Class 11

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. दहन के लिए आवश्यक वह कौन-सी गैस है जिसे औद्योगिक सभ्यता का आधार कहा जाता है?
(A) ओज़ोन
(B) नाइट्रोजन
(C) ऑक्सीजन
(D) आर्गन
उत्तर:
(C) ऑक्सीजन

2. रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन ऐसी कौन-सी गैस है जिसके अभाव में मनुष्य व जीव-जंतुओं के ऊतक जलकर नष्ट हो जाते हैं?
(A) हीलियम
(B) क्रिप्टान
(C) हाइड्रोजन
(D) नाइट्रोजन
उत्तर:
(D) नाइट्रोजन

3. वह कौन-सी गैस है जिससे मिलकर पौधे स्टार्च व शर्कराओं का निर्माण करते हैं?
(A) जीनोन
(B) नियोन
(C) कार्बन-डाईऑक्साइड
(D) ओज़ोन
उत्तर:
(C) कार्बन-डाईऑक्साइड

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

4. उस गैस का नाम बताइए जो चूने की चट्टानों पर कार्ट स्थलाकृति की रचना करती है और ग्रीन हाऊस प्रभाव उत्पन्न करती है।
(A) ऑक्सीजन
(B) कार्बन-डाईऑक्साइड
(C) नाइट्रोजन
(D) हाइड्रोजन
उत्तर:
(B) कार्बन-डाईऑक्साइड

5. पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेने वाली ओजोन गैस वायुमंडल में किस ऊंचाई पर मिलती है?
(A) 80 कि०मी० पर
(B) 50 से 100 कि०मी० तक
(C) 10 से 50 कि०मी० तक
(D) 8 से 16 कि०मी० तक
उत्तर:
(C) 10 से 50 कि०मी० तक

6. वायुमंडल में कार्बन-डाईऑक्साइड किस ऊंचाई तक पाई जाती है?
(A) 50 कि०मी०
(B) 90 कि०मी०
(C) 120 कि०मी०
(D) 30 कि०मी०
उत्तर:
(B) 90 कि०मी०

7. वायुमंडल का कौन-सा घटक इंद्रधनुष और प्रभामण्डल जैसे मनभावन दृश्य विकसित करने में भूमिका निभाता है?
(A) कण
(B) गैस
(C) उल्कापात
(D) जलवाष्प
उत्तर:
(D) जलवाष्प

8. अधिकांश मौसमी घटनाएँ किस मण्डल में घटित होती हैं?
(A) क्षोभमण्डल
(B) समतापमण्डल
(C) आयनमण्डल
(D) ओज़ोन मण्डल
उत्तर:
(A) क्षोभमण्डल

9. वायुमंडल की किस परत को “मौसमी परिवर्तनों की छत” कहा जाता है?
(A) समतापमण्डल
(B) समताप सीमा
(C) मध्यमण्डल सीमा
(D) क्षोभसीमा
उत्तर:
(D) क्षोभसीमा

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

10. वायुमंडल की कौन-सी परत पृथ्वी की ओर से भेजी गई रेडियो तरंगों को परावर्तित करके पुनः पृथ्वी पर भेज देती है?
(A) तापमण्डल
(B) समतापमण्डल
(C) मध्यमण्डल
(D) क्षोभमण्डल
उत्तर:
(A) तापमण्डल

11. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?
(A) पृथ्वी की ओर आ रहे उल्कापिंड समतापमण्डल में जलकर नष्ट हो जाते हैं।
(B) मध्यमण्डल सीमा को ‘मुक्त मेघों की जननी’ कहा जाता है।
(C) समतापमण्डल में उड़ते जेट विमान से छूटती सफेद पूंछ वास्तव में इंजन से निकली नमी होती है।
(D) वायुमंडल गतिशील, लचीला, संपीड्य और प्रसारणीय है।
उत्तर:
(B) मध्यमण्डल सीमा को ‘मुक्त मेघों की जननी’ कहा जाता है।

12. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे कम मात्रा में मौजूद है?
(A) ऑक्सीजन
(B) कार्बन-डाइऑक्साइड
(C) नाइट्रोजन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कार्बन-डाइऑक्साइड

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
वायुमंडल की सबसे निचली परत में कौन सी गैस पाई जाती है?
उत्तर:
कार्बन-डाइऑक्साइड।

प्रश्न 2.
वह कौन-सी गैस है जिसके बिना आग नहीं जलाई जा सकती?
उत्तर:
ऑक्सीजन।

प्रश्न 3.
कौन-सी गैस पौधों व वनस्पति का भोजन बनाने में काम आती है?
उत्तर:
नाइट्रोजन।

प्रश्न 4.
वायुमंडल की कौन-सी गैस पराबैंगनी विकिरण को सोख लेती है?
उत्तर:
ओज़ोन।

प्रश्न 5.
मानव तथा धरातलीय जीवों के लिए कौन-सी परत सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
क्षोभमण्डल।

प्रश्न 6.
क्षोभमण्डल की ध्रुवों तथा भूमध्यरेखा पर ऊँचाई क्रमशः कितनी है?
उत्तर:
8 कि०मी० व 18 कि०मी०।

प्रश्न 7.
वायुमंडल की कौन-सी परत द्वारा रेडियो तरंगों का पृथ्वी की ओर परावर्तन होता है?
उत्तर:
आयनमण्डल द्वारा।

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प्रश्न 8.
जेट विमानों के उड़ान की आदर्श स्थिति किस मण्डल में है?
उत्तर:
समतापमण्डल में।

प्रश्न 9.
ऊँचाई के साथ तापमान किस मण्डल में बढ़ता है?
उत्तर:
समतापमण्डल में।

प्रश्न 10.
क्षोभमण्डल को समतापमण्डल से अलग करने वाली पतली परत का नाम बताइए।
उत्तर:
क्षोभ सीमा।

प्रश्न 11.
ध्रुवीय प्रकाश के दर्शन वायुमंडल की किस परत में होते हैं?
उत्तर:
आयनमण्डल में।

प्रश्न 12.
वायुमंडल की सबसे निचली परत का नाम बताएँ।
उत्तर:
क्षोभमण्डल।

प्रश्न 13.
वायुमंडल की किस परत में मौसमी दशाएँ अथवा वायुमंडलीय विघ्न पाए जाते हैं?
उत्तर:
क्षोभमण्डल में।

प्रश्न 14.
वायुमंडल की किस परत में तापमान स्थिर रहता है?
उत्तर:
समतापमण्डल में।

प्रश्न 15.
कौन-सी गैस ‘काँच घर का प्रभाव’ उत्पन्न करती है?
उत्तर:
कार्बन-डाइऑक्साइड।

प्रश्न 16.
वायुमंडल पृथ्वी के साथ किस शक्ति के कारण से टिका हुआ है?
उत्तर:
पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण।

प्रश्न 17.
आधुनिक खोजों के अनुसार वायुमंडल की ऊँचाई कितनी है?
उत्तर:
32,000 कि०मी० से अधिक।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में से प्रत्येक के लिए पारिभाषिक शब्द लिखिए-

  1. समतापमण्डल को क्षोभमण्डल से अलग करने वाली परत।
  2. वायुमंडल का वह संस्तर जिसमें वायुयानों को उड़ाने के लिए आदर्श दशाएँ मौजूद हैं।
  3. वायुमंडल का वह संस्तर जो पृथ्वी से प्रेषित रेडियो तरंगों को परावर्तित करके पुनः पृथ्वी के धरातल पर वापस भेज देता है।
  4. हवा का वह विस्तृत आवरण जो पृथ्वी को चारों ओर से पूर्णतः ढके हुए हैं।
  5. वायुमंडल का वह संस्तर जो समतापमण्डल और आयनमण्डल के बीच स्थित है।
  6. वायुमंडल का सबसे ऊपरी संस्तर।

उत्तर:

  1. क्षोभ सीमा
  2. समतापमण्डल
  3. आयनमण्डल
  4. वायुमंडल
  5. मध्यमण्डल
  6. बाह्यमण्डल।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायुमंडल किन तत्त्वों से बना हुआ है?
उत्तर:
अनेक गैसों, जलवाष्प तथा कुछ सूक्ष्म ठोस कणों से।

प्रश्न 2.
जीवन के लिए कौन-सी गैसें महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
मनुष्य और जानवरों के लिए ऑक्सीजन तथा पेड़-पौधों के लिए कार्बन-डाइऑक्साइड।

प्रश्न 3.
वायुमंडल की प्रमुख परतों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. क्षोभमण्डल
  2. समतापमण्डल
  3. मध्यमण्डल
  4. आयनमण्डल तथा
  5. बाह्यमण्डल।

प्रश्न 4.
क्षोभमण्डल में तापमान की सामान्य ह्रास दर कितनी है?
उत्तर:
165 मीटर के लिए 1° सेल्सियस या 1 कि०मी० के लिए 6.4° सेल्सियस।

प्रश्न 5.
वायुमंडल में नाइट्रोजन व ऑक्सीजन गैसों का कितना-कितना प्रतिशत है?
उत्तर:
क्रमशः 78 प्रतिशत व 21 प्रतिशत।

प्रश्न 6.
वायुमंडल का हमारे लिए क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमंडल के कारण ही पृथ्वी पर जीवन सम्भव हुआ है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 7.
ओज़ोन गैस का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
यह गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है।

प्रश्न 8.
ओजोन परत के छिलने या कम होने के दो कारण बताओ।
उत्तर:

  1. कार्बन-डाइऑक्साइड गैस का अधिक औद्योगिक उपयोग।
  2. वनों की अत्यधिक कटाई।

प्रश्न 9.
ओज़ोन परत धरातल से कितनी ऊँचाई पर स्थित है?
उत्तर:
10 से 50 कि०मी० की ऊँचाई पर।

प्रश्न 10.
आयतन के हिसाब से वायुमंडल में वाष्प की कितनी मात्रा पाई जाती है?
उत्तर:
अति ठण्डे व अति शुष्क क्षेत्रों में हवा के आयतन के एक प्रतिशत तक तथा भूमध्य रेखा के पास उष्ण व आर्द्र क्षेत्रों में हवा के आयतन के 4 प्रतिशत तक।

प्रश्न 11.
मौसम के प्रमुख तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
तापमान, वर्षा, पवनों की दिशा, पवनों की गति, आर्द्रता व मेघ इत्यादि।

प्रश्न 12.
जलवाष्प के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वाष्पीकरण तथा पेड़-पौधों व मिट्टी से वाष्पोत्सर्जन।

प्रश्न 13.
जलवाष्पों के मुख्य कार्य कौन-से होते हैं?
उत्तर:
वाष्प ही संघनित होकर ओस, कुहासा, कोहरा तथा बादल बनाते हैं।

प्रश्न 14.
धूलकणों का वायुमंडल में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
ये ताप का अवशोषण करते हैं तथा धुंध, धूम कोहरा व बादल बनाते हैं।

प्रश्न 15.
ऐरोसोल क्या होता है?
उत्तर:
वायुमंडल में धूल, पराग व नमक आदि के ठोस कणों को ऐरोसोल कहा जाता है।

प्रश्न 16.
क्षोभमण्डल की ऊँचाई भूमध्य रेखा पर अधिक क्यों होती है?
उत्तर:
ध्रुवों पर क्षोभमण्डल की ऊँचाई 8 किलोमीटर और भूमध्य रेखा पर 18 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा पर क्षोभमण्डल की अधिक ऊँचाई का कारण यह है कि वहाँ पर चलने वाली तेज़ संवहन धाराएँ ऊष्मा को धरातल से अधिक ऊँचाई पर ले जाती हैं। यही कारण है कि जाड़े की अपेक्षा गर्मी में क्षोभमण्डल की ऊँचाई बढ़ जाती है।

प्रश्न 17.
विषममण्डल (Heterosphere) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विषममण्डल एक परतदार उष्ण मण्डल है जो मध्यमण्डल से ऊपर स्थित है। इस मण्डल में तापमान तेज़ी से बढ़ता है। यहाँ 350 कि०मी० की ऊँचाई पर तापमान 900° सेल्सियस तक पहुँच जाता है।

प्रश्न 18.
पृथ्वी का अंग न होते हुए भी वायुमंडल पृथ्वी से क्यों जुड़ा हुआ है?
उत्तर:
वायुमंडल का अधिकतर भाग भू-पृष्ठ से केवल 32 कि०मी० की ऊँचाई तक सीमित है। पृथ्वी का अंग न होते हुए भी वायुमंडल- पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी से जुड़ा हुआ है।

प्रश्न 19.
वायुमंडल की सक्रिय व निष्क्रिय गैसें कौन-सी हैं?
उत्तर:
वायुमंडल में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन-डाइऑक्साइड तथा ओज़ोन गैसें सक्रिय गैसें हैं, परन्तु कुछ गैसें अत्यन्त कम मात्रा में मिलती हैं और रासायनिक प्रतिक्रियाओं में शामिल नहीं होतीं। ऐसी निष्क्रिय गैसों में जेलोन, क्रिप्टॉन, नियॉन तथा आर्गन इत्यादि आती हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायुमंडल की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वायुमंडल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. वायुमंडल की वायु एक रंगहीन, गंधहीन तथा स्वादहीन पदार्थ है।
  2. वायुमंडल को हम देख नहीं सकते। वर्षा, ओले, तूफ़ान, बादल, तड़ित व धुंध जैसी घटनाओं से हम इसकी उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं।
  3. नवीनतम खोजों के अनुसार वायुमंडल 32,000 कि०मी० से भी अधिक ऊँचाई तक फैला हुआ है। कभी इसकी ऊँचाई केवल 800 कि०मी० मानी जाती थी।
  4. वास्तव में वायुमंडल की कोई ऐसी ऊपरी सीमा तय नहीं हो सकी जो इसे अन्तरिक्ष (Universe) से अलग करती हो।
  5. भू-तल के निकट वायु सघन (Dense) होती है जो ऊँचाई बढ़ने के साथ उत्तरोत्तर विरल (Rare) और हल्की होती जाती है।
  6. यह पता ही नहीं चल पाता कि कहाँ वायुमंडल समाप्त होकर अन्तरिक्ष में विलीन हो गया।

प्रश्न 2.
वायुमंडल किन-किन तत्त्वों से मिलकर बना है? उन तत्त्वों की प्रतिशत मात्रा लिखिए।
उत्तर:
वायुमंडल विभिन्न गैसों का एक मिश्रण है जिसमें ठोस तथा तरल पदार्थों के कण असमान मात्रा में तैरते रहते हैं। शुद्ध शुष्क वायु में नाइट्रोजन 78.08%, ऑक्सीजन 20.95%, कार्बन-डाइऑक्साइड 0.036% और हाइड्रोजन 0.01% तथा ओज़ोन इत्यादि गैसें होती हैं। वायुमंडल में गैसों के अतिरिक्त जलकण तथा धूलकण होते हैं। वायु का संघटन विभिन्न स्थानों तथा विभिन्न समयों में भिन्न होता है। विश्व की जलवायु तथा मौसमी दशाएँ इसी पर आधारित होती हैं।

शुद्ध शुष्क वायु निम्नलिखित तत्त्वों से बनी होती है:

वायु में विभिन्न गैसों की प्रतिशत मात्रा (आयतन)
नाइट्रोजन (N2)78%
ऑक्सीजन (O2)21%
आर्गन (Ar)0.93%
कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2)0.03%
अन्य0.04%

प्रश्न 3.
वायुमंडल में ऑक्सीजन व कार्बन-डाइऑक्साइड के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ऑक्सीजन का महत्त्व-

  • यह एक जीवनदायिनी गैस है। मनुष्य और जानवर श्वसन में ऑक्सीजन को ही ग्रहण करते हैं।
  • ऑक्सीजन दहन के लिए आवश्यक है। इसके बिना आग नहीं जलाई जा सकती। इस प्रकार ऑक्सीजन ऊर्जा का प्रमुख साधन व औद्योगिक सभ्यता का आधार है।
  • शैलों के रासायनिक अपक्षय में सहयोग देकर ऑक्सीजन अनेक भू-आकारों की उत्पत्ति का कारण बनती है।

कार्बन-डाइऑक्साइड का महत्त्व-

  • जीवित रहने के लिए पौधे कार्बन-डाइऑक्साइड पर निर्भर करते हैं।
  • हरे पौधे वायुमंडल की कार्बन-डाइऑक्साइड से मिलकर स्टार्च व शर्कराओं का निर्माण करते हैं।
  • यह गैस प्रवेशी सौर विकिरण को तो पथ्वी तल तक आने देती है किन्त पथ्वी से विकिरित होने वाली लम्बी तरंगों को बाहर जाने से रोकती है। इससे पृथ्वी के निकट वायुमंडल का निचला भाग गर्म रहता है। इस प्रकार कार्बन-डाइऑक्साइड ‘काँच घर का प्रभाव’ उत्पन्न करती है।
  • औद्योगिक क्रान्ति के बाद जैव ईंधन (लकड़ी, कोयला, पेट्रोल व गैस) के अधिक जलने से वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा 10 प्रतिशत बढ़ी है जिससे भू-मण्डलीय ऊष्मा में वृद्धि हुई है।
  • वर्षा जल में घुलकर कार्बन-डाइऑक्साइड तनु अम्ल बनाती है और चूने की चट्टानों पर ‘कार्ट स्थलाकृति’ की रचना करती है।

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प्रश्न 4.
वायुमंडल में धूलकणों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमंडल में उपस्थित धूल के कण निम्नलिखित रूप से महत्त्वपूर्ण हैं-

  1. धूलकण सौर ताप के कुछ भाग को सोख लेते हैं तथा कुछ भाग को परावर्तित कर देते हैं जिससे वायुमंडल का तापमान अधिक नहीं बढ़ता।
  2. वायुमंडल में उपस्थित धूलकण आर्द्रताग्राही केन्द्र का कार्य करते हैं। इनके चारों ओर ही जलवाष्प केन्द्रित होते हैं जिससे कोहरा तथा बादल आदि का निर्माण होता है और वर्षा होती है।
  3. धूलकणों के कारण वायुमंडल की दर्शन क्षमता कम होती है।
  4. धूलकणों के कारण ही सूर्योदय, सूर्यास्त तथा इन्द्रधनुष आदि रंग-बिरंगे दृश्यों का निर्माण होता है।

प्रश्न 5.
वायुमंडल में नाइट्रोजन व ओज़ोन गैस का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
नाइट्रोजन का महत्त्व-

  • नाइट्रोजन वायु में उपस्थित ऑक्सीजन के प्रभाव को कम करती है। यदि वायुमंडल में नाइट्रोजन न होती तो वस्तुएँ इतनी तेज़ी से जलती कि उस पर नियन्त्रण करना कठिन होता।
  • नाइट्रोजन के अभाव में मनुष्य तथा जीव-जन्तुओं के शरीर के ऊतक भी जलकर नष्ट हो जाते हैं।
  • मिट्टी में नाइट्रोजन की उपस्थिति प्रोटीनों का निर्माण करती है जो पौधों और वनस्पति का भोजन बनते हैं।
  • नाइट्रोजन की उपस्थिति के कारण ही वायुदाब, पवनों की गति तथा प्रकाश के परावर्तन का आभास होता है।

ओज़ोन गैस का महत्त्व ओजोन गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है जिससे स्थलमण्डल एक उपयुक्त सीमा से अधिक गर्म नहीं हो पाता। इस प्रकार यह गैस एक छलनी (Filter) का कार्य करती है जिसकी अनुपस्थिति में सब कुछ जलकर समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 6.
वायुमंडल में जलवाष्प के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वाष्प ही संघनित होकर ओस, कुहासा, कोहरा तथा बादलों का सृजन करते हैं। धरती पर वर्षा और हिमपात भी इन्हीं के कारण होता है। वायुमंडल में जलवाष्प की उपस्थिति के कारण ही इन्द्रधनुष तथा प्रभा-मण्डल जैसे मनभावन दृश्य विकसित होते हैं।

वाष्प की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्रिया उसकी पारदर्शिता पर आधारित होती है। इसी पारदर्शिता के कारण लघु तरंगों के रूप में सूर्य की ऊष्मा धरती पर पहुँच सकती है किन्तु लम्बी तरंगों के रूप में विकिरित ऊष्मा वायुमंडल को चीरकर बाहर नहीं जा पाती। अतः वायुमंडल में वाष्पों की उपस्थिति के कारण पृथ्वी गर्म रह पाती है। इस प्रकार वाष्प विशाल कम्बल की भाँति कार्य करते हैं। वाष्प या जल के अन्य रूपों द्वारा छोड़ी गई गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) अनेक मौसमी दशाओं को जन्म देती है।

प्रश्न 7.
वायुमंडल में पाए जाने वाले ठोस कण और आकस्मिक रचक कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:
गैस तथा वाष्प के अतिरिक्त वायु में कुछ सूक्ष्म ठोस कण भी पाए जाते हैं जिनमें धूलकण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। ये कण सौर विकिरण का कुछ अंश अवशोषित कर लेते हैं साथ ही सूर्य की किरणों का परावर्तन (Reflection) और प्रकीर्णन (Scattering) भी करते हैं। इसी के परिणामस्वरूप हमें आकाश नीला दिखाई पड़ता है। किरणों के प्रकीर्णन के कारण ही सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आकाश में लाल और नारंगी रंग की छटाएँ बनती हैं। इन्हीं धूल कणों के कारण ही धुंध (Haze) व धूमकोहरा (Smog = Smoke + Fog) बनता है।

वायुमंडल में कुछ आकस्मिक रचक (Accidental Component) और अपद्रव्य (Impurities) भी शामिल होती हैं। इनमें धुएँ की कालिख (soot), ज्वालामुखी राख, उल्कापात के कण, समुद्री झाग के बुलबुलों के टूटने से मुक्त हुए ठोस लवण, जीवाणु, बीजाणु तथा पशुशालाओं के पास की वायु में अमोनिया के अंश इत्यादि पदार्थ आते हैं।

प्रश्न 8.
गुप्त ऊष्मा क्या होती है तथा मौसम पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
अथवा
“गुप्त ऊष्मा प्रचण्ड मौसमी दशाओं का इंजन कहलाती है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
केवल जल में निराली विशेषता होती है कि वह तापमान के अनुसार गैस, तरल व ठोस अवस्था में बदल सकता है। जल जब एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलता है तो यह या तो ऊष्मा छोड़ता है या ग्रहण करता है। इसके बिना जल की अवस्था बदल नहीं सकती। इस ऊष्मा को गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) कहते हैं। वाष्पन (Evaporation) की प्रक्रिया में जलवाष्प ऊष्मा को ग्रहण करते हैं जबकि संघनन की प्रक्रिया में ऊष्मा का त्याग होता है। प्रायः त्यागी गई ऊष्मा, ग्रहण की गई ऊष्मा के लगभग समान होती है। पवनें गुप्त ऊष्मा का स्थानान्तरण करती हैं। जब गुप्त ऊष्मा अत्यधिक मात्रा में निकलती है तो वायु में असन्तुलन की दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। फलस्वरूप बिजली की कड़क, बादलों का गरजना, उष्ण-कटिबन्धीय चक्रवात और तड़ित-झंझावात जैसी प्रचण्ड घटनाएँ घटित होती हैं।

प्रश्न 9.
मनुष्य के लिए वायुमंडल का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमंडल मनुष्य के लिए निम्नलिखित प्रकार से महत्त्वपूर्ण है-

  1. वायुमंडल में उपस्थित ऑक्सीजन गैस मानव-जीवन का आधार है।
  2. पेड़-पौधों का जीवन वायुमंडल की कार्बन-डाइऑक्साइड पर निर्भर करता है।
  3. वायुमंडल सूर्यातप को अवशोषित करके एक काँच घर (Glass House) का कार्य करता है।
  4. वायुमंडल में उपस्थित धूलकण वर्षा का आधार बनते हैं।
  5. वायुमंडल का विभिन्न खाद्यान्नों, मौसम, जलवायु तथा वायुमार्गों पर भी प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 10.
क्षोभमण्डल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भू-तल के सम्पर्क में क्षोभमण्डल वायुमंडल की सबसे निचली परत है जिसका घनत्व सर्वाधिक है। ध्रुवों पर इस परत की ऊँचाई 8 किलोमीटर और भूमध्य रेखा पर 18 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा पर क्षोभमण्डल की अधिक ऊँचाई का कारण यह है कि वहाँ पर चलने वाली तेज़ संवहन धाराएँ ऊष्मा को धरातल से अधिक ऊँचाई पर ले जाती हैं। यही कारण है कि जाड़े की अपेक्षा गर्मी में क्षोभमण्डल की ऊँचाई बढ़ जाती है। संवहन धाराओं की अधिक सक्रियता के कारण इस परत को प्रायः संवहन क्षेत्र भी कहते हैं। इस मण्डल में प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेल्सियस तापमान गिर जाता है। ऊँचाई बढ़ने पर तापमान गिरने की इस दर को सामान्य हास दर कहा जाता है। मानव व अन्य धरातलीय जीवों के लिए यह परत सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। ऋतु व मौसम सम्बन्धी लगभग सभी घटनाएँ; जैसे बादल, वर्षा, भूकम्प आदि जो मानव-जीवन को प्रभावित करती हैं, इसी परत में घटित होती हैं। क्षोभमण्डल में ही भारी गैसों, जलवाष्प, धूलकणों, अशुद्धियों व आकस्मिक रचकों की अधिकतम मात्रा पाई जाती है।

क्षोभमण्डल की ऊपरी सीमा को क्षोभ सीमा (Tropopause) कहते हैं। यह क्षोभमण्डल व समतापमण्डल को अलग करती है। लगभग 11/2 से 2 किलोमीटर मोटी इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान गिरना बन्द हो जाता है। इस भाग में हवाएँ व संवहनी धाराएँ भी चलना बन्द हो जाती हैं।

प्रश्न 11.
क्षोभ सीमा क्या है?
उत्तर:
भू-तल से ऊपर की ओर जाते हुए तापमान असमान दर से परिवर्तित होता है। 15 कि०मी० की ऊँचाई तक तापमान के घटने की दर धीमी होती है। 80 कि०मी० तक तापमान में परिवर्तन नहीं होता, परन्तु 80 कि०मी० के पश्चात् तापमान में तेज़ी से वृद्धि होती है। क्षोभमण्डल से ऊपर समतापमण्डल आरम्भ हो जाता है। समतापमण्डल तथा क्षोभमण्डल को अलग करने वाला संक्रमण क्षेत्र क्षोभ सीमा कहलाता है।

प्रश्न 12.
क्षोभ सीमा पर ध्रुवों की अपेक्षा विषुवत् रेखा के ऊपर न्यूनतम तापमान क्यों पाया जाता है?
उत्तर:
पृथ्वी पर न्यूनतम तापमान ध्रुवीय क्षेत्रों में मिलता है, परन्तु वायुमंडल में क्षोभ सीमा पर न्यूनतम तापमान विषुवत् रेखा पर मिलता है। विषुवत् रेखा पर क्षोभ सीमा में न्यूनतम तापमान -80° सेल्सियस तथा ध्रुवों पर -45° सेल्सियस पाया जाता है। इसका प्रमुख कारण क्षोभ सीमा की ऊँचाई है। विषुवत रेखा पर इसकी ऊँचाई 18 कि०मी० तथा ध्रुवों पर केवल 8 कि०मी० होती है। वायुमंडल में भू-तल से ऊपर की ओर जाते हुए प्रति 165 मी० पर तापमान 1° सेल्सियस कम होता है। भूमध्य रेखा से क्षोभ सीमा की ऊँचाई अधिक होने के कारण वहाँ तापमान न्यूनतम होता है।

प्रश्न 13.
वायुमंडलीय प्रक्रम क्या होते हैं तथा उनका जलवायु के तत्त्वों से क्या सम्बन्ध होता है?
उत्तर:
वायुमंडलीय प्रक्रमों का अर्थ वायुमंडल में होने वाली उन घटनाओं से है जो दीर्घकाल तक वायुमंडल और पृथ्वी के बीच ताप और आर्द्रता के विनिमय होने के फलस्वरूप घटित होती हैं। भूमण्डलीय पवन-प्रवाह, वाष्पन, द्रवण, ऊष्मा का संचरण एवं विकिरण, जलीय चक्र इत्यादि वायुमंडलीय प्रक्रम हैं जो जैवमण्डल को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। वायुमंडल के सभी प्रक्रम कुछ जलवायवीय तत्त्वों पर निर्भर करते हैं; जैसे तापमान, वायुदाब, आर्द्रता, वायु की दिशा एवं गति तथा जलवायु परिवर्तन आदि।

प्रश्न 14.
आयनमण्डल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
आयनमण्डल-मध्यमण्डल सीमा से परे स्थित आयनमण्डल 80 से 400 किलोमीटर की ऊँचाई तक विस्तृत है। इस परत में विद्यमान गैस के कण विद्युत् आवेशित होते हैं। इन विद्युत् आवेशित कणों को आयन कहा जाता है। ये आयन विस्मयकारी विद्युतीय और चुम्बकीय घटनाओं का कारण बनते हैं। इसी परत में ब्रह्माण्ड किरणों का परिलक्षण होता है। आयनमण्डल पृथ्वी की ओर से भेजी गई रेडियो-तरंगों को परावर्तित करके पुनः पृथ्वी पर भेज देता है। इसी मण्डल से उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Borealis) तथा दक्षिणी ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Australis) के दर्शन होते हैं।

प्रश्न 15.
जलवायु के मुख्य नियन्त्रक कौन-कौन से हैं?
अथवा
किसी स्थान की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
किसी स्थान की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक हैं-

  1. अक्षांश
  2. समुद्र तल से ऊँचाई
  3. जल व स्थल का वितरण
  4. वायुदाब
  5. प्रचलित पवनें
  6. सागरीय धाराएँ
  7. स्थलीय अवरोध।

प्रश्न 16.
ओज़ोन पर टिप्पणी लिखिए। यह परत क्यों छिज रही है? परत के पतला होने के सम्भावित नुकसान बताइए।
उत्तर:
ओजोन परत-ओज़ोन गैस ऑक्सीजन का ही एक विशिष्ट रूप है जो समतापमण्डल में 20 से 50 कि०मी० की ऊँचाई , में पाई जाती है। ओज़ोन गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों (Ultra-Violet Rays) के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है जिससे स्थलमण्डल एक उपयुक्त सीमा से अधिक गर्म नहीं हो पाता। इस प्रकार यह गैस एक छलनी (Filter) का कार्य करती है जिसकी अनुपस्थिति में सब कुछ जलकर समाप्त हो जाता है। कार्बन-डाइऑक्साइड, अन्य रसायनों तथा अणु शक्ति के परीक्षणों से ओज़ोन की मात्रा घट रही है। सन् 1980 में अंटार्कटिका महाद्वीप के ऊपर ओजोन परत में एक सुराख देखा गया था। इस सुराख से पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुँच सकती हैं जिससे त्वचा का कैंसर व अन्धापन बढ़ सकता है।

प्रश्न 17.
कौन-सी गैस अल्प मात्रा में होते हुए भी वायुमंडलीय प्रतिक्रियाओं के लिए महत्त्वपूर्ण मानी जाती है?
उत्तर:
वायुमंडल में 0.03 प्रतिशत होते हुए भी कार्बन-डाइऑक्साइड अनेक वायुमंडलीय प्रतिक्रियाओं में शामिल होती है। यह गैस ऊष्मा का अवशोषण करती है जिससे निचला वायुमंडल प्रवेशी सौर विकिरण तथा पार्थिव विकिरण द्वारा गर्म हो पाता है। प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया के दौरान हरे पौधे वायुमंडल से कार्बन-डाइऑक्साइड का प्रयोग करते हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 18.
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ स्पष्ट कीजिए-
(1) संघनन
(2) इन्द्रधनुष
(3) प्रभामण्डल
(4) धूम कोहरा
(5) प्रकीर्णन
(6) उल्काएँ
(7) मौसम और जलवायु में अंतर
(8) ध्रुवीय प्रकाश
(9) इंटरनेट।
उत्तर:
(1) संघनन-उस ताप को जिस पर वायु अपने में विद्यमान जलवाष्प से संतृप्त हो जाती है, ओसांक (dew point) कहते हैं। वायु का ताप ओसांक से नीचे गिरने पर उसमें विद्यमान जल-वाष्प द्रव जल में बदल जाता है जो ओस या कुहासे के रूप में प्रकट होता है। जलवाष्प के द्रव जल में परिणित होने की घटना संघनन कहलाती है।

(2) इन्द्रधनुष बहुरंजित प्रकाश की एक चाप, जो वर्षा की बूंदों द्वारा सूर्य की किरणों के आन्तरिक अपवर्तन तथा परावर्तन द्वारा निर्मित होती है।

(3) प्रभामण्डल-सूर्य अथवा चन्द्रमा के चारों ओर एक प्रकाश-वलय जो उस समय बनता है जब आकाश में पक्षाभ-स्तरी मेघ की एक महीन परत छायी रहती है। जब सौर प्रभामण्डल बन जाता है, तब वह सूर्य को चमक के कारण दिखाई नहीं देता, परन्तु गहरे रंग के शीशे से आसानी से देखा जा सकता है।

(4) धूम कोहरा अत्यधिक धुएँ से भरा कोहरा धूम कोहरा (Smog) कहलाता है, जो सामान्य रूप से औद्योगिक तथा घने बसे नगरीय क्षेत्रों में पाया जाता है। अंग्रेजी भाषा के इस शब्द की रचना दो शब्दों स्मोक व फॉग (Smoke + Fog) को मिलाकर की गई है।

(5) प्रकीर्णन-लघु तरंगी सौर विकिरण का वायुमंडल के धूलकण व जलवाष्पों से टकराकर टूटना।

(6) उल्काएँ उल्काएँ पत्थर व लोहे के पिण्ड हैं जो अन्तरिक्ष में तेज गति से घमते रहते हैं। कभी-कभी उल्काएँ वायमंडल में खिंच आती हैं और वायु के साथ घर्षण से उत्पन्न ऊष्मा से जल उठती हैं। ऐसी अवस्था में आकाश में प्रकाश की रेखा भी खिंचकर लुप्त हो उठती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे एक तारा टूटकर गिर रहा हो। इस घटना को उल्कापात कहते हैं। उल्काओं की उत्पत्ति का कुछ नहीं पता।

(7) मौसम और जलवायु में अन्तर-मौसम किसी स्थान की दिए हुए समय में वायुमंडलीय दशाओं; जैसे तापमान, आर्द्रता, वायु इत्यादि का वर्णन है। उदाहरण, आज सुबह ठण्ड थी, दोपहर को बादल छाए थे व शाम का मौसम सुहावना था इत्यादि। लेकिन 35 वर्षों तक पाई जाने वाली मौसमी दशाओं की औसत होती है। उदाहरणतः, राजस्थान की जलवायु शुष्क व पश्चिम बंगाल की आई है या इण्डोनेशिया की जलवायु उष्ण एवं आर्द्र है।

(8) ध्रुवीय प्रकाश-आयनमण्डल में विद्युत्-चुम्बकीय घटना (Electromagnetic Phenomenon) का एक प्रकाशमय प्रभाव, जो उच्च अक्षांशों में रात के समय पृथ्वी से 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर लाल, हरे व सफेद चापो के रूप में दिखाई पड़ता है, ध्रुवीय प्रकाश कहलाता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में यह प्रकाश दक्षिण ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Australis) व उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर ध्रुवीय प्रकाश (Aurora Borealis) के नाम से जाना जाता है।

(9) इंटरनेट (Internet)-एक ऐसी विद्युतीय व्यवस्था जिसमें सूचना के महामार्ग (Information Superhighway) पर बैठे लाखों, करोड़ों लोगों द्वारा आपस में जुड़े हुए कम्प्यूटरों द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर जीवन के लिए वायुमंडल के महत्त्व को स्पष्ट करें।
अथवा
“वायुमंडल की उपस्थिति ने ही पृथ्वी को सौरमण्डल में विलक्षणता प्रदान की है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण रूपी समग्र इकाई के चार प्रमुख अंगों यथा वायुमंडल, स्थलमण्डल, जलमण्डल और जैवमण्डल में वायुमंडल सबसे महत्त्वपूर्ण और गतिशील अंग है। सच तो यह है कि वायुमंडल की उपस्थिति ने ही पृथ्वी को सौरमण्डल में विलक्षणता प्रदान की है।

पृथ्वी पर जीवन के लिए वायुमंडल का महत्त्व-
1. जीवन का अनिवार्य तत्त्व-जल, थल और नभ में रहने वाला कोई भी प्राणी वायु के बिना जीवित नहीं रह सकता। वायु जीवन का मूलाधार है। मनुष्य और जानवरों के लिए ऑक्सीजन तथा पौधों के लिए कार्बन-डाइऑक्साइड वायुमंडल से ही प्राप्त होती है। पृथ्वी पर वायुमंडल की उपस्थिति ही इसे अन्य ग्रहों की अपेक्षा श्रेष्ठता प्रदान करती है।

2. ताप-सन्तुलन-गैसों का आवरण एक विशाल चंदोवे या कम्बल की भाँति कार्य करता हुआ सूर्य से आने वाली सम्पूर्ण ऊष्मा को पृथ्वी पर आने से रोकता है और रात्रि के समय पृथ्वी से विकिरित होने वाली ऊष्मा को अन्तरिक्ष में जाने से रोकता है। इस प्रकार वायुमंडल पृथ्वी पर 35° सेल्सियस का औसत तापमान बनाए रखता है। यदि वायुमंडल न होता तो पृथ्वी पर दिन का तापमान 100° सेल्सियस व रात का तापमान -200° सेल्सियस तक पहुँच जाता। ऐसी असहनीय दशाओं में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

3. मौसम तथा जलवायु-वायुमंडल के असमान गर्म होने की विशेषता के कारण ही वायु का क्षैतिज प्रवाह उच्च दाब से न्यून दाब की ओर होता है। इसी से वायुमंडल में मौसम सम्बन्धी सभी घटनाएँ घटती हैं; जैसे वाष्पीकरण, धुंध, कोहरा, बादल, वर्षा, हिमपात व आंधियाँ इत्यादि। इस प्रकार जल का ठोस, द्रव और गैस तीनों रूपों में, तीनों ही मण्डलों का संचरण होता है।

4. हानिकारक विकिरण से बचाव-वायुमंडल में उपस्थित ओज़ोन गैस सूर्य से आने वाली खतरनाक पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करके जीव-जगत को अनेक बीमारियों से बचाती है।

5. उल्काओं से रक्षा-अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर गिरती हुई उल्काएँ वायु के सम्पर्क में आकर घर्षण (Friction) पैदा करती हैं और इससे उत्पन्न हुई ऊष्मा में पूरी तरह से या कुछ भाग में जलकर राख बन जाती हैं। इससे उनकी पृथ्वी पर ‘मारक शक्ति’ कम हो जाती है।

6. रेडियो-तरंगें-रेडियो तरंगें आयनमण्डल से टकराकर वापस धरती पर लौट आती हैं। इससे दूर-संचार सम्भव हो पाता है। . आज दूरदर्शन, रेडियो, इंटरनेट, ई० मेल व ई० कॉमर्स जैसी सुविधाएँ इसी से सम्भव हो पाई हैं।

7. वायमार्ग-वायमंडल तीव्र वेग से चलने वाले वायुयानों व जेट विमानों को उड़ान सम्भव बनाता है।

8. जैविक विविधता-पृथ्वी पर जलवायु की क्षेत्रीय विभिन्नताओं को जन्म देने में वायुमंडलीय कारक ही प्रमुख हैं, जिनके कारण धरातल पर जैविक विविधता पाई जाती है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 2.
“वैज्ञानिक व तकनीकी विकास के साथ-साथ मानव की वायुमंडलीय प्रक्रमों के प्रेक्षण की क्षमता बढ़ती जाती है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जैसे-जैसे आधुनिक और विकसित यन्त्रों और विधियों द्वारा वायुमंडलीय घटनाओं का प्रेक्षण तथा अभिलेखन तीव्र और आसान होने लगा वैसे-वैसे प्राप्त आँकड़ों की सहायता से मौसम सूचक मानचित्र बनाए जाने लगे। इन मौसम सूचक मानचित्रों की सहायता से विभिन्न समय और स्थानों के मौसम की तुलना सम्भव होने लगी। विश्व का पहला अधिकृत मौसम सम्बन्धी मानचित्र सन् 1686 में बना जिसे ब्रिटेन के नक्षत्र-विज्ञानी एडमण्ड हैले ने बनाया था। इससे उत्साहित होकर अनेक विकसित देशों ने मौसम-सूचक मानचित्रों और मौसम का पूर्वानुमान प्रकाशित करना आरम्भ किया। भारत में मौसम विज्ञान सम्बन्धी सेवा सन् 1864 में आरम्भ हुई। वर्तमान में हमारे देश में 350 से अधिक मौसम-प्रेक्षणशालाएँ हैं जो मौसम सम्बन्धी तत्त्वों की जानकारी व आँकड़े पुणे स्थित मौसम विभाग के मुख्यालय को भेजती हैं। सन् 1951 में स्विट्ज़रलैण्ड के जेनेवा नगर में विश्व मौसम विज्ञान सस्थान की स्थापना की गई। यह संस्थान संयुक्त राष्ट्र संघ का एक विशिष्ट अभिकरण है जिसके माध्यम से विश्व के लगभग सभी देश मौसम-सम्बन्धी सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं।

