HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

HBSE 10th Class Hindi लखनवी अंदाज़ Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं?
उत्तर-
लेखक ने जब रेल के डिब्बे में प्रवेश किया तो उन्होंने देखा कि वहाँ पहले से एक सज्जन विराजमान हैं। वे सीट पर पालथी मारे बैठे हुए थे। उनके सामने एक तौलिए पर खीरे रखे हुए थे। उन्होंने लेखक की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। उसको देखते ही उनके चेहरे पर ऐसे भाव व्यक्त हुए कि जैसे लेखक का वहाँ आना उन्हें अच्छा नहीं लगा। उन्हें ऐसा लग रहा था कि जैसे लेखक ने वहाँ आकर उनके चिंतन में बाधा डाल दी हो। वे कुछ परेशान-से दिखाई दिए। अपनी इसी दशा में वे कभी खिड़की के बाहर देखते तो कभी सामने रखे खीरों की ओर। उनकी असुविधा और असंतोष वाली स्थिति से ही लेखक ने अनुभव कर लिया था, कि वे उससे बातचीत करने को उत्सुक नहीं थे।

प्रश्न 2.
नवाब साहब ने बहुत ही यत्न से खीरा काटा, ‘नमक-मिर्च बुरका, अंततः सूंघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? उनका ऐसा करना उनके कैसे स्वभाव को इंगित करता है?
उत्तर-
नवाबों की दूसरों पर अपना प्रभाव डालने की प्रवृत्ति होती है। उसके लिए उन्हें कुछ भी करना पड़े, वे करते हैं। इसलिए वे सामान्य समाज के तौर-तरीकों को नकारते हैं तथा नए-नए तरीके ढूँढते हैं जिनसे अपनी अमीरी को दर्शाया जा सके। नवाब साहब अकेले में बैठकर खीरे जैसी साधारण वस्तु को खाने की तैयारी में थे। किंतु उसी वक्त लेखक वहाँ आ टपका। उसे देखकर उनके मन में नवाबी स्वभाव उभर आया और उन्हें अपनी नवाबगिरी दिखाने का अवसर मिल गया। उन्होंने दुनिया के तौर-तरीकों से हटकर खीरे काटे, नमक-मिर्च लगाया, उन्हें सूंघा और खिड़की में से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा केवल सामने वाले पर अपने नवाबी स्वभाव का रौब जमाने के लिए किया।

प्रश्न 3.
बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है। यशपाल के इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर-
यशपाल का यह विचार अपने-आप में अधूरा-सा प्रतीत होता है। इसलिए हम इससे पूर्णतः सहमत नहीं हैं कि बिना विचारों, घटनाओं या पात्रों के कहानी लिखना संभव है। कहानी में कोई-न-कोई विचार, घटना अथवा पात्र अवश्य ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में विद्यमान रहता है। उदाहरणार्थ पठित कहानी ‘लखनवी अंदाज़’ को लिया जा सकता है। इस कहानी के लिखने के पीछे लेखक का प्रमुख उद्देश्य लखनऊ के पतनशील नवाबी वर्ग पर करारा व्यंग्य करना है। इसी विचार पर कहानी का पूरा ताना-बाना बुना गया है। इस कहानी में घटनाओं की अपेक्षा विचारों की प्रधानता है। घटना के रूप में रेलयात्रा, यात्री के रूप लखनवी नवाबों जैसा दिखने वाला सज्जन और उनके पतन को दिखाना है। अतः यह कहना उचित नहीं कि बिना विचार, घटना व पात्रों के कहानी बन सकती है।

प्रश्न 4.
आप इस निबंध को और क्या नाम देना चाहेंगे?
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में आदि से अंत तक नवाब की अकड़ या नवाब होने के अहंकार का ही उल्लेख किया गया है। वह अपने सामने की सीट पर बैठे हुए सहयात्री से बोलना भी पसंद नहीं करता। उसके सामने खीरा खाना अपनी तौहीन समझता है। वह खीरे खाने की अपेक्षा उन्हें सूंघकर चलती हुई गाड़ी की खिड़की से बाहर फेंक देता है। वह खीरों की सुगंध से ही स्वयं के संतुष्ट होने का नाटक करता है, क्योंकि खाने की वस्तु को खाकर ही संतुष्टि प्राप्त हो सकती है, सूंघकर नहीं। अतः इस पाठ का शीर्षक ‘नवाबी तहज़ीब’ हो सकता है।

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रचना और अभिव्यक्ति-

प्रश्न 5.
(क) नवाब साहब द्वारा खीरा खाने की तैयारी करने का एक चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया को अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।
उत्तर-
नवाब साहब ने अचानक घूमकर लेखक को आदाब-अर्ज़ किया। फिर उन्होंने तौलिए पर रखे दो ताज़े खीरे उठाए। उनको धोया, पोंछा। फिर उन्होंने लेखक से कहा, क्या आप खीरा खाना पसंद करेंगे। लेखक के मना करने पर वे खीरे को छीलकर और काटकर तौलिए पर रखने लगे। बड़े इत्मीनान से खीरे को काट चुकने के बाद उन्होंने उन कटे हुए खीरों पर नमक और मिर्च का पाउडर छिड़का। फिर बड़े इत्मीनान से एक-फाँक को उठाकर सूंघा एवं उसके स्वाद के आनंद को अनुभव किया। फिर एक-एक फाँक को वे सूंघते जाते और उसे खिड़की से बाहर फेंकते जाते।
(ख) किन-किन चीज़ों का रसास्वादन करने के लिए आप किस प्रकार की तैयारी करते हैं? उत्तर-यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

प्रश्न 6.
खीरे के संबंध में नवाब साहब के व्यवहार को उनकी सनक कहा जा सकता है। आपने नवाबों की और भी सनकों और शौक के बारे में पढ़ा-सुना होगा। किसी एक के बारे में लिखिए।
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

प्रश्न 7.
क्या सनक का कोई सकारात्मक रूप हो सकता है? यदि हाँ तो ऐसी सनकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
निश्चित रूप से सनक का सकारात्मक रूप हो सकता है। जितने भी बड़े-बड़े कार्य या अनुसंधान हुए हैं, वे सनकी व्यक्तियों द्वारा ही किए गए हैं। हम कुछ वैज्ञानिकों के उदाहरण ले सकते हैं। वे सनक के कारण ही रात-दिन अपने कार्य में इतने डूबे रहते हैं कि उन्हें अपने आस-पास की गतिविधियों का भी बोध नहीं रहता है। ऐसे लोग बड़े-से-बड़े जोखिम को उठाने से भी नहीं डरते। विश्व में जितनी भी बड़ी-बड़ी खोजें हुई हैं, वे सनकी वैज्ञानिकों की देन हैं। अतः स्पष्ट है कि सनक का सकारात्मक रूप भी होता है।

