Class 12

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. जीवन की उत्पत्ति की सबसे तर्कसंगत जैव रासायनिक मत का प्रतिपादन किया-
(अ) मूरे
(ब) वीजमान
(स) स्टैनले मिलर
(द) ओपेरिन
उत्तर:
(द) ओपेरिन

2. किस जहाज पर डार्विन को प्रकृति- वैज्ञानिक के पद पर रखा गया था ?
(अ) सेन्चुरी
(स) बिगुल
(ब) सीगल
(द) बीगल
उत्तर:
(द) बीगल

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

3. डी व्रिज ने किसका प्रतिपादन किया था ?
(अ) प्रबलता का नियम
(स) पृथक्करण का नियम
(ब) प्राकृतिक चयनवाद
(द) उत्परिवर्तनवाद
उत्तर:
(द) उत्परिवर्तनवाद

4. आस्ट्रेलोपिथेकस नामक आदि मानव का चेहरा था-
(अ) हाइपेग्निथस प्रकार का
(स) हाइपरथेस प्रकार का
(ब) प्रोग्रेस प्रकार का
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) प्रोग्रेस प्रकार का

5. अग्नि का प्रथम प्रयोग करने वाला प्रगैतिहासिक मानव सम्भवतः था-
(अ) पेकिंग मानव
(ब) निएन्डरथल
(स) क्रो-मैगनॉन
(द) जावा कपि मानव
उत्तर:
(अ) पेकिंग मानव

6. मानव का कपियों से भिन्न, एक प्रमुख लक्षण है-
(अ) पैर हाथों से लम्बे
(ब) वस्तुओं को पकड़ने योग्य हाथ
(स) आगे निकले हुए जबड़े
(द) सिर कम विकसित
उत्तर:
(अ) पैर हाथों से लम्बे

7. पृथ्वी पर “जीवन की उत्पत्ति” की दिशा में इनमें से कौनसे यौगिकों का उद्विकास हुआ-
(अ) प्रोटीन्स एवं अमीनो अम्ल
(ब) प्रोटीन्स एवं न्यूक्लिक अम्ल
(स) यूरिया एवं अमीनो अम्ल
(द) यूरिया एवं न्यूक्लिक अम्ल
उत्तर:
(ब) प्रोटीन्स एवं न्यूक्लिक अम्ल

8. संरचनाओं में कौनसे समुच्चय में केवल समवृति अंग है-
(अ) कॉकरोच, मच्छर व मधुमक्खी के मैण्डिबल्स
(ब) मानव, बंदर व कंगारू के हाथ
(स) चमगादड़, पक्षी तथा मधुमक्खी के पंख
(द) घोड़े, टिड्डी व चमगादड़ के पश्चपाद ।
उत्तर:
(स) चमगादड़, पक्षी तथा मधुमक्खी के पंख

9. प्राकृतिक चयन के विषय में हमारी आधुनिक समझ के अनुसार, योग्यतम सदस्य हैं-
(अ) जिनमें वातावरण के अनुसार अनुकूलन की सबसे अधिक क्षमता होती है।
(ब) जिनके वंशजों की संख्या अधिकतम होती है
(स) जो बहुत सी संतानें उत्पन्न करते हैं, परन्तु कुछ ही संतानें लैंगिक परिपक्वता तक जीवित रहती हैं
(द) जिनमें विशिष्ट वातावरणीय दशाओं का सामना करने की अधिकतम क्षमता होती है।
उत्तर:
(द) जिनमें विशिष्ट वातावरणीय दशाओं का सामना करने की अधिकतम क्षमता होती है।

10. डार्विन ने किस स्थान को उद्विकास की जीवित प्रयोगशाला माना-
(अ) गेल्पेगोस द्वीप
(ब) लक्ष्य द्वीप
(स) मेडागास्कर
(द) माल द्वीप
उत्तर:
(अ) गेल्पेगोस द्वीप

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11. जावा मानव का वैज्ञानिक नाम है-
(अ) पिथेकैन्थ्रोपस इरेक्टस
(ब) होमो इरेक्टस इरेक्टस
(स) होमो हैबिलिस
(द) अ व ब दोनों
उत्तर:
(द) अ व ब दोनों

12. निएन्डरथल मानव-
(अ) वर्तमान मानव से कम विकसित था
(ब) वर्तमान मानव से मिलता-जुलता था
(स) वर्तमान मानव से इसका मस्तिष्क बहुत बड़ा था
(द) इसका मस्तिष्क वर्तमान मानव के मस्तिष्क से छोटा था
उत्तर:
(अ) वर्तमान मानव से कम विकसित था

13. वीजमान अपने प्रयोग में पीढ़ी दर पीढ़ी नवजात चूहों की पूँछ को कर पृथक करते हरे । फिर भी पूँछ न तो गायब हुई और न ही छोटी हुई, उक्त प्रयोग से ज्ञात होता है-
(अ) लैमार्क के अर्जित लक्षणों की वंशागति का खण्डन
(ब) डार्विन के प्राकृतिक वरण मत का समर्थन
(स) डी – ब्रिज के उत्परिवर्तन मत का समर्थन
(द) सिद्ध होता है कि कशेरुकियों की पूँछ एक अनिवार्य लक्षण है
उत्तर:
(अ) लैमार्क के अर्जित लक्षणों की वंशागति का खण्डन

14. विज्ञान की वह शाखा जिसमें जीवाश्मों का अध्ययन किया जाता है-
(अ) इथोलॉजी
(ब) इरोलॉजी
(स) आर्निथोलॉजी
(द) पेलिओन्टोलॉजी
उत्तर:
(द) पेलिओन्टोलॉजी

15. जीनकोश (Gene pool) सदैव अपरिवर्तित रहते हैं, इसे कहते हैं-
(अ) आनुवंशिक संतुलन
(ब) रासायनिक संतुलन
(स) भौतिक संतुलन
(द) रासायनिक साम्य
उत्तर:
(अ) आनुवंशिक संतुलन

16. होमो सैपियंस (मानव) सर्वप्रथम विकसित हुआ-
(अ) ऑस्ट्रेलिया में
(ब) अफ्रीका में
(स) अमेरिका में
(द) रूस में
उत्तर:
(ब) अफ्रीका में

17. अमेरिकी वैज्ञानिक एच.एल. शैपिरो ने भावी मानव का नाम रखा है-
(अ) होमो फ्यूचेरिस
(ब) होमो यूचेरिस
(स) होमो ट्यूरेसिस
(द) होमो पीटूचेरिस
उत्तर:
(अ) होमो फ्यूचेरिस

18. जीव संख्या में सहसा आने वाले बड़े-बड़े परिवर्तन कहलाते हैं-
(अ) म्यूटेशन
(ब) आनुवंशिक संतुलन
(स) संस्थापक प्रवाह
(द) अभिसारी विकास
उत्तर:
(अ) म्यूटेशन

19. निम्न में औद्योगिक प्रदूषण का सूचक है-
(अ) पैन- स्पर्मिया
(ब) मृत यीस्ट
(स) बोगनविलिया
(द) लाइकेन
उत्तर:
(द) लाइकेन

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20. मलयआर्क पेलौगो पर कार्य करने वाले वैज्ञानिक का नाम है-
(अ) डार्विन
(ब) एल्फ्रेड वॉलेस
(स) मेंडल
(द) लैमार्क
उत्तर:
(अ) डार्विन

21. 1938 में दक्षिण अफ्रीका में एक मछली पकड़ी गई जो …………….. थी।
(अ) सीलाकेंथि
(ब) पीलाकेंथि
(स) टीलाकेंथि
(द) मीलाकेंथि
उत्तर:
(अ) सीलाकेंथि

22. डी – व्रिज ने जैविक क्रम विकास से सम्बन्धित अपना उत्परिवर्तन मत किस जीव पर शोध करते हुए प्रस्तुत किया था ?
(अ) इवनिंग प्रिमरोज
(ब) ड्रोसोफिला
(स) पाइसम सेटाइवम
(द) ऐल्थीयारोजिया
उत्तर:
(अ) इवनिंग प्रिमरोज

23. एक पृथक्कृत जनसंख्या में जीन की आवृति में परिवर्तन क्या कहलाता है?
(अ) जेनेटिक ड्रिफ्ट
(ब) जीन प्रवाह
(स) उत्परिवर्तन
(द) प्राकृतिक वरण
उत्तर:
(अ) जेनेटिक ड्रिफ्ट

24. निम्न में से कौन मानव का सर्वाधिक निकट सम्बन्धी है ?
(अ) चिम्पैंजी
(ब) गोरिल्ला
(स) औरगउटान
(द) गिब्बन
उत्तर:
(अ) चिम्पैंजी

25. जीवों में विविधता का कारण है-
(अ) उत्परिवर्तन
(ब) दीर्घकालिक उद्विकासीय परिवर्तन
(स) क्रमिक परिवर्तन
(द) अल्पकालिक उद्विकासीय परिवर्तन
उत्तर:
(ब) दीर्घकालिक उद्विकासीय परिवर्तन

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26. वर्तमान फसली पादपों में तीव्र जाति उद्भवन का कारण है-
(अ) उत्परिवर्तन
(ब) पृथक्करण
(स) बहुगुणिता
(द) लैंगिक जनन
उत्तर:
(अ) उत्परिवर्तन

27. हार्डी – वेनवर्ग साम्यता को प्रभावित करने वाला घटक है-
(अ) जीन प्रवाह
(ब) आनुवंशिक विचलन
(स) उत्परिवर्तन
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

28. ट्राइरेनोसोरस रेक्स की लगभग ऊँचाई कितनी थी ?
(अ) 20 फुट
(ब) 10 फुट
(स) 15 फुट
(द) 5 फुट
उत्तर:
(अ) 20 फुट

29. विशाल डरावने कटार जैसे दाँत वाला था-
(अ) डायनोसौर
(ब) ट्राइरेनोसोरस रेक्स
(स) इक्थियोसाएस
(द) ड्रायोपिथिकस
उत्तर:
(ब) ट्राइरेनोसोरस रेक्स

30. स्तनधारी प्राणी पूरी तरह से जल में रहते हैं-
(अ) समुद्री गायें
(ब) सील
(स) डॉल्फिन
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

31. दिशात्मक परिवर्तन या विदारण (डिसरप्शन ) किसके दोनों सिरों पर होता है-
(अ) संग्रह चक्र
(ब) वृद्धि वक्र
(स) वितरण वक्र
(द) तिरछा वक्र
उत्तर:

32. शारवनी अवरोहण और प्राकृतिक वरण विकास, ये संरचनाएँ किस वैज्ञानिक की हैं—
(अ) मिलर
(ब) आपेरिन
(स) एल्फ्रेड वालेस
(द) डार्विन
उत्तर:
(अ) मिलर

33. एक तलछट पर दूसरे तलछट की परत पृथ्वी के लम्बे इतिहास की गवाह है। यह संकेत देता है-
(अ) अर्थक्रस्ट (भूपर्थरी) का अनुप्रस्थ काट
(ब) अर्थक्रस्ट का लम्बवत् काट
(स) अर्थक्रस्ट का तिरछा काट
(द) अर्थक्रस्ट का अनुदैर्घ्य काट
उत्तर:
(द) अर्थक्रस्ट का अनुदैर्घ्य काट

34. “बिग बैंग” नामक महाविस्फोट का सिद्धान्त किससे सम्बन्धित है-
(अ) सूर्य की उत्पत्ति
(ब) मंगल ग्रह की उत्पत्ति
(स) ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
(द) चन्द्रमा की उत्पत्ति
उत्तर:
(अ) सूर्य की उत्पत्ति

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35. खगोल वैज्ञानिक अभी भी अपना मन पसंदीदा सिद्धान्त मानते
(अ) बिग बैंग महाविस्फोट सिद्धान्त को
(ब) स्वतः जनन के सिद्धान्त को
(स) पेन- स्पर्मिया ( सर्वबीजाणु) सिद्धान्त को
(द) आपेरेन के सिद्धान्त को
उत्तर:
(स) पेन- स्पर्मिया ( सर्वबीजाणु) सिद्धान्त को

36. “मिल्की वे” क्या है?
(अ) आकाश गंगा
(ब) प्रकाश वर्ष
(स) महासागर
(द) पेन- स्पर्मिया
उत्तर:
(अ) आकाश गंगा

37. तारकीय दूरियों को मापा जाता है-
(अ) किलोमीटर में
(स) प्रकाश वर्ष में
(ब) मीलों में
(द) किलो वाट में
उत्तर:
(स) प्रकाश वर्ष में

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
किस वैज्ञानिक ने साल्टेशन को प्रजाति की उत्पत्ति का मुख्य कारण बताया?
उत्तर:
ह्यूगो डी ब्रिज वैज्ञानिक ने साल्टेशन को प्रजाति की उत्पत्ति का मुख्य कारण बताया।

प्रश्न 2.
जीवात् जीवोत्पत्ति का सिद्धान्त किसने दिया था?
उत्तर:
जीवात् जीवोत्पत्ति का सिद्धान्त हार्वे तथा हक्सले ने दिया था।

प्रश्न 3.
आधुनिक मानव का वैज्ञानिक नाम क्या है?
उत्तर:
आधुनिक मानव का वैज्ञानिक नाम होमो सैपियन्स है।

प्रश्न 4.
वर्तमान मानव के सबसे निकट सम्बन्धी मानव का नाम बताइये।
उत्तर:
क्रोमैगनॉन मानव वर्तमान मानव का सबसे निकटतम सम्बन्धी है।

प्रश्न 5.
पृथ्वी का उद्भव किस आकाश गंगा से हुआ ?
उत्तर:
पृथ्वी का उद्भव मिल्की आकाश गंगा से हुआ।

प्रश्न 6.
अध: मानव ( Subhuman) व आदि मानव किसे माना गया?
उत्तर:
रामापिथिकस को अधः मानव तथा आस्ट्रैलोपिथेकस को आदिमानव माना गया है।

प्रश्न 7.
तारकीय दूरियों को किसमें मापा जाता है ?
उत्तर:
तारकीय दूरियों को प्रकाश वर्षों (Light Years) में मापा जाता है।

प्रश्न 8.
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति में कौनसा महाविस्फोटक का सिद्धान्त बताने का प्रयास करता है?
उत्तर:
बिग बैंग (Big Bang ) नामक महाविस्फोट ।

प्रश्न 9.
अनुरूपता ( Analogy) का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
ऑक्टोपस (Octopus) तथा स्तनधारियों की आँखें अनुरूपता का उदाहरण हैं।

प्रश्न 10.
औद्योगिक प्रदूषण के सूचक का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
लाइकेन (Lichen ) औद्योगिक प्रदूषण के सूचक होते हैं।

प्रश्न 11.
योजक कड़ी (Connecting Link) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जन्तुओं में कुछ जीव ऐसे होते हैं जिनमें दो वर्गों के लक्षण एक साथ पाये जाते हैं। ऐसे जन्तुओं को योजक कड़ी (Connecting Link) कहते हैं। उदाहरण- आर्किओप्टेरिस में रेप्टाइल्स व पक्षियों दोनों के लक्षण मिलते हैं ।

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प्रश्न 12.
योग्यतम की उत्तरजीविता से क्या समझते हो ?
उत्तर:
जीवन संघर्ष में केवल वे ही जीव जीवित रह पाते हैं. जिनमें वातावरण के अनुरूप अनुकूलन की क्षमता होती है। इसे ही योग्यतम की उत्तरजीविता कहते हैं।

प्रश्न 13.
जीवाश्म की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
चार्ल्स लायल के अनुसार – “पूर्व जीवों के चट्टानों से प्राप्त अवशेष जीवाश्म कहलाते हैं।”

प्रश्न 14.
अनुहरण (Mimicry) किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी जीव का दूसरों को धोखा देने के लिए, अपनी सुरक्षा या किसी अन्य लाभ (आक्रमण) के लिए दूसरे जीवों के या किसी अन्य प्राकृतिक वस्तु के समान दिखाई देना या नकल करना अनुहरण कहलाता है।

प्रश्न 15.
उत्परिवर्तन को परिभाषित कीजिए ।
उत्तर:
जीवों के आनुवंशिक संगठन में अचानक वंशागत होने वाले परिवर्तन उत्परिवर्तन (Mutation) कहलाते हैं।

प्रश्न 16.
उस वैज्ञानिक का नाम बताइए जिसने स्वतः जननवाद (Spontaneous generations theory) को गलत सिद्ध किया ।
उत्तर:
लुईस पाश्चर (Louis Pasteur ) ने स्वतः जननवाद को गलत सिद्ध किया ।

प्रश्न 17.
डार्विनवाद की दो मुख्य संकल्पनाएँ कौन-सी हैं ?
उत्तर:

  • शाखनी अवरोहण (Branching Descent )
  • प्राकृतिक वरण विकास (Natural Selection ) ।

प्रश्न 18.
होमोसेपियन्स के प्रवसन का कारण कौन-सी भौगोलिक प्रजातियाँ हैं ?
उत्तर:
चार प्रजातियाँ है- नीग्रॉयड (Negroid), ऑस्ट्रेलॉयड (Australoid), कॉकेसायड्स (Caucasoids) तथा मंगोलायड्स (Mongoloids)।

प्रश्न 19.
कौन से युग (काल) को डायनोसौर का स्वर्णिम युग कहते हैं?
उत्तर:
मीसोजोइक युग (काल) को डायनोसौर का स्वर्णिम युग कहते हैं।

प्रश्न 20.
किस समुद्री जहाज पर डार्विन ने प्रकृति का अध्ययन किया?
उत्तर:
बीगल नामक समुद्री जहाज पर डार्विन ने प्रकृति का अध्ययन किया।

प्रश्न 21.
मानव के किस पूर्वज ने सर्वप्रथम दो पैरों पर चलना आरम्भ किया?
उत्तर:
आस्ट्रेलोपिथिकस ने सर्वप्रथम दो पैरों पर चलना आरम्भ किया।

प्रश्न 22.
एक बच्चा पैदा हुआ जिसमें एक छोटी-सी पूँछ है, बताइए यह किसका उदाहरण है?
उत्तर:
पूर्वजानुरूपता का उदाहरण है।

प्रश्न 23.
क्रोमेग्नॉन मानव भोजन ग्रहण करने के आधार पर किस प्रकार का प्राणी था ?
उत्तर:
क्रोमेग्नॉन मानव भोजन ग्रहण करने के आधार पर मांसाहारी प्रकार का प्राणी था।

प्रश्न 24.
जीव विज्ञान की वह शाखा जिसमें जीवाश्मों का अध्ययन किया जाता है उसे क्या कहते हैं ?
उत्तर:
जीवाश्म विज्ञान (पेलियोन्टोलॉजी) शाखा जिसमें जीवाश्मों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 25
उस वैज्ञानिक का नाम बताइए जिसने स्वतः उत्पत्तिवाद सिद्धान्त का विरोध किया?
उत्तर:
वैज्ञानिक लुई पाश्चर (Louis Pasteur ) ने स्वत: उत्पत्तिवाद सिद्धान्त का विरोध किया।

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प्रश्न 26.
दो कशेरूकी शरीर के अंगों के नाम लिखिए जो मनुष्य की अग्रपाद के समजात अंग होते हैं।
उत्तर:

  • व्हेल के फ्लिपर
  • पक्षी का पंख ।

प्रश्न 27.
बोगनविलिया का कांटा तथा कुकुरबिटा का प्रतान किस प्रकार के अंग हैं समजात अथवा समवृत्ति ? उनमें इस प्रकार की समानता किस प्रकार के विकास से आयी है ?
उत्तर:
बोगनविलिया का कांटा तथा कुकुरबिटा का प्रतान समजात अंग हैं। यह समानता अपसारी विकास से आयी है।

प्रश्न 28.
मानव विकास के क्रम में कौनसे मानव के मस्तिष्क का आकार 1400 सी. सी. था?
उत्तर:
निएंडरथल (Neanderthal) मानव के मस्तिष्क का आकार 1400 सी. सी था

प्रश्न 29.
‘ड्रायोपिथिकस’ तथा ‘रामापिथिकस’ नामक नर वानर में दो समानताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • इनके शरीर बालों से भरपूर थे।
  • दोनों गोरिल्ला एवं चिंपैंजी जैसे चलते थे ।

प्रश्न 30.
महाकपियों तथा मानव के पूर्वज के नाम लिखिए।
उत्तर:
महाकपियों तथा मानव के पूर्वज का नाम ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus) है।

प्रश्न 31.
किस वैज्ञानिक ने प्रयोग करते हुए यह प्रदर्शित किया कि “जीवन पहले से विद्यमान जीवन से ही निकलकर आता है “?
उत्तर:
लुई पाश्चर ।

प्रश्न 32.
ड्रायोपिथिकस तथा रामापिथिकस नरवानरों में अन्तर बताइए ।
उत्तर:
ड्रायोपिथिकस वनमानुष (ऐप) जैसे थे जबकि रामापिथिकस अधिक मनुष्यों जैसे थे।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
पूर्वजता या प्रत्यावर्तन (Atavism or Reversion) किसे कहते हैं? इसके कोई दो उदाहरण दीजिए ।
उत्तर:
जीव जातियों में कभी-कभी अचानक ऐसे लक्षण आ जाते हैं जो उनकी स्वयं की जाति में नहीं पाये जाते किन्तु बहुत समय पूर्व पुराने पूर्वजों में ये लक्षण पाये जाते थे। इसे पूर्वजता या प्रत्यावर्तन कहते हैं।
इन संरचनाओं द्वारा यह सिद्ध होता है कि जो इन संरचनाओं को रखते हैं उनका विकास उन पूर्वजों से हुआ है जिनमें ये संरचनाएँ पूर्ण विकसित रही होंगी।
उदाहरण-

  • मानव शिशु में पूँछ की उपस्थिति
  • लम्बे तथा शरीर पर घने बाल हमारा आदि कपियों से संबध दर्शाता है।

प्रश्न 2.
स्वतः जननवाद (Spontaneous Creation) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्वतः जननवाद (Spontaneous Creation) – इसके अनुसार जीवों की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों द्वारा स्वत: हुई है। इस सिद्धान्त
का प्रतिपादन वान हैलमाण्ट ने किया था। इन्होंने बताया कि पसीने से भीगे कपड़े तथा गेहूं के भूसे को एक साथ रखने से 21 दिन में चूहे उत्पन्न हो जाते हैं। नील नदी पर जब सूर्य की किरणें गिरती हैं तो जीवों का निर्माण होता है। नम मिट्टी में मेंढक बनते हैं। भारत में आज भी कई लोग विश्वास करते हैं कि गधे के मूत्र और गाय के गोबर से बिच्छू उत्पन्न हो जाते हैं। इस विचार को वैज्ञानिकों ने अस्वीकार कर दिया है।

प्रश्न 3.
जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के संबंध में प्रमाणित हुए कोई चार तथ्य लिखिए।
उत्तर:
जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के संबंध में निम्न चार तथ्य प्रमाणित हुए-

  • जीवाश्म जो कि पुरानी चट्टानों से प्राप्त हुए सरल प्रकार के तथा जो नई चट्टानों से प्राप्त हुए जटिल प्रकार के थे।
  • विकास के प्रारम्भ में एककोशिकी प्रोटोजोआ जन्तु बने जिनसे बहुकोशिकी जन्तुओं का विकास हुआ।
  • कुछ जीवाश्म विभिन्न वर्ग के जीवों के बीच की योजक कड़ियों को प्रदर्शित करती हैं।
  • पौधों में एन्जिओस्पर्म (Angiosperm) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (Mammals) सबसे अधिक विकसित और आधुनिक हैं।
  • जीवाश्म के अध्ययन से किसी भी जन्तु जीवाश्म कथा ( विकासीय इतिहास) या वंशावली (Pedigree) का क्रमवार अध्ययन किया जा सकता है।

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प्रश्न 4.
जैव विकांस से क्या अभिप्राय है? समझाइये |
उत्तर:
ओपेरिन वैज्ञानिक के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद इसके जल भण्डार में रासायनिक पदार्थों के संयोजन से जीव की उत्पत्ति हुई। ये एक सरल कोशिका के बने जीव थे, इन्हीं से जैव विकास की क्रिया द्वारा विभिन्न प्रकार के जीवों की उत्पत्ति हुई। उद्विकास या जैव विकास का शाब्दिक अर्थ है, “सिमटी वस्तु का खुलकर या फैलकर समय-समय पर हुए परिवर्तनों को प्रदर्शित करना, सरल जीवों से जटिल जीवों के उत्पत्ति क्रम को जैव विकास कहते हैं।

” अन्य शब्दों में प्रारम्भिक निम्न कोटि के जीवों से क्रमिक परिवर्तनों द्वारा जटिल जीवों की उत्पत्ति को जैव विकास कहते हैं। ‘परिवर्तन के साथ अवतरण’ जैव विकास की मौलिक कल्पना है। पृथ्वी पर आवास करने वाले जीवधारी एक-दूसरे से भिन्न हैं परन्तु इन सभी का संरचनात्मक संगठन एक ही है, अर्थात् प्रत्येक का शरीर कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। सभी जीवों में जैविक क्रियायें समान रूप से होती हैं। सभी जीव अपना जीवन एक कोशिका समान संरचना युग्मनज से प्रारम्भ करते हैं जो इन विविध जीवधारियों के एक पूर्वजता को दर्शाता है।

प्रश्न 5.
डार्विनवाद को समझाने के लिए वैज्ञानिक वालेस ने कौन-सा चार्ट प्रस्तुत किया? समझाइए ।
उत्तर:
डार्विनवाद को समझाने के लिए वालेस ने एक चार्ट प्रस्तुत किया जिसे वालेस चार्ट कहते हैं-
यह सिद्धान्त बाद में डार्विन की पुस्तक, प्राकृतिक वरण द्वारा जाति उत्पत्ति में समझाया गया।

प्रमाणित तथ्य (Facts)परिणाम (Consequences)
(अ) जीव-जन्तुओं में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता

(ब) एक जाति के प्राणियों की संख्या स्थिर

जीवन संघर्ष
(अ) जीवन संघर्ष

(ब) विभिन्नताएँ तथा आनुवंशिकता

योग्यतम की उत्तरजीविता या प्राकृतिक वरण
(अ) योग्यतम की उत्तरजीविता

(ब) वातावरण में सतत् परिवर्तन

निर्तर प्राकृतिक वरण द्वारा नयी जाति की उत्पत्ति

प्रश्न 6.
जीवन की उत्पत्ति व विकास के सम्बन्ध में मिलर द्वारा किये गये प्रयोग को समझाइये |
अथवा
स्टैनले मिलर के प्रयोग का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइये ।
उत्तर:
मिलर ने एक तर्कपूर्ण प्रयोग किया। इस प्रयोग का उद्देश्य उस परिकल्पना का परीक्षण करना था जिसके अनुसार यह माना जाता है। कि अमीनो अम्ल सदृश पदार्थ अमोनिया, जल एवं मीथेन जैसे प्रथम यौगिकों से बने होंगे। मिलर ने एक विशिष्ट वायुरोधक उपकरण जिसे चिन्गारी विमुक्त उपकरण (Spark Discharge Apparatus) कहते हैं।

इस उपकरण में मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन (2:1:2) एवं जल का उच्च ऊर्जा ले विद्युत स्फुलिंग (High Energy Electrical Spark) में से परिवहन किया। जलवाष्प एवं उष्णता की पूत उबलते हुए जल के पात्र द्वारा की गई। परिवहन करती हुई जलवाष्प ठण्डी व संघनित होकर जल में परिवर्तित हो गई।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास 1

इस प्रयोग का उद्देश्य उन परिस्थितियों का निर्माण करना था जो कि जीव की उत्पत्ति के समय पृथ्वी पर रही होंगी। मिलर ने दो सप्ताह तक इस उपकरण में गैसों का परिवहन होने दिया । इसके बाद उसने उपकरण की ‘U’ नली में जमे द्रव को निकाल कर निरीक्षण किया तो इसमें अमीनो अम्ल एवं कार्बनिक अम्लों के साथ-साथ राइबोस, शर्करा, प्यूरीन्स, पिरामिडिन्स आदि पाये गए।

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प्रश्न 7.
निएण्डरथल मानव के जीवाश्म कहाँ पाये गये? इसकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इसके जीवाश्म सी. फूहलरोट (C. Fullhrott) द्वारा 1956 में जर्मनी की निएण्डर घाटी से प्राप्त हुए या पाये गये । विशेषताएँ निम्न हैं-

  • इनकी उत्पत्ति और विकास 40,000 से 1 लाख वर्ष पहले हुआ।
  • ये खुले मैदानों में झोंपड़ियाँ बनाकर रहते थे।
  • कपाल गुहा का आयतन 1300-1600 सी.सी. (आज के मानव के समान) औसतन (1400 सी. सी.) ।
  • पूर्व ऊर्ध्व शरीर था।
  • शरीर पर बाल पूर्व मानव की तुलना में संख्या में कम थे ।
  • अल्पविकसित ठोड़ी (Chin) उपस्थित थी (आर्थीग्नेथस चेहरा) ।
  • बोलने का केन्द्र (Speech Centre) का प्रारम्भ इसी मानव से हुआ।
  • ये जानवरों की खाल के कपड़े पहनते थे ।
  • ये अपने मृतकों को क्रियाकर्म के साथ दफनाते थे।
  • स्वभाव में सर्वाहारी ।

प्रश्न 8.
जीवन की उत्पत्ति अंतरिक्ष से होने पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
कुछ वैज्ञानिक यह मानते हैं कि जीवन अंतरिक्ष से आया है। पूर्व ग्रीक विचारकों का मानना है कि जीवन की ‘स्पोर’ नामक इकाई विभिन्न या अनेक ग्रहों में स्थानान्तरित हुई, पृथ्वी जिसमें एक थी। कुछ खगोल वैज्ञानिक ‘पैन स्पर्मिया’ (सर्वबीजाणु) को अभी भी मान्यता देते हैं।

प्रश्न 9.
औद्योगिक अतिकृष्णता का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राकृतिक वरण के सिद्धान्त के अध्ययन के लिये इंग्लैण्ड में पाये जाने वाले विशेष शलभ (Moth Bistoy Betularia) का परीक्षण किया। इस प्रयोग के अध्ययन से यह तथ्य स्पष्ट हुआ कि इंग्लैण्ड में औद्योगिक विकास से पूर्व की वनस्पतियों के तने भूरे रंग के थे क्योंकि उन पर भूरी लाइकेन परत के रूप में जमा थी।

उस समय वहाँ भूरे रंग के शलभ की संख्या बहुत अधिक थी तथा काले रंग के शलभ कार्बोनेरिया संख्या में कम एवं दुर्लभ थे। इसका सम्भावित कारण तनों का भूरा रंग भूरे शलभों की मांसाहारी पक्षियों से सुरक्षा प्रदान कर रहा था क्योंकि तनों पर शलभ के समान पृष्ठभूमि के कारण पहचान में नहीं आते। औद्योगिक विकास होने पर कोयले का अत्यधिक उपयोग किया जाने लगा।

इससे वातावरण में कालिख की मात्रा बढ़ गई। जिसके फलस्वरूप तनों पर कालिख के जमने के कारण उनका रंग काला हो गया। इस समय भूरे शलभ पक्षियों की पहचान में आसानी से आने लगे। उन्होंने इन्हें मारकर नष्ट कर दिया। कुछ समय बाद देखा कि भूरे रंग की शलभों की संख्या तो कम हो गई परन्तु काले रंग के शलभों की संख्या में भारी वृद्धि हो गई क्योंकि इस समय तनों का रंग काला उनको सुरक्षा प्रदान कर रहा है।

वर्तमान में उद्योगों में कोयले के स्थान पर बिजली का उपयोग किया जाने लगा जिससे वातावरण में कालिख एवं धुआँ लगभग समाप्त हो गया जिसके कारण वनस्पतियों के तने वापस अपने पूर्व रंग अर्थात् भूरे हो गये। इस रंग परिवर्तन का प्रभाव काले रंग के शलभों की संख्या पर भी पड़ा।

अब पक्षियों द्वारा काले शलभों को पहचान लिए जाने के कारण इनका भक्षण अधिक संख्या में होने लगा परन्तु भूरे रंग के शलभों को पक्षी द्वारा नहीं पहचान पाने के कारण शिकार होने से बच गये। इससे इनकी संख्या में पुनः पूर्ववत् वृद्धि हो गई। इस तरह प्रकृति जीवों के चयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 10.
कृत्रिम चयन ( Artificial Selection) किसे कहते हैं? उदाहरण देकर समझाइये |
उत्तर:
कृत्रिम चयन ( Artificial Selection ) – मानव द्वारा जननिक विभिन्नताओं का उपयोग जन्तुओं तथा पौधों की उत्तम क्वालिटी नस्ल सुधार के लिए किया जाता है मानव वांछनीय लक्षणों वाले सदस्यों का आबादी से चयन कर उन्हें उन सदस्यों से पृथक् कर लेता है जिनमें ये लक्षण नहीं पाये जाते। अब चयनित सदस्यों के बीच अंत:प्रजनन (Interbreeding) कराई जाती है।

इस प्रक्रिया को ही कृत्रिम वरण चयन ( Artificial Selection) कहते हैं। यदि यह प्रक्रिया कई पीढ़ियों तक जारी रहे तो अंततः एक नई वांछनीय लक्षणों वाली प्रजाति की उत्पत्ति हो जाती है। जन्तु प्रजनकों (Animal Breeders) द्वारा कृत्रिम चयन के माध्यम से अनेक पालतू जानवरों की वांछनीय लक्षणों युक्त जातियों का उनके सामान्य पूर्वजों से विकास किया गया है जैसे कुत्ता, घोड़ा, कबूतर, मुर्गी, गाय, बकरी, भेड़ और सुअर आदि।

इसी प्रकार पादप प्रजनकों (Plant breeders) द्वारा उपयोगी पौधों की उत्तम किस्मों को प्राप्त किया गया है जैसे गेहूं, चावल, गन्ना, कपास, दाल, सब्जियाँ और फल आदि। कृत्रिम चयन प्राकृतिक वरण के ही समान हैं केवल इसमें प्रकृति का स्थान मानव द्वारा मानव उपयोगी लक्षणों के विकास के लिये ले लिया जाता है। चयनित लक्षण मानव उपयोगी होते हैं।

प्रश्न 11.
जन्तु वर्गीकरण किस प्रकार से जैव विकास को प्रमाणित करता है?
उत्तर:
प्रकृति में पाये जाने वाले विविध जाति के जन्तुओं को समानताओं (similarities) एवं विभिन्नताओं (dissimilarities) के आधार पर छोटे या बड़े समहों में वर्गीकृत (classify) किया गया है। जैव विकास का यह महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। सभी जन्तुओं को सर्वप्रथम लीनियस ने द्विनाम पद्धति के आधार पर विभिन्न समुदायों में बाँटा था।

पृष्ठवंशी उपसमुदाय (Subphylum vertebrata) को कई वर्गों (classes) में बाँटा गया जो कि क्रमिक विकास के अनुसार चतुर्मुखीय (cyclostomes), मत्स उभयचरों (Amphibians), सरीसृपों (Reptiles), पक्षियों (Aves) तथा स्तनियों (Mammals) में श्रेणीबद्ध किया गया है।

इस क्रम से स्पष्ट है कि आदिकाल में किसी अपृष्ठवंशी (non-chordates) मछली सदृश जन्तु से परिवर्तित होकर मछली बनी, मछली से विकसित होकर उभयचर, उभयचर से सरीसृप, सरीसृप से पक्षी तथा बाद में स्तनी बने। इन सब वर्गों में क्रमिक विकास का प्रमाण इनमें पायी जाने वाली समानताओं के द्वारा मिलता है। वर्गीकरण की इस विधि से समस्त जन्तुओं व पेड़-पौधों का वंश वृक्ष (Family tree) तैयार किया जा सकता है जिससे समुदाय प्रोटोजोआ से लेकर पृष्ठवंशी (Chordata) तक विभिन्न समुदायों के जन्तुओं में क्रमिक विकास का प्रमाण मिलता है।

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प्रश्न 12.
संयोजक कड़ियों से आप क्या समझते हैं? उचित उदाहरण देकर इनका जैव विकास में महत्व को समझाइए ।
उत्तर:
जीवों के वर्गीकरण में समान गुणों वाले जीवों को एक ही वर्ग में रखा गया है। कुछ जन्तु ऐसे भी हैं जिनमें दो वर्गों के गुण पाये जाते हैं। इन जन्तुओं को योजक कड़ियाँ (Connecting links) कहते हैं।

संयोजक कड़ियों के उदाहरण-
आर्किओप्टेरिक्स (Archeopteryx ) – जर्मनी के बवेरिया प्रदेश में आर्किओप्टेरिक्स नामक जन्तु के जीवाश्म मिले हैं। इस जन्तु के कुछ लक्षण जैसे चोंच, पंख, पैरों की आकृति एवीज वर्ग (पक्षी वर्ग) के तो कुछ लक्षण जैसे दाँत, पूँछ तथा शरीर के शल्कों का होना रेप्टीलिया वर्ग के हैं। अत: इस जन्तु को एवीज तथा रेप्टीलिया वर्ग के मध्य योजक कड़ी कहते हैं।

इससे प्रमाणित होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों (Reptiles ) से हुआ है। जैव विकास में संयोजक कड़ियों का महत्त्व-संयोजक कड़ियाँ जैव विकास को प्रमाणित करने के लिए महत्त्वपूर्ण आधार हैं। इनके माध्यम से विभिन्न जातियों एवं वर्गों की निश्चित वंशावली एवं पूर्वजों का ज्ञान उपलब्ध होता है। इनमें जैव विकास का क्रम और दिशा भी निर्धारित होती है।

प्रश्न 13.
उत्परिवर्तन किसे कहते हैं? उत्परिवर्तन सिद्धान्त के मुख्य बिन्दुओं का वर्णन कीजिये ।
उत्तर:
डी – ब्रीज (1901) ने इवनिंग प्रिमरोज जाति के पौधों पर परीक्षणों के पश्चात् ज्ञात किया कि कुछ पौधे अकस्मात् अपनी जाति से बिल्कुल भिन्न हो जाते हैं। यही नहीं, विभिन्न लक्षण वंशागत होकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते रहते हैं और नयी जाति का निर्माण करते हैं। जातीय लक्षणों में अकस्मात् वंशागत परिवर्तनों की क्रिया को डी- ब्रीज ने उत्परिवर्तन की संज्ञा दी एवं उत्परिवर्तनवाद का सिद्धान्त दिया। आधुनिक अनुसंधानों से यह भी पता चल चुका है कि जीवों में उत्परिवर्तन उनकी जनन कोशिकाओं में स्थित गुणसूत्रों एवं जीन्स की व्यवस्था में परिवर्तन के कारण होता है।

डी- ब्रीज के उत्परिवर्तन सिद्धान्त के तथ्य निम्नलिखित हैं-

  1. प्राकृतिक रूप से जनन करने वाली जातियों या समष्टियों में समय-समय पर उत्परिवर्तन विकसित होते हैं। उत्परिवर्ती जीव (mutant organisms) जनक जीवों से भिन्न होते हैं।
  2. उत्परिवर्तन वंशागत होते हैं तथा इनसे नयी जातियों का विकास होता है।
  3. उत्परिवर्तन दीर्घ एवं आकस्मिक होते हैं।
  4. ये किसी भी दिशा में हो सकते हैं। अतः लाभप्रद भी हो सकते हैं और हानिकारक भी।
  5. उत्परिवर्तनों पर प्राकृतिक वरण का प्रभाव पड़ता है। लाभप्रद उत्परिवर्तन जीवों के अन्दर संचित कर लिये जाते हैं और हानिकारक उत्परिवर्तन वाले जीव प्राकृतिक वरण द्वारा नष्ट हो जाते हैं।
  6. डार्विन ने इन आकस्मिक परिवर्तनों को स्पोर्ट्स (Sports) का नाम दिया। अंगों का अत्यधिक विशेषीकरण (Specialization) की व्याख्या इन्हीं स्पोर्ट्स (Sports) या आकस्मिक उत्परिवर्तन द्वारा की जा सकती है।
  7. अंगों के विकास की प्रारम्भिक अवस्था को उत्परिवर्तन सिद्धान्त के द्वारा समझाया जा सकता है, क्योंकि उत्परिवर्तन प्रारम्भ से ही पूर्ण होते हैं।

उत्परिवर्तनवाद का महत्त्व – इसमें किंचित् मात्र भी सन्देह नहीं है कि उत्परिवर्तन प्रकृति में होते हैं तथा विकास में इनका योगदान होता है। प्राकृतिक वरण एवं उत्परिवर्तनों के फलस्वरूप ही जीवों में विकास होता है।

प्रश्न 14.
डार्विन के संदर्भ में जीवन-संघर्ष को समझाइए ।
अथवा
डार्विन के अनुसार प्रकृति में जीवन संघर्ष कितने प्रकार का होता है? समझाइए ।
उत्तर:
जीवन संघर्ष तीन प्रकार का होता है-
(i) अन्त: जातीय संघर्ष यह एक ही जाति के सदस्यों के मध्य होता है, जैसे-दो कुत्तों के मध्य रोटी का टुकड़ा फेंक दिया जाये तो वे आपस में लड़ने लगते हैं। उनमें से जो अधिक शक्तिशाली होता है वही रोटी ग्रहण कर लेता है। अन्त: जातीय संघर्ष भोजन, स्थान व जनन के लिये होता है।

(ii) अन्तर्जातीय संघर्ष – यह संघर्ष दो विभिन्न जातियों में होता है। प्राय: देखा जाता है कि चूहे को देखते ही बिल्ली उसे खाने को दौड़ती है। चूहा अपनी रक्षा का प्रयास करता है। यह संघर्ष प्रायः भोजन के लिये होता है।

(iii) वातावरण संघर्ष – पृथ्वी के वातावरण में कई परिवर्तन होते रहते हैं। जैसे अधिक सर्दी, अधिक गर्मी, भूचाल, वर्षा आदि। जीवों को ऐसे परिवर्तनों से संघर्ष करना पड़ता है।

प्रश्न 15.
कपि एवं मानव में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कपि (Apes) एवं मानव ( Human) में अन्तर –

कपि (Apes)मानव (Human)
1. अर्द्ध ऊर्ध्व स्थितिपूर्ण ऊर्ध्व स्थिति
2. गर्दन छोटी व धंसी हुईलम्बी तथा ऊर्ध्व गर्दन
3. पूर्ण शरीर पर बालों की घनी वृद्धिमानव में घनी वृद्धि केवल कुछ स्थानों पर होती है।
4. कपाल गुहा का आयतन (cranial capacity) कम होता है। (450-500 सी.सी.)कपाल गुहा का आयतन (cranial capacity) अधिक होता है (1300-1600 सी.सी.)
5. कम बुद्धिमान होते हैंअधिक बुद्धिमान होते हैं
6. अग्र पाद पश्च पादों से लम्बेअग्र पाद पश्च पादों से छोटे
7. जबड़े ‘U’ आकृति के होते हैंमानव में अर्द्धवृत्ताकार जबड़े होते हैं
8. ठोड़ी (Chin) अनुपस्थित होती हैठोड़ी (Chin) उपस्थित होती है
9. अंगूठा हथेली के समानान्तर होता हैसम्मुख अंगूठा (हथेली के समकोण पर स्थित)
10. श्रोणि मेखला दीर्घीतचौड़ी श्रोणि मेखला
11. प्रमुख रूप से वृक्षाश्रयी वासस्थलीय वास
12. ऊपरी होंठ पर खाँच नहीं होतीऊपरी होंठ पर मध्यवर्ती खाँच (Furrow) उपस्थित
13. शिशु एवं बाल्यावस्था अपेक्षाकृत छोटीशिशु एवं बाल्यावस्था लम्बी
14. मादा में उभरे हुए स्तन नहींमादा में स्तन उभरे हुए
15. प्रीमैक्सिली हड्डियाँ मैक्सिली से पृथक्प्रीमैक्सिली हड्डियाँ मैक्सिली से समेकित

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प्रश्न 16.
डी – ब्रीज और लेमार्क के सिद्धान्त में क्या अन्तर है? समझाइए ।
उत्तर:
डी ब्रीज और लेमार्क के सिद्धान्त में अन्तर-

डी-व्रीज के सिद्धान्तलेमार्क के सिद्धान्त
1. डी-व्रीज ने जैव विकास के उत्परिवर्तन के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।जबकि लैमार्क ने उपार्जित लक्षणों की वंशागति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
2. डी-व्रीज के मतानुसार नई जातियों की उत्पत्ति छोटी-छोटी विभिन्नताओं के वंशागत होने से नहीं बल्कि उत्परिवर्तन के कारण आकस्मिक बड़ी विभिन्नताओं के वंशागत होने से होती है ।लैमार्क के मतानुसार जीवों की वृद्धि एवं उनकी आकृति पर वातावरण का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है जिससे उनके अंगों की संरचना में धीरेधीरे परिवर्तन होने लगता है। यह उपार्जित परिवर्तन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पैतृक गुणों में वंशागत रहते हैं।
3. उदाहरण-इवनिंग प्रिमरोजउदाहरण-जिराफ की गर्दन का लम्बा होना।

प्रश्न 17.
पादप या उसके भागों में पायी जाने वाली समजातता एवं तुल्यरूपता उपयुक्त उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर:
समजातता व्हेल, चमगादड़ों, चीता और मानव (सभी स्तनधारी) अग्रपाद की अस्थियों में समानता दर्शाते हैं। ये यद्यपि भिन्न-भिन्न क्रियाकलाप करते हैं परन्तु इनकी शारीरिक संरचना समान होती है। ये सभी संरचनाएँ समजातीय होती हैं, जिनमें समान पूर्वज परम्पराएँ होती हैं; इसे समजातता कहते हैं। तुल्यरूपता- पक्षी एवं तितलियों के पंख लगभग एक समान दिखते हैं; लेकिन इनमें पूर्वज परम्परा सामान्य नहीं है और न ही शरीर की रचना में समानता है। भले ही वे समान क्रिया को सम्पन्न करते हैं।

प्रश्न 18.
पृथ्वी पर जीवन के विकास की प्रक्रिया में डार्विन तथा डी- ब्रीज के मतों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
डार्विन तथा डी ब्रीज के मतों में अन्तर-

डार्विन का मतडी व्रीज का मत
1. डार्विन के परिवर्तन छोटे तथा दिशात्मक हैं।जबकि डी-व्रीज के उत्परिवर्तन (Mutation) आकस्मिक तथा दिशाहीन हैं।
2. डार्विन के अनुसार परिवर्तन तथा प्राकृतिक वरण अनेक पीढ़ियों के पश्चात् उत्पन्न होता है जो कि नई जाति के लिए उत्तरदायी होता है।जबकि डी-व्रीज के अनुसार आकस्मिक उत्परिवर्तन के द्वारा नयी जाति उत्पन्न होती है।
3. डार्विन के अनुस्रार विकास धीरे-धीरे अर्थात् चरणों में हुआ है।जबकि डी-व्रीज के अनुसार विकांस एक चरण में हुआ है।

प्रश्न 19.
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ऊपर दिखाये गए डार्विन के फिंच पक्षियों में आप क्या भिन्नताएँ देख रहे हैं? लिखिए।
अथवा
गैलेपेगॉस द्वीपों पर फिंचों की विभिन्न किस्मों के अस्तित्व को डार्विन ने किस प्रकार समझाया ?
उत्तर:
डार्विन ने दक्षिण अमेरिका के समीप स्थित गेलेपेगोस द्वीप (Galapogos Island) की भिन्न वातावरणीय परिस्थितियों के कारण उपस्थित भिन्न प्रकार के जन्तु और पादप समष्टि (Fauna \& Flora) अध्ययन किया। उन्होंने एक प्रकार की चिड़िया जिसे डार्विन की फिंच (Darwin’s Finch) के नाम से जाना जाता है, उसका अध्ययन किया।

उन्होंने लगभग 20 प्रकार की चिड़ियाँ (Finches) देखीं, जो विश्व के किसी क्षेत्र में नहीं मिलती हैं। इन सभी फिंच की चोंच की आकृति अलग-अलग प्रकार की थी। इसकी एक जाति की फिंच अपनी चोंच से पेड़ की छाल को भेद तो देती थी पर भेदे हुए छिद्र के अन्दर से कीटों (Insects) को निकालने में असमर्थ थी अत: यह फिंच चोंच से एक कांटे की सहायता से कीटों को निकाल कर भक्षण करती थी।

ये सभी चिड़ियाँ (फिंच) देखने पर भिन्न-भिन्न प्रकार की थीं लेकिन ये सभी फिंच जाती की थीं जिनका मूल निवास दक्षिणी अमेरिका था। इनमें से कुछ सम्भवतया इन द्वीपों पर पहुँच गयीं और धीरे-धीरे इनमें भिन्न वातावरण में अनुकूलन स्थापित होने के फलस्वरूप चिड़ियों के खाने में अर्थात् उपलब्ध भोजन के आधार पर परिवर्तन आया।

प्रारम्भ में ये बीजभक्षी थीं, फिर शाकाहारी और अन्त में कीटभक्षी हो गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन पक्षियों की चोंच में भिन्नता स्थानीय वातावरण एवं उसमें उपलब्ध भोजन से अनुकूलनता का परिणाम है। इस तरह मूल रूप से एक जाति के पक्षी में जो भिन्न-भिन्न वातावरण में अभिगमन कर गये उनसे अनेक जातियों एवं उपजातियों का विकास हुआ।

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प्रश्न 20.
(i) वह कौनसा विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र है जहाँ ये जीव पाये जाते हैं?
(ii) उस परिघटना का नाम लिखिए एवं समझाइए जिसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में इतनी विविध जातियों का विकास हुआ है।
(iii) अपरा (प्लेसेन्टल) भेडिया और तस्मानियाई भेड़िया का साथ-साथ एक ही पर्यावरण में रहते रहना किस प्रकार सम्भव हुआ, कारण प्रस्तुत करते हुए समझाइए।
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उत्तर:
यदि जैव विकास (Organic Evolution) हुआ है तो प्रारम्भ से लेकर आज तक की जीव-जातियों की रचना, कार्यिकी एवं रसायनी, भ्रूणीय विकास, वितरण आदि में कुछ न कुछ सम्बन्ध एवं क्रम होना आवश्यक है। लैमार्क, डार्विन वैलेस, डी व्रिज आदि ने जैव विकास के बारे में अपनी-अपनी परिकल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए इन्हीं – सम्बन्धों एवं क्रम को दिखाने वाले प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिन्हें हम

निम्नलिखित श्रेणियों में बाँट सकते हैं-

  1. जीवों की तुलनात्मक संरचना
  2. शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण
  3. संयोजक कड़ियों के प्रमाण
  4. अवशेषी अंग
  5. भ्रोणिकी से प्रमाण
  6. जीवाश्मीय प्रमाण
  7. जीवों के घरेलू पालन से प्रमाण
  8. रक्षात्मक समरूपता

(1) जीवों की तुलनात्मक संरचना ( Comparative Anatomy) से प्रमाण – जन्तुओं में शारीरिक संरचनाएँ दो प्रकार की होती हैं-
(i) समजात अंग (Homologous organ ) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हो, समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं। इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फ्लिपर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल (ह्यूमरस, रेडियस अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स व अंगुलास्थियाँ ) की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं।
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कीटों के मुखांग (Mouth Parts of Insects ) – कीटों के मुखांग क्रमशः लेब्रम ( Labrum), मेण्डिबल (Mandibles), मैक्सिला (Maxilla), लेबियम (Labium) एवं हाइपोफे रिंक्स (hypopharynx) से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक कीट में इनकी संरचना एवं परिवर्धन समान होता है लेकिन इनके कार्यों में भिन्नता पाई जाती है।

कॉकरोच के मुखांग भोजन को काटने व चबाने (Biting and Chewing) का कार्य करते हैं । तितली एवं मक्खी में भोजन चूसने का एवं मच्छर में मुखांग भेदन एवं चूषण (Piercing and Sucking) दोनों का कार्य करते हैं। अकशेरुकियों के पैर (Legs of Invertibrates) – इसी प्रकार कॉकरोच एवं मधुमक्खी ( Honeybee) के टांगों के कार्य भिन्न- भिन्न हैं।

कॉकरोच अपनी टांगों का उपयोग चलने (Walking) में करता है जबकि मधुमक्खी अपनी टांगों का उपयोग परागकण को एकत्रित (Collecting of Pollens) करने में करती है। जबकि दोनों की टांगों में खण्ड पाये जाते हैं तथा सभी खण्ड समान होते हैं जैसे कॉक्सा (Coxa), ट्रोकेन्टर (Trochanter ), फीमर (Femur), टिबिया (Tibia), 1 से 5 युग्मित टारसस (1-5 Jointed Tarsus)।
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बोगेनविलिया का काँटा और कुकुरबिटा के प्रतान (Tendril) में समानता होती है। इसी प्रकार और भी उदाहरण जैसे

  1. आलू व अदरक,
  2. गाजर व मूली ।

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1. अपसारित विकास ( अनुकूली अपसारिता / अनुकूली विकिरण ) [Divergent Evolution (adaptive divergence / adaptive radiation)] – विभिन्न जन्तुओं में पायी जाने वाली समजातता यह प्रदर्शित करती है कि इन सबकी उत्पत्ति किसी समान पूर्वज से हुई है। किसी एक पूर्वज से उत्पन्न होने के बाद जातियाँ अपने-अपने आवासों के अनुसार अनुकूलित हो जाती हैं। जिसे ही अनुकूली विकिरण या अपसारित विकास कहते हैं। इन जातियों में समजात अंग (Homologous Organs) पाये जाते हैं । जैसे आस्ट्रेलिया में अनुकूली विकिरण के द्वारा ही विभिन्न प्रकार के मासूपिल्स (Marsupials) की उत्पत्ति हुई ।
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2. समवृत्ति अंग (Analogous Organs) – वे अंग जिनके कार्य समान हों किन्तु उनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में अन्तर हो, समवृत्ति अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए-कीट, पक्षी तथा चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते हैं परन्तु इनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में बड़ा अन्तर होता है । इन अंगों में केवल आभासी समानताएँ पाई जाती हैं। वातावरण एवं स्वभाव के कारण कार्यों में समानता होती है। कीट के पंखों का विकास शरीर की भित्ति से निकले प्रवर्गों के रूप में होता है जबकि पक्षी एवं चमगादड़ में इनकी उत्पत्ति शरीर भित्ति के प्रवर्गों के रूप में नहीं होती है । अतः इनके कार्यों में तो समानता होती है, परन्तु उत्पत्ति एवं संरचना में भिन्नता होती है।
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इसी तरह मधुमक्खी के डंक एवं बिच्छू के डंक दोनों ही समान कार्य करते हैं परन्तु इनकी संरचना एवं परिवर्धन भिन्न होता है । मधुमक्खी एक कीट है, इसके बाह्य जननांग मिलकर अण्ड निक्षेपक (Ovipositor) नाल बनाते हैं। यही अण्ड निक्षेपक नाल रूपान्तरित होकर डंक बनाती है जबकि बिच्छू में शरीर का अन्तिम खण्ड रूपान्तरित होकर डंक बनाता है।

इसके अतिरिक्त समवृत्ति के उदाहरण निम्न हैं-

  • ऑक्टोपस (अष्ट भुज) तथा स्तनधारियों की आँखें (दोनों में रेटिना की स्थिति में भिन्नता है) या पेंग्विन और डॉल्फिन मछलियों के फिलपर्स ।
  • रस्कस का पर्णाभ स्तम्भ (Phylloclade) और सामान्य पर्ण।
  • आलू (तना) और शकरकंद (जड़)।

समवृत्ति अंगों में कार्य की समानता एवं विशिष्ट वातावरण की आवश्यकता के अनुरूप विकास, अभिसरण जैव विकास (Convergent Evolution) को प्रकट करता है।

(2) शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण (Evidence from Physiology and Biochemistry)-fafum. जीव शरीर क्रिया और जैव रसायन में समानता प्रदर्शित करते हैं, कुछ स्पष्ट उदाहरण निम्न हैं-

  • जीवद्रव्य (Protoplasm) – जीवद्रव्य की संरचना और संगठन सभी जन्तुओं में (प्रोटोजोआ से स्तनधारियों तक) लगभग समान होती है।
  • एन्जाइम (Enzyme) – सभी जीवों में एन्जाइम समान कार्य करते हैं। जैसे ट्रिप्सिन ( Trypsin) । अमीबा से लेकर मानव तक प्रोटीन पाचन और एमाइलेज (Amylase) पॉरीफेरा से स्तनधारियों तक स्टार्च पाचन करता है।
  • रुधिर (Blood) – रुधिर की रचना सभी कशेरुकियों में लगभग समान होती है।
  • हार्मोन (Hormones) – सभी कशेरुकियों में समान प्रकार के हार्मोन बनते हैं, जिनकी रचना व कार्य समान होते हैं।
  • अनुवांशिक पदार्थ (Hereditary Material) – सभी जीवों में आनुवांशिक पदार्थ DNA होता है जिसकी मूल संरचना सभी जीवों में समान होती है।
  • ए.टी.पी. (ATP) – सभी जीवों में जैविक ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ATP के रूप में ऊर्जा संचित होती है।
  • साइटोक्रोम – सी (Cytochrome – C) – यह श्वसन वर्णक है जो सभी जीवों के माइटोकॉन्ड्रिया में उपस्थित होता है। इस प्रोटीन में 78-88 तक अमीनो अम्ल एक समान होते हैं जो समपूर्वजता को प्रदर्शित करते हैं।

इस प्रकार शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सभी जीवों का विकास एक ही मूल पूर्वज (Common Ancestor) से हुआ है।

(3) संयोजक कड़ियों के प्रमाण (Evidence of Connective Links) – जीवों के वर्गीकरण में समान गुणों वाले जीवों को एक ही वर्ग में रखा गया है। कुछ जन्तु ऐसे भी हैं जिनमें दो वर्गों के गुण पाये जाते हैं। इन जन्तुओं को योजक कड़ियाँ (Connective Links) कहते हैं।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

संयोजक कड़ियों के उदाहरण-
(i) आर्किओप्टेरिक्स (Archeopteryx) – जर्मनी के बवेरिया प्रदेश में आर्किओप्टेरिक्स नामक जन्तु के जीवाश्म मिले हैं। इस जन्तु के कुछ लक्षण जैसे चोंच, पंख, पैरों की आकृति, एवीज वर्ग (पक्षी वर्ग) के तो कुछ लक्षण जैसे दाँत, पूँछ तथा शरीर पर शल्कों का होना रेप्टीलिया वर्ग के हैं।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास 8

अतः इस जन्तु को एवीज तथा रेप्टीलिया वर्ग के मध्य योजक कड़ी कहते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों (Reptiles) से हुआ है।

(ii) प्लेटीपस और एकिडना (Platypus and Echidna ) – प्लेटीपस और एकिडना दोनों ही मैमेलिया वर्ग के जन्तु हैं। इनके शरीर पर बाल पाये जाते हैं तथा बच्चों को दूध पिलाने के लिए दुग्ध ग्रन्थियाँ (Mammary Glands) होती हैं जो मैमेलिया वर्ग के लक्षण हैं। ये दोनों ही जन्तु रेप्टीलिया वर्ग के जन्तुओं की भाँति कवचदार पीतकयुक्त अण्डे देते हैं। इस प्रकार प्लेटीपस और एकिडना रेप्टीलिया और मैमेलिया वर्ग के मध्य एक योजक कड़ी हैं। ये जन्तु भी सिद्ध करते हैं कि स्तनधारियों का विकास सरीसृपों ( Reptiles ) से हुआ है।

(iii) पेरीपेटस (Peripatus ) – यह एनेलिडा तथा आर्थोपोडा संघ के बीच की संयोजी कड़ी है। पेरीपेटस में एनेलिडा संघ के निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • बेलनाकार आकृति
  • देहभित्ति की आकृति व चर्म का पेशीय होना
  • क्यूटिकल द्वारा निर्मित बाह्य कंकाल अनुपस्थित एवं पार्श्व पादों के समान उभारों का उपस्थित होना।

संघ आर्थ्रोपोडा के समान पेरीपेटस में निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • तीन खण्डों के समेकन से सिर भाग का बनना
  • ऐंटिनी (Antennae ) का होना
  • एक जोड़ी सरल नेत्रों तथा एक जोड़ी मुख पैपिली का उपस्थित होना ।

अतः पेरिपेटस को एनीलीडा तथा आर्थ्रोपोडा संघ को जोड़ने वाली संयोजी कड़ी कहते हैं। यह प्रमाणित करता है कि आर्थोपोडा का विकास एनिलिडा से हुआ है ।

(iv) फुफ्फुस मछली (Lungfish ) प्रोटोप्टेरस (Portopterus) – प्रोटोप्टेरस में कुछ लक्षण मछलियों के (जैसे क्लोम तथा शल्कों की उपस्थिति) और कुछ लक्षण उभयचरों के (जैसे फुफ्फुस की उपस्थिति) पाये जाते हैं। अत: प्रोटोप्टेरस पिसीज तथा उभयचर संघ के बीच संयोजी कड़ी है।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास 9

उपरोक्त के अतिरिक्त निम्न संयोजी कड़ियों के उदाहरण हैं-

  • वायरस (Virus) – संजीव और निर्जीव के मध्य
  • यूग्लीना (Euglena) – पादप और जन्तु के मध्य
  • प्रोटेरोस्पॉन्जिया (Proterospongia ) – प्रोटोजोआ और पॉरीफेरा के मध्य
  • नियोपाइलीना (Neopilina) – मोलस्का और एनेलिडा के मध्य उक्त कार्बनिक विकास और समपूर्वजता के अच्छे उदाहरण प्रदर्शित करते हैं।

(4) अवशेषी अंगों के प्रमाण (Evidences from Vestigeal Organs) – अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवन भर पूर्ण विकास नहीं होता है। ये जन्तु की जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते है। अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं। ऐसे अंगों को अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) कहते हैं। मनुष्य के शरीर में लगभग 180 ऐसी रचनायें होती हैं जिनमें सामान्य निम्न हैं-

  • कृमिरूपी – परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है, जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरहे जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं . क्रियाशील होती है।
  • कर्ण पल्लव (Earpinna ) – घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे जन्तुओं के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है ।
  • पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है किन्तु फिर भी पुच्छ कशेरुकाएँ अत्यधिक हासित दुम के रूप में अवशेषी अंग के रूप में पायी जाती हैं। इससे पता चलता है कि मनुष्य के पूर्वज में पूँछ थी ।

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  • निमेषक पटला (Nictitating Membrane)-मेढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है । इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।
  • त्वचा के बाल (Hair ) – बन्दरों, घोड़ों, सूअरों, कपियों आदि स्तनियों के शरीर पर घने बाल होते हैं। ये ताप नियन्त्रण में सहायता करते हैं। मानव में बालों का यह कार्य नहीं रहा, फिर भी शरीर पर कुछ बाल होते हैं।
  • अक्कल दाढ़ ( Wisdom Teeth) – तीसरा मोलर दन्त अन्य प्राइमेट (Primate) स्तनियों में सामान्य होता है । मानव में इसका उपयोग नहीं होता है। अतः यह देर से निकलता है और अर्ध विकसित रहता है। यह दंतरोगों के प्रति संवेदनशील होता है।

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अन्य जन्तुओं में अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in other Animals)

  • अजगर (Python) के पश्च पाद और श्रोणि मेखला
  • बिना उड़ने वाले ( Flightless) पक्षियों के पंख जैसे शुतुरमुर्ग, ईमू कीवी आदि ।
  • घोड़े के पैरों की स्पिलिंट अस्थियाँ (Splint Bones ) 2 और 4 अगुंली।
  • व्हेल के पश्चपाद और श्रोणि मेखला

पादपों के अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in Plants) – रस्कस और अनेक भूमिगत तनों की शल्की पत्तियाँ ।
अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे किन्तु इनके महत्त्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

(5) श्रोणिकी से प्रमाण (Evidences from Embryology) – श्रोणिकी तुलनात्मक भ्रोणिकी तथा प्रायोगिक श्रोणिकी से विकास के पक्ष में निर्णायक प्रमाण मिलते हैं। सभी मेटोजोअन प्राणी एक कोशिकीय युग्मनज (Zygote) से विकसित होते हैं और सभी प्राणियों के परिवर्धन की प्रारम्भिक अवस्थाओं में अत्यधिक समानता होती है।

मनुष्य सहित सभी मेटाजोअन वर्गों के प्राणियों के अण्डों के परिवर्धन के समय विदलन, ब्लास्टूला एवं गेस्टुला में वही मूलभूत समानताएँ पायी जाती हैं। प्रौढ़ जन्तुओं में जितने निकट का सम्बन्ध होता है उनके परिवर्धन में उतनी अधिक समानता देखने को मिलती है। विभिन्न वर्गों में परिवर्धन के बाद की अवस्थाएँ अपसरित हो जाती हैं व यह अपसरण एक विशाखित वृक्ष के समान होता हैं।
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इसी प्रकार विभिन्न कशेरुकियों के भ्रूणों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उच्च वर्ग के जन्तुओं के भ्रूण निम्न वर्गों के प्रौढ़ जन्तुओं के समान होते हैं, जैसे मेढ़क का टेडपोल लारवा मछली के समान होता है। इसी आधार पर हेकल ने पुनरावर्तन का सिद्धान्त (Recapitulation Theory ) प्रतिपादित किया।

इसके अनुसार प्रत्येक जीव भ्रूणीय परिवर्धन में अपनी जाति के जातीय विकास की कथा को दोहराता है। पुनरावर्तन सिद्धान्त के आधार पर निषेचित अण्डे की तुलना समस्त जन्तुओं के एककोशिकीय पूर्वज से ब्लास्टुला की प्रोटोजोआ मण्डल या कॉलोनी से की जा सकती है। मेढ़क के ही नहीं वरन् रेप्टाइल, पक्षी और यहाँ तक कि मनुष्य के भ्रूण में भी क्लोम दरारें, क्लोम, नोटोकॉर्ड, युग्मित आयोटिक चॉपें, प्रोनेफ्रोस, पुच्छ तथा पेशियाँ आदि मछली के समान होती हैं और आरम्भ में सभी का हृदय मछली के समान द्विकक्षीय होता है।

इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारम्भ मे समस्त वर्टिब्रेट्स का विकास मछली के समान पूर्वजों से हुआ है। मनुष्य के भ्रूणीय परिवर्धन में देखा गया है कि उसका भ्रूण प्रारम्भ में मछली से, बाद में एम्फिबियन से और फिर रेप्टाइल से मिलता-जुलता होता है और सातवें मास में यह शिशु कपि से मिलता- जुलता होता है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव अपने भ्रूण परिवर्धन में उन समस्त अवस्थाओं से गुजरता है जिनसे कभी उसके पूर्वज धीरे-धीरे विकसित होकर बने होंगे।

(6) जीवाश्मीय प्रमाण (Palaeontological Evidences) – वैज्ञानिक चार्ल्स लायल के अनुसार पूर्व जीवों के चट्टानों से प्राप्त अवशेष जीवाश्म ( Fossils) कहलाते हैं। जीवाश्म का अध्ययन पेलियो-ओन्टोलॉजी (Palacontology) कहलाता है। जीवाश्म कार्बनिक विकास के पक्ष में सर्वाधिक मान्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि जीवाश्म द्वारा जीवों के सम्पूर्ण विकासीय इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है।

जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के सम्बन्ध में निम्न तथ्य प्रमाणित हुए-

  • जीवाश्म जो कि पुरानी चट्टानों से प्राप्त हुए सरल प्रकार के तथा जो नई चट्टानों से प्राप्त हुए जटिल प्रकार के थे।
  • विकास के प्रारम्भ में एक कोशिकी प्रोटोजोआ जन्तु बने जिनसे बहुकोशिकी जन्तुओं का विकास हुआ।
  • कुछ जीवाश्म विभिन्न वर्ग के जीवों के बीच की संयोजक कड़ियाँ (Connecting-links) को प्रदर्शित करती हैं।
  • पौधों में एन्जिओस्पर्म (Angiosperm) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (mammals) सबसे अधिक विकसित और आधुनिक हैं।
  • जीवाश्म के अध्ययन से किसी भी जन्तु को जीवाश्म कथा ( विकासीय इतिहास) या वंशावली का क्रमवार अध्ययन किया जा सकता है।

घोड़े की वंशावली ( जीवाश्मीय इतिहास ) [Evolution (Pedigree) of Horse] वैज्ञानिक सी. मार्श (C. Marsh) के अनुसार घोड़े का प्रारम्भिक जीवाश्म उत्तरी अमेरिका में पाया गया जिसका नाम इओहिप्पस (Eohippus) था। इसका विकास इओसीन काल में हुआ। इओहिप्पस लोमड़ी के समान तथा लगभग एक फुट ऊँचे थे। इनके अग्रपादों में चार तथा पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं।
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ओलिगोसीन काल में इन पूर्वजों से भेड़ के आकार के मीसोहिप्पस (Mesohippus) घोड़ों का विकास हुआ। इनके अग्र व पश्च पादों में केवल तीन-तीन अंगुलियाँ थीं। बीच की अंगुलियाँ इधर- उधर की दोनों अंगुलियों से बड़ी थीं और शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं पर रहता था। इनसे मायोसीन काल के मेरीचिप्पस (Merychippus) घोड़ों का विकास हुआ।

ये टट्ट के आकार के थे। इनके अग्र व पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं जिनमें से बीच वाली सबसे लम्बी थी और केवल यही भूमि तक पहुँचती थी । प्लायोसीन काल में प्लीओहिप्पस (Pliohippus) घोड़ों का विकास हुआ। ये आकार में टट्ट से ऊँचे थे। इनके अग्र व पश्चपादों में केवल एक-एक अंगुली विकसित थी और इधर-उधर की अंगुलियाँ अत्यधिक हासित होकर स्प्लिट अस्थियों (Splint Bones)

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के रूप में त्वचा में दबी हुई थीं। केवल एक ही अंगुली की उपस्थिति के कारण ये तेजी से दौड़ सकते थे । प्लीस्टोसीन युग में इन्हीं घोड़ों से आधुनिक घोड़े इक्वस (Equus) का विकास हुआ। इक्वस की ऊँचाई लगभग 5 फीट है और यह उसी रूप में आज भी चला आ रहा है।

(7) जीवों के घरेलू पालन ( Domestication) से प्रमाण- मनुष्य अपने लिए उपयोगी जन्तुओं (घोड़े, गाय, कुत्ता, बकरी, भेड़, भैंस, कबूतर, मुर्गा आदि) तथा खेतिहर वनस्पतियों (गोभी, आलू, कपास, गेहूँ, चावल, मक्का, गुलाब आदि) की इनके जंगली पूर्वजों से नस्लें सुधार कर उत्पत्ति की है।

यद्यपि नस्लें सुधार कर नयी जातियों की उत्पत्ति वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं, फिर भी इस प्रक्रिया में बदले हुए लक्षण विकसीय ही माने जायेंगे हजारों-लाखों वर्षों का समय मिले तो सम्भवतः मानव इस विधि से नयी जीव जातियों की उत्पत्ति कर लेगा। अतः इतने पुराने इतिहास की प्रकृति में अनुमानत: इसी प्रकार नस्लों में सुधार के फलस्वरूप नयी-नयी जातियों की उत्पत्ति हुई होगी।

(8) रक्षात्मक समरूपता (Protective Resemblance) से प्रमाण – इंगलिस्तान (Britain) के औद्योगिक नगरों के आस-पास के पेड़ चिमनियों के धुएँ से काले पड़ जाते हैं। इन क्षेत्रों के कीटों, विशेष तौर से पतंगों (moths) की विभिन्न जातियों में, गत सदी में, औद्योगिक साँवलेपन (Industrial melanism) का रोग हो गया।

उदाहरणार्थ, पंतगों की बिस्टन बिटूलैरिया (Biston betularia) नामक जाति में शरीर व पंख हल्के रंग के काले धब्बेदार होते थे । सन् 1884 में इनकी आबादी में पहली बार एक बिल्कुल काला पतंगा देखा गया। यह परिवर्तन रंग के जीन में अचानक जीन – उत्परिवर्तन (gene- mutation) के कारण हुआ।

बाद में काले पतंगों की संख्या बढ़ते-बढ़ते 90% हो गयी। यह एक विकासीय परिवर्तन था। इससे पतंगों का रंग पेड़ों के रंग से मिलता-जुलता हो गया ताकि ये शत्रुओं (पक्षियों) और शिकार की निगाहों से बच सकें । जीन – उत्परिवर्तन के कारण वातावरण से रक्षात्मक समरूपता के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं। इसे सादृश्यता (Mimicry) कहते हैं।

ऐसी तितलियाँ होती हैं जो उन्हीं सूखी पत्तियों जैसी दिखायी देती हैं जिन पर ये आराम के समय बैठती हैं शाखाओं से मिलती-जुलती आकृति की कई कीट जातियाँ पायी जाती हैं। ये सब दृष्टान्त ‘जैव – विकास’ को प्रमाणित करते हैं । इंगलिस्तान के पतंगों के सम्बन्ध में तो यहाँ तक कहा – गया है कि इनमें “वैज्ञानिकों ने विकास प्रक्रिया को होते हुए स्वयं देखा है। ”
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प्रश्न 21.
हार्डी-वेनबर्ग का नियम लिखिए।
उत्तर:
इसके अनुसार किसी समुदाय में यदि प्रजनन बेतरतीब (Random) होता है, यदि उत्परिवर्तन नहीं होते हैं तथा यदि समुदाय में सदस्यों की संख्या विशाल होती है तब इस समुदाय की जीन की जीन आवृत्ति (Gen Frequency) एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में स्थिर रहेगी अर्थात् यह समुदाय आनुवंशिक संतुलन (Genetic Equilibrium) स्थिति में होगा।

इस हार्डी – वेनबर्ग ने निम्न समीकरण द्वारा समझाया-
सभी अलील आवृत्तियों का योग 1 (एक) होता है तथा व्यष्टिगत आवृत्तियों को pq कहा गया । द्विगुणित में p तथा q अलील A तथा अलील a की आवृत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक जीव संख्या में AA की आवृत्ति साधारणतया P2 होती है। ठीक इस प्रकार से aa की आवृत्ति q2 होती है और Aa की 2pg होती है अत: P2 + 2pg + q2=1 हुआ। यह (p+q)2 की द्विपदी अभिव्यक्ति है।

इस प्रकार हार्डी – वेनबर्ग सिद्धान्त यह स्पष्ट करता है कि यदि जीन आवृत्तियाँ परिवर्तित नहीं होती हैं अर्थात् वह समुदाय आनुवंशिक ‘संतुलन की दशा में होता है तब इसमें विकास की दर भी शून्य होती है । इस सिद्धान्त को दिये गये उदाहरण से समझाया जा सकता है। मान लीजिए किसी विशाल समुदाय में दी गई आवृत्ति में दो अलील (Allel) A व a उपस्थित हैं। मेन्डल के वंशागति नियमानुसार इस समुदाय में तीन प्रकार के सदस्य उपस्थित होंगे जिनका अनुपात निम्न होगा –

AAAaaa
36%48%16%

यदि यह माना जाये कि समुदाय के सदस्यों के बीच प्रजनन अव्यवस्थित (Random) ढंग से हो रहा तब ऐसी स्थिति में सभी सदस्य संख्या में लगभग एक सामान युग्मक उत्पादित करेंगे । यहाँ यह भी मान लें कि जीन A व a में उत्परिवर्तन नहीं होता है तब इस समुदाय के कुल उत्पादित युग्मकों ‘उत्पादित युग्मकों का प्रतिशत निम्न प्रकार का होगा-
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लैंगिक प्रजनन में इन युग्मकों में परस्पर निषेचन निम्नलिखित चार प्रकार से सम्भव होगा-
शुक्राणु A का संयुग्मन अण्ड A से
शुक्राणु a का संयुग्मन अण्ड a से
शुक्राणु A का संयुग्मन अण्ड a से तथा
शुक्राणु a का संयुग्मन अण्ड A से
उपर्युक्त उदाहरणानुसार युग्मकों के परस्पर संयुग्मन की आवृत्ति प्रतिशत निम्नलिखित प्रकार की होगी-
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अतः इस नयी अगली पीढ़ी में सदस्यों का वही अनुपात उपलब्ध होगा जो मूल जनक समुदाय में था । स्पष्ट है कि यहाँ जीन आवृत्ति अपरिवर्तित रहती है अर्थात् यह समुदाय पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवंशिक सन्तुलन की दशा में रहता है व ऐसे समुदाय में विकास की दर शून्य होगी। इस वर्णन से स्पष्ट है कि विकास परिवर्तन उसी दशा में सम्भव है जब हार्डी-वेनबर्ग नियम की एक या अधिक शर्तें भंग होती हैं तथा इसके फलस्वरूप जब समुदाय का आनुवंशिक सन्तुलन बिगड़ता है । पाँच घटक हार्डी-वेनबर्ग साम्यता को प्रभावति करते हैं जो निम्न हैं-

  • जीन पलायन (Gene Migration) या जीन प्रवाह (Gene flow),
  • आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift),
  • उत्परिवर्तन (Mutation),
  • आनुवंशिक पुनर्योग (Genetic Recombination) और
  • प्राकृतिक वरण (Natural Selection )

इस प्रकार किसी समुदाय में प्राकृतिक चयन प्रक्रिया तभी होती है जब उस समुदाय में प्रजनन अव्यवस्थित प्रकार से नहीं होता है, जब उसमें आनुवंशिक उत्परिवर्तन होते या जब समुदाय में सदस्यों की संख्या कम होती है, तभी विकास सम्भव होता है। जब जीन संख्या का स्थान परिवर्तन होता है तो जीन आवृत्तियाँ भी बदल जाती हैं। यह दोनों मौलिक (पुरानी) तथा नई जीव संख्या में होता है।

नयी समष्टि में नई जीनें और अलील जोड़ दी जाती हैं व पुरानी समष्टि में ये घट जाती हैं।. यदि यही प्रक्रिया बार- बार होगी तो जीन प्रवाह सम्भव होगा। यदि यह परिवर्तन संयोगवश होता है तो आनुवंशिक अपवाह (Genetic Drift) कहलाता है । कभी-कभी अलील आवृत्ति का यह परिवर्तन समष्टि के नये नमूने में इतना भिन्न हो जाता है तो वह नूतन प्रजाति (Species) ही हो जाती है।

मौलिक अपवाहित (Original Drifted Population) संस्थापक बन जाती है व इस प्रभाव को संस्थापक प्रवाह कहा जाता है। सूक्ष्म जीवों पर किये गये प्रयोग यह दर्शाते हैं कि पूर्व विद्यमान लाभकारी उत्परिवर्तन का वरण होता है व नये फीनोटाइप (Phenotype) दिखाई देते हैं तथा कुछ पीढ़ियों के बाद यही नयी जाति हो जाती है। प्राकृतिक वरण में इन्हें जनन के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं।

वास्तव में उत्परिवर्तन व युग्मों के निर्माण समय में पुनर्योजन या जीन अपवाह का परिणाम होता है, इससे आगामी पीढ़ी में जीन आवृत्ति में परिवर्तन आता है। धीरे-धीरे जनन की सफलता के सहारे से प्राकृतिक वरण इसे अलग समष्टि का रूप दे देता है। फिर प्राकृतिक वरण स्थायित्व प्रदान कर देता है। (व्यष्टियों को लक्षण प्राप्त होना) दिशात्मक परिवर्तन ( Directional) या विदारण (डिसरप्शन ) जो वितरण वक्र के दोनों सिरों में होता है।
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प्रश्न 22.
अपसारी विकास (Divergent Evolution) क्या है ? पौधों का उदाहरण लेते हुए समझाइये।
उत्तर:
अपसारी विकास (Divergent Evolution) – विभिन्न जन्तुओं में पायी जाने वाली समजातता यह प्रदर्शित करती है कि इन सबकी उत्पत्ति किसी समान पूर्वज से हुई है। किसी एक पूर्वज से उत्पन्न होने के बाद जातियाँ अपने-अपने आवासों के अनुसार अनुकूलित हो जाती हैं जिसे ही अपसारी विकास कहते हैं।

इन जातियों में समजात पाये जाते हैं- जैसे बोगनविलिया का कांटा तथा कुकुरबिटा के प्रतान (Tendril) समजात होते हैं। ये दोनों ही तने के रूपान्तरण हैं जो कार्य तथा भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार ( आकारिकी) रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रश्न 23.
मानव के अवशेषी अंगों की सूची बनाइए ।
उत्तर:
मानव के शरीर में लगभग 180 अवशेषी अंग हैं जिनमें से सामान्य निम्नलिखित हैं-

  1. कृमिरूपी परिशेषिका (Vermiform Appendix )
  2. कर्ण पल्लव (Ear pinna)
  3. पुच्छ कशेरूकाएँ (Caudal Vertebrae)
  4. निमेषक पटल (Nictitating Membrane)
  5. त्वचा के बाल (Hair )
  6. अक्कल दाढ़ (Wisdom Teeth)
  7. सरवाइकल फिस्टुला (Cervical Fistula)
  8. केनाइन दाँत (Canine teeth)
  9. अतिरिक्त चूचुक (Extra nipple )
  10. रूडीमेन्टरी गिल स्लिटस (Rudimentary gill slits)
  11. मानव शिशु में पूँछ (Human Body with Tail)

प्रश्न 24.
विकास के आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्त का वर्णन करें।
उत्तर:
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में हमें ‘बिग बैंग’ नामक महाविस्फोट का सिद्धान्त यह कहता है कि एक महा विस्फोट के फलस्वरूप ब्रह्माण्ड का विस्तार हुआ और तापमान में कमी आई। कुछ समय बाद हाइड्रोजन एवं हीलियम गैसें बनीं। ये गैसें गुरुत्वाकर्षण के कारण संघनीभूत हुईं और वर्तमान ब्रह्माण्ड की आकाश गंगाओं का गठन हुआ। आकाश गंगा के सौर मण्डल में पृथ्वी की रचना 4.5 बिलियन वर्ष (450 करोड़) पूर्व मानी जाती है। प्रारम्भिक अवस्था में पृथ्वी पर वायुमण्डल नहीं था।

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जल, वाष्य, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अमोनिया आदि धरातल को ढकने वाले गलित पदार्थों से निर्मुक्त हुई। सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (अल्ट्रावायलेट) किरणों ने पानी को (H2) तथा (O2) में विखण्डित कर दिया तथा हल्की (H2) मुक्त हो गई। ऑक्सीजन ने अमोनिया (NH2) एवं मीथेन (CH2) के साथ मिलकर पानी, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) तथा अन्य गैसों आदि की रचना की।

पृथ्वी के चारों तरफ ओजोन परत का गठन हुआ। जब यह ठण्डा हुआ, तो जल-वाष्प बरसात के रूप में बरसी और गहरे स्थान भर गए, जिससे महासागरों की रचना हुई। पृथ्वी की उत्पत्ति के लगभग 50 करोड़ वर्ष बाद अर्थात् 400 करोड़ वर्ष पहले जीवन प्रकट हुआ। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिकों एवं दार्शनिकों ने समय-समय पर अपनी-अपनी परिकल्पनाएँ प्रस्तुत कीं। इनमें प्रमुख

परिकल्पनाएँ निम्न हैं-
1. विशिष्ट सृष्टि का सिद्धान्त (Theory of Special Creation)-यह सिद्धान्त धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक फादर सुआरेझ (Father Suarez) थे, बाइबिल के अनुसार जीवन तथा सभी वस्तुओं की रचना भगवान द्वारा 6 दिनों में की गई।

प्रथम दिनस्वर्ग तथा नरक
द्वितीय दिनआकाश तथा जल
तीसरे दिनसूखी धरती और वनस्पति
चौथे दिनसूर्य, चन्द्रमा और तारे
पाँचवें दिनमछलियाँ और पक्षी
छठे दिनस्थलीय जन्तु और मनुष्य बने।

प्रथम मनुष्य (Adam) आदम बना और इसकी बारहवीं पसली से (Five) हौवा प्रथम नारी बनी। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विश्व और सृष्टि की रचना ब्रह्मा द्वारा की गई। (प्रथम मानव मनु और प्रथम नारी श्रद्धा थे ) । इसके अनुसार जीवन अपरिवर्तनशील है तथा उत्पत्ति के बाद उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। विशिष्ट सृष्टिवाद का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होने के कारण इसे स्वीकार नहीं किया गया।

2. स्वतः जनन का सिद्धान्त (अजीवात जीवोत्पत्ति) (Theory of Spontaneous Generation Abiogenesis or Autogenesis)-इस परिकल्पना का प्रतिपादन पुराने यूनानी दार्शानिक जैसे थेल्स, एनेक्सिमेन्डर, जेनोफेन्स, प्लेटो, एम्पीडोकल्स, अरस्तू द्वारा किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से अपने आप अचानक हुई। इनका विश्वास था कि नील नदी के कीचड़ पर प्रकाश की किरणें गिरने पर उससे मेंढ़क, सर्प, मगरमच्छ आदि उत्पन्न हो गये।

अजैविक उत्पत्ति का प्रायोगिक समर्थन वाल हेल्मोन्ट (Val Helmont 1642) द्वारा किया गया। इनके द्वारा अन्धेरे स्थल पर गेहूँ के चौकर (Barn) में पसीने से भीगी गन्दी कमीज (Shirt) को रखने पर 21 दिन में चूहों की उत्पत्ति को स्वतः जनन के द्वारा होना बताया।

3. ब्रह्माण्डवाद का सिद्धान्त (Cosmologic Theory)-यह सिद्धान्त रिचर (Richter) द्वारा प्रतिपादित किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन पृथ्वी पर सर्वप्रथम किसी अन्य ग्रह या नक्षत्र से जीवद्रव्य (Protoplasm), बीजाणु (Spores) या अन्य कणों के रूप में कॉस्मिक धूल के साथ पहुँचा जिसने जीवन के विभिन्न रूपों को जन्म दिया।

4. कॉस्मिक पेनस्पर्मिया सिद्धान्त (Cosmic Panspermia Theory)-यह सिद्धान्त आरीनियस (Arrhenius) द्वारा प्रतिपाद्ति किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवों के बीजाणु (Spores) ब्रह्माण्ड में एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर स्वतन्त्र रूप से आ जा सकते हैं। इन्होंने ही पृध्व्वी पर पहुँचकर जीवन के विभिन्न रूपों को जन्म दिया।

5. जीवन की अनन्तकालता का सिद्धान्त (Theory of Eternity of Life)-हेल्महॉट्ज (Helmhotz) ने जीवन की अनन्तकालिता (Eternity of Life) में विश्वास किया। इनके अनुसार जीवन की उत्पत्ति या सृष्टि का प्रश्न उठता ही नहीं, क्योंकि ‘जीवन अमर है; ब्रह्माप्ड की उत्पत्ति के समय ही अजीव और सजीव पदार्थों की एक साथ उत्पत्ति हुई ।

6. जीवात् जीवोत्पत्ति का सिद्धान्त (Theory of Biogenesis)-यह सिद्धान्त हार्वे (Harvey, 1951) और हक्सले (T.H. Huxley, 1870) नामक वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपाद्त किया। इनके अनुसार पृथ्वी पर नये जीवन की उत्पत्ति या निर्माण पूर्व जीवों से होता है न कि निर्जीव पदार्थों से। यह सिद्धान्त स्वतः जनन (Spontaneous Generation) का तो खण्डन करता है किन्तु पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है। जीवात् जीवोत्पत्ति का प्रायोगिक सत्यापन और स्वतः जनन का प्रायोगिक खण्डन करने के लिए प्रमुख वैज्ञानिकों द्वारा किये गये प्रयोग अग्र हैं।

7. फ्रांसेस्को रेडी (Francesco Redi, 1668-इटालियन ) का प्रयोग-इन्होंने मरे हुए सांपों, मछलियों और माँस के टुकड़ों को जारों में रखकर कुछ जार खुुले छोड़े तथा कुछ को सील किया या जालीदार कपड़े में बंद किया। खुले जारों में मक्खियों ने माँस पर अण्डे दिये जिनसे डिम्भक (Larvae of maggots) निकले बंद जारों में मक्खियाँ नहीं घुस पायीं।

अतः इनके माँस में डिम्भक (Larvae or maggots) नहीं दिखाई दिये। इस प्रयोग द्वारा सिद्ध होता है कि डिम्भक का विकास मक्खियों द्वारा दिये गये अण्डों से हुआ जबकि बंद जार में मक्खियों के नहीं घुस पाने के कारण उनमें किसी प्रकार के डिम्भक (Larvae) का विकास नहीं हुआ। अतः जीव का जन्म पहले से उपस्थित जीव द्वारा संभव है न कि स्वतः जनन द्वारा।
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8. लैजेरो स्पैलैन्जनी (Lazzaro Spallanzani 1767 इटालियन) का प्रयोग-इन्होंने बंद फ्लास्कों में सब्जियों और माँस को उबालकर जीवाणु रहित (Sterilized) पोषक शोरबा (Broth) तैयार किया। खुले या ढीले कार्क से बन्द्र जारों में रखने पर इस शोरबे में अनेक जीवाणु पनप जाते थे, परन्तु सीलबन्द करके रखने पर इसमें जीवाणु उत्पन्न नहीं होते थे।

नीधम (Needham) ने इस प्रयोग के विरोध में कहा कि अधिक उबालने से यह शोरबा जीवों के स्वतः उत्पादन के योग्य नहीं रहा। इस पर स्पैलैन्जनी (Spallanzani) ने सीलबंद फ्लास्कों की नलियों को तोड़ दिया। कुछ दिन बाद हवा के भीतर पहुँचने के कारण, इन जारों के शोरबे में भी जीवाणु हो गये। इससे सिद्ध हुआ कि सूक्ष्म जीवाणु भी स्वतः उत्पादन द्वारा नहीं, वरन् हवा में उपस्थित जीवाणु से ही बनते हैं।

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9. लुईस पाश्चर (Louis Pasteur, 1860-1862-फ्रांसीसी) का प्रयोग-लुईस पाश्चर ने रोगों का रोगाणु सिद्धान्त (Germ Theory of Diseases or Germ Theory) प्रतिपादित के साथ अजैव उत्पत्ति को गलत सिद्ध किया।
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इन्होंने शक्कर और यीस्ट (Yeast) का घोल उबाल कर उसे जीवाणु रहित कर दिया। अब इस घोल को दो प्रकार के फ्लास्क में रखा एक जार (फ्लास्क) की गर्दन को गरम करके खींच कर ‘S’ आकार (हंस की गर्दन के समान) का बना दिया तथा दूसरे की गर्दन को तोड़ दिया  ‘S’ आकृति की गर्दन वाले फ्लास्क में कोई जीवाणु दिखाई नहीं दिये क्योंकि मुड़ी गर्दन पर धूल कण और सूक्ष्म जीव चिपक गए और विलयन तक नहीं पहुँच सके। जबकि टूटी ग्रीवा वाले फ्लांस्क में वायु और सूक्ष्म जीव आसानी से पहुँच जाने के कारण उसमें सूक्ष्म जीवों की कॉलोनी का विकास हो गया। लुईस पाश्चर के प्रयोगों से अजीवात् जीवोत्पत्ति की धारणा समाप्त हो गई और सजीवों से ही जीवन की उत्पत्ति सिद्ध हो गई।

10. ओपेरिन-हेल्डेन सिद्धान्त (Oparin-Haldane Theory of Origin of Life)-वैज्ञानिक ए.आई. ओपेरियन और जे.बी.एस. हेल्डेन (इंग्लैण्ड में जन्मे भारतीय वैज्ञानिक) ने प्रकृतिवाद् या रासायनिक विकास का सिद्धान्त (Naturalistic Theory or Theory of Chemical Evolution) प्रतिपादित किया। यह सिद्धान्त जीवन की उत्पत्ति का आधुनिक सिद्धान्त (Modern Theory of Origin of Life) है। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति रसायनों के संयोग से हुई जिसे निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझाया गया है-
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(i) परमाणु अवस्था (The Atomic Stage)-पृथ्व्वी की उत्पत्ति लगभग 4-6 अरब वर्ष पूर्व हुई। ऐसे तत्व जो जीवद्रव्य बनाने में प्रमुख रूप से भाग लेते हैं केवल परमाण्वीय अवस्था में पाये जाते थे। केवल हल्के तत्वों ने मिलकर पृथ्वी का आद्य वातावरण निर्मित किया जैसे कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन। इनमें सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन उपस्थित थी।

(ii) आण्विक अवस्था (अणुओं और सरल अकार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति) Molecular Stage (Origin of Molecules and Simple Inorganic Compounds)-पृथ्वी के ताप में कमी होने के साथ हल्के स्वतन्त्र परमाणुओं में संयोग से अणु और सरल अकार्बनिक यौगिक बनने लगे। अति उच्च ताप के कारण सक्रिय हाइड्रोजन परमाणुओं ने सम्मूर्ण ऑक्सीजन से संबोग कर जल बनाया और वातावरण में मुक्त ऑक्सीजन नहीं रही।

इसलिए आद्य वातावरण अपचायी (Reducing) था जबकि वर्तमान वातावरण स्वतन्त्र ऑक्सीजन की उपस्थिति के कारण उपचायी (Oxidising) है। हाइड्रोजन परमाणुओं ने नाइट्रोजन से संयोग कर अमोनिया (NH3) का निम्माण किया। जल तथा अमोनिया सम्भवतः प्रथम अकार्घनिक (Inorganic) यौगिक थे। इन हल्के तत्वों में क्रियाओं द्वारा CO2,CO N2,H2 आदि का भी निर्माण हो गया।

(iii) प्रारम्भिक कार्बनिक याँगिकों की उत्पत्ति (Origin of Early Organic Compounds)-वातावरण में उपस्थित नाइट्रोजन और कार्बन के धात्चिक परमाणुओं के साथ संयोग से नाइट्राइड और कार्बाइड का निर्माण हुआ। जल वाष्प और धात्चिक कार्बाइड के क्रिया द्वारा प्रथम काबंनिक यौगिक मेथेन CH4 का निर्माण हुआ। इसके बाद HCN हाइड्रोजन सायनाइड बना।

उस समय जो जल पृथ्वी पर बनता उच्च ताप के कारण वाष्पीकृत हो जाता जिससे बादल बन जाते तथा जलवाष्प वर्षा बंदों के रूप में पुनः भूमि पर आ जाती जिससे लम्बे समय तक इस प्रक्रम के चलते रहने से पृथ्वी का ताप कम होने लगा और इस पर समुद्र बनने लगे।

(iv) सरल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति (Origin of Simple Organic Compounds)-आदि सागर के जल में बड़ी मात्रा में मेथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन, सायनाइड्स, कार्बाइड और नाइट्राइड्स उपस्थित थे। इन प्रारम्भिक यौगिकों में संयोग द्वारा सरल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हुआ जैसे अमीनो अम्ल, गिलसरॉल, वसा अम्ल, प्यूरीन, पिरीमिडीन आद्व। क्रियाओं के लिए ऊर्जा सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों और ज्बालामुखी आदि से प्राप्त हई ।

(v) जटिल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति (Origin of Complex Organic Compounds)-समुद्री जल में छोटे सरल कार्बनिक यौगिकों के संयोग से बड़े जटिल कार्बनिक यौगिक बनने लगे जैसे-एमीनो अम्लों के संयोग से बड़ी शृंखलाएँ पॉलीपेप्टाइड्स (Polypeptides) और प्रोटीन बने। वसा अम्ल और ग्लिसरॉल के संयोग से वसा (Fat) और लिपिड (Lipid) बने।

सरल शर्कराओं के संयोग से डाइसैकेराइड और पॉलीसेकेराइड बने। शर्करा, नाइट्रोजनी क्षारक और फास्फेट्स के संयोग से न्यूक्लिओटाइड बने जिनकें बहुलीकरण से न्यूक्लिक अम्ल बने। इस प्रकार समुद्री जल में ऐसे दीर्घ अणुओं (Macro molecules) का निर्माण हो गया जो जीवद्रव्य के मुख्य घटकों का निर्माण करते हैं। अतः आदि सागर में जीवन की उत्पत्ति की संम्भावनाएँ स्थापित हो गईं।
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लम्बे समय के बाद रासायनिक विकास के परिणामस्वरूप आदि सागरों का जल इन कार्बनिक यौगिकों से पूर्णतया संतृप्त हो गया। कोसरवेट व न्यूक्लिओ प्रोटीन का निर्माण-बड़े कार्बनिक अणु जो कि सागर में अजैव संश्लेषण द्वारा बने थे, एक-दूसरे के समीप आने लगे जिससे बड़ी कोलाइडी बूँदों के समान संरचनाओं का निर्माण हुआ। इन्हीं कोलाइडी बूँदों का ऑपेरिन द्वारा कोसरवेट नाम दिया गया।

कोसरवेट (संराशयक) वृहद् अणुओं का झुण्ड था जिसमें प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, लिपिड्स और पॉलीसेकेराइड्स आदि थे। इनमें वातावरण से कार्बनिक अणुओं के अवशोषण की क्षमता थी, ये जीवाणुओं के समान मुकुलन द्वारा विभाजित हो सकते थे, इनमें ग्लूकोज के अपघटन जैसी क्रियाएँ होती थीं। रासायनिक क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती थी।

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ओपैरिन के अनुसार कोसरवेट सर्वप्रथम बने सरलजीवीय अणु थे जिन्होंने बाद में कोशिका को जन्म दिया। स्टैनले मिलर का प्रयोग (Experiment of S. Miller)ओपैरिन की परिकल्पना के अनुसार, प्रबल ऊर्जा की उपस्थिति में, मीथेन, हाइड्रोजन, जलवाष्प एवं अमोनिया के संयोजन से अमीनो अम्लों, सरल शर्कराओं तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण की सम्भावना को, अमेरिकी वैज्ञानिक स्टैनले मिलर (Stanley Miller 1953,1957)

ने अपने आचार्य-हेरोल्ड यूरे (Harold Urey) की देखरेख में एक साधारण से प्रयोग द्वारा सिद्ध किया। उन्होंने 5 लीटर के एक फ्लास्क में 2: 1: 2 के अनुपात में, मीथेन, अमोनिया एवं हाइड्रोजन का गैसीय मिश्रण भरा। एक आधा लीटर के फ्लास्क को काँच की नली द्वारा बड़े फ्लास्क से जोड़ा। इस छोटे फ्लास्क में जल भरकर इसे उबालने का प्रंबध किया जिससे जलवाष्प पूरे उपकरण में घूमती है।

बड़े फ्लास्क में टंग्टन (Tungsten) के दो इलेक्ट्रोड (Electrodes) फिट करके, आदिवायुमण्डल की बिजली जैसे प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए एक सप्ताह तक तीव्र विद्युत की चिन्गारियाँ मुक्त कीं। इसलिए इस उपकरण को चिन्गारी-विमुक्ति उपकरण (Spark-Discharge Apparatus) कहते हैं। बड़े फ्लास्क को उन्होंने दूसरी ओर एक U नली द्वारा भी छोटे फ्लास्क से जोड़ा।

इस नली को एक स्थान पर एक कन्डेंसर (Condenser) में से निकाला। प्रयोग के अन्त में बनी गैस वाष्प के साथ जब कन्डेंसर के कारण ठण्डी हुई तो U नली में एक गहरा लाल-सा ग़द्दला तरल भर गया। विश्लेषण से पता लगा कि यह तरल ग्लाइसीन एवं एलैनीन नामक सरलतम अमीनो अम्लों, सरल शर्कराओं, कार्बनिक अम्लों तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों का मिश्रण था।
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अन्य वैज्ञानिकों ने भी इसी प्रकार आदि पृथ्वी पर उपस्थित दशाओं को प्रयोगशाला में उत्पन्न करके सरल अकार्बनिक एवं कार्बनिक यौगिकों से जटिल कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण को सिद्ध किया। उल्का पिण्डों सें प्राप्त रासायनिक विश्लेषण द्वारा भी पता चलता है कि अंतरिक्ष में भी यह घटना क्रम चलता होगा। इन कार्बनिक अणुओं से जीवन प्रारम्भ हुआ।

यह अणु अपने समान अणु बनाने में भी सक्षम थे। उसके पश्चात् एक कोशिकीय जीव जल में उत्पन्न हुए एवं उसके बाद धीरे-धीरे विकास की ओर लगातार बढ़ते हुए जैवविविधता बढ़ती गई व जो पृथ्वी पर आज हमें पादप व जीव-जन्तु देखने को मिलते हैं वह सभी एक कोशिकीय जलीय जीवों से विकसित हुये हैं।

प्रश्न 25.
समजात एवं तुल्यरूप अंगों में उदाहरण सहित अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
समजातता और समवृत्तता में अन्तर- समजात अंग (Homologous Organs) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हों समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं। इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं।

इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फिल्पर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं, जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं। इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं।

इन अंगों की समजातता यह सिद्ध करती है कि इन सभी जन्तुओं के पूर्वज समान रहे होंगे तथा कालान्तर में इनका क्रमिक विकास हुआ हुआ है। अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवनभर पूर्ण विकास नहीं होता है ये जन्तु जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते हैं अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं ऐसे अंगों

को अवशेषी अंग कहते हैं। मनुष्य के शरीर में अनेक रचनाएँ होती हैं जो निम्न हैं-
1. कृमिरूपी परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरगोश जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं क्रियाशील होती है।

2. कर्ण पल्लव (Ear Pinna ) घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे प्राणियों के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है।

3. पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है। फिर भी कशेरुकदण्ड के अन्त में 3 से 5 तक (प्राय: अर्धविकसित) पुच्छ कशेरुकाएँ होती हैं। भ्रूणीय परिवर्धन पूरा होते-होते, ये समेकित (Fused) होकर हड्डी का एक ही टुकड़ा, कोक्सिस (Coccyx ) बना लेती हैं।

4. निमेषक पटल (Nictitating Membrane) – मेंढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है। इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।

5. शरीर पर बाल (Hair on the Body ) – गाय, घोड़े, गधे, बन्दर आदि का पूर्ण शरीर वालों से ढका रहता है, जो शरीर के ताप आदि के नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण सहायता देते हैं। मनुष्य अपने शरीर को तापक्रम के अनुकूल कपड़ों से ढक लेता है, अर्थात् बालों की आवश्यकता नहीं होती है, अतः ये बहुत सूक्ष्म होते हैं।

अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे। किन्तु इनके महत्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 26.
एक भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिन्दु से शुरू होकर अन्य भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होता है। उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर:
डार्विन जब अपनी यात्रा के दौरान गैलापैगो द्वीप गए तो उन्होंने प्राणियों में यह घटना देखी डार्विन को एक काली छोटी चिड़िया (डार्विन फिंच) ने आश्चर्यचकित किया। उन्होंने महसूस किया कि उसी द्वीप के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की फिंच भी पाई जाती हैं। जितनी भी किस्मों को उन्होंने परिकल्पित किया था, वे सभी उसी द्वीप में ही विकसित हुई थीं।

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ये पक्षी मूलतः बीजभक्षी विशिष्टताओं के साथ-साथ अन्य स्वरूप में बदलावों के साथ अनुकूलित हुई और चोंच के ऊपर उठने जैसे परिवर्तनों ने इसे कीट भक्षी एवं शाकाहारी फिंच बना दिया। एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिंदु से शुरू होकर अन्य भू-भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होने को अनुकूल विकिरण (Adaptive radiation) कहा जाता है। डार्विन की फिंच इस प्रकार की घटना का एक सबसे अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 27.
आनुवंशिक संतुलन क्या है? हार्डी वेनबर्ग साम्यता को प्रभावित करने वाले कोई चार घटक लिखिए।
उत्तर:
हार्डी – वेनबर्ग के सिद्धान्तानुसार एक जीव संख्या में अलील (युग्मविकल्पी) आवृत्तियाँ और उनके लोकस (विस्थल) सुस्थिर होती हैं, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरन्तर रहते हैं। जीन कोश सदा अपरिवर्तनीय रहते हैं। इसे आनुवंशिक संतुलन कहते हैं। इसे प्रभावित करने वाले चार घटक निम्न प्रकार से हैं-

  • जीन पलायन या जीन प्रवाह
  • उत्परिवर्तन |
  • आनुवंशिक विचलन ।
  • आनुवंशिक पुनर्योग।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
प्राकृतिक वरण कितने प्रकार का होता है? प्रत्येक का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राकृतिक वरण मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है-

  1. स्थायीकारी वरण
  2. दिशात्मक वरण
  3. विचलित वरण

1. स्थायीकारी वरण (Stabilizing Selection ) – स्थायीकारी वरण तब कार्य करता है जब जीवों के लक्षण वातावरण के अनुकूल होते हैं। यह किसी भी पराकाष्ठा को रोक कर औसत या मध्यमान समलक्षणी समष्टि को प्रेरित करता है व घंटीनुमा आरेख (Bell-shaped Curve) के दोनों सिरों पर उपस्थित जीव धीरे-धीरे विलुप्त हो जाते हैं। स्थायीकारी चयन विभिन्नताओं को कम करता जाता है पर मध्यमान को नहीं बदलता है। इस प्रकार के वरण में उद्विकास की दर प्रारूपिक रूप से धीमी होती है।

स्थायीकारी वरण हमेशा अपरिवर्तित वातावरण में ही कार्य करता है। उदाहरण- शिशुओं में मृत्युदर मानव शिशुओं में जन्म के समय वजन (Birth weight) भी स्थायीकारी वरण का उदाहरण है। नये-नये जन्मे शिशुओं का उपयुक्ततम (Birth weight-7.3 पाउण्ड) होता है। जिनका वजन 55 पाउण्ड से कम या 10 पाउण्ड से ज्यादा होता है उनकी मृत्युदर ज्यादा होती है।

2.  दिशात्मक वरण (Directional) – इस प्रकार का वरण वातावरण संबंधी परिवर्तनों से संबद्ध होता है। यह पराकाष्ठा वाले जीवों का वरण करके समष्टि की जीनी संरचना को उसी दिशा की ओर प्रेरित करता है। इस प्रकार का वरण सामान्य या औसत के एक ओर स्थित जीवों की एक बड़ी संख्या को लुप्त करता है और इसकी ओर स्थित जीवों की संख्या में वृद्धि करता है।

यह ऐसे जीवों का वरण करता है जो परिवर्तित वातावरण के अनुसार सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं। इस प्रकार या समष्टि के मध्यमान को एक निश्चित दिशा में परिवर्तित कर देता है अर्थात् यह जीन- आवृति परिवर्तन उत्पन्न कर देता है। दिशात्मक वरण वातावरण संबंधी परिवर्तन के साथ-साथ उसके बाद होता है।

उदाहरण-

  • DDT के प्रति कीटों की प्रतिरोधकता ।
  • विस्टन बीटेलेरीया।

3.  विचलित वरण-यह एक दुर्लभ प्रकार का वरण होता है लेकिन उद्विकास के संदर्भ में काफी महत्त्वपूर्ण है। वातावरण की परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार उस समष्टि में एक से ज्यादा समलक्षणी जीव उपयुक्ततम हो सकते हैं। जब यह वरण काम करता है। तो दोनों छोरों पर स्थित सजीव केन्द्र पर स्थित औरों की तुलना में अधिक संतानें उत्पन्न करते हैं व समष्टि में दो चोटियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस प्रकार एक समष्टि दो उप समष्टि में विभक्त हो जाती है।

अगर इन दोनों उप समष्टि (Sub population) के बीच में जीन विनिमय (Gene flow) नहीं हो पाये तो प्रत्येक उपसष्टि (Sub population) से एक नयी जाति की उत्पत्ति हो जाती है। उदाहरण – समुद्री मॉलस्का (Limpets) में दो प्रकार के कवच पाये जाते हैं सफेद या भूरा सफेद रंग वाले मॉलस्का सफेद रंग के बार्नेकल जीव पर रहते हैं व भूरे वाले मॉलस्का भूरे रंग की चट्टानों पर रहते हैं। दोनों अपने-अपने वातावरण के सर्वाधिक अनुकूल होने के कारण बचे रहते हैं व समष्टि में दोनों की संख्या बनी रहती है।

प्रश्न 2.
भौगोलिक वितरण किस प्रकार जैव विकास में सहायक रहा? उपयुक्त उदाहरण द्वारा समझाइये।
उत्तर:
जीव-जन्तुओं के भौगोलिक वितरण से जैव-विकास के प्रमाण मिलते हैं। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विशेष प्रकार के जीव-जन्तु तथा पेड़-पौधे मिलते हैं। यद्यपि कुछ देश भौगोलिक दृष्टि से भिन्न होते हुए भी वहां समान प्रकार के जीव पाये जाते हैं जबकि समान जलवायु वाले ‘कुछ’ देशों में विभिन्न प्रकार के प्राणी व पौधे मिलते हैं।

उदाहरण के लिये हाथी तथा सिंह अफ्रीका में पाये जाते हैं परन्तु आस्ट्रेलिया व अमेरिका में नहीं। बाघ भारत में पाये जाते हैं परन्तु अमेरिका व आस्ट्रेलिया में नहीं। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में मार्सुपियोलिया गण के जन्तुओं जैसे कंगारू, तस्मानियन भेड़िया, अफ्रीका में दरियाई घोड़ा, जिराफ, गोरिल्ला आदि पाये जाते हैं, अन्यत्र नहीं मिलते।

डार्विन ने द. अमेरिका के पश्चिमी तट पर प्रशान्त महासागर में स्थित गेलेपगॉस द्वीप पर पायी जाने वाली फिन्चेज (काली चिड़िया) के अध्ययन में पाया कि ये पक्षी अमेरिका में पाये जाने वाले पक्षियों के समान हैं परन्तु इनके चोंच के आकार व संरचना में भिन्नता है।

उन्होंने बताया कि इन पक्षियों की चोंच में भिन्नता स्थानीय वातावरण एवं उसमें उपलब्ध भोजन से अनुकूलता का परिणाम है (चित्र पाठ्यपुस्तक के प्रश्न 8 में देखिये) । इस प्रकार मूल रूप से एक जाति के पक्षी में जो भिन्न- भिन्न वातावरण में अभिगमन कर गये उनसे अनेक जातियों एवं उप- जातियों का विकास हुआ। इस प्रकार जन्तुओं का भौगोलिक वितरण जैव-विकास में सहायक रहा।

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अतः एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिंदु से प्रारम्भ होकर अन्य भू-भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होने को अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation) कहा गया। एक अन्य उदाहरण आस्ट्रेलियाई मासुंपियल (शिशुधानी प्राणियों) का है।

अधिकांश मार्सुपियल जो एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न थे; एक पूर्वज प्रभाव से विकसित हुए, और वे सभी आस्ट्रेलियाई महाद्वीप के अंतर्गत हुए हैं। जब एक से अधिक अनुकूली विकिरण एक अलग- थलग भौगोलिक क्षेत्र में (भिन्न आवासों का प्रतिनिधित्व करते हुए) प्रकट होते हैं तो इसे अभिसारी विकास कहा जा सकता है।

आस्ट्रेलिया के अपरास्तनी जंतु भी इस प्रकार के स्तनधारियों की किस्मों के विकास में अनुकूली विकिरण प्रदर्शित करते हैं, जिनमें से प्रत्येक मेल खाते मासुंपियल (उदाहरणार्थ- अपरास्तनी भेड़िया तथा तस्मानियाई वूल्फ मासुपियल) के समान दिखते हैं।

प्रश्न 3.
जीवाश्मिकी (पुराजीवी विज्ञान) तथा श्रोणिकी से जैव विकास की पुष्टि के प्रमाण दीजिए।
उत्तर:
यदि जैव विकास (Organic Evolution) हुआ है तो प्रारम्भ से लेकर आज तक की जीव-जातियों की रचना, कार्यिकी एवं रसायनी, भ्रूणीय विकास, वितरण आदि में कुछ न कुछ सम्बन्ध एवं क्रम होना आवश्यक है। लैमार्क, डार्विन वैलेस, डी व्रिज आदि ने जैव विकास के बारे में अपनी-अपनी परिकल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए इन्हीं – सम्बन्धों एवं क्रम को दिखाने वाले प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिन्हें हम निम्नलिखित श्रेणियों में बाँट सकते हैं-

  1. जीवों की तुलनात्मक संरचना
  2. शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण
  3. संयोजक कड़ियों के प्रमाण
  4. अवशेषी अंग
  5. भ्रोणिकी से प्रमाण
  6. जीवाश्मीय प्रमाण
  7. जीवों के घरेलू पालन से प्रमाण
  8. रक्षात्मक समरूपता

(1) जीवों की तुलनात्मक संरचना ( Comparative Anatomy) से प्रमाण – जन्तुओं में शारीरिक संरचनाएँ दो प्रकार की होती हैं-
(i) समजात अंग (Homologous organ ) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हो, समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं। इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं।

इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फ्लिपर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं। इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल (ह्यूमरस, रेडियस अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स व अंगुलास्थियाँ ) की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं।
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कीटों के मुखांग (Mouth Parts of Insects ) – कीटों के मुखांग क्रमशः लेब्रम ( Labrum), मेण्डिबल (Mandibles), मैक्सिला (Maxilla), लेबियम (Labium) एवं हाइपोफे रिंक्स (hypopharynx) से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक कीट में इनकी संरचना एवं परिवर्धन समान होता है लेकिन इनके कार्यों में भिन्नता पाई जाती है।

कॉकरोच के मुखांग भोजन को काटने व चबाने (Biting and Chewing) का कार्य करते हैं । तितली एवं मक्खी में भोजन चूसने का एवं मच्छर में मुखांग भेदन एवं चूषण (Piercing and Sucking) दोनों का कार्य करते हैं। अकशेरुकियों के पैर (Legs of Invertibrates) – इसी प्रकार कॉकरोच एवं मधुमक्खी ( Honeybee) के टांगों के कार्य भिन्न- भिन्न हैं।

कॉकरोच अपनी टांगों का उपयोग चलने (Walking) में करता है जबकि मधुमक्खी अपनी टांगों का उपयोग परागकण को एकत्रित (Collecting of Pollens) करने में करती है। जबकि दोनों की टांगों में खण्ड पाये जाते हैं तथा सभी खण्ड समान होते हैं जैसे कॉक्सा (Coxa), ट्रोकेन्टर (Trochanter ), फीमर (Femur), टिबिया (Tibia), 1 से 5 युग्मित टारसस (1-5 Jointed Tarsus)।
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बोगेनविलिया का काँटा और कुकुरबिटा के प्रतान (Tendril) में समानता होती है। इसी प्रकार और भी उदाहरण जैसे

  1. आलू व अदरक,
  2. गाजर व मूली ।

1. अपसारित विकास ( अनुकूली अपसारिता / अनुकूली विकिरण ) [Divergent Evolution (adaptive divergence / adaptive radiation)] – विभिन्न जन्तुओं में पायी जाने वाली समजातता यह प्रदर्शित करती है कि इन सबकी उत्पत्ति किसी समान पूर्वज से हुई है। किसी एक पूर्वज से उत्पन्न होने के बाद जातियाँ अपने-अपने आवासों के अनुसार अनुकूलित हो जाती हैं।

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जिसे ही अनुकूली विकिरण या अपसारित विकास कहते हैं। इन जातियों में समजात अंग (Homologous Organs) पाये जाते हैं। जैसे आस्ट्रेलिया में अनुकूली विकिरण के द्वारा ही विभिन्न प्रकार के मासूपिल्स (Marsupials) की उत्पत्ति हुई ।
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(ii) समवृत्ति अंग (Analogous Organs) – वे अंग जिनके कार्य समान हों किन्तु उनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में अन्तर हो, समवृत्ति अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए-कीट, पक्षी तथा चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते हैं परन्तु इनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में बड़ा अन्तर होता है । इन अंगों में केवल आभासी समानताएँ पाई जाती हैं।

वातावरण एवं स्वभाव के कारण कार्यों में समानता होती है। कीट के पंखों का विकास शरीर की भित्ति से निकले प्रवर्गों के रूप में होता है जबकि पक्षी एवं चमगादड़ में इनकी उत्पत्ति शरीर भित्ति के प्रवर्गों के रूप में नहीं होती है । अतः इनके कार्यों में तो समानता होती है, परन्तु उत्पत्ति एवं संरचना में भिन्नता होती है।
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इसी तरह मधुमक्खी के डंक एवं बिच्छू के डंक दोनों ही समान कार्य करते हैं परन्तु इनकी संरचना एवं परिवर्धन भिन्न होता है । मधुमक्खी एक कीट है, इसके बाह्य जननांग मिलकर अण्ड निक्षेपक (Ovipositor) नाल बनाते हैं। यही अण्ड निक्षेपक नाल रूपान्तरित होकर डंक बनाती है जबकि बिच्छू में शरीर का अन्तिम खण्ड रूपान्तरित होकर डंक बनाता है।

इसके अतिरिक्त समवृत्ति के उदाहरण निम्न हैं-

  • ऑक्टोपस (अष्ट भुज) तथा स्तनधारियों की आँखें (दोनों में रेटिना की स्थिति में भिन्नता है) या पेंग्विन और डॉल्फिन मछलियों के फिलपर्स ।
  • रस्कस का पर्णाभ स्तम्भ (Phylloclade) और सामान्य पर्ण।
  • आलू (तना) और शकरकंद (जड़)।

समवृत्ति अंगों में कार्य की समानता एवं विशिष्ट वातावरण की आवश्यकता के अनुरूप विकास, अभिसरण जैव विकास (Convergent Evolution) को प्रकट करता है।

(2) शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण (Evidence from Physiology and Biochemistry)-fafum. जीव शरीर क्रिया और जैव रसायन में समानता प्रदर्शित करते हैं, कुछ स्पष्ट उदाहरण निम्न हैं-

