Class 10

HBSE 10th Class Social Science Important Questions Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

Haryana State Board HBSE 10th Class Social Science Important Questions Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था Important Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Social Science Important Questions Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 1.
विश्व व्यापार संगठन कागठन कब हुआ था?
उत्तर-
सन् 1995 ई. में।
HBSE 10th Class वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था Important Questions Economics प्रश्न 2.
विश्व संगठन की स्थापना किसके द्वारा की गई थी?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों द्वारा।
(अ) मोटर गाड़ियों
(ब) कपड़ा, जूते-चप्पल, खेल सामान, व्यापार नियमत के लिए किया जाता है।
(स) कॉल सेंटर
(द) टाटा मोटर्स, इंफोसिस, रैनबैक्सी
(य) व्यापार अवरोधक
Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था Important Questions HBSE 10th Class प्रश्न 3.
विश्व व्यापार संगठन का मुख्य कार्यालय कहाँ
उत्तर-
जेनेवा में।
प्रश्न 4.
1991 ई. के आद भारत में अपनाई गई नई आर्थिक नीति का क्या उद्देश्य था?
उत्तर-
सन् 1991 ई. के बाद अपनाई गई नई आर्थिक नीति का उद्देश्य अर्थव्यवस्था को तेजी से आर्थिक विकास के मार्ग पर लाना था।
प्रश्न 5.
उदारीकरण प्रक्रिया के मुख्य कितने भाग होते
उत्तर-
उदारीकरण प्रक्रिया के मुख्यतः दो भाग होते हैं
(क) निजी क्षेत्र की उन औद्योगिक क्रियाओं को चलाने की अनुमति दी जाती है। जो पहले सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र में चलाई जाती थीं।
(ख) उन नियमों और प्रतिबंधों में छूअ देना जिनसे पहले निजी क्षेत्र के विकास में रुकावट आती थी।
प्रश्न 6.
भारत सरकार द्वारा वैश्वीकरण की नीति अपनाये जाने का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर-
भारत सरकार ने वैश्वीकरण की नीति को प्रमुखतः इसलिए अपनाया ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ा जा सके। जिससे तकनीकी ज्ञान, अनुभव, पूँजी आदि का अबाध रूप से आदान-प्रदान हो सके।

HBSE 10th Class Social Science Important Questions Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

प्रश्न 7.
उदारीकरण तथा वैश्वीकरण का भारत के संचार क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
उदारीकरण एवं वैश्वीकरण की नीतियों के कारण भारत में कम कीमत पर उत्तम संचार साधन उपलब्ध होने लगा।
प्रश्न 8.
वैश्वीकरण के लिए जिम्मेदार तीन कारक बताइये।
उत्तर-
(क) प्रौद्योगिकी में तीव्र उन्नति (ख) व्यापार और निवेश नीतियों का उदारीकरण (ग) डब्ल्यू. टी. ओ. जैसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का दबाव।
प्रश्न 9.
बहुराष्ट्रीय कंपनी किसे कहते हैं?
उत्तर-
एक बहुराष्ट्रीय कंपनी वह है जो एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण अथावा स्वामित्व रखती है।
प्रश्न 10.
निवेश से आपका क्या तात्यर्प हैं?
उत्तर-
(क) परिसंपत्तियों जैसे, भूमि, भवन, मशीन और अन्य उपकरणों की खरीद में व्यय की गई मुद्रा को निवेश कहते हैं।
(ख) कोई भी निवेश इस आशा से किया जाता है कि ये परिसंपत्तियाँ लाभ अर्जित करेंगी।
प्रश्न 11.
संयुक्त उत्पादन से स्थानीय कंपनियों को क्या लाभ होता हैं?
उत्तर-
संयुक्त उत्पादन से स्थानीय कंपनियों को दुगना लाभ होता है। एहला, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ तीव्र उत्पादन के लिए अतिरिक्त निवेश जैसे, नयी मशीन के लिए धन प्रदान कर सकती हैं।
(ख) दूसरा, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उतपादन की नवीनतम प्रौद्योगिकी अपने साथ लाती हैं।
प्रश्न 12.
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ किस प्रकार दूररथ स्थानों के उत्पादन पर अपना प्रभाव जमा रही हैं।
उत्तर-
स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी द्वारा, आपूर्ति के लिए स्थानीय कंपनियों का इस्तेमाल करके और स्थानीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करके अथवा उन्हें खरीदकर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ स्थानों के उत्पादन पर अपना प्रभाव जमा रही हैं।
प्रश्न 13.
विदेशी व्यापार का क्या लाभ होता है?
उत्तर-
(क) विदेश व्यापार घरेलू बाजारों से बाहर के बाजारों में पहुँचने के लिए उतपादकों को एक अवसर प्रदान करता है।
(ख) दूसरे देशों में उत्पादित वस्तुओं के आयात से खरीददारों के समक्ष वस्तुओं के विकल्पों का विस्तार होता है।
प्रश्न 14.
अतीन में देशों को जोड़ने वाला मुख्य माध्यम क्या था?
उत्तर-
प्रायः लोग बेहतर आय, बेहतर रोजगार एवं शिक्षा की तलाश में एक देश से दूसरे देश में आवागम करते हैं।
प्रश्न 15.
विगत वर्षों में विभिन्न देशों के बीच अधि काधिक व्यापार व निवेश में योगदान करने वाला मुख्य कारक क्या है?
उत्तर-
हाल के वर्षों में अनेक देशों के बीच अधिकाधिक व्यापार और निवेश में योगदान करने वाला मुख्य कारक हैं-अनेक प्रकार के व्यापार और निवेश अवरोधकों या प्रतिबंध में में कटौती होना।
प्रश्न 16.
कोटा से आपका कया अभिप्राय हैं?
उत्तर-
सरकार व्यार अवरोधक के रूप में, आयात होने वाली वस्तुओं की संख्या सीमित कर सकती हैं, इसे कोटा कहते हैं।
प्रश्न 17.
कुछ प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का विदेश व्यापार और विदेशी निवेश के बारे में क्या विचार हैं?
उत्तर-
कुछ प्रभावशली अंतराष्ट्रीय संगठनों का मानना है कि विदेश व्यापार तथा विदेशी निवेश पर सभी अवरोधक हानिकारक हैं। अत: कोई अवरोधक नहीं होना चाहिए। विभिन्न देशों के बीच मुक्त व्यापार होना चाहिए। तथा विश्व के सभी देशों को अपनी नीतियाँ उदार बनानी चाहिए।

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प्रश्न 18.
गत वर्षों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में किन क्षेत्रों में निवेश किया हैं?
उत्तर-
भारत में विगत पंद्रह वर्षों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उपभोक्ता वस्तुओं एवं सेवाओं जैसे, सेलफोन, मोअर गाड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, ठंडे पेय पदार्थो, जंक खाद्या पदार्थो जैसी वस्तुओं एवं बैंकिंग जैसी संवाओं में निवेश किया है।
प्रश्न 19.
विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
विश्व व्यापार संगठन के कुछ प्रमुख उद्देश्य निम्नवत्-
  • विश्व व्यापार संगठन का उद्देश्य है कि सदस्य देश आयात और निर्यात दोनों पर से प्रतिबंध हटा दें।
  • विश्व व्यापार संगठन आशा करता है। कि सभी सदस्य देश द्विपक्षीय व्यापारिक समझौतों के स्थान पर बहुपक्षीय व्यापारिक समझौते करें।
  • सभी सदस्य देशों के मध्य व्यापारिक समझौतों का विकास हो।
  • विश्व के सभी देशों के मध्य व्यापार का संचालन इस प्रकार हो कि समानता तथा खुलापन बरकार रहें।
  • सदस्य देशों में व्यापारिक गतिविधियों में किसी प्रकार का भेदभाव न हों।
प्रश्न 20.
उन प्रमुख प्रभावों का उल्लेख करें जो उदारीकरण नीति के तहत निजी क्षेत्र पर पड़े हैं
उत्तर-
  • अधिक-से-अधिक उद्योगों का निजी क्षेत्र के लिए खोला जाना।
  • निजी क्षेत्र को इस्पात, बिजली, वायु परिवहन, भारी मशीनरी निर्माण तथा रक्षा उपकरणों के निर्माण की अनुमति।
  • लाइसेंस के प्रतिबंधों से मुक्ति।
  • कच्चे माल के आयात की अनुमति।
  • मूल्य निर्धारण तथा वितरण पर नियंत्रण से मुक्ति।
  • बड़ी कम्पनियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध से मुक्ति।
प्रश्न 21.
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ किन स्थानों पर उतपादन कार्य संचलित करती हैं?
उत्तर-
(क) सामान्यत: बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उसी स्थान पर उत्पादन कार्य संचालित करनी हैं जहाँ बाजार की निकटता हो, जहाँ सस्ते दर पर श्रमिक उपलब्ध हों और जहाँ उत्पादन के अन्य कारकों की उपलबधता सुनिश्चित हों। .
(ख) साी ही, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सरकारी नीतियों पर भी विचार कर सकती हैं, जो उनके हितों की देखभाल करती
(ग) इन परिस्थितियों से सुनिश्चित होकर ही बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उतपादन के लिए कार्यालयों और कारखानों की स्थापना करती हैं।
प्रश्न 22.
सरकारें व्यापार अवरोधक का प्रयोग क्यों करती
उत्तर-
(क) देश में आयात पर कर लगाना व्यापार अवरोधक का उदाहरण है। इसे अवरोधक इसलिए कहा गया है। क्योंकि यह कुछ प्रतिबंध लगाता है।
(ख) सरकारें व्यपार अवरोधक का प्रयोग विदेश व्यापार में वृद्धि या कटौती करने तथा देश में आयात होनेवाली वस्तुओं की मात्रा निश्चित करने के लिए कर सकती है।
(ग) उपभोक्ताओं के लिए उचित मूल्ख सुनिश्चित करने __ की जरूरत भी इसका एक कारण हो सकता है।
(घ) सरकारें घरेलू उत्पादकों को संरक्षण प्रदान करने के लिए भी ऐसा करती हैं।
प्रश्न 23.
प्रतिस्पर्धा से भारत के लोगों को कैसे लाभ हुआ हैं?
उत्तर-
(क) वैश्वीकरण एवं राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय उत्पादकों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण उपभोक्ताओं, विशेषकर, धनी वर्ग के उपभोक्ताओं को काफी लाभ हुआ हैं इन उपभोक्ताओं के पास पहले से अधिक विकल्प मौजूद हैं।
(ख) अब उनको उत्पादों की उत्कृष्टता, गुणवत्ता और कम कीमत का लाभ मिल रहा हैं।
(ग) लोग आज पहले की तुलना में अपेक्षाकृत उच्चतर जीवन स्तर का उपभोग कर रहे हैं।
प्रश्न 24.
वैश्वीकरण को अधिकाधिक न्यायसंगत कैसे बनाया जा सकता हैं?
उत्तर-
(क) न्यायसंगत वैश्वीकरण से सभी के लिए नये अवसरों का सृजन होगा तथा वैश्वीकरण के लाभों में सबकी हिरेदारी सुनिश्चित की जा सकेगी।
(ख) इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। सरकारी नीतियों से देश के सभीलोगों के हितों को संरक्षण मिलना चाहिये। जैसे, श्रम कानूनों का उचित कार्यान्वयन एवं श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा का दायित्व सरकार पर है।
(ग) सरकार छोटे उत्पादकों को मदद देकर उन्हें प्रतिस्पध के लिये सक्षम बना सकती है। .
(घ) आवश्यकता होने पर सरकार व्यापार तथा निवेश अवरोधकों का उपयोग कर सकती हैं तथा न्यायसंगत नियमों के लिए विश्व व्यापार संगठन से समझौते भी कर सकती है।
(ङ) पिछले कुछ वर्षों, में बड़े अभियानों और जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने विश्व व्यापार संगठन के व्यापार और निवेश से संबंधित महत्त्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित किया है। इससे सिद्ध होता है कि जनता भी न्याय संगत वैश्वीकरण के संघर्ष में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

HBSE 10th Class Social Science Important Questions Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

प्रश्न 25.
उदारीकरण और वेश्वीकरण की नीति अपनाने के फलस्वरूप भारत में आए परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
उदारीकरण तथा वैश्वीकरण की नीति अपनाने के कारण भारत में मुख्यतः निम्नलिखित परिवर्तन आये हैं-
  1. संचार के क्षेत्र में कम कीमत पर दूरभाषा के अच्छे उपकरण मिलने लगे।
  2. कम कीमत पर रंगीन टेलीविजन के अच्छे सेट उपलब्ध होने लगे।
  3. अनेक खाद्य पदार्थ उत्पादन करने वाली कम्पनियों द्वारा खाद्य तथा पेय पदार्थ उपलब्ध कराये जाने के कारण खाद्य पदार्थो के क्षेत्र ने बाजार में ऊँचा स्थान बना लिया।
  4. विश्व बाजार में भारतीय माल तथा सेवाओं की भागीदारी काफी बढ़ी है तथा अभी और बढ़ने की प्रचुर सम्भावना है।
  5. विदेशी कम्पनियों द्वारा भारत में किया जाने वाला निवेश बढ़ने लगा है। सन् 1991 में विदेशी निवेश जहाँ मात्र 174 करोड़ रुपये था वहीं यह सन् 2000 में 9, 338करोड़ रुपये हो गया।
  6. उदारीकरण तथा वैश्वीकरण के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भण्डार में प्रचुर वृद्धि हुई है। यह भण्डार सन् 1991 में मात्र 4, 622 करोड़ था सन् 2000 तक यह बढ़कर 1, 52, 924 करोड़ रुपये हो गया।
  7. उदारीकरण तथा वैश्वीकरण के अपनाये जाने से मूल्य वृद्धि की दर में कमी आयी हैं। सन् 1990-93 में यह दर 12% थी जबकि 90 के दशक के ही अन्तिम भाग में यह मात्र 8% रह गई
  8. अर्थव्यवस्था के इस नये रूप के कारण रोजगार के नये अवसरों का सृजन हो रहा है हालांकि जनसंख्या वृद्धि के तेज रफ्तार के चलते रोजगार अवसरों की प्रगति और वृद्धि नाकाफी ही नजर आ रही है।
  9. 1991-2000 के दशक में उदारीकरण तथा वैश्वीकरण की नीति के कारण वर्याप्त औद्योगि विकास हुआ परन्तु अभी इस ओर प्रगति किये जाने की आवश्यकता है।
प्रश्न 26.
वैश्वीकरण क्या हैं?
उत्तर-
वैश्वीकरण का तात्पर्य किसी देश द्वारा अपनी अर्थव्यवस्था तथा किवश्व अर्थव्यवस्था के मध्य सामंजस्य स्थापित करने से है। इस प्रक्रिया के माध्यम से कोई देश आर्थिक रूप से वैश्विक यानि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पारस्परिक रूप से निर्भर होता है। यह प्रक्रिया कई स्तरों पर सम्पन्न होती-
(क) आज जहाँ भारत वैश्वीकरण को अपना चुका है तो विदेशी उतपादक अपना माल और सेवाएँ भारत में बेच सकते हैं, साथ ही भारत भी अपना निर्मित माल और सेवाएँ दूसरे देशों को बेच सकता है।
(ख) वैश्वीकरण उन लोगों के लिए भी लाभदायक है जिनके पास भारत में उद्योग लगाने के लिए धन उपलब्ध है। वैश्वीकरण के माध्यम से उत्पादन को देश में विक्रय के लिए भीप्रस्तुत किया जा सकता है और नर्यात के लिए भी।
(ग) वैश्वीकरण ने आज भारत के उद्यमियों को यह अवसर प्रदान कर दिया है। कि वे दूसरे देशों में जाकर पूंजी निवेश कर सकते हैं।
(घ) वैश्वीकरण में मात्र पूंजी का ही नहीं वरन् देशों के मध्य श्रमिकों का भी आदन-प्रदान होता है।
(ङ) इस प्रकार वैश्वीकरण का तात्पर्य उस आर्थिक प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से विश्व के देश आपस में सहयोग बढ़ाकर अधिक-से-अधिक उन्नति कर सकत हैं।
प्रश्न 27.
“सीमाओं के पार बहुराष्ट्रीय उत्पादन प्रक्रिया के प्रसार से असीमित लाभ हो सकता हैं।” व्याख्या कीजिये।
उत्तर-
(क)बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ विश्व स्तर पर अपना तैयार उतपाद बेचने के साथ-साथ वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन भी करती हैं।
(ख) उदाहरण के लिए, औद्योगिक उपकरण बनाने वाली एक बहुराष्ट्रीय कंपनी संयुक्त राज्य अमेरिका में अपने उत्पादों का डिजाइन तैयार करती है। उसके पुर्जे का निर्माण चीन में होता है पुिर इन सामानों का मेक्सिकों और पूर्वी यूरोप के देशों में ले जाते हैं। जहाँ इन्हें जोड़ा जाता है। और तैयार उतपाद को पूरे विश्व में बेचा जाता है!
(ग) इस बीच भारत स्थित कॉल सेंटरों के माध्यम से ग्राहक सेवा का संचालन किया जाता है।
(घ) इस प्रकार स्पष्ट है कि उतपादन प्रक्रिया क्रमशः जटिल ढंग से संगठित हुई है। उत्पादन प्रक्रिया दो छोटे भागों में विभाजित है और विश्व भर में फैली हुई है।
(ङ) उपरोक्त उदाहरण में चीन से एक ससता विनिर्माण केंद्र होने का फायदा मिलता है। मेक्सिकों एवं पूर्वी यूरोप बाजार की निकटता का लाभ देते हैं। भारत में उतपादन के तकनीकी पक्षों को समझने वाले दक्ष इंजीनियर मौजूद हैं और अंग्रेजी बोलने वाले शिक्षित युवक भी हैं जो उत्तम ग्राह देखभाल सेवायें उपलब्ध कराते हैं।
(च) इस कारण बहुराष्ट्रीय कंपनी की लागत का लगभग 50-60 प्रतिशत बचत हो सकता है जिससे लाभ प्रतिशत बढ़ता
प्रश्न 28.
बहराष्ट्रीय कंपनियाँ किस प्रकार उत्पादन पर नियंत्रण करती हैं?
उत्तर-
(क) बहुराष्टीय कंपनियों के निवेश का सामान्य तरीका हैं, स्थानीय कंपनियों को खरीदना, उसके बाद उतपादन का प्रसार करना।
(ख) उदारहण के तौर पर, एक बहुत बड़ी अमेरिकी कंपनी कारगिल फूड्स ने एक छोटी भारतीय कंपनी परख फूड्स को खरीद लिया। परख फूड्स का भारत में बहुत बड़ा विपणन तंत्र था तथा उसका ब्रांड भी प्रसिद्ध था। परख फूड्स के चार तेल शोधक केंद्र भी थे।
(ग) अब इन सभी पर कारगिल फूड्स का नियंत्रण है और अब करगिल फूड्स 50 लाख पैकेट प्रतिदिन निर्माण क्षमता के साथ भारत में खाद्य तेलों की सबस बड़ी उत्पादक कंपनी है।
(घ) इसके अलावा बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ छोटे उत्पादकों को उतपादन का आदेश देती है।
(ङ) विशेषकर वस्त्र, जूते-चप्पल व खेल के सामान ऐसे उद्योग हैं जिनका उत्पादन संपूर्ण विश्व में छोटे उत्पादकों द्वारा किया जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इन उत्पादों की आपूर्ति कर दी जाती है। जो अपने ब्रांड नाम से ग्राहों को बेचती
(च) इन बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में दूर स्थित उत्पादकों के मूल्य गुणवत्ता, आपूर्ति तथा श्रम शर्तो का निर्धारण करने की प्रचण्ड क्षमता होती है।
प्रश्न 29.
विदेश व्यापार के प्रभाव को उदाहरण देकर समझाइये। .
उत्तर-
(क) विदेश व्यापार उत्पादकों को घरेलू बाजारों से निकलकर बाहर के बाजारों में पहुँचने का अवसर प्रदान करता
(ख) इस कारण, खरीददारों के समक्ष विकल्पों का विस्तार होता है।
(ग) उदाहरण के लिए, चीन के खिलौना उत्पादक भारत को खिलौनों का निर्यात करते हैं। इससे भारतीय ग्राहकों को भारतीय अथवा चीनी खिलौना खरीदने का विकल्प उपलब्ध है।
(घ) नये डिजाइनों एवं कम दाम के कारण चीनी खिलौने भारत में काफी लोकप्रिय हैं। परिणामतः एक वर्ष में ही 70-80 प्रतिशत भारतीय दुकानें चीनी खिलौनों से भर गई और खिलौनों का दाम भी कम हुआ है।
(ङ) इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यापार के कारण ही चीनी खिलौन भारतीय बाजार में आए। चीनी खिलौने भारतीय खिलौनों की तुलना में बेहतर साबित हुए। अब भारतीय खरीददारों के पास कम कीमत पर खिलौनों के अपेक्षाकृत अधिक विकल्प हैं।
(च) साथ ही, चीनी खिलौना उतपटकों को अपना व्यवास फैलाने का अवसर मिलता है। इसके विपरीत भारतीय खिलौन निर्माताओं को हानि होती है, क्योंकि उनके खिलौनों की बिक्री कम हो गई हैं।

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प्रश्न 30.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की क्या भूमिका है?
उत्तर-
(क) पिछले दो-तीन दशकों से ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उन स्थानों की खोज कर रही है। जहाँ उनका उत्पादन सस्ता हों। ये कंपनियाँ ऐसे देशों में ज्यादा निवेश कर रही हैं, साथ ही विभिन्न देशों के बीच व्यापार भी बढ़ रहा है।
(ख) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ विदेश व्यापार का एक बड़ा भाग नियंत्रित करती है। जैसे, भारत में फोर्ड मोटर्स के कार संयंत्र में भारत के लिए कारों का निर्माण तो होता ही है साथ ही अन्य विकाशशील देशों के लिए कारें एवं अन्य जगहों में अपने कारखाने के लिए पुर्जी का निर्माण भी होता है।
(ग) इसी प्रकार अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बहुत बड़े पैमाने पर वस्तुओं व सेवाओं के व्यापार में शामिल हैं।
(घ) अधिक विदेशी निवेश एवं अधिक विदेशी व्यापार के कारण विभिन्न देशों के बाजारों एवं उतपादनों में एकीकरण हो रहा है।
(ङ) विभिन्न देशों के बीच अधिकाधिक वस्तुओं तथा संवाओं, निवेश और प्रौद्योगिक का आदान-प्रदान हो रहा है। वैश्वीकरण के कारण विश्व के अधिकांश देश एक-दूसरे के अपेक्षाकृत अधिक संपर्क में आए हैं।
(च) वैश्वीकरण के कारण बेहतर, शिक्षा,, बेहतर आय एवं बेहतर रोजगार की तलाश में विभिन्न देशों के लोगों में आवगमन भी होता है।
प्रश्न 31.
प्रौद्योगिकी की उन्नति से वैश्वीकरण की प्रक्रिया को उत्प्रेरित करने में किस प्रकार मदद मिला हैं?
उत्तर-
(क) प्रौद्योगिकी में तीव्र उन्नति ने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को उत्प्रेरित किया है। जैसे, पिछले लगभग पाँच दशकों में परिवहन प्रौद्योगिकी में विकास के कारण लंबी दूरियां तक कम समय तथा कम लागत में वस्तुओं की आपूर्ति संभव हुई
(ख) सूचना एवं सचार प्रौद्योगिकी में विकास के कारण दूरसंचार, कंप्यूटर, इंटरनेट के क्षेत्र में तीव्र गति से प्रगति हो · रही है।
(ग) संचार उपग्रहों के विकास से दूरसंचार सेवाओं जैसे, टेलीग्राम, टेलीफोन, मोबाईल फोन एवं फैक्स के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हआ है।
(घ) हमारे जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में कंप्यूटरों का प्रवेश हो गया है। इंटरनेट से हम तत्काल ई-मेल भेज सकते हैं। और अत्यन्त कम मूल्य पर पूरे विश्व में बात (वॉयस मेल) कर सकते हैं।
(ङ)सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी ने विभिन्न देशों के बीच सेवाओं के उत्पादन के प्रसार में मुख्य भूमिका निभाई है। जैसे, लंदन के पाठकों के लिए प्रकाशित एक समाचार पत्र की डिजाइनिंग और छपाई दिल्ली में होती है। पत्रिका छपाई के बाद वायुमार्ग से लंदन भेजी जाती है डिजाइन और छपाई का भुगतान ई-बैंकिंग के द्वारा लंदन के एक बैंक से दिल्ली के एक बैंक तत्काल हो जाता है।
प्रश्न 32.
विश्व व्यापार संगठन पर एक नोट लिखिये।
उत्तर-
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों द्वारा सन् 1995 ई. में की गई थीं। इसका मुख्य कार्यालय जेनेवा में हैं। वर्तमान में इसके 149 सदस्य हैं।
इस संगठन का मुख्य उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के स्थान पर बहुपक्षीय समझौतों का विस्तार करना है। इस संगठन का ध्येय अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाना है। विश्व व्यापार संगठन चाहता है कि सदस्य देश आयात और निर्यात दोनों पर से प्रतिबंध हटा दें। विकसित देशों की पहल पर शुरू विवर व्यापार संगठन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित नियम लागू करता है। और इन नियमों का पालन सुनिश्चित करता है।
यद्यपि विश्व व्यापार संगठन सभी देशों को मुक्त व्यापार की सुविधा देता है परंतु अनुभव किया गया है कि विकसित देशों ने अनुचित ढंग से व्यापार अवरोधकों को बरकरार रखा है। दूसरी ओर, विश्व व्यापार संगठन के नियमों के कारण विकासशील देश व्यापार अवरोधकों को हटाने के लिए विवश हुए हैं। कृषि उत्पादों के व्यापार पर वर्तमान बहस इसका एक ज्वलत उदाहरण है।
प्रश्न 33.
भारत में विदेशी निवेश आकर्षिक करने के लिए क्या कदम उड़ाए गए हैं?
उत्तर-
(क) पिछले कुछ वर्षों में भारत की केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) की स्थापना। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में विश्व स्तरीय सुविधाएँ जैसे, बिजली, पानी, सड़क, परिवहन, मनोरंजन, शिक्षा सुविधाएँ आदि उपलब्ध है।
(ख) विशेष आर्थिक क्षेत्र में उत्पादन इकाइयाँ शुरू करने वाली कंपनियों को प्रारंभिक पाँ चा वर्षों तक कर देने से छूट दी गई हैं।
(ग) विदेशी निवेश आकर्षित करने हेतु सरकार ने श्रम कानूनों में लचीलापन अपनाने की अनुमति दे दी हैं।
(घ) पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने कपनिया का अनक नियमों से छूट लेने की अनुमति दी हैं। श्रम लागत में कटौती करने के लिए कंपनियाँ अब नियमित आधार पर श्रमिकों को रोजगार देने के बजाय, छोटी अवधि, जब काम का अधिक दबाव होता है, के लिए श्रमिकों को रोजगार पर रख सकती हैं।
प्रश्न 34.
वैश्वीकरण का भारतीय कंपनियों को क्या लाभ हुआ हैं?
उत्तर-
(क) वैश्वीकरण के कारण बढ़ती प्रतिस्पर्धा से अनेक बड़ी भारतीय कंपनियों को लाभ हुआ है। इन कंपनियों ने नयी प्रौद्योगिकी एवं उत्पादन प्रणाली में निवेश किया और अपने उत्पादन मानकों को ऊँचा उठाया।
(ख) कुछ कंपनियों ने विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर उत्पादन कार्य किया और उनको इसका लाभ भी मिला।
(ग) कुछ बड़ी कंपनियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप में उभरने का मौका मिला। ___ (घ) टाटा मोटर्स, इंफोसिस, रैनबैक्सी, एशियन पेंट्स, सुन्दरम फास्टनर्स आदि कंपनियाँ अब विश्व स्तर पर अपने क्रियाकलापों का प्रसार कर रही है।
(ङ) वैश्वीकरण से सेवा प्रदाता कंपनियों, सूचना व संचार प्रौद्योगिकी वाली कंपनियों के लिए नये अवसरों का सृजन हुआ है। भारतीय कंपनी द्वारा लंदन स्थित कंपनी की पत्रिका का प्रकाशन और गुड़गाँव तथा बैंगलोर स्थित कॉल सेंटर इसके उदाहरण हैं।
(च) इसके अलावा डाटा एन्ट्री, लेखाकरण-प्रशासनिक कार्य, इंजीनियरिंग आदि कई सेवायें भारत जैसे देशों में अब ससते मे उपलब्ध हैं और कई विकतिस देशों को निर्यात की जाती है।
प्रश्न 35.
वैश्वीकरण के कारण श्रमिकों का जीवन किस प्रकार प्रभावित हुआ हैं?
अथवा
वस्त्र उद्योग के श्रमिकों, भारतीय निर्यातकों और विदेशी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा किस प्रकार प्रभावित कर रही हैं?
उत्तर-
(क) बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण अधिकांश नियोक्ता आजकल श्रमिकों को कम समय एवं काम का अधिक दबाव होने पर ही रोजगार देना पंसद करते हैं।
(ख) उदाहरण के मौर पर, अमेरिका और यूरोप की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों भारतीय निर्यातकों को वस्तुओं की आपूर्ति का आदेश देती हैं। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अधिक लाभ कमाने के लिए सबसे सस्ती वस्तुओं की माँग करती हैं।
(ग) भारतीय निर्यातक बड़ा आदेश प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनी लागत कम करने की कोशिश करते हैं।
(घ) चूंकि कच्चेमाल पर लागत में कमी नहीं हो सकती, अत: नियोक्ता श्रम-लागत में कटौती करते हैं।
(ङ) इस कारण श्रमिकों का अस्थायी रोजगार दिया जाता है श्रमिकों को वेतन कम मिलता हैं, परंतु उनके कार्य की अवधि अपेक्षाकृत लंबी होती है। काम का दबाव ज्यादा होने पर श्रमिकों को अतिरिक्त समय में भी काम करने के लिए विवश किया जाता है।
(च) वस्त्र निर्यातकों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होता है लेकिन वैश्वीकरण के कारण हुए लाभ में श्रमिकों को न्यायसंगत हिस्सा नहीं दिया जाता है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न 
निम्नलिखित प्रश्नों के दिए गए विकल्पों से सही विकल्प का चयन करें
प्रश्न 1.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में किसकी मुख्य भूमिका
(क) स्थानीय कंपनियाँ
(ख) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
(ग) सरकार
(घ) व्यक्ति एवं समाज
उत्तर-
(ख) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
प्रश्न 2.
हमारे बाजारों में वस्तुओं के बहुव्यापी विकल्प अपेक्षाकृत ………. परिघटना है :
(क) नवीन
(ख) प्राचीन
(ग) मिश्रित
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(क) नवीन

HBSE 10th Class Social Science Important Questions Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

प्रश्न 3.
विभिन्न देशों के बीच परस्पर संबंध और तीव्र एकीकरण की प्रक्रिया को कहते हैं:
(क) स्थानीयकरण
(ख) राष्ट्रीकरण
(ग) सामाजीकरण
(घ) वैश्वीकरण
उत्तर-
(घ) वैश्वीकरण
प्रश्न 4.
विदेशी निवेश और निवेशी व्यापार के माध्यम से देशों को जोड़ने से हुए वैश्वीकरण सेः
(क) उत्पादकों के बीच कम प्रतिस्पर्धा होगी
(ख) उत्पादकों के बीच अधिक प्रतिस्पर्धा होगी
(ग) प्रतिस्पर्धा में कोई परिवर्तन नहीं होगा
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ख) उत्पादकों के बीच अधिक प्रतिस्पर्धा होगी
प्रश्न 5.
किस क्षेत्र में तीव्र उन्नति के कारण वैश्वीकरण की प्रक्रिया उत्प्रेरित हुई?
(क) प्रौद्योगिकी
(ख) परिवहन
(ग) व्यापार
(घ) औद्योगीकरण
उत्तर-
(क) प्रौद्योगिकी
प्रश्न 6.
विभिन्न देशों के बीच सेवाओं के उत्पादन के विस्तार में किस क्षेत्र ने मुख्य भूमिका निभाई हैं:
(क) विदेशी व्यापार
(ख) सूचना एंव संचार प्रौद्योगिकी
(ग) विदेशी निवेश
(घ) सरकार
उत्तर-
(ख) सूचना एंव संचार प्रौद्योगिकी
प्रश्न 7.
व्यापार अवरोधक का अर्थ हैं :
(क) प्रतिबंध लगाना
(ख) प्रतिबंध हटाना
(ग) व्यापार का विस्तार
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(क) प्रतिबंध लगाना
प्रश्न 8.
भारत में नई आर्थिक नीति लागू की गई :
(क) सन् 1989 ई.
(ख) सन् 1990 ई.
(ग) सन् 1991 ई.
(घ) सन् 1992 ई.
उत्तर-
(ग) सन् 1991 ई.
प्रश्न 9.
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना कब हुई?
(क) 1993 ई.
(ख) 1995 ई.
(ग) 2000 ई.
(घ) 2003 ई.
उत्तर-
(ख) 1995 ई.
प्रश्न 10.
वर्तमान में विश्व व्यापार संगठन के कितने सदस्य
(क) 147
(ख) 148
(ग) 149
(घ) 150
उत्तर-
(ग) 149

HBSE 10th Class Social Science Important Questions Economics Chapter 4 वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

प्रश्न 11.
विशेष आर्थिक क्षेत्र में उत्पादन इकाइयाँ स्थपित करने वाली कंपनियों को शुरुआत में कितने वर्षों तक कर नहीं देना पड़ेगा?
(क) तीन वर्ष
(ख) चार वर्ष
(ग) छः वर्ष
(घ) पाँच वर्ष
उत्तर-
(घ) पाँच वर्ष
प्रश्न 12.
भारत में लघु उद्योगों में कितने लोग नियोजित हैं?
(क) 50 लाख
(ख) 1 करोड़
(ग) 2 करोड़
(घ) 4 करोड़
उत्तर-
(ग) 2 करोड़
प्रश्न 13.
एक कपंनी जो दो या उससे अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण अथवा स्वामित्व रखती हैं, उसे कहते हैं:
(क) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
(ख) स्थानीय कंपनियाँ
(ग) प्राइवेट कंपनी
(घ) सार्वजनिक कंपनी
उत्तर-
(क) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
प्रश्न 14.
बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किए गए निवेश को क्या कहते हैं?
(क) देशी निवेश
(ख) स्थानीय निवेश
(ग) विदेशी निवेश
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ग) विदेशी निवेश
प्रश्न 15.
विदेश व्यापार विभिन्न देशों के बाजारों के ……….में सहायक सिद्ध हुआ हैं:
(क) विखंडन
(ख) एकीकरण
(ग) स्थानीयकरण
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ख) एकीकरण
प्रश्न 16.
आयात पर कर उदाहरण हैं :
(क) व्यापार विस्तार
(ख) वैश्वीकरण
(ग) राष्ट्रीकरण
(घ) व्यापार अवरोधक
उत्तर-
(घ) व्यापार अवरोधक
प्रश्न 17.
सरकार द्वारा अवरोधकों अथवा प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?
(क) उदारीकरण
(ख) अनुदारीकरण
(ग) वैश्वीकरण
(घ) कोटा
उत्तर-
(क) उदारीकरण
प्रश्न 18.
अमेरिकी के जी. डी. पी. में कृषि का हिस्सा कितना हैं?
(क) 1%
(ख) 5%
(ग) 8%
(घ) 12%
उत्तर-
(क) 1%
प्रश्न 19.
वैश्वीकरण और उत्पादकों-स्थानीय एवं विदेशी दोनों के बीच बेहतर प्रतिस्पर्धा से किस वर्ग के उपभोक्ताओं को अधिक लाभ हुआ हैं?
(क) गरीब वर्ग
(ख) धनी वर्ग
(ग) मध्यम वर्ग
(घ) शहरी निवासी
उत्तर-
(ख) धनी वर्ग
प्रश्न 20.
शीर्ष भारतीय कंपनियों के पास क्या है जिसने उन्हें आधुनिकीकरण करने एवं प्रतिस्पर्धा में बने रहने में सहायता की?
(क) श्रमिक
(ख) मुद्रा
(ग) कारखाना
(घ) प्रौद्योगिकी
उत्तर-

(ख) मुद्रा

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

HBSE 10th Class Sanskrit व्यायामः सर्वदा पथ्यः Textbook Questions and Answers

व्यायामः सर्वदा पथ्यः प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(क) कीदृशं कर्म व्यायामसंज्ञितम् कथ्यते ?
(ख) व्यायामात् किं किमुपजायते ?
(ग) जरा कस्य सकाशं सहसा न समधिरोहति ?
(घ) कियता बलेन व्यायामः कर्तव्यः ?
(ङ) अर्धबलस्य लक्षणं किम् ?
उत्तराणि
(क) शरीरायाससजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम् कथ्यते।
(ख) व्यायामात् शरीरोपचयः कान्तिः गात्राणां सुविभक्तता दीप्ताग्नित्वम्, अनालस्यं, स्थिरत्वं लाघवं, मजा, श्रम-क्लम-पिपासोष्ण-शीतादीनां सहिष्णुता आरोग्यं च उपजायते।
(ग) जरा व्यायामाभिरतस्य सकाशं सहसा न समधिरोहति।
(घ) अर्धेन बलेन व्यायामः कर्तव्यः।
(ङ) यदा व्यायाम कुर्वतः हृदि स्थानास्थितो वायुः वक्त्रं प्रपद्यते, तद् अर्धबलस्य लक्षणम्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

Shemushi Sanskrit Class 10 Chapter 3 Solutions HBSE प्रश्न 2.
उदाहरणमनुसृत्य कोष्ठकगतेषु पदेषु तृतीयाविभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयतयथा – व्यायामः …….. हीनमपि सुदर्शनं करोति (गुण)
व्यायामः गुणैः हीनमपि सुदर्शनं करोति।
(क) ……………… व्यायामः कर्तव्यः। (बलस्यार्ध)
(ख) …………….. सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति। (व्यायाम)
(ग) ……………… विना जीवनं नास्ति। (विद्या)
(घ) सः …………….. खञ्जः अस्ति । (चरण)
(ङ) सूपकारः ……………. भोजनं जिघ्रति। (नासिका)
उत्तराणि
यथा – व्यायामः ……………….. हीनमपि सुदर्शनं करोति (गुण)
व्यायाम: गुणैः हीनमपि सुदर्शनं करोति।
(क) बलस्यार्धेन व्यायामः कर्तव्यः । (बलस्यार्ध)
(ख) व्यायामेन सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति। (व्यायाम)
(ग) विद्यया विना जीवनं नास्ति। (विद्या)
(घ) सः चरणेन खञ्जः अस्ति। (चरण)
(ङ) सूपकारः नासिकया भोजनं जिघ्रति। (नासिका)

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

व्यायामः सर्वदा पथ्यः HBSE 10th Class प्रश्न 3.
स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) शरीरस्य आयासजननं कर्म व्यायामः इति कथ्यते।
(ख) अरयः व्यायामिनं न अर्दयन्ति।
(ग) आत्महितैषिभिः सर्वदा व्यायामः कर्तव्यः ।
(घ) व्यायामं कुर्वतः विरुद्धं भोजनम् अपि परिपच्यते।
(ङ) गात्राणां सुविभक्तता व्यायामेन संभवति।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) कस्य आयासजननं कर्म व्यायामः इति कथ्यते ?
(ख) के व्यायामिनं न अर्दयन्ति ?
(ग) कैः सर्वदा व्यायामः कर्तव्यः ?
(घ) व्यायाम कुर्वतः कीदृशं भोजनम् अपि परिपच्यते ?
(ङ) केषां सुविभक्तता व्यायामेन संभवति ?

व्यायाम के 10 लाभ In Sanskrit HBSE प्रश्न 4.
निम्नलिखितानाम् अव्ययानाम् रिक्तस्थानेषु प्रयोगं कुरुत
सहसा, अपि, सदृशं, सर्वदा, यदा, सदा, अन्यथा
(क) ……………… व्यायामः कर्तव्यः।
(ख) ………………….. मनुष्यः सम्यक् रूपेण व्यायामं करोति तदा सः …. स्वस्थः तिष्ठति।
(ग) व्यायामेन असुन्दरा: ………………. सुन्दराः भवन्ति।
(घ) व्यायामिनः जनस्य सकाशं वार्धक्यं ……………….. नायाति।
(ङ) व्यायामेन ……….. किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति।
(च) व्यायाम समीक्ष्य एव कर्तव्यम् . ….. व्याधयः आयान्ति।
उत्तराणि
(क) सदा व्यायामः कर्तव्यः।
(ख) यदा मनुष्यः सम्यक्पेण व्यायाम करोति तदा सः सर्वदा स्वस्थः तिष्ठति।
(ग) व्यायामेन असुन्दराः अपि सुन्दराः भवन्ति।
(घ) व्यायामिनः जनस्य सकाशं वार्धक्यं सहसा नायाति।
(ङ) व्यायामेन सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति।
(च) व्यायाम समीक्ष्य एव कर्तव्यम् अन्यथा व्याधयः आयान्ति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

व्यायाम सर्वदा पथ्यः HBSE 10th Class प्रश्न 5.
(क) अधोलिखितेषु तद्धितपदेषु प्रकृति/प्रत्ययं च पृथक् कृत्वा लिखत
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-1
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-2.1
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-2

(ख) अधोलिखितकृदन्तपदेषु मूलधातुं प्रत्ययं च पृथक् कृत्वा लिखतमूलशब्दः
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-3
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-4

Shemushi Sanskrit Class 10 Solutions Chapter 3 HBSE प्रश्न 6.
अधोलिखितेभ्यः पदेभ्यः उपसर्गान् पृथक् कृत्वा लिखत
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-5
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-6

Sanskrit Class 10 Chapter 3 Shemushi HBSE प्रश्न 7.
(क) षष्ठ-श्लोकस्य भावमाश्रित्य रिक्तस्थानानि पूरयत
यथा – ……….. समीपे उरगा: न ………… एवमेव व्यायामिनः जनस्य समीपं ……….. न गच्छन्ति। व्यायामः वयोरूपगुणहीनम् अपि जनम् …………. करोति।
उत्तरम्-यथा वैनतेयस्य समीपे उरगाः न गच्छन्ति एवमेव व्यायामिनः जनस्य समीपं व्याधयः न गच्छन्ति। व्यायामः वयोरूपगुणहीनम् अपि जनं सुदर्शनं करोति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

(ख) उदाहरणमनुसृत्य वाच्यपरिवर्तनं कुरुत
कर्मवाच्यम् कर्तृवाच्यम्
यथा-आत्महितैषिभिः व्यायामः क्रियते आत्महितैषिणः व्यायाम कुर्वन्ति।
(1) बलवता विरुद्धमपि भोजनं पच्यते ……………………………..
(2) जनैः व्यायामेन कान्तिः लभ्यते ……………………………..
(3) मोहनेन पाठः पठ्यते ……………………………..
(4) लतया गीतं गीयते ……………………………..
उत्तराणि
कर्मवाच्यम् कर्तृवाच्यम्
यथा-आत्महितैषिभिः व्यायामः क्रियते – आत्महितैषिण: व्यायाम कुर्वन्ति। .
(1) बलवता विरुद्धमपि भोजनं पच्यते – बलवान् विरुद्धमपि भोजनं पचति।
(2) जनैः व्यायामेन कान्तिः लभ्यते – जनाः व्यायामेन कान्तिं लभन्ते।
(3) मोहनेन पाठः पठ्यते – मोहनः पाठं पठति।
(4) लतया गीतं गीयते । – लता गीतं गायति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

(ग) ‘व्यायामस्य लाभाः’ इति विषयमधिकृत्य पञ्चवाक्येषु एकम् अनुच्छेदं लिखत।
उत्तरम्
(1) स्वास्थ्यरक्षायाः सर्वोत्तमः उपायः व्यायामः अस्ति।
(2) व्यायामाः बहुविधाः भवन्ति, यथा-धावनम्, कूर्दनम्, तरणम्, मल्लयुद्धम् इत्यादयः।
(3) व्यायामेन शरीरं हृष्टं पुष्टं स्वस्थं बलिष्ठं च भवति।
(4) शरीरस्य सर्वांगीणविकासाय व्यायाम: आवश्यकः भवति।
(5) व्यायामेन शरीरम् एव आरोग्यं न लभते, मनः अपि प्रसन्नं भवति, अतः यथाबलं व्यायामः कर्तव्यः।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

योग्यताविस्तारः
(क) सुश्रुतः आयुर्वेदस्य ‘सुश्रुतसंहिता’ इत्याख्यस्य ग्रन्थस्य रचयिता। अस्मिन् ग्रन्थे शल्यचिकित्सायाः । प्राधान्यमस्ति। सुश्रुतः शल्यशास्त्रज्ञस्य दिवोदासस्य शिष्यः आसीत्। दिवोदासः सुश्रुतं वाराणस्याम् आयुर्वेदम् अपाठयत्। सुश्रुतः दिवोदासस्य उपदेशान् स्वग्रन्थेऽलिखत्
सुश्रुत आयुर्वेद के ‘सुश्रुतसंहिता’ नामक ग्रन्थ के रचयिता हैं। इस ग्रन्थ में शल्यचिकित्सा की प्रधानता है। सुश्रुत शल्य शास्त्र के ज्ञाता दिवोदास के शिष्य थे। दिवोदास ने सुश्रुत को वाराणसी में आयुर्वेद बढ़ाया था। सुश्रुत ने दिवोदास के उपदेशों को अपने ग्रन्थ में लिखा।

(ख) उपब्धासु आयुर्वेदीय-संहितासु ‘सुश्रुतसंहिता’ सर्वश्रेष्ठः शल्यचिकित्साप्रधानो ग्रन्थः। अस्मिन् ग्रन्थे 120 अध्यायेषु क्रमेण सूत्रस्थाने मौलिकसिद्धान्तानां शल्यकर्मोपयोगि-यन्त्रादीनां, निदानस्थाने प्रमुखाणां रोगाणां, शरीरस्थाने शरीरशास्त्रस्य चिकित्सास्थाने शल्यचिकित्सायाः, कल्पस्थाने च विषाणां प्रकरणानि वर्णितानि। अस्य उत्तरतन्त्रे 66 अध्यायाः सन्ति।
उपलब्ध आयुर्वेद की संहिताओं में सुश्रुत संहिता सर्वश्रेष्ठ शल्यचिकित्सा-प्रधान ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में 120 अध्यायों में क्रमशः सूत्र स्थान में मौलिक सिद्धान्तों का शल्य कर्म के लिए उपयोगी यन्त्र आदि का, निदान-स्थान में प्रमुख रोगों का, शरीर-स्थान में शरीर शास्त्र का, चिकित्सा-स्थान में शल्य चिकित्सा का और कल्प-स्थान में विषों के प्रकरण वर्णित हैं। इसके उत्तर तन्त्र में 66 अध्याय है।

(ग) वैनतेयमिवोरगा:-कश्यप ऋषि की दो पत्नियाँ थीं-कट्ठ और विनता। विनता का पुत्र गरुड़ था और कद्रु का पुत्र सर्प। विनता का पुत्र होने के कारण गरुड़ को वैनतेय कहा जाता है। (विनतायाः अयम् वैनतेयः, अण् प्रत्यये कृते)। गरुड़ सर्प से अधिक ताकतवर होता है, भयवश साँप गरुड़ के पास जाने का साहस नहीं करता। यहाँ व्यायाम करने वाले मनुष्य की तुलना गरुड़ से तथा व्याधियों की तुलना साँप से की गई है। जिस प्रकार गरुड़ के समक्ष साँप नहीं जाता। उसी प्रकार व्यायाम करने वाले व्यक्ति के पास रोग नहीं फटकते।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

भाषिकविस्तारः
गुणवाचक शब्दों से भाव अर्थ में ष्यञ् अर्थात् य प्रत्यय लगाकर भाववाची पदों का निर्माण किया जाता है। शब्द के प्रथम स्वर में वृद्धि होती है और अन्तिम अ का लोप होता है।
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-7
थाल्-प्रत्ययः-‘प्रकार’ अर्थ में थाल् प्रत्यय का प्रयोग होता है।
जैसेतेन प्रकारेण – तथा
येन प्रकारेण – यथा
अन्येन प्रकारेण – अन्यथा
सर्व-प्रकारेण – सर्वथा
उभय-प्रकारेण – उभयथा

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

भावविस्तारः
(क) शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
शरीर ही सर्वप्रथम धर्म-साधन है।

(ख) लाघवं कर्मसामर्थ्य स्थैर्यं क्लेशसहिष्णुता।
दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते॥
स्फूर्ति कार्य करने की सामर्थ्य, दृढ़ निश्चयता (स्थिरता) कष्टों को सहने की क्षमता, दोषों का नाश और (पाचन) अग्नि में वृद्धि व्यायाम से उत्पन्न होती है।

(ग) यथा शरीरस्य रक्षायै उचितं भोजनम् उचितश्च व्यवहारः आवश्यकोऽस्ति तथैव शरीरस्य स्वास्थ्याय व्यायामः अपि आवश्यकः।
जिस प्रकार शरीर की रक्षा के लिए उचित भोजन और उचित व्यवहार आवश्यक है, उसी प्रकार शरीर के स्वास्थ्य के लिए व्यायाम भी आवश्यक है।

(घ) युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। .
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥

योग आहार-विहार से युक्त, कर्मों में प्रयत्नशीलता से युक्त, स्वप्न तथा जागरण से युक्त मनुष्य के दुःखों का हरण करने वाला होता है।

(ङ) पक्षिणः आकाशे उड्डीयन्ते तेषाम् उड्डयनमेव तेषां व्यायामः। पशवोऽपि इतस्ततः पलायन्ते, पलायनमेव तेषां व्यायामः । शैशवे शिशुः स्वहस्तपादौ चालयति, अयमेव तस्य व्यायामः । वि + आ + यम् धातोः घञ् प्रत्ययात् निष्पन्नः व्यायाम शब्दः विस्तारस्य विकासस्य च वाचकः। यतो हि व्यायामेन अङ्गानां विकासः भवति। अतः सुखपूर्वकं जीवनं यापयितुं मनुष्यैः नित्यं व्यायामः करणीयः।
पक्षी आकाश में उड़ते हैं, उनके उड़ने में ही उनका व्यायाम है। पशु भी इधर-उधर घूमते है, घूमना ही उनका व्यायाम है। बचपन में बालक अपने हाथ-पैर चलाता है, यही ही उसका व्यायाम है। वि + आ + यम् धातु से घञ् प्रत्यय से निष्पन्न व्यायाम शब्द विस्तार और विकास का वाचक है। क्योंकि व्यायाम से अंगों का विकास होता है, अतः सुखपूर्वक जीवन बिताने के लिए मनुष्य को प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए।

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HBSE 10th Class Sanskrit व्यायामः सर्वदा पथ्यः Important Questions and Answers

व्यायामः सर्वदा पथ्यः पठित-अवबोधनम्

1. निर्देशः- अधोलिखितं पद्यांशं पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत
शरीरायासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम्।
तत्कृत्वा तु सुखं देहं विमृद्नीयात् समन्ततः ॥1॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) कीदृशं कर्म व्यायामसंज्ञितम् ?
(ii) देहं समन्ततः किं कुर्यात् ?
(iii) देहं कथं विमदनीयात् ?
(iv) केन आयासजननं कर्म ‘व्यायामः’ इति कथितम् ?
उत्तराणि:
(i) शरीरायासजननम्।
(ii) विमृदुनीयात् ।
(iii) सुखम्।
(iv) शरीरेण।

(ख) पूर्णवाक्येन:
(i) व्यायामसंज्ञितं कर्म किम् अस्ति ?
(ii) व्यायामं कृत्वा किं कुर्यात् ? उत्तराणि
उत्तरत:
(i) व्यायामसंज्ञितं कर्म शरीरायासजननम् अस्ति।
(ii) व्यायामं कृत्वा समन्ततः देहं विमृद्नीयात् ।

(ग) निर्देशानुसारम्:
(i) ‘शरीरम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं पर्यायपदं किम् ?
(ii) ‘कृत्वा’ इति पदे कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iii) ‘दुःखम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किमस्ति ?
(iv) ‘शरीरायासजननम्’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) देहम्।
(ii) क्त्वा।
(iii) सुखम्।
(iv) शरीर + आयासजननम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- शरीरायासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम् (भवति) तत् कृत्वा तु देहं समन्ततः सुख विमृनीयात् ।

शब्दार्थाः- शरीर-आयास-जननम् = शरीर में थकावट पैदा करने वाला। आयासः = (परिश्रमः, प्रयत्नः, प्रयासः, श्रमः) परिश्रम, मेहनत। देहम् = (शरीरम्) शरीर। विमृद्नीयात् = (मर्दयेत्) मालिश करनी चाहिए। समन्ततः = (सर्वतः) सब ओर से।

संदर्भ:- प्रस्तुत पद्यांश आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सुश्रुत संहिता’ के 24 वें अध्याय से हमारी पाठ्य- पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ में संकलित ‘व्यायामः सर्वदा पथ्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है।

प्रसंग:- प्रस्तुत पद्यांश में व्यायाम की परिभाषा बताई गई है। –

सरलार्थः- शरीर में थकावट करने वाला अर्थात् परिश्रम वाला कार्य व्यायाम कहलाता है। उस व्यायाम को करके शरीर की सभी ओर से सुखपूर्वक मालिश करनी चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

2. भावार्थ:- परिश्रम वाले कार्य को व्यायाम कहते हैं। इसके पश्चात् पूरे शरीर की भली-भाँति मालिश करनी चाहिए।
शरीरोपचयः कान्तित्राणां सुविभक्तता।
दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मजा॥2॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) व्यायामात् कस्य उपचयः भवति ?
(ii) अत्र केषां सुविभक्तता कथिता ?
(iii) व्यायामात् कीदृशं अग्नित्वं जायते ?
(iv) अनालस्यं कस्मात् जायते ?
उत्तराणि-:
(i) शरीरस्य।
(ii) गात्राणाम्।
(iii) दीप्तम्।
(iv) व्यायामात्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत:
(i) व्यायामात् किम् उपजायते ?
उत्तराणि:
(i) व्यायामात् शरीरोपचयः, कान्तिः, गात्राणां सुविभक्तता, दीप्ताग्नित्वम्, अनालस्यम्, स्थिरत्वम्, लाघवं मजा च उपजायते।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत:
(i) ‘शरीरोपचयः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(ii) ‘सुविभक्तता’-अत्र प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत।
(iii) ‘आलस्यम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘स्थायित्वम्’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
उत्तराणि:
(i) शरीर + उपचयः ।
(ii) सु + वि + √भज् + क्त + तल्।
(iii) अनालस्यम्।
(iv) स्थिरत्वम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- (व्यायामात्) शरीरोपचयः, कान्तिः, गात्राणां सुविभक्तता, दीप्ताग्नित्वम्, अनालस्यं, स्थिरत्वं, लाघवं, मजा (उपजायते)।

शब्दार्थाः- उपचयः = (अभिवृद्धिः) वृद्धि। कान्तिः = (आभा) चमक। गात्रम् = (शरीरम्) शरीर । सुविभक्तता = (शारीरिकं सौष्ठवम्) शारीरिक सौन्दर्य । दीप्ताग्नित्वम् = (जठराग्नेः प्रवर्धनम्) जठराग्नि का प्रदीप्त होना अर्थात् भूख लगना। मृजा = (स्वच्छीकरणम्) स्वच्छ करना।

संदर्भ:-पूर्ववत्।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में व्यायाम के लाभ वर्णित किए गए हैं।

सरलार्थ:- व्यायाम से शरीर की वृद्धि, चमक, शारीरिक सौन्दर्य, जठराग्नि की वृद्धि, आलस्यहीनता, स्थिरता, फुर्ती और स्वच्छता (उत्पन्न होती है।)

भावार्थ:- व्यायाम करने से शरीर का समुचित विकास होता है, चेहरे पर स्वाभाविक चमक आ जाती है, शरीर सडौल बनता है, पेट में भोजन को पचाने वाली अग्नि प्रदीप्त होने से अच्छी भूख लगती है, आलस्य दूर होता है; शरीर में स्थायित्व, स्फूर्ति तथा स्वच्छता आती है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

3. श्रमक्लमपिपासोष्ण-शीतादीनां सहिष्णुता।
आरोग्यं चापि परमं व्यायामादुपजायते ॥3॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) आरोग्यं कस्मात् उपजायते ?
(ii) कीदृशम् आरोग्यम् उपजायते ?
(iii) व्यायामात् शीतादीनां का उपजायते ?
(iv) श्रमस्य सहिष्णुता कस्मात् उपजायते ?
उत्तराणि-:
(i) व्यायामात्।
(ii) परमम्।
(iii) सहिष्णुता।
(iv) व्यायामात् ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) व्यायामात् केषां सहिष्णुता उपजायते ?
(ii) व्यायामात् परमं किम् उपजायते ?
उत्तराणि
(i) व्यायामात् श्रम-क्लम-पिपासोष्ण-शीतादीनां सहिष्णुता उपजायते।
(ii) व्यायामात् परमम् आरोग्यम् उपजायते।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘उष्णम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘सहिष्णुता’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iii) ‘रोगराहित्यम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iv) ‘व्यायामात्’ अत्र का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
उत्तराणि-:
(i) शीतम्।
(ii) तल्।
(iii) आरोग्यम्।
(iv) पञ्चमी विभक्तिः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- व्यायामात् श्रमक्लमपिपासोष्ण-शीतादीनां सहिष्णुता,परमम् आरोग्यं च अपि उपजायते।

शब्दार्था:- क्लमः = (श्रमजनितं शैथिल्यम्) थकान। पिपासा = (पातुम् इच्छा) प्यास। उष्णः = (तापः) गर्मी। सहिष्णुता = (सहत्वं क्षमता) सहन करने की सामर्थ्य।

संदर्भ:- पूर्ववत्। प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य में व्यायाम के लाभ बताए गए हैं।

सरलार्थ:- व्यायाम करने से परिश्रम से होने वाली थकान, प्यास, गर्मी-सर्दी आदि को सहन करने का सामर्थ्य और अच्छा स्वास्थ्य भी उत्पन्न होता है।

भावार्थ:- व्यायाम करने से गर्मी-सर्दी, श्रम जन्य थकावट, प्यास आदि को सहन करने की क्षमता बढ़ती है और उत्तम आरोग्य प्राप्त होता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

4. न चास्ति सदृशं तेन किञ्चित्स्थौल्यापकर्षणम्।
न च व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्त्यरयो बलात् ॥4॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) स्थौल्यापकर्षणं किमस्ति ?
(ii) अरयः कं न अर्दयन्ति ?
(ii) अरयः कीदृशं मर्यं न अर्दयन्ति ?
(iv) अरयः कथं न अर्दयन्ति ?
उत्तराणि:
(i) व्यायामः ।
(ii) मर्त्यम्।
(iii) व्यायामिनम्।
(iv) बलात्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) केन सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति ?
(ii) व्यायामिनं मर्यं के न अर्दयन्ति ?
उत्तराणि
(i) व्यायामेन सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति।
(ii) व्यायामिनं मर्त्यम् अरयः न अर्दयन्ति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘तुल्यम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘तेन’ इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम् ?
(iii) ‘अमर्त्यम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘शत्रवः’ इत्यस्य कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
(v) ‘अर्दयन्त्यरयः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) सदृशम्।
(ii) व्यायामाय।
(iii) मर्त्यम्।
(iv) अरयः ।
(v) अर्दयन्ति + अरयः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- तेन सदृशं स्थौल्यापकर्षणं च किञ्चित् न अस्ति। अरयः च व्यायामिनं मर्यं बलात् न अर्दयन्ति।

शब्दार्थाः- स्थौल्यम् = (अतिमांसलत्वं, पीनता) मोटापा। अपकर्षणम् = (दूरीकरणम्) दूर करना, कम करना। अर्दयन्ति = (अर्दनं कुर्वन्ति) कुचल डालते हैं। अरयः = (शत्रवः) शत्रुगण। मय॑म् = (मनुष्यम्) व्यक्ति को।

संदर्भ:- पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में व्यायाम के लाभ वर्णित किए गए हैं।

सरलार्थः- उस व्यायाम के समान मोटापे को कम करने वाला और कोई साधन नहीं है। शत्रु भी व्यायाम करने वाले व्यक्ति को बलपूर्वक पीड़ित नहीं करते हैं।

भावार्थः- व्यायाम से शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है, शरीर का थुलथुलापन दूर हो जाता है। व्यायाम करने वाले मनुष्य के हृष्ट-पुष्ट बलि शरीर को देखकर शत्रु भी दुम दबा कर भाग जाते हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

5. न चैनं सहसाक्रम्य जरा समधिरोहति।
स्थिरीभवति मांसं च व्यायामाभिरतस्य च ॥5॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) व्यायामिनं का न समधिरोहति ?
(ii) व्यायामिनं जरा कथं न आक्रमते ?
(iii) किं स्थिरीभवति ?
(iv) कस्य मांसं स्थिरीभवति ?
उत्तराणि:
(i) जरा।
(ii) सहसा।
(iii) मांसम्।
(iv) व्यायामाभिरतस्य।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) व्यायामाभिरतस्य मांसं कीदृशं भवति ?
उत्तराणि
(i) व्यायामाभिरतस्य मांसं स्थिरी भवति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘चैनम्’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(ii) ‘आक्रम्य’ अत्र प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत।
(iii) “एनम्’ इति सर्वनामपदस्य स्थाने संज्ञापदं लिखत।
(iv) ‘अकस्मात्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किमस्ति ?
उत्तराणि:
(i) च + एनम्।
(ii) आ + क्रम् + ल्यप्।
(iii) व्यायामिनम्।
(iv) सहसा।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- जरा च सहसा आक्रम्य एनं न समधिरोहति। व्यायामाभिरतस्य हि मांसं च स्थिरीभवति।

शब्दार्थाः- आक्रम्य = (आक्रमणं कृत्वा) हमला करके। जरा = (वार्धक्यम्) बुढ़ापा। समधिरोहति = (आरूढं भवति) सवार होता है। अभिरतस्य = (संलग्नस्य) तल्लीन होने वाले का।

संदर्भ:- पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में व्यायाम के लाभ बताए गए हैं।

सरलार्थः- व्यायाम करने वाले व्यक्ति पर बुढ़ापा सहसा आक्रमण कर सवार नहीं होता है। व्यायाम में लगे रहने वाले व्यक्ति का मांस भी पुष्ट हो जाता है।

भावार्थ:- व्यायाम करने से शरीर की मांस, मज्जा आदि सभी धातुएँ परिपुष्ट होने के कारण बुढ़ापा देर से आता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

6. व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भ्यामुवर्तितस्य च।
व्याधयो नोपसर्पन्ति वैनतेयमिवोरगाः वयोरूपगुणैीनमपि कुर्यात्सुदर्शनम् ॥6॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) व्यायमस्विन्नगात्रस्य के न उपसर्पन्ति ?
(ii) काभ्यां उद्वर्तितस्य व्याधयः नोपसर्पन्ति ?
(iii) व्याधयः के इव न उपसर्पन्ति ?
(iv) व्यायामः किं करोति ?
उत्तराणि:
(i) व्याधयः ।
(ii) पद्भ्याम्।
(iii) उरगाः ।
(iv) सुदर्शनम्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) व्याधयः कस्य न उपसर्पन्ति ?
(ii) कैः हीनमपि सुदर्शनं कुर्यात् ?
(iii) व्यायामः अत्र व्याधीनां तुलना कैः सह कृता ?
उत्तराणि:
(i) व्याधयः व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भ्याम् उद्वर्तितस्य च न उपसर्पन्ति ।
(ii) व्यायामः वयोरूपगुणैः हीनमपि सुदर्शनं कुर्यात् ।
(iii) अत्र व्याधीनां तुलना उरगैः सह कृता।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘नोपसर्पन्ति’ अत्र सन्धिविच्छेदं कुरुत।
(ii) ‘सर्पाः’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
(iii) ‘वैनतेयमिवोरगाः’-अत्र प्रयुक्तम् अव्ययपदं किम् ?
(iv) ‘सुदर्शनम्’ अत्र कः उपसर्गः प्रयुक्तः ?
(v) ‘गरुडम्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) न + उपसर्पन्ति ।
(ii) उरगाः ।
(iii) इव।
(iv) सु।
(v) वैनतेयम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भ्याम् उद्वर्तितस्य च व्याधयः वैनतेयम् उरगाः इव न उपसर्पन्ति। वयोरूपगुणैः हीनम् अपि सुदर्शनं कुर्यात्।

शब्दार्थाः- स्विन्नगात्रस्य = (स्वेदेन सिक्तस्य शरीरस्य) पसीने से लथपथ शरीर का। पद्भ्याम् उद्वर्तितस्य = (पद्भ्याम् उन्नमितस्य) दोनों पैरों से ऊपर उठने वाले व्यायाम। व्याधयः = (रोगा:) बीमारियाँ। वैनतेयः = (गरुड:) गरुड़। उरगः = (सर्प) साँप।

संदर्भ:- पूवर्वत् प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में व्यायाम के लाभ बताए गए हैं।

सरलार्थः- शरीर को पसीने से लथपथ कर देने वाले तथा पैरों को ऊपर उठाने वाले व्यायाम करने वाले व्यक्ति के समीप रोग उसी प्रकार नहीं आते जैसे गरुड़ के समीप साँप नहीं आते हैं। व्यायाम आयु, रूप और अन्य गुणों से हीन व्यक्ति को भी सुन्दर बना देता है।

भावार्थ:- व्यायाम करने से शरीर से पसीना निकलता है। जिससे शरीर के रोमछिद्र पूरी तरह खुल जाते हैं, शरीर पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है। जो मनुष्य व्यायाम द्वारा शरीर से पसीना निकालता है और ‘पादोत्तान’ आदि आसन करके अपने रक्तचाप को नियन्त्रित रखता है ; रोग उसके पास नहीं फटकते और शरीर में सौन्दर्य की अभिवृद्धि भी होती है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

7. व्यायाम कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम्।
विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते ॥7॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) किं कुर्वत: भोजनं परिपच्यते ?
(ii) भोजनं कथं परिपच्यते ?
(iii) कदा व्यायामं कुर्वत: भोजनं परिपच्यते ?
(iv) व्यायामेन विरुद्धमपि किं परिपच्यते ?
उत्तराणि-:
(i) व्यायामम् ।
(ii) निर्दोषम् ।
(iii) नित्यम् ।
(iv) भोजनम्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) व्यायामं कुर्वतः कीदृशं भोजनं निर्दोषं परिपच्यते ?
उत्तराणि
(i) व्यायामं कुर्वतः विरुद्धम्, विदग्धम् अविदग्धं वा अपि भोजनं निर्दोषं परिपच्यते।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘कुर्वतः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘प्रतिदिनम्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iii) ‘विदग्धम्’ इति पदस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘विरुद्धम्’ इति विशेषणस्य अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(v) ‘निर्दोषम्’ इति क्रियाविशेषणस्य क्रियापदं किमत्र प्रयुक्तम् ?
उत्तराणि:
(i) शतृ। कृ + शतृ = कुर्वत् + षष्ठी विभक्तिः एकवचनम्।
(ii) नित्यम्।
(iii) अविदग्धम्।
(iv) भोजनम्।
(v) परिपच्यते।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- नित्यं व्यायामं कुर्वतः विदग्धम् अविदग्धम् वा विरुद्धम् अपि भोजनं निर्दोषं परिपच्यते।

शब्दार्थाः- विरुद्धम् = (प्रतिकूलम्) विपरीत। विदग्धम् = (सुपक्वम्) भली प्रकार पका हुआ। अविदग्धम् = (अपक्वम्, अर्धपक्वम्) आधा पका हुआ, न पका हुआ। निर्दोषम् = दोषरहित। परिपच्यते = (जीर्यते) पच जाता है।

संदर्भ:- पूर्ववत् प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि व्यायाम से शरीर की पाचनक्षमता बढ़ जाती है।

सरलार्थ:- नित्य-प्रति व्यायाम करने वाले व्यक्ति को शरीर की प्रकृति के विपरीत,भली-भाँति पका हुआ अथवा न पका हुआ भोजन भी बिना किसी दोष के पच जाता है।

भावार्थ:- व्यायाम से मनुष्य की पाचक अग्नि इतनी तीव्र हो जाती है कि उसे हर प्रकार का भोजन बिना कोई रोग उत्पन्न किए पच जाता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

8. व्यायामो हि सदा पथ्यो बलिनां स्निग्धभोजिनाम् ।
स च शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः ॥8॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) सदा कः पथ्यः ?
(ii) व्यायामः केषां पथ्यः ?
(iii) शीते व्यायामः कीदृशः स्मृतः ?
(iv) वसन्ते व्यायामः कीदृशः कथितः ?
उत्तराणि:
(i) व्यायामः ।
(ii) बलिनाम्।
(iii) पथ्यतमः।
(iv) पथ्यतमः ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कीदृशानां बलिनां व्यायामः सदा पथ्यः ?
(ii) व्यायामः कदा पथ्यतमः स्मृतः ?
उत्तराणि
(i) स्निग्धभोजिनां बलिनां व्यायामः सदा पथ्यः।
(ii) व्यायामः शीते वसन्ते च पथ्यतमः स्मृतः।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘पथ्यतमः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘स च शीते’ अत्र ‘सः’ इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(iii) ‘हितकारी’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iv) ‘स्मृतः’ अत्र प्रकृति-प्रत्ययौ विभजत।
(v) ‘बलिनां स्निग्धभोजिनाम्’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) तमप् ।
(ii) व्यायामः ।
(iii) पथ्यः ।
(iv) √स्म + क्त।
(v) बलिनाम्।

हिन्दीभाषया पाठबोध:
अन्वयः- हि व्यायामः स्निग्धभोजिनां बलिनां सदा पथ्यः (भवति) सः शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः।

शब्दार्था:- स्निग्धभोजिनाम् = चिकनाई से युक्त भोजन करने वाले। पथ्यः = (अनूकूलः) उचित, स्वास्थ्यकारी। पथ्यतमः = (अनुकूलतमः) सर्वाधिक हितकारी। स्मृतः = (कथितः) कहा गया है।
संदर्भ:-पूर्ववत्
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में वर्णित किया गया है कि व्यायाम शीत ऋतु तथा वसन्त ऋतु में सर्वाधिक स्वास्थ्य प्रदान करने वाला होता है।
सरलार्थ:-निश्चय ही यह व्यायाम चिकनाईयुक्त भोजन खानेवाले बलवान् व्यक्तियों के लिए सदैव हितकर होता है। परन्तु वही व्यायाम शीत और वसन्त ऋतुओं में सबसे अधिक हितकारी कहा गया है।
भावार्थ:-व्यायाम करने वाले मनुष्य को चिकनाईयुक्त भोजन दूध आदि अवश्य लेना चाहिए, क्योंकि व्यायाम करने से पसीना अधिक आता है, वसा जल जाती है। इसका संतुलन चिकनाईयुक्त भोजन से ही हो पाता है। यद्यपि व्यायाम सभी ऋतुओं में हितकारी होता है, परन्तु शीत और वसन्त ऋतुओं में व्यायाम का लाभ सर्वाधिक होता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

9. सर्वेष्वतुष्वहरहः पुम्भिरात्महितैषिभिः।
बलस्यार्धेन कर्त्तव्यो व्यायामो हन्त्यतोऽन्यथा ॥१॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) कीदृशैः पुम्भिः व्यायामः कर्तव्यः ?
(ii) केषु ऋतुषु व्यायामः कर्तव्यः ?
(iii) कस्य अर्धेन व्यायामः कर्तव्यः ?
(iv) अहरहः कः कर्तव्यः ?
उत्तराणि:
(i) आत्महितैषिभिः ।
(ii) सर्वेषु ।
(iii) बलस्य।
(iv) व्यायामः ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) अहरहः कैः व्यायामः कर्तव्यः ?
(ii) व्यायामः कदा हन्ति ?
(iii) व्यायामः कदा कर्तव्यः ?
उत्तराणि
(i) अहरहः आत्महितैषिभिः पम्भिः व्यायामः कर्तव्यः।
(ii) बलस्यार्धेन व्यायामः कर्तव्यः अतोऽन्यथा व्यायामः हन्ति।
(iii) व्यायामः सर्वेषु ऋतुषु अहरहः कर्तव्यः।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘प्रतिदिनम्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘कर्तव्यः’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(iii) ‘कर्तव्यः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iv) ‘हन्त्यतोऽन्यथा’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत ?
(v) ‘मनुष्यैः’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) अहरहः ।
(ii) ऋतुषु।
(iii) तव्यत्।
(iv) हन्ति + अतः + अन्यथा।
(v) पुम्भिः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-आत्महितैषिभिः पुम्भिः सर्वेषु ऋतुषु अहरह: बलस्य अर्धेन व्यायामः कर्तव्यः अत: अन्यथा हन्ति।
शब्दार्था:- अहरहः = (प्रतिदिनम्) प्रत्येक दिन। पुम्भिः = (पुरुषैः) पुरुषों के द्वारा। आत्महितैषिभिः = (आत्मनः हितेच्छुकैः) अपना हित चाहने वालों द्वारा।
संदर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में बताया गया है कि मनुष्य को अपने बल का आधा व्यायाम ही करना उचित है।
सरलार्थः-अपना हित चाहनेवाले मनुष्यों को सब ऋतुओं में प्रतिदिन अपने शरीर-बल का आधा व्यायाम करना चाहिए; इससे भिन्न अर्थात् आधे बल से अधिक व्यायाम करने पर यह व्यायाम हानिकारक होता है।
भावार्थ:-व्यायाम कितना करना चाहिए? इसके उत्तर में सुश्रुत ऋषि का मत है कि मनुष्य का जितना बल हो उससे आधा व्यायाम करना ही हितकारी होता है, अन्यथा व्यायाम मनुष्य को स्वस्थ करने के स्थान पर रोगी बना देता है। कहा भी है-‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’-अति किसी भी विषय में नहीं करनी चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

10. हृदिस्थानास्थितो वायुर्यदा वक्त्रं प्रपद्यते।
व्यायाम कुर्वतो जन्तोस्तबलार्धस्य लक्षणम् ॥ 10 ॥ .

