Class 11

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सर्वप्रथम मानवाधिकारों की घोषणा कब और कहाँ हुई थी?
उत्तर:
सर्वप्रथम मानवाधिकारों की घोषणा 1789 ई० में फ्रांस की राष्ट्रीय सभा में हुई थी।

प्रश्न 2.
भारत में सर्वप्रथम कब और किसके द्वारा मौलिक अधिकारों की माँग की गई?
उत्तर:
भारत में सर्वप्रथम 1895 ई० में बाल गंगाधर तिलक के द्वारा मौलिक अधिकारों की माँग की गई।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान द्वारा दिए अधिकारों को मौलिक कहने के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:
(1) अधिकारों को मौलिक इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन्हें देश की मौलिक विधि अर्थात् संविधान में स्थान दिया गया है और इनमें विशेष संशोधन प्रक्रिया के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार से परिवर्तन नहीं किया जा सकता,

(2) ये अधिकार – व्यक्ति के प्रत्येक पक्ष के विकास हेतु मूल रूप में आवश्यक हैं, जिनके अभाव में उनके व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध हो जाएगा।

प्रश्न 4.
दक्षिण अफ्रीका के संविधान में वर्णित किन्हीं दो मूल अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • गरिमा का अधिकार,
  • स्वास्थ्य की रक्षा, रोटी, पानी तथा सामाजिक सुरक्षा का अधिकार।

प्रश्न 5.
मूल अधिकारों को संविधान में रखने के किन्हीं दो उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • सत्तारूढ़ दल के अत्याचार से सुरक्षा करने हेतु तथा,
  • अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने के लिए।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • मौलिक अधिकार पूर्ण तथा निरंकुश नहीं हैं,
  • संसद मूल अधिकारों को निलम्बित कर सकती है।

प्रश्न 7.
‘कानून के समक्ष समानता’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कानून के समक्ष समानता का तात्पर्य है कि किसी व्यक्ति को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होता और समस्त व्यक्ति कानून के सामने बराबर होते हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

प्रश्न 8.
‘कानून के समक्ष संरक्षण’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
कानून के समक्ष संरक्षण से तात्पर्य है कि समान परिस्थितियों में सभी व्यक्तियों के साथ कानून का एक-समान व्यवहार होना।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान में वर्णित ‘समानता के अधिकार’ के कोई दो अपवाद लिखिए।
उत्तर:

  • विदेशी राज्यों के मुखियाओं और राजनायिकों के विरुद्ध भारतीय कानून के अंतर्गत कार्रवाई नहीं की जा सकती,
  • राष्ट्रपति तथा राज्यपालों के विरुद्ध उनके कार्यकाल के दौरान कोई फौजदारी मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान में उल्लेखित स्वतंत्रता के अधिकार के किन्हीं दो अपवादों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • ये अधिकार शत्रु-देश के नागरिकों को प्राप्त नहीं होंगे,
  • निवारक नजरबन्दी के अधीन की गई गिरफ्तारी के सन्दर्भ में भी स्वतंत्रता संबंधी अधिकार की व्यवस्थाएँ लागू नहीं होंगी।

प्रश्न 11.
‘बन्दी प्रत्यक्षीकरण’ (Habeas Corpus) का क्या अर्थ है?
उत्तर:
हैबियस कॉरपस’ लेटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘शरीर हमारे सामने पेश करो।’ इस लेख द्वारा न्यायालय बन्दी बनाने वाले अधिकारी को यह आदेश देता है कि बन्दी बनाए गए व्यक्ति को एक निश्चित तिथि और स्थान पर न्यायालय में उपस्थित किया जाए, जिससे न्यायालय यह निर्णय कर सके कि किसी व्यक्ति को बन्दी बनाए जाने के कारण वैध हैं या अवैध । यदि बन्दी बनाने के कारण अवैध हैं तो उसे मुक्त करने संबंधी लेख जारी किया जाता है।

प्रश्न 12.
‘परमादेश लेख (Writ of Mandamus) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
‘मेण्डेमस’ शब्द लेटिन भाषा का है जिसका अर्थ है ‘हम आज्ञा देते हैं। यह लेख न्यायालय उस समय जारी करता है, जब कोई व्यक्ति या संस्था अपने सार्वजनिक दायित्व का निर्वाह न कर रही हो और जिसके फलस्वरूप व्यक्तियों के मूल अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों की आलोचना के कोई दो आधार लिखिए।
उत्तर:

  • संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों पर बहुत अधिक प्रतिबंध हैं, जिसके फलस्वरूप साधारण व्यक्ति इन्हें समझने में प्रायः असमर्थ-सा रहता है,
  • मौलिक अधिकारों की भाषा कठिन एवं अस्पष्ट है जिसे साधारण एवं अशिक्षित व्यक्ति समझ नहीं पाता।

प्रश्न 14.
मौलिक अधिकारों की कोई दो उपयोगिताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • मौलिक अधिकार कानून का शासन स्थापित करते हैं,
  • मौलिक अधिकारों द्वारा समाज में सामाजिक समानता की स्थापना होती है।

प्रश्न 15.
भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों को कब और कौन-से भाग में जोड़ा गया?
उत्तर:
भारतीय संविधान में सन् 1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा संविधान के भाग चार में अनुच्छेद 51-A में जोड़ा गया।

प्रश्न 16.
भारतीय संविधान में दिए गए किन्हीं दो मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • संविधान का पालन करना तथा इसके आदर्शों, इसकी संस्थाओं, राष्ट्रीय झण्डे तथा गान का सम्मान करना,
  • भारत की प्रभुसत्ता, एकता तथा अखण्डता को बनाए रखना और सुरक्षित रखना।।

प्रश्न 17.
भारतीय संविधान में सम्मिलित मौलिक कर्तव्यों के कोई दो महत्त्व लिखिए।
उत्तर:

  • मौलिक कर्तव्य व्यक्ति के आदर्श एवं पथ-प्रदर्शक हैं,
  • मौलिक कर्त्तव्य मूल अधिकारों की प्राप्ति में सहायक हैं।

प्रश्न 18.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कोई दो कार्य लिखिए।
उत्तर:

  • यह मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की जाँच करता है,
  • यह मानवाधिकारों के क्षेत्र में अनुसन्धान को प्रोत्साहित करता है।

प्रश्न 19.
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों का तात्पर्य यह है कि ये सिद्धान्त संविधान के द्वारा आगामी सरकारों के लिए कुछ नैतिक निर्देश हैं। ये सिद्धान्त इस प्रकार के आदेश हैं जिन पर आगामी सरकारों को जनता के हित में कार्य करने के लिए प्रेरणा दी गई है।

प्रश्न 20.
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों के कोई दो लक्षण लिखिए।
उत्तर:

  • ये राज्य की शासन-व्यवस्था के आधारभूत सिद्धान्त हैं,
  • ये सिद्धान्त न्याय योग्य नहीं हैं।

प्रश्न 21.
राज्य-नीति के कोई दो समाजवादी निदेशक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • राज्य ऐसा प्रयास करें कि सम्पत्ति और उत्पादन के साधनों का इस प्रकार केंद्रीयकरण न हो कि सार्वजनिक हित को किसी प्रकार की बाधा पहुँचे,
  • स्त्री और पुरुष दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले।

प्रश्न 22.
राज्य-नीति के कोई दो गाँधीवादी निदेशक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) अनुच्छेद 40 के अनुसार राज्य ग्राम पंचायतों के गठन के लिए प्रयत्न करेगा और उन्हें ऐसी शक्तियाँ तथा प्राधिकार प्रदान करेगा जिनसे कि वे स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर सकें,

(2) अनुच्छेद 46 के अनुसार राज्य समाज के दुर्बल वर्गों विशेषकर अनुसूचित जातियों तथा कबीलों की शिक्षा और आर्थिक उन्नति के लिए प्रयत्न करेगा तथा उन्हें सामाजिक अन्याय एवं शोषण से बचाएगा।

प्रश्न 23.
राज्य-नीति के कोई दो उदारवादी निदेशक सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर:

  • राज्य समस्त भारत में समान आचार-संहिता लागू करने का प्रयत्न करेगा,
  • राज्य ऐतिहासिक एवं कलात्मक महत्त्व रखने वाले स्मारकों, स्थानों तथा वस्तुओं की रक्षा करेगा और उनको नष्ट होने से बचाएगा।

प्रश्न 24.
राज्य-नीति के किन्हीं दो अंतर्राष्ट्रीय निदेशक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • राज्य द्वारा अंतर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास करना,
  • राष्ट्रों के मध्य उचित व सम्मानपूर्वक संबंध बनाए रखने का प्रयास करना।

प्रश्न 25.
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों की आलोचना के कोई दो आधार बताइए।
उत्तर:

  • निदेशक सिद्धान्तों के पीछे कानूनी शक्ति का अभाव है,
  • 20वीं शताब्दी में लागू होने वाले निदेशक सिद्धान्त 21वीं शताब्दी में भी उपयोगी होंगे, यह आवश्यक नहीं है।

प्रश्न 26.
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों के कोई दो महत्त्व लिखिए।
उत्तर:

  • ये सिद्धान्त कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सहायक सिद्ध होंगे,
  • इन सिद्धान्तों से सरकार की नीतियों में निरन्तरता तथा स्थिरता सम्भव होगी।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मौलिक अधिकार का क्या अर्थ है? भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को कौन-से मौलिक अधिकार दिए गए हैं?
उत्तर:
मौलिक अधिकार उन सुविधाओं, स्वतन्त्रताओं तथा अधिकारों को कहते हैं जो एक व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए अति आवश्यक हैं। ये वे मूल अधिकार हैं जिनका प्रयोग किए बिना व्यक्ति अपना शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक विकास नहीं कर सकता। प्रत्येक लोकतन्त्रीय राज्य अपने सभी नागरिकों को बिना किसी भेद-भाव के कुछ मौलिक अधिकार देता है। भारतीय संबिधान द्वारा भी नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए हैं जो इस प्रकार हैं-

  • समानता का अधिकार,
  • स्वतन्त्रता का अधिकार,
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार,
  • धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार,
  • सांस्कृतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार,
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान में दिए गए मूल अधिकारों का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का बहुत महत्त्व है। ये देश के सभी नागरिकों को समान रूप से विकास के अवसर प्रदान करते हैं। ये सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा कानून के सामने समानता पर बल देते हैं। ये नागरिकों को अनेक प्रकार की स्वतन्त्रताएँ प्रदान करते हैं जिनके प्रयोग से वे अपने जीवन की उन्नति तथा विकास कर सकते हैं।

इन अधिकारों से भारत के एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का भी संकेत मिलता है। मौलिक अधिकार सरकार की निरंकुशता पर रोक लगाते हैं और उसे मनमानी करने से रोकते हैं। ये अधिकार सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देते हुए भारत में सामाजिक-आर्थिक लोकतन्त्र के विकास में सहायता करते हैं। मौलिक अधिकार अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान करते हैं।

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प्रश्न 3.
भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की कोई पाँच विशेषताएँ बताएँ।।
उत्तर:
भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की पाँच विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकार बहुत ही व्यापक तथा विस्तृत हैं,
  • मौलिक अधिकार न्याय-संगत हैं। इसका अर्थ यह है कि इनका उल्लंघन होने पर नागरिकों को न्यायालय में जाकर न्याय माँगने का अधिकार है,
  • मौलिक अधिकार सीमित हैं। इनके प्रयोग पर कुछ सीमाएँ लगी हुई हैं,
  • मौलिक अधिकार देश के सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त हैं,
  • संकटकाल में मौलिक अधिकारों को निलम्बित (Suspend) किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में दिए गए समानता के अधिकार की व्याख्या करो।
अथवा
भारतीय संविधान के अनच्छेद 14-18 में दिए गए समानता के अधिकार का वर्णन करो।
उत्तर:
‘समानता का अधिकार’ का वर्णन संविधान की धारा 14-18 में किया गया है। अनुच्छेद 14 के अनुसार भारत के सभी नागरिकों को कानून के सामने समानता प्रदान की गई है।
अनुच्छेद 15 के अनुसार नागरिकों में जाति, धर्म, रंग, लिंग तथा जन्म-स्थान आदि के आधार पर सभी प्रकार के भेद-भावों को समाप्त कर दिया गया है।
अनुच्छेद 16 के अनुसार सभी नागरिकों को सरकारी नौकरी पाने के क्षेत्र में समानता प्रदान की गई है।
अनुच्छेद 17 के अनुसार देश में छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है और इसके प्रयोग को कानून द्वारा अवैध घोषित कर दिया गया है।
अनुच्छेद 18 द्वारा सैनिक तथा शिक्षा-सम्बन्धी उपाधियों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार की उपाधियों को समाप्त कर दिया गया है।

प्रश्न 5.
संविधान के अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत नागरिकों को कौन-कौन-सी स्वतन्त्रताएँ प्रदान की गई हैं? अथवा भारतीय संविधान में दी गई विभिन्न मूल स्वतन्त्रताओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत नागरिकों को दी गई स्वतन्त्रताएँ इस प्रकार हैं-

  • भाषण देने तथा विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता,
  • शान्तिपूर्ण तथा बिना हथियारों के सभा करने की स्वतन्त्रता,
  • समुदाय अथवा संघ बनाने की स्वतन्त्रता,
  • देश के किसी भी भाग में घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता,
  • देश में किसी भी स्थान पर बसने की स्वतन्त्रता,
  • कोई भी व्यवसाय अपनाने की स्वतन्त्रता।

प्रश्न 6.
मौलिक स्वतन्त्रताओं पर किन आधारों पर तार्किक प्रतिबन्ध (Reasonable Restrictions) लगाए जा सकते हैं?
उत्तर:
अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत दी गई स्वतन्त्रताओं पर निम्नलिखित तार्किक प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं-

(1) संसद भारत की प्रभुसत्ता, अखण्डता तथा सुरक्षा को बनाए रखने के लिए इन स्वतन्त्रताओं पर प्रतिबन्ध लगा सकती है,
(2) संसद विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को बनाए रखने के लिए इन स्वतन्त्रताओं पर प्रतिबन्ध लगा सकती है,
(3) संसद सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता अथवा नैतिकता, न्यायालय का अपमान, मान-हानि व हिंसा के लिए उत्तेजित करना आदि के आधारों पर इन स्वतन्त्रताओं पर प्रतिबन्ध लगा सकती है,
(4) राज्य जनता के हितों और अनुसूचित कबीलों के हितों की सुरक्षा के लिए इन स्वतन्त्रताओं पर उचित प्रतिबन्ध लगा सकते हैं।

प्रश्न 7.
शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Exploitation) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 के अनुसार नागरिकों को शोषण के विरुद्ध अधिकार दिया गया है। इस अधिकार के अनुसार व्यक्तियों को बेचा या खरीदा नहीं जा सकता है। किसी भी व्यक्ति से बेगार नहीं ली जा सकती। किसी भी व्यक्ति की आर्थिक दशा से अनुचित लाभ नहीं उठाया जा सकता और उसे कोई भी काम उसकी इच्छा के विरुद्ध करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी ऐसे कारखाने या खान में नौकर नहीं रखा जा सकता, जहाँ उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ने की सम्भावना हो।

प्रश्न 8.
मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए भारतीय संविधान में की गई व्यवस्थाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) संविधान के अनुच्छेद 13 में यह व्यवस्था की गई है कि राज्य कोई ऐसा कानून नहीं बना सकता जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सीमित अथवा समाप्त करता हो।

(2) मौलिक अधिकार न्यायसंगत हैं और हम उनकी रक्षा के लिए न्यायालयों में जा सकते हैं। न्यायालय अधिकारों की रक्षा के लिए आदेश जारी कर सकते हैं।

(3) सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के पास पुनर्निरीक्षण की शक्ति है। इस शक्ति के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय संसद तथा राज्य विधानमण्डल के कानूनों को और राष्ट्रपति तथा राज्यपालों के आदेश को रद्द कर सकते हैं, यदि वे कानून या आदेश मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों।

प्रश्न 9.
संवैधानिक उपचारों के अधिकार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सवैधानिक उपचारों का अधिकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों की प्राप्ति की रक्षा का अधिकार है। अनुच्छेद 32 के अनुसार प्रत्येक नागरिक अपने मौलिक अधिकारों की प्राप्ति और रक्षा के लिए उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के पास जा सकता है।

यदि सरकार हमारे किसी मौलिक अधिकार को लागू न करे या उसके विरुद्ध कोई काम करे तो उसके विरुद्ध न्यायालय में प्रार्थना-पत्र दिया जा सकता है और न्यायालय द्वारा उस अधिकार को लागू करवाया जा सकता है या उस कानन को रद्द कराया जा सकता है। उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय को इस सम्बन्ध में कई प्रकार के लेख (Writs) जारी करने का अधिकार है।

प्रश्न 10.
सवैधानिक उपचारों के अधिकार के अन्तर्गत न्यायपालिका किस प्रकार के आदेशों को जारी कर सकती है?
उत्तर:
मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए न्यायपालिका निम्नलिखित आदेश जारी कर सकती है-

  • बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख,
  • परमादेश का आज्ञा-पत्र,
  • मनाही आज्ञा-पत्र,
  • उत्प्रेषण लेख तथा
  • अधिकार-पृच्छा लेख।

प्रश्न 11.
‘बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख’ (Writ of Habeas Corpus) तथा ‘परमादेश लेख’ (Writ of Mandamus) पर नोट लिखिए।
उत्तर:
1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख-‘बन्दी प्रत्यक्षीकरण’ शब्द लेटिन भाषा के शब्द ‘हेबियस कॉर्पस’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है-‘हमारे सम्मुख शरीर को प्रस्तुत करो’ (Let us have the body.) इस आदेश के अनुसार न्यायालय किसी अधिकारी को जिसने किसी व्यक्ति को गैर-कानूनी ढंग से बन्दी बना रखा हो, आज्ञा दे सकता है कि कैदी को समीप के न्यायालय में उपस्थित किया जाए, ताकि उसकी गिरफ्तारी के कानून के औचित्य या अनौचित्य का निर्णय किया जा सके। अनियमित गिरफ्तारी की दशा में न्यायालय उसको स्वतन्त्र करने का आदेश दे सकता है।

2. ‘परमादेश’ लेख-‘परमादेश लेख’ लेटिन भाषा के शब्द ‘मैण्डमस’ से लिया गया है। जिसका अर्थ है-‘हम आदेश देते हैं। (We Command.) इस आदेश द्वारा न्यायालय किसी अधिकारी, संस्था अथवा निम्न न्यायालय को अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए बाधित कर सकता है। इस आदेश द्वारा न्यायालय राज्य के कर्मचारियों से ऐसे कार्य करवा सकता है जिनको वे किसी कारण से न कर रहे हों तथा जिनके न किए जाने से किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो।

प्रश्न 12.
अधिकार-पृच्छा लेख (Writ of Quo-Warranto) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अधिकार-पृच्छा लेख का अर्थ है ‘किसके आदेश से’ अथवा ‘किस अधिकार से’। यह आदेश उस समय जारी किया जाता है, जब कोई व्यक्ति ऐसे कार्य को करने का दावा करता हो, जिसको करने का उसको अधिकार न हो। इस आदेश के अनुसार उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय किसी व्यक्ति को कोई पद ग्रहण करने से रोकने के लिए निषेधाज्ञा जारी कर सकता है और उक्त पद के रिक्त होने की तब तक के लिए घोषणा कर सकता है, जब तक कि न्यायालय द्वारा कोई निर्णय न दिया जाए।

प्रश्न 13.
संकटकाल में मौलिक अधिकारों के स्थगन पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
संविधान राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि जब अनुच्छेद 352 तथा 356 के अन्तर्गत संकटकालीन व्यवस्था की जाए तो संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है। मौलिक अधिकार तभी स्थगित किए जा सकते हैं, जब संकटकाल की घोषणा युद्ध या बाहरी आक्रमण के कारण हो, न कि शस्त्र-विद्रोह के आधार पर।

राष्ट्रपति संकटकाल में मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए न्यायालय का सहारा लेने के अधिकार को समस्त भारत या उसके किसी भाग में स्थगित कर सकता है, परन्तु अनुच्छेद 21 के अधीन जीवन या व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार को लागू करवा अधिकार को स्थगित नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 14.
‘निवारक नजरबन्दी’ (Preventive Detention) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
किसी भी व्यक्ति को राज्य की सुरक्षा को भंग किए जाने के सन्देह पर बन्दी बनाया जा सकता है। ऐसे व्यक्ति को किसी भी प्रकार की ‘निजी स्वतन्त्रता’ प्राप्त नहीं होती, परन्तु यदि उसे दो महीने से अधिक नजरबन्द रखना हो, तो ऐसा सलाहकार बोर्ड के परामर्श पर ही किया जा सकता है। निवारक नजरबन्दी में बन्दी बनाए गए व्यक्ति को उसके बंदी बनाए जाने का कारण बताया जाना आवश्यक है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

प्रश्न 15.
सांस्कृतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इस अधिकार का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 29 तथा 30 में किया गया है। इसके अन्तर्गत-
(1) सभी नागरिकों को अपनी भाषा, धर्म व संस्कृति को सुरक्षित रखने तथा उसका विकास करने का पूरा अधिकार है,

(2) भाषा अथवा धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी इच्छानुसार शिक्षा-संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार है। इस प्रकार की संस्थाओं को अनुदान देने में राज्य किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करेगा,

(3) किसी भी नागरिक को राज्य द्वारा स्थापित अथवा सहायता से चलाए जाने वाले शिक्षा-संस्थान में प्रवेश देने में जाति, धर्म, वंश, भाषा अथवा इनमें से किसी एक के आधार पर मनाही नहीं की जा सकती।

प्रश्न 16.
भारतीय संविधान में दिए गए पाँच मौलिक कर्तव्यों की व्याख्या कीजिए। उत्तर भारतीय संविधान में दिए गए पाँच मौलिक कर्तव्य निम्नलिखित हैं

  • प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह संविधान, राष्ट्रीय झण्डे तथा राष्ट्रीय गीत का सम्मान करे।
  • नागरिकों का कर्तव्य है कि वे राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन के उद्देश्यों को स्मरण तथा प्रफुल्लित करें।
  • प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह भारत की प्रभुसत्ता, एकता व अखण्डता का समर्थन और रक्षा करे।
  • नागरिकों का कर्तव्य है कि वे देश की रक्षा करें तथा राष्ट्रीय सेवाओं में आवश्यकता के समय भाग लें।
  • लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण फैलाना।

प्रश्न 17.
मौलिक कर्तव्यों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
मौलिक कर्तव्यों का विशेष महत्त्व है। मौलिक कर्त्तव्य नागरिक को आदर्श बनाते हैं तथा उनमें जागरूकता उत्पन्न करते हैं। मौलिक कर्त्तव्य नागरिकों का दृष्टिकोण व्यापक बनाते हैं और नागरिकों में संविधान का पालन, देश की रक्षा, एकता तथा अखण्डता को बनाए रखने की भावना पैदा करते हैं। मौलिक कर्तव्यों का पालन करके लोकतन्त्र को सफल बनाया जा सकता है।

इसके फलस्वरूप व्यक्ति की व्यक्तिगत उन्नति तथा विकास के साथ-साथ समाज और देश भी प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा। इन मौलिक कर्तव्यों के बारे में श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था कि यदि लोग मौलिक कर्तव्यों को अपने दिमाग में रख लेंगे तो हम शीघ्र ही एक शान्तिपूर्ण एवं मैत्रीपूर्ण क्रान्ति देख सकेंगे। अतः मौलिक कर्तव्यों को संविधान में अंकित किए जाने से नागरिकों को यह ध्यान में रहेगा कि अधिकारों के साथ-साथ उनके कुछ कर्त्तव्य भी हैं।

प्रश्न 18.
संविधान में दिए गए मौलिक कर्तव्यों की आलोचना कीजिए।
उत्तर:
संविधान में दिए गए मौलिक कर्तव्यों की आलोचना निम्नलिखित तथ्यों के अन्तर्गत की जा सकती है

1. कुछ मौलिक कर्त्तव्य अस्पष्ट हैं-मौलिक कर्तव्यों का विवरण देते हुए संविधान में कुछ अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिनकी मनमाने ढंग से व्याख्या की जा सकती है; जैसे मिली-जुली संस्कृति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अन्वेषण व सुधार की भावना।

2. दण्ड की भावना का अभाव मौलिक कर्त्तव्यों के पीछे दण्ड की भावना का अभाव है। इसी संदर्भ में स्वर्ण सिंह समिति ने यह सुझाव दिया था कि मौलिक कर्तव्यों की अवहेलना करने वालों को दण्ड दिया जाना चाहिए और इसके लिए संसद द्वारा उचित कानून का निर्माण करना चाहिए।

3. केवल उच्च आदर्श मौलिक कर्तव्यों की आलोचना तीसरे स्थान पर की जा सकती है कि ये मात्र उच्च आदर्श प्रस्तुत करते. हैं। भारत की अंधिक जनसंख्या गाँवों में निवास करती है जो इन उच्च आदर्शों को समझने में असमर्थ है।

4. संविधान के तीसरे अध्याय में सम्मिलित होने चाहिएँ मौलिक कर्तव्यों को भारतीय संविधान के अध्याय चार में शामिल किया गया है, जबकि इन्हें मौलिक अधिकारों वाले अध्याय तीन में ही रखा जाना चाहिए, व कर्तव्य अच्छे लगते हैं।

प्रश्न 19.
भारतीय संविधान में दिए गए राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों का स्वरूप (प्रकृति) क्या है?
रतीय संविधान के निर्माता भारत को एक आदर्श कल्याणकारी राज्य बनाना चाहते थे। इस उद्देश्य से उन्होंने सरकार की नीति तथा शासन को सही दिशा देने के लिए संविधान में राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों को शामिल किया। ये सिद्धान्त सरकार का मार्गदर्शन करने के लिए हैं और ये न्यायसंगत नहीं हैं।

यदि सरकार इनमें से किसी भी सिद्धान्त को लागू नहीं करती, तो भी नागरिकों को न्यायालय में जाकर सरकार के विरुद्ध न्याय माँगने का अधिकार नहीं है। ये सरकार को सकारात्मक निर्देश हैं और यदि सरकार इन्हें लागू नहीं करती तो जनमत उस सरकार के विरुद्ध हो जाएगा। ऐसी सरकार के अगले चुनावों में जीतने की सम्भावना नहीं होगी।

प्रश्न 20.
हमारे संविधान में राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों से सम्बन्धित अध्याय का क्या महत्त्व है? अथवा राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों का महत्त्व बताएँ।
उत्तर:
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों का महत्त्व इस प्रकार है-
(1) संघीय सरकार तथा राज्य सरकारों द्वारा इन सिद्धान्तों के लागू करने से भारत एक कल्याणकारी राज्य बन सकता है,

(2) संविधान की प्रस्तावना में सभी नागरिकों को राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक न्याय प्रदान करने की जो घोषणा की गई है, ये सिद्धान्त उस उद्देश्य की प्राप्ति में सहायता करते हैं,

(3) ये सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा की स्थापना में सहायता करते हैं,

(4) सरकारें जब इन सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर अपनी नीति का निर्माण करेंगी, तो समान कानूनों का निर्माण होगा, जिससे राष्ट्रीय एकता की स्थापना होगी,

(5) ये सिद्धान्त जनता के पास सरकार की सफलताओं को जाँचने की कसौटी है।

प्रश्न 21.
42वें संशोधन द्वारा निदेशक सिद्धान्तों में कौन-से नए सिद्धान्त जोड़े गए हैं ?
उत्तर:

  • राज्य अपनी नीति का संचालन इस प्रकार करेगा कि बच्चों को स्वतंत्र और प्रतिष्ठापूर्ण वातावरण में अपने विकास के लिए अवसर और सुविधाएँ प्राप्त हों,
  • राज्य ऐसी कानून प्रणाली के प्रचलन की व्यवस्था करेगा जो समान अवसर के आधार पर न्याय का विकास करे,
  • राज्य कानून या अन्य ढंग से श्रमिकों को उद्योगों के प्रबन्ध में भागीदारी बनाने के लिए पग उठाएगा,
  • राज्य वातावरण की सुरक्षा और विकास करने के लिए देश के वन तथा वन्य जीवन को सुरक्षित रखने का प्रयत्न करेगा।

प्रश्न 22.
कोई ऐसे पाँच निदेशक सिद्धान्त बताएँ जिनका सम्बन्ध कल्याणकारी राज्य की स्थापना से है?
उत्तर:
(1) राज्य अपनी नीति का संचालन इस प्रकार करेगा कि राज्य के सभी नागरिकों, पुरुषों तथा स्त्रियों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त हों,

(2) बेकारी, बुढ़ापे, बीमारी तथा अंगहीन होने की अवस्था में ओर से आर्थिक सहायता पाने का अधिकार हो,

(3) राज्य काम करने वालों के लिए न्यायपूर्ण मानवीय परिस्थितियों में काम करने की व्यवस्था का प्रबन्ध करेगा और स्त्रियों के लिए प्रसूति सहायता देने का प्रबन्ध करेगा,

(4) संविधान के लागू होने से दस वर्ष के भीतर राज्य 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा का प्रबन्ध करेगा,

(5) राज्य अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के हितों की रक्षा की व्यवस्था करेगा।

प्रश्न 23.
राज्य-नीति के नीति निदेशक सिद्धान्तों के पीछे कौन-सी शक्ति कार्य कर रही है?
उत्तर:
राज्य-नीति के नीति निदेशक सिद्धान्त न्यायसंगत नहीं हैं अर्थात् इनके पीछे कानून की शक्ति नहीं है, परन्तु इन सिद्धान्तों के पीछे जनमत (Public Opinion) की शक्ति है। लोकतन्त्र में जनमत का बहुत महत्त्व होता है और कोई भी सरकार जनमत की अवहेलना करके अधिक समय तक पद पर बनी नहीं रह सकती।

चूँकि ये सिद्धान्त कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने में सहायता करते हैं, अतः कोई भी सरकार अपनी नीति का निर्माण करते समय इन्हें अपनी आँखों से ओझल नहीं कर सकती। इनकी अवहेलना करने वाली सरकार के लिए अगले चुनावों में जीतने की सम्भावना नहीं होती। अतः निदेशक सिद्धान्तों के पीछे जनमत की शक्ति है।

प्रश्न 24.
भारतीय संविधान में दिए गए निदेशक सिद्धान्तों में से कोई पाँच सिद्धान्त लिखें।
उत्तर:
भारतीय संविधान में दिए गए पाँच निदेशक सिद्धान्त इस प्रकार हैं-

  • राज्य ऐसे समाज का निर्माण करेगा, जिसमें लोगों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय प्राप्त होगा,
  • स्त्रियों और पुरुषों को आजीविका कमाने के समान अवसर दिए जाएँगे,
  • देश के सभी नागरिकों के लिए समान कानून तथा समान न्याय संहिता की व्यवस्था होनी चाहिए,
  • बच्चों और नवयुवकों की नैतिक पतन तथा आर्थिक शोषण से रक्षा हो,
  • राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करेगा।

प्रश्न 25.
नीति निदेशक सिद्धान्त भारत में किस प्रकार एक धर्म-निरपेक्ष और समाजवादी समाज की नींव डालते हैं?
उत्तर:
नीति निदेशक सिद्धान्त धर्म-निरपेक्ष और समाजवादी समाज की आधारशिला रखते हैं। निदेशक सिद्धान्त राज्य सरकार को भारत में एक समान व्यवहार संहिता लागू करने का निर्देश देते हैं। निदेशक सिद्धान्तों के अनुसार राज्य एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करेगा, जिसमें सभी नागरिकों को राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय प्राप्त होगा।

प्रश्न 26.
भारत की विदेश नीति से सम्बन्धित निदेशक सिद्धान्त लिखें। अथवा अन्तर्राष्ट्रीय नीति सम्बन्धी सिद्धान्तों का वर्णन करें।
उत्तर:
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त राष्ट्रीय नीति के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय नीति से भी सम्बन्धित हैं। अनुच्छेद 51 में कहा गया है कि राज्य-

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देगा,
  • राष्ट्रों के मध्य उचित व सम्मानपूर्वक सम्बन्ध बनाए रखेगा,
  • अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि व कानूनों को सम्मान देगा,
  • अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का मध्यस्थता द्वारा निपटारा करने का प्रयास करेगा।

प्रश्न 27.
किन बातों के आधार पर राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों की आलोचना की गई है?
उत्तर:
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों की आलोचना दी गई बातों के आधार पर की गई है

  • राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त न्याय-संगत नहीं हैं,
  • राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों में उचित वर्गीकरण तथा स्पष्टता का अभाव है,
  • निदेशक सिद्धान्त केवल आश्वासन मात्र हैं,
  • राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त अव्यावहारिक हैं,
  • निदेशक सिद्धान्तों में स्थायित्व की कमी है।

प्रश्न 28.
मौलिक अधिकारों तथा राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों में कोई पाँच अन्तर बताएँ।
उत्तर:
मौलिक अधिकारों तथा राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों में अन्तर इस प्रकार हैं-

  • मौलिक अधिकार न्याय-योग्य हैं, जबकि राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त न्याय-योग्य नहीं हैं,
  • मौलिक अधिकारों का स्वरूप निषेधात्मक है, जबकि निदेशक सिद्धान्त अधिकतर सकारात्मक हैं,
  • मौलिक अधिकार नागरिकों के लिए हैं, जबकि निदेशक सिद्धान्त सरकार के लिए हैं,
  • मौलिक अधिकार राजनीतिक लोकतन्त्र का आधार हैं, जबकि निदेशक सिद्धान्त सामाजिक तथा आर्थिक लोकतन्त्र की स्थापना में सहायक हैं,
  • मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है, जबकि निदेशक सिद्धान्तों को स्थगित नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 29.
मौलिक अधिकारों व राज्य-नीति के निदेशक तत्त्वों में टकराव की स्थिति में प्राथमिकता का क्या प्रश्न है?
उत्तर:
संविधान में स्पष्ट रूप से इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया गया है। इस प्रश्न का उत्तर सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में दिया है। सर्वप्रथम चम्पाकम दोराय राजन बनाम चेन्नई राज्य, 1951 के मुकद्दमे में सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों में वाद-योग्य होने के कारण माना कि यदि मौलिक अधिकारों व राज्य-नीति के निदेशक तत्त्वों में टकराव पाया जाता है तो मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, लेकिन शीघ्र ही सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी गलती को महसूस किया और इनरी केरल एजुकेशन विधेयक, चन्द्रभवन बोर्डिंग केस, विजय कॉटन मिल्स केस इत्यादि अनेक मामलों में दोनों को समान धरातल पर माना और निदेशक तत्त्वों को मौलिक अधिकारों पर युक्ति-युक्त प्रतिबन्ध के रूप में स्वीकार किया।

संसद ने सन् 1971 में संविधान के 25वें संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 39 (b) व (c) में निहित निदेशक तत्त्वों की अनुच्छेद 14, 19 व 31 में निहित मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता स्थापित की। इस संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानन्द भारती केस, सन् 1973 में संविधान के मूलभूत ढाँचे के अन्तर्गत नहीं माना, लेकिन इसके बाद सन् 1976 में संसद ने जब 42वें संविधान संशोधन के द्वारा सभी नीति-निदेशक तत्त्वों की अनुच्छेद 14, 19 व 31 में निहित समानता, स्वतन्त्रता व सम्पत्ति के मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता स्थापित की तो सर्वोच्च न्यायालय ने सन् 1980 में मिनर्वा मिल्स केस में इस संशोधन को संविधान के मूलभूत ढाँचे के विरुद्ध मानते हुए अवैध घोषित कर दिया और प्रतिपादित किया कि संविधान का मूलभूत ढाँचा मौलिक अधिकारों व नीति-निदेशक तत्त्वों के मध्य सन्तुलन पर आधारित है।

दोनों एक-दूसरे के पूरक व सम्पूरक हैं। दोनों में से किसी एक को प्राथमिकता देना संविधान के मूलभूत ढाँचे को विकृत तथा नष्ट करना होगा। … इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों को समान माना है जिसमें केवल एक अपवाद अनुच्छेद 39 (b) व (c) की अनुच्छेद 14 व 19 में निहित समानता व स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता है, क्योंकि अनुच्छेद 31 को सन् 1978 के 44वें समाप्त कर दिया गया है। इस प्रकार मौलिक अधिकार और राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त एक-दूसरे के पूरक हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

प्रश्न 30.
राष्ट्रीय आपात का मौलिक अधिकारों पर प्रभाव पर नोट लिखिए।
उत्तर:
भारत के संविधान में ऐसी व्यवस्था है कि राष्ट्रीय आपात् का भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। भारत का संविधान भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान करता है कि जब देश पर किसी विदेशी शक्ति का आक्रमण हुआ हो या आक्रमण होने की सम्भावना हो या देश में सशस्त्र विद्रोह फैल गया हो या ऐसा विद्रोह फैलने की सम्भावना हो तो वह देश में राष्ट्रीय आपात् की घोषणा कर सकता है।

राष्ट्रीय आपात् काल की घोषणा करके नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित कर सकता है। यहाँ तक कि संवैधानिक उपचारों के अधिकार को भी स्थगित किया जा सकता है। नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय में भी शरण नहीं ले सकते। ऐसी स्थिति में कार्यपालिका अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर सकती है, जैसा कि सन् 1975 में आपातकालीन घोषणा के बाद प्रशासन ने मनमाने तरीके से शक्ति का प्रयोग किया। इस प्रकार से मौलिक अधिकारों का स्थगित किया जाना प्रजातन्त्र की भावना के विपरीत है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मौलिक अधिकारों से क्या अभिप्राय है? मौलिक अधिकारों की प्रकृति अथवा विशेषताओं का वर्णन कीजिए। अथवा मौलिक अधिकारों से आप क्या समझते हैं? भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
प्रो० लास्की के अनुसार, “मूल अधिकार जीवन की उन आवश्यक अवस्थाओं को कहते हैं, जिनके बिना व्यक्ति के जीवन का विकास असम्भव है।” (Rights are those conditions of Social Life without which no man can seek in general, to be himself at his best.), अर्थात् प्रो० लास्की के अनुसार ये आवश्यक अवस्थाएँ व्यक्ति के चरित्र के विकास के लिए अनिवार्य हैं, क्योंकि व्यक्ति और राज्य की उन्नति एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई है,

अतः अधिकार एक प्रकार से राज्य के विकास और उन्नति के लिए भी अनिवार्य हैं। लगभग सभी राज्य अपने नागरिकों के लिए इन आवश्यक अवस्थाओं अथवा सुविधाओं की संविधान में व्यवस्था करते हैं। इंग्लैण्ड जैसे अलिखित संविधान में मौलिक अधिकार अलिखित हैं, परन्तु अमेरिका जैसे राज्यों में, जहां लिखित संविधान है, मौलिक अधिकार लिखित संविधान का भाग हैं।

भारतीय संविधान लिखित संविधान है, अतः भारत में मूल अधिकार लिखित संविधान का भाग हैं। संविधान के तीसरे भाग के 12 से 35 अनुच्छेदों में मूल अधिकार दिए गए हैं। भारत में मौलिक अधिकार केवल लिखित ही नहीं, बल्कि न्याय-योग्य भी हैं। मौलिक अधिकारों को न्याय-योग्य इसलिए ठहराया गया है कि विधानमण्डल और कार्यकारिणी के सदस्य नागरिकों को सताने न लगें।

कहने का तात्पर्य यह है कि न्यायपालिका पर लोगों के अधिकारों की रक्षा का उत्तरदायित्व है अर्थात् न्यायपालिका का यह कर्तव्य है कि वह देखे कि मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण न होने पाए, अतएव न्यायपालिका के पास यह शक्ति है कि वह विधानमण्डल द्वारा बनाए गए उन सब कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर सकती है जो मौलिक अधिकारों का हनन् करते हैं। मौलिक अधिकारों के तत्त्व या विशेषताएँ (Characteristics or Features of Fundamental Rights)-मौलिक अधिकारों के कुछ विशेष तत्त्व निम्नलिखित हैं

1. मौलिक अधिकार न्यायसंगत हैं (Fundamental Rights are Justiciable):
मौलिक अधिकार केवल नाममात्र के ही नहीं हैं, बल्कि इनको अदालत के द्वारा संरक्षित किया गया है। यदि किसी मनुष्य का अधिकार सरकार द्वारा या किसी और द्वारा छीना जाए तो वह अदालत की शरण ले सकता है और उसको न्याय मिलेगा। हम मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे ही उच्चतम तथा उच्च न्यायालय में जा सकते हैं।

2. मौलिक अधिकार सीमित हैं (Fundamental Rights are Limited):
ये मौलिक अधिकार सीमित हैं। नागरिक इनका प्रयोग मनमानी से नहीं कर सकता। इनके ऊपर उचित प्रतिबन्ध लगाए हुए हैं। सुरक्षा, शान्ति बनाए रखने के लिए इन पर प्रतिबन्ध लगाए गए हैं।

3. अति विस्तृत (Most Elaborate):
संविधान के तृतीय भाग में 24 अनुच्छेद (अनुच्छेद 12 से 35) नागरिक के मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित हैं। अनुच्छेद 12, 13, 33, 34 तथा 35 में ऐसे साधारण उपबन्ध हैं, जिनका सम्बन्ध सभी अधिकारों से है। अनुच्छेद 14 से 30 और अनुच्छेद 32 में नागरिकों को छः प्रकार के मौलिक अधिकार दिए गए हैं। मौलिक रूप में अनुच्छेद 31 द्वारा नागरिकों को ‘सम्पत्ति का अधिकार’ दिया गया था, परन्तु 44वें संशोधन द्वारा इस अनुच्छेद को संविधान में से निकाल दिया गया है।

4. मौलिक अधिकार निलम्बित किए जा सकते हैं (Fundamental Rights can be Suspended):
अनुच्छेद 352, 356 तथा 360 द्वारा राष्ट्रपति को आपात्काल की स्थिति की घोषणा करने का अधिकार दिया गया है। राष्ट्रपति आपात्काल की घोषणा. द्वारा इन अधिकारों को निलम्बित कर सकता है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 32 में वर्णित सवैधानिक उपचारों के अधिकार पर भी राष्ट्रपति आपातकालीन स्थिति में प्रतिबन्ध लगा सकता है।

यहाँ यह वर्णन करने योग्य है कि नागरिकों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार को लागू करवाने के लिए किसी आपात्कालीन अवस्था में भी नागरिकों के अदालत में शरण लेने के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। यह व्यवस्था भारतीय संविधान में 44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा की गई है।

5. संसद मौलिक अधिकारों को सीमित कर सकती है (Parliament can Curtail the Fundamental Rights):
संसद मौलिक अधिकारों में हर प्रकार का परिवर्तन कर सकती है। यह व्यवस्था 1971 में 24वें संशोधन द्वारा संविधान में की गई थी। 42वें संविधान संशोधन द्वारा भी यह व्यवस्था की गई है कि संसद मौलिक अधिकारों वाले प्रकरण सहित सम्पूर्ण संविधान में परिवर्तन कर सकती है तथा संसद द्वारा किए गए संशोधन को किसी भी न्यायालय में किसी भी आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। इसका अभिप्रायः यह हुआ कि संसद संविधान संशोधनों द्वारा मौलिक अधिकारों को कम या सीमित कर सकती है।

6. सकारात्मक व नकारात्मक प्रकृति (Positive and Negative Nature):
मौलिक अधिकारों की सकारात्मक प्रकृति से तात्पर्य है कि मौलिक अधिकार राज्य को कुछ कार्य करने का अधिकार प्रदान करते हैं और नकारात्मक प्रकृति से अर्थ है कि मौलिक अधिकार राज्य को कुछ कार्य करने से रोकते हैं।

भारतीय मौलिक अधिकारों में ये दोनों ही प्रवृतियाँ पाई जाती हैं। इसका सर्वोत्तम उदाहरण समानता का अधिकार है, जिसमें नागरिकों को ‘कानून के समक्ष समानता’ (Equality before Law) के साथ-साथ ‘कानून का समान संरक्षण’ (Equal Protection of Law) का अधिकार दिया गया है।

‘कानून के समक्ष समानता’ की प्रकृति नकारात्मक है, क्योंकि यह राज्य को नागरिकों में भेद-भाव करने से रोकती है और इसके विपरीत ‘कानून का समान संरक्षण’ की प्रकृति सकारात्मक है, क्योंकि इसके अन्तर्गत राज्य नागरिकों में भेद-भाव कर सकता है, ताकि गरीब व पिछड़े वर्गों का समान संरक्षण मिल सके।

7. मौलिक अधिकार संविधान द्वारा दिए गए हैं, प्राकृतिक अधिकार नहीं (Fundamental Rights are conferrred by the Constitution, not Natural Rights):
भारत में केवल वे ही मौलिक अधिकार हैं जो संविधान में दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त अन्य किसी अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है। अमेरिका की भाँति भारत में भी प्राकृतिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है। न्यायपालिका का संरक्षण संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को ही प्राप्त है।

8. भारतीय पृष्ठभूमि (Indian Background):
भारत में मौलिक अधिकार किसी अन्य देश की नकल नहीं हैं, बल्कि विशिष्ट भारतीय पृष्ठभूमि के अनुसार प्रदान किए गए हैं, जैसे छुआछूत का निषेध । छुआछूत भारतीय समाज में ही पाया जाता था, इसलिए इसका निषेध एक मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान किया गया है। इसी प्रकार से धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार भारतीय समाज के बहुधर्मी रूप को देखते हुए दिया गया है।

9. सभी पर लागू होते हैं (Binding upon Everybody):
मौलिक अधिकार राज्य की सभी संस्थाओं, जिनमें विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, सरकारी संस्थाएँ और यहाँ तक कि भारतीय नागरिक भी शामिल हैं, पर समान रूप से लागू होते हैं। कोई भी इनको मानने से इन्कार नहीं कर सकता और न ही किसी को इनके उल्लंघन का अधिकार है।

10. मुख्यतया राजनीतिक प्रकृति के (Primarily of Political Nature):
भारत में मौलिक अधिकार मुख्य रूप से राजनीतिक प्रकृति के हैं, सामाजिक और आर्थिक अधिकार राज्य-नीति के निदेशक तत्त्वों में दिए गए हैं। संविधान सभा का विचार था कि चूंकि अभी भारत के पास इतने अधिक साधन नहीं हैं कि नागरिकों को सामाजिक व आर्थिक अधिकार भी सुलभ कराए जा सकें। अतः राजनीतिक अधिकार ही प्रदान कर दिए गए, ताकि राजनीतिक दृष्टि से लोकतन्त्र स्थापित किया जा सके।

11. नागरिक व व्यक्ति में अन्तर किया गया है (Difference between Citizen and People):
भारत में कुछ मौलिक अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त हैं तो कुछ अधिकार व्यक्तियों को प्राप्त हैं। व्यक्तियों को दिए गए अधिकार नागरिकों व विदेशियों दोनों को प्राप्त हैं, जब कि नागरिकों को दिए गए अधिकार विदेशियों को प्राप्त नहीं हैं। उदाहरणार्थ, स्वतन्त्रता का अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त है, जबकि वैयक्तिक स्वतन्त्रता का अधिकार व्यक्तियों को प्राप्त है। समानता का अधिकार यदि नागरिकों को प्राप्त है तो शोषण के विरुद्ध अधिकार व्यक्तियों को प्राप्त है।

12. केन्द्र तथा राज्य सरकारों की शक्तियों पर प्रतिबन्ध (Limitations on the Powers of the Centre and the State Governments):
मौलिक अधिकार केन्द्र तथा राज्य सरकारों की शक्तियों पर प्रतिबन्ध लगाते हैं अर्थात् केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों तथा स्थानीय सरकारों को मौलिक अधिकारों के अनुसार ही कानून बनाने पड़ते हैं और ये सरकारें कोई ऐसा कानून नहीं बना सकतीं जो मौलिक अधिकारों की प्रकृति के विरुद्ध हो। यदि ये सरकारें मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई कानून बना दें तो न्यायालय उन्हें अवैध घोषित कर सकता है।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान द्वारा भारत के नागरिकों को प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों का उन पर लगी सीमाओं सहित विवेचन कीजिए।
अथवा
हमारे संविधान में निहित मौलिक अधिकारों पर एक लेख लिखिए।
अथवा
निम्नलिखित पर नोट लिखिए
(1) समानता का अधिकार, अनुच्छेद 14 से 18 तक,
(2) स्वतन्त्रता का अधिकार, अनुच्छेद 19 से 22 तक,
(3) शोषण के विरुद्ध अधिकार, अनुच्छेद 23 से 24 तक,
(4) संस्कृति एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार, अनुच्छेद 29 से 30 तक।
उत्तर:
सन् 1979 से पहले भारतीय नागरिकों को 7 प्रकार के मौलिक अधिकार प्राप्त थे, परन्तु इसके पश्चात् इन अधिकारों की संख्या 6 हो गई है। 30 अप्रैल, 1979 को 44वाँ संविधान संशोधन राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत किया गया था। इस संशोधन के अन्तर्गत नागरिकों का ‘सम्पत्ति का अधिकार’ (Right to Property) मौलिक अधिकारों की सूची में से निकाल दिया गया और अब यह अधिकार एक साधारण अधिकार (Ordinary Right) बन गया है। 44वें संशोधन के द्वारा सम्पत्ति के अधिकार सम्बन्धी यह व्यवस्था 19 जून, 1979 को लागू की गई थी। भारतीयों के शेष छः अधिकारों का विस्तारपूर्वक वर्णन निम्नलिखित है

1. समानता का अधिकार, अनुच्छेद 14 से 18 तक [Right to Equality, Articles 14 to 18|-अनुच्छेद 14 से 18 में वर्णित अधिकारों द्वारा भारतीयों को समानता का अधिकार दिया गया है। समानता के अधिकार के कई पक्ष हैं, जिनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है

(i) कानून के सामने समानता (Equality before Law):
अनुच्छेद 14 के अनुसार सभी व्यक्ति कानून के सामने समान हैं। कानून की दुनिया में ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, रंग या नस्ल, जाति, जन्म, धर्म आदि के आधार पर कोई मतभेद नहीं है। राष्ट्रपति से लेकर साधारण नागरिक तक सभी कानून की दृष्टि में समान समझे जाते हैं तथा कानून समान रूप से ही सबकी रक्षा करता है।

(ii) कोई भेदभाव नहीं (No Discrimination) संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य किसी नागरिक के साथ जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, रंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। सार्वजनिक स्थानों, जैसे होटल, तालाब, कुएँ, सिनेमा घर, दुकानों आदि, के प्रयोग के लिए किसी को मनाही नहीं होगी। अपवाद (Exceptions) अनुच्छेद 15 के दो अपवाद हैं-(क) राज्य बच्चों व महिलाओं के लिए विशेष सुविधाएँ प्रदान कर सकता है, (ख) पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के उत्थान के लिए राज्य विशेष प्रकार की व्यवस्था कर सकता है।

(iii) अवसर की समानता (Equality of Opportunity):
अनुच्छेद 16 के अनुसार सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर होगी। नियुक्ति करते समय सरकार किसी व्यक्ति के साथ रंग, नस्ल, जाति, जन्म, धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती। किसी व्यक्ति को इन बातों के आधार पर उसके पद से पदच्युत नहीं किया जा सकता, परन्तु सरकार को संविधान की ओर से अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए स्थान सुरक्षित रखने की छूट है।

अपवाद (Exceptions) इस व्यवस्था के तीन अपवाद हैं-प्रथम, कुछ विशेष पदों के लिए निवास स्थान सम्बन्धी आवश्यक शर्ते लगाई जा सकती हैं। द्वितीय, पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है। तृतीय, किसी धार्मिक अथवा साम्प्रदायिक संस्था से सम्बन्धित पदों पर एक विशेष धर्म अथवा सम्प्रदाय के लोगों की नियुक्ति की जा सकती है।।

(iv) अस्पृश्यता का अन्त (Abolition of Untouchability):
अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता को अवैध घोषित किया गया है। जो व्यक्ति अस्पृश्यता को किसी भी तरीके से लागू करने का यत्न करता है, अथवा प्रोत्साहित करता है उसको कानून द्वारा दण्ड दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त सभी सार्वजनिक स्थान मन्दिर, होटल, कुएँ, स्कूल, कॉलेज आदि हरिजन लोगों के लिए खुले हैं। उनको इनके प्रयोग से रोकना कानूनी अपराध है।

(v) उपाधियों की समाप्ति (Abolition of Titles):
अंग्रेज़ सरकार भारत में नागरिकों को कई प्रकार की उपाधियाँ प्रदान करती थी। ये उपाधियाँ हमारे भारतीय समाज में भेदभाव की भावना पैदा करती थीं। ऐसी स्थिति की समाप्ति के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18 द्वारा शैक्षणिक अथवा सैनिक उपाधियों के अलावा राज्य को अन्य किसी प्रकार की उपाधियाँ देना वर्जित किया गया है।

2. स्वतन्त्रता का अधिकार, अनुच्छेद 19 से 22 तक (Right to Freedom,Articles 19 to 22):
संविधान में स्वतन्त्रता के अधिकार का वर्णन अनुच्छेद 19 से 22 तक किया गया है। यह अधिकार ‘मौलिक अधिकारों की आत्मा’ है, क्योंकि इस अधिकार के बिना अन्य अधिकारों का कोई महत्त्व नहीं रहता। इस अधिकार के आधार पर ही प्रजातन्त्रीय समाज की कल्पना की जा सकती है। इस विषय में पायली महोदय का कथन महत्त्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा है, “संविधान निर्माताओं ने इन अधिकारों को मौलिक अधिकारों के अध्याय में शामिल करके ठीक ही किया है तथा इस प्रकार प्रजातन्त्रीय समाज के विकास में सहायता की है।”

(1) अनुच्छेद 19 के द्वारा निम्नलिखित स्वतन्त्रताएँ प्रदान की गई हैं…
(क) भाषण तथा लेखन की स्वतन्त्रता,
(ख) शान्तिपूर्वक तथा बिना शस्त्रों के इकट्ठा होने की स्वतन्त्रता,
(ग) संघ तथा समुदाय बनाने की स्वतन्त्रता,
(घ) भारत के किसी भी क्षेत्र में आने-जाने की स्वतन्त्रता,
(ङ) भारत के किसी भाग में रहने या निवास करने की स्वतन्त्रता,
(च) कोई भी व्यवसाय करने, पेशा अपनाने या व्यापार करने की स्वतन्त्रता।

इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है
(क) भाषण एवं लेखन की स्वतन्त्रता (Freedom of Speech and Expression)-सभी नागरिकों को भाषण देने और अपने विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। वे बोलकर या लिखकर और छपवाकर अपने विचार प्रकट कर सकते हैं। लोकतन्त्र में इस अधिकार का बड़ा महत्त्व होता है, क्योंकि इसी के द्वारा जनमत का निर्माण और अभिव्यक्ति हो सकती है।

परन्तु इस अधिकार पर राज्य न्यायालय के अपमान, सदाचार तथा नैतिकता, राज्य की सुरक्षा आदि के आधार पर उचित प्रतिबन्ध लगा सकता है। कोई भी नागरिक इस अधिकार का प्रयोग दूसरे का अपमान करने के लिए नहीं कर सकता।

(ख) शान्तिपूर्वक तथा बिना शस्त्रों के इकट्ठा होने की स्वतन्त्रता (Freedom to Assemble Peacefully and without Arms) नागरिकों को बिना हथियार और शान्तिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने, सभा करने तथा जुलूस निकालने की स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। इन सभाओं और जुलूसों में नागरिक अपने विचार प्रकट कर सकते हैं तथा अपने उद्देश्यों की पूर्ति के प्रयत्न कर सकते हैं।

इस स्वतन्त्रता पर भी राज्य उचित प्रतिबन्ध लगा सकता है। सार्वजनिक शांति और व्यवस्था, भारत की अखण्डता व सुरक्षा की दृष्टि से इस पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। अनुच्छेद 144 का लगाया जाना इसी प्रतिबन्ध का एक उदाहरण है।

(ग) संघ तथा समुदाय बनाने की स्वतन्त्रता (Freedom to form Associations and Unions)-नागरिकों को अपने विभिन्न लक्ष्यों की पूर्ति के लिए संगठित होने और संघ तथा समुदाय बनाने की स्वतन्त्रता दी गई है। इन संघों और समुदायों को भी अपना कार्य स्वतन्त्रता-पूर्वक करने का अधिकार है। परन्तु कोई समुदाय या संघ ऐसा कार्य नहीं कर सकता, जिससे देश की अखण्डता व सुरक्षा को खतरा पैदा हो, जो अनैतिक हो अथवा शान्ति व व्यवस्था में बाधक बने।

(घ) भारत के किसी भी क्षेत्र में आने-जाने की स्वतन्त्रता (Freedom to Move freely Throughout the Territory of India)- सभी नागरिकों को भारत के समस्त क्षेत्र में घूमने-फिरने और आने-जाने की स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर आने-जाने के लिए किसी भी तरह का आज्ञा-पत्र लेने की आवश्यकता नहीं है।

नागरिक भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक बिना रोक-टोक के आ-जा सकते हैं, परन्तु इस स्वतन्त्रता पर भी सार्वजनिक शांति, सुरक्षा, व्यवस्था तथा अनुसूचित कबीलों के हितों की दृष्टि से उचित सीमा लगाई जा सकती है और नागरिकों के घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगाए जाते रहे हैं।

(ङ) भारत के किसी भाग में रहने और निवास करने की स्वतन्त्रता (Freedom to Reside and Settle in any part of the Territory of India)-भारतीय नागरिकों को भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बस जाने की स्वतन्त्रता दी गई है। एक राज्य से दूसरे राज्य में जाकर रहने और निवास करने पर कोई अंकुश नहीं है, नागरिक जहाँ उचित समझे रह सकता है, परन्तु राज्य इस पर भी उचित प्रतिबन्ध लगा सकता है।

(च) कोई भी व्यवसाय करने, पेशा अपनाने या व्यापार करने की स्वतन्त्रता (Freedom to practise any Profession or carry on any Occupation, Trade or Business)- सरकार किसी नागरिक को कोई कार्य विशेष करने या न करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। अपनी आजीविका कमाने के लिए नागरिकों को कोई भी व्यवसाय, पेशा या व्यापार करने की स्वतन्त्रता है, जिसे वे उचित समझें।

इस स्वतन्त्रता पर भी उचित प्रतिबन्ध है। सरकार जन-हित में किसी भी व्यापार, काम-धन्धे और व्यवसाय पर प्रतिबन्ध लगा सकती है और अनैतिक व्यापार को रोक सकती है। सरकार किसी व्यवसाय के लिए व्यावसायिक योग्यताएँ भी निश्चित कर सकती है, जैसे चिकित्सा, व्यवसाय, वकालत आदि के लिए योग्यताएँ। सरकार कानून द्वारा किसी भी व्यापार को अपने स्वामित्व में ले सकती है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि सभी स्वतन्त्रताओं को असीमित रूप में नहीं दिया गया, बल्कि उन पर उचित प्रतिबन्ध लगाए गए हैं और लगाए जा सकते हैं। अधिकतर सार्वजनिक शांति और व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा और अखण्डता, सार्वजनिक नैतिकता, लोक-हित, अनुसूचित जातियों और कबीलों के हितों आदि के आधार पर ही ये प्रतिबन्ध लगे हुए हैं और लगाए जा सकते हैं। जब नगर में अशांति हो तो कयूं भी लगाया जाता है और घर से निकलने पर भी प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।

(2) अनुच्छेद 20 के अनुसार-

(क) व्यक्ति को किसी ऐसे कानून का उल्लंघन करने पर दण्ड नहीं दिया जा सकता जो उसके अपराध करते समय लागू नहीं था।
(ख) किसी व्यक्ति को एक ही अपराध की एक से अधिक बार सजा नहीं दी जा सकती।
(ग) किसी अपराधी को स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।

(3) अनुच्छेद 21 के अनुसार, किसी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित विधि के अतिरिक्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि 44वें संशोधन द्वारा संविधान में यह व्यवस्था की गई है कि नागरिकों के इस अधिकार को आपातकाल के समय भी समाप्त नहीं किया जा सकता। इसका भाव यह हुआ कि आपात्कालीन स्थिति के दौरान अन्य स्वतन्त्रताएँ तो समाप्त की जा सकती हैं, परन्तु नागरिकों की ‘जीवन या व्यक्तिगत स्वतन्त्रता’ को ऐसी स्थिति में भी समाप्त नहीं किया जा सकता।

(4) अनुच्छेद 22 विशेष रूप से बन्दियों के अधिकारों की घोषणा करता है। इस अनुच्छेद के अनुसार,
(क) किसी भी व्यक्ति को उसके अपराध से अवगत कराए बिना बन्दी नहीं बनाया जा सकता।
(ख) अपराधी को उसकी इच्छानुसार किसी वकील से परामर्श लेने की छूट है।
(ग) अपराधी को गिरफ्तार करने के 24 घण्टे के अन्दर-अन्दर किसी निकटतम मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक है।
(घ) न्यायालय की अनुमति के बिना किसी दोषी को 24 घण्टे से अधिक बन्दी नहीं रखा जा सकता।

अपवाद इस अधिकार के निम्नलिखित अपवाद भी हैं-
(क) ये अधिकार शत्रु-देश के नागरिकों को प्राप्त नहीं होंगे,

(ख) निवारक नजरबन्दी (Preventive Detention) के अधीन की गई गिरफ्तारी के सन्दर्भ में उपर्युक्त व्यवस्थाएँ लागू नहीं होंगी, निवारक नजरबन्दी के सम्बन्ध में 44वें संविधान संशोधन द्वारा व्यवस्थाएँ की गई हैं कि-
(क) नजरबन्दी का मामला दो महीने के अन्दर सलाहकार मण्डल (Advisory Board) के पास जाना आवश्यक है,
(ख) सलाहकार मण्डल का गठन उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा किया जाएगा,
(ग) सलाहकार मण्डल का अध्यक्ष उच्च न्यायालय का वर्तमान न्यायाधीश होगा, लेकिन उसके अन्य सदस्य वर्तमान अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश हो सकते हैं,
(घ) नजरबन्द किए गए व्यक्ति को शीघ्र-से-शीघ्र उसकी नजरबन्दी का कारण बताया जाएगा।

उपर्युक्त व्यवस्थाएँ 1975-77 की आपात स्थिति के कटु अनुभवों को ध्यान में रखकर ही की गई थीं। वर्तमान में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (N.S.A.) इसी अनुच्छेद के अन्तर्गत बनाया गया है। आलोचना (Criticism)-स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार की निम्नलिखित अनुच्छेदों पर आलोचना की जाती है

(क) नागरिकों की स्वतन्त्रताओं पर अनेक सीमाएँ लगा दी गई हैं, जिसके परिणामस्वरूप राज्य-सत्ता के सम उपर्युक्त स्वतन्त्रताएं अर्थहीन होकर रह जाती हैं। ये स्वतन्त्रताएं यदि एक हाथ से दी गई हैं तो दूसरे हाथ से छीन ली गई हैं।

(ख) सीमाएँ अत्यधिक व्यापक होने के कारण अस्पष्टता से ग्रसित हो जाती हैं। परिणामस्वरूप विधायिका व न्यायपालिका में टकराव की सम्भावना बनी रहती है।

(ग) निवारक नजरबन्दी का अधिकार राज्य को प्राप्त है जिसके कारण शान्ति काल में भी जीवन तथा निजी स्वतन्त्रता का अधिकार अर्थहीन हो जाता है। न्यायाधीश मुखर्जी के शब्दों में, “जहाँ तक मुझे मालूम है संसार के किसी भी देश में निवारक नज़रबन्दी को संविधान का अटूट भाग नहीं बनाया गया है, जैसा कि भारत में किया गया है, यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है।”

यद्यपि. उपर्युक्त आलोचनाएँ सही हैं और लोकतन्त्र पर प्रश्न-चिह्न लगाती हैं, नागरिक स्वतन्त्रताओं को दुष्प्रभावित करती हैं, लेकिन हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि भारतीय गणराज्य का जन्म साम्प्रदायिक हिंसा, हत्या तथा लूट-पाट के वातावरण में हुआ है। लोकतन्त्र की सफलता के लिए प्राथमिक अनिवार्यता राष्ट्र व गणराज्य की राष्ट्र-विरोधी असामाजिक तत्त्वों से सुरक्षा है।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार, अनुच्छेद 23 से 24 तक (RightAgainst Exploitation,Articles 23 to 24)-शोषण के विरुद्ध अधिकार का उद्देश्य है-समाज के निर्बल वर्गों को शक्तिशाली वर्ग के अन्याय से बचाना। इस मौलिक अधिकार के अन्तर्गत निम्नलिखित व्यवस्थाएँ हैं

(1) मनुष्यों के क्रय-विक्रय और उनके शोषण पर प्रतिबन्ध (Prohibition of Sale and Purchase of Human beings and their Exploitation): हजारों वर्ष गुलाम रहने के बाद भारतीय समाज में बहुत-सी कुरीतियाँ उत्पन्न हो गई थीं जिनमें से एक थी-स्त्रियों व बच्चों का क्रय-विक्रय। मनुष्यों का पशुओं के समान क्रय-विक्रय किया जाता था और उन्हें दास बनाकर मनमाने तरीके से उनका प्रयोग किया जाता था। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने अनुच्छेद 23 के अनुसार, मानव के इस शोषण के विरुद्ध प्रतिबन्ध लगाया है और इस प्रकार अब भारत में स्त्रियों, पुरुषों के क्रय-विक्रय पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। इस व्यवस्था का उल्लंघन करना एक दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया गया है।

(2) बेगार लेने पर प्रतिबन्ध (Prohibition on Forced Labour)-भारत के मध्य काल में जमींदार लोग तथा राजा और नवाब अपने अधीनस्थ लोगों से बेगार लेते थे। अपने निजी कार्य उनसे कराकर उनके बदले में उन्हें कुछ नहीं देते थे, परन्तु अब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 के अनुसार कोई व्यक्ति किसी से बेगार नहीं ले सकता अर्थात् बिना मजदूरी दिए किसी व्यक्ति से कोई काम नहीं लिया जा सकता और न ही किसी व्यक्ति से उसकी इच्छा के विपरीत कोई काम कराया जा सकता है। अब ये दोनों ही बातें एक दण्डनीय अपराध घोषित हो चुकी हैं।

अपवाद (Exceptions)-संविधान के अनुच्छेद 23 में दिए गए अधिकारों पर एक प्रतिबन्ध लगा दिया गया है और वह यह है कि सरकार को जनता के हितों के लिए अपने नागरिकों से आवश्यक सेवा करवाने का अधिकार है। उदाहरणस्वरूप, सरकार नागरिकों को अनिवार्य सैनिक-सेवा तथा अनिवार्य सामाजिक सेवा करने के लिए कानून बना सकती है, परन्तु ऐसा करते हुए सरकार धर्म, वंश, जाति, वर्ग अथवा इनमें से किसी के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं कर सकती।

(3) कारखानों आदि में छोटी आयु के बच्चों को काम करने की मनाही (Prohibition of Employment of Children in Factories etc.)-कारखानों व खानों के मालिक छोटी आयु के बच्चों को काम पर लगाना अति लाभदायक समझते थे क्योंकि उन्हें कम मजदूरी देनी पड़ती थी, परन्तु अब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24 में स्पष्ट उल्लेख कर दिया गया है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों या खानों में कार्य करने के लिए नहीं लगाया जा सकता। ऐसा करना अब एक दण्डनीय अपराध है। यह व्यवस्था इसलिए की गई है, ताकि बच्चों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव न पड़े।

4. साँस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार, अनुच्छेद 29 से 30 तक (Cultural and Educational Rights, Articles 29 to 30)
(1)अनुच्छेद 29 तथा 30 के अन्तर्गत नागरिकों को, विशेषतया अल्पसंख्यकों को, सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। ये अधिकार निम्नलिखित हैं अनुच्छेद 29 के अनुसार, भारत के किसी भी क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग या उसके किसी भाग को, जिसकी अपनी भाषा, लिपि अथवा संस्कृति हो, यह अधिकार है कि वह अपने संस्कृति व शिक्षा सम्बन्धी अधिकारों की रक्षा करे। अनुच्छेद 29 के अनुसार, केवल अल्पसंख्यकों को ही अपनी भाषा, संस्कृति इत्यादि को सुरक्षित रखने का अधिकार नहीं है, बल्कि यह अधिकार नागरिकों के प्रत्येक वर्ग को प्राप्त है।

(2) किसी भी नागरिक को राज्य द्वारा या उसकी सहायता से चलाई जाने वाली शिक्षा संस्था में प्रवेश देने से धर्म, जाति, वंश, भाषा या इनमें से किसी भी आधार पर इन्कार नहीं किया जा सकता। 1951 में मद्रास (चेन्नई) सरकार ने एक मैडिकल कॉलेज में सीटों का विभाजन भिन्न-भिन्न जातियों के आधार पर कर दिया था जिसके कारण चम्पाकम नामक एक ब्राह्मण लड़की को उस कॉलेज में दाखिला न मिल सका, क्योंकि उस जाति को दिए गए

सभी स्थान पूर्ण हो गए थे। चम्पाकम ने अपने अधिकार की प्राप्ति के लिए न्यायालय में रिट (Writ) की। उच्च न्यायालय ने सरकार के आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

(3) अनुच्छेद 30 के अनुसार, सभी अल्पसंख्यकों को, चाहे वे धर्म पर आधारित हों या भाषा पर, यह अधिकार प्राप्त है कि वे अपनी इच्छानुसार शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करें तथा उनका प्रबन्ध करें।

(4) अनुच्छेद 30 के अनुसार, राज्य द्वारा शिक्षा संस्थाओं को सहायता देते समय शिक्षा संस्था के प्रति इस आधार पर भेदभाव नहीं होगा कि वह अल्पसंख्यकों के प्रबन्ध के अधीन है, चाहे वे अल्पसंख्यक भाषा के आधार पर हों या धर्म के आधार पर। 44वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 30 में संशोधन करके यह व्यवस्था की गई है कि राज्य अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित की गई व चलाई जा रही शिक्षा संस्थाओं की सम्पत्ति को अनिवार्य रूप से लेने के लिए कानून का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखेगा कि कानून के अन्तर्गत निर्धारित की गई रकम से अल्पसंख्यकों के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस प्रकार अनुच्छेद 29 तथा 30 द्वारा अल्पसंख्यकों के हितों तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकारों को सुरक्षा प्रदान की गई है। भारत में इस अधिकार का बहुत महत्त्व है, क्योंकि भारत में विभिन्न जातियों, धर्मों तथा भाषाओं वाले लोग रहते हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

प्रश्न 3.
धार्मिक स्वतन्त्रता पर एक नोट लिखिए। अथवा भारतीय संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार की व्याख्या करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है। इसके अनुसार प्रत्येक भारतीय को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद 25 से अनुच्छेद 28 तक धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार का वर्णन किया गया है, जिसकी व्याख्या निम्नलिखित है

1. अन्तःकरण की स्वतन्त्रता तथा किसी भी धर्म को मानने व उसका प्रचार करने की स्वतन्त्रता (Freedom of Conscience and Freedom to Profess and Propagate any Religion)-अनुच्छेद 25 के द्वारा सभी को अन्तःकरण की स्वतन्त्रता है। इसका अभिप्रायः है कि प्रत्येक व्यक्ति जैसी चाहे पूजा-पद्धति को अपना सकता है।

प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने की स्वतन्त्रता है। राज्य किसी धर्म विशेष को मानने के लिए किसी भी व्यक्ति को बाध्य नहीं कर सकता। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति किसी भी धर्म का प्रचार कर सकता है, परन्तु उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय के अनुसार, “छल, कपट, प्रलोभन या बल-प्रयोग द्वारा किसी भी व्यक्ति का धर्म-परिवर्तन कराना संविधान के विरुद्ध है।”

प्रतिबन्ध (Limitations) अनुच्छेद 25 में दी गई धार्मिक स्वतन्त्रता पर जिस आधार पर प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं वे इस प्रकार हैं-
(1) यदि धर्म-प्रचार या धर्म-परिवर्तन लोक व्यवस्था, सदाचार और जन स्वास्थ्य के विरुद्ध है तो राज्य द्वारा उसमें हस्तक्षेप किया जा सकता है,

(2) अनुच्छेद 25 में दी गई धार्मिक स्वतन्त्रता के अन्तर्गत किसी भी धार्मिक स्थल का प्रयोग राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता है,

(3) प्रचार के नाम पर धर्म-परिवर्तन की मनाही है,

(4) समाज सुधार एवं कल्याण के लिए विभिन्न धार्मिक परम्पराओं और अन्धविश्वासों को दूर किया जा सकता है अर्थात् धर्म के नाम पर सामाजिक कुरीतियों और अन्धविश्वासों को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता,

(5) हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों को सभी वर्गों के लिए खोल दिया गया है।

2. धार्मिक मामलों के प्रबन्ध की स्वतन्त्रता (Freedom to Manage Religious Affairs):
संविधान के अनुच्छेद 26 के द्वारा धार्मिक मामलों के प्रबन्ध की स्वतन्त्रता प्रदान की गई है, जिसके अन्तर्गत निम्नलिखित स्वतन्त्रताएँ हैं

  • धार्मिक व लोकोपकारी संस्थाएँ चलाना,
  • अपने धार्मिक मामलों का स्वयं प्रबन्ध करना,
  • चल व अचल सम्पत्ति प्राप्त करना,
  • कानून के अनुसार उपर्युक्त सम्पत्ति का प्रबन्ध करना।

धार्मिक मामलों के प्रबन्ध की स्वतन्त्रता का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि धार्मिक संस्थाओं का दुरुपयोग राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के लिए किया जा सके। उदाहरणतः जून 1984 में ऑप्रेशन ब्लू स्टार के द्वारा स्वर्ण मन्दिर अमृतसर में सेना को इसलिए प्रवेश करना पड़ा था क्योंकि उसमें राष्ट्र-विरोधी असामाजिक तत्त्वों का जमाव हो चुका था।

3. किसी धर्म विशेष को बढ़ाने के लिए कर की अदायगी से छूट (Freedom from Payment of Taxes for Promotion of any Particular Religion) संविधान के अनुच्छेद 27 के अनुसार किसी व्यक्ति को कोई ऐसा कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसको किसी धर्म को बढ़ावा देने के लिए व्यय किया जाना हो। राज्य कर के रूप में लिए गए धन को किसी धर्म विशेष की उन्नति के लिए प्रयोग नहीं करेगा, परन्तु यदि राज्य बिना किसी भेदभाव के धार्मिक एवं अन्य संस्थाओं को समान रूप से सहायता प्रदान करता है तो उस स्थिति में अनुच्छेद लागू नहीं होगा।

4. राजकीय शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबन्ध (No Religious Teachings in Educational Institutions maintained by State Funds) अनुच्छेद 28 के अन्तर्गत उन राजकीय शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती, जिनका सारा खर्च राज्य करता हो, लेकिन यह प्रतिबन्ध उन शिक्षण संस्थाओं पर लागू नहीं होता जिन्हें राज्य की ओर से मान्यता प्राप्त है तथा आर्थिक सहायता भी मिलती है, लेकिन सारा खर्च राज्य न करता हो। किन्तु ऐसी शिक्षा संस्थाओं में भी किसी व्यक्ति को उसकी व उसके अभिभावकों की इच्छा के विरुद्ध धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। राज्य द्वारा प्रशासित तथा धर्मस्व व न्यास के अधीन शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा देने के बारे में कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

इस प्रकार धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार मौलिक अधिकारों की प्रस्तावना में घोषित उद्देश्यों-धर्म-निरपेक्षता व अंतःकरण की स्वतन्त्रता को निश्चित बनाता है जिसके अन्तर्गत राज्य का कोई सरकारी धर्म नहीं है और न ही राज्य किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देने के लिए कार्य कर सकता है। धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार पर निम्नलिखित तीन सीमाएँ हैं

(1) राज्य शान्ति और व्यवस्था, नैतिकता तथा जन-स्वास्थ्य के आधार पर इस अधिकार पर उचित प्रतिबन्ध लगा सकता है। सती-प्रथा तथा देवदासी प्रथा पर रोक इसी आधार पर लगा दी गई है।

(2) धार्मिक समुदायों की आर्थिक तथा राजनीतिक गतिविधियों पर नियन्त्रण रखने वाले कानून बनाए जा सकते हैं।

(3) हिन्दुओं की धार्मिक संस्थाओं को हिन्दू समाज के सभी वर्गों के लिए खोला जा सकता है। हिन्दू संस्थाओं के अन्तर्गत सिक्ख, जैन तथा बौद्ध समुदायों की संस्थाएँ भी सम्मिलित हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में लिखित संवैधानिक उपचारों के मौलिक अधिकार का विवेचन कीजिए। अथवा संवैधानिक उपचार के अधिकार का विश्लेषण करें।
उत्तर:
सवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)-भारतीय संविधान के द्वारा भारत के नागरिकों को जो मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, संविधान में ही उन अधिकारों की रक्षा भी की गई है। मौ की रक्षा की इस व्यवस्था के अभाव में सरकार अथवा कोई अन्य नागरिक इन अधिकारों के उपयोग में बाधा पैदा कर सकता था और इस प्रकार ये मौलिक अधिकार नागरिकों के लिए महत्त्वहीन हो जाते।

संवैधानिक उपचारों के अधिकार के अनुसार यदि सरकार या कोई नागरिक मौलिक अधिकारों से किसी को वंचित करता है तो वह व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की में न्यायालय अथवा उच्च न्यायालयों में कर सकता है। संविधान के अनुच्छेद 32 के अनुसार-

  • भारत के उच्चतम न्यायालय को नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए भिन्न-भिन्न आदेश जारी करने के अधिकार दिए गए हैं,
  • उच्चतम न्यायालय को विभिन्न आदेश या निर्देश जारी करने का अधिकार है,
  • संसद कानून बनाकर किसी भी न्यायालय को मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए आदेश (writ) जारी करने की शक्ति दे सकती है,
  • उन परिस्थितियों को छोड़कर, जिनका संविधान में वर्णन किया गया है, संवैधानिक उपचारों के मौलिक अधिकार को स्थगित नहीं किया जा सकता।

इसीलिए डॉ० अम्बेडकर ने संविधान सभा में बोलते हुए इस अधिकार को संविधान की आत्मा कहा था। उन्होंने इस अनुच्छेद के सन्दर्भ में लिखा था, “यदि मुझे कोई पूछे कि संविधान का कौन-सा महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद है जिसके बिना संविधान प्रभाव शून्य हो जाएगा तो मैं इस अनुच्छेद के अतिरिक्त किसी और अनुच्छेद की ओर संकेत नहीं कर सकता। यह संविधान की आत्मा है। यह संविधान का हृदय है।” मौलिक अधिकारों के संरक्षण हेतु निम्नलिखित आदेश जारी करने का अधिकार उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को प्राप्त है

(1) बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख (Writ of Habeas Corpus):
लैटिन भाषा के इस शब्द का अर्थ है-‘हमें शरीर दो’ (Let us have the body), अर्थात् शरीर हमारे सामने पेश करो। इस आदेश के अन्तर्गत न्यायपालिका को अधिकार है कि वह सरकार को बन्दी बनाए गए किसी भी व्यक्ति को अपने सामने प्रस्तुत करने का आदेश दे सकती है।

ऐसे लेख का प्रार्थना-पत्र बन्दी स्वयं या उसका कोई रिश्तेदार न्यायालय के सामने प्रस्तुत कर सकता है, यदि वह महसूस करे कि उसे गैर-कानूनी ढंग से बन्दी बनाया गया है।

बन्दी जब न्यायालय के सामने प्रस्तुत होता है तो न्यायालय उसके मामले पर विचार करता है और यदि न्यायालय यह समझे कि बन्दी को वास्तव में ही गैर-कानूनी ढंग से बन्दी रखा गया है तो वह उसके मुक्त किए जाने का आदेश जारी कर सकता है। इस प्रकार पुलिस किसी व्यक्ति को मनमाने ढंग से बन्दी नहीं बनाए रख सकती। इस अधिकार को आपातकाल में भी निलम्बित नहीं किया जा सकता। न्यायपालिका ने इस अधिकार का प्रयोग करके नागरिकों को पुलिस के अत्याचार से बचाया है। राजनीतिक कैदियों को भी कई बार न्यायालय ने इसका प्रयोग करके मुक्त किया है। इस प्रकार यह लेख नागरिक की दैहिक स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए बड़ा महत्त्वपूर्ण साबित हुआ है।

(2) परमादेश लेख (Writ of Mandamus):
इस आदेश द्वारा न्यायालय किसी व्यक्ति या अधिकारी या संस्था को अपना कर्त्तव्य-पालन करने के आदेश दे सकता है। लैटिन भाषा के इन शब्दों का अर्थ है “हम आदेश देते हैं” (We Command)। यदि कोई व्यक्ति यह महसूस करे कि कोई अधिकारी या संस्था अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करती तो वह न्यायालय को ऐसा आदेश जारी करने का प्रार्थना-पत्र दे सकता है।

इस प्रार्थना पर विचार करने के बाद न्यायालय यदि यह अनुभव करे कि वास्तव में ही उस अधिकारी या संस्था द्वारा अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं हो रहा है तो न्यायालय उसे आदेश दे सकता है और उस आदेश को मानना उस अधिकारी या संस्था का कर्तव्य है।

(3) प्रतिषेध लेख (Writ of Prohibition):
इस आदेश या लेख का अर्थ है-‘रोकना’ या ‘मनाही करना’ । यदि कोई कर्मचारी या संस्थान कोई ऐसा कार्य कर रहा हो जिसका उसे अधिकार नहीं है और इससे किसी के मौलिक अधिकार का हनन होता हो तो वह व्यक्ति न्यायालय में प्रार्थना-पत्र दे सकता है और यदि न्यायालय यह अनुभव करे कि कर्मचारी या अधिकारी या संस्था अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर जा रहा है या कानून की प्रक्रिया के विरुद्ध जा रहा है तो वह प्रतिषेध लेख जारी करके उसे ऐसा करने से रोक सकता है।

(4) अधिकार पृच्छा लेख (Writ of Quo-Warranto):
इन शब्दों का अर्थ है-“किस अधिकार से” (Under What Authority)। यदि कोई व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करने का दावा करता है, जिसे करने का उसे अधिकार नहीं या किसी व्यक्ति ने कानून के विरुद्ध कोई पद-ग्रहण कर लिया हो या किसी के पास पद की योग्यता न हो तो कोई भी नागरिक न्यायालय में प्रार्थना-पत्र देकर उसे ऐसा करने से रोकने की प्रार्थना कर सकता है।

न्यायालय यह आदेश जारी करके उस अधिकारी या कर्मचारी को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कह सकता है और यदि वह गैर-कानूनी ढंग से पद ग्रहण किए हुए है तो उसे पदच्युत भी कर सकता है।

(5) उत्प्रेषण लेख (Writof Certiorari):
इसका अर्थ है-“पूर्णतः सूचित करो।” (Be More Fully Informed)। यह आदेश उच्च न्यायालय द्वारा निम्न न्यायालय को दिया जाता है, जिसके द्वारा उच्च न्यायालय निम्न न्यायालय में चल रहे किसी भी मुकद्दमे का पूर्ण ब्यौरा तथा रिकार्ड अपने पास मॅगवा सकता है और यदि उच्च न्यायालय अनुभव करे कि निम्न न्यायालय ने अपने अधि का उल्लंघन किया है

या कानन की प्रक्रिया का समचित पालन नहीं किया है तो वह उस मकद्दमे को स्वयं भी सन सकता है और उसे कुछ निर्देश सहित निम्न न्यायालय को वापस भेज सकता है। इसके द्वारा नागरिकों को न्यायपालिका के अतिक्रमण से मुक्ति दिलाने की व्यवस्था की गई है।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार सभी व्यक्तियों को प्रदान किया गया है। प्रभावित व्यक्ति, अर्थात् जिसके अधिकार का उल्लंघन हुआ हो या जिसके साथ अत्याचार हुआ हो, उसके अतिरिक्त अन्य व्यक्ति तथा संस्थाएँ भी इन उपचारों का प्रयोग कर सकते हैं। न्यायपालिका ने लोगों द्वारा लिखे गए साधारण पत्रों, समाचार-पत्रों में छपी खबरों आदि को भी प्रार्थना-पत्र (Writ Petition) मानकर कार्रवाई की है और लोगों के अधिकारों की रक्षा करने का प्रयास किया है जो कि अत्यन्त सराहनीय है।

निष्कर्ष (Conclusion)-निःसन्देह भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की कई पक्षों से आलोचना की गई है। कुछ विद्वानों का कहना है कि मौलिक अधिकारों के अध्याय में सामाजिक और आर्थिक अधिकार सम्मिलित न करना एक बहुत बड़ी भूल है और इससे मौलिक अधिकार खोखले बनकर रह गए हैं। इन अधिकारों की आलोचना इसलिए भी की जाती है कि सरकार को मौलिक अधिकारों पर प्रतिबन्ध लगाने की शक्तियाँ बहुत दी गई हैं, परन्तु इन सब बातों के बावजूद भी हमें मानना पड़ता है कि मौलिक अधिकार लोकतन्त्र की नींव हैं। अधिकार कभी असीमित नहीं होते।

संसार में कोई भी देश ऐसा नहीं है जहाँ मूल अधिकारों पर बन्धन न लगाए गए हों। मौलिक अधिकारों द्वारा नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा की गई है और कार्यपालिका और संसद की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगा दिया गया है। हम एम०वी० पायली (M.V. Paylee) के इस कथन से ‘सहमत हैं, “सम्पूर्ण दृष्टि में संविधान में अंकित मौलिक अधिकार भारतीय प्रजातन्त्र को दृढ़ तथा जीवित रखने का अधिकार हैं।”

प्रश्न 5.
किन अनुच्छेदों पर मौलिक अधिकारों की आलोचना की गई है? व्याख्या करें। अथवा भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की आलोचना किन-किन आधारों पर की जाती है?
उत्तर:
हमारे संविधान-निर्माताओं ने भारत को प्रभुतासम्पन्न प्रजातन्त्रीय गणराज्य घोषित किया है। प्रजातन्त्रीय व्यवस्थाओं के अनुरूप ही भारतीय संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इनके अध्ययन से स्पष्ट है कि व्यवस्था में कछ दोष पाए जाते हैं। विद्वानों ने इन दोषों को देखते हए यहाँ तक कह दिया है कि मौलिक अधिकार नामक भाग को ‘मौलिक अधिकार तथा उनकी सीमाएँ’ नाम दे दिया जाए। मौलिक अधिकारों की अग्रलिखित अनुच्छेदों पर आलोचना की गई है

1. आर्थिक अधिकारों का न होना (Omission of Economic Rights):
आलोचकों का कहना है कि यद्यपि भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का विस्तार से वर्णन किया गया है, परन्तु इसमें कुछ महत्त्वपूर्ण आर्थिक तथा सामाजिक अधिकारों, जैसे कार्य पाने का अधिकार (Right to Work), ‘आराम तथा विश्राम का अधिकार’, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार (Right to Social Securities) भारतीयों को प्रदान नहीं किए गए। साम्यवादी देशों; जैसे रूस आदि में इन अधिकारों को प्रमुख स्थान दिया गया है।

2. भारतीयों को केवल वे ही अधिकार प्राप्त हैं, जो संविधान में दिए गए हैं (Only Enumerated Rights are granted to Indians):
भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की इस आधार पर भी आलोचना की गई है कि भारतीय नागरिकों को केवल वही अधिकार दिए गए हैं, जिनका कि संविधान में उल्लेख किया गया है।

इसके अलावा उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं हैं, परन्तु अमेरिका के नागरिकों को संविधान में वर्णित अधिकारों के अलावा वे अधिकार भी प्राप्त हैं, जो साधारण कानून (Common Law) तथा प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) पर आधारित हैं। भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं है।

3. मौलिक अधिकारों पर प्रतिबन्धों का होना (Limitations on Fundamental Rights):
मौलिक अधिकारों की इस आधार पर भी आलोचना की गई है कि संविधान ने एक हाथ से मौलिक अधिकार देकर उन पर प्रतिबन्धों तथा अपवादों का घेरा लगाकर दूसरे हाथ से उन्हें वापस ले लिया है। इस व्यवस्था से मौलिक अधिकारों की वास्तविकता ही समाप्त हो जाती है।

परन्तु यह आलोचना पूरी तरह से ठीक नहीं है। कोई भी मौलिक अधिकार असीमित नहीं हो सकता तथा देश की बदलती हई राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार उनमें संशोधन भी करना पड़ता है। इस व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि मौलिक अधिकारों के बारे में अन्तिम सत्ता संसद के हाथों में होनी चाहिए। यही व्यवस्था भारतीय संविधान में अपनाई गई है।

4. निवारक नजरबन्दी व्यवस्था (Preventive Detention Provision):
अनुच्छेद 22 के अन्तर्गत व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की व्यवस्था की गई है, इसके साथ ही संविधान में निवारक नजरबन्दी की भी व्यवस्था की गई है। जिन व्यक्तियों को निवारक नज़रबन्दी कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया हो, उनको अनुच्छेद 22 में दिए गए अधिकार प्राप्त नहीं होते। निवारक नज़रबन्दी के अधीन सरकार कानून बनाकर किसी भी व्यक्ति को बिना मुकद्दमा चलाए अनिश्चित काल के लिए जेल में बन्द कर सकती है तथा उसकी स्वतन्त्रता का हनन कर सकती है।

5. मौलिक अधिकारों पर संसद का नियन्त्रण (Control of Parliament Over Fundamental Rights):
भारतीय संविधान के अनुसार, कानून द्वारा निर्धारित ढंग (Procedure Established by Law) की व्यवस्था की गई है। इसके अनुसार मौलिक अधिकारों के बारे में अन्तिम निर्णय संसद के हाथों में है।

संसद जो भी कानून बनाती है, यदि वह संविधान के अनुकूल है, तो उच्चतम न्यायालय उसे वैध मानेगा। इस व्यवस्था की बजाय ‘उचित कानूनी प्रक्रिया’ (Due Process of Law) को अपनाया जाना चाहिए था, जिससे कि मौलिक अधिकारों के बारे में अन्तिम सत्ता उच्चतम न्यायालय के हाथों में होती, परन्तु भारत में कानून द्वारा निर्धारित ढंग अपनाने का मुख्य कारण मुकद्दमेबाजी को कम करना था।

6. न्यायपालिका के निर्णय संसद के कानूनों द्वारा निरस्त (Decisions of Judiciary struck by Parliament):
उच्चतम न्यायालय ने अनेक बार संसद के कानूनों को इस आधार पर निरस्त किया है कि वे कानून नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, परन्तु संसद ने संविधान में संशोधन करके न्यायपालिका द्वारा निरस्त घोषित किए गए कानूनों को वैध तथा सवैधानिक घोषित कर दिया।

7. कठिन भाषा (Difficult Language):
सर आइवर जेनिंग्स (Sir Ivor Jennings) के अनुसार, भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख बहुत कठिन भाषा में किया गया है। इसको साधारण व्यक्ति समझ नहीं सकता। उनका कहना है कि भारतीय मौलिक अधिकारों की भाषा अमेरिका के संविधान की तरह सरल तथा स्पष्ट होनी चाहिए थी।

8. न्याय का महँगा होना (Costly Judicial Remedies):
भारत में न्याय-व्यवस्था वैसे ही महँगी है। इधर मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए व्यक्ति या तो उच्च न्यायालय में या उच्चतम न्यायालय में प्रार्थना-पत्र दे। इसका अर्थ है-बहुत अधिक धन खर्च करना, जो कि साधारण नागरिक के लिए असहनीय है। न्याय-व्यवस्था सरल तथा सस्ती होनी चाहिए। उपर्युक्त मौलिक अधिकारों की आलोचना तथा उसके उत्तर से स्पष्ट है कि जो प्रतिबन्ध इन अधिकारों पर लगाए गए हैं, वे उचित हैं।

प्रश्न 6.
सम्पत्ति के अधिकार पर संक्षिप्त नोट लिखिए। अथवा भारतीय संविधान के अनुसार राज्य किन शर्तों पर व्यक्तिगत सम्पत्ति को ग्रहण कर सकता है?
उत्तर:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31 के अनुसार किसी व्यक्ति को कानून के प्राधिकार (Authority of Law) के बिना उसकी सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। इस अनुच्छेद के अनुसार ही सार्वजनिक हित के अतिरिक्त किसी सम्पत्ति पर अधिकार नहीं किया जा सकता और ऐसे कानून द्वारा उस सम्पत्ति के प्रति मुआवज़ा देने की व्यवस्था होनी चाहिए अथवा उन सिद्धान्तों का वर्णन होना चाहिए, जिनके आधार पर मुआवजा दिया जाता हो।

प्रथम संशोधन (1951) द्वारा अनुच्छेद 31-A तथा 31-B को अनुच्छेद 31 में जोड़ा गया। अनुच्छेद 31-A द्वारा यह निर्धारित किया गया कि यदि किसी राज्य का कोई कानून (पिछला या भविष्य में) किसी भी सम्पत्ति या जमींदारी प्रथा के मौलिक अथवा मध्यस्थ अधिकार पर प्रभाव डाले या कुछ समय के लिए किसी के अधिकारों को नियन्त्रित करे या उन अधिकारों को समाप्त करे या सार्वजनिक हित में उस सम्पत्ति का उचित प्रबन्ध करने के लिए, कुछ काल के लिए किसी की सम्पत्ति पर कब्जा करे तो ऐसी किसी भी अवस्था में न्यायालय उस राज्य के अधिकार को केवल इस आधार पर अवैध घोषित नहीं करेंगे कि यह अधिकार या कब्जा संविधान के उन अधिकारों के विरुद्ध है जो अनुच्छेद 14, 19 तथा 31 में प्रदान किए गए हैं।

अनुच्छेद 31-B ने संविधान के साथ 9वीं अनुसूची जोड़ी जिसमें जमींदारी प्रथा समाप्त करने सम्बन्धी 13 जमींदारी उन्मूलन कानून दर्ज किए, जिन्हें 31-A उपबन्ध के अभाव में अनुच्छेद 31 के अन्तर्गत न्यायालयों में चुनौती दी जा सकती थी। इस सूची के लिए व्यवस्था हुई कि ये कानून इस आधार पर अवैध घोषित नहीं किए जाएँगे कि इनका कोई उपबन्ध संविधान के भाग 3 में दिए गए मूल अधिकारों में से किसी के उलट है। अनुच्छेद 31 (B) द्वारा विधानमण्डल (Competent Legislature) की 9वीं सूची में दर्ज किसी भी अधिनियम को समाप्त अथवा संशोधित करने की शक्ति भी मिली।

25वें संशोधन द्वारा ‘मुआवज़ा’ (Compensation) शब्द के स्थान पर ‘रांशि’ (Amount) शब्द का प्रयोग किया गया। ऐसा इसलिए किया गया, ताकि सार्वजनिक हित के लिए प्राप्त सम्पत्ति के बदले दी जाने वाली राशि को इस न्यायालय में चुनौती न दी जा सके कि राशि अपर्याप्त है। 25वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 31-C को जोड़ा गया।

44वें संशेधन द्वारा अनुच्छेद 31 को संविधान में से निकाल दिया गया है परन्तु 31-A, 31-B, 31-C को वही रहने दिया गया है। अतः इस संशोधन द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों के अध्याय में से निकाल दिया गया है और सम्पत्ति का अधिकार केवल कानूनी अधिकार बन गया है। परन्तु इस बात का ध्यान रखा गया है कि सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से निकालने का प्रभाव अल्पसंख्यकों की संस्थाओं की स्थापना तथा उनके संचालन के अधिकार पर नहीं पड़ना चाहिए। 44वें संशोधन द्वारा संविधान में एक अनुच्छेद 300-A शामिल किया गया है जो यह घोषणा करता है कि कानून के आदेश के बिना किसी को भी उसकी सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का महत्त्व बताइए।
अथवा
नागरिकों की उन्नति और विकास के लिए मौलिक अधिकार क्यों आवश्यक हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मौलिक अधिकारों का महत्त्व (Importance of Fundamental Rights)-व्यक्ति की उन्नति और विकास के लिए मौलिक अधिकारों का बहुत महत्त्व है। यदि व्यक्ति को मौलिक अधिकार प्रदान न किए जाएँ, तो उसके जीवन, सम्पत्ति और स्वतन्त्रता की रक्षा का कोई उपाय न रहे। मौलिक अधिकार सरकार तथा विधानमण्डल को तानाशाह बनने से रोकते हैं. और व्यक्ति को आत्म-विकास का अवसर प्रदान करते हैं। मौलिक अधिकारों का व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के सम्बन्ध में विशेष महत्त्व है। मौलिक अधिकार वास्तव में लोकतन्त्र की आधारशिला हैं। मौलिक अधिकारों के महत्त्व का वर्णन निम्नलिखित है

1. मौलिक अधिकारों द्वारा सामाजिक समानता की स्थापना होती है (Social Equality is Established by the Fundamental Rights):
मौलिक अधिकारों द्वारा सामाजिक समानता की स्थापना होती है। मौलिक अधिकार देश के सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के प्रदान किए गए हैं। धर्म, जाति, भाषा, रंग-लिंग आदि के आधार पर सबको सामाजिक समानता प्राप्त हो तथा जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा हो।

मौलिक अधिकार विभिन्न प्रकार की स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं तथा जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा की व्यवस्था करते हैं। समानता, स्वतन्त्रता तथा भ्रातृत्व लोकतन्त्र की नींव हैं। भारतीय संविधान द्वारा ये तीनों प्रकार के मौलिक अधिकार नागरिकों को प्रदान किए गए हैं। अतः इस तरह से भारत में मौलिक अधिकार यहाँ के लोकतन्त्र की आधारशिला हैं।

2. मौलिक अधिकार कानून का शासन स्थापित करते हैं (Fundamental Rights Establish Rule of Law):
भारत में मौलिक अधिकार कानून के शासन की स्थापना करते हैं। मौलिक अधिकारों में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि सभी व्यक्ति कानून के समक्ष समान हैं और सभी को कानून का समान संरक्षण प्राप्त है।

जो व्यक्ति कानून को तोड़ता है, उसे कानून के अनुसार दण्ड दिया जाता है। कानून जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के आधार पर कोई मतभेद नहीं करता। किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना जीवन और निजी स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। शासन कानून के अनुसार चलाया जाता है, न कि किसी व्यक्ति की इच्छानुसार।

3. मौलिक अधिकार सरकार की निरंकुशता को रोकते हैं (Fundamental Rights check the Despotism of the Government):
मौलिक अधिकारों का महत्त्व इस बात में भी निहित है कि ये अधिकार एक ओर तो कार्यकारिणी तथा व्यवस्थापिका को उनके निश्चित अधिकार क्षेत्रों में रहने का निर्देश देते हैं और इस प्रकार अधिकारों को उनके अनुचित हस्तक्षेप से सुरक्षित रखते हैं।

दूसरी ओर ये अधिकार नागरिकों को सरकार के निरंकुश शासन के विरुद्ध जनमत को संगठित करने का अवसर प्रदान करते हैं। श्री ए०एन० पालकीवाला के अनुसार, “मौलिक अधिकार राज्य के निरंकुश स्वरूप से साधारण नागरिकों की रक्षा करने वाले कवच होते हैं।” हमारे देश में केन्द्रीय सरकार व राज्य सरकारें शासन चलाने के लिए अपनी इच्छानुसार कानून नहीं बना सकतीं, बल्कि उन्हें संविधान के अनुसार कार्य करना पड़ता है।

4. मौलिक अधिकार व्यक्तिगत हितों तथा सामाजिक हितों में उचित सामञ्जस्य स्थापित करते हैं (Co-ordinate Individual and Social Interests) मौलिक अधिकारों द्वारा व्यक्तिगत हितों तथा सामाजिक हितों में उचित सामंजस्य स्थापित करने के लिए काफी सीमा तक सफल प्रयास किया गया है।

5. मौलिक अधिकार कानून का शासन स्थापित करते हैं (Fundamental Rights Establish Rule of Law):
मौलिक अधिकारों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि ये कानून के शासन की स्थापना करते हैं, जिससे सबको समान न्याय प्राप्त होता है।

6. मौलिक अधिकार अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करते हैं (Fundamental Rights Protect the interests of Minorities):
अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि तथा संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार दिया गया है। अल्पसंख्यक अपनी पसन्द की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना कर सकते हैं और उनका संचालन करने का अधिकार भी उनको प्राप्त है।

सरकार अल्पसंख्यकों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगी। निष्कर्ष (Conclusion) यह कहना कि मौलिक अधिकारों का कोई महत्त्व नहीं है, एक बड़ी मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। सन् 1950 में लीनर नामक पत्रिका ने मौलिक अधिकारों के विषय में कहा था, “व्यक्तिगत अधिकारों पर लेख जनता को कार्यपालिका की स्वेच्छाचारिता की सम्भावना के विरुद्ध आश्वासन देता है। इन मौलिक अधिकारों जिसकी कोई भी बुद्धिमान राजनीतिज्ञ उपेक्षा नहीं कर सकता।” मौलिक अधिकारों का व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के सम्बन्ध में विशेष महत्त्व है। मौलिक अधिकार वास्तव में लोकतन्त्र की आधारशिला हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

प्रश्न 8.
भारतीय संविधान में लिखित मौलिक कर्तव्यों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा
मौलिक कर्तव्यों से आप क्या समझते हैं? भारतीय संविधान में 42वें संशोधन द्वारा सम्मिलित किए गए मौलिक कर्तव्य कौन-कौन से हैं? इनकी उपयोगिता पर प्रकाश डालिए। आप किन अनुच्छेदों पर इनकी आलोचना कर सकते हैं?
उत्तर:
मौलिक रूप में भारतीय संविधान में अधिकारों सम्बन्धी अनुच्छेद 14 से 32 तक सात प्रकार के मौलिक अधिकार अंकित किए गए थे, परन्तु इन अधिकारों के साथ भारतीय नागरिकों के किसी भी प्रकार के कर्तव्य निश्चित नहीं किए गए थे। काँग्रेस दल के प्रधान श्री डी०के० बरुआ द्वारा सवैधानिक परिवर्तनों के सम्बन्ध में विचार करने के लिए फरवरी, 1976 में एक 9 सदस्यीय समिति नियुक्त की गई थी। इस समिति के अध्यक्ष भारत के भूतपूर्व रक्षा मन्त्री सरदार स्वर्ण सिंह थे।

काफी तर्को के बाद इस समिति ने अपनी रिपोर्ट मई, 1976 में पेश की। अपनी रिपोर्ट में स्वर्ण समिति ने यह सिफारिश की कि भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों का भी एक अध्याय शामिल किया जाए। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही संविधान के 42वें संशोधन द्वारा भारतीय संविधान में एक नया भाग 4-A मौलिक कर्तव्य (Part IV-A, Fundamental Duties) अंकित किया गया है। इस नए भाग में भारतीय नागरिकों के दस प्रकार के मौलिक कर्त्तव्य अंकित किए गए हैं। इन दस प्रकार के कर्तव्यों का वर्णन निम्नलिखित है

1. संविधान का पालन तथा राष्ट्र-थ्वज व राष्ट्र-गान का आदर करना (To abide by the Constitution and Respect its Ideals and Institutions like National Flag and National Anthem):
भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह संविधान में निहित आदर्शों का पालन करे और देश की सर्वोच्च संस्थाओं, राष्ट्र-ध्वज तथा राष्ट्र-गान का आदर करे। संविधान देश का सर्वोच्च कानून है और इसका पालन करना सरकार का ही नहीं, नागरिकों का भी कर्तव्य है। इसी प्रकार राष्ट्र-गान तथा राष्ट्र-ध्वज का आदर करना भी प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

2. भारतीय प्रभुसत्ता, एकता व अखण्डता का समर्थन तथा रक्षा करना (To Uphold and protect the Sovereignty unity and Integrity of India): प्रत्येक नागरिक के लिए यह कर्त्तव्य बड़ा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यदि हम इस पर नहीं चलेंगे तो कड़े संघर्ष और बलिदान के बाद प्राप्त हुई स्वतन्त्रता और प्रभुसत्ता खतरे में पड़ सकती है। राष्ट्रीय एकता, देश की अखण्डता और राज्य की प्रभुसत्ता की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

3. देश की रक्षा करना तथा आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रीय सेवाओं में भाग लेना (To defend the Country and render National Service when called upon to do so):
जिस देश के नागरिक देश की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहेंगे, वह देश कभी गुलाम नहीं बन सकता। सबका कर्त्तव्य है कि देश की रक्षा करें और समय आने पर अनिवार्य सेवा के लिए सबको तैयार रहना चाहिए।

4. भारत में सब नागरिकों में भ्रातृत्व की भावना विकसित करना (To promote Spirit of Brotherhood amongest all citizens):
राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए यह लिखा गया है, “प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह धार्मिक, भाषायी तथा क्षेत्रीय या वर्गीय भिन्नताओं से ऊपर उठकर भारत के सब लोगों में समानता तथा भ्रातृत्व की भावना विकसित करे।” नारियों की स्थिति में सुधार लाने के लिए मौलिक कर्तव्यों के अध्याय में अंकित किया गया है कि प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह उन प्रथाओं का त्याग करे जिनसे नारियों का अनादर होता है।

5. स्वतन्त्रता के लिए किए गए राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को मानना तथा उनका प्रसार करना (To accept and follow the Noble Ideals which Inspired our National Struggle for the freedom):
प्रत्येक नागरिक का परम कर्त्तव्य है कि जिन आदर्शों, जैसे स्वतन्त्रता, धर्म-निरपेक्षता, लोकतन्त्र, अहिंसा, राष्ट्रीय एकता, विश्व-बन्धुत्व आदि, के लिए स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा गया और जिनके लिए शहीदों ने अपना बलिदान किया, उन्हें अपनाएँ और उन पर चलते हुए राष्ट्र का विकास करें।

6. लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण फैलाना (To Develop Scientific Attitude in the People):
आधुनिक युग विज्ञान का युग है, परन्तु भारत की अधिकांश जनता आज भी अन्धविश्वासों के चक्कर में फंसी हुई है। उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी है जिस कारण वे अपने व्यक्तित्त्व तथा अपने जीवन का ठीक प्रकार से विकास नहीं कर पाते। इसलिए अब व्यवस्था की है, “प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वैज्ञानिक स्वभाव, मानववाद तथा जाँच करने और सुधार करने की भावना विकसित करे।”

7. प्राचीन संस्कृति की देन को सुरक्षित रखना (To Preserve the Rich Heritage of Composite Culture):
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवकों को भारतीय संस्कृति की महानता के बारे में बताया जाए ताकि युवक अपनी संस्कृति पर गर्व अनुभव कर सकें। इसलिए मौलिक कर्तव्यों के अध्याय में यह अंकित किया गया है, “प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह सम्पूर्ण संस्कृति तथा शानदार विरासत का सम्मान करे और उसको स्थिर रखे।”

8. व्यक्तिगत तथा सामूहिक यत्नों के द्वारा उच्च राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के यत्न करना (To Strive towards excellence in spheres of Individual and Collective Activities):
कोई भी समाज तथा देश तब तक उन्नति नहीं कर सकता, जब तक कि उसके नागरिकों में प्रत्येक कार्य को करने की लगन तथा श्रेष्ठता प्राप्त करने की इच्छा न हो। अतः प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वह व्यक्तिगत तथा सामूहिक गतिविधियों के प्रत्येक क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठता प्राप्त करने का यत्न करे, ताकि उसका उच्च स्तरों के प्रति ज्ञान निरन्तर बढ़ता रहे और राष्ट्र उन्नति के पथ पर अग्रसर हो।

9. वनों, झीलों, नदियों तथा जंगली जानवरों की रक्षा करना तथा उनकी उन्नति के लिए प्रयत्न करना (To protect and improve the National Environment including Forests, Lakes, Rivers and Wildlife and to have compossion for living creatures):
प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वनों, झीलों, नदियों तथा वन्य-जीवन सहित प्राकृतिक वातावरण की रक्षा और सुधार करें तथा जीव-जन्तुओं के प्रति दया की भावना रखें।

10. हिंसा को रोकना तथा राष्ट्रीय सम्पत्ति की रक्षा करना (To safeguard Public Property and Adjure Vio lence) सार्वजनिक सम्पत्ति देश के धन, शक्ति और सम्पन्नता का स्रोत होती है। इसको हानि पहुँचाना एक प्रकार से अपनी सम्पत्ति को हानि पहुँचाना है। हिंसा से नैतिक और मानवीय मूल्यों का पतन होता है तथा देश की प्रगति में बाधा पड़ती है। इसलिए सभी भारतीय नागरिकों का कर्तव्य है कि वे सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करें तथा हिंसा का त्याग करें।

संविधान में मौलिक कर्तव्यों का अंकित किया जाना एक प्रगतिशील कदम है। संविधान में मौलिक कर्त्तव्यों की व्याख्या न होना संविधान की महत्त्वपूर्ण कमी थी, जिसे 42वें संशोधन ने मौलिक कर्तव्यों के अध्याय को शामिल करके दूर किया। कोई देश तब तक उन्नति नहीं कर सकता जब तक उसके नागरिक अपने अधिकार की अपेक्षा अपने कर्तव्यों के प्रति अधिक जागृत न हों।

महात्मा गाँधी अधिकारों की अपेक्षा कर्त्तव्यों पर अधिक जोर देते थे। उनका कहना था कि अधिकार कर्तव्यों का पालन करने से प्राप्त होते हैं। मौलिक कर्तव्यों की उपयोगिता एवं महत्त्व (Utility and Importance of the Fundamental Duties) मौलिक कर्त्तव्यों की उपयोगिता एवं महत्त्व निम्नलिखित है

1. मौलिक कर्त्तव्य व्यक्ति के आदर्श व पथ-प्रदर्शक हैं (The Fundamental Duties are the Ideals and Guidelines for the Individual)-भारत के संविधान में सम्मिलित किए गए मौलिक कर्त्तव्य आदर्शात्मक हैं। इन कर्त्तव्यों का उद्देश्य कोई स्वार्थ न होकर नागरिकों के दिलों में देश-हित की भावना जागृत करना है। इसके साथ ही ये कर्तव्य नागरिकों का पथ-प्रदर्शन करते हैं।

आज समाज के चारों तरफ स्वार्थ और भ्रष्टाचार का वातावरण फैला हुआ है तथा व्यक्ति व समाज के हितों में उचित सामंजस्य नहीं है। इसके अतिरिक्त जहाँ व्यक्ति स्वहित को प्राथमिक और समाज के हितों को गौण मानता है तो ऐसे समाज के लिए ये मौलिक कर्तव्य जनता का मार्गदर्शन करते हैं और उनके व्यवहार के लिए आदर्श उपस्थित करते हैं, ताकि वे निजी स्वार्थ की संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर सामूहिक हित के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करें।

2. मौलिक कर्त्तव्य नागरिकों में चेतना उत्पन्न करेंगे (The Fundamental Duties will Create Consciousness Among the People):
मौलिक कर्तव्यों को संविधान में सम्मिलित करने से नागरिकों में अपने कर्तव्यों के प्रति चेतना जागृत होगी और लोगों का श्रेष्ठ आचरण सम्भव हो सकेगा। इसके फलस्वरूप व्यक्तिगत उन्नति तथा विकास के साथ-साथ समाज और देश भी प्रगति के पथ पर अग्रसर होंगे।

मौलिक कर्तव्यों को संविधान में सम्मिलित करते समय हमारी स्वर्गीय प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था कि अगर लोग मौलिक कर्तव्यों को अपने दिमाग में रख लेंगे तो हम तुरन्त एक शान्तिपूर्ण तथा मैत्रीपूर्ण क्रान्ति देख सकेंगे। अतः इस प्रकार हम देखते हैं कि संविधान में मौलिक कर्त्तव्यों के अंकित किए जाने से ये नागरिकों को सदैव याद दिलाते रहेंगे कि उनके अधिकारों के साथ-साथ कुछ कर्त्तव्य भी हैं।

3. मौलिक अधिकारों की प्राप्ति में सहायक (Helpful in Attaining the Fundamental Rights):
कर्त्तव्यों की तीसरी महत्ता है कि ये भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होंगे क्योंकि कई ऐसे अधिकार हैं जो कर्त्तव्यों को निभाने मात्र से ही प्राप्त हो जाएँगे।

4. मौलिक कर्त्तव्य का नैतिक महत्त्व (Moral Importance of Fundamental Duties):
यद्यपि यह ठीक है कि इन कर्तव्यों के पीछे किसी प्रकार की कानूनी शक्ति नहीं है, फिर भी इनकी नैतिक महत्ता है। कर्तव्यों का नैतिक स्वरूप अपना विशेष महत्त्व रखता है।

5. कमी को पूरा करते हैं (Remove Deficiency):
भारतीय संविधान में मूल रूप से मौलिक कर्तव्यों को शामिल नहीं किया गया था, जिसके कारण भारतीय नागरिक केवल अपने अधिकारों के प्रति ही जागरूक थे तथा अपने कर्तव्यों को भूल गए थे। अतः इन मौलिक कर्त्तव्यों को संविधान में 42वें संशोधन द्वारा शामिल करके इस कमी को पूरा कर दिया गया है। मौलिक कर्त्तव्य प्रारम्भिक कमी को पूरा करते हैं।

6. कर्त्तव्य विवाद रहित हैं (Duties are Non-controversial):
भारतीय संविधान में सम्मिलित किए गए मौलिक कर्त्तव्य विवाद रहित हैं। इस पर विभिन्न विद्वानों में कोई मतभेद नहीं है। सभी विद्वानों ने इन कर्त्तव्यों को भारतीय संस्कृति के अनुकूल बताया है। सभी विद्वान इस बात पर सहमत हैं कि इन कर्तव्यों का पालन भारतीय विकास में सहायक होगा। मौलिक कर्तव्यों की आलोचना (Criticism of the Fundamental Duties) मौलिक कर्तव्यों की आलोचना इस प्रकार हैं

1. कुछ मौलिक कर्त्तव्य अस्पष्ट हैं (Some of the Fundamental Duties are not Clearly Defined):
आलोचकों का कहना है कि संविधान में ऐसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, जिनका अर्थ एकदम स्पष्ट हो। परन्तु ‘कर्तव्यों’ वाले भाग में कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनका मनमाना अर्थ लगाया जा सकता है, जैसे मिली-जुली संस्कृति (Composite Culture), वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper), अन्वेषण और सुधार की भावना (Spirit of Enquiry and Reform) तथा मानववाद आदि।

कर्तव्यों को लागू करने के लिए कोई दण्डात्मक व्यवस्था नहीं है (There is no Coercive Machinery for the Enforcement of the Duties): स्वर्णसिंह समिति ने यह सुझाव दिया था कि मौलिक कर्तव्यों की अवहेलना करने वालों को दण्ड दिया जाए और उसके लिए संसद उचित कानूनों का निर्माण करे, परन्तु अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया गया है। वास्तव में कर्तव्यों के वर्तमान रूप को देखते हुए दण्ड की व्यवस्था की ही नहीं जा सकती। जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है, कर्तव्यों के स्वरूप नितान्त अस्पष्ट हैं, अतः नागरिकों को किस आधार पर दण्ड दिया जा सकता है।।