भाषा-अध्ययन-

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्यों में से क्रियापद छाँटकर क्रिया-भेद भी लिखिए-
(क) एक सफेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे।
(ख) नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया।
(ग) ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है।
(घ) अकेले सफर का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे।
(ङ) दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोदकर झाग निकाला।
(च) नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा।
(छ) नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए।
(ज) जेब से चाकू निकाला।
उत्तर-
(क) बैठे थे – अकर्मक।
(ख) दिखाया – सकर्मक।
(ग) बैठे- अकर्मक।
कल्पना करना – अकर्मक।
है – अकर्मक।
(घ) काटना – सकर्मक।
खरीदे होंगे – सकर्मक।
(ङ) काटा – सकर्मक।
गोदकर – सकर्मक।
निकाला – सकर्मक।
(च) देखा – अकर्मक (प्रयोग)।
(छ) लेट गए – अकर्मक।
थककर – अकर्मक।
(ज) निकाला – सकर्मक।

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पाठेतर सक्रियता

‘किबला शौक फरमाएँ,’ ‘आदाब-अर्ज…शौक फरमाएँगे’ जैसे कथन शिष्टाचार से जुड़े हैं। अपनी मातृभाषा के शिष्टाचार सूचक कथनों की एक सूची तैयार कीजिए।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

‘खीरा… मेदे पर बोझ डाल देता है। क्या वास्तव में खीरा अपच करता है? किसी भी खाद्य पदार्थ का पच-अपच होना कई कारणों पर निर्भर करता है। बड़ों से बातचीत कर कारणों का पता लगाइए।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

खाद्य पदार्थों के संबंध में बहुत-सी मान्यताएँ हैं जो आपके क्षेत्र में प्रचलित होंगी, उनके बारे में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
विद्यार्थी स्वयं करें।

पतनशील सामंती वर्ग का चित्रण प्रेमचंद ने अपनी एक प्रसिद्ध कहानी’ ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में किया था और फिर बाद में सत्यजीत राय ने इस पर इसी नाम से एक फिल्म भी बनाई थी। यह कहानी ढूँढकर पढ़िए और संभव हो तो फिल्म भी देखिए।
उत्तर-
विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

HBSE 10th Class Hindi लखनवी अंदाज़ Important Questions and Answers

विषय-वस्तु संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नवाब साहब ने लेखक के गाड़ी में चढ़ने पर कोई उत्साह क्यों नहीं दिखाया?
उत्तर-
नवाब साहब पर अभी तक सामंती प्रभाव था। वे अपने आपको विशिष्ट व्यक्ति समझते थे। यदि वे लेखक के गाड़ी में चढ़ने पर उत्साह दिखाते तो उनका सम्मान कम हो जाता, उनकी शान-ए-शौकत में बट्टा लग सकता था। उनको यह सहन नहीं था कि शहर का कोई सफेदपोश उनको मँझले दर्जे में सफर करते देखे।

प्रश्न 2.
लेखक को नवाब साहब का अचानक भाव परिवर्तन कैसा लगा?
उत्तर-
लेखक को नवाब साहब का अचानक भाव परिवर्तन अच्छा नहीं लगा। वह शराफत का भ्रम बनाए रखने के लिए ही लेखक को खीरा खाने के लिए कह रहे थे। उनके इस व्यवहार में दिखावा ही झलक रहा था।

प्रश्न 3.
लेखक और नवाब दोनों ने सेकंड क्लास में यात्रा क्यों की? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर-
पाठ में इस विषय में स्पष्ट रूप में कुछ नहीं कहा गया कि नवाब ने ऐसा क्यों किया। अनुमान लगाया जा सकता है कि नवाबों की आर्थिक दशा अच्छी नहीं रह गई थी। अब नवाब कहने मात्र के रह गए थे। इसलिए पैसे बचाने के लिए उसने सेकंड क्लास के डिब्बे में यात्रा की होगी।
लेखक ने स्वयं स्वीकार किया है कि उसने नई कहानी के संबंध में कुछ चिंतन-मनन करने या सोचने के लिए तथा खिड़की में से कुछ प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए सेकंड क्लास की यात्रा थी। दोनों का विश्वास था कि डिब्बा खाली होगा।

प्रश्न 4.
नवाब ने अपनी नवाबी का परिचय किस प्रकार दिया?
उत्तर-
नवाब ने खीरों को पहले पानी से धोया फिर उन्हें तौलिए से पोंछा फिर जेब से चाकू निकालकर उनके सिरे काटे और छीलकर उनकी फाँकें काट-काटकर तौलिए पर रखीं और उन पर नमक-मिर्च का मिश्रण छिड़का। फिर लेखक को भी खीरे खाने का निमंत्रण दिया। अन्त में एक-एक फाँक को खाने की अपेक्षा सूंघ-सूंघ कर खिड़की से बाहर फेंकने लगा। उसने ऐसा दिखावा किया कि उसे सुगंध से ही बहुत तृप्ति मिली थी।

प्रश्न 5.
लेखक को नवाब साहब का न बोलना और बोलना दोनों ही बुरे लगे, क्यों?
उत्तर-
लेखक ने जब रेल के डिब्बे में प्रवेश किया तो नवाब अपनी सीट पर बैठा रहा। उसने लेखक की ओर देखना भी गवारा न किया। लेखक को नवाब साहब की यह अकड़ बुरी लगी। इसी प्रकार नवाब ने जब लेखक को खीरे खाने का निमंत्रण दिया तो लेखक को बुरा लगा क्योंकि उसे ऐसा अनुभव हुआ कि वह ऐसा करके अपना प्रभाव उस पर जमा रहा है। वह नहीं चाहता कि नवाब उस पर अपनी झूठी शान-ए-शौकत का प्रभाव छोड़े। लेखक को ऐसा नवाबों के प्रति अपनी पूर्व-धारणा के कारण भी लगा होगा।

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विचार/संदेश संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 6.
‘लखनवी अंदाज़’ पाठ का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
यह पाठ एक महत्त्वपूर्ण संदेश की अभिव्यक्ति करता है। इस पाठ के माध्यम से लेखक ने बताया है कि हर रचना के पीछे कोई-न-कोई विचार या चिंतन अवश्य रहता है। उस विचार या चिंतन को रचना में प्रस्तुत करने के लिए लेखक को एक निश्चित प्रक्रिया में से गुज़रना पड़ता है। इस रचना का प्रमुख संदेश दिखावा पसंद लोगों की जीवन शैली को दिखाना है। लेखक को रेल के डिब्बे में एक नवाब मिलता है। वह खीरे खाने की तैयारी में था, किंतु डिब्बे में लेखक के आ जाने से लेखक के सामने खीरे खाने में उसे संकोच होता है। इसलिए वह खीरे खाने की तैयारी विशेष ढंग से करता है किंतु उन्हें खाने की अपेक्षा सँघकर खिड़की के बाहर फेंक देता है तथा तृप्ति अनुभव करने का दिखावा करता है। अतः नवाब के इस व्यवहार से पता चलता है कि जो लोग जिस कार्य को एकांत में छुपकर करते हैं, उसे दूसरों के सामने करने में अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। यहाँ उनके चोरी आहार की तुष्टि होती है। इसमें वास्तविकता कुछ भी नहीं है, मात्र दिखावा है।