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) वायुः कुत्र स्थितः भवति ?
(ii) वायु कं प्रपद्यते ?
(ii) अत्र कस्य लक्षणं कथितम् ?
(iv) अत्र किं कुर्वत: जन्तोः लक्षणं कथितम् ?
उत्तराणि:
(i) हृदि।
(ii) वक्त्रम्।
(iii) बलार्धस्य।
(iv) व्यायामम्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कीदृशः वायुः वक्त्रं प्रपद्यते ?
(ii) अत्र बलार्धस्य किं लक्षणं कथितम् ?
उत्तराणि
(i) हृदिस्थानास्थितः वायुः वक्त्रं प्रपद्यते।
(ii) यदा व्यायाम कुर्वतः जन्तोः हृदिस्थानास्थितः वायुः वक्त्रं प्रपद्यते, तत् बलार्धस्य लक्षणं कथितम्।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘मुखम्’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः ?
(ii) ‘व्यायाम कुर्वतो जन्तोः’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(iii) ‘आस्थितः’ अत्र प्रकृति-प्रत्यय-निर्देशं कुरुत ?
(iv) ‘जन्तोः’ इति पदे का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
(v) ‘परिभाषा’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) वक्त्रम्।
(ii) जन्तोः ।
(iii) आ + √स्था + क्त ।
(iv) षष्ठी विभक्तिः ।
(v) लक्षणम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-व्यायामं कुर्वतः जन्तोः हृदिस्थानास्थितः वायुः यदा वक्त्रं प्रपद्यते तद् बलार्धस्य लक्षणम्।
शब्दार्थाः- हृदि = (हृदये) हृदय में। आस्थितः = (विद्यमानः) ठहरा हुआ। वक्त्रम् = (मुखम्) मुख को। प्रपद्यते = (प्राप्नोति) प्राप्त करता है। जन्तोः = (प्राणिनः) व्यक्ति का।
संदर्भः-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में व्यायाम के प्रसंग में व्यक्ति के अच्छे बल की पहचान बताई गई है।
सरलार्थ:-व्यायाम को करते हुए व्यक्ति के हृदय में उचित स्थान पर स्थित श्वास वायु जब मुख तक पहुँचने लगती है, तब आधे बल का लक्षण होता है।
भावार्थः-व्यायाम करते हुए हृदय में स्थित वायु प्रबलता से मुख में पहुँचने लगती है अर्थात् मनुष्य हाँपने लगता है, इस अवस्था को उस मनुष्य का आधा बल समझना चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

11. वयोबलशरीराणि देशकालाशनानि च।
समीक्ष्य कुर्याद् व्यायाममन्यथा रोगमाप्नुयात् ॥ 11॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) वयोबलशरीराणि समीक्ष्य किं कुर्यात् ?
(ii) देशकालाशनानि किं कृत्वा व्यायाम कुर्यात् ?
(iii) अन्यथा कम् आप्नुयात् ?
(iv) ‘लभेत’ इति स्थाने प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) व्यायामम्।
(ii) समीक्ष्य।
(iii) रोगम्।
(iv) प्राप्नुयात् ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) किं समीक्ष्य व्यायामं कुर्यात् ?
(ii) रोगं कदा आप्नुयात् ?
उत्तराणि
(i) वयोबलशरीराणि देशकालाशनानि च समीक्ष्य व्यायाम कुर्यात् ।
(ii) यदि वयोबलादीनि न समीक्ष्य व्यायामं कुर्यात् तदा रोगम् आप्नुयात्।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘सम्यक् विचार्य इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘भोजनम्’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः ?
(iii) ‘अविचार्य’ इत्यस्य प्रयुक्तं विपरीतार्थकपदं किम् ?
(iv) ‘समीक्ष्य’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(v) ‘आयुः’ इत्यस्य कः पर्यायः अत्र प्रयुक्तः ?
उत्तराणि:
(i) समीक्ष्य।
(ii) अशनम्।
(iii) समीक्ष्य।
(iv) ल्यप् ।
(v) वयः।

हिन्दीभाषया पाठबोध:
अन्वयः-वयः बलशरीराणि देश-काल-अशनानि च समीक्ष्य व्यायामं कुर्यात् अन्यथा रोगम् आप्नुयात्।
शब्दार्थाः- देशकालाशनानि = देश और काल के अनुरूप भोजन। अशनानि = (आहाराः/भोजनानि) भोजन। समीक्ष्य = (परीक्ष्य) परीक्षण करके।
संदर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में बताया गया है कि व्यायाम कितना करना चाहिए।
सरलार्थः- मनुष्य को अपनी आयु, बल, शरीर, स्थान, समय तथा भोजन का सोच-विचार करके व्यायाम करना चाहिए, अन्यथा रोगों को प्राप्त होता है।
भावार्थ:-व्यायाम करते समय कुछ सावधानियाँ आवश्यक हैं। व्यायाम करने वाले मनुष्य को यह ध्यान करना बहुत आवश्यक है कि उसकी आयु क्या है, उसका शरीर बल कितना है, शरीर की प्रकृति कैसी है, व्यायाम वाला स्थान कैसा है, व्यायाम किस समय या किस ऋतु में किया जा रहा है। यदि कोई मनुष्य इन बातों पर ध्यान दिए बिना व्यायाम करेगा तो यह व्यायाम ही उसे रोगी बना देगा।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

व्यायामः सर्वदा पथ्यःSummary in Hindi

व्यायामः सर्वदा पथ्यः पाठ-परिचय

(व्यायाम सदा हितकारी होता है)
‘सुश्रुत संहिता’ आयुर्वेद का अत्यन्त प्राचीन चिकित्सा शास्त्र है। इसकी रचना ईसा पर्व तीसरी शताब्दी में मानी जाती है। सुश्रुत संहिता में मुख्य रूप से शल्य चिकित्सा, विष, चिकित्सा तथा स्वास्थ्य के नियमों का निरुपण किया गया है। सुश्रुत संहिता छः खण्डों में विभाजित है.
(1) सूत्र स्थान (46 अध्याय, (2) निदान स्थान (16 अध्याय), (3) शारीर स्थान (10 अध्याय), (4) चिकित्सा स्थान (40 अध्याय), (5) कल्प स्थान (8 अध्याय), उत्तर तन्त्र (66 अध्याय)। सुश्रुत संहिता के लेखक आचार्य सुश्रुत हैं, जिनकी ख्याति चरक संहिता के रचयिता आचार्य चरक के तुल्य ही है।
प्रस्तुत पाठ ‘व्यायामः सर्वदा पथ्यः’ आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सुश्रुतसंहिता’ के चिकित्सा स्थान में वर्णित 24 वें अध्याय से संकलित है। इसमें आचार्य सुश्रुत ने व्यायाम की परिभाषा बताते हुए उससे होने वाले लाभों की चर्चा की है। शरीर में सुगठन, कान्ति, स्फूर्ति, सहिष्णुता, नीरोगता आदि व्यायाम के प्रमुख लाभ हैं। इनकी प्राप्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर के अनुकूल व्यायाम अवश्य करना चाहिए।

व्यायामः सर्वदा पथ्यः पाठस्य सारांश:
‘व्यायामः सर्वदा पथ्यः’ यह पाठ चरक मुनि द्वारा रचित चरक संहिता से लिया गया है। इस पाठ में व्यायाम से होने वाले लाभ व्यायाम की मात्रा आदि के बारे में बताया गया है। पाठ का सारांश इस प्रकार है
जिससे शरीर में थकावट पैदा हो उस कर्म को व्यायाम कहते हैं। ऐसा परिश्रम वाला कार्य करके पूरे शरीर का भलीभाँति मर्दन करना चाहिए। व्यायाम से शरीर की वृद्धि, सुडौलता, जठराग्नि का प्रदीप्त होना, आलस्यहीनता, स्फूर्ति तथा मोटापे को दूर करने आदि अनेक लाभ होते हैं। जो व्यक्ति नियमपूर्वक व्यायाम करता है ; उसका शरीर बलिष्ठ होता है और उसे बुढ़ापा भी देर से आता है। उसकी पाचक अग्नि इतनी तेज़ हो जाती है कि उसे पका, अधपका यहाँ तक कि कच्चा भोजन भी बिना किसी दोष के पच जाता है। व्यायाम करने से शरीर से पसीना निकलता है और पसीने के साथ कुछ खनिज भी बाहर निकल जाते हैं। अत: व्यायाम करने वाले व्यक्ति को दूध घी आदि चिकनाईयुक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए । व्यायाम यद्यपि सभी ऋतुओं में लाभकारी होता है परन्तु शीत और वसन्त ऋतु में व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम होता है। व्यायाम की मात्रा अपने बल के आधे से अधिक नहीं होनी चाहिए। जब व्यायाम करते हुए फेफड़ों में स्थित वायु बलपूर्वक मुँह के रास्ते बाहर आने लगती है तब समझना चाहिए कि आधा बल हो चुका है। व्यायाम करते समय स्थानीय वातावरण, शरीर के बल, आयु तथा उपलब्ध भोजन का भी ध्यान रखना चाहिए ; अन्यथा व्यायाम स्वास्थ्य देने के स्थान पर शरीर को रोगों का घर बना देता है।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 15 स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 15 स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 15 स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन

HBSE 10th Class Hindi स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन Textbook Questions and Answers

स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class Kshitij प्रश्न 1.
कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया?
उत्तर-
कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। द्विवेदी जी ने निम्नलिखित तर्क देकर स्त्रियों की शिक्षा का समर्थन किया है

(i) नाटकों में स्त्रियों का प्राकृत बोलना उनके अनपढ़ होने का प्रमाण नहीं है। वाल्मीकि रामायण में बंदर भी संस्कृत बोलते थे तो क्या स्त्रियाँ संस्कृत नहीं बोल सकती थीं।
(ii) बौद्ध धर्म का त्रिपिटक ग्रंथ, जो महाभारत से भी बड़ा ग्रंथ है, वह प्राकृत भाषा में रचित है। इसका प्रमुख कारण है कि प्राकृत उस समय जनभाषा थी। अतः प्राकृत बोलना अशिक्षित होने का चिह्न नहीं है। प्राकृत उस समय समाज की भाषा थी।
(iii) उस समय कुछ चुने हुए लोग ही संस्कृत बोल सकते थे। इसलिए दूसरे लोगों के साथ-साथ स्त्रियों की भाषा प्राकृत रखने का नियम बना दिया गया था।

Stri Shiksha Ke Virodhi Kutarkon Ka Khandan HBSE 10th Class Kshitij प्रश्न 2.
‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं। कुतर्कवादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने कैसे किया है? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
‘स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं।’-कुतर्कवादियों की इस दलील का खंडन करते हुए द्विवेदी जी ने लिखा है कि पढ़ने-लिखने से ऐसी कोई बात नहीं होती। अनर्थ तो पढ़े-लिखे व अनपढ़ दोनों से हो सकता है। स्त्रियों के पढ़ने से यदि अनर्थ होता है तो पुरुष भी पढ़-लिखकर कितने गलत कार्य करते हैं तो उनके लिए शिक्षित होने की मनाही क्यों नहीं की जाती। यदि पढ़ने-लिखने से स्त्रियाँ अनर्थकारी होती हैं तो इसमें स्त्रियों का दोष नहीं है, अपितु यह शिक्षा-प्रणाली का दोष है। अतः स्त्रियों को अवश्य शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। हमें दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली में ही संशोधन कर देना चाहिए।

स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन Summary HBSE 10th Class Kshitij प्रश्न 3.
द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा विरोधी कुतों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है जैसे ‘यह सब पापी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करतीं।’ आप ऐसे अन्य अंशों को निबंध में से छाँटकर समझिए और लिखिए।
उत्तर-
im

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स्त्री शिक्षा पर पोस्टर इन हिंदी HBSE 10th Class Kshitij प्रश्न 4.
पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना क्या उनके अपढ़ होने का सबूत है-पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
प्राचीनकाल में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा बोलने के अनेकानेक प्रमाण मिलते हैं। किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि प्राकृत बोलना उनके अनपढ़ होने का प्रमाण है, या फिर प्राकृत भाषा अनपढ़ों की भाषा है। सच्चाई यह है कि प्राकृत उस समय की जन-साधारण की भाषा थी। वैसे ही जैसे आज हिंदी, बाँग्ला, गुजराती आदि प्राकृत भाषाएँ हैं। अतः प्राकृत भाषा में बोलने के कारण महिलाओं को अनपढ़ कहना अनुचित है।

प्रश्न 5.
परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ाते हों तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर-
स्त्री-शिक्षा के विरोधियों का कुतर्क है कि यदि स्त्रियों को शिक्षा दी जाएगी तो अनर्थ हो जाएगा। यह बात तब तक सही थी कि पढ़-लिखकर कोई पुरुष अनर्थ न करता हो। पुरुष स्त्रियों की अपेक्षा अधिक अनर्थ करते हैं। एम.ए., बी.ए., शास्त्री और आचार्य होने के बावजूद भी पुरुष स्त्रियों को हंटर से पीटते हैं। अतः स्पष्ट है कि अनर्थ के पीछे पढ़ना-लिखना कोई कारण नहीं है। पढ़-लिखकर स्त्रियाँ किसी से कम नहीं रहीं। स्त्रियों ने पुरुषों के समान वेद-रचना तक की है और उन्हें अक्षर ज्ञान देना तक पाप समझें। यह बात तर्क सम्मत नहीं है। अतः स्त्री-पुरुष दोनों को पढ़ने का समान रूप से अधिकार है। स्त्रियों को शिक्षा नहीं दी जानी चाहिए। यह समानता की बात नहीं है। अतः इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 6.
तब की शिक्षा प्रणाली और अब की शिक्षा प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।
उत्तर-
तब स्त्रियों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं थी। उनके लिए कोई विद्यालय या विश्वविद्यालय तक नहीं थे। आज स्त्रियों को शिक्षित करने के लिए स्कूल, कॉलेज व विश्वविद्यालय हैं। स्त्रियाँ पुरुषों के साथ भी शिक्षा ग्रहण करती हैं। पहले ऐसा संभव नहीं था।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 7.
महावीरप्रसाद द्विवेदी का निबंध उनकी दूरगामी और खुली सोच का परिचायक है, कैसे?
उत्तर-
महावीरप्रसाद द्विवेदी महान् चिंतक एवं साहित्यकार थे। वे इस बात को भली-भाँति समझते थे कि स्त्रियों को शिक्षा दिए बिना समाज के पिछड़ेपन को दूर नहीं किया जा सकता। वे चाहते थे कि स्त्रियों को शिक्षित करके उनकी प्रतिभा का प्रयोग समाज के विकास के लिए किया जाए। वे स्त्री-पुरुष में समानता के अधिकार के पक्ष में थे। जो बात उन्होंने सौ वर्ष पूर्व सोची थी, वह आज पूर्णतः सत्य घटित होती जा रही है। गाँवों में स्त्रियों की शिक्षा की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वहाँ अनपढ़ स्त्रियों की संख्या अधिक है। स्त्री के शिक्षित होने से पूरा परिवार शिक्षित हो सकता है। स्त्रियों की शिक्षा की ओर विशेष ध्यान देना होगा। जिस घर में स्त्री शिक्षित होगी तो उस परिवार के बच्चे अच्छी शिक्षा ग्रहण करेंगे। अतः यह कथन पूर्णतः सत्य है कि यह निबंध महावीरप्रसाद द्विवेदी की खुली एवं दूरगामी सोच का परिचायक है।

प्रश्न 8.
द्विवेदी जी की भाषा-शैली पर एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर-
द्विवेदी जी आधुनिक हिंदी गद्य की भाषा के जनक कहे जाते हैं। उन्होंने भाषा के संबंध में अत्यंत उदार दृष्टिकोण अपनाया है। उन्होंने अपनी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ विषय की माँग के अनुकूल उर्दू-फारसी के शब्दों का भी प्रयोग किया है। उन्होंने छोटे व सुगठित वाक्यों का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में निरंतर प्रवाह बना रहता है। उनकी भाषा तो ऐसी है मानो कोई अध्यापक अपने छात्रों को समझा रहा हो। इस निबंध में द्विवेदी जी ने वर्णनात्मक एवं विचारात्मक शैलियों का प्रयोग किया है। कहीं-कहीं व्यंग्यात्मक भाषा का भी सफल एवं सुंदर प्रयोग किया गया है। शब्द विधान सरल एवं लघु वाक्य रचना है। भाषा आदि से अंत तक सजीवता एवं प्रवाहमयता लिए हुए है। द्विवेदी जी ने भाषा की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया है।

भाषा-अध्ययन

प्रश्न 9.
निम्नलिखित अनेकार्थी शब्दों को ऐसे वाक्यों में प्रयुक्त कीजिए जिनमें उनके एकाधिक अर्थ स्पष्ट होंचाल, दल, पत्र, हरा, पर, फल, कुल।.
उत्तर-
चाल- मैं तुम्हारी चाल भली-भाँति समझता हूँ।
उसकी चाल हाथी की भाँति मस्त है।

दल – टिड्डी दल ने फसल नष्ट कर दी।
मोहन काँग्रेस दल का नेता नहीं है।

पत्र – मैंने अपने पिताजी को पत्र लिखा था।
पूजा के लिए बेल-पत्र लाओ।

हरा – हमारा देश हरा-भरा है।
भारत ने क्रिकेट में पाकिस्तान को हरा दिया।

पर – मैं मोहन के घर गया पर वह तब जा चुका था।
मोर के पर सुंदर हैं।

फल- मेहनत का फल अच्छा है।
फल खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

कुल – उसे परीक्षा में कुल 500 अंक प्राप्त हुए हैं।
वह उच्च कुल से संबंधित है।

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पाठेतर सक्रियता

अपनी दादी, नानी और माँ से बातचीत कीजिए और (स्त्री-शिक्षा संबंधी) उस समय की स्थितियों का पता लगाइए और अपनी स्थितियों से तुलना करते हुए निबंध लिखिए। चाहें तो उसके साथ तसवीरें भी चिपकाइए।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

लड़कियों की शिक्षा के प्रति परिवार और समाज में जागरूकता आए-इसके लिए आप क्या-क्या करेंगे?
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

स्त्री-शिक्षा पर एक पोस्टर तैयार कीजिए।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

स्त्री-शिक्षा पर एक नुक्कड़ नाटक तैयार कर उसे प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

यह भी जानें

भवभूति- संस्कृत के प्रधान नाटककार हैं। इनके तीन प्रसिद्ध ग्रंथ-वीररचित, उत्तररामचरित और मालतीमाधव हैं। भवभूति करुणरस के प्रमुख लेखक थे।
विश्ववरा-अत्रिगोत्र की स्त्री। ये ऋग्वेद के पाँचवें मंडल 28वें सूक्त की एक में से छठी ऋक् की ऋषि थीं। शीला-कौरिडन्य मुनि की पत्नी का नाम । थेरीगाथा-बौद्ध भिक्षुणियों की पद्य रचना इसमें संकलित है।
अनुसूया-अक्रि मुनि की पत्नी और दक्ष प्रजापति की कन्या।
गार्गी–वैदिक समय की एक पंडिता ऋषिपुत्री। इनके पिता का नाम गर्ग मुनि था। मिथिला के जनकराज की सभा में इन्होंने पंडितों के सामने याज्ञवल्क्य के साथ वेदांत शास्त्र विषय पर शास्त्रार्थ किया था।
गाथा सप्तशती-प्राकृत भाषा का ग्रंथ जिसे हाल द्वारा रचित माना जाता है।
कुमारपाल चरित्र-एक ऐतिहासिक ग्रंथ है, जिसे 12वीं शताब्दी के अंत में अज्ञातनामा कवि ने अनहल के राजा कुमारपाल के लिए लिखा था। इसमें ब्रह्मा से लेकर राजा कुमारपाल तक बौद्ध राजाओं की वंशावली का वर्णन है।
त्रिपिटक ग्रंथ – गौतम बुद्ध ने भिक्षु-भिक्षुणियों को अपने सारे उपदेश मौखिक दिए थे। उन उपदेशों को उनके शिष्यों ने कंठस्थ कर लिया था और बाद में उन्हें त्रिपिटक के रूप में लेखबद्ध किया गया। वे तीन त्रिपिटक हैं-सुत या सूत्र पिटक, विनय पिटकं और ‘ अभिधर्म पिटक।
शाक्य मुनि- शक्यवंशीय होने के कारण गौतम बुद्ध को शाक्य मुनि भी कहा जाता है।
नाट्यशास्त्र-भरतमुनि रचित काव्यशास्त्र संबंधी संस्कृत के इस ग्रंथ में मुख्यतः रूपक (नाटक) का शास्त्रीय विवेचन किया गया है। इसकी रचना 300 ईसा पूर्व मानी जाती है।
कालिदास-संस्कृत के महान् कवियों में कालिदास की गणना की जाती है। उन्होंने कुमारसंभव, रघुवंश (महाकाव्य), ऋतु संहार, मेघदूत (खंडकाव्य), विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्र और अभिज्ञान शाकुंतलम् (नाटक) की रचना की।
आजादी के आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ी पंडिता रमाबाई ने स्त्रियों की शिक्षा एवं उनके शोषण के विरुद्ध जो आवाज़ उठाई उसकी एक झलक यहाँ प्रस्तुत है। आप ऐसे अन्य लोगों के योगदान के बारे में पढ़िए और मित्रों से चर्चा कीजिए

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पंडिता रमाबाई

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पाँचवाँ अधिवेशन 1889 में मुंबई में आयोजित हुआ था। खचाखच भरे हॉल में देश भर के नेता एकत्र हुए थे।
एक सुंदर युवती अधिवेशन को संबोधित करने के लिए उठी। उसकी आँखों में तेज और उसके कांतिमय चेहरे पर प्रतिभा झलक रही थी। इससे पहले कांग्रेस अधिवेशनों में ऐसा दृश्य देखने में नहीं आया था। हॉल में लाउडस्पीकर न थे। पीछे बैठे हुए लोग उस युवती की आवाज़ नहीं सुन पा रहे थे। वे आगे की ओर बढ़ने लगे। यह देखकर युवती ने कहा, “भाइयो, मुझे क्षमा कीजिए। मेरी आवाज़ आप तक नहीं पहुंच पा रही है। लेकिन इस पर मुझे आश्चर्य नहीं है। क्या आपने शताब्दियों तक कभी किसी महिला की आवाज़ सुनने की कोशिश की? क्या आपने उसे इतनी शक्ति प्रदान की कि वह अपनी आवाज़ को आप तक पहुँचने योग्य बना सके?”
प्रतिनिधियों के पास इन प्रश्नों के उत्तर न थे।

इस साहसी युवती को अभी और बहुत कुछ कहना था। उसका नाम पंडिता रमाबाई था। उस दिन तक स्त्रियों ने कांग्रेस के अधिवेशनों में शायद ही कभी भाग लिया हो। पंडिता रमाबाई के प्रयास से 1889 के उस अधिवेशन में 9 महिला प्रतिनिधि सम्मिलित हुई थीं।

वे एक मूक प्रतिनिधि नहीं बन सकती थीं। विधवाओं को सिर मुंडवाए जाने की प्रथा के विरोध में रखे गए प्रस्ताव पर उन्होंने एक ज़ोरदार भाषण दिया। “आप पुरुष लोग ब्रिटिश संसद में प्रतिनिधित्व की माँग कर रहे हैं जिससे कि आप भारतीय जनता की राय वहाँ पर अभिव्यक्त कर सकें। इस पंडाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चीख-चिल्ला रहे हैं तब आप अपने परिवारों में वैसी ही स्वतंत्रता महिलाओं को क्यों नहीं देते? आप किसी महिला को उसके विधवा होते ही कुरूप और दूसरों पर निर्भर होने के लिए क्यों विवश करते हैं? क्या कोई विधुर भी वैसा करता है? उसे अपनी इच्छा के अनुसार जीने की स्वतंत्रता है। तब स्त्रियों को वैसी स्वतंत्रता क्यों नहीं मिलती?”

निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि पंडिता रमाबाई ने भारत में नारी-मुक्ति आंदोलन की नींव डाली।
वे बचपन से ही अन्याय सहन नहीं कर पाती थीं। एक दिन उन्होंने नौ वर्ष की एक छोटी-सी लड़की को उसके पति के शव के साथ भस्म किए जाने से बचाने की चेष्टा की। “यदि स्त्री के लिए सम्म होकर सती बनना अनिवार्य है तो क्या पुरुष भी पत्नी की मृत्यु के बाद सता होते हैं?” रौबपूर्वक पूछे गए इस प्रश्न का उस लड़की की माँ के पास कोई उत्तर न था। उसने केवल इतना कहा कि “यह पुरुषों की दुनिया है। कानून वे ही बनाते हैं, स्त्रियों को तो उनका पालन भर करना होता है।” रमाबाई ने पलटकर पूछा, “स्त्रियाँ ऐसे कानूनों को सहन क्यों करती हैं? मैं जब बड़ी हो जाऊँगी तो ऐसे कानूनों के विरुद्ध संघर्ष करूँगी।” सचमुच उन्होंने पुरुषों द्वारा महिलाओं के प्रत्येक प्रकार के शोषण के विरुद्ध संघर्ष किया।

HBSE 10th Class Hindi स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन Important Questions and Answers

विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्त्री-शिक्षा के विरोधी लोगों के क्या तर्क हैं? पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में स्त्री-शिक्षा विरोधी लोगों ने स्त्री-शिक्षा के विरोध में निम्नलिखित तर्क दिए हैं
स्त्री-शिक्षा की आवश्यकता प्राचीनकाल में नहीं थी, इसलिए प्राचीनकाल के पुराणों व इतिहास में स्त्री-शिक्षा की किसी भी प्रणाली के प्रमाण नहीं मिलते। इसलिए स्त्री-शिक्षा की आज भी आवश्यकता नहीं है।
स्त्री-शिक्षा के विरोधियों का यह भी तर्क है कि स्त्री-शिक्षा से अनर्थ होते हैं। शकुंतला ने दुष्यंत को जो कुवाक्य कहे, वे स्त्री-शिक्षा के अनर्थ का परिणाम है।
संस्कृत नाटकों में स्त्री-पात्रों के मुख से प्राकृत भाषा बुलवाई गई है। उस समय प्राकृत को गँवार भाषा समझा जाता था। इससे पता चलता है कि उन्हें संस्कृत का ज्ञान नहीं था, वे गँवार व अनपढ़ थीं। उनकी दृष्टि में तो गँवार भाषा के ज्ञान से भी अनर्थ हुआ।

प्रश्न 2.
पुरातन पंथी लोगों ने शकुंतला पर जो आरोप लगाया क्या आप उससे सहमत हैं?
उत्तर-
पुरातन पंथी लोगों ने शकुंतला पर आरोप लगाया है कि उसने अशिक्षा के कारण ही राजा दुष्यंत को कुवाक्य कहे। यदि वह शिक्षित होती तो ऐसा अनर्थ न करती। हम पुरातन पंथियों के इस आरोप से सहमत नहीं हैं। यहाँ प्रश्न शिक्षा व अशिक्षा का नहीं है। यहाँ प्रश्न है कि दुष्यंत ने शकुंतला से गांधर्व विवाह किया और जब वह उससे मिलने आई तो उसने उसे पहचानने से ही इंकार कर दिया। ऐसी स्थिति में तो कोई भी कुवाक्य ही कहता। यहाँ शकुंतला की शिक्षा को दोष देना उचित नहीं है।

प्रश्न 3.
संस्कृत और प्राकृत के संबंध पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
संस्कृत प्राचीन एवं शुद्ध साहित्यिक भाषा है। इस भाषा को जानने वाले बहुत कम लोग थे। उस समय संस्कृत के साथ-साथ कुछ प्राकृत भाषाएँ भी प्रचलित थीं। ये सभी भाषाएँ संस्कृत से ही निकली हुई जनभाषाएँ थीं। मागधी, महाराष्ट्री, पाली, शौरसेनी आदि अपने समय की लोक-भाषाएँ थीं। इन्हें प्राकृत भाषाएँ भी कहा जाता है। बौद्ध और जैन साहित्य इन्हीं भाषाओं में रचित साहित्य हैं। अतः प्राकृत भाषाएँ गँवार या अनपढ़ों की भाषा नहीं है।

प्रश्न 4.
संस्कृत नाटकों में स्त्री पात्रों द्वारा संस्कृत न बोल पाना क्या उनकी अनपढ़ता का प्रमाण है? पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर-
स्त्री-शिक्षा के विरोधियों ने प्राचीनकाल में भी स्त्रियों को अनपढ़ व गँवार सिद्ध करने के लिए नाटकों का उदाहरण देते हुए कहा है कि नाटकों में नारी पात्रों द्वारा संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत भाषा बुलवाई जाती थी क्योंकि संस्कृत सुशिक्षितों की भाषा थी और प्राकृत लोक भाषा या जनभाषा थी। किंतु लेखक इन पुरातन पंथियों व स्त्री-शिक्षा विरोधियों के तर्क को उचित नहीं समझता। उनके अनुसार प्राकृत बोलना अनपढ़ता का सबूत नहीं है। उस समय आम बोलचाल में प्राकृत भाषा का ही प्रयोग किया जाता था। संस्कृत भाषा का प्रचलन तो कुछ ही लोगों तक सीमित था। अतः यही कारण रहा होगा कि नाट्यशास्त्रियों ने नाट्यशास्त्र संबंधी नियम बनाते समय इस बात का ध्यान रखा होगा क्योंकि संस्कृत को कुछ ही लोग बोल सकते थे। इसलिए कुछ पात्रों को छोड़कर अन्य पात्रों से प्राकृत बुलवाने का नियम बनाया जाए। इस प्रकार स्त्री पात्रों द्वारा संस्कृत न बोलने के कारण उन्हें अनपढ़ नहीं समझना चाहिए। फिर प्राकृत में भी तो महान् रचनाओं का निर्माण हुआ है।

प्रश्न 5.
‘प्राचीनकाल में प्राकृत भाषा का चलन था’-पाठ के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर-
स्त्री-शिक्षा विरोधियों ने प्राकृत भाषा को अनपढ़ एवं गँवार लोगों की भाषा बताया है। किंतु लेखक ने प्राकृत भाषा को जन-साधारण की भाषा बताया है। उस समय की पढ़ाई-लिखाई भी प्राकृत भाषा में होती थी। उस समय प्राकृत भाषा के प्रचलन का प्रमाण बौद्ध-ग्रंथों एवं जैन-ग्रंथों में मिलता है। दोनों धर्मों के हजारों ग्रंथ प्राकृत भाषा में रचित हैं। महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश भी प्राकृत भाषा में ही दिए हैं। बौद्ध धर्म का महान् ग्रंथ त्रिपिटक भी प्राकृत भाषा में रचित है। ऐसे महान् ग्रंथों का प्राकृत में रचे जाने का कारण यही था कि उस समय जन-भाषा प्राकृत ही थी। अतः प्राकृत अनपढ़ों की भाषा नहीं थी।

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प्रश्न 6.
लेखक के मतानुसार आज के युग में स्त्रियों के शिक्षित होने की आवश्यकता प्राचीनकाल की अपेक्षा अधिक क्यों है? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर-
यदि स्त्री-शिक्षा विरोधियों की बात मान भी ली जाए कि प्राचीनकाल में स्त्रियों को पढ़ाने या शिक्षित करने का प्रचलन नहीं था तो उस समय स्त्रियों को शिक्षा की अधिक आवश्यकता नहीं होगी। किंतु आज के युग में स्त्री-शिक्षा कि आवश्यकता एवं महत्त्व दोनों ही अधिक हैं। आज का युग भौतिकवादी एवं प्रतियोगिता का युग है। इस युग में अनपढ़ता देश व समाज के विकास में बाधा ही नहीं, अपितु देश व समाज के लिए कलंक भी है। नारी का शिक्षित होना तो इसलिए अति आवश्यक है कि जिस परिवार में नारी शिक्षित होगी उस परिवार के बच्चों की शिक्षा-व्यवस्था अच्छी हो सकेगी। शिक्षित नारी ही बच्चों को अच्छे-बुरे की पहचान करने का ज्ञान देकर उन्हें अच्छे नागरिक बना सकेगी। शिक्षित नारी नौकरी करके या अन्य कार्य करके धन कमाकर परिवार के आर्थिक विकास में सहायता कर सकती है। इसीलिए लेखक ने प्राचीनकाल की अपेक्षा आधुनिक युग में स्त्री-शिक्षा को अति आवश्यक बताया है।

प्रश्न 7.
प्राचीन ग्रंथों में स्त्रियों के लिए किस-किस शिक्षा का विधान किया गया था?
उत्तर-
प्राचीन ग्रंथों में कुछ ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि कुमारियों के लिए विभिन्न प्रकार की शिक्षा का प्रबंध था; जैसे चित्र बनाना, नाचने, गाने, बजाने, फूल चुनने, हार गूंथने आदि। लेखक का मानना है कि उन्हें पढ़ने-लिखने की शिक्षा भी निश्चित रूप से दी जाती होगी।

विचार/संदेश संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 8.
लेखक ने किन लोगों को स्त्री-शिक्षा के विरोधी बताया है ?
उत्तर-
लेखक ने बताया है कि जो लोग स्वयं शिक्षित हैं और जिन्होंने बड़े-बड़े स्कूल-कॉलेजों से शिक्षा ग्रहण की है, जो धर्मशास्त्र व संस्कृत साहित्य से परिचित हैं, जिनका काम कुशिक्षितों को सुशिक्षित करना है, जो कुमार्गियों को सुमार्गी बनाते हैं और अधार्मिकों को धर्मतत्त्व समझाते हैं, वही लोग स्त्री-शिक्षा का विरोध करते हैं।

प्रश्न 9.
‘स्त्री शिक्षा की पुराने समय में कोई नियमबद्ध प्रणाली थी, जो शायद नष्ट हो गई थी’ इस बात को सिद्ध करने के लिए लेखक ने कौन-कौन से प्रमाण प्रस्तुत किए हैं ?
उत्तर-
स्त्री-शिक्षा की पुराने समय में कोई नियमबद्ध प्रणाली रही होगी किंतु वह शायद नष्ट हो गई होगी। इस बात को सिद्ध करने के लिए लेखक ने सर्वप्रथम प्रमाण दिया है कि पुराने समय में विमान भी उड़ाए जाते थे तथा बड़े-बड़े जहाज़ों पर सवार होकर लोग एक द्वीप से दूसरे द्वीप पर जाते थे। ऐसी बातें अत्यंत आश्चर्यजनक हैं। इनके बनाने व चलाने के कोई नियमबद्ध प्रमाण नहीं मिलते क्योंकि शायद नष्ट हो गए होंगे। यदि विमानों व जहाज़ों के विषय में विश्वास किया जा सकता है तो स्त्री-शिक्षा की नियमबद्ध प्रणाली होने में विश्वास क्यों नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 10.
‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ नामक पाठ का उद्देश्य अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
इस पाठ का प्रमुख उद्देश्य स्त्री-शिक्षा के विरोधी लोगों के कुतर्कों का जोरदार शब्दों में खंडन करना है। लेखक ने अनेक प्रमाण प्रस्तुत करके सिद्ध करने का सफल प्रयास किया है कि प्राचीनकाल में भी स्त्री-शिक्षा की व्यवस्था थी और अनेक शिक्षित स्त्रियों के नामोल्लेख भी किए गए हैं यथा-गार्गी, अत्रि-पत्नी, विश्ववरा, मंडन मिश्र की पत्नी आदि अनेक विदुषियाँ हुई हैं। आज के युग में स्त्री- शिक्षा नितांत आवश्यक है। शिक्षा कभी किसी का अनर्थ नहीं करती। यदि स्त्री-शिक्षा में कुछ संशोधनों की आवश्यकता पड़े तो कर लेने चाहिएँ। किंतु स्त्री-शिक्षा का विरोध करना कदाचित उचित नहीं है।

प्रश्न 11.
आपकी दृष्टि में क्या स्त्री-शिक्षा अनर्थकारी हो सकती है?
उत्तर-
स्त्री-शिक्षा किसी भी प्रकार से अनर्थ नहीं हो सकती। किसी भी प्रकार की शिक्षा पापाचार नहीं सिखाती। यदि कोई व्यक्ति अर्थात् पुरुष या स्त्री कोई पाप या अपराध करता है तो उसका संबंध शिक्षा से नहीं होता। उनके पापाचार का कारण कुछ और हो सकता है, शिक्षा नहीं क्योंकि शिक्षा तो सबको सद्मार्ग की ओर ले जाती है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 15 स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ नामक पाठ के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ के लेखक महावीरप्रसाद द्विवेदी हैं।

प्रश्न 2.
महावीरप्रसाद द्विवेदी का जन्म कब हुआ था?
उत्तर–
महावीरप्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1864 में हुआ था।

प्रश्न 3.
महावीरप्रसाद द्विवेदी जी का निधन कब हुआ?
उत्तर-
महावीरप्रसाद द्विवेदी का निधन सन् 1938 में हुआ।

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प्रश्न 4.
सर्वप्रथम पठित निबंध किस शीर्षक से प्रकाशित हुआ था?
उत्तर-
सर्वप्रथम पठित निबंध ‘पढ़े-लिखों का पांडित्य’ से प्रकाशित हुआ था।

प्रश्न 5.
शकुंतला ने किस भाषा में श्लोक रचा है?
उत्तर-
शकुंतला ने अनपढ़ गँवारों की भाषा में श्लोक रचा है।

प्रश्न 6.
शंकराचार्य के छक्के किसने छुड़ा दिए? .
उत्तर-
मंडन मिश्र की धर्मपत्नी ने।

प्रश्न 7.
बौद्धों के त्रिपिटिक ग्रंथ की रचना किस भाषा में हुई है?
उत्तर-
बौद्धों के त्रिपिटिक ग्रंथ की रचना प्राकृत ग्रंथ में हुई है।

प्रश्न 8.
‘नाट्यशास्त्र’ संबंधी नियम किस भाषा में लिखित हैं?
उत्तर-
‘नाट्यशास्त्र’ संबंधी नियम संस्कृत भाषा में लिखित हैं।

प्रश्न 9.
गार्गी ने पांडित्यपूर्ण वाद-विवाद में किसे हराया था?
उत्तर-
गार्गी ने पांडित्यपूर्ण वाद-विवाद में ब्रह्मवादियों को हराया था।

प्रश्न 10.
मुमानियत का क्या अर्थ है?
उत्तर-
मुमानियत का अर्थ मनाही है।

प्रश्न 11.
मण्डन मिश्र की सहधर्मचारिणी ने किसके छक्के छुड़ा दिए?
उत्तर-
शंकराचार्य के।

प्रश्न 12.
कालिदास के युग में जन-साधारण के बोलचाल की कौन-सी भाषा बताई गई है?
उत्तर–
कालिदास के युग में जन-साधारण के बोलचाल की प्राकृत भाषा बताई गई है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सीता ने राम को क्या संबोधित करके अपना क्रोध प्रकट किया था?
(A) स्वामी
(B) आर्य पुत्र
(C) भगवन्
(D) राजा
उत्तर-
(D) राजा

प्रश्न 2.
त्रिपिटक ग्रंथों की रचना किसने की थी?
(A) बौद्धों ने
(B) नाथों ने
(C) सिद्धों ने
(D) जैनों ने
उत्तर-
(A) बौद्धों ने

प्रश्न 3.
प्रस्तुत लेख पहली बार प्रकाशित हुआ था-
(A) धर्मयुग में
(B) कल्याण में
(C) हिंदुस्तान में
(D) सरस्वती में
उत्तर-
(D) सरस्वती में

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 15 स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन

प्रश्न 4.
महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित पत्रिका का नाम था-
(A) हंस
(B) सरस्वती
(C) आलोचना
(D) कादम्बिनी
उत्तर-
(B) सरस्वती

प्रश्न 5.
महावीरप्रसाद द्विवेदी ने साहित्य के क्षेत्र में कौन-सा महान कार्य किया था?
(A) निबंध लेखन का
(B) पत्रिका संपादन का
(C) भाषा सुधार का
(D) आलोचना का
उत्तर-
(C) भाषा सुधार का

प्रश्न 6.
‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ शीर्षक निबंध प्रथम बार कब प्रकाशित हुआ था?
(A) सन् 1910 में
(B) सन् 1914 में
(C) सन् 1916 में
(D) सन् 1918 में
उत्तर-
(B) सन् 1914 में

प्रश्न 7.
लेखक के अनुसार आजकल कैसे शिक्षित लोग विद्यमान हैं?
(A) स्त्री-शिक्षा के पक्षधर
(B) स्त्री-शिक्षा के विरोधी
(C) स्त्री-शिक्षा को अनर्थ कहने वाले
(D) स्त्री-शिक्षा को फालतू की वस्तु बताने वाले
उत्तर-
(B) स्त्री-शिक्षा के विरोधी

प्रश्न 8.
पुराने संस्कृत कवियों के नाटकों में कुलीन स्त्रियों से किस भाषा में बातें कराई गई हैं?
(A) संस्कृत में
(B) पढ़े-लिखों की भाषा में
(C) विद्वत्तापूर्ण
(D) अपढ़ों की भाषा में
उत्तर-
(D) अपढ़ों की भाषा में

प्रश्न 9.
शकुंतला ने किसे कटु वाक्य कहे थे?
(A) दुष्यंत को
(B) ऋषि कण्व को ।
(C) ऋषि दुर्वासा को
(D) अपने पिता को
उत्तर-
(A) दुष्यंत को

प्रश्न 10.
शकुंतला ने दुष्यन्त से कैसा विवाह किया था?
(A) आसुरी
(B) आर्यसमाजी
(C) गांधर्व
(D) वैदिक
उत्तर-
(C) गांधर्व

प्रश्न 11.
‘शिक्षा’ शब्द कैसा है?
(A) व्यापक
(B) सीमित
(C) संकुचित
(D) महत्त्वपूर्ण
उत्तर-
(A) व्यापक

प्रश्न 12.
किसकी धर्मपत्नी ने शंकराचार्य के छक्के छुड़ा दिए थे?
(A) अत्रि की
(B) महावीर प्रसाद की
(C) मंडन मिश्र की
(D) भरत मुनि की
उत्तर-
(C) मंडन मिश्र की

प्रश्न 13.
श्रीमद्भागवत के कौन-से स्कंध में रुक्मिणी हरण की कथा है?
(A) पंचम
(B) सप्तम
(C) दशम
(D) द्वादश
उत्तर-
(C) दशम

प्रश्न 14.
हिंदू लोग वेदों को किसके द्वारा रचित मानते हैं? .
(A) पंडितों द्वारा
(B) ईश्वर द्वारा
(C) ऋषियों द्वारा
(D) विद्यार्थियों द्वारा
उत्तर-
(B) ईश्वर द्वारा

प्रश्न 15.
जिस समय आचार्यों ने नाट्यशास्त्र संबंधी नियम बनाए थे उस समय सर्वसाधारण की भाषा क्या थी?
(A) हिन्दी
(B) अंग्रेजी
(C) प्राकृत
(D) संस्कृत
उत्तर-
(C) प्राकृत

प्रश्न 16.
किस ऋषि की पत्नी ने पत्नी-धर्म पर व्याख्यान दिया था?
(A) कण्व ऋषि की
(B) गौतम ऋषि की
(C) दुर्वासा ऋषि की
(D) अत्रि ऋषि की
उत्तर-
(D) अत्रि ऋषि की

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प्रश्न 17.
बड़े-बड़े ब्रह्मवादियों को किसने हराया था?
(A) मंडन मिश्र की पत्नी
(B) गार्गी
(C) सत्यभामा
(D) अनुसूया
उत्तर-
(B) गार्गी

प्रश्न 18.
मंडन मिश्र की सहधर्मचारिणी (पत्नी) ने ज्ञान के क्षेत्र में किससे शास्त्रार्थ किया था?
(A) ब्रह्मवादियों से
(B) जैन मुनियों से
(C) शंकराचार्य से
(D) बौद्ध महात्माओं से
उत्तर-
(C) शंकराचार्य से

प्रश्न 19.
किसने श्रीकृष्ण को लंबा-चौड़ा पत्र लिखा था?
(A) राधा ने
(B) सत्यभामा ने
(C) कुब्जा ने
(D) रुक्मिणी ने
उत्तर-
(D) रुक्मिणी ने

प्रश्न 20.
त्रिपिटक ग्रंथों की रचना किस भाषा में हुई?
(A) हिन्दी
(B) प्राकृत
(C) संस्कृत
(D) अंग्रेजी
उत्तर-
(B) प्राकृत

प्रश्न 21.
श्रीमद्भागवत के दशम् स्कंध के उत्तरार्द्ध के कौन-से अध्याय में रुक्मिणी हरण की कथा है?
(A) 53वें
(B) 31वें
(C) 48वें
(D) 57वें
उत्तर-
(A) 53वें

प्रश्न 22.
थेरीगाथा निम्नलिखित में से किस ग्रंथ का एक भाग है?
(A) वेद
(B) भागवत
(C) त्रिपिटक
(D) कुमारसंभव
उत्तर-
(C) त्रिपिटक

स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन गद्यांशों के आधार पर अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(1) बड़े शोक की बात है, आजकल भी ऐसे लोग विद्यमान हैं जो स्त्रियों को पढ़ाना उनके और गृह-सुख के नाश का कारण समझते हैं। और, लोग भी ऐसे-वैसे नहीं, सुशिक्षित लोग-ऐसे लोग जिन्होंने बड़े-बड़े स्कूलों और शायद कॉलिजों में भी शिक्षा पाई है, जो धर्म-शास्त्र और संस्कृत के ग्रंथ साहित्य से परिचय रखते हैं, और जिनका पेशा कुशिक्षितों को सुशिक्षित करना, कुमार्गगामियों को सुमार्गगामी बनाना और अधार्मिकों को धर्मतत्त्व समझाना है। [पृष्ठ 105]

(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक के विचार में शोक की बात क्या है?
(ग) ‘गृह-सुख के नाश’ से क्या अभिप्राय है?
(घ) ‘ऐसे-वैसे’ किन लोगों को और क्यों कहा गया है?
(ङ) इस गद्यांश में लेखक ने किन-किन के पेशों की ओर संकेत किया है और क्यों?
(च) इस गद्यांश का मूल भाव स्पष्ट करें।
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन। लेखक का नाम आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

(ख) लेखक के विचार में शोक की बात यह है कि आज के युग में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो स्वयं तो शिक्षा प्राप्त करते हैं और स्त्रियों का पढ़ना या पढ़ाना उचित नहीं समझते। ऐसे लोगों का विचार है कि स्त्रियाँ पढ़-लिखकर बिगड़ जाती हैं तथा परिवार के सुख का नाश हो जाता है।

(ग) ‘गृह-सुख के नाश’ से अभिप्राय है कि घर के काम-काज में रुचि न लेना तथा परिवार की देखभाल न करना। घर में आए मेहमान का आदर न करना। किसी को अपने बराबर न समझना तथा सदैव अहंकार की बातें करना। ऐसा करने से घर की सुख-शांति नष्ट हो जाती है।

(घ) लेखक ने ‘ऐसे-वैसे’ उन लोगों को कहा है जो स्वयं खूब पढ़े-लिखे हैं। वे अच्छे-अच्छे स्कूल-कॉलेजों में पढ़े हुए हैं, किंतु नारी-शिक्षा के पक्ष में नहीं हैं। वे स्वयं शिक्षित होने का लाभ उठाकर स्त्रियों पर प्रभाव डालने के लिए उन्हें अशिक्षित रखना चाहते हैं।

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(ङ) इस गद्यांश में लेखक ने अध्यापकों, समाज-सुधारकों, धर्माचार्यों, उपदेशकों आदि के पेशों की ओर संकेत किया है। अध्यापक स्वयं शिक्षित होकर दूसरों को शिक्षित करने का कार्य करता है। समाज-सुधारक समाज में फैली बुराइयों को दूर करके समाज को अच्छा बनाता है तथा लोगों को सद्मार्ग पर चलने का उपदेश देता है। धर्माचार्य भी धर्म के मार्ग पर चलने का उपदेश देता है। ऐसे लोग सुयोग्य होते हुए भी स्त्री-शिक्षा के पक्ष में नहीं हैं। वे स्त्रियों को अनपढ़ बनाए रखने के पक्ष में हैं। लेखक ने इन्हीं लोगों को ‘ऐसे-वैसे’ की संज्ञा दी है तथा इन पर करारा व्यंग्य किया है।

(च) इस गद्यांश का मूल भाव स्त्री-शिक्षा के विरोधियों पर व्यंग्य करना है तथा स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देने की प्रेरणा देना है। क्योंकि स्त्री-शिक्षा से समाज का समुचित विकास हो सकता है।

(छ) आशय/व्याख्या प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने उन लोगों की स्त्री-शिक्षा संबंधी सोच का उल्लेख किया है जो न केवल स्वयं शिक्षित हैं, अपितु वे दूसरों को भी शिक्षा देते हैं। ऐसे लोग स्त्री-शिक्षा को उसके गृह-सुख का नाश बताते हैं। उनका विचार है कि शिक्षा प्राप्त करने से स्त्री के सुख नष्ट हो जाएँगे। यह विचार उन लोगों का है जो स्वयं उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। वे धर्मशास्त्र, संस्कृत के ग्रंथों एवं साहित्य को भी पढ़ चुके हैं तथा अनपढ़ों को पढ़ाते हैं। वे बुरे मार्ग पर चलने वालों को सद्मार्ग पर चलाते हैं। अधर्मियों को धर्म की शिक्षा देते हैं। ऐसे लोगों पर लेखक ने व्यंग्य किया है तथा स्त्री-शिक्षा का पक्ष लिया है।

(2) पुराने जमाने में स्त्रियों के लिए कोई विश्वविद्यालय न था। फिर नियमबद्ध प्रणाली का उल्लेख आदि पुराणों में न मिले तो क्या आश्चर्य। और, उल्लेख उसका कहीं रहा हो, पर नष्ट हो गया हो तो? पुराने ज़माने में विमान उड़ते थे। बताइए उनके बनाने की विद्या सिखाने वाला कोई शास्त्र! बड़े-बड़े जहाज़ों पर सवार होकर लोग द्वीपांतरों को जाते थे। दिखाइए, जहाज़ बनाने की नियमबद्ध प्रणाली के दर्शक ग्रंथ! पुराणादि में विमानों और जहाजों द्वारा की गई यात्राओं के हवाले देखकर उनका अस्तित्व तो हम बड़े गर्व से स्वीकार करते हैं, परंतु पुराने ग्रंथों में अनेक प्रगल्भ पंडिताओं के नामोल्लेख देखकर भी कुछ लोग भारत की तत्कालीन स्त्रियों को मूर्ख, अपढ़ और गँवार बताते हैं! इस तर्कशास्त्रज्ञता और इस न्यायशीलता की बलिहारी!
[पृष्ठ 106-107]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) पुराने जमाने में क्या उड़ते थे?
(ग) लोग द्वीपांतरों को कैसे जाते थे?
(घ) भारत की प्राचीन स्त्रियों को अनपढ़ व गँवार कौन बताते हैं?
(ङ) वेदों में स्त्री-शिक्षा के प्रमाण किस रूप में प्राप्त होते हैं?
(च) स्त्री-शिक्षा को कौन पाप समझता है और क्यों?
(छ) लेखक किस तर्कशास्त्रज्ञता और न्यायशीलता पर न्योछावर हो जाता है और क्यों?
(ज) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन। लेखक का नाम-आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

(ख) पुराने जमाने में विमान उड़ाते थे।

(ग) बड़े-बड़े जहाज़ों पर सवार होकर लोग दीपांतरों पर जाते थे।

(घ) कुछ लोग भारत की प्राचीन स्त्रियों को अनपढ़ व गँवार बताते हैं।

(ङ) वेदों में स्त्री-शिक्षा का सबसे बड़ा प्रमाण उपलब्ध है कि कितने ही वेदों की रचना स्त्रियों ने की है। इनमें एक देवी हैं विश्ववरा जिसने वेदों की रचना की है। इससे प्रमाणित होता है कि वेदों में स्त्री-शिक्षा के प्रमाण विद्यमान हैं।

(च) जो लोग स्त्री-शिक्षा का विरोध करते हुए कहते हैं कि स्त्रियों को शिक्षा देना उचित नहीं है, स्त्रियों को शिक्षित करने से घर का सुख-चैन चला जाता है। ऐसे लोग ही स्त्री-शिक्षा को पाप समझते हैं क्योंकि इन लोगों के विचार संकीर्ण एवं स्त्री विरोधी होते हैं।

(छ) लेखक तर्क देने वाले और न्याय करने वालों पर व्यंग्य करता हुआ ये शब्द कहता है। ये लोग बिना प्रमाण के विमान का होना तो स्वीकार कर सकते हैं, किंतु स्त्री-शिक्षा के होने को स्वीकार नहीं कर सकते। लेखक ऐसे लोगों पर व्यंग्य करते हुए कहता . है कि इनके तर्क एवं न्याय दोनों ही व्यर्थ हैं।

(ज) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने पुराने समय के स्त्री-शिक्षा के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा है कि उस समय ऐसा कोई विश्वविद्यालय नहीं था, जिसमें स्त्रियों को शिक्षा दी जाती हो। इसलिए प्राचीन ग्रंथों में स्त्रियों की नियमबद्ध शिक्षा प्रणाली के प्रमाण नहीं मिलते। इस संबंध में लेखक ने सुंदर तर्क प्रस्तुत किया है कि हो सकता है कि शिक्षा प्रणाली के नियम तो हों किंतु नष्ट हो गए हों। जिस प्रकार विमान उड़ने का वर्णन तो मिलता है किंतु विमान बनाने या विमान विद्या के कोई शास्त्र उपलब्ध नहीं है। पुराणादि ग्रंथों में जहाज़ों द्वारा की गई यात्रा का वर्णन तो बड़े गर्व से किया जाता है, किंतु जहाज़-निर्माण के नियम कहीं नहीं मिलते। पुराने ग्रंथों में कुछ महान् पंडितों के नामोल्लेख मात्र को देखकर भी लोग उस समय की स्त्रियों को मूर्ख, अनपढ़, गँवार बताते हैं। लेखक ने ऐसे तर्कों पर करारा व्यंग्य किया है। ये सब स्त्री-शिक्षा के विरोधी लोगों के कुतर्क हैं।

(3) अत्रि की पत्नी पत्नी-धर्म पर व्याख्यान देते समय घंटों पांडित्य प्रकट करे, गार्गी बड़े-बड़े ब्रह्मवादियों को हरा दे, मंडन मिश्र की सहधर्मचारिणी शंकराचार्य के छक्के छुड़ा दे! गज़ब! इससे अधिक भयंकर बात और क्या हो सकेगी! यह सब पापी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़ती, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करती। यह सारा दुराचार स्त्रियों को पढ़ाने ही का कुफल है। समझे। स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घुट ! ऐसी ही दलीलों और दृष्टांतों के आधार पर कुछ लोग स्त्रियों को अपढ़ रखकर भारतवर्ष का गौरव बढ़ाना चाहते हैं। [पृष्ठ 107]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) प्राचीनकाल में स्त्रियों ने किस प्रकार अपने ज्ञान का प्रभाव जमाया था?
(ग) लेखक ने ‘भयंकर बात’ और ‘पापी पढ़ने का अपराध’ किसे और क्यों कहा है?
(घ) “यह सारा दुराचार स्त्रियों को पढ़ाने ही का कुफल है”-इस पंक्ति में निहित व्यंग्य पर प्रकाश डालिए।
(ङ) किस बात को लेकर हम स्त्रियों एवं पुरुषों के साथ अलग-अलग व्यवहार करते हैं?
(च) इस गद्यांश का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन। लेखक का नाम आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

(ख) प्राचीनकाल में स्त्रियों ने अपने ज्ञान, तर्क एवं उपदेश की क्षमता-शक्ति के बल पर समाज में प्रभाव बढ़ाया था। अत्रि ऋषि की पत्नी ने पत्नी-धर्म पर घंटों व्याख्यान दिया था। गार्गी ने बड़े-बड़े ब्रह्मवादी चिंतकों को शास्त्रार्थ में चित्त कर दिया था। मंडन मिश्र की पत्नी ने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में निरुत्तर कर दिया था।

(ग) लेखक ने व्यंग्य में स्त्रियों द्वारा महान् एवं आदरणीय पुरुषों को हराने को ‘भयंकर बात’ कही है। भयंकर बात इसलिए भी है कि पुरुषों को अपने ज्ञान एवं विद्या पर अत्यधिक घमंड था और वे अपने-आपको अजेय समझते थे। ‘पापी पढ़ने का अपराध’ कहकर उन पुरुषों पर चोट की गई है जो स्त्रियों की शिक्षा का विरोध करते हैं। वे स्त्रियों के बढ़ते प्रभाव को सहन नहीं कर सकते।

