se, Te Po) प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं। अतः इन तत्वों को समान वर्ग में रखने का एक कारण यह भी है।

प्रश्न 7.18.
क्यों डाइऑक्सीजन एक गैस है जबकि सल्फर ठोस है?
उत्तर:
ऑक्सीजन परमाणु के छोटे आकार तथा संयोजी कोश में d कश्चकों की अनुपस्थिति के कारण इसमें Pπ – Pπ बन्ध बनाने की प्रबल प्रवृत्ति होती है अतः यह O = O बनाकर अपना अष्टक पूर्ण कर लेता है तथा यह स्वतंत्र अस्तित्व वाले ऑक्सीजन अणुओं (O2) के रूप में गैस अवस्था में पाई जाती है। लेकिन सल्फर के बड़े आकार के कारण S = S बन्ध एन्थैल्पी कम होती है अतः यह S2 न बनाकर Sg के रूप में पाया जाता है जिससे अणुभार बढ़ जाने के कारण अणुओं के मध्य आकर्षण बल बढ़ जाता है। इसी कारण सल्फर ठोस अवस्था में पाया जाता है।

प्रश्न 7.19.
यदि O→O तथा O→O2- के इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी मान पता हो, जो क्रमशः -141 तथा 702 kJ mol-1 हैं, तो आप कैसे स्पष्ट कर सकते हैं कि O2- स्पीशीज वाले ऑक्साइड अधिक बनते हैं न कि O वाले?
उत्तर:
प्रश्नानुसार O से O बनने पर ऊर्जा उत्सर्जित होती है। जबकि O से O-2 बनने पर बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है लेकिन O2- स्पीशीज वाले ऑक्साइड अधिक बनते हैं क्योंकि ऑक्साइड बनने पर उत्सर्जित उच्च जालक एन्थैल्पी ( अधिक ऋणावेश के कारण ) द्वितीय उच्च धनात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी की पूर्ति कर देती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 8

प्रश्न 7.20.
कौनसे ऐरोसोल्स ओजोन का क्षय करते हैं?
उत्तर:
ओजोन परत का क्षय करने वाले ऐरोसोल्स निम्नलिखित हैं-
(i) सुपर सोनिक जेट विमानों से उत्सर्जित नाइट्रिक ऑक्साइड (NO), ऊपरी वायुमण्डल में ओजोन परत की सांद्रता को कम करते हैं-
NO(g) + O3(g) → NO2(g) + O2(g)

(ii) ऐरोसोल स्प्रे तथा प्रशीतकों के रूप में प्रयुक्त फ्रेऑन भी ओजोन का क्षय करते हैं-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 9

प्रश्न 7.21.
संस्पर्श प्रक्रम ( Contact Process ) द्वारा H2SO4 के उत्पादन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सम्पर्क विधि (Contact Process ) – इस विधि में तीन पद होते हैं-
(i) सल्फर अथवा सल्फाइड अयस्कों को वायु में जलाकर सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) बनाना ।
(ii) V2O5 उत्प्रेरक की उपस्थिति में SO2 की ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया कराकर SO3 में परिवर्तित करना ।
(iii) SO3 को सल्फ्यूरिक अम्ल में अवशोषित करके ओलियम (H2S2O7) प्राप्त करना तथा इसके तनुकरण से H2SO4 प्राप्त करना ।

(i) SO2 बनाना – सल्फर या FeS2 को वायु के साथ गर्म करके SO2 का निर्माण किया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 21
प्राप्त SO2 को धूल के कणों तथा आर्सेनिक यौगिकों की अशुद्धियों से मुक्त कर लिया जाता है। इसके लिए जिलेटिनी FerOH3 प्रयुक्त करते हैं।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 7.22.
SO2 किस प्रकार से एक वायु प्रदूषक है?
उत्तर:
SO2 ऍक हानिकारक गैसीय प्रदूषक है। वायुमण्डल में उपस्थित SO2, प्रकाश की उपस्थिति में आक्सीकृत होकर SO3 बनाती है जो कि नमी की उपस्थिति में H2SO4 बनाती है जो कि अम्ल वर्षा के रूप में नीचे आती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 10
SO2 पेड़ों की पत्तियों को नुकसान पहुंचाती है तथा मनुष्य की आँखों तथा श्वसन तंत्र के लिए भी हानिकारक है।

प्रश्न 7.23.
हैलोजन प्रबल ऑक्सीकारक क्यों होते हैं?
उत्तर:
हैलोजनों की उच्च विद्युतॠणता तथा अधिक इलेक्ट्रॉन बन्धुता (उच्च ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी) के कारण इनमें इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति अधिक होती है तथा इनके मानक इलैक्ट्रोड – विभव (अपचयन विभव) के मान भी अधिक होते हैं। अतः ये प्रबल ऑक्सीकारक होते हैं।

प्रश्न 7.24.
स्पष्ट कीजिए कि फ्लुओरीन केवल एक ही ऑक्सो अम्ल, HOF क्यों बनाता है?
उत्तर:
फ्लुओरीन के छोटे आकार तथा उच्च विद्युतॠणता के कारण यह एकमात्र ऑक्सो अम्ल, HOF बनाती है जो कि फ्लुओरिक (I) अम्ल या हाइपोफ्लुओरस अम्ल कहलाता है। फ्लुओरीन उच्चतर ऑक्सो अम्लों में केन्द्रीय परमाणु के रूप में उपयोग में नहीं आ सकता, अतः यह उच्च ऑक्सो अम्ल नहीं बनाता।

प्रश्न 7.25.
व्याख्या कीजिए कि क्यों लगभग एक समान विद्युत्ऋणात्मकता होने के पश्चात् भी नाइट्रोजन हाइड्रोजन आबंध निर्मित करता है, जबकि क्लोरीन नहीं।
उत्तर:
नाइट्रोजन तथा क्लोरीन की विद्युतॠणता लगभग समान होती है फिर भी नाइट्रोजन, हाइड्रोजन बन्ध बनाता है जबकि क्लोरीन नहीं, क्योंकि नाइट्रोजन परमाणु का आकार क्लोरीन परमाणु से छोटा होता है जो कि हाइड्रोजन बन्ध बनाने में सहायक होता है।

प्रश्न 7.26.
ClO2 के दो उपयोग लिखिए।
उत्तर:
ClO2 (क्लोरीन डाइऑक्साइड) को आक्सीकारक तथा विरंजक (Bleaching agent) के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

प्रश्न 7.27.
हैलोजन रंगीन क्यों होते हैं?
उत्तर:
सभी हैलोजन रंगीन होते हैं, इसका कारण यह है कि इनमें दृश्य क्षेत्र में विकिरणों का अवशोषण होता है जिससे बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तर में चले जाते हैं क्योंकि संयोजकता कोश व उच्च ऊर्जा स्तर में ऊर्जा अन्तराल कम होता है। विकिरण के भिन्न- भिन्न क्वान्टम अवशोषित करने के कारण ये अलग-अलग रंग प्रदर्शित करते हैं; जैसे- फ्लुओरीन पीला, क्लोरीन हरापन लिए हुए पीला, ब्रोमीन लाल तथा आयोडीन बैंगनी रंग का होता है।

प्रश्न 7.28.
जल के साथ F2 तथा – Cl2 की अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर:
फ्लुओरीन (F2) जल को आक्सीकृत करके ऑक्सीजन देती है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 11
सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में क्लोरीन, जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोक्लोरिक तथा हाइपोक्लोरस अम्ल बनाती है-
Cl2(g) + H2O(l) HCl(aq) + HOCl(aq)

प्रश्न 7.29.
आप HCI से Cl2 तथा Cl2 से HCl को कैसे प्राप्त करेंगे? केवल अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर:
(i) HCl से Cl2 प्राप्त करना
सांद्र HCI को मैंगनीज डाइऑक्साइड या KMnO4 जैसे ऑक्सीकारक के साथ गर्म करने से Cl2 प्राप्त होती है।
MnO2 + 4HCl → MnCl2 + Cl2 + 2H2O
2KMnO4 + 16HCl → 2KCl + 2MnCl2 + 8H2O + 5Cl2

(ii) Cl2 से HCl प्राप्त करना
Cl2 की H2 के साथ क्रिया से HCl प्राप्त होती है-
H2 + Cl2 → 2HCl

प्रश्न 7.30.
एन- बार्टलेट Xe तथा PtF6 के बीच अभिक्रिया कराने के लिए कैसे प्रेरित हुए?
उत्तर:
लाल रंग के यौगिक \(\stackrel{+}{\mathrm{O}}_2 \mathrm{PtF}_6^{-}\) के संश्लेषण ने एन- बार्टलेट को Xe तथा PtF6 के बीच अभिक्रिया कराने को प्रेरित किया तथा उन्होंने लाल रंग का ही यौगिक Xe PtF6 बनाया क्योंकि Xe व O2 की प्रथम आयनन एन्थैल्पी लगभग बराबर होती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 12

प्रश्न 7.31.
निम्नलिखित में फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्या हैं?
(i) H3PO3
(ii) PCl3
(iii) Ca3P2
(iv) Na3PO4
(v) POF3
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 13

प्रश्न 7.32.
निम्नलिखित के लिए संतुलित समीकरण दीजिए।
उत्तर:
(i) जब NaCl को MnO2 की उपस्थिति में सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गरम करते हैं तो क्लोरीन गैस निकलती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 14
(ii) जब क्लोरीन गैस को Nal के जलीय विलयन में प्रवाहित किया जाता है तो आयोडीन बनती है।
2Nal + Cl2 → 2NaCl + I2

प्रश्न 7.33.
जीनॉन फ्लुओराइड, XeF2, XeF4 तथा XeF6 कैसे बनाए जाते हैं?
उत्तर:
अनुकूल परिस्थितियों में तत्वों की प्रत्यक्ष क्रिया द्वारा जीनॉन तीन प्रकार के द्विअंगी फ्लुओराइड, XeF2, XeF4 तथा XeF6 बनाती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 15
143K ताप पर XeF4 तथा O2F2 की क्रिया से भी XeF6 बनता है।
XeF4 + O2F2 → XeF6 + O2

प्रश्न 7.34.
किस उदासीन अणु के साथ ClO समइलेक्ट्रॉनी है ? क्या यह अणु लुइस क्षारक है ?
उत्तर:
ClF (क्लोरीन फ्लुओराइड) ClO का समइलेक्ट्रॉनी है क्योंकि दोनों में 26 इलेक्ट्रॉन हैं तथा ClF लुइस क्षारक है क्योंकि इसमें एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित है।

प्रश्न 7.35.
निम्नलिखित प्रत्येक समुच्चय को सामने लिखे गुणों के अनुसार सही क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
(क) F2, Cl2, Br2, I2 – आबंध वियोजन एन्थैल्पी के बढ़ते क्रम में
(ख) HF, HCI, HBr, HI -अम्ल सामर्थ्य के बढ़ते क्रम में
(ग) NH3, PH3, AsH3, SbH3, BiH3 – क्षारक सामर्थ्य के बढ़ते क्रम में ।
उत्तर:
(क) I—I < F−F < Br-Br < Cl-Cl
(ख) HF < HCl < HBr < HI
(ग) BiH3 ≤ SbH3 < AsH3 < PH3 < NH3

प्रश्न 7.36.
निम्नलिखित में से कौनसा एक अस्तित्व में नहीं है?
(a) XeOF4
(b) NeF2
(c) XeF2
(d) XeF6
उत्तर:
(b) NeF2

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 7.37.
उस उत्कृष्ट गैस स्पीशीज का सूत्र देकर संरचना की व्याख्या कीजिए जो कि इनके साथ समसंरचनीय है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 16
उत्तर:
(a) \(\mathrm{ICl}_4^{-}\) का समसंरचनीय XeF4 है।

XeF4 की संरचना वर्ग समतलीय होती है क्योंकि इसमें Xe पर 4 बन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म तथा 2 एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित हैं एवं Xe पर sp3d2 संकरण है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 17
(b) \(\mathrm{IBr}_2^{-}\) का समसंरचनीय XeF2 होता है इसकी संरचना रेखीय है तथा Xe पर sp d संकरण है ( 31.p + 2 b. p ) |
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 18
(c) \(\mathrm{BrO}_3\) का समसंरचनीय XeO3 है। इसकी संरचना पिरॅमिडी है तथा Xe पर sp3 संकरण है (3 b.p +1 1.p)।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 19