प्रश्न 7.
लेखक ने नवाब की असुविधा व संकोच को कैसे अनुभव किया?
उत्तर-
लेखक रेल के जिस डिब्बे में चढ़ा, वहाँ पहले से ही एक सज्जन पालथी मारे बैठा था। उनके डिब्बे में प्रवेश करने पर पहले से ही उपस्थित व्यक्ति ने लेखक को दुआ-सलाम कुछ भी नहीं कहा, अपितु वह उससे नज़रें बचाने का प्रयास करता रहा। लेखक ने उसकी इसी असुविधा और संकोच से अनुमान लगाया कि वह नहीं चाहता था कि कोई उसे वहाँ बैठे हुए देखे कि नवाब होते हुए सेकंड क्लास में यात्रा कर रहा है। उसके सामने रखे हुए खीरों से तो उनका संकोच और भी बढ़ गया था जिसे सही देखा जा सकता था। उन खीरों को लेखक के सामने खाने में भी उसे संकोच हो रहा था। सेकंड क्लास में यात्रा करना और खीरे खाना उसकी असुविधा और संकोच का कारण बन रहे थे जिसे लेखक ने सहज ही अनुभव कर लिया था।

प्रश्न 8.
‘लखनवी अंदाज’ पाठ में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
लखनवी अंदाज’ पाठ में लेखक ने उन लोगों पर व्यंग्य किया है जो जीवन की शान-बान का दिखावा करते हैं। वे जीवन की सहजता व स्वाभाविकता को स्वीकार करने से इन्कार करते हैं। लेखक ने दिखाया है कि खीरा एक साधारण वस्तु है तथा आम लोग उसका सेवन करते हैं किन्तु वह लखनवी नवाब उसे खाने में अपनी तौहीन समझता है। उसे सूंघकर चलती गाड़ी से नीचे फैंक देता है। वे इसी में अपनी महानता समझते हैं। ऐसे लोग सेकंड क्लास में यात्रा करना भी अपना बड़प्पन समझते हैं। इस प्रकार लेखक ने तथाकथित नवाबों के दिखावटी जीवन पर करारा व्यंग्य किया है।

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अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘लखनवी अंदाज़’ शीर्षक पाठ के लेखक का क्या नाम है?
उत्तर-
‘लखनवी अंदाज़’ शीर्षक पाठ के लेखक का नाम यशपाल है।

प्रश्न 2.
‘नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश पालथी मारे बैठे थे’-‘सफेदपोश’ का अर्थ क्या है?
उत्तर-
“सफेदपोश’ का अर्थ भद्रपुरुष है।

प्रश्न 3.
लेखक ने खीरा खाने से क्यों इंकार कर दिया था?
उत्तर-
आत्म-सम्मान की रक्षा हेतु लेखक ने खीरा खाने से इंकार कर दिया था।

प्रश्न 4.
नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की के बाहर क्यों फेंक दिया था?
उत्तर-
खानदानी रईसों का अंदाज दिखाने के लिए नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की से बाहर फेंक दिया था।

प्रश्न 5.
लेखक की पुरानी आदत क्या थी?
उत्तर-
अकेले में तरह-तरह की कल्पनाएँ करना लेखक की पुरानी आदत थी।

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प्रश्न 6.
लेखक के अनुसार नवाबों की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर-
लेखक के अनुसार अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझना नवाबों की प्रमुख विशेषता है।

प्रश्न 7.
‘खीरे की पनियाती फाँके देखकर पानी मुँह में जरूर आ रहा था’ यहाँ ‘पनियाती’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर-
यहाँ ‘पनियाती’ शब्द का अर्थ है रसीली।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लेखक ने ‘लखनवी अंदाज़’ शीर्षक पाठ में किस पर कटाक्ष/व्यंग्य किया है?
(A) कृषक वर्ग पर
(B) पतनशील सामंती वर्ग पर
(C) मध्य वर्ग पर
(D) निम्न मध्य वर्ग पर
उत्तर-
(B) पतनशील सामंती वर्ग पर

प्रश्न 2.
ट्रेन के सेकंड क्लास डिब्बे में एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के कैसे सज्जन पालथी मारे बैठे थे?
(A) सफेदपोश
(B) नवाब
(C) लम्बी दाड़ी वाले
(D) पठानी पोशाक वाले
उत्तर-
(A) सफेदपोश

प्रश्न 3.
‘नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश पालथी मारे बैठे थे’-‘सफेदपोश’ का अर्थ है-
(A) सफेद कपड़े पहने व्यक्ति
(B) सफेद दाढ़ी वाला व्यक्ति
(C) नवाब
(D) भद्रपुरुष
उत्तर-
(D) भद्रपुरुष

प्रश्न 4.
सफेदपोश सज्जन ने तौलिए पर कौन-सी वस्तु रखी हुई थी?
(A) आम
(B) तरबूज
(C) खीरे
(D) नींबू
उत्तर-
(C) खीरे

प्रश्न 5.
‘आँखें चुराना’ मुहावरे का अर्थ है-
(A) आँखों की चोरी करना
(B) आँखें न रहना
(C) नज़रें बचाना
(D) आँखों को छुपा देना
उत्तर-
(C) नज़रें बचाना

प्रश्न 6.
लेखक की दृष्टि में ‘खीरा’ किस वर्ग का प्रतीक है?
(A) मामूली लोगों के वर्ग का
(B) उच्च वर्ग का
(C) सामंती वर्ग का
(D) मध्यवर्ग का
उत्तर-
(A) मामूली लोगों के वर्ग का

प्रश्न 7.
नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को किस प्रकार देखा था?
(A) नवाबी
(B) खोई-खोई
(C) लालची
(D) सतृष्ण
उत्तर-
(D) सतृष्ण

प्रश्न 8.
नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की के बाहर क्यों फेंक दिया था?
(A) कड़वी होने के कारण
(B) खराब होने के कारण
(C) खानदानी रईसों का अंदाज दिखाने के लिए
(D) मूर्खता के कारण
उत्तर-
(C) खानदानी रईसों का अंदाज दिखाने के लिए

प्रश्न 9.
“खीरा लज़ीज़ होता है लेकिन होता है सकील, नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है।” ये शब्द किसने कहे हैं?
(A) डॉक्टर ने
(B) कथानायक ने
(C) तीसरे मुसाफिर ने
(D) नवाब साहब ने
उत्तर-
(D) नवाब साहब ने

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प्रश्न 10.
‘ज्ञान-चक्षु खुलना’ का अर्थ है-
(A) आँखें खुलना
(B) ज्ञान के द्वार खुलना
(C) ज्ञान होना
(D) ज्ञान की नदी बहना
उत्तर-
(C) ज्ञान होना

प्रश्न 11.
गाड़ी के डिब्बे में कौन बैठा था?
(A) टिकट निरीक्षक
(B) जेबकतरा
(C) नवाबी नस्ल का व्यक्ति
(D) स्वयं लेखक
उत्तर-
(C) नवाबी नस्ल का व्यक्ति

प्रश्न 12.
लेखक के अनुमान के प्रतिकूल क्या था?
(A) डिब्बा खाली नहीं था
(B) डिब्बा भरा हुआ था
(C) डिब्बा साफ नहीं था
(D) डिब्बा छोटा था
उत्तर-
(A) डिब्बा खाली नहीं था