3. केवल उच्च आदर्श (High Ideals Only):
मौलिक कर्तव्यों की आलोचना तीसरे स्थान पर की जा सकती है कि ये केवल मात्र उच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं। भारत की अधिक जनसंख्या गाँवों में निवास करती है जो इन उच्च आदर्शों को समझने में असमर्थ है।

4. संविधान के तीसरे अध्याय में सम्मिलित होने चाहिएँ (Should have been Included in Chapter No. Three):
मौलिक कर्तव्यों को भारतीय संविधान के अध्याय चार में शामिल किया गया है, जबकि इन्हें मौलिक अधिकारों वाले अध्याय तीन में ही रखा जाना चाहिए क्योंकि अधिकारों के साथ ही कर्तव्य अच्छे लगते हैं।

5. महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्यों का छोड़ा जाना (Some Important Duties have been Left):
मौलिक कर्तव्यों की आलोचना आलोचकों के द्वारा इस आधार पर की गई है कि कई महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्यों को कर्तव्यों की सूची में लिखा नहीं गया है, जैसे अनिवार्य मतदान, अनिवार्य सैनिक सेवा, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना आदि को संविधान में शामिल किया जाना चाहिए था। इन कर्तव्यों को सूची से बाहर रखा जाना विचित्र-सा लगता है।

प्रश्न 9.
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। अथवा राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों से क्या अभिप्राय है? निदेशक सिद्धान्तों के स्वरूप का विवेचन कीजिए। अथवा राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों का अर्थ लिखकर उनके स्वरूप की व्याख्या कीजिए। अथवा राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्तों की प्रकृति का वर्णन करें।
उत्तर:
हमारे संविधान-निर्माताओं ने इस बात को पूरी तरह से ध्यान में रखा और संविधान के चौथे अध्याय (Chapter IV) में कुछ ऐसे सिद्धान्तों का वर्णन किया जो राज्य के पथ-प्रदर्शन का कार्य करते रहें। इन सिद्धान्तों के पीछे कानून की शक्ति नहीं है अर्थात् इन सिद्धान्तों को न्यायालय द्वारा लागू नहीं करवाया जा सकता, परन्तु यह बात हमारे संविधान में स्पष्ट शब्दों में कह दी गई है कि राज्य की नीति के इन निदेशक सिद्धान्तों का शासन-व्यवस्था में मौलिक रूप से पालन किया जाएगा। भले ही ये सिद्धान्त कानूनी रूप में लागू न किए जा सकते हों, परन्तु इन्हें व्यवहार में लागू करने के लिए जनमत (Public Opinion) का हाथ अधिक मात्रा में होगा।

हमारे संविधान में इन सिद्धान्तों को राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों (Directive Principles of State Policy) का नाम दिया गया है। इनके नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ये सिद्धान्त राज्य का पथ-प्रदर्शन करने के लिए बनाए गए हैं। भारतीय संविधान के निर्माताओं का कथन था कि देश में राजनीतिक प्रजातन्त्र के साथ आर्थिक तथा सामाजिक प्रजातन्त्र का होना भी आवश्यक है, तभी राष्ट्र उन्नति कर सकता है।

राज्य-नीति निदेशक सिद्धान्त उन साधनों तथा नीतियों को बताते हैं, जिनका पालन करके भविष्य में भारत में एक क-कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की स्थापना की जा सके। एम०बी० पायली के शब्दों में, “सामूहिक रूप से सिद्धान्त लोकतन्त्रात्मक भारत का शिलान्यास करते हैं। ये भारतीय जनता के आदर्शों एवं आकांक्षाओं का वह भाग है जिन्हें वह एक सीमित अवधि के भीतर प्राप्त करना चाहती है।”

दूसरे शब्दों में, राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त वे आदेश-पत्र हैं, जिनको राज्य की व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका को कोई भी कानून या नीति बनाते समय ध्यान में रखना पड़ता है। डॉ० अम्बेडकर (Dr. Ambedkar) ने संविधान सभा में कहा था, “संविधान के इस भाग को अधिनियमित कर भविष्य में सभी व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका को यह निर्देश दिया गया है कि वे किस प्रकार से अपनी शक्तियों का प्रयोग करें।”
निदेशक सिद्धान्तों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. आयरलैण्ड के संविधान से प्रेरित (Inspired from Irish Constitution):
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त आयरलैण्ड के संविधान से प्रेरित कहे जा सकते हैं। आयरलैण्ड के संविधान में भी राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त पाए जाते हैं, परन्तु भारतीय व्यवस्था आयरिश व्यवस्था से कुछ भिन्न; जैसे भारत और आयरलैण्ड में निदेशक तत्त्वों की प्रकृति समान नहीं है तथा भारत में निदेशक तत्त्व राज्य के लिए निर्देश हैं, जबकि आयरलैंड में केवल विधायकों के लिए निर्देश हैं।

2. शासन-व्यवस्था के आधारभूत सिद्धान्त (Fundamental Principles for Governance of the State):
राज्य के निदेशक तत्त्व शासन-व्यवस्था के आधारभूत सिद्धान्त हैं। संविधान की अनुच्छेद 37 में स्पष्ट कहा गया है कि यद्यपि ये सिद्धान्तवाद योग्य नहीं हैं तो भी राज्य के प्रशासन हेतु आधारभूत हैं, जिनके आधार पर राज्य को कानून बनाने चाहिएँ।।

3. समाजवादी व्यवस्था के आधार (Basis of Socialist System):
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त समता पर आधारित समाजवादी व्यवस्था की स्थापना करते हैं जिसमें आर्थिक विषमता व असमानता को दूर करने की बात कही गई है। इसलिए आइवर जेनिंग्स (Ivor Jennings) ने नीति-निदेशक सिद्धान्तों के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा, “संविधान के ये पन्ने समाजवाद शब्द का प्रयोग किए बिना ही लोकतान्त्रिक समाजवाद की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हैं।”

4. भारतीय सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप (In accordance with Indian Social Background):
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त भारतीय सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप हैं, जैसे इनमें बहुधर्मी समाज होने के नाते समान नागरिक आचार संहिता. गरीबी के दृष्टिकोण से मुफ्त कानूनी सहायता, अनुसूचित जातियों व जनजातियों के विकास के लिए मुफ्त शिक्षा का प्रबन्ध इत्यादि को लागू करने के लिए कहा गया है।

5. व्यापक क्षेत्र (Wide Scope):
निदेशक सिद्धान्तों का क्षेत्र व्यापक है, जिसमें सामाजिक-आर्थिक न्याय से सम्बन्धित तत्त्वों के साथ अन्तर्राष्ट्रीय, गाँधीवादी पंचायत व्यवस्था, मद्य-निषेध, जंगली जीवों व पर्यावरण की रक्षा सम्बन्धी तत्त्व भी पाए जाते हैं। इस प्रकार निदेशक सिद्धान्त समाज के सभी पक्षों सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, पर्यावरण तथा इतिहास से सम्बन्धित हैं।

6. सकारात्मक प्रकृति (Positive Nature):
निदेशक सिद्धान्त की प्रकृति सकारात्मक है जो राज्य को निदेशक तत्त्वों के अनुसार कार्य करने का निर्देश देती है, जैसे राज्य गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करे, राज्य ऐसी नीतियाँ बनाए, जिनसे सभी नागरिकों को, स्त्री व पुरुषों को समान रूप से जीवनयापन के उचित साधन उपलब्ध हो सकें, इत्यादि।

7. मौलिक अधिकारों के पूरक (Complementary of Fundamental Rights):
नागरिकों को मौलिक अधिकार यथार्थ में तभी प्राप्त हो सकते हैं, जबकि नीति-निदेशक तत्त्वों को लागू किया जाए। राज्य-नीति के निदेशक तत्त्वों में निहित व्यवस्था के अन्तर्गत ही मौलिक अधिकारों की प्राप्ति सम्भव है। इसलिए न्यायपालिका ने बार-बार अनेक निर्णयों में कहा है कि नीति-निदेशक सिद्धान्त मौलिक अधिकारों के पूरक हैं।

8. आदर्शवादी (Idealistic):
नीति-निदेशक सिद्धान्त यथार्थवादी ही नहीं हैं, बल्कि उनमें आदर्श भी निहित हैं, जैसे विश्व-शान्ति का आदर्श, वन्य जीवों की रक्षा का आदर्श इत्यादि।

9. लोक-कल्याणकारी राज्य के आधार (Basis of Welfare State):
अनुच्छेद 38 में प्रतिपादित नीति-निदेशक सिद्धान्त में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्य लोगों के कल्याण हेतु ऐसी सामाजिक व्यवस्था करे, जिसमें लोगों को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय मिल सके। अनुच्छेद 39 का सम्बन्ध उन नीतियों से है जो लोक-कल्याणकारी राज्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं।

10. न्याय-योग्य नहीं (Non-Justiceable):
अनुच्छेद 37 में कहा गया है कि ये निदेशक सिद्धान्त वाद-योग्य नहीं हैं अर्थात् नागरिक इन तत्त्वों को लागू करवाने के लिए न्यायालय में नहीं जा सकते। न्यायालय सरकार को इन सिद्धान्त को लागू करने लिए निर्देश जारी नहीं कर सकता, लेकिन वाद-योग्य न होने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि नागरिक इन सिद्धान्त के आधार पर किसी कानून तथा शासकीय कार्य को चुनौती नहीं दे सकते और न्यायालय इन सिद्धान्त के आधार पर निर्णय नहीं दे सकते।

नागरिक इन सिद्धान्त के आधार पर कानूनों तथा प्रशासकीय कार्यों को न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं और न्यायालय इन सिद्धान्त के आधार पर निर्णय दे सकते हैं, केवल इन सिद्धान्त को लागू करने के लिए निर्देश नहीं दे सकते।

11. ये सिद्धान्त किसी विशेष राजनीतिक विचारअनुच्छेद से सम्बन्धित नहीं हैं (These Principles are not connected with any particular theory):
नीति-निदेशक सिद्धान्तों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि ये किसी विशेष विचारअनुच्छेद से बँधे हुए नहीं हैं। ये सिद्धान्त बहुत लचीले हैं और किसी भी विचारअनुच्छेद के माध्यम से इनकी पूर्ति हो सकती है। वास्तव में राजनीतिक लोकतन्त्र के माध्यम से कल्याणकारी राज्य की स्थापना के प्रयास के कारण इन्हें विचारअनुच्छेदों के बन्धन से मुक्त रखा गया है।

प्रश्न 10.
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त क्या हैं? हमारे संविधान में दिए गए राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए। इन्हें कैसे मनवाया जा सकता है?
अथवा
भारतीय संविधान में दिए गए किन्हीं पाँच राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संविधान के अध्याय IV में अनुच्छेद 36 से लेकर 51 तक कुल 16 अनुच्छेदों में निदेशक सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है। अध्ययन के लिए इन्हें प्रायः तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है-

  • समाजवादी सिद्धान्त (Socialist Principles),
  • गाँधीवादी सिद्धान्त (Gandhian Principles),
  • उदारवादी लोकतन्त्रीय सिद्धान्त (Liberal Democratic Principles)। इन तीन वर्गों में एक और वर्ग भी जोड़ा जा सकता है-
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धी सिद्धान्त (Principles Relating to International Relations) स्मरण रहे कि संविधान में इनका वर्णन इन विभिन्न रूपों में विभाजित करके नहीं किया गया है

1. समाजवादी सिद्धान्त (Socialist Principles)- इस वर्ग के अधीन ऐसे सिद्धान्त रखे जा सकते हैं जिनका उद्देश्य भारत में समाजवादी कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। ऐसे सिद्धान्त हैं-

(1) राज्य अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा जिससे
(क) सभी व्यक्तियों को समान रूप से जीविका उपार्जन के पर्याप्त साधन प्राप्त हो सकें,
(ख) समान काम के लिए सभी को समान वेतन मिले,
(ग) देश के भौतिक तथा उत्पादन के साधनों का विभाजन इस प्रकार हो कि सार्वजनिक हित का पालन हो,
(घ) धन का उचित वितरण हो तथा केवल कुछ ही व्यक्तियों के हाथों में धन का केन्द्रीयकरण न हो,
(ङ) मजदूरों, स्त्रियों तथा बालकों की परिस्थितियों का दुरुपयोग न हो और वे अपनी आर्थिक आवश्यकताओं से मजबूर होकर कोई ऐसा कार्य न करें जो उनकी शक्ति से बाहर हो तथा जिससे उनका स्वास्थ्य खराब हो,

(2) मजदूरों को काम करने की न्यायपूर्ण तथा मानवीय परिस्थितियाँ प्राप्त हों तथा स्त्रियों को प्रसति सहायता मिले। राज्य हर प्रकार से यह प्रयत्न करे कि राज्य से बेकारी और बीमारी दूर हो। बूढ़ों और दिव्यांगों को सार्वजनिक सहायता दी जाए,

(3) राज्य में अधिक-से-अधिक नागरिकों के लिए शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था की जाए,

(4) राज्य यह प्रयत्न करेगा कि सभी कर्मचारियों, जो किसी भी उद्योग, कृषि अथवा धन्धे में लगे हों, को काम का उचित वेतन तथा काम की उचित व्यवस्थाएँ उपलब्ध हों, जिनसे वे अपना जीवन-स्तर ऊँचा कर सकें।

2. गाँधीवादी सिद्धान्त (Gandhian Principles)-संविधान-निर्माताओं ने गाँधी जी के विचारों को व्यवहार में लाने के लिए निम्नलिखित सिद्धान्त निदेशक सिद्धान्तों में शामिल किए हैं-
(1) राज्य गाँवों में पंचायतों को संगठित करे तथा उनको इतनी शक्तियाँ दे जिनसे कि वे प्रशासनिक इकाइयों के रूप में सफलतापूर्वक कार्य कर सकें,

(2) राज्य समाज के दुर्बल वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों तथा कबीलों की शिक्षा और आर्थिक उन्नति के लिए प्रयत्न करेगा तथा उन्हें सामाजिक अन्याय एवं शोषप

(3) गाँवों में घरेलू दस्तकारियों की उन्नति के लिए प्रयत्न करेगा,

(4) राज्य नशीली वस्तुओं के सेवन को रोकने का प्रयत्न करेगा,

(5) राज्य कृषि तथा पशुपालन उद्योग का संगठन वैज्ञानिक अनुच्छेदों पर करने का प्रयत्न करेगा। दूध देने वाले पशुओं को मारने पर रोक लगाएगा और पशुओं की नस्ल सुधारने का प्रयत्न करेगा।

3. उदारवादी लोकतन्त्रीय सिद्धान्त (Liberal Democratic Principles)

  • राज्य न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए उचित कदम उठाएगा,
  • संविधान के लागू होने के 10 वर्ष के अन्दर-अन्दर राज्य 14 वर्ष के बालकों के लिए निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा का प्रबन्ध करेगा,
  • राज्य समस्त भारत में सामान्य व्यवहार नियम (Uniform Civil Code) लागू करने का प्रयत्न करेगा,
  • राज्य लोगों के जीवन-स्तर तथा आहार-स्तर को ऊँचा उठाने तथा उनके स्वास्थ्य में सुधार करने का यत्न करेगा,
  • राज्य ऐतिहासिक अथवा कलात्मक दृष्टि से महत्त्व रखने वाले स्मारकों, स्थानों तथा वस्तुओं की रक्षा करेगा और उनको नष्ट होने अथवा कुरूप होने से बचाएगा।

4. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों से सम्बन्धित सिद्धान्त (Principles Relating to International Relations)- नीति-निदेशक सिद्धान्त राष्ट्रीय नीति के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय नीति से भी सम्बन्धित हैं। अनुच्छेद 51 में कहा गया है कि राज्य-

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देगा,
  • राष्ट्रों के मध्य उचित व सम्मानपूर्वक सम्बन्ध बनाए रखेगा,
  • अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि व कानून को सम्मान देगा,
  • अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का मध्यस्थता द्वारा निपटारा करने का प्रयास करेगा।

42वें संशोधन द्वारा राज्य नीति के निदेशक सिद्धान्तों में वृद्धि (Accretion in Directive Principles of State Policy through 42nd Amendment)42वें संशोधन द्वारा राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों में निम्नलिखित नए सिद्धान्त शामिल किए गए हैं

(1) राज्य अपनी नीति का संचालन इस प्रकार से करेगा जिससे कि बच्चों को स्वस्थ, स्वतन्त्र और प्रतिष्ठापूर्ण वातावरण में अपने विकास के लिए अवसर और सुविधाएँ प्राप्त हों,

(2) राज्य ऐसी कानून प्रणाली के प्रचलन की व्यवस्था करेगा जो समान अवसरों के आधार पर न्याय का विकास करे। राज्य आर्थिक दृष्टि से कमजोर व्यक्तियों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता की व्यवस्था करने का प्रयत्न करेगा,

(3) राज्य कानून द्वारा या अन्य ढंग से श्रमिकों को उद्योगों के प्रबन्ध में भागीदार बनाने के लिए पग उठाएगा,

(4) राज्य पर्यावरण की सुरक्षा और विकास करने तथा देश के वन और वन्य जीवन को सुरक्षित रखने का प्रयत्न करेगा।

44वें संशोधन द्वारा राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों का विस्तार किया गया है। 44वें संशोधन के अन्तर्गत अनुच्छेद 38 के अन्तर्गत एक और निदेशक सिद्धान्त जोड़ा गया है। 44वें संशोधन के अनुसार राज्य, विशेषकर आय की असमानता को न्यूनतम करने और न केवल व्यक्तियों में, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों अथवा व्यवसायों में लगे लोगों के समूहों में स्तर, सुविधाओं और अवसरों की असमानता को दूर करने का प्रयास करेगा।

इस तरह राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त जीवन के पहलू के साथ सम्बन्धित हैं, क्योंकि ये सिद्धान्त कई विषयों के साथ सम्बन्ध रखते हैं, इसलिए स्वाभाविक ही है कि इनको परस्पर किसी विशेष तर्कशास्त्र के साथ नहीं जोड़ा गया है। यह तो एक तरफ का प्रयत्न था कि इन सिद्धान्तों द्वारा सरकार को निर्देश दिए जाएँ, ताकि सरकार उन कठिनाइयों को दूर कर सके जो उस समय समाज में विद्यमान थीं।

प्रश्न 11.
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों की आलोचना किस आधार पर की जाती है?
उत्तर:
भारतीय संविधान के अध्याय IV में दिए गए निदेशक सिद्धान्तों की आलोचकों द्वारा कटु आलोचना की गई है। इन्हें व्यर्थ व अनावश्यक कहा गया है। संविधान में केवल उन्हीं बातों का वर्णन होता है जिनको व्यवहार में लाया जा सके, परन्तु निदेशक सिद्धान्त ऐसे तत्त्व हैं जिनको तुरन्त व्यवहार में नहीं लाया जा सकता। सरकार को इन पर चलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

ये कोरे वायदे हैं जो जनता को धोखा देने के लिए संविधान में रखे गए हैं तथा इनकी वास्तविक उपयोगिता कुछ नहीं है। इनका महत्त्व राजनीतिक घोषणाओं के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। प्रो० व्हीयर (Prof. Wheare) ने इन्हें केवल उद्देश्यों व आकांक्षाओं का घोषणा-पत्र कहा है।

श्री के०टी० शाह (K.T. Shah) के अनुसार, “निदेशक सिद्धान्त उस चैक के समान हैं जिसका बैंक ने अपनी सुविधा के अनुसार भुगतान करना है।” (Directive Principles are like a cheque payable by the bank at its convenience.)

श्री नसीरुद्दीन (Sh. Nasiruddin) ने इनकी तुलना “नए वर्ष के उन प्रस्तावों से की है जो जनवरी के दूसरे दिन ही तोड़े जा सकते हैं।” (New years resolutions which can be broken on the second of January.) आलोचना निम्नलिखित अनुच्छेदों पर की गई है

1. इनके पीछे कानूनी शक्ति नहीं है (They are not backed by Legal Sanctions):
निदेशक सिद्धान्तों के पीछे कोई कानूनी शक्ति नहीं है तथा सरकार को इन पर चलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इन्हें मौलिक अधिकारों की तरह न्यायालयों द्वारा लागू नहीं करवाया जा सकता। ये न्यायसंगत नहीं हैं। इनको व्यावहारिक रूप देना सरकार की इच्छा पर निर्भर करता है।

2. ये अप्राकृतिक हैं (They are Unnatural):
संविधान में इन सिद्धान्तों का सम्मिलित किया जाना अप्राकृतिक प्रतीत होता है। कोई भी प्रभुत्व-सम्पन्न राज्य अपने आपको इस प्रकार के निर्देश नहीं दे सकता। निर्देश सदा सर्वोच्च सत्ता द्वारा अधीनस्थ सत्ता को दिए जाते हैं, न कि अपने आपको।

3. ये व्यर्थ हैं (They are Superfluous):
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त संविधान की प्रस्तावना में निहित हैं। इनका पृथक् वर्णन करने की आवश्यकता नहीं है। इससे संविधान की जटिलता बढ़ती है।

4. ये स्थाई नहीं हैं (They are not Permanent):
इस प्रकार के सिद्धान्त स्थाई नहीं हो सकते। देश की आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं तथा समय और स्थिति की आवश्यकता के अनुसार सिद्धान्तों को बदलना पड़ता है। यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि जो सिद्धान्त 20वीं शताब्दी में उपयोगी समझे गए हैं, वे 21वीं शताब्दी में भी उपयोगी सिद्ध होंगे।

5. कुछ सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं हैं (Some Principles are not Practicable):
निदेशक तत्त्वों में कुछ सिद्धान्त ऐसे हैं, जिनको व्यावहारिक रूप देना कठिन है। उदाहरणतया नशाबन्दी के सिद्धान्त को लागू करने से कई कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। एक ओर सरकार का राजस्व बहुत कम हो जाता है और दूसरी ओर अवैध शराब का निकालना बढ़ जाता है तथा कई कानूनी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। आलोचकों का कहना है कि राज्य द्वारा लागू की गई नैतिकता कोई नैतिकता नहीं होती।

6. ये प्रकृति में विदेशी हैं (They are Foreigner in Nature):
इन सिद्धान्तों पर विदेशी विचारअनुच्छेद का प्रभाव है। सर आइवर जेनिंग्स (Sir Ivor Jennings) के अनुसार, “इन पर इंग्लैण्ड के 19वीं शताबी के फेबियन समाजवाद (Fabian Socialism) का प्रभाव स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। जिन सिद्धान्तों को 19वीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में ठीक माना जाता था, उन्हें 20वीं शताब्दी के भारतीय संविधान में स्थान देना प्रगतिशील व्यवस्था नहीं थी। ये सिद्धान्त भारतीय संस्कृति व परम्परा के अनुकूल नहीं हैं।”

इनका सही ढंग से वर्गीकरण नहीं किया गया है (They are not Properly Classified):
डॉ० श्रीनिवासन (Dr. Srinivasan) के अनुसार, “निदेशक सिद्धान्तों का उचित ढंग से वर्गीकरण नहीं किया गया है और न ही उन्हें क्रमबद्ध रखा गया है। इस घोषणा में अपेक्षाकृत कम महत्त्व वाले विषयों को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आर्थिक व सामाजिक प्रश्नों के साथ जोड़ दिया गया है। इसमें आधुनिकता का प्राचीनता के साथ बेमेल मिश्रण किया गया है। इसमें तर्कसंगत और वैज्ञानिक व्यवस्थाओं को भावनापूर्ण और द्वेषपूर्ण समस्याओं के साथ जोड़ा गया है।”

8. वे अस्पष्ट व दोहराए गए हैं (They are Vague and Repetitive):
ये सिद्धान्त अस्पष्ट व अनिश्चित हैं। इन्हें बार-बार दोहराया गया है। ये सिद्धान्त संविधान की प्रस्तावना में निहित हैं। डॉ० श्रीनिवासन के अनुसार, “इन्हें उत्साहपूर्ण नहीं कहा जा सकता। ये अस्पष्ट व दोहराए गए सिद्धान्त हैं।” ।

9. ये कोरे वायदे हैं (They are Unused Promises):
आलोचकों का कहना है कि निदेशक सिद्धान्त जनता को धोखा देने का साधन मात्र हैं। ये कोरे आश्वासन हैं जिनसे जनसाधारण को सन्तुष्ट रखने का प्रयास किया गया है। इनके द्वारा भोली-भाली जनता को झुठलाने की कोशिश की गई है।

10. इनमें राजनीतिक दार्शनिकता अधिक है व व्यावहारिक राजनीति कम (They are more a Political Philoso phy than a Practical Politics) ये सिद्धान्त शुद्ध आदर्शवाद प्रस्तुत करते हैं। इनका व्यावहारिक राजनीति से बहुत कम सम्बन्ध है।

प्रश्न 12.
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों की उपयोगिता तथा महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों की उपयोगिता तथा महत्त्व (Utility and Importance of Directive Principles of State Policy)-राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों की काफी आलोचना हुई है और बहुत-से लोगों ने इन्हें केवल नव वर्ष की शुभ कामनाएँ मात्र कहा है, क्योंकि इन्हें लागू करवाने के लिए न्यायालय का द्वार नहीं खटखटाया जा सकता।

ये सरकार की इच्छा पर निर्भर करते हैं, परन्तु इनकी उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। निदेशक सिद्धान्तों में निहित सामाजिक व आर्थिक लोकतन्त्र के उद्देश्यों को प्राप्त किए बिना भारत में लोकतन्त्र सफल हो ही नहीं सकता। निदेशक सिद्धान्तों की उपयोगिता निम्नलिखित बातों से स्पष्ट होती है

1. ये मौलिक अधिकारों के पूरक हैं (These are Supplement of the Fundamental Rights):
मौलिक अधिकार देश में केवल राजनीतिक लोकतन्त्र (Political Democracy) को स्थापित करते हैं, परन्तु राजनीतिक लोकतन्त्र की सफलता के लिए देश में आर्थिक लोकतन्त्र की व्यवस्था करनी आवश्यक है। आर्थिक लोकतन्त्र के बिना राजनीतिक लोकतन्त्र अधूरा रह जाता है। राजनीतिक लोकतन्त्र में लोगों को राजनीतिक स्वतन्त्रताएँ तो प्राप्त होती हैं, परन्तु उन्हें आर्थिक चिन्ताओं से छुटकारा नहीं मिल पाता।

उन्हें वे सुविधाएँ प्राप्त नहीं होतीं, जिनसे उनका जीवन-स्तर ऊपर उठ सके और वे आर्थिक दृष्टि से समृद्ध हो सकें। निदेशक सिद्धान्त भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की कमी को दूर करते हैं और उन तत्त्वों को अपनाने के लिए कहते हैं जिन पर चलते हुए इस देश में राजनीतिक लोकतन्त्र के साथ-साथ आर्थिक लोकतन्त्र की भी स्थापना की जा सके।

2. ये सरकारों के लिए निर्देश हैं (They are Directives to Governments):
ये सिद्धान्त केन्द्रीय, राज्य व स्थानीय सरकारों का मागदर्शन करते हैं और उन्हें बतलाते हैं कि संविधान में निश्चित किए गए उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उन्हें क्या-क्या कार्य करने हैं। इन सिद्धान्तों की तुलना 1935 के अधिनियम के अन्तर्गत गवर्नर जनरल व गवर्नरों को जारी किए गए उन निर्देश-पत्रों से की जा सकती है जिनमें उन्हें अपनी शक्तियों का प्रयोग करने के बारे में निर्देश दिए जाते थे।

अन्तर केवल इतना है कि इन निर्देश-पत्रों में निर्देश विधानपालिका व कार्यपालिका दोनों को दिए गए हैं, जबकि नीति निदेशक सिद्धान्तों के अन्तर्गत निर्देश केवल कार्यपालिका को ही दिए जाते हैं। श्री एम०सी० सीतलवाद (M.C. Setalvad) के अनुसार, “वे संघ में समस्त अधिकारी वर्ग को दिए गए निर्देश-पत्र या सामान्य सिफारिशों के समान प्रतीत होते हैं जो उन्हें उन आधारभूत सिद्धान्तों की याद दिलाते हैं जिनके आधार पर संविधान का उद्देश्य नई सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना है।”

3. ये राज्य के सकारात्मक दायित्व हैं (They are Positive Obligations of State):
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त राज्य की सकारात्मक ज़िम्मेदारियाँ बतलाते हैं। ग्रेनविल ऑस्टिन (Granville Austin) के शब्दों में, “राज्य के सकारात्मक दायित्व निश्चित करते हुए संविधान सभा के सदस्यों ने भारत की भावी सरकारों को यह ज़िम्मेदारी सौंपी कि वे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और सार्वजनिक भलाई के बीच तथा कुछ व्यक्तियों की सम्पत्ति व विशेषाधिकार और सभी लोगों को लाभ पहुँचाने के बीच का मार्ग निकालें, ताकि सभी लोगों की शक्तियों को समान रूप से सभी लोगों की भलाई के लिए प्रयोग किया जा सके।”

4. ये सामाजिक क्रांति का आधार हैं (These are basis of Social Revolution):
राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त नई सामाजिक दशा के सूचक हैं। वे सामाजिक क्रांति का आधार हैं। ग्रेनविल ऑस्टिन (Granville Austin) के अनुसार, “निदेशक सिद्धान्तों में सामाजिक क्रांति का स्पष्ट विवरण मिलता है। वे भारतीय जनता को सकारात्मक अर्थ में स्वतन्त्र करते हैं। वे उन्हें समाज और प्रकृति द्वारा उत्पन्न की गई शताब्दियों की निष्क्रियता से मुक्ति दिलाते हैं। वे उन्हें उन घृणित शारीरिक परिस्थितियों से मुक्त कराते हैं जिन्होंने उन्हें अपने जीवन का सर्वोत्तम विकास करने से रोके रखा था।”

5. इन सिद्धान्तों के पीछे जनमत की शक्ति है (These Principles are backed by Public Opinion):
ये सिद्धान्त न्याय-संगत नहीं हैं, परन्तु इनके पीछे लोकमत की शक्ति है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, कोई भी सरकार लोकमत की अवहेलना नहीं कर सकती। यदि वह ऐसा करेगी तो वह लोगों का विश्वास खो बैठेगी और अगले आम चुनाव में उसकी हार अवश्य होगी।

प्रो० पायली के अनुसार, “ये निर्देश राष्ट्र की आत्मा का आधारभूत स्तर हैं तथा जो इनका उल्लंघन करेंगे, वे अपने आप को जिम्मेदार स्थान (Position of Responsibility) से हटाने का खतरा मोल लेंगे जिसके लिए उन्हें चुना गया है।”

6. ये सरकार की नीतियों में स्थिरता बनाए रखते हैं (These maintain stability in the Policies of Govt.):
संसदीय शासन-प्रणाली में सरकारें बदलती रहती हैं, परन्तु जो भी सरकार सत्तारूढ़ होगी, वह इन सिद्धान्तों पर चलने के लिए बाध्य होगी। इस प्रकार सरकार की मूल नीतियों में निरन्तरता व स्थिरता बनी रहेगी।

7. ये सिद्धान्त शैक्षणिक महत्त्व रखते हैं (These Principles have an Educative Value):
ये सिद्धान्त आने वाली पीढ़ियों के नवयुवकों को इस बात की शिक्षा देंगे कि हमारे संविधान-निर्माता देश में किस प्रकार की सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहते थे तथा इस बारे में क्या कछ किया जा चका है और क्या कछ करना बाकी है। प्रो० एम०वी० पायली (Prof. M.V. Pylee) के अनुसार, “वे भविष्य के नवयुवकों के मन व विचारों में स्थिर व गतिशील राजनीतिक व्यवस्था के मूल तत्त्वों को स्थान देंगे।” .

8. कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सहायक (Helpful for Establishment of a Welfare State):
आज कल्याणकारी राज्य का युग है और इन सिद्धान्तों में ही कल्याणकारी राज्य के आदर्शों की घोषणा की गई है। इन्हें लागू करके ही भारत को एक वास्तविक कल्याणकारी राज्य बनाया जा सकता है। न्यायमूर्ति संपू (Justice Sapru) ने कहा है कि राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों में वे सभी बातें विद्यमान हैं जिनके आधार पर किसी भी आधुनिक जाति में कल्याणकारी राज्य की स्थापना की. जा सकती है।

9. आर्थिक लोकतन्त्र हेत (For Economic Democracy):
आर्थिक लोकतन्त्र के अभाव में राजनीतिक लोकतन्त्र अर्थहीन है। आर्थिक लोकतन्त्र को निदेशक तत्त्वों के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। डॉ० अम्बेडकर के शब्दों में, “प्रत्येक सरकार आर्थिक प्रजातन्त्र की स्थापना के लिए प्रयास करेगी। इसी उद्देश्य से संविधान के चौथे भाग में कुछ सिद्धान्तों का उल्लेख किया गया है।”

10. संविधान का पालन (Enforcement of Constitution):
संविधान का पालन निदेशक तत्त्वों के पालन में ही हेत है। डॉ० अल्लादि कृष्णास्वामी का कथन है, “यदि राज्य इन आदर्शों की उपेक्षा करता है तो व्यावहारिक रूप से यह स्वयं संविधान की उपेक्षा करने के समान होगा।”

11. न्यायपालिका के लिए मार्गदर्शक (Guide for Judiciary):
भारतीय न्यायपालिका ही कानूनों तथा संविधानों की व्यवस्था का अधिकार रखती है। बेशक ये सिद्धान्त न्यायालयों के माध्यम से लागू नहीं करवाए जा सकते, परन्तु इन्होंने कानूनों तथा संविधान की व्याख्या में न्यायपालिका का मार्गदर्शन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णयों में इनका उल्लेख भी कर दिया है।

12. सरकार की नीति में निरन्तरता तथा स्थिरता (Continuity and Stability in Policies of the Government):
वैसे तो जब भी सत्ता में परिवर्तन होता है और दूसरे दल के हाथ में सत्ता आती है तो वह अपनी नीति निश्चित करता है, परन्तु इन सिद्धान्तों के कारण सरकार की नीति में निरन्तरता काफी मात्रा में बनी रहती है और उसे स्थिरता मिलती है क्योंकि प्रत्येक दल जन-कल्याण की नीति अवश्य अपनाता है और ऐसा करते समय उसे इनका सहारा लेना ही पड़ता है।

13. शासकीय कार्यों के मूल्याँकन हेतु मापदण्ड (Measurement for Evaluation of Government’s Functions):
नीति-निदेशक तत्त्व जनता को शासकीय कार्यों के मूल्यांकन के लिए मापदण्ड प्रदान करते हैं जिनके आधार पर जनता शासकीय कार्यों का मूल्यांकन कर सकती है। डॉ० अम्बेडकर के शब्दों में, “यदि कोई सरकार इनकी अवहेलना करती है तो उसे निर्वाचन के समय निर्वाचकों को निश्चित रूप से जवाब देना होगा।”

निष्कर्ष (Conclusion)-निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि भारतीय संविधान में लिखित उद्देश्यों-लोक-कल्याण, लोकतन्त्र, सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय, व्यक्ति की गरिमा इत्यादि को नीति-निदेशक तत्त्वों को लागू करके ही प्राप्त किया जा सकता है। वाद-योग्य न होने से इनका महत्त्व कम नहीं हो जाता।

वर्तमान में तो न्यायपालिका भी अपने निर्णय इन सिद्धान्तों के आधार पर देने लगी है। इन्हें उसी प्रकार से भारतीय जनता का समर्थन प्राप्त है, जिस प्रकार इंग्लैण्ड में प्रथाओं को प्राप्त है। भारत का भविष्य इन निदेशक सिद्धान्तों पर ही निर्भर है। एम०सी० छागला (M.C. Chagla) के अनुसार, “यदि इन सिद्धान्तों को ठीक प्रकार से अपनाया जाए तो हमारा देश वास्तव में धरती पर स्वर्ग बन जाएगा।

भारतीयों के लिए लोकतन्त्र तब केवल राजनीतिक अर्थ में ही नहीं होगा, बल्कि यह भारत के नागरिकों के कल्याण के लिए बना एक ऐसा कल्याणकारी राज्य होगा जिसमें कि प्रत्येक व्यक्ति को कार्य करने के लिए शिक्षा प्राप्त करने और अपने श्रम का उचित प्रतिफल पाने का समान अवसर प्राप्त होगा।”

वस्तु निष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. मौलिक अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है-
(A) राष्ट्रपति के द्वारा
(B) संसद के द्वारा
(C) विधानमंडलों के द्वारा
(D) प्रधानमंत्री के द्वारा
उत्तर:
(B) संसद के द्वारा

2. संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की व्यवस्था है
(A) अनुच्छेद 14 से 18 के अंतर्गत
(B) अनुच्छेद 19 से 22 के अंतर्गत
(C) अनुच्छेद 23 से 25 के अंतर्गत
(D) अनुच्छेद 25 से 28 के अंतर्गत
उत्तर:
(D) अनुच्छेद 25 से 28 के अंतर्गत

3. कौन-से संवैधानिक संशोधन द्वारा मौलिक कर्त्तव्य संविधान में अंकित किए गए हैं
(A) 42वें संशोधन द्वारा
(B) 44वें संशोधन द्वारा
(C) 45वें संशोधन द्वारा
(D) 47वें संशोधन द्वारा
उत्तर:
(A) 42वें संशोधन द्वारा

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

4. संविधान के कौन-से भाग में मौलिक कर्त्तव्य अंकित हैं
(A) भाग तृतीय में
(B) भाग चतुर्थ में
(C) भाग चतुर्थ-ए में
(D) भाग पांचवें में
उत्तर:
(C) भाग चतुर्थ-ए में

5. भारतीय नागरिकों को 6 प्रकार के मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं
(A) अनुच्छेद 14 से 31
(B) अनुच्छेद 12 से 35
(C) अनुच्छेद 12 से 35
(D) अनुच्छेद 1 से 32
उत्तर:
(C) अनुच्छेद 12 से 35

6. ‘समानता का अधिकार’ (Right to Equality) में सम्मिलित नहीं है
(A) कानून के समक्ष समानता
(B) अवसर की समानता
(C) सामाजिक समानता
(D) आर्थिक समानता
उत्तर:
(D) आर्थिक समानता

7. कौन-से अनुच्छेद द्वारा संसद को मौलिक अधिकारों को सीमित करने की मनाही की गई है?
(A) अनुच्छेद 13 द्वारा
(B) अनुच्छेद 33 द्वारा
(C) अनुच्छेद 35 द्वारा
(D) अनुच्छेद 18 द्वारा
उत्तर:
(A) अनुच्छेद 13 द्वारा

8. निम्नलिखित आदेशों में से कौन-सा आदेश न्यायालय द्वारा गैर-कानूनी ढंग से नजरबन्द किए गए व्यक्ति को छोड़ने के लिए दिया जाता है?
(A) बंदी प्रत्यक्षीकरण
(B) परमादेश
(C) उत्प्रेषण लेख
(D) अधिकार पृच्छा
उत्तर:
(A) बंदी प्रत्यक्षीकरण

9. ‘समानता के अधिकार’ (Right to Equality) की व्यवस्था है
(A) अनुच्छेद 14 से 18 के अंतर्गत
(B) अनुच्छेद 19 से 22 के अंतर्गत
(C) अनुच्छेद 25 से 28 के अंतर्गत
(D) अनुच्छेद 29 से 32 के अंतर्गत
उत्तर:
(A) अनुच्छेद 14 से 18 के अंतर्गत

10. मौलिक अधिकारों वाले अध्याय में स्पष्ट वर्णन नहीं है
(A) विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता का
(B) धार्मिक स्वतंत्रता का
(C) कानून के समक्ष समानता का
(D) प्रेस की स्वतंत्रता का
उत्तर:
(D) प्रेस की स्वतंत्रता का

11. सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधी अधिकारों की भारतीय संविधान में व्यवस्था है
(A) अनुच्छेद 31 व 32 के अंतर्गत.
(B) अनुच्छेद 23 व 24 के अंतर्गत
(C) अनुच्छेद 29 व 30 के अंतर्गत
(D) अनुच्छेद 33 व 34 के अंतर्गत
उत्तर:
(C) अनुच्छेद 29 व 30 के अंतर्गत

12. ‘स्वतंत्रता के अधिकार’ (Right to Freedom) में सम्मिलित नहीं है
(A) भाषण देने और विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता
(B) समुदाय बनाने की स्वतंत्रता
(C) कोई कारोबार करने की स्वतंत्रता
(D) हथियारों सहित एकत्र होने और सभा करने की स्वतंत्रता
उत्तर:
(D) हथियारों सहित एकत्र होने और सभा करने की स्वतंत्रता

13. निम्नलिखित में से कौन-सा मौलिक कर्त्तव्य नहीं है?
(A) संविधान का पालन करना
(B) भारत की प्रभुसत्ता, एकता और अखंडता का समर्थन व रक्षा करना
(C) सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना
(D) माता-पिता की सेवा करना
उत्तर:
(D) माता-पिता की सेवा करना

14. निम्नलिखित में से किस आदेश के द्वारा किसी व्यक्ति को उस कार्रवाई को करने से रोक दिया जाता है जिसके लिए वह कानूनी रूप से उपयुक्त नहीं है?
(A) परमादेश
(B) प्रतिषेध
(C) उत्प्रेषण
(D) अधिकार पृच्छा
उत्तर:
(D) अधिकार पृच्छा

15. किसके सुझावानुसार निदेशक सिद्धांत संविधान में अंकित किए गए थे?
(A) डॉ० बी०आर० अंबेडकर
(B) डॉ० राजेंद्र प्रसाद
(C) पं० जवाहरलाल नेहरू
(D) सर वी०एन० राव
उत्तर:
(D) सर वी०एन० राव

16. यह किसने कहा था कि “राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांत एक चैक की तरह हैं जिसका भुगतान बैंक की सुविधा पर छोड़ दिया है।”
(A) केन्टी० शाह ने
(B) नसीरुद्दीन ने
(C) डॉ० राजेंद्र प्रसाद ने
(D) श्रीमती इंदिरा गांधी ने
उत्तर:
(A) के०टी० शाह ने

17. संविधान में निदेशक सिद्धांत अंकित करने की प्रेरणा मिली थी
(A) 1935 के भारत सरकार कानून से
(B) ऑस्ट्रेलिया के संविधान से
(C) आयरलैंड के संविधान से
(D) अमेरिका के संविधान से
उत्तर:
(C) आयरलैंड के संविधान से

18. निम्नलिखित में से नीति-निदेशक सिद्धांतों का उद्देश्य कौन-सा है?
(A) पुलिस-राज्य की स्थापना करना
(B) सामाजिक तथा आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना
(C) राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना करना
(D) समाजवादी राज्य की स्थापना करना
उत्तर:
(B) सामाजिक तथा आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना

19. निम्नलिखित निदेशक सिद्धांतों में से कौन-सा उदारवादी है?
(A) काम देने का अधिकार
(B) विश्व-शांति एवं सुरक्षा
(C) समान व्यवहार संहिता
(D) धन केंद्रीकरण पर रोक
उत्तर:
(C) समान व्यवहार संहिता

20. निम्नलिखित निदेशक सिद्धांत सरकार द्वारा अभी तक लागू नहीं किया गया है
(A) पुरुषों तथा स्त्रियों के लिए समान
(B) ग्राम पंचायतों की स्थापना करना कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था
(C) शराब-बंदी लागू करना
(D) कृषि तथा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए प्रयत्न करना
उत्तर:
(C) शराब-बंदी लागू करना

21. निम्नलिखित में से किसने नीति-निदेशक सिद्धांतों को संविधान की अनोखी विशेषता कहा है?
(A) श्री वी०एन० राय ने
(B) पंडित जवाहरलाल नेहरू ने
(C) डॉ० बी० आर० अंबेडकर ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) डॉ० बी० आर० अंबेडकर ने

22. कौन-से निदेशक सिद्धांतों में भारतीय विदेश नीति के कुछ मूल आधार मिलते हैं?
(A) अनुच्छेद 36 में अंकित निदेशक सिद्धांत में
(B) अनुच्छेद 48 में अंकित निदेशक सिद्धांत में
(C) अनुच्छेद 51 में अंकित निदेशक सिद्धांत में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(C) अनुच्छेद 51 में अंकित निदेशक सिद्धांत में

23. “निदेशक सिद्धांतों का कोई महत्त्व नहीं है” यह कथन है
(A) डॉ० बी०आर० अंबेडकर
(B) जैनिंग्स
(C) डॉ० श्रीनिवासन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(D) इनमें से कोई नहीं ।

24. निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धांत गांधीवादी सिद्धांत है ?
(A) ग्राम पंचायतों और स्वशासन की समाप्ति
(B) स्त्री तथा पुरुषों को समान कार्य के लिए समान वेतन
(C) देश के सभी नागरिकों के लिए आचार संहिता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) ग्राम पंचायतों और स्वशासन की समाप्ति

25. “राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांत नौ वर्षों के प्रस्तावों का संग्रह है।” यह कथन किस विद्वान् का है?
(A) के०सी० ह्वीयर का
(B) नसीरुद्दीन
(C) डॉ० अंबेडकर का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) नसीरुद्दीन

26. निदेशक सिद्धांतों की आलोचना के संबंध में निम्नलिखित ठीक है
(A) अनिश्चित तथा अस्पष्ट
(B) वैधानिक शक्ति का अभाव
(C) पर्याप्त साधनों का अभाव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

27. निम्नलिखित निदेशक सिद्धांतों में एक अंतर्राष्ट्रीयवाद संबंधी सिद्धांत है
(A) विश्व-शांति एवं सुरक्षा
(B) ग्राम पंचायतों का संगठन
(C) समान व्यवहार संहिता
(D) समान कार्य, समान वेतन
उत्तर:
(A) विश्व-शांति एवं सुरक्षा

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक वाक्य या एक शब्द में दीजिए-

1. भारतीय संविधान के कौन-से भाग या अध्याय में मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई है?
उत्तर:
अध्याय तीन में।

2. मूल अधिकारों का उल्लेख संविधान के किन अनुच्छेदों में किया गया है?
उत्तर:
अनुच्छेद 12 से 35 तक।

3. भारतीय संविधान के किन अनुच्छेदों में ‘स्वतंत्रता के अधिकार’ का उल्लेख है?
उत्तर:
अनुच्छेद 19 से 22 तक।

4. भारतीय संविधान में वर्णित संवैधानिक उपचारों के अधिकार का उल्लेख कौन-से अनुच्छेद में किया गया है?
उत्तर:
अनुच्छेद 32 में।

5. भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
अक्तूबर, 1993 में।

6. कौन-से सवैधानिक संशोधन के द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से निकाला गया?
उत्तर:
44वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा।

7. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वर्तमान अध्यक्ष कौन हैं?
उत्तर:
पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री एच०एल० दत्तू।

8. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वर्तमान महासचिव कौन हैं?
उत्तर:
श्री जयदीप गोविंद।

9. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का कार्यकाल कितना है?
उत्तर:
5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु जो भी पहले पूर्ण हो।

10. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष या सदस्य अपना त्यागपत्र किसे सौंपते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रपति को।

11. राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों का उल्लेख संविधान के कौन-से अध्याय में किया गया है?
उत्तर:
अध्याय IV में।

रिक्त स्थान भरें

1. भारतीय संविधान के अध्याय ………… में मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है।
उत्तर:
III

2. भारतीय संविधान का अध्याय …………. राज्य नीति के निर्देशक सिद्धान्तों से सम्बन्धित है।
उत्तर:
IV

3. भारतीय संविधान में राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्त ………….. के संविधान से प्रेरित होकर सम्माहित किए गए है।
उत्तर:
आयरलैण्ड

4. वर्तमान में ………….. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष हैं।
उत्तर:
श्री एच०एल० दत्तू

5. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का कार्यकाल ……………. या अधिकतर ……………. तक की आयु तक है।
उत्तर:
5 वर्ष, 70 वर्ष

6. वर्तमान में संविधान में अंकित मौलिक कर्त्तव्यों की संख्या …………. है।
उत्तर:
11

7. भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन ………….. में हुआ।
उत्तर:
1993

8. दक्षिण अफ्रीका का संविधान सन् …………. में लागू हुआ।
उत्तर:
1996

9. भारत में शिक्षा के मूल अधिकार के रूप में …………. संवैधानिक संशोधन द्वारा संवैधानिक रूप दिया गया।
उत्तर:
86वें

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10. संविधान के भाग ……………. में मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया।
उत्तर:
IV क (अनुच्छेद 51क)

11. वर्तमान में ……….. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के महासचिव हैं।
उत्तर:
जयदीप गोविंद

12. …………. ने सवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान की आत्मा एवं हृदय कहा है।
उत्तर:
डॉ० बी.आर. अम्बेडकर

13. भारतीय संविधान का अनुच्छेद ………….. किसी भी रूप में अस्पृश्यता का निषेध करता है।
उत्तर:
अनुच्छेद 17

14. भारतीय संविधान का अनुच्छेद ………… सामाजिक, शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों हेतु आरक्षण का प्रावधान करता है।
उत्तर:
अनुच्छेद 151

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HBSE 11th Class Political Science भारतीय संविधान में अधिकार Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि वह सही है या गलत
(क) अधिकार-पत्र में किसी देश की जनता को हासिल अधिकारों का वर्णन रहता है।
(ख) अधिकार-पत्र व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
(ग) विश्व के हर देश में अधिकार-पत्र होता है।
उत्तर:
(क) सही,
(ख) सही,
(ग) गलत।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन मौलिक अधिकारों का सबसे सटीक वर्णन है?
(क) किसी व्यक्ति को प्राप्त समस्त अधिकार
(ख) कानून द्वारा नागरिकों को प्रदत्त समस्त अधिकार
(ग) संविधान द्वारा प्रदत्त और सुरक्षित समस्त अधिकार
(घ) संविधान द्वारा प्रदत्त वे अधिकार जिन पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
उत्तर:
(क) किसी व्यक्ति को प्राप्त समस्त अधिकार।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित स्थितियों को पढ़ें। प्रत्येक स्थिति के बारे में बताएँ कि किस मौलिक अधिकार का उपयोग या उल्लंघन हो रहा है और कैसे?
(क) राष्ट्रीय एयरलाइन के चालक-परिचालक दल (Cabin-Crew) के ऐसे पुरुषों को जिनका वजन ज्यादा है-नौकरी में तरक्की दी गई लेकिन उनकी ऐसी महिला सहकर्मियों को, दंडित किया गया जिनका वजन बढ़ गया था।

(ख) एक निर्देशक एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाता है जिसमें सरकारी नीतियों की आलोचना है।

(ग) एक बड़े बाँध के कारण विस्थापित हुए लोग अपने पुनर्वास की माँग करते हुए रैली निकालते हैं।

(घ) आंध्र-सोसायटी आंध्र प्रदेश के बाहर तेलुगु माध्यम के विद्यालय चलाती है।
उत्तर:
(क) राष्ट्रीय एयरलाइन के चालक-परिचालक दल (Cabin-Crew) के ऐसे पुरुषों को जिनका वजन ज्यादा है नौकरी में तरक्की दी गई लेकिन उनकी ऐसी महिला सहकर्मियों को, दंडित किया गया जिनका वजन बढ़ गया था। इस स्थिति में महिला सहकर्मियों के समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 14 के द्वारा सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता तथा कानून के समक्ष समान संरक्षण प्रदान किया गया है।

इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 15 (1) में इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि राज्य किसी नागरिक के धर्म, लिंग, मूलवंश, जाति, जन्म-स्थान या इनमें किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। अनुच्छेद 16 के अन्तर्गत सभी को अवसर की समानता का अधिकार प्रदान किया गया है तथा राज्य के अधीन किसी पद के सम्बन्ध में किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। उपर्युक्त घटना में महिला कर्मियों के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव किया गया है और उन्हें पदोन्नति से वंचित किया गया। इस प्रकार इनके संविधान द्वारा दिए गए समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है।

(ख) एक निर्देशक एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाता है और इसके माध्यम से वह सरकार की नीतियों की आलोचना करता है। उक्त घटना में एक निर्देशक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के अन्तर्गत दिए गए विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करता है। स्पष्ट है कि इस अधिकार के अन्तर्गत भारत के सभी नागरिकों को अपने विचारों को प्रकट प्रकाशित, प्रचारित एवं आलोचना करने का पूर्ण अधिकार है। अतः उक्त स्थिति में निर्देशक द्वारा मूल अधिकारों का सही उपयोग किया जा रहा है।

(ग) इस घटना में एक बड़े बाँध के कारण विस्थापित हुए लोग अपने पुनर्वास की माँग करते हुए रैली निकालते हैं। स्पष्ट है कि यहाँ पर विस्थापितों द्वारा संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ख) के अन्तर्गत प्रत्याभूत शांतिपूर्ण एवं निरस्र सम्मेलन की स्वतंत्रता का उपयोग किया गया है। अतः विस्थापितों की रैली मूल अधिकारों के अधीन है।

(घ) आंध्र-सोसायटी द्वारा आंध्र प्रदेश के बाहर तेलुगु माध्यम से विद्यालय के चलाए जाने की घटना में अनुच्छेद 30 (1) द्वारा दिए गए मौलिक अधिकार का उपयोग किया गया है। यहाँ यह स्पष्ट है कि इस अनुच्छेद द्वारा धर्म या भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा संस्था का गठन करने तथा उनके प्रबन्ध एवं प्रशासन का अधिकार प्राप्त है। अतः आंध्र-सोसायटी द्वारा विद्यालय का संचालन मूल अधिकारों का उपयोग है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में कौन सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की सही व्याख्या है?
(क) शैक्षिक संस्था खोलने वाले अल्पसंख्यक वर्ग के ही बच्चे इस संस्थान में पढ़ाई कर सकते हैं।

(ख) सरकारी विद्यालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अल्पसंख्यक-वर्ग के बच्चों को उनकी संस्कृति और धर्म-विश्वासों से परिचित कराया जाए।

(ग) भाषाई और धार्मिक-अल्पसंख्यक अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोल सकते हैं और उनके लिए इन विद्यालयों को आरक्षित कर सकते हैं।

(घ) भाषाई और धार्मिक-अल्पसंख्यक यह माँग कर सकते हैं कि उनके बच्चे उनके द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थाओं के अतिरिक्त किसी अन्य संस्थान में नहीं पढेंगे।
उत्तर:
(क) उपर्युक्त कथनों में से

(ग) में दिया गया कथन सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की सही व्याख्या करता है, क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 29 (1) अल्पसंख्यक वर्गों के हितों के संरक्षण हेतु उन्हें अपनी विशेष भाषा लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार प्रदान करता है एवं अनुच्छेद 30 (1) के अनुसार अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी भाषा, लिपि एवं संस्कृति के विकास के लिए शिक्षण संस्थाओं का गठन और प्रशासन का अधिकार देता है। ऐसी शिक्षण संस्थाओं को सरकार द्वारा आर्थिक सहायता देते समय किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।

प्रश्न 5.
इनमें कौन-मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और क्यों?
(क) न्यूनतम देय मजदूरी नहीं देना।
(ख) किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाना।
(ग) 9 बजे रात के बाद लाऊड-स्पीकर बजाने पर रोक लगाना।
(घ) भाषण तैयार करना।
उत्तर:
(क) न्यूनतम मज़दूरी न देना ‘शोषण के विरुद्ध अधिकार’ का उल्लंघन है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 23 द्वारा मानव के दुर्व्यापार और बेगार तथा इस प्रकार का अन्य जबरदस्ती लिया जाने वाला श्रम प्रतिबंधित किया गया है। इसका उद्देश्य दुराचारी व्यक्तियों तथा राज्य द्वारा समाज के दुर्बल वर्गों के शोषण की रक्षा करना है।

(ख) इस घटना में मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हो रहा है। यद्यपि किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाए जाने से उस व्यक्ति के विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन तो होता है, परंतु संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के अनुसार यदि इससे किसी वर्ग या समुदाय-विशेष की भावनाएँ आहत होती हैं या राष्ट्र विरोधी विचार हैं तो सदाचार, शिष्टाचार एवं देशहित के दृष्टिकोण से उन पर प्रतिबंध लगाया जाना कानून के अनुसार सही है।

(ग) उक्त घटना से भी मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं हो रहा है क्योंकि रात 9 बजे के बाद लाऊड-स्पीकर पर प्रतिबंध लगाने में भी समाज के व्यापक हितों को ध्यान में रखा जा रहा है। हमें किसी भी कार्य द्वारा दूसरों की स्वतंत्रता में बाधा पहुँचाने का अधिकार नहीं है।

(घ) किसी नागरिक द्वारा भाषण तैयार करना किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है क्योंकि नागरिकों को अपने विचार अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है।

प्रश्न 6.
गरीबों के बीच काम कर रहे एक कार्यकर्ता का कहना है कि गरीबों को मौलिक अधिकारों की ज़रूरत नहीं है। उनके लिए जरूरी यह है कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बना दिया जाए। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।
उत्तर:
जैसा कि हम जानते हैं कि मौलिक अधिकारों द्वारा जहाँ एक ओर राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना का प्रयास किया गया है, वहीं नीति-निर्देशक तत्त्वों द्वारा आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना का प्रयास किया गया है। यद्यपि दोनों का उद्देश्य जनकल्याण एवं न्याय की स्थापना करना है। इसके अतिरिक्त मौलिक अधिकारों के पीछे कानून की शक्ति है, जबकि नीति-निर्देशक सिद्धांतों के पीछे कानून की शक्ति न होकर केवल जनमत एवं नैतिक शक्ति है।

चूँकि नीति-निर्देशक सिद्धांतों में समाज के व्यापक हित एवं जनकल्याण का उद्देश्य निहित है। ऐसी स्थिति में इन्हें कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाकर इन लक्ष्यों की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सकती है। अत: इनके प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा राज्य के गरीब लोगों संबंधी आदर्शों एवं लक्ष्यों को प्राप्त करना अधिक सरल होगा।

प्रश्न 7.
अनेक रिपोर्टों से पता चलता है कि जो जातियाँ पहले झाडू देने के काम में लगी थीं उन्हें अब भी मज़बूरन यही काम करना पड़ रहा है। जो लोग अधिकार-पद पर बैठे हैं वे इन्हें कोई और काम नहीं देते। इनके बच्चों को पढ़ाई-लिखाई करने पर हतोत्साहित किया जाता है। इस उदाहरण में किस मौलिक-अधिकार का उल्लंघन हो रहा है?
उत्तर:
उपर्युक्त घटना के सन्दर्भ में वर्णित जातियों के कई मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, जिन्हें हम इस प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं

1. समानता का अधिकार-उक्त स्थिति में इनके समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है, क्योंकि अधिकार-पद पर बैठे लोग उन्हें कोई और काम नहीं देते हैं। अनुच्छेद 14 के अनुसार भारत के राज्य क्षेत्र में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति कानून के समक्ष समान है। अनुच्छेद 15 के अनुसार किसी भी नागरिक के विरुद्ध धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव निषिद्ध है।

2. स्वतंत्रता का अधिकार-उक्त घटना में इन जातियों को विवश होकर वही कार्य करना पड़ रहा है, क्योंकि वे इसी व्यवसाय को अपनाने के लिए बाध्य हैं। ऐसी स्थिति में उनकी स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार सभी नागरिकों को अपनी इच्छानुसार वृत्ति, व्यवसाय, व्यापार, आजीविका की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। अतः उपर्युक्त घटना के अन्तर्गत उन जातियों के स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है।

3. संस्कृति और शिक्षा का अधिकार-इस घटना में बच्चों को पढ़ाई-लिखाई करने से हतोत्साहित किया जाता है जो संविधान में दिए गए उनके सांस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार का उल्लंघन है। यहाँ यह स्पष्ट है कि संविधान के अनुच्छेद 29 (2) के अनुसार किसी भी व्यक्ति को केवल धर्म, मूलवंश, लिंग, जाति, भाषा के आधार पर राज्य द्वारा घोषित या राज्य विधि से सहायता प्राप्त किसी शिक्षा संस्थान में प्रवेश से वंचित या भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
एक मानवाधिकार-समूह ने अपनी याचिका में अदालत का ध्यान देश में मौजूद भूखमरी की स्थिति की तरफ खींचा। भारतीय खाद्य-निगम के गोदामों में 5 करोड़ टन से ज्यादा अनाज भरा हुआ था।शोध से पता चलता है कि अधिकांश राशन-कार्डधारी यह नहीं जानते कि उचित-मूल्य की दुकानों से कितनी मात्रा में वे अनाज खरीद सकते हैं। मानवाधिकार समूह ने अपनी याचिका में अदालत से निवेदन किया कि वह सरकार को सार्वजनिक-वितरण-प्रणाली में सुधार करने का आदेश दे।
(क) इस मामले में कौन-कौन से अधिकार शामिल हैं? ये अधिकार आपस में किस तरह जुड़े हैं?
(ख) क्या ये अधिकार जीवन के अधिकार का एक अंग हैं?
उत्तर:
(क) उपर्युक्त वर्णित घटनाओं में संवैधानिक उपचार का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार एवं सूचना का अधिकार सम्मिलित हैं। मानवाधिकार समूह द्वारा अदालत में याचिका दायर करना संवैधानिक उपचार का अधिकार है। भूख से होने वाली मौत उनके जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। राशन कार्डधारी को उचित मूल्य की दुकान से मिलने वाली अनाज की मात्रा का न मालूम होना, उनके सूचना के अधिकार का उल्लंघन है।

(ख) ये सभी अधिकार अलग-अलग हैं। परंतु इस घटना में ये सभी जीवन के अधिकार के अंग के रूप में जुड़े हुए हैं।

प्रश्न 9.
इस अध्याय में उद्धत सोमनाथ लाहिड़ी द्वारा संविधान-सभा में दिए गए वक्तव्य को पढ़ें। क्या आप उनके कथन से सहमत हैं? यदि हाँ तो इसकी पुष्टि में कुछ उदाहरण दें। यदि नहीं तो उनके कथन के विरुद्ध तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर:
सोमनाथ लाहिड़ी द्वारा संविधान सभा में दिए गए वक्तव्य का विश्लेषण करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को जो भी मौलिक अधिकार दिए गए हैं, वे अपर्याप्त हैं। कई ऐसी बातों की उपेक्षा की गई है जिन्हें मूल अधिकारों में स्थान दिया जाना चाहिए था; जैसे आजीविका का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, चिकित्सा-सुविधा का अधिकार इत्यादि यद्यपि इनमें शिक्षा एवं सूचना के अधिकार को तो मौलिक अधिकारों का रूप दे दिया गया है, लेकिन चिकित्सा-सुविधा के अधिकार इत्यादि को नहीं। जबकि चिकित्सा-सुविधा का अधिकार जो व्यक्ति के जीवन के साथ जुड़ा हुआ है वहाँ राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की आधारशिला भी है।

आलोचकों की दृष्टि में इस अधिकार की उपेक्षा करना गलत है। लाहिड़ी के असंतोष का अन्य कारण यह है कि प्रत्येक मौलिक अधिकार के साथ प्रतिबंध का प्रावधान किया गया है। आलोचकों का मत है कि भारतीय संविधान एक हाथ से मौलिक अधिकार देता हैं तो दूसरे हाथ से इसे छीन लेता है। संविधान द्वारा जिस प्रकार विशेष परिस्थितियों में अलग-अलग प्रतिबंध लगाए गए हैं, उसने मौलिक अधिकारों को एक तरह से व्यर्थ बना दिया है।

सोमनाथ लाहिड़ी का यह कथन है कि-“अनेक मौलिक अधिकारों को एक सिपाही के दृष्टिकोण से बनाया गया है।” संक्षेप में सोमनाथ लाहिड़ी के वक्तव्य से सहमति व्यक्त कर सकते हैं जैसे कि विष्णु कामथ ने मौलिक अधिकारों की आलोचना करते हुए संविधान सभा में कहा था कि-“इस व्यवस्था द्वारा हम तानाशाही राज्य और पुलिस राज्य की स्थापना कर रहे हैं।”

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प्रश्न 10.
आपके अनुसार कौन-सा मौलिक अधिकार सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? इसके प्रावधानों को संक्षेप में लिखें और तर्क देकर बताएँ कि यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
भारतीय संविधान के अध्याय तीन में मौलिक अधिकारों की प्रारम्भिक संख्या 7 थी जोकि बाद में 44वें संशोधन द्वारा सन् 1978 में संपत्ति के अधिकार को समाप्त करने पर मौलिक अधिकारों की संख्या 6 रह गई। इस प्रकार वर्तमान में संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकार निम्नलिखित हैं-

  • समानता का अधिकार,
  • स्वतंत्रता का अधिकार,
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार,
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार,
  • सांस्कृतिक और शिक्षा का अधिकार,
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

यहाँ यह स्पष्ट है कि किसी भी अधिकार की उपयोगिता तथा सार्थकता तभी है जब उन्हें कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाए। इस क्रम में संवैधानिक उपचारों का अधिकार इस दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार है जो संविधान के अनुच्छेद 32 में वर्णित किया गया है। यह अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों को न्यायिक संरक्षण प्रदान करता है।

राज्य द्वारा अन्य मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में उच्चतम न्यायालय को इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानूनी कार्रवाई का अधिकार दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 32 द्वारा दिए गए संवैधानिक उपचारों के अधिकार के तहत कोई भी नागरिक अपने अधिकारों की अवहेलना होने पर न्यायालय में प्रार्थना-पत्र देकर अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है।

ऐसी स्थिति में न्यायपालिका को मूल अधिकारों की रक्षा करने के लिए पाँच प्रकार के लेख जारी करने का अधिकार है जो बंदी-प्रत्यक्षीकरण लेख, परमादेश लेख, प्रतिषेध लेख, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा लेख हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि संवैधानिक उपचार का अधिकार सबसे महत्त्वपूर्ण मौलिक अधिकार है। इसी कारण से इस अधिकार को डॉ० भीमराव अंबेडकर ने इसे संविधान की मूल आत्मा कहा है। २७ मा अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न मार कर सकता ।

भारतीय संविधान में अधिकार HBSE 11th Class Political Science Notes

→ राज्य तथा व्यक्ति के आपसी संबंधों की समस्या सदा से ही एक जटिल समस्या रही है और वर्तमान समय की लोकतंत्रीय व्यवस्था में इस समस्या ने विशेष महत्त्व प्राप्त कर लिया है।

→ यदि एक ओर शान्ति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नागरिकों के जीवन पर राज्य का नियन्त्रण आवश्यक है तो दूसरी ओर राज्य की शक्ति पर भी कुछ सीमाएँ लगाना आवश्यक है, ताकि राज्य मनमाने तरीके से कार्य करते हुए नागरिकों की स्वतंत्रता तथा अधिकारों के विरुद्ध कार्य न कर सके।

→ अधिकारों की व्यवस्था राज्य की स्वेच्छाचारी शक्ति पर प्रतिबंध लगाने का एक श्रेष्ठ उपाय है।

→ मानव इतिहास में सर्वप्रथम 1789 को फ्रांस की राष्ट्रीय सभा ने ‘मानवीय अधिकारों की घोषणा करके राजनीति विज्ञान को क्रांतिकारी सिद्धान्त दिया था।

→ तब से मानवीय अधिकारों का महत्त्व इतना अधिक बढ़ गया है कि आधुनिक युग में शायद ही कोई ऐसी लोकतान्त्रिक व्यवस्था हो जहाँ के संविधान में इन मानवीय अधिकारों को स्थान नहीं दिया गया हो। भारतीय संविधान निर्माता भी इससे वंचित नहीं रहे।

→ भारत में मौलिक अधिकारों की माँग 1895 ई० में बाल गंगाधर तिलक द्वारा की गई थी। – इसके बाद 1918 में काँग्रेस के अधिवेशन में यह माँग की गई थी कि भारतीय अधिनियम 1919 के द्वारा भारतवासियों को मौलिक अधिकार दिए जाएँ, जिसकी ओर ब्रिटिश शासन ने कोई ध्यान नहीं दिया।

→ सन 1925 में श्रीमती ऐनी बेसेण्ट ने ब्रिटिश सरकार से भारतीयों के लिए अनेक मौलिक अधिकारों की माँग की थी। सन 1928 में नेहरू समिति ने अपनी रिपोर्ट में भारतीयों के लिए ब्रिटिश शासन से अनेक मौलिक अधिकारों की माँग की थी।

→ इन अधिकारों के विषय में विचार लन्दन में हुई गोलमेज कान्फ्रेंस में हुआ। भारत सरकार अधिनियम, 1935 में कुछ अधिकारों को सीमित रूप में मान्यता दी गई।

→ 1946 में जब संविधान सभा गठित हो गई तो मौलिक अधिकारों के संबंध में, सप्रू समिति (Sapru Committee) ने अपने प्रतिवेदन में कहा था, “हमारे विचार से भारत की विशेष परिस्थितियों में यह बहुत जरूरी है कि नए संविधान में मौलिक अधिकार अवश्य शामिल किए जाएँ जिससे देश के अल्पसंख्यक वर्गों को सुरक्षा की गारण्टी देने के साथ-साथ देश के विधानमंडलों, प्रशासनिक विभागों और न्यायालयों में एक समान कार्रवाई की जा सके।”

→ फिर भी भारत के स्वतंत्र होने से पहले मौलिक अधिकार देश के नागरिकों को प्राप्त नहीं थे और भारतीय संविधान द्वारा अपने तीसरे भाग (Part III) में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई है।

→ ये अधिकार व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास के लिए बहुत जरूरी समझकर सभी नागरिकों को दिए गए हैं। अतः सर्वप्रथम यहाँ मौलिक अधिकारों का अर्थ स्पष्ट करना आवश्यक है।

→ तत्पश्चात् भारतीय संविधान में दिए मौलिक अधिकारों का वर्गीकरण एवं अध्याय चार में दिए गए राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों पर प्रकाश डालेंगे।

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HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान

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HBSE 11th Class Physical Education मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान Textbook Questions and Answers

दीच उत्तरात्मक परन (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.मनोविज्ञान के बारे में आप क्या जानते हैं? इसकी मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। अथवा मनोविज्ञान की परिभाषा देते हुए, अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मनोविज्ञान का अर्थ (Meaning of Psychology):
मनोविज्ञान (Psychology) शब्द यूनानी भाषा के दो शब्दों का मेल है। ये दो शब्द ‘साइके’ (Psyche) और ‘लोगस’ (Logos) हैं। साइके का अर्थ है-आत्मा (Soul) और लोगस (Logos) का अर्थ है-बातचीत या विज्ञान । इसलिए ‘Psychology’ का शाब्दिक अर्थ आत्मा का विज्ञान है। प्लेटो (Plato) के अनुसार, “मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।” जैसे-जैसे समय बदलता गया, इसके अर्थों में वांछित परिवर्तन आते गए। सबसे पहले मनोविज्ञान को आत्मा का ज्ञान कहा गया (Psychology is the study of soul)।

परंतु इस विचारधारा की मनोवैज्ञानिकों की ओर से आलोचना की गई। फिर मनोविज्ञान को आत्मा की बजाय मन का विज्ञान कहा जाने लगा। 19वीं शताब्दी के मध्य में मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान कहा। उनका मानना था कि चेतना भी मन का एक भाग है। कोई भी व्यक्ति अपनी मानसिक प्रक्रियाओं के बारे में जागृत हो सकता है, परंतु दूसरों के बारे में सचेत होना कोई जानकारी नहीं हो सकती। अंत में मनोविज्ञान को ‘व्यवहार का विज्ञान’ (Science of Behaviour) के रूप में स्वीकार किया गया।

मनोविज्ञान की परिभाषाएँ (Definitions of Psychology): मनोविज्ञान के बारे में विद्वानों ने समय-समय पर अनेक परिभाषाएँ दी हैं जो निम्नलिखित हैं
1. एन० एल० मुन्न (N.L. Munn) के अनुसार, “मनोविज्ञान को व्यवहार का, वैज्ञानिक खोज का अध्ययन कहा जाता है।”
2. जे०एस० रॉस (J.S. Ross) का कथन है, “मनोविज्ञान मानसिक रूप में व्यवहार और स्पष्टीकरण का उल्लेख है।”
3. रॉबर्ट एस० वुडवर्थ (Robert S. Woodworth) के अनुसार, “मनोविज्ञान व्यक्ति की व्यक्तिगत क्रियाएँ, जो पर्यावरण से जुड़ी हुई हैं, उनका अध्ययन करता है।”
4. क्रो व क्रो (Crow and Crow) के अनुसार, “मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार और इसके संबंध का विज्ञान है।”
5. वाटसन (Watson) के कथनानुसार, “मनोविज्ञान व्यवहार का सकारात्मक या यथार्थ विज्ञान है।”
6. स्किनर (Skinner) के अनुसार, “मनोविज्ञान जीवन की विविध परिस्थितियों में व्यक्ति की प्रतिक्रियाओं का . अध्ययन करता है।”
7. डब्ल्यू० बी० काल्सनिक व पील्सबरी (W.B. Kalesnik and Pillsbury) के अनुसार, “मनोविज्ञान मानव व्यवहार का विज्ञान है।”
8. आर०एच० थाउलस (R.H. Thoulous) के अनुसार, “मनोविज्ञान मानव अनुभव एवं व्यवहार का यथार्थ विज्ञान है।”

मनोविज्ञान की विशेषताएँ (Features of Psychology): मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार एवं संबंधों की प्रक्रिया है।
(2) यह व्यक्ति के व्यवहार में भिन्नता लाने में सहायक होता है।
(3) यह व्यक्ति के परिवेश के प्रति किए गए व्यवहार का क्रमिक अध्ययन है।
(4) यह मानव के व्यवहार को नियंत्रित रखने की विधि है।
(5) यह व्यक्ति के संवेगात्मक, ज्ञानात्मक एवं क्रियात्मक क्रियाओं का अध्ययन है।
(6) यह व्यक्ति के व्यवहार के विभिन्न पक्षों का विस्तृत अध्ययन है।
(7) यह व्यक्ति के आचरण एवं व्यवहार का सकारात्मक अध्ययन है।
(8) यह न केवल मानव के व्यवहार का अध्ययन है, बल्कि इसमें पशुओं के व्यवहार का भी अध्ययन किया जाता है।
(9) यह सिद्धांतों एवं प्रयोगों का संग्रह है। इसके सिद्धांतों को जीवन में अपनाया जाता है।
(10) इसमें मानवीय व्यवहार के बारे में पूर्वानुमान लगाने का प्रयास किया जाता है।
(11) इसकी विषय-वस्तु या सामग्री में प्रामाणिकता होती है।
(12) इसके प्रत्येक अध्ययन तथ्यों पर आधारित होते हैं।

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प्रश्न 2.
मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक युग में मनोविज्ञान प्रभावशाली एवं व्यावहारिक विषय के रूप में प्रकट हुआ है। अनेक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों; जैसे बिने, साइमन व फ्रायड आदि ने मानवीय व्यवहार की नवीन व्याख्या की है। आज मनोविज्ञान का स्तर निरंतर बढ़ रहा है। आज के भौतिक युग में इसकी बहुत आवश्यकता है, क्योंकि यह निम्नलिखित प्रकार से हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है
(1) मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार के प्रत्येक पक्ष का बारीकी से अध्ययन करता है; जैसे भौतिक व्यवहार, सामाजिक व्यवहार आदि।

(2) मनोविज्ञान ने हमें ऐसे नियम एवं सिद्धांत प्रदान किए हैं जो हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं।

(3) मनोविज्ञान हमारे ज्ञान एवं बुद्धि में वृद्धि करता है। इससे हमारी कल्पना-शक्ति, तर्क-शक्ति, स्मरण-शक्ति का विकास होता है, क्योंकि इसमें ज्ञानात्मक एवं तर्कात्मक क्रियाओं पर अध्ययन किया जाता है।

(4) हमें व्यावहारिक कुशलता प्राप्त करने के लिए मनोविज्ञान की बहुत आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि इसमें व्यवहार पर अध्ययन किया जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का कोई भी व्यवहार शुद्ध रूप से मनोविज्ञान पर ही आधारित होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि मनोविज्ञान हमें व्यवहार कुशल बनाता है। एक व्यवहार कुशल व्यक्ति ही सफलता प्राप्त कर
सकता है।

(5) शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। आज पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियाँ मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के अनुकूल निर्धारित की जाती हैं। अब बच्चों को दण्ड एवं भय के माध्यम से शिक्षित नहीं किया जाता। यदि बच्चा किसी विषय में अरुचि प्रकट करता है तो उसका मनोवैज्ञानिक आधार पर निरीक्षण कर सुधारात्मक उपाय अपनाया जाता है।
आज की शिक्षा बाल-केंद्रित है और ये सब मनोविज्ञान ने ही संभव किया है।

(6) खेलों के क्षेत्र में भी मनोविज्ञान का बहुत महत्त्व है। मनोविज्ञान के नियमों ने खिलाड़ियों को मानसिक एवं संवेगात्मक रूप से प्रभावित किया है। युद्ध के क्षेत्र में भी मनोवैज्ञानिक कुशलता व ज्ञान बहुत उपयोगी होता है। प्रत्येक देश युद्धकाल में विभिन्न मनोवैज्ञानिक तरीकों द्वारा दुश्मन की सेना का मनोबल गिराने और अपनी सेना के मनोबल को बढ़ाने का प्रयास करता है।

(8) मनोविज्ञान की विषय-वस्तु व्यक्ति का व्यवहार है। व्यक्ति का व्यवहार मन द्वारा नियंत्रित होता है। इसलिए मनोविज्ञान में मानव के व्यवहार का अध्ययन वैज्ञानिक विधियों द्वारा किया जाता है। इस प्रकार से हमें इसकी अनेक विधियों की जानकारी प्राप्त होती है।

(9) मनोविज्ञान मन, शरीर और व्यवहार संबंधी प्रतिक्रियाओं के गहन अध्ययन पर प्रकाश डालता है। इसमें व्यवहार, रुचि, विचार, भावना, प्रेरणा, संवेग, कल्पना, दृष्टिकोण, प्रोत्साहन आदि पक्षों पर अध्ययन किया जाता है।

(10) व्यक्तिगत समस्याओं के कारणों और उनके समाधान हेतु मनोवैज्ञानिक ज्ञान बहुत महत्त्वपूर्ण होता है।

(11) मनोविज्ञान ने वैज्ञानिक शोधों के माध्यम से विभिन्न रोगों के उपचार के लिए नवीन विचारधाराओं या दृष्टिकोणों को उत्पन्न किया है।

(12) औद्योगिक, व्यावसायिक, राजनीतिक एवं आर्थिक आदि क्षेत्रों में भी मनोविज्ञान या मनोवैज्ञानिक ज्ञान की आवश्यकता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, क्योंकि मनोवैज्ञानिक ज्ञान विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होता है।

निष्कर्ष (Conclusion): उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि मनोविज्ञान मानव जीवन के पहले पहलू के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक है। आज के भौतिक एवं वैज्ञानिक युग में इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। मनोविज्ञान का क्षेत्र काफी विस्तृत है। यह मानव व्यवहार एवं ज्ञान से संबंधी विभिन्न नियमों एवं सिद्धांतों का संग्रह है। यह मानव व्यवहार, ज्ञान और क्रियाओं की विभिन्न शाखाओं के रूप में लागू होता है। खेलों के क्षेत्र में भी मनोविज्ञान के सिद्धांतों एवं नियमों को लागू किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान को परिभाषित कीजिए। इसका शिक्षा के क्षेत्र में क्या योगदान है?
अथवा
मनोविज्ञान को परिभाषित कीजिए। शिक्षा व मनोविज्ञान में क्या संबंध है?
उत्तर:
मनोविज्ञान की परिभाषाएँ (Definitions of Psychology): विद्वानों ने मनोविज्ञान को इस प्रकार परिभाषित किया है।

1. रॉबर्ट एस० वुडवर्थ (Robert S. Woodworth) के अनुसार, “मनोविज्ञान व्यक्ति की व्यक्तिगत क्रियाएँ, जो पर्यावरण से जुड़ी हुई हैं, उनका अध्ययन करता है।”
2. क्रो व क्रो (Crow and Crow) के अनुसार, “मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार और इसके संबंध का विज्ञान है।”

शिक्षा और मनोविज्ञान में संबंध (Relation between Education and Psychology):
शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है। मनोविज्ञान का उद्देश्य व्यक्ति के व्यवहारों का अध्ययन करना है। व्यक्ति का सर्वांगीण विकास तब तक संभव नहीं, जब तक उसके व्यवहारों का पूर्ण ज्ञान नहीं हो जाता। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। शिक्षा व मनोविज्ञान में परस्पर गहरा संबंध है। मनोविज्ञान ने शिक्षा के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण योगदान दिए हैं। इसके द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न बदलाव हुए हैं। शिक्षण की अधिकांश गतिविधियाँ या विधियाँ इससे संबंधित हैं। बी०एन० झा (B.N. Jha) के मतानुसार, “शिक्षा जो कुछ करती है और जिस प्रकार वह किया जाता है, उसके लिए इसे मनोवैज्ञानिक खोजों पर निर्भर रहना ‘पड़ता है।”

प्राचीनकाल में शिक्षण विधियों में बच्चों की विभिन्न अवस्थाओं की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था। शिक्षण अध्यापक केंद्रित होता था। वे बच्चों को दण्ड आदि देकर पढ़ाते थे, लेकिन आधुनिक समय में शिक्षण बाल केंद्रित हो गया है। अब अध्यापकों द्वारा छात्रों को दण्ड नहीं दिया जाता। वर्तमान में अध्यापकों द्वारा विद्यार्थियों के प्रत्येक पक्ष की ओर ध्यान दिया जाता है। इस बदले हुए दृष्टिकोण के अंतर्गत शिक्षण विधियों में छात्रों की रुचियों, आवश्यकताओं, अभिवृत्तियों आदि पर विशेष ध्यान दिया जाता है अर्थात् शिक्षण विधियाँ छात्रों की आवश्यकताओं एवं रुचियों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।

परन्तु अध्यापक तभी छात्रों के सर्वांगीण विकास में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है जब वह मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर सीखाने की क्रियाओं का कुशल से संचालन करने में सक्षम होगा अर्थात् उसके लिए मनोविज्ञान का ज्ञान बहुत आवश्यक है। इस प्रकार मनोविज्ञान शिक्षा के हर पहलू या पक्ष को प्रभावित करता है ; जैसे शिक्षण विधियों, शिक्षा के उद्देश्यों, पाठ्यक्रम में सुधार व बच्चों की विभिन्न अवस्थाओं आदि में महत्त्वपूर्ण योगदान देना। इस संदर्भ में डेविस (Davis) ने कहा है-मनोविज्ञान ने छात्रों की क्षमताओं व विभिन्नताओं का विश्लेषण करके शिक्षा के लिए विशिष्ट योगदान दिया है। इसी प्रकार स्किनर (Skinner) ने मनोविज्ञान को शिक्षा का आधारभूत विज्ञान कहा है।

अतः उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शिक्षा व मनोविज्ञान का परस्पर गहरा संबंध है। दोनों का बालक के विकास में विशेष महत्त्व है। शिक्षा की प्रत्येक प्रक्रिया मनोविज्ञान पर निर्भर है। इसकी मदद से ही विद्यार्थियों की रुचियों, इच्छाओं व आवश्यकताओं के अनुसार उन्हें उचित शिक्षा प्रदान की जा सकती है और उनका सर्वांगीण विकास किया जा सकता है।

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प्रश्न 4.
खेल मनोविज्ञान क्या है? खेलों या शारीरिक शिक्षा में इसका क्या महत्त्व है?
अथवा
खेल मनोविज्ञान को परिभाषित कीजिए। खेलों में इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
खेल मनोविज्ञान का अर्थ (Meaning of Sports Psychology):
मनोविज्ञान, वास्तव में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं विस्तृत विषय है। यह विषय, मानव ज्ञान और क्रियाओं की सभी शाखाओं में पूर्ण रूप से लागू होता है। मनोविज्ञान का संबंध मनुष्य के शरीर और मन की सुयोग्यता से होता है जबकि खेल मनोविज्ञान, जिसका प्रयोग शारीरिक शिक्षा एवं खेलों में होता है, का संबंध मानव के शरीर की योग्यता पर निर्भर करता है जोकि खेलकूद के द्वारा अर्जित की जा सकती है। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित होगा कि खेल मनोविज्ञान, व्यक्ति के चहुंमुखी विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। अतः हमारे लिए खेल मनोविज्ञान के वास्तविक अर्थ को समझना अति-आवश्यक है।

खेल मनोविज्ञान की परिभाषाएँ (Definitions of Sports Psychology): निम्नलिखित परिभाषाओं के द्वारा हम खेल मनोविज्ञान के वास्तविक अर्थ को अच्छी तरह से समझ सकते हैं
1. जॉन लोथर (John Lauther):
के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान वह क्षेत्र है, जो मनोवैज्ञानिक तथ्यों, सीखने के सिद्धांतों, प्रदर्शनों तथा खेलकूद में मानवीय व्यवहार के संबंधों में लागू होता है।”

2. के०एम० बर्नस (K.M. Burns):
के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान, शारीरिक शिक्षा की वह शाखा है जिसका संबंध व्यक्ति की शारीरिक योग्यता से होता है, जोकि खेलकूद में भाग लेने से आती है।”

3. आर०एन० सिंगर (R.N. Singer):
के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान एथलेटिक्स में व्यक्ति के व्यवहार की खोजबीन करता है।”

4. क्लार्क व क्लार्क (Clark and Clark):
के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान एक व्यावहारिक मनोविज्ञान है। यह व्यक्तियों, खेलों तथा शारीरिक क्रियाओं के प्रेरणात्मक या संवेगात्मक पहलुओं से अधिक संबंधित है। इसमें प्रायः उन सभी विधियों का प्रयोग होता है जो मनोविज्ञान में प्रयोग की जाती हैं।”

5. वेनबर्ग (Weinberg):
के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान लोगों के अध्ययन तथा खेल व व्यायाम संबंधी गतिविधियों में उनके व्यवहार और ज्ञान का व्यावहारिक अनुप्रयोग है।” उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि खेल मनोविज्ञान, खेलकूद के अंतर्गत खिलाड़ियों के व्यवहार एवं अनेक मनोवैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन है। यह मनोवैज्ञानिक और मानसिक कारकों का अध्ययन है जो भागीदारी, खेलने में प्रदर्शन और शारीरिक गतिविधियों से प्रभावित होते हैं।

शारीरिक शिक्षा या खेलों में खेल मनोविज्ञान का महत्त्व (Importance of Sports Psychology in Physical Education or Sports): शारीरिक शिक्षा या खेलकूद में खेल मनोविज्ञान का महत्त्व अथवा उपयोगिता निम्नलिखित है

(1) खेल मनोविज्ञान खेल प्रतियोगिताओं में शामिल खिलाड़ियों के व्यवहार को समझने में सहायता करता है।
(2) यह खेलों में खिलाड़ियों की क्रियात्मक क्षमताओं या योग्यताओं को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
(3) यह खिलाड़ियों की भावनात्मक या संवेगात्मक समस्याओं को नियंत्रित करने में सहायक होता है।
(4) यह खेलों में खिलाड़ियों के खेल-स्तर को ऊँचा उठाने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
(5) यह खिलाड़ियों के गतिपरक कौशल को बढ़ाने में सहायक होता है।
(6) यह खिलाड़ियों की अनेक मानसिक समस्याओं को दूर करने में सहायक होता है।
(7) यह खिलाड़ियों में अनेक सामाजिक गुणों का विकास करने में भी सहायक होता है।
(8) यह खिलाड़ियों को प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने हेतु मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(9) यह खिलाड़ियों के व्यवहार और शारीरिक सुयोग्यता में सुधार हेतु महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(10) यह खेल के विभिन्न मनोवैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन करता है और उनमें सुधार करने में सहायक होता है।
(11) इसमें खिलाड़ियों की अभिप्रेरणाओं और उपलब्धियों का मनोवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है।

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प्रश्न 5.
अभिप्रेरणा की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों का विस्तार से वर्णन करें। अथवा अभिप्रेरणा को परिभाषित कीजिए। इसके प्रकारों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
अभिप्रेरणा की अवधारणा (Concept of Motivation):
अभिप्रेरणा या प्रेरणा शब्द लातीनी भाषा के शब्द ‘Movere’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘to change’ तथा ‘to move’ जब यह कहा जाता है कि कोई किसी काम के प्रति प्रेरित हो गया है तो उसका अर्थ यह होता है कि उसकी आंतरिक शक्ति ने उसको उत्साहित किया है। इस शक्ति के कारण ही मनुष्य अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहता है और अंत में सफलता प्राप्त कर लेता है। अतः मनुष्य का प्रत्येक कार्य किसी-न-किसी प्रेरणा या अभिप्रेरणा से संचालित होता है। छात्र इसलिए पढ़ाई करते हैं ताकि वे पढ़ाई में पास होकर अच्छी नौकरी या व्यवसाय हासिल करें। अभिप्रेरणा ही किसी व्यक्ति को उद्देश्य या लक्ष्य की ओर ले जाने का कार्य करती है।

व्यक्ति की बहुत-सी जरूरतें होती हैं जिन्हें पूरा करने के लिए विभिन्न प्रेरक सहायक होते हैं। इन प्रेरकों के कारण व्यक्ति अधिक प्रयत्नशील हो जाता है। अभिप्रेरणा को सीखने का हृदय (Heart of Learning) तथा सीखने की सुनहरी सड़क (Golden Road of Learning) कहा जा सकता है, क्योंकि यह सीखने की प्रक्रिया है। प्रशिक्षण कोई भी हो, चाहे वह खेलों का क्षेत्र हो या विद्या का, अभिप्रेरणा हर क्षेत्र में अपना विशेष योगदान देती है। इसी कारण ही अभिप्रेरणा अधिक महत्त्वपूर्ण समझी जाती है। अत: अभिप्रेरणा वह शक्ति है जो मनुष्य में क्रिया सीखने की रुचि को उत्साहित करती है। यह शक्ति चाहे मनुष्य के अंदर से हो अथवा बाहर से उसको सीखने में मुख्य भूमिका निभाती है।

अभिप्रेरणा की परिभाषाएँ (Definitions of Motivation): विद्वानों ने अभिप्रेरणा को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है
1. बी०सी० राय (B.C. Rai):
के कथनानुसार, “अभिप्रेरणा एक ऐसी मनोवैज्ञानिक और शारीरिक स्थिति पैदा करती है जिसके प्रयत्नों से आवश्यकता और इच्छा पूरी होती है।”

2. पी०टी० यंग (P.T. Young):
के अनुसार, “अभिप्रेरणा आगे बढ़ रही क्रिया को जागृत, आगे बढ़ाने और उस क्रिया को आदर्श रूप में क्रमबद्ध करने की प्रक्रिया है।”

3. सैज (Sage):
के कथनानुसार, “एक मनुष्य जितनी शक्ति तथा दिशा से प्रयत्न करता है, उसे प्रेरणा कहा जाता है।”

4. क्रो व क्रो (Crow and Crow):
के अनुसार, “अभिप्रेरणा का संबंध सीखने में रुचि पैदा करने से है तथा अपने इसी रूप में यह सीखने का मूल आधार है।”

5. रॉबर्ट एस० वुडवर्थ (Robert S. Woodworth):
के अनुसार, “अभिप्रेरणा व्यक्ति की वह मनोवैज्ञानिक दशा है जो किसी निश्चित लक्ष्य की पूर्ति हेतु उसे एक निश्चित व्यवहार करने के लिए बाध्य करती हैं।”

6. आर०एन० सिंगर (R.N. Singer):
के अनुसार, “अभिप्रेरणा या प्रेरणा व्यक्ति में क्रिया के लिए उत्तेजन का सामान्य स्तर होता है।”

7. ब्लेयर जॉन्स व सिम्पसन (Blair Jones and Simpson):
के अनुसार, “अभिप्रेरणा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सीखने वाले की आंतरिक शक्तियाँ अथवा आवश्यकताएँ उसके वातावरण में निहित विभिन्न लक्ष्य बिंदुओं की ओर अग्रसर रहती हैं।”

8. मॉर्गेन (Morgan):
के अनुसार, “अभिप्रेरणा से तात्पर्य उन प्रेरक एवं चालक शक्तियों से है जिनके द्वारा व्यवहार को विशेष लक्ष्यों की ओर मोड़कर एक स्थायी रूप प्रदान किया जाता हैं।”

अभिप्रेरणा के प्रकार (Types of Motivation): अभिप्रेरणा मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है जो इस प्रकार है
1. आंतरिक अथवा प्राकृतिक अभिप्रेरणा (Intrinsic or Natural Motivation):
आंतरिक अभिप्रेरणा को प्राकृतिक प्रेरणा भी कहा जाता है। इस प्रेरणा का संबंध प्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति की प्राकृतिक इच्छाओं, स्वभाव तथा आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ है। कोई भी प्रेरित व्यक्ति किसी काम को इसलिए करता है क्योंकि उसको आंतरिक प्रसन्नता व खुशी मिलती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी विद्यार्थी को गणित की किसी समस्या को हल करके प्रसन्नता मिलती है तो उस समय वह आंतरिक प्रेरणा से प्रेरित होता है। ऐसी स्थिति में प्रसन्नता का स्रोत क्रिया में छिपा होता है। शिक्षा की प्रक्रिया में इस प्रकार की प्रेरणा का बहुत महत्त्व होता है, क्योंकि इससे प्राकृतिक रुचि पैदा होती है जो अंत तक बनी रहती है। कुछ आंतरिक अथवा प्राकृतिक अभिप्रेरणाएँ निम्नलिखित हैं

(1) नकल करने की अभिप्रेरणा (Imitative Motivation): किसी अच्छे खिलाड़ी का खेल से सीखना आदि।
(2) भावनात्मक अभिप्रेरणा (Emotional Motivation): स्नेह, सुरक्षा, सफलता आदि।
(3) भीतरी अभिप्रेरणा (Internal Motivation): इच्छा, शौक आदि।
(4) शारीरिक अभिप्रेरणा (Physical Motivation): भूख, प्यास, कार्य आदि।
(5) सामाजिक अभिप्रेरणा (Social Motivation): सहयोग, सामाजिक आवश्यकताएँ आदि।
(6) स्वाभाविक अभिप्रेरणा (Natural Motivation): आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास आदि।

2. बाहरी या कृत्रिम अभिप्रेरणा (Extrinsic or Artificial Motivation):
बाहरी अभिप्रेरणा अप्राकृतिक अथवा कृत्रिम होती है। इस अभिप्रेरणा में प्रसन्नता का स्रोत कार्य में नहीं छिपा होता। इसमें मनुष्य मानसिक प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए कोई कार्य नहीं करता, अपितु उद्देश्य की प्राप्ति अथवा इनाम जीतने के लिए कार्य करता है। कोई अच्छा स्तर हासिल करना, आजीविका कमाने के लिए कार्य सीखना, प्रशंसा हासिल करने के लिए कार्य करना आदि क्रियाएँ इस अभिप्रेरणा वर्ग में आती हैं।
(1) इनाम (Awards): आर्थिक वस्तुएँ; जैसे बैग, टेबल लैंप, सुंदर तस्वीरें आदि।
(2) सामाजिक इनाम (Social Rewards): नौकरी, उन्नति, प्रमाण-पत्र आदि।
(3) प्रतियोगिताएँ (Competitions): टूर्नामेंट आदि।
(4) सुनने-देखने की सामग्री (Audio-Visual Aids): फिल्में, तस्वीरें आदि।
(5) दंड (Punishment): जुर्माना, डर और शारीरिक दंड आदि।
(6) सहयोग (Co-operation): आपसी सहयोग, सामूहिक सहयोग आदि।
(7) लक्ष्य (Goal): पदोन्नति, प्रशंसा, पुरस्कार आदि।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 6.
खेल कुशलता में अभिप्रेरणा के योगदान का वर्णन करें।
अथवा
आप एक बिना रुचि वाले खिलाड़ी को खेल निपुणता प्रशिक्षण हेतु कैसे प्रेरित करेंगे?
अथवा
खिलाड़ियों को प्रेरित करने के तरीकों या उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र में चाहे वह खेलों का हो अथवा विद्या अथवा खोज का, अभिप्रेरणा बहुत बड़ा स्रोत बनकर उभरती है। खेलों में अभिप्रेरणा का बहुत बड़ा योगदान है। अच्छी खेल निपुणता या कुशलता के लिए प्रेरणा बहुत ज़रूरी है। यह एक ऐसी शक्ति है जो खिलाड़ी के निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने में सहायता प्रदान करती है। अच्छी खेल निपुणता या कुशलता के लिए बहुत सारे पक्षों का होना ज़रूरी होता है; जैसे अच्छा व्यक्तित्व, वातावरण, स्वभाव और प्रेरणा आदि। परंतु इन सभी के होते हुए भी प्रेरणा की मुख्य भूमिका होती है। इस प्रकार उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए खिलाड़ियों में प्रेरणा उनको अपने खेल के स्तर को ऊंचा उठाने और सुधारने में सहायता करती है।

अभिप्रेरणा सिर्फ अच्छी खेल कुशलता के लिए ज़रूरी नहीं है, अपितु यह कठिन प्रशिक्षण के समय भी बहुत ज़रूरी है। प्रत्येक खिलाड़ी में सर्वोत्तम स्तर भिन्न-भिन्न होता है, परंतु सर्वोत्तम प्रेरणा खेल निपुणता में वृद्धि पैदा करती है। सर्वोत्तम प्रेरणा के कारण ही खिलाड़ी निडरता, बहादुरी और साहस से निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि खेल कुशलता के लिए प्रेरणा की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण तथा लाभदायक होती है। खेलों में किसी व्यक्ति को प्रेरित करना आज के युग में काफी मुश्किल है, क्योंकि खेलें शारीरिक क्रियाओं पर आधारित होती हैं।

खिलाड़ी सुबह-शाम शारीरिक क्रियाओं में भाग लेते हैं। उन पर शारीरिक दबाव के साथ-साथ मानसिक और भावात्मक दबाव भी बढ़ते हैं। इन परिस्थितियों में खिलाड़ी को प्रेरित करना शारीरिक शिक्षा के अध्यापक और कोच की योग्यता पर निर्भर करता है; जैसे उसका आचरण, प्रशिक्षण के आधुनिक ढंगों से परिचित होना। खिलाड़ी को प्रेरित करने के लिए अग्रलिखित तरीके या उपाय अपनाए जा सकते हैं

1. दूसरे अच्छे खिलाड़ियों का खेल देखकर प्रेरित होना (To motivate By Watching the Game of Other Good Players):
आधुनिक युग में खिलाड़ी को खेलों के प्रति प्रेरित करने में टी०वी०, अखबारों, समाचार-पत्रों, रेडियो आदि का बहुत अधिक योगदान रहा है। आजकल क्रिकेट के खेल का बोलबाला है। किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मैच वाले दिन बच्चे, जवान, बूढ़े सभी टी०वी० के आगे बैठकर मैच का आनंद उठाते हैं। मैच के बाद बच्चे बैट और बॉल लेकर अच्छे खिलाड़ियों की नकल करते हैं और उन जैसा खेलना पसंद करते हैं। अच्छे खिलाड़ियों का खेल देखकर बच्चे जल्दी प्रेरित होते हैं।

2. खिलाड़ी की लोकप्रियता (Publicity of Player):
कोई भी व्यक्ति जब अपने किए हुए कार्यों की प्रशंसा दूसरों के मुँह से सुनता है तो वह फूला नहीं समाता। जब कोई खिलाड़ी अपने खेल का प्रदर्शन भिन्न-भिन्न माध्यमों द्वारा सुनता है तो गर्व अनुभव करता है। कोई भी खिलाड़ी अपने-आप ही नहीं, बल्कि दूसरे व्यक्तियों द्वारा अपनी उपलब्धियों को सुनकर और देखकर प्रेरित होता हैं।

3. प्रगति और अच्छे परिणामों का रिकॉर्ड रखकर (Maintaining the Record of Progress and Good Results):
खिलाड़ी प्रगति और अपने अच्छे परिणामों का रिकॉर्ड देखकर प्रेरित होता है। जब वह अपनी लगातार बढ़ती हुई प्रगति को देखता है तो वह और भी उत्साहित हो जाता है। इस प्रकार वह अधिक-से-अधिक अभ्यास करता है और राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में जीत प्राप्त करने को ही अपना उद्देश्य बना लेता है। इसलिए शारीरिक शिक्षा के अध्यापक और कोच को चाहिए कि वे उसके प्रत्येक स्तर के मुकाबलों में की गई प्रगति और अच्छे परिणामों का रिकॉर्ड रखें।

4. शारीरिक शिक्षा के अध्यापक और कोच का व्यक्तित्व और आचरण (Personality and Character of Physical Education Teacher and Coach):
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक और कोच के व्यक्तित्व और आचरण का खिलाड़ी पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। खिलाड़ी अपना काफी समय अध्यापक और कोच के साथ बिताता है। इसलिए उनके गुणों और अवगुणों का उस पर प्रभाव पड़ता है। यदि कोच का व्यवहार, बोलने का तरीका और उसके प्रशिक्षण का ढंग आकर्षक हो तो वह खिलाड़ी के लिए अभिप्रेरणा का स्रोत बनता है।

5. अच्छा खेल का मैदान और आधुनिक उपकरण (Good Playgrounds and Modern Equipments):
अच्छा खेल का मैदान और आधुनिक उपकरण खिलाड़ी को जल्दी प्रेरित करते हैं। अगर खेल का मैदान खेलने के योग्य न हो, तो वह आकर्षण का कारण नहीं बनेगा। इसी प्रकार खेल के उपकरण आधुनिक एवं उत्तम किस्म के हों तो खिलाड़ी की प्रेरणा बढ़ जाती है। खिलाड़ियों को आधुनिक एवं नए उपकरण से खेलने की अधिक उत्सुकता रहती है।

6. अच्छा प्रदर्शन (Good Demonstration):
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक और कोच का खिलाड़ी पर विशेष प्रभाव होता है। वे उसकी आज्ञा को मानते हैं और उसकी कही प्रत्येक बात ध्यान से सुनते हैं और उसे करने के इच्छुक होते हैं। इसलिए खेलों के अध्यापक और कोच के प्रशिक्षण का ढंग बड़ा ही सरल, आकर्षक और ऊंचे स्तर का होना चाहिए। प्रशिक्षक का प्रदर्शन सीखने वाले पर अधिक प्रभाव डालता है।

7.अच्छे इनामों द्वारा प्रेरित (To Motivate by Good Awards):
खिलाड़ियों को मुकाबलों में जीत-हार के बाद अच्छे इनामों से सम्मानित करके उत्साहित किया जा सकता है; जैसे नकद इनाम, प्रमाण-पत्र, पदक, शील्डे, उन्नति देकर, टी०वी० और रेडियो पर मुलाकात करवाकर अधिक प्रेरित किया जा सकता है।

8. अच्छी नौकरियों द्वारा (By Good Services):
अच्छे खिलाड़ियों को भिन्न-भिन्न विभागों; जैसे रेलवे, स्टेट बिजली बोर्ड, पुलिस, बी०एस०एफ०, सी०आर०पी०एफ० में अच्छी नौकरियाँ देकर प्रेरित किया जा सकता है।

9. खिलाड़ियों के लिए विशेष सुविधाएँ (Special Incentives to the Players):
खिलाड़ियों को विशेष सुविधाएँ; जैसे बसों, गाड़ियों और हवाई जहाज़ों में पास देकर, आय-कर और मनोरंजन कर में कमी करके, खिलाड़ी का बीमा करके, खिलाड़ी को चोट आदि लगने पर उसको पूरा खर्चा आदि देकर प्रेरित किया जा सकता है।

प्रश्न 7.
खेल भावना से आप क्या समझते हैं? अच्छे खिलाड़ी या स्पोर्ट्समैन के गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
खेल-भावनाका अर्थ (Meaning of Sportsmanship):
खेल-भावना आत्म-सम्मान का वह स्तर है जो खिलाड़ियों, दर्शकों, प्रशिक्षकों, अध्यापकों एवं विद्यालय प्रबंधों व खेल प्रबंधों के व्यवहार में सदा सभ्य, सम्मानपूर्वक व्यवहार का प्रदर्शन करने के रूप में अभिव्यक्त होता है। सभी खेलों के अपने नियम होते हैं। इन नियमों की तत्परता से पालना करना ही खेल-भावना (Sportsmanship) कहलाता है। यह एक अच्छे खिलाड़ी की ऐसी भावना है जो व्यक्ति के अंदर स्वत: जागृत होती है।

प्रत्येक शारीरिक शिक्षा के प्रशिक्षक एवं अध्यापक की यह कोशिश होती है कि वे इस भावना को बढ़ाने में सहायता करें, क्योंकि ऐसी भावना वाले खिलाड़ी का समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। जो खिलाड़ी या टीम अपने प्रतिद्वन्द्वी के प्रति वैर-विरोध न करके एक-दूसरे के प्रति सद्भावनापूर्वक व्यवहार से खेलता/खेलती है, खिलाड़ी या टीम के ऐसे आचरण को ही खेल-भावना कहते हैं।

अच्छे खिलाड़ी या स्पोर्ट्समैन के गुण (Qualities of Good Sportsman): एक अच्छे खिलाड़ी (स्पोर्ट्समैन) में निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है
1. सहनशीलता (Tolerance):
सहनशीलता खिलाड़ी का एक महत्त्वपूर्ण गुण है। यदि खिलाड़ी में सहनशीलता की भावना नहीं होगी तो वह खेलों में अपना अच्छा प्रदर्शन नहीं दिखा सकता। खेलों को खेलते समय अनेक प्रकार की चोटें लग सकती है परन्तु एक अच्छा खिलाड़ी उन चोटों को सहन करते हुए अपना अच्छा प्रदर्शन दिखाता है।

2. समानता की भावना (Spirit of Equality):
समानता की भावना खिलाड़ी का एक महत्त्वपूर्ण गुण है। एक अच्छा खिलाड़ी खेल के दौरान जाति-पाति, धर्म, रंग, संस्कृति तथा सभ्यता के भेदभाव से दूर रहकर प्रत्येक खिलाड़ी के साथ समानता का व्यवहार करता है।

3. सहयोग की भावना (Spirit of Co-operation):
एक अच्छे खिलाड़ी का तीसरा मुख्य गुण सहयोग की भावना है। वह सहयोग की भावना ही खेल के मैदान में टीम के खिलाड़ियों को इकट्ठा रखती है। खिलाड़ी अपने कप्तान के नेतृत्व में अपनी विजय के लिए संघर्ष करते हैं तथा विजय का श्रेय कप्तान अथवा किसी एक खिलाड़ी को प्राप्त नहीं होता बल्कि सारी टीम को प्राप्त होता है।

4. अनुशासन की भावना (Spirit of Discipline):
एक अच्छे स्पोर्ट्समैन का सबसे मुख्य गुण यह है कि वह नियमपूर्वक अनुशासन में कार्य करे। वास्तविक स्पोर्ट्समैन वही होता है जो खेल के सभी नियमों की पालना बहुत ही अच्छे ढंग से करे।

5. चेतनता (Consciousness):
किसी भी खेल के दौरान चेतन रहकर प्रत्येक अवसर का लाभ उठाना ही स्पोर्ट्समैनशिप है। प्रत्येक खिलाड़ी अपना पूरा ध्यान खेल की गतिविधियों में लगाकर ही जीत हासिल कर सकता है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक क्षण की चेतनता स्पोर्ट्समैन का महत्त्वपूर्ण गुण है।

6. ईमानदार तथा परिश्रमी (Honest and Hard Working):
एक अच्छे स्पोर्ट्समैन का ईमानदार तथा परिश्रमी होना सबसे मुख्य गुण है। अच्छा स्पोर्ट्समैन कठोर परिश्रम का सहारा लेता है। वह उच्च खेल की प्राप्ति के लिए अयोग्य ढंगों का प्रयोग नहीं करता अपितु देश की शान के लिए आगे बढ़ता है। आचार्य चाणक्य (Aacharya Chanakya) के अनुसार, “जब आप किसी काम की शुरुआत करें तो असफलता से मत डरें और उस काम को न छोड़ें, जो लोग ईमानदारी से काम करते हैं वे सबसे प्रसन्न होते हैं।”

7. भावुक नहीं होता (Does not become Emotional):
एक अच्छा स्पोर्ट्समैन कभी भावुक नहीं होता। वह जीत-हार में दिखावा नहीं करता, बल्कि हारे हुए विरोधियों का आदर करता है। वह हार जाने पर भी दुःखी नहीं होता बल्कि अपनी कमियों को ढूँढता है।

8. हार-जीत को बराबर समझना (No Difference between Victory or Defeat):
एक अच्छा स्पोर्ट्समैन मन में जीत-हार की भावना न रखते हुए देश के सम्मान तथा खेलों की शान के लिए इनमें भाग लेता है। बैरन डी कोबर्टिन (Barron de Coubertin) के अनुसार, “हमें खेल जीतने के लिए नहीं, बल्कि अच्छा प्रदर्शन करने के लिए खेलना चाहिए।” इसलिए वह बढ़िया खेल का प्रदर्शन करता है। यदि अच्छे खेल के प्रदर्शन से उनकी टीम विजयी होती है तो वह खुशी में मस्त होकर विरोधी टीम अथवा खिलाड़ी का मज़ाक नहीं करता, अपितु वह दूसरे पक्ष को बढ़िया खेल के लिए बधाई देता है। यदि वह हार जाता है तो निराश होकर अपना मानसिक संतुलन नहीं गंवाता। वह हार-जीत को हमेशा बराबर समझता है।

9. जिम्मेवारी की भावना (Spirit of Responsibility):
एक अच्छा स्पोर्ट्समैन अपनी जिम्मेवारी को अच्छी प्रकार समझता । है तथा इसको सही ढंग से निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। उसको इस बात का एहसास होता है कि यदि वह अपनी जिम्मेवारी से थोड़ा-सा भी लापरवाह हुआ तो उसकी टीम हार सकती है। परिणामस्वरूप स्पोर्ट्समैन अपनी जिम्मेवारी को पूरे तन-मन से निभाते हुए खेल में आरंभ से लेकर अंत तक पूरे जोश से भाग लेता है।

10. मुकाबले की भावना (Spirit of Competition):
एक अच्छा स्पोर्ट्समैन वही है जो अपने उत्तरदायित्व को अच्छी प्रकार समझता है। वह प्रत्येक कठिनाई में साथी खिलाड़ियों को धैर्य देता है तथा अच्छे खेल, उत्साह एवं अधिक प्रयास करने की प्रेरणा देता है। वास्तव में खेल की जीत का सारा राज मुकाबले की भावना में होता है। वह करो अथवा मरो की भावना से खेल के मैदान में जाता है। लेकिन यह भावना बिना किसी वैर-विरोध के होती है। इस भावना में किसी टीम अथवा खिलाड़ी के प्रति बुरी भावना नहीं रखी जाती। आरडब्ल्यू० इमर्जन (R.W. Emerson) के अनुसार, “जीतो ऐसे कि तुम्हें इसकी आदत हो, हारो ऐसे जैसे कि आनंद उठाने के लिए एक बदलाव किया हो।”

11. त्याग की भावना (Spirit of Sacrifice):
एक अच्छे स्पोर्ट्समैन में त्याग की भावना का होना भी आवश्यक है। किसी भी टीम में खिलाड़ी केवल अपने लिए ही नहीं खेलता बल्कि उसका मुख्य उद्देश्य सारी टीम को विजयी कराना होता है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक खिलाड़ी निजी स्वार्थ को त्याग कर पूरी टीम के लिए खेलता है। वह अपनी टीम की विजय प्राप्ति के लिए खूब संघर्ष करता है। वह अपनी टीम की विजय को अपनी विजय समझता है तथा उसका सिर गर्व से ऊँचा हो जाता है। परिणामस्वरूप त्याग की भावना रखने वाला खिलाड़ी ही अच्छा स्पोर्ट्समैन होता है। ऐसी भावना वाले खिलाड़ी ही अपनी टीम, स्कूल, प्रांत, क्षेत्र, देश तथा राष्ट्र के नाम को ऊँचा करते हैं।

12. आत्म-विश्वास की भावना (Spirit of Self-confidence):
यह गुण स्पोर्ट्समैन का बहुत ही महत्त्वपूर्ण गुण है। खेल वही खिलाड़ी जीत सकता है जिसमें आत्म-विश्वास की भावना होती है। आत्म-विश्वास के बिना खेलना असंभव है। अच्छा स्पोर्ट्समैन हमेशा हँसमुख होता है। वह संतुष्ट तथा शांत स्वभाव का दिखाई देता है। इससे उसका आत्म-विश्वास प्रकट होता है।

13. भातृत्व की भावना (Spirit of Brotherhood):
स्पोर्ट्समैन में भातृत्व की भावना होना अति आवश्यक है। वह जात-पात, रंग-भेद, धर्म, संस्कृति तथा सभ्यता को अपनी राह में नहीं आने देता तथा सभी व्यक्तियों से समान व्यवहार करता है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 8.
खेलों में नैतिकता या नीतिशास्त्र से आप क्या समझते हैं? खेलों में नैतिक मूल्यों को विकसित करने की विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
खेलों में नैतिकता का अर्थ (Meaning of Ethical or Ethics in Sports):
खेलों में नीतिशास्त्र की अवधारणा को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि नीतिशास्त्र क्या है? नीतिशास्त्र से अभिप्राय उचित आचरण के सिद्धांतों या नियमों की अवस्था से है जो व्यक्तियों द्वारा अपनाई जाती है। इन नियमों का पालन करने से व्यक्ति के व्यवहार एवं आचरण में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आता है। खेलों में नीतिशास्त्र की बहुत अधिक आवश्यकता है, क्योंकि खेलों के माध्यम से व्यक्तियों या खिलाड़ियों को अनेक सामाजिक व नैतिक गुण सीखने का अवसर प्राप्त होता है।

खेल नीतिशास्त्र का संबंध खेल के क्षेत्र में नैतिकता से है। इसका अर्थ हैखेलकूद में नैतिक आचरण करना। यदि खिलाड़ी नैतिक मूल्य रखते हों तो उनके लिए ये मूल्य केवल खेल के मैदान तक ही उपयोगी नहीं होते, बल्कि मैदान के बाहर भी उतने ही उपयोगी सिद्ध होते हैं। अतः खेलों में नीतिशास्त्र (Ethics in Sports) से अभिप्राय उन व्यक्तियों को, जो खेलों से संबंधित होते हैं, आदर्श आचरण तथा अच्छाई व बुराई की जानकारी देना है ताकि उनको पता चल सके कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है।

खेलों में नैतिक मूल्यों को विकसित करने की विधियाँ (Methods for Developing Ethical Values in Sports)खेलों में व्यक्तियों को अनेक नैतिक मूल्य सीखने के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं परन्तु यह व्यक्ति या खिलाड़ी पर निर्भर करता है कि वह खेलों से सकारात्मक पक्ष सीखता है या नकारात्मक पक्ष। खेलों में भी अच्छे एवं बुरे व्यवहार को प्रदर्शित करने के अवसर, अन्य क्रियाओं से अधिक अलग नहीं होते।

यह लक्ष्यों, प्रशिक्षकों, माता-पिता, खिलाड़ियों, दर्शकों के दृष्टिकोण पर अधिक निर्भर करता है कि खिलाड़ियों या बच्चों का किस प्रकार के गुणों की ओर अधिक झुकाव है। इसका मतलब यह हुआ कि खेलों में नैतिकता प्रशिक्षकों, खेल अधिकारियों, माता-पिता, दर्शकों, प्रबंधकों और विशेष रूप से खिलाड़ियों पर निर्भर करती है। खेलों में नैतिक मूल्यों को विकसित करने में निम्नलिखित विधियाँ अधिक लाभदायक हो सकती हैं

(1) खेलों में जीत हासिल करना, एक खिलाड़ी और उसके कोच के लिए गर्व की बात होती है। प्रत्येक खिलाड़ी और कोच को जीत का लुत्फ उठाना चाहिए, परन्तु कभी भी अनैतिक साधनों द्वारा जीत हासिल नहीं करनी चाहिए। यदि कोई खिलाड़ी गलत तरीके अपनाकर जीत हासिल करता है तो उसका नैतिक विकास नहीं हो पाता। इसलिए खिलाड़ियों में नैतिक मूल्यों को विकसित करने के लिए प्रशिक्षकों का लक्ष्य खिलाड़ियों को केवल जीत के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि डटकर मुकाबला करवाना होना चाहिए। ए०पी०जे० अब्दुल कलाम (A. P. J. Abdul Kalam) के अनुसार, “मनुष्य के लिए कठिनाइयाँ बहुत जरूरी हैं क्योंकि उनके बिना सफलता का आनंद नहीं लिया ला सकता।”

(2) खिलाड़ियों में बहुत बारीकी से अवलोकन करने की प्रवृत्ति होती है। यदि प्रशिक्षक या अध्यापक खिलाड़ियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करेगा तो इसका उन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसलिए खिलाड़ियों में नैतिक मूल्यों को विकसित करने के लिए प्रशिक्षकों तथा शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों को अपनी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं रखना चाहिए। कन्फ्यूशियस (Confucius) के अनुसार, “एक श्रेष्ठ व्यक्ति अपनी कथनी में कम, परन्तु अपनी करनी में ज्यादा विनम्र होता है।”

(3) खिलाड़ियों द्वारा नशीली वस्तुओं या दवाओं का सेवन करना पूर्णतया अनैतिकता है। नशीली वस्तुओं का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसलिए उन्हें नशीली वस्तुओं के सेवन से स्वयं को दूर रखना चाहिए। प्रशिक्षकों एवं अध्यापकों को उन्हें इन पदार्थों के सेवन हेतु निरुत्साहित करना चाहिए ताकि उनमें नैतिक मूल्यों का विकास हो सके और वे देश के अच्छे नागरिक बन सकें।

(4) खिलाड़ियों को अपने सहयोगियों, विरोधी खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों व खेल अधिकारियों का आदर-सम्मान करना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो उनका नैतिक विकास नहीं हो पाएगा और विरोधी खिलाड़ी भी उनका सम्मान नहीं करेंगे।

(5) प्रशिक्षकों एवं अध्यापकों को खिलाड़ियों के साथ एक-समान एवं निष्पक्ष आचरण एवं व्यवहार करना चाहिए। वे खिलाड़ियों को न्याय एवं समानता हेतु प्रोत्साहित कर सकते हैं और उनके नैतिक मूल्यों को विकसित करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

(6) प्रशिक्षकों एवं अध्यापकों को खिलाड़ियों को सकारात्मक क्रियाओं हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए। प्रोत्साहित खिलाड़ी खेल के नियमों का पालन करना, अनुशासन में रहना, सहयोग देना और ईमानदारी से खेलना आदि नैतिक गुणों को सीख सकता है।

(7) प्रशिक्षकों एवं अध्यापकों को खिलाड़ियों के साथ गलत एवं ठीक के बारे में विचार-विमर्श करना चाहिए अर्थात् किसी विषय पर उनके विचारों को जानने का प्रयास करना चाहिए, ताकि वे उचित निर्णय लेने में सक्षम हो सकें। उचित विचार-विमर्श से खिलाड़ियों में नैतिक मूल्यों का विकास होता है।

(8) खिलाड़ियों में सीखने की इच्छा होनी चाहिए, तभी वे नैतिक मूल्यों को प्राप्त करने में सक्षम होंगे। इसलिए प्रशिक्षकों एवं अध्यापकों को खिलाड़ियों को सीखने हेतु प्रेरित करना चाहिए।

(9) खिलाड़ियों को सकारात्मक सोच एवं अच्छी आदतों हेतु प्रेरित करना चाहिए। खिलाड़ियों को स्वयं का चिंतन करके अपने अवगुणों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। जो व्यक्ति स्वयं का मूल्यांकन करता है वह उन्नति की ओर अग्रसर होता है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि खेलों में नैतिक मूल्यों या नीतिशास्त्र को रखना बहुत आवश्यक है। इसके लिए प्रशिक्षक और अध्यापक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे अपने व्यवहार एवं आचरण से खिलाड़ियों को नैतिक मूल्यों हेतु प्रेरित कर सकते हैं और खिलाड़ी नए-नए सिद्धांतों और नियमों को अपनाकर अपना नैतिक विकास कर सकते हैं।

प्रश्न 9.
रुचि की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों को बताते हुए इसको बढ़ाने के तरीकों का वर्णन कीजिए।
अथवा
रुचि को परिभाषित कीजिए। इसको बढ़ाने के उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
रुचि की अवधारणा (Concept of Interest):
रुचि खिलाड़ियों को खेल की बारीकियाँ सीखने में ही सहायता नहीं करती, बल्कि उसके खेल में और भी निखार लाने में सहायक होती है। खिलाड़ी की यदि किसी भी खेल में रुचि न हो
और उसका ध्यान भटकता रहे तो वह अच्छे परिणामों की आशा नहीं रख सकता । रुचि और ध्यान एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। रुचि ही क्रियाशील अवस्था में ध्यान बन जाती है। यदि खिलाड़ी की रुचि उस क्रिया की ओर केंद्रित हो जोकि वह सीख रहा है तो उसको सफलता मिलेगी और उसकी खेल कुशलता में वृद्धि होगी। उदाहरणस्वरूप यदि खिलाड़ी की किसी खेल में रुचि है तो ही आप उसको खेल सिखा सकते हो। इसके परिणामस्वरूप उसकी खेल-कुशलता में वृद्धि होगी।

रुचि की परिभाषाएँ (Definitions of Interest):
रुचि को विभिन्न विद्वानों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है
1. क्रो व क्रो (Crow and Crow): के कथनानुसार, “रुचि वह प्रेरित शक्ति है जो हमारा ध्यान किसी व्यक्ति या वस्तु की तरफ दिलाती है या फिर कोई प्रभावशाली अनुभव है जोकि क्रिया से स्वयं उपजता है। दूसरे शब्दों में, रुचि या तो किसी क्रिया का कारण है या उस क्रिया में भाग लेने का परिणाम।”

2. जे०एस० रॉस (J.S. Ross): के अनुसार, “जो वस्तु हमारे साथ अधिक संबंधित होती है, उसके प्रति हमारी रुचि अधिक होती है।”

3. मैक्डूगल (McDougall): के अनुसार, “रुचि छुपा हुआ ध्यान है और ध्यान किसी क्रिया (कार्य) में रुचि है।”

4. रॉस (Ross): के अनुसार, “जो वस्तु हमें अधिक अच्छी लगती है अथवा हमारे लिए कुछ अर्थ रखती है उसी वस्तु में हमारी रुचि होती है।”

5. विलियम जेम्स (William James): के अनुसार, “रुचि चयनित जागरूकता या ध्यान का वह रूप है जो किसी के संपूर्ण अनुभवों में से अर्थ पैदा करता है।”
रुचि के प्रकार (Kinds of Interest)-रुचि दो प्रकार की होती है
1. जन्मजात रुचि (Innate Interest)-कुछ रुचियाँ ऐसी होती हैं, जो व्यक्ति में जन्म से ही होती हैं। इसलिए इनको ‘जन्मजात रुचि’ कहा जाता है। ये रुचियाँ व्यक्ति की मूल प्रवृत्तियों तथा जन्मजात प्रेरकों (चालकों) के कारण होती हैं। इसको प्राकृतिक या स्वभाविक रुचि भी कहते हैं।

2. अर्जित रुचि (Acquired Interest):
जो रुचि किसी वस्तु को देखने या जानने से उत्पन्न होती है, उसे ‘अर्जित रुचि’ कहते हैं। अर्जित रुचियों पर वातावरण का महत्त्वपूर्ण प्रभाव होता है। ये रुचियाँ शिक्षा के द्वारा विकसित की जा सकती हैं । इसे कृत्रिम रुचि भी कहते हैं।

रुचि बढ़ाने के ढंग या उपाय (Methods/Measures to Develop Interest): रुचि को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित उपायों/ढंगों का प्रयोग किया जा सकता है
1. भिन्न-भिन्न शिक्षण विधियाँ (Different Educative Methods):
रुचि को बढ़ाने के लिए शिक्षक को भिन्न-भिन्न शिक्षण विधियों का प्रयोग करना चाहिए। उसको शिक्षण-विधि में चार्ट, ग्राफ़, सहायक सामग्री, स्लाइड्स व चलचित्रों का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा करने से विद्यार्थियों में विषय-वस्तु या खेल-कौशल को समझने में रुचि बढ़ जाती है।

2. विषय-वस्तु (Subject Matter): यदि विद्यार्थियों को कोई विषय-वस्तु सिखानी हो तो सबसे पहले उस विषय-वस्तु के लक्ष्यों व उद्देश्यों से विद्यार्थियों को परिचित (Acquaint) करा देना चाहिए। इससे उनकी रुचि उस विषय-वस्तु में बढ़ जाएगी।

3. वातावरण (Environment):
जिस वातावरण में कोई विषय-वस्तु सिखाई जाती है उस वातावरण का प्रभाव रुचि पर अवश्य पड़ता है। यदि वातावरण अच्छा है तो सीखने में खिलाड़ियों या विद्यार्थियों की रुचि अधिक होगी। अत: शिक्षक को अनुकूल वातावरण में ही कोई कौशल (Skill) सिखाना चाहिए।

4. व्यक्तित्व (Personality):
शिक्षक का व्यक्तित्व यदि अच्छा है तो बच्चों की रुचि पर उसके व्यक्तित्व का अच्छा प्रभाव पड़ता है।

5. सिखाने की कुशलता (Skill of Learning):
यदि किसी कौशल (Skill) को ‘सरल से कठिन’ (Simple to Complex) के नियम के आधार पर सिखाया जाता है तो बच्चों में सीखने के प्रति रुचि अधिक होगी।

6. इच्छा-शक्ति (Will-power):
बच्चों की इच्छा-शक्ति बढ़ाकर भी रुचि बढ़ाई जा सकती है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 10.
सीखने की अवधारणा से क्या अभिप्राय है? सीखने के नियमों का वर्णन कीजिए।
अथवा
सीखने को परिभाषित कीजिए। सीखने के प्रमुख नियमों या सिद्धांतों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सीखने की अवधारणा (Concept of Learning):
प्रत्येक व्यक्ति बदलते पर्यावरण से समझौता करता है। बदला हुआ पर्यावरण प्रत्येक व्यक्ति पर अपनी छाप छोड़ जाता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह शारीरिक और मानसिक तौर पर बढ़ता है और नई-नई प्रतिक्रियाएँ सीखता है, जिससे उसमें परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। सीखना जिंदगी में सदैव चलता रहता है। बच्चा केवल स्कूल में ही नहीं सीखता, बल्कि जिन तजुर्बो या अनुभवों (Experiences) में से वह गुजर रहा होता है, उनसे भी वह बहुत कुछ सीखता है। बच्चा बचपन में शारीरिक, मानसिक, भावात्मक तौर पर दूसरों पर निर्भर रहता है। परंतु समय बीतने पर जब मानसिक और शारीरिक विशेषताएँ आ जाती हैं तो उसमें आत्म-निर्भरता की भावना बढ़ने लगती है।

सीखने की परिभाषाएँ (Definitions of Learning): सीखने के बारे में अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं, जो निम्नलिखित हैं

1. गेट्स (Gates): के कथनानुसार, “तजुर्बो से व्यवहार में आने वाले परिवर्तनों को सीखना कहा जाता है।”

2. जे०पी० गिलफोर्ड (J.P. Guilford): के अनुसार “व्यवहार के परिणामस्वरूप व्यवहार में कोई भी परिवर्तन सीखना है।”

3. हैनरी पी० स्मिथ (Henry p Smith): के अनुसार, “सीखना नए व्यवहार में बढ़ोतरी करना है या अनुभवों से पुराने व्यवहार को ताकतवर या कमजोर बनाया जा सकता है।”

4. रॉबर्ट एस० वुडवर्थ (Robert S. Woodworth): के कथनानुसार, “कोई भी ऐसी क्रिया सीखना कहलाती है, जो व्यक्ति के (अच्छे या बुरे प्रकार के ) विकास में सहायक होती है, उसका पहला व्यवहार या अनुभव कोई भी हो उससे अलग बनाती है।”

5. क्रो व क्रो (Crow and Crow): के कथनानुसार, “सीखना आदतें, ज्ञान और विचारधारा का समूह है। इसमें काम को करने के ढंग शामिल हैं और इनका आरंभ व्यक्ति की ओर से किसी रुकावट को दूर करने के लिए या नए हालातों में अपने व्यवहार या प्रयत्नों को लेकर होता है। इसकी सहायता से विचारधारा में अच्छे परिवर्तन होते रहते हैं। यह व्यक्ति को अपनी रुचियों और लक्ष्य को प्राप्त करने के योग्य बनाती है।”

6. जी०डी० ब्रूज (G. D. Brooze): के अनुसार, “सीखना एक ऐसी प्रतिक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति उन विविध आदतों, ज्ञान एवं दृष्टिकोणों को प्राप्त करता है जो मनुष्य के जीवन की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जरूरी है।” .