प्रश्न 7.38.
उत्कृष्ट ‘गैसों के परमाण्विक आकार तुलनात्मक रूप से बड़े क्यों होते हैं?
उत्तर:
उत्कृष्ट गैसों की परमाणु त्रिज्या (आकार) वान्डरवाल त्रिज्या के रूप में ली जाती है जबकि अन्य तत्वों के लिए सहसंयोजी त्रिज्या ली जाती है। उत्कृष्ट गैसों के लिए सहसंयोजी त्रिज्या ज्ञात नहीं की जा सकती क्योंकि ये अणु नहीं बनातीं । चूँकि वान्डरवाल त्रिज्या का मान सहसंयोजी त्रिज्या से अधिक होता है अतः उत्कृष्ट गैसों के परमाण्विक आकार तुलनात्मक रूप से बड़े होते हैं।

प्रश्न 7.39,
निऑन तथा ऑर्गन गैसों के उपयोग सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
निऑन तथा ऑर्गन गैसों के उपयोग निम्नलिखित
(a) (i) निऑन का उपयोग विसर्जन ट्यूब (Discharge tube) तथा प्रदीप्त बल्बों (Fluorescent bulbs ) में विज्ञापन प्रदर्शन हेतु किया जाता है।
(ii) निऑन बल्बों का उपयोग वनस्पति उद्यान तथा ग्रीनहाउस में किया जाता है।

(b) (i) ऑर्गन का उपयोग उच्चताप धातु कर्मीय प्रक्रमों में अक्रिय वातावरण उत्पन्न करने के लिए किया जाता है (धातुओं तथा उपधातुओं के आर्क वेल्डिंग में)
(ii) इसका उपयोग विद्युत बल्ब को भरने में किया जाता है।
(iii) प्रयोगशाला में इसका उपयोग वायु सुग्राही (Sensitive) पदार्थों के प्रबन्धन (Handling) में भी किया जाता है।

HBSE 12th Class Chemistry p-ब्लॉक के तत्व Intext Questions

प्रश्न 7.1.
P, As, Sb तथा Bi के द्राइहैलाइडों से पेन्टाहैलाइड अधिक सहसंयोजी क्यों होते हैं?
उत्तर:
किसी यौगिक में केन्द्रीय परमाणु की जितनी उच्च धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था होती है उतनी ही अधिक उसकी ध्रुवण क्षमता होती है जिसके कारण केन्द्रीय परमाणु और दूसरे परमाणु के बीच बने आबंध में सहसंयोजक लक्षण बढ़ते जाते हैं। चूंकि P, As, Sb तथा Bi के पेन्टाहैलाइडों में केन्द्रीय परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था (+5), इनके ट्राइहलाइडों में केन्द्रीय परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था (+3) से अधिक है अतः P, As, Sb तथा Bi के ट्राइहैलाइडों से पेन्यहैलाइड अधिक सहसंयोजी होते हैं।

प्रश्न 7.2.
वर्ग 15 के तत्वों के हाइड्राइडों में BiH3 सबसे प्रबल अपचायक क्यों है?
उत्तर:
वर्ग 15 में NH3 से BiH3 तक हाइड्राइडों का स्थायित्व घटता है क्योंक केन्द्रीय परमाणु का आकार बढ़ने से बन्ध ऊर्जा कम होती है, जिससे इनकी हाइड्रोजन देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है अतः अपचायक गुण बढ़ता है, इसी कारण BiH3 सबसे प्रबल अपचायक है तथा यह सबसे कम स्थायी होता है।

प्रश्न 7.3.
N2 कमरे के ताप पर कम क्रियाशील क्यों है?
उत्तर:
नाइट्रोजन परमाणु के छोटे आकार के कारण N2 में दो नाइट्रोजन परमाणुओं के मध्य त्रिआबन्ध (N ≡ N) होता है जिसमें प्रबल pπ – pπ अतिव्यापन होता है अतः इसकी बन्ध एन्थल्पो अधिक हाता है, इसलिए बन्ध का टूटना मुश्किल होता है। इसी कारण यह कमरे के ताप पर कम क्रियाशील है।

प्रश्न 7.4.
अमोनिया की लब्धि को बढ़ाने के लिए आवश्यक स्थितियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अमोनिया का औद्योगिक उत्पादन हाबर विधि द्वारा किया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 22
ले-शातैलिए के सिद्धान्त के अनुसार उच्च दाब अमोनिया बनाने के लिए अनुकूल होता है। अतः अमोनिया के उत्पादन के लिए अनुकूलतम परिस्थितियाँ 200 × 105 Pa (लगभग 200 वायुमंडलीय दाब, ~700K ताप तथा थोड़ी मात्रा में K2O एवं Al2O3 युक्त आयरन ऑक्साइड जैसे उत्प्रेरक का उपयोग किया जाता है, ताकि साम्य अवस्था प्राप्त करने की दर बढ़ाई जा सके।

प्रश्न 7.5.
Cu2+ विलयन के साथ अमोनिया कैसे क्रिया करती है?
उत्तर-:
Cu2+ विलयन के साथ अमोनिया (NH3) की क्रिया उपसहसंयोजक बन्ध बनकर संकुल आयन [Cu(NH3)4]2+ बनता है जिसमें NH3 के नाइट्रोजन का एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म धातु आयनों के साथ बन्ध बनाता है क्योंकि NH3 लुइस क्षारक है अतः यह इलेक्ट्रॉन युग्मदाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 23

प्रश्न 7.6.
N2O5 में नाइट्रोजन की सहसंयोजकता क्या है?
उत्तर:
N2O5 में नाइट्रोजन की सहसंयोजकता 4 होती है जिसकी पुष्टि निम्नलिखित संरचना से होती है। इसमें नाइट्रोजन परमाणु चार बन्ध बना रहा है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 24

प्रश्न 7.7.
(a) PH3 से \(\stackrel{+}{\mathrm{P}} \mathrm{H}_4\) का आबंध कोण अधिक है। क्यों?
(b) जब PH3 अम्ल से अभिक्रिया करता है तो क्या बनता है?
उत्तर:
(a) PH3 तथा \(\stackrel{+}{\mathrm{P}} \mathrm{H}_4\) दोनों में ही फॉस्फोरस sp3 संकरित हैं। \(\mathrm{PH}_4^{+}\) में बन्ध कोण 109°28′ तथा इसमें चारों ही बन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म होते हैं जबकि PH3 में P पर एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है जो कि एकाकी युग्म-आबंध युग्म प्रतिकर्षण के लिए उत्तरदायी है जिससे PH3 में आबंध कोण 109°28′ से कम हो जाता है। अतः PH3 से PH4 का आबंध कोण अधिक है।

(b) जब PH3 अम्ल से अभिक्रिया करता है तो फॉस्फोनियम यौगिक बनते हैं जैसे PH3 + HBr → PH4Br फॉस्फोनियम ब्रोमाइड।

प्रश्न 7.8.
क्या होता है जब श्वेत फॉस्फोरस को CO2 के अक्रिय वातावरण में सांद्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करते हैं?
उत्तर:
श्वेत फास्फोरस को CO2 के अक्रिय वातावरण में सांद्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करने पर PH3 (फॉस्फीन) तथा सोडियम हाइपो फॉस्फाइट (NaH2PO2) बनते हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 25

प्रश्न 7.9.
क्या होता है जब PCl5 को गर्म करते हैं?
उत्तर:
PCl5 में तीन निरक्षीय या विषुवतरेखीय (equatorial bonds) बन्ध हैं तथा दो अक्षीय बन्ध (axial bonds) हैं जो निरक्षीय बन्धों से बड़े हैं अतः ये निरक्षीय बन्धों से दुर्बल होते हैं, इसी कारण PCl5 को गर्म करने पर यह PCl3 तथा Cl2 में वियोजित हो जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 26

प्रश्न 7.10.
PCl5 की जल से अभिक्रिया का संतुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर:
PCl5 जल से अभिक्रिया करके (जल-अपघटन) फॉस्फोरस ऑक्सीक्लोराइड (POCl3) देता है जो कि अन्त में फास्फोरिक अम्ल (H3PO4) में परिवर्तित हो जाता है तथा इसके साथ ही HCl भी बनता है।

PCl5 + H2O → POCl3 + 2HCl
POCl3 + 3H2O → H3PO4 + 3HCl

प्रश्न 7.11.
H3PO4 की क्षारकता क्या है?
उत्तर:
H3PO4 में तीन P-OH बन्ध उपस्थित हैं अतः इसकी क्षारकता 3 होती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 27

प्रश्न 7.12.
क्या होता है जब H3PO3 को गरम करते हैं?
उत्तर:
ऑर्थोफॉस्फोरस अम्ल (फॉस्फोरस अम्ल ) (H3PO3) को गर्म करने पर असमानुपातन होकर ऑर्थोफॉस्फोरिक अम्ल (फॉस्फोरिक अम्ल ) (H3PO4) तथा फॉस्फीन देता है। इसमें फॉस्फोरस +3 से +5 तथा -3 ऑक्सीकरण अवस्था में परिवर्तित होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 28

प्रश्न 7.13.
सल्फर के महत्वपूर्ण स्रोतों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
सल्फर के महत्त्वपूर्ण स्रोत निम्नलिखित हैं-

  • भूपर्पटी में सल्फर की मात्रा केवल 0.03 से 0.1% ही होती है।
  • संयुक्त अवस्था में सल्फर मुख्यतया सल्फेटों के रूप में, जैसे-जिप्सम (CaSO4.2H2O), एपसम लवण (MgSO4.7H2O), बेराइट (BaSO4) तथा सल्फाइडों के रूप में, जैसे-गेलेना (PbS), यशद ब्लैंड (जिंक ब्लैंड) (ZnS), कॉपर पाइरॉइट (CuFeS2) में पाई जाती है।
  • सल्फर की सूक्ष्म मात्रा ज्वालामुखी में हाइड्रोजन सल्फाइड के रूप में भी पाई जाती है।
  • कार्बनिक पदार्थों; जैसे-अंडे, प्रोटीन, लहसुन, प्याज, सरसों, बाल तथा ऊन में भी सल्फर होती है।

प्रश्न 7.14.
वर्ग 16 के तत्वों के हाइड्राइडों के तापीय स्थायित्व के क्रम को लिखिए।
उत्तर:
वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के कारण बन्ध वियोजन एन्थैल्पी कम होती जाती है अतः हाइड्राइडों का तापीय स्थायित्व कम होगा।
H2O > H2S > H2Se > H2Te > H2Po
हाइड्राइडों का तापीय स्थायित्व

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 7.15.
H2O एक द्रव तथा H2S गैस क्यों है?
उत्तर:
ऑक्सीजन के छोटे आकार और उच्च विद्युत्त्त्टणात्मकता (3.0) के कारण O-H बन्ध अधिक ध्रुवीय होने से जल के अणु अन्तराअणुक हाइड्रोजन आबंध के द्वारा अधिक संगुणित होकर पास-पास आ जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप यह द्रव अवस्था में रहता है, जबकि H2S के अणु दुर्बल वान्डरवाल बल द्वारा आकर्षित होते हैं अतः अणु दूरदूर होने के कारण यह गैस होती है।

प्रश्न 7.16.
निम्नलिखित में से कौनसा तत्व ऑक्सीजन के साथ सीधे अभिक्रिया नहीं करता?
Zn, Ti, Pt, Fe
उत्तर:
इन तत्वों में से Pt, ऑक्सीजन के साथ सीधे अभिक्रिया नहीं करता क्योंकि इसकी क्रियाशीलता बहुत कम होती है अतः यह उत्कृष्ट धातु (Noble metal) है।

प्रश्न 7.17.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए-
(i) C2H4 + O2
(ii) 4Al + 3O2
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 29