प्रश्न 13.
नवाब साहब ने पलकें क्यों मूंद ली थीं?
(A) आनंदित होने के दिखावे के कारण
(B) अपने-आपको श्रेष्ठ दिखाने के लिए
(C) लेखक को हीन समझने के कारण
(D) अपनी संतुष्टि प्रकट करने के कारण
उत्तर-
(A) आनंदित होने के दिखावे के कारण।

प्रश्न 14.
नवाब साहब ने खीरे का स्वाद कैसे प्राप्त किया?
(A) खाकर
(B) सूंघकर
(C) देखकर
(D) दूसरों से सुनकर
उत्तर-
(B) सूंघकर

प्रश्न 15.
‘खीरा लज़ीज़ होता है लेकिन होता है सकील’ यहाँ ‘सकील’ शब्द का अर्थ है-
(A) आसानी से न पचने वाला
(B) सुपाच्य
(C) रसीला
(D) कोमल
उत्तर-
(A) आसानी से न पचने वाला

प्रश्न 16.
‘मुफस्सिल की पैसेंजर ट्रेन चल पड़ने की उतावली से फूंकार रही थी’-यहाँ ‘मुफस्सिल’ का अर्थ है-
(A) यात्रियों
(B) केन्द्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द के स्थान
(C) वातानुकूलित
(D) लम्बी दूरी
उत्तर-
(B) केन्द्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द के स्थान

प्रश्न 17.
यशपाल ने खीरे को क्या माना है?
(A) अपदार्थ वस्तु
(B) बहुमूल्य फल
(C) दुर्लभ फल
(D) अमर फल
उत्तर-
(A) अपदार्थ वस्तु

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प्रश्न 18.
लखनऊ के खीरे की विशेषता थी
(A) आलम
(B) लज़ीज़
(C) बालम
(D) देसी
उत्तर-
(B) लज़ीज़

प्रश्न 19.
नवाब साहब रेलगाड़ी में किस श्रेणी में सफर कर रहे थे?
(A) प्रथम श्रेणी
(B) वातानुकूलित
(C) तृतीय श्रेणी
(D) द्वितीय श्रेणी
उत्तर-
(D) द्वितीय श्रेणी

लखनवी अंदाज़ गद्यांशों के आधार पर अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(1) गाड़ी छूट रही थी। सेकंड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझकर, ज़रा दौड़कर उसमें चढ़ गए। अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा निर्जन नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। सामने दो ताजे-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे। डिब्बे में हमारे सहसा कद जाने से सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में विघ्न का असंतोष दिखाई दिया। सोचा, हो सकता है, यह भी कहानी के लिए सूझ की चिंता में हों या खीरे-जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हों।
नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। हमने भी उनके सामने की बर्थ पर बैठकर आत्मसम्मान में आँखें चुरा ली।
[पृष्ठ 78]

प्रश्न-
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक क्या सोचकर सेकंड क्लास के डिब्बे में चढ़ा था?
(ग) लेखक के अनुमान के प्रतिकूल क्या था?
(घ) गाड़ी के डिब्बे में कौन और कैसे बैठा था?
(ङ) लेखक ने पहले से बैठे सज्जन के विषय में क्या कल्पना की?
(च) लेखक और पहले से बैठे सज्जन ने एक-दूसरे से कैसा व्यवहार किया?
(छ) ‘लखनऊ की नवाबी नस्ल के सफेदपोश सज्जन’ में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।
(ज) पहले बैठे सज्जन के सामने क्या रखा हुआ था?
(झ) उपर्युक्त गद्यांश का प्रसंग लिखते हुए आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज़। लेखक का नाम यशपाल।

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(ख) लेखक यह सोचकर सेकंड क्लास के डिब्बे में चढ़ा था कि यह डिब्बा बिल्कुल खाली होगा। उसमें कोई यात्री नहीं होगा। वह वहाँ बैठकर अपनी इच्छानुसार बाहर के दृश्य देख सकेगा और चिंतन-मनन कर सकेगा।

(ग) लेखक के अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा बिल्कुल खाली नहीं था. अथवा डिब्बे का वातावरण बिल्कुल निर्जन नहीं था क्योंकि उसमें पहले से ही एक नवाबी स्वभाव वाला व्यक्ति बैठा हुआ था। इसलिए लेखक के लिए वहाँ बैठकर नई कहानी के विषय में सोचना संभव न हो सका।

(घ) गाड़ी के डिब्बे की बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल का एक सफेदपोश सज्ज़न बड़ी सुविधा से पालथी मारकर बैठा हुआ था।

(ङ) लेखक जब गाड़ी में आया तो उसने वहाँ एक लखनवी नवाबी किस्म के व्यक्ति को अकेले बैठे देखा। उसे देखकर लेखक ने कल्पना की कि हो सकता है कि यह भी कहानी के लिए सूझ की चिंता में हो या फिर खीरे जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हो।

(च) लेखक और पहले से बैठे व्यक्ति ने एक-दूसरे के प्रति अनजान, बेगानेपन और अवांछितों जैसा व्यवहार किया। मानो दोनों एक-दूसरे को अपने रास्ते में बाधा समझ रहे हों। पहले नवाबी स्वभाव वाले व्यक्ति ने लेखक की ओर से मुँह फेरा तो फिर उसने भी आत्म-सम्मान की रक्षा हेतु उसकी ओर से ध्यान हटा लिया। इस प्रकार दोनों का एक-दूसरे के प्रति सम्मानजनक व्यवहार नहीं रहा।

(छ) प्रस्तुत वाक्य के माध्यम को लेखक ने नवाबी स्वभाव वाले की विचित्रता को अभिव्यक्त किया है। वे स्वयं को बहुत ही नाजुक-मिज़ाज एवं सलीकेदार मनुष्य समझते हैं और दूसरों को हीन भाव से देखते हैं। उनकी ये विशेषताएँ कुछ अधिक बढ़ी-चढ़ी हुई होती हैं। वे अपने-आपको वास्तविकता से अधिक दिखाने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोगों की इस विचित्रता को दिखाने के लिए ‘नस्ल’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। मानो ये इंसान की नस्ल के न होकर अन्य किसी प्रजाति के लोग हों।

(ज) पहले बैठे हुए सज्जन के सामने तौलिए पर दो खीरे रखे हुए थे।

(झ) प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 2 में संकलित पाठ ‘लखनवी अंदाज’ में से लिया गया है। इसके रचयिता श्री यशपाल हैं। इस पाठ में लेखक ने पतनशील सामंती वर्ग के दिखावे की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है। यह वर्ग दिखावटी शैली का आदी है तथा वास्तविकता से बेखबर रहता है।

आशय/व्याख्या-लेखक को पास के स्टेशन तक की यात्रा करनी थी। इसलिए वह टिकट खरीदकर सेंकड क्लास के एक छोटे से डिब्बे में दौड़कर चढ़ गया। लेखक का अनुमान था कि डिब्बा खाली होगा, किंतु ऐसा नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल का व्यक्ति बड़े आराम से बैठा हुआ था। उसने अपने सामने दो कच्चे खीरे तौलिए पर रखे हुए थे। लेखक के एकाएक डिब्बे में आ जाने से उस भद्रपुरुष की आँखों में एकांत चिंतन में बाधा का असंतोष स्पष्ट देखा जा सकता था। लेखक का अनुमान था कि शायद यह व्यक्ति भी कहानी लिखने की सूझ की चिंता में हो अथवा खीरे जैसी सस्ती वस्तु का शौक करते हुए देखे जाने के संकोच में हो। नवाब साहब ने लेखक की संगति करने की इच्छा व्यक्त नहीं की। लेखक ने भी आत्मसम्मान की रक्षा हेतु उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। कहने का भाव है कि दोनों ने एक-दूसरे के प्रति सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया।