7. स्किनर (Skinner): के अनुसार, “व्यवहार ग्रहण की प्रगतिशील प्रक्रिया ही सीखना है।”

दी गई परिभाषाओं या विचारों के अनुसार सीखना अपने पर्यावरण में परिवर्तन, क्रियाशीलता और पर्यावरण की देन है। सीखना व्यक्ति में आए उस परिवर्तन को कहा जाता है जो किसी विशेष अनुभवों को प्राप्त करने पर उपलब्ध होता है। मनुष्य जिन मूल प्रवृत्तियों में जन्म लेता है, वे जिंदगी के संघर्ष के लिए काफी नहीं होती। इसलिए मुश्किल दशाओं और माहौल में नई प्रतिक्रियाएँ सीखनी पड़ती हैं। सीखने वाले को प्रेरणा उत्साहित करती है। प्रेरणा के कारण व्यक्ति कार्यों का चुनाव करता है। यह चुनाव बाहरी और आंतरिक होता है। सीखने में अंगों का योगदान होने के कारण व्यक्ति में परिवर्तन होता है।

सीखने के नियम (Laws of Learning):
शारीरिक शिक्षा में नई प्रक्रियाओं के सीखने से मनुष्य नए-नए तजुर्बे या अनुभव प्राप्त करता है। कुछ खिलाड़ी खास क्रिया में महारत हासिल करने में कठिनाई अनुभव करते हैं, परंतु कुछ खिलाड़ी शीघ्र ही महारत हासिल कर लेते हैं। सीखने संबंधी कई विद्वानों; जैसे थॉर्नडाइक, वाटसन, पैवलॉव और कोहलर आदि ने कई सिद्धांत दिए हैं। इन नियमों का पालन करके खिलाड़ी अपने कौशल को पूर्ण कर सकता है। सीखने के प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं

1. तैयारी का नियम (Law of Readiness):
तैयारी के नियम में जो खिलाड़ी या व्यक्ति प्रशिक्षण के लिए चुना गया है क्या वह शारीरिक, मानसिक और भावात्मक पक्ष से उस काम को सीखने के लिए तैयार है या नहीं। जब किसी व्यक्ति में कुछ सीखने की इच्छा होती है तो उसे सीखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, नहीं तो वह कुछ भी नहीं सीख सकता। इसलिए अगर कोई खिलाड़ी खेल सीखने के लिए तैयार हो और उसकी इच्छा या शौक भी उसे सीखने के लिए प्रेरित करें तो वह मुश्किल-से-मुश्किल क्रिया भी बड़ी आसानी से सीख सकता है। सीखने में प्रेरणा का बहुत योगदान होता है। इसलिए बच्चे को पूर्ण तौर पर प्रेरित करना आवश्यक है। असल में वह जो कुछ कर रहा है, उसके लक्ष्य के बारे में जानकारी होनी जरूरी है। परंतु कई बार बहुत ज्यादा प्रेरणा खिलाड़ी की कुशलता में रुकावट पैदा कर सकती है।

2. अभ्यास का नियम (Law of Exercise):
अभ्यास का नियम खेल सीखने में बहुत महत्त्वपूर्ण है। अभ्यास से मुश्किल-से-मुश्किल खेल आसानी से सीखा जा सकता है। बार-बार अभ्यास करने से खिलाड़ी की खेल-कुशलता में बढ़ोतरी होती है। अभ्यास के इस नियम को ‘प्रयोग’ और ‘गैर-प्रयोग’ का नियम भी कहा जाता है। प्रयोग के नियम के बारे में थॉर्नडाइक ने इस प्रकार विचार रखे हैं, “जब किसी स्थिति और प्रतिक्रिया में परिवर्तन हो सकने वाला संबंध बन जाता है और बाकी सभी चीजें उस प्रकार ही रहती हैं तो उस संबंध की शक्ति ज्यादा होती है।” गैर-प्रयोग के नियम के बारे में उसके विचार इस प्रकार हैं, “जब स्थिति और प्रतिक्रिया में लंबे समय तक परिवर्तन हो सकने वाला संबंध कायम किया जाता है तो उस संबंध की शक्ति कम हो जाती है।” इस नियम को दोहराई का नियम भी कहा जाता है।

3. प्रभाव का नियम (Law of Effect):
खेल बच्चों की मूल प्रवृत्ति है। प्रत्येक बच्चा खेल में मन की आजादी प्राप्त करना चाहता है। प्रभाव के नियम को ‘सजा’ और ‘इनाम’ का सिद्धांत (Law of Punishment and Reward) भी कहा जाता है। यह प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक थॉर्नडाइक का विचार है कि अगर स्थिति और हंगामे के दौरान संबंध सुखमयी है तो उस संबंध का प्रभाव शक्तिशाली होता है। परंतु अगर संबंध का प्रभाव दुखदायी है तो प्रभाव कमजोर हो जाता है। अगर अच्छी तरह जाँच करके देखा जाए तो सब कुछ क्रिया के परिणाम पर निर्भर करता है।

अगर बच्चा जिस क्रिया में भाग ले रहा होता है, वह क्रिया उसको अच्छी लगती है तो उसका प्रभाव भी अच्छा पड़ता है। बच्चा उसको खुशी-खुशी सीखना पसंद करता है और उसको बार-बार करके प्रसन्नता अनुभव करता है। परंतु अगर किसी क्रिया का प्रभाव दुखमयी है या वह क्रिया जो उसको अच्छी नहीं लगती है तो वह उसको सीखने से इंकार कर सकता है, बेशक यह प्रभाव उसकी अपनी गलती या घटिया सम्मान के कारण हो । बच्चे केवल उन क्रियाओं को करके खुश होते हैं, जिनका प्रभाव शारीरिक और मानसिक तौर पर खुशी देता है।

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प्रश्न 11.
सीखने में बढ़ोतरी करने वाले कारकों या तत्त्वों की व्याख्या कीजिए। उत्तर-सीखने में बढ़ोतरी करने वाले प्रमुख कारक या तत्त्व निम्नलिखित हैं
1. प्रशिक्षक का व्यक्तित्व (Personality of the Trainer):
प्रशिक्षक का व्यक्तित्व सीखने वाले पर गहरा प्रभाव डालता है। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक बच्चों के लिए आदर्श होता है। सीखने वाला उसके प्रत्येक कथन को मानता है और उसके अनुसार चलने की कोशिश करता है। इस प्रकार छात्र हमेशा ही अध्यापक के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर आने वाले समय की अच्छी नींव रखते हैं।

2. शारीरिक योग्यता (Physical Fitness):
शारीरिक योग्यता शारीरिक क्रियाओं के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। जो व्यक्ति शारीरिक तौर पर सक्षम नहीं है या उसमें शारीरिक योग्यता की कमी है तो उसकी सभी शारीरिक प्रणालियाँ ठीक तौर पर काम नहीं करेंगी और उसे कोई भी क्रिया सीखने के लिए कष्ट अनुभव होगा। शारीरिक क्रियाओं को सीखने में शारीरिक योग्यता एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

3. व्यक्तिगत भिन्नता (Individual Differences):
प्रत्येक व्यक्ति में भिन्नताएँ होती हैं। कुछ व्यक्ति किसी क्रिया को जल्दी सीख जाते हैं और कुछ उसको सीखने में काफी समय लगा देते हैं। यही भिन्नताएँ व्यक्ति को व्यक्ति से अलग करती हैं।

4. सीखने के लिए सही समय (Right Time for Learning):
सीखने का सही समय हर व्यक्ति पर निर्भर करता है। अगर सीखने में रुचि हो और समय भी अनुकूल हो तो सीखना आसान और सार्थक होता है। शारीरिक शिक्षा की क्रियाएँ सुबह या शाम की जा सकती हैं। अगर इन क्रियाओं को समय से हटकर किया जाए तो आवश्यक है कि खिलाड़ी की निपुणता पर प्रभाव पड़ेगा और अच्छे नतीजे प्राप्त करने में कुछ मुश्किल आएगी।

5. खेलों में रुचि (Interest in Games):
किसी भी काम को सीखने के लिए रुचि बहुत महत्त्वपूर्ण है। रुचि किसी खेल को ध्यान से सीखने और अपनी त्रुटियाँ सुधारने में सहायक होती है। रुचि जैसे तत्त्व खिलाड़ी को अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों के लिए प्रेरित करते हैं।

6. दिशा (Direction):
सीखने में सबसे महत्त्वपूर्ण बात खिलाड़ी की दिशा पर निर्भर करती है। दिशाहीन व्यक्ति कभी भी अपनी मंजिल को हासिल नहीं कर सकता। शारीरिक शिक्षा और खेलों में दिशा खास महत्त्व रखती है। किसी भी खेल में बड़े स्तर की निपुणता के लिए खिलाड़ी को अपनी दिशा, मंजिल और लक्ष्य का ज्ञान होना जरूरी है, नहीं तो वह खिलाड़ी जिंदगी-भर दिशाहीन होकर खेल निपुणता से वंचित रह सकता है।

7. अभ्यास और दोहराई (Practice and Revision):
अभ्यास और दोहराई का नियम सीखने में बहुत आवश्यक है। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक नई तकनीकों की जानकारी से क्रियाओं में अधिक-से-अधिक अभ्यास करने पर जोर देता है। अभ्यास और दोहराई का नियम व्यक्ति में आत्म-विश्वास पैदा करता है, जिससे सीखने में बढ़ोतरी होती है।

8. सही समय पर सुधार (Correction at Proper Time):
सीखने में त्रुटियाँ होना स्वाभाविक है। सीखने वाले को अगर उसकी त्रुटियों का एहसास न कराया जाए तो सीखना अधूरा रह जाता है । बार-बार गलती करना सीखने वाले का स्वभाव बन जाता है जिसमें परिवर्तन लाना मुश्किल हो जाता है। सीखने वाले की त्रुटियों का समय पर सुधार कर उसकी निपुणता में बढ़ोतरी करनी चाहिए।

9. सीखने संबंधी सुविधाएँ (Facilities for Learning):
सुविधाएँ प्रत्येक क्षेत्र में बहुत योगदान देती हैं, परंतु सुविधाएँ शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में अधिक आवश्यक हैं। शारीरिक शिक्षा की क्रियाओं में आने वाली मुश्किलें; जैसे ठीक तरीके से प्रशिक्षण, शारीरिक योग्यता, मानसिक योग्यता, अधिक-से-अधिक आधुनिक युग की सुविधाएँ आदि देकर खिलाड़ी की खेल-कुशलता में बढ़ोतरी की जा सकती है। अमेरिका, रूस, जर्मनी, चीन, इंग्लैंड, हॉलैंड जैसे देशों के खिलाड़ी अच्छी सुविधाओं के कारण सभी अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में अच्छा प्रदर्शन करते हैं।

10. आवश्यक जानकारी (Adequate Knowledge):
सीखना तभी सार्थक हो सकता है अगर सीखने वाले को उस काम या विषय के बारे में आवश्यक जानकारी हो। अधूरा ज्ञान सीखने वाले में हीन भावना पैदा कर सकता है और व्यक्तित्व के विकास में रुकावट बन जाता है। शारीरिक शिक्षा का संबंध क्रियाओं से है। क्रियाओं के बारे में पूर्ण जानकारी, आधुनिक तकनीक का आवश्यक ज्ञान खिलाड़ी की निपुणता में बढ़ोतरी करता है।

11. देखने और सुनने वाली वस्तुओं की सुविधाएँ (Facilities of Audio-Visual Aids):
देखने और सुनने वाली वस्तुओं की सुविधाएँ मनुष्य के दिलो-दिमाग पर गहरा प्रभाव डालती हैं। आजकल की शारीरिक शिक्षा में इसका महत्त्व और भी बढ़ गया है। प्रशिक्षक की ओर से बार-बार समझाए जाने पर भी खिलाड़ी उस क्रिया को समझने में असमर्थ होता है। देखने और सुनने वाली वस्तुओं की सुविधाओं से खिलाड़ी आसानी से सीख लेता है।

12. प्रशंसा की भावना (Sense of Appreciation):
प्रशंसा सुनकर अपने मन में खुश होना मनुष्य का स्वभाव है। यह स्वभाव कई बार मनुष्य को प्रगति के रास्ते पर ले जाता है। प्रशंसा करके एक साधारण मनुष्य को भी खेलों के प्रति प्रेरित किया जा सकता है। यह भावना खिलाड़ी को मुश्किल क्रिया सीखने और असंभव काम को संभव करने की प्रेरणा देती है।

प्रश्न 12.
खेल कुशलता को प्रभावित करने वाले मनोवैज्ञानिक तत्त्वों या कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
खेल कुशलता को प्रभावित करने वाले मनोवैज्ञानिक तत्त्व या कारक निम्नलिखित हैं
1. खिलाड़ी की रुचि (Interest of the Player):
खेलों को ठीक ढंग से सीखने के लिए खिलाड़ी की रुचि बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। खेल-कुशलता को बढ़ाने के लिए खेल की बारीकियाँ तभी सीखी जा सकती हैं अगर खिलाड़ी उस खेल में अधिक-से-अधिक रुचि रखता हो। अगर खिलाड़ी की खेल में रुचि नहीं है तो सफलता का मिलना मुश्किल हो जाता है। खेल-कुशलता में बढ़ोतरी तभी हो सकती है अगर खिलाड़ी की रुचि सीखते समय क्रिया पर केंद्रित हो। इसलिए रुचि और कुशलता में गहरा संबंध होता है।

2. सहनशीलता (Tolerance):
सहनशीलता का खेल-कुशलता पर सीधा असर पड़ता है। सहनशील खिलाड़ी ही हारी हुई बाजी को जीत में बदल सकता है। सहनशीलता खिलाड़ी में हिम्मत व धैर्य जैसे गुण पैदा करती है। सहनशील खिलाड़ी हार-जीत को एक-समान समझता है क्योंकि खेल में हार-जीत निश्चित होती है। इस प्रकार सहनशीलता खिलाड़ी की खेल-कुशलता को सबसे अधिक प्रभावित करती है।

3. संवेगों पर नियंत्रण (Control over Emotions):
संवेगों का खिलाड़ी की खेल-कुशलता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। खेल के दौरान दूसरी टीम के खिलाड़ी की कोशिश होती है कि अच्छे खिलाड़ी को भावात्मक तौर पर प्रभावित किया जाए ताकि वह अपनी अच्छी कुशलता न दिखा सके। अगर अच्छा खिलाड़ी अपने संवेगों पर काबू रखता है तो निश्चित ही वह अपनी अच्छी कुशलता दिखा सकता है। खेल के दौरान संवेगों पर संतुलन रखना जरूरी है क्योंकि कई बार जख्मी होना, दूसरे खिलाड़ी द्वारा बुरे शब्दों का प्रयोग, थकावट, लोगों का शोर संवेगों को प्रभावित करता है। संतुलित संवेगों वाला खिलाड़ी ही खेल के दौरान अच्छी खेल कुशलता का प्रदर्शन कर सकता है।

4. आत्म-विश्वास (Self-Confidence):
खिलाड़ी द्वारा आत्म-विश्वास से खेल सीखने और उसका बार-बार अभ्यास करने से आत्म-विश्वास में बढ़ोतरी होती है। कई बार सीखने वाली क्रिया मुश्किल होती है और कई बार अन्य कारणों से अन्य मुश्किलें पैदा होती हैं, परंतु खिलाड़ी का आत्म-विश्वास मुश्किल क्रिया को आसान क्रिया में बदल देता है। खेल में ऐसे कई उदाहरण हैं कि कई बार अच्छी टीम आत्म-विश्वास खो जाने के कारण मैच हार जाती है और कमजोर टीम आत्म-विश्वास पैदा करके जीत जाती है। इसलिए आत्म-विश्वास प्रत्येक खिलाडी के लिए बहत जरूरी है।

5. खिलाड़ी की बौद्धिक शक्ति (Intelligence of the Player):
खिलाड़ी की बौद्धिक शक्ति और कुशलता का परस्पर सीधा संबंध है। एक अच्छी बुद्धि रखने वाला खिलाड़ी हारती हुई टीम को अपनी ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण रखकर बढ़िया नतीजा निकालने में सक्षम होता है। खेल के दौरान कई प्रकार की मुश्किलें उत्पन्न होती हैं, परंतु बुद्धिमान खिलाड़ी उन समस्याओं का उचित हल जल्दी ही निकाल लेता है। बुद्धिमान खिलाड़ी अपने अनुभवों के प्रयोग से अपनी कुशलता में बढ़ोतरी कर लेता है।

6. खिलाड़ी के लिए प्रेरणा (Motivation for Player):
खिलाड़ी की खेल-कुशलता पर प्रेरणा का गहरा असर पड़ता है। कई बार खिलाड़ी को क्रिया सीखने के बाद मुश्किलें आती हैं। प्रशिक्षक को प्रेरणा से खिलाड़ी इन मुश्किलों पर नियंत्रण पा सकता है। प्रेरणा खेल से पहले और खेल के दौरान खेल-कुशलता को काफी प्रभावित करती है।

7. खिलाड़ी की अभिवृत्ति (Attitude of Player):
खेलों में अभिवृत्ति (Attitude) की बहुत महत्ता है। अगर खिलाड़ी की अभिवृत्ति सीखने की है तो उसका सीखना सरल और आसान हो सकता है। अभिवृत्ति सीखने पर असर डालती है। अगर खिलाड़ी के स्वभाव में एकरूपता नहीं है या तो वह न मानने वाली वृत्ति रखता है या वह भावात्मक प्रवृत्ति का शिकार होता है। वह एक विशेष दायरे से बाहर नहीं निकलना चाहता। खेल में बढ़िया व्यवहार भी महत्त्वपूर्ण होता है। बढ़िया व्यवहार खेल की कुशलता में बढ़ोतरी करता है।

8. साहस (Courage):
खेलों में साहस की अपनी महत्ता है। खेल में साहस रखने वाला ही जीतता है। साहस छोड़ने वाले के लिए जीत प्राप्त करना कठिन होता है। अगर देखा जाए तो जिंदगी के प्रत्येक पहलू में साहस की आवश्यकता होती है, परंतु खेलों में इसका विशेष महत्त्व है। खेलों में खेल से पहले और खेल के दौरान साहस रखना अत्यंत जरूरी है।

9. मुकाबले की भावना (Spirit of Competition):
खिलाड़ियों को वैज्ञानिक ढंग से इस प्रकार क्रियाओं का अभ्यास करवाना चाहिए कि उनमें मुकाबले की भावना जागृत हो सके। मुकाबला जिंदगी के प्रत्येक पहलू में आवश्यक है। मुकाबले के समय साहस छोड़ देना जिंदगी की सबसे बड़ी हार है। मुकाबला करने की भावना के लिए अभ्यास की अत्यंत आवश्यकता है। खेलों में मुकाबले की भावना खिलाड़ी के स्थान को ऊँचा उठाती है। अगर खिलाड़ी में मुकाबले की भावना (Competitive Spirit) नहीं होगी तो उसकी खेल-कुशलता प्रभावित होगी। मुकाबले की भावना खेलों में अहम स्थान रखती है।

10. खिलाड़ी और प्रशिक्षण के ढंग (Players and Learning Process):
व्यक्ति हमेशा जीवन में निरंतर सीखता रहता है। सीखने के नियम व्यक्ति के सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं । अगर कोई खिलाड़ी इन नियमों को सामने रखकर सीखने की कोशिश करता है तो वह अच्छे नतीजे प्राप्त कर लेता है। खिलाड़ी द्वारा किसी खेल को सीखने का ढंग उसकी खेल-कुशलता को प्रभावित करने का मुख्य कारण है। अगर किसी खिलाड़ी के सीखने का ढंग ठीक है तो उसके नतीजे भी ठीक ही निकलते हैं। खेल का प्रशिक्षण खिलाड़ी की खेल-कुशलता पर काफी गहरा प्रभाव डालता है।

11. खिलाड़ी की आदतें (Habits of Player):
खिलाड़ी की आदतें उसकी खेल-कुशलता पर गहरा प्रभाव डालती हैं। खिलाड़ी का समय पर क्रियाएँ करना, सुबह समय पर उठना, रोजाना खेल का अभ्यास करना, अपने कोच, बड़ों और माता-पिता का आदर करना आदि आदतें खेल-कुशलता में बढ़ोतरी करने में सहायक होती हैं। इसके विपरीत, खिलाड़ी का समय पर अभ्यास न करना, नशा करना, कोच की ओर से दिए गए प्रशिक्षण को न अपनाना, नियमों का पालन न करना आदि आदतें खिलाड़ी की खेल-कुशलता को कम करती हैं ।

आदतें खिलाड़ी के व्यवहार और साहस का प्रदर्शन करती हैं। आदतें खिलाड़ी के तौर-तरीके, सामाजिक गुणों, अनुशासन और मेल-मिलाप को असली रूप प्रदान करती हैं। खिलाड़ी को बुरी आदतों से बचना चाहिए और अच्छी आदतों को अपनाकर अपने मान-सम्मान और खेल-कुशलता में बढ़ोतरी करनी चाहिए।

12. जीतने की इच्छा (Will to Win):
मजबूत इरादों वाला खिलाड़ी दिलो-जान से अभ्यास करता है क्योंकि उसमें जीतने की इच्छा होती है। जीत की इच्छा रखने वाला खिलाड़ी अपनी खेल-कुशलता में हमेशा बढ़िया प्रदर्शन करता है।

13. थकावट सहने की क्षमता (Ability to bear Fatigue):
खिलाड़ी खेलों में थकावट होने के बावजूद भी खेल की प्रक्रिया को जारी रखता है। इसे थकावट सहने की क्षमता कहा जाता है। अगर खिलाड़ी थकावट होने के बावजूद भी खेल को जारी रखता है तो निश्चित ही उसकी कुशलता बढ़िया किस्म की कही जाएगी। अगर उसकी थकावट सहने की क्षमता कम है तो उसकी खेल की गति में कमी आ जाएगी और उसकी कुशलता भी प्रभावित होगी।खेलों में अच्छी कुशलता दिखाने के लिए थकावट सहन करने की क्षमता बहुत जरूरी है, परन्तु अधिक थकावट होने पर खेल को जारी रखना हानिकारक हो सकता है।

14. ध्यान (Concentration):
खेल को सीखना और सीखने के बाद क्रियाओं का अभ्यास ध्यानपूर्वक करना बहुत महत्त्वपूर्ण है। ध्यान से सीखी हुई क्रिया लंबे समय तक असर करती है क्योंकि खिलाड़ी खेल की बारीकियों से परिचित हो जाता है। खेल के दौरान ध्यान न देने से काफी गलतियाँ होती हैं जो खेल की कुशलता पर काफी असर डालती हैं। आधुनिक युग एक तकनीकी युग है। इसमें प्रत्येक खिलाड़ी नए ढंगों से प्रशिक्षण प्राप्त करता है। ध्यान न देने वाला खिलाड़ी आधुनिक प्रशिक्षण से पीछे रह जाता है, जिसके कारण उसकी खेल-कुशलता में कमी आ जाती है।

15. आराम (Relaxation):
खेल में तनाव का आना स्वाभाविक है, परंतु जो खिलाड़ी मानसिक और शारीरिक तनाव-रहित होता है, वह हमेशा ही बुलंदी को छूता है। खेल के दौरान शरीर की सभी प्रणालियाँ प्रभावित होती हैं, उनमें उत्तेजना होती है। अगर खिलाड़ी इन पर नियंत्रण कर लेता है तो निश्चित ही वह अपने खेल की कुशलता बढ़ा सकता है।खेल के दौरान सभी प्रणालियों को आराम की हालत में रखना तभी सार्थक हो सकता है अगर खिलाड़ी क्रियाओं को बार-बार करने का नियम कायम करता है। उपर्युक्त सभी कारक किसी भी खिलाड़ी की खेल-कुशलता को प्रभावित कर सकते हैं।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 13.
गुरु तथा शिष्य के बीच आपसी संबंधों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
अध्यापक व छात्रों के बीच सह-संबंधों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शिक्षा से हमें बहुत अनुभव सीखने को मिलते हैं । यह उन साधनों का वर्णन करती है जिसके द्वारा लोग योग्यता और ज्ञान अर्जित करते हैं। बच्चों को शिक्षित करने में अध्यापकों का मुख्य उत्तरदायित्व होता है। सीखना गुरु और शिष्य के संबंध पर निर्भर करता है। गुरु और शिष्य के बीच स्नेह और घनिष्ठता का संबंध सीखने को उत्साहित करता है।

गुरु और शिष्य के बीच संबंध सहृदयक होना चाहिए ताकि अध्यापक उनको अच्छा मार्गदर्शन प्रदान कर सके। अच्छा मार्गदर्शक केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है यदि गुरु और शिष्य के बीच संबंध अच्छा होगा। गुरु और शिष्य के बीच अच्छे संबंध के लिए निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण बातें आवश्यक हैं
1. अध्यापक एक आदर्श (Teacher as a Model):
अध्यापक को छात्र के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए, क्योंकि छात्रों के द्वारा उसका अनुसरण किया जाता है। उसका व्यक्तित्व एक आदर्श व्यक्ति जैसा होना चाहिए। उसे अपनी सफलता के अनुभवों को अपने छात्रों के साथ बाँटना चाहिए।

2. दृढ़-निश्चयी (Firm Determinant):
अध्यापक के व्यक्तित्व में दृढ़-निश्चयी का गुण होना चाहिए। उसे अपने सिखाने वाले ढंग के प्रति पूर्ण रूप से दृढ़-निश्चयी होना चाहिए। एक दृढ़-निश्चय वाला अध्यापक कभी भी अपने कार्य को अधूरा नहीं छोड़ता। इससे छात्रों पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है। शारीरिक शिक्षा में भी प्रशिक्षक अगर प्रशिक्षण प्रक्रिया को अच्छी तरह लागू करने के प्रति दृढ़-निश्चयी है तो वह उस प्रशिक्षण को प्रभावशाली ढंग से प्रदान कर सकता है।

3. सहयोगपूर्ण तथा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार (Co-operative and Sympathetic Behaviour):
एक अध्यापक को छात्रों के प्रति सहयोगपूर्ण तथा सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए। ऐसा दृष्टिकोण छात्रों पर अमिट छाप छोड़ता है जिससे वांछित लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता मिलती है। अध्यापक का सहानुभूतिपूर्ण तथा स्नेही दृष्टिकोण छात्रों द्वारा पसंद किया जाता है। इसके साथ-साथ शिक्षण प्रक्रिया भी दिलचस्प बनती है। अध्यापक और छात्र के बीच द्वेष तथा नफरत का संबंध शिक्षण प्रक्रिया में रुकावट उत्पन्न करता है।

4. अच्छा व्यक्तित्व (Good Personality):
अध्यापक के अंदर ऐसे गुण होने चाहिएँ जो छात्रों को प्रभावशाली ढंग से प्रभावित कर सकें। उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली होना चाहिए। अच्छा व्यक्तित्व हमेशा ही छात्रों द्वारा सराहनीय होता है। गतिशील व्यक्तित्व छात्रों पर अच्छा प्रभाव डालता है।

5. विषय का ज्ञान (Knowledge of the Subject):
अध्यापक को अपने विषय में पारंगत होना चाहिए और उस विषय में अध्यापक का ज्ञान विस्तृत होना चाहिए। किसी विशेष विषय के बारे में गहन ज्ञान हमेशा अच्छा प्रभाव डालता है। अध्यापक को सभी नवीनतम जानकारियों से सुसज्जित होना चाहिए। ऐसे अध्यापक का छात्रों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

6. अच्छा वक्ता (Good Orator):
अध्यापक को एक अच्छा वक्ता होना चाहिए। उनके पास अपने विचारों को प्रस्तुत करने के लिए शब्दों का विस्तृत भंडार होना चाहिए। भली-भांति प्रकार से तैयार भाषण छात्रों पर अच्छा प्रभाव डाल सकता है। अध्यापक को भाषा तथा शब्दावली में दक्ष होना चाहिए।

7. निष्पक्ष (Impartial):
अध्यापक को सभी के प्रति निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जो छात्रों के विश्वास को जीत सकता है। पक्षपातपूर्ण व्यवहार सदा द्वेष तथा नफरत की भावना पैदा करता है। एक टीम के लिए अंपायर तथा रैफरी का निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए, नहीं तो विवाद खड़ा हो सकता है।

8. सुहृदयता (Sincerity):
अध्यापक को अपना कार्य मन से करना चाहिए। उन्हें अपने कार्य तथा छात्रों के प्रति ईमानदार होना चाहिए। छात्र हमेशा एक समझदारीपूर्ण सलाह को मानते हैं।

9. ईमानदार तथा साहसी (Honest and Courageous):
ईमानदार अध्यापक का केवल छात्र ही सम्मान नहीं करते बल्कि समाज में भी उसको सम्मान दिया जाता है। ईमानदार अध्यापक स्कूल की सम्पत्ति तथा फण्ड का विचारणीय ढंग से प्रयोग करता है। छात्रों में अनुशासन को कायम रखने के लिए अध्यापक को साहसी भी होना चाहिए।

10. नियमित तथा समय का पाबंद (Regular and Punctual):
अध्यापक को नियमित तथा समय का पाबंद होना चाहिए। अनियमितता छात्रों पर बुरा प्रभाव डालती है। इसलिए एक आदर्श अध्यापक को समय का पाबंद होना चाहिए।
संक्षेप में अध्यापक को सदा छात्रों की क्षमता, योग्यता और रुचि को समक्ष रखकर ही उनको पढ़ाना चाहिए। अध्यापक को छात्रों का मूल्यांकन करते समय उनके प्रत्येक पक्ष की ओर निष्पक्ष रूप से ध्यान देना चाहिए। अध्यापक को सदा छात्रों को उत्साहित करना चाहिए ताकि वे किसी भी धारणा को स्पष्ट करने में झिझक महसूस न करें।

लघूत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मनोविज्ञान (Psychology) शब्द यूनानी भाषा के दो शब्दों का मेल है। ये दो शब्द ‘साइके’ (Psyche) और ‘लोगस’ (Logos) हैं। साइके का अर्थ है-आत्मा (Soul) और लोगस (Logos) का अर्थ-बातचीत या विज्ञान है। इसलिए ‘Psychology’ का शाब्दिक अर्थ आत्मा का विज्ञान है। प्लेटो के अनुसार, “मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।” जैसे-जैसे समय बदलता गया, इसके अर्थों में वांछित परिवर्तन आते गए। सबसे पहले मनोविज्ञान को आत्मा का ज्ञान कहा गया। परंतु इस विचारधारा की मनोवैज्ञानिकों की ओर से आलोचना की गई।

फिर मनोविज्ञान को आत्मा की बजाय मन का विज्ञान कहा जाने लगा। 19वीं शताब्दी के मध्य में मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान कहा। उनका मानना था कि चेतना भी मन का एक भाग है। कोई भी व्यक्ति अपनी मानसिक प्रक्रियाओं के बारे में जागृत हो सकता है, परंतु दूसरों के बारे में सचेत होना कोई जानकारी नहीं हो सकती। अंत में मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान (Science of Behaviour) के रूप में स्वीकार किया गया।

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान की कोई पाँच विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
मनोविज्ञान की पाँच विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार एवं संबंधों की प्रक्रिया है।
(2) यह व्यक्ति के व्यवहार में भिन्नता लाने में सहायक होता है।
(3) यह व्यक्ति के परिवेश के प्रति किए गए व्यवहार का क्रमिक अध्ययन है।
(4) यह मानव के व्यवहार को नियंत्रित रखने की विधि है।
(5) यह व्यक्ति के संवेगात्मक, ज्ञानात्मक एवं क्रियात्मक क्रियाओं का अध्ययन है।

प्रश्न 3.
खेल मनोविज्ञान के उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर;
खेल मनोविज्ञान के उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) शरीर-क्रियात्मक क्षमताओं में बढ़ोत्तरी करना।
(2) गति कौशल को सीखाना।
(3) संवेगों या भावनाओं पर नियंत्रण करना।
(4) खिलाड़ी को प्रतियोगिताओं के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करना।
(5) व्यवहार को समझने में सहायता करना।

प्रश्न 4.
अभिप्रेरणा के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अभिप्रेरणा मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है जो निम्नलिखित है
1. आंतरिक अथवा प्राकृतिक अभिप्रेरणा-आंतरिक अभिप्रेरणा को प्राकृतिक अभिप्रेरणा भी कहा जाता है। इस अभिप्रेरणा का संबंध प्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति की प्राकृतिक इच्छाओं, स्वभाव तथा आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ है। कोई भी प्रेरित व्यक्ति किसी काम को इसलिए करता है क्योंकि उसको आंतरिक प्रसन्नता व खुशी मिलती है। शिक्षा की प्रक्रिया में इस प्रकार की प्रेरणा का बहुत महत्त्व होता है, क्योंकि इससे प्राकृतिक रुचि पैदा होती है जो अंत तक बनी रहती है।

2. बाहरी या कृत्रिम अभिप्रेरणा-बाहरी अभिप्रेरणा अप्राकृतिक अथवा कृत्रिम होती है। इस अभिप्रेरणा में प्रसन्नता का स्रोत कार्य में नहीं छिपा होता। इसमें मनुष्य मानसिक प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए कोई कार्य नहीं करता, अपितु उद्देश्य की प्राप्ति अथवा इनाम जीतने के लिए कार्य करता है। कोई अच्छा स्तर हासिल करना, आजीविका कमाने के लिए कार्य सीखना, प्रशंसा हासिल करने के लिए कार्य करना आदि क्रियाएँ इस अभिप्रेरणा वर्ग में आती हैं।

प्रश्न 5.
रुचि बढ़ाने के मुख्य उपायों या तरीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रुचि को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित उपायों या तरीकों का प्रयोग किया जा सकता है
1. भिन्न-भिन्न शिक्षण विधियाँ:
रुचि को बढ़ाने के लिए शिक्षक को भिन्न-भिन्न शिक्षण-विधियों का प्रयोग करना चाहिए। उसको शिक्षण-विधि में चार्ट, ग्राफ़, सहायक सामग्री, स्लाइड्स व चलचित्रों का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा करने से विद्यार्थियों में विषय-वस्तु या खेल-कौशल को समझने में रुचि बढ़ जाती है।

2. विषय-वस्तु:
यदि विद्यार्थियों को कोई विषय-वस्तु सिखानी हो तो सबसे पहले उस विषय-वस्तु के लक्ष्यों व उद्देश्यों से विद्यार्थियों को परिचित (Acquaint) करा देना चाहिए। इससे उनकी रुचि उस विषय-वस्तु में बढ़ जाएगी।

3. वातावरण:
जिस वातावरण में कोई विषय-वस्तु सिखाई जाती है उस वातावरण का प्रभाव रुचि पर अवश्य पड़ता है। यदि वातावरण अच्छा है तो सीखने में खिलाड़ियों या विद्यार्थियों की रुचि अधिक होगी।अतः शिक्षक को अनुकूल वातावरण में ही कोई कौशल (Skill) सिखाना चाहिए।

4. व्यक्तित्व:
शिक्षक का व्यक्तित्व यदि अच्छा है तो बच्चों की रुचि पर उसके व्यक्तित्व का अच्छा प्रभाव पड़ता है।

5. सिखाने की कुशलता:
यदि किसी कौशल (Skill) को ‘सरल से कठिन’ (Simple to Complex) के नियम के आधार पर सिखाया जाता है तो बच्चों में सीखने के प्रति रुचि अधिक होगी।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 6.
मनोविज्ञान शारीरिक शिक्षा को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
मनोविज्ञान का उद्देश्य व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करना है और शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है। व्यक्ति का सर्वांगीण विकास तब तक संभव नहीं, जब तक उसके व्यवहार का पूर्ण ज्ञान नहीं हो जाता। मनोविज्ञान शारीरिक शिक्षा की सभी गतिविधियों व क्रियाओं को प्रभावित करता है। अतः शारीरिक शिक्षा की प्रत्येक प्रक्रिया मनोविज्ञान पर निर्भर है।

इसकी मदद से ही छात्रों को उनकी रुचियों, इच्छाओं व आवश्यकताओं के अनुसार उचित शिक्षा प्रदान की जा सकती है और उनका सर्वांगीण विकास किया जा सकता है। मनोविज्ञान शारीरिक शिक्षा को बहुत प्रभावित करता है। मनोविज्ञान द्वारा व्यक्ति के व्यवहार तथा उसकी प्रतिक्रिया सीखने के तरीकों का अध्ययन किया जाता है। अनेक मनोवैज्ञानिक तत्त्व; जैसे अभिवृत्ति, रुचि, प्रेरणा आदि शारीरिक शिक्षा को प्रभावित करते हैं।

मनोवैज्ञानिक तत्त्वों द्वारा खिलाड़ियों के आंतरिक व बाहरी स्वभाव या व्यवहार को समझा जाता है। जब कोई खिलाड़ी या व्यक्ति किसी खेल या व्यायाम में भाग लेता है तो उसके मन व व्यवहार की स्थिति उसकी खेल योग्यता को प्रभावित करती है। अत: मनोविज्ञान के तत्त्वों या पक्षों को ध्यान में रखकर या इसके सिद्धांतों की पालना करके शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में बढ़िया परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

प्रश्न,7.
अभिवृत्ति की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? अभिवृत्ति के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अभिवृत्ति की अवधारणा-खेल के प्रति खिलाड़ी की अभिवृत्ति (Attitude) का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि खिलाड़ी की अभिवृत्ति अड़ियल अथवा झगड़ालू है तो वह व्यर्थ की हलचलों का शिकार हो जाता है जिसका उसके खेल कौशल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए बढ़िया व्यवहार खेल-कुशलता को बढ़ाता है, परंतु विपरीत अभिवृत्तियाँ खेल-कुशलता पर धब्बा लगा देती हैं। अभिवृत्ति जन्मजात नहीं होती, बल्कि अर्जित होती है। अभिवृति एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति या खिलाड़ी का व्यक्तित्व उजागर होता है।

कोई भी व्यक्ति अपने आस-पास के वातावरण से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। वातावरण के अनुसार ही हमारी अभिवृत्ति बन जाती है। अभिवृत्ति के बनने में शिक्षा, अनुभव व वातावरण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। समय के साथ-साथ हमारी अभिवृत्ति भी बदलती रहती है। अभिवृत्ति की परिभाषाएँ-अभिवृत्ति की निम्नलिखित परिभाषाएँ हैं

1. आलपोर्ट के अनुसार, “अभिवृत्ति या मनोवृत्ति मानसिक एवं तटस्थ नियुक्ति की तत्परता की एक ऐसी स्थिति है जो अनुभवों द्वारा निर्धारित होती है तथा जो उन समस्त वस्तुओं व परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाओं को प्रेरित एवं निर्देशित करती है, जिनसे वह अभिवृत्ति संबंधित है।”

2. ट्रैवर्स के अनुसार, “अभिवृत्ति किसी कार्य को करने के लिए सहमति है जिससे व्यवहार को एक निश्चित दिशा मिल जाती है।” अभिवृत्ति के प्रकार-अभिवृत्ति निम्नलिखित दो प्रकार की होती है
(i) सकारात्मक अभिवृत्ति-यदि किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक है तो हम कह सकते हैं कि हमारी अभिवृत्ति सकारात्मक है।
(ii) नकारात्मक अभिवृत्ति-यदि किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति हमारा दृष्टिकोण नकारात्मक है तो उस वस्तु या व्यक्ति के प्रति हमारी अभिवृत्ति नकारात्मक होगी।

प्रश्न 8.
हमें मनोविज्ञान की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
आधुनिक युग में मनोविज्ञान प्रभावशाली एवं व्यावहारिक विषय के रूप में प्रकट हुआ है। अनेक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों; जैसे बिने, साइमन व फ्रायड आदि ने मानवीय व्यवहार की नवीन व्याख्या की है। आज मनोविज्ञान का स्तर निरंतर बढ़ रहा है। आज के भौतिक युग में इसकी बहुत आवश्यकता है, क्योंकि यह निम्नलिखित प्रकार से हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है
(1) मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार के प्रत्येक पक्ष का बारीकी से अध्ययन करता है; जैसे भौतिक व्यवहार, सामाजिक व्यवहार आदि।

(2) मनोविज्ञान ने हमें ऐसे नियम एवं सिद्धांत प्रदान किए हैं जो हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं।

(3) मनोविज्ञान हमारे ज्ञान एवं बुद्धि में वृद्धि करता है। इससे हमारी कल्पना-शक्ति, तर्क-शक्ति, स्मरण-शक्ति का विकास होता है, क्योंकि इसमें ज्ञानात्मक एवं तर्कात्मक क्रियाओं पर अध्ययन किया जाता है।

(4) हमें व्यावहारिक कुशलता प्राप्त करने के लिए मनोविज्ञान की बहुत आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि इसमें व्यवहार पर अध्ययन किया जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का कोई भी व्यवहार शुद्ध रूप से मनोविज्ञान पर ही आधारित होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि मनोविज्ञान हमें व्यवहार कुशल बनाता है। एक व्यवहार कुशल व्यक्ति ही सफलता प्राप्त कर सकता है।

(5) शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। आज पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियाँ मनोवैज्ञानिक मान्यताओं

प्रश्न 10.
मनुष्य की मनो-शारीरिक एकता की अवधारणा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जिसको समाज में रहकर अपना जीवन निर्वाह करना पड़ता है। इसको समाज में रहने के लिए दूसरे के साथ विचार-विमर्श, कौशल व्यवहार और सहयोग करना पड़ता है। मनुष्य के व्यवहार को हम दो भागों में बाँट सकते हैं, एक भाग आंतरिक है जिसे मानसिक कहा जाता है और दूसरा बाहरी जिसे शारीरिक कहा जाता है।

मानसिक अवस्था शारीरिक अवस्था को प्रभावित करती है और शारीरिक अवस्था मानसिक अवस्था को प्रभावित करती है अर्थात् शारीरिक एवं मानसिक-दोनों अवस्थाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं जिससे इनमें एकता का समन्वय होता है। इस प्रकार व्यक्ति की मनो-शारीरिक एकता बनती है। मन और शरीर अलग-अलग होते हुए भी एक साथ काम करते हैं। निस्संदेह व्यक्ति शरीर, मन, संवेग और दूसरी बहुत-सी वस्तुओं का मिला-जुला रूप है।

रूसो के कथनानुसार, “जब किसी को प्रशिक्षण दिया जाता है तो यह न केवल शारीरिक या मानसिक दिया जाता है, बल्कि संपूर्ण रूप से दिया जाता है।” शारीरिक काम करते समय मन भी काम करता है। इस तरह मानसिक काम के समय शरीर भी काम कर रहा होता है। हैरिक के अनुसार, “जब बच्चा स्कूल जाता है तो वह संपूर्ण रूप में जाता है। शिक्षा व्यक्ति का संपूर्ण विकास करती है न कि शारीरिक पक्ष को अलग और मानसिक पक्ष को अलग करती है। “जे०एफ० विलियम्स का कथन है, “विचारों पर पाचन क्रिया, रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा और ग्रंथि द्वारा पैदा किए रूपों का प्रभाव पड़ सकता है।”

उपर्युक्त विवरण एवं परिभाषाओं से स्पष्ट है कि हमारा शरीर इस प्रकार का अंग-संस्थान है जिसमें मन को शरीर से अलग नहीं किया जा सकता। दोनों परस्पर एक-दूसरे से संबंधित और एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। यदि शरीर बेचैन है तो इससे मन या मानसिक व्यवहार भी प्रभावित होगा और यदि मन बेचैन है तो इससे शारीरिक क्षमता प्रभावित होगी। इस प्रकार से स्पष्ट है कि व्यक्ति के शरीर और मन के सामूहिक कार्य को मनो-शारीरिक एकता (Psycho-physical Unity) कहा जाता है।

प्रश्न 11.
खेलों में प्रेरणा की भूमिका का संक्षेप में वर्णन करें। अथवा अभिप्रेरणा का खेलों में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
प्रेरणा या अभिप्रेरणा का क्षेत्र सीमित नहीं है। इसकी आवश्यकता सिर्फ खेलों में ही नहीं अपित अन्य क्षेत्र में भी ज़रूरी है। प्रेरणा व्यक्ति में अतिरिक्त शक्ति पैदा करती है जिससे वह प्रत्येक कार्य को स्वयं और खुशी-खुशी करता है । खेलों में विशेषतौर पर प्रेरणा का बहुत बड़ा योगदान है। यह एक ऐसी शक्ति है जो खिलाड़ी को कठिन परिस्थितियों में भी अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रेरित करती है। अच्छी कुशलता के लिए बहुत सारे तत्त्वों का होना ज़रूरी है।

परंतु यदि प्रेरणा वाला तत्त्व निकाल लिया जाए तो शेष सारे तत्त्व व्यर्थ हो जाते हैं । खेलों के प्रति खिलाड़ी को प्रेरित करना एक कठिन तथा लंबे समय का कार्य है। जितने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी होते हैं, वे खेलों के प्रति बहुत अधिक प्रेरित हुए होते हैं। खिलाड़ियों को मनोवैज्ञानिक, थकावट तथा तनाव जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। प्रेरणा के बिना खिलाड़ी प्रतियोगिताओं में अपनी कुशलता अच्छी तरह नहीं दिखा सकता।

प्रेरणा न सिर्फ अच्छी कुशलता के लिए प्रेरित करती है, अपितु कठोर प्रशिक्षण तथा दुःखदायी कठिनाइयों या परिस्थितियों से भी बचाकर रखती है। प्रेरणा सिर्फ नए खिलाड़ियों के लिए ही ज़रूरी नहीं, अपितु यह उन सभी खिलाड़ियों के लिए ज़रूरी होती है जो पहले से ही प्रेरित हुए होते हैं। कई बार वे भी कठिनाइयों के कारण साहस छोड़ देते हैं । उनको फिर से प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करना प्रेरणा का ही कमाल होता है। इस प्रकार प्रेरणा खेलों में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 12.
खेलकूद में खेल मनोविज्ञान किस प्रकार से सहायक होता है?
अथवा
खिलाड़ियों के लिए खेल मनोविज्ञान किस प्रकार से उपयोगी होता है?
उत्तर:
खेलकूद में खेल-मनोविज्ञान निम्नलिखित प्रकार से उपयोगी होता है
(1) खेल मनोविज्ञान खेल प्रतियोगिताओं में शामिल खिलाड़ियों के व्यवहार को समझने में सहायता करता है।
(2) यह खिलाड़ियों की क्रियात्मक क्षमताओं या योग्यताओं को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
(3) यह खिलाड़ियों की भावात्मक या संवेगात्मक समस्याओं को नियंत्रित करने में सहायक होता है।
(4) यह खिलाड़ियों के खेल-स्तर को ऊँचा उठाने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
(5) यह खिलाड़ियों के गतिपरक कौशल को बढ़ाने में सहायक होता है।
(6) यह खिलाड़ियों की अनेक मानसिक समस्याओं को दूर करने में भी सहायक होता है।
(7) यह खिलाड़ियों में अनेक सामाजिक गुणों का विकास करने में भी सहायक होता है।
(8) यह खिलाड़ियों को प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने हेतु मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 13.
सीखने के प्रभाव का नियम’ पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
खेल बच्चों की मूल प्रवृत्ति है। प्रत्येक बच्चा खेल में मन की आजादी प्राप्त करना चाहता है। प्रभाव के नियम को ‘सजा’ और ‘इनाम’ का सिद्धांत भी कहा जाता है। यह प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक थॉर्नडाइक का विचार है कि अगर स्थिति और हंगामे के दौरान संबंध सुखमयी है तो उस संबंध का प्रभाव शक्तिशाली होता है। परंतु अगर संबंध का प्रभाव दुखदायी है तो प्रभाव कमजोर हो जाता है।

अगर अच्छी तरह जाँच करके देखा जाए तो सब कुछ क्रिया के नतीजे पर निर्भर करता है। अगर बच्चा जिस क्रिया में भाग ले रहा होता है, वह क्रिया उसको अच्छी लगती है तो उसका प्रभाव भी अच्छा पड़ता है। बच्चा उसको खुशी-खुशी सीखना पसंद करता है और उसको बार-बार करके प्रसन्नता अनुभव करता है।

परंतु अगर किसी क्रिया का प्रभाव दुखमयी है या वह क्रिया जो उसको अच्छी नहीं लगती है तो वह उसको सीखने से इंकार कर सकता है, बेशक यह प्रभाव उसकी अपनी गलती या घटिया सम्मान के कारण हो सकता है। बच्चे केवल उन क्रियाओं को करके खुश होते हैं, जिनका प्रभाव शारीरिक और मानसिक तौर पर खुशी देता है। शारीरिक शिक्षा का भविष्य और खेलों के प्रति बच्चों की रुचि इस नियम पर ज्यादा आधारित है।

प्रश्न 14.
छात्रों को प्रेरित करने हेतु अध्यापक में कौन-कौन-से गुण होने चाहिएँ? उत्तर- छात्रों को प्रेरित करने हेतु अध्यापक में निम्नलिखित गुण होने चाहिएँ
(1) अध्यापक को छात्रों के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए क्योंकि उसका निरंतर उसके आस-पास रहने वाले व्यक्तियों तथा छात्रों के द्वारा अनुसरण किया जाता है।

(2) अध्यापक के व्यक्तित्व में दृढ़-निश्चयी का गुण होना चाहिए। उसे अपने सिखाने वाले ढंग के प्रति पूर्ण रूप से दृढ़-निश्चयी होना चाहिए। एक दृढ़-निश्चय वाला अध्यापक कभी भी अपने कार्य को अधूरा नहीं छोड़ता। इससे छात्रों पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है।

(3) अध्यापक का सहानुभूतिपूर्ण तथा स्नेही दृष्टिकोण छात्रों द्वारा पसंद किया जाता है। इसके साथ-साथ शिक्षण प्रक्रिया भी दिलचस्प बनती रहती है। अध्यापक और छात्र के बीच द्वेष तथा नफरत का संबंध शिक्षण प्रक्रिया में रुकावट उत्पन्न करता है।

(4) अध्यापक के अंदर ऐसे गुण होने चाहिएँ जो छात्रों को प्रभावशाली ढंग से प्रभावित कर सकें। उसका स्वभाव हंसमुख होना चाहिए। अच्छा व्यक्तित्व हमेशा ही छात्रों द्वारा सराहनीय होता है। गतिशील व्यक्तित्व छात्रों पर अच्छा प्रभाव डालता है।

(5) अध्यापक को सभी के प्रति निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जो छात्रों के विश्वास को जीत सकता है। पक्षपातपूर्ण व्यवहार सदा द्वेष तथा नफरत की भावना पैदा करता है। एक टीम के लिए अंपायर तथा रैफरी का निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए, नहीं तो विवाद खड़ा हो सकता है।

प्रश्न 15.
खेलों में संवेगों की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
संवेग जन्म से ही होते हैं। ये सभी में पाए जाते हैं। ये मानसिक विकास की स्थिति में होते हैं। संवेगों से शारीरिक परिवर्तन होता है; जैसे हृदय की धड़कन, ब्लड प्रैशर, पाचन तंत्र, ग्रंथियों और नाड़ी तंत्र की प्रतिक्रिया में परिवर्तन आ जाता है। इसलिए यह जरूरी है कि योजनाबद्ध क्रियाकलाप द्वारा संवेगों से पैदा होने वाली शक्ति को लाभदायक और रचनात्मक कार्यों में लगाया जाए।

शारीरिक शिक्षा के अध्यापक को प्रत्येक छात्र की संवेग परिपक्वता स्तर से परिचित होना आवश्यक है ताकि बच्चों की अपार-शक्ति को किसी उचित काम में लगाया जा सके। संवेगों को दबाना व्यक्ति के शरीर और मन से धोखा है। इससे उसके शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है। खेल के मैदान में नवयुवक लड़के और लड़कियाँ संवेगों का खुलकर प्रदर्शन करते हैं जिससे उनके संवेगों से उत्तेजना, उत्साह और जीवन में आनंद की प्राप्ति होती है।

भय, क्रोध, खुशी, प्रेम, घृणा और निराशा आदि संवेगों के मुख्य रूप हैं। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक इन संवेगों को समझकर अपने अध्यापन का ढंग अच्छा बना सकता है, जिससे बच्चों की रचनात्मक भावनाओं को शक्ति मिलती है और हानिकारक भावना खत्म होती है। संवेग खिलाड़ी को अपना उद्देश्य प्राप्त करने में भी सहायता करते हैं; जैसे मैच में असफलता का भय उसे अच्छी तरह खेलने के लिए प्रेरित करता है। मानसिक स्वास्थ्य संवेगों पर निर्भर करता है।

अगर इनको सही दिशा की ओर न लगाया जाए तो ये तनाव जैसे विकार पैदा करते हैं, जोकि शरीर पर बुरा प्रभाव डालते हैं। खेल द्वारा बच्चा मानसिक तनाव पर विजय प्राप्त कर सकता है क्योंकि खेल मनोभावुक विचारों के लिए औषधि का काम करता है। खेल में बच्चे का भय, कमजोरी आदि अनैच्छिक भावनाएँ सामने आ जाती हैं। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक इन भावनाओं को अच्छी तरह उभारकर शारीरिक प्रशिक्षण द्वारा सुधार करके बच्चे के पूर्ण विकास में योगदान दे सकता है।

संवेगों पर नियंत्रण का हमारे जीवन और व्यक्तित्व के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। संवेगों पर नियंत्रण करने के लिए खेल एकमात्र ऐसा साधन हैं, जिनसे संवेगों में सुधार किया जा सकता है। संवेगों पर नियंत्रण से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखा जा सकता है। इससे व्यक्ति के सामाजिक जीवन, चरित्र, संतुलित विकास और दृष्टिकोण में सुधार लाया जा सकता है।

प्रश्न 16.
संवेगों की प्रमुख किस्में (प्रकार) कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:
संवेगों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-एक साधारण और दूसरे जटिल संवेग। साधारण संवेग में एक ही संवेग होता है, जबकि जटिल संवेग में एक से अधिक संवेग होते हैं; जैसे घृणा और गुस्सा, प्यार, दया और हमदर्दी मिले-जुले संवेग हैं । साधारण संवेग ज्यादातर बच्चों में पाए जाते हैं और जटिल संवेग बड़ों में पाए जाते हैं। इस प्रकार गम और खुशी साधारण संवेग कहलाते हैं जबकि प्यार और घृणा जटिल संवेग कहलाते हैं जो निम्नलिखित हैं

1. दुःख-दुःख संवेग (Grief Emotion):
उस समय प्रकट होता है जब किसी का लक्ष्य पूरा नहीं होता या इच्छाएँ पूरी नहीं होती। इनमें मुंह सूज जाता है, छाती सिकुड़ जाती है, आँखों में अश्रु, गले का बैठना, बेहोश होना, जोर-जोर से रोना आदि दुःख की निशानियाँ हैं।

2. खुशी-खुशी (Joy):
दु:ख के विपरीत है। यह संवेग उस समय प्रकट होता है जब किसी की इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं। इसमें छाती का फूलना, चेहरे पर खुशी, आँखों में चमक, खुशी से उछलना, नाचना और तालियाँ मारने जैसी निशानियाँ होती हैं।

3. प्यार-प्यार (Love):
शक्तिशाली संवेग है। माँ जब बच्चे को प्यार करती है तो यह उसकी अंत:प्रक्रिया है। प्यार में स्वार्थ प्रायः देखने को मिलता है। यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। प्यार में गले मिलना, चूमना आदि साधारण निशानियाँ हैं।

4. घृणा-घृणा (Hate):
एक जटिल संवेग है। घृणा व्यक्ति की सोच पर बहुत निर्भर करती है। कुछ लोग दूसरे लोगों से घृणा करते हैं। वे लोग उनके प्रत्येक काम से घृणा करते हैं और उनसे कोई संबंध कायम नहीं करते।

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प्रश्न 17.
खिलाड़ी की आदतें उसकी खेल कुशलता को कैसे प्रभावित करती हैं?
उत्तर:
खिलाड़ी की आदतें उसकी खेल-कुशलता पर गहरा प्रभाव डालती हैं। खिलाड़ी का समय पर क्रियाएँ करना, सुबह समय पर उठना, रोजाना खेल का अभ्यास करना, अपने कोच, बड़ों और माता-पिता का आदर करना आदि आदतें खेल-कुशलता में बढ़ोत्तरी करती हैं। इसके विपरीत खिलाड़ी का समय पर अभ्यास न करना, नशा करना, कोच की ओर से दिए गए प्रशिक्षण को न अपनाना, नियमों का पालन न करना आदि आदतें खिलाड़ी की खेल-कुशलता को कम करती हैं।

अच्छी आदतें खिलाड़ी के व्यवहार और साहस का प्रदर्शन करती हैं। ये खिलाड़ी के तौर-तरीके, सामाजिक गुणों और मेल-मिलाप को असली रूप प्रदान करती हैं। खिलाड़ी को बुरी आदतों से बचना चाहिए और अच्छी आदतों को अपनाकर अपने मान-सम्मान और खेल-कुशलता में बढ़ोतरी करनी चाहिए।

अतिलघुत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)]

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान की कोई दो परिभाषाएँ लिखें।
उत्तर:
1. रॉस के कथनानुसार, “मनोविज्ञान मानसिक रूप में व्यवहार और स्पष्टीकरण का उल्लेख है।”
2. वाटसन के कथनानुसार, “मनोविज्ञान व्यवहार का सकारात्मक या यथार्थ विज्ञान है।”

प्रश्न 2.
खेल मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट करें।
अथवा
खेल मनोविज्ञान को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
खेल मनोविज्ञान एक व्यावहारिक मनोविज्ञान है। यह व्यक्तियों, खेलों तथा शारीरिक क्रियाओं के प्रेरणात्मक या संवेगात्मक पहलुओं से संबंधित है। इसमें प्रायः उन सभी विधियों का प्रयोग होता है जो मनोविज्ञान में प्रयोग की जाती हैं।

1. जॉन लोथर के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान वह क्षेत्र है, जो मनोवैज्ञानिक तथ्यों, सीखने के सिद्धांतों, प्रदर्शनों तथा खेलकूद में मानवीय व्यवहार के संबंधों में लागू होता है।”

2. के०एम० बर्नस के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान, शारीरिक शिक्षा की वह शाखा है जिसका संबंध व्यक्ति की शारीरिक योग्यता से होता है, जोकि खेलकूद में भाग लेने से आती है।”

प्रश्न 3.
खेल मनोविज्ञान की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
(1) खेल मनोविज्ञान व्यवहार का मनोविज्ञान है,
(2) यह खिलाड़ियों या व्यक्तियों की मानसिक क्रियाओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करता है।

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान की अवधारणा का क्रमिक विकास बताएँ।
उत्तर:
मनोविज्ञान सबसे पहले दर्शनशास्त्र की एक शाखा थी। बाद में इसे आत्मा का विज्ञान, मन का विज्ञान, चेतना का विज्ञान कहा गया है। वर्तमान में इसको व्यवहार का विज्ञान कहा जाता है।

प्रश्न 5.
मनोविज्ञान की कोई चार शाखाओं के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) शिक्षा मनोविज्ञान,
(2) बाल मनोविज्ञान,
(3) शारीरिक मनोविज्ञान,
(4) खेल मनोविज्ञान।

प्रश्न 6.
हमें मनोविज्ञान की अधिक आवश्यकता क्यों है? दो कारण बताएँ।
उत्तर:
(1) व्यवहार कुशलता के लिए,
(2) व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान के लिए।

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प्रश्न 7.
मनोविज्ञान जीवन के किन-किन क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण माना जाता है?
उत्तर:
(1) राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में,
(2) औद्योगिक व व्यावसायिक क्षेत्र में,
(3) शिक्षा, चिकित्सा व खेलों के क्षेत्र में,
(4) युद्ध के क्षेत्र में,
(5) व्यक्तिगत समस्याओं के क्षेत्र में आदि।

प्रश्न 8.
अभिप्रेरणा कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
अभिप्रेरणा दो प्रकार की होती है
(1) आंतरिक या प्राकृतिक अभिप्रेरणा,
(2) बाहरी या कृत्रिम अभिप्रेरणा।

प्रश्न 9.
पी०टी० यंग के अनुसार अभिप्रेरणा को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
पी०टी० यंग के अनुसार, “अभिप्रेरणा आगे बढ़ रही क्रिया को जागृत, आगे बढ़ाने और उस क्रिया को आदर्श रूप में क्रमबद्ध करने की प्रक्रिया है।”

प्रश्न 10.
अभिप्रेरणा के विभिन्न पक्ष कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
अभिप्रेरणा के कई पक्ष हैं जिनका ज्ञान होना ज़रूरी है। इन पक्षों को सामने रखकर खिलाड़ियों में अच्छी कुशलता लाई जा सकती है:
(1) इच्छा,
(2) आवश्यकता,
(3) मनोवृत्ति,
(4) रुचि,
(5) ध्यान,
(6) इनाम,
(7) दृढ़-निश्चय,
(8) खेलों की कुशलता सीखने की रुचि।

प्रश्न 11.
बाहरी अभिप्रेरणा अथवा कृत्रिम अभिप्रेरणा के कोई तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) सामाजिक इनाम,
(2) प्रतियोगिताएँ,
(3) दंड।

प्रश्न 12.
सीखने की प्रक्रिया में अभिप्रेरणा की क्या भूमिका होती है?
उत्तर:
सीखने की प्रक्रिया में अभिप्रेरणा की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि किसी छात्र को किसी कार्य हेतु अभिप्रेरित नहीं किया जाता तो वह सीखने की प्रक्रिया में रुचि नहीं लेता। अभिप्रेरणा ही छात्र को सफलता की ओर ले जाती है। छात्रों में अभिप्रेरणा उत्पन्न करने के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग किया जा सकता है और सीखने की प्रक्रिया को तीव्र किया जा सकता है।

प्रश्न 13.
सीखने की अवधारणा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रत्येक व्यक्ति बदलते पर्यावरण से समझौता करता है। बदला हुआ पर्यावरण प्रत्येक व्यक्ति पर अपनी छाप छोड़ जाता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह शारीरिक और मानसिक तौर पर बढ़ता है और नई-नई प्रतिक्रियाएँ सीखता है, जिससे उसमें परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। सीखना जिंदगी में सदैव चलता रहता है।

बच्चा केवल स्कूल में ही नहीं सीखता, बल्कि जिन तजुर्बो या अनुभवों (Experiences) में से वह गुजर रहा होता है, उनसे भी वह बहुत कुछ सीखता है। बच्चा बचपन में शारीरिक, मानसिक, भावात्मक तौर पर दूसरों पर निर्भर रहता है। परंतु समय बीतने पर जब मानसिक और शारीरिक विशेषताएँ आ जाती हैं तो उसमें आत्म-निर्भरता की भावना बढ़ने लगती है।

प्रश्न 14.
सीखने के कौन-कौन-से नियम होते हैं?
उत्तर:
सीखने के निम्नलिखित तीन नियम होते हैं
(1) तैयारी का नियम,
(2) अभ्यास का नियम,
(3) प्रभाव का नियम।

प्रश्न 15.
सीखने में बढ़ोतरी करने वाले कोई तीन कारक बताएँ।
उत्तर:
(1) प्रशिक्षक का व्यक्तित्व,
(2) शारीरिक योग्यता,
(3) खेलों में रुचि।

प्रश्न 16.
सीखने (Learning) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
1. गेट्स के कथनानुसार, “तजुर्बो से व्यवहार में आने वाले परिवर्तनों को सीखना कहा जाता है।”
2. हैनरी पी० स्मिथ के अनुसार, “सीखना नए व्यवहार में बढ़ोतरी करना है या अनुभवों से पुराने व्यवहार को ताकतवर या कमज़ोर बनाया जा सकता है।”

प्रश्न 17.
रुचि से आप क्या समझते हैं?
अथवा
रुचि को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
रुचि वह प्रेरित शक्ति है जो हमारा ध्यान किसी व्यक्ति या वस्तु की तरफ दिलाती है या फिर कोई प्रभावशाली अनुभव है जोकि क्रिया से स्वयं उपजता है। दूसरे शब्दों में, रुचि या तो किसी क्रिया का कारण है या उस क्रिया में भाग लेने का परिणाम। विलियम जेम्स के अनुसार, “रुचि चयनित जागरूकता या ध्यान का वह रूप है जो किसी के संपूर्ण अनुभवों में से अर्थ पैदा करता है।”

प्रश्न 18.
खिलाड़ी की रुचि खेल-कुशलता को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
खेलों को ठीक ढंग से सीखने के लिए खिलाड़ी की रुचि बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। खेल-कुशलता को बढ़ाने के लिए खेल की बारीकियाँ तभी सीखी जा सकती हैं अगर खिलाड़ी उस खेल में अधिक-से-अधिक रुचि रखता हो। अगर खिलाड़ी की खेल में रुचि नहीं है तो सफलता का मिलना मुश्किल हो जाता है। खेल-कुशलता में बढ़ोतरी तभी हो सकती है अगर खिलाड़ी की रुचि सीखते समय क्रिया पर केंद्रित हो। इसलिए रुचि और कुशलता में गहरा संबंध होता है।

प्रश्न 19.
अभिवृत्ति के प्रकार कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
सामान्य तौर पर अभिवृत्ति दो प्रकार की होती है
1. सकारात्मक अभिवृत्ति-किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक है तो हम कह सकते हैं कि हमारी अभिवृत्ति सकारात्मक है।
2. नकारात्मक अभिवृत्ति-यदि किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति हमारा दृष्टिकोण नकारात्मक है तो उस वस्तु या व्यक्ति के प्रति हमारी अभिवृत्ति नकारात्मक होगी।

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प्रश्न 20.
खिलाड़ी की खेल-कुशलता को प्रभावित करने वाले कोई चार मनोवैज्ञानिक कारक बताएँ।
उत्तर:
(1) रुचि,
(2) आत्म-विश्वास,
(3) अभिवृत्ति,
(4) साहस।

प्रश्न 21.
आत्म-विश्वास खिलाड़ी की कुशलता को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
खिलाड़ी द्वारा आत्म-विश्वास से खेल सीखने और उसका बार-बार अभ्यास करने से आत्म-विश्वास में बढ़ोतरी होती है। कई बार सीखने वाली क्रिया मुश्किल होती है और कई बार अन्य कारणों से अन्य मुश्किलें पैदा होती हैं, परंतु खिलाड़ी का आत्म-विश्वास मुश्किल क्रिया को आसान क्रिया में बदल देता है। खेल में ऐसे कई उदाहरण हैं कि कई बार अच्छी टीम आत्म-विश्वास खो जाने के कारण मैच हार जाती है और कमजोर टीम आत्म-विश्वास पैदा करके जीत जाती है। इसलिए आत्म-विश्वास प्रत्येक खिलाड़ी के लिए बहुत जरूरी तत्त्व है।।

प्रश्न 22.
खिलाड़ी की अभिवृत्ति खेल-कुशलता को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
खेलों में अभिवृत्ति (Attitude) की बहुत महत्ता है। अगर खिलाड़ी की अभिवृत्ति सीखने की है तो उसका सीखना सरल और आसान हो सकता है। अभिवृत्ति सीखने पर असर डालती है। अगर खिलाड़ी के स्वभाव में एकरूपता नहीं है या तो वह न मानने वाली प्रवृत्ति रखता है या वह भावात्मक प्रवृत्ति का शिकार होता है। वह एक विशेष दायरे से बाहर नहीं निकलना चाहता। कई बार ऐसे खिलाड़ी को नियमों से दूर रहना पड़ता है। खेल में बढ़िया व्यवहार भी महत्त्वपूर्ण होता है। बढ़िया व्यवहार खेल की कुशलता में बढ़ोतरी करता है।

प्रश्न 23.
खेल-भावना (Sportsmanship) से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
खेल-भावना क्या है? इसको कैसे बढ़ाया जा सकता है?
उत्तर:
जो खिलाड़ी या टीम अपने प्रतिद्वन्द्वी के प्रति वैर-विरोध न करके एक-दूसरे के प्रति सद्भावनापूर्ण व्यवहार से खेलता/ खेलती है, खिलाड़ी या टीम के ऐसे आचरण को ही खेल-भावना कहते हैं। अच्छा खिलाड़ी वही होता है जो विजयी होने पर भी हारी हुई टीम या खिलाड़ी को उत्साहित करें और हार जाने पर विजयी टीम को पूरे सम्मान के साथ बधाई दे। ऐसा खिलाड़ी खेल-भावना को बढ़ाता है। खेल के दौरान वह अनुशासन में रहकर सहनशीलता, धैर्य, त्याग, आत्मविश्वास आदि भावनाओं को भी अपनाता है जो उसकी आदर्श खेल भावना या खिलाड़ी भावना को उजागर करते हैं । इस प्रकार से खेल भावना को बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न 24.
संवेग (Emotion) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
‘Emotion’ शब्द लैटिन भाषा के शब्द ‘Emovere’ से बना है जिसका अर्थ हिलाना, उत्तेजित करना या हलचल पैदा करना है। जब हमारी भावनाएँ बहुत अशांत, तीव्र और उत्तेजित हो जाती हैं तो वे संवेग का रूप धारण कर लेती हैं। संवेग शरीर और मन की वह अवस्था है जिसमें उत्तेजना और हलचल पाई जाती है।

HBSE 11th Class Physical Education मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ पर Objective Type Questions)

भाग-I : एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
मनुष्य के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन क्या कहलाता है?
उत्तर:
मनुष्य के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन मनोविज्ञान कहलाता है।

प्रश्न 2.
“मनोविज्ञान व्यवहार का सकारात्मक या यथार्थ विज्ञान है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन वाटसन का है।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान (Psychology) शब्द किस भाषा का शब्द है?
उत्तर:
मनोविज्ञान (Psychology) शब्द ग्रीक भाषा का शब्द है।

प्रश्न 4.
‘Psychology’ शब्द किन दो शब्दों से मिलकर बना है?
उत्तर:
‘Psychology’ शब्द साइके (Psyche) और लोगस (Logos) शब्दों से मिलकर बना है।

प्रश्न 5.
क्रो व क्रो ने मनोविज्ञान को कैसे परिभाषित किया है?
उत्तर:
क्रो व क्रो के अनुसार, “मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार और इसके संबंधों का विज्ञान है।”

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प्रश्न 6.
उपलब्धि क्या है?
उत्तर:
खेलों के समय कुशलता तथा कार्य-क्षमता को उपलब्धि कहते हैं।

प्रश्न 7.
‘अभिप्रेरणा’ शब्द किस भाषा से लिया गया है?
उत्तर:
अभिप्रेरणा शब्द लातीनी भाषा के शब्द ‘Movere’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘to change’ तथा ‘to move’ ।

प्रश्न 8.
“मनोविज्ञान को व्यवहार का, वैज्ञानिक खोज का अध्ययन कहा जाता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन एन०एल० मुन्न का है।

प्रश्न 9.
रुचि कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
रुचि दो प्रकार की होती है।

प्रश्न 10.
अभिवृत्ति क्या है?
उत्तर:
अभिवृत्ति किसी कार्य को करने के लिए सहमति है जिससे व्यवहार को एक निश्चित दिशा मिल जाती है।

प्रश्न 11.
“मनोविज्ञान मानसिक रूप में व्यवहार और स्पष्टीकरण का उल्लेख है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन रॉस ने कहा।

प्रश्न 12.
किससे कठिन-से-कठिन खेल आसानी से सीखा जा सकता है?
उत्तर:
निरंतर अभ्यास से कठिन खेल भी आसानी से सीखा जा सकता है।

प्रश्न 13.
भूख, प्यास, स्नेह आदि किस अभिप्रेरणा के उदाहरण हैं?
उत्तर:
भूख, प्यास, स्नेह आदि आंतरिक अभिप्ररेणा के उदाहरण हैं।

प्रश्न 14.
अभिप्रेरणा कितने प्रकार की है?
उत्तर:
अभिप्रेरणा दो प्रकार की है।

प्रश्न 15.
अभिवृत्ति कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
अभिवृत्ति दो प्रकार की होती है।

प्रश्न 16.
मनोविज्ञान का जन्मदाता शास्त्र किसे माना जाता है?
उत्तर:
मनोविज्ञान का जन्मदाता दर्शनशास्त्र (Philosophy) को माना जाता है।

प्रश्न 17.
मनोविज्ञान का जनक किसे माना जाता है?
उत्तर:
मनोविज्ञान का जनक विल्हेल्म कुंड को माना जाता है।

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प्रश्न 18.
अरस्तू एवं प्लेटो ने मनोविज्ञान को किसका विज्ञान माना है?
उत्तर:
अरस्तू एवं प्लेटो ने मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना है।

प्रश्न 19.
वर्तमान में मनोविज्ञान को किसका अध्ययन कहा जाता है?
उत्तर:
वर्तमान में मनोविज्ञान को व्यवहार का अध्ययन कहा जाता है।

प्रश्न 20.
“मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।” मनोविज्ञान की यह परिभाषा किसकी है?
उत्तर:
मनोविज्ञान की यह परिभाषा प्लेटो की है।

प्रश्न 21.
आंतरिक अभिप्रेरणा के कोई दो उदाहरण बताएँ।
उत्तर:
(1) सफलता,
(2) सामाजिक आवश्यकताएँ।

प्रश्न 22.
व्यक्ति के शरीर और मन के सामूहिक कार्य को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
व्यक्ति के शरीर और मन के सामूहिक कार्य को मनो-शारीरिक एकता कहा जाता है।

प्रश्न 23.
मानव व्यवहार की नवीन व्याख्या करने वाले कोई दो मनोवैज्ञानिक बताएँ।
उत्तर:
(1) साइमन,
(2) फ्रायड।

प्रश्न 24.
‘Emotion’ शब्द की उत्पत्ति किस शब्द से हुई?
उत्तर:
‘Emotion’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘Emovere’ शब्द से हुई।

प्रश्न 25.
“संवेग वे घटनाएँ हैं जिनमें व्यक्ति अशांत या उत्तेजित होता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन गेट्स का है।

प्रश्न 26.
“खेल मनोविज्ञान एथलेटिक्स में व्यक्ति के व्यवहार की खोजबीन करता है” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन वाटसन का है।

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प्रश्न 27.
“अज्ञानी होना उतनी शर्म की बात नहीं है जितना कि सीखने की इच्छा न रखना।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा।

प्रश्न 28.
खेल के सभी नियमों का पालन बहुत ही अच्छे ढंग से करने वाले खिलाड़ी का कौन-सा गुण उजागर होता है?
उत्तर:
खेल के सभी नियमों का पालन बहुत ही अच्छे ढंग से करने वाले खिलाड़ी का अनुशासन का गुण उजागर होता है।

प्रश्न 29.
एक अच्छे स्पोर्टसमैन का कोई एक गुण बताएँ।
उत्तर:
आत्म-विश्वास की भावना।

प्रश्न 30.
खेल की जीत का सारा राज किस भावना पर अधिक निर्भर करता है?
उत्तर:
खेल की जीत का सारा राज मुकाबले की भावना पर अधिक निर्भर करता है।

प्रश्न 31.
खेल-नीतिशास्त्र का संबंध खेल के क्षेत्र में किससे है?
उत्तर:
खेल-नीतिशास्त्र का संबंध खेल के क्षेत्र में नैतिकता से है।

प्रश्न 32.
खेल-भावना और खेल नीतिशास्त्र का आपस में संबंध कैसा है?
उत्तर:
खेल-भावना और खेल नीतिशास्त्र का आपस में घनिष्ठ संबंध है।

भाग-II : सही विकल्प का चयन करें

1. मनोविज्ञान किसका अध्ययन करता है?
(A) व्यवहार का
(B) समाज का
(C) जाति का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) व्यवहार का

2. ‘Psychology’ शब्द किस भाषा के दो शब्दों का मेल है?
(A) लैटिन भाषा
(B) फारसी भाषा
(C) यूनानी भाषा
(D) संस्कृत भाषा
उत्तर:
(C) यूनानी भाषा

3. ‘साइके’ और ‘लोगस’ शब्द, जिनसे ‘मनोविज्ञान’ बना है, का अर्थ है
(A) आत्मा, विज्ञान
(B) मन, विज्ञान
(C) विज्ञान, बातचीत
(D) आत्मा, शरीर
उत्तर:
(A) आत्मा, विज्ञान

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4. किसको पहले ‘आत्मा का विज्ञान’ कहा जाता रहा है?
(A) दर्शनशास्त्र को
(B) अर्थशास्त्र को
(C) जीव विज्ञान को
(D) मनोविज्ञान को
उत्तर:
(D) मनोविज्ञान को

5. किस शताब्दी में मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान कहा जाने लगा?
(A) 18वीं शताब्दी में
(B) 19वीं शताब्दी में
(C) 17वीं शताब्दी में
(D) 20वीं शताब्दी में
उत्तर:
(B) 19वीं शताब्दी में

6. “मनोविज्ञान को व्यवहार का, वैज्ञानिक खोज का अध्ययन कहा जाता है।” यह कथन है
(A) रॉस का
(B) क्रो व क्रो का
(C) एन० एल० मुन्न का
(D) वुडवर्थ का
उत्तर:
(C) एन० एल० मुन्न का

7. “मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार और उसके संबंधों का विज्ञान है।” यह कथन है
(A) रॉस का
(B) क्रो व क्रो का
(C) एन० एल० मुन्न का
(D) वुडवर्थ का
उत्तर:
(B) क्रो व क्रो का

8. अभिप्रेरणा कितने प्रकार की होती है?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(A) दो

9. प्राकृतिक प्रेरणा का उदाहरण है
(A) आत्म-सम्मान
(B) स्नेह
(C) इच्छा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

10. खेलों के समय शारीरिक कुशलता तथा कार्यक्षमता को क्या कहते हैं?
(A) उपलब्धि
(B) अभिप्रेरणा
(C) रुचि
(D) अभिवृत्ति
उत्तर:
(A) उपलब्धि

11. “तजुर्बो से व्यवहार में आने वाले परिवर्तनों को सीखना कहा जाता है।” यह कथन है
(A) बी०सी० राय का
(B) पी०टी० यंग का
(C) आर०एन० सिंगर का
(D) गेट्स का
उत्तर:
(D) गेट्स का

12. “मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।” यह कथन है
(A) प्लेटो का
(B) रॉस का
(C) एन०एल० मुन्न का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) प्लेटो का

13. आंतरिक अभिप्रेरणा को और किस नाम से जाना जाता है?
(A) प्राकृतिक प्रेरणा
(B) अप्राकृतिक प्रेरणा
(C) कृत्रिम प्रेरणा
(D) बाहरी प्रेरणा
उत्तर;
(A) प्राकृतिक प्रेरणा

14. गुरु-शिष्य संबंध के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं
(A) आदर्श अध्यापक
(B) सहयोगपूर्ण एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार
(C) नियमितता तथा समय का पाबंद
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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15. निम्नलिखित में से सीखने का नियम है
(A) तैयारी का नियम
(B) अभ्यास का नियम
(C) प्रभाव का नियम
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

16. खिलाड़ी की खेल कुशलता को प्रभावित करने वाले मनोवैज्ञानिक तत्त्व हैं
(A) रुचि
(B) अभिवृत्ति
(C) आदतें
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

17. “अभिवृत्ति किसी कार्य को करने के लिए सहमति है जिससे व्यवहार को एक निश्चित दिशा मिल जाती है।’ यह कथन है
(A) ट्रैवर्स का
(B) रॉस का
(C) प्लेटो का
(D) जॉन लोथर का
उत्तर:
(A) ट्रैवर्स का

18. गुरु और शिष्य के बीच संबंध होना चाहिए
(A) लगावपूर्ण
(B) चंचलतापूर्ण
(C) सहृदयक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सहृदयक

19. मनोविज्ञान का जन्मदाता शास्त्र है
(A) अर्थशास्त्र
(B) समाजशास्त्र
(C) दर्शनशास्त्र
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) दर्शनशास्त्र

20. मनोविज्ञान में किसके व्यवहार का अध्ययन किया जाता है?
(A) मानव के
(B) पशुओं के
(C) पक्षियों के
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

21. ‘Outline of Psychology’ पुस्तक के लेखक हैं
(A) प्लेटो
(B) अरस्तू
(C) मैक्डूगल
(D) वुडवर्थ
उत्तर:
(C) मैक्डूगल

भाग-III : निम्नलिखित के उत्तर सही या गलत अथवा हाँ या नहीं में दें

1. मनोविज्ञान का संबंध मानव दिमाग से है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

2. मनोविज्ञान मानव अनुभव एवं व्यवहार का यथार्थ विज्ञान है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

3. मनोविज्ञान हमें व्यवहार कुशल बनाने में सहायक होता है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:

4. स्किनर ने मनोविज्ञान को शिक्षा का आधारभूत विज्ञान कहा। (सही/गलत)
उत्तर:
हाँ,

5. शिक्षा और मनोविज्ञान में परस्पर विपरीत संबंध है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

6. अभिप्रेरणा वह शक्ति है जो मनुष्य में क्रिया सीखने की रुचि को उत्साहित करती है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

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7. खेल में वही खिलाड़ी जीत सकता है जिसमें आत्म-विश्वास व धैर्य की भावना होती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

8. खेलों में नैतिक मूल्यों या नीतिशास्त्र को रखना बहुत आवश्यक है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

9. मनोविज्ञान की उत्पत्ति अर्थशास्त्र से मानी जाती है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

10. सीखना निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

11. मानव व्यवहार को समझने वाले विषय को दर्शनशास्त्र के नाम से जाना जाता है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं,

12. अध्यापक को सभी के प्रति निष्पक्षपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

13. सीखने की प्रक्रिया में अभिप्रेरणा की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

14. खेल मनोविज्ञान खिलाड़ियों के गतिपरक कौशल को बढ़ाने में सहायक होता है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

15. आंतरिक अभिप्रेरणा को कृत्रिम अभिप्रेरणा भी कहा जाता है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

16. मनोविज्ञान मानव मन का विज्ञान है। (सही/गलत)।
उत्तर:
गलत।

भाग-IV : रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. मनोविज्ञान का संबंध मानव …………….. से है।
उत्तर:
व्यवहार

2. …….. को मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।
उत्तर:
विल्हेल्म कुंड,

3. मनोविज्ञान की विषय-वस्तु व्यक्ति का …………….. है।
उत्तर:
व्यवहार

4. “अभिप्रेरणा का संबंध सीखने में रुचि पैदा करने से है तथा अपने इसी रूप में यह सीखने का मूल आधार है।” यह कथन ……………. ने कहा।
उत्तर:
क्रो व क्रो,

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5. रुचि …………….. प्रकार की होती है।
उत्तर:
दो,

6. अनुभवों से व्यवहार में आने वाले परिवर्तनों को …………….. कहा जाता है।
उत्तर:
सीखना,

7. ………….. के अनुसार मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।
उत्तर:
प्लेटो,

8. …………….. अभिप्रेरणा में प्रसन्नता का स्रोत क्रिया में नहीं छिपा होता।
उत्तर:
बाहरी,

9. “मनोविज्ञान व्यवहार का सकारात्मक या यथार्थ विज्ञान है।” यह कथन …………….. ने कहा।
उत्तर:
वाटसन,

10. खेल भावना और नीतिशास्त्र का आपस में …………….. संबंध होता है।
उत्तर:
घनिष्ठ,

11. ‘मनोविज्ञान (Psychology) शब्द …………….. भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है।
उत्तर:
यूनानी,

12. …………….. व्यक्ति के व्यवहार, संवेगात्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक क्रियाओं का अध्ययन है।
उत्तर:
मनोविज्ञान।

मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान Summary

मनोविज्ञान एवं खेल मनोविज्ञान परिचय

मनोविज्ञान (Psychology):
आधुनिक युग विज्ञान एवं तकनीकी का युग है। आज मानव वैज्ञानिक अनुसंधानों से चाँद तक पहुँच गया है। आज जितना भी ज्ञान विकसित हुआ है, उसमें मानव-व्यवहार का महत्त्वपूर्ण योगदान है। मानव व्यवहार को समझने वाले विषय को मनोविज्ञान के नाम से जाना जाता है। इसकी उत्पत्ति दर्शनशास्त्र (Philosophy) से मानी जाती है, क्योंकि प्राक्-वैज्ञानिक में मनोविज्ञान दर्शनशास्त्र की ही एक शाखा थी, परन्तु जब विल्हेल्म कुंड (Wilhelm Wundt) ने सन् 1871 में मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला खोजी, तब से मनोविज्ञान एक स्वतंत्र विषय बन गया। इसी कारण विल्हेल्म बुंड को मनोविज्ञान का जनक माना जाता है।

मनोविज्ञान को अंग्रेजी में ‘Psychology’ कहते हैं। यह शब्द ग्रीक (यूनानी) भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है। साइके (Psyche) का अर्थ है-आत्मा और लोगस (Logos) का अर्थ है-विज्ञान। अतः इसका शाब्दिक अर्थ है-आत्मा का विज्ञान । जैसे-जैसे समय बदलता गया, इसके अर्थ में भी वांछित बदलाव होता गया। वर्तमान में मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान कहा जाता है। मनोविज्ञान व्यक्ति के मानसिक कार्यों या व्यवहारों का वैज्ञानिक अध्ययन करता है और व्यक्ति के हर पक्ष या पहलू को अत्यधिक प्रभावित करता है। एन०एल० मुन्न (N.L. Munn) के अनुसार, “मनोविज्ञान को व्यवहार का, वैज्ञानिक खोज का अध्ययन कहा जाता है।”

मनोविज्ञान का क्षेत्र काफी विस्तृत है। यह मानव व्यवहार एवं ज्ञान से संबंधित विभिन्न नियमों एवं सिद्धांतों का संग्रह है। यह मानव व्यवहार, ज्ञान और क्रियाओं की विभिन्न शाखाओं के रूप में लागू होता है। खेलों के क्षेत्र में भी मनोविज्ञान के सिद्धांतों एवं नियमों को लागू किया जा सकता है। खेलों के क्षेत्र में मनोविज्ञान के सिद्धांतों के विस्तार ने मनोविज्ञान की एक नवीन शाखा को जन्म दिया है जिसे खेल मनोविज्ञान कहा जाता है।

खेल-मनोविज्ञान (Sports Psychology):
मनुष्य की प्रत्येक क्रियाएँ मनोविज्ञान द्वारा निर्धारित होती हैं। इसकी विभिन्न शाखाएँ हैं जो हमें प्रभावित करती हैं। खेल मनोविज्ञान शारीरिक शिक्षा में व्यक्ति की शारीरिक क्षमता या योग्यता पर प्रकाश डालता है। यह इस बात पर बल देता है कि व्यक्ति खेलकूद में किस प्रकार अपनी शारीरिक-मानसिक क्षमता को बढ़ा सकता है। अतः यह व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए अति आवश्यक है। क्लार्क व क्लार्क (Clark and Clark) के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान एक व्यावहारिक मनोविज्ञान है। यह व्यक्तियों, खेलों तथा शारीरिक क्रियाओं के प्रेरणात्मक या संवेगात्मक पहलुओं से अधिक संबंधित है। इसमें प्रायः उन सभी विधियों का प्रयोग होता है जो मनोविज्ञान में प्रयोग की जाती हैं।”

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HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 7 दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा

Haryana State Board HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 7 दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physical Education Solutions Chapter 7 दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा

HBSE 11th Class Physical Education दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा Textbook Questions and Answers

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions) 

प्रश्न 1.
दूसरे श्वास का क्या अर्थ है? इसके कारण एवं लक्षणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
दूसरे श्वास को परिभाषित कीजिए। इसके मुख्य लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दूसरे श्वास का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Second Wind):
दूसरे श्वास का अर्थ हैथके होने के बाद पुनः प्रयास करना। जब खिलाड़ी सख्त क्रियाएँ या लंबे समय की क्रियाओं में भाग लेता है तो उसे ऑक्सीजन और ऊर्जा की अधिक आवश्यकता होती है। उसे जब क्रियाओं में भाग लेते समय ऑक्सीजन और ऊर्जा कम मात्रा में मिलती हैं, तो आंतरिक दबाव बढ़ता है जिससे क्रियाओं को छोड़ने का मन करता है। परंतु यदि खिलाड़ी आंतरिक दबाव के बावजूद क्रियाएँ जारी रखता है जिससे श्वास घुटन स्वयं दूर हो जाती है और खिलाड़ी अपनी पहली स्थिति में आ जाता है, ऐसी स्थिति को ही दूसरा श्वास या द्वितीय हवा कहते हैं। दूसरे श्वास को विद्वानों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

1. ई० एल० फॉक्स (E.L. Fox):
के अनुसार, “लंबे समय की क्रियाओं में अचानक आने वाला परिवर्तन; जैसे आंतरिक दबाव व थकावट और कुछ समय बाद काफी आरामदायक तथा कम तनावपूर्ण अहसास क्रियाओं में आने को दूसरा श्वास कहते हैं।”

2. स्वेइगार्ड (Sweigard):
के कथनानुसार, “बढ़ती हुई ऑक्सीजन की माँग तथा पदार्थों के ऑक्सीजन को समाप्त करने के कारण हृदय एवं श्वसन संस्थान का शारीरिक क्रिया संबंधी समन्वय दूसरा श्वास कहलाता है।” .