ऊपरी वायुमंडल की छानबीन-17वीं शताब्दी तक वायुमंडल के बारे में वैज्ञानिकों का ज्ञान केवल पृथ्वी के निकट स्थित वायु की परतों तक सीमित था। 18वीं शताब्दी के आरम्भ में वायुमंडल की ऊपरी परतों का तापमान ज्ञात करने के लिए अनेक उपकरणों से सुसज्जित मानव-सहित गुब्बारों को उड़ाया गया। सन् 1804 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुज़ाक एक गुब्बारे के माध्यम से आकाश में 7 किलोमीटर की ऊँचाई तक उड़ा और पाया कि ऊँचाई पर वायु का रासायनिक संघटन एक जैसा ही रहता है। सन् 1904 में मारकोनी द्वारा रेडियो के आविष्कार से वायुमंडल का और अधिक ऊँचाई पर अध्ययन सम्भव हुआ। इसके बाद क्षोभमण्डल और समतापमण्डल की निचली परतों की जानकारी के लिए मानव-रहित गुब्बारों की सहायता ली जाने लगी।

रेडियो संचरण का प्रयोग करने वाले गुब्बारों का प्रयोग 30 किलोमीटर से अधिक ऊँचाई पर नहीं किया जा सकता था। परिणामस्वरूप 1940 के दशक में वैज्ञानिकों ने वायुमंडल की और अधिक ऊपरी परतों का अध्ययन करने के लिए वायुयानों, जेट विमानों, रॉकेटों व राडारों का प्रयोग आरम्भ कर दिया। सन् 1950 के बाद स्वचालित मौसम केन्द्रों की संख्या में काफ़ी वृद्धि हुई।

1960 के दशक में वायुमंडलीय प्रक्रमों के प्रेक्षण हेतु कृत्रिम उपग्रहों व इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों का सहारा लिया गया। अनेक देशों ने अन्तरिक्ष में विशेष मौसम उपग्रह छोड़े। सन् 1960 में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा छोड़े गए मौसम उपग्रह ने 700 किलोमीटर की ऊँचाई से बादलों और वायुमंडलीय दशाओं के चित्र भेजे। आजकल मौसम उपग्रहों का उपयोग सभी देशों के लिए आसान हो गया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने मुम्बई में अपना एक केन्द्र स्थापित किया है जो रोज़ाना INSAT 2E के माध्यम से बादलों के चित्र व प्रक्रमित आँकड़े प्राप्त करता है। मौसम सम्बन्धी इन्हीं सूचनाओं और पूर्वानुमानों को हम दूरदर्शन और समाचार पत्रों में देखते हैं।

आधुनिक युग में सुपर कम्प्यूटर और संवेदनशील उपग्रहों के प्रयोग ने हमारी वायुमंडलीय प्रक्रमों के प्रेक्षण की क्षमता को पहल से बेहतर किया है। आज हम पर्याप्त शुद्धता तक मौसम का पूर्वानुमान लगा सकते हैं किन्तु फिर भी इस दिशा में काफी कुछ करना शेष है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

HBSE 11th Class Geography भूगोल एक विषय के रूप में Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. मानव के लिए वायुमंडल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित में से कौन-सा है-
(A) जलवाष्प
(B) धूलकण
(C) नाइट्रोजन
(D) ऑक्सीजन
उत्तर:
(D) ऑक्सीजन

2. निम्नलिखित में से वह प्रक्रिया कौन-सी है जिसके द्वारा जल, द्रव से गैस में बदल जाता है-
(A) संघनन
(B) वाष्पीकरण
(C) वाष्पोत्सर्जन
(D) अवक्षेपण
उत्तर:
(B) वाष्पीकरण

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3. निम्नलिखित में से कौन-सा वायु की उस दशा को दर्शाता है जिसमें नमी उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप होती है-
(A) सापेक्ष आर्द्रता
(B) निरपेक्ष आर्द्रता
(C) विशिष्ट आर्द्रता
(D) संतृप्त हवा
उत्तर:
(D) संतृप्त हवा

4. निम्नलिखित प्रकार के बादलों में से आकाश में सबसे ऊँचा बादल कौन सा है?
(A) पक्षाभ
(B) वर्षा मेघ
(C) स्तरी
(D) कपासी
उत्तर:
(A) पक्षाभ

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वर्षण के तीन प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. हिमपात-जब तापमान 0° सेंटीग्रेड से कम होता है, तब वर्षण हिमतूलों के रूप में होता है, जिसे हिमपात कहते हैं।
  2. सहिम वृष्टि-सहिम वृष्टि वर्षा की जमी हुई बूंदें हैं या पिघली हुई बर्फ के पानी की जमी हुई बूंदें हैं।
  3. ओला पत्थर कभी-कभी वर्षा की बूंदें बादल से मुक्त होने के बाद बर्फ के छोटे गोलाकार ठोस टुकड़ों में परिवर्तित होकर पृथ्वी पर पहुँचती हैं, जिसे ओला पत्थर (वृष्टि) कहते हैं।

प्रश्न 2.
सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
किसी निश्चित तापमान पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा तथा उसी तापमान पर उसी वायु को संतृप्त करने के लिए आवश्यक जलवाष्प की मात्रा के अनुपात को सापेक्ष (आपेक्षिक) आर्द्रता (Relative Humidity) कहते हैं।

प्रश्न 3.
ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा तेजी से क्यों घटती है?
उत्तर:
वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा वाष्पीकरण तथा संघनन से क्रमशः घटती-बढ़ती रहती है। हवा द्वारा जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता पूरी तरह से तापमान पर निर्भर होती है। ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता जाता है, इसलिए ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटने पर जलवाष्प की मात्रा घटती जाती है।

प्रश्न 4.
बादल कैसे बनते हैं? बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
बादल पानी की छोटी बँदों या बर्फ के छोटे रवों की संहति होता है जो कि पर्याप्त ऊँचाई पर स्वतंत्र हवा में जलवाष्प के संघनन के कारण बनते हैं।

बादलों को चार रूपों में वर्गीकृत किया जाता है।

  • पक्षाभ मेघ (बादल)
  • कपासी मेघ
  • स्तरी मेघ
  • वर्षा मेघ

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षण-

  • भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर वर्षा की मात्रा कम होती जाती है।
  • उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में व्यापारिक पवनों के चलने के कारण महाद्वीपों के पूर्वी भागों में वर्षा अधिक तथा पश्चिमी भागों में वर्षा कम होती है।
  • शीतोष्ण कटिबन्ध में पछ्वा पवनों के कारण महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में वर्षा अधिक तथा पूर्वी भागों में वर्षा कम होती है।
  • महाद्वीपों के तटीय भागों की अपेक्षा आन्तरिक भागों में वर्षा कम होती है।
  • जहाँ समुद्र तटों के सहारे पर्वत श्रेणियाँ फैली होती हैं वहाँ पवनाभिमुखी ढालों तथा तटीय मैदानों में खूब वर्षा होती है, परन्तु पवनविमुखी ढालों पर वर्षा कम होती है।

विश्व में वर्षा के वितरण का निम्नलिखित ढाँचा प्रस्तुत होता है-
1. भूमध्य रेखीय प्रदेश यह संसार में सबसे अधिक वर्षा उपलब्ध क्षेत्र है। वर्षा की क्रिया संवहनिक है। वर्षा वर्ष भर नियमित रूप से होती रहती है। वर्षा का औसत लगभग 80 सें०मी० होता है। इस पेटी में अमेजन बेसिन (दक्षिण अमेरिका), कांगो बेसिन (अफ्रीका), मलाया तथा पूर्वी द्वीप मुख्य हैं।

2. उष्ण कटिबन्धीय प्रदेश-इन प्रदेशों का विस्तार अक्षांश तक है। इनमें सम्मिलित मुख्य देश भारत, दक्षिणी चीन, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, पूर्वी ब्राजील और पूर्वी अफ्रीका इत्यादि हैं। मध्यमान वार्षिक वर्षा 50 से 200 सें०मी० तक है। वर्षा व्यापारिक व मानसून हवाओं के द्वारा होती है।

3. शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेश-इन प्रदेशों का विस्तार 65° अक्षांश तक है। इनमें पश्चिमी यूरोप, पश्चिमी कनाडा, चिली व न्यूज़ीलैण्ड इत्यादि देश सम्मिलित हैं। यहाँ वर्षा पछुवा पवनों के प्रभाव से पश्चिमी किनारों पर होती है। औसत वार्षिक वर्षा 50 से 100 सें०मी० तक होती है।

4. शीत कटिबन्धीय प्रदेश इस पेटी में ऊँच अक्षांशों वाले प्रदेश सम्मिलित हैं। यह प्रदेश अधिक ठण्डे होने के कारण हिमाच्छादित रहते हैं। इसमें टुण्ड्रा और उत्तरी साइबेरिया सम्मिलित हैं। वार्षिक औसत वर्षा 25 सें०मी० से भी कम है।

औसत वार्षिक वर्षा के आधार पर विश्व के विभिन्न भागों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में बांटा जाता है-

  • 200 सें०मी० से अधिक वर्षा वाले प्रदेश ये भूमध्य रेखीय प्रदेश, शीतोष्ण कटिबन्ध के पश्चिमी तट पर पर्वतों के पवनाभिमुख ढाल तथा मानसूनी प्रदेशों के तटीय मैदान हैं।
  • 100 से 200 सें०मी० वर्षा वाले प्रदेश-इस वर्ग में 200 सें०मी० से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के निकटवर्ती भाग तथा उष्ण शीतोष्ण कटिबन्ध के तटीय प्रदेश सम्मिलित हैं।
  • 50 से 100 सें०मी० वर्षा वाले प्रदेश-ये उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों के भीतरी भागों में तथा शीतोष्ण क्षेत्रों के आन्तरिक भागों में स्थित हैं।
  • 20 से 50 सें०मी० वर्षा वाले प्रदेश इस वर्ग में पर्वत श्रेणियों के वृष्टि छाया प्रदेश, महाद्वीपों के अत्यधिक आन्तरिक भाग तथा उच्च अक्षांशीय प्रदेश सम्मिलित हैं।
  • 20 सें०मी० से कम वर्षा वाले प्रदेश-यह उष्ण एवं शीत मरुस्थलीय प्रदेश हैं।

प्रश्न 2.
संघनन के कौन-कौन से प्रकार हैं? ओस एवं तुषार के बनने की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संघनन के निम्नलिखित चार प्रकार हैं-

  • ओस
  • तुषार या पाला
  • कुहासा एवं कोहरा
  • बादल या मेघ।

1. ओस (Dew)-दिन के समय पृथ्वी सूर्य से गर्मी प्राप्त करती है और रात्रि के समय विकिरण द्वारा छोड़ देती है। रात को विकिरण द्वारा गर्मी निकल जाने से जब कभी धरातल का तापमान ओसांक से कम हो जाता है तो वायु में उपस्थित जलवाष्प पौधों की पत्तियों तथा अन्य तनों पर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में जमा हो जाते हैं, इसे ओस कहते हैं।

2. तुषार या पाला (Frost) यदि ओसांक 0° सेल्सियस अर्थात् हिमांक से नीचे हो तो वायु में उपस्थित जलवाष्प बिना द्रवावस्था में आए सीधे हिमकणों के रूप में परिवर्तित होकर धरातल पर जम जाते हैं। इन हिमकणों के विस्तार को पाला (Frost) कहते हैं।

3. कुहासा एवं कोहरा (Mist and Fog)-जब धरातल से कई मीटर की ऊँचाई तक वायु की परत का तापमान ओसांक से नीचे गिर जाए अर्थात् वायु की आपेक्षित आर्द्रता 100 प्रतिशत से अधिक हो जाए तो जलवाष्प जलकणों में परिवर्तित होकर वायुमण्डल के धूल-कणों पर एकत्रित हो जाते हैं और वायु में ही लटके रहते हैं। इससे धुन्धला-सा दिखाई देने लगता है और दृश्यता (Visibility) कम हो जाती है। इसे ही कुहासा या धुन्ध कहते हैं। जब दृश्यता एक किलोमीटर से भी कम हो जाती है तो इसे कोहरा (Fog) कहते हैं। 200 मीटर से कम दूरी तक ही वस्तुएँ दिखाई देने की स्थिति को सघन कोहरा (Thick Fog) कहते हैं।

4. बादल या मेघ (Clouds)-वायुमण्डल में ऊँचाई पर जलकणों या हिमकणों के जमाव एवं संघनन को बादल कहते हैं। मेघों का निर्माण वायु के ऊपर उठने वाली वायु के ठण्डा होने से होता है। मेघ कोहरे का बड़ा रूप है जो वायुमण्डल में वायु के रुद्धोष्म प्रक्रिया द्वारा उसका तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे आने से बनते हैं। बादलों की आकृति उनकी निर्माण प्रक्रिया पर आधारित है, लेकिन उनकी ऊँचाई, आकृति, रंग, घनत्व तथा प्रकाश के परावर्तन के आधार पर बादलों को निम्नलिखित चार रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है

ओस के बनने की प्रक्रिया-जाड़े की रातों में जब आकाश स्वच्छ होता है तो तीव्र भौमिक विकिरण से धरातल ठण्डा हो जाता है। ठण्डे धरातल पर ठहरी वायुमण्डल की आर्द्र निचली परतें भी ठण्डी होने लगती हैं। धीरे-धीरे यह वायु ओसांक तक ठण्डी हो जाती है। इससे वायु में विद्यमान जलवाष्प संघनित हो जाता है और नन्हीं-नन्हीं बूंदों के रूप में घास व पौधों की पत्तियों पर जमा हो जाता है। वाष्प से बनी जल की इन बूंदों को ओस कहते हैं।

तुषार के बनने की प्रक्रिया-पाला (तुषार) प्रायः तब बनाता है जब वायु का तापमान तीव्रता से हिमांक से नीचे गिर जाता है। पाला पड़ने के लिए भी उन्हीं परिस्थितियों की आवश्यकता होती है जिनकी ओस के लिए होती है, परन्तु पाला पड़ने के लिए ओसांक का हिमांक से नीचे होना आवश्यक है।

वायुमंडल में जल HBSE 11th Class Geography Notes

→ जलवाष्प (Water Vapours)-जलवाष्प वायुमण्डल की एक रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैस है।

→ निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity)-वायु के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प के वास्तविक भार को वायु की निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं।

→ विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity)–वायु के प्रति इकाई भार में जलवाष्प के भार को विशिष्ट आर्द्रता कहते हैं।

→ वाष्पीकरण (Evaporation)-जल की तरलावस्था अथवा ठोसावस्था का गैसीय अवस्था में परिवर्तन होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं।

→ संघनन या द्रवण (Condensation)-जल की गैसीय अवस्था का तरलावस्था या ठोसावस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन या द्रवण कहते हैं।

→ वृष्टि (Precipitation)-वायु में उपस्थित जलवाष्पों का संघनन द्वारा द्रवावस्था या ठोसावस्था में बदलकर पृथ्वी पर गिरने की घटना को वृष्टि कहते हैं।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. समुद्रतल पर वायुदाब कितना होता है?
(A) 1011 मिलीबार
(B) 34 मिलीबार/300 मीटर
(C) 1013 मिलीबार
(D) 36 मिलीबार/300 मीटर
उत्तर:
(B) 34 मिलीबार/300 मीटर

2. ऊँचाई के साथ वायुदाब किस दर से घटता है?
(A) 33 मिलीबार/300 मीटर
(B) 1012 मिलीबार मीटर
(C) 35 मिलीबार/300 मीटर
(D) 1014 मिलीबार मीटर
उत्तर:
(C) 35 मिलीबार/300 मीटर

3. भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब कटिबंध भूमध्य रेखा के उत्तर में कब खिसकता है?
(A) 21 जून
(B) 22 सितंबर
(C) 25 दिसम्बर
(D) 23 मार्च
उत्तर:
(A) 21 जून

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

4. समुद्रतल पर एक वर्ग इंच क्षेत्रफल पर वायु का कितना भार होता है?
(A) 5.68 कि०ग्रा०
(B) 6.68 किग्रा०
(C) 6.75 कि०ग्रा०
(D) 6.80 कि०ग्रा०
उत्तर:
(D) 6.80 कि०ग्रा०

5. वायुदाब मापने के स्वचालित यंत्र को कहते हैं-
(A) बैरोमीटर
(B) थर्मामीटर
(C) थर्मोग्राफ
(D) बैरोग्राफ
उत्तर:
(D) बैरोग्राफ

6. समुद्रतल के अनुसार समानीत समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा कहलाती है-
(A) समदाब रेखा
(B) समताप रेखा
(C) समोच्च रेखा
(D) समवर्षा रेखा
उत्तर:
(A) समदाब रेखा

7. कौन-सा बल वायुमंडल को भू-पृष्ठ से परे धकेलता है?
(A) अपकेंद्री बल
(B) अभिकेंद्री बल
(C) उत्पलावकता बल
(D) गुरुत्वाकर्षण बल
उत्तर:
(A) अपकेंद्री बल

8. किस वायुदाब पेटी को डोलड्रम या शांतपेटी कहते हैं?
(A) उपध्रुवीय निम्न-दाब कटिबंध
(B) उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंध
(C) भूमध्य-रेखीय निम्न-दाब कटिबंध
(D) ध्रुवीय उच्च-दाब कटिबंध
उत्तर:
(C) भूमध्य-रेखीय निम्न-दाब कटिबंध

9. भूमध्य रेखीय निम्न दाब कटिबंध तथा ध्रुवीय उच्च-दाब कटिबंध हैं-
(A) दाब प्रेरित
(B) ताप प्रेरित
(C) गति प्रेरित
(D) दिशा प्रेरित
उत्तर:
(B) ताप प्रेरित

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10. तापमान के बढ़ने पर वायुदाब-
(A) घटता है
(B) बढ़ता है
(C) वही रहता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) घटता है

11. लगभग ऊर्ध्वाधर दिशा में गतिमान वायु को कहा जाता है-
(A) जेट प्रवाह
(B) लंबवत् पवन
(C) चक्रवात
(D) वायु धारा
उत्तर:
(B) लंबवत् पवन

12. निम्नलिखित में से कौन-सी पवनें भूमंडलीय पवनें नहीं हैं?
(A) मानसून पवनें
(B) स्थायी पवनें
(C) पछुवा पवनें
(D) ध्रुवीय पवनें
उत्तर:
(A) मानसून पवनें

13. पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवनों का अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाना कहलाता है-
(A) आभासी प्रभाव
(B) फैरल का नियम
(C) कॉरिआलिस प्रभाव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

14. पछुवा (बहादुर) पवनें बहती हैं-
(A) उत्तरी अंध महासागर में
(B) उत्तरी प्रशांत महासागर में
(C) उत्तरी गोलार्द्ध में
(D) दक्षिणी गोलार्द्ध में
उत्तर:
(D) दक्षिणी गोलार्द्ध में

15. पश्चिमी यूरोप, पश्चिमी कनाडा व दक्षिणी-पश्चिमी चिली में कौन-सी पवनें वर्ष-भर वर्षा नहीं करती?
(A) पछुवा पवनें
(B) ध्रुवीय पवनें
(C) सन्मार्गी पवनें
(D) जल-समीरें
उत्तर:
(A) पछुवा पवनें

16. अपेक्षाकृत ठडे अक्षांशों से भूमध्य रेखा की ओर जाने वाली सन्मार्गी पवनें कहाँ वर्षा नहीं करती?
(A) पर्वतों पर
(B) महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर
(C) महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर
(D) महासागरों पर
उत्तर:
(C) महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर

17. गर्म व शुष्क शिनूक पवनें किस पर्वत के पूर्वी ढलानों से उतरती हैं?
(A) हिमालय
(B) रॉकीज
(C) एंडीज
(D) आल्प्स
उत्तर:
(B) रॉकीज

18. आल्प्स पर्वत को पार करके स्विट्ज़रलैंड की घाटियों में बहने वाली शुष्क, गर्म और तूफानी पवनों को कहते हैं-
(A) मिस्ट्रल
(B) फोएन
(C) बोरा
(D) खमसिन
उत्तर:
(B) फोएन

19. फ्राँस व स्पेन के तटों पर बहने वाली प्रचंड, शुष्क व ठंडी पवन कहलाती है
(A) हरमाट्टन
(B) बोरा
(C) मिस्ट्रल
(D) सिरोको
उत्तर:
(C) मिस्ट्रल

20. निम्नलिखित में से कौन-सी ठंडी स्थानीय पवन नहीं है?
(A) मिस्ट्रल
(B) बोरा
(C) खमसिन
(D) ब्लिजार्ड
उत्तर:
(C) खमसिन

21. भूमध्यरेखीय उष्ण एवं आर्द्र जलवायु की उमस से त्रस्त गिनी प्रदेश के निवासियों को कौन-सी सुखद और स्वास्थ्यप्रद पवन राहत पहुँचाती है?
(A) हरमाट्टन
(B) हिमहरिणी
(C) ब्रिकफील्डर
(D) लेवीची
उत्तर:
(A) हरमाट्टन

22. ब्यूफोर्ट स्केल पर ब्यूफोर्ट कोड-12 अधिसूचित करता है-
(A) शांत पवन को
(B) झंझावात को
(C) हरीकेन को
(D) तूफान को
उत्तर:
(C) हरीकेन को

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23. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा सुमेलित नहीं है?
(A) हरीकेन : यू०एस०ए०
(B) टाइफून : चीन
(C) सिरोक्को : ऑस्ट्रेलिया
(D) मिस्ट्रल : स्पेन
उत्तर:
(C) सिरोक्को : ऑस्ट्रेलिया

24. सन्मार्गी पवनें किन अक्षांशों के बीच चलती हैं?
(A) 23° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच
(B) 25° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच
(C) 30° से 5° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच
(D) 40° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच
उत्तर:
(C) 30° से 5° उत्तरी-दक्षिणी अक्षांश के बीच

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
वर्तमान में वायुमंडलीय दाब मापने के लिए किस इकाई का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
हैक्टोपास्कल इकाई का।

प्रश्न 2.
समुद्र-तल पर वायुदाब कितना होता है?
उत्तर:
1013 मिलीबार।

प्रश्न 3.
ऊँचाई के साथ वायदाब किस दर से घटता है?
अथवा
क्षोभमंडल में ऊँचाई के साथ वायुमंडलीय दबाव कम होने की क्या दर है?
उत्तर:
34 मिलीबार प्रति 300 मीटर।

प्रश्न 4.
किस बल के प्रभाव से पवन अपनी दिशा बदल देती है?
उत्तर:
कॉरिआलिस प्रभाव।

प्रश्न 5.
पवनों के विक्षेपण सम्बंधी नियम का सूत्रधार कौन था?
उत्तर:
अमेरिकी विद्वान फैरल।

प्रश्न 6.
भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब कटिबंध भूमध्य रेखा के उत्तर में कब खिसकता है?
उत्तर:
21 जून को।

प्रश्न 7.
शिनूक (Chinook) का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
हिमभक्षी।

प्रश्न 8.
मिस्ट्रल पवन कौन-सी घाटी में बहती है?
उत्तर:
रोन घाटी में।

प्रश्न 9.
समुद्र-तल पर एक वर्ग सें०मी० क्षेत्रफल पर वायु का कितना भार होता है?
उत्तर:
1.03 किलोग्राम।

प्रश्न 10.
समुद्र-तल पर एक वर्ग इंच क्षेत्रफल पर वायु का कितना भार होता है?
उत्तर:
6.68 किलोग्राम।

प्रश्न 11.
हमारे शरीर पर कितना वायुमंडलीय दबाव पड़ता है?
उत्तर:
लगभग एक टन।

प्रश्न 12.
वायुदाब कटिबंध कितने हैं?
उत्तर:
सात।

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प्रश्न 13.
लगभग ऊर्ध्वाधर दिशा में गतिमान वायु को क्या कहते हैं?
उत्तर:
वायुधारा।

प्रश्न 14.
आल्पस से उतरकर स्विट्ज़रलैण्ड में चलने वाली हवाएँ क्या कहलाती हैं?
उत्तर:
फोएन हवाएँ।

प्रश्न 15.
दिन के समय समुद्र से तट की ओर चलने वाली आर्द्र व ठण्डी पवनों को क्या कहते हैं?
उत्तर:
जल-समीर।

प्रश्न 16.
रात के समय समुद्र से तट की ओर चलने वाली शुष्क पवन को क्या कहते हैं?
उत्तर:
स्थल समीर।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शान्त कटिबंध या डोलड्रम्स किसे कहा जाता है?
उत्तर:
भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब कटिबंध को।

प्रश्न 2.
कॉरिआलिस प्रभाव कौन-से नियम द्वारा जाना जाता है?
उत्तर:
बाइज़ बैलेट अथवा फैरल का नियम।

प्रश्न 3.
कॉरिआलिस प्रभाव के अधीन विक्षेप बल कहाँ अधिकतम व कहाँ न्यूनतम होता है?
उत्तर:
ध्रुवों पर अधिकतम व भूमध्य रेखा पर न्यूनतम।

प्रश्न 4.
तीन प्रकार की स्थायी पंवनों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. सन्मार्गी
  2. पछुवा
  3. ध्रुवीय।

प्रश्न 5.
सन्मार्गी पवनें किन अक्षांशों के बीच चलती हैं?
उत्तर:
30° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के बीच।

प्रश्न 6.
पछुवा पवनें किन अक्षांशों के बीच चलती हैं?
उत्तर:
30°-40° से 50°-60° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के बीच।

प्रश्न 7.
पवनें क्यों चलती हैं?
उत्तर:
वायुदाब में अन्तर आ जाने से।

प्रश्न 8.
‘डॉक्टर’ नामक पवन कहाँ चलती है? उसका असली नाम क्या है?
उत्तर:
‘डॉक्टर’ नामक पवन अफ्रीका के गिनी तट पर चलती है। इसका असली नाम हरमट्टन है।

प्रश्न 9.
गरजता चालीसा व प्रचण्ड पचासा कहाँ स्थित हैं?
उत्तर:
40° और 50° दक्षिणी अक्षांशों पर।

प्रश्न 10.
वायु में भार कैसे पैदा होता है?
उत्तर:
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण।

प्रश्न 11.
वायुदाब और तापमान में क्या सम्बंध है?
उत्तर:
तापमान बढ़ने पर वायुदाब घटता है।

प्रश्न 12.
किसी स्थान का वायुदाब किन कारकों पर निर्भर करता है?
उत्तर:

  1. तापमान
  2. समुद्र-तल से ऊँचाई
  3. जलवाष्प
  4. दैनिक गति।

प्रश्न 13.
वायुमंडल के दबाव को मापने वाले यन्त्र का नाम बताएँ।
उत्तर:
बैरोमीटर तथा बैरोग्राफ़।

प्रश्न 14.
वायुमंडलीय दाब को मापने की कौन-सी तीन इकाइयाँ हैं?
उत्तर:

  1. इंच
  2. सेंटीमीटर
  3. मिलीबार।

प्रश्न 15.
समुद्र-तल पर सामान्य वायुदाब को तीन इकाइयों में व्यक्त कीजिए।
उत्तर:

  1. 29.92 इंच
  2. 76 सेंटीमीटर या 760 मिलीमीटर
  3. 1013.2 मिलीबार।

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प्रश्न 16.
मिलीबार क्या होता है?
उत्तर:
1000 डाइन प्रति वर्ग से०मी० के बराबर शक्ति।

प्रश्न 17.
उच्च वायुदाब की दशा में आकाश स्वच्छ कैसे रहता है?
उत्तर:
उच्च वायुदाब में वायु नीचे बैठती है जिससे वाष्पों का संघनन नहीं हो पाता।

प्रश्न 18.
तेजी से गिरता हुआ वायुदाब किस मौसम की सूचना देता है?
उत्तर:
चक्रवात, वर्षा तथा आँधी का पूर्वानुमान बताता है।

प्रश्न 19.
ताप-प्रेरित वायुदाब कटिबंध कौन-से हैं?
उत्तर:
भूमध्य रेखा पर निम्न दाब कटिबंध और ध्रवों पर उच्च दाब कटिबंध।

प्रश्न 20.
गति-प्रेरित वायुदाब कटिबंध कौन-से हैं?
उत्तर:
दोनों गोलार्डों में उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंध तथा उप-ध्रुवीय निम्न-वायुदाब कटिबंध।

प्रश्न 21.
वायुदाब के सात कटिबंधों का निर्माण क्यों हुआ है?
उत्तर:
विभिन्न अक्षांशों पर सूर्यातप के अन्तर और पृथ्वी की दैनिक गति के प्रभाव के कारण।

प्रश्न 22.
भूमध्य रेखीय कटिबंध को शान्तमंडल या डोलड्रम क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि इस पेटी में वायु का क्षैतिज संचलन न होने के कारण पवनें नहीं चलतीं।

प्रश्न 23.
भूमध्य रेखीय निम्न-दाब कटिबंध का विस्तार लिखिए।
उत्तर:
भूमध्य रेखा से 10° उत्तरी व 10° दक्षिणी अक्षांशों के बीच।

प्रश्न 24.
उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंध का विस्तार बताएँ।
उत्तर:
उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्डों में कर्क और मकर रेखाओं से 35° अक्षांश के बीच।

प्रश्न 25.
उप-ध्रुवीय निम्न-दाब कटिबंध का विस्तार बताइए।
उत्तर:
45° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के आर्कटिक व अंटार्कटिक (66/2° उ० व द० वृत्तों) के बीच।

प्रश्न 26.
दो अलग-अलग ‘शान्त’ वायुदाब पेटियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. भूमध्य रेखीय निम्न-दाब कटिबंध शान्तमंडल अथवा डोलड्रम कहलाता है।
  2. उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंध शान्त कटिबंध (Belt of Calm) या अश्व अक्षांश कहलाता है।

प्रश्न 27.
स्थायी पवनें किन्हें कहा जाता है?
उत्तर:
वे पवनें जो सारा वर्ष एक ही दिशा में चलती हैं, स्थायी पवनें कहलाती हैं।

प्रश्न 28.
पूर्वी पवनें कौन-सी होती हैं?
उत्तर:
सन्मार्गी या व्यापारिक पवनें।

प्रश्न 29.
सन्मार्गी पवनों को उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में क्या कहते हैं?
उत्तर:
क्रमशः उत्तर-पूर्वी सन्मार्गी पवनें तथा दक्षिण-पूर्वी सन्मार्गी पवनें।

प्रश्न 30.
व्यापारिक (सन्मार्गी) पवनों के क्षेत्र में शुष्क प्रदेश अथवा मरुस्थल कहाँ पाए जाते हैं?
उत्तर:
महाद्वीपों के पश्चिमी भागों पर।

प्रश्न 31.
उत्तरी गोलार्द्ध में पछुवा पवनों की क्या दिशा होती है?
उत्तर:
दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व।

प्रश्न 32.
पछुवा पवनें कहाँ वर्षा करती हैं?
उत्तर:
शीतोष्ण कटिबंधों में स्थित महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में।

प्रश्न 33.
शीतोष्ण चक्रवात किन पवनों के साथ चलते हैं?
उत्तर:
पछुवा पवनों के साथ।

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प्रश्न 34.
ध्रुवीय पवनें शुष्क क्यों होती हैं?
उत्तर:
क्योंकि इन ठण्डी पवनों में जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता नहीं होती।

प्रश्न 35.
आवर्ती पवनों की क्या विशेषता होती है?
उत्तर:
समय के एक निश्चित अन्तराल के बाद इन पवनों की प्रवाह-दिशा उलट जाती है।

प्रश्न 36.
मानसून पवनें क्या होती हैं?
उत्तर:
वे पवनें जिनकी मौसम के अनुसार प्रवाह दिशा बदल जाती है।

प्रश्न 37.
चक्रवाती परिसंचरण क्या है?
उत्तर:
निम्न दाब क्षेत्र के चारों ओर पवनों का परिक्रमण चक्रवाती परिसंचरण कहलाता है।

प्रश्न 38.
‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
उत्तर:
‘मानसन’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से हुई है।

प्रश्न 39.
चार ठण्डी स्थानीय पवनों के नाम बताएँ।
उत्तर:
यूरोप में मिस्ट्रल व बोरा, साइबोरिया में बुरान तथा अर्जेन्टाइना में पम्पेरो।

प्रश्न 40.
घाटी समीर क्या होती है?
उत्तर:
दिन के समय घाटी की गर्म वायु का पर्वतीय ढाल के साथ ऊपर उठना।

प्रश्न 41.
पर्वत समीर किसे कहते हैं?
उत्तर:
रात के समय पर्वतीय ढाल से घाटी की ओर बैठती वायु।

प्रश्न 42.
वातान किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब दो भिन्न प्रकार की वायुराशियाँ मिलती हैं तो उनके मध्य सीमा क्षेत्र को वाताग्र कहते हैं।

प्रश्न 43.
वाताग्र-जनन क्या है?
उत्तर:
वाताग्र-जनन (Frontogenesis) वातारों के बनने की प्रक्रिया को कहते हैं।

प्रश्न 44.
वाताग्र कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
वाताग्र चार प्रकार के होते हैं-

  1. उष्ण वाताग्र
  2. अचर वाताग्र
  3. शीत वाताग्र
  4. अधिविष्ट वाताग्र।

प्रश्न 45.
समदाब रेखाएँ किसे कहते हैं?
उत्तर:
समदाब रेखाएँ संमदाब रेखाओं को अंग्रेजी में ‘Isobar’ कहते हैं। “Iso’ का अभिप्राय समान तथा ‘bars’ का अभिप्राय दाब होता है अर्थात् समान दाब वाली रेखाएँ।

प्रश्न 46.
समुद्र-तल पर सामान्य औसत वायुदाब कितने मिलीबार होता है?
उत्तर:
समुद्र-तल पर वायु का दबाव 1.03 किग्रा० प्रति वर्ग सें०मी० होता है। वायुमंडल का सामान्य दाब 45° अक्षांश पर तथा समुद्र-तल पर 29.92 इंच अथवा 76 सें०मी० होता है। यह 1,013.25 मिलीबार के बराबर होता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायुमंडलीय दाब किसे कहते हैं?
उत्तर:
भू-पृष्ठ के ऊपर कई किलोमीटर की ऊँचाई में वायुमंडल पृथ्वी तल पर दबाव उत्पन्न करता है। वायुमंडल गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी पर टिका हुआ है। वायुदाब साधारण रूप से कई गैसों का मिश्रण है जो भार-युक्त है। अन्य वस्तुओं की भाँति वायु का भी भार अथवा दबाव होता है। वायु का जब पृथ्वी के ऊपर भार पड़ता है तो उसे वायुमंडलीय दाब कहते हैं। भूमि के ऊपर लगभग एक किलोग्राम वायुदाब होता है। समुद्र-तल पर सामान्य दशाओं में 76 सें०मी० वायुमंडलीय भार 1,013.25 मिलीबार के बराबर होता है।

प्रश्न 2.
दाब प्रवणता किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानचित्र पर वायुदाब समदाब रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। समदाब रेखाएँ वे कल्पित रेखाएँ हैं जो समुद्र-तल से समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती हैं। समदाब रेखाओं के बीच की दूरी वायुदाब के परिवर्तन की स्थिति दिखाती है। वायुदाब में परिवर्तन की दर को दाब प्रवणता कहते हैं। यदि समदाब रेखाएँ पास-पास हैं तो इसका तात्पर्य है कि धरातल पर थोड़ी दूर जाने पर दबाव अधिक बढ़ रहा है। इसलिए पास-पास वाली रेखाएँ तीव्र दाब को प्रदर्शित करती हैं, जबकि दूर वाली दाब रेखाएँ मन्द-दाब प्रवणता को दर्शाती हैं। तीव्र-दाब प्रवणता में पवनें तेज गति से चलती हैं तथा मन्द-दाब प्रवणता में पवनें धीमी गति से चलती हैं।

प्रश्न 3.
एक मिलीबार किसे कहते हैं? वायुदाब की माप इकाइयों में क्या संबंध है?
उत्तर:
एक मिलीबार-एक वर्ग सें०मी० पर एक ग्राम के बल अथवा एक हजार डाइन प्रति वर्ग सें०मी० के वायुभार को एक मिलीबार कहते हैं।
विभिन्न माप इकाइयों में संबंध-
30 इंच वायुदाब = 76 सें०मी० = 1,013.25 मिलीबार
1 इंच वायुदाब = 34 मिलीबार।
1 सें०मी० वायुदाब = 13.3 मिलीबार।

प्रश्न 4.
वायुराशियाँ (Air Masses) क्या है?
उत्तर:
वायुमंडल में एक विस्तृत भाग पर तापक्रम, आर्द्रता आदि भौतिक गुणों की समानता रखने वाली पवनों को वायुराशियाँ कहते हैं। वायुराशियों की मुख्य रूप से दो विशेषताएँ होती हैं, जिनमें तापमान का लम्बवत् वितरण और आर्द्रता की उपस्थिति शामिल हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण तापमान के लम्बवत् वितरण पर ही उनकी ऊष्मा तथा शीतलता निर्भर करती है। जो वायुराशियाँ स्थिर होती हैं, वे प्रायः ठण्डी तथा शुष्क होती हैं। ये वर्षा नहीं करतीं, परन्तु गतिशील तथा गर्म वायुराशियाँ वर्षा करती हैं। वायुराशि वायु से भिन्न है। वायुराशि में वायु-धाराएँ ऊपर उठती हैं तथा एक विस्तृत क्षेत्र में तापमान तथा आर्द्रता में समानता होती है, परन्तु वायु भूतल के समानान्तर चलती है तथा इसकी विभिन्न परतों में तापमान तथा आर्द्रता में भिन्नता पाई जाती है।

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प्रश्न 5.
कॉरिआलिस बल की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि पृथ्वी स्थिर होती और उसका धरातल एक-समान होता तो पवनें सीधी उच्च वायुदाब की ओर चलतीं। किन्तु न ही उसका धरातल एक-समान है, इसलिए वायु सीधी न चलकर वक्राकार मार्ग पर चलती है। वायु की दिशा में परिवर्तन लाने में पृथ्वी की दैनिक गति का सबसे बड़ा हाथ है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण एक प्रभाव उत्पन्न होता है जिसे ‘कॉरिआलिस बल’ अथवा कॉरिआलिस प्रभाव (Coriolis Force or Coriolis Effect) कहते हैं। इसके कारण पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ जाती हैं। इस तथ्य को सबसे पहले 1844 ई० में फैरल महोदय ने बताया था इसलिए इसे फैरल का नियम कहते हैं। फैरल के नियम (Ferrel’s Law) के अनुसार, भूमध्य रेखा पर कोई विक्षेप नहीं होता। 30° अक्षांशों पर 50%, 60° अक्षांशों पर 86.7% तथा ध्रुवों पर 100% विक्षेप हो जाता है।

प्रश्न 6.
पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक बताइए।
उत्तर:
पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

  1. भूतल पर धरातलीय विषमताओं के कारण घर्षण पैदा होता है जो पवनों की गति को प्रभावित करता है।
  2. पृथ्वी के घूर्णन से भी पवनों का वेग प्रभावित होता है।
  3. कॉरिआलिस बल के कारण भी पवनों की दिशा प्रभावित होती है।