(2) ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिल्कुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफायत के विचार से सेकंड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर का कोई सफेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफर करता देखे।… अकेले सफर का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे और अब किसी सफेदपोश के सामने खीरा कैसे खाएँ? । – [पृष्ठ 78]

प्रश्न-
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक की पुरानी आदत क्या और क्यों है?
(ग) लेखक ने नवाब के बारे में क्या सोचा?
(घ) लेखक नवाबों के विषय में किस धारणा से ग्रस्त है?
(ङ) यद्यपि लेखक ने भी सेकंड क्लास में यात्रा की फिर भी उसने नवाबों के चरित्र में कमियाँ निकाली, ऐसा क्यों?
(च) नवाब साहब खीरे क्यों नहीं खा रहे थे?
(छ) प्रस्तुत गद्यांश का प्रसंग लिखकर आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज़। लेखक का नाम यशपाल।

(ख) लेखक की पुरानी आदत थी कि जब वह अकेला होता तो तरह-तरह की कल्पनाएँ करने लगता था। लेखक होने के कारण वह कल्पना के आधार पर अपनी रचनाओं का निर्माण करता था। खाली समय में वह यही सोचता रहता था कि कौन-सी रचना लिखी जाए और उसका रूप-आकार कैसा होगा।

(ग) लेखक ने जब गाड़ी के डिब्बे में प्रवेश किया तो वहाँ नवाब साहब को देखकर सोचा होगा कि शायद ये इस डिब्बे में अकेले यात्रा करना चाहते होंगे। उन्होंने अंदाज़ा लगाया होगा कि सेकंड क्लास का डिब्बा खाली होगा। इसलिए उन्होंने किराया बचाने के लिए भी सेकंड क्लास का टिकट खरीदा होगा। किंतु अब वे नहीं चाहते कि कोई सफेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में यात्रा करते हुए देखे। वे इसे अपनी तौहीन समझते होंगे।

(घ) लेखक के मन में नवाबों के विषय में धारणा बन चुकी थीं कि ये नवाब अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं और सदा अपनी आन-शान के विषय में बढ़ा-चढ़ाकर बातें करने में लगे रहते हैं। वे स्वयं को ऊँचे दर्जे के प्राणी मानते हैं और ऊँचे दर्जे में यात्रा करके अपने आप को ऊँचे सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। यदि कभी सेकंड क्लास के डिब्बे में यात्रा करते देख लिए जाएँ तो अपनी तौहीन समझने लगते हैं। इसलिए ऐसे अवसर पर वे नज़रें चुराते फिरते हैं।

(ङ) निश्चय ही लेखक स्वयं सेकंड क्लास के दर्जे में यात्रा करता है और इसी दर्जे में नवाब को बैठे देखकर उसमें कमियाँ निकालता है। वह अपने विषय में कहता है कि उसने एकांत में बैठकर नई कहानी के विषय में चिंतन करने हेतु ही ऐसा किया। यद्यपि नवाब ने भी किसी ऐसे ही कारण से मँझोले दर्जे में यात्रा करने का निश्चय किया होगा। किंतु लेखक की धारणा बन चुकी है कि नवाब हमेशा ही अपनी शान बघारते रहते हैं। अतः लेखक पूर्व धारणा से ग्रस्त होने के कारण ऐसा कहता है।

(च) लेखक के अनुसार नवाब साहब ने अकेले में सफर करने के लिए, खीरे खाने के लिए खरीदे होंगे। किंतु अब खीरे इसलिए नहीं खा रहे होंगे कि कोई सफेदपोश व्यक्ति उन्हें खीरे जैसी सामान्य वस्तु खाते देख रहा है। इससे उनकी तौहीन होगी।

(छ) प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 2 में संकलित ‘लखनवी अंदाज़’ नामक पाठ से अवतरित है। इस पाठ के रचयिता श्री यशपाल हैं। इस पाठ में उन्होंने जहाँ एक ओर सामंती वर्ग के दिखावे की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है वहीं दूसरी ओर लेखकों की कल्पनाशीलता को भी उजागर किया है।

आशय/व्याख्या इन पंक्तियों में लेखक ने बताया है कि लेखक कल्पनाशील एवं एकांतप्रिय होते हैं। वे आसपास के जीवन को गहराई से देखते हैं तथा मानव-मनोविज्ञान में भी रुचि रखते हैं। लेखक सामने बैठे नवाब साहब की असुविधा एवं संकोच के कारण का अनुमान लगाने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिल्कुल अकेले में यात्रा करने के विचार से ही सेकंड क्लास की टिकट खरीदी हो क्योंकि आम लोग सेकंड क्लास में सफर नहीं करते। अब उन्हें यह बात भी अच्छी नहीं लगी होगी कि नगर का शिक्षित व्यक्ति उन्हें मध्य श्रेणी के दर्जे में सफर करते देखे। लेखक का अनुमान है कि उसने समय काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे, किंतु अब उन्हें किसी शिक्षित व्यक्ति के सामने खीरे खाने में संकोच हो रहा हो। कहने का भाव है कि नवाब साहब अपने-आपको अमीर व्यक्ति दिखाने का प्रयास कर रहे थे, जबकि वास्तव में वे थे नहीं। खीरा एक अति साधारण फल है। लेखक के सामने खीरा खाने से नवाब साहब की हेठी होती थी। इसलिए वह खीरे को कैसे खा सकता था।

(3) नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा। खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ निश्वास लिया। खीरे की एक फाँक उठाकर होंठों तक ले गए। फाँक को सँघा। स्वाद के आनंद में पलकें मुंद गईं। मुँह में भर आए पानी का बूट गले से उतर गया। तब नवाब साहब ने फाँक को खिड़की से बाहर छोड़ दिया। नवाब साहब खीरे की फाँकों को नाक के पास ले जाकर, वासना से रसास्वादन कर खिड़की के बाहर फेंकते गए। [पृष्ठ 79-80]

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

प्रश्न-
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) नवाब साहब ने खीरे की फाँकों की ओर किस प्रकार देखा?
(ग) नवाब साहब ने खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ साँस क्यों लिया?
(घ) नवाब साहब ने अपनी पलकें क्यों मूंद लीं?
(ङ) नवाब साहब खीरे की फाँकों को खिड़की के बाहर क्यों फेंकने लगे?
(च) नवाब साहब ने खीरे की फाँकों का स्वाद कैसे प्राप्त किया?
(छ) प्रस्तुत गद्यांश का प्रसंग लिखकर आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज़। लेखक का नाम यशपाल।