3. दूसरे श्वास का कारण (Cause of Second Wind):
दूसरे श्वास के कारणों के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है फिर भी तेज क्रिया को जारी रखने के प्रयास के अनुसार शरीर को ढालने में लगे समय को दूसरे श्वास का मुख्य कारण माना जाता है।

दूसरे श्वास के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) चेहरे पर तनाव के चिह्न नज़र आते हैं।
(2) माँसपेशियों में दर्द होता है।
(3) क्रियाएँ छोड़ने का मन करता है।
(4) श्वास में घुटन अनुभव होती है।
(5) सिर चकराता है।
(6) श्वास की आर्द्रता में कमी आ जाती है।
(7) श्वास की गति तेज हो जाती है।
(8) तनाव एवं घबराहट होने लगती है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 7 दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा

प्रश्न 2.
थकान से आप क्या समझते हैं? इसके प्रकारों एवं लक्षणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
थकावट की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? इसके लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
थकान या थकावट की अवधारणा (Concept of Fatigue):
मनुष्य शारीरिक शक्ति अपने रक्त में से प्राप्त करता है। जब हम कोई शारीरिक और मानसिक क्रिया करते हैं तो शरीर में जो शक्ति होती है उसमें कमी आ जाती है, इस कमी का मुख्य कारण थकावट होता है। जब शक्ति-भरा रक्त माँसपेशियों को प्राप्त नहीं होता तो माँसपेशियों में अवांछनीय पदार्थ पैदा हो जाते हैं, जिस कारण हम थकावट अनुभव करते हैं। परंपरागत परिभाषा के अनुसार लम्बे समय तक कार्य करने के कारण घटी हुई क्षमता को ही थकान कहा जाता है अर्थात् किसी कार्य को लगातार करने से कार्यक्षमता का ह्रास होना ही थकान है। बोरिंग के कथनानुसार, “थकावट से अभिप्राय कार्य की कम हो रही क्षमता से है।”

थकान के प्रकार (Types of Fatigue): थकावट दो प्रकार की होती है
1. शारीरिक थकान (Physical Fatigue): जब व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक शारीरिक क्रिया या कार्य करता है तो थकावट अनुभव करता है। इसको शारीरिक थकान कहा जाता है। जब माँसपेशियाँ लगातार सिकुड़ती हैं तो उनमें अवांछनीय पदार्थ; जैसे कार्बन-डाइऑक्साइड, लैक्टिक अम्ल पैदा हो जाते हैं जो माँसपेशियों को अपनी वास्तविक स्थिति में कार्य करने से रोकते हैं।

2. मानसिक थकान (Mental Fatigue):
लगातार मानसिक क्रिया करने से मानसिक थकान होती है; जैसे पढ़ना, लिखना आदि। मानसिक थकान प्रायः उन व्यक्तियों को होती है जो प्रायः दिन-भर मानसिक या बौद्धिक कार्य करते हैं; जैसे वकील, अध्यापक, डॉक्टर आदि। इस थकान के कई कारण हैं; जैसे तनाव, डर, गुस्सा और घबराहट आदि । इस प्रकार की थकान काफी हानिकारक होती है, क्योंकि इसका प्रभाव भिन्न-भिन्न ग्रंथियों पर पड़ता है।

थकान के लक्षण (Symptoms of Fatigue): थकान के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) नाड़ी-माँसपेशियों में समन्वय का अभाव।
(2) मानसिक नियंत्रण की कमी।
(3) किसी काम में मन न लगना और कार्य तुरंत बंद करने की इच्छा होना।
(4) नकारात्मक सोच में वृद्धि।
(5) शरीर में ऑक्सीजन की कमी होना।
(6) कार्य करने में गलतियाँ करना।
(7) व्यवहार में परिवर्तन होना अर्थात् स्वभाव चिड़चिड़ा होना।
(8) कमजोरी महसूस होना।
(9) माँसपेशियों में दर्द एवं अकड़न महसूस होना।
(10) सीखने की क्रिया में कमी आना।

प्रश्न 3.
थकान या थकावट को परिभाषित कीजिए। इसके कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
थकान या थकावट की परिभाषा (Definition of Fatigue):
परंपरागत परिभाषा के अनुसार लम्बे समय तक कार्य करने के कारण घटी हुई क्षमता को ही थकान (Fatigue) कहा जाता है अर्थात् किसी कार्य को लगातार करने से कार्यक्षमता का ह्रास होना ही थकान है। गिलझैथ ने थकान की परिभाषा इन तीन तथ्यों पर आधारित बताई है:

(1) कार्य करने की शक्ति का कम या ह्रास होना,
(2) कार्य-रहित घंटों में प्रसन्नता का अभाव,
(3) कार्य करने में आनंद की अनुभूति न होना।

थकान के कारण (Causes of Fatigue): थकान या थकावट के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
1. ज्यादा कार्य करना (To Much Work):
अपनी क्षमता से अधिक कार्य करना अर्थात् निरंतर बिना आराम किए कार्य करने से शरीर थकावट महसूस करता है।

2. विटामिन की कमी (Lack of Vitamins):
विटामिन शरीर की कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं। जो व्यक्ति अपने आहार में विटामिन-युक्त खाद्य पदार्थों को शामिल करते हैं, उनकी कार्यक्षमता दूसरों से अधिक होती है। इसलिए अधिक कार्यक्षमता हेतु विटामिन बहुत आवश्यक हैं। यदि हमारे शरीर में इन तत्त्वों की कमी है तो हम थोड़ा-सा कार्य करके ही जल्दी थक जाते हैं।

3. तनाव एवं चिंता (Tension and Worry):
जब कोई व्यक्ति तनाव एवं चिंता से ग्रस्त रहता है तो उसकी कार्य करने की क्षमता का स्तर कम हो जाता है। इससे व्यक्ति थका हुआ-सा महसूस करता है।

4. कमजोरी (Weakness):
कमजोर व्यक्ति की कार्यक्षमता कम होती है। वह निरंतर कार्य करने में समर्थ नहीं होता, क्योंकि शरीर कमजोर होने के कारण वह जल्दी थकान महसूस करता है।

5. बीमारी (Illness):
कोई भी व्यक्ति अच्छे स्वास्थ्य के बिना कोई भी कार्य अच्छे से नहीं कर सकता। बीमार व्यक्ति के शरीर में खून की कमी हो जाती है जिस कारण वह जल्दी थकावट महसूस करता है।

6. असंतुलित भोजन (Unbalanced Food):
संतुलित आहार हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। यदि हमारा स्वास्थ्य अच्छा होगा तभी हम किसी कार्य को बिना किसी कठिनाई के आसानी से करने में सक्षम होंगे। यदि हमारे भोजन में पौष्टिक तत्त्वों का अभाव है अर्थात् हमारा भोजन असंतुलित है तो इसका हमारे स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा, जिससे हमारी कार्य करने की क्षमता कम होगी और हमें जल्दी थकावट महसूस होगी।

7. मनोवैज्ञानिक कारक (Psychological Factors):
हमारे शरीर को बहुत से मनोवैज्ञानिक कारक प्रभावित करते हैं जिस कारण कई बार कई मानसिक समस्याएँ पैदा हो जाती हैं; जैसे तनाव, चिंता, व्यवहार का चिड़चिड़ा होना आदि। इन सभी का हमारी कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और हम जल्दी थकान महसूस करते हैं। इसलिए किसी भी कार्य के लिए मानसिक तत्परता बहुत जरूरी है।

8. पूर्ण नींद एवं आराम न करना (No Proper Sleep and Rest):
पूर्ण नींद एवं आराम न करने से भी थकान महसूस होती है। यदि हम कोई काम कई घंटों से निरंतर कर रहे हैं तो हमें नियमित अंतराल पर पूर्ण नींद एवं आराम की बहुत आवश्यकता होती है। नींद एवं आराम से हमारी खोई हुई कार्यक्षमता आती है और फिर से कार्य करने में पूर्णतया सक्षम हो जाते हैं। बिना आराम किए हम किसी कार्य को करते रहें तो इससे एक तो अधिक थकान होती है दूसरा हमारी कार्यक्षमता कम होती चलती जाती है और कार्य के गलत होने की संभावना भी रहती है।

9. खून की कमी होना (Lack of Blood):
शरीर में खून की कमी होने से जल्दी थकान महसूस होती है।

10. अधिक व्यायाम करना (To Much Exercises):
जरूरत से अधिक व्यायाम करने से भी थकावट महसूस होती है। प्रश्न

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 7 दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा

प्रश्न 4.
थकान या थकावट दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
थकावट दूर करने के उपाय निम्नलिखित हैं

1. पानी (Water):
थकान दूर करने में पानी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। पानी में हर तरह के गुण होते हैं जो हमारे शरीर की थकावट को दूर करते हैं। हमें ज्यादा थकावट शरीर में पानी की कमी से होती है। इसलिए हमें हर रोज लगभग 3-4 लीटर शुद्ध पानी अवश्य पीना चाहिए। काम के बीच में ठंडे पानी में हाथ-मुँह धोएँ और आँखों में पानी मारने से हम अच्छा महसूस करते हैं और हमारी थकान कम होती है।

2. संतुलित एवं पौष्टिक आहार (Balanced and Nutritious Diet):
थकान का सबसे बड़ा कारण हमारे जीवन में आवश्यक तत्त्वों की कमी है। थकान दूर करने के लिए पौष्टिक एवं संतुलित आहार बहुत आवश्यक है क्योंकि ऐसे आहार से हमारे शरीर में शक्ति का संचार होता है। हमें अपने भोजन में हरे खाद्य पदार्थों को अवश्य शामिल करना चाहिए; जैसे पालक, मटर, साग आदि। इन खाद्य पदार्थों में विटामिन-बी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है जो थकान को दूर करता है।

3. योग (Yoga):
मानसिक शांति के लिए योग और ध्यान बहुत लाभदायक हैं। मानसिक अशांति से चिंता एवं तनाव बढ़ता है जिस कारण हमें अधिक मानसिक थकावट होती है। इसलिए मन को शांत करने के लिए नियमित रूप से योग का अभ्यास करें।

4. जूस का सेवन (Use of Juice):
थकान को दूर करने के लिए हमें हर रोज जूस आदि पीना चाहिए। हर्बल ड्रिंक्स का भी सेवन करना चाहिए। ये थकान से लड़ने में शरीर की सहायता करते हैं।

5. मालिश (Massage):
थकावट दूर करने का सबसे अच्छा उपाय मालिश करना है। मालिश करने से शारीरिक माँसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। मालिश से शरीर में चुस्ती एवं ताकत आती है और तनाव कम होता है। इतना ही नहीं मालिश से मोटापा, उच्च रक्त-चाप आदि में भी फायदा मिलता है। इससे रक्त संचार तेज हो जाता है जिससे शरीर से व्यर्थ पदार्थों का तीव्रता से निकास होता है और शरीर की थकावट भी दूर होती है।

6. आराम एवं नींद (Relaxation and Sleep):
नींद एवं आराम से हमारी खोई हुई कार्यक्षमता बढ़ती है और फिर से कार्य करने में पूर्णतया सक्षम हो जाते हैं। बिना पूर्ण आराम किए हम किसी कार्य को करते रहें तो इससे एक तो अधिक थकान होती है दूसरा हमारी कार्यक्षमता कम होती जाती है और कार्य के गलत होने की संभावना भी रहती है। इसलिए पूर्ण आराम एवं नींद लेनी चाहिए। इससे हमारी थकावट दूर होती है।

7. मनोरंजन (Recreation):
हमें हमेशा तनावमुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए हमें मनोरंजन के साधनों को अपनाना चाहिए। मनोरंजन करने से हमारा मन शांत एवं तनावमुक्त होगा जिससे थकान दूर होगी।

8. काम में परिवर्तन (Change in Work):
यदि थकावट स्थानीय प्रकृति की है तो काम में परिवर्तन करके इसे दूर किया जा सकता है।

9. अन्य उपाय (Other Measures): थकान दूर करने के अन्य उपाय हैं
(1) सदा प्रसन्न एवं विनोदप्रिय रहना चाहिए,
(2) अपने विचारों एवं सोच को सकारात्मक रखना चाहिए,
(3) हमेशा तनाव एवं चिंता-मुक्त रहना चाहिए,
(4) अपने व्यवहार में सुधारात्मक परिवर्तन करना चाहिए,
(5) स्वयं को स्वच्छ वातावरण में रखना चाहिए ताकि शरीर नीरोग रहे,
(6) मन में व्यर्थ की चिंताएँ नहीं पालनी चाहिएँ,
(7) अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य की ओर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए, ताकि शरीर स्वस्थ एवं रोगमुक्त रहे।

प्रश्न 5.
उकताहट का क्या अर्थ है? इसके लक्षणों तथा इसको दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उकताहट का अर्थ (Meaning of Staleness):
सामान्य परिस्थितियों में शरीर को अलग-अलग क्रियाओं के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। जब कोई खिलाड़ी अधिक मेहनत और उत्साह से खेलता है तो, कम सफलता मिलने से उसका उत्साह कम हो जाता है। अधिक परिश्रम करने के बाद भी प्रगति न होने के कारण उसके कार्य या क्रिया में रुचि कम होती जाती है। उसके आत्म-विश्वास, व्यवहार और व्यक्तित्व में परिवर्तन के कारण उकताहट आ जाती है। उसका खेलों के प्रति उत्साह कम होना शुरू हो जाता है, इसे ही उकताहट (Staleness) कहते हैं।

उकताहट के लक्षण (Symptoms of Staleness): उकताहट के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं.
1. क्रियाओं में कम रुचि (Less Interest in Activities):
जब कोई खिलाड़ी अपनी क्षमता से अधिक प्रयत्न करता है, परंतु फिर भी उसे सफलता नहीं मिलती तो वह खेलों में रुचि कम कर देता है। कई बार तो खेल से इस प्रकार उकताहट हो जाती है कि वह खेलना तक छोड़ देता है।

2. अधिक तनाव (High Tension):
अधिक तनाव शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। इससे जहाँ सभी शारीरिक संस्थान प्रभावित होते हैं वहीं ज्यादा प्रभाव पाचन संस्थान पर पड़ता है और मानसिक चेतना प्रभावित होती है।

3. स्वभाव में चिड़चिड़ापन (Irritative Nature):
उकताहट का मुख्य कारण खिलाड़ी की क्रियाओं में कमी या प्रगति का रुक जाना है। लगातार उकताहट से स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है। वह किसी से बात करना पसंद नहीं करता और अकेला रहना ही पसंद करता है।

4. निपुणता में कमी (Decrease in Efficiency):
उकताहट की सबसे बड़ी हानि खिलाड़ी में मुकाबले की भावना में कमी आना है। वह दूसरे खिलाड़ियों से मुकाबला करने से कतराता है। इससे उसकी निपुणता में कमी आ जाती है।

उकताहट को दूर करने के उपाय (Remedies of Staleness): इसको दूर करने के उपाय निम्नलिखित हैं

1. अभ्यास के तरीकों में परिवर्तन (Change in Methods of Training):
उकताहट से बचने का सबसे बढ़िया तरीका अभ्यास के तरीकों में परिवर्तन लाना है। प्रतिदिन के अभ्यास से हटकर कुछ मनोरंजन भरी क्रियाओं में भाग लेकर उकताहट से बचा जा सकता है।

2. क्रियाओं में परिवर्तन (Change in Activities):
लगातार एक प्रकार की ही क्रियाओं में भाग लेते हुए कई बार खिलाड़ी उकताहट की स्थिति में आ जाता है। समझदार अध्यापक और कोच उसी समय ही उसकी क्रियाओं में परिवर्तन कर देता है। क्रियाओं में परिवर्तन उकताहट से शीघ्र छुटकारा पाने का बढ़िया तरीका है।

3. मनोवैज्ञानिक उपाय (Psychological Measure):
उकताहट आने का मुख्य कारण मानसिक तनाव है। मानसिक अवस्था प्रभावित होते ही उकताहट बढ़ती है। जब खिलाड़ी की कुशलता कम होती है या बढ़ने से रुक जाती है तो खिलाड़ी पर मानसिक दबाव बढ़ना शुरू हो जाता है। यदि उस समय खिलाड़ी के साथ मनोवैज्ञानिक ढंग से व्यवहार किया जाए तो उसकी मानसिक अवस्था को परिवर्तित करके उसे उकताहट से बचाया जा सकता है।

4. स्थान में परिवर्तन (Change in Place):
खिलाड़ी अपना प्रशिक्षण स्थान बदलकर उकताहट से बच सकता है। नया स्थान खिलाड़ी की रुचि में परिवर्तन लाता है। रुचि में परिवर्तन और स्थान में परिवर्तन खिलाड़ी में नई प्रेरणा पैदा करता है। इस प्रकार उकताहट से बचा जा सकता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न  (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
दूसरे श्वास की अवधारणा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
दूसरे श्वास का अर्थ है-थके होने के बाद पुनः प्रयास करना। जब खिलाड़ी सख्त क्रियाएँ या लंबे समय की क्रियाओं में भाग लेता है तो उसे ऑक्सीजन और ऊर्जा की अधिक आवश्यकता होती है। उसे जब ये दोनों क्रियाओं में भाग लेते समय कम मात्रा में मिलती हैं, तो आंतरिक दबाव बढ़ता है जिससे क्रियाओं को छोड़ने का मन करता है।

परंतु यदि खिलाड़ी आंतरिक दबाव के बावजूद क्रियाएँ जारी रखता है जिससे श्वास घुटन स्वयं दूर हो जाती है और खिलाड़ी अपनी पहली स्थिति में आ जाता है। ऐसी स्थिति को ही दूसरा श्वास कहते हैं। ई० एल० फॉक्स के अनुसार, “लंबे समय की क्रियाओं में अचानक आने वाला परिवर्तन; जैसे आंतरिक दबाव व थकावट और कुछ समय बाद काफी आरामदायक तथा कम तनावपूर्ण अहसास क्रियाओं में आने को दूसरा श्वास कहते हैं।”

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 7 दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा

प्रश्न 2.
दूसरे श्वास से मानवीय शरीर में होने वाले प्रमुख परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
दूसरे श्वास से मानवीय शरीर में होने वाले परिवर्तन निम्नलिखित हैं
(1) माँसपेशियों के तापमान में वृद्धि हो जाती है।
(2) माँसपेशियों का दर्द कम हो जाता है और इनकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है।
(3) सिर चकराना बंद हो जाता है।
(4) श्वास की गति सामान्य अवस्था में आ जाती है।
(5) तनाव एवं घबराहट दूर हो जाती है।
(6) शारीरिक क्रियाओं में भाग लेने की रुचि में बढ़ोतरी होती है।

प्रश्न 3.
थकान की अवधारणा से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मनुष्य शारीरिक शक्ति अपने रक्त में से प्राप्त करता है। जब हम कोई शारीरिक और मानसिक क्रिया करते हैं तो शरीर में जो शक्ति होती है उसमें कमी आ जाती है, इस कमी का मुख्य कारण थकावट होता है। जब शक्ति-भरा रक्त माँसपेशियों को प्राप्त नहीं होता तो माँसपेशियों में अवांछनीय पदार्थ पैदा हो जाते हैं, जिस कारण हम थकावट अनुभव करते हैं । परंपरागत परिभाषा के अनुसार लम्बे समय तक कार्य करने के कारण घटी हुई क्षमता को ही थकान कहा जाता है अर्थात् किसी कार्य को लगातार करने से कार्यक्षमता का ह्रास होना ही थकान है। बोरिंग के कथनानुसार, “थकावट से अभिप्राय कार्य की कम हो रही क्षमता से है।”

प्रश्न 4.
थकान या थकावट के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
थकान या थकावट दो प्रकार की होती है
1. शारीरिक थकान:
जब व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक शारीरिक क्रिया या कार्य करता है तो थकावट अनुभव करता है। इसको शारीरिक थकान कहा जाता है। जब माँसपेशियाँ लगातार सिकुड़ती हैं तो उनमें अवांछनीय पदार्थ; जैसे कार्बन-डाइऑक्साइड, लैक्टिक अम्ल पैदा हो जाते हैं जो माँसपेशियों को अपनी वास्तविक स्थिति में कार्य करने से रोकते हैं।

2. मानसिक:
थकान लगातार मानसिक क्रिया करने से मानसिक थकान होती है; जैसे पढ़ना, लिखना आदि। मानसिक थकान प्रायः उन व्यक्तियों को होती है जो प्रायः दिन-भर मानसिक या बौद्धिक कार्य करते हैं; जैसे वकील, अध्यापक, डॉक्टर आदि। इस थकान के कई कारण हैं; जैसे तनाव, डर, गुस्सा और घबराहट आदि। इस प्रकार की थकान काफी हानिकारक होती है, क्योंकि इसका प्रभाव भिन्न-भिन्न ग्रंथियों पर पड़ता है।

प्रश्न 5.
थकावट के कोई चार कारण बताएँ। उत्तर-थकावट के चार कारण निम्नलिखित हैं
1. तनाव एवं चिंता: जब कोई व्यक्ति तनाव एवं चिंता से ग्रस्त रहता है तो उसकी कार्य करने की क्षमता का स्तर कम हो जाता है। इससे व्यक्ति थका हुआ-सा महसूस करता है।

2. कमजोरी: कमजोर व्यक्ति की कार्यक्षमता कम होती है। वह निरंतर कार्य करने में समर्थ नहीं होता, क्योंकि शरीर कमजोर होने के कारण वह जल्दी थकान महसूस करता है।

3. बीमारी: कोई भी व्यक्ति अच्छे स्वास्थ्य के बिना कोई भी कार्य अच्छे से नहीं कर सकता। बीमार व्यक्ति के शरीर में खून की कमी हो जाती है जिस कारण वह जल्दी थकावट महसूस करता है।

4. अधिक कार्य करना: अधिक काम करने से शरीर थकावट महसूस करता है।

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प्रश्न 6.
थकान के कोई चार लक्षण बताएँ।
उत्तर:
थकान के चार लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) नाड़ी-माँसपेशियों में समन्वय का अभाव।
(2) किसी काम में मन न लगना अर्थात् मानसिक नियंत्रण की कमी।
(3) सकारात्मक सोच में कमी और नकारात्मक सोच में वृद्धि।
(4) व्यवहार में परिवर्तन होना अर्थात् स्वभाव चिड़चिड़ा होना।

प्रश्न 7.
थकान दूर करने के कोई चार उपाय बताएँ।
उत्तर:
थकान दूर करने के चार उपाय निम्नलिखित हैं

1. संतुलित एवं पौष्टिक आहार:
थकान का सबसे बड़ा कारण हमारे जीवन में आवश्यक तत्त्वों की कमी है। थकान दूर करने के लिए पौष्टिक एवं संतुलित आहार बहुत आवश्यक है क्योंकि ऐसे आहार से हमारे शरीर में शक्ति का संचार होता है।

2. योग:
मानसिक शांति के लिए योग और ध्यान बहुत लाभदायक हैं। मानसिक अंशाति से चिंता एवं तनाव बढ़ता है जिस कारण हमें अधिक मानसिक थकावट होती है। इसलिए मन को शांत करने के लिए नियमित रूप से योग का अभ्यास करें।

3. मालिश:
थकान दूर करने का सबसे अच्छा उपाय मालिश करना है। मालिश करने से शारीरिक माँसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। मालिश से शरीर में चुस्ती एवं ताकत आती है और तनाव कम होता है।

4. मनोरंजन:
हमें हमेशा तनावमुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए हमें मनोरंजन के साधनों को अपनाना चाहिए। मनोरंजन करने से हमारा मन शांत एवं तनावमुक्त होगा जिससे थकान दूर होगी।

प्रश्न 8.
उकताहट के कोई चार लक्षण बताएँ। उत्तर- उकताहट के चार लक्षण निम्नलिखित हैं
1. क्रियाओं में कम रुचि:
जब कोई खिलाड़ी अपनी क्षमता से अधिक प्रयत्न करता है, परंतु फिर भी उसे सफलता नहीं मिलती तो वह खेलों में रुचि कम कर देता है। कई बार तो खेल से इस प्रकार उकताहट हो जाती है कि वह खेलना तक छोड़ देता है।

2. अधिक तनाव:
अधिक तनाव शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। इससे जहाँ सभी शारीरिक संस्थान प्रभावित होते हैं वहीं ज्यादा प्रभाव पाचन संस्थान पर पड़ता है और मानसिक चेतना प्रभावित होती है।

3. स्वभाव में चिड़चिड़ापन:
उकताहट का मुख्य कारण खिलाड़ी की क्रियाओं में कमी या प्रगति का रुक जाना है। लगातार उकताहट से स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है। वह किसी से बात करना पसंद नहीं करता और अकेला रहना ही पसंद करता है।

4. निपुणता में कमी:
उकताहट की सबसे बड़ी हानि खिलाड़ी में मुकाबले की भावना में कमी आना है। वह दूसरे खिलाड़ियों से मुकाबला करने से कतराता है। इससे उसकी निपुणता में कमी आ जाती है।

प्रश्न 9.
ऑक्सीजन कर्ज या ऋण की अवधारणा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनुष्य की शारीरिक क्रियाएँ तभी संभव हो सकती हैं, यदि उसकी माँसपेशियाँ सिकुड़ने और फैलने की क्रिया ठीक ढंग से करती हों। व्यायाम करते समय हमारी माँसपेशियों को ऊर्जा और गर्मी की आवश्यकता होती है। इस अवस्था में ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा में आवश्यकता होती है । माँसपेशियों के सिकुड़ने और फैलने के कारण रासायनिक परिवर्तन होते हैं जिसके कारण रक्त में अवांछनीय पदार्थ इकट्ठे होने आरंभ हो जाते हैं । कठिन परिश्रम करते समय हागरे फेफड़ों के पास ऑक्सीजन की उचित मात्रा नहीं पहुँच पाती। हम लंबे-लंबे साँस लेकर इस कमी को पूरा करने की कोशिश करते हैं, परंतु कमी पूरी नहीं होती।

मनुष्य के शरीर में लाल रक्ताणु आवश्यकता पड़ने पर ऑक्सीजन शरीर में भेजते हैं । अतः सख्त शारीरिक क्रियाएँ करने के लिए ऑक्सीजन की जो मात्रा रक्त के लाल रक्ताणुओं के पास से ऋण के तौर पर ली जाती है, ऑक्सीजन कर्ज या ऋण कहलाती है । ई०एल० फॉक्स के अनुसार, “ऑक्सीजन ऋण या कर्ज ऑक्सीजन की उस मात्रा को कहते हैं जो कि व्यायाम की थकान भरी और श्वास की कमी की स्थिति में आवश्यक होती है। यह मात्रा उतनी ही अवधि में आराम की स्थिति में खपत की गई ऑक्सीजन से अधिक होती है।”

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प्रश्न 10.
ऑक्सीजन कर्ज को कम करने के मुख्य उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:
ऑक्सीजन कर्ज को कम करने के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं
1. अधिक ऑक्सीजन:
रक्त में अधिक मात्रा में ऑक्सीजन आने से ऑक्सीजन कर्ज को कम किया जा सकता है। ऑक्सीजन की कमी के कारण जो लैक्टिक अम्ल पैदा हो जाता है वह लंबे साँस लेकर और रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाकर बाहर निकालने वाले अंगों तक पहुँचा दिया जाता है। लैक्टिक अम्ल की कमी ऑक्सीजन कर्ज को कम करती है।

2. उचित विश्राम:
उचित विश्राम ऑक्सीजन कर्ज को कम करने का सबसे अच्छा और आसान तरीका है। विश्राम करते समय ऑक्सीजन का कम प्रयोग होता है और शरीर के अंदर ऑक्सीजन की मात्रा अधिक बढ़ जाती है जिसके कारण ऑक्सीजन कर्ज की आवश्यकता नहीं पड़ती।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न (Very ShortAnswer Type Questions)

प्रश्न 1.
दूसरे श्वास के कोई दो लक्षण लिखें।
उत्तर:
(1) चेहरे पर तनाव के चिह्न नज़र आते हैं,
(2) माँसपेशियों में दर्द होता है।

प्रश्न 2.
दूसरे श्वास (Second Wind) का क्या कारण है?
उत्तर:
सख्त क्रिया या कार्य को जारी रखने के लिए शरीर को तैयार करने में लगे समय को दूसरे श्वास का मुख्य कारण कहा जा सकता है, क्योंकि पहले शरीर क्रिया हेतु पूर्ण रूप से तैयार नहीं होता। इसलिए शरीर किसी क्रिया को पूर्ण करने में सक्षम नहीं होता।

प्रश्न 3.
हमें ऑक्सीजन कर्ज की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
उत्तर:
जोरदार क्रियाएँ करने से माँसपेशियों में लैक्टिक अम्ल पैदा हो जाता है जिसके कारण क्रिया करने में रुकावट आती है, इसीलिए हमें ऑक्सीजन कर्ज की आवश्यकता पड़ती है। परंतु कई बार लैक्टिक अम्ल के न होने पर भी ऑक्सीजन कर्ज की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 4.
उकताहट (Staleness) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
साधारण परिस्थितियों में शरीर को अलग-अलग क्रियाओं के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। जब कोई खिलाड़ी अधिक मेहनत और उत्साह से खेलता है, तो सफलता कम मिलने से उसका उत्साह कम होता है। अधिक परिश्रम करने के बाद भी प्रगति न होने के कारण उसके कार्य या क्रिया में कमी आ जाती है। उसके आत्म-विश्वास, व्यवहार और व्यक्तित्व में परिवर्तन के कारण उकताहट आ जाती है। उसका खेलों के प्रति उत्साह कम होना शुरू हो जाता है, इसे ही उकताहट कहते हैं।

प्रश्न 5.
थकान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनुष्य शारीरिक शक्ति अपने रक्त में से प्राप्त करता है। जब हम कोई शारीरिक और मानसिक क्रिया करते हैं तो शरीर में जो शक्ति होती है उसमें कमी आ जाती है, इस कमी का मुख्य कारण थकावट होता है। जब शक्ति-भरा रक्त माँसपेशियों को प्राप्त नहीं होता तो माँसपेशियों में अवांछनीय पदार्थ पैदा हो जाते हैं, जिस कारण हम थकावट अनुभव करते हैं।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 7 दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा

प्रश्न 6.
शारीरिक थकावट से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक शारीरिक क्रिया या कार्य करता है तो थकावट अनुभव करता है। इसको शारीरिक थकावट कहा जाता है। जब माँसपेशियाँ लगातार सिकुड़ती हैं तो उनमें अवांछनीय पदार्थ; जैसे कार्बन-डाइऑक्साइड, लैक्टिक अम्ल पैदा हो जाते हैं जो माँसपेशियों को अपनी वास्तविक स्थिति में कार्य करने से रोकते हैं।

प्रश्न 7.
मानसिक थकावट से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
लगातार मानसिक क्रिया करने से मानसिक थकावट होती है; जैसे पढ़ना, लिखना आदि। मानसिक थकावट प्रायः उन व्यक्तियों को होती है जो प्रायः दिन-भर मासिक या बौद्धिक कार्य करते हैं; जैसे वकील, अध्यापक, डॉक्टर आदि।

प्रश्न 8.
मानसिक थकान के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:
(1) निरंतर बौद्धिक कार्य करना,
(2) मानसिक चिंता एवं तनाव।

प्रश्न 9.
थकान से बचने के कोई तीन सामान्य उपाय बताएँ।
उत्तर:
(1) विनोदप्रिय होना,
(2) अपने विचारों को सकारात्मक रखना,
(3) सदा प्रसन्न एवं खुश रहना।

प्रश्न 10.
कौन-कौन-सी व्यक्तिगत बातें मानसिक एवं शारीरिक थकान की कारण बनती हैं?
उत्तर:
(1) दूसरे से ईर्ष्या करना,
(2) अतीत के दुःखों को याद करना,
(3) स्वयं और दूसरे के बारे में नकारात्मक सोचना,
(4) व्यर्थ की बातों में समय बर्बाद करना आदि।

HBSE 11th Class Physical Education दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

भाग-I : एक वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
किस प्रकार की थकान अधिक खतरनाक होती है?
उत्तर:
मानसिक थकान अधिक खतरनाक होती है।

प्रश्न 2.
मानसिक थकान दूर करने का सबसे अच्छा उपाय क्या है?
उत्तर:
मानसिक थकान दूर करने का सबसे अच्छा उपाय योग व ध्यान है।

प्रश्न 3.
दूसरे श्वास का कोई एक लक्षण बताएँ।
उत्तर:
दूसरे श्वास का एक लक्षण माँसपेशियों में दर्द होना।

प्रश्न 4.
मालिश करने से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
मालिश करने से शरीर में चुस्ती एवं ताकत आती है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 7 दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा

प्रश्न 5.
अधिक थकान से होने वाले कोई दो रोगों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) माइग्रेन,
(2) डिप्रेशन।

प्रश्न 6.
थकावट कम करने के कोई दो उपाय बताएँ।
उत्तर:
(1) पूर्ण विश्राम,
(2) संतुलित व पौष्टिक भोजन।

प्रश्न 7.
किसी कार्य की गति में रुकावट आ जाने को क्या कहते हैं?
उत्तर:
किसी कार्य की गति में रुकावट आ जाने को उकताहट कहते हैं।

प्रश्न 8.
“थकावट से अभिप्राय कार्य की कम हो रही क्षमता से है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन बोरिंग ने कहा।

प्रश्न 9.
थकावट/थकान मुख्यतः कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
थकावट/थकान मुख्यतः दो प्रकार की होती है।

प्रश्न 10.
शारीरिक कार्यों को करने से व्यक्ति को कौन-सी थकावट होती है?
उत्तर:
शारीरिक कार्यों को करने से व्यक्ति को शारीरिक थकावट होती है।

प्रश्न 11.
जोरदार व सख्त क्रियाएँ करने से माँसपेशियों में कौन-सा अम्ल पैदा हो जाता है?
उत्तर:
जोरदार व सख्त क्रियाएँ करने से माँसपेशियों में लैक्टिक अम्ल पैदा हो जाता है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 7 दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा

प्रश्न 12.
शारीरिक थकान का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर:
शारीरिक थकान का कारण शारीरिक कमजोरी या बीमारी है।

प्रश्न 13.
मानसिक थकान का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर:
मानसिक तनाव एवं चिंता होना।

प्रश्न 14.
उकताहट का कोई एक लक्षण बताएँ।
उत्तर:
कार्य में कम रुचि होना।

भाग-II : सही विकल्प का चयन करें

1. दूसरे श्वास के बाद मानवीय शरीर में होने वाला परिवर्तन है
(A) हृदय की गति का स्थिर होना
(B) मानसिक तनाव में कमी
(C) शरीर में स्फूर्ति बढ़ना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर;
(D) उपर्युक्त सभी

2. मनुष्य की थकावट दूर करने का उपाय निम्नलिखित है
(A) पूर्ण विश्राम
(B) क्रियाओं में परिवर्तन
(C) संतुलित व पौष्टिक भोजन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

3. किसी कार्य की प्रगति में रुकावट या बाधा आ जाने को क्या कहा जाता है?
(A) थकावट
(B) उकताहट
(C) ऑक्सीजन कर्ज
(D) दूसरा श्वास
उत्तर:
(B) उकताहट

4. निम्नलिखित में से थकावट का लक्षण है
(A) अवांछनीय पदार्थों का रक्त में इकट्ठा होना
(B) नींद व आराम की कमी होना
(C) माँसपेशियों में जकड़न व दर्द होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. निम्नलिखित में से उकताहट का लक्षण है
(A) थकावट
(B) रुचि में कमी
(C) स्वभाव में चिड़चिड़ापन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

6. जो ऑक्सीजन की मात्रा सख्त क्रिया करते समय लाल रक्त कणों से उधार ली जाती है, उसे क्या कहते हैं?
(A) थकावट
(B) उकताहट
(C) ऑक्सीजन कर्ज
(D) दूसरा श्वास
उत्तर:
(C) ऑक्सीजन कर्ज

7. ऑक्सीजन कर्ज की आवश्यकता पड़ती है
(A) लैक्टिक अम्ल की अधिकता के कारण
(B) लैक्टिक अम्ल के न होने पर
(C) लैक्टिक अम्ल की शरीर में बढ़ोतरी करने हेतु
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) लैक्टिक अम्ल के न होने पर

8. कार्य की कम हो रही क्षमता को क्या कहते हैं?
(A) थकावट
(B) उकताहट
(C) ऑक्सीजन कर्ज
(D) दूसरा श्वास
उत्तर:
(A) थकावट

9. थकावट के प्रकार हैं
(A) शारीरिक थकावट
(B) मानसिक थकावट
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) और (B) दोनों

10. थकावट का कारण है
(A) पूर्ण नींद एवं आराम न करना
(B) तनावग्रस्त रहना
(C) शरीर में विटामिन की कमी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

11. निम्नलिखित में से थकावट का कारण नहीं है
(A) ज्यादा व्यायाम करना
(B) शरीर में खून की कमी
(C) सोच का सकारात्मक होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) सोच का सकारात्मक होना

12. थकावट दूर करने के लिए हमारे भोजन में किस आवश्यक तत्त्व का होना आवश्यक है?
(A) पानी
(B) खनिज लवण
(C) विटामिन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

13. उकताहट को दूर करने का उपाय है
(A) व्यायाम करना
(B) अभ्यास के तरीकों में परिवर्तन करना
(C) मनोवैज्ञानिक उपाय
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

14. जोरदार क्रियाएँ करने से माँसपेशियों में कौन-सा अम्ल पैदा हो जाता है?
(A) सल्फ्यूरिक अम्ल
(B) लैक्टिक अम्ल
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) लैक्टिक अम्ल

भाग-III : निम्नलिखित कथनों के उत्तर सही या गलत अथवा हाँ या नहीं में दें

1. शरीर में खून की कमी होने से जल्दी थकान महसूस होती है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

2. किसी कार्य की प्रगति में रुकावट या बाधा आ जाने को ऑक्सीजन ऋण कहा जाता है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

3. थकावट से अभिप्राय कार्य की कम हो रही क्षमता से है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

4. लगातार मानसिक क्रिया करने से शारीरिक थकावट अधिक होती है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

5. कार्यक्षमता बढ़ाने हेतु विटामिन बहुत आवश्यक हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ

6. असंतुलित भोजन हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

7. नींद व आराम से हमारी खोई हुई कार्यक्षमता की प्राप्ति होती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

8. थकान दूर करने में पानी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

9. स्वयं को स्वच्छ वातावरण में रखना चाहिए ताकि शरीर नीरोग रहे। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

10. मन में व्यर्थ की चिंताएँ पालने से मानसिक तनाव कम होता है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं।

भाग-IV : रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. किसी कार्य को लगातार करने से कार्यक्षमता का …………….. होना थकान कहलाता है।
उत्तर:
ह्रास,

2. …………….. थकान प्रायः उन व्यक्तियों को अधिक होती है जो अधिक बौद्धिक या मानसिक कार्य करते हैं।
उत्तर:
मानसिक,

3. गिलझैथ ने थकान की अवधारणा को …………….. तथ्यों पर आधारित बताया है।
उत्तर:
तीन,

4. जब कोई व्यक्ति तनाव व चिंता से ग्रस्त रहता है तो उसकी कार्यक्षमता ……………. हो जाती है।
उत्तर:
कम,

5. शरीर को सामान्य अवस्था में रखने के लिए ऑक्सीजन कर्ज और …………….. की आवश्यकता होती है।
उत्तर:
दूसरे श्वास,

6. अपनी कार्यक्षमता से अधिक कार्य करने से शरीर …………….. महसूस करता है।
उत्तर:
थकान,

7. थकावट दूर करने के लिए …………….. आहार बहुत आवश्यक है।
उत्तर:
संतुलित एवं पौष्टिक,

8. मानसिक कार्यों में ………………………. ऊर्जा का व्यय होता है।
उत्तर:
मानसिक।

दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा Summary

दूसरे श्वास की आधारभूत अवधारणा परिचय

मनुष्य की शारीरिक क्रियाएँ तभी संभव हो सकती हैं, यदि उसकी माँसपेशियाँ सिकुड़ने और फैलने की क्रिया ठीक ढंग से करती हों। व्यायाम करते समय हमारी माँसपेशियों को ऊर्जा और गर्मी की आवश्यकता होती है। इस अवस्था में ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा में आवश्यकता होती है। माँसपेशियों के सिकुड़ने और फैलने के कारण रासायनिक परिवर्तन होते हैं जिसके कारण रक्त में अवांछनीय पदार्थ इकट्ठे होने आरंभ हो जाते हैं। कठिन परिश्रम करते समय हमारे फेफड़ों के पास ऑक्सीजन की उचित मात्रा नहीं पहुँच पाती।

हम लंबे-लंबे साँस लेकर इस कमी को पूरा करने की कोशिश करते हैं, परंतु कमी पूरी नहीं होती। इस कमी के मुख्य कारण थकावट, उकताहट, तनाव आदि होते हैं। शरीर को सामान्य अवस्था में लाने हेतु ऑक्सीजन कर्ज एवं दूसरे श्वास की आवश्यकता होती है। शरीर को सामान्य अवस्था में लाने के लिए ली गई ऑक्सीजन की अधिक खपत ऑक्सीजन कर्ज कहलाता है। दूसरा श्वास, श्वसन संस्थान में समायोजन स्थापित करता है, जिससे शरीर को मानसिक व शारीरिक थकान से राहत महसूस होती है।

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HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव

Haryana State Board HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 11th Class Physical Education विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव Textbook Questions and Answers

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न (LongAnswer Type Questions)

प्रश्न 1.
विभिन्न शारीरिक संस्थानों या प्रणालियों का संक्षिप्त वर्णन करें।
अथवा
मानवीय शरीर में कौन-कौन-से संस्थान होते हैं? संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
मानवीय शरीर में निम्नलिखित संस्थान होते हैं

1. अस्थिपिंजर/कंकाल संस्थान (Skeleton System):
मानवीय शरीर में छोटी, बड़ी, पतली, लंबी, चपटी व आकारहीन आदि अनेक तरह की 206 हड्डियाँ होती हैं जो मिलकर एक पिंजर का निर्माण करती हैं। इस पिंजर की भिन्न-भिन्न हड्डियाँ मिलकर जब शरीर के लिए विभिन्न कार्य करती हैं तो हम इनको अस्थिपिंजर या कंकाल संस्थान कहते हैं। यह शरीर के अंदर कोमल अंगों को सुरक्षित रखता है। यह शरीर में लीवर का काम करता है और अस्थियों के साथ माँसपेशियों को जुड़ने के लिए स्थान बनाता है।

2. माँसपेशी संस्थान (Muscular System):
माँसपेशी संस्थान एक मशीन की तरह है जो रासायनिक ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित कर देता है। यह संस्थान लगभग 639 माँसपेशियों से बना है। यदि हमारे शरीर की ऊपरी त्वचा को उधेड़कर देखा जाए तो उसके नीचे हमें लाल रंग के माँस के लोथड़े या धागे (Fibres) दिखाई देंगे। इनको ही हम माँसपेशियाँ (Muscles) कहते हैं। ये माँसपेशियाँ अनेक छोटी-छोटी जीवित कोशिकाओं (Cells) से बनी होती हैं। ये हड्डियों, कार्टिलेज और लिगामेंट्स त्वचा से जुड़ी होती हैं। इनके सिकुड़ने व फैलने से शरीर में गति पैदा होती है, जिससे शरीर के भिन्न-भिन्न अंग कार्य करते हैं।

3. रक्त-प्रवाह संस्थान (Circulatory System):
रक्त-प्रवाह या परिसंचरण संस्थान ऐसे अंगों का वह समूह है जो शरीर की कोशिकाओं के बीच रक्त के माध्यम से पोषक तत्त्वों का प्रवाह करता है। इससे रोगों से शरीर की रक्षा होती है तथा शरीर का ताप स्थिर व नियंत्रित बना रहता है। इस संस्थान का मुख्य कार्य शरीर के प्रत्येक अंग या भाग में रक्त को पहुँचाना है जिससे शरीर को पोषण एवं ऑक्सीजन (O,) प्राप्त हो सके। इस संस्थान का केंद्र हृदय है जो रक्त का निरंतर प्रवाह करता रहता है और धमनियाँ वे रक्त वाहिनियाँ हैं जिनमें से होकर रक्त शरीर के अंगों या भागों में पहुँचता है तथा केशिकाओं द्वारा वितरित होता है। अतः रक्त-प्रवाह में सहायक विभिन्न अंगों के समूह को रक्त-प्रवाह संस्थान कहा जाता है।

4. श्वसन संस्थान (Respiratory System):
ऑक्सीजन हमारे शरीर के लिए बहुत आवश्यक होती है। इसके बिना हमारा जीवन संभव नहीं है। जब हम साँस लेते हैं तो ऑक्सीजन हमारे शरीर में प्रवेश करती है और जब साँस छोड़ते हैं तो दूषित वायु अर्थात् कार्बन-डाइऑक्साइड शरीर से बाहर निकलती है। साँस लेने की क्रिया को हम श्वास अंदर खींचने की क्रिया (Inhalation) और साँस बाहर छोड़ने की किया (Exhalation) को श्वास छोड़ने की क्रिया कहते हैं । अतः साँस अंदर लेने और बाहर छोड़ने की क्रिया को श्वसन प्रक्रिया कहते हैं। इस प्रक्रिया में सहायक अंगों के समूह को श्वसन संस्थान कहते हैं। इस संस्थान के द्वारा हमारे शरीर में गैसों का आदान-प्रदान होता है।

5. नाड़ी या तंत्रिका संस्थान (Nervous System):
तंत्रिका या स्नायु संस्थान हमारे शरीर का वह संस्थान है जिसके द्वारा हमारा संपूर्ण शरीर नियंत्रित रहता है। इसके अंतर्गत हमारे संपूर्ण शरीर में महीन धागे के समान तंत्रिकाएँ फैली रहती हैं, जो शरीर के विभिन्न भागों के बीच कार्यात्मक समन्वय स्थापित करती हैं।

6. उत्सर्जन संस्थान (Excretory System):
शरीर की कोशिकाओं में, उपापचय के फलस्वरूप कार्बन-डाइऑक्साइड, अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल, लवण आदि कई ऐसे अपशिष्ट पदार्थ बनते रहते हैं जो हमारे शरीर के लिए हानिकारक होते हैं। उत्सर्जन संस्थान एक ऐसा संस्थान है जो इन अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने में सहायक होता है। वे अंग जो विशेष रूप से उत्सर्जन प्रक्रिया में सहायक होते हैं, उन्हें इस संस्थान का एक हिस्सा माना जाता है।

7. पाचन संस्थान (Digestive System):
पाचन प्रक्रिया वह रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें जीव एंजाइम की सहायता से भोजन के बड़े अवयवों; जैसे प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट्स को सरल अवयवों; जैसे प्रोटीन को अमीनो अम्ल में एवं कार्बोहाइड्रेट्स को ग्लूकोज में परिवर्तित कर शरीर के अवशोषण के योग्य बना देते हैं। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप भोजन पचता है और हमारे शरीर को ऊर्जा व शक्ति मिलती है। अत: पाचन संस्थान हमारे शरीर का ऐसा संस्थान है जिसके माध्यम से विभिन्न प्रकार के भोजन के अवयव तरल पदार्थ के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं और वे रक्त का हिस्सा बनकर हमारे शरीर को ऊर्जा व शक्ति प्रदान करते हैं।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव

प्रश्न 2.
माँसपेशी संस्थान से आपका क्या अभिप्राय है? इसके प्रकारों व कार्यों का वर्णन कीजिए। माँसपेशियाँ कितने प्रकार की होती हैं? इनके कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
माँसपेशी संस्थान का अर्थ (Meaning of Muscular System):
माँसपेशी संस्थान एक मशीन की तरह है जो रासायनिक ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित कर देता है। यह संस्थान लगभग 639 माँसपेशियों से बना है। यदि हमारे शरीर की ऊपरी त्वचा को उधेड़कर देखा जाए तो उसके नीचे हमें लाल रंग के माँस के लोथड़े या धागे (Fibres) दिखाई देंगे। इनको ही हम माँसपेशियाँ कहते हैं। ये माँसपेशियाँ अनेक छोटी-छोटी जीवित कोशिकाओं (Cells) से बनी होती हैं। इनके सिकुड़ने व फैलने से शरीर में गति पैदा होती है, जिससे शरीर के भिन्न-भिन्न अंग कार्य करते हैं।

माँसपेशियों के प्रकार (Types of Muscles): माँसपेशियाँ निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं
1. ऐच्छिक माँसपेशियाँ (Voluntary Muscles):
ऐच्छिक माँसपेशियों को धारीदार माँसपेशियाँ व आज्ञाकारी माँसपेशियाँ भी कहते हैं । जो माँसपेशियाँ मनुष्य की इच्छानुसार कार्य करती हैं, उन्हें ऐच्छिक माँसपेशियाँ कहते हैं। इनका संबंध मस्तिष्क से होता है। इन माँसपेशियों पर हमारी इच्छा का पूरा नियंत्रण रहता है। ये हमारे आदेश के बिना कोई कार्य नहीं करतीं। इन माँसपेशियों में धारियाँ होती हैं।

2. अनैच्छिक माँसपेशियाँ (Involuntary Muscles):
अनैच्छिक माँसपेशियों को गैर-धारीदार व सपाट माँसपेशियाँ भी कहते हैं । जो माँसपेशियाँ हमारी इच्छा के अनुसार कार्य न करके स्वचालित रूप से कार्य करें, उन्हें अनैच्छिक माँसपेशियाँ कहते हैं। ये माँसपेशियाँ हमारी इच्छा के नियंत्रण में नहीं रहतीं। ये स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करती हैं।

3. हृदयक माँसपेशियाँ (Cardiac Muscles):
हृदयक माँसपेशियाँ हमारे हृदय में होती हैं। इन माँसपेशियों में ऐच्छिक व अनैच्छिक माँसपेशियों का मिश्रण होता है। इनमें भी ऐच्छिक माँसपेशियों की तरह ही धारियाँ होती हैं। ये माँसपेशियाँ अनैच्छिक माँसपेशियों की तरह पूर्ण रूप से स्वतंत्र होती हैं और अपनी इच्छानुसार कार्य करती हैं। इनमें अनैच्छिक माँसपेशियों के गुण ऐच्छिक माँसपेशियों के गुणों की तुलना में अधिक होते हैं।

माँसपेशी संस्थान के कार्य (Functions of Muscular System): माँसपेशी संस्थान के अंतर्गत हमारे शरीर की विभिन्न प्रकार की माँसपेशियाँ निम्नलिखित कार्य करती हैं

  1. माँसपेशियाँ शरीर के विभिन्न अंगों को गति प्रदान करती हैं अर्थात् इनके कारण शरीर के विभिन्न अंग क्रिया करते हैं।
  2. माँसपेशियाँ शरीर के व्यर्थ पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य करती हैं।
  3. सपेशियाँ हमारे शरीर में उत्तोलक (Lever) की तरह कार्य करती हैं।
  4. माँसपेशियाँ हमारे जीवन के विभिन्न अंगों में संतुलन बनाए रखती हैं।
  5. माँसपेशियों द्वारा हमें खाने, पीने, श्वास लेने और बोलने आदि’ की क्रियाओं में सहायता मिलती है।
  6. वास्तव में माँसपेशियों के बिना शरीर का कोई अंग क्रिया नहीं कर सकता, क्योंकि हमारे शरीर की हड्डियाँ इनसे जुड़ी होती हैं।
  7. माँसपेशियाँ रक्त द्वारा लिए गए पदार्थ का भोजन के रूप में प्रयोग करती हैं।
  8. बड़ी माँसपेशियाँ हड्डियों को सुरक्षा प्रदान करती हैं।
  9. ये हृदय की पम्पिंग क्रिया में सहायक होती हैं।
  10. ये शरीर को आकृति भी प्रदान करती हैं।

प्रश्न 3.
माँसपेशी संस्थान या माँसपेशियों पर व्यायाम के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
माँसपेशी संस्थान या माँसपेशियों पर व्यायाम के निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं

  1. व्यायाम करने से माँसपेशियाँ फैलती हैं, जिनके कारण उनमें लचक आ जाती है।
  2. व्यायाम करने से माँसपेशियाँ मोटी, ठोस और लंबी हो जाती हैं।
  3. व्यायाम करने से शरीर की कोशिकाओं में वृद्धि होती है। कोशिकाएँ बढ़ने से शरीर आरोग्य, तंदुरुस्त और माँसपेशियों को रक्त अधिक मात्रा में मिलता है।
  4. व्यायाम से माँसपेशियाँ सशक्त बनती हैं और इसका सीधा प्रभाव श्वास क्रिया पर पड़ता है।
  5. व्यायाम माँसपेशियों की शक्ति व कार्यक्षमता में वृद्धि करते हैं।
  6. व्यायाम से भिन्न-भिन्न माँसपेशियों में तालमेल बढ़ता है। अगर माँसपेशियों का तालमेल ठीक न हो तो प्रत्येक कार्य करना असंभव हो जाता है।
  7. व्यायाम से हृदयक माँसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। इनकी मजबूती से रक्त सारे शरीर में उचित मात्रा में पहुँचता है।
  8. व्यायाम माँसपेशियों के आकार में वृद्धि करते हैं।
  9. व्यायाम से माँसपेशियों की प्रतिक्रिया में बढ़ोतरी होती है।
  10. व्यायाम से जहाँ माँसपेशियों को ताकत मिलती है, वहीं जोड़ भी मजबूत होते हैं। जोड़ों से जुड़े लिगामेंट्स (तंतु) मजबूत होते हैं। कठिन परिश्रम के लिए माँसपेशियों और जोड़ों का मजबूत होना बहुत आवश्यक है।
  11. व्यायाम करने से माँसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। मजबूत माँसपेशियाँ शरीर की हड्डियों की रक्षा करती हैं। ये उनके लिए कवच का कार्य करती हैं। मजबूत माँसपेशियाँ हड्डियों से जुड़कर व्यक्ति का आसन (Posture) ठीक रखती हैं।
  12. नियमित व्यायाम करने से माँसपेशियों का रंग बदल जाता है, क्योंकि नई केशिकाओं का निर्माण होने लगता है जिसके परिणामस्वरूप रक्त-संचार की कार्यक्षमता अच्छी हो जाती है।
  13. नियमित व्यायाम करने से माँसपेशियों की अतिरिक्त वसा नियंत्रित रहती है, जिस कारण शरीर का मोटापा नियंत्रित रहता है।
  14. नियमित व्यायाम करने से माँसपेशियों की गति में सुधार होता है।
  15. नियमित व्यायाम करने से माँसपेशियों की शक्ति बढ़ती है जिसके कारण आसन संबंधी विकृतियाँ दूर होती हैं।

प्रश्न 4.
रक्त-प्रवाह संस्थान के अंगों पर व्यायामों के क्या-क्या प्रभाव पड़ते हैं? वर्णन करें।
अथवा
रक्त-परिसंचरण संस्थान से आपका क्या अभिप्राय है? इस पर व्यायाम के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
रक्त-प्रवाह या रक्त-परिसंचरण संस्थान का अर्थ (Meaning of Circulatory System): रक्त-प्रवाह या परिसंचरण संस्थान ऐसे अंगों का वह समूह है जो शरीर की कोशिकाओं के बीच रक्त के माध्यम से पोषक तत्त्वों का प्रवाह करता है। इससे रोगों से शरीर की रक्षा होती है तथा शरीर का ताप स्थिर व नियंत्रित बना रहता है। इस संस्थान का मुख्य कार्य शरीर के प्रत्येक अंग या भाग में रक्त को पहुँचाना है जिससे शरीर को पोषण एवं ऑक्सीजन प्राप्त हो सके। इस संस्थान का केंद्र हृदय है जो शरीर में रक्त का निरंतर प्रवाह करता रहता है और धमनियाँ वे रक्त वाहिनियाँ हैं जिनमें से होकर रक्त शरीर के अंगों या भागों में पहुँचता है तथा केशिकाओं द्वारा वितरित होता है। अतः रक्त-प्रवाह में सहायक विभिन्न अंगों के समूह को रक्त-प्रवाह संस्थान कहा जाता है।

रक्त-प्रवाह संस्थान के अंग (Organs of Circulatory System): रक्त-प्रवाह संस्थान में निम्नलिखित अंग हैं

  1. हृदय (Heart),
  2. धमनियाँ (Arteries),
  3. शिराएँ (Veins),
  4. केशिकाएँ (Capillaries)।

रक्त-प्रवाह संस्थान पर व्यायाम के प्रभाव (Effects of Exercises on Circulatory System): रक्त-प्रवाह संस्थान पर व्यायाम के निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं

  1. व्यायाम करने से हृदय की माँसपेशियाँ अधिक कार्य करती हैं, जिसके कारण ये शक्तिशाली और मजबूत हो जाती हैं।
  2. व्यायाम करने से रक्त का शरीर के प्रत्येक भागों में पर्याप्त मात्रा में प्रवाह होता है। इससे शरीर का तापमान नियंत्रित एवं स्थिर रहता है।
  3. व्यायाम करने से हृदय का आकार बढ़ जाता है जिससे हृदय में रक्त की मात्रा बढ़ जाती है।
  4. रक्त हमारे जीवन का आधार है। व्यायाम करने से रक्त अधिक बनता है। व्यायाम करने से रक्त के बीच वाले सफेद कण उचित मात्रा में रहते हैं।
  5. व्यायाम करने से धमनियों और शिराओं की दीवारें मजबूत और शक्तिशाली बन जाती हैं।
  6. व्यायाम करने से रक्त-वाहिनियों में वृद्धि होती है जिससे शरीर के बीच वाले मल पदार्थ मल त्याग अंगों द्वारा बाहर निकल जाते हैं।
  7. व्यायाम करने से रक्त का प्रवाह शरीर के सभी अंगों में बढ़ जाता है जिसके कारण भोजन और ऑक्सीजन का प्रवाह भी शरीर को अधिक मात्रा में मिलना शुरू हो जाता है।
  8. व्यायाम करने से रक्त तेजी से प्रवाह करता है जिसके कारण रक्तचाप और नाड़ियों की बीमारियों से बचा जा सकता है।
  9. व्यायाम करने से हृदय में रक्त का दबाव और सिकुड़न क्रिया में बढ़ोतरी होती है। इससे रक्त की गति तेज हो जाती है।
  10. व्यायाम करते समय शरीर ऑक्सीजन की अधिक मात्रा की आवश्यकता अनुभव करता है जिसके परिणामस्वरूप कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा शरीर में से अधिक निकलती है और ऑक्सीजन तेजी से शरीर में प्रवेश करती है।
  11. व्यायाम रक्त-संचार संस्थान की कार्यक्षमता में वृद्धि करते हैं।
  12. व्यायाम करने से केशिकाओं की संख्या तथा उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है और इससे असक्रिय केशिकाएँ पुनः सक्रिय हो जाती हैं।
  13. नियमित व्यायाम करने से हम अपने शरीर को नीरोग रख सकते हैं। व्यायाम करने से हृदय एवं उच्च रक्तचाप संबंधी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं।
  14. नियमित व्यायाम करने से धमनियों में लचकता बढ़ती है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव

प्रश्न 5.
श्वसन संस्थान के बारे में आप क्या जानते हैं? इस पर व्यायामों का क्या प्रभाव पड़ता है?
अथवा
श्वसन संस्थान के अंग बताते हुए इन पर व्यायाम के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
श्वसन संस्थान का अर्थ (Meaning of Respiratory System):
ऑक्सीजन हमारे शरीर के लिए बहुत आवश्यक होती है। इसके बिना हमारा जीवन संभव नहीं है। जब हम साँस लेते हैं तो ऑक्सीजन हमारे शरीर में प्रवेश करती है और जब साँस छोड़ते हैं तो दूषित वायु अर्थात् कार्बन-डाइऑक्साइड शरीर से बाहर निकलती है। साँस लेने की क्रिया को हम श्वास अंदर खींचने की क्रिया (Inhalation) और साँस बाहर छोड़ने की क्रिया को श्वास छोड़ने की क्रिया (Exhalation) कहते हैं। अतः साँस अंदर लेने और बाहर छोड़ने की क्रिया को श्वसन प्रक्रिया कहते हैं । इस प्रक्रिया में सहायक अंगों के समूह को श्वसन संस्थान कहते हैं। इस संस्थान के द्वारा हमारे शरीर में गैसों का आदान-प्रदान होता है।

श्वसन संस्थान के अंग (Organs of Respiratory System): श्वसन संस्थान में विभिन्न अंग अपना महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। इनका विवरण निम्नलिखित है

  1. नाक (Nose),
  2. स्वर यंत्र/कण्ठ (Larynx),
  3. ग्रसनिका (Pharynx),
  4. वायु-नलियाँ या श्वसनियाँ (Bronchi),
  5. श्वासनली (Trachea),
  6. फेफड़े (Lungs)।

श्वसन संस्थान पर व्यायाम के प्रभाव (Effects of Exercises on Respiratory System): श्वसन संस्थान पर व्यायाम के निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं

  1. व्यायाम करने से फेफड़ों को अधिक कार्य करना पड़ता है। इससे फेफड़ों की कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है।
  2. व्यायाम करने से फेफड़े अपने अंदर ऑक्सीजन अधिक खींचकर लंबे समय तक अपने अंदर ऑक्सीजन की मात्रा रख सकते हैं।
  3. व्यायाम करने से शरीर से दूषित वायु अर्थात् कार्बन-डाइऑक्साइड बाहर निकलती है और उसके स्थान पर ऑक्सीजन अधिक मात्रा में अंदर जाती है।
  4. व्यायाम करने से फेफड़ों में वायु का आदान-प्रदान तेजी से होता है।
  5. व्यायाम करने से छाती के फैलाव में वृद्धि होती है।
  6. व्यायाम करने से शरीर की श्वसन संस्थान की शक्ति में वृद्धि होती है।
  7. नियमित व्यायाम करने से व्यक्ति की इच्छा-शक्ति में वृद्धि होती है।
  8. नियमित व्यायाम करने से व्यक्ति की श्वसन क्रिया की दर सामान्य रहती है।
  9. नियमित व्यायाम करने से व्यक्ति की सहनशीलता में वृद्धि होती है। वह कोई भी कार्य बिना किसी कठिनाई के लम्बे समय तक करने में समर्थ हो जाता है।
  10.  नियमित रूप से व्यायाम करने से श्वसन संस्थान संबंधी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं, क्योंकि व्यायाम करने से श्वसन संस्थान के अंगों की कार्यक्षमता सुचारू रूप से चलती है।

प्रश्न 6.
तंत्रिका या नाड़ी संस्थान के बारे में बताएँ। इस पर व्यायामों के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
तंत्रिका या स्नायु संस्थान कितने भागों में विभाजित होता है? इस पर व्यायामों के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
तंत्रिका या स्नायु संस्थान का अर्थ (Meaning of Nervous System):
तंत्रिका संस्थान हमारे शरीर का वह संस्थान है जिसके द्वारा हमारा संपूर्ण शरीर नियंत्रित रहता है। इसके अंतर्गत हमारे संपूर्ण शरीर में महीन धागे के समान तंत्रिकाएँ फैली रहती हैं, जो शरीर के विभिन्न भागों के बीच कार्यात्मक समन्वय स्थापित करती हैं।

तंत्रिका या स्नायु संस्थान के भाग (Organs of Nervous System): तंत्रिका तंत्र तीन भागों में विभाजित होता है
(क) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System): यह तंत्रिका तंत्र का वह भाग होता है जो हमारे सारे शरीर तथा स्वयं तंत्रिका तंत्र पर नियंत्रण रखता है। यह दो भागों या अंगों से मिलकर बना होता है-मस्तिष्क और मेरुरज्जु।

1. मस्तिष्क (Brain):
मानव मस्तिष्क का वजन लगभग 1400 ग्राम होता है। यह पूरे शरीर का समन्वय केंद्र है। मस्तिष्क कपाल में सुरक्षित रहता है। यह तीन झिल्लियों से ढका हुआ होता है। इन झिल्लियों के बीच में ऐसा द्रव पदार्थ भरा रहता है जो

प्रमस्तिष्क: खोपड़ी मस्तिष्क को आघात से बचाता है। हमारे मस्तिष्क के तीन भाग होते हैं:
(i) अग्र-मस्तिष्क,
(ii) मध्य-मस्तिष्क,
(iii) पश्च-मस्तिष्क।

(i) अग्र-मस्तिष्क (Fore Brain):
अग्र-मस्तिष्क में -मध्य-मस्तिष्क प्रमस्तिष्क तथा घ्राण पिंड होते हैं। प्रमस्तिष्क बहुत ही जटिल तथा विशिष्ट भाग होता है। यह दो अर्ध गोलाकार भागों से मिलकर बनता है। प्रमस्तिष्क बुद्धिमता, संवेदना तथा स्मरण शक्ति का केंद्र है। संवेदी अंग; जैसे आँखें, कान, त्वचा, जिह्वा आदि उससे प्रत्यक्ष रूप पीयूष ग्रंथि से जुड़े होते हैं। ऐच्छिक गतिविधियों का केंद्र होने के कारण यह नफरत, ईर्ष्या या द्वेष, प्यार तथा सहानुभूति का भी केंद्र है। चीजों को याद रखना व संचित करना मस्तिष्क के इसी भाग के कार्य हैं।
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(ii) मध्य-मस्तिष्क (Mid Brain):
यह मस्तिष्क के अग्र और पार्श्व भागों को मिलाता है। यह आँख की पलकें, आयरिस के प्रतिवर्त क्रियाओं को नियंत्रित करता है और कान से संवेदना की सूचना प्रमस्तिष्क तक पहुँचाता है।

(iii) पश्च-मस्तिष्क (Hind Brain):
पश्च-मस्तिष्क अनु-मस्तिष्क, पॉन्स और मेडुला ऑब्लांगेटा (Medulla Oblongata) आदि भागों से बना होता है। यह उपापचय, रक्तदाब, हृदय की धड़कनों को नियंत्रित करता है। यह शरीर को संतुलित बनाए रखता है।

2. मेरुरज्जु या सुषुम्ना नाड़ी (Spinal Cord):
वयस्क मानव में सुषुम्ना नाड़ी लगभग 42 से 45 सें०मी० लंबी तथा 2 सें०मी० मोटी होती है। यह लगभग बेलनाकार किन्तु अधर व पृष्ठ तलों पर कुछ चपटी-सी होती है। यह मेडुला ऑब्लांगेटा से शुरू होकर नीचे की ओर जाती है। इसकी मोटी दीवार दो स्तरों में विभाजित होती है-बाहर की ओर श्वेत द्रव्य तथा भीतर की ओर धूसर द्रव्य। मेरुरज्जु का श्वासनली से सीधा संबंध होता है। अतः इसके आंतरिक भाग में खराबी से श्वास आना बंद हो जाने से मृत्यु की संभावना बन जाती है।

(ख) परिधीय तंत्रिका तंत्र (Peripheral Nervous System):
परिधीय तंत्रिका तंत्र में शाखान्वित तंत्रिकाएँ आती हैं जिनका हमारे शरीर में जाल-सा फैला होता है। ये केंद्रीय तंत्रिका तंत्र अर्थात् मस्तिष्क व मेरुरज्जु को शरीर के विभिन्न भागों में स्थित संवेदांगों एवं संपादी या अपवाहक अंगों व ऊतकों से जोड़कर शरीर में एक विस्तृत संचार प्रणाली स्थापित करती हैं। .

(ग) स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System):
तंत्रिका तंत्र के उस भाग को जो शरीर के भीतरी भागों या अंगों; जैसे हृदय, छोटी-बड़ी आंत, वृक्क, मूत्राशय व रक्त वाहिनियों आदि को स्वतःचालित और नियंत्रित करता है, उसे स्वायत्त तंत्रिका तंत्र कहते हैं। इसके दो भाग होते हैं-अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र और परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र।

1. अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र (Symphathetic Nervous System):
इससे तंत्रिका की शाखाएँ निकलकर अपने-अपने अंगों के भीतरी भाग में प्रवेश करती हैं और उनकी क्रियाओं का संचालन करती हैं। अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र त्वचा में उपस्थित रक्त वाहिनियों को संकीर्ण करता है। यह हृदय स्पंदन व श्वसन दर को तीव्र करता है। यह रक्त का थक्का बनाने में सहायक होता है।

2. परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र (Parasymphathetic Nervous System):
परानुकम्पी तंतु मस्तिष्क व मेरुरज्जु से निकलकर गुच्छिकाओं में प्रवेश करती है और इन गुच्छिकाओं से तंत्रिका तंतु निकलकर शरीर के भीतरी अंगों में फैल जाती है। इस यंत्र का कार्य सामान्यतया अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र के कार्य के विपरीत है।

नाड़ी या स्नायु संस्थान पर व्यायाम के प्रभाव (Effects of Exercises on Nervous System): तंत्रिका या नाड़ी संस्थान पर व्यायाम के पड़ने वाले प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. प्रतिदिन व्यायाम करने से नाड़ी-माँसपेशियों का तालमेल ठीक हो जाता है।
  2. व्यायाम करने से नाड़ियों को संदेश और आज्ञा जल्दी-जल्दी मिलने लगते हैं।
  3. व्यायाम से हमारे कुछ कार्य प्रतिवर्त हो जाते हैं अर्थात् प्रतिवर्त क्रियाओं की संख्या बढ़ जाती है, जो हमारे शरीर की सुरक्षा के लिए ठीक होती हैं। इससे ताकत भी कम खर्च होती है।
  4. व्यायाम से नाड़ी नियंत्रण अधिक होने के कारण माँसपेशियों की सिकुड़ने की शक्ति अधिक होती है, जिसके कारण ऊर्जा
    की बचत हो जाती है।
  5. व्यायाम करते समय यह संस्थान और इसके भाग अधिक प्रयोग में आते हैं, जिसके कारण इनके दोष दूर होते हैं और इनकी थकावट कम होती है।
  6. व्यायाम करने से इस संस्थान की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इसमें शक्ति एवं ऊर्जा का संचार होता है।

प्रश्न 7.
पाचन संस्थान क्या है? पाचन संस्थान को व्यायाम किस प्रकार से प्रभावित करते हैं? अथवा पाचन प्रक्रिया में सहायक अंग बताते हुए इन पर व्यायामों के प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
पाचन संस्थान का अर्थ (Meaning of Digestive System):
पाचन प्रक्रिया वह रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें जीव एंजाइम की सहायता से भोजन के बड़े अवयवों; जैसे प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट्स को सरल अवयवों; जैसे प्रोटीन को अमीनो अम्ल में, कार्बोहाइड्रेट्स को ग्लूकोज में परिवर्तित कर शरीर के अवशोषण के योग्य बना देते हैं। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप भोजन पचता है और हमारे शरीर को ऊर्जा व शक्ति मिलती है। अतः पाचन संस्थान हमारे शरीर का ऐसा संस्थान है जिसके माध्यम से विभिन्न प्रकार के भोजन के अवयव तरल पदार्थ के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं और वे रक्त का हिस्सा बनकर हमारे शरीर को ऊर्जा व शक्ति प्रदान करते हैं।

पाचन संस्थान के अंग (Organs of Digestive System): पाचन संस्थान के अंग निम्नलिखित हैं

  1. मुँह या मुख (Mouth),
  2. आहार-नली या भोजन-नली (Gullet),
  3. आमाशय (Stomach),
  4. पक्वाशय (Duodenum),
  5. यकृत या जिगर (Liver),
  6. छोटी आंत (Small Intestine),
  7. बड़ी आंत (Large Intestine),
  8. मलाशय या गुदा (Retum and Anus)।

पाचन संस्थान पर व्यायामों के प्रभाव (Effects of Exercises on Digestive System): पाचन संस्थान पर व्यायामों के निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं

  1. भोजन के उपरांत कई बार आंतों में अपचय खाना रह जाता है, जिसके कारण गैस तथा कई प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। नियमित व्यायाम पाचन क्रिया को ठीक रखता है और कब्ज होने से बचाता है।
  2. लार गिल्टियाँ खाए हुए भोजन को पचाने में सहायता करती हैं। व्यायाम से लार गिल्टियों की कार्यक्षमता में बढ़ोतरी होती है।
  3. व्यायाम करने से आंतें, गुदा, तिल्ली और यकृत स्वस्थ रहते हैं, जिसके कारण ये अपना कार्य सुचारू रूप से करते रहते हैं।
  4. नियमित व्यायाम करने से दैनिक आहार एवं खुराक का भरपूर प्रयोग होता है जिससे मोटापा नियंत्रित रहता है।
  5. व्यायाम केवल भूख ही नहीं बढ़ाता, बल्कि स्वास्थ्य और इसके सभी पक्षों में बढ़ोतरी भी करता है।
  6. नियमित व्यायाम करने से भी असाध्य रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है।
  7. व्यायाम हमारी बड़ी आंत की मालिश करने में सहायक होता है, जिसके कारण इसकी कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है।
  8. व्यायाम करने से पेट संबंधी दोषों को दूर करने में सहायता मिलती है।
  9. व्यायाम पाचन संस्थान और इसके अंगों की कार्यक्षमता में वृद्धि करता है।
  10. नियमित रूप से व्यायाम करने से प्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि होती है जो हमारे शरीर को बीमारियों से बचाती है।
  11. व्यायाम करने से शरीर के लिए आवश्यक तत्त्वों; जैसे ग्रंथियों में वृद्धि होती है। ग्रंथियाँ पाचन क्रिया को ठीक रखने में सहायक होती हैं।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव

प्रश्न 8.
व्यायाम से आप क्या समझते हैं? व्यायाम करने से होने वाले लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यायाम का अर्थ (Meaning of Exercise):
कुछ विशेष तथा तेज शारीरिक क्रियाएँ जो मनुष्य अपनी इच्छानुसार करता है, व्यायाम कहलाता है। जिस प्रकार भोजन, जल और वायु जीवन के लिए आवश्यक हैं उसी प्रकार व्यायाम भी शरीर के लिए बहुत आवश्यक है। व्यायाम न करने से शरीर आलसी एवं रोगी हो जाता है, जबकि व्यायाम करने से शरीर चुस्त, फुर्तीला व सक्रिय बनता है। व्यायाम करने से शरीर नीरोग रहता है।

व्यायाम करने के लाभ (Advantages of doing Exercise)-एस०मिसेल कार्टराइट (S. Michael Cortwright) के अनुसार, “व्यायाम आपके मन, शरीर और आत्मा के लिए अच्छा है।” इसलिए हमें नियमित रूप से व्यायाम करने चाहिएँ, क्योंकि व्यायाम करने से हमारा शरीर और मन स्वस्थ एवं शांत रहता है। संक्षेप में, व्यायाम करने से होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं

  1. व्यायाम करने से शरीर की माँसपेशियाँ लचकदार तथा मजबूत बनती हैं। शरीर में कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है।
  2. व्यायाम करने से शरीर हृष्ट-पुष्ट रहता है और बुढ़ापा देर से आता है।
  3. व्यायाम करने से भूख अधिक लगती है। पाचन क्रिया ठीक रहती है।
  4. व्यायाम करने से क्षयरोग, दमा और कब्ज आदि नहीं हो सकते। अतः व्यायाम करने से शरीर नीरोग रहता है।
  5. व्यायाम करने से रात को नींद अच्छी आती है।
  6. व्यायाम करने से शरीर के सभी अंग सुचारू रूप से कार्य करते हैं।
  7. व्यायाम करने से रक्त का संचार तेज होता है। वृक्क (Kidneys) में रक्त के अधिक पहुँचने से उसके सारे विषैले पदार्थ
    मूत्र के द्वारा बाहर निकल जाते हैं।
  8. व्यायाम करने से नाड़ी प्रणाली स्वस्थ रहती है। ज्ञानेंद्रियों की शक्ति बढ़ जाती है।
  9. व्यायाम करने से फेफड़ों में ऑक्सीजन अधिक पहुँचती है और कार्बन-डाइऑक्साइड भी बाहर निकलती है।
  10. व्यायाम शरीर की बहुत-सी कमियों तथा जोड़ों के रोगों को दूर करने में सहायक होता है।
  11. व्यायाम से हृदय बलशाली हो जाता है तथा धमनियाँ, शिराएँ और केशिकाएँ आदि मजबूत बनती हैं।
  12. व्यायाम करने से टूटी कोशिकाओं को ऑक्सीजन तथा ताजा रक्त मिलता है। इस प्रकार इनकी मुरम्मत हो जाती है।
  13. व्यायाम करने से शरीर में फुर्ती बढ़ती है और आलस्य दूर होता है।
  14. व्यायाम करने से स्मरण शक्ति, तर्क शक्ति एवं कल्पना शक्ति बढ़ती है।

प्रश्न 9.
व्यक्तित्व पर व्यायामों के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए।
अथवा
व्यक्तित्व के विकास में शारीरिक क्रियाओं के योगदान पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रत्येक व्यक्ति में कुछ विशेष गुण या विशेषताएँ होती हैं जो सभी में नहीं होती। इन्हीं गुणों या विशेषताओं के कारण प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से अलग होता है। व्यक्ति के इन गुणों या विशेषताओं का समुच्चय ही व्यक्ति का व्यक्तित्व कहलाता है जो उसकी पहचान बनता है। संक्षेप में, व्यक्तित्व व्यक्ति की उस संपूर्ण छवि का नाम है जो वह दूसरों के सामने बनाता है।

व्यक्तित्व के विकास में वंशानुक्रम (Heredity) और परिवेश का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है । वंशानुक्रम व्यक्ति को जन्मजात प्राप्त है परन्तु परिवेश अर्जित होता है। परिवेश का क्षेत्र बहुत व्यापक है जो व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। व्यक्ति पर शारीरिक क्रियाओं या व्यायामों का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि शारीरिक व्यायामों का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है । व्यक्तित्व पर शारीरिक क्रियाओं या व्यायामों के पड़ने वाले प्रभाव को निम्नलिखित तथ्यों द्वारा स्पष्ट किया गया है

1. शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग बनाए रखने के लिए नियमित व्यायाम करना बहुत आवश्यक है। बिना शारीरिक स्वास्थ्य के जीवन में कोई भी उपलब्धि प्राप्त नहीं की जा सकती। कमजोर व्यक्ति का न तो कोई भविष्य होता है और न ही व्यक्तित्व। इसलिए स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए शारीरिक व्यायाम करना बहुत आवश्यक है तभी हमारे व्यक्तित्व
का विकास होगा।

2. व्यायाम करने से मनुष्य में धैर्य एवं संयम का विकास होता है। संयम का अर्थ है-शक्तियों को अपव्यय से बचाना और संग्रहित शक्तियों को अच्छे कार्य हेतु नियोजित करना। संयम के द्वारा हम अपने व्यक्तित्व को शक्तिशाली बना सकते हैं।

3. शारीरिक क्रियाएँ या व्यायाम व्यक्ति की छवि को सकारात्मक बनाने में सहायक होते हैं। हम दूसरों की प्रशंसा के पात्र तभी बन सकते हैं जब हमारी छवि सकारात्मक व अच्छी होगी। यदि हमारी छवि नकारात्मक है तो हम अपमान के पात्र होंगे और इससे हमारे व्यक्तित्व पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

4. शारीरिक व्यायाम करने से शरीर मजबूत, चुस्त एवं फुर्तीला रहता है जिस कारण व्यक्ति की शारीरिक संरचना आकर्षक एवं सुंदर दिखती है।

5. व्यक्तित्व न केवल अच्छी शारीरिक संरचना या बनावट को कहा जाता है बल्कि यह ज्ञान, अभिव्यक्ति, सहनशीलता, धैर्य, गंभीरता आदि गुणों के समन्वय से बनता है। शारीरिक व्यायाम व्यक्ति में इन सभी गुणों के विकास में सहायक होते हैं।

6. शारीरिक व्यायाम करने से हमारे मन को शांति मिलती है और हमारी सोच व चिंतन सकारात्मक व उच्च बनते हैं जिससे हमें मानसिक संतुष्टि व शांति प्राप्त होती है। एक प्रसिद्ध कहावत है-“जो व्यक्ति जैसा सोचता है और करता है वह वैसा ही बन जाता है।” निश्चित रूप से व्यक्ति की उच्च सोच से व्यक्तित्व अच्छा एवं प्रभावशाली बनता है।

7. आदतें हमारे व्यक्तित्व की पहचान होती हैं। इसलिए ये हमारे व्यक्तित्व को बहुत प्रभावित करती हैं। कुछ बुरी आदतें जिनसे हमारे व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और व्यक्तित्व का विकास बाधित होता है; जैसे बड़ों का सम्मान न करना, बार-बार गाली देना, देर से भोजन करना, रात को देर से सोना, सुबह देर से उठना आदि। शारीरिक क्रियाएँ करने से हमारे अंदर अच्छी आदतों का विकास होता है। नियमित व्यायाम करने से हमारा आलस्य दूर होता है और अच्छी आदतों के कारण हमारे व्यक्तित्व का विकास होता है।

8. स्वस्थ व्यक्ति दूसरों को अधिक प्रभावित करता है, क्योंकि वह अपने सभी कार्य आसानी से करने में सक्षम होता है। अच्छा स्वास्थ्य सबसे अधिक शारीरिक क्रियाओं पर निर्भर करता है। इस प्रकार व्यक्तित्व पर स्वास्थ्य का भी काफी प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 10.
अस्थिपिंजर या कंकाल संस्थान से आप क्या समझते हैं? इसके कार्यों तथा इस पर व्यायामों के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अस्थिपिंजर/कंकाल संस्थान का अर्थ (Meaning of Skeleton System):
मानवीय शरीर में छोटी, बड़ी, पतली, लंबी, चपटी व आकारहीन आदि अनेक तरह की 206 हड्डियाँ होती हैं जो मिलकर एक पिंजर का निर्माण करती हैं। इस पिंजर की भिन्न-भिन्न हड्डियाँ मिलकर जब शरीर के लिए विभिन्न कार्य करती हैं तो हम इनको अस्थिपिंजर या कंकाल संस्थान कहते हैं।

अस्थिपिंजर/कंकाल संस्थान के कार्य (Functions of Skeleton System): अस्थिपिंजर संस्थान अथवा हड्डियों के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. मानवीय अस्थिपिंजर शरीर को एक खास प्रकार की रूपरेखा प्रदान करता है।
  2. यह शरीर के कोमल अंगों को सुरक्षा प्रदान करता है।
  3. यह माँसपेशियों को जुड़ने का आधार प्रदान करता है।
  4. यह लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण में भी सहायक होती है।
  5. यह बाहरी दबावों, रगड, झटकों व चोटों आदि से अंतरांगों की रक्षा करता है।
  6. हड्डियों की गति के अनुसार ही शरीर के अंगों या भागों में गति होती है।
  7. विभिन्न प्रकार की कंकाल-संधियाँ शरीर के विभिन्न भागों की विशिष्ट गतियों को नियंत्रित करती हैं।
  8. हड्डियाँ शरीर को चलने-फिरने तथा अन्य कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती हैं।
  9. हड्डियाँ उत्तोलकों (Levers) का कार्य करती हैं।
  10. ये शरीर को सीधा रखने में सहायता प्रदान करती हैं।

अस्थिपिंजर संस्थान पर व्यायाम के प्रभाव (Effects of Exercises on Skeleton System): अस्थिपिंजर संस्थान पर व्यायाम के पड़ने वाले प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. नियमित व्यायाम या शारीरिक क्रियाएँ करने से जोड़ों की लचक में वृद्धि होती है अर्थात् जोड़ों में लोचशीलता बढ़ जाती है।
  2. व्यायाम करने से शारीरिक क्षमता में वृद्धि होती है।
  3. व्यायाम करने से जोड़ों तथा हड्डियों से संबंधी विकार दूर होते हैं।
  4. नियमित व्यायाम करने से आसन संबंधी विकृतियों को दूर किया जा सकता है।
  5. नियमित व्यायाम करने से अस्थिपिंजर संस्थान ठीक तरह से कार्य करता है। यदि यह संस्थान ठीक से कार्य न करे तो इसका अन्य शारीरिक संस्थानों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए नियमित व्यायाम करने से शारीरिक संस्थानों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
  6. नियमित व्यायाम करने से रीढ़ की हड्डी संबंधी विकारों को दूर किया जा सकता है।
  7. नियमित व्यायाम करने में पित्त संबंधी विकारों को कम किया जा सकता है।
  8. नियमित व्यायाम करने से हड्डियाँ एवं जोड़ मजबूत एवं लचकदार बनते हैं जिस कारण ये अधिक दबाव एवं तनाव सहन करने में समर्थ हो जाते हैं।
  9. नियमित व्यायाम करने से व्यक्ति के संपूर्ण शरीर में वृद्धि होती है। इससे व्यक्ति की लम्बाई और हड्डियों की लम्बाई में भी वृद्धि होती है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions) |

प्रश्न 1.
मस्तिष्क के भागों व उनके कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर:
मस्तिष्क खोपड़ी की अस्थियों के खोल खोपड़ी (क्रेनियम) में बंद रहता है, जो बाहरी आघातों से मस्तिष्क को बचाता है। इसका वजन लगभग 1400 ग्राम होता है। मस्तिष्क हमारे शरीर की प्रत्येक क्रिया को नियंत्रित करता है। इसके विभिन्न भाग एवं उनके कार्य निम्नलिखित हैं

1. अग्र-मस्तिष्क:
यह मस्तिष्क का सबसे अधिक विकसित एवं बड़ा भाग है। इसमें प्रमस्तिष्क (Cerebrum) एवं घ्राण पिंड होते हैं। यह दो अर्ध-गोलाकार भागों से मिलकर बना होता है। अग्र-मस्तिष्क बुद्धिमता, स्मृति, इच्छा-शक्ति, ज्ञान, वाणी व चिंतन का केंद्र होता है। यह ऐच्छिक माँसपेशियों के कार्यों को समन्वित करता है।

2. मध्य-मस्तिष्क:
यह मस्तिष्क के अग्र और पार्श्व भागों को मिलाता है। यह आँख की पलकें, आयरिस की प्रतिवर्त क्रियाओं को नियंत्रित करता है और कान से संवेदना की सूचना प्रमस्तिष्क तक पहुँचाता है।

3. पश्च-मस्तिष्क-पश्च:
मस्तिष्क अनु-मस्तिष्क, पॉन्स और मेडुला ऑब्लांगेटा (Medulla Oblongata) आदि भागों से बना होता है। यह उपापचय, रक्तदाब, हृदय की धड़कनों को नियंत्रित करता है। यह शरीर को संतुलित बनाए रखता है।

प्रश्न 2.
सुषुम्ना नाड़ी या मेरुरज्जु (Spinal Cord) के कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर:
सुषुम्ना नाड़ी भूरे व सफेद रंग के पदार्थ से बनी हुई एक बेलनाकार संरचना है। सुषुम्ना नाड़ी में मस्तिष्क की तरह ही तीन झिल्लियों की परत होती है। इसके मध्य भाग में एक प्रकार का तरल पदार्थ रहता है जो मस्तिष्क से शरीर के विभिन्न अंगों को प्रेरणा का संदेश पहुँचाता है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों से प्राप्त स्पर्श वेदनाओं; जैसे ठण्ड, गर्मी आदि को मस्तिष्क की ओर भेजना।
  2. मस्तिष्क से निकलने वाले संदेशों को प्राप्त करके उन्हें नाड़ी तंतुओं द्वारा माँसपेशियों को भेजना।
  3. प्रतिवर्त क्रियाओं या स्वाभाविक क्रियाओं पर नियंत्रण एवं इनका संचालन करना।

प्रश्न 3.
श्वसन क्रिया हमारे शरीर के लिए किस प्रकार महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
श्वसन क्रिया जीवन का मूल आधार है। हम भोजन के बिना कुछ दिनों तक जीवित रह सकते हैं लेकिन साँस के बिना हमारा जीवन संभव नहीं है। यह हमारे लिए निम्नलिखित प्रकार से महत्त्वपूर्ण है

  1. यह शरीर के तापमान को उचित करने में सहायक होती है।
  2. इस क्रिया से हमारे शरीर से व्यर्थ पदार्थों का निकास होता है।
  3. श्वसन क्रिया द्वारा मिली हुई ऑक्सीजन रक्त से मिलकर शरीर को ऊर्जा एवं शक्ति प्रदान करती है।
  4. साँस की प्रक्रिया हमारे जीवित रहने के लिए अति आवश्यक है।

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प्रश्न 4.
मनुष्य के शरीर में रक्त के कार्यों का उल्लेख करें।
अथवा
रक्त-प्रवाह संस्थान के क्या कार्य हैं?
उत्तर:
मनुष्य के शरीर में रक्त के कार्य निम्नलिखित हैं

  1. रक्त शरीर के अंगों को भोजन पहुँचाता है।
  2. रक्त अंगों को ऑक्सीजन देकर कार्बन-डाइऑक्साइड वापिस ले लेता है।
  3. रक्त कण रोगों से शरीर को बचाते हैं।
  4. रक्त शरीर के अंगों को पुष्ट रखने का कार्य करता है।
  5. रक्त शरीर के फालतू बचे हुए पदार्थों को बाहर निकालता है।
  6. रक्त शरीर के तापमान को नियमित करने में सहायता करता है।

प्रश्न 5.
यकृत या लीवर पर संक्षिप्त नोट लिखें। अथवा मानव यकृत के क्या कार्य हैं?
उत्तर:
यकृत हमारे शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह लगभग 15 सें०मी० लंबा व 22 सें०मी० चौड़ा होता है। यह शरीर के लिए अनावश्यक व हानिकारक व्यर्थ पदार्थों; जैसे अमोनिया व अतिरिक्त प्रोटीन को यूरिया व यूरिया अम्ल में बदलकर गुर्दे के माध्यम से मूत्र के रूप में उत्सर्जित करने में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त यह विखण्डित लाल रक्त कण के हीमोग्लोबिन को लाल या हरा पित्त में परिवर्तित कर पक्वाशय में छोड़ देता है और जहाँ से वह भोजन अवशेष के साथ हमारे शरीर से बाहर निकल जाता है। यकृत के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. यह भोजन को एकत्रित कर पचाने में सहायक होता है।
  2. यह भोजन-नली विशेषतौर पर आंतड़ियों से आए जहरीले पदार्थों के प्रभाव को नष्ट कर ऐसे पदार्थ बना देता है जो शरीर के लिए लाभदायक हों।
  3. यह प्रोटीन के व्यर्थ पदार्थों को नष्ट कर यूरिन (Urine) बनाता है जो गुर्दो की सहायता से शरीर से बाहर निकलता है।

प्रश्न 6.
माँसपेशी प्रणाली के मुख्य कार्य लिखें। अथवा माँसपेशियों के कार्य बताएँ।
उत्तर:
माँसपेशी प्रणाली के अंतर्गत हमारे शरीर की विभिन्न प्रकार की माँसपेशियाँ निम्नलिखित कार्य करती हैं

  1. माँसपेशियाँ शरीर के विभिन्न अंगों को गति प्रदान करती हैं अर्थात् इनके कारण शरीर के विभिन्न अंग क्रिया करते हैं।
  2. माँसपेशियाँ शरीर के व्यर्थ पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य करती हैं।
  3. माँसपेशियाँ हमारे शरीर में उत्तोलक (Lever) की तरह कार्य करती हैं।
  4. माँसपेशियाँ हमारे जीवन के विभिन्न अंगों में संतुलन बनाए रखती हैं।
  5. माँसपेशियों द्वारा हमें खाने, पीने, श्वास लेने और बोलने आदि क्रियाओं में सहायता मिलती है।
  6. वास्तव में माँसपेशियों के बिना शरीर का कोई अंग क्रिया नहीं कर सकता, क्योंकि हमारे शरीर की हड्डियाँ इनसे जुड़ी होती हैं।
  7. माँसपेशियाँ रक्त द्वारा लिए गए पदार्थ का भोजन के रूप में प्रयोग करती हैं।
  8. बड़ी माँसपेशियाँ हड्डियों को सुरक्षा प्रदान करती हैं।
  9. ये हृदय की पम्पिंग क्रिया में सहायक होती हैं।
  10.  ये शरीर को आकृति भी प्रदान करती हैं।

प्रश्न 7.
रक्त-वाहिकाएँ कितने प्रकार की होती हैं? संक्षेप में बताएँ। उत्तर-रक्त-वाहिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं
1. धमनी:
वे रक्त वाहिकाएँ जो हृदय से रक्त लेकर शरीर के सभी भागों में पहुँचती हैं, उन्हें धमनियाँ (Arteries) कहते हैं। इनमें शुद्ध रक्त होता है।

2. शिराएँ:
वे रक्त-वाहिकाएँ जो शरीर के विभिन्न भागों से अशुद्ध रक्त को इकट्ठा करके हृदय में ले आती हैं, उन्हें शिराएँ (Veins) कहते हैं। इनमें अशुद्ध रक्त होता है। .

3. केशिकाएँ:
धमनियों की छोटी-छोटी शाखाओं को केशिकाएँ (Capillaries) कहते हैं। ये बहुत पतली दीवार वाली रक्त-वाहिकाएँ हैं जो धमनियों से शुद्ध रक्त लेकर केशिकाओं को देती हैं और केशिकाओं का अशुद्ध रक्त शिराओं तक पहुँचाती हैं।

प्रश्न 8.
केंद्रीय नाड़ी संस्थान क्या है? इसके अंगों के नाम लिखें।
उत्तर:
केंद्रीय नाड़ी संस्थान-केंद्रीय नाड़ी संस्थान, तंत्रिका संस्थान का वह भाग है जो संपूर्ण शरीर पर नियंत्रण रखता है। केंद्रीय नाड़ी संस्थान के अंग-मनुष्य की केंद्रीय नाड़ी संस्थान दो अंगों से मिलकर बनी होती है; जैसे
1. मस्तिष्क-मस्तिष्क केंद्रीय नाड़ी संस्थान का बहुत ही महत्त्वपूर्ण भाग है। यह मानव शरीर की संचार व्यवस्था का नियंत्रण कक्ष (Control Room) है।
2. मेरुरज्जु (सुषुम्ना नाड़ी)- मेरुरज्जु एक दंडाकार संरचना है। यह मेडुला ऑब्लांगेटा से शुरू होकर नीचे की तरफ जाता है। इसका श्वासनली के साथ सीधा संबंध होता है।

प्रश्न 9.
व्यायाम का शरीर के संस्थानों पर प्रभाव लिखें।
उत्तर:
व्यायाम का शरीर के संस्थानों पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं

  1. व्यायाम करने से सभी शारीरिक संस्थानों की क्रियाशीलता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
  2. नियमित व्यायाम या शारीरिक क्रियाएँ करने से जोड़ों की लचक में वृद्धि होती है और हड्डियाँ व माँसपेशियाँ मजबूत बनती हैं।
  3. व्यायाम करने से रक्त का प्रवाह सुचारु रूप से होता है।
  4. व्यायाम सभी शारीरिक संस्थानों की शक्ति व कार्यक्षमता में वृद्धि करते हैं।
  5. व्यायाम से सभी संस्थानों और उनके अंगों संबंधी बीमारियाँ दूर होती हैं।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव

प्रश्न 10.
नियमित व्यायाम करने से रक्त-प्रवाह संस्थान पर पड़ने वाले कोई चार प्रभाव बताएँ।
उत्तर:
नियमित व्यायाम करने से रक्त-प्रवाह संस्थान पर पड़ने वाले चार प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. व्यायाम करने से रक्त-वाहिनियों में वृद्धि होती है जिससे शरीर के बीच वाले मल पदार्थ मल त्याग अंगों द्वारा बाहर निकल जाते हैं।
  2.  व्यायाम करने से रक्त का प्रवाह शरीर के सभी अंगों में बढ़ जाता है जिसके कारण भोजन और ऑक्सीजन का प्रवाह भी शरीर को अधिक मात्रा में मिलना शुरू हो जाता है।
  3. व्यायाम करने से रक्त तेजी से प्रवाह करता है जिसके कारण रक्तचाप और नाड़ियों की बीमारियों से बचा जा सकता है।
  4. व्यायाम करने से हृदय में रक्त का दबाव और सिकुड़न क्रिया में बढ़ोतरी होती है। इससे रक्त की गति तेज हो जाती है।

प्रश्न 11.
व्यायाम का स्वास्थ्य पर प्रभाव स्पष्ट करें।
उत्तर:
व्यायाम का स्वास्थ्य पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है

  1. व्यायाम करने से शरीर की माँसपेशियाँ लचकदार तथा मजबूत बनती हैं। शरीर में कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है।
  2. व्यायाम करने से शरीर हृष्ट-पुष्ट रहता है और बुढ़ापा देर से आता है।
  3. व्यायाम करने से भूख अधिक लगती है। पाचन क्रिया ठीक रहती है।
  4. व्यायाम करने से क्षयरोग, दमा और कब्ज आदि नहीं हो सकते। अत: व्यायाम करने से शरीर नीरोग रहता है।
  5. व्यायाम करने से रात को नींद अच्छी आती है।
  6. व्यायाम करने से शरीर के सभी अंग सचारु रूप से कार्य करते हैं।
  7. व्यायाम करने से रक्त का संचार तेज होता है। वृक्क में रक्त के अधिक पहुँचने से उसके सारे विषैले पदार्थ यूरिन के द्वारा बाहर निकल जाते हैं।
  8. व्यायाम करने से नाड़ी प्रणाली स्वस्थ रहती है। ज्ञानेंद्रियों की शक्ति बढ़ जाती है।

प्रश्न 12.
नियमित व्यायाम करने से श्वसन संस्थान पर पड़ने वाले कोई चार प्रभाव बताएँ। उत्तर-नियमित व्यायाम करने से श्वसन संस्थान पर पड़ने वाले चार प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. व्यायाम करने से शरीर से दूषित वायु अर्थात् कार्बन-डाइऑक्साइड बाहर निकलती है और उसके स्थान पर ऑक्सीजन अधिक मात्रा में अंदर जाती है।
  2. व्यायाम करने से फेफड़ों में वायु का आदान-प्रदान तेजी से होता है।
  3. व्यायाम करने से छाती के फैलाव में वृद्धि होती है।
  4. व्यायाम करने से व्यक्ति की श्वसन क्रिया की दर सामान्य रहती है।

प्रश्न 13.
जोड़ों के प्रकार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जोड़ों के कार्य और उनकी बनावट के आधार पर इन्हें तीन भागों में बाँटा जाता है:
1. अचल जोड़:
इन्हें रेशेदार जोड़ (Fibrous Joints) भी कहते हैं। वे जोड़ जिनमें अस्थियों के तल धागों जैसे बारीक रेशों से बँधे होते हैं। ये जोड़ गतिहीन होते हैं। इन जोड़ों में किसी प्रकार की कोई गति नहीं होती । इस प्रकार के जोड़ चेहरे और खोपड़ी में पाए जाते हैं।

2. थोड़ी गति वाले जोड़:
इस प्रकार की हड्डियों के जोड़ों में गति सीमित होती है अर्थात् ये जोड़ थोड़ा बहुत हिल सकते हैं। इस प्रकार के जोड़ों में हड्डियों के किनारे एक-दूसरे में फंसे होते हैं; परन्तु जोड़ों में खाली जगह पाई जाती है। ये जोड़ दो प्रकार के होते हैं:

  • सिम्फसिस जोड़ (Symphysis Joints),
  • सिन्कोंड्रोसिस जोड़ (Synchondrosis Joints)

इस प्रकार के जोड़ कूल्हे व रीढ़ की हड्डियों में पाए जाते हैं, क्योंकि रीढ़ की हड्डी में कम गति होती है।

3. गति वाले या चल जोड़:
इन्हें रिसावदार जोड़ (Synovial Joints) भी कहते हैं। हमारे शरीर के अधिक जोड़ इसी भाग के अंतर्गत आते हैं। टाँगों व बाजुओं के जोड़ इसी प्रकार के जोड़ों के उदाहरण हैं । इन जोड़ों में बहुत ही मुलायम सिनोवियल झिल्ली होती है। इस प्रकार के जोड़ों के कारण शरीर में हरकतें होती हैं। इस प्रकार के जोड़ों की संख्या शरीर में बहुत अधिक होती है। ऐसे जोड़ों में हड्डियों के दोनों किनारों पर कार्टिलेज की परत चढ़ी होती है, जिसके कारण हड्डियों के सिरे आपस में रगड़ नहीं खाते।

प्रश्न 14.
व्यायाम से शरीर में लचीलापन कैसे बढ़ता है?
उत्तर:
व्यायाम से शरीर में लचकता निम्नलिखित कारणों से बढ़ता है

  1. व्यायाम करने से माँसपेशियाँ फैलती हैं, जिनके कारण उनमें लचक आ जाती है।
  2. व्यायाम करने से शरीर के जोड़ों, हड्डियों व मांसपेशियों को मज़बूती मिलती है और इनकी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इससे शरीर में लचीलापन आता है।
  3. व्यायाम करने से शरीर की कोशिकाओं में रक्त एवं पोषक तत्त्व बिना किसी अवरोध के पहुंचते हैं। इससे शरीर में ऊर्जा, स्फूर्ति एवं लचकता में वृद्धि होती है।
  4. व्यायाम के दौरान स्ट्रेचिंग की क्रिया शरीर को लचीला एवं फुर्तीला बनाती है। यह क्रिया माँसपेशियों के तनाव को कम करती है और आसन में सुधार करती है।
  5. नियमित रूप से व्यायाम करने से न केवल आपके शरीर में लचकता बढ़ेगी, बल्कि आप मोटापे से भी छुटकारा पा सकोगे।

प्रश्न 15.
अस्थियों/हड्डियों के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। अथवा अस्थिपिंजर प्रणाली के मुख्य कार्य लिखें।
उत्तर:
अस्थियों/हड्डियों के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. हड्डियाँ शरीर को एक खास प्रकार की रूपरेखा प्रदान करती हैं।
  2. ये शरीर के कोमल अंगों को सुरक्षा प्रदान करती हैं।
  3. ये माँसपेशियों को जुड़ने का आधार प्रदान करती हैं।
  4. ये लाल रक्त कणिकाओं के निर्माण में भी सहायक होती हैं।
  5. ये बाहरी दबावों, रगड़ों, झटकों व चोटों आदि से अंतरांगों की रक्षा करती हैं।
  6. विभिन्न प्रकार की कंकाल-संधियाँ शरीर के विभिन्न भागों की विशिष्ट गतियों को नियंत्रित करती हैं।
  7. ये शरीर को चलने-फिरने तथा अन्य कार्यों को करने में सहायता प्रदान करती हैं।
  8. ये शरीर को सीधा रखने में सहायता प्रदान करती हैं।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव

प्रश्न 16.
नियमित व्यायाम करने से पाचन संस्थान को क्या-क्या फायदे होते हैं? कोई चार बताएँ।
उत्तर;
नियमित व्यायाम करने से पाचन संस्थान को निम्नलिखित फायदे होते हैं

  1. व्यायाम केवल भूख ही नहीं बढ़ाता, बल्कि स्वास्थ्य और इसके सभी पक्षों में बढ़ोतरी भी करता है।
  2. नियमित व्यायाम करने से भी असाध्य रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है।
  3. व्यायाम पाचन संस्थान और इसके अंगों की कार्यक्षमता में वृद्धि करता है।
  4. नियमित रूप से व्यायाम करने से पेट संबंधी बीमारियाँ दूर होती है; जैसे कब्ज, गैस की समस्या आदि।

प्रश्न 17.
नियमित व्यायाम करने से उत्सर्जन संस्थान पर पड़ने वाले कोई चार प्रभाव बताएँ।
उत्तर:
नियमित व्यायाम करने से उत्सर्जन संस्थान पर पड़ने वाले चार प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. व्यायाम करने से शरीर को अधिक पसीना आता है और पसीने के माध्यम से हमारे शरीर के व्यर्थ पदार्थों का बाहरी ओर निकास होता है।
  2. व्यायाम करने से इस संस्थान संबंधी समस्याएँ दूर होती हैं।
  3. उत्सर्जन संस्थान का मुख्य कार्य हमारे शरीर के अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना है। यदि हम नियमित रूप से व्यायाम करते हैं तो यह कार्य उत्सर्जन संस्थान अधिक क्षमता से करेगा।
  4. व्यायाम करने से फेफड़ों में वायु आदान-प्रदान अधिक तेजी से होता है जिससे फेफड़ों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 18.
नियमित व्यायाम करने से अस्थिपिंजर संस्थान पर पड़ने वाले कोई चार प्रभाव बताएँ।
उत्तर:
नियमित व्यायाम करने से अस्थिपिंजर संस्थान पर पड़ने वाले चार प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. नियमित व्यायाम या शारीरिक क्रियाएँ करने से जोड़ों की लचक में वृद्धि होती है अर्थात् जोड़ों में लोचशीलता बढ़ जाती है।
  2. व्यायाम करने से शारीरिक क्षमता में वृद्धि होती है।
  3. व्यायाम करने से हड्डियों से संबंधी विकार दूर होते हैं।
  4. नियमित व्यायाम करने से आसन संबंधी विकृतियों को दूर किया जा सकता है।

प्रश्न 19.
धमनियों तथा शिराओं में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
धमनियों तथा शिराओं में निम्नलिखित अंतर हैंधमनियाँ

धमनियाँशिराएँ
1. धमनियाँ (Arteries) वे रुधिर वाहिकाएँ हैं जिनमें रुधिर हुदय से दूसरे अंगों की ओर जाता है।1. शिराएँ (Veins) वे रक्त वाहिकाएँ हैं जिनमें रुधिर हृदय की ओर बहता है।
2. इसकी दीवारें तन्य, मोटी तथा पेशीयुक्त होती हैं।2. इनकी दीवारें पतली, रेशेदार तथा तन्य नहीं होतीं।
3. ये सिकुड़ सकती हैं।3. ये सिकुड़ नहीं•सकतीं।
4. इनमें रुधिर झटके के साथ बहता है।4. इनमें रुधिर बिना झटके से बहता है।
5. ये शरीर में गहराई में स्थित होती हैं।5. ये ऊपरी सतह पर स्थित होती हैं।
6. इसमें रुधिर उच्च दाब के साथ बहता है।6. इनमें रुधिर अपेक्षाकृत कम दाब के साथ बहता है।
7. इनमें अंदर की गुहिका छोटी होती है।7. इसकी गुहिका बड़ी होती है।
8. इसमें वाल्व नहीं होते।8. इसमें वाल्व होते हैं।
9. फुफ्फुसीय धमनी के अतिरिक्त सभी धमनियों में ऑक्सीजन युक्त रुधिर बहता है।9. फुफ्फुसीय शिरा के अतिरिक्त सभी शिराओं में अशुद्ध रुधिर बहता है।

प्रश्न 20.
ऐच्छिक व अनैच्छिक माँसपेशियों में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
ऐच्छिक व अनैच्छिक माँसपेशियों में निम्नलिखित अंतर हैंऐच्छिक माँसपेशियाँ

ऐच्छिक माँसपेशियाँअनैच्छिक माँसपेशियाँ
1. ऐच्छिक माँसपेशियाँ बेलनाकार व धारीदार होती हैं।1. अनैच्छिक माँसपेशियाँ तुर्काकार व गैर-धारीदार होती हैं।
2. ये स्वतंत्र नहीं होतीं।2. ये स्वतंत्र होती हैं।
3. ये जल्दी थकान महसूस करती हैं।3. ये थकान महसूस नहीं करतीं।
4. ये बहुकेन्द्रीय होती हैं।4. ये एक केन्द्रीय होती हैं।
5. इनमें संकुचन तेजी से व थोड़े समय के लिए होता है।5. इनमें संकुचन धीरे-धीरे काफी समय तक होता है।

अति-लघत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)|

प्रश्न 1.
शरीर संस्थान (Body System) से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब मानवीय शरीर के भिन्न-भिन्न अंग या भाग मिलकर एक प्रकार का कार्य करते हैं, तो उनके संग्रह या समूह को शरीर संस्थान कहते हैं।

प्रश्न 2.
रक्त-प्रवाह संस्थान किसे कहते हैं?
उत्तर:
रक्त-प्रवाह या परिसंचरण संस्थान ऐसे अंगों का वह समूह है जो शरीर की कोशिकाओं के बीच रक्त के माध्यम से पोषक तत्त्वों का प्रवाह करता है। इससे रोगों से शरीर की रक्षा होती है तथा शरीर का ताप स्थिर व नियंत्रित बना रहता है। इस संस्थान का मुख्य कार्य शरीर के प्रत्येक अंग या भाग में रक्त को पहुँचाना है जिससे शरीर को पोषण एवं ऑक्सीजन प्राप्त हो सके। प्रश्न

3. श्वसन संस्थान किसे कहते हैं?
उत्तर:
ऑक्सीजन हमारे शरीर के लिए बहुत आवश्यक होती है। इसके बिना हमारा जीवन संभव नहीं है। जब हम साँस लेते हैं तो ऑक्सीजन हमारे शरीर में प्रवेश करती है और जब साँस छोड़ते हैं तो दूषित वायु अर्थात् कार्बन-डाइऑक्साइड शरीर से बाहर निकलती है। साँस लेने की क्रिया को हम श्वास अंदर खींचने की क्रिया और साँस बाहर छोड़ने की क्रिया को श्वास छोड़ने की क्रिया कहते हैं। अतः साँस अंदर लेने और बाहर छोड़ने की क्रिया को श्वसन प्रक्रिया कहते हैं। इस प्रक्रिया में सहायक अंगों के समूह को श्वसन संस्थान कहते हैं। इस संस्थान के द्वारा हमारे शरीर में गैसों का आदान-प्रदान होता है।

प्रश्न 4.
पाचन क्रिया किसे कहते हैं? अथवा पाचन संस्थान क्या है?
उत्तर:
पाचन क्रिया वह रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें जीव एंजाइम की सहायता से भोजन के बड़े अवयवों; जैसे प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट्स को सरल अवयवों; जैसे प्रोटीन को अमीनो अम्ल में एवं कार्बोहाइड्रेट्स को ग्लूकोज में परिवर्तित कर शरीर के अवशोषण के योग्य बना देते हैं। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप भोजन पचता है और हमारे शरीर को ऊर्जा व शक्ति मिलती है। अत: पाचन संस्थान हमारे शरीर का ऐसा संस्थान है जिसके माध्यम से विभिन्न प्रकार के भोजन के अवयव तरल पदार्थ के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं और वे रक्त का हिस्सा बनकर हमारे शरीर को ऊर्जा व शक्ति प्रदान करते हैं।

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प्रश्न 5.
अस्थि संस्थान क्या है?
उत्तर:
मानवीय शरीर में छोटी, बड़ी, पतली, लंबी, चपटी व आकारहीन आदि अनेक तरह की 206 हड़ियाँ होती हैं जो मिलकर एक पिंजर का निर्माण करती हैं। इस पिंजर की भिन्न-भिन्न हड्डियाँ मिलकर जब शरीर के लिए विभिन्न कार्य करती हैं तो हम इनको अस्थि या कंकाल संस्थान कहते हैं। यह शरीर के अंदर कोमल अंगों को सुरक्षित रखता है। यह शरीर में लीवर का काम करता है और अस्थियों के साथ माँसपेशियों को जुड़ने के लिए स्थान बनाता है।

प्रश्न 6.
माँसपेशियाँ किन्हें कहते हैं?
उत्तर:
हमारे शरीर की ऊपरी त्वचा को उधेड़कर देखा जाए तो उसके नीचे हमें लाल रंग के माँस के लोथड़े या धागे (Fibres) दिखाई देंगे। इनको ही हम माँसपेशियाँ (Muscles) कहते हैं। ये माँसपेशियाँ अनेक छोटी-छोटी जीवित कोशिकाओं (Cells) से बनी होती हैं। ये हड्डियों, कार्टिलेज, लिगामेंट्स, त्वचा से जुड़ी होती हैं। इनके सिकुड़ने व फैलने से शरीर में गति पैदा होती है, जिससे शरीर के भिन्न-भिन्न अंग कार्य करते हैं।

प्रश्न 7.
नाड़ी संस्थान किसे कहते हैं?
उत्तर:
तंत्रिका या स्नायु संस्थान हमारे शरीर का वह संस्थान है जिसके द्वारा हमारा संपूर्ण शरीर नियंत्रित रहता है। इसके अंतर्गत हमारे संपूर्ण शरीर में महीन धागे के समान तंत्रिकाएँ फैली रहती हैं, जो शरीर के विभिन्न भागों के बीच कार्यात्मक समन्वय स्थापित करती हैं।

प्रश्न 8.
किन्हीं चार शारीरिक संस्थानों ( प्रणालियों) के नाम बताएँ।
उत्तर:

  1. पाचन संस्थान,
  2. रक्त संचार संस्थान,
  3. माँसपेशी संस्थान,
  4. अस्थिपिंजर संस्थान।

प्रश्न 9.
पाचन संस्थान के मुख्य अंगों के नाम बताएँ।
उत्तर:
मुँह, भोजन-नली, आमाशय, पक्वाशय, यकृत, छोटी आंत, बड़ी आंत, मलाशय व गुदा।

प्रश्न 10.
श्वास संस्थान के अंगों के नाम बताएँ।
उत्तर:
नाक, स्वर यंत्र/कण्ठ, ग्रसनिका, श्वासनली, वायु-नलियाँ या श्वसनियाँ,  फेफडे।

प्रश्न 11.
रक्त-प्रवाह संस्थान के अंगों के नाम बताएँ।
उत्तर:
हृदय, धमनियाँ, शिराएँ, केशिकाएँ।

प्रश्न 12.
उत्सर्जन संस्थान के मुख्य अंग कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
गुर्दे या वृक्क, त्वचा,  मूत्रवाहिनियाँ, मूत्राशय,  मूत्रमार्ग,  फेफड़े।

प्रश्न 13.
माँसपेशी के कौन-कौन-से भाग होते हैंउत्तर-माँसपेशी के तीन भाग होते हैं जो इस प्रकार हैं

1. पेट-माँसपेशी के सबसे आंतरिक अर्थात् मोटे भाग को पेट (Belly) कहते हैं।
2. जोड़-माँसपेशी का एक भाग गतिशील हड्डी के साथ जुड़ा हुआ होता है जो कि जोड़ (Insersion) कहलाता है।
3. जड़-माँसपेशी का दूसरा भाग अचल हड्डी से जुड़ा हुआ होता है जो कि जड़ (Origin) कहलाता है।

प्रश्न 14.
ऐच्छिक माँसपेशियाँ क्या होती हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वे माँसपेशियाँ जो हमारी इच्छा के अनुसार कार्य करती हैं, उन्हें ऐच्छिक माँसपेशियाँ कहते हैं। ये माँसपेशियाँ ढीली और सिकुड़ने वाली होती हैं और हड्डियों से जुड़ी होती हैं; जैसे हाथ, पैर, कंधे, कूल्हे आदि की माँसपेशियाँ।

प्रश्न 15.
अनैच्छिक माँसपेशियाँ क्या होती हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वे माँसपेशियाँ जो हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं रहतीं और स्वयं ही कार्य करती हैं, उन्हें अनैच्छिक माँसपेशियाँ कहते हैं; जैसे गुर्दे, हृदय आदि की माँसपेशियाँ।

प्रश्न 16.
हृदयक माँसपेशियों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
ये माँसपेशियाँ हमारे हृदय (Heart) में होती हैं। हृदयक माँसपेशियों में ऐच्छिक व अनैच्छिक माँसपेशियों का मिश्रण होता है। इनमें भी ऐच्छिक माँसपेशियों की तरह ही धारियाँ होती हैं। ये माँसपेशियाँ अनैच्छिक माँसपेशियों की तरह पूर्ण रूप से स्वतंत्र होती हैं और अपनी इच्छानुसार कार्य करती हैं। इनमें अनैच्छिक माँसपेशियों के गुण ऐच्छिक माँसपेशियों के गुणों की तुलना में अधिक होते हैं, परंतु फिर भी इनको ऐच्छिक माँसपेशियाँ माना जाता है।

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प्रश्न 17.
तंत्रिका या स्नायु तंत्र के कितने भाग होते हैं?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र तीन भागों में विभाजित होता है

  1. केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System)
  2. परिधीय तंत्रिका तंत्र (Peripheral Nervous System)
  3. स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System)।

प्रश्न 18.
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र क्या है?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र का वह भाग जो शरीर के भीतरी भागों या अंगों; जैसे हृदय, छोटी-बड़ी आंत, वृक्क, मूत्राशय व रक्त वाहिनियों आदि को स्वत:चालित और नियंत्रित करता है, स्वायत्त तंत्रिका तंत्र कहलाता है।

प्रश्न 19.
शरीर के सभी अंगों को रक्त की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
रक्त शरीर के सभी अंगों को अवशोषित भोजन व ऑक्सीजन पहुँचाने का कार्य करता है। साथ ही रक्त सभी अंगों से अपशिष्ट पदार्थ एकत्रित कर बाहर निकालने का कार्य करता है। यह शरीर के अंगों को संक्रमण से भी बचाता है।

प्रश्न 20.
शरीर की परावर्तित/स्वाभाविक क्रियाएँ क्या होती हैं? उदाहरण दें। अथवा प्रतिक्षेप/प्रतिवर्त प्रतिक्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर:
शरीर की परावर्तित/स्वाभाविक क्रियाएँ वे क्रियाएँ होती हैं जो स्वचालित होती हैं अर्थात् ये क्रियाएँ अपने-आप कार्य करती रहती हैं। जब कोई व्यर्थ पदार्थ हमारे नाक या गले में चला जाता है तो उसी समय स्वयं ही परावर्तित क्रियाएँ चलना शुरू कर देती हैं जिसके कारण खाँसी या छींक आती है। उदाहरण-खाँसना (Coughing), छींकना (Sneezing), उबासी (Yawning) आदि।

प्रश्न 21.
अन्तःस्त्रावी या नलीरहित ग्रंथियाँ क्या हैं?
उत्तर:
शरीर की कुछ विशिष्ट प्रकार की ग्रंथियों की कोशिकाएँ कुछ ऐसे पदार्थों का संश्लेषण करके इन्हें ऊतक द्रव्य में स्रावित करती हैं जो संकेत सूचनाओं को वहन करते हैं । ऊतक द्रव्य से ये पदार्थ रक्त में चले जाते हैं। इन ग्रंथियों को ही अन्तःस्रावी या नलीरहित ग्रंथियाँ कहा जाता है।

प्रश्न 22.
व्यायाम (Exercise) से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सामान्य शब्दों में, हमारे द्वारा शारीरिक क्रियाएँ; जैसे उठना, बैठना, दौड़ना, कूदना आदि करने को व्यायाम कहते हैं। अत: व्यायाम से तात्पर्य उन शारीरिक क्रियाओं को करने से है जो हम अपने स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए करते हैं। इसमें शरीर के विभिन्न अंगों या भागों को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 23.
शिराओं (Veins) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
शिराएँ पतली नलियाँ होती हैं। इनकी दीवारें झिल्ली द्वारा बनी होती हैं और दीवारों के साथ-साथ विभिन्न स्थानों पर प्याले की भाँति चंद्रमा की शक्ल के कपाट (Valve) बने होते हैं। इनकी सहायता से रक्त ऊपरी भाग से निचले भाग में जाता है। ये हृदय की ओर अशुद्ध रक्त लेकर जाती हैं। अशुद्ध रक्त के कारण ही इनका रंग नीला होता है, परंतु फेफड़ों वाली शिराएँ (Pulmonary Veins) शुद्ध रक्त, दिल के ऊपरी भाग में ले जाती हैं।

प्रश्न 24.
केशिकाओं (Capillaries) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
रक्त-प्रवाह प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण अवयव केशिकाएँ होती हैं । धमनियों और शिराओं के बीच में केशिकाओं का समूह स्थित होता है। जब हृदय से रक्त धमनियों में आता है तो धमनियाँ
छोटे-छोटे भागों या शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं, जिन्हें केशिकाएँ कहते हैं।

प्रश्न 25.
उत्सर्जन प्रक्रिया में त्वचा क्या कार्य करती है?
उत्तर:
त्वचा उत्सर्जन संस्थान का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह शरीर के अंदर वाले व्यर्थ पदार्थ; जैसे यूरिया, व्यर्थ खनिज, नमक आदि को पसीने द्वारा बाहर निकालकर रक्त को साफ करने का कार्य करती है। त्वचा एक सूझ इंद्रिय का कार्य भी करती है। यह शरीर में रोगाणुओं को दाखिल होने से रोकती है और शरीर के तापमान को सामान्य बनाए रखती है।

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वस्तनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

भाग-I : एक वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
हमारे शरीर में कुल कितनी हड्डियाँ होती हैं?
उत्तर:
हमारे शरीर में कुल 206 हड्डियाँ होती हैं।

प्रश्न 2.
मानव शरीर का सबसे व्यस्त अंग कौन-सा है?
उत्तर:
मानव शरीर का सबसे व्यस्त अंग हृदय है।

प्रश्न 3.
रक्त प्रवाह में सहायक अंगों के समूह को क्या कहते हैं?
उत्तर:
रक्त प्रवाह में सहायक अंगों के समूह को रक्त संचार संस्थान कहते हैं।

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प्रश्न 4.
साँस अंदर लेने और बाहर छोड़ने की क्रिया को क्या कहते हैं?
उत्तर:
साँस अंदर लेने और बाहर छोड़ने की क्रिया को श्वास प्रक्रिया कहते हैं।

प्रश्न 5.
मेरुरज्जु किस संस्थान का अंग है?
उत्तर:
मेरुरज्जु केंद्रीय तंत्रिका संस्थान का अंग है।

प्रश्न 6.
मानव हृदय का औसतन भार कितना होता है?
उत्तर:
मानव हृदय का औसतन भार 300 ग्राम होता है।

प्रश्न 7.
यकृत किस संस्थान का अंग है?
उत्तर:
यकृत पाचन संस्थान का अंग है।

प्रश्न 8.
माँसपेशियों के प्रकार लिखें।
उत्तर:

  1. ऐच्छिक माँसपेशियाँ,
  2. अनैच्छिक माँसपेशियाँ,
  3. हृदयक माँसपेशियाँ।

प्रश्न 9.
हमारे शरीर में कितनी माँसपेशियाँ पाई जाती हैं?
उत्तर:
हमारे शरीर में लगभग 639 माँसपेशियाँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 10.
जो माँसपेशियाँ मनुष्य की इच्छानुसार कार्य करती हैं, उन्हें क्या कहा जाता है?
उत्तर:
जो माँसपेशियाँ मनुष्य की इच्छानुसार कार्य करती हैं, उन्हें ऐच्छिक माँसपेशियाँ कहा जाता है।

प्रश्न 11.
ऐच्छिक माँसपेशियों का संबंध किससे होता है?
उत्तर:
ऐच्छिक माँसपेशियों का संबंध दिमाग से होता है।

प्रश्न 12.
जो माँसपेशियाँ मनुष्य की इच्छानुसार कार्य नहीं करतीं, उन्हें क्या कहते हैं?
उत्तर:
जो माँसपेशियाँ मनुष्य की इच्छानुसार कार्य नहीं करतीं, उन्हें अनैच्छिक माँसपेशियाँ कहते हैं।

प्रश्न 13.
कौन-सी माँसपेशियाँ निद्रावस्था में भी कार्य करती हैं?
उत्तर:
अनैच्छिक माँसपेशियाँ निद्रावस्था में भी कार्य करती हैं।

प्रश्न 14.
धारीदार माँसपेशियाँ कौन-सी होती हैं?
उत्तर:
धारीदार माँसपेशियाँ ऐच्छिक माँसपेशियाँ होती हैं।

प्रश्न 15.
व्यायाम से क्या बढ़ता है?
उत्तर:
व्यायाम से शरीर की माँसपेशियों की कार्यक्षमता बढ़ती है।

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प्रश्न 16.
हृदय की माँसपेशियों पर शरीर का कौन-सा संस्थान नियंत्रण रखता है?
उत्तर:
हृदय की माँसपेशियों पर शरीर का स्नायु संस्थान नियंत्रण रखता है।

प्रश्न 17.
मनुष्य के शरीर में सबसे ज्यादा रक्त की मात्रा कहाँ विद्यमान रहती है?
उत्तर:
मनुष्य के शरीर में सबसे ज्यादा रक्त की मात्रा हृदय में विद्यमान रहती है।

प्रश्न 18.
प्रतिवर्त क्रियाओं के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:
छींकना, खाँसना।

प्रश्न 19.
धमनियाँ कहाँ से आरंभ होती हैं?
उत्तर:
धमनियाँ हृदय से आरंभ होती हैं।

प्रश्न 20.
जोड़ों के कितने प्रकार होते हैं?
उत्तर:
जोड़ों के तीन प्रकार होते हैं:

  1. अचल जोड़,
  2. थोड़ी गति वाले जोड़,
  3. चल जोड़।

प्रश्न 21.
फेफड़ों और शरीर के दूसरे भागों से रक्त हृदय तक किसके द्वारा पहुँचता है?
उत्तर:
फेफड़ों और शरीर के दूसरे भागों से रक्त हृदय तक शिराओं द्वारा पहुँचता है।

प्रश्न 22.
अशुद्ध रक्त का संचार किसके द्वारा होता है?
उत्तर:
अशुद्ध रक्त का संचार शिराओं द्वारा होता है।

प्रश्न 23.
फेफड़ों की कार्यकुशलता बनाए रखने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
फेफड़ों की कार्यकुशलता बनाए रखने के लिए एरोबिक व्यायाम करने चाहिए।

प्रश्न 24.
व्यायाम करने से फेफड़ों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
व्यायाम करने से फेफड़ों में हवा भरने की शक्ति बढ़ जाती है जिसके कारण फेफड़ों में ज्यादा लचक आती है।

प्रश्न 25.
लाल रक्त कणों का निर्माण कहाँ होता है?
उत्तर:
लाल रक्त कणों का निर्माण अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में होता है।

प्रश्न 26.
रक्त के सफेद कणों का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
रक्त के सफेद कणों का मुख्य कार्य शरीर को बीमारियों से बचाना है।

प्रश्न 27.
रक्त के लाल कणों का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
रक्त के लाल कणों का मुख्य कार्य ऑक्सीजन और भोजन तत्त्वों को शरीर के सैलों तक पहुँचाना है।

प्रश्न 28.
जीवन धारिता मापने वाले यंत्र का नाम बताएँ।
उत्तर:
जीवन धारिता मापने वाले यंत्र का नाम स्पाइरोमीटर है।

प्रश्न 29.
हमारी छाती में कितनी पसलियाँ होती हैं?
उत्तर:
हमारी छाती में 24 पसलियाँ होती हैं।

प्रश्न 30.
माँस तन्तुओं का समूह क्या कहलाता है?
उत्तर:
माँस तन्तुओं का समूह माँसपेशियाँ कहलाता है।

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प्रश्न 31.
केंद्रीय तंत्रिका तंत्र किन अंगों से मिलकर बना है?
उत्तर:
मस्तिष्क, मेरुरज्जु।

प्रश्न 32.
मुख किस संस्थान का अंग है?
उत्तर:
मुख पाचन संस्थान का अंग है।

प्रश्न 33.
फेफड़े किस संस्थान के अंग हैं?
उत्तर:
फेफड़े श्वसन संस्थान के अंग हैं।

प्रश्न 34.
आंतें किस संस्थान की अंग हैं?
उत्तर:
आंतें पाचन संस्थान की अंग हैं।

प्रश्न 35.
हृदय किस संस्थान का अंग है?
उत्तर:
हृदय रक्त-प्रवाह संस्थान का अंग है।

भाग-II : सही विकल्प का चयन करें

1. निम्नलिखित में से माँसपेशियों के प्रकार हैं
(A) ऐच्छिक माँसपेशियाँ
(B) अनैच्छिक माँसपेशियाँ
(C) हृदयक माँसपेशियाँ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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2. व्यायाम का माँसपेशियों पर प्रभाव पड़ता है
(A) माँसपेशियों में लचक आना
(B) माँसपेशियों के आकार में वृद्धि होना
(C) माँसपेशियों का मजबूत व सशक्त होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

3. निम्नलिखित में से उत्सर्जन संस्थान का अंग नहीं है
(A) त्वचा
(B) हृदय
(C) फेफड़े
(D) गुर्दे
उत्तर;
(B) हृदय

4. श्वसन संस्थान का अंग है
(A) नाक
(B) स्वर तंत्र
(C) श्वासनली
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. मनुष्य के शरीर में कुल हड्डियाँ होती हैं
(A) 200
(B) 206
(C) 270
(D) 320
उत्तर:
(B) 206

6. वृक्क किस संस्थान का अंग है?
(A) उत्सर्जन संस्थान का
(B) रक्त संचार संस्थान का
(C) पाचन संस्थान का
(D) स्नायु संस्थान का
उत्तर:
(A) उत्सर्जन संस्थान का

7. रक्त-प्रवाह संस्थान का अंग है
(A) हृदय
(B) धमनियाँ
(C) शिराएँ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

8. श्वसन संस्थान का अंग नहीं है
(A) नाक
(B) कंठ
(C) हृदय
(D) फेफड़े
उत्तर:
(C) हृदय

9. किस प्रकार तंत्रिकाएँ शरीर के विभिन्न भागों की संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं?
(A) संवेदी तंत्रिकाएँ
(B) प्रेरक तंत्रिकाएँ
(C) मिश्रित तंत्रिकाएँ
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) संवेदी तंत्रिकाएँ

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10. माँसपेशियाँ शरीर को प्रदान करती हैं
(A) आकार
(B) गति
(C) लचक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

11. निम्नलिखित में से माँसपेशियों का भाग है
(A) पेट
(B) जोड़
(C) जड़
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

12. अनैच्छिक माँसपेशियों का कार्य है
(A) रक्त का संचार करना
(B) पाचन-क्रिया में सहायता करना
(C) श्वास-प्रक्रिया में सहायता करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

13. गैर-धारीदार माँसपेशियाँ होती हैं
(A) ऐच्छिक माँसपेशियाँ
(B) अनैच्छिक माँसपेशियाँ
(C) हृदयक माँसपेशियाँ
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) अनैच्छिक माँसपेशियाँ

14. पाचन संस्थान का अंग है
(A) मुँह
(B) पेट
(C) आंतें
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

15. नियमित व्यायाम करने से नाड़ी संस्थान पर प्रभाव पड़ता है
(A) नाड़ियों का तालमेल ठीक होना
(B) नाड़ियों को संदेश व आज्ञा जल्दी-जल्दी मिलना
(C) नाड़ियों की कार्यक्षमता में वृद्धि होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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16. नियमित व्यायाम करने से पाचन संस्थान पर प्रभाव पड़ता है
(A) भोजन को पचाने में सहायता करना
(B) लार गिल्टियों की कार्यक्षमता में बढ़ोतरी करना
(C) भूख में वृद्धि होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

17. नियमित व्यायाम करने से श्वसन संस्थान पर प्रभाव पड़ता है
(A) फेफड़ों की कार्य करने की क्षमता बढ़ना
(B) छाती के फैलाव में वृद्धि होना
(C) फेफड़ों में वायु की प्रक्रिया तेज होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

18. कौन-सी तंत्रिकाएँ मस्तिष्क से संदेश लेकर विभिन्न मांसपेशियों तक पहुँचाती हैं?
(A) संवेदी तंत्रिकाएँ
(B) प्रेरक तंत्रिकाएँ
(C) मिश्रित तंत्रिकाएँ
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर;
(B) प्रेरक तंत्रिकाएँ

19. साँस छोड़ने की क्रिया को कहते हैं
(A) श्वसन
(B) श्वसन खींचने की क्रिया
(C) श्वसन छोड़ने की क्रिया
(D) श्वसन संस्थान
उत्तर:
(C) श्वसन छोड़ने की क्रिया

20. साँस लेने की क्रिया को कहते हैं
(A) श्वसन
(B) श्वसन खींचने की क्रिया
(C) श्वसन छोड़ने की क्रिया
(D) श्वसन संस्थान
उत्तर:
(B) श्वसन खींचने की क्रिया

भाग-III : निम्नलिखित कथनों के उत्तर सही या गलत अथवा हाँ या नहीं में दें

1. अनैच्छिक माँसपेशियों को धारीदार माँसपेशियाँ व आज्ञाकारी माँसपेशियाँ भी कहा जाता है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

2. व्यायाम रक्त शोधन में सहायक होता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

3. व्यायाम से भूख में वृद्धि होती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

4. हमारा शरीर विभिन्न तंतुओं एवं अंगों से मिलकर बना है जिनका निर्माण कोशिकाओं द्वारा होता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

5. मानव शरीर में छह ज्ञानेंद्रियाँ होती हैं । (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

6. रक्त शरीर के अंगों को भोजन पहुँचाता है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

7. व्यायाम करने से फेफड़ों में हवा भरने की शक्ति बढ़ती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

8. अनैच्छिक माँसपेशियों पर हमारी इच्छा का पूरा नियंत्रण रहता है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

9. व्यायाम माँसपेशियों की शक्ति एवं कार्यक्षमता में कमी करते हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं,

10. व्यायाम से शरीर की क्षमता बढ़ती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव

11. व्यायाम करने से रक्त-संचार संस्थान की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

12. व्यायाम करने से लचीलापन बढ़ता है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

13. व्यायाम करने से फेफड़ों में वायु का आदान-प्रदान धीमा होता है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं,

14. व्यायाम से स्वास्थ्य ठीक रहता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

15. अस्थियाँ शरीर को सहारा देती हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

16. व्यायाम से माँसपेशियों में लचक आती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

17. व्यायाम करने से प्रतिवर्त क्रियाओं की संख्या कम हो जाती है। (सही/गलत)।
उत्तर:
गलत,

18. प्रतिदिन व्यायाम करने से नाड़ी-माँसपेशियों का तालमेल ठीक हो जाता है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

19. व्यायाम करने से जोड़ों में लचकता आती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

20. व्यायाम करने से पेट संबंधी बीमारियाँ बढ़ जाती हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

21. सिर में 22 हड्डियाँ होती हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

22. सभी प्रकार की माँसपेशियाँ अपनी इच्छानुसार कार्य करती हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

23. अस्थियाँ (हड्डियाँ) शरीर को आकृति प्रदान करती हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव

24. हड्डियों के पाँच प्रकार होते हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

25. व्यायाम शरीर के लचीलेपन में सहायक है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

भाग-IV : रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. व्यायाम करने से माँसपेशियों की कार्यक्षमता में …………… होती है।
उत्तर:
वृद्धि,

2. व्यायाम करने से हृदय का आकार …………….. जाता है।
उत्तर:
बढ़,

3. व्यायाम करते समय …………….. ऑक्सीजन की अधिक मात्रा खींचते हैं।
उत्तर:
फेफड़े

4. व्यायाम करने से नींद …………….. आती है।
उत्तर:
अच्छी,

5. हृदयक माँसपेशियों में ऐच्छिक व अनैच्छिक माँसपेशियों का ………….. होता है।
उत्तर:
मिश्रण,

6. हमारे शरीर में कुल …………… हड्डियाँ होती हैं।
उत्तर:
206,

7. ……………. शरीर के सभी अंगों को ऑक्सीजन पहुँचाने का कार्य करता है।
उत्तर:
रक्त,

8. शरीर की प्रतिवर्त क्रियाएँ वे होती हैं जो …………….. होती हैं।
उत्तर:
स्वचालित,

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव

9. वे रक्त वाहिनियाँ हैं जिनमें रक्त हृदय की ओर बहता है।
उत्तर:
शिराएँ,

10. ………… माँसपेशियाँ इच्छानुसार कार्य करती हैं।
उत्तर:
ऐच्छिक,

11. …………. तंत्रिकाएँ शरीर के विभिन्न भागों की संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं।
उत्तर:
संवेदी,

12. …………. शरीर को एक विशेष प्रकार का ढाँचा (रूपरेखा) प्रदान करती हैं।
उत्तर:
हड्डियाँ,

13. व्यायाम करने से भूख में ……………. होती है।
उत्तर:
वृद्धि,

14. व्यायाम से हड्डियाँ …………. होती हैं।
उत्तर:
मजबूत,

15. गुर्दे ……………….. संस्थान के अंग हैं।
उत्तर:
उत्सर्जन।

विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव Summary

विभिन्न शारीरिक संस्थान तथा उन पर व्यायामों के प्रभाव परिचय

हमारा शरीर बहुत-से तंतुओं व अंगों से मिलकर बना है जिनका निर्माण कोशिकाओं द्वारा होता है। शरीर के सभी अंगों या भागों में 206 हड्डियाँ होती हैं। हमारे शरीर में कोमल अंगों की रक्षा इन्हीं के द्वारा होती है। जीवित रहने के लिए मानवीय शरीर को पानी, भोजन और वायु की अति आवश्यकता होती है जिनके बिना हमारा जीवन सम्भव नहीं है। शरीर के अंदर पानी, भोजन, वायु और अन्य कार्यों को व्यवस्थित करने के लिए अनेक शारीरिक संस्थान निरंतर कार्यरत रहते हैं; जैसे माँसपेशी संस्थान, पाचन संस्थान, श्वसन संस्थान व उत्सर्जन संस्थान आदि।

ये सभी शारीरिक संस्थान अपने-अपने अंगों संबंधी कार्य करते रहते हैं, ताकि हमारा शरीर सुचारू रूप से चलता रहे। हमारे शारीरिक संस्थानों को निरंतर सुचारू रूप से कार्य करने में व्यायाम क्रियाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन क्रियाओं का हमारे शारीरिक संस्थानों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इनके करने से शारीरिक संस्थानों और उनके अंगों की कार्यक्षमता में वृद्धि व बढ़ोतरी होती है। इसलिए शारीरिक स्वास्थ्य हेतु हमें नियमित व्यायाम करते रहना चाहिए। व्यायाम का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है

इसकी पूर्णरूपेण जानकारी हेतु हमें शरीर के विभिन्न अवयवों की रचना तथा कार्यों से अवगत होना अनिवार्य हो जाता है। हमारा शरीर एक सुंदर और पेचीदे यंत्र के समान है जिसे हम अपनी सुविधानुसार कई भागों में विभाजित कर सकते हैं। ये सभी भाग सुचारू रूप से कार्य करें तभी शरीर स्वस्थ रह सकता है। किसी एक भाग के कार्य में विघ्न पड़ने से रोगाणु उत्पन्न हो जाते हैं और वे शरीर की क्षमता को प्रभावित करने लग जाते हैं क्योंकि सभी भाग एक-दूसरे से संबंधित हैं। अतः शरीर के विभिन्न भागों अथवा प्रणालियों के पृथक्-पृथक् अध्ययन करने से ही हम शरीर की क्रियाओं को समझ सकते हैं।

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HBSE 11th Class Physical Education Solutions Haryana Board

Haryana Board HBSE 11th Class Physical Education Solutions

HBSE 11th Class Physical Education Solutions in Hindi Medium

HBSE 11th Class Physical Education Solutions in English Medium

  • Chapter 1 Concept of Physical Education
  • Chapter 2 Concept of Health and Health Education
  • Chapter 3 Communicable Diseases
  • Chapter 4 Occupational Health
  • Chapter 5 Posture
  • Chapter 6 Different Body System and Effects of Exercises on Various System
  • Chapter 7 Basic Concept of Second Wind
  • Chapter 8 Psychology and Sports Psychology

HBSE 11th Class Physical Education Question Paper Design

Class: 10+1
Subject: Physical & Health Education
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 60
Time: 3 Hrs.