  • जीवद्रव्य (Protoplasm ) – जीवद्रव्य की संरचना और संगठन सभी जन्तुओं में (प्रोटोजोआ से स्तनधारियों तक) लगभग समान होती है।
  • एन्जाइम (Enzyme) – सभी जीवों में एन्जाइम समान कार्य करते हैं। जैसे ट्रिप्सिन ( Trypsin) । अमीबा से लेकर मानव तक प्रोटीन पाचन और एमाइलेज (Amylase) पॉरीफेरा से स्तनधारियों तक स्टार्च पाचन करता है।
  • रुधिर (Blood) – रुधिर की रचना सभी कशेरुकियों में लगभग समान होती है।
  • हार्मोन (Hormones) – सभी कशेरुकियों में समान प्रकार के हार्मोन बनते हैं, जिनकी रचना व कार्य समान होते हैं।
  • अनुवांशिक पदार्थ (Hereditary Material ) – सभी जीवों में आनुवांशिक पदार्थ DNA होता है जिसकी मूल संरचना सभी जीवों में समान होती है।
  • ए.टी.पी. ( ATP ) – सभी जीवों में जैविक ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ATP के रूप में ऊर्जा संचित होती है।
  • (vii) साइटोक्रोम – सी ( Cytochrome – C ) – यह श्वसन वर्णक है जो सभी जीवों के माइटोकॉन्ड्रिया में उपस्थित होता है। इस प्रोटीन में 78-88 तक अमीनो अम्ल एक समान होते हैं जो समपूर्वजता को प्रदर्शित करते हैं।

इस प्रकार शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सभी जीवों का विकास एक ही मूल पूर्वज (Common Ancestor) से हुआ है।

(3) संयोजक कड़ियों के प्रमाण (Evidence of Connective Links) – जीवों के वर्गीकरण में समान गुणों वाले जीवों को एक ही वर्ग में रखा गया है। कुछ जन्तु ऐसे भी हैं जिनमें दो वर्गों के गुण पाये जाते हैं। इन जन्तुओं को योजक कड़ियाँ (Connective Links) कहते हैं।

संयोजक कड़ियों के उदाहरण-
(i) आर्किओप्टेरिक्स (Archeopteryx) – जर्मनी के बवेरिया प्रदेश में आर्किओप्टेरिक्स नामक जन्तु के जीवाश्म मिले हैं। इस जन्तु के कुछ लक्षण जैसे चोंच, पंख, पैरों की आकृति, एवीज वर्ग (पक्षी वर्ग) के तो कुछ लक्षण जैसे दाँत, पूँछ तथा शरीर पर शल्कों का होना रेप्टीलिया वर्ग के हैं। अतः इस जन्तु को एवीज तथा रेप्टीलिया वर्ग के मध्य योजक कड़ी कहते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों (Reptiles) से हुआ है।
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(ii) प्लेटीपस और एकिडना (Platypus and Echidna ) – प्लेटीपस और एकिडना दोनों ही मैमेलिया वर्ग के जन्तु हैं। इनके शरीर पर बाल पाये जाते हैं तथा बच्चों को दूध पिलाने के लिए दुग्ध ग्रन्थियाँ (Mammary Glands) होती हैं जो मैमेलिया वर्ग के लक्षण हैं। ये दोनों ही जन्तु रेप्टीलिया वर्ग के जन्तुओं की भाँति कवचदार पीतकयुक्त अण्डे देते हैं। इस प्रकार प्लेटीपस और एकिडना रेप्टीलिया और मैमेलिया वर्ग के मध्य एक योजक कड़ी हैं। ये जन्तु भी सिद्ध करते हैं कि स्तनधारियों का विकास सरीसृपों ( Reptiles ) से हुआ है।

(iii) पेरीपेटस (Peripatus ) – यह एनेलिडा तथा आर्थोपोडा संघ के बीच की संयोजी कड़ी है। पेरीपेटस में एनेलिडा संघ के निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • बेलनाकार आकृति
  • देहभित्ति की आकृति व चर्म का पेशीय होना
  • क्यूटिकल द्वारा निर्मित बाह्य कंकाल अनुपस्थित एवं पार्श्व पादों के समान उभारों का उपस्थित होना।

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संघ आर्थ्रोपोडा के समान पेरीपेटस में निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • तीन खण्डों के समेकन से सिर भाग का बनना
  • ऐंटिनी (Antennae ) का होना
  • एक जोड़ी सरल नेत्रों तथा एक जोड़ी मुख पैपिली का उपस्थित होना ।

अतः पेरिपेटस को एनीलीडा तथा आर्थ्रोपोडा संघ को जोड़ने वाली संयोजी कड़ी कहते हैं। यह प्रमाणित करता है कि आर्थोपोडा का विकास एनिलिडा से हुआ है ।

(iv) फुफ्फुस मछली (Lungfish ) प्रोटोप्टेरस (Portopterus) – प्रोटोप्टेरस में कुछ लक्षण मछलियों के (जैसे क्लोम तथा शल्कों की उपस्थिति) और कुछ लक्षण उभयचरों के (जैसे फुफ्फुस की उपस्थिति) पाये जाते हैं। अत: प्रोटोप्टेरस पिसीज तथा उभयचर संघ के बीच संयोजी कड़ी है।
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उपरोक्त के अतिरिक्त निम्न संयोजी कड़ियों के उदाहरण हैं-

  • वायरस (Virus) – संजीव और निर्जीव के मध्य
  • यूग्लीना (Euglena) – पादप और जन्तु के मध्य
  • प्रोटेरोस्पॉन्जिया (Proterospongia ) – प्रोटोजोआ और पॉरीफेरा के मध्य
  • नियोपाइलीना (Neopilina) – मोलस्का और एनेलिडा के मध्य उक्त कार्बनिक विकास और समपूर्वजता के अच्छे उदाहरण प्रदर्शित करते हैं।

(4) अवशेषी अंगों के प्रमाण (Evidences from Vestigeal Organs) – अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवन भर पूर्ण विकास नहीं होता है। ये जन्तु की जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते है। अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं। ऐसे अंगों को अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) कहते हैं। मनुष्य के शरीर में लगभग 180 ऐसी रचनायें होती हैं

जिनमें सामान्य निम्न हैं-

  • कृमिरूपी – परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है, जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरहे जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं . क्रियाशील होती है।
  • कर्ण पल्लव (Earpinna ) – घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे जन्तुओं के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है ।
  • पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है किन्तु फिर भी पुच्छ कशेरुकाएँ अत्यधिक हासित दुम के रूप में अवशेषी अंग के रूप में पायी जाती हैं। इससे पता चलता है कि मनुष्य के पूर्वज में पूँछ थी ।

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  • निमेषक पटला (Nictitating Membrane)-मेढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है । इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।
  • त्वचा के बाल (Hair ) – बन्दरों, घोड़ों, सूअरों, कपियों आदि स्तनियों के शरीर पर घने बाल होते हैं। ये ताप नियन्त्रण में सहायता करते हैं। मानव में बालों का यह कार्य नहीं रहा, फिर भी शरीर पर कुछ बाल होते हैं।
  • अक्कल दाढ़ ( Wisdom Teeth) – तीसरा मोलर दन्त अन्य प्राइमेट (Primate) स्तनियों में सामान्य होता है । मानव में इसका उपयोग नहीं होता है। अतः यह देर से निकलता है और अर्ध विकसित रहता है। यह दंतरोगों के प्रति संवेदनशील होता है।

अन्य जन्तुओं में अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in other Animals)

  • अजगर (Python) के पश्च पाद और श्रोणि मेखला
  • बिना उड़ने वाले ( Flightless) पक्षियों के पंख जैसे शुतुरमुर्ग, ईमू कीवी आदि ।
  • घोड़े के पैरों की स्पिलिंट अस्थियाँ (Splint Bones ) 2 और 4 अगुंली।
  • व्हेल के पश्चपाद और श्रोणि मेखला

पादपों के अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in Plants) – रस्कस और अनेक भूमिगत तनों की शल्की पत्तियाँ ।
अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे किन्तु इनके महत्त्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

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(5) श्रोणिकी से प्रमाण (Evidences from Embryology) – श्रोणिकी तुलनात्मक भ्रोणिकी तथा प्रायोगिक श्रोणिकी से विकास के पक्ष में निर्णायक प्रमाण मिलते हैं। सभी मेटोजोअन प्राणी एक कोशिकीय युग्मनज (Zygote) से विकसित होते हैं और सभी प्राणियों के परिवर्धन की प्रारम्भिक अवस्थाओं में अत्यधिक समानता होती है।

मनुष्य सहित सभी मेटाजोअन वर्गों के प्राणियों के अण्डों के परिवर्धन के समय विदलन, ब्लास्टूला एवं गेस्टुला में वही मूलभूत समानताएँ पायी जाती हैं। प्रौढ़ जन्तुओं में जितने निकट का सम्बन्ध होता है उनके परिवर्धन में उतनी अधिक समानता देखने को मिलती है। विभिन्न वर्गों में परिवर्धन के बाद की अवस्थाएँ अपसरित हो जाती हैं व यह अपसरण एक विशाखित वृक्ष के समान होता हैं।
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इसी प्रकार विभिन्न कशेरुकियों के भ्रूणों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उच्च वर्ग के जन्तुओं के भ्रूण निम्न वर्गों के प्रौढ़ जन्तुओं के समान होते हैं, जैसे मेढ़क का टेडपोल लारवा मछली के समान होता है। इसी आधार पर हेकल ने पुनरावर्तन का सिद्धान्त (Recapitulation Theory ) प्रतिपादित किया।

इसके अनुसार प्रत्येक जीव भ्रूणीय परिवर्धन में अपनी जाति के जातीय विकास की कथा को दोहराता है। पुनरावर्तन सिद्धान्त के आधार पर निषेचित अण्डे की तुलना समस्त जन्तुओं के एककोशिकीय पूर्वज से ब्लास्टुला की प्रोटोजोआ मण्डल या कॉलोनी से की जा सकती है। मेढ़क के ही नहीं वरन् रेप्टाइल, पक्षी और यहाँ तक कि मनुष्य के भ्रूण में भी क्लोम दरारें, क्लोम, नोटोकॉर्ड, युग्मित आयोटिक चॉपें, प्रोनेफ्रोस, पुच्छ तथा पेशियाँ आदि मछली के समान होती हैं और आरम्भ में सभी का हृदय मछली के समान द्विकक्षीय होता है।

इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारम्भ मे समस्त वर्टिब्रेट्स का विकास मछली के समान पूर्वजों से हुआ है। मनुष्य के भ्रूणीय परिवर्धन में देखा गया है कि उसका भ्रूण प्रारम्भ में मछली से, बाद में एम्फिबियन से और फिर रेप्टाइल से मिलता-जुलता होता है और सातवें मास में यह शिशु कपि से मिलता- जुलता होता है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव अपने भ्रूण परिवर्धन में उन समस्त अवस्थाओं से गुजरता है जिनसे कभी उसके पूर्वज धीरे-धीरे विकसित होकर बने होंगे।

(6) जीवाश्मीय प्रमाण (Palaeontological Evidences) – वैज्ञानिक चार्ल्स लायल के अनुसार पूर्व जीवों के चट्टानों से प्राप्त अवशेष जीवाश्म ( Fossils) कहलाते हैं। जीवाश्म का अध्ययन पेलियो-ओन्टोलॉजी (Palacontology) कहलाता है। जीवाश्म कार्बनिक विकास के पक्ष में सर्वाधिक मान्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि जीवाश्म द्वारा जीवों के सम्पूर्ण विकासीय इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है।

जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के सम्बन्ध में निम्न तथ्य प्रमाणित हुए-

  • जीवाश्म जो कि पुरानी चट्टानों से प्राप्त हुए सरल प्रकार के तथा जो नई चट्टानों से प्राप्त हुए जटिल प्रकार के थे।
  • विकास के प्रारम्भ में एक कोशिकी प्रोटोजोआ जन्तु बने जिनसे बहुकोशिकी जन्तुओं का विकास हुआ।
  • कुछ जीवाश्म विभिन्न वर्ग के जीवों के बीच की संयोजक कड़ियाँ (Connecting-links) को प्रदर्शित करती हैं।
  • पौधों में एन्जिओस्पर्म (Angiosperm) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (mammals) सबसे अधिक विकसित और आधुनिक हैं।
  • जीवाश्म के अध्ययन से किसी भी जन्तु को जीवाश्म कथा ( विकासीय इतिहास) या वंशावली का क्रमवार अध्ययन किया जा सकता है।

घोड़े की वंशावली ( जीवाश्मीय इतिहास ) [Evolution (Pedigree) of Horse] वैज्ञानिक सी. मार्श (C. Marsh) के अनुसार घोड़े का प्रारम्भिक जीवाश्म उत्तरी अमेरिका में पाया गया जिसका नाम इओहिप्पस (Eohippus) था। इसका विकास इओसीन काल में हुआ। इओहिप्पस लोमड़ी के समान तथा लगभग एक फुट ऊँचे थे। इनके अग्रपादों में चार तथा पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं ।
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ओलिगोसीन काल में इन पूर्वजों से भेड़ के आकार के मीसोहिप्पस (Mesohippus) घोड़ों का विकास हुआ। इनके अग्र व पश्च पादों में केवल तीन-तीन अंगुलियाँ थीं। बीच की अंगुलियाँ इधर- उधर की दोनों अंगुलियों से बड़ी थीं और शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं पर रहता था। इनसे मायोसीन काल के मेरीचिप्पस (Merychippus) घोड़ों का विकास हुआ।

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ये टट्ट के आकार के थे। इनके अग्र व पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं जिनमें से बीच वाली सबसे लम्बी थी और केवल यही भूमि तक पहुँचती थी । प्लायोसीन काल में प्लीओहिप्पस (Pliohippus) घोड़ों का विकास हुआ। ये आकार में टट्ट से ऊँचे थे। इनके अग्र व पश्चपादों में केवल एक-एक अंगुली विकसित थी और इधर-उधर की अंगुलियाँ अत्यधिक हासित होकर स्प्लिट अस्थियों

(Splint Bones) के रूप में त्वचा में दबी हुई थीं। केवल एक ही अंगुली की उपस्थिति के कारण ये तेजी से दौड़ सकते थे । प्लीस्टोसीन युग में इन्हीं घोड़ों से आधुनिक घोड़े इक्वस (Equus) का विकास हुआ। इक्वस की ऊँचाई लगभग 5 फीट है और यह उसी रूप में आज भी चला आ रहा है।

(7) जीवों के घरेलू पालन ( Domestication) से प्रमाण- मनुष्य अपने लिए उपयोगी जन्तुओं (घोड़े, गाय, कुत्ता, बकरी, भेड़, भैंस, कबूतर, मुर्गा आदि) तथा खेतिहर वनस्पतियों (गोभी, आलू, कपास, गेहूँ, चावल, मक्का, गुलाब आदि) की इनके जंगली पूर्वजों से नस्लें सुधार कर उत्पत्ति की है।

यद्यपि नस्लें सुधार कर नयी जातियों की उत्पत्ति वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं, फिर भी इस प्रक्रिया में बदले हुए लक्षण विकसीय ही माने जायेंगे हजारों-लाखों वर्षों का समय मिले तो सम्भवतः मानव इस विधि से नयी जीव जातियों की उत्पत्ति कर लेगा। अतः इतने पुराने इतिहास की प्रकृति में अनुमानत: इसी प्रकार नस्लों में सुधार के फलस्वरूप नयी-नयी जातियों की उत्पत्ति हुई होगी।

(8) रक्षात्मक समरूपता (Protective Resemblance) से प्रमाण – इंगलिस्तान (Britain) के औद्योगिक नगरों के आस-पास के पेड़ चिमनियों के धुएँ से काले पड़ जाते हैं। इन क्षेत्रों के कीटों, विशेष तौर से पतंगों (moths) की विभिन्न जातियों में, गत सदी में, औद्योगिक साँवलेपन (Industrial melanism) का रोग हो गया।

उदाहरणार्थ, पंतगों की बिस्टन बिटूलैरिया (Biston betularia) नामक जाति में शरीर व पंख हल्के रंग के काले धब्बेदार होते थे । सन् 1884 में इनकी आबादी में पहली बार एक बिल्कुल काला पतंगा देखा गया। यह परिवर्तन रंग के जीन में अचानक जीन – उत्परिवर्तन (gene- mutation) के कारण हुआ। बाद में काले पतंगों की संख्या बढ़ते-बढ़ते 90% हो गयी। यह एक विकासीय परिवर्तन था ।

इससे पतंगों का रंग पेड़ों के रंग से मिलता-जुलता हो गया ताकि ये शत्रुओं (पक्षियों) और शिकार की निगाहों से बच सकें । जीन – उत्परिवर्तन के कारण वातावरण से रक्षात्मक समरूपता के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं। इसे सादृश्यता (Mimicry) कहते हैं।

ऐसी तितलियाँ होती हैं जो उन्हीं सूखी पत्तियों जैसी दिखायी देती हैं जिन पर ये आराम के समय बैठती हैं शाखाओं से मिलती-जुलती आकृति की कई कीट जातियाँ पायी जाती हैं। ये सब दृष्टान्त ‘जैव – विकास’ को प्रमाणित करते हैं । इंगलिस्तान के पतंगों के सम्बन्ध में तो यहाँ तक कहा – गया है कि इनमें “वैज्ञानिकों ने विकास प्रक्रिया को होते हुए स्वयं देखा है।”
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प्रश्न 4.
समजातता और समवृत्तता का अन्तर बताइये समजात और अवशेषी अंगों को उदाहारण सहित समझाइये। इन सबसे किस प्रकार जैव विकास प्रमाणित होता है?
उत्तर:
समजातता और समवृत्तता में अन्तर- समजात अंग (Homologous Organs) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हों समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं। इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फिल्पर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं, जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं। इन अंगों की समजातता यह सिद्ध करती है कि इन सभी जन्तुओं के पूर्वज समान रहे होंगे तथा कालान्तर में इनका क्रमिक विकास हुआ हुआ है।

अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवनभर पूर्ण विकास नहीं होता है ये जन्तु जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते हैं अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं ऐसे अंगों को अवशेषी अंग कहते हैं। मनुष्य के शरीर में अनेक रचनाएँ होती हैं जो निम्न हैं-

1. कृमिरूपी परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरगोश जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं क्रियाशील होती है।

2. कर्ण पल्लव (Ear Pinna ) घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे प्राणियों के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है।

3. पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है। फिर भी कशेरुकदण्ड के अन्त में 3 से 5 तक (प्राय: अर्धविकसित) पुच्छ कशेरुकाएँ होती हैं। भ्रूणीय परिवर्धन पूरा होते-होते, ये समेकित (Fused) होकर हड्डी का एक ही टुकड़ा, कोक्सिस (Coccyx ) बना लेती हैं।

4. निमेषक पटल (Nictitating Membrane) – मेंढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है। इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।

5. शरीर पर बाल (Hair on the Body ) – गाय, घोड़े, गधे, बन्दर आदि का पूर्ण शरीर वालों से ढका रहता है, जो शरीर के ताप आदि के नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण सहायता देते हैं। मनुष्य अपने शरीर को तापक्रम के अनुकूल कपड़ों से ढक लेता है, अर्थात् बालों की आवश्यकता नहीं होती है, अतः ये बहुत सूक्ष्म होते हैं।

अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे। किन्तु इनके महत्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

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प्रश्न 5.
डार्विनिज्म पर एक निबंध लिखिये।
अथवा
डार्विनवाद क्या है? सविस्तार वर्णन कीजिए।
अथवा
प्राकृतिक वरण ( चयन) के सिद्धान्त के क्रियान्वयन के पदक्रमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी पर जीवों के क्रमिक परिवर्तन से नई जाति का बनना जैव विकास कहलाता है। यह आज सर्वमान्य है परन्तु जैव विकास की क्रियाविधि क्या रही है? इस समस्या के समाधान हेतु 19 वीं शताब्दी के आरम्भ में ही लेमार्क (Lamarck) द्वारा, बाद में डार्विन (Darwin) एवं ह्यूगो डी व्रिज (Hugo de Vries) द्वारा प्रयास किया गया।

(1) लामार्कवाद (Lamarckism)-फ्रांस के वैज्ञानिक जीन बेपटिस्ट डी लामार्क (1744-1829) ने अपनी संकल्पना प्रस्तुत की जिसे लामार्कवाद कहते हैं। इन्होंने उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।
लामार्कवाद की मुख्य चार अवधारणायें निम्न हैं-
(i) आंतरिक जैव बल (Internal vital force)-लामार्क के अनुसार सभी जीवों में कुछ आन्तरिक जैव बल उपस्थित हैं, इन बलों के कारण ही जीवों में अपने अंगों तथा पूर्ण शरीर के आकार में वृद्धि करने की प्रवृत्ति बनी रहती है।

(ii) वातावरण का प्रभाव और नई आवश्यकताएँ (Effect of environment and new needs)-वातावरण सभी प्रकार के जीवों को प्रभावित करता है। परिवर्तित वातावरण ही जीवों में नई आवश्यकताओं को उत्पन्न करता है। इन नई आवश्यकताओं के कारण जीव नई संरचनाओं को उत्पन्न करते हैं जिससे उनके स्वभाव और संरचनाओं में परिवर्तन आ जाते हैं।

(iii) अंगों का उपयोग तथा अनुपयोग (Use and disuse of organs)-यदि अंग लगातार उपयोग में आता है तो यह अधिक विकसित और शक्तिशाली हो जाता है तथा अनुपयोगी अंग धीरे-धीरे अपह्गासित होने लगते हैं।

(iv) उपार्जित लक्षणों की वंशागति (Inheritance of acquired character)-इस प्रकार जीव के जीवन काल में आंतरिक जैव बलों, वातावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव, नई आवश्यकता और अंगों के उपयोग तथा अनुपयोग के द्वारा नए लक्षणों का विकास हो जाता है। इन लक्षणों को उपार्जित लक्षण कहते हैं।

ये लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी से वंशागत होते हैं, कई पीढ़ियों तक इन लक्षणों की वंशागति से एक नई जाति का विकास हो जाता है जो अपने पूर्वज से भिन्न होती है उदाहरण-जिराफ, अफ्रीका में पाया जाने वाला जन्तु है। इसके पूर्वजों की आकृति काफी छोटी थी और उस समय उनके निवास स्थान में घास-फूस अधिक थी अतः पूर्वज घास पर निर्वाह करते थे।

धीरे-धीरे वातावरण में परिवर्तन हुआ जिसके कारण यह क्षेत्र रेगिस्तान बनने लगा। अतः जिराफ को भोजन के लिए ऊँचे पेड़-पौधों की पत्तियों पर निर्भर होना पड़ा। पेड़ों की पत्तियों तक पहुँचने के लिए छोटे जन्तु को अपनी गर्दन लगातार ऊपर करनी पड़ती तथा अग्र टाँगों द्वारा कूदकर पत्तियों तक पहुँचना पड़ता।

लामार्क ने बताया कि जिराफ की अगली टाँगों तथा गर्दन का अधिक उपयोग होने से ये अंग लम्बे होते गये। इन लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरण हुआ। जिराफ के अंगों का लम्बा होना उपार्जित लक्षण तथा इसका हस्तानान्तरण वंशागति कहलाते हैं जिसके फलस्वरूप आधुनिक जिराफ का विकास हुआ।
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(2) माल्थस (Malthus, 1838), चार्ल्स लाइल (Charles Lyell)- हरबर्ट स्पेन्सर (Herbert Spencer), वैलेस (Wallace 1823-1913) आदि के विचारों से प्रभावित होकर वैज्ञानिक वैलेस के साथ सन् 1858 में चार्स्स डार्विन ने जीवों में जीवन के लिए संघर्ष तथा प्रकृति द्वारा योग्य जातियों के चयन के विचार संयुक्त रूप से छपवाये। सन् 1959 में अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘प्राकृतिक वरण द्वारा जातियों की उत्पत्ति’ (Origin of Species by Natural Selection) का प्रकाशन कर प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त के रूप में किया। इसे ही आज डार्विनवाद कहा जाता है।

प्राकृतिक वरणवाद के मुख्य बिन्दु निम्न हैं-
(1) अत्यधिक प्रजनन (Over Production)-सभी जीव जातियों में संतानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता होती हैं और जीव गुणात्मक रूप में अपनी जाति की संख्या में वृद्धि करते हैं। जैसे-

  • पादप हजारों की संख्या में बीज पैदा करते हैं।
  • कीट सैकड़ों अण्डे एक बार में देते हैं।
  • एक जोड़ा हाथी सम्पूर्ण जीवन में लगभग 6 संतान पैदा करता है।

यदि सभी संतानें जीवित रहें और इसी प्रकार प्रजनन करें तो लगभग 750 वर्ष में एक जोड़े हाथी से 19 मिलियन हाथी पैदा हो जायेंगे। कुछ जीव अधिक संतान पैदा करते हैं, जबकि कुछ जीव कम संख्या में संतानोत्पत्ति करते हैं, इसे विभेदात्मक जनन कहते हैं।

(2) उत्तरजीविता के लिए संघर्ष (Struggle of Existence)- प्रत्येक जीव अपनी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे स्थान, आवास और भोजन आदि के लिए अपनी ही जाति अथवा अन्य जाति के सदस्यों के साथ प्रतियोर्गिता करते हैं। इसे उत्तरजीविता के लिए संघर्ष कहते हैं। यह संघर्ष जीव के सम्पूर्ण जीवन में जारी रहता है, युग्मनज (Zygote) बनने से लेकर प्राकृतिक मृत्यु तक।

उत्तरजीविता के लिए संघर्ष तीन प्रकार से होता है-

  • सजातीय संघर्ष (Intraspecific Struggle)-यह संघर्ष एक ही जाति के सदस्यों के बीच उनकी समान आवश्यकताओं के लिए होता है जैसे भोजन, आवास और जनन (यह सबसे तीव्रतम संघर्ष होता है)।
  • अन्तरजातीय संधर्ष (Interspecific Struggle)-यह
    भिन्न जाति के सदस्यों के बीच होता है। भोजन तथा आवास के लिए।
  • वातावरणीय संघर्ष (Environmental Struggle)-यह जीवों के उनके वातावरण की भिन्न परिस्थितियों के बीच होने वाले संघर्ष हैं, जैसे-जीव वर्षा, बाढ़-सूखा, भूकम्प, सर्दी-गर्मी आदि से सुरक्षित रहने के लिए संघर्ष करते हैं।

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(3) विभिन्नताएँ एवं वंशागति (Variations \& Heredity)-केवल समान जुड़वाँ संतानों (Identical Twins) को छोड़कर कोई भी दो जीव तथा उनकी आवश्यकताएँ समान नहीं होतीं। इसका अर्थ है जीवों के मध्य अन्तर होते हैं, यही अन्तर विभिन्नताएँ कहलाती हैं। इन्हीं विभिन्नताओं के कारण कुछ जीव दूसरों की अपेक्षा अपने वातावरण के प्रति अधिक अनुकूलित होते हैं।

डार्विन के अनुसार विभिन्नताएँ सतत होती हैं और ऐसी विभिन्नताएँ जो जीव को अपने वातावरण के प्रति अनुकूल बनाने या अनुकूलन स्थापित करने में सहायक होती हैं, अगली पीढ़ी में वंशागत हो जाती हैं जबकि अन्य विलुप्त हो जाती हैं।

(4) योग्यतम की उत्तरजीविता या प्राकृतिक वरण (Survival of Fittest or Natural Selection)-डार्विन के अनुसार उत्तरजीविता के लिए संघर्ष में केवल अधिक सफलतापूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले सदस्य ही योग्यतम सिद्ध होते हैं। संघर्ष में जो भी अधिक सक्षम होते हैं वही विजयी होकर योग्यतम सिद्ध होते हैं।

योग्यतम प्राणी ही अपने विशिष्ट लक्षणों के कारण लैंगिक प्रजनन के लिए संगम साथी (Mating Partner) को पाने में सफल होते हैं। इसे लैंगिक वरण (Sexual Selection) कहते हैं। उत्तरजीविता के लिए संघर्ष में केवल वही जीव जीवित रहते हैं जो लाभदायक विभिन्नताएँ रखते हैं अर्थात् प्रकृति केवल योग्यतम जीवों का ही चयन करती है, इसे प्राकृतिक वरण (Natural Selection) कहते हैं अर्थात् योग्यता अनुकूलन क्षमता का अन्तिम परिणाम होती है और प्रकृति द्वारा चयनित हो जाती है।

(5) नई जाति की उत्पत्ति (Origin of New Species)डार्विन ने स्पष्ट किया कि ऐसी विभिन्नताएँ जो वातावरणीय परिवर्तनों के कारण उत्पन्न होती हैं अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित हो जाती हैं जिससे नई संतान अपने पूर्वजों से भिन्नता प्रदर्शित करती है। अगली पीढ़ी में प्राकृतिक वरण का यही प्रक्रम पुनः दोहराया जाता है और कई पीढ़ियों के बाद अतंतः एक नई जाति का निर्माण हो जाता है।

प्राकृ तिक वरण के उदाहरण (Examples of Natural Selection)-
(i) औद्योगिक अतिकृष्णता (Industrial Melanism)-इस घटना का अध्ययन बेनार्ड केटलवेल द्वारा किया गया। औद्योगिक क्रान्ति के पहले श्लभ (मोथ विस्टन बेटेलेरिया) का स्लेटी रूप प्रभावी था, कारबोनेरिया रूप काला कम ही मिलता था क्योंकि यह पक्षी द्वारा परभक्षण के प्रति अनुकूलित (Susceptible) था। यह तभी दिखाई देता था जब पेड़ के तने पर विश्राम अवस्था में होता था।

औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप अत्यधिक मात्रा में धुआँ (Somke) होता है जो पेड़ के तने पर जमा होता जाता है और उसे काला कर देता है। अब ग्रे रूप (स्लेटी) अनुकूलित (Susceptible) हो जाता है और काला रूप पनप जाता है। कोयले का तेल और बिजली द्वारा प्रतिस्थापित काले रूप के उत्पादन को कम करता है जिससे स्लेटी मॉथथ की आकृति पुन: बढ़ जाती है।

(ii) औषधि प्रतिरोधिता (Drug Resistance)-औषधियाँ जो रोगजनक (Pathogens) को नष्ट करती हैं समय के साथ अप्रभावी होती जा रही हैं क्योंकि रोगजनक जाति के सदस्य इनको झेल लेते हैं और जीवित रहते हैं, पनपते हैं और प्रतिरोधी समष्टि का उत्पादन करते हैं।

प्रश्न 6.
‘जीवन की उत्पत्ति’ में केवल रासायनिक विकास ही हुआ। विस्तारपूर्वक लिखिये ।
उत्तर:
रासायनिक विकास का सिद्धान्त यह सिद्धान्त रूसी वैज्ञानिक ओपेरिन और हेल्डेन ने दिया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति रसायनों के संयोग से हुई, जिसे निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझाया गया-
(i) परमाणु अवस्था – पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व हुई। ऐसे तत्व जो जीवद्रव्य बनाने में प्रमुख रूप से भाग लेते हैं केवल परमाण्वीय अवस्था में पाये जाते थे। केवल हल्के तत्वों ने मिलकर पृथ्वी का आद्य वातावरण निर्मित किया जैसे कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन। इनमें सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन उपस्थित थी ।

(ii) आण्विक अवस्था (अणुओं और सरल अकार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति) – पृथ्वी के ताप में कमी होने के साथ हल्के स्वतन्त्र परमाणुओं के संयोग से अणु और सरल अकार्बनिक यौगिक बनने लगे। अति उच्च ताप के कारण सक्रिय हाइड्रोजन परमाणुओं ने सम्पूर्ण ऑक्सीजन से संयोग कर जल बनाया और वातावरण में मुक्त O2 नहीं रही।

आरम्भिक जीव- कोशिका का निर्माण इसलिए आद्य वातावरण अपचायी (Reducing ) था जबकि वर्तमान वातावरण स्वतन्त्र ऑक्सीजन की उपस्थिति के कारण उपचाय (Oxidising ) है। हाइड्रोजन परमाणुओं ने नाइट्रोजन से संयोग कर अमोनिया का निर्माण किया । जल तथा अमोनिया संभवतः प्रथम अकार्बनिक यौगिक थे । इन हल्के तत्वों में क्रियाओं द्वारा CO2, CO, N2, H2 आदि का भी निर्माण हो गया।

(iii) प्रारम्भिक कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति – वातावरण में उपस्थित नाइट्रोजन और कार्बन के धात्विक परमाणुओं के साथ संयोग से नाइट्राइड और कार्बाइड का निर्माण हुआ। जलवाष्प और धात्विक कार्बाइड की क्रिया द्वारा प्रथम कार्बनिक यौगिक मेथेन (CH4) का निर्माण हुआ। इसके बाद (HCN) हाइड्रोजन सायनाइड बना।

उस समय जो जल पृथ्वी पर बनता वह उच्च ताप के कारण वाष्पीकृत होकर बादल बन जाते तथा जलवाष्प वर्षा बूँदों के रूप में पुनः भूमि पर आ जाती जिससे लम्बे समय तक इस प्रक्रम के चलते रहने से पृथ्वी का ताप कम होने लगा और इस पर समुद्र बनने लगे ।

(iv) सरल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति- आदि सागर में जल में बड़ी मात्रा में मेथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन, सायनाइड्स, कार्बाइड और नाइट्राइड उपस्थित थे। इन प्रारम्भिक यौगिकों में संयोगों द्वारा सरल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हुआ, जैसे- अमीनो अम्ल, ग्सिलरॉल, वसा अम्ल, प्यूरीन, पिरामिडिन आदि।

क्रियाओं के लिए ऊर्जा सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों और ज्वालामुखी आदि से प्राप्त हुई। लेडरबर्ग ने प्रतिकृति प्लेटिंग प्रयोग द्वारा जीवाणुओं को उनके वातावरण के प्रति अनुकूलता की आनुवंशिकता का प्रदर्शन किया।

प्रश्न 18.
जीवन की उत्पत्ति के सम्बंध में ऑपेरिन मत पर निबंध लिखिए ।
उत्तर:
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में हमें ‘बिग बैंग’ नामक महाविस्फोट का सिद्धान्त यह कहता है कि एक महा विस्फोट के फलस्वरूप ब्रह्माण्ड का विस्तार हुआ और तापमान में कमी आई। कुछ समय बाद हाइड्रोजन एवं हीलियम गैसें बनीं। ये गैसें गुरुत्वाकर्षण के कारण संघनीभूत हुईं और वर्तमान ब्रह्माण्ड की आकाश गंगाओं का गठन हुआ।

आकाश गंगा के सौर मण्डल में पृथ्वी की रचना 4.5 बिलियन वर्ष (450 करोड़) पूर्व मानी जाती है। प्रारम्भिक अवस्था में पृथ्वी पर वायुमण्डल नहीं था। जल, वाष्य, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अमोनिया आदि धरातल को ढकने वाले गलित पदार्थों से निर्मुक्त हुई। सूर्य से आने वाली पराबैंगनी (अल्ट्रावायलेट) किरणों ने पानी को (H2) तथा (O2) में विखण्डित कर दिया तथा हल्की (H2) मुक्त हो गई।

ऑक्सीजन ने अमोनिया (NH2) एवं मीथेन (CH2) के साथ मिलकर पानी, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) तथा अन्य गैसों आदि की रचना की। पृथ्वी के चारों तरफ ओजोन परत का गठन हुआ। जब यह ठण्डा हुआ, तो जल-वाष्प बरसात के रूप में बरसी और गहरे स्थान भर गए, जिससे महासागरों की रचना हुई। पृथ्वी की उत्पत्ति के लगभग 50 करोड़ वर्ष बाद अर्थात् 400 करोड़ वर्ष पहले जीवन प्रकट हुआ। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिकों एवं दार्शनिकों ने समय-समय पर अपनी-अपनी परिकल्पनाएँ प्रस्तुत कीं। इनमें प्रमुख परिकल्पनाएँ निम्न हैं-

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1. विशिष्ट सृष्टि का सिद्धान्त (Theory of Special Creation)-यह सिद्धान्त धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक फादर सुआरेझ (Father Suarez) थे, बाइबिल के अनुसार जीवन तथा सभी वस्तुओं की रचना भगवान द्वारा 6 दिनों में की गई।

प्रथम दिनस्वर्ग तथा नरक
द्वितीय दिनआकाश तथा जल
तीसरे दिनसूखी धरती और वनस्पति
चौथे दिनसूर्य, चन्द्रमा और तारे
पाँचवें दिनमछलियाँ और पक्षी
छठे दिनस्थलीय जन्तु और मनुष्य बने।

प्रथम मनुष्य (Adam) आदम बना और इसकी बारहवीं पसली से (Five) हौवा प्रथम नारी बनी। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विश्व और सृष्टि की रचना ब्रह्मा द्वारा की गई। (प्रथम मानव मनु और प्रथम नारी श्रद्धा थे ) । इसके अनुसार जीवन अपरिवर्तनशील है तथा उत्पत्ति के बाद उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। विशिष्ट सृष्टिवाद का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होने के कारण इसे स्वीकार नहीं किया गया।

2. स्वतः जनन का सिद्धान्त (अजीवात जीवोत्पत्ति) (Theory of Spontaneous Generation Abiogenesis or Autogenesis)-इस परिकल्पना का प्रतिपादन पुराने यूनानी दार्शानिक जैसे थेल्स, एनेक्सिमेन्डर, जेनोफेन्स, प्लेटो, एम्पीडोकल्स, अरस्तू द्वारा किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से अपने आप अचानक हुई।

इनका विश्वास था कि नील नदी के कीचड़ पर प्रकाश की किरणें गिरने पर उससे मेंढ़क, सर्प, मगरमच्छ आदि उत्पन्न हो गये। अजैविक उत्पत्ति का प्रायोगिक समर्थन वाल हेल्मोन्ट (Val Helmont 1642) द्वारा किया गया। इनके द्वारा अन्धेरे स्थल पर गेहूँ के चौकर (Barn) में पसीने से भीगी गन्दी कमीज (Shirt) को रखने पर 21 दिन में चूहों की उत्पत्ति को स्वतः जनन के द्वारा होना बताया।

3. ब्रह्माण्डवाद का सिद्धान्त (Cosmologic Theory)-यह सिद्धान्त रिचर (Richter) द्वारा प्रतिपादित किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन पृथ्वी पर सर्वप्रथम किसी अन्य ग्रह या नक्षत्र से जीवद्रव्य (Protoplasm), बीजाणु (Spores) या अन्य कणों के रूप में कॉस्मिक धूल के साथ पहुँचा जिसने जीवन के विभिन्न रूपों को जन्म दिया।

4. कॉस्मिक पेनस्पर्मिया सिद्धान्त (Cosmic Panspermia Theory)-यह सिद्धान्त आरीनियस (Arrhenius) द्वारा प्रतिपाद्ति किया गया। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवों के बीजाणु (Spores) ब्रह्माण्ड में एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर स्वतन्त्र रूप से आ जा सकते हैं। इन्होंने ही पृध्व्वी पर पहुँचकर जीवन के विभिन्न रूपों को जन्म दिया।

5. जीवन की अनन्तकालता का सिद्धान्त (Theory of Eternity of Life)-हेल्महॉट्ज (Helmhotz) ने जीवन की अनन्तकालिता (Eternity of Life) में विश्वास किया। इनके अनुसार जीवन की उत्पत्ति या सृष्टि का प्रश्न उठता ही नहीं, क्योंकि ‘जीवन अमर है; ब्रह्माप्ड की उत्पत्ति के समय ही अजीव और सजीव पदार्थों की एक साथ उत्पत्ति हुई ।

6. जीवात् जीवोत्पत्ति का सिद्धान्त (Theory of Biogenesis)-यह सिद्धान्त हार्वे (Harvey, 1951) और हक्सले (T.H. Huxley, 1870) नामक वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपाद्त किया। इनके अनुसार पृथ्वी पर नये जीवन की उत्पत्ति या निर्माण पूर्व जीवों से होता है न कि निर्जीव पदार्थों से।

यह सिद्धान्त स्वतः जनन (Spontaneous Generation) का तो खण्डन करता है किन्तु पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है। जीवात् जीवोत्पत्ति का प्रायोगिक सत्यापन और स्वतः जनन का प्रायोगिक खण्डन करने के लिए प्रमुख वैज्ञानिकों द्वारा किये गये प्रयोग अग्र हैं।

7. फ्रांसेस्को रेडी (Francesco Redi, 1668-इटालियन ) का प्रयोग-इन्होंने मरे हुए सांपों, मछलियों और माँस के टुकड़ों को जारों में रखकर कुछ जार खुुले छोड़े तथा कुछ को सील किया या जालीदार कपड़े में बंद किया। देखिए सामने। खुले जारों में मक्खियों ने माँस पर अण्डे दिये जिनसे डिम्भक (Larvae of maggots) निकले बंद जारों में मक्खियाँ नहीं घुस पायीं।

अतः इनके माँस में डिम्भक (Larvae or maggots) नहीं दिखाई दिये। इस प्रयोग द्वारा सिद्ध होता है कि डिम्भक का विकास मक्खियों द्वारा दिये गये अण्डों से हुआ जबकि बंद जार में मक्खियों के नहीं घुस पाने के कारण उनमें किसी प्रकार के डिम्भक (Larvae) का विकास नहीं हुआ। अतः जीव का जन्म पहले से उपस्थित जीव द्वारा संभव है न कि स्वतः जनन द्वारा।
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8. लैजेरो स्पैलैन्जनी (Lazzaro Spallanzani 1767 इटालियन) का प्रयोग-इन्होंने बंद फ्लास्कों में सब्जियों और माँस को उबालकर जीवाणु रहित (Sterilized) पोषक शोरबा (Broth) तैयार किया। खुले या ढीले कार्क से बन्द्र जारों में रखने पर इस शोरबे में अनेक जीवाणु पनप जाते थे, परन्तु सीलबन्द करके रखने पर इसमें जीवाणु उत्पन्न नहीं होते थे।

नीधम (Needham) ने इस प्रयोग के विरोध में कहा कि अधिक उबालने से यह शोरबा जीवों के स्वतः उत्पादन के योग्य नहीं रहा। इस पर स्पैलैन्जनी (Spallanzani) ने सीलबंद फ्लास्कों की नलियों को तोड़ दिया। कुछ दिन बाद हवा के भीतर पहुँचने के कारण, इन जारों के शोरबे में भी जीवाणु हो गये। इससे सिद्ध हुआ कि सूक्ष्म जीवाणु भी स्वतः उत्पादन द्वारा नहीं, वरन् हवा में उपस्थित जीवाणु से ही बनते हैं।

9. लुईस पाश्चर (Louis Pasteur, 1860-1862-फ्रांसीसी) का प्रयोग-लुईस पाश्चर ने रोगों का रोगाणु सिद्धान्त (Germ Theory of Diseases or Germ Theory) प्रतिपादित के साथ अजैव उत्पत्ति को गलत सिद्ध किया।
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इन्होंने शक्कर और यीस्ट (Yeast) का घोल उबाल कर उसे जीवाणु रहित कर दिया। अब इस घोल को दो प्रकार के फ्लास्क में रखा एक जार (फ्लास्क) की गर्दन को गरम करके खींच कर ‘S’ आकार (हंस की गर्दन के समान) का बना दिया तथा दूसरे की गर्दन को तोड़ दिया देखिए सामने ‘S’ आकृति की गर्दन वाले फ्लास्क में कोई जीवाणु दिखाई नहीं दिये क्योंकि मुड़ी गर्दन पर धूल कण और सूक्ष्म जीव चिपक गए और विलयन तक नहीं पहुँच सके।

जबकि टूटी ग्रीवा वाले फ्लांस्क में वायु और सूक्ष्म जीव आसानी से पहुँच जाने के कारण उसमें सूक्ष्म जीवों की कॉलोनी का विकास हो गया। लुईस पाश्चर के प्रयोगों से अजीवात् जीवोत्पत्ति की धारणा समाप्त हो गई और सजीवों से ही जीवन की उत्पत्ति सिद्ध हो गई।

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10. ओपेरिन-हेल्डेन सिद्धान्त (Oparin-Haldane Theory of Origin of Life)-वैज्ञानिक ए.आई. ओपेरियन और जे.बी.एस. हेल्डेन (इंग्लैण्ड में जन्मे भारतीय वैज्ञानिक) ने प्रकृतिवाद् या रासायनिक विकास का सिद्धान्त (Naturalistic Theory or Theory of Chemical Evolution) प्रतिपादित किया। यह सिद्धान्त जीवन की उत्पत्ति का आधुनिक सिद्धान्त (Modern Theory of Origin of Life) है। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवन की उत्पत्ति रसायनों के संयोग से हुई जिसे निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझाया गया है-
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास 35

(i) परमाणु अवस्था (The Atomic Stage)-पृथ्व्वी की उत्पत्ति लगभग 4-6 अरब वर्ष पूर्व हुई। ऐसे तत्व जो जीवद्रव्य बनाने में प्रमुख रूप से भाग लेते हैं केवल परमाण्वीय अवस्था में पाये जाते थे। केवल हल्के तत्वों ने मिलकर पृथ्वी का आद्य वातावरण निर्मित किया जैसे कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन। इनमें सर्वाधिक मात्रा में हाइड्रोजन उपस्थित थी।

(ii) आण्विक अवस्था (अणुओं और सरल अकार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति) Molecular Stage (Origin of Molecules and Simple Inorganic Compounds)-पृथ्वी के ताप में कमी होने के साथ हल्के स्वतन्त्र परमाणुओं में संयोग से अणु और सरल अकार्बनिक यौगिक बनने लगे। अति उच्च ताप के कारण सक्रिय हाइड्रोजन परमाणुओं ने सम्मूर्ण ऑक्सीजन से संबोग कर जल बनाया और वातावरण में मुक्त ऑक्सीजन नहीं रही।

इसलिए आद्य वातावरण अपचायी (Reducing) था जबकि वर्तमान वातावरण स्वतन्त्र ऑक्सीजन की उपस्थिति के कारण उपचायी (Oxidising) है। हाइड्रोजन परमाणुओं ने नाइट्रोजन से संयोग कर अमोनिया (NH3) का निम्माण किया। जल तथा अमोनिया सम्भवतः प्रथम अकार्घनिक (Inorganic) यौगिक थे। इन हल्के तत्वों में क्रियाओं द्वारा CO2,CO N2,H2 आदि का भी निर्माण हो गया।

(iii) प्रारम्भिक कार्बनिक याँगिकों की उत्पत्ति (Origin of Early Organic Compounds)-वातावरण में उपस्थित नाइट्रोजन और कार्बन के धात्चिक परमाणुओं के साथ संयोग से नाइट्राइड और कार्बाइड का निर्माण हुआ। जल वाष्प और धात्चिक कार्बाइड के क्रिया द्वारा प्रथम काबंनिक यौगिक मेथेन CH4 का निर्माण हुआ। इसके बाद HCN हाइड्रोजन सायनाइड बना।

उस समय जो जल पृथ्वी पर बनता उच्च ताप के कारण वाष्पीकृत हो जाता जिससे बादल बन जाते तथा जलवाष्प वर्षा बंदों के रूप में पुनः भूमि पर आ जाती जिससे लम्बे समय तक इस प्रक्रम के चलते रहने से पृथ्वी का ताप कम होने लगा और इस पर समुद्र बनने लगे।

(iv) सरल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति (Origin of Simple Organic Compounds)-आदि सागर के जल में बड़ी मात्रा में मेथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन, सायनाइड्स, कार्बाइड और नाइट्राइड्स उपस्थित थे। इन प्रारम्भिक यौगिकों में संयोग द्वारा सरल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हुआ जैसे अमीनो अम्ल, गिलसरॉल, वसा अम्ल, प्यूरीन, पिरीमिडीन आद्व। क्रियाओं के लिए ऊर्जा सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों और ज्बालामुखी आदि से प्राप्त हई ।

(v) जटिल कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति (Origin of Complex Organic Compounds)-समुद्री जल में छोटे सरल कार्बनिक यौगिकों के संयोग से बड़े जटिल कार्बनिक यौगिक बनने लगे जैसे-एमीनो अम्लों के संयोग से बड़ी शृंखलाएँ पॉलीपेप्टाइड्स (Polypeptides) और प्रोटीन बने। वसा अम्ल और ग्लिसरॉल के संयोग से वसा (Fat) और लिपिड (Lipid) बने।

सरल शर्कराओं के संयोग से डाइसैकेराइड और पॉलीसेकेराइड बने। शर्करा, नाइट्रोजनी क्षारक और फास्फेट्स के संयोग से न्यूक्लिओटाइड बने जिनकें बहुलीकरण से न्यूक्लिक अम्ल बने। इस प्रकार समुद्री जल में ऐसे दीर्घ अणुओं (Macro molecules) का निर्माण हो गया जो जीवद्रव्य के मुख्य घटकों का निर्माण करते हैं। अतः आदि सागर में जीवन की उत्पत्ति की संम्भावनाएँ स्थापित हो गईं।
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लम्बे समय के बाद रासायनिक विकास के परिणामस्वरूप आदि सागरों का जल इन कार्बनिक यौगिकों से पूर्णतया संतृप्त हो गया। कोसरवेट व न्यूक्लिओ प्रोटीन का निर्माण-बड़े कार्बनिक अणु जो कि सागर में अजैव संश्लेषण द्वारा बने थे, एक-दूसरे के समीप आने लगे जिससे बड़ी कोलाइडी बूँदों के समान संरचनाओं का निर्माण हुआ।

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इन्हीं कोलाइडी बूँदों का ऑपेरिन द्वारा कोसरवेट नाम दिया गया। कोसरवेट (संराशयक) वृहद् अणुओं का झुण्ड था जिसमें प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, लिपिड्स और पॉलीसेकेराइड्स आदि थे। इनमें वातावरण से कार्बनिक अणुओं के अवशोषण की क्षमता थी, ये जीवाणुओं के समान मुकुलन द्वारा विभाजित हो सकते थे, इनमें ग्लूकोज के अपघटन जैसी क्रियाएँ होती थीं।

रासायनिक क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती थी। ओपैरिन के अनुसार कोसरवेट सर्वप्रथम बने सरलजीवीय अणु थे जिन्होंने बाद में कोशिका को जन्म दिया। स्टैनले मिलर का प्रयोग (Experiment of S. Miller)ओपैरिन की परिकल्पना के अनुसार, प्रबल ऊर्जा की उपस्थिति में, मीथेन, हाइड्रोजन, जलवाष्प एवं अमोनिया के संयोजन से अमीनो अम्लों, सरल शर्कराओं तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण की सम्भावना को, अमेरिकी वैज्ञानिक स्टैनले मिलर (Stanley Miller 1953,1957) ने अपने आचार्य-हेरोल्ड यूरे (Harold Urey) की देखरेख में एक साधारण से प्रयोग द्वारा सिद्ध किया।

उन्होंने 5 लीटर के एक फ्लास्क में 2: 1: 2 के अनुपात में, मीथेन, अमोनिया एवं हाइड्रोजन का गैसीय मिश्रण भरा। देखिए चित्र 7.5 में। एक आधा लीटर के फ्लास्क को काँच की नली द्वारा बड़े फ्लास्क से जोड़ा। इस छोटे फ्लास्क में जल भरकर इसे उबालने का प्रंबध किया जिससे जलवाष्प पूरे उपकरण में घूमती है।

बड़े फ्लास्क में टंग्टन (Tungsten) के दो इलेक्ट्रोड (Electrodes) फिट करके, आदिवायुमण्डल की बिजली जैसे प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए एक सप्ताह तक तीव्र विद्युत की चिन्गारियाँ मुक्त कीं। इसलिए इस उपकरण को चिन्गारी-विमुक्ति उपकरण (Spark-Discharge Apparatus) कहते हैं। बड़े फ्लास्क को उन्होंने दूसरी ओर एक U नली द्वारा भी छोटे फ्लास्क से जोड़ा।

इस नली को एक स्थान पर एक कन्डेंसर (Condenser) में से निकाला। प्रयोग के अन्त में बनी गैस वाष्प के साथ जब कन्डेंसर के कारण ठण्डी हुई तो U नली में एक गहरा लाल-सा ग़द्दला तरल भर गया। विश्लेषण से पता लगा कि यह तरल ग्लाइसीन एवं एलैनीन नामक सरलतम अमीनो अम्लों, सरल शर्कराओं, कार्बनिक अम्लों तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों का मिश्रण था।
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अन्य वैज्ञानिकों ने भी इसी प्रकार आदि पृथ्वी पर उपस्थित दशाओं को प्रयोगशाला में उत्पन्न करके सरल अकार्बनिक एवं कार्बनिक यौगिकों से जटिल कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण को सिद्ध किया। उल्का पिण्डों सें प्राप्त रासायनिक विश्लेषण द्वारा भी पता चलता है कि अंतरिक्ष में भी यह घटना क्रम चलता होगा। इन कार्बनिक अणुओं से जीवन प्रारम्भ हुआ।

यह अणु अपने समान अणु बनाने में भी सक्षम थे। उसके पश्चात् एक कोशिकीय जीव जल में उत्पन्न हुए एवं उसके बाद धीरे-धीरे विकास की ओर लगातार बढ़ते हुए जैवविविधता बढ़ती गई व जो पृथ्वी पर आज हमें पादप व जीव-जन्तु देखने को मिलते हैं वह सभी एक कोशिकीय जलीय जीवों से विकसित हुये हैं।

प्रश्न 19.
तुलनात्मक शरीर रचना से जैव विकास के लिए क्या प्रमाण प्राप्त होते हैं? विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यदि जैव विकास (Organic Evolution) हुआ है तो प्रारम्भ से लेकर आज तक की जीव-जातियों की रचना, कार्यिकी एवं रसायनी, भ्रूणीय विकास, वितरण आदि में कुछ न कुछ सम्बन्ध एवं क्रम होना आवश्यक है। लैमार्क, डार्विन वैलेस, डी व्रिज आदि ने जैव विकास के बारे में अपनी-अपनी परिकल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए इन्हीं – सम्बन्धों एवं क्रम को दिखाने वाले प्रमाण प्रस्तुत किये हैं जिन्हें हम

निम्नलिखित श्रेणियों में बाँट सकते हैं-

  1. जीवों की तुलनात्मक संरचना
  2. शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण
  3. संयोजक कड़ियों के प्रमाण
  4. अवशेषी अंग
  5. भ्रोणिकी से प्रमाण
  6. जीवाश्मीय प्रमाण
  7. जीवों के घरेलू पालन से प्रमाण
  8. रक्षात्मक समरूपता

(1) जीवों की तुलनात्मक संरचना ( Comparative Anatomy) से प्रमाण – जन्तुओं में शारीरिक संरचनाएँ दो प्रकार की होती हैं-
(i) समजात अंग (Homologous organ ) – वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना एवं उत्पत्ति समान हो लेकिन कार्य भिन्न हो, समजात अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए व्हेल, पक्षी, चमगादड़, घोड़े तथा मनुष्य के अग्रपाद समजात अंग अर्थात् होमोलोगस अंग हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपाद बाहर से देखने से भिन्न दिखाई देते हैं। इनका बाहरी रूप उनके आवास एवं स्वभाव के अनुकूल होता है। व्हेल के अग्रपाद तैरने के लिए फ्लिपर में, पक्षी तथा चमगादड़ के अग्रपाद उड़ने के लिए पंख में रूपान्तरित हो गये हैं जबकि घोड़े के अग्रपाद दौड़ने के लिए, मनुष्य के मुक्त हाथ पकड़ने के लिए उपयुक्त हैं।

इन जन्तुओं के अग्रपादों के कार्यों एवं बाह्य बनावट में असमानताएँ होते हुए भी, इन सभी जन्तुओं के कंकाल (ह्यूमरस, रेडियस अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स व अंगुलास्थियाँ ) की मूल संरचना तथा उद्भव (Origin) समान होता है। ऐसे अंगों को समजात अंग (Homologous Organ) कहते हैं।
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कीटों के मुखांग (Mouth Parts of Insects ) – कीटों के मुखांग क्रमशः लेब्रम ( Labrum), मेण्डिबल (Mandibles), मैक्सिला (Maxilla), लेबियम (Labium) एवं हाइपोफे रिंक्स (hypopharynx) से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक कीट में इनकी संरचना एवं परिवर्धन समान होता है लेकिन इनके कार्यों में भिन्नता पाई जाती है। कॉकरोच के मुखांग भोजन को काटने व चबाने (Biting and Chewing) का कार्य करते हैं ।

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तितली एवं मक्खी में भोजन चूसने का एवं मच्छर में मुखांग भेदन एवं चूषण (Piercing and Sucking) दोनों का कार्य करते हैं। अकशेरुकियों के पैर (Legs of Invertibrates) – इसी प्रकार कॉकरोच एवं मधुमक्खी ( Honeybee) के टांगों के कार्य भिन्न- भिन्न हैं। कॉकरोच अपनी टांगों का उपयोग चलने (Walking) में करता है जबकि मधुमक्खी अपनी टांगों का उपयोग परागकण को एकत्रित (Collecting of Pollens) करने में करती है। जबकि दोनों की टांगों में खण्ड पाये जाते हैं तथा सभी खण्ड समान होते हैं जैसे कॉक्सा (Coxa), ट्रोकेन्टर (Trochanter ), फीमर (Femur), टिबिया (Tibia), 1 से 5 युग्मित टारसस (1-5 Jointed Tarsus)।
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बोगेनविलिया का काँटा और कुकुरबिटा के प्रतान (Tendril) में समानता होती है। इसी प्रकार और भी उदाहरण जैसे

  1. आलू व अदरक,
  2.  गाजर व मूली ।

(i)अपसारित विकास ( अनुकूली अपसारिता / अनुकूली विकिरण ) [Divergent Evolution (adaptive divergence / adaptive radiation)] – विभिन्न जन्तुओं में पायी जाने वाली समजातता यह प्रदर्शित करती है कि इन सबकी उत्पत्ति किसी समान पूर्वज से हुई है। किसी एक पूर्वज से उत्पन्न होने के बाद जातियाँ अपने-अपने आवासों के अनुसार अनुकूलित हो जाती हैं। जिसे ही अनुकूली विकिरण या अपसारित विकास कहते हैं। इन जातियों में समजात अंग (Homologous Organs) पाये जाते हैं । जैसे आस्ट्रेलिया में अनुकूली विकिरण के द्वारा ही विभिन्न प्रकार के मासूपिल्स (Marsupials) की उत्पत्ति हुई ।
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(ii) समवृत्ति अंग (Analogous Organs) – वे अंग जिनके कार्य समान हों किन्तु उनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में अन्तर हो, समवृत्ति अंग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए-कीट, पक्षी तथा चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते हैं परन्तु इनकी मूल संरचना एवं उत्पत्ति में बड़ा अन्तर होता है । इन अंगों में केवल आभासी समानताएँ पाई जाती हैं।

वातावरण एवं स्वभाव के कारण कार्यों में समानता होती है। कीट के पंखों का विकास शरीर की भित्ति से निकले प्रवर्गों के रूप में होता है जबकि पक्षी एवं चमगादड़ में इनकी उत्पत्ति शरीर भित्ति के प्रवर्गों के रूप में नहीं होती है । अतः इनके कार्यों में तो समानता होती है, परन्तु उत्पत्ति एवं संरचना में भिन्नता होती है।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास 41

इसी तरह मधुमक्खी के डंक एवं बिच्छू के डंक दोनों ही समान कार्य करते हैं परन्तु इनकी संरचना एवं परिवर्धन भिन्न होता है । मधुमक्खी एक कीट है, इसके बाह्य जननांग मिलकर अण्ड निक्षेपक (Ovipositor) नाल बनाते हैं। यही अण्ड निक्षेपक नाल रूपान्तरित होकर डंक बनाती है जबकि बिच्छू में शरीर का अन्तिम खण्ड रूपान्तरित होकर डंक बनाता है।

इसके अतिरिक्त समवृत्ति के उदाहरण निम्न हैं-

  • ऑक्टोपस (अष्ट भुज) तथा स्तनधारियों की आँखें (दोनों में रेटिना की स्थिति में भिन्नता है) या पेंग्विन और डॉल्फिन मछलियों के फिलपर्स ।
  • रस्कस का पर्णाभ स्तम्भ (Phylloclade) और सामान्य पर्ण।
  • आलू (तना) और शकरकंद (जड़)।

समवृत्ति अंगों में कार्य की समानता एवं विशिष्ट वातावरण की आवश्यकता के अनुरूप विकास, अभिसरण जैव विकास (Convergent Evolution) को प्रकट करता है।

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(2) शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन से प्रमाण (Evidence from Physiology and Biochemistry)-fafum. जीव शरीर क्रिया और जैव रसायन में समानता प्रदर्शित करते हैं, कुछ स्पष्ट उदाहरण निम्न हैं-

  • जीवद्रव्य (Protoplasm) – जीवद्रव्य की संरचना और संगठन सभी जन्तुओं में (प्रोटोजोआ से स्तनधारियों तक) लगभग समान होती है।
  • एन्जाइम (Enzyme) – सभी जीवों में एन्जाइम समान कार्य करते हैं। जैसे ट्रिप्सिन (Trypsin) । अमीबा से लेकर मानव तक प्रोटीन पाचन और एमाइलेज (Amylase) पॉरीफेरा से स्तनधारियों तक स्टार्च पाचन करता है।
  • रुधिर (Blood) – रुधिर की रचना सभी कशेरुकियों में लगभग समान होती है।
  • हार्मोन (Hormones) – सभी कशेरुकियों में समान प्रकार के हार्मोन बनते हैं, जिनकी रचना व कार्य समान होते हैं।
  • अनुवांशिक पदार्थ (Hereditary Material) – सभी जीवों में आनुवांशिक पदार्थ DNA होता है जिसकी मूल संरचना सभी जीवों में समान होती है।
  • ए.टी.पी. ( ATP) – सभी जीवों में जैविक ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ATP के रूप में ऊर्जा संचित होती है।
  • साइटोक्रोम – सी ( Cytochrome – C) – यह श्वसन वर्णक है जो सभी जीवों के माइटोकॉन्ड्रिया में उपस्थित होता है। इस प्रोटीन में 78-88 तक अमीनो अम्ल एक समान होते हैं जो समपूर्वजता को प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार शरीर क्रिया विज्ञान और जैव रसायन के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सभी जीवों का विकास एक ही मूल पूर्वज (Common Ancestor) से हुआ है।

(3) संयोजक कड़ियों के प्रमाण (Evidence of Connective Links) – जीवों के वर्गीकरण में समान गुणों वाले जीवों को एक ही वर्ग में रखा गया है। कुछ जन्तु ऐसे भी हैं जिनमें दो वर्गों के गुण पाये जाते हैं। इन जन्तुओं को योजक कड़ियाँ (Connective Links) कहते हैं।

संयोजक कड़ियों के उदाहरण-
(i) आर्किओप्टेरिक्स (Archeopteryx) – जर्मनी के बवेरिया प्रदेश में आर्किओप्टेरिक्स नामक जन्तु के जीवाश्म मिले हैं। इस जन्तु के कुछ लक्षण जैसे चोंच, पंख, पैरों की आकृति, एवीज वर्ग (पक्षी वर्ग) के तो कुछ लक्षण जैसे दाँत, पूँछ तथा शरीर पर शल्कों का होना रेप्टीलिया वर्ग के हैं। अतः इस जन्तु को एवीज तथा रेप्टीलिया वर्ग के मध्य योजक कड़ी कहते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों (Reptiles) से हुआ है।
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(ii) प्लेटीपस और एकिडना (Platypus and Echidna ) – प्लेटीपस और एकिडना दोनों ही मैमेलिया वर्ग के जन्तु हैं। इनके शरीर पर बाल पाये जाते हैं तथा बच्चों को दूध पिलाने के लिए दुग्ध ग्रन्थियाँ (Mammary Glands) होती हैं जो मैमेलिया वर्ग के लक्षण हैं। ये दोनों ही जन्तु रेप्टीलिया वर्ग के जन्तुओं की भाँति कवचदार पीतकयुक्त अण्डे देते हैं। इस प्रकार प्लेटीपस और एकिडना रेप्टीलिया और मैमेलिया वर्ग के मध्य एक योजक कड़ी हैं। ये जन्तु भी सिद्ध करते हैं कि स्तनधारियों का विकास सरीसृपों ( Reptiles ) से हुआ है।

(iii) पेरीपेटस (Peripatus ) – यह एनेलिडा तथा आर्थोपोडा संघ के बीच की संयोजी कड़ी है। पेरीपेटस में एनेलिडा संघ के निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • बेलनाकार आकृति
  • देहभित्ति की आकृति व चर्म का पेशीय होना
  • क्यूटिकल द्वारा निर्मित बाह्य कंकाल अनुपस्थित एवं पार्श्व पादों के समान उभारों का उपस्थित होना।

संघ आर्थ्रोपोडा के समान पेरीपेटस में निम्न लक्षण पाये जाते हैं-

  • तीन खण्डों के समेकन से सिर भाग का बनना
  • ऐंटिनी (Antennae ) का होना
  • एक जोड़ी सरल नेत्रों तथा एक जोड़ी मुख पैपिली का उपस्थित होना ।

अतः पेरिपेटस को एनीलीडा तथा आर्थ्रोपोडा संघ को जोड़ने वाली संयोजी कड़ी कहते हैं। यह प्रमाणित करता है कि आर्थोपोडा का विकास एनिलिडा से हुआ है ।

(iv) फुफ्फुस मछली (Lungfish ) प्रोटोप्टेरस (Portopterus) – प्रोटोप्टेरस में कुछ लक्षण मछलियों के (जैसे क्लोम तथा शल्कों की उपस्थिति) और कुछ लक्षण उभयचरों के (जैसे फुफ्फुस की उपस्थिति) पाये जाते हैं। अत: प्रोटोप्टेरस पिसीज तथा उभयचर संघ के बीच संयोजी कड़ी है।
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उपरोक्त के अतिरिक्त निम्न संयोजी कड़ियों के उदाहरण हैं-

  • वायरस (Virus) – संजीव और निर्जीव के मध्य
  • यूग्लीना (Euglena) – पादप और जन्तु के मध्य
  • प्रोटेरोस्पॉन्जिया (Proterospongia ) – प्रोटोजोआ और पॉरीफेरा के मध्य
  • नियोपाइलीना (Neopilina) – मोलस्का और एनेलिडा के मध्य उक्त कार्बनिक विकास और समपूर्वजता के अच्छे उदाहरण प्रदर्शित करते हैं।

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(4) अवशेषी अंगों के प्रमाण (Evidences from Vestigeal Organs) – अधिकांश जन्तुओं में कुछ ऐसे अंग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं परन्तु इन अंगों का जीवन भर पूर्ण विकास नहीं होता है। ये जन्तु की जीवन क्रिया में कोई योगदान नहीं देते है। अर्थात् ये निरर्थक एवं अनावश्यक होते हैं। ऐसे अंगों को अवशेषी अंग (Vestigeal Organs) कहते हैं। मनुष्य के शरीर में लगभग 180 ऐसी रचनायें होती हैं जिनमें सामान्य निम्न हैं-

  • कृमिरूपी – परिशेषिका (Vermiform Appendix ) – यह भोजन नाल का भाग होता है, जिसका कोई कार्य नहीं होता है परन्तु खरहे जैसे शाकाहारी जन्तुओं में यह सीकम के रूप में विकसित एवं . क्रियाशील होती है।
  • कर्ण पल्लव (Earpinna ) – घोड़े, गधे, कुत्ते व हाथी जैसे जन्तुओं के बाहरी कान से लगी कुछ पेशियाँ होती हैं जो कान को हिलाने का कार्य करती हैं परन्तु मनुष्य में ये पेशियाँ अविकसित रूप में पाई जाती हैं तथा कर्ण पल्लव अचल होता है ।
  • पुच्छ कशेरुकाएँ (Caudal Vertebrae) – मनुष्य में पूँछ नहीं पायी जाती है किन्तु फिर भी पुच्छ कशेरुकाएँ अत्यधिक हासित दुम के रूप में अवशेषी अंग के रूप में पायी जाती हैं। इससे पता चलता है कि मनुष्य के पूर्वज में पूँछ थी ।

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  • निमेषक पटला (Nictitating Membrane)-मेढक, पक्षियों तथा खरगोश में यह झिल्ली कई रूप में उपयोगी होती है, परन्तु मनुष्य में होते हुए भी इसका कोई कार्य नहीं होता है। यह लाल अर्द्धचन्द्राकार झिल्ली होती है जो आँख के एक ओर स्थित होती है । इसको प्लिका सेमील्यूनेरिस (Plica Semilunaris) कहते हैं।
  • त्वचा के बाल (Hair ) – बन्दरों, घोड़ों, सूअरों, कपियों आदि स्तनियों के शरीर पर घने बाल होते हैं। ये ताप नियन्त्रण में सहायता करते हैं। मानव में बालों का यह कार्य नहीं रहा, फिर भी शरीर पर कुछ बाल होते हैं।
  • अक्कल दाढ़ ( Wisdom Teeth) – तीसरा मोलर दन्त अन्य प्राइमेट (Primate) स्तनियों में सामान्य होता है । मानव में इसका उपयोग नहीं होता है। अतः यह देर से निकलता है और अर्ध विकसित रहता है। यह दंतरोगों के प्रति संवेदनशील होता है।

अन्य जन्तुओं में अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in other Animals)

  • अजगर (Python) के पश्च पाद और श्रोणि मेखला
  • बिना उड़ने वाले ( Flightless) पक्षियों के पंख जैसे शुतुरमुर्ग, ईमू कीवी आदि ।
  • घोड़े के पैरों की स्पिलिंट अस्थियाँ (Splint Bones ) 2 और 4 अगुंली।
  • व्हेल के पश्चपाद और श्रोणि मेखला

पादपों के अवशेषी अंग (Vestigeal Organs in Plants) – रस्कस और अनेक भूमिगत तनों की शल्की पत्तियाँ ।
अनावश्यक अंगों के अवशेषों का जन्तु के शरीर पर पाया जाना यह सिद्ध करता है कि ये अंग इनके पूर्वजों में क्रियाशील एवं विकसित रहे होंगे किन्तु इनके महत्त्व की समाप्ति पर उद्विकास के द्वारा क्रमशः विलुप्त हो जाने की प्रक्रिया में वर्तमान जन्तुओं में उपस्थित होते हैं।

(5) श्रोणिकी से प्रमाण (Evidences from Embryology) – श्रोणिकी तुलनात्मक भ्रोणिकी तथा प्रायोगिक श्रोणिकी से विकास के पक्ष में निर्णायक प्रमाण मिलते हैं। सभी मेटोजोअन प्राणी एक कोशिकीय युग्मनज (Zygote) से विकसित होते हैं और सभी प्राणियों के परिवर्धन की प्रारम्भिक अवस्थाओं में अत्यधिक समानता होती है।

मनुष्य सहित सभी मेटाजोअन वर्गों के प्राणियों के अण्डों के परिवर्धन के समय विदलन, ब्लास्टूला एवं गेस्टुला में वही मूलभूत समानताएँ पायी जाती हैं। प्रौढ़ जन्तुओं में जितने निकट का सम्बन्ध होता है उनके परिवर्धन में उतनी अधिक समानता देखने को मिलती है। विभिन्न वर्गों में परिवर्धन के बाद की अवस्थाएँ अपसरित हो जाती हैं व यह अपसरण एक विशाखित वृक्ष के समान होता हैं।
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इसी प्रकार विभिन्न कशेरुकियों के भ्रूणों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उच्च वर्ग के जन्तुओं के भ्रूण निम्न वर्गों के प्रौढ़ जन्तुओं के समान होते हैं, जैसे मेढ़क का टेडपोल लारवा मछली के समान होता है। इसी आधार पर हेकल ने पुनरावर्तन का सिद्धान्त (Recapitulation Theory ) प्रतिपादित किया।

इसके अनुसार प्रत्येक जीव भ्रूणीय परिवर्धन में अपनी जाति के जातीय विकास की कथा को दोहराता है। पुनरावर्तन सिद्धान्त के आधार पर निषेचित अण्डे की तुलना समस्त जन्तुओं के एककोशिकीय पूर्वज से ब्लास्टुला की प्रोटोजोआ मण्डल या कॉलोनी से की जा सकती है। मेढ़क के ही नहीं वरन् रेप्टाइल, पक्षी और यहाँ तक कि मनुष्य के भ्रूण में भी क्लोम दरारें, क्लोम, नोटोकॉर्ड, युग्मित आयोटिक चॉपें,

प्रोनेफ्रोस, पुच्छ तथा पेशियाँ आदि मछली के समान होती हैं और आरम्भ में सभी का हृदय मछली के समान द्विकक्षीय होता है। इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रारम्भ मे समस्त वर्टिब्रेट्स का विकास मछली के समान पूर्वजों से हुआ है। मनुष्य के भ्रूणीय परिवर्धन में देखा गया है कि उसका भ्रूण प्रारम्भ में मछली से, बाद में एम्फिबियन से और फिर रेप्टाइल से मिलता-जुलता होता है और सातवें मास में यह शिशु कपि से मिलता- जुलता होता है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव अपने भ्रूण परिवर्धन में उन समस्त अवस्थाओं से गुजरता है जिनसे कभी उसके पूर्वज धीरे-धीरे विकसित होकर बने होंगे।

(6) जीवाश्मीय प्रमाण (Palaeontological Evidences) – वैज्ञानिक चार्ल्स लायल के अनुसार पूर्व जीवों के चट्टानों से प्राप्त अवशेष जीवाश्म ( Fossils) कहलाते हैं। जीवाश्म का अध्ययन पेलियो-ओन्टोलॉजी (Palacontology) कहलाता है। जीवाश्म कार्बनिक विकास के पक्ष में सर्वाधिक मान्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि जीवाश्म द्वारा जीवों के सम्पूर्ण विकासीय इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है।

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जीवाश्म के अध्ययन से जीवों के विकास के सम्बन्ध में निम्न तथ्य प्रमाणित हुए-

  • जीवाश्म जो कि पुरानी चट्टानों से प्राप्त हुए सरल प्रकार के तथा जो नई चट्टानों से प्राप्त हुए जटिल प्रकार के थे।
  • विकास के प्रारम्भ में एक कोशिकी प्रोटोजोआ जन्तु बने जिनसे बहुकोशिकी जन्तुओं का विकास हुआ।
  • कुछ जीवाश्म विभिन्न वर्ग के जीवों के बीच की संयोजक कड़ियाँ (Connecting-links) को प्रदर्शित करती हैं।
  • पौधों में एन्जिओस्पर्म (Angiosperm) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (mammals) सबसे अधिक विकसित और आधुनिक हैं।
  • जीवाश्म के अध्ययन से किसी भी जन्तु को जीवाश्म कथा ( विकासीय इतिहास) या वंशावली का क्रमवार अध्ययन किया जा सकता है।

घोड़े की वंशावली ( जीवाश्मीय इतिहास ) [Evolution (Pedigree) of Horse] वैज्ञानिक सी. मार्श (C. Marsh) के अनुसार घोड़े का प्रारम्भिक जीवाश्म उत्तरी अमेरिका में पाया गया जिसका नाम इओहिप्पस (Eohippus) था। इसका विकास इओसीन काल में हुआ। इओहिप्पस लोमड़ी के समान तथा लगभग एक फुट ऊँचे थे। इनके अग्रपादों में चार तथा पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं ।
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ओलिगोसीन काल में इन पूर्वजों से भेड़ के आकार के मीसोहिप्पस (Mesohippus) घोड़ों का विकास हुआ। इनके अग्र व पश्च पादों में केवल तीन-तीन अंगुलियाँ थीं। बीच की अंगुलियाँ इधर- उधर की दोनों अंगुलियों से बड़ी थीं और शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं पर रहता था। इनसे मायोसीन काल के मेरीचिप्पस (Merychippus) घोड़ों का विकास हुआ।

ये टट्ट के आकार के थे। इनके अग्र व पश्च पादों में तीन-तीन अंगुलियाँ थीं जिनमें से बीच वाली सबसे लम्बी थी और केवल यही भूमि तक पहुँचती थी । प्लायोसीन काल में प्लीओहिप्पस (Pliohippus) घोड़ों का विकास हुआ। ये आकार में टट्ट से ऊँचे थे। इनके अग्र व पश्चपादों में केवल एक-एक अंगुली विकसित थी और इधर-उधर की अंगुलियाँ अत्यधिक हासित होकर स्प्लिट अस्थियों (Splint Bones) के रूप में त्वचा में दबी हुई थीं। केवल एक ही अंगुली की उपस्थिति के कारण ये तेजी से दौड़ सकते थे । प्लीस्टोसीन युग में इन्हीं घोड़ों से आधुनिक घोड़े इक्वस (Equus) का विकास हुआ। इक्वस की ऊँचाई लगभग 5 फीट है और यह उसी रूप में आज भी चला आ रहा है।

(7) जीवों के घरेलू पालन ( Domestication) से प्रमाण- मनुष्य अपने लिए उपयोगी जन्तुओं (घोड़े, गाय, कुत्ता, बकरी, भेड़, भैंस, कबूतर, मुर्गा आदि) तथा खेतिहर वनस्पतियों (गोभी, आलू, कपास, गेहूँ, चावल, मक्का, गुलाब आदि) की इनके जंगली पूर्वजों से नस्लें सुधार कर उत्पत्ति की है।

यद्यपि नस्लें सुधार कर नयी जातियों की उत्पत्ति वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं, फिर भी इस प्रक्रिया में बदले हुए लक्षण विकसीय ही माने जायेंगे हजारों-लाखों वर्षों का समय मिले तो सम्भवतः मानव इस विधि से नयी जीव जातियों की उत्पत्ति कर लेगा। अतः इतने पुराने इतिहास की प्रकृति में अनुमानत: इसी प्रकार नस्लों में सुधार के फलस्वरूप नयी-नयी जातियों की उत्पत्ति हुई होगी।

(8) रक्षात्मक समरूपता (Protective Resemblance) से प्रमाण – इंगलिस्तान (Britain) के औद्योगिक नगरों के आस-पास के पेड़ चिमनियों के धुएँ से काले पड़ जाते हैं। इन क्षेत्रों के कीटों, विशेष तौर से पतंगों (moths) की विभिन्न जातियों में, गत सदी में, औद्योगिक साँवलेपन (Industrial melanism) का रोग हो गया।

उदाहरणार्थ, पंतगों की बिस्टन बिटूलैरिया (Biston betularia) नामक जाति में शरीर व पंख हल्के रंग के काले धब्बेदार होते थे । सन् 1884 में इनकी आबादी में पहली बार एक बिल्कुल काला पतंगा देखा गया। यह परिवर्तन रंग के जीन में अचानक जीन – उत्परिवर्तन (gene- mutation) के कारण हुआ। बाद में काले पतंगों की संख्या बढ़ते-बढ़ते 90% हो गयी।

यह एक विकासीय परिवर्तन था । इससे पतंगों का रंग पेड़ों के रंग से मिलता-जुलता हो गया ताकि ये शत्रुओं (पक्षियों) और शिकार की निगाहों से बच सकें । जीन – उत्परिवर्तन के कारण वातावरण से रक्षात्मक समरूपता के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं।

इसे सादृश्यता (Mimicry) कहते हैं। ऐसी तितलियाँ होती हैं जो उन्हीं सूखी पत्तियों जैसी दिखायी देती हैं जिन पर ये आराम के समय बैठती हैं शाखाओं से मिलती-जुलती आकृति की कई कीट जातियाँ पायी जाती हैं। ये सब दृष्टान्त ‘जैव – विकास’ को प्रमाणित करते हैं । इंगलिस्तान के पतंगों के सम्बन्ध में तो यहाँ तक कहा – गया है कि इनमें “वैज्ञानिकों ने विकास प्रक्रिया को होते हुए स्वयं देखा है। ”
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प्रश्न 20.
(a) 15 मिलियन साल पहले रहने वाले प्राइमेट्स का नाम दीजिए तथा उनके लक्षण दीजिए।
(b) (i) पहले मानव समान जन्तु कहाँ मिले?
(ii) निएण्डरथल, होमोबिलिस तथा होमोइरेक्टस इस पृथ्वी पर किस क्रम में विकसित हुए?
(iii) आधुनिक मानव इस गृह पर कब उत्पन्न हुआ?
उत्तर:
(a) 15 मिलियन साल पहले रहने वाले प्राइमेट्स का नाम ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus) है।

ड्रायोपिथेकस के लक्षण निम्न हैं-

  • माथा गोल,
  • आधुनिक मानव के समान,
  • किन्तु इसके लम्बे कैनाइन दाँत कपि की भाँति थे,
  • यह कुछ झुक कर चारों पादों पर चलता था,
  • मानव तथा कपियों दोनों का ही पूर्वज रहा है।

(b) (i) प्रथम स्तनधारी श्रूज ( Shrews ) ईस्ट अफ्रीका,
(ii) होमो हे बिलस (Homohabilis), होमो इरेक्टस (Homoerectus), निएण्डरथल (Neanderthal),
(iii) 10,000 से 11,000 वर्ष पूर्व आधुनिक मानव उत्पन्न हुआ ।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. पेंग्विन एवं डॉल्फिन के पक्ष के उदाहरण हैं- (NEET-2020)
(अ) अभिसारी विकास का
(ब) औद्योगिक मैलेनिज्म का
(स) प्राकृतिक वरण का
(द) अनुकूली विकिरण का
उत्तर:
(अ) अभिसारी विकास का

2. एस. एल. मिलर ने अपने प्रयोग में एक बंद फ्लास्क में किसका मिश्रण कर ऐमिनो अम्ल उत्पन्न किये- (NEET-2020)
(अ) 800°C पर CH3 H2, NH3 और जल वाष्प
(ब) 600°C पर CH4, H2, NH2 और जल वाष्प
(स) 600°C पर CH3, H2, NH2 और जल वाष्प
(द) 800°C पर CH4, H2, NH2 और जल वाष्प
उत्तर:
(द) 800°C पर CH4, H2, NH2 और जल वाष्प

3. अनेक कशेरूकों के अग्रपाद की अस्थि संरचना में समानता किसका उदाहरण है? (NEET-2019)
(अ) अभिसारी विकास
(ब) तुल्यरूपता
(द) अनुकूली विकिरण
(स) समजातता
उत्तर:
(स) समजातता

4. निम्नलिखित अपसारी विकास के उदाहरण में से गलत विकल्प का चयन कीजिए-
(अ) चमगादड़, मनुष्य एवं चीता का मस्तिष्क
(ब) चमगादड़, मानव एवं चीता का हृदय
(स) मानव, चमगादड़ एवं चीता के अग्रपाद
(द) ऑक्टोपस, चमगादड़ एवं मानव की आँखें
उत्तर:
(द) ऑक्टोपस, चमगादड़ एवं मानव की आँखें

5. ह्यूगो डी ब्रिज के अनुसार विकास की क्रियाविधि किस प्रकार होती है- (NEET-2018)
(अ) लैंगिक दृश्य प्ररूप परिवर्तन (लक्षणप्ररूपी विभिन्नता)
(ब) साल्टेशन
(स) बहुवरण उत्परिर्वन
(द) लघु उत्परिवर्तन
उत्तर:
(ब) साल्टेशन

6. आदिमानव से अभिनव मानव तक मानव विकास का कालानुक्रमिक क्रम है- (NEET II-2016 )
(अ) रामपिथेकस → होमो हैविलिस → आस्ट्रेलोपिथेकस → होमो इरेक्टस
(ब) आस्ट्रेलोपिथेकस → होमो हैविलिस → रामपिथेकस होमो → इरेक्टस
(स) आस्ट्रेलोपिथेकस → रामपिथेकस → होमो हैबिलिस → होमो इरेक्टस
(द) रामपिथेकस → आस्ट्रेलोपिथेकस → होमो हैविलिस → होमो इरेक्टस
उत्तर:
(द) रामपिथेकस → आस्ट्रेलोपिथेकस → होमो हैविलिस → होमो इरेक्टस

7. निम्नलिखित संरचनाओं में से कौनसी संरचना पक्षी के पंख के समजात है- (NEET-2016)
(अ) खरगोश का पश्च पाद
(ब) व्हेल का फ्लीपर
(स) शार्क का पृष्ठ पंख
(द) शलभ का पंख
उत्तर:
(ब) व्हेल का फ्लीपर

8. पक्षी के पंख और कीट के पंख- (NEET-2015)
(अ) अनुरूप संरचनाएँ और अभिसारी विकास को दर्शाती हैं।
(ब) वंशावली संरचनाएँ और अपसारी विकास को दर्शाती हैं।
(स) समजातीय संरचनाएँ हैं और अभिसारी विकास को दर्शाती हैं।
(द) समजातीय संरचनाएँ अपसारी विकास को दर्शाती हैं।
उत्तर:
(द) समजातीय संरचनाएँ अपसारी विकास को दर्शाती हैं।

9. बिल्ली और छिपकली के अग्रपाद चलने; व्हेल के अग्रपाद तैरने और चमगादड़ के अग्रवाद उड़ने के लिए होते हैं, ये किसके उदाहरण हैं- (NEET-2014)
(अ) समवृति अंग
(ब) अनुकूली विकिरण
(स) समजात अंग
(द) अभिसारी विकास
उत्तर:
(स) समजात अंग

10. अपने पूर्वजों से विकसित होने के दौरान, आधुनिक मानव (होमोसेपिएस) की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति क्या रही थी- (NEET-2012)
(अ) जबड़ों का छोटा होते जाना
(ब) द्विनेत्रीय दृष्टि
(स) बढ़ती जाति कपाल धारिता
(द) सीधी खड़ी देह भंगिमा
उत्तर:
(अ) जबड़ों का छोटा होते जाना

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11. पूर्वजों से आधुनिक मनुष्य (होमो सैपियन्स) के उद्विकास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति थी- (CBSE, 2011 )
(अ) जबड़ों का छोटा होना
(ब) द्विनेत्री बाइनोकुलर दृष्टि
(स) मस्तिष्क क्षमता में वृद्धि
(द) सीधी मुद्रा
उत्तर:
(स) मस्तिष्क क्षमता में वृद्धि

12. जब कभी विभिन्न वंशवृत्तों की दो स्पेशीज अनुकूलनों के कारण एक-दूसरे के समान दिखने लगती हैं, तब इस परिघटना को क्या कहा जाता है? (CBSE-2007, RPMT-2010).
(अ) अपसारी विकास
(ब) अभिसारी विकास
(स) सूक्ष्म विकास
(द) सह विकास
उत्तर:
(ब) अभिसारी विकास

13. मिलर के प्रयोग में निम्नलिखित में से कौन अनुपस्थित था ? (CPMT, 2010)
(अ) CH4
(ब) H2
(स) NH3
(द) O2
उत्तर:
(द) O2

14. डार्विन की फिन्च एक अच्छा उदाहरण है- (CBSE PMT-2008, CBSE, 2010)
(अ) औद्योगिक मीलेनीकरण का
(ब) संयोजी कड़ी का
(स) अनुकूली विकिरण का
(द) अभिसारी जैव – विकास का
उत्तर:
(स) अनुकूली विकिरण का

15. मानव के पूर्वजों में से मस्तिष्क का आकार 1000 सी.सी. से अधिक था- (RPMT-2010)
(अ) होमो निएण्डरथेलेन्सिस
(ब) होमो इरेक्टस
(स) रामापिथेकस
(द) होमो हैबिलिस
उत्तर:
(अ) होमो निएण्डरथेलेन्सिस

16. आधुनिक मानव का नवीनतम एवं सीधा प्रागैतिहासिक पूर्वज है- (RPMT-2009)
(अ) क्रोमैगनॉन मानव
(ब) प्री-निएण्डरस्थल मानव
(स) निएण्डरथल मानव
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) क्रोमैगनॉन मानव

17. एक सबसे पुराना सर्वश्रेष्ठतः संरक्षित तथा सर्वाधिक पूर्ण होमिनिड जीवाश्म, जिसे लूसी नाम से जाना जाता है, किस वंश का प्रतिनिधित्व करता है- [AMU (Med)-2009]
(अ) आरियोबाइथेकस
(ब) ड्रायोपाइथेकस
(स) पाइथेकेन्थ्रोपस
(द) आस्ट्रेलोपाइथेकस
उत्तर:
(द) आस्ट्रेलोपाइथेकस

18. इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के दौरान पैपर्ड मॉथ अथवा विस्टन बेटुलेरिया की काले रंग की प्रजाति, इसके हल्के रंग वाली प्रजातियों पर अधिक प्रभावी हो गयी। यह एक उदाहरण है- (RPMT 2006, CBSE, 2009)
(अ) प्राकृतिक चयन का, जिसमें गहरे रंग वाली प्रजातियों का चयन हुआ
(ब) सूर्य के प्रकाश की बहुत कम मात्रा के कारण गहरे रंग वाले जीवों की उत्पत्ति का
(स) सुरक्षात्मक मिमिक्री का
(द) अंधेरे वातावरण के कारण गहरे रंग के गुण की आनुवंशिकता का
उत्तर:
(अ) प्राकृतिक चयन का, जिसमें गहरे रंग वाली प्रजातियों का चयन हुआ

19. विकास का महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करता है- (RPMT 2008)
(अ) जीवाश्म
(ब) आकारिकी
(स) भ्रूण
(द) अवशेषी अंग
उत्तर:
(अ) जीवाश्म

20. रासायनिक विकास की संकल्पना किस पर आधारित है- (CBSE-2007)
(अ) रसायनों का क्रिस्टलीकरण
(ब) तीव्र गर्मी में जल, वायु तथा मृत्तिका की परस्पर क्रिया
(स) रसायनों पर सौर विकिरण का प्रभाव
(द) उपयुक्त पर्यावरण परिस्थितियों में रसायनों के संयोजन द्वारा जीवन का संभावित उद्भव
उत्तर:
(द) उपयुक्त पर्यावरण परिस्थितियों में रसायनों के संयोजन द्वारा जीवन का संभावित उद्भव

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21. अनुकूली विकिरण का क्या अर्थ है ? (CBSE, 2007)
(अ) भौगोलिक पृथक्करण के कारण होने वाले अनुकूलन
(ब) एक समान पूर्वज से विभिन्न स्पीशीज का विकास
(स) किसी स्पीशीज के सदस्यों का विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में प्रवास
(द) किसी एक व्यष्टि की, विभिन्न पर्यावरणों के लिए अनुकूलन क्षमता
उत्तर:
(ब) एक समान पूर्वज से विभिन्न स्पीशीज का विकास

22. गेलोपेगॉस द्वीप समूह के फिंच पक्षी किस एक के पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करते हैं? (CBSE, 2007)
(अ) विशिष्ट सृजन
(ब) उत्परिवर्तनों के कारण हुआ विकास
(स) प्रतिगामी विकास
(द) जैव भौगोलिक विकास
उत्तर:
(द) जैव भौगोलिक विकास

23. मानव पूर्वजों में मस्तिष्क का आकार 1000 C. C. से ज्यादा किसका था? (CBSE, 2007)
(अ) होमो निएंडरथैलेसिस
(ब) होमो इरेक्टस
(स) रामापिथेकस
(द) होमो हैबिलिस
उत्तर:
(अ) होमो निएंडरथैलेसिस

24. प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त प्रतिपादित किया- (CPMT, 2006)
(अ) लैमार्क ने
(स) वैलेस ने
(ब) डार्विन ने
(द) वीजमान ने
उत्तर:
(द) वीजमान ने

25. जैव विकास के समर्थन में पाया जाने वाला एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण किसका पाया जाता है? (CBSE, 2006)
(अ) समजात तथा अवशेषी अंग
(ब) समवृत्ति तथा अवशेषी अंग
(स) केवल समजात अंग
(द) समजात एवं समवृत्ति अंग
उत्तर:
(अ) समजात तथा अवशेषी अंग

26. डी ब्रीज ने जैविक क्रमविकास से सम्बन्धित अपना उत्परिवर्तन मत किस जीव पर शोध करते हुए प्रस्तुत किया था- (CBSE, 2005)
(अ) इनोथेरा लैमार्कियाना ( सन्ध्या प्रिमरोज )
(ब) ड्रोसोफिलामेलोनोगेस्टर
(स) पाइसम सैटाइवम
(द) एल्थीया रोजिया
उत्तर:
(अ) इनोथेरा लैमार्कियाना ( सन्ध्या प्रिमरोज )

27. मुर्दे को दफन करने एवं धर्म के प्रमाण सर्वप्रथम किस जीवाश्म से मिलते हैं ? (RPMT, 2005 )
(अ) निएण्डरथल
(स) होमो इरेक्टस
(ब) क्रो-मैग्नॉन
(द) होमो हेबिलिस
उत्तर:
(अ) निएण्डरथल

28. निम्नलिखित में से किए गए प्रयोगों से ज्ञात होता है कि सरलतम सजीव जीवधारी निर्जीव पदार्थ से स्वतः जात उत्पन्न नहीं हो सकते थे- (NEET-2005)
(अ) सड़ते – गलते जैविक पदार्थों में लार्वा प्रकट हुए
(ब) मांस को यदि गर्म करके किसी पात्र में सील बंद करके रखा। गया तो मांस खराब नहीं हुआ
(स) भण्डारित मांस में सूक्ष्म जीव प्रकट नहीं हुए
(द) अनिजर्मीकृत जैव पदार्थ से सूक्ष्म जीव प्रकट हुए।
उत्तर:
(ब) मांस को यदि गर्म करके किसी पात्र में सील बंद करके रखा। गया तो मांस खराब नहीं हुआ

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 7 विकास

29. निम्न में से कौनसा गलत है- (Orissa JEE-2004)
(अ) कीटों एवं पक्षियों के पंख समरूप हैं।
(ब) कीटों एवं चमगादड़ के पंख समरूप हैं।
(स) कीटों एवं पक्षियों के पंख समजात अंग हैं
(द) चिड़ियों एवं चमगादड़ के पंख समजात अंग हैं।
उत्तर:
(स) कीटों एवं पक्षियों के पंख समजात अंग हैं

30. आलू और शकरकंद- (AIMS-2004)
(अ) में खांचशील भाग होते हैं जो समजात अंग होते हैं।
(ब) में खांचशील भाग होते हैं जो समवृद्धि अंग होते हैं।
(स) किसी एक बाहरी स्थान से भारत में प्रविष्ट कराए गए हैं।
(द) एक ही जीन के दो स्पीशीज ।
उत्तर:
(ब) में खांचशील भाग होते हैं जो समवृद्धि अंग होते हैं।

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. ठंडी जलवायु वाले स्तनधारियों के कान व पाद प्रायः छोटे होते हैं ताकि उष्मा की हानि कम से कम होती है, यह किसका नियम है?
(अ) ऐलन का नियम
(ब) बेलन का नियम
(स) हेलन का नियम
(द) डेलन का नियम
उत्तर:
(अ) ऐलन का नियम

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2. तुंगता बीमारी का लक्षण है-
(अ) मिचली आना
(ब) थकान आना
(स) हृदय स्पंदन में वृद्धि
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

3. समष्टि का दूसरा विशिष्ट गुण है-
(अ) लिंग अनुपात
(ब) जन्म दर
(स) मृत्यु दर
(द) यूरीथर्मल
उत्तर:
(अ) लिंग अनुपात

4. ध्रुवीय समुद्रों में सील जैसे जलीय स्तनधारियों में उनकी त्वचा के नीचे वसा (तिमिवसा/बलबर) की मोटी परत होती है। इसका क्या कार्य है?
(अ) उष्माशोषी
(ब) उष्मारोध (इंसुलेटर)
(स) अस्टिवेशन
(द) डॉरमेसी
उत्तर:
(ब) उष्मारोध (इंसुलेटर)

5. नागफनी (ओपंशिया) का कौनसा भाग प्रकाश संश्लेषण का प्रकार्य करता है?
(अ) चपटा तना
(ब) पत्ती
(स) पुष्प
(द) कांटों द्वारा
उत्तर:
(अ) चपटा तना

6. डायापॉज (Diapause) की परिघटना सम्बन्धित है-
(अ) निम्न ताप के प्रति अनुकूलन
(ब) उच्च ताप के प्रति अनुकूलन
(स) विषम ताप के प्रति अनुकूलन
(द) रंग प्रतिरूप
उत्तर:
(अ) निम्न ताप के प्रति अनुकूलन

7. ‘स्पर्धी” अपवर्जन नियम (Competitive exclusion principle) को देने वाले थे-
(अ) प्रो. रामदेव मिश्र
(स) ऐलन
(ब) गॉसे
(द) स्वामीनाथन
उत्तर:
(ब) गॉसे

8. चारघातांकी वृद्धि के अन्तर्गत जब ग्राफ बनाया जाता है तो यह किस प्रकार का बनता है?
(अ) S-आकार का
(ब) J-आकार का
(स) L-आकार का
(द) M-आकार का
उत्तर:
(ब) J-आकार का

9. शीतनिष्क्रियता (hibernation) ग्रीष्मनिष्क्रियता (aestivation) व उपरति (diapause) किससे सम्बन्धित है?
(अ) प्रवास करने से
(ब) समष्टि से
(स) अनुकूलन से
(द) नियमन से
उत्तर:
(स) अनुकूलन से

10. पृथ्वी की सतह के स्वरूप और व्यवहार से सम्बन्धित कारक कहलाता है-
(अ) मृदीय
(ब) स्थलाकृतिक
(स) जलवायवीय
(द) जैविक
उत्तर:
(ब) स्थलाकृतिक

11. निम्न तापक्रम पर पौधे मर जाते हैं क्योंकि-
(अ) धानीयुक्त जीवद्रव्य (Vacuolated Protoplasm) से जल निकल जाता है और पौधे सूख जाते हैं
(ब) बर्फ के यांत्रिक दबाव (Mechanical Pressure) के कारण कोशिकाएँ फट जाती हैं
(स) कोशिकीय प्रोटीनों का अवक्षेपण हो जाता है
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

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12. पादप वृद्धि के लिए सबसे उपयुक्त है-
(अ) बलुई मृदा
(ब) दोमट मृदा
(स) मृण्मय मृदा
(द) बजरी
उत्तर:
(ब) दोमट मृदा

13. निम्नलिखित में से कौनसा कारक प्रथमतः किसी स्थान की वनस्पति को निर्धारित करता है?
(अ) जलवायवीय
(ब) स्थलाकृतिक
(स) जैविक
(द) मृदीय
उत्तर:
(अ) जलवायवीय

14. समष्टि घनत्व बढ़ता है-
(अ) तीव्र मृत्युदर से
(ब) स्वदेश त्याग से
(स) देशान्तरवास
(द) उपरोक्त किसी से नहीं
उत्तर:
(स) देशान्तरवास

15. जलीय तल में सबसे नीचे का स्तर है-
(अ) एपिलिम्निओन (Epilimnion)
(ब) थर्मोक्लीन (Thermocline)
(स) हाइपोलिम्निओन (Hypolimnion)
(द) मीजोलिम्निओन (Mesolimnion)
उत्तर:
(स) हाइपोलिम्निओन (Hypolimnion)

16. प्राणी जो तापक्रम की वृहद परास को सहन कर सकते हैं, कहते हैं-
(अ) यूरीथर्मल (Eurythermal)
(ब) स्टीनोथर्मल (Stenothermal)
(स) पेरीथर्मल (Perithermal)
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) यूरीथर्मल (Eurythermal)

17. निम्न में से एक्टोथर्मिक प्राणी होते हैं-
(अ) शीतरूधिरधारी प्राणी (Poikilothermic animals)
(ब) गर्मरुधिर प्राणी (Homeothermic animals)
(स) विषमजातीय प्राणी (Heterothermic animals)
(द) (ब) व (स) दोनों
उत्तर:
(अ) शीतरूधिरधारी प्राणी (Poikilothermic animals)

18. भू-आकृतिक या स्थलाकृतिक (topographic) कारक है-
(अ) ऊँचाई, वर्षा व वायु की आर्द्रता
(ब) ढलानों की प्रवणता, वर्षा व ऊँचाई
(स) वर्षा, प्रकाश व वायुमण्डल का तापक्रम
(द) ढलानों की प्रवणता, ऊँचाई व घाटियाँ
उत्तर:
(द) ढलानों की प्रवणता, ऊँचाई व घाटियाँ

19. जैविक कारक के अन्तर्गत विभिन्न जातियों के मध्य वह सहयोग जिसमें एक को लाभ परन्तु हानि दोनों में से किसी को नहीं होगी-
(अ) प्राक्-सहयोग
(ब) सहोपकारिता
(स) सहभोजिता
(द) परजीविता
उत्तर:
(ब) सहोपकारिता

20. परजीविता और परभक्षण में होता है-
(अ) दोनों जातियों को लाभ
(ब) दोनों जातियों को हानि
(स) एक जाति को लाभ व दूसरी जाति को हानि
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) एक जाति को लाभ व दूसरी जाति को हानि

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21. जैविक कारक में जब दोनों सहयोगी जातियाँ लाभान्वित होती हैं तो इस प्रकार के सम्बन्ध को कहते हैं-
(अ) प्राक्-सहयोग
(ब) सहोपकारिता
(स) सहयोजिता
(द) परजीविता
उत्तर:
(ब) सहोपकारिता

22. मृदा में उपस्थित अपक्षयित होते कार्बनिक पदार्थों को कहते हैं-
(अ) ह्यूमस
(ब) ह्यूमिक-सम्मिश्र
(स) डफ
(द) करकट
उत्तर:
(अ) ह्यूमस

23. अजैविक कारकों के प्रति अनुक्रियाओं के अन्तर्गत नियमन (regulate) करने वाले प्राणी हैं-
(अ) सभी पक्षी
(ब) स्तनधारी
(स) कुछ निम्न कशेरुकी (Vertebrates) व कुछ अकशेरूकी जातियाँ
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

24. राजस्थान के केवलादेव राप्र्रीय उद्यान में प्रवासी पक्षी कहाँ से आते हैं?
(अ) आस्ट्रेलिया
(ब) नाइजीरिया
(स) साइबेरिया
(द) इथोपिया
उत्तर:
(स) साइबेरिया

25. मरूद्भिदी प्रवृत्तियाँ तथा सजीवप्रजकता किन पादपों में पाई जाती है?
(अ) मरूद्भिदों में
(ब) अम्लोद्भिदों में
(स) लवणमृदोद्भिदों में
(द) दरारोद्धिभों में
उत्तर:
(स) लवणमृदोद्भिदों में

26. एक जीव वैज्ञानिक ने खलिहान में चूहों की समष्टि का अध्ययन किया। उसने पाया कि औसत जन्म दर 250 है, औसत मृत्यु दर 240 है, अप्रवासन दर 20 है और उत्प्रवासन दर 30 है। समएि की शुद्ध वृद्धि कितनी है ?
(अ) 10
(ब) 15
(स) 05
(द) शून्य
उत्तर:
(द) शून्य

27. यदि ‘+’ चिह्न को लाभदायी परस्पर क्रिया के लिए,’-‘ चिन्द को हानिकारक के लिए और ‘O’ चिह्न को उदासीन परस्पर क्रिया के लिए दिया जाता है, तो ‘+’ ‘-‘ द्वारा प्रदर्शित समष्टि परस्पर क्रिया किसे संदर्भित करती है?
(अ) सहयोजिता
(ब) परजीविता
(स) सहपरोपकारिता
(द) अंतरजातीय परजीविता
उत्तर:
(ब) परजीविता

28. ऑफ्रिस (Ophrys) नामक भूमध्य सागरीय मेडिटेरिनियन आर्मिड की एक जाति परागण कराने के लिए किसका सहारा लेती है-
(अ) लैंगिक कपट
(ब) अलैंगिक कपट
(स) कायिक कपट
(द) असूत्री कपट
उत्तर:
(अ) लैंगिक कपट

29. किसके पुष्प के साथ मक्षिका कूट मैथुन (Pseudo Copulates) करती है?
(अ) ऑंक्रिस आर्मिड
(ब) सरसों
(स) एल्थेरोजिया
(द) अंजीर
उत्तर:
(अ) ऑंक्रिस आर्मिड

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30. आमडा (Calotropis) में पाये जाने वाला विषैला पदार्थ होता है-
(अ) ग्लाइकोसाइड
(ब) निकोटीन
(स) कैफीन
(द) क्वीनीन
उत्तर:
(अ) ग्लाइकोसाइड

31. नीचे दिये जा रहे चित्र में जीवधारियों की अजैविक कारकों के प्रति अनुक्रिया का एक आरेखीय निरूपण दिया गया है। इसमें रेखायें (i), (ii) तथा (iii) क्रमशः किनके प्रतिदर्श हैं-
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 1

(i)(ii)(iii)
(अ) नियामकआंशिक नियामकसंरूपक
(ब) आंशिक नियामकनियामकसंरूपक
(स) नियामकसंरूपकआंशिक नियामक
(द) संरूपकनियामकआंशिक नियामक

उत्तर:

(स) नियामकसंरूपकआंशिक नियामक

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
सहोपकारिता व सहभोजिता में अंतर बताइये।
उत्तर:
सहोपकारिता में संपर्क में रहने वाले जीवों को आपस में लाभ होता है जबकि सहभोजिता में केवल एक जीव को ही लाभ तथा दूसरे को न लाभ न हानि होती है।

प्रश्न 2.
ऐलन का नियम क्या बताता है?
उत्तर:
ठंडी जलवायु वाले स्तनधारियों के कान व पाद प्रायः छोटे होते हैं ताकि ऊष्मा की हानि कम से कम होती है।

प्रश्न 3.
छोटे आकार के गुंजन पक्षियों के लिये ध्रुवीय प्रदेश एक उपयुक्त आवास क्यों नहीं है?
उत्तर:
गुंजन पक्षी ध्रुवीय प्रदेश की सर्दी को सहन नहीं कर पाने के कारण यह आवास इनके उपयुक्त नहीं होता है।

प्रश्न 4.
प्रकृति में परभक्षण द्वारा निभायी जाने वाली कोई दो महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ बताइये।
उत्तर:
परभक्षण द्वारा भक्षों की संख्या को नियंत्रित करना तथा खाद्य श्रृंखला का क्रियान्वयन करना है।

प्रश्न 5.
किसी जीव के पारिस्थितिक निकेत का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जैवीय पर्यावरण में प्राणी का स्थान तथा पारितंत्र में इसकी भूमिका को पारिस्थितिकी निकेत कहते हैं।

प्रश्न 6.
कीट पीड़कों (pest/ insect) के प्रबंध के लिये जैव- नियंत्रण विधि के पीछे क्या पारिस्थितिक सिद्धांत है ?
उत्तर:
कीट पीड़कों को उनके शिकारियों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रश्न 7.
शरीर की ऊष्मा हानि को कम करने के अनुकूलन का उदाहरण दें।
उत्तर:
ध्रुवीय समुद्रों में सील जैसे जलीय स्तनधारियों में उनकी त्वचा के नीचे बसा की मोटी परत होती है जो ऊष्मारोधी (insulator) का कार्य करती है व शरीर की ऊष्मा हानि को कम करती है।

प्रश्न 8.
प्राणियों में प्रवास क्रिया का उदाहरण दीजिये, यह क्यों होता है?
उत्तर:
प्रत्येक शीत ऋतु में साइबेरिया व अन्य अधिक ठण्डे उत्तरी क्षेत्रों से आने वाले प्रवासी पक्षियों का तांता राजस्थान स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर में लगा रहता है। अनुकूलता आते ही ये पक्षी वापस लौट जाते हैं। प्रतिकूलता से बचने के लिये ये पक्षी वहाँ से यहाँ आते हैं। इसे प्रवास करना कहते हैं।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँb

प्रश्न 9.
पृथुलवणी व तनुलवणी क्या होते हैं?
उत्तर:
जो जीव लवणता की व्यापक परास के प्रति सहनशील होते हैं, उन्हें पृथुलवणी (Eurohaline) तथा कम परास में रहने वालों को तनुलवणी ( Stenohaline) कहते हैं।

प्रश्न 10.
अनुकूलनों का विकास किस प्रकार हुआ ?
उत्तर:
एक लम्बे समय में प्राकृतिक वरण द्वारा अपने आवास में उत्तरजीविता (survival) व जनन को इष्टतम बनाने के लिये जीव ने अनुकूलनों का विकास किया है।

प्रश्न 11.
तुंगता बीमारी का समाधान हमारा शरीर किस प्रकार करता है?
उत्तर:
यह बीमारी उच्च तुंगता वाले स्थानों पर होती है। हमारा शरीर कम O2 उपलब्ध होने की क्षतिपूर्ति लाल रुधिर कोशिका का उत्पादन बढ़ाकर, हीमोग्लोबिन की बंधनकारी क्षमता पटाकर और श्वसन दर बढ़ाकर करता है।

प्रश्न 12.
किन स्थानों के व्यक्तियों में लाल रुधिर कोशिकाओं की संख्या व कुल हीमोग्लोबिन की मात्रा अधिक होती है?
उत्तर:
जो व्यक्ति उच्च तुंगता वाले स्थलों पर रहते हैं उनके अन्दर लाल रुधिर कोशिकाओं की संख्या व कुल हीमोग्लोबिन की मात्रा मैदानी क्षेत्रों वाले व्यक्तियों से अधिक होती है।

प्रश्न 13.
आयु पिरैमिड क्या दर्शाता है?
उत्तर:
पिरैमिड का आकार समष्टि की स्थिति को प्रतिबिंबित करता है क्या यह बढ़ रहा है, स्थिर है या घट रहा है?

