Class 11

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 3 समानता

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 3 समानता Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Solutions Chapter 3 समानता

HBSE 11th Class Political Science समानता Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कुछ लोगों का तर्क है कि असमानता प्राकृतिक है जबकि कुछ अन्य का कहना है कि वास्तव में समानता प्राकृतिक है और जो असमानता हम चारों ओर देखते हैं उसे समाज ने पैदा किया है। आप किस मत का समर्थन करते हैं? कारण दीजिए।
उत्तर:
कुछ लोगों का विचार है कि मनुष्य में स्वाभाविक असमानता है। स्वयं प्रकृति ने भी सबको समान नहीं बनाया है। कुछ लोग जन्म से ही तीव्र एवं बुद्धिमान् होते हैं, तो कुछ लोग मूर्ख एवं मन्दबुद्धि वाले। कोई शारीरिक दृष्टि से अधिक शक्तिशाली है, तो कोई दुर्बल है। सभी के खान-पान, रहन-सहन एवं स्वभाव में कुछ-न-कुछ असमानता है। अतः सभी व्यक्तियों को समान तुला पर तोलना ठीक नहीं है। अतएव यह कहना कि प्रत्येक मनुष्य समान है, उसी प्रकार गलत है, जैसे यह कहना कि पृथ्वी समतल है। इसके ठीक विपरीत कुछ लोगों का विचार है कि सभी लोग जन्म से ही समान हैं।

वे संसार में दिखाई देने वाली सभी असमानताओं को मानवकृत मानते हैं। प्राकृतिक समानता की अवधारणा को 1789 ई० को फ्रांस की मानव अधिकारों की घोषणा में माना गया है और 1776 ई० की अमेरिका की स्वतन्त्रता घोषणा में भी माना गया है। परन्तु ऐसा विचार गलत है, क्योंकि लोगों में काफी असमानताएँ हैं जो जन्म से ही होती हैं और उनको समाप्त करना भी असम्भव है।

दो भाई भी आपस में बराबर नहीं होते। सभी लोगों में शरीर और दिमाग से सम्बन्धित परस्पर असमानता है। वास्तव में जन्म से ही बच्चों में शारीरिक और मानसिक असमानता होती है जिसे दूर करना सम्भव नहीं है। इसलिए मेरे विचार से यह कहना गलत है कि प्रकृति मनुष्यों को जन्म से समानता प्रदान करती है। प्राकृतिक असमानता का समर्थन करते हुए जी०डी०एच० कोल (GD.H. Cole) ने कहा है, “व्यक्ति शारीरिक बल, पराक्रम, मानसिक योग्यता, सृजनात्मक प्रवृत्ति, समाज सेवा की भावना और सबसे अधिक कल्पना शक्ति में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।”

प्रश्न 2.
एक मत है कि पूर्ण आर्थिक समानता न तो संभव है और न ही वांछनीय एक समाज ज़्यादा से ज़्यादा बहुत अमीर और बहुत ग़रीब लोगों के बीच की खाई को कम करने का प्रयास कर सकता है। क्या आप इस तर्क से सहमत हैं? अपना तर्क दीजिए।
उत्तर:
इस तर्क से मैं पूर्णतः सहमत हूँ कि पूर्ण आर्थिक समानता लाना बिल्कुल भी संभव नहीं है। लेकिन हाँ, अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बहुत चौड़ी या गहरी नहीं होनी चाहिए। इसीलिए आज अधिकतर सरकारें लोगों को आजीविका कमाने एवं आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु समान अवसर उपलब्ध करवाने का प्रयास कर रही हैं। यद्यपि यहाँ यह भी स्पष्ट है कि समान अवसरों के बावजूद भी असमानता बनी रह सकती है, लेकिन इसमें यह संभावना छिपी है कि आवश्यक प्रयासों द्वारा कोई भी समाज में अपनी स्थिति बेहतर प्राप्त कर सकता है।

इसी उद्देश्य के अंतर्गत ही हमारी भारतीय सरकार ने भी वंचित समुदायों के लिए छात्रवृत्ति और हॉस्टल जैसी सुविधाएँ भी मुहैया करवाई हैं। वंचित समुदायों को अवसर की समानता देने के लिए नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की सुविधा भी दी गई है। जैसे दिसम्बर, 2019 में दिए गए 104वें संवैधानिक संशोधन द्वारा संविधान के मूल आरक्षण सम्बन्धी प्रावधान को सन् 2030 तक बढ़ाया गया है। अतः ऐसे सब प्रयासों से बहुत अमीर और बहुत गरीब लोगों के बीच की खाई को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 3 समानता

प्रश्न 3.
नीचे दी गई अवधारणा और उसके उचित उदाहरणों में मेल बैठायें।
(क) सकारात्मक कार्रवाई – (1) प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार है।
(ख) अवसर की समानता – (2) बैंक वरिष्ठ नागरिकों को ब्याज की ऊँची दर देते हैं।
(ग) समान अधिकार – (3) प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए।
उत्तर:
(क) सकारात्मक कार्रवाई – (2) बैंक वरिष्ठ नागरिकों को ब्याज की ऊँची दर देते हैं।
(ख) अवसर की समानता – (3) प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए।
(ग) समान अधिकार – (1) प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार है।

प्रश्न 4.
किसानों की समस्या से संबंधित एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार छोटे और सीमांत किसानों को बाजार से अपनी उपज का उचित मल्य नहीं मिलता। रिपोर्ट में सलाह दी गई कि सरकार को बेहतर मल्य सनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन यह प्रयास केवल लघु और सीमांत किसानों तक ही सीमित रहना चाहिए। क्या यह सलाह समानता के सिद्धांत से संभव है?
उत्तर:
रिपोर्ट में सरकार को जो सलाह दी गई है वह समानता के सिद्धांत के अनुसार संभव है क्योंकि रिपोर्ट में केवल लघु और सीमांत किसानों की ही चर्चा की गई है। अत: सलाह भी उन्हीं के हितों से संबंधित है। इसलिए यह सलाह समानता के सिद्धांत से संभव है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से किस में समानता के किस सिद्धांत का उल्लंघन होता है और क्यों?
(क) कक्षा का हर बच्चा नाटक का पाठ अपना क्रम आने पर पड़ेगा।
(ख) कनाडा सरकार ने दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति से 1960 तक यूरोप के श्वेत नागरिकों को कनाडा में आने और बसने के लिए प्रोत्साहित किया।
(ग) वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से रेलवे आरक्षण की एक खिड़की खोली गई।
(घ) कुछ वन क्षेत्रों को निश्चित आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
उत्तर:
(क) इस कथन में सामाजिक समानता के सिद्धांत का उल्लंघन हो रहा है, क्योंकि नाटक का पाठ पढ़ने का अवसर सबसे पहले मेधावी बच्चों को मिलना चाहिए।

(ख) इस कथन में राजनीतिक समानता के सिद्धांत का उल्लंघन हो रहा है, क्योंकि इसमें कनाडा सरकार द्वारा अश्वेतों के साथ भेदभाव की नीति अपनाई गई है।

(ग) इस कथन में सामाजिक समानता के सिद्धांत का उल्लंघन हो रहा है, क्योंकि इस तरह की समानता सभी नागरिकों के साथ एक-समान व्यवहार करने का दावा करती है।

(घ) इस कथन में भी सामाजिक समानता के सिद्धांत का ही उल्लंघन हो रहा है, क्योंकि वन क्षेत्रों पर निश्चित आदिवासी समुदायों का ही नहीं बल्कि पूरे आदिवासी समुदायों का अधिकार होना चाहिए।

प्रश्न 6.
यहाँ महिलाओं को मताधिकार देने के पक्ष में कुछ तर्क दिए गए हैं। इनमें से कौन-से तर्क समानता के विचार से संगत हैं। कारण भी दीजिए।
(क) स्त्रियाँ हमारी माताएँ हैं। हम अपनी माताओं को मताधिकार से वंचित करके अपमानित नहीं करेंगे।
(ख) सरकार के निर्णय पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी प्रभावित करते हैं इसलिए शासकों के चुनाव में उनका भी मत होना चाहिए।
(ग) महिलाओं को मताधिकार न देने से परिवारों में मतभेद पैदा हो जाएंगे।
(घ) महिलाओं से मिलकर आधी दुनिया बनती है। मताधिकार से वंचित करके लंबे समय तक उन्हें दबाकर नहीं रखा जा सकता है।
उत्तर:
तर्क (क) समानता के विचार से संगत है, क्योंकि इसमें पुरुषों की भाँति स्त्रियों को भी मताधिकार देने की बात कही गई है।
तर्क (ख) भी समानता के विचार से संगत है, क्योंकि इसमें भी स्त्रियों को पुरुषों की तरह मताधिकार देने की बात कही गई है।
तर्क (ग) समानता के विचार से मेल नहीं खाता. क्योंकि इसमें महिलाओं को मताधिकार नहीं देने की बात कही गई है।
तर्क (घ) समानता के विचार से मेल खाता है, क्योंकि इसमें स्पष्ट किया गया है कि जिस दुनिया में हम रहते हैं वह स्त्रियों और पुरुषों की बराबर की संख्या से बनी है और इस आधार पर उन्हें मताधिकार अवश्य दिया जाना चाहिए।

समानता HBSE 11th Class Political Science Notes

→ समानता राजनीति विज्ञान का एक आधारभूत सिद्धांत है। समानता प्रजातंत्र का एक मुख्य स्तंभ है। समानता व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए परम आवश्यक है।

→ प्रत्येक युग में मनुष्य ने समानता सामंतवाद और पूंजीवाद ने समानता के नारे को बुलंद किया है। समानता के महत्त्व को प्राचीनकाल से ही विचारकों ने स्वीकार किया है, किंतु यह एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा के रूप में केवल 18वीं शताब्दी में ही उभरकर आई।

→ अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम (1776 ई०) और फ्रांस की राज्य क्रांति (1789 ई०) में जेफरसन, जॉन लॉक, रूसो, वाल्टैयर एवं पेन जैसे विचारकों ने स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व (Liberty, Equality and Fraternity) का नारा दिया जिसने आगे चलकर स्वतंत्र राष्ट्रों के निर्माण में मदद की।

→ 1776 ई० में अमेरिका में यह घोषणा की गई, “हम लोग इस सत्य को स्वतः सिद्ध मानते हैं कि सभी व्यक्ति समान पैदा होते हैं।”

→ सन् 1789 में फ्रांस की सफल क्रांति के बाद फ्रांस की राष्ट्रीय सभा (National Assembly) ने मानवीय अधिकारों की अपनी घोषणा में समानता के महत्त्व को स्वीकार करते हुए कहा था, “मनुष्य हमेशा स्वतंत्र और समान रूप में जन्म लेते हैं और अपने अधिकारों के विषय में समान ही रहते हैं।”

→ वर्तमान युग प्रजातंत्र और समाजवाद का युग है जिसका मूर्त रूप समानता के द्वारा ही संभव है। आज संपूर्ण विश्व समानता के सिद्धांत में आस्था प्रकट करता है तथा राजनीति विज्ञान की यह मुख्य धुरी बन गई है।

→ मानव-सभ्यता का विकास और प्रगति दोनों समानता के सिद्धांत पर आधारित हैं।

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 स्वतंत्रता

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 स्वतंत्रता Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 स्वतंत्रता

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतंत्रता को परिभाषित करें।
उत्तर:
राजनीति विज्ञान के विद्वान मैक्नी के अनुसार, “स्वतंत्रता सभी प्रतिबंधों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि युक्ति-रहित प्रतिबंधों के स्थान पर युक्ति-युक्त प्रतिबंधों को लगाना है।”

प्रश्न 2.
स्वतंत्रता के नकारात्मक रूप का वर्णन करें।
उत्तर:
नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता होना और उसकी स्वतंत्रता पर कोई प्रतिबंध न होना, परंतु स्वतंत्रता का यह अर्थ सही नहीं है। यदि स्वतंत्रता पर कोई प्रतिबंध न हो तो समाज में अराजकता फैल जाएगी और समाज में एक ही कानून होगा ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस ।’

प्रश्न 3.
आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ बताइए।
उत्तर:
आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि लोगों को अपनी जीविका कमाने की स्वतंत्रता हो तथा इसके लिए उन्हें उचित साधन व सुविधाएं प्राप्त हों। नागरिकों की बेरोज़गारी और भूख से मुक्ति हो तथा प्रत्येक को काम करने के समान अवसर प्राप्त होने चाहिएँ।

प्रश्न 4.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता किसे कहते हैं?
उत्तर:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता से तात्पर्य है कि व्यक्ति को ऐसे कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान करना जो केवल उस तक ही सीमित हों और उनके करने से दूसरों पर किसी प्रकार का प्रभाव न पड़ता हो।

प्रश्न 5.
प्राकृतिक स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है? उत्तर प्राकृतिक स्वतंत्रता से तात्पर्य है कि मनुष्य को वह सभी कुछ करने की स्वतंत्रता दी जाए जो कुछ वह करना चाहता है। प्रश्न 6. स्वतंत्रता की किन्हीं तीन विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:

  • स्वतंत्रता सभी बंधनों का अभाव नहीं है,
  • स्वतंत्रता केवल समाज में ही प्राप्त हो सकती है,
  • स्वतंत्रता सभी व्यक्तियों को समान रूप से मिलती है।

प्रश्न 7.
किसी व्यक्ति द्वारा स्वतंत्रता के उपयोग की आवश्यक दो दशाएँ बताइए।
अथवा
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए आवश्यक किन्हीं दो शर्तों का उल्लेख करें।
उत्तर:

  • स्वतंत्रता के उपयोग के लिए आवश्यक है कि स्वतंत्रता सबके लिए एक समान हो तथा सबको स्वतंत्रता एक समान मिलनी चाहिए।
  • शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध स्वतंत्रता का होना अनिवार्य है। स्वतंत्रता के उपयोग के लिए लोकतंत्र तथा प्रेस की स्वतंत्रता का होना अनिवार्य है।

प्रश्न 8.
क्या स्वतंत्रता असीम है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता व्यक्ति के विकास के लिए अति आवश्यक है। स्वतंत्रता का सही अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को उन कार्यों को करने का अधिकार हो जिससे दूसरे व्यक्तियों को हानि न पहुंचे। स्वतंत्रता पर अनैतिक तथा निरंकुश बंधन नहीं होने चाहिएँ, परंतु स्वतंत्रता असीम नहीं है। सभ्य समाज में स्वतंत्रता बिना बंधनों व कानूनों के दायरे में होती है, परंतु स्वतंत्रता पर अन्यायपूर्ण तथा अनुचित बंधन नहीं होने चाहिएँ।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 स्वतंत्रता

प्रश्न 9.
स्वतंत्रता के किन्हीं चार प्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता के चार प्रकार निम्नलिखित हैं

  • प्राकृतिक स्वतंत्रता,
  • नागरिक स्वतंत्रता,
  • आर्थिक स्वतंत्रता तथा
  • राजनीतिक स्वतंत्रता।

प्रश्न 10.
स्वतंत्रता के किन्हीं तीन संरक्षकों का उल्लेख करें।
उत्तर:
स्वतंत्रता के तीन संरक्षक निम्नलिखित हैं

  • मौलिक अधिकारों की घोषणा,
  • प्रजातंत्र व्यवस्था का होना,
  • कानून का शासन।

प्रश्न 11.
सकारात्मक स्वतंत्रता की किन्हीं तीन विशेषताओं का उल्लेख करें।
उत्तर:

  • स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव नहीं है।
  • सकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ विशेषाधिकारों का अभाव है।
  • राज्य स्वतंत्रताओं का रक्षक है।

प्रश्न 12.
स्वतंत्रता के मार्क्सवादी सिद्धांत की तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • पूंजीवादी व्यवस्था में स्वतंत्रता संभव नहीं है।
  • हिंसात्मक क्रांति द्वारा परिवर्तन।
  • स्वतंत्र न्यायपालिका का अभाव।

प्रश्न 13.
स्वतंत्रता के मार्क्सवादी सिद्धांत की आलोचना के दो शीर्षकों का उल्लेख करें।
उत्तर:

  • व्यक्तिगत संपत्ति का विरोध गलत है।
  • पूंजीवादी समाज की आलोचना अनुचित।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतंत्रता का अर्थ बताइए।
उत्तर:
स्वतंत्रता शब्द को अंग्रेज़ी भाषा में ‘Liberty’ कहते हैं। ‘लिबर्टी’ शब्द लैटिन भाषा के शब्द ‘लिबर’ (Liber) से निकला है, जिसका अर्थ है-‘पूर्ण स्वतंत्रता’ अथवा किसी प्रकार के बंधनों का न होना। इस प्रकार स्वतंत्रता का अर्थ है-व्यक्ति को उसकी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और उस पर कोई बंधन नहीं होना चाहिए, परंतु स्वतंत्रता का यह अर्थ गलत है। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ यह है कि व्यक्ति पर अन्यायपूर्ण तथा अनुचित प्रतिबंध नहीं होने चाहिएं, वरन उसे उन अवसरों की भी प्राप्ति होनी चाहिए जिनसे उसे अपना विकास करने में सहायता मिलती हो।

प्रश्न 2.
स्वतंत्रता की कोई तीन परिभाषाएँ लिखिए।
उत्तर:
1. गैटेल के अनुसार, “स्वतंत्रता से अभिप्राय उस सकारात्मक शक्ति से है जिससे उन बातों को करके आनंद प्राप्त होता है जो कि करने योग्य हैं।”

2. कोल के अनुसार, “बिना किसी बाधा के अपने व्यक्तित्व को प्रकट करने का नाम स्वतंत्रता है।”

3. प्रो० लास्की के अनुसार, “स्वतंत्रता का अर्थ उस वातावरण की उत्साहपूर्ण रक्षा करना है जिससे मनुष्य को अपना उज्ज्वलतम स्वरूप प्रकट करने का अवसर प्राप्त होता है।” अतः स्वतंत्रता अनुचित प्रतिबंधों के स्थान पर उचित प्रतिबंधों का होना है। स्वतंत्रता उस वातावरण को कहा जा सकता है, जिसका लाभ उठाकर व्यक्ति अपने जीवन का सर्वोत्तम विकास कर सके।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता की कोई पाँच विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
स्वतंत्रता की पाँच विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • सभी तरह की पाबंदियों का अभाव स्वतंत्रता नहीं है।
  • निरंकुश, अनैतिक, अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों का अभाव ही स्वतंत्रता है।
  • स्वतंत्रता सभी व्यक्तियों को समान रूप से प्राप्त होती है।
  • व्यक्ति को वह सब कार्य करने की स्वतंत्रता है जो करने योग्य हैं।
  • स्वतंत्रता का प्रयोग समाज के विरुद्ध नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 4.
नागरिक स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नागरिक स्वतंत्रता वह स्वतंत्रता है जो व्यक्ति को एक संगठित समाज का सदस्य होने के रूप में मिलती है। जीवन के विकास के लिए व्यक्ति को अनेक प्रकार की सुविधाओं की आवश्यकता होती है। ऐसी सुविधाएं केवल संगठित समाज में ही संभव हो सकती हैं। समाज में रह रहे व्यक्ति को राज्य के कानूनों के प्रतिबंधों के प्रसंग में जो सुविधाएं प्राप्त होती हैं, उन सुविधाओं को सामूहिक रूप से नागरिक स्वतंत्रता का नाम दिया जाता है।

नागरिक स्वतंत्रता प्राकृतिक स्वतंत्रता के बिल्कुल विपरीत है। प्राकृतिक स्वतंत्रता संगठित समाज में प्रदान नहीं की जा सकती, जबकि नागरिक स्वतंत्रता केवल संगठित समाज में ही संभव हो सकती है।

प्रश्न 5.
राजनीतिक स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
राजनीतिक स्वतंत्रता से अभिप्राय राजनीतिक अधिकारों का प्राप्त होना है। ऐसे अधिकार केवल प्रजातांत्रिक समाज में ही प्राप्त हो सकते हैं। जिन राज्यों में राजनीतिक अधिकार प्रदान नहीं किए जाते, वहां राजनीतिक स्वतंत्रता का अस्तित्व नहीं हो सकता। राजनीतिक स्वतंत्रता का अभिप्राय राज्य के कार्यों में भाग लेने के सामर्थ्य से है। मताधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, सरकार की आलोचना करने का अधिकार, याचिका देने का अधिकार आदि कुछ ऐसे राजनीतिक अधिकार हैं जिनकी प्राप्ति पर ही राजनीतिक स्वतंत्रता का अस्तित्व निर्भर करता है।

प्रश्न 6.
स्वतंत्रता के दो संरक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता के दो संरक्षण निम्नलिखित हैं

1. लोकतंत्र की व्यवस्था लोकतंत्रीय व्यवस्था में ही लोगों को स्वतंत्रता अधिक समय तक और अधिक-से-अधिक मात्रा में मिल सकती है। स्वतंत्रता लोकतंत्र का एक आधार है और शासक जनता के प्रतिनिधि होने के कारण आसानी से स्वतंत्रता का हनन नहीं कर सकते।

2. मौलिक अधिकारों की घोषणा अधिकारों का अतिक्रमण होने की संभावना राज्य की ओर से अधिक होती है। मौलिक अधिकार संविधान में लिखे होते हैं। ऐसा होने से अधिकारों का हनन राज्य द्वारा या व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता। मौलिक अधिकारों की घोषणा से स्वतंत्रता की रक्षा होती है।

प्रश्न 7.
स्वतंत्रता के सकारात्मक दृष्टिकोण का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता के सकारात्मक पक्ष से अभिप्राय यह है कि व्यक्ति को वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता है जो सभ्य समाज में करने के योग्य होता है। स्वतंत्रता के इस पक्ष का अर्थ प्रत्येक प्रकार के प्रतिबंधों का अभाव नहीं, अपितु अनैतिक, निरंकुश तथा अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों का अभाव है। स्वतंत्रता के सकारात्मक पक्ष का अभिप्राय एक ऐसा वातावरण स्थापित करना है, जिसमें मनुष्य को अपना सर्वोत्तम विकास करने के लिए उपयुक्त अवसर प्राप्त हों। स्वतंत्रता के सकारात्मक रूप का साधारण अर्थ है करने योग्य कार्यों को करने तथा उपभोग योग्य वस्तुओं का उपभोग करने की स्वतंत्रता।

प्रश्न 8.
आर्थिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक स्वतंत्रता के संबंधों का वर्णन करें।
उत्तर:
आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है-भूख और अभाव से मुक्ति। जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के अवसर, काम की उचित मजदूरी की व्यवस्था तथा आर्थिक अभाव से छुटकारा । राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ है-मत डालने, चुनाव लड़ने, सार्वजनिक पद प्राप्त करने और सरकार की आलोचना करने की स्वतंत्रता। राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता में घनिष्ठ संबंध है।

जहाँ आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है, वहां राजनीतिक स्वतंत्रता कोई अर्थ नहीं है और यह वास्तविक नहीं है। एक भूखे व्यक्ति के लिए मताधिकार का भी कोई मूल्य नहीं, यदि वह अपनी रोजी-रोटी के लिए दूसरे की दया पर निर्भर है। एक मजदूर को यदि उसका मालिक बिना कारण तुरंत नौकरी से निकाल सकता है और उसे भूखा मरने पर मजबूर कर सकता है तो क्या वह मजदूर अपने मत का प्रयोग अपने मालिक की इच्छा के विरुद्ध नहीं कर सकता।

एक भूखे व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ने के अधिकार का तो कोई अर्थ ही नहीं क्योंकि चुनाव लड़ने के लिए धन चाहिए। गरीबी के कारण वोट बेचे जाते हैं और धनवान व्यक्ति उन्हें खरीदते हैं। यह भी सत्य है कि जिस व्यक्ति का धन पर नियंत्रण है, उसका प्रशासन पर भी प्रभाव जम जाता है। एक दिन की मजदूरी खोकर कोई भी मजदूर अपनी आत्मा की आवाज़ के अनुरूप वोट डालने नहीं जा सकता। इन सभी बातों से स्पष्ट है कि आर्थिक स्वतंत्रता और राजनीतिक स्वतंत्रता में गहरा संबंध है तथा दोनों साथ-साथ ही रह सकती हैं।

प्रश्न 9.
आधुनिक राज्य में स्वतंत्रता किस प्रकार सुरक्षित रखी जा सकती है? अथवा स्वतंत्रता की सुरक्षा के कोई पांच उपाय बताइए।
उत्तर:
स्वतंत्रता मनुष्य के विकास व उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है। स्वतंत्रता की सुरक्षा के विभिन्न उपायों में से पांच उपाय अग्रलिखित हैं

1. प्रजातंत्र-स्वतंत्रता व प्रजातंत्र में गहरा संबंध है। स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रजातंत्र में ही की जा सकती है क्योंकि इस प्रकार की प्रणाली में जनता की सरकार होती है और लोगों के अधिकारों को छीना नहीं जा सकता। इसके विपरीत राजतंत्र प्रणाली में स्वतंत्रता की सुरक्षा नहीं हो सकती।

2. मौलिक अधिकारों की घोषणा जनता को स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए लोगों के मौलिक अधिकारों की घोषणा कर उन्हें संविधान में लिख दिया जाता है, ताकि संविधान द्वारा लोगों की स्वतंत्रता की सुरक्षा हो सके।

3. स्वतंत्र प्रेस स्वतंत्र प्रेस भी लोगों की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने में सहायता करती है। यदि प्रेस पर अनुचित दबाव हो तो कोई भी व्यक्ति अपने विचारों को स्वतंत्रतापूर्वक प्रकट नहीं कर सकता। स्वतंत्र प्रेस ही सरकार की सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखती है।

4. कानून का शासन-कानून का शासन स्वतंत्रता की सुरक्षा करता है। कानून के सामने सभी समान होने चाहिएं और सभी लोगों के लिए एक-सा कानून होना चाहिए। इससे शासन वर्ग की स्वेच्छाचारिता पर रोक लगती है।

5. स्वतंत्र न्यायपालिका स्वतंत्र न्यायपालिका लोगों की स्वतंत्रता की सुरक्षा करती है। कानून कितने ही अच्छे क्यों न हों, जब तक न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होती, कानूनों को सही ढंग से लागू नहीं किया जा सकता। अतः कानूनों को लागू करने के लिए न्यायाधीश स्वतंत्र, निडर व ईमानदार होने चाहिएँ।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 स्वतंत्रता

प्रश्न 10.
क्या स्वतंत्रता पूर्ण होती है?
उत्तर:
स्वतंत्रता वास्तविक रूप में पूर्ण नहीं हो सकती। किसी भी व्यक्ति को पूर्ण रूप से वह सब कुछ करने का अवसर या आजादी नहीं दी जा सकती जो वह करना चाहता है। समाज में रहते हुए व्यक्ति सामाजिक नियमों व कर्तव्यों से बंधा हुआ होता है और उसे अपने सभी कार्य दूसरों के सुख-दुःख, सुविधा-असुविधा को ध्यान में रखकर करने पड़ते हैं। पूर्ण स्वतंत्रता का अर्थ है स्वेच्छाचारिता, जो सामाजिक जीवन में संभव नहीं है।

समाज लोगों के आपसी सहयोग पर खड़ा है और कार्य कर रहा है। यदि प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण स्वतंत्रता का प्रयोग करते हुए मनमानी करेगा तो समाज की शांति समाप्त हो जाएगी तथा जंगल जैसा वातावरण पैदा हो जाएगा। एक सभ्य समाज में हम पूर्ण स्वतंत्रता की कल्पना भी नहीं कर सकते। इस प्रकार स्वतंत्रता पूर्ण नहीं होती, बल्कि उचित प्रतिबंधों के अस्तित्व में ही कायम रहती है।

प्रश्न 11.
“शाश्वत जागरूकता ही स्वतंत्रता की कीमत है।” टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
प्रो० लास्की ने ठीक ही कहा है, “शाश्वत जागरुकता ही स्वतंत्रता की कीमत है।” स्वतंत्रता की सुरक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय स्वतंत्रता के प्रति जागरुक रहना है। नागरिकों में सरकार के उन कार्यों के विरुद्ध आंदोलन करने की हिम्मत व हौंसला होना चाहिए जो उनकी स्वतंत्रता को नष्ट करते हों। सरकार को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि यदि उसने नागरिकों की स्वतंत्रता को कुचला तो नागरिक उसके विरुद्ध पहाड़ की तरह खड़े हो जाएंगे। लास्की के शब्दों में, “नागरिकों की महान भावना, न कि कानूनी शब्दावली स्वतंत्रता की वास्तविक संरक्षक है।”

प्रश्न 12.
कानून तथा स्वतंत्रता में क्या संबंध है? अथवा ‘कानून स्वतंत्रता का विरोधी नहीं है।’ व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
व्यक्तिवादियों के मतानुसार, राज्य जितने अधिक कानून बनाता है, व्यक्ति की स्वतंत्रता उतनी ही कम होती है। अतः उनका कहना है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकती है जब राज्य अपनी सत्ता का प्रयोग कम-से-कम करे। परंतु आधुनिक लेखकों के मतानुसार स्वतंत्रता तथा कानून परस्पर विरोधी न होकर परस्पर सहायक तथा सहयोगी हैं।

राज्य ही ऐसी संस्था है जो कानूनों द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करती है जिसमें व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का आनंद उठा सकता है। राज्य कानून बनाकर एक नागरिक को दूसरे नागरिक के कार्यों में हस्तक्षेप करने से रोकता है। राज्य कानूनों द्वारा सभी व्यक्तियों को समान सुविधाएं प्रदान करता है, ताकि मनुष्य अपना विकास कर सके। स्वतंत्रता और कानून एक-दूसरे के विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं। लॉक ने ठीक ही कहा है, “जहाँ कानून नहीं, वहां पर स्वतंत्रता भी नहीं।”

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं? स्वतंत्रता के नकारात्मक तथा सकारात्मक सिद्धांतों का वर्णन करें।
अथवा
नकारात्मक और सकारात्मक स्वतंत्रता में अंतर बतलाइए। अथवा सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थन में तर्क दीजिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता का मानव समाज में बड़ा महत्त्व है। व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास तथा उसकी प्रसन्नता के लिए इसका होना बहुत ही आवश्यक है। स्वतंत्र व्यक्ति ही अपने जीवन को अपनी इच्छा के अनुसार ढालकर उसे प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत कर सकता है। एक व्यक्ति को दूसरे के आदेश से किसी कार्य को करने में उतनी प्रसन्नता नहीं होती जितनी कि उसे उसी कार्य को अपनी इच्छा के अनुसार करने से होती है।

इसके अतिरिक्त अपने व्यक्तिगत मामलों को जितनी अच्छी तरह से एक व्यक्ति स्वयं समझ सकता है और उनकी गुत्थियों को सुलझा सकता है, उतनी अच्छी तरह से दूसरा व्यक्ति न तो उन मामलों को समझ सकता है और न ही उनकी गुत्थियों को सुलझा सकता है। स्वतंत्रता से व्यक्ति का नैतिक स्तर भी ऊंचा होता है। उसमें आत्म-विश्वास, स्वावलंबिता तथा कार्य को प्रारंभ करने की शक्ति आदि गुण उत्पन्न होते हैं।

इस दृष्टिकोण से यह प्रजातंत्र के लिए भी आवश्यक है। वास्तव में, स्वतंत्रता प्रजातंत्र का आधार है। इंग्लैंड में तो स्वतंत्रता, जिसका अर्थ उस समय जनता के स्वार्थों की रक्षा करना ही समझा जाता था, की भावना तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही दिखाई दी थी, जब मैग्ना कार्टा (MagnaCarta) नामक नागरिक स्वतंत्रता के अधिकार-पत्र की राजा जॉन के द्वारा घोषणा करवाई गई, परंतु इसका विस्तार से प्रचार व प्रसार सत्रहवीं शताब्दी में ही हुआ।

इंग्लैंड की महान क्रांति तथा फ्रांस की क्रांति ने यूरोप के सभी देशों में स्वतंत्रता की भावना फैला दी। फ्रांस की क्रांति के बाद लोकतंत्र के सिद्धांतों (Liberty, Equality, Fraternity) का झंडा सर्वत्र फहराया जाने लगा। बीसवीं शताब्दी तक यह झंडा एशिया व अफ्रीका के देशों में भी फहराया जाने लगा। व्यक्तिगत व राष्ट्रीय स्वतंत्रता अब भी सभी लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। स्वतंत्रता अर्थात Liberty शब्द लैटिन भाषा के शब्द ‘लिबर’ (Liber) से बना है, जिसका अर्थ है ‘कोई भी कार्य अपनी इच्छा के अनुसार करने की स्वतंत्रता’

साधारण व्यक्ति इस शब्द का अर्थ पूर्ण स्वतंत्रता से लेता है जो बिल्कुल प्रतिबंध-रहित हो, परंतु राजनीति शास्त्र में प्रतिबंध-रहित स्वतंत्रता का अर्थ स्वेच्छाचारिता (Licence) है, स्वतंत्रता नहीं। राजनीति शास्त्र में स्वतंत्रता का अर्थ उस हद तक स्वतंत्रता है, जिस हद तक वह दूसरों के रास्ते में बाधा नहीं बनती। इसलिए स्वतंत्रता पर कुछ प्रतिबंध लगाने पड़ते हैं, ताकि प्रत्येक व्यक्ति की समान स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।

इसी कारण से मैक्नी ने कहा है, “स्वतंत्रता सभी प्रतिबंधों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि युक्तिरहित प्रतिबंधों के स्थान पर युक्तियुक्त प्रतिबंधों को लगाना है।” इसकी पुष्टि करते हुए जे०एस० मिल ने कहा है, “स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ यह है कि हम अपने हित के अनुसार अपने ढंग से उस समय तक चल सकें जब तक कि हम दूसरों को उनके हिस्से से वंचित न करें और उनके प्रयत्नों को न रोकें।”

मानव अधिकारों की घोषणा (1789) में भी स्वतंत्रता का अर्थ इसी प्रकार से दिया है। इस घोषणा के अनुसार स्वतंत्रता व्यक्ति की वह शक्ति है जिसके द्वारा व्यक्ति वे सभी कार्य कर सकता है जो दूसरों के उसी प्रकार के अधिकारों पर कोई दुष्प्रभाव न डालें।

राजनीति विज्ञान के आधुनिक विद्वान स्वतंत्रता को केवल बंधनों का अभाव नहीं मानते, बल्कि उनके अनुसार स्वतंत्रता सामाजिक बंधनों में जकड़ा हुआ अधिकार है।

(क) स्वतंत्रता के दो रूप (Two Aspects of Liberty) स्वतंत्रता के सकारात्मक रूप के समर्थक लॉक, एडम स्मिथ, हरबर्ट स्पैंसर, जे०एस०मिल आदि हैं। प्रारंभिक उदारवादियों ने नकारात्मक स्वतंत्रता का समर्थन किया। इस प्रकार एडम स्मिथ व रिकार्डो आदि अर्थशास्त्रियों ने खुली प्रतियोगिता का समर्थन किया और कहा कि राज्य को व्यक्ति के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

जॉन स्टुअर्ट मिल (J.S. Mill) ने अपनी पुस्तक ‘On Liberty’ में व्यक्ति के कार्यों को दो भागों में विभाजित किया है-स्व-संबंधी कार्य व पर-संबंधी कार्य। मिल व्यक्ति के स्व-संबंधी कार्यों में राज्य के किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप को पसंद नहीं करता। यहां तक कि व्यक्ति के गलत कार्यों में राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि इनका संबंध व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन से होता है,

परंतु यदि व्यक्ति के कार्यों का प्रभाव दूसरे व्यक्ति के व्यवहार पर पड़ता है तो राज्य या समाज उसमें हस्तक्षेप कर सकता है। इसलिए जे०एस० मिल व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्र छोड़ देने के पक्ष में है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए।

1. स्वतंत्रता का नकारात्मक स्वरूप (Negative Aspect of Liberty):
स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी में ‘लिबर्टी’ (Liberty) शब्द का प्रयोग किया जाता है। लिबर्टी शब्द लेटिन भाषा के Liber शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है-स्वतंत्र। इसका प्रायः यही अर्थ लिया जाता है कि व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार कार्य करने की छूट हो। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति जैसा चाहे करे, उस पर कोई नियंत्रण या बंधन न हो, उसके काम का दूसरों पर चाहे जो भी प्रभाव पड़े।

इस प्रकार इसका अर्थ है-‘सभी प्रतिबंधों का अभाव’, परंतु सभ्य समाज में रहकर इस प्रकार की अनियंत्रित स्वतंत्रता मिलनी असंभव है। समाज में रहकर व्यक्ति अपनी इच्छा से जो चाहें, नहीं कर सकते। किसी भी व्यक्ति को चोरी करने या दूसरों को मारने की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। यह स्वतंत्रता का निषेधात्मक या नकारात्मक अर्थ है। समाज व्यक्ति को स्वेच्छा-अधिकार नहीं दे सकता, क्योंकि वह तो स्वतंत्रता न होकर उच्छृखलता हो जाती है। इससे ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ वाली कहावत चरितार्थ होती है। ऐसी स्वतंत्रता केवल सबल व्यक्ति ही उपयोग में ला सकेंगे, निर्बलों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं होगा।

स्वतंत्रता के नकारात्मक स्वरूप के विश्लेषण के पश्चात इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्टं होती हैं

  • कानून एक बुराई है, क्योंकि यह व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाता है।
  • व्यक्ति को विकास के लिए विभिन्न राजनीतिक व नागरिक स्वतंत्रताएं मिलनी चाहिएं।
  • व्यक्ति को स्व-कार्यों में पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए।
  • आर्थिक गतिविधियों और विचार व भाषण पर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।
  • पूंजीवादी व्यवस्था का समर्थन करते हैं।
  • मताधिकार को व्यापक बनाना चाहिए।
  • सरकार का कार्यक्षेत्र सीमित होना चाहिए। वह सरकार सबसे अच्छी सरकार है जो सबसे कम काम करती है।

2. स्वतंत्रता का सकारात्मक स्वरूप (Positive Aspect of Liberty):
नकारात्मक स्वतंत्रता, स्वतंत्रता न होकर लाइसैंस बन जाती है। इससे व्यक्ति को अपनी स्वेच्छा से बिना किसी प्रतिबन्ध के कुछ भी करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इससे किसी को स्वतंत्रता नहीं मिलती। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ है, “प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा काम करने की छूट, जिससे दूसरों को हानि न पहुंचे।” समाज में रहते हुए मनुष्य सीमित और नियंत्रित स्वतंत्रता को प्राप्त कर सकता है।

सभी पर न्यायोचित और समान प्रतिबंध होना चाहिए, जिससे स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव नहीं होता, बल्कि ऐसे प्रतिबंधों का अभाव होता है जो अन्यायपूर्ण, असमान तथा अनुचित हों। परंतु स्वतंत्रता केवल नकारात्मक अर्थ ही नहीं रखती, वरन उसका एक सकारात्मक अर्थ भी है। इसका अर्थ केवल अन्यायपूर्ण, अनुचित तथा असमान प्रतिबंधों का अभाव ही नहीं है,

बल्कि उन अवसरों की उपस्थिति भी है जो व्यक्ति को करने योग्य कामों को करने के और भोगने योग्य वस्तुओं को भोगने के योग्य बनाती है। इस प्रकार सकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है “वे परिस्थितियां, जिसमें मनुष्यों को अपने व्यक्तित्व के विकास का और अपने आपको अच्छा बनाने का पर्याप्त अवसर मिलता है।”

(ख) सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थन में तर्क (Arguments in Favour of Positive Liberty):
सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थकों का कहना है कि राज्य के कानून तथा नियम मनुष्यों की स्वतंत्रता का विनाश नहीं करते, बल्कि उसकी स्वतंत्रता में वृद्धि करते हैं। लेकिन जो प्रतिबंध राज्य द्वारा लगाए जाएं, वे जनता की इच्छा को ध्यान में रखते हुए लगाए जाने चाहिएं। यदि वे प्रतिबंध व्यक्ति के कार्यों में किसी प्रकार भी बाधक होंगे तो यह स्वतंत्रता के लिए हानिकारक है।

स्वतंत्रता का सकारात्मक सिद्धांत मनुष्य को उस स्तर तक उठाने से संबंधित है जिस स्तर तक वह अपने मानसिक और नैतिक गुणों का सर्वोत्तम ढंग से उपयोग कर सके। यह सरकार का दायित्व है कि वह नागरिकों को इसके लिए शिक्षित करे और उनके जीवन-स्तर को ऊपर उठाए। इस सिद्धांत के समर्थकों का कहना है कि व्यक्ति क्योंकि स्वयं विचारशील है, उसे स्वयं सोचना चाहिए कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं। लेकिन वास्तव में देखा जाए तो प्रत्येक व्यक्ति अपने हित के अनुसार ही कार्य करता है।

लास्की, लॉक, टी०एच० ग्रीन, मैक्नी, मैकाइवर और गैटेल आदि स्वतंत्रता के सकारात्मक सिद्धांत के प्रमुख समर्थक हैं। उनका कहना है कि स्वतंत्रता केवल बंधनों का अभाव नहीं है। मनुष्य समाज में रहता है और समाज का हित ही उसका हित है। समाज-हित के लिए सामाजिक नियमों तथा आचरणों द्वारा नियंत्रित रहकर व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के अवसर की प्राप्ति ही ब्दों में, “स्वतंत्रता एक सकारात्मक चीज है। इसका मतलब केवल बंधनों का अभाव नहीं है।” लास्की के अनुसार, “स्वतंत्रता से मेरा अभिप्राय उस वातावरण की स्थापना से है, जिसमें मनुष्यों को अपना सर्वोत्तम विकास करने का अवसर मिलता है।”

टी०एच० ग्रीन के अनुसार, “स्वतंत्रता से अभिप्राय प्रतिबंधों का अभाव नहीं है। स्वतंत्रता का सही अर्थ है उन कार्यों को करने या उन सुखों को भोग सकने की क्षमता जो वास्तव में भोगने योग्य हों।” संक्षेप में, सकारात्मक स्वतंत्रता का क्षेत्र नकारात्मक स्वतंत्रता के क्षेत्र से कहीं अधिक विस्तृत तथा व्यापक है। सकारात्मक स्वतंत्रता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव नहीं है। सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थक उचित प्रतिबंधों को स्वीकार करते हैं, परंतु वे अनुचित प्रतिबंधों के विरुद्ध हैं। सामाजिक हित के लिए व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

(2) स्वतंत्रता का अर्थ केवल नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता भी है। आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है आर्थिक सुरक्षा की भावना जिसे राज्य अपने अनेक कानूनों द्वारा उपलब्ध कराएगा।

(3) राज्य का कार्य व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में आने वाली बाधाओं को दूर करना है।

(4) राज्य का कार्य ऐसी परिस्थितियां पैदा करना है जो व्यक्तित्व के विकास में सहायक हों।

(5) स्वतंत्रता और राज्य के कानून परस्पर विरोधी नहीं हैं। कानून स्वतंत्रता को नष्ट नहीं करते बल्कि स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।

(6) स्वतंत्रता का अर्थ उन सामाजिक परिस्थितियों का विद्यमान होना है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में सहायक हों।

(7) स्वतंत्रता अधिकारों के साथ जुड़ी हुई है। जितनी अधिक स्वतंत्रता होगी, उतने ही अधिक अधिकार होंगे। अधिकारों के बिना व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।

प्रश्न 2.
स्वतंत्रता के विभिन्न प्रकार कौन-कौन-से हैं? व्याख्या कीजिए। अथवा स्वतंत्रता का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता को अंग्रेजी में ‘Liberty’ कहते हैं, जो लैटिन भाषा के शब्द ‘Liber’ से निकला है, जिसका अर्थ है “सब प्रतिबंधों का अभाव अर्थात प्रत्येक मनुष्य पर से सब प्रकार के प्रतिबंध हटा दिए जाएं और उसे अपनी इच्छानुसार कार्य करने का अधिकार दे दिया जाए।” परंतु राजनीति विज्ञान में स्वतंत्रता का अर्थ उस हद तक स्वतंत्रता है जिस हद तक वह दूसरों की स्वतंत्रता के मार्ग में बाधा नहीं बनती। यदि व्यक्ति को सभी प्रकार के कार्य करने की स्वतंत्रता दे दी जाए तो समाज में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी।

इसका अर्थ यह होगा कि केवल शक्तिशाली ही अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कर सकेंगे और समाज में एक ही कानून होगा-“जिसकी लाठी उसकी भैंस”। किसी भी व्यक्ति को चोरी करने या दूसरों की हत्या करने की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। अतः स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ है-“प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा कार्य करने की छूट जिससे दूसरों को हानि न पहुंचे।”

परंतु स्वतंत्रता केवल नकारात्मक अर्थ ही नहीं रखती, बल्कि उसका सकारात्मक अर्थ भी है। इस रूप में स्वतंत्रता का अर्थ केवल अन्यायपूर्ण तथा अनुचित प्रतिबंधों का अभाव ही नहीं, बल्कि उन अवसरों की उपस्थिति भी है, जो व्यक्ति को करने योग्य कार्यों को करने और भोगने योग्य वस्तुओं को भोगने का अवसर भी प्रदान करती है। विभिन्न विद्वानों द्वारा स्वतंत्रता की विभिन्न परिभाषाएं और विभिन्न अर्थ बताए गए हैं तथा परिभाषाओं के आधार पर ही स्वतंत्रता के विभिन्न तत्त्वों का उल्लेख किया गया है। अतः उन तत्त्वों के आधार पर स्वतंत्रता के निम्नलिखित विभिन्न रूपों का वर्णन किया जा सकता है

1. प्राकृतिक स्वतंत्रता (Natural Liberty):
प्राकृतिक स्वतंत्रता की कल्पना समझौतावादी विचारकों ने विशेष रूप से की है। प्राकृतिक स्वतंत्रता का ठीक-ठीक अर्थ क्या है, यह कहना कठिन है। रूसो के कथनानुसार, “मनुष्य स्वतंत्र उत्पन्न होता है, किंतु प्रत्येक स्थान पर वह बंधन से बंधा हुआ है।” इसका अर्थ है कि प्रकृति ने व्यक्ति को स्वतंत्र पैदा किया है और यदि उसमें कोई दासता की भावना है, तो वह समाज द्वारा दी गई स्वतंत्रता का परिणाम है।

समाज बनने से पहले व्यक्ति जंगल में रहने वाले पशु-पक्षियों की तरह स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करता था। प्राकृतिक स्वतंत्रता के होने से सब व्यक्ति इच्छानुसार जीवन व्यतीत करते थे और वे किसी कानून या नियम से नहीं बंधे हुए थे। उस समय तेरे-मेरे की भावना नहीं थी, आवश्यकता की वस्तुएं पर्याप्त मात्रा में लोगों को मिल जाया करती थीं, इसलिए मनुष्य प्राकृतिक स्वतंत्रता का उपभोग करता था।

परंतु इस मत से अधिकांश विचारक सहमत नहीं हैं, क्योंकि निरंकुश स्वतंत्रता का अर्थ है कि कोई भी स्वतंत्र नहीं है। प्राकृतिक स्वतंत्रता केवल जंगल की स्वतंत्रता है जो वास्तव में स्वतंत्रता है ही नहीं। सच्चे अर्थ में तो स्वतंत्रता केवल राजनीतिक दृष्टि से संगठित समाज में ही पाई जा सकती है। प्राकृतिक स्वतंत्रता और नागरिक स्वतंत्रता के बीच मौलिक अंतर यह है कि प्राकृतिक स्वतंत्रता व्यक्ति अपनी शारीरिक शक्ति के आधार पर ही प्राप्त करता है, जबकि नागरिक स्वतंत्रता का संरक्षण राज्य करता है। प्राकृतिक स्वतंत्रता बलवानों की वस्तु है, किंतु नागरिक स्वतंत्रता सभी की वस्तु है।

2. नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberty) नागरिक स्वतंत्रता प्राकृतिक स्वतंत्रता से उलट है। जहाँ प्राकृतिक स्वतंत्रता राज्य की स्थापना से पहले मानी जाती है, वहां नागरिक स्वतंत्रता राज्य के द्वारा सुरक्षित मानी जाती है। गैटेल के अनुसार, “नागरिक स्वतंत्रता में वे अधिकार और विशेषाधिकार शामिल हैं जिन्हें राज्य अपनी प्रजा के लिए बनाता और सुरक्षित रखता है। इसका मतलब यह है कि प्रत्येक (व्यक्ति) को कानून की सीमा के अंदर अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने का अधिकार है। इसमें दूसरे लोगों के हस्तक्षेप से रक्षा करना या सरकार के हस्तक्षेप से रक्षा करना शामिल हो सकते हैं।”

इस प्रकार नागरिक स्वतंत्रता उन अधिकारों के समूह का नाम है जो कानून के द्वारा मान लिए गए हों और राज्य जिनको सुरक्षित रखता हो। दूसरे शब्दों में, इसी बात को गिलक्राइस्ट इस प्रकार कहते हैं कि कानून दो प्रकार के होते हैं सार्वजनिक (Public) तथा व्यक्तिगत (Private)। सार्वजनिक कानून स्वतंत्रता की सरकार के हस्तक्षेप से रक्षा करता है। बार्कर के अनुसार, “नागरिक स्वतंत्रता तीन प्रकार की है-

  • शारीरिक स्वतंत्रता,
  • मानसिक स्वतंत्रता और
  • व्यावहारिक स्वतंत्रता।

वह शारीरिक स्वतंत्रता में जीवन, स्वास्थ्य और घूमना-फिरना, मानसिक स्वतंत्रता में विचारों और विश्वासों का प्रकट करना तथा व्यावहारिक स्वतंत्रता में दूसरे व्यक्तियों के साथ संबंधों और समझौतों से संबंधित कार्यों में अपनी इच्छा और छांट आदि को शामिल करता है।”

अमेरिका के संविधान में भी नागरिक स्वतंत्रताओं का उल्लेख मिलता है। संविधान में कहा गया है कि कानून की उचित प्रक्रिया के बिना किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की हद तथा तरीके का आधार सरकार का रूप है। प्रजातंत्र में नागरिक स्वतंत्रता अधिक सुरक्षित होती है, जबकि स्वेच्छाचारी सरकार में इसकी अधिक सुरक्षा नहीं होती।