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(घ) लेखक ने उन पुरुषों को दोषी ठहराया है जो स्त्रियों के पढ़ने-लिखने का विरोध करते हैं। यदि स्त्रियाँ तर्क के क्षेत्र में पुरुषों को हरा देती हैं तो ऐसे लोग इसे स्त्री-शिक्षा का ही दुराचार मानते हैं अर्थात् न स्त्री-शिक्षा होती न पुरुषों को नारियों के सामने हारना पड़ता। वास्तव में यह पंक्ति अहंकारी पुरुषों की अहंकार की मनोवृत्ति पर करारा व्यंग्य है।

(ङ) हम स्त्रियों एवं पुरुषों में शिक्षा को लेकर अलग-अलग व्यवहार करते हैं। हम पुरुषों के लिए शिक्षा को अनिवार्य समझते हैं, जबकि स्त्रियों के लिए नहीं। हम चाहते हैं कि कोई भी स्त्री पुरुष को शिक्षा के क्षेत्र में परास्त न करे। इससे पुरुषों के खोखले अहं को ठेस पहुँचती है।

(च) इस गद्यांश का मूल भाव है कि हमें स्त्री-शिक्षा का विरोध नहीं करना चाहिए। हमें स्त्री-शिक्षा का भी वैसा ही पक्ष लेना चाहिए जैसा कि हम पुरुषों का लेते हैं। यदि स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर दिए जाएँगे तो वे भी समाज के विकास में सहयोगी सिद्ध हो सकती हैं।

(छ) आशय-कुछ लोगों का मत है कि प्राचीनकाल में भारतीय स्त्रियाँ अनपढ़ और मूर्ख थीं। लेखक ने उन लोगों के इस मत का खंडन करते हुए कहा है कि अत्रि ऋषि की पत्नी ने पत्नी-धर्म पर पांडित्यपूर्ण व्याख्यान दिया। गार्गी ने भी बड़े-बड़े ब्रह्मवादी पंडितों को ज्ञान के क्षेत्र में पछाड़ दिया। मंडन मिश्र की पत्नी भी बहुत विदुषी थी। उसने ज्ञान के क्षेत्र में शंकराचार्य को हरा दिया था। इससे बढ़कर भारतीय स्त्रियों के ज्ञानवान होने के क्या प्रमाण हो सकते हैं। स्त्री-शिक्षा विरोधी इस बात को भी शिक्षा का कुफल कहते हैं। स्त्री-शिक्षा के विरोधियों का कथन है कि स्त्रियों के लिए पढ़ना ज़हर के समान है और पुरुषों के लिए अमृत। ऐसे उदाहरण देकर कुछ लोग स्त्रियों को अनपढ़ रखना चाहते हैं। इससे देश का गौरव नहीं बढ़ सकता। देश एवं समाज की उन्नति के लिए स्त्रियों का शिक्षित होना अति अनिवार्य है।

(4) स्त्रियों का किया हुआ अनर्थ यदि पढ़ाने ही का परिणाम है तो पुरुषों का किया हुआ अनर्थ भी उनकी विद्या और शिक्षा ही का परिणाम समझना चाहिए। बम के गोले फेंकना, नरहत्या करना, डाके डालना, चोरियाँ करना, घूस लेना ये सब यदि पढ़ने-लिखने ही का परिणाम हो तो सारे कॉलिज, स्कूल और पाठशालाएँ बंद हो जानी चाहिए। परंतु विक्षिप्तों, बातव्यथितों और ग्रहास्तों के सिवा ऐसी दलीलें पेश करने वाले बहुत ही कम मिलेंगे। शकुंतला ने दुष्यंत को कटु वाक्य कहकर कौन-सी अस्वाभाविकता दिखाई? क्या वह यह कहती कि-“आर्य पुत्र, शाबाश! बड़ा अच्छा काम किया जो मेरे साथ गांधर्व-विवाह करके मुकर गए। नीति, न्याय, सदाचार और धर्म की आप प्रत्यक्ष मूर्ति हैं!” पत्नी पर घोर से घोर अत्याचार करके जो उससे ऐसी आशा रखते हैं वे मनुष्य-स्वभाव का किंचित् भी ज्ञान नहीं रखते। [पृष्ठ 108]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक ने स्त्रियों द्वारा किए गए किस अनर्थ की चर्चा की है? क्या यह वास्तव में अनर्थ है?
(ग) पुरुष पढ़-लिखकर भी क्या कुकर्म करता है? क्या यह उसकी शिक्षा का दोष है?
(घ) मनुष्य को शिक्षा किस मार्ग पर चलने की शिक्षा देती है?
(ङ) लेखक स्कूल-कॉलेज बंद करने की बात क्यों कहता है?
(च) लेखक ने स्त्रियों को पढ़ा-लिखा होने को अनर्थ का कारण मानने वालों को क्या और क्यों कहा है?
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन। लेखक का नाम आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी

(ख) लेखक ने पढ़ी-लिखी स्त्रियों द्वारा अपनी विद्वता से शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित करने तथा अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करने की चर्चा की है, जिसे पुरुष प्रधान समाज स्त्रियों द्वारा किया गया अनर्थ मानता है और उन्हें अनपढ़ बनाए रखना चाहता है। वास्तव में यह अनर्थ नहीं है। यह पुरुष समाज द्वारा स्त्रियों पर बलात किया जाने वाला अनर्थ है।

(ग) पुरुष पढ़-लिखकर भी चोरी, डकैती, व्यभिचार आदि कुकर्म करता है जो उसकी पढ़ाई-लिखाई का दोष नहीं होता है। वह यह सब बुरे कार्य अपनी संगति अथवा संस्कारों के कारण करता है। इसलिए पढ़ाई-लिखाई को कुकर्मों को प्रेरित करने वाली नहीं मानना चाहिए।

(घ) शिक्षा सदा ही मनुष्य को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। वह मनुष्य को बुरे रास्ते से हटाकर अच्छे मार्ग पर चलाती है। शिक्षा मनुष्य में अच्छे-बुरे की पहचान करने की शक्ति भी उत्पन्न करती है। मनुष्य शिक्षा प्राप्त करके जीवन में विकास करने के सद्प्रयास करता है। शिक्षा मनुष्य में मानवीय गुणों का विकास भी करती है। इसलिए शिक्षा को अनर्थ कारक कहना अनुचित है।

(ङ) लेखक का तर्क है कि जब बम के गोले फेंकना, नर हत्या करना, डाके डालना, घूस लेना, व्यभिचार करना सब पढ़ने-लिखने का परिणाम है तो फिर ये स्कूल-कॉलेज किसलिए खोल रखे हैं। यदि शिक्षा से व्यक्ति दुष्कर्म ही करेगा तो फिर इन स्कूल-कॉलेजों को बंद करना ही उचित होगा।

(च) लेखक ने पढ़ी-लिखी स्त्रियों को अनर्थ करने वाली स्त्रियाँ कहने वाले पुरुषों को पागल, पूर्वाग्रहों से ग्रस्त, अंधविश्वासी आदि कहा है। ये लोग अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए स्त्रियों को अनपढ़ ही बनाए रखना चाहते हैं। ये लोग यह नहीं चाहते कि स्त्रियाँ अपना भला-बुरा सोचने तथा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बन सकें।

(छ) आशय/व्याख्या-इन पंक्तियों में लेखक ने बताया है कि स्त्रियों ने अपनी विद्वत्ता से शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े विद्वानों को हरा दिया और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष किया। किंतु पुरुष-प्रधान इस समाज के कुछ लोग उनके इस प्रयास को अनर्थ कहते हैं तथा वे उन्हें मूर्ख बनाए रखना चाहते हैं। यदि इन सभी बातों को विद्या-प्राप्ति या शिक्षा का परिणाम समझते हैं तो फिर पुरुष भी शिक्षा से बम बनाना, नर-हत्या करना, डाके डालना, चोरी करना, रिश्वत लेना आदि सीखता है तो उसे भी अनपढ़ ही रहना चाहिए। शिक्षा-प्राप्ति के सभी साधन समाप्त कर देने चाहिएँ। किंतु ऐसी बुरी दलीलें देने वाले कम ही लोग मिलेंगे। लेखक शकुंतला का उदाहरण देते हुए स्त्री-शिक्षा और स्त्री-अस्तित्व के संघर्ष का पक्ष लेते हुए कहता है कि शकुंतला ने दुष्यंत से यह पूछकर कोई बुराई नहीं की कि उसने उससे गांधर्व-विवाह किया था और वह उस विवाह से मुकर गया है। पत्नी पर घोर अत्याचार करने वाले पुरुष का पक्ष लेना अमानवीय है। ऐसे लोग नहीं चाहते कि स्त्रियाँ शिक्षित हों और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनें।

(5) जो लोग यह कहते हैं कि पुराने जमाने में यहाँ स्त्रियाँ न पढ़ती थीं अथवा उन्हें पढ़ने की मुमानियत थी वे या तो इतिहास से अभिज्ञता नहीं रखते या जान-बूझकर लोगों को धोखा देते हैं। समाज की दृष्टि में ऐसे लोग दंडनीय हैं। क्योंकि स्त्रियों को निरक्षर रखने का उपदेश देना समाज का अपकार और अपराध करना है-समाज की उन्नति में बाधा डालना है।
‘शिक्षा’ बहुत व्यापक शब्द है। उसमें सीखने योग्य अनेक विषयों का समावेश हो सकता है। पढ़ना-लिखना भी उसी के अंतर्गत है। इस देश की वर्तमान शिक्षा-प्रणाली अच्छी नहीं। इस कारण यदि कोई स्त्रियों को पढ़ाना अनर्थकारी समझे तो उसे उस प्रणाली का संशोधन करना या कराना चाहिए, खुद पढ़ने-लिखने को दोष न देना चाहिए। [पृष्ठ 109]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) स्त्री-शिक्षा को लेकर लेखक के क्या विचार थे?
(ग) ‘निरक्षर स्त्री समाज की उन्नति में बाधा है’ इस विषय पर अपना मत प्रकट कीजिए।
(घ) वर्तमान शिक्षा प्रणाली में संशोधन करने का अवसर आपको मिले तो क्या करना चाहेंगे?
(ङ) शिक्षा का क्या अर्थ है?
(च) लेखक स्त्री-शिक्षा के विरोधियों से क्या कहना चाहता है?
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन। लेखक का नाम आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

(ख) लेखक कहता है कि यदि कुछ लोग यह सोचते हैं कि पुराने ज़माने में स्त्रियाँ नहीं पढ़ती थीं तो वे सच्चाई से दूर हैं। स्त्री-शिक्षा की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। यह विचार गलत है कि स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होता है, बल्कि स्त्री को पढ़ाने से समाज शिक्षित होता है। लेखक इस विषय पर लोगों के कुतर्कों को महत्त्व नहीं देता।

(ग) यदि समाज में निरक्षर स्त्री होगी तो अवश्य ही समाज का विकास बाधित होगा। कोई भी स्त्री यदि पढ़ी-लिखी है तो वह अपने बच्चों तथा परिवार को अच्छी शिक्षा तथा अच्छे संस्कार देगी। यदि एक परिवार का सर्वांगीण विकास चाहिए तो स्त्री को अवश्य पढ़ाएँ।

(घ) संशोधित शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जिसमें रटने पर नहीं, बल्कि समझने पर जोर दिया गया हो। शिक्षा ऐसी हो जिसे व्यवहार में लाया जा सके। बच्चों के लिए शिक्षा भार न बनकर सीखने का माध्यम बने और वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

(ङ) शिक्षा का अर्थ केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करना ही नहीं, अपितु शिक्षा का बहुत व्यापक अर्थ है। हम जो कुछ भी सीखते हैं, वह शिक्षा कहलाती है। सीखने योग्य अनेक विषय हो सकते हैं जिनमें पढ़ना-लिखना भी एक विषय है।

(च) लेखक स्त्री-शिक्षा के विरोधियों से कहना चाहता है कि यदि आवश्यक है तो शिक्षा प्रणाली में संशोधन कर दीजिए। उनकी शिक्षा किस प्रकार की होनी चाहिए, इस पर बैठकर विचार किया जा सकता है, किंतु यह मत कहिए कि स्त्रियों का पढ़ना-लिखना अनर्थकारी है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 15 स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन

(छ) आशय/व्याख्या-उपर्युक्त गद्यांश में लेखक ने स्पष्ट शब्दों में बताया है कि जो लोग यह कहते हैं कि पुराने समय में स्त्रियाँ पढ़ती नहीं थीं अथवा उनको पढ़ने की मनाही थी तो ऐसे लोग इतिहास से अनभिज्ञ हैं या फिर जान-बूझकर लोगों को धोखा देना चाहते हैं। ऐसे लोगों को सजा मिलनी चाहिए, क्योंकि वे समाज में स्त्रियों के प्रति भ्रांति फैलाते हैं। स्त्रियों को अनपढ़ रखना समाज के विकास में बाधा डालना है। फिर ‘शिक्षा’ शब्द का अर्थ ही बहुत विस्तृत है। उसमें सीखने के अनेक विषय हैं। पढ़ना-लिखना भी उसी में आता है। लेखक के अनुसार इस देश की शिक्षा-प्रणाली अच्छी नहीं है। इसमें सुधार करना चाहिए। किंतु यह नहीं कहना चाहिए कि स्त्रियों का पढ़ना-लिखना अनर्थकारी है। स्त्रियाँ भी समाज का अभिन्न अंग हैं। यदि स्त्रियाँ शिक्षित नहीं होंगी तो समाज का एक भाग अशिक्षित रह जाएगा और समाज का विकास समुचित रूप से नहीं हो सकेगा।

स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन Summary in Hindi

स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन लेखक-परिचय

प्रश्न-
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी का जीवन परिचय एवं उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय-आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का आधुनिक साहित्य के साहित्यकारों में प्रमुख स्थान है। इनका जन्म सन् 1864 में रायबरेली के दौलतपुर गाँव में हुआ था। आपकी आरंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। आपने स्कूली शिक्षा मैट्रिक तक ही प्राप्त की थी, किंतु आपने अध्यवसाय, विपुल जिज्ञासा, प्रेरित अनवरत अध्ययन और चिंतन-मनन की अपनी प्रवृत्ति के कारण हिंदी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, उर्दू, बाँग्ला, गुजराती आदि अनेक भाषाओं का गहन अध्ययन किया। अपने इसी गुण के कारण आप अपने युग के अग्रणी साहित्यकार रहे। आप भाषा के महापंडित थे। आपने कई वर्षों तक रेलवे विभाग में नौकरी की। आपने 1903 ई० में ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादन का कार्यभार संभाला। हिंदी जगत् के लिए यह एक महान् घटना थी। सन् 1920 तक इस पत्रिका का संपादन करते हुए आपने हिंदी में खड़ी बोली गद्य को व्यवस्थित एवं परिष्कृत करके उसे व्याकरण-सम्मत बनाया। आप जीवन-पर्यंत साहित्य-साधना में लगे रहे। सन् 1938 में आपका देहांत हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ-आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने लगभग 80 रचनाएँ लिखीं, जिनमें से 14 अनूदित और 66 मौलिक रचनाएँ हैं। केवल गद्य पर इनकी अनूदित और मौलिक रचनाओं की संख्या 64 है। इनके प्रमुख निबंध-संग्रह निम्नलिखित हैं
‘संकलन’, ‘रसज्ञ रंजन’, ‘लेखांजलि’, ‘संचयन’, ‘विचार-विमर्श’, ‘साहित्य-सीकर’, ‘साहित्य-संदर्भ’, ‘समालोचना समुच्चय’ आदि।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी युग- प्रवर्तक एवं युग-निर्माता पहले हैं, साहित्यकार बाद में इसलिए उनके निबंधों में भारतेंदु अथवा बाद के निबंधकारों की भाँति वैयक्तिकता, रोचकता एवं सजीवता उपलब्ध नहीं होती। वस्तुतः द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ के माध्यम से धर्म, साहित्य, समाज, विज्ञान, राजनीति आदि विषयों पर जमकर निबंध लिखे। उन्होंने भाषा संस्कार और पुनरुत्थान का महान् कार्य किया। बेकन उनके आदर्श निबंधकार थे। इसलिए उन्होंने उनके अनेक निबंधों का हिंदी में अनुवाद भी किया। बेकन की भाँति ही महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के निबंधों में विचारों की अधिकता सर्वत्र देखी जा सकती है।

4. भाषा-शैली-आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भाषा सुधार का महान् कार्य किया। उनके निबंधों में शुद्ध साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है। वे विषयानुकूल, व्याकरण सम्मत एवं सरल भाषा के प्रयोग के पक्ष में थे। उनके निबंधों में विभिन्न शैलियों का प्रयोग हुआ है। उनके साहित्य की भाषा में लोक प्रचलित मुहावरों और लोकोक्तियों का भी प्रयोग किया गया है।

स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन पाठ का सार

प्रश्न-
‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कृतों का खंडन’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत निबंध में महावीरप्रसाद द्विवेदी ने उन लोगों को मुँह तोड़ जवाब दिया है जो स्त्री-शिक्षा को व्यर्थ एवं समाज के विघटन का कारण मानते थे। इसके साथ ही लेखक ने सड़ी-गली परंपराओं को त्याग देने की प्रेरणा भी दी है। निबंध का सार इस प्रकार है-
लेखक को इस बात का बेहद दुःख है कि पढ़े-लिखे लोग भी स्त्री-शिक्षा का विरोध करते थे। बड़े-बड़े धर्मगुरु व अध्यापक भी स्त्री-शिक्षा के विपक्ष में तर्क देते थे। उनका तर्क है कि पुराने संस्कृत नाटकों में स्त्री-पात्र अनपढ़ों की भाषा में बात करते थे। इससे पता चलता है कि पुराने समय में स्त्री-शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी। स्त्री-शिक्षा से समाज में अनर्थ होते हैं। वे शकुंतला का उदाहरण भी देते हैं कि शकुंतला ने गँवारों की भाषा में श्लोक रचा था। इससे पता चलता है कि स्त्रियों के लिए कुछ भी पढ़ना उचित नहीं था।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 15 स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन

लेखक ने तर्क देते हुए कहा है कि नाटकों में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना उनकी अनपढ़ता का प्रमाण नहीं है। संस्कृत न बोल पाना भी अनपढ़, गँवार होने का प्रतीक नहीं है। बौद्ध-धर्म और जैन-धर्म के ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में हुई है। इन धर्मों के उपदेश भी प्राकृत भाषा में ही दिए जाते थे। अतः स्पष्ट है कि प्राकृत बोलना या प्रयोग करना अनपढ़ता का प्रतीक नहीं हो सकता। जैसे हिंदी, बाँग्ला आदि भाषाएँ आज की प्राकृत हैं, वैसे ही शौरसेनी, मागधी, पाली आदि उस समय की प्राकृत भाषाएँ थीं। नाटकों में कुछ ही लोगों द्वारा संस्कृत बोलने का प्रावधान किया गया था क्योंकि सब संस्कृत नहीं बोल सकते थे।

लेखक का कथन है कि प्राचीनकाल में महिलाओं के लिए विश्वविद्यालय नहीं थे, किंतु वे प्रमाण आज नष्ट हो चुके हैं। किंतु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पुराने समय में जहाज़ और विमान थे किंतु उनको बनाने की विद्या सिखाने के प्रमाण नहीं मिलते। फिर भी हम उनके होने की बात को बड़े गर्व से स्वीकार करते हैं। लेकिन न जाने इसी तर्क पर हम स्त्रियों का शिक्षित होना क्यों नहीं मानते? ईश्वर ने अनेक वेद मंत्र उनके मुख से कहलवाए हैं। बौद्ध ग्रंथों में स्त्रियों की अनेक पद्य-रचनाएँ उपलब्ध हैं। इतना कुछ होने पर भी हम उन्हें अनपढ़ कहने पर तुले हुए हैं। . लेखक ने अनेक ज्ञानवान स्त्रियों के प्रमाण प्रस्तुत करके यह सिद्ध किया है कि स्त्रियाँ भी शिक्षित थीं। अत्रि की पत्नी गार्गी और मंडन मिश्र की पत्नी का तर्क ज्ञान पूजनीय पुरुषों को भी परास्त करता है। क्या यह दुराचार है। उधर एम.ए., बी.ए. करके पत्नियों को मारना व पीटना पुरुषों का सदाचार है। पुरुषों के लिए शिक्षा अमृत और स्त्रियों के लिए जहर, क्या इस बात को संगत कह सकते हैं।

यदि यह भी मान लिया जाए कि पुराने ज़माने में स्त्रियाँ अशिक्षित थीं किंतु वर्तमान युग में स्त्रियों का शिक्षित होना अति अनिवार्य है। अतः हमें स्त्रियों को अनपढ़ रखने की चाल को छोड़ देना चाहिए। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में पुराने समय में स्त्रियों के शिक्षित होने के प्रमाण उपलब्ध हैं। रुक्मिणी की हरण कथा इस बात का प्रमाण है। रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को प्रेम-पत्र लिखा था। वह प्राकृत में नहीं हो सकता।

लेखक ने तर्क देते हुए कहा है कि यदि नारी-शिक्षा से अनर्थ होता है तो पुरुषों की हिंसा और पापाचार भी पढ़ाई या शिक्षा का परिणाम है। इस प्रकार तो सभी स्कूल-कॉलेज बंद हो जाने चाहिएँ। शकुंतला ने ऐसी कौन-सी दलील दे दी थी, जिससे दुष्यंत का अपमान हुआ हो। यदि वह उससे विवाह करके उसे भुला देता है तो क्या वह उसका सम्मान करती? इसी प्रकार राम ने भी सीता की अग्नि-परीक्षा भी ले ली थी और फिर किसी के बहकावे में आकर उसे पुनः त्याग दिया था। यहाँ सीता का राम के प्रति क्रोध करना उसके गँवार होने की निशानी नहीं, उसका ऐसा करना स्वाभाविक है।

लेखक के अनुसार शिक्षा कभी-भी अनर्थकारी नहीं हो सकती। अनर्थ तो पुरुष भी करते हैं। अनपढ़ों और अशिक्षितों से भी अनर्थ होते हैं। जो लोग स्त्री-शिक्षा का विरोध करते हैं, वे अपनी अज्ञानता दिखाते हैं। ऐसे लोग तो दंडनीय हैं तथा समाज की उन्नति में बाधा डालने के लिए अपराधी भी। वस्तुतः शिक्षा बहुत व्यापक हैं उसमें सीखने योग्य विविध विषय हो सकते हैं। यदि आज की शिक्षा दोषपूर्ण है और स्त्रियों को सिखाने योग्य कुछ नहीं है तो उसमें सुधार होना चाहिए। पुरुषों की शिक्षा में भी दोष हैं, किंतु इस कारण स्कूल-कॉलेज बंद नहीं किए जा सकते। इस संदर्भ में लेखक का निवेदन है कि यदि शिक्षा में दोष है तो उस पर बहस होनी चाहिए, संशोधन होना चाहिए। किंतु इसे हमें अनर्थकारी, विनाशकारी या फिर मिथ्या नहीं कहना चाहिए।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-105) कुतर्क = गलत तर्क। शोक = दुःख। गृह-सुख = घर के सुख या घर की शांति। सुशिक्षित = अच्छे पढ़े-लिखे लोग। परिचय = जानकारी। पेशा = व्यवसाय। कुशिक्षित = गलत सीख वाले। कुमार्गगामी = गलत या बुरे मार्ग पर चलने वाले। सुमार्गगामी = अच्छे रास्ते पर चलने वाले। अधार्मिक = जिसका धर्म से संबंध न हो। दलील = तर्क। धर्मत्व = धर्म का सार। प्रमाणित = सिद्ध। चाल = रीति। अनर्थ = बुरा। गँवार = मूर्ख, अनपढ़। कटु = कड़वा। दुष्परिणाम = बुरा नतीजा।

(पृष्ठ-106) प्राकृत = प्राचीन भाषा का नाम। उत्तररामचरित = संस्कृत के कवि भवभूति द्वारा रचित नाटक। वेदांतवादिनी = वेदांत पर बोलने वाली। प्रचलित = प्रसिद्ध, व्यवहार में लाई जाने वाली। धर्मोपदेश = धर्म की बातें बताना। पंडित = विद्वान्। एकमात्र = केवल एक। सर्वसाधारण = जनसामान्य। नाट्यशास्त्र = नाटक कला से संबंधित ग्रंथ। विमान = हवाई जहाज़। द्वीपांतर = एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक। हवाला = संदर्भ। अस्तित्व = जीवन होना।

(पृष्ठ-107) तर्कशास्त्रज्ञता = तर्कशास्त्र की जानकारी। तत्कालीन = उसी समय का। न्यायशीलता = न्याय के अनुकूल व्यवहार करना । ईश्वर-कृत = ईश्वर के द्वारा किया हुआ। ककहरा = क.ख.ग. आदि का ज्ञान। पुरुष-कवि = कविता लिखने वाले पुरुष। आदृत ‘= आदर-प्राप्त, सम्मानित। शाङ्गधर-पद्धति = छंद शास्त्र लिखने वाले शाङ्गधर नामक कवि के अनुसार। पद्यरचना = कविता लिखना। उद्धृत = ली गई, संकलित। कुमारिका = कुमारी, बालिका। विज्ञ = ज्ञानी, जानकार। पत्नी-धर्म = पत्नी का कर्तव्य । ब्रह्मवादी = वेद पढ़ने-पढ़ाने वाला। सहधर्मचारिणी = पत्नी। छक्के छुड़ाना = बुरी तरह हराना।

भयंकर = भयानक। दुराचार = निंदनीय व्यवहार। कालकूट = ज़हर । पीयूष = अमृत। दृष्टांत = उदाहरण। विपक्षी = विरोधी। उत्तरार्द्ध = पीछे वाला आधा भाग। हरण = चुराना। एकांत = अकेला। पांडित्य = विद्वता, ज्ञान। अल्पज्ञ = कम जानने वाला। सनातन-धर्मावलंबी = सनातन धर्म को मानने वाला। अपेक्षा = तुलना में। दशा = हालत।

(पृष्ठ-108) प्राक्कालीन = पुराने समय की। घूस = रिश्वत । विक्षिप्त = पागल। बात व्यथित = बातों से दुःखी होने वाला। ग्रहग्रस्त = पाप ग्रह से प्रभावित । अस्वाभाविक = जो स्वाभाविक न हो। गांधर्व-विवाह = प्रेम-विवाह। प्रत्यक्ष मूर्ति = साक्षात् रूप। घोर = भयंकर। किंचित् = ज़रा। साध्वी = सीधी, पतिव्रता। दुर्वाक्य = निंदा करने वाला वचन। परित्यक्त = पूरी तरह छोड़ दिया गया। मिथ्यावाद = झूठी बात। अनुरूप = अनुसार। विद्वता = पंडित होना, बुद्धिमानी। महत्ता = महत्त्व। महाब्रह्मज्ञानी = ब्रह्म का ज्ञान रखने वाले महान् पुरुष। मन्वादि = मनु आदि। महर्षि = महान् ऋषि। धर्मशास्त्रज्ञता = धर्म-शास्त्र को जानना। नीतिज्ञ = नीति को जानने वाला। क्षमाशील = क्षमा करने वाला।

(पृष्ठ-109) अकुलीनता = बुरे कुल से होना। हरगिज़ = किसी भी स्थिति में। पापाचार = पापपूर्ण व्यवहार। चाल-चलन = व्यवहार, चरित्र। मुमानियत = मनाही, पाबंदी। अभिज्ञता = जानकारी, ज्ञान। दंडनीय = दंड देने योग्य। निरक्षर = अनपढ़। अपकार = बुरा। बाधा = रुकावट। व्यापक = विस्तार वाला। संशोधन = सुधार। राय = मत, विचार। अनर्थकर = बुरा करने वाला। उत्पादक = बनाने वाला। मिथ्या = झूठ। सोलहों आने = पूर्ण रूप से।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!

HBSE 10th Class Hindi एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! Textbook Questions and Answers

एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा Question Answer HBSE 10th Class प्रश्न 1.
हमारी आज़ादी की लड़ाई में समाज के उपेक्षित माने जाने वाले वर्ग का योगदान भी कम नहीं रहा है। इस कहानी में ऐसे लोगों के योगदान को लेखक ने किस प्रकार उभारा है?
उत्तर-
प्रस्तुत कहानी में लेखक ने उपेक्षित समाज के लोगों द्वारा आज़ादी की लड़ाई में योगदान पर प्रकाश डाला है। दुलारी एक गीत गाने वाली स्त्री है, जिसे समाज हेय दृष्टि से देखता है। टुन्नू एक किशोर युवक है। वह भी गीत गाता है तथा राष्ट्रीय आंदोलन और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेता है। दुलारी को फेंकू सरदार मानचेस्टर तथा लंका शायर की मिलों में बनी मखमली किनारे वाली कोरी धोतियों का बंडल लाकर देता है। दुलारी को बढ़िया-बढ़िया साड़ियाँ पहनने का चाव भी है। किंतु दुलारी के मन में देश-प्रेम की भावना भी है। वह उस बंडल को विदेशी वस्त्रों का संग्रह कर उनकी होली जलाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को दे देती है। वह टुन्नू के द्वारा दी हुई खादी आश्रम में बनाई साड़ी को पहनती है। वह फेंकू सरदार, जो अंग्रेज़ों का मुखबर है, को झाड़ मार-मार कर घर से निकाल देती है। टुन्नू विदेशी वस्त्रों को जला देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों का साथ देता है और इसी कारण अंग्रेज़ पुलिस द्वारा मारा जाता है। इस प्रकार लेखक ने प्रस्तुत कहानी में समाज में उपेक्षित समझे जाने वाले लोगों द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन में दिए गए सहयोग का सजीव चित्रण किया है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

Class 10th Kritika Chapter 4 Question Answer HBSE प्रश्न 2.
कठोर हृदयी समझी जाने वाली दुलारी टुन्नू की मृत्यु पर क्यों विचलित हो उठी?
उत्तर-
दुलारी एक गौनहारी है। उसे अत्यंत कठोर हृदय वाली स्त्री समझा जाता है। होली के अवसर पर साड़ी लाने पर वह टुन्नू को डाँट देती है। इतना ही नहीं, वह साड़ी को फैंक देती है। किंतु जब टुन्नू उसे कहता है कि “मन पर किसी का बस नहीं, वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।” उसके ये शब्द सुनकर कठोर दिखने वाली दुलारी का मन ही नहीं, आत्मा भी पिघल जाती है। टुन्नू के चले जाने पर वह साड़ी को उठाकर बार-बार चूमती है। इसी प्रकार दुलारी जब टुन्नू की मृत्यु का समाचार सुनती है तो व्याकुल हो उठती है और उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है। उसने जान लिया था कि टुन्नू उसके शरीर से नहीं, आत्मा से प्रेम करता है। वह उसकी गायन कला का प्रेमी था। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पर गौनहारिन दुलारी का विचलित होना स्वाभाविक था।

कक्षा 10 कृतिका पाठ 4 के प्रश्न उत्तर HBSE प्रश्न 3.
कजली दंगल जैसी गतिविधियों का आयोजन क्यों हुआ करता होगा? कुछ और परंपरागत लोक आयोजनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
कजली लोक गायन की एक शैली है। इसे भादो मास की तीज़ के अवसर पर गाया जाता है। कजली दंगल में दो कजली-गायकों के बीच प्रतियोगिता होती थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसके आयोजन पर खूब भीड़ जमा होती थी। यह आम जनता के मनोरंजन का प्रमुख साधन भी था। मनोरंजन के लिए ही ऐसे दंगलों का आयोजन किया जाता था। इसके माध्यम से जन प्रचार भी किया जाता था तथा गायन शैली में नए प्रयोग भी किए जाते थे। स्वतंत्रता के आंदोलनों के समय तो इन दंगलों के माध्यम से जनता में देश-भक्ति की भावना का संचार किया जाता था। हरियाणा में रागनी प्रतियोगिता व सांग भी लोक नाट्य परंपरा के प्रमुख उदाहरण हैं। ‘आल्हा- उत्सव’ राजस्थान की लोक गायन कला है। आजकल क्षेत्रीय लोक-गायकी के आयोजन किए जाते हैं। लोक-गायक इनमें बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।

Class 10th Hindi Kritika Chapter 4 Question Answer HBSE प्रश्न 4.
दुलारी विशिष्ट कहे जाने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक दायरे से बाहर है फिर भी अति विशिष्ट है। -इस कथन को ध्यान में रखते हुए दुलारी की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-
गौनहारिन होने के कारण दुलारी को समाज अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। वह समाज की दृष्टि में उपेक्षित और तिरस्कृत है। दूसरे शब्दों में विशिष्ट कहे जाने वाले सामाजिक व सांस्कृतिक दायरे से बाहर है। किंतु उसके व्यक्तिगत गुण इतने अच्छे हैं कि वह अति विशिष्ट समझी जाती है। उसके अग्रलिखित गुण व व्यक्तिगत विशेषताएँ ही उसे यह दर्जा दिलवाते हैं

  • कुशल गायिका-दुलारी एक कुशल गायिका थी। हर व्यक्ति उसके सामने गीत -गाने की हिम्मत नहीं रखता था। उसका स्वर मधुर एवं आकर्षक था। वह मौके के अनुसार हर प्रकार का गीत गा सकती थी।
  • कवयित्री-दुलारी एक कुशल गायिका ही नहीं, अपितु सफल कवयित्री भी थी। वह आशु कवयित्री थी। वह तुरंत ऐसा पद्य तैयार कर देती थी कि सुनने वाले दंग रह जाते थे।
  • स्वाभिमानी-दुलारी को भले ही समाज उपेक्षा के भाव से देखता था, किंतु वह कभी किसी वस्तु के लिए दूसरों के सामने हाथ नहीं फैलाती थी। जब कभी उसके स्वाभिमान पर चोट की गई तो उसने अपने स्वाभिमान की स्वयं साहसपूर्वक रक्षा की।
  • सच्ची प्रेमिका-दुलारी एक गौनहारिन है। उसे समाज में उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। किंतु उसके हृदय में सच्चे प्रेम के प्रति आदर का भाव है। वह टुन्नू के हृदय की भावना को समझ जाती है। वह उससे मन-ही-मन प्रेम करने लगती है। जब फेंकू सरदार टुन्नू के विषय में कुछ गलत कहता है, तो वह उसे झाड़ से पीटती हुई घर से बाहर निकाल देती है।

Chapter 4 Kritika Class 10 HBSE  प्रश्न 5.
दुलारी का टुन्नू से पहली बार परिचय कहाँ और किस रूप में हुआ?
उत्तर-
दुलारी का टुन्नू से पहली बार परिचय तीज के अवसर पर आयोजित ‘कजली दंगल’ में हुआ था। इस कंजली दंगल का आयोजन खोजवाँ बाजार में हो रहा था। दुलारी खोजवाँ वालों की ओर से प्रतिद्वंद्वी थी, तो दूसरे पक्ष यानि बजरडीहा वालों ने टुन्नू को अपना प्रतिद्वंद्वी बनाया था। इसी प्रतियोगिता में दुलारी का टुन्नू से पहली बार परिचय हुआ था।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

Class 10th Kritika Chapter 4 HBSE प्रश्न 6.
दुलारी का टुन्नू को यह कहना कहाँ तक उचित था-“तें सरबउला बोल ज़िन्नगी में कब देखले लोट?…” दुलारी ‘ के इस आक्षेप में आज के युवा वर्ग के लिए क्या संदेश छिपा है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
दुलारी इस कथन के माध्यम से टुन्नू पर यह आक्षेप लगाती है कि वह बढ़-चढ़कर बोलता है। उसके कथनों में सत्यता नहीं है। इसी प्रसंग में आगे वह उस पर बगुला भगत होने का भी आक्षेप लगाती है। वह आज के युवा-वर्ग को बड़बोलापन त्यागकर गंभीर बनने का संदेश देती है। उन्हें आडंबरों को त्यागकर गाँधी जी जैसा सीधा-सादा जीवन जीना चाहिए। देश के लिए त्यागशीलता की भावना होना अनिवार्य है।

Class 10 Kritika Chapter 4 Question Answer HBSE प्रश्न 7.
भारत के स्वाधीनता आंदोलन में दुलारी और टुन्नू ने अपना योगदान किस प्रकार दिया ?
उत्तर-
दुलारी और टुन्नू ने अपने-अपने ढंग से भारत के स्वाधीनता आंदोलन में योगदान दिया। टुन्नू ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने में भाग लेकर विदेशी शासकों का विरोध किया। उसने विदेशी वस्त्र इकट्ठे करके उनकी होली जलाई जिससे लोगों में देशभक्ति की भावना का संचार हुआ। इसी आंदोलन में भाग लेने के कारण उसे अपने प्राणों से भी हाथ धोने पड़े।
दुलारी एक गौनहारिन थी, किंतु उसके हृदय में देशभक्ति की भावना भी विद्यमान थी। उसने फेंकू सरदार द्वारा दी गई कीमती साड़ियों को विदेशी वस्त्रों की होली में फेंक दिया और खादी की साड़ी धारण की। टुन्नू की निर्मम हत्या से वह व्याकुल हो उठी और उसके बलिदान पर आँसू बहाने लगी।

कक्षा 10 कृतिका पाठ 4 के प्रश्न-उत्तर HBSE प्रश्न 8.
दुलारी और टुन्नू के प्रेम के पीछे उनका कलाकार मन और उनकी कला थी। यह प्रेम दुलारी को देश प्रेम तक कैसे पहुंचाता है?
उत्तर-
कहानी से पता चलता है कि दुलारी और टुन्नू के बीच शारीरिक प्रेम नहीं था। उनका प्रेम आत्मिक प्रेम था। दुलारी के गायन और उसकी काव्य कला से टुन्नू बहुत प्रभावित था। टुन्नू अभी सोलह-सत्रह वर्ष का किशोर था और दुलारी यौवन की अंतिम सीमा भी लाँघने वाली थी। वह उसे फटकारती भी है कि मैं तुम्हारी माँ से भी एक-आध वर्ष बड़ी हूँ। उसके मन के किसी एकांत कोने में टुन्नू ने अपना स्थान बना लिया था। यह सब दोनों के कलाकार मन और कला के कारण ही हुआ। टुन्नू द्वारा विदेशी कपड़ों के स्थान पर खादी पहनना और देश के लिए मर-मिटना दुलारी को भी देश-प्रेम के बहाव में बहाकर ले जाता है। वह टुन्नू की कुर्बानी से इतनी प्रभावित हुई कि उसने अपनी कीमती साड़ियों का बंडल अग्नि के हवाले कर दिया। स्वयं भी खादी की धोती पहनकर उस स्थान पर जाने के लिए तत्पर हो गई, जहाँ टुन्नू का कत्ल किया गया था। कहने का भाव है कि टुन्नू का महान् त्याग ही दुलारी को देश-प्रेम के मार्ग पर ले आता है।

Class 10 Kritika Chapter 4 HBSE प्रश्न 9.
जलाए जाने वाले विदेशी वस्त्रों के ढेर में अधिकांश वस्त्र फटे-पुराने थे परंत दुलारी द्वारा विदेशी मिलों में बनी कोरी साड़ियों का फेंका जाना उसकी किस मानसिकता को दर्शाता है? ..
उत्तर-
विदेशी वस्त्रों को जलाने वाले आंदोलनकारियों द्वारा फैलाई गई चादर पर लोग फटे-पुराने वस्त्र ही फेंक रहे थे। अच्छे वस्त्र उनमें बहुत ही कम थे। किंतु दुलारी ने फेंकू सरदार द्वारा लाई गई विदेशी साड़ियों को ही आग के हवाले करने के लिए दे दिया था। इससे पता चलता है कि उसके मन में देश-प्रेम की सच्ची भावना थी।

एही ठैयाँ झुलनी हो रामा HBSE 10th Class प्रश्न 10.
“मन पर किसी का बस नहीं है; वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।” टुन्नू के इस कथन में उसका दुलारी के प्रति किशोर जनित प्रेम व्यक्त हुआ है, परंतु उसके विवेक ने उसके प्रेम को किस दिशा की ओर मोड़ा? ?
उत्तर-
निश्चय ही टुन्नू का यह कथन सत्य है। मन पर किसी का बस नहीं चलता। वैसे भी टुन्नू का दुलारी के प्रति आत्मिक प्रेम था। उसे दुलारी के रूप व आयु से कोई सरोकार नहीं था, क्योंकि यह प्रेम शरीर की भूख की तृप्ति के लिए नहीं था। इसलिए उसने इसे देश-प्रेम के मार्ग की ओर मोड़ दिया था जो स्वार्थहीन और प्रेम का सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोच्च स्वरूप है। देश-प्रेम के रूप में व्यक्ति की आत्मा का उदात्तीकरण होता है। टुन्नू देश के लिए अपना बलिदान कर देता है। दुलारी में देश के प्रति सद्भावना जागती है। वह विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर खादी आश्रम में बनी सूती धोती धारण करती है और टुन्नू की मृत्यु पर बेचैन हो उठती है। कहने का भाव है कि दोनों का प्रेम देश-प्रेम में बदल गया था।

Class 10 Hindi Kritika Chapter 4 Question Answer HBSE प्रश्न 11.
‘एही छैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!’ का प्रतीकार्थ समझाइए।
उत्तर-
यह पंक्ति लोकगीत की प्रथम पंक्ति है। इसका शाब्दिक अर्थ है-इसी स्थान पर मेरी नाक की लोंग खो गई है। इसका प्रतीक अत्यंत गंभीर है। नाक में पहना जाने वाला झुलनी नामक आभूषण सुहाग का प्रतीक है। दुलारी एक गौनहारिन है। वह किसके नाम की झुलनी अपने नाक में पहने। किंतु आत्मिक स्तर पर वह टुन्नू से प्रेम करती थी और उसी के नाम की झुलनी उसने मानसिक व आत्मिक स्तर पर पहन ली थी। जिस स्थान पर वह यह गीत गा रही थी, उसी स्थान पर टुन्नू की हत्या की गई थी। अतः इस पंक्ति का भावार्थ यह हुआ कि यही वह स्थान है जहाँ उसका सुहाग लुटा था।

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HBSE 10th Class Hindi एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! Important Questions and Answers

एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा HBSE 10th Class प्रश्न 1.
“एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!” पाठ का उद्देश्य/मूलभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
इस पाठ में लेखक का परम उद्देश्य उपेक्षित कहे जाने वाले लोगों के द्वारा स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए महान् सहयोग को उजागर करना है। इस लक्ष्य में लेखक पूर्ण रूप से सफल रहा है। इस पाठ में लेखक ने टुन्नू और दुलारी के आत्मिक प्रेम को देश-प्रेम जैसी उदात्त भावना में परिवर्तित करके इस लक्ष्य की पूर्ति की है। टुन्नू किशोरावस्था में है और दुलारी यौवन के अंतिम छोर पर खड़ी है। टुन्नू का दुलारी के प्रति प्रेम आत्मिक प्रेम है। उसे उसके रूप-सौंदर्य से कुछ लेना-देना नहीं है। वह उसके कलाकार मन से प्रेम करता है। दुलारी भी उससे इसी भाव से प्रेम करती है। उसको फटकार कर उसका हित चाहती है। किंतु उसके जाने के बाद अपने मन में एक अजीब-सा भाव अनुभव करती है। टुन्नू के प्रति फेंकू सरदार द्वारा कहे गए अपशब्द सुनकर वह उसे झाड़ से पीटकर घर से बाहर निकाल देती है। फेंकू सरदार द्वारा दी गई कीमती साड़ियों को विदेशी वस्त्रों की होली में फैंक देती है और खादी की साड़ी धारण कर लेती है तथा टुन्नू की हत्या करने वालों पर व्यंग्य करती है। अतः इस कहानी का प्रमुख उद्देश्य देश-प्रेम और त्याग की भावना की प्रेरणा देना है।

Hindi Class 10 Chapter 4 Kritika HBSE प्रश्न 2.
दुलारी के दिन का आरंभ कैसे होता था?
उत्तर-
दुलारी के दिन का आरंभ कसरत से होता था। वह मराठी महिलाओं की भाँति धोती तथा कच्छा-बाँधकर प्रतिदिन प्रातःकाल कसरत करती थी। वह इतनी कठोर कसरत करती थी कि उसके शरीर से पसीना बहने लगता था। कसरत करने के पश्चात् वह अंगोछे से अपना पसीना पोंछती थी। वह सिर पर बंधे बालों के जूड़े को खोलकर बालों को सुखाती थी। उसके पश्चात् वह आदम कद शीशे के सामने खड़ी होकर पहलवानों की भाँति अपने भुजदंडों को मुग्ध दृष्टि से देखती थी। उसका प्रातःकाल का नाश्ता प्याज, हरी मिर्च व भीगे हुए चनों से होता था।

प्रश्न 3.
पठित पाठ के आधार पर टुन्नू के चरित्र पर प्रकाश डालिए। अथवा [H.B.S.E. March, 2018 (Set-A)] टुन्नू के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
टुन्नू “एही छैयां झुलनी हेरानी हो रामा!” कहानी का प्रमुख पात्र है। उसे कहानी का नायक भी कहा जा सकता है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  • गायक-वह एक उच्चकोटि का गायक कलाकार है। वह एक किशोर है, किंतु अपनी गायिकी से सुप्रसिद्ध गौनहारिन दुलारी का मुकाबला ही नहीं करता, अपितु उसे मात भी दे देता है।
  • गुण ग्राहक वह दूसरों के गुणों को शीघ्र ही पहचान लेता है और उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करता है। जब उसे पता चलता है कि दुलारी महान् गायिका है तो वह श्रद्धापूर्वक उसके पास गायिकी सीखने के लिए जाता है। वह उसकी कला का पुजारी बन जाता है।
  • देशभक्त निश्चय ही टुम्नू एक देशभक्त था। वह देश के राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेता है और देश के लिए अपना बलिदान भी देता है।
  • सच्चा प्रेमी-टुन्नू एक सच्चा प्रेमी है। वह दुलारी को एक कलाकार होने के नाते प्रेम करता है। उसका प्रेम आत्मिक है। इसलिए वह कहता भी है कि मन पर किसी का कोई बसें नहीं चलता। इससे सिद्ध हो जाता है कि उसके मन में दुलारी के प्रति सच्चा एवं पवित्र प्रेम भाव था।

प्रश्न 4.
दुलारी द्वारा टुन्नू के उपहार को ठुकराने के पीछे क्या भावना थी?
उत्तर-
दुलारी एक गौनहारिन स्त्री थी। वह नाच-गाकर लोगों का मन बहलाव करती थी। उसे समाज उपेक्षा की दृष्टि से देखता था। टुन्नू एक संस्कारी ब्राह्मण का पुत्र था। वह अभी किशोरावस्था में था। वह दुलारी की गायन कला से बेहद प्रभावित था। उसकी उम्र भी ऐसी न थी कि उसे समाज की ऊँच-नीच का पता हो। वह दुलारी के पास कभी-कभार आकर बैठ जाता था। उसने कभी कोई हल्की बात नहीं कही और न ही अपने मन की भावना ही प्रकट की। होली के त्योहार पर वह दुलारी को खादी की धोती उपहारस्वरूप देना चाहता था, किंतु दुलारी ने उसे फटकार दिया और उसके द्वारा लाई गई धोती को भी पटक दिया। दुलारी ने यह सब उसको अपमानित करने के लिए नहीं किया था। वह टुन्नू के प्रेम की सात्विकता की भावना को पहचानती थी। वह नहीं चाहती थी, टुन्नू उसकी बदनाम बस्ती में आए और समाज उसे और टुन्नू को लेकर ऊँगली उठाए। उसने टुन्नू के द्वारा लाए गए उपहार को इसलिए ठुकरा दिया था ताकि वह कभी उसकी ओर रुख न करे। वास्तव में वह टुन्नू की भलाई चाहती थी।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

प्रश्न 5.
टुन्नू के पद्यात्मक आक्षेप का दुलारी ने क्या उत्तर दिया था?
उत्तर-
टुन्नू द्वारा दुलारी को साँवले रंग की और दूसरों द्वारा पोषित होने का आक्षेप लगाया गया था। इस आक्षेप को दुलारी ने हँसते-हँसते झेला और इसका उत्तर देती हुई वह गीत के माध्यम से कहती है, “अरे कोढ़ी अपने मुख पर लगाम दे, यहाँ तू बड़ी-बड़ी बातें बना रहा है। तेरा बाप तो घाट पर बैठा-बैठा सारा दिन कौड़ी-कौड़ी जोड़ता है। त सिर-फिरा है। तने कभी जिंदगी में नोट देखे भी हैं। कब देखे हैं, बता तू मुझसे परमेसरी नोट (वादा) माँग रहा है, जरा अपनी औकात तो देख।” इस प्रकार दुलारी ने टुन्नू की दयनीय आर्थिक दशा और अनुभवहीनता पर आक्षेप करके उसके आक्षेप का तगड़ा उत्तर दिया जिसे सुनकर सभा में उपस्थित लोगों ने उसकी खूब प्रशंसा की।

प्रश्न 6.
शर्मा जी द्वारा लिखित रिपोर्ट को सार रूप में लिखिए।
उत्तर-
शर्मा जी अखबार के रिपोर्टर थे। उन्होंने टुन्नू के कत्ल की घटना वाले दिन होने वाली वारदात पर रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। उसका सार इस प्रकार है
उन्होंने “एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!” शीर्षक रिपोर्ट में लिखा कि कल छह अप्रैल को नेताओं की अपील पर नगर में पूर्ण हड़ताल रही। विदेशी वस्त्रों की होली जलाई और जुलूस निकाला। इस जुलूस में टुन्नू ने भी भाग लिया था। जिसे पुलिस के जमादार अली सगीर ने पकड़ा और गालियाँ दीं। विरोध करने पर उसे ठोकर मारी। टुन्नू गिर पड़ा और उसके मुख से खून आने लगा। गोरे सिपाहियों ने उसे अस्पताल ले जाने का बहाना किया, किंतु उसे वरुणा के जल में प्रवाहित कर दिया। संवाददाता ने गाड़ी का पीछा करके पता लगाया था कि टुन्नू मर चुका था। टुन्नू और दुलारी के संबंधों की चर्चा करते हुए संवाददाता ने दुलारी को पुलिस के द्वारा बलपूर्वक टाऊन हॉल में उसी स्थान पर नाचने के लिए विवश करने का विवरण भी दिया जहाँ टुन्नू की हत्या की गई थी। वह नाचते हुए. आँखों से आँसू बहाती रही।

प्रश्न 7.
कजली दंगल की मजलिस के बदमज़ा होने का क्या कारण था? सार रूप में उत्तर दीजिए।
उत्तर-
खोजवाँ बाजार में कजली दंगल का आयोजन किया गया था। ‘कजली दंगल’ में दुलारी का मुकाबला टुन्नू कर रहा था। लोग दोनों के तेवर देखकर आनंद ले रहे थे। टुन्नू ने दुलारी पर कोयल की भांति दूसरों पर पोषित होने का आक्षेप किया, तो दुलारी ने भी उसे बगुला भक्त कहकर उसकी औकात की याद दिला दी। उसे बगुलाभक्त कहकर किसी बुरे नतीजे के लिए तैयार रहने के लिए चेताया। इस पर टुन्नू ने भी बढ़कर चोट करते हुए कहा कि तुम कितनी भी गालियाँ दो हम तो अपने मन की बात को डंके की चोट पर कहेंगे। इस बात पर फेंकू सरदार लाठी लेकर टुन्नू को मारने दौड़े। दुलारी ने टुन्नू को बचाया। इसके बाद कोई गाने के लिए तैयार नहीं हुआ और मजलिस बदमज़ा हो गई।

प्रश्न 8.
‘एही छैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा, कासो मैं पूढूँ’-दुलारी के इस गीत का दूसरा चरण क्या है?
उत्तर-
‘सास से पूछू, ननदिया से पूछू, देवर से पूछत लजानी हो रामा’।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!’ शीर्षक पाठ के लेखक का क्या नाम है?
(A) शिवपूजन सहाय
(B) कमलेश्वर
(C) मधु कांकरिया .
(D) शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’
उत्तर-
(D) शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’

प्रश्न 2.
दुलारी ने किस प्रदेश की महिलाओं की भाँति धोती बाँधी हुई थी?
(A) महाराष्ट्र की महिलाओं की भाँति
(B) उत्तर प्रदेश की महिलाओं की भाँति
(C) हरियाणा की महिलाओं की भाँति
(D) पंजाब की महिलाओं की भाँति
उत्तर-
(A) महाराष्ट्र की महिलाओं की भाँति

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प्रश्न 3.
पाठ के आरंभ में दुलारी को क्या करते हुए दिखाया गया है?
(A) सोते हुए
(B) गीत गाते हुए
(C) दंड लगाते हुए
(D) प्राणायाम करते हुए
उत्तर-
(C) दंड लगाते हुए

प्रश्न 4.
दुलारी को मिलने के लिए कौन आता है?
(A) दुलारी का भाई
(B) टुन्नू
(C) दुलारी का पिता
(D) पुलिस का सिपाही
उत्तर-
(B) टुन्नू

प्रश्न 5.
टुन्नू दुलारी के लिए क्या लेकर आया था?
(A) भोजन
(B) आभूषण
(C) खादी की साड़ी
(D) छाता
उत्तर-
(C) खादी की साड़ी

प्रश्न 6.
“मन पर किसी का बस नहीं। वह उमर या रूप का कायल नहीं।” ये शब्द किसने कहे हैं?
(A) दुलारी ने
(B) दुलारी की सखी ने
(C) किसी अजनबी ने
(D) टुन्नू ने
उत्तर-
(D) टुन्नू ने

प्रश्न 7.
दुलारी का मुख्य धंधा क्या था?
(A) काव्य रचना
(B) नृत्य करना
(C) कजली गीत गाना
(D) कीर्तन करना
उत्तर-
(C) कजली गीत गाना

प्रश्न 8.
‘तीर कमान होना’ का क्या अर्थ है?
(A) लड़ने के लिए तैयार होना
(B) तीर की भाँति तेज गति से जाना
(C) कमान की भाँति गोल होना..
(D) कमान से तीर चलाना
उत्तर-
(A) लड़ने के लिए तैयार होना

प्रश्न 9.
टुन्नू के पिता क्या कार्य करते थे?
(A) अध्यापन
(B) पंडिताई
(C) वकालत
(D) व्यापार
उत्तर-
(B) पंडिताई

प्रश्न 10.
दुलारी किस की ओर से कजली गाने आई थी?
(A) बजरडीहा की ओर से
(B) सुंदरगढ़ की ओर से
(C) खोजवाँ बाजार की ओर से
(D) राम नगर की ओर से
उत्तर-
(C) खोजवाँ बाजार की ओर से

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एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! Summary in Hindi

एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! पाठ का सार

प्रश्न-
‘एही छैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में लेखक ने यथार्थ और आदर्श, दंत कथा और इतिहास, मानव मन की कमजोरियों और उदात्तताओं को उजागर किया है। लेखक ने इन सबको क्षेत्रीय भाषा की रंगत में रंगकर अभिव्यक्त किया है। यह एक प्रेम कहानी-सी लगती है, किंतु इसमें प्रेम भाव के अतिरिक्त आदर्श, यथार्थ और व्यंग्य का संगम कुछ इस प्रकार हुआ है कि इन्हें अलग-अलग करके देखना संभव नहीं है। पाठ का सार इस प्रकार है

बनारस में चार-पाँच के समूह में गाने वालियों की एक परंपरा रही है-‘गौनहारिन परंपरा’ । कहानी की मुख्य नारी पात्र दुलारी बाई उसी परंपरा की एक कड़ी रही है। दुलारी दनादन दंड लगा रही थी और उसका पसीना भूमि पर पसीने का पुतला बना रहा था। वह कसरत समाप्त कर पसीना पोंछ रही थी कि तभी किसी ने उसके दरवाजे की कुंडी खटखटाई। दुलारी ने स्वयं को व्यवस्थित किया, धोती पहनी, केश बाँधे और दरवाज़ा खोल दिया। बगल में बंडल दबाए बाहर टुन्नू खड़ा था। टुन्नू भी एक गायक था। उसकी आँखों में शर्म और होंठों पर झेंप भरी मुस्कराहट थी। दुलारी ने आते ही उसे फटकरा, “ मैंने तुम्हें यहाँ आने के लिए मना किया था न?” गिरे हुए मन से टुन्नू बोला, “साल भर का त्योहार था इसीलिए मैंने सोचा कि ……….,” कहते हुए उसने बगल से बंडल निकालकर दुलारी को दे दिया। इसमें खद्दर की एक साड़ी थी। दुलारी का रुख और कड़ा हो गया और बोली, लेकिन तुम इसे यहाँ क्यों लाए हो। तुम्हें जलने के लिए कोई और चिता नहीं मिली। तुम मेरे मालिक हो, बेटे हो, भाई हो क्या हो? उसने साड़ी टुन्नू के पैरों के पास फैंक दी। टुन्नू सिर झुकाए हुए ही बोला, “पत्थर की देवी भी अपने भक्त द्वारा दी गई भेंट को नहीं ठुकराती, फिर तुम तो हाड़-माँस की बनी हो। उसकी कज्जल भरी आँखों से आँसू टपक-टपककर धोती पर गिरने लगे। दुलारी कहती रही कि हाड़-माँस की बनी हूँ, तभी तो कहती हूँ कि अभी तुम्हारे दूध के दाँत भी नहीं टूटे। बाप तो कौड़ी-कौड़ी जुटाकर गृहस्थी चलाता है और बेटा आशिकी के घोड़े पर सवार है। यह गली तुम्हारे लिए नहीं है। मैं तो शायद तुम्हारी माँ से भी वर्ष भर बड़ी हूँ।

पत्थर की तरह मूर्तिवत खड़ा टुन्नू बोला, ‘मन पर किसी का बस नहीं। वह उमर या रूप का कायल नहीं।’ वह धीरे-धीरे . सीढ़ियाँ उतरने लगा। उसके जाने के बाद दुलारी के भाव बदले उसने धोती उठाई जिस पर टुन्नू के आँसू गिरे हुए थे। एक बार गली में टुन्नू को जाते देखा और धोती पर पड़े आँसुओं के धब्बों को बार-बार चूमने लगी।

भादो की तीज पर खोजवाँ बाजार में गाने का कार्यक्रम था। दुलारी गाने में निपुण थी। उसमें पद में सवाल – जवाब करने की अद्भुत क्षमता थी। बड़े-बड़े शायर भी उसके सामने गाते हुए घबराते थे। खोजवाँ बाजार वाले दुलारी को अपनी तरफ से खड़ा करके अपनी जीत सुनिश्चित कर चुके थे। उसके विपक्ष में सोलह-सत्रह वर्ष का टुन्नू किशोर था। टुन्नू के पिता यजमानी करके अपनी घर-गृहस्थी चलाते थे। किंतु टुन्नू को गायकी और शायरी का चस्का लग गया था। टुन्नू ने उस दिन जमकर दुलारी का मुकाबला किया। दुलारी को भी टुन्नू का गाना अच्छा लग रहा था। मुकाबले में टुन्नू के मुख से दुलारी की तारीफ सुनकर सुंदर के ‘मालिक’ फेंकू सरदार ने टुन्नू पर लाठी का वार किया। दुलारी ने टुन्नू की उस वार से रक्षा की थी। टुन्नू के चले जाने के बाद भी दुलारी. उसी के विषय में सोचती रही। टुन्नू उस दिन अत्यंत सभ्य लग रहा था। दुलारी ने घर जाकर टुन्नू द्वारा दी हुई साड़ी को संदूक में रख दिया। उसके मन में भी टुन्नू के प्रति कोमल भाव जागृत होने लगे थे। टुन्नू कई दिनों से उसके पास आने लगा था और उसकी बातों को बड़े गौर से सुनने लगा था। दुलारी का यौवन ढल रहा था। टुन्नू सोलह-सत्रह वर्ष का था जबकि दुलारी दुनिया देख चुकी थी। वह समझ गई थी कि टुन्नू और उसका संबंध शारीरिक नहीं, आत्मा का था। वह यह बात टुन्नू के सामने स्वीकार करने से डर रही थी। उसी समय फेंकू धोतियों का एक बंडल लेकर उसके पास आता है। फेंकू सरदार उसे तीज पर बनारसी साड़ी दिलवाने का वादा करता है। जब ये दोनों बातचीत कर रहे थे, तभी गली में नीचे विदेशी कपड़ों की होली जलाने वाली टोली निकली। लोग पुराने विदेशी कपड़े जलाने के लिए फैंक रहे थे। किंतु दुलारी ने फेंकू सरदार द्वारा दी गई बढ़िया साड़ियों का बंडल फैंक दिया। दुलारी द्वारा फैंके गए बंडल को देखकर सबकी आँखें उसकी ओर उठ गईं। जुलूस के पीछे चल रही खुफिया पुलिस के रिपोर्टर अली सगीर ने भी दुलारी को देख लिया।

दुलारी फेंकू सरदार की किसी बात पर बिगड़ गई और झाड़ से मारती हुई बोली निकल यहाँ से। यदि मेरी देहरी पर डाँका तो दाँत से तेरी नाक काट लूँगी। आँगन में खड़ी संगनियों और पड़ोसिनों ने दुलारी को अत्यंत हैरानी से देखा। चूल्हे पर चढ़ी दाल को दुलारी ने ठोकर मारकर गिरा दिया। दाल के गिरने से चूल्हे की आग तो बुझ गई, किंतु दुलारी के दिल की आग न बुझ सकी। पड़ोसिनों के मीठे वचनों की जलधारा से दुलारी के हृदय की आग कुछ ठंडी हुई। उनकी आपस की बातचीत से पता चला कि फेंकू सरदार टुन्नू से जलन रखता था। इसी बात को लेकर दुलारी ने फेंकू पर झाड़ बरसाए थे। तभी नौ वर्षीय झींगुर आकर बताता है कि टुन्नू महाराज को गोरे सिपाहियों ने मार डाला और लाश को उठा ले गए। टुन्नू की मौत की खबर सुनते ही दुलारी की आँखों से अश्रुधारा बह निकली। अब पड़ोसिनें दुलारी के दिल का हाल जान गई थीं। सभी ने उसके रोने को नाटक समझा किंतु दुलारी अपने मन की सच्चाई जानती थी। उसने टुन्नू द्वारा दी गई साधारण साड़ी पहन ली। वह झींगुर से टुन्नू की शहीदी के स्थान का पता पूछकर वहाँ जाने के लिए घर से निकली ही थी कि तभी थाने के मुंशी और फेंकू सरदार ने उसे थाने चलकर अमन सभा के समारोह में गाने के लिए कहा। न चाहते हुए भी उसे उनके साथ जाना पड़ा।

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उधर अखबार के दफ्तर में प्रधान संवाददाता शर्मा जी की लिखी रिपोर्ट को पढ़कर क्रोध से लाल हो रहे थे। संपादक जी के आदेश पर शर्मा जी रिपोर्ट पढ़ने लगे, शीर्षक दिया था, “एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा,” रिपोर्ट में लिखा था कि कल नगर भर में हड़ताल थी। यहाँ तक कि खोमचे वाले भी बाजार में दिखाई नहीं दिए थे।

सुबह से ही विदेशी कपड़ों को एकत्रित करके उनकी होली जलाने वालों के जुलूस निकलते रहे। उनके साथ प्रसिद्ध गायक टुन्नू भी था। जुलूस टाऊन हॉल पर पहुंचकर समाप्त हो गया। जब सब अपने-अपने घरों को लौट रहे थे तो पुलिस के जमादार अली सगीर ने टुन्नूं को गालियाँ दीं। प्रतिवाद करने पर उसे जमादार ने खूब पीटा और बूट से ठोकर मारी। इससे उसकी पसली पर चोट आई। वह गिर पड़ा और उसके मुख से खून निकलने लगा। गोरे सिपाहियों ने उसे अस्पताल में ले जाने की अपेक्षा वरुणा में प्रवाहित कर दिया, जिसे संवाददाता ने भी देखा था। इस टुन्नू नामक गायक का दुलारी से भी संबंध बताया जाता है।

शाम को टाऊन हॉल में आयोजित अमन सभा में जहाँ जनता का एक भी प्रतिनिधि उपस्थित नहीं था, दुलारी को नचाया व गवाया गया था। टुन्नू की मृत्यु से दुलारी बहुत उदास थी। उसने खद्दर की साधारण धोती पहनी हुई थी। वह उस स्थान पर गाना नहीं चाहती थी, जहाँ आठ घंटे पहले उसके प्रेमी की हत्या कर दी गई थी। फिर भी उसने कुख्यात जमादार अली सगीर के कहने पर गाया, किंतु उसके स्वर में दर्द स्पष्ट रूप में अनुभव किया जा सकता था। उसके गीत के बोल थे “एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा। कासों मैं पूछू।” उसने सारा गीत उस स्थान पर नज़र गड़ाकर गाया जहाँ टुन्नू का कत्ल किया गया था। गाते-गाते उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी थी। उसके आसुओं की बूंदें ऐसी लग रही थीं जैसे टुन्नू की लाश को वरुणा के जल में फैंकने से उस जल की बूंदें छिटक गई थीं।” संपादक महोदय को रिपोर्ट तो सत्य लगी, किंतु इसे वे छाप न सके।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-31) दनादन = तेज़ गति से। चणक-चर्वण-पर्व = चने चबाने का त्योहार। बाकायदे = ठीक ढंग से। विलोल = असली। विलीन = गायब होना, नष्ट होना।

(पृष्ठ-33) शीर्ण वदन = कमज़ोर शरीर। खैरियत = कुशल। उपेक्षापूर्ण = निरादर के भाव से। कज्जल-मलिन = काजल से मैली हुई। पाषाण = पत्थर। प्रतिमा = मूर्ति। वक्र = टेढ़ी। दुक्कड़ = शहनाई के साथ बजाया जाने वाला यंत्र। महती = अत्यधिक। पद्य = कविता। क्षमता = शक्ति। कजली = एक प्रकार का लोकगीत। कायल = मानने वाला। कोर दबना = लिहाज करना।