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKUASTotal
Percentage of Marks403327100
Marks24201660

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions3761228
Marks Allotted1521121260
Estimated Time70702515180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
1. Meaning and Definition of Physical Education9
2. Meaning and Definition of Health Education9
3. Communicable Diseases8
4. Occupational Health6
5. Posture6
6. Body System8
7. Second Wind5
8. Psychology and Sports Psychology9
Total60

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice in Long Answer Question, i.e. Essay Type

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% marks
Average: 50% marks
Easy: 40 % marks

Abbreviations: K (Knowledge), U (Understanding), A (Application), E (Essay Type), SA (Short Answer Type), VSA (Very Short Answer Type), O (Objective Type).

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HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 5 आसन

Haryana State Board HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 5 आसन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physical Education Solutions Chapter 5 आसन

HBSE 11th Class Physical Education आसन Textbook Questions and Answers

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions) |

प्रश्न 1.
अच्छे आसन की विभिन्न स्थितियों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
संतुलित मुद्रा के बारे में आप क्या जानते हैं? विस्तार से लिखें।
उत्तर:
आसन का मानवीय-जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। आसन से अभिप्राय शरीर की स्थिति से है अर्थात् मनुष्य किस प्रकार अपने शरीर की संभाल या देखरेख करता है। आसन की अवहेलना करना मानो कई प्रकार के शारीरिक दोषों या विकारों को निमंत्रित करना है। इसलिए बचपन से ही बच्चों के आसन की ओर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को शारीरिक विकारों से बचाया जा सके। एक अच्छा आसन ही मनुष्य की एक अच्छी शारीरिक संरचना या बनावट और विभिन्न स्थितियों में संतुलित रख सकता है। इसलिए शारीरिक संतुलन विभिन्न क्रियाओं; जैसे खड़े होना, बैठना, चलना, लेटना, पढ़ना आदि को करते हुए उचित होना चाहिए।

संतुलित आसन की अवस्थाएँ या स्थितियाँ (Positions of Correct Posture): उचित या अच्छे आसन की विभिन्न स्थितियाँ या अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं
1. खड़े रहने/होने का उचित आसन (Good Posture of Standing):
करूगर के अनुसार, “खड़े रहने का अच्छा आसन तभी कहा जा सकता है यदि खड़े रहते समय कम-से-कम शक्ति खर्च की जाए।” खड़े रहने या होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति भिन्न-भिन्न आसनों का प्रयोग करते हैं। खड़े होने की उचित स्थिति हेतु व्यक्ति को अपने दोनों पैरों की एड़ियों को आपस में मिला लेना चाहिए। पैरों के अंगूठे आपस में 3 या 4 इंच की दूरी पर होने चाहिएँ। शरीर तना हुआ और शरीर का भार दोनों पैरों पर एक-समान या बराबर होना चाहिए। इस स्थिति में व्यक्ति का संपूर्ण शरीर पूर्ण रूप से संतुलित होना चाहिए।

2. बैठने का उचित आसन (Good Posture of Sitting):
बहुत-से ऐसे कार्य हैं जिनको करने के लिए हमें अधिक देर तक बैठना पड़ता है। अधिक देर बैठने से धड़ की माँसपेशियाँ थक जाती हैं और धड़ में कई दोष आ जाते हैं । बैठते समय रीढ़ की हड्डी सीधी, छाती आमतौर पर खुली, कंधे समतल, पेट स्वाभाविक तौर पर अंदर की ओर, सिर और धड़ सीधी स्थिति में होने चाहिएँ। बैठने वाला स्थान हमेशा खुला, समतल तथा साफ-सुथरा होना चाहिए।

देखा जाता है कि कई व्यक्ति सही ढंग से बैठकर नहीं पढ़ते। पढ़ते समय मुद्रा ऐसी होनी चाहिए जिससे आँखों व शरीर पर कम-से-कम दबाव पड़े। लिखने के लिए मेज या डैस्क का झुकाव आगे की ओर होना चाहिए। हमें कभी भी सिर झुकाकर न तो पढ़ना चाहिए और न ही लिखना चाहिए। इससे हमारी रीढ़ की हड्डी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। गलत ढंग से बैठने से शरीर में कई विकार पैदा हो सकते हैं । बैठने के लिए व्यक्ति विभिन्न शारीरिक मुद्रा या आसन का प्रयोग करता है।

3. पढ़ने का उचित आसन (Good Posture of Reading):
व्यक्ति को इस प्रकार के आसन में बैठकर पढ़ना चाहिए, जिससे उसके शरीर तथा आँखों पर कम-से-कम दबाव पड़े। पढ़ते समय किताब से आँखों की दूरी उचित होनी चाहिए। जहाँ तक हो सके, छोटे बच्चों की किताबें बड़े अक्षरों वाली होनी चाहिएँ, ताकि उनकी आँखों पर कम-से-कम दबाव पड़े तथा आँखें कमजोर न हो सकें। पढ़ते समय किताब इस प्रकार पकड़नी चाहिए जिससे उस पर रोशनी ठीक पड़ सके। आँखों के बिल्कुल समीप तथा बहुत दूर रखी हुई किताब कभी नहीं पढ़नी चाहिए।

4. चलने का उचित आसन (Good Posture of Walking):
चलने का आसन व्यक्ति के व्यक्तित्व का दर्पण होता है। चलते समय पैर समानांतर रखने चाहिएँ। सिर को सीधा रखना चाहिए तथा कंधे पीछे की तरफ होने चाहिएँ। छाती तनी हुई तथा बाजुएँ बिना किसी तनाव के झूलनी चाहिएँ। चलते समय पैर आपस में टकराने नहीं चाहिएँ तथा शरीर की माँसपेशियाँ साधारण स्थिति में होनी चाहिएँ। चलते समय ठीक आसन ही अपनाया जाना चाहिए ताकि शरीर में कम-से-कम थकावट हो सके। गलत आसन में चलने से शारीरिक ढाँचा ठीक नहीं रहता, क्योंकि इससे न सिर्फ टाँगें तथा माँसपेशियाँ थकती हैं, अपितु टाँगों तथा पैरों में दर्द भी होता रहता है।

5. लेटने या सोने का उचित आसन (Good Posture of Lying):
लेटते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि श्वसन क्रिया में किसी भी प्रकार की कोई बाधा न आए। लेटते समय रीढ़ की हड्डी पर अधिक दबाव नहीं पड़ना चाहिए। पीठ के बल अधिक समय तक नहीं लेटना चाहिए और न ही टाँगों को मोड़कर लेटना चाहिए, क्योंकि इससे साँस लेने में बाधा आती है। हमें नाक से ही साँस लेनी चाहिए। अत: माता-पिता को बच्चों के लेटने के आसन की ओर विशेष रूप से ध्यान देकर उन्हें उचित आसन हेतु प्रेरित करना चाहिए।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 5 आसन

प्रश्न 2.
उचित आसन से आपका क्या अभिप्राय है? उचित आसन से होने वाले लाभों का वर्णन कीजिए।
अथवा
उचित या संतुलित मुद्रा क्या है? इससे होने वाले लाभ बताएँ।
उत्तर:
उचित या अच्छे आसन का अर्थ (Meaning of Correct or Good Posture):
आसन या मुद्रा शरीर की स्थिति को कहते हैं; जैसे उठना, बैठना, खड़े होना, लेटना आदि। अच्छे आसन से अभिप्राय व्यक्ति के शरीर का ठीक या उचित संतुलन में होना है। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर का संतुलन विभिन्न क्रियाओं; जैसे उठना, बैठना, खड़े होना, लिखना, पढ़ना, लेटना आदि को करते समय उचित या अच्छा होना चाहिए। वास्तव में एक खड़े हुए व्यक्ति का उचित आसन उस अवस्था में होगा, जब उसके शरीर का भार उसके दोनों पैरों पर एक-समान होगा। एवेरी (Avery) के अनुसार, “एक अच्छा आसन वह है जिसमें शरीर संतुलित हो, जिससे कम-से-कम थकावट उत्पन्न हो।” अत: शरीर के विभिन्न अंगों की ठीक स्थिति को ही उचित आसन कहते हैं।

उचित या अच्छे आसन के लाभ (Advantages of Correct or Good Posture):
शरीर की किसी एक स्थिति को मुद्रा नहीं कहा जाता बल्कि हम अपने शरीर को कई अलग-अलग ढंगों से स्थिर करते रहते हैं। शरीर को स्थिर रखने की स्थितियों को मुद्रा या आसन कहा जाता है। शरीर की प्रत्येक प्रकार की स्थिति मुद्रा ही कहलाएगी। परंतु गलत और ठीक मुद्रा में बहुत अंतर होता है। ठीक मुद्रा देखने में सुंदर लगती है।

इससे शरीर की माँसपेशियों पर अतिरिक्त भार नहीं पड़ता। ठीक मुद्रा वाला व्यक्ति काम करने तथा चलने-फिरने में चुस्त और फुर्तीला होता है। गलत मुद्रा व्यक्ति के शरीर के लिए अनावश्यक बोझ बन जाती है। इसलिए हमेशा शरीर की स्थिति प्रत्येक प्रकार का आसन प्राप्त करते समय ठीक रखनी चाहिए। संक्षेप में, उचित या संतुलित मुद्रा के निम्नलिखित लाभ हैं

  1. शरीर को उचित मुद्रा में रखने से शरीर को हिलाना-डुलाना आसान हो जाता है और शरीर के दूसरे भागों पर भी भार नहीं पड़ता।
  2. उचित मुद्रा मन को प्रसन्नता एवं खुशी प्रदान करती है।
  3. उचित मुद्रा वाले व्यक्ति की कार्य करने में कम शक्ति लगती है अर्थात् उसे कोई कार्य करने में कठिनाई नहीं होती।
  4. उचित मुद्रा हड्डियों और माँसपेशियों को संतुलित रखती है।
  5. उचित मुद्रा वाले व्यक्ति को बीमारियाँ कम लगती हैं।
  6. उचित आसन से व्यक्ति की शारीरिक आकृति आकर्षक एवं सुंदर दिखाई देती है अर्थात् उसका शारीरिक ढाँचा बहुत आकर्षित दिखता है।
  7. इससे स्वास्थ्य के सभी पहलुओं पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
  8. इससे शारीरिक योग्यता एवं क्षमता में वृद्धि होती है।
  9. इससे व्यक्ति की भूख में वृद्धि होती है जिससे उसके शारीरिक व मानसिक विकास में वृद्धि होती है।
  10.  यह अनेक प्रकार की शारीरिक गतिविधियों में लगने वाली क्षमता को बढ़ाने में सहायक होता है।
  11. इससे व्यक्ति में आत्म-विश्वास की वृद्धि होती है। वह अपने विचारों या भावों को विश्वास के साथ व्यक्त करता है।
  12. इससे रीढ़ की हड्डियों में लचकता आती है।
  13. इससे शरीर में स्फूर्ति एवं उमंग बढ़ती है।
  14. इससे शरीर के सभी अंगों का उचित विकास होता है, क्योंकि इससे शारीरिक विकार दूर होते हैं।
  15. इससे मन की तत्परता का पता चलता है अर्थात् यह मानसिक या बौद्धिक विकास में सहायक होता है।
  16. अच्छे आसन से व्यक्तित्व आकर्षण लगता है। यह व्यक्ति के सम्मान और नौकरी प्राप्त करने में भी सहायक होता है।
  17. अच्छी मुद्रा या आसन से माँसपेशी, श्वसन, पाचन एवं नाड़ी आदि संस्थानों की क्षमता में सुधार होता है और आपसी तालमेल भी बढ़ता है। इससे शरीर के सभी संस्थान सुचारु रूप से कार्य करते हैं।
  18. अच्छे आसन से विभिन्न प्रकार के कौशलों की संपूर्णता में सुधार होता है।
  19. अच्छे आसन से शारीरिक एवं मानसिक योग्यताओं में सुधार होता है और मन की तत्परता व शारीरिक क्षमता में वृद्धि होती है।
  20. अच्छे आसन से समाजीकरण की योग्यता का पता चलता है। यह व्यक्ति के समाज में उच्च-स्तर का द्योतक है।

प्रश्न 3.
मुद्रा की किस्मों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दीजिए।
उत्तर:
मुद्रा या आसन की किस्में निम्नलिखित हैं
1. स्थैतिक मुद्रा (Static Posture):
जिस मुद्रा में शरीर की स्थिति स्थिर रहती है, उसे स्थैतिक मुद्रा कहते हैं; जैसे खड़े होने की मुद्रा, बैठने की मुद्रा तथा लेटने की मुद्रा।

(i) खड़े होने की मुद्रा (Posture of Standing):
गलत ढंग से खड़े होने अथवा चलने से भी शरीर में थकावट आ जाती है। खड़े होने के दौरान शरीर का भार दोनों पैरों पर बराबर होना चाहिए। खड़े होने के दौरान पेट सीधा, छाती फैली हुई और धड़ सीधा होना चाहिए।

(ii) बैठने की मुद्रा (Posture of Sitting):
बैठते समय रीढ़ की हड्डी सीधी, छाती आमतौर पर खुली, कंधे समतल, पेट स्वाभाविक तौर पर अंदर की ओर, सिर और धड़ सीधी स्थिति में होने चाहिए। बैठने वाला स्थान हमेशा खुला और समतल होना चाहिए। देखा जाता है कि कई व्यक्ति सही ढंग से बैठकर नहीं पढ़ते । पढ़ते समय हमें ऐसी मुद्रा में बैठना चाहिए जिससे आँखों व शरीर पर कम-से-कम दबाव पड़े। हमें कभी भी सिर झुकाकर न तो पढ़ना चाहिए और न ही लिखना चाहिए। इससे हमारी रीढ़ की हड्डी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(iii) लेटने की मुद्रा (Posture of Lying):
लेटते समय हमारा शरीर विश्राम अवस्था में और शांत होना चाहिए। सोते समय शरीर प्राकृतिक तौर पर टिका होना चाहिए। हमें सोते समय कभी भी गलत तरीके से नहीं लेटना चाहिए। इससे हमारे रक्त के संचार पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे श्वास क्रिया भी रुक जाने का खतरा पैदा हो सकता है। गर्दन अथवा अन्य किसी भाग की नाड़ी आदि चढ़ जाने का खतरा रहता है।

2. गतिज मुद्रा (Kinetic Posture):
जिस मुद्रा में शरीर की स्थिति गतिशील अवस्था में होती है, उसे गतिज मुद्रा कहते हैं; जैसे चलने की मुद्रा । हमारी चाल हमेशा सही होनी चाहिए। चलते समय पंजे और एड़ियों पर ठीक भार पड़ना चाहिए। अच्छी चाल वाला व्यक्ति प्रत्येक मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करता है। चलते समय पैरों का अंतर समान रहना चाहिए। हाथ आगे-पीछे आने-जाने चाहिएँ। चलते समय पैरों की रेखाएँ चलने की दिशा की रेखा के समान होनी चाहिएँ।।

3. उचित मुद्रा (Correct Posture):
आसन या मुद्रा शरीर की स्थिति को कहते हैं; जैसे उठना, बैठना, खड़े होना, लेटना आदि। अच्छे आसन से अभिप्राय व्यक्ति के शरीर का ठीक एवं उचित संतुलन में होना है। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर का संतुलन विभिन्न क्रियाओं; जैसे उठना, बैठना, खड़े होना, लिखना, पढ़ना, लेटना आदि को करते हुए उचित या अच्छा होना चाहिए। वास्तव में एक खड़े हुए व्यक्ति का उचित आसन उस अवस्था में होगा, जब उसके शरीर का भार उसके दोनों पैरों पर एक-समान होगा।

4. अनुचित मुद्रा (Incorrect Posture):
भद्दी मुद्रा या अनुचित आसन मनुष्य के व्यक्तित्व में बाधा डालता है, जिसके कारण मनुष्य में आत्म-विश्वास की कमी आ जाती है। शरीर की स्थिति ठीक अवस्था में न होना अनुचित आसन कहलाता है अर्थात् चलते, बैठते, लिखते, पढ़ते व खड़े होते समय शरीर का उचित अवस्था या स्थिति में न रहना अनुचित आसन कहलाता है।

प्रश्न 4.
आसन संबंधी विकृतियों से आप क्या समझते हैं? आसन संबंधी विकृतियों के कारणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
आसन संबंधी कुरूपताओं से आपका क्या तात्पर्य है? इनके कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आसन संबंधी कुरूपताओं का अर्थ (Meaning of Postural Deformities):
आसन संबंधी कुरूपताओं या विकृतियों से अभिप्राय शरीर की स्थिति का ठीक या संतुलन अवस्था में न होना है। ऐसी स्थिति से शरीर को अनेक विकृतियों का सामना करना पड़ता है। यदि इनको समय रहते ठीक न किया जाए तो इनका हमारे शारीरिक विकास एवं वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

आसन संबंधी कुरूपताओं या विकृतियों के कारण (Causes of Postural Deformities): आसन संबंधी कुरूपताओं के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
1.पैदा होते समय कुरूपता (Inborn Deformity):
कुछ आसन पैदा होने के समय कुरूपता वाले होते हैं । इसका मुख्य कारण संतुलित भोजन न होना अथवा पैदा होने से पहले अधिक ध्यान न देना है। इस प्रकार की कुरूपताएँ स्थायी होती हैं।

2. कमजोर हड्डियाँ तथा माँसपेशियाँ (Weak Bones and Muscles):
आसन में कुरूपता का मुख्य कारण कमजोर हड्डियाँ और माँसपेशियाँ हैं। विटामिन ‘डी’ की कमी के कारण मनुष्य की हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं। जिसके कारण वे मुड़ जाती हैं। मनुष्य के शरीर में माँसपेशियाँ लीवर का कार्य करती हैं, जिससे हमारा शारीरिक विकास होता है। इनमें दोष पड़ने से रीढ़ की हड्डी का टेढ़ा होना, पीछे की तरफ कूब, आगे की तरफ कूब जैसी कुरूपताएँ पैदा हो जाती हैं।

3. बुरी आदतें (Bad Habits):
बैठते, उठते, लेटते समय, खड़े होते समय तथा कार्य करते समय गलत आसन शरीर में कुरूपताएँ पैदा करते हैं। उदाहरणस्वरूप पढ़ते समय हम एक तरफ झुककर अथवा कुर्सी पर बैठकर, मेज पर झुककर पढ़ते हैं, फिर यह आदत बन जाती है, जिससे आसन में कुरूपता आ जाती है।

4. अधिक दबाव (High Pressure):
अधिक दबाव के कारण भी शरीर में कुरूपताएँ आ जाती हैं। विशेषतौर पर बाल्यावस्था में माँसपेशियों तथा हड्डियों में अधिक दबाव हानिकारक होता है।

5. शरीर का अधिक भारी होना या मोटापा (Heavy Body or Obesity):
अधिक भारी शरीर हड्डियों, माँसपेशियों तथा लिगामेंट्स पर अधिक भार डालता है जिसके कारण आगे की ओर कूब (Lordosis), बाहर की तरफ मुड़ी हुई टाँगें (Bow Legs) तथा चपटे पैर (Flat Feet) जैसी कुरूपताएँ आ जाती हैं। अधिक भार से घुटने के जोड़ों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

6. व्यायाम की कमी (Lack of Exercise):
आसन संबंधी कुरूपताएँ आने का सबसे बड़ा कारण व्यायाम की कमी है, क्योंकि व्यायाम हमारी माँसपेशियों में शक्ति तथा नीरोगता लाते हैं। जो व्यक्ति रोजाना व्यायाम नहीं करते, उनकी माँसपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं, जिसके कारण उनमें कई बार स्थायी तौर पर कुरूपताएँ आ जाती हैं। बच्चे के लिए ठीक व्यायाम उसके आसन को सुंदरता प्रदान करते हैं, जिससे उसके व्यक्तित्व में वृद्धि होती है।

7. असुविधाजनक वस्त्र (Uncomfortable Clothes):
कई बार असुविधाजनक वस्त्र शरीर को गलत आसन हेतु मजबूर कर देते हैं, विशेषतौर पर तंग वस्त्र । तंग वस्त्र शरीर की हरकतों, माँसपेशियों तथा जोड़ों की गतिशीलता में बाधा पैदा करते हैं।

8. बीमारी अथवा दुर्घटना (Disease or Accident):
बीमारी अथवा दुर्घटना के कारण भी आसन में कुरूपताएँ आ जाती हैं। दुर्घटना के कारण आसन में आई कुरूपता डॉक्टर की सलाह से दूर की जा सकती है, परंतु कई बार दुर्घटना से आसन में स्थायी तौर पर कुरूपता आ जाती है। बीमारी के कारण बिस्तर पर लंबे समय तक पड़े रहने से भी माँसपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं, जिसके कारण कुरूपता आ जाती है।

9. मनोवैज्ञानिक तनाव (Psychological Tension):
मनोवैज्ञानिक तनाव या चिंता से भावनात्मक स्थिति में असंतुलन पैदा होता है जिससे हमारे आसन में कुरूपता आ जाती है।

10. असंतुलित आहार (Unbalanced Diet):
असंतुलित या पोषक तत्त्वहीन आहार से शरीर का पूर्ण विकास नहीं हो पाता। इसके कारण भी आसन की अवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 5 आसन

प्रश्न 5.
रीढ़ की हड्डी का पीछे की तरफ कूब या कूबड़ होने के कारणों तथा इसको ठीक करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पीछे के कूब (कूबड़) जैसी कुरूपता का मुख्य कारण रीढ़ की हड्डी का पीछे की तरफ झुक जाना है। इसमें गर्दन अगली तरफ झुक जाती है तथा पीठ वाला हिस्सा पिछली तरफ झुक जाता है। रीढ़ की हड्डी एक कमान जैसा रूप धारण कर लेती है। रीढ़ की हड्डी में कुरूपता पीठ की माँसपेशियों के सिकुड़ने से होती है।

कारण (Causes): रीढ़ की हड्डी का पीछे की तरफ कूब (काइफोसिस) होने के कारण निम्नलिखित हैं

  1. आगे की ओर झुककर पढ़ने तथा काम करने से।
  2. व्यायाम की कमी के कारण।
  3. लंबा कद होने के कारण।
  4. बीमारी अथवा दुर्घटना होने के कारण।
  5. बैठने के लिए अनुचित फर्नीचर का प्रयोग करने के कारण।
  6. शारीरिक कमजोरी व विकार के कारण।
  7. लंबे समय तक अनुचित मुद्रा में बैठने के कारण आदि।

ठीक करने के उपाय (Remedial Measures):
रीढ़ की हड्डी में पीछे की तरफ कूब होने की विकृति को निम्नलिखित उपायों द्वारा ठीक किया जा सकता है

  1. पीछे की तरफ कूब को ठीक करने के लिए नियमित व्यायाम करने चाहिएँ।व्यायाम करने से इस स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगता है।
  2. पीठ की माँसपेशियों को शक्तिशाली बनाने वाले व्यायाम करने चाहिएँ।
  3. लंबे-लंबे साँस लेने वाले व्यायाम करने चाहिएँ।
  4. छाती को आगे की तरफ सीधा करके चलना-फिरना चाहिए।
  5. लटकने वाले व्यायाम करने चाहिएँ।
  6. कुर्सी पर बैठते समय आसन को आगे की तरफ खींचकर बैठना चाहिए।
  7. इसको ठीक करने के लिए योग-आसन काफी लाभदायक हैं; जैसे भुजंगासन, शलभासन, सर्वांगासन तथा चक्रासन आदि।
  8. सोते समय अपनी पीठ के नीचे तकिया अवश्य रखें। ऐसा करके भी इस स्थिति में सुधार किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
रीढ़ की हड्डी का आगे की तरफ कूब या कूबड़ होने के कारणों तथा इसको ठीक करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आगे की तरफ कूब का भी मुख्य कारण अच्छा आसन धारण न करना है। इसमें रीढ़ की हड्डी ऊपर से नहीं, बल्कि नीचे पेट के पास आगे की ओर झुकी होती है। छाती आगे की तरफ तथा गर्दन पिछली तरफ झुक जाती है। यह कुरूपता काफी दुखदायी है, क्योंकि इससे चलने-फिरने, उठने-बैठने में काफी मुश्किलें आती हैं। इससे छाती तथा गर्दन की माँसपेशियों में अकड़ाव आ जाता है और कूल्हे की माँसपेशियाँ छोटी और पेट की माँसपेशियाँ लंबी हो जाती हैं।

कारण (Causes): रीढ़ की हड्डी का आगे की तरफ कूब या लॉर्डोसिस होने के कारण निम्नलिखित हैं

  1. व्यायाम की कमी के कारण।
  2. छाती तथा गर्दन की कमजोर माँसपेशियों के कारण।
  3. संतुलित भोजन की कमी के कारण।
  4. गलत आसन धारण करने के कारण।

ठीक करने के उपाय (Remedial Measures): रीढ़ की हड्डी का आगे की तरफ कूब को ठीक करने के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. पीठ के बल लेटने वाले व्यायाम करना।
  2. खड़े होकर धड़ को अगली तरफ झुकाना।
  3. गर्दन तथा कंधों को आगे की ओर झुकाकर लंबे-लंबे साँस लेना।
  4. पैरों को जोड़कर हाथों से पैरों को छूना
  5. इसको ठीक करने के लिए योग-आसन काफी लाभदायक है; जैसे हलासन तथा पद्मासन।

प्रश्न 7.
रीढ़ की हड्डी के एक ओर झुकने के क्या कारण हैं? इसको दूर करने के उपाय बताएँ।
अथवा
स्कोलिओसिस (Scoliosis) क्या है? इसको ठीक करने के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रीढ़ की हड्डी का एक ओर झुकना (Scoliosis or Spinal Deviation): रीढ़ की हड्डी का शरीर के दाईं या बाईं ओर झुकना या मुड़ना स्कोलिओसिस (Scoliosis) कहलाता है। स्कोलिओसिस का अर्थ है-झुकना, मुड़ना, ऐंठना या घुमना। वास्तव में इसमें बराबर की ओर एक गोलाई वक्र होता है जो स्कोलिओटिक वक्र (Scoliotic Curve) कहलाता है। जब यह वक्र रीढ़ की हड्डियों के बाईं ओर हो तो यह सामान्यतया ‘C’ वक्र कहलाता है। कई बार यह वक्र दोनों ओर भी हो सकता है, तब यह ‘S’ वक्र कहलाता है, क्योंकि उस समय आकृति ‘S’ के आकार जैसी हो जाती है। ठीक से न बैठने, चलने व खड़े होने से यह विकृति हो जाती है। परन्तु रीढ़ की हड्डी के मुड़ने का मुख्य कारण रिकेट्स व पोलियो जैसी बीमारियाँ हैं।

कारण (Causes): रीढ़ की हड्डी के एक ओर झुकने के कारण निम्नलिखित हैं

  1. हड्डियों के जोड़ों से संबंधित बीमारी होने के कारण।
  2. भोजन में आवश्यक तत्त्वों की कमी होने के कारण।
  3. उचित आसन धारण न करने के कारण।
  4. टाँगों के विकसित न होने के कारण।
  5. रिकेट्स व पोलियो रोग हो जाने के कारण।
  6. माँसपेशियों के कमजोर होने के कारण।

ठीक करने के उपाय (Remedial Measures): स्कोलिओसिस को ठीक करने के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. उचित आसन धारण करना।
  2. पढ़ाई करते समय झुकने वाली अवस्था से बचना।
  3. हॉरिजौंटल बार को दोनों हाथों से पकड़कर शरीर को दाईं और बाईं ओर झुकाना।
  4. तैरने की ब्रेस्ट स्ट्रोक तकनीक का प्रयोग करके तैरना।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें
(क) गोल या झुके हुए कंधे (Round Shoulders)
(ख) घुटनों का आपस में टकराना या भिड़ना (Knock Knees)।
उत्तर:
(क) गोल या झुके हुए कंधे के कारण (Causes of Round Shoulders): आसन संबंधी गोल या झुके हुए कंधे की विकृति के कारण अग्रलिखित हैं

  1. आनुवांशिकता संबंधी दोष।
  2. उचित आसन धारण न करना अर्थात् झुकी हुई अवस्था में बैठना, खड़े होना आदि।
  3. व्यायाम न करना।
  4. अनुचित फर्नीचर का प्रयोग करने के कारण।

ठीक करने के उपाय (Remedial Measures): गोल या झुके हुए कंधे की विकृति को ठीक करने के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. कुछ समय तक हॉरिजौटल बार पर लटकना।
  2.  नियमित रूप से व्यायाम व आसन करना, विशेषकर धनुरासन व चक्रासन।
  3. अपनी कोहनियों को वृत्ताकार रूप से बारी-बारी से विपरीत दिशा में घुमाना।

(ख) घुटनों का आपस में टकराना या भिड़ना (Knock Knees):
इस कुरूपता में दोनों घुटने आपस में मिल जाते हैं। जब बच्चा खड़ा होता है तो पाँव समानांतर रहते हैं। टखनों के मध्य का स्थान अधिक हो जाता है। बच्चा चलने तथा दौड़ने में कठिनाई महसूस करता है। वह अपनी सामान्य प्रसन्नता खो देता है। अगर कोई व्यक्ति दोनों पाँवों को सटाकर सीधा खड़ा होता है तब एक सामान्य आसन के दौरान घुटनों में थोड़ा अंतर होना चाहिए। अगर अंतर ज्यादा है और घुटने आपस में स्पर्श करते हैं तो इस कुरूपता को घुटनों का आपस में भिड़ना कहते हैं।

कारण (Causes): छोटे बच्चों के भोजन में कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा विटामिन ‘डी’ की कमी के कारण उनकी हड्डियाँ कमजोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं । इस कारण उनके घुटने टकराने लग जाते हैं । इस स्थिति में उन बच्चों से सावधान की मुद्रा में खड़ा नहीं हुआ जाता। उनके पाँव जुड़ने से पहले ही उसके घुटने टकराने लगते हैं। ऐसे बच्चों के लिए अच्छी तरह से भागना तथा चलना मुश्किल हो जाता है।

ठीक करने के उपाय (Remedial Measures): घुटनों के आपस में टकराने को ठीक करने के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) इस कुरूपता को दूर करने के लिए टाँगों की ऐसी कसरतें करवानी चाहिएँ, जिनसे घुटनों को बाहर निकाला जा सके।
(2) इस कुरूपता को ठीक करने के लिए साइकिल चलानी चाहिए।
(3) इस कुरूपता के लिए तैराकी और घुड़सवारी लाभदायक है।
(4) नियमित रूप से पद्मासन व गोमुखासन करना चाहिए।
(5) कैल्शियम व फॉस्फोरस तथा विटामिन ‘डी’ युक्त भोजन का सेवन करना चाहिए।

प्रश्न 9.
आसन संबंधी चपटे पैर की विकृति के कारणों तथा इसको ठीक करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चपटे पैरों की विकृति प्रायः बच्चों तथा वृद्धों में पाई जाती है। इसका मुख्य कारण बच्चे द्वारा गलत आसन धारण करना है। इससे पैरों की हड्डियों की बनावट में अंतर आता है तथा पैर का निचला हिस्सा नीचे की ओर झुक जाता है।

  • कारण (Causes): चपटे पैरों की विकृति के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
    1. पैरों की कमजोर माँसपेशियाँ।
    2. अधिक वजन उठाना।
    3. लंबे समय तक जूतों का प्रयोग किए बिना खड़े रहना।
    4. मोटापा।
    5. पुरानी बीमारी।
  • लक्षण (Symptoms): चपटे पैरों के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं
    1. पैरों में कमजोरी होना।
    2. घुटने व पीठ की माँसपेशियों में दर्द होना।
    3. चलने में कठिनाई आना।
    4. पैरों में अधिक पसीने का आना।
    5. पैरों का सुन्न रहना।
    6. पैरों में भौरियों का निकलना।
  • ठीक करने के उपाय (Remedial Measures): चपटे पैरों को ठीक करने के उपाय निम्नलिखित हैं
    1. पैरों में फिट आने वाले जूते पहनने चाहिएँ।
    2. चलते समय पैरों के बाहरी तरफ अधिक वजन डालना चाहिए।
    3. एक अवस्था में लंबे समय तक खड़ा नहीं रहना चाहिए।
    4. पंजों के बल दौड़ना व साइकिल चलानी चाहिए।
    5. पैरों को इकट्ठा करके पंजों के बल बैठना चाहिए।
    6. पंजों पर वजन उठाकर व्यायाम करना चाहिए।
    7. इस विकृति को ठीक करने में घुड़दौड़ काफी लाभदायक है।

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प्रश्न 10.
आसन संबंधी कुरूपताओं या विकृतियों में सुधार हेतु लाभदायक व्यायामों या शारीरिक क्रियाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्लेटो (Plato) के अनुसार, “गतिविधि या व्यायाम का अभाव प्रत्येक इंसान की अच्छी स्थिति को नष्ट कर देता है, जबकि व्यवस्थित शारीरिक व्यायाम इसे बचाए और बनाए रखते हैं।” बहुत-सी ऐसी शारीरिक गतिविधियाँ या व्यायाम होते हैं जिनको आसन संबंधी विकृतियों या विकारों को सामान्य करने के लिए सुधारात्मक उपायों के रूप में प्रयोग किया जा सकता है; जैसे

1. पीछे की ओर कूब या काइफोसिस (Kyphosis): इस विकृति में सुधार हेतु लाभदायक व्यायाम या क्रियाएँ निम्नलिखित हैं
(i) पीठ के बल लेटकर घुटनों को ऊपर की ओर उठाएँ और पैरों के तलवे जमीन को स्पर्श न करें। इसके बाद हॉरिजौटल अवस्था में दोनों हाथों को बराबर खोलकर सिर के ऊपर ले जाएँ। हथेलियाँ ऊपर की ओर होनी चाहिए। इस अवस्था में कुछ देर तक रहें। इसके बाद अपने हाथों को हॉरिजौंटल अवस्था में लाएँ। इस प्रकार से यह क्रिया 7-8 बार दोहरानी चाहिए।

(ii) छाती के बल लेटकर हाथों को अपने कूल्हों पर रखें। इसके बाद अपने सिर एवं धड़ को जमीन से कुछ इंच ऊपर उठाएँ। इस अवस्था में कुछ समय तक रुककर अपनी पहले वाली अवस्था में आएँ। इस प्रकार से यह क्रिया कई बार दोहरानी चाहिए।

2. आगे की ओर कूब या लॉर्डोसिस (Lordosis): इस विकृति में सुधार हेतु लाभदायक व्यायाम या क्रियाएँ निम्नलिखित हैं
(i) छाती के बल लेटकर अपने दोनों हाथ उदर पर रखें। इसके बाद कूल्हों एवं कंधों को नीचे रखें। फिर पीठ के निचले भाग को उठाने का प्रयास करें। इस प्रकार से यह क्रिया 5-6 बार दोहराएँ।
(ii) फर्श पर अधोमुख अवस्था में लेटकर अपने कंधों की चौड़ाई के अनुसार अपने दोनों हाथों की हथेलियाँ फर्श पर रखें। श्रोणी (Pelvis) को फर्श पर रखते हुए धड़ को ऊपर की ओर ले जाएँ। इस अवस्था में कुछ देर तक रहने के बाद पहले वाली अवस्था में आ जाएँ। इस प्रकार से यह प्रक्रिया कई बार दोहराएँ।

3. रीढ़ की हड्डी का एक ओर झुकाव या स्कोलिओसिस (Scoliosis): इस विकृति में सुधार हेतु लाभदायक व्यायाम या क्रियाएँ निम्नलिखित हैं
(i) छाती के बल लेटकर अपनी दाईं बाजू को ऊपर और बाईं बाजू को बराबर में रखें। इसके बाद दाईं बाज को सिर के ऊपर से बाईं ओर ले जाकर बाएँ हाथ से दबाएँ और कूल्हे को थोड़ा ऊपर की ओर सरकाएँ। इस प्रकार यह प्रक्रिया इस विकार में सुधार करने में सहायक होती है।

(ii) पैरों के बीच कुछ इंच की दूरी रखते हुए सीधे खड़े हो जाएँ। इसके बाद एड़ी एवं कूल्हे को ऊपर उठाकर अपनी दाईं बाजू को चाप के रूप में सिर के ऊपर से बाईं ओर ले जाएँ। फिर बाएँ हाथ से बाईं ओर की पसलियों या रिब्स को दबाएँ।

4. चपटे पैर (Flat Foot): इस विकृति में सुधार हेतु लाभदायक व्यायाम या क्रियाएँ निम्नलिखित हैं

  1. पैरों को इकट्ठा करके पंजों के बल बैठना।
  2. सीधे खड़े होकर एड़ियों को ऊपर व नीचे करना।
  3. नियमित रूप से रस्सी कूदना।
  4. नियमित रूप से पंजों पर वजन उठाकर व्यायाम करना।

5. घुटनों का आपस में टकराना (Knock-Knee): इस विकृति में सुधार हेतु लाभदायक व्यायाम या क्रियाएँ निम्नलिखित हैं

  1. घुड़सवारी करना और साइकिल चलाना।
  2. नियमित रूप से पद्मासन व गोमुखासन करना।

6. गोल कंधे (Round Shoulders): इस विकृति में सुधार हेतु लाभदायक व्यायाम या क्रियाएँ निम्नलिखित हैं

  1. नियमित रूप से हॉरिजौटल बार पर कुछ समय के लिए लटकना।
  2. नियमित रूप से चक्रासन एवं धनुरासन करना।।
  3. अपनी कोहनियों को कुछ समय तक घड़ी की सूई की दिशा में और कुछ समय घड़ी की सूई की विपरीत दिशा में वृत्ताकार रूप से घूमना।

प्रश्न 11.
भद्दी मुद्रा से क्या अभिप्राय है? इसके कारणों तथा इसको दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए।
अथवा
अनुचित आसन क्या है? इसको ठीक करने के उपायों का वर्णन कीजिए। अथवा आसन की खराबी को कैसे दूर करेंगे?
उत्तर:
अनुचित आसन का अर्थ (Meaning of Incorrect Posture): भद्दी मुद्रा या अनुचित आसन मनुष्य के व्यक्तित्व में बाधा डालता है, जिसके कारण मनुष्य में आत्म-विश्वास की कमी आ जाती है। शरीर की स्थिति ठीक अवस्था में न होना अनुचित आसन कहलाता है अर्थात् चलते, बैठते, लिखते, पढ़ते व खड़े होते समय शरीर का उचित अवस्था या स्थिति में न रहना अनुचित आसन कहलाता है।

अनुचित या भद्दी मुद्रा या आसन के कारण (Causes of Incorrect or Bad Posture): इस आसन के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
1. संतुलित व पौष्टिक आहार (Balanced and Nutritious Food):
शरीर की बनावट के लिए संतुलित व पौष्टिक आहार का होना बहुत जरूरी है। इसकी कमी के कारण शारीरिक अंगों का विकास रुक जाता है। इसके परिणामस्वरूप शारीरिक ढाँचा कमजोर पड़ जाता है जिसके कारण आसन में कुरूपता आ जाती है।

2. व्यायामों की कमी (Lack of Exercises):
व्यायामों की कमी के कारण शरीर की माँसपेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे आसन बेढंगा हो जाता है। व्यायाम अच्छे आसन के लिए लाभदायक होते हैं।

3. शरीर का अधिक भार (Over Weight of Body):
शरीर का अधिक भारी होना भी भद्दी मुद्रा का कारण है। मोटापे के कारण व्यक्ति को चलने-फिरने में कठिनाई महसूस होती है। इसका उसके आसन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

4. बुरी आदतें (Bad Habits):
गलत ढंग से पढ़ने, लिखने, बैठने, खड़े होने तथा चलने वाली बुरी आदतें मनुष्य के आसन में कुरूपता लाती हैं।

5. असुविधाजनक वस्त्र (Uncomfortable Clothes):
तंग वस्त्र, जूते, पैंट-कमीज आदि डालने से शरीर में तनाव बना रहता है, जिससे मनुष्य आराम महसूस नहीं करता। इससे वह बुरा आसन ग्रहण करता है।

भद्दी मुद्रा को ठीक करने के उपाय (Remedial Measures for Bad Posture): भद्दी या अनुचित आसन को ठीक करने के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. बच्चों को ठीक मुद्रा के बारे में जानकारी देनी चाहिए। स्कूल में अध्यापकों और घर में माता-पिता का कर्तव्य है कि बच्चों की खराब मुद्रा को ठीक करने के लिए निरंतर प्रयास करें।
  2. भोजन की कमी के कारण आई कमजोरी को ठीक करना चाहिए।
  3. बच्चों को न तो तंग कपड़े डालने चाहिएँ और न ही तंग जूते।
  4. हमें गलत ढंग से न तो चलना चाहिए और न ही पढ़ना व बैठना चाहिए।
  5. उचित और पूरी नींद लेनी चाहिए।
  6. बच्चों के स्कूल बैग का भार हल्का होना चाहिए।
  7. आवश्यकतानुसार डॉक्टरी परीक्षण करवाते रहना चाहिए ताकि मुद्रा-त्रुटि को समय पर ठीक किया जा सके।
  8. हमारे घरों, स्कूलों और कॉलेजों में ठीक मुद्रा की जानकारी देने वाले चित्र लगे होने चाहिएँ।
  9. घरों और स्कूलों में बड़ा शीशा लगा होना चाहिए, जिसके आगे खड़े होकर बच्चा अपनी मुद्रा देख सके।
  10. सोते समय शरीर को अधिक नहीं मोड़ना चाहिए।
  11. संतुलित एवं पौष्टिक आहार का सेवन करना चाहिए।
  12. बुरी आदतों से बचना चाहिए।
  13. नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए।

लघूत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
आसन की अवधारणा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आसन का मानवीय-जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। आसन से अभिप्राय शरीर की स्थिति से है अर्थात् मनुष्य किस प्रकार अपने शरीर की संभाल या देखरेख करता है। आसन की अवहेलना करना मानो कई प्रकार के शारीरिक दोषों या विकारों को निमंत्रित करना है। इसलिए बचपन से ही बच्चों के आसन की ओर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को शारीरिक विकारों से बचाया जा सके। एक अच्छा आसन ही मनुष्य को एक अच्छी शारीरिक संरचना या बनावट और विभिन्न स्थितियों में संतुलित रख सकता है। इसलिए शारीरिक संतुलन विभिन्न क्रियाओं; जैसे खड़े होना, बैठना, चलना, लेटना, पढ़ना आदि को करते समय उचित होना चाहिए।

प्रश्न 2.
अच्छे आसन (मुद्रा) की महत्ता पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
अथवा
अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए अच्छे आसन के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शरीर की किसी एक स्थिति को मुद्रा नहीं कहा जाता बल्कि हम अपने शरीर को कई अलग-अलग ढंगों से स्थिर करते रहते हैं । शरीर को स्थिर रखने की स्थितियों को मुद्रा या आसन कहा जाता है। शरीर को बिना तकलीफ के उठाना, बैठाना, घुमाना आदि मुद्रा में ही आते हैं। शरीर की प्रत्येक प्रकार की स्थिति मुद्रा ही कहलाएगी। परंतु गलत और ठीक मुद्रा में बहुत अंतर होता है।

ठीक मुद्रा देखने में सुंदर व आकर्षक लगती है। इससे शरीर की माँसपेशियों पर अतिरिक्त भार नहीं पड़ता। ठीक मुद्रा वाला व्यक्ति काम करने, चलने-फिरने में चुस्त और फुर्तीला होता है। भद्दी मुद्रा व्यक्ति के शरीर के लिए अनावश्यक बोझ बन जाती है। इसलिए हमेशा शरीर की स्थिति प्रत्येक प्रकार का आसन (Posture) प्राप्त करते समय ठीक रखनी चाहिए।शरीर को अच्छी स्थिति में रखने से शरीर को हिलाना-डुलाना आसान हो जाता है और शरीर के दूसरे भागों पर भी भार नहीं पड़ता।

अच्छी मुद्रा मन को प्रसन्नता एवं खुशी प्रदान करती है। अच्छी मुद्रा वाले व्यक्ति की कार्य करने में शक्ति कम लगती है अर्थात् उसे कोई भी कार्य करने में कठिनाई नहीं होती। अच्छी मुद्रा हड्डियों और माँसपेशियों को संतुलित रखती है। अच्छी मुद्रा वाले व्यक्ति को बीमारियाँ कम लगती हैं । उचित आसन से व्यक्ति की शारीरिक आकृति आकर्षक एवं सुंदर दिखाई देती है अर्थात् उसका शारीरिक ढाँचा बहुत आकर्षित दिखता है। इससे स्वास्थ्य के सभी पहलुओं पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 3.
आसन संबंधी विकृतियों या कुरूपताओं के कोई चार कारण बताएँ।
उत्तर:
आसन संबंधी विकृतियों या कुरूपताओं के कोई चार कारण निम्नलिखित हैं
1. बैठते, उठते, लेटते समय, खड़े होते समय तथा कार्य करते समय गलत आसन शरीर में कुरूपताएँ पैदा करते हैं। उदाहरणस्वरूप पढ़ते समय हम एक तरफ झुककर अथवा कुर्सी पर बैठकर, मेज पर झुककर पढ़ते हैं, फिर यह आदत बन जाती है, जिससे आसन में विकृति आ जाती है।

2. अधिक दबाव के कारण भी शरीर में विकृति आ जाती है। विशेषतौर पर बाल्यावस्था में माँसपेशियों तथा हड्डियों में अधिक दबाव हानिकारक होता है।

3. अधिक भारी शरीर हड्डियों, माँसपेशियों तथा लिगामेंट्स पर अधिक भार डालता है जिसके कारण आगे की ओर कूब (Lordosis), बाहर की तरफ मुड़ी हुई टाँगें (Bow Legs) तथा चपटे पैर (Flat Feet) जैसी कुरूपताएँ आ जाती हैं। अधिक भार से घुटनों के जोड़ों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

4. आसन में कुरूपताएँ आने का सबसे बड़ा कारण व्यायाम की कमी है, क्योंकि व्यायाम हमारी माँसपेशियों में शक्ति तथा नीरोगता लाते हैं। जो व्यक्ति रोजाना व्यायाम नहीं करते, उनकी माँसपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं, जिसके कारण उनमें कई बार स्थायी तौर पर कुरूपताएँ आ जाती हैं। व्यायाम बच्चे के आसन को सुंदरता प्रदान करते हैं, जिससे उसके व्यक्तित्व में
वृद्धि होती है।

प्रश्न 4.
घुटनों के आपस में टकराने की विकृति को ठीक करने के उपाय बताएँ।
उत्तर:
घुटनों के आपस में टकराने की विकृति को ठीक करने के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. इस विकृति को दूर करने के लिए टाँगों की ऐसी कसरतें करवानी चाहिएँ, जिनसे घुटनों को बाहर निकाला जा सके।
  2. इस विकृति को दूर करने के लिए साइकिल चलाई जानी चाहिए।
  3. इस विकृति को दूर करने में तैराकी और घुड़सवारी लाभदायक होती है।
  4. नियमित रूप से पद्मासन व गोमुखासन करना चाहिए।
  5. कैल्शियम व फॉस्फोरस तथा विटामिन ‘डी’ युक्त भोजन का सेवन करना चाहिए।

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प्रश्न 5.
झुकी हुई या धनुषाकार टाँगों के क्या कारण हैं? इसके ठीक करने के उपाय बताएँ।
उत्तर:
झुकी हुई टाँगें एक आसन संबंधी कुरूपता है। अनुमानतः यह घुटनों के मुड़ने के बिल्कुल विपरीत है। जब व्यक्ति दोनों पाँव मिलाकर खड़ा हो और घुटनों में कोई स्पर्श न हो तो इसको झुकी हुई टाँगों की कुरूपता कहते हैं।

  • कारण (Causes): झुकी हुई टाँगों के कारण निम्नलिखित होते हैं
    1. भोजन में कैल्शियम तथा फॉस्फोरस की कमी के परिणामस्वरूप हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं।
    2. हड्डियों पर अत्यधिक बोझ डालने वाले कार्य करने से।
    3. रिकेट्स रोग।
    4. लंबे समय तक खड़ा रहना।
    5. चलने तथा दौड़ने का अनुचित तरीका आदि।
  • ठीक करने के उपाय (Remedial Measures): झुकी हुई टाँगों को ठीक करने के उपाय निम्नलिखित हैं
    1. कैल्शियम तथा फॉस्फोरस-युक्त भोजन का सेवन करना चाहिए।
    2. सूर्य का प्रकाश तथा मछली के तेल को विटामिन ‘डी’ की पूर्ति हेतु लेना चाहिए।
    3. पाँवों की आंतरिक साइड पर दबाव डालकर चलने से झुकी हुई टाँगों की कुरूपता से बचा जा सकता है।
    4. वसा-युक्त भोजन को अत्यधिक मात्रा में नहीं लेना चाहिए।

प्रश्न 6.
रीढ़ की हड्डी के एक ओर झुके होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
रीढ़ की हड्डी के एक ओर झुके होने के कारण निम्नलिखित हैं

  1. हड्डियों के जोड़ों से संबंधित बीमारी होना।
  2. भोजन में आवश्यक तत्त्वों की कमी होना।
  3. अनुचित आसन धारण करना।
  4. रिकेट्स व पोलियो रोग होना।
  5. माँसपेशियों का कमजोर होना।

प्रश्न 7.
हमें उचित आसन की आवश्यकता क्यों होती है?
अथवा
अच्छे आसन की आवश्यकता पर संक्षेप में प्रकाश डालें।
उत्तर:
हमें उचित या अच्छे आसन की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से होती है

  1. शरीर को विकृतियों से बचाने हेतु।
  2. हड्डियों एवं माँसपेशियों की कार्यक्षमता बढ़ाने हेतु।
  3. शरीर में रक्त प्रवाह की गति सुचारू रूप से चलाने हेतु।
  4. व्यक्तित्व को आकर्षक व प्रभावशाली बनाने हेतु।
  5. शरीर में स्फूर्ति एवं उत्साह बनाए रखने हेतु।
  6. आत्म-विश्वास की भावना का विकास करने हेतु आदि।

प्रश्न 8.
चपटे पैरों के दोषों को किस प्रकार ठीक किया जा सकता है?
अथवा
चपटे पैरों की विकृति को ठीक करने के मुख्य उपाय बताएँ।
उत्तर:
चपटे पैरों की विकृति को ठीक करने के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं

  1. पैरों में फिट आने वाले जूते पहनने चाहिएँ।
  2. चलते समय पैरों की बाहरी तरफ अधिक बल डालना चाहिए।
  3. एक अवस्था में लंबे समय तक खड़ा नहीं रहना चाहिए।
  4. पंजों के बल दौड़ना व साइकिल चलानी चाहिए।
  5. भारी तथा असुविधाजनक जूते नहीं पहनने चाहिएँ।
  6. पैरों को इकट्ठा करके पंजों के बल बैठना चाहिए।
  7. पंजों पर वजन उठाकर व्यायाम करना चाहिए।
  8. इस विकृति को ठीक करने में घुड़दौड़ काफी लाभदायक है।

प्रश्न 9.
अनुचित आसन की प्रमुख हानियाँ संक्षेप में बताएँ।
उत्तर:
अनुचित आसन की हानियाँ निम्नलिखित हैं

  1. हड्डियों तथा माँसपेशियों में तालमेल नहीं हो पाता।
  2. थकान जल्दी हो जाती है।
  3. उठने, बैठने तथा चलने-फिरने में कठिनाई होती है।
  4. शारीरिक अंगों की शक्ति कम हो जाती है।
  5. जोड़ों में सहनशक्ति की कमी आ जाती है।

प्रश्न 10.
हम अपना आसन कैसे ठीक रख सकते हैं?
अथवा
आसनं ठीक रखने के महत्त्वपूर्ण उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आसन ठीक रखने के महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं

  1. बच्चों को ठीक आसन के बारे में जानकारी देनी चाहिए। स्कूल में अध्यापकों और घर में माता-पिता का कर्तव्य है कि बच्चों के खराब आसन को ठीक करने के लिए योग्य प्रयास करें।
  2. भोजन की कमी के कारण आई कमजोरी को ठीक करना चाहिए।
  3. बच्चों को न तो तंग कपड़े पहनाने चाहिएँ और न ही तंग जूते।
  4. हमें गलत ढंग से न तो चलना चाहिए और न ही पढ़ना व बैठना चाहिए।
  5. पौष्टिक व संतुलित भोजन खाना चाहिए।
  6. बच्चों के स्कूल बैग का भार हल्का होना चाहिए।
  7. आवश्यकतानुसार डॉक्टरी परीक्षण करवाते रहना चाहिए ताकि आसन-त्रुटि को समय पर ठीक किया जा सके।
  8. घरों, स्कूलों और कॉलेजों में ठीक मुद्रा की जानकारी देने वाले चित्र लगे होने चाहिएँ।

प्रश्न 11.
बैठने का उचित आसन कैसा होना चाहिए?
अथवा
बैठने की मुद्रा (Posture) पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
बहुत-से ऐसे कार्य हैं जिनको करने के लिए हमें अधिक देर तक बैठना पड़ता है। अधिक देर बैठने से धड़ की माँसपेशियाँ थक जाती हैं और धड़ में कई दोष आ जाते हैं । बैठते समय रीढ़ की हड्डी सीधी, छाती आमतौर पर खुली, कंधे समतल, पेट स्वाभाविक तौर पर अंदर की ओर, सिर और धड़ सीधी स्थिति में होने चाहिएँ। बैठने वाला स्थान हमेशा खुला, समतल तथा साफ-सुथरा होना चाहिए। देखा जाता है कि कई व्यक्ति सही ढंग से बैठकर नहीं पढ़ते।

पढ़ते समय मुद्रा ऐसी होनी चाहिए जिससे आँखों व शरीर पर कम-से-कम दबाव पड़े। लिखने के लिए मेज या डैस्क का झुकाव आगे की ओर होना चाहिए। हमें कभी भी सिर झुकाकर न तो पढ़ना चाहिए और न ही लिखना चाहिए। इससे हमारी रीढ़ की हड्डी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। गलत ढंग से बैठने से शरीर में कई विकार पैदा हो सकते हैं। इसलिए हमें उचित आसन में ही बैठना चाहिए।

प्रश्न 12.
चलते समय शरीर का आसन किस तरह होना चाहिए?
अथवा
चलने के उचित आसन के बारे में लिखिए।
उत्तर:
चलने का आसन व्यक्ति के व्यक्तित्व का दर्पण होता है । चलते समय पैर समानांतर रखने चाहिएँ। सिर को सीधा रखना चाहिए तथा कंधे पीछे की तरफ होने चाहिएँ। छाती तनी हुई तथा बाजुएँ बिना किसी तनाव के झूलनी चाहिएँ । चलते समय पैर आपस में टकराने नहीं चाहिएँ तथा शरीर की माँसपेशियाँ साधारण स्थिति में होनी चाहिएँ । चलते समय ठीक आसन ही अपनाया जाना चाहिए ताकि शरीर में कम-से-कम थकावट हो सके । गलत आसन में चलने से शारीरिक ढाँचा ठीक नहीं रहता, क्योंकि इससे न सिर्फ टाँगें तथा माँसपेशियाँ थकती हैं, अपितु टाँगों तथा पैरों में दर्द भी होता रहता है। इसलिए हमें चलते समय अपने आसन को उचित रखना चाहिए।

प्रश्न 13.
रीढ़ की हड्डी का पीछे की तरफ कूब (Kyphosis) के प्रमुख कारण बताएँ।
उत्तर:
रीढ़ की हड्डी का पीछे की तरफ कूब होने के कारण निम्नलिखित हैं

  1. आगे की ओर झुककर पढ़ने तथा काम करने से।
  2. व्यायाम की कमी के कारण।
  3. लंबा कद होने के कारण।
  4. बीमारी अथवा दुर्घटना होने के कारण।
  5. बैठने के लिए अनुचित फर्नीचर का प्रयोग करने के कारण।
  6. शारीरिक कमजोरी व विकार के कारण।
  7. लंबे समय तक अनुचित मुद्रा में बैठने के कारण आदि।

प्रश्न 14.
रीढ़ की हड्डी का आगे की ओर कूब (Lordosis) होने के कारण बताएँ।
उत्तर:
रीढ़ की हड्डी का आगे की तरफ कूब होने के कारण निम्नलिखित हैं

  1. छाती को आगे की तरफ निकालकर चलने की आदत।
  2. व्यायाम की कमी के कारण।
  3. छाती तथा गर्दन की कमजोर माँसपेशियों के कारण।
  4. संतुलित भोजन की कमी के कारण।
  5. गलत आसन धारण करने के कारण।

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प्रश्न 15.
रीढ़ की हड्डी का आगे की तरफ कूब को ठीक करने के उपाय बताएँ।
उत्तर:
रीढ़ की हड्डी का आगे की तरफ कूब को ठीक करने के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. पीठ के बल लेटने वाले व्यायाम करना।
  2. खड़े होकर धड़ को अगली तरफ झुकाना।
  3. गर्दन तथा कंधों को आगे की ओर झुकाकर लंबे-लंबे साँस लेना।
  4. पैरों को जोड़कर हाथों से पैरों को छूना।
  5. हलासन तथा पद्मासन इस कुरूपता के लिए लाभदायक हैं।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न (Very ShortAnswer Type Questions)

प्रश्न 1.
उचित आसन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आसन या मुद्रा शरीर की स्थिति को कहते हैं; जैसे उठना, बैठना, खड़े होना, लेटना आदि। अच्छे आसन से अभिप्राय व्यक्ति के शरीर का ठीक एवं उचित संतुलन में होना है। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर का संतुलन विभिन्न क्रियाओं; जैसे उठना, बैठना, खड़े होना, लिखना, पढ़ना, लेटना आदि को करते हुए उचित या अच्छा होना चाहिए। वास्तव में एक खड़े हुए व्यक्ति का उचित आसन उस अवस्था में होगा, जब उसके शरीर का भार उसके दोनों पैरों पर एक-समान होगा।

प्रश्न 2.
उचित आसन के कोई दो फायदे बताएँ।
उत्तर:

  1. उचित आसन से व्यक्ति की शारीरिक आकृति आकर्षक एवं सुंदर दिखाई देती है अर्थात् उसका शारीरिक ढाँचा आकर्षित दिखता है,
  2. इससे शरीर के सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हैं।

प्रश्न 3.
लेटते समय कौन-कौन-सी मुख्य बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:

  1. लेटते समय शरीर विश्राम की स्थिति में होना चाहिए,
  2. लेटते समय कठोर गद्दे का प्रयोग करना चाहिए,
  3. कभी भी लेटकर नहीं पढ़ना चाहिए।

प्रश्न 4.
आगे की ओर कूब को ठीक करने की शारीरिक क्रियाएँ बताएँ।
उत्तर:
1. छाती के बल लेटकर अपने दोनों हाथ उदर पर रखें। इसके बाद कूल्हों एवं कंधों को नीचे रखें। फिर पीठ के निचले भाग को उठाने का प्रयास करें। इस प्रकार से यह क्रिया 5-6 बार दोहराएँ।

2. फर्श पर अधोमुख अवस्था में लेटकर अपने कंधों की चौड़ाई के अनुसार अपने दोनों हाथों की हथेलियाँ फर्श पर रखें। श्रोणी (Pelvis) को फर्श पर रखते हुए धड़ को ऊपर की ओर ले जाएँ। इस अवस्था में कुछ देर तक रहने के बाद पहले वाली अवस्था में आ जाएँ। इस प्रकार से यह प्रक्रिया कई बार दोहराएँ।

प्रश्न 5.
चपटे पैरों की विकृति के कोई तीन लक्षण बताएँ।
उत्तर:

  1. पैरों की कमजोर माँसपेशियाँ,
  2. अधिक वजन उठाना,
  3. लंबे समय तक जूतों का प्रयोग किए बिना खड़े रहना।

प्रश्न 6.
घुटनों के आपस में टकराने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
छोटे बच्चों के भोजन में कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा विटामिन ‘डी’ की कमी के कारण उनकी हड्डियाँ कमजोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं। इस कारण उनके घुटने टकराने लग जाते हैं। इस स्थिति में उन बच्चों से सावधान की मुद्रा में खड़ा नहीं हुआ जाता। उनके पाँव टकराने लगते हैं। ऐसे बच्चों के लिए अच्छी तरह भागना तथा चलना मुश्किल होता है।

प्रश्न 7.
रीढ़ की हड्डी संबंधी विकृतियाँ बताएँ।
उत्तर:

  1. पीछे की तरफ कूब होना या काइफोसिस,
  2. आगे की तरफ कूब होना या लॉर्डोसिस,
  3. स्कोलिओसिस।

प्रश्न 8.
अनुचित आसन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शरीर की स्थिति ठीक अवस्था में न होना अनुचित आसन कहलाता है; जैसे चलते, बैठते, पढ़ते, लिखते व खड़े होते समय शरीर का उचित अवस्था या स्थिति में न रहना अनुचित आसन कहलाता है।

प्रश्न 9.
चपटे पैरों की विकृति को सुधारने हेतु लाभदायक व्यायाम बताएँ।
उत्तर:

  1. नियमित रूप से रस्सी कूदना,
  2. सीधा खड़े होकर एड़ियों को ऊपर-नीचे करना,
  3. पंजों पर कूदना।

प्रश्न 10.
घुटनों के टकराने की विकृति को सुधारने हेतु लाभदायक व्यायाम बताएँ।।
उत्तर:

  1. नियमित रूप से आसन करना, मुख्य रूप से पद्मासन व गोमुखासन अधिक लाभदायक हैं,
  2. घुड़सवारी करना,
  3. कुछ समय के लिए बिल्कुल सीधा खड़े होना।

प्रश्न 11.
अनुचित आसन के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  1. पौष्टिक व संतुलित आहार का अभाव,
  2. आसन संबंधी बुरी आदतें।

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प्रश्न 12.
पढ़ते समय कैसा आसन रखना चाहिए?
उत्तर:
पढ़ते समय व्यक्ति का आसन इस प्रकार का होना चाहिए, जिससे उसके शरीर तथा आँखों पर कम-से-कम दबाव पड़े। पढ़ते समय किताब से आँखों की दूरी उचित होनी चाहिए। किताब इस प्रकार पकड़नी चाहिए जिससे उस पर रोशनी ठीक पड़ सके।आँखों के बिल्कुल समीप तथा बहुत दूर रखी हुई किताब कभी नहीं पढ़नी चाहिए।

प्रश्न 13.
बैठते समय कौन-कौन-सी कमियाँ शरीर के ढाँचे को खराब करती हैं?
उत्तर:

  1. ढीले शरीर से बैठना,
  2. कुर्सी पर बैठते समय बच्चे के पैर फर्श पर न लगना,
  3. कुर्सी बहुत नीचे होना,
  4. एक ओर साइड लेकर बैठना,
  5. बैठते समय टाँगों की सही चौंकड़ी न मारना।

प्रश्न 14.
क्या ठीक चाल शरीर को आकर्षक बनाती है?
उत्तर:
हाँ, ठीक चाल शरीर को आकर्षक बनाती है। चलना एक कला है। चलते समय पंजे और एड़ी पर बराबर भार पड़ना चाहिए। अच्छी चाल शरीर को प्रभावशाली और आकर्षक बनाती है।

प्रश्न 15.
झुकी हुई टाँगों की विकृति के कोई तीन कारण बताएँ।
उत्तर:

  1. भोजन में कैल्शियम तथा फॉस्फोरस की कमी के परिणामस्वरूप हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं,
  2. रिकेट्स रोग,
  3. चलने तथा दौड़ने का अनुचित तरीका।

प्रश्न 16.
हमें किस प्रकार खड़े होना चाहिए? खड़े होने का उचित आसन क्या है?
उत्तर:
ठीक ढंग से खड़े होने की आदत डालने के लिए हमेशा दोनों पैरों पर बराबर भार डालकर खड़े होना चाहिए। खड़े होते समय पेट सीधा, छाती फैली हुई और धड़ सीधी होनी चाहिए।

प्रश्न 17.
गोल कंधों को ठीक करने के कोई दो सुधारात्मक व्यायाम बताएँ।
उत्तर:

  1. नियमित रूप से हॉरिजौटल बार पर कुछ देर तक लटके रहना,
  2. चक्रासन एवं धनुरासन करना।

प्रश्न 18.
आसन संबंधी सामान्य विकृतियाँ बताएँ।
उत्तर:

  1. चपटे पैर (Flat Foot),
  2. घुटनों का आपस में टकराना (Knock Knee),
  3. टाँगों का बाहरी ओर मुड़ा होना (Bow Legs),
  4. लॉर्डोसिस (Lordosis),
  5. काइफोसिस (Kyphosis),
  6. स्कोलिओसिस (Scoliosis)।

प्रश्न 19.
शरीर के आसन खराब होने के सामान्य कारण कौन-कौन-से हो सकते हैं?
उत्तर:

  1. संतुलित भोजन की कमी,
  2. व्यायाम न करना,
  3. पढ़ते समय बैठने के लिए सही कुर्सी एवं मेज का न होना,
  4. छोटे बच्चों द्वारा भारी बस्ता उठाना।

प्रश्न 20.
गोल कंधे होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:

  1. आनुवांशिकता संबंधी दोष,
  2. उचित आसन धारण न करना अर्थात् झुकी हुई अवस्था में बैठना, खड़े होना आदि,
  3. व्यायाम न करना,
  4. अनुचित फर्नीचर का प्रयोग करना।

HBSE 11th Class Physical Education आसन Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

भाग-I : एक वाक्य में उत्तर देंप्रश्न

1. आसन क्या है?
उत्तर:
शरीर द्वारा कोई टिकाऊ स्थिति ग्रहण करने को आसन कहते हैं।

प्रश्न 2.
उचित आसन देखने में कैसा लगता है?
उत्तर;
उचित आसन देखने में आकर्षक और प्रभावशाली लगता है।

प्रश्न 3.
उचित आसन व्यक्ति को कैसे रखता है?
उत्तर:
उचित आसन व्यक्ति को चुस्त, तेज और बीमारियों से बचाकर रखता है।

प्रश्न 4.
“एक संतुलित आसन वह है जिसमें शरीर संतुलित हो, जिससे कम-से-कम थकावट उत्पन्न हो।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
एवेरी का।

प्रश्न 5.
पीछे की तरफ कूब वाली कुरूपता में रीढ़ की हड्डी किस प्रकार का रूप धारण कर लेती है?
उत्तर:
पीछे की तरफ कूब वाली कुरूपता में रीढ़ की हड्डी कमान के आकार का रूप धारण कर लेती है।

प्रश्न 6.
आगे की ओर कूब वाली कुरूपता शरीर के किस अंग से संबंधित है?
उत्तर:
आगे की ओर कूब वाली कुरूपता रीढ़ की हड्डी से संबंधित है।

प्रश्न 7.
वह कौन-सी कुरूपता है जिसमें छाती अगली तरफ तथा गर्दन पिछली तरफ झुक जाती है?
उत्तर:
आगे की ओर कूब का निकलना या लॉर्डोसिस।

प्रश्न 8.
छाती को अगली तरफ सीधा करके चलना-फिरना किस कुरूपता के लिए लाभदायक है?
उत्तर;
छाती को अगली तरफ सीधा करके चलना-फिरना पीछे की तरफ निकले कूब के लिए लाभदायक है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 5 आसन

प्रश्न 9.
चपटे पैरों की विकृति या कुरूपता का कोई एक लक्षण बताएँ।
उत्तर:
पैरों में भौरियाँ निकलना।

प्रश्न 10.
पैरों की माँसपेशियाँ कमजोर होने के कारण पैरों के जोड़ कैसे हो जाते हैं?
उत्तर:
पैरों की माँसपेशियाँ कमजोर होने के कारण पैरों के जोड़ सीधे हो जाते हैं।

प्रश्न 11.
आसन संबंधी कुरूपताओं का कोई एक कारण बताएँ। अथवा भद्दी मुद्रा का कोई एक कारण लिखें।
उत्तर:
हड्डियाँ व माँसपेशियाँ कमजोर होना।

प्रश्न 12.
बच्चे के बैठने के लिए कुर्सी किस प्रकार की होनी चाहिए?
उत्तर:
बच्चे के बैठने के लिए कुर्सी बच्चे के कद के अनुसार होनी चाहिए।

प्रश्न 13.
बैठते समय किस प्रकार नहीं बैठना चाहिए?
उत्तर:
बैठते समय शरीर ढीला छोड़कर दाईं और बाईं ओर भार डालकर नहीं बैठना चाहिए।

प्रश्न 14.
हमें कुर्सी पर किस प्रकार बैठना चाहिए?
उत्तर:
हमें कुर्सी पर आगे की ओर झुककर नहीं, बल्कि रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठना चाहिए।

प्रश्न 15.
लेटकर पढ़ना हानिकारक क्यों है?
उत्तर:
लेटकर पढ़ने से आँखों की रोशनी पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 16.
शारीरिक आसन को ठीक रखने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
शारीरिक आसन को ठीक रखने के लिए प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए।

प्रश्न 17.
अच्छे आसन का कोई एक सामान्य नियम बताएँ।
उत्तर:
शरीर के विभिन्न अंगों के प्रभावशाली कार्य अर्थात् क्रियाओं का प्रभावशाली होना।

प्रश्न 18.
किसकी कमी के कारण बच्चों की हड्डियाँ टेढ़ी हो जाती हैं?
उत्तर:
संतुलित व पौष्टिक भोजन की कमी के कारण बच्चों की हड्डियाँ टेढ़ी हो जाती हैं।

प्रश्न 19.
धनुषाकार टाँगों के विपरीत कौन-सी आसन संबंधी विकृति होती है?
उत्तर:
घुटनों का आपस में टकराना (Knock Knee)।

प्रश्न 20.
अच्छे आसन वाला व्यक्ति अपने काम कैसे कर सकता है?
उत्तर:
अच्छे आसन वाला व्यक्ति अपने काम चुस्ती और फूर्ति के साथ कर सकता है।

प्रश्न 21.
ठीक आसन का ज्ञान देने के लिए स्कूलों में कौन-सी चीज का प्रबंध करना चाहिए?
उत्तर:
ठीक आसन का ज्ञान देने के लिए स्कूलों में ठीक आसन के चित्र लगाने चाहिएँ।

प्रश्न 22.
आगे की ओर कूब में सुधार हेतु कोई दो लाभदायक आसन बताएँ।
उत्तर:
हलासन, पद्मासन।

प्रश्न 23.
विटामिन ‘डी’ की कमी से कौन-सी विकृति हो सकती है?
उत्तर:
विटामिन ‘डी’ की कमी से रीढ़ की हड्डी मुड़ सकती है।

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प्रश्न 24.
आगे या पीछे की ओर कूबड़ काली विकृति किस अंग से संबंधित है?
उत्तर:
आगे या पीछे की ओर कूबड़ वाली विकृति रीढ़ की हड्डी से संबंधित है।

प्रश्न 25.
साइकिल चलाना, तैराकी और घुड़सवारी किस प्रकार की विकृति को ठीक करने में लाभदायक हैं?
उत्तर:
साइकिल चलाना, तैराकी और घुड़सवारी घुटने के आपस में टकराने की विकृति को ठीक करने में लाभदायक हैं।

प्रश्न 26.
अधोमुख अवस्था कौन-सी होती है?
उत्तर:
यह शरीर की ऐसी अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति की छाती नीचे और पीठ ऊपर की ओर होती है।

भाग-II : सही विकल्प का चयन करें

1. आसन का अर्थ है
(A) लेटना
(B) सोना
(C) व्यक्ति के शरीर की स्थिति
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) व्यक्ति के शरीर की स्थिति

2. मनुष्य के अच्छे आसन का पता चलता है
(A) खड़े होने से
(B) चलने से
(C) बैठने से
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

3. निम्नलिखित में से मुद्रा या आसन संबंधी सामान्य समस्या है
(A) स्कोलिओंसिस (Scoliosis)
(B) लॉर्डोसिस (Lordosis)
(C) काइफोसिस (Kyphosis)
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

4. अनुचित आसन के कारण हैं
(A) शारीरिक बीमारियाँ
(B) संतुलित व पौष्टिक आहार की कमी
(C) गलत आदतें
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. शरीर को सीधा खड़ा रखने में आधार प्रदान करने वाली माँसपेशियाँ होती हैं
(A) हाथों की माँसपेशियाँ
(B) पैरों की माँसपेशियाँ
(C) छाती की माँसपेशियाँ
(D) कूल्हे की माँसपेशियाँ
उत्तर:
(B) पाँवों की माँसपेशियाँ

6. अच्छे आसन के सामान्य नियम हैं
(A) प्रभावशाली क्रियाओं का होना
(B) शरीर के विभिन्न अंगों के प्रभावशाली कार्य
(C) माँसपेशी व अस्थिपिंजर संस्थानों पर असाधारण
(D) उपर्युक्त सभी दबाव का न होना
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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7. “खड़े रहने का अच्छा आसन तभी कहा जा सकता है यदि खड़े रहते समय कम-से-कम शक्ति खर्च की जाए।” यह कथन है
(A) करूगर का
(B) डॉ० थॉमस वुड का
(C) रॉस का
(D) जे० बी० नैश का
उत्तर:
(A) करूगर का

8. शरीर का संपूर्ण भार किन पर पड़ता है?
(A) माँसपेशियों पर
(B) हड्डियों पर
(C) हाथों पर
(D) नाड़ियों पर
उत्तर:
(B) हड्डियों पर

9. पढ़ते समय आँखों से किताब की दूरी कम-से-कम होनी चाहिए
(A) 30 सें०मी०
(B) 25 सें०मी०
(C) 15 सें०मी०
(D) 20 सें०मी०
उत्तर:
(A) 30 सें.मी०

10. मनुष्य के व्यक्तित्व का दर्पण कहा जाने वाला आसन है
(A) खड़े रहने का आसन
(B) बैठने का आसन
(C) पढ़ते समय का आसन
(D) चलते समय का आसन
उत्तर:
(D) चलते समय का आसन

11. चलते समय पैर होने चाहिएँ
(A) असमानांतर
(B) 60° कोण पर
(C) समानांतर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) समानांतर

12. लेटते समय पैर रखने चाहिएँ
(A) असमानांतर
(B) मुड़े हुए
(C) जुड़े हुए
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) जुड़े हुए

13. अच्छे आसन का लाभ है
(A) हड्डियों और माँसपेशियों में तालमेल
(B) आत्म-विश्वास में वृद्धि
(C) शारीरिक योग्यता एवं क्षमता में वृद्धि
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

14. अनुचित आसन के संबंध में असत्य है
(A) व्यक्तित्व में कमी
(B) कंधे ढल जाना
(C) शरीर का सीधा तथा एकरूपता में होना
(D) आत्म-विश्वास की कमी
उत्तर:
(C) शरीर का सीधा तथा एकरूपता में होना

15. ठीक आसन व्यक्ति को कैसे रखता है?
(A) चुस्त
(B) तेज
(C) नीरोग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

16. चपटे पैरों की कुरूपता का लक्षण नहीं है
(A) पैरों का सुन्न रहना
(B) पैरों में भौरियों का निकलना
(C) शरीर में स्फूर्ति बढ़ना
(D) पैरों में अधिक पसीने का आना
उत्तर:
(C) शरीर में स्फूर्ति बढ़ना

17. उचित आसन हमारे लिए किस कारण महत्त्वपूर्ण है?
(A) इससे शरीर में स्फूर्ति एवं उमंग बढ़ती है
(B) शारीरिक संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हैं
(C) शारीरिक अंगों का उचित विकास होता है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

18. आगे की तरफ कूब को ठीक करने का उपाय है
(A) पीठ के बल लेटने वाला व्यायाम करना
(B) हलासन एवं पद्मासन करना
(C) खड़े होकर धड़ को अगली तरफ झुकाना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

19. टाँगें झुकी हुई या धनुषाकार किस बीमारी के कारण होती हैं?
(A) कैंसर
(B) रिकेट्स
(C) टी०बी०
(D) मलेरिया
उत्तर:
(B) रिकेट्स

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20. घुटनों के आपस में टकराने से संबंधित शारीरिक क्रिया है
(A) साइकिल चलाना
(B) घुड़सवारी करना
(C) पद्मासन करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

21. आसन संबंधी कुरूपताओं का कारण है
(A) शरीर का अधिक भारी होना
(B) कमजोर हड्डियाँ तथा माँसपेशियाँ
(C) गलत आसन तथा बुरी आदतें
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

22. रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है
(A) ठीक प्रकार से न बैठने पर
(B) गलत ढंग से चलने से
(C) ठीक प्रकार से न खड़े होने पर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

23. पीछे की तरफ कूब वाली कुरूपता का मुख्य कारण है
(A) आगे की ओर झुककर पढ़ना
(B) व्यायाम की कमी
(C) संतुलित आहार की कमी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. पीछे की तरफ कूब वाली कुरूपता के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा व्यायाम/आसन काफी लाभदायक है?
(A) भुजंगासन
(B) शलभासन
(C) सर्वांगासन व चक्रासन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

भाग-III : निम्नलिखित कथनों के उत्तर सही या गलत अथवा हाँ या नहीं में दें

1. उचित/संतुलित आसन से शारीरिक थकान बढ़ती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं,

2. उचित आसन से शारीरिक पुष्टि कम होती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं,

3. उचित आसन हेतु नियमित रूप से व्यायाम करने चाहिएँ। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

4. उचित आसन से शरीर में स्फूर्ति एवं उमंग बढ़ती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

5. आसन (मुद्रा) से अभिप्राय मन की स्थिति से है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत

6. संतुलित आसन से विभिन्न प्रकार के कौशलों की संपूर्णता में सुधार होता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

7. हमें कभी भी सिर को झुकाकर नहीं पढ़ना चाहिए। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

8. चलने का आसन व्यक्ति के व्यक्तित्व का दर्पण होता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

9. तैरने से रीढ़ की हड्डी के टेढ़ेपन में लाभ होता है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

10. रीढ़ की हड्डी का शरीर के दाईं या बाईं ओर झुकना या मुड़ना स्कोलिओसिस कहलाता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

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11. चपटे पैरों की विकृति को ठीक करने के लिए साइक्लिंग और घुड़दौड़ काफी लाभदायक हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

12. आसन में विकृतियों के आने का मुख्य कारण व्यायाम करना है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत

13. अधिक देर तक बैठे रहने से धड़ की माँसपेशियाँ मजबूत होती हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत

14. जल्दी सोना अच्छी आदत है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

भाग-IV : रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. व्यक्ति का शारीरिक आभास (Appearance) उसके ……………. पर निर्भर करता है।
उत्तर:
आसन,

2. घुटनों के आपस में टकराने को सुधारने के लिए नियमित रूप से पद्मासन और ………………. करना चाहिए।
उत्तर:
गोमुखासन,

3. गोल कंधों की विकृति को सुधारने के लिए …………….. बार पर कुछ देर तक लटकना चाहिए।
उत्तर:
हॉरिजौंटल

4. उचित आसन वाला व्यक्ति किसी कार्य को करने में …………….. ऊर्जा व्यय करता है।
उत्तर:
कम,

5. आसन से अभिप्राय …………….. की स्थिति से है।
उत्तर:
शरीर,

6. आसन संबंधी विकृतियों में सुधार हेतु नियमित रूप से ………… करने चाहिएँ।
उत्तर:
व्यायाम,

7. अनुचित आसन धारण करने से …………… शारीरिक विकारों को बढ़ावा मिलता है।
उत्तर:
अनुचित,

8. उचित आसन से शारीरिक पुष्टि …………….. है।
उत्तर:
बढ़ती,

9. उचित आसन से शरीर के ………….. दूर होते हैं।
उत्तर:
विकार,

10. ……………. आसन आत्म-विश्वास एवं आत्म-सम्मान को बढ़ावा देता है।
उत्तर:
उचित,

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11. …………….. मुद्रा व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में बाधक होती है।
उत्तर:
भद्दी,

12. शरार का स्थात ठाक अवस्था में न होना …………….. आसन कहलाता है।
उत्तर:
अनुचित।

आसन Summary

आसन परिचय

मुद्रा या आसन (Posture) का मानवीय-जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। आसन से अभिप्राय शरीर की स्थिति से है अर्थात् मनुष्य किस प्रकार अपने शरीर की संभाल या देखरेख करता है। आसन की अवहेलना करना मानो कई प्रकार के शारीरिक दोषों या विकारों को निमंत्रित करना है। इसलिए बचपन से ही बच्चों के आसन की ओर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को शारीरिक विकारों से बचाया जा सके। एक अच्छा आसन ही मनुष्य को एक अच्छी शारीरिक संरचना या बनावट प्रदान कर सकता है और विभिन्न स्थितियों में संतुलित रख सकता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के जीवन या व्यक्तित्व में उचित आसन का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। जीवन के प्रत्येक पहलू या पक्ष में इसकी अहम् भूमिका होती है।

उचित आसन से अभिप्राय व्यक्ति के शरीर का ठीक अथवा उचित संतुलन में होना है। वास्तव में, व्यक्ति के अच्छे आसन का उसके खड़े होने, चलने तथा बैठने से पता लगता है। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर का संतुलन विभिन्न क्रियाओं; जैसे उठना, बैठना, खड़े होना, लिखना, पढ़ना, लेटना आदि को करते समय उचित या अच्छा होना चाहिए। उचित आसन से न केवल व्यक्ति का शारीरिक ढाँचा व स्वास्थ्य ठीक रहता है, बल्कि उसमें आत्म-विश्वास की भावना भी विकसित होती है। उसका व्यक्तित्व भी आकर्षित होता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के लिए उचित आसन बहुत आवश्यक है। उचित आसन हमारे लिए निम्नलिखित प्रकार से महत्त्वपूर्ण है

  • इससे शरीर में स्फूर्ति एवं उमंग बढ़ती है।
  • इससे शरीर के सभी अंगों का उचित विकास होता है, क्योंकि इससे शारीरिक विकार दूर होते हैं।
  • इससे शरीर को विभिन्न प्रकार की बीमारियों से बचाया जा सकता है।
  • इससे मन की तत्परता का पता चलता है अर्थात् यह मानसिक या बौद्धिक विकास में सहायक होता है।
  • इससे शरीर के सभी संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हैं।
  • यह व्यक्ति के सम्मान और नौकरी प्राप्त करने में भी सहायक होता है।
  • अच्छी मुद्रा या आसन से माँसपेशी, श्वसन, पाचन एवं नाड़ी आदि शारीरिक संस्थानों की क्षमता में सुधार होता है और आपसी तालमेल भी बढ़ता है।
  • अच्छे आसन से विभिन्न प्रकार के कौशलों की संपूर्णता में सुधार होता है।
  • अच्छे आसन से व्यक्तित्व सुंदर एवं आकर्षित दिखता है।
  • अच्छे आसन से शारीरिक एवं मानसिक योग्यताओं में सुधार होता है और मन की तत्परता व शारीरिक क्षमता में वृद्धि होती है।
  • अच्छे आसन से समाजीकरण की योग्यता का पता चलता है। यह व्यक्ति के समाज में उच्च-स्तर का द्योतक है।

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HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यावसायिक स्वास्थ्य

Haryana State Board HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यावसायिक स्वास्थ्य Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यावसायिक स्वास्थ्य

HBSE 11th Class Physical Education व्यावसायिक स्वास्थ्य Textbook Questions and Answers

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न ( (Long Answer Type Questions) |

प्रश्न 1.
व्यावसायिक स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं? व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं या संकटों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक स्वास्थ्य का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Occupational Health):
व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है। अपनी आजीविका चलाने के लिए उसे कोई-न-कोई व्यवसाय या कार्य अवश्य करना पड़ता है। कार्य करने के लिए व्यक्ति के लिए बहुत से व्यवसाय हैं; जैसे लघु उद्योग, बड़े उद्योग, कृषि व्यवसाय, पशुपालन व्यवसाय व अन्य व्यवसाय आदि। प्रत्येक प्रकार के व्यवसायों की परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं जिनका व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। कुछ व्यवसाय ऐसे भी होते हैं जिनमें रसायनों का प्रयोग किया जाता है। ऐसे व्यवसाय या इनकी परिस्थितियाँ किसी-न-किसी रूप में व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं।

यदि इन व्यवसायों की परिस्थितियों में सुधार तथा कार्य करने वाले लोगों को जागरूक किया जाए तो व्यावसायिक संकटों या बीमारियों से बचा जा सकता है। इस प्रक्रिया में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान व्यावसायिक स्वास्थ्य का होता है, क्योंकि यह एक ऐसी योजना है जो व्यक्ति को कार्य करने के स्थान पर होने वाली स्वास्थ्य संबंधी हानियों और हादसों से बचाव में सहायक होती है। इसका मुख्य उद्देश्य सुरक्षित वातावरण उत्पन्न करना है जिसमें कार्य करने वाले व्यक्तियों का स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है।

संक्षेप में, व्यावसायिक स्वास्थ्य व्यवसायों से संबंधित समस्याओं या संकटों की रोकथाम और प्रबंधन पर जोर देता है और कार्य करने वाले लोगों को अपने जीवन की सुरक्षा हेतु प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है। अतः व्यावसायिक स्वास्थ्य को इस प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है-“व्यावसायिक स्वास्थ्य पदोन्नति और स्वास्थ्य से प्रस्थान को रोकने, लोगों को अपनी नौकरी व काम का अनुकूलन करने और जोखिम को नियंत्रित करने से सभी व्यवसायों के श्रमिकों की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक भलाई का सबसे उत्तम रख-रखाव है।”

व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ (Problems Related to Occupational Health):
व्यावसायिक स्वास्थ्य का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। इसे केवल हम औद्योगिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का क्षेत्र ही नहीं मान सकते। इसमें बड़े-बड़े उद्योगों के अतिरिक्त लघु उद्योग, कृषि और छोटे-छोटे व्यवसाय संबंधी समस्याओं के क्षेत्र भी सम्मिलित हैं। आज के प्रगतिशील युग में विभिन्न प्रकार के व्यवसाय सामने आ रहे हैं जिनकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इन्हीं के साथ-साथ व्यावसायिक स्वास्थ्य जगत का महत्त्व भी बढ़ता जा रहा है। व्यावसायिक स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं

1. वातावरण संबंधी समस्याएँ (Problems Related to Environment):
ये वे समस्याएँ होती हैं जो वातावरण में त्रुटियों के कारण उत्पन्न होती हैं। इनका मुख्य कारण गलत योजनाएँ तथा भवन निर्माण होता है। इनमें समुचित प्रकाश का प्रबंध न होना, तापमान की वृद्धि अथवा कमी, तीव्र आवाज की गूंज, भवन निर्माण संबंधी समस्याओं से उत्पन्न होने वाली समस्याएँ आती हैं।

2. रासायनिक प्रदूषण (Chemical Pollution):
कुछ व्यावसायिक समस्याएँ रासायनिक प्रदूषण के कारण उत्पन्न होती हैं; जैसे विषैली गैसों की उत्पत्ति, विषैले रासायनिक पदार्थों का वायु में मिलना जिनमें सीसा, कोयला, पारा, लोहा आदि सम्मिलित हैं।

3. व्यावसायिक समस्याएँ (Occupational Problems):
कुछ ऐसी समस्याएँ व्यावसायिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में आती हैं जिनका संबंध चिकित्सा क्षेत्र से होता है। यदि चिकित्सा संबंधी सभी प्रकार के उपाय किए जाएँ तो श्रमिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा हो सकती है। चिकित्सा के साथ-साथ बीमारी, दुर्घटनाओं के शिकार व व्यक्तियों के पुनर्वास की समस्या भी जुड़ी हुई है।

4. कर्मचारियों की प्रशिक्षण संबंधी समस्याएँ (Problems Related to Training of Workers):
उन कर्मचारियों को, जिन्हें औजार तथा यंत्रों का अच्छी तरह से प्रशिक्षण न मिला हो, नौकरी पर लगाना भी दुर्घटना का कारण बनता है। कुछ व्यवसायों में विशेष प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। इसलिए व्यवसायों में कार्यरत कर्मचारियों को विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण तथा उच्च-स्तरीय तकनीक प्रदान करके व्यावसायिक संकट कम किए जा सकते हैं।

5. अनपढ़ता (Illiteracy):
श्रमिकों का अनपढ़ होना भी एक मुख्य समस्या है। शिक्षा का प्रसार जहाँ श्रमिकों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देने में सहायता करेगा, वहीं उनकी रोकथाम के उपाय तथा स्वच्छ रहन-सहन की विधि भी बताएगा। शिक्षा से श्रमिकों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारणों तथा उपायों का भी ज्ञान होगा। इसके अतिरिक्त विभिन्न कारखानों में काम करने से पड़ने वाले दुष्प्रभाव तथा उपाय की जानकारी भी प्राप्त हो सकेगी। इससे स्पष्ट हो जाता है कि व्यावसायिक क्षेत्र की समस्याएँ काफी जटिल हैं और इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। पूर्ण रूप से सतर्क रहकर ही श्रमिकों तथा उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा की जा सकती है। इसलिए हमें मिलकर सुरक्षित एवं स्वास्थ्यकारी कार्यस्थल सुनिश्चित करना चाहिए।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यावसायिक स्वास्थ्य

प्रश्न 2.
आधुनिक समाज में व्यावसायिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। अथवा व्यवसायों में कार्यरत व्यक्तियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों या कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
व्यवसायों में कार्यरत व्यक्तियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारणों को हम निम्नलिखित वर्गों में विभाजित कर सकते हैं
1. पर्यावरण संबंधी कारण (Environmental Causes):
विभिन्न उद्योग-धंधों अथवा व्यवसायों में काम करने वाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर उनके धंधों तथा आस-पास के पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। यदि पर्यावरण दूषित है तो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। यह समय की पुकार है कि ऐसे स्थानों को स्वच्छ रखा जाए और उन्हें स्वास्थ्य संबधी नियमों के अनुकूल बनाया जाए ताकि श्रमिक व कर्मचारी अनुकूल व स्वच्छ वातावरण में काम करते हुए अधिक उत्पादन की पूर्ति का प्रयास करें। स्वच्छता की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए फैक्टरी अधिनियम, 1948 बनाया गया जिसके अंतर्गत दिए गए नियमों का पालन करना अनिवार्य है। पर्यावरण दूषित होने से अनेक प्रकार के रोग पनपते हैं, जिनकी ओर सरकारी तथा क्षेत्रीय स्वास्थ्य सेवा संस्थाएँ समय-समय पर प्रबंधकों तथा श्रमिकों का ध्यान आकृष्ट करती रहती हैं।

2. यंत्र संबंधी कारण (Implement Causes):
कुछ व्यवसाय ऐसे होते हैं जहाँ पर श्रमिकों को मशीनों पर काम करना पड़ता है। उन्हें चलाते हुए कुछ सावधानियाँ बरतनी पड़ती हैं। इनके कारण ही अनेक घटनाओं से बचा जा सकता है। उदाहरणतया लकड़ी चीरने वाले कारखाने में आरे के सामने लोहे की जाली होती है। इसलिए मशीनों पर काम करने वाले श्रमिकों के शारीरिक, मानसिक व सामाजिक स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि किसी छोटे-से-छोटे विकार के कारण वे बड़ी दुर्घटना के शिकार हो सकते हैं। मशीनी समस्याओं के कारण कारखानों में आए दिन दुर्घटनाएँ होती हैं, इनसे बचने हेतु सभी प्रशासनिक उपाय किए जाने चाहिएँ।

3. विद्युत संबंधी कारण (Electrical Causes):
कई बार विद्युत के बारे में ज्ञान न होने के कारण तथा उचित ध्यान न दिए जाने के कारण दुर्घटनाएं हो जाती हैं, जिनमें शॉर्ट सर्किट के कारण आग लगना, नंगे तार आदि के छू जाने से झटका (शॉक) लगकर मृत्यु तक हो जाना जैसी घटनाएँ आए दिन होती रहती हैं। इन्हें रोकने के लिए हर प्रकार के प्रशासनिक व दूसरे उपाय किए जाने चाहिएँ। काम करने वालों को भी सुरक्षा संबंधी उपायों का पहले ज्ञान होना चाहिए।

4. रासायनिक संबंधी कारण (Chemical Causes):
कुछ ऐसे व्यवसायं भी हैं जहाँ रासायनिक प्रदूषण अधिक मात्रा में होता है अर्थात् मशीनों से रासायनिक कण उड़कर आस-पास हवा में प्रवेश कर उसमें मिल जाते हैं और ये कण काम करने वाले श्रमिकों के शरीर में तीन प्रकार से प्रवेश करते हैं

  1. श्वास के माध्यम से फेफड़ों तक,
  2. मुख के माध्यम से पेट तक,
  3. त्वचा के माध्यम से शरीर के अंदर रक्त तक।

इस प्रकार के प्रदूषण से निमोनिया, दमा और पेट की कुछ बीमारियाँ हो सकती हैं। इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक उपाय किए जाने चाहिएँ।

5. भौतिक कारण (Physical Causes):
इसके अंतर्गत तापमान की कमी या वृद्धि, पूर्ण रूप से प्रकाश का अभाव या अधिक प्रकाश, विषैली गैस अथवा किरणों का प्रभाव आता है। इसका कारखाने में काम करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ता है। अत: इसके बचाव के सभी उपाय किए जाने चाहिएँ अर्थात् काम करने वाले स्थान पर अच्छा प्रकाश, उचित तापमान, विषैली गैस या किरणों से बचने के उपाय तथा अन्य सभी उचित बचाव के साधन होने चाहिएँ।

6. सामाजिक कारण (Social Causes):
कुछ व्यवसाय इस प्रकार के हैं जिनसे काम करने वालों के सामाजिक जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। कुछ व्यावसायिक स्थान इस प्रकार के होते हैं जहाँ काम करने वालों का जीवन नीरस होता है और उन्हें आपसी मेल-जोल का कोई अवसर तक प्राप्त नहीं हो पाता। कार्य-क्षेत्र को आकर्षक बनाने और श्रमिकों की सामाजिक प्रगति के लिए विकासशील होना चाहिए।

7. मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Causes):
कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनमें भाग लेने वाले मनोवैज्ञानिक समस्या का शिकार हो सकते हैं। इस प्रकार के व्यवसाय जिनमें मानसिक दबाव अधिक हो अथवा काम करने से व्यक्ति हीन भावना का शिकार हो, विनाशकारी हो सकते हैं तथा उसका उपाय करना अत्यंत आवश्यक है।

8. औद्योगिक थकावट (Industrial Fatigue):
औद्योगिक थकावट भी कई व्यावसायिक रोगों को जन्म देती है। इस प्रकार की थकावट के मुख्य कारण हैं तापमान का अधिक होना, नमी, प्रकाश का अभाव, स्वच्छ वायु का अभाव, अनुचित समय, कार्य की तीव्रता, पदोन्नति के अवसरों का अभाव तथा कार्यकाल की अनिश्चितता आदि। इस प्रकार की समस्याओं को दूर करने के सभी उपाय करने चाहिएँ।

प्रश्न 3.
व्यावसायिक स्वास्थ्य को परिभाषित कीजिए। इसकी आवश्यकता एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक स्वास्थ्य की परिभाषा (Definition of Occupational Health):
व्यावसायिक स्वास्थ्य व्यवसायों से संबंधित समस्याओं या संकटों की रोकथाम और प्रबंधन पर जोर देता है और कार्य करने वाले लोगों को अपने जीवन की सुरक्षा हेतु प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-W.H.O.) के अनुसार “व्यावसायिक स्वास्थ्य कार्यस्थल में स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के सभी पहलुओं तथा संकटों(खतरों) की प्राथमिक रोकथाम पर एक मजबूत ध्यान केंद्रित करने की प्रक्रिया है।”

व्यावसायिक स्वास्थ्य की आवश्यकता (Need of Occupational Health):
विश्व के लगभग सभी व्यक्ति किसी-न-किसी व्यवसाय से संबंधित हैं। कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनमें काम करने वाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए यदि उपाय न किए जाएँ तो इससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ सकता है। इस प्रकार के व्यवसायों में उचित प्रबंध करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है। उदाहरणत: ऐसे कारखाने जहाँ पर बफिंग, वैल्डिंग, स्प्रेयिंग और कैमिकल्ज आदि का काम होता है, वहाँ श्रमिकों का जीवन खतरे से खाली नहीं होता। ऐसे व्यवसाय में काम करने से अनेक प्रकार के व्यावसायिक रोग लग सकते हैं। व्यावसायिक स्वास्थ्य सभी व्यवसायों में श्रमिकों की शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक भलाई की प्रक्रिया है जिसमें उनको व्यवसायों से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की जाती हैं।

यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो कार्य करने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा करने में सहायक होती है। यह स्वास्थ्य व्यवसाय से संबंधित विभिन्न समस्याओं की रोकथाम एवं प्रबंधन पर जोर देता है। स्वरोजगार हेतु व्यावसायिक शिक्षा बहुत आवश्यक है। बेरोजगारी की समस्या देश में प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए हमें व्यावसायिक शिक्षा की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। व्यावसायिक स्वास्थ्य एक ऐसी प्रक्रिया है जो कि हमें किसी व्यवसाय के बारे में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है। एक बार जब कोई विद्यार्थी किसी व्यवसाय का चयन कर लेता है तो उसे अपना लक्ष्य ज्ञात होता है

और अपने भविष्य के बारे में संतुष्टि होती है। बहुत-से ऐसे व्यवसाय हैं जिनमें काम करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यदि व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन किया जाए तो ऐसी परिस्थितियों में काम करके स्वास्थ्य की सुरक्षा की जा सकती है। अतः व्यावसायिक स्वास्थ्य हमें सुरक्षा एवं स्वास्थ्य के अनेक नियमों से अवगत करवाती है। व्यावसायिक स्वास्थ्य आज के समय की सबसे बड़ी माँग है। इस प्रकार आज के मशीनी युग में व्यावसायिक स्वास्थ्य की आवश्यकता बहुत अधिक बढ़ गई है।

व्यावसायिक स्वास्थ्य का महत्त्व (Importance of Occupational Health): आज के मशीनी एवं वैज्ञानिक युग में व्यावसायिक स्वास्थ्य की महत्ता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए व्यावसायिक स्वास्थ्य निम्नलिखित प्रकार से महत्त्वपूर्ण है
1. व्यावसायिक स्वास्थ्य किसी व्यक्ति या श्रमिक को कार्य करने के स्थान पर होने वाली स्वास्थ्य संबंधी हानियों एवं हादसों की जानकारी देकर उनसे बचने के उपाय बताता है।

2. बहुत-से ऐसे व्यवसाय हैं जिनमें काम करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यदि व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन किया जाए तो विपरीत परिस्थितियों में काम करके स्वास्थ्य की सुरक्षा की जा सकती है। अत: व्यावसायिक स्वास्थ्य हमें सुरक्षा एवं स्वास्थ्य के अनेक नियमों से अवगत करवाता है।

3. यह श्रमिकों की शारीरिक और मानसिक क्षमता के अनुकूल एक व्यावसायिक वातावरण बनाने में श्रमिकों व कर्मचारियों की सहायता करता है।

4. यह स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल कारकों के कारण उत्पन्न होने वाले जोखिमों को दूर करता है।

5. सरकार ने व्यवसाय संबंधी अनेक अधिनियम बनाए हैं। श्रमिकों व कर्मचारियों को इन अधिनियमों की जानकारी होनी चाहिए ताकि वे इन अधिनियमों के अनुसार कार्य करें। व्यावसायिक स्वास्थ्य के अंतर्गत श्रमिकों व कर्मचारियों को इन अधिनियमों की जानकारी दी जाती है।

6. व्यावसायिक स्वास्थ्य काम करने वाले लोगों को उनके स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की पूरी जानकारी देता है और उनके उपचार हेतु भी पूर्ण जानकारी देता है।

7. विभिन्न प्रकार के व्यवसायों में काम करने वाले श्रमिकों व कर्मचारियों को अनेक जोखिमों या कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि श्रमिक व कारीगर इस ओर ध्यान न दें तो कोई दुर्घटना घट सकती है। परन्तु व्यावसायिक स्वास्थ्य के अंतर्गत श्रमिकों व कर्मचारियों को अपनी सुरक्षा हेतु प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया जाता है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यावसायिक स्वास्थ्य

प्रश्न 4.
आधुनिक समाज में व्यावसायिक संकटों के लिए उत्तरदायी कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हमारा देश औद्योगिक क्षेत्र की तरफ तेजी से प्रगति कर रहा है। औद्योगिकरण के कारण आज उद्योगों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है, जिसके कारण व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उठना स्वाभाविक है। विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक संकटों के लिए विभिन्न कारक उत्तरदायी हैं। ये कारक निम्नलिखित हैं

1. भौतिक कारक (Physical Factors):
इसके अंतर्गत कम या अधिक तापमान, कम या अधिक प्रकाश, मशीनों की अधिक आवाज़ और हानिकारक किरणों तथा विषैली गैसों को सम्मिलित किया जाता है। जो व्यक्ति इन कारकों की उपस्थिति में किसी कारखाने या उद्योग में काम करता है, वह इनसे अवश्य प्रभावित होता है। अधिक तापमान काम करने वाले की कार्यक्षमता को कम कर देता है और थकावट जल्दी आती है। अतः काम करने वाले स्थान पर उचित प्रकाश, उचित तापमान, विषैली गैसों व किरणों से बचने के उपाय या बचाव के साधन होने चाहिएँ। ठंड में काम करने से फ्रॉस्ट बाइट (Frost Bite) नामक बीमारी हो जाती है और अत्यधिक शोर व्यावसायिक बहरेपन का कारण बनता है।

2. सामाजिक कारक (Social Factors):
कुछ व्यवसाय इस प्रकार के होते हैं जिनका प्रभाव काम करने वालों के सामाजिक जीवन पर पड़ता है। उनको आनंद-रहित व नीरस वातावरण मिलता है और उन्हें आपसी मेल-जोल का कोई अवसर प्राप्त नहीं हो पाता। ये कारक काम करने वालों के सामाजिक जीवन पर प्रभाव डालते हैं।

3. मनोवैज्ञानिक कारक (Psychological Factors):
मनोवैज्ञानिक कारकों की मनुष्य के जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यदि काम करने वाला श्रमिक किसी दबाव या तनाव में काम करता है तो वह मनोवैज्ञानिक रूप से उदास रहता है और कई मनोवैज्ञानिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इस तरह के कारक श्रमिक के सामने कई अन्य समस्याएँ भी उत्पन्न कर देते हैं जिनका समाधान करना एक जटिल कार्य है।

4. पर्यावरण संबंधी कारक (Environmental Factors):
विभिन्न प्रकार की फैक्टरियाँ तथा उद्योग पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। ये उद्योग-धंधे हमारे आस-पास के वातावरण को दूषित करते हैं जिसके कारण कर्मचारी तथा उनके परिवार के सदस्य कुछ असाध्य बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। कर्मचारी के स्वास्थ्य पर बाह्य तथा आंतरिक दोनों वातावरण प्रभाव डालते हैं। अगर पर्यावरण में संतुलन कायम नहीं होगा तो कर्मचारी अपने-आपको स्वस्थ रखने के योग्य नहीं होंगे। विभिन्न प्रकार की श्वास की समस्याएँ दूषित वायु में साँस लेने से होती हैं।

5. पारिस्थितिक कारक (Ecological Factors):
जहाँ तक दूषित वातावरण का संबंध है इसका प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण विकसित तकनीक तथा मनुष्य की ऐश्वर्यपूर्ण होने की अपनी लालसा ही है। इस प्रकार वर्तमान समय में सभी जीवों के जीने के सहायक तत्त्वों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। वास्तव में इस विकास ने पारिस्थितिक असंतुलन पैदा कर दिया है। यह असंतुलन मनुष्य के स्वास्थ्य पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

6. विद्युत-संबंधी कारक (Electrical Factors):
कई फैक्टरियाँ विद्युत से चलती हैं। कई बार इसका ज्ञान न होने के कारण शार्ट सर्किट द्वारा दुर्घटनाएं हो जाती हैं। इनसे श्रमिकों या कर्मियों को गहरी चोट लग जाती है और कई बार तो मृत्यु तक भी हो जाती है।

7. रासायनिक कारक (Chemical Factors):
बहुत-सी बीमारियों के उत्पन्न होने का कारण रासायनिक पदार्थ हैं। पर्यावरण प्रदूषण का मुख्य कारण अनेक जहरीली गैसें हैं; जैसे कार्बन-डाइऑक्साइड, कार्बन-मोनोक्साइड, लैड, क्लोरो-फ्लोरोकार्बन आदि जहरीली गैसें सिर-दर्द तथा श्वास की बीमारी उत्पन्न करती हैं तथा कभी-कभी तो मृत्यु तक भी हो जाती है। ये घटनाएँ अधिकतर खदानों में होती हैं। जहरीले रसायन श्रमिकों व कर्मचारियों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