इससे यह अर्थ नहीं लगा लेना चाहिए । नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन नहीं होता। लोकतंत्र में भी व्यक्तियों पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं, जिनसे नागरिक स्वतंत्रताओं पर रोक लग जाती है, जैसे भारत के संविधान में विभिन्न स्वतंत्रताएं प्रदान की गई हैं। इसके साथ संविधान में ही निवारक नजरबंदी कानून, भारत सुरक्षा अधिनियम, आंतरिक सुरक्षा कानून आदि के द्वारा समाज व राष्ट्र की सुरक्षा का बहाना लेकर नागरिक स्वतंत्रताओं पर रोक लगा दी गई है।

अतः नागरिक स्वतंत्रता का बहुत अधिक महत्त्व है। इस स्वतंत्रता के आधार पर ही देश की उन्नति व विकास का अनुमान लगाया जा सकता है। जिस देश में नागरिक स्वतंत्रता जितनी अधिक होगी, वह देश उतना ही विकासशील होगा।

3. आर्थिक स्वतंत्रता (Economic Liberty):
प्रजातंत्र तभी वास्तविक हो सकता है जब राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता भी हो। लेनिन के शब्दों में, “नागरिक स्वतंत्रता आर्थिक स्वतंत्रता के बिना निरर्थक है।” आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ वह नहीं, जिसे पूंजीवादी मुक्त प्रतिद्वंद्विता (Free Competition) कहते हैं वरन इसका अर्थ शोषण का अभाव और मालिक के अत्याचार से मुक्ति है।

प्रो० लास्की के अनुसार, “आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ मनुष्य को अपना दैनिक भोजन कमाते हुए युक्तियुक्त रूप में सुरक्षा व अवसर प्राप्त होना है।” प्रत्येक नागरिक को बेकारी और अभाव के भय से स्वतंत्र बनाया जाना ही सच्ची स्वतंत्रता है। आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त कराने के लिए ऐसी आर्थिक व्यवस्था स्थापित की जाए जिसमें व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अन्य व्यक्तियों के अधीन न रहे।

सब व्यक्तियों को अपनी आर्थिक उन्नति करने का समान अवसर प्राप्त हो। यदि इसके लिए राज्य को व्यक्ति के आर्थिक क्षेत्र में हस्तक्षेप भी करना पड़े तो उसे करना चाहिए। आर्थिक स्वतंत्रता का यह विचार उस आर्थिक व्यवस्था की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ है, जिसमें पूंजीपति श्रमिकों का मनमाना शोषण करते थे और उनकी मजदूरी का एक बड़ा भाग स्वयं हड़प करके धनी बन जाते थे।

इसलिए जिस प्रकार राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक शक्ति को कुछ लोगों के हाथों से निकालकर जनता के हाथों में सौंपा गया, उसी प्रकार आर्थिक शक्ति भी थोड़े-से पूंजीपतियों के हाथों से निकालकर जन-साधारण को दी जानी चाहिए। इसके लिए एक ओर मजदूरों के कुछ आर्थिक अधिकार हों; जैसे काम पाने,

उचित घंटे काम करने, उचित मजदूरी पाने, अवकाश पाने, बेकारी, बीमारी, बुढ़ापे और दुर्घटना की अवस्था में सहायता व सुरक्षा पाने तथा मजदूर संघ बनाकर अपने हितों की रक्षा करने के अधिकार तो दूसरी ओर मजदूरों को उद्योग-धंधों के प्रबंध में भागीदार बनाया जाना चाहिए। समाजवादी विचारक भी इसी बात पर बल देते हैं कि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता व्यर्थ है।

4. राष्ट्रीय स्वतंत्रता (National Liberty):
राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अर्थ है-विदेशी नियंत्रण से स्वतंत्रता। जनता की राजनीतिक तथा नागरिक स्वतंत्रता तभी संभव है जब राष्ट्र स्वयं पूर्ण रूप से प्रभुसत्ता-संपन्न राज्य हो। साम्राज्यवादी देश के अधीन रहने पर विदेशी सत्ता जनता को अपनी सरकार बनाने या शासन में हिस्सा लेने का मौका नहीं देती तथा शासन के अत्याचारों के विरुद्ध जनता को भाषण, संगठन, प्रकाशन आदि तक नहीं करने देती।

राष्ट्रीय स्वतंत्रता साम्राज्यवाद को नष्ट करना चाहती है। व्यक्ति का पूर्ण विकास एक स्वतंत्र राष्ट्र में ही हो सकता है। इसलिए व्यक्ति की उन्नति के लिए राष्ट्रीय स्वतंत्रता आवश्यक है। भारत ने 15 अगस्त, 1947 को राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त की। तभी से जनता को वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव होने लगा।

5. व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Individual Liberty):
व्यक्तिगत स्वतंत्रता से अभिप्राय उन कार्यों को करने की स्वतंत्रता है जो व्यक्ति के अपने निजी जीवन से संबंधित हों। कुछ मामले ऐसे हैं जो व्यक्ति के निजी जीवन से संबंधित होते हैं। ऐसे कार्यों में कोई भी व्यक्ति दूसरे का हस्तक्षेप सहन नहीं करता, यहाँ तक कि निजी संबंधियों का भी हस्तक्षेप सहन नहीं किया जाता।

अपने निजी मामलों में प्राप्त स्वतंत्रता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता कहते हैं, जैसे वस्त्र, रहन-सहन, पारिवारिक जीवन, विवाह-संबंध आदि। मिल का कहना है, “प्रत्येक व्यक्ति के कुछ कार्य ऐसे हैं जिनका दूसरों पर प्रभाव नहीं पड़ता और इन मामलों में उसे पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी आवश्यक है, परंतु वास्तव में व्यक्ति का ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिसका प्रभाव केवल उसी तक सीमित हो, दूसरों पर भी उसका कुछ-न-कुछ प्रभाव अवश्य पड़ता है।

व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में भी सामाजिक हित, कानून और व्यवस्था, नैतिकता, राष्ट्र की सुरक्षा आदि के आधार पर कुछ अंकुश लगाए जाते हैं। निरंकुशता या पूर्ण स्वतंत्रता जैसी कोई बात समाज में नहीं हो सकती।”

6. राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty):
राजनीतिक स्वतंत्रता व्यक्ति के राजनीतिक जीवन को उन्नत और विकसित करने के लिए आवश्यक है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को जो राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं, उनका यह स्वतंत्रतापूर्वक प्रयोग करे, वह कानून-निर्माण तथा प्रशासन में भाग ले। लास्की ने कहा है, “राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ राज्य के कार्यों में सक्रिय भाग लेने की शक्ति से है।

यह स्वतंत्रता केवल लोकतंत्र में ही संभव है, राजतंत्र और तानाशाही में नहीं। प्रतिनिधियों को चुनने के लिए मतदान की स्वतंत्रता, चुनाव लड़ने की स्वतंत्रता, सार्वजनिक पद प्राप्त करने की स्वतंत्रता, सरकार की आलोचना करने की स्वतंत्रता केवल लोकतंत्र में ही मिलती है। अधिनायकतंत्र में यह स्वतंत्रता लोगों को प्राप्त नहीं होती।

लीकॉक महोदय ने राजनीतिक स्वतंत्रता को संवैधानिक स्वतंत्रता का नाम दिया है और कहा है कि जनता को अपनी सरकार स्वयं चुनने का अधिकार दिया जाना चाहिए। इस प्रकार राजनीतिक स्वतंत्रता के अंतर्गत केवल सरकार के कार्यों में भाग लेने का अधिकार नहीं है, बल्कि सरकार का विरोध करना भी इसके अंतर्गत आता है।

राजनीतिक दलों का निर्माण करना व उनकी सदस्यता ग्रहण करना इस स्वतंत्रता में आते हैं। इस प्रकार की स्वतंत्रता साम्यवादी राज्यों में प्रदान नहीं की जाती है। अंत में इस प्रकार की स्वतंत्रता को सीमित तो किया जा सकता है, लेकिन पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए राजनीतिक क्षेत्र में उसे अधिकार देना अत्यंत आवश्यक है।

7. धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Liberty):
धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके विश्वास के अनुसार किसी धर्म को मानने, पूजा-पाठ करने व धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसलिए व्यक्ति अपने धर्म में किसी दूसरे व्यक्ति या राज्य के हस्तक्षेप को सहन नहीं करता। आधुनिक युग में अधिकांश देशों ने अपने नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान किया है।

जिन देशों में विभिन्न संप्रदायों के लोग निवास करते हैं, वहां धार्मिक स्वतंत्रता का महत्त्व और भी अधिक होता है। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देने से अल्पसंख्यकों में देश के शासन के प्रति विश्वास बना रहता है और राज्य में स्थिरता आती है। भारत ने इसी भावना के अनुसार धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाया है। भारतीय संविधान में धारा 25 से 28 तक प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है और यह भी स्पष्ट किया गया है कि राज्य धर्म के आधार पर नागरिकों में कोई मतभेद नहीं करेगा। राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है।

8. नैतिक स्वतंत्रता (Moral Liberty):
स्वतंत्रता केवल बाह्य परिस्थितियों द्वारा ही प्रदान नहीं की जा सकती। यह एक मनोवैज्ञानिक भावना है जिसे मनुष्य अनुभव करता है। व्यक्ति केवल तभी पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो सकता है, जब वह नैतिक रूप से भी स्वतंत्र हो। नैतिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी बुद्धि व विवेक के अनुसार तथा अन्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व को सम्मान प्रदान करते हुए निर्णय ले सके तथा कार्य कर सके।

आदर्शवादी राजनीतिक विचारकों ने नैतिक स्वतंत्रता पर विशेष बल दिया है। हीगल (Hegel), ग्रीन (Green) व बोसांके (Bosanquet) के अनुसार, “नैतिक स्वतंत्रता केवल राज्य में ही प्राप्त की जा सकती है। राज्य उन परिस्थितियों का निर्माण करता है, जिनमें रहकर मनुष्य नैतिक उन्नति कर सकता है और नैतिक रूप से स्वतंत्र हो सकता है।”

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 स्वतंत्रता

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मुख्य उपायों का वर्णन कीजिए।
अथवा
किसी व्यक्ति द्वारा स्वतंत्रता के उपभोग की आवश्यक दो दशाएं बताइए। अथवा स्वतंत्रता के मुख्य सरंक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर:
स्वतंत्रता व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए अति आवश्यक है। स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं वरन व्यक्ति के विकास के लिए उचित परिस्थितियों का रहना है, इसलिए स्वतंत्रता में वे अधिकार तथा परिस्थितियां शामिल हैं, जिनसे मनुष्य को अपने व्यक्तित्व के विकास में सहायता मिलती है। राज्य उन अधिकारों को सुरक्षित रखता है।

इसके लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे न तो सरकार और न ही लोग किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता को नष्ट कर सकें। इसलिए निम्नलिखित साधन स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए अपनाए जाते हैं स्वतंत्रता के संरक्षण (Safeguard of Liberty) स्वतंत्रता के संरक्षण निम्नलिखित हैं

1. प्रजातंत्र की स्थापना (Establishment of Democracy):
लोगों की स्वतंत्रता पर सरकार के रूप का भी प्रभाव पड़ता है। जहाँ राजतंत्र या कुलीनतंत्र होता है, वहां स्वेच्छाचारिता की अधिक संभावना होती है। प्रजातंत्र में सभी लोगों का प्रतिनिधित्व होता है, इसलिए जिन लोगों के अधिकारों पर आक्षेप होता है, उनके प्रतिनिधि विशेष रूप से और सांसद आम तौर से उनके लिए लड़ते हैं।

आम लोग भी ऐसे अवसरों पर भाषण और प्रैस आदि की स्वतंत्रताओं का लाभ उठा सकते हैं तथा स्वतंत्र न्यायालय फैसले में उनकी सहायता कर सकता है। वास्तव में, स्वतंत्रता के दूसरे रक्षा कवच; जैसे प्रैस, पक्षपात रहित न्यायालय, अधिकारों का संवैधानीकरण, मजबूत विरोधी दल, कानून का शासन आदि प्रजातंत्र में ही जीवित रह सकते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए प्रजातांत्रिक सरकार होनी चाहिए।

2. जागरूकता तथा शिक्षा (Vigilance and Education):
स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए लोगों का जागरूक रहना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए कहा जाता है, “शाश्वत-जागरूकता स्वतंत्रता की कीमत है।” (Eternal vigilance is the price of Liberty.) स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए लोगों को हमेशा देखते रहना चाहिए कि सरकार, कोई संघ या कोई व्यक्ति उनकी स्वतंत्रता पर आक्षेप तो नहीं कर रहा है।

यदि आक्षेप होता है तो तुरंत उसका विरोध करना चाहिए। जागरूकता के लिए और अधिकारों के ज्ञान की प्राप्ति के लिए तथा उन्हें सुरक्षित रखने के ढंग को जानने के लिए शिक्षा अनिवार्य है, क्योंकि अशिक्षित आदमी , अपने अधिकारों को और उन्हें सुरक्षित रखने के ढंग को नहीं समझ सकता है।

3. मौलिक अधिकारों की घोषणा (Declaration of Fundamental Rights):
जनता को स्वतंत्रता प्रदान करने वाले नागरिक तथा राजनीतिक अधिकारों को संविधान में मौलिक अधिकारों के रूप में घोषित कर दिया जाना चाहिए। इससे उनकी स्थायी सुरक्षा हो जाती है और उनका उल्लंघन सुगमता से नहीं किया जा सकता।

इस प्रकार स्वतंत्रता देश के संविधान द्वारा सुरक्षित कर दी जाती है। वह सरकार द्वारा छीनी भी नहीं जा सकती, क्योंकि वह उनकी पहुंच से बाहर हो जाती है।

4. न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary):
किसी भी देश के लोगों की स्वतंत्रता तब तक सुरक्षित नहीं रह सकती, जब तक कि न्यायालय स्वतंत्र न हों। कानून चाहे कितने ही अच्छे हों, परंतु उनसे स्वतंत्रता की रक्षा तब तक नहीं हो सकती, जब तक कि उन कानूनों को लागू करने वाले न्यायधीश स्वतंत्र, ईमानदार, निडर तथा निष्पक्ष न हों।

न्यायधीशों पर न तो कार्यपालिका का और न ही विधानमंडल का दबाव होना चाहिए, तब ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता व अधिकारों को अधिकारियों के दबाव से या लोगों से सुरक्षित रख सकते हैं। इसलिए यह कहा जाता है कि वैयक्तिक स्वतंत्रता बहुत कुछ उस पद्धति पर निर्भर है, जिसके द्वारा न्याय किया जाता है।

5. शक्ति का पृथक्करण (Separation of Powers):
न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए शक्ति का पृथक्करण (Separation of Power) आवश्यक है। शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत का प्रतिपादन माण्टेस्क्यू ने किया। उसने सरकार के तीनों अंगों के अलग होने पर बल डाला है। न्यायालय तभी स्वतंत्र रह सकते हैं जबकि राज्य में शासन-सत्ता को अलग-अलग अंगों में विभाजित कर दिया जाए अर्थात कानून बनाने वाली, शासन करने वाली तथा न्याय करने वाली संस्थाएं अलग-अलग संगठित हों तथा उनका एक-दूसरे पर कोई दबाव या प्रभाव न हो। इससे जनता की स्वतंत्रता की गारंटी मिल जाती है।

6. शक्ति का विकेंद्रीयकरण (Decentralization of Authority):
स्वतंत्रता की सुरक्षा का एक अन्य उपाय सत्ता का विकेंद्रीयकरण है। जहाँ भी शासन-सत्ता केंद्रित की जाती है, वहां तानाशाही व अनुत्तरदायी शासन स्थापित हो जाता है। अतः राज्य में स्वायत्त-शासन संस्थाओं को अधिक-से-अधिक सत्ताएं सौंपी जाएं। इससे जनता भी राजनीतिक शिक्षा प्राप्त करती है। स्थानीय संस्थाएं राष्ट्रीय-स्वशासन की पाठशालाएं कहलाती हैं।

इस संदर्भ में लास्की ने विचार व्यक्त किया हैं, “राज्य में शक्तियों का जितना अधिक वितरण होगा, उसकी प्रकृति उतनी अधिक विकेंद्रित होगी और व्यक्तियों में अपनी स्वतंत्रता के लिए उतना ही अधिक उत्साह होगा।” इसी प्रकार डॉ० टॉक्विल ने भी कहा है, “किसी भी राष्ट्र में स्वतंत्र सरकार स्थापित की जा सकती है, लेकिन स्वशासन की संस्थाओं के बिना लोगों में स्वतंत्रता की भावना विकसित नहीं हो सकती है।”

7. आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय (Economic Equality and Social Justice):
यह बिल्कुल उचित कहा गया है कि स्वतंत्रता आर्थिक समानता के बिना बिल्कुल व्यर्थ है (Liberty without Economic Equality is a farce)। स्वतंत्रता, वास्तविकता में साधन है, साध्य नहीं। स्वतंत्रता की आवश्यकता व्यक्तित्व के विकास और समान अवसरों के उपभोग के लिए पड़ती है, ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपना जीवन प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत कर सके और अपने विचारानुसार जीवन के ध्येय की प्राप्ति कर सके।

परंतु यह सब आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय के बिना संभव नहीं, क्योंकि सभी अधिकारों से पूरा लाभ उठाने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है और समाज के भेदभाव भी उसमें बाधक सिद्ध हो सकते हैं। इस तरह के तत्त्व एक देश में होने से वहां के लोगों की स्वतंत्रता पूरी तरह से सुरक्षित रह सकती है। प्रत्येक देश में इन सारे तत्त्वों का होना आवश्यक नहीं है। सरकार के रूप के अनुसार इनमें थोड़ा-बहुत भेद हो सकता है, परंतु इनमें से अधिकतर प्रत्येक देश में होने चाहिएं।

8. कानून (Law) कानून भी स्वतंत्रता की सुरक्षा में बहुत अधिक सहायता करता है हालांकि कभी-कभी कानून स्वतंत्रता का विरोध भी करता है परंतु साधारणतः यह स्वतंत्रता को सुरक्षित ही रखता है। समान स्वतंत्रता कानून के बिना असंभव है। कानून अधिकारों को सरकार तथा दूसरे लोगों के आक्षेप से बचाता है। जो लोग दूसरे लोगों के अधिकारों को छीनने के लिए कानून को तोड़ते हैं, उन पर मुकद्दमे चलाए जाते हैं और न्यायपालिका उन्हें दंड देती है। जो कानून स्वतंत्रता को सुरक्षित नहीं रखता और असमानता फैलाता है, वह अच्छा नहीं समझा जाता और कई बार ऐसे कानूनों का विरोध किया जाता है।

आधुनिककाल में ‘कानून का शासन’ (Rule of Law) सबसे अच्छा समझा जाता है। कानून के सामने सब समान होने चाहिएँ और सब लोगों पर, साधारण व्यक्ति से लेकर प्रधानमंत्री तक एक ही कानून लागू होना चाहिए। किसी व्यक्ति या वर्ग को कोई विशेषाधिकार (Privileges) नहीं दिए जाने चाहिएं। कानून के शासन का यह भी अर्थ है कि किसी व्यक्ति को बिना कानून तोड़े हुए दंड नहीं दिया जाना चाहिए।

9. सशक्त विरोधी दल (Strong Opposition Party):
स्वतंत्रता की सुरक्षा में विरोधी दल का भी बड़ा भारी हाथ होता है। जब कभी भी शासक दल लोगों के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है, उसी समय विरोधी दल संसद में तथा संसद से बाहर उसकी आलोचना करता है। आलोचना से सरकार को भी जनमत के खिलाफ होने का भय रहता है। यदि विरोधी दल मज़बूत है तो शासक दल को आने वाले निर्वाचनों में हार जाने का भय हो सकता है। इस प्रकार मज़बूत विरोधी दल स्वतंत्रता की सुरक्षा में सहायक सिद्ध होता है।

10. स्वतंत्र प्रैस (Free Press):
स्वतंत्र प्रैस भी लोगों की स्वतंत्रताओं को सुरक्षित रखने के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। यदि प्रैस के ऊपर कोई दबाव और अनुचित नियंत्रण नहीं है तो प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों को स्वतंत्रता-पूर्वक प्रकट कर सकता है। यदि कभी किसी व्यक्ति या संघ के अधिकारों पर कोई आक्षेप होता है तो प्रैस उस मामले के सत्य को प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचा सकता है।

जनमत बनाने में भी स्वतन्त्र प्रैस की अहम भूमिका होती है। स्वतंत्र प्रेस से सरकार भी डरती है जिसके कारण वह कोई ऐसा कार्य नहीं करती जिससे लोगों के अधिकारों को कोई ठेस पहुंचे। प्रैस की स्वतंत्रता में प्रेस सरकार के तथा धनी लोगों के अनुचित प्रभाव से मुक्त होनी चाहिए तथा प्रैस को भी रंग, जाति, धर्म तथा भाषा आदि के आधार पर कोई पक्षपात नहीं करना चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion)-दी गई चर्चा से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए रक्षा कवचों का होना अनिवार्य है। स्वतंत्रता की रक्षा पर लोकतंत्र का भविष्य निर्भर करता है। लोकतंत्र ऐसी शासन व्यवस्था है जो लोगों को जागरूक व कर्त्तव्यपरायण बनाती है। लोगों की कर्त्तव्यपरायणता और जागरूकता पर स्वतंत्रता की सुरक्षा हो सकती है। ऐसा होने से शासक वर्ग व्यक्तियों की स्वतंत्रता का अपहरण करने का दुःसाहस नहीं कर सकेंगे।

प्रश्न 4.
कानून व स्वतंत्रता के आपसी संबंधों की विवेचना कीजिए। अथवा कानून और स्वतंत्रता में क्या संबंध है?
उत्तर:
स्वतंत्रता और कानून के संबंधों का विषय इतना महत्त्वपूर्ण है कि अनेक विद्वानों का ध्यान इसकी ओर आकर्षित हुआ है। विद्वानों ने स्वतंत्रता और कानून के संबंध के विषय में दो दृष्टिकोण व्यक्त किए हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है

(क) स्वतंत्रता और कानून परस्पर विरोधी हैं (Liberty and Law opposed to each other):
पहले दृष्टिकोण के अनुसार मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति कानून व स्वतंत्रता को एक-दूसरे का विरोधी मानती है। 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में अधिकांश राजनीतिक विचारक यह मत रखते हैं कि स्वतंत्रता और कानून में परस्पर विरोध है। अराजकतावादियों तथा व्यक्तिवादियों का यह भी मत रहा है कि स्वतंत्रता और कानून एक-दूसरे के विरोधी हैं।

जितने अधिक कानून होंगे, उतनी कम स्वतंत्रता होगी। राज्य का कार्य-क्षेत्र इतना व्यापक है कि मनुष्य को हर कदम पर कानून रोकता है। इससे व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है और उसका काम करने का उत्साह मारा जाता है। इसलिए इनका मत है कि कानून स्वतंत्रता का विरोधी है। इस संबंध में विलियम गोडविन (Villiam Godwin) ने कहा है, “कानून स्वतंत्रता के लिए सबसे अधिक हानिकारक संस्था है।” इसी प्रकार कोकर (Coker) का भी यही विचार है, “राजनीतिक सत्ता अनावश्यक तथा अवांछनीय है।” इन विचारकों के मत निम्नलिखित हैं

1. व्यक्तिवादियों का मत (View of Individualists):
18वीं शताब्दी में व्यक्तिवादियों ने व्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर कि राज्य के कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक प्रतिबंध है, इसलिए व्यक्ति की स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब राज्य अपनी सत्ता का प्रयोग कम-से-कम करे, अर्थात उनके मतानुसार, “वह सरकार अच्छी है जो कम-से-कम शासन या कार्य करती है।” इसी प्रकार जे०एस० मिल (J.S. Mill) ने भी कहा है, “सरकार का हस्तक्षेप व्यक्ति के शारीरिक अथवा मानसिक विकास के कुछ-न-कुछ भाग को अवरुद्ध कर देता है।”

2. अराजकतावादियों का मत (View of Anarchists):
अराजकतावादियों के अनुसार राज्य प्रभुसत्ता का प्रयोग करके नागरिकों की स्वतंत्रता को नष्ट करता है, अतः अराजकतावादियों ने राज्य को समाप्त करने पर जोर दिया ताकि राज्य-विहीन समाज की स्थापना की जा सके। इसी संदर्भ में अराजकतावादी प्रोधा (Prondha) ने विचार व्यक्त किया है, “मनुष्य पर मनुष्य का किसी भी रूप में शासन अत्याचार है।”

3. सिंडीकलिस्ट का मत (View of Syndicalists):
सिंडीकलिस्ट अराजकतावादियों की तरह राज्य को पूर्णतः समाप्त करना चाहते हैं, क्योंकि उनके मतानुसार राज्य सदैव पूंजीपतियों का समर्थन करता है जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इस प्रकार सिंडीकलिस्ट राज्य और सरकार को समाप्त करके उसके स्थान पर श्रमिक संघों का शासन स्थापित करने के पक्ष में हैं। श्रमिक संघों की व्यवस्था में व्यक्तियों की स्वतंत्रता अधिक सुरक्षित रहती है।

4. बहुत्ववादियों का मत (View of Pluralists):
बहुत्ववादियों का विचार है कि राज्य के पास जितनी अधिक सत्ता होती है, उससे व्यक्ति की स्वतंत्रता उतनी ही कम होती है, इसलिए वे राज्य सत्ता को विभिन्न समुदायों में बांटने के पक्ष में हैं। इस प्रकार बहुत्ववादी राज्य को भी एक संस्था मानते हैं और उसे अन्य संस्थाओं से अधिक शक्ति देने के पक्ष में नहीं हैं। अगर राज्य को अधिक शक्ति दी गई तो उससे व्यक्ति की स्वतंत्रता नष्ट हो जाएगी। इस विचार का समर्थन करते हुए लास्की (Laski) महोदय ने कहा है, “असीमित और अनत्तरदायी राज्य मानवता के हितों के विरुद्ध है।”

(ख) स्वतंत्रता और कानून एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं (Liberty and Law are not opposed to Each Other) स्वतंत्रता और कानून को एक-दूसरे का विरोधी होने का विचार ऐसे लेखकों ने दिया जो स्वतंत्रता के नकारात्मक पक्ष में विश्वास रखते थे। यह विचार उस समय व्यक्त किया गया जिस समय तानाशाही प्रवृत्तियां पूरे जोर पर थीं, परंतु जैसे-जैसे लोकतंत्रात्मक प्रवृत्तियां सामने आईं तो राजनीतिक विचारकों ने यह स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया कि कानून और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।

अतः स्वतंत्रता और कानून के संबंध के विषय में दूसरा दृष्टिकोण यह है कि ये दोनों एक-दूसरे के विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का अस्तित्व दूसरे के बिना खतरे में पड़ जाएगा। इस दृष्टिकोण के समर्थक समाजवादी और आदर्शवादी हैं। इन विचारकों का कहना है कि कानून स्वतंत्रता का हनन नहीं करता, बल्कि उसकी रक्षा करता है।

इसलिए लॉक (Locke) महोदय ने ठीक ही कहा है, “जहाँ कानून नहीं है, वहां स्वतंत्रता नहीं है।” हॉकिंस (Hockins) ने भी लिखा है, “व्यक्ति जितनी अधिक स्वतंत्रता चाहता है, उतना ही उसे सत्ता के आगे झुकना पड़ता है।” इस दृष्टिकोण का विस्तारपूर्वक वर्णन निम्नलिखित है

1. कानून स्वतंत्रता का रक्षक है (Law safeguards Liberty):
अराजकतावादियों तथा अन्य विचारकों का मत सही नहीं है। कानून स्वतंत्रता का विरोधी तभी दिखाई देता है, जब स्वतंत्रता का अर्थ ही स्वेच्छाचारिता लगाया जाता है। स्वतंत्रता को जब मनमाना काम करने की छूट समझ लिया जाता है, तब बुरे कामों की रुकावट के लिए जो कानून नज़र आते हैं, वे विरोधी ही कहलाएंगे।

व्यक्ति को जब कानून चोरी-डकैती, लूटमार, जुआ, शराबखोरी नहीं करने देता तो ऐसे व्यक्ति कानून को उनकी स्वतंत्रता का बाधक समझेंगे ही, परंतु भले-मानसों की सुरक्षा तथा उनकी सुविधा के लिए ऐसे कानून बनाना राज्य के लिए जरूरी है। यह व्यक्ति के हित में होता है कि मनमाने काम करने की स्वतंत्रता पर सीमाएं लगाई जाएं, नहीं तो व्यक्ति एक-दूसरे के दायरे में कदम आघात करेंगे। इसलिए स्वतंत्रता का अर्थ सभी के लिए सीमित स्वाधीनता है।

अपने दायरे में रहकर अपना विकास करना ही स्वतंत्रता है, जिसका अभिप्राय है कि सब पर कुछ प्रतिबंध लगाए जाएं, जिससे वे एक-दूसरे की स्वतंत्रता न छीन सकें। ऐसे प्रतिबंध किसी व्यक्ति या संस्था के निजी प्रतिबंध नहीं हो सकते। यह कार्य तो राज्य ही अपनी शक्ति द्वारा कर सकता है। राज्य अपनी सत्ता कानून द्वारा प्रदर्शित करता है, इसलिए कानून सबकी स्वतंत्रता के लिए आवश्यक होते हैं। कानून स्वतंत्रता के विरोधी नहीं, बल्कि उसकी पहली शर्त होते हैं। वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं।

इसलिए लॉक (Locke) ने कहा था, “जहाँ कानून नहीं होते, वहां स्वतंत्रता नहीं होती।” जब तक हम कानून को बाहरी बंधन के रूप में मानते हैं तब तक उसके प्रति विरोध और असंतोष रहता उसे उचित समझकर अपनी अंतरात्मा से उसे स्वीकार कर लें तो वह स्वतंत्रता का सहायक नज़र आता है। जैसे रूसो ने कहा है, “उस कानून का पालन, जिसे हम अपने लिए बनाते हैं, स्वतंत्रता कहलाता है।”

2. कानून स्वतंत्रता की पहली शर्त है (Law is the first condition of Liberty):
जो विचारक स्वतंत्रता का सकारात्मक अर्थ स्वीकार करते हैं और स्वतंत्रता पर उचित बंधनों को आवश्यक मानते हैं, वे कानून को स्वतंत्रता की सुरक्षा की पहली शर्त समझते हैं और सत्ता को आवश्यक मानते हैं। हॉब्स, जो निरंकुशतावादी (Absolutist) माना जाता है, स्वीकार करता है कि कानून के अभाव में व्यक्ति हिंसक पशु बन जाता है।

अतः सत्ता व कानून का होना आवश्यक है, ताकि व्यक्ति स्वतंत्रतापूर्वक जीवन बिता सके। मॉण्टेस्क्यू (Montesquieu) ने स्वतंत्रता की परिभाषा करते हुए कहा है, “स्वतंत्रता वे सभी कार्य करने का अधिकार है, जिनको करने की अनुमति कानून देता है।” रूसो (Rousseau) ने सामान्य इच्छा (General Will) को मानने को ही वास्तविक स्वतंत्रता कहा है। विलोबी (Willoughby) के अनुसार, “स्वतंत्रता केवल वहीं सुरक्षित है, जहाँ बंधन हैं।”

रिचि (Ritchie) के स-विकास के सुअवसर के रूप में स्वतंत्रता को संभव बनाते हैं और सत्ता के अभाव में इस प्रकार की स्वतंत्रता संभव नहीं हो सकती।” स्वतंत्रता की प्रकृति में ही प्रतिबंध हैं और प्रतिबंध इसलिए आवश्यक हैं ताकि प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर व सुविधाएं प्राप्त हो सकें और एक व्यक्ति की स्वतंत्रता किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता या सामाजिक हित में बाधक न बन सके।

स्वतंत्रता को वास्तविक रूप देने के लिए आवश्यक है कि उसे सीमित किया जाए। समाज में रहते हुए शांतिमय जीवन व्यतीत करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति के व्यवहार पर कुछ नियंत्रण लगाए जाएं। नियंत्रणों से मर्यादित व्यक्ति ही अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सकता है और समाज की एक लाभदायक इकाई सिद्ध हो सकता है। अरस्तू (Aristotle) ने ठीक ही कहा है, “मनुष्य अपनी पूर्णता में सभी प्राणियों से श्रेष्ठ है, लेकिन जब वह कानून व न्याय से पृथक हो जाता है तब वह सबसे निकृष्ट प्राणी बन जाता है।”

3. आदर्शवादियों के विचार (View of Idealist) आदर्शवादी (Idealist) विचारकों ने कानून व स्वतंत्रता में घनिष्ठ संबंध स्वीकार किया है और इनके अनुसार स्वतंत्रता न केवल कानून द्वारा सुरक्षित है, अपितु कानून की देन है। हीगल (Hegel) के अनुसार, “राज्य में रहते हुए कानून के पालन में ही स्वतंत्रता निहित है।” हीगल ने राज्य को सामाजिक नैतिकता की साक्षात मूर्ति कहा है और कानून चूंकि राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति है। अतः नैतिक रूप से भी व्यक्ति की स्वतंत्रता कानून के पालन में ही निहित है।

टी०एच० ग्रीन (T.H. Green) के अनुसार, “हमारे अधिकांश कानून हमारी सामाजिक स्वतंत्रता को कम करते हैं, परंतु इनका उद्देश्य ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना है जिनके अंतर्गत व्यक्ति अपने गुणों का पूर्ण विकास कर सकता है।” स्पष्ट है कि स्वतंत्रता व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है और व्यक्तित्व का विकास कानून के पालन द्वारा ही हो सकता है। रूसो ने भी कहा है, “ऐसे कानून का पालन, जो हम स्वयं अपने लिए निश्चित करते हैं, वही स्वतंत्रता है।”

4. क्या प्रत्येक कानून स्वतंत्रता का रक्षक है? (Does every law protect the Liberty?)-प्रत्येक कानून स्वतंत्रता की रक्षा नहीं करता। कई बार ऐसे कानूनों का निर्माण किया जाता है जो शासकों के हित में होते हैं, न कि समस्त जनता के हित में। ब्रिटिश साम्राज्य के समय भारत में कई बार ऐसे कानूनों का निर्माण किया गया था, जिनका उद्देश्य भारतीयों की स्वतंत्रता को नष्ट करना होता था।

तानाशाही राज्य में ऐसे कानूनों का निर्माण किया जाता है। नागरिकों को उन कानूनों का पालन करना चाहिए जो नैतिकता पर आधारित हों तथा समाज के हित में हों। परंतु नागरिकों को शांतिपूर्वक उन कानूनों का विरोध करना चाहिए जो उनकी स्वतंत्रता को नष्ट करने के लिए पास किए गए हों।

निष्कर्ष (Conclusion) दिए गए विवरण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि कानून स्वतंत्रता का विरोधी है या सहयोगी, यह परिस्थितियों पर निर्भर है। यदि कानून जनता के हित को ध्यान में रखकर बनाया जाता है तो वह स्वतंत्रता का सहयोगी होता है और स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है परंतु जब कानून थोड़े-से लोगों के हित को ध्यान में रखकर बनाए जाएं अथवा शासकों के हित में बनाए जाएं तो ऐसे कानून स्वतंत्रता के विरोधी होते हैं। स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रजातंत्र की स्थापना सर्वोत्तम साधन है, क्योंकि प्रजातंत्र में जनता स्वयं ही शासक और शासित होती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. लेटिन भाषा के लिबर (Liber) शब्द का शाब्दिक अर्थ निम्नलिखित में से है
(A) बंधनों का अंकुश
(B) बंधनों से मुक्ति
(C) प्रतिबंधों की उपस्थिति
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(B) बंधनों से मुक्ति

2. “जिस तरह बदसूरती का न होना स्वतंत्रता नहीं है, उसी तरह बंधनों का होना स्वतंत्रता नहीं है।” यह कथन किस विद्वान का है?
(A) बार्कर
(B) लास्की
(C) हरबर्ट स्पेंसर
(D) ग्रीन
उत्तर:
(A) बार्कर

3. नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ निम्नलिखित में से है
(A) स्व-कार्यों में पूर्ण स्वतंत्रता
(B) व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध के कारण कानून एक बुराई है
(C) सरकार का सीमित कार्यक्षेत्र
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

4. सकारात्मक स्वतंत्रता की विशेषता निम्नलिखित में से है
(A) अनुचित प्रतिबंधों के विरुद्ध जबकि उचित प्रतिबंधों का समर्थन
(B) कानून स्वतंत्रता को नष्ट नहीं बल्कि रक्षा करते हैं
(C) स्वतंत्रता अधिकारों के साथ जुड़ी हुई है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, परंतु प्रत्येक स्थान पर वह बंधन में बंधा हुआ है।” यह कथन निम्न में से है
(A) रूसो
(B) हॉब्स
(C) लॉक
(D) मिल
उत्तर:
(A) रूसो

6. राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अर्थ निम्न में से है
(A) एक राष्ट्र को विदेशी नियंत्रण से पूर्णतः स्वतंत्रता का प्राप्त होना
(B) एक राष्ट्र की विदेश नीति पर अन्य राष्ट्र का नियंत्रण होना
(C) एक राष्ट्र के आंतरिक मामलों में अन्य राष्ट्रों का हस्तक्षेप न होना
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(A) एक राष्ट्र को विदेशी नियंत्रण से पूर्णतः स्वतंत्रता का प्राप्त होना

7. निम्नलिखित में से स्वतंत्रता का संरक्षण माना जाता है
(A) कानून का शासन
(B) मौलिक अधिकारों की संवैधानिक व्यवस्था
(C) स्वतंत्र प्रेस
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

8. स्वतंत्रता की सुरक्षा हेतु निम्नलिखित उपाय उपयुक्त नहीं है
(A) निरंकुशतंत्र की स्थापना
(B) सशक्त विरोधी सत्तापक्ष
(C) न्यायपालिका एवं विधानपालिका में पृथक्करण
(D) प्रजातंत्र की स्थापना
उत्तर:
(A) निरंकुशतंत्र की स्थापना

9. “स्वतंत्रता अति शासन का उल्टा रूप है।” यह कथन निम्नलिखित में से किस विद्वान का है
(A) मिल
(B) गैटेल
(C) लास्की
(D) रूसो
उत्तर:
(C) लास्की

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 स्वतंत्रता

10. “व्यक्ति जितनी अधिक स्वतंत्रता चाहता है, उतना ही उसे सत्ता के आगे झुकना पड़ता है।” यह कथन निम्नलिखित में से किस विद्वान का है?
(A) हॉकिन्स
(B) लास्की
(C) प्रोंधा
(D) मिल
उत्तर:
(A) हॉकिन्स

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दें

1. अंग्रेजी भाषा के लिबर्टी (Liberty) शब्द की उत्पत्ति लिबर (Liber) शब्द से हुई है। यह शब्द किस भाषा से लिया गया है?
उत्तर:
लेटिन भाषा से।

2. “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
बाल गंगाधर तिलक का।

3. सामाजिक समझौता (Social Contract) नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
उत्तर:
रूसो।

4. “जहाँ कानून नही होते, वहाँ स्वतंत्रता नहीं होती।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
जॉन लॉक।

रिक्त स्थान भरें

1. अंग्रेजी भाषा के ‘लिबर्टी’ शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के …………. शब्द से हुई है।
उत्तर:
लिबर

2. …………… विचारधारा के विद्वान कानून को स्वतंत्रता का शत्रु नहीं मानते।
उत्तर:
समाजवादी

3. “पूँजीवाद के उदय से मजदूर लगातार जंजीरों में जकड़ा हुआ है।” यह कथन ……………. का है।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धांत : एक परिचय

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धांत : एक परिचय Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धांत : एक परिचय

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीति शब्द की उत्पत्ति किस शब्द से हुई और यह किस भाषा का है?
उत्तर:
राजनीति शब्द की उत्पत्ति ‘पोलिस’ (Polis) शब्द से हुई है और यह यूनानी भाषा का शब्द है।

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान का पितामह किसको माना जाता है और उसका संबंध किस देश से था?
उत्तर:
राजनीति विज्ञान का पितामह अरस्तू को माना जाता है। अरस्तू का संबंध यूनान देश से था।

प्रश्न 3.
राजनीति को ‘सर्वोच्च विज्ञान’ (Master Science) की संज्ञा किसने दी थी?
उत्तर:
राजनीति को सर्वोच्च विज्ञान की संज्ञा अरस्तू ने दी थी।

प्रश्न 4.
राजनीति से संबंधित विभिन्न दृष्टिकोणों के नाम लिखिए।
उत्तर:
राजनीति से संबंधित मुख्यतः तीन दृष्टिकोण हैं-

  • प्राचीन यूनानी दृष्टिकोण,
  • परंपरागत दृष्टिकोण,
  • आधुनिक दृष्टिकोण।

प्रश्न 5.
प्राचीन यूनानी दृष्टिकोण के किन्हीं दो मुख्य समर्थकों का नाम लिखिए।
उत्तर:
अरस्तू और प्लेटो को प्राचीन यूनानी दृष्टिकोण का समर्थक माना जाता है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धांत : एक परिचय

प्रश्न 6.
प्राचीन यूनानी दृष्टिकोण की तीन मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
प्राचीन यूनानी दृष्टिकोण की तीन मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • नगर राज्यों से संबंधित है,
  • राज्य और समाज में भेद नहीं करता,
  • आदर्श राज्य की परिकल्पना करता है।

प्रश्न 7.
राजनीति की कोई एक परंपरागत परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
लॉर्ड एक्टन के अनुसार, “राजनीति शास्त्र राज्य व उसके विकास के लिए अनिवार्य दशाओं से संबंधित है।”

प्रश्न 8.
किन्हीं दो विद्वानों के नाम लिखें जो राजनीति को राज्य का अध्ययन मानते हैं।
उत्तर:
गार्नर व लॉर्ड एक्टन राजनीति को केवल राज्य का अध्ययन मानते हैं।

प्रश्न 9.
राजनीतिक सिद्धांत के आधुनिक दृष्टिकोण क्या है?
उत्तर:
आधुनिक दृष्टिकोण में औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं के स्थान पर अनौपचारिक राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 10.
आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति के क्षेत्र के मूल में क्या आता है?
उत्तर:
आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति के क्षेत्र में शक्ति का अध्ययन आता है। यह मानव व्यवहार का भी अध्ययन करता है।

प्रश्न 11.
पोलिटिक्स (Politics) नामक पुस्तक किस विद्वान ने लिखी थी और किस देश का निवासी था?
उत्तर:
पोलिटिक्स नामक पुस्तक अरस्तू ने लिखी थी और वह यूनान देश का निवासी था।

प्रश्न 12.
गैर-राजनीतिक क्षेत्र में राजनीति के हस्तक्षेप के दो शीर्षकों के नाम लिखें।
उत्तर:
गैर-राजनीतिक क्षेत्र में राजनीति के हस्तक्षेप के मुख्य दो उदाहरण हैं-(1) घरेलू मामलों में राजनीति का हस्तक्षेप, (2) महिलाओं को संपत्ति के अधिकार की प्राप्ति।

प्रश्न 13.
सिद्धांत से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सिद्धांत से अभिप्राय एक ऐसी मानसिक दृष्टि से है जो कि एक वस्तु के अस्तित्व एवं उसके कारणों को प्रकट करती है।

प्रश्न 14.
‘सिद्धांत’ शब्द की उत्पत्ति किस शब्द से हुई और यह किस भाषा का है?
उत्तर:
‘सिद्धांत’ शब्द की उत्पत्ति ‘थ्योरिया’ शब्द से हुई और यह ग्रीक भाषा का है।

प्रश्न 15.
सिद्धांत की कोई एक परिभाषा दें।।
उत्तर:
गिब्सन के अनुसार, “सिद्धांत ऐसे व्यक्तियों का जो विभिन्न जटिल तरीकों के द्वारा आपस में एक दूसरे से संबंधित हो एक समूह का संग्रह है।”

प्रश्न 16.
राजनीतिक सिद्धांत के मुख्य तीन तत्त्वों के नाम लिखें।
उत्तर:
राजनीतिक सिद्धांत के मख्य तीन तत्त्व-(1) अवलोकन. (2) व्याख्या और (3) मल्यांकन हैं।

प्रश्न 17.
परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की मुख्य दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • यह मुख्यतः वर्णनात्मक अध्ययन है,
  • यह समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करता है।

प्रश्न 18.
राजनीतिक सिद्धांत के परंपरागत तथा आधुनिक विचारों में दो मुख्य अंतर लिखें।[
उत्तर:

  • परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत संस्थाओं से जबकि आधुनिक राजनीति सिद्धांत एक प्रयोग सिद्ध अध्ययन है।
  • परंपरावादी आदर्शवादी है जबकि आधुनिक यथार्थवादी है।

प्रश्न 19.
राजनीतिक सिद्धांत का आधुनिक दृष्टिकोण किस बात पर अधिक बल देता है?
उत्तर:
राजनीतिक सिद्धांत का आधुनिक दृष्टिकोण विस्तृत है। यह यथार्थवाद एवं व्यावहारिक अध्ययन पर भी बल देता है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धांत : एक परिचय

प्रश्न 20.
राजनीतिक सिद्धांत की कोई दो महत्त्वपूर्ण उपयोगिताएं लिखें।
उत्तर:

  • यह भविष्य की योजना संभव बनाता है,
  • यह राजनीतिक वास्तविकताओं को समझाने में सहायक है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीति का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘राजनीति’ आधुनिक युग में सबसे अधिक प्रयोग होने वाला शब्द है। इसलिए भिन्न-भिन्न लोगों ने इस शब्द का प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में किया है। साधारण अर्थों में इस शब्द का प्रयोग नकारात्मक अर्थ में किया जाता है। इस शब्द का प्रयोग उन क्रियाओं और प्रक्रियाओं के लिए किया जाता है जिन्हें अच्छा नहीं समझा जाता है; जैसे विद्यार्थियों को राजनीति में भाग नहीं लेना चाहिए या फिर अपने मित्रों के साथ राजनीति नहीं खेलनी चाहिए अर्थात् राजनीति शब्द का प्रयोग विकृत अर्थ में किया जाता है।

वर्तमान लोक जीवन में यह शब्द बड़ा अप्रतिष्ठित हो गया है और इससे छल, कपट, बेईमानी आदि का बोध होता है। राजनीति का उपरोक्त अर्थ संकुचित व विकृत है, परंतु राजनीति शब्द का अर्थ संकुचित न होकर व्यापक है। राजनीति एक ऐसी क्रिया है जिसमें हम सभी किसी-न-किसी रूप में अवश्य भाग लेते हैं। लोकतंत्र में रहते हुए राजनीति से अलग नहीं रहा जा सकता।

राजनीति अरस्तू के समय से ही समाज में है। अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और स्वभाव से एक सामाजिक प्राणी है। वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समाज में अनेक प्रकार के संघ, दल और समुदायों का निर्माण करता है। इन संस्थाओं या संगठनों के संघर्ष से समाज में मतभेद पैदा हो जाते हैं, मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के नाते क्रांति या शक्ति का सहारा न लेकर शांतिपूर्ण संघर्ष द्वारा अपने मतभेदों को दूर करने का प्रयत्न करते हैं। समाज के इस संघर्ष से उत्पन्न क्रिया को राजनीति कहा जाता है।

प्रश्न 2.
राजनीति की कोई दो परिभाषाएँ दीजिए।
उत्तर:
यद्यपि ‘राजनीति’ शब्द को परिभाषित करना एक कठिन कार्य है फिर भी सुविधा की दृष्टि से राजनीति की कुछ मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  • हरबर्ट जे० स्पाइरो (Herbert J. Spiro) के अनुसार, “राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानव समाज अपनी समस्याओं का समाधान करता है।”
  • डेविड ईस्टन (David Easton) के अनुसार, “राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानव आवश्यकताओं तथा इच्छाओं की पूर्ति सीमित (मानवीय, भौतिक और आध्यात्मिक) साधनों का सामाजिक इकाई में (चाहे नगर हो, राज्य हो या संगठन) बंटवारा करता है।”

प्रश्न 3.
राजनीति के प्राचीन यूनानी दृष्टिकोण की चार विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
यूनानी दृष्टिकोण की चार विशेषताएँ इस प्रकार हैं
1. नगर-राज्यों से संबंधित-प्राचीन यूनानी दृष्टिकोण नगर-राज्य को राजनीति के अध्ययन का प्रमुख विषय मानता है। नगर-राज्यों का आकार बहुत छोटा होता था। जनसंख्या भी सीमित होती थी, परंतु नगर-राज्य अपने-आप में निर्भर और स्वतंत्र होते थे। नगर-राज्य का उद्देश्य लोगों को अच्छा जीवन प्रदान करना था।

2. सामुदायिक जीवन में भाग लेना जरूरी-यूनानी विचारकों के अनुसार प्रत्येक नागरिक के लिए राजनीति में भाग लेना आवश्यक है। इसलिए अरस्तू ने नागरिक का अर्थ बताते हुए कहा था कि वह व्यक्ति नागरिक है जो राज्य के कानूनी और न्यायिक कार्यों में भाग लेता है, लेकिन अरस्तू ने नागरिकों को राजनीतिक जीवन में भाग लेने तक सीमित रखा अर्थात् समाज के कुछ ऐसे वर्ग थे जिन्हें राजनीति में या राज्य के कार्यों में भाग लेने का अधिकार प्राप्त नहीं था; जैसे श्रमिकों, गुलामों और स्त्रियों को राज्य . के कार्यों में भाग लेने के अधिकार से वंचित रखा गया था।

3. राज्य और समाज में भेद नहीं यूनानी दार्शनिकों ने राज्य और समाज में कोई अंतर नहीं किया। दोनों शब्दों का प्रयोग उन्होंने एक-दूसरे के लिए किया है। उनके अनुसार, राज्य व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पक्ष; सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक से संबंधित है।