प्रश्न 7.
अश्व अक्षांश क्या हैं?
उत्तर:
231/2° से 35° के मध्य अक्षांशों को ‘अश्व अक्षांश’ कहते हैं, क्योंकि मध्य युग में पश्चिमी द्वीप समूहों से यूरोप को पालदार जलयानों के द्वारा घोड़े भेजे जाते थे। इन अक्षांशों पर आने पर अधिक वायुदाब के कारण ये जहाज आगे नहीं बढ़ पाते थे। इन जहाजों का भार कम करने के लिए कुछ घोड़े समुद्र में फेंक दिए जाते थे। कर्क रेखा तथा मकर रेखा के निकट का यह क्षेत्र शान्तमंडल कहलाता है। यहाँ पवनें भू-तल के समानान्तर नहीं चलतीं। यहाँ पवनें ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर की ओर चलती हैं। यहाँ वायुमंडल शान्त रहता है तथा मौसम साफ होता है। निरन्तर नीचे उतरती हुई वायु के कारण यहाँ अधिक वायुदाब होता है तथा इन अक्षांशों से पवनें ध्रुवों की ओर पछुवा पवनों के रूप में तथा विषुवत् रेखा की ओर व्यापारिक पवनों के रूप में चलती हैं।

प्रश्न 8.
बहिरूपण कटिबंधीय चक्रवात और उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में क्या अन्तर है?
उत्तर:
बहिरूपण कटिबंधीय चक्रवात और उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में निम्नलिखित अन्तर हैं-

बहिरूपण कंटिबंधीय चक्रवातउष्ण कटिबंधीय चक्रवात
1. बहिरूपण चक्रवात स्थल व सागर दोनों प्रदेशों पर ही उत्पन्न व विकसित होते हैं।1. उष्ण चक्रवात प्रायः महासागरों पर ही उत्पन्न व विकसित होते हैं और स्थल-खण्ड में प्रवेश करते ही इनका लोप होने लगता है।
2. ये प्रायः शीत ऋतु में उत्पन्न होते हैं।2. ये ग्रीष्म ऋतु में अधिक उत्पन्न होते हैं।
3. इनकी समदाब रेखाएँ प्रायः दीर्धवृत्ताकार होती हैं।3. इनकी समदाब रेखाएँ प्रायः वृत्ताकार होती हैं।
4. ये चक्रवात हजारों वर्ग किलोमीटर में फैले हुए होते हैं। इनका व्यास प्राय: 800 से 1600 किलोमीटर तक होता है।4. इन चक्रवातों का विस्तार बहुत कम होता है। इनका व्यास प्रायः 300 से 1000 किलोमीटर तक होता है।
5. अधिक विस्तार होने के कारण इन चक्रवातों में वायुदाब प्रवणता मन्द होती है।5. कम विस्तार होने के कारण इनमें वायुदाब प्रवणता तीव्र होती है।

प्रश्न 9.
डोलड्रम किसे कहते हैं?
उत्तर:
डोलड्रम एक शान्त क्षेत्र है जो भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5°N तथा 5°S के मध्य स्थित है। यह भूमध्य रेखा शान्त-खण्ड भी कहलाता है। यहाँ भू-तल पर चलने वाली पवनें नहीं होतीं। यहाँ धीमी तथा शान्त वायु बहती है। इसका प्रमुख कारण सूर्य का यहाँ लगभग लम्बवत् रूप से चमकना है। यहाँ तापमान अधिक होता है। वायु गर्म तथा हल्की होकर संवाहिक धाराओं के रूप में ऊपर उठती है जिससे इस क्षेत्र में वायुदाब कम हो जाता है।

प्रश्न 10.
पर्वत-समीर तथा घाटी-समीर क्या होती हैं?
उत्तर:
ये समीरें मुख्य रूप से दैनिक पवनें हैं जो दैनिक तापान्तर के प्रभाव से वायुदाब की भिन्नता के कारण चलती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में रात्रि के समय पर्वत शिखर से घाटी की ओर ठण्डी तथा भारी चलने वाली वायु को पर्वत-समीर कहते हैं। इन पवनों के कारण घाटियाँ ठण्डी वायु से भर जाती हैं जिससे घाटी के निचले क्षेत्र में पाला पड़ता है। दिन के समय घाटी की गर्म वायु पर्वतीय ढाल के साथ-साथ पर्वतीय शिखर की ओर चलती है जिसे घाटी-समीर कहते हैं। ज्यों-ज्यों ये पवनें ऊपर की ओर जाती हैं, त्यों-त्यों ये ठण्डी होकर भारी वर्षा करती हैं।

प्रश्न 11.
व्यापारिक या सन्मार्गी पवनें क्या हैं?
उत्तर:
व्यापारिक पवनें स्थायी पवनें हैं। ये पवनें उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबंधों से (लगभग 30° उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांश) विषुवतीय निम्न-वायुदाब कटिबंध की ओर दोनों गोलार्डों में चलती हैं। ये पवनें महाद्वीपों के पूर्वी भागों में वर्षा करती हैं। पश्चिमी क्षेत्रों में पहुँचते-पहुँचते ये पवनें शुष्क हो जाती हैं, इसलिए महाद्वीपों के पश्चिम में मरुस्थल पाए जाते हैं। जब व्यापारिक पवनें दोनों गोलार्डों से विषुवत रेखा के निकट आपस में टकराती हैं तो ऊपर उठकर घनघोर वर्षा करती हैं। हिन्द महासागर में ये पवनें मानसून पवनों का रूप धारण करके दक्षिण-पूर्वी एशिया में मानसूनी वर्षा करती हैं।

प्रश्न 12.
फैरल का नियम क्या है?
उत्तर:
भू-तल पर पवनें कभी सीधे रूप से उत्तर से दक्षिण या दक्षिण से उत्तर की ओर नहीं चलतीं। सभी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दाईं ओर तथा दक्षिण गोलार्द्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ जाती हैं। इसे फैरल का नियम कहते हैं। वायु की दिशा में यह परिवर्तन पृथ्वी की दैनिक गति के कारण होता है। जब पवनें कम गति वाले क्षेत्रों से अधिक गति वाले क्षेत्रों की तरफ आती हैं तो पीछे रह जाती हैं। इस विक्षेप शक्ति को कॉरिआलिस बल कहते हैं।

प्रश्न 13.
“मानसूनी पवन सामान्य भूमंडलीय पवन तन्त्र का ही रूपान्तरण है।” इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
मानूसन पवनें मौसम में परिवर्तन के अनुसार अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती हैं। वैज्ञानिक इन्हें बड़े पैमाने की मानते हैं, क्योंकि मानसन पवनों की उत्पत्ति का प्रमुख कारण जल तथा स्थल में तापक्रम की भिन्नता है। मानसून की उत्पत्ति के विषय में उपलब्ध वर्तमान सिद्धान्तों में फ्लोन का सिद्धान्त सर्वमान्य है। इस सिद्धान्त के अनुसार, मानसूनी तन्त्र भू-मंडलीय पवन तन्त्र का ही रूपान्तरित रूप है। ग्रीष्मकाल में जब सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में चमकता है तो उपोष्ण उच्च वायुदाब तथा तापीय भूमध्य रेखा उत्तर की ओर खिसक जाते हैं।

एशिया में भू-खण्ड के प्रभाव के कारण यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर होती है जिससे उष्ण कटिबंधीय व्यापारिक पवन और विषुवतीय पछुवा पवन भी उत्तर की ओर खिसक जाती है। पवनें महासागर से महाद्वीपों की ओर चलने लगती हैं जिन्हें दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पवनें कहते हैं। शीत ऋतु में उपोष्ण उच्च-वायुदाब कटिबंध तथा तापीय भूमध्य रेखा दक्षिण की ओर वापस अपनी पुरानी स्थिति पर लौट आते हैं जिससे सामान्य व्यापारिक चक्र स्थापित हो जाता है जिसे उत्तरी-पूर्वी मानसून पवन कहते हैं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि भू-मंडलीय पवन तन्त्र में चलने वाली व्यापारिक पवनों के स्थान पर मानूसन पवनें चलने लगती हैं।

प्रश्न 14.
पृथ्वी के धरातल पर कुछ वायुदाब कटिबंध तापीय कारणों से नहीं, बल्कि गतिक कारणों से उत्पन्न हुए हैं। ये कटिबंध कौन से हैं? इनकी उत्पत्ति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी के धरातल पर विषुवत् रेखा तथा ध्रुवों के मध्य उपोष्ण उच्च-वायुदाब तथा उप-ध्रुवीय निम्न-वायुदाब की उत्पत्ति गतिक-कारणों से होती है। विषुवत् रेखा से सूर्य की गर्मी के कारण वायु गर्म होकर ऊपर उठती है तथा ठण्डी तथा भारी होकर 30° अक्षांशों के निकट नीचे उतरती है तथा पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ध्रुवों से आने वाली वायु भी इन्हीं अक्षांशों में नीचे उतरती है जिसके कारण इन अक्षांशों पर उच्च-वायुदाब की पेटी बन जाती है। उपध्रुवीय निम्न-वायुदाब की उत्पत्ति का मुख्य कारण भी यही है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ही 60° अक्षांशों के निकट की वायु के विषुवत् रेखा तथा ध्रुवों की ओर खिसकने के कारण ही यहाँ निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है।

प्रश्न 15.
“मानसून पवनें एक बड़े पैमाने पर जल-समीर तथा स्थल-समीर हैं।” व्याख्या करें।
उत्तर:
‘मानूसन’ शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से बना है, जिसका अर्थ है-मौसम। अतः मानसूनी पवनें वे पवनें हैं जो मौसमानुसार दिशा में चलती हैं। ये पवनें 6 मास तक ग्रीष्मकाल में दक्षिण दिशा से तथा 6 मास तक शीतकाल में उत्तर दिशा से चलती हैं। ग्रीष्मकाल में ये पवनें सागरों से स्थल की ओर तथा शीतकाल में स्थल से सागरों की ओर चलती हैं। इनकी उत्पत्ति जल तथा स्थल के गर्म तथा ठण्डा होने में पाई जाने वाली भिन्नता है। स्थलीय भाग जल की अपेक्षा शीघ्र गर्म होता है तथा शीघ्र ही ठण्डा होता है।

इसलिए दिन के समय सागर के निकट स्थल भाग पर कम वायुदाब होता है तथा सागर में कम तापमान के कारण वायुदाब अधिक होता है जिसके कारण सागर से स्थल की ओर जल-समीर चलने लगती है, परन्तु रात्रि के समय वह स्थिति विपरीत हो जाती है, जिससे स्थल से सागर की ओर स्थल-समीर चलने लगती है। इस प्रकार प्रतिदिन वायु की दिशा में परिवर्तन आता रहता है, परन्तु मानूसन पवनों की दिशा में परिवर्तन, मौसम में परिवर्तन के कारण होता है तथा पवनें सागरीय तट के निकट चलने के स्थान पर पूरे महाद्वीप पर चलती हैं। इसलिए मानूसन पवनों को विस्तृत स्तर पर जल-समीर तथा स्थल-समीर का रूप मानते हैं।

प्रश्न 16.
पवन की परिभाषा देते हुए स्पष्ट कीजिए कि पवनों की उत्पत्ति किस प्रकार की होती है?
उत्तर:
पवन (Wind) भू-पृष्ठ के सहारे क्षैतिज बहती हुई हवा (Air) को पवन (Wind) कहते हैं। पवनें पृथ्वी पर वायुदाब में क्षैतिज अन्तर के कारण चलती हैं। जिस प्रकार जल अपना तल बराबर रखने के लिए ऊँचे स्थानों से निचले स्थानों की ओर बहता है उसी प्रकार वायु भी अपने दबाव में सन्तुलन बनाए रखने के लिए उच्च-वायुदाब वाले क्षेत्रों से निम्न-वायुदाब वाले क्षेत्रों की ओर चलती है। यह प्रकृति का नियम है। पवनों के नाम उस दिशा के अनुसार रखे जाते हैं जिनसे वे बहकर आती हैं।

लगभग ऊर्ध्वाधर (Vertical) दिशा में गतिमान वायु को वायुधारा (Air Current) कहा जाता है। पवनें और वायुधाराएँ दोनों मिलकर वायुमंडल में एक संचार तन्त्र (Circulation System) स्थापित करती हैं। पवनों की उत्पत्ति (Origin of Winds)-पवन की उत्पत्ति अत्यन्त जटिल होती है। पवन की उत्पत्ति का प्रत्यक्ष कारण वायुदाब का अन्तर होता है लेकिन पवन का मूल प्रेरक बल सौर विकिरण होता है।

यदि पृथ्वी की दैनिक गति न होती अर्थात् पृथ्वी स्थिर होती और उसका धरातल भी एकदम समतल होता तब पवन उच्च-वायुदाब क्षेत्र से निम्न-वायुदाब क्षेत्र की ओर समदाब रेखाओं पर समकोण बनाते हुए बहती। इसका तात्पर्य यह है कि पवन या तो उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है या दक्षिण से उत्तर की ओर। वायुदाब समान होते ही पवनें भी चलना बन्द कर देतीं। परन्तु वास्तविकता यह है कि पृथ्वी न तो स्थिर है और न ही समतल। इस कारण पवन की गति और दिशा को अनेक कारक सम्मिलित रूप से प्रभावित करते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात क्या है? उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उष्ण-कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)-उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के महासागरों पर उत्पन्न व विकसित होने वाले चक्रवातों को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं। इनका विस्तृत वर्णन निम्नलिखित प्रकार से हैं-
1. उत्पत्ति (Origin)-ये चक्रवात उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्डों में लगभग 5° से 25° अक्षांशों के बीच उत्पन्न होते हैं। भूमध्य रेखा के निकट दोनों गोलार्डों की व्यापारिक पवनें आकर मिलती हैं। जिस तल पर ये पवनें आकर मिलती हैं उसे अन्तरा-उष्ण कटिबंधीय वाताग्र अथवा अन्तरा-उष्ण कटिबंधीय मिलन तल (Inter-tropical Front or Inter-tropical Convergence Zone) कहते हैं। ग्रीष्म ऋतु के उत्तरार्द्ध में अन्तरा-उष्ण कटिबंधीय वाताग्र भूमध्य रेखा से काफी दूर चला जाता है।

इस वाताग्र के किसी भाग में जलवायु काफी गरम होकर बड़े पैमाने पर ऊपर को उठती है तो कॉरिआलिस बल के कारण इस निम्न-वायुदाब क्षेत्र की ओर सभी दिशाओं में पवनें चलने लगती हैं और एक चक्रवात का जन्म होता है। इसके चारों ओर वायु-भार अधिक तथा बीच में वायु-भार कम होता है। कम वायु-भार वाले इस केन्द्र को चक्रवात की आँख (Eye of the Cyclone) कहते हैं। चक्रवात में पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों की विपरीत दिशा में तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के अनुकूल चलती हैं।

2. आकार तथा विस्तार (Shape and Size)-उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की समभार रेखाएँ लगभग वृत्ताकार अथवा दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) होती हैं। भीतरी न्यून तथा बाहरी अधिक वायु-भार में लगभग 55-60 मिलीबार का अन्तर होता है। इनका विस्तार शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के विस्तार में बहुत ही कम होता है, इनका व्यास साधारणतया 150 से 750 किलोमीटर तक होता है, परन्तु कुछ छोटे चक्रवातों का व्यास 40 से 50 किलोमीटर तक ही होता है।

3. मौसम (Weather)-शीतोष्ण चक्रवातों की भाँति उष्ण चक्रवातों के आने पर सबसे पहले आकाश में पक्षाभ-स्तरीय मेघ दृष्टिगोचर होते हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा के चारों ओर प्रभा-मंडल का विकास होता है। वायु उमस वाली हो जाती है और शान्त वातावरण उत्पन्न हो जाता है। वायुदाब एकदम से बढ़ जाता है। इसके पश्चात् मन्द समीर चलने लगती है, मेघ नीचे होने लगते हैं और वायुदाब धीरे-धीरे कम होने लगता है।

तत्पश्चात् वर्षादायनी मेघों (Nimbus Clouds) का विकास होता है जो सबसे पहले क्षैतिज पर दिखाई देते हैं और फिर धीरे-धीरे समस्त आकाश पर छा जाते हैं। वायुदाब तापमान की तीव्रता से कम होने लगता है और पवन का वेग बहुत बढ़ जाता है। दाहिने अग्र चतुर्थांश (Right Front Quadrant) में प्रायः तेज बौछारों के साथ वर्षा होती है। यदि गतियुक्त चक्रवात कुछ समय के लिए स्थिर हो जाएँ तो दाएँ पृष्ठ चतुर्थांश में भी काफी वर्षा होती है। चक्रवात के अन्तिम भाग में फिर से पक्षाभ तथा पक्षाभ-स्तरीय मेघ दृष्टिगोचर होते हैं, पवन का वेग मन्द पड़ जाता है और वायुदाब सामान्य हो जाता है।

4. मार्ग तथा प्रभाव क्षेत्र (Path and Affected Areas)-उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की दिशा विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न होती है। भूमध्य रेखा से 15° तक ये सन्मार्गी (व्यापारिक) पवनों से प्रभावित होकर पूर्व से पश्चिम की ओर चलते हैं। 15° से 30° अक्षांशों के बीच इनकी दिशा अनिश्चित रहती है, परन्त 30° को पार करने के बाद ये पछ्वा पवनों के प्रभावाधीन पश्चिम से पूर्व दिशा में मुड़ जाते हैं। स्थल पर पहुँचकर ये समाप्त हो जाते हैं क्योंकि वहाँ पर जलवाष्प की कमी तथा भू-घर्षण में वृद्धि हो जाती है। इनके प्रभाव-क्षेत्र निम्नलिखित हैं-
(i) कैरीबियन सागर (Caribbean Sea) यहाँ इन्हें हरीकेन (Hurricane) कहते हैं। ये मुख्यतः जून से अक्तूबर तक कैरीबियन सागर से उठते हैं और पश्चिमी द्वीप समूह, फ्लोरिडा तथा दक्षिणी-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के अन्य भागों को प्रभावित करते हैं।

(ii) चीन सागर (China Sea)-यहाँ इन्हें टाइफून (Typhoon) कहते हैं। यहाँ ये जुलाई से अक्तूबर तक चलते हैं और फिलीपींस, चीन तथा जापान को प्रभावित करते हैं।

(iii) हिन्द महासागर (Indian Ocean)-यहाँ इन्हें चक्रवात के नाम से पुकारा जाता है। ये भारत, बांग्लादेश, बर्मा, मेडागास्कर तथा ऑस्ट्रेलिया से उत्तरी तट के अतिरिक्त बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर को भी प्रभावित करते हैं। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के तट पर इन्हें विली-विलीज (Willy Wilies) कहते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा मैक्सिको में इन्हें टोरनेडो (Tormado) कहते हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 2.
‘वायुराशियाँ’ क्या हैं? ‘वातान’ कैसे बनते हैं?
उत्तर:
वायुराशियाँ-वायुमंडल में एक विस्तृत भाग पर तापक्रम, आर्द्रता आदि भौतिक गुणों की समानता रखने वाली पवनों को वायुराशियाँ कहते हैं। वायुराशियों की मुख्य रूप से दो विशेषताएँ होती हैं, जिनमें तापमान का लम्बवत वितरण और आर्द्रता की उपस्थिति शामिल हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण तापमान के लम्बवत् वितरण पर ही उनकी ऊष्मा तथा शीतलता निर्भर करती है। जो वायुराशियाँ स्थिर होती हैं, वे प्रायः ठण्डी तथा शुष्क होती हैं। ये वर्षा नहीं करतीं, परन्तु गतिशील तथा गर्म वायराशियाँ वर्षा करती हैं। वायराशि वाय से भिन्न है।वायराशि में वाय-धाराएँ ऊपर उठती हैं तथा मान तथा आर्द्रता में समानता होती है, परन्तु वायु भूतल के समानान्तर चलती है तथा इसकी विभिन्न परतों में तापमान तथा आर्द्रता में भिन्नता पाई जाती है।

‘वातान’ कैसे बनते हैं-दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियों के मिलन-स्थल को वाताग्र (Front) कहते हैं। यह न तो धरातलीय सतह के समानान्तर होता है और न ही उस पर लम्बवत् होता है बल्कि कुछ कोण पर झुका हुआ होता है।

टी० पीटरसन के अनुसार, “वाताग्री सतह एवं धरातलीय सतह को अलग करने वाली रेखा को वाताग्र कहते हैं तथा जिस प्रक्रिया द्वारा वाताग्र बनता है, उसे वाताग्र उत्पत्ति (Frontogenesis) कहते हैं”।

वातानों की उत्पत्ति निम्नलिखित दो बातों पर आधारित है-
1. भौगोलिक कारक-जब दो विभिन्न प्रकार की वायुराशियाँ एक-दूसरे के समीप आती हैं तो वाताग्र की उत्पत्ति होती है अर्थात् वाताग्र की उत्पत्ति के लिए दो विभिन्न वायुराशियों का तापमान तथा उनकी आर्द्रता का भिन्न होना अनिवार्य है।

2. गतिज कारक-वाताग्र की उत्पत्ति के लिए वायुराशियों में प्रवाह अर्थात् गति होना अत्यन्त आवश्यक है। पीटरसन तथा बर्गरॉन ने यह सिद्ध किया है कि वायुराशियों की गति वातारों को तीव्रता प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में अंतर बताइए।
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात तथा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में अंतर निम्नलिखित हैं-

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones)
1. ये चक्रवात उष्ण कटिबंध में 5° से 30° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्द्धों में चलते हैं।1. ये चक्रवात शीतोष्ण कटिबंध में 35° से 65° अंक्षाशों के मध्य दोनों गोलार्द्धों में चलते हैं।
2. इन चक्रवातों का आकार छोटा होने के कारण दाब प्रवणता अधिक होती है।2. इन चक्रवातों का आकार बड़ा होने के क्रारण दाब प्रवणता कम होती है।
3. इन चक्रवातों का व्यास सामान्यतः 100 से 700 कि०मी० तक होता है। कुछ चक्रवात छोटे भी होते हैं।3. इन चक्रवातों का व्यास सामान्यतः 500 से 700 कि०मी० तक होता है। कुछ चक्रवात कई हजार कि०मी० व्यास के भी होते हैं।
4. इनमें अधिक दाब-प्रवणता के कारण पवनें तेजी से चलती हैं।4. इनमें कम दाब-प्रवणता के कारण पवनें मन्द गति से चलती हैं।
5. इनका जन्म संवहनीय धाराओं के कारण अंतर-उष्ण कटिबंधीय अभिसरण (ITCZ) तल पर होता है।5. इनका जन्म शीतल तथा उण्ण वायु-राशियों के मिलने पर होता है।
6. ये चक्रवात प्रायः उष्ण समुद्री भागों में उत्पन्न व विकसित होते हैं।6. ये चक्रवात समुद्री तथा स्थलीय दोनों ही भागों में समान रूप सं विकसित उ उत्पन्न होते हैं।
7. ये चक्रवात ग्रीष्मकाल में उत्पन्न होते हैं।7. ये चक्रवात शीतकाल में उत्पन्न होते हैं।
8. इन चक्रवातों में वाताग्र नहीं होते ।8. इन चक्रवातों में वाताग्र होते हैं।
9. इन चक्रवातों में समदाब रेखाएँ पास-पास होती हैं।9. इन चक्रवातों में समदाब रेखाएँ दूर-दूर होती हैं।
10. पवनें चक्राकार मार्ग में चलती हैं।10. पवनों की गति व दिशा वाताग्रों पर निर्भर करती है।
11. इनमें वर्षा तेजी से होती है।11. इनमें वर्षा धीरे-धीरे होती है।
12. इनमें वर्षा के साथ ओले नहीं गिरते।12. इनमें वर्षा के साथ ओले गिरते हैं।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

HBSE 11th Class Geography पृथ्वी पर जीवन Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन जैवमंडल में सम्मिलित हैं।
(A) केवल पौधे
(B) केवल प्राणी
(C) सभी जैव व अजैव जीव
(D) सभी जीवित जीव
उत्तर:
(C) सभी जैव व अजैव जीव

2. उष्णकटिबंधीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं?
(A) प्रेयरी
(B) स्टैपी
(C) सवाना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सवाना

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

3. चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है?
(A) आयरन सल्फेट
(B) आयरन कार्बोनेट
(C) आयरन ऑक्साइड
(D) आयरन नाइट्राइट
उत्तर:
(C) आयरन ऑक्साइड

4. प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है?
(A) प्रोटीन
(B) कार्बोहाइड्रेट्स
(C) एमिनोएसिड
(D) विटामिन
उत्तर:
(B) कार्बोहाइड्रेट्स

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पारिस्थितिकी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पारिस्थितिकी का सीधा सम्बन्ध जैविक तथा अजैविक तत्त्वों के पारस्परिक सम्बन्धों से है। जैव समूहों तथा जीवों और वातावरण के बीच जो सम्बन्ध होते हैं, उनका अध्ययन पारिस्थितिकी कहलाता है अर्थात् वातावरण तथा जीवों के मध्य पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन को ही पारिस्थितिकी कहते हैं।

प्रश्न 2.
पारितत्र (Ecological system) क्या है? संसार के प्रमुख पारितंत्र प्रकारों को बताएं।
उत्तर:
पारितन्त्र का अर्थ-पारितन्त्र पर्यावरण के सभी जैव तथा अजैव घटकों के एकीकरण का परिणाम है। दूसरे शब्दों में, जीव तथा उसके पर्यावरण के बीच की स्वतन्त्र इकाई को पारितन्त्र (Ecosystem) कहा जाता है।
पारितन्त्र के प्रकार-पारितन्त्र दो प्रकार के होते हैं-

  • जलीय पारितन्त्र (Terrestrial Ecosystem)
  • स्थलीय पारितन्त्र (Aquatic Ecosystem)

संसार के कुछ प्रमुख पारितंत्र निम्नलिखित हैं- वन, घास-क्षेत्र, मरुस्थल, झील, नदी, समुद्र इत्यादि।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

प्रश्न 3.
खाद्य श्रृंखला क्या है? चराई खाद्य शृंखला का एक उदाहरण देते हुए इसके अनेक स्तर बताएं।
उत्तर:
खाद्य श्रृंखला का अर्थ-भोजन अथवा ऊर्जा के एक पोषण तल से अन्य पोषण तलों तक पहुँचने की प्रक्रिया को खाद्य श्रृंखला (Food Chain) कहा जाता है।

एक पारितन्त्र में अनेक खाद्य शृंखलाएँ बनती हैं जिनमें चराई खाद्य शृंखला भी एक प्रमुख श्रृंखला है। यह शृंखला हरे पौधों (उत्पादक) से आरम्भ होकर माँसाहारी तक जाती है। इस श्रृंखला के विभिन्न स्तर निम्नलिखित हैं
घास → हरा टिड्डा → मेंढ़क → साँप → बाज

प्रश्न 4.
खाद्य जाल (Food web) से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित बताएं।
उत्तर:
खाद्य जाल का अर्थ-पारितन्त्र में खाद्य शृंखलाएँ स्वतन्त्र इकाइयों के रूप में नहीं चलती हैं। ये आपस में अन्य खाद्य श्रृंखलाओं से अलग स्तर पर जुड़ी रहती हैं और एक जाल-सा बनाती हैं, जिसे खाद्य जाल (Food Web) कहा जाता है।

उदाहरण-किसी चरागाह पारितन्त्र में हिरण, खरगोश, चरने वाले पशु-चूहे और सुनसुनिया आदि घास को अपना भोजन बनाते हैं। चूहों को साँप या शिकारी पक्षी खा सकते हैं तथा शिकारी पक्षी साँपों को भी खा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि उपभोक्ताओं के पास कई विकल्प मौजूद हैं जिस कारण पारितन्त्र में सन्तुलन बना रहता है।

प्रश्न 5.
बायोम (Biome) क्या है?
उत्तर:
बायोम-विशेष परिस्थितियों में पादप व जन्तुओं के अन्तर्सम्बन्धों के कुल योग को बायोम (Biome) कहते हैं। यह पौधों और प्राणियों का एक समुदाय है जो बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पाया जाता है। संसार के प्रमुख बायोम हैं

  • वन बायोम
  • मरुस्थलीय बायोम
  • घास-भूमि बायोम
  • जलीय बायोम
  • उच्च प्रदेशीय बायोम।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
संसार के विभिन्न वन बायोम (Forest Biomes) की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
वन बायोम को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन 1
1. उष्ण कटिबन्धीय वन-ये दो प्रकार के होते हैं-

  • भूमध्य रेखीय वन
  • उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन।

भूमध्य रेखीय वन-

  • भूमध्य रेखीय वन भूमध्य रेखा से उत्तर व दक्षिण अक्षांश के बीच स्थित होते हैं।
  • इन वनों में तापमान 20° से 25°C के बीच रहता है।
  • इन क्षेत्रों की मिट्टी अम्लीय होती है जिसमें पोषक तत्त्वों की कमी होती है।
  • इन वनों में असंख्य वृक्षों के झुण्ड लम्बे व घने वृक्ष मिलते हैं।

उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन-

  • उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन 10° से 25° उत्तर व दक्षिण अक्षांशों के बीच पाए जाते हैं।
  • इन वनों का तापमान 25° से 30°C के बीच रहता है।
  • इन वनों में वार्षिक औसत वर्षा 1000 मि०मी० होती है।
  • इन वनों में कम घने तथा मध्यम ऊँचाई के वृक्ष मिलते हैं।
  • इन वनों में कीट, पतंगे, चमगादड़, पक्षी व स्तनधारी जीव पाए जाते हैं।

2. शीतोष्ण कटिबन्धीय वन-

  • इन वनों का तापमान 20° से 30° के बीच पाया जाता है।
  • इन वनों में वर्षा समान रूप से वितरित होती है तथा 750-1500 मि०मी० के बीच होती है।
  • इन वनों में पौधों की प्रजातियों में कम विविधता पाई जाती है। यहाँ ओक, बीच आदि वृक्ष पाए जाते हैं।
  • प्राणियों में गिलहरी, खरगोश, पक्षी तथा काले भालू आदि जन्तु पाए जाते हैं।

3. बोरियल वन-

  • इन वनों में छोटी आई ऋतु व मध्यम रूप से गर्म ग्रीष्म ऋतु तथा लम्बी शीत ऋतु पाई जाती है।
  • इन वनों में वर्षा मुख्यतः हिमपात के रूप में होती है जो 400-1000 मि०मी० होती है।
  • वनस्पति में पाइन, स्यूस आदि कोणधारी वृक्ष मिलते हैं।
  • प्राणियों में कठफोड़ा, चील, भालू, हिरण, खरगोश, भेड़िया व चमगादड़ आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 2.
जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) क्या है? वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Fixation) कैसे होता है? वर्णन करें।
उत्तर:
जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) पृथ्वी पर जीवन विविध प्रकार से जीवित जीवों के रूप में पाया जाता है। ये जीवधारी विविध प्रकार के पारिस्थितिक अन्तर्सम्बन्धों में जीवित हैं। जीवधारी बहुलता व विविधता में ही जीवित रह सकते हैं। जीवित रहने की प्रक्रिया में विविध प्रवाह; जैसे ऊर्जा, जल व पोषक तत्त्वों की उपस्थिति सम्मिलित है। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले 100 वर्षों में वायुमण्डल व जलमण्डल की संरचना में रासायनिक घटकों का सन्तुलन लगभग एक समान रहा है। रासायनिक तत्त्वों का यह सन्तुलन पौधों व प्राणी ऊत्तकों से होने वाले चक्रीय प्रवाह के द्वारा बना रहता है। जैवमण्डल में जीवधारी व पर्यावरण के बीच में रासायनिक तत्त्वों के चक्रीय प्रवाह को जैव भू-रासायनिक चक्र कहा जाता है।

वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण-(Fixation)वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाइट्रोजन को जीव-जन्तु प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करने में असमर्थ हैं परन्तु कुछ फलीदार पौधों की जड़ों में उपस्थित जीवाणु तथा नीली-हरी शैवाल (Blue green Algae) वायुमण्डल की नाइट्रोजन को सीधे ही ग्रहण कर सकते हैं और उसे नाइट्रोजन के यौगिकों में बदल देते हैं। इस प्रक्रिया को नाइट्रोजन यौगिकीकरण कहते हैं। शाकाहारी जन्तुओं द्वारा इन पौधों के खाने पर इसका कुछ भाग उनमें चला जाता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

प्रश्न 3.
पारिस्थितिक संतुलन (Ecological balance) क्या है? इसके असंतुलन को रोकने के महत्त्वपूर्ण उपायों की चर्चा करें।
उत्तर:
पारिस्थितिक सन्तुलन का अर्थ-किसी पारितन्त्र या आवास में जीवों के समुदाय में परस्पर गतिक साम्यता की अवस्था ही पारिस्थितिक सन्तुलन है। यह तभी सम्भव है जब जीवधारियों की विविधता अपेक्षाकृत स्थायी रहे। अतः पारितन्त्र में हर प्रजाति की संख्या में एक स्थायी सन्तुलन को भी पारिस्थितिक सन्तुलन (Ecological Balance) कहा जाता है।

पारिस्थितिक असन्तुलन को रोकने के उपाय-

  • जीव-जन्तुओं के आवास स्थानों को नष्ट नहीं करना चाहिए।
  • वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।
  • पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए।
  • वृक्षारोपण किया जाना चाहिए।
  • पर्यावरणीय कारकों का सही एवं उचित प्रयोग करना चाहिए।
  • जनसंख्या दबाव से भी पारिस्थितिकी बहुत प्रभावित हुई है अतः जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगानी चाहिए।
  • मानव के अधिक हस्तक्षेप से असंतुलन बढ़ता है, जिससे बाढ़ और कई जलवायु संबंधी परिवर्तन देखने को मिलते है। अतः मानव का पर्यावरण से छेड़छाड़ कम करना भी एक उपाय हो सकता है।

पृथ्वी पर जीवन HBSE 11th Class Geography Notes

→ जैवमण्डल (Biosphere)-जैवमण्डल पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी पौधों, जन्तुओं, प्राणियों और इनके चारों ओर के पर्यावरण के पारस्परिक अन्तर्संबंध से बनता है।

→ पारिस्थितिकी (Ecology)-भौतिक पर्यावरण और जीवों के बीच घटित होने वाली पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।

→ पारितंत्र (Ecosystem)-पारितंत्र पर्यावरण के सभी जैव तथा अजैव घटकों के समाकलन का परिणाम है।

→ स्वपोषित (Autotroph)- ऐसे पौधे जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं अकार्बनिक पदार्थों से तैयार करते हैं, स्वपोषित कहलाते हैं।

→ खाद्य शृंखला (Food Chain)-पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह क्रमबद्ध स्तरों की एक श्रृंखला होती है, जिसे खाद्य श्रृंखला कहते हैं।

→ जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle)-पारितंत्र में अजैव तत्त्वों का जैव तत्त्वों में बदलना तथा पुनः जैव तत्त्वों का अजैव तत्त्वों में बदल जाना, जैव भू-रासायनिक चक्र कहलाता है।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. महासागरों की सतह पर एक-साथ भिन्न-भिन्न लंबाई व दिशाओं वाली तरंगों के समूह को कहते हैं-
(A) स्वेल
(B) ‘सी’
(C) सर्फ
(D) बैकवाश
उत्तर:
(B) ‘सी’

2. किस महासागर में पवनों की दिशा बदलते ही धाराओं की दिशा बदल जाती है?
(A) हिंद महासागर में
(B) अंध महासागर में
(C) प्रशांत महासागर में
(D) आर्कटिक महासागर में
उत्तर:
(D) आर्कटिक महासागर में

3. तटीय भागों में टूटती हुई तरंगें कहलाती हैं-
(A) स्वेल
(B) ‘सी’
(C) सर्फ
(D) बैकवाश
उत्तर:
(C) सर्फ

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

4. क्यूरोशियो धारा उत्पन्न होती है-
(A) अटलांटिक महासागर में
(B) प्रशांत महासागर में
(C) हिंद महासागर में
(D) आर्कटिक महासागर में
उत्तर:
(B) प्रशांत महासागर में

5. सारगैसो सागर स्थित है-
(A) प्रशांत महासागर में
(B) दक्षिणी ध्रुव के पास
(C) भूमध्य सागर के पास
(D) अटलांटिक महासागर के मध्य में
उत्तर:
(D) अटलांटिक महासागर के मध्य में

6. निम्नलिखित में से कौन-सी धारा अटलांटिक महासागर में नहीं बहती?
(A) गल्फ स्ट्रीम
(B) लैब्रेडोर की धारा
(C) हंबोल्ट धारा
(D) फाकलैंड की धारा
उत्तर:
(C) हंबोल्ट धारा

7. निम्नलिखित में से कौन-सी गर्म धारा है?
(A) लैब्रेडोर की धारा
(B) फाकलैंड की धारा
(C) क्यूराइल की धारा
(D) फ्लोरिडा की धारा
उत्तर:
(D) फ्लोरिडा की धारा

8. दो लगातार शिखरों या गर्तों के बीच की दूरी कहलाती है-
(A) तरंग काल
(B) तरंग गति
(C) तरंग दैर्ध्य
(D) तरंग आवृत्ति
उत्तर:
(C) तरंग दैर्ध्य

9. निम्नलिखित में से कौन-सी समुद्री धारा ‘यूरोप का कंबल’ के उपनाम से जानी जाती है?
(A) कनारी
(B) बेंगुएला
(C) इरमिंजर
(D) गल्फ स्ट्रीम
उत्तर:
(D) गल्फ स्ट्रीम

10. कालाहारी मरुस्थल के पश्चिम में कौन-सी धारा बहती है? ।
(A) कनारी
(B) बेंगुएला
(C) इरमिंजर
(D) गल्फ स्ट्रीम
उत्तर:
(B) बेंगुएला

11. जापान व ताइवान के पूर्व में कौन-सी गर्म धारा बहती है?
(A) लैब्रेडोर की धारा
(B) क्यूरोशियो की धारा
(C) गल्फ स्ट्रीम
(D) फ्लोरिडा की धारा
उत्तर:
(B) क्यूरोशियो की धारा

12. ‘प्रणामी तरंग सिद्धांत’ निम्नलिखित में से किसकी उत्पत्ति की व्याख्या करता है?
(A) महासागरीय तरंग
(B) चक्रवात
(C) ज्वार-भाटा
(D) उपसागरीय भूकंप
उत्तर:
(C) ज्वार-भाटा

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

13. गर्म समुद्री धाराएँ
(A) ध्रुवों की ओर जाती हैं
(B) भूमध्य रेखा की ओर जाती हैं
(C) उष्ण कटिबंध की ओर जाती हैं
(D) कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच चलती हैं
उत्तर:
(A) ध्रुवों की ओर जाती हैं

14. अर्द्ध दैनिक ज्वार-भाटा प्रायः कितने समय बाद आता है?
(A) 24 घंटे बाद
(B) 12 घंटे 26 मिनट बाद
(C) 36 घंटे बाद
(D) 48 घंटे बाद
उत्तर:
(B) 12 घंटे 26 मिनट बाद

15. निम्नलिखित में से कौन-सी तीन गर्म समुद्री धाराएँ हैं?
(A) गल्फ स्ट्रीम – क्यूराइल – क्यूरोशियो
(B) क्यूरेशियो – क्यूराइल – कैलिफोर्निया
(C) क्यूरोशियो – गल्फ स्ट्रीम – मोजांबिक
(D) गल्फ स्ट्रीम – मोजांबिक – ब्राजील
उत्तर:
(D) गल्फ स्ट्रीम – मोजांबिक – ब्राजील

16. जिस द्वीप के द्वारा अगुलहास धारा दो भागों में विभक्त होती है, वह है
(A) जावा
(B) आइसलैंड
(C) क्यूबा
(D) मैडागास्कर
उत्तर:
(D) मैडागास्कर

17. गल्फ स्ट्रीम की धारा उत्पन्न होती है-
(A) बिस्के की खाड़ी में
(B) मैक्सिको की खाड़ी में
(C) हडसन की खाड़ी में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) मैक्सिको की खाड़ी में

18. निम्नलिखित में से कौन समुद्री धाराओं के प्रवाहित होने का वास्तविक कारण नहीं है?
(A) पानी की लवणता में परिवर्तन
(B) पानी के ताप में परिवर्तन
(C) पानी की गहराई में परिवर्तन
(D) पानी के घनत्व में परिवर्तन
उत्तर:
(C) पानी की गहराई में परिवर्तन

19. सुनामी की उत्पत्ति किस कारणवश होती है?
(A) भूकम्प
(B) ज्वालामुखी
(C) समुद्र गर्भ में भूस्खलन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