प्रश्न 7.18.
O3, एक प्रबल ऑक्सीकारक की तरह क्यों क्रिया करती है?
उत्तर:
O3 (ओजोन ) आसानी से वियोजित होकर नवजात ऑक्सीजन [O] देती है अतः यह प्रबल ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करती है।
O3 → O2 + O ( नवजात ऑक्सीजन )

प्रश्न 7.19.
O3 का मात्रात्मक आकलन कैसे किया जाता है?
उत्तर:
जब ओजोन, बोरेट बफर (उभय प्रतिरोधी) (pH 9.2) युक्त उभय प्रतिरोधित पोटैशियम आयोडाइड (KI) विलयन के आधिक्य से अभिक्रिया करती है तो आयोडीन (I2) मुक्त होती है जिसका मानक सोडियम थायोसल्फेट (Na2S2O3) विलयन के साथ अनुमापन करके O3 गैस का मात्रात्मक आकलन किया जाता है।

प्रश्न 7.20.
तब क्या होता है जब सल्फर डाइऑक्साइड को Fe(III) लवण के जलीय विलयन में से प्रवाहित करते हैं?
उत्तर:
जब सल्फर डाइऑक्साइ्ड को Fe(III) लवण के जलीय विलयन में प्रवाहित करते हैं तो SO2 इसे Fe(II) में अपचयित कर देती है क्योंकि नम सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) अपचायक की तरह व्यवहार करती है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 30

प्रश्न 7.21.
दो S-O आबंधों की प्रकृति पर टिप्पणी कीजिए जो SO2 अणु बनाते हैं। क्या SO2 अणु के ये दोनों S-O आबंध समतुल्य (समान) हैं?
उत्तर:
SO2 अणु कोणीय होता है तथा यह दो अनुनादी संरचनाओं (विहित रूपों) का अनुनाद संकर है अतः ये दोनों S-O बन्ध समान हैं तथा सहसंयोजी हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 31

प्रश्न 7.22.
SO2 की उपस्थिति का पता कैसे लगाया जाता है?
उत्तर:
SO2 तीखी गंधयुक्त रंगहीन गैस है। SO2 गैस की उपस्थिति का पता निम्नलिखित परीक्षण से लगाया जाता है। यह अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट (VII) (KMnO4) के गुलाबी विलयन को रंगहीन कर देती है क्योंकि इससे KMnO4 का अपचयन हो जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 32

प्रश्न 7.23.
उन तीन क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए जिनमें H2SO4 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उत्तर:
H2SO4 निम्नलिखित क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है-

  • पेट्रोलियम के शोधन में,
  • अपमार्जक उद्योग में तथा
  • उर्वरकों (अमोनियम सल्फेट, सुपर फास्फेट) के उत्पादन में।

प्रश्न 7.24.
संस्पर्श प्रक्रम (सम्पर्क विधि) द्वारा H2SO4 की मात्रा में वृद्धि करने के लिए आवश्यक परिस्थितियों को लिखिए।
उत्तर:
संस्पर्श प्रक्रम द्वारा H2SO4 के निर्माण की मुख्य अभिक्रिया SO2 गैस का V2O5 उत्प्रेरक की उपस्थिति में O2 द्वारा ऑक्सीकरण है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 Img 33
यह अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी तथा उत्क्रमणीय है एवं इसमें आयतन में कमी होती है। अतः कम ताप और उच्च दाब SO3 की उच्च लब्धि (yield) के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ हैं। परन्तु ताप बहुत कम नहीं होना चाहिए अन्यथा अभिक्रिया की गति धीमी हो जाएगी। अतः सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन में प्रयुक्त संयंत्र का दाबं 2 तथा ताप 720K रखा जाता है।

प्रश्न 7.25.
जल में H2SO4 के लिए \(K_{a_2} \ll K_{a_1}\) क्यों है?
उत्तर:
जलीय विलयन में H2SO4 का आयनन दो पदों में होता है-
(i) \(\mathrm{H}_2 \mathrm{SO}_4(\mathrm{aq})+\mathrm{H}_2 \mathrm{O}(l) \rightarrow \mathrm{H}_3 \mathrm{O}^{+}(\mathrm{aq})+\mathrm{HSO}_4^{-}(\mathrm{aq}) \text {; }\)

K1 = बहुत अधिक (\(K_{a_1}\) > 10)

(ii) \(\mathrm{HSO}_4^{-}(\mathrm{aq})+\mathrm{H}_2 \mathrm{O}(l) \rightarrow \mathrm{H}_3 \mathrm{O}^{+}(\mathrm{aq})+\mathrm{SO}_4^{2-}(\mathrm{aq})\)

K2 = 1.2 × 10-2

\(K_{a_1}\) का अधिक मान यह दर्शाता है कि H2SO4 अधिकतर H+ तथा \(\mathrm{HSO}_4^{-}\) में वियोजित हो जाता है।

\(\mathrm{K}_{\mathrm{a}_2}\) का मान \(\mathrm{K}_{\mathrm{a}_1}\) से बहुत कम होता है क्योंकि H2SO4 (उदासीन अणु) का प्रथम वियोजन आसानी से होता है जबकि \(\mathrm{HSO}_4^{-}\) का वियोजन (द्वितीय वियोजन) बहुत कम होता है क्योंक ऋणात्मक आयन में से प्रोटोन का निकलना मुश्किल होता है।

प्रश्न 7.26.
आबंध वियोजन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा जलयोजन एन्थैल्पी जैसे प्राचलों (Parameters) को महत्व देते हुए F2 तथा Cl2 की ऑक्सीकारक क्षमता की तुलना कीजिए।
उत्तर:
वर्ग में नीचे जाने पर हैलोजनों के जलीय विलयन में उनकी ऑक्सीकारक क्षमता कम होती है जिसकी पुष्टि मानक इलेक्ट्रॉड विभव मानों से होती है जो कि आबंध वियोजन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा जलयोजन एन्थैल्पी पर निर्भर करते हैं।
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F2 के लिए बन्ध वियोजन एन्थैल्पी का मान Cl2 की तुलना में कम है तथा F के छोटे आकार के कारण इसकी जलयोजन एन्थैल्पी भी Cl से बहुत अधिक है अतः F का मानक इलेक्ट्रोड विभव (अपचयन विभव) Cl के मानक इलेक्ट्रोड विभव से अधिक है। इसी कारण F2 का ऑक्सीकारक गुण Cl2 से अधिक है।

प्रश्न 7.27.
दो उदाहरणों द्वारा फ्लुओरीन के असामान्य व्यवहार को दर्शाइए।
उत्तर:
फ्लुओरीन के असामान्य व्यवहार का कारण उसका छोटे आकार, उच्च विद्युतत्रणता, निम्न F-F बन्ध वियोजन एन्थैल्पी तथा संयोजकता कोश में d कक्षकों की अनुपस्थिति है।
फ्लुओरीन के असामान्य व्यवहार के उदाहरण निम्नलिखित हैं-

  • फ्लुओरीन केवल एक ऑक्सो अम्ल बनाती है जबकि दूसर हैलोजन कई ऑक्सो अम्ल बनाते हैं।
  • F2 की आबंध वियोजन एन्थैल्पी तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के मान अपेक्षित मानों से बहुत कम होते हैं।

प्रश्न 7.28.
समुद्र कुछ हैलोजन का मुख्य स्तोत है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
समुद्र कुछ हैलोजनों का मुख्य स्रोत है क्योंकि समुद्री पानी में सोडियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम तथा कैल्शियम के क्लोराइड, ब्रोमाइड तथा आयोडाइड होते हैं लेकिन मुख्यतः यह सोडियम क्लोराइड का विलयन (द्रव्यमान 2.5%) है। शुष्क हुए समुद्री निक्षेपों में सोडियम क्लोराइड तथा कारनेलाइट (KCl.MgCl2.6H2O) जैसे यौगिक उपस्थित होते हैं। कुछ समुद्री जीवों के तंत्र में आयोडीन होती है; बहुत से समुद्री पादपों में 0.5% आयोडीन तथा चिली साल्टपीटर में 0.2% तक सोडियम आयोडेट पाया जाता है।

प्रश्न 7.29.
Cl2 की विरंजक क्रिया का कारण बताइए।
उत्तर:
Cl2 एक प्रबल विरंजक है। विरंजन क्रिया नमी की उपस्थिति में ऑक्सीकरण के कारण होती है। नमी की उपस्थिति में Cl2 नवजात ऑक्सीजन [O] देती है जो रंगीन पदार्थ का ऑक्सीकरण करके उसे रंगहीन कर देती है। यह विरंजन स्थायी होता है।
Cl2 + H2O → 2HCl + [O]
रंगीन पदार्थ + [O] → रंगहीन पदार्थ

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 7.30.
उन दो विषैली गैसों के नाम बताइए जो क्लोरीन गैस से बनाई जाती हैं।
उत्तर:
क्लोरीन गैस से बनाई जाने वाली विषैली गैसें फास्जीन (COCl2), अश्रु गैस (CCl3NO2) तथा मस्टर्ड गैस (Cl-CH2-CH2-S-CH2-CH2-Cl) हैं।

प्रश्न 7.31.
I2 से ICI अधिक क्रियाशील क्यों है?
उत्तर:
सामान्यतः अंतराहैलोजन यौगिक हैलोजन की अपेक्षा अधिक क्रियाशील होते हैं क्योंकि X-X आबंध की अपेक्षा X-X’ आबंध दुर्बल होता है। l-Cl बन्ध ध्रुवीय तथा l-l बन्ध अध्रुवीय है। अतः lCl, l2 से अधिक क्रियाशील है।

प्रश्न 7.32.
हीलियम को गोताखोरी के उपकरणों में उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
आधुनिक गोताखोरी के उपकरणों में हीलियम, ऑक्सीजन के तनुकारी (Diluent) के रूप में प्रयुक्त की जाती है क्योंक रक्त में इसकी विलेयता बहुत कम होती है।

प्रश्न 7.33.
निम्नलिखित समीकरण को संतुलित कीजिए –
XeF6 + 2H2O → XeO2F2 + 4HF
जीनॉन डाइऑक्सीडाइफ्लुओराइड

प्रश्न 7.34.
रेडॉन के रसायन का अध्ययन करना कठिन क्यों था?
उत्तर:
रेडॉन (Rn) रेडियोसक्रिय तत्व है तथा इसकी अर्धायु बहुत कम (3.82 दिन) होती है अतः इसका विघटन हो जाता है। इसलिए रेडॉन के रसायन का अध्ययन कठिन हो जाता है।

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HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक

प्रश्न 15.1.
बहुलक और एकलक पदों की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर:

  1. बहुलक उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले बृहदाणु होते हैं। जिनमें बहुत अधिक संख्या में, एकलक अणुओं से बनी पुनरावृत्त संरचनात्मक इकाइयाँ उपस्थित होती हैं।
  2. एकलक सरल तथा क्रियाशील अणु होते हैं जो बहुलकीकृत होने में सक्षम होते हैं तथा इनसे पुनरावृत्त संरचनात्मक इकाई बनती है।

प्रश्न 15.2.
प्राकृतिक और संश्लिष्ट बहुलक क्या हैं? प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए ।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक बहुलक उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले बृहदाणु होते हैं जो प्रकृति (पादपों और जंतुओं) में पाए जाते हैं। प्रोटीन तथा न्यूक्लीक अम्ल इनके उदाहरण हैं।
  2. संश्लिष्ट बहुलक मानव निर्मित उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले बृहदाणु होते हैं। संश्लिष्ट प्लास्टिक तथा रबर इनके उदाहरण हैं।

प्रश्न 15.3.
समबहुलक और सहबहुलक पदों (शब्दों) में विभेद कर प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
समबहुलक – समान प्रकार की एकलक स्पीशीज़ के बहुलकीकरण से बने बहुलकों को समबहुलक कहते हैं। उदाहरण- पॉलिथीन ।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 1
सहबहुलक – दो भिन्न प्रकार की एकलक स्पीशीज के बहुलकीकरण से बने बहुलकों को सहबहुलक कहा जाता है। उदाहरण- ब्यूना – S
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 2