4. आदर्श राज्य यूनानी विचारकों के लिए राज्य एक नैतिक संस्था है। मनुष्य केवल राज्य में रहकर ही नैतिक जीवन व्यतीत करता है। राज्य द्वारा ही नागरिकों में नैतिक गुणों का विकास किया जाता है। इसलिए यूनानी एक आदर्श राज्य की स्थापना करना चाहते थे।

प्रश्न 4.
राजनीति के परंपरागत दृष्टिकोण की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
राजनीति के परंपरागत दृष्टिकोण की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • प्राचीन लेखक संस्थाओं की संरचनाओं और सरकार के गठन पर विचार करते हैं। वे यह जानने का प्रयत्न करते हैं कि संस्थाओं का उदय कैसे हुआ।
  • परंपरागत विचारक आदर्शवादी हैं। वे देखते हैं कि क्या होना चाहिए? उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि क्या है? अर्थात् वह राजनीतिक मूल्यों, नैतिकता व सात्विक विचारों पर अधिक बल देते हैं। इसमें कल्पना अधिक है।
  • परंपरावादियों का दृष्टिकोण व्यक्तिगत अधिक है। उसमें चिंतन और कल्पना है। ये दार्शनिक व विचारात्मक पद्धति में विश्वास करते हैं।
  • परंपरावादी विचारक राजनीति शास्त्र को विज्ञान मानते हैं।

प्रश्न 5.
राजनीति के आधुनिक दृष्टिकोण की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
राजनीति के आधुनिक दृष्टिकोण की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. सीमित साधनों का आबंटन राजनीति है समाज में मूल्य-भौतिक साधन; जैसे सुख-सुविधाएँ, लाभकारी पद, राजनीतिक पद आदि सीमित हैं। इन सीमित साधनों को समाज में बांटना है। अतः सीमित साधनों को पाने के लिए संघर्ष होता है तथा एक होड़-सी लग जाती है। प्रत्येक व्यक्ति या व्यक्ति-समूह द्वारा साधनों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। साधनों के बंटवारे की इसी प्रक्रिया को राजनीति कहा जाता है।

2. समूची राजनीतिक व्यवस्था का विश्लेषण ही राजनीति है-परंपरावादियों ने राजनीति को राज्य व शासन का अध्ययन मात्र माना है। लेकिन आधुनिक विचारक न केवल राज्य व शासन का अध्ययन करते हैं, बल्कि उन सभी पहलुओं का भी अध्ययन करते हैं जिनका संबंध प्रत्यक्ष या अप्रयत्क्ष रूप से राज्य व शासन से होता है अर्थात वह समुदाय, समाज, श्रमिक संगठन, दबाव-समूह व हित-समूह आदि का अध्ययन करते हैं।

3. राजनीति शक्ति का अध्ययन है-आधुनिक लेखकों ने राजनीति की शक्ति के अध्ययन में अधिक रुचि प्रकट की है। उन्होंने राजनीति को शक्ति के लिए संघर्ष कहा है। इन लेखकों में से केटलिन, लासवैल, वाइज़मैन, मैक्स वेबर और राबर्ट डहल उल्लेखनीय हैं।

4. राजनीति एक वर्ग-संघर्ष है-आधुनिक लेखक राजनीति को एक वर्ग-संघर्ष के अतिरिक्त कुछ और नहीं मानते।जैसे कार्ल मार्क्स ने राजनीति को वर्ग-संघर्ष माना है। उसके अनुसार समाज सदा ही दो वर्गों में विभाजित रहा है शासक वर्ग व शासित वर्ग।

प्रश्न 6.
क्या गैर-राजनीति क्षेत्र में राजनीति का हस्तक्षेप है? व्याख्या करें।
उत्तर:
साधारणतः यह धारणा बन चुकी है कि राजनीति आम जीवन को प्रभावित नहीं करती, लेकिन आधुनिक समय में इस धारणा में परिवर्तन हुआ है और यह सोचा जाने लगा है कि राजनीति सामान्य जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करती है। 19वीं शताब्दी के आधुनिकीकरण ने तथा जन-आंदोलनों ने राजनीति के क्षेत्र का विस्तार किया है। अब राजनीति लगभग प्रत्येक घर में प्रवेश कर चुकी है। अब हम कुछ ऐसे क्षेत्रों का अध्ययन करेंगे जो कभी राजनीति की परिधि से बाहर माने जाते थे, लेकिन अब के राजनीति से अछूते नहीं हैं।

1. घरेलू मामलों में राजनीति का हस्तक्षेप-पारिवारिक मामलों को कभी राजनीति से पूर्ण रूप से स्वतंत्र माना जाता और घरेलू मामलों में राजनीति का हस्तक्षेप न के बराबर था। लेकिन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में घरेलू मामलों में राजनीति के हस्तक्षेप का आरंभ हुआ।

2. महिलाओं को संपत्ति में अधिकार की प्राप्ति-भारतीय संसद ने संविधान में संशोधन कर हिंदू संपत्ति उत्तराधिकार अधिनियम में सन् 2005 में संशोधन किया। अब महिलाओं को पारिवारिक संपत्ति में बराबर का अधिकार प्राप्त हो गया है।

3. विभिन्न अधिकारों के क्षेत्र में बढ़ोतरी-प्रारंभ में व्यक्ति को केवल कर्त्तव्य-पालन की ही शिक्षा मिलती थी। उसके अधिकार बड़े सीमित थे। लेकिन राजनीति के हस्तक्षेप से व्यक्तियों के अधिकारों में बढ़ोतरी हुई है। जैसे उसे अब दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। उसे विदेश भ्रमण का भी अधिकार प्राप्त हो चुका है।

4. शिक्षा का अधिकार-किसी भी समाज की उन्नति व विकास शिक्षा पर निर्भर करता है। यदि नागरिक शिक्षित है तो निश्चित रूप से समाज अनेक प्रकार के कष्टों से मुक्त होता है। इसलिए निरक्षरता को दूर करने के लिए संविधान में संशोधन कर शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकारों की श्रेणी रख दिया है।

प्रश्न 7.
पर्यावरण के संरक्षण में राजनीति का हस्तक्षेप कैसे है? व्याख्या करें।
उत्तर:
राजनीति पर्यावरण के संरक्षण को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। विकास और पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। यदि पर्यावरण विकास के लिए आधार प्रदान करता है तो विकास पर्यावरण के रख-रखाव, इसके पोषण और समृद्धि में सहायता देता है। पर्यावरण विकास की प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण सहायक तत्व है।

यही नहीं मानव जीवन के लिए पर्यावरण अति-आवश्यक है और पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए भारतीय संसद ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक अधिनियमों वायु प्रदूषण अधिनियम, जल प्रदूषण अधिनियम, पर्यावरण प्रदूषण अधिनियम आदि का निर्माण किया है।

प्रश्न 8.
राजनीतिक सिद्धांत की कोई चार परिभाषाएँ दीजिए।
उत्तर:
राजनीतिक सिद्धांत की चार परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

1. डेविड हैल्ड (David Held):
के अनुसार, “राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक जीवन से संबंधित अवधारणाओं और व्यापक अनुमानों का एक ऐसा ताना-बाना है जिसमें शासन, राज्य और समाज की प्रकृति व लक्ष्यों और मनुष्यों की राजनीतिक क्षमताओं का विवरण शामिल है।”

2. जॉन प्लेमैंनेज़ (John Plamentaz):
के अनुसार, “एक सिद्धांतशास्त्री राजनीति की. शब्दावली का विश्लेषण और स्पष्टीकरण करता है। वह उन सभी अवधारणाओं की समीक्षा करता है जो कि राजनीतिक बहस के दौरान प्रयोग में आती हैं। सीमाओं के उपरान्त अवधारणाओं के औचित्य पर भी प्रकाश डाला जाता है।”

3. कोकर (Coker):
के अनुसार, “जब राजनीतिक शासन, उसके रूप एवं उसकी गतिविधियों का अध्ययन केवल अध्ययन या तुलना मात्र के लिए नहीं किया जाता अथवा उनको उस समय के और अस्थायी प्रभावों के संदर्भ में नहीं आंका जाता, बल्कि उनको लोगों की आवश्यकताओं, इच्छाओं एवं उनके मतों के संदर्भ में घटनाओं को समझा व इनका मूल्य आंका जाता है, तब हम इसे राजनीतिक सिद्धांत कहते हैं।” ।

4. एण्ड्रयु हैकर (Andrew Hecker):
के शब्दों में, “राजनीतिक सिद्धांत एक ओर बिना किसी पक्षपात के अच्छे राज्य तथा समाज की तलाश है तो दूसरी ओर राजनीतिक एवं सामाजिक वास्तविकताओं की पक्षपात रहित जानकारी का मिश्रण है।”

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धांत : एक परिचय

प्रश्न 9.
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की कोई तीन विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. विश्लेषणात्मक अध्ययन आधुनिक विद्वानों ने विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण को अपनाया है। वे संस्थाओं के सामान्य वर्णन से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि वे राजनीतिक वास्तविकताओं को समझना चाहते थे। इस कारण से उन्होंने व्यक्ति व संस्थाओं के वास्तविक व्यवहार को समझने के लिए अनौपचारिक संरचनाओं, राजनीतिक प्रक्रियाओं व व्यवहार के विश्लेषण पर बल दिया।

2. अध्ययन की अन्तर्शास्त्रीय पद्धति-आधुनिक विद्वानों की यह मान्यता है कि राजनीतिक व्यवस्था समाज व्यवस्था की अनेक उपव्यवस्थाओं (Multi-Systems) में से एक है और इन सभी व्यवस्थाओं का अध्ययन अलग-अलग नहीं किया जा सकता। प्रत्येक उपव्यवस्था अन्य उप-व्यवस्थाओं के व्यवहार को प्रभावित करती है।

इसीलिए किसी एक उपव्यवस्था का अध्ययन अन्य उपव्यवस्थाओं के संदर्भ में ही किया जा सकता है। राजनीतिक व्यवस्था पर समाज की आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक आदि व्यवस्थाओं का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। अतः हमें किसी समाज की राजनीतिक व्यवस्था को ठीक ढंग से समझने के लिए उस समाज की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करना आवश्यक है।

3. आनुभाविक अध्ययन-राजनीति के आधुनिक विद्वानों ने राजनीति को शुद्ध विज्ञान बनाने के लिए राजनीतिक तथ्यों के माप-तोल पर बल दिया है। यह तथ्य-प्रधान अध्ययन है जिसमें वास्तविकताओं का अध्ययन होता है। इससे उन्होंने नए-नए तरीके अपनाए, जैसे जनगणना तथा आंकड़ों का अध्ययन करना तथा जनमत जानने की विधियां और साक्षात्कार के द्वारा कुछ परिणाम निकालना आदि।

प्रश्न 10.
राजनीतिक सिद्धांत के कार्यक्षेत्र के किन्हीं तीन शीर्षकों की व्याख्या करें।
उत्तर:”
राजनीतिक सिद्धांत के तीन कार्यक्षेत्र निम्नलिखित हैं

1. राज्य का अध्ययन-प्राचीनकाल से ही राज्य की उत्पत्ति, प्रकृति तथा कार्य-क्षेत्र के बारे में विचार होता रहा है कि राज्य का विकास कैसे हुआ तथा नगर-राज्य के समय से लेकर वर्तमान राष्ट्रीय राज्य के रूप में पहुंचने तक इसके स्वरूप का कैसा विकास हुआ आदि।

2. सरकार का अध्ययन सरकार ही राज्य का वह तत्व है जिसके द्वारा राज्य की अभिव्यक्ति होती है। अतः सरकार भी राजनीतिक सिद्धांत के क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। सरकार के तीन अंग व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका-माने गए हैं। इन तीनों अंगों का संगठन, इनके अधिकार, इनके आपस में संबंध तथा इन तीनों से संबंधित भिन्न-भिन्न सिद्धांतों का अध्ययन भी हम करते हैं।

3. शक्ति का अध्ययन वर्तमान समय में शक्ति के अध्ययन को भी राजनीतिक सिद्धांत के क्षेत्र में शामिल किया जाता है। शक्ति के कई स्वरूप हैं, जैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक शक्ति, व्यक्तिगत शक्ति, राष्ट्रीय शक्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति इत्यादि।

प्रश्न 11.
राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के कोई चार लाभ लिखें।
उत्तर:
राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के लाभों को निम्नलिखित तथ्यों से प्रकट किया जा सकता है

1. भविष्य की योजना संभव बनाता है नई परिस्थितियों में समस्याओं के निदान के लिए नए-नए सिद्धांतों का निर्माण किया जाता है। ये सिद्धांत न केवल तत्कालीन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं बल्कि भविष्य की परिस्थितियों का भी आंकलन करते हैं। वे कुछ सीमा तक भविष्यवाणी भी कर सकते हैं। इस प्रकार देश व समाज के हितों को ध्यान में रखकर भविष्य की योजना बनाना संभव होता है।

2. वास्तविकता को समझने का साधन-राजनीतिक सिद्धांत हमें राजनीतिक वास्तविकताओं को समझने में सहायता प्रदान करता है। सिद्धांतशास्त्री सिद्धांत का निर्माण करने से पहले समाज में विद्यमान सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों का तथा समाज की इच्छाओं, आकांक्षाओं व प्रवृत्तियों का अध्ययन करता है तथा उन्हें उजागर करता है।।

3. अवधारणा के निर्माण की प्रक्रिया संभव-राजनीतिक सिद्धांत विभिन्न विचारों का संग्रह है। यह किसी राजनीतिक घटना को लेकर उस पर विभिन्न विचारों को इकट्ठा करता है तथा उनका विश्लेषण करता है। जब कोई निष्कर्ष निकल आता है तो उसकी तुलना की जाती है। उन विचारों की परख की जाती है तथा अंत में एक धारणा बना ली जाती है। यह एक गतिशील प्रक्रिया है जो नए संकलित तथ्यों को पुनः नए सिद्धांत में बदल देती है।।

4. समस्याओं के समाधान में सहायक-राजनीतिक सिद्धांत का प्रयोग शांति, विकास, अभाव तथा अन्य सामाजिक, आर्थिक . व राजनीतिक समस्याओं के लिए भी किया जाता है। राष्ट्रवाद, प्रभुसत्ता, जातिवाद तथा युद्ध जैसी गंभीर समस्याओं को सिद्धांत के माध्यम से ही नियंत्रित किया जा सकता है। सिद्धांत समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त करते हैं और निदानों (Solutions) को बल प्रदान करते हैं। बिना सिद्धांत के जटिल समस्याओं को सुलझाना संभव नहीं होता।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीति से आप क्या समझते हैं? इसकी परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
राजनीति क्या है, यह एक विवादास्पद व रोचक प्रश्न है। इस प्रश्न का सही उत्तर देना बड़ा कठिन है। साधारण व्यक्ति से लेकर विद्वानों तक ने इस प्रश्न का अपने-अपने ढंग से उत्तर देने का प्रयत्न किया है, लेकिन कोई भी इसका संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया है। राजनीति का अध्ययन प्राचीन समय से चला आ रहा है। अरस्तू ने राजनीति को सामान्य जीवन से संबंधित माना और राजनीति को ‘सर्वोच्च विज्ञान’ (Master Science) की संज्ञा दी। उनके अनुसार मनुष्य के चारों ओर के वातावरण को समझने के लिए राजनीति-शास्त्र का ज्ञान अति आवश्यक है।

अरस्तू के विचार में मनुष्य के जीवन के विभिन्न पहलुओं में से उसका राजनीतिक पहलू अधिक महत्त्वपूर्ण है। यही पहलू जीवन के अन्य पहलुओं को प्रभावित करता है। उसका कहना था कि राजनीति वैज्ञानिक रूप से यह निश्चित करती है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

वर्तमान काल में राजनीति की महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि अब राज्य एक पुलिस राज्य न होकर एक कल्याणकारी राज्य बन गया है, जो व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक पक्ष में हस्तक्षेप करता है अर्थात राज्य व्यक्ति की हर छोटी व बड़ी आवश्यकता को पूरा करने का प्रयास करता है। इस प्रकार शासक व शासितों में घनिष्ठ संबंध स्थापित हो जाते हैं। एक ओर शासक अपने-आपको सत्ता में रखने का प्रयत्न करते हैं तो दूसरी ओर शासित उन पर अंकुश लगाना चाहते हैं। इससे राजनीति का जन्म होता है।

अतः राजनीति का मनुष्य जीवन पर इतना प्रभाव होने से यह अनिवार्य हो जाता है कि इस शब्द की उत्पत्ति और अर्थ को समझा जाए। राजनीति शब्द की उत्पत्ति और अर्थ (Origin and Meaning of Politics)-प्राचीन काल से ही राजनीति विज्ञान के लिए ‘राजनीति’ शब्द का प्रयोग होता आ रहा है। अरस्तू ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘पॉलिटिक्स’ (Politics) रखा था।

पॉलिटिक्स शब्द ग्रीक भाषा के पॉलिस (Polis) शब्द से बना है। पॉलिस शब्द का संबंध नगर-राज्यों (City States) से है। प्राचीन यूनान में छोटे-छोटे नगर-राज्य होते थे। प्रत्येक नगर एक प्रभुसत्ता संपन्न राज्य था। इसलिए यूनानियों के दृष्टिकोण से पॉलिटिक्स का अर्थ उस विज्ञान से हुआ जो राज्य की समस्याओं से संबंधित हो, परंतु आधुनिक समय में बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना होने के कारण पॉलिटिक्स का अर्थ उन राजनीतिक समस्याओं से है जो किसी ग्राम, नगर, प्रांत, देश और विश्व के सामने हैं।

‘राजनीति’ आधुनिक युग में सबसे अधिक प्रयोग होने वाला शब्द है। इसलिए भिन्न-भिन्न लोगों ने इस शब्द का प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में किया है। साधारण अर्थों में इस शब्द का प्रयोग नकारात्मक अर्थ में किया जाता है। इस शब्द का प्रयोग उन क्रियाओं और प्रक्रियाओं के लिए किया जाता है जिन्हें अच्छा नहीं समझा जाता है; जैसे विद्यार्थियों को राजनीति में भाग नहीं लेना चाहिए या फिर अपने मित्रों के साथ राजनीति नहीं खेलनी चाहिए अर्थात् राजनीति शब्द का प्रयोग विकृत अर्थ में किया जाता है। वर्तमान लोक जीवन में यह शब्द बड़ा अप्रतिष्ठित हो गया है और इससे छल, कपट, बेईमानी आदि का बोध होता है।

राजनीति का उपर्युक्त अर्थ संकुचित व विकृत है, परंतु राजनीति शब्द का अर्थ संकुचित न होकर व्यापक है। राजनीति एक ऐसी क्रिया है जिसमें हम सभी किसी-न-किसी रूप में अवश्य भाग लेते हैं। लोकतंत्र में रहते हुए राजनीति से अलग नहीं रहा जा सकता। राजनीति अरस्तू के समय से ही समाज में है। अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और स्वभाव से एक सामाजिक प्राणी है।

वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समाज में अनेक प्रकार के संघ, दल और समुदायों का निर्माण करता है। इन संस्थाओं या संगठनों के संघर्ष से समाज में मतभेद पैदा हो जाते हैं, मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के नाते क्रांति या शक्ति का सहारा न लेकर शांतिपूर्ण संघर्ष द्वारा अपने मतभेदों को दूर करने का प्रयत्न करते हैं। समाज के इस संघर्ष से उत्पन्न क्रिया को राजनीति कहा जाता है।

गिलक्राइस्ट (Gilchrist) के अनुसार, “राजनीति से अभिप्राय आजकल सरकार की वर्तमान समस्याओं से होता है जो अक्सर वैज्ञानिक दृष्टि से राजनीति के ढंग की होने की बजाय आर्थिक ढंग की होती हैं। जब हम किसी मनुष्य के बारे में यह कहते हैं कि वह राजनीति में रुचि रखता है तो हमारा आशय यह होता है कि वह वर्तमान समस्याओं, आयात-निर्यात, श्रम समस्याओं, कार्यकारिणी का विधानपालिका से संबद्ध और वास्तव में किसी अन्य ऐसे प्रश्नों में रुचि रखता है, जिनकी ओर देश के कानून निर्माताओं को ध्यान देना आवश्यक है या ध्यान देना चाहिए।”

इस प्रकार राजनीति का क्षेत्र बहुत व्यापक है। वह केवल व्यावहारिक बातों तक ही सीमित नहीं होती। राजनीति में हम राजनीतिक क्रियाओं तथा संबंधों को शामिल करते हैं। राजनीति प्रत्येक समाज में पाई जाती है। राजनीति में सर्वव्यापकता है। राजनीति व्यक्ति की हर गतिविधि में विद्यमान है।

1. राजनीति की परिभाषाएँ (Definitions of Politics):
यद्यपि ‘राजनीति’ शब्द को परिभाषित करना एक कठिन कार्य है फिर भी सुविधा की दृष्टि से राजनीति की कुछ मुख्य परिभाषाएँ अग्रलिखित हैं हरबर्ट जे० स्पाइरो (Herbert J. Spiro) के अनुसार, “राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानव समाज अपनी समस्याओं का समाधान करता है।”

2. डेविड ईस्टन (David Easton):
के अनुसार, “राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानव आवश्यकताओं तथा इच्छाओं की पूर्ति सीमित (मानवीय, भौतिक और आध्यात्मिक) साधनों का सामाजिक इकाई में (चाहे नगर हो, राज्य हो या संगठन) बंटवारा करता है।”

3. हेनरी बी० मेयो (Henri B. Meyo):
के शब्दों में, “राजनीति केवल विवाद ही नहीं है, बल्कि एक ऐसी विधि भी है जिसके द्वारा झगड़ों को सुलझाकर और संघर्ष का निपटारा करके ऐसी नीतियां बनाई जाती हैं जो शासन से संबंधित और बाध्यकारी होती हैं।”

प्रश्न 2.
परंपरागत तथा आधुनिक दृष्टिकोणों में राजनीति के अर्थ बताएँ।
उत्तर:
परंपरागत दृष्टिकोण (Traditional View)-परंपरागत दृष्टिकोण से तात्पर्य है कि राजनीति का संबंध जीवन की ओं से है। इसलिए परंपरावादियों का दृष्टिकोण औपचारिक व संस्थात्मक (Formal and Institutional) है। उन्होंने अपने अध्ययन के क्षेत्र को संस्थाओं के अध्ययन तक ही सीमित रखा है और उन्होंने राजनीति को राजनीति शास्त्र कहना उचित समझा। इस दृष्टिकोण के मुख्य समर्थक प्लेटो, हॉब्स व रूसो हैं। इस दृष्टिकोणं का अध्ययन निम्नलिखित है

1. राजनीति विज्ञान राज्य से संबंधित (Political Science deals with State):
इस क्षेत्र में ऐसे लेखक आते हैं, जिन्होंने राजनीति विज्ञान को केवल राज्य से संबंधित माना है। उनके अध्ययन का आधार राज्य है और राज्य राजनीति विज्ञान का केंद्र-बिंदु है। ब्लंशली (Bluntschli) के अनुसार, “राजनीति शास्त्र वह विज्ञान है जिसका संबंध राज्य से है और जो यह समझने का प्रयत्न करता है कि राज्य के आधार का मूल तत्व क्या है, उसका आवश्यक रूप क्या है, उसकी किन विविध रूपों में अभिव्यक्ति होती है तथा उसका विकास कैसे हुआ।”

इसी तरह लार्ड एक्टन (Lord Acton) ने कहा है, “राजनीति शास्त्र राज्य व उसके विकास के लिए अनिवार्य दशाओं से संबंधित है।” गार्नर (Garner) द्वारा भी इसी प्रकार का मत व्यक्त किया गया है, “राजनीति शास्त्र का प्रारंभ तथा अंत राज्य के साथ होता है।” उपर्युक्त परिभाषाएं राजनीति शास्त्र में राज्य के महत्त्व को समझने का प्रयत्न करती हैं।

2. राजनीति विज्ञान सरकार से संबंधित है (Political Science is related to Government):
राजनीति शास्त्र में राज्य के अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है, परंतु राज्य के अतिरिक्त राजनीति शास्त्र में सरकार, मानव तथा राज्य के बाहरी संबंधों का भी अध्ययन किया जाता है। इसलिए राजनीति शास्त्र को सरकार व शासन से संबंधित संस्थाओं का अध्ययन भी माना जाता है। कुछ परंपरावादी लेखक इसी दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं।

लीकॉक (Leacock) के अनुसार, “राजनीति शास्त्र सरकार से संबंधित है।” इसी तरह सीले (Seeley) का भी मत है, “राजनीति शास्त्र शासन के तत्वों का अनुसंधान उसी प्रकार करता है; जैसे अर्थशास्त्र संपत्ति का, जीवशास्त्र जीवन का, बीजगणित अंकों का तथा ज्यामिति-शास्त्र स्थान तथा ऊंचाई का करता है।”

इन लेखकों ने सरकार को राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय माना है। इसका कारण यह है कि राज्य अपने कार्य स्वयं नहीं कर सकता, इसलिए सरकार की इस उद्देश्य के लिए आवश्यकता पड़ती है। राजनीति शास्त्र में सरकार की रचना, उसके उद्देश्य व उसके विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।

3. राजनीति विज्ञान में राज्य व सरकार का अध्ययन (Study of State and Government in Political Science):
राजनीति विचारकों का एक समूह राज्य के अध्ययन पर बल देता है तो दूसरा सरकार व शासन के अध्ययन को अपना विषय बनाता है। वस्तुतः यह दोनों ही धारणाएँ महत्त्वपूर्ण तो हैं, लेकिन दोनों ही अधूरी हैं। ये दोनों धारणाएं एक-दूसरे की पूरक हैं। क्योंकि राज्य का सरकार के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सरकार राज्य का न केवल अंग है, बल्कि वह उसके स्वरूप की व्याख्या भी करता है।

इस तरह राजनीतिक वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसी परिभाषाएं दी हैं जो राज्य तथा सरकार दोनों के अध्ययन पर प्रकाश डालती हैं। इसी संदर्भ में गिलक्राइस्ट (Gilchrist) ने कहा है, “राजनीति शास्त्र राज्य तथा सरकार से संबंधित है।” इसी तरह पाल जैनेट (Paul Janet) द्वारा भी विचार व्यक्त किया गया है, “यह समाज शास्त्र का वह भाग है जो राज्य के मूल आधारों तथा शासन के सिद्धांत की विवेचना करता है।”

गैटेल (Gettel) भी राजनीति शास्त्र में सरकार व राज्य दोनों का अध्ययन करता है। गैटेल के अनुसार, “राजनीति शास्त्र राज्य के भूत, वर्तमान तथा भविष्य के राजनीतिक संगठन तथा राजनीतिक कार्यों का, राजनीतिक समस्याओं तथा राजनीति सिद्धांतों का अध्ययन करता है।”

परंपरावादी दृष्टिकोण की विशेषताएँ (Characteristics of the Traditional View)-दी गई विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर परंपरावादी दृष्टिकोण की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) प्राचीन लेखक संस्थाओं की संरचनाओं और सरकार के गठन पर विचार करते हैं। वे यह जानने का प्रयत्न करते हैं कि संस्थाओं का उदय कैसे हुआ।
परंपरागत विचारक आदर्शवादी हैं।

(2) वे देखते हैं कि क्या होना चाहिए? उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि क्या है? अर्थात् वह राजनीतिक मूल्यों, नैतिकता व सात्विक विचारों पर अधिक बल देते हैं। इसमें कल्पना अधिक है।

(3) परंपरावादियों का दृष्टिकोण व्यक्तिगत अधिक है। उसमें चिंतन और कल्पना है। ये दार्शनिक व विचारात्मक पद्धति में विश्वास करते हैं।

(4) परंपरावादी विचारक राजनीति शास्त्र को विज्ञान मानते हैं।

(5) परंपरावादी केवल राजनीति से संबंधित नहीं हैं। उनका संबंध अनेक समाजशास्त्रों से है। परंपरावादी नैतिकवाद व अध्यात्मवाद में विश्वास रखते हैं। उन्होंने राज्य को एक नैतिक संस्था माना है। उनका झुकाव उदारवाद की ओर था। इसलिए उन्होंने राज्य को कल्याणकारी कहा था। वे व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता देने के पक्ष में हैं।

आधुनिक द्र ष्टिकोण (Modern View)-परंपरावादियों और उदारवादियों ने राजनीति के अध्ययन के विषय को केवल राज्य, सरकार व कानून तक ही सीमित रखा। उन्होंने राजनीति को केवल औपचारिक माना अर्थात उन्होंने राजनीति में औपचारिक दिया, लेकिन इसके विपरीत आधुनिक दृष्टिकोण में राजनीति को औपचारिक संस्थाओं के अध्ययन के बंधन से मुक्त करने का प्रयत्न किया गया है।

आधुनिक विचारधारा के अनुसार राजनीति में औपचारिक संस्थाओं की अपेक्षा अनौपचारिक संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है। उनका कहना है कि संस्थाएं विधानमंडल, कार्यपालिका व न्यायालय तथा अन्य संस्थाएं स्वयं कोई कार्य नहीं कर सकतीं। ये संस्थाएं किस प्रकार से कार्य करती हैं, इन्हें कौन-से लोग चलाते हैं तथा देश की सामाजिक व आर्थिक स्थिति कैसी है, इन सब बातों का अध्ययन राजनीति में किया जाता है।

अतः आधुनिक विचारक राजनीतिक गतिविधियों पर अधिक जोर देते हैं। वे औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं के स्थान पर अनौपचारिक राजनीतिक संस्थाओं; जैसे राजनीतिक दल, दबाव-समूह, लोकमत, चुनाव, मतदान व आचरण आदि पर अधिक ध्यान देते हैं। कछ आधनिक लेखक राजनीति को संघर्ष के रूप में देखते हैं। इस प्रकार आधनिक राजनीति दृष्टिकोण से अधिक विस्तृत है। राजनीति के आधुनिक दृष्टिकोण का संक्षेप में इस प्रकार वर्णन किया जा सकता है

1. सीमित साधनों का आबंटन राजनीति है (Allocation of Scarce Resources is Politics):
डेविड ईस्टन (David Easton) ने राजनीति की परिभाषा देते हुए कहा है, “राजनीति का संबंध मूल्यों के अधिकारिक आबंटन से है।” इसका अर्थ यह है कि समाज में मूल्य–भौतिक साधन; जैसे सुख-सुविधाएं, लाभकारी पद, राजनीतिक पद आदि सीमित हैं। इन सीमित साधनों को समाज में बांटना है। इनका वितरण करने के लिए एक ऐसी शक्ति की आवश्यकता है जिसकी बात सभी मानें।

इसलिए ईस्टन ने ‘अधिकारिक’ शब्द का प्रयोग किया है। इस प्रकार की बाध्यकारी शक्ति प्रत्येक समाज में होती है। अतः सीमित साधनों को पाने के लिए संघर्ष होता है तथा एक होड़-सी लग जाती है। प्रत्येक व्यक्ति या व्यक्ति-समूह द्वारा साधनों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। साधनों के बंटवारे की इसी प्रक्रिया को राजनीति कहा जाता है। एक अन्य आधुनिक लेखक लासवैल (Lasswell) ने इसे दूसरे शब्दों में लिखा है, “राजनीति की विषय-वस्तु है कौन प्राप्त करता है, क्या प्राप्त करता है, कब प्राप्त करता है और कैसे प्राप्त करता है।”

2. समूची राजनीतिक व्यवस्था का विश्लेषण ही राजनीति है (Politics is an Analysis of the whole Political System):
परंपरावादियों ने राजनीति को राज्य व शासन का अध्ययन मात्र माना है। लेकिन आधुनिक विचारक न केवल राज्य व शासन का अध्ययन करते हैं, बल्कि उन सभी पहलुओं का भी अध्ययन करते हैं जिनका संबंध प्रत्यक्ष या अप्रयत्क्ष रूप से राज्य व शासन से होता है अर्थात वह समुदाय, समाज, श्रमिक संगठन, दबाव-समूह व हित-समूह आदि का अध्ययन करते हैं।

इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि आधुनिक लेखक राजनीति में समूची राजनीतिक व्यवस्था को सम्मिलित करते हैं; जैसे कि ऐलन बाल (Alan Ball) ने कहा है, “राजनीतिक व्यवस्था में केवल औपचारिक संस्थाओं (विधानमंडल, कार्यपालिका और न्यायपालिका) का ही समावेश नहीं है, बल्कि उसमें समाज की हर प्रकार की राजनीतिक गतिविधि समाहित है।”

इस तरह राजनीतिक व्यवस्था विभिन्न राजनीतिक गतिविधियों का एक समूह है जिसमें प्रत्येक गतिविधि का एक-दूसरे पर प्रभाव पड़ता है। जैसे चुनाव-प्रणाली के दोषों का प्रभाव सभी गतिविधियों पर पड़ता है। अतः राजनीति में सामाजिक जीवन के उन सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है जिनका प्रभाव राजनीतिक संस्थाओं, गतिविधियों व प्रक्रियाओं पर पड़ता है।

राजनीति शक्ति का अध्ययन है (Politics is the study of Power)-आधुनिक लेखकों ने राजनीति की शक्ति के अध्ययन में अधिक रुचि प्रकट की है। उन्होंने राजनीति को शक्ति के लिए संघर्ष कहा है। इन लेखकों में से केटलिन, लासवैल, वाइज़मैन, मैक्स वेबर और राबर्ट डहल उल्लेखनीय हैं। केटलिन (Catlin) ने कहा है, “समस्त राजनीति स्वभाव से शक्ति-संघर्ष है।”

मैक्स वेबर (Max Weber) ने इसी संदर्भ में व्यक्त किया है, “राजनीति शक्ति के लिए संघर्ष है अथवा जिन लोगों के हाथ में सत्ता है उन्हें प्रभावित करने की क्रिया है। यह संघर्ष राज्यों के मध्य तथा राज्य के भीतर संगठित समुदायों के बीच चलता है और यह दोनों संघर्ष राजनीति के अंतर्गत आ जाते हैं।” इस तरह इस परिभाषा से यह निश्चित हो जाता है कि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाला शक्ति के लिए संघर्ष राजनीति के अध्ययन का विषय बन गया है। लासवैल (Lasswell) ने राजनीति को इस प्रकार से परिभाषित किया है, “राजनीति शक्ति को बनाने व उसमें भाग लेने का यन है।”

वाइज़मैन (Wiseman) ने शक्ति की व्याख्या करते हुए अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए हैं “विरोध के होते हुए किसी व्यक्ति की इच्छाओं का पालन करवाने की योग्यता को शक्ति कहते हैं।” अर्थात आधुनिक लेखकों के अनुसार राजनीति में, शक्ति क्या है? कैसे प्राप्त की जाती है? कैसे खोई जाती है? इसके क्या आधार हैं; इत्यादि आते हैं।

4. राजनीति एक वर्ग-संघर्ष है (Politics is a Class Struggle):
आधुनिक लेखक राजनीति को एक वर्ग-संघर्ष के अतिरिक्त कुछ और नहीं मानते। जैसे कार्ल मार्क्स ने राजनीति को वर्ग-संघर्ष माना है। उसके अनुसार समाज सदा ही दो वर्गों में विभाजित रहा है-शासक वर्ग व शासित वर्ग। शासक वर्ग हमेशा शासित वर्ग का शोषण करता रहा है क्योंकि उसके पास शक्ति है और वह राज्य के यंत्र का प्रयोग शासितों का शोषण करने के लिए करता है।

इसी शोषण प्रक्रिया को राजनीति कहा जाता है। यह शोषण या वर्ग-संघर्ष तब तक चलता रहता है जब तक समाज में वर्ग-भेद समाप्त नहीं हो जाता। इसलिए मार्क्स एक वर्ग-विहीन समाज की स्थापना करना चाहता था। न वर्ग होंगे, न संघर्ष होगा और न राजनीति होगी।

5. राजनीति सामान्य हित स्थापित करने का साधन है (Politics as a mean to bring Common Good):
साधारणतः राजनीति को संघर्ष माना जाता है जिसमें समाज में रहने वाला एक वर्ग दूसरे वर्ग पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है या शक्ति-विहीन लोग शासन पर अधिकार प्राप्त करके शक्ति प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं।

लेकिन यह राजनीति का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष है कि राजनीति वर्ग-संघर्ष नहीं है, बल्कि समाज के विभिन्न समुदायों अथवा वर्गों के बीच संघर्षों को दूर करके शांति स्थापित करने का साधन है। राजनीति समाज में शांति व्यवस्था व न्याय की स्थापना का प्रयास है जिसमें समाज हित व व्यक्तिगत हित में सामंजस्य स्थापित किया जाता है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धांत : एक परिचय

प्रश्न 3.
राजनीतिक सिद्धांत की परिभाषा दीजिए। आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की विशेषताएँ लिखिए। शांत क्या है? लंबे समय से विद्वानों के बीच यह विवाद का विषय रहा है। विभिन्न अवधारणाएं इसे विभिन्न तरह से परिभाषित करती हैं। इसके लिए विभिन्न शब्दावली; जैसे राजनीति शास्त्र (Political Science), राजनीति (Politics), राजनीतिक दर्शन (Political Philosophy) आदि का प्रयोग किया जाता है।

परंतु इन सभी के भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। राजनीतिक सिद्धांत को अंग्रेजी में पॉलिटिकल थ्योरी (Political Theory) कहा जाता है। राजनीतिक सिद्धांत ‘राजनीति एवं सिद्धांत’ दो शब्दों से मिलकर बना है। राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ जानने से पूर्व ‘सिद्धांत’ का अर्थ समझना अति आवश्यक है।

सिद्धांत का अर्थ (Meaning of Theory)-सिद्धांत को अंग्रेजी में थ्योरी (Theory) कहा जाता है। ‘थ्योरी’ शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द थ्योरिया (Theoria) से हुई है, जिसका अर्थ होता है “एक ऐसी मानसिक दृष्टि जो कि एक वस्तु के अस्तित्व एवं उसके कारणों को प्रकट करती है।” ‘विवरण’ (Description) या किसी लक्ष्य के बारे में कोई विचार या सुझाव देने (Proposals of Goals) को ही सिद्धांत नहीं कहा जाता है।

प्रत्येक व्यक्ति संसार में घटने वाली घटनाओं, वस्तुओं, प्राणियों एवं समूहों को अपने दृष्टिकोण से देखता है तथा उस पर अपनी टिप्पणियां करते हैं। प्रत्येक मानव आवश्यकता पड़ने पर उस पर कुछ प्रयोग भी करते हैं तथा आवश्यकता एवं समय के अनुसार उसमें कुछ परिवर्तन भी करते हैं, जिसे सिद्धांत (Theory) कहा जाता है। आर्नोल्ड ब्रेट (Armold Breht) के शब्दों में, “सिद्धांत के अंतर्गत तथ्यों का वर्णन, उनकी व्याख्या, लेखक का इतिहास बोध, उनकी मान्यताएं एवं लक्ष्य शामिल हैं जिनके लिए किसी सिद्धांत का प्रतिपादन किया जाता है।”

आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की विशेषताएँ (Characteristics of Modern Political Theory)-आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. विश्लेषणात्मक अध्ययन (Analytical Study)-आधुनिक विद्वानों ने विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण को अपनाया है। वे संस्थाओं के सामान्य वर्णन से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि वे राजनीतिक वास्तविकताओं को समझना चाहते थे। इस व्यक्ति व संस्थाओं के वास्तविक व्यवहार को समझने के लिए अनौपचारिक संरचनाओं, राजनीतिक प्रक्रियाओं व व्यवहार के विश्लेषण पर बल दिया। ईस्टन, डहल, वेबर तथा आमंड इत्यादि अनेक विद्वानों ने व्यक्ति के कार्यों व उसके व्यवहार पर अधिक बल दिया क्योंकि इनके विश्लेषण से राजनीतिक व्यवस्था को समझना आसान था।

2. अध्ययन की अन्तर्शास्त्रीय पद्धति (Inter-Disciplinary Approach to the Study of Politics)-आधुनिक विद्वानों की यह मान्यता है कि राजनीतिक व्यवस्था समाज व्यवस्था की अनेक उपव्यवस्थाओं (Multi-Systems) में से एक है और इन सभी व्यवस्थाओं का अध्ययन अलग-अलग नहीं किया जा सकता। प्रत्येक उपव्यवस्था अन्य उप-व्यवस्थाओं के व्यवहार को प्रभावित करती है।

इसीलिए किसी एक उपव्यवस्था का अध्ययन अन्य उपव्यवस्थाओं के संदर्भ में ही किया जा सकता है। राजनीतिक व्यवस्था पर समाज की आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक आदि व्यवस्थाओं का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। अतः हमें किसी समाज की राजनीतिक व्यवस्था को ठीक ढंग से समझने के लिए उस समाज की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करना आवश्यक है।

वर्तमान समय में यह धारणा ज़ोर पकड़ रही है कि अंतर्राष्ट्रीयकरण (Globalization) की प्रक्रिया को समझे बिना राज्य के बारे में कोई चिंतन नहीं किया जा सकता। राजनीतिक सिद्धांत में विश्व अर्थव्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय कानून तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन अलग-अलग नहीं बल्कि एक साथ करने की आवश्यकता है। इसका कारण यह है कि ये सभी तत्व राज्य के कार्यक्षेत्र और इसकी प्रभुसत्ता को प्रभावित करते हैं।

3. आनुभाविक अध्ययन (Empirical Study or Approach) राजनीति के आधुनिक विद्वानों ने राजनीति को शुद्ध विज्ञान बनाने के लिए राजनीतिक तथ्यों के माप-तोल पर बल दिया है। यह तथ्य-प्रधान अध्ययन है जिसमें वास्तविकताओं का अध्ययन होता है। इससे उन्होंने नए-नए तरीके अपनाए, जैसे जनगणना (Census Records) तथा आंकड़ों (Datas) का अध्ययन करना तथा जनमत जानने की विधियां (Opinion Polls) और साक्षात्कार (Interviews) के द्वारा कुछ परिणाम निकालना आदि।

डेविड ईस्टन (David Easton) ने कहा है, “खोज सुव्यवस्थित रूप से की जानी चाहिए। यदि कोई सिद्धांत आंकड़ों पर आधारित नहीं है तो वह निरर्थक साबित होगा।” आधुनिक विद्वान् वर्तमान काल के लोकतंत्रात्मक शासन के आदर्श स्वरूप के अध्ययन में रुचि न रखकर लोकतंत्र के वास्तविक व्यावहारिक रूप का आनुभाविक अध्ययन करते हैं और इस धारणा से उन्होंने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि अन्य शासन-प्रणालियों की भांति लोकतंत्र में भी एक ही वर्ग-छोटा-सा विशिष्ट वर्ग (Elite)-शासन करता है। यह दृष्टिकोण लोकतंत्र के आनुभाविक अध्ययन का ही परिणाम है।

4. अनौपचारिक कारकों का अध्ययन (Study of Informal Factors) आधुनिक विद्वानों के अनुसार परंपरागत अध्ययन की औपचारिक संस्थाओं; जैसे राज्य, सरकार व दल आदि का अध्ययन काफी नहीं है। वे राजनीतिक वास्तविकताओं को समझने के लिए उन सभी अनौपचारिक कारकों का अध्ययन करना आवश्यक समझते हैं जो राजनीतिक संगठन के व्यवहार को प्रभावित करता है।

वह जनमत, मतदान आचरण (Voting Behaviour), विधानमंडल, कार्यपालिका, न्यायपालिका, राजनीतिक दल, दबाव-समूहों तथा जनसेवकों (Public Servants) के अध्ययन पर भी बल देते हैं। इस श्रेणी में व्यवहारवादी विचारक-डहल, डेविस ईस्टन, आमंड तथा पॉवेल शामिल हैं।

5. मूल्यविहीन अध्ययन (Value-free Study)-आधुनिक लेखक, विशेष रूप से व्यवहारवादी (Behaviouralists), नीति के मूल्यविहीन अध्ययन पर बल देते हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक विचारकों को ‘मूल्यनिरपेक्ष’ अर्थात तटस्थ (Neutral) रहना चाहिए। उन्हें ‘क्या होना चाहिए’ (What ought to be) के स्थान पर ‘क्या है’ (What exists) का उत्तर खोजना चाहिए। उन्हें ठीक तथा गलत के प्रश्नों से मुक्त रहना चाहिए।

लेखक को चाहिए कि वह तथ्यों तथा आंकड़ों के स्थान पर मात्र वर्गीकरण तथा विश्लेषण करे। उसे यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि कौन-सी शासन-प्रणाली अच्छी है और कौन-सी बुरी है। इस प्रकार व्यवहारवादी विचारक मूल्यविहीन अध्ययन पर बल देते हैं जिससे उपयुक्त वातावरण में वास्तविकताओं का अध्ययन किया जा सके।

6. उत्तर व्यवहारवाद-मूल्यों को पुनः स्वीकार करने की पद्धति (Post-Behaviouralism : Acceptance of Values in the Study of Politics)-व्यवहारवादी क्रांति ने आदर्शों तथा मूल्यों को पूर्णतः अस्वीकार कर दिया था। राजनीति को पूर्ण विज्ञान बनाने की चाह में व्यवहारवादी लेखक आंकड़ों तथा तथ्यों में ही उलझकर रह गए थे।

उन्होंने किसी लक्ष्य व आदर्श के साथ जुड़ने से साफ इन्कार कर दिया। परंतु शीघ्र ही एक नई क्रांति का उदय हुआ जिसे उत्तर व्यवहारवाद (Post Behaviouralism) के नाम से पुकारा जाता है। इस युग के सिद्धांतशास्त्रियों को यह अनुभव हो गया कि राजनीति प्राकृतिक विज्ञानों की भांति पूर्ण विज्ञान का रूप नहीं ले सकती। अतः उन्होंने मानवीय उद्गम (Normative Approach) और आनुभाविक उद्गम (Empirical Approach) दोनों को स्वीकार कर लिया।

डेविड ईस्टन की ही भांति कोबन (Cobban) तथा ‘लियो स्ट्रास’ (Leo Starauss) ने भी मूल्यों के पुनर्निर्माण (Reconstruction of Values) पर बल दिया है। जॉन रॉल्स (John Rawls) ने उन सिद्धांतों तथा प्रक्रियाओं का पता लगाने का प्रयत्न किया है जिन पर चलकर हम न्यायोचित समाज की स्थापना कर सकते हैं।

7. समस्या समाधान का प्रयास (Problem Solving Efforts) सिद्धांतशास्त्रियों द्वारा मूल्यों को स्वीकार कर लेने का यह परिणाम निकला है कि अब वे समस्याओं के समाधान में जुट गए हैं। आधुनिक सिद्धांतशास्त्री जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं वे हैं युद्ध तथा शांति, बेरोज़गारी, पर्यावरण, असमानता तथा सामाजिक हलचल। राजसत्ता, प्रभुसत्ता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा न्याय आदि तो पहले से ही राजनीतिक विज्ञान के अंग हैं।

प्रश्न 4.
परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. मुख्यतः वर्णनात्मक अध्ययन (Mainly Descriptive Studies):
परंपरागत सिद्धांत की मुख्य विशेषता यह है कि यह मुख्यतः वर्णनात्मक है। इसका अर्थ यह है कि इसमें केवल राजनीतिक संस्थाओं का वर्णन किया गया है। अतः यह न तो व्याख्यात्मक है, न विश्लेषणात्मक और न ही इसके माध्यम से राजनीतिक समस्या का समाधान हो पाया है। इन विद्वानों के अनुसार राजनीतिक संस्थाओं का वर्णन मात्र पर्याप्त है और उनके द्वारा इस बात पर विचार नहीं किया गया कि इन संस्थाओं की समानताओं तथा भिन्नताओं के मूल में कौन-सी ऐसी परिस्थितियां हैं, जो इन्हें प्रभावित करती हैं।

2. समस्याओं का समाधान करने का प्रयास (Study for Solving Problems):
परंपरागत लेखकों की रचनाओं पर अपने युग की घटनाओं का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है और वे अपने-अपने ढंग से इन समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए प्रयत्नशील थे। उदाहरणस्वरूप, प्लेटो (Plato) के सामने यूनान के नगर-राज्यों के आपसी ईर्ष्या-द्वेष तथा कलह का जो वातावरण मौजूद था उससे छुटकारा पाने के लिए उसने दार्शनिक राजा (Philosopher King) के सिद्धांत की रचना की। उस व्यवस्था का उद्देश्य शासक वर्ग को निजी स्वार्थ से ऊपर रखना था।

दार्शनिक राजा का अपना कोई निजी परिवार नहीं होगा और शासक वर्ग में शामिल अन्य व्यक्तियों को भी अपना निजी परिवार बसाने का अधिकार नहीं होगा। उन्हें तो समस्त समाज को ही अपना परिवार समझना होगा। इटली की तत्कालीन स्थिति को देखकर मैक्यावली (Machiavelli) इस परिणाम पर पहुंचा कि शासक के लिए अपने राज्य को विस्तृत तथा मज़बूत बनाने के लिए झूठ, कपट, हत्या और अन्य सभी साधन उचित हैं।

इस प्रकार इंग्लैंड में अशांति तथा अराजकता की स्थिति को देखते हुए हॉब्स (1588-1679) ने निरंकुश राजतंत्र (Absolute Monarchy) का समर्थन किया। हॉब्स के चिंतन का मुख्य उद्देश्य किसी ऐसी व्यवस्था की खोज करना था जिससे गृह-युद्ध तथा अशांति के वातावरण को समाप्त किया जा सके।

3. परंपरागत चिंतन पर दर्शन, धर्म तथा नीतिशास्त्र का प्रभाव (Influence of Philosophy, Religion and Ethics on Classical Studies):
परंपरागत चिंतन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे दर्शन तथा धर्म से प्रभावित रहा है तथा उसमें नैतिक मूल्य विद्यमान रहे हैं। यद्यपि प्लेटो तथा अरस्तू के चिंतन में ये कुछ हद तक दिखाई देते हैं परंतु इनका स्पष्ट उदाहरण मध्ययुग में ईसाई धर्म द्वारा राज्य के प्रभावित हो जाने पर प्राप्त हुआ।