प्रश्न 14.
समष्टि साइज का मापन किस विधि से अधिक उपयुक्त है?
उत्तर:
समष्टि साइज के माप के लिये प्रतिशत आवरण अथवा जीव भार (Biomass) अधिक उपयुक्त है।

प्रश्न 15.
आप्रवासन ( immigration) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
किसी जाति के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समय अवधि के दौरान आवास में कहीं और से आये हैं।

प्रश्न 16.
उत्प्रवासन (emigration) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समष्टि के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समयावधि के दौरान आवास छोड़कर कहीं और चले गये हैं।

प्रश्न 17.
यदि समय पर समष्टि घनत्व N है तो समय + पर इसका घनत्व क्या होगा?
उत्तर:
Nt+1 = N1 + [(B + 1) (D +E)]
B + 1 = जन्म लेने वालों की संख्या जमा आप्रवासियों की संख्या ।
D + E – मरने वाले की संख्या जमा उत्प्रवासियों की संख्या ।

प्रश्न 18.
डार्विन योग्यता किसे कहते हैं?
उत्तर:
समष्टियाँ जिस आवास में रहती हैं, उसमें अपनी जनन योग्यता को डार्विन योग्यता कहते हैं।

प्रश्न 19.
कुछ जीव अपने जीवन काल में केवल एक बार प्रजनन करते हैं, इसके दो उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
प्रशांत महासागरीय सामन मछली (Salmon Fish) तथा बाँस (Bamboo)।

प्रश्न 20.
ऐसे कोई दो उदाहरण दीजिये जो कुछ छोटी साइज की संतति बहुत बड़ी संख्या में उत्पन्न करती है।
उत्तर:
ऑयस्टर (Oysters) और पैलेजीक मछलियाँ ( Pelagic Fishes)।

प्रश्न 21.
कोई दो उदाहरण बताइये जिसमें बड़ी साइज की संतति कम संख्या में उत्पन्न करती है ।
उत्तर:
पक्षी और स्तनधारी ।

प्रश्न 22.
परजीविता व परभक्षण में किसको लाभ व हानि होती है?
उत्तर:
परजीवी व परभक्षी को लाभ होता है तथा परपोषी व शिकार को हानि होती है।

प्रश्न 23.
परभक्षी किस प्रकार महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
ये शिकार समष्टि को नियंत्रण में रखते हैं। यदि परभक्षी नहीं होते तो शिकार जातियों का समष्टि घनत्व बहुत ज्यादा हो जाता और परितंत्र में अस्थिरता आ जाती।

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प्रश्न 24.
मैंग्रोव (Mangrove) वनस्पति क्या है?
उत्तर:
उष्ण व उपोष्ण कटिबन्धों के समुद्रतटों पर मैंग्रोव वन पाये जाते हैं। इनकी मूलों को न्यूमेटोफोर कहते हैं तथा इनमें सजीव प्रजक बीजांकुरण पाया जाता है। जैसे- राइजोफोरा ।

प्रश्न 25.
मरुस्थलीय पौधों में वाष्पोत्सर्जन को कम करने हेतु पाये जाने वाले कोई चार अनुकूलन लिखिए।
उत्तर:
चार अनुकूलन निम्न हैं-

  • पर्ण तथा स्तम्भ की अधिचर्म मोटी क्यूटिकल युक्त होती है।
  • रन्ध्र (Stomata) गहरे गर्त में अर्थात् गर्ती रन्ध्र होते हैं, जैसे- कनेर ।
  • पत्तियाँ कांटों में रूपान्तरित हो जाती हैं।
  • तने व पत्तियों में मोम के समान आवरण पाया जाता है जो वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
किसी कार्यिकीय अनुकूलन को उदाहरण सहित समझाइये |
उत्तर:
कुछ जीवों के अनुकूलन कार्यिकीय होते हैं जिसकी वजह से वे दबावपूर्ण परिस्थितियों के प्रति शीघ्र अनुक्रिया करते हैं। यदि हमें कभी उच्च तुंगता वाले क्षेत्र में जाने का मौका मिले (3,500 मी. से अधिक, मनाली के पास रोहतांग दर्रा, तिब्बत में मानसरोवर) तो वहाँ ‘तुंगता बीमारी’ का अवश्य अनुभव होता है। इस ‘बीमारी’ के लक्षण हैं- मिचली, थकान और हृदय स्पंदन में वृद्धि ।

इसका कारण यह है कि उच्च तुंगता वाले क्षेत्र में वायुमंडलीय दाब कम होता है इसलिए शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती। लेकिन धीरे-धीरे पर्यानुकूलित (एक्लेमिटाइज्ड) हो जाते हैं और फिर हमें तुंगता बीमारी का अनुभव नहीं होता। इस समस्या का समाधान हमारा शरीर स्वयं करता है।

हमारा शरीर कम ऑक्सीजन उपलब्ध होने की क्षतिपूर्ति लाल रुधिर कोशिका का उत्पादन बढ़ाकर, हीमोग्लोबिन की बंधनकारी क्षमता घटाकर और श्वसन दर बढ़ाकर करता है। हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में अनेक जनजातियाँ रहती हैं जिसमें मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों की तुलना में सामान्यतया लाल रुधिर कोशिकाओं की संख्या (या कुल हीमोग्लोबिन) ज्यादा होती है।

प्रश्न 2.
जलवायु तथा मौसम में भेद कीजिये ।
उत्तर:
किसी क्षेत्र विशेष की जलवायु से तात्पर्य उस क्षेत्र के जलवायवीय कारकों (प्रकाश, तापमान, वर्षण, पवन, वायुमण्डलीय गैसें, आर्द्रता आदि) की मात्रा के वर्षभर के औसत से होता है। जब इन्हीं कारकों की मात्रा का निर्धारण अल्पावधि के लिये नियत जगह पर किया जाये तो मौसम कहलाता है। इस प्रकार मौसम में साप्ताहिक, दैनिक परिवर्तन होते हैं, जबकि जलवायु का निर्धारण दीर्घकालिक ऋतुओं और वर्षों के आधार पर होता है।

प्रश्न 3.
सजीव प्रजकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अधिकांश लवणोद्भिद् में सजीवप्रजक बीजांकुरण पाया जाता है। इसमें बीज का अंकुरण फल के भीतर मातृ पौधे पर ही हो जाता है, इसे ही सजीवप्रजकता कहते हैं। मैंग्रोव वनस्पति में इस प्रकार का बीजांकुरण पाया जाता है। इनके बीजों में विश्रामी अवस्था नहीं होती है। जैसे ही फल का भार बढ़ता है तो वह टूटकर नीचे दलदली भूमि पर गिरता है तथा इससे नये पौधे का विकास हो जाता है।

प्रश्न 4.
आतपोद्भिद तथा छायोद्भिद में अन्तर लिखिये ।
उत्तर:
आतपोद्भिद और छायोद्भिद पादपों में अन्तर-

आतपोद्भिद (Heliophytes)छायोद्भिद (Sciophytes)
1. जड़ें विकसित, संख्या में अधिक तथा पूर्ण शाखित होती हैं।जड़ें छोटी, संख्या में कम और अल्प शाखित होती हैं।
2. तना सुदृढ़ तथा जाइलम पूर्ण विकसित होता है।तना पतला, दुर्बल तथा जाइलम अल्प विकसित होता है।
3. पत्तियाँ छोटी, हल्की हरी तथा मोटी होती हैं।पत्तियाँ बड़ी, गहरी हरी तथा पतली होती हैं।
4. पर्णरंध्रों (Stomata) की संख्या अधिक होती है। पर्णरंध्र निचली सतह पर ऊपरी सतह की अपेक्षा अधिक होते हैं।पर्णरंध्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है तथा दोनों सतहों पर समान रूप से वितरित होते हैं।
5. पर्णमध्योतक (Mesophyll tissue) में खंभ ऊतक (Palisade tissue) अधिक विकसित तथा अन्तराकोशिकीय अवकाश काफी छोटे होते हैं।पर्णमध्योतक में स्पंजी ऊतक (Spongy tissue) अधिक विकसित तथा अन्तराकोशिकीय अवकाश (Inter-cellular space) अपेक्षाकृत अधिक होते हैं।
6. यांत्रिक ऊतक (Mechanical tissues) पूर्ण विकसित होते हैं।यांत्रिकी ऊतक अल्प विकसित या अनुपस्थित होते हैं।
7. पुष्प एवं फल उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है।पुष्प एवं फल उत्पन्न करने की क्षमता अपेक्षाकृत बहुत कम होती है।
8. खनिज लवणों की मात्रा अधिक होती है। इस कारण कोशिकाओं का परासरण दाब अधिक होता है।खनिज लवणों की मात्रा कम होती है। कोशिकाओं का परासरण दाब कम होता है।

प्रश्न 5.
ह्यूमस के प्रकार और निर्माण को समझाइये।
उत्तर:
मृदा के मृत अपघटित कार्बनिक अवशेषों को ह्यूमस कहते हैं। यह मृदा की उर्वरकता के लिये अति आवश्यक है। यह मुख्य रूप से पौधों तथा जन्तुओं के अवशेषों तथा उनके उत्सर्जी पदार्थों के अपघटन से बनता है। केंचुए ह्यूमस निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। मृत कार्बनिक पदार्थों का अपघटन मृदा सूक्ष्म जीवों, जैसे- जीवाणुओं, कवकों आदि द्वारा होता है। ह्यूमस निर्माण प्रक्रिया को ह्यूमीफिकेशन (Humification) कहते हैं तथा ह्यूमस का खनिज लवणों में परिवर्तन खनिजीकरण (Mineralization) कहलाता है।

ह्यूमस दो प्रकार के होते हैं-

  • मोर ह्यूमस (Mor Humus) – यह ह्यूमस अपरिपक्व अवस्था में होता है। इसमें खनिज लवण अपेक्षाकृत कम होते हैं। मृदा में केंचुओं का अभाव होता है। इसकी pH 3.8 4.0 होती है। अपघटन धीरे-धीरे होता है।
  • मल ह्यूमस (Mull Humus) – यह परिपक्व ह्यूमस होता है। इसमें केंचुओं की बाहुल्यता होती है। मृदा की pH 5.0 होती है। अपघटन तेजी से होता है।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिये-
(i) वसन्तीकरण
(ii) दीप्तिकालिकता ।
उत्तर:
(i) वसन्तीकरण (Vernalization) – कुछ पौधों में पुष्पीकरण न्यूनताप मिलने पर होता है। बीज पर न्यून तापक्रम प्रयोग द्वारा पुष्पीकरण शीघ्र प्राप्त करने की क्रिया को वसन्तीकरण कहते हैं । इसके लिये ऑक्सीजन की उपस्थिति आवश्यक होती है। वसन्तीकरण में वर्नेलिन (Vernalin) नामक पदार्थ बनता है जो फ्लोरीजन (Florigen ) या जिबरेलिन में परिवर्तित हो जाता है तथा यह पुष्पीकरण को समय से पूर्व प्रारम्भ करने के लिए उत्तरदायी होता है।

(ii) दीप्तिकालिकता (Photoperiodism)- पौधों के पुष्पीकरण तथा फलन क्रियाओं पर दैनिक प्रकाश की अवधि का प्रभाव पड़ता है, इसे दीप्तिकालिकता कहते हैं। दैनिक प्रकाश अवधि के प्रभाव के अनुसार पुष्पी पादपों को तीन वर्गों में बांटा गया है-

  • दीर्घ – प्रकाशीय (दीप्तिकाली) पौधे
  • अल्प- प्रकाशीय (दीप्तिकाली) पौधे
  • प्रकाश या दिवस निरपेक्ष पौधे ।

तापमान दीप्तिकालिकता को सबसे अधिक प्रभावित करता है। इसके अलावा पौधे की आयु और उसका प्रकार (श्यान या ऊर्ध्ववर्ती) भी दीप्तिकालिकता को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 7.
शुष्कतारोधी पादपों में पाये जाने वाले चार आकारिकी व शरीर क्रियात्मक अनुकूलन बताइये ।
उत्तर:
आकारिकी अनुकूलन-

  • मूलतंत्र सुविकसित, शाखित, गहरा तथा प्रसारित मूल रोम व मूल गोप पूर्ण विकसित होते हैं।
  • तना चपटा व मांसल हो जाता है तथा पर्ण व स्तम्भ दोनों का कार्य करता है, जिसे पर्णाभ स्तम्भ कहते हैं, जैसे-नागफनी, कोकोलाबा ।
  • पत्तियाँ बहुकोशिकीय रोमों से ढँकी होती हैं जिससे वाष्पोत्सर्जन कम होता है, जिसे रोम पर्ण पादप (Trichophyllous Plants) कहते हैं, जैसे- केलोट्रापिस ।
  • इनमें हाइड्रोकेसी या आर्द्रता स्फुटन का लक्षण पाया जाता है।

शारीरिकीय अनुकूलन-

  1. पर्ण तथा स्तम्भ की अधिचर्म मोटी क्यूटिकल युक्त होती है।
  2. रंध्र गहरे गर्त में अर्थात् गर्ती रंध्र होते हैं, जैसे- कनेर ।
  3. यांत्रिक व संवहन ऊतक सुविकसित होती है।
  4. अधिचर्म तथा अधश्चर्म में क्यूटीन, लिग्निन, सूबेरिन का निक्षेपण होता है।

प्रश्न 8.
पहाड़ियों के तीव्र ढलानों पर वनस्पति क्यों नहीं पायी जाती है? कारण सहित समझाइये |
उत्तर:
ढलान प्रवणता जितनी अधिक होगी वर्षाजल उतने ही वेग से नीचे की ओर प्रवाहित होगा। यह ढलानों की मृदा के गुणों को बदलता है। तीव्र ढलानों पर भूमि को जल अवशोषित करने का अवसर नहीं मिल पाता है, अतः अधिक ढलान वाले भागों पर कम वनस्पति, कम प्रवणता के ढलानों पर अपेक्षाकृत सघन वनस्पति पायी जाती है। अधिक प्रवणता वाले ढलानों पर वर्षा व वायु द्वारा होने वाला मृदा अपरदन भी अधिक होता है और ऐसे ढलानों पर पादप नहीं पाये जाते हैं।

प्रश्न 9.
पारिस्थितिकी में वनस्पति को ताप आधारित संवर्गों में वगीकृत किया गया है। इन संवर्गों के नाम दीजिये तथा प्रत्येक की ताप स्थिति व वनस्पति प्रकार का वर्णन कीजिये ।
उत्तर:
संवर्गों के नाम-

  1. उच्चतापी – ये वे पौधे हैं, जिन्हें वृद्धि व विकास के लिए निरन्तर उच्च तापक्रम चाहिए। उदाहरण- मरुस्थल, घास वन आदि ।
  2. मध्यतापी – पौधे निम्न तापक्रम को कुछ समय सह सकते हैं। उच्च एवं न्यून तापक्रम एकान्तर क्रम में पाया जाता है। उदाहरण- उष्णकटिबन्ध वन ।
  3. निम्नतापी- इनमें न्यून तापक्रम पर वृद्धि एवं विकास होता है। उदाहरण- शीतोष्ण वन ।
  4. अतिनिम्नतापी या हैकिस्टोथर्म- ये अधिकांशत: न्यून तापक्रम पर वृद्धि एवं विकास करते हैं, अल्पाइन वनस्पति ।

प्रश्न 10.
पर्यावरण से क्या तात्पर्य है? इनके विभिन्न कारकों के शीर्षक लिखिये ।
उत्तर:
पर्यावरण से तात्पर्य है ‘चारों ओर से घेरे हुये। पर्यावरण अनेक कारकों का मिला-जुला एक जटिल सम्मिश्र है जो जीव को चारों ओर से घेरे हुए है। कोई पदार्थ या परिस्थिति या बाहरी बल जो जीव के जीवन को किसी भी प्रकार से प्रभावित करे, वह पर्यावरण कारक होता है। इन्हें पर्यावरण कारक या पारिस्थितिकी कारक कहते हैं। ये कारक जैविक या अजैविक हो सकते हैं। अजैविक व जैविक कारकों का जटिल सम्मिश्र ही जीव का पर्यावरण बनता है। पर्यावरणी कारकों को निम्न चार वर्गों में वगीकृत किया गया है-

1. जलवायवी या वायुव कारक – इसमें
(अ) प्रकाश,
(ब) तापमान,
(स) वर्षा,
(द) पवन,
(य) वायुमण्डलीय आर्द्रता तथा
(र) वायुमण्डलीय गैसें होती हैं।

2. भू-आकृतिक या स्थलाकृतिक कारक – यह कारक पृथ्वी के भौतिक भूगोल से सम्बन्धित है। इसमें
(अ) ऊँचाई,
(ब) पर्वत श्रृंखलाओं की दिशा व घाटियां तथा
(स) ढलानों की प्रवणता आती है।

3. मृदीय कारक – इसमें मृदा का संगठन व उसके गुण आते हैं।

4. जैविक कारक विभिन्न प्रकार के जीवों की अन्तर्क्रियाएँ।

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प्रश्न 11.
जलवायवीय कारकों के अन्तर्गत पवन से होने वाले पादप प्रभाव को समझाइए ।
उत्तर:
बहती वायु को पवन कहते हैं। पवन का पौधों पर प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दोनों प्रकार का प्रभाव होता है। पवन की गति पादपों की आकृति, वाष्पोत्सर्जन, आन्तरिक संरचना, परागण, प्रजनन, फल एवं बीजों के प्रकीर्णन इत्यादि पर प्रभाव डालती है। यही नहीं, पवन का तापमान, वर्षण व वायुदाब पर भी प्रभाव पड़ता है। पवन के कारण पौधों में अनेक कार्यिकी एवं आन्तरिक संरचना में परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं।

समुद्रतट व ऊँचे पर्वतों के पादपों में तेज हवाओं के एक दिशा में गति के कारण स्थायी वक्रता उत्पन्न हो जाती है तथा इन पौधों की शाखाएँ भी एक ही ओर से निकलती हैं। शुष्क वायु के प्रभाव से पौधों में निर्जलीकरण हो जाता है तथा उनकी स्फीति कम हो जाती है। फलस्वरूप पौधे वामन या बौने रह जाते हैं। समुद्रतटों तथा ऊँचे पर्वतों की वनस्पति प्रायः बौनी होती है।

प्रश्न 12.
ऑर्किड में पाये जाने वाले लैंगिक कपट (Sexual Deceit) को समझाइये।
अथवा
मेडिटेरेनियन ऑर्किड पुष्प की एक पंखुड़ी का आकार, रंग तथा चिह्नों का मादा भक्षिका से मिलता-जुलता होने का क्या कारण है ? समझाइए ।
उत्तर:
ऑर्किड पुष्प प्रतिरूपों में आश्चर्यचकित करने वाली विविधता पाई जाती है। इनके पुष्पों में पुष्पीय संरचना परागणकारी कीट भ्रमरों व गुंज मक्षिकाओं (Bees and Bumblebees) को आकर्षित करने के लिये ही विकसित हुए हैं ताकि इसके द्वारा निश्चित रूप से परागण हो सके । यद्यपि यह प्रवृत्ति सभी ऑर्किड पुष्पों में नहीं पायी जाती है। परन्तु ऑफिस (Ophrys) नामक भूमध्य सागरीय मेडिटेरिनियन ऑर्किड मक्षिका (Boc) की एक जाति परागण कराने के लिए लैंगिक कपट (Sexual Doceit) का सहारा लेता है।

इस पुष्प की एक पंखुड़ी (petal) साइज, रंग और चिन्हों में मादा मक्षिका (Bee) से मिलती-जुलती होती है। नर मक्षिका इसे मादा समझकर इसकी ओर आकर्षित होती है तथा पुष्प के साथ कूट मैथुन (Pseudo copulates ) करती है। इस क्रिया के दौरान इस पर पुष्प से पराग झड़कर उस पर गिर जाते हैं।

जब यही मक्षिका अन्य पुष्प से कूट मैथुन करती है तो इसके शरीर पर लगे परागकण उस पुष्प पर गिर जाते हैं जिससे पुष्प को परागित करती है। परन्तु विकास के दौरान यदि किसी भी कारण से मादा मक्षिका का रंग-प्रतिरूप (Colour-pattern) जरा सा भी बदल जाता है तो परागण की सफलता कम रहेगी अतः इस कारण से ऑर्किड पुष्प अपनी पंखुड़ी को मादा मक्षिका के सदृश बनाए रखते हैं ।

प्रश्न 13.
बताइये कि दी गई अवधि के दौरान दिये गये आवास में समष्टि का घनत्व किन मूलभूत प्रक्रमों (Processes) में घटता-बढ़ता है?
उत्तर:
जन्मदर तथा आप्रवासन समष्टि घनत्व को बढ़ाते हैं तो मृत्युदर व उत्प्रवासन इसे घटाते हैं। इन प्रक्रमों को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा रहा है-

  • जन्मदर (Natality )-जन्मदर से तात्पर्य समष्टि में जन्मी उस संख्या से है जो दी गई अवधि के दौरान आरंभिक घनत्व में जुड़ती है।
  • मृत्युदर (Mortality )-यह दी गई अवधि समष्टि में होने वाली मृत्यु की संख्या है।
  • आप्रवासन (Immigration )-उसी जाति के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समय अवधि के दौरान आवास में कहीं और आए हैं।
  • उत्प्रवासन (Emigration )-समष्टि के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समयावधि के दौरान आवास छोड़कर कहीं और चले गए हैं।

प्रश्न 14.
समष्टि पारस्परिक क्रियाओं को संक्षेप में बताइये ।
उत्तर:
समष्टि पारस्परिक क्रियाएँ (Population Interactions)
पृथ्वी के किसी भी आवास पर किसी एक ही जाति का वास नहीं होता। विभिन्न प्रकार की जातियाँ एक दूसर पर निर्भर होती हैं। पौधे भले ही अपना भोजन स्वयं बनाते हैं परन्तु वे अकेले जीवित नंहीं रह सकते। जैसे मृदा के कार्बनिक पदार्थ को तोड़ने और अकार्बनिक पोषकों को इसके अवशोषण के लिये लौटने के लिये मृदा के सूक्ष्मजीवों की आवश्यकता पड़ती है।

इसके अतिरिक्त प्राणी एजेन्ट (agent) पादप परागण की व्यवस्था बनाते हैं। अतः कोई भी जीव पृथक् नहीं रहता जब वे साथ रहते हैं तो उनमें पारस्परिक क्रियायें होती हैं। अंतराजातीय (interspecific) पारस्परिक क्रियायें (दो भिन्न जातियों की समष्टियों के बीच) एक जाति या दोनों जातियों के लिये हितकारी, हानिकारक या उदासीन (न हानिकारक न लाभदायक) हो सकती हैं।

लाभदायक पारस्परिक क्रियाओं के लिये ‘ + ‘ चिन्ह तथा हानिकारक के लिये ‘-‘ चिन्ह तथा उदासीन के लिये ‘ 0 ‘ चिन्ह का उपयोग करते हैं। अंतराजातीय पारस्परिक क्रियाओं को निम्न सारणी में दर्शाया जा रहा है-

सारणी-समष्टियों की पारस्परिक क्रिया

जाति ‘अ’जाति ‘ब’पारस्परिक क्रिया का नाम
++सहोपकारिता (Mutualism)
स्पर्धा (Competition)
+परभक्षण (Predation)
+परजीविता (Parasitism)
+0सहभोजिता (Commensalism)
0अंतराजातीय परजीविता (Amensalism)

सहोपकारिता में दोनों जातियों को लाभ होता है और स्पर्धा में दोनों को हानि होती है। परजीविता और परभक्षण दोनों में केवल एक जाति को लाभ होता है (क्रमशः परजीवी और परभक्षी को) और पारस्परिक क्रिया दूसरी जाति (क्रमशः परपोषी और शिकार) के लिये हानिकारक है।

वह पारस्परिक क्रिया जिसमें एक जाति को लाभ होता है और दूसरी को न लाभ व न हानि होती है, उसे सहभोजिता कहते हैं। दूसरी ओर, अंतरजातीय परजीविता में एक जाति को हानि होती है जबकि दूसरी जाति अप्रभावित रहती है।

(क) परभक्षण (Predation) – यदि किसी समुदाय में पौधों को खाने वाले प्राणी न हों तो स्वपोषी जीवों द्वारा स्थिर की गई संपूर्ण ऊर्जा व्यर्थ होगी। प्राणियों के द्वारा पौधे खाये जाते हैं तथा ऊर्जा को उच्चतर पोषी स्तरों में स्थानांतरित करते हैं। परभक्षण वे होते हैं जो अन्य जीवों का भक्षण या खाते हैं। यद्यपि पौधों को खाने वाले जीवों को शाकाहारी कहते हैं परंतु सामान्य पारिस्थितिक संदर्भ में वे भी परभक्षी जैसे होते हैं।

परभक्षी पोषी स्तर तक ऊर्जा स्थानांतरण के लिये संनाल (Conduits) का कार्य करने के अतिरिक्त वे शिकार समष्टि को नियंत्रित रखते हैं। यदि प्रकृति में परभक्षी नहीं होते तो शिकार जातियों का समष्टि घनत्व बहुत अधिक हो जाता और परितंत्र में अस्थिरता आ जाती। जब भी किसी भौगोलिक क्षेत्र में कुछ विदेशज जातियाँ लाई जाती हैं तो वे आक्रामक होकर तेजी से फैलने लगती हैं क्योंकि उन स्थानों पर उसके प्राकृतिक परभक्षी नहीं होते हैं।

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सन् 1920 के आरंभ में आस्ट्रेलिया में लाई गई नागफनी ने वहाँ लाखों हेक्टेयर भूमि में तेजी से फैलकर तबाही मचा दी। अंत में नागफनी को खाने वाले परभक्षी (एक प्रकार का शलभ) को लाकर आक्रामक नागफनी को नियंत्रित किया जा सका। परभक्षी, स्पर्धी शिकार जातियों के बीच स्पर्धा की तीव्रता कम करके किसी समुदाय में जातियों की विविधता (diversity) बनाए रखने में भी सहायता करता है।

उदाहरणार्थ, अमेरिकी प्रशांत तट की चट्टानी अंतराज्वारीय (intertidal) समुदायों में पाइसैस्टर तारामीन एक महत्त्वपूर्ण परभक्षी है। प्रयोग में जब एक बंद अंतराज्वारीय क्षेत्र से सभी तारामीन को हटा दिया गया तो अंतराजातीय स्पर्धा के कारण एक वर्ष में ही अकशेरुकियों की 10 से अधिक जातियाँ विलुप्त हो गईं।

यदि परभक्षी ज्यादा ही दक्ष है तो वह अपने शिकार का अतिदोहन करता है जिससे शिकार विलुप्त हो जायेगा परंतु जब शिकार का अभाव हो जायेगा तो परभक्षी भी शिकार न मिलने के कारण विलुप्त हो जायेगा। प्रकृति में शिकारी जातियों ने परभक्षण के प्रभाव को कम करने के लिये विभिन्न रक्षा विधियाँ विकसित कर ली हैं। कीटों और मेढ़कों की कुछ जातियों ने परभक्षी से बचने के लिये गुप्त रूप से रंगीन (छद्मावरण) हो जाती हैं, जिससे परभक्षी उन्हें पहचान नहीं पाता।

कुछ शिकार जातियाँ विषैली होती हैं, इसके कारण परभक्षी उनका भक्षण नहीं करते। मॉनार्क तितली के शरीर में विशेष रसायन होने के कारण स्वाद में खराब होती है, इस कारण परभक्षी उन्हें नहीं खाते हैं। यह तितली इस रसायन को अपनी इल्ली अवस्था में विषैली खरपतवार खाकर प्राप्त करती है।

पौधों के लिये शाकाहारी प्राणी परभक्षी होते हैं। लगभग 25% कीट पादपभक्षी (phytophagous) होते हैं अर्थात् वे पादप रस या पादपों के अन्य भाग खाते हैं। पादपों के लिये परभक्षी से बचने के लिये एक समस्या है क्योंकि वे प्राणियों की जैसे भाग नहीं सकते। इस कारण पौधों ने शाकाहारियों से बचने के लिये आकारिकीय और रासायनिक रक्षाविधियाँ विकसित कर ली हैं।

आकारिकीय रक्षाविधियों का उदाहरण एकेशिया (Acacia) व कैक्टस (Cactus) में कांटे हैं। रासायनिक रक्षाविधियों में अनेक पादप ऐसे रसायन उत्पन्न कर एकत्रित कर लेते हैं जो कि शाकाहारी द्वारा खाये जाने पर, उन्हें बीमार कर देते हैं, पाचन का संदमन करते हैं, उनके जनन को भंग कर देते हैं या मार देते हैं।

प्रायः खाली खेतों में आकड़ा या मदार (Calotropis) की खरपतवार उगी रहती है, उसे कोई भी पशु नहीं खाता है क्योंकि इस पौधे में विषैला ग्लाइकोसाइड (glycoside) उत्पन्न होता है। विविध प्रकार के पौधों से अनेक प्रकार के व्यापारिक स्तर पर रासायनिक पदार्थ जैसे-निकोटीन, कैफीन, क्वीनीन, स्ट्रिकनीन, अफीम इत्यादि प्राप्त करते हैं। इन रसायनों के कारण पशु इन्हें नहीं खाते हैं तथा पौधे शाकाहारी प्राणियों से अपनी रक्षा करते हैं।

(ख) स्पर्धा (Competition)-डार्विन ने प्रकृति में जीवनसंघर्ष और योग्यतम की उत्तरजीविता के विषय में बताते हुये कहा कि जैव-विकास में अंतरजातीय स्पर्धा (interspecific competition) एक शक्तिशाली कारक है। वस्तुतः स्पर्धा प्रायः तब होती है जब निकट रूप से संबंधित जातियाँ उन्हीं संसाधनों के लिये स्पर्धा करती हैं जो सीमित हैं।

किन्तु यह सत्य नहीं है कि एक ही जाति के जीव आपस में प्रतिस्पर्धा रखें। डार्विन के अनुसार भोजन व स्थान के लिये विभिन्न समष्टियों के जीव भी स्पर्धा रख सकते हैं। उदाहरणार्थ, दक्षिण़ी अमेरिका की कुछ उथली (कम गहरी) झीलों में आगुंतक फ्लेमिंगो और वहीं क्री रहने वाली मछलियां दोनों ही झील में मिलने वाले प्राणिप्लवक (Zooplankton) के लिये प्रतिस्पर्धा करते हैं।

स्थान व खाद्य सामग्री पर्याप्त होने पर भी यह देखा गया है कि स्पर्धा में एक समष्टि के प्राणी बाधित हो जाते हैं क्योंकि दूसरी समष्टि के जीव अधिक आक्रामक होते हैं जिससे वे पहली जाति के जीवों को उपलब्ध स्थान व भोजन का उपयोग नहीं करने देते हैं। प्रकृति में यह देखा गया है कि एक जाति की योग्यता अधिक बढ़ने पर वह दूसरी जाति के जीवों को कम कर सकती है परन्तु उन्हें विलुप्त नहीं कर पाती।

यद्यपि प्रकृति में ऐसे उदाहरण हैं कि योग्य जाति दूसरी जाति को समाप्त कर देती है। गैलापेगो द्वीप में एबिंगडन (Abingdon) कहुए अधिक संख्या में पाये जाते थे परंतु जब बकरियाँ पहुँचीं तो उन्होंने अधिक चरने के कारण सारे पौधे समाप्त कर दिये जिससे 10 साल में ही कछुए समाप्त हो गये।

प्रतिस्पर्धा का एक अन्य प्रमाण स्पर्धी मोचन (competitive release) है। यदि एक योग्य जाति है जिसने अपने से कम योग्य जाति को स्थान विशेष में सीमित कर रखा है व किसी भी कारण से यदि योग्य जाति नष्ट हो जाती है व उस स्थान से प्रवास कर जाती है तो दूसरी जाति स्पर्धा के अभाव में उस पूरे क्षेत्र में फैल कर समष्टि घनत्व बढ़ा सकती है।

गॉसे (Gause) का स्पर्धी अपवर्जन नियम (Competitive exclusion principle) यह बताता है कि एक ही प्रकार के संसाधनों के लिये स्पर्धा करने वाली दो निकटतम संबंधित जातियाँ लंबे समय तक साथ-साथ नहीं रह सकतीं और स्पर्धी रूप से कमजोर जाति बाद में समाप्त हो जाती है। गॉसे का यह नियम केवल तब ही लागू होगा जब स्थान या भोजन सीमाकारी (limiting) हो जायेंगे अन्यथा स्पर्धा

का यह नियम लागू नहीं होगा। आधुनिक अध्ययन से यह भी ज्ञात हुआ है कि जब दो जातियाँ स्पर्धा करती हैं तब एक विलुप्त नहीं होती वरन् यह इस प्रकार के अनुकूलन विकसित कर लेती है जिससे दोनों का एक साथ अस्तित्व बना रहता है। इस प्रकार की क्रियाविधि को ‘संसाधन विभाजन’ कहते हैं।

यदि दो जातियां एक ही संसाधन के लिये स्पर्धा करती हैं तो वे आहार के लिये भिन्न समय या भिन्न चारण प्रतिरूप चुनकर स्पर्धा से बच सकती हैं। मैक आर्थर (Mac Arthur) ने बताया कि एक ही पेड़ पर रह रही फुदकी (Warblers) की पांच जातियां स्पर्धा से बचने में सफल रहीं और पेड़ की शाखाओं और वितान पर कीट शिकार के लिये तलाशने की अपनी चारण गतिविधियों में व्यावहारिक भिन्नताओं के कारण साथ-साथ रह सकीं।

(ग) परजीविता (Parasitism) – परजीविता में रहने व भोजन की मुफ्त व्यवस्था होती है। एक जीव दूसरे जीव पर भोजन या आश्रय के लिये उस पर निर्भर होता है। जो जीव दूसरे जीव पर निर्भर होता है उसे परजीवी (parasite) तथा जिसके ऊपर यह आश्रित होता है उसे परपोषी (host) कहते हैं। इसमें परजीवी को तो लाभ होता है परन्तु परपोषी का शोषण होता है।

परजीविता पादपों से लेकर उच्च कोटि के कशेरुकियों तक पाई जाती है। ऐसे परजीवी जो एक निश्चित परपोषी के साथ ही रहते हैं, यदि उनको अपना निश्चित परपोषी उपलब्ध नहीं होता है तो उनकी मृत्यु हो जाती है, ऐसे परजीवियों को अविकल्पी परजीवी (obligate parasite) कहते हैं।

परजीविता में परजीवियों ने विशेष अनुकूलन विकसित किये हैं, जैसे-आसंजी अंगों या चूषकांगों (haustoria) की उपस्थिति, पाचन तंत्र का लोप तथा उच्च जनन क्षमता आदि। परजीवियों का जीवन चक्र प्रायः जटिल होता है। जिसमें एक या दो मध्यस्थ पोषक अथवा रोगवाहक होते हैं।

उदाहरणस्वरूप मानव यकृत पर्णाभ (liver fluke) अपने जीवन चक्र को पूर्ण करने के लिये दो मध्यस्थ पोषकों जैसेघोंघा और मछली पर निर्भर करता है। मलेरिया परजीवी को दूसरे परपोषियों पर फैलने के लिये रोगवाहक (मच्छर) की आवश्यकता पड़ती है। अधिकांश परजीवी, परपोषी को हानि पहुँचाते हैं, परपोषी की उत्तरजीविता, वृद्धि और जनन को कम कर सकते हैं तथा उसके समष्टि घनत्व को घटा सकते हैं।

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परजीवी परपोषी को कमजोर बनाकर, उसे परभक्षण के लिये अधिक सुरक्षित बना देते हैं। परजीवी दो प्रकार के होते हैं-बाह्य परजीवी (Ecto-parasite) तथा अन्तः परजीवी (Endo-parasite)। वे परपोषी जो अपना पोषण परपोषी की बाहरी सतह से प्राप्त करते हैं, उन्हें बाह्य परजीवी कहते हैं, उदाहरण-जूँ मानव पर, कुत्तों पर चिंचिड़ियाँ (Tricks) तथा प्राणियों में कई मछलियों पर कोपीपॉड्स (copepods) इनके शरीर पर निवास करते हैं।

अमरबेल या आकाश बेल (Cuscuta) एक स्तम्भ परजीवी है जिसमें पत्तियों व पर्णहरित (chlorophyll) का अभाव होता है। इसमें केवल पीले रंग का दुर्बल तना होता है। इसके तने से अनेक चूषकांग (haustoria) निकलकर, परपोषी के अंदर घुसकर उसके संवहन ऊतक (जाइलम व फ्लोयम) से अपना संबंध स्थापित कर लेते हैं।

ये पूर्णतः तैयार भोजन अपने परपोषी से प्राप्त करते हैं। अंतःपरजीवी (endoparasite) वे हैं जो परपोषी के शरीर में भिन्न स्थलों जैसे यकृत, वृक्क, फुफ्फुस, लाल रुधिर कोशिका आदि में रहते हैं। पक्षियों में अंड परजीविता (egg or brood parasitism) का अच्छा उदाहरण है जिसमें परजीवी पक्षी अपने अंडे परपोषी के घोंसले में देता है और परपोषी को उन अंडों को सेने (incubate) देता है।

आगे जाकर परजीवी पक्षी के अंडे साइज और रंगों में परपोषी के अंडों की भांति विकसित हो जाते हैं। इससे परपोषी इन अंडों को अपना समझकर बाहर नहीं निकालता। कोयल में भी अंड परजीविता पाई जाती है।

(घ) सहभोजिता (Commensalism) – इस प्रक्रिया में एक जाति को लाभ और दूसरी जाति को न तो लाभ होता है व न हानि होती है। उदाहरणार्थ, ऑर्किड (Orchid) आम की शाखा पर अधिपाद्प (epiphyte) के रूप में उगता है, ठीक इसी प्रकार व्हेल (whale) की पीठ पर बार्नेकल (Barnacle) निवास करता है। इस संबंध में ऑर्किड व बार्नेकल को तो लाभ होता है परंतु आम व क्लेल को न तो इनसे लाभ व न हानि होती है।

इसी प्रकार अन्य उदाहरणों में पक्षी बगुला और चरने वाले पशु आपस में साहचर्य में रहते हैं जो कि सहभोजिता का एक अच्छा उदाहरण है। खेत में पशु चरते रहते हैं और उनके पास ही बगुला भोजन प्राप्त करता रहता है। वस्तुत: खेत में पशु चरते हुये वनस्पति को हिलाते रहते हैं जिससे कीट बाहर निकलते रहते हैं तथा बगुला उन कीटों को खा जाता है।

सहभोजिता का एक अन्य उदाहरण समुद्री ऐनीमोन (Sea anemons) की दंशन स्पर्शक (stinging tantacles) का है। इन समुद्री ऐनीमोन के बीच रहने वाली क्लाउन मछली को परभक्षियों से दंशक स्पर्शक द्वारा सुरक्षा मिल जाती है क्योंकि परभक्षी इन दंशन स्पर्शकों से दूर रहते हैं यद्यपि समुद्री ऐनीमोन को क्लाउन मछली से कोई लाभ नहीं मिलता है।

(ङ) सहोपकारिता (Mutualism)-इस प्रक्रिया में दोनों जीवों को लाभ होता है। इसे प्रकाश-संश्लेषी शैवाल या सायनोबैक्टीरिया व लाइकेन के मध्य देखा जा सकता है। यहां शैवाल प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा अपने तथा कवक सहभागी के लिये खाद्य पदार्थों का निर्माण करता है।

इसके बदले में कवक अपने तथा शैवाल सहभागी के लिये वर्षा का जल, नमी आदि एकत्र करके उसका जीवन आसान बनाता है। इसमें कवक व शैवाल दोनों को लाभ होता है। इसी प्रकार का संबंध कवकों और उच्च कोटि के पादपों की जड़ों के बीच कवकमूल (Mycorrhiza) संबंध होता है।

कवक, मृदा से आवश्यक पोषक तत्वों के अवशोषण में पादपों की सहायता करते हैं जबकि बदले में पादप, कवकों को ऊर्जा-उत्पादी कार्बोहाइड्रेट देते हैं। विकास की दृष्टि से सहोपकारिता के अच्छे उदाहरण पादपप्राणी संबंध में मिलते हैं। पादपों को अपने पुष्प परागित करने और बीजों के प्रकीर्णन के लिये प्राणियों की सहायता जरूरी है।

अनेक जंतु एवं पक्षी फलों व बीजों को खाकर अन्य स्थानों पर अपना मल विसर्जित करते हैं। इनके मल के साथ फलों के बीज भी बाहर आ जाते हैं, जिससे बीजों के प्रकीर्णन में सहायता मिलती है। विभिन्न पादपों में कुछ प्राणियों जैसे मधुमक्खी तथा तितलियों व अन्य पक्षियों की अहम भूमिका होती है।

ये पुष्पों पर मकरन्द प्राप्त करने के लिये जाते हैं तथा इसके बदले में परागकणों को एक पुष्प से अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरित करके परागण क्रिया संपन्न कराते हैं। इस प्रकार पादप- प्राणी पारस्परिक क्रिया में सहोपकारिता होती है या यों कहा जा सकता है कि पुष्य व इसके परागणकारी जातियों के विकास एक-दूसरे से मजबूती से जुड़े हुए हैं।

अंजीर के वृक्षों की अनेक जातियों में बर्र की परागणकारी जातियों के बीच अगाढ़ संबंध है। अंजीर की जाति केवल इसके ‘साथी’ बर्र की जाति से ही परागित हो सकती है, यह किसी बर्र की दूसरी जाति से परागित नहीं हो सकती। मादा बर्र फल को केवल अंड निक्षेपण (ovipositor) के लिये ही उपयोग में नहीं लेती, बल्कि फल के अंदर वृद्धि कर रहे बीजों के डिंबकों (larvae) के पोषण के लिये उपयोग करती है।

अंडे देने के लिये उपयुक्त स्थान की तलाश करते हुए बर्र अंजीर पुष्पक्रम को परागित करती है। इसके बदले में अंजीर अपने कुछ परिवर्धनशील बीज, परिवर्धनशील बर्र के डिंबकों को आहार के रूप में देती है। अ पुष्प प्रतिरूपों में अ श चर्य चकि त करने वाली विविधता पाई जाती है।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 2

इनके पुष्पों में पुष्पीय संरचना परागणकारी कीट भ्रमरों व गुंज मक्षिकाओं (Bees and Bumblebees) को आकर्षित करने के लिये ही विकसित हुए हैं ताकि इसके द्वारा निश्चित रूप से परागण हो सके। यद्यपि यह प्रवृत्ति सभी ऑर्किड पुष्पों में नहीं पायी जाती है परन्तु ऑफ्रिस (Ophrys) नामक भूमध्यसागरीय मेडिटेरिनियन ऑर्किड की एक जाति परागण कराने के लिए लैंगिक कपट (Sexual deceit) का सहारा लेती है।

इस पुष्प की एक पंखुड़ी (petal) साइज, रंग और चिन्हों में मादा मक्षिका (Bee) से मिलती-जुलती होती है। नर मक्षिका इसे मादा समझकर इसकी ओर आकर्षित होती है तथा पुष्प के साथ कूट मैथुन (Pseudo copulates) करती है। इस क्रिया के दौरान इस पर पुष्प से पराग झड़कर उस पर गिर जाते हैं।

जब यही मक्षिका अन्य पुष्प से कूट मैथुन करती है तो इसके शरीर पर लगे परागकण उस पुष्प पर गिर जाते हैं जिससे पुष्प को परागित करती है। परन्तु विकास के दौरान यदि किसी भी कारण से मादा मक्षिका का रंग-प तिरूप (Colourpattern) जरा-सा भी बदल जाता है तो परागण की सफलता कम रहेगी अतः इस कारण से ऑर्किड पुष्प अपनी पंखुड़ी को मादा मक्षिका के सदृश बनाए रखते हैं
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प्रश्न 15.
जीवोम से क्या समझते हैं? ये विभिन्न प्रकार के क्यों होते हैं? पाये जाने वाले जीवोम को सचित्र बताइये ।
उत्तर:
विश्व के मुख्य पादप समुदायों को जीवोम (Biomes ) कहते हैं । जीवोम में विभिन्नता तापक्रम, वर्षण व विभिन्न ऋतुओं के कारण होती है। प्रत्येक जीवोम के अंदर ही क्षेत्रीय और स्थलीय विभिन्नताओं के कारण आवास में व्यापक विभिन्नता होती है। भारत के प्रमुख जीवोम निम्न प्रकार से हैं-

  • मरुथल जीवोम (Desert Biome )
  • घास स्थल जीवोम (Grassland Biome)
  • उष्णकटिबंध वन जीवोम (Tropical Forest Biome)
  • शीतोष्ण वन जीवोम (Temperate Forest Biome)
  • शंकुधारी वन जीवोम (Coniferous Forest Biome)
  • उत्तरी ध्रुवीय और अल्पाइन टुंड्रा जीवोम (Arctic and Alpine Tundra Biome)

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प्रश्न 16.
जैविक अनुक्रिया के अन्तर्गत नियमन करने (Regulate) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कुछ जीव समस्थापन (Homeostasis) कार्यिकीय साधनों द्वारा बनाए रखते हैं जिसके कारण शरीर का तापमान, परासरणी सांद्रता इत्यादि स्थिर रहती है। सभी पक्षी और स्तनधारी तथा बहुत कम निम्न कशेरुकी (Lower vertebrates ) व अकशेरुकी ( invertebrates ) जातियाँ वास्तव में ताप व परासरण नियमन (Thermoregulation and Osmoregulation) बनाए रखने में सक्षम होते हैं।

विकासवादी जीव वैज्ञानिकों का यह विश्वास है कि स्तनधारियों की सफलता का मुख्य कारण यही है कि वे अपने शरीर का तापमान स्थिर बनाये रखने में सक्षम होते हैं, भले वे अंटार्कटिका में रहें या सहारा के मरुस्थल में । प्रायः स्तनधारी अपने शरीर के तापमान का नियमन उसी प्रकार करते हैं जैसे मानव करते हैं। हम शरीर का तापमान 37°C स्थिर रखते हैं।

गर्मियों के समय में जब बाहर का तापमान शरीर से अधिक हो जाता है तब हमें अधिक पसीना आता है। यह पसीना वाष्प बनकर उड़ता है उससे शरीर के तापमान का नियमन हो जाता है। सर्दियों में पर्यावरण में जब तापक्रम कम हो जाता है तब हम काँपने लगते हैं। काँपने से जो व्यायाम होता है उससे ऊष्मा पैदा होकर शरीर के ताप का नियमन होता है । परन्तु पादपों में नियमन करने का कोई तरीका नहीं होता है।

प्रश्न 17.
संरूपण रखना भी जैविक अनुक्रिया का तरीका है, इसे स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
लगभग 99% प्राणी व सभी पौधे स्थिर आंतरिक पर्यावरण बनाये रखने में सक्षम नहीं होते हैं। उनके शरीर का तापमान पर्यावरण तापमान के अनुसार बदलता रहता है। जलीय प्राणियों में तो शरीर के द्रव की परासरण सांद्रता बाहरी जल की परासरण सांद्रता के अनुसार बदलती रहती है। ये प्राणी और पौधे संरूपी (Conform ) कहलाते हैं।

संरूपी या संरूपण जैविक अनुक्रिया की विधि है। अनेक जीवों के लिये ताप नियमन ( Thermoregulation) ऊर्जा की दृष्टि से महँगा है। यह तर्क मंजोरु ( Shrews ) व गुंजन पक्षी (Humming Birds) जैसे छोटे प्राणियों के विषय में सही है। ताप हानि या ताप लाभ पृष्ठीय क्षेत्रफल ( Surface Area) का प्रकार्य है।

चूंकि छोटे प्राणियों का पृष्ठीय क्षेत्रफल उनके आयतन की अपेक्षा ज्यादा होता है, इसलिए जब बाहर ठंड होती है तो उनके शरीर की ऊष्मा बहुत तेजी से कम होती है। ऐसी स्थिति में उन्हें उपापचय (Metabolism) द्वारा शरीर की ऊष्मा पैदा करने के लिए अधिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।

यह मुख्य कारण है कि बहुत छोटे प्राणी बिरले ही ध्रुवीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं। विकास के दौरान कुछ जातियों में नियमन करने की क्षमता उत्पन्न हो गई है ( केवल सीमित परास वाले पर्यावरण परिस्थितियों में ) । यदि पर्यावरण परास ज्यादा होता है तो वे केवल संरूपण (Conform ) करते हैं।

प्रश्न 18.
जीवों में प्रवास करने (Migration) को समझाइये।
उत्तर:
जीव दबावपूर्ण आवास से अस्थायी रूप से अधिक अनुकूल क्षेत्र में चला जाए और जब दबावभरी अवधि बीत जाये तो वापस लौट आए। मानव सादृश्य में, यह नीति ऐसी है जैसे गरमी की अवधि में व्यक्ति दिल्ली से शिमला चला जाए। अनेक प्राणी, विशेषत: पक्षी, शीतऋतु के दौरान लंबी दूरी का प्रवास करके अधिक अतिथि अनुकूली क्षेत्रों में चले जाते हैं।

प्रत्येक शीतकाल में राजस्थान स्थित प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर) साइबेरिया और अन्य अत्यधिक ठंडे उत्तरी क्षेत्रों से आने वाले प्रवासी पक्षियों को अतिथि के रूप में स्वागत करता है। इस प्रकार जीवों के एक स्थान से अन्य स्थान पर जाने की प्रक्रिया को प्रवास करना कहते हैं।

प्रश्न 19
गाँसे (Gauses) के स्पर्धी अपवर्जन नियम (Competitive Exclusion Principle) को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
गाँसे ‘स्पर्धी अपवर्जन नियम’ यह बतलाता है कि एक ही तरह के संसाधनों के लिए स्पर्धा करने वाली दो निकटतम से संबंधित जातियाँ अनंतकाल तक साथ-साथ नहीं रह सकतीं और स्पर्धी रूप से घटिया जाति अंततः विलुप्त कर दी जाती है। ऐसा तभी होगा जब संसाधन सीमाकारी होंगे अन्यथा नहीं।

अधिक वर्तमान अध्ययन स्पर्धा के ऐसे घोर सामान्यीकरण की पुष्टि नहीं करते। वे प्रकृति में अंतरजातीय स्पर्धा होने को नकारते तो नहीं पर वे इस ओर ध्यान दिलाते हैं स्पर्धा का सामना करने वाली जातियाँ ऐसी क्रियाविधि विकसित कर सकती हैं जो बहिष्कार की बजाय सह अस्तित्व को बढ़ावा दे। ऐसी क्रियाविधि ‘संसाधन विभाजन है।

अगर दो जातियाँ एक ही संसाधन के लिए स्पर्धा करती हैं तो उदाहरण के लिए वे आहार के लिए भिन्न समय अथवा भिन्न चारण प्रतिरूप चुनकर स्पर्धा से बच सकती हैं। मैकआर्थर ने दिखाया कि एक ही पेड़ पर रह रहीं फुदकी (वार्बलर) की पाँच निकटत: संबंधित जातियाँ स्पर्धा से बचने में सफल रहीं और पेड़ की शाखाओं और वितान पर कीट शिकार के लिए तलाशने की अपनी चारण गतिविधियों में व्यावहारिक भिन्नताओं के कारण साथ- साथ रह सकीं।

प्रश्न 20.
सहोपकारिता के अन्तर्गत पुष्पीय पादपों में पुष्प व इसके परागणकारी जातियों के विकास एक-दूसरे से मजबूती से जुड़े होते हैं, इस कथन की पुष्टि अंजीर (Fig) पादप से कीजिए ।
उत्तर:
अंजीर के पेड़ों की अनेक जातियों में बर्र की परागणकारी जातियों के बीच मजबूत संबंध है। इसका अर्थ यह है कि कोई दी गई अंजीर जाति केवल इसके ‘साथी’ बर्र की जाति से ही परागित हो सकती है, बर्र की दूसरी जाति से नहीं। मादा बर्र फल को न केवल अंडनिक्षेपण (अंडे देने) के लिए काम में लेती है; बल्कि फल के भीतर ही वृद्धि कर रहे बीजों को डिंबकों (लार्वी) के पोषण के लिए प्रयोग करती है। अंडे देने के लिए उपयुक्त स्थल की तलाश करते हुए बर्र अंजीर पुष्पक्रम (इनफ्लोरेसेंस) को परागित करती है। इसके बदले में अंजीर अपने कुछ परिवर्धनशील बीज, परिवर्धनशील बर्र के डिंबकों को आहार के रूप में देती है।

प्रश्न 21.
सहभोजिता एवं सहपरोपकारिता में अन्तर स्पष्ट कीजिए । प्रत्येक का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
सहभोजिता (Commensalism) – इस साहचर्य में दोनों में से केवल एक को लाभ होता है लेकिन हानि किसी को नहीं होती है। अधिपादप तथा कंठलताएँ इसका उपयुक्त उदाहरण हैं। अधिपादप स्वपोषी होते हुए भी अन्य पौधों पर उगते हैं। ये वेलामेन (Velamen) मूल द्वारा आर्द्रता को ग्रहण करते हैं तथा प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं।

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उदा – वैन्डा तथा आर्किड्स । हरित शैवाल बेसीक्लेडिया (Basicladia) अलवणीय जल में पाये जाने वाले कछुए के कवच पर उगता है, यह अधिजन्तु का उदाहरण है। कंठलताएँ काष्ठीय आरोही पौधे हैं जो पृथ्वी पर उगकर अन्य पेड़ों का सहारा लेकर ऊपर चढ़ते हैं तथा उनके शीर्ष भागों पर फैल जाते हैं ताकि उन्हें उचित प्रकाश प्राप्त हो।

उदाहरण- टीनोस्पोरा, बिग्नोनिया, बोगेनविलिया आदि । सहोपकारिता (Mutualism) – इसमें दोनों जातियों को लाभ पहुँचता है तथा जीवनयापन हेतु दोनों का साथ आवश्यक है। उदाहरण-शैक, सहजीवी नाइट्रोजन स्थिर कारक, कवकमूल साहचर्य आदि । कुछ उच्च श्रेणी के पौधों की मूलों व कवक में साहचर्य होता है, इसे कवकमूल साहचर्य कहते हैं।

उदाहरण-पाइनस, ओक, हिकरी, बीच आदि। इनमें कवक जल व खनिज लवणों का अवशोषण कर पौधे को उपलब्ध करवाता है तथा मूल कवक को भोजन प्रदान करते हैं। इस प्रकार के पौधों की मूल में मूलरोमों का अभाव होता है ।

प्रश्न 22.
रेगिस्तानी पौधों की पत्तियों में पाये जाने वाले चार अनुकूलन लिखिए।
उत्तर:

  • रंध्र (stomata) गहरे गर्त में व्यवस्थित होते हैं, ताकि वाष्पोत्सर्जन (transpiration) द्वारा जल की न्यूनतम हानि हो।
  • प्रकाश संश्लेषी (सी ए एम) मार्ग भी विशेष प्रकार के होते हैं जिसके कारण वे अपने रंध्र दिन के समय में बन्द रख सकते हैं।
  • कुछ पौधों जैसे-नागफनी, कैक्टस आदि में पत्तियाँ नहीं होतीं बल्कि वे काँटे के रूप में रूपान्तरित हो जाती हैं और प्रकाश संश्लेषण का प्रकार्य चपटे तनों द्वारा होता है।

प्रश्न 23.
जीवाणु, कवक और निम्न पादप प्रतिकूल परिस्थितियों में कैसे जीवित रहते हैं? समझाइए ।
उत्तर:
जीवाणुओं, कवकों और निम्न पादपों में विभिन्न प्रकार के मोटी भित्ति वाले बीजाणु बन जाते हैं, जिससे उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित बचे रहने में सहायता मिलती है। उपयुक्त पर्यावरण उपलब्ध होने पर ये अंकुरित हो जाते हैं।

प्रश्न 24.
जहाँ पशु चरते हैं, उसके पास ही बगुले भोजन प्राप्ति के लिए रहते हैं । इस पारस्परिक क्रिया को क्या कहते हैं? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
पक्षी बगुला और चारण पशु निकट साहचर्य में रहते हैं। यह सहभोजिता (Commensalism) का अच्छा उदाहरण है। इसका कारण यह है कि जब पशु चलते हैं तो उनके खुरों से जमीन से पौधों के हिलने से कीड़े बाहर निकलते हैं। बगुले उन कीटों को आसानी से पकड़कर खा लेते हैं।

प्रश्न 25.
परभक्षण तथा परजीविता में अन्तर स्पष्ट कीजिए । उत्तर- परभक्षण व परजीविता दोनों ऋणात्मक पारस्परिक सम्बन्ध हैं क्योंकि इन दोनों परस्पर सम्बन्धों में एक जाति को लाभ होता है तो दूसरी जाति को हानि होती है। परभक्षण प्रक्रिया में एक जीव दूसरे जीव को खाता है, जैसे बाघ हिरण को खाता है, जन्तु पौधों को खाते हैं। यहाँ बाघ शिकारी है व हिरण शिकार है।

परभक्षित जीव शिकार समष्टि को नियंत्रित करते हैं। परजीविता में छोटे आकार की जाति (परजीवी) बड़ी जातियों ( पोषक) के अन्दर या उन पर जीवित रहते हैं जिससे कि वह भोजन और आश्रय ग्रहण करते हैं। परजीवी पोषक के शारीरिक द्रव्य से भोजन लेते हैं। परजीवी, परभक्षक की तरह पोषक जातियों की संख्या को सीमित करते हैं।

परजीवी पोषक विशिष्ट होते हैं, उनके पास परभक्षियों की जैसे कोई विकल्प नहीं होता। परजीवी आकार में छोटे होते हैं और इनमें परभक्षक की तुलना में उच्च जैविक/ प्रजनन सामर्थ्य होता है। परजीवियों में प्रकीर्णन के लिए विशिष्ट संरचनाओं की आवश्यकता पोषक तक पहुँचने और उन पर आक्रमण करने के लिए होती है। परभक्षक चलनशील होते हैं और शिकार को पकड़ने के लिए समर्थ होते हैं।

प्रश्न 26.
किसी आवास में समष्टि के घनत्व के घटने-बढ़ने के चार मूलभूत प्रक्रमों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समष्टि के घनत्व के घटने-बढ़ने के चार मूलभूत प्रक्रम निम्न प्रकार से हैं-

  • जन्मदर – जन्म दर से तात्पर्य समष्टि में जन्मी उस संख्या से है जो दी गई अवधि के दौरान आरम्भिक घनत्व में जुड़ती है।
  • मृत्युदर – यह दी गई अवधि समष्टि में होने वाली मौतों की संख्या है।
  • आप्रवासन – उसी जाति के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समय अवधि के दौरान आवास में कहीं और से आये हैं।
  • उत्प्रवासन – समष्टि के व्यष्टियों की वह संख्या है जो दी गई समयावधि के दौरान आवास छोड़कर कहीं और चले गये हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिए-
(क) परभक्षण
(ख) स्पर्धा
(ग) मृदा ।
उत्तर:
(क) परभक्षण (Predation) – यदि किसी समुदाय में पौधों को खाने वाले प्राणी न हों तो स्वपोषी जीवों द्वारा स्थिर की गई संपूर्ण ऊर्जा व्यर्थ होगी। प्राणियों के द्वारा पौधे खाये जाते हैं तथा ऊर्जा को उच्चतर पोषी स्तरों में स्थानांतरित करते हैं। परभक्षण वे होते हैं जो अन्य जीवों का भक्षण या खाते हैं।

यद्यपि पौधों को खाने वाले जीवों को शाकाहारी कहते हैं परंतु सामान्य पारिस्थितिक संदर्भ में वे भी परभक्षी जैसे होते हैं। परभक्षी पोषी स्तर तक ऊर्जा स्थानांतरण के लिये संनाल (Conduits) का कार्य करने के अतिरिक्त वे शिकार समष्टि को नियंत्रित रखते हैं। यदि प्रकृति में परभक्षी नहीं होते तो शिकार जातियों का समष्टि घनत्व बहुत अधिक हो जाता और परितंत्र में अस्थिरता आ जाती।

जब भी किसी भौगोलिक क्षेत्र में कुछ विदेशज जातियाँ लाई जाती हैं तो वे आक्रामक होकर तेजी से फैलने लगती हैं क्योंकि उन स्थानों पर उसके प्राकृतिक परभक्षी नहीं होते हैं। सन् 1920 के आरंभ में आस्ट्रेलिया में लाई गई नागफनी ने वहाँ लाखों हेक्टेयर भूमि में तेजी से फैलकर तबाही मचा दी।

अंत में नागफनी को खाने वाले परभक्षी (एक प्रकार का शलभ) को लाकर आक्रामक नागफनी को नियंत्रित किया जा सका। परभक्षी, स्पर्धी शिकार जातियों के बीच स्पर्धा की तीव्रता कम करके किसी समुदाय में जातियों की विविधता (diversity) बनाए रखने में भी सहायता करता है।

उदाहरणार्थ, अमेरिकी प्रशांत तट की चट्टानी अंतराज्वारीय (intertidal) समुदायों में पाइसैस्टर तारामीन एक महत्त्वपूर्ण परभक्षी है। प्रयोग में जब एक बंद अंतराज्वारीय क्षेत्र से सभी तारामीन को हटा दिया गया तो अंतराजातीय स्पर्धा के कारण एक वर्ष में ही अकशेरुकियों की 10 से अधिक जातियाँ विलुप्त हो गईं।

यदि परभक्षी ज्यादा ही दक्ष है तो वह अपने शिकार का अतिदोहन करता है जिससे शिकार विलुप्त हो जायेगा परंतु जब शिकार का अभाव हो जायेगा तो परभक्षी भी शिकार न मिलने के कारण विलुप्त हो जायेगा। प्रकृति में शिकारी जातियों ने परभक्षण के प्रभाव को कम करने के लिये विभिन्न रक्षा विधियाँ विकसित कर ली हैं।

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कीटों और मेढ़कों की कुछ जातियों ने परभक्षी से बचने के लिये गुप्त रूप से रंगीन (छद्मावरण) हो जाती हैं, जिससे परभक्षी उन्हें पहचान नहीं पाता। कुछ शिकार जातियाँ विषैली होती हैं, इसके कारण परभक्षी उनका भक्षण नहीं करते। मॉनार्क तितली के शरीर में विशेष रसायन होने के कारण स्वाद में खराब होती है, इस कारण परभक्षी उन्हें नहीं खाते हैं।

यह तितली इस रसायन को अपनी इल्ली अवस्था में विषैली खरपतवार खाकर प्राप्त करती है। पौधों के लिये शाकाहारी प्राणी परभक्षी होते हैं। लगभग 25% कीट पादपभक्षी (phytophagous) होते हैं अर्थात् वे पादप रस या पादपों के अन्य भाग खाते हैं। पादपों के लिये परभक्षी से बचने के लिये एक समस्या है क्योंकि वे प्राणियों की जैसे भाग नहीं सकते। इस कारण पौधों ने शाकाहारियों से बचने के लिये आकारिकीय और रासायनिक रक्षाविधियाँ विकसित कर ली हैं।

आकारिकीय रक्षाविधियों का उदाहरण एकेशिया (Acacia) व कैक्टस (Cactus) में कांटे हैं। रासायनिक रक्षाविधियों में अनेक पादप ऐसे रसायन उत्पन्न कर एकत्रित कर लेते हैं जो कि शाकाहारी द्वारा खाये जाने पर, उन्हें बीमार कर देते हैं, पाचन का संदमन करते हैं, उनके जनन को भंग कर देते हैं या मार देते हैं।

प्रायः खाली खेतों में आकड़ा या मदार (Calotropis) की खरपतवार उगी रहती है, उसे कोई भी पशु नहीं खाता है क्योंकि इस पौधे में विषैला ग्लाइकोसाइड (glycoside) उत्पन्न होता है। विविध प्रकार के पौधों से अनेक प्रकार के व्यापारिक स्तर पर रासायनिक पदार्थ जैसे-निकोटीन, कैफीन, क्वीनीन, स्ट्रिकनीन, अफीम इत्यादि प्राप्त करते हैं। इन रसायनों के कारण पशु इन्हें नहीं खाते हैं तथा पौधे शाकाहारी प्राणियों से अपनी रक्षा करते हैं।

(ख) स्पर्धा (Competition)-डार्विन ने प्रकृति में जीवनसंघर्ष और योग्यतम की उत्तरजीविता के विषय में बताते हुये कहा कि जैव-विकास में अंतरजातीय स्पर्धा (interspecific competition) एक शक्तिशाली कारक है। वस्तुतः स्पर्धा प्रायः तब होती है जब निकट रूप से संबंधित जातियाँ उन्हीं संसाधनों के लिये स्पर्धा करती हैं जो सीमित हैं।

किन्तु यह सत्य नहीं है कि एक ही जाति के जीव आपस में प्रतिस्पर्धा रखें। डार्विन के अनुसार भोजन व स्थान के लिये विभिन्न समष्टियों के जीव भी स्पर्धा रख सकते हैं। उदाहरणार्थ, दक्षिण़ी अमेरिका की कुछ उथली (कम गहरी) झीलों में आगुंतक फ्लेमिंगो और वहीं क्री रहने वाली मछलियां दोनों ही झील में मिलने वाले प्राणिप्लवक (Zooplankton) के लिये प्रतिस्पर्धा करते हैं।

स्थान व खाद्य सामग्री पर्याप्त होने पर भी यह देखा गया है कि स्पर्धा में एक समष्टि के प्राणी बाधित हो जाते हैं क्योंकि दूसरी समष्टि के जीव अधिक आक्रामक होते हैं जिससे वे पहली जाति के जीवों को उपलब्ध स्थान व भोजन का उपयोग नहीं करने देते हैं। प्रकृति में यह देखा गया है कि एक जाति की योग्यता अधिक बढ़ने पर वह दूसरी जाति के जीवों को कम कर सकती है परन्तु उन्हें विलुप्त नहीं कर पाती।

यद्यपि प्रकृति में ऐसे उदाहरण हैं कि योग्य जाति दूसरी जाति को समाप्त कर देती है। गैलापेगो द्वीप में एबिंगडन (Abingdon) कहुए अधिक संख्या में पाये जाते थे परंतु जब बकरियाँ पहुँचीं तो उन्होंने अधिक चरने के कारण सारे पौधे समाप्त कर दिये जिससे 10 साल में ही कछुए समाप्त हो गये। प्रतिस्पर्धा का एक अन्य प्रमाण स्पर्धी मोचन (competitive release) है।

यदि एक योग्य जाति है जिसने अपने से कम योग्य जाति को स्थान विशेष में सीमित कर रखा है व किसी भी कारण से यदि योग्य जाति नष्ट हो जाती है व उस स्थान से प्रवास कर जाती है तो दूसरी जाति स्पर्धा के अभाव में उस पूरे क्षेत्र में फैल कर समष्टि घनत्व बढ़ा सकती है। गॉसे (Gause) का स्पर्धी अपवर्जन नियम (Competitive exclusion principle) यह बताता है कि एक ही प्रकार के संसाधनों के लिये

स्पर्धा करने वाली दो निकटतम संबंधित जातियाँ लंबे समय तक साथ-साथ नहीं रह सकतीं और स्पर्धी रूप से कमजोर जाति बाद में समाप्त हो जाती है। गॉसे का यह नियम केवल तब ही लागू होगा जब स्थान या भोजन सीमाकारी (limiting) हो जायेंगे अन्यथा स्पर्धा  का यह नियम लागू नहीं होगा।

आधुनिक अध्ययन से यह भी ज्ञात हुआ है कि जब दो जातियाँ स्पर्धा करती हैं तब एक विलुप्त नहीं होती वरन् यह इस प्रकार के अनुकूलन विकसित कर लेती है जिससे दोनों का एक साथ अस्तित्व बना रहता है। इस प्रकार की क्रियाविधि को ‘संसाधन विभाजन’ कहते हैं। यदि दो जातियां एक ही संसाधन के लिये स्पर्धा करती हैं तो वे आहार के लिये भिन्न समय या भिन्न चारण प्रतिरूप चुनकर स्पर्धा से बच सकती हैं।

मैक आर्थर (Mac Arthur) ने बताया कि एक ही पेड़ पर रह रही फुदकी (Warblers) की पांच जातियां स्पर्धा से बचने में सफल रहीं और पेड़ की शाखाओं और वितान पर कीट शिकार के लिये तलाशने की अपनी चारण गतिविधियों में व्यावहारिक भिन्नताओं के कारण साथ-साथ रह सकीं।

मृदा (Soil)-भूमि की ऊपरी उपजाऊ सतह को मृदा कहते हैं। पौधों तथा जंतुओं के लिए मृदा प्राकृतिक आवास होता है। जीवधारियों को मृदा से जल एवं खनिज लवण प्राप्त होते हैं। विभिन्न स्थानों की मृदा की प्रकृति और गुण में भिन्नता होती है। मृदा का निर्माण कठोर चट्टानों के अपक्षय (weathering) के कारण होता है। यह अपक्षय प्रक्रिया भौतिक, रासायनिक व जैविक प्रकार की होती है।

इन अपक्षयित पदार्थों से मृदा का निर्माण होता है जिसे मृदाजनन (Pedogenesis) कहते हैं। इन कणों में अनेक जीवधारी व पादपों के भाग (पत्तियां, जड़ें, भूमिगत भाग इत्यादि) मृत्यु के पश्चात् कार्बनिक पदार्थों में रूपातंरित होकर मिल जाते हैं जिससे वास्तविक मृदा या उर्वर मृदा का निर्माण होता है। निर्माण के आधार पर मृदा दो प्रकार की होती-
(i) अवशिष्ट मृदा (Residual soil) – जिन चट्टानों के अपक्षय से मृदा कण बनते हैं, यदि वह मृदा उसी स्थान पर रहती है तो उसे अवशिष्ट मृदा कहते हैं।

(ii) वाहित मृदा (Transported soil) – निर्माण स्थल से जब मृदा किन्हीं कारकों द्वारा अन्य स्थानों पर पहुंच जाती है तो उसे वाहित मृदा कहते हैं। हवा द्वारा लायी गयी मृदा इओलियन मृदा (Eolian soil), गुरुत्व द्वारा लायी गई मृदा कोल्युवियल मृदा (Colluvial soil), जल द्वारा बहाकर लायी गई मृदा को एल्युवियल मृदा (Alluvial soil) तथा ग्लेशियरों के पिघलने से लायी गयी मृदा ग्लेसियल मृदा (Glacial soil) कहते हैं।

मृदा का अध्ययन विज्ञान की जिस शाखा में किया जाता है उसे मृदा विज्ञान (Pedology) कहते हैं। मृदा के तीन संस्तर (horizon) होते हैं-

  • शीर्ष मृदा (Top soil or ‘A’-horizon)-यह मृदा की सबसे ऊपरी परत है जिसमें बालू (sand) और ह्यूमस (humus) होता है। पौधों की जड़ें प्राय: इसी संस्तर में रहती हैं।
  • उपमृदा (Subsoil or ‘B’-horizon)-शीर्ष मृदा के नीचे वाले स्तर को उपमृदा कहते हैं, इसमें चिकनी मिट्टी होती है। वर्षा का जल रिसकर इस स्तर में एकत्रित होता रहता है। इसमें ह्यूमस व वायु की मात्रा कम होती है तथा इस संस्तरण में जीव भी नहीं पाये जाते हैं।
  • ‘C’ संस्तर (C’-horizon) – यह संस्तर ‘B’ के नीचे होता है। इसमें अपूर्ण क्षरित चट्टानें होती हैं तथा ह्यूमस एवं सूक्ष्मजीवों का अभाव होता है। इस संस्तर के नीचे बिना अपक्षयित मातृ चट्टानें होती हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित को समझाइये-
(क) समतापीय प्राणियों में उच्चताप के प्रति होने वाली अनुक्रियायें ।
(ख) चारघातांकी वृद्धि को सचित्र बताइये ।
उत्तर:
(क) समजात प्राणियों में उच्च ताप के प्रति होने वाली अनुक्रियाएँ – समतापीय प्राणियों में उच्च ताप के प्रति होने वाली अनुक्रियाएँ ( responses ) निम्न प्रकार से होती हैं-
(1) कम उपत्वचीय वसा (Less subcutaneous fat) – वे प्राणी जो प्रायः अधिक ताप वाले क्षेत्रों में रहते हैं, उनमें त्वचा में संचित वसा की मात्रा कम होती है। इसी कारण रेगिस्तानी प्राणियों में वसा कूबड़ (hump) में उपस्थित होती है।

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(2) लोमचर्म का झुकना (Lowerdown of pelage) – उत्थापक पेशी के शिथिलन के कारण, लोमचर्म पुनः सामान्य हो जाता है जिससे रोम के मध्य कोई वायु नहीं रहती है। इस कारण ऊष्मा का ह्रास विकिरणों के रूप में हो जाता है परन्तु ताप के और अधिक बढ़ जाने के कारण ऊष्मा का ह्रास विकिरणों के रूप में नहीं होता है बल्कि त्वचा अवरोधक का कार्य करती है।

(3) पृष्ठीय रक्तवाहिनियों का प्रसारित होना (Dialation of superficial blood vessels) – पृष्ठीय रक्तवाहिनियों के प्रसारित होने से रक्त समूह के निकट आ जाता है, जिससे वातावरण में ऊष्मा का ह्रास हो जाता है, सेतु वाहिनियाँ संकुचित हो जाती हैं, जिससे कुल रक्त का आयतन बढ़ जाता है। इस कारण भी सतह पर रक्त का प्रभाव बढ़ जाता है।

(4) पसीने का स्राव ( Secretion of Sweat ) – शरीर का ताप बढ़ने के साथ ही स्वेद ग्रंथियों द्वारा पसीने का स्राव होता है, जिसके वाष्पीकरण से शरीर का तापमान कम हो जाता है। वाष्पीकरण की दर प्रवाहित वायु के द्वारा भी प्रभावित होती है। इस क्रिया में ऊष्मा का ह्रास फेफड़ों से वाष्पीकरण द्वारा होता है, साथ ही रक्त के फुफ्फुसीय कोशिकाओं (pulmonary capillary) में प्रवाहित होने के कारण, ऊष्मा का कुछ ह्रास रक्त के द्वारा भी होता है।

(5) उपापचय का मंद होना (Fall of metabolism) – तापमान अधिक होने से प्राणियों में उपापचय दर कम हो जाती है व कम ऊष्मा का उत्पादन होता है। अतः ये प्राणी कम सक्रिय रहते हैं। स्तनधारियों में ताप का नियमन हाइपोथेलेमस द्वारा होता है। इसके अतिरिक्त इन प्राणियों में लम्बे कान होते हैं, जो एक रेडियेटर का कार्य करते हैं व ये रात्रिचर आवास के होते हैं।

(ख) चरघातांकी वृद्धि (Exponential growth) को सचित्र बताइये –
समष्टि में व्यष्टियों की संख्या का बढ़ना समष्टि वृद्धि (Population growth) कहलाता है। वैसे किसी भी जाति के लिये समष्टि का आकार स्थितिक (static) नहीं होता है। यह समय-समय पर बदलता रहता है जो विभिन्न कारकों जैसे आहार उपलब्घता, परभक्षण दाब और मौसमी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

यदि उपरोक्त दशाएँ अनुकूल होती हैं तो समष्टि की वृद्धि होती है परंतु प्रतिकूल दराओं के होने पर समध्टि की हानि होती है। किसी आवास में समष्टि का घनत्व चार मूलभूत प्रक्रमों में घटता व बढ़ता है। इन चारों में से जन्म दर व आप्रवासन (migration) समष्टि घनत्व को बढ़ाते है अरकि मृत्युदर तथा उत्प्रवासन (Emigration) इसे घटाते हैं।
(i) जन्म दर (Natality) समस्त जीव प्रजनन क्रिया द्वारा अपनी संतति में वृद्धि करके समष्टि में वृद्धि करते हैं अतः एक निश्चित अवधि में किसी समष्टि द्वारा उत्पन्न नये जोवों की औसत संख्या को उस समष्टि की जन्म दर कहते हैं।

(ii) मृत्यु दर (Death rate or Mortality)—समष्टि में सभी जीव एक निश्चित समय उपरांत मरते हैं अतः एक निश्चित अव्वि में समष्टि में मरने वाले जीवों की संख्या को मृत्यु दर कहते हैं। इससे समष्टि में कमी आती है।

(iii) आप्रवासन या अन्तःप्रवास (Immigration)- किसी स्थान पर एक जाति के जीवों का आगमन अन्तःप्रवास कहलाता है। इस प्रकार के प्रवास में किसी क्षेत्र में अंदर की ओर केवल एक तरफ गति होती है। इस प्रक्रिया फलस्वरूप आये हुये जीव वापस न तो लौटते हैं व न ही इरादा रखते हैं।

(iv) उत्प्रवासन या बहि:प्रवास (Emigration)-इस प्रक्रिया में जीवों का गमन आवास को छोड़कर अन्य स्थान की ओर होता है या एक देश से दूसरे देश की ओर होता है। अतः एक क्षेत्र से जाति के निकास को उत्प्रवासन कहते हैं। यह निकास स्थायी होता है क्योंकि ये जीव वापस पूर्व स्थान की और नहीं लौटते हैं।

इसलिये यदि समय t पर समष्टि धनत्व N है तो समय t+I पर इसका घनत्व
Nt+I = N1 + [(B+I) -(D+E)]
N1 = एक समय पर समष्टि घनत्व, B = जन्म दर (Birth rate), I = आप्रवासन (Immigration), D = मृत्यु दर (Death rate), E = उत्त्रवासन (Emigration) है।

उपरोक्त समीकरण को देखने पर हम यह कह सकते है कि यदि जन्मदर व आप्रवासन अधिक हो रहा है तब समष्टि घनत्व बढ़ जायेगा परंतु मृत्युदर व उत्त्रवासन अधिक होने पर समष्टि घनत्व घट जायेगा। सामान्यतः समष्टि घनत्व को जन्म दर व मृत्यु दर ही प्रभावित करते हैं। उत्प्रवासन व आप्रवासन इसे कम प्रभावित करते हैं परंत ऐसे समय में जब कहीं नया आवास बना हो तब वहाँ का समष्टि घनत्व जन्म दर से न बढ़कर बल्कि आप्रवासन से बढ़ेगा।
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वृद्धि मॉडल (Growth Model)-वृद्धि मॉडल के दो प्रारूप होते हैं-चरघातांकी वृद्धि तथा संभार तंत्र वृद्धि।

(अ) चरघातांकी वृद्धि (Exponential growth)-किसी भी समष्टि की निरंतर वृद्धि के लिये पर्याप्त संसाधन (आहार और स्थान) उपलब्ध होना आवश्यक है। यदि यह दोनों उपलब्ध हैं तब समष्टि की वृद्धि अबाधित रूप से चलती रहेगी। इसे डार्विन ने अपने प्राकृतिक वरण के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुये बताया था। ऐसी स्थिति में समष्टि चरघातांकी या ज्यामितीय (geometrical) शैली में वृद्धि करती है। यदि समष्टि घनत्व N में प्रति व्यक्ति जन्म दर को b से व प्रति व्यक्ति मृत्यु दर को d से दर्शाएं तब दिये गये समय t में वृद्धि की कमी या अधिकता को निम्न समीकरण द्वारा दर्शा सकते हैं-
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r = प्राकृतिक वृद्धि की इंट्रीन्जिक दर (intrinsic rate of natural increase) कहते हैं।
N = समष्टि का आकार
r का मान अलग-अलग समष्टियों के लिये अलग-अलग होता है, जैसे नार्वे चूहे के लिये r 0.015, आटा भृंग (floor betel) के लिये 0.12 तथा मानव आबादी के लिये 0.0205 होता है (1981 की गणना के अनुसार)। उपरोक्त दी गई समीकरण समष्टि के चरघातांकी था ज्यामितीय वृद्धि को बताता है।
और जबN को समय के संदर्भ में आरेखित करते हैं तो इससेJ-आकार का वक्र बनता है। अतः हम चरघातांकी समीकरण समाकलीय रूप से निम्न प्रकार से बता सकते हैं-
Nt = Noert
Nt  = समय t में समष्टि घनत्व
No = समय शून्य में समष्टि घनत्व

r = प्राकृतिक वृद्धि की इंट्रीन्जिक दर (आंतरिक दर)
e = प्राकृतिक लघुगणकों (logarithms) का आधार (2.71828)
असीमित संसाधन परिस्थितियों में चरघातांकी रूप से वृद्धि करने वाली कोई भी जाति कुछ ही समय में विशाल समष्टि घनत्वों तक पहुंच सकती है। डार्विन ने बताया कि हाथी जैसा धीमे बढ़ने वाला प्राणी, किसी प्रकार की रोक न होने पर विशाल संख्या तक पहुँच सकता है।
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(ब) संभार तंत्र (Logistic growth)-प्रकृति में किसी भी समष्टि के पास इतने असीमित संसाधन नहीं होते जिससे कि चरघातांकी वृद्धि होती रहे। इसके कारण सीमित संसाधनों के लिये व्यष्टियों में प्रतिस्पर्धा होती है। प्रतिस्पर्धा के कारण अन्त में ‘योग्यतम’ व्यष्टि जीवित रह पाती है और जनन करती रहती है। इस प्रकार के वृद्धि प्रारूप में समष्टि की सजीव संख्या में प्रारम्भ में तो धीरे-धीरे वृद्धि होती है, इसे पश्चता प्रावस्था (Lag Phase) कहते हैं।

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परन्तु इसके पश्चात् वृद्धि की दर तेजी से बढ़ती है। समष्टि की तेजी से वृद्धि होने पर वातावरणीय प्रतिरोध बढ़ जाने के कारण एक संतुलन स्तर या स्थिर अवस्था (Stationary Phase) स्थापित हो जाती है। यदि इस प्रकार की वृद्धि प्रदर्शित कर रही समष्टि एवं समय के मध्य एक आरेख बनाया जावे तो एक S – आकार का वक्र बनता है। इस वक्र को सिग्माइड वक्र (Sigmoid curve) कहते हैं। इस प्रकार की समष्टि वृद्धि विर्हुस्ट-पर्ल लॉजिस्टिक वृद्धि (Verhulst-Pearl logistic growth) कहलाती है। इसे निम्न समीकरण द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है-
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अधिकतर प्राणियों की समष्टियों में वृद्धि हेतु संसाधन सीमित होते हैं और धीरे-धीरे और अधिक सीमित होते जायेंगे। इस कारण से लॉजिस्टिक वृद्धि मॉडल को अधिक यथार्थपूर्ण माना जाता है।

प्रश्न 3.
पारिस्थितिकी के जैविक कारकों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर:
सजीवों के समस्त जैविक क्रियाओं तथा अन्योन्यक्रियाओं के प्रभाव को जैविक कारक कहते हैं। ओडम ने समस्त जैविक सम्बन्धों को धनात्मक तथा ऋणात्मक अन्योन्यक्रियाओं में बाँटा है।
I. धनात्मक अन्योन्यक्रियाएँ (Positive interactions ) – इस प्रकार की क्रियाओं में एक या दोनों जातियों को लाभ पहुँचता है। ये तीन प्रकार की होती हैं-
(अ) सहोपकारिता (Mutualism) – इसमें दोनों जातियों को लाभ पहुँचता है तथा जीवनयापन हेतु दोनों का साथ आवश्यक है। उदा. – शैक, सहजीवी नाइट्रोजन स्थिर कारक, कवकमूल साहचर्य आदि । कुछ उच्च श्रेणी के पौधों की मूलों व कवक में साहचर्य होता है, इसे कवकमूल साहचर्य कहते हैं। उदा. पाइनस, ओक, हिकरी, बीच · आदि। इनमें कवक जल व खनिज लवणों का अवशोषण कर पौधे को उपलब्ध करवाता है तथा मूल कवक को भोजन प्रदान करते हैं। इस प्रकार के पौधों की मूल में मूलरोमों का अभाव होता है।

(ब ) प्राक् सहयोगिता (Protocooperation)-इसमें दोनों समष्टियों को लाभ होता है परंतु जीवनयापन हेतु साथ रहना आवश्यक नहीं होता है। उदा. समुद्री एनिमोन तथा हर्मिट केंकड़े के बीच इसी प्रकार का सम्बन्ध होता है। समुद्री एनिमोन केंकड़े के कवच से चिपका रहता है जो इसे भोजन के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है तथा समुद्री एनिमोन अपनी दंश कोशिकाओं के हर्मिट केंकड़े को शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
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(स) सहभोजिता (Commensalism) – इस साहचर्य में दोनों में से केवल एक को लाभ होता है लेकिन हानि किसी को नहीं होती है। अधिपादप तथा कंठलताएँ इसका उपयुक्त उदाहरण हैं। अधिपादप स्वपोषी होते हुए भी अन्य पौधों पर उगते हैं। ये वेलामेन (Velamen) मूल द्वारा आर्द्रता को ग्रहण करते हैं तथा प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं।

उदा.- वैन्डा तथा आर्किड्स । हरित शैवाल बेक्लेडिया (Basicladia) अलवणीय जल में पाये जाने वाले कछुए के कवच पर उगता है, यह अधिजन्तु का उदाहरण है। कंठलताएँ काष्ठीय आरोही पौधे हैं जो पृथ्वी पर उगकर अन्य पेड़ों का सहारा लेकर ऊपर चढ़ते हैं तथा उनके शीर्ष भागों पर फैल जाते हैं ताकि उन्हें उचित प्रकाश प्राप्त हो उदा. टीनोस्पोरा, बिग्नोनिया, बोगेनविलिया आदि ।

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II. ऋणात्मक अन्योन्यक्रियाएँ (Negative interactions) – इस प्रकार का सहजीवन जिसमें एक या दोनों जीव को हानि पहुँचती है। इन्हें ऋणात्मक अन्योन्यक्रियाएँ या विरोध ( antagonism) कहते हैं। ऐसे सम्बन्धों को तीन वर्गों में विभक्त किया गया है –
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(अ) शोषण (Exploitation) – इसमें एक जीव अन्य जीव को आधार, आश्रय या भोजन हेतु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उपभोग करके हानि पहुँचाता है। भोजन के लिए शोषण दो प्रकार का होता है-
(i) परजीविता (Parasitism) – वे जीव जो भोजन के लिए अन्य जीव पर निर्भर रहते हैं, उन्हें परजीवी कहते हैं तथा जिससे भोजन प्राप्त करते हैं उसे परपोषी (host) कहते हैं। परजीवी, परपोषी से चूषकांग (haustoria) की सहायता से भोजन चूसते हैं।

परजीवी दो प्रकार के होते हैं- बाह्य परजीवी (Ectoparasite) – ऐसे परजीवी, परपोषी के बाहर रहते हैं किन्तु चूषकांगों को परपोषी की कोशिका में प्रवेश करा देते हैं। उदा. – अमरबेल, कसाईथा (Cassytha) आदि । ऐसे परजीवी जब परपोषी की मूलों से भोजन प्राप्त करते हैं तो मूल परजीवी कहलाते हैं।

ये आंशिक या पूर्ण मूल परजीवी हो सकते हैं, जैसे चंदन, शीशम, सीरस की जड़ों पर आंशिक परजीवी होता है। स्ट्राइगा घासों पर तथा ऑरोबैंकी, सोलेनेसी व क्रूसीफेरी कुल के पादपों की जड़ों पर पूर्ण मूल परजीवी होते हैं। वे परजीवी जो परपोषी के स्तम्भ से अपना भोजन प्राप्त करते हैं, जैसे अमरबेल, बेर, आक आदि पर पूर्ण स्तम्भ परजीवी होता है ।

कसाई था नीम पर पूर्ण स्तम्भ परजीवी तथा लोरेन्थस व विस्कम क्रमशः बोसविलीया (Boswellia) व पाइनस पर आंशिक स्तम्भ परजीवी होता है। अन्त: परजीवी (Endoparasite ) – इसमें परजीवी, परपोषी की कोशिकाओं के अन्दर रहते हैं, जैसे विषाणु, जीवाणु, माइकोप्लाज्मा आदि।

(ii) परभक्षिता (Predation ) – कुछ जीव अन्य जीवों को भोजन के लिए उपयोग करते हैं। प्रायः परभक्षी जन्तु होते हैं जो शाकाहारी या मांसाहारी हो सकते हैं। कवक डेक्टिलेला तथा जुफेगस आदि कीटों, गोलकृमि आदि को खाते हैं। कुछ कीटभक्षी पादप जैसे नेपेन्थीज, ड्रोसेरा, यूट्रीकुलेरिया, डायोनिया आदि प्रायः नाइट्रोजन की कमी व जलाक्रांत मृदा में उगते हैं। ये पौधे अपने विशेष अंगों की सहायता से कीटों को खाते हैं।

(ब) प्रतिजीविता (Antibiosis ) – इसमें एक जीव द्वारा कुछ रासायनिक पदार्थों का स्रवण किया जाता है जिससे दूसरे जीव की वृद्धि पूर्ण या आंशिक रूप से अवरुद्ध हो जाती है या उसकी मृत्यु हो जाती है, इसे प्रतिजीविता कहते हैं। कुछ उच्च श्रेणी पादपों की जड़ों से ऐसे रसायनों का स्रवण होता है जिससे दूसरे जाति के पौधों के बीजों के अंकुरण संदमित हो जाते हैं, इसे एलीलोपैथी (allelopathy) कहते हैं। उदा.- एरिस्टिडा घास फीनोल जैसे पदार्थों का स्रवण कर नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणु व शैवालों की वृद्धि को रोक देती है ।
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(स) स्पर्धा (Competition ) – पर्यावरण की समान आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए जीवों में स्पर्धा उत्पन्न होती है। यह स्पर्धा मुख्यतः जल, प्रकाश, पोषक तत्वों व आश्रय के लिए होती है। यह स्पर्धा जब एक ही जाति के पादपों के बीच होती है तो उसे अन्तरजातीय स्पर्धा कहते हैं। दो भिन्न जातियों के बीच होने वाली स्पर्धा को अन्तरजातीय स्पर्धा कहा जाता है।

प्रश्न 4.
तापमान पौधों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
सामान्यतः पौधे 0° से. से 52° से. तापमान परिसर में अपनी समस्त जैविक क्रियाओं को संचालित करते हैं किन्तु 20° से. से 30° से. का तापमान पादप वृद्धि हेतु अनुकूल होता है। तापमान पौधों को अग्र प्रकार से प्रभावित करता है-
1. उपापचयी क्रियाएँ (Metabolic activities) – जीवों की समस्त उपापचयी क्रियायें तापमान की एक निश्चित परास के अन्दर एन्जाइमों की सहायता से होती हैं। प्रत्येक 10° से. तापमान बढ़ने पर रासायनिक क्रिया दुगुनी हो जाती है। इसे Q10 या तापमान गुणांक कहते हैं। अधिक ताप पर एन्जाइम विकृत हो जाते हैं।

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2. वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)- अधिक तापमान पर वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है तथा कम तापमान पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

3. अवशोषण (Absorption ) – स्थलीय पौधों में जड़ों द्वारा अवशोषण 20° से. से 30° से. के बीच सबसे अधिक होता है। 0° से. के आसपास अवशोषण प्रायः रुक जाता है। 0° से. पर जल बर्फ में बदल जाता है। इस प्रकार के आवास स्थल कार्यिकी शुष्क होते हैं।

4. प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis ) – प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया प्राय: 5° से. ताप पर आरम्भ हो जाती है किन्तु इस क्रिया के लिए अनुकूलतम तापमान 10° से. से 30° से. है। एक सीमा तक ताप वृद्धि के पश्चात् प्रकाश संश्लेषण क्रिया में भारी गिरावट आती है क्योंकि अधिक ताप पर प्रकाश संश्लेषणीय एन्जाइम्स विकृत हो जाते हैं।

5. श्वसन (Respiration ) – श्वसन क्रिया पर तापमान का प्रभाव 0° से. से 40° से. के मध्य होता है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता जाता है श्वसन दर कम हो जाती है। इसमें भी उच्च ताप पर श्वसनीय एन्जाइम नष्ट हो जाते हैं।

6. गति ( Movement ) – पौधों में तापानुचलनी (thermotactic) व तापानुकुंचनी ( thermonastic ) गतियाँ ताप के उद्दीपन के कारण होती हैं।

7. तापकालिता (Thermoperiodism ) – पौधों की कुछ कार्यिक क्रियायें तापमान के दैनिक चक्र द्वारा प्रभावित व नियंत्रित होती हैं। उदाहरण के लिए, टमाटर में पुष्पन तभी होता है जब तापमान परास (range) 18° से. से 26° से. के बीच की होती है। इस प्रकार के तापक्रम को तापकालिता कहते हैं।
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8. बसन्तीकरण (Vernalisation)- कुछ पौधों में पुष्पों का निर्माण न्यून ताप पर होता है। बीज पर शीत या न्यून ताप का प्रयोग द्वारा पुष्पीकरण शीघ्र प्राप्त करने की क्रिया को बसन्तीकरण कहते हैं, किन्तु इसके लिए ऑक्सीजन की उपस्थिति आवश्यक है। वैज्ञानिकों के अनुसार बसन्तीकरण में वर्नेलिन नामक पदार्थ बनता है जो फ्लोरीजन (florigen ) या जिबरेलिन (gibberellin) में परिवर्तित हो जाता है। यह पुष्पीकरण को समय से पूर्व प्रारम्भ करने के लिए उत्तरदायी होता है।

9. पादप वृद्धि पर प्रभाव (Effect on plant growth) – अधिक व कम ताप दोनों ही पादप वृद्धि को अधिक प्रभावित करते हैं। न्यून या कम ताप से पौधों में तीन प्रकार की शीत क्षति (cold injury) हो सकती है-

  • निर्जलीकरण (dessication),
  • द्रुतशीतलन क्षति (chilling injury) तथा
  • प्रशीतलन क्षति ( freezing injury)

प्राय: 40° से. ताप पर जीवद्रव्य न्यूनतम क्रिया करने लगता है तथा 90° से. पर निष्क्रिय या मृत हो जाता है। इसे ऊष्मा क्षति (heat injury) कहते हैं। अतः न्यून या उच्च तापक्रम पर पौधे या तो प्रसुप्त रहते हैं या फिर मृत हो जाते हैं। अनेक मरुस्थलीय पौधे आकारिकीय, शारीरिकीय व कार्यिकीय अनुकूलन उत्पन्न कर 66° से. ताप पर भी जीवित रहते हैं। इन पौधों को ऊष्मा प्रतिरोध (heat resistant) कहते हैं। यद्यपि हवा में सूखी यीस्ट कोशिकाएँ 114° से. तथा जीवाणु 120° से. से 130° से. तक कार्यशील बने रह सकते हैं। कुछ कवक तो 89° से. ताप पर भी जीवित रहते हैं।

10. वनस्पति के विस्तार पर प्रभाव (Effect on distribution of vegetation) – तापक्रम का वनस्पति के विस्तारण पर भी प्रभाव पड़ता है । ताप के आधार पर समस्त वनस्पति को उच्चतापी, मध्यतापी, निम्नतापी तथा अतिनिम्नतापी या हैकिस्टोथर्म में विभक्त किया गया है। भूमध्य रेखा से उत्तरी या दक्षिणी ध्रुवों की ओर जैसे-जैसे अक्षांश बढ़ते जाते हैं त्यों- त्यों तापमान कम होता जाता है। इसी प्रकार समुद्र से पहाड़ों की ओर ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान कम होता जाता है। दोनों ओर लगभग समान प्रकार की वनस्पति समूह मिलते हैं जैसे उष्णकटिबन्धीय वर्षा सदाबहार वन, उष्णकटिबन्धीय वन, शंकुधारी वन, अल्पाइन वनस्पति आदि ।

प्रश्न 5.
पौधों पर प्रकाश के प्रभाव बताइए।
उत्तर:
प्रकाश का मुख्य स्रोत सूर्य है। सूर्य विकिरण का केवल 390nm से 760nm तक का दृश्यमान वर्णक्रम ही दृश्य प्रकाश (visible light) कहलाता है तथा इसे ही प्रकाश संश्लेषी सक्रिय विकिरण (PAR) कहते हैं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रकाश के नीले (430 से 470 nm) और लाल (650 से 760 nm ) भाग में अधिकतम होती है। प्रकाश की तीव्रता तथा अवधि का भी विशेष महत्त्व होता है। पादपों पर प्रकाश के निम्न प्रभाव होते हैं-
1. प्रकाश संश्लेषण पर प्रभाव (Effect on Photosynthesis) – पौधों में पर्णहरिम का निर्माण प्रकाश की उपस्थिति में होता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रकाशीय क्रिया में प्रकाश का महत्त्वपूर्ण योगदान है। प्रकाशीय ऊर्जा के आधार पर ही फोटोफोस्फोराइलेशन क्रिया द्वारा ATP अणुओं का निर्माण होता है तथा जल का प्रकाश अपघटन द्वारा सह एन्जाइम NADPH बनता है। प्रकाश संश्लेषण की अप्रकाशी अभिक्रिया में CO2 के स्थिरीकरण हेतु NADPH, महत्त्वपूर्ण होते हैं।

2. वाष्पोत्सर्जन पर प्रभाव (Effect on transpiration) – पौधों में रंध्रों का खुलना व बन्द होना प्रकाश पर आधारित है। रंध्र के द्वारा गैसों तथा जलवाष्प का विनिमय होता है। तीव्र प्रकाश में पर्णरंध्र खुल जाते हैं तथा वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। वाष्पोत्सर्जन की दर पर ही अवशोषण तथा रसारोहरण की दर निर्भर करती है।

3. श्वसन व पादप वृद्धि पर प्रभाव (Effect on respiration and plant growth) – अनेक पौधों में प्रकाश की तीव्रता में श्वसन दर बढ़ जाती है। श्वसन में वृद्धि प्रकाश के कोशिका झिल्ली का पारगम्यता तथा जीवद्रव्य की श्यानता ( viscocity) पर प्रभाव के फलस्वरूप होती है।

पौधों की अनेक क्रियायें जैसे बीजों का अंकुरण, नवोद्भिद की वृद्धि, कलियों का खिलना, प्ररोह की शीर्ष वृद्धि आदि क्रियायें प्रकाश द्वारा प्रभावित होती हैं। प्रकाश की अनुपस्थिति में नवोद्भिद पीला रहकर पाण्डुरित (etiolated) रह जाता है, इसे पाण्डुरिता (etiolation ) कहते हैं। पादप वृद्धि हार्मोन्स तथा फ्लोरीजन (पुष्पीय हार्मोन) के निर्माण में भी प्रकाश महत्त्वपूर्ण है।

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4. पादप वितरण पर प्रकाश का प्रभाव (Effect of light on plant distribution ) – पौधों के वितरण तथा वनस्पति के स्तरीकरण में प्रकाश एक महत्त्वपूर्ण कारक है। जलीय तंत्र में भी पादप वितरण प्रकाश की उपस्थिति व तीव्रता से नियंत्रित होता है। फलस्वरूप जल में वनस्पति के भिन्न-भिन्न क्षेत्र (जैसे- वेलांचल, सरोवरी तथा गंभीर क्षेत्र) बन जाते हैं।

5. प्रकाश का पौधों की आन्तरिक रचना पर प्रभाव (Effect of light on internal structure of plants) प्रकाश के आधार पर पौधों की आन्तरिक संरचना में अन्तर आता है। द्विबीजपत्री पौधों की पृष्ठाधारी पत्तियों में पर्णमध्योतक का खम्भ ऊतक तथा स्पंजी मृदूतक में विभेदन दोनों सतह पर प्रकाश के असंगत वितरण के कारण होता है।

एकबीजपत्री पौधों की पत्तियों को दोनों पार्श्व सतह को बराबर सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है अतः उनके पर्णमध्योतक में इस प्रकार का विभेदन नहीं पाया जाता है। जलीय तंत्र में प्रकाश एक सीमाकारक है। इसमें प्रकाश की उपलब्धता अधिकांश जैविक क्रियाओं को नियंत्रित करती है।

झील, समुद्र तथा गहरे जलीय तंत्र में प्रकाश की उपलब्धता तथा इसकी मात्रा उत्पादक व उपभोक्ता जीवों के प्रकार व जीव संख्या को निर्धारित करती है। जैसे अधिकतर पादप्लवक ( phytoplankton ) जल की सतह पर रहते हैं जहाँ उन्हें प्रकाश प्राप्त होता है जबकि नितलस्थ (benthic ) जन्तु झील के तलछट पर या तलछट के भीतर रहते हैं।
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प्रश्न 6.
स्थलाकृतिक कारक क्या होते हैं? पौधों को प्रभावित करने वाले स्थलाकृतिक कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूमि या स्थल की आकृति जैसे तुंगता, घाटियाँ, पर्वतों की दिशायें आदि स्थलाकृतिक कारक होते हैं। अक्षांश, समुद्रतल से ऊँचाई या तुंगता ( altitude) भूमध्यरेखा से दूरी तथा ढाल एवं पर्वतों की. दिशा, घाटियाँ आदि का पौधों के प्रकार व उनके वितरण पर प्रभाव होता है। स्थलाकृतिक कारक मुख्यरूप से चार प्रकार के होते हैं-
1. तुंगता या ऊँचाई ( Altitude) – प्राय: किसी स्थान की समुद्रतल से ऊँचाई बढ़ने पर ताप कम हो जाता है। यह देखा गया है कि समुद्रतल से प्रत्येक 165 मीटर की ऊँचाई पर तापमान 1° से. गिर जाता है। इस प्रकार प्रत्येक 1000 मीटर की ऊँचाई पर लगभग 6-7° से. तक तापमान कम हो जाता है परन्तु वर्षा अधिक होती है।

प्रत्येक 1000 से 1500 मीटर की ऊँचाई पर वनस्पति में सुस्पष्ट परिवर्तन आते हैं। पश्चिमी हिमालय के ढलान के अध्ययन से ज्ञात होता है कि प्रथम 1200 मीटर की ऊँचाई पर मिश्रित पर्णपाती वन, 1200-3300 मीटर तक शंकुधारी वन तथा ऊँचाई के साथ-साथ रोडोडेन्ड्रोन पौधे पाये जाते हैं। 3600 मीटर पर वन समाप्त हो जाते हैं। 4200 मीटर की ऊँचाई पर अल्पाइन क्षेत्र होता है जिसके नीचे कुछ मॉस, शैक आदि पाये जाते हैं। सबसे अधिक ऊँचाई पर अल्पाइन किस्म की वनस्पतियाँ मिलती हैं तथा इससे भी अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्र वनस्पति रहित होते हैं।

2. ढाल (Slope) – पर्वतों पर ढाल होती है। वर्षा के समय इन ढलानों पर जल बहकर नीचे आ जाता है तथा मृदा में इसका रिसाव नहीं हो पाता है । फलस्वरूप इन ढलानों पर वनस्पति का पूर्ण अभाव रहता है या कुछ झाड़ीनुमा मरुद्भिद् वनस्पति मिलती है, जैसे अगेव, यूफोर्बिया आदि।

3. ढाल का अनावरण (Exposure of slope ) – पर्वतों के दक्षिण अभिमुखी ढालों पर उत्तर अभिमुख ढालों की अपेक्षा अधिक धूप तथा गर्मी पड़ती है। इसी कारण दक्षिणी ढलानों पर मरुद्भिद् वनस्पति तथा उत्तरी ढलानों पर वन तथा सतही वनस्पति अधिक संख्या में होती है।
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4. पर्वतों की दिशा (Direction of mountains) – पर्वत दिशाओं का जलवायु तथा वनस्पति दोनों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। ये हवाओं को निश्चित दिशा में मोड़कर वात उत्पन्न करते हैं। दिशा के अनुसार पर्वतों को प्राप्त होने वाली प्रकाश की मात्रा, वायु तथा वायुमण्डलीय आर्द्रता में परिवर्तन आते हैं। ऊँचे पर्वतों से जैसे ही मानसूनी हवाएँ टकराती हैं, उससे वर्षा होती है।

यही कारण है कि बाहरी हिमालय सघन वनों से ढँका हुआ है ताकि यहाँ समोद्भिद् प्रकार की वनस्पति की बाहुल्यता होती है। मध्य व केन्द्रवर्ती हिमालय तुलनात्मक शुष्क है तथा यहाँ मरुद्भिद् प्रकार की वनस्पति मिलती है। यही कारण है कि ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं को जलवायु अवरोध (climatic barriers) कहते हैं।
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वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. निम्नलिखित में से कौन एक जीव संख्या का एक गुण नहीं है? (NEET-2020)
(अ) जन्म दर
(ब) मृत्यु दर
(स) जाति परस्पर क्रिया
(द) लिंग अनुपात
उत्तर:
(स) जाति परस्पर क्रिया

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2. निम्नलिखित में से कौनसा पादप शलभ की एक जाति के साथ ऐसा निकट सम्बन्ध दर्शाता है, जिसमें कोई भी एक-दूसरे के बिना अपना जीवन चक्र पूरा नहीं कर सकता? (NEET-2018)
(अ) केला
(ब) भुक्का
(स) हाइड्रिला
(द) वायोला
उत्तर:
(ब) भुक्का

3. श्वसन मूल किससे होते हैं? (NEET-2018)
(अ) माँसाहारी पादपों में
(ब) स्वतंत्र-अल्पलावक जलोद्भिद् में
(स) लवणमृदोद्भिद् में
(द) जलमान जलोद्भिद् में
उत्तर:
(स) लवणमृदोद्भिद् में

4. निकेत क्या है? (NEET-2018)
(अ) तापमान का वह परास जो जीव को रहने के लिए चाहिए
(ब) वह भौतिक स्थान जहाँ एक जीवधारी रहता है
(स) जीव के पर्यावरण में सभी जैविक कारक
(द) एक जीव द्वारा निभाई गई कार्यात्मक भूमिका, जहाँ वह रहता है।
उत्तर:
(द) एक जीव द्वारा निभाई गई कार्यात्मक भूमिका, जहाँ वह रहता है।

5. निम्नलिखित में से चिकित्सा विज्ञान में प्रतिजैविक के उत्पादन के लिए समष्टि की कौनसी पारस्परिक क्रिया बहुदा प्रयोग की जाती है? (NEET-2018)
(अ) परजीविता
(ब) सहोपकारिता
(स) सहभोजिता
(द) अंतराजातीय परजीविता (एमेन्सेलिज्म)
उत्तर:
(द) अंतराजातीय परजीविता (एमेन्सेलिज्म)

6. कवकमूल किसके उदाहरण हैं? (NEET-2017)
(अ) कवकरोधन
(ब) अंतराजातीय परजीविता
(स) प्रतिजीविता
(द) सहपरोपकारिका
उत्तर:
(द) सहपरोपकारिका

7. लॉजिस्टिक वृद्धि (संभार तंत्र) में अनंतस्पर्शी कब प्रास होता है? जब- (NEET-2017)
(अ) ‘r’ की मान शून्य की तरफ अग्रसर होता है
(ब) K=N
(स) K>N
(द) K<N
उत्तर:
(ब) K=N

8. सुस्पष्ट उध्ध्वाधर स्तरों में व्यवस्थित पादपों की अपनी लम्बाई के अनुसार उपस्थिति सबसे अच्छी कहाँ देखी जा सकती है? (NEET-2017)
(अ) उष्णकटिबन्धीय सवाना
(स) घास भूमि
(ब) उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन
(द) शीतोष्ण वन
उत्तर:
(ब) उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन

9. स्पर्धी अपवर्जन के नियम का प्रतिपादन किसने किया था? (NEET II-2016)
(अ) मैक्आर्थर
(ब) वरहुल्स्ट और पर्ल
(स) सी. डार्बिन
(द) जी.एफ. गॉसे
उत्तर:
(द) जी.एफ. गॉसे

10. स्पर्धी अपवर्जन का गॉसे नियम कहता है कि- (NEET-2016)
(अ) कोई भी दो स्पीशीज एक ही निकेत में असीमित अवधि के लिए नहीं रह सकती क्योंकि सीमाकारी संसाधान समान ही होते हैं।
(ब) अपेक्षाकृत बड़े आकार के जीव स्पर्धा द्वारा छोटे जन्तुओं को बाहर निकाल देते हैं।
(स) अधिक संख्या में पाए जाने वाली स्पीशीज स्पर्धा द्वारा कम संख्या में पाये जाने वाली स्पेशीज को अपवर्जित कर देगी।
(द) समान संसाधनों के लिए स्पर्धा उस स्पीशीज को अपवर्जित कर देगी जो भिन्न प्रकार के भोजन पर भी जीवित रह सकती है।
उत्तर:
(अ) कोई भी दो स्पीशीज एक ही निकेत में असीमित अवधि के लिए नहीं रह सकती क्योंकि सीमाकारी संसाधान समान ही होते हैं।

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11. निम्नलिखित में से किस पारस्परिक क्रिया में दो सभी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होते हैं? (NEET-2015)
(अ) परभक्षण
(ब) परजीविता
(स) सहोपकारिता
(द) स्पर्धा
उत्तर:
(द) स्पर्धा

12. एक ही पर्यावरण में रह रही विभिन्न स्पीशीजों की व्यट्टियों का पारस्परिक सम्बन्ध और क्रियात्मक क्रिया करना है- (NEET-2015)
(अ) जीवीय समुदाय
(ब) पारितंत्र
(स) समष्टि
(द) पारिस्थितिक निकेत
उत्तर:
(अ) जीवीय समुदाय

13. जिस प्रकार एक व्यक्ति गर्मी के मौसम में गर्मी से बचने के लिए दिल्ली से शिमला जाता है उसी प्रकार साइबेरिया और अन्य अत्यधिक ठंडे उत्तरी प्रदेशों से हजारों प्रवासी पक्षी किस ओर जाते हैं? (NEET-2014)
(अ) पश्चिमी घाट
(ब) मेघालय
(स) कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान
(द) केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान
उत्तर:
(द) केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान

14. एक स्थानबद्ध समुद्री एनीमोन केकड़े के कवच के अस्तर पर चिपक गया। यह सम्बन्ध क्या कहलाता है? (NEET-2013)
(अ) बाह्य परजीविता
(ब) सहजीविता
(स) सहयोजिता
(द) ऐमेन्सेलिज्म
उत्तर:
(ब) सहजीविता

15. नीलहरित शैवाल (सायनोबैक्टिरिया) धान के खेतों के अलावा किसके कायिक भाग के अन्दर भी पाये जाते हैं? (NEET-2013)
(अ) पाइनस
(ब) सायकस
(स) इम्वीसीटम
(द) साइलोटम
उत्तर:
(ब) सायकस

16. अमरबेल (कस्कुटा) किस एक का उदाहरण है? (Mains-2012)
(अ) बाह्य परजीविता
(ब) प्रजनन परजीविता
(स) परभक्षण
(द) अन्तःपरजीविता
उत्तर:
(अ) बाह्य परजीविता

17. नीचे दिये जा रहे आयुपिरामिड में किस प्रकार की मानव समष्टि प्रदर्शित की गई है? [CBSE PMT (Pre)-2011, NEET-2011]
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 15
(अ) गायब होती समष्टि
(ब) स्थिर समष्टि
(स) घटती समष्टि
(द) बढ़ती समष्टि
उत्तर:
(स) घटती समष्टि

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ

18. लघुगणक समष्टि वृद्धि (लॉजिस्टिक जनसंख्या वृद्धि) को किस समीकरण से अभिव्यक्त किया जाता है? [CBSE PMT (Mains)-2011, NEET-2011]
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 16
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 17
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 18
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 19
उत्तर:
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ 20

19. चारघातांकी जनसंख्या वृद्धि का सूत्र कौनसा है? (NEET-2006, Kerala PMT-2010)
(अ) rN/dN = dt
(ब) dN/dt = rN
(स) dt/dN = rN
(द) dN/rN = dt
उत्तर:
(ब) dN/dt = rN

20. निश्चित वहन क्षमता के द्वारा सीमित जनसंख्या वाली लॉजिस्टिक वृद्धि का आकार किस अक्षर के समान होगा? (DUMET-2010)
(अ) J
(ब) L
(स) M
(द) S
उत्तर:
(द) S

21. निम्नलिखित में से किस एक में क्वेरकस की जातियाँ एक प्रभावी घटक होती हैं? (NEET-2008)
(अ) स्क्रब वन
(ब) उष्णकटिबंधीय वर्षा वन
(स) शीतोष्ण पर्णपाती वन
(द) ऐल्पाइन वन
उत्तर:
(स) शीतोष्ण पर्णपाती वन

22. किसी क्षेत्र में हाथियों की समष्टि की अधिक सघनता का नतीजा क्या हो सकता है? (NEET-2007)
(अ) एक-दूसरे का परभक्षण
(ब) सहोपकारिता
(स) अन्तरजातीय प्रतिस्पर्धा
(द) अन्तर्जातीय प्रतिस्पर्धा
उत्तर:
(अ) एक-दूसरे का परभक्षण

23. आयु संरचना का ज्यामितीय प्रदर्शन क्या दर्शाता है? (NEET-2007, CBSE PMT-2007)
(अ) जैविक समुदाय
(ब) जनसंख्या
(स) भूस्खलन
(द) परिस्थितिकी
उत्तर:
(ब) जनसंख्या

24. गर्तीय रंध्र (sunken stomata) पाये जाते हैं- (Orissa JEE 2006)
(अ) मरुद्भिदों में
(ब) जलोद्भिदों में
(स) समोद्भिदों में
(द) लवणोद्भिदों में
उत्तर:
(अ) मरुद्भिदों में

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ

25. इ.पी. ओडम है- (HP PMT 2005)
(अ) ब्रायोलोजिस्ट
(ब) फिजियोलोजिस्ट
(स) इकोलोजिस्ट
(द) माइकोलोजिस्ट
उत्तर:
(स) इकोलोजिस्ट

26. छोटी मछली शार्क के निचले तल के पास चिपक जाती है और पोषण प्राप्त करती है, तो ऐसा संबंध कहलाता है- (BHU 2005)
(अ) सहजीविता
(ब) सहभोजिता
(स) परभक्षण
(द) परजीविता
उत्तर:
(ब) सहभोजिता

27. प्राणियों में शिकारियों से बचने की स्वाभाविक क्षमता होती है, गलत उदाहरण को चुनिये- (CBSE, 2005)
(अ) केमीलोन में रंग परिवर्तन
(ब) पफर मछली में हवा खींचकर बड़ा आकार
(स) सर्पों का विष
(द) माँस में मेलेनिन
उत्तर:
(स) सर्पों का विष

28. दो जातियाँ जिनमें दोनों साथी एक-दूसरे के लाभकारी होते हैं तो ऐसा संबंध कहलाता है- (HP PMT 2005)
(अ) परजीविता
(ब) सहजीविता
(स) सहभोजिता (Commensalism)
(द) परभक्षण (Predation)
उत्तर:
(ब) सहजीविता

29. निम्न में से कौनसा, वातावरण का भाग नहीं है- (MP PMT 2005)
(अ) प्रकाश
(ब) तापमान
(स) मृदीय कारक
(द) अवक्षेपण
उत्तर:
(स) मृदीय कारक

30. शब्द ‘पारिस्थितिकी’ किसने प्रस्तावित किया- (M.P. PMT, 2003; KCET 2004)
(अ) हेकल
(ब) ओडम
(स) रीटर
(द) डोबेनमायर
उत्तर:
(स) रीटर

31. सहभोजिता होती है- (MP PMT 2004)
(अ) जब दोनों सहभागी लाभान्वित होते हैं।
(ब) जब दोनों सहभागियों को हानि होती है।
(स) कमजोर लाभान्वित होते हैं अपेक्षाकृत शक्तिशाली हानिकारक होते हैं।
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(स) कमजोर लाभान्वित होते हैं अपेक्षाकृत शक्तिशाली हानिकारक होते हैं।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 13 जीव और समष्टियाँ

32. चरने वाले जंतुओं से संभवतः क्या लाभ है- (BVP 2003)
(अ) वन्य जीवधारियों को हटाना
(ब) खरपतवारों का नाश करना
(स) वन्य पौधों को हटाना
(द) उनके उत्सर्जी पदार्थों का मृदा में मिलना
उत्तर:
(द) उनके उत्सर्जी पदार्थों का मृदा में मिलना

33. पौधों की वृद्धि के लिये ह्यूमस आवश्यक है क्योंकि- (BVP 2003)
(अ) यह आंशिक अपघटित होती है
(ब) यह पत्तियों से व्युत्पन्नित होती है
(स) इसमें पोषक तत्वों की अधिकता एवं जल धारण करने की क्षमता भी अधिक होती है
(द) यह मृत कार्बनिक पदार्थों की बनी होती है
उत्तर:
(स) इसमें पोषक तत्वों की अधिकता एवं जल धारण करने की क्षमता भी अधिक होती है

34. निम्न में से कौनसा सही चयनित युग्म है- (AIIMS 2003)
(अ) शार्क एवं सकर मछलियाँ-असहभोजिता (Amensalism)
(ब) शैवाल एवं कवक का लाइकेन्स से-सहोपकारिता (Mutualism)
(स) आर्किड्स का वृक्षों पर उगना-परपोषिता
(द) परपोषिता (डोडर) का दूसरे पुष्पीय पौधों पर उगनाअधिपादपता
उत्तर:
(ब) शैवाल एवं कवक का लाइकेन्स से-सहोपकारिता (Mutualism)

35. झील के सतही जल में किसकी अधिकता होती है- (AFMC 2003)
(अ) कार्बनिक पदार्थ
(ब) खनिजों
(स) अकार्बनिक पदार्थ
(द) प्रदूषकों
उत्तर:
(अ) कार्बनिक पदार्थ

36. अधिकतर ह्यूमस की मात्रा पायी जाती है- (CPMT 2003)
(अ) सबसे निचली परत में
(ब) ऊपरी परत में
(स) मध्य परत में
(द) सभी जगह समान
उत्तर:
(ब) ऊपरी परत में

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37. जलधारण क्षमता अधिकतम होती है- (CMC Ludhiana 2003)
(अ) मृत्तिका (Clay) या चिकनी मिट्टी में
(ब) बालू में
(स) गाद (silt) में
(द) बजरी (gravel) में
उत्तर:
(अ) मृत्तिका (Clay) या चिकनी मिट्टी में

38. किसी समष्टि में अबाधिकजनन की क्षमता को क्या कहते हैं? (NEET-2002)
(अ) जैव विभव
(ब) उपजाऊता
(स) वहन क्षमता
(द) जन्म दर
उत्तर:
(अ) जैव विभव

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HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

बहुविकल्पीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
फलक-केन्द्रित घनीय एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या कितनी होती है ?
(अ) 1
(ब) 2
(स) 4
(द) 6
उत्तर:
(स) 4

प्रश्न 2.
घनीय निविड संकुलन (ccp) संरचना की संकुलन क्षमता होती है-
(अ) 68%
(ब) 74%
(स) 78%
(द) 84%
उत्तर:
(ब) 74%

प्रश्न 3.
अक्रिस्टलीय ठोस है-
(अ) ग्रेफाइट
(ब) काँच
(स) श्वेत टिन
(द) एकनताक्ष गंधक
उत्तर:
(ब) काँच

प्रश्न 4.
फेरीचुंबकीय पदार्थ का उदाहरण है –
(अ) Fe2O3
(ब) Mn2O3
(स) MnO
(द) Fe3O4
उत्तर:
(द) Fe3O4

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 5.
हीरे का क्रिस्टल किसका उदाहरण है ?
(अ) आयनिक ठोस
(ब) धात्विक ठोस
(स) सहसंयोजक ठोस
(द) आण्विक ठोस
उत्तर:
(स) सहसंयोजक ठोस

प्रश्न 6.
क्रिस्टलों का घनत्व ज्ञात करने का सही सूत्र है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 21
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 22

प्रश्न 7.
किसी ठोस पदार्थ के क्रिस्टल में कितने प्रकार के त्रिविमीय जालकों का निर्माण संभव है ?
(अ) 7
(ब) 14
(स) 21
(द) 28
उत्तर:
(ब) 14

प्रश्न 8.
लोहचुंबकीय पदार्थ का उदाहरण है-
(अ) TiO2
(ब) VO2
(स) CuO
(द) CrO2
उत्तर:
(द) CrO2

प्रश्न 9.
क्रिस्टलीय ठोस का उदाहरण है-
(अ) हीरा
(ब) काँच
(स) रबर
(द) हीरा तथा काँच दोनों
उत्तर:
(अ) हीरा

प्रश्न 10.
अनुचुंबकीय पदार्थ है-
(अ) N2
(ब) F2
(स) O2
(द) CO2
उत्तर:
(स) O2

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से कौनसी व्यवस्था षट्कोणीय निविड संकुलन को दर्शाती है ?
(अ) ABC…..ABA……
(ब) ABC…..ABC……
(स) ABABA….
(द) ABB ABB….
उत्तर:
(स) ABABA….