प्रश्न 15.4.
एकलक की प्रकार्यात्मकता को आप किस प्रकार समझाएंगे ?
उत्तर:
एकलक में स्थित आबंधी स्थितियों की संख्या को एकलक की प्रकार्यात्मकता कहते हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक

प्रश्न 15.5.
बहुलकन पद (शब्द) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
बहुलकन (Polymerisation ) – एक अथवा अधिक (समान या भिन्न) छोटे तथा सरल अणु (एकलक) आपस में क्रिया करके उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले वृहद अणु बनाते हैं इन्हें बहुलक कहते हैं तथा बहुलक बनने की इस क्रिया को बहुलकन कहते हैं।

प्रश्न 15.6.
(NH-CHR – CO) एक समबहुलक है या सहबहुलक?
उत्तर:
(NH-CHR-CO) इकाई एक ही प्रकार के एकलक अणु से बनी है अतः यह एक समबहुलक है।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक

प्रश्न 15.7.
प्रत्यास्थ बहुलकों में प्रत्यास्थ गुण किस कारण से होता है?
उत्तर:
प्रत्यास्थ बहुलकों में विभिन्न श्रृंखलाएं एक-दूसरे के साथ दुर्बल वान्डरवाल्स अन्योन्य क्रियाओं द्वारा जुड़ी होती हैं तथा कुंडलित संरचना बना लेती हैं इसलिए इन्हें स्प्रिंग की तरह खींचा जा सकता है अतः इन दुर्बल अन्तरा आण्विक बलों के कारण ही इनमें प्रत्यास्थ गुण होता है।

प्रश्न 15.8.
संकलन (योगात्मक) और संघनन बहुलकन के मध्य आप किस प्रकार विभेद करेंगे?
उत्तर:
संकलन या योगात्मक बहुलकन (बहुलकीकरण) में समान अथवा भिन्न अंसतृप्त एकलक अणु मिल कर बृहत् बहुलक अणु बनाते हैं जबकि संघनन बहुलकन में दो अथवा अधिक प्रकार के द्विक्रियात्मक एकलक अणु संघनन अभिक्रिया द्वारा बहुलक बनाते हैं, इस प्रक्रिया में छोटे अणु जैसे जल, ऐल्कोहॉल इत्यादि का विलोपन होता है। उदाहरण-प्रोपीन (CH3CH = CH2) से पॉलिप्रोपीन HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 3 का बनना संकलन बहुलकन है जबकि हैक्सा मेथिलीन डाइऐमीन (NH2-(CH2)6NH2) तथा ऐडिपिक अम्ल (HOOC- (CH2)4COOH) के बहुलकन से नाइलॉन 6,6 का बनना संघनन बहुलकन है। इसमें H2O का विलोपन होता है।
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प्रश्न 15.9.
सहबहुलकन शब्द (पद) की व्याख्या कीजिए और दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
सहबहुलकन या सहबहुलकीकरण – सहबहुलकीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें बहुलक के निर्माण में एक से अधिक प्रकार की एकलक स्पीशीज़ प्रयुक्त होती है। सहबहुलक में प्रत्येक एकलक की अनेक इकाइयाँ होती हैं। 1, 3 – ब्यूटाडाईन तथा स्टाइरीन और 1, 3 – ब्यूटाडाईन एवं ऐक्रिलोनाइट्राइल के सहबहुलक इसके उदाहरण हैं।
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प्रश्न 15.10.
एथीन के बहुलकन के लिए मुक्त मूलक क्रियाविधि दीजिए ।
उत्तर:
एथीन के बहुलकन की मुक्तमूलक क्रियाविधि में निम्नलिखित तीन पद होते हैं-
(1) श्रृंखला प्रारंभक पद-
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(2) श्रृंखला संचरण पद-
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(3) शृंखला समापन पद-दीर्घ श्रृंखला के समापन के लिए मुक्त- मूलक विभिन्न प्रकार से जुड़कर पॉलिथीन बनाते हैं।
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प्रश्न 15.11.
तापसुघट्य और तापदृढ़ बहुलकों को प्रत्येक के दो उदाहरण के साथ परिभाषित कीजिए ।
उत्तर:
आण्विक बलों पर आधारित वर्गीकरण (Classifcation based on Molecular Forces):
सभी प्रकार के अणुओं में अन्तराअणुक बल पाए जाते हैं लेकिन बहुलकों में ये बल आपस में मिलकर अधिक प्रभावी होते हैं जिससे इनमें विशिष्ट गुण उत्पन्न हो जाते हैं। जैसे- तनन सामर्थ्य प्रत्यास्था तथा चर्मलता। इन बलों द्वारा बहुलक श्रृंखलाएँ आपस में जुड़ी होती हैं। बहुलकों के यांत्रिक गुणों के आधार पर ही इन्हें दैनिक जीवन में विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग में लिया जाता है।

बहुलकों को उनमें उपस्थित अंतराआण्विक बलों के परिमाण के आधार पर इन्हें निम्नलिखित चार उपसमूहों में वर्गीकृत किया गया है-
(a) प्रत्यास्थ बहुलक (Elastomers ) – प्रत्यास्थ बहुलकों में बहुलक श्रृंखलाएँ आपस में दुर्बल अंतराआण्विक बलों द्वारा जुड़ी होती हैं। ये दुर्बल बल बहुलक को तनित होने देते हैं। श्रृंखलाओं के बीच कुछ ‘तिर्यकबंध’ भी होते हैं अतः ये बहुलक खींचने पर लम्बे हो जाते हैं तथा छोड़ देने पर पुनः अपनी पूर्व अवस्था में आ जाते हैं अर्थात् इनमें प्रत्यास्थता का गुण पाया जाता है। ये रबर के समान ठोस होते हैं। जैसे वल्कनीकृत रबर । ब्यूना – N, ब्यूना S तथा निओप्रीन भी प्रत्यास्थ बहुलकों के उदाहरण हैं।

(b) रेशे या रेशेदार बहुलक (Fibres or Fibrous Poly- mers ) – रेशेदार बहुलकों में तनन सामर्थ्य उच्च होता है क्योंकि इनमें बहुलक श्रृंखलाओं के मध्य असंख्य प्रबल अन्तराअणुक हाइड्रोजन बन्ध पाए जाते हैं। इसी कारण ये क्रिस्टलीय ठोस होते हैं तथा इनका गलनांक तीक्ष्ण होता है। ये बहुलक धागे बनाने में प्रयुक्त होते हैं।

उदाहरण-पॉलिएस्टर (टैरीलीन) तथा पॉलिऐमाइड (नाइलॉन- 6,6 ) इत्यादि ।

(c) तापसुघट्य बहुलक या ताप सुनम्य बहुलक (Thermo plastic Polymers) – ये बहुलक रेखीय अथवा अल्प शाखित लंबी श्रृंखला युक्त होते हैं, जिन्हें बार-बार गरम करने से मृदुल और ठंडा करने से कठोर हो जाते हैं अतः इन्हें साँचों में ढाला जा सकता है। इन बहुलकों में अंतराआण्विक आकर्षण बल प्रत्यास्थ बहुलकों से अधिक तथा रेशों से कम होता है। उदाहरण- पॉलिथीन, पॉलिस्टाइरीन, पॉलिवाइनिल क्लोराइड, पॉलिप्रोपिलीन इत्यादि ।

(d) तापदुढ़ बहुलक या थर्मोसेटिंग बहुलक (Thermoset- ting Polymers)-ये बहुलक तिर्यक बद्ध अथवा अत्यधिक शाखित होते हैं। इन्हें गर्म करने पर तिर्यक बन्धन बढ़ जाते हैं तथा इनकी संरचना त्रिविमीय जालक के समान हो जाती है अतः ये दुर्गलनीय ( Infusible ) हो जाते हैं। इसलिए इनका पुनः उपयोग नहीं किया जा सकता। ताप दृढ़ बहुलकों को सामान्यतः निम्न अणु भार वाले अर्ध तरल बहुलकों को गरम करके बनाया जाता है। उदाहरण-बैकेलाइट, यूरिया – फार्मेल्डिहाइड रेजिन इत्यादि ।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक

प्रश्न 15.12.
निम्न बहुलकों को प्राप्त करने के लिए प्रयुक्त एकलक लिखिए-
(i) पॉलिवाइनिल क्लोराइड
(ii) टेफ्लॉन
(iii) बैकेलाइट।
उत्तर:
उपर्युक्त बहुलकों को प्राप्त करने के लिए प्रयुक्त एकलक निम्न प्रकार हैं-

  • पॉलिवाइनिल क्लोराइड का एकलक CH2=CH-CI (वाइनिल क्लोराइड) है।
  • टेफ्लॉन का एकलक CF2 = CF2 (टेट्राफ्लुओरोएथिलीन) है।
  • बैकेलाइट के बनने में प्रयुक्त होने वाले एकलक HCHO (फार्मेल्डिहाइड) और C6H5OH (फ़ीनॉल) हैं।

प्रश्न 15.13.
मुक्तमूलक योगज बहुलकन में प्रयुक्त एक सामान्य प्रारंभक का नाम और संरचना लिखिए।
उत्तर:
मुक्तमूलक योगज बहुलकन में सामान्यतः बेन्जॉयल परॉक्साइड को प्रारंभक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है जिसकी संरचना निम्न प्रकार होती है-
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प्रश्न 15.14.
रबर अणुओं में द्विबंधों की उपस्थिति किस प्रकार उनकी संरचना और क्रियाशीलता को प्रभावित करती है?
उत्तर:
संरचनात्मक रूप से प्राकृतिक रबर एक रेखीय सिस – 1, 4 – पॉलि आइसोप्रीन है। इसमें द्विआबंध, आइसोप्रीन इकाइयों के C, और C के मध्य स्थित होते हैं तथा द्विआबंध का सिस अभिविन्यास होता है अतः इसकी श्रृंखलाओं के मध्य दुर्बल अंतराआण्विक आकर्षण होने के कारण ये समीप नहीं आ पाती हैं। इस कारण प्राकृतिक रबर की कुंडलित संरचना होती है तथा यह प्रत्यास्थता का गुण प्रदर्शित करता है ।

प्रश्न 15.15.
रबर के वल्कनीकरण के मुख्य उद्देश्य की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
प्राकृतिक रबर उच्च ताप (> 335K ) पर नरम तथा निम्न ताप पर (< 283K) भंगुर हो जाता है तथा इसमें जल को अवशोषित करने की क्षमता होती है। यह अध्रुवीय विलायकों में विलेय होता है तथा ऑक्सीकारकों के प्रति प्रतिरोधी नहीं होता है।

रबर के इन भौतिक गुणों में सुधार करने के लिए रबर का वल्कनीकरण किया जाता है। वल्कनीकरण से, द्विबंधों की क्रियाशील स्थितियों पर सल्फर तिर्यक बन्ध बन जाते हैं। इससे रबर की कठोरता तथा प्रत्यास्थता बढ़ जाती है।

प्रश्न 15.16.
नाइलॉन – 6 और नाइलॉन – 6,6 में पुनरावृत्त एकलक इकाइयाँ क्या हैं?
उत्तर:
नाइलॉन 6 की पुनरावृत्त एकलक इकाई [-NH(CH2)5-CO-] है तथा नाइलॉन – 6,6 बहुलक की पुनरावृत्त एकलक इकाई दो एकलकों हैक्सामेथिलीनडाइऐमीन और ऐडिपिक अम्ल से बनती है जो कि निम्न प्रकार है-
[-NH-(CH2)6-NH-CO-CH2)4-CO-]

प्रश्न 15.17.
निम्नलिखित बहुलकों के एकलकों का नाम और संरचना लिखिए-
(i) ब्यूना – S
(ii) ब्यूना – N
(iii) डेक्रॉन
(iv) निओप्रीन ।
उत्तर:
उपर्युक्त बहुलकों के बनने में प्रयुक्त एकलकों के नाम तथा संरचना निम्न प्रकार है-
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प्रश्न 15.18.
निम्नलिखित बहुलक संरचनाओं के एकलक की पहचान कीजिए-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 14
उत्तर:
उपर्युक्त बहुलकों में प्रयुक्त एकलक निम्नलिखित हैं-
(i) डेकेन – 1, 10 – डाइओइक अम्ल (HOOC(CH2)8 COOH) और हैक्सामेथिलीन डाइऐमीन H2N(CH2)6NH2