इस समय राज्य तथा चर्च (Church) के आपसी संबंध को लेकर एक भीषण विवाद उठ खड़ा हुआ जो उस काल की विचारधारा का मुख्य विषय बन गया। यूरोप के कई विद्वानों ने यह विचार व्यक्त किया कि धर्म राज्य से श्रेष्ठ है और धर्माधिकारी भी राज्य के मामलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं।

सेंट थॉमस एक्वीनास (Saint Thomas Acquinas) इसी मत के समर्थक थे। दूसरी ओर, यह विचार निरंतर महत्त्वपूर्ण बना रहा कि राजसत्ता, धर्मसत्ता से श्रेष्ठ है और उसे चर्च को विनियमित करने का अधिकार है। इस विचार का समर्थन मुख्य रूप से विलियम ऑकम (William Occam) द्वारा किया गया।

4. मुख्यतः आदर्शात्मक अध्ययन (Mainly Normative Studies):
परंपरागत चिंतनों के ग्रंथों को पढ़ने से यह पता चलता है कि इनमें कुछ आदर्शों को न केवल पहले से ही स्वीकार कर लिया गया है, बल्कि इन्हीं मान्यताओं की कसौटी पर अन्य देशों की राजनीतिक संस्थाओं व शासन को परखा जाता है। इस प्रकार उन लेखकों ने मानवीय उद्गम (Normative Approach) का सहारा लिया।

मानवीय उद्गम का अर्थ यह है कि पहले मस्तिष्क में किसी विशेष आदर्श की कल्पना कर ली जाती है और फिर उस कल्पना को व्यावहारिक रूप देने के लिए सिद्धांत का निर्माण किया जाता है। इस अध्ययन पद्धति को अपनाने वाले लेखकों में प्लेटो, हॉब्स, रूसो, थाटे तथा हीगल आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन विद्वानों ने मनघड़त अथवा काल्पनिक आदर्शों के आधार पर आदर्श राज्य की रचना का प्रयास किया।

प्लेटो ने दार्शनिक राजा (Philosopher King) तथा रूसो ने सामान्य इच्छा (General Will) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। रूसो के अनुसार सामान्य इच्छा कभी असत्य व भ्रांत नहीं हो सकती और वही शासन अच्छा होगा जो सामान्य इच्छा के अनुसार चलाया जाएगा। हीगल (Hegal) ने लिखा है कि पूर्ण विकसित राज्य राजतंत्र हो सकता है। सम्राट राज्य की एकता का प्रतीक है।

परंतु कुछ परंपरागत लेखक ऐसे भी हैं जिन्होंने मानवीय उद्गम के साथ-साथ आनुभाविक उद्गम (Empirical Approach) को भी अपनाया। उन्होंने तथ्यों तथा आंकड़ों का संकलन करके उनका विधिवत् विश्लेषण किया। उदाहरणस्वरूप अरस्तू ने अपने काल के 158 नगर-राज्यों के संविधानों का अध्ययन किया और फिर उसने अपने आदर्श राज्य की कल्पना की। इसी प्रकार मार्क्स के विचारों में भी मानवीय तथा आनुभाविक, दोनों पद्धतियों का मिला-जुला रूप मिलता है।

5. मुख्यतः कानूनी, औपचारिक तथा संस्थागत अध्ययन (Primarily Legal, Formal and Institutional Studies) परंपरागत अध्ययन मुख्यतः विधि तथा संविधान द्वारा निर्मित औपचारिक संस्थाओं से संबंधित था। उस काल के लेखकों ने इस बात का प्रयास नहीं किया कि संस्था के औपचारिक रूप से बाहर जाकर उसके व्यवहार का अध्ययन किया जाए, जिससे उसके विशिष्ट व्यवहार का परीक्षण किया जा सके।

उदाहरणस्वरूप डायसी (Diecy), जेनिंग्स (Jennings), लास्की (Laski) तथा मुनरो (Munro) आदि विद्वानों ने अपने अध्ययनों में संस्थाओं के कानूनी व औपचारिक रूप का ही अध्ययन किया। इस प्रकार परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत दार्शनिक, आदर्शवादी तथा इतिहासवादी था। प्रश्न 5. राजनीति सिद्धांत के कार्यक्षेत्र या विषय-वस्तु का वर्णन करो।
उत्तर:
आज के युग में मनुष्य के जीवन का कोई भी भाग ऐसा नहीं है जो राजनीति से अछूता रह सके। उदारवादियों ने राज्य तथा राजनीति का संबंध केवल सरकार तथा नागरिकों तक ही सीमित रखा जबकि मार्क्सवादियों ने उत्पादन के सभी साधनों पर राज्य का स्वामित्व माना है। आज के नारीवादी लेखक (Feminist Writers) पारिवारिक तथा घरेलू मामलों में भी राज्य के हस्तक्षेप का समर्थन करते हैं।

इस प्रकार अब राजनीति विज्ञान का क्षेत्र बहुत ही व्यापक हो गया है। राजनीतिक सिद्धांतशास्त्रियों को अब बहुत से विषयों के बारे में सिद्धांतों का निर्माण करना पड़ता है। आजकल मुख्य रूप से निम्नलिखित विषयों को राजनीतिक सिद्धांत के कार्यक्षेत्र में शामिल किया जाता है

1. राज्य का अध्ययन (Study of State):
प्राचीनकाल से ही राज्य की उत्पत्ति, प्रकृति तथा कार्य-क्षेत्र के बारे में विचार होता रहा है कि राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, उसका विकास कैसे हुआ तथा नगर-राज्य के समय से लेकर वर्तमान राष्ट्रीय राज्य के रूप में पहुंचने तक इसके स्वरूप का कैसा विकास हुआ आदि। इसके अतिरिक्त मनुष्य के राज्य संबंधी विचारों में भी लगातार परिवर्तन होता आया है।

प्राचीनकाल में लोग राजा की आज्ञा को ईश्वर की आज्ञा मानते थे और उसका विरोध करना पाप समझा जाता था। परंतु वर्तमान काल में राजनीति शास्त्रियों के अनुसार राज्य की सत्ता का अंतिम स्रोत जनता है और राज्य को जनता की भलाई के लिए ही कार्य करना होता है। इस प्रकार हम राज्य के स्वरूप, उद्देश्यों तथा कार्यक्षेत्र के बारे में अध्ययन करते हैं।

2. सरकार का अध्ययन (Study of the Government):
सरकार ही राज्य का वह तत्त्व है जिसके द्वारा राज्य की अभिव्यक्ति होती है। अतः सरकार भी राजनीतिक सिद्धांत के क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। सरकार के तीन अंग-व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका-माने गए हैं। इन तीनों अंगों का संगठन, इनके अधिकार, इनके आपस में संबंध तथा इन तीनों से संबंधित भिन्न-भिन्न सिद्धांतों का अध्ययन भी हम करते हैं।

जिस प्रकार राज्य के ऐतिहासिक स्वरूप का हमें अध्ययन करना होता है, ठीक उसी प्रकार हमें सरकार के स्वरूप का भी अध्ययन करना होता है जैसे एक समय था, जब दरबारियों की सरकारें हुआ करती थीं, अब वह समय है, जब सरकारें जनता के प्रतिनिधियों की होती हैं। अतः राजनीतिशास्त्र में सरकार के अंग, उसके प्रकार तथा उसके संगठन आदि का भी अध्ययन किया जाता है।

3. नीति-निर्माण प्रक्रिया (Policy-making Process):
आधुनिक विद्वानों के अनुसार नीति-निर्माण प्रक्रिया भी राजनीतिक सिद्धांत के क्षेत्र में अध्ययन की जानी चाहिए। इस विषय में उन सब साधनों का अध्ययन होना चाहिए जो कि शासकीय नीति निश्चित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। इस दृष्टि से राजनीतिशास्त्र में विधानपालिका तथा कार्यपालिका के शासन-संबंधी कार्यों, मतदाताओं, राजनीतिक दलों, उनके संगठनों तथा उनको प्रभावित करने वाले ढंगों का अध्ययन किया जाता है।

राज्य की अनेक संस्थाएं क्या नीतियां अपनाएं, उन नीतियों को किस प्रकार लागू किया जाए, यह भी राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन का एक मुख्य विषय है। सिद्धांतशास्त्रियों ने राजनीतिक दलों की न केवल परिभाषाएं दी हैं, बल्कि उनकी संरचना, कार्यों तथा उनके रूपों के बारे में भी लिखा है।

प्रायः तीन प्रकार की दल-प्रणालियों की चर्चा की जाती है-एकदलीय पद्धति, द्विदलीय पद्धति तथा बहुदलीय पद्धति। इसी प्रकार मतदान तथा प्रतिनिधित्व के विषय में भी कई सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। कुछ वर्ष पहले तक महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखा गया था और इसके पक्ष में अनेक दलीलें दी जाती थीं परंतु अंत में व्यस्क मताधिकार के सिद्धांत की विजय हुई। इस प्रणाली के अंतर्गत केवल कुछ लोगों (पागल, दिवालिये तथा अपराधियों) को छोड़कर अन्य सभी नागरिकों को एक निश्चित आयु प्राप्त करने पर मतदान का अधिकार दे दिया जाता है।

4. शक्ति का अध्ययन (Study of Power):
वर्तमान समय में शक्ति के अध्ययन को भी राजनीतिक सिद्धांत के क्षेत्र में शामिल किया जाता है। शक्ति के कई स्वरूप हैं, जैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक शक्ति, व्यक्तिगत शक्ति, राष्ट्रीय शक्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति इत्यादि। राजनीतिक सिद्धांतकार शक्ति के इन विभिन्न रूपों के पारस्परिक संबंधों को देखता है और यह जानना चाहता है कि मानव समाज में किसको क्या मिलता है, कैसे मिलता है और क्यों मिलता है। परंतु शक्ति के अध्ययन में प्रमुख स्थान राजनीतिक शक्ति को दिया जाता है और राजनीतिक सिद्धांतकार इसी को महत्त्व देते हैं।

5. व्यक्ति तथा राज्य के संबंधों का अध्ययन (Study of Individual’s Relations with State):
व्यक्ति और राज्य का क्या संबंध हो, इस विषय पर राजनीतिक सिद्धांत के विद्वानों ने अपने-अपने मत दिए। प्राचीनकाल से लेकर अब तक इस विषय पर अनेक विरोधी विचार आए हैं। 18वीं सदी में व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अत्यधिक बल दिया गया तथा राज्य के अधिकारों को सीमित करने का समर्थन किया गया। आदर्शवादियों के विचारों में काफी मतभेद रहा है।

वर्तमान लोकतंत्रीय व्यवस्था ने मौलिक अधिकारों पर बहुत जोर दिया है, ताकि व्यक्ति का पूर्ण विकास हो सके। संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से आरंभ होकर अब तक जितने भी संविधान बने हैं उनमें नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है। यहाँ तक कि साम्यवादी राज्यों में भी नागरिकों को मौलिक अधिकर दिए गए हैं भले ही उनकी रक्षा की उचित व्यवस्था न की गई हो।

आज जबकि भिन्न-भिन्न विचारधाराओं को अपनाने वाले देश अपने राज्यों में ‘कल्याणकारी राज्य’ के सिद्धांतों को अपना रहे हैं जिनके अनुसार राज्य नागरिकों के जीवन के सभी क्षेत्रों-राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक आदि में हस्तक्षेप कर सकता है। यह प्रश्न बहुत ही महत्त्वपूर्ण बना हुआ है कि इस परिस्थिति में नागरिकों के अधिकारों को किस हद तक सुरक्षित किया जाए।

भारत में जहाँ आर्थिक व्यवस्था एक निश्चित योजना के अनुसार चलाई जा रही है, वहाँ भी यह प्रश्न गंभीर है कि कहीं इससे राज्य नागरिकों के अधिकारों का अतिक्रमण न कर दे। अतः यह स्पष्ट है कि व्यक्ति तथा राज्य के आपसी संबंध राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण विषय हैं।

6. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन (Study of International Relations):
आवागमन के विकास के कारण आज का संसार एक लघु संसार बन गया है जिसके कारण भिन्न-भिन्न राज्यों में आपसी संबंध होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि आज हमें राजनीतिक सिद्धांत में अंतर्राष्ट्रीय कानून तथा भिन्न-भिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठनों जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations Organization) आदि का अध्ययन भी राजनीतिक क्षेत्र में आता है।

7. शक्ति सिद्धांत तथा क्षेत्रीय संगठन जैसे यूरोपियन समुदाय तथा दक्षेस का अध्ययन (Study of the concept of Power and Regional Organization like SAARC and European Community):
राजनीतिशास्त्र के आधुनिक विद्वानों ने शक्ति को इस शास्त्र का मुख्य विषय माना है। उनके अनुसार राजनीति में जो कुछ होता है वह सब इसी शक्ति-संघर्ष के कारण होता है। कैटलीन ने भी राजनीति को संघर्ष पर आधारित माना है। उसके अनुसार जहाँ कहीं भी राजनीति है, वहाँ शक्ति का होना स्वाभाविक है। इसी विचारधारा का समर्थन लासवैल ने भी किया है।

इन विद्वानों के अनुसार शक्ति के कई रूप; जैसे सत्ता, प्रभाव, बल, अनुनय, दमन या दबाव भी हो सकते हैं जो परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। राज्य और राजनीतिक संस्थाओं द्वारा शक्ति और उसके विभिन्न रूपों का प्रयोग किया जाता है परंतु इसके साथ-साथ राजनीति में सहयोग का भी प्रमुख स्थान है।

8. स्वतंत्रता, समानता तथा न्याय के आदर्शों की समीक्षा (Review of the ideals of Liberty, Equality and Justice):
प्राचीनकाल से लेकर अब तक ऐसे अनेक राजनीतिक विचारक हुए हैं जो बहुत-सी विचारधाराओं–व्यक्तिवाद, आदर्शवाद, मार्क्सवाद, समाजवाद, उपयोगितावाद तथा गांधीवाद आदि के साथ जुड़े हुए हैं। इन सभी विचारधाराओं का लक्ष्य एक ऐसे समाज की स्थापना करना था जिसमें स्वतंत्रता, समानता तथा न्याय के सिद्धांत को समर्थन प्राप्त हो।

उदारवादियों ने राजनीतिक स्वतंत्रता तथा नागरिकों के अधिकारों के लिए जो संघर्ष किया उसका समर्थन कार्ल मार्क्स द्वारा भी किया गया। यद्यपि उन्होंने इस बात पर बल दिया कि वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना तभी होगी जब समाज से वर्ग-भेद दूर हो जाएंगे। महात्मा गांधी ने एक ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें सत्ता का अधिक से अधिक विकेंद्रीकरण होगा। यह विकेंद्रीकरण न केवल राजनीतिक तथा प्रशासनिक क्षेत्रों में बल्कि आर्थिक क्षेत्रों में भी होगा। ऐसी व्यवस्था में प्रशासन, उत्पादन तथा वितरण की मूल इकाई ‘ग्राम’ (Village) होगा। इसे उन्होंने ग्राम स्वराज्य का नाम दिया।

9. नारीवाद (Feminism):
इसमें कोई संदेह नहीं है कि पारिवारिक मामलों में केवल एक सीमा तक ही सरकार द्वारा हस्तक्षेप किया जा सकता है परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार इस ओर कोई भी ध्यान न दे। अनेक देशों में स्त्रियों की दशा को लए आंदोलन हो रहे हैं परंतु व्यक्तिवादी तथा मार्क्सवादी विचारकों ने एक लंबे अर्से तक नारी-उत्पीड़न के विरुद्ध कोई आवाज़ नहीं उठाई।

सन् 1970 के दशक में स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के लिए बहुत गंभीर प्रयत्न किए गए और अनेक लेखकों ने इस बात पर विचार प्रकट किया है कि सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक सभी क्षेत्रों में उनकी स्थिति कैसे सुनिश्चित की जाए।

भारत में सती-प्रथा, बाल-विवाह तथा देवदासी प्रथा के विरुद्ध लड़ाई लड़ी गई और राज्य द्वारा इनके विरुद्ध कानून पास करके ही इन्हें समाप्त किया गया। अब भारत में सभी स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं के लिए 1/3 स्थान सुरक्षित करने की व्यवस्था की गई है और संसद तथा राज्य विधानमंडलों में भी उनके लिए स्थान सुरक्षित रखने से संबंधित बिल विचाराधीन है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धांत : एक परिचय

10. मानव व्यवहार का अध्ययन (Study of Human Behaviour):
राजनीति के आधुनिक विद्वानों ने राजनीतिक व्यवहार को राजनीतिशास्त्र का मुख्य विषय माना है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि राजनीतिक क्षेत्र में व्यक्ति जो कुछ करता है उसके पीछे जो प्रेरणाएं कार्य करती हैं उनका अध्ययन राजनीतिक सिद्धांत में होना चाहिए। इस प्रकार राजनीति मनुष्य व्यवहार के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।

मनुष्य समाज में रहते हुए जो कुछ क्रिया-कलाप करता है वे सभी क्रिया-कलाप राजनीतिक सिद्धांत के अंतर्गत आने चाहिएं। इन आधुनिक विद्वानों, जो व्यवहारवादी दृष्टिकोण से राजनीतिक सिद्धांत के विषय का अध्ययन करते हैं, की मान्यताएं हैं कि मनुष्य भावनाओं का समूह होता है, उसकी अपनी प्रवृत्तियां और इच्छाएँ होती हैं जिनके अनुसार उसका राजनीतिक व्यवहार नियंत्रित होता है।

इसलिए ये आधुनिक विद्वान् व्यक्ति या व्यक्ति-समूहों के राजनीतिक व्यवहार को बहुत महत्व देते हैं और राजनीतिक संस्थाओं को बहुत कम। मनुष्य के व्यवहार का वैज्ञानिक रीति से अध्ययन करके उसकी कमियों को दूर करने के उपाय बतलाए जा सकते हैं जिससे कि भविष्य में ऐसी गलतियां न हों।

11. विकास, आधुनिकीकरण और पर्यावरण की समस्याएँ (Problems of Development, Modernization and Environment):
समाजशास्त्र के बढ़ते प्रभाव के कारण राजनीतिक सिद्धांत में कुछ नवीन अवधारणाओं को भी अपनाया गया है जिसमें समाजीकरण, विकास, गरीबी, असमानता तथा आधुनिकीकरण आदि शामिल हैं। विकासशील देशों के राजनीतिक विकास के संबंध में लिखने वाले लेखकों में जी० आमण्ड (G. Almond) तथा डेविड एप्टर (David Apter) हैं।

माईरन वीनर (Myren Wenir) तथा रजनी कोठारी (Rajni Kothari) ने भारत के सामाजिक एवं राजनीतिक विकास का क्रमबद्ध अध्ययन किया जिससे जातिवाद, संप्रदायवाद तथा दलित राजनीति अब भारतीय राजनीति के मुख्य केंद्र-बिंदु बन गए हैं।

पिछले कई वर्षों से पर्यावरण संबंधी समस्याएं भी मनुष्य जाति के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरकर सामने आई हैं। पर्यावरण संरक्षण के अनेक उपाय सुझाए जाते हैं; जैसे जनसंख्या नियंत्रण, वन सर्वेक्षण तथा औद्योगिक विकास के लिए साफ-सुथरे वातावरण की आवश्यकता आदि।
इस प्रकार हम देखते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है और यह दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है।

प्रश्न 6.
राजनीति सिद्धांत के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राजनीतिक सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य मनुष्य के समक्ष आने वाली सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक समस्याओं का समाधान ढूंढना है। यह मनुष्य के सामने आई कठिनाइयों की व्याख्या करता है तथा सुझाव देता है ताकि मनुष्य अपना जीवन अच्छी प्रकार व्यतीत कर सके। राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन के महत्त्व (उद्देश्य) को निम्नलिखित तथ्यों से प्रकट किया जा सकता है

1. भविष्य की योजना संभव बनाता है (Makes Future Planning Possible):
राजनीतिक सिद्धांत सामान्यीकरण (Generalization) पर आधारित है, अतः यह वैज्ञानिक होता है। इसी सामान्यीकरण के आधार पर वह राजनीति विज्ञान को तथा राजनीतिक व्यवहार को भी एक विज्ञान बनाने का प्रयास करता है। वह उसके लिए नए-नए क्षेत्र ढूंढता है और नई परिस्थितियों में समस्याओं के निदान के लिए नए-नए सिद्धांतों का निर्माण करता है।

ये सिद्धांत न केवल तत्कालीन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं बल्कि भविष्य की परिस्थितियों का भी आंकलन करते हैं। वे कुछ सीमा तक भविष्यवाणी भी कर सकते हैं। इस प्रकार देश व समाज के हितों को ध्यान में रखकर भविष्य की योजना बनाना संभव होता है।

2. वास्तविकता को समझने का साधन (Source to Know the Truth):
राजनीतिक सिद्धांत हमें राजनीतिक वास्तविकताओं मझने में सहायता प्रदान करता है। सिद्धांतशास्त्री सिद्धांत का निर्माण करने से पहले समाज में विद्यमान सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों का तथा समाज की इच्छाओं, आकांक्षाओं व प्रवृत्तियों का अध्ययन करता है तथा उन्हें उजागर करता है।

वह अध्ययन तथ्यों तथा घटनाओं का विश्लेषण करके समाज में प्रचलित कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों को उजागर करता है। वास्तविकता को जानने के पश्चात ही हम किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं। अतः यह हमें शक की स्थिति से बाहर निकाल देता है।

3. अवधारणा के निर्माण की प्रक्रिया संभव (Process of the Concept of Construction Possible):
राजनीतिक सिद्धांत विभिन्न विचारों का संग्रह है। यह किसी राजनीतिक घटना को लेकर उस पर विभिन्न विचारों को इकट्ठा करता है तथा उनका विश्लेषण करता है। जब कोई निष्कर्ष निकल आता है तो उसकी तुलना की जाती है। उन विचारों की परख की जाती है तथा अंत में एक धारणा बना ली जाती है। यह एक गतिशील प्रक्रिया है जो नए संकलित तथ्यों को पुनः नए सिद्धांत में बदल देती है।

4. समस्याओं के समाधान में सहायक (Useful in Solving Problems):
राजनीतिक सिद्धांत का प्रयोग शांति, विकास, अभाव तथा अन्य सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक समस्याओं के लिए भी किया जाता है। राष्ट्रवाद, प्रभुसत्ता, जातिवाद तथा युद्ध जैसी गंभीर समस्याओं को सिद्धांत के माध्यम से ही नियंत्रित किया जा सकता है। सिद्धांत समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त करते हैं और निदानों (Solutions) को बल प्रदान करते हैं। बिना सिद्धांत के जटिल समस्याओं को सुलझाना संभव नहीं होता।

5. सरकार (शासन) को औचित्य प्रदान करता है (Provides legitimacy to the Government):
कोई भी सरकार (शासन) केवल दमन तथा आतंक के आधार पर अधिक समय तक नहीं चल सकती। उसका ‘वैधीकरण’ आवश्यक होता है। जनता के मन में यह विश्वास बिठाना आवश्यक होता है कि अमुक व्यक्ति अथवा दल को देश पर शासन करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है। जब भी कोई शासक शासन पर अधिकार करता है और शासन के स्वरूप को बदलता है तब वह उसके औचित्य को सिद्ध करने के लिए किसी सिद्धांत का सहारा लेता है।

हिटलर तथा मुसोलिनी जैसे व्यक्तियों ने भी अपनी तानाशाही स्थापित करने के लिए क्रमशः नाजीवाद (Nazism) तथा फासीवाद (Fascism) जैसी विचारधाराओं का सहारा लिया। लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद तथा विशिष्ट वर्गीय शासन की स्थापना के लिए भी सिद्धांत ही औचित्य प्रदान करते हैं। अपनी विचारधाराओं का जनता में प्रचार करके वे जनता का समर्थन प्राप्त करने तथा लोगों का विश्वास जीतने में सफल होते हैं। इससे उनका वैधीकरण हो जाता है।

6. अनुगामियों का मार्गदर्शन (Guidance to Followers):
सिद्धांतशास्त्री विभिन्न सिद्धांतों का निर्माण करके अपने अनुगामियों तथा समर्थकों व शिष्यों का मार्गदर्शन करते हैं तथा उनमें आत्मविश्वास की भावना उत्पन्न करते हैं। हिन्दू चिंतन की लंबी परंपरा में अनेक ऋषियों ने अपने संपूर्ण जीवन को लगाकर विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे सार्वकालिक सिद्धांतों की रचना की जो हजारों वर्षों के पश्चात भी उनके अनुयायियों तथा समर्थकों का मार्गदर्शन कर रहे हैं और वे बड़े आत्मविश्वास के साथ इन सिद्धांतों का अनुसरण करते हैं।

मार्क्स (Marx) तथा एंगेल्स (Engles) ने जिस साम्यवादी विचारधारा का प्रतिपादन किया और जिस सिद्धांत की रचना की उसने उनके समर्थकों में बहुत विश्वास उत्पन्न किया था।

7. सिद्धांत राजनीतिक आंदोलन के प्रेरणा स्रोत बनते हैं (Theories become inspiration behind many Political Movements):
सिद्धांत राजनीतिक आंदोलनों को प्रभावित करते हैं। लेनिन (Lenin) जो राजनीतिक आंदोलन के लिए सिद्धांत के महत्व को समझते थे, ने सन् 1902 में कहा था, “एक विकसित या प्रगतिशील सिद्धांत के बिना कोई दल किसी संघर्ष का नेतृत्व नहीं कर सकता।” लेनिन (Lenin) ने यह बात बार-बार कही, “क्रांतिकारी सिद्धांत के बिना क्रांतिकारी आंदोलन संभव नहीं है।”

भारत में गांधी जी द्वारा चलाए गए राष्ट्रीय आंदोलन के पीछे देशवासियों का समर्थन उस विचारधारा के कारण था जो .. सत्य तथा अहिंसा के आधार पर आधारित था। इस प्रकार प्लेटो, अरस्तू, चाणक्य, लॉक, माण्टेस्क्यू, गांधी, मार्क्स तथा एगेल्स जैसे . विचारकों की कृतियों में उस समय की परिस्थितियों के संबंध में जो प्रश्न उन्होंने उठाए, उनका आज भी महत्व है। 20वीं शताब्दी में इस कार्य के लिए ग्राहम वालास, लास्की, मैकाइवर, चार्ल्स मैरियम, रॉबर्ट डहल, डेविड ईस्टन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

8. सामाजिक परिवर्तन को समझने में सहायक (Helpful in understanding the Social Change):
मानव समाज एक गतिशील संस्था है जिसमें दिन-प्रतिदिन परिवर्तन होते रहते हैं। ये परिवर्तन समाज के राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर कुछ न कुछ प्रभाव डालते हैं। ऐसे परिवर्तनों के विभिन्न पक्षों तथा उनके द्वारा उत्पन्न हुए प्रभावों को समझने के लिए राजनीतिक सिद्धांत सहायक सिद्ध होता है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन देशों में स्थापित सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध क्रांतियां हुईं अथवा विद्रोह हुए उनका मुख्य कारण यह था कि स्थापित सामाजिक व्यवस्थाएं (Established Social Order) नई उत्पन्न परिस्थितियों के अनुकूल नहीं थीं। फ्रांस की सन् 1789 की क्रांति का उदाहरण हमारे सामने है।

कार्ल मार्क्स ने राजनीतिक सिद्धांत को एक विचारधारा (Ideology) का ही रूप माना है और उसका विचार था कि जब नई सामाजिक व्यवस्था (वर्गविहीन तथा राज्यविहीन समाज) की स्थापना हो जाएगी तो फिर सिद्धांतीकरण की आवश्यकता नहीं रहेगी। मार्क्स ने एक विशेष विचारधारा और कार्यक्रम के आधार पर वर्गविहीन और राज्यविहीन समाज की कल्पना की थी।

उसका यह विचार ठीक नहीं है कि ऐसा समाज स्थापित हो जाने के पश्चात सिद्धांतीकरण (Theorising) की आवश्यकता नहीं रहेगी। वास्तव में, सभ्यता के निरंतर हो रहे विकास के कारण जैसे-जैसे मानव-समाज का अधिक विकास होगा वैसे-वैसे सामाजिक परिवर्तन को समझने तथा उसकी व्याख्या करने के लिए राजनीतिक सिद्धांत की आवश्यकता महसूस होगी।

9. स्पष्टता प्राप्त करना (Acquiring Clarity):
राजनीतिक सिद्धांत वैचारिक तथा विश्लेषणात्मक स्पष्टता (Conceptual and Analytical) प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण सहायता करते हैं। राजनीतिक विचारों का यह कर्त्तव्य है कि लोकतंत्र, कानून, स्वतंत्रता, समानता तथा न्याय आदि मूल्यों की रक्षा करें। इसके लिए राजनीतिक सिद्धांत का ज्ञान होना अति आवश्यक है क्योंकि इससे हमें इन राजनीतिक अवधारणाओं का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त होता है। ये स्पष्टतया विश्लेषणात्मक अध्ययन से प्राप्त होती हैं।

10. राजनीतिक सिद्धांत की राजनीतिज्ञों, नागरिकों तथा प्रशासकों के लिए उपयोगिता (Utility of Political Theory for Politicians, Citizens and Administrators) राजनीतिक सिद्धांत के द्वारा वास्तविक राजनीति के अनेक स्वरूपों का शीघ्र ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है जिस कारण वे अपने सही निर्णय ले सकते हैं।

डॉ० श्यामलाल वर्मा ने लिखा है, “उनका यह कहना केवल ढोंग या अहंकार है कि उन्हें राज सिद्धांत की कोई आवश्यकता नहीं है या उसके बिना ही अपना कार्य कुशलतापूर्वक कर रहे हैं अथवा कर सकते हैं। वास्तविक बात यह है कि ऐसा करते हुए भी वे किसी न किसी प्रकार के राज-सिद्धांत को काम में लेते हैं।” इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीतिक विज्ञान के सम्पूर्ण ढांचे का भविष्य राजनीतिक सिद्धांत के निर्माण पर ही निर्भर करता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. निम्नलिखित में से किस विद्वान को प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक कहा जाता है ?
(A) प्लेटो
(B) सुकरात
(C) अरस्तू
(D) कार्ल मार्क्स
उत्तर:
(C) अरस्तू

2. राजनीति की प्रकृति संबंधी यूनानी दृष्टिकोण की विशेषता निम्न में से नहीं है
(A) राज्य एक नैतिक संस्था है
(B) राज्य एवं समाज में अंतर नहीं
(C) राजनीति एक वर्ग-संघर्ष है।
(D) नगर-राज्यों से संबंधित अध्ययन पर बल
उत्तर:
(C) राजनीति एक वर्ग-संघर्ष है

3. निम्नलिखित में से राजनीति संबंधी परंपरागत दृष्टिकोण के समर्थक हैं
(A) प्लेटो
(B) हॉब्स
(C) रूसो
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धांत : एक परिचय

4. राजनीति संबंधी परंपरावादी दृष्टिकोण की विशेषता निम्नलिखित में से है
(A) दार्शनिक एवं विचारात्मक पद्धति में विश्वास
(B) नैतिकवाद एवं अध्यात्मवाद में विश्वास
(C) राजनीति शास्त्र को विज्ञान के रूप में स्वीकार करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. राजनीति संबंधी आधुनिक दृष्टिकोण की विशेषता निम्नलिखित में से नहीं है
(A) राजनीति शक्ति का अध्ययन है
(B) राजनीति एक वर्ग-संघर्ष है
(C) राजनीति केवल राज्य एवं सरकार का अध्ययन
(D) राजनीति समूची राजनीतिक व्यवस्था का विश्लेषण है मात्र है
उत्तर:
(C) राजनीति केवल राज्य एवं सरकार का अध्ययन

6. मात्र है “राजनीति शास्त्र शासन के तत्त्वों का अनुसंधान उसी प्रकार करता है जैसे अर्थशास्त्र संपत्ति का जीवशास्त्र जीवन का, बीजगणित अंकों का तथा ज्यामिति-शास्त्र स्थान तथा ऊंचाई का करता है।” यह कथन निम्नलिखित में से किस विद्वान का है?
(A) गार्नर
(B) लाई एक्टन
(C) गैटेल
(D) सीले
उत्तर:
(D) सीले

7. निम्नलिखित में से परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत का लक्षण है
(A) यह मुख्यतः वर्णनात्मक अध्ययन है
(B) यह मुख्यतः आदर्शात्मक अध्ययन है
(C) यह मुख्यतः कानूनी, औपचारिक एवं संस्थागत अध्ययन है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

8. निम्नलिखित में से आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत का लक्षण नहीं है
(A) विश्लेषणात्मक अध्ययन
(B) आनुभाविक अध्ययन
(C) अनौपचारिक कारकों का अध्ययन
(D) वर्णनात्मक अध्ययन पर बल
उत्तर:
(D) वर्णनात्मक अध्ययन पर बल

9. राजनीतिक सिद्धांत के क्षेत्र में निम्नलिखित में से सम्मिलित है
(A) शक्ति का अध्ययन
(B) राज्य एवं सरकार का अध्ययन
(C) मानव व्यवहार का अध्ययन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

10. राजनीतिक सिद्धांत के क्षेत्र में निम्नलिखित में से सम्मिलित नहीं है
(A) राज्य एवं व्यक्तियों के संबंधों का अध्ययन
(B) नारीवाद का अध्ययन
(C) विदेशी संविधानों का अध्ययन
(D) अंतर्राष्ट्रीय संबंधों एवं संगठनों का अध्ययन
उत्तर:
(C) विदेशी संविधानों का अध्ययन

11. राजनीतिक सिद्धांत का महत्त्व निम्न में से है
(A) यह राजनीतिक वास्तविकताओं को समझने में सहायक है
(B) यह सामाजिक परिवर्तन को समझने में सहायक है
(C) यह सरकार को औचित्यपूर्णता प्रदान करने में सहायक है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दें

1. ‘पॉलिटिक्स’ नामक ग्रंथ के रचयिता कौन हैं?
उत्तर:
अरस्तू।

2. “राजनीति शास्त्र का प्रारंभ तथा अंत राज्य के साथ होता है।” यह कथन किस विद्वान का है?
उत्तर:
गार्नर का।

3. राजनीति शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के किस शब्द से हुई है?
उत्तर:
पोलिस (Polis) शब्द से।

4. थ्योरी (Theory) शब्द की उत्पत्ति थ्योरिया (Theoria) शब्द से हुई है। यह शब्द किस भाषा से लिया गया है?
उत्तर:
ग्रीक भाषा से।

5. “राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानव समाज अपनी समस्याओं का समाधान करता है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
हरबर्ट जे० स्पाइरो ने।

रिक्त स्थान भरें

1. “राजनीतिक सिद्धांत एक प्रकार का जाल है जिससे संसार को पकड़ा जा सकता है, ताकि उसे समझा जा सके। यह एक अनुभवपूरक व्यवस्था के प्रारूप की अपने मन की आँख पर बताई गई रचना है।” यह कथन ………… विद्वान का है।
उत्तर:
कार्ल पॉपर

2. “समस्त राजनीति स्वभाव से शक्ति-संघर्ष है।” यह कथन ……………. ने कहा।
उत्तर:
केटलिन

3. “राजनीति का संबंध मूल्यों के अधिकारिक आबंटन से है।” यह कथन ……………. ने कहा।
उत्तर:
डेविड ईस्टन।

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संघात्मक सरकार किसे कहा जाता है?
उत्तर:
संघात्मक सरकार उसे कहा जाता है, जिसमें शासन की शक्तियाँ संविधान द्वारा केंद्र तथा राज्यों में बंटी हुई हों तथा प्रत्येक इकाई अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतन्त्र हो।

प्रश्न 2.
भारत के संविधान में संघ के स्थान पर किन शब्दों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
भारत के संविधान में भारत के लिए ‘संघ’ के स्थान पर ‘राज्यों का संघ’ शब्द का प्रयोग किया गया है।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान के कोई दो संघात्मक लक्षण बताएँ।
उत्तर:

  • भारतीय संविधान लिखित तथा कठोर है,
  • संविधान द्वारा केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का बँटवारा किया गया है।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान के कोई दो एकात्मक लक्षण बताइए।
उत्तर:

  • संकटकालीन स्थिति की घोषणा होने पर हमारा संघीय ढाँचा एकात्मक में बदल जाता है।
  • भारतीय संविधान द्वारा देश के प्रत्येक नागरिक के लिए इकहरी नागरिकता के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

प्रश्न 5.
भारत में केंद्रीय सरकार को अधिक शक्तिशाली बनाने के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • समस्त देश के आर्थिक विकास के लिए,
  • स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय देशी रियासतों की समस्या तथा भारत की एकता व अखण्डता को बनाए रखना।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान द्वारा शासन की शक्तियों को कितनी तथा कौन-सी सूचियों में बाँटा गया है? प्रत्येक सूची में दिए गए तीन-तीन विषय लिखिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान द्वारा शासन की शक्तियों को तीन सूचियों में बाँटा गया है। ये हैं-

  • संघीय सूची,
  • राज्य सूची तथा
  • समवर्ती सूची।

संघीय सूची में विदेशी मामले, प्रतिरक्षा व रेलवे, राज्य सूची में कृषि, पुलिस व जेलें तथा समवर्ती सूची में शिक्षा, विवाह व तलाक आदि विषय शामिल हैं।

प्रश्न 7.
समवर्ती सूची में दिए गए विषयों के सम्बन्ध में कानून बनाने की शक्ति किसके पास है ?
उत्तर:
समवर्ती सूची में दिए गए विषयों पर संसद तथा राज्य विधानमण्डल दोनों को कानून बनाने का अधिकार है। दोनों द्वारा परस्पर विरोधी कानून बनाने की स्थिति में संसद द्वारा बनाया गया कानून लागू होगा।

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प्रश्न 8.
अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) किसे कहते हैं? भारतीय संविधान द्वारा ये शक्तियाँ किसे दी गई हैं?
उत्तर:
अवशिष्ट शक्तियाँ वे विषय हैं जिनका वर्णन तीनों सूचियों संघ सूची, राज्य सूची तथा समवर्ती सूची में से किसी में भी नहीं किया गया है। इन पर कानून बनाने की शक्ति संसद को दी गई है।

प्रश्न 9.
अन्तर्राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) की स्थापना क्यों तथा किसके द्वारा की जाती है?
उत्तर:
अन्तर्राज्यीय परिषद् की स्थापना राज्यों के आपसी झगड़ों का निपटारा करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

प्रश्न 10.
पॉल एपलबी (Paul Appleby) ने भारतीय संघात्मक व्यवस्था को कैसी संघात्मक व्यवस्था का नाम दिया है?
उत्तर:
पॉल एपलबी (Paul Appleby) ने भारतीय संघवाद व्यवस्था को अत्यन्त संघात्मक (Extremely Federal) व्यवस्था का नाम दिया है।

प्रश्न 11.
सातवीं अनुसूची में कितनी सूचियाँ दी गई हैं और प्रत्येक में कितने विषय शामिल हैं?
उत्तर:
सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ-संघ सूची, समवर्ती सूची व राज्य सूची हैं। संघ सूची में मूलतः 97 विषय (वर्तमान में 100 विषय), समवर्ती सूची में मूलतः 47 (वर्तमान में 52 विषय) विषय तथा राज्य सूची में मूलतः 66 विषय (वर्तमान में 61 विषय) शामिल हैं।

प्रश्न 12.
समवर्ती सूची में मूल रूप से कितने विषय थे और वर्तमान में कितने विषय हैं?
उत्तर:
समवर्ती सूची में मूल रूप से 47 विषय थे और वर्तमान में 52 विषय हैं।

प्रश्न 13.
संघ सूची में मूल रूप से कितने विषय थे और वर्तमान में कितने विषय हैं ?
उत्तर:
संघ सूची में मूल रूप से 97 विषय थे और वर्तमान में भी 100 विषय ही हैं।

प्रश्न 14.
राज्य सूची में मूल रूप से कितने विषय थे और अब कितने विषय हैं?
उत्तर:
राज्य सूची में मूल रूप से 66 विषय थे और वर्तमान में 61 विषय हैं।

प्रश्न 15.
राज्य सूची में दिए गए किन्हीं दो विषयों के नाम बताइए।
उत्तर:
राज्य सूची में निम्नलिखित दो विषय हैं-

  • कानून व शान्ति-व्यवस्था,
  • कृषि।

प्रश्न 16.
समवर्ती सूची में दिए गए दो विषयों के नाम बताइए।
उत्तर:
समवर्ती सूची में निम्नलिखित दो विषय हैं-

  • दण्ड विधान,
  • विवाह।

प्रश्न 17.
केंद्र की आय के दो साधन बताइए।
उत्तर:
केंद्र की आय के दो साधन हैं-

  • सीमा-शुल्क,
  • आय-कर।

प्रश्न 18.
राज्यों की आय के दो साधन बताइए।
उत्तर:
राज्यों की आय के दो साधन हैं

  • बिक्री-कर
  • कषि भूमि के उत्तराधिकार के विषय में शल्क।

प्रश्न 19.
केंद्र व राज्यों के बीच तनाव के दो कारण बताइए।
उत्तर:
केंद्र व राज्यों के बीच तनाव के दो प्रमुख कारण हैं-

  • राज्यपालों की भेदभावपूर्ण तथा विवादास्पद भूमिका,
  • केंद्र द्वारा उन राज्यों के साथ भेदभाव किया जाना, जिनमें विपक्षी दलों की सरकारें होती हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

प्रश्न 20.
वित्त आयोग की नियुक्ति कौन करता है और उसके क्या कार्य हैं?
अथवा
वित्त आयोग की स्थापना क्यों की जाती है? इसके सदस्यों की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर:
वित्त आयोग की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। वित्त आयोग देश की वित्तीय व्यवस्था का परीक्षण करता है और केंद्र व राज्यों के बीच वित्तीय सम्बन्धों के बारे में भी सिफारिश करता है।

प्रश्न 21.
केंद्र-राज्य सम्बन्धों पर पुनः विचार करने के लिए कब और किस आयोग की स्थापना की गई थी? अथवा सरकारिया आयोग की स्थापना कब और किस उद्देश्य के लिए की गई थी?
उत्तर:
9 जून, 1983 को केंद्र-राज्य सम्बन्धों पर पुनः विचार करने के लिए केंद्रीय सरकार ने सरकारिया आयोग की स्थापना की थी, जिसके अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश श्री आर०एस० सरकारिया थे।

प्रश्न 22.
सरकारिया आयोग की कोई दो सिफारिशें बताइए।
उत्तर:
सरकारिया आयोग की दो प्रमुख सिफारिशें थीं-

  • केंद्र को राज्यों में केंद्रीय पुलिस बल नियुक्त करने का अधिकार बना रहे,
  • अन्तर्राज्यीय परिषदों की स्थापना की जाए।

प्रश्न 23.
उन दो परिस्थितियों को बताएँ जिनमें कि संसद राज्य सूची पर कानून बना सकती है।
उत्तर:
संसद राज्य सूची पर दी गई दो परिस्थितियों में कानून बना सकती है-

  • अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि व समझौते लागू करने पर,
  • जब राज्यसभा राज्य सूची के किसी विषय को 2/3 बहुमत से राष्ट्रीय महत्त्व को घोषित कर दे।

प्रश्न 24.
केंद्र व राज्यों के बीच दो विधायी सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
केंद्र व राज्यों के बीच दो विधायी सम्बन्ध इस प्रकार हैं-(1) समवर्ती सूची के विषय पर केंद्र व राज्य दोनों ही कानून बना सकते हैं, (2) राज्यपाल विधान सभा द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेज सकता है।

प्रश्न 25.
केंद्र व राज्यों के बीच दो वित्तीय सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
केंद्र व राज्यों के बीच दो वित्तीय सम्बन्ध इस प्रकार हैं-

  • केंद्र राज्यों को अनुदान देता है,
  • वित्तीय संकट की स्थिति में केंद्र राज्यों की आय के साधनों में परिवर्तन कर सकता है।

प्रश्न 26.
केंद्र व राज्यों के बीच दो प्रशासनिक सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
केंद्र व राज्यों के बीच दो प्रशासनिक सम्बन्ध इस प्रकार हैं-

  • केंद्र राज्यों में केंद्रीय पुलिस बल भेज सकता है,
  • राज्य के उच्च प्रशासनिक अधिकारी अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्य होते हैं।

प्रश्न 27.
केंद्र कब और किस आधार पर राज्य में आपात स्थिति लागू कर सकता है?
उत्तर:
केंद्र राज्य में संवैधानिक तन्त्र विफल हो जाने पर आपात स्थिति लागू कर सकता है। ऐसा केंद्र राज्यपाल की रिपोर्ट पर अथवा बिना रिपोर्ट के भी कर सकता है।

प्रश्न 28.
केंद्र-राज्य सम्बन्धों पर विचार-विमर्श हेतु गठित सरकारिया आयोग ने अपनी रिपोर्ट कब प्रस्तुत की?
उत्तर:
केंद्र-राज्य सम्बन्धों पर विचार-विमर्श हेतु गठित सरकारिया आयोग ने अपनी रिपोर्ट 27 अक्तूबर, 1987 को प्रस्तुत की।

प्रश्न 29.
राज्य की स्वायत्तता की मांग के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
राज्यों की स्वायत्तता की माँग के दो कारण इस प्रकार हैं-

  • संसद की व्यापक विधि निर्माण शक्तियाँ,
  • वित्तीय दृष्टि से राज्यों की केंद्र पर निर्भरता।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

प्रश्न 30.
राज्य स्वायत्तता के कोई दो साधन लिखें।
उत्तर:
राज्यों की स्वायत्तता के लिए विभिन्न सुझाए गए साधनों में दो निम्नलिखित हैं-

  • संविधान में संघात्मक शासन का स्थापित किया जाना,
  • राष्ट्रपति के परामर्श हेतु एक समिति का गठन हो जो उसे निष्पक्ष परामर्श प्राप्त करा सके।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संघात्मक सरकार से क्या अभिप्राय है? संक्षेप में व्याख्या करें।
उत्तर:
संघ जिसे अंग्रेजी में (Federation) अथवा (Federal) कहा जाता है, वास्तव में लैटिन भाषा के एक शब्द (Foedus) से बना है जिसका अर्थ है सन्धि अथवा समझौता। इस प्रकार संघ सरकार कुछ राज्यों का एक ऐसा स्थायी संगठन है, जिसकी स्थापना एक समझौते के आधार पर की जाती है। जब दो या अधिक स्वतन्त्र राज्य कुछ सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक केंद्रीय सरकार संगठित करते हैं तथा शेष उद्देश्यों की पूर्ति वे स्वयं करते हैं तो एक संघात्मक शासन की स्थापना हो जाती है।

प्रश्न 2.
संघात्मक सरकार के चार लक्षण बताएँ।।
उत्तर:
संघात्मक सरकार के चार लक्षण निम्नलिखित हैं
1. शक्तियों का बँटवारा संघात्मक सरकार में शक्तियों का बँटवारा होता है। महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ केंद्र के पास तथा स्थानीय महत्त्व की शक्तियाँ राज्य सरकारों को दी जाती हैं। दोनों इकाइयाँ अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतन्त्र होती हैं।

2. लिखित तथा कठोर संविधान संघ राज्य कई राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम होता है, इसलिए समझौते की सभी शर्ते लिखित रूप में होनी चाहिएँ। साथ ही ये शर्ते स्थायी हों, अतः संविधान लिखित तथा कठोर होता है।

3. स्वतन्त्र तथा सर्वोच्च न्यायालय केंद्र तथा राज्यों के आपसी विवादों को निपटाने के लिए तथा कोई भी इकाई संविधान के विरुद्ध कानून न बना सके, इसके लिए एक स्वतन्त्र तथा सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की जाती है।

4. दो-सदनीय विधानपालिका-संघात्मक सरकार में दो-सदनीय विधानमण्डल की आवश्यकता होती है। विधानमण्डल का निम्न सदन राष्ट्र की जनता का प्रतिनिधित्व करता है तथा ऊपरी सदन संघ की इकाइयों का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रश्न 3.
संघात्मक सरकार के चार लाभ बताएँ।
उत्तर:
संघात्मक सरकार के चार मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं
1. शक्तिशाली राज्य की स्थापना-संघ सरकार स्थापित होने से छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर एक शक्तिशाली संघ राज्य कायम हो जाता है।

2. सरकार में अधिक कार्यकुशलता-संघ सरकार में केंद्र तथा राज्यों में शक्तियों तथा कार्य-क्षेत्रों का बँटवारा हो जाने से सरकारों की प्रशासनिक दक्षता बढ़ जाती है।

3. बड़े राज्यों के लिए उपयोगी-संघ सरकार अधिक जनसंख्या तथा भिन्नता वाले राज्यों के लिए उपयुक्त है।

4. अधिक लोकतन्त्रीय संघ सरकार में लोकतन्त्र की संस्थाएँ अधिक तथा प्रत्येक स्तर पर संगठित की जाती हैं। इसमें स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ लोगों को लोकतन्त्र का प्रशिक्षण देती हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान संघात्मक है, स्पष्ट करो।
अथवा
भारतीय संविधान के उन प्रावधानों का उल्लेख करें जो इसे संघीय स्वरूप प्रदान करते हैं।
अथवा
भारतीय संविधान की कोई पाँच संघीय विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान की संघीय विशेषताएँ (लक्षण) इस प्रकार हैं-
(1) भारतीय संविधान द्वारा शासन की शक्तियों का तीन सूचियों में विभाजन किया गया है-

1. संघीय सूची (Union List), इस सूची में राष्ट्रीय महत्त्व के मूलतः 97 विषय (वर्तमान में 100 विषय) हैं जिन पर कानून बनाने की शक्ति संघीय संसद के पास है।

2. राज्य सूची (State List) में मूलतः 66 विषय (वर्तमान में 61 विषय) हैं। ये विषय स्थानीय महत्त्व के हैं और उन पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों के विधानमण्डलों को दिया गया है।