20. समुद्री धाराओं के बहने का कारण है
(A) वायुदाब और पवनें
(B) पृथ्वी का परिभ्रमण और गुरुत्वाकर्षण
(C) भूमध्यरेखीय व ध्रुवीय प्रदेशों के असमान तापमान के कारण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
तरंग की गति किस सूत्र से ज्ञात की जाती है?
उत्तर:
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन 1

प्रश्न 2.
सुनामी की उत्पत्ति किन कारणों से होती है?
उत्तर:
भूकम्प, ज्वालामुखी, समुद्र के गर्भ में भूस्खलन आदि से।

प्रश्न 3.
समुद्री धाराएँ कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर:
समुद्री धाराएँ दो प्रकार की होती हैं-

  1. गर्म धारा तथा
  2. ठण्डी धारा।

प्रश्न 4.
किस महासागर में पवनों की दिशा बदलते ही धाराओं की दिशा बदल जाती है?
उत्तर:
हिन्द महासागर में।

प्रश्न 5.
‘सी’ क्या होती है?
उत्तर:
अव्यवस्थित व अनियमित समुद्री तरंगों को ‘सी’ कहा जाता है।

प्रश्न 6.
जापान व ताइवान के पूर्व में कौन-सी गर्म धारा बहती है?
उत्तर:
क्यूरोशियो धारा।

प्रश्न 7.
अन्ध महासागर की सबसे महत्त्वपूर्ण गर्म धारा कौन-सी है?
उत्तर:
गल्फ स्ट्रीम धारा।

प्रश्न 8.
न्यू-फाऊंडलैण्ड के निकट कोहरा क्यों उत्पन्न हो जाता है?
उत्तर:
गल्फ स्ट्रीम गर्म धारा तथा लैब्रेडोर ठण्डी धारा के मिलने के कारण।

प्रश्न 9.
कालाहारी मरुस्थल के पश्चिम में कौन-सी धारा बहती है?
उत्तर:
बेंगुएला धारा।

प्रश्न 10.
दो ज्वारों के बीच में कितना समय रहता है?
उत्तर:
12 घण्टे, 26 मिनट।

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प्रश्न 11.
उष्ण धाराएँ कहाँ-से-कहाँ चलती हैं?
उत्तर:
उष्ण क्षेत्रों से ठण्डे क्षेत्रों की ओर।

प्रश्न 12.
ठण्डी धाराएँ कहाँ-से-कहाँ चलती हैं?
उत्तर:
ठण्डे क्षेत्रों से उष्ण क्षेत्रों की ओर।

प्रश्न 13.
सागर की प्रमुख समुद्री धाराएँ किन पवनों का अनुगमन करती हैं?
उत्तर:
सनातनी अथवा प्रचलित पवनों का।

आल-लघलरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
महासागरीय जल के परिसंचरण के मुख्य रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. तरंगें
  2. धाराएँ और
  3. ज्वार-भाटा।

प्रश्न 2.
पवन द्वारा उत्पन्न तरंगें कौन-कौन सी होती हैं?
उत्तर:

  1. सी
  2. स्वेल तथा
  3. सर्फ।

प्रश्न 3.
बृहत् ज्वार कब आता है?
उत्तर:
अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिन जब पृथ्वी, चन्द्रमा तथा सूर्य एक सीध में आ जाते हैं।

प्रश्न 4.
लघु ज्वार कब आता है?
उत्तर:
शुक्ल व कृष्णपक्ष की अष्टमी के दिन जब सूर्य तथा चन्द्रमा पृथ्वी के केन्द्र पर समकोण बनाते हैं।

प्रश्न 5.
जल तरंग के दो प्रमुख घटक अथवा भाग कौन-से होते हैं?
उत्तर:

  1. तरंग शीर्ष
  2. तरंग गर्त या द्रोणी।

प्रश्न 6.
‘सी’ क्या होती है?
उत्तर:
अव्यवस्थित व अनियमित समुद्री तरंगों को ‘सी’ कहा जाता है।

प्रश्न 7.
सर्फ किसे कहते हैं?
उत्तर:
तटीय भागों में टूटती हुई तरंगों को सर्फ कहते हैं।

प्रश्न 8.
तरंगों द्वारा कौन-कौन सी स्थलाकृतियों की रचना होती है?
उत्तर:
भृगु, वेदी, खाड़ियाँ, कन्दराएँ, पुलिन तथा लैगून इत्यादि।

प्रश्न 9.
गल्फ स्ट्रीम धारा तथा क्यूरोशियो धारा किन पवनों के प्रभाव से किस दिशा में बहती हैं?
उत्तर:
गल्फ स्ट्रीम धारा तथा क्यूरोशियो धारा पछुआ पवनों के प्रभाव से पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं।

प्रश्न 10.
न्यू-फाऊंडलैण्ड के निकट कोहरा क्यों उत्पन्न हो जाता है?
उत्तर:
गल्फ स्ट्रीम गर्म धारा तथा लैब्रेडोर ठण्डी धारा के मिलने के कारण।

प्रश्न 11.
हम्बोल्ट धारा कहाँ बहती है?
उत्तर:
दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर दक्षिण से उत्तर की ओर। इसे पीरुवियन ठण्डी धारा भी कहते हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 12.
प्रशान्त महासागर की दो ठण्डी धाराएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. पूरू की धारा
  2. कैलीफोर्निया की धारा।

प्रश्न 13.
ज्वार-भाटा की उत्पत्ति का कारण क्या है?
उत्तर:
चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी की पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति।

प्रश्न 14.
एक पिण्ड से दूसरे पिण्ड पर गुरुत्व बल की तीव्रता किन दो बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर:

  1. उस पिण्ड का भार तथा
  2. दोनों पिण्डों के बीच की दूरी।

प्रश्न 15.
तरंगों के आकार और बल को कौन-से कारक नियन्त्रित करते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
समुद्री तरंगें जल की सतह पर पवनों के दबाव या घर्षण से उत्पन्न होती हैं। तरंगों का आकार और बल तीन कारकों पर निर्भर करता है

  1. पवन की गति
  2. पवन के बहने की अवधि और
  3. पवन के निर्विघ्न बहने की दूरी अर्थात् समुद्र का विस्तार।

प्रश्न 16.
सागरीय तरंगों के भौगोलिक महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अनाच्छादन के अन्य साधनों की भाँति समुद्री तरंगें भी अपरदन और निक्षेपण कार्यों द्वारा नाना प्रकार की स्थलाकृतियाँ बनाती हैं। तरंगों द्वारा निर्मित मुख्य स्थलाकृतियाँ भृगु (Cliff), वेदी (Platform), खाड़ियाँ (Bays), कन्दराएँ (Caves), पुलिन (Beaches) तथा लैगून (Lagoons) हैं।

प्रश्न 17.
महासागरीय धाराएँ क्या होती हैं?
उत्तर:
महासागरों के एक भाग से दूसरे भाग की ओर निश्चित दिशा में बहुत दूरी तक जल के निरन्तर प्रवाह को महासागरीय धारा कहते हैं। धारा के दोनों किनारों पर तथा नीचे समुद्री जल स्थिर रहता है। वास्तव में समुद्री धाराएँ स्थल पर बहने वाली नदियों जैसी होती हैं लेकिन ये स्थलीय नदियों की अपेक्षा स्थिर और विशाल होती हैं।

प्रश्न 18.
किन-किन कारकों के सम्मिलित प्रयास से महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति होती है?
उत्तर:
महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति में निम्नलिखित कारक सम्मिलित होते हैं-

  1. प्रचलित पवनें
  2. तापमान में भिन्नता
  3. लवणता में अन्तर
  4. वाष्पीकरण
  5. भू-घूर्णन
  6. तटों की आकृति।

प्रश्न 19.
ज्वार-भाटा दिन में दो बार क्यों आता है?
उत्तर:
एक समय में पृथ्वी के दो स्थानों पर ज्वार व दो स्थानों पर भाटा उत्पन्न होते हैं। पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग 24 घण्टों में घूमकर एक चक्कर (Rotation) पूरा करती है। इससे पृथ्वी के प्रत्येक स्थान को दिन में दो बार ज्वार वाली स्थिति से व दो बार भाटा वाली स्थिति से गुज़रना पड़ता है। अतः पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ही पृथ्वी के प्रत्येक स्थान पर एक दिन में दो बार ज्वार व दो बार भाटा अवश्य आते हैं।

प्रश्न 20.
उदावन (Swash) क्या होता है?
उत्तर:
समुद्री तरंग के टूटने पर तट की ढाल के विरुद्ध ऊपर की ओर चढ़ता हुआ विक्षुब्ध (Turbulent) जल जो बड़े आकार की तटीय अपरदन से उत्पन्न सामग्री को बहा ले जा सकता है उदावन कहलाता हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
तरंगें क्या हैं? तरंगों की विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तरंगें तरंगे महासागरीय जल की दोलायमान गति है जिसमें जल स्थिर रहता है और अपने स्थान पर ही ऊपर-नीचे और आगे-पीछे होता रहता है। तरंग एक ऊर्जा है।

तरंग की विशेषताएँ-

  1. तरंग शिखर एवं गर्त तरंग के उच्चतम और निम्नतम बिन्दुओं को क्रमशः शिखर एवं गर्त कहा जाता है।
  2. तरंग की ऊँचाई-यह एक तरंग के गर्त के अधःस्थल से शिखर के ऊपरी भाग तक की उर्ध्वाधर दूरी है।
  3. तरंग आयाम-यह तरंग की ऊँचाई का आधा होता है।
  4. तरंग काल-तरंग काल एक निश्चित बिन्दु से गुजरने वाले दो लगातार तरंग शिखरों या गर्मों के बीच समयान्तराल है।
  5. तरंगदैर्ध्य यह दो लगातार शिखरों या गर्तों के बीच की दूरी है।
  6. तरंग गति जल के माध्यम से तरंग के गति करने की दर को तरंग गति कहते हैं।
  7. तरंग आवृत्ति-यह एक सैकिण्ड के समयान्तराल में दिए गए बिन्दु से गुजरने वाली तरंगों की संख्या है।

प्रश्न 2.
समुद्री तरंगें क्या हैं? समुद्री तरंग के प्रमुख घटकों (Components) की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समुद्री तरंगें महासागरों की सतह पर पवनों के घर्षण के प्रभाव से जल अपने ही स्थान पर एकान्तर क्रम से ऊपर-नीचे और आगे-पीछे होने लगता है, इसे समुद्री तरंगें कहते हैं।

समुद्री तरंग के प्रमुख घटक-पवन के प्रभाव से जब तरंग या लहर का जन्म होता है तो इसका कुछ भाग ऊपर उठा हुआ और कुछ भाग नीचे धंसा हुआ होता है। तरंग का ऊपर उठा हुआ भाग तरंग-श्रृंग (Crest of the wave) कहलाता है, जबकि दूसरा नीचे धंसा हुआ भाग तरंग-गर्त या द्रोणी (Trough of the wave) कहलाता है।

तरंग के एक शृंग से दूसरे शृंग तक या एक द्रोणी से दूसरी द्रोणी तक की दूरी को तरंग की लम्बाई (Wavelength) कहा जाता है। द्रोणी से शृंग तक की ऊँचाई को तरंग की ऊँचाई कहा जाता है। किसी भी निश्चित स्थान पर दो लगातार तरंगों के गुज़रने की अवधि को तरंग का आवर्त काल (Wave Period) कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 3.
लहरों (तरंगों) तथा धाराओं में क्या अन्तर है?
उत्तर:
लहरों (तरंगों) तथा धाराओं में निम्नलिखित अन्तर हैं-

लहरेंधाराएँ
1. इनका आकार जल की गहराई पर निर्भर करता है।1. ये जल की विशाल राशियाँ होती हैं।
2. ये अस्थायी होती हैं तथा बनती-बिगड़ती रहती हैं।2. ये स्थायी होती हैं तथा निरन्तर दिशा में चलती हैं।
3. लहरें महासागरीय जल की दोलायमान गति हैं जिसमें जल ऊपर-नीचे का स्थान छोड़कर आगे नहीं बढ़ता।3. धाराओं का जल नदी के समान है जिसमें जल अपना स्थान छोड़कर आगे बढ़ता है।
4. ये जल की ऊपरी सतह क्षेत्र तक ही सीमित हों।4. इनका प्रभाव काफी गहराई तक होता है।
5. लहरें पवनों के वेग पर निर्भर करती हैं।5. धाराएँ स्थायी पवनों के प्रभाव से निश्चित दिशा में चलती हैं।

प्रश्न 4.
ज्वार-भाटा के महत्त्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ज्वार-भाटा का महत्त्व निम्नलिखित प्रकार से है-
1. जब ज्वार-भाटा आता है तो उससे जल-विद्युत उत्पन्न की जा सकती है। कनाडा, फ्रांस, रूस तथा चीन में ज्वार का इस्तेमाल विद्युत शक्ति उत्पन्न करने में किया जा रहा है। एक 3 मैगावाट का विद्युत शक्ति संयंत्र
पश्चिम बंगाल में सुन्दरवन के दुर्गादुवानी में लगाया जा रहा है।

2. ज्वार-भाटा के समय समुद्रों से बहुत-सी बहुमूल्य वस्तुएँ; जैसे सीपियाँ, कोड़ियाँ आदि बाहर आ जाते हैं।

3. ज्वार-भाटा के समय लहरें बन्दरगाहों के तटीय भागों का कूड़ा-कर्कट बहाकर समुद्र में ले जाती हैं, जिससे नगर के समीपवर्ती भाग स्वच्छ हो जाते हैं।

4. ज्वार-भाटा के द्वारा नदियों के मुहाने का कीचड़ तथा तलछट साफ हो जाता है या बहाकर ले जाया जाता है, जिससे जहाज नदियों के मुहाने तक आसानी से आ और जा सकते हैं तथा व्यापार में सुविधा रहती है। माल को तट तक पहुँचाया जा सकता है तथा निर्यातक माल को आसानी से जहाजों में बाहर भेज सकते हैं।

5. समुद्रों के जल में ज्वार-भाटा की गति के कारण सागरीय जल, शुद्ध तथा स्वच्छ रहता है।

6. जब समुद्रों में ज्वार-भाटा आता है तो मछली पकड़ने वाले मछुआरे खुले सागर में मछली पकड़ने जाते हैं और ज्वार के समय आसानी से तट तक लौट आते हैं।

7. ज्वार-भाटा के कारण बन्दरगाह जम नहीं पाते तथा व्यापार के लिए खुले रहते हैं।

प्रश्न 5.
वृहत् ज्वार तथा निम्न ज्वार में क्या अन्तर है?
उत्तर:
वृहत् ज्वार तथा निम्न ज्वार में निम्नलिखित अन्तर हैं-

वृहत्त ज्वारनिम्न ज्यार
1. पूर्णमासी (Full Moon) तथा अमावस्या (New Moon) के दिन सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी के एक सीध में होने के कारण संयुक्त गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण समुद्र का जल अधिक ऊँचाई तक पहुँच जाता है, जिसे उच्च ज्वार या वृहत् ज्यार कहते हैं।1. कृष्ग तथा शुक्ल पक्ष की सप्तमी अथवा अष्टमी के दिन सूर्य तथा चन्द्रमा पृथ्वी के साथ समकोण पर स्थित होने के कारण महासागरों में ज्वार की ऊँचाई कम रह जाती है, जिसे निम्न ज्वार कहते हैं।
2. उच्च ज्वार प्रायः साधारण ज्यार की तुलना में 20% अधिक ऊँचा होता है।2. निम्न ज्वार प्रायः साधारण ज्वार की तुलना में 20% कम ऊँचा होता है।

प्रश्न 6.
महासागरीय धाराओं के जलवायु पर प्रभाव का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय धाराओं का मुख्य रूप से आसपास के क्षेत्रों की जलवायु पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है, जो निम्नलिखित है-
जलवायु पर प्रभाव – किसी भी क्षेत्र में बहने वाली धाराओं का उसके समीपवर्ती भागों पर अत्यधिक प्रभाव देखने को मिलता है। यदि गर्म जल धारा प्रवाहित होती है तो तापक्रम को बढ़ा देती है, जबकि ठण्डी धारा जिस क्षेत्र से गुजरती है वहाँ का तापमान गिर जाता है। उदाहरणार्थ, ब्रिटिश द्वीप समूह का अक्षांश न्यू-फाउण्डलैण्ड के अक्षांश से अधिक है, लेकिन गल्फ स्ट्रीम की गर्म धारा के प्रभाव से ब्रिटिश द्वीप समूहों की जलवायु सुहावनी रहती है और यह कड़ाके की ठण्ड से बचा रहता है, जबकि न्यू-फाउण्डलैण्ड के आसपास लैब्रेडोर की ठण्डी धारा के प्रभाव के कारण तापक्रम काफी गिर जाता है और यहाँ लगभग 9 माह तक बर्फ जमी रहती है।

वर्षा की मात्रा भी जल धाराओं से प्रभावित होती है। गर्म जल धाराओं के ऊपर बहने वाली हवाएँ गर्म होती है तथा अधिक जलवाष्प ग्रहण करती हैं, जबकि इसके विपरीत ठण्डी जल धाराओं के ऊपर की वायु शुष्क तथा शीतल होने से वर्षा नहीं करती। उदाहरणार्थ, पश्चिमी यूरोप के तटवर्ती भागों में गल्फ स्ट्रीम के प्रभाव से अधिक वर्षा होती है, जबकि पश्चिमी आस्ट्रेलिया के तटों के साथ ठण्डी धाराओं के प्रभाव के कारण वर्षा भी कम होती है।

प्रश्न 7.
पवनों द्वारा उत्पन्न तीन प्रकार की समुद्री तरंगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सागरीय जल की सतह पर पवनों की रगड़ द्वारा तरंगों का निर्माण होता है। पवनें तरंगों की गति में भी संचार करती हैं। तरंगों का आकार भी पवनों की गति तथा अवधि पर निर्भर करता है। पवनों द्वारा निर्मित तरंगें तीन प्रकार की हैं-
1. सी (Sea) लहरों के अनियमित तथा अव्यस्थित रूप को ‘सी’ कहते हैं। इनका निर्माण पवनों के महासागरों पर अनियमित रूप से चलने के कारण होता है।

2. स्वेल या महातरंग (Swell) जब समुद्रों में पवन के वेग के कारण तरंगें बनती हैं और तरंगें पवनों के प्रभाव-क्षेत्र से काफी दूर चली जाती हैं तो तरंगें समान ऊँचाई तथा अवधि से आगे बढ़ती हैं, जिसे स्वेल कहते हैं।

3. सर्फ (Surf)-जब तरंगें महासागरीय भागों से समुद्र के तटवर्ती भागों की ओर आती हैं और तटीय भाग पर खड़ी चट्टानों से टकराती हैं तो ऊँचाई की ओर बढ़ती हैं और फिर टकराकर उनका श्रृंग आगे की ओर झुककर और फिर टूटकर सागर में गिर जाता है तो उसे सर्फ या फेनिल तरंग कहते हैं।

प्रश्न 8.
पवनों के अतिरिक्त अन्य कारकों द्वारा उत्पन्न समुद्री तरंगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पवनों के अतिरिक्त अन्य कारकों द्वारा उत्पन्न समुद्री तरंगों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है-
1. प्रलयकारी तरंगें (Catastrophic Waves)-इन तरंगों की उत्पत्ति ज्वालामुखी, भूकम्प या महासागरों में हुए भूस्खलन के कारण होती है, इन्हें सुनामी (Tsunami) भी कहते हैं। सुनामी जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “agreat harbour wave”।

2. तूफानी तरंगें (Stormy Waves) इनकी ऊँचाई भी अधिक होती है और ये तटीय क्षेत्रों पर भारी विनाशलीला करती हैं।

3. अन्तःतरंगें (Internal Waves) अन्तःतरंगें दो भिन्न घनत्व वाली समुद्री परतों के सीमा तल पर उत्पन्न होती हैं।

प्रश्न 9.
तापमान के आधार पर महासागरीय धाराओं के दो मोटे वर्ग कौन-से हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तापमान के आधार पर महासागरीय धाराओं को दो मोटे वर्गों में रखा जाता है-
1. गर्म धाराएँ (Warm Currents) ये धाराएँ उष्ण क्षेत्रों से ठण्डे क्षेत्रों की ओर चलती हैं। ऐसी धाराएँ जो भूमध्य रेखा के निकट से ध्रुवों की ओर चलती हैं, गर्म धाराएँ कहलाती हैं।

2. ठण्डी धाराएँ (Cold Currents) ये धाराएँ ठण्डे क्षेत्रों से उष्ण क्षेत्रों की ओर चलती हैं। ऐसी धाराएँ जो उच्च अक्षांशों व ध्रुवों के निकट से भूमध्य रेखा की ओर चलती हैं, ठण्डी धाराएँ कहलाती हैं।

प्रश्न 10.
महासागरीय जलधाराओं की सामान्य विशेषताएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
महासागरीय जलधाराओं की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • जलधाराएँ हमेशा एक निश्चित दिशा में बहती हैं।
  • उच्च अक्षांशों में गर्म जल की धाराएँ महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर तथा ठण्डे जल की धाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर बहती हैं।
  • निम्न अक्षांशों में गर्म जल की धाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर तथा ठण्डे जल की धाराएँ महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर बहती हैं।
  • निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर बहने वाली धाराएँ गर्म जल की धाराएँ कहलाती हैं।
  • उच्च अक्षांशों से निम्न अक्षांशों की ओर बहने वाली धाराएँ ठण्डे जल की धाराएँ कहलाती हैं।

प्रश्न 11.
यदि महासागरीय धाराएँ न होतीं तो विश्व का क्या हुआ होता?
उत्तर:
यदि महासागरीय धाराएँ न होतीं तो विश्व की निम्नलिखित स्थिति होती-

  • तटीय प्रदेशों की वर्षा, तापमान व आर्द्रता पर किसी तरह का प्रभाव न पड़ता।
  • ऊँचे अक्षांशों में बन्दरगाहें जमीं रहतीं और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में बाधा पहुँचती।
  • ठण्डी धाराओं के अभाव में नाशवान वस्तुओं (Perishable Goods) का समुद्री परिवहन सम्भव नहीं हो पाता।
  • विश्व-प्रसिद्ध मत्स्य ग्रहण क्षेत्र विकसित न हो पाते।
  • धाराओं के अभाव में जलयान उनका अनुसरण न कर पाते। परिणामस्वरूप समय व ईंधन की बचत न हो पाती।
  • यूरोप की जलवायु सुहावनी न होती तथा शीतोष्ण कटिबन्ध में वर्षा कम होती।
  • महाद्वीपों के पश्चिमी किनारे मरुस्थलीय न होते।

प्रश्न 12.
समुद्री धाराओं के नकारात्मक प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए। अथवा धाराओं से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समुद्री धाराओं के नकारात्मक प्रभाव या हानियाँ निम्नलिखित हैं-
1. धाराओं के कुछ नकारात्मक प्रभाव भी होते हैं। भिन्न तापमान वाली धाराओं के मिलन-स्थल पर घना कुहासा उत्पन्न हो जाता है जो जलयानों के आवागमन को बाधित करता है।

2. ध्रवीय क्षेत्रों से आने वाली धाराएँ अपने साथ बड़ी-बड़ी हिमशैलें (Icebergs) बहा लाती हैं जिनके टकराने से बड़े-बड़े जलयान चकनाचूर हो जाते हैं। सन् 1912 में टाईटैनिक (Titanic) नामक विश्व प्रसिद्ध व उस समय का आधुनिक और सबसे बड़ा जहाज, न्यूफाऊंडलैण्ड के निकट एक हिमशैल से टकराकर 1517 सवारियों के साथ उत्तरी अन्ध महासागर की तली में जा टिका।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 13.
ज्वार-भाटा कैसे उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
ज्वार-भाटा सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी के पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न होते हैं। सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा से आकार में कई गुणा बड़ा है, परन्तु सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण का पृथ्वी पर अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि चन्द्रमा पृथ्वी के निकट है। परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी का जो धरातलीय भाग चन्द्रमा के सामने आ जाता है, उसकी दूरी सबसे कम तथा उसके विपरीत वाला धरातलीय भाग सबसे दूर होता है। सबसे नजदीक वाले भाग का ज्वारीय उभार ऊपर होगा, इसे उच्च ज्वार कहते हैं। जिस स्थान पर जल-राशि कम रह जाती है, वहाँ जल अपने तल से नीचे चला जाता है, उसे निम्न ज्वार कहते हैं। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण प्रत्येक स्थान पर 24 घण्टे में दो बार ज्वार-भाटा आता है।

प्रश्न 14.
ज्वार-भाटा कितने प्रकार का होता है? व्याख्या कीजिए।
अथवा
बृहत् ज्वार-भाटा और लघु ज्वार-भाटा में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ज्वार की ऊँचाई पृथ्वी के सन्दर्भ में सूर्य और चन्द्रमा की सापेक्षिक स्थितियों के बदलने से घटती-बढ़ती रहती है। इस आधार पर ज्वार-भाटा दो प्रकार के होते हैं-
1. बहत ज्वार-भाटा (Spring Tide)-पूर्णमासी (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) को सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी एक सीध में आ जाते हैं जिससे पृथ्वी पर चन्द्रमा तथा सूर्य के संयुक्त गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पड़ता है। परिणामस्वरूप इन दोनों दिनों में साधारण दिनों की अपेक्षा जल का उतार-चढ़ाव अधिकतम होता है। इसे उच्च या बृहत् ज्वार-भाटा कहते हैं।

2. लघु ज्वार-भाटा (Neap Tide) शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की सप्तमी या अष्टमी के दिन सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी के केन्द्र ओं में आ जाते हैं। ऐसी स्थितियों में सर्य और चन्द्रमा के गरुत्व बल पथ्वी पर एक-दूसरे के विरुद्ध काम करते हैं। परिणामस्वरूप इन दोनों दिनों में महासागरों में जल का उतार-चढ़ाव साधारण दिनों के उतार-चढ़ाव की अपेक्षा कम होता है। इसे लघु ज्वार-भाटा कहते हैं।

प्रश्न 15.
ज्वारीय धारा (Tidal Current) क्या होती है?
उत्तर:
जब कोई खाड़ी खुले सागरों और महासागरों के साथ एक संकीर्ण मार्ग के साथ जुड़ी हुई होती है तब ज्वार के समय महासागर का जल-तल खाड़ी के जल-तल से ऊँचा हो जाता है। परिणामस्वरूप खाड़ी के संकीर्ण प्रवेश मार्ग के द्वारा एक द्रव-प्रेरित धारा (Hydraulic Current) खाड़ी में प्रवेश करती है। जब भाटा के समय समुद्र तल नीचा हो जाता है तो खाड़ी का जल-तल महासागर के जल-तल से ऊँचा बना रहता है। ऐसी दशा में एक तीव्र द्रव-प्रेरित धारा खाड़ी से समुद्र की ओर बहने लग जाती है। खाड़ी के अन्दर तथा बाहर की ओर जल के इस प्रवाह को ज्वारीय धारा कहते हैं।

प्रश्न 16.
ज्वारीय भित्ति (Tidal Bore) किसे कहते हैं? इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जब कोई ज्वारीय धारा किसी नदी के छिछले और सँकरे नदमुख (Estuary) में प्रवेश करती है तो वह नदी के विपरीत दिशा में प्रवाह से टकराती है। नदी तल के घर्षण तथा दो विपरीत प्रवाहों के टकराने से जल एक तीव्र चोंच वाली ऊँची दीवार के रूप में नदी में प्रवेश करता है। इसे ज्वारीय भित्ति कहते हैं। भारत में हुगली नदी के मुहाने पर ज्वारीय भित्तियों की उत्पत्ति एक आम बात है। ज्वारीय भित्ति प्रायः दीर्घ ज्वार के समय आती है। इन भित्तियों की ऊँचाई 4 से 50 फुट तक आंकी गई है। ज्वारीय भित्तियों से छमेरी नावों को हानि उठानी पड़ती है।

प्रश्न 17.
प्रवाह (Drift), धारा (Current) तथा विशाल धारा (Stream) में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रवाह-जब पवन से प्रेरित होकर सागर की सतह का जल आगे की ओर बढ़ता है तो उसे प्रवाह (Drift) कहते हैं। इसकी गति और सीमा तय नहीं होती। प्रवाह की गति मन्द होती है और इसमें केवल ऊपरी सतह का जल ही गतिशील होता है; जैसे दक्षिणी अटलांटिक प्रवाह।

धारा-महासागरों के एक भाग से दूसरे भाग की ओर निश्चित दिशा में बहुत दूरी तक जल के निरन्तर प्रवाह को धारा (Current) कहते हैं। यह प्रवाह से तेज़ गति की होती है; जैसे लैब्रेडोर धारा।

विशाल धारा-जब महासागर का अत्यधिक जल स्थलीय नदियों की भाँति एक निश्चित दिशा में गतिशील होता है तो उसे विशाल धारा (Stream) कहते हैं। इसकी गति प्रवाह और धारा दोनों से अधिक होती है; जैसे गल्फ स्ट्रीम।

प्रश्न 18.
ज्वार-भाटा से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ज्वार-भाटे से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं-

  1. ज्वार-भाटा या ज्वारीय भित्ति के कारण कई बार छोटे जहाज़ों को हानि पहुँचती है और छोटी नावें तो डूब ही जाती हैं।
  2. ज्वार से बन्दरगाहों के समीप रेत जमना (Siltation) शुरू हो जाता है जिससे जहाजों की आवाजाई में रुकावट पैदा होती है।
  3. ज्वार-भाटा डेल्टा के निर्माण में बाधा उत्पन्न करता है।
  4. ज्वार के समय मछली पकड़ने का काम बाधित होता है।
  5. ज्वार का पानी तटीय प्रदेशों में दलदल जैसी हालत पैदा कर देता है।

प्रश्न 19.
उत्तरी हिन्द महासागर में शीत एवं ग्रीष्म ऋतुओं में समुद्री जलधाराएँ अपनी दिशा क्यों बदलती हैं?
उत्तर:
उत्तरी हिन्द महासागर में शीत एवं ग्रीष्म ऋतुओं में समुद्री जलधाराएँ मानसून पवनों के कारण अपनी दिशा में परिवर्तन करती हैं। शीत ऋतु में उत्तर:पूर्व मानसून पवनों के प्रभाव के कारण उत्तरी हिन्द महासागर की मानसूनी धारा उत्तर पूर्व से भूमध्य रेखा की ओर बहने लगती है जिसे उत्तर-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं। ग्रीष्म ऋतु में मानसून की दिशा दक्षिण-पश्चिम हो जाती है जिससे भूमध्य रेखीय धारा का कुछ जल उत्तरी हिन्द महासागर में उत्तर:पूर्वी अफ्रीका तट के सहारे सोमाली की धारा के रूप में बहने लगता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जल धाराओं की उत्पत्ति के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जल धाराओं की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारण हैं-

  • पृथ्वी की परिभ्रमण अथवा घूर्णन गति से सम्बन्धित कारक
  • अन्तः सागरीय या महासागरों से सम्बन्धित कारक
  • बाह्य सागरों से सम्बन्धित कारक

1. पृथ्वी की परिभ्रमण अथवा घूर्णन गति से सम्बन्धित कारक-पृथ्वी के घूर्णन या गुरुत्वाकर्षण बल की धाराओं की उत्पत्ति पर प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही है। सम्पूर्ण पृथ्वी जल तथा स्थल दो मण्डलों में विभक्त होने के कारण परिभ्रमण में जलीय भाग स्थल का साथ नहीं दे पाते। अतः जल तरल होने के कारण विपरीत दिशा में पूर्व से पश्चिम की ओर गति करना आरम्भ कर देता है और उत्तरी गोलार्द्ध में धाराएँ भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर तथा ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर चलने लगती हैं, अर्थात विक्षेपक बल के कारण धाराएँ दाईं ओर मुड़ जाती हैं। उदाहरणार्थ गल्फ स्ट्रीम और क्यूरोसियो की गरम जल धाराएँ भूमध्य रेखा के उत्तर में दाईं ओर (उत्तर:पूर्व) होती हैं।

2. महासागरों से सम्बन्धित कारक-अन्तः सागरीय कारकों से तात्पर्य है कि सागर से सम्बन्धित कारकों का धाराओं की उत्पत्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है। इनमें तापक्रम की विभिन्नता, सागरीय लवणता तथा घनत्व की विभिन्नता सम्मिलित है।

(क) तापक्रम की विभिन्नता-सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अलग-अलग अक्षांशों पर भिन्न-भिन्न कोण बनाती हैं। भूमध्य रेखा तथा कर्क और मकर रेखाओं के मध्य सूर्य की किरणें वर्ष-भर लगभग लम्बवत् चमकती हैं जिससे तापक्रम की मात्रा अधिक होती है। भूमध्य रेखा के निकटवर्ती समुद्र अधिक ताप ग्रहण करते हैं, जिससे समुद्री जल हल्का होकर ध्रुवों की ओर अधिक घनत्व वाले स्थानों की ओर अग्रसर हो जाता है। उसकी आपूर्ति के लिए ध्रुवीय क्षेत्रों से अधिक घनत्व वाला जल आ जाता है। इस प्रकार जल राशि का प्रवाह धाराओं के रूप में होने लगता है।

(ख) महासागरीय लवणता सभी समुद्रों में लवणता पाई जाती है, लेकिन लवणता की मात्रा सर्वत्र समान नहीं है। जो सागरीय भाग अधिक लवणता वाले होते हैं, उनके पानी का घनत्व भी कम होता है इसलिए अधिक खारा पानी अधिक घनत्व के कारण नीचे तथा कम खारा पानी सागर की ओर प्रवाहित होकर धाराओं को जन्म देता है। उदाहरणार्थ उत्तरी अटलांटिक महासागर का जल भूम य रेखीय समुद्रों के जल से कम खारा होता है जिसके फलस्वरूप उत्तरी अटलांटिक का जल जिब्राल्टर से होकर अधिक लवणता वाले भूमध्य सागर की ओर प्रवाहित होता है और भूमध्य सागर का जल खारा होने से नीचे बैठता है और अन्तःप्रवाह द्वारा अटलांटिक महासागर में प्रवेश करता है।

3. बाह्य सागरों से सम्बन्धित कारक महासागरों में वायुमण्डलीय बाह्य कारकों का धाराओं की उत्पत्ति पर प्रभाव पड़ता है। वायुमण्डलीय दाब, पवनें, वर्षा, वाष्पीकरण आदि का धाराओं के विकास पर प्रभाव दिखाई देता है।

(क) प्रचलित पवनें हवाओं की दिशा तथा उनके चलने से महासागरीय जल की सतह पर घर्षण (friction) से पवनें अपनी दिशा में जल का प्रवाह करती हैं अर्थात् पवनें जिस दिशा में चलती हैं समुद्री जल को उसी दिशा में धकेलती हैं। स्थायी पवनें (प्रचलित पवनें) सदैव एक ही दिशा में चलती हैं; जैसे कर्क और मकर रेखाओं के बीच व्यापारिक पवनों की दिशा पूर्व से पश्चिम होती है। इसलिए धाराएँ भी पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं और शीतोष्ण कटिबन्ध में इनकी दिशा पश्चिम से पूर्व (पछुवा पवनों के अनुरूप) भी होती हैं।

(ख) वाष्पीकरण और वर्षा (Evaporation and Rainfall) वाष्पीकरण और वर्षा का धाराओं पर काफी प्रभाव पड़ता है। जिन समुद्री भागों में वाष्पीकरण अधिक होता है वहाँ वर्षा भी अधिक होती है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में वर्षा अधिक तथा वाष्पीकरण कम होता है। ऐसे महासागरों में लवणता बहुत कम पाई जाती है। ऐसे क्षेत्रों में जल का तल ऊँचा होता है और जहाँ वाष्पीकरण अधिक तथा वर्षा कम होती है, वहाँ जल का घनत्व अधिक तथा पानी का तल निम्न होता है। जल का तल ऊँचा-नीचा होने के फलस्वरूप ऊँचे तल से धाराओं का प्रवाह निम्न तल की ओर होता है। धाराएँ भूमध्य रेखीय उच्च तल से मध्य अक्षांशीय निम्न तल की ओर चलती हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 2.
जल धाराओं का जलवायु तथा व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय धाराओं का मुख्य रूप से आसपास के क्षेत्रों की जलवायु तथा व्यापार पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। जिसका वर्णन निम्नलिखित है-
1. जलवायु पर प्रभाव (Effect on Climate) किसी भी क्षेत्र में बहने वाली धाराओं का उसके समीपवर्ती भागों पर अत्यधिक प्रभाव देखने को मिलता है। यदि गर्म जल धारा प्रवाहित होती है तो तापक्रम को बढ़ा देती है, जबकि ठण्डी धारा जिस क्षेत्र से गुजरती है वहाँ का तापमान गिर जाता है। उदाहरणार्थ, ब्रिटिश द्वीप समूह का अक्षांश न्यू-फाउण्डलैण्ड के अक्षांश से अधिक है, लेकिन गल्फ स्ट्रीम की गर्म धारा के प्रभाव से ब्रिटिश द्वीप समूहों की जलवायु सुहावनी रहती है और यह कड़ाके की ठण्ड से बचा रहता है, जबकि न्यू-फाउण्डलैण्ड के आसपास लैब्रेडोर की ठण्डी धारा के प्रभाव के कारण तापक्रम काफी गिर जाता है और यहाँ लगभग 9 माह तक बर्फ जमी रहती है।

वर्षा की मात्रा भी जल धाराओं से प्रभावित होती है। गर्म जल धाराओं के ऊपर बहने वाली हवाएँ गर्म होती हैं तथा अधिक जलवाष्प ग्रहण करती हैं, जबकि इसके विपरीत ठण्डी जल धाराओं के ऊपर की वायु शुष्क तथा शीतल होने से वर्षा नहीं करती। उदाहरणार्थ, पश्चिम यूरोप के तटवर्ती भागों में गल्फ स्ट्रीम के प्रभाव से अधिक वर्षा होती है, जबकि पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तटों के साथ ठण्डी धाराओं के प्रभाव के कारण वर्षा भी कम होती है।

2. व्यापार पर प्रभाव (Effect on Trade) गर्म धाराओं के प्रभाव-क्षेत्र में आने वाले बन्दरगाह शीत ऋतु में भी जमने नहीं पाते तथा साल भर व्यापार के लिए खुले रहते हैं। जैसे पश्चिमी यूरोप के बन्दरगाहों पर गल्फ स्ट्रीम का प्रभाव रहता है, जबकि लैब्रेडोर की ठण्डी धारा के प्रभाव के कारण बन्दरगाह जम जाते हैं तथा व्यापार नहीं हो पाता। – ठण्डी तथा गर्म धाराओं के मिलने से कोहरा उत्पन्न हो जाता है, जिससे व्यापार में कठिनाइयाँ आती हैं। साथ ही इन धाराओं के आपस में मिलने से चक्रवातों की भी उत्पत्ति होती है; जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट पर हरीकेन (Hurricane), जापान के समीप टाइफून तथा प्रशान्त महासागर में टारनैडो (Tarnado) तूफानी चक्रवातों के कारण ही जन्म लेते हैं।

प्रश्न 3.
जल धाराओं के प्रभावों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय धाराओं के प्रभावों का वर्णन निम्नलिखित है-
(1) समुद्री धाराएँ निकटवर्ती समुद्रतटीय प्रदेशों के तापमान, आर्द्रता और वर्षा की मात्रा को प्रभावित करके वहाँ की जलवायु का स्वरूप निर्धारित करती हैं।

(2) उच्च अक्षांशों में गर्म धाराएँ सारा साल बन्दरगाहों को जमने से बचाकर अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में सहायक सिद्ध होती हैं। इसी प्रकार ठण्डी धाराएँ नाशवान वस्तुओं (Perishable goods) के समुद्री परिवहन को प्रोत्साहित करती हैं।

(3) ठण्डी धाराएँ ध्रुवीय तथा उपध्रुवीय क्षेत्रों में अपने साथ प्लवक (Plankton) नामक सूक्ष्म जीवों को बहाकर लाती है जो मछलियों का उत्तम आहार सिद्ध होता है। इसी कारण ठण्डी धाराओं के मार्ग में मछलियाँ खूब फलती-फूलती हैं।

(4) ठण्डी और गर्म धाराओं के मिलन स्थल विश्व प्रसिद्ध मत्स्य ग्रहण क्षेत्रों के रूप में विकसित हुए हैं।

(5) महासागरों के व्यावसायिक समुद्री जलमार्ग यथासम्भव समुद्री धाराओं का अनुसरण करते हैं। इससे जलयानों की गति में तीव्रता आती है और ईंधन व समय की बचत होती है।