प्रश्न 12.
षट्कोणीय निविड संकुलन संरचना में धातु की उपसहसंयोजन संख्या होती है-
(अ) 4
(ब) 12
(स) 8
(द) 16
उत्तर:
(ब) 12

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से सहसंयोजक ठोस है-
(अ) Fe
(ब) NaCl
(स) Cu
(द) SiC
उत्तर:
(द) SiC

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से किस प्रकार के ठोसों का गलनांक उच्चतम होता है ?
(अ) आयनिक ठोस
(ब) सहसंयोजक ठोस
(स) आण्विक ठोस
(द) धात्विक ठोस
उत्तर:
(ब) सहसंयोजक ठोस

प्रश्न 15.
एक N गोलों वाली निविड संकुलन व्यवस्था में चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या होगी-
(अ) \(\frac { N }{ 2 }\)
(ब) N
(स) 4N
(द) 2N
उत्तर:
(द) 2N

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से किस दोष के कारण क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है ?
(अ) शॉट्की
(ब) फ्रेंकेल
(स) अन्तराकाशी
(द) F-केन्द्र
उत्तर:
(अ) शॉट्की

प्रश्न 17.
फलक – केन्द्रित घन संरचना में प्रत्येक गोले के लिए अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या होगी-
(अ) 8
(ब) 4
(स) 1
(द) 2
उत्तर:
(स) 1

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में से किसमें फ्रेंकेल दोष पाया जाता है ?
(अ) NaCl
(ब) AgBr
(स) CsCl
(द) हीरा
उत्तर:
(ब) AgBr

प्रश्न 19.
सरल घनीय जालक की संकुलन क्षमता होती है-
(अ) 68%
(ब) 74%
(स) 52.4%
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) 52.4%

प्रश्न 20.
हाइड्रोजन आबंधित आण्विक ठोस का उदाहरण है-
(अ) HCl
(ब) H2O
(स) H2
(द) Fe
उत्तर:
(ब) H2O

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 21.
विषमदैशिक प्रकृति के ठोस होते हैं-
(अ) क्रिस्टलीय
(ब) अक्रिस्टलीय
(स) क्रिस्टलीय तथा अक्रिस्टलीय
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) क्रिस्टलीय

प्रश्न 22.
प्रकाश वोल्टीय (Photo Voltic) पदार्थ है-.
(अ) Cs
(ब) Si ( अक्रिस्टलीय)
(स) NaCl
(द) ग्रेफाइट
उत्तर:
(ब) Si ( अक्रिस्टलीय)

प्रश्न 23.
विद्युत का सुचालक ठोस है-
(अ) NaCl ठोस
(ब) ग्रेफाइट
(स) हीरा
(द) AlN
उत्तर:
(ब) ग्रेफाइट

प्रश्न 24.
शॉट्की दोष युक्त यौगिक का उदाहरण है-
(अ) NaCl
(ब) KCl
(स) CsCl
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 25.
ताप बढ़ाने पर अर्धचालकों की विद्युत चालकता –
(अ) कम होती है
(ब) बढ़ती है
(स) स्थिर रहती है
(द) कम या अधिक हो सकती है।
उत्तर:
(ब) बढ़ती है

प्रश्न 26.
वे पदार्थ जिनमें सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं, वे होते हैं-
(अ) अनुचुंबकीय
(ब) प्रतिचुंबकीय
(स) लोहचुंबकीय
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) प्रतिचुंबकीय

प्रश्न 27.
एक क्रिस्टलीय ठोस नर्म तथा विद्युत का सुचालक है जिसमें परमाणुओं के मध्य सहसंयोजी बन्ध होता है, वह होगा-
(अ) सिल्वर
(ब) हीरा
(स) AlN
(द) ग्रेफाइट
उत्तर:
(द) ग्रेफाइट

प्रश्न 28.
सोलर सेल में कौनसा तत्व प्रयुक्त किया जाता है ?
(अ) Rb
(ब) Pb
(स) Si
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(स) Si

प्रश्न 29.
CaF2 में क्रिस्टल की एकक कोष्ठिका में Ca2+ आयनों की संख्या होती है-
(अ) 6
(ब) 8
(स) 4
(द) 12
उत्तर:
(स) 4

प्रश्न 30.
एकान्तर धारा (A.C.) को दिष्ट धारा (D.C.) में परिवर्तित करने में प्रयुक्त अर्धचालक होता है-
(अ) p-प्रकार
(ब) n-p संधि
(स) n- प्रकार
(द) नैज
उत्तर:
(द) नैज

प्रश्न 31.
बिन्दु दोष पाया जाता है-
(अ) आयनिक ठोस में
(ब) अक्रिस्टलीय ठोस में
(स) आण्विक ठोस में
(द) द्रवों में
उत्तर:
(अ) आयनिक ठोस में

प्रश्न 32.
निम्नलिखित चित्र में किस प्रकार का क्रिस्टल दोष दर्शाया गया है ?
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 1
(अ) फ्रेन्केल दोष
(ब) फ्रेन्केल तथा शॉट्की दोष
(स) अन्तराकाशी दोष
(द) शॉट्की दोष
उत्तर:
(द) शॉट्की दोष

प्रश्न 33.
एक ठोस की घनीय क्रिस्टल जालक संरचना में W परमाणु घन के शीर्षों पर, O परमाणु भुजाओं के केन्द्र में तथा Na परमाणु घन के केन्द्र पर स्थित है तो यौगिक का सूत्र है-
(अ) NaWO2
(ब) NaWO3
(स) Na2WO5
(द) NaWO4
उत्तर:
(ब) NaWO3

प्रश्न 34.
एक ठोस AX में A+ आयन पर X की व्यवस्था ( सही मापसूचक में नहीं) चित्र में दी गयी है। यदि X का अर्द्धव्यास 250 pm है तो A+ का अर्द्धव्यास होगा।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 2
(अ) 104 pm
(ब) 125 pm
(स) 183 pm
(द) 57 pm
उत्तर:
(अ) 104 pm

प्रश्न 35.
कैल्सियम फलक – केन्द्रित घनीय एकक कोष्ठिका में क्रिस्टलित होता है तो कैल्सियम (Ca) की एकक कोष्ठिका के लिए संकुलन भिन्न होगी-
(अ) π/6
(ब) π/3
(स) \(\frac{\sqrt{2} \pi}{3}\)
(द) \(\frac{\sqrt{2} \pi}{6}\)
उत्तर:
(द) \(\frac{\sqrt{2} \pi}{6}\)

प्रश्न 36.
निम्नलिखित में से किसकी संकुलन क्षमता निम्नतम है ?
(अ) आद्य घनीय एकक कोष्ठिका
(ब) अंतः केन्द्रित घनीय एकक ‘कोष्ठिका
(स) फलक- केन्द्रित घनीय एकक कोष्ठिका
(द) षट्कोणीय निविड संकुलित संरचना
उत्तर:
(अ) आद्य घनीय एकक कोष्ठिका

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न :

प्रश्न 1.
क्रिस्टल जालक किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी ठोस के अन्तराल (space) में बिन्दुओं (परमाणु या आयनों) की नियमित त्रिविमीय व्यवस्था को क्रिस्टल जालक कहते हैं।

प्रश्न 2.
धात्विक ठोस के गुण बताइए ।
उत्तर:
धात्विक ठोस कठोर, उच्च गलनांक युक्त तथा विद्युत के सुचालक होते हैं। इनमें आघातवर्ध्यता तथा तन्यता का गुण भी होता है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 3.
अंत: केंद्रित घनीय एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या कितनी होती है ?
उत्तर:
अंत: केंद्रित घनीय एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या दो होती है।

प्रश्न 4.
फलक- केन्द्रित घन संरचना की विलगित एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या तथा एक एकक कोष्ठिका में कणों की वास्तविक संख्या कितनी होती है ?
उत्तर:
फलक- केन्द्रित घन संरचना की विलगित एकक कोष्ठिका में 14 परमाणु तथा एक एकक कोष्ठिका में कणों की वास्तविक संख्या 4 होती है।

प्रश्न 5.
एकक कोष्ठिका तथा क्रिस्टल जालक में क्या सम्बन्ध होता है ?
उत्तर:
एकक कोष्ठिका की पुनरावृत्ति से ही क्रिस्टल जालक का निर्माण होता है ।

प्रश्न 6.
ज्यामितीय विन्यास के आधार पर क्रिस्टलों को कितने समूहों में वर्गीकृत किया जाता है ?
उत्तर:
ज्यामितीय विन्यास के आधार पर क्रिस्टलों को सात समूहों में वर्गीकृत किया जाता है।

प्रश्न 7.
घनीय क्रिस्टल तंत्र में अक्षीय कोण का मान बताइए ।
उत्तर:
घनीय क्रिस्टल तंत्र में अक्षीय कोण α = β = γ = 90° होते हैं।

प्रश्न 8.
एक घन में कितने फलक तथा कितने किनारे होते हैं ?
उत्तर:
एक घन में 6 फलक तथा 12 किनारे होते हैं।

प्रश्न 9.
धात्विक ठोसों का रंग तथा चमक का कारण क्या है ?
उत्तर:
मुक्त इलेक्ट्रॉन ।

प्रश्न 10.
अष्टफलकीय रिक्ति की त्रिज्या (r) तथा परमाणु (गोले) की त्रिज्या (R) में क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर:
r = 0.414R

प्रश्न 11.
hcp तथा ccp संरचना युक्त धातुएँ उच्च गलनांक की होती हैं। क्यों ?
उत्तर:
hcp तथा ccp संरचना की संकुलन क्षमता उच्च (74%) होने के कारण परमाणु एक-दूसरे के अधिक निकट होते हैं तथा इनमें प्रबल धात्विक बन्ध होता है, अतः इनका गलनांक उच्च होता है।

प्रश्न 12.
यदि किसी क्रिस्टल के लिए त्रिज्या अनुपात 0.225 है तो उसकी ज्यामिति किस प्रकार की होगी ?
उत्तर:
त्रिज्या अनुपात 0.225 होने पर क्रिस्टल की ज्यामिति चतुष्फलकीय होगी।

प्रश्न 13.
अष्टफलकीय रिक्ति की समन्वयी संख्या कितनी होती है ?
उत्तर:
अष्टफलकीय रिक्ति की समन्वयी संख्या छः होती है ।

प्रश्न 14.
Zn+2, Cu+1, Cu+2 तथा Fe+3 में से अनुचुंबकीय आयन कौनसे हैं ?
उत्तर:
Cu+2 तथा Fe3+ अनुचुंबकीय हैं क्योंकि इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं।

प्रश्न 15.
प्रतिलोहचुम्बकीय पदार्थ का उदाहरण बताइए ।
उत्तर:
MnO प्रतिलोहचुम्बकीय पदार्थ का उदाहरण है।

प्रश्न 16.
किस प्रकार के ठोसों में दाब विद्युत गुण पाया जाता है ?
उत्तर:
नेट द्विध्रुव युक्त क्रिस्टलों में दाब विद्युत गुण पाया जाता है।

प्रश्न 17.
ताप विद्युत प्रभाव किसे कहते हैं ?
उत्तर:
ऐसे क्रिस्टल जिन्हें गर्म करने पर विद्युत धारा उत्पन्न होती है, उन्हें ताप विद्युत क्रिस्टल कहते हैं तथा इस प्रभाव को ताप विद्युत प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न 18.
ताप बढ़ाने पर चालकों की चालकता कम हो जाती है। क्यों ?
उत्तर:
ताप बढ़ाने पर चालकों में ऊष्मीय कम्पन बढ़ने के कारण प्रतिरोध बढ़ता है, जिससे उनकी चालकता कम हो जाती है।

प्रश्न 19.
चालकों तथा अर्धचालकों की चालकता को किस सिद्धान्त द्वारा समझाया जाता है ?
उत्तर:
बैण्ड सिद्धान्त या आण्विक कक्षक सिद्धान्त ।

प्रश्न 20.
CaF2 में समन्वयी संख्याओं का अनुपात बताइए ।
उत्तर:
8 : 4 (CaF2)

प्रश्न 21.
CsCl की एकक कोष्ठिका का नाम लिखिए ।
उत्तर:
अन्तः केन्द्रित घन संरचना ।

प्रश्न 22.
सूर्य के प्रकाश को विद्युत में परिवर्तित करने के लिए उपयुक्त ठोस पदार्थ बताइए ।
उत्तर:
अक्रिस्टलीय सिलिका। यह एक फोटोवोल्टीय पदार्थ है ।

प्रश्न 23.
क्यूरी ताप किसे कहते हैं ?
उत्तर:
वह ताप जिससे कम ताप पर कोई चुम्बकीय पदार्थ, लोहचुम्बकीय हो जाता है, उसे क्यूरी ताप कहते हैं ।

प्रश्न 24.
गैस लाइटर को दबाने से चिंगारी उत्पन्न होती है, क्यों ?
उत्तर:
गैस लाइटर में दाब विद्युत क्रिस्टल होते हैं, अतः जब इस पर दाब लगाया जाता है तो विद्युत चिंगारी उत्पन्न होती है।

प्रश्न 25.
किस ताप पर अधिकतर धातुएँ अतिचालक की भाँति व्यवहार करती हैं?
उत्तर:
2K – 5K

लघूत्तरात्मक प्रश्न :

प्रश्न 1.
ठोसों की विषमदैशिक तथा समदैशिक प्रकृति में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
विषमदैशिक ठोस वे होते हैं जिनके भौतिक गुण जैसे विद्युत प्रतिरोधकता तथा अपवर्तनांक, भिन्न-भिन्न दिशाओं में मापने पर भिन्न-भिन्न मान दर्शाते हैं। यह अलग-अलग दिशाओं में कणों की भिन्न- भिन्न व्यवस्था के कारण होता है। क्रिस्टलीय ठोस विषमदैशिक होते हैं। अपवाद – घनीय क्रिस्टल |
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 3
समदैशिक ठोस वे होते हैं जिनके भौतिक गुणों का मान सभी दिशाओं में समान होता है। अक्रिस्टलीय ठोस समदैशिक होते हैं, क्योंकि इनमें कणों की दीर्घ परासी व्यवस्था नहीं होती तथा सभी दिशाओं में अनियमित विन्यास होता है ।

प्रश्न 2.
(a) सरल घनीय एकक कोष्ठिका में अवयवी कणों की गणना किस प्रकार करते हैं?
उत्तर:
सरल घन की एकक कोष्ठिका में आठ कोनों पर आठ कण होते हैं तथा प्रत्येक कण का योगदान \(\frac { 1 }{ 8 }\) होता है अतः कुल अवयवी कण = \(\frac { 1 }{ 8 }\) × 8 = 1

(b) बन्धों की प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित ठोसों का वर्गीकरण कीजिए-
CaO, Sn, बर्फ ।
उत्तर:
CaO – प्रबल स्थिर वैद्युत आकर्षण बल (आयनिक ठोस )
Sn – धात्विक बन्ध ( धात्विक ठोस )
बर्फ – परमाणुओं के मध्य सहसंयोजी बन्ध तथा अणुओं के मध्य हाइड्रोजन बन्ध (हाइड्रोजन आबन्धित आण्विक ठोस) ।

प्रश्न 3.
हाइड्रोजन बंधित आण्विक ठोसों की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर:
हाइड्रोजन बंधित आण्विक ठोसों में अणुओं के मध्य प्रबल हाइड्रोजन बन्ध होता है। इसके लिए H तथा F, O व N के मध्य ध्रुवीय सहसंयोजी बन्ध होना चाहिए। ये ठोस विद्युत के कुचालक होते हैं। उदाहरण – बर्फ (ठोस H2O) तथा ठोस NH3 आदि।

प्रश्न 4.
धात्विक ठोसों के गुण लिखिए।
उत्तर:
धातुएँ सामान्यतः ठोस अवस्था में होती हैं, अतः इन्हें धात्विक ठोस कहते हैं। इनमें धनायन, मुक्त तथा गतिशील इलेक्ट्रॉनों के समुद्र में व्यवस्थित होते हैं। प्रत्येक धातु परमाणु, एक या अधिक इलेक्ट्रॉन देता है । ये इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल में समान रूप से फैले रहते हैं । गतिशील इलेक्ट्रॉनों के कारण ही धातुएं विद्युत एवं ऊष्मा की सुचालक होती हैं। विद्युत प्रवाहित करने पर इलेक्ट्रॉन, धनायनों के नेटवर्क में प्रवाहित होते हैं। धातुओं का विशेष रंग होता है तथा उनमें चमक पायी जाती है। धातुएं अत्यधिक आघातवर्धनीय एवं तन्य होती हैं।

प्रश्न 5.
पदार्थों के अनुचुम्बकीय तथा लोहचुम्बकीय गुण में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
अनुचुम्बकीय गुण बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति में ही पाया जाता है जबकि लोहचुम्बकीय गुण चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में भी पाया जाता है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 6.
क्षार धातु हैलाइडों में शुद्ध अवस्था में फ्रेंकेल दोष क्यों नहीं पाया जाता?
उत्तर:
शुद्ध अवस्था में क्षार धातु हैलाइडों में फ्रेंकेल दोष नहीं पाया जाता क्योंकि क्षार धातु आयनों के बड़े आकार के कारण ये अन्तराकाशी स्थानों में स्थान ग्रहण नहीं कर सकते।

प्रश्न 7.
लोहचुम्बकीय तथा फेरीचुम्बकीय पदार्थों में अन्तर बताइए ।
उत्तर:
लोहचुम्बकीय पदार्थों में अधिक संख्या में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं तथा इनमें चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में भी चुम्बकीय गुण पाया जाता है जबकि फेरीचुम्बकीय पदार्थों में डोमेनों के चुम्बकीय आघूर्णों की व्यवस्था समानान्तर तथा प्रतिसमानान्तर दिशा में असमान संख्या में होती है जिसके कारण इनमें परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण पाया जाता है तथा ये चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं।

प्रश्न 8.
प्रतिलोहचुम्बकत्व तथा फेरीचुम्बकत्व (लघु- लोहचुम्बकत्व) में अन्तर बताइए ।
उत्तर:
प्रतिलोहचुम्बकत्व उन पदार्थों का गुण है जिनमें चुम्बकीय आघूर्ण का मान शून्य होता है जबकि फेरीचुम्बकत्व युक्त पदार्थों में अल्प मात्रा में चुम्बकीय आघूर्ण होता है अतः इनका चुम्बकत्व कम होता है। MnO प्रतिलोहचुम्बकीय पदार्थ है जबकि Fe3O4 चुम्बकीय होता है।

प्रश्न 9.
फ्रेंकेल तथा शॉट्की दोषों में दो अन्तर बताइए ।
उत्तर:
(i) फ्रेंकेल त्रुटि (दोष) से पदार्थ का घनत्व अपरिवर्तित रहता है जबकि शॉट्की त्रुटि के कारण पदार्थ का घनत्व कम हो जाता है ।
(ii) फ्रेंकेल त्रुटि उन क्रिस्टलों में पाई जाती है जिनमें समन्वयी संख्या निम्न होती है जबकि शॉट्की त्रुटि, उच्च समन्वयी संख्या युक्त क्रिस्टलों में पाई जाती है।

बोई परीक्षा के हृष्टिकोण से सम्भावित महवपूर्ण प्रश्न :

प्रश्न 1.
ठोस क्रिस्टलों में किस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व अप्रभावित रहता है?
उत्तर:
फ्रेन्केल त्रुटि ।

प्रश्न 2.
सिलिकन के क्रिस्टल में जब आर्सेनिक की अशुद्धि मिलाते हैं तो इस प्रकार बने अर्धचालक का नाम क्या होगा?
उत्तर:
n – प्रकार का अर्धचालक ।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए –
(अ) शॉट्की त्रुटि
(ब) अन्तराकाशी त्रुटि ( दोष ) ।
उत्तर:
(अ) शॉट्की त्रुटि – यह मुख्य रूप से आयनिक ठोसों का रिक्तिका दोष ( vacancy defect) है। विद्युत उदासीनता को बनाए रखने के लिए क्रिस्टल से गायब होने वाले धनायनों और ऋणायनों की संख्या बराबर होती है अर्थात् धनायन तथा ऋणायन दोनों ही अपने स्थान से गायब हो. जाते हैं। सरल रिक्तिका दोष की भाँति, शॉट्की दोष से भी पदार्थ का घनत्व कम हो जाता है। आयनिक ठोसों के ऐसे दोषों में संख्या महत्वपूर्ण होती है ।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 4
जैसे NaCl में कमरे के ताप पर लगभग 10° शॉट्की युगल प्रति cm3 होते हैं। एक cm में करीब 1022 आयन होते हैं। इस प्रकार प्रति 1016 आयनों में एक शॉट्की दोष होता है। शॉट्की दोष उन आयनिक पदार्थों में होता है जिनमें धनायन और ऋणायन लगभग समान आकार के होते हैं तथा जिनकी समन्वयी संख्या उच्च होती है। उदाहरण NaCl, KCl, CsCl | AgBr में फ्रेंकेल तथा शॉट्की दोनों ही प्रकार के दोष होते हैं।

(ब) अन्तराकाशी दोष : किसी क्रिस्टल जालक में जब कुछ अवयवी कण अंतराकाशी स्थल पर उपस्थित होते हैं तो इसे अंतराकाशी दोष कहते हैं। इससे पदार्थ का घनत्व बढ़ जाता है। ‘रिक्तिका दोष तथा अंतराकाशी दोष अनआयनिक ठोसों में पाए जाते हैं। आयनिक ठोसों में विद्युत उदासीनता रहना आवश्यक है। अतः इन दोषों को फ्रेंकेल तथा शॉट्की दोषों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 5
(a) फ्रें केल दोष या फ्रें के ल त्रुटि (Frenkel defect) – यह दोष आयनिक ठोसों में पाया जाता है। छोटा आयन (साधारणतः धनायन) अपने वास्तविक स्थान से विस्थापित होकर अन्तराकाशी स्थान में चला जाता है। इससे वास्तविक स्थान पर रिक्तिका दोष और नए स्थान पर अंतराकाशी दोष उत्पन्न होता है। (dislocation defect) भी कहते हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 6
इससे ठोस के घनत्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल विद्युत चालकता दर्शा सकते हैं तथा इससे यौगिक का परावैद्युतांक (Dielectric Constant) बढ़ जाता है। फ्रेंकेल दोष उन आयनिक पदार्थों द्वारा दर्शाया जाता है जिनमें आयनों (धनायन तथा ऋणायन) के आकार में अधिक अंतर होता है तथा जिनमें समन्वयी संख्या कम होती है। उदाहरण – ZnS, AgCl, AgBr और AgI |
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 7

प्रश्न 4.
सिल्वर fcc एकक कोष्ठिका के रूप में पाया जाता है जिसकी कोर लम्बाई 409 pm है तो सिल्वर परमाणु की त्रिज्या ज्ञात कीजिए। (इसमें प्रत्येक फलक परमाणु चार कोनों को स्पर्श कर रहा है )।
उत्तर:
एक एकक कोष्ठिका की कोर लम्बाई a = 409 pm
अतः (fcc संरचना) परमाणु त्रिज्या (r) = \(\frac{a}{2 \sqrt{2}}\) = \(\frac{409}{2 \sqrt{2}}\)
r = \(\frac{409}{2 \times 1.414}\) = 144.6 pm

प्रश्न 5.
एक ध्रुवीय आण्विक ठोस में अणुओं को परस्पर एकत्र रखने में किस प्रकार की पारस्परिक क्रिया होती है?
उत्तर:
एक ध्रुवीय आण्विक ठोस में अणुओं को परस्पर एकत्र रखने में द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्य क्रिया होती है।

प्रश्न 6.
कॉपर धातु का घनत्व 8.95 g cm-3 है। यदि कॉपर परमाणु की त्रिज्या 127.8 pm हो तो कॉपर एकक सेल इनमें से किस प्रकार का होगा – साधारण घनीय, काय- केन्द्रित घनीय अथवा फलक- केन्द्रित घनीय?
(दिया गया है – Cu का परमाणु द्रव्यमान = 63.54 g mol-1 और NA = 6.02 × 1023 mol-1)
उत्तर:
दिया गया है – d = 8.95 g cm-3, r = 127.8 pm = 127.8 × 10-10 cm
M = 63.54 g mol-1, NA = 6.02 × 1023, Z = ?
माना Cu की संरचना फलक – केन्द्रित घनीय है जिसके लिए a = 2√2r अतः
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 8
अतः कॉपर का एकक सेल फलक-केन्द्रित घनीय होगा

प्रश्न 7.
यदि आप एक अज्ञात धातु का द्रव्यमान, घनत्व और इसके क्रिस्टल के एकक सेल की लम्बाई-चौड़ाई (विमाएँ ) जानते हों तो इसका परमाणु द्रव्यमान कैसे ज्ञात करेंगे? व्याख्या कीजिए ।
उत्तर:
माना दिया गया द्रव्यमान घनत्व = d
तथा एकक सेल की विमा = a
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 9
माना एक परमाणु का द्रव्यमान = M
तथा एक एकक सेल में परमाणुओं की संख्या = Z
एक एकक सेल का परमाणु द्रव्यमान = ZM = IMG
M = मोलर द्रव्यमान, NA = आवोगाद्रो संख्या
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 10
इस सूत्र की सहायता से M ज्ञात किया जा सकता है, जब z का मान ज्ञात हो ।

प्रश्न 8.
साधारण घनाकार जालक के लिए एक धातु क्रिस्टल की पैकिंग क्षमता परिकलित कीजिए ।
उत्तर:
सरल घनीय क्रिस्टल की संकुलन क्षमता 52.4 प्रतिशत होती है। जिसकी गणना निम्नलिखित है-
एक सरल घनीय जालक में परमाणु केवल घन के कोनों पर स्थित होते हैं। घन के किनारों पर स्थित कण एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 11
a = 2r
इसलिए घन की भुजा की लंबाई ‘a’ और प्रत्येक कण की त्रिज्या, में निम्न संबंध है-
a = 2r
अतः घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन = a3 = (2r)3 = 8r3
चूँकि सरल घनीय एकक कोष्ठिका में केवल 1 परमाणु उपस्थित होता है।
इसलिए घेरे गए त्रिविमीय स्थान का आयतन = \(\frac { 4 }{ 3 }\) πr3
अतः, संरचना की संकुलन क्षमता
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 12

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 ठोस अवस्था

प्रश्न 9.
कॉपर फलक- केन्द्रित घनीय यूनिट सेलों में क्रिस्टलित होता है। यदि कॉपर परमाणु की त्रिज्या 127.8 pm है तो कॉपर धातु का घनत्व परिकलित कीजिए।
(Cu का परमाणु द्रव्यमान = 63.554 और ऐवोगाद्रो संख्या NA = 6.022 × 1023 mol-1 )
अथवा
आयरन का यूनिट सेल कॉय-केन्द्रित घनीय होता है और इस सेल का सिरा 286.65 pm है। आयरन का घनत्व 7.87 g cm-3 है । इस सूचना का उपयोग करके ऐवोगाद्रो संख्या का परिकलन | (Fe का परमाणु द्रव्यमान = 56.04)
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 13

प्रश्न 10.
काँच को अतिशीतित द्रव कहते हैं । कारण दीजिए ।
उत्तर:
काँच अक्रिस्टलीय ठोस है तथा इसमें द्रवों के समान ‘प्रवाह’ की प्रवृत्ति होती है, यद्यपि यह बहुत धीमे होता है, अतः इसे अतिशीतित द्रव कहते हैं।

प्रश्न 11.
लौह चुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक बनाते हैं। कारण दीजिए ।
उत्तर:
लौह चुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक बनाते हैं क्योंकि ये चुम्बकीय क्षेत्र की ओर प्रबलता से आकर्षित होते हैं। ठोस अवस्था में इनमें धातु आयन छोटे खण्डों में एक साथ समूहित हो जाते हैं, इन्हें डोमेन कहते हैं। पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर सभी डोमेन चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में अभिविन्यासित हो जाते हैं जिससे स्थायी तथा प्रबल चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न होता है ।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित क्रिस्टल संरचनाओं की संकुलन क्षमता तथा उपसहसंयोजन संख्या दीजिए |
(अ) अंतःकेन्द्रित घनीय
(ब) घनीय निविड संकुलन ।
उत्तर:
(अ) अंतः केन्द्रित घनीय क्रिस्टल संरचना की संकुलन क्षमता 68% तथा उपसहसंयोजन संख्या 8 होती है।
(ब) घनीय निविड संकुलन क्रिस्टल संरचना की संकुलन क्षमता 74% तथा उपसहसंयोजन संख्या 12 होती है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से कौन-से ध्रुवीय आण्विक ठोस हैं? ठोस सल्फर डाइऑक्साइड, ठोस अमोनिया, आयोडीन क्रिस्टल, ग्रेफाइट, कार्बन टेट्राक्लोराइड ।
उत्तर:
ठोस सल्फर डाइऑक्साइड तथा ठोस अमोनिया ध्रुवीय आण्विक ठोस हैं।

प्रश्न 14.
एक घनीय क्रिस्टल P तथा Q दो तत्वों से बना है । इसमें Q के परमाणु घन के कोनों पर तथा P घन के केन्द्र में स्थित है तो यौगिक का सूत्र क्या होगा ?
उत्तर:

  • घन के कोने पर स्थित परमाणु का एकक कोष्ठिका में योगदान = \(\frac { 1 }{ 8 }\)
    अतः Q परमाणुओं की संख्या = \(\frac { 1 }{ 8 }\) × 8 = 1
  • घन के केन्द्र में स्थित परमाणु का एकक कोष्ठिका में योगदान = 1
    अतः P परमाणुओं की संख्या = 1 × 1 = 1
    इसलिए यौगिक का सूत्र = P : Q = 1 : 1 = PQ

प्रश्न 15.
(a) निम्नलिखित का कारण बताइए-
(i) शॉट्की त्रुटि के कारण ठोस का घनत्व कम हो जाता है।
(ii) Si को P से डोपित करने पर चालकता बढ़ती है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 14
उत्तर:
(a)

  • शॉट्की त्रुटि में धनायन तथा ऋणायन समान संख्या में क्रिस्टल में से गायब हो जाते हैं अतः द्रव्यमान कम हो जाता है इसलिए घनत्व कम हो जाता है।
  • Si को P से डोपित करने पर, बन्ध बनाने के पश्चात् बचे इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र रहते हैं जिनके कारण चालकता बढ़ जाती है।

(b) उपर्युक्त संरेखण में चुम्बकीय आघूर्ण के सभी डोमेन एक ही दिशा में अभिविन्यासित हैं अतः यह लोहचुम्बकत्व को प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित त्रुटियुक्त क्रिस्टल का परीक्षण कीजिए-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 15
तथा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(i) क्रिस्टल किस प्रकार का रससमीकरणमितीय दोष दर्शाता
(ii) इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल के घनत्व पर क्या प्रभाव होता है?
(iii) किस प्रकार के आयनिक यौगिक यह त्रुटि दर्शाते हैं?
उत्तर:
(i) क्रिस्टल में शॉट्की दोष (त्रुटि) है।
(ii) इस त्रुटि के कारण क्रिस्टल का घनत्व कम हो जाता है।
(iii) यह त्रुटि उन आयनिक यौगिकों द्वारा दर्शाई जाती है जिनमें धनायन तथा ऋणायन लगभग समान आकार के होते हैं।

प्रश्न 17.
एक तत्व जिसका घनत्व 11.2 g cm-3 जाक बनाता है जिसके किनारे की लम्बाई 4 × 10-8cm है तो तत्व का परमाणु द्रव्यमान परिकलित कीजिए । (NA = 6.022 × 1023 mol-1)
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 16

प्रश्न 18.
(i) LiCI के गुलाबी रंग के लिए किस प्रकार का अरससमीकरणमितीय दोष उत्तरदायी होता है?
(ii) NaCl किस प्रकार का रससमीकरणमितीय दोष दर्शाता है?
उत्तर:

  • ऋणायनिक रिक्तिका के कारण धातु आधिक्य दोष
  • शॉट्की दोष ।

प्रश्न 19.
( अ ) यह मानते हुए कि परमाणु एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं, सरल घनीय धातु के क्रिस्टल में संकुलन क्षमता की गणना कीजिए ।
(ब) आयनिक ठोसों की प्रकृति के आधार पर फ्रेंकेल दोष एवं शॉटकी दोष की तुलना कीजिए।
उत्तर:
(अ) सरल घनीय क्रिस्टल की संकुलन क्षमता 52.4 प्रतिशत होती है जिसकी गणना निम्नलिखित है-
एक सरल घनीय जालक में परमाणु केवल घन के कोनों पर स्थित होते हैं। घन के किनारों पर स्थित कण एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं इसलिए घन की भुजा की लंबाई ‘a’ और प्रत्येक कण की त्रिज्या r में निम्न संबंध है –
a = 2r
अतः घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन
= a3 = (2r)-3 = 8r3
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 17
चूँकि सरल घनीय एकक कोष्ठिका में केवल 1 परमाणु उपस्थित
इसलिए घेरे गए स्थान का आयतन = \(\frac { 4 }{ 3 }\)πr3,
अतः, संरचना की संकुलन क्षमता
एक परमाणु का आयतन घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 18
(ब) आयनिक ठोसों की प्रकृति के आधार पर फ्रेंकेल दोष एवं शॉट्की दोष की तुलना निम्नलिखित है
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 19

प्रश्न 20.
( अ ) षट्कोणीय क्रिस्टल तंत्र हेतु अक्षीय कोणों के मान लिखिए।
(ब) सिलिकन में बोरॉन अपमिश्रित करने पर किस प्रकार का अर्धचालक प्राप्त होता है? समझाइए ।
उत्तर:
(अ) षट्कोणीय क्रिस्टल तंत्र में अक्षीय कोण a, B तथा y का मान क्रमश: 90°, 90° तथा 120° होता है।
(ब) सिलिकन में बोरॉन अपमिश्रित करने पर p-प्रकार का अर्धचालक प्राप्त होता है क्योंकि बोरॉन में तीन संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं अतः वह स्थान जहाँ चौथा इलेक्ट्रॉन नहीं होता उसे इलेक्ट्रॉन छिद्र कहते हैं। पास वाले परमाणु से इलेक्ट्रॉन आकर इस इलेक्ट्रॉन छिद्र को भर देता है, ऐसा होने पर वह अपने मूल स्थान पर इलेक्ट्रॉन छिद्र छोड़ देता है, इससे ऐसा लगता है जैसे कि इलेक्ट्रॉन छिद्र जिस इलेक्ट्रॉन द्वारा यह भरा गया है।

उसकी विपरीत दिशा में चल रहा है। विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में इलेक्ट्रॉन, इलेक्ट्रॉन छिद्रों में से धनावेशित प्लेट की ओर चलते हैं। परन्तु ऐसा लगता है जैसे इलेक्ट्रॉन छिद्र धनावेशित हैं तथा ॠणावेशित प्लेट की ओर चल रहे हैं । अतः इस प्रकार के अर्धचालकों को p-प्रकार के अर्धचालक कहते हैं। यहाँ p= धनात्मक (Positive)

प्रश्न 21.
उस यौगिक का सूत्र लिखिए जिसमें Y तत्त्व ccp जालक बनाता है और X के परमाणु चतुष्फलकीय रिक्तियों का 1/3 वाँ भाग घेरते हैं ।
उत्तर:
ccp जालक, तत्त्व Y से बना है अतः उत्पन्न चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या उसमें उपस्थित Y परमाणुओं की संख्या की दोगुनी होगी। इन रिक्तियों का 1/3 भाग X के परमाणुओं से भरा है अतः Y तथा X के परमाणुओं का अनुपात Y: 2X x 1/3 है। इसलिए यौगिक का सूत्र Y3X2 या X2Y3 है।

प्रश्न 22.
दिए गए दोषपूर्ण क्रिस्टल की जाँच कीजिए-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 1 Img 20
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(i) उपर्युक्त दोष रससमीकरणमितीय (स्टॉइकियोमीट्रिक ) है अथवा अ-रससमीकरणमितीय ( अन-स्टॉइकियोमीट्रिक ) है ?
(ii) इलेक्ट्रॉन वाली स्थिति के लिए जो पद प्रयुक्त होता है, उसे लिखिए।
(iii) इस प्रकार का दोष दिखाने वाले यौगिक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • उपर्युक्त दोष अरससमीकरणमितीय है क्योंकि इस यौगिक के आयन रससमीकरणमितीय अनुपात में नहीं हैं।
  • इलेक्ट्रॉन की इस स्थिति को F केन्द्र कहते हैं ।
  • NaCl इस प्रकार का दोष दर्शाता है ।

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. निम्नलिखित कथन प्रतिबंधन एण्ड्रोन्यूक्लिएज एंजाइम के लक्षणों का वर्णन करते हैं। गलत कथन को चुनिए-
(अ) यह एंजाइम डी.एन.ए. पर एक विशिष्ट पैलीन्ड्रोमिक न्यूक्लियोटाइड अनुक्रम की पहचान करता है।
(ब) यह एंजाइम डी.एन.ए, पर पहचाने हुए स्थान पर डी.एन.ए. अणु को काटता है।
(स) यह एंजाइम डी.एन.ए. को विशेष स्थलों पर जोड़ता है और दो में से केवल एक लड़ी को काटता है।
(द) यह एंजाइम प्रत्येक लड़ी पर विशेष स्थलों पर शर्कराफास्फ्रेट रज्जु को काटता है।
उत्तर:
(स) यह एंजाइम डी.एन.ए. को विशेष स्थलों पर जोड़ता है और दो में से केवल एक लड़ी को काटता है।

2. विलोदित टैक जैव रिऐक्टर किस लिए अभिकल्पित किए गए हैं?
(अ) सारी प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीजन की प्राप्यता बनाए रखने के लिए
(ब) प्रवर्धन नलिका में अवायवीय दशाओं को बनाये रखने के लिए
(स) उत्पादों के शुद्धिकरण के लिए
(द) उत्पादों में परिरक्षकों को मिलाने के लिए
उत्तर:
(अ) सारी प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीजन की प्राप्यता बनाए रखने के लिए

3. निम्नलिखित में से कौनसा अनुप्रवाह प्रक्रमण का एक अवयव नहीं है ?
(अ) परिरक्षण
(ब) अभिव्यक्ति
(स) पृथक्करण
(द) शुद्धिकरण
उत्तर:
(ब) अभिव्यक्ति

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

4. निम्नलिखित में से कौनसा एक प्लाज्मिड का अभिलक्षण नहीं है?
(अ) स्थानान्तरण योग्य
(ब) एकल-रज्जुकीय
(स) स्वतंत्र प्रतिकृतीयन
(द) वृत्तीय संरचना
उत्तर:
(ब) एकल-रज्जुकीय

5. निम्नलिखित में से कौनसा एक प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज है?
(अ) डी.एन.एज. I
(ब) आर.एन.एज.
(स) हिन्द II
(द) प्रोटीएज
उत्तर:
(स) हिन्द II

6. प्रतिबन्ध एंजाइम प्राकृतिक रूप से पाये जाते हैं-
(अ) यूकैरियोटिक कोशिकाओं में
(ब) यीस्ट में
(स) जीवाणु में
(द) उपरोक्त सभी में
उत्तर:
(स) जीवाणु में

7. वे एन्जाइम जो DNA को विशिष्ट पहचान वाले स्थलों पर काटते हैं, वह हैं-
(अ) लाइगेज
(ब) एक्सोन्यूक्लिएज
(स) सीकामारी एन्डोन्यूक्लिएज
(द) DNA पॉलिमरेज
उत्तर:
(स) सीकामारी एन्डोन्यूक्लिएज

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

8. उच्च श्रेणी के पादपों में जीन क्लोनिंग हेतु कौनसा जीवाणु अधिक उपयोगी है-
(अ) ई.कोली
(ब) राइजोबियम
(स) एग्रोबैक्टीरियम
(द) स्यूडोमोनॉस
उत्तर:
(स) एग्रोबैक्टीरियम

9. जीन में हेर-फेर से तात्पर्य है-
(अ) आनुवंशिक पदार्थ को जोड़ना
(ब) आनुवंशिक पदार्थ को हटाना
(स) आनुवंशिक पदार्थ को ठीक करना
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

10. वांछित DNA को परपोषी कोशिका में पहुँचाने वाला अणु होता है
(अ) वाहक
(ब) परपोषी
(स) परजीवी
(द) एन्जाइम
उत्तर:
(अ) वाहक

11. निम्न में से कौनसा वांछित DNA हो सकता है-
(अ) संश्लेषित DNA
(ब) C-DNA
(स) जीनोमिक DNA
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

12. सीमाकारी एन्जाइम EcoRI DNA को निम्न में से किस स्थान पर काटता है-
(अ) GATTC
(ब) GACCTG
(स) AAATTT
(द) GGGCCC
उत्तर:
(अ) GATTC

13. न्यूक्लिक अम्ल का एकल रज्जु जिसके साथ एक रेडियोधर्मी अणु जोड़ दिया गया हो, क्या कहलाता है?
(अ) वेक्टर
(ब) चयनशील मार्कर
(स) प्लाज्मिड
(द) प्रोब
उत्तर:
(द) प्रोब

14. तथाकथित ‘चिपचिपे सिर’ किससे बने होते हैं?
(अ) अयुग्मित क्षारकों से
(ब) DNA तंतुक के सिरे पर चिपचिपे पॉलिसैकेराइड से
(स) मिथाइल समूह से
(द) अयुग्मित RNA क्षारकों से
उत्तर:
(अ) अयुग्मित क्षारकों से

15. द्विबीजपत्रियों में जीन स्थानान्तरण हेतु सामान्यतः प्रयुक्त प्लाज्मिड है-
(अ) PBR 322
(ब) PBR 235
(स) Ti प्लाज्मिड
(द) कास्मिड
उत्तर:
(स) Ti प्लाज्मिड

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

16. प्रथम प्रतिबंधन एण्डोन्यूक्लिएज कौनसा पहचाना गया था?
(अ) EcoRI
(ब) Hind II
(स) Hind III
(द) Taq I
उत्तर:
(ब) Hind II

17. एग्रोबैक्टिरियम ट्यूमीफेशिएंस का DNA खंड (T-DNA) सामान्य पौधों की कोशिकाओं में क्या रोग उत्पन्न करता है-
(अ) कैंसर
(ब) अपघटन
(स) अर्बुद
(द) कुछ नहीं
उत्तर:
(स) अर्बुद

18. रीट्रोवाइरस (पश्च विषाणु) सामान्य जन्तु कोशिकाओं में कौनसा रोग उत्पन्न करता है?
(अ) कैंसर
(ब) विघटन
(स) अर्बुद
(द) कुछ नहीं
उत्तर:
(अ) कैंसर

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 11 जैव प्रौद्योगिकी-सिद्धांत व प्रक्रम

19. एक रेस्ट्रीक्शन (प्रतिबंधन) एन्डोन्यूक्लिएज को EcoRI का नाम दिया गया है। इसमें भाग “co” किसके लिए है?
(अ) colon (वृहदांत्र)
(ब) coelom (देहगुहा)
(स) coenzyme (सहएन्जाइम)
(द) coli (कोलाई)
उत्तर:
(द) coli (कोलाई)

20. जीवाणु कोशिका में गुणसूत्रीय DNA के अतिरिक्त पाया जाने वाला वर्तुल (Circular) DNA कहलाता है-
(अ) एपीसोम
(ब) कोस्मिड
(स) प्लाज्मिड
(द) फेज्मिड
उत्तर:
(स) प्लाज्मिड

21. pBR322 वाहक में किसके प्रति प्रतिरोधक जीन होती है?
(अ) एम्पीसिलिन
(ब) टेट्रासाइक्लिन
(स) उपर्युक्त दोनों
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(द) इनमें से कोई नहीं

22. प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज द्वारा DNA के कटे खण्डों को किस तकनीक द्वारा अलग करते हैं?
(अ) बायोरियक्टर
(ब) इलेक्ट्रोफोरेसिस
(स) बायोलिस्टिक
(द) माइक्राइंजेक्शन
उत्तर:
(ब) इलेक्ट्रोफोरेसिस

23. वह विधि जिसके द्वारा पुनर्योगज DNA को सीधे जंतु कोशिका के केन्द्रक के अन्दर अंतःक्षेपित कर सकते हैं, वह है-
(अ) जीन गन
(ब) बायोलिस्टिक
(स) माइक्रोइं जेक्शन
(द) बायोरियक्टर
उत्तर:
(स) माइक्रोइं जेक्शन

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24. प्लाज्मिड जिसमें वांछित DNA खण्ड जुड़ा रहता है, उसे कहते हैं-
(अ) विजातीय प्लाज्मिड
(ब) काइमेरिक प्लाज्मिड
(स) सेलेरा प्लाज्मिड
(द) विदलनीय प्लाज्मिड
उत्तर:
(ब) काइमेरिक प्लाज्मिड

25. कौनसे एंजाइम DNA को खण्डित करते हैं-
(अ) लाइगेज
(ब) टाइप II रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज
(स) पॉलीमरेज
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ब) टाइप II रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज

26. वाहक DNA है-
(अ) प्लाज्मिड
(ब) C-DNA
(स) संश्लेषित DNA
(द) उपर्युक्त DNA
उत्तर:
(अ) प्लाज्मिड

27. लेडरबर्ग के रेप्लीका प्लेटिंग प्रयगो में स्ट्रेप्टोमायसीन प्रतिरोधी विभेद प्राप्त करने हेतु किसका उपयोग किया गया?
(अ) न्यूनतम माध्यम एवं स्ट्रेप्टोमायसीन
(ब) पूर्ण माध्यम और स्ट्रेप्टोमायसीन
(स) केवल न्यूनतम माध्यम
(द) केवल पूर्ण माध्यम
उत्तर:
(अ) न्यूनतम माध्यम एवं स्ट्रेप्टोमायसीन

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28. निम्नलिखित में से किसका जीन क्लोनिंग में उपयोग किया जाता है?
(अ) लोमासोम्स
(ब) मीजोसोम्स
(स) प्लाज्मिडस
(द) न्यूक्लिओइडस
उत्तर:
(अ) लोमासोम्स

29. निम्न में जैव प्रौद्योगिकी का भाग है-
(अ) जीन का संश्लेषण एवं उपयोग
(ब) डी.एन.ए. टीका का निर्माण या दोषमुक्त
(स) पात्रे (इनविट्रो) निषेचन द्वारा परखनली शिशु का निर्माण
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

30. जीव के आनुवंशिक रूपांतर में मूलभूत चरण है-
(अ) वांछित जीनयुक्त डी.एन.ए. की पहचान
(ब) चिन्हित डी.एन.ए. का परपोषी में स्थानान्तरण
(स) स्थानान्तरित डी.एन.ए. को परपोषी में सुरक्षित रखना तथा उसकी संतति में स्थानान्तरित करना
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
लक्ष्य जीन को पृथक् करने के लिए कौनसे एन्जाइम की आवश्यकता होती है ?
उत्तर:
लक्ष्य जीन को पृथक् करने के लिए प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज एंजाइम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
कौनसा DNA पॉलीमरेज उच्च ताप पर भी सक्रिय रहता है?
उत्तर:
टेक (Taq) DNA पॉलीमरेज उच्च ताप पर भी सक्रिय रहता है।

प्रश्न 3.
किन्हीं तीन प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज एन्जाइमों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • EαRI,
  • Hind II
  • Hind III

प्रश्न 4.
PCR का पूर्ण नाम लिखिए। इसमें कौनसा एन्जाइम प्रयुक्त होता है?
उत्तर:
पॉलिमरेज शृंखला अभिक्रिया (Polymerase Chain Reaction), इसमें टेक (Taq) DNA पॉलीमरेज एन्जाइम प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 5.
जीवाणुभोजी (Bacteriophage) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जीवाणुओं को संक्रमित करने वाले विषाणु को जीवाणुभोजी कहते हैं।

प्रश्न 6.
प्रथम पुनर्योगज DNA का निर्माण किसमें हुआ था?
उत्तर:
जीवाणु सालमोनेला टाइफीमूरियम में।

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प्रश्न 7.
आणविक कैंची किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रतिबंधन एन्जाइम (Restriction Enzyme) को आणविक कैंची कहते हैं।

प्रश्न 8.
हिंड II (Hind II) DNA अणु को कहाँ से काटता है?
उत्तर:
हिंड II, DNA अणु को उस विशेष बिंदु पर काटते हैं जहाँ पर छः क्षारक युग्मों (Base pairs) का विशेष अनुक्रम होता है।

प्रश्न 9.
पैलिंड्रोम (Palindrom) क्या है?
उत्तर:
ये वर्णों के समूह हैं जिन्हें आगे व पीछे दोनों तरफ से पढ़ने पर एक ही शब्द बनता है जैसे ‘मलयालम’।

प्रश्न 10.
चिपचिपे सिरे किस एंजाइम के कार्य में सहायता करते हैं?
उत्तर:
एंजाइम DNA लाइगेज के कार्य में सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 11.
DNA खंड किस प्रकार के आवेशित अणु होते हैं?
उत्तर:
ऋणात्मक आवेशित (Charged) अणु होते हैं।

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प्रश्न 12.
इलेक्ट्रोफोरेसिस में DNA को देखने के लिये किससे अभिरंजित किया जाता है?
उत्तर:
इथीडियम ब्रोमाइड नामक यौगिक से अभिरंजित करते हैं।

प्रश्न 13.
रूपान्तरण (Transformation) क्या प्रक्रिया है?
उत्तर:
यह एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा DNA के एक खण्ड को परपोषी जीवाणु में प्रवेश कराते हैं।

प्रश्न 14.
पौधों व जन्तुओं की कोशिकाओं में पुनर्योगज DNA को किस विधि से अंतःक्षेपित किया जाता है?
उत्तर:
पौधों में बायोलिस्टिक या जीन गन से तथा जन्तुओं में माइक्रोइंजेक्शन विधि से अंतःक्षेपित किया जाता है।

प्रश्न 15.
पुनर्योगज DNA टेक्नोलॉजी के विभिन्न चरण बताइये ।
उत्तर:
DNA का विलगन, DNA का खंडन, DNA खंड का संवाहक से बंधन, पुनर्योगज DNA का परपोषी में स्थानांतरण, परपोषी कोशिकाओं का माध्यम में व्यापक स्तर पर संवर्धन व वांछित उत्पाद का निष्कर्षण।

प्रश्न 16.
DNA पृथक्करण हेतु विभिन्न कोशिकाओं को किस प्रकार तोड़कर खोलते हैं?
उत्तर:
जीवाणु कोशिकाओं को लाइसोजाइम, पादप कोशिकाओं को सेलुलेज तथा कवक कोशिकाओं को काइटिनेज एंजाइम द्वारा तोड़ा जाता है अर्थात् भित्तियों को इन एंजाइम की क्रिया से नष्ट करते हैं।

प्रश्न 17.
लाभकारी जीन का प्रवर्धन किस प्रक्रिया द्वारा होता है?
उत्तर:
प्रवर्धन पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (PCR) द्वारा होता है।

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प्रश्न 18.
पुनर्योगज प्रोटीन किसे कहते हैं?
उत्तर:
यदि कोई प्रोटीन कूटलेखन ( इनकोडिंग ) जीन किसी विषमजात (हेटेरोलोगस) परपोषी में अभिव्यक्त होता है तो उसे पुनर्योगज प्रोटीन कहते हैं।

प्रश्न 19.
बायोरिएक्टर कितने प्रकार के उपयोग में लिये जाते हैं?
उत्तर:
दो प्रकार के साधारण विलोडन हौज बायोरिएक्टर (simple stirred tank bioreactor) तथा दंड विलोडक हौज बायोरिएक्टर (sparged strirred tank bioreactor )।

प्रश्न 20.
इलेक्ट्रोफोरेसिस में क्या होता है ?
उत्तर:
DNA खंड का पृथक्करण एवं विलगन ।

प्रश्न 21.
यूरोपीय जैव प्रौद्योगिकी संघ द्वारा जैव प्रौद्योगिकी की क्या परिभाषा दी गई है ?
उत्तर:
जैव प्रौद्योगिकी-नये उत्पादों तथा सेवाओं के लिए प्राकृतिक विज्ञान व जीवों, कोशिकाओं, इसके अंग एवं आण्विक अवरूपों के समायोजन को जैव प्रौद्योगिकी कहते हैं।

प्रश्न 22.
जीवाणु कोशिका में मिलने वाले वर्तुल डी एन ए का प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर:
यह संवाहक (वेक्टर) की तरह कार्य करता है।

प्रश्न 23.
किण्वक से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यावसायिक पैमाने पर सूक्ष्मजीवियों को पैदा करने के लिए बड़े बर्तन की आवश्यकता होती है जिसे किण्वक या फरमैंटर कहते हैं ।

प्रश्न 24.
उस तकनीक का नाम लिखिए, जिसके द्वारा डीएनए खंडों को अलग कर सकते हैं।
उत्तर:
जैल वैद्युत का संचलन (Electrophoresis)

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प्रश्न 25.
क्षारक युग्मों के ऐसे अनुक्रम को क्या कहते हैं, जिसे पढ़ने के अभिविन्यास को समान रखने पर डीएनए की दोनों लड़ियों को एक जैसा पढ़ा जाता है?
उत्तर:
पैलिंड्रोम क्षारक युग्म।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विजातीय DNA के खंड को परपोषी जीवों में पहुंचाने के लिये संवाहक का विचार जैव प्रौद्योगिकी वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में कैसे आया?
उत्तर:
जैव प्रौद्योगिकी में हम जानते हैं कि प्लाज्मिड DNA संवाहक (Vector) की तरह कार्य करता है जो इससे जुड़े DNA को स्थानान्तरित करता है। यह विचार मच्छर व कीट संवाहकों से उत्पन्न हुआ। प्रायः मच्छर, कीट संवाहक के रूप में मलेरिया परजीवी को मानव शरीर में स्थानान्तरित करता है। ठीक उसी तरह से प्लाज्मिड को संवाहक के रूप में प्रयोग कर विजातीय DNA के खंड को परपोषी जीवों में पहुंचाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज एंजाइमों का नामकरण किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
इन एंजाइमों के नामकरण में परंपरानुसार नाम का पहला शब्द वंश व दूसरा एवं तीसरा शब्द प्राकेंद्रकी कोशिकाओं की जाति से लिया गया है, जिनसे ये पृथक् किए गए थे। जैसे – ईको आर I ( EαRI) एशरिशिया कोलाई RY13, ईको आर I में अक्षर ‘आर (R) ‘ प्रभेद के नाम से लिया गया है। नाम के बाद रोमन अंक उस क्रम को दर्शाते हैं जिसको जीवाणु के प्रभेद से एंजाइम पृथक् किए गए थे।

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प्रश्न 3.
पुनर्योगज DNA को जीवाणु में प्रवेश करवाने के लिये क्या विधि अपनाई जाती है?
उत्तर:
DNA जलरागी (Hydrophillic) अणु है, इस कारण यह कोशिका झिल्ली के द्वारा प्रवेश नहीं कर पाता है। अतः जीवाणु को प्लाज्मिड ग्रहण करने हेतु सक्षम बनाया जाता है। इसके लिये कैल्सियम की विशिष्ट सान्द्रता के साथ संसाधित किया जाता है जिससे DNA को जीवाणु की कोशिका भित्ति में स्थित छिद्रों से प्रवेश करने में सहायता मिलती है। इन कोशिकाओं को पुनर्योगज DNA के साथ पहले बर्फ पर रखते हैं फिर पुनर्योगज DNA को उन कोशिकाओं में बलपूर्वक प्रवेश कराया जाता है। इसके पश्चात् कोशिकाओं को कुछ समय के लिए 42° सेल्शियस (तापप्रघात) पर रखते हैं व पुनः बर्फ पर रखते हैं। इससे पुनर्योगज DNA जीवाणु में प्रवेश कर जाता है।

प्रश्न 4.
परपोषी कोशिकाओं में विजातीय DNA को प्रवेश करवाने की अन्य विधियों के विषय में बताइये ।
उत्तर:
परपोषी कोशिकाओं में विजातीय डीएनए को प्रवेश कराने हेतु अन्य विधियाँ भी हैं। जैसे सूक्ष्म अंतःक्षेपण (microinjection) विधि में पुनर्योगज डीएनए को सीधे जंतु कोशिका के केंद्रक के भीतर अंतःक्षेपित किया जाता है।

दूसरी विधि जो पौधों के लिए उपयोगी है, कोशिकाओं पर डीएनए से विलेपित, स्वर्ण या टंग्स्टन के उच्च वेग सूक्ष्म कणों से बमबारी करते हैं जिसे बायोलिस्टिक या जीन गन (Biolistics or Gene gun) कहते हैं। अंतिम विधि जिसमें अहानिकारक रोगजनक संवाहक का उपयोग किया जाता है। इन संवाहकों को जब कोशिकाओं को संक्रमित करने दिया जाता है तब ये पुनर्योगज डीएनए को परपोषी में स्थानांतरित कर देते हैं।

प्रश्न 5.
पौधों तथा जन्तुओं में जीन क्लोनिंग हेतु संवाहक सम्बन्ध में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जीवाणु व विषाणुओं से ज्ञान अर्जित कर पौधों व जन्तुओं में भी जीन क्लोनिंग करवाई गई। कुछ इस प्रकार के जीवाणु व विषाणुओं का अध्ययन किया गया जो पादप व जन्तुओं में रोगजनक पैथोजन है। उदाहरणार्थ- एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेशिएंस कई द्विबीजपत्री पौधों का रोगजनक पैथोजन है।

वह डीएनए के एक खंड जिसे ‘टी- डीएनए’ कहते हैं, को स्थानांतरित कर सामान्य पौधों की कोशिकाओं को अर्बुद (ट्यूमर) में रूपांतरित करता है और ये अर्बुद कोशिकाएँ रोगजनक के लिए जरूरी रसायनों का उत्पादन करते हैं। ठीक इसी तरह से जंतु कोशिकाओं में पश्चविषाणु ( रीट्रोवायरस) सामान्य कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं पर रूपांतरित कर देते हैं। रोगजनकों द्वारा अपने सुकेंद्रकी परपोषी में जीन स्थानांतरण की कला को अच्छी तरह से समझ कर रोगजनकों की इस विधि का उपयोग कर, अच्छे संवाहक के रूप में प्रयोग कर, मानव के लिए उपयोगी जीन का स्थानांतरण कर सकते हैं।

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एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेशियंस का टी आई (Ti) प्लाज्मिड क्लोनिंग संवाहक के रूप में अब रूपांतरित कर दिया गया है जो पौधों के लिए रोगजनक नहीं है, लेकिन इसका उपयोग अपनी अभिरुचि के जीन को अनेक पौधों में स्थानांतरित करने में किया जाता है। ठीक इसी तरह से पश्चविषाणु को अहानिकारक बनाकर जंतु कोशिकाओं में वांछित जीन को रूपांतरित करने में उपयोग किया जाता है। इस तरह से जब एक जीन या डीएनए के खंड को उचित संवाहक से जोड़ दिया जाता है तब इसे जीवाणु, पौधों व जंतु परपोषी में स्थानांतरित किया जाता है (जहाँ यह गुणित होता रहता है)।

प्रश्न 6.
क्लोनिंग के लिये ई. कोली जीवाणु को उपयुक्त परपोषी क्यों माना जाता है?
उत्तर:
क्लोनिंग के लिये ई. कोली जीवाणु को उपयुक्त परपोषी निम्न गुणों के कारण माना जाता है-

  1. यह आसानी से रूपान्तरित हो जाता है ।
  2. इसमें कार्यशील सीमाकारी एन्जाइमों का अभाव होता है।
  3. यह पुनर्योगज डी.एन.ए. की पुनरावृत्ति में सहायता करता है।
  4. इसके डी. एन. ए. की संरचना व अन्य जैव रासायनिक क्रियायें पूर्णत: ज्ञात हैं।
  5. इसके प्लाज्मिड व जीवाणुभोजियों को स्पष्ट रूप से अभिलक्षित किया जा चुका है।

प्रश्न 7.
वाहक के रूप में जीवाणुभोजी की उपयोगिता पर संक्षिप्त लेख लिखिए ।
उत्तर:
जीवाणुभोजी में सामान्य रूप से एक रैखिक डी. एन. ए. अणु पाया जाता है। इसको एक स्थान से तोड़ने पर दो खण्ड बन जाते हैं। इन दोनों खण्डों के बीच वांछित डी.एन.ए. के निवेशन से पुनर्योगज डी.एन.ए. का निर्माण हो जाता है। जीवाणुभोजी जीवाणुओं को संक्रमित कर लयन चक्र पूरा कर पुनर्योगज डी.एन.ए. की कई प्रतियाँ निर्मित कर लेता है। इस वन्य जीवाणुभोजी डी.एन.ए. में से आवश्यक भाग को हटाकर इसका पुनः निर्माण किया जाता है। इस पुनः निर्मित जीवाणुभोजी डी.एन.ए. में 20-25 Kb बाहरी DNA निवेशित किया
जाता है। कई जीवाणुभोजियों, मुख्य रूप से (लेम्डा) व M13 फाजी का वाहक के रूप में उपयोग करते हैं।

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प्रश्न 8.
उत्तम वाहक के कोई चार गुणधर्म लिखिए ।
उत्तर:
उत्तम वाहक के गुणधर्म निम्न हैं-

  1. इसका बिलगन एवं शोधन सरल एवं सुविधाजनक होना चाहिए।
  2. इसको परपोषी कोशिका में सफलतापूर्वक प्रविष्ट कराया जा सके अर्थात् इसके द्वारा रूपान्तरण दक्ष एवं सरल होना चाहिए।
  3. इसको वांछित DNA की अभिव्यक्ति करनी होती हैं। इसलिए वाहक में प्रमोटर ऑपरेटर जैसे नियामक अवयव एवं अन्य आवश्यक क्रमों का उपस्थित होना आवश्यक है।
  4. जीन रूपान्तरण के लिए वाहक में यह क्षमता होनी चाहिए कि या तो वह स्वयं या अपने DNA निवेश को परपोषी क्रोमोसोम में समाकलित कर सके।
  5. इसमें उपयुक्त रिपोर्टर जीन होने चाहिये जिससे रूपान्तरित परपोषी कोशिकाओं का आसानी से वरण किया जा सके।

प्रश्न 9.
pBR322 क्या है? इसका चित्र बनाकर वर्णन कीजिये।
उत्तर:
इस प्लाज्मिड का क्लोनिंग वाहक के रूप में उपयोग किया जाता है। इसमें p = प्लाज्मिड BR इसे बनाने वाले वैज्ञानिक बोलिवर तथा रोड्रिगन के नाम का प्रथम अक्षर तथा 322 उनके प्रयोग पर आधारित संख्या है। इनका आकार 1.5 Kb से लेकर 1500 Kb तक हो सकता है। इसमें तीन जीनों से लेकर कई हजार जीन हो सकते हैं।

इन वाहकों में 15 Kb से छोटे DNA खण्डों का ही क्लोन कर सकते हैं। इसमें दो प्रतिजीव प्रतिरोधिता जीनें पाई जाती हैं। एक जीन ऐम्पिसिलिन तथा दूसरी टेट्रासाइक्लिन में प्रतिरोधिता प्रदान करती है। इसमें अनेक विशिष्ट सीमाकारी एन्जाइमों का अभिज्ञान स्थल पाये जाते हैं। इसमें 4361 क्षार युग्म पाये जाते हैं तथा इसे शुद्ध रूप से प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 10.
पॉलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया तथा जीन क्लोनिंग ‘तुलना कीजिए।
उत्तर:

पॉलीमरेज शृंखला अभिक्रिया (Polymerase chain reaction = PCR)जीन क्लोनिंग (Gene cloning)
1. इसमें बहुत कम DNA की आवश्यकता होती है, यहाँ तक जीन की एक प्रति भी पर्यास होती है।इसमें अधिक DNA की आवश्यकता होती है।
2. यह एक सस्ती विधि है क्योंकि इसमें महंगे प्रतिबन्धन एन्जाइम, लाइगेज व वाहक DNA की आवश्यकता नहीं होती है।इसमें इन सब की आवश्यकता होती है अतः यह एक महंगी विधि है।
3. इसमें कम समय (4-5 घन्टे) श्रम व दक्षता की आवश्यकता होती है।इसमें अधिक समय (2-4 दिन), श्रम व दक्षता की आवश्यकता होती है।
4. इसके अनेक अनुप्रयोग हैं और वर्तमान में नये अनुप्रयोग विकसित हो रहे हैं।इसके सीमित अनुप्रयोग हैं।
5. यह एक पूर्णरूप से स्वचालित विधि है।स्वचालित नहीं है।

प्रश्न 11.
आनुवंशिक अभियान्त्रिकी में प्रयुक्त कौनसे एन्जाइम आण्विक कैंची के नाम से प्रख्यात हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक का नाम व कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आनुवंशिक अभियान्त्रिकी में प्रयुक्त प्रतिबन्धन एन्जाइम (Restriction Enzyme) आण्विक कैंची के नाम से प्रख्यात है।

ये दो प्रकार के होते हैं –
1. प्रतिबंधन एक्सोन्यूक्लिएज (RestrictionExonuclease) – कार्य ये DNA के सिरे से न्यूक्लियोटाइड को अलग करते हैं।
2. प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज (Restriction Endonuclease) – कार्य ये DNA के भीतर विशिष्ट स्थलों पर काटते हैं। प्रत्येक प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएज DNA अनुक्रम की लंबाई के निरीक्षण पश्चात् कार्य करता है। जब यह अपना विशिष्ट पहचान अनुक्रम पा जाता है तब यह DNA से जुड़ता है तथा द्विकुंडलिनी की दोनों लड़ियों को शर्करा – फॉस्फेट आधारस्तंभों के विशिष्ट केन्द्रों पर काटता है।

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प्रश्न 12.
पुनर्योगज डी एन ए किसे कहते हैं? परपोषी कोशिकाओं में विजातीय डी एन ए के प्रवेश करवाने की सूक्ष्म अंतःक्षेपण तथा जीन गन विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किसी एक जीव से DNA का एक खण्ड लेकर उसका दूसरे जीव के DNA के साथ संकरण करवाना पुनर्योगज DNA कहते हैं। इस तकनीक में एक जाति के DNA को दूसरी प्रजाति के DNA में प्रवेश करवा कर पुनर्योगज DNA (recombinant DNA ) प्राप्त किया जाता है।

सूक्ष्म अंतःक्षेपण (Microinjection) – इसमें DNA को प्रोटोप्लास्टों अथवा परागकणों अथवा सीधे ही विकासशील पुष्पक्रमों में दबाव के साथ अंत:क्षेपित (inject) कर प्रवेश करा दिया जाता है। जीन गन (Gene Gun) – DNA से विलोपित ( coated) स्वर्ण या टंग्स्टन के 1-3 माइक्रो मी. व्यास वाले कणों को बुलेट ( bullet) के द्वारा उच्च वेग से लक्ष्य कोशिकाओं में दाग दिया जाता है। इससे कोशिका भित्ति को भेदकर कोशिका के अन्दर प्रविष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 13.
प्रतिबन्धित एन्जाइम किसे कहते हैं? जैल वैद्युत- संचलन तकनीक से डी एन ए खण्ड के पृथक्करण एवं विलगन की प्रक्रिया समझाइए |
उत्तर:
वे एन्जाइम जो DNA को निश्चित बिन्दुओं पर काटकर उसको निश्चित आकार के छोटे-छोटे टुकड़ों में कर देते हैं, इन्हें सीमाकारी या प्रतिबंधित एन्जाइम (Restriction enzyme) कहते हैं। जैल वैद्युत संचलन (Electrophoresis ) से DNA खण्ड का पृथक्करण एवं विलगन कर सकते हैं।

DNA खण्ड ऋणात्मक आवेशिक (charged) अणु होते हैं, इसलिए इन्हें विद्युत क्षेत्र में माध्यम / आधात्री द्वारा एनोड की तरफ बलपूर्वक भेजकर अलग कर सकते हैं। इसमें ऐगारोज माध्यम का उपयोग होता है। DNA खण्डों को ऐगारोज जैल के छलनी प्रभाव द्वारा उनके आकार के अनुसार अलग करते हैं। इस कारण खण्ड जितने छोटे आकार के होंगे, वे अधिक दूर तक जायेंगे।

इथीडियम ब्रोमाइड अभिरंजित जैल को पराबैंगनी प्रकाश से अनावृत करने पर DNA की चमकीली नारंगी रंग की पट्टी दिखाई पड़ती है। DNA की पृथक्कृत पट्टियों को ऐगारोज जैल से काट कर निकालते हैं और जैल के टुकड़ों से निष्कर्षित (extract) कर लेते हैं। इस प्रकार शुद्ध किये गये DNA को क्लोनिंग संवाहक से जोड़कर, पुनर्योगज DNA निर्माण में उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 14.
आनुवंशिक इंजीनियरिंग किसे कहते हैं? पुनर्योगज डीएनए निर्माण की तकनीक समझाइए ।
उत्तर:
वह तकनीक जिसमें एक जाति के DNA को दूसरी प्रजाति के DNA में प्रवेश करवा कर पुनर्योजी DNA (recombinant (DNA) प्राप्त किया जाता है, आनुवंशिक इंजीनियरिंग कहते हैं। आनुवंशिक इंजीनियरिंग में जीन क्लोनिंग एवं जीन स्थानांतरण का उपयोग कर पुनर्योगज डीएनए का निर्माण किया जाता है। प्रथम पुनर्योगज DNA का निर्माण सालमोनेला टाइफीमूरियम के प्लाज्मिड में प्रतिजैविक प्रतिरोधी कूटलेखन जीन के जुड़ने से हुआ था।

स्टेनले कोहेन व हरबर्ट बोयर ने 1972 में यह कार्य प्लाज्मिड से DNA का टुकड़ा काटकर सम्पन्न किया, जिसमें प्रतिजैविक प्रतिरोध प्रदान करने के लिए जिम्मेदार जीन थी। आणविक कैंची कहे जाने वाले ‘प्रतिबंधन एन्जाइम’ (Restriction Enzyme) की खोज से DNA को विशिष्ट जगहों पर काटना संभव हो सका। कटे हुए DNA का भाग प्लाज्मिड DNA से जोड़ा जाता है।

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यह प्लाज्मिड DNA संवाहक ( vector) की भांति कार्य करता है जो इससे जुड़े DNA को स्थानांतरित करता है। प्रतिजैविक प्रतिरोधी जीन को संवाहक के साथ जोड़ने का काम एंजाइम DNA लाइगेज के द्वारा होता है जो DNA अणु के कटे हुए भाग पर कार्य कर उसके किनारों को जोड़ने का काम करता है। इस संयोजन से पात्रे ( in vitro) नये गोलाकार स्वतः प्रतिकृति बनाने वाले DNA का निर्माण होता है जिसे पुनर्योगज DNA कहते हैं। जब यह DNA एशरिकिआ कोलाई में स्थानांतरित किया जाता है तो यह नए परपोषी के DNA पॉलीमरेज एंजाइम का उपयोग कर अनेक प्रतिकृतियाँ बना लेता है।

प्रश्न 15.
बायोरिएक्टर क्या है? इसकी कार्यप्रणाली समझाइए ।
उत्तर;
लगभग सभी पुनर्योगज प्रौद्योगिकियों का मुख्य उद्देश्य वांछित प्रोटीन का उत्पादन करना होता है। इसके लिए वांछित जीन को क्लोन करने, लक्ष्य प्रोटीन की अभिव्यक्ति को प्रेरित करने वाली परिस्थितियों को अनुकूलतम बनाने के पश्चात् इनका व्यापक स्तर पर उत्पादन सम्भव है। लाभकारी जीनों को आश्रय देने वाली कोशिकाओं का छोटे पैमाने पर प्रयोगशाला में वर्धन किया जा सकता है।

संवर्धन को वांछित प्रोटीन का निष्कर्षण कर पृथक्करण की विभिन्न विधियों का प्रयोग कर प्रोटीन का शोधन कर सकते हैं। कोशिकाओं को सतत संवर्धन तंत्र में गुणित कर सकते हैं, जिसमें उपयोग किये गये माध्यम को एक तरफ से निकालकर दूसरी तरफ से ताजा माध्यम को भरते हैं ताकि कोशिकाएँ अपने क्रियात्मक रूप से सर्वाधिक सक्रिय लॉग (exponential) प्रावस्था में बनी रहें।

यह संवर्धन विधि अधिक जैव मात्रा के उत्पादन में वांछित प्रोटीन के अधिक उत्पादन हेतु उपयोगी है। इन उत्पादों के अधिक मात्रा में उत्पादन हेतु बायोरिएक्टर का उपयोग किया जाता है। बायोरिएक्टर एक बर्तन के समान होते हैं, जिसमें सूक्ष्मजीवों, पौधों, जन्तुओं व मानव कोशिकाओं का उपयोग करते हुए कच्चे माल को जैव रूप से विशिष्ट उत्पादों व्यष्टि एन्जाइम आदि में परिवर्तित किया जाता है। बायोरिएक्टर वांछित उत्पाद प्राप्त करने के लिए अनुकूलतम परिस्थितियाँ उपलब्ध करता है।

तापमान, PH, क्रियाधार, लवण, विटामिन, ऑक्सीजन आदि वृद्धि हेतु अनुकूलतम परिस्थितियाँ हैं । प्रायः विलोडन ( stirring) प्रकार का बायोरिएक्टर सर्वाधिक उपयोग में लाया जाता है। विलोडित हौज बायोरिएक्टर (stirred tank bioreacter) बेलनाकार होते हैं। इसके आधार घुमावदार होने से बायोरिएक्टर के अंदर अंतर्वस्तु के मिश्रण में सहायता मिलती है। बायोरिएक्टर में ऑक्सीजन की उपलब्धता तथा मिश्रण मिलाने की विलोडन ( stirrer ) सुविधा होती है। एकान्तर में बायोरिएक्टर में हवा बुलबलों के रूप में भेजी जाती है।

बायोरिएक्टर में एक प्रक्षोभक तंत्र (agitator system), ऑक्सीजन प्रदाय तंत्र, झाग नियंत्रण तंत्र, पीएच नियंत्रण तंत्र, तापक्रम नियंत्रण तंत्र व प्रतिचयन प्रद्वार (sampling ports ) लगा होता है जिससे संवर्धन की थोड़ी मात्रा समय-समय पर निकाली जा सकती है।

प्रश्न 16.
जीन क्लोनिंग में एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस के कार्य को समझाइए ।
उत्तर:
जीन क्लोनिंग में एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस का उपयोग होता है। वैसे एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस अनेक द्विबीजपत्री पौधों का रोगजनक पैथोजन है। यह DNA के एक खण्ड जिसे ‘टी. डीएनए’ कहते हैं, को स्थानान्तरित कर सामान्य पौधों की कोशिकाओं को अर्बुद (Tumor ) में रूपान्तरित करता है और ये अर्बुद कोशिकाएँ रोगजनक के लिए आवश्यक रसायनों का उत्पादन करते हैं। इसी आधार पर एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस का टीआई (Ti) प्लाज्मिड क्लोनिंग संवाहक के रूप में अब रूपान्तरित कर दिया गया है जो पौधों के लिए रोगजनक नहीं है, परन्तु इसका उपयोग अपनी अभिरुचि के जीन को अनेक पौधों में स्थानान्तरित करने में किया जाता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आनुवंशिक अभियान्त्रिकी को परिभाषित कीजिए । इसके प्रमुख चरणों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर:
आनुवंशिक अभियान्त्रिकी (Genetic Engineering)-इस तकनीक द्वारा आनुवंशिक पदार्थों (डी.एन.ए. या आर.एन.ए.) के रसायन में परिवर्तन कर इसे परपोषी जोवों में प्रवेश कराकर इसके समलक्षणी (फीनोटाइप) में परिवर्तन करते हैं।

आनुवंशिक अभियांत्रिकी के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं –
(1) वांछित जीन अथवा लक्ष्य जीन की पहचान व पृथक्करण किसी भी जीन का चयन उसकी उपयोगिता पर निर्भर करता है। वैज्ञानिकों का उद्देश्य सूक्ष्मजीवों के जीनों का उपयोग कर मानव के लिए आवश्यक हार्मोन का संश्लेषण करना, रोगों का निदान करना, आवश्यक एन्जाइमों, विटामिन, ऐन्टीबायोटिक का उत्पादन बढ़ाना, ऐसे सूक्ष्म जीव उत्पन्न करना जो उपयोगी पौधों को शाकनाशी एवं कीटनाशियों के प्रभाव से बचा सकें। उच्च श्रेणी के पौधों की प्रकाश संश्लेषण की दक्षता बढ़ाना, लेग्यूमिनोसी कुल के अतिरिक्त अन्य पौधों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता विकसित करना, फसल की पैदावार एवं पोषणिक मान बढ़ाना आदि हो सकते हैं। अतः वांछित DNA का चयन उद्देश्य पर निर्भर करता है।

वांछित डी. एन. ए. तीन प्रकार का होता है –

  1. जीनोमिक DNA
  2. C – DNA
  3. संश्लेषित DNA

क्लोनिंग के लिए वांछित जीन की पहचान कर उसे पृथक् करने का कार्य सीमाकारी एन्जाइम द्वारा किया जाता है।
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(2) पुनर्योगज DNA ( Recombinant DNA = r.DNA) या काइमेरिक DNA (Chimeric DNA ) का निर्माण – इस चरण में पृथक् की गई वांछित जीन को वाहक DNA के साथ जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया DNA लाइगेज नामक एन्जाइम द्वारा उत्प्रेरित होती है। यह एन्जाइम प्रत्येक कोशिका में संश्लेषित होता है। वांछित जीन वाहक DNA में जोड़ने से पुनर्योगज DNA का निर्माण हो जाता है।

(3) पुनर्योगज DNA का परपोषी कोशिका अथवा ग्राही कोशिका में स्थानान्तरण- पुनर्योगज DNA का जीवाणु कोशिका में प्रवेश रूपान्तरण क्रिया द्वारा किया जाता है। इस हेतु पुनर्योगज DNA को जीवाणु कोशिकाओं के साथ 37-43°C वाले उष्ण विलयन में स्थानान्तरित कर इन्हें ताप प्रघात दिया जाता है जिससे r DNA जीवाणु कोशिका में प्रवेश कर जाता है।

यूकैरियोटिक जीन स्थानान्तरण के लिए यीस्ट कोशिकाओं तथा वाहक के रूप में यीस्ट प्लाज्मिड का उपयोग करते हैं। पादप कोशिकाओं में जीन स्थानान्तरण के लिए एग्रोबैक्टिरियम के Ti एवं Ri प्लाज्मिड का उपयोग होता है। संवर्धित माध्यम की कोशिकाओं में पुनर्योजी DNA का स्थानान्तरण ट्रांसफेक्शन के द्वारा किया जाता है।

(4) पुनर्योगज DNA युक्त परपोषी कोशिकाओं का चयन एवं गुणन निवेशित जीन की सफलता जानने के लिए सामान्यतः प्रतिजैविकों के लिए प्रतिरोधकता प्रदान करने वाली जीनों को चिन्हक जीनों के रूप में उपयोग किया जाता है। ये ऐम्पिसिलिन, टेट्रासाइक्लिन, केनामाइसिन आदि प्रतिजैविकों के लिए प्रतिरोधी जीन हो सकती हैं।

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जिन कोशिकाओं में क्लोनित जीन की उपस्थिति का परीक्षण करना हो उनका संवर्धन उपर्युक्त प्रतिजैविकों युक्त माध्यम में किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि ऐम्पिसिलिन के प्रतिरोधी जीन चिन्हक के रूप में प्रयोग की गई है और पुनर्योगज DNA युक्त कोशिकाएँ ऐम्पिसिलिन माध्यम में वृद्धि करती हैं तो इसका तात्पर्य है कि क्लोनित जीन ठीक स्थान पर निवेशित हुई ।

इसके विपरीत यदि इस माध्यम में कोशिकाओं की वृद्धि नहीं होती है तो निश्चित ही पुनर्योगज DNA में क्लोनित जीन ठीक स्थान पर निवेशित नहीं हुई है। चयनित जीवाणु कोशिकाओं को ठोस माध्यम पर संवर्धित किया जाता है। जहाँ प्लाज्मिड युक्त जीवाणुओं की कालोनियां बन जाती हैं, जीवाणु कोशिका में वृद्धि के साथ-साथ वांछित जीन की संख्या में भी वृद्धि हो जाती है। इस क्रिया को क्लोनिंग कहते हैं।

(5) चयनित क्लोनों से वांछित जीन की ग्राही कोशिका में अभिव्यक्ति – चयनित पुनर्योगज कोशिकाओं व निवहों को विलगित कर वांछित उद्देश्य के अनुसार उपयोग किया जाता है। इन्हें वांछित प्रोटीन के संश्लेषण के लिए संवर्धित करते हैं। आवश्यकतानुसार इन जीनों को विभिन्न माध्यमों द्वारा जीवाणु, या यीस्ट, पादप व जन्तुओं में स्थानान्तरित किया जाता है।

इस तरह वांछित जीनों को अन्य जीवों में स्थानान्तरित कर इन जीवों को वांछित कार्य करने के लिए तैयार कर लिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी पादप में रोगाणु प्रतिरोधी जीन का निवेशन करवाया जाता है तो वह पादप रोग के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. एक वेक्टर में सहलग्नी डी. एन. ए. की प्रति की संख्या को नियंत्रित करने वाले अनुक्रम को क्या कहा गया है? (NEET 2020)
(अ) ओरी साइट
(ब) पेलीड्रोमिक अनुक्रम
(स) रिकॉग्नीशन (पहचान ) साइट
(द) चयनयुक्त मार्कर
उत्तर:
(अ) ओरी साइट

2. जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस में पृथक् हुए डी.एन.ए. के खण्डों को किसकी सहायता से देखा जा सकता है? (NEET-2020)
(अ) UV विकिरण में एथिडियम ब्रोमाइड से
(ब) UV विकिरण में एसीटोकार्यिन से
(स) अवरक्त विकिरण में एथिडियम ब्रोमाइड
(द) चमकीले नीले प्रकाश में एसीटाकार्यिन से
उत्तर:
(अ) UV विकिरण में एथिडियम ब्रोमाइड से

3. प्रतिबंधन एंजाइमों के विषय में गलत कथन को पहचानिए- (NEET-2020)
(अ) ये डी.एन.ए. की लड़ी को पैलिन्ड्रोमिक स्थलों पर काटते हैं
(ब) ये आनुवंशिक इंजीनियरिंग में उपयोगी हैं।
(स) चिपचिपे सिरे डी. एन. ए. लाइगेज द्वारा जोड़े जा सकते हैं।
(द) प्रत्येक प्रतिबंधन एंजाइम डी.एन.ए. क्रम की लम्बाई का निरीक्षण करके कार्य करते हैं।
उत्तर:
(स) चिपचिपे सिरे डी. एन. ए. लाइगेज द्वारा जोड़े जा सकते हैं।

4. निम्नलिखित में से सही युग्म को चुनिए-( NEET 2020 )
(अ) पॉलिमरेज डी.एन.ए. को खण्डों में तोड़ता है
(ब) न्यूक्लियेज डी.एन.ए. के दो रज्जुकों को पृथक् करता है
(स) एक्सोन्यूक्लियेज डी.एन.ए. में विशिष्ट स्थानों पर काट लगाता है।
(द) लाइगेज दो डी.एन.ए. के अणुओं को जोड़ता है।
उत्तर:
(द) लाइगेज दो डी.एन.ए. के अणुओं को जोड़ता है।

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5. इको आर I द्वारा पहचाने जाने वाला पैलिन्ड्रोमिक क्रम है-(NEET-2020)
(अ) 5′ GGACC – 3′
3′ CCTTGG – 5′
(ब) 5′- CTTAAG – 3′
3′ – GAATTC – 5′
(स) 5′-GGATCC -3′
3′ CCTAGG – 5′
(द) 5′ GAATTC – 3′
3′ CTTAAG – 5′
उत्तर:
(द) 5′ GAATTC – 3′
3′ CTTAAG – 5′

6. जैव जीवाणुओं के एक मिश्रण में किससे उपचार करके डी.एन.ए. अवक्षेपण को प्राप्त किया जा सकता है? (NEET-2019)
(अ) शीतित क्लोरोफार्म से
(ब) आइसोप्रोपेनॉल से
(स) शीतित इथेनॉल से
(द) कमरे के तापमान पर मिथेनॉल से
उत्तर:
(स) शीतित इथेनॉल से

7. पॉलिमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (PCR) में चरणों का सही क्रम क्या है? (NEET-2018)
(अ) विकृतिकरण, विस्तारण, अनीलन
(ब) अनीलन, विस्तारण, विकृतिकरण
(स) विस्तारण, विकृतिकरण, अनीलन
(द) विकृतिकरण, अनीलन, विस्तारण
उत्तर:
(द) विकृतिकरण, अनीलन, विस्तारण

8. एमरोज जैल में पृथक् हुए डी.एन.ए. खण्ड को किसके अभिरंजन के बाद देखा जा सकता है? (NEET-2017)
(अ) ब्रोमोफिनोल ब्ल्यू
(ब) एसिटोकार्यिन
(स) एनिलीन ब्ल्यू
(द) इथिडियम ब्रोमाइड
उत्तर:
(द) इथिडियम ब्रोमाइड

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9. डी. एन. ए. के खण्ड कैसे होते हैं?
(अ) धनात्मक आवेशित
(ब) ऋणात्मक आवेशित
(स) उदासीन
(द) वे अपने आमाप के अनुसार धनात्मक या ऋणात्मक आवेशित हो सकते हैं।
उत्तर:
(ब) ऋणात्मक आवेशित

10. बाजार में भेजने से पहले अभिव्यक्त प्रोटीन के पृथक्करण और शुद्धिकरण की प्रक्रिया को क्या कहा जाता है? (NEET-2017)
(अ) प्रतिप्रवाह प्रक्रमण
(ब) अनुप्रवाह प्रक्रमण
(स) जैव प्रक्रमण
(द) पश्च उत्पादन प्रक्रमण
उत्तर:
(ब) अनुप्रवाह प्रक्रमण

11. एक ही प्रतिबंधन एण्डोन्यूक्लिएज से काटे गये एक विजातीय DNA और प्लाज्मिड को पुनर्योगज प्लाज्मिड बनाने के लिए जिसका उपयोग करके इन्हें जोड़ा जा सकता है- (NEET II-2016)
(अ) पॉलिमरेज-III
(ब) लाइगेज
(स) EαRI
(द) टेक पॉलिमरेज
उत्तर:
(ब) लाइगेज

12. DNA को विशिष्ट स्थानों पर काट देना किसके आविष्कार से सम्भव हुआ? (NEET-2016)
(अ) प्रोब्स
(स) लाइगेज
(ब) सलैक्टेबल मार्करस
(द) रेस्ट्रिक्शन एंजाइम
उत्तर:
(द) रेस्ट्रिक्शन एंजाइम

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13. निम्नलिखित में से कौनसा प्रतिबंधित एंजाइम कुंठित सिरे उत्पन्न करता है? (NEET-2016)
(अ) Xαl
(ब) Hind III
(स) Sal I
(द) EαRV
उत्तर:
(द) EαRV

14. DNA अंगुलिछापी की किसी भी तकनीक के लिए निम्नलिखित में से किसी एक की आवश्यकता नहीं होती? ( NEET – 2016 )
(अ) प्रतिबंधित एन्जाइम
(ब) DNA-DNA संकरण
(स) पॉलिमरेज श्रृंखला अभिक्रिया
(द) जिंक अंगुलि विश्लेषण
उत्तर:
(ब) DNA-DNA संकरण

15. उस DNA को क्या कहते जिसमें क्लोनिंग के लिए रूचि वाली जीन को समाकलित किया जाता है? (NEET-2015)
(अ) टेम्पलेट
(ब) वेक्टर
(स) करियर
(द) रूपान्तरक
उत्तर:
(ब) वेक्टर

16. कौनसा संवाहक DNA के केवल एक छोटे टुकड़े को क्लोन कर सकता है? (NEET-2014)
(अ) जीवाणु का कृत्रिम गुणसूत्र
(ब) यीस्ट का कृत्रिम गुणसूत्र
(स) प्लाज्मिड
(द) कॉस्मिड
उत्तर:
(स) प्लाज्मिड

17. मानव जीनोम अनुक्रमण के लिए आमतौर पर प्रयुक्त वेक्टर है- (NEET-2014)
(अ) T-DNA
(ब) बी.ए.सी. और बाई. ए.सी.
(स) अभिव्यक्ति वेक्टर
(द) T/A क्लोनिंग वेक्टर
उत्तर:
(ब) बी.ए.सी. और बाई. ए.सी.

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18. जीव और उसकी कोशिका भित्ति निम्नकारक एंजाइम के लिए निम्नलिखित में से कौन सही सुमेलित नहीं है? (NEET-2013)
(अ) जीवाणु – लाइसोजाइम
(ब) पादप कोशिकाएँ – सेलुलोज
(स) शैवाल मिथाइलेज
(द) कवक काइटीनेज
उत्तर:
(स) शैवाल मिथाइलेज

19. बायोलिस्टिक (जीन गोलाबारी) किसके लिए उपयुक्त है? (NEET-2012)
(अ) रोगजनक संवाहकों को निष्क्रिय करना
(ब) पादप कोशिकाओं का रूपान्तरण
(स) संवाहकों के साथ जोड़कर पुनर्योग्ज DNA का बनाना
(द) DNA फिंगर प्रिंटिंग
उत्तर:
(ब) पादप कोशिकाओं का रूपान्तरण

20. EαRI क्लोनिंग वेक्टर pBR322 के दिये जा रहे आरेखिये प्रतिदर्श में निम्नलिखित में से किस एक विकल्प के भाग को सही पहचान की गई है? [CBSE PMT] (Pre) – 2012, NEET-2012)
(अ) Ori-मूल कर्तन एंजाइम
(ब) rop घट गयी परासरणी दाब
(स) Hind III EcoRI चयनशील
(द) amp tet ऐन्टीबायोटिक प्रतिरोधी जीन
उत्तर:
(द) amp tet ऐन्टीबायोटिक प्रतिरोधी जीन

21. रूपान्तरण हेतु DNA से लेपित सूक्ष्म कण जिनको “जीन गन” से दागा जाता हो, किसके बने होते हैं? ” (NEET-2012)
(अ) रजत अथवा प्लेटिनम
(ब) प्लेटिनम अथवा जिंक
(स) सिलिकॉन अथवा प्लेटिनम
(द) स्वर्ण अथवा टंगस्टन
उत्तर:
(द) स्वर्ण अथवा टंगस्टन

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22. एक कोई रोगी जो अनुमानतः एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंसी सिन्ड्रोम (उपार्जित प्रतिरक्षा न्यूनता संलक्षण) से पीड़ित है इसकी पहचान के लिए आप कौनसी निदान तकनीक की सलाह देंगे? (NEET-2012)
(अ) एलिसा
(ब) एम.आर.आई.
(स) अल्ट्रासाउण्ड
(द) विडाल
उत्तर:
(अ) एलिसा

23. निम्न में से कौनसी एक तकनीक आनुवंशिकी अभियांत्रिक जीवित जीवों को सम्भव बनाती है? (CBSE PMT Mains 2011, NEET 2011 )
(अ) संकरण
(ब) पुर्नसंयोजित DNA तकनीक
(स) X किरण परावर्तन
(द) भारी समस्थानिकों द्वारा चिन्हित करना
उत्तर:
(ब) पुर्नसंयोजित DNA तकनीक

24. अनुषंगी DNA किस एक क्षेत्र में उपयोगी साधन होता है ? (NEET-2010)
(अ) लिंग निर्धारण
(ब) फोरेन्सिक विज्ञान
(स) आनुवंशिक इंजीनियरिंग
(द) अंग प्रतिरोपण
उत्तर:
(ब) फोरेन्सिक विज्ञान

25. DNA प्रतिलिपिकरण के लिये आवश्यकता होती है- (CBSE-2010)
(अ) DNA पॉलीमरेज की
(ब) DNA लाइगेज की
(स) DNA पॉलीमरेज तथा DNA लाइगेज की
(द) ट्रांसलोकेज तथा RNA पॉलीमरेज की
उत्तर:
(स) DNA पॉलीमरेज तथा DNA लाइगेज की

26. प्रतिबन्धन एन्जाइम (Restriction enzyme ) – (RPMT-2010)
(अ) संवाहक हीन प्रत्यक्ष जीन के अन्तरण में सहायक होते हैं।
(ब) DNA खंडों को काटते या जोड़ते हैं
(स) एण्डोन्यूक्लिवेज होते हैं, जो DNA को विशेष स्थलों पर विदलित करते हैं
(द) विद्यमान DNA या RNA को पूरक DNA बनाते हैं।
उत्तर:
(स) एण्डोन्यूक्लिवेज होते हैं, जो DNA को विशेष स्थलों पर विदलित करते हैं

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27. जैल इलेक्ट्रोफोरेसिस (Gel electrophoresis ) का प्रयोग होता है- (RPMT-2010)
(अ) DNA अणु के विगलन के लिये
(ब) DNA को खण्डों में काटने के लिये
(स) DNA अणुओं को उनके आकार के अनुसार पृथक् करने के लिए
(द) क्लोनकारी संवाहक को जोड़कर पुनर्योगज DNA निर्माण के लिए
उत्तर:
(स) DNA अणुओं को उनके आकार के अनुसार पृथक् करने के लिए

28. आनुवंशिकी अभियांत्रिकी में ‘आण्विक कैंची’ की तरह उपयोग किया जाता है- (KCET 2000; WBJWW-2009)
(अ) DNA पॉलीमरेज
(ब) DNA लाइगेज
(स) हेलिकेज
(द) रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज
उत्तर:
(द) रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज

29. निम्नलिखित में से किस एक विजातीय DNA को फसली पौधों में डलने के लिए सामान्यतः उपयोग में लाया जाता है? (NEET-2009)
(अ) पेनिसीलियम एम्सपैसम
(ब) ट्राइकोडर्मा हरजिएनम
(स) मेलॉयडोगाइन एन्कोनिआ
(द) एप्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस
उत्तर:
(द) एप्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेसिएंस

30. ऐन्टीबायोटिक प्रतिरोध जीन का प्लाज्मिड वाहक के साथ जोड़ा जा सकना किससे सम्भव हुआ? (CBSE PMT 2008, NEET 2008)
(अ) DNA पॉलीमरेजों से
(ब) एक्सोन्यूक्लिऐजों से
(स) DNA लाइगेज से
(द) एण्डोन्यूक्लिएजों से
उत्तर:
(स) DNA लाइगेज से

31. शाकनाशी- प्रतिरोधी आनुवंशिकता : रूपान्तरित (GM) फसलों के उत्पाद / उपयोग का मुख्य उद्देश्य क्या है? (CBSE PMT-2008, NEET-2008)
(अ) पर्य- प्रेमी शाकनाशियों को बढ़ावा देना
(ब) स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए खाद्य वस्तओं में शाकनाशी का संचयन कम करना
(स) मानव श्रम का उपयोग किए बिना ही खेत से खरपतवारों का सफाया कर देना
(द) बिना शाकनाशियों का उपयोग किए ही खेत से खरपतवारों को दूर कर देना
उत्तर:
(ब) स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए खाद्य वस्तओं में शाकनाशी का संचयन कम करना

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32. pBR322 वाहक में किसके प्रति प्रतिरोधक जीन होती है- (CBSE PMT-2006)
(अ) एम्पीसिलिन
(ब) टेट्रासाइक्लिन
(स) उपर्युक्त दोनों
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(स) उपर्युक्त दोनों

33. प्रतिबन्धन एन्डोन्यूक्लिएज काटता है- (Haryana PMT-2006)
(अ) DNA के दोनों रज्जुकों को
(ब) एक DNA रज्जु को विशिष्ट स्थल पर
(स) DNA के दोनों रज्जुओं को किसी भी स्थल पर
(द) एकल रज्जुकी RNA को किसी भी स्थान पर
उत्तर:
(अ) DNA के दोनों रज्जुकों को

34. आनुवंशिक अभियांत्रिकी में प्रयोग होने वाले दो महत्त्वपूर्ण जीवाणु हैं- (CBSE PMT 2006 )
(अ) नाइट्रोबैक्टर एवं एजेटोबैक्टर
(ब) राइजोबियम एवं डिप्लोकोकस
(स) नाइट्रोसोमोनॉस एवं कैलिबसिल्ला
(द) इश्वीरिचिया एवं एग्रोबैक्टिरियम
उत्तर:
(द) इश्वीरिचिया एवं एग्रोबैक्टिरियम

35. प्लाज्मिड (Plasmid ) है, एक ( Haryana PMT-2006)
(अ) जीवाणु
(ब) कवक
(स) प्लाज्मा झिल्ली का एक भाग
(द) जीवाणु कोशिका में अतिरिक्त गुणसूत्रीय DNA
उत्तर:
(द) जीवाणु कोशिका में अतिरिक्त गुणसूत्रीय DNA

36. प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज का प्रयोग पुनर्योगज DNA तकनीक में व्यापक रूप से किया जाता है। ये प्राप्त किये जाते हैं- (KCET-2006)
(अ) प्लाज्मिड से
(ब) सभी प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं से
(स) जीवाणुभोजी से
(द) जीवाणु कोशिका से
उत्तर:
(द) जीवाणु कोशिका से

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37. पारजीनी जीवों में लक्ष्य ऊतक में पारजीन की अभिव्यक्ति किसके द्वारा निर्धारित होती है ?
(अ) पारजीन (ट्रांसजीन)
(ब) रिपोर्टर द्वारा
(स) संवाहक (रिपोर्टर)
(द) संवृद्धिकर (एन्हेंसर) में ट्रांसजीन की ट्रांसजेनिक
उत्तर:
(स) संवाहक (रिपोर्टर)

38. लक्ष्य ऊतक (Target tissue) अभिव्यक्ति निर्धारित होती है-(NEET-2004)
(अ) इन्हेन्सर द्वारा
(ब) उन्नायक (प्रमोटर )
(स) प्रमोटर द्वारा
(द) ट्रांसजीन द्वारा
उत्तर:
(ब) उन्नायक (प्रमोटर )

39. आनुवंशिक पदार्थ पृथक् करने के लिए एन्जाइम का उपयोग होता है- (APMC-2004)
(अ) हाइड्रोलेज
(ब) एमाइलेज
(स) लाइगेज
(द) रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज
उत्तर:
(द) रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज

40. निम्नलिखित में से कौनसा एक जीवाणु पौधों में आनुवंशिक इंजीनियरिंग में सर्वाधिक उपयोग में लाया जाता है? (NEET-2003)
(अ) क्लास्ट्रिडियम सेप्टिकम
(ब) जेन्थेमोनास बिट्राइ
(स) बेसिलस कोएगुलेन्स
(द) एग्रोबैक्टिरियम ट्यूमीफेसिएन्स
उत्तर:
(द) एग्रोबैक्टिरियम ट्यूमीफेसिएन्स

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41. किसकी खोज के कारण आनुवंशिक अभियांत्रिकी में DNA का तोड़-फोड़ सम्भव हो सका ? (NEET-2002)
(अ) रेस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज
(ब) DNA लाइगेज
(स) ट्रांसक्रिप्टेज
(द) प्राइमेज
उत्तर:
(अ) रेस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज

42. अभी तक खोजे गये प्लाज्मिड्स में अधिकतम क्षारकों की संख्या (MP PMT-2000)
(अ) 50 किलो बेस
(ब) 500 किलो बेस
(स) 5000 किलो बेस
(द) 5 किलो बेस अभियान्त्रिकी में प्रयुक्त होता
उत्तर:
(ब) 500 किलो बेस

43. निम्न में से कौन-सा आनुवंशिक (NEET-2001)
(अ) RNA पॉलीमरेज
(ब) DNA पॉलीमरेज’
(स) प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज
(द) न्यूक्लिएज
उत्तर:
(स) प्रतिबन्धन एण्डोन्यूक्लिएज

44. निम्न में से किसके द्वारा पादपों और जन्तुओं को इच्छित (desired) लक्षणों के साथ प्रजनन करना सम्भव है- (KCET-1994)
(अ) आनुवंशिक इंजीनियरिंग द्वारा
(ब) गुणसूत्र इंजीनियरिंग द्वारा
(स) आइकेबाना विधि द्वारा
(द) ऊतक संवर्धन द्वारा
उत्तर:
(अ) आनुवंशिक इंजीनियरिंग द्वारा

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-
1. मनुष्य के अगुणित डी.एन.ए. में कितने क्षार युग्म होते हैं?
(अ) 5.5 × 107
(ब) 4.6 × 106
(स) 3.3 × 109
(द) 6.3 × 108
उत्तर:
(स) 3.3 × 109

2. केन्द्रक में मिलने वाले अम्लीय पदार्थ डी.एन.ए. की खोज किसने की थी?
(अ) फ्रेडरीच मेस्वर
(ब) राबर्ट हुक
(स) वाटसन क्रिक
(द) राबर्ट ब्राउन
उत्तर:
(अ) फ्रेडरीच मेस्वर

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

3. डी.एन.ए. का वह खण्ड जो आर. एन. ए. का कूटलेखन करता है, उसे कहते हैं-
(अ) रज्जुक
(ब) क्रोमोसोम
(स) जीन
(द) इंट्रान
उत्तर:
(स) जीन

4. फिंगर प्रिंट के लिए निम्न में से किसका DNA का सैम्पल लिया जाता है-
(अ) कपड़ों पर लगे वीर्य
(ब) योनि स्राव
(स) बाल या मृत व्यक्ति के बाल
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

5. मानव में लगभग 1.4 करोड़ जगहों पर अलग इकहरा क्षार पाया जाता है जिसे कहते हैं-
(अ) स्निप्स
(ब) पिनिप्स
(स) जिनीप्स
(द) टिनिप्स
उत्तर:
(अ) स्निप्स

6. मानव में ज्ञात सबसे बड़ी जीन डिसट्राफिन (Distraphin) में कितने करोड़ क्षार पाए जाते हैं-
(अ) 2.4 करोड़
(ब) 3.4 करोड़
(स) 4.4 करोड़
(द) 5.4 करोड़
उत्तर:
(अ) 2.4 करोड़

7. गुणसूत्रों के एक अगुणित समुच्चयी (Haploid set ) को क्या कहते हैं?
(अ) अनुलेखन
(ब) आनुवंशिक कूट
(स) लैक ओपेरॉन
(द) जीनोम
उत्तर:
(द) जीनोम

8. डी.एन.ए. में अनुलेखन इकाई का भाग नहीं है-
(अ) उन्नायक (प्रमोटर )
(ब) संरचनात्मक जीन
(स) समापक
(द) लैक ओपेरॉन ।
उत्तर:
(द) लैक ओपेरॉन ।

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9. पहला आनुवांशिक पदार्थ था-
(अ) DNA
(ब) RNA
(स) प्रोटीन
(द) CSC
उत्तर:
(ब) RNA

10. आर.एन.ए. के रासायनिक रूपांतरण से किसका विकास हुआ-
(अ) tRNA
(ब) mRNA
(स) rRNA
(द) DNA
उत्तर:
(द) DNA

11. फ्रेडेरिक ग्रिफीथ (1928) ने स्ट्रेप्टोकोकस नीमोनी किस रोग के लिए जिम्मेदार माना-
(अ) हैजा
(ब) निमोनिया
(स) टीबी
(द) टॉयफाइड
उत्तर:
(ब) निमोनिया

12. ‘न्यूक्लिन’ नाम किस वैज्ञानिक ने दिया?
(अ) मेण्डल ने
(ब) हर्ष ने
(स) ओसवाल्ड एवेरी ने
(द) फ्रेडरीच मेस्चर ने।
उत्तर:
(द) फ्रेडरीच मेस्चर ने।

13. निम्न में से किसे पालिन्यूक्लिओटाइड एंजाइम कहते हैं?
(अ) पॉलीमरेज- I
(ब) पॉलीमरेज- II
(स) लाइगेज
(द) राइबोन्यूक्लिएज
उत्तर:
(स) लाइगेज

14. न्यूक्लिओसाइड न्यूक्लिोटाइड से भिन्न होता है, क्योंकि इसमें नहीं होता-
(अ) फास्फेट
(ब) शर्करा
(स) नाइट्रोजन क्षारक
(द) फास्फेट व शर्करा
उत्तर:
(अ) फास्फेट

15. 64 कोडोन्स में से 61 कोडोन्स 20 अमीनो अम्ल को कोड करते हैं, यह कहलाता है-
(अ) कोडोन की वॉवलिंग
(ब) जीन का अतिव्यापन
(स) कोडोन की सार्वभिकता
(द) जेनिटिक कोड का ह्रास
उत्तर:
(द) जेनिटिक कोड का ह्रास

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16. संरचनात्मक जीन्स की क्रिया किसके द्वारा नियंत्रित होती है –
(अ) आपरेटर
(ब) प्रमोटर
(स) लाइगेज
(द) रेग्यूलेटरी जीन ।
उत्तर:
(अ) आपरेटर

17. DNA का अनुलेखन (Transcription ) किसके द्वारा सहायक होता है?
(अ) RNA पॉलीमरेज
(ब) DNA पॉलीमरेज
(स) एक्सोन्यूक्लिएज
(द) रीकाम्बीनेज
उत्तर:
(अ) RNA पॉलीमरेज

18. ओकाजाकी खण्ड किस समय दिखाई देते हैं-
(अ) प्रतिलिपिकरण (Replication)
(ब) पारक्रमण (Transduction )
(स) ट्रांसक्रिप्शन (Transcription)
(द) अनुलिपिकरण (Translation)
उत्तर:
(अ) प्रतिलिपिकरण (Replication)

19. DNA का एक्सरे क्रिस्टलोग्राफी द्वारा अध्ययन करने वाले थे-
(अ) गिफिथ
(ब) वाटसन एवं क्रिक
(स) विलकिन्स
(द) मैकलिन्टॉक
उत्तर:
(स) विलकिन्स

20. आनुवंशिक कूट होते हैं-
(अ) एकक
(ब) द्विक
(स) त्रिक
(द) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) त्रिक

21. आनुवंशिक कूट का वहन करने वाले हैं-
(अ) इन्ट्रॉन
(ब) एम्सॉन
(स) स्पलाइसोम
(द) SRNA
उत्तर:
(ब) एम्सॉन

22. कोशिका जैविकी का केन्द्रीय सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया?
(अ) वाटसन
(ब) विलिकिन्स
(स) ग्रिफिथ
(द) क्रिक
उत्तर:
(द) क्रिक

23. प्रोटीन संश्लेषण स्थान पर अमीनो अम्लों को कौन ले जाता है?
(अ) m.RNA
(स) t.RNA
(ब) r.RNA
(द) DNA
उत्तर:
(स) t.RNA

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24. न्यूक्लिक अम्ल के खोजकर्ता थे-
(अ) मीशर
(स) खुराना
(ब) वानमोल
(द) वाटसन क्रिक
उत्तर:
(अ) मीशर

25. यूकैरियोटोप में DNA के अनुलेखन के पश्चात् बनने वाले RNA को कहते हैं-
(अ) rRNA
(स) RNA
(ब) mRNA
(द) H RNA
उत्तर:
(द) H RNA

26. DNA में क्षारक युग्मों की परस्पर दूरी होती है-
(अ) 20A°
(स) 344°
(ब) 3.4A°
(द) 10A°
उत्तर:
(ब) 3.4A°

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
DNA आनुवंशिक पदार्थ है। इसके बारे में सुस्पष्ट प्रमाण किसने दिये ?
उत्तर:
अल्फ्रेड हर्षे व मार्था चेस ने।

प्रश्न 2.
DNA में शर्करा एवं फॉस्फोरिक अम्ल के मिलने से कौनसा बन्ध बनता है?
उत्तर:
फॉस्फो डाइएस्टर बन्ध ।

प्रश्न 3.
ऐसे खण्डों का नाम बताइये जो hnRNA में से RNA स्प्लाइसिंग के द्वारा काटकर अलग कर दिये जाते हैं।
उत्तर:
इन्ट्रॉन (Intron ) ।

प्रश्न 4.
उस एन्जाइम का नाम लिखिये जो अनुलेखन में सहायता करता है।
उत्तर:
RNA पॉलीमरेज विकर।

प्रश्न 5.
जीन अभिव्यक्ति के नियमन की ऑपेरॉन अवधारणा किन वैज्ञानिकों ने दी ?
उत्तर:
जैकब एवं मोनाड ।

प्रश्न 6.
hnRNA में पाये जाने वाले वे खण्ड जो प्रोटीन संश्लेषण में भाग नहीं लेते हैं, क्या कहलाते हैं?
उत्तर:
इन्ट्रॉन (Intron ) ।

प्रश्न 7.
ऋणात्मक नियमन क्या है ?
उत्तर:
इस नियमन में नियामक जीन का उत्पाद जीन की अभिव्यक्ति को रोक देता है। उदाहरण- लेक ऑपेरॉन ।

प्रश्न 8.
आनुवंशिक कूट में कोमारहित का क्या तात्पर्य है? उत्तर- दो कोडोन के बीच विराम नहीं होता है। एक के बाद दूसरा कोडोन तुरन्त प्रारम्भ हो जाता है।

प्रश्न 9.
snRNP का पूर्ण नाम बताइये ।
उत्तर:
लघुकेन्द्रकीय राइबोन्यूक्लियोप्रोटीन ( Small nuclear ribonucleoprotein) |

प्रश्न 10
सबसे छोटा RNA कौनसा होता है व इसमें कितने न्यूक्लियोटाइड होते हैं?
उत्तर:
t.RNA सबसे छोटे होते हैं। इसमें 75-80 न्यूक्लियोटाइड होते हैं।

प्रश्न 11.
सिस्ट्रॉन की संख्या के आधार पर m. RNA कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
दो प्रकार के मोनोसिस्ट्रानिक ( Monocistronic) तथा पॉलीसिस्ट्रॉनिक (Polycistronic)।

प्रश्न 12.
मोनोसिस्ट्रॉनिक किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह m. RNA जिसमें केवल एक सिस्ट्रॉन अर्थात् प्रोटीन के एक अणु के संकेत अनुलेखित होते हैं। उदाहरण-यूकैरियोटिक कोशिकाओं में।

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प्रश्न 13.
रेप्लीसोम ( Replisome) किसे कहते हैं?
उत्तर:
DNA प्रतिकृति विधि में एन्जाइमों की एक श्रृंखला भाग लेती है जिसे रेप्लीसोम कहते हैं।

प्रश्न 14.
DNA के एक कुण्डल की लम्बाई तथा एक कुण्डल में नाइट्रोजनी क्षारकों की संख्या बताइये।
उत्तर:
लम्बाई 34A° तथा क्षारकों की संख्या 11) होती है।

प्रश्न 15.
RNA कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
तीन प्रकार के r. RNA. t.RNA m. RNA तथा इनके अतिरिक्त विषमांगी केन्द्रकी RNA (hnRNA) तथा लघु केन्द्रकीय RNA भी होते हैं।

प्रश्न 16.
कोशिका में कितने प्रकार के r.RNA अणु पाये जाते हैं?
उत्तर:
लगभग 60 विभिन्न प्रकार के ।

प्रश्न 17.
ओकाजाकी खंड किस घटना से सम्बन्धित है ?
उत्तर:
प्रतिकरण से ।

प्रश्न 18.
BAC व YAC का पूर्ण नाम लिखिए।
उत्तर:
BAC = Bacterial Artificial Chromosome YAC = Yeast Artificial Chromosome.