3. समवर्ती सूची (Concurrent List), इस सूची में दिए गए मूल 47 विषयों (वर्तमान में 52 विषय) पर संसद तथा राज्य विधानमण्डल दोनों ही कानून बना सकते हैं,
(2) संविधान देश का सर्वोच्च कानून (Supremacy of the Constitution) है,
(3) भारतीय संविधान लिखित तथा कठोर है,
(4) संविधान की रक्षा करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई है,
(5) संघीय विधानमण्डल (संसद) का गठन द्वि-सदनीय प्रणाली के आधार पर किया गया है। लोकसभा देश की जनता का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधि बैठते हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

प्रश्न 5.
भारत में शक्तिशाली केंद्र की स्थापना के पाँच कारण बताएँ।
उत्तर:
भारत में शक्तिशाली केंद्र की स्थापना के कारण इस प्रकार हैं-

  • ऐतिहासिक अनुभव के कारण संविधान के निर्माताओं ने शक्तिशाली केंद्रीय सरकार की स्थापना की,
  • तत्कालीन परिस्थितियों भारत का विभाजन, साम्प्रदायिक दंगों, तेलंगाना में सशस्त्र किसान आन्दोलन, भारतीय देशी रियासतों की समस्या इत्यादि ने भी संविधान निर्माताओं को प्रभावित किया,
  • भारतीय आर्थिक समस्याओं के समाधान हेतु भी केंद्रीय शासन का शक्तिशाली होना अनिवार्य था,
  • समस्त संसार में केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति विद्यमान है, भारत इसका कोई अपवाद नहीं है,
  • स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत में 562 देशी रियासतें मौजूद थीं। संविधान निर्माताओं ने देशी रियासतों की समस्या से निपटने के लिए शक्तिशाली केंद्रीय सरकार की स्थापना करने का निर्णय दिया।

प्रश्न 6.
केंद्र तथा राज्यों में कोई छह प्रशासनिक सम्बन्ध बताएँ।
उत्तर:
केंद्र तथा राज्यों में प्रशासनिक सम्बन्ध इस प्रकार हैं-

  • केंद्रीय सरकार को राज्य सरकारों को निर्देश तथा आदेश देने का अधिकार है,
  • राज्यपाल केंद्रीय सरकार के एजेण्ट के रूप में कार्य करता है,
  • बाहरी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में केंद्रीय सरकार द्वारा प्रान्तीय सरकारों को निर्देश दिया जाता है,
  • राष्ट्रपति को प्रान्तीय संकट की घोषणा (अनुच्छेद 356) करने का अधिकार है,
  • राज्यों के आपसी झगड़ों का निपटारा करने के लिए राष्ट्रपति अन्तर्राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) की स्थापना कर सकता है,
  • राष्ट्रपति अनुसूचित जातियों, जन-जातियों तथा अन्य पिछड़ी हुई जातियों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए राज्यों को निर्देश दे सकता है।

प्रश्न 7.
अर्द्ध-संघात्मक (Quasi-Federal) से क्या अभिप्राय है? संक्षेप में व्याख्या करें।
उत्तर:
भारत में संघात्मक सरकार की स्थापना की गई है, परन्तु पूर्ण संघात्मक नहीं, अर्द्ध-संघात्मक। अर्द्ध-संघात्मक से अभिप्राय है कि केंद्र तथा राज्यों में शक्तियों का बँटवारा तो किया गया है, परन्तु शक्ति सन्तुलन केंद्र के पक्ष में है। संघ के अधिक शक्तिशाली होने के कारण भारतीय संघीय व्यवस्था को अर्द्ध-संघात्मक कहा जाता है। प्रो० के०सी० व्हीयर के शब्दों में, “भारत का नया संविधान ऐसी शासन-व्यवस्था को जन्म देता है जो अधिक-से-अधिक अर्द्ध-संघीय है।”

प्रश्न 8.
राज्यों की स्वायत्तता पर संक्षेप में एक लेख लिखिए। .
उत्तर:
संविधान के लागू होने से लेकर अब तक केंद्र-राज्यों के सम्बन्धों में तनाव है। राज्य अधिक-से-अधिक स्वायत्तता की माँग करते रहे हैं तथा केंद्र के नियन्त्रण को कम करने के लिए संघर्ष करते रहे हैं। राज्यों की स्वायत्तता का अर्थ है कि राज्यों को अपने आन्तरिक क्षेत्र में अपनी शक्तियों का प्रयोग करने की स्वतन्त्रता हो। संविधान द्वारा जो शक्तियाँ राज्यों को दी गई हैं, उनमें केंद्र हस्तक्षेप न करे।

प्रश्न 9.
संसद किन परिस्थितियों में राज्य सूची में दिए गए विषयों के सम्बन्ध में कानून बना सकती है?
उत्तर:
ये परिस्थितियाँ इस प्रकार हैं-

  • देश में संकटकालीन स्थिति की घोषणा होने पर,
  • यदि राज्यसभा दो-तिहाई बहुमत से यह प्रस्ताव पास कर दे कि राज्य सूची में दिया गया कोई विषय राष्ट्रीय महत्त्व का बन गया है और उस पर संसद को कानून बनाना चाहिए,
  • किसी अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि अथवा समझौते को लागू करने के लिए,
  • यदि दो अथवा दो से अधिक राज्यों के विधानमण्डल प्रस्ताव पास करके संसद को ऐसा करने की प्रार्थना करें,
  • किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने की स्थिति में उस राज्य के लिए।

प्रश्न 10.
वित्त आयोग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
संविधान की धारा 280 के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई है कि देश की आर्थिक परिस्थिति का अध्ययन करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर एक वित्त आयोग की नियुक्ति की जाएगी। वित्त आयोग की स्थापना प्रायः 5 वर्ष के लिए की जाती है। इस आयोग के सदस्यों की योग्यताएँ तथा नियुक्ति का तरीका निश्चित करने का अधिकार संसद को प्राप्त है। वित्त आयोग सरकार को दी गई कुछ बातों के बारे में परामर्श देता है

  • संघ तथा राज्यों में राजस्व का विभाजन,
  • केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान की मात्रा के बारे में,
  • अन्य कोई भी मामला जो राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सौंपा गया है। अब तक पन्द्रह (11 अप्रैल 2020 से) वित्त आयोग नियुक्त किए जा चुके हैं।

प्रश्न 11.
‘अवशिष्ट शक्तियाँ’ (Residuary Powers) पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार उन सब विषयों को, जिनका वर्णन किसी भी सूची अर्थात् संघीय सूची, राज्य सूची, अथवा समवर्ती सूची में नहीं किया गया है, उन्हें अवशिष्ट शक्तियों का नाम दिया गया है। इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है। अमेरिका में अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को नहीं, बल्कि राज्य सरकारों को सौंपी गई हैं।

प्रश्न 12.
सरकारिया आयोग पर संक्षेप में लेख लिखिए।
उत्तर:
सन् 1983 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने केंद्र व राज्यों के सम्बन्धों पर विचार करके रिपोर्ट देने के । लिए न्यायमूर्ति श्री आर०एस० सरकारिया के नेतृत्व में तीन-सदस्यीय आयोग का गठन किया। इस आयोग ने भारतीय संविधान के अन्तर्गत केंद्र तथा राज्यों के सम्बन्धों को ठोस बताया और अपनी रिपोर्ट में कहा कि इसमें किसी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। केवल कार्य-प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता है और उन्हें ईमानदारी से लागू करना है। केंद्र सरकार ने इन सुझावों के आधार पर कोई ठोस कार्य नहीं किया।

प्रश्न 13.
योजना आयोग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
योजना आयोग एक संविधानोत्तर संस्था है, क्योंकि संविधान में इसकी स्थापना की कोई व्यवस्था नहीं है। भारत में योजना आयोग की स्थापना भारत सरकार द्वारा 15 मार्च, 1950 को एक प्रस्ताव पारित करके की गई थी और 28 मार्च, 1950 से योजना आयोग ने अपना कार्य प्रारंभ कर दिया था परन्तु 16वीं लोकसभा चुनाव के बाद नवगठित भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने 65 वर्ष पुराने योजना आयोग के स्थान पर नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इण्डिया (NITI) आयोग का गठन करने का निर्णय लिया जिसके परिणामस्वरूप एक नई संस्था नीति (NITI-National Institute for Transforming India) का मार्ग प्रशस्त किया तथा 5 जनवरी, 2015 को इसकी नियुक्ति कर दी गई।

यद्यपि यहाँ हम सर्वप्रथम पाठ्यक्रम के अनुसार योजना आयोग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के अनुसार योजना आयोग के स्वरूप, इसके कार्यों एवं भारत के विकास में योजना आयोग द्वारा निभाई गई भूमिका का भी संक्षेप में उल्लेख करेंगे एवं तत्पश्चात् नवगठित नीति आयोग की संरचना, उद्देश्यों एवं कार्यों पर भी संक्षेप में प्रकाश डालेंगे।

भारत में 1950 में कार्यरत योजना आयोग में प्रधानमंत्री इसका अध्यक्ष (Ex-officio Chairman) होता था और वही इसकी बैठकों की अध्यक्षता करता था। इसके अतिरिक्त आयोग का एक उपाध्यक्ष होता था जिसकी नियुक्ति मंत्रिमंडल के द्वारा की जाती थी। उपाध्यक्ष पद पर देश के विख्यात अर्थशास्त्री या प्रसिद्धि प्राप्त वित्त विशेषज्ञ विराजमान रहे हैं।

यद्यपि उपाध्यक्ष मंत्रिमंडल का सदस्य नहीं होता था परंतु उसका स्तर कैबिनेट मंत्री के समान होता था। उपाध्यक्ष वास्तव में योजना आयोग का सबसे प्रभावकारी अधिकारी होता था। इसके अतिरिक्त उपाध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री के समान वेतन एवं भत्ते मिलते थे। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के अलावा योजना आयोग में 14-15 व्यक्ति और होते थे।

इनमें सात-आठ तो मंत्री शामिल थे; जैसे मानव संसाधन और विकास मंत्री, वित्त मंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, कृषि मंत्री और योजना-राज्य मंत्री तथा पांच-छः अन्य सदस्य होते थे। सदस्यों में से कोई एक सदस्य आयोग के सचिव (Member Secretary) के रूप में कार्य करता था। आयोग के विशेषज्ञ सदस्यों को केंद्रीय राज्य मंत्री का दर्जा दिया जाता था।

प्रश्न 14.
समवर्ती सूची पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
इस सूची में साधारणतः वे विषय रखे गए हैं, जिनका महत्त्व क्षेत्रीय व संघीय दोनों ही दृष्टियों से है। इस सूची के विषयों पर संघ तथा राज्य, दोनों को ही कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। यदि इस सूची के किसी विषय पर संघीय तथा राज्य व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित कानून परस्पर विरोधी हों, तो सामान्यतः संघ का कानून मान्य होगा।

इस सूची में वर्तमान समय में कुल 52 विषय हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं फौजदारी विषय, विवाह और विवाह-विच्छेद, दत्तक और उत्तराधिकार, कारखाने, श्रमिक-संघ, औद्योगिक विवाद, आर्थिक और सामाजिक योजना, सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा, पुनर्वास और पुरातत्व आदि। 42वें संवैधानिक संशोधन में 4 विषय शिक्षा, वन, जंगली जानवरों और पक्षियों की रक्षा और नाप-तोल राज्य सूची में से समवर्ती सूची में परिवर्तित कर दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त समवर्ती सूची में एक नवीन विषय-‘जनसंख्या नियन्त्रण’ और ‘परिवार नियोजन’ रखा गया है।

प्रश्न 15.
केंद्र तथा राज्यों के बीच तनाव के पाँच कारण लिखें।
उत्तर:
केंद्र तथा राज्यों के बीच तनाव के पाँच कारण निम्नलिखित हैं-
(1) केंद्र तथा राज्यों के बीच तनाव का मुख्य कारण वित्त रहा है। राज्यों को हमेशा केंद्र से यह शिकायत रहती है कि वह सहायता देते समय भेदभावपूर्ण नीति अपनाता है,

(2) केंद्र व राज्यों के बीच तनाव का कारण राज्यपाल की भूमिका भी है। राज्यपाल राष्ट्रपति के एजेन्ट के रूप में कार्य करता है। विशेष रूप से ऐसे राज्यों में जहाँ विरोधी दलों की सरकारें होती हैं, वहाँ राज्यपाल की भूमिका विवा का विषय बनी रहती है,

(3) नौकरशाही की भूमिका भी तनाव का अन्य कारण है, क्योंकि प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति केंद्र द्वारा किए जाने के कारण राज्य सरकारों का उन पर नियन्त्रण नहीं होता,

(4) कानून तथा व्यवस्था की समस्याएँ भी तनाव का कारण हैं, क्योंकि केंद्र शान्ति व व्यवस्था का बहाना लेकर राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है,

(5) दलीय भावना के कारण भी केंद्र राज्यों तथा राज्य केंद्र पर दोषारोपण करते रहते हैं, विशेष रूप से उस समय जब केंद्र में एक दल की सरकार हो तथा राज्य में किसी दूसरे दल की।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

प्रश्न 16.
राज्य की स्वायत्तता से आप क्या समझते हैं? .
उत्तर:
राज्यों की स्वायत्तता का अर्थ स्वतन्त्रता नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है कि राज्यों को उनके मामलों में केंद्रीय सरकार द्वारा किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न किया जाना। राज्यों को जो शक्तियाँ संविधान द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं उन्हें उनका प्रयोग बिना किसी रोक-टोक के करने की आज्ञा होनी चाहिए। इस प्रकार राज्यों की स्वायत्तता का अर्थ न तो राज्यों की स्वतन्त्रता से है और न ही प्रभुसत्ता से। यह एक ऐसा वैधानिक दर्जा है जिसमें राज्यों को कुछ क्षेत्रों में पूर्ण स्वतन्त्रता तथा कम-से-कम केंद्रीय हस्तक्षेप का आश्वासन प्राप्त होता है। राज्यों को अपने एक निश्चित क्षेत्र में स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य के अधिकार का नाम ही राज्यों की स्वायत्तता है।

प्रश्न 17.
राज्य की स्वायत्तता की माँग के मुख्य कारणों का उल्लेख करो।
उत्तर:
राज्य की स्वायत्तता की माँग के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-

  • संसद की व्यापक विधि निर्वाण शक्तियाँ,
  • वित्तीय दृष्टि से राज्यों की केंद्र पर निर्भरता,
  • अखिल भारतीय सेवाएँ तथा राज्यपाल,
  • राज्यों के बीच भाषायी एवं सांस्कृतिक विभिन्नता,
  • राज्यपाल की भूमिका एवं राष्ट्रपति शासन,
  • अन्तर्राष्ट्रीय झगड़े,
  • राज्यसभा में राज्यों का असमान प्रतिनिधित्व ।

प्रश्न 18.
भारतीय संविधान की कोई तीन एकात्मक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की तीन एकात्मक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. शक्तिशाली केंद्रीय सरकार-वैसे तो संविधान ने केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया है, परंतु इस विभाजन में केंद्र को अधिक शक्तियाँ दी गई हैं। संघीय सूची में 97 विषय हैं, जबकि राज्य सूची में केवल 66 विषय हैं। राज्य विषयों की संख्या ही कम नहीं, इनका महत्त्व भी कम है। जेलें, पुलिस तथा अन्य स्थानीय विषयों पर ही राज्य सरकारों को कानून बनाने का अधिकार है।

समवर्ती सूची में दिए गए विषयों पर राज्य सरकारें तथा केंद्रीय सरकारें दोनों ही कानून बना सकती हैं, परंतु मतभेद या विरोध की स्थिति में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा बनाया गया कानून ही माना जाएगा और राज्य विधानमंडल के कानून को रद्द कर दिया जाएगा। अवशिष्ट शक्तियों (Residuary Powers) के विषय भी केंद्रीय सरकार को ही सौंपे गए हैं।

2. राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह से करता है। वह जिस राज्यपाल को जब चाहे, उसके पद से हटा सकता है। इस प्रकार गवर्नरों द्वारा भी केंद्र सरकार राज्य सरकारों के शासन-प्रबंध में हस्तक्षेप कर सकती है।

3. राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन-संसद कानून पास कर किसी भी राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करने का अधिकार रखती है। वह दो या दो से अधिक राज्यों को मिलाकर एक राज्य बना सकती है या एक राज्य को दो भागों में बाँट सकती है; जैसे पंजाब का विभाजन करके (पंजाब व हरियाणा) दो राज्य बनाए गए थे। यह अधिकार केंद्र को बहुत अधिक शक्ति देता है। इससे वह चाहे तो राज्यों पर निरंकुश होकर नियंत्रण कर सकता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संघीय सरकार की परिभाषा देते हुए इसकी विशेषताओं का वर्णन करें।
अथवा
संघ किसे कहते हैं? इसके आवश्यक लक्षणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संघात्मक सरकार की परिभाषा दीजिए तथा उसके गुण-दोषों की विवेचना कीजिए।
अथवा
संघ क्या है? संघ की सफलता में सहायक अनिवार्य तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संघात्मक सरकार की परिभाषा दें। एकात्मक तथा संघात्मक सरकार में भेद बतलाइए। अथवा संघ क्या होता है? एक अच्छे संघ के निर्माण के लिए कौन-से तथ्य सहायक होते हैं? अथवा संघ क्या होता है? भारत में कौन-सी सरकार उपयुक्त है?
उत्तर:
संघात्मक सरकार ऐसी शासन-व्यवस्था है, जिसमें शासन-सत्ता का विकेंद्रीयकरण किया जाता है तथा जिसमें दोहरी सरकारें स्थापित की जाती हैं और उनकी शक्तियों का बँटवारा कर दिया जाता है।

संघ जिसे अंग्रेज़ी में ‘Federation’ अथवा ‘Federal’ कहा जाता है, वास्तव में लैटिन भाषा के एक शब्द ‘फोडस’ (Foedus) से बना है जिसका अर्थ है ‘सन्धि अथवा समझौता’ । इस प्रकार संघ सरकार कुछ राज्यों का एक ऐसा स्थायी संगठन है, जिसकी स्थापना एक समझौते के आधार पर की जाती है। जब दो अथवा दो से अधिक स्वतन्त्र राज्य कुछ सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक केंद्रीय सरकार संगठित करते हैं तथा शेष उद्देश्यों की पूर्ति वे स्वयं करते हैं तो एक संघात्मक शासन की स्थापना हो जाती है। विभिन्न विद्वानों ने संघ सरकार की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं

1. मॉण्टेस्क्यू (Montesquieu):
के शब्दों में, “संघात्मक सरकार एक ऐसा समझौता है जहाँ बहुत-से एक जैसे राज्य बड़े राज्य के सदस्य बनने के लिए सहमत हों।”

2. हेमिल्टन (Hemilton):
का कथन है, “संघ राज्य, राज्यों का एक ऐसा समुदाय है जो एक नवीन राज्य की स्थापना करता है।”

3. गार्नर (Garner):
का कथन है, “संघ सरकार एक ऐसी प्रणाली है जिसमें केंद्रीय तथा स्थानीय सरकारें एक ही प्रभुसत्ता के अधीन होती हैं। ये सरकारें संविधान द्वारा अथवा संसदीय कानून द्वारा निर्धारित अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वोच्च होती हैं।”

4. जेलीनेक (Jelineck):
के अनुसार, “संघात्मक राज्य कई राज्यों के मेल से बना हुआ एक प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य है।”

5. फाइनर (Finer):
के शब्दों में, “संघात्मक राज्य वह राज्य है जिसमें अधिकार और शक्ति का कुछ भाग स्थानीय राज्यों को दिया जाए, दूसरा भाग संघात्मक सरकार को दिया जाए जो कि अपने स्थानीय राज्यों की इच्छा से बनी होती है।”

इन परिभाषाओं के आधार पर संघात्मक सरकार वह शासन-प्रणाली है, जिसमें कई स्वतन्त्र राज्य मिलकर समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक संघ स्थापित कर लेते हैं। इस संघ में प्रत्येक सदस्य-राज्य कुछ विशेष क्षेत्रों में अपनी स्वतन्त्रता बनाए रखता है तथा सामान्य हित के विषयों को एक केंद्रीय सत्ता के सुपुर्द कर देता है। संघात्मक सरकार के लक्षण (Features of Federal Government)-संघात्मक सरकार के आवश्यक लक्षण अथवा विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. लिखित, कठोर तथा सर्वोच्च संविधान संघ राज्य कई राज्यों के बीच एक समझौते का परिणाम होता है, इसलिए समझौते की सभी शर्ते लिखित रूप में होनी चाहिएँ। साथ ही ये शर्ते स्थायी भी हों। इसलिए संघ सरकार का संविधान केवल लिखित ही नहीं, कठोर भी होता है, जिससे कोई भी इकाई मनमाने ढंग से इसमें परिवर्तन न कर सके। संविधान सर्वोच्च भी होता है ताकि कोई भी सरकार उस संविधान के विरुद्ध कानून बनाकर दूसरी इकाई के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप न कर सके।

2. शक्तियों का बँटवारा-संघात्मक सरकार में केंद्रीय महत्त्व के विषय केंद्रीय सरकार को तथा प्रान्तीय और स्थानीय महत्त्व के विषय राज्य सरकारों को सौंप दिए जाते हैं। दोनों सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में कानून बनाती तथा प्रशासन चलाती हैं। वे एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप नहीं करतीं। भारत में शक्तियों के विभाजन के अधीन तीन सूचियाँ केंद्रीय सूची, राज्य सूची तथा समवर्ती सूची बनाई गई हैं।

3. स्वतन्त्र तथा सर्वोच्च न्यायपालिका-संघात्मक शासन में एक निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र संघीय न्यायालय का होना भी जरूरी है। संघ सरकार में यद्यपि केंद्र व राज्यों में अधिकारों का स्पष्ट विभाजन किया जाता है, फिर भी उनमें कई बातों में विवाद होना स्वाभाविक है। संघ न्यायालय उनके विवादों को हल करता है। यह न्यायालय संविधान के संरक्षण का भी कार्य करता है। केंद्रीय तथा प्रान्तीय सरकारें संविधान के विरुद्ध कानून न बना सकें, इसके लिए एक स्वतन्त्र तथा सर्वोच्च न्यायपालिका का होना बहुत आवश्यक है।

4. द्वि-सदनीय विधानपालिका-संघात्मक सरकार में द्वि-सदनीय विधानमण्डल की आवश्यकता पड़ती है। विधानमण्डल का निम्न सदन सारे राष्ट्र की जनता का तथा उच्च सदन संघ की इकाइयों का प्रतिनिधित्व करता है। ऊपरी सदन राज्यों के हितों की रक्षा करने के लिए गठित किया जाता है। इसमें संघ की इकाइयों को बराबर सीट देने की व्यवस्था की जाती है, जिससे उनकी संवैधानिक समानता स्थापित हो सके।

5. दोहरा शासन-संघात्मक सरकार में दोहरा शासन-प्रबन्ध होता है। एक केंद्रीय शासन तथा दूसरा स्थानीय अथवा प्रान्तीय शासन। संघ तथा प्रान्तों के अधिकार संविधान द्वारा निश्चित होते हैं। दोनों सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र होती हैं।

6. दोहरी नागरिकता-संघ सरकार में नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त होती है। एक उस राज्य की नागरिकता जहाँ वह निवास करता है, तथा दूसरी संघ की नागरिकता। ऊपर वर्णित तत्त्व संघीय सरकार के निर्माण में आवश्यक हैं। इन तत्त्वों के आधार पर ही संघात्मक सरकार की स्थापना होती है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

प्रश्न 2.
“भारतीय संविधान का स्वरूप या ढाँचा संघात्मक है, लेकिन उसकी आत्मा एकात्मक है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
अथवा
भारतीय संविधान की संघीय विशेषताएँ बताएँ। भारतीय संविधान में दिए गए एकात्मक तत्त्वों का विवरण दो।
उत्तर:
26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने पर अधिकांश विद्वानों तथा राजनेताओं ने इसे एक आवाज में संघात्मक संविधान माना। फिर भी संविधान का संघात्मक ढाँचा विद्वानों में हमेशा विवाद का विषय रहा है। एक ओर प्रो० अलैक्जेण्ड्रोविक्स, के० संथानम, मोरिस जोन्स, एम०वी० पायली, डॉ० अम्बेडकर, पाल एपेल्बी आदि विद्वान् और राजनेता .. भारतीय संविधान को संघात्मक मानते थे तो दूसरी ओर कुछ विचारक इस बात से सहमत नहीं थे।

प्रो० अलेक्जेण्ड्रोविक्स के शब्दों में, “भारत निस्सन्देह एक संघ है जिसमें प्रभुसत्ता के तत्त्वों को केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित किया गया है।” डॉ० के०सी० व्हीयर, जेनिंग्ज, डी०डी० बसु, डी०एन० बैनर्जी, के०पी० मुखर्जी, के०वी० राव आदि भारत के संविधान को संघात्मक मानने के लिए तैयार नहीं हैं। के०पी० मुखर्जी के अनुसार,

“भारतीय संविधान निश्चय ही गैर-संघात्मक या एकात्मक संविधान है।” इसी तरह के०सी० व्हीयर का कहना है, “भारतीय संविधान अर्द्ध-संघात्मक है। वह नाममात्र की एकात्मक विशेषताओं के साथ संघात्मक राज्य होने के बजाय गौण संघीय विशेषताओं के साथ एकात्मक राज्य है।” कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय संविधान में संघात्मक एवं एकात्मक दोनों तरह के तत्त्व पाए जाते हैं।

इस तरह भारतीय संविधान संघात्मक होते हुए भी उसका झुकाव एकात्मकता की ओर है। भारतीय संविधान के संघात्मक तत्त्व (Federal Elements of Indian Constitution)-भारतीय संविधान में निम्नलिखित संघात्मक तत्त्व मौजूद हैं

1. लिखित संविधान भारत का संविधान एक लिखित संविधान है। 9 दिसम्बर, 1946 में संविधान का कार्य आरम्भ हुआ तथा 26 नवम्बर, 1949 में संविधान पूरा हुआ। 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हुआ। वर्तमान में संविधान में 395 अनुच्छेद हैं जिन्हें 12 अनुसूचियों और 22 अध्यायों में बाँटा गया है। भारतीय संविधान में अब तक 104 संशोधन हो चुके हैं।

2. संविधान की कठोरता भारत का संविधान एक कठोर संविधान है। यद्यपि भारत का संविधान अमेरिका के संविधान की तरह कठोर तो नहीं है, परन्तु फिर भी इसमें संशोधन करने की प्रक्रिया इतनी सरल नहीं रखी गई है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 ने भी इसीलिए संविधान में संशोधन करने के लिए संसद का 2/3 बहुमत तथा केंद्र-राज्यों के सम्बन्धों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाली व्यवस्थाओं पर आधे राज्यों के अनुमोदन के साथ संसद के दो-तिहाई बहुमत का जटिल तरीका अपनाया गया है।

3. संविधान की सर्वोच्चता भारत में संविधान को सर्वोच्च बनाया गया है। यदि किसी समय केंद्र तथा राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्र के किसी मामले पर विवाद हो तो उसका हल संविधान में दी गई व्यवस्थाओं के अन्तर्गत ही निकाला जाएगा। अमेरिका आदि संघीय संविधानों की तरह भारत में भी यही तरीका अपनाया गया है।

4. शक्तियों का विभाजन-भारत में संघीय शासन के अन्तर्गत शक्तियों को केंद्र तथा राज्यों में बाँटा गया है। इस उद्देश्य के लिए तीन सूचियाँ (संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची) बनाई गई हैं। संघ सूची में 97 विषय (वर्तमान में 100 विषय), राज्य सूची में 66 विषय (वर्तमान में 61 विषय) तथा समवर्ती सूची में 47 विषय (वर्तमान में 52 विषय) रखे गए हैं। अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र सरकार को दी गई हैं।

राष्ट्रीय महत्त्व के विषय, यथा-देश की सुरक्षा, संचार साधन, विदेश-नीति, मुद्रा, बैंकिंग आदि महत्त्वपूर्ण विषय संघ सूची में रखे गए हैं। पुलिस, जेल, स्वास्थ्य, स्थानीय प्रशासन आदि विषय राज्य सूची में रखे गए हैं। दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण समझे जाने वाले विषय समवर्ती सूची में रखे गए हैं, परन्तु इस सूची पर सर्वोच्चता केंद्र सरकार को दी गई है।

5. दोहरी शासन-प्रणाली-भारत में दोहरी शासन-प्रणाली अपनाई गई है। केंद्र तथा राज्यों की अलग-अलग सरकारें हैं। दोनों को शासन की शक्तियाँ संविधान ने दी हैं। यद्यपि सहकारी संघवाद के कारण दोनों सरकारें आपस में सहयोग करके अपने-अपने दायरे में शासन चलाती हैं, फिर भी दोनों में से कोई किसी के अधीन नहीं हैं।

6. न्यायपालिका की विशेष स्थिति-संघ-शासन में केंद्र तथा राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्र के विवाद को संविधान में की गई. व्यवस्थाओं के आधार पर निपटाने की शक्ति न्यायपालिका को दी जाती है। इस आधार पर भारत में भी न्यायपालिका को सर्वोच्च शक्ति प्रदान की गई है। उच्चतम न्यायालय केंद्र तथा राज्यों के आपसी विवादों का निपटारा करता है। इसके निर्णय अन्तिम होते हैं।

7. दो-सदनीय विधानमण्डल-संघ शासन में दो-सदनीय विधानमण्डल होता है। एक सदन सारे देश का तथा दूसरा सदन उन इकाइयों का प्रतिनिधित्व करता है जो मिलकर संघीय सरकार का निर्माण करती हैं। भारत में लोकसभा सारे देश का तथा राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। यह व्यवस्था इसलिए की जाती है, जिससे केंद्र सरकार राज्यों के हितों को नुकसान न पहुँचा सके।

संविधान में एकात्मक तत्त्व (Unitary Elements of Indian Constitution)-भारतीय संविधान में संघ शासन की इन आधारभूत विशेषताओं के होते हुए भी एकात्मक तत्त्वों की कमी नहीं है। भारत के संविधान में निम्नति

1. इकहरी नागरिकता भारत में अमेरिका के विरुद्ध इकहरी नागरिकता प्रदान की गई है। कोई भी व्यक्ति किसी भी राज्य में रहे (जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर) वह राज्य का नहीं, भारत का नागरिक है। इकहरी नागरिकता की यह व्यवस्था संघ शासन के विरुद्ध है।

2. केंद्र तथा राज्यों के लिए एक संविधान-संघ शासन वाले राज्यों में संघ की इकाइयों को अलग-अलग संविधान बनाने का अधिकार होता है। अमेरिका, स्विट्जरलैण्ड तथा अन्य संघीय देशों में यही तरीका अपनाया गया है। लेकिन भारत में जम्मू-कश्मीर को छोड़कर अन्य राज्यों का अपना अलग संविधान नहीं है। पूरे देश पर एक ही संविधान लागू होता है।

3. शक्तियों का विभाजन केंद्र के पक्ष में शक्तियों का विभाजन भी केंद्र के पक्ष में है। संघ सूची में 97 विषय हैं जिन पर कानून बनाने का अधिकार संघ सरकार को है। राज्य सूची में दिए गए विषयों पर भी केंद्र कानून बना सकता है, यदि राज्यसभा ऐसा प्रस्ताव पास कर दे, राज्य स्वयं कानून बनाने की प्रार्थना करे अथवा राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो। समवर्ती सूची पर केंद्र तथा राज्यों को कानून बनाने का अधिकार है, परन्तु विवाद की दशा में केंद्र का कानून लागू होगा। ऐसी दशा में केंद्र सरकार राज्यों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है।

4. अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास आमतौर पर संघ शासन में अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों के पास होती हैं, लेकिन भारतीय संविधान में साफ तौर पर यह व्यवस्था की गई है कि जो विषय तीनों सूचियों में नहीं हैं ऐसे सभी अवशिष्ट विषयों पर संसद कानून बनाएगी, राज्यों के विधानमण्डल नहीं।

5. राज्यपालों की नियुक्ति-भारतीय संघ के राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। राष्ट्रपति ही राज्यपाल को एक राज्य से दूसरे राज्य में भेजता है तथा किसी भी राज्यपाल का कार्यकाल बढ़ाता है अथवा पाँच वर्ष की अवधि से पहले हटाता भी है। राज्यपाल की नियुक्ति करते समय उस राज्य के मुख्यमन्त्री से परामर्श लिया जाता है, परन्तु उस परामर्श को मानना आवश्यक नहीं है। राज्यपाल अपने कार्यों के लिए राज्य के प्रति नहीं, वरन् राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होता है, यह संघात्मक गुणों के विपरीत है।

6. राज्यों में राष्ट्रपति शासन-राष्ट्रपति राज्यपाल के सुझाव अथवा स्वयं निर्णय करके किसी भी राज्य में वहाँ की विधिवत निर्वाचित सरकार को भंग करके राष्ट्रपति शासन लाग कर सकता है। ऐसी दशा में शासन की सारी शक्तियाँ केंद्र के पास आ जाती हैं।

7. राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व-अमेरिकी सीनेट की तरह संघ शासन वाले देशों में केंद्रीय विधानमण्डल के ऊपरी सदन में सभी राज्यों के बराबर संख्या में प्रतिनिधि होते हैं, परन्तु भारत में इस सिद्धान्त को नहीं अपनाया गया है। राज्यसभा में राज्यों को उनकी आबादी के अनुसार स्थान दिए गए हैं। जिस कारण राज्यसभा अधिक प्रभावशाली बनकर राज्यों के हितों की पूरी तरह रक्षा नहीं कर सकती।

8. संसद को राज्यों के पुनर्गठन का अधिकार संघ शासन में केंद्रीय विधानमण्डल सम्बन्धित राज्य की इच्छा के बिना उसकी सीमाओं तथा नामों आदि में परिवर्तन नहीं कर सकता। लेकिन भारत में संसद को यह अधिकार दिया गया है।

सन् 1956 में केंद्र ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास किया, जिसके अधीन कितने ही नए राज्य बनाए गए हैं, उनकी सीमाओं में परिवर्तन किए गए हैं तथा उनके नामों में भी परिवर्तन किए गए हैं। इसी आधार पर के०पी० मुखर्जी ने लिखा है, “अगर एकात्मक सरकार की परिभाषा यह नहीं है तो मैं नहीं जानता कि वह क्या है।”

9. इकहरी न्याय पद्धति संघ शासन में न्याय व्यवस्था दोहरी होती हैं, परन्तु भारत में नीचे से ऊपर तक न्यायपालिका का ढाँचा एकीकृत है। उच्चतम न्यायालय न्यायपालिका के शिखर पर है। इसके साथ ही पूरे देश के लिए एक जैसी दीवानी तथा फौजदारी व्यवस्था है।

में राज्य केंद्र पर आश्रित केंद्र की अपेक्षा राज्य सरकारों की आय के साधन बहुत कम हैं। इसलिए राज्यों को अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है। अनेक केंद्रीय करों से प्राप्त राजस्व का राज्यों में वितरण किया जाता है। इन सभी व्यवस्थाओं और नीति आयोग के निर्देशन में पूरे राष्ट्र के सुनियोजित विकास की व्यवस्था ने राज्यों को केंद्र पर निर्भर बना दिया है।

11. नीति आयोग पर केंद्र का प्रभुत्व (Dominance of Centre on NITI Commission)-1 जनवरी, 2015 को 65 वर्ष पुराने योजना आयोग के स्थान पर अस्तित्व में आए नीति आयोग पर भी केंद्र का ही प्रभुत्व है। नीति आयोग का अध्यक्ष भी योजना आयोग की तरह प्रधानमन्त्री होगा तथा उपाध्यक्ष की नियुक्ति भी प्रधानमन्त्री करता है। इसके अतिरिक्त दो पूर्वकालिक सदस्यों की नियुक्ति भी प्रधानमन्त्री द्वारा की जाती है। इसके साथ-साथ समय-समय पर विशिष्ट सदस्यों को भी प्रधानमन्त्री द्वारा ही आमन्त्रित किया जाता है।

पदेन सदस्यों में भी केंद्रीय मन्त्री ही सम्मिलित होते हैं। नीति आयोग में उल्लेखित प्रशासनिक परिषद् में यद्यपि राज्यों के मुख्यमन्त्री सदस्य होंगे परन्तु इसकी अध्यक्षता प्रधानमन्त्री द्वारा की जाएगी। इसके अतिरिक्त विशिष्ट क्षेत्रीय परिषदों का गठन भी प्रधानमन्त्री द्वारा ही किया जाएगा। इस प्रकार स्पष्ट है कि नवगठित नीति आयोग में केंद्र का ही प्रभुत्व बना हुआ है जो भारतीय शासन को एकात्मकता की ओर झुकाता है।

निष्कर्ष-उपरोक्त संघात्मक एवं एकात्मक तत्त्वों का अध्ययन करने के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि भारतीय संविधान न तो पूर्णतः एकात्मक है और न ही संघात्मक। डॉ० जैनिंग्ज के अनुसार, यह कहना उचित होगा कि, “भारत सशक्त केंद्रीयकरण वाली विशेषताओं से युक्त संघ है।”

प्रश्न 3.
केंद्र तथा राज्यों के बीच विधायी सम्बन्धों का वर्णन करें। अथवा केंद्र राज्यों की वित्तीय जरूरतों को कैसे पूरा करता है? स्पष्ट करें। अथवा केंद्र तथा राज्यों के प्रशासनिक सम्बन्धों का विवरण दो।
अथवा
भारत में संघ तथा राज्यों के आपसी सम्बन्धों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में संघात्मक सरकार की स्थापना की गई है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत शासन की शक्तियों को तीन सूचियों में बाँटा गया है और अवशेष शक्तियाँ केंद्र सरकार को सौंपी गई हैं। भारत में पूर्णतः संघात्मक सरकार नहीं है और जिन देशों में पूर्ण संघात्मक सरकार की स्थापना की गई है, उन देशों में भी केंद्र का राज्यों पर प्रभुत्व बढ़ता ही जा रहा है तथा राज्यों की भी केंद्र पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। भारत में केंद्र अथवा संघ सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों के आपसी सम्बन्धों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है

  • विधायी सम्बन्ध,
  • प्रशासनिक सम्बन्ध,
  • वित्तीय सम्बन्ध ।

1. केंद्र तथा राज्यों के विधायी सम्बन्ध (Legislative Relation between Centre and States) भारतीय संविधान ने केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच विधायी सम्बन्धों का विवरण संविधान के ग्यारहवें भाग के अध्याय एक में अनुच्छेद .245 से 254 तक में दिया है।

(1) संघ सूची इस सूची में संविधान लागू होते समय मूलतः 97 विषय (वर्तमान में 100 विषय) रखे गए है। इनमें प्रतिरक्षा, अणुशक्ति, विदेशी मामले, युद्ध और सन्धि, रेलवे, मुद्रा, बैंकिंग, डाक- तार आदि विषय शामिल हैं। संघ सूची में इन सभी मामलों पर कानून बनाने की शक्ति संसद को प्राप्त है और उन पर केंद्र सरकार का ही प्रशासनिक नियन्त्रण कायम है।

(2) राज्य सूची इस सूची में मूल रूप से 66 विषय (वर्तमान में 61 विषय) रखे गए हैं। राज्य सूची में पुलिस, जेल, न्याय . प्रबन्ध, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा स्थानीय स्वशासन आदि शामिल हैं। समय-समय पर संविधान संशोधनों द्वारा इस सूची में विषयों को निकाला तथा जोड़ा जाता रहा है, परन्तु मूल रूप में इनकी संख्या 66 ही रही है। इस सूची में शामिल विषयों पर राज्य सरकार कानून बनाती है तथा उन पर उनका ही प्रशासनिक नियन्त्रण कायम रहता है।

(3) समवर्ती सूची-इस सूची में मूल 47 विषय (वर्तमान में 52 विषय) रखे गए हैं। इनमें फौजदारी कानून, निवारक नजरबंदी कानून, विवाह, तलाक, ट्रेड यूनियन, श्रम, कल्याण, खाद्य पदार्थों में मिलावट आदि विषय शामिल हैं। इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र तथा राज्यों को प्रदान किया गया है। इसके अतिरिक्त जिन विषयों का उल्लेख तीनों सूचियों में से किसी में भी नहीं है, ऐसे सभी मामलों पर अवशिष्ट अधिकार के रूप में कानून बनाने की शक्ति संसद को दी गई है।

संसद द्वारा राज्य-सूची पर कानून निर्माण-यद्यपि राज्य सूची में दिए गए विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों का – है, परन्तु निम्नलिखित परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर भी संसद कानून बना सकती है-

(1) यदि राज्यसभा अपने उपस्थित स्यों के बहमत और कल सदस्य संख्या के 2/3 बहमत से प्रस्ताव पास करके राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित कर दे,

(2) राष्ट्रपति देश में संकटकाल की घोषणा कर दे,

(3) अगर दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमण्डल एक प्रस्ताव पारित करके राज्य सूची के किसी विषय पर संसद को कानून बनाने की अपील करें,

(4) अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों तथा समझौतों को लागू कराने के लिए संसद राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बना सकती है,

(5) राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के विफल हो जाने पर राष्ट्रपति संकटकाल की घोषणा कर सकता है। तब उस राज्य के लिए राज्य सूची में दिए गए सभी विषयों पर कानून बनाने का अधिकार संसद को मिल जाता है,

(6) राज्यपाल राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए उसके पास भेज सकता है। राष्ट्रपति ऐसे विधेयकों पर अपनी स्वीकृति दे सकता है अथवा उसे रोक सकता है,

(7) राज्य सरकारों को एक राज्य से दूसरे राज्यों अथवा संघ प्रशासित क्षेत्रों से आने वाली वस्तुओं या उनके व्यापार और वाणिज्य से सम्बन्धित मामलों पर युक्तिसंगत प्रतिबन्ध लगाने का अधिकार दिया गया है। लेकिन ऐसा विधेयक विधानमण्डल में पेश करने से पहले राष्ट्रपति की स्वीकृति अनिवार्य है।

इस विवरण से स्पष्ट है कि विधायी क्षेत्र में राज्य सूची में दिए गए मामलों पर भी केंद्र सरकार को बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इसके अतिरिक्त समवर्ती सूची पर केंद्र तथा राज्य दोनों को ही कानून बनाने का अधिकार है, परन्तु विवाद की दशा में राज्य विधानमण्डल द्वारा बनाया गया कानून लागू नहीं होगा, वरन् केंद्रीय संसद द्वारा बनाया गया कानून लागू होगा।

2. केंद्र तथा राज्यों के प्रशासनिक सम्बन्ध (Administrative Relation of Centre and State) भारतीय संविधान ने केंद्र तथा राज्य सरकारों को जिन मामलों पर कानून बनाने का अधिकार दिया है, उन्हीं मामलों पर उसने उन्हें अपना प्रशासनिक नियन्त्रण कायम करने की शक्ति भी दी है। संविधान में केंद्र और राज्यों के प्रशासनिक सम्बन्धों का विवरण दिया गया है, जो इस प्रकार है

(1) संविधान के अनुच्छेद 256 में यह व्यवस्था की गई है कि राज्य सरकारें अपनी प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग इस तरह करेंगी जिससे संसद के कानूनों का पालन होता रहे,

(2) केंद्र सरकार राज्य सरकारों को अपनी प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग करने के बारे में जरूरी निर्देश दे सकती है। केंद्र सरकार नदियों, जलाशयों और महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक मार्गों को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित कर सकती है तथा रेलवे सम्पत्ति के संरक्षण के बारे में निर्देश दे सकती है,

(3) राष्ट्रपति ऐसे किसी भी कार्य को केंद्र सरकार की ओर से राज्य सरकार या उसके किसी अधिकारी को सौंप सकता है जो केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है,

(4) केंद्र तथा राज्य सरकारें न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णयों को लागू करेगी और इस बारे में आवश्यक कानून संसद द्वारा बनाए जाएँगे,

(5) नदियों के पानी के प्रयोग, वितरण और नियन्त्रण के मामलों पर संसद कानून बना सकती है तथा उस बारे में राज्यों के बीच विवाद होने पर मामले को मध्यस्थ या पंच के द्वारा हल करने के निर्देश केंद्र सरकार सम्बन्धित राज्य सरकारों को दे सकती है,

(6) भारतीय संघ के राज्यों के बीच होने वाले आपसी विवादों का निपटारा करने के लिए संविधान ने केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रपति को अन्तराज्यीय-परिषद् (Inter-state Council) कायम करने की शक्ति दे रखी है,

(7) राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राज्यपाल राज्य सरकार का संवैधानिक मुखिया होने के साथ सम्बन्धित राज्य में राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य करता है। अतः उसके द्वारा केंद्र सरकार राज्य के प्रशासन को प्रभावित करती है,

(8) केंद्र सरकार को अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए आयोग नियुक्त करने की शक्ति दी गई है। ऐसे आयोगों से प्राप्त रिपोर्टों के आधार पर या अपनी ओर से भी इन वर्गों के कल्याण के लिए निर्देश देने का अधिकार राष्ट्रपति के माध्यम से केंद्र सरकार को प्राप्त है। ऊपर वर्णित विवरण से स्पष्ट है कि प्रशासनिक सम्बन्धों के मामलों में राज्यों की तुलना में केंद्र सरकार की स्थिति बहुत अधिक प्रभावशाली है।

3. केंद्र तथा राज्यों के वित्तीय सम्बन्ध (Financial Relations between Centre and State Relation)-संविधान में केंद्र तथा राज्यों के मध्य वित्तीय सम्बन्धों की भी व्यवस्था की गई है जिसके अन्तर्गत वित्तीय मामलों में केंद्रीय सरकार राज्य सरकारों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है। केंद्र तथा राज्यों के वित्तीय सम्बन्धों को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है

(1) संघ तथा राज्यों की आय के साधन-संविधान के अनुसार संघ तथा केंद्र सरकार की आय के मुख्य साधनों में आय-कर, आयात व निर्यात-कर, सीमा शुल्क, समाचार-पत्रों की बिक्री तथा विज्ञापन पर कर, शराब तथा अन्य वस्तुओं पर उत्पादन कर, सम्पत्ति शुल्क, डाक, टेलीफोन से प्राप्त आय आदि शामिल हैं। दूसरी ओर राज्य सरकार की आय के प्रमुख साधनों में कृषि से होने वाली आय पर कर, शराब तथा ऐसी अन्य वस्तुओं पर उत्पादन कर, कृषि पर सम्पदा शुल्क, बिक्री-कर, बिजली के उपभोग पर कर, आमोद-प्रमोद के साधनों पर कर, वाहनों पर कर आदि शामिल किए गए हैं।

(2) करों के वितरण की व्यवस्था केंद्र की तुलना में राज्यों की आय के स्रोत बहुत कम हैं। राज्यों को शिक्षा, स्वास्थ्य और चिकित्सा आदि सुविधाओं के लिए धन की बहुत जरूरत पड़ती है। इसीलिए संविधान में व्यवस्था की गई है कि कुछ कर ऐसे होंगे जिन्हें लगाने का अधिकार तो केंद्र सरकार को होगा, लेकिन इन करों से होने वाली आय को केंद्र प्रशासित क्षेत्रों को छोड़कर राज्य : सरकारें अपने-अपने राज्यों में इकट्ठा करेंगी और वे ही उसे खर्च करेंगी।

इन करों में स्टाम्प शुल्क, दवाइयों और शृंगार की वस्तुओं पर उत्पादन शुल्क आदि शामिल हैं। संविधान में यह व्यवस्था की गई है कि कुछ वस्तुओं पर केंद्र सरकार कर लगाएगी और वसूली करेगी, परन्तु आय का कुछ भाग राज्यों को दिया जाएगा। उदाहरणस्वरूप, कृषि-भूमि को छोड़कर अन्य सम्पत्तियों पर उत्तराधिकार कर, रेल-भाड़े और माल-भाड़े पर लगने वाला कर, समाचार-पत्रों पर बिक्री तथा विज्ञापन कर, आय-कर, पटसन तथा जूट के निर्यात पर कर आदि शामिल हैं।

(3) राज्यों को अनुदान-ऊपर वर्णित वित्तीय व्यवस्था के अतिरिक्त संविधान में व्यवस्था की गई है कि केंद्र सरकार राज्यों को वित्तीय अनुदान या आर्थिक सहायता देगी। इनके अन्तर्गत राज्य सरकारें केंद्र से विकास की नई परियोजनाओं और दूसरे विकास कार्यों के लिए अनुदान प्राप्त कर सकती हैं। इसी तरह बाढ़, भूकम्प, अकाल तथा अन्य प्राकृतिक विपदाओं की हालत में पीड़ित जनता की सहायता के लिए केंद्र सरकार राज्यों को वित्तीय सहायता देती है। आदिम जातियों और कबीलों की उन्नति के लिए भी केंद्र सरकार राज्यों को अनुदान देती है। पूर्वोत्तर भारत में अनुसूचित क्षेत्रों की उन्नति तथा विकास के लिए केंद्र सरकार उन्हें वित्तीय सहायता देती है।

(4) ऋण-संविधान ने केंद्र तथा राज्य सरकारों को ऋण लेने का अधिकार भी दे रखा है। केंद्र सरकार अपनी संचित निधि की जमानत पर संसद की अनुमति से देशवासियों तथा विदेशी सरकारों अथवा अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाइयों से ऋण ले सकती है। राज्य सरकारें देशवासियों तथा केंद्र सरकार से ही ऋण प्राप्त कर सकती हैं।

(5) वित्तीय संकटकाल में केंद्र तथा राज्यों के सम्बन्ध-संविधान के अनुच्छेद 360 के अन्तर्गत राष्ट्र की वित्तीय साख अथवा वित्तीय स्थिरता को खतरा पैदा हो जाने की दशा में राष्ट्रपति आर्थिक संकट की घोषणा कर सकता है। इस घोषणा के परिणामस्वरूप राज्यों के आर्थिक मामलों में केंद्र सरकार को निर्देश देने का अधिकार मिल जाता है। राज्यों के विधानमण्डलों द्वारा पास किए गए धन सम्बन्धी विधेयकों और प्रस्तावों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति लेनी जरूरी हो जाती है।