8. तकनीकी कारक (Mechanical Factors):
लगभग सभी उद्योगों में उत्पादन के लिए बड़े-बड़े तकनीकी यंत्र लगे हुए हैं। अगर कर्मचारी इन यंत्रों को लापरवाही के साथ प्रयोग कर रहा हो तो दुर्घटना होना स्वाभाविक है। यहाँ तक कि मशीन चलाने की जानकारी न होने के कारण भी कर्मचारी को मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। विभिन्न तकनीकी संकट सुरक्षात्मक यंत्र न प्रयोग करने के कारण भी हो सकते हैं। हाथों की दुर्घटनाएँ खेतों में प्रयोग होने वाले यंत्र जैसे थ्रेशर आदि के कारण हो सकती हैं।

प्रश्न 5.
व्यवसायों में सुधार हेतु सरकारी व सामाजिक संस्थाओं तथा कारखानों की तरफ से किए जाने वाले उपायों का वर्णन कीजिए।
अथवा
व्यावसायिक जोखिमों या दुर्घटनाओं से बचने के लिए क्या-क्या उपाय किए जाने चाहिएँ?
उत्तर:
सरकारी व सामाजिक संस्थाओं की तरफ से किए जाने वाले उपाय (Remedies Adopted by Government and Social Institutions)-सरकारी एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा व्यावसायिक बीमारियों की रोकथाम के लिए किए जाने वाले उपाय निम्नलिखित हैं

1. लोगों को सुरक्षा के बारे में जानकारी देना (To Educate the People about Safety):
सरकारी व सामाजिक संस्थाओं का कर्त्तव्य बनता है कि वे विज्ञापनों, टेलीविजनों, फिल्मों, भाषणों और प्रदर्शनों द्वारा लोगों को दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए उपाय बताएँ और अपनी सुरक्षा हेतु प्रेरित करें।

2. चिकित्सा केंद्र खोलना (Opening of Medical Centres):
चिकित्सा केंद्र खोलना सरकारी व सामाजिक संस्थाओं का पहला कर्त्तव्य है। किसी समय भी आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टरी सहायता दी जा सकती है। इस काम में सामाजिक संस्थाएँ अधिक योगदान दे सकती हैं। ऐसी संस्थाएँ लोगों को नियमों का पालन करना तथा दुर्घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है, आदि बताकर लोगों और समाज की सेवा कर सकती हैं।

3. बुरी आदतों से छुटकारा पाने के उपाय (Measures of Eliminating the Bad Habits):
सरकार द्वारा नशीले पदार्थों, शराब और अन्य नशे वाली चीजें, जिनका सेवन करने से दुर्घटनाएं हो सकती हैं, को रोका जाए और इन परिस्थितियों में वाहन चलाने पर पाबंदी लगाई जाए।

कारखानों की तरफ से किए जाने वाले उपाय (Remedies adopted by Factories): कारखानों की तरफ से किए जाने वाले उपाय निम्नलिखित हैं
1. सुरक्षा के उपाय (Safety Measures):
प्रत्येक कारखाने में श्रमिकों के लिए बढ़िया और आधुनिक सुरक्षात्मक प्रबंध होने चाहिएँ ताकि दुर्घटनाओं से बचा जा सके। आग बुझाने के लिए गैस का प्रबंध, पानी का प्रबंध, प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स आदि का होना अत्यंत आवश्यक है।

2. डॉक्टरी निरीक्षण (Medical Checkup):
प्रत्येक श्रमिक व कर्मचारी का डॉक्टरी निरीक्षण अत्यंत आवश्यक है। इसके द्वारा श्रमिकों व कर्मियों की बीमारियों का पता लगाया जा सकता है। एक स्वस्थ श्रमिक ही मालिक और कारखाने के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है। बीमार श्रमिक दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं।

3. योग्य, प्रशिक्षित और अनुभवी कर्मचारी (Efficient, Trained and Experienced Workers):
कारखानों में सदैव योग्य, अच्छे प्रशिक्षित और अनुभवी कर्मचारियों को ही भर्ती किया जाना चाहिए। मशीनों का अच्छी तरह प्रयोग एक अच्छा प्रशिक्षित कर्मचारी ही कर सकता है। अनुभवहीन कर्मचारी दुर्घटना के शिकार हो सकते हैं।

4. मशीनों की समय-समय पर जाँच (Checking of Machines from Time to Time):
कारखानों में कई प्रकार की मशीनें लगी हुई होती हैं और कई बार ये मशीनें काफी पुरानी हो जाती हैं। इन मशीनों की समय-समय पर जाँच करके उनकी आवश्यकतानुसार मरम्मत करनी चाहिए। ऐसा करने से दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है।

प्रश्न 6.
व्यावसायिक स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न अधिनियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों, कर्मचारियों व प्रबंधकों की अपनी लापरवाही के कारण वे कई बार व्यावसायिक संबंधी खतरों के शिकार बन जाते हैं। इस वास्तविकता को ध्यान में रखकर विभिन्न स्तरों पर सरकार द्वारा कुछ अधिनियम बनाए गए हैं जिससे कर्मचारियों के स्वास्थ्य की अधिक-से-अधिक सुरक्षा की जा सके और विपत्ति पड़ने पर सहायता की जा सके। इनमें से कुछ आवश्यक अधिनियम इस प्रकार हैं

1. श्रमिक मुआवजा अधिनियम, 1923 (Workmen’s Compensation Act, 1923):
इस अधिनियम के अनुसार व्यावसायिक स्थान पर यदि किसी कर्मचारी को दुर्घटना का शिकार होना पड़ जाए और वह उस दुर्घटना-स्वरूप आजीवन कमाने में असमर्थ हो जाए तो ऐसी स्थिति में सरकार को मुआवजा देना पड़ता है। इसकी राशि दुर्घटना की गंभीरता पर निर्भर करती है। इसमें कारखानों, बागानों, मशीनों से चलने वाले वाहनों के संचालन, निर्माण कार्यों और जोखिम वाले कुछ अन्य व्यवसायों में कार्यरत श्रमिक व कर्मचारी की आयु और वेतन के हिसाब से मृत्यु होने पर मुआवजा निर्धारित किया गया है। इस अधिनियम को 23 दिसम्बर, 2009 को कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 2009 बनाया गया।

2. वेतन भुगतान अधिनियम, 1936 (Payment of Wages Act, 1936):
वेतन भुगतान अधिनियम, 1936 एक श्रमिक हितैषी अधिनियम है जिसका मुख्य उद्देश्य वेतन का समय पर भुगतान तथा वेतन से अधिकृत कटौतियों के अतिरिक्त अन्य कटौती न की जाए, यह सुनिश्चित करना है।

3. फैक्टरी अधिनियम, 1948 (Factory Act, 1948):
इस अधिनियम के अनुसार विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों की भली-भांति सफाई होनी चाहिए। गंदगी नियमित रूप से उठानी चाहिए। फर्शों को कीटाणुनाशक दवाई डालकर साफ करना चाहिए। कारखानों आदि में अधिक भीड़भाड़ नहीं होनी चाहिए ताकि किसी दुर्घटना की संभावना न रहे। काम के स्थान पर उचित हवा व प्रकाश आदि की व्यवस्था होनी चाहिए। काम करने वाले कर्मचारियों के लिए पीने के पानी का भी समुचित प्रबंध होना चाहिए। यदि किसी कारखाने में 250 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं तो पानी का उचित प्रबंध होना चाहिए।

कार्यस्थल पर उचित हवा और प्रकाश आदि की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि किसी दुर्घटना की संभावना न रहे। इस अधिनियम के अनुसार किसी राज्य में उपर्युक्त नियमों का पालन करवाना मुख्य फैक्टरी निरीक्षक (Chief Inspector of Factories) के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस नियम के अनुसार फैक्टरी के प्रबंधकों को या किसी श्रमिक को कोई व्यावसायिक बीमारी हो जाने पर अनिवार्य रूप से मुख्य फैक्टरी निरीक्षक को सूचित करना पड़ता है और इन्हें निश्चित बचावात्मक कार्रवाई करनी पड़ती है।

4. राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम, 1948 (Employees State Insurance Act, 1948):
इस अधिनियम के फलस्वरूप विभिन्न व्यवसायों में काम करने वाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा के उपाय किए जाते हैं। इस अधिनियम का उद्देश्य व्यवसायों में काम करने वाले व्यक्तियों को बीमारी या काम करने वाले स्थान पर किसी दुर्घटना का शिकार होने पर हर प्रकार की सहायता दिलाना है। इस अधिनियम के अंतर्गत कर्मचारियों तथा मालिकों को निश्चित राशि जमा करानी पड़ती है। इस योजना के अंतर्गत राज्य सरकारें एवं केंद्रीय सरकार भी आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं। इससे होने वाले लाभ इस प्रकार हैं

(i) चिकित्सा संबंधी लाभ (Advantages Related to Treatment):
कर्मचारियों की चिकित्सा हेतु राज्य श्रमिक बीमा अस्पताल तथा चिकित्सालय आदि खोले गए हैं जिनमें कर्मचारियों का उपचार किया जाता है और उन्हें दवाइयाँ दी जाती हैं। उन्हें परिवार कल्याण संबंधी परामर्श व सहायता प्रदान की जाती है। स्वास्थ्य शिक्षा दी जाती है और स्वास्थ्य प्रतिरक्षा संबंधी कार्यक्रम चलाए जाते हैं।

(ii) आर्थिक सहायता (Economical Help):
लंबी बीमारी अथवा किसी दुर्घटना के अवसर पर राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम के अंतर्गत श्रमिकों व कर्मचारियों को आर्थिक सहायता भी दी जाती है। बीमारी पर अधिक खर्च होने पर राज्य सरकार उस व्यय को वहन करती है और श्रमिकों व कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों के लिए भी सहायता प्रदान करती है।

5. खान अधिनियम (Mines Act):
खानों में काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा तथा स्वास्थ्य रक्षा के लिए कुछ अधिनियम जारी किए गए हैं, उनका खानों में पालन किया जाता है।

6. मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity BenefitAct, 1961):
इस अधिनियम के तहत प्रसव पूर्व तथा प्रसव पश्चात् महिलाओं से काम करवाने की मनाही है। कुछ शर्तों को पूरा करने पर गर्भावस्था के दौरान कार्य से अनुपस्थित रहने की दशा में मातृत्व अवकाश तथा वित्तीय लाभ देने का प्रावधान किया गया है।

7. बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 (Payment of Bonus Act, 1965):
इस अधिनियम में श्रमिकों व कर्मचारियों के किसी कारखाने व प्रतिष्ठान में बोनस की भुगतान की व्यवस्था की गई है।

8. ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 (Payment of Gratuity Act, 1972):
यह अधिनियम कारखानों, खानों, तेल क्षेत्रों, बन्दरगाहों, रेलवे, मोटर परिवहन प्रतिष्ठानों, कम्पनियों, दुकानों तथा अन्य प्रतिष्ठानों में काम करने वाले श्रमिकों एवं कर्मचारियों पर लागू होता है।

9. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (Minimum Wages Act):
सरकार की ओर से विभिन्न व्यवसायों में काम करने वाले श्रमिकों अथवा व्यक्तियों को न्यूनतम भत्ता देने का आदेश दिया हुआ है। उसकी अवहेलना करने पर अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है। श्रमिकों को किसी प्रकार की कठिनाई अनुभव न हो, इसको ध्यान में रखते हुए सरकार समय-समय पर श्रमिकों व कारीगरों को दिए जाने वाले न्यूनतम वेतन में संशोधन करती रहती है।

प्रश्न 7.
व्यवसायों से लगने वाली बीमारियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
इस पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति अपना जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए कोई-न-कोई व्यवसाय अपनाता है। कई बार ये व्यवसाय हमारे शरीर में विकार उत्पन्न करने का कारण बन जाते हैं। कई व्यवसाय ऐसे होते हैं जिनके कारण अनेक प्रकार की दिव्यांगता या बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे व्यवसाय से होने वाली बीमारियाँ निम्नलिखित हैं

1. दमा और कैंसर (Asthma and Cancer):
जो मज़दूर स्प्रे (Spray) या डोप (Dope) का कार्य करते हैं उन्हें दमा, कैंसर या ब्रोंकाइटिस (Bronchitis) की बीमारी हो जाती है। मजदूर व कारीगर काफी समय तक काम करते रहते हैं तथा इन बीमारियों का शिकार हो जाते हैं।

2. एन्थराक्रोसिस (Anthracosis):
यह बीमारी कोयले के कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों को ज्यादातर होती है। कोयले के छोटे-छोटे कणों का शरीर में प्रवेश करने से यह बीमारी उत्पन्न होती है।

3. बाइसीनोसिस (Byssinosis):
यह बीमारी प्राय: उन श्रमिकों व कारीगरों को होती है जो कपड़ा उद्योगों में कार्य करते हैं। कपास और धूल के छोटे-छोटे कण सांस के द्वारा फेफड़ों में घुस जाते हैं जिनके कारण वे इस बीमारी के शिकार हो जाते हैं।

4. सीसे का जहर (Lead Poisoning):
सीसे के जहरीले (Lead Poisoning) कण त्वचा तथा श्वास द्वारा शरीर में पहुंच जाते हैं। ये कण रक्त के ऊपर प्रभाव डालते हैं। ज्यादातर यह बीमारी उन श्रमिकों व कारीगरों को होती है जो पीतल फाउंड्री, लेड फाउंड्री, रंग-रोगन आदि के व्यवसाय में कार्य करते हैं। इससे सिर-दर्द, निद्रा का ठीक प्रकार से न आना, शारीरिक वृद्धि में विकार व अधरंग हो सकता है जिसके कारण व्यक्ति दिव्यांगता का शिकार हो जाता है।

5. सिलीकोसिस (Silicosis):
यह बीमारी सिलिका के कणों के द्वारा होती है। सिलिका के छोटे-छोटे कण सांस के द्वारा शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। यह फेफड़ों की बीमारी है। यह बीमारी ईंटों के भट्ठे पर, फाउंड्री में, कोयले की खानों में, चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने जैसे व्यवसायों में कार्य करने वाले मजदूरों व कारीगरों को होती है। इससे वे दिव्यांग हो जाते हैं।

6. क्षय रोग (Tuberculosis):
यह बीमारी अधिकतर उन श्रमिकों व कारीगरों को होती है जो कपड़ा उद्योगों में कार्य करते हैं। यह भी फेफड़ों की बीमारी है। रूई के छोटे-छोटे कण साँस द्वारा फेफड़ों में चले जाते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति धीरे-धीरे क्षय रोग से ग्रस्त हो जाता है।

7. साइड्रोसिस (Siderosis):
आयरन उद्योग साइड्रोसिस के लिए जिम्मेदार हैं। साइड्रोसिस बीमारी आयरन ऑक्साइड वाली धूल के कारण होती है। आयरन ऑक्साइड के कण शरीर में श्वास और त्वचा के द्वारा प्रवेश हो जाते हैं और रक्त को विषैला कर देते हैं।

8. अन्य व्यावसायिक रोग (Other Occupational Diseases):
जलना, बिजली का झटका लगना, खेलने वाले उपकरणों की चोट से कई प्रकार के रोग हमारे शरीर में पैदा हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप व्यक्ति दिव्यांग हो जाता है। बहुत से व्यवसाय ऐसे हैं जहाँ श्रमिकों को चर्म रोग, रीढ़ की हड्डी संबंधी विकार उत्पन्न हो जाते हैं। बहुत तेज रोशनी में काम करने वाले श्रमिक नेत्रहीनता के शिकार हो जाते हैं। तेज आवाज में काम करने वाले व्यक्तियों को बहरेपन की समस्या हो जाती है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
व्यावसायिक स्वास्थ्य की अवधारणा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है। अपनी आजीविका चलाने के लिए उसे कोई-न-कोई व्यवसाय या कार्य अवश्य करना पड़ता है। कार्य करने के लिए व्यक्ति के लिए बहुत से व्यवसाय हैं; जैसे लघु उद्योग, बड़े उद्योग, कृषि व्यवसाय, पशुपालन व्यवसाय व अन्य व्यवसाय आदि। प्रत्येक प्रकार के व्यवसायों की परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं जिनका व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। कुछ व्यवसाय ऐसे भी होते हैं जिनमें रसायनों का प्रयोग किया जाता है।

ऐसे व्यवसाय या इनकी परिस्थितियाँ किसी-न-किसी रूप में व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं। यदि इन व्यवसायों की परिस्थितियों में सुधार तथा कार्य करने वाले लोगों को जागरूक किया जाए तो व्यावसायिक संकटों या बीमारियों से बचा जा सकता है। इस प्रक्रिया में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान व्यावसायिक स्वास्थ्य का होता है, क्योंकि यह एक ऐसी योजना है जो व्यक्ति को कार्य करने के स्थान पर होने वाली स्वास्थ्य संबंधी हानियों और हादसों से बचाव में सहायक होती है। इसका मुख्य उद्देश्य सुरक्षित वातावरण उत्पन्न करना है।

जिसमें कार्य करने वाले व्यक्तियों का स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है। संक्षेप में, व्यावसायिक स्वास्थ्य व्यवसायों से संबंधित समस्याओं या संकटों की रोकथाम और प्रबंधन पर जोर देता है और कार्य करने वाले लोगों को अपने जीवन की सुरक्षा हेतु प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार “व्यावसायिक स्वास्थ्य कार्यस्थल में स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के सभी पहलुओं तथा संकटों ( खतरों) की प्राथमिक रोकथाम पर एक मजबूत ध्यान केंद्रित करने की प्रक्रिया है।”

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प्रश्न 2.
व्यावसायिक स्वास्थ्य से संबंधित किन्हीं तीन समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक स्वास्थ्य से संबंधित कोई तीन समस्याएँ निम्नलिखित हैं
1. वातावरण संबंधी समस्याएँ-ऐसी समस्याएँ जो वातावरण में त्रुटियों के कारण उत्पन्न होती हैं। इनका मुख्य कारण गलत योजनाएँ तथा भवन निर्माण होता है। इनमें समुचित प्रकाश का प्रबंध न होना, तापमान की वृद्धि अथवा कमी, तीव्र आवाज की गूंज, भवन-निर्माण संबंधी समस्याओं से उत्पन्न होने वाली समस्याएँ आती हैं।

2. रासायनिक प्रदूषण-कुछ व्यावसायिक समस्याएँ रासायनिक प्रदूषण के कारण उत्पन्न होती हैं; जैसे विषैली गैसों की उत्पत्ति, विषैले रासायनिक पदार्थों का वायु में मिलना जिनमें सीसा, कोयला, पारा, लोहा आदि सम्मिलित हैं।

3. व्यावसायिक समस्याएँ-कुछ ऐसी समस्याएँ व्यावसायिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में आती हैं जिनका संबंध चिकित्सा क्षेत्र से होता है। यदि चिकित्सा संबंधी सभी प्रकार के उपाय किए जाएँ तो श्रमिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा हो सकती है। चिकित्सा के साथ-साथ बीमारी, दुर्घटनाओं के शिकार व व्यक्तियों के पुनर्वास की समस्या भी जुड़ी हुई है।

प्रश्न 3.
व्यावसायिक बीमारियों या समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए कारखानों की तरफ से किए जाने वाले उपाय बताएँ।
उत्तर:
व्यावसायिक समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए कारखानों की तरफ से किए जाने वाले उपाय निम्नलिखित हैं
1. सुरक्षा के उपाय:
प्रत्येक कारखाने में श्रमिकों के लिए बढ़िया और आधुनिक सुरक्षात्मक प्रबंध होने चाहिएँ ताकि दुर्घटनाओं से बचा जा सके। आग बुझाने के लिए गैस का प्रबंध, पानी का प्रबंध, प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स आदि का होना अत्यंत आवश्यक है।

2. डॉक्टरी निरीक्षण:
प्रत्येक श्रमिक व कर्मचारी का डॉक्टरी निरीक्षण अत्यंत आवश्यक है। इसके द्वारा श्रमिकों व कर्मचारियों की बीमारियों का पता लगाया जा सकता है। एक स्वस्थ श्रमिक ही मालिक और कारखाने के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है। बीमार श्रमिक दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं।

3. योग्य, प्रशिक्षित और अनुभवी कर्मचारी:
कारखानों में सदैव योग्य, अच्छे प्रशिक्षित और अनुभवी कर्मचारियों को ही भर्ती किया जाना चाहिए। मशीनों का अच्छी तरह प्रयोग एक अच्छा प्रशिक्षित कर्मचारी ही कर सकता है। अनुभवहीन कर्मचारी दुर्घटना के शिकार हो सकते हैं।

4. मशीनों की समय-समय पर जाँच:
कारखानों में कई प्रकार की मशीनें लगी हुई होती हैं और कई बार ये मशीनें काफी पुरानी हो जाती हैं। इन मशीनों की समय-समय पर जाँच करके उनकी आवश्यकतानुसार मरम्मत करनी चाहिए। ऐसा करने से दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है।

प्रश्न 4.
व्यावसायिक बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए सरकारी एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले उपाय बताएँ।
उत्तर:
सरकारी एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा व्यावसायिक बीमारियों की रोकथाम के लिए अपनाए जाने वाले उपाय निम्नलिखित हैं
1. लोगों को सुरक्षा के बारे में जानकारी देना:
सरकारी व सामाजिक संस्थाओं का कर्तव्य बनता है कि वे विज्ञापनों, टेलीविजनों, फिल्मों, भाषणों और प्रदर्शनों द्वारा लोगों को दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए उपाय बताएँ और अपनी सुरक्षा हेतु प्रेरित करें।

2. चिकित्सा केंद्र खोलना:
चिकित्सा केंद्र खोलना सरकारी व सामाजिक संस्थाओं का पहला कर्त्तव्य है। किसी समय भी आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टरी सहायता दी जा सकती है। इस काम में सामाजिक संस्थाएँ अधिक योगदान दे सकती हैं। ऐसी संस्थाएँ, लोगों को नियमों का पालन करना तथा दुर्घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है आदि बताकर लोगों और समाज की सेवा कर सकती हैं।

3. बुरी आदतों से छुटकारा पाने के उपाय;
सरकार द्वारा नशीले पदार्थों, शराब और अन्य नशे वाली चीजें, जिनका सेवन करने से दुर्घटनाएं हो सकती हैं, को रोका जाए और इन परिस्थितियों में वाहन चलाने पर पाबंदी लगाई जाए।

प्रश्न 5.
व्यावसायिक स्वास्थ्य हेतु पर्यावरण संबंधी कारक के बारे में बताएँ।
उत्तर:
विभिन्न उद्योग: धंधों अथवा व्यवसायों में काम करने वाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर उनके धंधों तथा आस-पास के पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। यदि पर्यावरण दूषित है तो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। यह समय की पुकार है कि ऐसे स्थानों को स्वच्छ रखा जाए और उन्हें स्वास्थ्य संबधी नियमों के अनुकूल बनाया जाए ताकि श्रमिक व कर्मचारी अनुकूल व स्वच्छ वातावरण में काम करते हुए अधिक उत्पादन की पूर्ति का प्रयास करें। स्वच्छता की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए फैक्टरी अधिनियम, 1948 बनाया गया, जिसके अंतर्गत दिए गए नियमों का पालन करना अनिवार्य है। पर्यावरण दूषित होने से अनेक प्रकार के रोग पनपते हैं, जिनकी ओर सरकारी तथा क्षेत्रीय स्वास्थ्य सेवा संस्थाएँ समय-समय पर प्रबंधकों तथा श्रमिकों का ध्यान आकृष्ट करती रहती हैं।

प्रश्न 6.
व्यावसायिक स्वास्थ्य हेतु रासायनिक संबंधी कारक के बारे में बताएँ।
उत्तर:
कुछ ऐसे व्यवसाय भी हैं जहाँ रासायनिक प्रदूषण अधिक मात्रा में होता है अर्थात् मशीनों से रासायनिक कण उड़कर आस-पास हवा में प्रवेश कर उसमें मिल जाते हैं और ये कण काम करने वाले श्रमिकों व कारीगरों के शरीर में तीन प्रकार से प्रवेश करते हैं

  1. श्वास के माध्यम से फेफड़ों तक।
  2. मुख के माध्यम से पेट तक।
  3. त्वचा के माध्यम से शरीर के अंदर रक्त तक।

इस प्रकार के प्रदूषण से निमोनिया, दमा और पेट की कुछ बीमारियाँ हो सकती हैं। इसकी रोकथाम के लिए उचित उपाय किए जाने चाहिएँ।

प्रश्न 7.
हमें व्यावसायिक स्वास्थ्य की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
उत्तर:
विश्व के लगभग सभी व्यक्ति किसी-न-किसी व्यवसाय से संबंधित हैं। कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनमें काम करने वाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए यदि उपाय न किए जाएँ तो इससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ सकता है। इस प्रकार के व्यवसायों में उचित प्रबंध करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है।

उदाहरणतः ऐसे कारखाने जहाँ पर बफिंग, वैल्डिंग, स्प्रेयिंग और कैमिकल्ज आदि का काम होता है, वहाँ श्रमिकों का जीवन खतरे से खाली नहीं होता। ऐसे व्यवसाय में काम करने से अनेक प्रकार के व्यावसायिक रोग लग सकते हैं। व्यावसायिक स्वास्थ्य सभी व्यवसायों में श्रमिकों की शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक भलाई की प्रक्रिया है जिसमें उनको व्यवसायों से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की जाती हैं।

यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो कार्य करने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा करने में सहायक होती है। यह स्वास्थ्य व्यवसाय से संबंधित विभिन्न समस्याओं की रोकथाम एवं प्रबंधन पर जोर देता है। स्वरोजगार हेतु व्यावसायिक शिक्षा बहुत आवश्यक है। बेरोजगारी की समस्या देश में प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए हमें व्यावसायिक शिक्षा की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। व्यावसायिक स्वास्थ्य एक ऐसी

प्रक्रिया है जो कि हमें किसी व्यवसाय के बारे में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है। एक बार जब कोई विद्यार्थी किसी व्यवसाय का चयन कर लेता है तो उसे अपना लक्ष्य ज्ञात होता है और अपने भविष्य के बारे में संतुष्टि होती है। बहुत-से ऐसे व्यवसाय हैं जिनमें काम करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यदि व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन किया जाए तो ऐसी परिस्थितियों में काम करके स्वास्थ्य की सुरक्षा की जा सकती है। अत: व्यावसायिक स्वास्थ्य हमें सुरक्षा एवं स्वास्थ्य के अनेक नियमों से अवगत करवाती है। व्यावसायिक स्वास्थ्य आज के समय की सबसे बड़ी माँग है। इस प्रकार आज के मशीनी युग में व्यावसायिक स्वास्थ्य की आवश्यकता बहत अधिक बढ़ गई है।।

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प्रश्न 8.
व्यावसायिक स्वास्थ्य की महत्ता पर संक्षेप में प्रकाश डालें।
उत्तर:
आज के मशीनी एवं वैज्ञानिक युग में व्यावसायिक स्वास्थ्य की महत्ता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए व्यावसायिक स्वास्थ्य निम्नलिखित प्रकार से महत्त्वपूर्ण है
1. व्यावसायिक स्वास्थ्य किसी व्यक्ति या श्रमिक को कार्य करने के स्थान पर होने वाली स्वास्थ्य संबंधी हानियों एवं हादसों की जानकारी देकर उनसे बचने के उपाय बताता है।

2. बहुत-से ऐसे व्यवसाय हैं जिनमें काम करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यदि व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन किया जाए तो ऐसी परिस्थितियों में काम करके स्वास्थ्य की सुरक्षा की जा सकती है। अतः व्यावसायिक स्वास्थ्य हमें सुरक्षा एवं स्वास्थ्य के अनेक नियमों से अवगत करवाता है।

3. सरकार ने व्यवसाय संबंधी अनेक अधिनियम बनाए हैं। श्रमिकों व कर्मचारियों को इन अधिनियमों की जानकारी होनी चाहिए ताकि वे इन अधिनियमों के अनुसार कार्य करें। व्यावसायिक स्वास्थ्य के अंतर्गत श्रमिकों व कर्मचारियों को इन अधिनियमों की जानकारी दी जाती है।

4. व्यावसायिक स्वास्थ्य काम करने वाले लोगों को उनके स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की और उनके उपचार हेतु भी पूर्ण जानकारी देता है।

5. विभिन्न प्रकार के व्यवसायों में काम करने वाले श्रमिकों व कर्मचारियों को अनेक जोखिमों या कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि श्रमिक इस ओर ध्यान न दें तो कोई दुर्घटना घट सकती है। परन्तु व्यावसायिक स्वास्थ्य के अंतर्गत श्रमिकों व कर्मचारियों को अपनी सुरक्षा हेतु प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया जाता है।

प्रश्न 9.
व्यावसायिक स्वास्थ्य के मुख्य सिद्धांत बताएँ।
अथवा
व्यावसायिक स्वास्थ्य के किन्हीं चार सिद्धांतों का वर्णन करें।
उत्तर:
व्यावसायिक स्वास्थ्य के मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित हैं

1. व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी अधिनियमों की पूर्ण जानकारी:
श्रमिकों व कर्मचारियों को उन अधिनियमों की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए जिनके अंतर्गत वे काम कर रहे हैं। प्रत्येक श्रमिक को व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी कानूनों के अंतर्गत काम करना चाहिए।

2. स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का पूर्ण ज्ञान:
श्रमिकों व कर्मचारियों को स्वास्थ्य-संबंधी समस्याओं की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। इसके साथ-साथ उनके उपचार की भी पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। सामान्य रूप से देखा गया है कि श्रमिकों व कर्मचारियों को ऐसी जानकारी नहीं होती और न ही वे इसकी ओर ध्यान देते हैं। अतः ऐसे श्रमिकों व कर्मचारियों को स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा देनी चाहिए।

3. नियुक्ति के समय चिकित्सा जाँच:
नियुक्ति के समय चिकित्सा जाँच होनी चाहिए। यदि श्रमिक का स्वास्थ्य पूर्ण रूप से ठीक है तभी उसे नौकरी देनी चाहिए।

4. मध्यांतर में चिकित्सा जाँच:
नियमित अंतराल पर श्रमिकों व कारीगरों के स्वास्थ्य की जाँच अवश्य करवानी चाहिए। इससे बीमारियों का पता चलता है और उनका उपचार भी किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
व्यावसायिक संकटों से बचाव के उपायों का वर्णन कीजिए। उत्तर-व्यावसायिक संकटों या बीमारियों से निम्नलिखित उपायों द्वारा बचाव किया जा सकता है
1. वातावरण की देखभाल:
वातावरण को नियंत्रित रखने के लिए कई उपाय करने की आवश्यकता होती है; जैसे व्यर्थ सामग्री का सुरक्षित निष्कासन, स्वच्छ पीने का पानी, उचित प्रकाश, वायु का सही आना-जाना तथा सफाई के उपाय आदि।

2. चिकित्सा उपाय:
भर्ती के समय श्रमिकों व कारीगरों का चिकित्सा परीक्षण, प्राथमिक सहायता के साधन तथा रोगियों अथवा घायलों की देखभाल कुछ आवश्यक चिकित्सा संबंधी उपाय हैं जो श्रमिकों की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।

3. स्वास्थ्य शिक्षा:
श्रमिकों व कारीगरों तथा कर्मचारियों को सुरक्षा के उपायों की शिक्षा देने से उनके स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सकता है।

4. इंजीनियरिंग एवं तकनीकी उपाय:
इन उपायों में कारखानों का सही निर्माण, जिससे इन स्थानों पर अधिक भीड़-भाड़ न हो तथा वातावरण स्वच्छ रहे, उचित मशीनों का प्रयोग, उनका समय-समय पर निरीक्षण तथा खराब होने की अवस्था में उनको बदलना, सुरक्षा के सही कदम उठाना तथा खतरनाक यंत्रों के लिए सुरक्षित स्थानों का निर्माण जैसे कार्य आते हैं।

5. अधिनियम बनाकर:
श्रमिकों व कारीगरों तथा कर्मचारियों की सुरक्षा हेतु, सरकार द्वारा कई अधिनियम बनाए गए हैं। इनको नियमानुसार लागू किया जाना चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर इनमें संशोधन होने चाहिएँ। ये अधिनियम हैं:

  1. फैक्टरी अधिनियम,
  2. खान अधिनियम,
  3. राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम,
  4. श्रमिक मुआवजा अधिनियम,
  5. मातृत्व लाभ अधिनियम,
  6. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम आदि।

प्रश्न 11.
दुर्घटनाओं से बचने के मुख्य सुझाव बताएँ।
उत्तर:
दुर्घटनाओं से बचने के मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं

1. यातायात के नियमों का पालन करना:
सड़क या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर चलने, सड़क पार करने और यातायात आदि के नियमों का पालन करना चाहिए। ऐसा करने से हम दुर्घटनाओं से बच सकते हैं।

2. शिक्षा की बढ़िया योजना:
दिव्यांगता को रोकने, उनसे बचाव करने और उपाय सम्बन्धी शिक्षा का समूचा प्रबन्ध करने के लिए सरकार को बढ़िया योजना बनानी चाहिए।

3. सामान की जांच:
पड़ताल करना-घर या खेल के मैदान में इस्तेमाल किए जाने वाले सामान को जांच-पड़ताल के बाद ही प्रयोग में लाना चाहिए ताकि दुर्घटनाओं से बचा जा सके।

4. नियमित व्यायाम:
व्यवसायों से पैदा होने वाले रोगों से बचने के लिए नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए। इससे व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक रहेगा और रोगों से मुक्ति मिलेगी।

5. दुर्घटनाओं को रोकना:
जहाँ तक सम्भव हो सके, व्यावसायिक क्षेत्रों में दुर्घटनाओं को रोकने के प्रयत्न करने चाहिएँ। सरकार द्वारा बनाए गए नियमों की पालना करनी चाहिए। ऐसा करने से दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। सुरक्षा सम्बन्धी कानूनों की पालना करने से केवल श्रमिकों को ही नहीं अपितु उद्योगपतियों को भी लाभ पहुँचता है। श्रमिकों को काम सम्बन्धी नियमों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए और प्रबन्धकों को भी प्रबन्ध करने में सावधानीपूर्वक काम लेना चाहिए।

6. मादक पदार्थों से परहेज़:
मादक पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इन पदार्थों का सेवन दुर्घटनाओं को बढ़ावा देता है। इसलिए मादक पदार्थों से परहेज करना चाहिए।

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प्रश्न 12.
व्यावसायिक शिक्षा की उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
व्यावसायिक शिक्षा की अवधारणा एवं आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्वरोजगार हेतु व्यावसायिक शिक्षा बहुत आवश्यक है। बेरोजगारी की समस्या देश में प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए हमें व्यावसायिक शिक्षा की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। व्यावसायिक शिक्षा एक ऐसी शिक्षा प्रणाली है जोकि हमें किसी व्यवसाय के बारे में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करती है। एक बार जब कोई विद्यार्थी किसी व्यवसाय का चयन कर लेता है तो उसे अपना लक्ष्य ज्ञात होता है और अपने भविष्य के बारे में संतुष्टि होती है।

व्यावसायिक शिक्षा आज के समय की सबसे बड़ी माँग है। यह शिक्षा युवाओं को विशेष प्रकार से कौशल पूर्ण बनाकर उन्हें अनेक रोजगार प्राप्त करने के अवसर प्रदान करती है। ज्यादातर युवाओं को घर चलाने के लिए नौकरी की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक शिक्षा नौकरी दिलाने में भी अहम् योगदान देती है। व्यावसायिक शिक्षा स्वयं का उद्योग स्थापित करने में भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न (Very ShortAnswer Type Questions)

प्रश्न 1.
व्यवसाय की धारणा से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अपनी जीविका चलाने के लिए व्यक्ति को रोजगार के लिए कोई-न-कोई व्यवसाय अपनाना पड़ता है। व्यक्ति के लिए कई प्रकार के व्यवसाय होते हैं । विभिन्न प्रकार के व्यवसायों में काम करने वाले श्रमिक, कारीगर कर्मचारी विभिन्न प्रकार की स्थिति और विभिन्न प्रकार के वातावरण में अपना काम करते हैं। कुछ व्यवसाय इस प्रकार के हैं जिनके करने से व्यक्ति के मानसिक व
शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ व्यवसाय ऐसे भी हैं जिनका संबंध विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थों से या कोयला, लकड़ी, रुई, लोहा, सीसा जैसे पदार्थों से होता है। यहाँ काम करने वाले श्रमिकों व कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर इनका बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार व्यावसायिक स्वास्थ्य को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार “व्यावसायिक स्वास्थ्य कार्यस्थल में स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के सभी पहलुओं तथा संकटों (खतरों) की प्राथमिक रोकथाम पर एक मजबूत ध्यान केंद्रित करने की प्रक्रिया है।”

प्रश्न 3.
व्यावसायिक स्वास्थ्य के क्षेत्र पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक स्वास्थ्य का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। इसे केवल हम औद्योगिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का क्षेत्र ही नहीं मान सकते। इसमें बड़े-बड़े उद्योगों के अतिरिक्त लघु उद्योग, कृषि और छोटे-छोटे व्यवसाय, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के क्षेत्र भी सम्मिलित हैं। आज के प्रगतिशील युग में विभिन्न प्रकार के व्यवसाय सामने आ रहे हैं जिनकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इन्हीं के साथ-साथ व्यावसायिक स्वास्थ्य जगत का महत्त्व भी बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 4.
कर्मचारियों की प्रशिक्षण संबंधी समस्या बताएँ।
उत्तर:
उन कर्मचारियों को, जिन्हें औजार तथा यंत्रों का अच्छी तरह से प्रशिक्षण न मिला हो, नौकरी पर लगाना भी दुर्घटना का कारण बनता है। कुछ व्यवसायों में विशेष प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। इसलिए व्यावसायिक स्वास्थ्य कर्मचारियों को विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण ढंग तथा उच्च-स्तरीय प्रशिक्षण प्रदान करके व्यावसायिक संकट कम कर सकता है।

प्रश्न 5.
व्यावसायिक स्वास्थ्य से संबंधी किन्हीं तीन समस्याओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. वातावरण संबंधी समस्याएँ,
  2. रासायनिक पदार्थों से प्रदूषण,
  3. व्यावसायिक समस्याएँ।

प्रश्न 6.
कारखानों की तरफ से व्यावसायिक बीमारियों या चोटों से बचने के लिए किए जाने वाले कोई तीन उपाय बताएँ।
उत्तर:

  1. सुरक्षा का प्रबंध,
  2. डॉक्टरी निरीक्षण,
  3. योग्य, प्रशिक्षित और अनुभवी कर्मचारी।

प्रश्न 7.
व्यावसायिक स्वास्थ्य के कोई तीन सिद्धांत बताएँ।
उत्तर:

  1. व्यावसायिक स्वास्थ्य संबंधी अधिनियम की पूर्ण जानकारी,
  2. स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का पूर्ण ज्ञान,
  3. नियुक्ति के समय चिकित्सा जाँच।

प्रश्न 8.
व्यवसायों से लगने वाली किन्हीं चार बीमारियों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  1. कैंसर,
  2. एन्थराक्रोसिस,
  3. चमड़ी रोग,
  4. दमा।

प्रश्न 9.
आधुनिक समाज में व्यावसायिक स्वास्थ्य संकट के लिए उत्तरदायी कोई तीन कारक बताएँ।
उत्तर:

  1. पर्यावरण संबंधी कारक,
  2. भौतिक कारक,
  3. मनोवैज्ञानिक कारक।

प्रश्न 10.
व्यावसायिक रोगों के मामलों का प्रबंधन कैसे होता है?
उत्तर:
व्यावसायिक रोगों के मामलों के प्रबंधन के लिए विशेष प्रकार के कौशल की जरूरत होती है। इनके निदान, उपचार के लिए उचित प्रबंध करने पड़ते हैं। इसके बाद स्थानिक एवं वातावरण संबंधी समस्याओं पर विचार करके उन्हें दूर किया जाता है।

प्रश्न 11.
काम करने वाले स्थान पर किन-किन बुराइयों से दूर रहना चाहिए?
उत्तर:
धूम्रपान, नशाखोरी, मद्यपान आदि।

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प्रश्न 12.
व्यावसायिक स्वास्थ्य से संबंधित कोई तीन अधिनियम बताएँ।
उत्तर:

  1. श्रमिक मुआवजा अधिनियम-1923,
  2. फैक्टरी अधिनियम-1948,
  3. राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम-1948।

प्रश्न 13.
सिलीकोसिस (Silicosis) क्या है?
उत्तर:
सिलीकोसिस बीमारी सिलिका के कणों के द्वारा होती है। सिलिका के छोटे-छोटे कण साँस के द्वारा शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। यह फेफड़ों की बीमारी है। यह बीमारी ईंटों के भट्ठे पर, फाउंड्री में, कोयले की खानों में, चीनी-मिट्टी के बर्तन बनाने जैसे व्यवसायों में कार्य करने वाले श्रमिकों व कारीगरों को होती है।

प्रश्न 14.
‘सीसे का विष’ क्या है?
उत्तर:
सीसे के जहरीले कण त्वचा तथा श्वास द्वारा शरीर में पहुंच जाते हैं। ये कण रक्त के ऊपर प्रभाव डालते हैं। ज्यादातर यह बीमारी उन मजदूरों को होती है जो पीतल फाउंड्री, लेड फाउंड्री, रंग-रोगन आदि के व्यवसाय में कार्य करते हैं। इससे सिर-दर्द, निद्रा का ठीक प्रकार से न आना, शारीरिक वृद्धि में विकार व अधरंग हो सकता है जिसके कारण व्यक्ति दिव्यांगता का शिकार हो जाता है।

प्रश्न 15.
‘साइड्रोसिस’ क्या है?
उत्तर:
आयरन उद्योग साइड्रोसिस के लिए ज़िम्मेदार हैं। साइड्रोसिस बीमारी आयरन ऑक्साइड वाली धूल के कारण होती है। आयरन ऑक्साइड के कण शरीर में श्वास और त्वचा के द्वारा प्रवेश हो जाते हैं और रक्त को विषैला कर देते हैं।

प्रश्न 16.
‘बाइसीनोसिस’ क्या है?
उत्तर:
यह बीमारी प्रायः उन श्रमिकों को होती है जो कपड़ा उद्योगों में कार्य करते हैं । कपास और धूल के छोटे-छोटे कण साँस के द्वारा फेफड़ों में घुस जाते हैं जिनके कारण वे इस बीमारी के शिकार हो जाते हैं।

प्रश्न 17.
‘एन्थराक्रोसिस’ क्या है?
उत्तर:
यह बीमारी कोयले के कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों को ज्यादातर होती है। कोयले के छोटे-छोटे कणों का शरीर में प्रवेश करने से यह बीमारी उत्पन्न होती है। कोयले की खानें विशेषकर बिहार व झारखण्ड राज्यों में अधिक पाई जाती हैं।

HBSE 11th Class Physical Education व्यावसायिक स्वास्थ्य Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

भाग-I : एक वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
कोयले की खान में कार्य करने वाले व्यक्ति प्रायः कौन-से रोग का शिकार हो जाते हैं?
उत्तर:
न्यूमोकोनियोसिस नामक रोग।

प्रश्न 2.
व्यावसायिक स्वास्थ्य की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता क्या है?
उत्तर:
व्यावसायिक स्वास्थ्य की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता डेटाबेस और सूचना प्रणाली है।

प्रश्न 3.
तंबाकू की खेती में लगे श्रमिक किस व्यावसायिक बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं?
उत्तर:
तंबाकू की खेती में लगे श्रमिक ग्रीन तंबाकू बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
रेडियोधर्मी विकिरणों के संपर्क से होने वाली कोई एक बीमारी बताएँ।
उत्तर:
रेडियोधर्मी विकिरणों के संपर्क से होने वाली बीमारी कैंसर है।

प्रश्न 5.
व्यक्ति के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कोई दो पदार्थ बताएँ।
उत्तर:
कोयला, लकड़ी।

प्रश्न 6.
वातावरण संबंधी समस्या के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:
प्राकृतिक आपदाओं का आना, ज्वालामुखी विस्फोट।

प्रश्न 7.
प्रत्येक व्यक्ति अपनी जीविका के लिए क्या करता है?
उत्तर:
प्रत्येक व्यक्ति अपनी जीविका के लिए कोई-न-कोई व्यवसाय या काम करता है।

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प्रश्न 8.
भोपाल गैस त्रासदी कब घटित हुई?
उत्तर:
भोपाल गैस त्रासदी 3 दिसम्बर, 1984 में घटित हुई।

प्रश्न 9.
लोग कारखानों में कैंसर जैसी असाध्य बीमारी के शिकार कैसे होते हैं?
उत्तर:
कारखानों में प्रदूषण को नियंत्रित करने के साधन उपलब्ध न होने के कारण।

प्रश्न 10.
टी०बी० या तपेदिक रोग का सबसे अधिक प्रभाव शरीर के किस अंग पर पड़ता है?
उत्तर:
टी०बी० या तपेदिक रोग का सबसे अधिक प्रभाव फेफड़ों पर पड़ता है।

प्रश्न 11.
श्रमिक मुआवजा अधिनियम कब बनाया गया?
उत्तर:
श्रमिक मुआवजा अधिनियम सन् 1923 में बनाया गया।

प्रश्न 12.
राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम कब बनाया गया?
उत्तर:
राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम सन् 1948 में बनाया गया।

प्रश्न 13.
फैक्टरी अधिनियम कब बनाया गया?
उत्तर:
फैक्टरी अधिनियम सन् 1948 में बनाया गया।

प्रश्न 14.
बेरोजगारी की समस्या को दूर करने में किस प्रकार की शिक्षा अधिक लाभदायक हो सकती है?
उत्तर:
बेरोजगारी की समस्या को दूर करने में व्यावसायिक शिक्षा अधिक लाभदायक हो सकती है।

प्रश्न 15.
वे रोग जो किसी व्यवसाय में लगे हुए व्यक्ति को उसके व्यवसाय के कारण हो जाते हैं, कौन-से रोग कहलाते हैं?
उत्तर:
वे रोग जो किसी व्यवसाय में लगे हुए व्यक्ति को उसके व्यवसाय के कारण हो जाते हैं, व्यावसायिक रोग कहलाते हैं।

प्रश्न 16.
ऐसे कोई दो कार्य बताएँ जिनसे स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
उत्तर:
वैल्डिंग, स्प्रेयिंग।

प्रश्न 17.
मातृत्व लाभ अधिनियम कब बनाया गया?
उत्तर:
मातृत्व लाभ अधिनियम वर्ष 1961 में बनाया गया।

प्रश्न 18.
ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम कब बनाया गया?
उत्तर:
ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम वर्ष 1972 में बनाया गया।

भाग-II : सही विकल्प का चयन करें

1. व्यक्ति के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले पदार्थ हैं
(A) रासायनिक पदार्थ
(B) कोयला, लकड़ी
(C) रुई, लोहा, सीसा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. किस प्रकार की शिक्षा स्वरोजगार प्रदान करने में सहायक होती है?
(A) स्वास्थ्य शिक्षा
(B) शारीरिक शिक्षा
(C) व्यावसायिक शिक्षा
(D) नैतिक शिक्षा
उत्तर:
(C) व्यावसायिक शिक्षा

3. वातावरण संबंधी समस्याओं का कारण है
(A) प्राकृतिक आपदाओं का आना
(B) ज्वालामुखी विस्फोट
(C) गलत योजनाएँ तथा भवन निर्माण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

4. विषैली गैसों की उत्पत्ति और विषैले रासायनिक पदार्थों का वायु में मिलना किससे संबंधित है?
(A) कृषि संबंधी समस्याओं से
(B) रासायनिक पदार्थों के प्रदूषण से
(C) कर्मचारियों के प्रशिक्षण संबंधी समस्याओं से
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) रासायनिक पदार्थों के प्रदूषण से

5. रेडियोधर्मी विकिरण क्षेत्रों में काम करने वाले व्यक्ति अधिकतर किस बीमारी की चपेट में आते हैं?
(A) दमा
(B) ब्लड प्रेशर
(C) कैंसर
(D) तपेदिक
उत्तर:
(C) कैंसर

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6. कोयले की खानों अथवा कोयले से चलने वाले प्लांटों में काम करने वाले श्रमिक किस बीमारी की चपेट में आते हैं?
(A) एन्थराक्रोसिस
(B) तपेदिक
(C) कैंसर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) एन्थराक्रोसिस

7. व्यावसायिक समस्याओं में शामिल है
(A) श्रमिकों की चिकित्सा
(B) श्रमिकों के स्वास्थ्य की रक्षा
(C) बीमारी या दुर्घटना के शिकार व्यक्तियों के
(D) उपर्युक्त सभी पुनर्वास की समस्या
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

8. व्यावसायिक संकटों से बचाव किया जा सकता है
(A) वातावरण की देखभाल से
(B) इंजीनियरिंग उपायों से
(C) अधिनियम बनाकर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

9. पृथ्वी का कितना प्रतिशत भाग पानी से घिरा हुआ है?
(A) लगभग 2/3 प्रतिशत भाग
(B) लगभग 1/4 प्रतिशत भाग
(C) लगभग 3/4 प्रतिशत भाग
(D) लगभग 2/4 प्रतिशत भाग
उत्तर:
(A) लगभग 2/3 प्रतिशत भाग

10. अधिक रक्त-दाब का मुख्य कारण है
(A) जल प्रदूषण
(B) ध्वनि प्रदूषण
(C) वायु प्रदूषण
(D) भूमि प्रदूषण
उत्तर:
(B) ध्वनि प्रदूषण

11. ध्वनि प्रदूषण से किसका स्राव अधिक होता है?
(A) पित्तरस का
(B) रक्त का
(C) ऐडरलीन का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर;
(C) ऐडरलीन का

12. जनसंख्या वृद्धि के कारण निम्नलिखित समस्या बढ़ रही है
(A) बेरोजगारी की समस्या
(B) अन्न की समस्या
(C) आवास की समस्या
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

13. वातावरण में अनुचित व अनचाही आवाज या शोर क्या कहलाता है?
(A) वायु प्रदूषण
(B) ध्वनि प्रदूषण
(C) जल प्रदूषण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) ध्वनि प्रदूषण

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14. भोपाल गैस त्रासदी में किस गैस का रिसाव हुआ था?
(A) मिथाइल आइसोसाइनेट का
(B) सोडियम का
(C) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का
(D) जिंक सल्फेट का
उत्तर:
(A) मिथाइल आइसोसाइनेट का

15. औद्योगिक थकान के कारण होते हैं
(A) तापमान का अधिक होना
(B) स्वच्छ वायु का अभाव व कार्य की तीव्रता
(C) पदोन्नति के अवसरों का अभाव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

16. ठंड में काम करने से कौन-सी बीमारी हो जाती है?
(A) कैंसर
(B) फ्रॉस्ट बाइट
(C) तपेदिक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) फ्रॉस्ट बाइट

17. विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक संकटों के लिए उत्तरदायी कारक हो सकते हैं
(A) भौतिक व सामाजिक कारक
(B) मनोवैज्ञानिक व पर्यावरण संबंधी कारक
(C) पारिस्थितिक व विद्युत-संबंधी कारक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

18. वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारी है
(A) ब्रोनकिटिस
(B) दमा
(C) निमोनिया
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

भाग-III : निम्नलिखित कथनों के उत्तर सही या गलत अथवा हाँ या नहीं में दें

1. कर्मचारियों के लिए साफ व शुद्ध पानी का प्रबंध करना आवश्यक है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

2. कर्मचारियों को व्यावसायिक स्वास्थ्य की अवहेलना करनी चाहिए। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं,

3. वैल्डिंग करते समय तेज रोशनी निकलती है जिसका आँखों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

4. सिलिकोसिस, बाइसिनोसिस व न्यूमोकोसिस आदि व्यावसायिक रोगों के उदाहरण हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

5. बोनस भुगतान अधिनियम वर्ष 1980 में बनाया गया। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

6. काम करने के स्थान स्वच्छ एवं हवादार होने चाहिएँ। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

7. अच्छा व्यावसायिक वातावरण किसी फैक्टरी की उत्पादन क्षमता को कम करता है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यावसायिक स्वास्थ्य

8. व्यावसायिक स्वास्थ्य का मुख्य उद्देश्य सुरक्षित वातावरण प्रदान करना है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

9. समय-समय पर मशीनी यंत्रों की जाँच करवाते रहना चाहिए। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

10. फैक्टरियों में काम करने वाले कर्मचारियों के स्वास्थ्य को ठीक रखने की प्रक्रिया व्यावसायिक स्वास्थ्य कहलाती है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही।

भाग-IV : रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. प्रत्येक व्यक्ति अपनी जीविका निर्वाह हेतु कोई-न-कोई ……….. अपनाता है।
उत्तर:
व्यवसाय,

2. तीव्र औद्योगिकरण ने पारिस्थितिक में …………. उत्पन्न कर दिया है।
उत्तर:
असन्तुलन,

3. कार्यस्थल पर हवा, पानी और रोशनी आदि का ……………. होना चाहिए।
उत्तर:
उचित प्रबंध,

4. कर्मचारियों को …………….. वातावरण में कार्य करना चाहिए।
उत्तर:
स्वच्छ व हवादार,

5. रेडियोधर्मी विकिरणों से …………….. जैसी भयानक बीमारी हो सकती है।
उत्तर:
कैंसर,

6. फैक्टरी अधिनियम वर्ष ………….. में बनाया गया।
उत्तर:
1948,

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7. रुई से संबंधी फैक्टरी में काम करने वालों को प्रायः …………….. रोग हो जाता है।
उत्तर:
बिसिनोसिस,

8. …………. शिक्षा बेरोजगारी को दूर करने में लाभदायक है।
उत्तर:
व्यावसायिक,

9. राज्य कर्मचारी बीमा अधिनियम वर्ष ………… में बनाया गया।
उत्तर:
1948,

10. भोपाल गैस त्रासदी …………….. में घटित हुई।
उत्तर:
3 दिसम्बर, 1984

व्यावसायिक स्वास्थ्य Summary

व्यावसायिक स्वास्थ्य परिचय

विश्व के लगभग सभी व्यक्ति किसी-न-किसी व्यवसाय से संबंधित हैं। कुछ व्यवसाय ऐसे हैं जिनमें काम करने वाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए यदि उपाय न किए जाएँ तो इससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ सकता है। इस प्रकार के व्यवसायों में उचित प्रबंध करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है। उदाहरणतः ऐसे कारखाने जहाँ पर बकिंग, वैल्डिंग, स्प्रेयिंग और कैमिकल्ज आदि का काम होता है, वहाँ श्रमिकों का जीवन खतरे से खाली नहीं होता। ऐसे व्यवसाय में काम करने से अनेक प्रकार के व्यावसायिक रोग लग सकते हैं।

व्यावसायिक स्वास्थ्य सभी व्यवसायों में श्रमिकों की शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक भलाई की प्रक्रिया है जिसमें उनको व्यवसायों से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान की जाती हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो कार्य करने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा करने में सहायक होती है। यह स्वास्थ्य व्यवसाय से संबंधित विभिन्न समस्याओं की रोकथाम एवं प्रबंधन पर जोर देता है। इस प्रकार आज के मशीनी युग में व्यावसायिक स्वास्थ्य की आवश्यकता बहुत अधिक बढ़ गई है।

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HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 संक्रामक रोग

Haryana State Board HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 संक्रामक रोग Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 संक्रामक रोग

HBSE 11th Class Physical Education संक्रामक रोग Textbook Questions and Answers

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न ( (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
संक्रामक रोगों से क्या अभिप्राय है? इनके फैलने के माध्यमों का वर्णन करें।
अथवा
छूत के रोग क्या होते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? इन रोगों के फैलने के विभिन्न कारण कौन-कौन-से हैं? अथवा संक्रामक (छूत के ) रोग क्या होते हैं? इनके फैलने के कारण तथा लक्षण लिखें। अथवा संक्रामक रोगों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर:
संक्रामक रोग का अर्थ (Meaning of Communicable Diseases):
सभी प्रकार के संक्रामक रोग किसी विशेष प्रकार के रोगाणु से पनपते हैं। ये रोगाणु हमारे शरीर में प्रवेश कर हमें रोगग्रस्त कर देते हैं। जब स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में रोगाणु (वायरस, बैक्टीरिया, कीटाणु, फफूंदी आदि) जल, वायु, भोजन तथा स्पर्श के माध्यम से प्रवेश करके उसके स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं या रोगग्रस्त करते हैं, तो वे संक्रामक या छूत के रोग (Communicable Diseases) कहलाते हैं।

संक्रामक (छूत के) रोगों के प्रकार (Types of Communicable Diseases): विषाणु, बैक्टीरिया व कीटाणुओं के आधार पर ये रोग दो प्रकार के होते हैं
1. संसर्ग रोग (Contagious Diseases):
संसर्ग रोग रोगी के प्रत्यक्ष रूप से संपर्क में आने से लगते हैं; जैसे खसरा, काली खाँसी, जुकाम आदि।

2. संचारी रोग (Infectious Diseases):
संचारी रोग अप्रत्यक्ष रूप से फैलते हैं। इन रोगों के जीवाणु साँस, पानी एवं भोजन द्वारा शरीर में प्रवेश करके हैजा, चेचक, पेचिश, टायफाइड आदि रोगों को फैलाते हैं।

फैलने के कारण/माध्यम (Causes/Modes of Transmission)-संक्रामक रोग निम्नलिखित कारणों (माध्यमों) से फैलते हैं
1. वायु द्वारा (By Air): साँस लेने से वायु द्वारा रोगाणु शरीर में प्रविष्ट होकर स्वस्थ व्यक्ति को बीमार कर देते हैं। चेचक, काली खाँसी, जुकाम आदि रोग वायु के माध्यम से ही फैलते हैं।

2. भोजन और पानी द्वारा (Through Food and Water): कई रोग दूषित भोजन और गंदे पानी द्वारा भी फैलते हैं। मक्खियाँ भोजन पर बैठकर उसको दूषित कर देती हैं और रोग के रोगाणु भोजन में छोड़ देती हैं। ऐसे भोजन को खाने से व्यक्ति बीमार हो जाता है। गंदे पानी के प्रयोग से हैजा, पेचिश, मियादी बुखार आदि रोग हो जाते हैं।

3. प्रत्यक्ष स्पर्श द्वारा (By Direct Contact): रोगी द्वारा इस्तेमाल किए हुए वस्त्रों, बर्तनों आदि का उपयोग करने या उसको स्पर्श करने से छूत की बीमारियाँ फैलती हैं; जैसे जुकाम, चेचक, खुजली आदि।

4. कीड़ों द्वारा (Through Insects): जब मच्छर या खटमल किसी रोगी को काटते हैं तो वे रोगाणु अपने अंदर ले जाते हैं। फिर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटते समय वे रोगाणु उसके शरीर में छोड़कर उसे रोगग्रस्त कर देते हैं। मलेरिया, फाइलेरिया व खुजली आदि कीड़ों द्वारा फैलने वाले संक्रामक रोग हैं। लक्षण (Symptoms): संक्रामक रोगों के लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. छूत के रोगों में मिलते-जुलते लक्षण पाए जाते हैं। इनमें बीमारी बढ़ने पर शरीर बेजान हो जाता है।
  2. पूरे शरीर में पीड़ा होने लगती है जो असहनीय होती है।
  3. सिर में दर्द रहने लगता है और बुखार तेजी से बढ़ने लगता है।
  4. शरीर का तापमान बढ़ जाता है।
  5. शरीर में कंपकंपी होने लगती है और रोगी को ठंड लगने लगती है।
  6. शरीर कमजोर होने लगता है।
  7. छूत के रोगों में उल्टियाँ तथा पाचन क्रिया में गड़बड़ी होने से दस्त भी लग जाते हैं।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 संक्रामक रोग

प्रश्न 2.
संक्रामक रोगों का क्या अर्थ है? संक्रामक रोगों के बचावात्मक या सुरक्षात्मक उपायों का वर्णन करें। अथवा छूत के रोगों से बचने के लिए हमें किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए? अथवा छूत की बीमारियों को कैसे रोका जा सकता है?
उत्तर:
संक्रामक रोगों का अर्थ (Meaning of Communicable Diseases):
संक्रामक रोगों से अभिप्राय उन रोगों से है जो कीटाणुओं, बैक्टीरिया, वायरस आदि के कारण फैलते हैं। ये रोग रोगी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क में आने अर्थात् संक्रमण से फैलते हैं।

बचावात्मक या सुरक्षात्मक उपाय (Preventive Measures): संक्रामक रोगों से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय/नियम अपनाए जा सकते हैं
1. रोगी को अलग रखना (Isolation of Patient):
जो व्यक्ति रोग का शिकार होता है उसे घर के शेष व्यक्तियों से अलग रखना चाहिए जिससे कम-से-कम व्यक्तियों का उससे संपर्क हो सके। केवल एक या दो व्यक्ति ही उसकी देखभाल के लिए होने चाहिएँ। अस्पताल में भी संक्रामक रोग से प्रभावित व्यक्ति को अलग कमरे में रखना चाहिए। ऐसा करने से संक्रामक रोगों के रोगाणुओं को फैलने से रोका जा सकता है।

2. स्वास्थ्य विभाग को सूचना देना (Information to the Health Department):
यदि कोई व्यक्ति किसी संक्रामक रोग से प्रभावित हो जाता है तो उसके आस-पड़ोस के या उसके घर के व्यक्तियों का यह नैतिक कर्त्तव्य बन जाता है कि वे इस बात की सूचना शीघ्रता से स्वास्थ्य विभाग को दें ताकि वह बीमारी और कहीं न फैल सके। इस प्रकार की सूचना हैजा, चेचक, मलेरिया, रेबीज़ और प्लेग के बारे में अवश्य देनी चाहिए।

3. व्यक्तिगत सफाई की ओर विशेष ध्यान देना (Proper Care of Personal Cleanliness):
संक्रामक रोगों की रोकथाम या बचाव में व्यक्तिगत सफाई महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। व्यक्तिगत सफाई या स्वच्छता के लिए दैनिक कार्य ध्यान से करने पड़ते हैं; जैसे शौच आदि से निवृत्त होकर हाथ साबुन से अच्छी प्रकार साफ करना, प्रतिदिन ठीक प्रकार से नहाना, समय-समय पर नाखून काटना, घर में तौलिया, रूमाल, कंघी, बर्तन आदि साफ रखना तथा भोजन करने से पहले हाथ अच्छे से साफ करना आदि।

4. टीकाकरण (Vaccination):
टीकाकरण कराने से ये रोग कम होते हैं, क्योंकि इससे व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। पोलियो, खसरा, चेचक, टायफाइड आदि से संबंधित टीके बचपन में ही लगवा लेने चाहिएँ ताकि इन रोगों से बचा जा सके।

5. पीने के पानी का नियमित निरीक्षण (Regular Checking of Drinking Water):
समय-समय पर पीने के पानी का निरीक्षण अवश्य करते रहना चाहिए। पीने के पानी के द्वारा होने वाले संक्रामक रोगों से बचने के लिए क्लोरीन एवं लाल दवाई युक्त पानी ही पीने हेतु उपयोग में लाना चाहिए। इसके अलावा पानी को पीने योग्य बनाने के लिए आधुनिक यंत्रों या उपकरणों का प्रयोग भी किया जा सकता है। ऐसा करने से पानी के हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।

6. विसंक्रमण/कीटाणु-मुक्त करना (Disinfection):
जब बीमार व्यक्ति ठीक हो जाए तो उसके द्वारा प्रयोग किए गए कपड़े, बिस्तर, बर्तन आदि वस्तुओं से रोगाणुओं को नष्ट कर देना चाहिए, ताकि इन वस्तुओं से स्वस्थ व्यक्ति का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क होने से उसके स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव न पड़े।

7. आस-पड़ोस में सफाई की व्यवस्था (Arrangement of Cleanliness in Neighbourhood):
संक्रामक रोगों से बचने के लिए अपने आस-पड़ोस में सफाई की व्यवस्था पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। यदि आस-पास गंदगी हो या गंदा पानी एकत्रित हो तो संक्रामक रोग अधिक फैलते हैं। इसीलिए आस-पड़ोस में सफाई की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए ताकि इस प्रकार के रोगों से स्वस्थ व्यक्ति बच सकें।

8. संक्रामक रोगों के बारे में उचित शिक्षा (Proper Education Regarding Communicable Diseases):
सभी व्यक्तियों को संक्रामक रोगों के बारे में उचित शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। टी०वी०, रेडियो, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और शिक्षण संस्थानों आदि के माध्यम से संक्रामक रोगों के बारे में उचित शिक्षा प्रदान की जा सकती है जिसके परिणामस्वरूप ऐसे रोगों से बचाव किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
एड्स (AIDS) क्या है? इसके लक्षण तथा उपचार के उपाय लिखें।
अथवा
एड्स के फैलने के माध्यमों, लक्षणों तथा बचाव व नियंत्रण के उपायों का वर्णन करें। अथवा “एड्स एक जानलेवा बीमारी है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
एड्स का अर्थ (Meaning of AIDS)-एड्स का पूरा नाम है एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशेंसी सिंड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome)। एड्स स्वयं में कोई रोग नहीं है, लेकिन प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर शरीर अनेक रोगों/ संक्रमण से ग्रसित हो जाता है। एड्स एक जानलेवा बीमारी है क्योंकि एच०आई०वी० (HIV) नामक वायरस मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर उसकी रोगों से लड़ने वाली शक्ति (प्रतिरोधक शक्ति) कम कर देता है और शरीर अनेक संक्रमणों से ग्रस्त हो जाता है।

कारण या माध्यम (Causes/Modes): एड्स के प्रमुख माध्यम निम्नलिखित हैं:

  • उपचार के लिए लगाए जाने वाले टीके में दूषित सिरिंजों का प्रयोग करना।
  • स्वास्थ्य संबंधी गलत आदतें व व्यक्तिगत सफाई की ओर ध्यान न देना।
  • यौन संबंधी गलत आदतें।
  • दूसरे के उपयोग किए टूथ-ब्रश व रेजर या ब्लेड आदि का प्रयोग करना।
  • रक्त चढ़ाने संबंधी बरती जाने वाली असावधानी आदि।

लक्षण (Symptoms): एड्स के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

  • शरीर की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है।
  • रोगी लम्बे समय तक बीमार रहता है जिसका कोई कारण दिखाई नहीं देता।
  • अचानक शरीर का वजन कम हो जाता है।
  • स्मरण शक्ति समाप्त होने लगती है।
  • यदि शरीर में कोई जख्म हो जाए, वह लम्बे समय तक ठीक नहीं होता।
  • खून बहने पर जल्दी बन्द नहीं होता।
  • सिर में दर्द भी रहता है।

बचाव व उपचार के उपाय (Measures of Prevention and Treatment): एड्स एक ऐसी बीमारी है जिसका सबसे अच्छा उपाय बचाव या सावधानी माना जाता है। एड्स के बचाव व उपचार के उपाय निम्नलिखित हैं
1. यौन संबंधी आदतों में सुधार करना चाहिए। अपने जीवन-साथी के प्रति वफादार रहना चाहिए। यौन संबंध केवल अपने जीवन-साथी के साथ बनाएँ।

2. सुरक्षित रक्त आदान-प्रदान करें, रक्त लेने से पहले यह निश्चित कर लें कि वह रक्त एच०आई०वी० से ग्रस्त तो नहीं है अर्थात् जिन्हें एड्स की आशंका हो, उन्हें रक्तदान नहीं करना चाहिए और तुरंत अपना एच०आई०वी० परीक्षण करवाना चाहिए।

3. दूसरे के उपयोग किए टूथ-ब्रश व रेजर या ब्लेड आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

4. इंजेक्शन के लिए हमेशा ऐसी सुइयों का प्रयोग करना चाहिए जिनका केवल एक बार ही प्रयोग किया जाता है अर्थात् इंजेक्शन लगवाते समय हमेशा यह ध्यान रखें कि डिस्पोजेबल सीरिंज या सुइयों का ही इस्तेमाल हो।

6. गर्भवती महिलाओं को अपना एच०आई०वी० परीक्षण अवश्य करवाना चाहिए। अगर जाँच पॉजिटिव है तो बच्चा हो जाने के बाद एच०आई०वी० से ग्रस्त माँ को स्तनपान नहीं करवाना चाहिए। ऐसी स्थिति में बच्चे को बोतल से दूध पिलाना ही बेहतर माना जाता है।

7. एच०आई०वी० पॉजिटिव व्यक्ति को इलाज के दौर एंटी-रेट्रोवायरल ड्रग्स दिए जाते हैं।

प्रश्न 4.
हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis-B) के लक्षण और इलाज के उपाय लिखें। अथवा हेपेटाइटिस-बी के माध्यम, लक्षण और बचाव के उपाय लिखें।
उत्तर:
हेपेटाइटिस-बी एक संक्रामक रोग है जो रक्त या संक्रमित व्यक्ति के शरीर के अन्य तरल पदार्थ के साथ संपर्क के माध्यम से फैलता है। हेपेटाइटिस के विषैले तत्त्वों से जिगर की कोशिकाओं को हानि पहुँचती है जिसके कारण पीलिया हो जाता है। इसको ‘पीलिया की महामारी’ भी कहा जाता है।

लक्षण (Symptoms): हेपेटाइटिस-बी के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. शरीर का पीला पड़ जाना।
  2. अधिक थकावट महसूस होना।
  3. भूख न लगना।
  4. आँखों के सफेद भाग का पीला पड़ जाना।
  5. हेपेटाइटिस के प्रभाव से रोगी को तीव्र ज्वर, सिरदर्द तथा जोड़ों में दर्द रहना।
  6. उत्तेजनशील चकते दिखाई देना।
  7. संक्रमण के कुछ दिनों बाद गहरे पीले रंग का मूत्र तथा हल्के रंग की विष्ठा (मल) आना।

बचाव व इलाज के उपाय (Measures of Prevention and Treatment) हेपेटाइटिस-बी के बचाव व इलाज के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. हेपेटाइटिस-बी से बचाव के लिए साफ-सफाई बेहद आवश्यक है। इस रोग से बचने के लिए खाने और पीने में हमेशा साफ चीजों का ही उपयोग करना चाहिए।
  2. बाहर का खाना खाने से बचना चाहिए। अगर खाना भी पड़े तो साफ-सफाई का अवश्य ध्यान रखें और हमेशा पौष्टिक व संतुलित भोजन ही खाना चाहिए।
  3. व्यक्तिगत सफाई की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  4. महामारी फैलने के दौरान उबला हुआ और क्लोरीन-युक्त पानी का प्रयोग करना चाहिए।
  5. हरी पत्तेदार सब्जियाँ खानी चाहिएँ और मौसमी एवं गन्ने का जूस पीना चाहिए।
  6. रोगी के वस्त्र, बिछौने तथा बर्तन छूने के उपरांत हाथों को भली-भांति धोना चाहिए।
  7. डॉक्टर की सलाहानुसार हेपेटाइटिस-बी के टीके बचाव हेतु अवश्य लगवाने चाहिए।
  8. रक्त चढ़ाने पर इस बात का विशेष ध्यान रखें कि सूई नई हो और रक्त संक्रमित न हो।
  9. किसी दूसरे की सूई, रेजर, टूथब्रश आदि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 5.
हेपेटाइटिस-सी (Hepatitis-C) के लक्षण, उपचार तथा बचाव के उपाय लिखें।
उत्तर:
हेपेटाइटिस-सी का अर्थ है-लीवर में सूजन। जब यह सूजन किसी विशेष प्रकार के सूक्ष्म-जीवाणु की वजह से लम्बी होती है, तो ऐसी स्थिति को हेपेटाइटिस-सी कहा जाता है। हेपेटाइटिस-सी अथवा सीरम एक घातक संक्रामक रोग है। इस रोग के सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ती है। ये सूक्ष्म-जीवाणु लीवर की कोशिकाओं को नष्ट कर देते हैं। यह रोग शरीर में दूषित रक्त या रक्त पदार्थों के चढ़ने से फैलता है। यह रोग शरीर के किसी अंग का प्रत्यारोपण करने से भी हो सकता है।

लक्षण (Symptoms): हेपेटाइटिस-सी के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. बुखार होना।
  2. कान महसूस होना।
  3. जिगर तेजी से क्षतिग्रस्त होना।
  4. आँखों एवं त्वचा का पीला होना।
  5. जोड़ों और माँसपेशियों में दर्द होना।
  6. मानसिक कार्य करने में परेशानी होना।
  7. पेट व शरीर में दर्द होना।
  8. भूख कम लगना।
  9. त्वचा में खुजली होना।
  10. रक्त की उल्टी आना।

उपचार (Treatment) हेपेटाइटिस-सी के उपचार की इंटरफेरोन, राइबावेरिन व अमान्टिडिन दवाइयाँ ही उपलब्ध हैं। ये इसके उपचार के लिए लाभदायक हैं। होम्योपेथिक दवाइयों से भी हम इस रोग की गति को नियंत्रित कर सकते हैं। इन दवाइयों से इस बीमारी के लक्षणों को कम किया जा सकता है।

बचाव के उपाय (Measures of Prevention):

  1. रोगी को भरपूर आराम करना चाहिए।
  2. स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए साफ-सुथरा भोजन तथा शुद्ध पानी पीना चाहिए। भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
  3. व्यक्तिगत सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
  4. डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए और उचित दवाइयों का प्रयोग करना चाहिए।
  5. हरी पत्तेदार सब्जियाँ खाएँ, मौसमी एवं गन्ने का रस पिएँ।
  6. किसी दूसरी की सूई, रेजर और टूथब्रश इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 6.
रेबीज़ के फैलने के कारण, लक्षण और बचाव व इलाज के उपाय लिखें।
उत्तर:
रेबीज़ के फैलने के कारण (Causes of Spreading Rabies):
रेबीज़ रोग बहुत संक्रामक बीमारी है क्योंकि इस बीमारी से रोगी की मृत्यु होने की संभावना रहती है। रोगी पानी से डरने लगता है इसीलिए इसे जलभीति रोग भी कहते हैं। यह रोग किसी पागल जानवर; जैसे बंदर, बिल्ली, खरगोश तथा विशेषकर कुत्ते के द्वारा काटने से होता है। यह रोग काटने वाले जंतु की लार के साथ मनुष्य के शरीर के रक्त में प्रवेश कर उसे रोगग्रस्त कर देता है।

लक्षण (Symptoms): रेबीज़ के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. रोगी को सिर-दर्द व बुखार हो जाता है।
  2. रोगी को अधिक पानी पीने का मन करता है लेकिन प्यास होने पर भी उसे पी नहीं पाता।
  3. रेबीज़ से प्रभावित व्यक्ति को तीव्र मस्तिष्क पीड़ा, तीव्र ज्वर, गले व छाती की पेशियों में तीव्र जकड़न होती है।
  4. रोगी को तरल पदार्थ या भोजन लेने में कठिनाई होती है।
  5. केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के अत्यधिक क्षतिग्रस्त होने की संभावना रहती है।
  6. इस रोग का प्रकोप पशु के काटने के तीन दिन के बाद व तीन वर्ष के भीतर कभी भी हो सकता है।

बचाव व इलाज के उपाय (Measures of Prevention and Treatment): रेबीज़ से बचाव के लिए जरूरी है-इसके बारे में जानकारी होना। रेबीज़ के बचाव व इलाज के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. पशुओं के काटने पर काटे गए स्थान को पानी व साबुन से अच्छी तरह धो लेना चाहिए।
  2. धोने के बाद काटे गए स्थान पर अच्छी तरह से टिंचर या पोवोडीन आयोडीन लगाना चाहिए। ऐसा करने से कुत्ते या अन्य पशुओं की लार में पाए जाने वाले कीटाणु सिरोटाइपवन लायसा वायरस (Sirotypeone Laysa Virus) की ग्यालकोप्रोटिन की परतें घुल जाती हैं। इससे रोग की मार एक हद तक कम हो जाती है, जो रोगी के बचाव में सहायक होती है।
  3. किसी पागल जानवर के काटने पर तुरंत नजदीकी चिकित्सा केन्द्र पर ले जाना चाहिए।
  4. रोगी को टैटनस का इंजेक्शन लगवाकर चिकित्सालय ले जाना चाहिए। चिकित्सक की सलाह से काटे गए स्थान पर कार्बोलिक एसिड लगाया जाता है, जिससे अधिकतम कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
  5. इसके बाद चिकित्सक की सलाह पर आवश्यकतानुसार इंजेक्शन लगवाए जाते हैं, जो 3 या 14 दिन की अवधि के होते हैं।
  6. इंजेक्शन लगाने की क्रमबद्धता में लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 संक्रामक रोग

प्रश्न 7.
टैटनस के फैलने के कारण, लक्षण एवं बचाव व उपचार के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
टैटनस (Tetanus):
टैटनस को हिन्दी में धनुस्तंभ कहा जाता है। यह एक संक्रामक रोग है जिसमें कंकाल पेशियों को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका कोशिकाएँ प्रभावित होती हैं। यह रोग मिट्टी में विद्यमान बैक्टीरिया से घावों को प्रदूषित करने से फैलता है। इस बैक्टीरिया को बैक्टीरियम क्लोस्ट्रीडियम टेटानी कहा जाता है। यह बैक्टीरिया सामान्यतया मिट्टी, धूल और जानवरों के मल में पाया जाता है। हमारे शरीर में इस बैक्टीरिया का प्रवेश कटे या फटे घाव से होता है।1. फैलने के कारण (Causes of Transmission): टैटनस के फैलने के कारण निम्नलिखित हैं

  • इस रोग का मुख्य कारण बैक्टीरियम क्लोस्ट्रीडियम टेटानी नामक बैक्टीरिया होता है।
  • यह बैक्टीरिया मिट्टी, धूल या जानवरों के मल में रहता है। मिट्टी व धूल के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करता है। इस प्रकार किसी खुले घाव के अंदर बैक्टीरिया के प्रवेश हो जाने के कारण यह रोग फैलता है।
  • यह रोग त्वचा पर किसी चोट या घाव के कारण अधिक फैलता है।

2. लक्षण (Symptoms): टेटनस के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

  • बोलने और साँस लेने में कठिनाई होना।
  • गर्दन में दर्द एवं अकड़न होना।
  • शरीर में खुजली, माँसपेशियों में खिंचाव, सूजन एवं कमजोरी होना।
  • पीठ की माँसपेशियों में दर्द होना।
  • जबड़ा सिकुड़ना और जकड़ना।
  • घाव के आस-पास की माँसपेशियों में जकड़न पैदा होना।

3. बचावव उपचारके उपाय (Measures of Prevention and Treatment): टैटनस से बचाव व उपचार के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. कोई भी ऐसा घाव जिससे त्वचा फट गई हो, उसे तुरंत पानी और साबुन से साफ किया जाना चाहिए।
  2. घाव को कभी खुला न छोड़ें। खुले घाव में संक्रमण का अधिक खतरा रहता है। यदि घाव से खून बह रहा हो तो उस पर सूती या सुखा कपड़ा बाँधे।
  3. टीकाकरण द्वारा टैटनस से पूरी तरह बचाव संभव है। इससे बचाव के लिए बचपन और गर्भावस्था के दौरान टीकाकरण अवश्य करवा लेना चाहिए।
  4. शरीर के किसी भी हिस्से पर चोट लगने पर एंटी-टैटनस का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।
  5. टैटनस टॉक्सायड में निष्क्रिय टेटनस टॉक्सीन को रसायनों और ताप के प्रभाव में लाकर उसके जहरीले प्रभाव को कम किया जाना चाहिए।
  6. रोगी को स्वच्छ वातावरण में रहना चाहिए अर्थात् धूल, मिट्टी भरे वातावरण से दूर रहना चाहिए।
  7. हल्के हाथ से तारपीन के तेल से शरीर की मालिश करनी चाहिए।
  8.  तेल को गर्म करके और उसमें हल्दी मिलाकर घाव पर लगाएँ। घाव पर नीम का तेल लगाने से भी टेटनस का डर नहीं रहता।

प्रश्न 8.
मलेरिया (Malaria) रोग के फैलने के कारण, लक्षण और बचाव के उपाय बताइए।
अथवा
मलेरिया कितने प्रकार का होता है? इसके फैलने के माध्यमों तथा उपचार व रोकथाम का वर्णन करें।
उत्तर:
मलेरिया रोग के फैलने के कारण/माध्यम (Causes/Modes of Transmission of Malaria):
मलेरिया एक संक्रामक रोग है जो मादा एनाफ्लीज़ (Female Anopheles) नामक मच्छर के काटने से फैलता है। जब यह मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है तो उसके रक्त में मलेरिया के कीटाणु छोड़ देता है, जिससे मच्छर के द्वारा काटे जाने वाले व्यक्ति को मलेरिया हो जाता है। इसे ‘मौसमी बुखार’ भी कहते हैं । यह रोग लगभग 7 से 11 दिन तक रह सकता है।

प्रकार (Types): मलेरिया मुख्यत: चार प्रकार का होता है

  • प्लाज्मोडियम विवेक्स (Plasmodium Vivax),
  • प्लाज्मोडियम ओवेल (Plasmodium Ovale),
  • प्लाज्मोडियम मलेरी (Plasmodium Malariae),
  • प्लाज्मोडियम फैल्सिपैरम (Plasmodium Falciparum)।

लक्षण (Symptoms): मलेरिया के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं

  • रोगी को ठंड लगने लगती है और शरीर काँपने लगता है।
  • शरीर का तापमान 103°F से 106°F तक हो जाता है।
  • कभी-कभी उल्टी भी आ जाती है।
  • बुखार उतरने पर पसीना काफी आता है।
  • शरीर बेजान और कमजोर हो जाता है और शरीर में दर्द होने लगता है।
  • शरीर में खून की कमी हो जाती है।

उपचार (Treatment): मलेरिया एक उपचार-योग्य रोग है। उपचार का प्राथमिक उद्देश्य पूर्ण इलाज सुनिश्चित करना है, जो कि रोगी के रक्त से प्लाज्मोडियम परजीवी का तेजी से और पूर्ण उन्मूलन है, ताकि गंभीर बीमारी या मलेरिया को रोका जा सके। मलेरिया होने पर तुरंत कोशिश करनी चाहिए कि रोगी को डॉक्टर के पास ले जाकर जाँच करवाएँ । जाँच में मलेरिया की पुष्टि होने पर तुरंत उपचार शुरू करवाना चाहिए।

मलेरिया में क्लोरोक्विन (Chloroquine) जैसी एंटी-मलेरियल दवा (Anti-malarial Medicine) दी जाती है। इस दवा के दुष्प्रभाव हो सकते हैं, इसलिए यह दवा डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं लेनी चाहिए। रोगी को पूरा आराम करने देना चाहिए। उसे हर 6 घंटे में पैरासिटामोल (Paracetamol) देनी चाहिए और बार-बार पानी व तरल पदार्थों का सेवन करवाना चाहिए।

रोकथाम या बचाव के उपाय (Measures of Prevention): मलेरिया की रोकथाम या बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. सोते समय मच्छरदानी लगाकर सोना चाहिए ताकि मच्छर न काट सकें।
  2. मच्छरों के पैदा होने वाले स्थान पर मच्छरों को मारने वाली दवाई का छिड़काव करना चाहिए ताकि मच्छर पैदा ही न हो सकें।
  3. रोगी को कुनैन की गोलियाँ खानी चाहिएँ।
  4. घरों के आसपास गंदा पानी इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए।
  5. नमी और गंदे स्थानों पर डी०डी०टी० (D.D.T.) का छिड़काव करना चाहिए ताकि मच्छर पैदा ही न हो सकें।
  6. रोगी के उपयोग किए हुए कपड़े व बर्तनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए अर्थात् इन्हें उपयोग करने से पहले कीटाणु-रहित कर देना चाहिए।
  7. रोगी का कमरा अलग होना चाहिए।

प्रश्न 9.
तपेदिक अथवा क्षय रोग (Tuberculosis – T.B.) के फैलने के कारण, लक्षण और बचाव के उपाय लिखें।
अथवा
तपेदिक रोग (टी०बी०) मुख्यतः कितने प्रकार के होते हैं? इनके लक्षण और रोकथाम के उपाय लिखें।
उत्तर:
तपेदिक रोग (Tuberculosis – T.B.)-तपेदिक या क्षय रोग वायु द्वारा फैलने वाला एक संक्रामक रोग है। यह रोग माइकोबैक्टीरिम ट्यूबरकुलोसिस (Mycobacterium Tuberculosis) नामक रोगाणु द्वारा फैलता है। शुरू में इस रोग का पता नहीं चल पाता परंतु इसके बढ़ जाने पर यह सेहत को अत्यधिक नुकसान पहुंचाता है।

प्रकार (Types)-तपेदिक रोग मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं
(i) फुफ्फुसीय तपेदिक रोग (Pulmonary Tuberculosis),
(ii) अफुफ्फुसीय तपेदिक रोग (Non-pulmonary Tuberculosis)।

(i) फुफ्फुसीय तपेदिक रोग (Pulmonary Tuberculosis): फुफ्फुसीय तपेदिक रोग का प्रभाव फेफड़ों पर होता है। इस रोग के फैलने के कारण रोगी द्वारा थूकी बलगम तथा उनकी साँस होती है, जो वायु में रोगाणु छोड़ देती है और वह स्वस्थ व्यक्ति को रोगग्रस्त कर देती है।
लक्षण (Symptoms):

  1. तपेदिक में थोड़ा काम करने पर रोगी की साँस फूलने लगती है।
  2. शरीर का भार कम होने लगता है।
  3. भूख कम लगती है।
  4. थूक वाली खाँसी रहती है। कभी-कभी थूक के साथ खून भी आ जाता है।
  5. बलगम पीले रंग की आती है।

रोकथाम या बचाव के उपाय (Measures of Prevention):

  • रोगी व उसके द्वारा प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं को अलग रखना चाहिए।
  • रोगी की बलगम की जाँच करवाते रहना चाहिए।
  • तपेदिक होने पर औषधि या दवाई का, जब तक यह रोग ठीक न हो जाए, सेवन करते रहना चाहिए।
  • रोगी को पूर्ण आराम करना चाहिए। उसे किसी अच्छे सेनीटोरियम में रखा जाए।
  • रोगी को संतुलित और पौष्टिक भोजन देना चाहिए।
  • रोगी की थूक और बलगम को इधर-उधर नहीं फेंकना चाहिए। हो सके तो उसे ज़मीन में दबा देना चाहिए।
  • रोग से बचने के लिए बी०सी०जी० (B.C.G.) का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।

(ii) अफुफ्फुसीय तपेदिक रोग (Non-pulmonary Tuberculosis): अफुफ्फुसीय तपेदिक रोग बच्चों में अधिक होता है। अफुफ्फुसीय तपेदिक अर्थात् लसिका ग्रंथियों, हड्डियों, जोड़ों, गले, आंतड़ियों, गुर्दे आदि के तपेदिक का मुख्य कारण भोजन में पौष्टिक तत्त्वों की कमी होता है।

लक्षण (Symptoms):

  1. पेट में कब्ज रहती है।
  2. रोगग्रस्त ग्रंथियाँ व आंतड़ियाँ आदि काम नहीं करतीं।
  3. ज्वर रहने लगता है।
  4. शरीर कमजोर होने लगता है।
  5. रोगग्रस्त व्यक्ति जल्दी थकान अनुभव करता है।

रोकथाम या बचाव के उपाय (Measures of Prevention):

  1. रोग के लक्षण देखते ही तुरंत इलाज करवाना चाहिए।
  2. रोगी को कुछ समय के लिए सेनीटोरियम में रखना चाहिए।
  3. रोगी को पूर्ण आराम देना चाहिए।
  4. रोगी को खुली हवा में रखा जाए।
  5. रोगी को संतुलित और पौष्टिक आहार देना चाहिए।
  6. रोगी को बी०सी०जी० का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।

प्रश्न 10.
डेंगू बुखार के फैलने के माध्यमों तथा इलाज व रोकथाम का वर्णन करें।
अथवा
डेंगू फीवर के फैलने के कारणों, लक्षणों तथा नियंत्रण व बचाव के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
डेंगू बुखार के फैलने के कारण/माध्यम (Causes/Modes of Spreading Dengue):
डेंगू बुखार को हड्डी तोड़ ज्वर (Break Bone Fever) भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है जो मच्छरों के काटने से फैलता है। डेंगू बुखार हवा, पानी या साथ खाने से नहीं फैलता। यह एडिज़ इजिप्टी (Aedes Aegypti) नामक मादा प्रजाति के मच्छरों के काटने से फैलता है। जब ये मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटते हैं तो उसके शरीर में डेंगू के विषाणु छोड़ देते हैं जिससे स्वस्थ व्यक्ति भी इस बुखार से ग्रस्त हो जाता है।

लक्षण (Symptoms):

  1. अचानक तीव्र बुखार होना।
  2. सिर, बदन और आँखों में दर्द होना।
  3. माँसपेशियों व जोड़ों में दर्द होना।
  4. शरीर पर लाल चकते निकल आना।
  5. भूख कम लगना और चक्कर आना।
  6. शरीर में कमजोरी होना आदि।

इलाज (Treatment):
डेंगू बुखार की कोई विशेष दवा नहीं है, पर फिर भी इस रोग के कारण शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों से बचने के लिए रोगी को डॉक्टर की सलाहानुसार उचित समय पर दवा लेनी चाहिए और उचित आराम करना चाहिए। इस बुखार में एस्प्रीन या अन्य गैर-स्टेरोइड दवाएँ लेने से रक्त-स्राव बढ़ सकता है।

इसलिए रोगग्रस्त रोगियों को डॉक्टर की सलाहानुसार इनकी जगह पर पेरासिटामोल (Paracetamol) आदि देनी चाहिए। रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या बहुत कम होने या रक्त-स्राव शुरू होने पर रक्त चढ़वा लेना चाहिए। तरल पदार्थों का अधिक-से-अधिक सेवन करना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो सके।

नियंत्रण एवं बचाव के उपाय (Measures of Control and Prevention): डेंगू बुखार के नियंत्रण एवं बचाव के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

  1. डेंगू बुखार से बचने का एकमात्र उपाय मच्छरों से स्वयं को बचाना है। इसलिए मच्छरों के काटने से स्वयं को बचाएँ।
  2. एडिज़ प्रजाति के मच्छर दिन में काटते हैं। इसलिए इनसे बचने के लिए अपने शरीर को कपड़ों से ढककर रखना चाहिए, ताकि ये मच्छर काट न सकें।
  3. मच्छर प्रभावित क्षेत्रों से दूर रहना चाहिए और मच्छरों के पैदा होने वाली जगह को नष्ट कर देना चाहिए।
  4. घर के आस-पास गंदा पानी इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए।
  5. ऐसी जगह जहाँ डेंगू फैल रहा है वहाँ पानी को इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए।
  6. बदलते मौसम में अगर आप किसी नई जगह पर जा रहे हैं तो मच्छरों से बचने के उत्पादों का प्रयोग करें।
  7. घर में और खुले बर्तनों में पानी जमा न होने दें। यदि आप ड्रम या बाल्टी में पानी जमा करना चाहें तो उन्हें ढककर रखें।
  8. घर में कीटनाशक दवाई का छिड़काव करवाएँ।
  9. यदि आपके आस-पास कोई व्यक्ति डेंगू बुखार से ग्रस्त है तो उसकी सूचना स्वास्थ्य विभाग एवं नगर निगम को अवश्य दें, जिससे तुरंत मच्छर विरोधी उपाय किया जा सके।
  10. डॉक्टर की सलाहानुसार घरेलू नुस्खों को अपनाना चाहिए; जैसे पपीते के पत्तों का रस व गिलोए का पानी आदि का सेवन करना।

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प्रश्न 11.
प्लेग (Plague) नामक महामारी के फैलने के कारण, इलाज तथा बचाव के उपाय लिखें।
अथवा
प्लेग कैसे फैलता है? इस रोग के लक्षणों तथा रोकथाम के उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्लेग के फैलने के कारण (Causes of Transmission of Plague):
प्लेग एक ऐसा संक्रामक रोग है जो भयानक महामारी का रूप धारण कर लेता है। यह रोग पास्चुरेला पेस्टिस (Pasteurella Pestis) नामक जीवाणु द्वारा फैलता है। वैसे प्लेग चूहों को होता है। इसके पिस्सू पहले चूहे में प्रवेश कर उसे मार देते हैं और फिर ये मनुष्य को काटकर उसे प्लेग-ग्रस्त कर देते हैं। इस तरह से यह रोग मनुष्यों में फैल जाता है। प्लेग एक ऐसा संक्रामक रोग है जो भयानक महामारी का रूप धारण कर लेता है। यह रोग गाँव या शहर में किसी एक को हो जाने से बड़ी तेजी से चारों तरफ फैल जाता है। इसी कारण प्लेग को महामारी कहा जाता है।

लक्षण (Symptoms): प्लेग के लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. जांघ व गर्दन आदि पर गिल्टियाँ निकल आती हैं।
  2. अचानक तेज बुखार हो जाता है। यह 103°F से 106°F तक हो सकता है।
  3. आँखें लाल हो जाती हैं और इनमें से पानी बहने लगता है।
  4. प्यास अधिक लगने लगती है।
  5. शरीर कमजोर हो जाता है।

इलाज (Treatment): प्लेग एक बहुत ही गंभीर बीमारी है, लेकिन इसका इलाज संभव है। प्लेग का इलाज आम एंटीबायोटिक दवाओं से किया जा सकता है। सामान्यतया इसके इलाज में निम्नलिखित को शामिल किया जाता है

  1. शक्तिशाली व प्रभावी एंटीबायोटिक; जैसे जेंटामाइसिन (Gentamicin) व सिप्रोफ्लोक्सासिन (Ciprofloxacin)।
  2. इंट्रावेनस फ्लूड (नसों में दिए जाने वाले द्रव्य)।
  3. ऑक्सीजन।
  4. साँस लेने में मदद करने वाले उपकरण।

प्लेग से ग्रस्त व्यक्ति का जितनी जल्दी इलाज किया जाए, उसकी उतनी ही जल्दी पूरी तरह से स्वस्थ होने की संभावना बढ़ जाती है। इसका इलाज रोग ठीक होने के कई सप्ताह तक निरंतर चलता रहता है । इलाज के दौरान रोगी को अलग रखना चाहिए, ताकि किसी अन्य व्यक्ति में यह संक्रमण फैलने से रोका जा सकें।

रोकथाम या बचाव के उपाय (Measures of Prevention): प्लेग की रोकथाम या बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. पिस्सू और चूहों को मारने के लिए की मार दवाई का प्रयोग करना चाहिए।
  2. रोगी को अलग कमरे में रखना चाहिए।
  3. रोग के लक्षण देखते ही स्वास्थ्य विभाग को इसकी सूचना देनी चाहिए।
  4. घर की सफाई के लिए प्रयोग किए जाने वाले पानी में कीटाणुनाशक दवाई आदि डालनी चाहिए।
  5. मरे हुए चूहों को दबा देना चाहिए ताकि पिस्सुओं को नष्ट किया जा सके।
  6. प्लेग का टीका लगवाना चाहिए।
  7. गर्म पानी से नहाना चाहिए।
  8. यह एक जानलेवा बीमारी है, इसलिए इसका डॉक्टरी इलाज करवाना चाहिए।
  9. रोगी को संतुलित एवं पौष्टिक आहार देना चाहिए।

प्रश्न 12.
रोग निवारक क्षमता क्या है? इसके प्रकारों का वर्णन करते हुए इसको प्राप्त करने के उपायों का वर्णन करें।
अथवा
रोग प्रतिरोधक शक्ति (Immunity Power) से आपका क्या अभिप्राय है? यह कितने प्रकार की होती है तथा इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर:
रोग प्रतिरोधक शक्ति या क्षमता का अर्थ (Meaning of Immunity Power):
हमारा वातावरण अनेक सूक्ष्म जीवाणुओं से भरा हुआ है। इनमें से बहुत से जीवाणु या रोगाणु हमें रोगग्रस्त कर देते हैं। लेकिन हम सभी इन रोगाणुओं से प्रभावित नहीं होते। ऐसा हमारे शरीर में उपस्थित ऐसी शक्ति या क्षमता के कारण होता है जो इन रोगाणुओं से हमारी सुरक्षा करती है। हमारे शरीर में उपस्थित इस रोग रोधक शक्ति को ही रोग प्रतिरोधक शक्ति या रोग निवारक क्षमता कहते हैं । इस शक्ति को जीवन रक्षक शक्ति’ भी कहा जाता है।

रोग प्रतिरोधक शक्ति के प्रकार (Types of Immunity Power): रोग प्रतिरोधक शक्ति मुख्यतः दो प्रकार की होती है
1. प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक शक्ति (Natural Immunity Power),
2. अर्जित या कृत्रिम रोग प्रतिरोधक शक्ति (Acquired or Artificial Immunity Power)।

1. प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक शक्ति (Natural Immunity Power):
इस शक्ति को जन्मजात (Innate) रोग प्रतिरोधक शक्ति भी कहते हैं, क्योंकि यह शक्ति हमें जन्म से प्राप्त होती है। यह शक्ति अर्जित नहीं की जाती, बल्कि जन्मजात होती है। यह हमें जाति, वंश या व्यक्तिगत प्रवृत्तियों के कारण प्राप्त होती है।

2. अर्जित या कृत्रिम रोग प्रतिरोधक शक्ति (Acquired or Artificial Immunity Power):
कृत्रिम रोग प्रतिरोधक शक्ति को हम अपने जीवन-काल में अर्जित करते हैं। यह शक्ति निम्नलिखित दो प्रकार की होती है

(i) सक्रिय कृत्रिम रोग प्रतिरोधक क्षमता (Active Artificial Immunity Power):
इसको सक्रिय अर्जित रोग निवारक शक्ति भी कहते हैं। सक्रिय कृत्रिम रोग प्रतिरोधक रोग प्रतिरोधक क्षमता उसे कहते हैं जो व्यक्ति को उसके ही शरीर के तंतुओं के प्रयत्नों से अर्जित होती है; जैसे एक बार चेचक हो जाने पर उसके शरीर में ऐसी प्रतिविष (एंटीबॉडीज) तैयार हो जाते हैं, जिससे उस व्यक्ति को पुनः चेचक नहीं होता।

(ii) निष्क्रिय कृत्रिम रोग प्रतिरोधक क्षमता (Passive Artificial Immunity Power):
इसको अक्रिय अर्जित रोग निवारक शक्ति भी कहते हैं। इसके अंतर्गत किसी पशु में कुछ समय के अंतराल पर सूक्ष्म मात्रा में रोग के कीटाणु पहुँचाए जाते हैं। इससे उस पशु के रक्त में धीरे-धीरे उस रोग के लिए प्रतिवर्ष उत्पन्न हो जाते हैं। फिर उस पशु का रक्त-वारि (Serum) लेकर मनुष्य के शरीर में पहुँचाया जाता है। उसके शरीर में यह प्रतिवर्ष (Antibodies) रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देता है। इस प्रकार से अर्जित रोग प्रतिरोधक क्षमता स्थायी होती है।

रोग प्रतिरोधक शक्ति को प्राप्त करने के उपाय (Achieving Measures of Immunity Power): रोग प्रतिरोधक शक्ति को प्राप्त करने के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. संतुलित एवं पौष्टिक आहार लेने से।
  2. व्यक्तिगत स्वास्थ्य या सफाई की ओर विशेष ध्यान देने से।
  3. स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्द्धक वातावरण में रहने से।
  4. नियमित व्यायाम व आसन करने से।
  5. मादक पदार्थों के सेवन निषेध से।
  6. टीकाकरण द्वारा।
  7.  नियमित दिनचर्या एवं डॉक्टरी जाँच से आदि।

उपर्युक्त उपायों द्वारा इस शक्ति को प्राप्त किया या बढ़ाया जा सकता है। प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक शक्ति जन्मजात होती है अर्थात् इसे अर्जित नहीं किया जा सकता, परंतु इस शक्ति को इन उपायों द्वारा बढ़ाया अवश्य जा सकता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
संक्रामक तथा असंक्रामक रोगों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संक्रामक तथा असंक्रामक रोगों में निम्नलिखित अंतर हैंसंक्रामक रोग असंक्रामक रोग

1. संक्रामक रोग (Communicable Diseases) वे रोग हैं जो रोगी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क में आने से अन्य व्यक्तियों को लग जाते हैं।1. असंक्रामक रोग (Non-communicable Diseases) वे रोग हैं जो रोगी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क में आने से नहीं लगते।
2. ये रोग संक्रमण से फैलते हैं।2. ये रोग संक्रमण से नहीं फैलते।
3. रेबीज, खसरा, चेचक, काली खाँसी आदि संक्रामक रोगों के उदाहरण हैं।3. विभिन्न प्रकार के मानसिक रोग, बवासीर, मधुमेह आदि असंक्रामक रोगों के उदाहरण हैं।
4. ये रोग रोगी के पास उठने-बैठने, उसके साथ खाना खाने और उसके प्रयोग की गई वस्तुओं का इस्तेमाल करने से फैलते हैं।4. ये रोग रोगी के पास उठने-बैठने, उसके साथ खाना खाने और उसके द्वारा प्रयोग की गई वस्तुओं का इस्तेमाल से फैलते हैं। करने से नहीं फैलते।
5. इन रोगों के रोगवाहक विशेष प्रकार के सूक्ष्म रोगाणु (जीवाणु, कीटाणु, विषाणु) होते हैं।5. ये रोग संतुलित व पौष्टिक आहार के अभाव के कारण फैलते हैं।

प्रश्न 2.
संक्रामक रोगों के मुख्य लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संक्रामक रोगों के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. छूत के रोगों में मिलते-जुलते लक्षण पाए जाते हैं। इनमें बीमारी बढ़ने पर शरीर बेजान व कमजोर हो जाता है।
  2. पूरे शरीर में पीड़ा होने लगती है जो असहनीय होती है।
  3. सिर में दर्द होने लगता है।
  4. शरीर का तापमान बढ़ जाता है।
  5. शरीर में कंपकंपी होने लगती है और रोगी को ठंड लगने लगती है।
  6. बुखार तेजी से बढ़ने लगता है।
  7. छूत के रोगों में उल्टियाँ तथा पाचन क्रिया में गड़बड़ी होने से दस्त भी लग जाते हैं।

प्रश्न 3.
पानी से फैलने वाली छूत की बीमारियों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
पानी से फैलने वाली छूत की बीमारियाँ हैजा, पेचिश, टायफाइड या मियादी बुखार हैं।

1. हैजा-हैजा गंदे पानी एवं दूषित भोजन द्वारा फैलने वाली एक छूत की बीमारी है। इसको ‘विसूचिका’ भी कहा जाता है। इस रोग का संप्राप्ति काल कुछ घंटों से लेकर 4 या 5 दिनों तक होता है। इस रोग के जीवाणु को विब्रिओ कोलेरी (Vibrio-Cholerae) कहा जाता है। सामान्य रूप से इसे कोमा बेसिलस कहा जाता है। मक्खियाँ इस रोग को फैलाने का काम करती हैं। हैजे के रोगाणु पानी एवं भोजन के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करके हमें रोगग्रस्त कर देते हैं।

2. पेचिश-पेचिश एंट अमीबा हिस्टोलिटिका नामक जीवाणु से फैलता है। यह रोग खाद्य पदार्थों पर मक्खियों के बैठने से अधिक फैलता है। इसके अतिरिक्त गंदे पानी के कारण भी यह रोग हो जाता है। इस रोग के कीटाणु व्यक्ति की आंतड़ियों पर आक्रमण करके उनको जख्मी कर देते हैं, जिससे रोगी बहुत कमजोर हो जाता है।

3. टायफाइड या मियादी बुखार-टायफाइड को मियादी बुखार तथा आंत्रिक ज्वर आदि नामों से भी जाना जाता है। इस रोग का कारण सालमोनेला टाइफी (Salmonella Typhi) नामक दण्डाणु होते हैं। ये दण्डाणु (Bacillus) स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में वायु, पानी व भोजन के माध्यम से प्रवेश करके उसे रोगग्रस्त कर देते हैं, परन्तु इस रोग का मुख्य कारण दूषित पानी होता है। यह बुखार 7 से 14 या इससे अधिक दिन भी रह सकता है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 संक्रामक रोग

प्रश्न 4.
संक्रामक या छूत के रोगों की रोकथाम एवं बचाव के कोई चार उपाय लिखें। अथवा संक्रामक रोगों से कैसे बचा जा सकता है?
उत्तरं:
संक्रामक या छूत के रोगों की रोकथाम एवं बचाव के चार उपाय निम्नलिखित हैं
1. पीने का पानी साफ-सुथरा एवं कीटाणुरहित होना चाहिए, क्योंकि दूषित जल में अनेक प्रकार के संक्रामक रोगाणु उत्पन्न हो जाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। इसलिए पानी हमेशा क्लोरीन-युक्त या उबालकर पीना चाहिए।

2. परिवार के सभी सदस्यों को नियमित रोग निरोधक टीके लगवाने चाहिएँ, क्योंकि इससे संक्रामक रोगों से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

3. पर्यावर्णिक स्वास्थ्य या आस-पड़ोस के स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। गलियों में गंदा पानी इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि उसमें अनेक प्रकार के कीटाणु तथा मच्छर पैदा हो जाते हैं जो अनेक रोग फैलाते हैं।

4. संक्रामक रोगों को रोकने एवं नियंत्रित करने के लिए संक्रामक रोग से ग्रस्त व्यक्ति को उस समय तक स्वस्थ व्यक्तियों या घर के अन्य सदस्यों से अलग रखना चाहिए जब तक कि वह पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो जाए।

प्रश्न 5.
संक्रामक रोगों के फैलने के विभिन्न माध्यम कौन-कौन-से हैं? अथवा संक्रामक रोगों के रोगाणु किन-किन साधनों से हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं? अथवा संक्रामक रोग किन-किन कारणों से फैलते हैं?
उत्तर:
संक्रामक रोगों के रोगाणु निम्नलिखित साधनों या माध्यमों द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं
1. वायु द्वारा-साँस लेने से वायु द्वारा कीटाणु शरीर में प्रविष्ट होकर व्यक्ति को बीमार कर देते हैं। काली खाँसी, चेचक, जुकाम आदि रोग वायु द्वारा ही फैलते हैं।

2. जल द्वारा-हैजा, टायफाइड, पेचिश आदि रोगों के रोगाणु पीने वाले जल में मिलकर शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। दूषित जल में बर्तन धोने, फल-सब्जियों को धोने से भी रोगों का संक्रमण होता है।

3. भोजन द्वारा-भोजन और अन्य दूषित खाने वाले पदार्थों के द्वारा रोगाणु शरीर में पहुँचकर स्वस्थ व्यक्ति को रोगी बना देते हैं। बासी और ठंडा भोजन अधिक नुकसानदायक होता है।

4. संपर्क द्वारा-रोगी के कपड़ों, बिस्तरों, बर्तन, तौलिए या सीधे संपर्क द्वारा संक्रामक रोगों के रोगाणु स्वस्थ व्यक्ति तक पहुँच कर हानि पहुंचाते हैं।

5. जंतुओं/कीटों द्वारा-कुछ जंतु या कीट जैसे; मक्खी, मच्छर, चूहा आदि रोग फैलाने के कारण बनते हैं। भोजन को दूषित कर या सीधे शरीर में पहुँचकर रोगाणु रोग के कारण बन जाते हैं । मलेरिया मच्छर के काटने और रेबीज़ पागल कुत्ते के काटने तथा प्लेग चूहे के द्वारा फैलता है।

प्रश्न 6.
मलेरिया रोग कैसे फैलता है? इसके लक्षण लिखें।
उत्तर:
मलेरिया रोग मादा एनाफ्लीज नामक मच्छर के काटने से फैलता है। जब यह मच्छर किसी को काटता है तो उसके रक्त में मलेरिया के कीटाणु छोड़ देता है जिससे मच्छर के द्वारा काटे जाने वाले व्यक्ति को मलेरिया हो जाता है। इसे मौसमी बुखार भी कहते हैं। लक्षण:

  1. रोगी को ठंड लगने लगती है और शरीर काँपने लगता है।
  2. शरीर का तापमान 103°F से 106°F तक हो जाता है।
  3. कभी-कभी उल्टी भी आ सकती है।
  4. बुखार उतरने पर पसीना काफी आता है।
  5. शरीर बेजान और कमजोर हो जाता है।

प्रश्न 7.
हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis-B) के लक्षण और बचाव के उपाय लिखें।
उत्तर:

  • हेपेटाइटिस-बी के लक्षण:
    1. शरीर का पीला पड़ जाना।
    2. अधिक थकावट महसूस होना।
    3. भूख न लगना।
    4. सिर-दर्द व बुखार होना।
    5. आँखों के सफेद भाग का पीला पड़ जाना।
  • बचाव के उपाय:
    • मल-मूत्र की सफाई का उचित प्रबन्ध करना चाहिए।
    • व्यक्तिगत सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
    • महामारी फैलने के दौरान उबले हुए और क्लोरीन-युक्त पानी का प्रयोग करना चाहिए।
    • हेपेटाइटिस-बी के टीके अवश्य लगवाएँ।

प्रश्न 8.
टैटनस के फैलने के कारण और बचाव के उपाय लिखें।
उत्तर:
टैटनस के फैलने के कारण: टैटनस एक बहुत खतरनाक संक्रामक रोग है। यह रोग एक विशेष प्रकार के बैक्टीरिया से फैलता है। किसी खुले घाव के अंदर रोगाणुओं के घुस जाने के कारण यह रोग उत्पन्न हो जाता है। बचाव के उपाय:

  1. जख्म को साफ पानी से अच्छी तरह से धोना चाहिए और जख्म को रोगाणुओं से मुक्त करने के लिए डिटॉल या सैवलॉन आदि का प्रयोग करना चाहिए।
  2. चोट लगते ही टैटनस का टीका अवश्य लगवाएँ।
  3. रोगी को अलग कमरे में रखना चाहिए।

प्रश्न 9.
हेपेटाइटिस-सी (Hepatitis-C) के फैलने का कारण और रोकथाम के उपाय लिखें।
उत्तर:
हेपेटाइटिस-सी के फैलने के कारण-हेपेटाइटिस-सी अथवा सीरम हेपेटाइटिस एक घातक संक्रामक रोग है। यह रोग शरीर में दूषित रक्त या रक्त-पदार्थों के चढ़ने से फैलता है। यह रोग शरीर के किसी अंग का प्रत्यारोपण करने से भी फैल सकता है। रोकथाम के उपाय:

  1. रोगी को भरपूर आराम करना चाहिए।
  2. भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
  3. व्यक्तिगत सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
  4. डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए और उचित दवाइयों का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 10.
एड्स क्या है? यह कैसे फैलता है?
अथवा एड्स (AIDS) के फैलने के माध्यमों/कारणों का उल्लेख करें।
उत्तर:
एड्स (AIDS) का पूरा नाम एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशेंसी सिंड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome) है। यह स्वयं में कोई रोग नहीं है, लेकिन इससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है जिससे शरीर अनेक संक्रमणों से ग्रस्त हो जाता है। अत: यह एक जानलेवा बीमारी है जिससे शरीर की प्रतिरक्षित प्रणाली बहुत प्रभावित होती है। इससे प्रभावित रोगी की मृत्यु निश्चित है। एड्स के विषाणु रक्त व वीर्य के द्वारा फैलते हैं।

इसके फैलने के माध्यम निम्नलिखित हैं:

  1. उपचार के लिए लगाए जाने वाले टीके में दूषित सिरिंजों का प्रयोग करना।
  2. स्वास्थ्य संबंधी गलत आदतें व व्यक्तिगत सफाई की ओर ध्यान न देना।
  3. यौन संबंधी गलत आदतें।
  4. दूसरे के उपयोग किए टूथ-ब्रश व रेजर या ब्लेड आदि का प्रयोग करना।
  5. रक्त चढ़ाने संबंधी बरती जाने वाली असावधानी आदि।

प्रश्न 11.
तपेदिक से बचाव के उपायों का उल्लेख करें।
उत्तर:
तपेदिक से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. रोगी की प्रत्येक वस्तु को अलग रखना चाहिए।
  2. रोगी की बलगम की जाँच करवाते रहना चाहिए।
  3. तपेदिक होने पर औषधि का, जब तक यह रोग ठीक न हो जाए, सेवन करते रहना चाहिए।
  4. रोगी को पूर्ण आराम करना चाहिए। उसे किसी अच्छे सेनीटोरियम में रखना चाहिए।
  5. रोगी को संतुलित और पौष्टिक भोजन देना चाहिए।
  6. रोग से बचने के लिए बी०सी०जी० (B.C.G.) का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।

प्रश्न 12.
प्लेग की रोकथाम के उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्लेग की रोकथाम के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. पिस्सू और चूहों को मारने के लिए कीड़े-मार दवाई का प्रयोग करना चाहिए।
  2. रोगी को अलग कमरे में रखना चाहिए।
  3. रोग के लक्षण देखते ही स्वास्थ्य विभाग को इसकी सूचना देनी चाहिए।
  4. घर की सफाई के लिए प्रयोग किए जाने वाले पानी में कीटाणुनाशक दवाई आदि डालनी चाहिए।
  5. मरे हुए चूहों को दबा देना चाहिए ताकि पिस्सुओं को नष्ट किया जा सके।
  6. प्लेग का टीका लगवाना चाहिए।

प्रश्न 13.
संक्रामक रोगों को फैलने से रोकने के लिए आपके स्कूल में सावधानी हेतु कौन-कौन-से उपाय किए जाने आवश्यक हैं?
उत्तर:
संक्रामक रोगों को फैलने से रोकने के लिए स्कूल में सावधानी हेतु निम्नलिखित उपाय किए जाने आवश्यक हैं

  1. पेयजल का क्लोरीनेशन कर रोगाणुहीन किया जाना चाहिए।
  2. कैंटीन में सभी खाद्य पदार्थों को ढककर रखना चाहिए।
  3. बासी व गले-सड़े खाद्य पदार्थों व फलों के बेचने पर रोक होनी चाहिए।
  4. बच्चों को व्यक्तिगत व सामुदायिक स्वच्छता के बारे में पूरी जानकारी दी जानी चाहिए।
  5. सभी बच्चों का संक्रामक रोगों से बचाव के लिए टीकाकरण किया जाना चाहिए।
  6. समय-समय पर विद्यार्थियों को इन रोगों से संबंधित जानकारी दी जानी चाहिए।

प्रश्न 14.
रेबीज़ से बचाव के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रेबीज़ से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. किसी पागल जानवर के काटने पर तुरंत नजदीकी चिकित्सा केन्द्र को सूचित करना चाहिए।
  2. सभी पालतू कुत्तों को पागलपन से बचाने के लिए टीके लगवाने चाहिएँ।
  3. किसी पागल जानवर से दूर रहना चाहिए।
  4. तुरंत एंटी-रेबीज़ टीकाकरण का पूरा कोर्स करवा लेना चाहिए।

प्रश्न 15.
छूत की बीमारियों के बारे में जानकारी दीजिए।
उत्तर:
छूत की प्रमुख बीमारियों की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है

  1. हैजा-हैजा का रोगवाहक विब्रिओ कोलेरी है। यह दूषित जल के पीने या संक्रमित खाद्य-पदार्थों के खाने से होता है।
  2. टायफाइड-यह सालमोनेला टाइफी नामक रोगवाहक द्वारा फैलता है। सिर दर्द, नाक से रक्त का बहना, त्वचा पर चकते पड़ना, छाती पर लाल दाने निकलना टायफाइड रोग के प्रमुख लक्षण हैं।
  3. छोटी माता-इसका रोगवाहक वेरीसेला जोस्टर विषाणु है। इसमें रोगी के शरीर पर चकते, पीठ में दर्द, तेज बुखार तथा सिर-दर्द होता है।
  4. रेबीज़-यह रेबीज़ विषाणु द्वारा फैलता है। पागल कुत्ते, बिल्ली, बंदर, खरगोश आदि के काटने से फैलता है। रेबीज़ से प्रभावित व्यक्ति पानी से डरता है।
  5. खाँसी-जुकाम-यह राइनो विषाणु द्वारा होता है। नाक से पानी बहना, आँखों का लाल होना, जलन होना व सिर-दर्द आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं।
  6. एड्स- यह लैंगिक संचारी रोग की श्रेणी में आता है जो HIV-III विषाणु के द्वारा फैलता है। एड्स से प्रभावित व्यक्ति का प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर पड़ जाता है जिसके कारण उसका शरीर हल्के संक्रमण का मुकाबला करने में भी असमर्थ हो जाता है।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
संक्रामक या छूत के रोग (Communicable Disease) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वे रोग जो रोगी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क में आने से एक-दूसरे को लग जाते हैं, संक्रामक रोग कहलाते हैं; जैसे हैजा, मियादी बुखार, तपेदिक आदि। इस प्रकार के रोग रोगी के पास उठने-बैठने, उसके साथ खाना खाने या उसके द्वारा प्रयोग की गई वस्तुओं का उपयोग करने से हो जाते हैं।

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प्रश्न 2.
असंक्रामक रोगों से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
असंक्रामक रोगों (Non-communicable Diseases) से तात्पर्य उन रोगों से है जो रोगी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क में आने से नहीं फैलते अर्थात् जो रोग संक्रमण से न फैलें; जैसे सिर-दर्द, बवासीर, मधुमेह आदि। इस प्रकार के रोग रोगी के साथ खाना-खाने या उसके द्वारा प्रयोग की गई वस्तुओं का इस्तेमाल करने से नहीं फैलते।

प्रश्न 3.
संसर्ग व संचारी रोग क्या होते हैं? उदाहरण दें।
अथवा
संक्रामक रोग कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
विषाणु, बैक्टीरिया, कीटाणुओं के आधार पर संक्रामक रोग दो प्रकार के होते हैं
1. संसर्ग रोग-ये रोग रोगी के प्रत्यक्ष रूप से संपर्क से लगते हैं; जैसे खसरा, काली खाँसी, जुकाम आदि।
2. संचारी रोग-ये रोग रोगी के अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क से लगते हैं; जैसे हैजा, मियादी बुखार, पेचिश आदि।

प्रश्न 4.
रोग निवारक क्षमता या प्रतिरोधक शक्ति से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
हमारा वातावरण अनेक सूक्ष्म जीवाणुओं से भरा हुआ है। इनमें से बहुत से जीवाणु या रोगाणु हमें रोगग्रस्त कर देते हैं। लेकिन हम सभी इन रोगाणुओं से प्रभावित नहीं होते। ऐसा हमारे शरीर में उपस्थित ऐसी शक्ति या क्षमता के कारण होता है जो इन रोगाणुओं से हमारी सुरक्षा करती है। हमारे शरीर में उपस्थित इस रोग रोधक शक्ति को ही रोग प्रतिरोधक शक्ति या रोग निवारक क्षमता कहते हैं। इस शक्ति को ‘जीवन रक्षक शक्ति’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 5.
एड्स से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
एड्स (AIDS) का पूरा नाम है-एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशेंसी सिंड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome)। एड्स स्वयं में कोई रोग नहीं है, लेकिन प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर शरीर अनेक रोगों/संक्रमण से ग्रसित हो जाता है। एड्स एक जानलेवा बीमारी है क्योंकि एच०आई०वी० (HIV) नामक वायरस मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर उसकी रोगों से लड़ने वाली शक्ति (प्रतिरोधक शक्ति) कम कर देता है और शरीर अनेक संक्रमणों से ग्रस्त हो जाता है।

प्रश्न 6.
संक्रामक रोगों के सामान्य चिह्न या लक्षण बताएँ।
उत्तर:
शरीर व सिर में दर्द होना,  प्यास लगना, बुखार होना, बेचैनी रहना।

प्रश्न 7.
संक्रामक रोगों की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  1. सभी संक्रामक रोगों के सूक्ष्म-जीवाणु भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं,
  2. इन रोगों का संप्राप्ति काल लगभग निश्चित होता है।

प्रश्न 8.
संक्रामक रोगों की विभिन्न अवस्थाएँ लिखें।
उत्तर:

  1. उद्भव अवस्था (Incubation Stage),
  2. आक्रमण अवस्था (Invasion Stage),
  3. क्षीण अवस्था (Decline Stage),
  4. स्वास्थ्य लाभ अवस्था (Convalescent Stage)।

प्रश्न 9.
हेपेटाइटिस-बी के कोई दो लक्षण बताएँ।
उत्तर:

  1. शरीर का पीला पड़ जाना,
  2. अधिक थकावट महसूस होना।

प्रश्न 10.
वायु द्वारा संक्रमण कैसे होता है?
उत्तर:
रोगी व्यक्ति जब वायु में साँस छोड़ता है, छींकता है या खाँसी करता है तो रोगाणु वायु में मिल जाते हैं। इसी वायु में अन्य व्यक्ति द्वारा श्वसन करने से ये रोगाणु उसके शरीर में पहुँच जाते हैं। खाँसी-जुकाम, निमोनिया व क्षय रोग इसी के माध्यम से फैलते हैं।

प्रश्न 11.
डी०पी०टी० (D.P.T.) का क्या अर्थ है?
उत्तर:
डी०पी०टी० को ट्रिपल एंटीजन भी कहा जाता है। डी०पी०टी० का अर्थ है-गलघोंटू/डिप्थीरिया (Diphtheria), काली खाँसी (Pertussis), व धनुवति/टैटनस (Tetanus)। यह टीका (वैक्सीन) इन तीनों रोगों के खिलाफ प्रतिरक्षित करता है।

प्रश्न 12.
तपेदिक क्या है?
उत्तर:
तपेदिक या क्षय रोग वायु द्वारा फैलने वाला एक संक्रामक रोग है। यह रोग माइकोबैक्टीरिम ट्यूबरकुलोसिस नामक रोगाणु द्वारा फैलता है। शुरू में इस रोग का पता नहीं चल पाता, परंतु इसके बढ़ जाने पर यह सेहत को अत्यधिक नुकसान पहुंचाता है।

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प्रश्न 13.
रोग क्या है?
उत्तर:
शारीरिक, मनोवैज्ञानिक या शरीर की किसी अन्य कार्य-प्रणाली में अवरोध की स्थिति को, रोग (Disease) कहा जाता है। रोगी व्यक्ति अपने-आपको आराम की स्थिति में अनुभव नहीं करता।

प्रश्न 14.
टेटनस रोग की रोकथाम के कोई दो उपाय लिखें।
उत्तर:

  1. चोट लगते ही टैंटनस का टीका अवश्य लगवाएँ,
  2. रोगी को अलग कमरे में रखना चाहिए।

प्रश्न 15.
कीड़ों-मकौड़ों (कीटों) द्वारा फैलने वाले रोगों के नाम लिखें।
उत्तर:
मलेरिया,  फाइलेरिया, प्लेग, खुजली, जिगर की सड़न, पीला ज्वर, कालाजार आदि।

प्रश्न 16.
वायु या साँस के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोगों के नाम बताएँ।
उत्तर:
तपेदिक, खसरा, छोटी माता, काली खाँसी, इन्फ्लूएंजा आदि।

प्रश्न 17.
मलेरिया कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
मलेरिया मुख्यतः चार प्रकार का होता है

  1. प्लाज्मोडियम विवेक्स (Plasmodium Vivax),
  2. प्लाज्मोडियम ओवेल (Plasmodium Ovale),
  3. प्लाज्मोडियम मलेरी (Plasmodium Malariae),
  4. प्लाज्मोडियम फैल्सिपैरम (Plasmodium Falciparum)।

प्रश्न 18.
प्लेग को महामारी क्यों कहते हैं?
उत्तर:
प्लेग एक ऐसा संक्रामक रोग है जो भयानक महामारी का रूप धारण कर लेता है। यह रोग गाँव या शहर में किसी एक को हो जाने से बड़ी तेजी से चारों तरफ फैल जाता है। इसी कारण प्लेग को महामारी कहते हैं।

प्रश्न 19.
मच्छरों की कितनी प्रजातियाँ होती हैं? उन्हें कितनी श्रेणियों में रखा जाता है?
उत्तर:
मच्छरों की लगभग 1500 प्रजातियाँ होती हैं जिन्हें तीन श्रेणियों में रखा जाता है

  1. क्यूलैक्स,
  2. एनाफ्लीज,
  3. एडिज़ इजिप्टी।

प्रश्न 20.
रोगी को अलग रखने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
छूत के रोग संक्रमण से फैलते हैं। जिस संक्रमण रोग से रोगी संक्रमित है, वह घर या परिवार के अन्य सदस्यों में न फैले, उसके बचाव हेतु रोगी को अलग कमरे में रखा जाता है। इसे ही रोगी को अलग रखना कहा जाता है।

प्रश्न 21.
डेंगू कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
डेंगू मुख्यत: तीन प्रकार का होता है

  1. सामान्य डेंगू,
  2. रक्त-स्राव डेंगू,
  3. डेंगू शोक सिंड्रोम।

प्रश्न 22.
रोग कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
रोग मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:

  1. संचरणीय या संक्रामक या छूत के रोग (Communicable Diseases)
  2. असंचरणीय या असंक्रामक रोग (Non-communicable Diseases)।

प्रश्न 23.
हेपेटाइटिस-सी के उपचार के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हेपेटाइटिस-सी के उपचार की इंटरफेरोन, राइबावेरिन व अमान्टिडिन दवाइयाँ ही उपलब्ध हैं। ये इसके उपचार के लिए लाभदायक हैं। होम्योपेथिक दवाइयों से भी हम इस रोग की गति को नियंत्रित कर सकते हैं। इन दवाइयों से इस बीमारी के लक्षणों को कम किया जा सकता है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 संक्रामक रोग

प्रश्न 24.
टैटनस कैसे फैलता है?
उत्तर:
टैटनस रोग का मुख्य कारण बैक्टीरियम क्लोस्ट्रीडियम टेटानी नामक बैक्टीरिया होता है। यह बैक्टीरिया मिट्टी, धूल या जानवरों के मल में रहता है। मिट्टी व धूल के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करता है। इस प्रकार किसी खुले घाव के अंदर बैक्टीरिया के प्रवेश हो जाने के कारण यह रोग फैलता है।

प्रश्न 25.
डेंगू बुखार कैसे फैलता है?
उत्तर:
डेंगू बुखार एडिज़ इजिप्टी नामक प्रजाति के मच्छरों (Aegypti Mosquitoes) के काटने से फैलता है। जब ये मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटते हैं तो उसके शरीर में डेंगू के विषाणु छोड़ देते हैं। शरीर में विषाणु के प्रवेश के लगभग एक सप्ताह बाद डेंगू बुखार के लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं।

HBSE 11th Class Physical Education संक्रामक रोग Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ पश्न। (Objective Type Questions)

भाग-I : एक वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
AIDS का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
Acquired Immuno-deficiency Syndrome (एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशेंसी सिंड्रोम)।

प्रश्न 2.
कोई दो संचारी रोगों के नाम लिखें।
उत्तर:
(1) मियादी बुखार,
(2) पेचिश।

प्रश्न 3.
क्या मलेरिया का कोई वैक्सीन होता है?
उत्तर:
हाँ, मलेरिया का वैक्सीन होता है।

प्रश्न 4.
‘एड्स दिवस’ प्रतिवर्ष किस दिन मनाया जाता है?
उत्तर: एड्स दिवस’ प्रतिवर्ष 1 दिसम्बर को मनाया जाता है।

प्रश्न 5.
मलेरिया रोग का संप्राप्ति काल कितना होता है? उत्तर-मलेरिया रोग का संप्राप्ति काल 7 से 11 दिन तक होता है।

प्रश्न 6.
क्या एड्स (AIDS) स्पर्श से फैलता है?
उत्तर:
नहीं, यह रोग असुरक्षित यौन संबंधों, HIV माँ से बच्चे को तथा संदूषित खून से फैलता है।

प्रश्न 7.
चिकित्सा-शास्त्र का जनक किसे माना जाता है?
उत्तर:
चिकित्सा-शास्त्र का जनक हिप्पोक्रेट्स (Hippocrates) को माना जाता है।

प्रश्न 8.
तपेदिक के दंडाणु/जीवाणु की खोज किसने की थी?
उत्तर:
तपेदिक के दंडाणु की खोज डॉ० रॉबर्ट कोच (Dr. Robert Koach) ने की थी।

प्रश्न 9.
बच्चों में फैलने वाले कोई दो संक्रामक रोगों के नाम बताएँ।
उत्तर:
खसरा, काली खाँसी।

प्रश्न 10.
डेंगू बुखार किस मच्छर के काटने से फैलता है?
उत्तर:
डेंगू बुखार एडिज़ इजिप्टी नामक मच्छर के काटने से फैलता है।

प्रश्न 11.
किस बीमारी में रोगी को पानी से डर लगता है?
उत्तर:
रेबीज़ में रोगी को पानी से डर लगता है।

प्रश्न 12.
HIV का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
Human Immuno-deficiency Virus.