(6) धाराओं के कुछ नकारात्मक प्रभाव भी होते हैं। भिन्न तापमान वाली धाराओं के मिलन-स्थल पर घना कुहासा उत्पन्न हो जाता है जो जलयानों के आवागमन को बाधित करता है। ध्रुवीय क्षेत्रों से आने वाली धाराएँ अपने साथ बड़ी-बड़ी हिमशैलें (Icebergs) बहा लाती हैं जिनके टकराने से बड़े-बड़े जलयान चकनाचूर हो जाते हैं। सन् 1912 में टाईटेनिक (Titanic) नामक विश्व प्रसिद्ध व उस समय का आधुनिक और सबसे बड़ा जहाज़, न्यू-फाऊंडलैण्ड के निकट एक हिमशैल से टकराकर 1517 सवारियों के साथ उत्तरी अन्ध महासागर की तली में जा टिका।

प्रश्न 4.
ज्वार-भाटा क्या है? इसकी उत्पत्ति के कारण व प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ज्वार-भाटा-“सूर्य और चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति समुद्री जल को प्रतिदिन क्रमशः ऊपर-नीचे करती रहती है, ज्वार-भाटा कहलाती है।” ज्वार-भाटा के कारण समुद्रों का जल एक दिन में दो बार ऊपर चढ़ता है तथा उतरता है। ज्वार-भाटा के समय नदियों के जल-तल में परिवर्तन हो जाते हैं। जब समुद्रों में ज्वार आता है, तो नदियों के जल-तल ऊँचे हो जाते हैं तथा इसके विपरीत भाटे के समय नीचे हो जाते हैं।

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति-ज्वार-भाटा सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी के पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न होते हैं। सूर्य तथा चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी का भाग उनकी ओर खिंचता है और स्थलीय भाग की अपेक्षा जलीय भाग पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव अधिक होता है। सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा से आकार में कई गुना अधिक बड़ा है, लेकिन सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण का पृथ्वी पर अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि चन्द्रमा पृथ्वी के निकट है।

परिभ्रमण करती हुई पृथ्वी का जो धरातलीय भाग चन्द्रमा के सामने आ जाता है, उसकी दूरी सबसे कम तथा उसके विपरीत वाला धरातलीय भाग सबसे दूर होता है। सबसे नजदीक वाले भाग का ज्वारीय उभार ऊपर होगा, जबकि पीछे वाला भाग सबसे कम गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में होता है, लेकिन इस पीछे वाले भाग में भी उच्च ज्वार की स्थिति होती है। इस प्रकार पृथ्वी का चन्द्रमा के सामने तथा पीछे (विपरीत दिशा) वाला भाग जलीय (तरल पदाथ) होने के कारण पृथ्वी के साथ गति नहीं कर पाता। यह भाग पृथ्वी की गति से पीछे रह जाता है। आगे तथा पीछे के जलीय भाग उभरी हुई या खिंची हुई अवस्था में होते हैं। यह स्थिति एक दिन में दो बार ज्वार की तथा दो बार भाटे की होती है।

ज्वार-भाटा के प्रकार-विश्व के अनेक महासागरों तथा सागरों में जो ज्वार-भाटा आते हैं, उनकी आवृत्ति तथा ऊँचाई में अन्तर देखने को मिलता है। भूमध्य रेखीय भागों के आसपास दिन में दो बार उच्च ज्वार तथा दो बार निम्न ज्वार देखने को मिलते हैं, जबकि ध्रुवीय प्रदेशों में एक ही बार उच्च तथा निम्न ज्वार देखने को मिलते हैं, इंग्लैण्ड के दक्षिणी तट पर स्थित साऊथैप्टन (Southampton) में ज्वार प्रतिदिन चार बार आता है। इसके कारण यह है कि ज्वार दो बार तो इंग्लिश चैनल से होकर और दो बार उत्तरी सागर से होकर विभिन्न अन्तरालों पर वहाँ पहुँचते हैं। यह पृथ्वी तथा चन्द्रमा की गतियों के परिणामस्वरूप है। इस प्रकार ज्वार-भाटा दो प्रकार के होते हैं

1. उच्च या वृहत् ज्वार-भाटा जब सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी तीनों एक ही सीध में होते हैं तो उस समय उच्च या वृहत् ज्वार-भाटा आता है। ऐसी स्थिति पूर्णमासी (Full Moon) तथा अमावस्या (New Moon) के दिन होती है। इन दिनों दिन में पृथ्वी पर सूर्य तथा चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव अधिक होता है। जब सूर्य और पृथ्वी एक ही दिशा में स्थित होते हैं, तो बीच में चन्द्रमा के आ जाने से सूर्य ग्रहण होता है और जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच में पृथ्वी आ जाती है, तो चन्द्रग्रहण होता है।

2. लघु ज्वार-भाटा-कृष्ण तथा शुक्ल पक्ष की सप्तमी अथवा अष्टमी के दिन सूर्य तथा चन्द्रमा पृथ्वी के साथ समकोण पर स्थित होते हैं। इस समकोण स्थिति के कारण चन्द्रमा तथा सूर्य पृथ्वी को विभिन्न दिशाओं से आकर्षित करते हैं, जिसके कारण गुरुत्वाकर्षण बल अन्य तिथियों की अपेक्षा कम रहता है और महानगरों में ज्वार की ऊँचाई भी कम रहती है जिसे लघु ज्वार कहते हैं।

प्रश्न 5.
हिन्द महासागर की धाराओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हिन्द महासागर की धाराएँ-हिन्द महासागर में मानसूनी पवनें चला करती हैं जो छः महीने बाद अपनी दिशा बदल देती हैं। फलस्वरूप हिन्द महासागर में चलने वाली धाराएँ भी मानसून के साथ अपनी दिशा बदल देती हैं। हिन्द महासागर की धाराओं को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-
(क) स्थायी धाराएँ-हिन्द महासागर में विषुवत् रेखा के दक्षिण में चलने वाली धाराएँ वर्ष भर एक ही क्रम में चलती हैं, अतः इन्हें ‘स्थायी धाराएँ’ कहते हैं। इन धाराओं में दक्षिणी विषुवत रेखीय जलधारा, मोजम्बिक धारा, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की जलधारा और अगुलहास धारा मुख्य हैं।

(ख) परिवर्तनशील धाराएँ-विषुवत् रेखा के उत्तर की ओर हिन्द महासागर की समस्त धाराएँ मौसम के अनुसार अपनी दिशा और क्रम बदल देती हैं। इसलिए ये परिवर्तनशील धाराएँ कहलाती हैं। इन धाराओं की दिशा व क्रम मानसून हवाओं से प्रभावित होते हैं। अतः इन्हें मानसून प्रवाह भी कहा जाता है।
1. दक्षिणी विषुवरेखीय जलधारा-यह धारा दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक पवनों के प्रभाव से ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम से पूर्व की ओर चलती है। मलागसी तट के समीप यह दक्षिण की ओर मुड़ जाती है।

2. मोजम्बिक जलधारा-यह एक गरम जल की धारा है जो अफ्रीका के पूर्वी तट और मलागसी के बीच बहती है। यह उत्तर से आकर दक्षिणी विषुवत् रेखीय धारा की दक्षिणी शाखा से मिल जाती है।

3. अगुलहास जलधारा-अफ्रीका से दक्षिण में अगुलहास अन्तरीप में पछुआ पवनों के प्रभाव द्वारा पूर्व की ओर एक धारा चलने लगती है। इसी धारा को अगुलहास की गर्म धारा कहते हैं।

4. पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की धारा-अण्टार्कटिक प्रवाह की एक शाखा ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण-पश्चिमी भाग से मुड़कर उत्तर की ओर पूर्व को ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के साथ-साथ बहने लगती है। यही पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की ठण्डी जलधारा कहलाती है।

5. ग्रीष्मकालीन मानसून प्रवाह-ग्रीष्म ऋतु में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पवनों के प्रवाह से एशिया महाद्वीप के पश्चिमी तटों से एक उष्ण प्रवाहपूर्व की तरफ चलने लगता है। उत्तरी विषुवत् रेखीय धारा भी मानसून के प्रभाव से पूर्व की ओर बहकर मानसून प्रवाह के साथ ग्रीष्मकाल की समुद्री धाराओं का क्रम बनाती है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

HBSE 11th Class Geography विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. कोपेन के A प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन-सी दशा अर्हक हैं?
(A) सभी महीनों में उच्च वर्षा
(B) सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिंदु से अधिक
(C) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक
(D) सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस के नीचे
उत्तर:
(C) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक

2. जलवायु के वर्गीकरण से संबंधित कोपेन की पद्धति को व्यक्त किया जा सकता है
(A) अनुप्रयुक्त
(B) व्यवस्थित
(C) जननिक
(D) आनुभविक
उत्तर:
(D) आनुभविक

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3. भारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भागों को कोपेन की पद्धति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा-
(A) “Af”
(B) “BSh”
(C) “Cfb”
(D) “Am”
उत्तर:
(D) “Am”

4. निम्नलिखित में से कौन सा साल विश्व का सबसे गर्म साल माना गया है?
(A) 1990
(B) 1998
(C) 1885
(D) 1950
उत्तर:
(B) 1998

5. नीचे लिखे गए चार जलवायु समूहों में से कौन आर्द्र दशाओं को प्रदर्शित करता हैं?
(A) A-B-C-E
(B) A-C-D-E
(C) B-C-D-E
(D) A-C-D-F
उत्तर:
(D) A-C-D-F

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलवायु के वर्गीकरण के लिए कोपेन के द्वारा किन दो जलवायविक चरों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
कोपेन ने जलवायु के वर्गीकरण के लिए निम्नलिखित जलवायविक चरों का प्रयोग किया है-

  • तापमान
  • वर्षण
  • तापमान और वर्षण का वनस्पति के वितरण से सम्बन्ध।

प्रश्न 2.
वर्गीकरण की जननिक प्रणाली आनुभविक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
जननिक प्रणाली में जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास किया जाता है, जबकि आनुभविक प्रणाली में जलवायु तापमान और वर्षण से सम्बन्धित आंकड़ों पर आधारित है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

प्रश्न 3.
किस प्रकार की जलवायुओं में तापांतर बहुत कम होता है?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु में तापांतर बहुत कम होता है। यह जलवायु विषुवत् रेखा के निकट पाई जाती है। इन प्रदेशों में तापमान सामान्य रूप से ऊँचा और वार्षिक तापांतर नगण्य होता है। किसी भी दिन अधिकतम तापमान लगभग 30° से० और न्यूनतम तापमान लगभग 20° से होता है। लेकिन वार्षिक ताप में अंतर बहुत कम है।

प्रश्न 4.
सौर कलंकों में वृद्धि होने पर किस प्रकार की जलवायविक दशाएँ प्रचलित होंगी?
उत्तर:
सौर कलंक सूर्य पर काले धब्बे होते हैं, जो एक चक्रीय ढंग से घटते-बढ़ते रहते हैं। मौसम वैज्ञानियों के अनुसार सौर कलंकों की संख्या के बढ़ने से मौसम ठंडा और आर्द्र हो जाता है तथा तूफानों की संख्या बढ़ जाती है। सौर कलंकों के कम होने से उष्ण एवं शुष्क दशाएँ उत्पन्न होती हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तुलना करें।
उत्तर:
A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तुलना निम्नलिखित प्रकार से है-

‘A’ प्रकार की जलवायु‘B’ प्रकार की जलवायु.
(1) ये उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु वाले प्रदेश हैं।(1) ये शुष्क जलवायु वाले प्रदेश हैं।
(2) इस प्रकार की जलवायु में वर्षा अधिक होती है।(2) इस प्रकार की जलवायु में वर्षा बहुत कम होती है।
(3) इस प्रकार की जलवायु में वार्षिक तापान्तर कम होता है।(3) इस प्रकार की जलवायु में वार्षिक तापान्तर अधिक होता है।
(4) यह जलवायु 0° अक्षांश के आसपास के क्षेत्रों तथा कर्क रेखा और मकर रेखा के मध्य पाई जाती है।(4) यह जलवायु 15° से 60° उत्तर व दक्षिण अक्षांशों के मध्य विस्तृत है तथा 15° से 30° के निम्न अंक्षाशों में यह उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में पाई जाती है।
(5) इस प्रकार की जलवायु में जैव-विविधता वाले उष्ण कटिबंधीय सदाहरित वन पाए जाते हैं।(5) इस प्रकार की जलवायु में कंटीले बन पाए जाते हैं।

प्रश्न 2.
C तथा A प्रकार के जलवायु में आप किस प्रकार की वनस्पति पाएँगे?
उत्तर:
‘A’ उष्ण कटिबंधीय जलवायु को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है-
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन 1
(1) AF-उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु विषुवत् वृत्त के निकट पाई जाती है। इस जलवायु में सघन वितान तथा व्यापक जैव विविधता वाले सदाबहार वन पाए जाते हैं।

(2) Am-उष्ण कटिबंधीय मानसून जलवायु भारतीय उपमहाद्वीप दक्षिण अमेरिका के उत्तर:पूर्वी तथा उत्तरी आस्ट्रेलिया में पाई जाती है। इस जलवायु में पर्णपाती वन पाए जाते हैं जिसमें पेड़ अपनी पत्तियाँ वर्ष में एक बार गिरा देता है।

(3) Aw-उष्ण कटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु AF प्रकार के जलवायु प्रदेशों के उत्तर एवं दक्षिण में पाई जाती है। इस जलवायु में पर्णपाती वन और पेड़ों से ढकी घासभूमियाँ पाई जाती हैं।
‘B’ कोष्ण शीतोष्ण जलवायु को चार प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है-
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन 2

  • Cwa-आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु में पतझड़ वन पाए जाते हैं।
  • Cs-भूमध्य-सागरीय प्रदेशों में फलों के वृक्ष पाए जाते हैं।
  • Cfa-आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय (Cfa) में पर्णपाती वन पाए जाते हैं। इस क्षेत्र के कुछ क्षेत्रों में घासभूमियाँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 3.
ग्रीनहाऊस गैसों से आप क्या समझते हैं? ग्रीन हाऊस गैसों की एक सूची तैयार करें।
उत्तर:
ग्रीनहाऊस गैसें ऐसी गैसें जो धरती पर एक आवरण बनाकर कम्बल की भाँति काम करती हैं और धरती की ऊष्मा को बाहर जाने से रोकती हैं, ग्रीनहाऊस गैसें कहलाती हैं। ये पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में सहायक हैं।

ग्रीनहाऊस गैसें वर्तमान में प्रमुख ग्रीनहाऊस गैसें कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2), क्लोरो-फ्लोरोकार्बन्स (CFCs), मीथेन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) और ओज़ोन (O3) हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और कार्बन मोनोक्साइड (CO) कुछ ऐसी अन्य गैसें हैं जो ग्रीनहाऊस गैसों से आसानी से प्रतिक्रिया करती हैं और वायुमण्डल में उनके सान्द्रण को प्रभावित करती हैं।

1. कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2) वायुमण्डल में उपस्थित ग्रीनहाऊस गैसों में सबसे अधिक सान्द्रण CO2 का है। वैसे तो कार्बन-चक्र हजारों वर्षों की अवधि में वायुमण्डल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा सन्तुलित बनाए रखता है, लेकिन लघु-अवधि में यह सन्तुलन कई बार बिगड़ जाता है। विगत कुछ वर्षों में कोयला, पेट्रोल, डीजल तथा प्राकृतिक गैस; जैसे जीवश्मी ईंधनों के जलने से प्रतिवर्ष 6 अरब टन कार्बन-डाइऑक्साइड वायुमण्डल में मिल रही है। वन तथा महासागर CO2 के कुण्ड माने जाते हैं। वन अपनी वृद्धि के लिए CO2 का उपयोग करते हैं। अतः भूमि उपयोग में परिवर्तनों के कारण की गई जंगलों की कटाई भी CO2 की मात्रा बढ़ाती है।

CO2 लगभग 0.5 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है। सन् 1750 के बाद वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 30 प्रतिशत बढ़ी है, जिसने ग्रीनहाऊस प्रभाव में 65 प्रतिशत का योगदान दिया है। एक अन्य अनुमान के अनुसार 21वीं शताब्दी के मध्य तक वायुमण्डल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा औद्योगिक क्रांति से पूर्व की तुलना में दोगुनी हो जाएगी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी हो जाए तो वायुमण्डल का तापमान 3° सेल्सियस बढ़ सकता है। 21वीं सदी के अन्त तक वायुमण्डल का तापमान 1.4° से 5.8° सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

2. क्लोरो फ्लोरो कार्बन (CFCs)-यह गैस मनुष्य का अनुसंधान है, प्रकृति में यह नहीं मिलती। यह वास्तव में संश्लेषित (Synthetic) यौगिकों का समूह है जिसका प्रत्येक अणु कार्बन-डाइऑक्साइड की तुलना में 20 हजार गुना ताप प्रग्रहित करता है। ये यौगिक वातानुकूलन व प्रशीतन की मशीनों, आग बुझाने के उपकरणों में तथा छिड़काव यन्त्रों में प्रणोदक (Propelent) के रूप में प्रयोग होते हैं। वर्तमान में इसकी मात्रा 4 प्रतिशत की दर से वायुमण्डल में बढ़ रही है। CFCs वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर समताप मण्डल में क्लोरीन को मुक्त करती है जो ओज़ोन को तोड़ती है। ओज़ोन परत पैराबैंगनी किरणों (Ultraviolet rays) से पृथ्वी की रक्षा करती है। समताप मण्डल में ओज़ोन के सान्द्रण का ह्रास ओज़ोन छिद्र कहलाता है। यह छिद्र हानिकारक पराबैंगनी किरणों को क्षोभमण्डल से गुजरने देता है। ओज़ोन का सबसे अधिक हास अंटार्कटिका के ऊपर हुआ है।

3. नाइट्रस ऑक्साइड-इसका महत्त्वपूर्ण स्रोत उष्ण कटिबन्धीय मिट्टी है, जहाँ पर जीवाणु नाइट्रोजन के प्राकृतिक यौगिकों से क्रिया करके नाइट्रस ऑक्साइड पैदा करते हैं। कृषि में नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग, पेड़-पौधों को जलाने, नाइट्रोजन वाले ईंधन को जलाने तथा नाइलोन उद्योग द्वारा छोड़े जाने के कारण वायुमण्डल में इसकी मात्रा में वृद्धि हुई है। इस समय वायुमण्डल में इसकी मात्रा 0.31 भाग प्रति दस लाख भाग (PPM) है। नाइट्रस ऑक्साइड का प्रत्येक अणु कार्बन-डाइऑक्साइड की तुलना में 250 गुना अधिक ताप प्रग्रहित (Trap) करता है।

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4. मीथेन गैस-तापमान बढ़ाने में मीथेन गैस का प्रत्येक अणु कार्बन-डाइऑक्साइड की तुलना में 25 गुना अधिक प्रभावी है। मीथेन अपघटकों (Decomposers) की देन है। इसके अधिकांश स्रोत जैविक हैं। मीथेन गैस धान के खेतों, नम भूमि तथा दलदल से निकलती है, इसलिए इसे मार्श गैस (Marsh Gas) भी कहते हैं। यह सागरों, ताज़े जल, खनन कार्य, गैस ड्रिलिंग तथा जैविक पदार्थों के सड़ने से उत्पन्न होती है। पशु और लकड़ी खाने वाले कीड़े; जैसे दीमक को मीथेन छोड़ने का जिम्मेदार पाया गया है।

5. जलवाष्प-अन्य ग्रीनहाऊस गैसों के कारण तापमान बढ़ने से जल की वाष्पन दर भी बढ़ जाती है। वायुमण्डल में जमा हुए ज्यादा जलवाष्प तापमान को और ज्यादा बढ़ाते हैं, क्योंकि जलवाष्प स्वयं एक प्राकृतिक ग्रीनहाऊस गैस है।

6. ओज़ोन-यद्यपि निचले वायुमण्डल में यह गैस कम पाई जाती है पर फिर भी इसका जमाव गर्मी बढ़ाने का काम करता है। ग्रीनहाऊस गैसों के प्रभाव को नियन्त्रित करने वाले कारक-

  • गैस के सान्द्रण में वृद्धि के परिणाम।
  • वायुमण्डल में इसके जीवनकाल अर्थात् ग्रीनहाऊस गैसों के अणु जितने लंबे समय तक बने रहते हैं, इनके द्वारा लाए गए परिवर्तनों से वायुमण्डलीय तंत्र को उबरने में उतना अधिक समय लगता है।
  • इसके द्वारा अवशोषित विकिरण की तरंग लंबाई।

विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन HBSE 11th Class Geography Notes

→ समताप रेखाएँ (Isotherms)-ये काल्पनिक रेखाएँ समुद्र तल के अनुसार समान ताप वाले स्थानों को मिलाती हैं।

→ जलवायु प्रदेश (Climatic Region)-पृथ्वी के धरातल पर पाए जाने वाले ऐसे भू-भाग, चाहे वे पास-पास हों या दूर-दूर। जहाँ लगभग एक समान जलवायु पाई जाती है, जलवायु प्रदेश कहलाते हैं।

→ ध्रुवीय ज्योति (Aurora) आयनमण्डल में विद्युत चुम्बकीय घटना का एक प्रकाशमय प्रभाव, जो उच्च अक्षांशों में लाल, हरे तथा सफेद चापों के रूप में दिखाई देता है। रात को आकाश में भू-पृष्ठ से 100 कि०मी० की ऊँचाई पर ध्रुवीय ज्योति किरणों तथा चादरों की तरह दिखाई पड़ती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में यह ज्योति दक्षिणी ध्रुवीय ज्योति (Aurora Australis) तथा उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी ध्रुवीय ज्योति (Aurora Borealis) कहलाती है।

→ स्टैपी (Steppe) महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में स्थित शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदानों को विभिन्न महाद्वीपों में अलग-अलग नामों से जानते हैं; जैसे-यूरेशिया में स्टैपी, उत्तरी अमेरिका में प्रेयरी, दक्षिणी अमेरिका में पंपास, अफ्रीका में वेल्ड्स तथा ऑस्ट्रेलिया में डाउन्स आदि।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

HBSE 11th Class Geography वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमंडल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?
(A) ऑक्सीजन
(B) आर्गन
(C) नाइट्रोजन
(D) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर:
(C) नाइट्रोजन

2. वह वायुमंडलीय परत जो मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है-
(A) समतापमंडल
(B) क्षोभमंडल
(C) मध्यमंडल
(D) आयनमंडल
उत्तर:
(B) क्षोभमंडल

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

3. समुद्री नमक, पराग, राख, धुएँ की कालिमा, महीन मिट्टी किससे संबंधित हैं?
(A) गैस
(B) जलवाष्प
(C) धूलकण
(D) उल्कापात
उत्तर:
(C) धूलकण

4. निम्नलिखित में से कितनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है?
(A) 90 कि०मी०
(B) 100 कि०मी०
(C) 120 कि०मी०
(D) 150 कि०मी०
उत्तर:
(C) 120 कि०मी०

5. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है तथा पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी?
(A) ऑक्सीजन
(B) नाइट्रोजन
(C) हीलियम
(D) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर:
(D) कार्बन डाइऑक्साइड

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुमंडल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के चारों तरफ कई सौ किलोमीटर की मोटाई में व्याप्त वायु के आवरण को वायुमंडल कहा जाता है। वायुमंडल पृथ्वी की गुरुत्व शक्ति के कारण ही इसके साथ टिका हुआ है। मोंकहाउस के शब्दों में, “वायुमंडल गैस की एक पतली परत है जो गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी के साथ सटी हुई है।” क्रिचफील्ड के अनुसार, “वायुमंडल गैसों का गहरा आवरण है जो पृथ्वी को पूर्णतः घेरे हुए है।”

प्रश्न 2.
मौसम एवं जलवायु के तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वे तत्त्व जिनसे किसी विशिष्ट प्रकार के मौसम या जलवायु की रचना होती है, उन्हें मौसम अथवा जलवायु के तत्त्व कहा जाता है। तापमान, वायुदाब, आर्द्रता, वर्षा, वायु की दिशा एवं गति तथा जलवायु परिवर्तन आदि जलवायु के मुख्य तत्त्व हैं।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 3.
वायुमंडल की संरचना के बारे में लिखें।
उत्तर:
वायुमंडल अलग-अलग घनत्व तथा तापमान वाली विभिन्न परतों का बना होता है। पृथ्वी की सतह के पास घनत्व अधिक होता है, जबकि ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ यह घटता जाता है। वायुमंडल को पाँच संस्तरों में बाँटा गया है-

  • क्षोभमंडल
  • समतापमंडल
  • मध्यमंडल
  • आयनमंडल
  • बाह्य वायुमंडल या बहिर्मंडल।

प्रश्न 4.
वायुमंडल के सभी संस्तरों में क्षोभमंडल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?
उत्तर:
क्षोभमंडल वायुमंडल का सबसे नीचे का संस्तर है इसकी ऊँचाई लगभग 13 कि०मी० है। इस संस्तर में धूलकण तथा जलवाष्प मौजूद होते हैं। मौसम में परिवर्तन इसी संस्तर में होता है। इस संस्तर में प्रत्येक 165 मी० की ऊँचाई पर तापमान 1°C घटता जाता है। जैविक क्रिया के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण संस्तर है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुमंडल के संघटन की व्याख्या करें।
उत्तर:
वायुमंडल का संघटन वायुमंडल के संघटन का अर्थ है कि वायुमंडल किन-किन पदार्थों से मिलकर बना हुआ है। वायुमंडल अनेक गैसों का यांत्रिक मिश्रण है। गैसों के अतिरिक्त वायुमंडल में जलवाष्प और कुछ सूक्ष्म ठोस कण भी पाए जाते हैं जिनमें धूलकण सबसे महत्त्वपूर्ण होते हैं।
1. गैसें (Gases)-आयतन के अनुसार शुद्ध शुष्क वायु में लगभग 78 प्रतिशत नाइट्रोजन तथा लगभग 21 प्रतिशत ऑक्सीजन पाई जाती है। इस प्रकार नाइट्रोजन व ऑक्सीजन वायुमंडल की दो प्रमुख गैसें हैं जो समूचे वायुमंडल के आयतन का 99 प्रतिशत भाग घेरे हुए हैं। शेष 1 प्रतिशत में अन्य अनेक गैसें आती हैं।

वायु में विभिन्न गैसों की प्रतिशत मात्रा (आयतन)
नाइट्रोजन78 %
ऑक्सीजन21 %
आर्गन0.93 %
कार्बन-डाइऑक्साइड0.03 %
अन्य0.04 %

कुछ महत्त्वपूर्ण गैसों की उपयोगिता
(1) ऑक्सीजन मनुष्य और जानवर साँस के रूप में ऑक्सीजन को ही ग्रहण करते हैं। ऑक्सीजन दहन (Combustion) के लिए आवश्यक है। इसके बिना आग नहीं जलाई जा सकती। ऑक्सीजन की उत्पत्ति प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से होती है व इसका ह्रास वनों के विनाश से होता है। शैलों के रासायनिक अपक्षय में सहयोग देकर ऑक्सीजन अनेक भू-आकारों की उत्पत्ति का कारण बनती है।

(2) नाइट्रोजन नाइट्रोजन वायु में उपस्थित ऑक्सीजन के प्रभाव को कम करती है। यदि वायुमंडल में नाइट्रोजन न होती तो वस्तुएँ इतनी तेजी से जलतीं कि उस पर नियन्त्रण करना कठिन होता। इतना ही नहीं, नाइट्रोजन के अभाव में मनुष्य व जीव-जन्तुओं के शरीर के ऊतक भी जलकर नष्ट हो जाते। मिट्टी में नाइट्रोजन की उपस्थिति प्रोटीनों का निर्माण करती है जो पौधों और वनस्पति का भोजन बनते हैं।

(3) कार्बन-डाइऑक्साइड-पौधे जीवित रहने के लिए कार्बन-डाइऑक्साइड पर निर्भर करते हैं। हरे पौधे वायुमंडल की कार्बन-डाइऑक्साइड से मिलकर स्टार्च व शर्कराओं का निर्माण करते हैं। यह गैस प्रवेशी सौर विकिरण को तो पृथ्वी तल तक आने देती है किन्तु पृथ्वी से विकिरित होने वाली लम्बी तरंगों को बाहर जाने से रोकती है। इससे पृथ्वी के निकट वायुमंडल का निचला भाग गर्म रहता है। इस प्रकार कार्बन-डाइऑक्साइड ‘काँच घर’ का प्रभाव उत्पन्न करती है।

(4) ओषोण या ओज़ोन यह गैस ऑक्सीजन का ही एक विशिष्ट रूप है जो वायुमंडल में अधिक ऊँचाइयों पर ही न्यून मात्रा में मिलती है। ओजोन गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों (Ultra-Violet Rays) के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है जिससे स्थलमण्डल एक उपयुक्त सीमा से अधिक गर्म नहीं हो पाता। ओज़ोन मुख्यतः धरातल से 10 से 50 किलोमीटर की ऊँचाई तक स्थित है।

2. जलवाष्प (Water Vapour)-वाष्प वायुमंडल की सबसे अधिक परिवर्तनशील और असमान वितरण वाली गैस है। वायुमंडल में वाष्प के मुख्य स्रोत जलमण्डल से वाष्पीकरण तथा पेड़-पौधों व मिट्टी से वाष्पोत्सर्जन है। अति ठण्डे तथा अति शुष्क क्षेत्रों में यह हवा के आयतन के एक प्रतिशत से भी कम होती है जबकि भूमध्य रेखा के पास उष्ण और आर्द्र क्षेत्रों में आयतन के हिसाब से यह 4 प्रतिशत तक हो सकती है। वायु में उपस्थित कुल जलवाष्प का लगभग आधा भाग 2,000 मीटर की ऊँचाई से नीचे व्याप्त है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर वायु में जलवाष्प की मात्रा कम होती जाती है। इसी प्रकार ऊँचाई के साथ भी जलवाष्प की मात्रा घटती जाती है।

3. ठोस कण व आकस्मिक रचक (Solid Particles and Accidental Component)-गैस तथा वाष्प के अतिरिक्त वायु में कुछ सूक्ष्म ठोस कण भी पाए जाते हैं जिनमें धूलकण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। ये कण सौर विकिरण का कुछ अंश अवशोषित कर लेते हैं साथ ही सूर्य की किरणों का परावर्तन और प्रकीर्णन भी करते हैं। इसी के परिणामस्वरूप हमें आकाश नीला दिखाई पड़ता है। किरणों के प्रकीर्णन के कारण ही सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आकाश में लाल और नारंगी रंग की छटाएँ बनती हैं। इन्हीं धूल कणों के कारण ही धुंध व धूम कोहरा बनता है।

वायुमंडल में कुछ आकस्मिक रचक और अपद्रव्य भी शामिल होते हैं। इनमें धुएँ की कालिख, ज्वालामुखी राख, उल्कापात के कण, समुद्री झाग के बुलबुलों के टूटने से मुक्त हुए ठोस लवण, जीवाणु, बीजाणु तथा पशुशालाओं के पास की वायु में अमोनिया . के अंश इत्यादि पदार्थ आते हैं।

प्रश्न 2.
वायुमंडल की संरचना का चित्र खींचे और व्याख्या करें।
उत्तर:
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना 1
पृथ्वी के चारों तरफ पाया जाने वाला वायु का सारा आवरण केवल एक परत नहीं है बल्कि इसमें हवा की अनेक संकेन्द्रीय परतें हैं जो घनत्व और तापमान की दृष्टि से एक-दूसरे से भिन्न हैं। भूमण्डल से परे हटने के क्रम में वायुमंडल की निम्नलिखित परते हैं-
1. क्षोभमण्डल (Troposphere)-भू-तल के सम्पर्क में यह वायुमंडल की सबसे निचली परत है जिसका घनत्व सर्वाधिक है। ध्रुवों पर इस परत की ऊँचाई 8 किलोमीटर और भूमध्य रेखा पर 18 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा पर क्षोभमण्डल की अधिक ऊँचाई का कारण यह है कि वहाँ पर चलने वाली तेज़ संवहन धाराएँ ऊष्मा को धरातल से अधिक ऊँचाई पर ले जाती हैं।

यही कारण है कि जाड़े की अपेक्षा गर्मी में क्षोभमण्डल की ऊँचाई बढ़ जाती है। संवहन धाराओं की अधिक सक्रियता के कारण इस परत को प्रायः संवहन क्षेत्र भी कहते हैं। इस मण्डल में प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेल्सियस तापमान गिर जाता है। ऊँचाई बढ़ने पर तापमान गिरने की इस दर को सामान्य ह्रास दर कहा जाता है। मानव व अन्य धरातलीय जीवों के लिए यह परत सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। ऋतु व मौसम सम्बन्धी लगभग सभी घटनाएँ; जैसे बादल, वर्षा, भूकम्प आदि जो मानव-जीवन को प्रभावित करती हैं, इसी परत में घटित होती हैं। क्षोभमण्डल में ही भारी गैसों, जलवाष्प, धूलकणों, अशुद्धियों व आकस्मिक रचकों की अधिकतम मात्रा पाई जाती है।

क्षोभमण्डल की ऊपरी सीमा को क्षोभ सीमा (Tropopause) कहते हैं। यह क्षोभमण्डल व समतापमण्डल को अलग करती है। लगभग 11/2 से 2 किलोमीटर मोटी इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान गिरना बन्द हो जाता है। इस भाग में हवाएँ व संवहनी धाराएँ भी चलना बन्द हो जाती हैं।

2. समतापमण्डल (Stratosphere)-क्षोभ सीमा से परे यह एक संवहन-रहित परत है जिसमें आँधी, बादलों की गरज, तड़ित-झंझा, धूलकण और जलवाष्प इत्यादि नहीं पाए जाते। इसमें केवल क्षीण क्षैतिज हवाएँ चलती हैं। यह परत 50 किलोमीटर की ऊँचाई तक विस्तृत है। इसकी मोटाई भूमध्य रेखा की अपेक्षा ध्रुवों पर अधिक होती है। कभी-कभी यह परत भूमध्य रेखा पर लुप्तप्राय हो जाती है। इस परत के निचले भागों में अर्थात् 20 किलोमीटर की ऊँचाई तक तापमान एक-जैसा रहता है।

इससे ऊपर 50 किलोमीटर की ऊँचाई तक तापमान धीरे-धीरे बढ़ता है। इसका कारण यह है कि 20 से 50 किलोमीटर की ऊँचाई में वायुमंडल में ओज़ोन गैस पाई जाती है जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी को ऊर्जा के तीव्र तथा हानिकारक तत्त्वों से बचाती है। समतापमण्डल की ऊपरी सीमा समताप सीमा (Stratopause) कहलाती है जिसमें ओज़ोन की मात्रा अधिक होती है।

3. मध्यमण्डल (Mesosphere)-समतापमण्डल के ऊपर स्थित वायुमंडल की यह तीसरी परत मध्यमण्डल कहलाती है। इसका विस्तार 80 किलोमीटर की ऊँचाई तक होता है। इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान घटने लगता है और 80 किलोमीटर की ऊँचाई पर तापमान -100° सेल्सियस तक नीचे गिर जाता है। मध्यमण्डल की ऊपरी सीमा मध्य सीमा (Mesopause) कहलाती है।

4. आयनमण्डल (Ionosphere)-मध्यमण्डल सीमा से परे स्थित यह परत 80 से 400 किलोमीटर की ऊँचाई तक विस्तृत है। इस परत में विद्यमान गैस के कण विद्युत् आवेशित होते हैं। इन विद्युत् आवेशित कणों को आयन कहा जाता है। ये आयन विस्मयकारी विद्युतीय और चुम्बकीय घटनाओं का कारण बनते हैं। इसी परत में ब्रह्माण्ड किरणों का परिलक्षण होता है। आयनमण्डल पृथ्वी की ओर से भेजी गई रेडियो-तरंगों को परावर्तित करके पुनः पृथ्वी पर भेज देता है। इसी मण्डल से उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश तथा दक्षिणी ध्रुवीय प्रकाश के दर्शन होते हैं।

5. बाह्यमण्डल (Exosphere) वायुमंडल की यह सबसे ऊपरी परत है। इसे बहिर्मंडल भी कहा जाता है। इसकी वायु अत्यन्त विरल है जो धीरे-धीरे अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है। यह सबसे ऊँचा संस्तरन है तथा इसके बारे में विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है।

वायुमंडल का संघटन तथा संरचना HBSE 11th Class Geography Notes

→ ब्रह्मांड किरणें (Cosmic Rays)-बाह्य अंतरिक्ष से पृथ्वी पर पहुंचने वाला रहस्यमयी विकिरण।

→ इंद्रधनुष (Rainbow)-बहुरंजित प्रकाश की एक चाप, जो वर्षा की बूंदों द्वारा सूर्य की किरणों के आंतरिक अपवर्तन तथा परावर्तन द्वारा निर्मित होती है।

→ प्रभामंडल (Halo)-सूर्य अथवा चंद्रमा के चारों ओर एक प्रकाश-वलय जो उस समय बनता है जब आकाश में पक्षाभ-स्तरी मेघ की एक महीन परत छायी रहती है। जब सौर प्रभामंडल बन जाता है, तब वह सूर्य की चमक के कारण दिखाई नहीं देता, परंतु गहरे रंग के शीशे से आसानी से देखा जा सकता है।

→ धूम कोहरा (Smog)-अत्यधिक धुएं से भरा कोहरा, जो सामान्य रूप से औद्यौगिक तथा घने बसे नगरीय क्षेत्रों में पाया जाता है। अंग्रेज़ी भाषा के इस शब्द की रचना दो शब्दों स्मोक व फॉग को मिलाकर की गई है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

→ प्रकीर्णन (Scattering)-लघु तरंगी सौर विकिरण का वायुमंडल के धूलकण व जलवाष्पों से टकराकर टूटना।

→ इंटरनेट (Internet) एक ऐसी विद्युतीय व्यवस्था जिसमें सूचना के महामार्ग (Information Superhighway) पर बैठे लाखों, करोड़ों लोगों द्वारा आपस में जुड़े हुए कंप्यूटरों द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है।

→ वायुमंडल (Atmosphere)-पृथ्वी के चारों तरफ कई सौ कि०मी० की मोटाई में व्याप्त वायु के आवरण को वायुमंडल कहा जाता है।

→ क्षोभमंडल (Troposphere)-भूतल के सम्पर्क में यह वायुमंडल की सबसे निचली परत है जिसका घनत्व सर्वाधिक है।

→ वायु दीप्ति (Air Glow)-आयनमंडल में वायु में एक अजीब चमक होती है जिसे वायु दीप्ति कहा जाता है।

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HBSE 11th Class History Solutions Haryana Board

Haryana Board HBSE 11th Class History Solutions

HBSE 11th Class History Solutions in Hindi Medium

  • Chapter 1 समय की शुरुआत से
  • Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन
  • Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ एक साम्राज्य
  • Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०
  • Chapter 5 यायावर साम्राज्य
  • Chapter 6 तीन वर्ग
  • Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ
  • Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव
  • Chapter 9 औद्योगिक क्रांति
  • Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन
  • Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

HBSE 11th Class History Solutions in English Medium

  • Chapter 1 From the Beginning of Time
  • Chapter 2 Writing and City Life
  • Chapter 3 An Empire Across Three Continents
  • Chapter 4 Rise and Spread of Islam: About 570-1200 C.E.
  • Chapter 5 Nomadic Empires
  • Chapter 6 Three Orders
  • Chapter 7 Changing Cultural Traditions
  • Chapter 8 Confrontation of Cultures
  • Chapter 9 The Industrial Revolution
  • Chapter 10 Displacing Indigenous Peoples
  • Chapter 11 Paths to Modernization

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HBSE 11th Class History Important Questions and Answers

Haryana Board HBSE 11th Class History Important Questions and Answers

HBSE 11th Class History Important Questions in Hindi Medium

HBSE 11th Class History Important Questions in English Medium

  • Chapter 1 From the Beginning of Time Important Questions
  • Chapter 2 Writing and City Life Important Questions
  • Chapter 3 An Empire Across Three Continents Important Questions
  • Chapter 4 Rise and Spread of Islam: About 570-1200 C.E. Important Questions
  • Chapter 5 Nomadic Empires Important Questions
  • Chapter 6 Three Orders Important Questions
  • Chapter 7 Changing Cultural Traditions Important Questions
  • Chapter 8 Confrontation of Cultures Important Questions
  • Chapter 9 The Industrial Revolution Important Questions
  • Chapter 10 Displacing Indigenous Peoples Important Questions
  • Chapter 11 Paths to Modernization Important Questions