(6) वित्त आयोग-संविधान के अनुसार संविधान के लागू होने के दो साल के अन्दर राष्ट्रपति एक वित्त आयोग (Finance Commission) गठित करेगा और फिर हर पाँच वर्ष बाद एक नया वित्त आयोग कायम किया जाएगा। आयोग में अध्यक्ष समेत पाँच सदस्य होंगे। यह आयोग केंद्र तथा राज्यों के बीच राजस्व के बंटवारे के बारे में निर्णय करके अपनी सिफारिशें राष्ट्रपति को पेश करता है।

(7) भारत का नियन्त्रक तथा महालेखा परीक्षक-संविधान ने पूरे देश के लिए एक नियन्त्रक तथा महालेखा परीक्षक नियुक्त करने की व्यवस्था की है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। यह महालेखा परीक्षक केंद्र तथा राज्य सरकारों के लेखा-जोखा की निष्पक्ष तरीके से जाँच करके अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को देता है, जिसे राष्ट्रपति संसद में प्रति वर्ष पेश करता है।

(8) योजना आयोग-योजना आयोग का उल्लेख संविधान में नहीं किया गया है, फिर भी संसद के 15 मार्च, 1950 को पास किए गए एक कानून के अनुसार उसे कायम किया गया था। देश के सम्पूर्ण सुनियोजित विकास की जिम्मेदारी योजना आयोग की थी और वही उस सम्बन्ध में योजना का प्रारूप तैयार करता था। इस आयोग की अध्यक्षता प्रधानमन्त्री करता है। वर्तमान में योजना आयोग की जगह नीति आयोग का गठन किया गया है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

प्रश्न 4.
संघ (केंद्र) तथा राज्यों के बीच सम्बन्धों की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
संविधान द्वारा केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का जो विभाजन किया गया है, वह संघ के पक्ष में है अर्थात् संघीय सरकार को राज्य सरकारों के मुकाबले में बहुत ही अधिक शक्तिशाली बनाया गया है। ऐसा होने पर भी सन् 1967 तक केंद्र तथा राज्यों के सम्बन्ध अच्छे रहे और उनमें किसी प्रकार का संघर्ष अथवा तनाव (Tension) उत्पन्न नहीं हुआ।

इसका मुख्य कारण था केंद्र तथा राज्यों में एक ही राजनीतिक दल अर्थात् काँग्रेस दल की सरकारों का होना। सन् 1967 के चुनावों के पश्चात् केंद्र में तो पुनः काँग्रेस दल की सरकार की स्थापना हुई, परन्तु कई राज्यों-बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु आदि में गैर-काँग्रेसी सरकारों की स्थापना हुई। इन सरकारों ने राज्यों को और अधिक शक्तियाँ देने की माँग की, जिससे केंद्र तथा राज्यों में संघर्ष आरम्भ हो गया। संघ तथा राज्यों के बीच संघर्ष अथवा तनाव के मुख्य कारण निम्नलिखित रहे हैं और आज भी हैं

1. वित्तीय समस्या केंद्र तथा राज्यों के बीच तनाव का एक मुख्य कारण वित्त रहा है। राज्य सरकारों को सदा यह शिकायत रहती है कि उन्हें जन-कल्याण के अनेक कार्य करने पड़ते हैं और उनकी आय के साधन बहुत कम हैं, इस कारण से उन्हें केंद्र द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता पर निर्भर रहना पड़ता है। केंद्र राज्यों को सहायता देते समय राज्यों में विरोधी दलों की सरकारों के साथ पक्षपात करता है। अतः अधिकतर राज्यों की यह माँग रहती है कि उनकी आय के साधनों में वृद्धि की जाए, ताकि वित्त के मामले में उनकी केंद्र पर निर्भरता कुछ कम हो।

2. राज्यपाल की भूमिका केंद्र तथा राज्यों के बीच तनाव का एक बहुत बड़ा कारण यह है कि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है और वह अपने कार्यों के लिए राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होता है। राष्ट्रपति राज्यपाल को पद से हटाने की भी शक्ति रखता है, राज्यपाल राष्ट्रपति के एजेन्ट के रूप में कार्य करता है। पिछले कुछ समय से राज्यपाल की भूमिका के बारे में देश में काफी विवाद रहा है। विशेष रूप से ऐसे राज्यों में जहाँ विरोधी दलों की सरकारें बनी हैं। इस विवाद का एक मुख्य प्रश्न यह रहा है कि राज्यपाल को किन परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश करनी चाहिए।

3. नौकरशाही की भूमिका भारत में राज्यों के उच्च अधिकारी अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं (I.A.S.) के सदस्यों में से नियुक्त किए जाते हैं, जिन पर राज्य सरकारों का पूरा नियन्त्रण नहीं होता। उनकी नियुक्ति केंद्रीय सरकार द्वारा की जाती है। इसलिए राज्य सरकारों की यह माँग रही है कि उन सभी कर्मचारियों पर, जो राज्य में काम कर रहे हैं, राज्य सरकार का ही नियन्त्रण होना चाहिए। परन्तु अभी स्थिति पहले जैसी ही बनी हुई है।

4. कानून तथा व्यवस्था की समस्याएँ-संविधान के अनुसार कानून तथा व्यवस्था को बनाए रखना राज्य सरकार का दायित्व है, परन्तु केंद्रीय सरकार किसी भी राज्य में शान्ति तथा व्यवस्था को बनाए रखने के लिए केंद्रीय सुरक्षा पुलिस बल भेज सकती है। राज्य सरकारों का यह विचार रहा है कि केंद्र द्वारा राज्यों में सशस्त्र सेनाएँ तभी भेजनी चाहिएँ जब राज्य द्वारा ऐसी माँग की जाए, परन्तु व्यवहार में केंद्र ने कई बार अपनी इस शक्ति का प्रयोग राज्य की इच्छा के विरुद्ध किया है।

5. संकटकालीन प्रावधान-संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार केंद्रीय सरकार राज्य की विधायी एवं प्रशासनिक सत्ता अपने हाथों में ले सकता है। इस प्रावधान का प्रयोग राज्य में “सवैधानिक तन्त्र की विफलता” (Failure of Constitutional Machinery in the State) की स्थिति में होता है। यह कदम राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर सर्वप्रथम सन् 1959 में केरल में ई०एम०एस० नम्बूदरिपाद की सरकार को निलम्बित करके राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था।

उसके बाद लगभग सभी राज्यों को किसी-न-किसी कारण से राष्ट्रपति शासन के अन्तर्गत रहना पड़ा है। जिन राज्यों में विरोधी दल की सरकार को बर्खास्त किया जाता है, उनके द्वारा केंद्र पर सदा ही पक्षपात का आरोप लगाया जाता है। इसी प्रकार सन् 1989 में कर्नाटक में जनता दल की सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन का लागू किया जाना इस बात का स्पष्ट उदाहरण है।

सन् 1997 में उत्तर प्रदेश में राज्यपाल रोमेश भण्डारी द्वारा भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार को बर्खास्त करना भी एक ऐसा ही उदाहरण है। इस कारण से राज्य सरकारों ने प्रायः यह कहा है कि संवैधानिक तन्त्र की विफलता के प्रावधान की व्याख्या केंद्र ने समय-समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार से की है।

6. दलीय कारण-दलीय भावना के कारण भी केंद्र राज्यों पर तथा राज्य केंद्र पर दोषारोपण करते रहते हैं, विशेष रूप से उस समय जब केंद्र में एक दल की सरकार हो तथा राज्य में किसी दूसरे दल की।

7. केंद्रीय कानूनों का कार्यान्वन-संविधान के अनुच्छेद 256 तथा 257 केंद्र को यह अधिकार देते हैं कि वह राज्य सरकारों को संसद के कानून के अनुसार कार्य करने तथा राज्य के कार्यकारी अधिकारों के प्रयोग के बारे में आदेश दे। अनुसूचित जातियों के कल्याण के बारे में भी उन्हें आदेश दिए जा सकते हैं। ऐसे कई आदेश राज्य सरकारों द्वारा अस्वीकार भी कर दिए जाते हैं, जिससे तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है।

8. अन्य फुटकर कारण-इस श्रेणी में राज्यों की सीमाओं अथवा नाम में परिवर्तन, नए राज्यों का निर्माण, भाषा का विवाद तथा नदियों के जल के बँटवारे से सम्बन्धित प्रश्न शामिल हैं। कई बार केंद्र द्वारा बनाई गई औद्योगिक नीति भी केंद्र तथा राज्यों के बीच तनाव का कारण बन जाती है।

प्रश्न 5.
सरकारिया आयोग पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
सन् 1983 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने केंद्र-राज्यों के सम्बन्धों पर विचार करने के लिए एक तीन-सदस्यीय आयोग का गठन किया। न्यायमूर्ति आर०एस० सरकारिया को इस आयोग का अध्यक्ष तथा पी० शिवरामन और एस०आर० सेन को इस आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया था। इस आयोग ने सरकार को अपनी रिपोर्ट 27 अक्तूबर, 1987 को पेश की। इस आयोग की मुख्य सिफारिशें इस प्रकार हैं

(1) आयोग ने राज्य सरकारों के वित्तीय साधन बढ़ाने के उपायों पर जोर दिया है,

(2) आयोग ने राज्यों के अधिकार बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन के सुझाव दिए हैं। एक सुझाव यह है कि संविधान में संशोधन करके राज्यों को अनुच्छेद 242 के अन्तर्गत राज्य सूची के कानूनों में संशोधन करने का अधिकार दिया जाए,

(3) आयोग ने केंद्र व राज्य के विवादों को सुलझाने के लिए स्थायी अन्तर्राज्यीय परिषद् गठित किए जाने की सिफारिश की है। प्रधानमन्त्री, केंद्रीय मन्त्रियों और सभी मुख्यमन्त्रियों को इस परिषद् में रखा जाए,

(4) आयोग के अनुसार राज्यपालों की नियुक्ति से पहले सम्बन्धित मुख्यमन्त्री से परामर्श किया जाना चाहिए,

(5) राज्यों के विधेयकों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति में विलम्ब रोका जाना चाहिए,

(6) उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में विलम्ब रोका जाना चाहिए,

(7) उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों का स्थानान्तरण उनकी स्वीकृति से किया जाना चाहिए,

(8) आयोग ने संविधान की समवर्ती सूची के अन्तर्गत विषयों पर कानून बनाने के सम्बन्ध में संयम बरतने की सलाह दी है,

(9) आयोग ने राज्य सूची के विषयों पर केंद्रीय योजनाएँ बनाने पर रोक लगाने का सुझाव दिया है,

(10) आयोग ने सुझाव दिया है कि स्थानीय निकायों के नियमित चुनाव कराने और इनके समुचित कामकाज का संसद द्वारा कानून बनाना चाहिए,

(11) समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने से पहले केंद्र द्वारा राज्यों से परामर्श अनिवार्य होना चाहिए। इसके लिए दृढ़ परम्परा का पालन किया जाए,

(12) आयोग ने कहा है कि सामान्य तौर पर केंद्र को केवल उन क्षेत्रों में कार्रवाई करनी चाहिए जिनमें राष्ट्र के व्यापक हित में एक-सी नीति और कार्रवाई जरूरी है,

(13) आयोग ने राष्ट्रीय विकास परिषद्, नीति आयोग जैसे संगठनों तथा अखिल भारतीय सेवाओं को मजबूत बनाने के भी सुझाव दिए हैं,

(14) आयोग की राय में राज्यों की क्षेत्रीय परिषदों की व्यवस्था असफल रही है और इसे फिर सक्रिय किया जाना चाहिए,

(15) आयोग ने देश की एकता और अखण्डता के हित में सभी राज्यों में समान रूप से त्रि-भाषा फार्मूले को इसकी सही भावना से लागू करने के लिए प्रभावशाली कदम उठाने की सिफारिश की है,

(16) राजभाषा के रूप में हिन्दी को सरल बनाने पर जोर देते हुए आयोग ने कहा है कि आसानी से समझे जाने वाले शब्दों के स्थान पर कठिन सांस्कृतिक शब्दों का उपयोग उचित नहीं है,

(17) आयोग ने कहा है कि राजभाषा के विकास के लिए यदि अंग्रेज़ी सहित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के उन प्रचलित शब्दों और रूप को, जो अब हिन्दुस्तान के हिस्से बन चुके हैं, निकाला गया तो वह संविधान के अनुच्छेद की भावना के विरुद्ध होगा।

आयोग के अनुसार संविधान के अन्तर्गत केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों के वितरण में राज्यों की स्वतन्त्रता की आवश्यकताओं के साथ एक मजबूत केंद्र की जरूरत को महत्त्व दिया गया है। सरकारिया आयोग की सभी सिफारिशें केंद्रीय सरकार के विचाराधीन हैं और अभी तक इन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

प्रश्न 6.
राज्य की स्वायत्तता का क्या अर्थ है? इसकी माँग के मुख्य कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन प्रारम्भ से ही विवादपूर्ण रहा है। संविधान सभा में भी अनेक सदस्यों ने यह आपत्ति उठाई थी कि शक्ति विभाजन की यह योजना भारत संघ के घटक राज्यों को ‘नगरपालिकाओं’ का रूप देती है। वास्तविकता भी यही है कि भारत के संविधान में केंद्र सरकार को विस्तृत शक्तियाँ दी गई हैं और राज्य नामक इकाइयों को निश्चित रूप से कमजोर रखा गया है।

सन् 1967 तक राज्यों में तथा केंद्र में एक ही दल काँग्रेस की सरकार सत्ता में रहने से केंद्र राज्यों के बीच विवाद नहीं उठे, किन्तु सन् 1967 के बाद जब देश के 8 राज्यों में दूसरे दलों की गैर-काँग्रेसी सरकारें बनी तो केंद्र-राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण और सामंजस्य की समस्या पैदा हो गई। राज्यों की ओर से स्वायत्तता की माँग उठी।

राज्यों की स्वायत्तता की माँग के समर्थक यह मानते हैं कि संविधान में कई ऐसे प्रावधान हैं जो राज्यों की स्वायत्तता को सीमित करते हैं। यहाँ हम राज्यों की स्वायत्तता से सम्बन्धित विभिन्न प्रश्नों; जैसे राज्य की स्वायत्तता की माँग के कारण एवं स्वायत्तता के पक्ष एवं विपक्ष में विभिन्न तर्कों का उल्लेख करेंगे।

राज्य की स्वायत्तता का अर्थ साधारण शब्दों में स्वायत्तता का अर्थ है कि किसी को भी अपने क्षेत्र में निर्बाध कार्य करने की स्वतन्त्रता अर्थात् आन्तरिक व बाह्य कार्य-क्षेत्र में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न होना। राज्यों के मामले में स्वायत्तता का अर्थ थोड़ा-सा भिन्न है। राज्यों की स्वायत्तता का अर्थ स्वतन्त्रता नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है कि राज्यों को उनके मामलों में केंद्रीय सरकार द्वारा किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।

राज्यों को शक्तियाँ संविधान द्वारा उपलब्ध कराई गई हैं और उन्हें उनका प्रयोग करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए। राज्यों को जन-कल्याण की योजनाएँ बनाने एवं उन्हें लागू करने की शक्तियाँ बिना किसी रोक-टोक के प्राप्त होनी चाहिएँ। यही नहीं वित्तीय क्षेत्र में भी राज्य स्वतन्त्र होने चाहिएँ। तभी राज्य की स्वायत्तता को लागू किया जा सकता है।

दूसरे शब्दों में, केंद्र का राजनीतिक व प्रशासनिक मामलों में न्यूनतम हस्ताक्षेप होना चाहिए। केंद्र का कार्य-क्षेत्र सीमित होना चाहिए। उसे केवल विदेश सम्बन्ध, रक्षा, मुद्रा और जन-संचार के विषयों के मामलों में शक्तियाँ प्रदान की जानी चाहिएँ। कराधान के क्षेत्र में भी उनकी शक्तियाँ सीमित होनी चाहिएँ। उन्हें केवल उतने ही कर लगाने का अधिकार दिया ।

जाना चाहिए, जितने उन्हें उपरोक्त कार्य सम्पन्न करने के लिए आवश्यक हों। राज्यों को कराधान के इतने अधिकार प्रदान किए जाने चाहिएँ, जिससे कि वे साधनों का अभाव महसूस न करें। अतः राज्यों की स्वायत्तता का अर्थ न तो राज्यों की स्वतन्त्रता से है और न ही प्रभुसत्ता से। यह एक ऐसा वैधानिक दर्जा है जिसमें राज्यों को कुछ क्षेत्रों में पूर्ण स्वतन्त्रता तथा कम-से-कम केंद्रीय हस्तक्षेप का आश्वासन प्राप्त हो एक निश्चित क्षेत्र में स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य के अधिकार का नाम ही राज्यों की स्वायत्तता है।

राज्य की स्वायत्तता की मांग के कारण (Causes of demand for State Autonomy) भारत में राज्यों पर केंद्र के नियन्त्रण के अनेक साधन हैं। इन साधनों के कारण ही राज्यों की स्वायत्तता की माँग ने जन्म लिया। उन कारणों का विवरण निम्नलिखित है

1. संसद की व्यापक विधि निर्माण शक्तियाँ संविधान द्वारा केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का बंटवारा अवश्य किया गया है, परन्तु निम्नलिखित परिस्थितियों में संसद उन विषयों पर भी कानून बना सकती है जो राज्य सूची में दिए गए हैं (1) यदि राज्यसभा दो-तिहाई बहुमत से यह प्रस्ताव पास कर दे कि राष्ट्रीय हित के लिए यह आवश्यक है।

संसद राज्य सूची के किसी विषय पर भी कानून बनाए तो संसद उस पर कानून बना सकती है, (2) राष्ट्रपति द्वारा आपात्काल की घोषणा हो जाने पर संसद राज्य सूची में सम्मिलित विषयों पर भी कानून बना सकती है। केंद्रीय संसद की शक्ति की व्यापकता का तीन बातों से पता चलता है-प्रथम, यदि समवर्ती सूची में तथा उन दोनों में कोई विरोध हो तो संसद द्वारा निर्मित कानून मान्य होगा। द्वितीय, अवशिष्ट

शक्तियाँ केंद्र को प्राप्त हैं। तृतीय, यदि राज्य विधानमण्डल द्वारा स्वीकृत किसी विधेयक का सम्बन्ध किसी निजी सम्पत्ति पर कब्जा करने अथवा उच्च न्यायालयों की शक्तियों को कम करने से हो तो राज्यपाल के लिए यह जरूरी है कि उस विधेयक को वह राष्ट्रपति के पास उनकी स्वीकृति के लिए भेजे। अतः राज्य प्रशासन में केंद्र के अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण ही राज्यों के द्वारा स्वायत्तता की माँग जोर पकड़ रही है।

2. वित्तीय दृष्टि से राज्यों की केंद्र पर निर्भरता वित्तीय दृष्टि से भी राज्यों को केंद्र का मुँह ताकना पड़ता है। केंद्र पर राज्यों की आर्थिक निर्भरता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

3. अखिल भारतीय सेवाएँ तथा राज्यपाल अखिल भारतीय सेवाएँ जैसे भारतीय प्रशासनिक सेवा (I.A.S.) तथा भारतीय . पुलिस सेवा (I.P.S.) पर भारत की संघीय सरकार का नियन्त्रण है। इन सेवाओं से सम्बन्धित उच्च अधिकारी राज्यों में अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त होते हैं। अतएव इन अधिकारियों के माध्यम से ही केंद्रीय सरकार राज्यों की सरकारों पर नियन्त्रण रखती है। जहाँ तक राज्यपाल का प्रश्न है, उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है तथा वह राज्य में केंद्र के एजेण्ट के रूप में कार्य करता है। .

4. राज्यों के बीच भाषायी एवं सांस्कृतिक विभिन्नता भारत में राज्यों की भाषायी एवं सांस्कृतिक विभिन्नता भी राज्यों की स्वायत्तता की माँग को बढ़ाने में एक महत्त्वपूर्ण कारक रहा है। इसी आधार पर कुछ राज्य यह महसूस करते हैं कि हिन्दी भाषी राज्य गैर-हिन्दी भाषी राज्यों पर अपना आधिपत्य एवं प्रभाव जमाने का प्रयास कर रहे हैं। इसी भावना से ग्रस्त होकर सन् 1960 के दशक में हिन्दी भाषा के विरोध में गैर-हिन्दी भाषायी राज्यों के द्वारा आन्दोलन चलाए गए। अतः ऐसी माँग एवं भावनाएँ ही भारतीय संघवाद के स्वरूप को चुनौती देने के साथ-साथ राज्यों की स्वायत्तता की माँग के रूप में आगे बढ़ती जा रही हैं।

5. राज्यपाल की भूमिका एवं राष्ट्रपति शासन-अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड जैसे संघों में केंद्र को यह शक्ति प्रदान नहीं है कि राज्यों की स्वायत्तता (Autonomy) समाप्त कर सके, किंतु भारत में आपात्काल की घोषणा किए जाने पर संविधान एकात्मक रूप धारण कर लेता है। आपात्काल में केंद्रीय संसद उन विषयों पर कानून बना सकती है जो राज्य सूची में सम्मिलित हैं।

जब राष्ट्रपति यह घोषणा कर देता है कि किसी राज्य की सरकार संविधान की धाराओं के अनुसार नहीं चलाई जा रही, तो राज्य की विधानसभा भंग कर दी जाती है और राष्ट्रपति के माध्यम से राज्यपाल को राज्य की सभी प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। राज्य का राज्यपाल जनता के द्वारा निर्वाचित नहीं होता। राज्यपाल केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होता है।

इसलिए राज्यपाल केवल मात्र राज्यों में केंद्र सरकार का एजेण्ट बनकर कार्य करता है। केंद्र सरकार अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए राज्यों में अनुच्छेद 356 का प्रयोग कर विशेषतः विपक्षी दलों की सरकार को भंग करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार केंद्र सरकार राज्यपाल के पद के माध्यम से राज्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप करती है।

इसी कारण आज राज्यपाल का पद सबसे अधिक विवादित पद बना हुआ है। राज्यों में राज्यपाल के निर्णयों एवं केंद्र द्वारा राष्ट्रपति शासन लागू करने की शक्ति के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में विभिन्न राज्यों द्वारा दायर याचिकाओं पर, न्यायपालिका ने निर्णय दिया कि केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 356 का प्रयोग गलत ढंग से किया जाता रहा है।

इसीलिए केंद्र राज्य सम्बन्धों सम्बन्धी गठित सरकारिया आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में यह संस्तुति दी थी कि राज्यपाल के पद पर गैर-राजनीतिक व्यक्ति की नियुक्ति की जाए ताकि यह संविधान के अनुसार बिना केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के निष्पक्ष होकर अपना कार्य कर सके, परन्तु अभी तक इस समस्या का कोई हल नहीं हो पाया है। इसीलिए राज्यों के द्वारा निरन्तर स्वायत्तता की माँग जोर पकड़ती जा रही है।

6. अन्तर्राज्यीय झगड़े-राज्यों के बीच भाषायी एवं सांस्कृतिक विभिन्नता के साथ-साथ राज्यों के बीच सीमा सम्बन्धी एवं नदी जल सम्बन्धी विवादों का केंद्र सरकार द्वारा समुचित समाधान न करवाने के कारण भी राज्यों की स्वायत्तता की माँग को बल दिया है। महाराष्ट्र एवं कर्नाटक, मणिपुर और नागालैंड एवं पंजाब व हरियाणा के बीच राजधानी चण्डीगढ़ को लेकर आज भी विवाद कायम है।

इसी तरह से तमिलनाडु एवं कर्नाटक के बीच कावेरी नदी जल विवाद एवं गुजरात, मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र के बीच नर्मदा नदी जल-विवाद आदि ने राज्यों के बीच संघात्मक भावना को जहाँ ठेस पहुंचाई है, वहीं केंद्र के प्रभावी नियन्त्रण के अभाव ने भी राज्यों की स्वायत्तता की माँग को बल देने का कार्य किया है।

7. संसद किसी नवीन राज्य का निर्माण कर सकती है और किसी भी राज्य की सीमा घटा या बढ़ा सकती है –अमेरिका . या ऑस्ट्रेलियाई संघ व्यवस्था में केंद्र राज्यों की इच्छा के विरुद्ध उनकी सीमाओं में हेर-फेर नहीं कर सकता, परन्तु भारत में केंद्रीय संसद नवीन राज्यों का निर्माण कर सकती है और राज्यों के आकार को घटा या बढ़ा सकती है। ऐसा करने के लिए संसद को राज्यों की अनुमति नहीं लेनी पड़ती।

8. राज्यसभा में सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व नहीं विश्व की अधिकांश संघ व्यवस्थाओं में संसद के उच्च सदन का संगठन राज्यों की समानता के सिद्धान्त के आधार पर किया गया है। समानता का सिद्धान्त इसलिए अपनाया गया है जिससे केंद्रीय संसद पर बड़े राज्य का आधिपत्य कायम न हो सके, परन्तु भारत के उच्च सदन अर्थात् राज्यसभा में सभी राज्यों का बराबर संख्या में प्रतिनिधित्व नहीं होता।

9. राज्यों के अपने संविधान नहीं हैं-अमेरिका और स्विट्जरलैंड के राज्यों के अपने पृथक् संविधान हैं और उनमें संशोधन करने की शक्तियाँ भी राज्यों के विधानमण्डलों को ही प्राप्त हैं, परन्तु भारत में एक ही संविधान है जो केंद्र और राज्यों दोनों की संरचना और शक्तियों का उल्लेख करता है। राज्यों को यह अधिकार प्राप्त नहीं है कि वे भारतीय संविधान की उन धाराओं में संशोधन कर सकें जिनका उनकी संरचना और प्रकार्यों से सम्बन्ध है। भारतीय संविधान में संशोधन प्रक्रिया की शुरुआत केवल संसद ही कर सकती है।

निष्कर्ष दिए गए कारणों की वजह से विभिन्न राज्यों में राज्य की स्वायत्तता की माँग ने जोर पकड़ा। डी०एम०के० तथा : अन्ना डी०एम०के० ने अपने राज्य के लिए स्वायत्तता की माँग की। मार्क्सवादी दल ने संविधान की प्रस्तावना से ‘यूनियन’ शब्द को हटाकर ‘फेडरल’ शब्द का उल्लेख करने की माँग की। इसी प्रकार अकाली दल ने पंजाब में राज्य की स्वायत्तता के लिए उग्र आन्दोलन चलाया। जम्मू और कश्मीर में भी इसी प्रकार की माँग को लेकर कई सम्मेलनों का आयोजन किया गया।

प्रश्न 7.
राज्यों की स्वायत्तता के विभिन्न प्रश्नों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
राज्यों की स्वायत्तता के विभिन्न प्रश्न (Various Issues of State Autonomy)-राज्यों की स्वायत्तता का मामला एक अहम् एवं कठिन विषय है जिसके चलते देश की एकता पर संकट आ सकता है। समय-समय पर राज्यों की स्वायत्तता से सम्बन्धित जिन मामलों पर आवाज उठाई गई वे विषय इस प्रकार हैं

1. राज्यपाल की नियुक्ति राज्यपाल की नियुक्ति का अधिकार भारत के राष्ट्रपति का है। वह राज्यपाल की नियुक्ति प्रधानमन्त्री के परामर्श से करता है। साधारणतया राज्यपाल की नियुक्ति में अमुक राज्य के मुख्यमन्त्री की सलाह नहीं ली जाती। विपक्षी दलों की यह माँग रही है कि राज्यपाल की नियुक्ति के समय राज्य के मुख्यमन्त्री की सलाह ली जानी चाहिए।

केंद्र द्वारा अनेकों बार राज्य की सलाह लिए बिना राज्यपाल की नियुक्ति की है जिसका राज्य सरकार द्वारा विरोध किया जाता है। इस प्रकार राज्य सरकार और राज्यपाल के सम्बन्धों में खटास पैदा हो जाती है। यही नहीं जब केंद्र में सत्ता परिवर्तन होता है तो जिन राज्यों में विपक्ष सत्ता में होता है तो राज्यपालों के इस्तीफे माँग लिए जाते हैं।

जैसा 2004 में काँग्रेस के सत्ता में आने के बाद, एन०डी०ए० (N.D.A.) द्वारा नियुक्त राज्यपालों के इस्तीफे माँग लिए गए। इस विवाद को लेकर अन्तर्राज्यीय परिषद् में कई बार चर्चा हुई और यह सुझाव दिया गया कि राज्यपाल की नियुक्ति में सम्बन्धित राज्य से सलाह लेने की प्रक्रिया को संवैधानिक दर्जा दिया जाए, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ।

2. राज्यपाल की भूमिका तथा राष्ट्रपति शासन-राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा की जाती है और वह केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल कई बार केंद्र में सत्तारूढ़ दल के दबाव में आकर ऐसे कार्य कर देता है जो उसे नहीं वह राज्य में संवैधानिक मशीनरी फेल होने की रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेज देता है जिसके स्वीकार होते ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाता है।

इस मामले में राज्यपाल की भूमिका विवादास्पद रही है। राज्यपाल निष्पक्ष तरीके से काम नहीं करता। अभी तक अनेकों उदाहरण हैं जबकि राज्यपाल से रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद राष्ट्रपति ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया। सन् 1952 से अब तक लगभग 130 बार से भी अधिक राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है। इन मामलों में राज्यपाल की भूमिका निन्दा का पात्र बनी। सन् 2005 में बिहार में राज्यपाल की सिफारिश पर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया जिसकी विपक्ष ने जमकर आलोचना की। ऐसे में राज्यों की स्वायत्तता माँगना स्वाभाविक है।

3. राज्यों के विधेयकों पर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने में देरी-राज्यों को यह शिकायत रहती है कि जिन विधेयकों को विधानमण्डल पारित कर देती है, उन पर स्वीकृति देने में केंद्र अनावश्यक देरी करता है। कुछ पर स्वीकृति नहीं दी जाती और इसकी सूचना तक भी राज्य सरकार को नहीं दी जाती। कुछ पर भेदभाव की नीति अपनाई जाती है। माँग होने पर भी राष्ट्रपति की स्वीकृति की अवधि निश्चित करने के लिए संविधान में संशोधन नहीं किया जाता। इस प्रकार राज्यों के विधेयकों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने में देरी होना भी राज्यों की स्वायत्तता की माँग बढ़ाता है।

4. अखिल भारतीय सेवाओं का पक्षपातपूर्ण प्रयोग-अखिल भारतीय सेवाएँ केंद्र द्वारा नियन्त्रित और अनुशासित हैं। इन सेवाओं के किसी सदस्य का व्यवहार सेवा की शर्तों, आचार संहिता आदि के कितना ही विरुद्ध, आपत्तिजनक एवं पक्षपातपूर्ण क्यों न हो राज्य सरकारें केंद्र की अनुमति के बिना इन सेवाओं के सदस्यों के विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सकती।

इससे राज्य सरकारें शिथिल होती हैं। कई बार तो केंद्र से प्रोत्साहन पाकर इन सेवाओं के सदस्य राज्य सरकारों की योग्यता, कुशलता पर ही प्रश्न-चिह्न लगा देते हैं। केंद्र में जब सत्ताधारी पार्टी इन सेवाओं का प्रयोग विपक्षी राज्य सरकारों को बदनाम करने के लिए करती है और सेवा के उन सदस्यों को पदोन्नत कर पुरस्कृत करती है जो राज्य सरकारों की उपेक्षा कर केंद्र के आदेशों का सीधे पालन करते हैं तो राज्यों में बेचैनी पैदा होती है।

इस प्रकार अखिल भारतीय सेवाओं का पक्षपातपूर्ण प्रयोग, केंद्र एवं राज्यों के सम्बन्धों में दरार पैदा करता है। अतः स्पष्ट है कि अखिल भारतीय सेवाओं के पक्षपातपूर्ण ढंग के प्रयोग ने राज्यों की स्वायत्तता की माँग को बढ़ावा दिया है।

5. केंद्र का राज्यों की विपक्षी सरकारों एवं उनकी समस्याओं के प्रति असवेदनशील एवं उदासीन व्यवहार केंद्र का दृष्टिकोण राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारों के प्रति असंवेदनशील और उदासीन रहा है। केंद्र एक लम्बे समय तक समस्याओं पर हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है, जो अन्ततः केंद्र और राज्यों में टकराव पैदा करती हैं।

विपक्षी दल की राज्य सरकारों के प्रति असंवेदनशीलता का एक अन्य पहलू दो राज्य सरकारों के परस्पर विवाद में उस राज्य सरकार की समस्या के प्रति उदासीन हो जाना भी देखने में आया, जो दूसरे दल की थी। जनवरी, 1994 में पानी को लेकर हरियाणा और दिल्ली की सरकार के विवाद को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। इसके अन्तर्गत हरियाणा के मुख्यमन्त्री ने दिल्ली को होने वाली पानी की सप्लाई को कम कर दिया, चूंकि दिल्ली में भाजपा की सरकार थी।

इस पर केंद्र सरकार चुप बनी रही और उस पर भी तभी जूं रेंगी जब दिल्ली सरकार ने केंद्रीय मन्त्रियों की पानी की सप्लाई को रोकने की चेतावनी दी। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि केंद्र-राज्य, सम्बन्ध में केंद्र सरकार की नीति प्रारम्भ से ही राज्यों को अपने ऊपर आश्रित बनाए रखने की रही है। सन् 1967 से राज्यों में केंद्र के हस्तक्षेप की यह नीति खुलकर सामने आई जो कि सन् 1995 तक जारी रही।

सन् 1996 से केंद्र में मिली-जुली सरकारों में क्षेत्रीय दलों के प्रभावी होने के कारण यह प्रवृत्ति कमजोर हो रही है और आम-सहमति की नीति का विकास हो रहा है। अतः कहा जा सकता है कि केंद्र के राज्यों के प्रति असंवेदनशील व्यवहार ने राज्यों की स्वायत्तता की माँग को न केवल जन्म दिया, बल्कि उसे बढ़ावा भी दिया है।

6. राज्यों की वित्तीय दुर्दशा-राज्यों की वित्तीय स्थिति में निरन्तर गिरावट ने नीति निर्धारकों के सामने जटिल समस्याएँ खड़ी कर दी हैं जिनके कारण राज्यों में न तो विकास गति पकड़ रहा है और न ही पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। राजस्व में निरन्तर कमी, वित्तीय और प्राथमिक घाटे, कों के बढ़ते बोझ और अन्य देनदारियाँ, पूँजीगत खाते और रख-रखाव के खर्चों में कमी इत्यादि राज्यों की वित्तीय दुर्दशा के संकेत हैं।

साथ ही राज्यों को मिलने वाली केंद्रीय सहायता की वृद्धि का संकुचन और केंद्रीय वेतन पुनः निरीक्षण के प्रभाव ने राज्यों की वित्तीय स्थिति पर घातक प्रभाव डाला है। ऐसी स्थिति के लिए केंद्र की अपेक्षा राज्य सरकारें स्वयं ही अधिक जिम्मेदार हैं। अतः राज्यों की स्वायत्तता के लिए राज्यों की वित्तीय दुर्दशा भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है।

7. दूरदर्शन और आकाशवाणी का पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल केंद्र का दूरदर्शन और आकाशवाणी जैसे महत्त्वपूर्ण जन-संचार साधनों पर पूर्ण नियन्त्रण और एकाधिकार है। सन् 1966 में चन्दा समिति ने इन्हें स्वायत्तशासी बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन इसे नामंजूर कर दिया। दूरदर्शन और आकाशवाणी एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा बन गया है जिसने केंद्र और राज्यों के बीच उत्तेजना पैदा की है।

राज्यों की जन-संचार के इन साधनों के विरुद्ध ये शिकायतें रहीं-

(1) खबरें निष्पक्ष भाव से एवं पक्षपातरहित होकर प्रसारित नहीं की जातीं। यह स्थिति अत्यधिक उत्तेजना उस समय पैदा करती है जब किसी महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर केंद्र और विपक्षी राज्य सरकारों में नीति सम्बन्धी कोई महत्त्वपूर्ण मतभेद होता है और दूरदर्शन एवं आकाशवाणी राज्यों के दृष्टिकोण की उपेक्षा करके केवल केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं।

(2) राज्यों को विशेषकर चुनाव के समय प्रचार सुविधाएँ नहीं दी जातीं।

(3) देश के विविध जातीय एवं सांस्कृतिक समूहों को समुचित प्रतिनिधित्व न देना। इस प्रकार केंद्र द्वारा दूरदर्शन और आकाशवाणी को पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल करना, राज्यों के लिए द्वितीय या अतिरिक्त चैनल खोलने की माँग को जन्म देती है। अतः इस प्रकार दूरदर्शन और आकाशवाणी का पक्षपातपूर्ण तरीके से प्रयोग राज्यों की स्वायत्तता के लिए एक मुद्दा है।

8. समवर्ती सूची-राज्य और केंद्र के बीच शक्तियों के विभाजन के लिए संविधान में तीन सूचियों की व्यवस्था है। केंद्रीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। समवर्ती सूची में ऐसे विषय रखे गए हैं जिन पर केंद्र और राज्यों दोनों को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। संसद के द्वारा कानून बनाने की स्थिति में राज्यों द्वारा बनाया गया कानून मान्य नहीं होता। इसलिए विपक्षी दल समवर्ती सूची को पूर्णरूपेण राज्यों के अधीन करने के पक्ष में हैं।

9. अवशिष्ट शक्तियाँ अवशिष्ट शक्तियों को लेकर भी केंद्र व राज्यों में तनाव है। यह भी राज्यों की स्वायत्तता की माँग को बढ़ावा देने का कारण है। राज्य सभी अवशिष्ट शक्तियों को राज्यों के देने के पक्ष में है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. संविधान द्वारा भारत को कहा गया है
(A) संघीय राज्य
(B) एकात्मक राज्य
(C) राज्यों का संघ
(D) बनावट में संघात्मक, परंतु भाव में एकात्मक
उत्तर:
(C) राज्यों का संघ

2. संविधान में संघीय सूची में मूलतः विषयों की संख्या कितनी है?
(A) 97
(B) 99
(C) 100
(D) 102
उत्तर:
(A)97

3. संघीय सूची में दिए गए विषयों के सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार है
(A) संसद के पास
(B) राज्यसभा के पास
(C) लोकसभा के पास
(D) राज्य विधानमंडल के पास
उत्तर:
(A) संसद के पास

4. संविधान में राज्य-सूची में मूलतः कुल विषय कितने दिए गए हैं?
(A) 97
(B) 61
(C) 66
(D) 47
उत्तर:
(C) 66

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 7 संघवाद

5. संविधान में समवर्ती सूची में मूलतः कुल विषय कितने दिए गए हैं?
(A) 61
(B) 47
(C) 52
(D) 66
उत्तर:
(B) 47

6. समवर्ती सूची में दिए गए विषयों के संबंध में कानून पास करने का अधिकार है
(A) संसद के पास
(B) राज्य विधानमंडलों के पास
(C) संसद तथा राज्य विधानमंडल दोनों के पास
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) संसद तथा राज्य विधानमंडल दोनों के पास

7. समवर्ती सूची में दिए गए किसी विषय के संबंध में संसद तथा राज्य विधानमंडल द्वारा परस्पर विरोधी कानून बनाने की स्थिति में
(A) दोनों कानून रद्द हो जाएँगे
(B) संसद द्वारा पास किया गया कानन लाग होगा
(C) राज्य विधानमंडल द्वारा पास किया गया कानून लागू होगा
(D) दोनों में गतिरोध उत्पन्न हो जाएगा
उत्तर:
(B) संसद द्वारा पास किया गया कानून लागू होगा

8. भारतीय संघ में कुल कितने राज्य हैं?
(A) 26
(B) 21
(C) 28
(D) 29
उत्तर:
(C) 28

9. निम्नलिखित परिस्थितियों में संसद राज्य-सूची में दिए गए विषयों के संबंध में भी कानून बना सकती है
(A) संकटकालीन स्थिति की घोषणा होने पर
(B) दो अथवा दो से अधिक राज्यों द्वारा ऐसी प्रार्थना करने पर
(C) किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि अथवा समझौते की शर्तों को लागू करने के लिए
(D) उपर्युक्त सभी परिस्थितियों में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी परिस्थितियों में

10. वित्त आयोग के सदस्यों की नियुक्ति करने का अधिकार निम्नलिखित को है
(A) राष्ट्रपति
(B) उप-राष्ट्रपति
(C) संसद
(D) प्रधानमंत्री
उत्तर:
(A) राष्ट्रपति

11. अंतर्राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) की स्थापना करने का अधिकार निम्नलिखित को प्राप्त है
(A) राज्यपाल
(B) राष्ट्रपति
(C) प्रधानमंत्री
(D) मुख्य न्यायाधीश
उत्तर:
(B) राष्ट्रपति

12. भारत की संघीय व्यवस्था का संरक्षक है
(A) राष्ट्रपति
(B) संसद
(C) प्रधानमंत्री
(D) सर्वोच्च न्यायालय
उत्तर:
(D) सर्वोच्च न्यायालय

13. भारतीय संघ में नए राज्यों को शामिल तथा राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करने का अधिकार किसके पास है?
(A) राष्ट्रपति
(B) संसद
(C) प्रधानमंत्री
(D) सर्वोच्च न्यायालय
उत्तर:
(B) संसद

14. शिक्षा निम्नलिखित सूची का विषय है
(A) संघ सूची
(B) राज्य-सूची
(C) समवर्ती सूची
(D) अवशिष्ट शक्तियाँ
उत्तर:
(C) समवर्ती सूची

15. भारतीय संघ में कुल कितने संघीय क्षेत्र हैं?
(A) 7
(B) 10
(C) 9
(D) 8
उत्तर:
(D) 8

16. शेष शक्तियों (Residuary Powers) के संबंध में कानून बनाने का अधिकार निम्नलिखित को है
(A) राष्ट्रपति
(B) संसद
(C) राज्य विधानमंडल
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) संसद

17. निम्नलिखित में से कौन-सा विषय संघीय सूची में है?
(A) विदेशी मामले
(B) विवाह और तलाक
(C) शिक्षा
(D) स्थानीय सरकार
उत्तर:
(A) विदेशी मामले

18. निम्नलिखित विषय राज्य-सूची में शामिल है
(A) प्रतिरक्षा
(B) डाक
(C) कृषि
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) कृषि

19. निम्नलिखित विषय समवर्ती-सूची में शामिल हैं
(A) विदेशी मामले
(B) शिक्षा
(C) कृषि
(D) पुलिस एवं जेलें
उत्तर:
(B) शिक्षा

20. वित्त आयोग (Finance Commission) नियुक्त करने का अधिकार प्राप्त है
(A) प्रधानमंत्री को
(B) राष्ट्रपति को
(C) संसद को
(D) लोकसभा को
उत्तर:
(B) राष्ट्रपति को

21. “भारतीय संविधान रूप में तो संघात्मक है पर भावना में एकात्मक है।” यह किसने कहा?
(A) डी०एन० बनर्जी ने
(B) दुर्गादास बसु ने
(C) डॉ० अम्बेडकर ने
(D) के०सी० बीयर ने
उत्तर:
(A) डी०एन० बनर्जी ने

22. “भारतीय संविधान न तो पूर्ण रूप से संघात्मक है और न ही एकात्मक, बल्कि दोनों का मिश्रण है।” यह कथन किसका है?
(A) डी०डी० बसु का
(B) के०सी० बीयर का
(C) जी०एन० जोशी का
(D) जी०एन० सिंह का
उत्तर:
(A) डी०डी० बसु का

23. 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा समवर्ती सूची में जोड़े गए विषयों से समवर्ती सूची के विषयों की कुल संख्या कितनी हो गई?
(A) 47
(B) 49
(C) 52
(D) 66
उत्तर:
(C) 52

24. वर्तमान में राज्यसूची में कितने विषय हैं?
(A) 47
(B) 52
(C) 66
(D) 61
उत्तर:
(D) 61

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दें

1. भारतीय संविधान में संघ के स्थान पर किस शब्द का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
राज्यों का संघ (Union of States)।

2. शक्तियों के विभाजन की तीन सूचियों में मूलतः कितने-कितने विषय शामिल हैं?
उत्तर:
संघीय सूची में 97, राज्य-सूची में 66 तथा समवर्ती सूची में 47 विषय शामिल हैं।

3. भारतीय संघ में कुल कितने राज्य एवं संघीय क्षेत्र हैं?
उत्तर:
भारतीय संघ में कुल 28 राज्य एवं 8 संघीय क्षेत्र हैं।

4. भारतीय संविधान का स्वरूप कैसा है?
उत्तर:
भारतीय संविधान का स्वरूप संघात्मक है।

5. भारत में अंतर्राज्यीय परिषद् की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारत में अंतर्राज्यीय परिषद् की स्थापना 28 मई, 1990 को हुई।

6. संविधान में शक्तियों के विभाजन के आधार पर कौन-सी शासन-प्रणाली अपनाई गई है?
उत्तर:
संविधान में शक्तियों के विभाजन के आधार पर संघात्मक शासन-प्रणाली अपनाई गई है।

7. भारतीय संविधान द्वारा अवशिष्ट शक्तियाँ किसे प्रदान की गई हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान द्वारा अवशिष्ट शक्तियाँ संघीय संसद को प्रदान की गई हैं।

8. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक राष्ट्रपति द्वारा कब पारित किया गया?
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक राष्ट्रपति द्वारा 9 अगस्त, 2019 को पारित हुआ।

9. नीति आयोग कब अस्तित्व में आया?
उत्तर:
1 जनवरी, 2015 को।

10. जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक लोकसभा एवं राज्यसभा द्वारा कब पारित किया गया?
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक लोकसभा एवं राज्यसभा में क्रमशः 5 एवं 6 अगस्त, 2019 को पारित हुआ।

रिक्त स्थान भरें

1. “भारतीय संविधान रूप में तो संघात्मक है, परन्तु भाव में एकात्मक है।” यह कथन ……………. ने कहा।
उत्तर:
डी०एन० बनर्जी

2. अवशिष्ट विषयों पर कानून बनाने का अधिकार ………….. को प्राप्त है।
उत्तर:
संसद

3. भारतीय संघ में …………… केंद्र शासित प्रदेश हैं।
उत्तर:
8

4. संघीय सूची में ……………. विषय हैं।
उत्तर:
97

5. राज्य सूची में …………… विषय हैं।
उत्तर:
61

6. शिक्षा ……………. सूची का विषय है।
उत्तर:
समवर्ती

7. भारत में वित्त आयोग नियुक्त करने का अधिकार को है।
उत्तर:
राष्ट्रपति

8. नीति आयोग के उपाध्यक्ष ………………….हैं।
उत्तर:
राजीव कुमार

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HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 7 संघवाद

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 7 संघवाद Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Solutions Chapter 7 संघवाद

HBSE 11th Class Political Science संघवाद Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
नीचे कुछ घटनाओं की सूची दी गई है। इनमें से किसको आप संघवाद की कार्य-प्रणाली के रूप में चिह्नित करेंगे और क्यों?
(क) केंद्र सरकार ने मंगलवार को जीएनएलएफ के नेतृत्व वाले दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल को छठी अनुसूची में वर्णित दर्जा देने की घोषणा की। इससे पश्चिम बंगाल के इस पर्वतीय जिले के शासकीय निकाय को ज्यादा स्वायत्तता प्राप्त होगी। दो दिन के गहन विचार-विमर्श के बाद नई दिल्ली में केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और सुभाष घीसिंग के नेतृत्व वाले गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

(ख) वर्षा प्रभावित प्रदेशों के लिए सरकार कार्य-योजना लाएगी। केंद्र सरकार ने वर्षा प्रभावित प्रदेशों से पुनर्निर्माण की विस्तृत योजना भेजने को कहा है ताकि वह अतिरिक्त राहत प्रदान करने की उनकी माँग पर फौरन कार्रवाई कर सके।

(ग) दिल्ली के लिए नए आयुक्त। देश की राजधानी दिल्ली में नए नगरपालिका आयुक्त को बहाल किया जाएगा। इस बात की पुष्टि करते हुए एमसीडी के वर्तमान आयुक्त राकेश मेहता ने कहा कि उन्हें अपने तबादले के आदेश मिल गए हैं और संभावना है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अशोक कुमार उनकी जगह संभालेंगे। अशोक कुमार अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव की हैसियत से काम कर रहे हैं। 1975 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री मेहता पिछले साढ़े तीन साल से आयुक्त की हैसियत से काम कर रहे हैं।

(घ) मणिपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा । राज्यसभा ने बुधवार को मणिपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान करने वाला विधेयक पारित किया। मानव संसाधन विकास मंत्री ने वायदा किया है कि अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और सिक्किम जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में भी ऐसी संस्थाओं का निर्माण होगा।

(ङ) केंद्र ने धन दिया। केंद्र सरकार ने अपनी ग्रामीण जलापूर्ति योजना के तहत अरुणाचल प्रदेश को 553 लाख रुपए दिए हैं। इस धन की पहली किश्त के रूप में अरुणाचल प्रदेश को 466 लाख रुपए दिए गए हैं।

(च) हम बिहारियों को बताएंगे कि मुंबई में कैसे रहना है। करीब 100 शिवसैनिकों ने मुंबई के जे.जे. अस्पताल में उठा-पटक करके रोजमर्रा के कामधंधे में बाधा पहुँचाई, नारे लगाए और धमकी दी कि गैर-मराठियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की गई तो इस मामले को वे स्वयं ही निपटाएँगे।

(छ) सरकार को भंग करने की माँग। काँग्रेस विधायक दल ने प्रदेश के राज्यपाल को हाल में सौंपे एक ज्ञापन में सत्तारूढ़ डमोक्रेटिक एलायंस ऑफ नागालैंड (डीएएन) की सरकार को तथाकथित वित्तीय अनियमितता और सार्वजनिक धन के गबन के आरोप में भंग करने की माँग की है।