(ख) नवाब साहब ने खीरे की फाँकों की ओर सतृष्ण नज़रों से देखा मानो वह खीरा खाने के लिए बहुत ही उतावले हों।

(ग) नवाब साहब ने खिड़की से बाहर देखकर दीर्घ साँस इसलिए भरी थी क्योंकि वे चाहकर भी खीरा नहीं खा पा रहे थे। यही कारण था कि उन्हें खीरे की फाँकों को खिड़की से बाहर फेंकना पड़ा था। उनकी लंबी साँस ही उनकी खीरे को खाने की चाह को भी व्यक्त कर रही थी।

(घ) नवाब साहब खीरे के स्वाद के आनंद में डूबे हुए थे, उनकी खुशबू से आनंदित होकर उन्होंने अपनी आँखें मूंद ली थीं।

(ङ) नवाब साहब खीरे की फाँकों को खिड़की के बाहर फेंककर यह दर्शाना चाहते थे कि वे अब भी वही पुराने नवाब हैं। उनके शौक शाही हैं। उनमें किसी प्रकार का अंतर नहीं आया है।

(च) नवाब साहब ने खीरे की कटी हुई फाँक को उठाया, अपनी ललचाई हुई दृष्टि से उन्हें अपने होंठों तक ले आए। इसके बाद फाँक को भली-भाँति सूंघा। उन्हें ऐसा करने से बहुत आनंद प्राप्त हुआ। सूंघने के पश्चात् उन्हें खिड़की के बाहर फेंक दिया।

(छ) प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 2 में संकलित एवं श्री यशपाल द्वारा रचित व्यंग्य पाठ ‘लखनवी अंदाज’ से लिया गया है। इस पाठ में लेखक ने सामंती वर्ग की दिखावा करने की आदत का व्यंग्यपूर्ण उल्लेख किया है। इन पंक्तियों में लेखक ने बताया है कि नवाब साहब किस प्रकार अपनी नवाबी शान, खानदानी तहज़ीब, लखनवी अंदाज और नज़ाकत प्रकट करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने आम व्यक्ति की तरह खीरा नहीं खाया, अपितु उसे सूंघ कर ही पेट भर लिया।

आशय/व्याख्या-लेखक कहता है कि नवाब साहब ने बहुत ललचाई हुई आँखों से नमक-मिर्च लगी हुई खीरे की चमकती हुई फाँकों को देखा। उन्होंने खिड़की की ओर देखकर एक लंबी साँस ली। इस प्रकार खीरे को देखकर लंबी साँस भरना नवाब साहब की विवशता को दर्शाता है। उन्होंने फाँक को हाथ में उठाया और सूंघा। स्वाद के आनंद का दिखावा करने के लिए पलकें बंद कर ली, किंतु मुँह में भर आए पानी का यूंट उनके गले से उतर गया। कहने का भाव है कि भले ही नवाब साहब खीरा न खाने का ढोंग कर रहे थे, किंतु वास्तविकता तो यह थी कि खीरे को देखकर उसे खाने के लिए उनका मन ललचा रहा था। तब नवाब साहब ने खीरे की फाँक को खिड़की से बाहर फेंक दिया। इस प्रकार नवाब साहब ने सभी फाँकों को नाक के पास ले जाकर केवल सूंघकर उसका रसास्वादन करके उन्हें खिड़की से बाहर फेंक दिया। कहने का भाव है कि नवाब साहब को फाँकों को इसलिए फैंकना पड़ा था क्योंकि वे चाहकर भी दूसरे व्यक्ति के सामने खीरे जैसी साधारण वस्तु नहीं खाना चाहते थे। उनके द्वारा ली गई लंबी साँस ही उनकी खीरा खाने की चाह को व्यक्त कर रही थी।

(4) नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए। हमें तसलीम में सिर खम कर लेना पड़ा-यह है खानदानी तहज़ीब, नफासत और नज़ाकत!
हम गौर कर रहे थे, खीरा इस्तेमाल करने के इस तरीके को खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से संतुष्ट होने का सूक्ष्म, नफीस या एब्स्ट्रैक्ट तरीका ज़रूर कहा जा सकता है परंतु क्या ऐसे तरीके से उदर की तृप्ति भी हो सकती है?
नवाब साहब की ओर से भरे पेट के ऊँचे डकार का शब्द सुनाई दिया और नवाब साहब ने हमारी ओर देखकर कह दिया, ‘खीरा लज़ीज़ होता है लेकिन होता है सकील, नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है।’ । [पृष्ठ 80]

प्रश्न-
(क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
(ख) नवाब साहब क्यों थककर लेट गए थे?
(ग) नवाब साहब ने खीरा खाने की तैयारी कैसे की?
(घ) नवाब साहब की जीवन शैली देखकर लेखक ने क्या सोचा?
(ङ) लेखक को नवाब साहब की किस बात पर सिर खम करना पड़ा?
(च) नवाब साहब डकार लेकर क्या दिखाना चाहते थे?
(छ) नवाब साहब ने खीरा न खाने का क्या कारण बताया?
(ज) प्रस्तुत गद्यांश का प्रसंग बताकर उसके आशय को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) पाठ का नाम-लखनवी अंदाज़।
लेखक का नाम-यशपाल।

(ख) नवाब साहब को खीरे खाने की तैयारी में खीरे को धोने, साफ करने, सिरे काटकर मलने, छीलने, फाँके काटने, नमकमिर्च छिड़कने आदि कार्य करने और चाहकर भी उन्हें खा नहीं पाने के कारण थक गए थे।

(ग) नवाब साहब ने खीरों के नीचे रखा तौलिया झाड़कर अपने सामने बिछा लिया। सीट के नीचे से पानी का लोटा निकालकर खीरों को खिड़की के बाहर धोया और तौलिए से साफ किया। जेब से चाकू निकालकर दोनों खीरों के सिरों को काटा
और उन्हें गोदकर झाग निकाला। खीरों को सावधानी से छीला और फिर उनकी एक-एक फाँक काटते गए और तौलिए पर सजाते गए। तत्पश्चात् उन पर नमक-मिर्च छिड़का। अब खीरे खाने हेतु तैयार थे।

(घ) नवाब साहब की जीवन-शैली देखकर लेखक ने मन-ही-मन सोचा कि केवल स्वाद और सुगंध की कल्पना से उनका पेट कैसे भरता होगा? जब खीरा सूंघकर फेंक दिया तो पेट की तीव्र भूख कैसे शांत होगी। ऐसा करने से भूख का शांत होना तो असंभव ही है।

(ङ) लेखक को नवाब साहब द्वारा खीरे के प्रयोग की विधि पर अपना सिर झुकाना पड़ा था। वे किस प्रकार अपनी खानदानी शिष्टता, स्वच्छता तथा कोमलता का दिखावा करते हुए खीरे का रसास्वादन मात्र सूंघकर करते हैं। केवल अपनी शान-बान बघारने के लिए वे ऐसा क्यों करते हैं? वे सहज जीवन में शर्म अनुभव क्यों करते हैं।

(च) नवाब साहब ने डकार लेकर यह बताना चाहा है कि उनका पेट सुगंध और कल्पना से ही भर गया है। साथ ही यह भी दिखाना चाहते हैं कि वे ऊँचे, श्रेष्ठ और सूक्ष्म स्वादप्रिय व्यक्ति हैं।