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

1. पृथ्वी की आंतरिक परत निफे के निर्माण में किन तत्त्वों की प्रधानता है?
(A) सिलिका व एल्यूमीनियम
(B) सिलिका व मैग्नीशियम
(C) बेसाल्ट व सिलिका
(D) निकिल व फेरस
उत्तर:
(D) निकिल व फेरस

2. पृथ्वी की किस गहराई पर तापमान बढ़ने से ठोस पदार्थ तरलावस्था में आ जाते हैं?
(A) 32 कि०मी०
(B) 50 कि०मी०
(C) 96 कि०मी०
(D) 100 कि०मी०
उत्तर:
(B) 50 कि०मी०

3. पृथ्वी की किस परत में बेसाल्ट चट्टानें पाई जाती हैं?
(A) सियाल
(B) साइमा
(C) निफे
(D) किसी में भी नहीं
उत्तर:
(B) साइमा

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

4. पृथ्वी की संरचना की परत है-
(A) भू-पर्पटी
(B) मैंटल
(C) क्रोड
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. सीस्मोग्राफ यंत्र किस चीज का अंकन करता है?
(A) वायुदाब का
(B) तापमान का
(C) भूकंपीय तरंगों का
(D) पवनों की गति का
उत्तर:
(C) भूकंपीय तरंगों का

6. भूकंप मूल या भूकंप केंद्र वह होता है-
(A) जहां भूकंपीय तरंगें सबसे पहले पहुँचती हैं
(B) जहां भूकंपीय तरंगों का उद्गम होता है
(C) जहां भूकंपीय तरंगें धरातल से टकराकर लौटती हैं
(D) जहां भूकंपीय तरंगें समाप्त होती हैं
उत्तर:
(B) जहां भूकंपीय तरंगों का उद्गम होता है

7. P अथवा प्राथमिक तरंगों की कौन-सी विशेषता सही नहीं है?
(A) ये तरंगें किसी भी स्थान पर सबसे पहले पहुँचती हैं।
(B) ये ठोस, तरल तथा गैसीय तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं।
(C) शैलों का घनत्व बदलने पर भी P तरंगों का वेग नहीं बदलता।
(D) ये सबसे तेज चलती हैं।
उत्तर:
(C) शैलों का घनत्व बदलने पर भी P तरंगों का वेग नहीं बदलता।

8. मोहोरोविसिस असंतति किसे कहा जाता है?
(A) धरातल पर बिछी तलछटी चट्टान की परत को
(B) अवसादी चट्टानों के नीचे बिछी ग्रेनाइट की परत को
(C) ग्रेनाइट की परत तथा मिश्रित मंडल के बीच स्थित कम सिलिका वाली परत को
(D) पृथ्वी के केंद्रीय मंडल को
उत्तर:
(C) ग्रेनाइट की परत तथा मिश्रित मंडल के बीच स्थित कम सिलिका वाली परत को

9. ‘मोहो’ के बारे में कौन-सा कथन असत्य है?
(A) जिस कोल्पा घाटी में आए भूकंप के अध्ययन से ‘मोहो’ का पता चला, वह कुल्लू में है
(B) यह परत भू-पर्पटी तथा मैंटल के बीच सीमा रेखा है
(C) महाद्वीपों के नीचे यह 30 से 70 फुट की गहराई में मिलती है
(D) महासागरों के नीचे यह 5 से 7 कि०मी० की गहराई पर मिलती है
उत्तर:
(A) जिस कोल्पा घाटी में आए भूकंप के अध्ययन से ‘मोहो’ का पता चला, वह कुल्लू में है

10. दुर्बलतामण्डल का विस्तार कहाँ तक आँका गया है?
(A) 200 कि०मी० तक
(B) 300 कि०मी० तक
(C) 400 कि०मी० तक
(D) 600 कि०मी० तक
उत्तर:
(C) 400 कि०मी० तक

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

11. पृथ्वी के अंदर वह स्थान जहां भूकंप उत्पन्न होते हैं, क्या कहलाता है?
(A) अपकेंद्र
(B) अधिकेंद्र
(C) उद्गम केंद्र
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) उद्गम केंद्र

12. पृथ्वी के क्रोड से निम्नलिखित में से कौन-सी तरंगें निकल सकती हैं?
(A) लंबी तरंगें
(B) गौण तरंगें
(C) प्राथमिक तरंगें
(D) आड़ी तरंगें
उत्तर:
(C) प्राथमिक तरंगें

13. भूकंप की तीव्रता को मापने के बारे में कौन-सा कथन असत्य है?
(A) रिक्टर पैमाने में कोई न्यनतम व अधिकतम सीमा ही नहीं होती
(B) मरकेली पैमाना लोगों के अनुभवों के आधार पर भूकंप की तीव्रता बताता था
(C) रिक्टर पैमाने पर तीन परिमाण वाले भूकंप का कंपन दो परिमाण वाले भूकंप की अपेक्षा 10 गुना होगा
(D) रिक्टर पैमाने से भूकंप की तीव्रता का तो मापन होता है मगर मुक्त हुई ऊर्जा का नहीं
उत्तर:
(D) रिक्टर पैमाने से भूकंप की तीव्रता का तो मापन होता है मगर मुक्त हुई ऊर्जा का नहीं

14. भूकंप की तीव्रता को मापने का सबसे पहला पैमाना कौन-सा था?
(A) वुड और फ्रैंक न्यूमान का
(B) गाइसेप मरकेली का
(C) रौसी-फोरेल का
(D) चार्ल्स रिक्टर का
उत्तर:
(C) रौसी-फोरेल का

15. निम्नलिखित में से कौन-सा एक भूकंप उत्पन्न करने का कारण नहीं है?
(A) रिसे हुए समुद्री जल के उबलने से बनी
(B) मैग्मा के प्रचंड वेग से धरातल पर आने से गैसों के फैलने से
(C) सूर्य एवं चंद्रमा के ज्वारीय बल में वृद्धि होने से
(D) भू-प्लेटों के आपस में टकराने से
उत्तर:
(C) सूर्य एवं चंद्रमा के ज्वारीय बल में वृद्धि होने से

16. सन 1833 में इंडोनेशिया के क्राकाटोआ में आए भूकंप के पीछे क्या कारण था?
(A) जलीय भार से
(B) सिकुड़ती हुई चट्टानों के समायोजन से
(C) ज्वालामुखी उद्भेदन से
(D) भू-प्लेटों के टकराने से
उत्तर:
(C) ज्वालामुखी उद्भेदन से

17. उन भूकंपों को क्या कहते हैं जो दरार घाटियों, अंशों व ब्लॉक पर्वतों की रचना के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं?
(A) विवर्तनिक भूकंप
(B) ज्वालामुखी भूकंप
(C) वितलीय भूकंप
(D) समस्थितिक भूकंप
उत्तर:
(A) विवर्तनिक भूकंप

18. विनाशकारी सुनामी लहरों की उत्पत्ति का क्या कारण है?
(A) समुद्री तटों पर भूकंप आना
(B) समुद्र में ज्वालामुखी फूटना
(C) समुद्री तली में भूकंप आना
(D) महासागरीय नितल का प्रसारण
उत्तर:
(C) समुद्री तली में भूकंप आना

19. 26 जनवरी, 2001 को गुजरात के भुज में आया भूकंप रिक्टर स्केल पर कितना था?
(A) 8.4
(B) 7.9
(C) 6.8
(D) 7.0
उत्तर:
(B) 7.9

20. विश्व के अधिकतर भूकंप कहाँ आते हैं?
(A) मध्य अटलांटिक पेटी
(B) पामीर की गांठ
(C) प्रशांत महासागरीय पेटी
(D) तिब्बत का पठार
उत्तर:
(C) प्रशांत महासागरीय पेटी

21. भारत में सबसे कम भूकंप किस क्षेत्र में आते हैं?
(A) दक्कन पठार
(B) जलोढ़ मैदान
(C) हिमालय पर्वत
(D) मरुस्थल
उत्तर:
(A) दक्कन पठार

22. भू-तल पर जिस मुंह से मैग्मा, गैसें तथा विखंडित पदार्थ बाहर निकलते हैं, उसे कहा जाता है
(A) ज्वालामुखी शंकु
(B) ज्वालामुखी छिद्र
(C) नली
(D) चिमनी
उत्तर:
(B) ज्वालामुखी छिद्र

23. निम्नलिखित में से कौन-सा सक्रिय ज्वालामुखी है?
(A) स्ट्रॉमबोली
(B) विसूवियस
(C) बैरनआईलैंड
(D) पोपा
उत्तर:
(A) स्ट्रॉमबोली

24. ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों में 80 से 90% अंश किस गैस का होता है?
(A) हाइड्रोजन सल्फाइड
(B) सल्फर डाइऑक्साइड
(C) अमोनिया क्लोराइड
(D) भाप
उत्तर:
(D) भाप

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

25. ज्वालामुखी से निःसत तरल पदार्थों के बारे में कौन-सा कथन असत्य है?
(A) ताजे लावे का तापमान 600° से 1200° सेल्सियस होता है
(B) ज्वालामुखी पर्वत को ऊंचाई, अधिसिलिक लावा प्रदान करता है
(C) पैठिक लावा पतला होता है जो पठारों का
(D) अम्लिक लावा में सिलिका का अंश नगण्य निर्माण करता है होता है
उत्तर:
(D) अम्लिक लावा में सिलिका का अंश नगण्य निर्माण करता है होता है

26. पर्वत निर्माणकारी हलचलों में निम्नलिखित में से कौन सम्मिलित नहीं है?
(A) संवलन
(B) वलन
(C) अवतलन
(D) भ्रंशन
उत्तर:
(C) अवतलन

27. किलिमंजारो नामक मृत ज्वालामुखी किस देश में है?
(A) सिसली
(B) जापान
(C) तंजानिया
(D) मैक्सिको
उत्तर:
(C) तंजानिया

28. विश्व का सबसे ऊंचा सक्रिय ज्वालामुखी कौन-सा है?
(A) एटना
(B) फ़्यूजीयामा
(C) क्राकाटोआ
(D) अंटोफ़ाला
उत्तर:
(D) अंटोफ़ाला

29. अग्निवृत किसे कहा जाता है?
(A) परिप्रशांत महासागरीय पेटी
(B) हिंद महासागरीय पेटी
(C) मध्य महाद्वीपीय पेटी
(D) अटलांटिक महाद्वीपीय पेटी
उत्तर:
(A) परिप्रशांत महासागरीय पेटी

30. वह कौन-सा महाद्वीप है जिसमें एक भी ज्वालामुखी नहीं है?
(A) ऑस्ट्रेलिया
(B) अफ्रीका
(C) यूरोप
(D) उपर्युक्त में से कोई भी नहीं
उत्तर:
(A) ऑस्ट्रेलिया

31. भूकंप किस प्रकार की आपदा है?
(A) वायुमण्डलीय
(B) भौतिकी
(C) जलीय
(D) जीवमण्डलीय
उत्तर:
(B) भौतिकी

32. ज्वालामुखी उद्भेदन से निकले निम्नलिखित ठोस पदार्थों में से कौन-सा एक स्पंज की भांति हल्का है और जल में नहीं डूबता?
(A) लैपिली
(B) स्कोरिया
(C) टफ़
(D) झामक
उत्तर:
(D) झामक

33. वह किस प्रकार का ज्वालामुखी है जिसकी गैसों से प्रकाशमान मेघों को हवाई द्वीप के लोग अग्नि की रेफी की केशराशि समझते हैं?
(A) प्लिनी तुल्य
(B) पीलियन तुल्य
(C) हवाई तुल्य
(D) वलकैनो तुल्य
उत्तर:
(B) पीलियन तुल्य

34. किस ज्वालामुखी को ‘भूमध्य सागर का प्रकाश स्तंभ’ कहा जाता है?
(A) मोनालोआ
(B) क्राकाटोआ
(C) स्ट्रॉम्बोली
(D) विसुवियस
उत्तर:
(C) स्ट्रॉम्बोली

35. निम्नलिखित में से कौन-सा ज्वालामुखी मृत या विलुप्त हो चुका है?
(A) इटली का एटना
(B) ईरान का कोह-सुलतान
(C) लिपारी का स्ट्रॉम्बोली
(D) इटली का विसुवियस
उत्तर:
(B) ईरान का कोह-सुलतान

36. निम्नलिखित में से कौन-सा सक्रिय ज्वालामुखी भारत में है?
(A) बैरन द्वीप
(B) इरेबस
(C) टैरर
(D) एटना
उत्तर:
(A) बैरन द्वीप

37. क्रेटर और काल्डेरा स्थलाकृतियां निम्नलिखित में से किससे संबंधित हैं?
(A) उल्कापात
(B) ज्वालामुखी क्रिया
(C) पवन क्रिया
(D) हिमानी क्रिया
उत्तर:
(B) ज्वालामुखी क्रिया

38. लंबे समय तक शांत रहने के पश्चात् विस्फोट होने वाला ज्वालामुखी क्या कहलाता है?
(A) मृत
(B) प्रसुप्त
(C) सक्रिय
(D) निष्क्रिय
उत्तर:
(B) प्रसुप्त

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
पृथ्वी का व्यास कितना है?
उत्तर:
12,742 कि०मी०।

प्रश्न 2.
भू-गर्भ की जानकारी प्राप्त करने के दो परोक्ष स्रोत बताएँ।
उत्तर:

  1. पृथ्वी के भीतर का तापमान
  2. उल्कापिण्ड।

प्रश्न 3.
भूकंपीय तरंगों द्वारा वक्राकार मार्ग अपनाया जाना क्या इंगित करता है?
उत्तर:
वक्राकार मार्ग यह सिद्ध करता है कि पृथ्वी के भीतर घनत्व परिवर्तित हो रहा है।

प्रश्न 4.
क्रोड किन दो प्रमुख धातुओं से बना है?
उत्तर:
लोहा और निकिल।

प्रश्न 5.
भूकंप से पैदा होने वाली समुद्री तरंगों को जापान में क्या कहा जाता है?
उत्तर:
सुनामी (Tsunami)

प्रश्न 6.
सबसे मन्द गति से चलने वाली भूकंपीय तरंगें कौन-सी हैं?
उत्तर:
धरातलीय तरंगें (L-Waves)

प्रश्न 7.
सियाल व साइमा का घनत्व बताएँ।
उत्तर:
सियाल 2.75 से 2.90 व साइमा 2.90 से 3.4।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

प्रश्न 8.
‘पी’, ‘एस’ व ‘एल’ तरंगों के अन्य नाम बताइए।
उत्तर:
पी = अनुदैर्ध्य तरंगें; एस = अनुप्रस्थ तरंगें तथा एल = धरातलीय या लम्बी तरंगें।

प्रश्न 9.
धरातल पर परिवर्तन लाने वाले बलों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  1. आन्तरिक बल
  2. बाह्य बल।

प्रश्न 10.
भारत की किसी एक क्रेटर झील का उदाहरण दें।
उत्तर:
लोनार झील।

प्रश्न 11.
पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की जानकारी देने वाले दो प्रत्यक्ष साधन या स्रोत बताएँ।
उत्तर:

  1. खाने
  2. छिद्र।

प्रश्न 12.
पृथ्वी के भीतर तापमान बढ़ने की औसत दर क्या है?
उत्तर:
प्रति 32 मीटर पर 1° सेल्सियस।

प्रश्न 13.
भू-पृष्ठ किन दो प्रमुख पदार्थों से बना हुआ है?
उत्तर:

  1. सिलिका
  2. एल्यूमीनियम।

प्रश्न 14.
भूकंपीय तरंगों का अध्ययन करने वाले यन्त्र का नाम बताइए।
उत्तर:
सीस्मोग्राफ (Seismograph)।

प्रश्न 15.
पृथ्वी के भीतर ‘S’ तरंगें कितनी गहराई के बाद लुप्त हो जाती हैं?
उत्तर:
2900 किलोमीटर की गहराई के बाद।

प्रश्न 16.
वे कौन सी भूकंपीय तरंगें हैं जो केवल ठोस माध्यम से ही गुज़र सकती हैं?
उत्तर:
S-तरंगें अथवा गौण तरंगें अथवा अनुप्रस्थ तरंगें।

प्रश्न 17.
पृथ्वी का औसत अर्धव्यास कितना है?
उत्तर:
6371 किलोमीटर।

प्रश्न 18.
सियाल (Sial) किन दो शब्दों से मिलकर बना है?
उत्तर:
सियाल शब्द सिलिका (Si) तथा एल्यूमीनियम (al) के संयोग (Si + al = Sial) से बना है।

प्रश्न 19.
साइमा (Sima) किन दो शब्दों से मिलकर बना है?
उत्तर:
साइमा शब्द सिलिका (Si) तथा मैग्नीशियम (ma) के संयोग (Si+ma = Sima) से बना है।

प्रश्न 20.
निफे (Nife) किन दो शब्दों से मिलकर बना है?
उत्तर:
निफे शब्द निकिल (Ni) तथा फैरस (Fe) के संयोग (Ni + fe = Nife) से बना है।

प्रश्न 21.
पृथ्वी की केन्द्रीय परत का क्या नाम है?
उत्तर:
अभ्यान्तर या क्रोड (Core)।

प्रश्न 22.
क्रोड का घनत्व इतना अधिक क्यों है?
उत्तर:
पृथ्वी के क्रोड का अधिक घनत्व लोहे तथा निकिल की उपस्थिति के कारण है।

प्रश्न 23.
भूकंपीय तीव्रता की मापनी किस नाम से जानी जाती है?
उत्तर:
रिक्टर स्केल।

प्रश्न 24.
भूकंप की उत्पत्ति के दो कारण बताइए।
उत्तर:

  1. विवर्तनिक हलचल और
  2. ज्वालामुखी विस्फोट।

प्रश्न 25.
माउण्ट फ्यूज़ीयामा किस श्रेणी का ज्वालामुखी है?
उत्तर:
मिश्रित शंकु प्रकार का।।

प्रश्न 26.
माउण्ट विसुवियस किस श्रेणी का ज्वालामुखी है और कहाँ है?
उत्तर:
माउण्ट विसुवियस प्रसुप्त श्रेणी का ज्वालामुखी है जो इटली में है।

प्रश्न 27.
कौन-सा ज्वालामुखी ‘भूमध्य सागर का प्रकाश स्तम्भ’ कहलाता है? यह किस द्वीप पर स्थित है?
उत्तर:
स्ट्रॉम्बोली ज्वालामुखी, लिपारी द्वीप पर।

प्रश्न 28.
ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थ कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
गैस, तरल व ठोस।

प्रश्न 29.
भारत के दो ज्वालामुखियों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. बैरन द्वीप व
  2. नारकोण्डम द्वीप (बंगाल की खाड़ी में)।

प्रश्न 30.
पृथ्वी के धरातल पर अकस्मात् होने वाली दो हलचलों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. भूकंप
  2. ज्वालामुखी।

प्रश्न 31.
ज्वालामुखी विस्फोट से भू-गर्भ से निकले खनिज किस रूप में होते हैं?
उत्तर:
पिघली हुई अवस्था में।

प्रश्न 32.
मैग्मा और लावा में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
पिघला हुआ पदार्थ पृथ्वी के अन्दर मैग्मा और बाहर लावा कहलाता है।

प्रश्न 33.
विस्फोटक प्रकार के ज्वालामुखियों के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
इटली का एटना तथा जापान का फ्यूज़ीयामा।

प्रश्न 34.
दरारी उद्भेदन से बने दो प्रदेशों का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. दक्षिणी भारत का लावा पठार
  2. अमेरिका का स्नेक नदी का पठार।

प्रश्न 35.
शान्त उद्भेदन वाले ज्वालामुखियों के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
स्ट्रॉम्बोली व हवाई।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

प्रश्न 36.
ज्वालामुखी से निकले ठोस पदार्थों को किन-किन नामों से जाना जाता है?
उत्तर:
ज्वालामुखी राख, लैपिली, स्कोरिया, ब्रेसिया या संकोणाश्म ज्वालामुखी बम तथा झामक।

प्रश्न 37.
अधिक गाढ़ा और चिपचिपा लावा, जिसमें सिलिका का अंश ज्यादा होता है, कौन-सा ज्वालामुखी भू-आकार बनाता है?
उत्तर:
अम्लीय लावा शंकु अथवा गुम्बद।

प्रश्न 38.
भूकंप मूल (Seismic Focus) या भूकंप का उद्गम केन्द्र क्या होता है?
उत्तर:
भू-गर्भ में जिस स्थान पर भूकंप उत्पन्न होता है, उसे भूकंप मूल या भूकंप का उद्गम केन्द्र कहा जाता है।

प्रश्न 39.
अधिकेन्द्र (Epicentre) से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उद्गम केन्द्र के ठीक ऊपर धरातल पर स्थित उस बिन्दु को जहाँ भूकंपीय तरंगें सबसे पहले पहुँचती हैं, अधिकेन्द्र कहते हैं।

प्रश्न 40.
अति गरम, तरल, हल्का लावा जिसमें सिलिका का अंश कम होता है, कौन-सा ज्वालामुखी भू-आकार बनाता है?
उत्तर:
पैठिक लावा शंकु अथवा लावा शील्ड।

प्रश्न 41.
दुनिया का सबसे बड़ा सक्रिय ज्वालामुखी कौन-सा है?
उत्तर:
हवाई द्वीप समूह का मोनालोआ (Mouna Loa) ज्वालामुखी।

प्रश्न 42.
विलुप्त या मृत ज्वालामुखियों के कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
ईरान का कोह-सुल्तान, म्यांमार का पोपा।

प्रश्न 43.
किन अंकों के माध्यम से भूकंप की ऊर्जा को इंगित किया जाता है?
उत्तर:
1 से 9 अंकों के माध्यम से।

प्रश्न 44.
ज्वालामुखी शंकु की कौन-सी तीन किस्में होती हैं?
उत्तर:

  1. राख शंकु
  2. सिंडर शंकु
  3. मिश्रित शंकु।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘एल’ तरंगों की खोज किसने की? इसका अन्य नाम क्या है?
उत्तर:
इन तरंगों की खोज H.D. Love ने की थी, इसलिए इन्हें Love Waves भी कहा जाता है। इनका एक और नाम R-Waves (Raylight Waves) भी है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी के आन्तरिक भाग में ऊँचे ताप के क्या कारण हैं?
उत्तर:

  1. रासायनिक प्रतिक्रियाएँ
  2. आन्तरिक शक्तियाँ
  3. रेडियोधर्मी पदार्थों का स्वतः विखण्डन तथा
  4. उच्च मूल तापमान।

प्रश्न 3.
भू-पर्पटी क्या होती है?
उत्तर:
अवसादी शैलों से बने धरातलीय आवरण के नीचे पृथ्वी की सबसे बाहरी परत जो लगभग 5 से 50 किलोमीटर चौड़ी है, भू-पर्पटी कहलाती है।

प्रश्न 4.
श्यानता (Viscosity) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
श्यानता किसी तरल पदार्थ का वह गुण है जो इसके तत्त्वों के आन्तरिक घर्षण के कारण इसे धीरे बहने देता है। एस्फाल्ट, शहद, लावा तथा लाख ऐसे ही विस्कासी पदार्थ हैं।

प्रश्न 5.
स्थलमण्डल क्या होता है?
उत्तर:
भू-पर्पटी का वह भाग जो सियाल, साइमा तथा ऊपरी मैण्टल के कुछ भाग से मिलकर बना हुआ है, स्थलमण्डल कहलाता है।

प्रश्न 6.
तरंग दैर्ध्य (Wave Length) क्या होती है?
उत्तर:
किसी एकान्तर तरंग के क्रमिक समान बिन्दुओं के बीच की दूरी को तरंग-दैर्ध्य कहते हैं।

प्रश्न 7.
ज्वालामुखी उद्भेदन के समय कौन-कौन-सी गैसें पृथ्वी से बाहर निकलती हैं?
उत्तर:
हाइड्रोजन सल्फाइड, कार्बन-डाइ-सल्फाइड, कार्बन मोनो-ऑक्साइड, सल्फर डाइ-ऑक्साइड, हाइड्रोक्लोरिक एसिड व अमोनियम क्लोराइड इत्यादि।

प्रश्न 8.
प्रशान्त महासागरीय ज्वालावृत्त (Fiery Ring of the Pacific)
उत्तर:
विश्व के सक्रिय ज्वालामुखियों का 88 प्रतिशत प्रशान्त महासागर के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर पाए जाने के कारण प्रशान्त महासागरीय परिमेखला को ज्वालावृत्त कहा जाता है।

प्रश्न 9.
ज्वालामुखी से होने वाले तीन लाभ बताइए।
उत्तर:

  1. उपजाऊ मिट्टी का निर्माण
  2. बहुमूल्य खनिजों की प्राप्ति
  3. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का ज्ञान।

प्रश्न 10.
ज्वालामुखी से होने वाली तीन हानियाँ बताइए।
उत्तर:

  1. जन-धन की हानि
  2. वायुमण्डलीय प्रदूषण
  3. जीव-जगत की मृत्यु से पारिस्थितिकी (Ecology) असन्तुलन।

प्रश्न 11.
ज्वालामुखी छिद्र क्या होता है?
उत्तर:
भूतल पर जिस मुँह से मैग्मा, गैसें तथा विखण्डित पदार्थ बाहर निकलते हैं, उसे ज्वालामुखी छिद्र कहते हैं।

प्रश्न 12.
ज्वालामुखी शंकु क्या होता है?
उत्तर:
ज्वालामुखी छिद्र से निकली हुई सामग्री के जमा होने से ज्वालामुखी शंकु बनता है।

प्रश्न 13.
ज्वालामुखी चिमनी क्या होती है?
उत्तर:
ज्वालामुखी छिद्र से जुड़ी जिस प्राकृतिक नली से मैग्मा इत्यादि का निकास होता है, उसे ज्वालामुखी नली या चिमनी कहते हैं।

प्रश्न 14.
काल्डेरा क्या होता है?
उत्तर:
क्रेटर का विस्तृत रूप काल्डेरा कहलाता है।

प्रश्न 15.
ज्वालामुखी क्या होता है?
उत्तर:
भू-पर्पटी के ऐसे निकास द्वार, जिनसे गरम पिघली चट्टानें (लावा), धुआँ, गरम गैसें, गरम वाष्प (Steam) आदि निकलकर धरातल पर और वायुमण्डल में फैल जाते हैं, को ज्वालामुखी कहते हैं।

प्रश्न 16.
पटलविरूपणी बल क्या होते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के भीतर होने वाली वे धीमी, किन्तु दीर्घकालीन हलचलें जो भू-पटल में विक्षोभ, मुड़ाव, झुकाव व टूटन (Fracture) लाकर धरातल पर विषमताएँ लाती हैं, उन्हें पटलविरूपणी बल कहा जाता है।

प्रश्न 17.
भूकंप के कोई चार प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  1. हिमस्खलन
  2. सुनामी
  3. भूमि का हिलना
  4. इमारतों का टूटना व ढाँचों का ध्वस्त होना।

प्रश्न 18.
तरंग दैर्घ्य (Wave Length) क्या होती है?
उत्तर:
किसी एकान्तर तरंग के क्रमिक समान बिन्दुओं के बीच की दूरी को तरंग दैर्ध्य कहते हैं।

प्रश्न 19.
उल्कापिण्ड क्या है?
उत्तर:
उल्का का वह हिस्सा, जो अपने बड़े आकार के कारण या कम वेग के कारण पृथ्वी के वायुमण्डल में आते हुए घर्षण से पूरी तरह जल नहीं पाता और पृथ्वी तल पर आ गिरता है। अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर गिरने वाले ऐसे पिण्डों को उल्कापिण्ड कहते हैं। वायुमण्डल में पहुँचने से पहले उल्का को उल्काभ कहते हैं।

प्रश्न 20.
सुनामी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भूकंप-जनित समुद्री लहरों के लिए सारे संसार में प्रयुक्त किया जाने वाला सुनामी एक जापानी, शब्द है, जिसका अर्थ है-Great Harbour Wave. भूकंप, विशेष रूप से समुद्री तली पर पैदा होने वाले भूकंप, 15 मीटर या इससे ऊँची लहरों को जन्म देते हैं, जिसकी गति 640 से 960 किलोमीटर प्रति घण्टा होती है। सुनामी बहुत दूर तक जा सकती हैं और तटों पर विनाशलीला करती हैं। सुनामी भूकंपों के साथ-साथ विस्फोटक ज्वालामुखी से भी पैदा होती हैं; जैसे क्राकाटोआ (1883) ज्वालामुखी से सुनामी उत्पन्न हुई थी।

प्रश्न 21.
तीन प्रकार की भूकंपीय तरंगों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. प्राथमिक अनुदैर्ध्य तरंगें
  2. गौण या अनुप्रस्थ तरंगें
  3. धरातलीय या लम्बी तरंगें।

प्रश्न 22.
भूकंपीय तरंगों का मार्ग वक्राकार क्यों हो जाता है? इसका महत्त्व भी स्पष्ट करें।
उत्तर:
भूकंपीय तरंगें भूकंप केन्द्र से सीधी दिशा में न चलकर टेढ़े मार्ग को अपनाती हैं। इसका कारण यह है कि घनत्व में आने वाली भिन्नता के कारण तरंगें परावर्तित होकर वक्राकार हो जाती हैं। तरंगों के मार्ग के वक्राकार होने का महत्त्व यह है कि इससे हमें पृथ्वी के अन्दर विभिन्न घनत्व वाली अनेक परतों के होने का प्रमाण मिलता है।

प्रश्न 23.
छायामण्डल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भूकंप केन्द्र से 11,000 कि०मी० के बाद लगभग 5,000 कि०मी० का क्षेत्र ऐसा है जहाँ कोई भी तरंग नहीं पहुँचती, इस क्षेत्र को छायामण्डल कहते हैं। छायामण्डल का होना साबित करता है कि पृथ्वी का आन्तरिक भाग भारी धातुओं से बना हुआ है. इसे धात्विक क्रोड (Metallic core) भी कहते हैं।

प्रश्न 24.
रिक्टर स्केल क्या होती है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अमेरिकी भूकंप वैज्ञानिक चार्ल्स फ्रांसिस रिक्टर (Charles Francis Richter) के नाम से प्रसिद्ध इस माप के द्वारा उद्गम केन्द्र पर भूकंप द्वारा निर्मुक्त ऊर्जा को मापा जाता है। इसमें 1 से 9 अंकों के माध्यम से भूकंप की ऊर्जा को इंगित किया जाता है। उदाहरणतः 7 परिमाण वाला भूकंप, 6 परिमाण वाले भूकंप से 10 गुना, 5 परिमाण वाले भूकंप से 100 गुना तथा 4 परिमाण वाले भूकंप की अपेक्षा 1000 गुना शक्तिशाली होता है। आगे भी इसका माप इसी अनुरूप होता है।

प्रश्न 25.
भूकंप क्या है? अथवा भूकंप को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी की भीतरी हलचलों के कारण जब धरातल का कोई भाग अकस्मात् काँप उठता है तो उसे भूकंप कहते हैं। चट्टानों की तीव्र गति के कारण हुआ यह कम्पन अस्थाई होता है। जे.बी. मेसिलवाने के अनुसार, “भूकंप धरातल के ऊपरी भाग की वह कम्पन विधि है जो धरातल के ऊपर या नीचे चट्टानों के लचीले गुरुत्वाकर्षण की समस्थिति में क्षणिक अव्यवस्था द्वारा पैदा होती है।” सेलिसबरी के अनुसार, “भूकंप वे धरातलीय कम्पन हैं जो मनुष्य से असम्बन्धित क्रियाओं के परिणामस्वरूप होते हैं।”

प्रश्न 26.
ज्वालामुखी उद्गारों को प्रायः पर्वत निर्माण क्रिया से क्यों जोड़ा जाता है?
उत्तर:
ज्वालामुखी आकस्मिक बल है। पृथ्वी के भीतर पैदा होने वाला यह बल भू-तल के ऊपर तथा नीचे अचानक परिवर्तन ला देता है। इस आकस्मिक बल के कारण भू-पटल पर देखते-ही-देखते पर्वत, पठार, मैदान, झील, दरारें आदि बन जाती हैं। इसलिए ज्वालामुखी उद्गारों को पर्वत निर्माण क्रिया से जोड़ा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

प्रश्न 27.
प्रशान्त महासागर के तटीय भागों को अग्नि वलय क्यों कहा जाता है?
अथवा
प्रशान्त महासागरीय परिमेखला को ज्वालावृत क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
प्रशान्त महासागर के तटीय क्षेत्रों के चारों ओर सक्रिय ज्वालामुखी पाए जाते हैं। विश्व में लगभग 522 सक्रिय ज्वालामुखी हैं। इनमें से 403 सक्रिय ज्वालामुखी इसी क्षेत्र में पाए जाते हैं। इन ज्वालामुखियों ने प्रशान्त महासागर को एक वृत्त की तरह घेर रखा है। इन सक्रिय ज्वालामुखियों में से समय-समय पर लावा का उद्गार होता रहता है इसलिए प्रशान्त महासागर को अग्नि वलय कहते हैं।

प्रश्न 28.
भूकंप विज्ञान (Seismology) क्या होता है?
उत्तर:
वह विज्ञान जो भूकंपों की उत्पत्ति, उनकी तीव्रता का अध्ययन करता है, भूकंप विज्ञान कहलाता है। इसमें भूकंपीय तरंगों का अध्ययन भूकंपमापी यन्त्र (Seismograph) की सहायता से किया जाता है।

प्रश्न 29.
पृथ्वी का निर्माण करने वाली तीन परतों के नाम बताइए।
उत्तर:
भू-पर्पटी, मैण्टल तथा क्रोड।

प्रश्न 30.
पृथ्वी की सबसे भारी तथा सबसे हल्की परत का नाम बताइए।
उत्तर:
सबसे भारी परत-क्रोड तथा सबसे हल्की परत-भू-पर्पटी है।

प्रश्न 31.
भू-पर्पटी, मैण्टल तथा क्रोड का आयतन कितना है?
उत्तर:
भू-पर्पटी 1%, मैण्टल 83% तथा क्रोड 16%।

प्रश्न 32.
किन प्रमाणों से ज्ञात होता है कि पृथ्वी के भीतर भारी गर्मी है?
उत्तर:

  1. ज्वालामुखी
  2. गरम जल के झरने
  3. गहरी खानें।

प्रश्न 33.
विवर (Crator) क्या होता है?
उत्तर:
ज्वालामुखी शंकु के शिखर पर स्थित कीपनुमा खड्डे को विवर कहते हैं।

प्रश्न 34.
सक्रियता के आधार पर ज्वालामुखियों के प्रकार बताइए।
उत्तर:

  1. सक्रिय ज्वालामुखी
  2. प्रसुप्त ज्वालामुखी तथा
  3. विलुप्त ज्वालामुखी।

प्रश्न 35.
ज्वालामुखी के प्रमुख अंग कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
ज्वालामुखी छिद्र, ज्वालामुखी नली या चिमनी, क्रेटर, ज्वालामुखी शंकु इत्यादि।

प्रश्न 36.
ज्वालामुखी उद्भेदन कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
तीन प्रकार का-

  1. केन्द्रीय उद्भेदन
  2. शान्त उद्भेदन व
  3. दरारी उद्भेदन।

प्रश्न 37.
ज्वालामुखी विस्फोट किन कारणों से होता है?
उत्तर:

  1. भू-गर्भ का उच्च ताप
  2. भाप तथा गैसें
  3. दुर्बल भू-भाग
  4. भूकंप।

प्रश्न 38.
विश्व की प्रमुख ज्वालामुखी पेटियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. प्रशान्त महासागरीय परिमेखला
  2. मध्य महाद्वीपीय पेटी
  3. अन्ध महासागरीय पेटी।

प्रश्न 39.
गुरुमण्डल (Barysphere) क्या है?
उत्तर:
पृथ्वी के अभ्यन्तर का वह सारा भाग, जो स्थलमण्डल के नीचे है, गुरुमण्डल कहलाता है। इसमें क्रोड, मैण्टल तथा दुर्बलतामण्डल (Asthenosphere) तीनों शामिल होते हैं। केवल क्रोड या मैण्टल को गुरुमण्डल नहीं कहना चाहिए।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का अध्ययन क्यों आवश्यक है?
अथवा
भू-गर्भ की जानकारी हमारे लिए किस प्रकार महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
भू-गर्भ का अध्ययन भू-गर्भ विज्ञान करता है, परन्तु भू-गर्भ का ज्ञान कई भौगोलिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए सहायक है, जो निम्नलिखित हैं-

  1. भू-गर्भ के अध्ययन से पर्वतों के उत्थान, निर्माण तथा धंसाव का ज्ञान प्राप्त होता है।
  2. इससे भू-तल पर होने वाले परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त होती है।
  3. भू-गर्भ से हमें पथ्वी की आन्तरिक शक्तियों तथा हलचलों के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है।
  4. इसके अध्ययन से हमें विभिन्न क्रियाओं; जैसे तनाव और खिंचाव आदि का ज्ञान प्राप्त होता है।
  5. भू-गर्भ की जानकारी से विभिन्न खनिज-पदार्थों की स्थिति तथा संरचना की जानकारी प्राप्त होती है।
  6. भूकंपों और ज्वालामुखियों के कारणों की व्याख्या पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के ज्ञान से ही हो सकती है।
  7. पृथ्वी की आन्तरिक हलचलों से बने पर्वत, पठार और मैदान मानव बसाव व आर्थिक क्रियाओं का निर्धारण करते हैं।

प्रश्न 2.
पृथ्वी के आन्तरिक भाग की जानकारी परोक्ष प्रमाणों पर आधारित है, क्यों?
उत्तर:
पृथ्वी का आन्तरिक भाग दृश्य (Visible) न होने के कारण भू-गर्भ के बारे में हमारा ज्ञान सीमित है। पृथ्वी के भीतर की अधिकतर जानकारी हमें परोक्ष (Indirect) रूप से प्राप्त हुई है। भू-गर्भ के बारे में प्रत्यक्ष ज्ञान हमें खानों और सछिद्रों (Bore-holes) से मिलता है। विश्व की सबसे गहरी खान दक्षिण अफ्रीका में रॉबिन्सन गर्त है। सोने की यह खान 4 कि०मी० से कुछ कम गहरी है। तेल की खोज में खोदे गए कुओं की गहराई भी 8 कि०मी० से अधिक नहीं हो पाई है। ये दोनों गहराइयाँ पृथ्वी के केन्द्र की दूरी की तुलना में नगण्य हैं। इससे यह साफ हो जाता है कि प्रत्यक्ष रूप से तो केवल भू-पर्पटी के ऊपरी भाग की, जो धरातल के एकदम नीचे स्थित है, जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यह ऊपरी भाग तो पृथ्वी पर खरोंच जैसा है। इससे निचले भाग की जानकारी के लिए परोक्ष वैज्ञानिक प्रमाणों का सहारा लेना पड़ता है।

प्रश्न 3.
उल्कापिण्ड पृथ्वी की आन्तरिक बनावट के विषय में जानकारी देने में किस प्रकार सहायता करती हैं?
उत्तर:
उल्कापिण्ड उल्का (Meteor) का वह हिस्सा होता है जो अपने बड़े आकार के कारण या कम वेग के कारण पृथ्वी के वायुमण्डल में आते हुए घर्षण से पूरी तरह नहीं जल पाता और पृथ्वी तल पर आ गिरता है। सौरमण्डल का सदस्य होने के कारण उल्कापिण्डों और पृथ्वी की रचना में समानता पाई जाती है, इनके अध्ययन से दो बातों का अनुमान लगाया जा सकता है-प्रथम, पृथ्वी में भी उल्कापिण्डों के समान प्याज के छिलकों जैसी संकेन्द्रीय (Concentric) परतें पाई जाती हैं। द्वितीय, उल्कापिण्डों के निर्माण में लोहा तथा निकिल की प्रधानता इंगित करती है कि पृथ्वी का केन्द्रीय भाग भी ऐसी भारी धातुओं से बना हुआ होगा।