(पृष्ठ-34) गौनहारियों की गोल = गाने वालों का समूह। प्रतिकूल = उलट। स्वर = आवाज़ । मुग्ध = मोहित। सार्वजनिक आविर्भाव = मंच पर लोगों के सामने अपनी कला दिखाने का अवसर। यजमानी = पुरोहित की जीविका। चस्का = स्वाद। रंग उतर गया = निराश हो गए। मद-विह्वल = अहंकार से पूर्ण। कोढ़ियल = कुरूप, कोढ़ के रोग से पीड़ित।

(पृष्ठ-35) सरबउला = पागल। व्यर्थ = बेकार। मजलिस = महफिल। बदमज़ा = बेस्वाद। प्रकृतिस्थ = स्वाभाविक। आबरवाँ = बहुत महीन मलमल। चंचल = अस्थिर, व्याकुल । दुर्बलता = कमज़ोरी।

(पृष्ठ-36) मनोयोग = लगन। यौवन का अस्ताचल = जवानी के समाप्त होने की दशा। उन्माद = पागलपन। कृशकाय = दुबला-पतला। पाँडुमुख = पीला मुख। करुणा = दया। आसक्त = मोहित, ललचाया हुआ। कृत्रिम = बनावटी। निभृत = एकांत। प्रस्तुत = तैयार। सहसा = एकाएक।

(पृष्ठ-37-38) आकृति = रूप, शक्ल । मुखबर = वह अपराधी जो अपराध स्वीकार करके सरकारी गवाह बन जाता है। तमोली = पान बेचने वाला। शपाशप = निरंतर। देहरी डाँकना = दहलीज पार करना। उत्कट = प्रबल। अधर = होंठ। कुतूहल = हैरानी। बटलोही = दाल पकाने का बर्तन। कातर = व्याकुल। स्तब्ध = हक्का-बक्का रह जाना। आँखों में मेघमाला घिर आना = आँखों से निरंतर आँसू बहना।

(पृष्ठ-39) कर्कशा = कटु वचन बोलने वाली। वनिता-सुलभ = सद् गृहिणियों के अनुरूप। दिल्लगी = मज़ाक। सहकर्मी = साथ काम करने वाला। बूते की बात नहीं = वश का काम नहीं। बड़ा घर = यहाँ जेल के लिए प्रयोग हुआ है। सजग = सावधान, चौकन्ने। झेंप = लज्जा। मुद्रा = भाव।

(पृष्ठ-40-41) विघटित = छंट गया, अलग-अलग हो गया। शव = मृत शरीर। विवश = मजबूर। आमोदित = प्रसन्न। उद्घांत दृष्टि = उड़ती-सी बेचैन नज़रें। अधर-प्रांत पर = होंठों पर। स्मित = हल्की-सी मुसकान। आविर्भाव = उदय होना।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

HBSE 10th Class Hindi साना साना हाथ जोड़ि Textbook Questions and Answers

साना साना हाथ जोड़ि के प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 1.
झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था?
उत्तर-
झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका के मन में सम्मोहन उत्पन्न कर रहा था। वहाँ की सुंदरता ने लेखिका पर एक जादू सा कर दिया था, कि वह एकटक उसे देखती ही रह गई। उसे उस समय सब कुछ ठहरा हुआ-सा लग रहा था। उसके आस-पास व उसके अंतर्मन में एक शून्य-सा समा गया था।

साना-साना हाथ जोड़ि के प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 2.
गंतोक को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ क्यों कहा गया?
उत्तर-
मेहनतकश से यहाँ अभिप्राय है, कड़ा परिश्रम करने वाले लोग। ‘बादशाह’ से तात्पर्य है अपनी इच्छानुसार काम करने वाले। गंतोक पहाड़ी स्थल है। पहाड़ी क्षेत्र का जीवन कठिन होता है। अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यहाँ के लोग कड़ी मेहनत करने से घबराते नहीं, अपितु मेहनत करते हुए भी मस्त रहते हैं। उन्हें किसी की परवाह नहीं होती और न ही वे दूसरों की सहायता के लिए किसी के आगे हाथ फैलाते हैं। इसीलिए लेखिका ने गंतोक को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ कहा है।

Class 10 Kritika Chapter 3 HBSE प्रश्न 3.
कभी श्वेत तो कभी रंगीन पताकाओं का फहराना किन अलग-अलग अवसरों की ओर संकेत करता है?
उत्तर-
श्वेत पताकाएँ किसी बौद्ध धर्म के अनुयायी की मृत्यु पर फहराई जाती हैं। किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु हो जाने पर नगर से बाहर वीरान स्थान पर मंत्र-लिखित एक सौ आठ पताकाएँ फहराई जाती हैं। उन्हें उतारा नहीं जाता। वे धीरे-धीरे स्वयं नष्ट हो जाती हैं। रंगीन पताकाएँ काम के शुभारंभ के समय फहराई जाती हैं।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

Class 10th Kritika Chapter 3 HBSE प्रश्न 4.
जितेन नार्गे ने लेखिका को सिक्किम की प्रकृति के बारे में, वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनजीवन के बारे में क्या महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ दीं। लिखिए।
उत्तर-
जितेन नार्गे सिक्किम का नागरिक था। वह ड्राइवर और गाइड दोनों का कार्य अकेले ही करता था। लेखिका ने जितेन नार्गे के साथ ही सिक्किम की यात्रा की थी। वह लेखिका को यात्रा के दौरान वहाँ की प्राकृतिक, भौगोलिक व जनजीवन की महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ देता रहता था। उसने बताया कि सिक्किम में प्राकृतिक नज़ारे अत्यंत सुंदर हैं। गंतोक से यूमथांग 149 किलोमीटर दूर है। यह मार्ग खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से भरा पड़ा है। कहीं घाटियाँ फूलों से भरी हुई हैं। अनेक झरने कल-कल की ध्वनि करते हुए बहते हैं। कहीं घाटियों को फूलों की वादियाँ भी कहते हैं। सिक्किम की सीमा चीन से सटी हुई है। पहले यहाँ राजा का शासन था किंतु अब वह भारत का अंग है।

यहाँ बौद्ध धर्म का बोल-बाला है। यदि किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु हो जाए तो उसकी आत्मा की शांति के लिए एक सौ आठ सफेद पताकाएँ फहराई जाती हैं। जब किसी कार्य का शुभारंभ किया जाता है तो रंगीन पताकाएँ फहराई जाती हैं। यहाँ की औरतें बहुत मेहनत करती हैं। यहाँ बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूल कम हैं। बच्चों को स्कूल भेजने के लिए आवागमन के साधन भी कम हैं। यहाँ की नारियाँ रंगीन कपड़े पहनना पसंद करती हैं। उनका परंपरागत परिधान ‘बोकु’ है।

Class 10 Kritika Chapter 3 Solutions HBSE प्रश्न 5.
लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक-सी क्यों दिखाई दी?
उत्तर-
लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र के विषय में जितेन नार्गे ने बताया कि इसे घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं। लेखिका उस घूमते हुए चक्र को देखकर सोचने लगती हैं कि पूरे भारत में ऐसे विश्वास पाए जाते हैं। इसलिए भारत के लोगों की आत्मा एक-जैसी है, विज्ञान ने चाहे कितनी ही तरक्की क्यों न कर ली हो फिर भी लोगों की पाप-पुण्य संबंधी मान्यताएँ एक-जैसी ही हैं। वह चाहे पहाड़ी क्षेत्र हो अथवा मैदानी क्षेत्र। इन मान्यताओं में कहीं कोई अंतर नहीं है।

साना साना हाथ जोड़ी पाठ के प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 6.
जितेन नार्गे की गाइड की भूमिका के बारे में विचार करते हुए लिखिए कि कुशल गाइड में क्या गुण होते हैं?
उत्तर-
जितेन नार्गे केवल गाइड ही नहीं, अपितु कुशल ड्राइवर भी था। एक कुशल गाइड की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि उसे उस क्षेत्र का पूरा ज्ञान होना चाहिए जिसमें वह गाइड का काम कर रहा है। जितेन एक कुशल गाइड है क्योंकि उसे सिक्किम के सारे पहाड़ी क्षेत्र का पूरा ज्ञान था। वह सैलानियों को उस क्षेत्र की पूरी जानकारी देता है। वह छोटी-से-छोटी जानकारी भी यात्रियों को देता है। इसके अतिरिक्त एक कुशल गाइड यात्रियों को कभी निराश नहीं होने देता। जितेन भी लेखिका और उसके सहयात्रियों को दिलासा दिलाता है कि उन्हें आगे चलकर बर्फ अवश्य देखने को मिलेगी। वह यात्रियों के साथ मित्र जैसा व्यवहार करता है। वह संगीत का ज्ञान भी रखता है। यात्रियों की थकान को दूर करने के लिए उनकी पसंद का संगीत सुनाता है। एक गाइड को अपने क्षेत्र के इतिहास और संस्कृति का पूरा ज्ञान होना चाहिए। जितेन इस दृष्टि से एक कुशल गाइड है। उसे सिक्किम के इतिहास और संस्कृति का पूरा ज्ञान है। वह लेखिका और अन्य यात्रियों को उससे अवगत कराता है। इसी प्रकार एक कुशल गाइड अपने क्षेत्र के जन-जीवन, वहाँ के प्रमुख व्यवसाय आदि की भी जानकारी रखता है। जितेन नार्गे को भी यह जानकारी थी। मार्ग में काम करने वाली सिक्किम नारियों के जीवन के बारे में वह पूर्ण जानकारी देता है। वहाँ के लोगों के धार्मिक स्थलों और लोगों के विश्वास व आस्थाओं की भी जानकारी देता है। अतः स्पष्ट है कि जितेन एक कुशल गाइड है। उसके मार्गदर्शन में यात्रा करने वाले यात्रियों का आनंद दुगुना हो जाता है। वह आस-पास के वातावरण को प्रसन्नतायुक्त बना देता है।

Kritika Chapter 3 Class 10th HBSE प्रश्न 7.
इस यात्रा-वृत्तांत में लेखिका ने हिमालय के जिन-जिन रूपों का चित्र खींचा है, उन्हें अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
लेखिका की पहाड़ी यात्रा गंतोक से यूमथांग जाने के लिए आरंभ होती है। वे अपने पूरे दल के साथ जीप में बैठकर यात्रा शुरु करती है। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं वैसे-वैसे ऊँचाई भी बढ़ती जाती है। उन्होंने देखा कि हिमालय का प्राकृतिक दृश्य पल-पल में बदलता है। हिमालय का विराट रूप सामने आता है। अब हिमालय अपने विशाल रूप में दिखाई देने लगता है। आसमान में घटाएँ फैली हुई हैं। घाटियों में दूर – दूर तक खिले हुए फूल फैले हुए हैं। चारों ओर एक गहन शांति पसरी हुई थी। लेखिका हिमालय के उस चमत्कारी रूप को अपनी आत्मा में समेट लेना चाहती है। वह उस दृश्य से एकात्म हो उठती है। वह हिमालय को मेरे नगपति, मेरे विशाल कहकर सलामी देती है। हिमालय कहीं हरे रंग का कालीन ओढ़े हुए नज़र आता है तो कहीं सफेद बर्फ की चादर ओढ़े हुए और कहीं-कहीं बादल में लुका-छिपी का खेल खेलता सा लगता है। लेखिका को पर्वत क्षेत्र ‘जादू की छाया’ ‘माया एवं खेल लगता है तो कहीं लेखिका उसे देखकर गहन विचारों में डूब जाती है। उसे वह परम् सत्य का अनुभव होने लगता है। इसी प्रकार वह वहाँ के जन-जीवन का चित्र अंकित करने लगती है।

Class 10 Kritika Ch 3 Solutions HBSE प्रश्न 8.
प्रकृति के उस अनंत और विराट स्वरूप को देखकर लेखिका को कैसी अनुभूति होती है?
उत्तर-
हिमालय,की प्राकृतिक छटा पल-पल बदलती है। लेखिका हिमालय पर प्रकृति के अनंत और विराट रूप को देखकर अवाक् रह जाती है। वह प्रकृति के ‘माया’ और ‘छाया’ के रूप को देखकर सम्मोहित हो जाती है। उसे ऐसा लगता है कि प्रकृति उसे अपना परिचय दे रही है। वह उसे अधिक सयानी बनाने के लिए उसके सामने अपने रहस्यों का उद्घाटन कर रही है। प्रकृति के उस विराट रूप को देखकर उसे अनेक अनुभूतियाँ होती हैं। उसे अनुभव होता है कि जीवन की सार्थकता झरनों और फूलों की भाँति स्वयं को दे देने में है। झरनों की भांति निरंतर गतिशील रहना और फूलों की भांति सदा मुस्कुराते रहने में ही जीवन की जीवंतता है। जीवन में दूसरों के लिए कुछ कर गुज़रना ही जीवन को सार्थक बनाता है। ऐसी अनुभूति लेखिका को प्रकृति के विराट और अनंत स्वरूप को देखकर ही होती है।

Class 10 Hindi Kritika Chapter 3 Short Answers HBSE प्रश्न 9.
प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को कौन-कौन से दृश्य झकझोर गए?
उत्तर-
प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को सड़क बनाने वाली पहाड़ी औरतों के द्वारा पत्थर तोड़ने के दृश्य झकझोर गए। लेखिका ने देखा कि उस प्राकृतिक सौंदर्य के दृश्यों से बेपरवाह कुछ अत्यंत सुंदर एवं कोमलांगी पहाड़ी औरतें पत्थर तोड़ने में लीन थीं। उनके हाथों में कुदाल व हथौड़े थे। कईयों की पीठ पर तो डोको (बड़ी टोकरी) में उनके बच्चे भी बँधे हुए थे। यह विचार लेखिका को बार-बार झकझोरता था कि नदियों, फूलों, झरनों, वादियों के प्राकृतिक नज़ारों के बीच भूख, प्यास, मौत और मानव के जीने की इच्छा के बीच कड़ा संघर्ष चल रहा था। वे नारियाँ उस संघर्ष से जीतने के लिए जीतोड़ परिश्रम कर रही थीं। मानव ने सदा कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की है।

Kritika Chapter 3 Class 10 HBSE प्रश्न 10.
सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में किन-किन लोगों का योगदान होता है, उल्लेख करें।
उत्तर-
सैलानियों को प्राकृतिक छटा का अनुभव कराने में अनेक लोगों का योगदान रहता है। सर्वप्रथम सैलानियों को पर्यटन-स्थलों पर ठहराने का प्रबंध करने वाले लोगों का योगदान रहता है। इसके पश्चात् उनके लिए वाहनों का प्रबंध करने वाले लोगों का योगदान रहता है। वाहनों के चालकों व गाइडों का योगदान भी सराहनीय होता है। मार्गदर्शक (गाइड) की भूमिका तो और भी महत्त्वपूर्ण रहती है, क्योंकि वह सैलानियों को वहाँ के स्थानों की जानकारी के साथ – साथ वहाँ के इतिहास व सांस्कृतिक परंपराओं में विश्वास, जन-जीवन व परंपराओं की जानकारी देकर उनकी यात्रा को रोचक बनाता है। इनके अतिरिक्त वहाँ स्थानीय लोगों व सरकारी रख-रखाव के प्रबंध की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

Chapter 3 Kritika Class 10 Questions And Answers HBSE प्रश्न 11.
“कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती है।” इस कथन के आधार पर स्पष्ट करें कि आम जनता की देश की आर्थिक प्रगति में क्या भूमिका है?
उत्तर-
निश्चय ही देश की आर्थिक प्रगति में आम जनता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। देश की महत्त्वपूर्ण योजनाओं को सफल बनाने में आम जनता सहयोग देती है। सड़कों का निर्माण करने हेतु पत्थर तोड़ने व पत्थर जोड़ने से लेकर बहुमंजली अट्टालिकाएँ खड़ी करने में आम-जनता का परिश्रम ही काम करता है। किंतु आम जनता के इस कार्य के बदले में उन्हें बहुत कम पैसे मिलते हैं। बड़े-बड़े कामों को अंजाम देने वाली यह आम जनता अपनी दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति भी बड़ी मुश्किल से कर पाती है। सड़कों के निर्माण, बाँध-बाँधने, बड़ी- बड़ी फैक्टरियों के निर्माण की नींव आम जनता के खून-पसीने पर रखी जाती है। सड़कों के निर्माण से आवागमन सुगम हो जाता है। समान एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरलता से पहुंचाया जा सकता है। इससे देश में आर्थिक प्रगति होती है। बड़ी-बड़ी फैक्टरियों के द्वारा वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। बाँधों से बिजली का उत्पादन होता है। फसलों की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होता है। इन सब कार्यों में आम-जनता का पूर्ण योगदान रहता है। आम-जनता के सहयोग व भूमिका के बिना देश का आर्थिक विकास संभव नहीं है।

प्रश्न 12.
आज की पीढ़ी द्वारा प्रकृति के साथ किस तरह खिलवाड़ किया जा रहा है? इसे रोकने में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए?
उत्तर-
आज की पीढ़ी का विश्वास भौतिक उन्नति तक सीमित हो गया है। वह अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए कुछ भी करने के लिए तत्पर है। वह केवल आज के विषय में सोचती है। इसलिए वह प्रकृति के प्रति भी निर्ममता का व्यवहार करती है। वह भूल चुकी है, कि प्रकृति को नष्ट करके हम भी नष्ट हो जाएँगे। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, नदियों के जल का दुरुपयोग तथा कृषि योग्य भूमिका बड़े-बड़े नगर बसाने व औद्योगिक संस्थान खड़े करने से प्राकृतिक संतुलन समाप्त हो जाएगा।

आज हमें देखना होगा कि हम ऐसा कोई कार्य न करें, जिससे प्रकृति को हानि पहुँचती है या हम वे कार्य कम-से-कम करें जिससे प्रकृति का नुकसान हो। हमें वृक्षों के काटने पर ही रोक नहीं लगानी चाहिए, अपितु अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाने का प्रयास भी करना चाहिए। हम विद्यार्थी भी अपने आँगन या घर के आस-पास की खाली पड़ी धरती पर छायादार वृक्षों के पौधे लगाकर प्रकृति को बचाने में योगदान दे सकते हैं। अपने विद्यालय में खड़े वृक्षों की देखभाल करके व और वृक्ष लगाकर प्रकृति के प्रति किए जा रहे खिलवाड़ को रोकने में सहायता दे सकते हैं। हमें जल के उचित प्रयोग के प्रति समाज में जागरूकता उत्पन्न करनी होगी, ताकि जल का सही प्रयोग हो। हमें नदियों में गंदगी नहीं फैंकनी चाहिए। कारखानों से निकले गंदे पानी को नदियों के पानी में नहीं बहाना चाहिए। कृषि योग्य भूमि का भी सदुपयोग करने का प्रचार करके हम प्रकृति को हानि पहुँचने से रोक सकते हैं। सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करके भी हम इस नेक कार्य में योगदान दे सकते हैं।

प्रश्न 13.
प्रदूषण के कारण स्नोफॉल में कमी का जिक्र किया गया है। प्रदूषण के और कौन-कौन से दुष्परिणाम सामने आए हैं, लिखें।
उत्तर-
प्रदूषण के कारण सबसे बड़ा दुष्परिणाम तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ना है। प्रदूषण से मानव स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा है। प्रदूषण से सारे देश व समाज का आर्थिक और सामाजिक वातावरण बिगड़ रहा है। खेती के उगाने के कृत्रिम उपायों, खादों आदि के प्रयोग से जहाँ धरती की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है, वहीं खराब फसलें उत्पन्न हो रही हैं, जिनके खाने से मानव के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। इसी प्रकार ध्वनि व वायु-प्रदूषण ने भी हमारे प्राकृतिक वातावरण को विकलांग बना दिया है। वायु-प्रदूषण से फेफड़ों की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। ध्वनि-प्रदूषण से मन की शांति नष्ट हो रही है और तनाव बढ़ता जा रहा है। ध्वनि-प्रदूषण से बहरेपन की बीमारी बढ़ रही है। इस प्रदूषण की बढ़ती समस्या के प्रति हर व्यक्ति का जागरूक होना अति अनिवार्य है। सरकार को चाहिए की प्रदूषण को रोकने के लिए कड़े नियम बनाए और उनको सख्ती से लागू करे।

प्रश्न 14.
‘कटाओ’ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। इस कथन के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कीजिए?
उत्तर-
‘कटाओ’ को भारत का स्विट्ज़रलैंड कहा जाता है। वह स्विटज़रलैंड से भी अधिक सुंदर स्थान है, जिसे देखकर लोग अपने आपको ईश्वर के निकट समझते हैं। वहाँ उन्हें अद्भुत शांति मिलती है। यदि वहाँ पर दुकानें खुल जातीं, तो लोगों की भीड़ बढ़ जाती। गंदगी फैल जाती। वहाँ का प्राकृतिक वातावरण नष्ट हो जता। उसे भारत का स्विट्ज़रलैंड नहीं कहा जा सकता था। इसलिए ‘कटाओ’ पर किसी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है।

प्रश्न 15.
प्रकृति ने जल संचय की व्यवस्था किस प्रकार की है?
उत्तर-
प्रकृति के नियम अनोखे हैं। वह हर कार्य की व्यवस्था अपने ही ढंग से करती है। उसकी जल संचय व्यवस्था भी अत्यंत रोचक है। सर्दियों में बर्फ के रूप में जल एकत्रित होता है। गर्मियों में जब लोग प्यास से व्याकुल होते हैं तो प्रकृति के द्वारा एकत्रित बर्फ रूपी जल पिघलकर जलधारा बनकर बहने लगता है। जिसे प्राप्त करके लोग अपनी प्यास को बुझाते हैं।

प्रश्न 16.
देश की सीमा पर बैठे फौजी किस तरह की कठिनाइयों से जूझते हैं? उनके प्रति हमारा क्या उत्तरदायित्व होना चाहिए?
उत्तर-
देश की सीमाओं पर बैठे फौजी विशेषकर पहाड़ी क्षेत्र की सीमाओं पर उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वहाँ वे बर्फीली हवाओं और तूफानों का सामना करते हैं। पौष और माघ की ठंड में तो पेट्रोल के अतिरिक्त सब कुछ जम जाता है। फौजी बड़ी मुश्किल से अपने शरीर का तापमान सामान्य रखते हुए देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं। वहाँ तक पहुँचने के मार्ग अत्यंत संकरे और खतरनाक हैं। कहीं-कहीं पर तो कोई वाहन भी नहीं जा सकता। वहाँ फौजी अपना सामान अपनी पीठ पर लादकर ले जाते हैं। वहाँ कभी भी किसी के भी प्राण जाने की संभावना बनी रहती है। किंतु फौजी अपने आपको खतरे में डालकर हमारे आने वाले कल को सुरक्षित करते हैं।

देश की सीमाओं की सुरक्षा करने वाले फौजियों के प्रति हमारा उत्तरदायित्व बनता है, कि हम उनका हौसला बढ़ाएँ और उनके परिवार की खुशहाली के लिए प्रयत्नशील रहें ताकि फौजी अपने परिवार की चिंता से मुक्त होकर सीमाओं की रक्षा कर सकें। समय-समय पर उनका साहस बढ़ाने के लिए उनके बीच जाकर उनका मनोरंजन करना चाहिए। हमें अपने फौजियों का सम्मान करना चाहिए।

HBSE 10th Class Hindi जॉर्ज पंचम की नाक Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखिका को गंतोक से कंजनजंघा की पहाड़ियाँ क्यों नहीं दिखाई दे रही थीं?
उत्तर-
लेखिका प्रातःकाल जब जगी तो वह तुरंत बाहर आकर कंचनजंघा की पहाड़ियाँ देखने लगी। किंतु उसे वे पहाड़ियाँ दिखाई नहीं दीं, क्योंकि उस प्रातः मौसम साफ नहीं था। मौसम के साफ रहने पर ही कंचनजंघा की पहाड़ियाँ दिखाई दे सकती हैं। किंतु उस दिन आकाश में हल्के-हल्के बादल छाए हुए थे। ..

प्रश्न 2.
लेखिका को लायुंग में बर्फ देखने को क्यों नहीं मिली?
उत्तर-
लेखिका अपने सहयात्रियों के साथ आगे बढ़ती जा रही थी। उन्हें उम्मीद थी कि वे लायुग में बर्फ देख सकेंगे। किंतु वहाँ उन्हें बर्फ के दर्शन नहीं हुए। किंतु जैसे ही लेखिका प्रातः उठी उन्हें विश्वास था, कि उन्हें बर्फ देखने को मिलेगी। किंतु ऐसा नहीं हुआ और लेखिका निराश हो गई। वहाँ बर्फ का एक भी कतरा न था। वहाँ स्थानीय लोगों ने बताया कि प्रदूषण के बढ़ने के कारण वहाँ बर्फ नहीं पड़ती। जिस प्रकार तेजगति से प्रदूषण बढ़ रहा है, वैसे-वैसे प्रकृति के साधनों में भी कमी आती जा रही है।

प्रश्न 3.
लेखिका के गाइड ने उसे कैसा स्थान बताया था, जहाँ बर्फ मिल सकती थी? उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर-
लेखिका के गाइड जितेन नार्गे ने लेखिका को बताया था, कि कटाओ में बर्फ अवश्य देखने को मिलेगी। कटाओ को अभी टूरिस्ट स्थान नहीं बनाया गया। वह अपने प्राकृतिक रूप में विद्यमान है। उसे भारत का स्विट्ज़रलैंड कहा जाता है। कटाओ लायुंग से 500 फुट की ऊँचाई पर है। लायुंग से कटाओ पहुँचने के लिए लगभग दो घंटे लग जाते हैं। यहाँ के रास्ते अत्यंत संकरे एवं खतरनाक हैं।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

प्रश्न 4.
लायुंग के विषय में सार रूप में लिखते हुए बताइए, कि यहाँ आजकल बर्फ कम क्यों पड़ने लगी है?
उत्तर-
लायुंग सिक्किम राज्य का एक छोटा-सा कस्बा है। यह गंतोक और यूमथांग के बीच का मुख्य पड़ाव है। यहाँ के लोगों की जीविका का साधन पहाड़ी आलू, धान की खेती और शराब का व्यापार हैं। यद्यपि यह कस्बा समुद्र-तल से 14000 फुट की ऊँचाई पर है, किंतु यहाँ हिमपात बहुत कम होता है। इसका प्रमुख कारण पर्वतीय क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण है।

प्रश्न 5.
‘साना-साना हाथ जोड़ि……’ पाठ में झरने के संगीत में विलीन आत्मा के संगीत पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
लेखिका मार्ग में आने वाले एक खूबसूरत झरने के पास रुकी। उसका नाम था ‘सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल’। लेखिका वहाँ पत्थरों पर बैठकर झरने के संगीत के साथ ही आत्मा का संगीत भी सुनने लगी थी। उसका मन भी झरने के संगीत को सुनकर काव्यमय हो उठा। आत्मा सत्य व सौंदर्य का छूने लगी। आत्मा को झरना अनंतता का प्रतीक अनुभव हो रहा था। उससे उसे जीवन की शक्ति का भी एहसास होने लगा था। ऐसा लगा कि उसके जीवन से सभी कुटिलताएँ और दुष्ट भावनाएँ इस निर्मल धारा में बह गई हैं। उसका . जीवन असीम बनकर बहने लगा हो। वह कामना करती है कि मैं भी अनंत समय तक ऐसे ही बहती रहूँ और इस झरने की पुकार को सुनती रहूँ।

प्रश्न 6.
पताकाओं को लेखिका ने बौद्ध संस्कृति का अंग क्यों कहा है? अथवा घाटी में दिखाई देने वाली रंगीन पताकाएँ कब लगाई जाती हैं?
उत्तर-
लेखिका को जितेन ने बताया है कि जब किसी बौद्ध अनुयायी की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी आत्मा की शांति हेतु मंत्र-लिखित एक सौ आठ पताकाएँ फहरा दी जाती हैं। इन्हें उतारा नहीं जाता, अपितु ये स्वयं नष्ट हो जाती हैं। जब कोई नया कार्य आरंभ किया जाता है, तो रंगदार पताकाएँ फहराई जाती हैं। अतः स्पष्ट है कि पताकाएँ बौद्ध संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। ये बौद्ध संस्कृति की पहचान भी कही जा सकती हैं।

प्रश्न 7.
सिक्किमी नवयुवक ने ‘कटाओ’ के बारे में लेखिका को क्या जानकारी दी?
उत्तर-
युवक ने लेखिका को बताया कि कटाओ जाने पर लेखिका को शर्तिया बर्फ मिल जाएगी-कटाओ यानि भारत का स्विट्जरलैंड! जो कि अभी तक टूरिस्ट स्पॉट नहीं बनने के कारण सुर्खियों में नहीं आया था और अपने प्राकृतिक स्वरूप में था।

प्रश्न 8.
किस कारण से कटाओ के मार्ग में सभी यात्री मौन हो गए थे, केवल उनकी साँसों की ध्वनि ही सुनाई देती थी?
उत्तर-
लायुंग और कटाओ के बीच का मार्ग अत्यंत संकरा और खतरनाक था। वाहन चालक को एक-एक इंच का ध्यान रखना पड़ता है। उसकी ज़रा- सी भूल से न जाने क्या हो जाए। जब लेखिका और उसके सहयात्री आगे बढ़े तो उस समय हल्की-हल्की वर्षा हो रही थी और धुंध भी छाई हुई थी। रास्ते के खतरे के अहसास ने सभी को खामोश कर दिया था। उस धुंध और फिसलन भरे रास्ते में कुछ भी घटित हो सकता था। इसलिए वे सब सारी मस्ती भूलकर अपना दम साधे बैठे थे।

प्रश्न 9.
कटाओ के अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर लेखिका क्या सोचने लगी थी?
उत्तर-
कटाओ का प्राकृतिक सौंदर्य जहाँ अनुपम एवं पवित्र था, वहीं उसका प्रभाव भी जादू की भाँति असरदार था। लेखिका उसकी सम्मोहन शक्ति से न बच पाई थी। वह उसे अपनी आत्मा में समा लेना चाहती थी। वह अनुभव करने लगी, कि विभोर कर देने वाली उस दिव्यता के बीच बैठकर हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की होगी। उन्होंने ऐसे ही दिव्य प्राकृतिक वातावरण में बैठकर जीवन के सत्य को खोजा होगा। ‘सर्वे भवंतु सुखिनः के महामंत्र का उच्चारण किया होगा।

प्रश्न 10.
जितेन ने सैलानियों से गुरु नानक देव जी से संबंधित किस घटना का वर्णन किया है?
उत्तर-
जितेन को उस क्षेत्र के इतिहास और भौगोलिक स्थिति का पूरा ज्ञान था। वह लेखिका और उसके सहयात्रियों को रास्ते में अनेक जानकारियाँ देता रहता है। एक स्थान पर उसने बताया कि यहाँ पर एक पत्थर पर गुरु नानक देव जी के पैरों के निशान हैं। जब गुरु नानक देव जी यहाँ आए थे उस समय उनकी थाली से कुछ चावल छिटककर बाहर गिर गए थे। जहाँ-जहाँ चावल छिटके थे, वहाँ-वहाँ चावलों की खेती होने लगी थी।

प्रश्न 11.
सिक्किम के अधिकतर लोगों की जीविका का साधन क्या है?
उत्तर-
सिक्किम के अधिकतर लोग मेहनत मजदूरी करते हैं। उनके खेत छोटे होते हैं तथा वे पशु-पालन का काम भी करते हैं।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘साना-साना हाथ जोड़ि’ नामक पाठ की रचयिता का क्या नाम है?
(A) महादेवी वर्मा
(B) मधु कांकरिया
(C) कमलेश्वर
(D) शिवपूजन सहाय
उत्तर-
(B) मधु कांकरिया

प्रश्न 2.
‘साना-साना हाथ जोड़ि’ नामक पाठ साहित्य की किस विधा के अंतर्गत आता है?
(A) कहानी
(B) निबंध
(C) यात्रा वृत्तांत
(D) संस्मरण
उत्तर-
(C) यात्रा वृत्तांत

प्रश्न 3.
‘गैंगटॉक’ नगर किस राज्य की राजधानी है?
(A) आसाम
(B) सिक्किम
(C) बंगाल
(D) अरुणाचल
उत्तर-
(B) सिक्किम

प्रश्न 4.
सिक्किम भारत की किस दिशा में स्थित है?
(A) पश्चिम
(B) पश्चिमोत्तर
(C) पूर्व
(D) पूर्वोत्तर
उत्तर-
(D) पूर्वोत्तर

प्रश्न 5.
लेखिका ने गैंगटॉक को किन लोगों का शहर बताया है?
(A) मेहनतकश बादशाहों को
(B) गरीबों का
(C) नवाबों का
(D) राजाओं का
उत्तर-
(A) मेहनतकश बादशाहों को

प्रश्न 6.
‘साना-साना हाथ जोड़ि’ प्रार्थना लेखिका ने किस देश की युवती से सीखी थी?
(A) वर्मा की
(B) श्रीलंका की
(C) नेपाल की
(D) चीन की
उत्तर-
(C) नेपाल की

प्रश्न 7.
‘कंचनजंघा’ किस पर्वत की चोटी का नाम है?
(A) हिमालय पर्वत
(B) कंचन पर्वत
(C) सुमेरू पर्वत
(D) नीलमणि पर्वत
उत्तर-
(A) हिमालय पर्वत

प्रश्न 8.
गैंगटॉक से यूमथांग कितनी दूर है?
(A) 139 किलोमीटर
(B) 149 किलोमीटर
(C) 159 किलोमीटर
(D) 169 किलोमीटर
उत्तर-
(B) 149 किलोमीटर

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

प्रश्न 9.
लेखिका के ड्राइवर-कम-गाइड का क्या नाम है?
(A) रामदीन
(B) विक्रम थापा
(C) जितेन नार्गे
(D) उथापा
उत्तर-
(C) जितेन नार्गे

प्रश्न 10.
लेखिका को मार्ग में सफेद रंग के जो ध्वज दिखाई दिए थे, वे किस धर्म से संबंधित थे?
(A) बौद्धधर्म
(B) जैनधर्म
(C) ईसाई धर्म
(D) मुस्लिम धर्म
उत्तर-
(A) बौद्धधर्म

प्रश्न 11.
बौद्ध धर्म में किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु पर उसकी आत्मा की शांति के लिए कितनी पताकाएँ फहराई जाती हैं?
(A) 130
(B) 140
(C) 150
(D) 108
उत्तर-
(D) 108

प्रश्न 12.
जितेन नार्गे की जीप में किसकी तस्वीर लगी हुई थी?
(A) महात्मा गाँधी की
(B) दलाई लामा की
(C) महात्मा बुद्ध की
(D) महावीर की
उत्तर-
(B) दलाई लामा की

प्रश्न 13.
‘कवी-लोंगस्टॉक’ नामक स्थान पर कौन-सी हिंदी फिल्म की शूटिंग हुई थी?
(A) गाइड
(B) क्रांति
(C) उपकार
(D) देश प्रेमी
उत्तर-
(A) गाइड

प्रश्न 14.
लेखिका को पूरे देश में एक जैसी कौन-सी वस्तु दिखाई दी थी?
(A) आस्थाएँ
(B) धर्म
(C) वेशभूषा
(D) खानपान
उत्तर-
(A) आस्थाएँ

प्रश्न 15.
सिलीगुड़ी के पास लेखिका को कौन-सी नदी दिखाई दी थी? ।
(A) गंगा
(B) यमुना
(C) तिस्ता
(D) ब्यास
उत्तर-
(C) तिस्ता

प्रश्न 16.
‘मशगूल’ शब्द का अर्थ है-
(A) मशहूर
(B) व्यस्त
(C) प्रसिद्ध
(D) सुंदर
उत्तर-
(B) व्यस्त

प्रश्न 17.
लेखिका ने किस जंगल में पत्ते तलाशती हुई युवतियाँ देखीं थीं?
(A) पलामू
(B) सतपूड़ा
(C) पलाश के जंगल
(D) गीर के जंगल
उत्तर-
(A) पलामू

प्रश्न 18.
प्रकृति के विराट रूप को देकर लेखिका को क्या प्रेरणा मिलती है?
(A) सदा काम में लगा रहना चाहिए।
(B) सदा मुस्कराते रहना चाहिए
(C) चिंता नहीं करनी चाहिए
(D) लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए
उत्तर-
(B) सदा मुस्कराते रहना चाहिए

प्रश्न 19.
लायुंग समुद्रतल से कितनी ऊँचाई पर है?
(A) 10000 फीट
(B) 11000 फीट
(C) 12000 फीट
(D) 14000 फीट
उत्तर-
(D) 14000 फीट

प्रश्न 20.
कटाओ लायुग से कितनी ऊँचाई पर स्थित है?
(A) 500 फीट
(B) 400 फीट
(C) 300 फीट
(D) 200 फीट
उत्तर-
(A) 500 फीट

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

प्रश्न 21.
कटाओ को हिंदुस्तान का क्या कहा जाता है?
(A) इंग्लैंड
(B) अमेरिका
(C) स्विट्ज़रलैंड
(D) जर्मनी
उत्तर-
(C) स्विट्ज़रलैंड

जॉर्ज पंचम की नाक Summary in Hindi

जॉर्ज पंचम की नाक पाठ का सार

प्रश्न-
‘साना साना हाथ जोड़ि…….’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
‘साना साना हाथ जोड़ि…….’ ‘मधु कांकरिया’ द्वारा रचित यात्रा-वृत्तांत है। इस पाठ में लेखिका ने सिक्किम राज्य की राजधानी गैंगटॉक से हिमालय तक की यात्रा का सजीव एवं भावपूर्ण वर्णन किया है। लेखिका का मत है कि यात्राओं से मनोरंजन, ज्ञानवर्धन एवं अज्ञात स्थलों की जानकारी के साथ-साथ भाषा और संस्कृति का आदान-प्रदान होता है। प्रस्तुत पाठ में लेखिका ने हिमालय के अनंत – सौंदर्य का अत्यंत अद्भुत एवं काव्यात्मक वर्णन किया है कि मानो हिमालय का पल-पल बदलता सौंदर्य हम अपनी आँखों से देख रहे हों। इस यात्रा वृत्तांत में महिला यायावरी विशिष्टता भी देखी जा सकती है। प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत में प्राकृतिक नज़ारों के साथ-साथ वहाँ के जीवन का भी यथार्थ चित्र अंकित किया गया है।

लेखिका गैंगटॉक में रात को तारों से जगमगाते आसमान को देखती है। रात में ऐसा सम्मोहन था कि कोई भी देखने वाला उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। लेखिका भी ऐसे दृश्य को देखकर उसमें खो जाती है। उसकी आत्मा भाव-शून्य हो जाती है। वह प्रातः उठकर नेपाली भाषा में प्रातःकालीन की जाने वाली प्रार्थना करती है। उसी सुबह उन्हें यूमथांग जाना था। यदि मौसम ‘साफ हो तो वहाँ से हिमालय की सबसे ऊँची चोटी दिखाई देती है। मौसम साफ था, किंतु आकाश में हल्के-हल्के बादल थे इसलिए हिमालय की ऊँची चोटी कंचनजंघा दिखाई न दे सकी। यूमथांग गैंगटॉक से लगभग 149 किलोमीटर दूर था। उनके ड्राइवर-कम-गाइड का नाम जितेन नार्गे था। यूमथांग का मार्ग फूलों भरी घाटियों वाला था। मार्ग में उन्हें एक स्थान पर सफेद रंग की बौद्ध पताकाएँ दिखाई दीं। ये पताकाएँ अहिंसा और शांति की प्रतीक थीं।

नार्गे ने बताया कि जब कोई बुद्धिस्ट मर जाता है तो एक सौ आठ श्वेत पताकाएँ फहराई जाती हैं। जिन्हें उतारा नहीं जाता। किसी नए कार्य के आरंभ के समय रंगीन पताकाएँ फहराई जाती हैं। जितेन नार्गे ने बताया कि कवी-लोंग स्टॉक नामक स्थान पर ‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग हुई थी। उन लोगों ने मार्ग में एक घूमता हुआ चक्र भी देखा जिसे धर्म चक्र कहते हैं। वहाँ के लोगों का विश्वास है कि उसे घुमाने से घुमाने वाले के सभी पाप धुल जाते हैं। लेखिका को लगा कि सब स्थानों के लोगों की आस्थाएँ, विश्वास, अंधविश्वासों और पाप- पुण्य संबंधी धारणाएँ लगभग एक समान हैं ज्यों-ज्यों उनकी जीप ऊपर बढ़ती जा रही थी, त्यों- त्यों, बाज़ार, लोग, बस्तियाँ पीछे छूटते जा रहे थे। बड़ी-बड़ी पहाड़ियाँ सामने अपने विराट रूप में दिखाई देने लगी थीं। पास जाकर देखने से लगता था कि वे सौंदर्य के वैभव से मंडित थीं।

धीरे-धीरे मार्ग घुमावदार होते जा रहे थे। चारों ओर हरियाली-ही-हरियाली दिखाई देती थी। लगता था कि वे किसी हरी-भरी गुफा में प्रवेश कर रहे हैं। वहाँ के अत्यंत सुंदर मौसम का प्रभाव सब पर हो रहा था किंतु लेखिका चुपचाप बैठी हुई वहाँ के संपूर्ण दृश्यों को अपने में समा लेना चाहती थी। सिलीगुड़ी से साथ चल रही तिस्ता नदी का सौंदर्य अब देखते ही बनता था। लेखिका नदी के सौंदर्य को देखकर रोमांचित हो रही थी। साथ ही मन-ही-मन हिमालय को सलामी दे रही थी। जीप ‘सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल’ पर जाकर रुकती है। सभी लोग वहाँ के अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य को अपने-अपने कैमरों में बंद करने लगते हैं किंतु लेखिका अत्यंत तल्लीनता के साथ झरने से बह रहे संगीत को आत्मलीन होकर सुन रही थीं। उन्हें लगता था कि जैसे उन्होंने सत्य एवं सौंदर्य को छू लिया हो। झरने का बहता पानी उनमें एक जोश, शक्ति और अहसास भर रहा था। उन्हें लग रहा था कि उनके अंतःकरण की सारी कुटिलताएँ और बुरी इच्छाएँ पानी की धारा के साथ बह गई थीं। वे वहाँ से हटने के लिए तैयार नहीं थीं।

जब जितेन ने आकर कहा कि आगे इससे भी सुंदर दृश्य हैं, तब वे आगे चलने को तैयार हुईं। मार्ग में आँखों और आत्मा को आनंद प्रदान करने वाले अनेक दृश्य बिखरे हुए थे। मार्ग में प्राकृतिक दृश्य पल-पल में अपना रंग बदलते थे। लगता था कि कोई जादू की छड़ी घुमाकर जल्दी-जल्दी दृश्य बदल रहा है। माया और छाया का यह अनूठा खेल लेखिका को जीवन के रहस्य समझा रहा था। चारों ओर के दृश्य रहस्यों से भरे हुए थे। उनकी जीप थोड़ी देर के लिए रुक जाती है, जहाँ जीप रुकी थी वहाँ लिखा हुआ था ‘थिंक ग्रीन’ । वहाँ पूरे, ब्रह्मांड का दृश्य मानो एक साथ देखने को मिल रहा था। वहाँ बहते झरने, तिस्ता नदी का तीव्र वेग, धुंध का आवरण, ऊपर आकाश में बादल थे और हवा धीरे-धीरे बह रही थी। आस-पास खिले हुए फूलों की हँसी बिखरी हुई थी। संपूर्ण अद्भुत वातावरण को देखकर तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हमारा अस्तित्व भी इस वातावरण के साथ ही बहता जा रहा है।

धुंधली चादर के हटते ही सामने विपरीत दिशाओं में खड़े पहाड़ दिखाई दिए। इन पहाड़ों के बीच स्वर्ग के समान सुंदर दृश्य बिखरे हुए थे। पर्वत, झरने, फूलों, घाटियों और वादियों के दुर्लभ नज़ारे लेखिका को कहीं बहुत गहरे अपने आपसे जोड़ रहे थे। उसकी आत्मा उदार होती जा रही थी। उसे लगा कि वह ईश्वर के बहुत समीप है। उसके होंठों पर फिर वही प्रार्थना “साना-साना हाथ जोड़ि ….” आने लगी। कुछ ही दूर चलने पर, लेखिका की दृष्टि पहाड़ी औरतों पर पड़ी। वे औरतें पत्थर तोड़ रही थीं, उनकी काया कोमल थी, किंतु उनके हाथों में हथौड़े और कुदाल थे। कुछ की पीठ पर तो उनके बच्चे भी बँधे हुए थे। वे पूरी ताकत के साथ पत्थर तोड़ रही थीं। वे उस अलौकिक सौंदर्य से निरपेक्ष अपनी जीविका के संघर्ष में लगी हुई थीं। लेखिका को एकाएक लगा मानो किसी समाधि भाव से नाचती नृत्यांगना के धुंघरू टूट गए हों। स्वर्गीय सौंदर्य के बीच मौत, भूख और जिंदा रहने की लड़ाई उनके सामने थी।

पूछने पर पता चला कि ये पहाड़िने सड़क को चौड़ा करने का काम कर रही थीं। यह बहुत ही खतरे से भरा हुआ कार्य है। आपको हैरानी होगी, किंतु इस काम को करने में बहुत-से लोगों ने तो मौत को भी झुठला दिया है। लेखिका गहरी चिंता में डूब गई थी। उन्हें देखकर जितेन नार्गे ने कहा, “मैडम, ये मेरे देश की आम जनता है। इन्हें तो आप कहीं भी देख सकती हो। आप पहाड़ों की सुंदरता को देखिए जिनको देखने के लिए आप पैसे खर्च करके आई हैं।” किंतु लेखिका सोच रही थी कि मेरे देश की जनता कितना कम लेकर कितना अधिक देती है। तभी वे श्रम-सुंदरियाँ किसी बात पर खिलखिला पड़ी। लेखिका को लगा कि खंडहर ताजमहल बन गया हो।

जीप चढ़ाई चढ़ती जा रही थी। हेयर पिन बेंट से पहले एक पड़ाव पर बहुत सारे पहाड़ी बच्चे स्कूल से लौट रहे थे। वे लिफ्ट माँग रहे थे। जितेन ने बताया कि यहाँ स्कूल बस की कोई व्यवस्था नहीं है। नीचे तराई में एक ही स्कूल है। दूर-दूर से बच्चे वहीं पढ़ने आते हैं। ये बच्चे पढ़ते ही नहीं, अपितु अपनी माताओं के साथ मवेशी चराते हैं, पानी भरते हैं और लकड़ियों के गट्ठर भी उठाकर लाते हैं। अब आगे का मार्ग और भी संकरा (तंग) हो गया था। जगह-जगह चेतावनी के बोर्ड लगाए हुए थे।

सूरज ढलने पर पहाड़ी औरतें और बच्चे गाय चराकर लौट रहे थे। कुछ के सिर पर लकड़ियों के गट्ठर थे। शाम का समय हो गया था। जीप चाय के बागानों से गुज़र रही थी। बागानों में कुछ युवतियाँ सिक्किमी परिधान पहने चाय की पत्तियाँ तोड़ रही थीं। उनके चेहरे ढलती शाम के सूरज की रोशनी में चमक रहे थे। चारों ओर इंद्रधनुषी रंग छटा बिखेर रहे थे। लेखिका इतना अधिक प्राकृतिक सौंदर्य देखकर खुशी से चीख उठी थी। यूमथांग पहुँचने से पूर्व लोग कुछ समय के लिए लायुंग रुके थे। लायुंग में लकड़ी से बने छोटे-छोटे घर थे। लेखिका थकान उतारने के लिए तिस्ता नदी के पत्थरों पर जाकर बैठ गई थी। वहाँ का वातावरण शांत था। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति अपनी लय, ताल और गति में कुछ कह रही हो। इस सफर में लेखिका दार्शनिक-सी बन गई थी। रात होने पर जितेन व अन्य साथियों ने नाच-गाना आरंभ कर दिया था। लेखिका की सहयात्री मणि ने अति सुंदर नृत्य किया। लागुंग के लोगों का मुख्य व्यवसाय आलू, धान की खेती और शराब था। लेखिका, की इच्छा वहाँ बर्फ देखने की थी, किंतु वहाँ बर्फ दिखाई नहीं दे रही थी।

वे लोग इस समय 14000 फीट की ऊँचाई पर थे। एक स्थानीय युवक का मानना था कि यहाँ प्रदूषण के कारण स्नोफाल नहीं होता। उसने बताया ‘कटाओ’ नामक स्थान पर बर्फ देखने को मिल सकती है। ‘कटाओ’ को भारत का स्विट्जरलैंड कहते हैं। ‘कटाओ’ को अभी तक टूरिस्ट स्थान नहीं बनाया गया था। इसलिए वह अपने प्राकृतिक स्वरूप में था। लागुंग से ‘कटाओ’ का सफर केवल दो घंटे का था। अब रास्ता और भी खतरनाक था। सब लोग खामोश बैठे हुए थे। जितेन अंदाज़ से गाड़ी चला रहा था। वहाँ के सारे वातावरण में बादल छाए हुए थे। जरा-सी असावधानी से कोई भी दुर्घटना हो सकती थी। थोड़ी दूर चलने पर मौसम साफ हो गया। मणि स्विट्ज़रलैंड देख चुकी थी।

इसलिए उसने एकाएक कहा यह स्थान तो स्विट्ज़रलैंड से भी अधिक सुंदर है। ‘कटाओ’ दिखने लगा था। चारों ओर बर्फ रूपी चाँदी की चादर फैली हुई थी। कटाओ पहुँचते ही थोड़ी-थोड़ी बर्फ पड़ने लगी थी। बर्फ को देखकर सभी के हृदय खिल गए थे। सभी यात्री वहाँ की बर्फ के फोटो खींच रहे थे। लेखिका बर्फ में जाना चाहती थी किंतु उनके पास बर्फ में पहनने वाले जूते नहीं थे। लेखिका फोटो खींचने की अपेक्षा वहाँ के वातावरण को अपनी साँसों में समा लेना चाहती थी। उन्हें लग रहा था कि यहाँ के वातावरण ने ही ऋषि-मुनियों को वेदों की रचना करने की प्रेरणा दी होगी। ऐसे अनुपम सौंदर्य को यदि कोई अपराधी भी देख ले तो वह भी कुछ समय के लिए आध्यात्मिक हो जाएगा। मणि के मन में भी आध्यात्मिकता का भाव जागने लगा था। लेखिका सोचती है कि ये हिमशिखर ही पूरे एशिया को पानी देते हैं। प्रकृति अपने ढंग से सर्दियों में हमारे लिए पानी एकत्रित करती है और गर्मियों में ये बर्फ की शिलाएँ पिघलकर जलधारा बनकर हमारी प्यास को शांत करती हैं। प्रकृति की जल संचय की यह विधि भी अद्भुत है। हम इन हिमशिखरों और नदियों के ऋणी हैं।

लेखिका और उसके सहयोगी यात्री कुछ आगे बढ़ते हैं तो वहाँ उन्हें फौजी छावनियाँ दिखाई देती हैं। वहाँ से कुछ ही दूरी पर चीन की सीमा है। फौजी जवान कड़कती ठंड में अपने आपको कष्ट देकर हमारी सुरक्षा करते हैं। लेखिका फौजियों को देखकर कुछ उदास हो जाती है कि जहाँ बैशाख के महीने में भी इतनी अधिक ठंड है तो वे लोग पौष – माघ की ठंड में किस तरह रहते होंगे। वहाँ जाने का रास्ता भी मुसीबतों से भरा हुआ है। वास्तव में फौजी अपना सुख त्यागकर हमारे लिए शांतिपूर्वक कल का निर्माण करते हैं।

वे लोग वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों को अपनी आत्मा में संजोकर लौट पड़े थे। यूमथांग की संपूर्ण घाटी फूलों से भरी हुई थी। जितेन नार्गे ने बताया कि यहाँ के लोग बंदर का माँस भी खाते हैं। बंदर का माँस खाने से कैंसर नहीं होता। उसकी बातों पर लेखिका के अतिरिक्त किसी को विश्वास नहीं हो रहा था, क्योंकि उसने पठारी इलाकों की भयानक गरीबी देखी थी। लोगों को सूअर का दूध पीते देखा था। यूमथांग पहुँचकर लोगों को सब कुछ फीका- फीका लग रहा था। वहाँ के लोग अपने आपको भारतीय कहलवाने में गर्व अनुभव करते हैं। पहले सिक्किम स्वतंत्र राज्य था। अब वह भारत का ही एक हिस्सा बन गया है। ऐसा होने से वहाँ के लोग बहुत खुश हैं। मणि ने बताया कि पहाड़ी कुत्ते केवल चाँदनी रात में ही भौंकते हैं। यह सुनकर लेखिका हैरान हुई। उसे लगा कि पहाड़ी कुत्तों पर भी ज्वारभाटे की तरह पूर्णिमा की चाँदनी का प्रभाव पड़ता है। लौटते समय जितेन नार्गे ने और भी बहुत-सी जानकारियाँ उन्हें दी थीं। मार्ग में उन्हें एक ऐसा स्थान दिखाया, जहाँ पूरे एक किलोमीटर के क्षेत्र में देवी-देवताओं का निवास है। जो वहाँ गंदगी फैलाएंगा वह मर जाएगा, ऐसा विश्वास किया जाता है। उसने यह भी बताया कि वे पहाड़ों पर गंदगी नहीं फैलाते। वे लोग गंतोक बोलते हैं। गंतोक का अर्थ है-पहाड़। सिक्किम में अधिकतर क्षेत्रों को टूरिस्ट स्पॉट बनाने का श्रेय भारतीय आर्मी के कप्तान शेखर दत्ता को जाता है। लेखिका को इस यात्रा के पश्चात् लगा कि मनुष्य की कभी न समाप्त होने वाली खोज का नाम ही सौंदर्य है।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-17) संधि-स्थल = मिलने का स्थान। सम्मोहन = मोहित होने का भाव। स्थगित = कुछ समय के लिए टाला गया। अतींद्रियता = इंद्रियों से परे जाने का भाव। उजास = प्रकाश।

(पृष्ठ-18) रकम-रकम के = तरह- तरह के। गहनतम = सबसे गहरा। गाइड = मार्गदर्शक। जायज़ा = अनुभव और अनुमान। पताकाएँ = झंडे। बुद्धिस्ट = बौद्ध धर्म को मानने वाले। संधि-पत्र = समझौते के लिए लिखा गया पत्र। अवधारणाएँ = मानसिक विचार।

(पृष्ठ-19) परिदृश्य = नज़ारा। रफ्ता-रफ़्ता = धीरे-धीरे। वीरान = सुनसान। सँकरे = तंग। विशालकाय = बहुत बड़े आकार वाला। परिवर्तन = बदलाव। काम्य = मन की चाहत। वादियाँ = पर्वतों के बीच फैला हुआ भाग।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

(पृष्ठ-20) मुंडकी = सिर। सैलानी = सैर करने आए यात्री। पराकाष्ठा = पूरी ऊँचाई पर। फेन = झाग। जल-प्रपात = जल का ऊँचाई से गिरना। मशगूल = व्यस्त। अभिशप्त = जिसे अभिशाप दिया गया हो। काव्यमय = कविता से संबंधित। सरहद = सीमा। अनंतता = अंत न होने का भाव। लम्हे = पल। तामसिकताएँ = बुरी भावनाएँ।

(पृष्ठ-21) सतत = निरंतर। वजूद = होने का भाव। छोर तक = किनारे तक। तंद्रिल अवस्था = नींद जैसी स्थिति में होना। आत्मलीन = अपने-आप में लीन। निरपेक्ष = जो किसी से पक्ष-पात न करे। समाधिस्थ = समाधि की दशा में।

(पृष्ठ-22-23) अकस्मात = अचानक। संजीदा = गंभीर। डाइनामाइट = एक प्रकार का विस्फोटक पदार्थ । चुहलबाजी = हंसी मज़ाक। वंचना = वंचित होने का भाव (कमी)। गमगीन = गम में डूबा हुआ। हेयर पिन बेंट = बालों में लगाने वाली सूई के आकार का। पड़ाव = ठहराव, ठहरने का स्थान।

(पृष्ठ-24-25) सात्विक = पवित्र। आभा = चमक। असहाय = असहनीय। संकल्प = निश्चय। हलाहल = ज़हर। जन्नत = स्वर्ग। परिदे = पक्षी। अनायास = अचानक।

(पृष्ठ-26-27) अहसास = अनुभव । गर्व = अभिमान। डाइवोर्स = तलाक। ख्वाहिश = इच्छा। विभोर = लीन होना। सर्वे भवंतु सुखिनः, = सभी सुखी हों। अमंगल = बुरा। वृत्ति = स्वभाव। अभिभूत = भावना से भरकर। बार्डर = सीमा।

(पृष्ठ-28-29) टुडे = आज। टुमारो = आने वाला कल। मीआद = समय-सीमा। अपेक्षाकृत = की बजाय। रोमांचक = रोमांच से भर देने वाला। फुटप्रिंट = पाँवों के निशान।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 मैं क्यों लिखता हूँ?

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 मैं क्यों लिखता हूँ? Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 मैं क्यों लिखता हूँ?