(छ) नवाब साहब ने खीरा न खाने का कारण बताते हुए कहा कि खीरा होता तो बहुत ही स्वादिष्ट है, किंतु वह आसानी से पचता नहीं। इससे मेदे पर बोझा पड़ता है। इसलिए वे खीरा नहीं खाते।

(ज) प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 2 में संकलित पाठ ‘लखनवी अंदाज’ से उद्धृत है। इस पाठ के रचयिता श्री यशपाल हैं। इस गद्यांश में लेखक ने नवाबों के खीरा खाने की शैली अथवा केवल सूंघकर या कल्पना से पेट भरने के दिखावे पर कटाक्ष किया है। यहाँ लेखक ने नवाब द्वारा खीरा न खाने के बहाने को भी उजागर किया है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 12 लखनवी अंदाज़

आशय/व्याख्या-लेखक का कथन है कि नवाब साहब खीरे खाने की तैयारी और उसके प्रयोग से थककर लेट गए। लेखक को सम्मान में सिर झुकाना पड़ा कि यह है उनकी पारिवारिक शिष्टता, स्वच्छता और नाजुक मिज़ाजी अर्थात् कोमलता। कहने का भाव है कि नवाब साहब ने खीरा काटने व खाने में अपनी नवाबी शान-शौकतं को बड़ी सफाई से दिखाया। लेखक बताता है कि वह भली-भाँति देख रहा था कि खीरे को प्रयोग करने के इस ढंग को खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से संतुष्ट होने का सूक्ष्म, बढ़िया अथवा अमूर्त ढंग अवश्य कहा जा सकता है, किंतु क्या खीरा खाने के ऐसे ढंग से पेट की तृप्ति भी हो सकती है अर्थात् क्या खीरा सूंघने मात्र से पेट भर सकता है। लेखक को नवाब साहब द्वारा ली गई डकार का शब्द सुनाई दिया। इससे अनुमान लगाया जा सकता था कि वास्तव में ही नवाब साहब का पेट भर गया होगा। नवाब साहब ने डकार लेने के बाद लेखक की ओर देखकर कहा कि यह खीरा भी स्वादिष्ट होता है, किंतु होता बहुत भारी है। अभागा मेदे पर बोझ डाल देता है, अर्थात् जल्दी से हज़्म नहीं होता। कहने का भाव है कि नवाब साहब ने डकार मारने से यह सिद्ध करना चाहा है कि बड़े लोग साधारण तरीके से नहीं खाते। उनके अपने ही अंदाज होते हैं।

लखनवी अंदाज़ Summary in Hindi

लखनवी अंदाज़ लेखक-परिचय

प्रश्न-
यशपाल का जीवन परिचय एवं उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय-यशपाल हिंदी के प्रमुख कहानीकारों में से एक हैं। इनका जन्म 3 दिसंबर, सन् 1903 को पंजाब के फीरोज़पुर छावनी में हुआ था। सन् 1921 में फीरोज़पुर जिले से मैट्रिक परीक्षा में प्रथम आकर उन्होंने अपनी कुशाग्र प्रतिभा का परिचय दिया। सन् 1921 में ही इन्होंने स्वदेशी आंदोलन में सहपाठी लाजपतराय के साथ जमकर भाग लिया। इन्हें सरकार की ओर से प्रथम आने पर छात्रवृत्ति भी मिली। परंतु न केवल इन्होंने उस छात्रवृत्ति को ठुकरा दिया, बल्कि सरकारी कॉलेज में नाम लिखवाना भी मंजूर नहीं किया। शीघ्र ही यशपाल काँग्रेस से उदासीन हो गए। इन्होंने पंजाब के राष्ट्रीय नेता लाला लाजपतराय द्वारा स्थापित लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला ले लिया। यहाँ से प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु के संपर्क में आए।

कॉलेज के विद्यार्थी जीवन में ही ये क्रांतिकारी बन गए। भगतसिंह द्वारा सार्जेंट सांडर्स को गोली मारना, दिल्ली असेम्बली पर बम फेंकना तथा लाहौर में बम फैक्टरी पकड़े जाना आदि इन सभी षड्यंत्रों में उनका भी हाथ था। बाद में समाजवादी प्रजातंत्र सेना के अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद के इलाहाबाद में, अंग्रेजों की गोली का शिकार हो जाने पर ये इस सेना के कमांडर नियुक्त हुए। 23 फरवरी, 1932 को अंग्रेजों से लड़ते हुए ये गिरफ्तार हो गए। इन्हें चौदह वर्ष की सज़ा हो गई। जेल में ही इन्होंने विश्व की अनेक भाषाओं; जैसे फ्रेंच, इटालियन, बांग्ला आदि का अध्ययन किया। जेल में ही इन्होंने अपनी प्रारंभिक कहानियाँ लिखीं। सन 1936 में जेल में ही इनका विवाह प्रकाशवती कपूर से हुआ। इनकी तरह वे भी क्रांतिकारी दल की सदस्या थीं। उनका झुकाव मार्क्सवादी चिंतन की ओर अधिक हुआ। उनकी कहानी ‘मक्रील’ के द्वारा उन्हें बहुत यश मिला। उनकी यह कहानी ‘भ्रमर’ नामक पत्रिका में भी प्रकाशित हुई थी। उन्होंने हिंदी साहित्य की सेवा साहित्यकार और प्रकाशक दोनों रूपों में की। 26 दिसंबर, 1976 को उनकी मृत्यु हो गई।

2. प्रमुख रचनाएँ-यशपाल ने अनेक रचनाओं का निर्माण किया, उनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं- ..

  • कहानी संग्रह-‘पिंजरे की उड़ान’, ‘वो दुनिया’, ‘तर्क का तूफान’, ‘ज्ञानदान’, ‘अभिशप्त’, ‘फूलों का कुर्ता’, ‘धर्म-युद्ध’, ‘उत्तराधिकारी’, ‘चित्र का शीर्षक’, ‘तुमने क्यों कहा था कि मैं सुंदर हूँ’, ‘उत्तमी की माँ’, ‘ओ भैरवी’, ‘सच बोलने की भूल’, ‘खच्चर और आदमी’, ‘भूख के तीन दिन’, ‘लैंप शेड’ ।
  • उपन्यास ‘दादा कॉमरेड’, ‘देशद्रोही’, ‘दिव्या’, ‘पार्टी कॉमरेड’, ‘मनुष्य के रूप’, ‘अमिता’, ‘झूठा सच’, ‘बारह घंटे’, ‘अप्सरा का श्राप’, ‘क्यों फँसे’, ‘मेरी तेरी उसकी बात’।
  • व्यंग्य लेख-चक्कर क्लब’ ।
  • संस्मरण-‘सिंहावलोकन’।
  • विचारात्मक निबंध ‘मार्क्सवाद’, ‘न्याय का संघर्ष’, ‘गाँधीवाद की शव परीक्षा’, ‘बात-बात में बात’, ‘चीनी कम्युनिस्ट पार्टी’, ‘रामराज्य की कथा’, ‘लोहे की दीवार के दोनों ओर’।