प्रश्न 13.
चूहे कौन-सा रोग फैलाते हैं? उत्तर-चूहे प्लेग नामक रोग फैलाते हैं।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 संक्रामक रोग

प्रश्न 14.
कोई दो संसर्गी रोगों के नाम लिखें।
उत्तर:
जुकाम,  खसरा।

प्रश्न 15.
“रोकथाम इलाज से बेहतर है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन डेसिडेरियस इरास्मस ने कहा।

प्रश्न 16.
पागल कुत्ते के काटने से कौन-सा रोग लग जाता है?
उत्तर:
पागल कुत्ते के काटने से रेबीज़ नामक रोग लग जाता है।

प्रश्न 17.
रॉबर्ट कोच ने क्षय रोग अथवा तपेदिक रोग की खोज कब की?
उत्तर:
रॉबर्ट कोच ने क्षय रोग अथवा तपेदिक रोग की खोज वर्ष 1882 में की।

प्रश्न 18.
तपेदिक कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
तपेदिक दो प्रकार का होता है:
फुफ्फुसीय तपेदिक, अफुफ्फुसीय तपेदिक।

प्रश्न 19. श
रीर में रोगों से लड़ने वाली शक्ति को क्या कहते हैं?
उत्तर:
शरीर में रोगों से लड़ने वाली शक्ति को रोग प्रतिरोधक शक्ति कहते हैं।

प्रश्न 20.
कोई दो असंक्रामक रोगों के नाम लिखें।
उत्तर:
मधुमेह,  बवासीर।

प्रश्न 21.
एड्स के वायरस का नाम क्या है? उत्तर-एड्स के वायरस का नाम HIV-III है।

प्रश्न 22.
डी०पी०टी० में पी० का क्या अर्थ है?
उत्तर:
डी०पी०टी० में पी० का अर्थ Pertussis (काली खाँसी) है।

प्रश्न 23.
डी०पी०टी० में टी० का क्या अर्थ है?
उत्तर:
डी०पी०टी० में टी० का अर्थ tanus’ (टैटनस) है।

प्रश्न 24.
किस रोग को हड्डी तोड़ ज्वर (Bone Break Fever) कहते हैं?
उत्तर:
डेंगू बुखार को हड्डी तोड़ ज्वर कहते हैं।

प्रश्न 25.
टेटनस के बैक्टीरिया का नाम बताएँ।
उत्तर:
बैक्टीरियम क्लोस्ट्रीडियम टेटानी।

प्रश्न 26.
बी०सी०जी० का टीका कौन-सी बीमारी से संबंधित है?
उत्तर:
बी०सी०जी० का टीका तपेदिक या क्षय रोग नामक बीमारी से संबंधित है।

भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. संक्रामक रोग मुख्यतः कितने प्रकार के होते हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(A) दो

2. संसर्ग रोग (Contagious Diseases) फैलते हैं
(A) रोगी के प्रत्यक्ष संपर्क से
(B) रोगी के अप्रत्यक्ष संपर्क से
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर;
(A) रोगी के प्रत्यक्ष संपर्क से

3. संचारी रोग (Infectious Diseases) फैलते हैं
(A) रोगी के प्रत्यक्ष संपर्क से
(B) रोगी के अप्रत्यक्ष संपर्क से
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) रोगी के अप्रत्यक्ष संपर्क से

4. वायु या साँस के माध्यम से फैलने वाला रोग है
(A) खसरा
(B) काली खाँसी
(C) तपेदिक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. कीटों द्वारा फैलने वाला रोग है
(A) मलेरिया
(B) डेंगू
(C) फाइलेरिया
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

6. पानी के माध्यम से फैलने वाला रोग है
(A) हैजा
(B) पेचिश
(C) मियादी बुखार
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

7. मलेरिया का रोगवाहक मच्छर है
(A) मादा एनाफ्लीज मच्छर
(B) क्यूलैक्स मच्छर
(C) एडिज़ इजिप्टी मच्छर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) मादा एनाफ्लीज मच्छर

8. पागल कुत्ते के काटने से फैलने वाला रोग है
(A) चेचक
(B) खसरा
(C) रेबीज़
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) रेबीज़

9. तपेदिक की खोज रॉबर्ट कोच ने कब की?
(A) वर्ष 1856 में
(B) वर्ष 18270 में
(C) वर्ष 1882 में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) वर्ष 1882 में

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10. डेंगू ज्वर किस मच्छर द्वारा फैलता है?
(A) क्यूलैक्स मच्छर द्वारा
(B) एडिज़ इजिप्टी मच्छर द्वारा
(C) मादा एनाफ्लीज मच्छर द्वारा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) एडिज़ इजिप्टी मच्छर द्वारा

11. चूहों द्वारा फैलने वाला रोग है
(A) प्लेग
(B) पेचिश
(C) डिफ़्थीरिया
(D) चेचक
उत्तर:
(A) प्लेग

12. टेटनस रोग से बचाव के लिए कौन-सा टीका (वैक्सीन) लगाया जाता है?
(A) डी०पी०टी०
(B) टी०ए०बी०
(C) एम०एम०आर०
(D) बी०सी०जी०
उत्तर:
(A) डी०पी०टी०

13. डी०पी०टी० में डी० का अर्थ है
(A) Diphtheria
(B) Dengue
(C) Dysentery
(D) Diarrhoea
उत्तर:
(A) Diphtheria

14. हड्डी तोड़ बुखार (Break Bone Fever) किस रोग को कहते हैं?
(A) मलेरिया को
(B) हैजा को
(C) डेंगू को
(D) तपेदिक को
उत्तर:
(C) डेंगू को

15. निम्नलिखित में से संक्रामक/छूत का रोग नहीं है
(A) डेंगू
(B) मलेरिया
(C) कैंसर
(D) उपर्युक्त सभी उत्तर:
(C) कैंसर

16. रेबीज़ एक रोग है
(A) जीवाणु जन्य
(B) विषाणु जन्य
(C) प्रोटोजन्य
(D) कवक जन्य
उत्तर:
(B) विषाणु जन्य

17. टैटनस का लक्षण है
(A) गर्दन में अकड़न होना
(B) जबड़ा सिकुड़ना
(C) माँसपेशियों में सूजन आना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

18. टेटनस के जीवाणु पाए जाते हैं
(A) मिट्टी में
(B) पानी में
(C) कूड़े-कचरे में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) मिट्टी में

19. मलेरिया का कारण है
(A) प्रोटोजोआ
(B) जीवाणु
(C) वायरस
(D) कवक
उत्तर:
(A) प्रोटोजोआ

20. किस रोग को मौसमी बुखार भी कहा जाता है?
(A) टायफाइड
(B) मलेरिया
(C) चेचक
(D) खसरा
उत्तर:
(B) मलेरिया

भाग-III : निम्नलिखित कथनों के उत्तर सही या गलत अथवा हाँ या नहीं में दें

1. चिकित्सा-शास्त्र का जनक रॉबर्ट कोच है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

2. बच्चों को रोगों से बचाव हेतु टीकाकरण (Vaccination) आवश्यक है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

3. मलेरिया नर एनाफ्लीज मच्छर के काटने से होता है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

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4. छूत की बीमारियाँ पानी से भी फैलती हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

5. छूत की बीमारियाँ स्पर्श से भी फैलती हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

6. मनुष्यों में प्लेग प्रायः पागल कुत्ते के काटने से होता है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

7. छूत की बीमारियाँ वायु के माध्यम से फैलती हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
सही

8. मधुमेह एक संक्रामक रोग है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

9. एड्स एक असंक्रामक रोग है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

10. संक्रामक रोग वायु, पानी व कीड़ों से फैलते हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

11. चेचक, प्लेग व मलेरिया संक्रामक रोग हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

12. मलेरिया को मौसमी बुखार भी कहा जाता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

13. टी०बी० का इलाज संभव है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

14. सभी प्रकार के बैक्टीरिया हमारे शरीर के लिए हानिकारक होते हैं । (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

15. बच्चों को बी०सी०जी० (B.C.G.) का टीका अवश्य लगवाना चाहिए। (हाँ/नहीं)
उत्तर:

16. क्या तपेदिक का इलाज संभव है? (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

भाग-IV : रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. …………….. रोग के कारण रोगी को पानी से डर लगने लगता है।
उत्तर:
रेबीज़,

2. ……………. ने निष्पादन किया था कि बीमारियाँ कीटाणुओं के कारण फैलती हैं।
उत्तर:
रॉबर्ट कोच,

3. ……………. वे रोग हैं जो रोगी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क में आने से नहीं लगते।
उत्तर:
असंक्रामक रोग,

4. मानसिक रोग, रक्तचाप, रिकेट्स, मधुमेह आदि रोग …………….. रोगों के उदाहरण हैं।
उत्तर:
असंक्रामक,

5. …………….. मादा एनाफ्लीज मच्छर के काटने से होता है।
उत्तर:
मलेरिया,

6. चिकित्सा-शास्त्र का पिता (जनक) …………….. को माना जाता है।
उत्तर:
हिप्पोक्रेट्स,

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7. दाद, खुजली आदि ऐसे रोग हैं जो रोगी के …………….. संपर्क के द्वारा फैलते हैं।
उत्तर:
अप्रत्यक्ष,

8. रॉबर्ट कोच ने तपेदिक की खोज वर्ष ……… में की।
उत्तर:
1882,

9. पागल कुत्ते के काटने से …………….. रोग होता है।
उत्तर:
रेबीज़,

10. रोग प्रतिरोधक शक्ति को …………… शक्ति भी कहा जाता है।
उत्तर:
जीवन रक्षक।

संक्रामक रोग Summary

संक्रामक रोग परिचय

संक्रामक छूत के रोग (Communicable Diseases):
सभी प्रकार के संक्रामक रोग किसी विशेष प्रकार के रोगाणु से पनपते हैं। ये रोगाणु हमारे शरीर में प्रवेश कर हमें रोगग्रस्त कर देते हैं। जब स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में रोगाणु (वायरस, बैक्टीरिया, कीटाणु, फफूंदी आदि) जल, वायु, भोजन तथा स्पर्श के माध्यम से प्रवेश करके उसके स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं या उसे रोगग्रस्त करते हैं, तो वे संक्रामक या छूत के रोग (Communicable Diseases) कहलाते हैं। विषाणु, बैक्टीरिया व कीटाणुओं के आधार पर ये रोग दो प्रकार के होते हैं- (1) संसर्ग रोग, (2) संचारी रोग।

संक्रामक रोगों की रोकथाम व नियंत्रण के उपाय (Measures of Prevention and Control of Communicable Diseases): संक्रामक या छूत के रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण के कुछ उपाय निम्नलिखित हैं

  • पीने का पानी साफ-सुथरा एवं कीटाणुरहित होना चाहिए, क्योंकि दूषित जल में अनेक प्रकार के संक्रामक रोगाणु उत्पन्न हो जाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। इसलिए पानी हमेशा क्लोरीन-युक्त या उबालकर पीना चाहिए।
  • परिवार के सभी सदस्यों को नियमित रोग निरोधक टीके लगवाने चाहिएँ, क्योंकि इससे संक्रामक रोगों से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  • पर्यावर्णिक स्वास्थ्य या आस-पड़ोस के स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। गलियों में गंदा पानी इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि उसमें अनेक प्रकार के कीटाणु तथा मच्छर पैदा हो जाते हैं जो अनेक रोग फैलाते हैं।
  • संक्रामक रोगों को रोकने एवं नियंत्रित करने के लिए संक्रामक रोग से ग्रस्त व्यक्ति को उस समय तक स्वस्थ व्यक्तियों या घर के अन्य सदस्यों से अलग रखना चाहिए जब तक कि वह पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो जाए।

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HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 2 स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा

Haryana State Board HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 2 स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physical Education Solutions Chapter 2 स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा

HBSE 11th Class Physical Education स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा Textbook Questions and Answers

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य का क्या अर्थ है? इसके पहलुओं का वर्णन कीजिए। अथवा स्वास्थ्य की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? इसके आयामों या रूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Health):
स्वास्थ्य से सभी परिचित हैं। सामान्यतया पारस्परिक व रूढ़िगत संदर्भ में स्वास्थ्य से अभिप्राय बीमारी की अनुपस्थिति से लगाया जाता है, परंतु यह स्वास्थ्य का विस्तृत अर्थ नहीं है। स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है, जिससे वह मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसके सभी शारीरिक संस्थान व्यवस्थित रूप से सुचारू होते हैं।

इसका अर्थ न केवल बीमारी अथवा शारीरिक कमजोरी की अनुपस्थिति है, अपितु शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना भी है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति का मन या आत्मा प्रसन्नचित्त और शरीर रोग-मुक्त रहता है। विभिन्न विद्वानों ने स्वास्थ्य को अग्रलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

  1. जे०एफ० विलियम्स (J.E. Williams) के अनुसार, “स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएँ प्रदान करता है।”
  2. विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-W.H.O.) के अनुसार, “स्वास्थ्य केवल रोग या विकृति की अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुख की स्थिति को कहते हैं।”
  3. वैबस्टर्स विश्वकोश (Webster’s Encyclopedia) के कथनानुसार, “उच्चतम जीवनयापन के लिए व्यक्तिगत, भावनात्मक और शारीरिक स्रोतों को संगठित करने की व्यक्ति की अवस्था को स्वास्थ्य कहते हैं।”
  4. रोजर बेकन (Roger Bacon) के अनुसार, “स्वस्थ शरीर आत्मा का अतिथि-भवन और दुर्बल तथा रुग्ण शरीर आत्मा का कारागृह है।”
  5. इमर्जन (Emerson) के अनुसार, ‘स्वास्थ्य ही प्रथम पूँजी है।”

संक्षेप में, स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है जिसमें वह मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसमें उसके शारीरिक अंग, आंतरिक तथा बाहरी रूप से अपने पर्यावरण से व्यवस्थित होते हैं। स्वास्थ्य के विभिन्न पहलू या आयाम (Aspects or Dimensions of Health): स्वास्थ्य एक गतिशील प्रक्रिया है जो हमारी जीवन-शैली को प्रभावित करता है। इसके विभिन्न आयाम या पहलू निम्नलिखित हैं

1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health):
शारीरिक स्वास्थ्य संपूर्ण स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। इसके अंतर्गत हमें व्यक्तिगत स्वास्थ्य की जानकारी प्राप्त होती है। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि उसके सभी शारीरिक संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हों। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को न केवल शरीर के विभिन्न अंगों की रचना एवं उनके कार्यों की जानकारी होनी चाहिए, अपितु उनको स्वस्थ रखने की भी जानकारी होनी चाहिए।

शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समाज व देश के विकास एवं प्रगति में भी सहायक होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने शारीरिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाने हेतु संतुलित एवं पौष्टिक भोजन, व्यक्तिगत सफाई, नियमित व्यायाम व चिकित्सा जाँच और नशीले पदार्थों के निषेध आदि की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health):
मानसिक या बौद्धिक स्वास्थ्य के बिना सभी स्वास्थ्य अधूरे हैं, क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य का संबंध मन की प्रसन्नता व शांति से है अर्थात् इसका संबंध तनाव व दबाव मुक्ति से है। यदि व्यक्ति का मन चिंतित एवं अशांत रहेगा तो उसका कोई भी विकास पूर्ण नहीं होगा। आधुनिक युग में मानव जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि उसका जीवन निरंतर तनाव, दबाव व चिंताओं से घिरा रहता है।

परन्तु जिन व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य उत्तम होता है वे आधुनिक संदर्भ में भी स्वयं को चिंतामुक्त अनुभव करते हैं। मानसिक स्वास्थ्य से व्यक्ति के बौद्धिक विकास और जीवन के अनुभवों को सीखने की क्षमता में वृद्धि होती है। लेकिन मानसिक अस्वस्थता के कारण न केवल मानसिक रोग हो जाते हैं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य भी गिर जाता है और शारीरिक कार्य-कुशलता में भी कमी आ जाती है। इसलिए व्यक्ति को अपने मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए तनाव व दबाव से दूर रहना चाहिए; उचित विश्राम करना चाहिए और सकारात्मक सोच रखनी चाहिए।

3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social Health):
सामाजिक स्वास्थ्य भी स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है। यह व्यक्ति की सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति में संतोषजनक व्यक्तिगत संबंधों की क्षमता में वृद्धि करता है। व्यक्ति सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज के नियमों, मान-मर्यादाओं आदि का पालन करता है।

यदि एक व्यक्ति अपने परिवार व समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत है तो उसे सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति कहा जाता है। सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति सैद्धांतिक, वैचारिक, आत्मनिर्भर व जागरूक होता है। वह अनेक सामाजिक गुणों; जैसे आत्म-संयम, धैर्य, बंधुत्व, आत्म-विश्वास आदि से पूर्ण होता है। समाज, देश, परिवार व जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण रचनात्मक व सकारात्मक होता है।

4. संवेगात्मक या भावनात्मक स्वास्थ्य (Emotional Health):
संवेगात्मक स्वास्थ्य में व्यक्ति के अपने संवेग; जैसे भय, गुस्सा, सुख, क्रोध, दु:ख, प्यार आदि शामिल होते हैं। इसके अंतर्गत स्वस्थ व्यक्ति का अपने संवेगों पर पूर्ण नियंत्रण होता है। वह प्रत्येक परिस्थिति में नियंत्रित व्यवहार करता है। हार-जीत पर वह अपने संवेगों को नियंत्रित रखता है और अपने परिवार, मित्रों व अन्य व्यक्तियों से मिल-जुलकर रहता है। जिस व्यक्ति का अपने संवेगों पर नियंत्रण होता है वह बड़ी-से-बड़ी परिस्थितियों में भी स्वयं को संभाल सकता है और निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है।

5. आध्यात्मिक स्वास्थ्य (Spiritual Health):
आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति उसे कहा जाता है जो नैतिक नियमों का पालन करता हो, दूसरों के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करता हो, सत्य व न्याय में विश्वास रखने वाला हो और जो दूसरों को किसी भी प्रकार का कोई नुकसान न पहुँचाता हो आदि। ऐसा व्यक्ति व्यक्तिगत मूल्यों से संबंधित होता है। दूसरों के प्रति सहानुभूति एवं सहयोग की भावना रखना, सहायता करने की इच्छा आदि आध्यात्मिक स्वास्थ्य के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं। आध्यात्मिक स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु मुख्यत: योग व ध्यान सबसे उत्तम माध्यम हैं। इनके द्वारा आत्मिक शांति व आंतद्रिक प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 2 स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य क्या है? इसके महत्त्व या उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य का अर्थ (Meaning of Health):
स्वास्थ्य से सभी परिचित हैं। सामान्यतया पारस्परिक व रूढ़िगत संदर्भ में स्वास्थ्य से अभिप्राय बीमारी की अनुपस्थिति से लगाया जाता है, परंतु यह स्वास्थ्य का विस्तृत अर्थ नहीं है। स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है, जिसमें वह मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसके सभी शारीरिक संस्थान व्यवस्थित रूप से सुचारू होते हैं। इसका अर्थ न केवल बीमारी अथवा शारीरिक कमजोरी की अनुपस्थिति है, अपितु शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना भी है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति का मन या आत्मा प्रसन्नचित्त और शरीर रोग-मुक्त रहता है।

स्वास्थ्य का महत्त्व या उपयोगिता (Importance or Utility of Health):
अच्छे स्वास्थ्य के बिना कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम नहीं कर सकता। अस्वस्थ व्यक्ति समाज की एक लाभदायक इकाई होते हुए भी बोझ-सा बन जाता है। एक प्रसिद्ध कहावत है-“स्वास्थ्य ही धन है।” यदि हम संपूर्ण रूप से स्वस्थ हैं तो हम जिंदगी में बहुत-सा धन कमा सकते हैं।

अच्छे स्वास्थ्य का न केवल व्यक्ति को लाभ होता है, बल्कि जिस समाज या देश में वह रहता है, उस पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। साइरस (Syrus) के अनुसार, “अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ-दोनों जीवन के सबसे बड़े आशीर्वाद हैं।” इसलिए स्वास्थ्य का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है; जैसे

  1. स्वास्थ्य मानव व समाज का आधार स्तंभ है। यह वास्तव में खुशी, सफलता और आनंदमयी जीवन की कुंजी है।
  2. अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी होते हैं।
  3. स्वास्थ्य के महत्त्व के बारे में अरस्तू ने कहा-“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है।” इस कथन से भी हमारे जीवन में स्वास्थ्य की उपयोगिता व्यक्त हो जाती है।
  4. स्वास्थ्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुधारने व निखारने में सहायक होता है।
  5. स्वास्थ्य से हमारा जीवन संतुलित, आनंदमय एवं सुखमय रहता है।
  6. स्वास्थ्य हमारी जीवन-शैली को बदलने में हमारी सहायता करता है।
  7. किसी भी देश के नागरिकों के स्वास्थ्य व आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष संबंध पाया जाता है। यदि किसी देश के नागरिक शारीरिक रूप से स्वस्थ होंगे तो उस देश का आर्थिक विकास भी उचित दिशा में होगा।
  8. स्वास्थ्य से हमारी कार्यक्षमता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
  9. अच्छे स्वास्थ्य से हमारे शारीरिक अंगों की कार्य-प्रणाली सुचारू रूप से चलती है।

निष्कर्ष (Conclusion):
स्वास्थ्य एक गतिशील प्रक्रिया है जो हमारे शारीरिक संस्थानों को प्रभावित करती है और हमारी जीवन-शैली में आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण बदलाव करती है। अच्छा स्वास्थ्य रोगों से मुक्त होने के अतिरिक्त किसी व्यक्ति की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक खुशहाली एवं प्रसन्नता को व्यक्त करता है। यह हमेशा अच्छा महसूस करवाता है।

वर्जिल के अनुसार, “सबसे बड़ा धन स्वास्थ्य है।” इस तरह हमारे जीवन में स्वास्थ्य बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। स्वास्थ्य की महत्ता बताते हुए महात्मा गाँधी ने कहा”स्वास्थ्य ही असली धन है न कि सोने एवं चाँदी के टुकड़े।” स्वास्थ्य ही हमारा असली धन है। जब हम इसे खो देते हैं तभी हमें इसका असली मूल्य पता चलता है।

प्रश्न 3.
स्वस्थ रहने के लिए व्यक्ति को किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए?
अथवा
अच्छे स्वास्थ्य हेतु हमें किन-किन नियमों या सिद्धांतों का पालन करना चाहिए?
उत्तर:
स्वस्थ रहने के लिए हमें निम्नलिखित आवश्यक नियम या सिद्धांत ध्यान में रखने चाहिएँ
1. शारीरिक संस्थानों या अंगों का ज्ञान (Knowledge of Body System or Organs):
हमें अपने शरीर के संस्थानों या अंगों; जैसे दिल, आमाशय, फेफड़े, तिल्ली, गुर्दे, कंकाल संस्थान, माँसपेशी संस्थान, उत्सर्जन संस्थान आदि का ज्ञान होना चाहिए।

2. डॉक्टरी जाँच (Medical Checkup):
समय-समय पर अपने शरीर की डॉक्टरी जाँच करवानी चाहिए। इससे हम अपने स्वास्थ्य को बनाए रख सकते हैं। डॉक्टरी जाँच या चिकित्सा जाँच से हम समय पर अपने शारीरिक विकारों या बीमारियों को दूर कर सकते हैं।

3. निद्रा व विश्राम (Sleep and Rest):
रात को समय पर सोना चाहिए और शरीर को पूरा विश्राम देना आवश्यक है।

4. व्यायाम (Exercises):
प्रतिदिन व्यायाम या सैर आदि करनी आवश्यक है। हमें नियमित योग एवं आसन आदि भी करने चाहिएँ।

5. नाक द्वारा साँस लेना (Breathing by Nose):
हमें हमेशा नाक द्वारा साँस लेनी चाहिए। नाक से साँस लेने से हमारे शरीर को शुद्ध हवा प्राप्त होती है, क्योंकि नाक के बाल हवा में उपस्थित धूल-कणों को शरीर के अंदर जाने से रोक लेते हैं।

6. साफ वस्त्र (Clean Cloth):
हमें हमेशा साफ-सुथरे और ऋतु के अनुसार कपड़े पहनने चाहिएँ।

7. शुद्ध एवं स्वच्छ वातावरण (Pure and Clean Environment):
हमें हमेशा शुद्ध एवं स्वच्छ वातावरण में रहना चाहिए।

8. संतुलित भोजन (Balanced Diet):
हमें ताजा, पौष्टिक और संतुलित आहार खाना चाहिए।

9. अच्छा आचरण (Good Conduct):
हमेशा अपना आचरण व विचार शुद्ध व सकारात्मक रखने चाहिएँ और हमेशा खुश एवं संतुष्ट रहना चाहिए। कभी भी किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए। हमेशा बड़ों का आदर करना चाहिए।

10. मादक वस्तुओं से परहेज (Away from Intoxicants):
मादक वस्तुओं का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसलिए हमें नशीली वस्तुओं; जैसे अफीम, शराब, चरस, गाँजा, तंबाकू आदि से स्वयं को बचाना चाहिए। दूसरों को भी नशीली वस्तुओं के दुष्प्रभावों से अवगत करवाना चाहिए।

11. उचित मनोरंजन (Proper Recreation):
आज के इस दबाव एवं तनाव-युक्त युग में स्वास्थ्य को बनाए रखने हेतु मनोरंजनात्मक क्रियाओं का होना अति आवश्यक है। हमें मनोरंजनात्मक क्रियाओं में अवश्य भाग लेना चाहिए। इनसे हमें आनंद एवं संतुष्टि की प्राप्ति होती है।

12. नियमित दिनचर्या (Daily Routine):
समय पर उठना, समय पर सोना, समय पर खाना, ठीक ढंग से खड़े होना, बैठना, चलना, दौड़ना आदि क्रियाओं से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। व्यक्तिगत स्वच्छता, कपड़ों की सफाई व आस-पास की सफाई दिनचर्या के आवश्यक अंग होने चाहिएँ।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 2 स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 4.
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों या तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं
1. वंशानुक्रमण (Heredity):
व्यक्ति के मानसिक व शारीरिक गुण जीन (Genes) द्वारा निर्धारित होते हैं। जीन या गुणसूत्र को ही वंशानुक्रमण (Heredity) की इकाई माना जाता है। इसी कारण वंशानुक्रमण द्वारा व्यक्ति का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। वंशानुक्रमण संबंधी गुण; जैसे ऊँचाई, चेहरा, रक्त समूह, रंग आदि माता-पिता के गुणसूत्रों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। बहुत-सी बीमारियाँ हैं जो वंशानुक्रमण द्वारा आगामी पीढ़ी को भी हस्तान्तरित हो जाती हैं।

2. वातावरण (Environment):
अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ वातावरण का होना बहुत आवश्यक होता है। यदि वातावरण प्रदूषित है तो ऐसे वातावरण में व्यक्ति अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं।

3. संतुलित व पौष्टिक भोजन (Balanced and Nutritive Diet):
भोजन शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और शरीर को विभिन्न प्रकार की बीमारियों से बचाता है। यदि हमारा भोजन संतुलित एवं पौष्टिक है तो इसका हमारे स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा और यदि भोजन में पौष्टिक तत्त्वों का अभाव है तो इसका हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत. प्रभाव पड़ेगा।

4. सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण (Social and Cultural Environment):
वातावरण के अतिरिक्त व्यक्ति का अपना सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण भी उसके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। यदि व्यक्ति और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण के बीच असामंजस्य है तो इसका उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसीलिए व्यक्ति को अपने अच्छे स्वास्थ्य हेतु सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहिए। इसमें न केवल उसका कल्याण है बल्कि समाज व देश का भी कल्याण है।

5. आर्थिक दशाएँ (Economic Conditions):
स्वास्थ्य आर्थिक दशाओं से भी प्रभावित होता है। यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है अर्थात् गरीब है तो वह अपने परिवार के सदस्यों के लिए न तो संतुलित आहार की व्यवस्था कर पाएगा और न ही उन्हें चिकित्सा सुविधाएँ दे पाएगा। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी है तो वह अपने परिवार के सदस्यों की सभी आवश्यकताएँ पूर्ण कर पाएगा।

6. अन्य कारण (Other Factors):
स्वास्थ्य को जीवन शैली भौतिक व जैविक वातावरण, स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर, मनोवैज्ञानिक कारक और पारिवारिक कल्याण सेवाएँ भी प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 5.
स्वास्थ्य शिक्षा को परिभाषित कीजिए। इसके मुख्य उद्देश्यों पर प्रकाश डालें।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा से आपका क्या अभिप्राय है? विस्तार से लिखिए।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा की परिभाषा देकर, अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थव परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों या पहलुओं के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाने में सहायता करते हैं। स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने विचार निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किए हैं
1. डॉ० थॉमस वुड (Dr. Thomas Wood) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”

2. सोफी (Sophie) के कथनानुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े व्यवहार से संबंधित है।”

3. प्रसिद्ध स्वास्थ्य शिक्षक ग्राऊंट (Grount) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा से अभिप्राय है कि स्वास्थ्य के ज्ञान को शिक्षा द्वारा व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार में बदलना है।”

4. विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-W.H.O.) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ रहने की स्थिति को कहते हैं न कि केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ या रोगमुक्त होने को।” इस प्रकार स्वास्थ्य शिक्षा से अभिप्राय उन सभी बातों और आदतों से है जो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं।

स्वास्थ्य शिक्षा के मुख्य उद्देश्य (Main Objectives of Health Education): स्वास्थ्य शिक्षा के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
1. सामाजिक गुणों का विकास (Development of Social Qualities):
स्वास्थ्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति में अच्छे सामाजिक गुणों का विकास करके अच्छा नागरिक बनाना है। स्वास्थ्य शिक्षा जहाँ सर्वपक्षीय विकास करके अच्छे व्यक्तित्व को निखारती है, वहीं कई प्रकार के सामाजिक गुणों; जैसे सहयोग, त्याग-भावना, साहस, विश्वास, संवेगों पर नियंत्रण एवं सहनशीलता आदि का भी विकास करती है।

2. सर्वपक्षीय विकास (All Round Development):
सर्वपक्षीय विकास से अभिप्राय व्यक्ति के सभी पक्षों का विकास करना है। वह शारीरिक पक्ष से बलवान, मानसिक पक्ष से तेज़, भावात्मक पक्ष से संतुलित, बौद्धिक पक्ष से समझदार और सामाजिक पक्ष से निपुण हो। सर्वपक्षीय विकास से व्यक्ति के व्यक्तित्व में बढ़ोतरी होती है। वह परिवार, समाज और राष्ट्र की संपत्ति बन जाता है।

3. उचित मनोवृत्ति का विकास (Development of Right Attitude):
स्वास्थ्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल निर्देश देकर ही पूरा नहीं किया जा सकता बल्कि इसे पूरा करने के लिए सकारात्मक सोच की अति-आवश्यकता होती है। स्वास्थ्य संबंधी उचित मनोवृत्ति का विकास तभी अस्तित्व में आ सकता है, यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आदतें और व्यवहार इस प्रकार परिवर्तित करे कि वे उसकी आवश्यकताओं का अंग बन जाएँ, तो इससे एक अच्छे समाज और राष्ट्र की नींव रखी जा सकती है।

4. स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान (Knowledge about Health):
पुराने समय में स्वास्थ्य संबंधी बहुत अज्ञानता थी, परन्तु समय बदलने से रेडियो, टी०वी०, अखबारों और पत्रिकाओं ने संक्रामक बीमारियों और उनकी रोकथाम, मानसिक चिंताओं और उन पर नियंत्रण और संतुलित भोजन के गुणों के बारे में वैज्ञानिक ढंग से जानकारी सामान्य लोगों तक पहुँचाई है। यह ज्ञान उन्हें अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए प्रेरित करता है।

5. स्वास्थ्य संबंधी नागरिक ज़िम्मेदारी का विकास (To Develop Civic Sense about Health):
स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य छात्रों या व्यक्तियों में स्वास्थ्य संबंधी नागरिक जिम्मेदारी या उत्तरदायित्व की भावना का विकास करना है। उन्हें नशीली वस्तुओं का सेवन करना, जगह-जगह पर थूकना, खुली जगह पर मल-मूत्र करना और सामाजिक अपराध आदि जैसी बुरी आदतों से दूर रहना चाहिए।

6. आर्थिक कुशलता का विकास (Development of Economic Efficiency):
आर्थिक कुशलता का विकास तभी हो सकता है अगर स्वस्थ व्यक्ति अपने कार्यों को सही ढंग से करें। अस्वस्थ मनुष्य अपनी आर्थिक कुशलता में बढ़ोतरी नहीं कर सकता। स्वस्थ व्यक्ति जहाँ अपनी आर्थिक कुशलता में बढ़ोतरी करता है, वहीं उससे देश की आर्थिक कुशलता में भी बढ़ोतरी होती है। इसीलिए स्वस्थ नागरिक समाज व देश के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं । उनको देश की बहुमूल्य संपत्ति कहना गलत नहीं होगा।

प्रश्न 6.
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या अभिप्राय है? इसकी महत्ता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा क्या है? इसकी हमारे जीवन में क्या उपयोगिता है? वर्णन करें।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ (Meaning of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ उन सभी आदतों से है जो किसी व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं। इसका संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्म-निर्भर बनने में सहायता करते हैं । यह एक ऐसी शिक्षा है जिसके बिना मनुष्य की सारी शिक्षा अधूरी रह जाती है।

स्वास्थ्य शिक्षा की महत्ता या उपयोगिता (Importance or Utility of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) ने कहा था-“एक कमजोर आदमी जिसका शरीर या मन कमजोर है वह कभी भी मजबूत काया का मालिक नहीं बन सकता।” इसलिए स्वास्थ्य की हमारे जीवन में विशेष उपयोगिता है। स्वस्थ व्यक्ति ही समाज, देश आदि के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

इसलिए हमें अपने स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य शिक्षा व्यक्ति को स्वास्थ्य से संबंधित विशेष जानकारियाँ प्रदान करती है, जिनकी पालना करके व्यक्ति संतुष्ट एवं सुखदायी जीवन व्यतीत कर सकता है। अतः स्वास्थ्य शिक्षा हमारे लिए निम्नलिखित कारणों से महत्त्वपूर्ण है

1. स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान (Knowledge about Health):
पुराने समय में बच्चों और साधारण लोगों में स्वास्थ्य संबंधी बहुत अज्ञानता थी, परन्तु समय बदलने से रेडियो, टी०वी०, अखबारों और पत्रिकाओं ने शारीरिक बीमारियों और उनकी रोकथाम, मानसिक चिंताओं और उन पर नियंत्रण और संतुलित भोजन के गुणों के बारे में वैज्ञानिक ढंग से जानकारी साधारण लोगों तक पहुँचाई है। स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान के कारण व्यक्तियों का जीवन सुखमय व आरामदायक हुआ है।

2. स्वास्थ्यप्रद आदतों का विकास (Development of Healthy Habits):
बचपन में बालक जैसी आदतों का शिकार हो जाता है वो आदत बालक के साथ जीवनपर्यन्त चलती है। अतः बालक को स्वास्थ्यप्रद आदतों को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर साफ-सफाई का ध्यान, सुबह जल्दी उठना, रात को जल्दी सोना, खाने-पीने तथा शौच का समय निश्चित होना ऐसी स्वास्थ्यप्रद आदतों को अपनाने से व्यक्ति स्वस्थ तथा दीर्घायु रह सकता है। यह स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा ही सम्भव है।

3. सामाजिक गुणों का विकास (Development of Social Qualities):
स्वास्थ्य शिक्षा व्यक्ति में सामाजिक गुणों का विकास करके उसे अच्छा नागरिक बनाने में सहायक होती है। स्वास्थ्य शिक्षा जहाँ सर्वपक्षीय विकास करके अच्छा व्यक्तित्व निखारती है, वहीं इसके साथ-साथ यह और कई प्रकार के गुणों; जैसे सहयोग, त्याग-भावना, साहस, विश्वास, संवेगों पर नियंत्रण एवं सहनशीलता आदि का भी विकास करती है।

4. प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी प्रदान करना (To Provide First Aid Information):
स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा व्यक्ति को प्राथमिक चिकित्सा प्रदान की जा सकती है जिसके अन्तर्गत व्यक्तियों को प्राथमिक चिकित्सा के सामान्य सिद्धान्तों की तथा विभिन्न परिस्थितियों में जैसे-साँप के काटने पर, डूबने पर, जलने पर, अस्थि टूटने आदि पर प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी प्रदान की जाती है क्योंकि इस प्रकार की दुर्घटनाएँ कहीं भी, कभी भी तथा किसी के भी साथ घट सकती है तथा व्यक्ति का जीवन खतरे में पड़ सकता है। ऐसी जानकारी स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा ही दी जा सकती है।

5. स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक आदतों को बढ़ाने में सहायक (Helpful in increase the Desirable Health Habits):
स्वास्थ्य शिक्षा जीवन के सिद्धांतों एवं स्वास्थ्य की अच्छी आदतों का विकास करती है; जैसे स्वच्छ वातावरण में रहना, पौष्टिक व संतुलित भोजन करना आदि।

6. जागरूकता एवं सजगता का विकास (Development of Awareness and Alertness):
स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा एक स्वस्थ व्यक्ति सजग एवं जागरूक रह सकता है। उसके चारों तरफ क्या घटित हो रहा है उसके प्रति वह हमेशा सचेत रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्यों एवं अधिकारों के प्रति सजग एवं जागरूक रहता है।

7.बीमारियों से बचाववरोकथाम के विषय में सहायक (Helpful Regarding Prevention and Control of Diseases):
स्वास्थ्य शिक्षा संक्रामक-असंक्रामक बीमारियों से बचाव व उनकी रोकथाम के विषय में हमारी सहायता करती है। इन बीमारियों के फैलने के कारण, लक्षण तथा उनसे बचाव व इलाज के विषय में जानकारी स्वास्थ्य शिक्षा से ही मिलती है।

8. शारीरिक विकृतियों को खोजने में सहायक (Helpful in Discovering Physical Deformities):
स्वास्थ्य शिक्षा शारीरिक विकृतियों को खोजने में सहायक होती है। यह विभिन्न प्रकार की शारीरिक विकृतियों के समाधान में सहायक होती है।

9. मानवीय संबंधों को सुधारना (Improvement in Human Relations):
स्वास्थ्य शिक्षा अच्छे मानवीय संबंधों का निर्माण करती है। स्वास्थ्य शिक्षा विद्यार्थियों को यह ज्ञान देती है कि किस प्रकार वे अपने मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों व समुदाय के स्वास्थ्य के लिए कार्य कर सकते हैं।

10. सकारात्मक दृष्टिकोण (Positive View):
स्वास्थ्य शिक्षा से व्यक्ति की सोच काफी विस्तृत होती है। वह दूसरे व्यक्तियों के दृष्टिकोण को भली भाँति समझता है। उसकी सोच संकीर्ण न होकर व्यापक दृष्टिकोण वाली होती है।

प्रश्न 7.
स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आज का बालक कल का भविष्य है। उसको इस बात का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है कि वह अपने तन व मन को किस प्रकार से स्वस्थ रख सकता है। एक पुरानी कहावत है-“स्वास्थ्य ही जीवन है।” अगर धन खो दिया तो कुछ खास नहीं खोया, लेकिन यदि स्वास्थ्य खो दिया तो सब कुछ खो दिया। अतः सुखी व प्रसन्नमय जीवन व्यतीत करने के लिए उत्तम स्वास्थ्य का होना बहुत आवश्यक है।

एक स्वस्थ व्यक्ति अपने परिवार, समाज तथा देश के लिए हर प्रकर से सेवा प्रदान कर सकता है, जबकि अस्वस्थ या बीमार व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। तन व मन को स्वस्थ व प्रसन्न रखने में स्वास्थ्य शिक्षा महत्त्वपूर्ण योगदान देती है, क्योंकि स्वास्थ्य शिक्षा में वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं जिनसे व्यक्ति में स्वास्थ्य के प्रति सजगता बढ़ती है, और इनके परिणामस्वरूप उसका स्वास्थ्य तंदुरुस्त रहता है। स्वास्थ्य शिक्षा को बहुत-से कारक प्रभावित करते हैं जिनमें से प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं

1. संतुलित भोजन (Balance Diet):
संसार में प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ जीवन व्यतीत करना चाहता है और स्वस्थ जीवन हेतु भोजन ही मुख्य आधार है। वास्तव में हमें भोजन की जरूरत न केवल ऊर्जा या शक्ति की पूर्ति हेतु होती है बल्कि शरीर की वृद्धि, उसकी क्षतिपूर्ति और उचित शिक्षा प्राप्त करने हेतु भी होती है। अतः स्पष्ट है कि संतुलित भोजन स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करता है।

2. शारीरिक व्यायाम (Physical Exercise):
स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा व्यक्ति अपने शरीर को शारीरिक व्यायामों द्वारा लचीला एवं सुदृढ़ बनाता है। शारीरिक व्यायाम की क्रियाओं द्वारा पूरे शरीर को तंदुरुस्त बनाया जा सकता है। कौन-से व्यायाम कब करने चाहिएँ और कब नहीं करने चाहिएँ, का ज्ञान स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा प्राप्त होता है।

3. आदतें (Habits):
आदतें भी स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव व आदतें अलग-अलग होती हैं। बालक की स्वास्थ्य शिक्षा उसके स्वभाव एवं आदत पर निर्भर करती है। बच्चों में अच्छी आदतों का विकास किया जाए, ताकि वह एक सफल नागरिक बन सके। अच्छी आदतों वाला व्यक्ति उचित मार्ग पर अग्रसर होकर तरक्की करता है। स्वास्थ्य शिक्षा अच्छी आदतों का विकास करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।

4. बीमारी (Disease):
स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है कि “एक व्यक्ति जिसका शरीर या मन कमजोर है वह कभी भी मज़बूत काया का मालिक नहीं बन सकता।” अत: बीमारी भी स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करती है। एक बीमार बालक कोई भी शिक्षा प्राप्त करने में पूर्ण रूप से समर्थ नहीं होता। स्वास्थ्य शिक्षा के माध्यम से एक स्वस्थ व्यक्ति या बालक प्रायः बीमारियों से मुक्त रहता है।

5. जीवन-शैली (Lifestyle):
जीवन-शैली जीवन जीने का एक ऐसा तरीका है जो व्यक्ति के नैतिक गुणों या मूल्यों और दृष्टिकोणों को प्रतिबिम्बित करता है। यह किसी व्यक्ति विशेष या समूह के दृष्टिकोणों, व्यवहारों या जीवन मार्ग का प्रतिमान है। स्वास्थ्य शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करने हेतु एक स्वस्थ जीवन-शैली बहुत आवश्यक होती है। एक स्वस्थ जीवन-शैली व्यक्तिगत रूप से पुष्टि के स्तर को बढ़ाती है। यह हमें बीमारियों से बचाती है और हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करती है। इसके माध्यम से आसन संबंधी विकृतियों में सुधार होता है। इसके माध्यम से मनोवैज्ञानिक शक्ति या क्षमता में वृद्धि होती है जिससे तनाव, दबाव व चिंता को कम किया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक स्वस्थ जीवन-शैली स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करती है।

6. वातावरण (Environment):
स्वास्थ्य शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करने हेतु स्वच्छ वातावरण का होना बहुत आवश्यक है। वातावरण दो प्रकार के होते हैं
(i) आन्तरिक वातावरण,
(ii) बाह्य वातावरण। दोनों प्रकार के वातावरण बालक को प्रभावित करते हैं।
शिक्षा प्राप्त करने हेतु स्कूली वातावरण विद्यार्थियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। बिना वातावरण के कोई भी विद्यार्थी किसी प्रकार का ज्ञान अर्जित नहीं कर सकता। इसलिए स्कूल प्रबन्धों को स्कूली वातावरण की ओर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए, ताकि विद्यार्थी बिना किसी बाधा के ज्ञान अर्जित कर सकें।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 2 स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 8.
स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों के विभिन्न सिद्धांतों या नियमों का ब्योरा दें। अथवा स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रमों के लिए किन-किन बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए? अथवा आप अपने स्कूल में स्वास्थ्य शिक्षण कार्यक्रम को कैसे अधिक प्रभावशाली बनाएँगे?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों के विभिन्न सिद्धांत अथवा नियम निम्नलिखित हैं

  1. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों की आयु और लिंग के अनुसार होना चाहिए।
  2. स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में जानकारी देने का तरीका साधारण और जानकारी से भरपूर होना चाहिए।
  3. स्वास्थ्य शिक्षा पढ़ने-लिखने तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए अपितु उसकी प्राप्तियों के बारे में कार्यक्रम बनाने चाहिएँ।
  4. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम लोगों या छात्रों की आवश्यकताओं, रुचियों और पर्यावरण के अनुसार होना चाहिए।
  5. मनुष्य का व्यवहार ही उसका सबसे बड़ा गुण है, जिसमें उसकी रुचि ज्यादा है वह उसे सीखने और करने के लिए तैयार रहता है। इसलिए कार्यक्रम बनाते समय बच्चों की उत्सुकता, रुचियों और इच्छाओं का ध्यान रखना चाहिए।
  6. स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में जानकारी देते समय जीवन से संबंधित समस्याओं पर भी बातचीत होनी चाहिए।
  7. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्तर के अनुसार बनाना चाहिए।
  8. स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम ऐसे होने चाहिएँ जो बच्चों की अच्छी आदतों को उत्साहित कर सकें ताकि वे अपने सोचने के तरीके को बदल सकें।
  9. स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों में बुरी आदतों को छोड़ने और अच्छी आदतों को ग्रहण करने हेतु फिल्में, चार्ट, टी०वी०, रेडियो आदि माध्यमों के प्रयोग द्वारा बच्चों को प्रेरित किया जाना चाहिए।
  10. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम केवल स्कूलों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अंग होना चाहिए।
  11. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम रुचिपूर्ण, शिक्षा से भरपूर और मनोरंजनदायक होना चाहिए।
  12. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम प्रस्तुत करते समय लोगों में प्रचलित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। यह भाषा उनकी आयु और समझने की क्षमता के अनुसार होनी चाहिए।
  13. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बनाते समय संक्रामक-असंक्रामक बीमारियों के बारे में व उनकी रोकथाम के उपायों के बारे में जानकारी देनी चाहिए।
  14. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम केवल एक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका क्षेत्र विशाल होना चाहिए।
  15. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम लोगों की आंतरिक भावनाओं को जानकर ही बनाना चाहिए।
  16. स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम में पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्तर के विषय शामिल होने चाहिएँ।

प्रश्न 9.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के विभिन्न तत्त्व या घटक कौन-कौन-से हैं? वर्णन कीजिए। अथवा स्वास्थ्य शिक्षा के मुख्य क्षेत्रों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का क्षेत्र बहुत विशाल है। यह केवल स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं है। इसमें स्वास्थ्य ज्ञान के अतिरिक्त और बहुत-से घटक शामिल हैं, जिनका आपस में गहरा संबंध होता है। ये सभी घटक बच्चों के स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव डालते हैं। स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम के विभिन्न घटक या क्षेत्र निम्नलिखित हैं

1. स्वास्थ्य सेवाएँ (Health Services):
छात्रों को शिक्षा देने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की रक्षा करना भी विद्यालय का मुख्य उत्तरदायित्व माना जाता है। स्वास्थ्य सेवाएँ वे सेवाएँ हैं जिनके माध्यम से छात्रों के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है और उनमें पाए जाने वाले दोषों से माता-पिता को अवगत करवाया जाता है ताकि समय रहते उन दोषों का उपचार किया जा सके। इन सेवाओं के अंतर्गत स्कूल के अन्य कर्मचारियों एवं अध्यापकों के स्वास्थ्य की भी जाँच की जाती है।

आधुनिक युग में स्वास्थ्य सेवाओं की बहुत महत्ता है। स्वास्थ्य सेवाओं की सहायता से बच्चे और वयस्क अपने स्वास्थ्य का स्तर ऊँचा उठा सकते हैं। साधारण जनता को ये सेवाएँ सरकार की ओर से मिलनी चाहिएँ, जबकि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को स्कूल की ओर से ये सुविधाएँ मिलनी चाहिएँ । स्वास्थ्य सेवाओं का उद्देश्य बच्चों में संक्रामक रोगों को ढूँढकर उनके माता-पिता की सहायता से ठीक करना है। इस उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए डॉक्टर, नर्स, मनोरोग चिकित्सक और अध्यापक विशेष योगदान दे सकते हैं।

2. स्वास्थ्यपूर्णस्कूली जीवन या वातावरण (Healthful School Living or Environment):
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है। स्कूल का वातावरण, रहने का स्थान और काम करने का स्थान स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

जिस देश के बच्चे और नवयुवक स्वस्थ होते हैं वह देश प्रगति के रास्ते पर अग्रसर होता है, क्योंकि आने वाला भविष्य उनसे बंधा होता है। बच्चा अपना अधिकांश समय स्कूल में गुजारता है। बच्चे का उचित विकास स्कूल के वातावरण पर निर्भर करता है। यह तभी संभव हो सकता है, अगर साफ़-सुथरा व स्वच्छ स्कूल अर्थात् वातावरण हो। स्वच्छ वातावरण बच्चे और वयस्क दोनों को प्रभावित करता है। स्वच्छ वातावरण केवल छात्रों के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावात्मक और नैतिक विकास में भी सहायक होता है।

3. स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन (Health Instructions):
स्वास्थ्य निर्देशन का आशय है-स्कूल के बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना। बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी ऐसी जानकारी देना कि वे स्वयं को स्वच्छ एवं नीरोग बना सकें। स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों एवं दृष्टिकोणों का विकास करते हैं। ये बच्चों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी सभी महत्त्वपूर्ण पहलुओं से अवगत कराना है ताकि वे स्वयं को स्वस्थ रख सकें।

स्वास्थ्य संबंधी निर्देशन में वे सभी बातें आ जाती हैं जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होती हैं; जैसे अच्छी आदतें, स्वास्थ्य को ठीक रखने के तरीके और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना आदि। शरीर की बनावट एवं संरचना, संक्रामक रोगों के लक्षण एवं कारण, इनकी रोकथाम या बचाव के उपायों के लिए बच्चों को फिल्मों या तस्वीरों आदि के माध्यम से अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। स्वास्थ्य निर्देशन की जानकारी प्राप्त कर बच्चे अनावश्यक विकृतियों या कमजोरियों का शिकार होने से बच सकते हैं।

प्रश्न 10.
छात्रों के स्वास्थ्य में सुधार हेतु शारीरिक शिक्षा का अध्यापक क्या भूमिका निभा सकता है? अथवा शारीरिक शिक्षा का अध्यापक विद्यार्थियों के स्वास्थ्य में क्या भूमिका निभाता है?
उत्तर:
छात्र अपना अधिकांश समय स्कूल में व्यतीत करते हैं। जितना वे स्कूल के वातावरण में सीखते हैं उतना शायद ही कहीं और सीखते हैं। स्कूल के वातावरण में सबसे अधिक वे अध्यापकों से प्रभावित होते हैं एवं उनको अपना आदर्श मानते हैं। स्कूल में शारीरिक शिक्षा के अध्यापक का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। वह विद्यार्थियों को अच्छे स्वास्थ्य हेतु प्रेरित करता है। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक बच्चों के स्वास्थ्य को सुधारने के लिए निम्नलिखित उपाय कर अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देता है या दे सकता है

1. शारीरिक शिक्षा का अध्यापक छात्रों को उनके व्यक्तिगत स्वास्थ्य हेतु प्रेरित करता है। वह व्यक्तिगत स्वास्थ्य के महत्त्व को बताकर उनके स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है।

2. वह विद्यार्थियों को नियमित दिनचर्या के महत्त्व बताता है । वह छात्रों में अच्छी आदतें अपनाने हेतु प्रोत्साहित करता है। वह छात्रों को नियमित समय पर सोने एवं उठने के लिए प्रोत्साहित करता है। जो छात्र नियमित समय पर सोते एवं उठते हैं वे हमेशा चुस्त एवं फुर्तीले होते हैं। उनमें आलस्य नहीं होता।

3. वह छात्रों को स्वास्थ्य की महत्ता बताकर उनको अपने स्वास्थ्य हेतु जागरूक करता है। वर्जिल के अनुसार, “सबसे बड़ा धन स्वास्थ्य है।” वर्जिल का यह कथन इस प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण है।

4. वह अभिभावकों को भी स्वास्थ्य संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी देकर अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है ताकि अभिभावक
अपने बच्चों के स्वास्थ्य की ओर विशेष रूप से ध्यान दे सकें।

5. वह स्कूल में स्वास्थ्य संबंधी अनेक कार्यक्रमों का आयोजन करवाकर भी छात्रों के स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है।

6. अधिकांश शारीरिक शिक्षा के अध्यापक चुस्त एवं फुर्तीले होते हैं और अधिकांश छात्र अपने अध्यापकों का अनुसरण करते हैं। अत: वे अपने व्यक्तित्व से भी छात्रों को प्रभावित कर सकते हैं।

7. वह छात्रों को संक्रामक बीमारियों के कारणों व लक्षणों से अवगत करवाता है तथा उनकी रोकथाम के उपायों से भी अवगत करवाता है।

8. वह छात्रों को भोजन के आवश्यक तत्त्वों की महत्ता के बारे में बताता है। यदि भोजन में सभी आवश्यक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में विद्यमान होंगे तो इसका इनके स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

9. वह विद्यार्थियों को नशीले पदार्थों के दुष्परिणामों से अवगत करवाता है।

10. वह विद्यार्थियों को स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों को विकसित करने में सहायता करता है।

11. शारीरिक शिक्षा का अध्यापक स्कूल में अनेक शारीरिक क्रियाएँ करवाता है जिनका छात्रों के स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 2 स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 11.
व्यक्ति एवं समाज के स्वास्थ्य की भलाई के लिए विभिन्न संगठनों की भागीदारी के योगदान का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत में स्वास्थ्य कल्याण हेतु कार्यरत प्रमुख संघों या संस्थाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक युग में किसी देश की शक्ति का अनुमान वहाँ के स्वस्थ नागरिकों से लगाया जा सकता है। स्वास्थ्य की पूर्ण व्याख्या किसी व्यक्ति के सही शारीरिक पक्ष से की जा सकती है। स्वास्थ्य की पूर्ण व्याख्या से अभिप्राय व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक पक्ष के पूर्ण होने से है।

प्रत्येक पक्ष से स्वस्थ व्यक्ति अच्छे समाज का निर्माण करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य का ज्ञान अति आवश्यक है। विकासशील देशों में सरकार और अन्य संगठन लोगों के स्वास्थ्य के लिए भरपूर सेवाएँ उपलब्ध करवाते हैं। भारत में निम्नलिखित प्रमुख संघ या संस्थान स्वास्थ्य कल्याण हेतु कार्यरत हैं

1. भारतीय तपेदिक रोग संगठन (Tuberculosis Association of India):
भारतीय तपेदिक रोग संगठन वर्ष 1939 में अस्तित्व में आया। इसका मुख्य कार्य टी०बी० से पीड़ित लोगों को इससे राहत देना है। भारत की बहुत-सी जनसंख्या इस रोग से पीड़ित है। भारत सरकार ने इस रोग पर नियंत्रण पाने के लिए कई बड़े-बड़े अस्पताल और अन्वेषण केंद्र स्थापित किए हैं, ताकि इस घातक बीमारी से लोगों को निजात दिलाई जा सके। यह संगठन डॉक्टरों, नर्सी और अन्य संगठन जो इस रोग के निवारण हेतु योगदान दे रहे हैं, उन्हें प्रशिक्षण की सुविधाएँ प्रदान करता है।

2. भारत सेवक समाज (Bharat Sewak Samaj):
भारत सेवक समाज संस्था वर्ष 1952 में अस्तित्व में आई। यह एक गैर-सरकारी संस्था है। इसका मुख्य कार्य लोगों को स्वस्थ रहने के तौर-तरीके बताना है। यह संस्था समय-समय पर शहरों और गाँवों में शिविर लगाकर लोगों को स्वास्थ्य चेतना या जागरूकता के बारे में जानकारी देती है।

3. अखिल भारतीय नेत्रहीन सहायक सोसायटी (All India Blind Relief Society):
यह सोसायटी वर्ष 1945 में स्थापित की गई। यह नेत्रहीन लोगों की सहायता के लिए कार्य कर रही है। यह अन्य कई संस्थाओं जोकि नेत्रहीनता को दूर करने के लिए कार्य कर रही हैं, उनकी सहायता करती है। इसका अस्तित्व सरकार की आर्थिक सहायता पर अधिक निर्भर करता है। यह समय-समय पर आँखों के शिविर लगाकर लोगों को आँखों की गंभीर बीमारियों से अवगत करवाती है और उन्हें इनके प्रति सुविधाएँ प्रदान करती है। यह लोगों को आँखें दान हेतु प्रेरित करती है, ताकि नेत्रहीनता के शिकार लोगों को रोशनी दी जा सके।

4. हिंद कुष्ठ निवारण संघ (Hind Kusht Niwaran Sangh):
हिंद कुष्ठ निवारण संघ वर्ष 1947 में स्थापित की गई। कुष्ठ रोग जैसी घातक बीमारी को रोकने के लिए यह संघ दिन-रात प्रयासरत है। यह संघ वैज्ञानिक खोजों से इस बीमारी के कारण और उपयुक्त इलाज संबंधी जानकारी लोगों को प्रदान कर रहा है।

5. भारतीय परिवार नियोजन संघ (Family Planning Association of India):
भारतीय परिवार नियोजन संघ की स्थापना वर्ष 1949 में हुई। भारत में बढ़ रही जनसंख्या पर रोक लगाने हेतु यह संघ प्रयासरत है। थोड़े ही समय में इसकी शाखाएँ पूरे भारत में खुल गई हैं। इस संघ ने अनेक डॉक्टरों और समाज-सुधारकों को प्रशिक्षण देकर लोगों को परिवार नियोजन के बारे में जागरूक किया है।

6. भारतीय बाल कल्याण परिषद् (Indian Council for Child Welfare):
भारतीय बाल कल्याण परिषद् की स्थापना वर्ष 1952 में हुई। इसका मुख्य कार्य बच्चों संबंधी समस्याओं का हल और उनके कल्याण संबंधी योजनाएँ बनाना है। इस परिषद् ने भारत के पहले प्रधानमंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस 14 नवंबर को बच्चों का दिन (बाल-दिवस) मनाने का निर्णय लिया। अब भारत में प्रत्येक वर्ष 14 नवंबर को यह दिन मनाया जाता है। यह परिषद् अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़ी हुई है। यह प्रत्येक वर्ष बच्चों के कल्याण के लिए नई-नई योजनाएँ बनाती है।

7. भारतीय चिकित्सा संघ (Indian Medical Association):
इस संघ का मुख्य कार्य सरकार का ध्यान राष्ट्रीय स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की ओर दिलाना और उन्हें हल करने के लिए सहयोग देना है। यह संघ समय-समय पर सरकार से अपने वार्षिक बजट में आर्थिक सहायता की वृद्धि के लिए माँग करता है। भारतीय चिकित्सा संघ वैज्ञानिक अन्वेषण करके सरकार को घातक बीमारियों के फैलने और बचाव के बारे में सिफारिश करता रहता है। इस संघ की सिफारिश पर ही सरकार लोगों के स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार, अच्छी दवाइयाँ और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए नई-नई योजनाएँ बनाती रहती है।

8. भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी (Indian Redcross Society):
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी एक राष्ट्रीय संगठन है। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय सोसायटी का सदस्य है। भारत में यह वर्ष 1920 में अस्तित्व में आई। यह सोसायटी मानवता की सेवा में संलग्न है। यह लोगों को स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान, बीमारियों के बचाव और उपाय, युद्ध के दौरान घायलों की सहायता, प्राकृतिक आपदाओं के समय दवाइयाँ और आवश्यकतानुसार सुविधाएँ उपलब्ध करवाती है। भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी जन-कल्याण के लिए निम्नलिखित कार्य करती है

  • रक्त बैंक की स्थापना करना और आवश्यकता पड़ने पर रक्त की सुविधाएँ उपलब्ध करना।
  • युद्ध के दौरान घायल हुए और रोगी सैनिकों की देखभाल करना।
  • भूकंप, बाढ़, प्लेग और सूखा पड़ने से पीड़ित लोगों की सहायता करना।
  • बाल कल्याण और उनकी भलाई के लिए विशेष योगदान देना।
  • तपेदिक, कुष्ठ, एड्स और अन्य कई बीमारियों की रोकथाम के लिए मुफ्त दवाइयाँ प्रदान करना।
  • उन अन्य संगठनों की आर्थिक सहायता करना, जो मानवता की सेवा में संलग्न हैं।
  •  दिव्यांग लोगों को नकली अंग देकर उनकी मदद करना।

लघूत्तरात्मक प्रश्न ( (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ उन सभी आदतों से है जो किसी व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं। स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्म-निर्भर बनने में सहायता करते हैं। यह एक ऐसी शिक्षा है जिसके बिना मनुष्य की सारी शिक्षा अधूरी रह जाती है।

सामान्य शब्दों में, स्वास्थ्य शिक्षा से अभिप्राय बीमारियों पर काबू पाने, स्वास्थ्य सुधार के लिए प्रयत्न करने और अच्छे स्वास्थ्य के लिए उत्साहित करने की प्रक्रिया से है। डॉ० थॉमस वुड के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य क्या है ?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

  1. विद्यालय में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण बनाए रखना।
  2. बच्चों में ऐसी आदतों का विकास करना जो स्वास्थ्यप्रद हों।
  3. रोगों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करना तथा प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी देना।
  4. सभी विद्यार्थियों के स्वास्थ्य का निरीक्षण करना व निर्देश देना।
  5. सभी विद्यार्थियों में स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान तथा अभिव्यक्ति का विकास करना।
  6. व्यक्तिगत सफाई तथा स्वच्छता के बारे में जानकारी देना।
  7. स्वास्थ्य संबंधी आदतों का विकास करना।
  8. रोगों से बचने का उपाय करना और शारीरिक रोगों की जांच करना।

प्रश्न 3.
स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत हमें किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का ज्ञान स्वयं में ही सरल उपाय है जिसके द्वारा रोगों को फैलने से रोका जा सकता है। हमें स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए तथा उनका प्रचार करना चाहिए

  1. विभिन्न खाद्य-पदार्थों में कौन-कौन-से पोषक तत्त्व उपलब्ध होते हैं?
  2. विभिन्न रोगों के क्या कारण होते हैं? वे किस प्रकार फैलते हैं तथा उनसे बचने के तरीके क्या हैं?
  3. स्वास्थ्य संबंधी व्यक्तिगत स्तर पर अच्छी आदतों का ज्ञान तथा सामुदायिक स्तर पर अच्छी परंपराओं की आवश्यकता।
  4. विभिन्न नशीले व मादक पदार्थों के सेवन से होने वाले कुप्रभावों तथा परिणामों की जानकारी।
  5. खाद्य-पदार्थों को पकाने तथा उन्हें संगृहीत करने की विधियाँ।
  6. वातावरण को स्वच्छ रखने की विधियाँ या तरीके।
  7. घरेलू या औद्योगिक स्तर पर उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों के निपटान की विधियाँ।

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प्रश्न 4.
स्वास्थ्य शिक्षा का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है? अथवा स्वास्थ्य शिक्षा हमारे लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा की महत्ता लिखें।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा हमारे लिए निम्नलिखित कारणों से महत्त्वपूर्ण है
1. मानवीय संबंधों में वृद्धि करना-स्वास्थ्य शिक्षा अच्छे मानवीय संबंधों में वृद्धि करती है। स्वास्थ्य शिक्षा विद्यार्थियों को यह ज्ञान भी देती है कि किस प्रकार वे अपने मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों व समुदाय के अच्छे स्वास्थ्य के लिए कार्य कर सकते हैं।

2. बीमारियों से बचाव व रोकथाम में सहायक-स्वास्थ्य शिक्षा कई प्रकार की बीमारियों के बचाव व रोकथाम के विषय में हमारी सहायता करती है। विभिन्न प्रकार की बीमारियों के फैलने के कारण, लक्षण, उनसे बचाव व इलाज के विषय में जानकारी स्वास्थ्य शिक्षा से ही मिलती है।

3. सामाजिक गुणों का विकास-स्वास्थ्य शिक्षा व्यक्ति में सामाजिक गुणों का विकास करके उसे अच्छा नागरिक बनाने में सहायक होती है। स्वास्थ्य शिक्षा जहाँ सर्वपक्षीय विकास करके अच्छा व्यक्तित्व निखारती है, वहीं इसके साथ-साथ यह और कई प्रकार के गुणों; जैसे सहयोग, त्याग-भावना, साहस, विश्वास, संवेगों पर नियंत्रण एवं सहनशीलता आदि का भी विकास करती है।

प्रश्न 5.
स्वस्थ व्यक्ति किसे कहते हैं? अच्छे स्वास्थ्य के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
स्वस्थ व्यक्ति-स्वस्थ व्यक्ति के शरीर के सभी अंगों की बनावट और उनके कार्य ठीक-ठाक होते हैं। वह हर प्रकार के मनोवैज्ञानिक, मानसिक व सामाजिक तनावों से मुक्त होता है। केवल शारीरिक रोगों से मुक्त व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ नहीं होता, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति को रोग घटकों से भी मुक्त होना चाहिए। अच्छे स्वास्थ्य के लाभ:

  1. अच्छे स्वास्थ्य से व्यक्ति का जीवन सुखमय व आनंदमय होता है।
  2. अच्छे स्वास्थ्य का न केवल व्यक्तिगत लाभ होता है, बल्कि इसका सामूहिक लाभ भी होता है। इसका समाज व देश पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 6.
अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने में स्वास्थ्य शिक्षा किस प्रकार सहायक होती है?
उत्तर:
अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक तौर पर विकारों तथा तनावों को दूर करने की आवश्यकता है, परंतु भारतवर्ष में बहुत-से लोग इस बात से भी अनभिज्ञ हैं कि कौन-कौन-से रोग किस-किस कारण से होते हैं? उनकी रोकथाम कैसे की जा सकती है तथा उनके बचाव के क्या उपाय हैं? केवल रोगों के निदान से ही स्वास्थ्य कायम नहीं होता।

इसके लिए बाह्य कारक; जैसे प्रदूषण तथा सूक्ष्म-जीवों के संक्रमण से भी बचाव अत्यंत आवश्यक है। स्वास्थ्य शिक्षा संतुलित आहार और उनमें पौष्टिक तत्त्व की कितनी-कितनी मात्रा होनी चाहिए आदि की जानकारी देने में हमारी सहायता करती है। स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा ही हमें किसी रोग के कारण, लक्षण और उनकी रोकथाम के उपायों का पता चलता है। स्वास्थ्य शिक्षा ही हमें पर्यावरण से संबंधित आवश्यक जानकारी देती है।

प्रश्न 7.
अभिभावकों को शिक्षित करके बच्चों में होने वाले रोगों की रोकथाम किस प्रकार की जा सकती है?
अथवा
माता-पिता किस प्रकार बच्चों की रोगों से बचाव हेतु सहायता कर सकते हैं?
उत्तर:
अभिभावकों को शिक्षित करके बच्चों में होने वाले रोगों की रोकथाम निम्नलिखित उपायों द्वारा की जा सकती है

  1. अभिभावकों को उचित एवं संतुलित आहार तथा विशेष परिस्थितियों में भोजन की आवश्यकताओं का ज्ञान कराने से बच्चों में कुपोषण से होने वाले रोगों की रोकथाम की जा सकती है।
  2. जन्म के बाद बच्चों में रोगों के कारण मृत्यु होने की संभावना रहती है। इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक है कि अभिभावक अपने बच्चों को समय-समय पर प्रतिरक्षी टीके लगवाएँ।
  3. महिलाओं को यह ज्ञान कराना आवश्यक है कि बच्चे के लिए माँ का दूध सर्वोत्तम आहार है। इससे बच्चे को सभी पोषक तत्त्व तथा प्रतिजैविक पदार्थ प्राप्त होते हैं।
  4. अभिभावकों को विभिन्न रोगाणुओं से संक्रमण के तरीके तथा उनसे बचाव के उपायों की शिक्षा देकर भी बच्चों को इनसे होने वाले रोगों से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 8.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं। स्कूल में जाने वाले बच्चे किसी राष्ट्र को सशक्त व मजबूत बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समस्त राष्ट्र का उत्तरदायित्व उनके कोमल कंधों पर टिका होता है। इसलिए स्कूल के बच्चों का स्वास्थ्य ही स्कूल प्रणाली का महत्त्वपूर्ण तथा प्राथमिक मुद्दा है। अतः स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम वह ग्रहणित प्रक्रिया है जिसको स्कूली स्वास्थ्य सेवाओं, स्वास्थ्यप्रद स्कूली जीवन और स्वास्थ्य अनुदेशन में बच्चों के स्वास्थ्य के विकास के लिए अपनाया जाता है। इस प्रकार स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तीन चरण होते हैं:

  1. स्वास्थ्य सेवाएँ (Health Services),
  2. स्वास्थ्यप्रद स्कूली जीवन या वातावरण (Healthful School Living or Environment) तथा
  3. स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन (Health Instructions)।

प्रश्न 9.
स्वास्थ्य शिक्षा के किन्हीं चार सिद्धांतों का उल्लेख करें।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा के चार सिद्धांत निम्नलिखित हैं

  1. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम व पाठ्यक्रम बच्चों की आयु और रुचि के अनुसार होना चाहिए।
  2. स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में जानकारी देने का तरीका साधारण और जानकारी से भरपूर होना चाहिए।
  3. स्वास्थ्य शिक्षा पढ़ने-लिखने तक ही सीमित नहीं रखनी चाहिए अपितु उसकी प्राप्तियों के बारे में कार्यक्रम बनाने चाहिएँ।
  4. स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम छात्रों की आवश्यकताओं, इच्छाओं और पर्यावरण के अनुसार होना चाहिए।

प्रश्न 10.
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी वातावरण हेतु किन मुख्य बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए?
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी वातावरण हेतु निम्नलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए

  1. अध्यापकों को अपना पाठ्यक्रम बच्चों की इच्छाओं, आवश्यकताओं, रुचियों के अनुसार बनाना चाहिए। इसके लिए अध्यापक को अपने अनुभव का प्रयोग करना चाहिए।
  2. बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विद्यालय का भवन रेलवे स्टेशनों, सिनेमाघरों, कारखानों, यातायात सड़कों आदि से दूर होना चाहिए।
  3. बच्चों के संपूर्ण विकास हेतु अध्यापकों एवं छात्रों में सहसंबंध होना चाहिए।
  4. विद्यालय की समय-सारणी का विभाजन छात्रों के स्तर के अनुसार होना चाहिए।

प्रश्न 11.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के महत्त्व पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम से बच्चे अनेक बीमारियों की रोकथाम तथा उपचार के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। स्वास्थ्य तथा स्वच्छता की जानकारी स्वस्थ समाज के निर्माण में सहायक है। स्कूल के दिनों में बच्चों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति अति तीव्र होती है। उनकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए ये कार्यक्रम अति-आवश्यक होते हैं। सभी स्कूली छात्र कक्षा के अनुसार समान आयु के होते हैं, इसलिए उनकी समस्याएँ भी लगभग एक-जैसी होती हैं और उनके निदान के प्रति दृष्टिकोण भी एक-जैसा ही होता है।

इसलिए स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम सभी छात्रों के लिए समान रूप से उपयोगी होते हैं। स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों को पोषक तत्त्वों एवं खनिज-लवणों की जानकारी की महत्ता बताई जाती है जो उनकी संपूर्ण जिंदगी में सहायक होती है। स्कूल के दिनों के दौरान विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम अनेक अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक हैं जो समाज के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 12.
स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं के प्रमुख उपाय या अभियान बताएँ। अथवा आजकल स्कूलों में बच्चों को अपने परिवेश के बारे में जागरूक बनाने हेतु अपनाए गए प्रमुख तरीके बताएँ।
उत्तर:
वर्तमान समय में स्कूलों में स्वास्थ्य के प्रति बच्चों को जागरूक बनाने के लिए नए-नए तरीके या अभियान अपनाए जा रहे हैं। इनका विवरण निम्नलिखित है

1. मेडिकल निरीक्षण-अनेक स्कूल सर्वप्रथम तो उस समय निरीक्षण की माँग करते हैं, जब बच्चे स्कूल में प्रवेश पाते हैं और उसके बाद वे नियमित अंतराल के बाद मेडिकल निरीक्षण करवाने पर जोर डाल सकते हैं । इसके अंतर्गत वे शारीरिक माप, स्वास्थ्य जाँच, बोलने एवं सुनने की जाँच तथा खून की जाँच करवाते हैं। इसके अतिरिक्त दाँतों की देखभाल, संक्रामक रोगों के लक्षण, कारण एवं इसकी रोकथाम के उपायों आदि की जानकारी भी सेमिनारों के माध्यम से दी जाती है।

2. रोगों से मुक्ति के कार्यक्रम- अधिकतर स्कूल अनेक रोगों से मुक्ति के कार्यक्रम चलाते हैं; जैसे पल्स पोलियो, टी०बी०, मलेरिया, हेपेटाइटिस-बी, चेचक आदि।

3. एड्स जागरूकता संबंधी कार्यक्रम-स्कूल राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिकतर भयानक बीमारियों; जैसे एड्स को . नियंत्रण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

4. प्राथमिक सहायता और आपातकालीन सेवाओं के पाठ्यक्रम- स्कूलों के आधुनिक तरीकों के अंतर्गत विद्यार्थियों को कक्षाओं तथा पाठ्यक्रम के माध्यम से प्राथमिक सहायता तथा आपातकालीन सेवाओं की जानकारी दी जाती है।

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प्रश्न 13.
स्वास्थ्य शिक्षा में सुधार के प्रमुख उपाय बताएँ।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा में सुधार के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

  1. स्वास्थ्य शिक्षा का पाठ्यक्रम बच्चों की आवश्यकताओं एवं रुचियों के अनुसार होना चाहिए।
  2. स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रम व्यावहारिक जीवन से संबंधित होने चाहिएँ।
  3. स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी आदतें, पर्यावरण प्रदूषण, प्राथमिक उपचार, बीमारियों की रोकथाम आदि को चित्रों या फिल्मों की सहायता से समझाया या दिखाया जाना चाहिए।
  4. स्वास्थ्य शिक्षा में वाद-विवाद और भाषण आदि को अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  5. स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्यपूर्ण कार्यक्रमों को अधिक-से-अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को नियमित डॉक्टरी जाँच और अन्य सुविधाओं से लाभ हो सके।
  6. स्वास्थ्य शिक्षा में उन सभी पक्षों को शामिल करना चाहिए, जो छात्रों के सर्वांगीण विकास में सहायक हों।

प्रश्न 14.
हमारे जीवन में अच्छे स्वास्थ्य की क्या उपयोगिता है?
अथवा
स्वास्थ्य (Health) का महत्त्व बताएँ।
उत्तर:
अच्छे स्वास्थ्य के बिना कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम नहीं कर सकता। इसलिए स्वास्थ्य का हमारे जीवन में निम्नलिखित प्रकार से विशेष महत्त्व या उपयोगिता है:

  1. स्वास्थ्य मानव व समाज का आधार स्तंभ है। यह असल में खुशी, सफलता और आनंदमयी जीवन की कुंजी है।
  2. अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी होते हैं।
  3. स्वास्थ्य के महत्त्व के बारे में अरस्तू ने कहा था-“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है।” अतः इस कथन से भी हमारे जीवन में स्वास्थ्य की उपयोगिता व्यक्त हो जाती है।
  4. स्वास्थ्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुधारने व निखारने में सहायक होता है।
  5. किसी भी देश के नागरिकों के स्वास्थ्य व आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष संबंध पाया जाता है। यदि किसी देश के नागरिक स्वस्थ होंगे तो आर्थिक विकास भी अच्छा होगा।

प्रश्न 15.
स्कूल में स्वास्थ्य निर्देशन के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
स्कूल में स्वास्थ्य निर्देशन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की जानकारी देना।
  2. बच्चों को स्वास्थ्य के विषय में पर्याप्त ज्ञान देना।
  3. स्वास्थ्य संबंधी महत्त्वपूर्ण नियमों या सिद्धांतों की जानकारी देना।
  4. संक्रामक रोगों की रोकथाम के उपायों की जानकारी देना।
  5. बच्चों को अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देने हेतु प्रेरित करना।
  6. अच्छी आदतें एवं सेहत को ठीक रखने के उपाय बताना।

प्रश्न 16.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं पर संक्षिप्त नोट लिखें। अथवा विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
छात्रों को शिक्षा देने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की रक्षा करना भी विद्यालय का मुख्य उत्तरदायित्व माना जाता है। विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ, वे सेवाएँ हैं जिनके माध्यम से छात्रों के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है और उनमें पाए जाने वाले दोषों से माता-पिता को अवगत करवाया जाता है ताकि समय रहते उन दोषों का उपचार किया जा सके। इन सेवाओं के अंतर्गत स्कूल के अन्य कर्मचारियों एवं अध्यापकों के स्वास्थ्य की भी जाँच की जाती है।

इनके अंतर्गत छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा प्रदान की जाती है और उन्हें सभी प्रकार की बीमारियों के लक्षणों, कारणों, रोकथाम या बचाव के उपायों की जानकारी प्रदान की जाती है। स्कूल/विद्यालय में ऐसी सुविधाओं को विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ (School Health Services) कहा जाता है। आधुनिक युग में इन सेवाओं की बहुत आवश्यकता है।

प्रश्न 17.
स्कूल के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शिक्षक की भूमिका पर प्रकाश डालिए। उत्तर-स्कूल के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शिक्षक निम्नलिखित प्रकार से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है

  1. शिक्षक छात्रों को स्वास्थ्य कार्यक्रम की उपयोगिता बताकर उन्हें अपने स्वास्थ्य हेतु प्रेरित कर सकता है।
  2. वह छात्रों को व्यक्तिगत सफाई के लिए प्रेरित कर सकता है, ताकि छात्र स्वयं को नीरोग एवं स्वस्थ रख सकें।
  3. शिक्षक छात्रों को संक्रामक रोगों के कारणों एवं रोकथाम के उपायों की जानकारी दे सकता है।
  4. शिक्षक को चाहिए कि वह स्वास्थ्य शिक्षा की विषय-वस्तु से संबंधित विभिन्न सेमिनारों का आयोजन करे।
  5. वह छात्रों को अच्छी आदतें अपनाने के लिए प्रेरित करे।

प्रश्न 18.
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन पर संक्षिप्त नोट लिखें। अथवा स्वास्थ्य अनुदेशन/निर्देशन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्वास्थ्य निर्देशन से अभिप्राय है-स्कूल के बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी ऐसी जानकारी देना कि वे स्वयं को स्वस्थ एवं नीरोग बना सकें। स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों एवं दृष्टिकोणों का विकास करते हैं । ये बच्चों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाते हैं । इनका मुख्य उद्देश्य बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी सभी महत्त्वपूर्ण पहलुओं से अवगत कराना है ताकि वे स्वयं को स्वस्थ रख सकें।

स्वास्थ्य संबंधी निर्देशन में वे सभी बातें आ जाती हैं जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होती हैं; जैसे अच्छी आदतें, सेहत को ठीक रखने के तरीके और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना आदि। शरीर की बनावट एवं संरचना, संक्रामक रोगों के लक्षण एवं कारण, इनकी रोकथाम या बचाव के उपायों के लिए बच्चों को फिल्मों या तस्वीरों आदि के माध्यम से अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। स्वास्थ्य निर्देशन की जानकारी प्राप्त कर बच्चे अनावश्यक विकृतियों या कमजोरियों का शिकार होने से बच सकते हैं।

प्रश्न 19.
शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य शिक्षा में क्या अंतर है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य शिक्षा में परस्पर अटूट संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं, क्योंकि आज एक ओर जहाँ स्वास्थ्य शिक्षा को शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत पढ़ाया जाता है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य शिक्षा के अध्ययन में भी शारीरिक शिक्षा के पक्षों पर जोर दिया जाता है। फिर भी इनमें कुछ अंतर है। शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत शारीरिक गतिविधियों या क्रियाओं पर विशेष बल दिया जाता है, जबकि स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है । शारीरिक शिक्षा का क्षेत्र स्वास्थ्य शिक्षा से अधिक व्यापक है।

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प्रश्न 20.
सामाजिक स्वास्थ्य शिक्षा (Social Health Education) पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक वह समाज का सदस्य बना रहता है। बिना समाज के इसके अस्तित्व की कल्पना करना व्यर्थ है। वह समाज के नियमों, कानूनों एवं मान-मर्यादाओं का पालन करता है और समाज में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाता है। यदि एक व्यक्ति समाज में अपनी अलग पहचान की योग्यता रखता है तो यही उसका सामाजिक स्वास्थ्य शिक्षा की ओर महत्त्वपूर्ण कदम है। सामाजिक स्वास्थ्य शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा का महत्त्वपूर्ण पहलू है जिसका संबंध समाज के स्वास्थ्य से है।

यह शिक्षा सामाजिक गुणों का विकास करने में सहायक होती है जो सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन में अच्छे समायोजन के लिए बहुत आवश्यक हैं। स्वास्थ्य जीवन का एक ऐसा पहलू है जिसकी कार्य-प्रणाली एवं उसे स्वस्थ रखने के उपायों का ज्ञान आवश्यक है, ताकि हम समाज को कुछ देने की आकांक्षा रख सके। सामाजिक एवं व्यक्तिगत रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही किसी को कुछ देने में समर्थ होता है। बीमार व्यक्ति न तो स्वयं की मदद कर सकता है और न ही समाज की।

सामाजिक स्वास्थ्य शिक्षा वह शिक्षा है जो एक व्यक्ति को समाज के अन्य सदस्यों के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत करती है और आसपास के लोगों से अच्छे संबंध बनाने की योग्यता एवं क्षमता का विकास करती है। जो व्यक्ति समाज से अनभिज्ञ होता है उसका व्यवहार समाज में अस्वीकार्य होता है। इसलिए हमें असामाजिक व्यवहार पर नियंत्रण रखने का प्रयास करना चाहिए। इसमें सामाजिक स्वास्थ्य शिक्षा बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह शिक्षा निम्नलिखित सामाजिक मूल्यों के विकास में भी सहायक होती है

  1. सामूहिक एकता का विकास,
  2. सामाजिक व्यवहार में सुधार,
  3. सहयोग व स्वभाव का विकास,
  4. मनोवृत्ति का विकास,
  5. सहानुभूति एवं धैर्य का विकास,
  6. सामाजिक स्वास्थ्य में सुधार,
  7. सामाजिक आदर्शों को बनाए रखने में सहायक।

प्रश्न 21.
व्यक्तित्व स्वास्थ्य शिक्षा (Personal Health Education) पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
व्यक्तिगत स्वास्थ्य शिक्षा, वह शिक्षा है जो हमें तंदुरुस्त एवं नीरोग रहने की जानकारी देती है। इसमें नीरोग रहने हेतु स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन करने पर बल दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को व्यक्तिगत स्तर पर बिना किसी दवाई के स्वस्थ बनाना है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य हेतु व्यक्ति को स्वयं ही प्रयत्नशील होना पड़ता है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी आचरण; जैसे शरीर की स्वस्थता, दाँतों, बालों, आँखों, हाथों आदि की सफाई, भोजन संबंधी नियमों का पालन, नशीले पदार्थों से परहेज और व्यायाम आदि अपनाने पड़ते हैं, तभी न केवल व्यक्ति स्वयं के लिए बल्कि समाज और देश के लिए भी महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी होता है।

एक स्वस्थ व्यक्ति ही देश की उन्नति एवं विकास में सहायक होता है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य शिक्षा हमें अच्छी आदतों को अपनाने की शिक्षा देती है। अच्छी आदतों से हमारा व्यक्तित्व आकर्षित एवं प्रभावशाली बनता है और अच्छी आदतों से हमारी सोच सकारात्मक बनती है। इसलिए हमें व्यक्तिगत स्वास्थ्य शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। संक्षेप में, यह शिक्षा स्वस्थ एवं सुडौल शरीर बनाने में, रोग-मुक्त रहने में, रोग प्रतिरोधक शक्ति बनाए रखने में और शारीरिक अंगों की कार्यक्षमता सुचारू रूप से बनाए रखने में हमारी सहायता करती है।

प्रश्न 22.
ग्रामीण जीवन की प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएँ क्या हैं? अथवा गाँवों में स्वास्थ्य संबंधी किसी एक समस्या का वर्णन करें।
उत्तर:
ग्रामीण जीवन की प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं
1. स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का अभाव-गाँवों में अधिकतर मकान कच्चे तथा गलियाँ ऊँची-नीची तथा नालियां भी गन्दे पानी का निकास नहीं कर पातीं। इसलिए यह गन्दा तथा दूषित पानी गाँव के बीच में ही इकट्ठा होने लगता है और उस पर कई प्रकार के संक्रामक रोगों के कीटाणु पनपने लगते हैं।

2. हस्पतालों तथा डॉक्टरों का अभाव-ग्रामीण बीमारी के घरेलू इलाज तथा झाड़-फूंक से रोग-मुक्त होने की कोशिश करते हैं। कई बार ऐसा डॉक्टरी सुविधाओं की कमी के कारण भी करना पड़ जाता है। यदि पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ व हस्पताल उपलब्ध हो तो तुरन्त लाभ उठाया जा सकता है।

3. व्यक्तिगत स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी-अधिकतर ग्रामीण लोग व्यक्तिगत स्वच्छता के प्रति लापरवाही करते हैं। यही लापरवाही कई बीमारियों को जन्म देती है। प्रतिदिन स्नान करके साफ व सुथरे कपड़े पहनने से, समय पर नाखून आदि काटने और बालों को साफ रखने व दाँतों की प्रतिदिन ब्रश आदि से सफाई करने की आदत न होने से अच्छे स्वास्थ्य की आशा नहीं की जा सकती।

4. मादक पदार्थों का सेवन-ग्रामवासियों में बीड़ी, तम्बाकू, शराब आदि पदार्थों का प्रचलन आम बात है, जो कि अन्ततः स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

प्रश्न 23.
स्वास्थ्य के कोई चार सिद्धांत या नियम बताएँ।
उत्तर:
स्वास्थ्य के चार सिद्धांत निम्नलिखित हैं

  1. हमें हमेशा शुद्ध एवं स्वच्छ वातावरण में रहना चाहिए।
  2. हमें ताजा, पौष्टिक और संतुलित आहार करना चाहिए।
  3. हमेशा अपना आचरण व विचार शुद्ध व सकारात्मक रखने चाहिएँ और हमेशा खुश एवं सन्तुष्ट रहना चाहिए। कभी भी किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए। हमेशा बड़ों का आदर करना चाहिए।
  4. मादक वस्तुओं का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसलिए हमें नशीली वस्तुओं; जैसे अफीम, शराब, चरस, गाँजा, तंबाकू आदि से स्वयं को बचाना चाहिए। दूसरों को भी नशीली वस्तुओं के दुष्प्रभावों से अवगत करवाना चाहिए।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं? अथवा स्वास्थ्य को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है, जिसमें वह मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसके सभी शारीरिक संस्थान व्यवस्थित रूप से सुचारू होते हैं। इसका अर्थ न केवल बीमारी अथवा शारीरिक कमजोरी की अनुपस्थिति है, अपितु शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना भी है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति का मन या आत्मा प्रसन्नचित और शरीर रोग-मुक्त रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, “स्वास्थ्य केवल रोग या विकृति की अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुख की स्थिति को कहते हैं।”

प्रश्न 2.
अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के आवश्यक कारक बताएँ।
उत्तर:

  1. व्यक्तिगत तथा पर्यावरण स्वच्छता,
  2. व्यायाम तथा उचित विश्राम,
  3. भोजन में पौष्टिक तत्त्व एवं खनिज लवण,
  4. स्वच्छ भोजन व जल का उपयोग।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 2 स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 3.
स्वास्थ्य के विभिन्न पहलू या रूप बताइए।
उत्तर:
(1) शारीरिक स्वास्थ्य,
(2) मानसिक स्वास्थ्य,
(3) सामाजिक स्वास्थ्य,
(4) आध्यात्मिक स्वास्थ्य,
(5) संवेगात्मक स्वास्थ्य।

प्रश्न 4.
स्वस्थ व्यक्ति के कोई दो गुण लिखें।
उत्तर:
(1) स्वस्थ व्यक्ति का व्यक्तित्व आकर्षक एवं सुंदर होता है,
(2) वह चुस्त एवं फुर्तीला होता है।

प्रश्न 5.
स्वास्थ्य के प्रमुख निर्धारक तत्त्व कौन-कौन-से हैं?
अथवा
विद्यालयी छात्रों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक बताइए।
उत्तर:

  1. आनुवंशिकता,
  2. वातावरण,
  3. जीवन-शैली,
  4. सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण,
  5. आर्थिक दशाएँ,
  6. पारिवारिक कल्याण सेवाएँ आदि।

प्रश्न 6.
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी एक राष्ट्रीय संगठन है। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय सोसायटी का सदस्य है। भारत में यह वर्ष 1920 में अस्तित्व में आई। यह सोसायटी मानवता की सेवा में संलग्न है। यह लोगों को स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान, बीमारियों के बचाव और उपाय, युद्ध के दौरान घायलों की सहायता, प्राकृतिक आपदाओं के समय दवाइयाँ और आवश्यकतानुसार सुविधाएँ उपलब्ध करवाती है।

प्रश्न 7.
विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम के विभिन्न अंग कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:

  1. स्वास्थ्य सेवाएँ,
  2. स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण,
  3. स्वास्थ्य निर्देश।

प्रश्न 8.
सर्वपक्षीय विकास (All Round Development) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सर्वपक्षीय विकास से अभिप्राय व्यक्ति के सभी पक्षों का विकास करना है। वह शारीरिक पक्ष से बलवान, मानसिक पक्ष से तेज़, भावात्मक पक्ष से संतुलित, बौद्धिक पक्ष से समझदार और सामाजिक पक्ष से निपुण हो। सर्वपक्षीय विकास से व्यक्ति के व्यक्तित्व में बढ़ोतरी होती है। वह परिवार, समाज और राष्ट्र की संपत्ति बन जाता है।

प्रश्न 9.
स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम कैसे होने चाहिएँ?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम रुचिकर, मनोरंजक तथा शिक्षाप्रद होने चाहिएँ, ताकि इनमें सभी बढ़-चढ़कर भाग ले सकें। ये बच्चों की रुचि, आयु, लिंग, स्वास्थ्य के स्तर तथा वातावरण की आवश्यकता के अनुसार तथा व्यावहारिक भी होने चाहिएँ, ताकि इनसे स्वास्थ्य संबंधी सभी पहलुओं की उचित जानकारी प्राप्त हो सके।

प्रश्न 10.
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  1. बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की महत्ता की जानकारी देना,
  2. बच्चों को स्वास्थ्य के विषय में पर्याप्त ज्ञान देना।

प्रश्न 11.
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों या पहलुओं के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्मनिर्भर बनने में सहायता करते हैं। डॉ० थॉमस वुड के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”

प्रश्न 12.
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

प्रश्न 13.
निजी स्वास्थ्य क्या है?
उत्तर:
निजी स्वास्थ्य व्यक्ति का स्वयं का स्वास्थ्य है। इसमें वह व्यक्तिगत रूप से अपने शरीर की देख-रेख अर्थात् साफ-सफाई का ध्यान रखता है।

प्रश्न 14.
हमें स्वास्थ्य की आवश्यकता क्यों होती है? दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  1. आनंदमय एवं सुखमय जीवन जीने हेतु,
  2. शारीरिक अंगों की कार्य प्रणाली सुचारू रूप से चलाने हेतु।

प्रश्न 15.
स्वास्थ्य अनुदेशन के कोई दो मार्गदर्शक सिद्धांत बताइए।
उत्तर:

  1. स्वास्थ्य संबंधी किसी विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता करवाना,
  2. स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से संबंधित साहित्य स्कूल पुस्तकालय में उपलब्ध करवाना।

प्रश्न 16.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  1. छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना,
  2. उन्हें स्वास्थ्य के नियमों से अवगत कराना।

प्रश्न 17.
स्वास्थ्य शिक्षा प्रदान करने के कोई चार उपाय या तरीके बताएँ।
उत्तर:

  1. भाषणों द्वारा,
  2. फिल्मों द्वारा,
  3. रेडियो व टेलीविजन द्वारा,
  4. विज्ञापनों एवं समाचार-पत्रों द्वारा।

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प्रश्न 18.
स्वास्थ्य के नए दर्शनशास्त्र को किन बातों से समझा जा सकता है?
उत्तर:
स्वास्थ्य के नए दर्शनशास्त्र को निम्नलिखित बातों से समझा जा सकता है

  1. स्वास्थ्य एक आधारभूत अधिकार है,
  2. स्वास्थ्य समस्त संसार का सामाजिक ध्येय है,
  3. स्वास्थ्य विकास का अभिन्न अंग है,
  4. स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता की धारणा का केंद्र बिंदु है।

प्रश्न 19.
स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के निराकरण के किन्हीं तीन उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से बचने के लिए व्यक्ति को शारीरिक व्यायाम तथा योगासन करने चाहिएँ।
  2. शुद्ध एवं स्वच्छ पर्यावरण या वातावरण में रहना चाहिए।
  3. संतुलित एवं पौष्टिक भोजन समय पर करना चाहिए। शुद्ध पानी पीना चाहिए।

प्रश्न 20.
शारीरिक स्वास्थ्य के बारे में आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शारीरिक स्वास्थ्य संपूर्ण स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। इसके अंतर्गत हमें व्यक्तिगत स्वास्थ्य की जानकारी प्राप्त होती है। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि उसके सभी शारीरिक संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हों। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को न केवल शरीर के विभिन्न अंगों की रचना एवं उनके कार्यों की जानकारी होनी चाहिए, अपितु उनको स्वस्थ रखने की भी जानकारी होनी चाहिए।

शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समाज व देश के विकास एवं प्रगति में भी सहायक होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने शारीरिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाने हेतु संतुलित एवं पौष्टिक भोजन, व्यक्तिगत सफाई, नियमित व्यायाम व चिकित्सा जाँच और नशीले पदार्थों के निषेध आदि की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न 21.
आध्यात्मिक स्वास्थ्य के बारे में आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति उसे कहा जाता है जो नैतिक नियमों का पालन करता हो, दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता हो, सत्य व न्याय में विश्वास रखने वाला हो और जो दूसरों को किसी भी प्रकार का कोई नुकसान न पहुँचाता हो आदि। ऐसा व्यक्ति व्यक्तिगत मूल्यों से संबंधित होता है। दूसरों के प्रति सहानुभूति एवं सहयोग की भावना रखना, सहायता करने की इच्छा आदि आध्यात्मिक स्वास्थ्य के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं। आध्यात्मिक स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु मुख्यत: योग व ध्यान सबसे उत्तम माध्यम हैं। इनके द्वारा आत्मिक शांति व आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 22.
स्वास्थ्य को आनुवंशिकी या वंशानुक्रमण कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
व्यक्ति के मानसिक व शारीरिक गुण जीन (Genes) द्वारा निर्धारित होते हैं। जीन या गुणसूत्र को ही वंशानुक्रमण (Heredity) की इकाई माना जाता है। इसी कारण वंशानुक्रमण द्वारा व्यक्ति का स्वास्थ्य प्रभावित होता है । वंशानुक्रमण संबंधी गुण; जैसे ऊँचाई, चेहरा, रक्त समूह, रंग आदि माता-पिता के गुणसूत्रों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। बहुत-सी बीमारियाँ हैं जो वंशानुक्रमण द्वारा आगामी पीढ़ी को भी हस्तान्तरित हो जाती हैं।

HBSE 11th Class Physical Education स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions).

भाग-I : एक वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
“स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएं प्रदान करता है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन जे०एफ० विलियम्स ने कहा।

प्रश्न 2.
“स्वस्थ शरीर आत्मा का अतिथि-भवन और दुर्बल तथा रुग्ण शरीर आत्मा का कारागृह है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन रोजर बेकन ने कहा।

प्रश्न 3.
“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन अरस्तू ने कहा।

प्रश्न 4.
किसी देश का कल्याण किसके स्वास्थ्य पर निर्भर करता है?
उत्तर:
किसी देश का कल्याण उस देश के नागरिकों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।

प्रश्न 5.
स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत आने वाले कोई दो कार्यक्रमों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  1. एड्स जागरूकता संबंधी कार्यक्रम,
  2. मेडिकल निरीक्षण कार्यक्रम।

प्रश्न 6.
“अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ-दोनों जीवन के सबसे बड़े आशीर्वाद हैं।” यह कथन किसने कहा? उत्तर-यह कथन साइरस ने कहा।

प्रश्न 7.
प्राचीनकाल में स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध किससे था?
उत्तर:
प्राचीनकाल में स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध स्वास्थ्य निर्देशन से था।

प्रश्न 8.
विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को मनाया जाता है।

प्रश्न 9.
“स्वास्थ्य प्रथम पूँजी है।” यह किसका कथन है?
उत्तर:
यह कथन इमर्जन का है।

प्रश्न 10.
W.H.0. का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
World Health Organisation.