HBSE 10th Class Hindi मैं क्यों लिखता हूँ? Textbook Questions and Answers

Class 10 Hindi Kritika Chapter 5 Question Answer HBSE प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा अनुभूति उनके लेखन में कहीं अधिक मदद करती है, क्यों?
उत्तर-
लेखक का मत है कि सच्चा लेखन भीतरी मज़बूरी या विवशता से ही उत्पन्न होता है। यह मजबूरी मन के भीतर से उत्पन्न अनुभूति से ही जगती है। बाहरी घटनाओं या दबाव से उत्पन्न नहीं होती। जब तक किसी लेखक का हृदय अनुभव के कारण पूरी तरह संवेदनशील नहीं हो उठता, उसमें अभिव्यक्ति की आकुलता पैदा नहीं होती, तब तक वह कुछ लिख नहीं पाता।

Class 10 Kritika Chapter 5 Solutions HBSE प्रश्न 2.
लेखक ने अपने आपको हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता कब.और किस तरह महसूस किया?
उत्तर-
लेखक हिरोशिमा गया और वहाँ के विस्फोट के दुष्परिणामों को प्रत्यक्ष रूप में देखकर भी विस्फोट का भोक्ता नहीं बन सका था। किंतु एक दिन जब लेखक जापान के हिरोशिमा नगर की सड़क पर घूम रहा था, अचानक उसकी नज़र एक पत्थर पर पड़ी। उस पत्थर पर एक मानव की छाया छपी हुई थी। वास्तविकता यह है कि विस्फोट के समय कोई मनुष्य उस पत्थर के समीप खड़ा होगा। रेडियम-धर्मी किरणों ने उस मनुष्य को भाप की तरह उड़ाकर उसकी छाया पत्थर पर डाल दी। उसे देखकर लेखक के मन में एक अनुभूति जगी थी। उसके मन में विस्फोट का प्रत्यक्ष दृश्य साकार हो उठा। उस समय वह विस्फोट का भोक्ता बन गया था।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

मैं क्यों लिखता हूँ पाठ के प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class  प्रश्न 3.
‘मैं क्यों लिखता हूँ” के आधार पर बताइए कि
(क) लेखक को कौन-सी बातें लिखने के लिए प्रेरित करती हैं?
(ख) किसी रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को कुछ भी रचने के लिए किस तरह उत्साहित कर सकते हैं?
उत्तर-
(क) लेखक के अनुसार वह स्वयं जानना चाहता है कि वह क्यों लिखना चाहता है? यही जानने की इच्छा ही उसे लिखने की प्रेरणा देती है। वह अपने भीतर उत्पन्न होने वाली विवशता से मुक्ति पाने के लिए भी लिखता है। यह विवशता ही वह भावना है जो उसे लिखने के लिए मजबूर करती है। वस्तुतः लेखक अपने भीतर उत्पन्न विवशता से मुक्ति पाने की इच्छा और तटस्थ होकर उसे देखने और पहचानने की भावना ही लेखक को लिखने की प्रेरणा देती है।

(ख) यह बात काफी हद तक सही है कि एक ही रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को कुछ भी रचने के लिए उत्साहित करते हैं। जापान के हिरोशिमा नामक स्थान पर अणु-बम गिराने वाले ने भी अपना दुष्कर्म करके लेखक को लिखने के लिए प्रेरित किया। कभी-कभी व्यक्ति संपादकों, प्रकाशकों व आर्थिक लाभ से उत्साहित होकर भी लेखन कार्य करता है। किंतु यह कारण कोई जरूरी नहीं है। किंतु वास्तविक एवं सच्चा कारण तो लेखक के भीतर उत्पन्न आकुलता या विवशता ही होती है।

मैं क्यों लिखता हूँ कहानी का सारांश HBSE 10th Class प्रश्न 4.
कुछ रचनाकारों के लिए आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव के साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्त्वपूर्ण होता है। ये बाह्य दबाव कौन-कौन से हो सकते हैं? .
उत्तर-
ये बाह्य दबाव निम्नलिखित हो सकते हैं(1) संपादकों का आग्रह। (2) प्रकाशकों का तकाजा। (3) आर्थिक लाभ। . (4) किसी विषय-विशेष पर प्रचार-प्रसार करने का दबाव।

Class 10 Kritika Chapter 5 Question Answer HBSE प्रश्न 5.
क्या बाह्य दबाव केवल लेखन से जुड़े रचनाकारों को ही प्रभावित करते हैं या अन्य क्षेत्रों से जुड़े कलाकारों को भी प्रभावित करते हैं, कैसे?
उत्तर-
बाह्य दबाव तो सभी क्षेत्रों से जुड़े लोगों या कलाकारों को प्रभावित करते हैं। यदि कोई व्यक्ति कला के किसी क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है तो लोगों की उससे अपेक्षाएँ और भी बढ़ जाती हैं। इसके साथ-साथ आर्थिक लाभ की लालसा भी हर व्यक्ति पर दबाव बनाती है। वह लोगों के दबाव व धन के लालच में आकर कार्य करता है। वर्तमान युग में धन के बिना कोई कार्य संपन्न नहीं होता। इसी कारण धन की आवश्यकता जैसा बाह्य दबाव तो हर क्षेत्र के व्यक्ति से जुड़ा रहता है। अतः स्पष्ट है कि केवल रचनाकारों को ही नहीं, अपितु हर क्षेत्र से जुड़े कलाकारों को भी बाह्य दबाव प्रभावित करते हैं।

Kritika Chapter 5 Class 10 HBSE प्रश्न 6.
हिरोशिमा पर लिखी कविता लेखक के अंतः व बाह्य दोनों दबाव का परिणाम है यह आप कैसे कह सकते हैं?
उत्तर-
हिरोशिमा पर लिखी लेखक की कविता को हम उनके आंतरिक दबाव का परिणाम कह सकते हैं। उसके लिए उन्हें किसी संपादक या प्रकाशक ने तकाजा नहीं किया था और न ही उनके सामने कोई आर्थिक अभाव था। इस कविता को उन्होंने अपनी आंतरिक अनुभूति की जागृति के प्रकाश से प्रभावित होकर लिखा है। अतः यह कविता कवि की आंतरिक अनुभूति का परिणाम है।

Ch 5 Kritika Class 10 HBSE प्रश्न 7.
हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है। आपकी दृष्टि में विज्ञान का दुरुपयोग कहाँ-कहाँ और – किस तरह से हो रहा है?
उत्तर-
निश्चय ही हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है, किंतु आज भी विज्ञान का दुरुपयोग करके मानव, मानव का विनाश करने पर तुला हुआ है। परमाणु बम, एटम बम, हाइड्रोजन बम, मिसाइल्स तथा अनेक ऐसे विनाशकारी अस्त्र-शस्त्र बनाकर मानव विज्ञान का दुरुपयोग कर रहा है। इन अस्त्र-शस्त्रों से संसार कभी भी नष्ट हो सकता है। आज एक से बढ़कर एक विषैली गैसें तैयार की जा रही हैं जिससे किसी भी देश का जलवायु विषाक्त किया जा सकता है। जिससे लोगों का जीवन पलक झपकते ही नष्ट हो सकता है। आज विश्व भर में आतंकवादी विस्फोटक पदार्थों का प्रयोग कर आतंक फैला रहे हैं। शक्तिशाली देश विज्ञान से प्राप्त शक्ति से कमज़ोर देशों पर आक्रमण करके वहाँ के जीवन को नष्ट कर रहे हैं।

विज्ञान के दुरुपयोग से चिकित्सक बच्चों का गर्भ में भ्रूण-परीक्षण कर रहे हैं। इससे जनसंख्या संतुलन बिगड़ता जा रहा है। कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करने से अनाज की पैदावार तो बढ़ जाती है, किंतु उनसे उत्पन्न अनाज स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। आज विज्ञान के परीक्षणों से वातावरण भी दूषित हो रहा है।

मैं क्यों लिखता हूँ प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 8.
एक सवेदनशील युवा नागरिक की हैसियत से विज्ञान का दुरुपयोग रोकने में आपकी क्या भूमिका है?
उत्तर-
आज के युग में विज्ञान के बिना जीवन संभव नहीं है, किंतु विज्ञान का दुरुपयोग भी बराबर किया जा रहा है। मैं विज्ञान के दुरुपयोग को रोकने के लिए चाहूँगा कि उन सब कार्यों के विरुद्ध प्रचार करूँ जो मानवता के लिए हानिकारक हैं। उदाहरणार्थ पोलिथीन का निर्माण न हो क्योंकि इसके अनेक दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। पोलिथीन से वातावरण तो दूषित हो ही रहा है इससे पशुओं की जान भी चली जाती है। इसी प्रकार कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग भी सोच-समझकर करना चाहिए। इनके प्रयोग से बहुत सारा जहर हमारे शरीर में जाता है, जिससे कैंसर जैसी बीमारी लग जाती है। खेतों में अधिक रासायनिक खादों की अपेक्षा गोबर से बनी खाद का प्रयोग करना चाहिए। इन सब कार्यों से कुछ सीमा तक विज्ञान के दुरुपयोग को रोका जा सकता है।

HBSE 10th Class Hindi मैं क्यों लिखता हूँ? Important Questions and Answers

Class 10 Hindi Ch 5 Kritika HBSE प्रश्न 1.
‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ शीर्षक पाठ का उद्देश्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
इस पाठ में लेखन कार्य की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। लेखक ने बताया है कि लेखन कार्य वास्तव में आंतरिक . अनुभूति से उत्पन्न भावों की व्याकुलता से होता है। कभी-कभी बाहरी दबाव के कारण भी लेखन कार्य किया जाता है। किंतु जो लेखन कार्य आंतरिक अनुभूति की प्रेरणा से लिखा जाता है, वह ही वास्तविक कृति होती है और उसके लेखक को कृतिकार कहा जाता है। लेखक ने इस बात को हिरोशिमा में घटित घटना के वर्णन से सिद्ध किया है। लेखक ने जब वहाँ एक पत्थर पर मनुष्य की आकृति को देखा जो विस्फोट के समय भाप बनकर उड़ गया था, तब लेखक ने विस्फोट से उत्पन्न भयानक दृश्य को साक्षात रूप में अनुभव किया था और उसकी अनुभूति की प्रेरणा से ही हिरोशिमा नामक कविता लिखी थी।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

Class 10 Hindi Kritika Chapter 5 Summary HBSE प्रश्न 2.
लेखक और कृतिकार में क्या अंतर बताया गया है?
उत्तर-
श्री अज्ञेय ने लेखक और कृतिकार में अंतर करते हुए बताया है कि कुछ भी लिखना लेखन कार्य नहीं होता। सच्चा लेखन वही होता है जो आंतरिक दबाव से लिखा जाए। मन की छटपटाहट को व्यक्त करने के लिए लिखा जाए ऐसा लेखन ही कृति कहलाता है और ऐसे लेखक को कृतिकार कहा जाता है। इसके विपरीत जिस लेखन में धन या यश की प्रेरणा रहती है, वह सामान्य लेखन कार्य कहलाता है।

Class 10th Kritika Chapter 5 Question Answer HBSE प्रश्न 3.
अज्ञेय जी ने अपने लिखने का क्या कारण बताया है?
उत्तर-
अज्ञेय जी ने अपने लिखने के कारण पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि वह अपने भीतर (मन की) की विवशता से मुक्ति पाने के लिए लिखता है। वह भी अपनी आंतरिक विवशता से मुक्ति पाने के लिए तथा तटस्थ होकर उसे देखने और पहचानने के लिए लिखता है। अज्ञेय जी स्वीकार करते हैं कि वह बाह्य दबाव में आकर बहुत कम लिखता है। उसके लिखने का प्रमुख कारण तो उसकी आंतरिक विवशता है। लिखकर ही वह अपनी विवशता से मुक्ति प्राप्त करता है।

मैं क्यों लिखता हूँ Summary HBSE 10th Class प्रश्न 4.
लेखक ने अणु बम द्वारा होने वाले व्यर्थ जीवनाश को कैसे अनुभव किया?
उत्तर-
लेखक ने युद्ध के समय देखा कि पूर्वी सीमा पर सैनिक ब्रह्मपुत्र नदी में बम फेंककर हजारों मछलियाँ मार रहे थे। जबकि उनकी आवश्यकता कम थी। इस प्रकार लेखक ने अनुभव किया न केवल मछलियाँ ही, अपितु जल में रहने वाले दूसरे जीवों को बिना किसी कारण मारा जा रहा था। यह देखकर लेखक ने अनुभव किया कि अणु बम के द्वारा असंख्य लोगों को व्यर्थ ही मारा जा रहा है। हिरोशिमा पर गिराया गया अणु बम इसका स्पष्ट उदाहरण है।

मैं क्यों लिखता हूं प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 5.
अज्ञेय जी के लेखन के लिए बाहरी दबावों का कितना सहयोग रहता है?
उत्तर-
अज्ञेय ऐसे कवि हैं जो लेखन कार्य के लिए आंतरिक अनुभूति से उत्पन्न आकुलता के कारण ही रची गई, रचना को उत्तम साहित्य या काव्य मानते हैं। किंतु वे बाहरी दबावों को भी अस्वीकार नहीं करते। उन्होंने अपने लेखन कार्य के लिए बाहरी दबावों को कभी. महत्त्व नहीं दिया। यदि बाहरी दबावों की प्रेरणा उन पर दबाव बनाए तो भी इसमें उन्हें कोई बाधा प्रतीत नहीं होती। वे कहते भी हैं, “मुझे इस सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ती लेकिन कभी इससे बाधा भी नहीं होती।”

प्रश्न 6.
प्रत्यक्ष अनुभव और अनुभूति के अंतर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
प्रत्यक्ष अनुभव सामने घटी घटना से प्राप्त होता है। यह आवश्यक नहीं कि सामने घटने वाली घटना देखने वाले के मन में अनुभूति जगा दे। अनुभूति आंतरिक भाव है। जब किसी घटना के अनुभव से मन में किसी भाव की गहरी आकुलता जाग उठती है तो वह ही अनुभूति होती है। वास्तव में यह अनुभूति ही लेखन कार्य की प्रेरणा बनती है।

प्रश्न 7.
लेखक ने बाहरी दबाव की तुलना किससे की है?
उत्तर-
लेखक ने बताया है कि कुछ लेखक बाहरी दबाव के बिना नहीं लिख पाते। उन लोगों की स्थिति कुछ ऐसी होती है कि कोई व्यक्ति प्रातःकाल नींद खुल जाने पर भी अलार्म बजने तक बिस्तर पर पड़ा रहता है। अलार्म बजता है, तभी उठता है। कुछ लेखक ऐसे होते हैं कि जब तक उन पर बाहरी दबाव न पड़े, तब तक वे लेखन कार्य नहीं करते। ऐसे लेखक बाहरी दबाव के बिना लिख नहीं सकते।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मैं क्यों लिखता हूँ’ पाठ के लेखक का क्या नाम है?
(A) अज्ञेय
(B) शिवपूजन सहाय
(C) मधु कांकरिया
(D) कमलेश्वर
उत्तर-
(A) अज्ञेय

प्रश्न 2.
लेखक के अनुसार कोई लेखक लिखता क्यों है?
(A) शौक के लिए
(B) अभ्यांतर विवशता के लिए
(C) दिखावे के लिए
(D) प्रसिद्धि के लिए
उत्तर-
(B) अभ्यांतर विवशता के लिए

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

प्रश्न 3.
कोई भी लेखक लिखने के पश्चात् क्या अनुभव करता है?
(A) निराशा
(B) भय
(C) मुक्ति
(D) बंधन
उत्तर-
(C) मुक्ति

प्रश्न 4.
भीतरी उन्मेष किसे कहते हैं?
(A) मानसिक ज्ञान
(B) भीतरी शक्ति
(C) मानसिक विकास
(D) अनुशासन
उत्तर-
(A) मानसिक ज्ञान

प्रश्न 5.
आत्मानुशासन किसे कहते हैं?
(A) आत्मा को अनुशासन में रखना
(B) अपने आप अपनाए गए नियम
(C) किसी भी आत्मा पर दबाव डालना
(D) अपना अनुशासन
उत्तर-
(B) अपने आप अपनाए गए नियम

प्रश्न 6.
हिरोशिमा नगर किस देश में स्थित है?
(A) जापान
(B) फ्रांस
(C) भारत
(D) जर्मनी
उत्तर-
(A) जापान

प्रश्न 7.
लेखक द्वितीय विश्व युद्ध के समय कहाँ था?
(A) भारत की पश्चिमी सीमा पर
(B) पूर्वीय सीमा पर
(C) दक्षिण भारत में
(D) उत्तरी सीमा पर
उत्तर-
(B) पूर्वीय सीमा पर

प्रश्न 8.
जापान में किसे देखकर लेखक की अनुभूति को बल मिला था?
(A) जापान के लोगों को
(B) जापान की सड़कों को
(C) पत्थर पर बनी छाया को
(D) जापान की घटना के वर्णन को
उत्तर-
(C) पत्थर पर बनी छाया को

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

मैं क्यों लिखता हूँ? Summary in Hindi

मैं क्यों लिखता हूँ? पाठ का सार

प्रश्न-
में क्यों लिखता हूँ?’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत लघु निबंध में श्री अज्ञेय ने बताया है कि रचनाकार की भीतरी विवशता ही उसे लिखने के लिए मजबूर करती है तथा रचनाकार लिखने पर ही अपनी उस विवशता से मुक्ति पाता है।

लेखक का मत है कि जब प्रत्यक्ष अनुभव ही अनुभूति का रूप धारण करता है तभी रचना की उत्पत्ति होती है। यह आवश्यक नहीं कि हर अनुभव अनुभूति बने। अनुभव जब भाव-जगत और संवेदना का भाग बनता है तभी वह कलात्मक अनुभूति में बदल जाता है।

लेखक ने लिखने के कारणों के साथ-साथ लेखक के प्रेरणा स्रोतों को भी उजागर किया है। हर रचनाकार की आत्मानुभूति ही उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है। इसके अतिरिक्त कुछ बाहरी दबाव भी होते हैं जिनके कारण लेखक लिखता है। बाहरी दबावों में संपादक का आग्रह, प्रकाशक का तकाजा तथा आर्थिक आवश्यकता होती है। वास्तव में बाहरी दबाव से लेखक कम प्रभावित है। उसकी आंतरिक अनुभूति ही उसे लिखने के लिए अधिक प्रेरित करती है। लेखक का मत है कि प्रत्यक्ष अनुभव एवं अनुभूति गहरी चीज़ है। अनुभव तो सामने घटित एक रचनाकार के लिए घटना को देखकर होता है, किंतु अनुभूति संवेदना और कल्पना के द्वारा उस सत्य को भी ग्रहण कर लेती है जो रचनाकार के सामने घटित नहीं हुआ। फिर वह सत्य आत्मा के सामने ज्वलंत प्रकाश में आ जाता है और रचनाकार उसका वर्णन करता है। लेखक बताता है कि उनके द्वारा लिखी ‘हिरोशिमा’ नामक कविता भी ऐसी ही है। एक बार जब वह जापान गयां तो वहाँ हिरोशिमा में उसने देखा कि एक पत्थर बुरी तरह झुलसा हुआ है और उस पर एक व्यक्ति की लंबी उजली छाया है। उसे देखकर उसने अनुमान लगाया कि जब हिरोशिमा पर अणु-बम गिराया गया तो उस समय वह व्यक्ति इस पत्थर के पास खड़ा होगा और अणु-बम के प्रभाव से वह भाप बनकर उड़ गया, किंतु उसकी छाया उस पत्थर पर ही रह गई।

उस छाया को देखकर लेखक को थप्पड़-सा लगा। मानो उसके मन में एक सूर्य-सा उगा और डूब गया। यही प्रत्यक्ष अनुभूति थी। इसी क्षण वह हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता बन गया। इसी से कविता लिखने की विवशता जगी। मन की आकुलता बुद्धि से आगे बढ़कर संवेदना का विषय बनी। धीरे-धीरे कवि ने उसे अनुभव से अलग कर लिया। एक दिन कवि ने हिरोशिमा पर एक कविता लिख दी। यह कविता जापान में नहीं, अपितु भारत में रेलगाड़ी में यात्रा करते हुए लिखी। कवि को कविता के अच्छे-बुरे होने से कोई सरोकार नहीं। यह कविता अनुभूति प्रसूत है यही कवि के लिए प्रमुख बात है।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ–42) आंतरिक = भीतरी, हृदय संबंधी। कठिन = मुश्किल। संक्षेप = छोटा। स्पर्श = छूना। आभ्यंतर = भीतरी। विवशता = मजबूरी। मुक्त = स्वतंत्र, आज़ाद। तटस्थ = अलग। कृतिकार = रचना लिखने वाला। ख्याति = प्रसिद्धि। संपादक = पत्र या पत्रिका की सामग्री व्यवस्थित करने वाला। प्रकाशक = छापने वाला। तकाजा = कहना। भेद = अंतर। आर्थिक = धन से संबंधित। भीतरी उन्मेष = मानसिक प्रकाश, मानसिक ज्ञान। निमित्ति = कारण।

(पृष्ठ-43) आत्मानुशासन = अपने आप अपनाए गए नियम। बिछौना = बिस्तर। समर्पित होना = पूरी तरह लग पाना। यंत्र = मशीन। भौतिक यथार्थ = संसार की वास्तविकता। बखानना = वर्णन कर पाना। कदाचित् = शायद। रेडियम-धर्मी तत्त्व = रेडियम किरणों का फैलना। अध्ययन = पढ़ना। भेदन = तोड़ना। सैद्धांतिक = सिद्धांत संबंधी। परवर्ती प्रभाव = बाद में पड़ने वाला प्रभाव। विवरण = ब्योरा। ऐतिहासिक प्रमाण = इतिहास में घटित वास्तविकता। दुरुपयोग = गलत उपयोग। विद्रोह = विरोध। अनुभूति का स्तर = मन में अपने-आप भावों का उमड़ना। बौद्धिक पकड़ = बुद्धि की पकड़।
तर्क संगति = तर्क-परंपरा। अपव्यय = फिजूलखर्ची। व्यथा = दुःख। अनुभव = बोध, ज्ञान। आहत = घायल। प्रत्यक्ष = आँखों के सामने, सीधा। घटित = घटा हुआ। संवेदना = भावना। आत्मसात् करना = मन में धारण करना।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

(पृष्ठ-44-45) ज्वलंत प्रकाश = तेज़ प्रकाश। अनुभूति प्रत्यक्ष = मन-ही-मन किसी दृश्य का साकार हो उठना। तत्काल = तुरंत । कसर = कमी। रुद्ध = रुकी हुई। समूची = सारी। ट्रेजडी = दुखद घटना। अवाक् = मौन। सहसा = एकाएक। भोक्ता = भोगने वाला। आकुलता = बेचैनी। अनुभूति-प्रसूत = अनुभूति से उत्पन्न।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति

HBSE 10th Class Hindi संस्कृति Textbook Questions and Answers

Chapter 17 संस्कृति HBSE 10th Class Kshitij प्रश्न 1.
लेखक की दृष्टि में ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ की सही समझ अब तक क्यों नहीं बन पाई है?
उत्तर-
लेखक का मत है कि रूढ़िवादी अपनी रूढ़ियों से इस प्रकार बँधे हुए हैं कि हर पल, हर क्षण बदलते इस संसार से पिछड़ जाते हैं। वे अपनी बँधी हुई सीमाओं तक ही सीमित रह जाते हैं। ऐसे लोग अपनी संकीर्ण सोच और संकुचित दृष्टिकोण के कारण सभ्यता एवं संस्कृति के लोककल्याणकारी पक्ष नहीं देख पाते तथा अपने व्यक्तिगत, जातिगत व वर्गगत हितों की रक्षा में लगे रहते हैं। वे इसे अपनी सभ्यता और संस्कृति मान बैठते हैं। यद्यपि सच्चाई यह है कि सभ्यता और संस्कृति में बिना किसी वर्गगत, जातिगत यहाँ तक कि धर्मगत भावना का कोई स्थान नहीं होता, उसमें पूरी मानवता के कल्याण की भावना रहती है। यही कारण है कि अब तक लोगों की सभ्यता और संस्कृति के प्रति सही सोच नहीं बन पाई है।

HBSE 10th Class Hindi Kshitij Chapter 17 संस्कृति प्रश्न 2.
आग की खोज एक बहुत बड़ी खोज क्यों मानी जाती है? इस खोज के पीछे रही प्रेरणा के मुख्य स्रोत क्या रहे होंगे?
उत्तर-
आग की खोज एक बहुत बड़ी खोज है क्योंकि वह मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता को पूरी करती है। वह भोजन पकाने में काम आती है और भोजन से मनुष्य की भूख समाप्त हो जाती है। आज भी इस खोज का महत्त्व सर्वोप्रिय है। आज भी हम हर सांस्कृतिक कार्य के आरंभ में दीप जलाते हैं। सर्दियों में तो आग का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। ठंडी रात में जहाँ आग से तपन मिलती है वहीं अँधेरा भी दूर भाग जाता है। आदिम युग में केवल पेट की भूख को दूर करने के लिए आग की खोज की भावना रही होगी। तत्पश्चात् आग के अन्य लाभ सामने आने पर इसे देवता तुल्य पूजा जाने लगा था। आज भी आग का मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है।

संस्कृति Chapter 17 HBSE 10th Class Hindi Kshitij प्रश्न 3.
वास्तविक अर्थों में ‘संस्कृत व्यक्ति’ किसे कहा जा सकता है?
उत्तर-
जो व्यक्ति अपनी बुद्धि और विवेक से मानवता को किसी नए तथ्य के दर्शन कराता है, अर्थात् निःस्वार्थ भाव से मानव-कल्याण के लिए कार्य करता है, उसे ही वास्तविक अर्थों में ‘संस्कृत व्यक्ति’ कहते हैं। ऐसा व्यक्ति आंतरिक प्रेरणा से नए-नए आविष्कार करता रहता है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति

प्रश्न 4.
न्यूटन को संस्कृत मानव कहने के पीछे कौन से तर्क दिए गए हैं? न्यूटन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों एवं ज्ञान की कई दूसरी बारीकियों को जानने वाले लोग भी न्यूटन की तरह संस्कृत नहीं कहला सकते, क्यों?
उत्तर-
न्यूटन एक महान् वैज्ञानिक थे। उन्होंने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का आविष्कार किया था, जो उनसे पहले किसी ने नहीं किया था, संस्कृत मानव वह कहलवाएगा जो बिना किसी भेदभाव के सबके लिए नया काम करेगा। किसी पूर्व खोजी हुई वस्तु या सिद्धांत में परिमार्जन करने वाले व्यक्ति को संस्कृत मानव नहीं कहा जाता क्योंकि वह पहले आविष्कृत काम को ही आगे बढ़ा रहा है। न्यूटन के सिद्धांत की कोई कितनी ही बारीकियाँ क्यों न जान ले परंतु संस्कृत कहलवाने का अधिकारी तो उस सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाला व्यक्ति ही रहेगा। अन्य व्यक्ति सभ्य हो सकते हैं, किंतु संस्कृत नहीं।।

प्रश्न 5.
किन महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सुई-धागे का आविष्कार हुआ होगा?
उत्तर-
आदिम युग में मनुष्य जंगलों में नंगा घूमता था। उसे सर्दी-गर्मी के कष्टों को सहना पड़ता था। इन्हीं कष्टों से बचने के कारण ही मनुष्य ने सुई-धागे का आविष्कार किया होगा। इसके अतिरिक्त अपने शरीर को ढकने व सजाने के भाव के कारण भी उसे ऐसी वस्तु की तलाश होगी जो दो वस्तुओं को जोड़ सके। किंतु दूसरा विचार गौण प्रतीत होता है और पहला प्रथम।

प्रश्न 6.
मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है।” किन्हीं दो प्रसंगों का उल्लेख करें जब-
(क) मानव संस्कृति को विभाजित करने की चेष्टाएँ की गईं।
(ख) जब मानव संस्कृति ने अपने एक होने का प्रमाण दिया।
उत्तर-
(क) मानव संस्कृति अविभाज्य है परंतु कभी-कभी मानव ने अज्ञानतावश संस्कृति को भी धर्म व सामाजिक विश्वासों के आधार पर विभाजित करने का दुस्साहस किया है। हिंदू-मुस्लिम भावनाओं को भड़काकर लड़ाई-झगड़े करवाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना आज के नेताओं का आम कार्य हो गया है। आजकल आरक्षण के नाम पर संस्कृति को विभाजित किया जाता है।

(ख) जब-जब भी कुछ स्वार्थी लोगों ने संस्कृति को विभाजित करने का प्रयास किया तब-तब संस्कृति के वे तत्त्व उभरकर सामने आते हैं, जो उसे एक बनाए रखते हैं। यथा ‘त्याग’ संस्कृति का प्रमुख तत्त्व है। इसे सब मानते हैं। त्यागशील व्यक्ति किसी भी धर्म व संस्कृति का हो वह सबके लिए काम करता है। हिंसा के सभी विरोधी हैं। जापान पर परमाणु बम के आक्रमण का संपूर्ण विश्व ने एक स्वर में विरोध किया था। रसखान ने मुसलमान होकर कृष्ण की आराधना की। बिस्मिल्ला खाँ भी मुसलमान था किंतु बालाजी से आशीर्वाद लेकर संगीत का सम्राट बन गया। सभी हिंदू लोग गुरुद्वारों में जाकर माथा टेकते हैं। पीर-पैगंबरों के सामने जाकर मन्नतें माँगते हैं। अतः संस्कृति मानवीय गुण है। इसे विभाजित नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 7.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) मानव की जो योग्यता उससे आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति? ,
उत्तर-
लेखक प्रश्न करता है मानव की जो योग्यता, भावना, प्रेरणा और प्रवृत्ति उससे विनाशकारी हथियारों का निर्माण करवाती है, उसे हम संस्कृति कैसे कहें? वह तो आत्म-विनाश कराती है। लेखक कहता है ऐसी भावना और योग्यता को असंस्कृति कहना चाहिए।

रचना और अभिव्यक्ति-

प्रश्न 8.
लेखक ने अपने दृष्टिकोण से सभ्यता और संस्कृति की एक परिभाषा दी है। आप सभ्यता और संस्कृति के बारे में क्या सोचते हैं? लिखिए।
उत्तर-
मेरे विचार से संस्कृति वह है जो मानवता के हित के लिए किया गया कार्य हो। कर्म हमारे विचारों के अनुसार ही घटित होते हैं। जो ज्ञान या विचार हमारे कर्मों को श्रेष्ठ व महान् बनाएँ वे ही संस्कृति की संज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। संस्कृति के सामने संपूर्ण मानवता एक है। उसमें किसी धर्म व जातिगत भेदभाव नहीं होते। संस्कृति ही हमारी सभ्यता को श्रेष्ठ बनाती है। कहा भी गया है कि सभ्यता संस्कृति का परिणाम होता है। जो समाज जितना सुसंस्कृत होगा वह उतना ही सुसभ्य भी होगा।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति

भाषा-अध्ययन-

प्रश्न 9.
निम्नलिखित सामासिक पदों का विग्रह करके समास का भेद भी लिखिए-
गलत-सलत
आत्म-विनाश
महामानव
पददलित
हिंदू- मुसलिम
यथोचित
सुलोचना
उत्तर-
HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति 1

पाठेतर सक्रियता

“स्थूल भौतिक कारण ही आविष्कारों का आधार नहीं है।” इस विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन कीजिए।
उन खोजों और आविष्कारों की सूची तैयार कीजिए जो आपकी नज़र में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर-
ये प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं हैं। इन्हें विद्यार्थी स्वयं करें।

HBSE 10th Class Hindi संस्कृति Important Questions and Answers

विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने किस वस्तु को रक्षणीय और वांछित नहीं कहा है?
उत्तर-
लेखक ने कहा है कि संस्कृति के नाम से जिस कूड़े-करकट के ढेर का बोध होता है, वह न संस्कृति है और न रक्षणीय वस्तु है। ऐसी वस्तुएँ वांछनीय भी नहीं हैं। ऐसी वस्तु की रक्षा के लिए किसी प्रकार की दलबंदी करने की आवश्यकता भी नहीं है।

प्रश्न 2.
संस्कृत व्यक्ति के वंशज संस्कृत होंगे या सभ्य? सिद्ध कीजिए।
उत्तर-
लेखक के अनुसार संस्कृत व्यक्ति के वंशज सभ्य तो होंगे, किंतु संस्कृत नहीं। संस्कृत होने के लिए नई-नई वस्तुओं की खोज करने की योग्यता, प्रेरणा और प्रवृत्ति का होना आवश्यक है। लेखक का यह विचार संकीर्ण एवं एकपक्षीय है।

प्रश्न 3.
संस्कृति अविभाज्य कैसे है? सिद्ध कीजिए।
उत्तर-
संस्कृति एक विचार है, उसे जातिगत व धर्मगत आधारों पर नहीं बाँटा जा सकता। जिस व्यक्ति ने आग या सुई-धागे का आविष्कार किया, वह किसी एक जाति या धर्म का न होकर मानव मात्र के लिए है। इसलिए संस्कृति को बाँटा नहीं जा सकता। वह अविभाज्य है।

प्रश्न 4.
सभ्यता या संस्कृति के विनाश का खतरा कब और कैसे होता है?
उत्तर-
सभ्यता या संस्कृति खतरे में तब पड़ जाती है जब किसी जाति अथवा देश पर अन्य लोगों की ओर से विनाशकारी आक्रमण होते हैं। हिटलर के आक्रमण से मानव संस्कृति खतरे में पड़ गई थी। धर्म, जाति, संप्रदाय व वर्ग भावना से प्रेरित होकर किए जाने वाले दंगों से भी सभ्यता एवं संस्कृति के खतरे बढ़ जाते हैं।

प्रश्न 5.
पेट की भूख शांत होने और तन ढकने के पश्चात् मानव की क्या स्थिति होती है?
उत्तर-
जब मानव का पेट भर जाता है और उसका तन भी ढका होता है, तो वह खुले आकाश के नीचे लेटा हुआ आकाश में जगमगाते हुए तारों को देखकर यह जानने के लिए बेचैन हो उठता है कि यह तारों से भरा हुआ औंधा थाल कैसे लटका हुआ है। इसका मूल कारण क्या है। मानव कभी भी निट्ठला नहीं बैठ सकता। मानव मन की आंतरिक प्रेरणा ही उसे कुछ नया करने या वर्तमान वस्तुओं के रहस्य या सत्य को जानने के लिए प्रेरित करती रहती है। आंतरिक प्रेरणा ही वह प्रेरणा है जो मानव को जन-कल्याण के कार्य करने के लिए व्याकुल बना देती है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति

विचार/संदेश संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 6.
‘संस्कृति’ नामक निबंध के संदेश पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
प्रस्तुत निबंध में लेखक ने संस्कृति और असंस्कृति के अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया है कि महान् कार्य करना, जिनसे मानवता मात्र का कल्याण संभव है, वह संस्कृति है। इसके विपरीत लूट-पाट, भ्रष्टाचार, रिश्वत, धोखा-धड़ी, हर प्रकार की अहिंसा, अविश्वास आदि सभी कार्य संस्कृति नहीं हो सकते, वे असंस्कृति के कार्य हैं। इससे स्पष्ट है कि लेखक ने बताया है कि हमें सदा संस्कृत बनने का प्रयास करना चाहिए। इसी प्रकार सभ्यता और असभ्यता के अंतर को स्पष्ट करते हुए हमें सदा सभ्य बनने की प्रेरणा दी है। लेखक का मत है कि हम जितने अधिक सुसंस्कृत होंगे, उतने ही सभ्य होंगे। इससे पता चलता है कि इस पाठ में सुसंस्कृत एवं सुसभ्य बनने पर बल दिया गया है।

प्रश्न 7.
प्रस्तुत निबंध में लेखक ने किस-किस विचारधारा का पक्ष लिया है और किसका विरोध किया है? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत निबंध में लेखक ने लेनिन व कार्लमार्क्स की साम्यवादी विचारधारा का पक्ष लिया है। कहा गया है कि लेनिन ने दूसरों की भूख को दूर करने के लिए डबलरोटी के सूखे टुकड़े बचाकर रखे और कार्लमार्क्स ने मजदूरों को सुखी देखने के लिए सारा जीवन दुखों में बिताया। इसी प्रकार संसार के दुखों से मनुष्य को निजात दिलाने के लिए सिद्धार्थ ने संसार को त्यागकर तपस्या की। इसके साथ-साथ उन्होंने हिंदी-संस्कृति या विचारधारा को परंपरावादी या पुरानी रूढ़ियाँ कहकर उसका विरोध किया है।

इसी प्रकार संस्कृति या संस्कृत व्यक्ति तथा सभ्य व्यक्ति का पक्ष लिया है तथा असंस्कृत और असभ्य व्यक्ति का विरोध किया है। लेखक ने विरोध के कारण नहीं बताए।

प्रश्न 8.
पठित पाठ के आधार पर सभ्यता और संस्कृति में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
किसी जाति अथवा राष्ट्र की वे सब बातें जो उसके शिक्षित सहभावनायुक्त एवं उन्नत होने के सूचक ही उसकी सभ्यता कहलाती है अर्थात् मानव-जीवन के बाहरी चाल-चलन व्यवहार को सभ्यता का नाम दिया गया है। किन्तु संस्कृति का सम्बन्ध किसी जाति व राष्ट्र की उन सब बातों से होता है जो उसकी मन, रुचि, आचार-विचार, कला-कौशल और सभ्यता के क्षेत्र में बौद्धिक विकास होता है। सभ्यता का विकास संस्कृति पर ही निर्भर करता है।

अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘संस्कृति’ पाठ के लेखक का क्या नाम है?
उत्तर-
‘संस्कृति’ पाठ के लेखक भदंत आनंद कौसल्यायन हैं।

प्रश्न 2.
भदंत आनंद कौसल्यायन का जन्म कब हुआ था?
उत्तर-
भदंत आनंद कौसल्यायन का जन्म सन् 1905 में हुआ था।

प्रश्न 3.
भदंत आनंद कौसल्यायन ने किस धर्म को अपनाया था?
उत्तर-
भदंत आनंद कौसल्यायन ने बौद्ध धर्म को अपनाया था।

प्रश्न 4.
लेखक के अनुसार कौन संस्कृत व्यक्ति कहलाता है?
उत्तर-
लेखक के अनुसार आविष्कार करने वाला व्यक्ति संस्कृत व्यक्ति कहलाता है।

प्रश्न 5.
‘शीतोष्ण’ से बचने के लिए मानव ने किसकी खोज की थी?
उत्तर-
शीतोष्ण’ से बचने के लिए मानव ने सुई-धागे की खोज की थी।

प्रश्न 6.
संस्कृत व्यक्ति के कार्यों के पीछे कौन-सी भावना रहती है?
उत्तर-
संस्कृत व्यक्ति के कार्यों के पीछे जन-कल्याण की भावना रहती है।

प्रश्न 7.
लेखक ने मनीषी किसे कहा है?
उत्तर-
जो मन की जिज्ञासा की तृप्ति के लिए प्राकृतिक रहस्यों को जानना चाहते हों, लेखक ने उसे मनीषी कहा है।

प्रश्न 8.
सिद्धार्थ ने बड़े होकर किस धर्म की स्थापना की थी?
उत्तर-
सिद्धार्थ ने बड़े होकर बौद्ध धर्म की स्थापना की थी।

प्रश्न 9.
लेखक ने असंस्कृत व्यक्ति किसे कहा है?
उत्तर-
मानव-कल्याण की भावना से हीन व्यक्ति को असंस्कृत व्यक्ति कहा है।

प्रश्न 10.
मानव संस्कृति कैसी वस्तु है?
उत्तर-
मानव संस्कृति अविभाज्य वस्तु है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भदंत आनंद कौसल्यायन किस राज्य के रहने वाले थे?
(A) हरियाणा
(B) उत्तर प्रदेश
(C) मध्य प्रदेश
(D) राजस्थान
उत्तर-
(A) हरियाणा

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति

प्रश्न 2.
भदंत आनंद कौसल्यायन ने कहाँ से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की थी?
(A) बनारस से
(B) लखनऊ से
(C) लाहौर से
(D) चंडीगढ़ से
उत्तर-
(C) लाहौर से

प्रश्न 3.
श्री भदंत आनंद कौसल्यायन जी का निधन कब हुआ?
(A) सन् 1980 में
(B) सन् 1985 में
(C) सन् 1988 में
(D) सन् 1990 में
उत्तर-
(C) सन् 1988 में

प्रश्न 4.
श्री भदंत आनंद कौसल्यायन का बचपन का क्या नाम था?
(A) हरिराम
(B) हरनाम दास
(C) हरदेव सिंह
(D) हरिप्रसाद
उत्तर-
(B) हरनाम दास

प्रश्न 5.
भदंत आनंद कौसल्यायन किस महान कांग्रेसी नेता से प्रभावित थे और उन्होंने अपने जीवन का लंबा समय उनके साथ बिताया?
(A) जवाहर लाल नेहरू
(B) लाल बहादुर शास्त्री
(C) सरदार वल्लभ भाई पटेल
(D) महात्मा गांधी
उत्तर-
(D) महात्मा गांधी

प्रश्न 6.
अपने पूर्वजों की खोज की गई वस्तु को अनायास प्राप्त करने वाला व्यक्ति क्या कहलाता है?
(A) बुद्धिमान
(B) ज्ञानवान
(C) सभ्य
(D) संस्कृत
उत्तर-
(C) सभ्य

प्रश्न 7.
संसार के मज़दूरों को सुखी देखने का सपना किसने देखा था?
(A) लेनिन ने
(B) रूसो ने
(C) कार्ल मार्क्स ने
(D) गाँधी ने
उत्तर-
(C) कार्ल मार्क्स ने

प्रश्न 8.
तृष्णा के वशीभूत लड़ती-कटती मानवता को सुख से रखने के लिए घर का त्याग किसने किया?
(A) सिद्धार्थ ने
(B) अशोक ने
(C) लेनिन ने
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर-
(A) सिद्धार्थ ने

प्रश्न 9.
रूस का भाग्य-विधाता माना गया है
(A) लेनिन
(B) मार्क्स
(C) सिद्धार्थ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर-
(A) लेनिन

प्रश्न 10.
जो योग्यता किसी महामानव से सर्वस्व त्याग कराती है वह क्या कहलाती है?
(A) विश्वास
(B) सभ्यता
(C) धर्म
(D) संस्कृति
उत्तर-
(D) संस्कृति

प्रश्न 11.
नई चीज़ की खोज कौन करता है?
(A) सभ्य व्यक्ति
(B) संस्कृत व्यक्ति
(C) जंगली व्यक्ति
(D) प्रवीण व्यक्ति
उत्तर-
(A) सभ्य व्यक्ति

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति

प्रश्न 12.
‘मोती भरा थाल’ किसे कहा गया है?
(A) मोतियों से भरी थाली को
(B) चाँद-तारों को
(C) तारों से भरे आकाश को
(D) घास पर चमकती हुई ओस की बूंदों को
उत्तर-
(C) तारों से भरे आकाश को

प्रश्न 13.
लेखक के अनुसार मनुष्य किस प्रकार का प्राणी है?
(A) चिन्तनशील
(B) आलसी
(C) लालची
(D) निठल्ला
उत्तर-
(A) चिन्तनशील

प्रश्न 14.
संस्कृति का संबंध मानव के किस जीवन से होता है?
(A) भौतिक जीवन से
(B) बाहरी जीवन से
(C) सामाजिक जीवन से
(D) आंतरिक जीवन से
उत्तर-
(D) आंतरिक जीवन से

प्रश्न 15.
कौन डबल रोटी के सूखे टुकड़े स्वयं न खाकर दूसरों को खिला देता था?
(A) कार्ल मार्क्स
(B) महात्मा गांधी
(C) लेनिन
(D) सिद्धार्थ
उत्तर-
(C) लेनिन

प्रश्न 16.
संसार के मजदूरों को सुखी देखने का स्वप्न देखते हुए कार्ल मार्क्स ने अपना सारा जीवन किसमें बिता दिया?
(A) दुख
(B) सुख
(C) गरीबी
(D) कल्पना
उत्तर-
(A) दुख

प्रश्न 17.
प्रस्तुत पाठ के अनुसार सिद्धार्थ ने कितने वर्ष पूर्व घर का त्याग किया?
(A) 4500
(B) 3500
(C) 1500
(D) 2500
उत्तर-
(D) 2500

प्रश्न 18.
लेखक ने सभ्यता को किसका परिणाम बताया है?
(A) राजनीति का
(B) धर्म का
(C) संस्कृति का
(D) शिक्षा का
उत्तर-
(C) संस्कृति का

प्रश्न 19.
लेखक ने मानव सभ्यता किसे कहा है?
(A) मानव के बाह्य व्यवहार को
(B) मानव की जन-कल्याण की भावना को
(C) मानव की हिंसात्मक प्रवृत्ति को
(D) मानव की नई खोज को
उत्तर-
(A) मानव के बाह्य व्यवहार को

प्रश्न 20.
लेखक ने असभ्यता की जननी किसे कहा है?
(A) सभ्यता को
(B) संस्कृति को
(C) असंस्कृति को
(D) लालची प्रवृत्ति को
उत्तर-
(C) असंस्कृति को

प्रश्न 21.
मानव संस्कृति कैसी वस्तु है?
(A) अविभाज्य
(B) विभाज्य
(C) स्थूल
(D) अस्थायी
उत्तर-
(A) अविभाज्य

प्रश्न 22.
यह संसार परिवर्तित होता है
(A) शताब्दियों में
(B) प्रतिवर्ष
(C) क्षण-क्षण
(D) कभी-कभी
उत्तर-
(C) क्षण-क्षण

प्रश्न 23.
आग के आविष्कार की पृष्ठभूमि में मूल तत्त्व का नाम है
(A) बारूद
(B) पेट की ज्वाला
(C) सौर ऊर्जा
(D) बड़वानल
उत्तर-
(B) पेट की ज्वाला

प्रश्न 24.
सिद्धार्थ के गृह-त्याग का सर्वोच्च लक्ष्य था-
(A) निर्वाण
(B) मानव-सुख
(C) निर्जरा
(D) विपश्यना
उत्तर-
(B) मानव-सुख

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति

प्रश्न 25.
संस्कृति के दायरे में न्यूटन थे-
(A) राजनीतिज्ञ
(B) संगीतज्ञ
(C) योगाचार्य
(D) संस्कृत
उत्तर-
(D) संस्कृत

संस्कृति गद्यांशों के आधार पर अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(1) एक संस्कृत व्यक्ति किसी नयी चीज़ की खोज करता है; किंतु उसकी संतान को वह अपने पूर्वज से अनायास ही प्राप्त हो जाती है। जिस व्यक्ति की बुद्धि ने अथवा उसके विवेक ने किसी भी नए तथ्य का दर्शन किया, वह व्यक्ति ही वास्तविक संस्कृत व्यक्ति है और उसकी संतान जिसे अपने पूर्वज से वह वस्तु अनायास ही प्राप्त हो गई है, वह अपने पूर्वज की भाँति सभ्य भले ही बन जाए, संस्कृत नहीं कहला सकता। एक आधुनिक उदाहरण लें। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का आविष्कार किया। वह संस्कृत मानव था। आज के युग का भौतिक विज्ञान का विद्यार्थी न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण से तो परिचित है ही, लेकिन उसके साथ उसे और भी अनेक बातों का ज्ञान प्राप्त है, जिनसे शायद न्यूटन अपरिचित ही रहा। ऐसा होने पर भी हम आज के भौतिक विज्ञान के विद्यार्थी को न्यूटन की अपेक्षा अधिक सभ्य भले ही कह सके; पर न्यूटन जितना संस्कृत नहीं कह सकते। [पृष्ठ 129]

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प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) ‘संस्कृत व्यक्ति’ किसे कहा गया है?
(ग) संस्कृत व्यक्ति की संतान के संस्कृत न होने का क्या कारण बताया गया है?
(घ) संस्कृत व्यक्ति की संतान लेखक की दृष्टि में क्या और क्यों है?
(ङ) लेखक ने संस्कृत व्यक्ति के कौन-से गुण बताए हैं?
(च) न्यूटन कौन था? उसने क्या आविष्कार किया था?
(छ) सभ्य विद्यार्थी किसे कहा जा सकता है?
(ज) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-संस्कृति। लेखक का नाम-भदंत आनंद कौसल्यायन।

(ख) संस्कृत व्यक्ति उसे कहा गया है, जो अपनी प्रवृत्ति, योग्यता और प्रेरणा के आधार पर कोई नई खोज कर सकता है। उदाहरणार्थ न्यूटन एक संस्कृत व्यक्ति था। उसने अपनी प्रवृत्ति एवं योग्यता के बल पर गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत की खोज की थी।

(ग) संस्कृत व्यक्ति की संतान को संस्कृत व्यक्ति इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि संस्कृत व्यक्ति जिस नई वस्तु का आविष्कार करता है, उसकी संतान को वह वस्तु बिना प्रयास के ही उत्तराधिकार में मिल जाती है। उसे उस वस्तु की खोज के लिए अथवा प्राप्त करने के लिए कोई पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता। इसलिए वह संस्कृत व्यक्ति नहीं हो सकता।

(घ) लेखक की दृष्टि में संस्कृत व्यक्ति की संतान सभ्य है, क्योंकि उसने न तो किसी सभ्य के दर्शन किए और न ही अपनी बुद्धि व विवेक के बल पर किसी नई वस्तु की खोज की है। उसने तो पूर्वजों द्वारा की गई आविष्कृत वस्तु को उत्तराधिकारी के रूप में प्राप्त करके उसका प्रयोग या उपयोग किया है।

(ङ) लेखक ने संस्कृत व्यक्ति होने के लिए बताया है कि वह प्रखर बुद्धि वाला हो, विचारवान हो, परिश्रमी, त्यागशील और मानवतावादी हो। उसमें कुछ नया करने की इच्छा शक्ति का होना भी नितांत आवश्यक है। उसके सभी कार्यों के पीछे जनकल्याण की भावना निहित रहती है। वह अपना स्वार्थ सिद्ध करने की अपेक्षा दूसरों की सहायता करने में अधिक विश्वास रखता है।

(च) न्यूटन एक वैज्ञानिक था। उसने गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत की खोज की थी। उसके सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी गुरुत्वाकर्षण के बल पर अपने परिवेश की सारी वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है।

(छ) सभ्य विद्यार्थी कहलवाने के लिए आवश्यक है कि वह संस्कृत लोगों द्वारा दिए गए ज्ञान का प्रयोग करने वाला हो। संस्कृत लोगों के द्वारा की गई खोजों का सदुपयोगकर्ता होना चाहिए। जो विद्यार्थी इतना भी नहीं करते, वे न तो सभ्य कहलवाएँगे और न संस्कृत।

(ज) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बताया है कि वही व्यक्ति संस्कृत व्यक्ति है जो समाज के हित के लिए कुछ नया करता है। उसकी यह उपलब्धि उसकी संतान को अनायास ही प्राप्त हो जाती है। जिस व्यक्ति के विवेक में किसी भी नए तथ्य की खोज हो, वही संस्कृत व्यक्ति कहलाता है। उसकी इस खोज को उसकी संतान अनायास ही प्राप्त कर लेती है। वे अपने पूर्वजों की भाँति सभ्य भले ही हो, किंतु संस्कृत नहीं कहला सकती। इस विषय में गुरुत्वाकर्षण की खोज का उदाहरण लिया जा सकता है। न्यूटन ने इस सिद्धांत की खोज की थी। इसके अतिरिक्त भी उन्हें और भी बातों का ज्ञान था, जिनसे केवल वही परिचित थे। आज के विद्यार्थी भले ही सभ्य हों, किंतु न्यूटन जितने संस्कृत नहीं कहला सकते। कहने का भाव है कि जो समाज के लिए कुछ नया करते हैं, वे संस्कृत हैं तथा जो उसे प्राप्त कर समाज-हित में उसका प्रयोग करते हैं, वे सभ्य हैं।

(2) आग के आविष्कार में कदाचित पेट की ज्वाला की प्रेरणा एक कारण रही। सुई-धागे के आविष्कार में शायद शीतोष्ण से बचने तथा शरीर को सजाने की प्रवृत्ति का विशेष हाथ रहा। अब कल्पना कीजिए उस आदमी की जिसका पेट भरा है, जिसका तन ढंका है, लेकिन जब वह खुले आकाश के नीचे सोया हुआ रात के जगमगाते तारों को देखता है, तो उसको केवल इसलिए नींद नहीं आती क्योंकि वह यह जानने के लिए परेशान है कि आखिर यह मोती भरा थाल क्या है? पेट भरने और तन ढंकने की इच्छा मनुष्य की संस्कृति की जननी नहीं है। पेट भरा और तन ढंका होने पर भी ऐसा मानव जो वास्तव में संस्कृत है, निठल्ला नहीं बैठ सकता। हमारी सभ्यता का एक बड़ा अंश हमें ऐसे संस्कृत आदमियों से ही मिला है, जिनकी चेतना पर स्थूल भौतिक कारणों का प्रभाव प्रधान रहा है, किंतु उसका कुछ हिस्सा हमें मनीषियों से भी मिला है जिन्होंने तथ्य-विशेष को किसी भौतिक प्रेरणा के वशीभूत होकर नहीं, बल्कि उनके अपने अंदर की सहज संस्कृति के ही कारण प्राप्त किया है। रात के तारों को देखकर न सो सकने वाला मनीषी हमारे आज के ज्ञान का ऐसा ही प्रथम पुरस्कर्ता था। [पृष्ठ 129]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक की दृष्टि में मनुष्य ने आग का आविष्कार क्यों किया होगा?
(ग) सुई-धागे के आविष्कार के पीछे मनुष्य की कौन-सी भावना काम कर रही होगी?
(घ) ‘मोती भरे थाल’ से क्या तात्पर्य है और उसके रहस्य को जानने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को क्या कहा गया है?
(ङ) मनुष्य किस प्रकार का प्राणी है?
(च) हमारी सभ्यता का अधिकांश भाग किन संस्कृत आदमियों ने निर्मित किया है?
(छ) मनीषी किसे कहा गया है? वे किस प्रेरणा के बल पर ज्ञान की प्राप्ति करते हैं?
(ज) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-संस्कृति। लेखक का नाम-भदंत आनंद कौसल्यायन।

(ख) आदि मानव जंगलों में रहता हुआ कंद-मूल, फल आदि खाकर अपना पेट भरता था। किंतु इससे उसकी भूख शांत नहीं होती थी। पेट की भूख को शांत करने के लिए उसने आग का आविष्कार किया होगा।

(ग) सर्दी-गर्मी के कष्ट से बचने के लिए मनुष्य ने अपने को ढंकना चाहा होगा। उसने अपनी इसी इच्छापूर्ति के लिए सुई-धागे का आविष्कार किया होगा।

(घ) ‘मोती भरे थाल’ से तात्पर्य’ आकाश में खिले तारों से है। जो लोग पेट भरा और तन ढका होने पर भी जागकर तारों के रहस्य को जानने की इच्छा रखते हैं, उन्हें लेखक ने मनीषी कहा है। उन्हें वास्तविक संस्कृत मनुष्य की संज्ञा दी गई है।

(ङ) मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है। उसके मन में सदा कुछ-न-कुछ जानने की इच्छा बनी रहती है। वह अपनी इसी इच्छा की पूर्ति हेतु कुछ-न-कुछ नया करता रहता है। वह कभी विचारहीन होकर नहीं बैठ सकता। वह सदा नए-नए कार्य करता रहता है।

(च) आज हम जिस सभ्यता में जी रहे हैं, उसके अधिकांश भाग का निर्माण ऐसे संस्कृत व्यक्तियों ने किया है, जो इस भौतिक संसार को सुखी और सुविधापूर्ण बनाना चाहते थे। उन्होंने ही आग, सुई-धागा, परिवहन के साधन, बिजली व बिजली से चलित मशीनों का आविष्कार किया है।

(छ) मनीषी ऐसे संस्कृत व्यक्तियों को कहा गया है, जो भौतिक आवश्यकता की अपेक्षा मन की जिज्ञासा की तप्ति हेतु प्रकृति के रहस्यों को जानना चाहते हैं। सूक्ष्म और अज्ञात तथ्यों को जानना उनका स्वाभाविक गुण होता है। वे अपने मन की सहज सांस्कृतिक प्रेरणा के बल पर ज्ञान की खोज करते हैं। वे भौतिक उपकरणों को बनाने में अपनी शक्ति व्यर्थ नहीं करते।

(ज) आशय/व्याख्या-इस गद्यांश में लेखक ने उन कारणों पर प्रकाश डाला है जिनकी वजह से व्यक्ति ने नए-नए आविष्कार किए हैं। लेखक का मानना है कि पेट की भूख को शांत करने के लिए ही आग का आविष्कार किया गया होगा। इसी प्रकार शरीर को गर्मी-सर्दी से बचाने हेतु ही सुई-धागे का आविष्कार हुआ होगा। किंतु सभी नई खोजों पर यह बात लागू नहीं होती। एक व्यक्ति का पेट भरा हुआ है, वस्त्र भी उसने पहने हुए हैं और वह रात को लेट कर आसमान में जगमगाते हुए तारों को देखता है तो केवल इसलिए नहीं कि उसे नींद नहीं आती, अपितु वह यह सोचता है कि वास्तव में यह तारों से भरा हुआ आकाश है क्या चीज? पेट भरने और शरीर को ढंकने की इच्छा को संस्कृति नहीं कह सकते। हमें हमारी सभ्यता का बड़ा भाग ऐसे ही लोगों से प्राप्त हुआ है, जिनकी चेतना पर स्थूल भौतिक कारणों का प्रभाव प्रमुख रहा है। किंतु समाज में कुछ ऐसे मनीषी भी रहे हैं जिन्होंने तथ्य विशेष की खोज भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति से प्रेरित होकर नहीं की, अपितु उनको अंदर की सहज संस्कृति के ही कारण प्राप्त किया है। रात को तारों को देखकर न सो सकने वाला मनीषी हमारे आज के ज्ञान को प्रस्तुत करता है। कहने का भाव है कि मनीषी भौतिक आवश्यकताओं की अपेक्षा मन की जिज्ञासा की तृप्ति हेतु प्रकृति के रहस्यों को जानना चाहते हैं। प्रकृति के अज्ञात तथ्यों को जानना चाहते हैं। प्रकृति के अज्ञात तथ्यों को जानना उनका स्वाभाविक गुण होता है। वे अपने इसी गुण के कारण नई-नई खोज करते हैं, तभी लेखक ने उन्हें संस्कृत व्यक्ति कहा है।

(3) भौतिक प्रेरणा, ज्ञानेप्सा-क्या ये दो ही मानव संस्कृति के माता-पिता हैं? दूसरे के मुँह में कौर डालने के लिए जो अपने मुँह का कौर छोड़ देता है, उसको यह बात क्यों और कैसे सूझती है? रोगी बच्चे को सारी रात गोद में लिए जो माता बैठी रहती है, वह आखिर ऐसा क्यों करती है? सुनते हैं कि रूस का भाग्यविधाता लेनिन अपनी डैस्क में रखे हुए डबल रोटी के सूखे टुकड़े स्वयं न खाकर दूसरों को खिला दिया करता था। वह आखिर ऐसा क्यों करता था? संसार के मजदूरों को सूखी देखने का स्वप्न देखते हुए कार्ल मार्क्स ने अपना सारा जीवन दुख में बिता दिया। और इन सबसे बढ़कर आज नहीं, आज से ढाई हज़ार वर्ष पूर्व सिद्धार्थ ने अपना घर केवल इसलिए त्याग दिया कि किसी तरह तृष्णा के वशीभूत लड़ती-कटती मानवता सुख से रह सके। [पृष्ठ 129-130]

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प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) मानव संस्कृति का जन्म किन-किन भावों के कारण होता है?
(ग) दूसरों के लिए सर्वस्व त्याग करने वाले व्यक्तियों में लेखक ने किन-किन महापुरुषों का नामोल्लेख किया है?
(घ) संस्कृति के कौन-से तीन रूप गिनाए गए हैं?
(ङ) प्रस्तुत गद्यांश का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।
(च) सिद्धार्थ का प्रमुख गुण क्या था?
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-संस्कृति।
लेखक का नाम-भदंत आनंद कौसल्यायन।

(ख) मानव संस्कृति का जन्म भौतिक प्रेरणा, आग व सुई-धागे के आविष्कार, ज्ञानेप्सा-तारों आदि के रहस्य जानने की इच्छा, अन्य लोगों के लिए त्याग की भावना आदि कारणों से हुआ है। इनके अतिरिक्त मानव की बौद्धिक इच्छा एवं शक्ति भी मानव संस्कृति को जन्म देने में सहयोगी सिद्ध हुई है।

(ग) सर्वस्व त्यागने वालों में कवि ने निम्नलिखित महानुभावों के नामों का उल्लेख किया है-

  • लेनिन-जो अपने डेस्क में रखे डबल रोटी के सूखे टुकड़े भी दूसरों को खिला देता था।
  • कार्ल मार्क्स-जिसने मजदूरों के हक के लिए सारा जीवन दुःख में बिता दिया।
  • सिद्धार्थ-जिसने तृष्णा के वशीभूत लड़ती-कटती मानवता के सुख के लिए अपना घर-बार त्याग दिया।

(घ) संस्कृति के निम्नलिखित तीन रूप गिनाए गए हैं-

  • भौतिक प्रेरणा (पेट की भूख व तन को ढकने अर्थात् आग व सुई-धागा) के आविष्कार वाली संस्कृति।
  • ज्ञानेप्सा–तारों के संसार को जानने की इच्छा से उत्पन्न संस्कृति।
  • सर्वस्व त्याग कराने वाली संस्कृति।

(ङ) प्रस्तुत गद्यांश में मानव संस्कृति की उपलब्धि के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डाला गया है।
लेखक ने संस्कृति निर्माण में सक्रिय प्रमुख तत्त्वों का भी उद्घाटन किया है। संस्कृति के प्रकार पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने उन महान् पुरुषों का उल्लेख किया, जिन्होंने संस्कृति निर्माण में महान् योगदान दिया है। लेखक का मूल उद्देश्य मानव को संस्कृत मानव बनने की प्रेरणा देना है।

(च) सिद्धार्थ एक राजकुमार था। वह चाहता तो अपना सारा जीवन ऐशो-आराम में व्यतीत कर सकता था, किंतु उसने इस संसार के दुःखी लोगों के लिए अपना आराम का जीवन त्यागकर घोर तपस्या की और उसके फलस्वरूप चिंतन-मनन को उपदेश के रूप में संसार के लोगों तक पहुँचाया जिससे उनका जीवन सुखी बन सके।

(छ) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने मानव संस्कृति के जन्म के कारणों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया है कि मानव संस्कृति का जन्म भौतिक प्रेरणा, आग या सूई-धागे के आविष्कार अथवा ज्ञानेप्सा तारों आदि के रहस्य जानने की इच्छा तथा अन्य लोगों के लिए त्याग भावना आदि कारणों से होता है। इनके अतिरिक्त मानव की बौद्धिक इच्छा-शक्ति की भावना संस्कृति को जन्म देने में सहायक सिद्ध हुई है। लेखक ने संस्कृति के निर्माण में सक्रिय प्रमुख तत्त्वों का भी उद्घाटन किया है। संस्कृति के प्रकार पर अपना मत व्यक्त करते हुए उन्होंने उन महापुरुषों का उदाहरण दिया है, जिन्होंने मानव-संस्कृति के निर्माण के लिए अपना सर्वस्व त्याग करके महान् सहयोग दिया है। उनमें लेनिन, कार्ल मार्क्स, सिद्धार्थ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। लेखक का मूल उद्देश्य मानव-संस्कृति द्वारा मानव बनाने की प्रेरणा देना है। दूसरों के दुख को समझना और उसे दूर करने के लिए किए गए त्याग की भावना ही मानव संस्कृति की सच्ची रचयिता है। भले ही वह माँ का त्याग हो या फिर सिद्धार्थ का।

(4) और सभ्यता? सभ्यता है संस्कृति का परिणाम । हमारे खाने-पीने के तरीके, हमारे ओढ़ने पहनने के तरीके, हमारे गमनागमन के साधन, हमारे परस्पर कट मरने के तरीके; सब हमारी सभ्यता हैं। मानव की जो योग्यता उससे आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति? और जिन साधनों के बल पर वह दिन-रात आत्म-विनाश में जुटा हुआ है, उन्हें हम उसकी सभ्यता समझें या असभ्यता? संस्कृति का यदि कल्याण की भावना से नाता टूट जाएगा तो वह असंस्कृति होकर ही रहेगी और ऐसी संस्कृति का अवश्यंभावी परिणाम असभ्यता के अतिरिक्त दूसरा क्या होगा?[पृष्ठ 130]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक के अनुसार सभ्यता क्या है?
(ग) सभ्यता और संस्कृति में क्या अंतर है?
(घ) लेखक ने असंस्कृति किसे कहा है?
(ङ) असभ्यता क्या है?
(च) संस्कृति में कौन-सी भावना प्रधान रहती है?
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-संस्कृति। लेखक का नाम-भदंत आनंद कौसल्यायन।

(ख) लेखक ने बताया है कि सभ्यता हमारी संस्कृति का ही परिणाम होता है। हमारे जीवनयापन के तौर-तरीके, रहन-सहन, खान-पान, हमारे ओढ़ने-पहनने के तरीके हमारे गमना-गमन के साधन, परस्पर मेल-जोल, लड़ाई-झगड़े सबके-सब हमारी सभ्यता को दर्शाते हैं। हमारे कार्य जितने सुसंस्कृत ढंग से होंगे हमारी सभ्यता भी वैसी ही अच्छी होगी।

(ग) कहा गया है कि सभ्यता संस्कृति की ही उपज है। यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रेरणा और योग्यता के बल पर सर्वकल्याण हेतु कोई आविष्कार करता है तो वह हमारी संस्कृति कहलाती है। तत्पश्चात् जब उस आविष्कारित वस्तु का प्रयोग किया जाता है तो उसे सभ्यता कहते हैं। संस्कृति का संबंध विचार से है और सभ्यता बाहरी जीवन से संबंध रखती है। एक यदि विचार है या सूक्ष्म है तो दूसरा विचार के अपनाने का ढंग है और स्थूल है।

(घ) लेखक ने मनुष्य के उन कार्यों को असंस्कृति का जनक कहा है, जिनके कारण वह ऐसे उपकरणों का उत्पादन करता है, जिनसे मानवता का विनाश होता है। मानव-कल्याण की भावना-विहीन व्यक्ति असंस्कृत व्यक्ति होता है। इसी प्रकार लूट-मार, हिंसा, चोरी आदि सभी कार्य असंस्कृति की पहचान हैं।

(ङ) जैसे संस्कृति सभ्यता की जननी होती है, वैसे ही असंस्कृति असभ्यता की जननी है। जैसे संस्कृत व्यक्ति सभ्यता को जन्म देता है वैसे ही असंस्कृत व्यक्ति अपने बुरे कर्मों से असभ्यता का निर्माण करता है। मानवता और मानव कल्याण के विरुद्ध किए गए सभी कार्य असभ्यता के अंतर्गत आते हैं। चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार, झूठ, युद्ध आदि सब कार्य असभ्यता के सूचक हैं।

(च) संस्कृति में सदैव कल्याण की भावना ही प्रधान रहती है। इसी भावना से प्रेरित होकर व्यक्ति मानवता के उत्थान या कल्याण के कार्य करता है। ऐसी प्रेरणा मनुष्य की आंतरिक प्रेरणा होती है। जन-कल्याण की भावना किसी बाहरी या भौतिक आकर्षण का कारण नहीं हुआ करती। अतः संस्कृति सदैव मानव कल्याण की भावना से ही विकसित होती है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 17 संस्कृति

(छ) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने संस्कृति-असंस्कृति तथा सभ्यता और असभ्यता का अंतर स्पष्ट किया है। लेखक का मत है कि सभ्यता संस्कृति का परिणाम होती है। हमारे जीवन-यापन के सभी साधन-खान-पान, रहन-सहन, गमनागमन के साधन, आपस में मेल-जोल यहाँ तक कि लड़ने का ढंग भी हमारी सभ्यता को दर्शाता है। हमारे ये कार्य जितने सुसंस्कृत ढंग से होंगे, हमारी सभ्यता भी उतनी ही श्रेष्ठ होगी। संस्कृति का संबंध हमारे विचारों से है तथा सभ्यता हमारे बाहरी जीवन से संबंध रखती है। विचार सूक्ष्म होता है और उसे कार्यान्वित करने का ढंग सभ्यता है जो स्थूल है। मानवता का विनाश करने वाले सभी कार्य असंस्कृति होते हैं। असंस्कृत व्यक्ति अपने बुरे कार्यों से असभ्यता का निर्माण करता है। चोरी, डकैती, हिंसा, झूठ, रिश्वत, भ्रष्टाचार आदि सभी असभ्यता के अंतर्गत आते हैं। संस्कृति सदैव कल्याण की भावना को प्रेरित करती है। वह बाहरी नहीं, अपितु आंतरिक तत्त्व होता है।

संस्कृति Summary in Hindi

संस्कृति लेखक-परिचय

प्रश्न-
भदंत आनंद कौसल्यायन का जीवन-परिचय एवं उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय-भदंत आनंद कौसल्यायन एक सुप्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु एवं हिंदी के महान् प्रचारक-प्रसारक थे। उनका जन्म सन् 1905 में अंबाला जिले के सोहाना नामक गाँव में हुआ था। बौद्ध भिक्षु होने के कारण उन्होंने देश-विदेश का बहुत भ्रमण किया है। वे गाँधी जी के साथ भी एक लंबे समय तक रहे। उनकी रचनाओं में गाँधी जी के जीवन-दर्शन का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। बौद्ध धर्म के कार्यों के साथ-साथ उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य की निरंतर सेवा की है। वे हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से संबद्ध रहे तथा बाद में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सचिव पद पर रहकर हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार का कार्य करते रहे। सन् 1988 में उनका निधन हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ-भदंत आनंद कौसल्यायन की 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं जिनमें ‘भिक्षु के पत्र’, ‘जो भूल ना सका’, ‘आह! ऐसी दरिद्रता’, ‘बहानेबाजी’, ‘यदि बाबा ना होते’, ‘रेल का टिकट’, ‘कहाँ क्या देखा’ आदि प्रमुख हैं। बौद्धधर्म-दर्शन से संबंधित उनके मौलिक और अनूदित अनेक ग्रंथ हैं जिनमें जातक कथाओं का अनुवाद विशेष उल्लेखनीय है।

3. साहित्यिक विशेषताएँ भदंत कौसल्यायन की पर्यटन में रुचि होने के कारण वे देश-विदेश की यात्राएँ करते रहे। उनको जीवन का महान् अनुभव था, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से झलकता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में तत्कालीन अनेकानेक विषयों का अत्यंत सहज एवं सरल रूप में वर्णन किया है। उनका संपूर्ण जीवनदर्शन गाँधी जी के आदर्शों से प्रभावित है। उनके साहित्य में मानवीय आचार-व्यवहार, यात्रा- संस्मरण, गाँधी जी के महत्त्वपूर्ण संस्मरण रहे हैं। उनके साहित्य में विषय-वर्णन की ताज़गी देखते ही बनती है। उनके संपूर्ण साहित्य में मानवतावाद का स्वर मुखरित हुआ है।

4. भाषा-शैली-कौसल्यायन जी के साहित्य की भाषा सरल, सहज एवं व्यावहारिक है। उन्होंने अपनी रचनाओं में खड़ी-बोली हिंदी का सफल एवं सार्थक प्रयोग किया है। भाषा की आडंबरहीनता उनके साहित्य की सबसे बड़ी कलात्मक विशेषता है। उनकी भाषा को जन-भाषा कहना भी उचित होगा। उनके प्रस्तुत निबंध में कहीं-कहीं भाषा की शिथिलता खटकती है।

संस्कृति पाठ का सार

प्रश्न-
‘संस्कृति’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में लेखक ने संस्कृति और सभ्यता से जुड़े अनेक प्रश्नों पर प्रकाश डाला है। लेखक ने अनेक उदाहरण देकर सभ्यता और संस्कृति के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उनके अंतर पर भी प्रकाश डाला है। लेखक ने बताया है कि सभ्यता और संस्कृति दो अलग-अलग वस्तुएँ हैं। सभ्यता संस्कृति का परिणाम है किंतु संस्कृति अविभाज्य वस्तु है। वे संस्कृति का विभाजन नहीं करना चाहते। लेखक की दृष्टि में जो मानव के लिए कल्याणकारी नहीं है, वह संस्कृति या सभ्यता हो ही नहीं सकती। पाठ का सार इस प्रकार है

लेखक ने सभ्यता और संस्कृति के स्वरूप को समझने के लिए उदाहरण देते हुए कहा है कि आग का आविष्कार और सुई-धागे का आविष्कार मनुष्य की खोजने की शक्ति या प्रवृत्ति का परिणाम है। इसे ही लेखक ने संस्कृति बताया है। इस आविष्कार के परिणामस्वरूप आग और सुई-धागे को सभ्यता कहते हैं। दूसरे शब्दों में प्रवृत्ति या प्रेरणा को संस्कृति और आविष्कृत वस्तु को सभ्यता कहते हैं। जिस मनुष्य में प्रवृत्ति जितनी अधिक होगी वह उतना ही अच्छा आविष्कारक होगा और उतना ही अधिक संस्कृत भी।

लेखक ने अपनी अवधारणा को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि एक आविष्कारक व्यक्ति सुसंस्कृत होता है, किंतु उसकी संतान जिसने यह आविष्कृत वस्तु-एकाएक या अनायास ही प्राप्त कर ली है वह सभ्य हो सकता है, सुसंस्कृत नहीं। इस दृष्टि से न्यूटन एक संस्कृत था किंतु आज उसके सिद्धांत व अन्य ज्ञान रखने वाले संस्कृत नहीं अपितु सभ्य कहलाएँगे।