3. भाषा-शैली-भाषा के बारे में यशपाल जी का बड़ा ही उदार दृष्टिकोण रहा है। उन्होंने उर्दू, अंग्रेज़ी आदि भाषाओं के शब्दों से कभी परहेज़ नहीं किया। ‘लखनवी अंदाज’ कहानी में जहाँ एक ओर संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है, वहाँ दूसरी ओर उर्दू एवं सामान्य बोलचाल के शब्दों का भी प्रयोग है। इस कहानी की भाषा स्थान, काल तथा चरित्र की प्रकृति के अनुसार गठित हुई है। इसका कारण यह है कि उन्हें न तो संस्कृत के शब्दों से अधिक प्रेम था और न ही अंग्रेज़ी, उर्दू शब्दों से परहेज़। वे भाषा को अभिव्यक्ति का साधन मानते थे। अतः उन्होंने इस कहानी में भाषा का सरल, सहज एवं स्वाभाविक रूप में प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने वर्णनात्मक शैली के साथ-साथ संवादात्मक शैली का भी सफल प्रयोग किया है।

कुल मिलाकर लेखक ने सीधी-सादी और सामान्य हिंदी भाषा का ही प्रयोग किया है। प्रस्तुत कहानी में उर्दू मिश्रित हिंदी का प्रयोग किया गया है।

लखनवी अंदाज़ कहानी का सार

प्रश्न-
लखनवी अंदाज़’ शीर्षक कहानी का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
‘लखनवी अंदाज़’ शीर्षक कहानी एक व्यंग्य रचना है। इसमें लेखक ने पतनशील सामंती वर्ग पर व्यंग्य किया है। जो. वास्तविकता से बेखबर एक बनावटी जीवन-शैली का आदी है। आज के युग में भी समाज पर पलने वाली संस्कृति के लोगों को देखा जा सकता है। कहानी का सार इस प्रकार है-

लेखक को पास के स्टेशन तक ही यात्रा करनी थी। यद्यपि सेकंड क्लास में पैसे अधिक लगते थे। फिर भी सोचा कि नई कहानी के बारे में सोचने का और खिड़की से बाहर दृश्य देखने का अवसर भी मिल जाएगा। लेखक यही सोचकर सेकंड क्लास का टिकट लेकर रेल के डिब्बे में जा बैठा। वहाँ पहले से ही एक सज्जन बैठे थे। उनका पहनावा लखनवी नवाबों जैसा था। वे सीट पर पालथी मारकर बैठे हुए थे। उनके सामने तौलिए पर दो ताज़ा-चिकने खीरे रखे हुए थे। लेखक के आने से उन्हें कुछ विघ्न अनुभव हुआ, किंतु लेखक ने इसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया।

लेखक नवाब के विषय में अनुमान लगाने लगा कि उसे लेखक का आना अच्छा क्यों नहीं लगा होगा। अचानक नवाब ने लेखक से खीरे खाने के लिए पूछा। किंतु लेखक ने इंकार कर दिया। नवाब ने दो खीरों को धोया, तौलिए से साफ किया। खीरों को चाकू से सिरों से काटकर उनके झाग निकाले और बहुत सलीके के साथ छीलकर काटा और उन पर नमक-मिर्च छिड़का। नवाब साहब का मुख देखकर ऐसा लगता था कि खीरे की फाँकें देखकर उनके मुँह में पानी आ रहा है। खीरे की सजावट को देखकर लेखक की खीरे खाने की इच्छा हो रही थी, किंतु लेखक एक बार इंकार कर चुका था, इसलिए अब नवाब द्वारा पुनः पूछे जाने पर आत्म-सम्मान की रक्षा हेतु इंकार करना पड़ा।

नवाब साहब भी खीरे की फाँकों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने खीरे की एक-एक फाँक उठाई, उन्हें सूंघा और खिड़की के बाहर फेंक दिया। बाद में नवाब ने लेखक की ओर देखा ऐसा लग रहा था जैसे कह रहे हों कि खानदानी रईसों का यह भी खाने का एक अनोखा ढंग है।

लेखक मन-ही-मन सोच रहा था कि खाने के इस ढंग ने क्या पेट की भूख को शांत किया होगा? इतने में नवाब साहब जोर से डकार लेते हैं। अंत में नवाब साहब बोले कि खीरा खाने में बहुत अच्छा लगता है, किंतु अपच होने के कारण मेदे पर भारी पड़ता है। लेखक ने सोचा कि यदि नवाब बिना खीरा खाए डकार ले सकता है तो बिना घटना, पात्र और विचार के नई कहानी क्यों नहीं लिखी जा सकती।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-78) मुफस्सिल = केंद्रीय स्थान। पैसेंजर ट्रेन = यात्री गाड़ी। उतावली = जल्दी में। फूंकार करना = तेज़ आवाज़ करना। दाम = कीमत। अनुमान = अंदाज़ा। प्रतिकूल = उल्टा। निर्जन = एकांत, खाली। बर्थ = रेल के डिब्बे में बैठने की सीट। सफेदपोश = भला व्यक्ति। नवाबी नस्ल = नवाबों के स्वभाव वाला। सुविधा = आराम। सहसा = अचानक। चिंतन = विचार करना। विघ्न = बाधा। असंतोष = संतोष न होना। अपदार्थ वस्तु = तुच्छ वस्तु। आँखें चुराना = नज़रें बचाना। असुविधा = जहाँ सुविधा न हो। किफायत = बचत। संगति = साथ। संकोच = शर्म। गवारा न होना = सहन न होना। वक्त काटना = समय व्यतीत करना। गौर करना = ध्यान देना। आदाब-अर्जु = स्वागत या अभिवादन की एक विधि। शौक फरमाना = आनंद लेना। भाँप लेना = जान लेना, समझ लेना। गुमान = भ्रम। हरकत = गति, कार्य। लथेड़ लेना = सम्मिलित करना। किबला = सम्मानपूर्ण संबोधन।

(पृष्ठ-79) गोदकर = चुभाकर। एहतियात = सावधानी। हाज़िर = उपस्थित। करीने से = अच्छे ढंग से। सुर्जी = लाली। बुरकना = छिड़कना। स्फुरण = हिलना। भाव-भंगिमा = चेहरे पर उभरे हुए भाव। रईस = अमीर। असलियत = वास्तविकता। प्लावित होना = भर आना। पनियाती = रस से युक्त। मुँह में पानी आना = ललचाना। महसूस होना = अनुभव होना। मेदा = पाचन शक्ति। सतृष्ण = प्यास। दीर्घ निश्वास = लंबी साँस । पलकें मूंदना = आँखें बंद करना।

(पृष्ठ-80) रसास्वादन = रस का स्वाद लेना। गर्व = अभिमान। गुलाबी आँखें = अभिमान से भरी नज़रें। तसलीम = सम्मान। सूक्ष्म = बारीक। नफीस = बढ़िया। एब्स्ट्रैक्ट = अमूर्त, जिसका स्थूल आकार न हो। नज़ाकत = कोमलता। उदर = पेट। नामुराद = अभागा। ज्ञान चक्षु = ज्ञान रूपी नेत्र। सकील = भारी।

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