(ज) एनडीए सरकार ने नक्सलियों से हथियार रखने को कहा। विपक्षी दल राजद और उसके सहयोगी काँग्रेस तथा सीपीआई (एम) के वॉक आऊट के बीच बिहार सरकार ने आज नक्सलियों से अपील की कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें। बिहार को विकास के नए युग में ले जाने के लिए बेरोजगारी को जड़ से खत्म करने के अपने वादे को भी सरकार ने दोहराया।
उत्तर:
(क) प्रथम सूची ‘क’ की घटना संघवाद की कार्य-प्रणाली को दर्शाती है, क्योंकि इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकार सुभाष घीसिंग के नेतृत्व वाले जीएनएलएफ के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

(ख) द्वितीय सूची ‘ख’ की घटना भी संघवाद की कार्य-प्रणाली को चिहनित करती है क्योंकि संविधान के अनुसार संघ सरकार राज्यों के निर्देश देने एवं राहत सहायता देने का अधिकार राज्यों पर रखती है।

(ग) तृतीय सूची ‘ग’ की घटना को भी संघवाद के रूप में चिहनित किया जा सकता है क्योंकि संघीय शासन व्यवस्था में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों का तबादला एक राज्य से दूसरे राज्य में संघीय सरकार करती है अर्थात् यह घटना भी संघवाद की कार्य-प्रणाली को दर्शाती है।

(घ) चौथी सूची ‘घ’ की घटना भी संघवाद की कार्य-प्रणाली को दर्शाती है क्योंकि मणिपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने का अधिकार संघीय संसद एवं केंद्र सरकार को है।

(ङ) प्रश्न की पाँचवीं सूची भी संघवाद की कार्य-प्रणाली को दर्शाती है। संघीय ढाँचे में केंद्र सरकार राज्यों को वित्तीय सहायता के रूप में अनुदान सहायता प्रदान कर सकती है।

(च) छठी सूची ‘च’ की घटना संघवाद की कार्य-प्रणाली के प्रतिकूल है, क्योंकि भारतीय संविधान में इकहरी नागरिकता प्रदान की जाती है और देश के किसी भी नागरिक को देश के किसी भी राज्य में रहने और व्यवसाय करने का अधिकार है।

(छ) सातवीं सूची ‘छ’ की घटना संघीय प्रणाली की परिचायक है, क्योंकि संविधान के अनुसार जब किसी राज्य में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगती है तो केंद्र को अधिकार है कि वह राज्यपाल से राज्य की संवैधानिक स्थिति पर रिपोर्ट माँग सकता है और राज्यपाल की अनुशंसा पर राज्य में सरकार को भंग कर संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन लागू करने की घोषणा कर सकता है।

(ज) प्रश्न की आठवीं अर्थात् अंतिम सूची ‘ज’ संघीय प्रणाली के अनुरूप नहीं है, क्योंकि उक्त घटना राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आती है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 7 संघवाद

प्रश्न 2.
बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही होगा और क्यों?
(क) संघवाद से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग मेल-जोल से रहेंगे और उन्हें इस बात का भय नहीं रहेगा कि एक की संस्कृति दूसरे पर लाद दी जाएगी।
(ख) अलग-अलग किस्म के संसाधनों वाले दो क्षेत्रों के बीच आर्थिक लेनदेन को संघीय प्रणाली से बाधा पहुँचेगी।
(ग) संघीय प्रणाली इस बात को सनिश्चित करती है कि जो केंद्र में सत्तासीन हैं उनकी शक्तियाँ सीमित रहें।
उत्तर:
प्रश्न में दिए गए उक्त तीनों कथनों में कथन ‘क’ सही होगा, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 1 के अंतर्गत भारत को राज्यों का संघ कहा गया है। यहाँ एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र के लोगों के साथ आपसी मेल-जोल एवं सहयोग से रह सकते हैं और अपनी-अपनी संस्कृति को बनाए भी रख सकते हैं।

प्रश्न 3.
बेल्जियम के संविधान के कुछ प्रारंभिक अनुच्छेद नीचे लिखे गए हैं। इसके आधार पर बताएँ कि बेल्ज़ियम में संघवाद को किस रूप में साकार किया गया है। भारत के संविधान के लिए ऐसा ही अनुच्छेद लिखने का प्रयास करके देखें। शीर्षक I : संघीय बेल्जियम, इसके घटक और इसका क्षेत्र?
अनुच्छेद-1-बेल्ज़ियम एक संघीय राज्य है जो समुदायों और क्षेत्रों से बना है।
अनुच्छेद-2-बेल्जियम तीन समुदायों से बना है-फ्रैंच समुदाय, फ्लेमिश समुदाय और जर्मन समुदाय।
अनुच्छेद-3-बेल्जियम तीन क्षेत्रों को मिलाकर बना है वैलून क्षेत्र, फ्लेमिश क्षेत्र और ब्रूसेल्स क्षेत्र
अनुच्छेद-4-बेल्ज़ियम में 4 भाषाई क्षेत्र हैं फ्रेंच-भाषी क्षेत्र, डच-भाषी क्षेत्र, ब्रूसेल्स की राजधानी का द्विभाषी क्षेत्र तथा जर्मन भाषी क्षेत्र राज्य का प्रत्येक ‘कम्यून’ इन भाषाई क्षेत्रों में से किसी एक का हिस्सा है।
अनुच्छेद-5-वैलून क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले प्रांत हैं वैलून ब्राबैंट, हेनॉल्ट, लेग, लक्जमबर्ग और नामूर। फ्लेमिश क्षेत्र के अंतर्गत शामिल प्रांत हैं-एंटीवर्प, फ्लेमिश ब्राबैंट, वेस्ट फ्लैंडर्स, ईस्ट फ्लैंडर्स और लिंबर्ग।
उत्तर:
अनुच्छेद-1 : बेल्जियम एक संघीय राज्य है जो समुदायों और क्षेत्रों से बना है। इसी तरह भारत के संविधान का प्रथम अनुच्छेद है-

  • भारत राज्यों का एक संघ है,
  • राज्य और उनके राज्यक्षेत्र वे होंगे जो पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं,
  • भारत के राज्य क्षेत्र में
    (क) राज्यों के राज्य क्षेत्र,
    (ख) पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट संघराज्य क्षेत्र और,
    (ग) ऐसे अन्य राज्य क्षेत्र जो अर्जित किए जाएँ, समाविष्ट होंगे।

अनुच्छेद-2 : बेल्जियम तीन समुदायों से बना है-फ्रेंच, फ्लेमिश और जर्मन । ठीक इसके विपरीत भारत एक ऐसे समाज की स्थापना के लिए प्रेरित है जो जाति भेद की भावना से ऊपर हो।

अनुच्छेद-3 : बेल्जियम तीन क्षेत्रों से बना है-

  • वैलून क्षेत्र,
  • फ्लेमिश क्षेत्र,
  • ब्रूसेल्स क्षेत्र। ठीक इसी तरह भारत 28 राज्यों तथा 8 केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर बना है। अनुच्छेद-1 के अनुसार भारत राज्यों का संघ होगा। राज्य तथा संघ शासित प्रदेश वे होंगे जो अनुसूची (i) में वर्णित हैं।

अनुच्छेद-4 : बेल्जियम में चार भाषाई क्षेत्र हैं-फ्रेंच भाषी क्षेत्र, डच भाषी क्षेत्र, ब्रूसेल्स की राजधानी का हि जर्मन भाषी क्षेत्र, राज्य के प्रत्येक ‘कम्यून’ इन भाषाई क्षेत्रों में किसी एक का हिस्सा है। भारतीय संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाओं का उल्लेख संविधान की आठवीं अनुसूची में किया गया है। इस समय अनुसूची में कुल 22 भाषाएँ हैं जो इस प्रकार हैं-असमिया, बंगला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलगु, उर्दू, नेपाली, कोंकणी, मणिपुरी, मैथिली, डोगरी, संथाली तथा बोडो

इस प्रकार आज संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त संवैधानिक भाषाओं की कुल संख्या 22 है। अनुच्छेद 345 के अधीन प्रत्येक राज्य के विधानमंडल को यह अधिकार दिया गया है कि वह संविधान की आठवीं अनुसूची में दी गई भाषाओं में से किसी एक या एक से अधिक सरकारी कार्यों के लिए राज्य की भाषा के रूप में अपना सकता है, परन्तु राज्यों के परस्पर संबंधों तथा संघ और राज्यों के परस्पर संबंधों में संघ की राजभाषा को ही प्राधिकृत भाषा माना जाएगा।

अनुच्छेद-5 : वैलून क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले प्रांत हैं वैलून, ब्राबैंट, हेनॉल्ट, लेग, लक्जमबर्ग, और नामूर। फ्लेमिश क्षेत्र के अंतर्गत शामिल प्रांत हैं-एंटीवर्प, फ्लेमिश ब्राबैंट, वेस्ट फ्लैंडर्स, ईस्ट फ्लैंडर्स और लिंगबर्ग। यहाँ यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान में अलग-अलग क्षेत्रों का उल्लेख नहीं किया गया। यद्यपि इनकी तुलना हम पहाड़ी क्षेत्र, उत्तरी क्षेत्र, पश्चिमी क्षेत्र, दक्षिण क्षेत्र, पूर्वी क्षेत्र, पूर्वोतर भारत तथा मध्य भारत आदि के रूप में कर सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद एक में केवल इतना ही कहा गया है भारत राज्यों का संघ होगा, जिसमें राज्य तथा संघ शासित प्रदेश इस प्रकार सम्मिलित होंगे; जैसे अनुसूची (i) में दिए गए हैं।

प्रश्न 4.
कल्पना करें कि आपको संघवाद के संबंध में प्रावधान लिखने हैं। लगभग 300 शब्दों का एक लेख लिखें जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर आपके सुझाव हों
(क) केंद्र और प्रदेशों के बीच शक्तियों का बँटवारा,
(ख) वित्त-संसाधनों का वितरण,
(ग) राज्यपालों की नियुक्ति।
उत्तर:
(क) केंद्र और प्रदेशों के बीच शक्तियों का बँटवारा-संघात्मक शासन में दो स्तर की सरकारें होती हैं संघीय स्तर पर संघ की और राज्य स्तर पर संघ की इकाई (राज्य) की। संविधान के अनुच्छेद 246 में अंकित तीन सूचियों के द्वारा इन दोनों सरकारों के बीच शक्ति विभाजन किया गया है। परंतु इस विभाजन में केंद्र को अधिक शक्तियाँ दी गई हैं क्योंकि संघ सूची में संख्या की दृष्टि से 100 विषय (मूलतः 97) दिए गए हैं,

जबकि राज्य सूची में 61 विषय (मूलत : 66) हैं और समवर्ती सूची में 52 विषय (मूलतः 47) हैं। संविधान के अनुसार समवर्ती सूची पर कानून बनाने का अधिकार संघीय संसद और राज्य विधानमंडल दोनों को दिया गया है। परंतु कानून निर्माण की प्रक्रिया में परस्पर विरोध की स्थिति में संघ के कानून मान्य होंगे। इसके अतिरिक्त अवशिष्ट शक्तियाँ भी केंद्र को ही प्रदान की गई हैं।

राज्य सूची के विषय पर भी संघीय संसद को राज्यसभा द्वारा राज्य सूची के किसी विषय में विशेष बहुमत से प्रस्ताव द्वारा राष्ट्रीय महत्त्व का विषय घोषित करने, दो या दो से अधिक राज्यों द्वारा अनुरोध करने एवं राज्य सूची के किसी विषय पर अंतर्राष्ट्रीय संधि या समझौता करने पर विधि बनाने का अधिकार है।

यहाँ यह भी स्पष्ट है कि मूल संविधान द्वारा संघ और राज्य व्यवस्थापिका के मध्य शक्तियों का जो विभाजन हुआ है, उसमें भी 42वें संशोधन द्वारा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कर दिया गया है और राज्य सूची के पाँच विषयों को समवर्ती सूची में सम्मिलित कर दिया गया है। वे पाँच विषय हैं-शिक्षा, वन, जंगली जानवरों की रक्षा, नाप-तोल तथा जनसंख्या नियंत्रण।

(ख) वित्तीय संसाधनों का वितरण-संविधान के भाग 12 द्वारा संघ तथा राज्यों के बीच वित्तीय शक्तियों अर्थात् आय के साधनों का भी बँटवारा किया गया है। कुछ वित्तीय साधन केवल संघीय सरकार के पास हैं और कुछ राज्य सरकारों के अधीन हैं, परंतु इस विभाजन के अंतर्गत वे सभी विषय जिनसे अधिक आय होती है, संघीय सरकार के अधीन हैं। इस कारण से राज्य सदा ही आर्थिक सहायता के लिए केंद्र की ओर देखते रहते हैं। संघ तथा राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है

1. संघ सरकार द्वारा लगाए जाने वाले प्रमुख कर-कृषि के अतिरिक्त अन्य आय पर आय-कर, निर्यात कर, आयात कर, शराब, अफीम, गांजा, भांग आदि पर उत्पाद कर, संपति कर, समाचार-पत्रों के क्रय-विक्रय पर कर, रेल तथा हवाई जहाजों में यात्रा करने वाले यात्रियों और उनके सामान पर लिया जाने वाला कर, स्टांप कर तथा संघीय सरकार द्वारा संचालित रेलवे, हवाई जहाज, टेलीफोन, बैंक, बीमा आदि से होने वाली आय इत्यादि शामिल हैं।

2. राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले प्रमुख कर भू-राजस्व, कृषि की आय पर आय-कर, खेती की भूमि पर उत्तराधिकार र, समाचार-पत्रों के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर कर, विज्ञापनों पर कर, सड़कों और जलमार्गों पर आने-जाने वाले माल पर कर, यात्री कर, मनोरंजन कर तथा दस्तावेजों की रजिस्ट्री पर कर तथा राज्य सरकार द्वारा संचालित उद्योगों और कारखानों से होने वाली आय पर कर। राज्यों को दिए गए साधनों से स्पष्ट है कि वे इनकी आवश्यकताओं के लिए बहुत कम हैं, इसलिए वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अन्य साधनों की व्यवस्था की गई है जो इस प्रकार है

(क) कुछ कर ऐसे भी हैं जो संघ द्वारा लगाए जाते हैं, लेकिन राज्य सरकारें उन्हें वसूल करती हैं और अपने ही पास रखती हैं। इस श्रेणी में सौंदर्य प्रसाधनों पर उत्पादन कर, स्टांप शुल्क, दवाइयों तथा नशीले पदार्थों पर कर शामिल हैं।

(ख) कुछ ऐसे कर हैं जो संघ द्वारा ही लगाए जाते हैं और उसी द्वारा वसूल किए जाते हैं, परंतु उनकी कुल आय संघ और राज्यों के बीच बाँट दी जाती है। इस श्रेणी में कृषि संबंधी आय को छोड़कर अन्य आयकर शामिल हैं।

(ग) जूट और उसके निर्यात से होने वाली आय असम, बिहार, ओडिशा तथा बंगाल के राज्यों को एक निश्चित अनुपात में बाँट दी जाती है। संघ राज्यों को उनके विकास में सहायता के लिए अनुदान भी देता है। संघ तथा राज्यों के वित्तीय संबंधों से स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में राज्यों की स्थिति बड़ी दयनीय है। वे अपनी विकास योजनाओं के लिए संघ पर निर्भर रहते हैं। इस व्यवस्था में राज्यों पर संघ का नियंत्रण रहता है।

(ग) राज्यपालों की नियुक्ति-राज्यों में राज्यपाल कार्यपालिका का संवैधानिक मुखिया होता है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति साधारणतः उसके लिए मंत्रिपरिषद् एवं उसके मुखिया प्रधानमंत्री से परामर्श करता है। आजकल ऐसा देखा जा रहा है कि मंत्रिपरिषद् का मुखिया प्रधानमंत्री भी ऐसे व्यक्ति को राज्यपाल के पद पर नियुक्त करने की अनुशंसा करता है जो उसका विश्वासपात्र होता है।

राज्य के राज्यपाल राष्ट्रपति की इच्छा-पर्यन्त अपने पद पर बने रहते हैं। इस प्रकार राज्यपाल पूरी तरह से राष्ट्रपति या केंद्र के प्रति ही उत्तरदायी रहता है। ऐसी स्थिति में राज्यपाल राज्यों में केंद्र के एजेंट के रूप में कार्य करते हैं। इसके माध्यम से केंद्र राज्यों के शासन पर अंकुश रखते हैं।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन-सा प्रांत के गठन का आधार होना चाहिए और क्यों? (क) सामान्य भाषा, (ख) सामान्य आर्थिक हित, (ग) सामान्य क्षेत्र, (घ) प्रशासनिक सुविधा।
उत्तर:
अंग्रेजों ने भारत के राज्यों का गठन प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से किया था, परंतु आधुनिक युग में भाषाई आधार पर प्रांत का गठन किया जा सकता है। यद्यपि कोई एक इकाई, प्रांत, भाषाई समुदाय के आधार पर संघ का निर्माण नहीं करते हैं। समाज में अनेक विभिन्नताएँ होती हैं और आपसी विश्वास एवं सहयोग के आधार पर संघवाद का कार्य सुचारू रूप से चलाने का प्रयास किया जाता है।

कई इकाई, प्रांत, भाषाई समुदाय आदि मिलकर संघ का निर्माण करते हैं और संघवाद मजबूती के साथ आगे . बढ़े, उसके लिए इकाइयों में टकराव कम-से-कम अर्थात् भारत में राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर किया गया है। कोई एक भाषाई समुदाय पूरे संघ पर हावी न हो जाए, इस कारण इकाई क्षेत्रों की अपनी भाषा, धर्म संप्रदाय या सामुदायिक पहचान बनी रहती है और वह इकाई होते हुए भी संघ की एकता में विश्वास रखती है।

प्रश्न 6.
उत्तर भारत के प्रदेशों – राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार के अधिकांश लोग हिंदी बोलते हैं। यदि इन सभी प्रांतों को मिलाकर एक प्रदेश बना दिया जाय तो क्या ऐसा करना संघवाद के विचार से संगत होगा? तर्क दीजिए।
उत्तर:
उत्तर भारत के अधिकांश लोग हिंदी भाषी हैं। भाषा के आधार पर उपर्युक्त प्रांतों को मिलाकर यदि एक प्रदेश बना दिया जाए तो यह संघवाद के विचार से संगत नहीं होगा। क्योंकि संघीय प्रणाली में द्वि-व्यवस्थापिका है-एक केंद्र की, दूसरी प्रांत की अर्थात् उसके अंतर्गत लोगों की पहचान दोहरी होती है-प्रथम क्षेत्रीय पहचान, द्वितीय राष्ट्रीय पहचान अर्थात् उपर्युक्त प्रदेशों को केवल हिंदी भाषी होने के कारण एक प्रदेश बनाना तर्कसंगत नहीं लगता।

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान की ऐसी चार विशेषताओं का उल्लेख करें जिसमें प्रादेशिक सरकार की अपेक्षा केंद्रीय सरकार को ज्यादा शक्ति प्रदान की गई है।
उत्तर:
भारतीय संविधान द्वारा संघात्मक शासन की व्यवस्था की गई है। यहाँ एक संघ की सरकार होती है और दूसरी इकाई (राज्यों) की। दोनों सरकारों की शक्तियों का विभाजन भी संविधान के अनुसार किया गया है। परंतु कुछ विशेष परिस्थितियों में केंद्र को इकाई (राज्यों) की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बनाया गया है, जिसका उल्लेख यहाँ किया जा रहा है

1. वैधानिक क्षेत्र में संघ की प्रभुता-वैधानिक क्षेत्र में केंद्र को राज्यों के मुकाबले में बहुत ही अधिक शक्तिशाली बनाया गया है। संघीय सूची में 97 विषय हैं जबकि राज्य सूची में 66 विषय रखे गए हैं। समवर्ती सूची में दिए गए विषयों के सम्बन्ध में यद्यपि दोनों (ससंद तथा राज्य विधानमंडल) को ही कानून बनाने का अधिकार दिया गया है, परन्तु इस सम्बन्ध में केंद्र को प्रभुत्व दिया गया है।

इसके अतिरिक्त अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) केंद्रीय सरकार को सौंप कर उसे और अधिक मजबूत बना दिया गया है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वैधानिक क्षेत्र में केंद्र को इतना अधिक शक्तिशाली बना दिया गया है कि इससे राज्यों की स्वायत्तता (Autonomy) ही समाप्त हो जाती है।

2. कुछ परिस्थितियों में संसद को राज्य-सूची के विषयों के सम्बन्ध में भी कानून बनाने का अधिकार-संविधान में अनेक ऐसी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनके उत्पन्न होने पर संसद को राज्य-सूची में दिए गए विषयों के सम्बन्ध में भी कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है। ऐसी परिस्थितियाँ निम्नलिखित हो सकती हैं

(1) संविधान के अनुच्छेद 249 के अधीन यदि राज्यसभा अपने उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से यह प्रस्ताव पास कर दे कि राज्य सूची में दिया गया कोई भी विषय अब राष्ट्रीय महत्त्व का बन गया है और उस पर संघीय संसद द्वारा कानून बनाना सारे राष्ट्र के लिए हितकारी होगा, तो संसद को उस विषय पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है।

(2) संविधान के अनुच्छेद 250 के अधीन यदि संसद अपने किसी अंतर्राष्ट्रीय समझौते अथवा सन्धि आदि में निहित उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए राज्य सूची के किसी विषय पर स्वयं कानून आवश्यक समझे तो उसे ऐसा करने का अधिकार प्राप्त है।

(3) संविधान के अनुच्छेद 252 के अधीन, यदि दो या इससे अधिक राज्य सूची के अंकित विषय पर संघीय संसद को ऐसा करने के लिए प्रार्थना करें, परन्तु संसद द्वारा बनाया गया वह कानून केवल उन्हीं राज्यों पर लागू होगा, जिन्होंने संसद से ऐसा करने के लिए प्रार्थना की थी।

(4) यदि अनुच्छेद 352 के अधीन देश में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा लागू हो तो, ऐसी स्थिति में केंद्रीय संसद राज्य सूची के किसी भी विषयों पर कानून बना सकती है।

(5) यदि अनुच्छेद 356 के अधीन किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाए तो, संघीय संसद संबंधित राज्य में राज्य-सूची के किसी भी विषय पर कानून बना सकती है। अतः उपर्युक्त व्यवस्था में संघ की महत्त्वपूर्ण स्थिति भारतीय संघीय प्रणाली की आत्मा के विरुद्ध है।

3. प्रशासकीय सम्बन्धों में भी केंद्र की प्रभुता वैधानिक क्षेत्र की भांति प्रशासनिक क्षेत्र में भी केंद्रीय सरकार बहुत अधिक शक्तिशाली है। राज्यपाल यद्यपि राज्य सरकारों के संवैधानिक मुखिया होते हैं, परन्तु उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। ऐसी स्थिति में वे केंद्रीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं और केंद्रीय सरकार राज्यपाल द्वारा राज्य के प्रशासन में हस्तक्षेप कर सकती है।

संविधान में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रत्येक राज्य सरकार अपनी प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग इस प्रकार से करेगी, जिससे संघीय संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन निश्चित रूप से हो सके और संघीय सरकार की प्रशासनिक शक्ति के प्रयोग में किसी प्रकार की बाथा न आए। संघीय सरकार राज्य सरकारों को प्रशासन के सम्बन्ध में निर्देश दे सकती है। यदि कोई राज्य सरकार केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन नहीं करती तो राष्ट्रपति उस राज्य में संवैधानिक मशीनरी की विफलता की घोषणा करके उस राज्य की समस्त शक्तियाँ केंद्र सरकार को सौंप सकता है।

4. वित्तीय सम्बन्धों में भी केंद्र का प्रभुत्व-वित्तीय क्षेत्र में तो राज्य सरकारों की स्थिति और भी अधिक दयनीय है। राज्यों को विकास कार्यों के लिए धन की अधिक आवश्यकता होती है, परन्तु उनकी आय के साधन बहुत सीमित हैं। इस कारण से राज्यों को अपने विकास सम्बन्धी कार्य करने के लिए केंद्र सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है। जिन राज्यों में विरोधी दलों की सरकारें होती . हैं, केंद्रीय सरकार प्रायः उन राज्यों के साथ भेदभाव करती है और उन्हें उचित वित्तीय सहायता नहीं देती, जिससे उन राज्यों का विकास रुक जाता है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 7 संघवाद

प्रश्न 8.
बहुत-से प्रदेश राज्यपाल की भूमिका को लेकर नाखुश क्यों हैं?
उत्तर:
संविधान के अनुसार राज्यपाल को राज्य का संवैधानिक मुखिया बनाया गया है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है। उसका कार्यकाल पाँच वर्षों का होता है, परंतु वह राष्ट्रपति के प्रसाद-पर्यन्त अपने पद पर बना रहता है। परंतु हाल के कुछ वर्षों से राज्यपाल की भूमिका, अधिकार क्षेत्र, नियुक्ति के तरीके आदि को लेकर केंद्र और राज्य में मतभेद उत्पन्न हए हैं। विरोधी दल की राज्य सरकारें यह आरोप लगाती रही हैं कि केंद्र सरकार राज्यपाल के माध्यम से उनकी सरकारों का पतन करने में लगी रहती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि सन् 1950 से लेकर अब तक लगभग 127 से भी अधिक बार अनुच्छेद 356 का प्रयोग संघवाद के द्वारा किया जा चुका है।

अधिकांश मामलों में राज्यपाल की भूमिका निन्दा की पात्र बनी है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस तरह की घटनाएँ आए दिन भारतीय राजनीति में घटती रहती हैं जिससे राज्यपाल की भूमिका विवादास्पद बन गई और अन्य लोगों में भी असन्तोष देखने को मिलता है। यद्यपि राज्यपाल का पद बहुत ही गौरव और गरिमा का पद है। इसलिए संविधान के अनुरूप राज्यपाल को अपने पद की प्रतिष्ठा हर प्रकार से बनाए रखनी चाहिए। राज्य को प्रशासन में अपनी भूमिका स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर निभानी चाहिए। इसके अतिरिक्त विशेष परिस्थितियों में उसे भी स्वविवेक की शक्तियाँ दी गई हैं, उसका प्रयोग आवश्यकता पड़ने पर केंद्र के हाथों में कठपुतली बनकर नहीं बल्कि उचित एवं विवेकपूर्ण तरीके से करना चाहिए।

प्रश्न 9.
यदि शासन संविधान के प्रावधानों के अनुकूल नहीं चल रहा, तो ऐसे प्रदेश में राष्ट्रपति-शासन लगाया जा सकता है। बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सी स्थिति किसी देश में राष्ट्रपति-शासन लगाने के लिहाज से संगत है और कौन-सी नहीं? संक्षेप में कारण भी दें
(क) राज्य के विधानसभा के मुख्य विपक्षी दल के दो सदस्यों को अपराधियों ने मार दिया और विपक्षी दल प्रदेश की सरकार को भंग करने की माँग कर रहा है।
(ख) फिरौती वसूलने के लिए छोटे बच्चों के अपहरण की घटनाएँ बढ़ रही हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफा हो रहा है।
(ग) प्रदेश में हुए हाल के विधान सभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला है। भय है कि एक दल दूसरे दल के कुछ विधायकों से धन देकर अपने पक्ष में उनका समर्थन हासिल कर लेगा।
(घ) केंद्र और प्रदेश में अलग-अलग दलों का शासन है और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं।
(ङ) सांप्रदायिक दंगों में 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।
(च) दो प्रदेशों के बीच चल रहे जल विवाद में एक प्रदेश ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इनकार कर दिया।
उत्तर:
(क) दिए गए प्रश्नों में ‘क’ के लिए राष्ट्रपति शासन संगत नहीं है। विपक्षी दलों की माँग अनुचित है, क्योंकि सदस्यों को मारे जाने के बदले में अपराधियों को दंडित करना चाहिए न कि सरकार को भंग करने का काम। अन्यथा संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति हेतु अपराधिक घटनाएँ बढ़ सकती हैं।

(ख) फिरौती वसूलने के लिए छोटे बच्चों का अपहरण और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इज़ाफा को रोकने के लिए राष्ट्रपति शासन की आवश्यकता नहीं बल्कि अपराधियों को उचित सजा और कानून व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है ताकि राज्य में ऐसी घटनाएँ करने के बारे में कोई सोच भी न सके।

(ग) प्रदेश में हुए हाल के विधान सभा चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और विधायकों की खरीद-फरोख्त का के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू करना असंगत है क्योंकि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में भारत के राज्यों में अनेक गठबन्धन सरकारें बनी हैं।

(घ) केंद्र और प्रदेश में अलग-अलग दलों का शासन और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं यह स्थिति राष्ट्रपति शासन के योग्य नहीं है, क्योंकि संघात्मक एवं केंद्रीय सरकार संघ एवं राज्य सत्ता पर अलग-अलग दलों की सरकारों का होना कोई अस्वाभाविक स्थिति नहीं है। अतः यदि केंद्र में एक दल की सरकार है तो राज्य में दूसरे दल की सरकार हो सकती है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति प्रशासन थोपना गलत होगा।

(ङ) सांप्रदायिक दंगों में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए यह घटना सरकार की संवैधानिक विफलताओं को दर्शाती है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना न्यायसंगत माना जाएगा।

(च) दो प्रदेशों के बीच चल रहे जल विवाद में एक प्रदेश ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इन्कार कर दिया। इस स्थिति में भी राष्ट्रपति शासन उचित नहीं होगा।

प्रश्न 8.
बहुत-से प्रदेश राज्यपाल की भूमिका को लेकर नाखुश क्यों हैं?
उत्तर:
संविधान के अनुसार राज्यपाल को राज्य का संवैधानिक मुखिया बनाया गया है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती । उसका कार्यकाल पाँच वर्षों का होता है, परंतु वह राष्ट्रपति के प्रसाद-पर्यन्त अपने पद पर बना रहता है। परंतु हाल के कुछ वर्षों से राज्यपाल की भूमिका, अधिकार क्षेत्र, नियुक्ति के तरीके आदि को लेकर केंद्र और राज्य में मतभेद उत्पन्न हुए हैं।

विरोधी दल की राज्य सरकारें यह आरोप लगाती रही हैं कि केंद्र सरकार राज्यपाल के माध्यम से उनकी सरकारों का पतन करने में लगी रहती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि सन् 1950 से लेकर अब तक लगभग 127 से भी अधिक बार अनुच्छेद 356 का प्रयोग संघवाद के द्वारा किया जा चुका है। अधिकांश मामलों में राज्यपाल की भूमिका निन्दा की पात्र बनी है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस तरह की घटनाएँ आए दिन भारतीय राजनीति में घटती रहती हैं जिससे राज्यपाल की भूमिका विवादास्पद बन गई और अन्य लोगों में भी असन्तोष देखने को मिलता है।

यद्यपि राज्यपाल का पद बहुत ही गौरव और गरिमा का पद है। इसलिए संविधान के अनुरूप राज्यपाल को अपने पद की प्रतिष्ठा हर प्रकार से बनाए रखनी चाहिए। राज्य को प्रशासन में अपनी भूमिका स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर निभानी चाहिए। इसके अतिरिक्त विशेष परिस्थितियों में उसे भी स्वविवेक की शक्तियाँ दी गई हैं, उसका प्रयोग आवश्यकता पड़ने पर केंद्र के हाथों में कठपुतली बनकर नहीं बल्कि उचित एवं विवेकपूर्ण तरीके से करना चाहिए।

प्रश्न 9.
यदि शासन संविधान के प्रावधानों के अनुकूल नहीं चल रहा, तो ऐसे प्रदेश में राष्ट्रपति-शासन लगाया जा सकता है। बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सी स्थिति किसी देश में राष्ट्रपति-शासन लगाने के लिहाज से संगत है और कौन-सी नहीं? संक्षेप में कारण भी दें
(क) राज्य के विधानसभा के मुख्य विपक्षी दल के दो सदस्यों को अपराधियों ने मार दिया और विपक्षी दल प्रदेश की सरकार को भंग करने की माँग कर रहा है।
(ख) फिरौती वसूलने के लिए छोटे बच्चों के अपहरण की घटनाएँ बढ़ रही हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफा हो रहा है।
(ग) प्रदेश में हुए हाल के विधान सभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला है। भय है कि एक दल दूसरे दल के कुछ विधायकों से धन देकर अपने पक्ष में उनका समर्थन हासिल कर लेगा।
(घ) केंद्र और प्रदेश में अलग-अलग दलों का शासन है और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्र हैं। (ङ) सांप्रदायिक दंगों में 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। (च) दो प्रदेशों के बीच चल रहे जल विवाद में एक प्रदेश ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इनकार कर दिया।
उत्तर:
(क) दिए गए प्रश्नों में ‘क’ के लिए राष्ट्रपति शासन संगत नहीं है। विपक्षी दलों की माँग अनुचित है, क्योंकि सदस्यों को मारे जाने के बदले में अपराधियों को दंडित करना चाहिए न कि सरकार को भंग करने का काम पूर्ति हेतु अपराधिक घटनाएँ बढ़ सकती हैं।

(ख) फिरौती वसूलने के लिए छोटे बच्चों का अपहरण और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफा को रोकने के लिए राष्ट्रपति शासन की आवश्यकता नहीं बल्कि अपराधियों को उचित सजा और कानून व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है ताकि राज्य में ऐसी घटनाएँ करने के बारे में कोई सोच भी न सके।

(ग) प्रदेश में हुए हाल के विधान सभा चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू करना असंगत है क्योंकि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में भारत के राज्यों में अनेक गठबन्धन सरकारें बनी हैं।

(घ) केंद्र और प्रदेश में अलग-अलग दलों का शासन और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं यह स्थिति राष्ट्रपति शासन के योग्य नहीं है, क्योंकि संघात्मक एवं केंद्रीय सरकार संघ एवं राज्य सत्ता पर अलग-अलग दलों की सरकारों का होना कोई अस्वाभाविक स्थिति नहीं है। अतः यदि केंद्र में एक दल की सरकार है तो राज्य में दूसरे दल की सरकार हो सकती है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति प्रशासन थोपना गलत होगा।

(ङ) सांप्रदायिक दंगों में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए यह घटना सरकार की संवैधानिक विफलताओं को दर्शाती है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना न्यायसंगत माना जाएगा।

(च) दो प्रदेशों के बीच चल रहे जल विवाद में एक प्रदेश ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इन्कार कर दिया। इस स्थिति में भी राष्ट्रपति शासन उचित नहीं होगा।

प्रश्न 10.
ज्यादा स्वायत्तता की चाह में प्रदेशों ने क्या माँगें उठाई हैं?
उत्तर:
भारत में संघात्मक शासन है और संघ और इकाइयों के अधिकार क्षेत्र संविधान द्वारा बँटे हुए हैं, परंतु केंद्र को अधिक शक्ति प्रदान की गई है। राज्यों में अधिक स्वायत्तता की माँग सन् 1960 के बाद आरंभ हुई। स्वायत्तता का अर्थ स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है कि राज्यों को उनके मामलों में केंद्रीय सरकार द्वारा किसी भी प्रकार का अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

राज्यों को शक्तियाँ संविधान द्वारा उपलब्ध कराई गई हैं और उन्हें उनका प्रयोग करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। राज्यों को जन-कल्याण की योजनाएँ बनाने एवं उन्हें लागू करने की शक्तियाँ बिना किसी रोक-टोक के प्राप्त होनी चाहिएँ। यही नहीं वित्तीय क्षेत्र में भी राज्य स्वतंत्र होने चाहिएँ। तभी राज्य की स्वायत्तता को लागू किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, केंद्र का राजनीतिक व प्रशासनिक मामलों में न्यूनतम हस्तक्षेप होना चाहिए।

केंद्र का कार्य-क्षेत्र सीमित होना चाहिए। उसे केवल विदेश संबंध, रक्षा, मुद्रा और जन-संचार के विषयों के मामलों में शक्तियाँ प्रदान की जानी चाहिएँ। कराधान के क्षेत्र में भी उनकी शक्तियाँ सीमित होनी चाहिएँ। उन्हें केवल उतने ही कर लगाने का अधिकार दिया जाना चाहिए, जितने उन्हें उपर्युक्त कार्य सम्पन्न करने के लिए आवश्यक हों। राज्यों को कराधान के इतने अधिकार प्रदान किए जाने चाहिएँ, जिससे कि वे साधनों का अभाव महसूस न करें।

प्रश्न 11.
क्या कुछ प्रदेशों में शासन के लिए विशेष प्रावधान होने चाहिएँ? क्या इससे दूसरे प्रदेशों में नाराज़गी पैदा होती है? क्या इन विशेष प्रावधानों के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच एकता मजबूत करने में मदद जब कुछ प्रदेशों में शासन के लिए विशेष प्रावधान होंगे तो अन्य राज्यों में नाराजगी या असन्तोष पनपना स्वाभाविक है। इसका एक उदाहरण यह है-उत्तराखंड राज्य का दर्जा पाने से पूर्व उत्तर प्रदेश का भाग था और उत्तर प्रदेश के लोग जहाँ चाहे रह सकते थे।

परंतु जब उत्तराखंड को विशेष दर्जा प्राप्त हो गया तो उत्तराखंड के बाहर के लोग वहाँ अचल संपत्ति नहीं खरीद सकते थे जबकि उत्तराखंड के लोग उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहाँ चाहे संपत्ति खरीद सकते हैं। स्थायी रूप से मूल निवासी का दर्जा उत्तराखंड अथवा अन्य किसी विशेष दर्जा प्राप्त अर्थात् विशेष प्रावधानों द्वारा शासित राज्यों में किसी बाहरी राज्य के व्यक्ति को नहीं मिल सकता। अर्थात्न होती है।

संविधान द्वारा संघ एवं राज्यों में शक्तियों का विभाजन समान रूप से किया गया है। परंतु कुछ राज्यों की ऐतिहासिक, सामाजिक तथा जनसंख्या संबंधी अवस्थाओं को देखते हुए विशेष प्रावधान किया गया है। अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड आदि राज्य ऐसे हैं जहाँ कुछ विशेष प्रावधान लागू हैं। संघीय व्यवस्था में शक्तियों का विभाजन संघ के सभी प्रांतों में सामान रूप से होना चाहिए। यद्यपि कुछ पिछड़े एवं आदिम जातियों वाले राज्यों के लिए विशेष प्रावधानों का किया जाना भी आवश्यक था। इसीलिए संविधान में अपवादस्वरूप विशिष्ट उद्देश्यों के अंतर्गत ऐसे प्रावधान किए गए हैं।

संघवाद HBSE 11th Class Political Science Notes

→ भूमिका आधुनिक युग में प्रजातन्त्र को शासन का लोकप्रिय स्वरूप माना जाता है। प्राचीन समय में नगर-राज्य होते थे, जिनकी जनसंख्या व उनका क्षेत्र सीमित होता था।

→ वर्तमान काल में राज्यों की जनसंख्या और कार्य-क्षेत्र इतना बढ़ गया है कि उन्हें राष्ट्रीय-राज्य (National State) कहा जाने लगा है। इन राष्ट्रीय-राज्यों का प्रशासन एक-स्थान से चलाना कठिन कार्य है।

→ इसलिए शासन सुविधा की दृष्टि से राज्य को कई इकाइयों (Units) में बाँट दिया जाता है।

→इन इकाइयों में अलग-अलग शासन-व्यवस्था स्थापित कर दी जाती है तथा उन्हें स्थानीय मामलों का प्रबन्ध करने की शक्तियाँ या अधिकार प्रदान कर दिए जाते हैं और राष्ट्रीय स्तर के मामलों का प्रबन्ध केंद्रीय या राष्ट्रीय सरकार को सौंप दिया जाता है।

→ अतः इन इकाइयों की सरकारों व राष्ट्रीय सरकार में क्या संबंध स्थापित होते हैं, इस आधार पर शासन-व्यवस्था को दो भागों एकात्मक व संघात्मक (Unitary and Federal) में बाँटा जाता है।

→ इस अध्याय में संघात्मक या संघवाद व्यवस्था का विवेचन करते हुए इसके अर्थ, लक्षण या आवश्यक तत्त्व, भारतीय संघवाद का स्वरूप एवं संघात्मक स्वरूप में केंद्र को शक्तिशाली बनाने के कारणों तथा संघ एवं राज्यों के बीच संबंधों तथा दोनों के बीच पाए जाने वाले तनाव के कारणों के परिणामस्वरूप राज्यों के बीच उठने वाली स्वायत्तता की माँग से जुड़े विभिन्न प्रश्नों पर भी प्रकाश डाला जाएगा।

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HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 8 स्थानीय शासन

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 8 स्थानीय शासन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Solutions Chapter 8 स्थानीय शासन

HBSE 11th Class Political Science स्थानीय शासन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
भारत का संविधान ग्राम पंचायत को स्व-शासन की इकाई के रूप में देखता है। नीचे कुछ स्थितियों का वर्णन किया गया है। इन पर विचार कीजिए और बताइए कि स्व-शासन की इकाई बनने के क्रम में ग्राम पंचायत के लिए ये स्थितियाँ सहायक हैं या बाधक?

(क) प्रदेश की सरकार ने एक बड़ी कंपनी को विशाल इस्पात संयंत्र लगाने की अनुमति दी है। इस्पात संयंत्र लगाने से बहुत-से गाँवों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। दुष्प्रभाव की चपेट में आने वाले गाँवों में से एक की ग्राम सभा ने यह प्रस्ताव पारित किया कि क्षेत्र में कोई भी बड़ा उद्योग लगाने से पहले गाँववासियों की राय ली जानी चाहिए और उनकी शिकायतों की सुनवाई होनी चाहिए।

(ख) सरकार का फैसला है कि उसके कुल खर्चे का 20 प्रतिशत पंचायतों के माध्यम से व्यय होगा।

(ग) ग्राम पंचायत विद्यालय का भवन बनाने के लिए लगातार धन माँग रही है, लेकिन सरकारी अधिकारियों ने माँग को यह कहकर ठुकरा दिया है कि धन का आबंटन कुछ दूसरी योजनाओं के लिए हुआ है और धन को अलग मद में खर्च नहीं किया जा सकता।

(घ) सरकार ने डुंगरपुर नामक गाँव को दो हिस्सों में बाँट दिया है और गाँव के एक हिस्से को जमुना तथा दूसरे को सोहना नाम दिया है। अब डुंगरपुर नामक गाँव सरकारी खाते में मौजूद नहीं है।

(ङ) एक ग्राम पंचायत ने पाया कि उसके इलाके में पानी के स्रोत तेजी से कम हो रहे हैं। ग्राम पंचायत ने फैसला किया कि गाँव के नौजवान श्रमदान करें और गाँव के पुराने तालाब तथा कुएँ को फिर से काम में आने लायक बनाएँ।
उत्तर:
प्रश्न में कुल पाँच स्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनका उत्तर निम्नलिखित प्रकार से है-
(क) प्रश्न की प्रथम स्थिति ग्राम पंचायत के लिए सहायक सिद्ध होगी,
(ख) द्वितीय स्थिति भी ग्राम पंचायत के लिए सहायक है,
(ग) प्रश्न की तीसरी स्थिति ग्राम पंचायत के लिए बाधक हो सकती है,
(घ) प्रश्न की चौथी स्थिति भी ग्राम पंचायत के लिए बाधक है,
(ङ) पाँचवीं स्थिति ग्राम पंचायत के लिए सहायक है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 8 स्थानीय शासन

प्रश्न 2.
मान लीजिए कि आपको किसी प्रदेश की तरफ से स्थानीय शासन की कोई योजना बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ग्राम पंचायत स्व-शासन की इकाई के रूप में काम करे, इसके लिए आप उसे कौन-सी शक्तियाँ देना चाहेंगे? ऐसी पाँच शक्तियों का उल्लेख करें और प्रत्येक शक्ति के बारे में दो-दो पंक्तियों में यह भी बताएँ कि ऐसा करना क्यों जरूरी है।
उत्तर:
ग्राम पंचायत स्थानीय स्व-शासन की त्रिस्तरीय ढाँचे में सबसे निम्न स्तर की संस्था है। ग्राम पंचायत स्व-शासन की इकाई के रूप में कार्य करें, इसके लिए उसे निम्नलिखित शक्तियाँ देनी चाहिएँ
1. नागरिक सुविधाएँ-नागरिक सुविधाओं के अधीन ग्राम पंचायत अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकती है। उदाहरण के लिए – गाँव के लोगों के लिए स्वच्छ पानी, प्रकाश की पर्याप्त व्यवस्था, चिकित्सालयों की व्यवस्था, दूषित पानी की निकासी आदि।

2. समाज कल्याण का कार्य-ग्राम पंचायतें समाज कल्याण के लिए अनेक कार्य कर सकती हैं; जैसे परिवार नियोजन तथा कल्याण के कार्यों को प्रभावी बनाने के लिए विभिन्न उपाय कर सकती हैं।

3. विकास कार्य-विकास के लिए भी ग्राम पंचायतें बहुत सारे कार्य कर सकती हैं; जैसे गाँव में छोटे-छोटे कुटीर उद्योग लगा सकती हैं। इससे ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा और उनकी आय में वृद्धि होगी तथा जीवन-स्तर भी उन्नत होगा।

4. शिक्षा का प्रबंध ग्राम पंचायत ग्रामीण लोगों के विकास एवं समृद्धि के लिए शिक्षा का प्रबंध करें ताकि ग्रामीण बच्चों की । शिक्षा में रुचि बढ़े और वे आसानी से शिक्षा ग्रहण कर आदर्श नागरिक बन सकें।

5. मनोरंजन कार्य-ग्राम पंचायतें ग्रामीण लोगों के लिए मनोरंजन की व्यवस्था कर सकती है। इसके लिए वह स्टेडियम में खेल-प्रतियोगिता आदि का आयोजन भी कर सकती है जिससे गाँव के बच्चों का शारीरिक विकास भी होगा।

प्रश्न 3.
सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए संविधान के 73वें संशोधन में आरक्षण के क्या प्रावधान हैं? इन प्रावधानों से ग्रामीण स्तर के नेतृत्व का खाका किस तरह बदला है?
उत्तर:
24 अप्रैल, 1993 को 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम अर्थात् नए पंचायती राज अधिनियम को लागू कर शक्तिशाली स्थानीय स्वशासी सरकार की दिशा में संसद ने ऐतिहासिक कार्य किया। कमजोर वर्गों के लिए उक्त संशोधन अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं

(1) कुल स्थानों में से 50% स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित करने की घोषणा की गई।

(2) अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों (S.C., S.T.) के सदस्यों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार होगा। इन आरक्षित पदों में से 1/3 स्थान इन्हीं जातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाएंगे। उदाहरण के लिए, यदि गाँव की जनसंख्या 10,000 है और उसमें (S.C., S.T.) की संख्या 2,000 है, तो S.C., S.T. के लिए कुल सीटों का 5वाँ हिस्सा आरक्षित होगा अर्थात् यदि कुल 20 सीटें हैं तो S.C., S.T. के लिए चार सीटें आरक्षित करनी पड़ेंगी,

(3) पिछड़ी जातियों के आरक्षण का निर्णय राज्य की विधानसभा कानून के द्वारा करेगी, (4) पंचायतों के तीनों स्तरों पर अध्यक्षों के पदों का भी आरक्षण किया गया है। इन पदों पर S.C., S.T. और महिलाओं के लिए क्रमवार (Rotation) स्थान आरक्षित किए गए हैं। यह व्यवस्था 24 अप्रैल, 1994 से पूरे देश में लागू हो गई है। इस प्रकार कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान करने से इनकी स्थिति में काफी परिवर्तन आया है। विशेषकर महिलाओं को अपनी कार्यक्षमता सिद्ध करने का अवसर मिला है।

प्रश्न 4.
संविधान के 73वें संशोधन से पहले और संशोधन के बाद के स्थानीय शासन के बीच मुख्य भेद बताएँ।
उत्तर:
भारत में ग्रामीण स्थानीय शासन का इतिहास काफी पुराना है। वैदिक काल में भी इस बात के संकेत मिलते हैं कि लोग मिल-जुलकर अपनी स्थानीय समस्याओं का समाधान निकाल लेते थे। मुगल, मौर्य और ब्रिटिश काल में भी ग्रामीण स्वशासन की इकाइयों के कार्यों एवं शक्तियों में परिवर्तन होते रहे। स्वतंत्र भारत में इन संस्थाओं को राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों (धारा 40 के अनुसार राज्य के द्वारा पंचायतों का गठन) में स्थान दिया गया। फिर भी इनके विकास में आशातीत सफलता नहीं मिली। बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों के अनुसार 2 अक्तूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में प्रथम पंचायत की स्थापना की गई।

राज्य सरकारों द्वारा पंचायतों को भंग करना, अनियमित चुनाव, वित्त की समस्या व कमजोर वर्गों तथा महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व न मिलना आदि कुछ ऐसी समस्याएँ थीं, जिनका हल निकालने के लिए तथा पंचायती राज संस्थाओं को संविधान में दर्जा देने के लिए 24 अप्रैल, 1993 से 73वाँ संवैधानिक संशोधन लागू किया गया। संविधान के 73वें संशोधन से पूर्व स्थानीय संस्थाओं की शक्ति बहुत कम थी। वह स्थानीय संस्थाओं की देखभाल करने में असमर्थ थी और उसे वित्तीय मदद के लिए केंद्र पर बहुत निर्भर रहना पड़ता था।

परंतु 73वें संशोधन के बाद स्थिति बहुत बदल गई है। अब स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में मतदाता भाग लेते हैं। सीटों के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्र बनाए जाते हैं। महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दिया गया है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए भी विशेष आरक्षण सम्बन्धी प्रावधान किए गए हैं। अतः 73वें संशोधन के पहले और बाद की स्थिति में बहुत अन्तर आया है।