जब भी कोई आविष्कार भौतिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए होगा तो उसमें संस्कृति कम और सभ्यता अधिक कही जा सकती है। किंतु जब पेट भरा होने पर भी कुछ लोग रात को जगमगाते तारों का रहस्य जानने का प्रयास करते हैं, वे संस्कृति के जनक हैं। पेट भरने और तन ढकने के भौतिक कारणों की प्रेरणा वाला व्यक्ति संस्कृति का जनक नहीं है। भौतिक कारणों की अपेक्षा अंदर की भावना से प्रभावित होकर जो ज्ञान पैदा करता है, वह सच्चा संस्कृति का आविष्कारक कहलाएगा।

भौतिक प्रेरणा और ज्ञान-प्राप्ति की इच्छा-ये दोनों ही मानव संस्कृति के जनक हैं। दूसरों के मुख में रोटी का टुकड़ा डालने के लिए जो अपने मुँह का कौर छोड़ देता है या फिर रोगी बच्चे को सारी रात गोद में लिए जो माँ बैठी रहती है, वह ऐसा क्यों करती है। इसी प्रकार कार्लमार्क्स मज़दूरों का जीवन सुखी देखने के लिए अपना सारा जीवन दुःखों में गला देता है। इसी प्रकार सिद्धार्थ ने अपना घर-बार इसलिए त्याग दिया था, ताकि तृष्णा के वशीभूत लड़ती-कटती मानवता सुख से रह सके। अतः हम समझ सकते हैं कि संस्कृति ही आग और सुई-धागे का आविष्कार कराती है, तो वह तारों की दुनिया के रहस्य का ज्ञान कराती है और वह योग्यता जो किसी महामानव से सर्वस्व त्याग कराती है, भी संस्कृति ही है।

सभ्यता क्या है? वह संस्कृतियों का परिणाम है। खान-पान, रहन-सहन, ओढ़ने-पहनने और कटने-मरने के तरीके भी सभ्यता के अंतर्गत आते हैं। मानव की जो योग्यता मानव-विनाश का कारण बनती है, वही असंस्कृति है। उससे पैदा हुए हथियार आदि भी असभ्यता के सूचक हैं।

संस्कृति के नाम पर जिस कूड़े-करकट के ढेर का ज्ञान होता है, वह संस्कृति नहीं हो सकता। हर क्षण बदलने वाली इस दुनिया की किसी भी चीज़ को पकड़कर नहीं बैठा जा सकता। लेखक का मत है कि मानव संस्कृति या नए तथ्यों की रक्षा के लिए दलबंदियों की आवश्यकता नहीं है। मानव संस्कृति अविभाज्य है। उसमें कल्याणकारी अंश श्रेष्ठ ही नहीं, स्थायी भी है।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-128) सभ्यता = रहन-सहन के ढंग। संस्कृति = विचार-चिंतन की विधि। भौतिक = ठोस संसार संबंधी वस्तु। आध्यात्मिक = आत्मा-परमात्मा संबंधी। साक्षात् = सम्मुख मिलन। आविष्कार = खोज। आविष्कर्ता = खोज करने वाला। प्रवृत्ति = स्वभाव, रुझान। प्रेरणा = गतिशील बनाने की शक्ति या भावना।

(पृष्ठ-129) संस्कृत व्यक्ति = अच्छे संस्कार या गुणों वाला व्यक्ति। पूर्वज = बाप-दादा आदि। अनायास = अचानक। परिष्कृत = शुद्ध । तथ्य = सत्य, सार। सिद्धांत = नियम। अपरिचित = अनजान। ज्वाला = आग। शीतोष्ण = ठंड तथा गर्मी। हाथ होना = सहयोग होना। मोती भरा थाल = आकाश । जननी = पैदा करने वाली, माँ। चेतना = बुद्धि। निठल्ला = बेकार। पुरस्कर्ता = बढ़ाने वाला। ज्ञानेप्सा = ज्ञान पाने की इच्छा। कौर = रोटी का टुकड़ा।

(पृष्ठ-130) भाग्यविधाता = भाग्य का निर्माण करने वाला। तृष्णा = इच्छा। सिद्धार्थ = महात्मा बुद्ध का वास्तविक नाम । सर्वस्व = सब कुछ। मानवता = मनुष्य जाति। गमनागमन = आना-जाना, यातायात। असंस्कृति = जो संस्कृति न हो। प्रज्ञा = बुद्धि। कल्याण = मंगल। नाता = संबंध। अविभाज्य = जो विभाजित न हो। अंश = भाग। अकल्याणकर = जो कल्याणकारी न हो। स्थायी = टिकाऊ।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 16 नौबतखाने में इबादत

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 16 नौबतखाने में इबादत Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 16 नौबतखाने में इबादत

HBSE 10th Class Hindi नौबतखाने में इबादत Textbook Questions and Answers

नौबतखाने में इबादत का सारांश HBSE 10th Class Kshitij प्रश्न 1.
शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?
उत्तर-
अमीरुद्दीन अर्थात् उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ, जो शहनाईवादन के क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध हैं, का जन्म डुमराँव गाँव में हुआ था। इस कारण शहनाई की दुनिया में डुमराँव गाँव को याद किया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य कारण यह भी है कि शहनाई बजाने के लिए जिस ‘रीड’ का प्रयोग किया जाता है, वह नरकट (एक विशेष प्रकार की घास) से बनती है, जो डुमराँव गाँव के समीप सोन नदी के किनारे पाई जाती है। इन दोनों कारणों से शहनाई की दुनिया में डुमराँव गाँव को याद किया जाता है।

नौबतखाने में इबादत प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class Kshitij  प्रश्न 2.
बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?
उत्तर-
जहाँ भी कोई संगीत का आयोजन हो या अन्य कोई मांगलिक कार्य का आयोजन हो वहाँ सर्वप्रथम उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई की ध्वनि सुनाई देगी। समारोहों में शहनाई की गूंज का अभिप्राय उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ से है। उनकी शहनाई की आवाज़ लोगों के सिर चढ़कर बोलती है। गंगा के किनारे स्थित बालाजी का मंदिर हो या विश्वनाथ का मंदिर अथवा संकटमोचन मंदिर सब जगह संगीत के समारोहों में भी बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई की चर्चा रहती थी। इन सब मंदिरों में प्रभाती मंगलस्वर बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई के रूप में सुनाई पड़ता है। वे अपनी मधुर शहनाईवादन कला के द्वारा हर व्यक्ति के मन को प्रभावित करने में सफल रहते हैं। इसलिए उन्हें शहनाई की मंगलध्वनि का नायक कहते हैं।

नौबतखाने में इबादत HBSE 10th Class Kshitij प्रश्न 3.
‘सुषिर-वाद्यों’ से क्या तात्पर्य है? शहनाई को ‘सुषिर-वाद्यों में शाह’ की उपाधि क्यों दी गई होगी?
उत्तर-
‘सुषिर’ बाँस अथवा मुँह से फूंककर बजाए जाने वाले वाद्यों से निकलने वाली ध्वनि को कहा जाता है। इसी कारण ‘सुषिर-वाद्यों’ से अभिप्राय उन वाद्ययंत्रों से है जो फूंककर बजाए जाने पर ध्वनि उत्पन्न करते हैं। फूंककर बजाए जाने वाले वाद्य जिनमें नाड़ी (नरकट या रीड) होती है, को ‘नय’ कहा जाता है। इसी कारण शहनाई को ‘शाहेनय’ अर्थात् ‘सुषिर-वाद्यों में शाह’ कहते हैं। अतः स्पष्ट है कि शहनाई को ‘सुषिर-वाद्यों में शाह’ की उपाधि दी गई होगी।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 16 नौबतखाने में इबादत

प्रश्न 4.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) ‘फटा सुर न बख्शे। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।
उत्तर-
दिन-रात सुरों की इबादत में लगे रहने वाले बिस्मिल्ला खाँ से जब उनकी एक शिष्या ने कहा कि वे फटी लुंगी न पहना करें तो उन्होंने कहा कि लुंगी यदि आज फटी है तो कल सिल जाएगी, किंतु यदि एक बार सुर बिगड़ गया तो उसका सँवरना मुश्किल है। अतः अपने पहनावे से कहीं अधिक ध्यान उनका सुरों पर रहता था।

(ख) ‘मेरे मालिक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।’
उत्तर-
इस पंक्ति के माध्यम से बताया गया है कि बिस्मिल्ला खाँ अस्सी वर्षों से शहनाई बजा रहे हैं। वे शहनाईवादन में बेजोड़ हैं। फिर भी नमाज़ पढ़ते समय वे परमात्मा से यही प्रार्थना करते हैं कि हे ईश्वर! मुझे मधुर स्वर प्रदान कर। मेरे सुरों में ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर दे जिसे सुनकर लोग प्रभावित हो उठे। उनकी आँखों से भावावेश में सच्चे मोतियों के समान अनायास आँसुओं की झड़ी लग जाए।

प्रश्न 5.
काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?
उत्तर-
काशी के पक्का महाल से मलाई-बरफ बेचने वाले जा चुके थे। न ही वहाँ अब देसी घी की कचौड़ी-जलेबी थी और न ही संगीत के लिए गायकों के मन में आदर भाव रह गया था। इस प्रकार वहाँ से संगीत, साहित्य और संस्कृति संबंधी अनेक परंपराएँ लुप्त होती जा रही थीं, जिनके कारण बिस्मिल्ला खाँ को बहुत दुःख था और वे उनके विषय में सोचकर अत्यंत व्याकुल हो उठते थे।

प्रश्न 6.
पाठ में आए किन प्रसंगों के आधार पर आप कह सकते हैं कि-
(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे। अथवा शहनाईवादक बिस्मिल्ला खाँ के धर्मनिरपेक्ष व्यक्तित्व का वर्णन कीजिए।
(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इंसान थे।
उत्तर-
(क) निम्नलिखित कथनों के आधार पर कह सकते हैं कि बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे
1. वह एक शिया मुसलमान का बेटा था जो सुबह उठकर बाबा विश्वनाथ के मंदिर में शहनाई बजाता। फिर गंगा स्नान करता और बालाजी के सामने रियाज़ करता। फिर भी वह हिंदू नहीं हो गया था। पाँच बार नमाज़ पढ़ने वाला मुसलमान ही था जो मानता था कि उसे बालाजी ने शहनाई में सिद्धि दे दी है।
2. वे अल्लाह की इबादत भैरवी में करते थे। नाम अल्लाह का है, राग तो भैरव है। वे इन दोनों को एक मानकर ही साधते थे।
(ख) पाठ में उद्धृत निम्नलिखित प्रसंगों व कथनों के आधार पर कहा जा सकता है कि बिस्मिल्ला खाँ एक सच्चे इंसान थे. वे अपनी शहनाई बजाने की कला को सदैव ईश्वर की देन मानते थे। इतने बड़े शहनाईवादक होने पर भी वे अत्यंत सरल एवं साधारण जीवन जीते थे। उन्होंने अपनी कला को कभी बाजारू वस्तु नहीं बनाया। वे हवाईजहाज़ की यात्रा को बहुत महँगी समझते थे। इसलिए उन्होंने कभी हवाईजहाज़ से यात्रा नहीं की। कभी पाँच सितारा होटल में नहीं ठहरे। शहनाई बजाने की फीस भी उतनी ही माँगते थे जितनी उन्हें आवश्यकता होती थी। वे सदा सच्चे और खरे इंसान रहे थे। जैसा उनकी शहनाई बजाना मधुर था, वैसा ही उनका जीवन भी अत्यंत मधुर एवं सरल व सच्चा था।

प्रश्न 7.
बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्ध किया?
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ के जीवन में अनेक ऐसे लोगों का संबंध रहा है जिन्होंने उनकी संगीत-साधना को समृद्ध किया है, यथा बालाजी के मंदिर के मार्ग में रसूलनबाई व बतूलनबाई दो बहनें थीं जो ठुमरी, टप्पे आदि का गायन किया करती थीं। बिस्मिल्ला खाँ उनका संगीत सुनने के लिए उनके घर के सामने से गुज़रा करते थे। उन्होंने बाल्यावस्था में ही उनके जीवन में संगीत के प्रेम की भावना भर दी थी।

अमीरुद्दीन (बिस्मिल्ला खाँ) के नाना भी एक महान् शहनाईवादक थे। वह नाना के शहनाईवादन को छुप-छुपकर सुनता था और चोरी से नाना की शहनाई उठाकर उसे बजा-बजाकर देखता था। इससे उन्हें शहनाई बजाने की प्रेरणा मिली थी। इसी प्रकार बिस्मिल्ला खाँ के मामा अलीबख्श खाँ एक अच्छे शहनाईवादक थे। वे बिस्मिल्ला खाँ के उस्ताद भी थे। उन्होंने उसे शहनाई बजाने की कला सिखाई थी। उनका सहयोग अत्यंत सराहनीय रहा है।

रचना और अभिव्यक्ति-

प्रश्न 8.
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया?
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताओं ने मुझे प्रभावित किया है

  • बिस्मिल्ला खाँ अपनी कला के प्रति समर्पित हैं। वे सच्ची लगन से शहनाईवादन का काम करते हैं। उसके विकास हेतु नए-नए प्रयोग करते हैं। इसीलिए उन्हें पद्मभूषण व भारतरत्न जैसे महान् पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।
  • सादगीपूर्ण जीवन जीना तो मानो उनका स्वभाव बन चुका है। इतने बड़े-बड़े पुरस्कार और उपाधियाँ प्राप्त करके भी उनके मन में कहीं अहंकार की भावना नहीं आई। वे पूर्ववत् सरल एवं साधारण जीवन व्यतीत करते रहे। उन्होंने इतनी शोहरत प्राप्त करके भी कभी बनाव-श्रृंगार नहीं किया।
  • ईश्वर के प्रति आस्थावान बने रहना उनके व्यक्तित्व की अन्य प्रमुख विशेषता है जिसने मुझे प्रभावित किया। वे सदा प्रभु से प्रार्थना करते कि वे उन्हें सुरों की नियामत प्रदान करें। उन्होंने जो कुछ जीवन में प्राप्त किया, उसे वे प्रभु की कृपा समझते थे।
  • धार्मिक उदारता उनके जीवन की अन्य विशेषता है। वे मुसलमान होते हुए भी दूसरे धर्मों का सम्मान करते थे। • बिस्मिल्ला खाँ बचपन से ही विनोद प्रिय थे। वे सदा विनोद से भरे रहते थे। वे खाने-पीने एवं संगीत सुनने के भी शौकीन थे।

प्रश्न 9.
मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ मुस्लिम धर्म में मनाए जाने वाले त्योहारों में अत्यंत उत्साहपूर्वक भाग लेते थे। मुहर्रम से तो उनका विशेष लगाव था। मुहर्रम के दस दिनों में वे किसी प्रकार का मंगल वाद्य नहीं बजाते थे तथा न ही कोई राग-रागनी गाते थे। इन दिनों में वे शहनाई भी नहीं बजाते थे। आठवें दिन दालमंडी से चलने वाले मुहर्रम के जुलूस में पूरे उत्साह के साथ आठ किलोमीटर रोते हुए नौहा बजाते हुए चलते थे।

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प्रश्न 10.
बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे, तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर-
निश्चय ही उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ कला के उपासक थे। उन्होंने अस्सी वर्षों तक लगातार शहनाई बजाकर इस बात को सिद्ध कर दिया है। वे प्रतिदिन ईश्वर से अच्छे सुर की प्राप्ति हेतु प्रार्थना किया करते थे। उन्हें सदा ऐसा लगता था कि खुदा उन्हें कोई ऐसा सुर देगा जिसे सुनकर श्रोता भाव-विभोर हो उठेंगे और उनकी आँखों से आनंद के आँसू बह निकलेंगे। वे अपने आपको कभी पूर्ण नहीं मानते थे। वे सदा कुछ-न-कुछ सीखने का प्रयास करते रहते थे। उन्हें कभी अपनी शहनाईवादन कला पर घमंड नहीं हुआ। वे उसमें सुधार लाने के लिए प्रयत्नरत रहते थे। इससे सिद्ध होता है कि बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे।

भाषा-अध्ययन-

प्रश्न 11.
निम्नलिखित मिश्र वाक्यों के उपवाक्य छाँटकर भेद भी लिखिए-
(क) यह ज़रूर है कि शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं।
(ख) रीड अंदर से पोली होती है, जिसके सहारे शहनाई को फूंका जाता है।
(ग) रीड नरकट से बनाई जाती है, जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।
(घ) उनको यकीन है, कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा।
(ङ) हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी गमक उसी में समाई है।
(च) खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा।
उत्तर-
(क) 1. यह ज़रूर है। – (प्रधान उपवाक्य)
2. शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं। – (संज्ञा उपवाक्य)

(ख) 1. रीड अंदर से पोली होती है। – (प्रधान उपवाक्य)
2. जिसके सहारे शहनाई को फूंका जाता है। – (विशेषण उपवाक्य)

(ग) 1. रीड नरकट से बनाई जाती है। – (प्रधान उपवाक्य)
2. जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है। – (विशेषण उपवाक्य)

(घ) 1. उनको यकीन है। – (प्रधान उपवाक्य)
2. कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा। – (संज्ञा उपवाक्य)

(ङ) 1. हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है। – (प्रधान उपवाक्य)
2. जिसकी गमक उसी में समाई है। – (विशेषण उपवाक्य)

(च) 1. खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है। – (प्रधान उपवाक्य)
2. पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा।- (संज्ञा उपवाक्य)

प्रश्न 12.
निम्नलिखित वाक्यों को मिश्रित वाक्यों में बदलिए-
(क) इसी बालसुलभ हँसी में कई यादें बंद हैं।
(ख) काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है।
(ग) धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।
(घ) काशी का नायाब हीरा हमेशा से दो कौमों को एक होकर आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।
उत्तर-
(क) यही वह बालसुलभ हँसी है जिसमें कई यादें बंद हैं।
(ख) काशी की यह प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है कि यहाँ संगीत आयोजन होते हैं।
(ग) धत्! पगली ई भारतरत्न जो हमको मिला है, ऊ शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।
(घ) यह काशी का नायाब हीरा है जो हमेशा से दो कौमों को एक होकर आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।

पाठेतर सक्रियता

कल्पना कीजिए कि आपके विद्यालय में किसी प्रसिद्ध संगीतकार के शहनाईवादन का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम की सूचना देते हुए बुलेटिन बोर्ड के लिए नोटिस बनाइए।
उत्तर-
शहनाईवादन-यह जानकर सभी विद्यार्थियों को प्रसन्नता होगी कि दिनांक 15 अप्रैल, 2008 को विद्यालय के विशाल कक्ष में सुप्रसिद्ध शहनाईवादक उस्ताद हुसैन अली का शहनाईवादन कार्यक्रम होगा। हुसैन अली देश के जाने-माने शहनाईवादक हैं। यह कार्यक्रम प्रातः 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक चलेगा। सभी विद्यार्थी एवं अध्यापक आमंत्रित हैं।

आप अपने मनपसंद संगीतकार के बारे में एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

हमारे साहित्य, कला, संगीत और नृत्य को समृद्ध करने में काशी (आज के वाराणसी) के योगदान पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

काशी का नाम आते ही हमारी आँखों के सामने काशी की बहुत-सी चीजें उभरने लगती हैं, वे कौन-कौन सी हैं?
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

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यह भी जानें

सम – ताल का एक अंग, संगीत में वह स्थान जहाँ लय की समाप्ति और ताल का आरंभ होता है।
श्रुति – एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाते समय का अत्यंत सूक्ष्म स्वरांश
वाद्ययंत्र – हमारे देश में वाद्य यंत्रों की मुख्य चार श्रेणियाँ मानी जाती हैं
ताल-वितत- तार वाले वाद्य-वीणा, सितार, सारंगी, सरोद
सुषिर – फूंक कर बजाए जाने वाले वाद्य-बाँसुरी, शहनाई, नागस्वरम्, बीन
घनवाद्य – आघात से बजाए जाने वाले धातु वाद्य-झाँझ, मंजीरा, घुघरू
अवनद्ध – चमड़े से मढ़े वाद्य-तबला, ढोलक, मृदंग आदि।

चैती – एक तरह का चलता गाना
चैती
चढ़ल चइत चित लागे ना रामा
बाबा के भवनवा
बीर बमनवा सगुन बिचारो
कब होइहैं पिया से मिलनवा हो रामा
चढ़ल चइत चित लागे ना रामा

ठुमरी – एक प्रकार का गीत जो केवल एक स्थायी और एक ही अंतरे में समाप्त होता है।

ठुमरी-
बाजुबंद खुल-खुल जाए
जादु की पुड़िया भर-भर मारी
हे! बाजुबंद खुल-खुल जाए

टप्पा – यह भी एक प्रकार का चलता गाना ही कहा जाता है। ध्रुपद एवं ख्याल की अपेक्षा जो गायन संक्षिप्त है, वही टप्पा है।

टप्पा –
बागाँ विच आया करो
बागाँ विच आया करो मक्खियाँ तों डर लगदा
गुड़ ज़रा कम खाया करो।

दादरा – एक प्रकार का चलता गाना। दो अर्द्धमात्राओं के ताल को भी दादरा कहा जाता है।
दादरा-
तड़प तड़प जिया जाए
साँवरिया बिना
गोकुल छाड़े मथुरा में छाए
किन संग प्रीत लगाए
तड़प तड़प जिया जाए

HBSE 10th Class Hindi नौबतखाने में इबादत Important Questions and Answers

विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिस्मिल्ला खाँ को संगीत की आरंभिक शिक्षा किससे और कैसे मिली?
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ महान संगीत प्रेमी थे। उन्हें संगीत सीखने की प्रारंभिक प्रेरणा काशी की रसूलनबाई और बतलनबाई नाम की दो गायिका बहनों के ठुमरी, टप्पे आदि गीत सुनकर मिली थी। जब बालक अमीरुद्दीन (बिस्मिल्ला खाँ) शहनाई का रियाज़ करने बालाजी के मंदिर जाया करते तो मार्ग में उन्हें इन दोनों बहनों के गीत सुनने को मिलते थे। वहीं से उनके मन में संगीत सीखने की प्रेरणा जागृत हुई थी।

प्रश्न 2.
‘बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई एक-दूसरे के पूरक हैं’-इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर-
भारतवर्ष के किसी भी कोने में संगीत का आयोजन होता था तो वहाँ सर्वप्रथम बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई के मांगलिक स्वर अवश्य सुने जाते थे। संगीत आयोजन बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई के अभाव में अधूरे एवं फीके लगते थे। बिस्मिल्ला खाँ का मतलब उनकी शहनाई, शहनाई का मतलब उनका हाथ और हाथ से आशय उनकी शहनाई से सुरों का निकलना। फिर देखते-ही-देखते संपूर्ण वातावरण सुरीला हो उठता था। अतः यह कहना उचित ही है कि बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई एक-दूसरे के पूरक हैं।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 16 नौबतखाने में इबादत

प्रश्न 3.
बिस्मिल्ला खाँ को किन-किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया और उनकी सबसे बड़ी देन क्या है?
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ को उनकी शहनाईवादन कला के क्षेत्र में महान् उपलब्धियों के कारण अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा अनेक मानद उपाधियों से अलंकृत किया गया।
भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण व भारतरत्न जैसे महान् पुरस्कारों से पुरस्कृत किया। बिस्मिल्ला खाँ की सबसे बड़ी देन यही है कि अस्सी वर्षों तक उन्होंने संगीत को संपूर्णता और एकाधिकार से सीखने की इच्छा को अपने भीतर जीवित रखा।

प्रश्न 4.
बिस्मिल्ला खाँ की ऐतिहासिक उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
आज तक किसी भी संगीतकार को वह गौरव प्राप्त करने का सौभाग्य नहीं मिला जो बिस्मिल्ला खाँ को प्राप्त हुआ। उन्हें भारत की आज़ादी की पहली सुबह 15 अगस्त, 1947 को लाल किले पर शहनाई बजाने का अवसर मिला था। दूसरा अवसर उन्हें 26 जनवरी, 1950 को लोकतांत्रिक गणराज्य के मंगल प्रभात के रथ की अगुवाई पर बिस्मिल्ला खाँ को लालकिले पर शहनाई बजाने पर मिला।

प्रश्न 5.
ऐसे कौन-से कारण थे जिनसे बिस्मिल्ला खाँ को लगता था कि बालाजी ने उन्हें शहनाईवादन में सिद्धि दी है?
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ चार वर्ष की आयु में ही अपने मामा के घर बनारस में आ गए थे। उनके नाना व मामा बाबा विश्वनाथ के मंदिर के नौबतखाने में शहनाई बजाया करते थे। बालक बिस्मिल्ला खाँ भी उनके साथ बाबा विश्वनाथ को जगाने के बाद बालाजी के घाट पर गंगा में गोते लगाते थे। तत्पश्चात् बालाजी के सामने बैठकर रियाज़ करते थे। उन्हें सुरों की साधना में घंटों लग जाते थे। एक दिन सुरों की साधना की इबादत करते-करते उन्हें बालाजी ने प्रकट होकर साक्षात् रूप में दर्शन दिए। उनके सिर पर हाथ रखकर उन्हें आजीवन आनंद करने का आशीर्वाद दिया। इसलिए बिस्मिल्ला खाँ को लगता था कि बालाजी ने उन्हें शहनाईवादन की सिद्धि प्रदान की है।

प्रश्न 6.
‘बिस्मिल्ला खाँ ने संगीत के क्षेत्र में उन्नति के साथ-साथ जीवन को अत्यंत सरलता और सादगी से व्यतीत किया है’-पाठ से उदाहरण देकर इस कथन को सिद्ध कीजिए।
उत्तर-
निश्चय ही बिस्मिल्ला खाँ महान् संगीतकार थे। उन्होंने शहनाईवादन कला को जिन बुलंदियों तक पहुँचाया है, वह एक असाधारण उपलब्धि कही जा सकती है। वे चाहते तो अपने भौतिक सुख के लिए धन-दौलत बटोर सकते थे, किंतु उन्होंने ऐसा न करके संगीत की साधना के साथ-साथ सरल ढंग से जीवन व्यतीत किया। उदाहरणार्थ एक बार अमेरिका का राकफलेर फाउंडेशन उन्हें और उनके संगतकार साथियों को परिवार सहित अमेरिका में उनकी जीवन-शैली के अनुसार रखना चाहता था। किंत बिस्मिल्ला खाँ ने अमेरिका के ऐश्वर्य की चाह न रखते हुए उनसे पूछा कि वहाँ गंगा नदी कहाँ से लाएँगे। इससे उनकी उपलब्धि अन्य से अधिक दिखाई देती है। वे चाहते तो अपने लिए सभी प्रकार के सुख और आराम एकत्रित कर सकते थे, किंतु उन्होंने अपना जीवन अपनी इच्छा और सादगी के साथ जीना ही पसंद किया।

प्रश्न 7.
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन में गंगा नदी का क्या महत्त्व है? पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर-
पाठ में बताया गया है कि बालक बिस्मिल्ला खाँ बचपन से ही गंगा नदी में स्नान करता और तत्पश्चात् बालाजी के मंदिर में घंटों रियाज़ करता है। उनका यह क्रम आजीवन बना रहा। गंगा का उनके जीवन में इतना सहचर्य रहा है कि परिवार के सदस्यों व संगतकारों की भाँति वह उनके जीवन का अभिन्न अंग थी। गंगा के सहचर्य को वे कभी भी छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। बड़े-से-बड़ा लालच भी उनके इस सहचर्य की भावना को हिला न सका। अमेरिका के राकफलेर फांउडेशन ने उन्हें और उनके संगतकारों को अमेरिका में उनके ढंग से रहने के लिए निमंत्रित किया था। किंतु उन्होंने कहा था कि वहाँ गंगा नदी कहाँ से लाएँगे। गंगा नदी उन्हें सदा सुख व आनंद देने वाली लगती थी। उनके लिए संसार के सभी सुख-ऐश्वर्य गंगा के सामने व्यर्थ थे। उन्हें जीवन का जो आनंद गंगा नदी के सहचर्य से मिलता था, वह कहीं और नहीं। इसलिए उनके जीवन में गंगा नदी का अत्यधिक महत्त्व रहा है।

प्रश्न 8.
बिस्मिल्ला खाँ साहब की मृत्यु कब हुई थी?
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ को ईश्वर ने जैसे शहनाई के क्षेत्र में अत्यधिक सफलता प्रदान की थी, वैसे ही उन्हें लंबी आयु का वरदान भी दिया था। वे नब्बे वर्ष तक जीवित रहे। दिनांक 21 अगस्त, 2006 को यह महान् संगीतकार इस नश्वर संसार को अलविदा कह गया था। उनकी मृत्यु के इस दुखद समाचार से संगीत प्रेमियों को गहरा सदमा लगा था। सबकी आँखें नम हो गई थीं। ऐसे महान् संगीतकार कभी-कभी ही धरती पर आते हैं।

विचार/संदेश संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न 9.
‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ का प्रमुख संदेश क्या है?
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में लेखक ने महान् शहनाईवादक बिस्मिल्ला खाँ के जीवन पर प्रकाश डाला है। जहाँ एक ओर खाँ साहब के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों व विशेषताओं को उजागर किया गया है, वहीं कला के प्रति प्रेम, सरल एवं सादगीयुक्त जीवन जीने तथा धार्मिक उदारता की प्रेरणा भी दी गई है। इस पाठ में बताया गया है कि कला कोई भी हो, जब तक हम उसमें तल्लीनता व सच्चे मन से कार्य नहीं करेंगे, तब तक हमें सफलता नहीं मिल सकती। इसी प्रकार हमें अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे धर्मों का सम्मान भी करना चाहिए। हमें सफलता प्राप्ति पर कभी अहंकार व घमंड नहीं करना चाहिए। हमें सदा ईश्वर के सम्मुख मन में समर्पण की भावना रखनी चाहिए।

प्रश्न 10.
बिस्मिल्ला खाँ की जीवन पद्धति कैसी थी तथा उससे हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ की जीवन पद्धति अत्यंत सरल एवं सहज थी। वे इतने महान् शहनाईवादक होकर भी एक साधारण व्यक्ति की भाँति जीवन व्यतीत करते थे। वे मुसलमान होते हुए भी अन्य धर्मों का आदर करते थे। दिखावा व अहंकार तो उनके पास फटकता तक न था। उनके जीवन-जीने की इस पद्धति से हमें शिक्षा मिलती है कि हमें सहज एवं स्वाभाविक जीवन जीना चाहिए। विनम्रता और अहंकार-रहित जीवन महानता का गुण है, जिसे हमें अपने जीवन में अपनाना चाहिए। हमें भी दूसरों के धर्म का सम्मान करना चाहिए और अपने काम में ही अपना ध्यान लगाना चाहिए।

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प्रश्न 11.
काशी का भारतीय संस्कृति में क्या महत्त्व है?
उत्तर-
काशी भारतवर्ष का एक धार्मिक स्थल है। यह नगर साहित्य, संगीत आदि कलाओं का केंद्र रहा है। यहाँ बड़े-बड़े साहित्यकार एवं संगीतकार हुए हैं जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से भारतीय साहित्य एवं संस्कृति को न केवल जीवित रखा, अपितु उसे विकास की ओर अग्रसर किया। उदाहरणार्थ शहनाईवादक बिस्मिल्ला खाँ की शहनाईवादन कला को लिया जा सकता है। उन्होंने अपने जीवन के अस्सी वर्षों तक शहनाईवादन कला में नए-नए सुरों का प्रयोग करके उसे बुलंदियों तक पहुँचा दिया। इसी प्रकार काशी शिक्षा का केंद्र रहा है। यहाँ देश-विदेश से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते रहे हैं। वे यहाँ की संस्कृति से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। वे अपने जीवन में यहाँ की संस्कृति और संस्कार ग्रहण कर उनके अनुसार जीवनयापन करते। अतः स्पष्ट है कि काशी का भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान है।

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अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
नौबतखाने में इबादत’ पाठ के लेखक श्री यतींद्र मिश्र हैं।

प्रश्न 2.
‘नौबतखाना’ किसे कहते हैं?
उत्तर-
प्रवेश द्वार के ऊपर मंगल ध्वनि बजाने के स्थान को नौबतखाना कहते हैं।

प्रश्न 3.
बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का क्या नाम था?
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का नाम अमीरुद्दीन था।

प्रश्न 4.
अमीरुद्दीन के परदादा का क्या नाम था?
उत्तर-
अमीरुद्दीन के परदादा का नाम सलार हुसैन खाँ था।

प्रश्न 5.
बालक अमीरुद्दीन बालाजी के मंदिर में क्यों जाता था?
उत्तर-
बालक अमीरुद्दीन बालाजी के मंदिर में शहनाई वादन का अभ्यास करने के लिए जाता था।

प्रश्न 6.
बिस्मिल्ला खाँ को खुदा की किस चीज़ पर विश्वास है?
उत्तर-
बिस्मिल्ला खाँ को खुदा की वरदान शक्ति पर विश्वास है।

प्रश्न 7.
पुराणकार का संबंध किस रचना से है?
उत्तर-
पुराणकार का संबंध भागवत से है।

प्रश्न 8.
लेखक ने काशी का नायाब हीरा किसे कहा है?
उत्तर-
लेखक ने बिस्मिल्ला खाँ को काशी का नायाब हीरा कहा है।

प्रश्न 9.
शहनाई को बजाने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
शहनाई को बजाने के लिए रीड का प्रयोग किया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ के लेखक कौन हैं?
(A) यतींद्र मिश्र
(B) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(C) मंगलेश डबराल
(D) मन्नू भंडारी
उत्तर-
(A) यतींद्र मिश्र

प्रश्न 2.
यतींद्र मिश्र जी का जन्म कब हुआ था?
(A) सन् 1967 में
(B) सन् 1970 में
(C) सन् 1977 में
(D) सन् 1987 में
उत्तर-
(C) सन् 1977 में

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प्रश्न 3.
यतींद्र मिश्र किस राज्य के रहने वाले थे?
(A) पंजाब
(B) उत्तर प्रदेश
(C) हिमाचल प्रदेश
(D) मध्य प्रदेश
उत्तर-
(B) उत्तर प्रदेश

प्रश्न 4.
यतींद्र मिश्र ने किस भाषा में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की थी?
(A) संस्कृत में
(B) पंजाबी में
(C) अंग्रेज़ी में
(D) हिंदी में
उत्तर-
(D) हिंदी में

प्रश्न 5.
‘लाखों सजदे, इसी एक सच्चे सुर की इबादत में खुदा के आगे झुकते हैं। यहाँ ‘सजदे’ का अर्थ है-
(A) भक्त
(B) सिर
(C) शिष्य
(D) लोग
उत्तर-
(B) सिर

प्रश्न 6.
‘नौबतखाने में इबादत’ किस प्रकार की साहित्यिक विधा से संबंधित है?
(A) जीवनी
(B) भाव चित्र
(C) रेखा चित्र
(D) व्यक्ति चित्र
उत्तर-
(D) व्यक्ति चित्र

प्रश्न 7.
अरब देश में बजाए जाने वाले वाद्य, जिसमें नाड़ी (नरकट या रीड) होती है, उसे क्या कहते हैं?
(A) शहनाई
(B) शृंगी
(C) नय
(D) सुषिर वाद्य
उत्तर-
(C) नय

प्रश्न 8.
पंचगंगा घाट किस शहर में है?
(A) कानपुर में
(B) इलाहाबाद में
(C) पटना में
(D) बनारस में
उत्तर-
(D) बनारस में

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प्रश्न 9.
अमीरुद्दीन का जन्म किस राज्य में हुआ था?
(A) पंजाब
(B) बिहार (डुमराँव)
(C) राजस्थान
(D) महाराष्ट्र
उत्तर-
(B) बिहार (डुमराँव)

प्रश्न 10.
अमीरुद्दीन का ननिहाल कहाँ है?
(A) रामपुर
(B) डुमरखाँ
(C) काशी
(D) बीजागढ़
उत्तर-
(C) काशी

प्रश्न 11.
बिस्मिल्ला खाँ की एक रीड कितने मिनट में अंदर से गीली हो जाया करती थी?
(A) 15 से 20 मिनट में
(B) 1 से 10 मिनट में
(C) 5 से 10 मिनट में
(D) 10 से 15 मिनट में
उत्तर-
(A) 15 से 20 मिनट में

प्रश्न 12.
बिस्मिल्ला खाँ का देहांत कितने वर्ष की आयु में हुआ था?
(A) 70 वर्ष
(B) 80 वर्ष
(C) 90 वर्ष
(D) 100 वर्ष
उत्तर-
(C) 90 वर्ष

प्रश्न 13.
खाँ साहब कितने वर्ष तक खुदा के आगे सच्चे सुर की इबादत में झुकते रहे थे?
(A) 60 वर्ष
(B) 80 वर्ष
(C) 70 वर्ष
(D) 90 वर्ष
उत्तर-
(B) 80 वर्ष

प्रश्न 14.
अमीरुद्दीन के बड़े भाई का क्या नाम था?
(A) सादिक हुसैन
(B) मुहम्मद अली
(C) शम्सुद्दीन
(D) नूर मुहम्मद
उत्तर-
(C) शम्सुद्दीन

प्रश्न 15.
शहनाई की मंगल ध्वनि के नायक कौन थे?
(A) तानसेन
(B) बैजू
(C) चित्ररथ
(D) बिस्मिल्ला खाँ
उत्तर-
(D) बिस्मिल्ला खाँ

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प्रश्न 16.
शहनाई को बजाने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है?
(A) रीड
(B) पाइप
(C) पानी
(D) बिजली
उत्तर-
(A) रीड

प्रश्न 17.
शहनाई बजाने के प्रयोग में आने वाली ‘रीड’ किससे बनाई जाती है?
(A) स्टील से
(B) नरकट से
(C) बाँस से
(D) तूंबी से
उत्तर-
(B) नरकट से

प्रश्न 18.
उस मन्दिर का नाम लिखें जिससे बिस्मिल्ला खाँ को रोज एक अठन्नी मेहनताना मिलता था-
(A) अक्षरधाम
(B) सोमनाथ
(C) विश्वनाथ
(D) बाला जी
उत्तर-
(D) बाला जी

प्रश्न 19.
संकटमोचन मंदिर काशी की किस दिशा में है?
(A) पूर्व
(B) दक्षिण
(C) पश्चिम
(D) उत्तर
उत्तर-
(B) दक्षिण

प्रश्न 20.
‘नरकट’ नामक घास डुमराँव में किस नदी के पास पाई जाती है?
(A) गंगा
(B) यमुना
(C) नर्मदा
(D) सोन
उत्तर-
(D) सोन

प्रश्न 21.
मुहर्रम के गमजदा माहौल से अलंग कभी-कभी सुकून के क्षणों में बिस्मिल्ला खाँ अपने किन दिनों को याद करते थे?
(A) बचपन
(B) बुढ़ापा
(C) यौवन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर-
(C) यौवन

प्रश्न 22.
‘फटा सुर न बख्शें! लुंगिया का क्या है, आज फटी तो कल सी जाएगी’-मालिक से यह दुआ कौन माँगता है?
(A) बिस्मिल्ला खाँ
(B) शिष्या
(C) शम्सुद्दीन
(D) डुमराँव गाँव के लोग
उत्तर-
(A) बिस्मिल्ला खाँ

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प्रश्न 23.
प्रवेश द्वार के ऊपर मंगलध्वनि बजाने का स्थान क्या कहलाता है?
(A) अटारी
(B) चौबारा
(C) नौबतखाना
(D) दरवाजा
उत्तर-
(C) नौबतखाना

नौबतखाने में इबादत गद्यांशों के आधार पर अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(1) अमीरुद्दीन अभी सिर्फ छः साल का है और बड़ा भाई शम्सुद्दीन नौ साल का। अमीरुद्दीन को पता नहीं है कि राग किस चिड़िया को कहते हैं। और ये लोग हैं मामूजान वगैरह जो बात-बात पर भीमपलासी और मुलतानी कहते रहते हैं। क्या वाज़िब मतलब हो सकता है इन शब्दों का, इस लिहाज से अभी उम्र नहीं है अमीरुद्दीन की, जान सके इन भारी शब्दों का वज़न कितना होगा। गोया, इतना ज़रूर है कि अमीरुद्दीन व शम्सुद्दीन के मामाद्वय सादिक हुसैन तथा अलीबख्श देश के जाने-माने शहनाईवादक हैं। विभिन्न रियासतों के दरबार में बजाने जाते रहते हैं। रोज़नामचे में बालाजी का मंदिर सबसे ऊपर आता है। हर दिन की शुरुआत वहीं ड्योढ़ी पर होती है। मंदिर के विग्रहों को पता नहीं कितनी समझ है, जो रोज़ बदल-बदलकर मुलतानी, कल्याण, ललित और कभी भैरव रागों को सुनते रहते हैं। ये खानदानी पेशा है अलीबख्श के घर का। उनके अब्बाजान भी यहीं ड्योढ़ी पर शहनाई बजाते रहते हैं। [पृष्ठ 116]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) अमीरुद्दीन कौन है और उसकी आयु कितनी है?
(ग) अमीरुद्दीन के बड़े भाई का क्या नाम था और उसकी उम्र क्या थी?
(घ) भीमपलासी और मुलतानी क्या हैं? अमीरुद्दीन को इनका पता क्यों नहीं था?
(ङ) अमीरुद्दीन के मामूजानों के क्या नाम थे और वे किस काम के लिए प्रसिद्ध थे?
(च) सादिक हुसैन तथा अलीबख्श प्रतिदिन प्रातः के समय कहाँ शहनाई बजाते थे?
(छ) अलीबख्श के अब्बाजान क्या काम करते थे?
(ज) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) लेखक का नाम-श्री यतींद्र मिश्र। पाठ का नाम-नौबतखाने में इबादत।

(ख) अमीरुद्दीन उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का बचपन का नाम है। वह उस समय केवल छः वर्ष के थे।

(ग) अमीरुद्दीन के बड़े भाई का नाम शम्सुद्दीन था। उस समय उसकी आयु केवल नौ वर्ष की थी।

(घ) भीमपलासी और मुलतानी संगीत के रागों के नाम हैं। उस समय अमीरुद्दीन केवल छः वर्ष का बालक था, इसलिए उसे रागों का बोध नहीं था।

(ङ) अमीरुद्दीन के मामूजानों के नाम सादिक हुसैन तथा अलीबख्श थे। वे शहनाईवादक के रूप में प्रसिद्ध थे।

(च) सादिक हुसैन तथा अलीबख्श प्रतिदिन प्रातः के समय बालाजी के मंदिर की ड्योढ़ी में शहनाई बजाते थे। वहीं से वे अपना दैनिक कार्य आरंभ करते थे।

(छ) अलीबख्श के अब्बाजान भी शहनाईवादन का कार्य करते थे। इस क्षेत्र में उन्होंने भी खूब नाम कमाया था।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 16 नौबतखाने में इबादत

(ज) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने अमीरुद्दीन के बचपन और उनके परिवार की जानकारी दी है। अमीरुद्दीन अभी छः वर्ष का है और उसका बड़ा भाई शम्सुद्दीन नौ वर्ष का है। अमीरुद्दीन अपने मामा के घर में रहता है। उसे अभी रागों का ज्ञान नहीं है। किंतु उसके मामा आदि बात-बात में विभिन्न रागों के नाम लेकर उनका वर्णन करते रहते हैं। इन शब्दों का वास्तिक अर्थ क्या है, . यह जानने के लिए अमीरुद्दीन की आयु अभी बहुत कम है। इतना अवश्य है कि उसके मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श देश के सुप्रसिद्ध शहनाई वादक हैं। वे भिन्न-भिन्न रियासतों के दरबारों में शहनाई बजाने जाते हैं। वे प्रतिदिन प्रातः बाला जी के मंदिर की ड्योढ़ी पर भी शहनाई बजाते हैं। वे हर रोज़ विभिन्न रागों में शहनाई वादन करते हैं। शहनाई वादन उनका खानदानी पेशा है। उनके अब्बाजान भी यहीं ड्योढ़ी पर शहनाई बजाते रहते थे।

(2) मसलन बिस्मिल्ला खाँ की उम्र अभी 14 साल है। वही काशी है। वही पुराना बालाजी का मंदिर जहाँ बिस्मिल्ला खाँ को नौबतखाने रियाज़ के लिए जाना पड़ता है। मगर एक रास्ता है बालाजी मंदिर तक जाने का। यह रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाता है। इस रास्ते से अमीरुद्दीन को जाना अच्छा लगता है। इस रास्ते न जाने कितने तरह के बोल-बनाव कभी ठुमरी, कभी टप्पे, कभी दादरा के मार्फत ड्योढ़ी तक पहुँचते रहते हैं। रसूलन और बतूलन जब गाती हैं तब अमीरुद्दीन को खुशी मिलती है। अपने ढेरों साक्षात्कारों में बिस्मिल्ला खाँ साहब ने स्वीकार किया है कि उन्हें अपने जीवन के आरंभिक दिनों में संगीत के प्रति आसक्ति इन्हीं गायिका बहिनों को सुनकर मिली है। एक प्रकार से उनकी अबोध उम्र में अनुभव की स्लेट पर संगीत प्रेरणा की वर्णमाला रसूलनबाई और बतूलनबाई ने उकेरी है। [पृष्ठ 117]

प्रश्न-
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) 14 वर्षीय बिस्मिल्ला खाँ को बालाजी के मंदिर में जाने के लिए कौन-सा रास्ता अच्छा लगता था?
(ग) अमीरुद्दीन को रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से जाना क्यों अच्छा लगता था?
(घ) रसूलनबाई और बतूलनबाई कौन-कौन से रागों में गाती थीं?
(ङ) अमीरुद्दीन बालाजी के मंदिर में क्यों जाते थे?
(च) अमीरुद्दीन अपने जीवन में संगीत का प्रथम प्रेरक किसे मानते हैं और क्यों?
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) लेखक का नाम-श्री यतींद्र मिश्र।
पाठ का नाम-नौबतखाने में इबादत।

(ख) 14 वर्षीय बिस्मिल्ला खाँ को बालाजी के मंदिर में जाने के लिए वह रास्ता अच्छा लगता जिसमें रसूलनबाई और बतूलनबाई का घर था।

(ग) अमीरुद्दीन (बिस्मिल्ला खाँ) को रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से जाना इसलिए अच्छा लगता था क्योंकि वह उनकी गायकी को सुनकर बहुत प्रसन्न होता था। उसे हर प्रातः वहाँ से गुज़रते हुए तरह-तरह के मधुर रागों से युक्त उनकी ध्वनि सुनाई पड़ती थी। इसी कारण वह इस रास्ते से जाता था।

(घ) रसूलनबाई तथा बतूलनबाई ठुमरी, टप्पे व दादरा आदि रागों में गाती थीं जो मधुर ध्वनियुक्त राग हैं।

(ङ) अमीरुद्दीन बालाजी के मंदिर में शहनाईवादन का रियाज़ करने जाते थे।

(च) अमीरुद्दीन अपने जीवन में संगीत का प्रथम प्रेरक रसूलनबाई व बतूलनबाई नामक दो गायिका-बहनों को मानते हैं, क्योंकि वे प्रतिदिन बालाजी के मंदिर में जाते समय उनके संगीत को सुनते थे। उनके संगीत से आकृष्ट होकर उन्होंने संगीत में रुचि लेनी आरंभ की थी।

(छ) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि अमीरुद्दीन ही बड़ा होकर बिस्मिल्ला खाँ के नाम से प्रसिद्ध होता है। वह अभी 14 वर्ष का है, उसे प्रतिदिन बालाजी के मंदिर में नौबतखाने में शहनाई वादन के अभ्यास के लिए जाना पड़ता है। आम रास्ते के अतिरिक्त एक दूसरा रास्ता भी है जो बालाजी के मंदिर को जाता है। अमीरुद्दीन उसी रास्ते से जाता है। वह रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर के आगे से होकर जाता है। ये दोनों बहनें गायिकाएँ थीं और इनके गाए गए ठुमरी, टप्पे, दादरा आदि के बोल बालक अमीरुद्दीन को बहुत अच्छे लगते थे। उसे उनका संगीत सुनकर बहुत अच्छा लगता था। बाद में बिस्मिल्ला खाँ ने स्वीकार भी किया है कि उन्हें अपने जीवन के आरंभिक दिनों में गीत-संगीत की प्रेरणा इन दोनों गायिका बहनों को सुनकर मिली है। उनके मन की स्लेट पर संगीत प्रेरणा की वर्णमाला इन दोनों बहनों ने ही लिखी है। कहने का भाव है कि महान् शहनाई वादक बिस्मिल्ला खाँ के गीत-संगीत की प्रेरणा ये दोनों बहनें ही रही हैं।

(3) शहनाई के इसी मंगलध्वनि के नायक बिस्मिल्ला खाँ साहब अस्सी बरस से सुर माँग रहे हैं। सच्चे सुर की नेमत। अस्सी बरस की पाँचों वक्त वाली नमाज़ इसी सुर को पाने की प्रार्थना में खर्च हो जाती है। लाखों सज़दे, इसी एक सच्चे सुर की इबादत में खुदा के आगे झुकते हैं। वे नमाज़ के बाद सज़दे में गिड़गिड़ाते हैं-‘मेरे मालिक एक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ। उनको यकीन है, कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा और अपनी झोली से सुर का फल निकालकर उनकी ओर उछालेगा, फिर कहेगा, ले जा अमीरुद्दीन इसको खा ले और कर ले अपनी मुराद पूरी। [पृष्ठ 117]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) बिस्मिल्ला खाँ को किसका नायक कहा गया है?
(ग) उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ अस्सी वर्ष से क्या माँग रहे हैं?
(घ) शहनाई की ध्वनि को क्या कहा जाता है?
(ङ) ‘सच्चे सुर की नेमत’ का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
(च) नमाज़ के पश्चात् उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ सज़दे में क्या कहते हैं और क्यों?
(छ) बिस्मिल्ला खाँ को खुदा की किस चीज़ पर विश्वास है?
(ज) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) लेखक का नाम-श्री यतींद्र मिश्र। पाठ का नाम-नौबतखाने में इबादत ।

(ख) बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मांगलिक ध्वनि का नायक कहा गया है, क्योंकि उन्होंने शहनाईवादन में नए-नए सुरों को ढाला है।

(ग) उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ अस्सी वर्ष से खुदा से सच्चे सुर का वरदान माँग रहे हैं, जो श्रोताओं के मन में आनंदानुभूति उत्पन्न कर दे।

(घ) शहनाई की ध्वनि को मंगल ध्वनि कहा जाता है, क्योंकि बिस्मिल्ला खाँ इस ध्वनि से अपनी दिनचर्या आरंभ करते थे। वे सबसे पहले बालाजी के मंदिर की ड्योढ़ी में इसे बजाते थे।

(ङ) इस वाक्य के द्वारा लेखक ने बताया है कि बिस्मिल्ला खाँ शहनाईवादन में सर्वश्रेष्ठ हैं। वे निरंतर शहनाई बजाते रहते हैं तथा अपने वादन से सबको मंत्र-मुग्ध कर देते हैं, फिर भी वे खुदा से विनती करते रहते हैं कि उनकी शहनाई से सच्चे सुर ही निकलें।

(च) नमाज़ के पश्चात् सज़दे में बिस्मिल्ला खाँ यही कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे सच्चा सुर प्रदान करो। मेरे सुरों में ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर दो कि भावविभोर होकर मेरी आँखों से अनायास ही अश्रुधारा बह निकले। वे ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि वे सदा अच्छी से-अच्छी शहनाई बजाना चाहते हैं।

(छ) बिस्मिल्ला खाँ को खुदा की वरदान-शक्ति पर पूरा विश्वास है। उसे यह भी विश्वास है कि उसे शहनाईवादन की जो कला मिली है, वह भी ईश्वर का ही वरदान है। आगे भी उसे सुरों की जो कला प्राप्त होगी, वह भी प्रभु की ही देन होगी।

(ज) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में शहनाई वादन के महान् कलाकार बिस्मिल्ला खाँ के विनम्र एवं उदार स्वभाव तथा शहनाई वादन की कला के प्रति उनकी समर्पण की भावना को अभिव्यक्त किया गया है। शहनाई की मंगल ध्वनि के नायक बिस्मिल्ला खाँ साहब अस्सी वर्ष से ईश्वर से सच्चे सुर के वरदान की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते आ रहे हैं। वे अपनी प्रतिदिन की पाँच बार की नमाज़ (प्रार्थना) को भी सच्चे सुर के लिए खर्च करते हैं। वे लाखों बार प्रभु के सामने इसी सुर के लिए माथा टेक चुके हैं। वे हर बार यही माँगते हैं कि सुर में ऐसी विशेषता उत्पन्न कर दे कि भावविभोर होकर उसकी आँखों से अनायास ही अश्रु-धारा बह निकलें। उन्हें पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर उन पर एक-न-एक दिन अवश्य ही मेहरबान होकर सुर रूपी फल दे देंगे। कहने का तात्पर्य है कि बिस्मिल्ला खाँ अस्सी वर्ष तक शहनाई वादन के क्षेत्र में नए-नए सुरों का अभ्यास करते रहे और परमात्मा से अच्छे से अच्छे सुर की प्रार्थना भी करते रहे।

(4) इसी बालसुलभ हँसी में कई यादें बंद हैं। वे जब उनका ज़िक्र करते हैं तब फिर उसी नैसर्गिक आनंद में आँखें चमक उठती हैं। अमीरुद्दीन तब सिर्फ चार साल का रहा होगा। छुपकर नाना को शहनाई बजाते हुए सुनता था, रियाज़ के बाद जब अपनी जगह से उठकर चले जाएँ तब जाकर ढेरों छोटी-बड़ी शहनाइयों की भीड़ से अपने नाना वाली शहनाई ढूँढता और एक-एक शहनाई को फेंक कर खारिज़ करता जाता, सोचता-‘लगता है मीठी वाली शहनाई दादा कहीं और रखते हैं।’ जब मामू अलीबख्श खाँ (जो उस्ताद भी थे) शहनाई बजाते हुए सम पर आएँ, तब धड़ से एक पत्थर ज़मीन पर मारता था। सम पर आने की तमीज़ उन्हें बचपन में ही आ गई थी, मगर बच्चे को यह नहीं मालूम था कि दाद वाह करके दी जाती है, सिर हिलाकर दी जाती है, पत्थर पटक कर नहीं। [पृष्ठ 119]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) इस गद्यांश में अमीरुद्दीन की किस अवस्था का वर्णन किया गया है?
(ग) चार वर्षीय बालक अमीरुद्दीन शहनाइयों में से किसकी शहनाई खोजता था और क्यों?
(घ) अमीरुद्दीन के नाना के विषय में कैसे विचार थे?
(ङ) अमीरुद्दीन के उस्ताद का क्या नाम था?
(च) अमीरुद्दीन दाद कैसे देता था?
(छ) शहनाईवादन में दाद देने का सही ढंग क्या है?
(ज) सम पर आने से क्या अभिप्राय है?
(झ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) लेखक का नाम-श्री यतींद्र मिश्र। पाठ का नाम-नौबतखाने में इबादत।

(ख) इस गद्यांश में अमीरुद्दीन की बाल्यावस्था का वर्णन किया गया है जिसमें उनकी बालसुलभ क्रियाएँ अत्यंत आकर्षक हैं।

(ग) चार वर्षीय अमीरुद्दीन नाना के चले जाने के बाद नौबतखाने में रखी हुई शहनाइयों में से अपने नाना की शहनाई को खोजता था। उसके नाना बहुत मीठी शहनाई बजाते थे। इसलिए वह उन्हीं की शहनाई को खोजता था।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 16 नौबतखाने में इबादत

(घ) अमीरुद्दीन का अपने नाना के प्रति अत्यंत स्नेह था। वह उन्हें अपना आदर्श मानता था। वह उन्हीं की शहनाई खोजकर बजाना चाहता था। किंतु शहनाई न मिलने पर सोचता था कि नाना ने अपनी शहनाई कहीं छुपाकर रख दी है।

(ङ) अमीरुद्दीन के उस्ताद का नाम अलीबख्श खाँ था जो उसके मामा भी थे।

(च) अमीरुद्दीन शहनाई के सम पर पत्थर को ज़मीन पर पटककर दाद देता था।

(छ) शहनाईवादन में सही दाद सिर हिलाकर दी जाती है अथवा ‘वाह’ शब्द बोलकर भी दाद दी जाती है।

(ज) शहनाईवादन क्रिया में जब लय समाप्त होती है और ताल आरंभ होती है, तो उसे सम की स्थिति कहा जाता है।

(झ) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने शहनाई वादन के क्षेत्र के शहंशाह बिस्मिल्ला खाँ (अमीरुद्दीन) के बचपन की कुछ यादों का भावपूर्ण वर्णन किया है। जब बिस्मिल्ला खाँ अपने बचपन की यादों का वर्णन करते हैं तो एक सात्विक आनंद से उनकी आँखें चमक उठती हैं। वे बताते हैं कि जब वे चार वर्ष के थे तो छुपकर नाना जी को शहनाई बजाते हुए देखते थे। अभ्यास के पश्चात् जब वे उठकर चले जाते थे तो वहाँ रखी बहुत-सी शहनाइयों में से वह शहनाई ढूँढ़ते थे जिससे उनके नाना जी अभ्यास करते थे। उसके लिए वे एक-एक शहनाई को उठाकर खारिज कर देते थे और सोचते थे कि नाना जी ने मीठी वाली शहनाई कहीं और रख दी है। एक घटना को याद करते हुए वे कहते हैं कि जब उनके मामा अलीबख्श खाँ शहनाई बजाते समय सम पर आते तो वे एक पत्थर ज़मीन पर मारते थे। उनकी इस हरकत को देखकर उनके मामा ने कहा था कि दाद वाह करके या सिर हिलाकर दी जाती है, न कि ज़मीन पर पत्थर मार कर। निश्चय ही बालक अमीरुद्दीन की ये दोनों यादें बहुत ही मीठी यादें हैं।

(5) काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है। यह आयोजन पिछले कई बरसों से संकटमोचन मंदिर में होता आया है। यह मंदिर शहर के दक्षिण में लंका पर स्थित है व हनुमान जयंती के अवसर पर यहाँ पाँच दिनों तक शास्त्रीय एवं उपशास्त्रीय गायन-वादन की उत्कृष्ट सभा होती है। इसमें बिस्मिल्ला खाँ अवश्य रहते हैं। अपने मजहब के प्रति अत्यधिक समर्पित उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की श्रद्धा काशी विश्वनाथ जी के प्रति भी अपार है। वे जब भी काशी से बाहर रहते हैं तब विश्वनाथ व बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते हैं, थोड़ी देर ही सही, मगर उसी ओर शहनाई का प्याला घुमा दिया जाता है और भीतर की आस्था रीड के माध्यम से बजती है। [पृष्ठ 119]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) काशी में कौन-सी प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा रही है?
(ग) हनुमान जयंती के अवसर पर आयोजित संगीत सभा का परिचय दीजिए।
(घ) बिस्मिल्ला खाँ की काशी विश्वनाथ के प्रति कैसी भावनाएँ थीं?
(ङ) काशी के संकटमोचन मंदिर के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
(च) इस गद्यांश का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) लेखक का नाम श्री यतींद्र मिश्र। . पाठ का नाम-नौबतखाने में इबादत।

(ख) काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा रही है। इस परंपरा के कारण काशी का नाम सर्वत्र आदर से लिया जाता है। ।

(ग) हनुमान जयंती के अवसर पर काशी के सुप्रसिद्ध संकटमोचन मंदिर में पाँच दिनों तक शास्त्रीय व उपशास्त्रीय संगीत की श्रेष्ठ । सभा का आयोजन किया जाता है। इस सभा में उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का शहनाईवादन अवश्य होता है।

(घ) बिस्मिल्ला खाँ संगीत के साथ-साथ धार्मिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति थे। वे अपने धर्म के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। वे पाँचों वक्त नमाज़ पढ़ते थे। इसके साथ वे बालाजी के मंदिर में शहनाईवादन भी करते थे। वे काशी के विश्वनाथ मंदिर में भी शहनाई बजाते थे। उनकी काशी विश्वनाथ जी के प्रति अपार श्रद्धा थी। वे सदा ही उन्हें स्मरण करते थे।

(ङ) काशी में नगर के दक्षिण में लंका पर संकटमोचन मंदिर विद्यमान है। यहाँ प्रतिवर्ष धार्मिक एवं संगीत के विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। हनुमान जयंती के अवसर पर तो संगीत के विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर लोग उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की मधुर शहनाई का आनंद भी उठाते हैं।

(च) इस गद्यांश के माध्यम से लेखक ने काशी नगर की सांस्कृतिक भूमि को उजागर किया है। काशी जी में संगीत सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है। ऐसे अवसरों पर बिस्मिल्ला खाँ जैसे महान् संगीतकार भाग लेते थे। इसलिए काशी नगरी के सांस्कृतिक जीवन को उद्घाटित करना प्रस्तुत गद्यांश का मूल भाव है।

(छ) आशय/व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने काशी नगरी की शास्त्रीय एवं उपशास्त्रीय गायन वादन की श्रेष्ठ परंपरा और बिस्मिल्ला खाँ की बालाजी के प्रति अटूट श्रद्धा का वर्णन किया है। काशी में संगीत आयोजन की प्राचीन परंपरा रही है। इसी परंपरा के कारण काशी का आदर भी किया जाता है। बालाजी के मंदिर में हनुमान जयंती के शुभ अवसर पर शास्त्रीय संगीत का समायोजन किया जाता है। इस सभा में बिस्मिल्ला खाँ का शहनाई वादन अवश्य होता है। यद्यपि बिस्मिल्ला खाँ में अपने धर्म के प्रति अत्यधिक समर्पण की भावना है फिर भी उनकी अपार श्रद्धा काशी विश्वनाथ के प्रति भी है। वे जब भी काशी से बाहर रहते हैं तब भी वे विश्वनाथ व बालाजी के मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके शहनाई वादन अवश्य करते हैं। उनकी यह हार्दिक आस्था ही उनकी शहनाई के रूप में प्रकट होती है। कहने का भाव है कि बिस्मिल्ला खाँ का धार्मिक दृष्टिकोण अत्यंत उदार है और शहनाई वादन कला के प्रति भी पूर्णतः समर्पित है।

(6) काशी आज भी संगीत के स्वर पर जगती और उसी की थापों पर सोती है। काशी में मरण भी मंगल माना गया है। काशी .. आनंदकानन है। सबसे बड़ी बात है कि काशी के पास उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ जैसा लय और सुर की तमीज़ सिखाने वाला नायाब हीरा रहा है जो हमेशा से दो कौमों को एक होने व आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा। [पृष्ठ 121]

प्रश्न
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) आज की काशी की स्थिति कैसी है?
(ग) काशी में मरना मंगलमय क्यों माना जाता है?
(घ) नायाब हीरा किसे और क्यों कहा गया है?
(ङ) उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ ने किन दो कौमों को कैसी प्रेरणा दी है?
(च) लेखक ने काशी को आनंदकानन क्यों कहा है?
(छ) उपर्युक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) लेखक का नाम श्री यतींद्र मिश्र। पाठ का नाम-नौबतखाने में इबादत।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 16 नौबतखाने में इबादत

(ख) आज काशी की स्थिति अत्यंत अच्छी है। यहाँ संगीत कला का आदर किया जाता है। काशी आज भी संगीत के स्वरों से जागती है और संगीत की थपकी से ही सोती है। कहने का भाव है कि काशी में प्रातः बिस्मिल्ला खाँ जैसे महान् संगीतज्ञ द्वारा शहनाईवादन किया जाता है।

(ग) काशी में मरना इसलिए मंगलमय माना जाता है, क्योंकि यह शिव की नगरी है। यहाँ मरने से मनुष्य को शिव लोक प्राप्त होता है। वह सांसारिक आवागमन से मुक्त हो जाता है।

(घ) नायाब हीरा उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ को कहा गया है, क्योंकि सुर एवं लय से वह काशी में आनंद की धारा प्रवाहित करता है। उसने सदा सबको मिल-जुलकर रहने की प्रेरणा दी है।

(ङ) उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ ने हिंदुओं एवं मुसलमानों को मिल-जुलकर रहने की प्रेरणा दी है। उनके अनुसार अपनी मेल-जोल की भावना से समाज में एकता एवं प्रेमभाव का विकास होता है।

(च) लेखक ने काशी को आनंदकानन इसलिए कहा है क्योंकि यहाँ विश्वनाथ विराजमान हैं। उनकी कृपा से यहाँ सर्वत्र मंगल वर्षा होती रहती है। उनकी दया से ही जीवात्माएँ मोक्ष को प्राप्त होती हैं। काशी जी में सदा संगीत सभाओं का आयोजन किया जाता है। इसलिए वहाँ संगीतमय वातावरण बना रहता है। अतः काशी को आनंदकानन कहना उचित है।

(छ) आशय/व्याख्या प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने काशी नगरी के संगीत-प्रेम का उल्लेख किया है। साथ ही उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के चरित्र के उदात्त गुणों का उल्लेख किया है। लेखक का मत है कि काशी में सुबह-शाम संगीत के स्वर थिरकते हैं। काशी जी में मरण भी शुभ माना जाता है। काशी नगरी आनंद देने वाला उपवन है। इससे भी अच्छी बात यह है कि काशी के पास बिस्मिल्ला खाँ जैसा सुर और लय का ज्ञान देने वाला अनोखा हीरा है। वह सदा ही दो जातियों (हिंदू और मुसलमान) के लोगों को आपस के मतभेद को भूलकर भाईचारे के साथ अर्थात् मिलजुल कर रहने की प्रेरणा देता रहा है।