प्रश्न 19
प्रोटीन में अमीनो अम्लों के अनुक्रमों को निर्धारित करने वाली विधि के विकास का श्रेय किसे जाता है ?
उत्तर:
फ्रेडिरक सेंगर ।

प्रश्न 20.
DNA अंगुलिछापी में किन DNA का महत्त्व है?
उत्तर:
पुनरावृत्ति DNA ( Repetitive DNA ) व अनुषंगी DNA (Satellite DNA) का।

प्रश्न 21.
आनुवंशिक पदार्थ के अणु हेतु आवश्यक चार मानदण्डों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर:
आनुवंशिक पदार्थ के अणु हेतु आवश्यक चार मानदण्ड निम्न हैं-

  • यह अपनी प्रतिकृति बनाने में सक्षम है। (प्रतिकृति)
  • इसे रचना व रासायनिक संगठन के आधार पर स्थित होना चाहिये।
  • इसमें धीमे परिवर्तनों (उत्परिवर्तन) की सम्भावना होती है जो विकास के लिये आवश्यक है।
  • इसे स्वयं ‘मेंडल के लक्षण’ के अनुरूप अभिव्यक्त होना चाहिए।

प्रश्न 22.
आनुवंशिक कूट की चार विशेषताएँ बताइए ।
उत्तर:

  • प्रकूट त्रिक होता है।
  • एक प्रकूट केवल एक अमीनो अम्ल का कूट लेखन होता है अतः यह असंदिग्ध व विशिष्ट होता है।
  • कुछ अमीनो अम्ल का कूट लेखन एक से अधिक प्रकूटों द्वारा होता है, इस कारण इन्हें अपहासित कूट कहते हैं।
  • कूट लगभग सार्वभौमिक होते हैं।

प्रश्न 23.
यदि DNA के एक रज्जुक का अनुक्रम निम्नानुसार है-
5′ – AAGTTACTAGAC – 3′
तो इसके आधार पर बनने वाले m RNA के अनुक्रम लिखिए।
उत्तर:
5′- AAGUUACUAGAC – 3′

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
पॉलीन्यूक्लियोटाइड से क्या तात्पर्य है? इनके घटकों को बताइये ।
उत्तर:
अनेक न्यूक्लियोटाइड्स आपस में जुड़कर पॉलीन्यूक्लियोटाइड की श्रृंखला बनाकर DNA व RNA की संरचना बनाते हैं। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड के तीन घटक होते हैं – नाइट्रोजनी क्षार, पेंटोस शर्करा (RNA में रिबोस तथा DNA में डीऑक्सीरिबोज) और एक फॉस्फेट समूह । नाइट्रोजनी क्षार दो प्रकार के होते हैं प्यूरीन्स (एडेनीन व ग्वानीन) व पायरिमिडीन (साइटोसीन, यूरेसिल व थाइमीन) । साइटोसीन DNA व RNA दोनों में मिलता है जबकि थाइमीन DNA में मिलता है ।

थाइमीन के स्थान पर यूरेसील RNA में मिलता है । नाइट्रोजनी क्षार नाइट्रोजन ग्लाइकोसिडिक बंध द्वारा पेंटोस शर्करा से जुड़कर न्यूक्लियोटाइड बनाता है जैसे एडीनोसीन या डीऑक्सी एडीनोसीन, ग्वानोसीन या डीऑक्सी ग्वानोसीन, साइटीडीन या डीऑक्सी साइटीडीन व यूरीडीन या डीऑक्सी थाइमीडिन ।

जब फॉस्फेट समूह फॉस्फोएस्टर बंध द्वारा न्यूक्लियोसाइड 5′ हाइड्रॉक्सिल समूह से जुड़ जाता है तब संबंधित न्यूक्लियोटाइड्स का निर्माण होता है। दो न्यूक्लियोटाइड्स 3-5 फॉस्फोडाइस्टर बंध द्वारा जुड़कर डाइन्यूक्लियोटाइड का निर्माण करता है। इस तरह से अनेक न्यूक्लियोटाइड्स जुड़कर एक पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला का निर्माण करते हैं।

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प्रश्न 2.
निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये-
(i) चारगाफ का तुल्यता नियम
(ii) अर्द्ध-संरक्षणीय प्रतिकृतिकरण
(iii) क्लोवर पत्ती प्रतिरूप
(iv) स्प्लाइसियोसोम
(v) समापन कोडोन
(vi) विपरीत अनुलेखन
(vii) बहुराइबोसोम
(viii) hnRNA
उत्तर:
(i) चारगाफ का तुल्यता नियम- चारगाफ ने 1949 में विभिन्न स्रोतों से DNA प्राप्त कर व अध्ययन कर नियम बनाये, जिन्हें चारगाफ का नियम कहते हैं-

  • प्यूरीन की कुल मात्रा पिरिमिडीन की कुल मात्रा के बराबर होती है (A + G = T + C) ।
  • A वT तथा G और C का अनुपात बराबर होता है परन्तु A + T व G+ C का समान होना आवश्यक नहीं है अतः A = T,

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(ii) अर्द्ध संरक्षणीय प्रतिकृतिकरण – DNA के प्रतिकृतिकरण सम्बन्ध में मेसलसन एवं स्टाइल (1958) के द्वारा प्रस्तुत अर्द्ध संरक्षणीय प्रतिकृत मत सर्वमान्य है । इसके अनुसार DNA अणु के दोनों सूत्र एक- दूसरे से अलग होकर अपने-अपने अस्तित्व को बनाये रखते हैं और प्रत्येक सूत्र, कोशिका में उपलब्ध न्यूक्लिओटाइडों के कुण्ड (pool) से अपने सम्पूरक सूत्र का संश्लेषण करते हैं।

इस प्रकार नये बने DNA अणु में एक सूत्र पूर्ववर्ती DNA अणु का एवं एक सूत्र नया संश्लेषित होता है अर्थात् आधा पूर्व जैसा तथा आधा नया, इसे अर्ध संरक्षणीय प्रतिकृति कहते हैं। मेसलसन एवं स्टाइल ने इसकी पुष्टि ई कोलाई जीवाणु पर भारी समस्थानिक N15 का उपयोग करके की थी ।

(iii) क्लोवर पत्ती प्रतिरूप – 1- RNA की संरचना का राबर्ट होले ने प्रतिरूप प्रस्तुत किया जिसे क्लोवर पत्ती प्रतिरूप कहते हैं। क्लोवर पत्ती प्रतिरूप के अनुसार RNA की एक पोलीन्यूक्लिओटाइड श्रृंखला मुड़कर के पांच भुजाएँ बनाती है। मुड़ने के कारण 5 व 3 सिरे पास-पास आ जाते हैं। प्रत्येक tRNA अणु के 3 छोर पर CCA अनुक्रम होता है, इस पर अमीनो अम्ल सिन्थेटेज एन्जाइम की सहायता से एक विशिष्ट अमीनो अम्ल जुड़ जाता है। 5′ छोर पर ‘G’ होता है। दो भुजाएँ –

  • TψC भुजा – इसकी सहायता से 1-RNA राइबोसोम्स से बन्धन करता है तथा
  • D भुजा या DHU भुजा – यह अमीनो अम्ल सिन्थेटेज से बन्धन में भाग लेती है। 1-RNA के नीचे लूप वाले भाग पर तीन क्षारों का अनुक्रम एन्टीकोडन वाले होते हैं। यह m RNA के विशिष्ट कोडोन से क्षार युग्मन करती है।

(iv) स्प्लाइसियोसोम – यूकैरियोटों में अनुलेखन के बाद बनने वाले RNA को hnRNA कहते हैं। RNA दो प्रकार के भागों का बना होता है। इसमें एक को इन्ट्रॉन ( Intron ) कहते हैं, इसमें कोड नहीं होता है। दूसरे भाग को एक्सॉन (Exon) कहते हैं जो आनुवंशिक कूट का वाहन करता है। इनमें से इन्ट्रॉन को RNA Splicing की प्रक्रिया द्वारा निकाल दिया जाता है। स्प्लाइसियोसोम नामक केन्द्रकीय अवयव इस प्रक्रिया में सहायता करते हैं।

(v) समापन कोडोन – ये कोड प्रोटीन श्रृंखला के निर्माण को रोकने या समापन के लिए होते हैं अर्थात् ये किसी भी अमीनो अम्ल को कोड नहीं करते हैं। ये UAA, UAG व UGA हैं। इन्हें स्टोप सिग्नल (Stop Signal) कहते हैं अर्थात् अनर्थक कोडोन (Nonsense Codon) होते हैं। ऐसे कुल 03 कोडोन होते हैं।

(vi) विपरीत अनुलेखन (Reverse transcription)-1970 में टेमिन एवं बाल्टीमोर (Temin and Baltimore) ने इसकी खोज की। अनेक ट्यूमर जनक विषाणुओं में आनुवंशिक पदार्थ के रूप में RNA होता है जिससे पूरक DNA बनता है। यह विपरीत अनुलेखन ट्रान्सक्रिप्टेज द्वारा किया जाता है। ऐसे विषाणुओं को रेट्रो वाइरस (Retro Virus) कहते हैं। इसके अन्तर्गत एड्स रोग HIV विषाणु भी आते हैं।

(vii) बहुराइबोसोम (Polyribosome ) – कभी प्रोटीन संश्लेषण के दौरान m – RNA पर अनेक राइबोसोम का समूह एकत्रित हो जाता है, इसे बहुराइबोसोम कहते हैं। ये राइबोसोम m. RNA के ऊपर 5′ सिरे से 3 सिरे की ओर गति करते हैं । m RNA की लम्बाई के अनुसार 5 से 20 तक राइबोसोम एक के बाद एक क्रम में जुड़ते जाते हैं। वह राइबोसोम जो 5′ सिरे के निकट होता है वह सबसे छोटी तथा जो 3 सिरे के पास होता है सबसे बड़ी पैप्टाइड श्रृंखलायुक्त होता है।

(viii) hnRNA – इसे विषमांगी केन्द्रकी RNA (Heterogenous nuclear RNA) कहते हैं। यूकैरियोटों में DNA के अनुलेखन पश्चात् बनने वाले RNA को ही hnRNA कहते हैं। इसे उच्च आणविक भार RNA या पूर्व केन्द्रकीय RNA या DNA जैसा RNA भी कहते हैं। यह प्राथमिक दूत RNA दो प्रकार के भागों का बना होता है।

इसमें एक को इन्ट्रॉन (Intron ) कहते हैं, इसमें कोड नहीं होता है। दूसरे भाग को एक्सॉन (Exon) कहते हैं जो आनुवंशिक कूट को वहन करता है। इनमें से इन्ट्रॉन को RNA Splicing की प्रक्रिया द्वारा निकल दिया जाता है। स्प्लाइसिओसोम (Spliceosome) नामक केन्द्रकीय अवयव इस प्रक्रिया में सहायता करता है। इसके बाद m – RNA का निर्माण होता है, जो अनुवादन की क्रिया में भाग लेता है।

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प्रश्न 3.
निम्न में अन्तर स्पष्ट कीजिए-
(i) न्यूक्लिओसाइड एवं न्यूक्लिओटाइड
(ii) DNA एवं RNA
(iii) इन्ट्रॉन एवं एक्सॉन
(iv) कोडोन एवं एन्टीकोडोन
(v) अनुलेखन एवं अनुवादन
(vi) प्रेरणीय एवं निरोधक नियमन
(vii) RNA स्प्लाइसिंग एवं RNA सम्पादन ।
उत्तर:
(i) न्यूक्लिओसाइड एवं न्यूक्लिओटाइड (Nucleoside and Nucleotide ) – एक अणु नाइट्रोजन क्षारक के साथ एक अणु शर्करा, के जुड़ने से जो संरचना बनती है, उसे न्यूक्लियोसाइड कहते हैं। इसी प्रकार एक अणु न्यूक्लियोसाइड के साथ फॉस्फोरिक अम्ल का एक अणु जुड़कर न्यूक्लियोटाइड बनता है।

  • नाइट्रोजन क्षारक + शर्करा = न्यूक्लियोसाइड
  • नाइट्रोजन क्षारक + शर्करा + फॉस्फोरिक अम्ल = न्यूक्लियोटाइड ।

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(ii) DNA u RNA

लक्षणDNARNA
1. प्राप्ति स्थानपादप विषाणुओं के अतिरिक्त अन्य विषाणुओं एवं सभी जीवों में पाया जाता है।जन्तु विषाणु, जीवाणुभोजियों (Bacterio-phages) के अतिरिक्त अन्य विषाणुओं में तथा सभी जीवों में पाया जाता है।
2. कोशिका में स्थितिप्रायः केन्द्रक में पाया जाता है।प्रायः कोशिका द्रव्य में पाया जाता है।
3. रज्जुकों की संख्याद्विरज्जुकीयएकरज्जुकीय
4. पैन्टोस शर्कराडीऑक्सीराइबोस (C5H10O4)राइबोज (C5H10O4)
5. पिरमिडीन क्षारकथायमीन एवं साइटोसिनयूरेसिल एवं साइटोसिन
6. प्यूरीन एवं पिरिमिडीन की मात्राबराबर होती है।नहीं होती।
7. असामान्य क्षारकये बहुत ही कम अथवा अनुपस्थित होते हैं।इसमें अधिक संख्या में पाये जाते हैं।
8. क्षारकों का युग्मनपूरी लम्बाई में होता है।केवल मुड़े हुए भाग में होता है।
9. संश्लेषण के लिए एन्जाइमडी एन ए पॉलीमरेज।आर एन ए पॉलीमरेज।
10. कार्ययह प्राणियों में आनुवंशिक पदार्थ का कार्य करता है।इसका मुख्य कार्य प्रोटीन संश्लेषण होता है। पादप विषाणुओं एवं कुछ अन्य विषाणुओं में यह आनुवंशिक पदार्थ का कार्य करता है।

(iii) इन्ट्रॉन एवं एक्सॉन

इन्ट्रॉन (Intron)एक्सॉन (Exon)
इसमें कोड नहीं होता है अतः ये आनुवंशिक कूट को वहन नहीं करते।यह आनुवंशिक कूट को वहन करता है।
RNA Splicing की प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाल दिये जाते हैं।बाहर नहीं निकाले जाते हैं।
अनुवादन की क्रिया में भाग नहीं लेता है।भाग लेता है।

(iv) कोडोन एवं एन्टीकोडोन

कोडोन (Codon)एन्टीकोडोन (Anticodon)
m-RNA पर तीन अक्षरों के कोडोन होते हैं।t-RNA पर तीन अक्षरों का एन्टीकोडोन होता है।
इसमें अनर्थक कोडोन (nonsense codons) होते हैं जो संख्या में तीन होते हैं।अनर्थक एन्टीकोडोन नहीं होते हैं।
m-RNA जिस पर कोडोन होते हैं वह m-RNA स्थिर होता है।t-RNA कोशिकाद्रव्य से अमीनो अम्ल को पकड़कर t-RNA उस स्थल पर लगते हैं जहाँ उपयुक्त कोडोन होता है।

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(v) अनुलेखन एवं अनुवाद

अनुलेखन (Transcription)अनुवादन (Translation)
इसमें आनुवंशिक सूचना का स्थानांतरण DNA से RNA में होता है ।m-RNA में न्यूक्लिओटाइडों की शृंखला का अमीनो अम्लों की पॉलिपेप्टाइड शृंखला में परिवर्तन होता है।
यह क्रिया केन्द्रक में होती है तथा वहां से m-RNA कोशिकाद्रव्य में आता है।यह क्रिया कोशिकाद्रव्य में राइबोसोम की सतह पर होती है।
इसमें कोडोन होते हैं, राइबोसोम पर m-RNA के 5 सिरे पर जुड़ता है।राइबोसोम की m-RNA की 3 सिरे की तरफ गति के होने से m = RNA के कोडोन अनुवादित होते हैं।
इस क्रिया के लिए DNA टेम्पलेट, RNA पॉलीमरेज विकर, सक्रिय अग्रदूत तथा द्विसंयोजक धातु आयन की आवश्यकता होती है।इसके लिये m-RNA, t-RNA राइबोसोम, अमीनो अम्ल विभिन्न अनुवादन कारक आवश्यक होते हैं।

(vi) प्रेरणीय नियमन एवं निरोधक नियमन

प्रेरणीय नियमन (Inducible Regulation)निरोधक नियमन (Repressible Regulation)
इस नियमन के द्वारा जीन को प्रोटीन उत्पन्न करने के लिए प्रेरित किया जाता है।इसमें जीन की सक्रियता निरुद्ध हो जाती है, जिसके कारण प्रोटीन संश्लेषण रुक जाता है।
इन पदार्थों को प्रेरक (Inducer) कहते हैं।इन्हें दमनकर (Repressor) कहते हैं।
उदा.-ई. कोलाई में लेक्टोज के अपचय का नियमन।उदा.-ई.कोलाई के ट्रप्टीफान ऑपेरॉन, हिस्टीडीन ऑपेरॉन।

(vii) RNA स्प्लाइसिंग एवं RNA सम्पादन

RNA स्प्लाइसिंग (RNA Splicing)RNA सम्पादन (RNA Processing)
RNA में से इन्ट्रॉन निकालने की क्रिया है।विभिन्न प्रकार के RNA जैसे m-RNA, t-RNA तथा r-R N A इत्यादि।
प्रोटीन संश्लेषण से पूर्व यह क्रिया होती है।प्रोटीन संश्लेषण के दौरान आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4.
DNA की आणविक संरचना का नामांकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए ।
उत्तर:
DNA एक दीर्घ अणु है। इसकी इकाइयों को न्यूक्लिओटाइड कहते हैं। प्रत्येक न्यूक्लिओटाइड में तीन यौगिक- पेन्टोज शर्करा, फॉस्फोरिक अम्ल तथा नाइट्रोजनी क्षारक होते हैं।
I. पेन्टोज शर्करा (Pentose Sugar) – यह पाँच कार्बन युक्त शर्करा होती है जिसे डीआक्सीराइबोज कहते हैं। इसमें राइबोज शर्करा की तुलना में दूसरे कार्बन पर एक ऑक्सीजन का अणु कम होता है।
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II. फॉस्फोरिक अम्ल (Phosphoric Acid ) – यह आर्थोफॉस्फोरिक अम्ल (H3PO4) होता है। न्यूक्लिक अम्लों में फॉस्फोरिक अम्ल एवं पैन्टोज शर्करा एकान्तर क्रम में पाये जाते हैं अर्थात् दो शर्करा के अणुओं के बीच फॉस्फोरिक अम्ल का एक अणु पाया जाता है। प्रत्येक फॉस्फेट समूह एक शर्करा के 3°C तथा दूसरी शर्करा के 5°C से जुड़कर फॉस्फो डाइएस्टर बन्ध (Phospho diester bond) बनाता है। न्यूक्लिक अम्ल की श्रृंखला 5°C से प्रारम्भ होकर 3°C पर समाप्त होती है अथवा 3°C शुरू होकर 5°C पर समाप्त होती है।

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III. नाइट्रोजनी क्षारक (Nitrogenous bases) – ये दो प्रकार के होते हैं-
(i) पिरिमिडीन (Pyrimidine ) – इनमें एक विषमचक्रीय षट्भुजी वलय होती है जिसमें चार कार्बन एवं दो नाइट्रोजन होते हैं। DNA में दो प्रकार के पिरिमिडीन थाइमीन (Thymine = T) एवं साइटोसीन (Cystosine = C ) पाये जाते हैं। RNA में थाइमीन के स्थान पर यूरेसिल (Uracil = U) होता है।

(ii) प्यूरीन (Purine ) – इसमें पिरिमिडीन वलय के चौथे एवं पाँचवें कार्बन से एक इमिडेजोल वलय (imidazole ring) संयुक्त होती है। DNA तथा RNA दोनों में ही एडीनीन (Adenine = A) एवं गुआनीन (Guanine = G) नामक प्यूरीन पाये जाते हैं।

प्रश्न 5.
DNA प्रतिकृतिकरण में भाग लेने वाले प्रमुख एन्जाइमों के नाम लिखिये।
उत्तर:
DNA प्रतिकृतिकरण में भाग लेने वाले एन्जाइम निम्न प्रकार से हैं-

  • हेलिकेज एन्जाइम – DNA की द्विकुण्डली खोलते हैं।
  • एस. एस. बी. प्रोटीन्स एकल लड़ी बंधन प्रोटीन्स सम्बद्ध होकर स्थिति को स्थिर रखते हैं।
  • टोपोआइसोमेरेज एन्जाइम कुण्डलीकरण तनाव को कम करते हैं।
  • R.N.A. पॉलिमेरेज या प्राइमेज एन्जाइम (R.N.A. प्राइमर) – DNA संश्लेषण की प्रक्रिया करने के लिए RNA का छोटा हिस्सा बनाते हैं।
  • DNA पॉलीमेरेज III एन्जाइम प्राइमर को 5-3 दिशा में आगे बढ़ाने का कार्य करने हैं।
  • DNA पॉलीमेरेज I-DNA के खण्डों के मध्य पाये जाने वाले रिक्त स्थानों की पूर्ति करते हैं।
  • लाइगेज एन्जाइम – DNA के खण्डों को जोड़ते हैं।
  • एण्डोन्यूक्लिएज एवं एक्सोन्यूक्लिएज एन्जाइम सही न्यूक्लियोटाइड को जोड़ने का कार्य करते हैं।

प्रश्न 6.
tRNA के क्लोवर पत्ती प्रतिरूप का नामंकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राबर्ट होले (Robert Holley) तथा उनके साथियों ने यीस्ट के एलीनीन T- RNA की संरचना का अध्ययन कर बताया कि 1- RNA की संरचना क्लोवर की पत्ती की भांति होती है, इसे क्लोवर पत्ती प्रतिरूप (Model) कहते हैं। इसके अनुसार RNA की एक पोलीन्यूक्लिओटाइड श्रृंखला मुड़कर के पाँच भुजायें बनाती है। मुड़ने के कारण इसके 5 व 3 सिरे पास-पास आ जाते हैं। 5 सीमान्त छोर पर गुआनीन अवशेष ‘G’ तथा 3 सिरे पर ‘CCA अयुग्मित अनुक्रम होता है। अमीनो अम्ल को केवल 3’ छोर पर स्वीकार किया जाता है

क्लोवर पत्ती प्रतिरूप के अनुसार 1-RNA में निम्न भुजायें होती हैं-

  1. ग्राही भुजा (Acceptor arm ) – इसके 3 सिरे पर अमीनो अम्ल जुड़ता है।
  2. डाइहाइड्रो यूरीडीन भुजा (DHU भुजा अथवा D भुजा) – यह अमीनो अम्ल सिन्थेटेज नामक एन्जाइम को बाँधती है।
  3. एन्टीकोडोन (Anticodon arm ) – इसकी लूप में तीन न्यूक्लिओटाइडों का विशिष्ट क्रम प्रतिकूट (anticodon) होता है जो mRNA के कूट (Codon) से क्षार युग्मन करता है।
  4. अतिरिक्त भुजा – यह एन्टीकोडोन भुजा एवं TC भुजा के मध्य पाई जाती है। इसकी लम्बाई अनिश्चित होती है।
  5. TyC भुजा – इसकी भुजा से प्रोटीन संश्लेषण के समय राइबोसोम जुड़ता है।

t.RNA का कार्य – इसकी मुख्य भूमिका प्रोटीन संश्लेषण में त्रिक् आनुवंशिक कूट को पहचान कर अनुरूप अमीनो अम्लों को राइबोसोम तक पहुँचाना है।

प्रश्न 7.
विषमांगी केन्द्रकी RNA व लघुकेन्द्रकीय RNA पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विषमांगी केन्द्रकी RNA (Heterogenous nuclear RNA = hnRNA)- यूकैरियोटों में DNA में अनुलेखन के पश्चात् बनने वाले RNA को ही hnRNA कहते हैं। इसे उच्च आणविक भार या पूर्व केन्द्रीय RNA या DNA जैसा RNA कहते हैं। यह प्राथमिक m. RNA दो प्रकार के भागों इन्ट्रॉन (intron ) एवं एक्सॉन (exon) से बना होता है। एक्सॉन आनुवंशिक कूट वहन करता ।

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परन्तु इन्ट्रॉन वहन नहीं करता । इन्ट्रॉन को RNA Splicing विधि द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है, इसके लिए केन्द्रकीय अवयव स्प्लाइसिओसोम (Spliceosome) सहायता करते हैं। इसके बाद m- RNA का निर्माण होकर अनुवादन क्रिया में भाग लेता है। लघुकेन्द्रकीय RNA ( Small nuclear RNA = snRNA)- यह यूकैरियोटों के केन्द्रक में मिलता है।

यह केन्द्रक में प्रोटीनों के साथ मिलकर लघुकेन्द्रकीय राइबोन्यूक्लिओप्रोटीन (snRNP) का निर्माण करता है। इसे प्राय: स्नर्प (Snurps ) भी कहते हैं । इनसे स्प्लाइसिओसोम बनता है जो RNA Splicing में सहायता करता है।

प्रश्न 8.
अनुवादन के प्रमुख चरणों के नाम लिखिये ।
उत्तर:
m – RNA में न्यूक्लिओटाइडों की श्रृंखला का अमीनो अम्लों की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में परिवर्तन को ही अनुवादन (Translation) कहते हैं । यह क्रिया कोशिकाद्रव्य में राइबोसोम की सतह पर होती है। राइबोसोम – RNA के 5 ́ सिरे पर जुड़ता है तथा इसकी 3 ́ सिरे की ओर गति होने से m-RNA के कोडोन अनुवादित हो जाते हैं। अनुवादन हेतु m-RNA, t-RNA राइबोसोम, अमीनो अम्ल व विभिन्न अनुवादन कारक आवश्यक होते हैं। प्रोकैरियोटों में यह क्रिया निम्न चरणों में पूर्ण होती है-

  1. अमीनो अम्ल का सक्रियण ।
  2. सक्रिय अमीनो अम्ल का t-RNA से जुड़ना ।
  3. पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का समारम्भ।

समारम्भ की प्रक्रिया में समारम्भ कारक (Initiation Factors) आवश्यक होते हैं। प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में ये IFs होते हैं ।

प्रश्न 9.
सेंट्रल डोमा सिद्धान्त किसने बताया व उससे क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
आण्विक जीव विज्ञान में फ्रांसिस क्रिक ने सेंट्रल डोमा (Central dogma) का विचार प्रस्तुत किया । सिद्धान्त के अनुसार आनुवंशिक सूचनाओं का बहाव DNA से RNA व इससे प्रोटीन की ओर होता है (DNA → RNA → प्रोटीन) । यद्यपि कुछ विषाणुओं में यह बहाव विपरीत दिशा अर्थात् RNA से DNA की ओर होता है।
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प्रश्न 10.
RNA प्रथम आनुवंशिक पदार्थ है, व्याख्या कीजिए ।
उत्तर:
RNA पहला आनुवंशिक पदार्थ था । अब बहुत पर्याप्त प्रमाण हैं कि जीवन के आवश्यक प्रक्रमों (जैसे- उपापचयी, स्थानांतरण, संबंधन आदि) का विकास RNA से हुआ। RNA आनुवंशिक पदार्थ के साथ एक उत्प्रेरक (जैविक तंत्र में कुछ ऐसी महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक अभिक्रियाएँ हैं जो RNA उत्प्रेरक द्वारा उत्प्रेरित की जाती हैं, प्रोटीन एंजाइम का इसमें कोई योगदान नहीं है )

RNA उत्प्रेरक के रूप में क्रियाशील लेकिन अस्थायी है। इस कारण से RNA के रासायनिक रूपांतरण से DNA का विकास हुआ, जिससे यह अधिक स्थायी है। DNA के द्विरज्जुकों व पूरक रज्जुकों के कारण तथा इनमें मरम्मत प्रक्रियाओं के विकास से अपने में होने वाले परिवर्तनों के प्रति प्रतिरोधी है।

प्रश्न 11.
अनुलेखन की इकाई व जीन को समझाइये |
उत्तर:
जीन वंशागति ( inheritance) की क्रियात्मक इकाई है। जीन DNA पर स्थित होती हैं। DNA अनुक्रम जो 1. RNA व r. RNA को कोडित (Coding) करते हैं उसे भी जीन परिभाषित करते हैं। परिभाषा के अनुसार समपार (Cistron) DNA का वह खंड है जो पॉलीपेप्टाइड का कूटलेखन (Coding) करता है, अनुलेखन (transcription ) इकाई में संरचनात्मक जीन मोनोसिस्ट्रानिक (Monocistronic ) या पॉलीसिस्ट्रानिक (Polycistronic) हो सकती है।

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प्रायः सुकेन्द्रकी (cukaryotic) में मोनोसिस्ट्रानिक तथा पॉलीसिस्ट्रानिक जीवाणु या असीमकेन्द्री (Prokaryotic) में होती है। सुकेन्द्रकी में मोनोसिस्ट्रानिक संरचनात्मक जीन मिलती है जिसमें अंतरापित कूटलेखन (Interrupted Coding) अनुक्रम पाये जाते हैं। सुकेन्द्रकी में जीन विखंडित (Split) होते हैं। कूटलेखन अनुक्रम या अभिव्यक्त अनुक्रमों को व्यक्तेक (exon) कहते हैं।

व्यक्तेक वे अनुक्रम हैं जो परिपक्व या संसाधित (Processed) RNA में मिलते हैं। व्यक्तेक, अव्यक्तेक (intron ) द्वारा अंतरापित (interrupted) होते हैं। अव्यक्तेक या मध्यवर्ती ( intervening) अनुक्रम परिपक्व या संसाधित RNA में नहीं मिलते हैं। लक्षण की वंशागति संरचनात्मक जीन के उन्नायक व नियामक (Promotor and Regulatory) अनुक्रमों द्वारा प्रभावित होती है. क्योंकि कभी-कभी नियामक अनुक्रम अस्पष्ट रूप से नियामक जीन कहलाते हैं। इसके बावजूद भी ये अनुक्रम किसी RNA या प्रोटीन का कूटलेखन नहीं करते हैं ।

प्रश्न 12.
DNA के अग्रक रज्जुक एवं पश्चगामी रज्जुक में अन्तर बताइये ।
उत्तर:

अग्रक रज्जुक (Leading strand)पश्चगामी रज्जुक (Lagging strand)
1. अग्रक सूत्र या रज्जुक DNA के 3→5 सूत्र पर संश्लेषित होता है ।पश्चगामी सूत्र जनक DNA के 5→3 सूत्र पर संश्लेषित होता है ।
2. इसके संश्लेषण की दिशा 5→3 व द्विगुणन शाख की तरफ होती है।यह पूर्ण सूत्र 3→5 दिशा में तथा द्विगुणन शाख के विपरीत दिशा में संश्लेषित होता है परन्तु इनके खण्डों का संश्लेषण 5→3 दिशा में ही होता है।
3. इसका संश्लेषण एक शृंखला के रूप में होता है।पश्चगामी रज्जुक का संश्लेषण छोटे -छोटे पॉलीन्यूक्लियोटाइड खण्डों में होता है जिन्हें ओकाजॉकी खण्ड कहते हैं।
4. इसके संश्लेषण हेतु केवल एक RNA प्राइमर होता है।इसमें ओकाजॉकी खण्ड के संश्लेषण हेतु अलग-अलग RNA प्राइमर चाहिए।
5. इसमें संश्लेषण के लिये DNA लाइगेज एन्जाइम की आवश्यकता नहीं होती है।इनमें ओकाजॉकी खण्डों को जोड़ने के लिये DNA लाइगेज एन्जाइम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 13.
रो – कारक (Rho – factor ) क्या होते हैं?
उत्तर:
ई. कोलाई ( E. coli ) जीवाणु में वह प्रोटीन जो RNA पॉलीमरेज द्वारा एक प्रकार के अनुलेखन (transcription ) समापन स्थलों (terminating sites) पर अनुलेखन समाप्त करने में सहायक होता है, ऐसे स्थलों को रो – निर्भर समापन स्थल कहते हैं। प्रोकैरियोट्स के समापन स्थलों को दो वर्गों में विभक्त किया गया है-

  • रो – स्वतन्त्र समापन स्थल ( rho independent terminator)
  • रो- आश्रित समापन स्थल (rho-dependent terminator)

प्रश्न 14.
यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाये जाने वाले RNA पॉलीमरेज एन्जाइम की स्थिति, कार्य व प्रतिशत को – बताइये ।
उत्तर:

एन्जाइम (Enzyme)स्थिति (Position)कार्य (Functions)प्रतिशतता (Percentage)
1. RNA पॉलीमेरेज-Iकेन्द्रक मेंr.RNA का संश्लेषण50-70%
2. RNA पॉलीमेरेज-IIकेन्द्रक द्रव्य मेंm.RNA का संश्लेषण20-40%
3. RNAपॉलीमेरेज-IIIकेन्द्रक द्रव्य मेंt.RNA व 5 S RNA का संश्लेषण10%

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प्रश्न 15.
प्रेरण व दमन में क्या अन्तर होता है?
उत्तर:

प्रेरण (Induction)दमन (Repression)
1. यह ऑपेरॉन को प्रारम्भ करता है।यह समाप्त करता है।
2. यह अनुलेखन व अनुवादन को प्रारम्भ करता है।यह अनुलेखन व अनुवादन को रोकता है।
3. यह उपचयी पथ (metabolic path) को सुचारु व व्यवस्थित करता है ।यह उपचयी पथ को संचालित करता है।
4. ऑपेरॉन जीन से जुड़ने से प्रेरण द्वारा दमन को रोका जाता है।ऑपरेटर जीन से सह-दमनकर के जुड़ने से एपोरिप्रेसर उत्पन्न होता है।

प्रश्न 16.
प्रोकैरियोटिक व यूकैरियोटिक कोशिकाओं में होने वाले अनुलेखन में क्या अन्तर होता है? तुलना कीजिए।
उत्तर:

लक्षणप्रोकैरियोटिक अनुलेखनयूकैरियोटिक अनुलेखन
1. स्थानकोशिक द्रव्य में सम्पन्न होता है।केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm) में होता है।
2. समयइसके लिये कोशिका चक्र की कोई निश्चित अवस्था नहीं होती है।कोशिका चक्र की G1 व G2 अवस्थाओं में अनुलेखन होता है।
3. RNA संसाधनविभिन्न प्रकार के RNAs का संसाधन या परिपक्वन कोशिका द्रव्य में होता है।RNAS का संसाधन केन्द्रक द्रव्य में होता है।
4. अनुलेखन इकाईएक इकाई में एक से अधिक जीन हो सकते हैं।इसमें केवल एक जीन होती है।
5. एन्जाइमतीनों प्रकार के RNA के संश्लेषण हेतु केवल एक एन्जाइम, RNA पॉलीमेरे ज-I की आवश्यकता होती है।तीनों प्रकार के RNA संश्लेषण हेतु अलग-अलग प्रकार के एन्जाइम की आवश्यकता होती है। इसमें पॉलीमेरेज-I, II व III की आवश्यकता होती है।
6. RNA पॉलीमरेज की संरचनाRNA पॉलीमरेज, 5-पॉलीपेप्टाइड शृंखला की जटिल संरचना है।RNA पॉलीमरे ज में 10-15 पॉलीपे प्टाइ ड शृंखलायें होती हैं।
7. अनुलेखन व अनुवादनm.RNA का अनुलेखन तथा पॉलीपेप्टाइड श्वृंखला का अनुवादन साथ होते हैं।ऐसा नहीं होता है।
8. राइबोसोमी RNAतीन प्रकार के राइबोसोमी RANs (23S, 16S, 5S) के लिये केवल एक प्राथमिक ट्रान्सक्रिप्ट RNA अणु बनता है।चार प्रकार के राइबोसोमी RNA के लिये दो प्राथमिक प्रतिलिपि RNA बनते हैं। एक अनुलेखन से 28S, 18S व 5.8S r.RNA बनते हैं तथा दूसरे से केवल 5S r.RNA बनता है।
9. प्रमोटरसरल व छोटा होता है।तुलनात्मक जटिल, बड़ा व विविधापूर्ण होता है।
10 अनुलेखन संकुलक्रोड एन्जाइम + σ  कारकRNA पॉलीमरेज व अनुलेखन कारक।

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प्रश्न 17.
प्रोकैरियोटिक व यूकैरियोटिक DNA में अन्तर बताइये ।
उत्तर:

प्रोकैरियोटिक DNAयूकैरियोटिक DNA
1. DNA के साथ हिस्टोन प्रोटीन्स नहीं पाये जाते हैं।हिस्टोन प्रोटीन्स पाये जाते हैं।
2. निष्क्रिय (non-coding) DNA की बहुत कम मात्रा होती है।बहुत अधिक होती है।
3. कोडिंग खण्डों में नॉन-कोडिंग अनुक्रम (introns) नहीं होते हैं।नॉन-कोडिंग खण्ड पाये जाते हैं।
4. DNA अणु वृत्ताकार होता है।केन्द्रकीय DNA अणु रैखिक (linear) होता है।
5. DNA एक अति कुण्डलित गुणसूत्र बनाता है।गुणसूत्रों की संख्या सदैव एक से अधिक होती है।

प्रश्न 18.
लैक ओपेरॉन क्या है? लैक ओपेरॉन की संरचना तथा इसकी कार्यविधि समझाइये। लेक ओपेरॉन प्रक्रिया का नामांकित चित्र बनाइये ।
उत्तर:
लैक-प्रचालेक (Lac-Operon)-
1. लैक ऑपेरॉन के विषय में स्पष्ट जानकारी जैकब व मोनाड (Jacob \& Monod) ने दी।

2. लैक ऑपेरॉन (यहाँ लैक से तात्पर्य लैक्टोज से है) में पॉलीसिस्ट्रोनिक संरचनात्मक जीन का नियमन एक सामान्य प्रमोटर व नियामक (regulatory) जीन द्वारा होता है। इस प्रकार की व्यवस्था जीवाणु में बहुत सामान्य रूप से देखने को मिलती है व इसे ऑपेरॉन कहा जाता है। उदाहरणार्थ val ऑपेरॉन, his ऑपेरॉन, trp ऑपेरॉन, lac ऑपेरॉन आदि।

3. मानव की आंत में पाये जाने वाले जीवाणु ई-कोलाई सामान्यतया लैक्टोज के अपचय से ऊर्जा को प्राप्त करते हैं। जैकब व मोनाड ने ज्ञात किया कि इसके DNA में तीन जीन का एक समूह लैक्टोज का अपचय करने वाले तीन एन्जाइम के संश्लेषण से सम्बन्धित होता है।
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4. जब पोषण माध्यम में लैक्टोज उपस्थित होता है तो ये जीन सक्रिय होते हैं किन्तु लैक्टोज की अनुपस्थिति होने पर ये निष्क्रिय होते हैं। जैकब व मोनाड ने इन जीन की सक्रियता के नियमन के लिये ऑपेरॉन संकल्पना (operon concept) दी।

5. उक्त संकल्पना के अनुसार जीन की सक्रियता का नियमन अनुलेखन (transcription) स्तर पर प्रेरण या दमन (induction or repression) द्वारा होता है।

6. लैक्टोज के अपघटन और उससे ऊर्जा उत्पादन हेतु तीन एन्जाइम्स की आवश्यकता होती है-

  • बीटा गैलेक्टोसाइडेज (beta-galactosidase),
  • परमिएज (permease) तथा
  • ट्रान्सएसीटिलेज (transacetylase)।

7. इन एन्जाइ म्स का संश्लेषण एक बहु सिस्ट्र भॅनिक (polycistronic) m.RNA अणु के अनुवादकरंण (translation) से होता है। इस बहुसिस्ट्रॉनिक m.RNA का संश्लेषण लैक ऑपेरॉन में स्थित तीन संरचनात्मक जीन्स या सिस्ट्रॉन्स (structural genes or cistrons) की शृंखला के अनुलेखन (transcription) के द्वारा होता है।

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8. इन तीन संरचनात्मक जीन या सिस्ट्रॉन में-

  • सिस्ट्रॉन-Z,
  • सिस्ट्रॉन-Y तथा सिस्ट्रॉन- a होती है। ये एक-दूसरे के समीप होती हैं व इनमें परस्पर समन्वय होता है। ये तीनों जीन इनको कन्ट्रोल करते हैं। इन्हें रेगुलेटर जीन (Regulator gene), प्रोमोटर जीन (Promotor gene) तथा ओपरेटर जीन (Operator gene) कहते हैं।

9. सिस्ट्रॉन- Z जीन बींटा गैलेक्टोसाइडेज के लिये कोड करता है जो डाइसैकेराइड लैक्टोज का जल अपघटन करके उन्हें गैलेक्टोज व ग्लूकोज में विभक्त कर देता है। सिस्ट्रॉन-Y जीन परमीएज के लिये कोड करता है जो beta-गैलेक्टोसाइडेज के लिये कोशिका की पारगम्यता को बढ़ा देते हैं। सिस्ट्रॉन-a जीन ट्रान्सएसीटिलेज के लिये कोड करता है। अतः लैक्टोज के उपापचय के लिये तीनों जीन के उत्पाद लैक ऑप्रॉन में आवश्यक हैं।

लैक ऑपेरॉन का प्रकार्य (Functioning of Lac Operon)-
ई.कोलाई जीवाणु में लैक ऑपेरॉन की कार्यविधि को दो प्रकार से स्पष्ट किया गया है-
(i) लैक्टोज की उपस्थिति में-माध्यम में लैक्टोज-प्रेरक (inducer) के उपस्थित होने पर प्रेरक कोशिका में प्रवेश करके नियामक जीन (regulator gene) से उत्पन्न दमनकारी (repressor) के साथ जुड़ जाता है। परिणामस्वरूप दमनकारी प्रचालक (operator) जीन से नहीं जुड़ने पाता और प्रचालक जीन स्वतन्त्र रहती है।

यह RNA पॉलीमरेज को प्रमोटर जीन (promotor gene) के समारम्भन स्थल से जुड़ने के लिये प्रेरित करता है। फलस्वरूप संरचनात्मक जीन या सिस्ट्रॉन से बहुसिस्ट्रॉनिक m.RNA का अनुलेखन होता है जो लैक्टोज उपयोग के लिये आवश्यक तीनों एन्जाइम्स को कोडित करता है अर्थात् यह लेक्टोज उत्प्रेरक का कार्य करता है। अतः सम्पूर्ण क्रिया एन्जाइम प्रेरण है या यह उत्प्रेरण या प्रेरण (induction or inducer) का उदाहरण है।

(ii) लैक्टोज की अनुपस्थिति में-लैक्टोज प्रेरक की अनुपस्थिति में नियामक जीन एक दमनकारी प्रोटीन उत्पन्न करता है (यह i जीन द्वारा संश्लेषित होता है) जो ओपरेटर स्थल से जुड़कर इसके अनुलेखन को रोक देती है। अतः संरचनात्मक जीन m.RNA का संश्लेषण नहीं कर पाते और प्रोटीन का निर्माण रुक जाता है।

यह संदमन या दमनकारी (repression) का उदाहरण है। कभी-कभी लैक्टोज उत्प्रेरक से जुड़कर दमनकारी में संरचनात्मक परिवर्तन करता है और ओपरेटर से जुड़कर इसके अनुलेखन को रोक देता है। इस प्रकार के उत्प्रेरक को सहदमनकारी (co-repressor) कहते हैं। क्योंकि यह प्रचालक स्थल (operator side) को निष्क्रिय करने के लिये दमनकारी (repressor) को सक्रिय करता है।

प्रश्न 19.
अनुलेखन ( ट्रांसक्रिप्सन) से क्या तात्पर्य है? अनुलेखन क्रिया को चित्र सहित समझाइए ।
अथवा
अनुलेखन किसे कहते है ? जीवाणु में अनुलेखन प्रक्रिया को नामांकित चित्र बनाकर समझाइए ।
उत्तर:

  1. आनुवंशिक सूचनाओं का स्थानान्तरण, DNA से RNA में होता है। वह प्रक्रिया जिसके द्वारा DNA से RNA का निर्माण होता है, अनुलेखन या ट्रांसक्रिप्सन (Transcription) कहलाती है।
  2. हम जानते हैं कि DNA विशिष्ट प्रकार के प्रोटीन्स का संश्लेषण करता है। प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं के केन्द्रकाय ( Nucleoid) तथा यूकेरियोटिक कोशिकाओं के केन्द्रक में DNA पाये जाते हैं परन्तु प्रोटीन संश्लेषण कोशिका द्रव्य में होता है।
  3. DNA अणु केन्द्रक से कोशिका द्रव्य में नहीं जाते और सीधे ही प्रोटीन संश्लेषण को निर्देशित नहीं करते हैं।
  4. DNA अणु प्रोटीन संश्लेषण की सूचनाओं को सन्देशवाहक RNA (m.RNA) पर अंकित करते हैं और कोशिका द्रव्य में जाकर राइबोसोम से जुड़ते हैं। अत: DNA फर्मे (DNA Template) पर RNA के निर्माण को अनुलेखन कहते हैं।
  5. DNA पर जब m. RNA का निर्माण होता है तो इसमें नाइट्रोजन बेस थायमीन के स्थान पर यूरेसिल होता है।
  6. यह प्रक्रिया विशेष प्रकार के एन्जाइम RNA पॉलीमरेज (RNA Polymerase) की उपस्थिति में होती है।

अनुलेखन इकाई (Transcription Unit) –
1. एक DNA खण्ड, जो RNA के अणु का अनुलेखन करता है, उसे अनुलेखन इकाई कहते हैं। अनुलेखन इकाई एक जीन के समान या इसमें अनेक सतत जीन हो सकते हैं।

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2. DNA में अनुलेखन इकाई के मुख्यतः तीन भाग होते हैं-

  • उन्नायक ( Promoter )
  • संरचनात्मक जीन (Structural gene)
  • समापक (Treminator)

3. DNA निर्भर RNA पॉलीमरेज बहुलकीकरण केवल एक दिशा 5→3′ की ओर उत्प्रेरित होते हैं।

4. रज्जुक जिसमें ध्रुवत्व 3→5 की ओर होता है वह टेम्पलेट के रूप में कार्य करता है। इस कारण इसे टेम्पलेट रज्जुक (Template Strand) कहते हैं।

5. दूसरा रज्जुक जिसमें ध्रुवत्व 5→3′ होता है व अनुक्रम (Sequences) RNA के समान होते हैं (थायमीन के स्थान पर यूरेसिल) वह अनुलेखन प्रक्रिया के दौरान विस्थापित (displaced ) या स्थानांतरित हो जाता है। वह रज्जुक जो किसी के लिये कूटलेखन नहीं करता है उसे कूटलेखन रज्जुक (Coding Strand) कहते हैं।

सभी उपर्युक्त बिन्दु या संदर्भ बिन्दु (reference point) जो अनुलेखन इकाई के भाग होते हैं। वे कूटलेखन रज्जुक से बने होते हैं। उदाहरण के रूप में एक परिकल्पित अनुलेखन इकाई के अनुक्रम निम्न प्रकार के होंगे- 3′-AT GC AT GC AT GC AT GC AT GC AT GC 5′ टेम्पलेट रज्जुक 5′-TA CG TA CG TA CG TA CG TA CG TA CG-3′ कूटलेखन रज्जुक

6. अनुलेखन इकाई में संरचनात्मक जीन के दोनों सिरों पर प्रमोटर (उन्नायक ) व टर्मिनेटर ( समापक) जीन उपस्थित होती हैं। संरचनात्मक जीन के 5 (प्रतिप्रवाह upstream) सिरे पर प्रमोटर जीन तथा 3′ ( अनुप्रवाह; down stream) सिरे पर समापन जीन होती है और इससे अनुलेखन प्रक्रम की समाप्ति का निर्धारण होता है। इसके अतिरिक्त उन्नायक (Promoter) के प्रतिप्रवाह ( upstream) व अनुप्रवाह (downstream) की तरफ नियामक अनुक्रम (regulatory sequences) उपस्थित होते हैं।
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6.5.2 अनुलेखन इकाइ व जान (Transcription unit and Gene) –
1. जीन वंशागति ( inheritance) की क्रियात्मक इकाई है। यह t.DNA पर स्थित होते हैं। वह DNA अनुक्रम जो T. RNA अथवा r. RNA अणु के लिये कूटलेखन (Code) करता है, वह भी जीन कहलाता है।

2. समपार या सिस्ट्रॉन (Cistron) DNA का वह खण्ड है जो पॉलीपेप्टाइड का कूटलेखन करता है या जिसमें एक पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के संश्लेषण की सूचना कोडित होती है। अतः यह एक जीन के समतुल्य है तथा सिस्ट्रॉन शब्द का प्रयोग एक जीन के लिये ही किया जाता है।

3. प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं में एक ही m. RNA अणु में प्राय: एक से अधिक पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाओं के बहुलकीकरण (Polymerization) की सूचना निहित होती है। अतः इन m. RNA अणुओं को पॉलीसिस्ट्रॉनिक (Polycistronic ) कहते हैं।

4. यूकेरियोटिक कोशिकाओं के m. RNA अणु में केवल एक ही पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के बहुलकीकरण की सूचना निहित होती है। इसलिये इन्हें मोनोसिस्ट्रॉनिक (Monocistronic ) कहते हैं।

5. जैसा कि यूकेरियोटिक कोशिकाओं में अधिकांश जीनों में एक ही प्रोटीन के संश्लेषण की संकेत सूचना DNA के कई छोटे-छोटे खण्डों में होती है। इस कारण इन्हें विपटित जीन (Split genes) कहते हैं। ये DNA खण्ड व्यक्तेक या एक्सॉन ( exon) कहलाते हैं। एक्सॉन्स के बीच-बीच में अक्रिय DNA खण्ड पाये जाते हैं जिनमें प्रोटीन संश्लेषण की सूचना नहीं होती है।

DNA के ये निष्क्रिय खण्ड अव्यक्तेक या इन्ट्रॉन्स (introns) कहलाते हैं। अतः RNA की प्राथमिक प्रतिलिपियों में एक्सॉन्स व इन्ट्रॉन्स दोनों प्रकार के खण्ड होते हैं। RNA की ऐसी प्राथमिक प्रतिलिपि को विषमांगी केन्द्रकीय RNA (heterogenous nuclear RNA or hn RNA) भी कहते हैं।

RNA के प्रकार व अनुलेखन का प्रक्रम (Types of RNA and Process of Transcription)-
1. अनुलेखन में आनुवंशिक सूचनाओं का स्थानान्तरण DNA से RNA में होता है। इस क्रिया में DNA कुण्डली की एक श्रृंखला पर RNA के न्यूक्लियोटाइड्स ( राइबोन्यूक्लियोटाइड्स) आकर जुड़ जाते हैं जिससे एक अस्थायी DNA-RNA संकर का निर्माण हो जाता है। कुछ समय पश्चात् RNA की समजात (complementary) श्रृंखला अलग हो जाती है। इसमें नाइट्रोजन बेस थायमीन के स्थान पर यूरेसिल होता है। इस क्रिया को अनुलेखन कहते हैं। यह क्रिया एन्जाइम RNA पॉलीमरेज (RNA polymerase) द्वारा होती है।

प्रोकेरियोट्स में अनुलेखन (Transcription in Prokaryotes) –
1. प्रोकेरियोट्स में पॉलिसिस्ट्रानिक व सतत संरचनात्मक जीन पाये जाते हैं।

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2. जीवाणुओं में RNA पॉलिमरेज की एक ही जाति से m. RNA, t.RNA तथा r. RNA का संश्लेषण होता है ये तीनों प्रकार के RNA प्रोटीन संश्लेषण के लिये आवश्यक होते हैं। m. RNA टेम्पलेट प्रदान करता है, t.RNA अमीनो अम्लों के लाने व आनुवंशिक कूट को पढ़ने का काम व r.RNA स्थानान्तरण के दौरान संरचनात्मक व उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है।

3. RNA पॉलीमरेज एन्जाइम अनुलेखन के प्रारम्भ होने वाले DNA का वर्धक व प्रमोटर स्थल को पहचानने में सहायता करता है। इस एन्जाइम के दो भाग होते हैं-क्रोड एन्जाइम (Core enzyme) तथा क्रोड एन्जाइम के साथ जुड़ने वाला सिग्मा (०) कारक, जो कि RNA का संवर्धन का प्रारम्भन ( initiation) करता है।

4. क्रोड एन्जाइम चार प्रकार के पॉलीपेप्टाइडों से बना होता है-

  • दो a श्रृंखलायें ये पॉलीपेप्टाइड वर्धक (Promotor) DNA के साथ बंध बनाते हैं।

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  • पहली B श्रृंखला – RNA संवर्धन हेतु प्रयुक्त . न्यूक्लियोटाइड को बाँधने का काम यह श्रृंखला करती है।
    दूसरी श्रृंखला – यह टेम्पलेट DNA के बंध स्थापित कर अनुलेखन क्रिया में सहायता करती है।.

5. सिग्मा (σ) कारक क्रोड एन्जाइम के साथ सम्बद्ध होकर इसे सक्रिय बनाने का काम करता है। यह DNA के वर्धक या प्रमोटर स्थल को पहचान करके क्रोड RNA पॉलीमरेज को इसके साथ जोड़ता है एवं अनुलेखन का समारंभ ( initiation) करने में सक्रिय भाग लेता है ।

6. RNA के संवर्धन में (DNA से अनुलेखन की क्रिया में), क्रोड RNA पॉलीमरेज का सिग्मा कारक से सम्बद्ध (bind) होकर सक्रिय हो जाता है । वर्धक स्थल (promotor site ) पर सिग्मा युक्त RNA पॉलीमरेज का बन्धन हो जाता है। इस स्थान से DNA रज्जुक खुल जाता है। दोनों रज्जुकों की पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलायें खुलकर अलग हो जाती हैं। दोनों रज्जुकों में से केवल एक रज्जुक (प्रधान रज्जुक) पर ही संदेशवाहक RNA अणु का निर्माण होता है।
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7. प्रधान रज्जुक फर्मों की भांति काम करता है। प्रधान रज्जुक के क्षारक क्रमों के अनुसार RNA रज्जुक पर क्षारक आते जाते हैं। इस प्रकार RNA श्रृंखला का निर्माण होता जाता है व RNA पॉलीमरेज आगे बढ़ता चला जाता है और अन्त में एक विशेष कारक (रो-p-कारक ) की उपस्थिति में समापन (termination) हो जाता है तथा पॉलीमरेज अलग हो जाता है। इस प्रकार RNA रज्जुक का निर्माण पूरा हो जाता है।

यूकेरियोट्स में अनुलेखन (Transcription in Eukaryotes)-
1. यूकेरियोट्स में तीन प्रकार के पॉलीमरेज होते हैं। इनमें से एक केन्द्रक में होता है तथा इसे RNA पॉलीमरेज – I या RNA पॉलीमरेज (A) कहते हैं। यह राइबोसोमल RNA (285, 18S व 5.8S) को अनुलेखित करता है ।

2. दूसरा RNA पॉलीमरेज केन्द्रकद्रव्य ( Nucleoplasm ) में पाया जाता है। इसे RNA पॉलीमरेज- II या RNA पॉलीमेरज B कहा जाता है। यह hn RNA ( heterogenous nuclear RNA ) के संश्लेषण हेतु उत्तरदायी होता है।

3. तीसरा RNA पॉलीमरेज भी केन्द्रकद्रव्य में ही पाया जाता है। इसे RNA पॉलीमरेज -III कहते हैं जो 5sr RNA व छोटे केन्द्रकीय RNA (snRNA) तथा t. RNA के संश्लेषण के लिये उत्तरदायी होता है।
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4. यूकेरियोट्स में अधिकतर जीन्स विभक्त या स्पिलिट जीन (Split gene) होते हैं। इन खण्डों में संबंधित प्रोटीन अणुओं के संश्लेषण की संकेत सूचना होती है। इन खण्डों को एक्सॉन्स ( exons) कहते हैं। एक्सॉन्स के बीच-बीच में निष्क्रिय DNA के खण्ड होते हैं, जिनमें प्रोटीन अणुओं को संश्लेषण की संकेत सूचना नहीं होती है। DNA के इन निष्क्रिय खण्डों को इन्ट्रॉन्स ( introns) कहते हैं। अनुलेखन क्रिया दोनों ही प्रकार के खण्डों की होती है। अतः इस प्रकार के RNA अणु को प्राथमिक प्रतिलिपि या विषमांगी केन्द्रकीय RNA ( heterogenous nuclear RNA=hnRNA ) कहते हैं।

5. hnRNA अणु को एन्जाइम्स द्वारा पहले एक्सॉन्स तथा इन्ट्रान्स की प्रतिलिपियों में तोड़ा जाता है और इसके बाद केवल एक्सॉन्स की प्रतिलिपियों को संयोजित करके वास्तविक और परिपक्व RNA अणु का निर्माण किया जाता है। इस प्रक्रिया को RNA अणुओं का संसाधन (Processing) या समबंधन ( Splicing) कहते हैं ।

hnRNA में आच्छादन (Capping) व पुच्छन (Tailing) की. अतिरिक्त क्रियाएँ भी होती हैं। आच्छादन के दौरान एक असाधारण न्यूक्लियोटाइड मीथाइल ग्वानोसीन ट्राइफास्फेट hnRNA के 5′ सिरे से जुड़ जाता है व पुच्छन में 200-300 एडीनायलेट अवशेष ( Adenylate residue) hnRNA टेम्पलेट के 3′ सिरे पर स्वतन्त्र रूप से जुड़ जाते हैं।

अब यह पूर्णरूप से संसाधित (Processed) hnRNA या m. RNA कहलाता है व ट्रांसलेशन की क्रिया के लिये केन्द्रक से बाहर स्थानान्तरित हो जाता है। यूकेरियोट्स में अनुलेखन प्रक्रिया में व्याप्त जटिलतायें व विभक्त जीन व्यवस्था (Split gene arrangement) जीनोम के आद्य लक्षण (Primitive character) को दर्शाते हैं।

प्रश्न 20
अर्थ- संरक्षी प्रतिकृति से आपका क्या तात्पर्य है? DNA में अर्ध-संरक्षी प्रतिकृतियन की क्रिया होती है, को प्रमाणित करने के लिए मैथ्यू मेसेल्सन तथा फ्रैंकलिन स्टाल द्वारा किये गये प्रयोग का वर्णन कीजिए। अर्थ- संरक्षी DNA प्रकृतियन प्रतिरूप का चित्र बनाइए।
उत्तर:
जब कोई कोशिका वृद्धि की अधिकतम सीमा तक पहुँच जाती है तो उसके बाद विभाजन के लिये तैयार होती है, इसमें DNA का द्विगुणन भी होता है। सभी जीवों के सम्पूर्ण जीवन चक्र में आनुवंशिक पदार्थ अर्थात् DNA-की बारंबार प्रतिकृति होती है। प्रतिकृति के फलस्वरूप संतति कोशिकाओं में DNA की हूबहू प्रतिलिपियाँ प्राप्त होती हैं।

यद्यपि प्रतिकृति क्रिया के दौरान किसी प्रकार की त्रुटि नहीं होती है परन्तु थोड़ी बहुत ज्रुटि होनी भी चाहिये जिससे उत्परिवर्तन होते रहें। इन उत्परिवर्तनों के फलस्वरूप आनुवंशिक विविधता होती रहती है जो कि जैविक विकास हेतु आवश्यक है।
1. सभी जैविक अणुओं में केवल DNA अणु ही स्वद्विगुणन (Self-duplication) करने में सक्षम होते हैं। DNA स्वद्विगुणन की प्रक्रिया को प्रतिकृतिकरण या रेप्लिकेशन (replication) कहते हैं।

2. सुकेन्द्रीय कोशिकाओं (Eucaryotic cells) में यह प्रतिकृतिकरण कोशिका चक्र की अन्तरालवस्था (interphase) की S-प्रावस्था (synthesis phase) में होती है । प्रतिकृतिकरण की क्रिया केन्द्रक के अन्दर होती है।

3. DNA का प्रतिकृतिकरण तीन प्रकार से हो सकता है-परिक्षेपी (Dispersive), संरक्षी (Conservative) तथा अर्ध-संरक्षी (Semi-conservative) । परन्तु DNA का प्रतिकृतिकरण अर्ध-संरक्षी विधि से ही होता है, इसके अनेक साक्ष्य प्राप्त किये जा चुके हैं।

4. अर्ध-संरक्षी विधि में DNA के दोनों रज्जुक अलग होकर सांचे (Templete) के रूप में कार्यकर नये पूरक रज्जुकों का निर्माण करते हैं। प्रतिकृति के पूर्ण होने पर जो DNA अणु बनता है उसमें एक पैतृक व एक नई निर्मित लड़ी रज्जुक होती है।

प्रायोगिक प्रमाण (Experimental evidence)-
1. यह सिद्ध हो चुका है कि DNA का अर्ध-संरक्षी विधि से प्रतिकृति होती है। इस सम्बन्ध में सर्वप्रथम जानकारी इस्चेरिचिया कोलाई (Escherichia coli) से प्राप्त हुई।

2. मैथ्यू मेसेल्सन व फ्रेंकलिन स्टाल (Mathew Meselson and Franklin Stahl) ने 1958 में जीवाणु ई.कोलाई (E.coli) में DNA द्विगुणन की पुष्टि की थी। जबकि टेलर (Taylor) ने 1957 में यूकेरियोटिक DNA के अर्ध-संरक्षी द्विगुणन को सर्वप्रथम बताया था।
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वाटसन तथा क्रिक (Watson and Crick) ने DNA के द्विरज्जुक (Double helix ) का मॉडल प्रस्तुत करते समय यह स्पष्ट कर दिया था कि DNA का द्विगुणन या प्रतिकृतिकरण अर्द्ध संरक्षी होगा।

मेसेल्सन व स्टाल का प्रयोग (Experiments of Meselson and Stahl) –
1. इन्होंने मानव की आन्त्र में पाये जाने वाले ई-कोलाई को ऐसे संवर्धन माध्यम में विकसित किया जिसमें 15NH4 CI (15N नाइट्रोजन का भारी समस्थानिक है, यह सामान्य 14N नाइट्रोजन अणु से भारी होता है। नाइट्रोजन का स्रोत होता है। इसी संवर्धन माध्यम में इन जीवाणुओं को कई पीढ़ियों तक पुनरुत्पादन करने दिया गया।

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2. जब इन जीवाणुओं के DNA का अध्ययन किया गया तो यह पाया गया कि इनके प्यूरीन्स तथा पिरीमिडिन्स ( Purine and Pyrimidines) में 14N के स्थान पर 15N नाइट्रोजन के आइसोटोप या समस्थानिक थे।

3. इस भारी DNA (15N युक्त) अणु को सामान्य DNA (14N) से सोडियम क्लोराइड के घनत्व प्रवणता में अपकेंद्रीकरण (Cen trifugation) करने से अलग कर सकते हैं। इसके बाद तत्कालीन जीवाणु संतति (15N) को उस माध्यम में स्थानान्तरित कर दिया गया जिसमें नाइट्रोजन स्रोत में नाइट्रोजन का
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सामान्य आइसोटोप 14N उपस्थित था। इस आइसोटोप का घनत्व 15N से कम होता है। तदुपरान्त DNA को विलगित करके आल्ट्रासेन्ट्रीफ्यूगेशन द्वारा (सीजियम क्लोराइड घनत्व प्रवणता पर) उसका घनत्व ज्ञात किया तो यह पाया गया कि प्रथम विभाजन चक्र के बाद संकर DNA अणु को व्यक्त करने वाली केवल एक ही घनत्व की पट्टी प्राप्त हुई थी जिसमें एक श्रृंखला 14N नाइट्रोजन द्वारा तथा दूसरी 15N नाइट्रोजन द्वारा अंकित थी ।

4. इसी प्रकार दूसरे विभाजन चक्र के बाद (ई. कोलाई 20 मिनट में विभाजित होता है, प्रत्येक 20 मिनट बाद नई पीढ़ी बनती है DNA को व्यक्त करने के लिये दो घनत्व पट्टियाँ दिखाई दीं। पहली में दो DNA द्विक कुण्डलों में 15N नाइट्रोजन तथा दूसरी दो में संकर DNA अणु के लिये थी ।

5. संकर DNA अणु में उन्होंने पाया कि दोनों श्रृंखलाओं में परिणामस्वरूप इस अणु का घनत्व 15N वाले DNA तथा 14N वाले DNA अणु के घनत्व के बीच का था। इस प्रयोग द्वारा उन्होंने सिद्ध किया कि DNA की प्रतिकृति अर्ध-संरक्षी विधि से होती है।
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6. इसी प्रकार का प्रयोग टेलर (Taylor) व उनके सहयोगियों ने 1958 में विसिया फाबा (Vicia faba) की मूलाग्र कोशिकाओं पर रेडियोएक्टिव थाइमीडिन का प्रयोग करके किया था । इन्होंने सिद्ध किया कि DNA अर्ध-संरक्षी विधि द्वारा प्रतिकृत होता है।

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DNA द्विगुणन की कार्य प्रणाली व एंजाइम (Mechanism of DNA duplication and Enzymes)-
द्विगुणन प्रक्रिया में प्रत्येक रज्जुक (Strand) का निर्माण 53′ दिशा में बढ़ता है। अतः अलग होने वाले दोनों रज्जुओं पर विपरीत दिशा में नये रज्जुओं के बनने की विधि भिन्न-भिन्न होती है-
(i) 3→5′ दिशा वाले रज्जुक पर श्रृंखला का सतत निर्माण (continuous synthesis) होता है।

(ii) 5’→3′ दिशा वाले रज्जुक पर यह निर्माण असतत तथा छोटे-छोटे भागों में होता है।

इन छोटे-छोटे टुकड़ों को ओकाजाकी खण्ड (Okazaki segments) कहते हैं। बाद में ये खण्ड फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध ( Phosphodiester bond) बनाकर DNA लाइगेज (DNA ligase) एन्जाइम की उपस्थिति में आपस में मिलकर सूत्र बनाते हैं। उपरोक्त क्रियाओं के प्रत्येक चरण को चलाने के लिये निश्चित प्रोटीन्स तथा एन्जाइम होते हैं। सभी एन्जाइम एक एन्जाइम तन्त्र के रूप में होते हैं। इसे रेप्लीसोम ( Replisome) कहते हैं। DNA द्विगुणन अग्र चरणों में होता है-

(i) समारम्भन बिन्दु का अभिज्ञान ( Recognition of initiation point)-जिस स्थान से DNA द्विगुणन का प्रारम्भ होता है, उस स्थान को प्रारम्भन का स्थान (Initiation site) कहते हैं। प्रोकेरियोटिक कोशिकाओं में द्विगुणन प्रारम्भ होने का केवल एक ही बिन्दु होता है, जबकि यूकेरियोटिक कोशिकाओं में DNA अणु में अनेक स्थानों पर एक साथ द्विगुणन प्रारम्भ होता है।

(ii) दोहरे हेलिक्स का खुलना (Unwinding of double helix)-एन्जाइम हेलीकेज (Helicase) DNA के रज्जुकों को खोलने का कार्य करता है। जब रज्जुक खुल जाते हैं, तब एन्जाइम 5 टोपो आइसोमरेज (Topoisomerase) या DNA गाइरेज की सहायता से रज्जुक कट जाता है जिससे कुण्डलित DNA का तनाव समाप्त हो जाता है।

हेलिक्स डीस्टैबिलाइजिंग प्रोटीन (Helix destabilizing protein) अलग हुए रज्जुकों को अलग ही बनाए रखने में सहायक होता है। दोहरे हेलिक्स के खुलने के कारण एक Y के आकार की प्रतिकृति द्विशाख (Replication fork) जैसी रचना बन जाती है।

(iii) न्यूक्लियोसाइड्स का सक्रियकरण (Activation of nucleosides)-केन्द्रकद्रव्य में उपस्थित न्यूक्लियोसाइड फॉस्फोरिलेज (Phosphorylase) एन्जाइम तथा ATP की उपस्थिति में सक्रिय हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को फॉस्फोरिलेशन ( Phosphorylation) कहते हैं।

(iv) R.N.A. प्राइमर का निर्माण (Formation of RNA Primer) – DNA टेम्पलेट ( DNA Template) पर पहले RNA का एक छोटा टुकड़ा स्थित होता है। इसे RNA प्राइमर कहते हैं। RNA प्राइमर का निर्माण प्राइमेज (Primase) एन्जाइम या RNA पॉलीमरेज (RNA Polymerase) की सहायता से होता है।

(v) DNA श्रृंखला का निर्माण तथा लम्बा होना (Formation of DNA Chain and elongation of Chain)- DNA पॉलीमरेज III (DNA Polymerase III) या रेप्लिकेज ( Replicase) एन्जाइम R. N.A. प्राइमर में 5→3′ दिशा में नए क्षारकों को जोड़ता है। इन क्षारकों का क्रम DNA टेम्प्लेट के अनुसार होता है। DNA के दोनों रज्जुक प्रति समानान्तर होते हैं अर्थात् एक रज्जुक की दिशा 5→3′ होती है और दूसरे रज्जुक की दिशा 3’5′ होती है।
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एन्जाइम DNA पॉलीमरेज III क्षारकों को केवल 5→3′ दिशा में ही जोड़ सकता है; अतः 3→5 दिशा वाले रज्जुक (टेम्पलेट) पर DNA श्रृंखला का सतत् निर्माण होता है। जिस रज्जुक का निर्माण सतत् होता है, उसे अग्रक रज्जुक (Leading Strand) कहते हैं। जिस रज्जुक का निर्माण 3’5′ दिशा में होता है अर्थात् 5’3′ दिशा वाले पितृ रज्जुक (टेम्पलेट) पर होता है, यह लगातार नहीं होता।

छोटे-छोटे टुकड़ों का निर्माण होता है जिन्हें ओकाजाकी खण्ड (Okazaki segments) कहते हैं। इन टुकड़ों को एन्जाइम DNA लाइगेज (Ligase) की सहायता से जोड़ा जाता है। इस प्रकार 35′ दिशा वाले रज्जुक का निर्माण असतत् (Discontinuous ) होता है। इस रज्जुक को पश्चगामी पुत्री रज्जुक (Lagging daughter strand) कहते हैं। DNA द्विगुणन के साथ ही DNA अणु का दोहरा कुण्डल आगे की ओर खुलता चला जाता है।

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(vi) RNA प्राइमर का हटना ( Removal of RNA Primer)-DNA श्रृंखला की लम्बाई बढ़ जाने के बाद RNA प्राइमर श्रृंखला से हट जाता है। एन्जाइम आर. एन. ऐज एच (R.N. Aas H) की सहायता से RNA प्राइमर को DNA श्रृंखला से हटाया जाता है। RNA प्राइमर के हटने से उत्पन्न रिक्त स्थान को भरने में एन्जाइम DNA पॉलीमरेज I सहायता करता है।

(vii) DNA द्विगुणन का अन्त (Termination of DNA Replication)-जब DNA निर्माण पूर्ण हो जाता है, तब एक टर्मिनेशन बाइंडिंग प्रोटीन (Termination binding protein) एन्जाइम DNA हेलीकेज (DNA Helicase) की क्रिया को रोक देता है। DNA द्विगुणन का अन्त टर्मिनेशन जोन (Termination Zone) में पहुँचने पर या दूसरी ओर के द्विगुणन बिन्दु से मिलने पर होता है ।

प्रश्न 21.
पुनरावृत्ति DNA किसे कहते हैं ? अल्फ्रेड हर्षे तथा मार्थांचेज के प्रयोग को सचित्र समझाइये कि DNA एक आनुवंशिक पदार्थ है’।
उत्तर:
DNA फिंगरप्रिन्ट के लिये DNA अनुक्रम में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में विभिन्नता का पता लगाते हैं। इन स्थानों पर DNA का छोटा भाग कई बार पुनरावृत्त (repeated) होता है। उसे पुनरावृत्ति DNA कहते हैं।
आनुवंशिक पदार्थ DNA है (DNA is Genetic material)-
ए.डी. हर्षे (A.D. Hershey) तथा एम.जे. चेज (M.J. Chase) ने सन् 1952 में विषाणु T2 भोजी (बेक्टिरियोफेज; Bacteriophage) पर प्रयोग करके यह परिणाम निकाला कि DNA आनुवंशिक पदार्थ है, क्योंकि इस क्रिया में संक्रमण करने वाले भोजी का केवल DNA अंश ही परपोषी जीवाणु कोशिका में प्रवेश करता है। वही आनुवंशिक सूचनाओं का वहन करता है जिससे नई भोजी सन्तानें बनती हैं।
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– इन वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों में रेडियोएविटव सल्फर S35 तथा रेडियोएक्टिव फॉस्फोरस P32 बुक्त माध्यम पर उगाकर जीवाणुभोजी DNA को रेडियोएक्टिव बना दिया, क्योंकि जीवाणुभोजी कणों के प्रोटीन में फॉस्फोरस नहीं होता है, किन्तु DNA में फॉस्फोरस होता है इसलिए केवल DNA ही रेडियोएक्टिव फॉस्फोरस द्वारा अंकित होता है।

इसी प्रकार जीवाणुभोजी प्रोटीन में ही सल्फर पाया जाता है। जिसे उन्होंने रेडियोएक्टिव सल्फर (S35) द्वारा अंकित कर दिया। इस प्रकार के विभेदी अंकन द्वारा जीवाणुभोजी के DNA व प्रोटीन घटकों को बिना किसी रासायनिक परीक्षण के सरलता से अलग-अलग पहचानना सम्भव हो पाया।

हर्षे व चेज ने इन अंकित जीवाणुभोजी कणों से अलग-अलग जीवाणु कोशिकाओं को संक्रमित कराया तो, उन्ह्रोंने पाया कि केवल रेडियोएक्टिव (P32) ही जीवाणवीय कोशिकाओं के साथ सम्बद्ध था, किन्तु रेंयोएक्टिव S35 का नहीं था, इन प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हुआ कि जीवाणवीय कोशिका में केवल DNA ही प्रवेश करता है न कि प्रोटीन।

प्रोटीन आवरण परपोषी के बाहर ही रह जाता है तथा DNA ही प्रवेश करने के बाद अपने समान नये जीवाणुभोजी कणों का संश्लेषण करता है। हर्षें तथा चेज के इस प्रयोग द्वारा और अधिक स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो गया कि DNA ही आनुवंशिक पदार्थ है।

आनुवंशिक पदार्थ के गुण (Characteristics of Genetic material)-
(i) उपरोक्त प्रयोगों से यह स्पष्ट है कि DNA आनुवंशिक पदार्थ के रूप में कार्य करता है परन्तु कुछ विषाणुओं में RNA आनुवंशिक पदार्थ होता है, उदाहरण-टोबैको मोजेक वाइरस (TMV), क्यूबीटा बैक्टिरियोफेज आदि।

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(ii) वह अणु जो आनुवंशिक पदार्थ के रूप में कार्य करता है वह निम्न मापदंडों को निश्चित रूप से पूरा करता है-
(क) यह अपनी प्रतिकृति बनाने में सक्षम होता है।
(ख) इसे संरचना व रासायनिक संगठन के आधार पर स्थिर होना चाहिए।
(ग) इसमें धीमी गति से उत्परिवर्तन होते हैं, यह विकास हेतु आवश्यक है।
(घ) इसे स्वयं ‘मेंडल के लक्षण’ के अनुरूप अभिव्यक्त होना चाहिए।

(iii) सजीव तंत्र में जितने अणु पाये जाते हैं उनमें प्रतिकृति की क्षमता नर्हीं होती है परन्तु दोनों न्यूक्लिक अम्लों (DNA \& RNA) में यह क्षमता होती है।

(iv) आनुवंशिक पदार्थ स्थायी होता है, जीवन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं में आने वाले परिवर्तनों का इस पर कोई प्रभाव नहीं होता है जैसे प्रिफिथ के ‘रूपान्तरित कारक’ से स्पष्ट है कि ताप से जीवाणु की मृत्यु हो जाती है परन्तु आनुर्वंशिक पदार्थ की कुछ विशेष्ताएँ नष्ट नहीं हो पाती हैं।

(v) DNA के दोनों रू्जुक एक-दूसरे के पूरक होते हैं जो गर्म करने पर एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं परन्तु पुन: उचित परिस्थिति के आने पर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। RNA के प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड पर 2 -हाइड्राक्सिल समूह मिलता है। यह एक क्रियाशील समूह है जिसके कारण RNA अस्थिर व आसानी से विखंडित हो जाता है। इस कारण DNA रासायनिक संगठन की दृष्टि से कम सक्रिय व संरचनात्मक दृष्टि से अधिक स्थायी होता है। अतः दोनों प्रकार के न्यूक्लिक अम्लों में से DNA एक अच्च्छा आनुर्वंशिक पदार्थ है।

(vi) DNA में यूरेसील के स्थान पर थाइमीन होने से उसमें. अधिक स्थायित्व होता है।

(vii) दोनों प्रकार के न्यूक्लिक अम्ल उत्परिवर्तित हो सकते हैं। RNA अस्थायी व तीव्र गति से उत्परिवर्तित होता है। यही कारण है कि विषाणुओं में RNA होने से इनकी जीवन अवधि छोटी व तेजी से उत्परिवर्तित होने वाली होती है।

(viii) RNA प्रोटीन संश्लेषण के लिये सीधे कूटलेखन करते हैं, इसी कारण वे आसानी से लक्षण व्यक्त करते हैं। जबकि DNA प्रोटीन संश्लेषण के लिये RNA पर निर्भर है।

(ix) अत: DNA व RNA दोनों अनुर्वंशिक पदार्थ के रूप में कार्य करते हैं। DNA के अधिक स्थायी होने से वह आनुर्वंशिक सूचनाओं के संचय हेतु अधिक उपयोगी है तथा RNA आनुवंशिक सूचनाओं के स्थानान्तरण हेतु डपयुक्त है।

प्रश्न 22.
द्विकुंडली DNA की संरचना की कोई चार मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
(i) यह दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं का बना होता है जिसका आधार शर्करा- फॉस्फेट का बना होता है व क्षार भीतर की ओर प्रक्षेपी होते हैं।

(ii) दोनों श्रृंखलाएँ प्रति समानांतर ध्रुवणता रखती हैं। इसका मतलब एक श्रृंखला की ध्रुवणता 5 से 3′ की ओर हो तो दूसरी की ध्रुवणता 3′ से 5′ की तरह होगी।

(iii) दोनों रज्जुकों के क्षार आपस में हाइड्रोजन बंध द्वारा युग्मित होकर क्षार युग्मक बनाते हैं। एडेनिन व थाइमिन जो विपरीत रज्जुकों में होते हैं, आपस में दो हाइड्रोजन बंध बनाते हैं। ठीक इसी तरह से ग्वानीन, साइटोसीन से तीन हाइड्रोजन बंध द्वारा बंधा रहता है जिसके फलस्वरूप सदैव प्यूरीन के विपरीत दिशा में पिरिमीडीन होता है। इससे कुंडली के दोनों रज्जुकों के बीच लगभग समान दूरी बनी रहती है ।

(iv) दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिणवर्ती कुंडलित होती हैं। कुंडली का पिच 3.4 नैनोमीटर व प्रत्येक घुमाव में लगभग 10 क्षार युग्मक मिलते हैं। परिणामस्वरूप एक कुंडली में एक क्षार युग्मक के बीच लगभग 0.34 नैनोमीटर की दूरी होती है ।

प्रश्न 23.
न्यूक्लियोसोम किसे कहते हैं? डीएनए कुंडली का पैकेजिंग समझाइए। न्यूक्लियोसोम का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
यदि DNA द्विकुंडली की लम्बाई की गणना की जाए तो यह लम्बाई काफी अधिक होती है परन्तु जीवों में DNA कुंडली का विशेष पैकेजिंग होता है जो न्यूक्लियोसोम के रूप में होता है। यूकैरियोटिक गुणसूत्रों में 50% अधिक प्रोटीन होती है जो DNA तथा RNA के संश्लेषण से सम्बन्धित होती है परन्तु इनमें से एक बड़ा भाग हिस्टोन का होता है।

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हिस्टोन्स धनात्मक आवेशित क्षारीय प्रोटीन का समूह होता है। हिस्टोन्स में क्षारीय एमीनो अम्लीय लाइसीन व आरजीनीन अधिक मात्रा में मिलते हैं। दोनों एमीनो अम्ल की पार्श्व श्रृंखलाओं पर धनात्मक आवेश होता है। हिस्टोन व्यवस्थित होकर आठ हिस्टोन अणुओं की एक इकाई बनाता है जिसे हिस्टोन अष्टक कहते हैं।

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धनात्मक आवेशित हिस्टोन अष्टक चारों तरफ से ऋणात्मक आवेशित DNA से सटा होता है जिसे न्यूक्लियोसोम कहते हैं। एक प्रारूपी न्यूक्लियोसोम 200 क्षार युग्म की DNA कुंडली होती है । प्रत्येक हिस्टोन अष्टक में H2A, H2B, H3 तथा H के दो-दो अणु होते हैं। न्यूक्लियोसोम संयोजक DNA (linker DNA)

द्वारा एक- दूसरे से जुड़े होते हैं तथा क्रोमेटीन डोरी पर लगभग छ: न्यूक्लियोसोम मिलकर सोलेनायड का निर्माण करते हैं। केन्द्रक में मिलने वाला क्रोमेटीन एक धागे के जैसा होता है तथा इस डोरी पर धूक्लियोसोम गोल मणियों के जैसे दिखाई देते हैं ।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
आनुवंशिक कूट क्या हैं? इनकी चार विशेषताएँ लिखिए। tRNA का चित्र बनाइए ।
उत्तर:
सजीवों की कोशिकाओं में विभिन्न 20 प्रकार के अमीनो अम्ल होते हैं। प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया में अमीनो अम्लों का निश्चित क्रम m. RNA पर उपस्थित चार नाइट्रोजनी क्षारकों (A, G, C, U) के क्रम पर निर्भर रहता है। अतः m. RNA के चार क्षारकों के क्रम व 20 अमीनो अम्लों के बीच आनुवंशिक सूचना के संचरण को ही आनुवंशिक कूट कहते हैं। आनुवंशिक कूट के विषय में जानकारी देने का श्रेय

नीरेनबर्ग (Nirenberg, 1961 ) व उनके सहयोगियों को है। आनुवंशिक कूट की विशेषताएँ-

1. कोड के अक्षर ( Code letters) – m. RNA पर चार क्षार होते हैं अतः ये अक्षर A, G, U, C हैं।

2. कोड शब्द (Code words ) – A, G, U, C चार अक्षरों से त्रिक कोड अनुसार 64 शब्द बनते हैं, इन्हें कोडोन (Codon) कहते हैं। गैमो (Gammow, 1959 ) के अनुसार आनुवंशिक कोड तीन अक्षरों का होता है। कुल 64 कोडोनों में 61 कोड तो 20 अमीनो अम्लों को कोडित करने तथा शेष 03 किसी भी अमीनो अम्ल को कोडित नहीं करते। अतः ये निरर्थक कोडोन (nonsense codon) होते हैं।

3. पठन दिशा (Reading Direction ) – m. RNA के ऊपर आनुवंशिक कोड का पठन 5 से 3′ दिशा की ओर होता है।

4. प्रारम्भी कोडोन (Initiation Codon ) – प्राय m. RNA के प्रारम्भ में 5′ सिरे पर AUG कोडोन पाया जाता है, इसे प्रारम्भी कोडोन कहते हैं। यह कोड मेथियोनीन अमीनो अम्ल को कोडित करता है।

प्रश्न 2.
मानव जीनोम परियोजना क्या है? मानव जीनोम परियोजना की विशेषताएँ लिखिए। मानव जीनोम परियोजना का निरूपक आरेख दीजिए।
उत्तर:
मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project HGP) को जानने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि जीनोम क्या है। किसी भी जीव की जीनी संरचना उसका जीनोम कहलाता है और क्योंकि जीन गुणसूत्रों पर पाये जाते हैं इसलिये गुणसूत्रों के एक अगुणित समुच्चयी (Haploid set ) को जीनोम कहते हैं।

सन्तान को अपने जनकों (Parents) से जो गुणसूत्र प्राप्त होते हैं उनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंश DNA है। इस DNA के एक खण्ड को जिसमें आनुवंशिक कूट निहित होता है, उसे वैज्ञानिक ‘जीन’ कहते हैं। अतः किसी भी जीव की आनुवंशिक व्यवस्था उसके DNA में मिलने वाले अनुक्रम से निर्धारित होती है।

दो विभिन्न व्यक्तियों में मिलने वाला DNA अनुक्रम कुछ जगहों पर भिन्न-भिन्न होता है। सन् 1990 में मानव जीनोम के अनुक्रमों को ज्ञात करने के लिए यह योजना प्रारम्भ की गई। – मानव जीनोम परियोजना मानव जीनोम की मुख्य विशेषताएँ-
में निम्न मुख्य विशेषताएँ हैं-

  • मानव जीनोम में 3164.7 करोड़ न्यूक्लियोटाइड क्षार हैं।
  • औसतन जीन में 3000 क्षार होते हैं परन्तु इनके आकार में विभिन्नताएँ मिलती हैं। मानव में ज्ञात सबसे बड़ी जीन डिस्ट्रॉफिन (Dystrophin) में 24 करोड़ क्षार होते हैं।
  • कुछ जीनों की संख्या 30,000 होती है तथा लगभग सभी व्यक्तियों में मिलने वाले न्यूक्लियोटाइड क्षार एकसमान होते हैं।
  • दो प्रतिशत से कम जीनोम प्रोटीन का कूटलेखन करते हैं।
  • मानव जीनोम के बहुत बड़े भाग का निर्माण पुनरावृत्ति अनुक्रम द्वारा होता है।
  • पुनरावृत्ति अनुक्रम डीएनए के फैले हुए भाग हैं जिनकी कभी-कभी सौ से हजार बार पुनरावृत्ति होती है। जिनके बारे में यह विचार है कि इनका सीधा कूटलेखन में कोई कार्य नहीं है लेकिन इनसे गुणसूत्र की संरचना, गतिकीय व विकास के बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।
  • गुणसूत्र | में सर्वाधिक जीन (2968) व Y गुणसूत्र में सबसे कम जीन (231) मिलते हैं।
  • वैज्ञानिकों ने मानव में लगभग 14 करोड़ जगहों पर अलग इकहरा क्षार (SNPs – एकल न्यूक्लियोटाइड बहुरूपता; सिंगल न्यूक्लियोटाइड पॉलीमारफीजम; जिसे ‘स्निप्स’ कहा जाता है) का पता लगाया । उपरोक्त जानकारी से गुणसूत्रों में उन जगहों जो रोग आधारित अनुक्रम मानव इतिहास का पता लगाने में सहायक हैं, के विषय में जानकारी एकत्र करने में अधिक सहयोग प्रदान किया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न –

1. ट्रांसलेशन (अनुवादन/ स्थानान्तरण) की प्रथम अवस्था कौनसी होती है ? (NEET-2020)
(अ) डी. एन. ए. अणु की पहचान
(ब) tRNA का एमीनोएसीलेशन
(स) एक एन्टी-कोडॉन की पहचान
(द) राइबोसोम से mRNA का बंधन
उत्तर:
(ब) tRNA का एमीनोएसीलेशन

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

2. निम्नलिखित में से कौनसा कथन सही है (NEET 2020 )
(अ) एडीनीन एक H-बंध के द्वारा थायमीन के साथ युग्म बनाता है।
(ब) एडीनीन तीन H-बंधों के द्वारा थायमीन के साथ युग्म बनाता है
(स) एडीनीन थायमीन के साथ युग्म नहीं बनाता है
(द) एडीनीन दो H-बंधों के द्वारा थायमीन के साथ युग्म बनाता है।
उत्तर:
(द) एडीनीन दो H-बंधों के द्वारा थायमीन के साथ युग्म बनाता है।

3. यदि दो लगातार क्षार युग्मों के बीच की दूरी 0.34 nm है और एक स्तनपायी कोशिका की DNA द्विकुण्डली में क्षार युग्मों की कुल संख्या 6.6 x 10 bp है। (NEET-2020)
(अ) 2.5 मीटर
(ब) 2.2 मीटर
(स) 2.7 मीटर
(द) 2.0 मीटर
उत्तर:
(ब) 2.2 मीटर

4. अनुलेखन के समय डी.एन.ए. की कुण्डली को खोलने में कौनसा एंजाइम मदद करता है? (NEET-2020)
(अ) डी.एन.ए. . हैलीकेज
(ब) डी. एन. ए. पॉलिमरेज
(स) आर. एन. ए. पॉलिमरेज
(द) डी.एन.ए. लाइगेज
उत्तर:
(स) आर. एन. ए. पॉलिमरेज

5. डी.एन.ए. एवं आर. एन. ए. दोनों में पाये जाने वाले प्यूरीन कौनसे हैं ? (NEET-2019)
(अ) साइटोसिन और थाईमीन
(ब) एडेनीन और थाईमीन
(स) ऐडेनीन और ग्वानीन
(द) ग्वानीन और साइटोसीन
उत्तर:
(स) ऐडेनीन और ग्वानीन

6. व्यक्त अनुक्रम घुंडी (ई.एस.टी.) का क्या तात्पर्य है? (NEET-2019)
(अ) नूतन डी.एन.ए. अनुक्रम
(ब) आर. एन. ए. रूप में जीनों का अभिव्यक्त होना
(स) पॉलिपेप्टाइड अभिव्यक्ति
(द) डी. एन. ए. बहुरूपता ।
उत्तर:
(ब) आर. एन. ए. रूप में जीनों का अभिव्यक्त होना

7. बहुत से राइबोसोम एक mRNA से संबद्ध होकर एक साथ पॉलिपेप्टाइड की प्रतियाँ बनाते हैं। राइबोसोम की ऐसी श्रृंखलाओं को क्या कहते हैं?(NEET-2018)
(अ) प्लस्टिडोम
(स) बहुसूत्र
(ब) बहुतलीय पिण्ड
(द) केन्द्रिकाय
उत्तर:
(स) बहुसूत्र

8. डी.एन.ए. एक आनुवंशिक पदार्थ है? इसका अंतिम प्रमाण किसके प्रयोग से आया ? (NEET-2017)
(अ) ग्रिफिथ
(ब) हर्शे और चेस
(स) अवरी मैकलॉड और मैककार्टी
(द) हरगोविन्द खुराना
उत्तर:
(ब) हर्शे और चेस

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

9. निम्नलिखित में से कौन संरचनात्मक जीन के समान है ? (NEET-2016)
(अ) ओपेरॉन
(ब) रिकॉन
(स) म्यूटान
(द) सिस्टॉन
उत्तर:
(द) सिस्टॉन

10. निम्नलिखित में से कौनसा RNA पर लागू नहीं होता ? (NEET-2015)
(अ) 5 फास्फोरिल और 3 हाइड्रोक्सिल सिरे
(ब) विषम चक्रीय नाइट्रोजीनी बेस
(स) चारगॉफ नियम
(द) सम्पूरक बेस युग्मन
उत्तर:
(स) चारगॉफ नियम

11. दिया गया आलेख DNA के आनुवांशिक विचार को महत्त्वपूर्ण संकल्पना दर्शाता है। रिक्त स्थानों (A से लेकर C तक) की पूर्ति कीजिए- (NEET-2013)
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 17
(अ) A – अनुलेखन B – प्रतिकृतिय C – इरविन चारगॉफ
(ब) A – ट्रांसलेशन B – अनुलेखन C – इरविन चारगॉफ
(स) A – अनुलेखन B – ट्रांसलेशन C – फ्रांसिस क्रिक
(द) A – ट्रांसलेशन B – विस्तार C – रोजेलिन फ्रैंकलिन
उत्तर:
(ब) A – ट्रांसलेशन B – अनुलेखन C – इरविन चारगॉफ

12. यदि DNA के एक रज्जुक के नाइट्रोजनी क्षारकों का अनुक्रम ATCTG है तो उसके पूरक RNA रज्जुक में क्या अनुक्रम होगा? (NEET-2012)
(अ) TTAGU
(ब) UAGAC
(स) AACTG
(द) ATCGU
उत्तर:
(स) AACTG

13. जीव विज्ञान के इतिहास में मानव जीनोम प्रोजेक्ट के अधीन किसका विकास किया गया ? (Mains-2011)
(अ) बायोस्टिमेटिक
(ब) जैव प्रौद्योगिक
(स) बायोमॉनिटरिंग
(द) जैव सूचनिकी
उत्तर:
(द) जैव सूचनिकी

14. निम्नलिखित में से कौनसा एक है जिसमें आण्विक जीवविज्ञान के सेन्ट्रल-डोरमा का अनुसरण नहीं होता? (NEET-2010)
(अ) म्यूकर
(ब) स्लेमाइडोमोनास
(स) HIV
(द) मटर
उत्तर:
(अ) म्यूकर

15. DNA की अर्धसंरक्षी प्रतिकृति सर्वप्रथम किसमें प्रदर्शित की गयी थी? (NEET-2009)
(अ) साल्मोनेला टाइफीमुरिम
(ब) ड्रोसोफिला मैलेनोगेस्टर
(स) एशरिशिचया कोलाई
(द) स्ट्रेप्टोकॉकस न्यूमोनी
उत्तर:
(स) एशरिशिचया कोलाई

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

16. DNA अणु के भीतर- (NEET-2008)
(अ) थाइमीन के प्रति ऐडेनीन का अनुपात अलग-अलग जीव में अलग-अलग होता है।
(ब) दो रज्जुक होते हैं जो एक-दूसरे के प्रति समान्तर चलते हैं। एक 53 दिशा में तथा दूसरा 35 दिशा में ।
(स) प्यूरीन न्यूक्लियोटाइडों तथा पाइरिमिडिन न्यूक्लियोटाइडों की सकल मात्रा सदैव बराबर नहीं होती ।
(द) दो रज्जुक होते हैं जो 53 दिशा में समानान्तर चलते हैं।
उत्तर:
(ब) दो रज्जुक होते हैं जो एक-दूसरे के प्रति समान्तर चलते हैं। एक 53 दिशा में तथा दूसरा 35 दिशा में ।

17. DNA के खंडों को जोड़ने का कार्य करने वाला एंजाइम है- (Kerala PMT-2005, 09)
(अ) DNA पॉलीमरेज- I
(स) DNA लाइगेज
(ब) DNA पॉलीमरेज – III
(द) एण्डोन्यूक्लिएज
उत्तर:
(स) DNA लाइगेज

18. लैक ऑपेरॉन परिकल्पना में संरचनात्मक जीन का अनुक्रम होता है- (Karnataka CET-2007)
(अ) Lac-a, Lac-Z, Lac – Y
(ब) Lac-Y, Lac-Z, Lac-a
(स) Lac-a, Lac -Y, Lac Z
(द) Lac Z, Lac -Y, Lac-a
उत्तर:
(द) Lac Z, Lac -Y, Lac-a

19. लैक- ऑपेरॉन मॉडल में रिप्रेशर प्रोटीन किस स्थान से जुड़ता है-
(अ) आपरेटर
(ब) प्रमोटर
(स) रेग्यूलेटर
(द) संरचनात्मक जीन
उत्तर:
(अ) आपरेटर

20. श्रृंखला समापन कोडॉन (Stop Codons) हैं- (Bihar CECE -2006; DPMT-2006)
(अ) AGT, TAG UGA
(ब) GAT, AAT, AGT
(स) TAG TAA, TGA
(द) UAG, UGA, UAA
उत्तर:
(द) UAG, UGA, UAA

21. DNA की प्रतिकृति (replication) होता है- (Haryana PMT-2005)
(अ) 25 दिशा में
(ब) 35 दिशा में
(स) 35 व 53 दोनों दिशाओं में
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) 35 व 53 दोनों दिशाओं में

22. RNA में अनुपस्थित तत्व है- (AMU-2005)
(अ) नाइट्रोजन
(ब) सल्फर
(स) ऑक्सीजन
(द) हाइड्रोजन
उत्तर:
(ब) सल्फर

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

23. RNA का कौन-सा सर्वाधिक हेटरोजीनस होता है? (Haryana PMT-2005)
(अ) t.RNA
(स) r.RNA
(ब) m. RNA
(द) hn. RNA
उत्तर:
(द) hn. RNA

24. यदि एडिनिन का प्रतिशत 30 है तो ग्वानिन का क्या प्रतिशत होगा- (Haryana PMT-2005)
(अ) 10%
(स) 30%
(ब) 20%
(द) 40%
उत्तर:
(ब) 20%
नोट- क्योंकि A+ G का प्रतिशत 50% के बराबर होता है, प्रकार ग्वानिन का प्रतिशत 20% होता है।

25. ओकाजाकी खण्ड का एक सही क्रम में जुड़ते हैं- (Kerala PMT-2005)
(अ) DNA पॉलीमरेज द्वारा
(ब) DNA लाइगेज द्वारा
(स) RNA पॉलीमरेज द्वारा
(द) प्राइमेज द्वारा
उत्तर:
(द) प्राइमेज द्वारा

नोट- अन्तिम चरण में फास्फोडाईएस्टर बंध के द्वारा ओकाजाकी खण्ड को जोड़ने के लिए लेगिंग स्ट्रेन्ड (lagging strand) के पूर्ण संश्लेषण की आवश्यकता होती है जो DNA लाइगेज के द्वारा पूर्ण होती है।

26. ई. कोलाई DNA के रेप्लीकेशन की विधि होती है- (CPMT-2005)
(अ) संरक्षी और एकदिशीय
(ब) अर्द्धसंरक्षी और एकदिशीय
(स) संरक्षी और द्विदिशीय
(द) अर्द्धसंरक्षी और द्विदिशीय
उत्तर:
(द) अर्द्धसंरक्षी और द्विदिशीय

27. निम्न में से कौन-सा सही नहीं है? (DPMT-2003; Haryana PMT 2005 )
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 21
(ब) A+ T = G+ C
(स) A+G = C + T
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) A+ T = G+ C

28. निम्न में से कौन DNA संश्लेषण हेतु RNA का टेम्पलेट के रूप में प्रयोग होता है- (CBSE PMT-2005)
(अ) रिवर्स ट्रॉन्सक्रिप्टेज
(ब) DNA डिपेन्डेन्ट RNA पॉलीमरेज
(स) DNA पॉलीमरेज
(द) RNA पॉलीमरेज
उत्तर:
(अ) रिवर्स ट्रॉन्सक्रिप्टेज
नोट- टेमिन ओर बाल्टीमोर द्वारा यह ज्ञात किया गया कि RNA टेम्पलेट पर DNA का निर्माण या RNA से भी DNA का निर्माण होता है, इसे रिवर्स ट्रान्सक्रिप्सन या टेमिनिज्म कहते हैं। यह रिवर्स ट्रान्सक्रिप्सन, रिवर्स ट्रान्सक्रिप्टेज एन्जाइम के प्रभाव से होता है।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

29. सुपर कोइल्ड ( Super coiled) DNA पाया जाता है- (Wardha-2005)
(अ) प्रोकैरियोट्स व यूकैरियोट्स में
(ब) केवल यूकैरियोट्स में
(स) केवल प्रोकैरियोट्स में
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) प्रोकैरियोट्स व यूकैरियोट्स में

30. गर्म करने के बाद DNA के विघटन ( Degeneration) का अध्ययन निम्न में से किसकी तुलना करके किया जा सकता है- (Wardha-2005)
(अ) AT अनुपात
(ब) G C अनुपात
(स) शर्करा : फॉस्फेट
(द) न्यूक्लियोटाइड्स की संख्या
उत्तर:
(द) न्यूक्लियोटाइड्स की संख्या

31. जीन का वह भाग जो अनुलेखित (transcript) होता है परन्तु उसका अनुलिपिकरण ( translation) नहीं होता, वह है- (CPMT-2005)
(अ) एक्सॉन
(ब) इन्ट्रॉन
(स) सिस्ट्रॉन
(द) कोडोन
उत्तर:
(ब) इन्ट्रॉन

32. किस RNA का क्लोवर लीफ मॉडल होता है? (CBSE, PMT-2004)
(अ) t.RNA
(ब) r.RNA
(स) hn. RNA
(द) m. RNA
उत्तर:
(अ) t.RNA

33. अनुलेखन के दौरान, यदि DNA में न्यूक्लियोटाइडों का क्रम ATACG है तब m.RNA में न्यूक्लियोटाइडों का क्रम होगा- (CBSE PMT-2004)
(अ) UAUGC
(स) TATGC
(ब) UATGC
(द) TCTGG
उत्तर:
(अ) UAUGC

34. DNA रिपेयरिंग (Repairing) किसके द्वारा की जाती है- (Kerala CET-2002; AFMC-2004; Orissa JEE-2004)
(अ) लाइगेज
(स) DNA पालिमरेज
(ब) DNA पालिमरेज III
(द) DNA पालिमरेज I
उत्तर:
(अ) लाइगेज

35. DNA स्ट्रैण्ड की दिशा से सम्बन्धित सही कथन चुनिए- (MHCET-2004; BVP-2004)
(अ) टेम्पलेट स्ट्रेण्ड पर 5→3
(ब) नए स्ट्रेण्ड पर 3→5
(स) लीडिंग स्ट्रेण्ड पर 5→3
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(स) लीडिंग स्ट्रेण्ड पर 5→3

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

36. वाटसन और क्रिक के डबल हैलिक्स मॉडल को किसके द्वारा जाना जाता है- (CPMT-2004)
(अ) C-DNA
(ब) B-DNA
(स) Z-DNA
(द) D-DNA
उत्तर:
(ब) B-DNA

37. ऑपेरॉन अवधारणा में रेग्यूलेटर जीन किस तरह कार्य करता है- (KCET-2004)
(अ) रिप्रेसर (Represser )
(ब) रेग्यूलेटर ( Regulator)
(स) इनहीबीटर (Inhibitor)
(द) सभी
उत्तर:
(अ) रिप्रेसर (Represser )

38. वह एन्जाइम जो DNA के अणु को खण्डों में काटता है, उसे कहते हैं- (Orissa PMT-2002; Kerala CET-2003)
(अ) DNA पॉलीमरेज
(ब) DNA लाइगेज
(स) रेस्ट्रिक्शन एन्जाइम
(द) DNA जाइरेज
उत्तर:
(स) रेस्ट्रिक्शन एन्जाइम

39. निम्न में से कौन-सा चित्र DNA रेप्लीकेशन की सही विधि को दर्शाता है- (AIIMS 2003)
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 18
उत्तर:
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 22

40. DNA पॉलीमरेज एन्जाइम के खोजकर्त्ता थे- (Kerala CET 2003; Kerala PMT 2003)
(अ) ओकाजाकी
(ब) कॉर्नबर्ग
(स) वाट्सन-क्रिक
(द) जैकब-मोनॉड
उत्तर:
(ब) कॉर्नबर्ग

41. यूकैरियोटिक RNA पॉलीमरेज III किसके संश्लेषण को उत्प्रेरित करता है- (Kerala CET 2003)
(अ) m.RNA
(ब) t.RNA
(स) 18.5 r.RNA
(द) इन्ट्रॉन्स
उत्तर:
(ब) t.RNA

42. निम्न में से कौन-सा कोडोन UGC के समान सूचना को कोड करता है- (AIIMS 2003)
(अ) UGU
(ब) UGA
(स) UAG
(द) UGG
उत्तर:
(अ) UGU

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार

45 RNA पॉलीमरेज का सम्बन्ध किससे है- (CPMT 2003)
(अ) ट्रांसलेशन
(ब) ट्रांसक्रिप्सन
(स) ट्रांसलोकेशन
(द) रेप्लीकेशन
उत्तर:
(ब) ट्रांसक्रिप्सन

44. निम्न में से किस RNA की आयु न्यूनतम होती है- (MP PMT 2002)
(अ) m. RNA
(ब) r.RNA
(स) r.RNA
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) m. RNA

45. प्रोटीन संश्लेषण का सेन्ट्रल डोग्मा होता है- (MHCET 2002)
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 19
उत्तर:
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 6 वंशागति के आणविक आधार 20

46. DNA टेम्पलेट पर नये स्ट्रेण्ड का प्रारम्भन किया जाता है- (MHCET 2002)
(अ) RNA पॉलीमरेज
(ब) DNA पॉलीमरेज
(स) DNA लाइगेज
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं

47. यदि दिये गये DNA खण्ड में ग्वानिन के न्यूक्लियोटाइड्स की संख्या 75 और थाइमिन के 75 हैं तो उस खण्ड में कुल उपस्थित न्यूक्लियोटाइड्स की संख्या होगी -(MHCET 2002)
(अ) 75
(ब) 750
(स) 225
(द) 300
उत्तर:
(द) 300

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HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. क्लोरोफिल में उपस्थित धातु आयन है-
(अ) Fe3+
(ब) Co2+
(स) Mg 2+
(द) Zn 2+
उत्तर:
(स) Mg 2+

2. संकुल [Co(en)2(NH3)2] Br3 में Co की समन्वयी संख्या (CN) है-
(अ) 3
(ब) 4
(स) 7
(द) 6
उत्तर:
(द) 6

3. संकुल [Pt(NH3)3Cl2Br]Cl2 के जलीय विलयन में उपस्थित हैलाइड आयनों की संख्या कितनी होगी?
(अ) 4
(ब) 3
(स) 1
(द) 2
उत्तर:
(स) 1

4. लिगेन्ड सामान्यतः होते हैं-
(अ) लुईस अम्ल
(ब) लुईस क्षार
(स) ऋणायन
(द) उदासीन अणु
(स) ऋणायन
उत्तर:
(ब) लुईस क्षार

5. K4[Fe(CN)6] में Fe की प्राथमिक संयोजकता कितनी है ?
(अ) -4
(ब) +2
(स) +6
(द) +4
उत्तर:
(ब) +2

6. संकुल [Co(NH3) )5Br] SO4 तथा [Co (NH3)5SO4]Br में आपस में कौनसी समावयवता है?
(अ) बंधनी
(ब) ज्यामितीय
(स) आयनन
(द) उपसहसंयोजन
उत्तर:
(स) आयनन

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

7. संकुल में कौनसा लिगेन्ड होने पर बंधनी समावयवता होगी ?
(अ) NH3
(ब) en
(स) NC\(\overline{\mathbf{S}}\)
(द) H2O
उत्तर:
(स) NC\(\overline{\mathbf{S}}\)

8. निम्नलिखित में से कौनसा कीलेट लिगेन्ड है?
(अ) \(\overline{\mathrm{C}}\)N
(ब) C2O4-2
(स) NH3
(द) NO2
उत्तर:
(ब) C2O4-2

9. निम्नलिखित में से किस संकुल आयन में अनुचुंबकीय गुण अधिकतम होगा?
(अ) [Cr(H2O)6]3+
(ब) [Fe(CN)6]4-
(स) [Fe(H2O)6]2+
(द) [Zn(H2O)6]2+
उत्तर:
(स) [Fe(H2O)6]2+

10. निम्नलिखित में से कौनसा द्विक लवण (double salt) नहीं है?
(अ) KCl.MgC2.6H2O
(ब) FeSO4.(NH4)2SO4.6H2O
(स) K4[Fe (CN)6]
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(स) K4[Fe (CN)6]

11. संकुल (Co(H2O)6] [CrCl3] तथा [Cr(H2O)6] [CoCl6] दर्शाते हैं-
(अ) बन्धनी समावयवता
(ब) उपसहसंयोजन समावयवेता
(स) आयनन समावयवता
(द) विलायकयोजन समावयवता
उत्तर:
(ब) उपसहसंयोजन समावयवेता

12. निम्नलिखित से कौनसा संकुल ज्यामितीय समावयवता नहीं दर्शाता ?
(अ) [MX2L2]
(ब) [MX2AB]
(स) [ML4]
(द) [MABXY]
उत्तर:
(स) [ML4]

13. [Fe (CN)6)]4- में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या कितनी है?
(अ) 3
(ब) 4
(स) शून्य
(द) 2
उत्तर:
(स) शून्य

14. निम्नलिखित में से कौनसा धातु आयन, NH3 के साथ रंगीन विलयन देता है?
(अ) Cu2+
(ब) Zn2+
(स) Mg2+
(द) Ag+
उत्तर:
(अ) Cu2+

15. निम्नलिखित में से किसके जलीय विलयन में स्वतंत्र Fe3+ आयन उपस्थित होगा?
(अ) K3Fe (CN)6
(ब) Fe2 (SO4)3
(स) K4Fe(CN)6
(द) (NH4)2SO4 . FeSO4.6H2O
उत्तर:
(ब) Fe2 (SO4)3

16. संकुल (Cr(H2O)6]Cl3 तथा (Cr(H2O)5Cl]Cl2. H2O
(अ) बन्धनी समावयवी
(ब) आयनन समावयवी
(स) हाइड्रेट समावयवी
(द) उपसहसंयोजन समावयवी
उत्तर:
(स) हाइड्रेट समावयवी

17. [Fe(CO)5] का IUPAC नाम है-
(अ) आयरन पेन्टा कार्बोनिल
(ब) पेन्टा कार्बोनिल आयरन (O)
(स) आयरन पेन्टा कार्बनमोनोऑक्साइड
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ब) पेन्टा कार्बोनिल आयरन (O)

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

18. निम्नलिखित में से कौनसा द्विदन्तुर लिगेन्ड है?
(अ) अमोनिया
(ब) जल
(स) एथिलीनडाइऐमीन
(द) पिरीडीन
उत्तर:
(स) एथिलीनडाइऐमीन

19. संकुल Na2[Ni ( EDTA)) में Ni की समन्वयी संख्या (CN) कितनी है?
(अ) 1
(ब) 2
(स) 4
(द) 6
उत्तर:
(द) 6

20. निम्नलिखित में से कौनसा बाह्य कक्षक संकुल है?
(अ) [Co(NH3)6]3+
(ब) [CoF6]3-
(स) [Co(CN)6]3-
(द) [Fe(CN)6]3-
उत्तर:
(ब) [CoF6]3-

21. [Fe(CN)6]4- में Fe पर कौनसा संकरण होता है?
(अ) dsp³
(ब) sp³d²
(स) d²sp³
(द) sp³d³
उत्तर:
(स) d²sp³

22. निम्नलिखित में से कौनसा संकुल आयन प्रकाशिक समावयवता दर्शाता है?
(अ) [ZnCl4]2-
(ब) [Co(CN)6)3-
(स) [Cu(NH3)4]2+
(द) [Cr(C2O4)3]3-
उत्तर:
(द) [Cr(C2O4)3]3-

23. संकुल यौगिक [Cr(H2O)6]Cl3 के लिए चुम्बकीय आघूर्ण का मान 3.83 BM है तो इस संकुल में Cr परमाणु में 3d इलेक्ट्रॉनों का वितरण होगा-
(अ) \(3 \mathrm{~d}_{\mathrm{xy}}^1, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{yz}}^1, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{xz}}^1\)
(ब) \(3 \mathrm{~d}_{\mathrm{xy}}^1, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{x}^2-\mathrm{y}^2}^1, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{z}}^1\)
(स) \(3 \mathrm{~d}_{\mathrm{xy}}^{\mathrm{l}}, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{yz}}^1, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{z}^2}^1\)
(द) \(3 \mathrm{~d}_{\mathrm{x}^2-\mathrm{y}^2}^1, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{z}^2}^1, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{xy}}^1\)
उत्तर:
(अ) \(3 \mathrm{~d}_{\mathrm{xy}}^1, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{yz}}^1, 3 \mathrm{~d}_{\mathrm{xz}}^1\)

24. निम्नलिखित में से प्रतिचुम्बकीय संकुल आयन कौनसा है ?
(अ) [CoCl4]2-
(ब) (CoF6]2-
(स) [Ni (CN)4]2-
(द) [NiCl4]2-
उत्तर:
(स) [Ni (CN)4]2-

25. निम्नलिखित में से किस संकुल आयन की ज्यामिति वर्गाकार समतलीय है?
(अ) [NiCl4]2-
(ब) [FeCl4]2-
(स) [PtCl4]2-
(द) [CoCl4]2-
उत्तर:
(स) [PtCl4]2-

26. किसी संक्रमण धातु के संकुल का विन्यास (t2g)4 (eg)² है। धातु आयन से जुड़े लिगेण्ड की प्रकृति है-
(अ) प्रबल क्षेत्र
(ब) दुर्बल क्षेत्र
(स) उदासीन
(द) धनात्मक क्षेत्र
उत्तर:
(ब) दुर्बल क्षेत्र

27. [Co(NH3)4(NO2)2]Cl प्रदर्शित करता है-
(अ) बन्धन, आयनन समावयवता तथा प्रकाशिक समावयवता
(ब) बन्धन, आयनन तथा ज्यामितीय समावयवता
(स) आयनन ज्यामितीय तथा प्रकाशिक समावयवता
(द) बन्धन, ज्यामितीय तथा प्रकाशिक समावयवता
उत्तर:
(ब) बन्धन, आयनन तथा ज्यामितीय समावयवता

28. चतुष्फलकीय ज्यामिति निम्नलिखित में से किसकी है?
(अ) [Ni(NH3)6]2+
(ब) Ni (CO)4
(स) [Ni (CN)4]2-
(द) [Pt(CN)4]2-
उत्तर:
(ब) Ni (CO)4

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

29. निम्नलिखित में से कौन अनुचुम्बकीय लक्षण प्रदर्शित नहीं करता है?
(परमाणु क्रमांक Ti = 22; Fe = 26; Cr = 24; Cu = 29 )
(अ) [Ti(H2O)6]3+
(ब) [Fe(CN)6]3+
(स) [Cr(NH3)6]3+
(द) [Co(NH3)6]3+
उत्तर:
(द) [Co(NH3)6]3+

30. निम्नलिखित में से कौनसा संकुल दृश्य प्रकाश अवशोषण के लिए प्रत्याशित (Expected) नहीं है?
(अ) [Cr(NH3)6]2+
(ब) [Fe (H2O)6]2+
(स) [Ni(CN)4]2-
(द) [Ni(H2O)6]2+
उत्तर:
(स) [Ni(CN)4]2-

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
\(\overline{\mathrm{N}}\)H2 लिगेन्ड का IUPAC नाम बताइए।
उत्तर:
\(\overline{\mathrm{N}}\)H2 का नाम ऐमीडो है।

प्रश्न 2.
[NiCl4]2- में Ni का प्रभावी परमाणु क्रमांक कितना है?
उत्तर:
[NiCl4]2- में Ni का प्रभावी परमाणु क्रमांक 26 + 8 = 34 है।

प्रश्न 3.
कार्नेलाइट का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
कार्नेलाइट का सूत्र KCl . MgCl2 . 6H2O होता है।

प्रश्न 4.
[Cr(EDTA)]-1 में Cr की समन्वयी संख्या कितनी है?
उत्तर:
इस संकुल आयन में Cr की समन्वयी संख्या 6 है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित संकुलों के जलीय विलयन की चालकता का आरोही क्रम बताइए।
(i) K4[Fe(CN)
(ii) [Pt(NH3)4] [PtCl4]
(iii) [Ni (CO)4]
उत्तर:
(iii) < (ii) < (i) क्योंकि (iii) के विलयन में कोई आयन नहीं है लेकिन (ii) व (i) के जलीय विलयन में क्रमशः 2 तथा 5 आयन होंगे।

प्रश्न 6.
(i) [Pt(NH3)4Cl2]Br2 तथा
(ii) [Pt(NH3)4Br2]Cl2 में किस प्रकार विभेद किया जा सकता है?
उत्तर:
दोनों संकुलों के जलीय विलयन में AgNO3 का विलयन डालने पर (i) में AgBr का पीला अवक्षेप बनेगा जबकि (ii) में AgCl का श्वेत अवक्षेप प्राप्त होगा।

प्रश्न 7.
संकुल (Fe (C5H5)2] का IUPAC नाम बताइए।
उत्तर:
बिस (साइक्लोपेन्टा डाइइनिल) आयरन (II)

प्रश्न 8.
किस प्रकार के वर्गाकार समतलीय संकुल ज्यामितीय समावयवता दर्शाते हैं?
उत्तर:
[MX2L2], [ML2X4], [M(AB)2] प्रकार के वर्गाकार समतलीय संकुल ज्यामितीय समावयवता दर्शाते हैं।

प्रश्न 9.
[M ABXY] प्रकार के संकुल के कितने ज्यामितीय समावयवी सम्भव हैं?
उत्तर:
तीन (दो समपक्ष तथा एक विपक्ष)।

प्रश्न 10.
[Fe(CO)5] में Fe पर dsp³ कौनसा संकरण होता है तथा इसका चुम्बकीय गुण भी बताइए।
उत्तर:
[Fe(CO)5] में Fe पर dsp³ संकरण होता है तथा यह प्रतिचुम्बकीय होता है।

प्रश्न 11.
[Pt (NH3)4Cl2]2+ के समपक्ष तथा विपक्ष समावयवी बनाइए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 1

प्रश्न 12.
समपक्ष [PtCl2(en)2] के प्रकाशिक समावयवी बनाइए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 2

प्रश्न 13.
Pt(NH3)2Cl2 के ज्यामितीय समावयवी बनाइए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 3

प्रश्न 14.
[Co(en)3]3+ के ध्रुवण समावयवियों की संरचना बनाइए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 4

प्रश्न 15.
जल की कठोरता के निर्धारण के लिए आवश्यक लिगेन्ड का नाम बताइए।
उत्तर:
जल की कठोरता का निर्धारण EDTA ( एथिलीनडाई एमीनटेट्रासीटेट) द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 16.
[Cu (NH3)4]2+ संकुल आयन की अपेक्षा [Cu(CN)4]2- संकुल आयन अधिक स्थायी होता है, क्यों?
उत्तर:
NH3 की अपेक्षा \(\overline{\mathrm{C}}\)N अधिक प्रबल लिगेन्ड होता है अतः [Cu(NH3)4]2+ संकुल की अपेक्षा [Cu (CN)4]2- संकुल अधिक स्थायी होता है।

प्रश्न 17.
युग्मन ऊर्जा क्या होती है?
उत्तर:
किसी कक्षक में दो इलेक्ट्रॉनों के युग्मन के लिए आवश्यक ऊर्जा को युग्मन ऊर्जा कहते हैं।

प्रश्न 18.
I, S2-, H2O, NC\(\overline{\mathrm{S}}\) तथा CO में से प्रबल क्षेत्र लिगन्ड कौनसे हैं ?
उत्तर:
NC\(\overline{\mathrm{S}}\) तथा CO प्रबल क्षेत्र लिगेन्ड हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
(a) विशेष नाम युक्त उदासीन लिगेन्डों के उदाहरण बताइए।
(b) धनात्मक लिगेन्डों का नाम किस प्रकार दिया जाता है ? समझाइए।
उत्तर:
(a) विशेष नाम युक्त उदासीन लिगेन्ड निम्नलिखित हैं-
H2O = एक्वा
CS = थायोकार्बोनिल
NH3 = एम्मीन
NO = नाइट्रोसिल
CO = कार्बोनिल
NS थायोनाइट्रोसिल

(b) धनात्मक लिगेन्डों के नाम के अन्त में अनुलग्न इयम (ium) प्रयुक्त किया जाता है।
उदाहरण- \(\stackrel{+}{N}\)O नाइट्रोसिलियम, NH2 – \(\stackrel{+}{N}\)H, हाइड्रेजिनियम तथा \(\stackrel{+}{N}\)O2 नाइट्रोनियम।

प्रश्न 2.
संकुल यौगिकों में उपस्थित केन्द्रीय धातु परमाणु का ऑक्सीकरण अंक तथा संकुल आयन पर आवेश किस प्रकार ज्ञात किया जाता है?
उत्तर:
(i) संकुल में केन्द्रीय धातु परमाणु पर उपस्थित आवेश को उसका ऑक्सीकरण अंक कहते हैं जब वह लिगन्डों से नहीं जुड़ा हो।

(ii) किसी संकुल स्पीशीज पर उपस्थित आवेश उसके केन्द्रीय धातु परमाणु या आयन तथा उससे जुड़े हुए लिगन्डों के आवेश के योग के बराबर होता है तथा यह प्रति आयनों द्वारा उदासीन होता है।

(iii) किसी उदासीन संकुल में केन्द्रीय धातु परमाणु तथा उससे जुड़े लिगन्डों के आवेश का योग शून्य होता है। कभी-कभी धातु तथा लिगन्ड दोनों ही उदासीन होते हैं, जैसे-[Ni(CO)4]

(iv) उदाहरण –
(a) संकुल K4[Fe(CN)6] में Fe का ऑक्सीकरण अंक ज्ञात करना-
यहाँ K तथा CN पर आवेश ज्ञात है जो कि क्रमशः + 1 तथा – 1 है। अतः
K4[Fe(CN)6]
+ 4 + x – 1 ( 6 ) = 0
+ 4 + x – 6 = 0
x = + 2
अतः इसमें Fe का ऑक्सीकरण अंक, + 2 है।

(b) [Co(NH3)5Cl] Cl2 में Co का ऑक्सीकरण अंक भी इसी प्रकार ज्ञात किया जाता है।
यहाँ NH3 उदासीन है तथा Cl पर आवेश – 1 है अतः
[Co(NH3)5Cl] Cl2
x + 0 – 1 – 2 = 0
x = + 3

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रकार के संकुलों के उदाहरण तथा IUPAC नाम बताइए –
(i) उदासीन संकुल
(ii) ऋणायनिक संकुल
(iii) धनायनिक संकुल
उत्तर:
(i) Fe(CO)5 पेन्टाकार्बोनिल आयरन (O)
(ii) [Co(NO3)6]3- हेक्सानाइट्रेटोकोबाल्टेट (IH) आयन
(iii) [Pt(NH3)4Cl2]2+ टेट्राऐम्मीनडाइक्लोरिडोप्लेटिनम (IV) आयन

प्रश्न 4.
Pt (IV), NH3, Cl तथा Na+ आपस में मिलकर सात प्रकार के संकुल यौगिक बनाते हैं। इनमें से एक संकुल यौगिक निम्नलिखित है-
[Pt(NH3)6]Cl4
(i) अन्य छः संकुल यौगिकों के सूत्र लिखिए।
(ii) इन संकुल यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए।
(iii) इनमें से किस संकुल जलीय विलयन की चालकता सर्वाधिक होगी?
(iv) इनमें से कौनसा संकुल अनआयनिक है?
(v) इन संकुलों में Pt का ऑक्सीकरण अंक व उपसहसयोजन संख्या भी बताइए।
उत्तर:
(i) (a) [Pt (NH3)5Cl]Cl3
(b) [Pt (NH3)4Cl2]Cl2
(c) [Pt(NH3)3Cl3]Cl
(d) [Pt(NH3)2Cl4]
(e) Na[Pt(NH3)Cl5]
(f) Na2[PtCl6]

(ii) (a) पेन्टाऐम्मीन प्लेटिनम (IV) क्लोराइड
(b) टेट्राऐम्मीन डाइक्लोरिडो प्लेटिनम (IV) क्लोराइड
(c) ट्राइऐम्मीन ट्राइक्लोरिडो प्लेटिनम (IV) क्लोराइड
(d) डाइऐम्मीन टेट्राक्लोरिडो प्लेटिनम (IV)
(e) सोडियम ऐम्मीन पेन्टाक्लोरिडो प्लेटिनेट (IV)
(f) सोडियम हेक्साक्लोरिडो प्लेटिनेट (IV)

(iii) संकुल [Pt(NH3)6]Cl4 की चालकता सर्वाधिक होगी क्योंकि यह विलयन में अधिकतम (पाँच आयन) देता है।

(iv) [Pt(NH3)2Cl4] अनआयनिक है।

(v) इन सभी संकुलों में Pt का ऑक्सीकरण अंक + 4 तथा उपसहसंयोजन संख्या 6 है।

प्रश्न 5.
समावयवता को परिभाषित कीजिए तथा इसके प्रकार बताइए।
उत्तर:
समावयवता (Isomerism) – ऐसे दो या दो से अधिक यौगिक जिनके रासायनिक सूत्र (अणु सूत्र ) समान होते हैं परन्तु उनमें परमाणुओं की व्यवस्था भिन्न होती है, उन्हें एक-दूसरे के समावयवी कहते हैं तथा इस गुण को समावयवता कहते हैं। परमाणुओं की भिन्न व्यवस्थाओं के कारण इनके एक या अधिक भौतिक या रासायनिक गुणों में भिन्नता होती है। उपसहसंयोजन यौगिकों में दो प्रमुख प्रकार की समावयवताएँ होती हैं जिनको पुनः कई भागों में वर्गीकृत किया जाता है-
(a) त्रिविम समावयवता-

  • ज्यामितीय समावयवता
  • ध्रुवण समावयवता

(b) संरचनात्मक समावयवता-

  • बंधनी समावयवता
  • उपसहसंयोजन समावयवता या समन्वयी समावयवता
  • आयनन समावयवता
  • विलायकयोजन समावयवता या हाइड्रेट समावयवता
  • लिगन्ड समावयवता
  • बहुलकीकरण समावयवता
  • उपसहसंयोजन स्थिति समावयवता

प्रश्न 6.
आयनन समावयवता की व्याख्या उदाहरण सहित कीजिए।
उत्तर:
आयनन समावयवता – जब किसी संकुल में उपस्थित प्रतिआयन स्वयं एक संभावित लिगेन्ड हो तथा यह किसी लिगेन्ड को प्रतिस्थापित करके दूसरा संकुल बनाता है तो प्राप्त संकुल को आयनन समावयवी तथा इस गुण को आयनन समावयवता कहते हैं।
उदाहरण-
(i) [Co (NH3)5 SO4] Br तथा

(ii) [Co(NH3)5Br]SO4
(i) के आयनन से Br प्राप्त होता है जबकि
(ii) के आयनन से SO2-4 प्राप्त होगा।

प्रश्न 7.
उपसहसंयोजन समावयवता क्या होती है? समझाइए।
उत्तर:
उपसहसंयोजन समावयवता – जब किसी संकुल में उपस्थित भिन्न-भिन्न धातुओं की धनायनिक एवं ऋणायनिक उपसहसंयोजन सत्ता के मध्य लिगेन्डों का अंतरपरिवर्तन (Interchange) होता है तो यह समावयवता उत्पन्न होती है। संकुल [Co (NH3)6] [Cr(CN)6] जिसमें NH3, CO3+ से बंधित हैं तथा CN, Cr3+ से जबकि इसके उपसहसंयोजन समावयवी [Cr(NH3)6] [Co(CN6)] में, NH3, Cr3+ से तथा CN, Co3+ से बंधित है।

प्रश्न 8.
प्रकाशिक या ध्रुवण समावयवता किसे कहते हैं? संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यह समावयवता असममित अणुओं या संकुलों में पाई जाती है जिनमें सममिति नहीं होती। ये संकुल ध्रुवित प्रकाश के तल को घुमा देते हैं, अतः इन्हें प्रकाशिक या ध्रुवण समावयवी कहते हैं। ध्रुवण समावयवी एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब होते हैं तथा इन्हें एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किया जा सकता। इन्हें प्रतिबिम्ब रूप या एनैन्टिओमर (enantiomers) भी कहते हैं।

अणु या आयन जो एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किए जा सकते, उन्हें काइरल (chiral) कहते हैं । काइरल अणु दो प्रकाशिक समावयवियों के रूप में पाया जाता है दक्षिण-ध्रुवण घूर्णक (d) तथा वाम ध्रुवण घूर्णक (l)। ये ध्रुव प्रकाश को अलग-अलग दिशा में घुमाते हैं (d दाईं तरफ तथा / बाईं तरफ)। प्रकाशिक समावयवता सामान्यतः द्विदंतुर लिगेन्ड युक्त. अष्टफलकीय संकुलों में पाई जाती है, जिनका सामान्य सूत्र

  • [M(AA)2X2]
  • M (AA )3]
  • [M (AA ) X2 Y2] तथा
  • [MX2Y2Z2] होता है।

लेकिन जिन संकुलों में ज्यामितीय समावयवता होती है, उनका समपक्ष रूप ही प्रकाशिक समावयवता दर्शाता है क्योंकि विपक्ष रूप तो सममित होता है।

उदाहरण-
(i) [PtCl2(en)2]2+ या [Rh (en)2Cl2]+ या [Co(en)2 Cl2]+
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 21

(ii) [Co(en)3]3+ या [Cr(OX)3]5- [OX = ऑक्सेलेट (C2O2-4)]
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 22

(iii) [Co(en)(NH3)2Cl2]+
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 23

(iv) [Pt(NH3)2(Py)2Cl2]2+
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 24
उपसहसंयोजन संख्या 4 वाले संकुलों में वर्गाकार समतलीय ज्यामिति होने पर प्रकाशिक समावयवता नहीं होती क्योंकि इन संकुलों में सममिति तल पाया जाता है लेकिन असममित द्विदंतुर लिगेन्ड युक्त चतुष्फलकीय संकुलों में प्रकाशिक समावयवता होती है।

उदाहरण – बिस (ग्लाइसिनेटो) निकल (II)
[Ni(NH2-CH2-COO)2] (gly = O-N) या [Ni (Gly)2]
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 25

इसी प्रकार बस (बेन्जॉयल ऐसीटोनेटो) बेरिलियम (II) भी प्रकाशिक समावयवता दर्शाता है।
[Be(C6H5COCHCOCH3)2]
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 26

प्रश्न 9.
[Co(NH3)6]3+ की ज्यामिति तथा चुम्बकीय गुण की व्याख्या VBT की सहायता से कीजिए।
उत्तर:
[Co(NH3)6]3+ संकुल आयन-संकुल आयन [Co(NH3)6]3+ में, कोबाल्ट आयन +3 ऑक्सीकरण अवस्था में है तथा Co3+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 36 है। अतः इसमें संकरण निम्न प्रकार होता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 5
छः अमोनिया अणुओं से प्रत्येक का एक इलेक्ट्रॉन युग्म छः d²sp³ संकरित कक्षकों में स्थान ग्रहण करता है। इस प्रकार संकुल की ज्यामिति अष्टफलकीय है तथा अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति के कारण यह संकुल आयन प्रतिचुंबकीय होता है। यह एक आन्तरिक कक्षक संकुल या निम्न चक्रण संकुल है।

प्रश्न 10.
[CoFo6]3- के अनुचुम्बकीय गुण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
[CoFo6]3- संकुल आयन-इस संकुल में भी कोबाल्ट की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है लेकिन F(WFL) की उपस्थिति में धातु आयन के इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं होता अतः इसमें sp³d² संकरण होता है तथा अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण यह अनुचुम्बकीय होता है तथा इसे बाह्य कक्षक संकुल या उच्च चक्रण संकुल कहते हैं। इसकी ज्यामिति भी अष्टफलकीय होती है। इस संकुल में संकरण को निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 6

प्रश्न 11.
[Fe(CO)5] की ज्यामिति तथा प्रतिचुम्बकीय गुण की व्याख्या VBT की सहायता से कीजिए।
उत्तर:
त्रिकोणीय द्विपिरेमिडी संकुल-उदाहरण [Fe(CO)5] इस संकुल में Fe परमाणु अवस्था में है, जिसका इलेक्ट्रॉंनिक विन्यास 3d64s² होता है। CO(SFL) की उपस्थिति में Fe के 3d तथा 4s कक्षकों के सभी इलेक्ट्रॉन 3d में युग्मित हो जाते हैं तथा एक d कक्षक रिक्त होकर dsp³ संकरण होता है। इसमें सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होने के कारण यह संकुल प्रतिचुम्बकीय होता है तथा इसकी ज्यामिति त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी होती है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 7

प्रश्न 12.
[Cu(NH3)4]2+ की वर्गाकार समतलीय ज्यामिति को समझाइए।
उत्तर:
[Cu(NH3)4]2+ – इस संकुल में भी dsp² संकरण होता है क्योंकि X-किरण विवर्तन से ज्ञात हुआ है कि इसमें लिगेन्ड समतलीय अवस्था में पाए जाते हैं। इसमें एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाए जाने के कारण यह अनुचुम्बकीय होता है तथा इसकी ज्यामिति भी वर्गाकार समतलीय होती है। इसमें संकरण को निम्न प्रकार दर्शाया जाता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 8

बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से सम्भावित महत्त्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित के कारण स्पष्ट कीजिए-
(i) निकल के अल्प स्पिन (Low spin) के अष्टफलकीय कॉम्पलेक्स (संकुल) ज्ञात नहीं हैं।
(ii) केवल संक्रमण तत्वों के लिए ही π-कॉम्पलेक्स जाने जाते हैं।
(iii) बहुत-सी धातुओं के लिए CO लिगेण्ड NH3 की अपेक्षा अधिक प्रबल है।
अथवा
निम्नलिखित संकुलों (कॉम्पलेक्सों) की तुलना, उनकी इकाइयों की आकृतियों, चुम्बकीय व्यवहार और इकाइयों में उपस्थित संकर ऑर्बिटलों के सन्दर्भ में कीजिए-
(i) [Ni(CN)4]2-
(ii) [NiCl4]2-
(iii) [CoF6]3- [परमाणु क्रमांक : Ni = 28; Co = 27]
उत्तर:
(i) निकल (Ni) सामान्यतः +2 अवस्था में संकुल बनाता है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d84s0 होता है जिसमें प्रबल क्षेत्र लिगेन्ड की उपस्थिति में भी इलेक्ट्रॉनों के युग्मन से दो d कक्षक रिक्त नहीं हो सकते अतः इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं होता एवं इसमें sp³d² संकरण होता है अतः यह उच्च चक्रण संकुल ही बनाता है अर्थात् निम्न चक्रण संकुल नहीं बनते।

(ii) केवल संक्रमण तत्व ही π कॉम्पलेक्स बनाते हैं क्योंकि इस प्रकार के संकुल बनाने के लिए आवश्यक लिगेन्ड (जैसे बेन्जीन, साइक्लोपेन्टा डाइइनिल ऋणायन) संक्रमण तत्वों के रिक्त कक्षकों के साथ π बन्ध बना लेते हैं। π संकुलों के उदाहरण निम्नलिखित हैं-
फेरोसीन Fe (η5 – C5H5)2
तथा डाइबेन्जीन क्रोमियम Cr (η56 -C6H6)2
(यहाँ η6 का अर्थ है C6H6 के 6C क्रोमियम से जुड़े हैं।)
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 9

(iii) स्पेक्ट्रमी रासायनिक श्रेणी से ज्ञात होता है कि CO लिगेन्ड, NH3 की अपेक्षा अधिक प्रबल है क्योंकि CO की इलेक्ट्रॉन देने की प्रवृत्ति, NH3 की अपेक्षा अधिक होती है। क्योंकि कार्बन की विद्युतॠणता का मान नाइट्रोजन से कम होता है।
अथवा
उत्तर:

सकुलसंकरणआकृति (ज्यामिति)चुम्बकीय गुण
(i) [Ni(CN)4]2-dsp²वर्गाकार समतलीयप्रतिचुम्बकीय
(ii) [NiCl4]2-sp³चतुष्फलकीयअनुचुम्बकीय
(iii) [CoF6]3-sp³d²अष्टफलकीयअनुचुम्बकीय

(i) [Ni(CN)4]2- – [Pt(CN)4]2- – वर्ग समतलीय आयन [Ni(CN)4]2- में Ni पर dsp² संकरण होता है। इसमें Ni की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है अतः इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d8 है। इसमें संकरण निम्न प्रकार होता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 10
प्रत्येक संकरित कक्षक एक सायनाइड आयन से एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति के कारण यह संकुल प्रतिचुंबकीय होते हैं।

(ii) [NiCl4]2--[NiCl4]2- आयन में Ni पर sp³ संकरण होता है तथा इसकी ज्यामिति चतुष्फलकीय होती है। यहाँ एक s तथा तीन p कक्षकों के संकरण से चार समान sp³ संकर कक्षक बनते हैं। इस संकुल में निकल +2 ऑक्सीकरण अवस्था में है अतः इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d8 है। इसमें संकरण निम्न प्रकार होता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 11
संकरण के पश्चात् भी 3d कक्षकों में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं जिनके कारण यह संकुल आयन अनुचुम्बकीय होता है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

(iii) [CoF6]3- [परमाणु क्रमांक : Ni = 28; Co = 27] संकुल आयन-इस संकुल में भी कोबाल्ट की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है लेकिन F(WFL) की उपस्थिति में धातु आयन के इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं होता अतः इसमें sp³d² संकरण होता है तथा अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण यह अनुचुम्बकीय होता है तथा इसे बाह्य कक्षक संकुल या उच्च चक्रण संकुल कहते हैं। इसकी ज्यामिति भी अष्टफलकीय होती है। इस संकुल में संकरण को निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 12

प्रश्न 2.
उपयुक्त कारण देते हुए निम्नलिखित की व्याख्या कीजिए-
(i) निकल न्यून-चक्रण अष्टफलकीय संकुल नहीं बनाता है।
(ii) π-कॉम्प्लेक्स केवल संक्रमण तत्वों के ही ज्ञात हैं।
उत्तर:
(i) निकल (Ni) सामान्यतः +2 अवस्था में संकुल बनाता है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d84s0 होता है जिसमें प्रबल क्षेत्र लिगेन्ड की उपस्थिति में भी इलेक्ट्रॉनों के युग्मन से दो d कक्षक रिक्त नहीं हो सकते अतः इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं होता एवं इसमें sp³d² संकरण होता है अतः यह उच्च चक्रण संकुल ही बनाता है अर्थात् निम्न चक्रण संकुल नहीं बनते।

(ii) केवल संक्रमण तत्व ही π कॉम्पलेक्स बनाते हैं क्योंकि इस प्रकार के संकुल बनाने के लिए आवश्यक लिगेन्ड (जैसे बेन्जीन, साइक्लोपेन्टा डाइइनिल ऋणायन) संक्रमण तत्वों के रिक्त कक्षकों के साथ π बन्ध बना लेते हैं। π संकुलों के उदाहरण निम्नलिखित हैं-
फेरोसीन Fe (η5 – C5H5)2
तथा डाइबेन्जीन क्रोमियम Cr (η56 -C6H6)2
(यहाँ η6 का अर्थ है C6H6 के 6C क्रोमियम से जुड़े हैं।)
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 9

प्रश्न 3.
उपयुक्त उदाहरण देते हुए निम्नलिखित प्रत्येक पद की व्याख्या कीजिए-
(i) उभयदन्ती लिगेन्ड ( Ambidentate ligand)
(ii) लिगण्ड की दंतिता (Denticity)
(iii) अष्टफलकीय संकुलों में क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन।
उत्तर:
(i) उभयदन्ती या उभयदंतुर लिगन्ड वह लिगेन्ड होता है जो दो भिन्न-भिन्न परमाणुओं द्वारा धातु से जुड़ सकता है लेकिन एक समय में केवल एक दाता परमाणु ही बन्ध बनाता है।
उदाहरण – \(\overline{\mathrm{C}}\)N व \(\overline{\mathrm{N}}\)C

(ii) किसी संकुल में उपस्थित लिगेन्ड के उन परमाणओं की संख्या जो धातु के साथ बन्ध बनाते हैं, उसे लिगेन्ड की दंतिता या दन्तुरता कहते हैं।

(iii) अष्टफलकीय संकुलों में क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन- एक अष्टफलकीय संकुल में धातु परमाणु छः लिगेन्डों द्वारा घिरा होता है। इसमें धातु के d कक्षकों के इलेक्ट्रॉनों तथा लिगेन्डों के इलेक्ट्रॉनों के मध्य प्रतिकर्षण होता है। जब धातु ad कक्षक लिगेन्ड की ओर सीधे निर्दिष्ट (directed) होते हैं तो प्रतिकर्षण अधिक होता है। dx² – y² तथा dz² कक्षक, लिगेन्ड की दिशा वाले अक्षों पर होते हैं, अतः इन पर प्रतिकर्षण अधिक होता है जिससे इनकी ऊर्जा में वृद्धि हो जाती है जबकि dxy, dyz और dxz कक्षक, अक्षों के बीच में स्थित होते हैं, अतः इनकी ऊर्जा गोलीय क्रिस्टल क्षेत्र की औसत ऊर्जा की तुलना में कम हो जाती है।

इस प्रकार अष्टफलकीय संकुल लगन्ड इलेक्ट्रॉन धातु इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण के कारण d कक्षकों की समभ्रंशता समाप्त हो जाती है तथा ये तीन निम्न ऊर्जा वाले, t2g कक्षकों तथा दो उच्च ऊर्जा वाले, eg कक्षकों में विभाजित हो जाते हैं। इस प्रकार समान eg ऊर्जा वाले कक्षकों का, लिगेन्डों की निश्चित ज्यामिति में उपस्थिति से दो भागों में विपाटन क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन कहलाता है तथा इस ऊर्जा अंतर को ∆0 [ यहाँ O = अष्टफलकीय (octahedral)] से दर्शाते हैं । eg कक्षकों की ऊर्जा में (3/5) ∆0 के बराबर वृद्धि होती है तथा t2g कक्षकों की ऊर्जा में (2/5) ∆0 के बराबर कमी होती है। प्रबल क्षेत्र लिगेन्ड की उपस्थिति में ∆0 का मान अधिक होता है जबकि दुर्बल क्षेत्र लिगेन्ड की उपस्थिति में यह मान कम होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 13
∆ को प्रभावित करने वाले कारक – क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन (∆) निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है-

  • धातु की प्रकृति
  • धातु आयन पर आवेश
  • लिगेन्ड की प्रकृति
  • संकुल की ज्यामिति
  • d- इलेक्ट्रॉनों की संख्या

ये कारक संकुल आयन के रंग को भी प्रभावित करते हैं। धातु आयन पर आवेश बढ़ने से तथा प्रबल क्षेत्र लिगेन्डों की उपस्थिति में विपाटन अधिक होता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित उपसहसंयोजन अवस्थाओं ( एन्टीटियों) के नाम और उनके त्रिविम- समावयवियों की संरचनाएँ दीजिए-
(i) [ Co(en)2Cl2]+ (en = एथेन – 1, 2 – डाइऐमीन )
(ii) [Cr(C2O4)3]3-
(iii) [Co(NH3)3Cl3]
(परमाणु क्रमांक Cr = 24, Co = 27)
उत्तर:
(i) [Co(en)2 Cl2]+ का नाम बिस (एथेन – 1,2- डाइऐमीन) डाइक्लोरिडोकोबाल्ट (III) आयन है।
(ii) [Cr(C2O4)3]3- ट्राइऑक्सेलेटो क्रोमेट (III) आयन
(iii) ट्राइऐम्मीनट्राइक्लोरिडो कोबाल्ट (III)

प्रश्न 5.
अणुसूत्र Co (NH3)5SO4 Br वाले दो संकुलों को बोतल A व B में अलग-अलग भरा गया है। इनमें से एक संकुल BaCl2 के साथ श्वेत अवक्षेप जबकि दूसरा सिल्वर नाइट्रेट के साथ हल्का पीला अवक्षेप देता है तो बोतल A व B में उपस्थित संकुलों के सूत्र लिखिए तथा अलग-अलग अभिक्रिया प्रदर्शित करने का कारण समझाइये।
उत्तर:
अणु सूत्र Co ( NH3)5 SO4 Br वाले दो संकुलों में से बोतल A में [Co ( NH3 )5 Br] SO4 तथा बोतल B में [Co(NH3)5SO4]Br संकुल का विलयन है।

संकुल A के आयनन से SO2-2 आयन प्राप्त होगा जो BaCl2 के साथ क्रिया करके BaSO4 का श्वेत अवक्षेप देता है जबकि संकुल B आयनन से प्राप्त Br आयन AgNO3के साथ AgBr का हल्का पीला अवक्षेप देता है। अतः संकुल A तथा B एक-दूसरे के आयनन समावयवी हैं।

प्रश्न 6.
क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन सिद्धान्त के आधार पर चतुष्फलकीय उपसहसंयोजन यौगिकों के बनने में d-कक्षकों के विपाटन को समझाते हुए बताइये कि ये संकुल हमेशा उच्च चक्रण वाले ही क्यों बनते हैं?
उत्तर:
चतुष्फलकीय संकुलों में क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन- चतुष्फलकीय संकुलों में d कक्षकों का विपाटन अष्टफलकीय संकुलों से विपरीत तथा कम होता है। अर्थात् eg कक्षकों की ऊर्जा t2g कक्षकों से कम होती है। समान धातु, समान लिगन्डों तथा धातु तथा लिगेन्ड के बीच की दूरी समान होने पर ∆t = 4 / 9 ∆0, ∆t = चतुष्फलकीय कक्षकों की क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा, अतः कक्षकों की विपाटन ऊर्जा इतनी कम होती है कि इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कक्षकों में नहीं होता अतः चतुष्फलकीय संकुल सामान्यतः उच्च चक्रण युक्त ही होते हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 14

प्रश्न 7.
निम्नलिखित संकुल यौगिकों के आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिए-
(अ) [CoCl2 (en)2 ]Cl
(ब) K3[Fe (CN)6]
उत्तर:
(अ) डाइक्लोरिडोबिस (एथेन-1, 2- डाइऐमीन) कोबाल्ट (III) क्लोराइड
(ब) पोटैशियम हेक्सासायनोफेरेट (III)

प्रश्न 8.
[NiCl4]2- आयन अनुचुम्बकीय है जबकि [Ni(CN)4]2- आयन प्रतिचुम्बकीय है। संयोजकता बंध सिद्धान्त की सहायता से समझाइए।
उत्तर:
वर्ग समतलीय आयन [Ni (CN)4]2- में Ni पर dsp² संकरण पाया जाता है। इसमें Ni की ऑक्सीकरण अवस्था + 2 है अतः इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d8 है। इसमें संकरण निम्न प्रकार होता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 15
प्रत्येक संकरित कक्षक एक सायनाइड आयन से एक इलेक्ट्रॉन युग्म प्राप्त करता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अनुपस्थित होने के कारण यह संकुल प्रतिचुंबकीय है।

[NiCl4]2-आयन में Ni पर sp³ संकरण पाया जाता है तथा इसकी ज्यामिति चतुष्फलकीय होती है।

इसमें एक s तथा तीन कक्षकों के संकरण से चार समान sp³ संकर कक्षक बनते हैं। यहाँ निकल + 2 ऑक्सीकरण अवस्था में है तथा इस आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d8 है अतः इसमें संकरण निम्न प्रकार होता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 16
संकरण के पश्चात् भी 3d कक्षकों में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं जिनके कारण यह संकुल आयन अनुचुंबकीय होता है।

प्रश्न 9.
उभयदंती लिगन्ड का एक उदाहरण लेकर बताइए कि यह क्यों उभयदन्ती लिगेन्ड कहलाता है?
उत्तर:
वह लिगेन्ड जो दो भिन्न परमाणुओं द्वारा धातु आयन के साथ जुड़ सकता है, उसे उभयदंती लिगेन्ड कहते हैं। उदाहरण – NO2, यह नाइट्रोजन (NO2) अथवा ऑक्सीजन (\(\overline{\mathrm{O}}\)NO) द्वारा धातु आयन से जुड़ सकता है।

प्रश्न 10.
संकुल यौगिक K3[ Fe(C2O4)3] में केन्द्रीय धातु परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या तथा उपसहसंयोजन संख्या बताइए।
उत्तर:
संकुल यौगिक K3[Fe (C2O4)3] में केन्द्रीय धातु परमाणु (Fe) की ऑक्सीकरण संख्या + 3 तथा उपसहसंयोजन संख्या 6 है।
ऑक्सीकरण संख्या की गणना निम्न प्रकार की जाती है-
K3[Fe (C2O4)3]
+ 3 + x – 2 ( 3 ) = 0
+ 3 + x – 6 = 0
x = + 3
Fe से तीन द्विदंतुर लिगेन्ड (C2O42-) जुड़े हैं अतः इसकी उपसहसंयोजन संख्या 6 है।

प्रश्न 11.
समपक्ष [CoCl2 (en)2 ] तथा फलकीय [Co(NH3)3(NO2)3] समावयवियों की संरचना दीजिए।
उत्तर:
(i) समपक्ष [CoCl2 (en)2] की संरचना
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 17

(ii) फलकीय [Co(NH3)3(NO2)3] की संरचना
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 18

प्रश्न 12.
संकुल [NiCL]2- के लिए निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(i) IUPAC नाम
(ii) संकरण का प्रकार
(iii) संकुल की ज्यामिति।
उत्तर:
(i) टेट्राक्लोरिडोनिकलेट (II) आयन
(ii) sp³ संकरण
(iii) चतुष्फलकीय ज्यामिति।

प्रश्न 13.
संकुल [Cr (NH3)4 Cl2]Cl का IUPAC नाम लिखिए तथा इसमें किस प्रकार की समावयवता पाई जाती है?
उत्तर:
संकुल [Cr(NH3)4 Cl2] Cl का IUPAC नाम- टेट्राएम्मीन डाइक्लोरिडो क्रोमियम (III ) क्लोराइड है तथा इसमें ज्यामितीय समावयवता पाई जाती है, अर्थात् इसके दो रूप होते हैं – समपक्ष एवं विपक्ष।

प्रश्न 14.
(अ) धातुओं के शुद्धिकरण के क्षेत्र में उपसहसंयोजन यौगिकों का अनुप्रयोग एक उदाहरण के साथ समझाइए
(ब) उपसहसंयोजन यौगिक [Ag (NH3)2] [Ag(CN)2] का IUPAC नाम लिखिए।
उत्तर:
(अ) धातुओं का शुद्धिकरण उनके संकुल बनाकर तथा उसे पुनः अपघटित करके किया जाता है। उदाहरण- अशुद्ध निकल को पहले [Ni(CO)4] में परिवर्तित किया जाता है तथा फिर इसे अपघटित करके शुद्ध निकल प्राप्त कर लिया जाता है।

(ब) [Ag (NH3)2] [Ag (CN)2] का IUPAC नाम डाइएम्मीनसिल्वर (I) डाइसायनो अर्जेन्टेट (I) है।

प्रश्न 15.
द्विक लवण तथा संकुल में अन्तर समझाते हुए प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
द्विक लवण तथा संकुल दोनों ही दो या दो से अधिक स्थायी यौगिकों के रससमीकरणमितीय अनुपात में मिलाने से बनते हैं। फिर भी दोनों में निम्नलिखित अन्तर पाए जाते हैं-
(i) द्विक लवण, जल में पूर्ण रूप से साधारण आयनों में वियोजित हो जाते हैं जबकि संकुल, जल में वियोजित होकर संकुल आयन तथा प्रति आयन देते हैं।

(ii) द्विक लवण का विलयन सभी आयनों का परीक्षण देता है जबकि संकुल का विलयन संकुल आयन तथा प्रतिआयन का ही परीक्षण देता है।

(iii) द्विक लवण में आयनिक बन्ध पाया जाता है जबकि संकुल में उपसहसंयोजी बन्ध भी पाया जाता है। मोहर लवण (FeSO4 . (NH4)2SO4 . 6H2O) ( फेरस अमोनियम सल्फेट) द्विक लवण का उदाहरण है जबकि पोटैशियम फेरो सायनाइड K4[Fe(CN)6] संकुल का उदाहरण है।

प्रश्न 16.
[Cr (H2O) Br2]Cl के आयनन समावयवी का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
[Cr(H2O)4 Br2] Cl का आयनन समावयवी [Cr(H2O)4BrCl] Br होता है।

प्रश्न 17.
मर्क्युरी टेट्राथायोसायनेटो – कोबाल्टेट (III) उपसहसंयोजक यौगिक का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
Hg [Co(SCN)4]

प्रश्न 18.
संयोजकता बंध सिद्धान्त के आधार पर समझाइए कि [Ni(CN)4]2- एक निम्न प्रचक्रण संकुल आयन है।
उत्तर:
वर्ग समतलीय आयन [Ni(CN)4]2- में Ni पर dsp² संकरण पाया जाता है। इसमें Ni की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है। अतः इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d8 है। इसमें संकरण निम्न प्रकार होगा-
Ni2+ आयन के कक्षक
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 19
\(\overline{\mathrm{C}}\)N (प्रबल क्षेत्र लिगन्ड) की उपस्थिति में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन हो जाता है।
Ni2+ के dsp² संकरित कक्षक
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक 20
प्रत्येक संकरित कक्षक एक \(\overline{\mathrm{C}}\)N से एक इलेक्ट्रॉन युग्म प्राप्त करता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति के कारण यह एक निम्न प्रचक्रण संकुल आयन है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 9 उपसहसंयोजन यौगिक

प्रश्न 19.
[Co(NH3)5ONO]Cl2 किस प्रकार की समावयवता प्रदर्शित करता है?
(ii) क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त के आधार पर यदि ∆0 < P है, तो d+ आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
(iii) [Fe(CN)′′]’ में संकरण अवस्था और इसका आकार लिखिए।
(Fe का परमाणु क्रमांक = 26)
उत्तर:
(i) [Co(NH3)5ONO]Cl2 बन्धनी तथा आयनन समावयवता दर्शाता है क्योंकि इसमें ONO में दाता परमाणु O है जबकि NO2 में दाता परमाणु N है। इसके साथ ही ŌNO व \(\overline{\mathrm{C}}\)l के विनिमय से आयनन समावयवता होती है।

(ii) जब ∆0 < P, तो क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त के अनुसार + आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास t2g³eg1 होगा।

(iii) [Fe(CN)6]3- में d²sp³ संकरण होता है क्योंकि इसमें \(\overline{\mathrm{C}}\)l प्रबल श्क्षेत्र लिगेन्ड है जिसकी उपस्थिति में Fe+3 आयन में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन हो जाता है और इस आयन का आकार अष्टफलकीय है।

प्रश्न 20.
(i) निम्नलिखित कॉम्प्लेक्स का आई.यू.पी.ए.सी. नाम लिखिए-
[Pt(NH3)(H2O)Cl2]
(ii) निम्नलिखित कॉम्प्लेक्स का सूत्र लिखिए- ट्रिस (एथेन – 1, 2 – डाइऐमीन) क्रोमियम (III ) क्लोराइड
उत्तर:
(i) इस कॉम्प्लेक्स (संकुल) का आई. यू. पी. ए. सी. नाम ऐम्मीन एक्वा डाइक्लोरिडो प्लेटिनम (II) है।
(ii) इस कॉम्प्लेक्स का सूत्र [Cr(en)3]Cl3 है।

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HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

बहुविकल्पीय प्रश्न:

1. PH3 (फॉस्फीन) में फॉस्फोरस परमाणु पर संकरण है-
(अ) sp
(ब) sp2
(स) sp3d
(द) sp3
उत्तर:
(द) sp3

2. ns2np5 बाह्यतम सामान्य विन्यास वाला तत्व है-
(अ) नाइट्रोजन वर्ग का
(ब) ऑक्सीजन वर्ग का
(स) हैलोजन वर्ग का
(द) अक्रिय गैस वर्ग का
उत्तर:
(स) हैलोजन वर्ग का

3. अंतराहैलोजन यौगिक है-
(अ) PCl5
(ब) SF6
(स) ICl
(द) XeF2
उत्तर:
(स) ICl

4. हैलोजनों की क्रियाशीलता का सही क्रम है-
(अ) F2 > Br2 > Cl2 > I2
(ब) F2 > Cl2 > Br2 > I2
(स) I2 > Br2 > Cl2 > F2
(द) F2 = Cl2 > Br2 = I2
उत्तर:
(ब) F2 > Cl2 > Br2 > I2

5. OF2 में ऑक्सीज़न की ऑक्सीकरण अवस्था है-
(अ) -2
(ब) +1
(स) +2
(द) -1
उत्तर:
(स) +2

6. अभिक्रिया 2SO2 + O2 → 2SO3 + x k.cal में अधिक मात्रा में उत्पाद बनाने के लिए अनुकूल शर्तें हैं-
(अ) कम ताप एवं कम दाब
(ब) कम दाब एवं अधिक ताप
(स) कम ताप एवं अधिक दाब
(द) अधिक ताप, अधिक दाब तथा O2 की कम मात्रा
उत्तर:
(स) कम ताप एवं अधिक दाब

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

7. वर्ग 16 के तत्व कहलाते हैं-
(अ) हैलोजन
(ब) कैल्कोजन
(स) संक्रमण तत्व
(द) उत्कृष्ट गैसें
उत्तर:
(ब) कैल्कोजन

8. सल्फर की अधिकतम सहसंयोजकता कितनी हो सकती है?
(अ) 2
(ब) 4
(स) 6
(द) 8
उत्तर:
(स) 6

9. निम्नलिखित में से कौनसा तत्व +3 ऑक्सीकरण अवस्था में अधिक स्थायी यौगिक बनाता है?
(अ) P
(ब) As
(स) Sb
(द) Bi
उत्तर:
(द) Bi

10. निम्नलिखित में से कौनसा यौगिक चिली साल्ट पीटर या चिली शोरा कहलाता है?
(अ) NaNO3
(ब) KNO3
(स) Na2SO4
(द) K2SO4
उत्तर:
(अ) NaNO3

11. निम्नलिखित में से किस तत्व में अक्रिय युग्म प्रभाव सबसे अधिक प्रभावी होता है?
(अ) N
(ब) P
(स) As
(द) Bi
उत्तर:
(द) Bi

12. निम्नलिखित में से नाइट्रोजन का कौनसा हाइड्राइड अम्लीय है?
(अ) NH3
(ब) N3H
(स) N2H4
(द) N2H2
उत्तर:
(ब) N3H

13. निम्नलिखित में से किसका क्वथनांक न्यूनतम होता है?
(अ) H2O
(ब) H2S
(स) H2Se
(द) H2Te
उत्तर:
(ब) H2S

14. H2SO4 के लिए निम्नलिखित में से कौनसा कथन असत्य है?
(अ) यह एक ऑक्सीकारक है।
(ब) यह निर्जलीकारक है।
(स) यह द्विक्षारकीय अम्ल है।
(द) यह दुर्बल अम्ल है।
उत्तर:
(द) यह दुर्बल अम्ल है।

15. विरंजक के रूप में प्रयुक्त होने वाला हैलोजन है-
(अ) F2
(ब) Cl2
(स) Br2
(द) I2
उत्तर:
(ब) Cl2

16. प्रबलतम अम्ल है-
(अ) HF
(ब) HCl
(स) HBr
(द) HI
उत्तर:
(द) HI

17. HClO है, एक-
(अ) ऑक्साइड
(ब) ऑक्सी अम्ल
(स) क्लोराइड
(द) हाइड्राइड
उत्तर:
(ब) ऑक्सी अम्ल

18. कौनसा तत्व केवल -1 ऑक्सीकरण अवस्था ही दर्शाता है?
(अ) F
(ब) Cl
(स) Br
(द) I
उत्तर:
(अ) F

19. किस तत्व की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिकतम ऋणात्मक होती है?
(अ) F
(ब) Cl
(स) Br
(द) I
उत्तर:
(ब) Cl

20. निम्नलिखित में से कौनसा ऑक्साइड सर्वाधिक अम्लीय है?
(अ) N2O5
(ब) P2O5
(स) As2O5
(द) Sb2O5
उत्तर:
(अ) N2O5

21. XeF2 में Xe पर कितने एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित हैं?
(अ) 2
(ब) 3
(स) 1
(द) 4
उत्तर:
(ब) 3

22. निम्नलिखित में से कौनसा यौगिक नहीं बनता?
(अ) XeF5
(ब) XeF
(स) XeF3
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

23. निम्नलिखित में से कौनसा तत्व +1 से +5 सभी ऑक्सीकरण अवस्थाओं में ऑक्साइड बनाता है?
(अ) P
(ब) Sb
(स) N
(द) As
उत्तर:
(स) N

24. XeF3 की जल से क्रिया द्वारा कौनसा यौगिक बनाया जा सकता है?
(अ) XeO3
(ब) XeOF4
(स) XeO2F2
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

25. BrF3 की आकृति है-
(अ) त्रिकोणीय समतल
(ब) बेन्ट- T आकृति
(स) पिरैमिडी
(द) वर्गाकार समतलीय
उत्तर:
(ब) बेन्ट- T आकृति

26. निम्नलिखित में से किसकी आकृति रेखीय है?
(अ) SO2
(ब) O3
(स) \(\mathrm{NO}_2^{-}\)
(द) \(\stackrel{+}{\mathrm{N}} \mathrm{O}_2\)
उत्तर:
(द) \(\stackrel{+}{\mathrm{N}} \mathrm{O}_2\)

27. निम्नलिखित में से कौनसा क्रम (उनके साथ दिए गए गुणों के आधार पर) सही नहीं है?
(अ) ऑक्सीकारक गुण F2 > Cl2 > Br2 > I2
(ब) विद्युतत्रणता F > Cl > Br > I
(स) अम्लीय गुण HI > HBr > HCl > HF
(द) बन्ध वियोजन एन्थैल्पी F2 > Cl2 > Br2 > I2
उत्तर:
(द) बन्ध वियोजन एन्थैल्पी F2 > Cl2 > Br2 > I2

28. निम्नलिखित में से किसमें सभी बन्ध समान नहीं हैं?
(अ) XeF4
(ब) SF4
(स) \(\mathrm{BF}_4^{-}\)
(द) SiF4
उत्तर:
(ब) SF4

29. वह यौगिक कौनसा है जो गैस अवस्था में आण्विक प्रकृति रखता है लेकिन ठोस अवस्था में उसमें आयनिक गुण आ जाता है?
(अ) PCl3
(ब) NCl3
(स) POCl3
(द) PCl5
उत्तर:
(द) PCl5

30. H2SO5 में सल्फर की ऑक्सीजन अवस्था है-
(अ) +8
(ब) +4
(स) +6
(द) -2
उत्तर:
(स) +6

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

31. कौनसा अम्ल अधिकतम वाष्पशील है?
(अ) HF
(ब) HCl
(स) HBr
(द) HI
उत्तर:
(ब) HCl

32. निम्नलिखित में से किसमें P-O-P बन्ध पाया जाता है?
(अ) H3PO3
(ब) H4P2O6
(स) H4P2O7
(द) H3PO4
उत्तर:
(स) H4P2O7

33. \(\mathrm{NO}_3^{-}\) के परीक्षण में भूरी वलय निम्नलिखित में से किसके बनने के कारण बनता है?
(अ) [Fe(H2O)5.NO]SO4
(ब) [Fe(SO4)2.NO]H2O
(स) Fe2(SO4)3. NO
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) [Fe(H2O)5.NO]SO4

34. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?
(अ) आवर्त सारणी के वर्ग 15 में हाइड्राइडों का स्थायित्व NH3 से BiH3 तक बढ़ता है।
(ब) नाइट्रोजन dπ-pπ बन्ध नहीं बना सकता।
(स) N-N एकल बन्ध P-P एकल बन्ध की अपेक्षा दुर्बल होता है।
(द) N2O4 की दो अनुनादी संरचनाएँ होती हैं।
उत्तर:
(अ) आवर्त सारणी के वर्ग 15 में हाइड्राइडों का स्थायित्व NH3 से BiH3 तक बढ़ता है।

35. निम्नलिखित में से कौन-सा यौगिक O3 द्वारा ऑक्सीकृत नहीं होता है?
(अ) KI
(ब) FeSO4
(स) K2MnO4
(द) KMnO4
उत्तर:
(द) KMnO4

36. XeF2, XeF4 तथा XeF6 में Xe के एकल इलेक्ट्रॉन युग्मों की संख्या है-
(अ) 3,2,1
(ब) 2,4,6
(स) 1,2,3
(द) 6,4,2
उत्तर:
(अ) 3,2,1

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1.
वर्ग 15 के तत्वों की सामान्य ऑक्सीकरण अवस्थाएँ बताइए।
उत्तर:
वर्ग 15 के तत्वों की सामान्य ऑक्सीकरण अवस्थाएँ – 3,+ 3 तथा +5 होती हैं।

प्रश्न 2.
नाइट्रोलियम का सूत्र बताइए।
उत्तर:
नाइट्रोलियम का सूत्र Ca CN2 होता है।

प्रश्न 3.
वर्ग 15 के तत्वों के हाइड्राइडों में बन्ध कोण का बढ़ता क्रम लिखिए।
उत्तर:
BiH3 < SbH3 < AsH3 < PH3 < NH3

प्रश्न 4.
नाइट्रोजन के उदासीन ऑक्साइड कौनसे होते हैं?
उत्तर:
N2O तथा NO

प्रश्न 5.
वर्ग 15 के तत्वों में कौनसा तत्व मुक्त अवस्था में अधिक मात्रा में पाया जाता है?
उत्तर:
नाइट्रोजन।

प्रश्न 6.
नाइट्रोजन का वह यौगिक कौनसा है जो ऑक्सीकारक, अपचायक दोनों की भाँति व्यवहार करता है?
उत्तर:
नाइट्रस अम्ल (HNO2)।

प्रश्न 7.
किसी एक समीकरण द्वारा नाइट्रिक अम्ल के ऑक्सीकारण गुण को बताइए।
उत्तर:
2HNO3 + 3SO2 + 2H2O → 3H2SO4 + 2NO

प्रश्न 8.
H3PO3 में π बन्ध की प्रकृति HNO3 के π बन्ध से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
H3PO3 में π बन्ध p-p समपाश्रिक अतिव्यापन से बनता है जबकि H3PO3 में d कक्षकों के प्रयोग से pπ-dπ अतिव्यापन होता है।

प्रश्न 9.
सान्द्र HNO3 को ऐलुमिनियम तथा क्रोमियम के पात्र में रखा जा सकता है, क्यों?
उत्तर:
ऐलुमिनियम तथा क्रोमियम धातुएँ सान्द्र HNO3 में विलेय नहीं होतीं क्योंकि इनकी सतह पर ऑक्साइड की एक निष्क्रिय परत बन जाती है अतः सान्द्र HNO3 को ऐलुमिनियम तथा क्रोमियम के पात्र में रखा जा सकता है।

प्रश्न 10.
सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में सान्द्र HNO3 रंगहीन न होकर पीला होता है, क्यों?
उत्तर:
सूर्य के प्रकाश में HNO3 का आंशिक विघटन हो जाता है जिससे NO2 गैस बनती है जिसके कारण HNO3 पीलुा होता है।

प्रश्न 11.
वह यौगिक कौनसा है जिससे लाल तथा श्वेत फॉस्फोरस के मिश्रण को पृथक् किया जा सकता है तथा क्यों?
उत्तर:
NaOH, लाल फॉस्फोरस से क्रिया नहीं करता जबकि श्वेत फॉस्फोरस, NaOH से क्रिया करके विलेय NaH2PO2 बनाता है अत: NaOH द्वारा लाल तथा श्वेत फॉस्फोरस के मिश्रण को पृथक् किया जा सकता है।

प्रश्न 12.
नाइट्रोजन के विभिन्न ऑक्सो अम्लों के नाम तथा सूत्र बताइए।
उत्तर:

  • हाइपोनाइट्रस अम्ल (H2N2O2)
  • नाइट्रस अम्ल (HNO2)
  • नाइट्रिक अम्ल (HNO3)

प्रश्न 13.
फॉस्फोरस का कौनसा अपररूप विद्युत का चालक होता है?
उत्तर:
काला फॉस्फोरस।

प्रश्न 14.
ऐसे यौगिक बताइए जिनमें ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्था क्रमशः +2, -1 तथा –\(\frac { 1 }{ 2 }\) हो।
उत्तर:
OF2 (+ 2), H2O2(- 1) तथा KO2 (-\(\frac { 1 }{ 2 }\))

प्रश्न 15.
सल्फर का एक यौगिक बताइए जिसे रसायनों का राजा कहा जाता है।
उत्तर:
सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) |

प्रश्न 16.
H2S2O7 (पायरो सल्फ्यूरिक अम्ल) की संरचना लिखिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 1

प्रश्न 17.
SO2 के अपचायक गुण को दर्शाने वाला एक समीकरण दीजिए।
उत्तर:
2Fe3+ + SO2 + 2H2O → 2Fe2+ + \(\mathrm{SO}_4^{2-}\) + \(4 \stackrel{+}{\mathrm{H}}\)

प्रश्न 18.
सल्फर के कौनसे दो ऑक्सो अम्लों में परऑक्साइड (-O-O-) बन्ध पाया जाता है?
उत्तर:
H2SO5 तथा H2S2O8
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 2

प्रश्न 19.
H2SO5 तथा H2S2O8 में सल्फर की ऑक्सीकरण अवस्था बताइए।
उत्तर:
इनमें पराक्साइड बन्ध होने के कारण सल्फर की ऑक्सीकरण अवस्था +6 होती है।

प्रश्न 20.
H2SO5 तथा H2S2O8 के विशिष्ट नाम बताइए।
उत्तर:
H2SO5 को कैरो अम्ल तथा H2S2O8 को मार्शल अम्ल कहा जाता है।

प्रश्न 21.
वर्ग 16 का वह हाइड्राइड कौनसा होता है जो रंगहीन, गंधहीन द्रव है तथा जीवन के लिए अतिआवश्यक होता है।
उत्तर:
जल (H2O)।

प्रश्न 22.
सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की श्यानता तथा क्वथनांक अधिक होते हैं, क्यों?
उत्तर:
H2SO4 के अधिक अणुभार तथा इसके अणुओं के मध्य पाए जाने वाले प्रबल अन्तराअणुक हाइड्रोजन बन्ध के कारण इसकी श्यानता तथा क्वथनांक अधिक होते हैं।

प्रश्न 23. निम्नलिखित ऑक्साइडों की प्रकृति बताइए-
(i) Al2O3
(ii) K2O
(iii) CO
(iv) P2O5
उत्तर:
(i) Al2O3 उभयधर्मी
(ii) K2O क्षारीय
(iii) CO उदासीन
(iv) P2O5 अम्लीय

प्रश्न 24.
गंधक का वह यौगिक कौनसा है जो ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों की तरह व्यवहार करता है?
उत्तर:
सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) |

प्रश्न 25.
निम्नलिखित यौगिकों के विशिष्ट नाम बताइए-
(i) H2SO4
(ii) FeS2
(iii) FeSO2. 7H2O
उत्तर:
(i) कसीस का तेल (ऑयल ऑफ विट्रियॉल )
(ii) मूर्खों का सोना (फूल्स गोल्ड)
(iii) हरा कसीस।

प्रश्न 26.
SO2 के प्रतिक्लोर गुण को दर्शाने वाला समीकरण लिखिए।
उत्तर:
Cl2 + SO2 + 2H2O → 2HCl + H2SO4

प्रश्न 27.
SF6, SeF6 तथा TeF6 की क्रियाशीलता का क्रम बताइए।
उत्तर:
SF6, < SeF6 < TeF6

प्रश्न 28.
वर्ग 16 के तत्वों की आयनन एन्थैल्पी का मान वर्ग 15 के संगत तत्वों की आयनन एन्थैल्पी से कम होता है, इसका क्या कारण है?
उत्तर:
वर्ग 15 के तत्वों का अर्धपूरित स्थायी विन्यास (ns2np3) होता है अतः उनमें से इलेक्ट्रॉन निकालना अधिक मुश्किल होता है।

प्रश्न 29.
HF, HCl, HBr तथा HI के क्वथनांक का बढ़ता क्रम लिखिए।
उत्तर:
HCl < HBr < HI < HF

प्रश्न 30.
क्लोरीन की गर्म तथा सान्द्र NaOH के साथ अभिक्रिया का समीकरण लिखिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 3

प्रश्न 31.
CIF5 में क्लोरीन पर संकरण बताइए।
उत्तर:
sp3d2

प्रश्न 32.
F2, Cl2, Br2 तथा I2 की बन्ध वियोजन एन्थैल्पी का घटता क्रम बताइए।
उत्तर:
CI-CI > Br-Br > F-F > I-I

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 33.
फ्लुओरीन के अन्तराहैलोजन यौगिकों की संख्या सबसे अधिक होती है, क्यों?
उत्तर:
फ्लुओरीन के छोटे आकार, उच्च विद्युतत्तणता तथा प्रबल ऑक्सीकारक गुण के कारण इसके अन्तराहैलोजन यौगिकों की संख्या सबसे अधिक होती, है।

प्रश्न 34.
अश्रु गैस के रूप में प्रयुक्त होने वाले एक यौगिक का नाम बताइए जिसमें हैलोजन होता है।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 4

प्रश्न 35.
क्लोरीन का विरंजक गुण इसके किस गुण के कारण होता है?
उत्तर:
ऑक्सीकारक गुण।

प्रश्न 36.
हैलोजनों के ऑक्सीकारक गुण का क्रम बताइए।
उत्तर:
F2 > Cl2 > Br2 > I2

प्रश्न 37.
वह हैलोजन कौनसा होता है जिसमें ऊध्र्वपातन का गुण पाया जाता है?
उत्तर:
आयोडीन (I2) ।

प्रश्न 38.
फ्लुओरीन केवल -1 ऑक्सीकरण अवस्था ही दर्शाती है। इसका कारण बताइए।
उत्तर:
अधिक विद्युतत्रणता तथा d कक्षकों की अनुपस्थिति।

प्रश्न 39.
\(\mathrm{ClO}_4^{-}\) में Cl पर कौनसा संकरण होता है?
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 5

प्रश्न 40.
जीनॉन, केवल फ्लुओरीन तथा ऑक्सीजन के साथ ही यौगिक बनाती है, क्यों?
उत्तर:
फ्लुओरोन तथा ऑक्सीजन की विद्युत्तरणता अधिक होने के कारण इनमें ऑक्सीकारक गुण पाया जाता है, अतः जीनॉन इनके साथ ही यौगिक बनाती है।

प्रश्न 41.
न्यूनतम क्वथनांक वाली उत्कृष्ट गैस कौनसी होती है?
उत्तर:
हीलियम (He)।

प्रश्न 42.
He को p-ब्लॉक में रखा गया है जबकि इसमें इलेक्ट्रॉन p-कक्षक में नहीं भरे जाते, क्यों?
उत्तर:
He के गुणों के आधार पर इसे अन्य उत्कृष्ट गैसों के साथ p-ब्लॉक में रखा गया है।

प्रश्न 43.
आवर्त सारणी में He की आयनन एन्थैल्पी अधिकतम होती है। क्यों?
उत्तर:
He के छोटे आकार तथा पूर्ण पूरित विन्यास के कारण इसकी इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति नगण्य होती है अतः इसकी आयनन एन्थैल्पी अधिकतम होती है।

प्रश्न 44.
जीनॉन के फ्लुओराइडों के स्थायित्व का क्रम लिखिए।
उत्तर:
XeF2 > XeF4 > XeF6

प्रश्न 45.
XeO3 की संरचना बताइए।
उत्तर:
XeO3 में sp3 संकरण होता है तथा इसकी ज्यामिति पिंरैमिडी होती है।

प्रश्न 46.
H2SO4 में S की संकरण अवस्था बताइए।
उत्तर:
sp3 संकरण।

प्रश्न 47.
निम्नलिखित में से कौनसे यौगिक ज्ञात नहीं हैं?
BiCl5, PCl3, SbCl3, NCl5, PCl5
उत्तर:
NCl5 तथा BiCl5

लघूत्तरात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1.
अमोनिया की FeCl3 तथा ZnSO4 के साथ अभिक्रियाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
रासायनिक गुण:
(i) अम्लों से क्रिया-अमोनिया की अम्लों से क्रिया कराने पर अमोनियम लवण बनते हैं। इससे इसकी दुर्बल क्षारीय प्रकृति की पुष्टि होती है।
NH3 + HCl → NH4Cl (अमोनियम क्लोराइड)
2NH3 + H2SO4 → (NH4)2SO4 (अमोनियम सल्फेट)

प्रश्न 2.
Cu2+ तथा Ag+ आयनों की NH3 द्वारा पहचान की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
Cu2+ तथा Ag+ आयन, NH3 के साथ उपसहसंयोजी बन्ध बनाकर संकुल बना लेते हैं जिनमें NH3 धातु आयन को एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करता है (लुइस क्षार)। इन संकुल यौगिकों से ही आयनों की पहचान की जाती है। जैसे Cu+2, NH3 के साथ गहरा नीला संकुल बनाता है जबकि NH3 विलयन में AgCl का अवक्षेप विलेय हो जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 6

प्रश्न 3.
नाइट्रोजन के विभिन्न ऑक्साइडों को कैसे बनाया जाता है? केवल अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 7

प्रश्न 4.
नाइट्रोजन के विभिन्न ऑक्साइडों की उ्यामिति बताइए।
उत्तर:
नाइट्रोजन के विभिन्न औक्साइड N2O, NO, N2O3, NO2, N2O4 तथा N2O5 होते हैं। N2O, N2O3, NO2, N2O4 तथा N2O5 की ज्यामिति क्रमशः रेखीय, समतलीय, कोणीय तथा समतलीय होती हैं।

प्रश्न 5.
अमोनिया से नमी को दूर करने के लिए निर्जल CaCl2 या P4O10 या सान्द्र H2SO4 प्रयुक्त नहीं किए जाते। क्यों?
उत्तर:
NH3 क्षारीय होती है अतः अम्लीय प्रकृति के निर्जलीकारक (जैसे P4O10 या सान्द्र H2SO4) इसमें से नमी को दूर करने के लिए प्रयुक्त नहीं किए जा सकते क्योंकि ये NH3 से क्रिया करके लवण बना लेते हैं तथा CaCl2, NH3 के साथ क्रिया करके योगोत्पाद बनाता है।

प्रश्न 6.
वर्ग 15 क एक तत्व का हाइड्राइड (Y) का जलीय विलयन (i) लाल लिटमस को नीला करता है। (ii) CuSO4 विलयन के साथ आधिक्य में प्रयुक्त करने पर गहरा नीला विलयन देता है तथा (iii) FeCl3 विलयन के साथ भूरा अवक्षेप देता है तो यौगिक Y तथा अभिक्रिया (ii) एवं (iii) के उत्पाद बताइए।
उत्तर:
(i) यौगिक Y, NH3 है जिसका जलीय विलयन (NH4 OH) क्षारीय होता है अंतः यह लाल लिटमस को नीला करता है। अभिक्रिया (ii) में प्राप्त उत्पाद [Cu(NH3 )4 ]SO4 तथा अभिक्रिया (iii) का उत्पाद Fe(OH)3 होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 8

प्रश्न 7.
श्वेत फॉस्फोरस की निम्नलिखित के साथ क्रियाओं के समीकरण दीजिए-
(i) वायु
(ii) HNO3
(iii) H2SO4
(iv) NaOH
(v) Ca
उत्तर:
(i) P4 + 5O2 → P4O10 (फॉस्फोरस पेन्य ऑक्साइड)
(ii) P4 + 2oHNO3 → 4H3PO4 + 2oNO2 + 4H2O
(iii) P4 + 10H2SO4 → 4H3PO4 + 10SO2 + 4H2O
(iv) P4 + 3NaOH + 3H2O → PH3 + 3NaH2PO2 (सोडियम हाइपोफॉस्फाइट)
(v) P4 + 6Ca → 2Ca3P2 (कैल्सियम फॉस्फाइड)

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 8.
फॉस्फीन की निम्नलिखित के साथ अभिक्रिया बताइए-
(i) ऑक्सीजन
(ii) सान्द्र HNO3
(iii) कॉपर सल्फेट तथा मरक्यूरिक क्लोराइड।
उत्तर:
(i) ऑक्सीजन से क्रिया- PH3 की वायु के साथ क्रिया होने पर P2O5 बनता है।
2PH3 + 4O2 → P2O5 + 3H2O

(ii) सान्द्र HNO3 द्वारा PH3 का ऑक्सीकरण हो जाता है तथा P2O5 बनता है।
2PH3 + 16HNO3 → P2O5 + 16NO2 + 11H2O

(iii) कॉपर सल्फेट तथा मरक्यूरिक क्लोराइड, फॉस्फीन के साथ क्रिया करके संगत फॉस्फाइड बनाते हैं।
3CuSO4 + 2PH3 → Cu3P2 + 3H2SO4
3HgCl2 + 2PH3 → Hg3P2 + 6HCl

प्रश्न 9.
PCl3 तथा PCl5 की निम्नलिखित के साथ अभिक्रियाओं की तुलना कीजिए-
(i) C3H3OH
(ii) CH3COOH
उत्तर:
(i) C2H5OH के साथ PCl3 तथा PCl5 दोनों की क्रिया से ही मुख्य उत्पाद C5H5Cl बनता है लेकिन इसके साथ ही PCl3 द्वारा H3PO3 तथा PCl5 द्वारा POCl3 एवं HCl बनते हैं।
3C2H5OH + PCl3 → 2C2H5Cl + H3PO3
C2H5OH + PCl5 → C2H5Cl + HCl + POCl3

(ii) CH3COOH की PCl3 तथा PCl5 के साथ क्रिया द्वारा CH3COCl बनता है तथा सहउत्पाद C2H5OH के साथ क्रिया के समान ही होते हैं।

3CH3COOH + PCl3 → 3CH3COCl + H3PO3
CH3COOH + PCl5 → CH3COCl + POCl3 + HCl

प्रश्न 10.
फॉस्फोरस के विभिन्न ऑक्सो अम्लों को बनाने के . लिए आवश्यक यौगिक बताइए।
उत्तर:
फॉस्फोरस के विभिन्न ऑक्सो अम्लों को बनाने के लिए आवश्यक यौगिक निम्नलिखित हैं-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 9

प्रश्न 11.
(a) ठोस अवस्था में PCl5 किस रूप में पाया जाता है?
(b) H3PO2, H3PO3 तथा H3PO4 तीनों में ही हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या समान है फिर भी इनकी क्षारकता क्रमश: 1 , 2 तथा 3 है। क्यों?
उत्तर:
(a) ठोस अवस्था में PCl5 एक आयनिक ठोस [PCl4]+[PCl6] के रूप में पाया जाता है, जिसमें धनायन [PCl4+] चतुष्फलकीय होता है तथा ऋणायन [PCl6] अष्टफलकीय होता है जिनमें क्रमशः sp3 तथा sp3d2 संकरण होता है।

(b) फॉस्फोरस के ऑक्सो अम्लों में केवल वे ही हाइड्रोजन आयनित होकर H+ देते हैं जो ऑक्सीजन से जुड़े होते हैं अतः H3PO2, H3PO3 तथा H3PO4 की क्षारकता क्रमशः 1, 2 तथा 3 है क्योंकि इनमें क्रमशः एक, दो तथा तीन -OH बन्ध पाए जाते हैं।

प्रश्न 12.
SO2 के अम्लीय गुण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अम्लीय गुण:
SO2 गैस जल में विलेय होकर H2SO3 (सल्फ्यूरस अम्ल) बनाती है अतः इसे सल्फ्यूरस एन्हाइड्राइड भी कहते हैं। यह विलयन नीले लिटमस को लाल कर देता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 10
यह सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन के साथ अभिक्रिया कर सोडियम सल्फाइट बनाती है जो कि सल्फरडाइऑक्साइड के आधिक्य के साथ अभिक्रिया कर सोडियम हाइड्रोजन सल्फाइट में परिवर्तित हो जाता है।
2NaOH + SO2 → Na2SO2 + H2O
Na2 SO3 + H2O + SO2 → 2NaHSO3

प्रश्न 13.
सल्फर डाइऑक्साइड के अपचायक गुण का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अपचायक गुण-नमी की उपस्थिति में SO2 अपचायक की भाँति व्यवहार करती है।
उदाहरण-(a) यह अम्लीय पोटेशियम परमैंगनेट विलयन (गुलाबी) को रंगहीन कर देती है। इस अभिक्रिया से SO2 गैस का परीक्षण किया जा सकता है।
5SO2 + \(\begin{gathered} 2 \mathrm{MnO}_4^{-} \\ +7 \end{gathered}\) + 2H2O → 2Mn2+ + \(5 \mathrm{SO}_4^{2-}\) + 4H+

(b) यह अम्लीय पोटैशियम डाइक्रोमेट विलयन (नारंगी) को हरा कर देती है।
\(\mathrm{Cr}_2 \mathrm{O}_7^{2-}\) + 3SO2 + 2H+ → 2Cr3+ + \(3 \mathrm{SO}_4^{2-}\) + H2O

(c) सल्फरडाइऑक्साइड, Fe(III) को Fe(II) में अपचयित कर देती है।
2Fe3+ + SO2 + 2H2O → 2Fe2+ + \(\mathrm{SO}_4^{2-}\) + 4H+

(d) सल्फर डाइऑक्साइड हैलोजनों को हैलोजन अम्लों में परिवर्तित कर देती है।
Cl2 + SO2 + 2H2O → 2HCl + H2SO4

इस अभिक्रिया में क्लोरीन का गुण नष्ट हो रहा है अतः SO2 को प्रतिक्लोर (Antichlor) के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

प्रश्न 14.
नमी की उपस्थिति में SO2 विरंजक का कार्य करती है। इस कथन की व्याख्या उदाहरण सहित कीजिए।
उत्तर:
नमी की उपस्थिति में SO2 रंगीन वनस्पतियों आदि का रंग उड़ा देती है। यहाँ भी यह अपचायक का ही कार्य करती है। अतः SO2 को विरंजक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
SO2 + 2H2O → H2SO4 + 3S
ये हाइड्रोजन परमाणु पदार्थ का विरंजन करते हैं लेकिन यह विरंजन अस्थायी होता है क्योंकि रंगहीन पदार्थ (अपचयित रूप) वायुमण्डल्भिय ऑक्सीजन के सम्पर्क में आते ही ऑक्सीकृत होकर पुनः वास्तविक रूप (रंगीन ) में आ जाता है।

प्रश्न 15.
सान्द्र H2SO4 का तनुकरण करते समय जल में H2SO4 डालना चाहिए न कि H2SO4 में जल। क्यों?
उत्तर:
सांद्र H2SO4 का तनुकरण करते समय H2SO4 की कम मात्रा को धीरे-धीरे जल में डालना चाहिए तथा इसको लगातार हिलाते रहना चाहिए क्योंकि H2SO4 का जल में विलयन बनना उच्च ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है, जिसमें बहुत अधिक मात्रा में ऊष्मा उत्सर्जित होती है। अतः इसका विपरीत अर्थात् H2SO4 में जल मिलाने पर विस्फोट होकर दुर्घटना हो सकती है।

प्रश्न 16.
सल्प्यूरिक अम्ल एक प्रबल अम्ल है तथा यह एक निर्जलीकारक भी होता है, व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सल्फ्यूरिक अम्ल के उपयोग – सल्फ्यूरिक अम्ल एक बहुत महत्वपूर्ण औद्योगिक रसायन होता है। इसके मुख्य उपयोग निम्नलिखित हैं-

  • उर्वरकों के उत्पादन में (जैसे अमोनियम सल्फेट, सुपर फॉस्फेट );
  • पेट्रोलियम के शुद्धिकरण में;
  • अपमार्जक उद्योग में;
  • संचायक बैटरियों में;
  • प्रयोगशाला में महत्त्वपूर्ण अभिकर्मक के रूप में;
  • वर्णकों, प्रलेपों (Paints) तथा रंजकों के मध्यवर्तियों के उत्पादन में;
  • धातुकर्म में इनेमलन (enameling), वैद्युतलेपन एवं यशदलेपन (Galvanisation) प्रक्रमों से पहले धातुओं के शोधन में;
  • नाइट्रोसेलुलोज उत्पादों के निर्माण में।

प्रश्न 17. H2SO4 के ऑक्सीकरण गुण को समझाइए।
उत्तर:
ऑक्सीकारक गुण – सांद्र H2SO4 गरम अवस्था में मध्यम आक्सीकारक होता है। यह धातुओं तथा अधातुओं को आक्सीकृत कर देता है तथा स्वयं SO2 में अपचयित हो जाता है। ऑक्सीकारक गुण में यह H3PO4 तथा HNO3 के बीच का होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 11

(a) धातुओं से क्रिया-सक्रिय धातुएँ तनु H2SO4 से क्रिया करके H2 गैस देती हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 12

(b) अधातुओं से क्रिया-सल्फर तथा कार्बन की सान्द्र H2SO4 के साथ क्रिया से संगत ऑक्साइड तथा जल प्राप्त होता है।
3S + H2SO4 (सांद्र) → 3SO2 + 2H2O
C + 2H2SO4 (सांद्र) → CO2 + 2SO2 + 2H2O

प्रश्न 18.
(a) SF6 ज्ञात है जबकि SH6 नहीं, क्यों?
(b) ऑक्सीजन का अणुसूत्र O2 है जबकि सल्फर का S8, क्यों?
उत्तर:
(a) S की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था (+ 6) उच्च विद्युत ऋणी तत्वों जैसे फ्लुओरीन के साथ संयोग से प्राप्त हो जाती है, अतः SF6 ज्ञात है लेकिन हाइड्रोजन ऐसा नहीं कर सकता अतः SH6 नहीं बनता।

(b) ऑक्सीजन के छोटे परमाणु आकार के कारण इसमें pπ – pπ अतिव्यापन द्वारा यह O2 (O = O) बना लेता है जबकि सल्फर के बड़े आकार के कारण इसमें π बन्ध नहीं बनता अतः इसके परमाणु एकल बन्ध द्वारा जुड़कर S8 बनाते हैं।

प्रश्न 19.
सान्द्र H2SO4 का प्रयोग H2 तथा H2S से नमी हटाने में नहीं किया जाता। इसका कारण बताइए।
उत्तर:
(i) H2SO4 द्वारा नमी के अवशोषण के दौरान बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है, जिसके कारण हाइड्रोजन गैस जल उठती है अतः H2 के शुष्कन हेतु H2SO4 का प्रयोग नहीं किया जाता।

(ii) जब H2S से नमी के अवशोषण हेतु H2SO4 का प्रयोग करते हैं तो यह H2S का ऑक्सीकरण कर देता है अतः इसे H2S के शुष्कन हेतु भी प्रयोग नहीं किया जाता।
H2S + H2SO4 → H2O + SO2 + S

प्रश्न 20.
(a) O2 अनुचुम्बकीय होती है जबकि O3 प्रतिचुम्बकीय, क्यों?
(b) ओजोन की क्रियाशीलता, ऑक्सीजन से अधिक होती है, इसका कारण दीजिए।
उत्तर:
(a) अणु कक्षक सिद्धान्त (MOT) के अनुसार O2 में दो अयुग्मित इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं अतः यह अनुचुम्बकीय होती है जबकि ओजोन में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं अतः यह प्रतिचुम्बकीय होती है।

(b) ओजोन का बनना एक ऊष्माशोषी अभिक्रिया होती है अतः ओजोन का अणु अधिक ऊर्जा युक्त होता है जिसके कारण इसका पुनः वियोजन हो जाता है। इसलिए इसकी क्रियाशीलता अधिक होती है जबकि O2 में O = O के कारण यह अधिक स्थायी होती है अतः इसकी क्रियाशीलता कम होती है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 21.
(a) SO2 केवल गीले फूलों का रंग ही उड़ा पाती है, सूखों का नहीं, क्यों?
(b) अधिक भीड़युक्त स्थानों पर ओजोन का प्रयोग किया जाता है, क्यों?
उत्तर:
(a) SO2 का विरंजक गुण क्रियाशील हाइड्रोजन परमाणुओं के कारण होता है, जो केवल नमी की उपस्थिति में ही उत्पन्न होते हैं अतः SO2 केवल गीले फूलों का रंग ही उड़ा पाती है, सूखों का नहीं।
SO2 + 2H2O → H2SO4 + 2H

(b) ओजोन अस्थायी होती है अतः इसके विघटन से O2 प्राप्त हो जाती है इसलिए अधिक भीड़युक्त स्थान जहाँ पर ऑक्सीजन को कमी होती है, उसकी पूर्ति हो जाती है अतः इन स्थानों पर ओजोन का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 22.
क्लोरीन से निम्नलिखित यौगिक प्राप्त करने के लिए समीकरण लिखिए-
(i) NaOCl
(ii) NaClO3
(iii) विरंजक चूर्ण
(iv) NH4Cl
(v) NCl3 |
उत्तर:
(i) 2NaOH + Cl2 → NaCl + NaOCl + H2O ठण्डा तथा तनु
(ii) 6NaOH + Cl2 → 5NaCl + NaClO3 + 3H2O गर्म तथा सान्द्र
(iii) Ca(OH)2 +2Cl2 → [Ca(OCl)2 + CaCl2 + 2H2O] विरंजक चूर्ण
(iv) 8NH3 + 3Cl2 → 6NH4Cl + N2 अधिक्य
(v) NH3 + 3Cl2 (आधिक्य) → NCl3 + 3HCl

प्रश्न 23.
क्लोरीन के ऑक्सीकारक गुण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
क्लोरीन बनाने की औद्योगिक विधियाँ-ये विधियाँ निम्नलिखित हैं-
(i) वैद्युतअपघटन-लवण जल (सांद्र NaCl विलयन या ब्राइन ) के वैद्युतअपघटन से क्लोरीन प्राप्त की जाती है। ब्राइन के जलीय विलयन में विद्युत प्रवाहित करने पर ऐनोड पर क्लोरीन प्राप्त होती है। इस प्रक्रम में कास्टिक सोडा (NaOH) का निर्माण भी होता है। अतः क्लोरीन यहाँ अन्य उत्पाद है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 13
गलित NaCl के वैद्युत अपघटन से कैथोड पर सोडियम तथा ऐनोड पर क्लोरीन प्राप्त होती है।

(ii) डेकॉन विधि – हाइड्रोजन क्लोराइड गैस का CuCl2 उत्प्रेरक की उपस्थिति में 723K ताप पर वायुमंडलीय ऑक्सीजन द्वारा ऑक्सीकरण करने पर क्लोरीन प्राप्त होती है।

प्रश्न 24.
क्लोरीन का विरंजक गुण समझाइए।
उत्तर:
विरंजक गुण-क्लोरीन एक प्रबल विरंजक है। इसकी विरंजन क्रिया ऑक्सीकरण के कारण होती है, जो कि नवजात ऑक्सीजन उत्पन्न करती है।
Cl2 + H2O → 2HCl + [O]
रंगीन पदार्थ + [O] → रंगहीन पदार्थ
क्लोरीन नमी की उपस्थिति में ही वनस्पति अथवा कार्बनिक पदार्थों का विरंजन करती है तथा क्लोरीन का यह विरंजक प्रभाव स्थायी होता है। लेकिन SO2 का विरंजक प्रभाव अस्थायी होता है।

प्रश्न 25.
HCl एक अपचायक है, समझाइए।
उत्तर:
अपचायक गुण – प्रबल ऑक्सीकारकों के साथ क्रिया कराने पर यह अपचायक की तरह व्यवहार करती है। जैसे- MnO2, K2Cr2O2 तथा KMnO4 इत्यादि।

4HCl + MnO2 → MnCl2 + 2H2O + Cl2
14HCl + K2Cr2O7 → 2CrCl3 + 2KCl + 3Cl2 + 7H2O
16HCl + 2KMnO4 → 2MnCl2 + 2KCl + 5Cl2 + 8H2O

प्रश्न 26.
अम्लराज (एक्वारेजिया) कैसे बनाया जाता है? तथा इसके उपयोग भी बताइए।
उत्तर:
सान HCl त्षा यान्द्र HNO3 को 3 : 1 में मिलाने पर एक्यांजिजिया बनता है जिसे घोने तथा प्लेटिनम औैसी उल्क्ष्ट धातुओं को घोलने के लिए प्रयुक्त किया काता है।
Au + 4H+ + \(\mathrm{NO}_3^{-}\) + \(4 \mathrm{Cl}^{-}\) → \(\mathrm{AuCl}_4^{-}\) + NO + 2H2O3Pt + 16H+ + \(4 \mathrm{NO}_3^{-}\) + \(18 \mathrm{Cl}^{-}\) → \(3 \mathrm{PtCl}_6^{2-}\) + 4NO + 8H2O

प्रश्न 27.
इकृष्ट गैसों की द्रव तथा ठोस अवस्था में पाएँ जाने वाले आकर्षण बलों को समझाइए।
उत्तर:
उत्कृष्ट गैसों के परमाणु अधुखीय होते हैं लेकिन यह माना जात है कि इलेक्यान अभक्षे हिचलन से इमें धुवता उत्पन्न हो जती है तबा एक परमायु अन्य पस्मागुओं को भी पुवित कर सेत है। इन ज्ञनणुओं के मध्य उनक्षित आकर्षंग बस, परिशेपग बल या सन्द्न बल कहागता है। यह एक प्रकर का वन्डवल कल है तथा इस्ते के कारण उत्लृष्ट शैसों बदी द्रव तथा वोस अयलक्वा होती है।

प्रश्न 28.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए-
(i) XeF2 का जल अघघटन
(ii) XeF4 का अषचयन
(iii) XeF2 की PF5 से किया
(iv) XeF4 की SbF5 से लिख्या
(v) XeF6 से NaF से क्रिया।
उत्तर:
(i) 2XCF2(S) + 2H2O(l) → 2Xe(g) + 4HF(aq) + O2(g)
(ii) XeF4 + 2H2 → Xe + 4HF
(iii) XeF2 + PF5 → [XeF]+ [PF6]
(iv) XeF4 + SbF5 → [XeF3]+ [SbF6]
(v) XeF6 + NaF → Na+ [XeF7]

प्रश्न 29.
XeO3, XeOF4 तथा XeO2F2 को विस्स प्रकास बनाया जाता है? समझाइए।
उत्तर:
XeO3 : XeF4 तथा XeF6 के जल अकघटन से XeO3 बना है।
6XeF4 + 12H2O → 4Xe + 2XeO3 + 24HF + 3O2
XeF6 + 3H2O → XeO3 + 6HF

XeOF4 तथा XeO2F2 :

XeF6 के आंिक क्ल अपवटन से आक्यीफ्तुओंग्ड XeOF4 तथा XeO2F2 प्राप्त होते हैं।
XeF6 + H2O → XeOF4 + 2HF
XeF6 + 2H2O → XeO2F2 + 4HF

प्रश्न 30.
XeF6 तथा XeOF4 की आकृति को समझाइए।
उ्तर:
XeF6 में Xe पर 6 खची क्लेकट्रॉन युग्म तथा एक एक्लकी इसेष्ट्रोन युग्म वपास्थित होते है अतः इस पर sp3d3 संकर्य होत है तथा झसकी अकृति विकृत अष्टफलकीय होती है। XeOF4 में Xe पर 5 बंधी इलेक्ट्रॉन युग्म तथा एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होने के कारण sp3d2 संकरण होता है तथा इसकी आकृति वर्ग पिरैमिडी होती है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 14
XeF6 की विकृत अष्ठल्लकीय अवृति XeOF6 की वर्ग विर्मिड्री आकृति

प्रश्न 31.
वर्ग 16 के तत्वों के हाइड़ाइडों में निम्नलिखित गुणों वाले यौगिक बताइए।
(i) अधिकतम बन्ध कोण
(ii) निम्नतम क्वथनांक
(iii) अधिकतम अम्लीय गुण।
उत्तर:
(i) H2O
(ii) H2S
(iii) H2Te

प्रश्न 32.
SF6 ज्ञात है लेकिन SCl2 नहीं, क्यों?
उत्तर:
फ्नुओरीन की विद्युतत्ताणता अधिक होने के कारण यह प्रबल औक्सीकारक होती है इसलिए यह सल्फर को + 6 औक्सीकरण अवस्था तक ऑवसीकृत कर देती है अतः SF6 ज्ञात है। लेकिन क्लोरीन की दुर्बल ऑक्सीकारक प्रवृत्ति के कारण यह सल्फर को + 4 ऑक्सीकरण अवस्था तक ही ऑक्सीकृत कर पाती है, इसलिए SCl6 ज्ञात नहीं है।

प्रश्न 33.
SO2 की विरंजक क्रिया अस्थायी होती है, जबकि Cl2 की विरंजक क्रिया स्थायी होती है, क्यों?
उत्तर:
SO2 की जल के साथ क्रिया द्वारा नवजात हाइड्रोजन उत्पन्न होती है जो कि रेगीन पदार्थ को अपचयित करके रंगहीन कर देती है, लेकिन यह पदार्थ वायु द्वारा आंक्सीकृत होकर पुनः रेगीन हो जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 15
जबकि क्लोरीन, जल से क्रिया करके नवजात आंक्लीजन देती है जो कि रंगहीन पदार्थ को आंक्सीकृत करके रंगहीन कर देती है जिस पर वायु का कोई प्रभाव नर्हीं होता।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 16

बोर्ड परीक्षा के दूष्टिकोण से सम्भावित महत्त्वपूर्ण प्रश्न:

प्रश्न 1.
सफफेद् फॉस्फोरस की अपेक्षा लाल फॉस्फोरस कम क्रियाशील क्यों होता है?
उत्तर:
सफेद फॉस्फोरस के P4 अणुओं में कोणीय तनाव के कारण (60° का कोण ) यक कम स्थायी होता है अतः यह अधिक क्रियाशील होता है जबकि लाल फॉस्फोरस में ऐसा नहीं होता इसलिए सफेद फॉस्फोरस की अपेक्ष लाल फॉर्फोरस कम क्रियाशील होता है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रिया समीकरणों को पूर्ण कीजिए-
(i) XeF2 + H4O →
(ii) PH3 + HgCl2
उत्तर:
(i) 2XeF2(s) + 2H2O(l) → 2Xe(g) + 4HF(aq) + O2(g)
(ii) PH3 + 3HgCl2 → Hg3P2 + 6HCl मरक्यूरिक फॉस्फाइड

प्रश्न 3.
(a) निम्नलिखित की संरचनाएँ आरेखित कीजिए-
(i) XeF4
(ii) H2S2O7
(b) निम्नलिखित अवलोकनों की व्याख्या कीजिए-
(i) नाइट्रोजन की अपेक्षा फॉस्फोरस में शृंखलन की प्रवृत्ति अधिक होती है।
(ii) इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का ऋणात्मक मान फ्लुओरीन के लिए, क्लोरीन के अपेक्षाकृत कम होता है।
(iii) हाइड्रोजन क्नोराइड की अपेक्षा हाइड्रोजन फ्लुओराइड का क्वथनांक बहुत अधिक होता है।
अथवा
(a) निम्नलिखित की संरचनाएँ आरेखित कीजिए-
(i) PCl3(s)
(ii) \(\mathrm{SO}_3^{2-}\)

(b) निम्नलिखित अवलोकनों के आधार स्पष्ट कीजिए-
(i) फॉस्फीन की अपेक्षा अमोनिया का क्वथनांक उच्चतर होता है।
(ii) हीलियम कोई रासायनिक योगिक नहीं बनाता है।
(iii) Sb(V) की अपेक्षा Bi(V) एक अधिक प्रबल उपचायक है।
उत्तर:
(a) XeF4 वथा H2S2O7 की संरचना निम्नलिखित है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 17

(b) (i) नाइट्रोजन की अवेक्षा फैस्फोरस में शृंखलन की प्रवृत्ति अधिक होती है क्योंकि फॉस्फोरस विवृत (open) तथा संवृत (closed) दोनों प्रकार की श्रंखला बनाता है तथा नाइट्रोजन के छोटे आकार के कारण यह N ≡ N बनाकर, N2 के रूप में ही पाया जाता है ल्लेकिन फॉस्फोरस के बड़े आकार के कारण यह द्विपरमाणुक अणु नहीं बनाता।

(ii) हाइड्रोजन क्लोराइड की अपेक्षा हाइड्रोजन फ्लुओराइड का क्वथनांक बहुत अधिक होता है क्योंकि HF के अणुओं के मध्य प्रबल अन्तराअणुक हाइड्रोजन बन्ध पाया जाता है जिसके कारण अणु बहुत अधिक पास आ जाते हैं जिन्हें दूर-दूर करने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता ह्षेती है, जबकं HCl के अणुओं के मध्य दुर्बल वान्डरवाल बल पाया जाता है।
अथवा
(a) (i) PCl5(s) → ठोस अवस्था में PCl5 एक आयनिक ठोस के रूप में पाया जाता है जिसमें चतुष्फलकीय \(\mathrm{PCl}_4^{+}\) तथा अष्टफल्लकीय \(\mathrm{PCl}_6^{-}\) पाया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 18
(b) (i) फॉस्फीन की अपेक्षा अमोनिया का क्वधनांक उच्च होता है क्यौंकि NH3 में धुरुखीय बन्य (N-H) होने के कारण इसके अणुओं के मध्य अन्तरअणुक छाइडोजन बन्ध पाचा जाता है जिससे आण्विक संगुणन अधिक हो जाता है उबकि PH3 के अणुओं के मध्य दुर्बल बान्डरवाल बल पाया जाता है।

(ii) हीलियम कोई रुसायनिक यौगिक नहीं बनाता है ब्योकि हीलियम के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (1s2) में पूर्ण पूरित कोश है अतः इसके पास कोई अयुम्मित इलेक्टॉन नहैं है तथा इसके छोटे आकार के कारण इसकी आयनन एव्थैल्पी भी उच्च होती है इसलिए इसमें इलेक्ट्रॉन देने की प्रवृति भी नही होती तथा धनात्रक इ्लेक्ट्रॉन ल्यिं एन्येल्पी के कारण यह इ्लेक्ट्रॉन स्रक्षण भी नहीं करती।

(iii) Sb(V) की अपेक्षा Bi(V) अधिक प्रबल उपचायक (ऑक्सीकारक ) होता है क्योंकि Bi+5 अवस्था की अपेक्षा Bi+3 अवस्था अधिक स्थायी होती है (निक्रिय युग्म प्रभास के कारण) अतः Bi(V) आसानी से इसेक्ट्रॉन ग्रहण करके Bi(III) बनाता है जिसके कारण इसका औक्सीकारक गुण अधिक छोता है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 4.
फ्तुओरीन कोई धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित नहीं करती। क्यों?
उत्तर:
फ्लुओरीन की विद्युप्रणता सर्वाधिक होती है तथा इसके संयोजी कोश में रिक्त d कक्षेक भी उपलय्ध नलीं है अतः इसमें अश्टक का प्रस्तर नहीं हैता इस्स कारण यह केवल -1 औक्सीकरण अवस्था दर्शाती है अधाँत् यह कोई धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रक्रांत नहर्ती करती।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रिया समीकर्णों को पूरा कीजिए-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 19

प्रश्न 6.
निम्नलिखित योगिकों के संखचा सूत्र बनाइए-
(i) H4P2O5
(ii) XeF4
उत्तर:
H4P2O5 तखा XeF4 की संरचना निम्न फ्रकार सेती है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 20

प्रश्न 7.
निम्नलिखित को कारण देते हुए आष कैसे समझाएंगे-
(i) NCl3 एक ऊष्माशोषी यौगिक है जलकि NF3 ऊष्चाजिया है।
(ii) XeF2 मुड्ता हुभा न द्रोका एक सीधा रेख्रिय आकार वाता क्या है।
उत्तर:
(i) NCl3 एक कप्माोोी वौगिक है वबकि NF3 ऊप्यारेपी है क्योंकि NCl3 बनते समय कर्न का अवरोष्य होता है हसका कारण Cl-Cl बन्थ वियोग्यन एन्देली कर मान F-F बन्ध क्लिजन एन्थैल्पी से अधिक होना है अतः इस बन्य को तोड़ने के हिए अधिक ऊर्जा की आवस्पकता हैती है जबकि फ्लुओरीन के होटे आलार के बाएग प्रयत्त बन्य बनती है अतः NF3 बनते समख कर्जा उत्सरित होती है।

(ii) XeF2 में Xe पा दो बन्धित क्षेक्टॉन युग्म वथा तीन एकाही इलेकट्टॉन तुम्य कोते है। (sP3d स्थिकण) VSEPR स्द्धान्त के अनुसार रेखीय ज्यामिति होने पर प्रतिकर्षण न्यूनत्न होता है उतः XeF2 रेखीय ख्वामिति युक्ल अणु है।

प्रश्न 8. निम्नलिखित के वया कााएण हैं-
(i) H2O की अपेक्षा H2S अधिक अम्लीय है।
(ii) \(\mathrm{NO}_2^{-}\) में N-O आबंध \(\mathrm{NO}_3^{-}\) में N-O काजंध से छोटा होता है।
(iii) O2 और F2 दोनों ही उख्य उपषयन अवस्तुओ को स्थायित्य केते हैं परन्तु इसमें फलुओरीन की आवेक्षा औंवसीजन बक्रात है।
उत्तर:
(i) H2O की अपेक्षा H2S अधिक अम्लीय है क्योंकि सल्फर के बड़े आकार के कारण S-H बन्ध वियोजन एन्थैल्पी का मान O-H बन्ध वियोजन एन्थैल्पी से कम होता है अतः H2S की H+ देने की प्रवृत्ति अधिक होती है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 21
\(\mathrm{NO}_2^{-}\) में एक N = O तथा एक N-O बन्थ होता है जबकि \(\mathrm{NO}_3^{-}\) में एक N = O तथा दो N-O बन्ध होते हैं अतः \(\mathrm{NO}_2^{-}\) में औसत बन्ध क्रम (1.5), \(\mathrm{NO}_3^{-}\) में औसत बन्ध क्रम (1.33) से अधिक है अतः \(\mathrm{NO}_2^{-}\) में N-O आब्दैघ, \(\mathrm{NO}_3^{-}\) में N-O आबन्ध से छोटा होत है।

(iii) O2 तथा F2 दोनों ही उच्च उपचयन अवस्थाओं (आक्सीकरण अवस्थाओं) को स्थायित्व देते हैं लेकिन ऑक्सीजन कौ द्विन्ध बनाने की क्षमत के कारण या उच्च ओंक्सीकरण अवस्था को अंक ए्थायित्व प्रदान करता है जबक्षक फ्लुओरीन में द्विआंन्ध नहीं बनखा।

प्रश्न 9.
(a) निम्नलिखित अणुओं की संरचनाएँ आरेखित कीजिए-
(i) (HPO3)3
(ii) BrF2
(b) निम्नलिखित रासायनिक समीकरणों को पूरा कीजिए-
(i) HgCl2 + PH2
(ii) SO3 + H2SO4
(iii) XeF4 + H2O →
अथवा
(a) क्या होता है जब
(i) NaOH के सान्द्र गरम विलयन में क्लोरीन गैस प्रवाहित की जाती है?
(ii) Fe(III) लवण के जलीय विलयन में से सस्फर डाइओंक्साइड गैस प्रवाहित की जाती है ?

(b) निम्नलिखित के उत्तर दीजिए-
(i) H3PO3 की क्षार्त्ता (basicity) ब्या है और क्यों?
(ii) अन्तराहललोजन यौगिकों में फ्लुओरीन केन्द्रीय पसमाणु की भूमिका में क्यों नहीं होती है?
(iii) उत्कृष्ट (नोबल) गैसों के क्वथनांक बहुत कम क्यों होते हैं?
उत्तर:
(a) (i) (HPO3)3 पौलीमेटाफॉस्पेरिक अम्ल की संरचना निम्न प्रकार होती है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 22

(ii) BrF3 की संरचना बंकित T जैसी होती है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 23
(b) (i) 3HgCl2 + 2PH3 → Hg3P2 + 6HCl
(ii) SO3 + H2SO4 → H2S2O7 (अ)लिम)
(iii) 6XeF4 + 12H2O → 4Xe + 2XeO3 + 24HF + 3O2
अधवा
(a) (i) NaOH के सान्द्र स्वम विलयन में करोरोन सैस प्रवाहित कहने का NaCl तथा NaClO3 (संडियम बलोरोट) बनल है।
6NaOH + 3Cl2 → 5NaCl + NaClO3 + 3H2O
गन् तथा बान्द्र

(ii) Fe(III) के लवण के जलीय विलयन में से सल्फर डाइऑक्साइड गैस प्रवाहित करने पर फैरस (Fe2+) तथा सल्फेट आयन बनते हैं।
2Fe3+ + SO2 + 2H2O → 2Fe2+ + \(\mathrm{SO}_4^{2-}\) + 4H+

(b) (i) H3PO3 की क्षारकता दो होती है क्योंकि इसकी संरचना में दो -O-H बन्ध होते हैं जिसके आयनन से H+ प्राप्त होते हैं, लेकिन P-H बन्ध का आयनन नहीं होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 24

(ii) अन्तराहैलोजन यौगिकों में केन्द्रीय परमाणु पर अष्टक का प्रंसार होता है चूँकि फ्लुओरीन में रिक्त $\mathrm{d}$ कक्षक उपलब्ध नहीं होते अतः इसमें अष्टक का प्रसार नहीं हो पाता। इस कारण अन्तराहैलोजन यौगिकों में फ्लुओरीन, केन्द्रीय परमाणु की भूमिका में नहीं होती है।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में सो प्रत्येक के लिए उषघुक्त उद्बाहला बेते हुए उनखा स्पष्टीसरण कीजिए-
(i) NF3 एक कब्मांक्षेपी चौनिक है जक्कि NCl3 एमा नहीं है।
(ii) SF4 में सभी आघन्ध समतुल्ब नहीं हैं।
उत्तर:
(i) क्सी भाग (विभिन्न पणिधाओं के प्रश्न ) में प्रश्न संख्या 7(i) क्ष उत्तर देखें।
(ii) SF4 में सल्फर पर चार बन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म तथा एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित है। (sp3d संकरण) तथा इसकी ज्यामिति सी सॉं (see saw) जैसी होती है जिसमें निरक्षीय बन्धों की तुलना में विषुवतरेखीय बन्धों पर अधिक तनाव होता है अतः इनकी बन्ध लम्बाई कुछ अधिक होती है SF4 के सभी बन्य सनतात्व नली कोते।

प्रश्न 11.
SbH3 तथा BiH3 में खौन अधिक प्रबल भबचादक है और वर्खों ?
उत्तर:
SbH3 तथा BiH3 में से BiH3 अधिक प्रबल अपचायक है क्योंकि BiH3 में Bi के बड़े आकार के कारण बन्ध वियोजन एन्थैल्पी कम होती है अतः हाइड्रोजन परमाणुओं के प्राप्त होने की सम्भावना अधिक होती है।

प्रश्न 12.
(a) निम्नलिखित यौगिकों की आण्विक संरचनाएँ आरेखित कीजिए-
(i) N2O5
(ii) XeOF4
(b) निम्नलिखित अवलोकनों की व्याख्या कीजिए-
(i) ऑक्सीजन की अपेक्षा सल्फर में श्रृंखलन की प्रवृत्ति अधिक होती है।
(ii) I2 की अपेक्षा ICI अधिक क्रियाशील है।
(iii) फ्लुओरीन की इलेक्ट्रॉन प्राप्ति एन्थैल्पी ऋण चिह्न के साथ यद्यपि क्लोरीन की अपेक्षा कम है, फिर भी फ्लुओरीन (F2) अपेक्षाकृत क्लोरीन (Cl2) से प्रबल ऑक्सीकारक है।
अथवा
(a) निम्नलिखित रासायनिक समीकरणों को पूर्ण कीजिए-
(i) Cu + HNO3 (तनु) →
(ii) XeF4 + O2F2
(b) निम्नलिखित अवलोकनों की व्याख्या कीजिए-
(i) नाइट्रोजन की अपेक्षा फॉस्फोरस में श्रृंखलन की प्रवृत्ति अधिक होती है।
(ii) ऑक्सीजन एक गैस है जबकि सल्फर एक ठोस है।
(iii) हैलोजन रंगीन होते हैं। क्यों?
उत्तर:
(a) N2O5 तथा XeOF4 की संरचना निम्न प्रकार होती है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 25
(b) ऑक्सीजन के छोटे आकार के कारण यह pπ-pπ अतिव्यापन द्वारा बन्ध बनाकर O2 के रूप में पाया जाता है। जबकि सल्फर के बड़े आकार के कारण यह π बन्ध नहीं बनाता तथा बहुत से परमाणु आपस में जुड़कर S8 बनाते हैं अर्थात् सल्फर में श्रृंखलन की प्रवृत्ति; ऑक्सीजन की अपेक्षा अधिक होती है।
अथवा
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 26
(b) हैलोजनों में दृश्य क्षेत्र में विकिरणों का अवशोषण होता है जिससे बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तर में चले जाते हैं। जब ये इलेक्ट्रॉन वापस निम्न ऊर्जा स्तर में आते हैं तो ऊर्जा उत्सर्जित होती है जिसके कारण हैलोजन रंगीन होते हैं। विकिरण के भिन्न-भिन्न क्वान्टम अवशोषित करने के कारण इनका रंग भी भिन्न-भिन्न होता है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 13.
(i) ‘इंडियन साल्टपीटर’ का नाम एवं रासायनिक सूत्र लिखिए।
(ii) क्या होता है जब अमोनिया के जलीय विलयन को- (A) Cu2+ आयन युक्त जलीय विलयन में डालते हैं ( समीकरण सहित ) ।
(B) Cl आयनों की उपस्थिति में Ag+ आयन युक्त जलीय विलयन में डालते हैं। (समीकरण सहित )
(iii) H3PO4 अम्ल की संरचना बनाइये।
अथवा
(i) किस वर्ग के तत्व चैल्कोजेन कहलाते हैं और क्यों?
(ii) (A) फ्लोरीन केवल 1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है, क्यों?
(B) फ्लोरीन के अलावा अन्य हैलोजन धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी दर्शाते हैं, क्यों?
(iii) विषमलंबा गंधक की Ss आणविक संरचना को चित्रित कीजिए।
उत्तर:
(i) पोटैशियम नाइट्रेट (KNO3) को इंडियन साल्टपीटर कहते हैं।
(ii) (A) Cu2+ आयन युक्त जलीय विलयन में अमोनिया का जलीय विलयन डालने पर गहरे नीले रंग का विलेयशील संकुल टेट्राऐमीन कॉपर (II) सल्फेट बनता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 27
(B) Cl आयनों की उपस्थिति में Ag+ के जलीय विलयन में अमोनिया का जलीय विलयन डालने पर एक विलेय संकुल डाइऐमीन सिल्वर (I) क्लोराइड प्राप्त होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 28
(iii) H3PO4 (आर्थो फॉस्फोरिक अम्ल) की संरचना निम्नलिखित है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 29
अथवा
(i) 16वें वर्ग (ऑक्सीजन परिवार) के तत्वों को चैल्कोजेन कहते हैं क्योंकि इसका अर्थ है अयस्क बनाने वाला तथा सामान्यतः अयस्कों में ऑक्सीजन तथा सल्फर होता है अर्थात् अयस्क ऑक्साइड तथा सल्फाइड के रूप में पाए जाते हैं।

(ii) (A) फ्लोरीन केवल – 1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शता है क्योंकि इसका परमाणु आकार छोटा होता है तथा इसमें d कक्षक अनुपस्थित है एवं इसकी विद्युत ऋणात्मकता भी सबसे अधिक होती है।

(B) फ्लोरीन के अलावा अन्य हैलोजन धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी दर्शाते हैं क्योंकि इनमें रिक्त d कक्षक उपस्थित होते हैं अतः ये अपने अष्टक का प्रसार कर सकते हैं। इनकी ये ऑक्सीकरण अवस्थाएँ + 1, + 3, + 5 तथा + 7 होती हैं।

(iii) विषम लंबा गंधक की S8 आण्विक संरचना क्राउन शेप यानी किरीटाकार वलय होती है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 30

प्रश्न 14.
(अ) निम्नलिखित समीकरणों को पूर्ण कीजिए-
(i) Cl2 + NaOH (ठण्डा व तनु) →
(ii) C + सान्द्र HNO3
(ब) निम्नलिखित को समझाइए –
(i) 17वें वर्ग में F2 प्रबल ऑक्सीकारक है।
(ii) ऑक्सीजन गैस है जबकि सल्फर ठोस है।

(स) निम्नलिखित की संरचना बनाइए-
(i) N2O5
(ii) H3PO4
अथवा

(अ) निम्नलिखित समीकरणों को पूर्ण कीजिए-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 31

(ब) निम्नलिखित को समझाइए-
(i) नाइट्रोजन का अणुसूत्र N2 है जबकि फॉस्फोरस का P4 है।
(ii) नाइट्रोजन की तुलना में फॉस्फोरस अधिक क्रियाशील है।
(स) निम्नलिखित की संरचना बनाइए-
(i) H2S2O7
(ii) XeF2
उत्तर:
(अ) (i) Cl2 + NaOH (ठण्डा व तनु ) → NaCl + NaClO + H2O
(ii) C + 4HNO3 (सान्द्र) → CO2 + 2H2O + 4NO2

(च) (i) 17वें वर्ग में F2 प्रबल ऑक्सीकारक है क्योंकि F-F आबंध की वियोजन एन्थैगी कम है तथा F की जलयोजन एन्यैल्पी का मान उच्च होता है, अतः F में इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति अधिक होती है।

(ii) ऑक्सीजन परमाणु के छोटे आकार तथा संयोजी कोश में d कक्षकों की अनुपस्थिति के कारण इसमें pπ-pπ बन्ध बनाने की प्रबल प्रवृत्ति होती है अतः यह O = O बनाकर अपना अष्टक पूर्ण कर लेती है। तथा O2 के विविक्त अणुओं के रूप में गैस अवस्था में पायी जाती है। लेकिन सल्फर के बड़े आकार के कारण S = S बन्ध एन्पी कम होती है अतः यह S2 न बनाकर S8 के रूप में पाया जाता है जिससे अणुओं के मध्य आकर्षण बल बढ़ जाता है। इसी कारण सल्फर ठोस अवस्था में पाया जाता है।

(स) N2O5 तथा H3PO4 की संरचना निम्नलिखित है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 32

(ब) (i) नाइट्रोजन द्विपरमाणुक अणु N2 के रूप में पाया जाता है क्योंकि नाइट्रोजन परमाणु के छोटे आकार तथा d कक्षकों की अनुपस्थिति के कारण इसमें बहुल आबन्ध (N ≡ N) बनाने की प्रबल क्षमता होती है जबकि फॉस्फोरस P4 के रूप में पाया जाता है क्योंकि इसके बड़े आकार के कारण इसमें बहुल आबन्ध बनाने की प्रवृत्ति नहीं होती तथा आन्तरिक अबन्धित इलेक्ट्रॉनों के बीच प्रतिकर्षण होता है अतः इसमें P-P-P बन्ध कोण 60″ होता है इसलिए pπ-pπ बन्ध संभव नहीं है।

(ii) नाइट्रोजन की तुलना में फॉस्फोरस अधिक क्रियाशील है क्योंकि नाइट्रोजन का आकार बहुत छोटा होता है तथा इसकी विद्युतॠणता एवं आयनन एन्फैल्पी, फॉस्फोरस की तुलना में अधिक होती है। नाइट्रोजन के संयोजी कोश में रिक्त d कक्षक उपलब्ध नहीं हैं जबकि फॉस्फोरस के संयोजी कोश में रिक्त d कक्षक होते हैं नाइट्रोजन में pπ-pπ अतिव्यापन द्वारा त्रिआबन्ध बनाने की प्रवृत्ति होती है अतः इसकी [बन्ध एन्येपी बहुत अधिक होती है जिसके कारण वह बहुत कम क्रियाशील होता है जबकि फॉस्फोरस में pπ-pπ अतिव्यापन नहीं होता।

(स) H2S2O7 तथा XeF2 की संरचना निम्न प्रकार होती है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 33

प्रश्न 15.
(अ) वर्ग 15 में ऊपर से तीसरे तत्व का नाम एवं इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
(ब) अमोनिया अणु की संरचना बनाइए ।
(स) NH3 लुइस क्षारक की तरह व्यवहार करती है। क्यों?
(द) तनु एवं सान्द्र HNO3 की Zn के साथ अभिक्रिया के समीकरण दीजिए।
उत्तर:
(अ) वर्ग 15 में ऊपर से तीसरे तत्व का नाम आर्सेनिक 33(As) है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d104s24p3 है।
(ब) अमोनिया का अणु त्रिकोणीय पिरैमिडी होता है, क्योंकि इसमें नाइट्रोजन पर sp3 संकरण होता है। (3σ बन्ध तथा एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ) इसे निम्न प्रकार दर्शाया जाता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 34

(स) अमोनिया में नाइट्रोजन परमाणु पर एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म, प्रदान करने के लिए उपलब्ध है अतः यह लूइस धारक की तरह व्यवहार करती है।
(द) 4Zn + 10 HNO3
तनु → 4Zn (NO3)2 + 5H2O + N2O
Zn + 4HNO3 (सांद्र ) → Zn (NO3)2 + 2H2O + 2NO2

प्रश्न 16.
(अ) वर्ग 15 के धातु तत्व का नाम एवं इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
(ब) क्लोरीन गैस की विरंजन क्रिया का कारण समझाइए ।
(स) भूरी वलय परीक्षण के समीकरण लिखिए।
(द) PCl5 अणु की संरचना बनाइए ।
उत्तर:
(अ) वर्ग 15 का धातु तत्व बिस्मथ (88Bi) है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Xe]-4f14 5d10 6s2 6p3 है।

(ब) क्लोरीन गैस की विरंजन क्रिया ऑक्सीकरण के कारण होती है। नमी की उपस्थिति में क्लोरीन नवजात ऑक्सीजन [O] देती है जो रंगीन पदार्थ का ऑक्सीकरण करके उसे रंगहीन कर देती है।
Cl2 + H2O → 2HCl + [O]
रंगीन पदार्थ + [O] → रंगहीन पदार्थ

(स) भूरी वलय परीक्षण नाइट्रेट आयन के लिए किया जाता है। इसमें प्रयुक्त समीकरण निम्नलिखित हैं-
NO3 + 3Fe2+ + 4H+ → NO + 3Fe3+ + H2O
[Fe(H2O)6]2+ + NO → [Fe(H2O)5(NO)]2+ + H2O भूरी वलय

(द) PCl5 की संरचना त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी होती है क्योंकि इसमें फॉस्फोरस पर 5 σ बन्ध होते हैं। (sp3d संकरण) इसे निम्न प्रकार दर्शाया जाता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 35

प्रश्न 17.
(i) H3PO3 की क्षारकता कितनी होती है तथा क्यों?
(ii) क्लोरीन गैस से बनाई जा सकने वाली दो जहरीली गैसों का नाम बताइए।
(iii) नाइट्रोजन +5 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाती है फिर भी यह पेन्टालाइड नहीं बनाती, क्यों?
उत्तर:
(i) H3PO3 की धारकता दो होती है क्योंकि इसमें दो O-H बन्ध होते हैं।
(ii) फॉस्जीन (COCl2) तथा मस्टर्ड गैस (ClCH2– CH2SCH2CH2Cl)
(iii) नाइट्रोजन में d कवक अनुपस्थित होते हैं अतः यह पेन्टालाइड नहीं बनाती।

प्रश्न 18.
R3P = O पाया जाता है जबकि R3N = O नहीं क्यों ? (R= ऐल्किल समूह)
उत्तर:
वर्ग 15 के तत्वों में अतिरिक्त स्थायित्व प्राप्त अर्धपूरित इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के p-कक्षक होते हैं। अतः वर्ग 16 के तत्वों की तुलना में इनमें से इलेक्ट्रॉन को निकालने में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है, अतः वर्ग 15 के तत्वों की तुलना में वर्ग 16 के तत्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान कम होता है।

प्रश्न 19.
(a) निम्नलिखित की संरचनाएँ बताइए-
(i) XeF2
(ii) BrF3
(b) H3PO3 की अपेक्षा H2PO2 अधिक प्रबल अपचायक है, क्यों?
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 36
(b) H3PO2 में ऐ P-H बन्ध होते हैं तथा इसमें की ऑक्सीकरण अवस्था निम्न (+1) है। अतः यह उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में परिवर्तित हो सकता है। जबकि H3PO3 में एक P-H बन्ध एवं P की ऑक्सीकरण अवस्था उच्च (+ 3) है अतः H3PO3 की अपेक्षा H3PO2 अधिक प्रबल अपचायक है।

प्रश्न 20.
(अ) क्लोरीन के चार ऑक्सो अम्लों के रासायनिक सूत्र लिखिए।
(ब) उत्कृष्ट गैस समूह का सामान्य इलेक्ट्रॉन विन्यास लिखिए। चुम्बकीय अनुनाद प्रतिविम्ब (MRI) में इस समूह का कौन-सा तत्व उपयोगी है?
(स) C2H5OH की PCl3 एवं PCl5 के साथ पृथक् पृथक् रासायनिक अभिक्रियाएँ लिखिए।
अथवा
(अ) सल्फर के चार ऑक्सो अम्लों के रासायनिक सूत्र लिखिए।
(ब) केल्कोजेन समूह का सामान्य इलेक्ट्रॉन विन्यास लिखिए। एप्सम लवण का रासायनिक सूत्र लिखिए।
(स) अमोनिया एक लुइस क्षारक की तरह व्यवहार करता है। समझाइए |
उत्तर:
(अ) क्लोरीन के चार ऑक्सो अम्ल निम्नलिखित हैं- HOCl (हाइपोक्लोरस अम्ल) HClO2 (क्लोरस अम्ल), HClO3 (क्लोरिक अम्ल) तथा HCIO4 (परक्लोरिक अम्ल)।

(ब) उत्कृष्ट गैस समूह का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 np2 होता है जहाँ n = 2 से 6 [He (1s2) के अतिरिक्त), चुम्बकीय अनुनाद प्रतिषिध (MRI) में हीलिंगम प्रयुक्त होती है।

(स) C2H5OH + PCl5 → C2H5Cl + HCl + POCl3
2C2H5OH + PCl3 → 3C2H5Cl + P(OH)3 या H3PO3
अथवा

(अ) सल्फर के चार ऑक्सो अम्ल निम्नलिखित है-
H2SO3 (सल्फ्यूरस अम्ल), H2SO4 (सल्फ्यूरिक अम्ल), H2S2O8 (परॉक्सो डाइसल्फ्यूरिक अम्ल) तथा H2S2O7 (पायरो सल्फ्यूरिक अम्ल )।

(ब) केल्कोजेन समूह ऑक्सीजन समूह होता हैं जिसका सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 np4 है जहाँ n = 2 से 61 एप्सम लवण का रासायनिक सूत्र MgSO4 . 7H2O होता है।

(स) अमोनिया में नाइट्रोजन पर एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान करने के लिए उपलब्ध है अतः यह लुइस क्षारक की तरह व्यवहार करता है।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 p-ब्लॉक के तत्व

प्रश्न 21.
Ba(N3)2 के तापीय अपघटन से क्या होता है? (केवल अभिक्रिया की समीकरण लिखिए।)
उत्तर:
Ba(N3)2 के तापीय अपघटन से बेरियम तथा नाइट्रोजन गैस प्राप्त होती है-
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प्रश्न 22.
H3PO3 की क्षारकता क्या है?
उत्तर:
H3PO3 में दो P-OH बन्ध उपस्थित हैं अतः इसकी क्षारकता 2 है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 38

प्रश्न 23.
(अ) क्लोरीन के ठण्डे व तनु NaOH विलयन से अभिक्रिया की समीकरण लिखिए।
(ब) H3PO2 की अपचायक प्रकृति को समझाइए |
अथवा
(अ) क्लोरीन की गरम व सान्द्र NaOH विलयन से अभिक्रिया की समीकरण लिखिए।
(ब) PCl5 के पाँचों बन्ध समतुल्य क्यों नहीं हैं? समझाइए |
उत्तर:
(अ) क्लोरीन की ठण्डे व तनु NaOH मिलयन से अभिक्रिया कराने पर सोडियम क्लोराइड (NaCl) तथा सोडियम हाइपोक्लोराइट (NaClO) बनते हैं।

Cl2 + 2NaOH → NaCl + NaClO + H2O

(ब) H3PO2 में दो P-H बन्ध होने के कारण वह एक अच्छा अपचायक होता है। इसी कारण वह AgNO3 को Ag में अपचारित कर देता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 39
अथवा
OH
(अ) क्लोरीन की गरम व सान्द्र NaOH विलयन से अभिक्रिया कराने पर सोडियम क्लोराइड (NaCl) तथा सोडियम क्लोरेट (NaClO3) प्राप्त होते हैं।
3Cl2 + 6NaOH → 5NaCl + NaClO3 + 3H2O

(ब) PCl5 के पाँच बन्धों में से तीन निरक्षीय बन्ध समान होते हैं। जबकि वे अक्षय बन्यों की बन्ध लम्बाई अधिक होती है क्योंकि निरखीय बन्ध युग्मों की अपेक्ष अक्षीय बन्ध युग्मों पर प्रतिकर्षण अधिक होता है। PCl5 की त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी संरचना होती है (sp3d संकरण ) ।

प्रश्न 24.
(a) निम्नलिखित के कारण देते हुए स्पष्ट कीजिए-
(i) \(\mathrm{NH}_4^{+}\) में आबन्ध कोण अपेक्षाकृत NH3 वाले कोण से बड़ा है।
(ii) अपचायक व्यवहार SO3 से TeO2 की ओर घटता है।
(iii) HClO की अपेक्षा HClO4 प्रबलतर अम्ल है।

(b) निम्नलिखित की संरचनाएँ आरेखित कीजिए—
(i) H2S2O8
(ii) XeOF4
अथवा
(a) जब सफेद फॉस्फोरस को सान्द्र NaOH के विलयन के साथ गर्म किया जाता है तो कौनसी जहरीली गैस निकलती है? रासायनिक समीकरण लिखिए।
(b) एन. बेर्टलेट द्वारा बनाए गए उत्कृष्ट गैस के प्रथम यौगिक का सूत्र लिखिए। इस यौगिक को बनाने के लिए एन. बैर्टलेट की प्रेरणा क्या थी?
(c) क्लोरीन की अपेक्षा फ्लुओरीन प्रबलतर उपचाचक है क्यों?
(d) क्लोरीन गैस का एक उपयोग लिखिए।
(e) निम्नलिखित समीकरण को पूर्ण कीजिए-
CaF2 + H2SO4
उत्तर:
(a) (i) NH3 तथा \(\mathrm{NH}_4^{+}\) दोनों में से नाइट्रोजन sp3 संकरित है। लेकिन \(\mathrm{NH}_4^{+}\) में आबन्ध कोण अपेक्षाकृत NH3 वाले बन्ध कोण से बड़ा है क्योंकि इसमें चारों ही बन्धित इलेक्ट्रॉन युग्म है जबकि NH3 में N पर एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म है जो कि एकाकी युग्म आबंध युग्म प्रतिकर्षण के लिए उत्तरदायी है, जिससे NH3 में आबन्ध कोण कम हो जाता है।

(ii) अपचायक व्यवहार SO2 से TeO2 की ओर घटता है, क्योंकि इस वर्ग में नीचे जाने पर 6 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व कम होता है तथा 4 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व बढ़ता है। अतः इनकी इलेक्ट्रॉन देने की प्रवृत्ति भी कम होती जाती है।

(iii) HClO की अपेक्षा HClO4 प्रबलतम अम्ल है क्योंकि HClO में Cl का ऑक्सीकरण अंक + 1 है जबकि HClO4 में Cl का ऑक्सीकरण अंक + 7 है अतः HClO4 में Cl की इलेक्ट्रॉन को आकर्षित करने की प्रवृत्ति अधिक होती है जिससे इसका आयनन होकर H+ आसानी से प्राप्त हो जाते हैं।
(b) (i) H2S2O8
(ii) XeOF4
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 40
अथवा
(a) जब सफेद फॉस्फोरस को सान्द्र NaOH के विलयन के साथ गर्म किया जाता है तो फाल्जीन (PH3) गैस निकलती है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 7 Img 41
(b) इस प्रश्न के उत्तर के लिए पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न संख्या 7.30 का उत्तर देखें।

(c) क्लोरीन की अपेक्षा फ्लुओरीन प्रबलतर उपचायक (ऑक्सीकारक) है क्योंकि क्लोरीन के मानक अध्ययन विभव का मान फ्लुओरीन के मानक अपचयन विभव के अपेक्षा कम होता है। इसी कारण फ्लुओरीन जल को ऑक्सीजन में ऑक्सीकृत कर देती है जबकि क्लोरीन, जल के साथ अभिक्रिया करके HCl तथा HClO बनाती है।

(d) क्लोरीन को पीने के जल को जीवाणुरहित करने में प्रयुक्त किया जाता है।

(e) CaF2 + H2SO4 → CaSO4 + 2HF

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. गोबर गैस संयंत्र में काम आने वाला जीवाणु है-
(अ) मीश्रेनोजनं
(ब) नाइट्रीकारी जीवाणु
(स) अमीनोकारी जीवाणु
(द) विनाइट्रीकारी जीवाणु
उत्तर:
(अ) मीश्रेनोजनं

2. ब्रेड बनाते समय किसकी क्रिया के द्वारा CO2 निकलने से यह छिद्रित हो जाती है ?
(अ) यीस्ट
(ब) जीवाणु
(स) वाइरस
(द) प्रोटोजोन्स
उत्तर:
(अ) यीस्ट

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

3. निम्न में से कौनसा युग्म जैव उर्वरक है-
(अ) एजोला तथा BGA
(ब) नास्टॉक तथा लेग्यूम
(स) राइजोबियम वास
(द) साल्मोनेला व इकोलाई
उत्तर:
(अ) एजोला तथा BGA

4. निम्नलिखित में से कौनसा एक जोड़ा गलत मिलाया गया है?
(अ) कोलिफॉर्मर्स – सिरका
(ब) मेथोनोजन्स – गोबर गैस
(स) यीस्ट – एथेनॉल
(द) स्ट्राप्टोमाईसाटीज – एंटीबायोटिक
उत्तर:
(अ) कोलिफॉर्मर्स – सिरका

5. ‘जीवन के खिलाफ’ किससे सम्बन्धित है-
(अ) प्रतिजैविक
(ब) जीवाणु
(स) कवक से
(द) शैवाल से
उत्तर:
(अ) प्रतिजैविक

6. कवक एवं पादपों के साथ सहजीवी सम्बन्ध कहलाता है-
(अ) माइकोराइजा
(ब) लाइकेन
(स) सिम्बायोसिस
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(अ) माइकोराइजा

7. बटर फ्लाई केटरपिलर के नियंत्रण में प्रयोग किया जाता है-
(अ) बैसीलस थूरिजिऐसिस
(ब) ट्राइकोडर्मा
(स) बैम्पूलोवायरेसिस
(द) मीथेनोबैक्टिरिया
उत्तर:
(अ) बैसीलस थूरिजिऐसिस

8. जल के एक नमूने में सूक्ष्जीवियों द्वारा ऑक्सीजन के उद्य्रहण की दर का मापन किया जाता है-
(अ) सी.ओ.डी. परीक्षण
(ब) एच.ओ.डी. परीक्षण
(स) एस.ओ.डी. परीक्षण
(द) बी.ओ.डी. परीक्षण
उत्तर:
(द) बी.ओ.डी. परीक्षण

9. ‘थक्का स्फोटन’ के रूप में निम्न में से प्रयोग किया जाता है-
(अ) स्ट्रेप्टोकाइनेज
(ब) लाइपेज
(स) एमाइलेज
(द) प्रोटिऐजिज
उत्तर:
(अ) स्ट्रेप्टोकाइनेज

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

10. सायनोबैक्टिरिया पोषण के आधार पर है-
(अ) परजीवी
(ब) परपोषी
(स) स्वपोषित
(द) मृतजीवी
उत्तर:
(स) स्वपोषित

11. एफिडो तथा मच्छरों से छुटकारा दिलवाने में निम्न में से लाभप्रद है-
(अ) ड्रेगनफ्लाई एवं बीटल
(ब) वैक्यूलोवायरेसिस
(स) बेसीलस थूरिजिऐसिस
(द) ट्राइकोडर्मी
उत्तर:
(अ) ड्रेगनफ्लाई एवं बीटल

12. ताड़ वृक्ष (palms) के किस भाग से प्राप्त स्राव को किण्वित कर टोडी (Toddy) तैयार किया जाता है-
(अ) जड़
(ब) पत्ती
(स) तना
(द) पुष्प
उत्तर:
(स) तना

13. कौनसा पीड़कनाशी वसा-स्नेही है?
(अ) आर्गेनोक्लोरीन
(ब) आर्गेनोफॉस्फेट
(स) ट्राइआजीन
(द) पायरिथोयड
उत्तर:
(अ) आर्गेनोक्लोरीन

14. निम्न में से किसका उत्पादन बिना आसवन के किया जाता है-
(अ) वाइन
(ब) व्हिस्की
(स) ब्रांडी
(द) रम
उत्तर:
(अ) वाइन

15. निम्न में से किसे किण्वित रस के आसवन द्वारा तैयार किया जाता है-
(अ) रम
(ब) बीयर
(स) वाइन
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(अ) रम

16. पैनिसिलीन के खोजकर्ता हैं-
(अ) एलैग्जेंडर हुक
(ब) एलैग्जैंडर फ्लैमिंग
(स) एलैग्जैंडर ब्राउन
(द) एलैग्जैंडर श्वान
उत्तर:
(ब) एलैग्जैंडर फ्लैमिंग

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

17. एसीटीक अम्ल के उत्पादन में निम्न में से कौनसा जीवाणु सहायक है-
(अ) लैक्टोबैसिलस
(ब) क्लोस्ट्रीडियम
(स) एसीटोबेक्टर एसिटाई
(द) पेनीसिलीयम नोटेटम
उत्तर:

18. निम्न में से कौनसा प्लान सूत्रपात किया गया ताकि देश की प्रमुख नदियों को प्रदूषण से बचाया जा सके-
(अ) यमुना एक्शन प्लान
(ब) गंगा एक्शन प्लान
(स) साँभर झील एक्शन प्लान
(द) (अ) व (ब) दोनों
उत्तर:
(द) (अ) व (ब) दोनों

19. व्यावसायिक पैमाने पर सूक्ष्मजीवियों को पैदा करने के लिए बड़े बर्तन की आवश्यकता होती है जिसे कहते हैं-
(अ) फरमैंटर
(ब) थरमैंटर
(स) इरमैंटर
(द) पीरमेंटर
उत्तर:
(अ) फरमैंटर

20. प्रतिजैविक कौनसे संक्रमित रोग के रोकथाम में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं?
(अ) डिप्थीरिया
(ब) काली खांसी
(स) निमोनिया
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

21. किस तत्व के पोषण के लिए माइकोराइजा उत्तरदायी है?
(अ) पोटैशियम
(ब) कॉपर
(स) जिंक
(द) फॉस्फोरस
उत्तर:
(द) फॉस्फोरस

22. द्वितीयक सीवेज उपचार मुख्यतः क्या है?
(अ) भौतिक प्रक्रिया
(ब) यांत्रिक प्रक्रिया
(स) रासायनिक प्रक्रिया
(द) जैविक प्रक्रिया
उत्तर:
(द) जैविक प्रक्रिया

23. सीवेज पर अवायवीय बैक्टिरिया को क्रिया द्वारा मुख्यतः क्या बनता है?
(अ) लाफिंग गैस
(ब) प्रोपेन
(स) मस्टर्ड गैस
(द) मार्स गैस
उत्तर:
(ब) प्रोपेन

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

24. ‘फेड बैच’ किण्वन विधि में शर्करा को निरन्तर डालने की क्रिया निम्न में किस एक के लिए की जाती है?
(अ) मीथेन बनाने में
(ब) एन्यीबायोटिक्स प्रास्त करने में
(स) एन्जाइमों के शुद्धिकरण में
(द) सीवेज विघटन में
उत्तर:
(ब) एन्यीबायोटिक्स प्रास्त करने में

25. एथेनॉल के उत्पादन के लिए मद्यनिर्माणशालाओं (डिस्टिलेरीज) में सर्वाधिक सामान्यतः इस्तेमाल किया जाने वाला क्रियाधर (सब्ट्रेट) कौनसा होता है?
(अ) मकई का आटा
(ब) सोयाबीन का आटा
(स) चने का आटा
(द) शीरा
उत्तर:
(द) शीरा

26. मायोकार्डियल इन्फार्कस (हुदय पेशी रोध गलन) के रोगी को अस्पताल में लाने पर तत्काल सामान्यतः क्या दिया जाता है-
(अ) पेनेसिलिन
(ब) स्टेप्टोकाइनेज
(स) साइक्लोस्पोरिन
(द) स्टैटिन्स
उत्तर:
(द) स्टैटिन्स

27. सूक्ष्म जीवों का उपयोग करते हुए पीड़कों/रोगों के जैविकीय नियंत्रण का निम्नलिखित में से एक उदाहरण कौनसा है?
(अ) कुछ खास पादप रोग जनकों के लिए ट्राइकोडर्मा स्पी का होना।
(ब) ब्रैसिमा में श्वेत किट्ट के प्रति न्यूकिलयोपा हैड्रो वाइरस का होना
(स) कपास की उपज में बढ़ोतरी करने के लिए Bt कपास का बनाया जाना
(द) सरसों में कीटों के प्रति लेडी बर्ड बीटल का होना
उत्तर:
(अ) कुछ खास पादप रोग जनकों के लिए ट्राइकोडर्मा स्पी का होना।

28. निम्न में से कौनसा युग्म जैव उर्वरक का है ?
(अ) एजोला तथा BGA
(ब) नास्टॉक तथा लेग्यूम
(स) राइजोबियम तथा घास
(द) साल्मोनेला व ई. कोलाई
उत्तर:
(अ) एजोला तथा BGA

29. निम्नलिखित में से कौनसा एक जोड़ा सही नहीं मिलाया गया है?
(अ) सिरोटिया – औषधि व्यसन
(ब) स्पाइरूलाइना – एकल कोशिका प्रोटीन
(स) राइजोबियम – जैव उर्वरक
(द) स्ट्रेप्टोमाइसीज – एंटिबायोटिक
उत्तर:
(अ) सिरोटिया – औषधि व्यसन

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

30. जैविक अपशिष्ट के अवायवीय पीपन के दौरान जैसा कि बायो गैस बनाने में होता है, निम्नलिखित में से कौनसा एक अंश अपघटित नहीं होता-
(अ) लिपिड
(ब) लिग्निन
(स) हेमोसेलुलोज
(द) सेलुलोज
उत्तर:
(ब) लिग्निन

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
बैक्टीरिया का नाम लिखिए जो दूध को दही में परिवर्तित कर देते हैं ।
उत्तर:
लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया ।

प्रश्न 2.
ब्रेड बनाने में प्रयोग किये जाने वाले आटे में किस यीस्ट का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर:
ब्रेड बनाने में प्रयोग किये जाने वाले आटे में बैकर यीस्ट (Satcharomyces cerevisiae) का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 3.
डोसा बनाये जाने वाले आटे की फूली एवं उभरी हुई शक्ल किस गैस के उत्पादन से होती है?
उत्तर:
डोसा बनाये जाने वाले आटे की फूली एवं उभरी हुई शक्ल CO2 गैस के उत्पादन से होती है।

प्रश्न 4.
दक्षिण भारत में कुछ भागों में पारंपरिक पेय टोडी (Toddy) किस वृक्ष के स्राव को किण्वित कराकर तैयार किया जाता है ?
उत्तर:
दक्षिण भारत के कुछ भागों में पारंपरिक पेय टोडी (Toddy) ताड़ वृक्ष (Palms) के तने के स्राव को किण्वित कराकर तैयार किया जाता है।

प्रश्न 5.
स्विस चीज में बड़े-बड़े छिद्र किस गैस के उत्पन्न होने के कारण होते हैं?
उत्तर:
स्विस चीज (Swiss Cheese) में बड़े-बड़े छिद्र अधिक मात्रा में CO2 गैस के उत्पन्न होने के कारण होते हैं ।

प्रश्न 6.
उस जीवाणु का नाम बनाइए जो स्विस चीज (Swiss Cheese) में CO2 का उत्पादन करता है?
उत्तर:
प्रोपिओ निबैक्टीरियम शारमे नाई (Propionibacterium sharmanii) नामक जीवाणु स्विस चीज में CO2 का उत्पादन करता है।

प्रश्न 7.
राक्यूफोर्ट चीज (Roquefort Cheese) में विशेष सुगंध किसके कारण आती है ?
उत्तर:
राक्यूफोर्ट चीज (Roquefort Cheese) एक विशेष प्रकार के कवक की वृद्धि से परिपक्व होते हैं जिससे विशेष सुगंध आती है।

प्रश्न 8.
सामान्यतः कौनसा यीस्ट ब्रीवर्स यीस्ट के नाम से प्रसिद्ध है ?
उत्तर:
सैके रो माइ सीज सैरीविसी (Saccharomyces cerevisiae) यीस्ट ब्रीवर्स यीस्ट के नाम से प्रसिद्ध है ।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

प्रश्न 9.
उस कवक का नाम लिखिए जिससे पैनीसीलिन प्राप्त किया जाता है।
उत्तर:
पैनीसीलियम नोटेटम नामक कवक से पैनीसीलिन प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 10.
किन वैज्ञानिकों ने पैनीसीलिन की एक शक्तिशाली तथा प्रभावशाली एंटीबॉयोटिक के रूप में पुष्टि की ?
उत्तर:
अरनैस्ट चैन तथा हावर्ड फ्लौरे ने पैनीसीलिन की एक शक्तिशाली तथा प्रभावशाली एंटीबॉयोटिक के रूप में पुष्टि की।

प्रश्न 11.
पैनीसीलिन एंटीबॉयोटिक का प्रयोग दूसरे विश्व युद्ध में किसके लिए किया गया था ?
उत्तर:
पैनीसीलिन एंटीबॉयोटिक का प्रयोग दूसरे विश्व युद्ध में घायल अमरीकन सिपाहियों के उपचार में व्यापक रूप से किया गया था।

प्रश्न 12.
बाजार से खरीदा गया बोतल का फल रस अधिक साफ व स्वच्छ किसके प्रयोग के कारण दिखाई देता है?
उत्तर:
बाजार से खरीदा गया बोतल का फल रस अधिक साफ व स्वच्छ पेक्टीनेजिज तथा प्रोटीऐजिज के प्रयोग के कारण दिखाई देता है।

प्रश्न 13.
साइक्लोस्पोरिन ए का उत्पादन किस कवक से किया जाता है?
उत्तर:
साइक्लोस्पोरिन ए का उत्पादन ट्राइकोडर्मा पालोस्पोरम नामक कवक से किया जाता है।

प्रश्न 14.
मोनास्कस परप्यूरीअस यीस्ट से उत्पन्न स्टैटिन (Statins) का कार्य क्या है?
उत्तर:
मोनास्कस परप्यूरीअस यीस्ट से उत्पन्न स्टैटिन (Statins) का कार्य रक्त में उपस्थित कॉलेस्ट्रॉल को कम करने का कार्य करता है।