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 15

प्रश्न 15.19.
एथिलीन ग्लाइकॉल और टेरेपथैलिक अम्ल से डेक्रॉन किस प्रकार प्राप्त किया जाता है?
उत्तर:
एथिलीन ग्लाइकॉल तथा टेरेपथैलिक अम्ल की क्रिया से टेरिलीन अथवा डेक्रॉन बनाने का समीकरण निम्न है। यह संघनन बहुलकन का उदाहरण है क्योंकि इसमें जल का अणु निकलता है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 11

प्रश्न 15.20
जैवनिम्ननीय बहुलक क्या है? एक जैवनिम्ननीय ऐलिफैटिक पॉलिएस्टर का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
बहुत से बहुलक पर्यावरण निम्नीकरण प्रक्रियाओं के प्रति प्रतिरोधी होते हैं तथा ये लम्बे समय तक अनिम्नीकृत रूप में ही पड़े रहते हैं। ये बहुलक ठोस अपशिष्ट द्रव्य के रूप में एकत्रित हो जाते हैं जिनसे पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं इसी कारण जैव निम्ननीय बहुलकों का विकास हुआ।

जैवनिम्ननीय बहुलक वे बहुलक होते हैं जो एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रियाओं द्वारा विघटित हो जाते हैं। ये एन्जाइम, जीवाणुओं (Micro organisms) द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं। जैवनिम्ननीय बहुलकों में, जैव बहुलकों के समान क्रियात्मक समूह उपस्थित होते हैं। जैवनिम्ननीय बहुलकों से पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न नहीं होतीं। जैवनिम्ननीय बहुलकों के उदाहरण निम्नलिखित हैं-
(1) पॉलि β-हाइड्रॉक्सीब्यूटिरेट-को-β-हाइड्रॉक्सी वैलेरेट (PHB V)-यह एक ऐलिफैटिक पॉलिएस्टर है। यह 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनॉइक अम्ल तथा 3-हाइड्रॉक्सीपेन्टेनॉइक अम्ल के सहबहुलकीकरण से बनता है।
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 12

PHB V का उपयोग विशिष्ट पैकेजिंग, अस्थियों में प्रयुक्त युक्तियों (Devices) तथा औषधों के नियंत्रित मोचन (release) में होता है। पर्यावरण में PHBV का जीवाण्विक निम्नीकरण (Bacterial degradation) हो जाता है।

(2) नाइलॉन-2-नाइलॉन-6-यह ग्लाइसिन (NH2-CH2-COOH) तथा ऐमीनो कैप्रोइक अम्ल (NH2(CH2)5COOH) का एकान्तर पॉलिऐमाइड है। यह सहबहुलकीकरण का एक उदाहरण है जिसको निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है-
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HBSE 12th Class Chemistry बहुलक Intext Questions

प्रश्न 15.1.
बहुलक क्या होते हैं?
उत्तर:
बहुलक उच्च आण्विक द्रव्यमान वाले पदार्थ होते हैं जिनमें बहुत अधिक संख्या में पुनरावृत्त संरचनात्मक इकाइयाँ पाई जाती हैं। जोकि कुछ सरल तथा क्रियाशील अणुओं से प्राप्त होती हैं जिन्हें एकलक कहते हैं। ये इकाइयाँ सहसंयोजक बंधों द्वारा आपस में जुड़ी होती हैं। बहुलकों को बृहदाणु भी कहते हैं। उदाहरणपॉलिथीन तथा बैकेलाइट, रबर तथा नाइलॉन-6,6.

प्रश्न 15.2.
निम्नलिखित बहुलकों को बनाने वाले एकलकों के नाम लिखिए-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 16
उत्तर:
उपर्युक्त बहुलकों को बनाने वाले एकलकों के नाम निम्नलिखित हैं-

  • हैक्सामेथिलीनडाइऐमीन तथा ऐडिपिक अम्ल
  • कैप्रोलैक्टम
  • टेट्राफ्लुओरोएथीन।

प्रश्न 15.3
निम्न को योगज (योगात्मक) (Addition) और संघनन बहुलकों में वर्गीकृत कीजिए-टेरिलीन, बैकेलाइट, पॉलिथीन, टेफ्लॉन।
उत्तर:

  1. योगज बहुलक-पॉलिथीन, टैफ्लॉन।
  2. संघनन बहुलक-टेरिलीन, बैकेलाइट।

प्रश्न 15.4.
ब्यूना-N और ब्यूना-S के मध्य अंतर समझाइए।
उत्तर:
ब्यूना-N, 1,3-ब्यूटाडाईन (CH2 = CH – CH = CH2) तथा ऐक्रिलो नाइट्राइल HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 17 का सहबहुलक है जबकि ब्यूना-S, 1,3-ब्यूटाडाईन तथा स्टाइरीन HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 15 बहुलक 18का सहबहुलक है।

प्रश्न 15.5.
निम्न बहुलकों को उनके अंतराआण्विक बलों के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
नाइलॉन-6,6, ब्यूना-S, पॉलिथीन
उत्तर:
उपरोक्त बहुलकों में अंतराआण्विक बलों का बढ़ता क्रम निम्न प्रकार होता है-
ब्यूना-S < पॉलिथीन < नाइलॉन-6,6

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Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 5 पृष्ठ रसायन Textbook Exercise Questions and Answers.

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प्रश्न 5.1.
अधिशोषण एवं अवशोषण शब्दों (पदों) के तात्पर्य में विभेद कीजिए । प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए ।
उत्तर:
अधिशोषण – किसी ठोस या द्रव द्वारा किसी पदार्थ के अणुओं को आकर्षित करके उन्हें पृष्ठ पर धारण करने को अधिशोषण कहते हैं।
अवशोषण – किसी पदार्थ का दूसरे पदार्थ में समान वितरण अवशोषण कहलाता है।
अधिशोषण में पदार्थ केवल पृष्ठ पर सांद्रित होता है जबकि अवशोषण में पदार्थ, दूसरे पदार्थ में समान रूप से वितरित हो जाता है। सिलिका जेल पर जल वाष्प का अधिशोषण होता है जबकि शुष्क CaCl2 पर जल वाष्प का अवशोषण होता है।

प्रश्न 5.2.
भौतिक अधिशोषण एवं रासायनिक अधिशोषण में क्या अंतर है?
उत्तर:
अधिशोषण के प्रकार:
ठोसों पर गैसों के अधिशोषण को अधिशोष्य तथा अधिशोषक के अणुओं के मध्य आकर्षण बलों के आधार पर दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-
(a) भौतिक अधिशोषण
(b) रासायनिक अधिशोषण या रसोवशोषण

(a) भौतिक अधिशोषण – या वान्डरवाल अधिशोषण – किसी ठोस की सतह पर जब गैस का अधिशोषण वान्डरवाल बलों के कारण होता है तो इसे भौतिक अधिशोषण कहते हैं। दुर्बल वान्डरवाल बलों के कारण ताप बढ़ाने से या दाब कम करने से इसे आसानी से कम किया जा सकता है। भौतिक अधिशोषण में अधिशोष्य तथा अधिशोषक के मध्य किसी प्रकार के रासायनिक बन्ध का निर्माण नहीं होता ।

(b) रासायनिक अधिशोषण या लैंग्म्यूर अधिशोषण – जब किसी ठोस की सतह पर गैस के अधिशोषण में रासायनिक बन्ध बनते हैं तो इसे रासायनिक अधिशोषण कहते हैं। ये रासायनिक बन्ध आयनिक या सहसंयोजक हो सकते हैं, लेकिन प्रायः यह बन्ध सहसंयोजक होता है। रासायनिक अधिशोषण की सक्रियण ऊर्जा उच्च होती है अतः इसे सक्रियत अधिशोषण (activated adsorption) भी कहते हैं। भौतिक एवं रासायनिक अधिशोषण साथ-साथ भी हो सकते हैं। तब निम्न ताप पर होने वाला भौतिक अधिशोषण, ताप बढ़ाने पर रासायनिक अधिशोषण में परिवर्तित हो जाता है।

उदाहरण, H2 गैस पहले Ni की सतह पर वान्डरवाल बलों के द्वारा अधिशोषित होती है। उसके बाद हाइड्रोजन के अणु, परमाणुओं में वियोजित होकर रासायनिक अधिशोषण द्वारा निकल की सतह पर बंध जाते हैं, क्योंकि उच्च ताप पर अभिकारकों को सक्रियण ऊर्जा प्राप्त हो जाती है। रासायनिक अधिशोषण में अधिशोषक की सतह पर उत्पाद बनता है, अतः विशोषण के समय उत्पाद का ही विशोषण होता है। जैसे कार्बन की सतह पर O2 के अधिशोषण से CO तथा CO2 बनती है तथा इन्हीं CO तथा CO2 का विशोषण होता है।

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प्रश्न 5.3.
कारण बताइए कि सूक्ष्म विभाजित पदार्थ अधिक प्रभावी अधिशोषक क्यों होता है?
उत्तर:
सूक्ष्म विभाजित पदार्थ का पृष्ठ क्षेत्रफल तथा सक्रिय केन्द्र अधिक होते हैं। अधिशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं सक्रिय केन्द्र बढ़ने पर अधिशोषण की मात्रा बढ़ती है अतः सूक्ष्म विभाजित पदार्थ अधिक प्रभावी अधिशोषक होता है।

प्रश्न 5.4.
किसी ठोस पर गैस के अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कारक कौनसे हैं ?
उत्तर:
भौतिक अधिशोषण के अभिलक्षण – या भौतिक अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कारक – भौतिक अधिशोषण के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं-

(i) अधिशोष्य की प्रकृति किसी ठोस द्वारा अधिशोषित गैस की मात्रा गैस की प्रकृति पर निर्भर करती है। सामान्यतया, आसानी से द्रवित होने वाली गैसें, जैसे – SO2, CO2, HCl, NH2 ( उच्च क्रांतिक तापयुक्त) शीघ्रता से अधिशोषित हो जाती हैं, जबकि हल्की गैसें जो आसानी से द्रवित नहीं होतीं, जैसे- H2, N2, O2, का अधिशोषण मुश्किल से होता है क्योंकि वान्डरवाल बल क्रांतिक तापों के निकट अधिक प्रबल होते हैं। इसीलिए 1g सक्रियत चारकोल, मेथेन ( क्रांतिक ताप 190K) की अपेक्षा अधिक सल्फर डाइऑक्साइड (क्रांतिक ताप 630K) अधिशोषित करता है।

(ii) अधिशोषक की प्रकृति तथा उसका पृष्ठीय क्षेत्रफल – अधिशोषक का पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ने पर अधिशोषण की मात्रा बढ़ती है तथा रन्ध्रहीन एवं कठोर पदार्थों की तुलना में सरन्ध्र व महीन चूर्णित धातुओं पर अधिशोषण अधिक मात्रा में होता है क्योंकि इनका पृष्ठ क्षेत्रफल अधिक होता है जैसे H2 गैस Ni पर सतह पर आसानी से अधिशोषित हो जाती है। विभिन्न धातुओं की अधिशोषण क्षमता का क्रम निम्न प्रकार होता है-
कोलाइडी Pd > सामान्य Pd Pt Au > Ni
विशिष्ट क्षेत्रफल – किसी अधिशोषक के प्रति ग्राम पृष्ठ क्षेत्रफल को उसका विशिष्ट क्षेत्रफल कहते हैं ।

(iii) विशिष्टता की कमी- भौतिक अधिशोषण की प्रकृति विशिष्ट नहीं होती क्योंकि वान्डरवाल बल व्यापक होते हैं अतः किसी भी गैस का किसी भी अधिशोषक की सतह पर अधिशोषण हो सकता है।