प्रश्न 4.
पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तापमान की क्या दशा होती है?
उत्तर:
पृथ्वी के भीतर जाने पर तापमान बढ़ता जाता है। इस बात की पुष्टि ज्वालामुखी विस्फोटों तथा गरम जल के झरनों से होती है। गहरी खानों और गहरे कुओं से भी यही साबित होता है कि धरती में नीचे जाने पर गर्मी बढ़ती जाती है। सामान्यतः की गहराई पर 1 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ जाता है। इस दर से 50 कि०मी० की गहराई पर तापमान 1,200 डिग्री सेल्सियस से 1800 डिग्री सेल्सियस के बीच तथा पृथ्वी के धात्विक क्रोड पर 2 लाख डिग्री सेल्सियस होना चाहिए परन्तु वास्तव में यह सत्य नहीं है। अब वैज्ञानिकों का विचार है कि गहराई के साथ तापमान की वृद्धि की दर भी कम होती जाती है जो इस प्रकार है

  • धरातल से 100 कि०मी० की गहराई तक 12 डिग्री सेल्सियस प्रति कि०मी०
  • 100 कि०मी० से 300 कि०मी० तक 2 डिग्री सेल्सियस/प्रति कि०मी० और
  • 300 कि०मी० से नीचे 1 डिग्री सेल्सियस प्रति कि०मी०।

इस गणना के अनुसार धात्विक क्रोड का तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस है, परन्तु अनेक विद्वानों का मत है कि पृथ्वी के क्रोड में 6,000 डिग्री सेल्सियस तापमान होना चाहिए।

प्रश्न 5.
सीस्मोग्राफ क्या है? सीस्मोग्राफ के प्रयोग के उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सीस्मोग्राफ वह यन्त्र है जो भूकंपीय तरंगों तथा उनकी तीव्रता को मापता है। इस यन्त्र में एक सुई लगी होती है जो ग्राफ पेपर पर भूकंपीय तरंगों को रेखांकित करती है। सीस्मोग्राफ द्वारा रेखांकित भूकंपीय तरंगों के अध्ययन द्वारा विभिन्न चट्टानों के प्रकारों तथा संरचना का ज्ञान प्राप्त होता है। सीस्मोग्राफ भूकंप के उद्गम, भूकंपीय तरंगों की गति, मार्ग और तीव्रता का ज्ञान प्रदान करता है। सीस्मोग्राफ का प्रयोग पृथ्वी की आन्तरिक जानकारी, विभिन्न खनिज-पदार्थों तथा उनकी संरचना आदि की जानकारी के लिए किया जाता है। यदि पृथ्वी का आन्तरिक भाग कठोर है तो भूकंपीय तरंगों का व्यवहार तरल भाग की तुलना में भिन्न होगा।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए.
(1) सियाल
(2) साइमा
(3) निफे
(4) मैण्टल
(5) भू-पर्पटी।
उत्तर:
(1) सियाल (Sial) यह भू-पर्पटी का ऊपरी भाग है। इस परत में Silica (SI) और Aluminium (AI) अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे इसका नाम Sial (SI+AL) पड़ गया। इसका औसत घनत्व 2.75 से 2.90 है। इस परत की मोटाई 8 कि०मी० से 100 कि०मी० तक है। इस परत में अम्लीय पदार्थ अधिक मात्रा में मिलते हैं। महाद्वीपों की रचना सियाल से हुई मानी जाती है।

(2) साइमा (Sima) सियाल के नीचे स्थित यह परत अपेक्षाकृत भारी शैलों से बनी है। इस परत में Silica (S1) तथा Magnesium (MA) की प्रधानता है। इसी कारण इसका नाम Sima (SI + MA) पड़ा। इस परत का औसत घनत्व 2.90 से 3.4 है। इस परत की मोटाई 100 कि०मी० से 2,900 कि०मी० तक है। महासागरों की तली भी इसी साइमा से बनी है।

(3) निफे (Nife)-साइमा परत के नीचे अन्तिम परत कठोर धातुओं से बनी है इसे निफे (Nife) परत कहते हैं। इसमें Fe = Ferrus (फेरस) की मात्रा अधिक है। लौह पदार्थों की अधिकता के कारण इसमें चुम्बकीय गुण है जिससे यह प्रत्येक वस्तु को पृथ्वी की ओर आकर्षित करती है। इस परत की मोटाई 2,900 से 4980 कि०मी० है।

(4) मैण्टल (Mantle)-यह परत भू-पर्पटी के नीचे स्थित है। इसकी मोटाई 2,900 कि०मी० है। भारी चट्टानों से बनी इस परत के ऊपरी भाग में तापमान 870° सेल्सियस व निचले भाग में 2,200° सेल्सियस रहता है। ऊपरी मैण्टल अपेक्षाकृत कम तप्त होने के कारण ठोस चट्टानों का बना है। यहाँ निचले मैण्टल की अपेक्षा दबाव भी कम है। अतः यहाँ पृथ्वी के भू-गर्भ से उठती हुई तप्त चट्टानें प्रायः पिघलकर मैग्मा बनाती हैं।

(5) भू-पर्पटी (Crust) यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है, जो एक पतले आवरण की तरह पृथ्वी के आन्तरिक भाग को घेरे हुए है। भू-पर्पटी स्थलमण्डल (Lithosphere) का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी मोटाई हर जगह एक जैसी नहीं है। भू-पर्पटी की औसत मोटाई 60 कि०मी० है। यद्यपि इस बारे में विद्वानों की राय अलग-अलग है लेकिन यह सत्य है कि यदि पृथ्वी को एक अण्डा मान लिया जाए, तो भू-पर्पटी की तुलना उसके छिलके से की जा सकती है। भू-पर्पटी के दो भाग हैं सियाल तथा साइमा।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए-
(1) P-तरंगें तथा S-तरंगें
(2) सियाल तथा निफे
(3) भू-पर्पटी तथा क्रोड
(4) गुटेनबर्ग असंतति तथा मोहोरोविसिक असंतति
(5) मैग्मा तथा लावा
उत्तर:
(1) P-तरंगों तथा S-तरंगों में अंतर निम्नलिखित हैं-

P-तरंगेंS-तारों
1. इन तरंगों के प्रभाव से पदार्थ आगे-पीछे हिलते हैं।1. इन तरंगों के प्रभाव से पदार्थों के कण गति की दिशा के लम्बवत् दाएँ-बाएँ या ऊपर-नीचे दोलन करते हैं।
2. P-तरंगें ध्वनि तरंगों के समान होती हैं। इनके कणों की गति तरंग की रेखा के सीध में होती है।2. S-तरंगें प्रकाश अथवा जल तरंगों के समान होती हैं जिनमें कणों की गति तरंग की दिशा के समकोण पर होती है।
3. ये तरंगें ठोस, तरल और गैसीय तीनों ही माध्यमों से गुज़र सकती हैं।3. ये तरंगें तरल भाग में प्राय: लुप्त हो जाती हैं।
4. इनका वेग 8 से 14 कि०मी० प्रति सैकिण्ड होता है।4. इनका वेग अपेक्षाकृत कम अर्थात् 4 कि०मी० प्रति सैकिण्ड होता है।

(2) सियाल तथा निफे में अंतर निम्नलिखित हैं-

सियालनिफ़े
1. सियाल भू-पर्पटी का ऊपरी भाग है।1. निफे साइमा परत के नीचे अन्तिम परत है।
2. इस परत में सिलिका और एल्यूमीनियम अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।2. यह भाग कठोर धातुओं निकिल तथा फेरस (लोहा) आदि से निर्मित है।
3. इस परत की मोटाई 8 से 100 कि०मी० तक है।3. यंह 2,900 कि०मी० से पृथ्वी के केन्द्र तक (6,371 कि०मी०) विस्तृत है।

(3) भू-पर्पटी तथा क्रोड में अंतर निम्नलिखित हैं-

भू-पर्पटीक्रोड
1. यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है जिसकी औसत मोटाई 60 कि०मी० है।1. यह पृथ्वी का केन्द्रीय भाग है जिसका विस्तार पृथ्वी की 2,900 कि०मी० की गहराई से पृथ्वी के केन्द्र $(6,371$ कि०मी०) तक है।
2. भू-पर्पटी के दो भाग हैं-सियाल और साइमा।2. क्रोड के भी दो भाग हैं-बाह्य क्रोड, आन्तरिक क्रोड।
3. भू-पर्पटी सिलिका, एल्यूमीनियम तथा मैग्नीशियम से बनी है।3. क्रोड की रचना निकिल तथा फेरस से हुई है।

(4) गुटेनबर्ग असंतति तथा मोहोरोविसिक असंतति में अंतर निम्नलिखित हैं-

गुट़नबर्ग असंततिमोहोरोविडिक असंतति
1. यह असंतति मैण्टल और क्रोड के बीच सीमा का कार्य करती है।1. यह असंतति भू-पर्पटी और मैण्टल के बीच सीमा का कार्य करती है।
2. इसका पता भूकंप वैज्ञानिक गुटेनबर्ग ने सन् 1926 में लगाया था।2. इसका पता यूगोस्लाविया के भूकंप वैज्ञानिक मोहोरोविसिक ने सन् 1909 में लगाया था।

(5) मैग्मा तथा लावा में निम्नलिखित अन्तर हैं-

मैग्मालावा
1. पृथ्वी के भीतरी भाग में पिघले हुए गर्म घोल को मैग्मा कहा जाता है।1. जब उद्भेदन के कारण मैग्मा धरती के बाहर आकर ठण्डा तथा ठोस रूप धारण कर लेता है, तो उसे लावा कहा जाता है।
2. यह पृथ्वी के भीतरी भागों में ऊपरी मैंटल में उत्पन्न होता है।2. यह पृथ्वी के धरातल पर वायुमण्डल के सम्पर्क से ठण्डा एवं ठोस होता है।
3. इसमें जल एवं अन्य गैसें भी मिली होती हैं।3. इसमें जल एवं गैसों के अंश नहीं होते।

प्रश्न 8.
भूकंप आने के कारणों को संक्षिप्त में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भूकंप निम्नलिखित कारणों से आते हैं-

  1. भू-प्लेटों का खिसकना-स्थलमण्डल भू-प्लेटों से बना है। इन प्लेटों के आपस में टकराने से भूकंप पैदा होते हैं।
  2. ज्वालामुखी क्रिया-पृथ्वी के अन्दर स्थित मैग्मा व गैसें जब प्रचण्ड वेग से भू-पटल पर आने का प्रयास करती हैं या बाहर आ जाती हैं तो चट्टानों में कम्पन आता है।
  3. भू-पटल का संकुचन-पृथ्वी के ऊपर की चट्टानें जब नीचे की ओर सिकुड़ती हुई चट्टानों से समायोजन करती हैं तो शैलों में आई अव्यवस्था के कारण भूकंप आते हैं।
  4. भू-सन्तुलन-ऊँचे उठे भू-भागों के अपरदन से उत्पन्न तलछट धीरे-धीरे समुद्री तली में निक्षेपित होने लगता है। इससे पृथ्वी का सन्तुलन भंग हो जाता है। अतः पुनः सन्तुलन प्राप्त करने की प्रक्रिया भूकंप को जन्म देती है।
  5. जलीय भार-बड़े-बड़े जलाशयों में जल एकत्रित करने से चट्टानों पर दबाव बढ़ता है। इसमें भू-सन्तुलन अस्थिर हो जाता है जिससे भूकंप आते हैं।
  6. गैसों का फैलाव पृथ्वी के भीतर की गर्मी से गैसें गरम होकर फैलती हैं जिससे चट्टानों पर दबाव बढ़ता है और उनमें कम्पन पैदा होता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

प्रश्न 9.
क्या भूकंपों से किसी प्रकार का लाभ भी होता है? संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूकंपों से कुछ लाभ भी हुआ करते हैं-

  1. भूकंपों के माध्यम से हमें पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलती है।
  2. भूकंपीय बल से उत्पन्न भ्रंश और वलन अनेक प्रकार के भू-आकारों को जन्म देते हैं; जैसे पर्वत, पठार, मैदान और घाटियाँ आदि।
    भूकंप के समय भूमि के धंसने से झरनों और झीलों जैसे नए जलीय स्रोतों की रचना होती है।
  3. समुद्र तटीय भागों में आए भूकंपों के कारण कम गहरी खाड़ियों का निर्माण होता है जहाँ सुरक्षित पोताश्रय बनाए जा सकते हैं।
  4. भूकंपों का आर्थिक महत्त्व भी कम नहीं है। वर्तमान में भूकंपीय तरंगें परतदार चट्टानों की अपनतियों (Anticlines) में गैस व तेल
  5. भण्डार (Oil Traps) ज्ञात करने का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन मानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त भूकंप से हुई चट्टानों की उथल-पुथल में अनेक प्रकार के अन्य खनिज भी प्राप्त होते हैं।
  6. भूकंप से भू-स्खलन क्रिया होती है। इससे मृदा के निर्माण में सहायता मिलती है और कृषि को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 10.
भूकंपों से बचने के प्रमुख उपाय सुझाइए।
उत्तर:
भूकंप कुदरत का एक ऐसा कहर है जिसे रोकना तो सम्भव नहीं, किन्तु संगठित प्रयासों से उसके विनाश को कम किया जा सकता है। भूकंप सैकड़ों वर्षों के विकास को क्षण भर में मिटा सकता है। अतः भूकंप के विरुद्ध एक नीतिगत रक्षा कवच बनाया जाना जरूरी है। इसके तहत न केवल भूकंपमापी केन्द्रों की संख्या बढ़ाई जाए, बल्कि भूकंप की सूचना को कारगर तरीके से आखिरी आदमी तक फैलाया जाए। संवेदनशील भूकंप क्षेत्रों में लोगों को भूकंप से पहले, उसके दौरान व बाद में उठाए जाने वाले कदमों का अभ्यास करवाते रहना चाहिए। वहाँ तरंगरोधी मकानों की योजना लागू करना जरूरी है। जापान ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। भूकंप के विरुद्ध उपायों द्वारा इच्छारहित जन-धन की अपार हानि को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 11.
किसी ज्वालामुखी घटना और भूकंप में आप क्या सम्बन्ध पाते हैं?
उत्तर:
ज्वालामुखी विस्फोटों और भूकंपों में प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। भूकंप-क्षेत्र तथा ज्वालामुखी क्षेत्र लगभग एक ही हैं। मुख्यतः भूकंप ज्वालामुखी क्षेत्रों में ही आते हैं। ज्वालामुखी उद्गार के समय भू-पटल पर अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है। विस्फोट के समय भू-भाग झटके तथा धमाके के साथ नीचे गिरता है तथा भू-पटल पर झटके लगने लगते हैं। उदाहरण के लिए, सन् 1883 में जावा तथा सुमात्रा के मध्य क्राकाटोआ द्वीप पर भयंकर भूकंप ज्वालामुखी उद्गार के कारण आया जिसका प्रभाव 8,000 कि०मी० की दूरी तक था। इसके झटके दक्षिणी अमेरिका के केपहार्न तक महसूस किए गए।

प्रश्न 12.
ज्वालामुखी की परिभाषा दीजिए तथा चित्र की सहायता से इसके विभिन्न अंगों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ज्वालामुखी एक आकस्मिक प्रक्रिया है जिसमें भू-गर्भ से मैग्मा, गैसें तथा चट्टानी चूर्ण विस्फोट के रूप में धरातल पर आता है। वारसेस्टर के अनुसार, “ज्वालामुखी वह क्रिया है जिसमें गरम पदार्थ की धरातल की तरफ या धरातल पर आने की सभी क्रियाएँ सम्मिलित की जाती हैं।” ज्वालामुखी के अंग-भू-तल पर जिस मुँह से मैग्मा, गैसें तथा विखण्डित पदार्थ बाहर निकलते हैं, उसे ज्वालामुखी छिद्र राख, गैसें, वाष्प, शिलाखंड (Volcanic Hole) कहते हैं।
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना 1
इस छिद्र के चारों ओर निकली हुई ज्वालामुखी विवर सामग्री के जमा होने से ज्वालामुखी शंकु (Volcanic Cone) का निर्माण होता है। इस जमाव के बड़ा और ऊँचा होने पर शंकु पर्वत शिलाखंड गौण ज्वालामुखी लावा प्रवाह सामग्री का रूप धारण कर लेता है जिसे ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic की परतें Mountain) कहते हैं। छिद्र से जुड़ी जिस प्राकृतिक नली से मैग्मा इत्यादि का निकास होता है, उसे ज्वालामुखी नली या चिमनी (Volcanic Chimney) कहा जाता है। चिमनी के ऊपर कटोरे मैग्मा चैंबर जैसी आकृति का एक घेरा बनता है जिसे क्रेटर या विवर (Crator) ज्वालामुखी की संरचना कहा जाता है। क्रेटर के अत्यधिक विस्तृत हो जाने पर उसे काल्डेरा (Caldera) कहते हैं। कई बार मैग्मा मुख्य नली के दोनों या एक ओर रन्ध्रों से होकर बाहर निकलता है और छोटे-छोटे शंकुओं का निर्माण करता है, इन्हें गौण शंकु (Secondary Cones) कहा जाता है।

प्रश्न 13.
भूमण्डलीय उष्मन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूमण्डलीय उष्मन (Global Warming) का अर्थ है-पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि होना। जीवाश्म ईंधनों के . चलने (कोयला, तेल, गैस) के कारण, तीव्र शहरीकरण व औद्योगीकरण के कारण, अधिक परिवहन साधनों के प्रयोग, कृषि में अधिक पैदावार हेतु रासायनिक पदार्थों के अधिक प्रयोग तथा वनों की निरंतर कटाई से वायुमंडल के संघटन में एक असंतुलन उत्पन्न हो गया है। इन क्रियाओं के कारण हमारे वातावरण में कार्बन-डाइऑक्साइड गैस की मात्रा निरंतर बढ़ रही है। इससे पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है। भूमण्डलीय उष्मन या ग्रीन हाउस प्रभाव से पृथ्वी का औसत तापमान 0.5°C बढ़ गया है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2040 तक पृथ्वी के तापमान में 2°C की वृद्धि हो जाएगी। भूमण्डलीय उष्मन/ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख दुष्परिणाम इस प्रकार हैं

  • विश्व में औसत तापमान बढ़ने से हिमाच्छादित क्षेत्रों में हिमानियाँ पिघलेंगी।
  • समुद्र का जल-स्तर ऊँचा उठेगा जिससे तटवर्ती प्रदेश व द्वीप जलमग्न हो जाएँगे। करोड़ों लोग शरणार्थी बन जाएंगे।
  • वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज़ होगी। पृथ्वी का समस्त पारिस्थितिक तन्त्र प्रभावित होगा। शीतोष्ण कटिबन्धों में वर्षा बढ़ेगी और समुद्र से दूर उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा घटेगी।
  • आज के ध्रुवीय क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक गर्म हो जाएँगे।
  • जलवायु के दो तत्त्वों तापमान और वर्षा में जब परिवर्तन होगा तो निश्चित रूप से धरातल की वनस्पति का प्रारूप बदलेगा।
  • हरित गृह प्रभाव के कारण कृषि क्षेत्रों, फसल प्रारूप तथा कृषि प्राकारिकी (Topology) में परिवर्तन होने की संभावना निश्चित है।

प्रश्न 14.
ज्वालामुखी उद्भेदन के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
ज्वालामुखी उद्भेदन तीन प्रकार के होते हैं-
1. विस्फोटक अथवा केन्द्रीय उद्भेदन ज्वालामुखी का यह उद्भेदन किसी एक केन्द्रीय मुख से प्रचण्ड विस्फोटक ध्वनि, कम्पन और गड़गड़ाहट के साथ होता है। इसमें नुकीले शैलखण्डों की बारिश के साथ लावा निकलना आरम्भ होता है। इटली का एटना तथा विसुवियस और जापान का फ्यूज़ीयामा केन्द्रीय उद्भेदन वाले ज्वालामुखियों के उदाहरण हैं।

2. शान्त उदभेदन जब मैग्मा भू-पटल की मोटी परत को नहीं तोड़ पाता तो वह अन्य निर्बल एवं दरार वाले क्षेत्रों से बाहर निकलता है। इस प्रकार के उद्भेदन में भीषणता नहीं होती, इसी कारण इसे शान्त उद्भेदन कहते हैं। स्ट्रॉम्बोली, हवाई, आईसलैण्ड व समोआ के ज्वालामुखी शान्त उद्भेदन वाले ज्वालामुखियों के उदाहरण हैं।

3. दरारी उद्भेदन इस प्रकार के उद्भेदन में बेसाल्टी लावा किसी एक मुख से न निकलकर सैंकड़ों लम्बी-लम्बी दरारों से उबल-उबलकर निकल रहा होता है। दरारी उद्भेदन में न तो भीषणता होती है और न ही गैसें और चट्टानी पदार्थ निकलते हैं। इसमें अत्यन्त तरल लावा बाहर आकर एक मोटी परत के रूप में भूमि को ढक लेता है। दक्षिणी भारत का लावा पठार और संयुक्त राज्य अमेरिका का स्नेक नदी (Snake River) का प्रदेश दरारी उद्भेदन से बने हुए हैं।

प्रश्न 15.
ज्वालामुखी विस्फोट के आधार पर इसके प्रकारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विश्व में विभिन्न प्रकार के ज्वालामुखी पाए जाते हैं, परन्तु ज्वालामुखी विस्फोट के आधार पर इन्हें निम्नलिखित तीन प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है-
1. सक्रिय ज्वालामुखी-इस प्रकार के ज्वालामुखी से जलवाष्प, गैसें, विखण्डित पदार्थ तथा लावा उद्गार के पश्चात् हमेशा प्रवाहित होता रहता है। विश्व में लगभग 522 सक्रिय ज्वालामुखी हैं। इटली का ‘एटना’ ज्वालामुखी तथा सिसली द्वीप का ‘स्ट्रॉम्बोली’ सक्रिय ज्वालामुखी के उदाहरण हैं।।

2. प्रसुप्त ज्वालामुखी-ऐसे ज्वालामुखी जिनमें एक बार उद्गार के पश्चात् वे कुछ समय या वर्षों के लिए शान्त हो जाते हैं, परन्तु इनसे पुनः विस्फोट होते हैं, प्रसुप्त ज्वालामुखी कहलाते हैं। ये ज्वालामुखी अधिक भयानक तथा हानिकारक होते हैं। इनसे . जन तथा धन की अपार हानि होती है। इसका मुख्य उदाहरण इटली का विसुवियस ज्वालामुखी है।

3. विलुप्त या शान्त ज्वालामुखी विलुप्त ज्वालामुखी वे ज्वालामुखी हैं जो पूर्ण रूप से ठण्डे हो चुके हैं। इनके द्वारा अभी तक विस्फोट नहीं हुआ। जर्मनी का ऐफिल पर्वत तथा म्यांमार (बर्मा) का पोपा ज्वालामुखी इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रश्न 16.
भूकंप क्षेत्रों के विश्व वितरण के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अधिकांश भूकंप नवीन वलितदार पर्वतों के सहारे एवं समुद्र तटों पर पाए जाते हैं। भूकंपों और ज्वालामुखियों का वितरण मिलता-जुलता है।
1. प्रशान्त महासागरीय परिमेखला-विश्व के लगभग 68 प्रतिशत भूकंप प्रशान्त महासागर के तटीय भागों में आते हैं। इस पेटी को ‘अग्नि वलय’ (Ring of Fire) कहते हैं। यहाँ ज्वालामुखी के उद्भेदन तथा स्तर अंश की संयुक्त प्रक्रिया के फलस्वरूप भीषण भूकंप आते हैं। इस पेटी में चिली, कैलिफोर्निया, अलास्का, जापान, फ़िलीपीन्स तथा मध्य महासागरीय भाग आते हैं।

2. मध्य महाद्वीपीय पेटी विश्व के लगभग 21 प्रतिशत भूकंप इसी पेटी में आते हैं। मैक्सिको से आरम्भ होकर यह पेटी अन्धमहासागर, भूमध्य सागर, आल्पस तथा काकेशस से होती हुई हिमालय क्षेत्र तथा उसके निकटवर्ती भागों में फैली हुई है।

3. अन्य क्षेत्र-शेष 11 प्रतिशत भूकंप उपर्युक्त दो पेटियों से बाहर यहाँ-वहाँ पाए जाते हैं। कुछ भूकंप पूर्वी अफ्रीका की महान् भ्रंश घाटी क्षेत्र, लाल सागर तथा मृत सागर वाली भ्रंश पेटी में आते हैं।

प्रश्न 17.
उद्गम-केन्द्र और अधिकेन्द्र से क्या अभिप्राय है?
अथवा
उद्गम केन्द्र या भूकंप केन्द्र और अधिकेन्द्र के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
भूकंप एक प्राकृतिक घटना है जो भूपटल में हलचल उत्पन्न कर देती है। जिस बिन्दु या केन्द्र पर भूकंप उत्पन्न होता है, उसके चारों ओर भूकंप की लहरें फैलती हैं। अधिकांश भूकंप भू-गर्भ में उत्पन्न होते हैं।
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना 3
जिस केन्द्र या बिन्दु से भूकंप की लहरें उत्पन्न होती हैं, उसे उद्गम-केन्द्र या भूकंप-केन्द्र कहते हैं। इसको अवकेंद्र भी कहते हैं। अधिकांश भूकंपों की गहराई 50 कि०मी० से 100 कि०मी० तक होती है तथा पातालीय भूकंप की गहराई लगभग 700 कि०मी० तक उद्गम केंद्र होती है। उद्गम-केन्द्र के ठीक ऊपर धरातल पर जो बिन्दु या स्थान स्थित होता है, उसे अधिकेन्द्र (Epicentre) कहते हैं। धरातल पर भूकंप मूल (उद्गम केंद्र) और अधिकेंद्र सर्वप्रथम इसी केन्द्र पर भूकंप के झटके महसूस किए जाते हैं तथा सबसे अधिक कम्पन इसी केन्द्र पर अनुभव किया जाता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी की आन्तरिक परतों या भागों का वर्णन कीजिए।
अथवा
पृथ्वी की संरचना का वर्णन करें।
अथवा
पृथ्वी की भूपर्पटी, मैंटल व क्रोड का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूकंपीय तरंगों का आचरण बताता है कि हमारी पृथ्वी एक गठा हुआ पिण्ड (Solid Mass) नहीं है। इसके आन्तरिक भाग की रचना प्याज जैसी है, जिसमें पहली परत के नीचे दूसरी परत व दूसरी के नीचे तीसरी परत अथवा केन्द्र में धात्विक क्रोड है। भूकंपीय तरंगों की सहायता से इन परतों की सही स्थिति, मोटाई, गहराई तथा भौतिक व रासायनिक संरचना की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। ये परतें हैं
1. भू-पर्पटी (Crust) यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत है, जो एक पतले आवरण की तरह पृथ्वी के आन्तरिक भाग को घेरे हुए है। भू-पर्पटी स्थलमण्डल (Lithosphere) का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी मोटाई हर जगह एक-जैसी नहीं है। भू-पर्पटी की औसत मोटाई 60 कि०मी० है, यद्यपि इस बारे में विद्वानों की राय अलग-अलग है लेकिन यह सत्य है कि यदि पृथ्वी को एक अण्डा मान लिया जाए, तो भू-पर्पटी की तुलना उसके छिलके से की जा सकती है।
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना 2
भू-पर्पटी के दो भाग हैं
(i) सियाल (Sial)-यह भू-पर्पटी का ऊपरी भाग है। इस परत में Silica (SI) और Aluminium (AL) अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे इसका नाम Sial (SI + AL) पड़ गया। इसका औसत घनत्व 2.75 से 2.90 है। महाद्वीपों की रचना सियाल से हुई मानी जाती है।
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना 4

(ii) साइमा (Sima)-सियाल के नीचे स्थित यह परत अपेक्षाकृत भारी शैलों से बनी है। इस परत में Silica (SI) तथा Magnesium (MA) की प्रधानता है। इसी कारण इसका नाम Sima (SI + MA) पड़ा। इस परत का औसत घनत्व 2.90-3.4 है। महासागरों की तली भी इसी साइमा से बनी है। यद्यपि सियाल और साइमा दोनों का आयतन पृथ्वी के कुल आयतन का लगभग 0.5 प्रतिशत है। फिर भी यह हमारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यही प्रकृति और मनुष्य दोनों का कर्मक्षेत्र है।

(2) मैण्टल (Mantle) यह परत भू-पर्पटी के नीचे स्थित है। इसकी मोटाई 2,900 कि०मी० है। भारी चट्टानों से बनी इस परत के ऊपरी भाग में तापमान 870° सेल्सियस व निचले भाग में 2,200° सेल्सियस रहता है। ऊपरी मैण्टल अपेक्षाकृत कम तप्त होने के कारण ठोस चट्टानों का बना है। यहाँ निचले मैण्टल की अपेक्षा दबाव भी कम है। अतः यहाँ पृथ्वी के भू-गर्भ से उठती हुई तप्त चट्टानें प्रायः पिघलकर मैग्मा बनाती हैं।

भू-पर्पटी और मैण्टल के बीच मोहो अथवा मोहोरोविसिक असंतति (Mohorovicic Discontinuity) पाई जाती है। मोहो भू-पर्पटी को मैण्टल से अलग करने वाले स्पष्ट आकार को कहते हैं। भूकंपीय तरंगों के वेग के आधार पर मैण्टल को तीन भागों में बाँटा जाता है-

  • मोहो असंतति से 200 कि०मी० की गहराई तक
  • 200 कि०मी० से 700 कि०मी० की गहराई तक तथा
  • 700 कि०मी० से क्रोड की साइमा तक।

पृथ्वी के आन्तरिक भाग में होने वाली अदृश्य घटनाओं में मैण्टल की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। इसी से संवहन धाराएँ (Convectional Currents) निकलती हैं, जो महाद्वीपीय विस्थापन, भूकंप तथा ज्वालामुखी आदि के लिए ऊर्जा प्रदान करती हैं।

(3) क्रोड (Core) यह पृथ्वी का केन्द्रीय भाग है, जिसका विस्तार 2,900 कि०मी० की गहराई से पृथ्वी के केन्द्र (6,371 कि०मी०) तक है। क्रोड का आरम्भ गुटेनबर्ग असंतति (Gutenberg Discontinuity) से होता है। यह असंतति मैण्टल और क्रोड के बीच का कार्य करती है। क्रोड के दो भाग माने जाते हैं-

  • बाह्य क्रोड
  • आन्तरिक क्रोड।

बाह्य क्रोड सम्भवतः द्रव अथवा अर्ध-द्रव अवस्था में है। यह 2,900 कि०मी० से 5,150 कि०मी० की गहराई तक विस्तृत है। इसका घनत्व 5 है। आन्तरिक क्रोड ठोसावस्था में है। यह 5,150 कि०मी० से केन्द्र तक (6,371 कि०मी०) विस्तृत है।

क्रोड का आयतन पृथ्वी के आयतन का 16 प्रतिशत है। इसकी रचना भारी खनिज पदार्थों Nickel (Ni) तथा Ferrus (Fe) से होने के कारण इसे निफे (Nife) कहा जाता है। इसका कुल द्रव्यमान (Mass) 32 प्रतिशत है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी की आन्तरिक बनावट की जानकारी किन-किन स्रोतों से प्राप्त होती है? इस सम्बन्ध में विभिन्न प्रमाणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी की आन्तरिक बनावट की जानकारी देने वाले प्रमुख स्रोत व उनके प्रमाण निम्नलिखित हैं
1. घनत्व पर आधारित प्रमाण-पृथ्वी का औसत घनत्व 5.517 (ग्राम घन सेंटीमीटर) है। इसका तात्पर्य यह है कि पृथ्वी का भार अपने समान आकार वाले जलपिण्ड (Water body) से 5.5 गुना अधिक है। पृथ्वी के ऊपरी भाग में बिछी परतदार चट्टानों का घनत्व केवल 2.7 (ग्राम घन सेंटीमीटर) है जबकि इससे नीचे स्थित आग्नेय शैलों से बनी परत का घनत्व 3.0 से 3.5 (ग्राम घन सेंटीमीटर) तक ही है। इस आधार पर पृथ्वी के भीतरी भागों का घनत्व ऊपरी भागों की अपेक्षा अधिक होना चाहिए। इससे यह प्रमाणित होता है कि पृथ्वी के अंतरतम का घनत्व सर्वाधिक है।

2. दबाव पर आधारित प्रमाण-पृथ्वी में गहराई के साथ बढ़ते घनत्व के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों के दो मत हैं। एक मत के अनसार पृथ्वी के आन्तरिक भाग का अधिक घनत्व इसकी बाहरी परतों के भार अथवा दबाव के कारण है। इससे यह प्रमाणित होता है कि पृथ्वी के क्रोड का अत्यधिक घनत्व वहाँ स्थित दबाव के कारण है। किन्तु आधुनिक प्रयोगों ने सिद्ध कर दिया है कि हर शैल में एक साइभा के बाद घनत्व बढ़ना बन्द हो जाता है, दबाव चाहे कितना ही बढ़ जाए। अतः बढ़ा हुआ दबाव चट्टानों को ठोसावस्था में नहीं रख पाता। इस आधार पर दूसरे मत के अनुसार पृथ्वी का क्रोड धातु से बना है, जिसके भार के कारण यहाँ घनत्व अधिक है।

3. तापमान पर आधारित प्रमाण-पृथ्वी के भीतर जाने पर तापमान बढ़ता जाता है। इस बात की पुष्टि ज्वालामुखी विस्फोटों तथा गरम जल के झरनों से होती है। गहरी खानों और गहरे कुओं से भी यही साबित होता है कि धरती में नीचे जाने पर गर्मी बढ़ती जाती है। इस गर्मी व तापमान में वृद्धि के कई कारण हैं; जैसे

  • रासायनिक प्रतिक्रियाएँ (Chemical Reactions)
  • आन्तरिक शक्तियाँ (Internal Forces)
  • रेडियोधर्मी पदार्थों का स्वतः विखण्डन (Self Disintegration of Radioactive Minerals)

सामान्यतः प्रत्येक 32 मीटर की गहराई पर 1 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ जाता है। अब वैज्ञानिकों का विचार है कि गहराई के साथ तापमान की वृद्धि की दर भी कम होती जाती है जो इस प्रकार है

  • धरातल से 100 कि०मी० की गहराई तक 12 डिग्री सेल्सियस प्रति कि०मी०
  • 100 कि०मी० से 300 कि०मी० तक 2 डिग्री सेल्सियस प्रति कि०मी० और
  • 300 कि०मी० से नीचे 1 डिग्री सेल्सियस प्रति कि०मी०।

इस गणना के अनुसार धात्विक क्रोड का तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस है परन्तु अनेक विद्वानों का मत है कि पृथ्वी के क्रोड में 6,000 डिग्री सेल्सियस तापमान होना चाहिए। इतने अधिक तापमान में क्रोड के पदार्थ ठोसावस्था में नहीं रह सकते। अतः वे तरल या गैसीय अवस्था में होंगे।

पृथ्वी के तरल अथवा गैसीय होने की भी सम्भावना प्रतीत नहीं होती क्योंकि इससे अनेक भू-गर्भिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। उपर्युक्त व्याख्या से स्पष्ट होता है कि घनत्व, दबाव और तापमान के आधार पर पृथ्वी की बनावट के बारे में कोई निश्चित प्रमाण एकत्रित नहीं किए जा सके हैं। वूलरिज़ तथा मॉर्गन ने पृथ्वी की आन्तरिक भौतिक अवस्था के सम्बन्ध में निम्नलिखित तीन निष्कर्ष निकाले हैं

  • अत्यधिक तापमान के बावजूद धात्विक क्रोड की तरल चट्टानें भारी दबाव के कारण ठोस पदार्थों जैसा आचरण करती हैं।
  • ये चट्टानें प्लास्टिक अवस्था में हैं, जिनमें लचीलापन है। अतः दबाव के कारण 2,900 कि०मी० की गहराई तक ठोस प्रतीत होती हैं।
  • आन्तरिक सतह का कुछ भाग दबाव के घटने या तापमान के बढ़ने से तरल हो सकता है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया का आविर्भाव हो सकता है।

4. उल्कापिण्डों पर आधारित प्रमाण-अन्तरिक्ष से भू-तल पर गिरने वाले उल्कापिण्डों से भी हमें भू-गर्भ को जानने में सहायता मिलती है। सौरमण्डल का सदस्य होने के कारण उल्कापिण्डों और पृथ्वी की रचना में समानता पाई जाती है। इनके अध्ययन से दो बातों का अनुमान लगाया जा सकता है-प्रथम, पृथ्वी में भी उल्कापिण्डों के समान प्याज की परतों जैसी संकेन्द्रीय (Concentric) परतें पाई जाती हैं। द्वितीय, उल्कापिण्डों के निर्माण में लोहा तथा निकिल की प्रधानता इंगित करती है कि पृथ्वी का केन्द्रीय भाग भी ऐसी भारी धातुओं से बना हुआ होगा।

5. भूकंपीय तरंगों पर आधारित प्रमाण-
(1) ये तरंगें भूकंप केन्द्र से सीधी दिशा में न चलकर टेढ़े मार्ग को अपनाती हैं। इसका कारण यह है कि घनत्व में आने वाली भिन्नता के कारण तरंगें परावर्तित होकर वक्राकार हो जाती हैं। इससे प्रमाणित होता है कि पृथ्वी के भीतर घनत्व में भिन्नता है।

(2) पृथ्वी के क्रोड में S-तरंगों का पूर्णतया अभाव है। इससे यह प्रमाणित होता है कि भू-गर्भ का आन्तरिक भाग तरलावस्था में है क्योंकि S-तरंगें तरल भाग में लुप्त हो जाती हैं, यह क्रोड 2,900 कि०मी० की गहराई में केन्द्र के चारों ओर विस्तृत है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी के क्रोड का लोहा तथा अन्य धातु तरलावस्था में तो हैं किन्तु उनका व्यवहार ठोस जैसा है।

(3) भूकंप केन्द्र से 11,000 कि०मी० के बाद लगभग 5,000 कि०मी० का क्षेत्र ऐसा है जहाँ कोई भी तरंग नहीं पहुँचती, इस क्षेत्र को छायामण्डल कहते हैं। छायामण्डल का होना साबित करता है कि पृथ्वी का आन्तरिक भाग भारी धातुओं से बना हुआ है, इसे धात्विक क्रोड (Metallic core) भी कहते हैं।

प्रश्न 3.
विभिन्न प्रकार की भूकंपीय तरंगें पृथ्वी की आन्तरिक परतों के स्वभाव की भिन्नता की जानकारी किस प्रकार देती हैं?
अथवा
भूकंपीय तरंगों के बारे में संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
भूकंपीय तरंगों को सीस्मोग्राफ यन्त्र द्वारा रेखांकित किया जाता है। इन तरंगों से पृथ्वी की आन्तरिक बनावट के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। भूकंप के दौरान अग्रलिखित तीन प्रकार की भूकंपीय तरंगें पैदा होती हैं
(1) P-तरंगें इन्हें प्राथमिक (Primary) अथवा अनुदैर्ध्य तरंगें भी कहते हैं। विशेषताएँ-

  • इन तरंगों के प्रभाव से पदार्थ आगे-पीछे हिलते हैं।
  • P-तरंगें ध्वनि तरंगों के समान होती हैं। इनके कणों की गति तरंग की रेखा की सीध में होती है।
  • ये तरंगें किसी भी स्थान पर सबसे पहले पहुँचती हैं।
  • ये ठोस, तरल और गैसीय तीनों ही माध्यमों से गजर सकती हैं।
  • पृथ्वी के क्रोड से केवल यही तरंगें ही निकल सकती हैं, बाकी नहीं। इनका वेग 8 से 14 कि०मी० प्रति सैकिण्ड होता है। ये सबसे तेज चलती हैं।
  • शैलों का घनत्व बदलने पर P-तरंगों का वेग भी बदल जाता है।
    HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना 5

(2) S-तरंगें इन्हें गौण (Secondary) अथवा अनुप्रस्थ तरंगें भी कहते हैं। विशेषताएँ-

  • इन तरंगों के प्रभाव से पदार्थों के कण गति की दिशा के लम्बवत् दाएँ-बाएँ या ऊपर-नीचे दोलन करते हैं।
  • S-तरंगें-प्रकाश अथवा जल तरंगों के समान होती हैं, जिनमें कणों की गति तरंग की दिशा के समकोण पर होती है, इसलिए इन्हें आड़ी तरंगें भी कहते हैं।
  • ये तरंगें तरल भाग में प्रायः लुप्त हो जाती हैं।
  • इनका वेग प्राथमिक तरंगों के वेग से कम अर्थात् 4 कि०मी० प्रति सैकिण्ड होता है।
    HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना 6

(3) L-तरंगें इन्हें धरातलीय या लम्बी तरंगें (Long waves) भी कहा जाता है। विशेषताएँ-