प्रश्न 15.
बी.ओ.डी. का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
र- बॉयोकेमीकल ऑक्सीजन डिमांड (Biochemical Oxygen Demand)

प्रश्न 16.
पर्यावरण तथा वन मंत्रालय ने हमारे देश की प्रमुख नदियों को बचाने के लिए कौनसे दो ऐक्शन प्लान तैयार किए हैं?
उत्तर:

  • गंगा ऐक्शन प्लान
  • यमुना ऐक्शन प्लान ।

प्रश्न 17.
भारत में बायोगैस उत्पादन की प्रौद्योगिकी का विकास किसके प्रयासों से हुआ?
उत्तर:
भारत में बायोगैस उत्पादन की प्रौद्योगिकी का विकास निम्न के प्रयासों के द्वारा हुआ-

  • भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान
  • खादी एवं ग्रामीण उद्योग आयोग

प्रश्न 18.
ऐसे रोगजनक का नाम लिखिए जो कीटों एवं संधिपादों (आर्थ्रोपोडों) पर हमला करते हैं ।
उत्तर:
बैक्यूलोवायेरेसिस ऐसे रोगजनक हैं जो कीटों तथा संधिपादों (आर्थ्रोपोडों) पर हमला करते हैं।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

प्रश्न 19.
औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में काम आने वाले किन्हीं तीन सूक्ष्मजीवों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • यीस्ट
  • जीवाणु
  • कवक

प्रश्न 20.
उद्योगों में सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके प्राप्त होने वाले दो उत्पादों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • ऐल्कोहॉल
  • प्रतिजैविक ।

प्रश्न 21.
लैक्टिक अम्ल जीवाणु के कोई दो लाभ लिखिए।
उत्तर;

  • दूध में वृद्धि करते हैं।
  • दूध को दही में परिवर्तित कर देते हैं।

प्रश्न 22.
जलाक्रांत खेत में नॉस्टॉक एवं एनाबीना जैसे शैवालों की आबादी अधिक हो जाने से खेत किस प्रकार प्रभावित होगा? सकारण समझाइए ।
उत्तर:
जलाक्रांत खेत में नॉस्टॉक एवं एनाबीना आदि शैवालों की अधिकता से उर्वरता बढ़ जाती है क्योंकि ये वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत करते हैं। ये शैवाल जैव उर्वरक की भूमिका निभाते हैं। ये मृदा में कार्बनिक पदार्थ भी बढ़ा देते हैं।

प्रश्न 23.
जैव वैज्ञानिक नियंत्रण के तहत कौन-सी कवक का उपयोग पादप रोगों के उपचार में किया जाता है?
उत्तर:
ट्राइकोडर्मा कवक ।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
सूक्ष्मजीव की आवास व्यवस्था का वर्णन कीजिए। इन्हें पोषक माध्यमों पर क्यों उगाया जाता है? समझाइए ।
उत्तर:
सूक्ष्मजीव की आवास व्यवस्था – सूक्ष्मजीव सर्वव्यापी होते हैं। ये मृदा, जल, वायु हमारे शरीर के अन्दर तथा अन्य प्रकार के प्राणियों तथा पादपों में पाये जाते हैं। जहाँ किसी प्रकार जीवन संभव नहीं है जैसे- गीजर के भीतर गहराई तक (तापीय चिमनी) जहाँ ताप 100°C तक बढ़ा हुआ रहता है, मृदा में गहराई तक बर्फ की परतों के कई मीटर नीचे तथा उच्च अम्लीय पर्यावरण जैसे स्थानों पर पाये जाते हैं। सूक्ष्मजीव विविध रूपायित प्रोटोजोआ, जीवाणु, कवक तथा सूक्ष्मदर्शीय पादपों से होते हैं।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव 1

सूक्ष्मजीवियों को जीवाणु तथा अधिकांश कवकों के समान इसलिए पोषक माध्यमों पर उगाया जाता है, ताकि ये वृद्धि कर सकें एवं कॉलोनी का रूप ले लें और इन्हें नग्न आँखों से देखा जा सके। देखिए ऊपर चित्र में ऐसे संवर्धनजन सूक्ष्मजीवी अध्ययन के दौरान लाभदायक होते हैं।

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प्रश्न 2.
वाइरस से विरोइड कैसे भिन्न होते हैं?
उत्तर:
वाइरस से विरोइड में भिन्नता-

वाइरस (Viruses)विरोइड (Viroids)
1. ये बैक्टीरिया से छोटे होते हैं।1. ये वायरस से छोटे होते हैं।
2. इनमें आनुवंशिक पदार्थ RNA अथवा DNA2. जबकि इनमें केवल RNA पाया जाता है।
3. हो सकता है। इनमें प्रोटीन का आवरण पाया जाता है।3. जबकि इनमें प्रोटीन का आवरण नहीं पाया जाता है।
4. इनके द्वारा निम्न रोग होते हैंएड्स, चेचक आदि।4. जबकि इनके द्वारा पोटेटो स्पाइन्डल ट्यूबर नामक रोग होता है।

प्रश्न 3.
बैक्टीरिया तथा सायनोबैक्टीरिया में कोई चार अन्तर लिखिए।
उत्तर:
बैक्टीरिया तथा सायनोबैक्टीरिया में चार अन्तर-

बैक्टीरिया (Bacteria)सायनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria)
1. छोटी कोशिकाएँ।1. अपेक्षाकृत बड़ी कोशिकाएँ।
2. कशाभ हो सकते हैं।2. कशाभ नहीं होते हैं।
3. कुछ बैक्टीरिया (हरे बैक्टीरिया) में प्रकाश- संश्लेषण एक अलग प्रकार से होता है, जिसमें ऑक्सीजन बाहर निकलती है।3. प्रकाश-संश्लेषण में सामान्य तरीके से ऑक्सीजन निकलती है जैसा कि हरे पौधों में होता है।
4. लैंगिक जनन संयुग्मन द्वारा।4. संयुग्मन होता नहीं देखा गया।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित बैक्टीरिया के लाभकारी क्रियाकलाप लिखिए-

  • राइजोबियम
  • एजोटोबैक्टर
  • स्ट्रेप्टोमाइसीज
  • लेक्टोबैसिलस ।

उत्तर:
बैक्टीरिया के लाभकारी क्रियाकलाप निम्न हैं-

बैक्टीरियम का नामक्रियाकलाप
1. राइजोबियम (Rhizobium)1. लेग्यूमो (मटर, चना, दालें आदि) की जड़ों में रहता पाया जाता है, वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को अमोनिया के रूप में स्थिर कर देता है जो फिर आगे उपयोगी ऐमिनो अम्लों में बदल जाती है।
2. एजोटोबैक्टर (Azotobacter)2. मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। यह वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर कर देता है।
3. स्ट्रेप्टोमाइसीज (Streptomyces)3. इससे स्ट्रे प्टोमाइसिन नामक ऐंटिबायोटिक बनती है।
4. लेक्टोबैसिलस (Lactobacillus)4. लैक्टोज़ (दुग्ध शर्करा) का लैक्टिक अम्ल में किण्वन करता है। इससे दूध के दही में जमने में सहायता मिलती है।

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प्रश्न 5.
स्पाईरुलीना का खाद्य के रूप में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
स्पाईरुलीना नील हरित शैवाल का सदस्य है। इसका उपयोग सम्पूर्ण आहार के रूप में किया जा सकता है। स्पाईरुलीना में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, एमीनो अम्ल, विटामिन्स, मिनरल्स, एन्जाइम्स, वसा तथा पिगमेन्ट्स ये सभी तत्व इसमें विद्यमान होते हैं। स्पाईरुलीना में उपस्थित प्रोटीन की खास बात यह भी है कि यह ठीक वैसा ही है, जैसा कि शरीर स्वयं अपने लिए तैयार करता है। इसमें दूध के बराबर कैल्सियम पाया जाता है तथा गाजर के मुकाबले 15 गुणा अधिक विटामिन A होता है।

प्रश्न 6.
चावल की खेती में खाद की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ती है?
उत्तर:
नील हरी शैवाल अर्थात् सायनोजीवाणु की कुछ जातियाँ जिनमें नॉस्टॉक, एनेबीना तथा टोलीपोथ्रिक्स आदि वायुमण्डल की नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करने में सक्षम होती हैं। ये शैवाल भूमि की उर्वरता में वृद्धि करती हैं। चावल की खेती में इनका योगदान सराहनीय है। अतः इसी कारण खाद की आवश्यकता नहीं रहती है।

प्रश्न 7.
माइकोराइजा किसे कहते हैं? इसके प्रमुख लाभ लिखिए।
उत्तर:
कवक तथा उच्च वर्ग के पादपों की मूल (root) का परस्पर सहजीवन माइकोराइजा कहलाता है। इसमें कवक अपने तन्तुओं द्वारा पादप की मूल के बाहर की तरफ चारों ओर पूरी तरह से एक आवरण बना लेता है। कवक तन्तु पादप मूल की कार्टेक्स कोशिकाओं के मध्य अन्तराकोशिका (Intercellular) स्थान में प्रवेश कर जाते हैं और एक जाल रूपी संरचना बनाते हैं जिसको हारटिंग नेट कहते हैं। इसमें पादपमूल पर मूल रोम नहीं होते हैं। कवक मूल का मुख्य कार्य खनिज लवण (फॉस्फोरस) के अवशोषण में सहायता करना है। कवक के कारण मूल का अवशोषण क्षेत्र बढ़ जाता है।

माइकोराइजा के प्रमुख लाभ-

  1. मूलवातोढ (root-borne ) रोगजनक के प्रति प्रतिरोधकता ।
  2. कवक मूल से मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है।
  3. कवक मूल से पादप की वृद्धि तीव्र तथा उत्पादन बढ़ता है।
  4. खनिज लवण व अन्य पोषक तत्वों का अवशोषण अधिक मात्रा में व सुगमता से होता है। इस कारण पादप को बाह्य पोषक तत्वों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है।
  5. ऑक्सीजन का संश्लेषण बढ़ जाता है।
  6. कवकमूल में कवक के कारण अवशोषण सतह बढ़ जाती है।
  7. कुछ पादपों में यह सम्बन्ध बीज अंकुरण के लिए आवश्यक है।
  8. कवक मूल के कारण उर्वरकों पर पादप की निर्भरता कम होती है तथा इससे धन की बचत होती है।
  9. पादप में लवणता तथा सूखे के प्रति सहनशीलता बढ़ जाती है।
  10. चीड़ के पादप कवक सम्बन्ध के अभाव में कभी-कभी सड़ जाते हैं अतः यह सम्बन्ध जंगल निर्माण में सहायक होता है।
  11. एक्टोट्रॉफिक कवक मूल के कारण बहुत से पादपों से पिथियम, फाइटोप्थोरा, फ्यूसेरियम आदि का संक्रमण नहीं हो पाता है।

प्रश्न 8.
बीटी क्या है? यह किस प्रकार कीटों के प्रति प्रतिरोधकता उत्पन्न करते हैं? समझाइए ।
उत्तर:
बीटी (Bt) एक प्रकार का जीवविष है । यह बैसीलस थुरीनजिएंसीस ( संक्षेप में बीटी) नामक जीवाणु से निर्मित होता है । बीटी जीवविष जीन जीवाणु से क्लोनीकृत होकर पौधों में अभिव्यक्त होकर कीटों (पीड़कों) के प्रति प्रतिरोधकता पैदा करता है। जिससे कीटनाशकों के उपयोग की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस तरह से जैव पीड़कनाशकों का निर्माण होता है।

उदाहरण- बीटी कपास, बीटी मक्का, धान, टमाटर, आलू आदि । बीटी कपास – बैसीलस धूरीनजिएंसीस की कुछ नस्लें ऐसे प्रोटीन का निर्माण करती हैं जो विशिष्ट कीटों जैसे-लपीडोप्टेशन (तम्बाकू की कलिका कीड़ा, सैनिक कीड़ा) कोलियोप्टेरान (भृंग) व डीप्टेरान (मक्खी, मच्छर ) को मारने में सहायक हैं। बी. थूरीनजिएंसीस अपनी वृद्धि की विशेष अवस्था में कुछ प्रोटीन रवों का निर्माण करती है।

इन रवों में विषाक्त कीटनाशक प्रोटीन होता है। यह जीवविष बैसीलस को क्यों नहीं मारता? वास्तव में बीटी जीवविष प्रोटीन, प्राक्जीव विष निष्क्रिय रूप में होता है, ज्योंही कीट इस निष्क्रिय जीव विष को खाता है, इसके रवे आंत में क्षारीय पी. एच. के कारण घुलनशील होकर सक्रिय रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।

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सक्रिय जीवविष मध्य आंत के उपकलीय कोशिकाओं की सतह से बंधकर उसमें छिद्रों का निर्माण करते हैं जिस कारण से कोशिकाएँ फूल. कर फट जाती हैं और परिणामस्वरूप कीट की मृत्यु हो जाती है। विशिष्ट बीटी जीवविष बैसीलस थुरीनजिएंसीस से पृथक् कर कई फसलों जैसे कपास में समाविष्ट किया जा चुका है। जींस का चुनाव फसल व निर्धारित कीट पर निर्भर करता है। जबकि सर्वाधिक बीटी जीवविष कीट समूह विशिष्टता पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 9.
निम्न को कारण सहित समझाइए-
(1) अस्पतालों में उबले हुए उपकरणों का प्रयोग आवश्यक है।
उत्तर:
उपकरणों को उबालने से जीवाणु इत्यादि समाप्त हो जाते हैं जिससे संक्रमण होने की संभावना नहीं रहती है।

(2) लेग्यूमिनोसी कुल के पौधे जिस खेत में उगाये जाते हैं उसकी उर्वरता बनी रहती है।
उत्तर:
लेग्यूमिनोसी कुल के पादपों की जड़ें ग्रन्थिकामय होती हैं। इन ग्रन्थियों में राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम नामक जीवाणु रहते हैं जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर भूमि की उर्वरता को बढ़ाते हैं ।

(3) ताजा तथा बिना उबला हुआ दूध खट्टा होने की सम्भावना अधिक होती है।
उत्तर:
कुछ जीवाणु दूध में उपस्थित लेक्टोस शर्करा को लेक्टिक अम्ल में किण्वित करते हैं जिससे दूध खट्टा हो जाता है, जैसे-. स्ट्रेप्टोकोकस लैक्टिस, लेक्टोबैसिलस कैसिआई, ले. एसिडोफिल्स आदि । दूध को उबालने से ये जीवाणु समाप्त हो जाते हैं तथा दूध को खट्टा होने से बचाया जा सकता है।

(4) शराब अधिक समय तक रखने पर खट्टी हो जाती है।
उत्तर:
शराब अधिक समय तक रखने पर जीवाणुओं का प्रकोप हो जाने से खट्टी हो जाती है।

(5) सड़ी-गली चीजों का सड़ते समय तापमान अधिक होता है।
उत्तर:
ये मृतोपजीवी जीवाणु होते हैं, कार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण व उपापचय क्रियाओं से ऊर्जा निकलने के कारण ताप बढ़ जाता है।

प्रश्न 10.
बायोगैस का उत्पादन करते समय किण्वन सम्बन्धी कौन-कौनसी परिस्थितियाँ बनाए रखना आवश्यक है ?
उत्तर:
बायोगैस का उत्पादन करते समय किण्वन सम्बन्धी निम्न परिस्थितियाँ बनाए रखना आवश्यक है-

  1. किण्वन पूर्णत: अवायवीय पर्यावरण में कराया जाना चाहिए और किसी भी तरह मुक्त ऑक्सीजन मौजूद नहीं होनी चाहिए।
  2. फरमेंटर (किण्वक) के भीतर pH 6.8 से 7.6 तक लगभग उदासीन (Neutral) स्तर पर बनाए रखना चाहिए।
  3. किण्वन में मीथेनजनी बैक्टीरिया उपस्थित होने चाहिए।

प्रश्न 11.
उद्योगों में इस्तेमाल किए जाने वाले महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीव के नाम लिखिए। किन्हीं पाँच उत्पादों का नाम लिखिए जिनके निर्माण में सूक्ष्मजीवों का इस्तेमाल किया जाता है।
उत्तर:
उद्योगों में इस्तेमाल किए जाने वाले महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीव इस प्रकार हैं-

  1. यीस्ट (कवक)
  2. फंफूद (कवक)
  3. जीवाणु
  4. तंतुमय बैक्टीरिया (ऐक्टिनोमायेसिटीज) ।

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सूक्ष्मजीवों को अग्र उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल किया जाता है-

  • ऐल्कोहॉल-युक्त पेय पदार्थ
  • दही
  • प्रतिजैविक
  • कार्बनिक रसायन जिनमें विटामिन, स्टीरॉइड एवं एंजाइम शामिल हैं।
  • बायोगैस ।

प्रश्न 12.
ऐसे कोई सामान्य पाँच एंटीबायोटिक लिखकर उनके स्रोत का भी नाम लिखिए।
उत्तर:
एंटीबायोटिक तथा उनके स्रोत

एंटीबायोटिकस्रोत
1. क्लोरोटेट्रासाइक्लिनस्ट्रेप्टोमाइसीज ऑरीफेसिस
2. स्ट्रेप्टोमाइसिनस्ट्रेप्टोमाइसीज ग्रीसेव्स
3. पैनिसीलिनपेनिसिलियम नोटेटम
4. सेफेलोस्पोरिनसेफेलोस्पोरियम एक्रीमोनियम
5. साइक्लोहेक्सिमाइडस्ट्पेप्टोमाइसीज ग्रीसेक्स

प्रश्न 13.
जैव उर्वरक पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा
जैव उर्वरक किसे कहते हैं? उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर:
जैव उर्वरक (Biofertilisers) – मृदा की उर्वरता बढ़ाने वाले सूक्ष्मजीवों को जैव उर्वरक अथवा बायोफर्टिलाइजर्स कहते हैं। कई नाइट्रोजन स्थायीकर जीवाणु, नीलहरित शैवालें, मूल कवकें आदि मृदा की उर्वरता बढ़ाते हैं। उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण निम्न हैं-
(1) लेग्यूम – राइजोबियम सहजीवन- फलीदार पौधों की मूलों की ग्रंथियों में निवास करने वाली राइजोबियम की जातियाँ पौधे को उपयोग करने योग्य रूप में नाइट्रोजन उपलब्ध कराती हैं।

(2) एजोला – एनाबीना सहजीवन – एजोला एक जलीय टेरिडोफाइट है जो जल की सतह पर वृद्धि करता है। इसके साथ ऐनाबीना नामक नील हरित शैवाल सहजीवी रूप में रहती है तथा पादप को नाइट्रेट उपलब्ध कराती है।

(3) मुक्तजीवी सायेनोबैक्टीरिया तथा बैक्टीरिया-रिवुलेरिया व नॉस्टॉक (नील हरित शैवाल) तथा क्लोस्ट्रीडियम व एजेटोबेक्टर (मुक्तजीवी जीवाणु) मृदा में स्वतंत्र रूप से रहते हुये वायुमण्डल की नाइट्रोजन का यौगिककरण करते हैं। आजकल जैवप्रौद्योगिकी तकनीकों के अनुप्रयोग से सूक्ष्मजीवों के नाइट्रोजन स्थिर करने वाले जीन (Nif जीन) को उच्च पादपों में स्थानांतरित करने के प्रयास जारी हैं।

प्रश्न 14.
लैग्यूमिनस पादप की जड़ों पर स्थित ग्रन्थियों को नष्ट कर दिया जाये तो पादप पर क्या प्रभाव पड़ेगा? सकारण समझाइए ।
उत्तर:
जैव उर्वरक एक प्रकार के जीव हैं, जो मृदा की पोषक गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। जैव उर्वरकों का मुख्य स्रोत जीवाणु, कवक तथा सायनोबैक्टीरिया होते हैं। लैग्यूमिनस पादपों की जड़ों पर विद्यमान ग्रन्थियों (nodules) का निर्माण राइजोबियम जीवाणु के सहजीवी संबंध द्वारा होता है। यह जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर देते हैं व पादप इसका उपयोग पोषकों के रूप में करते हैं। यदि इन पौधों से ग्रन्थियों को नष्ट कर दिया जाये तो पादप पोषक पदार्थों के अभाव में वृद्धि नहीं कर पायेंगे व धीरे-धीरे नष्ट हो जायेंगे।

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प्रश्न 15
विभिन्न पेय उत्पादन में सूक्ष्मजीवों के उपयोग को उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर:
सूक्ष्मजीव विशेषकर यीस्ट का प्रयोग प्राचीन काल से वाइन, बियर, व्हिस्की, ब्रान्डी, जिन, रम आदि पेयों के उत्पादन में किया जाता रहा है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वही यीस्ट- सैकेरोमाइसिस सिरेबिसी जो सामान्यतः बेकर्स यीस्ट के नाम से प्रसिद्ध है, ब्रेड बनाने वाले तथा माल्टीकृत धान्यों फलों के रसों में एथेनॉल उत्पन्न करने में प्रयुक्त किया जाता है। इन सभी क्रियाओं में किण्वन होता है, जिसे निम्न समीकरण द्वारा बताया जा रहा है-
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव 2
विभिन्न प्रकार के ऐल्कोहॉलीय पेय की प्राप्ति किण्वन तथा विभिन्न प्रकार के संसाधन (आसवन अथवा उसके बिना) कच्चे पदार्थों पर निर्भर करती है। शराब, बियर, सिडर, रेड वाइन, शैम्पियन, शैरी, टोड़ी आदि का उत्पादन बिना आसवन के होता है जबकि व्हिस्की, ‘ब्रान्डी तथा रम किण्वित रस के आसवन द्वारा तैयार किये जाते हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
औद्योगिक उत्पादों में सूक्ष्मजीव से क्या तात्पर्य है? पेय पदार्थ बनाने में सूक्ष्मजीव किस प्रकार हमारी मदद करते हैं? समझाइए ।
उत्तर:
औद्योगिक उत्पादों में सूक्ष्मजीव-उद्योगों में सूक्ष्मजीवियों का प्रयोग बहुत से उत्पादों के निर्माण में किया जाता है जो कि मनुष्य के लिए मूल्यवान होते हैं। मादक पेय तथा प्रतिजैविक (एंटीबॉयोटिक) इसके कुछ उदाहरण हैं । व्यावसायिक पैमाने पर सूक्ष्मजीवियों को पैदा करने के लिए बड़े बर्तन की आवश्यकता होती है जिसे किण्वक (Fermenter) कहते हैं।

सूक्ष्म जीव विशेषकर यीस्ट का प्रयोग प्राचीन काल से वाइन, बीयर, व्हिस्की, रम जैसे पेयों के उत्पादन में किया जाता आ रहा है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यीस्ट सैकेरोमाइसीज सेरीविसी (Saccharomyces cerevisiae) ब्रेड बनाने तथा माल्टीकृत धान्यों तथा फलों के रसों से ऐथनॉल उत्पन्न करने में प्रयोग किया जाता है।

किण्वन तथा विभिन्न प्रकार के संसाधन (आसवन अथवा उसके बिना) कच्चे पदार्थों पर निर्भर करती है; वाइन तथा बीयर का उत्पादन बिना आसवन के; जबकि व्हिस्की, ब्रांडी तथा रम किण्वित रस के आसवन द्वारा तैयार किये जाते हैं।

प्रश्न 2.
जीवाणु फेज क्या हैं? इनकी संरचना का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विषाणु जो जीवाणुओं को संक्रमित कर नष्ट कर देते हैं, उन्हें जीवाणुभोजी या बैक्टीरियोफेज (Bacteriophage) या संक्षेप में फेज (Phage) कहते हैं। फेज शब्द ग्रीक शब्द फेगॉस (Phagos) से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ दूसरों का भक्षण करना है। इनकी खोज ट्वार्ट एवं डी हैरेल द्वारा पृथक् रूप से की गई थी। जीवाणुभोजी जीवाणुओं की ही भाँति लगभग हर प्रकार के आवास एवं प्राकृतिक अवस्थाओं में पाये जाते हैं।

आकारिकी (Morophology) की दृष्टि से इनमें अत्यधिक असमानताएँ हैं। जीवाणुभोजी की संरचना – एक प्रारूपिक जीवाणुभोजी की संरचना टैडपोल के समान होती है, जो स्पष्ट शीर्ष एवं पुच्छ (Tail) में विभेदित होता है। अधिकांश जीवाणुभोजी (T2, T6) सिर प्रिज्माभ होता है जबकि इसकी पूँछ लम्बी एवं बेलनाकार होती है, पूँछ प्रिज्माभ सिर से जुड़ी रहती है।

इसकी सहायता से ये जीवाणु कोशिका से संलग्न होते हैं। इसकी लम्बाई लगभग सिर की लम्बाई के बराबर होती है। प्रिज्माभ सिर प्रोटीन अणुओं द्वारा बना होता है एवं इसके केन्द्रीय कोर में एक लम्बा DNA का एक वृहत् अणु होता है। सिर एवं पूँछ के मध्य एक कॉलर होती है। पूँछ के समीपस्थ छोर पर कॉलर से जुड़ी षट्कोणीय प्लेट होती है जिसे आधार प्लेट कहते हैं। आधार प्लेट की निचली सतह पर 6 पुच्छ तंतु जुड़े रहते हैं जिनकी सहायता से फेज जीवाणु की सतह से चिपका रहता है तथा इनके द्वारा स्त्रावित एन्जाइम जीवाणु की भित्ति से संलयन (Lysis) में सहायक होते हैं।
HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव 3

प्रश्न 3.
जीवाणुओं की लाभदायक गतिविधियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
हम किस प्रकार कह सकते हैं कि जीवाणु हमारे मित्र हैं? समझाइए ।
उत्तर:
लाभदायक गतिविधियाँ ( Useful activities) – बैक्टीरिया अत्यंत महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीव हैं। ये वातावरण के नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके मृदा की उर्वरता को बढ़ाते हैं, डेयरी उद्योग में दही बनाने के काम आते हैं तथा अनेक प्रमुख प्रतिजैविक भी इन्हीं से मिलते हैं। बैक्टीरिया द्वारा मनुष्य को पहुँचने वाले लाभों की सूची अग्र दी गई है-
(1) नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) – कुछ बैक्टीरिया वायुमण्डल में स्थित आणविक नाइट्रोजन को नाइट्रोजन के यौगिक में बदल देते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-

  • स्वतंत्र रूप से रहने वाले (Fire Living) -मृदा में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाले, जैसे- ऐजोटोबैक्टर, क्लॉस्ट्रीडियम आदि ।
  • सहजीवी (Symbiotic) -लेग्यूमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों की ग्रंथिकाओं में सहजीवन करने वाले, जैसे- राइजोबियम लेग्युमिनोसेर ।

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(2) नाइट्रीकरण जीवाणु (Nitrifying Bacteria) – ये दो प्रकार के होते हैं-

  • अमोनिया को नाइट्राइट (NO2) में बदल देने वाले, जैसे- नाइट्रोसोमोनास ।
  • अमोनिया को नाइट्रेट (NO3) में बदल देने वाले, जैसे- नाइट्रोबेक्टर ।

(3) अमोनीकरण (Ammonification)- ये बैक्टीरिया, प्रोटीन तथा कुछ अन्य जटिल पदार्थों को अमोनिया में बदल देते हैं, जैसे- बैसिलस माइकॉइडिस ।

(4) खाद्य श्रृंखला में (In Food Chains) – कुछ बैक्टीरिया, पौधे तथा जन्तुओं के मृत शरीर पर वृद्धि करते हैं और इन जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं। इस कारणवश मृदा में पौधों के लिए उपयोगी पोषक तत्त्व संचयित होते हैं । पौधे इन सरल अकार्बनिक तत्वों का अवशोषण करते हैं।

(5) डेयरी उद्योग में (In Dairy) – बैक्टीरिया, दूध में उपस्थित लैक्टोस (Lactose) शर्करा को लैक्टिक अम्ल में बदल देते हैं। इस कारणवश दूध खट्टा हो जाता है। इस प्रकार की किण्वन क्रिया करने वाले मुख्य बैक्टीरिया हैं स्ट्रेप्टोकोकस लैक्टिस, लैक्टोबैसिलस कैसिआई, लै. एसिडोफिलस इत्यादि ।

(6) अन्य उद्योगों में (In other Industries) – अनेक महत्त्वपूर्ण पदार्थों का निर्माण विभिन्न बैक्टीरिया की सहायता से किया जाता है। सिरका, लैक्टिक अम्ल, लाइसीन, ऐसीटोन, ब्यूटोनोल निर्माण में तथा तन्तुओं को सड़ाने व तम्बाकू एवं चाय उद्योग में बैक्टीरिया का विशेष महत्त्व है।

(7) मानव के आंत्र में सहजीवन (Symbiosis in Human Intestine)-मानव तथा अनेक कशेरुकी प्राणियों के आंत्र में एशिरिकिआ कोली ( Escherichia coli) पाया जाता है। यह बैक्टीरिया सामान्यतः हानिकारक नहीं होता और पाचन क्रियाओं में सहायक होता है।

(8) रोमन्थी प्राणियों में (In Ruminate Animals) – इन प्राणियों के रुमेन (rumen, प्रथम आमाशय) में सेलुलोस के पाचन के काम करने वाले बैक्टीरिया, जैसे- रुमिनोकोकस एल्बस इत्यादि पाये जाते हैं। ये प्राणी मुख्यतः घास चरते हैं परन्तु घास के सेलुलोस को केवल उनके रुमेन में पाये जाने वाले बैक्टीरिया ही अपघटित कर सकते हैं।

(9) प्रतिजैविक अथवा ऐन्टिबायोटिक (Antibiotics) – ये जीवधारियों के उपापचयी व्युत्पन्न होते हैं। किसी अन्य सूक्ष्म बैक्टीरिया के लिए हानिकारक अथवा निरोधी ( inhibitory ) होते हैं। प्रतिजैविक प्रतियोगिता निरोध (competitive inhibition ) द्वारा रोगों को ठीक करते हैं। अधिकतर प्रतिजैविक, बैक्टीरिया से ही प्राप्त होते हैं।

(10) मल व्यवस्था ( Sewage Oxidation) – कृत्रिम जलाशयों में मलमूत्र इत्यादि एकत्रित करके बैक्टीरिया द्वारा उनका ऑक्सीकरण किया जाता है। इस क्रिया में निकलने वाली CO2 शैवाल उपयोग में ले जाते हैं। और यह शैवाल ऑक्सीजन छोड़ते हैं। यह ऑक्सीजन मलमूत्र के ऑक्सीकरण में उपयोगी होती है। शैवाल तथा बैक्टीरिया, मलव्यवस्था ताल (Sewage pond) में सहजीविता ( Symbiosis) दिखाते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. निम्न में से वाहित मल उपचार के लिए अवायवीय अपांक संपाचित्र में डाला जाता है- (NEET-2020)
(अ) तैरते हुए कूड़े-करकट
(ब) प्राथमिक उपचार के लिए वहिःसाव
(स) संक्रियीत अपांक
(द) प्राथमिक अपांक
उत्तर:
(स) संक्रियीत अपांक

2. निम्न स्तम्भों का मिलान कीजिए- (NEET-2020)

स्तम्भ-Iस्तम्भ-II
1. क्लोस्ट्रीडियम ब्यूटायलिकम(i) साइक्लोस्पेरिन
2. टाइकोडर्मा पॉलीस्पोरम(ii) ब्यूटिरिक अम्ल
3. मोनास्कस परप्यूरीअस(iii) सिट्रिक अम्ल
4. एस्चरजिलस नाइगर(iv) रक्त-कोलेस्टेरोल कम करने वाला कारक
विकल्प :1234
(अ)(ii)(i)(iv)(iii)
(ब)(i)(ii)(iv)(iii)
(स)(iv)(iii)(ii)(i)
(द)(iii)(iv)(ii)(i)

उत्तर:

(अ)(ii)(i)(iv)(iii)

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3. निम्नलिखित में से किसे जैव नियंत्रण के एक कारक के रूप में पादप रोग उपचार के लिए उपयोग किया जा सकता है? (NEET-2019)
(अ) लैक्टोवेसीलस
(ब) ट्राइकोडर्मा
(स) क्लोरेला
(द) एनाबीना
उत्तर:
(ब) ट्राइकोडर्मा

4. निम्न में से कौन रुधिर कॉलेस्ट्राल कम करने वाला व्यावसायिक कारक है?
(NEET-2019)
(अ) लाइपेज
(ब) साइक्लोस्पोरीन
(स) स्टैनिन
(द) स्ट्रेप्टोकाइनेज
उत्तर:
(स) स्टैनिन

5. दूध के दही में रूपान्तरण से इसकी अच्छी पोषक क्षमता किसकी वृद्धि के कारण होता है? (NEET-2018)
(अ) विटामिन B12
(ब) विटामिन A
(स) विटामिनD
(द) विटामिन E
उत्तर:
(अ) विटामिन B12

6. बेमेल चुनिए- (NEET-2017)
(अ) फ्रंकिया – एलनस
(ब) रोडोस्पायरलम – कवकमूल
(स) एनाबीना – नाइट्रोजन स्थायीकारक\
(द) राइजोवियम-एल्फाएल्फा
उत्तर:
(ब) रोडोस्पायरलम – कवकमूल

7. निम्नलिखित में से कौनसा वाहितमल उपचार में निलम्बित हुए ठोसों को निकालता है? (NEET-2017)
(अ) तृतीयक उपचार
(ब) द्वितीयक उपचार
(स) प्राथमिक उपचार
(द) अपांक उपचार
उत्तर:
(स) प्राथमिक उपचार

8. निम्न में कौन उसके द्वारा उत्पन्न उत्पाद के साथ उचित रूप से मेलित है- (NEET-2017)
(अ) एसीटोवेक्टर : प्रतिजैविक
(ब) मीथोमोबैक्टीरियम : लैक्टिक अम्ल
(स) पेनीसिलीयम नोटेटम : एसीटिक अम्ल
(द) सैकरोसाइसीटीज सैरीवीसी : एथेनॉल
उत्तर:
(द) सैकरोसाइसीटीज सैरीवीसी : एथेनॉल

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9. नीचे दी गई तालिका में गलत मिलाई गई मदों को चुनिए- (NEET-2016)

विकल्प :सूक्ष्मजीवउत्पादअनुप्रयोग
(अ)स्ट्रेप्टोकॉकसस्ट्रेप्टोकाइनेजरुधिर वाहिका से थक्का को हटाना
(ब)क्लॉस्ट्रीडियमलाइपेजतेल के धब्बों को हटाना
(स)ट्राइकोडर्मा पोलीस्पोरमसाइक्लोस्पोरिन – Aप्रतिरक्षा संदमक औषधि
(द)मौनेस्कस परप्यूरियसस्टेटिंसरुधिर कॉलेस्ट्रोल को कम करना

उत्तर:
(ब)

10. कॉलम-I और कॉलम-II के बीच मिलान कीजिए- (NEET-2016)

कॉलम-Iकॉलम-II
1. सिट्रिक अम्ल(i) ट्राइकोडर्मा
2. साइक्लोस्पोरिन(ii) क्लास्ट्रिडियम
3. स्टेनिन(iii) ऐस्परिजिलस
4. ब्यूटाइरिक अम्ल(iv) मौनेस्कस
विकल्प :1234
(अ)(i)(iv)(ii)(iii)
(ब)(iii)(iv)(i)(ii)
(स)(iii)(i)(ii)(iv)
(द)(iii)(i)(iv)(ii)

उत्तर:

(द)(iii)(i)(iv)(ii)

11. वह कौनसा शैवाल है जिसे मानव के लिए खाद्य के रूप में नियोजित किया जा सकता है- (NEET-2014)
(अ) यूलोथ्रिक्स
(ब) क्लोरेला
(स) स्पाइरोगायरा
(द) पालिसाइफोनिया
उत्तर:
(ब) क्लोरेला

12. निम्नलिखित में से कौनसे कवक में हेलोसिनोजन होते हैं- (NEET-2014)
(अ) मारकेला एस्कुलेन्टा
(ब) अमानीरा मास्कादिया
(स) न्यूरोरचोरा जाति
(द) अस्टीलेगो जाति
उत्तर:
(ब) अमानीरा मास्कादिया

13. सिट्रिक अम्ल का अच्छा उत्पादक कौनसा है- (NEET-2013)
(अ) एस्चरजिलस
(ब) स्यूडोमोनास
(स) क्लॉस्ट्रीडियम
(द) सैकेरोमाइसीज
उत्तर:
(अ) एस्चरजिलस

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

14. जल-मल के उपचार के दौरान विभिन्न बायो गैसें उत्पन्न होती हैं, जिनमें शामिल हैं- (NEET-2013)
(अ) मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड, कार्बनडाइऑक्साइड
(ब) मीथेन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजनसल्फाइड
(स) हाइड्रोजनसल्फाइड, मीथेन सल्फरडाइऑक्साइड
(द) हाइड्रोजनसल्फाइड, नाइट्रोजन, मीथेन
उत्तर:
(अ) मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड, कार्बनडाइऑक्साइड

15. धान के खेतों में एजोला के साथ साहचर्य बनाता हुआ एक नाइट्रोजन यौगीकरण जीवाणु कौनसा है- (NEET-2012)
(अ) स्पाइरूलाइना
(ब) ऐनाबीना
(स) फ्रेन्किया
(द) टोलीपेश्रिक्स
उत्तर:
(ब) ऐनाबीना

16. गोबर गैस में सबसे अधिक मात्रा किसकी होती है? (Mains-2012)
(अ) ब्यूटेन
(ब) मीथेन
(स) प्रोपेन
(द) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर:
(ब) मीथेन

17. निम्नलिखित में से कौनसा एक जैव उर्वरक नहीं है? (NEET-2011)
(अ) एग्रोबेक्टिरियम
(ब) राइजोवियम
(स) नॉस्टॉक
(द) माइकोराइजा
उत्तर:
(अ) एग्रोबेक्टिरियम

18. मिथेनोजन कहे जाने वाले जीव प्रचुर मात्रा में कहाँ पाए जाते हैं? (NEET-2011)
(अ) गंधक की चट्टानों
(ब) मवेशी बाड़ा
(स) प्रदूषित सरिता
(द) उष्म झरने
उत्तर:
(ब) मवेशी बाड़ा

19. जैविक ऑक्सीजन आवश्यकता (Biological Oxygen Demand) एक माप है- (RPMT-2010)
(अ) जल स्रोतों में उड़ेले गये औद्योगिक अपशिष्टों की
(ब) जैविक यौगिकों द्वारा प्रदूषित जल के विस्तार की
(स) पृथक् न होने योग्य कार्बन मोनोऑक्साइड की हीमोग्लोबिन युक्त मात्रा
(द) रात्रि में हरे पौधों को आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा
उत्तर:
(द) रात्रि में हरे पौधों को आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा

20. जैव गैस उत्पादन में प्रयुक्त जीवाणु समूह है- (BSEB-2010)
(अ) यूबैक्टिरिया
(ब) आर्गेनोट्राॅफ
(स) मीथेनोट्रॉफ
(द) मेथेनोजन
उत्तर:
(द) मेथेनोजन

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

21. सर्वाधिक एन्टीबायोटिक्स किससे प्राप्त किये जाते हैं- (MP PMT-2009)
(अ) बेसिलस द्वारा
(ब) पेनिसिलियम द्वारा
(स) स्ट्रेप्टोमायसिसं द्वारा
(द) सिफेलोस्पोरियम द्वारा
उत्तर:
(अ) बेसिलस द्वारा

22. निम्न में सहजीवी नाइट्रेजन स्थिरीकरण है- (CBSE PMT-2009)
(अ) एजेटेबैक्टर
(ब) फ्रेंकिया
(स) एजोला
(द) ग्लोमस
उत्तर:
(ब) फ्रेंकिया

23. निम्न में से किसका प्रयोग जैव कीटनाशी के रूप में नहीं किया जाता है- (CBSE PMT-2009)
(अ) ट्राइकोडर्मा हाराजिए्सिस
(ब) न्यूक्लियर पॉलीहेड्रोसिस वायरस (NPV)
(स) जैन्थोमोनास कैस्पेस्ट्रिस
(द) बेसीलस थूरिज्जिएन्सिस
उत्तर:
(ब) न्यूक्लियर पॉलीहेड्रोसिस वायरस (NPV)

24. लेक्टिक अम्ल जीवाणु (LAB) उचित तापक्रम पर दूध को दही में बदल देता है जिससे उसकी पोषक गुणवत्ता में निम्न में से कौन-सा विटामिन बढ़ जाता है- (AMU-2009)
(अ) A
(ब) B
(स) C
(द) D
उत्तर:
(ब) B

25. ऐलनस की मूल ग्रंथिकाओं में नाइट्रोजन स्थिरीकरण किसके द्वारा सम्पन्न होता है? (NEET-2008)
(अ) फ्रेन्किया
(ब) एजोराइजोवियम
(स) ब्रैडीराइजोवियम
(द) क्लास्ट्रीडियम
उत्तर:
(अ) फ्रेन्किया

26. ट्राइकोडर्मा हैर्जिएनम किस एक के लिए एक उपयोगी सूक्ष्म जीव सिद्ध हो चुका है? (NEET-2008)
(अ) उच्चतर पौधों में जीन स्थानान्तरण
(ब) मृदावाही पादप रोगजनकों के जैवकीय नियंत्रण
(स) सदूषित मृदाओं का जैवोपचार
(द) बंजर भूमि का पुनरुद्धार
उत्तर:
(ब) मृदावाही पादप रोगजनकों के जैवकीय नियंत्रण

27. प्रोबायोटिक्स (NEET-2007)
(अ) सजीव सूक्ष्मजीवीय खाद्य सम्पूरक
(ब) सुरक्षित एंटीबायोटिक्स
(स) कैंसर प्रेरक सूक्ष्मजीव
(द) नये प्रकार के खाद्य पदार्थ
उत्तर:
(अ) सजीव सूक्ष्मजीवीय खाद्य सम्पूरक

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30. स्ट्रैप्टोमाइसिन उत्पादित की जाती है- (BHU-2006)
(अ) स्ट्रेप्टोमाइसिस स्कोलियस द्वारा
(ब) स्ट्रेप्टोमाइसिस फ्रेडी द्वारा
(स) स्ट्रेप्टोमाइसिस वैनेजुएली द्वारा
(द) स्ट्रेप्टोमाइसिस ग्रीसिअस द्वारा
उत्तर:
(स) स्ट्रेप्टोमाइसिस वैनेजुएली द्वारा

31. ऐल्कोहॉल का किण्वन किसकी उपस्थिति में होता है- (RPMT-2006)
(अ) माल्टेज
(ब) जाइमेज
(स) एमाइलेज
(द) इन्वरटेज
उत्तर:
(ब) जाइमेज

32. बीयर बनाने में किण्वन (Fermentation) प्रक्रम के दौरान किस कच्चे पदार्थ का उपयोग किया जाता है- (Orissa JEE-2005)
(अ) सब्जियों का मण्ड
(ब) अनाजों का मण्ड
(स) फलों की शर्करा
(द) दालों की प्रोटीन
उत्तर:
(ब) अनाजों का मण्ड

33. बैसीलस थूरिन्जियन्सिस (Bt) प्रभेद का प्रयोग किया गया है- (CBSE-2005)
(अ) बायो-मैटालर्जिक तकनीक के लिए
(ब) बायो-मिनरेलाइजेशन प्रोसेस के लिये
(स) बायो-इन्सेक्टीसाइडल पौधों के लिए
(द) जैविक उर्वरकों के लिए
उत्तर:
(स) बायो-इन्सेक्टीसाइडल पौधों के लिए

34. एजोला का किसके साथ सहजीवी संबंध होता है- (CBSE-2004)
(अ) क्लोरेला
(ब) एनाबीना
(स) नोस्टोक
(द) टोलीपोश्रिक्स
उत्तर:
(ब) एनाबीना

35. Nif जीन पाया जाता है- (CPMT-2004)
(अ) पेनीसीलियम में
(ब) राइजोबियम में
(स) एस्परजिलस में
(द) स्ट्रैप्टोकोकस में
उत्तर:
(ब) राइजोबियम में

36. निम्नलिखित में से किसका उपयोग ब्रेड (bread) बनाने में होता है- (MP PMT-2004)
(अ) राइजोपस स्टोलोनीफर
(ब) जाइगोसैकरो माइसीज
(स) सैकेरोमाइसीज सेरेविसी
(द) सैकेरोमाइसीज लुडबीजाई
उत्तर:
(स) सैकेरोमाइसीज सेरेविसी

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37. स्ट्रैप्टोकॉकस किसके निर्माण में उपयोग किया जाता है- (BVP-2004)
(अ) वाइन (Wine)
(ब) ब्रेड (bread)
(स) चीज (Cheese)
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(स) चीज (Cheese)

38. निम्न में से कौनसे जीव का उपयोग रोक्यूफॉर्ट (Roquefort) पनीर को बनाने में किया जाता है- (BHU-2004)
(अ) म्युकर
(ब) राइजोपस
(स) एस्परजिलस
(द) पेनिसिलियम
उत्तर:
(द) पेनिसिलियम

39. ऐल्कोहॉलीय किण्वन के लिये कौन-सा जीवधारी प्रयोग किया जाता है- (MHCET-2004)
(अ) पेनिसिलियम (Penicillium)
(ब) स्यूडोमोनॉस (Pseudomonas)
(स) एस्पराजिलस (Aspergilus)
(द) सैकेरोमाइसीज (Saccharomyces)
उत्तर:
(द) सैकेरोमाइसीज (Saccharomyces)

40. गुंथे हुए आटे को पूरी रात गर्म वातावरण में रखने पर यह मुलायम एवं स्पंजी क्यों हो जाता है- (CBSE PMT-2004)
(अ) संसंजन (Cohesion) के कारण
(ब) परासरण
(स) वायुमण्डल में CO2 के अवशोषण के कारण
(द) किण्वन के कारण
उत्तर:
(द) किण्वन के कारण

41. इथाइल ऐल्कोहॉल व्यावसायिक रूप से किससे निर्मित होता है- (BHU-2004)
(अ) गेहूं
(ब) अंगूर
(स) मक्का
(द) गन्ना
उत्तर:
(द) गन्ना

42. स्ट्रेप्टोकोकस का प्रयोग तैयार करने में किया जाता है- (CBSE-2003)
(अ) वाइन
(ब) इडली
(स) पनीर
(द) ब्रेड
उत्तर:
(स) पनीर

43. एन्टीबायोटिक शब्द् सर्वप्रथम प्रयोग किया- (CBSE-2003)
(अ) फ्लेमिंग ने
(ब) पाश्चर ने
(स) वाक्समेन ने
(द) लिस्टर ने
उत्तर:
(स) वाक्समेन ने

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

44. पनीर तथा योगर्ट किस प्रक्रिया के उत्पाद हैं- (MP PMT-2003)
(अ) आसवन
(ब) पाश्चुराइजेशन
(स) किण्वन
(द) निर्जलीकरण
उत्तर:
(स) किण्वन

45. प्राचीनकाल में पनीर या चीज (Cheese) बनाई जाती थी- (BVP-2003)
(अ) एस्परजिलस के उपयोग से
(ब) रेनेज एन्जाइम के उपयोग से
(स) क्लॉस्ट्रीडियम जीवाणु के उपयोग से
(द) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ब) रेनेज एन्जाइम के उपयोग से

46. पनीर उद्योग में उपयोग आने वाला रेनिन क्या होता है- (BVP-2002)
(अ) प्रतिजैविक (Antibiotic)
(ब) एल्केलॉएड (Alkaloid)
(स) जैव उत्प्रेरक (Biocatalyst)
(द) संदमक (Inhibitor)
उत्तर:
(स) जैव उत्प्रेरक (Biocatalyst)

47. स्वतंत्रजीवी अवायवीय नाइट्रोजन स्थिरीकारी जीवाणु है- (MP PMT-2002)
(अ) राइजोबियम
(ब) स्ट्रैप्टोकोकस
(स) एजोटोबैक्टर
(द) क्लॉस्ट्रीडियम
उत्तर:
(द) क्लॉस्ट्रीडियम

48. सिट्रिक अम्ल का उत्पादन होता है- (CBSE-2002)
(अ) राइजोपस से
(ब) म्यूकर से
(स) एस्परजिलस से
(द) सैकरोमाइसिस से
उत्तर:
(अ) राइजोपस से

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 10 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव

49. नॉस्टॉक में नाइट्रोजिनेज एन्जाइम पाया जाता है- (MP PMT-2001)
(अ) वर्धी कोशिकाओं में
(ब) हेटरोसिस्ट में
(स) दोनों ‘अ’ व ‘ब’ में
(द) केवल हार्मोगोन्स में
उत्तर:
(ब) हेटरोसिस्ट में

50. सायनोबैक्टीरिया के लिये यह सही है कि- (CBSE-2001)
(अ) ऑक्सीजन उत्पादी व नाइट्रीकारी है
(ब) ऑक्सीजन उत्पादी व अनाइट्रीकारी है
(स) अ-ऑक्सीजन उत्पादी व नाइट्रीकारी है
(द) अ-ऑक्सीजन उत्पादी व अनाइट्रीकारी है
उत्तर:
(अ) ऑक्सीजन उत्पादी व नाइट्रीकारी है

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HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

Haryana State Board HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

बहुविकल्पीय प्रश्न:

1. निम्नलिखित में से किस धातु का निक्षालन (निष्कर्षण) सायनाइड विधि द्वारा किया जाता है?
(अ) सोडियम
(ब) सिल्वर
(स) ऐलुमिनियम
(द) कॉंपर
उत्तर:
(ब) सिल्वर

2. निम्नलिखित अभिक्रिया धातुओं के शोधन की किस विधि से सम्बन्धित है?
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 1
(अ) मंडल परिक्करण
(ब) वॉन-आरकलल विधि
(स) मान्ड प्रक्रम
(द) वर्णलेखिकी
उत्तर:
(ब) वॉन-आरकलल विधि

3. निम्नलिखित में से कौनसा यौगिक ऐलुमिनियम का अयस्क है?
(अ) Al2O3
(ब) Na3AlF6
(स) Al2O3 . H2O
(द) Al2O3 . 2H2O
उत्तर:
(द) Al2O3 . 2H2O

4. भूपर्पटी में सबसे अधिक मात्रा में पायी जाने वाली धातु है-
(अ) Mg
(ब) Ag
(स) Al
(द) Cu
उत्तर:
(स) Al

5. अयस्कों के सान्द्रण की फेन (झाग) प्लवन विधि कौनसे अयस्कों के लिए प्रयुक्त होती है?
(अ) कार्बोनेट अयस्क
(ब) सल्फाइड अयस्क
(स) औंक्साइड अयस्क
(द) हेलाइड अयस्क
उत्तर:
(ब) सल्फाइड अयस्क

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

6. सल्फाइड अयस्कों को ऑक्साइड में परिवर्तित करने का प्रक्रम है-
(अ) निस्तापन
(ब) भर्जंन
(स) निक्षालन
(द) फेन प्लवन विधि
उत्तर:
(ब) भर्जंन

7. कॉपर के धातु कर्म में FeO की अशुद्धि को हटाने के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला गालक है-
(अ) CaO
(ब) CaCO3
(स) SiO2
(द) Cu2S
उत्तर:
(स) SiO2

8. जिंक ऑक्साइड के अपचयन के लिए कौनसा अपचायक प्रयुक्त किया जाता है?
(अ) CO
(ब) कोक
(स) Al
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ब) कोक

9. पीतल बनाने में प्रयुक्त धातुएँ है-
(अ) Cu + Ni
(ब) Fe + Cu
(स) Cu + Zn
(द) Cu + Mn
उत्तर:
(स) Cu + Zn

10. निम्नलिखित में से मैग्नेटाइट अयस्क कौनसा है?
(अ) Fe2O3
(ब) ZnO
(स) Na3AlF6
(द) Fe3O4
उत्तर:
(द) Fe3O4

11. जिंक धातु के शोधन की विधि है-
(अ) मंडल परिष्करण
(ब) प्रभाजी आसवन
(स) वाष्म अवस्था परिष्करण
(द) वैद्युत अपघटनी शोधन
उत्तर:
(ब) प्रभाजी आसवन

12. कैलामाइन, निम्नलिखित में से किस धातु का अयस्क है?
(अ) Cu
(ब) Ag
(स) Zn
(द) Al
उत्तर:
(स) Zn

13. धातकर्म में निस्तान प्रत्रम किस प्रक्र है अयस्कों के लिए प्रयुक्त नहाँ होत है?
(अ) कलयेज्ञित औक्साइड
(ब) काबनिद
(स) सक्फाइड
(द) उपर्वुक्त सभी
उत्तर:
(स) सक्फाइड

14. मंड्डल परिफ्राग किजि किस शतु के शोधन के लिए प्रदुम्त्त की जाती है?
(अ) जम्निनिम्म
(ब) गैलिखम
(स) इंध्यिम
(द) उर्ज्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उर्ज्युक्त सभी

15. Al2O3 के वैद्युत अपषटन से Al प्राप्त करने की सिधि है-
(अ) मौन्ड प्रक्रम
(ब) बॉन-असक्त विधि
(स) सल- हेराएट प्रक्म
(द) मदल बिंजि
उत्तर:
(स) सल- हेराएट प्रक्म

16. नौतय, निम्नलिखित में से किसका सुनि है?
(अ) Cu
(ब) Al
(स) Zn
(द) Fe
उत्तर:
(ब) Al

17. कौपर के बैद्युत अपषटनी शोधन में सौने की कुछ माता किस हूप में मिलती है?
(अ) कैषेड
(ब) वैद्युत अनबटृद
(स) श्नोड मंक
(द) कैराड पंक
उत्तर:
(स) श्नोड मंक

18. निम्नलिखित में से किस धात्व के पहुकार्म में दर्मद्ध किधि का प्रयोग किवा जाता है?
(अ) Ag
(ब) Pb
(स) Fe
(द) Cr
उत्तर:
(द) Cr

19. मोडिवम के निबर्बें की किषि है-
(अ) केषर की विधि
(ब) धर्नाइट विधि
(स) द्वॉक की विधि
(द) सर्पक की विधि
उत्तर:
(ब) धर्नाइट विधि

20. चौड़ी के धातुकर्म में बना वौगिक है-
(अ) AgCN
(ब) [Na[Ag(CN)2]
(स) Na3[Ag(CN)4]
(द) वपर्वुक्त समी
उत्तर:
(ब) [Na[Ag(CN)2]

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

21. धातुं के सल्पद्ड अवस्कों को समान्यक् फेन सबन बिधि दूरा सान्हित किय जल है। निम्नलिखित सार्फाइड अवस्कों में से कौनसा अपवाद है गिले रासायनिक विषिए त्वरा सन्द्रित किया ज्ञाता है?
(अ) अजेंन्टम्ट
(ब) गैलेना
(स) कापर घझढ़्ट
(द) सेलेरइट
उत्तर:
(द) सेलेरइट

22. गालक, अगतनीय अथृद्धियों को गलाइए बनात है-
(अ) अधत्री
(ब) धतुमाल
(सं) मैट
(द) मैट्रिक्य
उत्तर:
(ब) धतुमाल

23. कॉचर के निद्रांग में कौन अयस्क को सिलिक तथा क्षेक दूरा है। घतुमल क अगुसात्र है-
(अ) FeSiO3
(ब) Fe2O3
(स) FeSi ( वोस)
(द) FeSi (बाल)
उत्तर:
(अ) FeSiO3

24. निम्नलिखित कपनों में से गसत क्षच को पहचानिदे-
(अ) अयन्त के सान्दूर में द्रवीब धवन से हूके कैं के कर जल के साध बहकर बाहर निकल वाते हैं तथा अ्यस्क के भागी का शोष चर ज्ञाते हैं।
(ब) श्रद्ध Al2O3 को, बौक्साद्ट अपस्क का सान सोडियम लम्ड्रौस्सद्ड के संथ निषालन से प्राप्त कहीं किपा व्या सकत है।
(स) फेन प्लवन विधि के दौरन अयस्क के कण को फेन के रूप में अलग कर लिया जाता है और गैंग शेष बचा रहता है।
(द) सल्फाइड अयस्कों को, फेन-प्लवन विधि में तेल तथा जल का अनुपात परिवर्तित करके सफलतापूर्वक अलग किया जा सकता है।
उत्तर:
(ब) श्रद्ध Al2O3 को, बौक्साद्ट अपस्क का सान सोडियम लम्ड्रौस्सद्ड के संथ निषालन से प्राप्त कहीं किपा व्या सकत है।

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1.
प्रकृति में मुक्त अवस्था में पाई जाने वाली तीन धातुएँ बताइए।
उत्तर:
सोना, चाँदी तथा प्लेटिनम।

प्रश्न 2.
सान्द्रण की फेन प्लवन विधि किस प्रकार के अयस्कों के लिए प्रयुक्त की जाती है?
उत्तर:
सल्फाइड अयस्कों के लिए।

प्रश्न 3.
गालक किसे कहते हैं?
उत्तर:
वे पदार्थ जो अशुद्धियों के गलनांक को कम करने के लिए प्रगलन प्रक्रम में मिलाए जाते हैं, उन्हें गालक कहते हैं।

प्रश्न 4.
धातुमल क्या होता है?
उत्तर:
अशुद्धि तथा गालक की क्रिया से बना पदार्थ धातुमल या कीट कहलाता है। इसका गलनांक कम होने के कारण यह आसानी से पिघल जाता है।

प्रश्न 5.
आधात्री या गैंग किसे कहते हैं?
उत्तर:
अयस्क के साथ उपस्थित अवांछनीय पदार्थों जैसे कंकड़, रेत तथा मिट्टी को आधात्री या मैट्रिक्स कहते हैं।

प्रश्न 6.
प्लवन कारक किसे कहते हैं?
उत्तर:
वे पदार्थ जो सल्फाइड अयस्क के कणों को जल प्रतिकर्षी बनाकर जल की सतह पर लाते हैं, उन्हें प्लवन कारक कहते हैं।

प्रश्न 7.
प्लवन कारकों के दो उदाहरण बताइए।
उत्तर:
सोडियम एथिल जेन्थेट तथा सोडियम ऐमिल जेन्थेट प्लवन कारक होते हैं।

प्रश्न 8.
किस प्रकार के अयस्कों के लिए निस्तापन प्रक्रम की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
जलयोजित ऑक्साइड, कार्बोनेट तथा हाइड्रॉक्साइड अयस्कों के लिए निस्तापन प्रक्रम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 9.
थर्माइट क्या होता है?
उत्तर:
धातु ऑक्साइड तथा ऐलुमिनियम चूर्ण के मिश्रण को थर्माइट कहते हैं।

प्रश्न 10.
क्रोमियम के ऑक्साइड (Cr2O3) के अपचयन के लिए कार्बन के स्थान पर Al का प्रयोग किया जाता है, क्यों?
उत्तर:
Cr की ऑक्सीजन से बन्धुता, कार्बन की ऑक्सीजन से बन्धुता की तुलना में अधिक होती है, अतः क्रोमियम ऑक्साइड का अपचयन कार्बन के बजाय Al से किया जाता है।

प्रश्न 11.
पायरोधातुकर्म या तापीय अपचयन क्या होता है?
उत्तर:
धातु ऑक्साइडों को गर्म करके धातु में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को पायरोधातुकर्म कहते हैं।

प्रश्न 12.
वर्णलेखिकी के विभिन्न प्रकार बताइए।
उत्तर:
वर्णलेखिकी मुख्यतः चार प्रकार की होती है-

  • पेपर वर्णलेखिकी
  • स्तंभ वर्णलेखिकी
  • गैस वर्णलेखिकी
  • पतली परत वर्णलेखिकी।

प्रश्न 13.
स्तंभ वर्णलेखिकी में प्रयुक्त अधिशोषक बताइए।
उत्तर:
ऐलुमिना जेल (Al2O3)

प्रश्न 14.
कॉपर का शोधन किस विधि द्वारा किया जाता है?
उत्तर:
कॉपर का शोधन वैद्युत अपघटनी विधि से किया जाता है।

प्रश्न 15.
सिलिकॉन के शोधन की विधि का नाम बताइए।
उत्तर:
मण्डल परिष्करण विधि।

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

प्रश्न 16.
कॉपर तथा मैग्नीशियम के मिश्रण में से इन धातुओं को किस विधि द्वारा पृथक् किया जाता है तथा क्यों?
उत्तर:
Mg तथा Cu के मिश्रण में से इन धातुओं को द्रवण विधि द्वारा पृथक् किया जाता है क्योंकि Mg की तुलना में Cu का गलनांक उच्च होता है।

प्रश्न 17.
जिंक तथा आयस के मिश्रण के पुथक्करण की विधि बताइए।
उत्तर:
Zn तथा Fe के मिश्रण को आसवन विधि द्वारा पृथक् किया जाता है क्योंकि Zn का वाष्पीकरण सुगमता से हो जाता है।

प्रश्न 18.
थर्माइट विधि द्वारा कौनसे धातु ऑक्साइडों का अपचयन किया जाता है?
उत्तर:
Cr2O3, MnO2 इत्यादि।

प्रश्न 19.
प्रगलन की प्रक्रिया कौनसी भट्टी में की जाती है?
उत्तर:
वात्या भट्टी।

प्रश्न 20.
Zn, Cd तथा Hg के शोधन के लिए कौनसी विधि प्रयुक्त की जाती है?
उत्तर:
आसवन विधि।

लघूत्तरात्मक प्रश्न:

प्रश्न 1.
भर्जन प्रक्रम को समझाइए।
उत्तर:
भर्जन (Roasting)-इस प्रक्रम में सल्फाइड अयस्कों को वायु (O2) की उपस्थिति में धातु के गलनांक से नीचे के ताप पर परावर्तनी भट्टी में तेजी से गर्म करते हैं जिससे सल्फाइड, ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं तथा SO2 गैस निकल जाती है।
उदाहरण-
2Cu2S + 3O2 → 2Cu2O + 2SO2
2Pbs + 3O2 → 2Pbo + 2SO2
2Zns + 3O2 → 2Zno + SO2

प्रश्न 2.
धातु ऑक्साइडों के अपचयन की थर्माइट विधि को समझाइए।
उत्तर:
धातु ऑक्साइड का धातु में अपचयन – धातु ऑक्साइड का धातु में अपचयन विभिन्न विधियों द्वारा किया जा सकता है जो कि धातु ऑक्साइड की प्रकृति पर निर्भर करता है।

(i) रासायनिक अपचयन (प्रगलन ) – इस विधि में धातु ऑक्साइड का अपचयन कार्बन या CO द्वारा किया जाता है। यह प्रक्रम वात्या भट्टी में किया जाता है, जिसके लिए धातु ऑक्साइड, कार्बन (अपचायक) तथा गालक (फ्लक्स) के मिश्रण को भट्टी में डालकर गर्म किया जाता है तो कार्बन द्वारा धातु ऑक्साइड के अपचयन से धातु प्राप्त होती है जो कि द्रवित अवस्था में होती है। कुछ धातु ऑक्साइड आसानी से अपचयित हो जाते हैं, जबकि कुछ को अपचयित करना कठिन होता है। अपचयन की सामान्य अभिक्रिया निम्नलिखित है-

MxOy + yC → xM + yCO

ऊष्मागतिकी की मूल धारणाएँ धातुकर्मीय परिवर्तनों के सिद्धान्त को समझने में सहायक होती हैं। तापीय अपचयन (पायरो धातुकर्म) के लिए आवश्यक ताप परिवर्तन तथा ऑक्साइड के अपचयन के लिए आवश्यक अपचायक की पहचान गिब्ज ऊर्जा द्वारा की जाती है। इसके लिए यह आवश्यक है कि दिए गए ताप पर गिब्ज ऊर्जा का मान ऋणात्मक हो।
उदाहरण- Fe के धातुकर्म में होने वाली अभिक्रियाएँ-

Fe2O3 + 3C → 2Fe + 3CO
Fe2O3 + CO → 2FeO + CO2
FeO + CO → Fe + CO2

इस प्रक्रम में कार्बन (कोक) ईंधन तथा अपचायक दोनों का कार्य करता है। धातु के साथ उपस्थित अशुद्धियों का गलनांक उच्च होने के कारण वे आसानी से नहीं पिघलतीं अतः इनके गलनांक को कम करने के लिए फ्लक्स या गालक मिलाया जाता है जो अशुद्धि के साथ क्रिया करके धातुमल (slag) बनाता है, यह आसानी से पिघल जाता है तथा हल्का होने के कारण द्रवित धातु की सतह पर तैरता है। आयरन के धातुकर्म में SiO2 की अशुद्धि होती है जिसके लिए गालक के रूप में CaO(CaCO3) प्रयुक्त किया जाता है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 2
ताँबे के धातुकर्म में FeO की अशुद्धि उपस्थित होने पर SiO2 को गालक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 3
ताँबा, कॉपर मेट के रूप में प्राप्त होता है जिसमें Cu2S तथा FeS होता है।

(ii) थर्माइट विधि (गोल्डश्मिट विधि) या एलुमिनोतापी Cr तथा Mn के ऑक्साइड कार्बन द्वारा आसानी से अपचयित नहीं होते अतः इनका अपचयन सक्रिय धातुओं जैसे Al से किया जाता है। धातु ऑक्साइड तथा ऐलुमिनियम चूर्ण के मिश्रण को थर्माइट कहते हैं। अतः इस विधि को थर्माइट विधि भी कहते हैं। इस विधि में ऑक्साइड को ऐलुमिनियम चूर्ण के साथ Mg से जलाते हैं। प्रक्रिया ऊष्माक्षेपी होती है, अतः यह स्वतः चलती रहती है।
Cr2O3 + 2 Al → Al2O3 + 2Cr + x K. Cal
3 MNO2 + 4Al → 2Al2O3 + 3Mn + x K.Cal
भारी धातु (द्रव) नीचे रहती है तथा द्रवित Al2O3 ऊपर की तरफ रहता है, जिसे टेपिंग होल द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

प्रश्न 3.
(a) कच्चे लोहे तथा ढलवाँ लोहे का संघटन बताइए तथा कच्ये लोहे से ढलवाँ लोहा किस प्रकार प्राप्त किया जाता है?
(b) ढलवाँ लोहे से पिटवाँ लोहा कैसे बनाया जाता है?
उत्तर:
(a) कच्चे लोहे में 4% कार्बन तथा सूक्ष्म मात्रा में S, P, Si तथा Mn की अशुद्धियाँ होती हैं। इसे विभिन्न आकृतियों में ढाला जा सकता है। ढलवाँ लोहा में 3% कार्बन होता है। यह अतिकठोर तथा भंगुर होता है, अतः इसे पीटा नहीं जा सकता। कच्चे लोहे को रद्दी लोहे तथा कोक के साथ गर्म करने पर ढलवाँ लोहा प्राप्त होता है।

(b) ढलवाँ लोहे को हेमाटाइट की परत चढ़ी परावर्तनी भट्टी में गर्म करने से अशुद्धियाँ आक्सीकृत हो जाती हैं तथा हेमाटाइट कार्बन को कार्बन मोनोक्साइड में आक्सीकृत कर देता है-
Fe2O3 + 3C → 2Fe + 3CO
इसमें चूना पत्थर को गालक के रूप में मिलाया जाता है जिससे सल्फर, सिलिकन तथा फॉस्फोरस ऑक्सीकृत होकर धातुमल में चले जाते हैं। धातु को निकाल लिया जाता है तथा रोलरों पर से गुज़ार कर धातुमल से पृथक् कर लिया जाता है। पिटवाँ लोहा, लोहे का शुद्धतम रूप है तथा यह आघातवर्धनीय होता है। इसमें 0.25 तक कार्बन होता है।

प्रश्न 4.
अयस्क के सान्द्रण के लिए निक्षालन प्रक्रम का प्रयोग कब किया जाता है? सोने के निष्कर्षण के उदाहरण द्वारा इस प्रक्रम को समझाइए।
उत्तर:
जब कोई अयस्क, किसी उपयुक्त विलायक में विलेय हो तो प्रायः सान्द्रण की निक्षालन विधि का प्रयोग किया जाता है। सोने के निष्कर्षण में सायनाइड द्वारा निक्षालन किया जाता है। इसमें Au का ऑक्सीकरण होता है। इसके पश्चात् अधिक सक्रिय धातु जैसे जिंक का अपचायक के रूप में प्रयोग करके Au को विस्थापित कर लिया जाता है। इस प्रक्रम में प्रयुक्त अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं-
4Au(s) + 8CN(aq) + 2H2O(aq) + O2(g) → 4[Au(CN)2](aq) + 4OH(aq)
2[Au(CN)2](aq) + Zn(s) → 2Au(s) + [Zn(CN)4]2-(aq)

बोर्ड परीक्षा के दूष्टिकोण से सम्भावित महत्त्वपूर्ण प्रश्न:

प्रश्न 1.
‘ताप धातुकर्म’ से क्या तात्पर्य होता है?
उत्तर:
धातु ऑक्साइडों को गर्म करके धातु में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को ताप धातुकर्म या तापीय अपचयन कहते हैं।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित की भूमिका का वर्णन कीजिए-
(i) सिल्वर अयस्क से सिल्वर के निष्कर्षण में NaCN की
(ii) विशुद्ध ऐलुमिना से ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में क्रायोलाइट की।
उत्तर:
(i) सिल्वर अयस्क से सिल्वर के निष्कर्षण में NaCN का उपयोग, सिल्वर का संकुल बनाने में किया जाता है जिसे पृथक् करके इसकी क्रिया सक्रिय धातु (Zn) से कराकर Ag को प्राप्त कर लिया जाता है।
(ii) ऐलुमिनियम के धातु कर्म में क्रायोलाइट इसलिए मिलाया जाता है क्योंकि इससे मिश्रण का गलनांक कम हो जाता है तथा विलयन की चालकता बढ़ जाती है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित की भूमिका का वर्णन कीजिए-
(i) टाइटेनियम के परिष्करण में आयोडीन की
(ii) ऐलुमिनियम के धातुकर्म में क्रायोलाइट की।
उत्तर:
(i) जर्कोनियम या टाइटेनियम के शोधन के लिए वॉनआरकैल विधि-यह विधि Zr तथा Ti जैसी धातुओं से अशुद्धियों के रूप में उपस्थित ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन को हटाने में प्रयुक्त की जाती है। अपरिष्कृत धातु को निर्वातित पात्र में आयोडीन के साथ गरम करते हैं, जिससे धातु आयोडाइड बनता है। यह अधिक सहसंयोजी होने के कारण आसानी से वाष्पीकृत हो जाता है तथा अशुद्धि बच जाती है।
Zr + 2I2 → ZrI4
धातु आयोडाइड को 1800K ताप पर विद्युत द्वारा गरम किए गए टंग्टन तंतु पर गर्म किया जाता है, जिससे यह विघटित होकर शुद्ध धातु देता है जो कि तंतु पर जमा हो जाती है।
ZrI4 → Zr + 2I2

(ii) ऐलुमिनियम के धातु कर्म में क्रायोलाइट इसलिए मिलाया जाता है क्योंकि इससे मिश्रण का गलनांक कम हो जाता है तथा विलयन की वालकता बढ़ जाती है।

प्रश्न 4.
एक खनिज और एक अयस्क में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भूपर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले यौगिक जिन्हें खनन द्वारा प्राप्त किया जाता है, उन्हें खनिज कहते हैं लेकिन अयस्क वे खनिज होते हैं जिनसे धातु का निष्कर्षण आसानी से हो सके तथा आर्थिक दृष्टि से लाभदायक हों।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित प्रत्येक प्रक्रम के निर्धारक सिद्धान्त का वर्णन कीजिए-
(i) टाइटेनियम धातु का वाष्प प्रावस्था परिष्करण
(ii) सल्फाइड अयस्क का झाग प्लवन विधि द्वारा सान्द्रण।
उत्तर:
(i) जर्कोनियम या टाइटेनियम के शोधन के लिए वॉनआरकैल विधि-यह विधि Zr तथा Ti जैसी धातुओं से अशुद्धियों के रूप में उपस्थित ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन को हटाने में प्रयुक्त की जाती है। अपरिष्कृत धातु को निर्वातित पात्र में आयोडीन के साथ गरम करते हैं, जिससे धातु आयोडाइड बनता है। यह अधिक सहसंयोजी होने के कारण आसानी से वाष्पीकृत हो जाता है तथा अशुद्धि बच जाती है।
Zr + 2I2 → ZrI4
धातु आयोडाइड को 1800K ताप पर विद्युत द्वारा गरम किए गए टंग्टन तंतु पर गर्म किया जाता है, जिससे यह विघटित होकर शुद्ध धातु देता है जो कि तंतु पर जमा हो जाती है।
ZrI4 → Zr + 2I2

(ii) सान्द्रण की यह विधि सल्फाइड अयस्कों को गैंग से मुक्त करने के लिए प्रयुक्त की जाती है, जैसे कॉपर पाइराइटीज, गैलेना इत्यादि। इस विधि में चूर्णित अयस्क का पानी के साथ निलंबन बनाकर इसमें संग्राही (Collectors) तथा फेन-स्थायीकारी (Froth stabilisers) मिला देते हैं। संग्राही (जैसे चीड़ का तेल, यूकेलिप्टस का तेल, वसा अम्ल, जैंथेट इत्यादि ) अयस्क कणों के नहीं भीगने के गुण अक्लेदनीयता को बढ़ा देते हैं तथा फेन (झाग) स्थायीकारी (जैसे क्रिसॉल, ऐनीलीन ) फेन को स्थायित्व प्रदान करते हैं।

चीड़ का तेल इत्यादि झागकारक होते हैं तथा जैन्थैट जैसे सोडियम एथिलजैन्थैट या सोडियम एमिलजैन्थैट सल्फाइड अयस्क के कणों को जल प्रतिकर्षी बनाकर उन्हें जल की सतह पर लाने तथा तैरने में सहायक होते हैं, अतः इन्हें प्लवनकारक कहते हैं। फेन प्लवन विधि अयस्क तथा आधात्री के भीगने के गुणों में अन्तर पर आधारित है। अयस्क के कण तेल से, जबकि गैंग या (आधात्री ) के कण जल से भीगते हैं।

पैडल मिश्रण को विलोडित करता है तथा इससे वायु प्रवाहित होती है, जिससे झाग बनते हैं जिसमें अयस्क के कण होते हैं। झाग हल्के होते हैं जिन्हें मथकर अलग निकाल लिया जाता है। अयस्क के कणों को प्राप्त करने के लिए इसे सुखा लिया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 4

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

प्रश्न 6.
निम्न श्रेणी के अपने अयस्कों से कॉपर का निष्कर्षण कैसे किया जाता है?
उत्तर:
निम्न कोटि अयस्कों तथा रद्दी धातु से कॉपर का निष्कर्षण – वैद्युत रासायनिक सिद्धान्त का उपयोग करते हुए निम्न कोटि अयस्कों से कॉपर का निष्कर्षण हाइड्रो धातुकर्म द्वारा किया जाता है। निम्न कोटि अयस्कों में कॉपर बहुत ही कम मात्रा में पाया जाता है। कॉपर प्राप्त करने के लिए, अयस्क का निक्षालन अम्ल या जीवाणु (बैक्टीरिया) के उपयोग द्वारा किया जाता है, जिससे कॉपर आयन (Cu2+) विलयन में चले जाते हैं जिनकी क्रिया H2 या रद्दी आयरन से करके Cu प्राप्त किया जाता है। इस क्रिया में Cu2+ का अपचयन होता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 5

प्रश्न 7.
निम्नलिखित धातुओं को परिष्कृत करने के लिए कौन-कौन सी विधियाँ साधारण रूप से काम में लाई जाती हैं-
(i) निकल
(ii) जर्मनियम
इन विधियों के पीछे निहित सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(i) वाष्प प्रावस्था परिष्करण – शोधन की इस विधि में, धातु को वाष्पशील यौगिक में बदल कर उसे दूसरी जगह एकत्रित कर लेते हैं तथा इस वाष्पशील यौगिक के विघटन से शुद्ध धातु प्राप्त कर ली जाती है। इस विधि के लिए दो शर्तें आवश्यक हैं-
(i) उपलब्ध अभिकर्मक के साथ धातु वाष्पशील यौगिक बनाती हो तथा
(ii) वाष्पशील पदार्थ आसानी से विघटित होने वाला हो, ताकि धातु आसानी से पुनः प्राप्त की जा सके। इस विधि से Zr, Ti तथा Ni का शोधन किया जाता है।

उदाहरण- (a) निकल के शोधन की मॉन्ड की विधि-इस विधि में Ni को CO के प्रवाह में गर्म करने पर वाष्पशील संकुल यौगिक निकल टेट्राकार्बोनिल बनता है, जिसे उच्च ताप पर गर्म करने पर इसके विघटन से शुद्ध निकैल प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार निकल से अशुद्धियाँ पृथक् हो जाती हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 6

(ii) मंडल परिष्करण या जोन परिष्करण – मंडल परिष्करण द्वारा अतिशुद्ध धातु प्राप्त होती है। यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि अशुद्धियों की विलेयता धातु की ठोस अवस्था की अपेक्षा गलित अवस्था में अधिक होती है। इस विधि में अशुद्ध धातु की छड़ के एक किनारे पर एक वृत्ताकार गतिशील हीटर ( तापक) लगा होता है। जो छड़ को हर तरफ से घेरे रहता है। हीटर जैसे ही आगे बढ़ता है, गलित मण्डल भी आगे बढ़ता जाता है और गलित से शुद्ध धातु क्रिस्टलित हो जाती है तथा अशुद्धियाँ पास वाले गलित जोन में चली जाती हैं।

इस प्रक्रिया को कई बार दोहराते हैं तथा हीटर को एक ही दिशा में बार-बार चलाते जाते हैं। अशुद्धियाँ छड़ के एक किनारे पर एकत्रित हो जाती हैं, जिसे काटकर अलग कर लेते हैं। इस विधि से अति शुद्ध अर्धचालकों तथा अन्य शुद्ध धातुओं; जैसे-जर्मेनियम, सिलिकॉन, बोरॉन, गैलियम तथा इंडियम को प्राप्त किया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 7

प्रश्न 8.
वैद्युत अपघटन क्रिया का ताँबे के शोधन में किस प्रकार प्रयोग होता है? समीकरणों सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वैद्युत अपघटनी शोधन – धातुओं के शोधन की इस विधि में अशुद्ध धातु का ऐनोड तथा शुद्ध धातु की पट्टी का कैथोड बनाया जाता है। वैद्युत अपघटनी सेल में उसी धातु के किसी उपयुक्त लवण का जलीय विलयन वैद्युत अपघट्य के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसमें अधिक क्षारीय धातु विलयन में तथा कम क्षारीय धातुएँ ऐनोड पंक (anode mud) के रूप में प्राप्त होती हैं।

वैद्युत अपघटन की इस प्रक्रिया की व्याख्या इलेक्ट्रॉड विभव, अधिविभव तथा गिब्ज ऊर्जा की सहायता से की जा सकती है। वैद्युत अपघटन करने पर शुद्ध धातु कैथोड पर जमा हो जाती है तथा अशुद्धियाँ ऐनोड पर ऐनोड पंक के रूप में एकत्रित हो जाती हैं। वैद्युत अपघटन की सामान्य अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं-

कैथोड पर Mn+ + ne → M
ऐनोड पर M → Mn+ + ne

प्रश्न 9.
फेन प्लवन विधि में संग्राही व फेन स्थायीकारक के नाम व भूमिका दीजिए।
उत्तर:
फेन प्लवन विधि में संग्राही के रूप में चीड़ का तेल, यूकेलिप्टस का तेल, वसा अम्ल या जैन्थेट प्रयुक्त किया जाता है तथा फेन स्थायीकारक के रूप में क्रिसॉल या ऐनीलिन का प्रयोग किया जाता है। संग्राही अयस्क कणों के नहीं भीगने का गुण बढ़ाता है जबकि फेन स्थायीकारक फेन को स्थायित्व प्रदान करता है।

प्रश्न 10.
बॉक्साइट अयस्क में उपस्थित किन्हीं दो अशुद्धियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
बॉक्साइट अयस्क में सिलिका (SiO2) तथा टाइटेनियम आक्साइड (TiO2) की अशुद्धियाँ उपस्थित होती हैं।

प्रश्न 11.
निकल धातु शोधन के मॉन्ड प्रक्रम से सम्बन्धित रासायनिक अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर:
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 8

प्रश्न 12.
(i) कॉपर का शुद्धिकरण किस विधि से किया जाता है?
(ii) ऐलुमिनियम के मुख्य अयस्क का नाम बताइए तथा ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में निक्षालन के महत्त्व की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(i) कॉपर के शुद्धिकरण में वैद्युत अपघटनी विधि का प्रयोग किया जाता है।
(ii) ऐलुमिनियम का मुख्य अयस्क बॉक्साइट (Al2O3 . 2H2O) है। ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में निक्षालन के महत्व की व्याख्या के लिए बॉक्साइट से ऐलुमिना का निक्षालन, बेयर की विधि – निक्षालन विधि से मुख्यतः ऐलुमिनियम के अयस्क बॉक्साइट का सान्द्रण किया जाता है। बॉक्साइट (Al2O3.2H2O) में मुख्यतः सिलिका (SiO2), आयरन ऑक्साइड (Fe2O3) तथा टाइटेनियम ऑक्साइड (TiO2) की अशुद्धियाँ होती हैं।

ऐलुमिना से सिलिका इत्याद को पृथक् करने के लिए 473 – 523K ताप तथा 35 bar दाब पर चूर्ण किए हुए अयस्क को सान्द्र NaOH विलयन से क्रिया कराकर सान्द्रित किया जाता है, चूँकि SiO2 अम्लीय, Al2O3 उभयधर्मी तथा NaOH क्षारीय हैं, अतः इनकी क्रिया से Al2O3, सोडियम ऐलुमिनेट के रूप में एवं SiO2 सोडियम सिलिकेट के रूप में प्राप्त होता है, जो जल में विलेय होने के कारण निक्षालित हो जाते हैं तथा अन्य अशुद्धियाँ बच जाती हैं।

Al2O3(s) + 2NaOH(aq) + 3H2O(l) → 2Na [A]

जल में विलेय सोडियम ऐलुमिनेट विलयन में CO2 गैस प्रवाहित करने से ऐलुमिनेट उदासीन होंकर जलयोजित Al2O3 के रूप में अवक्षेपित हो जाता है। यहाँ पर विलयन में थोड़ा-सा ताजा बना जलयोजित Al2O3 डालने पर अवक्षेपण की दर बढ़ जाती है। इसे बीजारोपण कहा जाता है।

2Na[Al(OH)4](aq) + 2CO2(g) → Al2O3 . 2H2O(s) + 2NaHCO3(aq) + H2O

सोडियम सिलिकेट विलयन में बच जाता है तथा जलयोजित ऐलुमिना को छानकर, सुखाकर, गरम करने से पुनः शुद्ध Al2O3 प्राप्त हो जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 9

प्रश्न 13.
निम्नलिखित विधियों द्वारा धातुओं के शोधन में प्रयुक्त सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए-
(i) वाष्प अवस्था परिष्करण
(ii) मंडल परिष्करण।
उत्तर:
(i) वाष्प प्रावस्था परिष्करण – शोधन की इस विधि में, धातु को वाष्पशील यौगिक में बदल कर उसे दूसरी जगह एकत्रित कर लेते हैं तथा इस वाष्पशील यौगिक के विघटन से शुद्ध धातु प्राप्त कर ली जाती है। इस विधि के लिए दो शर्तें आवश्यक हैं-
(i) उपलब्ध अभिकर्मक के साथ धातु वाष्पशील यौगिक बनाती हो तथा
(ii) वाष्पशील पदार्थ आसानी से विघटित होने वाला हो, ताकि धातु आसानी से पुनः प्राप्त की जा सके। इस विधि से Zr, Ti तथा Ni का शोधन किया जाता है।
उदाहरण:
(a) निकल के शोधन की मॉन्ड की विधि-इस विधि में Ni को CO के प्रवाह में गर्म करने पर वाष्पशील संकुल यौगिक निकल टेट्राकार्बोनिल बनता है, जिसे उच्च ताप पर गर्म करने पर इसके विघटन से शुद्ध निकैल प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार निकल से अशुद्धियाँ पृथक् हो जाती हैं।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 10
(b) जर्कोनियम या टाइटेनियम के शोधन के लिए वॉनआरकैल विधि – यह विधि Zr तथा Ti जैसी धातुओं से अशुद्धियों के रूप में उपस्थित ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन को हटाने में प्रयुक्त की जाती है। अपरिष्कृत धातु को निर्वातित पात्र में आयोडीन के साथ गरम करते हैं, जिससे धातु आयोडाइड बनता है। यह अधिक सहसंयोजी होने के कारण आसानी से वाष्पीकृत हो जाता है तथा अशुद्धि बच जाती है।
Zr + 2I2 → Zrl4
धातु आयोडाइड को 1800K ताप पर विद्युत द्वारा गरम किए गए टंग्टन तंतु पर गर्म किया जाता है, जिससे यह विघटित होकर शुद्ध धातु देता है जो कि तंतु पर जमा हो जाती है।
Zrl4 → Zr + 2I2

(ii) मंडल परिष्करण या जोन परिष्करण – मंडल परिष्करण द्वारा अतिशुद्ध धातु प्राप्त होती है। यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि अशुद्धियों की विलेयता धातु की ठोस अवस्था की अपेक्षा गलित अवस्था में अधिक होती है। इस विधि में अशुद्ध धातु की छड़ के एक किनारे पर एक वृत्ताकार गतिशील हीटर (तापक) लगा होता है। जो छड़ को हर तरफ से घेरे रहता है। हीटर जैसे ही आगे बढ़ता है, गलित मण्डल भी आगे बढ़ता जाता है और गलित से शुद्ध धातु क्रिस्टलित हो जाती है तथा अशुद्धियाँ पास वाले गलित जोन में चली जाती हैं।

इस प्रक्रिया को कई बार दोहराते हैं तथा हीटर को एक ही दिशा में बार-बार चलाते जाते हैं। अशुद्धियाँ छड़ के एक किनारे पर एकत्रित हो जाती हैं, जिसे काटकर अलग कर लेते हैं। इस विधि से अति शुद्ध अर्धचालकों तथा अन्य शुद्ध धातुओं; जैसे-जर्मेनियम, सिलिकॉन, बोरॉन, गैलियम तथा इंडियम को प्राप्त किया जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 11

HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

प्रश्न 14.
निक्षालित निम्न कोटि अयस्क से कॉपर प्राप्त करने के लिए कौनसा अपचायक प्रयुक्त किया जाता है?
उत्तर:
निक्षालित निम्न कोटि अयस्क से कॉपर प्राप्त करने के लिए हाइड्रोजन या रद्दी आयरन (स्क्रेप आयरन) का अपचायक के रूप में प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 15.
ऐलुमिनियम के निष्कर्षण के लिए वैद्युत अपघटनी सेल का नामांकित चित्र बनाइए एवं इसमें होने वाली सम्पूर्ण अभिक्रिया लिखिए।
अथवा
मंडल परिष्करण प्रक्रम का नामांकित चित्र बनाइए। यह विधि मुख्य रूप से किसमें उपयोगी है?
उत्तर:
ऐलुमिनियम के निष्कर्षण के लिए वैद्युत अपघटनी सेल का नामांकित चित्र निम्न है-
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 12
इस प्रक्रम में होने वाली सम्पूर्ण अभिक्रिया को निम्न प्रकार लिखा जा सकता है-
2Al2O3 + 3C → 4Al + 3CO2
अधवा
मंडल परिष्करण प्रक्रम का नामांकित चित्र निम्न है
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 13

प्रश्न 16.
निस्तापन तथा भर्जन को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
निस्तापन-निस्तापन में अयस्क को धातु के गलनांक से नीचे के ताप पर वायु की अनुपस्थिति में धीर-धीरे गर्म करते हैं जिससे वाष्पशील पदार्थ जैसे CO2, H2O इत्यादि निकल जाते हैं तथा धातु ऑक्साइड बच जाता है।
HBSE 12th Class Chemistry Important Questions Chapter 6 Img 14
भर्जन-भर्जन प्रक्रम में सल्फाइड अयस्कों को वायु की उपस्थिति में धातु के गलनांक से नीचे के ताप पर गर्म करते हैं जिससे सल्फाइड, ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं तथा S, P, As, Sb इत्यादि की अशुद्धियाँ वाष्पशील ऑक्साइड के रूप में निकल जाती हैं।
उदाहरण – 2Cu2S + 3O2 → 2Cu2O + 2SO2

प्रश्न 17.
(i) टाइटेनियम के परिष्करण के लिए प्रयुक्त होने वाली विधि का नाम लिखिए।
(ii) सिल्वर के निष्कर्षण में Zn की क्या भूमिका होती है?
(iii) धातु ऑक्साइड का धातु में अपचयन सरल हो जाता है यदि प्राप्त धातु द्रव अवस्था में हो। क्यों?
उत्तर:
(i) टाइटेनियम के परिष्करण के लिए वॉन-ऑरकेल विधि का प्रयोग किया जाता है।

(ii) सिल्वर के निष्कर्षण में Zn मिलाने पर सिल्वर के संकुल Na[Ag(CN)2] में उपस्थित Ag का विस्थापन होकर Zn का संकुल बन जाता है तथा सिल्वर प्राप्त हो जाती है। यह Zn अपचायक का कार्य करता है।

(iii) जब धातु ठोस अवस्था की अपेक्षा द्रव अवस्था में होती है तो उसकी एन्ट्रॉपी अधिक होती है। जब निर्मित धातु द्रव अवस्था में होती है और अपचयित होने वाली धातु ऑक्साइड ठोस अवस्था में होती है तो अपचयन प्रक्रम के एन्ट्रॉपी परिवर्तन (△S) का मान अधिक धनात्मक हो जाता है। अतः △G° का मान अधिक ऋणात्मक हो जाता है और अपचयन आसान हो जाता है।

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HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 3 जनसंख्या संघटन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Important Questions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. सबसे कम परिवर्तनशील अनुपात किस जनसंख्या वर्ग का होता है?
(A) बाल वर्ग का
(B) प्रौढ़ वर्ग का
(C) वृद्ध वर्ग का
(D) युवा वर्ग का
उत्तर:
(C) वृद्ध वर्ग का

2. आयु और लिंग पिरामिड से क्या प्रदर्शित किया जाता है?
(A) आयु संरचना
(B) लिंग संरचना
(C) आयु और लिंग संरचना
(D) लिंग अनुपात
उत्तर:
(C) आयु और लिंग संरचना

3. आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक उत्पादक आयु वर्ग कौन-सा है?
(A) बाल वर्ग
(B) प्रौढ़ वर्ग
(C) वृद्ध वर्ग
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) वृद्ध वर्ग

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

4. बौद्धिकतापूर्ण व्यवसाय किस वर्ग में आते हैं?
(A) प्राथमिक व्यवसाय
(B) द्वितीयक व्यवसाय
(C) तृतीयक व्यवसाय
(D) चतुर्थक व्यवसाय
उत्तर:
(C) तृतीयक व्यवसाय

5. विश्व का सर्वाधिक नगरीकृत महाद्वीप कौन-सा है?
(A) यूरोप
(B) एशिया
(C) ऑस्ट्रेलिया
(D) उत्तरी अमेरिका
उत्तर:
(C) ऑस्ट्रेलिया

6. लिंगानुपात = HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 3 जनसंख्या संघटन 2
(A) कुल जनसंख्या
(B) मृत्यु-दर
(C) जन्म-दर
(D) स्त्रियों की जनसंख्या
उत्तर:
(D) स्त्रियों की जनसंख्या

7. चौड़ा आधार तथा पतला होता शीर्ष आकृति वाला पिरामिड क्या दर्शाता है?
(A) स्थिर जनसंख्या
(B) विकासशील जनसंख्या
(C) घटती जनसंख्या
(D) कोई नहीं
उत्तर:
(D) कोई नहीं

8. बच्चे, वृद्ध, सेवानिवृत्त व्यक्ति, गृहणियां तथा विद्यार्थियों को जनसंख्या के किस वर्ग में रखा गया है?
(A) सक्रिय जनसंख्या
(B) नगरीय जनसंख्या
(C) पराश्रित जनसंख्या
(D) कोई नहीं
उत्तर:
(C) पराश्रित जनसंख्या

9. निम्नलिखित में कौन-सा घटक जनसंख्या के संघटन को प्रदर्शित नहीं करता-
(A) आयु
(B) लिंग
(C) साक्षरता
(D) प्रजननशीलता
उत्तर:
(D) प्रजननशीलता

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

10. एशिया का कौन-सा देश उच्च मानव विकास की श्रेणी में है?
(A) जापान
(B) भारत
(C) श्रीलंका
(D) चीन
उत्तर:
(A) जापान

11. 1951 में भारत की साक्षरता दर कितनी थी?
(A) 16%
(B) 17%
(C) 18%
(D) 19%
उत्तर:
(C) 18%

12. जनसंख्या की आयु संरचना का अर्थ है-
(A) विभिन्न आयु वर्ग के लिंग अनुपात की जनसंख्या
(B) आयु और लिंग अनुपात का विवरण
(C) विभिन्न आयु वर्ग के लोगों की संख्या
(D) 60 वर्ष से ऊपर की आयु के लोगों की संख्या
उत्तर:
(C) विभिन्न आयु वर्ग के लोगों की संख्या

13. ऋणात्मक वार्षिक जनसंख्या वृद्धि-दर दिखलाने वाला देश कौन-सा है?
(A) बेल्जियम
(B) इंग्लैंड
(C) रूस
(D) अमेरिका
उत्तर:
(C) रूस

14. जनसंख्या की आयु-लिंग संरचना सबसे अच्छी प्रदर्शित होती है-
(A) सममान रेखा द्वारा
(B) वृत्त आरेख द्वारा
(C) छाया आरेख द्वारा
(D) पिरामिड आरेख द्वारा
उत्तर:
(D) पिरामिड आरेख द्वारा

15. जनांकिकीय संक्रमण की दूसरी अवस्था में कौन-सा देश है?
(A) चिली
(B) कनाडा
(C) फ्रांस
(D) अफ्रीका
उत्तर:
(D) अफ्रीका

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16. जनांकिकीय संक्रमण की तीसरी अवस्था में कौन-सा देश है?
(A) चिली
(B) कनाडा
(C) फ्रांस
(D) अफ्रीका
उत्तर:
(A) चिली

17. जनांकिकीय संक्रमण की चौथी अवस्था में कौन-सा देश है?
(A) चिली
(B) कनाडा
(C) फ्रांस
(D) अफ्रीका
उत्तर:
(B) कनाडा

B. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में दीजिए

प्रश्न 1.
कृषि अथवा प्राथमिक क्रियाकलापों में संलग्न जनसंख्या को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
ग्रामीण जनसंख्या।

प्रश्न 2.
चौड़ा आधार तथा पतला होता शीर्ष आकृति वाला पिरामिड क्या दर्शाता है?
उत्तर:
विकासशील जनसंख्या को।

प्रश्न 3.
गैर-कृषि कार्यों में संलग्न जनसंख्या को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
नगरीय जनसंख्या।

प्रश्न 4.
वर्ष 1951 में भारत की साक्षरता दर कितने प्रतिशत थी?
उत्तर:
18 प्रतिशत।

प्रश्न 5.
ऋणात्मक वार्षिक जनसंख्या वृद्धि-दर दिखलाने वाला देश कौन-सा है?
उत्तर:
रूस।

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प्रश्न 6.
सबसे कम परिवर्तनशील अनुपात किस जनसंख्या वर्ग का होता है?
उत्तर:
वृद्ध वर्ग।

प्रश्न 7.
बच्चे, वृद्ध, सेवानिवृत्त व्यक्ति, गृहणियाँ तथा विद्यार्थियों को जनसंख्या के किस वर्ग में रखा गया है?
उत्तर:
पराश्रित जनसंख्या वर्ग।

प्रश्न 8.
किसी जनसंख्या के आयु-लिंग पिरामिड का आधार संकीर्ण है, तो उस जनसंख्या की वृद्धि-दर कितनी होगी?
उत्तर:
कम जनसंख्या वृद्धि-दर।

प्रश्न 9.
किसी जनसंख्या में उच्च जन्म-दर होने पर आयु-लिंग पिरामिड का आकार कैसा होगा?
उत्तर:
त्रिभुज के आकार का।

प्रश्न 10.
किसी जनसंख्या में जन्म-दर व मृत्यु-दर समान होने पर आयु-लिंग पिरामिड का आकार कैसा होगा?
उत्तर:
घण्टी के आकार का।

प्रश्न 11.
जनांकिकीय संक्रमण की तीसरी अवस्था में शामिल कोई एक देश बताएँ।
उत्तर:
चिली।

प्रश्न 12.
प्रति सौ व्यक्तियों के अनुपात में साक्षर व्यक्तियों की संख्या क्या कहलाती है?
उत्तर:
साक्षरता दर।

प्रश्न 13.
विस्तृत जनसंख्या पिरामिड किस आकार का होता है?
उत्तर:
चौड़े आकार का।

प्रश्न 14.
ऑस्ट्रेलिया का जनसंख्या पिरामिड किस प्रकार का है?
उत्तर:
विस्तृत प्रकार का।

प्रश्न 15.
कार्यशील जनसंख्या का आयु वर्ग कौन-सा है?
उत्तर:
15 से 59 वर्ष।

प्रश्न 16.
किसी जनसंख्या के आयु लिंग पिरामिड का आधार संकीर्ण है, तो उस जनसंख्या की वृद्धि दर कितनी होगी?
उत्तर:
ह्रासमान जनसंख्या।

प्रश्न 17.
किसी जनसंख्या में उच्च जन्म-दर होने पर आयु लिंग पिरामिड का आकार कैसा होगा?
उत्तर:
विस्तारित होती जनसंख्या।

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प्रश्न 18.
किसी जनसंख्या में जन्म-दर व मृत्यु-दर समान होने पर आयु लिंग पिरामिड का आकार कैसा होगा?
उत्तर:
स्थिर जनसंख्या।

प्रश्न 19.
आयु और लिंग पिरामिड से क्या प्रदर्शित किया जाता है?
उत्तर:
आयु और लिंग संरचना।

प्रश्न 20.
आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक उत्पादक आयु वर्ग कौन-सा है?
उत्तर:
प्रौढ़ वर्ग।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आयु संरचना को प्रभावित करने वाले तीन कारकों के नाम बताएँ।
उत्तर:
आयु संरचना को प्रभावित करने वाले तीन कारक निम्नलिखित हैं-

  1. जन्म-दर या प्रजननशीलता
  2. मृत्यु-दर या मर्त्यता
  3. प्रवास।

प्रश्न 2.
जनसंख्या के तीन बड़े आयु वर्ग कौन से हैं?
उत्तर:

  1. बाल तरुण आयु वर्ग (0 से 14 वर्ष)
  2. प्रौढ़ आयु वर्ग (15 से 59 वर्ष)
  3. वृद्ध आयु वर्ग (60 वर्ष व इससे ऊपर)।

प्रश्न 3.
नगरीय जनसंख्या की वृद्धि किन तीन तरीकों से होती है?
उत्तर:

  1. प्राकृतिक वृद्धि द्वारा
  2. गाँव से नगर की ओर प्रवास द्वारा तथा
  3. किसी ग्रामीण क्षेत्र के नगरीय घोषित हो जाने से।

प्रश्न 4.
जनसंख्या पिरामिड (Population Pyraimid) क्या होता है?
उत्तर:
जनसंख्या पिरामिड विभिन्न आयु वर्ग की जनसंख्या का एक त्रिकोणात्मक प्रदर्शन है। इसका प्रतिपादन डब्ल्यू एम० थॉमसन तथा ऑर्थर लेविस ने किया था। इस पिरामिड में सबसे नीचे के आधार पर निम्नतम आयु वर्ग की जनसंख्या (पुरुष एवं महिला) को प्रदर्शित करते हैं, जो सबसे बड़ी संख्या होती है। क्रमशः घटते हुए आयु वर्ग पर चलते हैं। उच्चतम आयु वर्ग की जनसंख्या जो आकार में सबसे कम होगी, सबसे ऊपर प्रदर्शित होती है। इस प्रकार बनी आकृति पिरामिड की तरह होगी। यही जनसंख्या पिरामिड कहलाता है।

प्रश्न 5.
लिंगानुपात किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रति हजार पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या के अनुपात को लिंगानुपात कहा जाता है। यह भारत के संदर्भ में है क्योंकि विभिन्न देशों में लिंगानुपात की परिभाषा अलग-अलग है।

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प्रश्न 6.
ह्रासमान जनसंख्या को प्रदर्शित करने वाले आयु-लिंग पिरामिड का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ह्रासमान या घटती हुई जनसंख्या के पिरामिड का आधार संकीर्ण और शीर्ष शुण्डाकार होता है। यह निम्न जन्म-दर तथा मृत्यु-दर को दर्शाता है। इसमें जनसंख्या वृद्धि दर शून्य अथवा ऋणात्मक होती है। जापान, ऑस्ट्रेलिया के जनसंख्या पिरामिड इसी प्रकार के हैं।

प्रश्न 7.
विस्तारित होती या विकासशील जनसंख्या को प्रदर्शित करने वाले आयु-लिंग पिरामिड का उल्लेख कीजिए।
अथवा
किसी क्षेत्र का विस्तारित होती जनसंख्या को प्रदर्शित करने वाले आयु लिंग पिरामिड की व्याख्या करें।
उत्तर:
अल्पविकसित या विकासशील देशों में आयु-लिंग पिरामिड का आधार चौड़ा और शीर्ष तेजी से पतला होता जाता है। यह उच्च जन्म दर तथा मृत्यु दर को दर्शाता है। इसमें जनसंख्या वृद्धि दर धनात्मक होती है। अल्पविकसित या विकासशील देशों में वृद्धों की जनसंख्या कम और बच्चों की जनसंख्या बढ़ती जाती है। नाइजीरिया, बांग्लादेश के जनसंख्या पिरामिड इसी प्रकार के हैं।

प्रश्न 8.
उत्पादक और आश्रित जनसंख्या में क्या अंतर है?
उत्तर:
उत्पादक और आश्रित जनसंख्या में निम्नलिखित अंतर हैं-

उत्पादक जनसंख्याआश्रित जनसंख्या
1. उत्पादक जनसंख्या लाभदायक आर्थिक क्रियाओं में काम करती है।1. आश्रित जनसंख्या आर्थिक क्रियाओं में विशेष योगदान नहीं देती।
2. ऐसे लोगों के समुदाय को श्रमिक बल कहा जाता है।2. ऐसे लोगों के समुदाय को अश्रमिक बल कहा जाता है।
3. ये लोग स्वयं परिश्रम करके अपना जीवन-निवर्वाह करते हैं।3. ये लोग बेरोज़गार होते हैं तथा श्रमिक लोगों पर आश्रित रहते हैं।

प्रश्न 9.
विकासशील और हासशील जनसंख्या में क्या अंतर है?
उत्तर:
विकासशील और ह्रासशील जनसंख्या में निम्नलिखित अंतर हैं-

विकासशील जनसंख्याहासशील जनसंख्या
1. विकासशील जनसंख्या में जन्म-दर तथा मृत्यु-दर दोनों उच्च होती हैं।1. ह्रसशील जनसंख्या में जन्म-दर तथा मृत्यु-दर दोनों निम्न होती हैं।
2. जनसंख्या पिरामिड का आधार चौड़ा तथा शीर्ष पतला होता जाता है।2. जनसंख्या पिरामिड का आधार पतला तथा शीर्ष संकीर्ण होता जाता है।

प्रश्न 10.
जनसंख्या के घटते लिंगानुपात के कारण क्या हैं?
उत्तर:

  1. पुरुष और स्त्री मृत्यु-दर में अंतर होने के कारण लिंगानुपात कम हो रहा है।
  2. स्त्री-पुरुष के जन्म-दर में अंतर होने के कारण भी लिंगानुपात कम हो रहा है।
  3. प्रवास भी लिंगानुपात को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण कारक है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विकासशील देशों में नगरीकरण की दर तेजी से क्यों बढ़ रही है?
उत्तर:
विकासशील देशो में तेजी से बढ़ते नगरीकरण के निम्नलिखित कारण हैं-

  1. इन देशों में भारी मात्रा में औद्योगीकरण हुआ है जिससे रोजगार के अवसर अधिक उपलब्ध हैं। फलस्वरूप इन देशों के गांवों से लोग नगरों की ओर स्थानांतरित हुए।
  2. इन देशों के गांवों में जीवन की आवश्यक सुविधाएँ; जैसे-चिकित्सा तथा शिक्षा आदि का अभाव पाया जाता है। इसलिए अधिक-से-अधिक लोग नगरो की ओर प्रवास करते हैं जिससे इन देशों के नगरों के आकार में भारी वृद्धि हो गई।

प्रश्न 2.
आयु संरचना पर मृत्यु-दर के प्रभाव का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आयु संरचना पर मृत्यु-दर के प्रभाव निम्नलिखित हैं-

  1. किसी भी देश में निम्न शिशु मृत्यु-दर होने पर वहाँ बच्चों की संख्या का अनुपात घट जाता है।
  2. वृद्ध मृत्यु-दर निम्न होने पर उनकी संख्या बढ़ जाती है और बच्चों की संख्या कम हो जाती है।
  3. युवा व वृद्ध आयु वर्ग में मृत्यु-दर कम होने पर उच्च आयु वर्ग की जनसंख्या का अनुपात बढ़ जाता है। विकसित देशों में ऐसा ही हो रहा है।।

प्रश्न 3.
आयु-संरचना पर जन्म-दर के प्रभाव का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जन्म-दर किसी देश की जनसंख्या के विभिन्न आयु वर्गों में लोगों के अनुपात को प्रभावित करती है। आयु-संरचना पर जन्म-दर के प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिकी अल्पविकसित देशों में उच्च जन्म-दर पाई जाती है इसलिए वहाँ निम्न आयु वर्ग तथा युवा वर्ग की प्रधानता होती है।
  2. जब निम्न आयु वर्ग संतान पैदा करने की उम्र में शामिल होते हैं तो जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ती है।
  3. निम्न आयु वर्ग (0-14 वर्ष) और 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की अधिक संख्या आश्रित जनसंख्या को प्रदर्शित करती है।
  4. जिन देशों में जन्म-दर कम तथा जीवन प्रत्याशा अधिक होती है, वहाँ बच्चों की संख्या कम और वृद्धों की संख्या अधिक होती है।

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प्रश्न 4.
स्त्री-पुरुष की भिन्न मृत्यु-दर लिंगानुपात को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
विकासशील और अल्प-विकसित देशों में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की मृत्यु-दर अधिक होती है। इन देशों में स्त्रियों का सामाजिक और आर्थिक रूप से निम्न स्तर तथा स्त्रियों के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण के कारण स्त्री मृत्यु-दर अधिक पाई जाती है।

विकसित देशों में जीवन के सभी आयु वर्गों में पुरुष मृत्यु-दर, स्त्री मृत्यु-दर से अधिक होती है। फलस्वरूप पुरुषों की संख्या उत्तरोतर समाप्त होती जाती है। इसका एक कारण और भी हो सकता है कि जैविक दृष्टि से स्त्रियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पुरुषों से अधिक होती है।

प्रश्न 5.
ग्रामीण जनसंख्या की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
ग्रामीण जनसंख्या की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. गाँवों में रहने वाली जनसंख्या को ग्रामीण जनसंख्या कहते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय कृषि होता है।
  2. ये लोग अपनी आजीविका के लिए प्राथमिक व्यवसाय; जैसे-कृषि, पशुपालन, खनन, मत्स्यपालन, संग्रहण व कुटीर उद्योग पर निर्भर करते हैं।
  3. गाँव के लोग सरल, धर्मनिष्ठ व सामुदायिक भावना से ओत-प्रोत होते हैं।
  4. ग्रामीण जनसंख्या भावनात्मक होती है।

प्रश्न 6.
नगरीय जनसंख्या की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
नगरीय जनसंख्या की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. नगरों में रहने वाली जनसंख्या को नगरीय जनसंख्या कहते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय उद्योग एवं व्यापार होता है।
  2. ये लोग अपनी आजीविका के लिए द्वितीयक, तृतीयक व चतुर्थक व्यवसाय; जैसे विनिर्माण उद्योग, परिवहन, व्यापार, सेवाओं आदि पर निर्भर करते हैं।
  3. नगरीय लोगों के जीवन की तीव्र गति व सम्बन्ध बनावटी होते हैं।
  4. नगरीय जनसंख्या व्यावसायिक होती है।

प्रश्न 7.
किसी देश की जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना से उस देश के आर्थिक विकास के स्तर का पता कैसे लगता है?
उत्तर:
किसी भी देश की जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना को चार भागों में बाँटा जा सकता है प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक और चतुर्थक। किसी भी राष्ट्र के आर्थिक विकास का स्तर उसकी कार्यशील जनसंख्या के आधार पर होता है। जिस देश की जनसंख्या द्वितीयक, तृतीयक, चतुर्थक क्रियाकलापों में लगी होती है, वह देश विकसित अवस्था में होता है।

प्रश्न 8.
आयु-लिंग पिरामिड से क्या अभिप्राय है? इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आयु-लिंग पिरामिड का अर्थ-जनसंख्या की आयु लिंग संरचना का अभिप्राय विभिन्न आयु वर्गों में स्त्रियों और पुरुषों की संख्या से है। आयु लिंग संरचना को दर्शाने के लिए एक विशेष प्रकार का रेखाचित्र बनाया जाता है, जिस कारण इसे आयु-लिंग अथवा जनसंख्या पिरामिड कहा जाता है।

आयु-लिंग पिरामिड के प्रकार-आयु-लिंग पिरामिड के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं-
1. विस्तारित होती जनसंख्या-यह विस्तृत आकार वाला त्रिभुजाकार पिरामिड है जो कम विकसित देशों का प्रतिरूपी है। इस पिरामिड में उच्च जन्म-दर के कारण निम्न आयु वर्गों में विशाल जनसंख्या पाई जाती है। उदाहरणतया-नाइजीरिया, बांग्लादेश, मैक्सिको के लिए ऐसे पिरामिड की रचना होगी।

2. स्थिर जनसंख्या इस आयु-लिंग पिरामिड का आकार घंटी के आकार का है जो शीर्ष की ओर शुंडाकार होता जाता है। यह दर्शाता है कि जन्म-दर और मृत्यु-दर लगभग समान है जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या स्थिर हो जाती है। उदाहरणतया ऑस्ट्रेलिया का आयु-लिंग पिरामिड।

3. हासमान जनसंख्या-इस पिरामिड का संकीर्ण आधार और शुंडाकार शीर्ष निम्न जन्म-दर और मृत्यु-दर को दर्शाता है। इन देशों में जनसंख्या वृद्धि ऋणात्मक या शून्य होती है।

प्रश्न 9.
ग्रामीण तथा नगरीय जनसंख्या में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ग्रामीण जनसंख्या तथा नगरीय जनसंख्या में निम्नलिखित अंतर हैं-

ग्रामीण जनसंख्यानगरीय जनसंख्या
1. ग्रामीण लोग अपनी व्यवसाय-संरचना, जीवन-पद्धति, विचारों तथा दृष्टिकोणों से नगरों की जनसंख्या से भिन्न होते हैं। ये लोग छोटी बस्तियों तथा छोटे मकानों में रहते हैं। इनके आपसी संबंध घनिष्ठ होते हैं।1. ये लोग बड़े मकानों में रहते हैं तथा इनके आपसी संबंध औपचारिक ही होते हैं।
2. इन लोगों का मुख्य धंधा ‘कृषि’ है।2. ये लोग अधिकतर उद्योगों तथा व्यापार में काम करते हैं।
3. गाँवों में यातायात, स्वास्थ्य तथा शैक्षणिक सुविधाएँ अच्छी नहीं हैं।3. शहरों में ये सभी सुविधाएँ पर्याप्त हैं।
4. ग्रामीण क्षेत्रों की जनसंख्या 5,000 से कम होती है।4. नगरीय क्षेत्रों की जनसंख्या 5,000 से अधिक होती है।

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प्रश्न 10.
विश्व के विभिन्न भागों में आयु-लिंग में असंतुलन के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
आयु-लिंग में असंतुलन के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं-
1. स्त्री-पुरुष के जन्म-दर में अंतर-प्रत्येक समाज में जन्म के समय नर बच्चे, मादा बच्चों से अधिक पैदा होते हैं। साधारणतया इनका अनुपात क्रमशः 107 से 100 का है किंतु जन्म के पहले और बाद की दशाएँ कभी-कभी इस स्थिति को परिवर्तित कर देती हैं।

2. स्त्री-पुरुष की मृत्यु-दर में अंतर-स्त्री-पुरुष की मृत्यु-दर में अंतर होने के कारण भी लिंगानुपात में अंतर आ जाता है। विकसित देशों में जीवन की सभी अवस्थाओं में पुरुष मृत्यु-दर, स्त्री मृत्यु-दर से अधिक होती है जबकि विकासशील देशों में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में मृत्यु-दर अधिक होती है। ऐसे समाज में स्त्री भ्रूण हत्या, स्त्री शिशु हत्या और स्त्रियों के प्रति घरेलू हिंसा की प्रथा प्रचलित होती है। इन देशों में न केवल स्त्रियों की मृत्यु-दर ऊँची होती है बल्कि उनकी जीवन प्रत्याशा भी कम हो जाती है।

3. प्रवास-स्त्रियों और पुरुषों का प्रवास भी लिंगानुपात को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। अधिकांश विकासशील देशों में विशेषतया एशियाई और अफ्रीकी देशों में बड़ी संख्या में पुरुष ग्रामीण इलाकों से नगरों की ओर आजीविका की तलाश में प्रवास करते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विकासशील देशों में नगरीकरण की दर तेजी से क्यों बढ़ रही है?
उत्तर:
विकासशील देशो में तेजी से बढ़ते नगरीकरण के निम्नलिखित कारण हैं-

  1. इन देशों में भारी मात्रा में औद्योगीकरण हुआ है जिससे रोजगार के अवसर अधिक उपलब्ध हैं। फलस्वरूप इन देशों के गांवों से लोग नगरों की ओर स्थानांतरित हुए।
  2. इन देशों के गांवों में जीवन की आवश्यक सुविधाएँ; जैसे-चिकित्सा तथा शिक्षा आदि का अभाव पाया जाता है। इसलिए अधिक-से-अधिक लोग नगरों की ओर प्रवास करते हैं जिससे इन देशों के नगरों के आकार में भारी वृद्धि हो गई।

प्रश्न 2.
आयु संरचना पर मृत्यु-दर के प्रभाव का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आयु संरचना पर मृत्यु-दर के प्रभाव निम्नलिखित हैं-

  1. किसी भी देश में निम्न शिशु मृत्यु-दर होने पर वहाँ बच्चों की संख्या का अनुपात घट जाता है।
  2. वृद्ध मृत्यु-दर निम्न होने पर उनकी संख्या बढ़ जाती है और बच्चों की संख्या कम हो जाती है।
  3. युवा व वृद्ध आयु वर्ग में मृत्यु-दर कम होने पर उच्च आयु वर्ग की जनसंख्या का अनुपात बढ़ जाता है। विकसित देशों में ऐसा ही हो रहा है।

प्रश्न 3.
आयु-संरचना पर जन्म-दर के प्रभाव का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जन्म-दर किसी देश की जनसंख्या के विभिन्न आयु वर्गों में लोगों के अनुपात को प्रभावित करती है। आयु-संरचना पर जन्म-दर के प्रभाव निम्नलिखित हैं-

  1. एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिकी अल्पविकसित देशों में उच्च जन्म-दर पाई जाती है इसलिए वहाँ निम्न आयु वर्ग तथा युवा वर्ग की प्रधानता होती है।
  2. जब निम्न आयु वर्ग संतान पैदा करने की उम्र में शामिल होते हैं तो जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ती है।
  3. निम्न आयु वर्ग (0-14 वर्ष) और 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की अधिक संख्या आश्रित जनसंख्या को प्रदर्शित करती है।
  4. जिन देशों में जन्म-दर कम तथा जीवन प्रत्याशा अधिक होती है, वहाँ बच्चों की संख्या कम और वृद्धों की संख्या अधिक होती है।

प्रश्न 4.
स्त्री-पुरुष की भिन्न मृत्यु-दर लिंगानुपात को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
विकासशील और अल्प-विकसित देशों में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की मृत्यु-दर अधिक होती है। इन देशों में स्त्रियों का सामाजिक और आर्थिक रूप से निम्न स्तर तथा स्त्रियों के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण के कारण स्त्री मृत्यु-दर अधिक पाई जाती है।

विकसित देशों में जीवन के सभी आयु वर्गों में पुरुष मृत्यु-दर, स्त्री मृत्यु-दर से अधिक होती है। फलस्वरूप पुरुषों की संख्या उत्तरोतर समाप्त होती जाती है। इसका एक कारण और भी हो सकता है कि जैविक दृष्टि से स्त्रियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पुरुषों से अधिक होती है।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

प्रश्न 5.
ग्रामीण जनसंख्या की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
ग्रामीण जनसंख्या की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  1. गाँवों में रहने वाली जनसंख्या को ग्रामीण जनसंख्या कहते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय कृषि होता है।
  2. ये लोग अपनी आजीविका के लिए प्राथमिक व्यवसाय; जैसे-कृषि, पशुपालन, खनन, मत्स्यपालन, संग्रहण व कुटीर उद्योग पर निर्भर करते हैं।
  3. गाँव के लोग सरल, धर्मनिष्ठ व सामुदायिक भावना से ओत-प्रोत होते हैं।
  4. ग्रामीण जनसंख्या भावनात्मक होती है।

प्रश्न 6.
नगरीय जनसंख्या की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
नगरीय जनसंख्या की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. नगरों में रहने वाली जनसंख्या को नगरीय जनसंख्या कहते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय उद्योग एवं व्यापार होता है।
  2. ये लोग अपनी आजीविका के लिए द्वितीयक, तृतीयक व चतुर्थक व्यवसाय; जैसे विनिर्माण उद्योग, परिवहन, व्यापार, सेवाओं आदि पर निर्भर करते हैं।
  3. नगरीय लोगों के जीवन की तीव्र गति व सम्बन्ध बनावटी होते हैं।
  4. नगरीय जनसंख्या व्यावसायिक होती है।

प्रश्न 7.
किसी देश की जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना से उस देश के आर्थिक विकास के स्तर का पता कैसे लगता है?
उत्तर:
किसी भी देश की जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना को चार भागों में बाँटा जा सकता है प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक और चतुर्थक। किसी भी राष्ट्र के आर्थिक विकास का स्तर उसकी कार्यशील जनसंख्या के आधार पर होता है। जिस देश की जनसंख्या द्वितीयक, तृतीयक, चतुर्थक क्रियाकलापों में लगी होती है, वह देश विकसित अवस्था में होता है।

प्रश्न 8.
आयु-लिंग पिरामिड से क्या अभिप्राय है? इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आयु-लिंग पिरामिड का अर्थ-जनसंख्या की आयु लिंग संरचना का अभिप्राय विभिन्न आयु वर्गों में स्त्रियों और पुरुषों की संख्या से है। आयु लिंग संरचना को दर्शाने के लिए एक विशेष प्रकार का रेखाचित्र बनाया जाता है, जिस कारण इसे आयु-लिंग अथवा जनसंख्या पिरामिड कहा जाता है।

आयु-लिंग पिरामिड के प्रकार-आयु-लिंग पिरामिड के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं-
1. विस्तारित होती जनसंख्या-यह विस्तृत आकार वाला त्रिभुजाकार पिरामिड है जो कम विकसित देशों का प्रतिरूपी है। इस पिरामिड में उच्च जन्म-दर के कारण निम्न आयु वर्गों में विशाल जनसंख्या पाई जाती है। उदाहरणतया नाइजीरिया, बांग्लादेश, मैक्सिको के लिए ऐसे पिरामिड की रचना होगी।

2. स्थिर जनसंख्या इस आयु-लिंग पिरामिड का आकार घंटी के आकार का है जो शीर्ष की ओर शुंडाकार होता जाता है। यह दर्शाता है कि जन्म-दर और मृत्यु-दर लगभग समान है जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या स्थिर हो जाती है। उदाहरणतया ऑस्ट्रेलिया का आयु-लिंग पिरामिड।

3. हासमान जनसंख्या-इस पिरामिड का संकीर्ण आधार और शुंडाकार शीर्ष निम्न जन्म-दर और मृत्यु-दर को दर्शाता है। इन देशों में जनसंख्या वृद्धि ऋणात्मक या शून्य होती है।

प्रश्न 9.
ग्रामीण तथा नगरीय जनसंख्या में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ग्रामीण जनसंख्या तथा नगरीय जनसंख्या में निम्नलिखित अंतर हैं-

ग्रामीण जनसंख्यानगरीय जनसंख्या
1. ग्रामीण लोग अपनी व्यवसाय-संरचना, जीवन-पद्धति, विचारों तथा दृष्टिकोणों से नगरों की जनसंख्या से भिन्न होते हैं। ये लोग छोटी बस्तियों तथा छोटे मकानों में रहते हैं। इनके आपसी संबंध घनिष्ठ होते हैं।1. ये लोग बड़े मकानों में रहते हैं तथा इनके आपसी संबंध औपचारिक ही होते हैं।
2. इन लोगों का मुख्य धंधा ‘कृषि’ है।2. ये लोग अधिकतर उद्योगों तथा व्यापार में काम करते हैं।
3. गाँवों में यातायात, स्वास्थ्य तथा शैक्षणिक सुविधाएँ अच्छी नहीं हैं।3. शहरों में ये सभी सुविधाएँ पर्याप्त हैं।
4. ग्रामीण क्षेत्रों की जनसंख्या 5,000 से कम होती है।4. नगरीय क्षेत्रों की जनसंख्या 5,000 से अधिक होती है।

प्रश्न 10.
विश्व के विभिन्न भागों में आयु-लिंग में असंतुलन के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
आयु-लिंग में असंतुलन के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं-
1. स्त्री-पुरुष के जन्म-दर में अंतर प्रत्येक समाज में जन्म के समय नर बच्चे, मादा बच्चों से अधिक पैदा होते हैं। साधारणतया इनका अनुपात क्रमशः 107 से 100 का है किंतु जन्म के पहले और बाद की दशाएँ कभी-कभी इस स्थिति को परिवर्तित कर देती हैं।

2. स्त्री-पुरुष की मृत्यु-दर में अंतर-स्त्री-पुरुष की मृत्यु-दर में अंतर होने के कारण भी लिंगानुपात में अंतर आ जाता है। विकसित देशों में जीवन की सभी अवस्थाओं में पुरुष मृत्यु-दर, स्त्री मृत्यु-दर से अधिक होती है जबकि विकासशील देशों में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में मृत्यु-दर अधिक होती है। ऐसे समाज में स्त्री भ्रूण हत्या, स्त्री शिशु हत्या और स्त्रियों के प्रति घरेलू हिंसा की प्रथा प्रचलित होती है। इन देशों में न केवल स्त्रियों की मृत्यु-दर ऊँची होती है बल्कि उनकी जीवन प्रत्याशा भी कम हो जाती है।

3. प्रवास स्त्रियों और पुरुषों का प्रवास भी लिंगानुपात को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। अधिकांश विकासशील देशों में विशेषतया एशियाई और अफ्रीकी देशों में बड़ी संख्या में पुरुष ग्रामीण इलाकों से नगरों की ओर आजीविका की तलाश में प्रवास करते हैं।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जनसंख्या की आयु लिंग संरचना पर एक भौगोलिक निबंध लिखिए।
उत्तर:
जनसंख्या की आयु लिंग संरचना (Age composition of Population) इसे आयु एवं लिंग पिरामिड द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यह वास्तव में एक विशेष वर्ष का दंड ग्राफ होता है जिसमें प्रत्येक अनुप्रस्थ पट्टी जनसंख्या के एक विशेष आयु वर्ग को दर्शाती है। बाईं ओर के दंड की लंबाई पुरुषों की संख्या के प्रतिशत को दर्शाती है तथा दाईं ओर यह स्त्रियों के लिए दर्शाई गई है।
(क) विकासशील देशों के आयु एवं लिंग पिरामिड का आधार व्यापक होता है। इसका अर्थ है प्रति 5 वर्ष पहले 5 वर्ष के मुकाबले जनसंख्या में और अधिक बच्चे शामिल हो रहे हैं। इस प्रकार पिरामिड का आधार विस्तृत हो रहा है और उच्च आयु वर्ग के लोगों की संख्या में कम वृद्धि हो रही है। इसके साथ ही जब अधिक बच्चे संतान पैदा करने की आयु में आते हैं, तब पैदा होने वाले बच्चों की संख्या बढ़ जाती है।

(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका के आयु लिंग पिरामिड का आधार छोटा पाया जाता है अर्थात् यहाँ प्रत्येक अगले 5 वर्षों में कम बच्चे पैदा होते रहे हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि यहाँ की जनसंख्या में वृद्धि नहीं हो रही है; जैसे ही बच्चों की संख्या उच्च आयु समूह में शामिल होती है वैसे ही पूरी जनसंख्या में वृद्धि हो जाती है।
HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 3 जनसंख्या संघटन 1

(ग) तीसरी प्रकार के पिरामिड का आधार पतला तथा शीर्ष संकीर्ण होता जाता है। ऐसी जनसंख्या में बिल्कुल वृद्धि नहीं होती। ऐसी स्थिति स्वीडन में पाई जाती है।

प्रश्न 2.
आयु-संरचना क्या है? आयु-संरचना पर जन्म-दर तथा मृत्यु-दर के प्रभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आयु-संरचना किसी भी जनसंख्या की एक आधारभूत विशेषता होती है। किसी क्षेत्र की जनसंख्या में विभिन्न आयु के लोग रहते हैं। किसी भी व्यक्ति की आयु उसकी जन्म-तिथि तथा वर्तमान तिथि के बीच का समय होता है। किसी क्षेत्र की आयु-संरचना में समस्त मनुष्यों की आयु को पूर्ण वर्षों में ज्ञात किया जा सकता है, न कि महीनों अथवा दिनों में।

आयु-संरचना पर जन्म-दर का प्रभाव (Effect of Birth Rate on Age Composition) – जन्म-दर किसी देश की जनसंख्या के विभिन्न आयु वर्गों में लोगों के अनुपात को प्रभावित करती है। आयु-संरचना पर जन्म-दर के प्रभाव निम्नलिखित हैं

  • एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिकी अल्प विकसित देशों में उच्च जन्म-दर पाई जाती है इसलिए वहाँ निम्न आयु वर्ग तथा युवा वर्ग की प्रधानता होती है।
  • जब निम्न आयु वर्ग संतान पैदा करने की उम्र में शामिल होते हैं तो जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ती है।
  • युवा वर्ग का जनसंख्या में अधिक पाए जाने का अर्थ है कि वहाँ श्रम की उपलब्धता अधिक है।
  • निम्न आयु वर्ग (0-14 वर्ष) और 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की अधिक संख्या आश्रित जनसंख्या को प्रदर्शित करती है।
  • जिन देशों में जन्म-दर कम तथा जीवन प्रत्याशा अधिक होती है, वहाँ बच्चों की संख्या कम और वृद्धों की संख्या अधिक होती है।

आयु-संरचना पर मृत्यु-दर का प्रभाव (Effect of Death Rate on Age Composition)-आयु संरचना पर मृत्यु-दर के प्रभाव निम्नलिखित हैं

  • शिशु मृत्यु-दर में सुधार होने पर जनसंख्या में बच्चों का अनुपात बढ़ जाता है तथा बड़ी आयु वाले लोगों का अनुपात घट जाता है।
  • यदि वृद्धों की मृत्यु-दर में सुधार होता है तो उनकी संख्या बढ़ जाती है और बच्चों की संख्या कम हो जाती है।
  • इसी प्रकार यदि युवा व वृद्ध आयु-वर्गों में मृत्यु-दर कम हो जाती है तो उच्च आयु वर्ग की जनसंख्या का अनुपात बढ़ जाता है जैसा कि विकसित देशों में होता है।
  • यदि निम्न आयु वर्गों में मृत्यु-दर में तेज़ गिरावट उच्च आयु वर्गों की अपेक्षा अधिक है तो युवा वर्ग की जनसंख्या बढ़ जाती है जैसा कि विकासशील देशों में होता है।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

प्रश्न 3.
साक्षरता से क्या तात्पर्य है? साक्षरता को प्रभावित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
साक्षरता (Literacy) यद्यपि साक्षरता (Literacy) जनसंख्या का एक सामाजिक पक्ष है तथापि यह जनसंख्या की गुणवत्ता का बोध कराती है। व्यापक रूप से साक्षरता वह ज्ञान है जो लोगों में जागृति लाए। साधारणतया साक्षरता लोगों को किसी भाषा में समझ के साथ लिखने या पढ़ने की योग्यता को कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ जनसंख्या आयोग के अनुसार, “साक्षर वह व्यक्ति है जो किसी भाषा में साधारण संदेश को पढ़, लिख और समझ सकता है।”

विश्व स्तर पर अधिकांश देशों में साक्षरता की गणना की जाती हैं। प्रति सौ व्यक्तियों के अनुपात में साक्षर व्यक्तियों की संख्या को साक्षरता दर कहा जाता है।
साक्षरता को प्रभावित करने वाले कारक (Factory affecting Literacy) साक्षरता को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं
1. अर्थव्यवस्था (Economy)-विश्व के विभिन्न भागों में साक्षरता की दरों में विभिन्नता पाई जाती है। किसी भी देश के आर्थिक विकास के स्तर और साक्षरता दर में घनिष्ठ संबंध पाया जाता है। ऊंची अर्थव्यवस्था वाले देशों में उच्च साक्षरता दर पाई जाती है जबकि कम विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों में निम्न साक्षरता दर पाई जाती है।

2. नगरीकरण (Urbanization) साक्षरता को प्रभावित करने वाले कारकों में किसी देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ उस देश के नगरीकरण का स्तर भी प्रमुख है। उच्च नगरीकृत देशों में साक्षरता भी अधिक है। क्योंकि नगरीय क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था उपयुक्त होती है। इसके अतिरिक्त नगरों में विभिन्न स्तर की शिक्षा सुविधाओं के अवसर भी उपलब्ध होते हैं।

3. समाज में स्त्रियों का स्तर (Level of Female in Society)-विभिन्न समाजों में साक्षरता उनकी अपनी विशेषताओं द्वारा भी निर्धारित होती है। समाज में स्त्रियों का स्तर और उनकी जनसंख्या भी साक्षरता दर को प्रभावित करती है। विकासशील तथा पिछड़े राष्ट्रों में स्त्रियों के निम्न सामाजिक स्तर के कारण स्त्रियों में साक्षरता दर कम पाई जाती है जबकि ईसाई समुदाय की स्त्रियों
के उच्च सामाजिक स्तर के कारण उनमें साक्षरता दर उच्च पाई जाती है।

4. यातायात एवं संचार के साधन (Source of Transport and Communication) यातायात एवं संचार के साधनों का अल्प विस्तार भी विकासशील समाज में ग्रामीण समाज को अलग-थलग कर देता है और ग्रामीण समाज ज्ञान से वंचित रह जाता है।

5. प्रशासकीय नीतियाँ (Administrial Policies)-सरकारी नीतियाँ भी साक्षरता दर की वृद्धि में सहायक सिद्ध होती हैं। विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा की मुफ्त व्यवस्था और उसका प्रसार सरकारी नीति पर ही निर्भर करता है।

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HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. कितनी कोशिका अवस्था वाले निषेचित अण्डे को बिना शल्य चिक्रिसा से प्रास कर प्रतिनियुक्त मादा में स्थानान्तरित किया जाता है-
(अ) 8-32 कोशिका
(ब) 6-8 कोशिका
(स) 1-5 कोशिका
(द) 33-40 कोशिका
उत्तर:
(ब) 6-8 कोशिका

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

2. निम्न में गौ पशुओं में सुधार का कार्यक्रम है-
(अ) मल्टीपल ओबियूलेशन
(ब) एैम्ब्रयो ट्रांसफर
(स) (अ) व (ब) दोनों
(द) अन्तःप्रजनन अवसादन
उत्तर:
(ब) एैम्ब्रयो ट्रांसफर

3. शहद के उत्पादन के लिए मधुमक्खिखों के छत्तों के रखरखाव को कहते हैं-
(अ) मौन पालन
(ब) मछली पालन
(स) पशुपालन
(द) कुक्कुट पालन
उत्तर:
(अ) मौन पालन

4. निम्न में से मधुमक्खी के द्वारा परागण की क्रिया होती है-
(अ) सूर्यमुखी
(ब) सरसों
(स) नाशपाती
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

5. स्पाइरुलिना किसका धनी स्रोत है ?
(अ) प्रोटीन
(ब) विटामिन
(स) खनिज
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(अ) प्रोटीन

6. किसी कोशिका कर्तोतकी से पूर्ण पादप में जनित्र होने की क्षमता कहलाती है-
(अ) ऊतक संवर्धन
(ब) अमरता
(स) सूक्ष्म प्रवर्धन
(द) पूर्णशक्तता
उत्तर:
(द) पूर्णशक्तता

7. जल अभाव के प्रति प्रतिरोधी उच्च उत्पादन वाली किस्में हैं-
(अ) संकर मक्का
(ब) संकर ज्वार
(स) संकर बाजरा
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

8. ए. ऐसकुलैटस की नई किस्म है-
(अ) हरित क्रान्ति
(ब) नील क्रान्ति
(स) परभनी क्रान्ति
(द) नरभनी क्रान्ति
उत्तर:
(स) परभनी क्रान्ति

9. पशुओं की फार्मिंग (रखरखाव) के दौरान एक किलो मांस उत्पन्न करने के लिए कितने किलो धान्यों की आवश्यकता होती है?
(अ) 3-10 किग्रा.
(ब) 10-12 किग्रा.
(स) 14-15 किग्रा.
(द) 17-18 किय्रा.
उत्तर:
(अ) 3-10 किग्रा.