(iv) अधिशोषण की एन्थेल्पी – भौतिक अधिशोषण में ऊष्मा उत्सर्जित होती है अर्थात् यह एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रिया है लेकिन अधिशोष्य (गैस) तथा अधिशोषक (ठोस) के मध्य दुर्बल वान्डरवाल बल होने के कारण अधिशोषण एन्थैल्पी का मान कम (20-40 kJ mol-1 ) होता है। किसी धातु की सतह पर एक मोल गैस के अधिशोषण से परिवर्तन को अधिशोषण की एन्थैल्पी कहते हैं।

(v) उत्क्रमणीय प्रकृति ठोस की सतह पर गैस का अधिशोषण उत्क्रमणीय प्रकृति का होता है।
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(vi) अधिशोषक सक्रियण-
(i) अधिशोषक को रासायनिक तथा यांत्रिक विधियों द्वारा खुरदरा बनाकर इसका सक्रियण किया जाता है, इससे इसका पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ जाता है अतः अधिशोषण बढ़ जाता है।
(ii) ठोसों को सूक्ष्म विभाजित करने पर उनकी मुक्त संयोजकता तथा पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ जाता है।
(iii) अधिशोषक की सतह पर पहले से उपस्थित गैसों को हटाने के लिए उसे निर्वात में अतितप्त भाप के साथ गर्म करते हैं इससे प्राप्त अधिशोषक की अधिशोषण क्षमता अधिक होती है जैसे चारकोल का सक्रियण।

(vii) ताप तथा दाब का प्रभाव – दाब बढ़ाने पर किसी गैस का अधिशोषण अधिक मात्रा में होता है क्योंकि इससे गैस का आयतन कम होता है । (ले- शातैलिए का नियम) तथा ताप कम करने पर अधिशोषण अधिक होता है क्योंकि अधिशोषण एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है। अतः ताप बढ़ाकर तथा दाब कम करके अधिशोषित गैस को बाहर निकाला जा सकता है।

(viii) आण्विक परत की प्रकृति – भौतिक अधिशोषण में बहु आण्विक परत बनती है क्योंकि इसमें अधिशोषक तथा अधिशोष्य के मध्य वान्डरवाल बल होता है अतः थोड़े से अधिक दाब से ही अधिशोषित गैस की मात्रा बढ़ जाती है।

प्रश्न 5.5.
अधिशोषण समतापी वक्र क्या है? फ्रॉयन्डलिक अधिशोषण समतापी वक्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अधिशोषण समतापी वक्र – अधिशोषण की मात्रा दाब पर निर्भर करती है अतः निश्चित ताप पर अधिशोषित गैस की मात्रा का दाब के साथ सम्बन्ध अधिशोषण समतापी वक्र कहलाता है।
प्रतिग्राम अधिशोषक द्वारा अधिशोषित गैस की मात्रा तथा दाब के मध्य ग्राफ बनाने पर जो वक्र प्राप्त होते हैं, उन्हें वैज्ञानिक के नाम के आधार पर फ्रायन्डलिक समतापी वक्र कहते हैं।
फ्रायन्डलिक अधिशोषण समतापी वक्र – प्रयोगों के आधार पर यह पाया गया कि अधिशोषित गैस की मात्रा \(\left(\frac{x}{\mathrm{~m}}\right)\), दाब (p) बढ़ाने पर बढ़ती है। गणितीय रूप में-
\(\frac { x }{ m }\) = k.p1/n (n>1) ….(1)
यहाँ x अधिशोषक के m द्रव्यमान द्वारा p दाब पर अधिशोषित गैस का द्रव्यमान है। k तथा n स्थिरांक हैं जो अधिशोषक एवं गैस की प्रकृति पर निर्भर करते हैं।
समीकरण (1) का लघुगणक लेने पर
log \(\frac { x }{ m }\) = log k + \(\frac { 1 }{ n }\) log p …..(2)
यह समीकरण y = mx + c ( सरल रेखा का समीकरण) के समतुल्य है अतः log\(\frac { x }{ m }\) तथा log P के मध्य ग्राफ एक सरल रेखा होती है जिसका ढाल = \(\frac { 1 }{ n }\) तथा अन्तःखण्ड log k (y अक्ष पर ) के बराबर होगा। इससे समतापी वक्रों की वैधता की पुष्टि हो जाती है लेकिन समीकरण (2) दाब के निश्चित परिसर तक ही लागू होता है।

प्रश्न 5.6.
अधिशोषक के सक्रियण से आप क्या समझते हैं? यह कैसे प्राप्त किया जाता है?
उत्तर:
अधिशोषक के सक्रियण का अर्थ है उसकी अधिशोषण क्षमता बढ़ाना। इसे निम्न प्रकार प्राप्त किया जाता है-
(i) रासायनिक या यांत्रिक विधि से अधिशोषक की सतह को खुरदरा बनाना ।
(ii) अधिशोषण को चूर्णित ( Powdered ) या सूक्ष्म विभाजित अवस्था में परिवर्तित करना ।
(iii) ठोस पर पहले से अधिशोषित गैसों को हटाना ।

प्रश्न 5.7.
विषमांगी उत्प्रेरण में अधिशोषण की क्या भूमिका है?
उत्तर:
विषमांगी उत्प्रेरण में गैसीय अवस्था या विलयन में अभिकारक, ठोस उत्प्रेरक की सतह पर अधिशोषित हो जाते हैं । पृष्ठ पर अभिकारकों की सांद्रता में वृद्धि होने से अभिक्रिया की दर बढ़ जाती है तथा उत्पाद बनकर, उत्प्रेरक की सतह से पृथक् हो जाते हैं एवं उत्प्रेरक की सतह पुनः अभिक्रिया के लिए उपलब्ध हो जाती है।

प्रश्न 5.8.
अधिशोषण हमेशा ऊष्माक्षेपी क्यों होता है?
उत्तर:
भौतिक अधिशोषण हमेशा ऊष्माक्षेपी होता है क्योंकि गैसीय अणुओं एवं ठोस सतह के मध्य आकर्षण ( वान्डरवाल बल) होता है। यह आकर्षण बल दुर्बल होता है अतः अधिशोषण की एन्थैल्पी कम (20-40 kJ mol-1 ) होती है।

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प्रश्न 5.9.
कोलॉइडी विलयनों को परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं के आधार पर कैसे वर्गीकृत किया जाता है ?
उत्तर:
परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्था के आधार पर आठ प्रकार के कोलाइडी तंत्र हो सकते हैं, क्योंकि परिक्षिप्त प्रावस्था तथा परिक्षेपण माध्यम ठोस, द्रव अथवा गैस होते हैं। लेकिन किसी गैस का किसी अन्य गैस में मिश्रण हमेशा समांगी होता है अतः वह कोलॉइड नहीं होता । विभिन्न प्रकार के कोलॉइडों के उदाहरण तथा उनके विशिष्ट नामों के लिए भाग 5.4 में सारणी (कोलॉइडी तंत्रों के प्रकार) देखें ।

प्रश्न 5.10.
ठोसों द्वारा गैसों के अधिशोषण पर दाब एवं ताप के प्रभाव की विवेचना कीजिए ।
उत्तर:
ठोसों द्वारा गैसों के अधिशोषण पर दाब का प्रभाव- दाब बढ़ाने पर ठोस की सतह पर गैसों का अधिशोषण अधिक मात्रा में होता है। क्योंकि दाब बढ़ाने पर गैस का आयतन कम होता है। (ला शातैलिए का नियम )
ताप का प्रभाव – अधिशोषण, ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है अतः निम्न ताप पर अधिशोषण अधिक मात्रा में होता है तथा ताप बढ़ाने पर गैस का ठोस की सतह पर अधिशोषण कम होगा।

प्रश्न 5.11.
द्रवरागी एवं द्रवविरागी सॉल क्या होते हैं? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए। द्रवविरोधी सॉल आसानी से स्कंदित क्यों हो जाते हैं?
उत्तर:
परिक्षिप्त प्रावस्था तथा परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्य क्रिया के आधार पर कोलॉइडी सॉल को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है- द्रवरागी (द्रवस्नेही) अर्थात् विलायक को आकर्षित करने वाले तथा द्रवविरागी (द्रवविरोधी) अर्थात् विलायक को प्रतिकर्षित करने वाले । परिक्षेपण माध्यम जल होने पर जलस्नेही तथा जलविरोधी शब्द प्रयुक्त किया जाता है। गोंद द्रव कोलॉइड है जबकि धातुएँ एवं उनके सल्फाइडों के सॉल द्रवविरागी कोलॉइड के उदाहरण हैं। द्रवविरोधी सॉल आसानी से स्कंदित हो जाते हैं क्योंकि ये अस्थायी होते हैं एवं इनमें परिक्षिप्त प्रावस्था तथा परिक्षेपण माध्यम एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।

प्रश्न 5.12.
बहुञ्यणुक एवं वृहदाणुक कोलॉइड में क्या अंतर है ? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए । सहचारी कोलॉइड इन दोनों प्रकार के कोलॉइडों से कैसे भिन्न हैं?
उत्तर:
परिक्षिप्त प्रावस्था के कणों के प्रकार के आधार पर कोलॉइड तीन प्रकार के होते हैं-
(i) बहुआण्विक कोलॉइड
(ii) वृहदाण्विक कोलॉइड तथा
(iii) सहचारी कोलॉइड (मिसेल)।

(i) बहुआण्विक कोलॉइड – किसी पदार्थ के घोलने पर उसके बहुत सारे परमाणु या अणु एकत्रित होकर ऐसी स्पीशीज बनाते हैं जिनका आकार कोलॉइडी सीमा (व्यास < 1nm ) में होता है, तो इन्हें बहुआण्विक कोलॉइड कहते हैं। उदाहरण, एक गोल्ड सॉल में अनेक परमाणु युक्त भिन्न-भिन्न आकारों के कण होते हैं। सल्फर सॉल में एक हजार या उससे अधिक S8 (सल्फर अणु) के कण उपस्थित होते हैं। इनमें कोलॉइडी कण वान्डरवाल बल से जुड़े होते हैं।

(ii) वृहदाण्विक कोलॉइड – वृहदाणु उपयुक्त विलायकों में ऐसे विलयन बनाते हैं जिनमें वृहदाणुओं का आकार कोलॉइडी कणों के समान होता है तो ऐसे निकाय को वृहदाण्विक कोलॉइड कहते हैं। ये कोलॉइड बहुत स्थायी होते हैं तथा कभी-कभी ये वास्तविक विलयनों के समान होते हैं। प्राकृतिक वृहदाण्विक कोलाइडों के उदाहरण हैं- स्टार्च, सेलुलोज प्रोटीन तथा एन्जाइम एवं मानव निर्मित उदाहरण हैं- पॉलीथीन, नायलोन, पॉलीस्टायरीन, संश्लेषित रबर आदि ।

(iii) सहचारी कोलॉइड (मिसेल) – कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जो कम सांद्रता पर प्रबल वैद्युत अपघट्य के समान व्यवहार करते हैं परन्तु उच्च सांद्रता पर कणों का समूह बनने के कारण कोलॉइड की भाँति व्यवहार करते हैं, इन्हें सहचारी कोलॉइड या मिसेल कहते हैं। तनु करने पर ये कोलॉइड पुनः आयनों में टूट जाते हैं। उदाहरण – साबुन तथा अपमार्जक (पृष्ठ सक्रिय पदार्थ ) । मिसेल का निर्माण एक निश्चित ताप से अधिक ताप पर ही होता है जिसे क्राफ्ट ताप कहते हैं तथा जिस सान्द्रता के ऊपर मिसेल बनता है उसे क्रान्तिक मिसेल सान्द्रता कहते हैं। मिसेल में 100 या अधिक अणु हो सकते हैं।

प्रश्न 5.13.
एन्जाइम क्या होते हैं? एन्जाइम उत्प्रेरण की क्रियाविधि को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
एन्जाइम सजीव उत्प्रेरक (Biocatalyst) होते हैं जो जटिल नाइट्रोजनी कार्बनिक यौगिक हैं तथा ये जीवित पौधों एवं जन्तुओं द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं। इन्हें जैव-रासायनिक उत्प्रेरक (Bio chemical catalyst) भी कहते हैं तथा उत्प्रेरण की इस क्रिया को जैव-रासायनिक उत्प्रेरण कहते हैं।