  • ये अत्यधिक प्रभावशाली तरंगें होती हैं।
  • इनकी गति यद्यपि कम (3.5 कि०मी० प्रति सैकिण्ड) होती है, फिर भी ये सबसे लम्बा मार्ग तय करती हैं।
  • ये तरंगें भयंकर होती हैं जो ठोस, तरल और गैस-तीनों माध्यमों से गुज़र सकती हैं।
  • ये तरंगें मुख्यतः धरातल तक ही सीमित रहती हैं।
  • भूकंपों में होने वाली जन व धन की सबसे ज्यादा बर्बादी इन्हीं तरंगों से होती है।

भूकंपीय तरंगों का स्वभाव/व्यवहार-

  • सभी भूकंपीय तरंगों की गति अधिक घनत्व वाले क्षेत्र में तेज और कम घनत्व वाले क्षेत्र में कम हो जाती है।
  • भ्रमण पथ पर घनत्व में अन्तर आते ही ये तरंगें सीधी रेखा में न चलकर टेढ़े रूप में चलने लगती हैं। इसे तरंगों का परावर्तन (Reflection) और आवर्तन (Refraction) कहते हैं।।
  • केवल प्राथमिक तरंगें (P-Waves) ही पृथ्वी के केन्द्रीय भाग से गुज़र सकती हैं।
  • गौण तरंगें (S-Waves) द्रव (Liquid) पदार्थों में से नहीं गुज़र सकतीं।
  • धरातलीय तरंगें (L-Waves) केवल धरातल के पास ही चलती हैं, यद्यपि वे ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों से गुज़र सकती हैं।

प्रश्न 4.
भूकंप की परिभाषा देते हुए इसके कारणों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
भूकंप किसे कहते हैं? यह कैसे उत्पन्न होता है?
उत्तर:
भूकंप का अर्थ व परिभाषा (Meaning and Definition of Earthquake)-भूकंप का तात्पर्य पृथ्वी का काँपना अथवा हिलना है। जब किसी भू-गर्भिक हलचलों के कारण पृथ्वी अचानक काँप उठती है तो उसे भूकंप कहते हैं। .. सेलिसबरी के अनुसार, “भूकंप वे धरातलीय कम्पन हैं जो व्यक्ति से असम्बन्धित क्रियाओं के परिणामस्वरूप होते हैं।”

भूकंप के कारण (Cause of Earthquake)-भूकंप सम्बन्धी जानकारी के बारे में हमारा ज्ञान अभी तक अपूर्ण है, परन्तु वर्तमान वैज्ञानिकों के अनुसार भूकंप आने के कारण निम्नलिखित हैं
1. ज्वालामुखी क्रिया (Volcanic Process)-ज्वालामुखी उद्गार का भूकंप से गहरा सम्बन्ध है। जब ज्वालामुखी विस्फोट में लावा तथा अन्य पदार्थ बड़ी तीव्र गति से धरातल पर आते हैं तो आस-पास की चट्टानों में कम्पन उत्पन्न हो जाता है। उदाहरण के लिए, जावा तथा सुमात्रा के मध्य क्राकोटोआ द्वीप पर भयंकर भूकंप ज्वालामुखी उद्गार के कारण आया।

2. वलन तथा भ्रंश (Folding and Faulting)-भू-पटल पर दबाव तथा तनाव के कारण चट्टानों में वलन तथा भ्रंश पड़ जाते हैं जिससे आस-पास का क्षेत्र काँप उठता है। उदाहरण के लिए, सन् 1950 में असम राज्य में वलन तथा भ्रंश के कारण ही भूकंप उत्पन्न हुआ जिसमें 1,500 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। अक्तूबर, 1991 में उत्तरकाशी में आने वाला भूकंप वलन तथा भ्रंशन का ही परिणाम था।

3. पृथ्वी का सिकुड़ना (Contraction of Earth)-पृथ्वी अपनी उत्पत्ति के समय से निरन्तर ठण्डी हो रही है। धरातलीय भागों के सिकुड़ने से धरातल की चट्टानों में अव्यवस्था के कारण कम्पन उत्पन्न हो जाता है तथा भूकंप आते हैं।

4. भू-सन्तुलन में अव्यवस्था (Imbalancing of Earth)-पृथ्वी में कहीं-न-कहीं चट्टानों में अव्यवस्था आती रहती है तथा सन्तुलन बिगड़ जाता है जिससे भूकंप की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उदाहरण के लिए 4 मार्च, 1949 को हिन्दूकुश पर्वत पर सन्तुलन अव्यवस्था के कारण भूकंप आया।

5. जलीय भार (Water Weight)-भूगोल-वेत्ताओं के अनुसार धरातल पर झीलों तथा तालाबों में पानी के भार के कारण भूकंप की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उदाहरण के लिए 11 दिसम्बर, 1967 में महाराष्ट्र में कोयना में आने वाला भूकंप कोयना बाँध के निर्माण के कारण आया।

6. अन्य कारण (Other Reasons) भूकंप के कुछ कारण ऐसे भी हैं जो मानव-निर्मित या कृत्रिम हैं और जिनका प्रभाव-क्षेत्र सीमित होता है। इनमें परमाणु परीक्षण, रेलों के चलने तथा पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले विस्फोटकों के कारण भी आस-पास का क्षेत्र काँप उठता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

प्रश्न 5.
भूकंप के विनाशकारी एवं लाभकारी प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूकंप के विनाशकारी प्रभाव भूकंप के विनाशकारी प्रभाव निम्नलिखित हैं-
1. भूकंप से अपार जन तथा धन की हानि होती है। 11 दिसम्बर, 1967 में कोयना भूकंप द्वारा सड़कें तथा बाजार वीरान हो गए, हरे-भरे खेत ऊबड़-खाबड़ हो गए तथा हजारों व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। अक्तूबर, 1991 में उत्तर काशी तथा सन् 1992 में उस्मानाबाद और लाटूर के भूकंपों में हज़ारों व्यक्तियों की मृत्यु हो गई तथा करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति नष्ट हो गई।

2. भूकंप के कारण कई बार नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती हैं तथा उनमें बाढ़ आ जाती है। सन् 1950 में असम में ब्रह्मपुत्र में भूकंप के कारण ही बाढ़ आई थी।

3. भूकंप के द्वारा भू-स्खलन (Landslides) के कारण बड़े-बड़े शिलाखण्ड टूटकर नदियों के मार्ग में अवरोधक बन जाते हैं और बाढ़ आने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

4. भूकंप के कारण धरातल पर बड़ी-बड़ी दरारें पड़ जाती हैं। सन् 1966 में कैलिफोर्निया में सैंकड़ों कि०मी० विशाल भ्रंश का निर्माण हुआ।

5. भूकंप के कारण समुद्रों में ऊँची-ऊँची लहरें उठती हैं जिससे जलयानों तथा तटीय क्षेत्रों की अपार हानि होती है।

6. भूकंप के कारण चट्टानों की रगड़ से जंगलों में आग लग जाती है जिससे प्राकृतिक वनस्पति तथा जीव-जन्तुओं की अपार हानि होती है।

भूकंप के लाभकारी प्रभाव-भूकंप के कारण धरातल पर कुछ लाभकारी प्रभाव भी पड़ते हैं, जो निम्नलिखित हैं-

  • भूकंप से भू-स्खलन की प्रक्रिया होती है जिससे कई बार धरातल पर ऊपजाऊ मिट्टी ऊपर आ जाती है।
  • भूकंप से धरातल पर जो वलन तथा भ्रंश होते हैं उनसे कई नए जल-स्रोतों का जन्म होता है।
  • भूकंप के द्वारा कई बार जलमग्न भाग समतल धरातल में परिवर्तित हो जाते हैं जो कृषि के लिए लाभदायक होते हैं।
  • भूकंप से जो दरारें तथा भ्रंश पड़ते हैं, उनसे कई खनिजों को ढूँढने में की जाने वाली खुदाई आसानी से हो जाती है।
  • भूकंपीय तरंगों से भू-गर्भ की आवश्यक जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
  • भूकंपों के कारण तटीय क्षेत्रों में गहरी खाड़ियाँ बन जाती हैं जहाँ सुरक्षित प्राकृतिक जलपोत बनते हैं।
  • भूकंप से कई स्रोतों (Springs) की उत्पत्ति होती है जिनमें स्नान करने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं।
  • भूकंप से नए पठारों, द्वीपों तथा झीलों का निर्माण होता है।

प्रश्न 6.
ज्वालामुखी का अर्थ बताते हुए इसके कारणों की व्याख्या कीजिए तथा इनके विश्व-वितरण पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
ज्वालामुखी का अर्थ (Meaning of Volcano)-ज्वालामुखी भू-तल पर घटने वाली आकस्मिक और भयानक घटना है। मोंकहाऊस के शब्दों में, “ज्वालामुखी धरातल के वे छिद्र हैं जिनसे भू-गर्भ का मैग्मा आदि पदार्थ उद्गार के रूप में बाहर निकलता है।” ट्रिवार्था के अनुसार, “वे सभी प्रक्रियाएँ जिनसे द्रवित चट्टानें पृथ्वी की गहराई से भू-पटल के बाहर निकलती हैं, ज्वालामुखी क्रिया (Volcanicity) कहलाती हैं।”

ज्वालामुखी उद्गार के कारण (Causes of Volcano Origin) ज्वालामुखी उद्गार के निम्नलिखित कारण होते हैं
1. भू-गर्भ में तापमान की वृद्धि-पृथ्वी के भू-गर्भ में अत्यधिक तापमान है। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में 32 मीटर की गहराई में जाने पर 1 सेल्सियस तापमान बढ़ जाता है तथा भू-गर्भ में रेडियो-एक्टिव खनिजों से तापमान में वृद्धि होती है। धरातल की चट्टानों का बढ़ता हुआ दबाव भी तापक्रम में वृद्धि करता है इसलिए भू-गर्भ अत्यन्त तप्त तथा गरम है। इसलिए भू-गर्भ में चट्टानें पिघल जाती हैं जिससे आयतन में वृद्धि हो जाती है और वह तरल पदार्थ पृथ्वी की कमजोर पपड़ी को तोड़कर धरातल पर विस्फोट के रूप में आता है।

2. गैसों की उत्पत्ति धरातल का पानी छिद्रों तथा प्लेटों के किनारे से रिसकर भू-गर्भ में जाता है जिससे गैसों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि भू-गर्भ के अत्यन्त गरम होने के कारण जब उसमें पानी पहुँचता है तो वह जलवाष्प में बदल जाता है जिससे आयतन तथा दबाव में वृद्धि हो जाती है और वह जलवाष्प गैसों के रूप में कमजोर धरातल को तोड़कर विस्फोट उत्पन्न करता है।

3. दुर्बल भू-भागों का होना दुर्बल भू-भागों में किसी आन्तरिक हलचल के कारण शैलें आसानी से टूट जाती हैं और दरारों की रचना होती है जिनसे ज्वालामुखी उद्गार होता है।

4. भूकंप-भूकंप भू-पटल की चट्टानों में उपस्थित सन्तुलन में विकार आने से आते हैं। इससे चट्टानों में भ्रंश या दरारें प हैं। इन दुर्बल क्षेत्रों से गैसें व वाष्प मैग्मा के लिए बाहर आने का रास्ता बनाती हैं। अतः भूकंप और ज्वालामुखी में चोली-दामन का साथ होता है।

ज्वालामुखियों का विश्व वितरण-विश्व में लगभग 522 सक्रिय ज्वालामुखी हैं। अधिकांश ज्वालामुखी तटीय या महासागरीय क्षेत्रों तथा द्वीपों पर स्थित हैं। अधिकतर ज्वालामुखी भूकंप पेटियों के आस-पास मिलते हैं। कुछ ज्वालामुखी नवीन वलित पर्वतों के निकट भी स्थित हैं। ज्वालामुखी अग्रलिखित पेटियों में पाए जाते हैं-
1. परिप्रशान्त महासागरीय पेटी-विश्व के अधिकांश सक्रिय ज्वालामुखी इसी पेटी में स्थित हैं। यह पेटी इण्डोनेशिया के जावा, सुमात्रा से आरम्भ होकर उत्तर:पूर्व में फिलीपाइन, फारमोसा, जापान तथा कमचटका से होती हुई अलास्का से दक्षिणी अमेरिका तक चली जाती है। यहाँ प्रत्येक प्रकार के ज्वालामुखी स्थित हैं। विश्व के दो-तिहाई ज्वालामुखी इसी पेटी में स्थित हैं।

2. मध्य महाद्वीपीय पेटी-यह पेटी यूरोप तथा एशिया के मध्य पश्चिम से पूर्व में फैली हुई है। पश्चिम में यह पेटी कनारी द्वीप से आरम्भ होकर भूमध्य सागर, काकेशस, आरमीनिया, ईरान, इराक, अफ़गानिस्तान, ब्लूचिस्तान, भारत में हिमालय, म्यांमार (बा) में अराकानयोमा से होती हुई दक्षिण में इण्डोनेशिया तक फैली हुई है। इटली तथा सिसली द्वीप समूह के ज्वालामुखी भी इसी पेटी में स्थित हैं।

3. अन्ध महासागरीय पेटी-इस महासागर में मध्य अटलांटिक कटक के साथ-साथ ज्वालामुखियों का विस्तार है। यहाँ सबसे अधिक ज्वालामुखी आयरलैण्ड में हैं। एजोर तथा सेण्ट हेलना द्वीपों के ज्वालामुखी भी इसी पेटी में सम्मिलित हैं।

4. अन्य क्षेत्र-उपरोक्त तीन पेटियों के अतिरिक्त महासागरों, महाद्वीपों तथा द्वीपों में भी छुटपुट ज्वालामुखी पाए जाते हैं जो अण्टार्कटिक महाद्वीप में रास सागर, हिन्द महासागर में मैडागास्कर के आस-पास कमोटो, मॉरीशस तथा रीयूनियन द्वीपों पर स्थित हैं।

प्रश्न 7.
ज्वालामुखी से आप क्या समझते हैं? ज्वालामुखी द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों का वर्णन करें।
अथवा
ज्वालामुखी से निर्मित भू-आकारों/स्थलाकृतियों का सचित्र विवरण दीजिए।
उत्तर:
ज्वालामुखी एक आकस्मिक प्रक्रिया है जिसमें भू-गर्भ से मैग्मा, गैसें तथा चट्टानी चूर्ण विस्फोट के रूप में धरातल पर आता है। वारसेस्टर के अनुसार, “ज्वालामुखी वह क्रिया है जिसमें गरम पदार्थ की धरातल की तरफ या धरातल पर आने की सभी क्रियाएँ सम्मिलित की जाती हैं।” ज्वालामुखी से निःसृत पदार्थ निम्नलिखित भू-आकृतियों की रचना करते हैं-
I. ऊँचे उठे भाग (Elevated Landscape)-
1. सिडर अथवा राख शंकु (Cinder or Ash Cone)-सिंडर शंकु का निर्माण प्रायः विस्फोटीय ज्वालामखी से होता है। इन शंकुओं की रचना असंगठित पदार्थों; जैसे धूल, राख तथा हवा में उड़े हुए लावा के छोटे टुकड़ों के ठोस होकर गिरने से होता है। विशेष बात यह है कि सिंडर शंकु के निर्माण में तरल लावे का अवतल ढाल योगदान नहीं होता। आरम्भ में राख शंकु चींटी के ढेर के समान छोटे से बनते हैं, धीरे-धीरे इनका आकार बढ़ता जाता है। ये अपनी रचना में पूर्ण शंकु होते हैं और इनकी ऊँचाई 300 मीटर से अधिक धरातल नहीं होती। इन शंकुओं के किनारे अवतल (Concave) ढाल वाले सिंडर अथवा राख शंकु होते हैं। सिंडर शंकु की ढाल 30 से 40 डिग्री होती है। मैक्सिको तथा हवाई द्वीप समूह में ऐसे अनेक शंकु पाए जाते हैं।
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2. अम्लीय लावा शंकु अथवा गुम्बद (Acid Lava Cone or Dome) ये शंकु अम्ल लावा से बनते हैं जिसका उद्भेदन गाढ़ा, चिपचिपा लावा अत्यधिक विस्फोटक ढंग से होता है। इस लावा में सिलिका का अंश अधिक होता है। अधिक गाढ़ा और चिपचिपा होने के कारण यह लावा अधिक दूर तक नहीं बह पाता। अतः यह लावा भू-गर्भ से निकलते ही ज्वालामुखी के आस-पास जम जाता है। इससे संकीर्ण धरातल और उत्तल ढाल वाले शंकुनुमा गुम्बद की रचना होती है। सिसली का अम्लीय लावा शंकु अथवा गुंबद स्ट्रॉम्बोली ज्वालामुखी गुम्बद शंकु का प्रमुख उदाहरण है।
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3. पैठिक लावा शंकु अथवा लावा शील्ड (Basic Lava Cone or Lava Shield)-पैठिक लावा में सिलिका का अंश कम होता है। यह लावा अति गरम, तरल और हल्का होता है जिस कारण यह अधिक दूरी तक फैल जाता है। शान्त उभेदन (Effusive Eruption) से निकला यह लावा विस्तृत क्षेत्रों पर कम ऊँचे और मन्द ढाल वाले शंकु का निर्माण करता है। इसका आधार शील्ड की तरह होने के कारण इसे शील्ड शंकु भी कहा जाता है। हवाई अति तरल लावा से बनी द्वीप समूह का मोनालोआ (Mauna Loa) ज्वालामुखी पैठिक लावा विवर विस्तृत शीट. शंकु का मुख्य उदाहरण है। भारत का दक्षिणी पठार और संयुक्त राज्य अमेरिका का कोलम्बिया पठार लावा शील्डों के उदाहरण हैं।
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4. मिश्रित शंकु (Composite Cone)-मिश्रित शंकुओं का निर्माण तरल लावा और राख आदि अन्य ज्वालामुखी पदार्थों के बारी-बारी परतों में जमने से होता है। अपनी सुन्दर और स्पष्ट परतों के कारण इन्हें परतदार शंकु (Strato-Cones) भी कहा जाता है। विश्व के सबसे ऊँचे और विशाल ज्वालामुखी पर्वत मिश्रित शंकुओं का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं; जैसे जापान का फ्यूज़ीयामा, संयुक्त राज्य अमेरिका के माऊण्ट शस्ता, रेनियर तथा हुड, फिलीपाइन्स का मेयॉन और सिसली का स्ट्रॉम्बोली आदि। मिश्रित शंकुओं के अत्यधिक विस्तृत हो जाने पर इनकी ढलानों पर कई छोटी उपनलियों द्वारा उपशंकु बन जाते हैं, जिन्हें परजीवी शंकु (Parasite Cones) कहा जाता है।
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5. घोंसलादार शंकु (Nested Cone) कई बार पहले से बने हुए ज्वालामुखी शंकु के अन्दर एक या कई और शंकुओं का निर्माण हो जाता है। इन्हें शंकुस्थ शंकु (Cone in Cone) भी कहते हैं। इटली का विसुवियस ज्वालामुखी घोंसलादार शंकु का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
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6. ज्वालामुखी डाट या प्लग (Volcanic Plug)-मिश्रित शंकु वाले ज्वालामुखी के शान्त होने पर उनकी नली में रुका हुआ न हो चुका भाग लावा जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है। शंकु का निर्माण करने अपरदित भाग वाले अन्य ज्वालामुखी पदार्थों की अपेक्षा यह लावा अधिक कठोर और प्रतिरोधी (Resistant) होता है। अनाच्छादन के द्वारा शंकु के अधिकांश भाग का अपरदन हो जाने के बाद भी नली की ठोस चट्टान ज्वालामुखी डाट बची रहती है, जिसे डाट कहा जाता है। इसे ज्वालामुखी ग्रीवा अपरदन से अब तक बचा हुआ भाग (Volcanic Neck) भी कहते हैं। इसकी औसत ऊँचाई 600 मीटर और व्यास 300 से 600 मीटर तक पाया जाता है। अमेरिका का डेविल टावर (Devil Tower) व ब्लैक हिल्स तथा फ्राँस का पाई द डोम (Puy de Dome) ज्वालामुखी डाट के उत्तम उदाहरण हैं।
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II. नीचे फँसे भाग (Depressed Landscape)-
1. क्रेटर झील (Crater Lake)-ज्वालामुखी छिद्र के चारों ओर बनी कीप जैसी आकृति वाला गर्त क्रेटर कहलाता है। ज्वालामुखी के शान्त होने जल – पर यह क्रेटर वर्षा के जल से भर जाता है। इस प्रकार बनी झील को क्रेटर झील कहा जाता है। भारत में महाराष्ट्र की लोनार झील, उत्तरी सुमात्रा की टोबा झील (Toba Lake) व अमेरिका में ओरेगान (Oregan) की झील क्रेटर झील क्रेटर झीलों के प्रसिद्ध उदाहरण हैं।
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2. काल्डेरा (Caldera) स्पेनिश भाषा में काल्डेरा ‘कड़ाहा’ को कहते हैं। अत्यन्त तीव्र और भयंकर विस्फोट के परिणामस्वरूप ज्वालामुखी की संरचना कमजोर पड़ जाती है जिससे शंकु का ऊपरी भाग धमाके से हवा में उड़ जाता है। उद्भेदन के समाप्त होने पर ज्वालामुखी का बहुत-सा भाग नीचे के मैग्मा कुण्ड में भर-भरा कर गिर जाता है। इस प्रकार बना गर्त काल्डेरा कहलाता है। यह क्रेटर से बहुत बड़ा होता है। काल्डेरा का मुँह कई किलोमीटर चौड़ा होता है। विश्व का सबसे बड़ा काल्डेरा जापान का आसो (Aso) है जिसकी अधिकतम चौड़ाई 27 किलोमीटर व घेरा 112 किलोमीटर है।

प्रश्न 8.
ज्वालामुखियों के लाभ तथा हानियों का वर्णन करें।
अथवा
ज्वालामुखी मानव-जीवन पर अपना प्रभाव कैसे दर्शाते हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भ-गर्भ से उत्पन्न होने वाली इस विस्मयकारी प्रक्रिया ने मानव-जीवन को बहत प्रभावित किया है। ज्वालामुखी के लाभ-ज्वालामुखी से होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) लावा चट्टानों के अपक्षय से उपजाऊ मिट्टी का निर्माण होता है जो कपास, गन्ना, तम्बाकू, गेहूँ जैसी अनेक फसलों के लिए लाभदायक होती है। दक्षिणी भारत का काली मिट्टी का प्रदेश तथा अमेरिका के वाशिंगटन प्रदेश की मिट्टियाँ लावा से बनी होने के कारण उपजाऊ हैं।

(2) ज्वालामुखी उद्भेदन से निकली उपजाऊ राख का विस्तृत क्षेत्रों पर निक्षेपण खेतों और बगीचों के लिए उपयोगी होता है।

(3) लावा और मैग्मा के जमाव से अनेक भू-आकारों की रचना होती है।

(4) ज्वालामुखी उद्भेदन से बनी आग्नेय चट्टानों में अनेक प्रकार के बहुमूल्य खनिज संचित होते हैं। लावा से बना होने के कारण भारत का दक्षिणी पठार खनिजों का भण्डार कहलाता है। इसी प्रकार स्वीडन के किसना (Kiruna) क्षेत्र में लोहे की खानें पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त ज्वालामुखी से गन्धक, बोरिक एसिड व प्यूमिस (Pumice) जैसे पदार्थ भी यहाँ से प्राप्त होते हैं।

(5) ज्वालामुखी क्षेत्रों में पाए जाने वाले धुआरों (Fumaroles) से अनेक प्रकार की गैसें और वाष्य प्राप्त किए जाते हैं। अलास्का के कटमई ज्वालामुखी क्षेत्र में विशाल मात्रा में निकली गैसों से बने दृश्य को ‘Valley of Ten Thousand Smokes’ कहा जाता है।

(6) ज्वालामुखी पर्वतों के पास गरम जल के चश्मे (Hot Springs) पाए जाते हैं। इन चश्मों के जल में गन्धक का अंश होता है जिसमें नहाने से गठिया और चर्म रोगों का इलाज होता है। आईसलैण्ड में ऐसे सैकड़ों चश्में हैं जिनका प्रयोग खाना पकाने, घर व दफ्तर गरम रखने, वस्त्र धोने आदि में होता है।

(7) ज्वालामुखी प्रदेशों से निकलने वाली ऊँचे तापमान की भाप को संचित करके उससे भूतापीय विद्युत् का निर्माण किया जाता है। न्यूज़ीलैण्ड, इटली व आईसलैण्ड जैसे कई देश इस ऊर्जा का निर्माण और उपयोग कर रहे हैं।

(8) बेसाल्ट और ग्रेनाइट जैसी आग्नेय चट्टानों का भवन निर्माण में प्रयोग बढ़ रहा है।

(9) क्रेटर और काल्डेरा झीलों से खेतों की सिंचाई की जाती है। ये झीलें कई बार नदियों का उद्गम स्रोत बनती हैं। उदाहरणतः, मिस्र की नील नदी ऐसी ही एक झील विक्टोरिया से निकली है।

(10) ज्वालामुखी झीलें, शंकु, गीज़र, गरम जल के चश्मे आदि सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों की रचना करते हैं। इन्हें देखने पर्यटक दूर-दूर से आते हैं। इन पर्यटकों को ज्वालामुखी बम व सिंडर आदि अद्भुत पदार्थ बेचे जाते हैं। इससे पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलता है। एटना, माउण्ट रेनियर, विसुवियस, फ्यूज़ीयामा, माउण्ट लैसेन पर्यटन की महत्त्वपूर्ण मंजिलें मानी जाती हैं।

(11) ज्वालामुखी क्रिया पृथ्वी के इतिहास व उसकी बनावट को समझने में मदद करती है।

(12) ज्वालामुखी प्राकृतिक सुरक्षा वाल्व (Safety Valves) का कार्य करते हैं जिनके माध्यम से खौलता हुआ मैग्मा व भारी दबाव वाली गैसें निकलती रहती हैं।

ज्वालामुखी की हानियाँ-ज्वालामुखी से होने वाली हानियाँ निम्नलिखित हैं-
(1) ज्वालामुखी विस्फोट प्रायः विनाशकारी होते हैं। 600 से 1200 डिग्री सेल्सियस तापमान वाला दहकता हुआ लावा जिस ओर बह निकलता है, सब कुछ भस्म करता चलता है।

(2) ज्वालामुखी पदार्थ न केवल सैकड़ों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को उजाड़ बना देते हैं, अपितु भारी जन-धन का भी विनाश करते हैं। आज तक लाखों लोग और जीव-जन्तु ज्वालामुखियों की भेंट चढ़ चुके हैं।

(3) विस्फोटक ज्वालामुखी अनेक गाँवों, नगरों व सभ्यताओं को मिटाकर राख कर देते हैं। उदाहरणतः इटली के विसुवियस ज्वालामुखी के उद्भेदन से पोम्पियाई (Pompeii) व हरकुलेनियस नगर देखते-ही-देखते 20 से 50 फुट मोटी लावा परत के नीचे दबकर समाप्त हो गए।

(4) ज्वालामुखी से निकली जहरीली गैसों व विखण्डित पदार्थों से पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है। सन् 1982 में अलास्का के एल चिचोन (El Chichon) ज्वालामुखी से निकली सल्फरयुक्त गैसों ने सारे विश्व की जलवायु को प्रभावित किया था।

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HBSE 11th Class Geography पृथ्वी की आंतरिक संरचना Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन भूगर्भ की जानकारी का प्रत्यक्ष साधन है?
(A) भूकंपीय तरंगें
(B) गुरुत्वाकर्षण बल
(C) ज्वालामुखी
(D) पृथ्वी का चुंबकत्व
उत्तर:
(C) ज्वालामुखी

2. दक्कन ट्रैप की शैल समूह किस प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार का परिणाम है?
(A) शील्ड
(B) मिश्र
(C) प्रवाह
(D) कुंड
उत्तर:
(C) प्रवाह

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3. निम्नलिखित में से कौन-सा स्थलमंडल को वर्णित करता है?
(A) ऊपरी व निचला मैंटल
(B) भूपटल व क्रोड
(C) भूपटल व ऊपरी मैंटल
(D) मैंटल व क्रोड
उत्तर:
(C) भूपटल व ऊपरी मैंटल

4. निम्न में भूकंप तरंगें चट्टानों में संकुचन व फैलाव लाती हैं?
(A) ‘P’ तरंगें
(B) ‘S’ तरंगें
(C) धरातलीय तरंगें
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(A) ‘P’ तरंगें

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
भूगर्भीय तरंगें क्या हैं?
उत्तर:
भूगर्भीय तरंगें उद्गम केंद्र से ऊर्जा मुक्त होने के दौरान पैदा होती हैं और पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं की तरफ आगे बढ़ती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। इन्हें ‘P’ तरंगें और ‘S’ तरंगें भी कहा जाता है।

  • ‘P’ तरंगें इन्हें प्राथमिक तरंगें भी कहा जाता है। ये तरंगें तीव्र गति से चलने वाली तरंगें होती हैं जो धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं।
  • ‘S’ तरंगें इन्हें द्वितीयक तरंगें भी कहा जाता है। ये तरंगें धरातल पर कुछ समय के अंतराल के बाद पहुँचती हैं।

प्रश्न 2.
भूगर्भ की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष साधनों के नाम बताइए।
उत्तर:
(1) भूगर्भ की जानकारी का सबसे आसानी से उपलब्ध ठोस पदार्थ धरातलीय चट्टानें हैं। ये चट्टानें हमें खनन प्रक्रिया द्वारा प्राप्त होती हैं। खनन प्रक्रिया द्वारा हम भूगर्भ में स्थित जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं।

(2) खनन के अलावा भू-वैज्ञानिक दो मुख्य परियोजनाओं पर भी काम कर रहे हैं जोकि इस प्रकार हैं-

  • गहरे समुद्र में प्रवेधन परियोजना
  • समन्वित महासागरीय प्रवेधन परियोजना

(3) ज्वालामुखी उद्गार भी प्रत्यक्ष जानकारी का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

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प्रश्न 3.
भूकंपीय तरंगें छाया क्षेत्र कैसे बनाती हैं?
उत्तर:
ऐसे क्षेत्र को भूकंपीय छाया क्षेत्र कहा जाता है जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंगें अभिलेखित नहीं होती। वैज्ञानिकों के अनुसार भूकंप अधिकेन्द्र से 105° और 145° के बीच का क्षेत्र दोनों (S या P) तरंगों का छाया क्षेत्र होगा।

105° के परे क्षेत्र में ‘S’ तरंगें नहीं पहुँचतीं। ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र एक पट्टी के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ फैला है, ‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र विस्तार में बड़ा अर्थात् पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग से भी अधिक है।
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प्रश्न 4.
भूकंपीय गतिविधियों के अतिरिक्त भूगर्भ की जानकारी संबंधी अप्रत्यक्ष साधनों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
पदार्थ के गुणधर्म के विश्लेषण से पृथ्वी के आंतरिक भाग की अप्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है। पृथ्वी की आंतरिक जानकारी के अप्रत्यक्ष साधन उल्काएँ हैं, जो कभी-कभी धरती पर पहुँच जाती हैं। इन्हीं ठोस उल्काओं से हमारी पृथ्वी का गठन हुआ है। गुरुत्वाकर्षण तथा चुबकीय स्रोतों का अध्ययन करना भी अप्रत्यक्ष साधनों के अंतर्गत आता है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
भूकंपीय तरंगों के संचरण का उन चट्टानों पर प्रभाव बताएँ जिनसे होकर ये तरंगें गुजरती हैं।
उत्तर:
भूकंपीय तरंगें दो प्रकार की होती हैं-भूगर्भिक तरंगें व धरातलीय तरंगें। भूगर्भिक तरंगों और धरातलीय शैलों के मध्य अन्योय क्रिया के कारण कई तरंगें उत्पन्न होती हैं। अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने के कारण इन तरंगों के वेग में परिवर्तन आता रहता है। इन परिवर्तनों के कारण परावर्तन (Reflection) एवं आवर्तन (Refraction) होता है, जिस कारण तरंगों की दिशा में बदलाव आता रहता है।

भिन्न-भिन्न प्रकार की भूकंपीय तरंगों के संचरित होने की प्रणाली भी भिन्न-भिन्न होती है, जैसे ही ये संचरित होती हैं, तो शैलों में कंपन पैदा होती है। ‘P’ तरंगें-‘P’ तरंगों से कंपन की दिशा तरंगों की दिशा के समानांतर ही होती है। ये तरंगें संचरण गति की दिशा में ही पदार्थ पर दबाव डालती हैं। इसके फलस्वरूप पदार्थ के घनत्व में भिन्नता आती है और शैलों में संकुचन व फैलाव की प्रक्रिया पैदा होती है।

‘S’ तरंगें-ये तरंगें ऊर्ध्वाधर तल में तरंगों की दिशा के समकोण पर कंपन पैदा करती हैं। ये तरंगें जिस पदार्थ से गुजरती हैं, उसमें उभार व गर्त बनाती हैं। ये तरंगें सबसे अधिक विनाशकारी समझी जाती हैं।

प्रश्न 2.
अंतर्वेधी आकृतियों से आप क्या समझते हैं? विभिन्न अंतर्वेधी आकृतियों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
अंतर्वेधी आकृति (Intrusive Landform)-ज्वालामुखी उद्गार से जो लावा निकलता है, उसके ठंडा होने से आग्नेय शैल बनती है और जब लावा भूपटल के भीतर ही ठंडा हो जाता है तो कई आकृतियाँ बनती हैं इन्हें ही अंतर्वेधी आकृतियाँ कहते हैं।

विभिन्न अंतर्वेधी आकृति (Various Intrusive Landform)-विभिन्न अंतर्वेधी आकृतियाँ इस प्रकार हैं-
1. बैथोलिथ (Batholiths) यदि मैग्मा का बड़ा पिंड भूपर्पटी में अधिक गहराई पर ठंडा हो जाए तो एक गुंबद के आकार में विकसित हो जाता है, इसे ही बैथोलिथ कहते हैं। ये अनाच्छादन प्रक्रियाओं के द्वारा ऊपरी पदार्थ के हटने पर धरातल पर उभर आते हैं। ये ग्रेनाइट के बने पिंड होते हैं।

2. लैकोलिथ (Lacoliths)-ये गंबदनुमा विशाल चट्टानें हैं, जिनका तल समतल व एक पाइपरूपी वाहक-नली से नीचे से जडा होता है और गहराई में पाया जाता है। इनक कृति धरातल पर पाए जाने वाले मिश्रित ज्वालामुखी के गुंबद से मिलती है।

3. लैपोलिथ, फैकोलिथ व सिल (Lapoliths, Phacoliths and sills) ऊपर उठते लावा का कुछ भाग क्षैतिज दिशा में पाए जाने वाले कमजोर धरातल में चला जाता है और यहाँ यह अलग-अलग आकृतियों में जम जाता है। यदि यह तश्तरी के आकार में जम जाए तो लैपोलिथ कहलाता है। यदि यह लहरदार आकृति में जम जाए तो फैकोलिथ कहलाता है।

अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानों का क्षैतिज तल में एक चादर के रूप में ठंडा होना सिल या शीट कहलाता है। जमाव की मोटाई के आधार पर इन्हें विभाजित किया जाता है। कम मोटाई वाली जमाव को “शीट” व घने मोटाई वाले जमाव को “सिल” कहा जाता है।

4. डाइक (Dyke)-जब लावा का प्रवाह दरारों में धरातल के लगभग समकोण होता है और यदि इसी अवस्था में ठण्डा हो जाए तो दीवार की भाँति संरचना बनती है। यही संरचना डाइक कहलाती है। ज्वालामुखी उद्गार से बने दक्कन ट्रेप इसी प्रकार की स्थलाकृति के उदाहरण हैं।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना HBSE 11th Class Geography Notes

→ भू-पर्पटी (Crust of the Earth) यह अवसादी शैलों से बने धरातलीय आवरण के नीचे पृथ्वी की सबसे बाहरी परत है, जो लगभग 5 से 50 किलोमीटर चौड़ी है। इस पतली परत की तुलना अण्डे के छिलके से की जा सकती है।

→ श्यानता (Viscosity)-किसी तरल पदार्थ का वह गुण जो इसके तत्त्वों के आन्तरिक घर्षण के कारण इसे धीरे बहने देता है। एस्फाल्ट, लाख, शहद, लावा इत्यादि ऐसे ही विस्कासी पदार्थ हैं।

→ उल्कापिण्ड (Meteorites)-उल्का का वह हिस्सा जो अपने बड़े आकार के कारण या कम वेग के कारण पृथ्वी के वायुमंडल में आते हुए घर्षण से पूरी तरह जल नहीं पाता और पृथ्वी तल पर आ गिरता है। अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर गिरने वाले ऐसे पिण्डों को उल्कापिण्ड कहते हैं। वायुमंडल में पहुंचने से पहले उल्का को उल्काभ कहते हैं।

→ स्थलमंडल (Lithosphere)-वायुमण्डल और जलमंडल से भिन्न भू-पर्पटी का वह भाग, जो सियाल, साइमा तथा ऊपरी मैंटल के कुछ भाग से मिलकर बना है, उसे स्थलमंडल कहते हैं।

→ तरंगदैर्ध्य (Wave Length)-किसी एकांतर तरंग (Alternating wave) के क्रमिक समान बिंदुओं के बीच की दूरी तरंगदैर्ध्य कहलाती है। उदाहरणतः दो समुद्री तरंगों के शीर्षों के बीच की दूरी।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 3 पृथ्वी की आंतरिक संरचना

→ गुरुमंडल (Barysphere)-पृथ्वी के अभ्यंतर का वह सारा भाग, जो स्थलमंडल के नीचे है। इसमें क्रोड, मैंटल तथा दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) तीनों शामिल होते हैं। केवल क्रोड या मैंटल को गुरुमंडल नहीं कहना चाहिए।

→ पटलविरूपणी बल (Diastrophic Forces)-पृथ्वी के भीतर होने वाली वे धीमी, किंतु दीर्घकालीन हलचलें जो भू-पटल में विक्षोभ, मुड़ाव, झुकाव व टूटन (Fracture) लाकर धरातल पर विषमताएं लाती हैं, उन्हें पटलविरूपणी बल कहा जाता है। इन बलों से महाद्वीप बनते हैं।

→ सुनामी (Tsunamis) भूकंप-जनित समुद्री लहरों के लिए सारे संसार में प्रयुक्त किया जाने वाला सुनामी एक जापानी शब्द है, जिसका अर्थ है-Great Harbour Wave भूकंप, विशेष रूप से समुद्री तली पर पैदा होने वाले भूकंप, 15 मीटर या इससे ऊंची लहरों को जन्म देते हैं, जिसकी गति 640 से 960 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। सुनामी बहुत दूर तक जा सकती हैं और तटों पर विनाशलीला करती हैं। सुनामी भूकंपों के साथ-साथ विस्फोटक ज्वालामुखी से भी पैदा होती हैं; जैसे क्राकाटोआ (1883) ज्वालामुखी से सुनामी उत्पन्न हुई थी। ऐसी तरंगों को ज्वारीय तरंगें कहना सर्वथा गलत है।

→ प्रशांत अग्नि वलन (Pacific Ring of Fire)-प्रशांत महासागर के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर दुर्बल भू-पटल के कारण वहां अधिकतर होने वाली ज्वालामुखी क्रिया और भूकंपों के आगमन के कारण इस क्षेत्र को प्रशांत अग्नि वलय कहा जाता है।

→ भूकंप मूल (Seismic Focus) पृथ्वी के अन्दर वह स्थान जहाँ भूकंप उत्पन्न होता है अर्थात् जहाँ से ऊर्जा निकलती है, भूकंप का उद्गम केन्द्र या भूकंप मूल कहलाता है।

→ अधिकेन्द्र (Epicentre)-धरातल का वह बिन्दु जो उद्गम केन्द्र के सबसे निकट होता है अर्थात् जहाँ भूकंपीय तरंगें सबसे पहले पहुँचती हैं, अधिकेन्द्र कहलाता है।

→ भूकंपलेखी (Seismograph or Seismometre)-भूकंपीय तरंगों को दर्ज (Record) करने वाला स्वचालित यंत्र भूकंपलेखी कहलाता है।

→ समभूकंप रेखाएँ (Iso-seismal lines) समान तीव्रता अथवा आघात वाली भूकंप-रेखाओं को समभूकंप रेखाएँ कहते हैं।

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