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

10. भारतीय कृषि अनुसंधान, नई दिल्ली द्वारा मोचित की गई कौनसी सब्जी की फसल है जिसमें विटामिन ‘सी’ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है ?
(अ) करेला
(ब) बधुआ
(स) सरसों
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

11. डॉ. नार्गन बोरलॉग का नाम किससे जुड़ा है?
(अ) हरित क्रांति
(ब) स्वेत क्रांति
(स) पीत क्रांति
(द) नील क्रांति
उत्तर:
(अ) हरित क्रांति

12. गेहूं का किसके साथ संकरण द्वारा ट्रिटीकेल प्रास हुआ-
(अ) जई
(ब) जौ
(स) मक्का
(द) राई
उत्तर:
(द) राई

13. फसली पौधों में प्रेरित उत्परिवर्तनजन के लिए सामान्यतः किसका उपयोग किया जाता है?
(अ) गामा किरणें (कोबाल्ट 60 से)
(ब) ऐल्फा कफ
(स) X-किरणें
(द) UV (200 mm)
उत्तर:
(अ) गामा किरणें (कोबाल्ट 60 से)

14. कर्तोतक का उपयोग होता है-
(अ) आनुर्वंशिक अभियांत्रिकी में
(स) सूक्ष्म प्रवर्धन में
(ब) DNA पुनर्बोगज में
(द) संरक्षण में।
उत्तर:
(स) सूक्ष्म प्रवर्धन में

15. मूंग में जो पीत मोजेक वायरस तथा चूर्णिल आसिता के प्रति प्रतिरोधक क्षमता किसके द्वारा प्रेरित थी-
(अ) अन्तःप्रेजनन
(ब) उत्परिवर्तन
(स) बहि:प्रजनन
(द) कृत्रिम गर्भाधान
उत्तर:
(ब) उत्परिवर्तन

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16. विश्व की सर्वाधिक छाद्य अनाज प्रदान करने वाल तीन फसलें कौनसी हैं?
(अ) गेहु, चावल और मक्का
(ब) चावल, मक्का और सोरघम
(स) गेहूँ, मक्का और सोरघम
(द) गेहूं, चावल और जो
उत्तर:
(अ) गेहु, चावल और मक्का

17. गेहूँ की अर्द्धवामन किस्म का विकास किस वैज्ञानिक ने किया-
(अ) नारमैन ई. बारलौग
(ब) चारवेल ई. यारलौग
(स) चारमैन ई. लारलोग
(द) वारमैन ई. प्यारलौग।
उत्तर:
(द) वारमैन ई. प्यारलौग।

18. लबलब तथा गार्डन मटर में कौनसा पोषक तत्त्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता है-
(अ) विटामिन-ए
(ब) विटामिन-सी
(स) आयरन एवं कैल्सियम
(द) प्रोटीन
उत्तर:
(द) प्रोटीन

19. विश्व की अत्यन्त उत्कृष्ट ऊन प्रदान करने वाली पश्मीना नस्ल किसकी है?
(अ) कश्मीर भेड़ तथा अफगान भेड़ का संकर
(ब) बकरी
(स) भेड़
(द) बकरी और भेड़ का संकर
उत्तर:
(ब) बकरी

20. गेहूँ के पास स्टेम सॉफ्लाई किसके कारण नहीं आती है?
(अ) जड़
(ब) पत्ती
(स) तना
(द) पुष्प
उत्तर:
(स) तना

21. मधुमक्खी पालन कहलाता है-
(अ) सेरीकल्चर
(ब) ऐपीकल्चर
(स) टिशूकल्चर
(द) पिसीकल्चर
उत्तर:
(ब) ऐपीकल्चर

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22. हिसरडैल क्या है?
(अ) गाय
(ब) बकरी
(स) सुअर
(द) भेड़
उत्तर:
(द) भेड़

23. निम्न में कौनसे तीन मुख्य खाद्य पदार्थ (वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट) एक साथ हमें मिलते हैं?
(अ) केला
(ब) मूंगफली
(स) नारंगी
(द) चना
उत्तर:
(ब) मूंगफली

24. मक्का में संकर औज का समायोजन किसके द्वारा किया जाता है?
(अ) उत्परिवर्तनों का प्ररेण करके
(ब) बीजों में DNA का प्रभेदन करके
(स) अन्तःप्रजनन किए गए दो जनक वंशक्रमों में प्रसंकरण करके
(द) सर्वाधिक उत्पादनशील पौधों से बीज प्राप्त करके
उत्तर:
(स) अन्तःप्रजनन किए गए दो जनक वंशक्रमों में प्रसंकरण करके

25. भारत में यूरोपीयन्स के आने से पहले कौनसी सब्जी अनुपस्थित थी?
(अ) आलू तथा टमाटर
(ब) शिमला मिर्च तथा बैंगन
(स) मक्का तथा चिचिडा
(द) करेला
उत्तर:
(अ) आलू तथा टमाटर

26. पूर्ण शक्तता (Totipotency) का अर्थ है-
(अ) जन्तुओं द्वारा खोये गये अंगों को पुनः उत्पन्न करने की क्षमता
(ब) कायिक कोशिकाओं द्वारा पूर्ण जीव उत्पन्न करने की क्षमता
(स) कोशिका के डी.एन.ए. में बाह्य जीन प्रविष्ट कराना
(द) अपरिपक्व भ्रूणों के वर्धन की तकनीक
उत्तर:
(ब) कायिक कोशिकाओं द्वारा पूर्ण जीव उत्पन्न करने की क्षमता

27. रोगाणुरहित पौधों को तैयार करने के लिए पौधे के कौनसे भाग में विभज्योतक का संवर्धन करते हैं?
(अ) कैम्बियम
(ब) प्ररोहशीर्ष
(स) अन्तर्वेशीय विभज्योतक
(द) मूलशीर्ष
उत्तर:
(ब) प्ररोहशीर्ष

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

28. टमाटर का प्रोटोप्लास्ट आलू के प्रोटोप्लास्ट से युग्मित होने के परिणामस्वरूप किसका निर्माण होता है?
(अ) पोमेटो
(ब) टोमेटो
(स) सोमेटो
(द) जीटोमेटो
उत्तर:
(अ) पोमेटो

29. निम्न में से जीवाणु जनित रोग है-
(अ) तम्बाकू मोजेक
(ब) शलजम मोजेक
(स) आले पछेती अंगमारी
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(स) आले पछेती अंगमारी

30. निम्न में पशुधन है-
(अ) भैंस
(ब) गाय
(स) सूअर
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

31. कौनसी मछली मच्छर के लार्वा को चुन-चुन कर खाती है?
(अ) गेम्बूसिया
(ब) रोहू
(स) क्लेरियस
(द) एक्सोसीटस
उत्तर:
(अ) गेम्बूसिया

32. प्राणिकोशिका संवर्धन प्रौद्योगिकी का आज सर्वाधिक अनुप्रयोग किसके उत्पादन में हो रहा है ?
(अ) इंसुलिन
(ब) इंटरफेरोन
(स) वैक्सीन
(द) खाद्यशील प्रोटीन
उत्तर:
(स) वैक्सीन

33. कौनसा पीड़कनाशी वसा-स्नेही है-
(अ) आर्गेनोक्लोरीन
(ब) आर्गेनोफास्फेट
(स) ट्राइआजीन
(द) पायरिथोयड
उत्तर:
(अ) आर्गेनोक्लोरीन

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अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
उस जीव का नाम लिखिए जिसका प्रयोग एकल कोशिका प्रोटीन के व्यापारिक उत्पादन में किया जाता है।
उत्तर:
स्पाइरुलाइना जिसका प्रयोग एकल कोशिका प्रोटीन के व्यापारिक उत्पादन में किया जाता है।

प्रश्न 2.
डेयरी उद्योग किसका प्रबंधन है ?
उत्तर:
डेयरी उद्योग पशु प्रबंधन है।

प्रश्न 3.
कर्तोंतक किसे कहते हैं?
उत्तर:
संवर्धन आरम्भ करने के लिए उपयोग में लाये जाने वाले पौधों से लिए गये ऊतक या अंग के कटे हुए टुकड़े को कर्तोतक कहते हैं।

प्रश्न 4.
पशुपालन किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानव कल्याण के लिए पशुधन एवं देखभाल को पशुपालन कहते हैं।

प्रश्न 5
वांछित विशेषकों (ट्रेटों) के लिए मवेशियों में समयुग्मता बढ़ाने के लिए उपयोग की जाने वाली रणनीति के विषय में बताइए ।
उत्तर:
वांछित विशेषकों (ट्रेटों) के लिए मवेशियों में समयुग्मता बढ़ाने के लिए उपयोग की जाने वाली रणनीति के विषय अन्तः प्रजनन (Interbreeding) हैं।

प्रश्न 6.
अर्द्ध- वामन धान की किस्मों को किससे व्युत्पन्न किया गया ?
उत्तर:
अर्द्ध-वामन धान की किस्मों को IR-8 तथा थाइचूंग नेटिव -1 से व्युत्पन्न किया गया।

प्रश्न 7.
पामेटो का निर्माण किस-किसके प्रोटोप्लास्ट से युग्मन के फलस्वरूप होता है?
उत्तर:
पोमेटो का निर्माण टमाटर का प्रोटोप्लास्ट व आलू के प्रोटोप्लास्ट के युग्मन से बनता है।

प्रश्न 8.
जननद्रव्य (जर्मप्लाज्म ) संग्रहण किसे कहते हैं?
उत्तर:
फसल में पाये जाने वाले सभी जीनों के विभिन्न अलील का समस्त संग्रहण (पादपों/ बीजों) को उसका जननद्रव्य (जर्मप्लाज्म ) संग्रहण कहते हैं।

प्रश्न 9.
पादपों में विषाणु द्वारा उत्पन्न होने वाले किन्हीं दो रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(अ) तंबाकू मोजेक
(ब) शलजम मोजेक

प्रश्न 10.
एस. टी. पी. का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
एस. टी. पी. का पूरा नाम एकल कोशिका प्रोटीन है।

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प्रश्न 11.
अलवण जल में पाई जाने वाली किन्हीं दो मछलियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • कतला
  • रोहू

प्रश्न 12.
स्पाइरुलाइना का आर्थिक महत्त्व क्या है?
उत्तर:
यह प्रदूषण को कम करने में एवं प्रोटीन का बहुत अच्छा स्रोत है।

प्रश्न 13.
हिसरडैल क्या है? इसका विकास किसके संगम से हुआ है?
उत्तर:
हिसरडैल भेड़ की नस्ल है। इसका विकास एवीज तथा मैरीनोरेम्स के बीच संगम कराने से हुआ है।

प्रश्न 14.
गाय में पुटक परिपक्वन तथा उच्च अंडोत्सर्जन को प्रेरित करने के लिए कौनसा हार्मोन दिया जाता है ?
उत्तर:
गाय में पुटक परिपक्वन तथा उच्च अंडोत्सर्जन को प्रेरित करने के लिए एफ एस एच (FSH) नामक हार्मोन दिया जाता है।

प्रश्न 15.
पारजीनी गाय रोजी से उत्पन्न दूध की क्या विशेषता
उत्तर:
पारजीनी गाय रोजी के दूध में वसा की मात्रा कम तथा प्रोटीन की मात्रा अधिक थी।

प्रश्न 16.
मधुमक्खी की उस प्रजाति का नाम लिखिए जिन्हें पाला जा सकता है।
उत्तर:
ऐपिस इंडिका मधुमक्खी की वह प्रजाति है जिसे पाला जा सकता है।

प्रश्न 17.
पुष्पीकरण के समय मधुमक्खी के छत्तों को खेत के बीच रखने पर पौधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
पुष्पीकरण के समय मधुमक्खी के छत्तों को खेत के बीच रखने पर पौधों की परागण क्षमता बढ़ जायेगी ।

प्रश्न 18.
अन्त: प्रजनन किसे कहते हैं?
उत्तर:
एक ही नस्ल के पशुओं के मध्य होने वाले प्रजनन को अन्तः प्रजनन कहते हैं।

प्रश्न 19.
पशु प्रजनन का एक उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
पशु प्रजनन का उद्देश्य पशुओं के उत्पादन को बढ़ाना तथा उनके उत्पादों की वांछित गुणवत्ता में सुधार करना है।

प्रश्न 20.
हरित क्रान्ति से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
उच्च उत्पादन क्षमता वाली उन्नत किस्मों के विकास द्वारा खाद्यान्न ( धान व गेहूँ) में हुई तीव्र वृद्धि की प्रावस्था को हरित क्रान्ति कहते हैं।

प्रश्न 21.
बर्ड फ्लू के रोगकारक का नाम लिखिए।
उत्तर:
बर्ड फ्लू HgN, विषाणु है। के रोगकारक का नाम इन्फ्लुन्जा-ए-विषाणु या

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प्रश्न 22.
श्वेत क्रान्ति किससे सम्बन्धित है ?
उत्तर:
श्वेत क्रान्ति डेयरी उत्पादों में वृद्धि के लिए हुए क्रान्तिकारी परिवर्तनों से सम्बन्धित है।

प्रश्न 23.
कितनी कोशिका अवस्थाओं वाले निषेचित अण्डे को बिना शल्य चिकित्सा से प्राप्त कर प्रतिनियुक्त मादा (माँ) में स्थानांतरित किया जाता है ?
उत्तर:
8-32 कोशिका अवस्थाओं वाले निषेचित अण्डे को बिना शल्य चिकित्सा से प्राप्त कर प्रतिनियुक्त मादा (माँ) में स्थानांतरित किया जाता है।

प्रश्न 24.
बहि: प्रजनन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
भिन्न-भिन्न नस्लों के मध्य होने वाले प्रजनन को बहि: प्रजनन कहते हैं।

प्रश्न 25.
दक्षिण भारत में पैदा होने वाला उष्णकटिबंधीय गन्ने का वानस्पतिक नाम लिखिए।
उत्तर:
दक्षिण भारत में पैदा होने वाला उष्णकटिबंधीय गन्ने का वानस्पतिक नाम सैकरम ऑफीसिनेरम है।

प्रश्न 26.
पामफ्रैट एवं मैकेरेल कौनसे जल में पाई जाती है?
उत्तर:
पामफ्रैट एवं मैकेरेल लवणीय जल (समुद्र) में पाई जाती है।

प्रश्न 27.
परभनी क्रान्ति क्या है?
उत्तर:
परभनी क्रान्ति भिण्डी की पीत मॉजेक वायरस प्रतिरोधी किस्म है।

प्रश्न 28.
नीली क्रान्ति किससे सम्बन्धित है ?
उत्तर:
नीली क्रान्ति मात्स्यकी उद्योग में आये क्रान्तिकारी परिवर्तनों से सम्बन्धित है।

प्रश्न 29.
आनुवंशिक रूपान्तरित पादपों के कोई दो नाम लिखिए।
उत्तर:

  • गोल्डन राइस
  • फ्लेवर सेवर ।

प्रश्न 30.
जैव प्रबलीकरण का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
इसके द्वारा प्राप्त जैव पुष्टिकारक, विटामिन, खनिज, प्रोटीन तथा स्वास्थ्यवर्द्धक वसा वाली प्रजनित फसलें जननस्वास्थ्य को सुधारने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 31.
भेड़ की नयी नस्ल ‘हिसरडेल’ के जनकों के नाम दीजिए।
उत्तर:
बीकानेरी एैवीज (भेड़) तथा मैरीनो रेम्स (मेढ़ा या मेष)

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प्रश्न 32.
अन्त: प्रजनन किसे कहते हैं?
उत्तर:
एक ही नस्ल के पशुओं के मध्य होने वाले प्रजनन को अन्तः प्रजनन कहते हैं।

प्रश्न 33.
जैव प्रबलीकरण का महत्त्व बताइये।
उत्तर:
जैव पुष्टि कारक विटामिन तथा खनिज के उच्च स्तर वाली अथवा उच्च प्रोटीन तथा स्वास्थ्यवर्धक वसा वाली प्रजनित फसलें जन- स्वास्थ्य को सुधारने में महत्त्व है।

प्रश्न 34.
ऐसे दो पौधों के नाम लिखिए जो कृत्रिम वरण द्वारा उत्पन्न किये गये हैं।
उत्तर:

  • कल्याण सोना
  • शाइनिंग मूंग ।

प्रश्न 35.
सोमा क्लोन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
ऊतक संवर्धन के अन्तर्गत एक पादप से प्राप्त कर्तोंतक द्वारा उत्पन्न सभी आनुवांशिक रूप से समान पादप सोमा क्लोन कहलाते हैं।

प्रश्न 36.
फसलों के सुधार के लिए उपयोग की जाने वाली प्रौद्योगिकी का नाम लिखिए।
उत्तर:
ऊतक संवर्धन ।

प्रश्न 37.
पूर्ण शक्तता (Totipotency) क्या है ?
उत्तर:
किसी कोशिका से सम्पूर्ण नये पौधे के उत्पन्न होने की क्षमता पूर्ण शक्तता (Totipotency) कहलाती है।

प्रश्न 38
इच्छित विशेषक (trait) के लिए पशुओं में समयुग्मजता (Homozygosity) वृद्धि के लिए कार्यनीति बताइये ।
उत्तर:
अन्त: प्रजनन समयुग्मजता प्राप्त करने की कार्यनीति है।

प्रश्न 39.
व्यावसायिक रूप में प्रयुक्त जीव का नाम बताइये जो एकल कोशिका प्रोटीन उत्पादित करता है।
उत्तर:
स्पाइरुलीना (Spirulina)।

प्रश्न 40.
आधुनिक गेहूँ के त्रिगुणित पूर्वज नाम क्या है?
उत्तर:
आधुनिक गेहूँ के त्रिगुणित पूर्वज का नाम ट्रिटिकम ड्यूरम (Triticum durum) है।

प्रश्न 41.
कवक द्वारा फसलों में उत्पन्न कोई एक रोग का नाम लिखिए ।
उत्तर:
श्वेत किट्ट रोग।

प्रश्न 42.
‘पोमेटो’ पादप का निर्माण किन दो पादपों के प्रोटोप्लास्ट संलयन से होता है?
उत्तर:
टमाटर तथा आलू ।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
अंतः विशिष्ट संकरण को उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर:
अन्तः विशिष्ट संकरण (Inter Specific Hybridisation) – जन्तुओं में सुधार हेतु प्रयुक्त इस विधि में एक जाति के नर या मादा जन्तुओं का किसी अन्य जाति के मादा या नर जन्तुओं के साथ संगम कराया जाता है। ऐसे संगम से उत्पन्न संततियाँ सामान्यतः दोनों जनक जातियों से भिन्न लक्षण दर्शाती हैं।

दुर्भाग्य से अधिकतर अन्तरजातीय संकर जन्तु बन्ध्य होते हैं तथा इनकी उत्तरजीविता काफी कम होती है किन्तु कई बार ऐसे कुछ संकरों की संततियों में दोनों ही जनक प्रजातियों के वांछनीय लक्षण उपस्थित होते हैं जो कि आर्थिक महत्त्व के हो सकते हैं। उदाहरणार्थ घोड़ी एवं गधे के बीच संगम से उत्पन्न खच्चर (Mule) अपनी जनक प्रजातियों की तुलना में अधिक दमदार एवं पुष्ट होता है। यह कठिन मार्गों तथा पर्वतीय क्षेत्रों में दुलाई जैसे कठिन कार्य के लिए अधिक उपयोगी होता है।

प्रश्न 2.
पशुधन किसे कहते हैं? पशुधन में कौन-कौनसे जन्तु सम्मिलित हैं?
उत्तर:
पशुधन – ऐसे समस्त जन्तु या पशु जो उनकी मानव के लिए लाभदायक उपयोगिता के कारण मनुष्य द्वारा पालतू बनाए जाते हैं।
व उनकी देखभाल की जाती है, सामूहिक रूप से जन्तु सम्पदा या पशुधन कहते हैं। पशुधन में निम्न जन्तु सम्मिलित हैं-

  • गाय
  • बकरी
  • ऊँट
  • भैंस
  • बैल
  • घोड़ा
  • सूअर आदि।

प्रश्न 3.
एकल कोशिका प्रोटीन से क्या तात्पर्य है ? उदाहरण सहित समझाइए ।
उत्तर:
एकल कोशिका प्रोटीन (Single Cell Protein) – अनाज, दालें, सब्जियों, फल आदि के पारंपरिक कृषि उत्पादन से मनुष्यों तथा पशुओं की संख्या जिस गति से बढ़ रही है, आहार संबंधी उसकी माँग पूरी नहीं हो पाती। अनाज से मांस की ओर बढ़ने से भी धान्यों की माँग बढ़ गई है क्योंकि पशुओं के रख-रखाव के दौरान एक किलोग्राम मांस उत्पन्न करने के लिए उसे तीन से दस किलोग्राम धान्यों की आवश्यकता होती है।

25 प्रतिशत से भी अधिक मानव की जनसंख्या भूख तथा कुपोषण (malnutrition) की शिकार है। पशु तथा मानव पोषण के लिए प्रोटीन के वैकल्पिक स्रोतों में से एक एकल कोशिका प्रोटीन (Single Cell Protein) है। प्रोटीन के अच्छे स्रोत के रूप में सूक्ष्मजीवों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। मशरूम को आजकल अधिकांश लोगों के द्वारा भोजन के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

अतः बड़े पैमाने पर मशरूम संवर्धन एक प्रकार से बढ़ता हुआ उद्योग है। जिससे अब विश्वास – सा होने लगा है कि सूक्ष्मजीव भी आहार के रूप में स्वीकार्य हो जायेंगे। सूक्ष्मजीव जैसे स्पाइरुलाइना (Spirulina) को आलू संसाधन संयंत्र (जिसमें स्टार्च है) घासफूस, शीरा, खाद और यहाँ तक वाहितमल पर आसानी से उगाया जा सकता है; ताकि बड़ी मात्रा में यह प्राप्त हो सके।

स्पाइरुलाइना (Spirulina) में प्रोटीन, खनिजों, वसा, कार्बोहाइड्रेटों तथा विटामिनों की प्रचुर मात्रा विद्यमान है। गणना के अनुसार 250 किलोग्राम वाली गाय 200 ग्राम प्रोटीन पैदा करती है। इतने ही समय में 250 ग्राम सूक्ष्मजीव जैसे- मिथायलोफिलस मिथायलो ट्राफस (Methylophilus Methylotrophus) इनकी वृद्धि तथा बायोमास उत्पादन की उच्चदर से सम्भावित 25 टन तक प्रोटीन उत्पन्न कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
पादपों में प्रजनन की क्रिया अपनाने से पूर्व किन महत्त्वपूर्ण दो बातों का ध्यान रखना चाहिए? कवक, जीवाणु एवं विषाणु द्वारा फसलों में होने वाले दो-दो रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पादपों में प्रजनन की क्रिया अपनाने से पूर्व निम्न दो बातों का ध्यान रखना चाहिए-

  1. रोगकारक जीव के बारे में जानकारी
  2. उसके प्रसार की क्रियाविधि की जानकारी

1. कवकों द्वारा उत्पन्न रोग-

  • गेहूँ का भूरा किट्ट (Brown rust of wheat)
  • गन्ने का रैंड रॉट रोग (Red rot of sugarcane)

2. जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न रोग-

  • आलू पछेती अंगमारी ( Late blight of potato)
  • क्रूसीफर का ब्लैक राट (Black rot of crucifers)

3. विषाणु द्वारा उत्पन्न रोग-

  • तंबाकू मोजेक (Tobacco mosaic)
  • शलजम मोजेक (Turnip mosaic )

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प्रश्न 5.
जैव तकनीक से प्राप्त एकल कोशिका प्रोटीन (SCP) के चार उपयोग लिखिए।
उत्तर:
एकल कोशिका प्रोटीन के निम्न चार उपयोग हैं-

  1. इनमें गुणवत्ता वाले प्रोटीन की मात्रा अधिक तथा वसा व कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होती है।
  2. इनका उत्पादन वर्षभर किया जा सकता है तथा उत्पादन जलवायु पर निर्भर नहीं होता।
  3. सूक्ष्मजीवों की वृद्धि दर अधिक होने से कम क्षेत्रफल से अधिक मात्रा में SCP प्राप्त किया जा सकता है।
  4. विश्व में प्रोटीन की कमी को पूरा करने का यह एक उपयुक्त साधन है।

प्रश्न 6.
सूक्ष्मप्रवर्धन का संक्षिप्त महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
सूक्ष्मप्रवर्धन का महत्त्व – ऊतक संवर्धन के माध्यम से पादप के पुनर्जनन अथवा पुनर्उद्भवन को सूक्ष्म प्रवर्धन कहते हैं। इस तकनीक द्वारा कायिक प्रजनन करने वाले आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण पौधों का बहुगुणन तेजी से किया जाता है। इस तकनीक की विशेषता यह है कि बहुत ही कम समय में कम स्थान में अधिक संख्या में पौधों का उत्पादन किया जा सकता है।

इस तकनीक को कई पौधों के तीव्र बहुगुणन में काम में लिया जा चुका है, उदाहरण- आर्किडस कटेलीया, सिम्बिडियम, डेन्ड्रोबियम, वान्डा एवं शोभाकारी पादप- जरबेरा, गुलदाऊदी, कारनेशन, बिगोनिया आदि । भारत में व्यापक स्तर पर सूक्ष्मप्रवर्धन का उपयोग हो रहा है जिसमें अनेक प्राइवेट कम्पनियों ने सफलता प्राप्त की है।

इस विधि का प्रयोग निर्यात के लिए अलंकारिक पौधों को भारी संख्या में प्राप्त करने के लिए भी किया जा रहा है। कुछ पौधे जैसे केला में जहाँ बीज या तो कम बनते हैं या इनके विकसित होने में अनेक बाधायें आती हैं वहाँ यह लाभदायक तकनीक है। दुर्लभ एवं संकटग्रस्त या विलुप्ति के कगार पर पहुँचे पौधों का गुणन क्लोनिंग द्वारा किया जा सकता है।

प्रश्न 7.
कर्तोंतकों के प्रकार लिखिये ।
उत्तर:
कर्तोंतक चार प्रकार के होते हैं-

  1. पूर्ववर्ती विभज्योतक युक्त कर्तोतक (Explant having pre-existing meristems)
  2. पुमंगधानी (Anthers)
  3. तरुण भ्रूण (Young embryo)
  4. प्रोटोप्लास्ट (Protoplast)।

प्रश्न 8.
पादप प्रजनन क्या है? इसमें आनुवंशिकी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
फसलों के जीनप्ररूप में मानव के लिए उपयोगी परिवर्तन करने की क्रिया को पादप प्रजनन कहते हैं। पादप प्रजनन में अच्छी किस्में तैयार की जाती हैं। ये किस्में खेती के लिए उपयोगी, अधिक उत्पादन करने वाली एवं रोग प्रतिरोधी होती हैं। पूर्व में पादप प्रजनकों को आनुवंशिकी का ज्ञान नहीं था।

1856 में मेण्डल ने वंशागति के नियमों का प्रतिपादन किया, फिर इन नियमों की 1900 में पुनः खोज हुई। बाद में जीन, अन्योन्यक्रिया, सहलग्नता की खोज हुई तथा ज्ञात हुआ कि जीन गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं। मेण्डल के नियमों के अनुसार लक्षण जीन द्वारा नियंत्रित होते हैं। जीनों में विसंयोजन तथा स्वतन्त्र अपव्यूहन होने के कारण लक्षणों में विविधता उत्पन्न होती है। पादप प्रजनकों द्वारा पहले दो किस्मों का आपस में संकरण किया जाता है।

इस संकरण से प्राप्त F, पीढ़ी में स्वपरागण किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त F पीढ़ी तथा बाद की पीढ़ियों में नए व उत्कृष्ट जीन संयोजनों वाले पौधों का चयन कर एक नई किस्म का विकास किया जा सकता है। इस प्रकार पादप प्रजनन विधियाँ आनुवंशिकी के सिद्धान्तों पर आधारित होती हैं। पादप प्रजनक द्वारा फसल सुधार की परियोजनाओं का प्रारूप आनुवंशिकी सिद्धान्तों के आधार पर तैयार किया जाता है।

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प्रश्न 9.
कायिक संकरण का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
कायिक संकरण का महत्त्व – कायिक संकरण विधि से ऐसी जातियों के संकर प्राप्त किये जा सकते हैं, जिनमें लैंगिक संकरण संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, आलू के पुष्पी एवं अपुष्पी क्लोन के कायिक संकर जननक्षम (Fertile) पुष्प देते हैं। गाजर एवं चावल के कायिक संकर प्राप्त कर सकते हैं। इनमें लैंगिक संकर प्राप्त करना संभव नहीं है। कायिक संकरों से जीन स्थानान्तरण एवं कोशिकाद्रव्य स्थानान्तरण किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
जन्तु नस्लों में सुधार के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर:
जन्तु नस्लों में सुधार के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं-

  1. जन्तुओं की वृद्धि दर में सुधार करना
  2. दूध, मांस, अण्डे एवं ऊन आदि के उत्पादन में वृद्धि करना
  3. उक्त उत्पादों की गुणात्मक वृद्धि में सुधार
  4. जन्तुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि
  5. उच्च स्तर या संतोषजनक स्तर की जनन दर
  6. उत्पादक जीवनकाल में वृद्धि आदि ।

प्रश्न 10.
जन्तु नस्लों में सुधार के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर:
जन्तु नस्लों में सुधार के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं-

  1. जन्तुओं की वृद्धि दर में सुधार करना
  2. दूध, मांस, अण्डे एवं ऊन आदि के उत्पादन में वृद्धि करना
  3. उक्त उत्पादों की गुणात्मक वृद्धि में सुधार
  4. जन्तुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि
  5. उच्च स्तर या संतोषजनक स्तर की जनन दर
  6. उत्पादक जीवनकाल में वृद्धि आदि।

प्रश्न 11.
संकर ओज क्या है?
उत्तर:
संकर ओज- आनुवंशिक गुणों में विभिन्न दो समयुग्मजी अन्तःप्रजातों का जब परस्पर क्रॉस कराते हैं तो प्राप्त संकरण संतति उत्पादकता, दृढ़ता और कद में जनकों से अधिक प्रबल या ओजस्वी अथवा श्रेष्ठ होती है। संकर सन्तान की जनकों की तुलना में अधिक उत्पादकता व अधिक उत्तमता को संकर ओज कहते हैं। जैविक प्रभाव – जनन क्षमता में वृद्धि, जीवन में अधिक सक्षमता, अनुकूलनता व रोग कीट प्रतिरोधकता में वृद्धि ।

गुणात्मक प्रभाव – आकार में वृद्धि, मात्रात्मक गुणों जैसी उपज प्रति हैक्टर में वृद्धि, पौधा अधिक प्रबल व बहुस्वस्थ । जनकों में जितनी अधिक वंशागत विभिन्नता होगी संकर संगति में उतना अधिक संकर ओज होगा। उदाहरण- संकर मक्का, संकर बाजरा आदि । जन्तुओं में कुक्कुटों एवं सूअरों के लगभग सभी संकर, अन्तःप्रजात क्रमों के मध्य संकरण द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं।

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प्रश्न 12.
निम्न को परिभाषित कीजिये-

  1. कर्तोंतक (Explant)
  2. कैलस (Callus)
  3. जीवद्रव्यक ( Protoplast )
  4. निर्जर्म (Aseptic or Sterile )
  5. निर्जर्मीकरण (Sterilization)
  6. निवेशित करना ( Inoculate )
  7. पात्रे (In Vitro)
  8. भ्रूणाभ (Embryoid)

उत्तर:

  1. कर्तोंतक (Explant) – संवर्ध आरम्भ करने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले पौधे से लिए गए ऊतक या अंग के काटे हुए टुकड़े।
  2. कैलस (Callus ) – प्रायः घाव से या ऊतक संवर्धन में विकसित होने वाली अविभेदित एवं विभेदित कोशिकाओं के सक्रिय रूप से विभाजित होने वाले असंगठित ऊतक ।
  3. जीवद्रव्यक ( Protoplast ) – कोशिका भित्ति के एन्जाइमी विघटन द्वारा प्राप्त होने वाली पादप कोशिका । क्रिया ।
  4. निर्जर्म (Aseptic or Sterile ) – सभी सूक्ष्मजीवों से मुक्त।
  5. निर्जर्मीकरण (Sterilization) – सूक्ष्मजीवों के उन्मूलन की
  6. निवेशित करना ( Inoculate ) – कर्तोंतकों को पोषक माध्यम में रखना ।
  7. पात्रे (In Vitro) – परखनली, बोतल आदि में संवर्धन।
  8. भ्रूणाभ (Embryoid ) – पात्रे कायिक कोशिकाओं के द्वारा उत्पन्न संरचना में भ्रूण सदृश पादपक (Plantlet = छोटे पौधे) ।

प्रश्न 13.
कायिक संकरण के लाभ लिखिये।
उत्तर:
कायिक संकरण के लाभ निम्नलिखित हैं-

  • ऐसे संकरों की रचना सम्भव हो गई है जो वर्गिकीय या अन्य बाधाओं के कारण सामान्य संकरणों से सम्भव नहीं थी ।
  • ऐसे पौधों से संकर बनाना कायिक संकरण से सम्भव हो गया है, जिनमें लैंगिक अंग असामान्य होते हैं या जिनमें नरबन्ध्यता होती है।

प्रश्न 14.
संवर्धन माध्यम किसे कहते हैं? इन माध्यमों में एक निश्चित अनुपात में कौन-कौनसे पदार्थ लिये जाते हैं? नाम लिखिये ।
उत्तर:
संवर्धन माध्यम वह माध्यम जिस पर पादप अंगों, ऊतकों व कोशिकाओं को संवर्धित करते हैं, संवर्धन माध्यम कहलाता है।
इन माध्यमों में निम्न पदार्थ एक निश्चित अनुपात में लिये जाते हैं –

  1. अकार्बनिक पोषक
  2. विटामिन
  3. कार्बन स्रोत (सामान्यत: सुक्रोस)
  4. वृद्धि नियामक, जैसे ऑक्सिन व साइटोकाइनिन
  5. जटिल कार्बनिक पदार्थ जैसे नारियल का पानी, केसीन जल अपघटनी, टमाटर रस आदि ।

प्रश्न 15.
कृत्रिम गर्भाधान के क्या-क्या लाभ हैं?
उत्तर:
कृत्रिम गर्भाधान ( Artificial Insemination) के लाभ निम्नलिखित हैं-

  1. प्राकृतिक प्रजनन द्वारा एक वर्ष में एक सांड 60-100 गायें गर्भित कर सकता है, जबकि कृत्रिम गर्भाधान द्वारा 10,000 या अधिक गायें गर्भित कराई जा सकती हैं।
  2. उत्तम नस्ल के सांड के उपलब्ध न होने पर वहाँ उनके वीर्य का उपयोग किया जा सकता है।
  3. वीर्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुगमता से ले जाया जा सकता है।
  4. कृत्रिम गर्भाधान विधि से बड़े सांड़ों का वीर्य छोटी गाय पर प्रयोग में लाया जा सकता है।
  5. इस प्रणाली में जो गायें लूली, लंगड़ी या चोट आदि लग जाने से प्राकृतिक सम्भोग के लिए अयोग्य होती हैं, उन्हें भी गर्भित करके बच्चे प्राप्त किए जा सकते हैं।
  6. कृत्रिम ढंग से पशु सुधार करने पर थोड़े ही सांड़ों द्वारा काम चल जायेगा।
  7. विदेशों से भी श्रेष्ठ एवं चयनित सांड़ों का वीर्य आयात कर प्रयोग में लिया जा सकता है।
  8. प्राकृतिक गर्भाधान की तुलना में इस विधि द्वारा गर्भाधान कराने में सफलता अधिक मिलती है।
  9. पशुपालक को सांड़ रखने की आवश्यकता नहीं होती है।
  10. इस विधि में मादाओं को जननेन्द्रिय रोग होने की आशंका नहीं होती है।
  11. कृत्रिम गर्भाधान विधि द्वारा प्रजनन सम्बन्धित पूर्ण लेखा- जोखा रखा जा सकता है।

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प्रश्न 16.
पशुधन का भारत की अर्थव्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। समझाइए ।
उत्तर:
भारत एक कृषि प्रधान देश होने से यहाँ की जनसंख्या का 70 प्रतिशत भाग गाँवों में रहता है तथा पशुधन से अपनी आजीविका कमाता है। जिस देश की उपज अच्छी रहती है वहाँ की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होती है।

प्रश्न 17.
पशुपालन किसे कहते हैं? पालतू जानवरों का संक्षिप्त में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
पशुपालन कृषि की वह शाखा है जिसका संबंध पालतू जानवरों के प्रजनन, उनके खाने-पिलाने और अन्य देखभाल करने से है। जब इसमें आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पालतू जानवरों के उचित उपयोग को शामिल कर लिया जाता है तब इसे पशुधन प्रबंधन (Livestock Management) कहते हैं।

पालतू जानवरों का महत्त्वश्रेणीउसके अन्तर्गत आने वाले प्राणी
1. दूध और मांस प्रदायीगाय, भैंस, बकरी, भेड़, सूअर, मुर्गा, मछली आदि
2. भारवाहकबैल, घोड़ा, गधा, खच्चर, ऊँट आदि
3. रेशा, खाल या चमड़ा प्रदायीभेड़, बकरी, गाय, भैंस, ऊँट आदि
4. अण्डा प्रदायीमुर्गी, बतख

प्रश्न 18.
डेयरी उत्पाद पर टिप्पणी लिखिए ।
उत्तर:
डेयरी उत्पाद – दूध मनुष्यों तथा जानवरों के बच्चों के लिए सम्पूर्ण भोजन है। इसमें प्रोटीन, वसा, लैक्टोज, शर्करा, कैल्सियम तथा फॉस्फोरस जैसे खनिज, विटामिन ‘ए’ तथा ‘बी’ और साथ ही साथ प्रतिरक्षा प्रदान करने वाले एंटीबॉडी भी होते हैं। अलग-अलग लोग अपनी-अपनी पसंद और आवश्यकतानुसार दूध को अनेक प्रकार से इस्तेमाल करते हैं। दही, मक्खन, मट्ठा, पनीर, घी, क्रीम, खोया, दूध का पाउडर, कंडेस्ट मिल्क आदि प्रमुख डेयरी उत्पाद हैं ।

प्रश्न 19.
मधुमक्खियों से मिलने वाले उत्पाद क्या हैं? प्रत्येक के दो-दो उपयोग भी लिखिए।
उत्तर:
मधुमक्खियों से मिलने वाले उत्पाद निम्न हैं-

  1. शहद
  2. मोम

शहद के उपयोग-

  1. भोजन – शहद एक पोषक भोजन है, इसमें भरपूर ऊर्जा तथा विटामिन होते हैं।
  2. औषध – आयुर्वेदिक तथा यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में बहुत-सी दवाइयाँ शहद में मिलाकर या शहद के साथ दी जाती हैं। यह मृदुरोचक, रुधिर शोधक तथा जुकाम, खाँसी व ज्वर के रोध के रूप में कार्य करता है।
  3. मादक पेय तथा सौन्दर्य प्रसाधक लोशन तैयार करने के लिए।
  4. वैधानिक अनुसंधान में बैक्टिरिया के संवर्धन बनाने में।
  5. फल- मक्खियों तथा अन्य नाशकीटों के लिए विषैला चारा बनाने में।

मोम के उपयोग-

  1. मोमबत्तियों के बनाने में ।
  2. दवाइयों के निर्माण में ।
  3. वार्निशों तथा पेंट्स के बनाने में।
  4. जलरोधन तथा धागों पर मोम चढ़ाना।

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प्रश्न 20.
निम्न फसलों की किस्म का नाम बताइए जो पीड़क के प्रति प्रतिरोधकता रखते हैं, साथ ही पीड़क अथवा रोग प्रतिरोधक का नाम भी बताइए ।
(1) ब्रैसिका ( रेपसीड मस्टर्ड )
(2) फलैट बीन
(3) ओकरा (भिंडी) ।
उत्तर:
निम्न फसलों की किस्म एवं रोग के प्रति प्रतिरोधक –

फसल का नामकिस्मरोग के प्रति प्रतिरोधक
1. ब्रैसिका (रेपसीड मस्टर्ड)पूसा गौरवऐफिड
2. फलैट बीनपूसा सेम 2 पूसा सेम 3जैसिड, ऐफिड तथा फलभेदक
3. ओकरा (भिंड़ी)पूसा स्वामी पूसा-ए-4शूट तथा फलभेदक

प्रश्न 21.
मछली पालन का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
मछली पालन का महत्त्व निम्नलिखित है-

  1. भोजन के रूप में मछलियों का पालन स्वादिष्ट एवं अधिक पौष्टिक मांस प्राप्ति हेतु किया जाता है।
  2. तेल- मछलियों से प्राप्त तेल स्नेहक, सौन्दर्य प्रसाधनों, पेन्ट एवं वार्निश के निर्माण में उपयोग किया जाता है।
  3. मत्स्य त्वचा – मछलियों की त्वचा का उपयोग ताश के डिब्बे, आभूषणों के डिब्बे, जूते, स्त्रियों के लटकाने वाले विशेष पर्स आदि में किया जाता है।
  4. रजतशल्क द्वारा मोती का निर्माण-प्र – फ्रान्स में मछली के शल्कों का उपयोग कृत्रिम मोती निर्माण में किया जाता है।
  5. उर्वरक के रूप में मछलियों के मरने के बाद इनका उपयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है। इनको सुखाकर मत्स्य चूर्ण तैयार किया जाता है जिसका उपयोग तम्बाकू, चाय व कॉफी की खेती में उर्वरक के रूप में किया जाता है।
  6. औषधि के रूप में मछलियों के यकृत निष्कर्षण द्वारा यकृत तेल प्राप्त होता है। इसमें विटामिन ए, सी, डी, ई की मात्रा पायी जाती है जो अभाव रोग के उपचार में औषधि का काम करती है। अनेक व्यक्ति मछली पालन के व्यवसाय से रोजगार प्राप्त कर रहे हैं।

प्रश्न 22.
मधुमक्खी पालन की सफलता के आवश्यक बिन्दु बताइये ।
अथवा
मधुमक्खी पालन की सफलता के लिए आप किन बातों का ध्यान रखेंगे?
उत्तर:
सफल मधुमक्खी पालन के लिए निम्नलिखित बिन्दु महत्त्वपूर्ण हैं-

  1. मधुमक्खियों की प्रकृति तथा स्वभाव का ज्ञान ।
  2. मक्खी के छत्तों को रखने के लिए उपयुक्त स्थान का चयन ।
  3. मक्खियों के समूह ( दल) को पकड़ना तथा उन्हें छत्ते में रखना।
  4. विभिन्न मौसमों में छत्तों को प्रबंधन ।
  5. शहद तथा मोम का रख-रखावं तथा एकत्रीकरण ।
  6. मधुमक्खियाँ हमारी बहुत-सी फसलों जैसे- सूर्यमुखी, सरसों, सेब तथा नाशपाती के लिए परागणक हैं।

पुष्पीकरण के समय यदि इन छत्तों को खेतों के बीच रख दिया जाये तो इससे पौधों की परागण क्षमता बढ़ जाती है और इस प्रकार फसल तथा शहद दोनों के उत्पादन में सुधार हो जाता है।

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प्रश्न 23.
कुक्कुट पालन से क्या तात्पर्य है? कुक्कुट पालन के महत्त्वपूर्ण घटक कौन-कौनसे हैं ?
उत्तर:
मुर्गीपालन या कुक्कुट पालन (Poultry Farming)- मुर्गियों एवं कुछ अन्य पक्षियों की प्रजातियों का पालन और प्रजनन मुर्गीपालन कहलाता है। इन पक्षियों से प्राप्त मांस एवं अण्डे प्रोटीन के सम्पन्न स्रोत होते हैं। प्रोटीन के अतिरिक्त इनमें अन्य पोषक पदार्थ भी मिलते हैं। मुर्गीपालन को पशु-पालन (Cattle rearing ) की अपेक्षा अधिक उपयोगी माना जाता है क्योंकि ये अधिक दर से अण्डे देती हैं व विभिन्न जलवायु दशाओं में रह सकती हैं।

मुर्गीपालन के लिए बहुत कम स्थान की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त इनका पालन सरल होता है व कम समय में ही यह अच्छी आय का स्रोत बन सकता है ।

कुक्कुट पालन में उपयोगी पक्षी-पक्षियों की कई प्रजातियों को कुक्कुट पालन हेतु उपयोग में लिया जाता है जिनमें मुख्य प्रजातियाँ निम्न हैं-

  1. मुर्गा प्रजातियाँ (Breeds of Fowl ) – भारत में घरेलू मुर्गी (Domestic fowl), गैलस डोमेस्टिकस (Gallus domesticus) को मुख्य रूप से पाला जाता है।
  2. बतख ( Ducks) – बतखों से भी अण्डे व मांस प्राप्त किया जाता है। भारत में कुल कुक्कुटों की जनसंख्या (Poultry population) का 6 प्रतिशत योगदान बतखों का है। ये सामान्यतः भारत के दक्षिणी एवं पूर्वी प्रदेशों में पाई जाती हैं।
  3. टर्की (Turkey) – टर्की (Meleagris) हाल के कुछ वर्षों में ही पालतू बनाया गया पक्षी है।

कुक्कुट पालन के प्रमुख घटक – कुक्कुट फार्म प्रबंधन के लिए उपयुक्त नस्लें, सही, सुरक्षित फार्म की परिस्थितियाँ, सही-सही आहार तथा जल और सफाई एवं स्वास्थ्य के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।

प्रश्न 24.
मुर्गीपालन के किन्हीं चार महत्त्वपूर्ण घटकों की
सूची बनायें।
उत्तर:

  • स्वास्थ्य तथा सफाई का ध्यान
  • रोगमुक्त तथा उपयुक्त जाति का चयन
  • सुरक्षित एवं नियमित फार्म परिस्थितियाँ
  • जल व दाने की समुचित व्यवस्था ।

प्रश्न 25.
किसी रोगयुक्त गन्ने के पौधे से पुनः स्वस्थ गन्ने के पौधे प्राप्त करने में वैज्ञानिक सफल हो गए हैं-
(a) पौधे के उस भाग का नाम लिखिए जिसे वैज्ञानिकों ने कर्तोंतक (एक्सप्लान्ट ) के रूप में उपयोग किया था।
(b) स्वस्थ पौधों की पुनःप्राप्ति के लिए वैज्ञानिकों ने जो कार्यविधि अपनाई उसका वर्णन कीजिए।
(c) फसलों के सुधार के लिए उपयोग की जाने वाली इस प्रौद्योगिकी का नाम लिखिए।
उत्तर:
(a) विभज्योतक (meristem) शीर्षस्थ एवं अक्षीय ।
(b) अक्षीय विभज्योतक भाग को वैज्ञानिक द्वारा अलग करके उसे निजर्मीकरण कर लेते हैं तदुपरान्त कृत्रिम माध्यम में उगाया जाता है। इस माध्यम में पोषक तत्व तथा प्रतिजैविक का उपयोग किया जाता है, जिससे विषाणु रहित पौधे उत्पन्न होते हैं।
(c) फसलों के सुधार के लिए उपयोग की जाने वाली इस प्रौद्योगिकी को ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) कहते हैं।

प्रश्न 26.
यदि कुक्कुट फार्म में कुछ कुक्कुट बर्ड फ्लू से संक्रमित हो जायें तब इसे फैलने से किस प्रकार रोकेंगे?
उत्तर:
बर्ड फ्लू से संक्रमित होने पर इसे निम्न प्रकार से फैलने से रोका जा सकता है-

  1. बर्ड फ्लू एक संक्रमित रोग है जो संक्रमित कुक्कुट से स्वस्थ कुक्कुट में तेजी से फैलता है अतः संक्रमित कुक्कुटों को स्वस्थ कुक्कुटों से अलग रखना चाहिये ।
  2. मृत संक्रमित कुक्कुटों को जमीन में गहरी दफना देना चाहिए।
  3. स्वस्थ कुक्कुटों का टीकारण करवाना चाहिए ।

HBSE 12th Class Biology Important Questions Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

प्रश्न 27.
एक केला शाक वायरस संक्रमित हो गया है। इस शाक से आप केले का स्वस्थ पौधा कैसे प्राप्त करेंगे? समझाइये |
उत्तर:
इसके लिए ऊतक संवर्धन तकनीक का उपयोग करना चाहिए। यद्यपि पौधा विषाणु से संक्रमित है, परन्तु विभज्योतक ( शीर्ष एवं कक्षीय) विषाणु से अप्रभावित रहता है। अतः विभज्योतक को अलग कर उसे विट्रो में उगाया जाता है ताकि विषाणुमुक्त पादप तैयार हो सके।

प्रश्न 28.
शहद उत्पादन बढ़ जाता है जब छत्तों को खेतों में पुष्पन के दौरान रखा जाता है। समझाइए ।
उत्तर:
मधुमक्खियां बहुत-सी फसलों जैसे सूर्यमुखी, सरसों, सेब, नाशपाती के लिए परागणक है। पुष्पीकरण के समय यदि इन छत्तों को खेतों के बीच रखा जाता है तो इससे पौधों की परागण क्षमता बढ़ जायेगी और इस प्रकार फसल एवं शहद का उत्पादन भी बढ़ जायेगा ।

प्रश्न 29.
डेरी फार्म में पशुओं की दुग्ध उत्पादकता स्वास्थ्य तथा सफाई को उन्नत करने के लिए कौन-से प्रयास किये जा रहे हैं? समझाइये ।
उत्तर:
दुग्ध उत्पादन मूल रूप से फार्म में रहने वाले पशुओं की नस्ल की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। अच्छी नस्ल का चयन तथा उनकी रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को महत्त्वपूर्ण माना जाता है अच्छी उत्पादन क्षमता प्राप्त करने के लिए पशुओं की देखभाल, जिससे उनके रहने का अच्छा घर तथा पर्याप्त जल तथा रोगाणुमुक्त वातावरण होना चाहिए। पशुओं का भोजन प्रदान करने का तरीका वैज्ञानिक होना चाहिए।

इसमें विशेषकर चारे की गुणवत्ता तथा मात्रा पर बल दिया जाना चाहिये। इसके अलावा दुग्धीकरण, दुग्ध उत्पादों का भण्डारण तथा परिवहन के दौरान सफाई तथा पशु पर कार्य करने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य सर्वोपरि है। समय-समय पर डेयरी फार्मों व पशुओं के स्वास्थ्य का परीक्षण भी आवश्यक है। किसी पशु चिकित्सक से पशुओं की नियमित जाँच होनी चाहिए।

प्रश्न 30.
हरित क्रान्ति क्या है?
उत्तर:
सन् 1952 में हमारे देश में गेहूँ तथा चावल की उपज क्रमश: 654 Kg. तथा 800 Kg. प्रति हेक्टर थी। यह उत्पादन की मांग की तुलना में बहुत कम था। अतः सरकार और कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि में सुधार की दिशा में खास ध्यान दिया। ऐसा करने से अनाज फसलों में भारी बढ़ोतरी हुई और हम आत्मनिर्भर हो गये। इस लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में जो भी विभिन्न कदम उठाये गये उन सबको एक साथ मिलाकर हरित क्रान्ति का नाम दिया जाता है।

हरित क्रान्ति – कृषि में आधुनिक तकनीकों को लगाकर खासतौर से अनाजों की फसलों में जो चमत्कारिक वृद्धि हुई उसे हरित क्रान्ति कहा जाता है। भारत में हरित क्रान्ति का जनक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को माना जाता है। विश्व संदर्भ में यह श्रेय नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत डॉ. नॉर्मन बोरलॉग को जाता है जिन्होंने कि 1963 में गेहूँ की अर्द्धवामन किस्म का विकास किया था।

हरित क्रान्ति में सहायक रहे कारक इस प्रकार थे-

  • फसलों की अधिक उपज देने वाली किस्मों को शामिल किया गया।
  • बहुफसलन (multiple cropping), बेहतर सिंचाई और उर्वरकों की पर्याप्त सप्लाई ।
  • फसलों को रोगों तथा नाशी जीवों से बचाने के लिए सुरक्षा उपाय अपनाना ।
  • वैज्ञानिक कृषि को अनुसंधान खेतों से गाँव के किसानों तक पहुँचाना।
  • खेतों की उपज को बाजार तक पहुँचाने के लिए सुसंगठित प्रबंध करना।

प्रश्न 31.
मानव कल्याण में पशुपालन की क्या भूमिका है?
उत्तर:
विज्ञान की वह शाखा जिसका संबंध पालतू जानवरों तथा उनकी देखभाल से है, पशुपालन कहलाता है। प्रबंधन के फलस्वरूप अच्छे उत्पाद और सेवाएँ पशुपालन द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं। हसबेन्ड्री (पालन) शब्द हसबैण्ड (Husband) पति शब्द से आया है, जिसका अर्थ है ऐसा व्यक्ति जो उचित देखभाल कर सके। जब इसमें आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पालतू जानवरों के उचित उपयोग के अध्ययन को शामिल कर लिया जाता है तब इसे पशु प्रबंधन (Livestock Management) कहते हैं।

पशुपालन का संबंध पशुधन जैसे गाय, भैंस, सूअर, घोड़ा, भेड़, ऊँट, बकरी आदि के प्रजनन तथा उनकी देखभाल से होता है जो मनुष्य के लिए लाभप्रद हैं। इसमें कुक्कुट तथा मत्स्य पालन भी शामिल है। मत्स्य पालन के अन्तर्गत मत्स्यों (Fishes), मृदुकवची मोलस्का तथा क्रस्टेशियाई प्रॉन (Prawn) व केकड़ा (Crab) का पालन किया जाता है। इसके अन्तर्गत इन्हें पकड़ना, शिकार कर बेचना तथा पालन करना शामिल है।

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अति प्राचीन काल से मानव मधुमक्खी, रेशमकीट, झींगा (प्रॉन), केकड़ा (Crab), मछलियाँ, पक्षी, सूअर, भेड़, ऊँट आदि का प्रयोग उनके उत्पादों जैसे शहद, रेशम, मांस, दूध, अण्डे, ऊन आदि प्राप्त करने के लिए कर रहा है। एक गणना के अनुसार विश्व का सत्तर प्रतिशत से भी अधिक पशुधन भारत तथा चीन में है। अतः पशु प्रजनन तथा देखभाल की पारंपरिक पद्धतियों के अतिरिक्त गुणवत्ता तथा उत्पादकता में सुधार लाने के लिए नयी प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना आवश्यक हो गया है।

प्रश्न 32.
MOET का पूरा नाम लिखें। पशुओं की उन्नति की इस तकनीक की व्याख्या करें।
उत्तर:
MOET का पूरा नाम मल्टीपल औवियूलेशन ऍम्ब्रयो ट्रांसफर (Mutiple Ovulation Embryo Transfer) है। इस तकनीक के अन्तर्गत एक गाय को पुटक परिपक्व एवं उच्च अण्डोत्सर्ग (ovulation ) प्रेरित करने के लिए FSH (Follicular Stimulating Hormone) हार्मोन दिया जाता है जिसके फलस्वरूप गाय 6-8 अण्डे उत्सर्ग करती है जबकि सामान्यतः प्रतिचक्र में एक अण्डे का निर्माण होता है। इस गाय का क्रॉस उच्च नस्ल के साँड के साथ कराया जाता है या फिर कृत्रिम वीर्यसेचन (Artificial Insomination) कराया जाता है।

इसके बाद 8-32 कोशिकीय निषेचित अण्डे को सावधानीपूर्वक जनन मार्ग से होकर बाहर निकाल लिया जाता है। इसके पश्चात् इसका स्थानान्तरण सोरगेट मादा के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है जहाँ भ्रूण का पुनः विकास होता है। इस तकनीक द्वारा कम समय में ही अधिक दुग्ध उत्पादन व उच्च गुणवत्ता वाले गौ पशुओं की नस्लें उत्पन्न की गई हैं। इस तकनीक (MOET) का प्रयोग सफलतापूर्वक गाय, भेड़, खरगोश, भैंस, घोड़ा आदि में किया जा सकता है।

प्रश्न 33.
एकल कोशिका प्रोटीन किसे कहते हैं? यह कैसे बनता है? इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए। मानवों के लिए यह किस प्रकार उपयोगी है?
उत्तर:
अनाज, दालें, सब्जियों, फल आदि के पारंपरिक कृषि उत्पादन से मनुष्यों तथा पशुओं की संख्या जिस गति से बढ़ रही है, आहार संबंधी उसकी मांग पूरी नहीं हो पाती। अनाज से मांस की ओर बढ़ने से भी धान्यों की मांग बढ़ गई है क्योंकि पशुओं के रख-रखाव के दौरान एक किलोग्राम मांस उत्पन्न करने के लिए उसे तीन से दस किलोग्राम धान्यों की आवश्यकता होती है।

25 प्रतिशत से अधिक मानव की जनसंख्या भूख तथा कुपोषण की शिंकार है। पशु तथा मानव पोषण के लिए प्रोटीन के वैकल्पिक स्रोतों में से एक एकल कोशिका प्रोटीन (Single Cell Protein) है। प्रोटीन के अच्छे स्रोत के रूप में सूक्ष्मजीवों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। मशरूम को आजकल अधिकांश लोगों के द्वारा भोजन के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

अतः बड़े पैमाने पर मशरूम संवर्धन एक प्रकार से बढ़ता हुआ उद्योग है। जिससे अब विश्वास सा होने लगा है कि सूक्ष्मजीव भी आहार के रूप में स्वीकार्य हो जायेंगे। सूक्ष्मजीव जैसे स्पाइरूलाइना (Spirulina) को आलू संसाधन संयंत्र (जिसमें स्टार्च है)। घासफूस, शीरा, खाद और यहाँ तक वाहितमल पर आसानी से उगाया जा सकता है, ताकि बड़ी मात्रा में यह प्राप्त हो सके। स्पाइरूलाइना (Spirulina) में प्रोटीन, खनिजों, वसा, कार्बोहाइड्रेटों तथा विटामिनों की प्रचुर मात्रा विद्यमान है।

गणना के अनुसार 250 किलोग्राम वाली गाय 200 ग्राम प्रोटीन पैदा करती है। इतने ही समय में 250 ग्राम सूक्ष्म जीव जैसे मिथायलोफिलस मिथायलोट्राफस (Methylophilus Methylotrophus) इनकी वृद्धि तथा बायोमास उत्पादन की उच्च दर से सम्भावित 25 टन तक प्रोटीन उत्पन्न कर सकते हैं।

प्रश्न 34.
रोग प्रतिरोधक फसल प्राप्त करने के लिए कृषक के द्वारा उपयोग किये जाने वाले विभिन्न चार चरणों को क्रम से लिखिए।
उत्तर:
रोग प्रतिरोधक फसल प्राप्त करने के लिए कृषक द्वारा उपयोग किये जाने वाले चार चरण निम्न हैं-

  • प्रतिरोधकता स्रोतों के लिए जननद्रव्य को छानना।
  • चयनित जनकों का संकरण।
  • संकरों का चयन तथा मूल्यांकन।
  • नयी किस्मों का परीक्षण तथा उन्हें उत्पन्न करना।

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प्रश्न 35.
MOET कार्यक्रम ने पशुओं की वांछित प्रजाति की संख्या को अत्यधिक बढ़ाने में सहायता की है। कार्यक्रम को चलाने के लिए चरणों को बनाइये।
उत्तर:
MOET (मल्टीपल औवियूलेशन एैम्ब्रयो ट्रांसफर) कार्यक्रम को चलाने के लिए निम्नलिखित चरण हैं-

  • सुपरओव्यूलेशन (Superovulation ) – मादा पशु को FSH (Follicular Stimulating Hormone) हार्मोन देकर सुपर अण्ड निर्माण के लिए उद्दीपित किया जाता है।
  • सुपर ओव्यूलेटेड मादा का क्रॉस प्राकृतिक विधि से उच्च नस्ल के साँड (नर) या उच्च नस्ल नर (साँड) का वीर्य लेकर कृत्रिम विधि से मादा को निषेचित किया जाता है।
  • S-32 कोशिकीय निषेचित अण्ड को सोरगेट मादा के गर्भाशय में स्थानान्तरित कर दिया जाता है ।

प्रश्न 36.
उत्तरी भारत के क्षेत्रों में गन्ने के उच्च उत्पादन एवं वांछनीय गुण, , जैसे कि मोटा तना तथा उच्च शर्करा वाले पौधे प्राप्त करने के लिये कौन-सी तकनीक अपनाई जाती है? समझाइये।
उत्तर:
सैकेरम बारबरी ( Saccharum barberi) को मूलत: उत्तरी भारत में पैदा किया जाता था, परन्तु इसका शर्करा अंश तथा उत्पादन क्षमता बहुत कम थी। दक्षिण भारत में पैदा होने वाला उष्णकटिबंधीय गन्ना सैरम ऑफीसिनेरम (Saccharum officinarum) का तना मोटा था तथा इसमें शर्करा अंश कहीं अधिक था, परन्तु यह उत्तरी भारत में ठीक से नहीं पनप पाया। इन दोनों किस्मों को सफलतापूर्वक संकरित कराया गया ताकि उच्च उत्पादन के वांछनीय गुण जैसे कि मोटा तना तथा उच्च शर्करा वाले पौधे प्राप्त हो सकें और साथ ही इसे उत्तरी भारत के गन्ना उत्पादन क्षेत्रों में भी पैदा किया जा सके।

प्रश्न 37.
डेरी फार्म प्रबन्धन की प्रक्रियाओं को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
डेरी फार्म वह फार्म है जहाँ दुग्ध उत्पादों को प्राप्त करने के लिए दुग्ध उत्पन्न करने वाले पशुओं जैसे गाय, भैंस, ऊँट, बकरी आदि का पालन-पोषण किया जाता है। ऐसे कार्य जहाँ दूध का उत्पादन होता है, के प्रबन्धन को डेरी फार्म प्रबन्धन कहते हैं। इससे दुग्ध की गुणवत्ता में सुधार तथा उसका उत्पादन बढ़ता है। दुग्ध उत्पादन मूल रूप से फार्म में रहने वाले पशुओं की नस्ल की गुणवत्ता पर निर्भर करता है अच्छी नस्ल का चयन तथा उनकी रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

अच्छी उत्पादन क्षमता प्राप्त करने के लिए पशुओं की अच्छी देखभाल, जिसमें उनके रहने का अच्छा घर तथा पर्याप्त जल तथा रोगाणुमुक्त वातावरण होना चाहिए। पशुओं को भोजन प्रदान करने का तरीका वैज्ञानिक होना चाहिए। इसमें विशेषकर चारे की गुणवत्ता तथा मात्रा पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

इसके अतिरिक्त दुग्धीकरण, दुग्ध उत्पादों का भण्डारण तथा परिवहन के दौरान सफाई तथा पशु पर कार्य करने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य सर्वोपरि है। समय-समय पर डेरी फार्मों की सफाई व पशुओं के स्वास्थ्य का परीक्षण भी आवश्यक है। किसी पशु चिकित्सक से पशुओं की नियमित जाँच होनी चाहिए जिससे उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियाँ दूर कराई जा सकें।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
भारतीय उच्च उत्पादन वाली संकर फसलों का वर्णन कीजिए ।
अथवा
निम्न भारतीय संकर फसलों का वर्णन कीजिए-
(1) गेहूँ एवं धान
(2) गन्ना
(3) ज्वार ।
उत्तर:
पादप प्रजनन क्या है –
पादप प्रजनन पादप प्रजातियों का एक उद्देश्यपूर्ण परिचालन है ताकि-

  • वांछित पादप किस्में तैयार हो सकें।
  • किस्में खेती के लिए अधिक उपयोगी हों।
  • अच्छा उत्पादन करने वाली हों।
  • रोग प्रतिरोधी हों।
  • मृदा की अम्लीयता, लवणता व क्षारीयता के प्रति प्रतिरोधी किस्में तैयार करना।
  • फसल परिपक्वन काल में कमी लाना अर्थात् पादप जीवन चक्र (Plant life cycle) की अवधि को छोटा करना।

पूरे संसार के सरकारी संस्थानों तथा व्यापारिक कंपनियों द्वारा पादप प्रजनन कार्यक्रम अत्यन्त सुव्यवस्थित ढंग से चलाए जाते हैं।फसल की नयी आनुवंशिक नस्ल विकसित करने से प्रजनन के निम्नलिखित प्रमुख पद हैं-
(1) विभिन्नताओं का चयन (Selection of Variability)प्रजनन में किसी भी नस्ल के सुधार से विभिन्नताओं का उपस्थित होना व इनका चयन ही प्रमुख आधार है। अनेक फसलों में पूर्ववर्ती आनुवंशिक विभिन्नतायें उन्हें अपनी जंगली प्रजातियों से प्राप्त हुई हैं।

विभिन्न जंगली किस्मों, प्रजातियों तथा कृषि योग्य प्रजातियों के संबंधियों का संग्रहण एवं परिरक्षण तथा उनके अभिलक्षणों का मूल्यांकन उनके समष्टि में उपलब्य प्राकृतिक जीन के प्रभावकारी समुपयोजन के लिए पूर्वापेक्षित होता है। किसी जाति के सम्पूर्ण आनुवंशिक द्रव्य या उसमें उपस्थित समस्त जीनों के योग को उस जाति का जनन द्रव्य (Germ plasm) कहते हैं। जनन द्रव्य को नष्ट होने से बचाने के लिए द्रव्य संरक्षण किया जाता है। जनन द्रव्य संरक्षण प्रायः पादपों/बीजों के रूप में किया जाता है।

(2) जनकों का मूल्यांकन तथा चयन (Evaluation and selection of parents)-पादपों की पहचान हेतु जर्म प्लाजम (Germ plasm) का आकलन किया जाता है जिससे वाँछित लक्षणों का समावेश किया जा सके। चयनित वांछित लक्षणों वाले उत्कृष्ट पाद्पों की संख्या में वृद्धि (बहुगुणन) करके इनको संकरण प्रक्रिया के लिए काम में लेते हैं। यदि आवश्यकता होती है तो शुद्ध वंशक्रम भी प्राप्त कर लिया जाता है।

(3) चयनित जनकों के बीच पर संकरण (Crops Hybridization among selected parents)-वांछित लक्षणों को बहुधा दो भिन्न पादपों (जनकों) से प्राप्त कर संयोजित किया जाता है। जैसे एक जनक में उच्च प्रोटीन उपस्थित है तथा दूसरे में रोग निरोधक गुण उपस्थित है तो ऐसे जनकों के गुणों का समावेश संकरण द्वारा संकर जाति में किया जाता है।

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इस क्रॉस संकरण द्वारा निर्मित संकर जाति में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन व रोग प्रतिरोधक क्षमता दोनों ही पायी जाती हैं परन्तु यह अधिक प्रक्रिया कठिन एवं अधिक समय लेती है। इसके लिए वांछित गुणयुक्त नर के परागकणों को एकत्रित करके वांछित गुणों युक्त मादा पादप के वर्तिकाग्र पर छिड़काव किया जाता है। इसके फलस्वरूप बने पादपों में वांछित संयोजन की संभावना सैकड़ों हजारों में एक की ही रहती है।

(4) श्रेष्ठ पुनर्योगज का चयन तथा परीक्षण (Selection and Testing of Superior Recombination)-इसके अन्तर्गत संकरों की संतति के बीच से पाद्प का चयन किया जाता है जिनमें वांछित लक्षण संयोजित होते हैं। अतः संतति का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप ऐसे पादप उत्पन्न होते हैं जो दोनों जनकों में श्रेष्ठ होते हैं। इनका कई पीढ़ियों तक स्वपरागण क्रिया तब तक कराते हैं जब तक कि समरूपता की अवस्था नहीं आ जाती (समयुग्मजता)। जिससे संतति में लक्षण विसंयोजित नहीं हो पाते।

(5) नये कंषणों का परीक्षण, निर्मुक्त होना तथा व्यापारीकरण (Test of New cultivative Release and Commercilization)-नव चयनित वंशक्रम का उनके उत्पादन, गुणवत्ता, कीट प्रतिरोधकता एवं रोग प्रतिरोधकता आदि के लक्षणों के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। मूल्यांकन की कसौटी पर खरा उतरने पर इन पादपों को आदर्श परिस्थितियों में अनुसंधान वाले खेतों में उगाया जाता है।

यहाँ पादपों में वांछित गुणों का मूल्यांकन करते हैं। इसके पश्चात् इन पौधों का परीक्षण देश भर में किसानों के खेत में कई स्थानों पर, कम से कम तीन ऋतुओं तक किया जाता है। यदि नई किस्में स्थानीय श्रेष्ठ किस्म से अधिक उत्कृष्ट होती हैं तो इसे किस्म के रूप में मोचित किया जा सकता है। नई किस्म के मोचन का प्रस्ताव किस्म मोचन समिति के समक्ष रखा जाता है।

प्रस्ताव स्वीकार होने पर इसे एक नाम देकर नई किस्म के रूप में मोचित कर दिया जाता है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की लगभग 33 प्रतिशत आय तथा समष्टि की लगभग 62 प्रतिशत जनसंख्या को रोजगार कृषि से प्राप्त होता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद देश के सामने मुख्य चुनौती उसकी बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए पर्याप्त आहार का उत्पादन करना था।

1960 के मध्य गेहूँ तथा धान की बहुत-सी उच्च उत्पादन वाली प्रजातियों का विकास पादप प्रजनन तकनीकों के प्रयोग से किया गया। परिणामस्वरूप खाद्य उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई। यही प्रावस्था सामान्यतः हरित क्रान्ति के नाम से जानी जाती है। उच्च उत्पादन वाली किस्मों की भारतीय संकर फसलों को नीचे चित्र में प्रदर्शित किया गया है-
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गेहूं तथा धान (Wheat & Paddy)- 1960 से 2000 तक के वर्षों के दौरान गेहूं का उत्पादन ग्यारह मिलियन टन से बढ़कर पचहत्तर मिलियन टन हुआ। जबकि धान का उत्पादन पैंतीस मिलियन टन से बढ़कर 89.5 मिलियन टन तक पहुँच गया। इसका कारण गेहूं तथा धान की अर्द्धवामन किस्मों का विकसित होना है। मैक्सिको स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर व्हीट एंड मेंज में नोबेल पुरस्कार पुरस्कृत डॉ. नॉरमैन ई. बारलौग ने गेहूं की अर्द्धवामन किस्म का विकास किया।

यह उसी का परिणाम है कि सन् 1963 में उच्च उत्पादन तथा प्रतिरोधी किस्मों की वंश रेखाएं जैसे सोनालिका तथा कल्याण सोना का विकास कर उन्हें भारत के गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में प्रयोग किया। अर्द्धवामन धान की प्रजातियों को IR-8 (इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट IRRI, फिलिपींस में विकसित) तथा थाइचूंग नेटिव-I (ताइवान) से व्युत्पन्न किया गया। सन् 1966 में इन किस्मों को प्रयोग में लाया गया।

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बाद में और अधिक उत्पादन क्षमता वाली अर्द्धवामन प्रजातियों जया तथा रत्ना का विकास भारत में किया गया। गन्ना (Sugarcane)-सै के रम बारबरी (Saccharum barberi) को मूलत: उत्तरी भारत (North India) में उगाया जाता था।. लेकिन इसमें शर्करा की मात्रा कम एवं इसकी उत्पादन की क्षमता कम थी। दक्षिणी भारत में पैदा होने वाला उष्णकटिबंधीय गन्ना सैकेरम ऑफीसिनेरम (Saccharum officinarum) का तना मोटा एवं इसमें शर्करा की मात्रा कहीं अधिक थी, किन्तु यह उत्तरी भारत में सही ढंग से विकसित नहीं हो रहा था।

इन दोनों किस्मों को सफलतापूर्वक संकरित किया गया ताकि उच्च उत्पादन के वांछनीय गुण जैसे कि मोटा तना तथा उच्च शर्करा वाले पौधे प्राप्त हो सकें और साथ ही इसे उत्तरी भारत (North India) के गन्ना उत्पादन क्षेत्रों में भी पैदा किया जा सके। ज्वार (Millets)-संकर मक्का, ज्वार और बाजरा का सफलतापूर्वक विकास भारत में किया जा चुका है। इनका विकास संकर प्रजनन (Hybrid Breeding) के फलस्वरूप हुआ है। ये किस्में जल अभाव के प्रति प्रतिरोधी एवं उच्च उत्पादन वाली हैं।

प्रश्न 2.
रोग प्रतिरोधकता के लिए प्रजनन विधियों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर:
रोग प्रतिरोधकता के लिए पादप प्रजनन (Plant breeding for Disease Resistant)-
अनेक प्रकार के रोगकारक, जैसे-कवक, जीवाणु तथा विषाणु उष्णकटिबन्धीय जलवायु की कृष्य जातियों को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं। इन रोगकारकों के कारण फसलों को 20-30 प्रतिशत तक हानि या कभी-कभी पूर्ण हानि भी होती है। ऐसी परिस्थितियों में रोग के प्रति प्रतिरोधी खेतिहर जातियों में प्रजनन तथा विकास से खाद्य उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।

इन्हें उगाने से जीवाणुनाशी तथा कवकनाशी पदार्थों का प्रयोग भी कम हो जाता है तथा उन पर आश्रितता कम हो जाती है। पोषी पादपों की प्रतिरोधकता उसकी रोगजनकों को रोग उत्पन्न करने से रोकने की क्षमता है तथा इसका निर्धारण पोषी पादप के आनुवंशिक ढाँचे द्वारा किया जाता है।

प्रजनन की क्रिया अपनाने से पहले रोगकारक जीव के बारे में जानकारी तथा उसके प्रसार की क्रियाविधि की जानकारी महत्वपूर्ण है। कवकों द्वारा उत्पन्न कुछ रोग निम्न हैं-गेहूं का भूरा किट्ट, गन्ने का रैड रॉट रोग तथा आलू पछेती अंगमारी। विषाणु द्वारा तथा जीवाणु द्वारा उत्पन्न रोग के उदाहरण क्रमशः निम्न हैं-तम्बाकू मोजेक, शलजम मोजेक, टमाटर का पर्ण बेलन आदि एवं जीवाणु द्वारा उत्पन्न रोग सिट्स कैकर चावल का किट्ट। रोग प्रतिरोधकता के लिए प्रजनन विधियाँ (Methods of Breeding for Disease Resistance)-
रोग प्रतिरोधकता उत्पन्न करने की परम्परागत विधियाँ निम्न प्रमुख हैं-

  1. संकरण (Hybridisation)
  2. चयन (Selection)

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित पदों को अपनाते हैं-

  • प्रतिरोधकता स्रोतों के जनन द्रव्य को छानना
  • चयनित जनकों का संकरण
  • संकरों का चयन
  • मूल्यांकन
  • नयी किस्मों का परीक्षण
  • तथा उन्हें उत्पन्न करना

संकरण तथा चयन द्वारा प्रजनित कुछ शस्य कवकों, जीवाणुओं तथा विषाणुओं के प्रति रोग प्रतिरोधकता होती है। ये शस्य प्रजातियाँ नीचे तालिका में दी गई हैं –

फसलकिस्म/प्रजातिरोग के प्रति प्रतिरोधक
1. गेहूंहिमगिरीपर्ण तथा धारी किट्ट हिलबंट
2. सरसोंपूसा स्वर्णिमश्वेत किट्ट
3. फूलगोभीपूसा शुभ्रा, पूसा स्नोबॉल K-1कुंचित अंगमारी (शीर्णन) कृष्ण विगलन
4. लोबियापूसा कोमलजीवाणीय अंगमारी (शीर्णन)
5. मिर्चपूसा सदाबहारचिली मोजेक वायरस, तम्बाकू मोजेक वायरस तथा पर्ण कुंचन

रोग प्रतिरोधी जीन जो विभिन्न फसलों की प्रजातियों अथवा उनकी जंगली प्रजातियों में उपस्थित रहती है लेकिन इनकी सीमित संख्या में उपलब्धि के कारण पारम्परिक प्रजनन प्रायः निरुद्ध होता है। पादपों में विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा उत्परिवर्तन (Mutation) प्रेरित किया जाता है तथा बाद में प्रतिरोधकता के लिए पादप पदार्थों की स्क्रीनिंग द्वारा वांछनीय जीन की पहचान की जाती है।

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वांछनीय लक्षण वाले पौधे को या तो सीधे ही गुणित किया जा सकता है अथवा इसका प्रयोग प्रजनन में किया जा सकता है। उत्परिवर्तन सोमाक्लोनल वैरिएंट तथा आनुवंशिक अभिंयान्त्रिकी में चुनाव की अन्य प्रजनन विधियाँ, जिनका प्रयोग इस कार्य में किया जाता है। उत्परिवर्तन (Mutation)-जीन के भीतर आधार अनुक्रम में परिवर्तन द्वारा जो आनुवंशिक भिन्नताएँ उत्पन्न हो जाती हैं, उसे उत्परिवर्तन (Mutation) कहते हैं। इसी के फलस्वरूप नये लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं जो अपने जनकों से भिन्न होते हैं।

उत्परिवर्तन को कृत्रिम रूप से रसायनों के प्रयोग अथवा विकिरण जैसे गामा विकिरण द्वारा प्रेरित किया जाता है। ऐसे पादपों के चयन एवं प्रयोग द्वारा जिनसे प्रजनन के लिए वांछनीय लक्षण स्रोत के रूप में उत्परिवर्तन प्रजनन (Mutation Breeding) कहलाता है। मूंग में जो पीत मोजेक वायरस (Yellow mosaic virus) तथा चूर्णिल आसिवा (Powdery mildew) के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्परिवर्तन के कारण ही है।

पादपों की विभिन्न कृष्य प्रजातियों से सम्बन्धित अधिकांश जंगली पादप कुछ प्रतिरोधक लक्षण प्रदर्शित करते हैं परन्तु उनका उत्पादन बहुत ही कम होता है, अतः उच्च उत्पादन के लिए इन प्रजातियों के जीनों को कृष्य प्रजातियों के जीनों में मिलाने की आवश्यकता है। भिण्डी (एबेलमासकाल ऐस्क्यूलैटस) में पीत मोजेक वायरस (Yellow mosaic virus) के प्रति प्रतिरोधकता इसकी जंगली प्रजाति से स्थानान्तरित की गई है। जिसके परिणामस्वरूप ए. ऐसकुलैटस की एक नई किस्म परमनी क्रान्ति उत्पन्न हुई।

प्रश्न 3.
फसलों में सुधार की आधुनिक तकनीक का नाम बताइए। यह फसल सुधार में किस प्रकार लाभदायक है? समझाइए ।
अथवा
ऊतक संवर्धन पर निबन्ध लिखिये।
उत्तर:
फसलो में सुधार की आधुनिक तकनोंक उतक संवधन (Tissue Culture) है। जब पारम्परिक प्रजनन विधियों से फसलों की उन्नत किस्में तैजार की गई तब भी बढ़ती हुई खाद्यान्नों की मांगों को पूरा नहीं किया जा सका। अतः पर्याप्त उन्तत फसलों को तैयार करने व बढ़ती खाधान्न मांगों की आपूर्ति हेतु आधुनिक तकनीक ऊतक संवर्धन का सहारा लिया गया।

20 र्वी सदी के मध्य में जीच वैज्ञानिकों ने अनुसंधान करके बह ज्ञात किया कि पौधे के भाग से सम्पर्ण पौधों को युनर्जनित किया जाना सम्भव है, उसे कत्तोतक कहते हैं। किसी कोशिका कर्तोतक से पूर्ण पादप में जानत होने की क्षमता को पूर्णशक्तता कहते हैं। कर्तोतक का एक विशिष्ट पोश माध्यम में तथा रोगाणुरहित स्थिति में पात्रे संबर्धन किया जाता है। इस पोश माध्यम में कार्बन स्रोत जैसे सुक्रोज तथा अकार्यनिक लवण, विटामिन, अमीनो अम्ल तथा वृद्धि नियंत्रक जैसे-ऑंक्सिन, साइटोकाइटिन आदि उपस्थित होने चाहिए।

ऊतक संबर्धन विधि द्वारा पौधे के कायिक या वानस्पतिक प्रवर्धन को सूक्ष्म प्रवर्धन कहते हैं। इस विधि में बहुत छोटे कत्तोंतक का उपभोग करके बहुत छोटे-छोटे पौधे कम समय में उत्पादित करते हैं। इनमें प्रत्येक पादप आनुर्वंशिक रूप से मूल पादक के समान होते हैं, जहाँ से वह पैदा हुए हैं, इन्हें सोमाक्लोन (Somaclone) कहते हैं। ऊतक संवर्धन तक्रीक से रोगमुक्त पादपों का संबर्धन उत्पादन सम्भव है ।

प्रत्येक पादप विषाणु (Virus) से संक्रमित होते हैं, परन्तु उन पौधों के विभग्योतक (शीर्घ तथा कक्षीय) विषाणु से प्रभावित नहीं होते है। अतः विषाणुमुक्त पादप तैयार करने के लिए विभज्योतक को पृथक् कर उसका पात्रे संवर्धन करते हैं। संवर्धन से तैयार पादप विघाणु रोग से पूर्णतया मुक्त होते हैं। वैज्ञानिकों ने केला, गन्ना, आलू आदि में विभज्योतक संबर्धन द्वारा व्यापारिक स्तर पर रोगमुक्त पादप तैयार किये हैं।

कतक संवर्धन के अन्तर्गत चैज्ञानिकों ने पादपों से एकल कोशिकाएँ पृथक् कर उनकी कोशिका भित्ति को सैल्यूलोज तथा पैविट्नेज एन्जाइम की सहायता से प्लाज्मा झिल्ली द्वारा चिरा नग्न जीवद्रव्य पृथक कर लिया। प्रत्येक किस्म में वांधनीय लक्षण विद्यमान होते है। पादर्पों की दो आनुबंशिक रूप से भिन्न किस्मों से अलग किया गया जीवद्रव्य युग्मित होकर संकर जीवद्रव्य उत्पन्न करता है, जिससे नए पादप तैयार किये जाहे हैं।

यह संकर कायिक संकर, जबांक यह प्रक्रम कायिक संकरण कहलाता है। इस विधि के द्वारा पोमेटो (आलू तथा टमाटर के जोवद्रव्य संकरण से प्राप्त कायिक संकर) तथा ब्रोमेटो (थँगन तथा टमाटर के जीवद्रब्य संकरण से प्राप्त कायिक संकर) विकसित किये गये हैं। इन दोनों कायिक संकरों के पादपों में व्यावसायिक उपयोग हेतु वींहित्त समुचित अभिलक्षणों का अभाव था। ऊतक संवर्धन विधि का प्रयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने पादपों में विभिन्नता प्राप्त की, उसे सोमाक्लोनल विभिन्नता कहते हैं। ये विभिन्नताएँ स्थायी होती हैं तथा कृषि के लिए उपयोगी होती हैं।

प्रश्न 4.
मत्स्य पालन पर एक निबन्धात्मक लेख लिखिए।
उत्तर:
मत्स्य पालन- मछलियों की उपयोगी व उच्च उत्पादक क्षमता से युक्त प्रजातियों का संवर्धन मत्स्य पालन कहलाता है। मछलियों से हमें उत्तम किस्म की खास प्रोटीन, विटामिन ए व डी तथा कई अन्य उपयोगी व उपउत्पाद प्राप्त होते हैं। इनकी अत्यधिक उपयोगिता के कारण इनके संवर्धन व पालन हेतु विशेष वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग किया जाता है।

मछलियों समेत कई अन्य जलीय जीव जैसे-प्रॉन, लोब्स्टर, मोलस्का इत्यादि के पालन व संवर्धन को जल संवर्धन या जल कृषि (एक्वाकल्चर) कहते हैं। भारत का चीन के बाद विश्व में मत्स्य पालन में दूसरा स्थान है। एवं सम्पूर्ण विश्व में चौथे स्थान पर है। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, केरल तथा पंजाब में मत्स्य पालन चावल के खेतों, बांधों, सिंचाई नहरों, झीलों व तालाबों के जलीय स्रोतों में किया जाता है।

संवर्धन योग्य मछलियाँ – इन मछलियों को दो भागों में बाँटा गया है –
(1) पारंपरिक स्वच्छ जलीय मछलियाँ अलवणीय जल की मछलियाँ – इनका पालन स्वच्छ अर्थात् अलवणीय जल में किया जाता है; जैसे- नदियां, तालाब व जलाशय आदि। उदाहरण- लेबियो रोहिता या रोहूं, कतला कतला, सिरिनस म्रिगला या मृगल, लेबियो कालबासु, चन्ना मछलियों की प्रजातियां, वैलेगो अट्टू (मुल्ली) आदि।

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(2) लवणीय जल की मछलियाँ – जिनका पालन लवण जल में किया जाता है, लवणीय मछलियां कहलाती हैं। मछलियों का उत्पादन खारे पानी की तुलना में मीठे पानी में अधिक होता है। उदाहरण- हिल्ला, सरडाइन, मैकेरल तथा पामफ्रैट आदि । पालने हेतु ऐसी मछलियों का चयन किया जाता है जो उच्च खाद्य गुणों से युक्त, उच्च प्रजनन एवं वृद्धि दर दर्शाने वाली, रोग प्रतिरोधी क्षमता से युक्त, वातावरणीय

परिवर्तन के प्रति सहनशीलता, प्राकृतिक एवं कृत्रिम भोजन को आसानी से ग्रहण करने में समर्थ तथा वातावरण में उपस्थित अन्य मछलियों के प्रति न्यूनतम प्रतिस्पर्धा आदि गुण रखती हों। मेजर कार्प, लेबियो रोहिता, कतला कतला, सिरिनस म्रिगंला आदि इन सभी मछलियों का प्रमुख विदेशी कार्प मछलियों के साथ उचित अनुपात में एक साथ सरोवर में पालन किया जाता है। इस तकनीक को कम्पोजिट मत्स्य पालन कहते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

1. किस विधि द्वारा बीकानेरी ऐबीज एवं मैरीनो रेक्स से भेड़ की नई नस्ल ‘हिसारडेल’ तैयार की गई है? (NEET-2020)
(अ) उत्परिवर्तन प्रजनन
(ब) संकरण
(स) अंतःप्रजनन
(द) बहिःप्रजनन
उत्तर:
(ब) संकरण

2. अधिक दूध देने वाली गायों को प्राप्त करने के लिए किया गया कृत्रिम वरण क्या दर्शाता है? (NEET-2019)
(अ) स्थायीकारक वरण क्योंकि यह जनसंख्या में इस लक्षण का स्थायीकरण करता है।
(ब) दिशात्मक वरण क्योंकि यह लक्षण माध्य को एक दिशा में धकेल देता है।
(स) विदारक क्योंकि यह जनसंख्या को दो में विभाजित करता है, एक अधिक उत्पादन करने वाली एवं अन्य कम उत्पादन करने वाली।
(द) स्थायीकारक के बाद विदारक क्योंकि यह जनसंख्या में उच्च उत्पादक गायों का स्थायीकरण करता है।
उत्तर:
(ब) दिशात्मक वरण क्योंकि यह लक्षण माध्य को एक दिशा में धकेल देता है।

3. अनुचित कथन का चयन करो- (NEET-2019)
(अ) अंतःप्रजनन श्रेष्ठ जीनों के संग्रह एवं अवांछनीय जीनों के उन्मूलन में सहायता करता है।
(ब) अंतः प्रजनन समयुग्मता में वृद्धि करता है।
(स) अंतःप्रजनन किसी जानवर को शुद्ध वंशक्रम के विकित होने के लिए आवश्यक है।
(द) अंतःप्रजनन हानिकारक अप्रभावी जीनों का चयन करता है जो जननता एवं उत्पादकता कम करते हैं।
उत्तर:
(द) अंतःप्रजनन हानिकारक अप्रभावी जीनों का चयन करता है जो जननता एवं उत्पादकता कम करते हैं।

4. पशुओं में शुद्ध वंशक्रम में समयुग्मजी किस प्रकार प्राप्त किए जा सकते हैं? (NEET-2017)
(अ) एक ही नस्ल के सम्बन्धित पशुओं के संगम द्वारा
(ब) एक ही नस्ल के असंबंधित पशुओं के स्रोत द्वारा
(स) विभिन्न नस्लों के पशुओं के संगम द्वारा
(द) विभिन्न प्रजातियों के पशुओं के संगम द्वारा
उत्तर:
(अ) एक ही नस्ल के सम्बन्धित पशुओं के संगम द्वारा

5. एक वास्तविक प्रजनन पादप वह है जो कि- (NEET II-2016)
(अ) लगभग समजात हो और अपनी तरह की संतान उत्पन्न करता हो
(ब) अपने आनुवंशिक गहन में हमेशा समजात अप्रभावी हो।
(स) अपने आप प्रजनन कर सके।
(द) असंबद्ध पादपों के बीच पर-परागण से उत्पन्न किया गया हो।
उत्तर:
(अ) लगभग समजात हो और अपनी तरह की संतान उत्पन्न करता हो

6. निम्नलिखित खाद्यमछलियों में से कौनसी समुद्री मछली है जो ओमेगा-3 वसा अम्लों का उत्तम स्रोत है? (NEET-2016)
(अ) मिग्रल
(ब) मैकेरल
(स) मिस्टस
(द) मांगुर
उत्तर:
(ब) मैकेरल

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7. लेग्यूम या घास को चारागाह में या चक्रीय फसल द्वारा मिट्टी की संरचना या उत्पादकता को सुधारने के लिए जो प्रक्रिया अपनाते हैं, कहलाती है- (NEET I-2016)
(अ) स्ट्रिपखेती
(ब) शिफ्टिंग कृषि
(स) ले खेती
(द) काउण्टर खेती
उत्तर:
(स) ले खेती

8. ‘जीवद्रव्यक’ एक कोशिका है- (NEET-2015)
(अ) केन्द्रक रहित
(ब) विभाजित हुई
(स) कोशिका भित्ति रहित
(द) प्रद्रव्यरहित
उत्तर:
(स) कोशिका भित्ति रहित

9. पशुपालन में बहि:प्रजनन एक महत्त्वपूर्ण क्रियाविधि है क्योंकि यह- (NEET-2015)
(अ) जन्तुओं के शुद्ध वंशक्रमों को उत्पन्न करने में उपयोगी है।
(ब) अन्तःप्रजनन के अवसाद को दूर करने में उपयोगी है।
(स) हानिकारक अप्रभावी जीनों को अनावृत कर देता है जिन्हें चयन द्वारा निष्कासित किया जा सकता है।
(द) बेहतर जीनों के एकत्रीकरण में मदद करता है।
उत्तर:
(ब) अन्तःप्रजनन के अवसाद को दूर करने में उपयोगी है।

10. ऊतक संवर्धन तकनीक द्वारा रोगी पादप से विषाणु मुक्त स्वस्थ पादपों को प्रास करने के लिए रोगी पादप के किस भाग/भागों को लिया जाएगा? (NEET-2014)
(अ) केवल शीर्ष विभज्योतक
(ब) पेलीसेड पेरेन्काइमा
(स) शीर्ष और अक्षीय विभज्योतक दोनों ही
(द) केवल अधिचर्म।
उत्तर:
(स) शीर्ष और अक्षीय विभज्योतक दोनों ही

11. पादपों में स्वपात्रे क्लोनीय प्रवर्धन किसके द्वारा चित्रित होता है- (NEET-2014)
(अ) पी.सी.आर. और आर.ए.पी.डी.
(ब) नार्दन शोषण
(स) वैद्युत कण संचलन और एच.पी.एल.सी.
(द) सूक्ष्मदर्शीकी।
उत्तर:
(अ) पी.सी.आर. और आर.ए.पी.डी.

12. सूक्ष्मप्रवर्धन के लिए वाइरस रहित पौधे बनाने के लिए कौनसा भाग सबसे उपयुक्त होगा- (NEET-2012)
(अ) छाल
(ब) संवहनीय ऊतक
(स) विभज्योतक
(द) नोड (पर्व)
उत्तर:
(स) विभज्योतक

13. भारत में हरित क्रान्ति किस दौरान हुई थी? (Mains-2012)
(अ) 1960 के दशक में
(ब) 1970 के दशक में
(स) 1980 के दशक में
(द) 1950 के दशक में
उत्तर:
(अ) 1960 के दशक में

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14. किट्ट रोगजनक के विरुद्ध रोगरोधन के लिए संकरण तथा चयन द्वारा विकसित हिमगिरी किसकी एक किस्म है? (NEET-2011)
(अ) मिर्च
(ब) मक्का
(स) गन्ना
(द) गेहूं
उत्तर:
(द) गेहूं

15. भारत में सर्वाधिक आनुवंशिक विविधता प्रदर्शित करता है- (CBSE, 2011)
(अ) चावल
(ब) मक्का
(स) आम
(द) मूंगफली
उत्तर:
(स) आम

16. ट्रान्सजीनिक जन्तुओं के रूप में सर्वाधिक संख्या में पाये जाने वाले जीव हैं- (CBSE, 2011)
(अ) चूहे
(ब) गाय
(स) सूअर
(द) मछली
उत्तर:
(अ) चूहे

17. भारत में हरित क्रान्ति के लिए विकसित की गई ‘जया’ और ‘रत्ना’ किस्में हैं- (CBSE, 2011)
(अ) चावल की
(ब) गेहुँ की
(स) बाजरे की
(द) मक्के की
उत्तर:
(अ) चावल की

18. सोमेक्लोन (Somaclones) प्राप्त होते हैं- (NEET 2009, CBSE, 2010)
(अ) ऊतक संवर्धन द्वारा
(ब) पादप प्रजनन द्वारा
(स) विकिरणन द्वारा
(द) जीनी अभियान्त्रिकी द्वारा।
उत्तर:
(अ) ऊतक संवर्धन द्वारा

19. ट्रांसजीनिक बासमती चावल की उन्नत किस्म- (CBSE, 2010)
(अ) को रासायनिक उर्वरकों तथा वृद्धि हार्मोनों की आवश्यकता नहीं होती है।
(ब) उच्च उत्पादन तथा विटामिन- A से प्रचुर होती है।
(स) सभी कीट-पीड़कों तथा धान के रोगों के प्रति पूर्णतया प्रतिरोधक होती है ।
(द) उच्च उत्पादन करती है किन्तु इसमें कोई अभिलाक्षणिक सुगंध नहीं होती है।
उत्तर:
(ब) उच्च उत्पादन तथा विटामिन- A से प्रचुर होती है।

20. ऐसी फसलों के प्रजनन को, जिनमें खनिज प्रोटीन, विटामिन के स्तर ऊँचे हो, क्या कहते हैं? (NEET-2010)
(अ) जैव प्रबलीकरण
(ब) जैव आवर्धन
(स) सूक्ष्म प्रवर्धन
(द) कायिक संकरण
उत्तर:
(अ) जैव प्रबलीकरण

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21. पॉली एथीलीन ग्लाइकॉल विधि का उपयोग किस काम के लिए किया जाता है- (NEET-2009)
(अ) मल जल (सीवेज) से ऊर्जा का उत्पादन
(ब) बिना किसी वेक्टर के जीन स्थानान्तरण
(स) बायोडीजल उत्पादन
(द) बीज रहित फल उत्पादन
उत्तर:
(ब) बिना किसी वेक्टर के जीन स्थानान्तरण

22. एक लोकप्रिय कवकनाशी के रूप में बोडों मिश्रण की खोज के साथ किसका सम्बन्ध रहा है? (NEET-2008)
(अ) गेहूं के श्लथ कंड
(ब) गेहूं का काला किट्ट
(स) चावल की जीवाण्विक पत्ती शीर्णता
(द) अंगूर की मृदुरोमिल आसिता
उत्तर:
(द) अंगूर की मृदुरोमिल आसिता

23. निम्नांकित सही मिलाया गया है- (RPMT, 2008)
(अ) एपीकल्चर-मधुमक्खी
(ब) पिसीकल्चर-सिल्कमॉथ
(स) सेरीकल्चर-मछली
(द) एक्वाकल्चर-मच्छर
उत्तर:
(अ) एपीकल्चर-मधुमक्खी

24. वह कौनसी एक पारजीनी खाद्य फसल है जिससे विकासशील देशों में रतौंधी की समस्या का समाधान हो सकता है? (NEET-2008)
(अ) फ्लैव सैव्र किस्म के टमाटर
(ब) स्टारालिंग मक्का
(स) Bt सोयाबीन
(द) गोल्डन राइस (सुनहरा चावल)
उत्तर:
(द) गोल्डन राइस (सुनहरा चावल)

25. सांड की तुलना में बैल अधिक सीधा-साधा (विनम्र) इसलिए होता है कि बैल के भीतर- (NEET-2007, CBSE-2007)
(अ) रक्त में ऐड्रीनलीन/नार ऐड्रीनलीन के निम्न स्तर होते हैं
(ब) कार्टिसोन के उच्च स्तर होते हैं
(स) थायरॉक्सिन केस्तर ऊँचे होते हैं
(द) रक्त टेस्टोस्टेरोन के स्तर निम्न होते हैं।
उत्तर:
(द) रक्त टेस्टोस्टेरोन के स्तर निम्न होते हैं।

26. निम्नलिखित में से कौनसी एक दशा मुर्गियों का एक विषाणु रोग है- (NEET-2007)
(अ) पाश्चुरेलोसिस
(ब) साल्मोनेलोसिस
(स) कोइराजा
(द) न्येकैस्टल रोग
उत्तर:
(द) न्येकैस्टल रोग

27. निम्नलिखित में से कौनसा एक जोड़ा गलत मिलाया गया है- (NEET-2007)
(अ) बाम्बिक्स मोराई-रेशम
(ब) पाइलाग्लोबोमा-मोती
(स) एपिस इण्डिका-शहद
(द) केनिया लाका-लाख।
उत्तर:
(अ) बाम्बिक्स मोराई-रेशम

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28. मवेशियों के क्लोनिंग में एक निषेचित अण्डे की माता गऊ के गर्भाशय से निकालकर- (CBSE, 2007)
(अ) उस अण्डे को 4 जोड़ी कोशिकाओं में विभाजित किया जाता है जिन्हें अन्य गायों के गर्भाशयों में अन्तर्रोपित कर दिया जाता है।
(ब) उसकी आठ कोशिका अवस्था में, कोशिकाओं को पृथक् किया जाता है और उन्हें छोटे-छोटे भ्रूण बनने तक संवर्धित किया जाता है जिसके बाद उन्हें अन्य गायों के गर्भाशय में अन्तर्रोपित कर दिया जाता है।
(स) उसकी आठ, कोशिका अवस्था में, कोशिकाओं को विद्युत् परिवेश में पृथक् कर दिया जाता है और उससे आगे का परिवर्धन संवर्धन माध्यम में किया जाता है।
(द) उससे आठ अभिन्न जुड़वाँ बच्चे पैदा किये जा सकते हैं।
उत्तर:
(ब) उसकी आठ कोशिका अवस्था में, कोशिकाओं को पृथक् किया जाता है और उन्हें छोटे-छोटे भ्रूण बनने तक संवर्धित किया जाता है जिसके बाद उन्हें अन्य गायों के गर्भाशय में अन्तर्रोपित कर दिया जाता है।

29. मक्का में संकर ओज किससे सबसे ज्यादा प्राप्त होता है? (CBSE, 2006)
(अ) जीवद्रव्यक में DNA बॉम्बार्ड करके
(ब) दो अन्तःप्रजात वंशक्रमों के बीच संकरण करके
(स) सर्वाधिक उत्पादनशील पौधों से बीज एकत्रित करके
(द) उत्परिवर्तनों को प्रेरित करके
उत्तर:
(ब) दो अन्तःप्रजात वंशक्रमों के बीच संकरण करके

30. सुनहरा चावल एक बहुत ही सम्भावनापूर्ण पारजीनी फसल है। कृषि में उतारने पर यह किस चीज में सहायक होगा? (CBSE 2006)
(अ) विटामिन-A का अभाव दूर करने में
(ब) पीड़क प्रतिरोध में
(स) शाकनाशी सहनता में
(द) चावल से एक पेट्रोल-सरीखा ईंधन बनाने में।
उत्तर:
(अ) विटामिन-A का अभाव दूर करने में

31. ऊतक संवर्धन द्वारा विषाणु-मुक्त पौधे प्राप्त करने की सबसे अच्छी विधि क्या है ? (CBSE, PMT 2006)
(अ) एन्थर संवर्धन
(ब) विभज्योतक संवर्धन
(स) जीवद्रव्य संवर्धन
(द) भूरण रस्क्यू
उत्तर:
(ब) विभज्योतक संवर्धन

32. एकल कृषि में उगाए जाने वाले फसल पौधे कैसे होते हैं? (CBSE, 2006)
(अ) कम उत्पादन करने वाले
(ब) अंतःजातीय स्पर्धा से मुक्त
(स) क्षीण मूल तन्त्र के अभिलक्षण वाले
(द) पीड़कों के लिए अति प्रवृत्त।
उत्तर:
(द) पीड़कों के लिए अति प्रवृत्त।

33. निम्न में से कौन फसल के सुधार में प्रयुक्त नहीं होता- (Bihar CECE, 2006)
(अ) अन्तःप्रजनन
(ब) परिचय
(स) संकरण
(द) उत्परिवर्तन
उत्तर:
(अ) अन्तःप्रजनन

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34. यदि किसी पादप कोशिका में सम्मूर्ण पौधा बनाने की क्षमता पायी जाती है तब कोशिका के उस गुण को क्या कहते हैं? (HP PMT, 2005)
(अ) ऊतक संवर्धन
(ब) टोटीपोटेन्सी
(स) प्ल्यूरीपोटेन्सी
(द) जीन क्लोनिंग
उत्तर:
(ब) टोटीपोटेन्सी

35. कायिक संकरण उत्पन्न होता है- (Manipal 2005)
(अ) जीवद्रव्य संयुग्मन द्वारा
(ब) टिशु कल्चर द्वारा
(स) परागण कल्चर द्वारा
(द) हाइब्रिडोमा प्रक्रिया द्वारा
उत्तर:
(अ) जीवद्रव्य संयुग्मन द्वारा

36. खच्चर (Mule) उत्पन्न होता है- (AFMC, 2004)
(अ) ब्रीडिंग द्वारा
(ब) म्यूटेशन द्वारा
(स) हाइब्रिडाइ जेशन द्वारा
(द) इन्टरस्पेस्फिक हाइब्रिडाइजेशन द्वारा
उत्तर:
(स) हाइब्रिडाइ जेशन द्वारा

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