एन्जाइम – एन्जाइम नाइट्रोजनयुक्त जटिल कार्बनिक यौगिक होते हैं जो पौधों तथा जन्तुओं द्वारा प्राप्त होते हैं। एन्जाइम उच्च अणुभार वाले प्रोटीन होते हैं जो कोलॉइडी अवस्था में होते हैं। जन्तुओं एवं पौधों में जीवन को व्यवस्थित रखने हेतु आवश्यक शारीरिक क्रियाएँ एन्जाइमों द्वारा ही उत्प्रेरित होती हैं, अतः एन्जाइमों को जैव-रासायनिक उत्प्रेरक भी कहते हैं। एन्जाइम बहुत प्रभावी उत्प्रेरक होते हैं, जो अनेक प्राकृतिक प्रक्रियाओं से सम्बन्धित अभिक्रियाओं का उत्प्रेरण करते हैं। सर्वप्रथम प्रयोगशाला में 1969 में एन्जाइम का संश्लेषण किया गया था।

एन्जाइम उत्प्रेरण – एन्जाइमों द्वारा विभिन्न अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करने की प्रक्रिया को एन्जाइम उत्प्रेरण या जैव-रासायनिक उत्प्रेरण कहते हैं। ये विषमांगी उत्प्रेरण के उदाहरण हैं।
एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रियाओं के उदाहरण-
(i) स्टार्च का माल्टोस में परिवर्तन – डायस्टेज एन्जाइम स्टार्च को माल्टोस में परिवर्तित कर देता है।
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प्रश्न 5.14.
कोलॉइडों को निम्न आधार पर कैसे वर्गीकृत किया गया है ?
(क) घटकों की भौतिक अवस्था
(ख) परिक्षेपण माध्यम की प्रकृति
(ग) परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्य क्रिया ।
उत्तर:
कोलॉइडों का वर्गीकरण
(क) घटकों की भौतिक अवस्था के आधार पर – घटकों की भौतिक अवस्था के आधार पर कोलॉइडों को आठ प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है । इसके विस्तृत विवेचन के लिए भाग 5.4 में सारणी देखें ।

(ख) परिक्षेपण माध्यम की प्रकृति के आधार पर – परिक्षेपण माध्यम की प्रकृति के आधार पर कोलॉइड निम्न प्रकार के होते हैं – (1) सॉल (द्रवों में ठेस) (2) जेल (ठोसों में द्रव) (3) इमल्शन (द्रव में द्रव ) । विभिन्न प्रकार के द्रवों के आधार पर सॉलों का विशिष्ट नाम दिया जाता है-
(i) एक्वासॉल या हाइड्रोसॉल (परिक्षेपण माध्यम – जल)
(ii) ऐल्कोसॉल (परिक्षेपण माध्यम – ऐल्कोहॉल)
(iii) बेन्जोसॉल) परिक्षेपण माध्यम – बेन्जीन ) ।
(ग) परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्य क्रिया के आधार पर – कोलॉइडी सॉल दो प्रकार के होते हैं- (1) द्रवरागी या द्रवस्नेह विलायक को आकर्षित करने वाले, (2) द्रवविरागी या द्रवविरोधी विलयक को प्रतिकर्षित करने वाले ।

प्रश्न 5.15.
निम्नलिखित परिस्थितियों में क्या प्रेक्षण होंगे?
(i) जब प्रकाश किरण पु. कोलॉइडी सॉल में से गमन करता है ।
(ii) जलयोजित फेरिक ऑक्साइड सॉल में NaCl वैद्युत अपघट्य मिलाया जाता है।
(iii) कोलॉइडी सॉल में से विद्युतधारा प्रवाहित की जाती है।
उत्तर:
(i) जब प्रकाश किरण पुंज, कोलॉ: डी सॉल में से गमन करता है तथा उसे प्रकाश के पथ की दिशा के लम्बवत् देखने पर वह मंद से प्रबल दूधियापन दर्शाता है, अर्थात् प्रकाश किरण पुंज का पागमन पथ नीले प्रकाश से प्रदीप्त हो जाता है, इसे टिन्डल प्रभाव कहते हैं । यह कोलॉइडी कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण होता है।
(ii) जलयोजित फेरिक ऑक्साइड Fe (OH), सॉल में NaCl वैद्युत अपघट्य मिलाया जाता है तो इस सॉल पर स्थित धनावेश, Cl के ऋणावेश द्वारा उदासीन हो जाता है जिससे कोलॉइडी कण पास-पास आकर अवक्षेपित हो जाते हैं।
(iii) कोलॉइडी सॉल में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर कोलॉइडी कण विपरीत आवेशित इलेक्ट्रोड की ओर गमन कसं हैं एवं इलेक्ट्रॉड पर आवेश विसर्जित करके अवक्षेपित हो जाते हैं।

प्रश्न 5.16.
इमल्शन क्या है? इनके विभिन्न प्रकार क्या हैं? प्रत्येक प्रकार का उदाहरण दी जाए।
उत्तर:
इमल्शन (पस) – इमल्शन वे कोलॉइड हैं जिनमें सूक्ष्म विभाजित द्रव की बूँदों का दूसरे द्रव में परिक्षेपण होता है, अर्थात् परिक्षेपण माध्यम तथा परिक्षिप्त प्रावस्था दोनों ही द्रव होते हैं।
जब दो अमिश्रणीय या आंशिक मिश्रणीय द्रवों को मिलाकर तेजी से हिलाया जाता है, तो एक द्रव में दूसरे द्रव का परिक्षेपण प्राप्त होता है जिसे इमल्शन कहते हैं। सामान्यतया दो द्रवों में से एक जल होता है। इमल्शन दो प्रकार के होते हैं-
(i) तेल का जल में परिक्षेपण (o/w प्रकार) (जलीय इमल्शन) एवं
(ii) जल का तेल में परिक्षेपण (w/o प्रकार) (तेलीय इमल्शन)
प्रथम प्रकार में जल परिक्षेपण माध्यम का कार्य करता है। उदाहरण-
दूध एवं वेनीशिंग क्रीम दूध में, द्रव वसा जल में परिक्षिप्त होती है। दूसरे प्रकार में, तेल परिक्षेपण माध्यम का कार्य करता है। उदाहरण- मक्खन एवं क्रीम ।

प्रश्न 5.17.
पायसीकारक पायस को स्थायित्व कैसे देते हैं? दो पायसीकारकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पायस अस्थायी होते हैं और पड़े रखने पर दो परतों में विभक्त हो जाते हैं अतः इनके स्थायित्व के लिए इनमें एक पदार्थ मिलाया जाता है, जिसे पायसीकारक कहते हैं । पायसीकारक माध्यम एवं निलंबित कणों के मध्य एक फिल्म बनाता है जिससे वे एक-दूसरे के साथ मिलकर द्रव की सतह के रूप में पृथक् न हो सकें। प्रोटीन तथा वसीय अम्लों के भारी धातुओं के लवण पायसीकारकों के उदाहरण हैं।

प्रश्न 5.18.
“साबुन की क्रिया पायसीकरण एवं मिसेल बनने के कारण होती है ।” इस पर टिप्पणी कीजिए ।
उत्तर:
मिसेल निर्माण की क्रियाविधि – मिसेल बनने की क्रियाविधि को साबुन के उदाहरण से समझा जा सकता है। पानी में विलेय साबुन उच्च वसा अम्लों के सोडियम या पोटैशियम लवण होते हैं। उदाहरण सोडियम स्टिऐरेट (C17H35COONa) जिसे सामान्य सूत्र RCOONa से व्यक्त करते हैं। साबुन को जल में घोलने पर यह RCOO तथा Na+ आयन बनाता है।

RCOO आयन दो भागों से मिलकर बना है, एक लम्बी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला (R) जो कि अध्रुवीय पूँछ या पुच्छ (Tail) कहलाती है तथा COO को ध्रुवीय आयनिक शीर्ष या सिर (Head) कहते हैं। पूँछ वाला भाग जल प्रतिकर्षी होता है जबकि सिर वाला भाग आयनिक होने के कारण जल – आकर्षी या जलस्नेही होता है।
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प्रश्न 5.19.
विषमांगी उत्प्रेरण के चार उदाहरण दीजिए ।
उत्तर:
विषमांगी उत्प्रेरण – किसी अभिक्रिया में जब अभिकारक एवं उत्प्रेरक भिन्न-भिन्न भौतिक अवस्था में होते हैं तो इसे विषमांगी उत्प्रेरण कहते हैं।
(i) प्लैटिनम की उपस्थिति में सल्फर डाइऑक्साइड का सल्फर ट्राइऑक्साइड में ऑक्सीकरण-
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यहाँ अभिकारक गैसीय प्रावस्था में हैं जबकि उत्प्रेरक ठोस अवस्था में हैं |

(ii) सूक्ष्म विभाजित Ni की उपस्थिति में वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण
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इस अभिक्रिया में अभिकारक द्रव तथा गैस है जबकि उत्प्रेरक ठोस है।
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(v) ओस्टवाल्ड प्रक्रम में, प्लैटिनम की जाली पर अमोनिया का नाइट्रिक ऑक्साइड में ऑक्सीकरण-
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यहाँ अभिकारक गैस हैं जबकि उत्प्रेरक ठोस हैं।
(vi) ऐल्कीनों का बहुलकीकरण में जिग्लर नट्टा उत्प्रेरक (R3Al + TiCl4) प्रयुक्त किया जाता है। यहाँ ऐल्कीन गैस तथा जिग्लर नट्टा उत्प्रेरक ठोस है।
(vii) हाबर प्रक्रम में सूक्ष्म विभाजित आयरन की उपस्थिति में अमोनिया का बनना
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यहाँ अभिकारक गैसीय प्रावस्था में हैं जबकि उत्प्रेरक ठोस हैं।

प्रश्न 5.20.
उत्प्रेरक की सक्रियता एवं वरण क्षमता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
(a) उत्प्रेरक की सक्रियता – उत्प्रेरक की किसी रासायनिक अभिक्रिया के वेग को बढ़ाने की क्षमता को ही उसकी सक्रियता कहते हैं।
(b) उत्प्रेरक की वरण क्षमता (वरणात्मकता) – उत्प्रेरक द्वारा किसी अभिक्रिया द्वारा विशिष्ट उत्पाद बनाने की क्षमता को उसकी वरण क्षमता कहते हैं।
उदाहरण – H2 तथा CO से भिन्न-भिन्न उत्प्रेरकों द्वारा भिन्न-भिन्न उत्पाद प्राप्त होते हैं।
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प्रश्न 5.21.
जिओलाइटों द्वारा उत्प्रेरण के कुछ लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(i) जिओलाइटों द्वारा उत्प्रेरण में उत्प्रेरकी अभिक्रिया उत्प्रेरक की रंध्र संरचना तथा अभिकारक एवं उत्पाद के अणुओं के आकार पर निर्भर करती है, अतः जिओलाइट आकार वरणात्मक उत्प्रेरक कहलाते हैं।
(ii) जिओलाइटों द्वारा उत्प्रेरण, जिओलाइटों के संरंध्रों तथा कोटरों (cavities) पर भी निर्भर करता है।

प्रश्न 5.22.
आकृति वरणात्मक उत्प्रेरण क्या है?
उत्तर:
आकृति वरणात्मक उत्प्रेरण – वह उत्प्रेरकी अभिक्रिया जो उत्प्रेरक की रंध्र संरचना एवं अभिकारक एवं उत्पाद अणुओं के आकार पर निर्भर करती है उसे आकार वरणात्मक उत्प्रेरण कहते हैं । मधुमक्खी के छत्ते जैसी संरचना के कारण जिओलाइट अच्छे आकृति वरणात्मक उत्प्रेरक होते हैं। ये सिलिकेट्स के त्रिविमीय नेटवर्क वाले सूक्ष्मरंध्री ऐलुमिनो सिलीकेट होते हैं, जिनमें कुछ सिलिकन परमाणु ऐलुमिनियम के परमाणुओं द्वारा प्रतिस्थापित होकर Al-O-Si ढाँचा बनाते हैं। जिओलाइटों में होने वाली अभिक्रियाएँ जिओलाइटों के संरंध्रों एवं कोटरों (cavities) पर भी निर्भर करती हैं। जिओलाइट प्रकृति में पाए जाते हैं तथा उत्प्रेरक वरणात्मकता के लिए इनका संश्लेषण भी किया जाता है।