नौबतखाने में इबादत Summary in Hindi

नौबतखाने में इबादत लेखक-परिचय

प्रश्न-
श्री यतींद्र मिश्र का जीवन-परिचय एवं उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय श्री यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में राम-जन्मभूमि अयोध्या में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी विषय में एम.ए. की परीक्षा पास की। वे आजकल स्वतंत्र लेखन के साथ अर्द्धवार्षिक ‘सहित’ पत्रिका का संपादन कर रहे हैं। सन् 1999 से अब तक वे ‘विमला देवी फाउंडेशन’ नामक एक सांस्कृतिक न्यास का संचालन कर रहे हैं। इस न्यास का संबंध साहित्य और कलाओं के संवर्द्धन से है।

2. प्रमुख रचनाएँ-(क) काव्य-संग्रह ‘यदा-कदा’, ‘अयोध्या तथा अन्य कविताएँ’, ‘ड्योढ़ी पर आलाप’।
(ख) अन्य रचनाएँ–’गिरिजा’ (शास्त्रीय संगीत गायिका गिरिजा देवी की जीवनी), ‘कवि द्विजदेव की ग्रंथावली का सह-संपादन’, ‘थाती’ (स्पिक मैके के लिए विरासत-2001 के कार्यक्रम के लिए रूपंकर कलाओं पर केंद्रित)।

3. सम्मान-उन्हें ‘भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान’, ‘हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार’, ‘ऋतुराज सम्मान’ आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

4. भाषा-शैली-श्री यतींद्र मिश्र की भाषा-शैली सरल, सहज एवं व्यावहारिक है। ‘नौबतखाने में इबादत’ नामक पाठ में सुप्रसिद्ध शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन के विभिन्न पक्षों का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह एक सफल व्यक्ति-चित्र है। इसमें शास्त्रीय संगीत परंपरा के विभिन्न पहलुओं को सफलतापूर्वक उजागर किया गया है। इस पाठ की भाषा में लेखक ने संगीत से संबंधित प्रचलित शब्दों का सार्थक प्रयोग किया है, यथा-सम, सर, ताल, ठुमरी, टप्पा, दादरी, रीड, कल्याण, मुलतानी, भीमपलासी आदि। उर्दू-फारसी के शब्दों का भी भरपूर प्रयोग किया गया है, यथा दरबार, पेशा, साहबजादे, खानदानी मुराद, गमजदा, बदस्तूर आदि। कहीं संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग भी किया गया है। वाक्य रचना सुगठित एवं व्याकरण सम्मत है। कहीं-कहीं संवादों का भी सफल प्रयोग किया गया है, जिससे विषय में रोचकता का समावेश हुआ है। भावात्मक, वर्णनात्मक एवं चित्रात्मक शैलियों का सफल प्रयोग किया गया है।

नौबतखाने में इबादत पाठ का सार

प्रश्न-
‘नौबतखाने में इबादत’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में लेखक ने सुप्रसिद्ध शहनाईवादक बिस्मिल्ला खाँ के जीवन एवं उनकी शहनाईवादन कला के विभिन्न पक्षों का सजीव उल्लेख किया है। सन् 1916 से 1922 के आस-पास का समय था, जब छः वर्ष का अमीरुद्दीन अपने बड़े भाई शम्सुद्दीन के साथ काशी में अपने मामूजान सादिक हुसैन और अलीबख्श के पास रहने के लिए आया था। इनके दोनों मामा सुप्रसिद्ध शहनाईवादक थे। वे दिन की शुरुआत पंचगंगा घाट स्थित बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर शहनाई बजाकर किया करते थे। उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का बचपन का नाम अमीरुद्दीन था। इनका जन्म बिहार के डुमराँव नामक गाँव में हुआ। वैसे तो डुमराँव और शहनाई में कोई संबंध नहीं है लेकिन डुमराँव गाँव में सोन नदी के किनारे पाई जाने वाली नरकट नामक घास से शहनाई की रीड बनाई जाती है, जिससे शहनाई बजती है। इनके पिता का नाम उस्ताद पैगंबर बख्श खाँ और माता का नाम मिट्ठन था।

अमीरुद्दीन चौदह वर्ष की आयु में बालाजी के मंदिर में जाते समय रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर के रास्ते से होकर जाते थे। इन दोनों बहनों द्वारा गाए हुए टप्पे, दादरा, ठुमरी आदि के बोल उन्हें बहुत अच्छे लगते थे। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि उन्हें अपने जीवन के आरंभिक दिनों में इन्हीं गायिका बहनों से संगीत की प्रेरणा मिली है।

वैदिक इतिहास में शहनाई का कोई वर्णन प्राप्त नहीं होता। अरब देशों में फूंककर बजाए जाने वाले वाद्यों को ‘नय’ कहते हैं। शहनाई को ‘शाहेनय’ कहकर ‘सुषिर वाद्यों में शाह’ माना जाता है। सोलहवीं शती के अंत में तानसेन द्वारा रचित राग कल्पद्रुम की बंदिश में शहनाई, मुरली, वंशी शृंगी और मुरछंग का वर्णन मिलता है। अवधी के लोकगीतों में शहनाई का भी वर्णन देखा जा सकता है। मंगल कार्य के समय ही शहनाई का वादन किया जाता है। दक्षिण भारत में शहनाई प्रभाती की मंगलध्वनि मानी जाती है।

उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ अस्सी वर्ष की आयु में भी परमात्मा से सदा ‘सुर में तासीर’ पैदा करने की दुआ माँगते थे। वे ऐसा अनुभव करते थे कि वे अभी तक सुरों का सही प्रयोग करना नहीं सीख पाए हैं। वे अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के थे। मुहर्रम के दिनों की आठवीं तारीख को खड़े होकर शहनाईवादन किया करते थे और उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार वालों के बलिदान की याद में भीग जाती थीं।

लेखक ने बिस्मिल्ला खाँ के यौवन के दिनों के विषय में बताया है कि उन्हें कुलसुम हलवाइन की दुकान की कचौड़ियाँ खाने व गीताबाली और सुलोचना की फ़िल्में देखने का जुनून सवार रहता था। वे बचपन में माम, मौसी और नाना से पैसे लेकर घंटों लाइन में खड़े होकर टिकट हासिल कर फिल्म देखने जाते थे। जब बालाजी के मंदिर पर शहनाई बजाने के बदले उन्हें अठन्नी मिलती थी तो वे कचौड़ी खाने और फिल्म देखने अवश्य जाते थे। . लेखक ने पुनः लिखा है कि कई वर्षों से काशी में संगीत का आयोजन संकटमोचन मंदिर में होता है। हनुमान जयंती पर तो पाँच दिनों तक शास्त्रीय व उपशास्त्रीय संगीत का सम्मेलन होता है। इस अवसर पर उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ विशेष रूप में उपस्थित रहते थे। उन्हें काशी के विश्वनाथ के प्रति भी अपार श्रद्धा थी। वे जब भी काशी से बाहर होते तो विश्वनाथ एवं बालाजी के मंदिर की ओर मुख करके अवश्य ही शहनाईवादन करते। उन्हें काशी और गंगा से बहुत लगाव था। उन्हें काशी और शहनाई से बढ़कर कहीं स्वर्ग दिखाई नहीं देता था। काशी की अपनी एक संस्कृति है।

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उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का पर्याय शहनाई है। इनकी फंक से शहनाई में जादुई ध्वनि उत्पन्न होती थी। एक बार उनकी एक शिष्या ने उन्हें कहा कि आपको भारतरत्न मिल चुका है, आप फटी हुई तहमद न पहना करें। इस पर उन्होंने कहा कि भारतरत्न शहनाई पर मिला है, न कि तहमद पर। हम तो मालिक से यही दुआ करते हैं कि फटा हुआ सुर न दे, तहमद भले फटा रहे। उन्हें इस बात की कमी खलती थी कि पक्का महाल क्षेत्र से मलाई बरफ बेचने वाले चले गए। देसी घी की कचौड़ी-जलेबी भी पहले जैसी नहीं बनती। संगीत, साहित्य और अदब की प्राचीन परंपराएँ भी लुप्त होती जा रही हैं।

काशी में आज भी संगीत की गुंजार सुनाई पड़ती है। यहाँ मरना भी मंगलमय माना जाता है। यहाँ बिस्मिल्ला खाँ और विश्वनाथ एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। यहाँ की गंगा-जमुनी संस्कृति का विशेष महत्त्व है। भारतरत्न और अनेकानेक पुरस्कारों से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ सदा संगीत के अजेय नायक बने रहेंगे। नब्बे वर्ष की आयु में 21 अगस्त, 2006 को यह संगीत की दुनिया का महान् साधक संगीत प्रेमियों की दुनिया से विदा हो गया।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-116) ड्योढ़ी = दहलीज़। नौबतखाना = प्रवेशद्वार के ऊपर मंगलध्वनि बजाने का स्थान। इबादत = पूजा। घाट = नदी का किनारा। मंगलध्वनि = आनंददायक आवाज़ । मामूजान = प्रिय मामाजी। भीमपलासी, मुलतानी = संगीत के रागों के नाम। वाजिब = ठीक। लिहाज = शर्म। गोया = फिर भी। वादक = बजाने वाला। रियासत = शासन-क्षेत्र। रोज़नामचा = दैनिक जमा-खर्च का खाता। पेशा = व्यवसाय । खानदान = परिवार । ननिहाल = नाना का घर। उपयोगी = काम में आने वाला। साहबजादा = पुत्र।

(पृष्ठ-117) रियाज़ = अभ्यास। बोल-बनाव = गीत के सुरों की रचना। ठुमरी = एक चलता गीत। टप्पा = गाने की एक शैली। दादरा = गायन-शैली। साक्षात्कार = भेंट। आसक्ति = लगाव, मोह। अनुभव = तजुरबा। अबोध = अनजान। वर्णमाला = आरंभिक ज्ञान। सुषिर-वाद्य = खोखले यंत्र, जिन्हें फूंककर बजाया जाता है। नाड़ी = तने का खोखला डंठल। शास्त्रांतर्गत = शास्त्र के अंदर। उत्तरार्द्ध = अंतिम भाग। बंदिश = सुरों की रचना। श्रृंगी = सींग से बना वाद्ययंत्र। मुरछंग = वाद्ययंत्र का नाम। चैती = गीत की शैली। परिवेश = वातावरण। मांगलिक विधि-विधान = कल्याणकारी आयोजन। प्रभाती = प्रातःकाल में की जाने वाली आनंदमय ध्वनि। नेमत = वरदान। सज़दा = माथा टेकना। मुराद = इच्छा। ऊहापोह = उलझन। दुश्चिता = बुरी चिंता। तिलिस्म गढ़ना = नई योजना बनाना। महक = सुगंध।

(पृष्ठ-118) गमक = खुशबू, सुगंध। तमीज़ = तरीका, ढंग। सलीका = ढंग। वंशज = परिवार के सदस्य। अज़ादारी = शोक मनाना। शिरकत करना = सम्मिलित होना। नौहा बजाना = करबला के शहीदों पर लिखे हुए शोक-गीत की धुन में वाद्य बजाना। अदायगी = प्रस्तुति। निषेध = रोक। शहादत = कुर्बानी, बलिदान। नम = गीली। पुनर्जीवित = फिर से जीवित होना। संपन्न = पूरा होना। मानवीय रूप = मानवीय भावनाओं से युक्त रूप। गमजदा = दुख से भरपूर। माहौल = वातावरण। सुकून = चैन। जुनून = नशा, सनक। अब्बाजान = पिता जी। उस्ताद = गुरु। बदस्तूर = तरीके से। कायम = बनी हुई।

(पृष्ठ-119) बालसुलभ = बच्चों जैसी। नैसर्गिक = प्राकृतिक, स्वाभाविक। आँखें चमकना = आँखों में आनंद प्रकट होना। खारिज़ करना = छोड़ना। सम = लय की समाप्ति और ताल के आरंभ के बीच की स्थिति। दाद = प्रशंसा करना। बुखार = नशा। मेहनताना = मेहनत से पाया हुआ पैसा। कलकलाता = पूरी तरह गरम। आरोह-अवरोह = उतार-चढ़ाव । स्वादी = स्वाद लेने वाले, आनंद लेने वाले। शक = संदेह। हाथ लगना = प्राप्त होना। अद्भुत परंपरा = अनोखा रिवाज़ । शास्त्रीय = शास्त्र की परंपरा के अनुसार। गायन-वादन = गाना और बजाना। उत्कृष्ट = श्रेष्ठ। मजहब = धर्म। समर्पित = लगे हुए, अर्पित। श्रद्धा = आदर। आस्था = विश्वास।

(पृष्ठ-120) पुश्त = पीढ़ी। शहनाईवाज़ = शहनाई बजाने वाले। अदब = लोक-व्यवहार का उचित ढंग। जन्नत = स्वर्ग। आनंदकानन = आनंदमय वन। रसिक = आनंद लेने वाला। उपकृत = जिस पर उपकार किया गया हो। तहज़ीब = तौर-तरीका। गम = दुख। सेहरा बन्ना = दूल्हे की सेहराबंदी पर गाए जाने वाले गीत। सिर पर चढ़कर बोलना = जादू का-सा प्रभाव रखना। परवरदिगार = परमात्मा। नसीहत = शिक्षा। सुबहान अल्लाह = बहुत अच्छा। अलहमदुलिल्लाह = तमाम तारीफ़ ईश्वर के लिए। करतब = जादू, कला। अजान = बाँग, नमाज के समय की सूचना ऊँचे स्वर में देना। कतार = पंक्ति। सरताज होना = सबसे ऊँचा होना। दुआ लगना = शुभकामना का असर होना। लुंगिया = लुंगी। खाक = बेकार, व्यर्थ।

(पृष्ठ-121) शिद्दत = तीव्रता, प्रबलता। संगती = संगतकार, गायक के साथ वाद्य-यंत्र बजाने वाले कलाकार। अफसोस = दुख। लुप्त होना = छुप जाना। सुर साधक = सुर की साधना करने वाला। सामाजिक = समाज का उदार हृदय मनुष्य। पूरक = पूरा करने वाला। ताजिया = मुहर्रम के अवसर पर चमकीली पन्नियों से बना शव के आकार का ताबूत। अबीर = चमकीला पाउडर। गंगा-जमुनी संस्कृति = मिली-जुली संस्कृति। थाप = ताल। तमीज = सलीका, तरीका। नायाब हीरा = अनमोल रत्न। कौम = जाति। मानद उपाधि = मान के रूप में दी जाने वाली उपाधि। अजेय = जिसे जीता न जा सके। नायक = अगुआ। एकाधिकार = पूरी तरह अधिकार रखना। जिजीविषा = जीने की इच्छा।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 1 माता का अँचल

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 1 माता का अँचल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 1 माता का अँचल

HBSE 10th Class Hindi माता का अँचल Textbook Questions and Answers

Class 10 Kritika Chapter 1 Question Answer HBSE  प्रश्न 1.
प्रस्तुत पाठ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बच्चे का अपने पिता से अधिक जुड़ाव था, फिर भी विपदा के समय वह पिता के पास न जाकर माँ की शरण लेता है। आपकी समझ से इसकी क्या वजह हो सकती है?
उत्तर-
निश्चय ही पाठ में दिखाया गया है कि बच्चे (लेखक) को अपने पिता से अधिक लगाव था। उसके पिता ने उसके लालन-पालन में ही सहयोग नहीं दिया, अपितु वे उसके अच्छे दोस्त भी थे। उसके खेल में साथ रहते थे। विपदा के समय बच्चे को लाड़-प्यार की अपेक्षा ममता एवं सुरक्षा की भावना की आवश्यकता होती है, वह उसे माँ की गोद में मिल सकती है। बच्चा माँ की गोद में अपने-आपको जितना सुरक्षित महसूस करता है उतना पिता के लाड़-प्यार की छाया में नहीं। इसी कारण संकट में बच्चे को माँ की याद आती है, पिता की नहीं। माँ की ममता बच्चे के घाव भरने में मरहम का काम करती है।

Class 10 Kritika Chapter 1 Solution HBSE प्रश्न 2.
आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना क्यों भूल जाता है?
उत्तर–
बच्चा सदैव अपने साथियों में खेलना व रहना पसंद करता है। भोलानाथ भी एक साधारण बालक था। उसे अपने साथियों के साथ खेलने में गहरा आनंद मिलता था। वह अपने साथियों को शोर मचाते, शरारतें करते और खेलते हुए देखकर सब कुछ भूल जाता है। इसी मग्नावस्था में वह सिसकना भी भूल जाता था।

Class 10th Kritika Chapter 1 Question Answer HBSE प्रश्न 3.
आपने देखा होगा कि भोलानाथ और उसके साथी जब-तब खेलते-खाते समय किसी न किसी प्रकार की तुकबंदी करते हैं। आपको यदि अपने खेलों आदि से जुड़ी तुकबंदी याद हो तो लिखिए।
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

Kritika Chapter 1 Class 10 HBSE प्रश्न 4.
भोलानाथ और उसके साथियों के खेल और खेलने की सामग्री आपके खेल और खेलने की सामग्री से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर-
आज के युग में और भोलानाथ के युग में बहुत अंतर आ गया है। आज माता-पिता बच्चों को भोलानाथ और उसके साथियों की भाँति ऐसे-वैसे गली-मोहल्ले में घूमने की इजाजत नहीं देते। वे बच्चों का बहुत ध्यान रखते हैं। आज के बच्चे घर बनाना, विवाह रचना, चिड़ियाँ पकड़ना, दुकान बनाना, खेती करना आदि खेल नहीं खेलते। आज के बच्चे क्रिकेट, साइकिल चलाना, दौड़ना, कार्टून बनाना, तैरना, लूडो, आदि खेल खेलते हैं। भोलानाथ के समय के बच्चों के खेलों की सामग्री और साधन भी अलग थे; जैसेचबूतरा, सरकंडे, टूटी चूहेदानी, गीली मिट्टी, टूटे हुए घड़े के टुकड़े, पुराने व टूटे हुए कनस्तर आदि। आजकल के बच्चों के खेलों की सामग्री व साधन हैं टी.वी., कंप्यूटर, साइकिल, बैट-बॉल, फुटबॉल आदि।

Hindi Class 10 Kritika Chapter 1 Question Answers HBSE प्रश्न 5.
पाठ में आए ऐसे प्रसंगों का वर्णन कीजिए जो आपके दिल को छू गए हों?
उत्तर-
पाठ में आए कुछ ऐसे प्रसंग हैं जो पाठक के हृदय को छू जाते हैं-
(1) देखिए, मैं खिलाती हूँ। मरदुए क्या जाने कि बच्चों को कैसे खिलाना चाहिए, और महतारी के हाथ से खाने पर बच्चों का पेट भी भरता है। यह कह वह थाली में दही-भात सानती और अलग-अलग तोता, मैना, कबूतर हंस, मोर आदि के बनावटी नाम से कौर बनाकर यह कहते हुए खिलाती जाती कि जल्दी खा लो, नहीं तो उड़ जाएँगे; पर हम उन्हें इतनी जल्दी उड़ा जाते थे कि उड़ने का मौका ही नहीं मिलता।

(2) एक टीले पर जाकर हम लोग चूहों के बिल में पानी उलीचने लगे। नीचे से ऊपर पानी फेंकना था। हम सब थक गए। तब तक गणेश जी के चूहे की रक्षा के लिए शिव जी का साँप निकल आया। रोते-चिल्लाते हम लोग बेतहाशा भाग चले!

(3) इसी समय बाबू जी दौड़े आए। आकर झट हमें मइयाँ की गोद से अपनी गोद में लेने लगे। पर हमने मइयाँ के आँचल की प्रेम और शांति के चँदोवे की-छाया न छोड़ी………।

Class 10 Kritika Chapter 1 HBSE प्रश्न 6.
इस उपन्यास के अंश में तीस के दशक की ग्राम्य संस्कृति का चित्रण है। आज की ग्रामीण संस्कृति में आपको किस तरह के परिवर्तन दिखाई देते हैं? ।
उत्तर-
तीस के दशक की ग्राम्य संस्कृति और आज की ग्राम्य संस्कृति में पर्याप्त अंतर दिखाई देता है। आज कुओं से पानी भरना व कुओं से खेतों की सिंचाई का प्रचलन समाप्त हो गया है। गाँवों में पीने के लिए पानी की वाटर सप्लाई हो गई है और खेतों में ट्यूबवैल लग गए हैं। खेतों में बैलों की अपेक्षा ट्रैक्टर से काम लिया जाता है। संपूर्ण ग्राम अंचल के विवाह संबंधी रीति-रिवाज़ बदल गए हैं। भौतिकवाद और उपभोक्तावाद का प्रभाव ग्राम्य संस्कृति में भी दिखाई देने लगा है। आपसी भाईचारा व मेल-मिलाप भी कम होने लगा है। आज मनोरंजन के साधन बदल चुके हैं। चौपालों में हुक्के गुड़गुड़ाने की अपेक्षा हमारे बुजुर्ग भी टी.वी. के आगे बैठकर क्रिकेट के मैच का आनंद लेते हुए देखे जा सकते हैं। ग्रामीण अंचल की मौज-मस्ती भरे जीवन के स्थान पर व्यस्त एवं तेज़ रफ़्तार वाला जीवन देखा जाता है।

Kritika Chapter 1st Question Answer HBSE 10th Class प्रश्न 7.
पाठ पढ़ते-पढ़ते आपको भी अपने माता-पिता का लाड़-प्यार याद आ रहा होगा। अपनी इन भावनाओं को डायरी में अंकित कीजिए।
उत्तर-
बचपन में पिता के स्थान पर माता ही हमें जगाया करती थी तथा शीघ्रता से नहाकर खाना खाने के लिए कहती, यदि इस काम में थोड़ी सी देरी हो जाती तो डाँट पड़नी निश्चित थी। पिता जी ने पैरों पर बिठाकर कई बार झूले दिए थे। जब सबसे ऊँचा झूला मिलता था तो हमारी खुशी का ठिकाना न रहता। कभी पिता जी अपने साथ खेत में भी ले जाया करते थे। वहाँ तरह-तरह की फसलों को देखकर हम बहुत खुश होते थे। खेतों में चरते हुए पशु भी मुझे बहुत अच्छे लगते थे। खेत में चल रहे ट्यूबवैल के चबचों में नहाने का तो आनंद ही और था। स्कूल में जाते समय माता-पिता से पैसे लेना हम कभी नहीं भूलते थे। उन पैसों को दोस्तों के साथ मिलकर खर्च करने का आनंद भी कम नहीं था। देर तक घर से बाहर रहने पर कई बार फटकार भी सुननी पड़ती थी।

Class 10 Hindi Kritika Chapter 1 HBSE प्रश्न 8.
यहाँ माता-पिता का बच्चे के प्रति जो वात्सल्य व्यक्त हुआ है उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में आदि से अंत तक माता-पिता का बच्चों के प्रति वात्सल्य भाव का ही उद्घाटन हुआ है। यह व्यक्त करना ही पाठ का प्रमुख लक्ष्य है। लेखक का उसके पिता के पास सोना प्रातः समय पर उठकर उनके साथ नहाना-धोना और पिता के द्वारा भोजन कराया जाना, कम भोजन खाने पर चिंता व्यक्त करना। पिता जी द्वारा कंधे पर बैठाकर गंगा के किनारे ले जाना। उसके साथ कुश्ती करना। बच्चों को खुश रखने के लिए खेल में हार जाना। साँप को देखने से डर जाने पर माँ द्वारा आँचल में छुपा लेना आदि में वात्सल्य भाव का ही चित्रण हुआ है।

Class 10th Kritika Chapter 1st HBSE प्रश्न 9.
‘माता का अँचल’ शीर्षक की उपयुक्तता बताते हुए कोई अन्य शीर्षक सुझाइए।
उत्तर-
माता का अँचल’ नामक पाठ का शीर्षक उपयुक्त नहीं है क्योंकि यह पाठ के अंतिम भाग पर लागू होता है, संपूर्ण पाठ में पिता और पुत्र के संबंधों का उल्लेख किया गया है। केवल एक घटना में बच्चे सर्प को देखकर डर जाते हैं तथा लेखक (बालक) माँ से अलग होने का नाम नहीं लेता। यह बात पूरी काल्पनिक सी लगती है, क्योंकि बच्चा दिन-रात पिता के साथ घुला-मिला रहता है। उसका अधिकांश समय पिता के साथ बीतता है लेकिन जब पिता डरे हुए बालक के पास जाता है तो वह और भी अधिक माँ के आँचल में छुप जाता है। ऐसा संभव नहीं क्योंकि पिता, पिता ही नहीं बालक का अच्छा मित्र भी है। इस पाठ का शीर्षक हो सकता है ‘मेरा बचपन’ अथवा ‘मेरा शैशवकाल’ ।

Class 10 Hindi Kritika Chapter 1 Question Answer HBSE  प्रश्न 10.
बच्चे माता-पिता के प्रति अपने प्रेम को कैसे अभिव्यक्त करते हैं?
उत्तर-
बच्चे अपने माता-पिता के साथ रहते हुए, माता-पिता की बताई हुई अच्छी बातों पर अमल करके, उनके साथ खेलकर, उनकी आज्ञा का पालन करके, उनकी गोद में बैठकर आदि बातों से अपने प्रेम को उनके प्रति व्यक्त करते हैं।

Class 10 Hindi Mata Ka Aanchal Question Answer HBSE प्रश्न 11.
इस पाठ में बच्चों की जो दुनिया रची गई है वह आपके बचपन की दुनिया से किस तरह भिन्न है?
उत्तर-
यह पाठ काफी समय पहले का लिखा हुआ है। उस समय और आज के समय के जीवन में दिन-रात का अंतर हो गया . है। उस समय के बचपन में बच्चों पर पढ़ाई-लिखाई का कोई दबाव नहीं था। सब बच्चे मिल-जुलकर खूब खेलते थे। किंतु अब आपस में स्नेह भाव, विचारों का आदान-प्रदान व विश्वास की कमी हो गई है। आज के युग में बच्चों की पढ़ाई के पाठ्यक्रम इतने मुश्किल हो गए हैं कि उन्हें पूरा करने में इतना समय लगता है कि उनके पास खेलने तक का समय नहीं बचता। इसके अतिरिक्त माता-पिता के पास भी इतना समय नहीं कि वे बच्चों के साथ कुछ समय खेल सकें। आज खेल की सामग्री व साधन भी बदल गए हैं। गिल्ली-डंडे के स्थान पर क्रिकेट है। वीडियो गेम, टी.वी. आदि अनेक आधुनिकतम साधन हैं। गली में नाटक खेलना, गीली मिट्टी के खिलौने बनाना, विवाह रचना, खेती करना आदि खेल अब नहीं रह गए हैं।

Mata Ka Aanchal Class 10 Question Answer HBSE  प्रश्न 12.
फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन की आँचलिक रचनाओं को पढ़िए।
उत्तर-
विद्यार्थी अपने विद्यालय के पुस्तकालय से इन रचनाओं को लेकर स्वयं पढ़ें।

HBSE 10th Class Hindi माता का अँचल Important Questions and Answers

Mata Ka Aanchal Question Answer HBSE 10th Class प्रश्न 1.
‘माता का अँचल’ पाठ का मूल भाव लिखिए।
उत्तर-‘माता का अँचल’ पाठ में लेखक की बाल्यावस्था का अत्यंत आकर्षक रूप में चित्रण किया गया है। लेखक ने बताया है कि उसे अपने माता-पिता का भरपूर स्नेह मिला है। बचपन में कितनी निश्चिंतता और भोलापन होता है, इसका साक्षात् रूप पाठ में देखने को मिलता है। बच्चे अपने खेल में तल्लीन होकर खेलते हैं। वहाँ किसी प्रकार का भेदभाव, घृणा व जलन का भाव नहीं होता। बच्चों की दुनिया की सजीव तस्वीर अंकित करना लेखक का प्रमुख लक्ष्य रहा है, जिसमें उसे पूर्ण सफलता भी मिली है।

Hindi Class 10 Chapter 1 Kritika HBSE प्रश्न 2.
लेखक का तारकेश्वरनाथ से भोलानाथ नाम कैसे पड़ा?
उत्तर-
लेखक के पिता बहुत सवेरे उठते थे। वे अपने साथ-साथ लेखक और उसके भाई को भी उठा देते थे। अपने साथ ही उन्हें नहला-धुलाकर पूजा में बिठा लेते थे। पूजा के पश्चात् दोनों बेटों के चौड़े मस्तक पर चंदन की अर्धचंद्राकार रेखाएँ बना देते थे। उन दोनों के लंबे-लंबे बाल भी थे। लेखक के मस्तक पर भभूत भी बहुत अच्छी लगती थी। इसलिए प्यार से तारकेश्वरनाथ को उनके पिता भोलानाथ कहकर पुकारते थे। तभी उनका नाम भोलानाथ पड़ा था।

Chapter 1 Kritika Class 10 HBSE प्रश्न 3.
‘मरदुए क्या जाने कि बच्चों को कैसे खिलाना चाहिए’ इस पंक्ति में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से पुरुष वर्ग पर करारा व्यंग्य किया गया है। यह वाक्य लेखक की माता ने उनके पिता से कहा था। यह पूर्ण सत्य है कि नारी की अपेक्षा पुरुष में ममता का भाव कम होता है। एक बच्चे को जो लाड़-प्यार माता के रूप में एक नारी कर सकती है, वह पिता के रूप में एक पुरुष नहीं कर सकता। पिता की अपेक्षा माँ बच्चों के मनोभाव को शीघ्र भाँप जाती है। माँ भावात्मक रूप से अपने बच्चों से जुड़ी रहती है लेकिन पुरुष ऐसा नहीं कर पाते।

प्रश्न 4.
पाठ में बच्चों के द्वारा बनाए गए घरौंदे का उल्लेख अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर-
लेखक की बचपन की मित्र-मंडली ने एक दिन घर बनाने का खेल खेलने का निश्चय किया। धूल-मिट्टी की दीवारें खड़ी की गईं तथा तिनकों को जोड़कर छप्पर डाला गया, दातुन के खंभे खड़े किए गए दियासलाई की डिब्बी के किवाड़ खड़े किए गए, टूटे हुए घड़े के टुकड़ों से चूल्हा-चक्की बनाई गई, घर में पानी का घी बनाया गया, धूल के पिसान और बालू की चीनी बनाई। भोजन का भी प्रबंध किया गया। सब लोगों ने घर के अंदर पंगत में बैठकर भोजन किया। इस प्रकार लेखक ने बच्चों के अद्भुत व विचित्र घरौंदे का सजीव चित्र अंकित किया है।

प्रश्न 5.
पठित पाठ के आधार पर लेखक के पिता के जीवन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
‘माता का अँचल’ नामक पाठ पढ़ने पर पता चलता है कि लेखक के पिता ईश्वर में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। वे प्रतिदिन ईश्वर की वंदना करते थे। साथ ही अपने दोनों बेटों को भी वंदना करते समय अपने पास बिठा लेते थे। तत्पश्चात् वे ‘रामनामा बही’ पर हजार बार ‘राम-राम’ लिखते थे। वे राम-नाम की पर्चियाँ बनाकर उनमें आटा लपेटकर गंगा नदी में मछलियों को खिला आते थे। इस प्रकार पता चलता है कि लेखक के पिता ईश्वरभक्त व्यक्ति थे।
वे स्वभाव से सरल एवं भोले थे। उनके मन में संतान के प्रति अथाह स्नेह था। अपने बच्चों को डरे हुए देखकर वे व्याकुल हो उठते थे। वे बच्चों के साथ मित्रता का व्यवहार करते थे।

प्रश्न 6.
‘बचपन में बच्चे सरल, निर्दोष और मस्त होते हैं पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर-
बचपन में सभी बच्चे सरल होते हैं। उनके मन में जो भाव उठते हैं वे उन्हें सहज एवं सरल वाणी में कह देते हैं। वे मन से भी निर्दोष होते हैं। उन्हें किसी प्रकार की चिंता व भय नहीं सताता। वे बूढ़े दूल्हे को पसंद नहीं करते, इसलिए उसे खसूट कह देते हैं। उन्हें अपनी शरारत के दुष्परिणाम का बोध नहीं था, इसलिए बूढ़ा दूल्हा उनके पीछे पड़ जाता है। बच्चे खेल में इतने मस्त हो जाते हैं, कि उन्हें घर-बार यहाँ तक कि माँ की भी याद नहीं आती।

प्रश्न 7.
खेल खेलते हुए बच्चे पिता को देखकर क्यों भाग खड़े होते हैं?
उत्तर-
गाँव में बच्चे अपनी इच्छा एवं रुचि के अनुकूल खेल खेलते हैं। वे वैसी सामग्री भी जुटाते हैं। वे खेल में पूर्णतः लीन हो जाते हैं। वे अपनी खेल की दुनिया में किसी की दखलअंदाजी नहीं चाहते अर्थात् वे नहीं चाहते कि उनके खेल में बड़े लोग भी सम्मिलित हों। इसलिए जब भी लेखक के पिता ने उन्हें खेलते हुए देखा और उनके करीब चले गए, तो बच्चे अपना खेल अधूरा छोड़कर भाग खड़े होते हैं।

प्रश्न 8.
पठित पाठ से हमें बाल्य जीवन की कौन-सी जानकारी प्राप्त होती है?
उत्तर-
इस पाठ से पता चलता है बाल्य जीवन में बच्चे मन में दूसरों के प्रति कोई भेदभाव की भावना नहीं रखते। वे सब मिलकर खेल रचते हैं। उनके मन में किसी प्रकार की जातिगत भावना भी नहीं होती। सब जाति-धर्मों के बच्चे मिलकर खेलते हैं। बच्चे अपने मन में किसी प्रकार की बात को छुपाकर नहीं रखते। यदि वे दुःखी हैं या भयभीत हैं तो रोकर या चिल्लाकर व्यक्त कर देते हैं। प्रसन्नता के भाव को वे खिलखिलाकर व हँसकर व्यक्त कर देते हैं। इसी प्रकार रोते-रोते खुश हो जाना और तुरंत खेल में लग जाना बच्चों का विचित्र स्वभाव है। वे मन में कभी बदले की भावना नहीं रखते। जो उनके मन में भाव या इच्छा होती है उसे वे कह डालते हैं। उसका परिणाम क्या होगा, उसकी चिंता उन्हें नहीं होती।

सबसे बड़ी बात यह है कि बच्चों के मन पर तनाव या किसी विचार का बोझ नहीं होता। वे बीती बातों को याद करके दुःखी नहीं होते। उनके सामने जो भी उनकी रुचि के अनुकूल खेल या प्रसंग आता है वे उसी में लीन हो जाते हैं।

प्रश्न 9.
बूढ़े दूल्हे पर की गई टिप्पणी के माध्यम से लेखक ने क्या संदेश दिया है?
उत्तर–
प्रस्तुत पाठ में लेखक ने बूढ़े दूल्हे पर बच्चों के माध्यम से व्यंग्यात्मक टिप्पणी की है। लेखक ने यहाँ यह बताया है कि बुढ़ापे में विवाह करना उचित कार्य नहीं है। हर कार्य समय पर ही अच्छा लगता है। बुढ़ापे में दूल्हा बनना न केवल सामाजिक दृष्टि से बल्कि नैतिक दृष्टि से भी उचित नहीं है। लेखक का संदेश है कि वृद्ध-विवाह नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 10.
लेखक को बचपन में स्कूल के अध्यापक से डाँट क्यों सुननी पड़ी थी?
उत्तर-
लेखक को बचपन में स्कूल के अध्यापक की डाँट-फटकार इसलिए सुननी पड़ी थी क्योंकि उसने अन्य बच्चों के साथ मिलकर मूसन तिवारी नामक बूढ़े व्यक्ति को अपशब्द कहे थे। बैजू नामक लड़के ने मस्ती करते हुए मूसन तिवारी को ‘बुढ़वा बेईमान माँगे करैला का चोखा’ कहकर चिढ़ाया था। अन्य बच्चों ने भी मस्ती में आकर ये शब्द दोहराए थे। नतीजा यह हुआ कि मूसन तिवारी अपने अपमान का बदला लेने के लिए स्कूल में जा पहुँचे और बच्चों को अध्यापक से खूब डाँट पड़वाई।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 6 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘माता का अँचल’ नामक कहानी के लेखक कौन हैं?
(A) कमलेश्वर
(B) शिवपूजन सहाय
(C) प्रेमचंद
(D) मधु कांकरिया
उत्तर-
(B) शिवपूजन सहाय

प्रश्न 2.
लेखक के पिता प्रातः उठकर क्या करते थे?
(A) कसरत
(B) सैर
(C) पूजा
(D) समाचार पढ़ना
उत्तर-
(C) पूजा

प्रश्न 3.
लेखक बचपन में किसका तिलक लगाता था?
(A) चंदन का
(B) गोरस का
(C) रोली का
(D) भभूत का
उत्तर-
(D) भभूत का

प्रश्न 4.
भभूत लगाने से लेखक क्या बन जाते थे?
(A) श्रीकृष्ण
(B) श्रीराम
(C) बम-भोला
(D) राजकुमार
उत्तर-
(C) बम-भोला

प्रश्न 5.
लेखक का वास्तविक नाम क्या था?
(A) तारकेश्वरनाथ
(B) महेशनाथ
(C) पृथ्वीराज
(D) भोलानाथ
उत्तर-
(A) तारकेश्वरनाथ

प्रश्न 6.
लेखक के पिता बचपन में उसे क्या कहकर पुकारते थे?
(A) नाथ
(B) भोलानाथ
(C) अमरनाथ
(D) शिव महाराज
उत्तर-
(B) भोलानाथ

प्रश्न 7.
लेखक के पिता कितनी बार ‘राम’ शब्द लिखकर ‘रामनामा बही पोथी बंद करते थे?
(A) पाँच सौ बार
(B). छह सौ. बार
(C) सात सौ बार
(D) एक हज़ार बार
उत्तर-
(D) एक हज़ार बार

प्रश्न 8.
लेखक के पिता कितनी बार कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों पर राम नाम लिखकर आटे की गोलियों में लपेटकर मछलियों को खिलाने जाते थे?
(A) पाँच सौ बार
(B) चार सौ बार
(C) तीन सौ पाँच बार
(D) दो सौ इक्कावन बार
उत्तर-
(A) पाँच सौ बार

प्रश्न 9.
‘मरदुए’ शब्द कहानी में किसने किसके लिए प्रयोग किया है?
(A) लेखक ने पिता के लिए
(B) लेखक की माता ने उसके पिता के लिए
(C) लेखक की माता ने लेखक के लिए
(D) इनमें से किसी ने नहीं
उत्तर-
(B) लेखक की माता ने उसके पिता के लिए

प्रश्न 10.
‘ठौर’ शब्द का अर्थ है-
(A) ठहरना
(B) दौड़ना
(C) स्थान
(D) आकाश
उत्तर-
(C) स्थान

प्रश्न 11.
लेखक गली में कौन-सा खिलौना लेकर जाते थे?
(A) कार
(B) बैलगाड़ी
(C) हाथी
(D) काठ का घोड़ा
उत्तर-
(D) काठ का घोड़ा

प्रश्न 12.
लेखक को बचपन में कैसे खेल पसंद थे?
(A) तरह-तरह के नाटक करना
(B) गिल्ली-डंडा खेलना
(C) लुका-छिपी खेलना
(D) चोर-सिपाही बनना
उत्तर-
(A) तरह-तरह के नाटक करना

प्रश्न 13.
वर्षा आने पर बच्चों ने कहाँ का आसरा लिया था?
(A) झोंपड़ी में
(B) पेड़ की जड़ों के पास
(C) किसी कमरे में
(D) छतरी के नीचे
उत्तर-
(B) पेड़ की जड़ों के पास

प्रश्न 14.
बच्चों की शिकायत किस व्यक्ति ने की थी?
(A) लेखक के पिता ने
(B) बाग के मालिक ने
(C) मूसन तिवारी ने
(D) लेखक की माता ने
उत्तर-
(C) मूसन तिवारी ने

प्रश्न 15.
‘चिरौरी करना’ का क्या अर्थ है?
(A) चिड़ाना
(B) नकल करना
(C) चोरी करना
(D) विनती करना
उत्तर-
(D) विनती करना

प्रश्न 16.
“चिड़िया की जान जाए, लड़कों का खिलौना।” ये शब्द किसने कहे?
(A) लेखक के पिता जी और उनके मित्रों ने
(B) लेखक की माता ने
(C) लेखक के मित्रों और उनके मित्रों ने
(D) खेत के मालिक ने
उत्तर-
(A) लेखक के पिता जी और उनके मित्रों ने

प्रश्न 17.
बूढ़े दूल्हे पर की गई टिप्पणी के द्वारा क्या संदेश दिया गया है?
(A) बूढ़ा दूल्हा सुंदर नहीं होता
(B) बुढ़ापे में विवाह करना उचित नहीं
(C) हर कार्य समय पर अच्छा होता है
(D) बूढ़ा दूल्हा सम्मानित नहीं होता
उत्तर-
(B) बुढ़ापे में विवाह करना उचित नहीं

प्रश्न 18.
भोलानाथ को सबसे अच्छा क्या लगता है?
(A) भोजन खाना
(B) पढ़ना
(C) खेलना
(D) सोना
उत्तर-
(C) खेलना

माता का अँचल Summary in Hindi

माता का अँचल पाठ का सार

प्रश्न-
‘माता का अँचल’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ श्री शिवपूजन सहाय के ‘देहाती दुनिया’ नामक उपन्यास का अंश है। ‘देहाती दुनिया’ हिंदी साहित्य का पहला आंचलिक उपन्यास है। इसे शिशु भोलानाथ के चरित्र को मध्य में रखकर रचा गया है। संकलित अंश में ग्रामीण अंचल और उसके चरित्रों का एक अद्भुत चित्र अंकित किया गया है। बालकों के खेल, कौतूहल, माँ की ममता, पिता का प्यार, लोकगीत आदि का एक साथ चित्रण किया गया है। बाल-सुलभ मनोभावों की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है। साथ ही तत्कालीन समाज के पारिवारिक परिवेश का भी उल्लेख किया गया है। पाठ का सार इस प्रकार है-

लेखक अभी बच्चा ही था कि वह अपने पिता जी के साथ प्रातः शीघ्र उठकर, स्नान आदि करके पूजा करने बैठ जाता था। वह अपने पिता से जिद्द करके माथे पर त्रिपुंड लगवाया करता था। अपनी लंबी-लंबी जटाओं के कारण वह भोलानाथ अथवा बम-भोला ही लगता था। लेखक अपने पिता जी को बाबू जी और माताजी को मइयाँ कहकर पुकारता था। जब उसके पिता जी रामायण का पाठ करते तो वह भी वहाँ बैठ जाता था। वह वहाँ बैठा-बैठा दर्पण देखा करता था, जब उसके पिता जी उसकी तरफ देखते तो वह हँस पड़ता था। लेखक के पिता पूजा-पाठ करने के पश्चात् रामनामा बही पर हज़ार बार राम-नाम लिखते थे। फिर कागज़ के टुकड़ों पर पाँच सौ बार राम-नाम लिखकर तथा उन्हें आटे की गोलियों में लपेटकर गंगा जी में मछलियों को खिलाने के लिए जाते थे। भोलानाथ भी पिता के साथ गंगा तट पर जाता था। उस समय वह पिता के कंधों पर बैठकर मुस्कराता रहता था।

लेखक बचपन में पिता के.साथ अनेक खेल खेलता था। कभी-कभी कुश्ती भी लड़ता था और उनकी छाती पर बैठकर उनकी मूंछे उखाड़ने लगता था। तब उसके पिता उससे पूँछे छुड़वाकर उसका हाथ चूम लेते थे। पिता जी उसके दोनों गाल चूमते व उन पर अपनी दाढ़ी रगड़ देते। लेखक फिर उनकी मूंछे उखाड़ने लगता और वे झूठ-मूठ का रोने लगते। लेखक पिता जी के साथ भोजन करता। पिता उसे अपने हाथों से भोजन खिलाते थे। जब उसका पेट भर जाता था तो उसे माँ और भोजन खिलाने की जिद्द करती और कहती-

‘जब खाएगा बड़े-बड़े कौर, तब पाएगा दुनिया में ठौर’ वह अपने पति को ताना देती हुई कहती है कि आप मर्द लोग बच्चों को खाना खिलाना क्या जानो। तब माँ उसे तोता, मैना, चिड़िया, मोर आदि पक्षियों के नाम ले-लेकर भोजन कराती। कभी-कभी माँ उसके बालों में चुल्लू भर कड़वा तेल लगा देती, उसके माथे पर बिंदी लगा देती, उसकी चोटी गूंथ देती तथा उसमें फूलदार लट्ट भी बाँध देती। उसे रंगीन कुर्ता और टोपी पहना देती। तब वह गली में खेलने के लिए चल देता।

लेखक बच्चों के साथ मिलकर तरह-तरह के खेल खेलता था। वह मिठाइयों की दुकान सजाता तो कभी नाटक किया करता। दुकान में पत्तों की पूरियाँ, गीली मिट्टी की जलेबियाँ भी बनाई जातीं। जब पिता उन्हें ऐसे खेलता देख लेता तो वह सबको तोड़-फोड़ देता और पिता हँसने लगते। इसी प्रकार लेखक घर बनाने का खेल व विवाह रचाने, बारात को भोजन कराने के खेल भी खेला करता था। वह बच्चों के साथ मिलकर बारात का जुलूस निकालने का खेल भी खेलता था जिसमें कनस्तर का तंबूरा बजता, आम के पौधे की शहनाई बजती, टूटी हुई चूहेदानी की पालकी सजाई जाती, समधी बनकर बकरे पर चढ़ जाते। यह जुलूस चबूतरे के एक कोने से दूसरे कोने तक जाता। कभी-कभी खेती करने का खेल भी खेला जाता। इस प्रकार के खेल और नाटक करना प्रतिदिन का काम था।

कभी किसी दूल्हे के आगे चलती पालकी देखते तो ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगते। एक बार एक बूढ़े वर ने लेखक मंडली को खदेड़कर ढेलों से मारा। एक बार रास्ते में आते हुए मूसन तिवारी को बुढ़वा बेईमान कहकर चिढ़ा दिया। मूसन तिवारी ने भी उनको खूब डाँटा। उसके बाद मूसन तिवारी स्कूल पहुंच गए। वहाँ चारों लड़कों में से बैजू तो भाग निकला, किंतु लेखक और उसका भाई पकड़े गए। यह सुनकर बाबू जी दौड़ते हुए पाठशाला गए। गुरु जी से विनती कर बाबू जी उन्हें घर ले गए। लेखक और उसके मित्र एक बार मकई के खेत में चिड़ियाँ पकड़ने घुस गए। चिड़ियाँ तो पकड़ी नहीं गईं और खेत से अलग होकर वे सब मिलकर ‘राम जी की चिरई, राम जी का खेत, खा लो चिरई, भर-भर पेट’ गीत गाने लगे। कुछ ही दूरी पर खड़े बाबूजी व अन्य लोग उनका यह तमाशा देखकर प्रसन्न हो रहे थे।

टीले पर जाकर लेखक और उसका भाई अपने मित्रों के साथ चूहों के बिलों में पानी डालने लगे। कुछ देर बाद उसमें से श्रीगणेश जी के चूहे की अपेक्षा सर्प निकल आया। उससे वे इतने डर गए कि वहाँ से रोते-चिल्लाते भागते हुए घर आ गए। गिरने, फिसलने व काँटे लग जाने के कारण सब लहूलुहान हो गए। सब अपने-अपने घरों में घुस गए। उस समय बाबू जी बरामदे में बैठकर हुक्का पी रहे थे। वे दोनों अपनी माँ की गोद में जाकर छिप गए। उन्हें डर से काँपते हुए देखकर माँ भी रोने लगी। वह व्याकुल होकर कारण पूछने लगी। वह उन्हें कभी अपने आँचल में छिपाती तो कभी गले से लगाती। माँ ने तुरंत हल्दी पीसकर लेखक और उसके भाई के घावों पर लगाई। उनके शरीर अभी भी काँप रहे थे। आँखें चाहकर भी नहीं खुलती थीं। बाबू जी भी उन्हें अपनी गोद में लेने लगे। किंतु वे माँ के आँचल में ही छिपे रहे।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-1) अँचल = गोद, आँचल। संग = साथ। मृदंग = वाद्य यंत्र। तड़के = प्रातःकाल। नाता = संबंध। भभूत = राख। दिक करना = तंग करना। लिलार = ललाट। त्रिपुंड करना = माथे पर तीन आड़ी या अर्धचंद्राकार रेखाएँ बनाना। जटाएँ = बालों का जुड़कर रस्सी के समान बन जाना। रमाने = लगाना। बम-भोला = शिव का ही एक नाम। आइना = दर्पण। निहारना = देखना। पोथी = ग्रंथ, पुस्तक।

(पृष्ठ-3) विराजमान = उपस्थित। शिथिल = ढीला, सुस्त। पछाड़ना = हराना। उतान पड़ना = पीठ के बल लेटना। नोचना = जोर से खींचना। चौका = भोजन बनाने का स्थान । गोरस = दूध । भात = चावल । सानकर = मिलाकर। फूल का कटोरा = काँच का कटोरा। अफरना = भरपेट से अधिक खा लेना। कौर = रोटी का टुकड़ा। ठौर = स्थानं । मरदए = मर्द, पुरुष । महतारी = माता।

(पृष्ठ-4) काठ = लकड़ी। कड़वा तेल = सरसों का तेल। बिगड़ना = क्रोध में आना, गुस्सा करना। बोथना = लगाना। नाभी = पेट का मध्य भाग। बाट जोहना = प्रतीक्षा करना। हमजोली = साथी। रंगमंच = नाटक खेलने का स्थान। तमाशे करना = खेल खेलना। सरकंडा = एक प्रकार का नुकीला पौधा। चँदोआ = छोटा शामियाना। खोंचा = ढाँचा। बताशे = चीनी की मिठाई। ठीकरा = मिट्टी का टुकड़ा। घरौंदा = घर, रहने का स्थान। आचमनी = पानी पीने के काम आने वाला बर्तन। कलछी = दाल या भात डालने वाला बर्तन। पिसान = पिसी हुई वस्तु। बालू = रेत। ज्योनार = दावत, भोजन। पाँत = पंक्ति। जीमना = भोजन खाना। लोट-पोट हो जाना = खूब ज़ोर से हँसना।

(पृष्ठ-5) कनस्तर = टिन का खाली पीपा। तंबूरा = एक प्रकार का बर्तन। कलसा = कलश। खटोली = छोटी-सी चारपाई। ओहार = परदे के लिए डाला हुआ कपड़ा। कुल्हिए = मिट्टी का बर्तन। गराड़ी = गरारी। कसोरा = मिट्टी का बना बर्तन। जुआठा = बैल को हल में जोतना। ओसाना = अनाज को भूसे से अलग करना। पटाना = सींचना । बटोही = राही, पथिक। ठिठककर = चौंककर।

(पृष्ठ-6) रहरी = अरहर। खसूट-खब्बीस = लूटने वाला पापी व्यक्ति। जमाई = दामाद। घोड़ मुँहा = घोड़े के मुख जैसा। पट पड़ना = औंधे पड़ना। मेघ = बादल। कौंधना = चमकना। छितराई = फैली हुई। बिलाई = धुल गई। अँठई = कुत्ते या शेर के शरीर में चिपके रहने वाले छोटे कीड़े। चोखा = भरथा। सुर = स्वर। बेतहाशा = बहुत ज़ोर-शोर से, आवेग के साथ। आँधी होना = तेज़ भागना। नौ-दो ग्यारह होना = गायब होना। खबर लेना = कठोरता से व्यवहार करना। चिरौरी = दीनतापूर्वक की गई प्रार्थना।

(पृष्ठ-7-8) हाथ न आना = पकड़ में न आना। चिरई = चिड़िया। पराई पीर = दूसरों का दुःख। उलीचना = हाथों से पानी डालना। अंटाचिट = पूरी तरह से चित करना। छलनी होना = बिंध जाना। ओसारा = बरामदा। अमनिया = साफ। कुहराम मचाना = शोर मचाना। रोंगटे खड़े होना = हैरान होना।

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HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Sandhi संधि Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Vyakaran संधि

संधि

Hindi Vyakaran Sandhi HBSE 10th Class प्रश्न 1.
संधि किसे कहते हैं? इसके कितने भेद हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट करें।
उत्तर:
संधि का शाब्दिक अर्थ है-मिलना या जुड़ना। निकटवर्ती वर्गों के मेल से होने वाले परिवर्तन को ही संधि कहते हैं अर्थात् जब ध्वनियाँ निकट होने पर आपस में मिल जाती हैं और एक नया रूप धारण कर लेती हैं, तब संधि मानी जाती है; जैसे
विद्या + आलय = विद्यालय
सत् + जन = सज्जन
दुः + जन = दुर्जन
देव + इंद्र = देवेंद्र
रेखा + अंकित = रेखांकित

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

संधि के तीन भेद हैं-
(i) स्वर संधि,
(ii) व्यंजन संधि,
(iii) विसर्ग संधि।

(i) स्वर संधि दो स्वरों के आपस में मेल होने से जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं; जैसे-परम + आत्मा = परमात्मा।

स्वर संधि के पाँच उपभेद हैं
1. दीर्घ संधि
2. गुण संधि
3. वृद्धि संधि
4. यण संधि
5. अयादि संधि।

1. दीर्घ संधि-जब ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ से परे क्रमशः ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ आए तो दोनों मिलकर क्रमशः आ, ई, ऊ हो जाते हैं।
अ + अ = आ
मत + अनुसार = मतानुसार
वेद + अंत = वेदांत
परम + अणु = परमाणु
सार + अंश = सारांश
धर्म + अर्थ = धर्मार्थ
स्व + अधीन = स्वाधीन

अ + आ = आ
भोजन + आलय = भोजनालय
हिम + आलय = हिमालय
परम + आत्मा = परमात्मा
दश + आनन = दशानन
रत्न + आकर = रत्नाकर
धन + आदेश = धनादेश

आ + अ = आ
यथा + अर्थ = यथार्थ
रेखा + अंकित = रेखांकित
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
दीक्षा + अंत = दीक्षांत
परीक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी

आ + आ = आ
महा + आत्मा = महात्मा
विद्या + आलय = विद्यालय
महा + आनंद = महानंद
कारा + आवास = कारावास
दया + आनंद = दयानंद
मदिरा + आलय = मदिरालय

इ + इ = ई
रवि + इंद्र = रवींद्र
कवि + इंद्र = कवींद्र
अति + इव = अतीव
कपि + इंद्र = कपींद्र
अभि + इष्ट = अभीष्ट

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

इ + ई = ई
गिरि + ईश = गिरीश
परि + ईक्षा = परीक्षा
कपि + ईश = कपीश
हरि + ईश = हरीश
फणि + ईश्वर = फणीश्वर
मुनि+ ईश्वर = मुनीश्वर

ई + इ = ई
मही + इंद्र = महींद्र
नारी+ इंदु = नारीदु
नदी + इंद्र = नदींद्र
शची+ इंद्र = शचींद्र
नारी + इच्छा = नारीच्छा

ई + ई = ई
रजनी + ईश = रजनीश
नदी + ईश = नदीश
जानकी + ईश = जानकीश
नारी + ईश्वर = नारीश्वर
मही + ईश = महीश
योगी + ईश्वर = योगीश्वर

उ + उ = ऊ
भानु + उदय = भानूदय
सु + उक्ति = सूक्ति
लघु + उत्तर = लघूत्तर
विधु + उदय = विधूदय
गुरु + उपदेश = गुरूपदेश
अनु + उदित = अनूदित

उ + ऊ = ऊ
अंबु + ऊर्मि = अंबूर्मि
सिंधु + ऊर्मि = सिंधूमि
लघु + ऊर्मि = लघूर्मि

ऊ + उ = ऊ
वधू + उत्सव = वधूत्सव
भू + उत्सर्ग = भूत्सर्ग

ऊ + ऊ = ऊ
भू + ऊर्जा = भूर्जा
वधू + ऊर्मि = वधूर्मि

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

Sandhi 10th Class HBSE

2. गुण संधि-यदि ‘अ’ और ‘आ’ के आगे ‘इ’ या ‘ई’, ‘उ’ या ‘ऊ’, ऋ स्वर आते हैं, तो दोनों के मिलने से क्रमशः ‘ए’, ‘ओ’ और ‘अर’ हो जाते हैं।

अ + इ = ए
देव + इंद्र = देवेंद्र
नर + इंद्र = नरेंद्र
भारत + इंदु = भारतेंदु
स्व + इच्छा = स्वेच्छा
सत्य + इंद्र = सत्येंद्र
गज + इंद्र = गजेंद्र

आ + इ = ए
राजा + इंद्र = राजेंद्र
रमा + इंद्र = रमेंद्र
यथा + इष्ट = यथेष्ट
महा + इंद्र = महेंद्र

अ + ई = ए
गण + ईश = गणेश
नर + ईश = नरेश
राज + ईश = राजेश
कमल + ईश = कमलेश
परम + ईश्वर = परमेश्वर
सुर + ईश = सुरेश

आ + ई = ए
रमा + ईश = रमेश
महा + ईश्वर = महेश्वर
राका + ईश = राकेश
लंका + ईश = लंकेश
महा + ईश = महेश
गंगा + ईश्वर = गंगेश्वर

अ + उ = ओ
वीर + उचित = वीरोचित
सूर्य + उदय = सूर्योदय
वसंत + उत्सव = वसंतोत्सव
भाग्य + उदय = भाग्योदय
पर + उपकार = परोपकार
उत्तर + उत्तर = उत्तरोत्तर

अ + ऊ = ओ
जल + ऊर्मि = जलोमि
भाव + ऊर्मि = भावोर्मि
समुद्र + ऊर्मि = समुद्रोर्मि
नव + ऊढ़ा = नवोढ़ा
सागर + ऊर्मि = सागरोर्मि

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

आ + उ = ओ
महा + उत्सव = महोत्सव
महा + उदधि = महोदधि

आ + ऊ = ओ
गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि
महा + ऊर्मि = महोर्मि
महा + ऊष्पा = महोष्मा

अ + ऋ = अर्
देव + ऋषि = देवर्षि
राज + ऋषि = राजर्षि
ब्रह्म + ऋषि = ब्रह्मर्षि
देव + ऋषि = देवर्षि
सप्त + ऋषि = सप्तर्षि

आ + ऋ = अर्
महा + ऋषि = महर्षि

उद्यत का संधि HBSE 10th Class

3. वृद्धि संधि-जब ‘अ’ या ‘आ’ से परे ‘ए’ या ‘ऐ’ हो तो दोनों मिलकर ‘ऐ’ हो जाते हैं और ‘ओ’ या ‘औ’ हो तो ‘औ’ हो जाता है।

अ + ए = ऐ
एक + एक = एकैक
लोक + एषणा = लोकैषणा

अ + ऐ = ऐ
मत + ऐक्य = मतैक्य
परम + ऐश्वर्य = परमैश्वर्य
धन + ऐश्वर्य = धनैश्वर्य

आ + ए = ऐ
सदा + एव = सदैव
तथा + एव = तथैव/

आ + ऐ = ऐ
महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य
रमा + ऐश्वर्य = रमैश्वर्य

अ + ओ = औ
परम + ओज = परमौज
दंत + ओष्ठ = दंतौष्ठ
जल + ओघ = जलौघ

अ + औ = औ
वन + औषधि = वनौषधि
परम + औदार्य = परमौदार्य
परम + औषध = परमौषध

आ + ओ = औ
महा + ओजस्वी = महौजस्वी
महा + ओज = महौज
महा + ओघ = महौघ

आ + औ = औ
महा + औषध = महौषध
महा + औदार्य = महौदार्य

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

Sandhi Class 10 HBSE

4. यण संधि-यदि इ, ई, उ, ऊ और ऋ के बाद भिन्न स्वर आए तो इ/ई का ‘य’, उ/ऊ का ‘व’ और ऋ का ‘र’ हो जाता है।

इ + अ = य
अति + अधिक = अत्यधिक
अति + अंत = अत्यंत
यदि + अपि = यद्यपि
अति + आवश्यक = अत्यावश्यक

इ + आ = या
इति + आदि = इत्यादि
नदी + आगम = नद्यागम

ई + आ = या
सखी + आगमन = सख्यागमन
अति + उत्तम = अत्युत्तम

इ + उ = यु
उपरि + उक्त = उपर्युक्त
अभि + उदय = अभ्युदय
प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर
प्रति + ऊष = प्रत्यूष

इ + ऊ = यू
नि + ऊन = न्यून
वि + ऊह = व्यूह

इ + ए = ये
प्रति + एक = प्रत्येक
अधि + एषणा = अध्येषणा

उ + अ = व
सु + अच्छ = स्वच्छ
मनु + अंतर = मन्वंतर
अनु + अय = अन्वय

उ + आ = वा
सु + आगत = स्वागत
मधु + आलय = मध्वालय
गुरु + आदेश = गुवदिश

उ + इ = वि
अनु + इति = अन्विति
अनु + इत = अन्वित

उ + ए = वे
अनु + एषण = अन्वेषण
प्रभु + एषणा = प्रभ्वेषणा

ऊ + आ = वा
वधू + आगमन = वध्वागमन
भू + आदि = भ्वादि

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

ऋ + आ = रा
मातृ + आज्ञा = मात्राज्ञा
पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा
पितृ + आनुमति = पित्रानुमति
मातृ + आदेश = मात्रादेश

Sandhi Class 10 Hindi HBSE

5. अयादि संधि-जहाँ ए/ऐ, ओ/औ के बाद कोई भिन्न स्वर आता है, तो इनके स्थान पर क्रमशः ए का अय, ऐ का आय, ओ का अव तथा औ का आव हो जाता है।

ए + अ = अय
ने + अन = नयन
शे + अन = शयन
चे + अन = चयन

ऐ + अ = आय
नै + अक = नायक
गै + अक = गायक

ऐ + इ = आयि
गै + इका = गायिका
नै + इका = नायिका
कै + इक = कायिक

ओ + अ = अव
पो + अन = पवन
भो + अन = भवन
हो + अन = हवन

औ + उ = आवु
भौ + उक = भावुक

औ + अ = आव
पौ + अन = पावन
पौ + अक = पावक

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

(ii) व्यंजन संधि-व्यंजन ध्वनि से परे कोई स्वर या व्यंजन आने से जो परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं; जैसेजगत् + नाथ =’जगन्नाथ।
व्यंजन संधि के नियम इस प्रकार हैं

1. वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन यदि क, च, ट्, त्, प् वर्ण से परे कोई स्वर या वर्ग का तीसरा-चौथा वर्ण या य, र, ल, व, ह में से कोई वर्ण हो, तो पहले वर्ण का उसी वर्ण का तीसरा वर्ण हो जाता है।
वाक् + दत्ता = वाग्दत्ता
वाक् + ईश = वागीश
षट् + आनन = षडानन
दिक् + अंबर = दिगंबर
दिक् + गज = दिग्गज
सत् + गति = सद्गति
सत् + गुण = सद्गुण
सत् + वाणी = सद्वाणी
अप + धि = अब्धि

2. वर्ग के पहले वर्ण का पंचम वर्ण में परिवर्तन यदि वर्ग के पहले वर्ण से परे कोई अनुनासिक अर्थात् ‘न’ या ‘म’ हो, तो पहला वर्ण उसी वर्ग का अनुनासिक वर्ण हो जाता है।
वाक् + मय = वाङ्मय
षट् + मास = षण्मास
जगत् + नाथ = जगन्नाथ
सत् + मार्ग = सन्मार्ग
चित् + मय = चिन्मय
उत् + मत = उन्मत
सत् + मति = सन्मति
उत् + नायक = उन्नायक
उत् + मेष = उन्मेष
उत् + यत = उद्यत

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

3. ‘त’ सम्बन्धी नियम-
(क) ‘त्’ के बाद यदि ‘ल’ हो तो ‘त’ ‘ल’ में बदल जाता है।
उत् + लेख = उल्लेख
तत् + लीन = तल्लीन
उत् + लास = उल्लास

(ख) ‘त्’ या ‘द्’ के बाद ज/झ हो, तो त्, द् ‘ज्’ में बदल जाता है।
सत् + जन = सज्जन
उत् + ज्वल = उज्ज्वल
जगत् + जननी = जगज्जननी
विपत् + जाल = विपज्जाल

(ग) “त्’ के बाद यदि ट/ड हो तो ‘त’ ट्/ड् में बदल जाता है।
तत् + टीका = तट्टीका ।
उत् + डयन = उड्डयन
बृहत् + टीका = बृहट्टीका

(घ) ‘त्’ के बाद यदि ‘श्’ हो तो ‘त्’ का ‘च’ और ‘श’ का ‘छ्’ हो जाता है।
उत् + श्वास = उच्छवास
सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र
तत् + शिव = तच्छिव
उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट

‘त्’ के बाद यदि ‘च/छ’ हो तो ‘त्’ का ‘च’ हो जाता है।
उत् + चारण = उच्चारण
सत् + चरित्र = सच्चरित्र
उत् + चरित = उच्चरित
जगत् + छाया = जगच्छाया

‘त्’ के बाद ‘ह’ हो तो ‘त’ का ‘द’ और ‘ह’ का ‘धू’ हो जाता है।
तत् + हित = तद्धित
उत् + हार = उद्धार
पत् + हति = पद्धति
उत् + हत = उद्धत