प्रश्न 11.
W.H.0. की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
W.H.O. की स्थापना अप्रैल, 1948 में हुई।

प्रश्न 12.
W.H.0. का मुख्यालय कहाँ है?
उत्तर:
W.H.O. का मुख्यालय जेनेवा में है।

प्रश्न 13.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम तीन प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 14.
शहरों में स्वास्थ्य संबंधी प्रमुख समस्या क्या है?
उत्तर:
शहरों में स्वास्थ्य संबंधी प्रमुख समस्या यातायात वाहनों की अधिकता के कारण बढ़ता प्रदूषण है।

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प्रश्न 15.
जन-साधारण को स्वास्थ्य-संबंधी उपयोगी जानकारी देने वाले माध्यम या साधन बताएँ।
उत्तर:
टेलीविजन, रेडियो, वार्तालाप, भाषण, समाचार-पत्र आदि।

प्रश्न 16.
अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन कैसा होता है?
उत्तर:
अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन शांत एवं सुखमय होता है।

प्रश्न 17.
“हमारा कर्तव्य है कि हम अपने शरीर को स्वस्थ रखें अन्यथा हम अपने मन को सक्षम और शुद्ध नहीं रख पाएँगे।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन महात्मा गौतम बुद्ध ने कहा।

प्रश्न 18.
“सबसे बड़ा धन स्वास्थ्य है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन वर्जिल का है।

प्रश्न 19.
भारतीय परिवार नियोजन संघ की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारतीय परिवार नियोजन संघ की स्थापना वर्ष 1949 में हुई।

प्रश्न 20.
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की स्थापना वर्ष 1920 में हुई।

भाग-II : सही विकल्प का चयन करें

1. स्वास्थ्य का शाब्दिक अर्थ है
(A) स्वस्थ शरीर
(B) स्वस्थ दिमाग
(C) स्वस्थ आत्मा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. “स्वास्थ्य हृष्ट-पुष्ट होने की एक दशा है।” यह कथन किसके अनुसार है?
(A) यूनिसेफ के
(B) विश्व स्वास्थ्य संगठन के
(C) अंग्रेज़ी पद के
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) अंग्रेज़ी पद के

3. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम किसको ध्यान में रखकर तय करना चाहिए?
(A) बच्चों की आयु और लिंग को
(B) बच्चे के स्वास्थ्य को
(C) बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक स्तर को
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

4. “स्वास्थ्य ही असली धन है, न कि सोने एवं चाँदी के टुकड़े।” यह कथन है
(A) महात्मा गाँधी का
(B) डॉ० थॉमस वुड का
(C) हरबर्ट स्पेंसर का
(D) जे०एफ०विलियम्स का
उत्तर:
(A) महात्मा गाँधी का

5. निम्नलिखित में से स्कूल स्वास्थ्य का चरण है
(A) स्वास्थ्य सेवाएँ
(B) स्कूली वातावरण
(C) स्वास्थ्य निर्देश
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

6. निम्नलिखित में से स्वास्थ्य का आयाम है
(A) शारीरिक स्वास्थ्य
(B) मानसिक स्वास्थ्य
(C) सामाजिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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7. “स्वास्थ्य ही प्रथम पूँजी है।” यह कथन किसने कहा?
(A) स्वामी विवेकानंद ने
(B) इमर्जन ने
(C) गाँधी जी ने
(D) डॉ० थॉमस वुड ने
उत्तर:
(B) इमर्जन ने

8. “स्वास्थ्य केवल रोग या विकृति की अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुख की स्थिति को कहते हैं।” यह कथन है
(A) यूनिसेफ का
(B) स्वामी विवेकानंद का
(C) विश्व स्वास्थ्य संगठन का
(D) डॉ० थॉमस वुड का
उत्तर:
(C) विश्व स्वास्थ्य संगठन का

9. स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य है
(A) स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान देना
(B) उचित मार्गदर्शन करना
(C) स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों का विकास करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

10. प्राचीनकाल में स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध किससे था?
(A) स्वास्थ्य सेवाओं से
(B) स्वास्थ्य अनुदेशन से
(C) स्वास्थ्य निरीक्षण से
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) स्वास्थ्य अनुदेशन से

11. विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) का मुख्यालय कहाँ स्थित है?
(A) न्यूयार्क में
(B) पेरिस में
(C) जेनेवा में
(D) लंदन में
उत्तर:
(C) जेनेवा में

12. स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला कारक है
(A) वातावरण
(B) संतुलित आहार
(C) वंशानुक्रमण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

13. “अच्छा मनुष्य होना जीवन की सफलता के लिए बड़ी बात है। अच्छे मनुष्य पर ही देश की खुशहाली निर्भर करती है।” यह कथन है
(A) विश्व स्वास्थ्य संगठन का
(B) वैबस्टर का
(C) हरबर्ट स्पेंसर का
(D) थॉमस वुड का
उत्तर:
(C) हरबर्ट स्पेंसर का

14. “स्वास्थ्य शारीरिक और मानसिक पक्ष से मजबूती है, जिसके द्वारा व्यक्ति शारीरिक समस्याओं से पूरी तरह स्वतंत्रता प्राप्त कर लेता है।” यह कथन है
(A) विश्व स्वास्थ्य संगठन का
(B) वैबस्टर का
(C) हरबर्ट स्पेंसर का
(D) थामस वुड का
उत्तर:
(B) वैबस्टर का

15. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम मुख्यतः किसको ध्यान में रखकर तय करना चाहिए?
(A) बच्चों की आयु और लिंग को
(B) बच्चों के स्वास्थ्य को
(C) केवल आयु को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) बच्चों की आयु और लिंग को

16. सुखमय और आनंदमय जीवन की कुंजी है
(A) धन
(B) स्वास्थ्य
(C) परिश्रम
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) स्वास्थ्य

17. केंद्रीय स्तर पर कौन-सी स्वास्थ्य संबंधी संस्था स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का निपटारा करती है?
(A) केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय
(B) राज्य स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय
(C) जिला स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय

18. ‘प्रोटीन’ शब्द का प्रयोग बरजेलियास ने किया
(A) वर्ष 1938 में
(B) वर्ष 1948 में
(C) वर्ष 1976 में
(D) वर्ष 1996 में
उत्तर:
(A) वर्ष 1938 में

19. “स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है जिससे व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएँ प्रदान करता है।” यह कथन है
(A) विश्व स्वास्थ्य संगठन का
(B) जे०एफ० विलियम्स का
(C) हरबर्ट स्पेंसर का
(D) थॉमस वुड का
उत्तर:
(B) जे०एफ० विलियम्स का

20. W.H.O. का पूरा नाम है
(A) Organisation of World Health
(B) World Health Organisation
(C) World Healthy Organisation
(D) Health World Organisation
उत्तर:
(B) World Health Organisation

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21. व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक क्षमता की पूर्णरूपेण समन्वित स्थिति को क्या कहते हैं?
(A) स्वास्थ्य
(B) स्वस्थता
(C) सुयोग्यता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) स्वास्थ्य

22. अखिल भारतीय नेत्रहीन सहायक सोसायटी की स्थापना हुई
(A) वर्ष 1949 में
(B) वर्ष 1945 में
(C) वर्ष 1920 में
(D) वर्ष 1939 में
उत्तर:
(B) वर्ष 1945 में

23. भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की स्थापना हुई
(A) वर्ष 1946 में
(B) वर्ष 1949 में
(C) वर्ष 1939 में
(D) वर्ष 1920 में
उत्तर:
(D) वर्ष 1920 में

24. भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार से जुड़ी स्वयंसेवी संस्था है
(A) अखिल भारतीय नेत्रहीन सहायक सोसायटी
(B) हिन्द कुष्ठ निवारण संस्था
(C) भारतीय बाल कल्याण परिषद्
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

25. भारत सेवक समाज की स्थापना हुई
(A) वर्ष 1939 में
(B) वर्ष 1952 में
(C) वर्ष 1950 में
(D) वर्ष 1948 में
उत्तर:
(B) वर्ष 1952 में

26. “स्वास्थ्य शिक्षा लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े व्यवहार से संबंधित है।” यह कथन है
(A) डॉ० थॉमस वुड का
(B) स्वामी विवेकानंद का
(C) सोफी का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सोफी का

भाग-III: निम्नलिखित कथनों के उत्तर सही या गलत अथवा हाँ या नहीं में दें

1. साफ-सुथरे माहौल में रहने से तनाव बढ़ता है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

2. अच्छे स्वास्थ्य के लिए नींद आवश्यक है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:

3. अच्छा स्वास्थ्य जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

4. अस्वस्थ व्यक्ति के सभी शारीरिक संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं,

5. हमें हमेशा स्वच्छ वातावरण में रहना चाहिए। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

6. वर्जिल के अनुसार व्यक्ति का सबसे बड़ा धन स्वास्थ्य है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

7. स्वास्थ्य आनंदमयी जीवन की कुंजी है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

8. क्या स्वास्थ्य शिक्षा से सामाजिक स्वास्थ्य बढ़ता है? (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

9. स्वास्थ्य शिक्षा व्यक्ति को स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

10. बिना स्वास्थ्य के आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

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11. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम अध्यापकों को ध्यान में रखकर तय करना चाहिए। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं,

12. स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम में केवल शैक्षिक विषय ही शामिल होने चाहिएँ । (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं,

13. स्वास्थ्य शिक्षा केवल स्वास्थ्य तक ही सीमित है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

14. स्वास्थ्य शिक्षा लोगों की सेहत का स्तर ऊँचा करने में सहायक है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

15. स्वास्थ्य का अर्थ व्यक्ति का केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ होना है। (सही/गलत)।
उत्तर:
गलत।

भाग-IV : रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. अच्छे स्वास्थ्य से व्यक्ति का जीवन ………….. होता है।
उत्तर:
सुखमयी व आनंदमयी,

2. स्कूल जाने वाले बच्चे किसी राष्ट्र को …………. बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।
उत्तर:
सशक्त व मजबूत,

3. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम व पाठ्यक्रम …………… की आयु और रुचि के अनुसार होना चाहिए।
उत्तर:
बच्चों,

4. ………… शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है।
उत्तर:
स्वस्थ,

5. ………… व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुधारने व निखारने में सहायक होता है।
उत्तर:
स्वास्थ्य,

6. …………. व्यक्ति के शरीर में फूर्ति एवं लचक होती है।
उत्तर:
स्वस्थ,

7. विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) का मुख्यालय …………… में है।
उत्तर:
जेनेवा,

8. स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम मुख्यतः ……………. प्रकार के होते हैं।
उत्तर:
तीन,

9. अच्छे स्वास्थ्य हेतु हमें ……………. वस्तुओं के सेवन से दूर रहना चाहिए।
उत्तर:
नशीली,

10. “स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है, जिसमें व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएँ प्रदान करता है।” यह कथन …………. ने कहा।
उत्तर:
जे०एफ० विलियम्स।

स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा Sammary

स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य शिक्षा की अवधारणा परिचय

स्वास्थ्य (Health): अच्छा स्वास्थ्य होना जीवन की सफलता के लिए बहुत आवश्यक है, क्योंकि अच्छे स्वास्थ्य से कोई व्यक्ति किसी निर्धारित उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हो सकता है। आरोग्य व्यक्ति को स्वस्थ कहना बड़ी भूल है। स्वस्थ व्यक्ति उसे कहा जाता है जिसकी सभी शारीरिक प्रणालियाँ ठीक ढंग से कार्य करती हों और वह स्वयं को वातावरण के अनुसार ढालने में सक्षम हो।

अलग-अलग लोगों के लिए स्वास्थ्य का अर्थ भिन्न-भिन्न होता है। कुछ लोगों के लिए यह बीमारी से छुटकारा है तो कुछ के लिए शरीर और दिमाग का सुचारू रूप से कार्य करना। स्वास्थ्य का शाब्दिक अर्थ स्वस्थ शरीर, दिमाग तथा मन से चुस्त-दुरुस्त होने की अवस्था है, विशेष रूप से किसी बीमारी या रोग से मुक्त होना है।

अत: स्वास्थ्य कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि जीवन में उपलब्धि प्राप्त करने का साधन है। महात्मा गौतम बुद्ध (Mahatma Gautam Budh) ने स्वास्थ्य के बारे में कहा- “हमारा कर्तव्य है कि हम अपने शरीर को स्वस्थ रखें अन्यथा हम अपने मन को सक्षम और शुद्ध नहीं रख पाएंगे।” स्वास्थ्य के नए दर्शनशास्त्र को निम्नलिखित बातों से समझा जा सकता है

  • स्वास्थ्य एक आधारभूत अधिकार है।
  • स्वास्थ्य समस्त संसार का सामाजिक ध्येय है।
  • स्वास्थ्य विकास का अभिन्न अंग है।
  •  स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता की धारणा का केंद्र-बिंदु है।

स्वास्थ्य शिक्षा (Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ उन सभी आदतों से है जो किसी व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं। इसका संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्म-निर्भर बनाने में सहायता करते हैं।

यह एक ऐसी शिक्षा है जिसके बिना मनुष्य की सारी शिक्षा अधूरी रह जाती है। डॉ० थॉमस वुड (Dr Thomas Wood) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”

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HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

Haryana State Board HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

HBSE 11th Class Physical Education शारीरिक शिक्षा की अवधारणा Textbook Questions and Answers

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न ( (Long Answer Type Questions) 

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा से आप क्या समझते हैं? इसके लक्ष्यों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
शारीरिक शिक्षा की परिभाषा देते हुए, अर्थ स्पष्ट कीजिए।
अथवा
शारीरिक शिक्षा से आपका क्या अभिप्राय है? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Physical Education) शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह अभिन्न अंग है, जो खेलकूद तथा अन्य शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से व्यक्ति में एक चुनी हुई दिशा में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। इससे केवल बुद्धि तथा शरीर का ही विकास नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति के स्वभाव, चरित्र एवं आदतों के निर्माण में भी सहायक होती है अर्थात् शारीरिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के संपूर्ण (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं संवेगात्मक आदि) व्यक्तित्व का विकास होता है।

शारीरिक शिक्षा ऐसी शिक्षा है जो वैयक्तिक जीवन को समृद्ध बनाने में प्रेरक सिद्ध होती है। शारीरिक शिक्षा, शारीरिक विकास के साथ शुरू होती है और मानव-जीवन को पूर्णता की ओर ले जाती है, जिसके परिणामस्वरूप वह एक हृष्ट-पुष्ट और मजबूत शरीर, अच्छा स्वास्थ्य, मानसिक स्फूर्ति और सामाजिक एवं भावनात्मक संतुलन रखने वाला व्यक्ति बन जाता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी प्रकार की चुनौतियों अथवा परेशानियों से प्रभावी तरीके से लड़ने में सक्षम होता है। शारीरिक शिक्षा के विषय में विभिन्न शारीरिक शिक्षाशास्त्रियों के विचार निम्नलिखित हैं

1. सी० सी० कोवेल (C.C.Cowell):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा व्यक्ति-विशेष के सामाजिक व्यवहार में वह परिवर्तन है जो बड़ी माँसपेशियों तथा उनसे संबंधित गतिविधियों की प्रेरणा से उपजता है।”

2. जे० बी० नैश (J. B. Nash):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा के संपूर्ण क्षेत्र का वह भाग है जो बड़ी माँसपेशियों से होने वाली क्रियाओं तथा उनसे संबंधित प्रतिक्रियाओं से संबंध रखता है।”

3. ए० आर० वेमैन (A. R. Wayman):
के मतानुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह भाग है जिसका संबंध शारीरिक गतिविधियों द्वारा व्यक्ति के संपूर्ण विकास एवं प्रशिक्षण से है।”

4. आर० कैसिडी (R. Cassidy):
के अनुसार, “शारीरिक क्रियाओं पर केंद्रित अनुभवों द्वारा जो परिवर्तन मानव में आते हैं, वे ही शारीरिक शिक्षा कहलाते हैं।”

5. जे० एफ० विलियम्स (J. E Williams):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा मनुष्य की उन शारीरिक क्रियाओं को कहते हैं, जो किसी विशेष लक्ष्य को लेकर चुनी और कराई गई हों।”

6. सी० एल० ब्राउनवैल (C. L. Brownwell):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा उन परिपूर्ण एवं संतुलित अनुभवों का जोड है जो व्यक्ति को बहु-पेशीय प्रक्रियाओं में भाग लेने से प्राप्त होते हैं तथा उसकी अभिवृद्धि और विकास को चरम-सीमा तक बढ़ाते हैं।”

7.निक्सन व कोजन (Nixon and Cozan):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा की पूर्ण क्रियाओं का वह भाग है जिसका संबंध शक्तिशाली माँसपेशियों की क्रियाओं और उनसे संबंधित क्रियाओं तथा उनके द्वारा व्यक्ति में होने वाले परिवर्तनों से है।”

8. डी०ऑबरटियूफर (D.Oberteuffer):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा उन अनुभवों का जोड़ है जो व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियों से प्राप्त हुई है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी पहलू है जिसमें शारीरिक गतिविधियों या व्यायामों द्वारा व्यक्ति के विकास के प्रत्येक पक्ष प्रभावित होते हैं। यह व्यक्ति के व्यवहार और दृष्टिकोण में आवश्यक परिवर्तन करती है। इसका उद्देश्य न केवल व्यक्ति का शारीरिक विकास है, बल्कि यह मानसिक विकास, सामाजिक विकास, भावनात्मक विकास, बौद्धिक विकास, आध्यात्मिक विकास एवं नैतिक विकास में भी सहायक होती है अर्थात् यह व्यक्ति का संपूर्ण या सर्वांगीण विकास करती है। संक्षेप में विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने से हमें निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती है

  1. शारीरिक शिक्षा साधारण शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।
  2. शारीरिक शिक्षा का माध्यम शिक्षा के साथ-साथ क्रियाएँ हैं। जब तक ये क्रियाएँ शक्तिशाली नहीं होंगी, शरीर के सारे अंगों का पूरी तरह से विकास नहीं हो सकता।
  3. शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य केवल शारीरिक विकास ही नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक विकास करना भी है।
  4. आज की शारीरिक शिक्षा वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें क्रियाओं का चुनाव इस प्रकार किया जाता है जिससे इसके उद्देश्य की पूर्ति की जा सके।
  5. शारीरिक शिक्षा संबंधी क्रियाओं द्वारा व्यक्ति अपने शरीर में सुधार करता है और इसे मजबूत बनाता है।
  6. यह शिक्षा शरीर की कार्य-कुशलता व क्षमता में वृद्धि करती है।

शारीरिक शिक्षा के लक्ष्य (Aims of Physical Education): शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य विद्यार्थी को इस प्रकार तैयार करना है कि वह एक सफल एवं स्वस्थ नागरिक बनकर अपने परिवार, समाज व राष्ट्र की समस्याओं का समाधान करने की क्षमता या योग्यता उत्पन्न कर सके और समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनकर सफलता से जीवनयापन करते हुए जीवन का पूरा आनंद उठा सके। विभिन्न विद्वानों के अनुसार शारीरिक शिक्षा के लक्ष्य निम्नलिखित हैं

1. जे० एफ० विलियम्स (J. E. Williams):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य एक प्रकार का कुशल नेतृत्व तथा पर्याप्त समय प्रदान करना है, जिससे व्यक्तियों या संगठनों को इसमें भाग लेने के लिए पूरे-पूरे अवसर मिल सकें, जो शारीरिक रूप से आनंददायक, मानसिक दृष्टि से चुस्त तथा सामाजिक रूप से निपुण हों।”

2. जे० आर० शर्मन (J. R. Sherman):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य है कि व्यक्ति के अनुभव को इस हद तक प्रभावित करे कि वह अपनी क्षमता से समाज में अच्छे से रह सके, अपनी जरूरतों को बढ़ा सके, उन्नति कर सके तथा अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए सक्षम हो सके।”

3. केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय (Central Ministry of Education):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा को प्रत्येक बच्चे को शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक रूप से स्वस्थ बनाना चाहिए और उसमें ऐसे व्यक्तिगत एवं सामाजिक गुणों का विकास करना चाहिए ताकि वह दूसरों के साथ प्रसन्नता व खुशी से रह सके और एक अच्छा नागरिक बन सके।”

उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है। इसके लक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए जे०एफ० विलियम्स (J.E. Williams) ने भी कहा है कि “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है।”

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 2.
शारीरिक शिक्षा से आपका क्या अभिप्राय है? इसके उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा
शारीरिक शिक्षा क्या है? विद्वानों ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को किस प्रकार से विभाजित किया है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का अर्थ (Meaning of Physical Education):
शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह अभिन्न अंग है, जो खेलकूद तथा अन्य शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से व्यक्ति में एक चुनी हुई दिशा में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। इससे केवल बुद्धि तथा शरीर का ही विकास नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति के स्वभाव, चरित्र एवं आदतों के निर्माण में भी सहायक होती है।

शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Physical Education):
शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य से हमारा अभिप्राय उन सीढ़ियों से है जिन पर एक-एक करके चढ़ते हुए हम अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं। जैसे कि हमारा लक्ष्य तो ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतना है, लेकिन इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें कई उद्देश्य बनाने पड़ते हैं जैसे कि अच्छा प्रशिक्षण लेना, अच्छा ट्रेनिंग प्रोग्राम, संतुलित आहार इत्यादि। इसके बाद जिला स्तर, राज्य स्तर, राष्ट्रीय स्तर पर जीत हासिल करना और फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जीत हासिल करना है।

उसके बाद हम अपने लक्ष्य को पाने में सफल हो सकते हैं। उद्देश्य गिनती में बहुत अधिक होते हैं तथा किसी मुख्य स्थान पर जाने के लिए निर्धारक का काम करते हैं। नि:संदेह इनकी प्राप्ति व्यक्तियों तथा सिद्धांतों द्वारा ही होती है, परंतु प्रत्येक हालत में सब उद्देश्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसका भाव यह नहीं है कि उद्देश्यों का कोई महत्त्व ही नहीं है, इनके द्वारा ही बच्चों या विद्यार्थियों के आचरण में कई तरह के परिवर्तन तथा सुधार किए जा सकते हैं । विभिन्न विद्वानों ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया है; जैसे

1. हैगमैन तथा ब्राउनवैल (Hagman and Brownwell) ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया है

  • शारीरिक स्वास्थ्य में बढ़ोतरी करना (Increase in Physical Health),
  • गति या तकनीकी योग्यताओं में बढ़ोतरी करना (Increase in Motor Skills),
  • ज्ञान में वृद्धि करना (Increase in Knowledge),
  • अभिरुचि में सुधार लाना (Improvement in Aptitude)।

2. जे०बी०नैश (J. B. Nash) ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया है

  • शारीरिक अंगों का विकास (Development of Organic),
  • नाड़ी-माँसपेशियों संबंधी विकास (Neuro-Muscular Development),
  • अर्थ समझने की योग्यता का विकास (Development of Inter-pretative Ability),
  • भावनात्मक विकास (Emotional Development)।

3. बी० वाल्टर (B. Walter) ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया है

  • सेहत या स्वास्थ्य में सुधार करना (Improvement in Health),
  • खाली समय का उचित प्रयोग (Proper or Worthy use of Leisure Time),
  • नैतिक आचरण (Ethical Character)।

4. लास्की (Laski) ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में विभाजित किया है

  • शारीरिक विकास (Physical Development),
  • नाड़ी-माँसपेशियों के समन्वय में विकास (Development of Neuro-Muscular Co-ordination),
  • भावनात्मक विकास (Emotional Development),
  • सामाजिक विकास (Social Development),
  • बौद्धिक विकास (Intellectual Development)।

5. एच० क्लार्क (H. Clark) के अनुसार, शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है

  • शारीरिक स्वास्थ्य में वृद्धि (Increase in Physical Health),
  • सांस्कृतिक विकास (Cultural Development),
  • सामाजिक गुणों में वृद्धि (Increase in Social Qualities)।

6. हेथरिंग्टन (Hetherington) के अनुसार, शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में विभाजित किया जाता है

  • तात्कालिक उद्देश्य (Immediately Objectives),
  • विकासात्मक उद्देश्य (Developmental Objectives),
  • सामाजिक स्तर के उद्देश्य (Objectives of Social Level),
  • शारीरिक स्थिति पर नियंत्रण (Control on Physical Condition),
  • दूरवर्ती उद्देश्य (Distal Objectives)।

7. इरविन (Irwin) ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में विभाजित किया है

  • शारीरीक विकास (Physical Development),
  • भावनात्मक विकास (Emotional Development),
  • सामाजिक विकास (Social Development),
  • मानसिक विकास (Mental Development),
  • मनोरंजक गतिविधियों में निपुणता या मनोरंजक विकास (Skill in Recreative Activities or Development of Recreation)

8. चार्ल्स ए० बूचर (Charles A. Bucher) ने अपनी पुस्तक ‘Foundations of Physical Education’ में शारीरिक शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं

  • शारीरिक विकास (Physical Development),
  • गतिज विकास (Motor Development),
  • मानसिक विकास (Mental Development),
  • मानवीय संबंधों का विकास (Development of Human Relations)।

उपर्युक्त वर्णित उद्देश्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शारीरिक शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं
1. शारीरिक विकास (Physical Development):
शारीरिक शिक्षा संबंधी क्रियाएँ शारीरिक विकास का माध्यम हैं। शारीरिक क्रियाएँ माँसपेशियों को मजबूत करने, रक्त का बहाव ठीक रखने, पाचन-शक्ति में बढ़ोतरी करने और श्वसन क्रिया को ठीक रखने में सहायक होती हैं। शारीरिक क्रियाएँ न केवल भिन्न-भिन्न प्रणालियों को स्वस्थ और ठीक रखती हैं, बल्कि उनके आकार, शक्ल
और कुशलता में भी बढ़ोतरी करती हैं। शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को शारीरिक तौर पर स्वस्थ बनाना और उसके व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलू को निखारना है।

2. गतिज विकास (Motor Development):
शारीरिक शिक्षा संबंधी क्रियाएँ शरीर में ज्यादा-से-ज्यादा तालमेल बनाती हैं। अगर शारीरिक शिक्षा में उछलना, दौड़ना, फेंकना आदि क्रियाएँ न हों तो कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं किया जा सकता। मानवीय शरीर में सही गतिज विकास तभी हो सकता है जब नाड़ी प्रणाली और माँसपेशीय प्रणाली का संबंध ठीक रहे। इससे कम थकावट और अधिक-से-अधिक कुशलता प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

3. भावनात्मक विकास (Emotional Development):
शारीरिक शिक्षा कई प्रकार के ऐसे अवसर पैदा करती है, जिनसे शरीर का भावनात्मक या संवेगात्मक विकास होता है। खेल में बार-बार जीतना या हारना दोनों हालातों में भावनात्मक पहलू प्रभावित होते हैं। इससे खिलाड़ियों में भावनात्मक स्थिरता उत्पन्न होती है। इसलिए उन पर जीत-हार का बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। शारीरिक शिक्षा खिलाड़ियों को अपनी भावनाओं पर काबू रखना सिखाती है।

4. सामाजिक व नैतिक विकास (Social and Moral Development):
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे समाज में मिल-जुलकर रहना पड़ता है। शारीरिक शिक्षा कई प्रकार के ऐसे अवसर प्रदान करती है, जिससे खिलाड़ियों के सामाजिक व नैतिक विकास हेतु सहायता मिलती है; जैसे उनका एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहना, एक-दूसरे का सम्मान करना, दूसरों की आज्ञा का पालन करना, नियमों का पालन करना, सहयोग देना, एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना आदि।

5. मानसिक विकास (Mental Development):
शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास भी होता है। जब बालक या खिलाड़ी शारीरिक क्रियाओं में भाग लेता है तो इनसे उसके शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास में भी बढ़ोतरी होती है।

6. सांस्कृतिक विकास (Cultural Development):
शारीरिक शिक्षा संबंधी खेल और क्रियाकलापों के दौरान विभिन्न संस्कृतियों के व्यक्ति आपस में मिलते हैं और एक-दूसरे के बारे में जानते हैं व उनके रीति-रिवाज़ों, परंपराओं और जीवन-शैली के बारे में परिचित होते हैं, जिससे सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा मिलता है।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों का क्षेत्र बहुत विशाल है। शारीरिक शिक्षा को व्यक्ति का विकास सामाजिक, भावनात्मक, शारीरिक तथा अन्य कई दृष्टिकोणों से करना होता है ताकि वह एक अच्छा नागरिक बन सके। एक अच्छा नागरिक बनने के लिए टीम भावना, सहयोग, दायित्व का एहसास और अनुशासन आदि गुणों की आवश्यकता होती है। शारीरिक शिक्षा, एक सामान्य शिक्षा के रूप में शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को पूरा करने में सहायक होती है। यह व्यक्ति में आंतरिक कुशलताओं का विकास करती है और उसमें अनेक प्रकार के छुपे हुए गुणों को बाहर निकालती है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 3.
शिक्षा के क्षेत्र में शारीरिक शिक्षा क्यों आवश्यक है? वर्णन करें। अथवा हमें शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता किन कारणों से पड़ती है? वर्णन करें।
उत्तर:
शिक्षा के क्षेत्र में शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता या उपयोगिता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वर्तमान युग में शारीरिक शिक्षा पूरे विश्व के स्कूल-कॉलेजों में पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग बन गई है। एच०सी० बॅक (H.C. Buck) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा सामान्य शिक्षा कार्यक्रम का वह भाग है जो माँसपेशियों के क्रियाकलापों के माध्यम से बच्चों की वृद्धि, विकास तथा शिक्षा से संबंधित है।” आज के मनुष्य को योजनाबद्ध खेलों और शारीरिक शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। आधुनिक संदर्भ में शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता या उपयोगिता निम्नलिखित प्रकार से है

1. शारीरिक विकास (Physical Development):
शारीरिक विकास शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से होता है। शारीरिक क्रियाएँ माँसपेशियों को मजबूत, रक्त का संचार सही, पाचन-शक्ति में बढ़ोतरी तथा श्वसन क्रिया को ठीक रखती हैं। शारीरिक क्रियाएँ न केवल अलग-अलग प्रणालियों को स्वस्थ और ठीक रखती हैं, बल्कि उनके आकार, शक्ल और कुशलता में बढ़ोतरी भी करती हैं। शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को शारीरिक तौर पर स्वस्थ बनाना है। नियमित रूप में किया जाने वाला व्यायाम एक स्वस्थ जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति की निपुणता और सामर्थ्य में वृद्धि करता है। इस कारण शारीरिक क्रियाकलाप शारीरिक वृद्धि और विकास के लिए अत्यावश्यक है।

2. नियमबद्ध वृद्धि एवं विकास (Harmonious Growth and Development):
नियमित रूप से वृद्धि और विकास शारीरिक शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है। सभी सजीव वस्तुएँ वृद्धि करती हैं। जैसे एक छोटा-सा बीज बड़ा होकर एक भारी पेड़ बन जाता है। शारीरिक शिक्षा का संबंध भी वृद्धि और विकास से है। व्यायाम करने से माँसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। नियमित रूप से किया जाने वाला शारीरिक अभ्यास विभिन्न अंगों में वृद्धि एवं विकास करता है। इसलिए आज हमें इसकी बहुत आवश्यकता है।

3. अच्छे नागरिक के गुणों का विकास (Development of Qualities of Good Citizen):
शारीरिक शिक्षा खेलकूद के माध्यम से अच्छे नागरिकों के गुणों को विकसित करती है। जैसे खेलों के नियमों की पालना करना, खेलों में आपसी तालमेल बनाना, हार व जीत में संयम रखना, दूसरों का आदर, देशभक्ति की भावना जो लोकतांत्रिक जीवन में आवश्यक है, को विकसित करती है।

4. मानसिक विकास (Mental Development):
अरस्तू के अनुसार, “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिमाग का वास होता है।” भाव यह है कि शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का विकास भी होना चाहिए। शारीरिक और मानसिक दोनों के मिलाप से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आता है। जब कोई व्यक्ति शारीरिक क्रियाओं में भाग लेता है तो उसके शारीरिक विकास के साथ-साथ उसका मानसिक विकास भी होता है।

5. नेतृत्व का विकास (Development of Leadership):
शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में नेतृत्व करने के अनेक अवसर होते हैं। जब किसी खिलाड़ी को शरीर गर्माने के लिए नियुक्त किया जाता है तो उस समय भी नेतृत्व की शिक्षा दी जाती है। उदाहरणतया, हॉकी की टीम के कैप्टन को निष्पक्षता और समझदारी से खेलना पड़ता है। कई बार प्रतियोगिताओं का आयोजन करना भी नेतृत्व के गुणों के विकास में सहायक होता है। इसलिए हमें शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है।

6. गतिज विकास (Motor Development):
शारीरिक क्रियाएँ शरीर में अधिक-से-अधिक तालमेल बढ़ाती हैं । यदि शारीरिक क्रियाओं में कूदना, दौड़ना, फेंकना आदि न हो तो कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं किया जा सकता । मानवीय शरीर में सही गतिज विकास तभी हो सकता है जब नाड़ी प्रणाली और माँसपेशीय प्रणाली का संबंध ठीक रहे। इससे कम थकावट और अधिक-से-अधिक कुशलता प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

7. भावनात्मक विकास (Emotional Development):
शारीरिक क्रियाएँ कई प्रकार के ऐसे अवसर पैदा करती हैं जिनसे भावनात्मक विकास होता है। खेल में बार-बार विजयी होना या हारना, दोनों अवस्थाओं में भावनात्मक स्थिरता आती है। इसलिए खिलाड़ी पर जीत-हार का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखाती है। जिस व्यक्ति का अपने संवेगों पर नियंत्रण होता है वह सफलता की ओर अग्रसर होता है। इसलिए हमें शारीरिक शिक्षा की अधिक आवश्यकता है।

8. सामाजिक विकास (Social Development):
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । वह समाज में मिल-जुलकर सम्मानपूर्वक जीना चाहता है। शारीरिक शिक्षा द्वारा व्यक्ति के सामाजिक पक्ष को जागृत करने के प्रबंध किए जाते हैं। शारीरिक शिक्षा की क्रियाओं द्वारा व्यक्ति का सामाजिक विकास होता है जैसे कि एक-दूसरे को सहयोग देना, दूसरों का सम्मान करना और आज्ञा का पालन करना, अनुशासन, वफादारी, सहनशीलता, सदाचार, नियमों व कर्तव्यों की पालना, नियमबद्धता इत्यादि। ये सभी गुण मित्रता और भाईचारे में वृद्धि करते हैं। इसलिए शारीरिक शिक्षा हमारे लिए उपयोगी है।

9. स्वास्थ्य शिक्षा का ज्ञान (Knowledge of Health Education):
स्वस्थ जीवन के लिए स्वास्थ्य संबंधी विस्तृत जानकारी होना आवश्यक है। शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को एक अच्छा जीवन व्यतीत करने का मार्ग दर्शाती है। शारीरिक शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत जन-संपर्क के रूप में कार्य करती है, जो सेहत और रोगों से संबंधी जानकारी प्रदान करती है। यह लोगों को अपनी आदतों और जीवन व्यतीत करने के तौर-तरीकों का विकास करने की प्रेरणा देती है।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि शारीरिक गतिविधियाँ नियमित रूप से वृद्धि करने में सहायक होती हैं। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में हमें शारीरिक शिक्षा की अति आवश्यकता पड़ती है। इसकी उपयोगिता देखते हुए इसका क्षेत्र दिन-प्रतिदिन विस्तृत होता जा रहा है। अतः हम यह कह सकते हैं कि शारीरिक शिक्षा को हमें विशाल स्तर पर सर्व-प्रिय बनाना चाहिए और इसे न केवल शिक्षा के क्षेत्र तक सीमित रखना चाहिए बल्कि इसे ग्रामीण या अन्य क्षेत्रों तक भी पहुँचाना चाहिए।

प्रश्न 4.
आधुनिक युग में शारीरिक शिक्षा के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
अथवा
दैनिक जीवन में शारीरिक शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आज का युग एक मशीनी व वैज्ञानिक युग है, जिसमें मनुष्य स्वयं मशीन बनकर रह गया है। इसकी शारीरिक शक्ति खतरे में पड़ गई है। मनुष्य पर मानसिक तनाव और कई प्रकार की बीमारियों का संक्रमण बढ़ रहा है। मनुष्य को नीरोग एवं स्वस्थ रखने में शारीरिक शिक्षा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शारीरिक शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए रूसो (Rousseau) ने कहा”शारीरिक शिक्षा शरीर का एक मजबूत ढाँचा है जो मस्तिष्क के कार्य को निश्चित तथा आसान करता है।” शारीरिक शिक्षा के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है

1. शारीरिक शिक्षा स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है (Physical Education is Useful for Health):
अच्छा स्वास्थ्य अच्छी जलवायु की उपज नहीं, बल्कि यह अच्छी खुराक, सफ़ाई, उचित आराम, अनावश्यक चिंताओं से मुक्ति और रोग-रहित जीवन है। आवश्यक डॉक्टरी सहायता भी स्वास्थ्य को अच्छा रखने के लिए जरूरी है। बहुत ज्यादा कसरत करना, परन्तु आवश्यक खुराक न खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। जो व्यक्ति खेलों में भाग लेते हैं, उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है। खेलों में भाग लेने से शरीर की सारी शारीरिक प्रणालियाँ सही ढंग से काम करने लग जाती हैं।

ये प्रणालियाँ शरीर में हुई थोड़ी-सी कमी या बढ़ोतरी को भी सहन कर लेती हैं। इसलिए जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति खेलों में अवश्य भाग ले। आधुनिक युग में शारीरिक शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए डॉ० राधाकृष्णन (Dr. Radha Krishanan) ने कहा है, “मजबूत शारीरिक नींव के बिना कोई राष्ट्र महान नहीं बन सकता।” कीजिए।

2. शारीरिक शिक्षा हानिकारक मनोवैज्ञानिक व्याधियों को कम करती है (Physical Education decreases Harmful Psychological Disorders):
आधुनिक संसार में व्यक्ति का ज्यादा काम दिमागी हो गया है; जैसे प्रोफैसर, वैज्ञानिक, गणित-शास्त्री, दार्शनिक आदि सारे व्यक्ति मानसिक कामों से जुड़े हुए हैं । मानसिक काम से हमारे स्नायु संस्थान (Nervous System) पर दबाव बढ़ता है। इस दबाव को कम करने के लिए काम में परिवर्तन आवश्यक है। यह परिवर्तन मानसिक शांति पैदा करता है। सबसे लाभदायक परिवर्तन शारीरिक कसरतें हैं। जे०बी० नैश (J.B. Nash) का कहना है कि “जब कोई विचार दिमाग में आ जाता है तो हालात बदलने पर भी दिमाग में चक्कर लगाता रहता है।” अतः स्पष्ट है कि शारीरिक क्रियाएँ करने से हमारी मानसिक थकान कम होती है।

3. शारीरिक शिक्षा भीड़-भाड़ वाले जीवन के दुष्प्रभाव को कम करती है (Physical Education decreases the side effects of Congested Life):
आजकल शहरों में जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है। इस बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण कई समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। शहरों में यातायात वाहनों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। मोटर-गाड़ियों और फैक्टरियों का धुआँ निरंतर पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है। अतः शारीरिक शिक्षा से लोगों की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है। विभिन्न क्षेत्रों में शारीरिक शिक्षा संबंधी खेल क्लब बनाकर लोगों को अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

4. शारीरिक शिक्षा सुस्त जीवन के बुरे प्रभावों को कम करती है (Physical Education corrects the Harmful effects of Lazy Life):
आज का युग मशीनी है। दिनों का काम कुछ घण्टों में हो जाता है जिसके कारण मनुष्य के पास काफी समय बच जाता है जो गुजारना बहुत मुश्किल होता है। बिना काम के जीवन सुस्त और क्रिया-रहित हो जाता है। ऐसी हालत में लोगों को दौड़ने-भागने के मौके देकर उनका स्वास्थ्य ठीक रखा जा सकता है। जब तक व्यक्ति योजनाबद्ध तरीके से खेलों और शारीरिक क्रियाओं में भाग नहीं लेगा, तब तक वह अपने स्वास्थ्य को अधिक दिनों तक तंदुरुस्त नहीं रख पाएगा।

5. शारीरिक शिक्षा और सामाजिक एकता (Physical Education and Social Cohesion):
सामाजिक जीवन में कई तरह की भिन्नताएँ होती हैं; जैसे अलग भाषा, अलग संस्कृति, रंग-रूप, अमीरी-गरीबी, शक्तिशाली-कमज़ोर आदि । इन भिन्नताओं के बावजूद मनुष्य को सामाजिक इकाई में रहना पड़ता है। शारीरिक शिक्षा भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों को एक स्थान पर इकट्ठा करती है।

उनमें एकता व एकबद्धता लाती है। खेल में धर्म, जाति, श्रेणी, वर्ग या क्षेत्र आदि के आधार पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं किया जाता। इस तरह से शारीरिक शिक्षा कई ऐसे अवसर प्रदान करती है जिससे सामाजिक एकता को बढ़ावा मिलता है और सामाजिक व नैतिक विकास में वृद्धि होती है; जैसे एक-दूसरे से मिलकर रहना, एक-दूसरे का सम्मान करना, दूसरों की आज्ञा का पालन करना, बड़ों का सम्मान करना, नियमों का पालन करना आदि।

6. शारीरिक शिक्षा मनोरंजन प्रदान करती है (Physical Education provides the Recreation):
मनोरंजन जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। मनोरंजन व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक खुशी प्रदान करता है। इसमें व्यक्ति निजी प्रसन्नता और संतुष्टि के कारण अपनी इच्छा से भाग लेता है। शारीरिक शिक्षा और मनोरंजन में गहरा संबंध है। शारीरिक शिक्षा मनुष्य को कई प्रकार की क्रियाएँ प्रदान करती है जिससे उसको मनोरंजन प्राप्त होता है।

7. शारीरिक शिक्षा शारीरिक संस्थानों का ज्ञान प्रदान करती है (Physical Education Provides the Knowledge of Human Body System):
शारीरिक शिक्षा मानवीय शरीर की सभी प्रणालियों का ज्ञान प्रदान करती है। यह किसी भी व्यक्ति के शरीर की विभिन्न प्रणालियों पर व्यायाम द्वारा पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जानकारी देती है। यह विभिन्न रोगों से व्यक्ति को अपने शारीरिक अंगों की रक्षा करने संबंधी जानकारी देती है।

8. खाली समय का सही उपयोग (Proper Use of Leisure Time):
शारीरिक शिक्षा खाली समय के सही उपयोग में सहायक होती है। खाली समय में व्यक्ति शारीरिक क्रियाकलापों द्वारा कोई अच्छा कार्य कर सकता है। जैसे कि वह खाली समय में कोई खेल, खेल सकता है। यदि वह बाहर जाकर नहीं खेल सकता तो घर में ही खेल सकता है जिससे व्यक्ति का मन सामाजिक कुरीतियों की तरफ नहीं जाता।

9. अच्छे नागरिक के गुणों का विकास (Development Qualities of Good Citizen):
शारीरिक शिक्षा खेलकूद के माध्यम से अच्छे नागरिकों के गुणों को विकसित करती है। जैसे खेलों के नियमों की पालना करना, खेलों में आपसी तालमेल बनाना, हार व जीत में संयम रखना, दूसरों के प्रति आदर व सम्मान की भावना, देशभक्ति की भावना जो लोकतांत्रिक जीवन में आवश्यक है, को विकसित करती है।

10. सांस्कृतिक विकास (Cultural Development):
शारीरिक शिक्षा खेल व शारीरिक गतिविधियों की प्रक्रिया है। खेलों और क्रियाकलापों के दौरान विभिन्न संस्कृतियों के खिलाड़ी आपस में मिलते हैं और एक-दूसरे के बारे में जानते हैं। वे एक-दूसरे के रीति-रिवाजों, परंपराओं और जीवन-शैली से परिचित होते हैं, जिससे सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा मिलता है।

11. राष्ट्रीय एकता का विकास (Development of National Integration):
शारीरिक शिक्षा एक ऐसा माध्यम है, जिससे राष्ट्रीय एकता में वृद्धि की जा सकती है। खेलें खिलाड़ियों में सांप्रदायिकता, असमानता, प्रांतवाद और भाषावाद जैसे अवगुणों को दूर करती है। इसमें खिलाड़ियों को ऐसे अनेक अवसर मिलते हैं, जब उनमें सहनशीलता, सामाजिकता, बड़ों का सत्कार और देश-भक्ति की भावना जैसे गुण विकसित होते हैं। ये गुण उनमें राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देते हैं और उनके व्यक्तित्व को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार खेलकूद में भाग लेने से मातृत्व या राष्ट्रीयता की भावना विकसित होती है।

12. शारीरिक शिक्षा सन्तुलित व्यक्तित्व बनाने में सहायता करती है (Physical Education helps in making Balanced Personality):
शारीरिक शिक्षा मनुष्य के सन्तुलित व्यक्तित्व में बढ़ोतरी करती है। यह बहु-पक्षीय प्रगति करती है। शारीरिक शिक्षा शरीर का हर पहलू से विकास करती है, जिससे मनुष्य का सन्तुलित व्यक्तित्व बनता है।

प्रश्न 5.
शारीरिक शिक्षा को परिभाषित करें। इसके सिद्धांतों का वर्णन करें।
अथवा
शारीरिक शिक्षा के सिद्धांतों या नियमों का वर्णन करें।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा की परिभाषा (Definition of Physical Education)-शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह अभिन्न अंग है, जो खेलकूद तथा अन्य शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से व्यक्ति में एक चुनी हुई दिशा में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। सी० ए० बूचर (C. A. Bucher) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा, संपूर्ण शिक्षा पद्धति का एक अभिन्न अंग है, जिसका उद्देश्य नागरिक को शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक तथा सामाजिक रूप से शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से, जो गतिविधियाँ उनके परिणामों को दृष्टिगत रखकर चुनी गई हों, सक्षम बनाना है।”

शारीरिक शिक्षा के सिद्धांत (Principles of Physical Education) शारीरिक शिक्षा के सिद्धांत या नियम निम्नलिखित हैं

  1. शारीरिक शिक्षा सामान्य शिक्षा का एक अभिन्न अंग है जो व्यक्ति के संपूर्ण विकास में सहायक होता है।
  2. शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत ऐसे कार्यक्रमों को शामिल किया जाता है जिनमें भाग लेकर छात्र या व्यक्ति अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करने में समर्थ हो सके। इससे अच्छे संवेगों का विकास होता है और बुरे संवेगों का निकास होता है।
  3. शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रम या गतिविधियाँ ज्ञान संबंधी तथ्यों को सीखने में योगदान देती हैं।
  4. शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रम गतिज कौशलों, शारीरिक सुयोग्यता एवं पुष्टि तथा स्वास्थ्य में सुधार करने वाले होने चाहिएँ।
  5. शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रम छात्रों की रुचियों, आवश्यकताओं एवं पर्यावरण पर आधारित होने चाहिएँ।
  6. शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रमों में छात्रों का पूर्ण चिकित्सा-परीक्षण किया जाना चाहिए, क्योंकि बिना चिकित्सा परीक्षण के किसी को यह पता नहीं चल सकता कि छात्र किस प्रकार की असमर्थता का सामना कर रहा है।
  7. शारीरिक शिक्षा का महत्त्वपूर्ण माध्यम शारीरिक क्रियाएँ हैं । जब तक ये क्रियाएँ व्यवस्थित एवं प्रभावशाली नहीं होंगी, तब तक व्यक्ति या छात्रों के सभी अंगों का पूरी तरह से विकास नहीं हो सकता।
  8. शारीरिक शिक्षा के सिद्धांत वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित हैं। इसमें क्रियाओं का चुनाव इस प्रकार से किया जाना चाहिए कि इसके उद्देश्यों की पूर्ति पूर्णतः की जा सके।
  9. शारीरिक शिक्षा की गतिविधियों द्वारा छात्रों के आचरण में कई प्रकार के महत्त्वपूर्ण परिवर्तन एवं सुधार किए जा सकते हैं; जैसे नियमों की पालना करना, सहयोग देना, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना आदि।
  10. शारीरिक शिक्षा के बारे में जानकारी सामान्य भाषा में देनी चाहिए और यह जानकारी भरपूर होनी चाहिए।
  11. शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत ऐसे कार्यक्रमों को भी शामिल करना चाहिए जिनमें छात्रों की स्वाभाविक इच्छाओं एवं आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।
  12. शारीरिक क्रियाओं का चयन छात्रों की आयु, लिंग के अनुसार होना चाहिए।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 6.
शारीरिक शिक्षा के बारे में क्या-क्या गलत धारणाएँ या भ्रांतियाँ प्रचलित हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा के बारे में लोगों की अलग-अलग धारणाएँ हैं। कुछ लोग शारीरिक शिक्षा को क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, एथलेटिक्स आदि समझ लेते हैं। इसके कारण इस विषय संबंधी गलत धारणाएँ प्रचलित हो जाती हैं। इस विषय संबंधी कुछ भ्रांतियाँ या गलत धारणाएँ अग्रलिखित हैं

1. यह एक आम भ्रांति है कि शारीरिक प्रशिक्षण और शारीरिक शिक्षा एक ही वस्तु है। परंतु ये दोनों भिन्न शब्द हैं। प्रशिक्षण वह कार्यक्रम है जो सेना में सैनिकों को शक्ति या शौर्य प्रदर्शन हेतु दिया जाता है। दूसरी ओर शारीरिक शिक्षा का अर्थ है अभिव्यक्ति, आत्म-अनुशासन, कल्पनाशील विचार, आयोजन में भाग लेना आदि।

2. लोगों की यह आम धारणा है कि शारीरिक शिक्षा के द्वारा शरीर को ही स्वस्थ बनाया जा सकता है। शारीरिक शिक्षा का संबंध केवल शारीरिक स्फूर्ति को बनाए रखने वाली शारीरिक क्रियाओं अथवा व्यायाम से ही है। इसलिए कोई भी इस प्रकार की क्रिया जिसका उद्देश्य व्यायाम करने से या शरीर को स्फूर्ति प्रदान करना हो, शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत मानी जाती है। परन्तु
यह धारणा संकुचित है।

3. कुछ लोग मानते हैं कि शारीरिक शिक्षा द्वारा वे अपने बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल नहीं कर सकते। उनका मानना है कि यह समय एवं पैसे की बर्बादी है जो कि गलत धारणा है। वास्तव में शारीरिक शिक्षा से बच्चों को आगे बढ़ने की शक्ति एवं प्रेरणा मिलती है। यह उनका पूर्ण रूप से शारीरिक विकास करने में सहायक होती है जिसके कारण वे सभी कार्य अधिक कुशलता एवं क्षमता से करने में समर्थ होते हैं।

4. कुछ लोग यह सोचते हैं कि शारीरिक शिक्षा व्यक्ति या खिलाड़ी के लिए कोई कैरियर या व्यवसाय नहीं है। परन्तु यह गलत है, क्योंकि वर्तमान में विभिन्न सरकारी विभागों में खिलाड़ियों के लिए नौकरियों में आरक्षण दिया जा रहा है। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में खिलाड़ियों के चयन की ओर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

5. कुछ लोगों की धारणा है कि शारीरिक शिक्षा केवल खेल है। खेल के लिए किसी प्रकार के निर्देश की आवश्यकता नहीं होती और न ही निरीक्षण आवश्यक होता है परन्तु यह एक नकारात्मक अवधारणा है।

6. कुछ लोग शारीरिक शिक्षा को पी०टी० कहते हैं । वास्तव में पी०टी० अंग्रेजी में फिजिकल ट्रेनिंग शब्दों के प्रथम दो अक्षर हैं। पी०टी० सेना में प्रातःकाल सैनिकों को स्वस्थ रखने के लिए करवाई जाती है। शारीरिक शिक्षा को पूर्ण रूप से पी०टी० कहना गलत है।

7. कुछ लोग शारीरिक शिक्षा को सामूहिक ड्रिल कहते हैं परन्तु सामूहिक ड्रिल और शारीरिक शिक्षा में बहुत अंतर है। शारीरिक शिक्षा से सर्वांगीण विकास होता है और सामूहिक ड्रिल से केवल शारीरिक विकास होता है। शारीरिक शिक्षा में स्वतंत्रता व विविधता रहने से वातावरण आनंददायी बनता है और सामूहिक ड्रिल में पुनरावृत्ति अधिक होने से थकान और उदासीन वृत्ति आ जाती है।

8. कुछ लोग जिम्नास्टिक को शारीरिक शिक्षा कहते हैं । जिम्नास्टिक के द्वारा तो केवल शरीर को अधिक लचीला बनाया जाता है। परन्तु शारीरिक शिक्षा संपूर्ण विकास का पहलू है।

9. कुछ लोगों की धारणा है कि शारीरिक शिक्षा संबंधी गतिविधियों से विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता फैलती है परन्तु यह गलत धारणा है। एक खिलाड़ी खेल गतिविधियों से अनेक आवश्यक नियमों की जानकारी प्राप्त करता है। एक अच्छा खिलाड़ी सदा अनुशासित ढंग से व्यवहार करता है और खेलों के नियमों के अनुसार खेलता है। वह न केवल खेल के मैदान
में नियमों का अनुसरण करता है बल्कि अपने वास्तविक जीवन में भी नियमों का अनुसरण करता है।

10. कुछ लोग यह सोचते हैं कि शारीरिक शिक्षा का अर्थ केवल खेलों में भाग लेना है। परन्तु वास्तव में शारीरिक गतिविधियों में भाग लेकर व्यक्ति या खिलाड़ी शारीरिक रूप से मजबूत एवं सुडौल बनता है और इन गतिविधियों का उसके स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

11. कुछ लोगों की धारणा है कि वीडियो गेम शारीरिक शिक्षा की गतिविधि है जिससे शारीरिक विकास होता है, परन्तु यह गलत धारणा है। वीडियो गेम से मनोरंजन तो हो सकता है परन्तु संपूर्ण शारीरिक विकास नहीं।

12. कुछ लोगों की धारणा है कि शारीरिक शिक्षा की गतिविधियों में भाग केवल सक्षम व्यक्ति या खिलाड़ी ही लेते हैं, परन्तु यह गलत धारणा है। खेल गतिविधियों में कोई भी भाग ले सकता है। इनमें अमीरी-गरीबी, ऊँच-नीच आदि प्रवृत्तियों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 7.
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक के व्यक्तिगत गुणों का वर्णन कीजिए। उत्तर-शारीरिक शिक्षा के अध्यापक के व्यक्तिगत गुण निम्नलिखित हैं
1. व्यक्तित्व (Personality):
अच्छा व्यक्तित्व शारीरिक शिक्षा के अध्यापक का सबसे बड़ा गुण है, क्योंकि व्यक्तित्व बहुत सारे गुणों का समूह है। एक अच्छे व्यक्तित्व वाले अध्यापक में अच्छे गुण; जैसे कि सहनशीलता, पक्का इरादा, अच्छा चरित्र, सच्चाई, समझदारी, ईमानदारी, मेल-मिलाप की भावना, निष्पक्षता, धैर्य, विश्वास आदि होने चाहिएँ।

2. चरित्र (Character):
शारीरिक शिक्षा का अध्यापक एक अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति होना चाहिए, क्योंकि उसका सीधा संबंध विद्यार्थियों से होता है। यदि उसके अपने चरित्र में कमियाँ हैं तो वह कभी भी विद्यार्थियों के चरित्र को ऊँचा नहीं उठा पाएगा।

3. नेतृत्व के गुण (Qualities of Leadership):
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक में एक अच्छे नेता के गुण होने चाहिएँ क्योंकि उसने ही विद्यार्थियों से शारीरिक क्रियाएँ करवानी होती हैं और उनसे क्रियाएँ करवाने के लिए सहयोग लेना होता है। यह तभी संभव है जब शारीरिक शिक्षा का अध्यापक अच्छे नेतृत्व वाले गुण अपनाए।

4. दृढ़-इच्छा शक्ति (Strong Will Power):
शारीरिक शिक्षा का अध्यापक दृढ़-इच्छा शक्ति या पक्के इरादे वाला होना चाहिए। वह विद्यार्थियों में वृढ़-इच्छा शक्ति की भावना पैदा करके उन्हें मुश्किल-से-मुश्किल प्रतियोगिताओं में भी जीत प्राप्त करने के लिए प्रेरित करे।

5. अनुशासन (Discipline):
अनुशासन एक बहुत महत्त्वपूर्ण गुण है और इसकी जीवन के हर क्षेत्र में जरूरत है। शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य भी बच्चों में अनुशासन की भावना पैदा करना है । शारीरिक शिक्षा का अध्यापक बच्चों में निडरता, आत्मनिर्भरता, दुःख में धीरज रखना जैसे गुण पैदा करता है। इसलिए जरूरी है कि शारीरिक शिक्षा का अध्यापक खुद अनुशासन में रहकर बच्चों में अनुशासन की आदतों का विकास करे ताकि बच्चे एक अच्छे समाज की नींव रख सकें।

6. आत्म-विश्वास (Self-confidence):
किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्म-विश्वास का होना बहुत आवश्यक है। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक बच्चों में आत्म-विश्वास की भावना पैदा करके उन्हें निडर, बलवान और हर दुःख में धीरज रखने वाले गुण पैदा कर सकता है।

7. सहयोग (Co-operation):
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक का सबसे बड़ा गुण सहयोग की भावना है। शारीरिक शिक्षा के अध्यापक का संबंध केवल बच्चों तक ही सीमित नहीं है बल्कि मुख्याध्यापक, बच्चों के माता-पिता और समाज से भी है।

8. सहनशीलता (Tolerance):
शारीरिक शिक्षा का अध्यापक बच्चों से अलग-अलग क्रियाएँ करवाता है। इन क्रियाओं में बच्चे बहुत सारी गलतियाँ करते हैं। उस वक्त शारीरिक शिक्षा के अध्यापक को सहनशील रहकर उनकी गलतियों पर गुस्सा न करते हुए गलतियाँ दूर करनी चाहिएँ। यह तभी हो सकता है अगर शारीरिक शिक्षा का अध्यापक सहनशीलता जैसे गुण का धनी हो।

9. त्याग की भावना (Spirit of Sacrifice):
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक में त्याग की भावना का होना बहुत जरूरी है। त्याग की भावना से ही अध्यापक बच्चों को प्राथमिक प्रशिक्षण अच्छी तरह देकर उन्हें अच्छे खिलाड़ी बना सकता है।

10. न्यायसंगत (Fairness):
शारीरिक शिक्षा का अध्यापक न्यायसंगत या न्यायप्रिय होना चाहिए, क्योंकि अध्यापक को न केवल शारीरिक क्रियाएँ ही करवानी होती हैं बल्कि अलग-अलग टीमों में खिलाड़ियों का चुनाव करने जैसे निर्णय भी लेने होते हैं। न्यायप्रिय और निष्पक्ष रहने वाला अध्यापक ही बच्चों से सम्मान प्राप्त कर सकता है।

प्रश्न 8.
संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास में शारीरिक शिक्षा का क्या योगदान है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास को अपना उद्देश्य बनाती है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि शारीरिक शिक्षा मनुष्य के संपूर्ण विकास में सहायक होती है। यह बात निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होती है

1. नेतृत्व का विकास (Development of Leadership):
शारीरिक शिक्षा में नेतृत्व करने के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं; जैसे क्रिकेट टीम में टीम का कैप्टन, निष्पक्षता, सूझ-बूझ और भावपूर्ण ढंग से खेल की रणनीति तैयार करता है। जब किसी खेल के नेता को खेल से पहले शरीर गर्माने के लिए नियुक्त किया जाता है, तब भी नेतृत्व की शिक्षा दी जाती है। कई बार प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन करना भी नेतृत्व के विकास में सहायता करता है।

2. अनुशासन का विकास (Development of Discipline):
शारीरिक शिक्षा हमें अनुशासन का अमूल्य गुण भी सिखाती है। हमें अनुशासन में रहते हुए और खेल के नियमों का पालन करते हुए खेलना पड़ता है। इस प्रकार खेल अनुशासन की भावना में वृद्धि करते हैं। खेल में अयोग्य करार दिए जाने के डर से खिलाड़ी अनुशासन भंग नहीं करते। वे अनुशासन में रहकर ही खेलते हैं।

3. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार का विकास (Development of Sympathetic Attitude):
खेल के दौरान यदि कोई खिलाड़ी घायल हो जाता है तो दूसरे सभी खिलाड़ी उसके प्रति हमदर्दी की भावना रखते हैं। ऐसा हॉकी अथवा क्रिकेट खेलते समय देखा भी जा सकता है। जब भी किसी खिलाड़ी को चोट लगती है तो सभी खिलाड़ी हमदर्दी प्रकट करते हुए उसकी सहायता के लिए दौड़ते हैं। यह गुण व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

4. राष्ट्रीय एकता का विकास (Development of National Integration):
शारीरिक शिक्षा एक ऐसा माध्यम है, जिससे राष्ट्रीय एकता में वृद्धि की जा सकती है। खेलें खिलाड़ियों में सांप्रदायिकता, असमानता, प्रांतवाद और भाषावाद जैसे अवगुणों को दूर करती हैं। इसमें खिलाड़ियों को ऐसे अनेक अवसर मिलते हैं, जब उनमें सहनशीलता, सामाजिकता, बड़ों का सत्कार और देश-भक्ति जैसे गुण विकसित होते हैं। ये गुण उनमें राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देते हैं और उनके व्यक्तित्व को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

5. अच्छे नागरिक के गुणों का विकास (Development of Qualities of Good Citizen):
शारीरिक शिक्षा खेलकूद के माध्यम से अच्छे नागरिकों के गुणों को विकसित करती है। जैसे खेलों के नियमों की पालना करना, खेलों में आपसी तालमेल बनाना, हार व जीत में संयम रखना, दूसरों के प्रति आदर व सम्मान की भावना, देशभक्ति की भावना जो लोकतांत्रिक जीवन में आवश्यक है, को विकसित करती है।

6. शारीरिक विकास (Physical Development):
शारीरिक शिक्षा संबंधी क्रियाएँ शारीरिक विकास का माध्यम हैं। शारीरिक क्रियाएँ माँसपेशियों को मज़बूत, रक्त का बहाव ठीक रखने, पाचन-शक्ति में बढ़ोतरी और श्वसन क्रिया को ठीक रखने में सहायक हैं । शारीरिक क्रियाओं से खिलाड़ी या व्यक्ति का शरीर मजबूत, शक्तिशाली, लचकदार और प्रभावशाली बनता है।

7. उच्च नैतिकता की शिक्षा (Lesson of High Morality):
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति में खेल भावना (Sportsmanship) उत्पन्न करती है। यह इस बात में भी सहायता करती है कि खिलाड़ी का स्तर नैतिक दृष्टि से ऊँचा रहे तथा वह पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर होता रहे। संक्षेप में, शारीरिक शिक्षा खिलाड़ी का उच्च स्तर का नैतिक विकास करने में सहायक होती है।

8. भावनात्मक संतुलन (Emotional Balance):
भावनात्मक संतुलन भी व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है । यह शारीरिक शिक्षा और खेलों द्वारा पैदा होता है। शारीरिक शिक्षा खिलाड़ी में अनेक प्रकार से भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है। बच्चे को बताया जाता है कि वह विजय प्राप्त करने के बाद आवश्यकता से अधिक प्रसन्न न हो और हार के गम को भी सहज भाव से ले। इस तरह भावनात्मक संतुलन एक अच्छे व्यक्तित्व के लिए अत्यावश्यक है।

9. सामाजिक विकास (Social Development):
शारीरिक शिक्षा समूचे व्यक्तित्व का विकास इस दृष्टि से भी करती है कि व्यक्ति में अनेक प्रकार के सामाजिक गुण आ जाते हैं। उदाहरणतया सहयोग, टीम भावना, उत्तरदायित्व की भावना और नेतृत्व जैसे गुण भी बच्चे में खेलों द्वारा ही उत्पन्न होते हैं। ये गुण बड़ा होने पर अधिक विकसित हो जाते हैं । फलस्वरूप बच्चा एक अच्छा नागरिक बनता है।

10. अच्छी आदतों का विकास (Development of Good Habits):
अच्छी आदतें व्यक्तित्व की कुंजी होती हैं। शारीरिक शिक्षा से खिलाड़ी या व्यक्ति में अच्छी आदतों का विकास होता है; जैसे दूसरों का आदर व सम्मान करना, बड़ों का आदर करना, समय का पाबंद होना, नियमों का पालन करना, समय पर भोजन करना, व्यक्तिगत स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना आदि। ये सभी संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त विवरण से हम कह सकते हैं कि शारीरिक शिक्षा बच्चों में न केवल भीतरी गुणों को ही व्यक्त करती है, अपितु यह उनके व्यक्तित्व के विकास में भी सहायक होती है। यह उनमें कई प्रकार के सामाजिक व नैतिक गुण पैदा करती है और उनमें भावनात्मक संतुलन बनाए रखती है। शारीरिक क्रियाओं द्वारा व्यक्ति में कुर्बानी, निष्पक्षता, मित्रता की भावना, सहयोग, स्व-नियंत्रण, आत्म-विश्वास और आज्ञा की पालना करने जैसे गुणों का विकास होता है। शारीरिक शिक्षा द्वारा सहयोग करने की भावना में वृद्धि होती है।

प्रश्न 9.
संपूर्ण शिक्षा प्रणाली में शारीरिक शिक्षा का क्या स्थान है? वर्णन कीजिए। अथवा शारीरिक शिक्षा व शिक्षा में क्या संबंध है? वर्णन करें।
उत्तर:
प्राचीन भारत में शारीरिक शिक्षा के स्वरूप के बारे में जानकारी प्राप्त करना बहुत कठिन है। केवल मूर्तियों और तस्वीरों से ही खेलों का अनुमान लगाया जा सकता है कि लोग कैसे अपने शरीर का ध्यान रखते थे। मोहनजोदड़ो से जो पुराने खंडहर मिले हैं, उनसे उस समय की नृत्यकारी के बारे में पता चलता है। इस नृत्यकारी के कारण लोग शारीरिक तौर पर शक्तिशाली, मजबूत और फुर्तीले थे। मध्यकालीन भारत पर अनेक विदेशी शासकों ने शासन किया, परन्तु जब भारत सन् 1947 में स्वतंत्र हुआ तो स्वदेशी सरकार ने देश की बागडोर को संभाला और व्यवस्थित शिक्षा एवं शारीरिक शिक्षा का प्रसार किया।

कई प्रकार की योजनाएँ भी तैयार की गईं। शिक्षा को प्रांतीय सरकार का विषय बना दिया गया। स्वतंत्रता के पश्चात् शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र का बहुत विकास हुआ। शारीरिक शिक्षा के अनेक नए कॉलेज और प्रशिक्षण केन्द्र खोल दिए गए। भारत सरकार ने सन् 1950 में शारीरिक शिक्षा व मनोरंजन के केंद्रीय सलाहकार बोर्ड (Central Advisory Board of Physical Education and Recreation) और सन् 1954 में भारतीय खेल सलाहकार परिषद् (All India Council of Sports) की स्थापना की। इन दोनों का उद्देश्य शारीरिक शिक्षा और खेल के विकास के लिए नई-नई योजनाएँ बनाना और उन पर अमल करवाना है।

आधुनिक युग विज्ञान एवं तकनीकी का युग है। अब लोगों के विचारों, रहन-सहन, पहनावे आदि में बहुत तबदीली आ गई है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमारी विचारधाराएँ बदल रही हैं। आज शारीरिक शिक्षा सामान्य शिक्षा का अभिन्न अंग है। यह सम्पूर्ण शिक्षा प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। प्राचीन समय में शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के तन का विकास करना था जबकि वर्तमान शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल व्यक्ति का शारीरिक विकास करना ही नहीं, बल्कि मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक विकास करना भी है। आज सामान्य शिक्षा व शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य एक जैसा ही हो गया है और वह है-मनुष्य का सर्वांगीण विकास करना। इनमें अंतर केवल इतना है कि उद्देश्य की प्राप्ति हेतु दोनों का ढंग भिन्न-भिन्न है।

सामान्य शिक्षा और शारीरिक शिक्षा के बारे में दिए गए विचारों से अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों के उद्देश्य एक हैं। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में चाहे वे मानसिक अथवा व्यावहारिक हों, ज्ञान बढ़ता रहता है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के छिपे हुए गुणों को अच्छी तरह विकसित करना है। इन गुणों के विकास द्वारा व्यक्ति का सर्वपक्षीय विकास संभव है।
आधुनिक युग में शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का नियमित कार्यक्रम है।

इस कार्यक्रम में सिर्फ शारीरिक पक्ष की ओर ही ध्यान नहीं दिया जाता, अपितु व्यक्ति के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाता है। ये पहलू बौद्धिक विकास, सामाजिक विकास और व्यक्तित्व निर्माण में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । शारीरिक शिक्षा ऐसी सुविधाएँ पैदा करती है जिनमें व्यक्ति का आवश्यक विकास होना संभव है। इसलिए शारीरिक शिक्षा और सामान्य शिक्षा के उद्देश्य एक होने के कारण इनमें गहरा संबंध है। विभिन्न विद्वानों व बोर्ड ने निम्नलिखित परिभाषाओं के माध्यम से इन दोनों के संबंधों को स्पष्ट किया है

1. चार्ल्स ए० बूचर (Charles A. Bucher):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा संपूर्ण शिक्षा पद्धति का अभिन्न अंग है, जिसका उद्देश्य नागरिकों को शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक तथा सामाजिक रूप से, जो शारीरिक गतिविधियाँ उनके परिणामों को दृष्टिगत रखकर चुनी गई हों, सक्षम बनाना है।”

2. जे०बी० नैश (J.B. Nash):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा के संपूर्ण क्षेत्र का वह भाग है, जिसका संबंध बड़ी माँसपेशियों और उनकी क्रियाओं से है।”

3. शारीरिक शिक्षा तथा मनोरंजन के केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड (Central Advisory Board of Physical Education and Recreation):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा ही है। यह वह शिक्षा है जो शारीरिक क्रियाओं द्वारा बच्चे के संपूर्ण व्यक्तित्व के लिए अथवा शरीर, मन व आत्मा के पूर्ण विकास के लिए दी जाती है।”

4. निक्सन व कोजन (Nixon and Cozan):
के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा की पूर्ण क्रियाओं का वह भाग है जिसका संबंध शक्तिशाली माँसपेशियों की क्रियाओं और उनसे संबंधित क्रियाओं तथा उनके परिणामों द्वारा व्यक्ति में होने वाले परिवर्तनों से है।”

निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि शारीरिक शिक्षा, शिक्षा प्रक्रिया का अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं अभिन्न अंग है। शारीरिक शिक्षा का माध्यम शारीरिक क्रियाएँ हैं। जब तक ये क्रियाएँ प्रभावशाली नहीं होंगी, तब तक शरीर के सभी अंगों का पूरी तरह विकास नहीं हो सकता। शारीरिक शिक्षा का मनोरथ सिर्फ शारीरिक विकास नहीं, अपितु सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक विकास करना भी है। आधुनिक शारीरिक शिक्षा वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें क्रियाओं का चुनाव इस प्रकार किया जाए ताकि इसके उद्देश्यों की पूर्ति की जा सके। इस प्रकार शारीरिक शिक्षा, संपूर्ण शिक्षा प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण तथा अभिन्न अंग है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 10.
शारीरिक शिक्षा के मुख्य क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का क्षेत्र बहुत विशाल है। इसमें तरह-तरह की गतिविधियाँ या क्रियाएँ शामिल होती हैं। इनमें से कुछ का संक्षेप में उल्लेख इस प्रकार है

1. शोधक क्रियाएँ (Corrective Exercises):
इन क्रियाओं द्वारा विद्यार्थियों के शारीरिक अंगों की कमजोरियों में सुधार किया जा सकता है। प्रायः ये कमजोरियाँ माँसपेशियों के अवगुणों के कारण होती हैं।

2. खेलकूद क्रियाएँ (Games & Sports Activities):
इन क्रियाओं में एथलेटिक्स, टेबल टेनिस, हॉकी, फुटबॉल, बास्केटबॉल, तैरना और किश्ती चलाना आदि शामिल हैं।

3. स्वयं-रक्षक क्रियाएँ (Self-defence Activities):
इनमें दंड निकालना, मुक्केबाजी, लाठी चलाना तथा गतका आदि क्रियाएँ सम्मिलित हैं।

4. मौलिक क्रियाएँ (Fundamental Exercises):
इस क्षेत्र में शरीर का संतुलन ठीक रखने के लिए चलना-फिरना, भागना, चढ़ना और उतरना इत्यादि क्रियाएँ शामिल हैं।

5. लयबद्ध क्रियाएँ (Rhythmics Exercises):
नाचना और गाना मनुष्य का स्वभाव है। इस स्वभाव से मनुष्य अपनी खुशी और पीड़ा को प्रकट करता है। शारीरिक शिक्षा में लोक-नाच और ताल-भरी क्रियाओं का विशेष स्थान है। टिपरी, डम्बल, लोक-नाच, लेजियम, उछलना और जिम्नास्टिक्स जैसी क्रियाएँ शामिल हैं। ये क्रियाएँ शारीरिक तंदुरुस्ती और माँसपेशियों के तालमेल के अतिरिक्त मनोरंजन का साधन भी हैं।

6. यौगिक क्रियाएँ (Yogic Exercises):
योग (Yoga) भारत की देन है। हजारों साल पहले ऋषि-मुनियों ने योग द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त की। आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि सारा संसार इन यौगिक क्रियाओं के लाभों से परिचित है। यौगिक क्रियाएँ केवल खेलों और बीमारी के उपचार के लिए ही लाभदायक नहीं हैं, बल्कि इन क्रियाओं द्वारा शरीर और आत्मा का निर्माण भी किया जा सकता है।

7. मनोरंजनात्मक क्रियाएँ (Recreation Activities):
शारीरिक शिक्षा में मनोरंजन का विशेष स्थान है। विकसित देशों में शारीरिक शिक्षा के अध्यापक को मनोरंजन की शिक्षा अवश्य दी जाती है। इसमें नाच, नाटक, पहाड़ों की सैर, कैंप लगाने, लंबी सैर, मछली पकड़ना, बागवानी और कुदरत के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है। इन क्रियाओं से व्यक्ति का विकास आसानी से हो सकता है।

8. खोजात्मक क्रियाएँ (Research Activities):
आधुनिक युग मशीनी युग है। मशीनों ने मनुष्य के शरीर को कमजोर और सुस्त बना दिया है। शारीरिक शिक्षा में अब खोज की पहले से ज्यादा आवश्यकता है। खोजों से शारीरिक शिक्षा का इतिहास, प्रबंध के नियम, शारीरिक रचना, शारीरिक बनावट, माँसपेशियों की हरकतें, खेल चिकित्सा, प्रशिक्षण विधि, खेल मनोविज्ञान के प्रभावों के बारे में जानकारी मिलती है।

दुनिया के जिस देश ने शारीरिक शिक्षा के विषय में खोजों में दिलचस्पी दिखाई है, उन देशों के खिलाड़ियों ने अंतर्राष्ट्रीय खेलों में अपने देश का नाम ऊँचा किया है। खोजें शारीरिक शिक्षा के विषय में आए भ्रमों को दूर करती हैं और शारीरिक कमजोरियों को दूर करने के तरीके बताती हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न ( (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा की परम्परागत अवधारणा का वर्णन करें।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा की अवधारणा व्यक्तियों के लिए कोई नई नहीं है। वास्तव में इसकी जड़ें बहुत प्राचीन हैं। प्राचीन समय में विचारों के आदान-प्रदान का सर्वव्यापी माध्यम शारीरिक गतिविधियों एवं शारीरिक अंगों का हाव-भाव था। प्राचीन समय में दौड़ने, कूदने, छलांग लगाने, युद्ध करने तथा शिकार करने आदि को ही शारीरिक शिक्षा का अभिन्न अंग माना जाता है। उस समय मानव इन सभी क्रियाओं का प्रयोग अपनी रक्षा करने और आजीविका कमाने के लिए करता है। पुरातन समय में कुशल, योद्धा एवं योग्य नागरिक बनाने के लिए जो शारीरिक क्रियाएँ करवाई जाती थीं, वे शारीरिक प्रशिक्षण कहलाती थीं।

इन गतिविधियों या क्रियाओं का मुख्य उद्देश्य शारीरिक विकास था अर्थात् व्यक्ति को शारीरिक रूप से मजबूत एवं शक्तिशाली बनाना था। अतः परम्परागत अवधारणा शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से शारीरिक विकास पर अधिक जोर देती थी और शैक्षिक पक्षों को अनदेखा करती थी। इसलिए शारीरिक शिक्षा की इस अवधारणा को वर्तमान जीवन हेतु उचित नहीं ठहराया जा सकता। ये क्रियाएँ व्यक्ति के मनोरंजन, कौशल, शक्ति प्रदर्शन का साधन मानी जाती थी।

प्रश्न 2.
शारीरिक शिक्षा की आधुनिक अवधारणा (Modern Concept) का वर्णन करें।
उत्तर:
आधुनिक युग विज्ञान एवं मशीनी युग है जिसकी बहुत-सी आवश्यकताएँ हैं। समय के साथ-साथ शारीरिक शिक्षा की परम्परागत अवधारणा का स्थान शारीरिक शिक्षा की आधुनिक अवधारणा ने ले लिया है। शिक्षाशास्त्रियों ने शारीरिक शिक्षा की अवधारणा को पुनः परिभाषित किया है। शारीरिक शिक्षा की आधुनिक अवधारणा के अंतर्गत शारीरिक शिक्षा न केवल शारीरिक विकास करती है बल्कि यह मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक विकास भी करती है अर्थात् इसका उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है।

इस अवधारणा के अनुसार शारीरिक शिक्षा का मुख्य लक्ष्य शिक्षा है न कि स्वास्थ्य, शारीरिक क्रियाएँ या प्रशिक्षण । शिक्षाशास्त्रियों के अनुसार यह शिक्षा का ही एक महत्त्वपूर्ण एवं अभिन्न अंग है क्योंकि शारीरिक क्रियाओं व खेलों द्वारा बच्चों का सर्वांगीण विकास किया जाता है। चार्ल्स ए० बूचर के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा समस्त शिक्षा प्रणाली का ही एक आधारभूत अंग है।” आज शारीरिक क्रियाएँ या गतिविधियाँ न केवल मनोरंजन या शक्ति प्रदर्शन के ही साधन मानी जाती हैं बल्कि ये बालक के विकास के विभिन्न पक्षों को प्रभावित कर उनके विकास में सहायक होती हैं।

आज यह माना जाने लगा है कि शारीरिक शिक्षा की आधुनिक अवधारणा से न केवल व्यक्ति की मूल भावनाओं या संवेगों को एक नई दिशा मिलती है बल्कि उसमें अनेक नैतिक एवं मूल्यपरक गुणों का विकास भी होता है। इससे मानसिक एवं बौद्धिक क्षमता में भी वृद्धि होती है। आज यह न केवल शारीरिक परीक्षण, शारीरिक सुयोग्यता एवं सामूहिक ड्रिल की प्रक्रिया है बल्कि यह बहु-आयामी एवं उपयोगी प्रक्रिया है जो जीवन एवं स्वास्थ्य के पहले पहलू के लिए अति आवश्यक है।

प्रश्न 3.
शारीरिक शिक्षा के कोई चार सिद्धांत बताएँ।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा के चार सिद्धांत या नियम निम्नलिखित हैं

  1. शारीरिक शिक्षा सामान्य शिक्षा का एक अभिन्न अंग है जो व्यक्ति के संपूर्ण विकास में सहायक होता है।
  2. शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत ऐसे कार्यक्रमों को शामिल किया जाता है जिनमें भाग लेकर छात्र या व्यक्ति अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करने लगे। इससे अच्छे संवेगों का विकास होता है और बुरे संवेगों का निकास होता है।
  3. शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रम या गतिविधियाँ ज्ञान संबंधी तथ्यों को सीखने में योगदान देती हैं।
  4. शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रम गतिज कौशलों, शारीरिक सुयोग्यता तथा पुष्टि एवं स्वास्थ्य में सुधार करने वाले होने चाहिएँ।

प्रश्न 4.
शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का अभिन्न अंग है-इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
आज से कुछ ही दशक पूर्व शिक्षा का लक्ष्य केवल मानसिक विकास माना जाता था और इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल किताबी ज्ञान पर ही बल दिया जाता था। लेकिन आधुनिक युग में यह अनुभव होने लगा कि मानसिक व शारीरिक विकास एक-दूसरे से किसी भी प्रकार अलग नहीं हैं। जहाँ मानसिक ज्ञान से बुद्धि का विकास होता है और मनुष्य इस ज्ञान का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में करके सुखी जीवन के लिए साधन जुटाने में सक्षम हो पाता है, वहीं शारीरिक शिक्षा उसे अतिरिक्त समय को बिताने की विधियाँ, अच्छा स्वास्थ्य रखने का रहस्य तथा चरित्र-निर्माण के गुणों की जानकारी प्रदान करती है।

शारीरिक शिक्षा स्वास्थ्य में सुधार लाकर कार्य-कुशलता को बढ़ाने में सहायता करती है और शिक्षा मानसिक विकास के उद्देश्यों की पूर्ति करने में विशेष भूमिका निभाती है। अत: आज के समय में शारीरिक शिक्षा (Physical Education) शिक्षा का अभिन्न अंग है जिससे व्यक्ति के जीवन का प्रत्येक पक्ष प्रभावित होता है।

प्रश्न 5.
शारीरिक शिक्षा के बारे में प्रचलित किन्हीं तीन भ्रांतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा के बारे में प्रचलित मुख्य भ्रांतियाँ निम्नलिखित हैं
1. यह एक आम भ्रांति है कि शारीरिक प्रशिक्षण और शारीरिक शिक्षा एक ही वस्तु है। परंतु ये दोनों भिन्न शब्द हैं। प्रशिक्षण वह कार्यक्रम है जो सेना में सैनिकों को शक्ति या शौर्य प्रदर्शन हेतु दिया जाता है। दूसरी ओर शारीरिक शिक्षा का अर्थ है अभिव्यक्ति, आत्म-अनुशासन, कल्पनाशील विचार, आयोजन में भाग लेना आदि।

2. लोगों की यह आम धारणा है कि शारीरिक शिक्षा के द्वारा शरीर को ही स्वस्थ बनाया जा सकता है। शारीरिक शिक्षा का संबंध केवल शारीरिक स्फूर्ति को बनाए रखने वाली शारीरिक क्रियाओं अथवा व्यायाम से ही है। कोई भी इस प्रकार की क्रिया जिसका उद्देश्य व्यायाम करने से या शरीर को स्फूर्ति प्रदान करना हो, शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत मानी जाती है। परन्तु यह
धारणा संकुचित है।

3. कुछ लोग मानते हैं कि शारीरिक शिक्षा द्वारा वे अपने बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल नहीं कर सकते। उनका मानना है कि यह समय एवं पैसे की बर्बादी है जो कि गलत धारणा है। वास्तव में शारीरिक शिक्षा से बच्चों को आगे बढ़ने की शक्ति एवं प्रेरणा मिलती है। यह उनका पूर्ण रूप से शारीरिक विकास करने में सहायक होती है जिसके कारण वे सभी कार्य अधिक कुशलता एवं क्षमता से करने में समर्थ होते हैं।

प्रश्न 6.
शारीरिक शिक्षा के किन्हीं तीन उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
1. शारीरिक शिक्षा संबंधी क्रियाएँ शरीर में ज्यादा-से-ज्यादा तालमेल बनाती हैं। अगर शारीरिक शिक्षा में उछलना, दौड़ना, फेंकना आदि क्रियाएँ न हों तो कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं किया जा सकता। मानवीय शरीर में सही गतिज विकास तभी हो सकता है जब नाड़ी प्रणाली और माँसपेशीय प्रणाली का संबंध ठीक रहे । इससे कम थकावट और अधिक-से-अधिक कुशलता प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

2. शारीरिक शिक्षा कई प्रकार के ऐसे अवसर पैदा करती है, जिनसे शरीर का भावनात्मक या संवेगात्मक विकास होता है। खेल में बार-बार जीतना या हारना दोनों हालातों में भावनात्मक पहलू प्रभावित होते हैं। इससे खिलाड़ियों में भावनात्मक स्थिरता उत्पन्न होती है। इसलिए उन पर जीत-हार का बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। शारीरिक शिक्षा खिलाड़ियों को अपनी
भावनाओं पर काबू रखना सिखाती है।

3. शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास भी होता है । जब बालक या खिलाड़ी शारीरिक क्रियाओं में भाग लेता है तो इनसे उसके शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास में भी बढ़ोतरी होती है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 7.
शारीरिक शिक्षा का क्या लक्ष्य है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य विद्यार्थी को इस प्रकार तैयार करना है कि वह एक सफल एवं स्वस्थ नागरिक बनकर अपने परिवार, समाज व राष्ट्र की समस्याओं का समाधान करने की क्षमता या योग्यता उत्पन्न कर सके और समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनकर सफलता से जीवनयापन करते हुए जीवन का पूरा आनंद उठा सके। विभिन्न विद्वानों के अनुसार शारीरिक शिक्षा के लक्ष्य निम्नलिखित हैं

1. जे० एफ० विलियम्स के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य एक प्रकार का कुशल नेतृत्व तथा पर्याप्त समय प्रदान करना है, जिससे व्यक्तियों या संगठनों को इसमें भाग लेने के लिए पूरे-पूरे अवसर मिल सकें, जोशारीरिक रूप से आनंददायक, मानसिक दृष्टि से चुस्त तथा सामाजिक रूप से निपुण हों।”

2. जे० आर० शर्मन के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य है कि व्यक्ति के अनुभव को इस हद तक प्रभावित करे कि वह अपनी क्षमता से समाज में अच्छे से रह सके, अपनी जरूरतों को बढ़ा सके, उन्नति कर सके तथा अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए सक्षम हो सके।” उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है। इसके लक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए जे०एफ० विलियम्स ने भी कहा है कि “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है।”

प्रश्न 8.
मानसिक व भावनात्मक विकास में शारीरिक शिक्षा या क्रियाओं का क्या योगदान है?
अथवा
शारीरिक शिक्षा मानसिक एवं भावनात्मक विकास में किस प्रकार सहायक होती है?
उत्तर:
मानसिक विकास:
अरस्तू के अनुसार, “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिमाग का वास होता है।” भाव यह है कि शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का विकास भी होना चाहिए। शारीरिक और मानसिक दोनों के मिलाप से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आता है। जब कोई व्यक्ति शारीरिक क्रियाओं में भाग लेता है तो उसके शारीरिक विकास के साथ-साथ उसका मानसिक विकास भी होता है। शारीरिक क्रियाओं से व्यक्ति की कल्पना एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।

भावनात्मक विकास:
शारीरिक क्रियाएँ कई प्रकार के ऐसे अवसर पैदा करती हैं जिनसे भावनात्मक विकास होता है। खेल में बार-बार विजयी होना या हारना, दोनों अवस्थाओं में भावनात्मक स्थिरता आती है। इसलिए खिलाड़ी पर जीत-हार का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखाती है। जिस व्यक्ति का अपने संवेगों पर नियंत्रण होता है वह सफलता की ओर अग्रसर होता है। इसलिए हमें शारीरिक शिक्षा की अधिक आवश्यकता है।

प्रश्न 9.
शारीरिक शिक्षा घरेलू तथा पारिवारिक जीवन में क्या योगदान देती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा घरेलू तथा पारिवारिक जीवन में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को न केवल अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने की कुशलता प्रदान करती है, बल्कि यह उसे अपने परिवार एवं समाज के स्वास्थ्य को ठीक रखने में भी सहायता करती है। किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य जितना अच्छा होगा, उसका पारिवारिक जीवन भी उतना ही अच्छा होगा।

शारीरिक शिक्षा अनेक सामाजिक व नैतिक गुणों जैसे सहनशीलता, धैर्यता, अनुशासन, सहयोग, बंधुत्व, आत्मविश्वास, अच्छा आचरण आदि को विकसित करने में सहायक होती है। शारीरिक शिक्षा अवसाद, चिन्ता, दबाव व तनाव को कम करती है। यह अनेक रोगों से बचाने में सहायक होती है, क्योंकि इसकी गतिविधियों द्वारा रोग निवारक क्षमता बढ़ती है। ये सभी विशेषताएँ घरेलू तथा पारिवारिक जीवन में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।

प्रश्न 10.
“आधुनिक शिक्षा को पूरा करने के लिए शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता है।” इस कथन की व्याख्या करें।
अथवा
आधुनिक शिक्षा को पूरा करने में शारीरिक शिक्षा क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
प्राचीनकाल में विद्या का प्रसार बहुत कम था। उस समय पिता ही पुत्र को पढ़ा देता था या शिक्षा आचार्य दे दिया करते थे। परंतु वर्तमान युग में प्रत्येक व्यक्ति के पढ़े लिखे होने की आवश्यकता है। बच्चा विभिन्न क्रियाओं में भाग लेकर अपना शारीरिक विकास करता है। इसलिए बच्चों को खेलों में भाग लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए। शारीरिक शिक्षा केवल शारीरिक निर्माण तक ही सीमित नहीं है, वास्तव में यह बच्चे का मानसिक, भावनात्मक, नैतिक और सामाजिक पक्ष का भी विकास करती है।

आधुनिक शिक्षा को पूरा करने के लिए शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वर्तमान युग में शारीरिक शिक्षा पूरे विश्व के स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग बन गई है, क्योंकि यह शिक्षा, शिक्षा के उद्देश्यों को योजनाबद्ध तरीके से प्राप्त करने में सहायक होती है। एच०सी० बॅक के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा सामान्य शिक्षा कार्यक्रम का वह भाग है जो माँसपेशियों के क्रियाकलापों के माध्यम से बच्चों की वृद्धि, विकास तथा शिक्षा से संबंधित है। इस प्रकार से स्पष्ट है कि आधुनिक शिक्षा को पूरा करने के लिए शारीरिक शिक्षा की बहुत आवश्यकता होती है।”

प्रश्न 11.
“शारीरिक शिक्षा बढ़ रहे स्कूल दायित्व को पूरा करती है।” इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राचीनकाल में शिक्षा का प्रसार बहुत कम था। बच्चा प्राथमिक शिक्षा अपने माता-पिता और भाई-बहनों से प्राप्त करता था। स्कूलों तथा कॉलेजों का प्रचलन बिल्कुल नहीं था। परंतु आधुनिक युग में शिक्षा का क्षेत्र बहुत बढ़ गया है। जगह-जगह पर स्कूल-कॉलेज खुल गए हैं। आज के युग में बच्चे को छोटी आयु में ही स्कूल भेज दिया जाता है।

घर में बच्चा नकल करके अथवा गलतियाँ करके बहुत कुछ सीख जाता है। अभिभावक उसकी गलतियों में सुधार करते हैं। बच्चा सहयोग और सहायता करना सीख जाता है। पाठ्यक्रम में शारीरिक शिक्षा का मिश्रण सीखने की क्रिया को आसान और मनोरंजक बना सकता है। परिणामस्वरूप शारीरिक शिक्षा बढ़ रहे स्कूली दायित्व को पूरा करती है।

प्रश्न 12.
शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु एक शिक्षक क्या भूमिका निभा सकता है?
उत्तर:
वर्तमान में स्कूल ही एकमात्र ऐसी प्राथमिक संस्था है, जहाँ शारीरिक शिक्षा प्रदान की जाती है। विद्यार्थी स्कूलों में स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान शिक्षकों से सीखते हैं। मुख्याध्यापक व शिक्षक-वर्ग विद्यार्थियों के लिए शारीरिक शिक्षा का कार्यक्रम बनाकर उन्हें शिक्षा देते हैं जिनसे विद्यार्थी यह जान पाते हैं कि किन तरीकों और साधनों से वे अपने शारीरिक संस्थानों व स्वास्थ्य को सुचारु व अच्छा बनाए रख सकते हैं। शिक्षकों द्वारा ही उनमें अपने शरीर व स्वास्थ्य के प्रति एक स्वस्थ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है और उनको अच्छे स्वास्थ्य हेतु प्रेरित किया जा सकता है।

प्रश्न 13.
शारीरिक शिक्षा हानिकारक मानसिक दुष्प्रभावों को किस प्रकार कम करती है? अथवा शारीरिक शिक्षा मनोवैज्ञानिक व्याधियों को कम करती है, कैसे?
उत्तर:
आधुनिक युग में व्यक्ति का अधिकतर काम मानसिक हो गया है। उदाहरण के रूप में, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, दार्शनिक, गणित-शास्त्री आदि सभी बुद्धिजीवी मानसिक कार्य अधिक करते हैं। मानसिक कार्यों से हमारे नाड़ी तंत्र (Nervous System) पर दबाव पड़ता है। इस दबाव को कम करने या समाप्त करने के लिए हमें अपने काम में परिवर्तन लाने की जरूरत है। यह परिवर्तन मानसिक सुख पैदा करता है। सबसे लाभदायक परिवर्तन शारीरिक व्यायाम है।

जे०बी० नैश का कहना है कि जब कोई विचार उसके दिमाग में आता है तो परिस्थिति बदल जाने पर भी वह विचार उसके दिमाग में चक्कर काटने लगता है तो इससे पीछा छुड़वाने के लिए अपने आपको दूसरे कामों में लगा लेता हूँ ताकि उसका दिमाग तरोताजा हो सके। इसलिए सभी लोगों को मानसिक उलझनों से छुटकारा पाने के लिए खेलों में भाग लेना चाहिए, क्योंकि खेलें मानसिक तनाव को दूर करती हैं। इस प्रकार हानिकारक प्रभावों को कम करने में शारीरिक शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 14.
खेलों या शारीरिक शिक्षा द्वारा व्यक्ति का सामाजिक विकास कैसे होता है?
उत्तर:
सामाजिक जीवन में कई तरह की भिन्नताएँ होती हैं; जैसे अलग भाषा, अलग संस्कृति, रंग-रूप, अमीरी-गरीबी, शक्तिशाली-कमज़ोर आदि । इन भिन्नताओं के बावजूद मनुष्य को सामाजिक इकाई में रहना पड़ता है। शारीरिक शिक्षा भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों को एक स्थान पर इकट्ठा करती है। उनमें एकता व एकबद्धता लाती है।

खेल में धर्म, जाति, श्रेणी, वर्ग या क्षेत्र आदि के आधार पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं किया जाता। इस तरह से शारीरिक शिक्षा कई ऐसे अवसर प्रदान करती है जिससे सामाजिक एकता को बढ़ावा मिलता है और सामाजिक व नैतिक विकास में वृद्धि होती है; जैसे एक-दूसरे से मिलकर रहना, एक-दूसरे का सम्मान करना, दूसरों की आज्ञा का पालन करना, बड़ों का सम्मान करना, नियमों का पालन करना आदि।

प्रश्न 15.
शारीरिक शिक्षा स्वास्थ्य के लिए कैसे लाभदायक है?
उत्तर:
अच्छा स्वास्थ्य अच्छी जलवायु की उपज नहीं, बल्कि यह अच्छी खुराक, सफ़ाई, उचित आराम, अनावश्यक चिंताओं से मुक्ति और रोग-रहित जीवन है। आवश्यक डॉक्टरी सहायता भी स्वास्थ्य को अच्छा रखने के लिए ज़रूरी है। बहुत ज़्यादा कसरत करना, परन्तु आवश्यक खुराक न खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। जो व्यक्ति खेलों में भाग लेते हैं, उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है।

खेलों में भाग लेने से शरीर की सारी शारीरिक प्रणालियाँ सही ढंग से काम करने लग जाती हैं। ये प्रणालियाँ शरीर में हुई थोड़ी-सी कमी या बढ़ोतरी को भी सहन कर लेती हैं। इसलिए जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति खेलों में अवश्य भाग ले।आधुनिक युग में शारीरिक शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए डॉ० राधाकृष्णन ने कहा है, “मजबूत शारीरिक नींव के बिना कोई राष्ट्र महान नहीं बन सकता।”

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 16.
शारीरिक शिक्षा राष्ट्रीय एकता में कैसे सहायक होती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा एक ऐसा माध्यम है, जिससे राष्ट्रीय एकता में वृद्धि की जा सकती है। खेलें खिलाड़ियों में सांप्रदायिकता, असमानता, प्रांतवाद और भाषावाद जैसे अवगुणों को दूर करती हैं। इसमें खिलाड़ियों को ऐसे अनेक अवसर मिलते हैं, जब उनमें सहनशीलता, सामाजिकता, बड़ों का सत्कार, देश-भक्ति और राष्ट्रीय आचरण जैसे गुण विकसित होते हैं। ये गुण उनमें राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देते हैं और उनके व्यक्तित्व को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अत: खेलकूद में भाग लेने से मातृत्व या राष्ट्रीयता की भावना विकसित होती है।

प्रश्न 17.
शारीरिक शिक्षा खाली समय का सदुपयोग करना कैसे सिखाती है?
उत्तर:
किसी ने ठीक ही कहा है कि “खाली दिमाग शैतान का घर होता है।” (An idle brain is a devil’s workshop.) यह आमतौर पर देखा जाता है कि खाली या बेकार व्यक्ति को हमेशा शरारतें ही सूझती हैं। कभी-कभी तो वह इस प्रकार के अनैतिक कार्य करने लग जाता है, जिनको सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं समझा जा सकता। खाली या बेकार समय का सदुपयोग न करके उसका दिमाग बुराइयों में फंस जाता है। शारीरिक शिक्षा में अनेक शारीरिक क्रियाएँ शामिल होती हैं।

इन क्रियाओं में भाग लेकर हम अपने समय का सदुपयोग कर सकते है। अतः शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को खाली समय का सदुपयोग करना सिखाती है। खाली समय का प्रयोग यदि खेल के मैदान में खेलें खेलकर किया जाए तो व्यक्ति के हाथ से कुछ नहीं जाता, बल्कि वह कुछ प्राप्त ही करता है। खेल का मैदान जहाँ खाली समय का सदुपयोग करने का उत्तम साधन है, वहीं व्यक्ति की अच्छी सेहत बनाए रखने का भी उत्तम साधन है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति को एक अच्छे नागरिक के गुण भी सिखा देता है।

प्रश्न 18.
शारीरिक शिक्षा समाजीकरण की प्रक्रिया को किस प्रकार से प्रभावित करती है? अथवा शारीरिक शिक्षा सामाजिक एवं नैतिक विकास कैसे करती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा समाजीकरण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। व्यक्ति किसी भी खेल में खेल के नियमों का पालन करते हुए तथा अपनी टीम के हित को सामने रखते हुए भाग लेता है। वह अपनी टीम को पूरा सहयोग देता है। वह हार-जीत को समान समझता है। उसमें अनेक सामाजिक गुण; जैसे सहनशीलता, धैर्यता, अनुशासन, सहयोग आदि विकसित होते हैं। इतना ही नहीं, प्रत्येक पीढ़ी कुछ-न-कुछ खास परंपराएँ व नियम भावी पीढ़ी के लिए छोड़ जाती है जिससे विद्यार्थियों को शारीरिक शिक्षा के माध्यम से परिचित करवाया जाता है। इस प्रकार शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के समाजीकरण में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे समाज में मिल-जुलकर रहना पड़ता है। शारीरिक शिक्षा कई प्रकार के ऐसे अवसर प्रदान करती है, जिससे खिलाड़ियों के सामाजिक व नैतिक विकास हेतु सहायता मिलती है; जैसे उनका एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहना, एक-दूसरे का सम्मान करना, दूसरों की आज्ञा का पालन करना, झूठ न बोलना, नियमों का पालन करना, सहयोग देना, एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना आदि।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न (Very ShortAnswer Type Questions)

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह अभिन्न अंग है, जो खेलकूद तथा अन्य शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से, व्यक्तियों में एक चुनी हुई दिशा में, परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। इससे केवल बुद्धि तथा शरीर का ही विकास नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति के स्वभाव, चरित्र एवं आदतों के निर्माण में भी सहायक होती है। अतः शारीरिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के संपूर्ण (शारीरिक, मानसिक एवं . आध्यात्मिक) व्यक्तित्व का विकास होता हैं।

प्रश्न 2.
शारीरिक शिक्षा की कोई दो परिभाषाएँ बताएँ। अथवा शारीरिक शिक्षा को परिभाषित करें।
उत्तर:
1. ए०आर० वेमैन के मतानुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह भाग है जिसका संबंध शारीरिक गतिविधियों द्वारा व्यक्ति के संपूर्ण विकास एवं प्रशिक्षण से है।”
2. आर० कैसिडी के अनुसार, “शारीरिक क्रियाओं पर केंद्रित अनुभवों द्वारा जो परिवर्तन मानव में आते हैं, वे ही शारीरिक शिक्षा कहलाते हैं।”

प्रश्न 3.
हैगमैन तथा ब्राउनवैल के अनुसार शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य बताएँ। अथवा हैगमन तथा ब्राउनवैल ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को किस प्रकार से वर्गीकृत किया है?
उत्तर:
हैगमैन तथा ब्राउनवैल (Hagman and Brownwell) ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकृत किया है:

  1. शारीरिक स्वास्थ्य में बढ़ोतरी करना,
  2. गति या तकनीकी योग्यताओं में बढ़ोतरी करना,
  3. ज्ञान में वृद्धि करना,
  4. अभिरुचि में सुधार लाना।

प्रश्न 4.
जे०बी०नैश के अनुसार शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:
जे०बी०नैश (J. B. Nash) के अनुसार शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. शारीरिक अंगों का विकास,
  2. नाड़ी-माँसपेशियों संबंधी विकास,
  3. अर्थ समझने की योग्यता का विकास,
  4. भावनात्मक विकास।

प्रश्न 5.
बी० वाल्टर के अनुसार शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:
बी० वाल्टर (B. Walter) के अनुसार शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. सेहत या स्वास्थ्य में सुधार करना,
  2. खाली समय का उचित प्रयोग,
  3. नैतिक आचरण।

प्रश्न 6.
लास्की के अनुसार शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:
लास्की (Laski) के अनुसार शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. शारीरिक विकास,
  2. नाड़ी-माँसपेशियों के तालमेल में विकास,
  3. भावनात्मक विकास,
  4. सामाजिक विकास,
  5. बौद्धिक विकास।

प्रश्न 7.
क्या खेल लोगों में मानसिक सद्भावना पैदा करती हैं?
उत्तर:
खेल लोगों में मानसिक सद्भावना पैदा करती हैं, क्योंकि खेल लड़ाइयों की भांति नहीं होतीं, ये तो आपसी प्यार, सहानुभूति और भ्रातृभाव पैदा करने के लिए खेली जाती हैं। आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत बैरन-डी-कोबर्टिन ने अंतर्राष्ट्रीय लोगों में सद्भाव पैदा करने के उद्देश्य को समक्ष रखकर की थी।

प्रश्न 8.
हमें बेकार या खाली समय का सदुपयोग कैसे करना चाहिए?
उत्तर:
हमें बेकार समय का सदुपयोग खेल खेलकर करना चाहिए। खेल खेलने से जहाँ बेकार समय का सदुपयोग हो जाता है, वहीं खेलों द्वारा शारीरिक रूप से अभ्यस्त होकर शरीर में सुंदरता, शक्ति और चुस्ती-स्फूर्ति आ जाती है। शरीर की कार्यकुशलता बढ़ जाती है और शरीर नीरोग रहता है।

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

प्रश्न 9.
युवा व्यक्तियों के लिए कौन-सी खेलों का चयन करना चाहिए?
उत्तरयुवा व्यक्तियों के लिए अधिक शारीरिक शक्ति खर्च करने वाली खेल क्रियाओं; जैसे हॉकी, फुटबॉल, एथलेटिक्स, पहाड़ों पर चढ़ना, तैरना और घुड़सवारी करने आदि का चयन करना चाहिए।

प्रश्न 10.
शारीरिक शिक्षा अनुशासन का गुण कैसे विकसित करती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा हमें अनुशासन का अमूल्य गुण सिखाती है। हमें अनुशासन में रहते हुए और खेल के नियमों का पालन करते हुए खेलना पड़ता है। इस प्रकार खेल अनुशासन के गुण में वृद्धि करते हैं। खेल में अयोग्य करार दिए जाने के डर से खिलाड़ी भावनात्मक जोश में होते हैं और वे अनुशासन भंग नहीं करते। वे अनुशासन में रहकर ही खेलते हैं।

प्रश्न 11.
शारीरिक पुष्टि को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक पुष्टि का अर्थ बहुत व्यापक है, इसलिए इसे परिभाषित करना बहुत कठिन है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि यह हमें अपने शरीर को सही ढंग से रखने और अधिक देर तक मेहनत करने की क्षमता प्रदान करती है। डॉ०ए०के० उप्पल के अनुसार, “शारीरिक पुष्टि वह क्षमता है जिसके द्वारा शारीरिक क्रियाओं के विभिन्न रूपों को बिना थकावट के तर्कपूर्ण ढंग से किया जा सके। इसके अंतर्गत व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा नीरोगता के महत्त्वपूर्ण गुण सम्मिलित होते हैं।”

प्रश्न 12.
शारीरिक शिक्षा का ज्ञान व्यक्ति को अच्छा कार्यक्रम बनाने में कैसे सहायता करता है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को शरीर से संबंधित विभिन्न गतिविधियों और उसे करने की सही तकनीकों की जानकारी प्रदान करती है। शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को उसके विभिन्न पक्षों; जैसे शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक आदि का ज्ञान प्रदान करती है। इसलिए शारीरिक शिक्षा का ज्ञान व्यक्ति को अच्छा कार्यक्रम बनाने में सहायता करता है।

HBSE 11th Class Physical Education शारीरिक शिक्षा की अवधारणा Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

भाग-I : एक वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
“शारीरिक शिक्षा शरीर का एक मजबूत ढाँचा है जो मस्तिष्क के कार्य को निश्चित एवं आसान करता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन रूसो का है।

प्रश्न 2.
शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
संपूर्ण शारीरिक विकास करना।

प्रश्न 3.
“शारीरिक क्रियाओं पर केंद्रित अनुभवों द्वारा जो परिवर्तन मानव में आते हैं, वे ही शारीरिक शिक्षा कहलाते हैं?” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन आर० कैसिडी ने कहा।

प्रश्न 4.
“मजबूत शारीरिक नींव के बिना कोई राष्ट्र महान् नहीं बन सकता।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन डॉ० राधाकृष्णन का है।

प्रश्न 5.
बी० वाल्टर ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को कितने भागों में विभाजित किया है?
उत्तर:
बी० वाल्टर ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को तीन भागों में विभाजित किया है।

प्रश्न 6.
भारतीय खेल सलाहकार परिषद् की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारतीय खेल सलाहकार परिषद् की स्थापना वर्ष 1954 में हुई।

प्रश्न 7.
भारत में संगठित शारीरिक शिक्षा कब और किसके प्रयासों से आरंभ हुई? \
उत्तर:
भारत में संगठित शारीरिक शिक्षा सन् 1920 में एच०सी० बॅक के प्रयासों से आरंभ हुई।

प्रश्न 8.
मध्यकाल में शारीरिक शिक्षा कहाँ दी जाती थी?
उत्तर:
मध्यकाल में शारीरिक शिक्षा गुरुकुल में दी जाती थी।

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प्रश्न 9.
शारीरिक शिक्षा किन अनुभवों का अध्ययन है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा उन सभी शारीरिक अनुभवों का अध्ययन है, जो शारीरिक अभ्यास द्वारा प्रकट होते हैं।

प्रश्न 10.
सामाजिक रूप से शारीरिक क्रियाएँ मनुष्य को किस प्रकार का बनाती हैं?
उत्तर:
सामाजिक रूप से शारीरिक क्रियाएँ मनुष्य को निपुण बनाती हैं।

प्रश्न 11.
शारीरिक शिक्षा को पहले कौन-कौन-से नामों से जाना जाता था?
उत्तर:
शारीरिक सभ्यता, शारीरिक प्रशिक्षण, खेलों और कोचिंग के नाम आदि से।

प्रश्न 12.
शारीरिक रूप से शारीरिक क्रियाएँ मनुष्य को किस प्रकार का बनाती हैं?
उत्तर:
शारीरिक रूप से शारीरिक क्रियाएँ मनुष्य को स्वस्थ एवं मजबूत बनाती हैं।

प्रश्न 13.
हेथरिंग्टन ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को कितने भागों में बाँटा है?
उत्तर:
हेथरिंग्टन ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को पाँच भागों में बाँटा है।

प्रश्न 14.
कौन-सा व्यक्ति अच्छा खिलाड़ी बन सकता है?
उत्तर:
मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रफुल्लित एवं मजबूत व्यक्ति अच्छा खिलाड़ी गन सकता है।

प्रश्न 15.
खेलें खिलाड़ी को समाज में कौन-सा स्थान प्रदान करती हैं?
उत्तर:
खेलें खिलाड़ी को सामाजिक मान्यता देती हैं और समाज में सम्मानजनक स्थान प्रदान करती हैं।

प्रश्न 16.
खिलाड़ी खेल के मैदान से क्या सीखता है?
उत्तर:
आज्ञा का पालन करना, सद्भावना, मेल-जोल और संयम से रहना।

प्रश्न 17.
इरविन के अनुसार, शारीरिक शिक्षा के कितने उद्देश्य होते हैं?
उत्तर:
इरविन के अनुसार, शारीरिक शिक्षा के पाँच उद्देश्य होते हैं।

प्रश्न 18.
“शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन जे०एफ० विलियम्स ने कहा।

प्रश्न 19.
“शारीरिक शिक्षा समस्त शिक्षा प्रणाली का ही एक आधारभूत अंग है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन चार्ल्स ए० बूचर ने कहा।

प्रश्न 20.
शारीरिक शिक्षा व मनोरंजन के केन्द्रीय सलाहाकार बोर्ड की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा व मनोरंजन के केन्द्रीय सलाहाकार बोर्ड की स्थापना सन् 1950 में हुई।

भाग-II : सही विकल्प का चयन करें

1. मनुष्य कैसा प्राणी है?
(A) अलौकिक
(B) सामाजिक
(C) प्राकृतिक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) सामाजिक

2. “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा के संपूर्ण क्षेत्र का वह भाग है जो बड़ी माँसपेशियों से होने वाली क्रियाओं तथा उनसे संबंधित प्रतिक्रियाओं से संबंध रखता है।” यह कथन किसका है?
(A) ए०आर० वेमैन का
(B) चार्ल्स ए० बूचर का
(C) जे०बी० नैश का
(D) आर० कैसिडी का
उत्तर:
(C) जे०बी० नैश का

3. ………….. शिक्षा का वह अभिन्न अंग है जो खेल-कूद व अन्य शारीरिक क्रियाओं की मदद से व्यक्तियों में एक चुनी हुई दिशा में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।
(A) स्वास्थ्य शिक्षा
(B) शारीरिक शिक्षा
(C) नैतिक शिक्षा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) शारीरिक शिक्षा

4. जे०बी० नैश के अनुसार शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य है
(A) शारीरिक अंगों का विकास
(B) नाड़ी-माँसपेशियों संबंधी विकास
(C) भावनात्मक विकास
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. “शारीरिक शिक्षा शरीर का मजबूत ढाँचा है जो मस्तिष्क के कार्य को निश्चित एवं आसान करता है।” यह कथन है
(A) रूसो का
(B) अरस्तू का
(C) प्लेटो का
(D) सुकरात का
उत्तर:
(A) रूसो का

6. लयात्मक क्रियाओं में शामिल है
(A) नाचना
(B) लोक-नृत्य
(C) लेजियम
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

7. शारीरिक शिक्षा किस विकास में मदद करती है?
(A) मानसिक विकास में
(B) सर्वांगीण विकास में
(C) सामाजिक विकास में
(D) भावनात्मक विकास में
उत्तर:
(B) सर्वांगीण विकास में

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8. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन लक्ष्य से संबंधित नहीं है?
(A) यह अंतिम उद्देश्य को प्राप्त करने का साधन है
(B) यह साधारण दिखावे वाला होता है
(C) इसकी व्याख्या पूर्ण होती है
(D) यह अदृश्य तथा अपूर्ण है
उत्तर:
(C) इसकी व्याख्या पूर्ण होती है

9. एच० क्लार्क ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को कितने भागों में बाँटा है?
(A) चार
(B) तीन
(C) पाँच
(D) छह
उत्तर:
(B) तीन

10. लास्की ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को कितने भागों में बाँटा है?
(A) तीन
(B) चार
(C) पाँच
(D) छह
उत्तर:
(C) पाँच

11. “Foundations of Physical Education” नामक पुस्तक लिखी है
(A) चार्ल्स ए० बूचर ने
(B) लास्की ने
(C) जे०बी० नैश ने
(D) बी० वाल्टर ने
उत्तर:
(A) चार्ल्स ए० बूचर ने

12. शारीरिक शिक्षा का क्षेत्र है
(A) विकट
(B) सरल
(C) सीमित
(D) विशाल
उत्तर:
(D) विशाल

13. शोधिक क्रियाएँ करने से सबसे अधिक प्रभावित होने वाली प्रणाली है
(A) माँसपेशी प्रणाली
(B) पाचन प्रणाली
(C) श्वास प्रणाली
(D) उत्सर्जन प्रणाली
उत्तर:
(A) माँसपेशी प्रणाली

14. शारीरिक शिक्षा से संबंधित कथन सही है
(A) यह व्यक्ति के संपूर्ण विकास में सहायक होती है
(B) यह मनोरंजन प्रदान करती है
(C) यह स्वास्थ्य में सुधार करती है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

15. वर्तमान में शिक्षा का मूल उद्देश्य है
(A) शरीर का विकास करना
(B) मन का विकास करना
(C) व्यक्ति का चहुंमुखी विकास करना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) व्यक्ति का चहुंमुखी विकास करना

16. “शारीरिक शिक्षा उन अनुभवों का जोड़ है जो व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियों से प्राप्त हुई है।” यह कथन है
(A) ए०आर० वेमैन का
(B) डी० ऑबरटियूफर का
(C) आर० कैसिडी का
(D) जे०बी० नैश का
उत्तर:
(B) डी० ऑबरटियूफर का

भाग-III: निम्नलिखित कथनों के उत्तर सही या गलत अथवा हाँ या नहीं में दें

1. शारीरिक शिक्षा से मानसिक विकास संभव है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

2. शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास करती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

3. शारीरिक शिक्षा केवल व्यक्तिगत गुणों का ही विकास करती है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत,

4. शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का अभिन्न अंग है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

5. शारीरिक शिक्षा का क्षेत्र संकुचित है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत

6. शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास भी होता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

7. शारीरिक शिक्षा से भावनात्मक विकास होता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

8. शारीरिक क्रियाएँ शारीरिक वृद्धि व विकास के लिए आवश्यक होती हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

9. शारीरिक शिक्षा मनोरंजन प्रदान करती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

10. एच० क्लार्क ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को तीन भागों में विभाजित किया है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

HBSE 11th Class Physical Education Solutions Chapter 1 शारीरिक शिक्षा की अवधारणा

11. शारीरिक शिक्षा मनो-शारीरिक व्याधियों को बढ़ाती है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत

12. शारीरिक शिक्षा राष्ट्रीय एकता के विकास में सहायक होती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

13. शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को शारीरिक तौर पर स्वस्थ बनाना है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ,

14. शारीरिक शिक्षा खाली समय का सही उपयोग करने में सहायक होती है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही,

भाग-IV: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. इरविन के अनुसार शारीरिक शिक्षा के ……… उद्देश्य होते हैं।
उत्तर:
पाँच,

2. “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है।” यह कथन …………….. ने कहा।
उत्तर:
जे०एफ० विलियम्स,

3. ………… शिक्षा हमें नेतृत्व के अनेक अवसर प्रदान करती है।
उत्तर:
शारीरिक,

4. जे०बी० नैश ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को ……………. भागों में बाँटा है।
उत्तर:
चार,

5. प्राचीनकाल में मनुष्य प्राकृतिक रूप से …………….. क्रियाएँ अधिक करता था।
उत्तर:
शारीरिक,

6. “मजबूत शारीरिक नींव के बिना कोई राष्ट्र महान् नहीं बन सकता।” यह कथन …………….. ने कहा।
उत्तर:
डॉ० राधाकृष्णन,

7. शारीरिक शिक्षा स्वास्थ्य के लिए …………….. है।
उत्तर:
लाभदायक,

8. शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को अपनी भावनाओं पर …………….. रखना सिखाती है।
उत्तर:
नियंत्रण,

9. मनुष्य एक ……………. प्राणी है।
उत्तर:
सामाजिक,

10. लास्की ने शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को …………….. भागों में विभाजित किया है।
उत्तर:
पाँच।

शारीरिक शिक्षा की अवधारणा Summary

शारीरिक शिक्षा की अवधारणा परिचय

शारीरिक शिक्षा की अवधारणा बहुत प्राचीन है। प्राचीन समय में इसका प्रयोग अव्यवस्थित रूप से था जो आज पूर्णतः व्यवस्थित हो चुका है। इसलिए शिक्षाशास्त्रियों ने शारीरिक शिक्षा की अवधारणा को पुनः परिभाषित किया है। शारीरिक शिक्षा की आधुनिक अवधारणा के अंतर्गत शारीरिक शिक्षा न केवल शारीरिक विकास करती है, बल्कि यह मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि विकास भी करती है अर्थात् इसका उद्देश्य व्यक्ति या छात्र का सर्वांगीण विकास करना है।

इस अवधारणा के अनुसार शारीरिक शिक्षा का मुख्य लक्ष्य शिक्षा है न कि स्वास्थ्य, शारीरिक क्रियाएँ या प्रशिक्षण। शिक्षाशास्त्रियों के अनुसार यह शिक्षा का ही एक महत्त्वपूर्ण एवं अभिन्न अंग है क्योंकि शारीरिक क्रियाओं व खेलों द्वारा बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है। चार्ल्स ए० बूचर के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा समस्त शिक्षा प्रणाली का ही एक आधारभूत अंग है।”

आज शारीरिक क्रियाएँ या गतिविधियाँ न केवल मनोरंजन या शक्ति प्रदर्शन के ही साधन मानी जाती हैं, बल्कि ये बालक के विकास के विभिन्न पक्षों को प्रभावित कर उनके विकास में सहायक होती हैं। आज यह माना जाने लगा है कि शारीरिक शिक्षा की आधुनिक अवधारणा से न केवल व्यक्ति की मूल भावनाओं या संवेगों को एक नई दिशा मिलती है, बल्कि उसमें अनेक नैतिक एवं मूल्यपरक गुणों का भी विकास होता है। इससे मानसिक एवं बौद्धिक क्षमता में भी वृद्धि होती है।

आज शारीरिक शिक्षा न केवल शारीरिक प्रशिक्षण, शारीरिक सुयोग्यता एवं सामूहिक ड्रिल की प्रक्रिया है, बल्कि यह बहु-आयामी एवं उपयोगी प्रक्रिया है जो जीवन एवं स्वास्थ्य के प्रत्येक पहलू के लिए अति आवश्यक है। जे० एफ० विलियम्स के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य एक प्रकार का कुशल नेतृत्व तथा पर्याप्त समय प्रदान करना है, जिससे व्यक्तियों या संगठनों को इसमें भाग लेने के लिए पूरे-पूरे अवसर मिल सकें, जो शारीरिक रूप से आनंददायक, मानसिक दृष्टि से चुस्त तथा सामाजिक रूप से निपुण हों।”

संक्षेप में, शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह अभिन्न अंग है, जो खेलकूद तथा अन्य शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से व्यक्ति में एक चुनी हुई दिशा में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। इससे केवल बुद्धि तथा शरीर का ही विकास नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति के स्वभाव, चरित्र एवं आदतों के निर्माण में भी सहायक होती है। अतः शारीरिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के संपूर्ण (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं संवेगात्मक आदि) व्यक्तित्व का विकास होता है।

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