प्रश्न 5.23.
निम्न पदों (शब्दों) को समझाइए –
(i) वैद्युतकणसंचलन,
(ii) स्कंदन,
(iii) अपोहन,
(iv) टिन्डल प्रभाव |
उत्तर:
(i) वैद्युत कण संचलन (Electrophoresis) – कोलॉइडी विलयन में कणों पर धनावेश या ऋणावेश होता है। जब एक कोलॉइडी विलयन में डूबे हुये दो प्लैटिनम इलेक्ट्रोडों पर विद्युत विभव लगाया जाता है तो कोलॉइडी कण विपरीत आवेशित इलेक्ट्रोड की ओर गमन करते हैं। इसे वैद्युतकणसंचलन कहते हैं। धनात्मक आवेशित कण कैथोड की ओर तथा ऋणात्मक आवेशित कण ऐनोड की ओर गति करते हैं।

(ii) स्कंदन (Coagulation) – द्रवविरागी (द्रवविरोधी) सॉल का स्थायित्व कोलॉइडी कणों पर आवेश के कारण होता है। यदि किसी प्रकार से इनका आवेश हटा दिया जाये तो कोलॉइडी कण एक-दूसरे के समीप आकर कंदित हो जाते हैं एवं गुरुत्व बल के कारण नीचे बैठ जाते हैं। कोलॉइडी कणों के स्कंदित होकर नीचे बैठने के प्रक्रम को प्रक्रम स्कंदन या अवक्षेपण कहते हैं।

(iii) अपोहन (Dialysis) – कोलॉइडी विलयन में घुले हुए विद्युत अपघट्य या अन्य विलेय पदार्थों को जांतव झिल्ली द्वारा पृथक् करने की प्रक्रिया को अपोहन कहते हैं।

(iv) टिन्डल प्रभाव (Tyndal effect ) – कोलॉइडी विलयन में प्रकाशकिरण पुंज गुजारकर उन्हें प्रकाश के पथ की दिशा के लम्बवत् देखने पर ये मंद से प्रबल दूधियापन दर्शाता है अर्थात् प्रकाश किरण पुंज का पारगमन पथ नीले प्रकाश से प्रदीप्त हो जाता है। इसे टिण्डल प्रभाव कहते हैं। यह कोलॉइडी कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण होता है।

प्रश्न 5.24.
इमल्शनों (पायस) के चार उपयोग लिखिये ।
उत्तर:
इमल्शनों के उपयोग निम्नलिखित हैं-
(i) दूधिया मैग्नीशिया जो कि एक इमल्शन है, का उपयोग पेट की गड़बड़ दूर करने में किया जाता है। मैग्नीशिया Mg(OH)2 का पायस होता है।
(ii) साबुन एवं अपमार्जकों की शोधन क्रिया में इमल्शन ( पायस) बनता है।
(iii) दूध जो कि हमारे दैनिक जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है, भी इमल्शन है जिसमें जल में वसा परिक्षिप्त रहती है।
(iv) धातुकर्म में अयस्क के सान्द्रण की झाग प्लवन विधि में भी पायस का योगदान होता है।

प्रश्न 5.25.
मिसेल क्या है? मिसेल निकाय का एक उदाहरण दीजिए ।
उत्तर:
मिसेल – कुछ पदार्थ विलयन में उच्च सान्द्रताओं पर कणों का एक पुंज बनाते हैं जिसे मिसेल कहते हैं। यह कोलॉइड के समान व्यवहार करता है। मिसेल सहचारी ( associated colloid) कोलॉइड द्वारा बनता है । अतः इन्हें सहचारी कोलॉइड भी कहते हैं।
मिसेल सामान्यतया पृष्ठ सक्रिय पदार्थों द्वारा बनते हैं जो कि विशिष्ट प्रकार के अणु होते हैं जिनमें द्रव – विरोधी तथा द्रवस्नेही सिरा होता है। साबुन, मिसेल बनाते हैं जैसे सोडियम ऑलिएट (C17H33 COONa+), इसमें हाइड्रोकार्बन भाग C17H33 – जलविरोधी सिरा है तथा COONa+ स्नेही सिरा है।

प्रश्न 5.26.
निम्न पदों को उचित उदाहरण सहित समझाइए –
(i) ऐल्कोसॉल,
(ii) ऐरोसॉल,
(iii) हाइड्रोसॉल।
उत्तर:
(i) ऐल्कोसॉल-वे कोलॉइडी सॉल जिनमें परिक्षेपण माध्यम ऐल्कोहॉल होता है, उन्हें एल्कोसॉल कहते हैं। उदाहरण – कोलोडियन।
(ii) ऐरोसॉल-वे कोलॉइड जिनमें द्रव, गैसीय अवस्था में परिक्षिप्त रहता है, उन्हें ऐरोसॉल कहते हैं। उदाहरण – कोहरा ।
(iii) हाइड्रोसॉल -वे कोलॉइडी सॉल जिनमें परिक्षेपण माध्यम जल होता है जिसमें ठोस के कण परिक्षिप्त रहते हैं, उन्हें हाइड्रोसॉल कहते हैं । उदाहरण – स्टार्च सॉल।

प्रश्न 5.27.
“कोलॉइड एक पदार्थ नहीं, पदार्थ की एक अवस्था है ।” इस कथन पर टिप्पणी कीजिए ।
उत्तर:
“कोलॉइड एक पदार्थ नहीं, पदार्थ की एक अवस्था है।” यह कथन सत्य है क्योंकि एक ही पदार्थ भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में कोलॉइड तथा क्रिस्टलाभ की तरह व्यवहार दर्शाता है, अर्थात् एक परिस्थिति में वह कोलॉइड है तो दूसरी परिस्थिति में वह क्रिस्टलाभ होगा। जैसे NaCl जल में क्रिस्टलाभ (Crystalloid) की भांति व्यवहार करता है जबकि बेन्जीन में यह कोलॉइड की भांति व्यवहार करता है।

इसी प्रकार साबुन का तनु विलयन, क्रिस्टलाभ के गुण दर्शाता है। जबकि इसी का सांद्र विलयन, कोलॉइड के गुण दर्शाता है। अतः किसी पदार्थ का कोलॉइडी व्यवहार कणों के आकार पर निर्भर करता है। जब कणों का आकार 1 nm से 1000 nm की परास में होता है तो पदार्थ कोलॉइड की भांति व्यवहार करता है।

HBSE 12th Class Chemistry पृष्ठ रसायन Intext Questions

प्रश्न 5.1.
रसोवशोषण के दो अभिलक्षण दीजिए।
उत्तर:
(i) रसोवशोषण अतिविशिष्ट होता है।
(ii) रसोवशोषण अनुत्क्रमणीय होता है।

प्रश्न 5.2.
ताप बढ़ने पर भौतिक अधिशोषण क्यों घटता है?
उत्तर:
भौतिक अधिशोषण ऊष्माक्षेपी प्रक्रम होता है (△H =-ve)
अतः ली शातेलिए के नियम से ताप बढ़ाने पर साम्य पश्च दिशा में जाता है अर्थात् अधिशोषण घटता है। निम्न ताप पर भौतिक अधिशोषण आसानी सेहोता है।

प्रश्न 5.3.
अपने क्रिस्टलीय रूपों की तुलना में चूर्णित पदार्थ, अधिक प्रभावी अधिशोषक क्यों होते हैं?
उत्तर:
अधिशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ने पर अधिशोषण की मात्रा बढ़ती है। क्रिस्टलीय रूपों की तुलना में चूर्णित एवं सरन्थ्र पदार्थों का पृष्ठीय क्षेत्रफल अधिक होता है अतः ये अपने क्रिस्टलीय रूपों की तुलना में अधिक प्रभावी अधिशोषक होते हैं।

प्रश्न 5.4.
हॉबर प्रक्रम में हाइड्रोजन को NiO उत्प्रेरक की उपस्थिति में मेथेन के साथ भाप की अभिक्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है। प्रक्रम को भाप-पुन: संभवन कहते हैं। अमोनिया प्राप्त करने के लिए हॉबर प्रक्रम में CO को हटाना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
हॉबर प्रक्रम में प्रयुक्त हाइड्रोजन को निम्नलिखित अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है-
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इस अभिक्रिया में CO भी सहउत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। इस CO को अभिक्रिया माध्यम से हटाना आवश्यक है क्योंकि यह हॉबर प्रक्रम में प्रयुक्त Fe (उत्प्रेरक) से क्रिया करके [Fe(CO)5] बनाता है जो कि कमरे के ताप पर द्रव होता है अतः यह NH3 के बनने में बाधा उत्पन्न करता है तथा उच्च ताप पर CO, H2 से भी क्रिया करती है इसलिए CO उत्प्रेरक विष है तथा उत्प्रेरक की सक्रियता को कम कर देती है।

HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 5 पृष्ठ रसायन

प्रश्न 5.5.
एस्टर का जल अपघटन प्रारंभ में धीमा एवं कुछ समय पश्चात् तीव्र क्यों हो जाता है?
उत्तर:
एस्टर के जल अपघटन की अभिक्रिया निम्नलिखित है-
HBSE 12th Class Chemistry Solutions Chapter 5 Img 11
इस अभिक्रिया में उत्पन्न कार्बनिक अम्ल, उत्प्रेरक (स्वउत्प्रेरक) का कार्य करता है अतः एस्टर का जल अपघटन प्रारंभ में धीमा तथा कुछ समय पश्चात् तीव्र हो जाता है।

प्रश्न 5.6.
उत्त्रेरण के प्रक्रम में विशोषण की क्या भूमिका है?
उत्तर:
ठोस उत्प्रेरक की सतह पर गैसीय अभिकारकों के अधिशोषण से मध्यवर्ती बनता है जिसके पश्चात् बने उत्पादों का उत्प्रेरक की सतह से विशोषण हो जाता है जिससे ठोस उत्प्रेरक की सतह पुन अभिक्रिया के लिए उपलब्ध हो जाती है। यदि विशोषण नहीं होगा तो आगे अभिक्रिया नहीं होगी अर्थात् अभिक्रिया रुक जाएगी। अतः उत्प्रेरण के प्रक्रम में विशोषण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रश्न 5.7.
आप हार्डी-शूल्से नियम में संशोधन के लिए क्या सुझाव दे सकते हैं?
उत्तर:
हार्डी-शूल्से नियम में निम्नलिखित संशोधन किया जा सकता है अर्थात् इसे इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-
किसी विद्युत अपघट्य की स्कंदन शक्ति उसके स्कंदन मान के व्युत्क्रमानुपाती होती है, अर्थात् जिस विद्युत अपघट्य का स्कंदन मान कम होगा उसकी स्कंदन शक्ति अधिक होगी। दो विद्युत अपघट्यों के लिए इसकी तुलना इस प्रकार की जा सकती है-
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किसी विद्युत अपघट्य पर जितना अधिक आवेश होता है कोलाइड के अवक्षेपण के लिए उसकी उतनी ही कम मात्रा की आवश्यकता होगी।

प्रश्न 5.8.
अवक्षेप का मात्रात्मक आकलन करने से पूर्व उसे जल से धोना आवश्यक क्यों है?
उत्तर:
अवक्षेप के मात्रात्मक आकलन करने से पूर्व उसे जल से धोना आवश्यक है क्योंकि अवक्षेप की सतह पर विद्युत अपघट्य के कुछ कण अधिशोषित होते हैं जो अवक्षेप को कोलाइडी अवस्था में परिवर्तित कर सकते हैं तथा अवक्षेप का द्रव्यमान भी बढ़ सकता है, जिससे अवक्षेप का मात्रात्मक आकलन सही नहीं होगा। अतः जल से धोने से विद्युत अपघट्य के कण फिल्टर पत्र द्वारा छनित में चले जाते हैं।

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