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

4. ‘छ’ संबंधी नियम-जब किसी शब्द के अंत में स्वर हो और आगे के शब्द का पहला वर्ण ‘छ’ हो, तो ‘छ’ का ‘छ’ हो जाता है।
अनु + छेद = अनुच्छेद
वि + छेद = विच्छेद
स्व + छंद = स्वच्छंद
परि + छेद = परिच्छेद
आ + छादन = आच्छादन
छत्र + छाया = छत्रच्छाया

5. ‘म’ संबंधी नियम-जब पहले शब्द के अंतिम वर्ण ‘म’ के आगे दूसरे शब्द का प्रथम वर्ण (य, र, ल, व) या (श, ष, स, ह) या अन्य स्पर्श व्यंजन हो, तो ‘म’ के स्थान पर पंचम वर्ण अथवा अनुस्वार हो जाता है।
सम् + चय = संचय
सम् + योग = संयोग
सम् + हार = संहार
सम् + भव = संभव
सम् + लाप = संलाप
सम् + लग्न = संलग्न
सम् + स्मरण = संस्मरण
सम् + शोधन = संशोधन
सम् + मति = सम्मति
सम् + बंध = संबंध
सम् + सार = संसार
सम् + रक्षण = संरक्षण
सम् + तोष = संतोष
सम् + गम = संगम
सम् + शय = संशय
अहम् + कार = अहंकार

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

6. ‘न’ का ‘ण’ संबंधी नियम-यदि ऋ, र, ष के बाद ‘न’ व्यंजन आता है तो ‘न’ का ‘ण’ हो जाता है।
परि + नाम = परिणाम
राम + अयन = रामायण
मर + न = मरण
प्र + मान = प्रमाण
भर + न = भरण

7. ‘स’ का ‘ष’ संबंधी नियम-यदि ‘स’ से पहले ‘अ’, ‘आ’ से भिन्न स्वर हो तो ‘स’ का ‘ष’ हो जाता है।
अभि + सेक = अभिषेक
नि + सेध = निषेध
वि + सम = विषम
सु + सुप्ति = सुषुप्ति

(iii) विसर्ग संधि-विसर्ग के बाद यदि स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं; जैसे
निः + गुण = निर्गुण।

विसर्ग संधि के नियम इस प्रकार हैं-
1. विसर्ग का ‘ओ’ होना विसर्ग से पहले यदि ‘अ’ हो और बाद में ‘अ’ अथवा वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवां अक्षर या य, र, ल, व आ जाए तो विसर्ग के स्थान पर ‘ओ’ हो जाता है।
यशः + गान = यशोगान
मनः + भाव = मनोभाव
सरः + ज = सरोज
मनः + विकार = मनोविकार
अधः + गति = अधोगति
निः + आहार = निराहार
रजः + गुण = रजोगुण
मनः + हर = मनोहर
तपः + बल = तपोबल
वयः + वृद्ध = वयोवृद्ध
पयः + द = पयोद
मनः + अनुकूल = मनोनुकूल

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

2. विसर्ग का ‘र’ होना यदि विसर्ग से पहले ‘अ’, ‘आ’ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो और आगे का तीसरा, चौथा, पाँचवां अक्षर या य, र, ल, व अथवा स्वर हो, तो विसर्ग का ‘र’ हो जाता है।
निः + आशा = निराशा
दुः + उपयोग = दुरुपयोग
दुः + लभ = दुर्लभ
आशीः + वाद = आशीर्वाद
निः + धन = निर्धन
दुः + जन = दुर्जन
निः + गुण = निर्गुण
बहिः + मुख = बहिर्मुख
पुनः + जन्म = पुनर्जन्म
निः + यात = निर्यात
दुः + बुद्धि = दुर्बुद्धि
निः + उत्तर = निरुत्तर
निः + भय = निर्भय

3. विसर्ग का ‘श’ होना विसर्ग से पहले यदि कोई स्वर हो और बाद में ‘च’ या ‘छ’ हो तो विसर्ग का ‘श्’ हो जाता है।
निः + चल = निश्चल
निः + छल = निश्छल
निः + चय = निश्चय
दुः + चरित्र = दुश्चरित्र
दुः + शासन = दुश्शासन
निः + चिंत = निश्चित

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

4. विसर्ग का ‘स’ होना-विसर्ग के बाद यदि ‘त’ या ‘स’ हो तो विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है।
निः + संतान = निस्संतान
निः + तेज = निस्तेज
दुः + साहस = दुस्साहस
मनः + ताप = मनस्ताप
नमः + ते = नमस्ते
निः + संदेह = निस्संदेह

5. विसर्ग का ‘ष’ होना विसर्ग से पहले इ/उ और बाद में क, खं, ट, ठ, प, फ में से कोई वर्ण हो, तो विसर्ग का ‘ष’ हो जाता है।
निः + कलंक = निष्कलंक
दुः + कर = दुष्कर
बहिः + कार = बहिष्कार
निः + फल = निष्फल
दुः + प्रकृति = दुष्प्रकृति
चतुः + पाद = चतुष्पाद
निः + पाप = निष्पाप
निः + कपट = निष्कपट

6. विसर्ग का लोप(क) यदि विसर्ग से पहले अ, आ हो और बाद में कोई भिन्न स्वर हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है; जैसे
अतः + एव = अतएव

(ख) विसर्ग के बाद ‘र’ हो तो विसर्ग लुप्त हो जाता है और स्वर दीर्घ हो जाता है।
निः + रोग = नीरोग
निः + रस = नीरस
निः + रव = नीरव

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

7. विसर्ग यथारूप-यदि विसर्ग के आगे क, प, में से कोई वर्ण हो, तो विसर्ग यथारूप रहता है।
अंतः + करण = अंतःकरण
प्रातः + काल = प्रातःकाल
अधः + पतन = अधःपतन

अभ्यासार्थ कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण:
सीमा + अंत = सीमांत
निः + सार = निस्सार
भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व
प्रति + एक = प्रत्येक
दुः + कर्म = दुष्कर्म
नर + इंद्र = नरेंद्र
उत् + चारण = उच्चारण
शाक + आहारी = शाकाहारी
देव + इंद्र = देवेंद्र
मनः + विज्ञान = मनोविज्ञान
वाक् + धारा = वाग्धारा ।
उत् + मत = उन्मत्त
दुः + कृत = दुष्कृत
लोक + एषण = लोकेषण
निः + आश्रय = निराश्रय
सम् + वाद = संवाद
परम + आत्मा = परमात्मा
निः +शेष = निश्शेष

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

स्व + अर्थी = स्वार्थी
तथा + अस्तु = तथास्तु
उत् + गम = उद्गम
निः + आमिष = निरामिष
स्व + आधीन = स्वाधीन
देव + आलय = देवालय
तमः + गुण = तमोगुण
रजनी + ईश = रजनीश
भोजन + आलय = भोजनालय
सत् + जन = सज्जन
सम + रक्षक = संरक्षक
शिक्षा + अर्थी = शिक्षार्थी
सम् + सार = संसार
कृष् + न = कृष्ण
परीक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी
नमः + आकार = नमस्कार
निर् + मान = निर्माण
सरः + ज = सरोज
मनः + रथ = मनोरथ
परम + ईश्वर = परमेश्वर
मनः + हर = मनोहर
अति + इव = अतीव
महा + इंद्र = महेंद्र
दुः + दशा = दुर्दशा
आयत + आकार = आयताकार
रमा + इंद्र = रमेंद्र
निः + आशा = निराशा

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

पद्य + आत्मक = पद्यात्मक
हित + उपदेश = हितोपदेश
दुः + शासन = दुश्शासन
निः + आकार = निराकार
मानव + उचित = मानवोचित
निः + काम = निष्काम
किम् + चित् = किंचित
जल + ऊर्मि = जलोर्मि
बहिः + कार = बहिष्कार
उत् + हार = उद्धार
गंगा + उदक = गंगोदक
दिन + ईश = दिनेश
तथा + एव = तथैव
देव + ऋषि = देवर्षि
प्रति + उपकार = प्रत्युपकार
विः + छेद = विच्छेद
दया + आनंद = दयानंद
स्व + अर्थ = स्वार्थ
पुरः + हित = पुरोहित
अति + इव = अतीव
सूर्य + अस्त = सूर्यास्त

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

तपः + वन = तपोवन
गिरि + ईश = गिरीश
हरि + ईश = हरीश
मनः + दशा = मनोदशा
कवि + ईश्वर = कवीश्वर
कपी + इंद्र = कपींद्र
निः + मल = निर्मल
नदी + ईश = नदीश
उत् + हरण = उद्धरण
दुः + साहस = दुस्साहस
विधु + उदय = विधूदय
विष् + नु = विष्णु
व्याकर् + अन = व्याकरण
निः + प्राण = निष्प्राण
दुः + परिणाम = दुष्परिणाम
परि + नाम = परिणाम
इति + आदि = इत्यादि
धनुः + धारी = धनुर्धारी
अधः + गति = अधोगति
सु + अल्प = स्वल्प
दिक् + दर्शन = दिग्दर्शन
सरः + वर = सरोवर
षट् + मास = षण्मास
अंतः + जातीय = अंतर्जातीय
निः + गुण = निर्गुण

HBSE 10th Class Hindi Vyakaran संधि

वाक् + दान = वाग्दान
तव + ऐश्वर्य = तवैश्वर्य
निः + चल = निश्चल
तत् + अनुसार = तदनुसार
महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य
निः + कलंक = निष्कलंक
तत् + लीन = तल्लीन
घृत + ओदन = घृतौदन
यशः + गान = यशोगान
सम् + बंध = संबंध
तव + औषधि = तवौषधि
दुः + कर = दुष्कर
अति + अधिक = अत्याधिक
उत् + लेख = उल्लेख
सम् + योग = संयोग
दिक् + अम्बर = दिंगबर

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

HBSE 10th Class Hindi लखनवी अंदाज़ Textbook Questions and Answers

Class 10 Kshitij Chapter 12 Question Answer HBSE प्रश्न 1.
लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं?
उत्तर-
लेखक ने जब रेल के डिब्बे में प्रवेश किया तो उन्होंने देखा कि वहाँ पहले से एक सज्जन विराजमान हैं। वे सीट पर पालथी मारे बैठे हुए थे। उनके सामने एक तौलिए पर खीरे रखे हुए थे। उन्होंने लेखक की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। उसको देखते ही उनके चेहरे पर ऐसे भाव व्यक्त हुए कि जैसे लेखक का वहाँ आना उन्हें अच्छा नहीं लगा। उन्हें ऐसा लग रहा था कि जैसे लेखक ने वहाँ आकर उनके चिंतन में बाधा डाल दी हो। वे कुछ परेशान-से दिखाई दिए। अपनी इसी दशा में वे कभी खिड़की के बाहर देखते तो कभी सामने रखे खीरों की ओर। उनकी असुविधा और असंतोष वाली स्थिति से ही लेखक ने अनुभव कर लिया था, कि वे उससे बातचीत करने को उत्सुक नहीं थे।

पाठ 12 लखनवी अंदाज के प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 2.
नवाब साहब ने बहुत ही यत्न से खीरा काटा, ‘नमक-मिर्च बुरका, अंततः सूंघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? उनका ऐसा करना उनके कैसे स्वभाव को इंगित करता है?
उत्तर-
नवाबों की दूसरों पर अपना प्रभाव डालने की प्रवृत्ति होती है। उसके लिए उन्हें कुछ भी करना पड़े, वे करते हैं। इसलिए वे सामान्य समाज के तौर-तरीकों को नकारते हैं तथा नए-नए तरीके ढूँढते हैं जिनसे अपनी अमीरी को दर्शाया जा सके। नवाब साहब अकेले में बैठकर खीरे जैसी साधारण वस्तु को खाने की तैयारी में थे। किंतु उसी वक्त लेखक वहाँ आ टपका। उसे देखकर उनके मन में नवाबी स्वभाव उभर आया और उन्हें अपनी नवाबगिरी दिखाने का अवसर मिल गया। उन्होंने दुनिया के तौर-तरीकों से हटकर खीरे काटे, नमक-मिर्च लगाया, उन्हें सूंघा और खिड़की में से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा केवल सामने वाले पर अपने नवाबी स्वभाव का रौब जमाने के लिए किया।

Kshitij Class 10 Chapter 12 Question Answer HBSE प्रश्न 3.
बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है। यशपाल के इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर-
यशपाल का यह विचार अपने-आप में अधूरा-सा प्रतीत होता है। इसलिए हम इससे पूर्णतः सहमत नहीं हैं कि बिना विचारों, घटनाओं या पात्रों के कहानी लिखना संभव है। कहानी में कोई-न-कोई विचार, घटना अथवा पात्र अवश्य ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में विद्यमान रहता है। उदाहरणार्थ पठित कहानी ‘लखनवी अंदाज़’ को लिया जा सकता है। इस कहानी के लिखने के पीछे लेखक का प्रमुख उद्देश्य लखनऊ के पतनशील नवाबी वर्ग पर करारा व्यंग्य करना है। इसी विचार पर कहानी का पूरा ताना-बाना बुना गया है। इस कहानी में घटनाओं की अपेक्षा विचारों की प्रधानता है। घटना के रूप में रेलयात्रा, यात्री के रूप लखनवी नवाबों जैसा दिखने वाला सज्जन और उनके पतन को दिखाना है। अतः यह कहना उचित नहीं कि बिना विचार, घटना व पात्रों के कहानी बन सकती है।

Class 10 Ch 12 Hindi Shitish Question Answer HBSE प्रश्न 4.
आप इस निबंध को और क्या नाम देना चाहेंगे?
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में आदि से अंत तक नवाब की अकड़ या नवाब होने के अहंकार का ही उल्लेख किया गया है। वह अपने सामने की सीट पर बैठे हुए सहयात्री से बोलना भी पसंद नहीं करता। उसके सामने खीरा खाना अपनी तौहीन समझता है। वह खीरे खाने की अपेक्षा उन्हें सूंघकर चलती हुई गाड़ी की खिड़की से बाहर फेंक देता है। वह खीरों की सुगंध से ही स्वयं के संतुष्ट होने का नाटक करता है, क्योंकि खाने की वस्तु को खाकर ही संतुष्टि प्राप्त हो सकती है, सूंघकर नहीं। अतः इस पाठ का शीर्षक ‘नवाबी तहज़ीब’ हो सकता है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

रचना और अभिव्यक्ति-

लखनवी अंदाज पाठ के प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 5.
(क) नवाब साहब द्वारा खीरा खाने की तैयारी करने का एक चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया को अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।
उत्तर-
नवाब साहब ने अचानक घूमकर लेखक को आदाब-अर्ज़ किया। फिर उन्होंने तौलिए पर रखे दो ताज़े खीरे उठाए। उनको धोया, पोंछा। फिर उन्होंने लेखक से कहा, क्या आप खीरा खाना पसंद करेंगे। लेखक के मना करने पर वे खीरे को छीलकर और काटकर तौलिए पर रखने लगे। बड़े इत्मीनान से खीरे को काट चुकने के बाद उन्होंने उन कटे हुए खीरों पर नमक और मिर्च का पाउडर छिड़का। फिर बड़े इत्मीनान से एक-फाँक को उठाकर सूंघा एवं उसके स्वाद के आनंद को अनुभव किया। फिर एक-एक फाँक को वे सूंघते जाते और उसे खिड़की से बाहर फेंकते जाते।
(ख) किन-किन चीज़ों का रसास्वादन करने के लिए आप किस प्रकार की तैयारी करते हैं? उत्तर-यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

Lakhnavi Andaaz Question Answer HBSE 10th Class प्रश्न 6.
खीरे के संबंध में नवाब साहब के व्यवहार को उनकी सनक कहा जा सकता है। आपने नवाबों की और भी सनकों और शौक के बारे में पढ़ा-सुना होगा। किसी एक के बारे में लिखिए।
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

Lakhnavi Andaaz Summary HBSE 10th Class प्रश्न 7.
क्या सनक का कोई सकारात्मक रूप हो सकता है? यदि हाँ तो ऐसी सनकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
निश्चित रूप से सनक का सकारात्मक रूप हो सकता है। जितने भी बड़े-बड़े कार्य या अनुसंधान हुए हैं, वे सनकी व्यक्तियों द्वारा ही किए गए हैं। हम कुछ वैज्ञानिकों के उदाहरण ले सकते हैं। वे सनक के कारण ही रात-दिन अपने कार्य में इतने डूबे रहते हैं कि उन्हें अपने आस-पास की गतिविधियों का भी बोध नहीं रहता है। ऐसे लोग बड़े-से-बड़े जोखिम को उठाने से भी नहीं डरते। विश्व में जितनी भी बड़ी-बड़ी खोजें हुई हैं, वे सनकी वैज्ञानिकों की देन हैं। अतः स्पष्ट है कि सनक का सकारात्मक रूप भी होता है।

भाषा-अध्ययन-

लखनवी अंदाज प्रश्न उत्तर HBSE 10th Class प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्यों में से क्रियापद छाँटकर क्रिया-भेद भी लिखिए-
(क) एक सफेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे।
(ख) नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया।
(ग) ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है।
(घ) अकेले सफर का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे।
(ङ) दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोदकर झाग निकाला।
(च) नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा।
(छ) नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए।
(ज) जेब से चाकू निकाला।
उत्तर-
(क) बैठे थे – अकर्मक।
(ख) दिखाया – सकर्मक।
(ग) बैठे- अकर्मक।
कल्पना करना – अकर्मक।
है – अकर्मक।
(घ) काटना – सकर्मक।
खरीदे होंगे – सकर्मक।
(ङ) काटा – सकर्मक।
गोदकर – सकर्मक।
निकाला – सकर्मक।
(च) देखा – अकर्मक (प्रयोग)।
(छ) लेट गए – अकर्मक।
थककर – अकर्मक।
(ज) निकाला – सकर्मक।

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पाठेतर सक्रियता

‘किबला शौक फरमाएँ,’ ‘आदाब-अर्ज…शौक फरमाएँगे’ जैसे कथन शिष्टाचार से जुड़े हैं। अपनी मातृभाषा के शिष्टाचार सूचक कथनों की एक सूची तैयार कीजिए।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

‘खीरा… मेदे पर बोझ डाल देता है। क्या वास्तव में खीरा अपच करता है? किसी भी खाद्य पदार्थ का पच-अपच होना कई कारणों पर निर्भर करता है। बड़ों से बातचीत कर कारणों का पता लगाइए।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

खाद्य पदार्थों के संबंध में बहुत-सी मान्यताएँ हैं जो आपके क्षेत्र में प्रचलित होंगी, उनके बारे में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

पतनशील सामंती वर्ग का चित्रण प्रेमचंद ने अपनी एक प्रसिद्ध कहानी’ ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में किया था और फिर बाद में सत्यजीत राय ने इस पर इसी नाम से एक फिल्म भी बनाई थी। यह कहानी ढूँढकर पढ़िए और संभव हो तो फिल्म भी देखिए।
उत्तर-
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

HBSE 10th Class Hindi लखनवी अंदाज़ Important Questions and Answers

विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

Lakhnavi Andaaz Class 10 Solutions HBSE प्रश्न 1.
नवाब साहब ने लेखक के गाड़ी में चढ़ने पर कोई उत्साह क्यों नहीं दिखाया?
उत्तर-
नवाब साहब पर अभी तक सामंती प्रभाव था। वे अपने आपको विशिष्ट व्यक्ति समझते थे। यदि वे लेखक के गाड़ी में चढ़ने पर उत्साह दिखाते तो उनका सम्मान कम हो जाता, उनकी शान-ए-शौकत में बट्टा लग सकता था। उनको यह सहन नहीं था कि शहर का कोई सफेदपोश उनको मँझले दर्जे में सफर करते देखे।

प्रश्न 2.
लेखक को नवाब साहब का अचानक भाव परिवर्तन कैसा लगा?
उत्तर-
लेखक को नवाब साहब का अचानक भाव परिवर्तन अच्छा नहीं लगा। वह शराफत का भ्रम बनाए रखने के लिए ही लेखक को खीरा खाने के लिए कह रहे थे। उनके इस व्यवहार में दिखावा ही झलक रहा था।

प्रश्न 3.
लेखक और नवाब दोनों ने सेकंड क्लास में यात्रा क्यों की? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर-
पाठ में इस विषय में स्पष्ट रूप में कुछ नहीं कहा गया कि नवाब ने ऐसा क्यों किया। अनुमान लगाया जा सकता है कि नवाबों की आर्थिक दशा अच्छी नहीं रह गई थी। अब नवाब कहने मात्र के रह गए थे। इसलिए पैसे बचाने के लिए उसने सेकंड क्लास के डिब्बे में यात्रा की होगी।
लेखक ने स्वयं स्वीकार किया है कि उसने नई कहानी के संबंध में कुछ चिंतन-मनन करने या सोचने के लिए तथा खिड़की में से कुछ प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए सेकंड क्लास की यात्रा थी। दोनों का विश्वास था कि डिब्बा खाली होगा।

प्रश्न 4.
नवाब ने अपनी नवाबी का परिचय किस प्रकार दिया?
उत्तर-
नवाब ने खीरों को पहले पानी से धोया फिर उन्हें तौलिए से पोंछा फिर जेब से चाकू निकालकर उनके सिरे काटे और छीलकर उनकी फाँकें काट-काटकर तौलिए पर रखीं और उन पर नमक-मिर्च का मिश्रण छिड़का। फिर लेखक को भी खीरे खाने का निमंत्रण दिया। अन्त में एक-एक फाँक को खाने की अपेक्षा सूंघ-सूंघ कर खिड़की से बाहर फेंकने लगा। उसने ऐसा दिखावा किया कि उसे सुगंध से ही बहुत तृप्ति मिली थी।

प्रश्न 5.
लेखक को नवाब साहब का न बोलना और बोलना दोनों ही बुरे लगे, क्यों?
उत्तर-
लेखक ने जब रेल के डिब्बे में प्रवेश किया तो नवाब अपनी सीट पर बैठा रहा। उसने लेखक की ओर देखना भी गवारा न किया। लेखक को नवाब साहब की यह अकड़ बुरी लगी। इसी प्रकार नवाब ने जब लेखक को खीरे खाने का निमंत्रण दिया तो लेखक को बुरा लगा क्योंकि उसे ऐसा अनुभव हुआ कि वह ऐसा करके अपना प्रभाव उस पर जमा रहा है। वह नहीं चाहता कि नवाब उस पर अपनी झूठी शान-ए-शौकत का प्रभाव छोड़े। लेखक को ऐसा नवाबों के प्रति अपनी पूर्व-धारणा के कारण भी लगा होगा।

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विचार/संदेश संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 6.
‘लखनवी अंदाज़’ पाठ का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
यह पाठ एक महत्त्वपूर्ण संदेश की अभिव्यक्ति करता है। इस पाठ के माध्यम से लेखक ने बताया है कि हर रचना के पीछे कोई-न-कोई विचार या चिंतन अवश्य रहता है। उस विचार या चिंतन को रचना में प्रस्तुत करने के लिए लेखक को एक निश्चित प्रक्रिया में से गुज़रना पड़ता है। इस रचना का प्रमुख संदेश दिखावा पसंद लोगों की जीवन शैली को दिखाना है। लेखक को रेल के डिब्बे में एक नवाब मिलता है। वह खीरे खाने की तैयारी में था, किंतु डिब्बे में लेखक के आ जाने से लेखक के सामने खीरे खाने में उसे संकोच होता है। इसलिए वह खीरे खाने की तैयारी विशेष ढंग से करता है किंतु उन्हें खाने की अपेक्षा सँघकर खिड़की के बाहर फेंक देता है तथा तृप्ति अनुभव करने का दिखावा करता है। अतः नवाब के इस व्यवहार से पता चलता है कि जो लोग जिस कार्य को एकांत में छुपकर करते हैं, उसे दूसरों के सामने करने में अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। यहाँ उनके चोरी आहार की तुष्टि होती है। इसमें वास्तविकता कुछ भी नहीं है, मात्र दिखावा है।

प्रश्न 7.
लेखक ने नवाब की असुविधा व संकोच को कैसे अनुभव किया?
उत्तर-
लेखक रेल के जिस डिब्बे में चढ़ा, वहाँ पहले से ही एक सज्जन पालथी मारे बैठा था। उनके डिब्बे में प्रवेश करने पर पहले से ही उपस्थित व्यक्ति ने लेखक को दुआ-सलाम कुछ भी नहीं कहा, अपितु वह उससे नज़रें बचाने का प्रयास करता रहा। लेखक ने उसकी इसी असुविधा और संकोच से अनुमान लगाया कि वह नहीं चाहता था कि कोई उसे वहाँ बैठे हुए देखे कि नवाब होते हुए सेकंड क्लास में यात्रा कर रहा है। उसके सामने रखे हुए खीरों से तो उनका संकोच और भी बढ़ गया था जिसे सही देखा जा सकता था। उन खीरों को लेखक के सामने खाने में भी उसे संकोच हो रहा था। सेकंड क्लास में यात्रा करना और खीरे खाना उसकी असुविधा और संकोच का कारण बन रहे थे जिसे लेखक ने सहज ही अनुभव कर लिया था।

प्रश्न 8.
‘लखनवी अंदाज’ पाठ में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
लखनवी अंदाज’ पाठ में लेखक ने उन लोगों पर व्यंग्य किया है जो जीवन की शान-बान का दिखावा करते हैं। वे जीवन की सहजता व स्वाभाविकता को स्वीकार करने से इन्कार करते हैं। लेखक ने दिखाया है कि खीरा एक साधारण वस्तु है तथा आम लोग उसका सेवन करते हैं किन्तु वह लखनवी नवाब उसे खाने में अपनी तौहीन समझता है। उसे सूंघकर चलती गाड़ी से नीचे फैंक देता है। वे इसी में अपनी महानता समझते हैं। ऐसे लोग सेकंड क्लास में यात्रा करना भी अपना बड़प्पन समझते हैं। इस प्रकार लेखक ने तथाकथित नवाबों के दिखावटी जीवन पर करारा व्यंग्य किया है।

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अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘लखनवी अंदाज़’ शीर्षक पाठ के लेखक का क्या नाम है?
उत्तर-
‘लखनवी अंदाज़’ शीर्षक पाठ के लेखक का नाम यशपाल है।

प्रश्न 2.
‘नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश पालथी मारे बैठे थे’-‘सफेदपोश’ का अर्थ क्या है?
उत्तर-
“सफेदपोश’ का अर्थ भद्रपुरुष है।

प्रश्न 3.
लेखक ने खीरा खाने से क्यों इंकार कर दिया था?
उत्तर-
आत्म-सम्मान की रक्षा हेतु लेखक ने खीरा खाने से इंकार कर दिया था।

प्रश्न 4.
नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की के बाहर क्यों फेंक दिया था?
उत्तर-
खानदानी रईसों का अंदाज दिखाने के लिए नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की से बाहर फेंक दिया था।

प्रश्न 5.
लेखक की पुरानी आदत क्या थी?
उत्तर-
अकेले में तरह-तरह की कल्पनाएँ करना लेखक की पुरानी आदत थी।

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प्रश्न 6.
लेखक के अनुसार नवाबों की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर-
लेखक के अनुसार अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझना नवाबों की प्रमुख विशेषता है।

प्रश्न 7.
‘खीरे की पनियाती फाँके देखकर पानी मुँह में जरूर आ रहा था’ यहाँ ‘पनियाती’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर-
यहाँ ‘पनियाती’ शब्द का अर्थ है रसीली।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने ‘लखनवी अंदाज़’ शीर्षक पाठ में किस पर कटाक्ष/व्यंग्य किया है?
(A) कृषक वर्ग पर
(B) पतनशील सामंती वर्ग पर
(C) मध्य वर्ग पर
(D) निम्न मध्य वर्ग पर
उत्तर-
(B) पतनशील सामंती वर्ग पर

प्रश्न 2.
ट्रेन के सेकंड क्लास डिब्बे में एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के कैसे सज्जन पालथी मारे बैठे थे?
(A) सफेदपोश
(B) नवाब
(C) लम्बी दाड़ी वाले
(D) पठानी पोशाक वाले
उत्तर-
(A) सफेदपोश

प्रश्न 3.
‘नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश पालथी मारे बैठे थे’-‘सफेदपोश’ का अर्थ है-
(A) सफेद कपड़े पहने व्यक्ति
(B) सफेद दाढ़ी वाला व्यक्ति
(C) नवाब
(D) भद्रपुरुष
उत्तर-
(D) भद्रपुरुष

प्रश्न 4.
सफेदपोश सज्जन ने तौलिए पर कौन-सी वस्तु रखी हुई थी?
(A) आम
(B) तरबूज
(C) खीरे
(D) नींबू
उत्तर-
(C) खीरे

प्रश्न 5.
‘आँखें चुराना’ मुहावरे का अर्थ है-
(A) आँखों की चोरी करना
(B) आँखें न रहना
(C) नज़रें बचाना
(D) आँखों को छुपा देना
उत्तर-
(C) नज़रें बचाना

प्रश्न 6.
लेखक की दृष्टि में ‘खीरा’ किस वर्ग का प्रतीक है?
(A) मामूली लोगों के वर्ग का
(B) उच्च वर्ग का
(C) सामंती वर्ग का
(D) मध्यवर्ग का
उत्तर-
(A) मामूली लोगों के वर्ग का

प्रश्न 7.
नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को किस प्रकार देखा था?
(A) नवाबी
(B) खोई-खोई
(C) लालची
(D) सतृष्ण
उत्तर-
(D) सतृष्ण

प्रश्न 8.
नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की के बाहर क्यों फेंक दिया था?
(A) कड़वी होने के कारण
(B) खराब होने के कारण
(C) खानदानी रईसों का अंदाज दिखाने के लिए
(D) मूर्खता के कारण
उत्तर-
(C) खानदानी रईसों का अंदाज दिखाने के लिए

प्रश्न 9.
“खीरा लज़ीज़ होता है लेकिन होता है सकील, नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है।” ये शब्द किसने कहे हैं?
(A) डॉक्टर ने
(B) कथानायक ने
(C) तीसरे मुसाफिर ने
(D) नवाब साहब ने
उत्तर-
(D) नवाब साहब ने

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प्रश्न 10.
‘ज्ञान-चक्षु खुलना’ का अर्थ है-
(A) आँखें खुलना
(B) ज्ञान के द्वार खुलना
(C) ज्ञान होना
(D) ज्ञान की नदी बहना
उत्तर-
(C) ज्ञान होना

प्रश्न 11.
गाड़ी के डिब्बे में कौन बैठा था?
(A) टिकट निरीक्षक
(B) जेबकतरा
(C) नवाबी नस्ल का व्यक्ति
(D) स्वयं लेखक
उत्तर-
(C) नवाबी नस्ल का व्यक्ति

प्रश्न 12.
लेखक के अनुमान के प्रतिकूल क्या था?
(A) डिब्बा खाली नहीं था
(B) डिब्बा भरा हुआ था
(C) डिब्बा साफ नहीं था
(D) डिब्बा छोटा था
उत्तर-
(A) डिब्बा खाली नहीं था

प्रश्न 13.
नवाब साहब ने पलकें क्यों मूंद ली थीं?
(A) आनंदित होने के दिखावे के कारण
(B) अपने-आपको श्रेष्ठ दिखाने के लिए
(C) लेखक को हीन समझने के कारण
(D) अपनी संतुष्टि प्रकट करने के कारण
उत्तर-
(A) आनंदित होने के दिखावे के कारण।

प्रश्न 14.
नवाब साहब ने खीरे का स्वाद कैसे प्राप्त किया?
(A) खाकर
(B) सूंघकर
(C) देखकर
(D) दूसरों से सुनकर
उत्तर-
(B) सूंघकर

प्रश्न 15.
‘खीरा लज़ीज़ होता है लेकिन होता है सकील’ यहाँ ‘सकील’ शब्द का अर्थ है-
(A) आसानी से न पचने वाला
(B) सुपाच्य
(C) रसीला
(D) कोमल
उत्तर-
(A) आसानी से न पचने वाला

प्रश्न 16.
‘मुफस्सिल की पैसेंजर ट्रेन चल पड़ने की उतावली से फूंकार रही थी’-यहाँ ‘मुफस्सिल’ का अर्थ है-
(A) यात्रियों
(B) केन्द्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द के स्थान
(C) वातानुकूलित
(D) लम्बी दूरी
उत्तर-
(B) केन्द्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द के स्थान

प्रश्न 17.
यशपाल ने खीरे को क्या माना है?
(A) अपदार्थ वस्तु
(B) बहुमूल्य फल
(C) दुर्लभ फल
(D) अमर फल
उत्तर-
(A) अपदार्थ वस्तु

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प्रश्न 18.
लखनऊ के खीरे की विशेषता थी
(A) आलम
(B) लज़ीज़
(C) बालम
(D) देसी
उत्तर-
(B) लज़ीज़

प्रश्न 19.
नवाब साहब रेलगाड़ी में किस श्रेणी में सफर कर रहे थे?
(A) प्रथम श्रेणी
(B) वातानुकूलित
(C) तृतीय श्रेणी
(D) द्वितीय श्रेणी
उत्तर-
(D) द्वितीय श्रेणी

लखनवी अंदाज़ गद्यांशों के आधार पर अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(1) गाड़ी छूट रही थी। सेकंड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझकर, ज़रा दौड़कर उसमें चढ़ गए। अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा निर्जन नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। सामने दो ताजे-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे। डिब्बे में हमारे सहसा कद जाने से सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में विघ्न का असंतोष दिखाई दिया। सोचा, हो सकता है, यह भी कहानी के लिए सूझ की चिंता में हों या खीरे-जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हों।
नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। हमने भी उनके सामने की बर्थ पर बैठकर आत्मसम्मान में आँखें चुरा ली।
[पृष्ठ 78]

प्रश्न-
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक क्या सोचकर सेकंड क्लास के डिब्बे में चढ़ा था?
(ग) लेखक के अनुमान के प्रतिकूल क्या था?
(घ) गाड़ी के डिब्बे में कौन और कैसे बैठा था?
(ङ) लेखक ने पहले से बैठे सज्जन के विषय में क्या कल्पना की?
(च) लेखक और पहले से बैठे सज्जन ने एक-दूसरे से कैसा व्यवहार किया?
(छ) ‘लखनऊ की नवाबी नस्ल के सफेदपोश सज्जन’ में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
(ज) पहले बैठे सज्जन के सामने क्या रखा हुआ था?
(झ) उपर्युक्त गद्यांश का प्रसंग लिखते हुए आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज़। लेखक का नाम यशपाल।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

(ख) लेखक यह सोचकर सेकंड क्लास के डिब्बे में चढ़ा था कि यह डिब्बा बिल्कुल खाली होगा। उसमें कोई यात्री नहीं होगा। वह वहाँ बैठकर अपनी इच्छानुसार बाहर के दृश्य देख सकेगा और चिंतन-मनन कर सकेगा।

(ग) लेखक के अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा बिल्कुल खाली नहीं था. अथवा डिब्बे का वातावरण बिल्कुल निर्जन नहीं था क्योंकि उसमें पहले से ही एक नवाबी स्वभाव वाला व्यक्ति बैठा हुआ था। इसलिए लेखक के लिए वहाँ बैठकर नई कहानी के विषय में सोचना संभव न हो सका।

(घ) गाड़ी के डिब्बे की बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल का एक सफेदपोश सज्ज़न बड़ी सुविधा से पालथी मारकर बैठा हुआ था।

(ङ) लेखक जब गाड़ी में आया तो उसने वहाँ एक लखनवी नवाबी किस्म के व्यक्ति को अकेले बैठे देखा। उसे देखकर लेखक ने कल्पना की कि हो सकता है कि यह भी कहानी के लिए सूझ की चिंता में हो या फिर खीरे जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हो।

(च) लेखक और पहले से बैठे व्यक्ति ने एक-दूसरे के प्रति अनजान, बेगानेपन और अवांछितों जैसा व्यवहार किया। मानो दोनों एक-दूसरे को अपने रास्ते में बाधा समझ रहे हों। पहले नवाबी स्वभाव वाले व्यक्ति ने लेखक की ओर से मुँह फेरा तो फिर उसने भी आत्म-सम्मान की रक्षा हेतु उसकी ओर से ध्यान हटा लिया। इस प्रकार दोनों का एक-दूसरे के प्रति सम्मानजनक व्यवहार नहीं रहा।

(छ) प्रस्तुत वाक्य के माध्यम को लेखक ने नवाबी स्वभाव वाले की विचित्रता को अभिव्यक्त किया है। वे स्वयं को बहुत ही नाजुक-मिज़ाज एवं सलीकेदार मनुष्य समझते हैं और दूसरों को हीन भाव से देखते हैं। उनकी ये विशेषताएँ कुछ अधिक बढ़ी-चढ़ी हुई होती हैं। वे अपने-आपको वास्तविकता से अधिक दिखाने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोगों की इस विचित्रता को दिखाने के लिए ‘नस्ल’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। मानो ये इंसान की नस्ल के न होकर अन्य किसी प्रजाति के लोग हों।

(ज) पहले बैठे हुए सज्जन के सामने तौलिए पर दो खीरे रखे हुए थे।

(झ) प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 2 में संकलित पाठ ‘लखनवी अंदाज’ में से लिया गया है। इसके रचयिता श्री यशपाल हैं। इस पाठ में लेखक ने पतनशील सामंती वर्ग के दिखावे की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है। यह वर्ग दिखावटी शैली का आदी है तथा वास्तविकता से बेखबर रहता है।

आशय/व्याख्या-लेखक को पास के स्टेशन तक की यात्रा करनी थी। इसलिए वह टिकट खरीदकर सेंकड क्लास के एक छोटे से डिब्बे में दौड़कर चढ़ गया। लेखक का अनुमान था कि डिब्बा खाली होगा, किंतु ऐसा नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल का व्यक्ति बड़े आराम से बैठा हुआ था। उसने अपने सामने दो कच्चे खीरे तौलिए पर रखे हुए थे। लेखक के एकाएक डिब्बे में आ जाने से उस भद्रपुरुष की आँखों में एकांत चिंतन में बाधा का असंतोष स्पष्ट देखा जा सकता था। लेखक का अनुमान था कि शायद यह व्यक्ति भी कहानी लिखने की सूझ की चिंता में हो अथवा खीरे जैसी सस्ती वस्तु का शौक करते हुए देखे जाने के संकोच में हो। नवाब साहब ने लेखक की संगति करने की इच्छा व्यक्त नहीं की। लेखक ने भी आत्मसम्मान की रक्षा हेतु उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। कहने का भाव है कि दोनों ने एक-दूसरे के प्रति सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया।

(2) ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिल्कुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफायत के विचार से सेकंड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर का कोई सफेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफर करता देखे।… अकेले सफर का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे और अब किसी सफेदपोश के सामने खीरा कैसे खाएँ? । – [पृष्ठ 78]

प्रश्न-
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक की पुरानी आदत क्या और क्यों है?
(ग) लेखक ने नवाब के बारे में क्या सोचा?
(घ) लेखक नवाबों के विषय में किस धारणा से ग्रस्त है?
(ङ) यद्यपि लेखक ने भी सेकंड क्लास में यात्रा की फिर भी उसने नवाबों के चरित्र में कमियाँ निकाली, ऐसा क्यों?
(च) नवाब साहब खीरे क्यों नहीं खा रहे थे?
(छ) प्रस्तुत गद्यांश का प्रसंग लिखकर आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज़। लेखक का नाम यशपाल।

(ख) लेखक की पुरानी आदत थी कि जब वह अकेला होता तो तरह-तरह की कल्पनाएँ करने लगता था। लेखक होने के कारण वह कल्पना के आधार पर अपनी रचनाओं का निर्माण करता था। खाली समय में वह यही सोचता रहता था कि कौन-सी रचना लिखी जाए और उसका रूप-आकार कैसा होगा।

(ग) लेखक ने जब गाड़ी के डिब्बे में प्रवेश किया तो वहाँ नवाब साहब को देखकर सोचा होगा कि शायद ये इस डिब्बे में अकेले यात्रा करना चाहते होंगे। उन्होंने अंदाज़ा लगाया होगा कि सेकंड क्लास का डिब्बा खाली होगा। इसलिए उन्होंने किराया बचाने के लिए भी सेकंड क्लास का टिकट खरीदा होगा। किंतु अब वे नहीं चाहते कि कोई सफेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में यात्रा करते हुए देखे। वे इसे अपनी तौहीन समझते होंगे।

(घ) लेखक के मन में नवाबों के विषय में धारणा बन चुकी थीं कि ये नवाब अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं और सदा अपनी आन-शान के विषय में बढ़ा-चढ़ाकर बातें करने में लगे रहते हैं। वे स्वयं को ऊँचे दर्जे के प्राणी मानते हैं और ऊँचे दर्जे में यात्रा करके अपने आप को ऊँचे सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। यदि कभी सेकंड क्लास के डिब्बे में यात्रा करते देख लिए जाएँ तो अपनी तौहीन समझने लगते हैं। इसलिए ऐसे अवसर पर वे नज़रें चुराते फिरते हैं।

(ङ) निश्चय ही लेखक स्वयं सेकंड क्लास के दर्जे में यात्रा करता है और इसी दर्जे में नवाब को बैठे देखकर उसमें कमियाँ निकालता है। वह अपने विषय में कहता है कि उसने एकांत में बैठकर नई कहानी के विषय में चिंतन करने हेतु ही ऐसा किया। यद्यपि नवाब ने भी किसी ऐसे ही कारण से मँझोले दर्जे में यात्रा करने का निश्चय किया होगा। किंतु लेखक की धारणा बन चुकी है कि नवाब हमेशा ही अपनी शान बघारते रहते हैं। अतः लेखक पूर्व धारणा से ग्रस्त होने के कारण ऐसा कहता है।

(च) लेखक के अनुसार नवाब साहब ने अकेले में सफर करने के लिए, खीरे खाने के लिए खरीदे होंगे। किंतु अब खीरे इसलिए नहीं खा रहे होंगे कि कोई सफेदपोश व्यक्ति उन्हें खीरे जैसी सामान्य वस्तु खाते देख रहा है। इससे उनकी तौहीन होगी।

(छ) प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 2 में संकलित ‘लखनवी अंदाज़’ नामक पाठ से अवतरित है। इस पाठ के रचयिता श्री यशपाल हैं। इस पाठ में उन्होंने जहाँ एक ओर सामंती वर्ग के दिखावे की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है वहीं दूसरी ओर लेखकों की कल्पनाशीलता को भी उजागर किया है।

आशय/व्याख्या इन पंक्तियों में लेखक ने बताया है कि लेखक कल्पनाशील एवं एकांतप्रिय होते हैं। वे आसपास के जीवन को गहराई से देखते हैं तथा मानव-मनोविज्ञान में भी रुचि रखते हैं। लेखक सामने बैठे नवाब साहब की असुविधा एवं संकोच के कारण का अनुमान लगाने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिल्कुल अकेले में यात्रा करने के विचार से ही सेकंड क्लास की टिकट खरीदी हो क्योंकि आम लोग सेकंड क्लास में सफर नहीं करते। अब उन्हें यह बात भी अच्छी नहीं लगी होगी कि नगर का शिक्षित व्यक्ति उन्हें मध्य श्रेणी के दर्जे में सफर करते देखे। लेखक का अनुमान है कि उसने समय काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे, किंतु अब उन्हें किसी शिक्षित व्यक्ति के सामने खीरे खाने में संकोच हो रहा हो। कहने का भाव है कि नवाब साहब अपने-आपको अमीर व्यक्ति दिखाने का प्रयास कर रहे थे, जबकि वास्तव में वे थे नहीं। खीरा एक अति साधारण फल है। लेखक के सामने खीरा खाने से नवाब साहब की हेठी होती थी। इसलिए वह खीरे को कैसे खा सकता था।

(3) नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा। खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ निश्वास लिया। खीरे की एक फाँक उठाकर होंठों तक ले गए। फाँक को सँघा। स्वाद के आनंद में पलकें मुंद गईं। मुँह में भर आए पानी का बूट गले से उतर गया। तब नवाब साहब ने फाँक को खिड़की से बाहर छोड़ दिया। नवाब साहब खीरे की फाँकों को नाक के पास ले जाकर, वासना से रसास्वादन कर खिड़की के बाहर फेंकते गए। [पृष्ठ 79-80]

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

प्रश्न-
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) नवाब साहब ने खीरे की फाँकों की ओर किस प्रकार देखा?
(ग) नवाब साहब ने खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ साँस क्यों लिया?
(घ) नवाब साहब ने अपनी पलकें क्यों मूंद लीं?
(ङ) नवाब साहब खीरे की फाँकों को खिड़की के बाहर क्यों फेंकने लगे?
(च) नवाब साहब ने खीरे की फाँकों का स्वाद कैसे प्राप्त किया?
(छ) प्रस्तुत गद्यांश का प्रसंग लिखकर आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज़। लेखक का नाम यशपाल।

(ख) नवाब साहब ने खीरे की फाँकों की ओर सतृष्ण नज़रों से देखा मानो वह खीरा खाने के लिए बहुत ही उतावले हों।

(ग) नवाब साहब ने खिड़की से बाहर देखकर दीर्घ साँस इसलिए भरी थी क्योंकि वे चाहकर भी खीरा नहीं खा पा रहे थे। यही कारण था कि उन्हें खीरे की फाँकों को खिड़की से बाहर फेंकना पड़ा था। उनकी लंबी साँस ही उनकी खीरे को खाने की चाह को भी व्यक्त कर रही थी।

(घ) नवाब साहब खीरे के स्वाद के आनंद में डूबे हुए थे, उनकी खुशबू से आनंदित होकर उन्होंने अपनी आँखें मूंद ली थीं।

(ङ) नवाब साहब खीरे की फाँकों को खिड़की के बाहर फेंककर यह दर्शाना चाहते थे कि वे अब भी वही पुराने नवाब हैं। उनके शौक शाही हैं। उनमें किसी प्रकार का अंतर नहीं आया है।

(च) नवाब साहब ने खीरे की कटी हुई फाँक को उठाया, अपनी ललचाई हुई दृष्टि से उन्हें अपने होंठों तक ले आए। इसके बाद फाँक को भली-भाँति सूंघा। उन्हें ऐसा करने से बहुत आनंद प्राप्त हुआ। सूंघने के पश्चात् उन्हें खिड़की के बाहर फेंक दिया।

(छ) प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 2 में संकलित एवं श्री यशपाल द्वारा रचित व्यंग्य पाठ ‘लखनवी अंदाज’ से लिया गया है। इस पाठ में लेखक ने सामंती वर्ग की दिखावा करने की आदत का व्यंग्यपूर्ण उल्लेख किया है। इन पंक्तियों में लेखक ने बताया है कि नवाब साहब किस प्रकार अपनी नवाबी शान, खानदानी तहज़ीब, लखनवी अंदाज और नज़ाकत प्रकट करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने आम व्यक्ति की तरह खीरा नहीं खाया, अपितु उसे सूंघ कर ही पेट भर लिया।

आशय/व्याख्या-लेखक कहता है कि नवाब साहब ने बहुत ललचाई हुई आँखों से नमक-मिर्च लगी हुई खीरे की चमकती हुई फाँकों को देखा। उन्होंने खिड़की की ओर देखकर एक लंबी साँस ली। इस प्रकार खीरे को देखकर लंबी साँस भरना नवाब साहब की विवशता को दर्शाता है। उन्होंने फाँक को हाथ में उठाया और सूंघा। स्वाद के आनंद का दिखावा करने के लिए पलकें बंद कर ली, किंतु मुँह में भर आए पानी का यूंट उनके गले से उतर गया। कहने का भाव है कि भले ही नवाब साहब खीरा न खाने का ढोंग कर रहे थे, किंतु वास्तविकता तो यह थी कि खीरे को देखकर उसे खाने के लिए उनका मन ललचा रहा था। तब नवाब साहब ने खीरे की फाँक को खिड़की से बाहर फेंक दिया। इस प्रकार नवाब साहब ने सभी फाँकों को नाक के पास ले जाकर केवल सूंघकर उसका रसास्वादन करके उन्हें खिड़की से बाहर फेंक दिया। कहने का भाव है कि नवाब साहब को फाँकों को इसलिए फैंकना पड़ा था क्योंकि वे चाहकर भी दूसरे व्यक्ति के सामने खीरे जैसी साधारण वस्तु नहीं खाना चाहते थे। उनके द्वारा ली गई लंबी साँस ही उनकी खीरा खाने की चाह को व्यक्त कर रही थी।

(4) नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए। हमें तसलीम में सिर खम कर लेना पड़ा-यह है खानदानी तहज़ीब, नफासत और नज़ाकत!
हम गौर कर रहे थे, खीरा इस्तेमाल करने के इस तरीके को खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से संतुष्ट होने का सूक्ष्म, नफीस या एब्स्ट्रैक्ट तरीका ज़रूर कहा जा सकता है परंतु क्या ऐसे तरीके से उदर की तृप्ति भी हो सकती है?
नवाब साहब की ओर से भरे पेट के ऊँचे डकार का शब्द सुनाई दिया और नवाब साहब ने हमारी ओर देखकर कह दिया, ‘खीरा लज़ीज़ होता है लेकिन होता है सकील, नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है।’ । [पृष्ठ 80]

प्रश्न-
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) नवाब साहब क्यों थककर लेट गए थे?
(ग) नवाब साहब ने खीरा खाने की तैयारी कैसे की?
(घ) नवाब साहब की जीवन शैली देखकर लेखक ने क्या सोचा?
(ङ) लेखक को नवाब साहब की किस बात पर सिर खम करना पड़ा?
(च) नवाब साहब डकार लेकर क्या दिखाना चाहते थे?
(छ) नवाब साहब ने खीरा न खाने का क्या कारण बताया?
(ज) प्रस्तुत गद्यांश का प्रसंग बताकर उसके आशय को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज़।
लेखक का नाम-यशपाल।

(ख) नवाब साहब को खीरे खाने की तैयारी में खीरे को धोने, साफ करने, सिरे काटकर मलने, छीलने, फाँके काटने, नमकमिर्च छिड़कने आदि कार्य करने और चाहकर भी उन्हें खा नहीं पाने के कारण थक गए थे।

(ग) नवाब साहब ने खीरों के नीचे रखा तौलिया झाड़कर अपने सामने बिछा लिया। सीट के नीचे से पानी का लोटा निकालकर खीरों को खिड़की के बाहर धोया और तौलिए से साफ किया। जेब से चाकू निकालकर दोनों खीरों के सिरों को काटा
और उन्हें गोदकर झाग निकाला। खीरों को सावधानी से छीला और फिर उनकी एक-एक फाँक काटते गए और तौलिए पर सजाते गए। तत्पश्चात् उन पर नमक-मिर्च छिड़का। अब खीरे खाने हेतु तैयार थे।

(घ) नवाब साहब की जीवन-शैली देखकर लेखक ने मन-ही-मन सोचा कि केवल स्वाद और सुगंध की कल्पना से उनका पेट कैसे भरता होगा? जब खीरा सूंघकर फेंक दिया तो पेट की तीव्र भूख कैसे शांत होगी। ऐसा करने से भूख का शांत होना तो असंभव ही है।

(ङ) लेखक को नवाब साहब द्वारा खीरे के प्रयोग की विधि पर अपना सिर झुकाना पड़ा था। वे किस प्रकार अपनी खानदानी शिष्टता, स्वच्छता तथा कोमलता का दिखावा करते हुए खीरे का रसास्वादन मात्र सूंघकर करते हैं। केवल अपनी शान-बान बघारने के लिए वे ऐसा क्यों करते हैं? वे सहज जीवन में शर्म अनुभव क्यों करते हैं।

(च) नवाब साहब ने डकार लेकर यह बताना चाहा है कि उनका पेट सुगंध और कल्पना से ही भर गया है। साथ ही यह भी दिखाना चाहते हैं कि वे ऊँचे, श्रेष्ठ और सूक्ष्म स्वादप्रिय व्यक्ति हैं।

(छ) नवाब साहब ने खीरा न खाने का कारण बताते हुए कहा कि खीरा होता तो बहुत ही स्वादिष्ट है, किंतु वह आसानी से पचता नहीं। इससे मेदे पर बोझा पड़ता है। इसलिए वे खीरा नहीं खाते।

(ज) प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 2 में संकलित पाठ ‘लखनवी अंदाज’ से उद्धृत है। इस पाठ के रचयिता श्री यशपाल हैं। इस गद्यांश में लेखक ने नवाबों के खीरा खाने की शैली अथवा केवल सूंघकर या कल्पना से पेट भरने के दिखावे पर कटाक्ष किया है। यहाँ लेखक ने नवाब द्वारा खीरा न खाने के बहाने को भी उजागर किया है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

आशय/व्याख्या-लेखक का कथन है कि नवाब साहब खीरे खाने की तैयारी और उसके प्रयोग से थककर लेट गए। लेखक को सम्मान में सिर झुकाना पड़ा कि यह है उनकी पारिवारिक शिष्टता, स्वच्छता और नाजुक मिज़ाजी अर्थात् कोमलता। कहने का भाव है कि नवाब साहब ने खीरा काटने व खाने में अपनी नवाबी शान-शौकतं को बड़ी सफाई से दिखाया। लेखक बताता है कि वह भली-भाँति देख रहा था कि खीरे को प्रयोग करने के इस ढंग को खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से संतुष्ट होने का सूक्ष्म, बढ़िया अथवा अमूर्त ढंग अवश्य कहा जा सकता है, किंतु क्या खीरा खाने के ऐसे ढंग से पेट की तृप्ति भी हो सकती है अर्थात् क्या खीरा सूंघने मात्र से पेट भर सकता है। लेखक को नवाब साहब द्वारा ली गई डकार का शब्द सुनाई दिया। इससे अनुमान लगाया जा सकता था कि वास्तव में ही नवाब साहब का पेट भर गया होगा। नवाब साहब ने डकार लेने के बाद लेखक की ओर देखकर कहा कि यह खीरा भी स्वादिष्ट होता है, किंतु होता बहुत भारी है। अभागा मेदे पर बोझ डाल देता है, अर्थात् जल्दी से हज़्म नहीं होता। कहने का भाव है कि नवाब साहब ने डकार मारने से यह सिद्ध करना चाहा है कि बड़े लोग साधारण तरीके से नहीं खाते। उनके अपने ही अंदाज होते हैं।

लखनवी अंदाज़ Summary in Hindi

लखनवी अंदाज़ लेखक-परिचय

प्रश्न-
यशपाल का जीवन परिचय एवं उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय-यशपाल हिंदी के प्रमुख कहानीकारों में से एक हैं। इनका जन्म 3 दिसंबर, सन् 1903 को पंजाब के फीरोज़पुर छावनी में हुआ था। सन् 1921 में फीरोज़पुर जिले से मैट्रिक परीक्षा में प्रथम आकर उन्होंने अपनी कुशाग्र प्रतिभा का परिचय दिया। सन् 1921 में ही इन्होंने स्वदेशी आंदोलन में सहपाठी लाजपतराय के साथ जमकर भाग लिया। इन्हें सरकार की ओर से प्रथम आने पर छात्रवृत्ति भी मिली। परंतु न केवल इन्होंने उस छात्रवृत्ति को ठुकरा दिया, बल्कि सरकारी कॉलेज में नाम लिखवाना भी मंजूर नहीं किया। शीघ्र ही यशपाल काँग्रेस से उदासीन हो गए। इन्होंने पंजाब के राष्ट्रीय नेता लाला लाजपतराय द्वारा स्थापित लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहाँ से प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु के संपर्क में आए।

कॉलेज के विद्यार्थी जीवन में ही ये क्रांतिकारी बन गए। भगतसिंह द्वारा सार्जेंट सांडर्स को गोली मारना, दिल्ली असेम्बली पर बम फेंकना तथा लाहौर में बम फैक्टरी पकड़े जाना आदि इन सभी षड्यंत्रों में उनका भी हाथ था। बाद में समाजवादी प्रजातंत्र सेना के अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद के इलाहाबाद में, अंग्रेजों की गोली का शिकार हो जाने पर ये इस सेना के कमांडर नियुक्त हुए। 23 फरवरी, 1932 को अंग्रेजों से लड़ते हुए ये गिरफ्तार हो गए। इन्हें चौदह वर्ष की सज़ा हो गई। जेल में ही इन्होंने विश्व की अनेक भाषाओं; जैसे फ्रेंच, इटालियन, बांग्ला आदि का अध्ययन किया। जेल में ही इन्होंने अपनी प्रारंभिक कहानियाँ लिखीं। सन 1936 में जेल में ही इनका विवाह प्रकाशवती कपूर से हुआ। इनकी तरह वे भी क्रांतिकारी दल की सदस्या थीं। उनका झुकाव मार्क्सवादी चिंतन की ओर अधिक हुआ। उनकी कहानी ‘मक्रील’ के द्वारा उन्हें बहुत यश मिला। उनकी यह कहानी ‘भ्रमर’ नामक पत्रिका में भी प्रकाशित हुई थी। उन्होंने हिंदी साहित्य की सेवा साहित्यकार और प्रकाशक दोनों रूपों में की। 26 दिसंबर, 1976 को उनकी मृत्यु हो गई।

2. प्रमुख रचनाएँ-यशपाल ने अनेक रचनाओं का निर्माण किया, उनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं- ..

  • कहानी संग्रह-‘पिंजरे की उड़ान’, ‘वो दुनिया’, ‘तर्क का तूफान’, ‘ज्ञानदान’, ‘अभिशप्त’, ‘फूलों का कुर्ता’, ‘धर्म-युद्ध’, ‘उत्तराधिकारी’, ‘चित्र का शीर्षक’, ‘तुमने क्यों कहा था कि मैं सुंदर हूँ’, ‘उत्तमी की माँ’, ‘ओ भैरवी’, ‘सच बोलने की भूल’, ‘खच्चर और आदमी’, ‘भूख के तीन दिन’, ‘लैंप शेड’ ।
  • उपन्यास ‘दादा कॉमरेड’, ‘देशद्रोही’, ‘दिव्या’, ‘पार्टी कॉमरेड’, ‘मनुष्य के रूप’, ‘अमिता’, ‘झूठा सच’, ‘बारह घंटे’, ‘अप्सरा का श्राप’, ‘क्यों फँसे’, ‘मेरी तेरी उसकी बात’।
  • व्यंग्य लेख-चक्कर क्लब’ ।
  • संस्मरण-‘सिंहावलोकन’।
  • विचारात्मक निबंध ‘मार्क्सवाद’, ‘न्याय का संघर्ष’, ‘गाँधीवाद की शव परीक्षा’, ‘बात-बात में बात’, ‘चीनी कम्युनिस्ट पार्टी’, ‘रामराज्य की कथा’, ‘लोहे की दीवार के दोनों ओर’।

3. भाषा-शैली-भाषा के बारे में यशपाल जी का बड़ा ही उदार दृष्टिकोण रहा है। उन्होंने उर्दू, अंग्रेज़ी आदि भाषाओं के शब्दों से कभी परहेज़ नहीं किया। ‘लखनवी अंदाज’ कहानी में जहाँ एक ओर संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है, वहाँ दूसरी ओर उर्दू एवं सामान्य बोलचाल के शब्दों का भी प्रयोग है। इस कहानी की भाषा स्थान, काल तथा चरित्र की प्रकृति के अनुसार गठित हुई है। इसका कारण यह है कि उन्हें न तो संस्कृत के शब्दों से अधिक प्रेम था और न ही अंग्रेज़ी, उर्दू शब्दों से परहेज़। वे भाषा को अभिव्यक्ति का साधन मानते थे। अतः उन्होंने इस कहानी में भाषा का सरल, सहज एवं स्वाभाविक रूप में प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने वर्णनात्मक शैली के साथ-साथ संवादात्मक शैली का भी सफल प्रयोग किया है।

कुल मिलाकर लेखक ने सीधी-सादी और सामान्य हिंदी भाषा का ही प्रयोग किया है। प्रस्तुत कहानी में उर्दू मिश्रित हिंदी का प्रयोग किया गया है।

लखनवी अंदाज़ कहानी का सार

प्रश्न-
लखनवी अंदाज़’ शीर्षक कहानी का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
‘लखनवी अंदाज़’ शीर्षक कहानी एक व्यंग्य रचना है। इसमें लेखक ने पतनशील सामंती वर्ग पर व्यंग्य किया है। जो. वास्तविकता से बेखबर एक बनावटी जीवन-शैली का आदी है। आज के युग में भी समाज पर पलने वाली संस्कृति के लोगों को देखा जा सकता है। कहानी का सार इस प्रकार है-

लेखक को पास के स्टेशन तक ही यात्रा करनी थी। यद्यपि सेकंड क्लास में पैसे अधिक लगते थे। फिर भी सोचा कि नई कहानी के बारे में सोचने का और खिड़की से बाहर दृश्य देखने का अवसर भी मिल जाएगा। लेखक यही सोचकर सेकंड क्लास का टिकट लेकर रेल के डिब्बे में जा बैठा। वहाँ पहले से ही एक सज्जन बैठे थे। उनका पहनावा लखनवी नवाबों जैसा था। वे सीट पर पालथी मारकर बैठे हुए थे। उनके सामने तौलिए पर दो ताज़ा-चिकने खीरे रखे हुए थे। लेखक के आने से उन्हें कुछ विघ्न अनुभव हुआ, किंतु लेखक ने इसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया।

लेखक नवाब के विषय में अनुमान लगाने लगा कि उसे लेखक का आना अच्छा क्यों नहीं लगा होगा। अचानक नवाब ने लेखक से खीरे खाने के लिए पूछा। किंतु लेखक ने इंकार कर दिया। नवाब ने दो खीरों को धोया, तौलिए से साफ किया। खीरों को चाकू से सिरों से काटकर उनके झाग निकाले और बहुत सलीके के साथ छीलकर काटा और उन पर नमक-मिर्च छिड़का। नवाब साहब का मुख देखकर ऐसा लगता था कि खीरे की फाँकें देखकर उनके मुँह में पानी आ रहा है। खीरे की सजावट को देखकर लेखक की खीरे खाने की इच्छा हो रही थी, किंतु लेखक एक बार इंकार कर चुका था, इसलिए अब नवाब द्वारा पुनः पूछे जाने पर आत्म-सम्मान की रक्षा हेतु इंकार करना पड़ा।

नवाब साहब भी खीरे की फाँकों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने खीरे की एक-एक फाँक उठाई, उन्हें सूंघा और खिड़की के बाहर फेंक दिया। बाद में नवाब ने लेखक की ओर देखा ऐसा लग रहा था जैसे कह रहे हों कि खानदानी रईसों का यह भी खाने का एक अनोखा ढंग है।

लेखक मन-ही-मन सोच रहा था कि खाने के इस ढंग ने क्या पेट की भूख को शांत किया होगा? इतने में नवाब साहब जोर से डकार लेते हैं। अंत में नवाब साहब बोले कि खीरा खाने में बहुत अच्छा लगता है, किंतु अपच होने के कारण मेदे पर भारी पड़ता है। लेखक ने सोचा कि यदि नवाब बिना खीरा खाए डकार ले सकता है तो बिना घटना, पात्र और विचार के नई कहानी क्यों नहीं लिखी जा सकती।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-78) मुफस्सिल = केंद्रीय स्थान। पैसेंजर ट्रेन = यात्री गाड़ी। उतावली = जल्दी में। फूंकार करना = तेज़ आवाज़ करना। दाम = कीमत। अनुमान = अंदाज़ा। प्रतिकूल = उल्टा। निर्जन = एकांत, खाली। बर्थ = रेल के डिब्बे में बैठने की सीट। सफेदपोश = भला व्यक्ति। नवाबी नस्ल = नवाबों के स्वभाव वाला। सुविधा = आराम। सहसा = अचानक। चिंतन = विचार करना। विघ्न = बाधा। असंतोष = संतोष न होना। अपदार्थ वस्तु = तुच्छ वस्तु। आँखें चुराना = नज़रें बचाना। असुविधा = जहाँ सुविधा न हो। किफायत = बचत। संगति = साथ। संकोच = शर्म। गवारा न होना = सहन न होना। वक्त काटना = समय व्यतीत करना। गौर करना = ध्यान देना। आदाब-अर्जु = स्वागत या अभिवादन की एक विधि। शौक फरमाना = आनंद लेना। भाँप लेना = जान लेना, समझ लेना। गुमान = भ्रम। हरकत = गति, कार्य। लथेड़ लेना = सम्मिलित करना। किबला = सम्मानपूर्ण संबोधन।

(पृष्ठ-79) गोदकर = चुभाकर। एहतियात = सावधानी। हाज़िर = उपस्थित। करीने से = अच्छे ढंग से। सुर्जी = लाली। बुरकना = छिड़कना। स्फुरण = हिलना। भाव-भंगिमा = चेहरे पर उभरे हुए भाव। रईस = अमीर। असलियत = वास्तविकता। प्लावित होना = भर आना। पनियाती = रस से युक्त। मुँह में पानी आना = ललचाना। महसूस होना = अनुभव होना। मेदा = पाचन शक्ति। सतृष्ण = प्यास। दीर्घ निश्वास = लंबी साँस । पलकें मूंदना = आँखें बंद करना।

(पृष्ठ-80) रसास्वादन = रस का स्वाद लेना। गर्व = अभिमान। गुलाबी आँखें = अभिमान से भरी नज़रें। तसलीम = सम्मान। सूक्ष्म = बारीक। नफीस = बढ़िया। एब्स्ट्रैक्ट = अमूर्त, जिसका स्थूल आकार न हो। नज़ाकत = कोमलता। उदर = पेट। नामुराद = अभागा। ज्ञान चक्षु = ज्ञान रूपी नेत्र। सकील = भारी।

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