प्रश्न 5.
नीचे लिखी बातचीत पढ़ें। इस बातचीत में जो मुद्दे उठाए गए हैं उसके बारे में अपना मत दो सौ शब्दों में लिखें।
आलोक – हमारे संविधान में स्त्री और पुरुष को बराबरी का दर्जा दिया गया है। स्थानीय निकायों में स्त्रियों को आरक्षण देने से सत्ता में उनकी बराबर की भागीदारी सुनिश्चित हुई है।
नेहा – लेकिन, महिलाओं का सिर्फ सत्ता के पद पर काबिज होना ही काफी नहीं है। यह भी जरूरी है कि स्थानीय निकायों के बजट में महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान हो।
जयेश – मुझे आरक्षण का यह गोरखधंधा पसंद नहीं। स्थानीय निकाय को चाहिए कि वह गाँव के सभी लोगों का ख्याल रखे और ऐसा करने पर महिलाओं और उनके हितों की देखभाल अपने आप हो जाएगी।
उत्तर:
उपर्युक्त बातचीत का मुख्य विषय महिलाओं के समानाधिकार से संबंधित है। संविधान में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में समानता का अधिकार दिया गया है। इसके के अध्याय चार में उल्लेखित नीति-निर्देशक सिद्धान्तों में भी महिलाओं के हितों को संरक्षित करने का प्रयास किया गया हैं। अनुच्छेद 39 राज्य को अपनी नीतियाँ इस प्रकार से बनाने का निर्देश देता है कि स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से आजीविका का साधन जैसे समान कार्य के लिए समान वेतन आदि की व्यवस्था सम्बन्धी निर्देश दिए गए हैं।

अनुच्छेद 40 में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि राज्य ग्राम पंचायतों का गठन करने के लिए कदम उठाने का प्रयास करे। इसी प्रतिबद्धतता के अधीन संसद ने पंचायती बन्धी 73वाँ और 74वाँ अधिनियम पारित किया है और महिलाओं के लिए पंचायत और नगरपालिकाओं में एक-तिहाई आरक्षण निश्चित किया है। उपर्युक्त प्रश्न में आलोक के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों को संविधान में बराबर का दर्जा दिया गया है।

स्थानीय निकायों में आरक्षण देकर महिलाओं को सत्ता में पुरुषों के बराबर लाने का प्रयास किया गया है। नेहा के अनुसार बजट में भी स्त्रियों के लिए विशेष प्रावधान करना चाहिए और जयेश का मत है कि स्थानीय निकायों को सभी के हित के लिए कार्य करना चाहिए अर्थात् पंचायतें सभी ग्रामवासियों के कल्याण के कार्यक्रम बनाएँ तो स्वतः ही स्त्रियों का कल्याण होगा।

यहाँ यह स्पष्ट है कि उपर्युक्त तीनों विचारों के संदर्भ में यह कहना महत्त्वपूर्ण होगा कि भारत के मतदाताओं में लगभग आधा भाग महिलाओं का है और उस अनुपात में राजनीति में इनका प्रतिनिधित्व नहीं है। संविधान में समानता के सिद्धांत को स्वीकार करने के लिए यह आवश्यक है कि महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए महिलाओं के लिए आरक्षण आवश्यक है।

प्रश्न 6.
73वें संशोधन के प्रावधानों को पढ़ें। यह संशोधन निम्नलिखित सरोकारों में से किससे ताल्लुक रखता है?
(क) पद से हटा दिये जाने का भय जन-प्रतिनिधियों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है।
(ख) भूस्वामी सामंत और ताकतवर जातियों का स्थानीय निकायों में दबदबा रहता है।
(ग) ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षरता बहुत ज़्यादा है। निरक्षर लोग गाँव के विकास के बारे में फैसला नहीं ले सकते हैं।
(घ) प्रभावकारी साबित होने के लिए ग्राम पंचायतों के पास गाँव की विकास योजना बनाने की शक्ति और संसाधन का होना जरूरी है।
उत्तर:
(क) सामान्यत ग्राम पंचायत का कार्यकाल विभिन्न राज्यों में 5 वर्षों का होता है परंतु राज्य सरकार यदि ग्राम पंचायत को निश्चित अवधि से पूर्व भंग करती है तो उसे 6 महीने के भीतर दोबारा चुनाव करवाना आवश्यक है। अतः जन-प्रतिनिधियों में भय की स्थिति बनी रहती है जिसके कारण जनप्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायित्व की स्थापना के आधार पर कार्य करने का प्रयास करते हैं।

(ख) भारतीय संविधान के पंचायती राज सम्बन्धी 73वें संशोधन द्वारा महिलाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया गया है। जहाँ महिलाओं को प्रत्येक वर्ग में एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया गया है, वहाँ अनुसूचित जातियों और जनजातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सम्बन्धी प्रावधान किया गया है। इस प्रकार इस संशोधन में उन ताकतवर वर्गों को एक तरह से झटका लगा है जिन्होंने अभी तक सत्ता में अपना दबदबा बनाया हुआ था।

(ग) 73वें संशोधन के माध्यम से पंचायत को कार्य करने के लिए 29 विषय प्रदान किए गए हैं। इन विषयों में तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा का भी उल्लेख किया गया है। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि गाँव के लोग बहुत निरक्षर होते हैं। उन्हें प्रशिक्षण द्वारा गाँव के उत्थान के विषय में योजना बनाने एवं निर्णय लेने में सक्षम बनाया जा सके और उनकी निरक्षरता कोई बाधा न बने।

(घ) भारतीय संविधान के 73वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार हर वर्ष एक वित्त आयोग गठित करने का प्रावधान किया गया है जो पंचायत के वित्त का पुनरावलोकन करेगा और राज्य सरकारों से पंचायत अनुदान के लिए सिफारिश करेगी। अतः गाँव की विकास योजनाओं के लिए संसाधन के रूप में सरकार आर्थिक सहायता प्रदान करेगी।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 8 स्थानीय शासन

प्रश्न 7.
नीचे स्थानीय शासन के पक्ष में कछ तर्क दिए गए हैं। इन तर्कों को आप अपनी पसंद से वरीयता क्रम में सजायें और बताएँ कि किसी एक तर्क की अपेक्षा दूसरे को आपने ज़्यादा महत्त्वपूर्ण क्यों माना है। आपके जानते वेगवसल गाँव की ग्राम पंचायत का फैसला निम्नलिखित कारणों में से किस पर और कैसे आधारित था?
(क) सरकार स्थानीय समुदाय को शामिल कर अपनी परियोजना कम लागत में पूरी कर सकती है।
(ख) स्थानीय जनता द्वारा बनायी गई विकास योजना सरकारी अधिकारियों द्वारा बनायी गई विकास योजना से ज़्यादा स्वीकृत होती है।
(ग) लोग अपने इलाके की ज़रूरत, समस्याओं और प्राथमिकताओं को जानते हैं। सामुदायिक भागीदारी द्वारा उन्हें विचार-विमर्श करके अपने जीवन के बारे में फैसला लेना चाहिए।
(घ) आम जनता के लिए अपने प्रदेश अथवा राष्ट्रीय विधायिका के जन-प्रतिनिधियों से संपर्क कर पाना मुश्किल होता है।
उत्तर:
स्थानीय स्वशासन के पक्ष में जो तर्क दिए गए हैं, उनका वरीयत-क्रम इस प्रकार है (क) प्रश्न के चौथे (घ) तर्क को प्रथम वरीयता दी जाएगी, क्योंकि आम जनता का राष्ट्रीय विधायिका के जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर पाना कठिन होता है और स्थानीय शासन के प्रतिनिधि हर समय अपने क्षेत्र में उपलब्ध रहते हैं इसलिए इनसे संपर्क तुरंत हो जाता है और समस्या का समाधान भी जल्दी हो जाता है, (ख) प्रश्न के तीसरे तर्क (ग) को दूसरे वरीयता-क्रम में रखा जा सकता है, क्योंकि लोग भी स्थानीय होते हैं और समस्याएँ भी स्थानीय होती हैं,

इसलिए निर्णय लेने में कोई मुश्किल नहीं होती, (ग) प्रश्न के दूसरे तर्क (ख) को तीसरी वरीयता में रखा गया है, क्योंकि पंचायती राज में स्थानीय स्तर पर शक्तियों को विकेंद्रित किया गया है। इसलिए उन स्थानीय लोगों की विकास योजनाओं को भी अधिक महत्त्व दिया जाता है, (घ) प्रश्न के प्रथम तर्क (क) को अंतिम वरीयता में रखा गया है। वेगवसल गाँव की ग्राम पंचायत का फैसला उस तर्क पर आधारित था कि स्थानीय जनता द्वारा बनाई गई विकास योजना सरकारी अधिकारी द्वारा बनाई गई विकास योजना से ज्यादा स्वीकृत ही नहीं होती बल्कि स्थानीय लोगों की सहायता से कम लागत में भी पूरा कर सकती है।

प्रश्न 8.
आपके अनुसार निम्नलिखित में कौन-सा विकेंद्रीकरण का साधन है? शेष को विकेंद्रीकरण के साधन के रूप में आप पर्याप्त विकल्प क्यों नहीं मानते?
(क) ग्राम पंचायत का चुनाव कराना।
(ख) गाँव के निवासी खुद तय करें कि कौन-सी नीति और योजना गाँव के लिए उपयोगी है।
(ग) ग्राम सभा की बैठक बुलाने की ताकत।
(घ) प्रदेश सरकार ने ग्रामीण विकास की एक योजना चला रखी है। खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) ग्राम पंचायत के सामने एक रिपोर्ट पेश करता है कि इस योजना में कहाँ तक प्रगति हुई है।
उत्तर:
ग्राम पंचायत स्थानीय स्वशासन का सबसे निम्न स्तर है। प्रश्न में दिए गए कथनों में कथन (ख) विकेंद्रीकरण का साधन है। यद्यपि ग्राम सभा की बैठक बुलाने का अधिकार भी ग्राम पंचायत के कार्यों का हिस्सा है, परन्तु यह विकेंद्रीकरण का साधन होने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यह बैठक बुलाने की शक्ति उच्च अधिकारियों को भी होती है।

वास्तव में, जब तक गाँव के निवासी ही इस शक्ति का प्रयोग न करें, तब तक यह विकेंद्रीकरण का साधन नहीं हो सकता। आम नागरिक की समस्या और उसकी दैनिक जीवन की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए ग्रामीण लोग ग्राम पंचायत के द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान करें। यही सच्चा लोकतंत्र है। लोकतंत्र में सत्ता का वास्तविक विकेंद्रीकरण स्थानीय लोगों की सत्ता में भागीदारी से ही हो सकता है।

यहाँ यह भी स्पष्ट है कि एक ग्राम पंचायत को खंड विकास पदाधिकारी द्वारा इस आशय की रिपोर्ट प्राप्त होना कि प्रदेश की सरकार द्वारा चालू अमुक परियोजना की प्रगति कहाँ तक हुई है, यह विकेंद्रीकरण का साधन नहीं है क्योंकि अमुक परियोजना ग्राम सभा या ग्राम पंचायत द्वारा नहीं चलायी जा रही। अतः विकेंद्रीकरण का साधन वास्तव में (ख) भाग ही है जिसमें गाँव के निवासी स्वयं ही यह निश्चित करते हैं कि कौन-सी योजना अथवा नीति गाँव के विकास के लिए उपयोगी होगी।

प्रश्न 9.
दिल्ली विश्वविद्यालय का एक छात्र प्राथमिक शिक्षा के निर्णय लेने में विकेंद्रीकरण की भूमिका का अध्ययन करना चाहता था। उसने गाँववासियों से कुछ सवाल पूछे। ये सवाल नीचे लिखे हैं। यदि गाँववासियों में आप शामिल होते तो निम्नलिखित प्रश्नों के क्या उत्तर देते? गाँव का हर बालक/बालिका विद्यालय जाए, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कौन-से कदम उठाए जाने चाहिएँ इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए ग्राम सभा की बैठक बुलाई जानी है।

(क) बैठक के लिए उचित दिन कौन-सा होगा, इसका फैसला आप कैसे करेंगे? सोचिए कि आपके चुने हुए दिन में कौन बैठक में आ सकता है और कौन नहीं?
(अ) खंड विकास अधिकारी अथवा कलेक्टर द्वारा तय किया हुआ कोई दिन।
(ब) गाँव का बाज़ार जिस दिन लगता है।
(स) रविवार
(द) नाग पंचमी/संक्रांति

(ख) बैठक के लिए उचित स्थान क्या होगा? कारण भी बताएँ।
(अ) जिला कलेक्टर के परिपत्र में बताई गई जगह।
(ब) गाँव का कोई धार्मिक स्थान।
(स) दलित मोहल्ला।
(द) ऊँची जाति के लोगों का टोला।
(ध) गाँव का स्कूल।
(ग) ग्राम सभा की बैठक में पहले जिला-समाहर्ता (कलेक्टर) द्वारा भेजा गया परिपत्र पढ़ा गया। परिपत्र में बताया गया था कि शैक्षिक रैली को आयोजित करने के लिए क्या कंदम उठाये जाएँ और रैली किस रास्ते होकर गुजरे। बैठक में उन बच्चों के बारे में चर्चा नहीं हुई जो कभी स्कूल नहीं आते।

बैठक में बालिकाओं की शिक्षा के बारे में, विद्यालय भवन की दशा के बारे में और विद्यालय के खुलने-बंद होने के समय के बारे में भी चर्चा नहीं हुई। बैठक रविवार के दिन हुई इसलिए कोई महिला शिक्षक इस बैठक में नहीं आ सकी। लोगों की भागीदारी के लिहाज से इस को आप अच्छा कहेंगे या बुरा? कारण भी बताएँ। (घ) अपनी कक्षा की कल्पना ग्राम सभा के रूप में करें। जिस मुद्दे पर बैठक में चर्चा होनी थी उस पर कक्षा में बातचीत करें और लक्ष्य को पूरा करने के लिए कुछ उपाय सुझायें।
उत्तर:
(क) ग्राम सभा की बैठक के लिए उचित दिन कौन-सा होगा, इसका निर्णय करने से पहले यह सोचना होगा कि अधिक-से-अधिक लोग किस दिन उपस्थित हो सकते हैं। प्रश्न में दिए गए दिन निम्नलिखित हैं (अ) खंड विकास पदाधिकारी अथवा कलेक्टर द्वारा तय किया हुआ कोई दिन (ब) जिस दिन गाँव का बाज़ार लगता है (स) रविवार (द) नागपंचमी/संक्रांति इन सब दिनों में खंड विकास पदाधिकारी
अथवा
कलेक्टर द्वारा निश्चित किया गया दिन उपयुक्त रहेगा। मैं यहाँ यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जिस दिन गाँव का बाज़ार लगता है, लोग अपनी खरीददारी में व्यस्त रहते हैं। इसके अतिरिक्त रविवार के दिन सम्बन्धित कर्मचारी एवं महिला शिक्षक उपस्थित नहीं हो पाएंगे। नागपंचमी अथवा संक्रांति तो त्योहार का दिन है जिसमें लोग व्यस्त रहते हैं।

(ख) ग्राम सभा की बैठक के लिए कौन-सा स्थान उचित होगा, इसके लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि स्थान का चुनाव करते समय यह देखा जाए कि अधिक-से-अधिक ग्रामीण सभा में उपस्थित हो सकें। प्रश्न में दिए गए स्थान निम्नलिखित हैं

(अ) जिला कलेक्टर के परिपत्र में बताई गई जगह पर बैठक करने अथवा (ब) गाँव का कोई धार्मिक स्थान या (स) दलित मोहल्ला या (द) ऊँची जाति के लोगों का टोला अथवा (ध) गाँव का स्कूल प्रश्न में दिए गए उपर्युक्त सभी स्थानों में से सबसे उपयुक्त स्थान गाँव का स्कूल है जिसे सभी वर्गों, धर्मों एवं जातियों के लोगों द्वारा समान आदर भाव के साथ निष्पक्ष स्थान के रूप में देखा जाता है।

(ग) ग्राम सभा बैठक में पहले जिला कलेक्टर द्वारा भेजा गया परिपत्र पढ़ा गया। परिपत्र में बताया गया था कि शैक्षिक रैली को आयोजित करने के लिए क्या कदम उठाए जाएँ और रैली किस रास्ते से होकर गुजरे, बैठक में उन बच्चों के विषय में चर्चा नहीं हुई जो कभी विद्यालय नहीं आते। बैठक में बालिकाओं की शिक्षा के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई। बैठक रविवार के दिन हुई इसलिए कोई महिला शिक्षक उस बैठक में नहीं आई।

अतः इस विवेचन से स्पष्ट होता है कि जनता की भागीदारी के लिहाज से बैठक की इस कार्यवाही में कोई कार्य जनता के हित में नहीं किया गया। जिला कलेक्टर द्वारा भेजे गए पत्र में मुख्य समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया है, क्योंकि स्थानीय समस्याएँ तो स्थानीय व्यक्तियों की व्यापक भागीदारी से ही हल हो सकती है।

(घ) अपनी कक्षा की ग्राम सभा के रूप में कल्पना करते हुए सर्वप्रथम हम एक मीटिंग बुलाने की घोषणा करेंगे। बैठक का मुख्य विषय इस प्रकार होगा-

  • उन बच्चों की समस्या पर चर्चा की जाए जो कभी स्कूल नहीं आते,
  • गरीबी उन्मूलन के उपायों पर चर्चा,
  • ग्रामीण विकास हेतु शिक्षा के महत्त्व पर चर्चा,
  • ग्राम प्रधान-द्वारा समापन-भाषण।

इस प्रकार ग्राम सभा द्वारा सर्वसम्मति से प्रत्येक बालक/बालिका को माता-पिता द्वारा विद्यालय में भेजने की अनिवार्यता निश्चित करने के साथ-साथ एक निगरानी समिति भी बनाई जाए जो गाँव में प्रत्येक घर के स्कूल जाने योग्य बच्चों एवं उनके माता-पिता को बराबर प्रेरित करने का कार्य करें।

स्थानीय शासन HBSE 11th Class Political Science Notes

→ आधुनिक युग प्रजातन्त्र का युग है और आज प्रजातन्त्र को सर्वोत्तम शासन माना जाता है। यह जन-प्रभुसत्ता पर आधारित होता है। जन-प्रतिनिधि लोक कल्याण की भावना से शासन चलाते हैं।

→ प्रजातन्त्र एक कल्याणकारी राज्य होता है। लोक कल्याण के सभी कार्य अकेली केन्द्रीय सरकार नहीं कर सकती। इसलिए सरकार के कार्य को कुशलतापूर्वक चलाने के लिए अत्यावश्यक है कि प्रजातान्त्रिक संस्थाओं का निचले स्तर तक प्रसार किया जाए।

→ इससे हमारा अभिप्राय है कि गाँवों एवं शहरों में जन-निर्वाचित संस्थाएँ होनी चाहिएँ। इन संस्थाओं को स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त स्वतन्त्रता होनी चाहिए।

→ भारत में भी जनता को सक्रिय रूप से भागीदार बनाने के लिए शक्तियों के विकेन्द्रीयकरण के सिद्धान्त को अपनाया गया है। आज ग्रामों व शहरों में स्थानीय संस्थाओं की स्थापना की गई है।

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
42वें संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में कौन-से दो शब्द जोड़े गए थे? यह संशोधन कब पारित हुआ था ?
उत्तर:
संविधान का 42वां संशोधन सन् 1976 में पारित हुआ। इस द्वारा प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ (Socialist) तथा धर्म-निरपेक्ष (Secular) शब्द जोड़े गए थे।

प्रश्न 2.
भारत एक प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य है, व्याख्या करें।
उत्तर:
इसका अर्थ यह है कि भारत अपने आन्तरिक तथा विदेशी मामलों में पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है और यह किसी अन्य विदेशी शक्ति के नियन्त्रण में नहीं है। भारत अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में अपनी इच्छानुसार आचरण कर सकता है और वह किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि अथवा समझौते को मानने के लिए बाध्य नहीं है। भारत अपनी आन्तरिक तथा बाहरी नीति के निर्माण में पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है।

प्रश्न 3.
किसी देश के संविधान में अंकित प्रस्तावना का महत्त्व क्यों होता है? कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • प्रस्तावना उस देश के संविधान के संचालन के पथ-प्रदर्शन का कार्य करती है।
  • प्रस्तावना संविधान में निहित उद्देश्यों, आदर्शों एवं मूल्यों की ओर संकेत करती है।

प्रश्न 4.
संविधान के दार्शनिक पहलू से क्या तात्पर्य है?
अथवा
संविधान के राजनीतिक दर्शन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
संविधान के दार्शनिक पहलू से तात्पर्य संविधान के सार से होता है जो एक देश के सामाजिक एवं राष्ट्रीय मूल्यों को प्रतिबिम्बित करता है।

प्रश्न 5.
किसी देश के संविधान के दर्शन में निहित किन्हीं दो बातों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • संविधान के दर्शन में 3G देश के संविधान के आदर्श एवं सिद्धान्त निहित होते हैं।
  • संविधान के दर्शन में 3G देश के संविधान द्वारा अपनाई जाने वाली कुछ अवधारणाएँ; जैसे न्याय, समानता, विकास एवं स्थिरता आदि निहित होती हैं।

प्रश्न 6.
किसी भी लोकतान्त्रिक देश में संविधान के मूल्य या महत्त्व के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • संविधान, सरकार पर नियन्त्रण रखने और ‘जन स्वतन्त्रता’ की रक्षा का साधन है।
  • संविधान, लोकतन्त्रीय पद्धति के अनुरूप देश में शान्तिपूर्ण तरीके से बदलाव लाने का साधन है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान के उद्देश्य को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान का उद्देश्य है-धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणतन्त्र स्थापित करना जो भारतीय नागरिकों को न्याय, स्वतन्त्रता और समानता का आश्वासन दे। इसके अतिरिक्त, संविधान भातृत्व को बढ़ावा देता है और व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की अखण्डता को आश्वासन देता है।

प्रश्न 8.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना से शासन के किन उद्देश्यों की स्पष्टता होती है?
उत्तर:

  • न्याय,
  • स्वतन्त्रता,
  • समानता,
  • बन्धुता एवं
  • राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की आलोचना के कोई दो आधार लिखिए।
उत्तर:

  • प्रस्तावना की न्यायिक मान्यता का अभाव होना।
  • समाजवाद एवं धर्मनिरपेक्षता; जैसे शब्दों की अस्पष्टता का होना।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान पर विदेशी संविधानों के प्रभाव के कारण इसे क्या कहकर आलोचना की जाती है?
उत्तर:
भारतीय संविधान पर विदेशी संविधानों के प्रभाव के कारण इसे ‘उधार ली गई वस्तुओं का थैला’ एवं विविध संविधानों की खिचड़ी’ कहकर आलोचना की जाती है।

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान की आलोचना के किन्हीं दो आधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • भारतीय संविधान अत्यधिक लम्बा और विस्तृत संविधान है।
  • भारतीय संविधान में अनेक प्रावधान ऐसे हैं जिनके पीछे कानूनी शक्ति का अभाव है।

प्रश्न 12.
भारतीय संविधान निर्माण पर किन देशों की छाप या प्रभाव अधिक दिखाई देता है? कोई पाँच देशों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • इंग्लैण्ड,
  • अमेरिका,
  • ऑस्ट्रेलिया,
  • जापान,
  • जर्मनी आदि।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान ‘उधार लिया गया थैला नहीं है। इस कथन के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान निर्माताओं ने विदेशी संविधानों की आँखें मूंद कर नकल नहीं की बल्कि प्रत्येक व्यवस्था को भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही संविधान में स्थान दिया जिससे हमारे संविधान में एक मौलिकता आ गई। ऐसे में हमारे संविधान को उधार का थैला कहना गलत है।

प्रश्न 14.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का बहुत महत्त्व है। संविधान सभा के सदस्य पं० ठाकुरदास भार्गव का कहना है कि प्रस्तावना संविधान का मुख्य तथा मूल्यवान भाग है। यह संविधान की आत्मा है। इसमें संवैधानिक शक्ति के स्रोत, भारतीय राज्य के स्वरूप, संविधान द्वारा प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्यों और संविधान को स्वीकार किए जाने वाली तिथि का वर्णन किया गया है। इसी कारण से कई लोगों द्वारा इसे ‘संविधान की कुंजी’ या ‘संविधान का दर्पण’ कहा जाता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत एक गणराज्य (Republic) कैसे है?
उत्तर:
गणराज्य का अर्थ यह है कि देश का अध्यक्ष प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित पदाधिकारी होगा। हमारे देश के मुखिया अर्थात् राष्ट्रपति का पद पैतृक सिद्धान्त पर आधारित नहीं है। वह एक निश्चित काल (5 वर्ष) के लिए जनता के प्रतिनिधियों (संसद एवं राज्यों की विधानसभा के सदस्यों द्वारा) द्वारा निर्वाचित किया जाता है। अतः भारत गणराज्य होने की शर्त को पूर्ण करता है। यदि राष्ट्रपति की मृत्यु हो जाए तो 6 मास के अन्दर नए राष्ट्रपति का चुनाव करवाना संविधान के अनुसार आवश्यक है।

प्रश्न 2.
भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य (Secular State) है, व्याख्या करें।
उत्तर:
यह शब्द संविधान की प्रस्तावना में संविधान के 42वें संशोधन के द्वारा जोड़ा गया है। इसका अर्थ है कि भारत में रहने वाले सभी लोगों को अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को मानने तथा उसका प्रचार करने का अधिकार है। राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं और धर्म के आधार पर राज्य किसी प्रकार के भेदभाव का प्रयोग नहीं करेगा।

सरकार किसी भी धर्म को कोई विशेष संरक्षण प्रदान नहीं करेगी। सरकार के द्वारा अपने नागरिकों को कोई ऐसा चन्दा या करं देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिससे प्राप्त आय किसी एक धर्म के प्रचार के लिए खर्च की जाने वाली हो । यद्यपि हमारे संविधान में धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार का पहले से ही संकेत था, परन्तु अब यह शब्द जोड़ने से संविधान का उद्देश्य और भी स्पष्ट हो गया है।

प्रश्न 3.
भारत को समाजवादी (Socialist) राज्य क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
यह शब्द संविधान की प्रस्तावना में संविधान के 42वें संशोधन के द्वारा जोड़ा गया है। इस शब्द का उद्देश्य है कि भारत में इस प्रकार की शासन व्यवस्था स्थापित की जाए जिससे समाज के सभी वर्गों को, विशेष रूप से पिछडे लिए उचित तथा समान अवसर प्राप्त हों, मनुष्य के द्वारा शोषण समाप्त हो और आर्थिक विषमता को कम किया जाए। काँग्रेस ने बहुत पहले से ही भारत में लोकतान्त्रिक समाजवाद की स्थापना करना अपना उद्देश्य घोषित किया था और उसी दल की सरकार द्वारा यह शब्द संविधान में सन् 1976 (42वें संशोधन द्वारा) में जोड़ दिया गया।

प्रश्न 4.
भारत एक लोकतान्त्रिक (Democratic) राज्य है, स्पष्ट करें।
उत्तर:
भारत एक लोकतान्त्रिक राज्य है जिसमें अन्तिम शक्ति जनता के हाथों में है। जनता वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्येक पाँच वर्ष के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है जो उस कार्यकाल में देश के शासन को चलाते हैं। मन्त्रिमण्डल जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों अर्थात् संसद के द्वारा हटाया जा सकता है। अतः अन्तिम शक्ति जनता में निहित है। देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं और उनकी रक्षा के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका की स्थापना की गई है।

प्रश्न 5.
‘प्रस्तावना’ (Preamble) का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘प्रस्तावना’ उस लेख (Document) को कहते हैं जिसे किसी संविधान के आरम्भ होने से पूर्व अंकित किया जाता है। इससे संविधान के मख्य उद्देश्यों, मौलिक सिद्धान्तों तथा उसके आदर्शों का सांकेतिक रूप में वर्णन किया जाता है। प्रस्तावना में उस समाज के सामाजिक, राजनीतिक तथा संवैधानिक ढाँचे का चित्र देखा जा सकता है। संविधान की प्रस्तावना एक ऐसा झरोखा होती है, जिसमें संविधान-निर्माताओं की भावनाओं और आशाओं का दृश्य देखा जा सकता है। यही कारण है कि प्रस्तावना को संविधान-निर्माताओं के ‘हृदय की कुंजी’ और ‘संविधान की आत्मा’ कहा जाता है।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना (Preamble) लिखें।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना इस प्रकार है “हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए। तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्म-समर्पित करते हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

प्रश्न 7.
संविधान की प्रस्तावना में वर्णित सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
न्याय शब्द से अभिप्राय यह है कि व्यक्ति के निजी हित और व्यवहार समाज के सामान्य हितों के अनुकूल हों। इस प्रकार न्याय का उद्देश्य वास्तव में सार्वजनिक भलाई ही है। इसमें सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्रियाएँ सम्मिलित हैं। सामाजिक न्याय से भाव यह है कि समाज का सदस्य होने के नाते एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति में धर्म, जाति, नस्ल, रंग आदि के आधार पर भेद नहीं किया जा सकता। आर्थिक न्याय का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका कमाने का समान अवसर प्राप्त है और उसे अपने काम की उचित मजदूरी मिलेगी।

राजनीतिक न्याय से अभिप्राय है कि राजनीति से सम्बन्धित क्रियाओं में प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के कोई भी पदवी प्राप्त कर सकता है तथा राजनीति में भाग ले सकता है। किसी भी व्यक्ति के साथ किसी भी आधार पर अर्थात् जाति, जन्म, वर्ग, वंश, कुल आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। सभी व्यक्तियों को इनमें से किसी भी आधार पर भेदभाव किए बिना वोट डालने, चुनाव लड़ने, सरकारी पद प्राप्त करने, राजनीतिक दल बनाने तथा सरकार की आलोचना करने के अधिकार प्रदान किए गए हैं।

प्रश्न 8.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का बहुत महत्त्व है। इसकी मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  • भारत एक पूर्ण प्रभुसत्ता-सम्पन्न राज्य होगा, जिसका अर्थ है कि भारत अब व्यावहारिक या कानूनी रूप से किसी भी बाहरी शक्ति के अधीन नहीं है,
  • संविधान में 42वें संशोधन के पश्चात् समाजवाद की स्थापना की गई, जिससे राष्ट्र की उन्नति का लाभ समाज के सब लोगों को प्राप्त हो सके,
  • प्रस्तावना में लोकतन्त्र की स्थापना के लिए कहा गया है। संविधान ने प्रभुसत्ता किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग को नहीं, अपितु जनता को सौंपी है,
  • गणराज्य की स्थापना की गई, जिसके अन्तर्गत राज्याध्यक्ष पैतृक न होकर जनता द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए निर्वाचित होगा।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त ‘राष्ट्र की एकता’ तथा ‘अखण्डता’ शब्दों का क्या अर्थ है?
उत्तर:
भारतीय संविधान के निर्माता अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो’ और शासन करो’ (Divide and Rule) की नीति से भली-भाँति परिचित थे और उसका परिणाम भुगत चुके थे। अतः वे भारत की एकता को बनाए रखने के बहुत इच्छुक थे। अतः संविधान की प्रस्तावना में भारत की एकता की घोषणा की गई। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारत के सभी नागरिकों को भारत की (इकहरी) नागरिकता प्रदान की गई है।

भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है तथा सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। भारतीय संविधान में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है। हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है। संविधान के 42वें संशोधन द्वारा ‘एकता’ के साथ ‘अखण्डता’ शब्द को भी जोड़ दिया गया है।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान की त्रुटियाँ या कमियाँ (Weaknesses) बताएँ।
अथवा
किन बातों के आधार पर भारतीय संविधान की आलोचना की जाती है?
य संविधान निर्माताओं ने देश की वर्तमान एवं भावी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हए एक अच्छा और स्थायी संविधान बनाने का प्रयास किया, परन्तु फिर भी कोई संविधान ऐसा नहीं हो सकता जो कमियों या दोषों से पूर्णतः मुक्त हो। भारतीय संविधान भी इसका अपवाद नहीं है। भारतीय संविधान की भी अनेक आधारों पर आलोचना हुई है। ऐसे कुछ प्रमुख आधार इस प्रकार हैं-

(1) भारतीय संविधान अत्यधिक लम्बा एवं विस्तृत संविधान है। इसके परिणामस्वरूप भारतीय संविधान न्यायपालिका के सामने वकीलों की वाक्कुशलता से एक खिलौना बनकर रह गया है। अनेक संवैधानिक विवाद खड़े हुए हैं, जिसमें स्वयं न्यायपालिका ने भी अलग-अलग समय में अलग-अलग निर्णय दिए हैं। जैसे मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में न्यायपालिका ने अपने निर्णय को बार-बार बदला है,

(2) भारतीय संविधान में अनेक प्रावधान ऐसे भी हैं जिनके पीछे कानूनी मान्यता का अभाव । है। ऐसे प्रावधान व्यर्थ में ही संविधान के प्रावधानों को अनावश्यक रूप दे रहे हैं। जैसे राज्य नीति के निदेशक सिद्धान्त एक अलग अध्याय IV के द्वारा संविधान में रखे गए हैं, परन्तु कानूनी शक्ति के अभाव में न्यायपालिका भी इन्हें लागू करवाने में असमर्थ है। अतः संविधान में केवल कानूनी स्वरूप के प्रावधान रखना ही अधिक अच्छा है,

(3) भारतीय संविधान-निर्मात्री सभा भी वास्तव में सच्चे अर्थों में जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही थी। आलोचकों का कहना है कि अधिकांश सदस्य विभिन्न सम्पन्न वर्गों से सम्बन्धित थे। अतः वे भारतीय समाज का समुचित प्रतिनिधित्व करने वाली संविधान सभा नहीं कही जा सकती। ऐसे में उनके द्वारा निर्मित संविधान समस्त जनता का संविधान कैसे कहा जा सकता है।

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान की ‘प्रस्तावना’ की आलोचना किन बातों के आधार पर की गई है?
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की आलोचना दी गई बातों के आधार पर की गई है-
(1) संविधान की प्रस्तावना के आरम्भ में यह बताया जा चुका है कि संविधान सभा के सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर सभी नागरिकों द्वारा नहीं चुने गए हैं। उनको चुनने वाला देश की आबादी का एक बहुत छोटा भाग था, क्योंकि सन् 1935 के भारत सरकार के अधिनियम ने सम्पत्ति के आधार पर लोगों को मताधिकार दिया था।

इसलिए आलोचकों का कहना है कि ऐसे सीमित मतदाताओं के प्रतिनिधियों द्वारा बनाया गया संविधान जनता का संविधान कैसे कहा जा सकता है, परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संविधान सभा में 82 प्रतिशत सदस्य काँग्रेस दल के थे तथा काँग्रेस उस समय सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रतिनिधि संस्था थी,

(2) संविधान की प्रस्तावना को न्यायिक मान्यता प्राप्त न होने से न्यायालय उसमें दिए गए सिद्धान्तों को लागू करने के लिए सरकार को बाध्य नहीं कर सकते। अतः उसमें दिए गए सिद्धान्त पवित्र घोषणा से अधिक कुछ भी नहीं हैं,

(3) संविधान के 42वें संशोधन ने प्रस्तावना में दो शब्द जोड़ तो अवश्य दिए हैं, लेकिन इन शब्दों का कोई सुनिश्चित अर्थ उसमें नहीं दिया है। अतः देश के विभिन्न वर्गों, संगठनों, राजनीतिक दलों तथा उनके नेताओं द्वारा इन शब्दों का मनमाने अर्थ लगाने से उन्हें व्यावहारिक रूप अभी तक नहीं दिया गया है। समाज में धन की प्रधानता तथा धर्म और जातियों के आधार पर प्रतिदिन होने वाले हिंसक दंगे इस विश्लेषण की पुष्टि करते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान के राजनीतिक दर्शन के क्या अर्थ हैं? इसमें प्रायः कौन-कौन सी बातें शामिल होती हैं?
उत्तर:
संविधान के राजनीतिक दर्शन का अर्थ (Meaning of Political Philosophy of the Constitution) वास्तव में संविधान का दर्शन संविधान में अंकित विभिन्न शब्दों एवं धाराओं के वास्तविक अर्थ एवं लक्ष्य को प्रकट करने वाला होता है। दूसरे शब्दों में किसी देश के संविधान का मूल्यांकन जिन आधारों पर किया जाता है, उन्हें ही संविधान के दर्शन का नाम दिया जाता है। संविधान का मूल्यांकन वास्तव में संविधान में निहित उद्देश्यों, आदर्शों एवं मूल्यों की सफलता के आधार पर किया जाता है कि हम इन्हें कहाँ तक प्राप्त करने में सफल हुए और कहाँ तक असफल हुए।

इस प्रकार किसी संविधान का वास्तविक ज्ञान केवल उस देश के संविधान की धाराओं या प्रावधानों के अध्ययन से ही नहीं होता, बल्कि उस दर्शन के अध्ययन से होता है जिस पर उस देश के संविधान की धाराएँ आधारित हैं और जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शासन या सरकार का स्वरूप निश्चित किया गया है।

जैसे हमारे भारतीय संविधान निर्माताओं ने प्रत्येक भारतीय नागरिक को न्याय, स्वतन्त्रता एवं समानता प्रदान करने के उद्देश्य से संविधान की विभिन्न धाराओं में कानूनी प्रावधान किए हैं। ऐसा इसीलिए क्योंकि हमारा राजनीतिक दर्शन लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर आधारित है। एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में न्याय, समानता एवं स्वतन्त्रता के तत्त्व अपरिहार्य होते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि संविधान के राजनीतिक दर्शन के आधार पर ही संविधान की सफलताओं एवं कमियों को इंगित किया जा सकता है। संक्षेप में, संविधान का दर्शन संविधान का सार होता है जो एक देश के सामाजिक एवं राष्ट्रीय मूल्यों को प्रतिबिम्बित करता है।

किसी भी देश के संविधान के दर्शन में जो बातें निहित होती हैं वे इस प्रकार हैं-

(1) किसी देश के संविधान का निर्माण जिन आदर्शों की बुनियाद पर हुआ है, वे संविधान के दर्शन की ओर संकेत करते हैं, जैसे भारत के संविधान का निर्माण लोकतन्त्र रूपी आदर्श की बुनियाद पर निर्मित हुआ है,

(2) किसी भी देश का संविधान कुछ अवधारणाओं को भी अपने में, अपने देश की परिस्थितियों के अनुरूप निहित रखता है जो उस देश के संविधान के दर्शन की ओर एक संकेत होता है; जैसे भारत में अधिकार, कर्तव्य, न्यायपालिका, नागरिकता आदि का भारतीय लोकतन्त्र के अनुरूप अर्थ एवं उद्देश्य है। जबकि चीन जैसे साम्यवादी देश में वहाँ के साम्यवादी दर्शन के अनुरूप इन्हीं अवधारणाओं के अर्थ बदल जाते हैं,

(3) एक देश के संविधान का दर्शन वास्तव में उस देश के संविधान निर्माण के समय संविधान निर्माताओं के सम्मुख तत्कालिक परिस्थितियों एवं उसके परिणामस्वरूप उनके बीच हुए वाद-विवाद एवं निर्णयों में भी देखा जा सकता है। जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान में निर्मित होने वाला संविधान एक तरह से ‘शान्ति संविधान’ रूपी दर्शन पर क्यों आधारित हुआ?

इसका उत्तर एवं कारण स्पष्ट है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार एवं हिरोशिमा और नागासाकी के ऊपर हुई विजित राष्ट्रों की बमबारी से व्यवस्थित तत्कालिक चुनौतियों ने संविधान निर्माताओं को यह निर्णय जापानी जनता के लिए लेना पड़ा कि वे युद्ध एवं अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान हेतु बल प्रयोग एवं धमकी के साधनों से सर्वथा दूर रहेंगे और न ही सेना व युद्ध सामग्री इत्यादि राष्ट्र के लिए रखेंगे।

जबकि दूसरी तरफ चीनी संविधान का निर्माण भी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हुआ, लेकिन उनकी साम्यवादी विचारधारा के प्रसार की चुनौती ने उन्हें युद्ध एवं राष्ट्रीय सीमाओं के विस्तार को अपने संविधान का निर्माण करते समय अपने राजनीतिक दर्शन में प्रमुख स्थान दिया। इसके अतिरिक्त यहाँ हम एक उदाहरण भारतीय संविधान का भी ले सकते हैं जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद निर्मित हुआ।

भारतीय संविधान निर्माताओं ने शोषणयुक्त एवं अन्याय एवं अत्याचार पर आधारित जीवन ब्रिटिश शासकों के अधीन व्यतीत किया था। इसलिए भारतीय संविधान निर्माताओं की चुनौतियाँ विशेषकर भारतीय नागरिक को गौरवमय जीवन के साथ-साथ न्याय, समानता एवं स्वतन्त्रता पर आधारित जीवन प्रदान करना था। अतः भारतीय संविधान एवं उसकी शासन-प्रणाली वास्तव में ऐसे ही राजनीतिक दर्शन पर आधारित है,

(4) किसी देश के संविधान का दर्शन वास्तव में देश की सरकार के विभिन्न अंगों की शक्ति एवं उसके सम्प्रभु सम्पन्न स्वरूप के साथ-साथ उस देश के नागरिकों के साथ उनके सम्बन्धों को भी स्पष्ट करता है। जैसे भारत का संविधान न्यायपालिका की सर्वोच्चता, स्वतन्त्रता एवं निष्पक्षता के साथ व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जबकि चीन में न्यायपालिका एक अधीनस्थ संस्था या अंग के रूप में कार्य करती हुई विधानपालिका एवं कार्यपालिका के कार्यों की ही पुष्टि करने का कार्य करती है। अतः उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि किसी देश के संविधान के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए उसके वैधानिक स्वरूप के साथ-साथ संविधान में निहित आदर्शों एवं मूल्यों के अनुरूप उसका मूल्यांकन किया जाए। यहाँ हम संविधान के दर्शन की स्पष्टता हेतु विशेषतः भारतीय संविधान में निहित मूल्यों एवं आदर्शों की स्पष्टता हेतु संविधान के मूल प्रावधानों का भी अध्ययन करेंगे।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान के मूल प्रावधानों (Core Provisions) का उल्लेख करें।
उत्तर:
किसी भी देश का संविधान न केवल शासक एवं शासित सम्बन्धों को निश्चित करता है, बल्कि एक वैधानिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के अधीन नागरिकों एवं समाज के विकास सम्बन्धी सिद्धान्तों का विवेचन करते हुए शासन शक्ति या सरकार के प्रभुसत्ता सम्पन्न अंगों के कार्यों एवं उनकी शक्तियों की भी स्पष्ट व्याख्या करता है। यही वास्तव में उस देश के संविधान के सारभूत या मूल प्रावधान होते हैं। यहाँ हम भारतीय संविधान के मूल प्रावधानों का विवेचन करेंगे जो निम्नलिखित हैं

1. सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक, गणराज्य की स्थापना (Establishment of a Sovereign, Socialist, Secular, Democratic, Republic)-भारत में संविधान के द्वारा भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न, लोकतान्त्रिक गणराज्य घोषित किया गया है और संविधान के 42वें संशोधन के द्वारा इसमें समाजवादी (Socialist) तथा धर्म-निरपेक्ष (Secular) शब्दों को जोड़कर इसे सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष लोकतान्त्रिक गणराज्य बना दिया गया है। इन विभिन्न अवधारणाओं को संक्षेप में निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा रहा है

(1) सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न (Sovereign):
सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न का अर्थ यह है कि भारत अपने आन्तरिक तथा बाहरी दोनों ही प्रकार के मामलों में पूर्ण रूप से स्वतन्त्र तथा सर्वोच्च सत्ताधारी है। आन्तरिक प्रभुसत्ता का अर्थ है कि भारत क्षेत्र में रहने वाले लोगों और भारत राज्य में स्थित सभी समुदायों पर भारत राज्य को अधिकार प्राप्त है और बाहरी प्रभुसत्ता का अभिप्राय यह है कि भारत किसी विदेशी राज्य के अधीन नहीं है

तथा दूसरे राज्यों से वह अपनी इच्छानुसार सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। 15 अगस्त, 1947 से पूर्व भारत को यह स्थिति प्राप्त नहीं थी। लेकिन 15 अगस्त, 1947 के पश्चात् भारत अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में अपनी इच्छानुसार आचरण कर सकता है और यह किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय संधि अथवा समझौते को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

(2) समाजवादी (Socialist):
समाजवादी शब्द संविधान की प्रस्तावना में संविधान के 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया है। इस शब्द का उद्देश्य है कि भारत में इस प्रकार की शासन-व्यवस्था स्थापित की जाए, जिससे समाज के सभी वर्गों को, विशेष रूप से पिछड़े वर्गों को, विकास के लिए उचित तथा समान अवसर प्राप्त हों, मनुष्य का मनुष्य के द्वारा शोषण समाप्त हो और आर्थिक विषमता को कम किया जाए।

कांग्रेस ने बहुत पहले से ही भारत में लोकतान्त्रिक समाजवाद की स्थापना करना अपना उद्देश्य घोषित किया था और उसी दल की सरकार द्वारा यह शब्द संविधान में 1976 (42वें संशोधन द्वारा) में जोड़ दिया गया।

(3) धर्म-निरपेक्ष (Secular):
धर्म-निरपेक्ष शब्द भी संविधान की प्रस्तावना में संविधान के 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह है कि भारत में रहने वाले सभी लोगों को अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को मानने तथा उसका प्रचार करने का अधिकार है। राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं और धर्म के आधार पर राज्य किसी प्रकार के भेदभाव का प्रयोग नहीं करेगा।

सरकार किसी भी धर्म को कोई विशेष संरक्षण प्रदान नहीं करेगी। सरकार के द्वारा अपने नागरिकों को कोई ऐसा चंदा या कर देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिससे प्राप्त आय किसी धर्म विशेष के प्रचार के लिए खर्च की जाने वाली हो। यद्यपि हमारे संविधान में धर्म-निरपेक्षता की ओर पहले से ही संकेत था, परन्तु अब यह शब्द जोड़ने से संविधान का उद्देश्य और भी स्पष्ट हो गया है।

(4) लोकतन्त्रात्मक (Democratic):
लोकतन्त्रात्मक का अर्थ है कि भारत एक लोकतन्त्रात्मक राज्य है, जिसमें अन्तिम शक्ति जनता के हाथों में है। जनता वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्येक पांच वर्ष के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है जो उस काल के लिए देश के शासन को चलाते हैं। अब तक देश में हुए 17 लोकसभा चुनाव इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट है कि यदि सरकार अपने उत्तरदायित्व के आधार पर कार्य ठीक तरह से नहीं करती है तो उस सरकार या मन्त्रिमण्डल को जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों अर्थात् संसद के द्वारा हटाया जा सकता है। देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं और उनकी रक्षा के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका की स्थापना की गई है।

(5) गणराज्य (Republic):
गणराज्य का अर्थ यह है कि देश का अध्यक्ष प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित पदाधिकारी होगा। हमारे देश के मुखिया अर्थात् राष्ट्रपति का पद पैतृक सिद्धान्त पर आधारित नहीं है, वह एक निश्चित काल (5 वर्ष) के लिए जनता के प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित किया जाता है। यदि उसकी मृत्यु हो जाए तो 6 मास के अन्दर नए राष्ट्रपति का चुनाव करवाना आवश्यक है।

संघात्मक संविधान परन्तु एकात्मक प्रणाली की ओर झुकाव (Federal Constitution with a Unitary Bias) यद्यपि भारतीय संविधान में ‘संघ’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, परन्तु फिर भी यह सत्य है कि भारत का वर्तमान संविधान देश में संघीय शासन-प्रणाली की स्थापना करता है। इसमें वे सभी लक्षण मौजूद हैं जो संघीय सरकार की स्थापना के लिए आवश्यक हैं; जैसे

(1) संविधान के अनुसार शासन की शक्तियों का केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों में संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची के द्वारा बँटवारा किया गया है।

(2) भारत का संविधान लिखित है तथा इसका अधिकांश भाग कठोर है। इसका कारण यह है कि संविधान का एक बहुत बड़ा. भाग ऐसा है, जिसमें संशोधन करने के लिए संसद के दोनों सदनों का विशेष बहुमत तथा राज्यों की स्वीकृति लेना भी आवश्यक है।

(3) संविधान देश का सर्वोच्च कानून है और इसकी रक्षा करने के लिए एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई है। सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के उल्लंघन में पास किए गए किसी भी कानून को अवैध घोषित करके रद्द करने का अधिकार प्राप्त है।

(4) इसके अतिरिक्त केन्द्रीय संसद का संगठन द्वि-सदनीय विधानमण्डल प्रणाली के आधार पर किया गया है। लोकसभा, जो कि संसद का निचला सदन है, देश की जनता का प्रतिनिधित्व करता है और राज्यसभा में संघ की इकाइयों के प्रतिनिधि बैठते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस संविधान में संघीय शासन-प्रणाली के सभी तत्त्व मौजूद हैं,

अतः यह संघीय संविधान है। कुछ आलोचकों का विचार है कि भारतीय संविधान एक पूर्ण संघीय संविधान नहीं है, क्योंकि इसका झुकाव एकात्मकता की ओर है। इसका कारण यह है कि केन्द्रीय सरकार को इतना अधिक शक्तिशाली बनाया गया है कि यह संविधान बनावट में संघात्मक है, परन्तु भाव में एकात्मक है। पी०एस० देशमुख का मत था कि, “जो संविधान बना है वह संघात्मक की अपेक्षा एकात्मक अधिक है।” भारतीय संविधान के एकात्मक लक्षण संक्षेप में निम्नलिखित हैं-

(1) भारतीय संविधान ने एक अत्यन्त शक्तिशाली केन्द्र का निर्माण किया है। डॉ० कश्यप के अनुसार, “संघ सूची में 97 विषय हैं और वह तीनों सूचियों में सबसे लम्बी है। समवर्ती सूची में 52 विषयों पर भी केन्द्र सरकार जब चाहे कानून बना सकती है। इसके अतिरिक्त अपशिष्ट शक्तियाँ भी केन्द्रीय सरकार में ही निहित हैं।”
(2) संघ एवं राज्यों के लिए एक ही संविधान का होना भी एकात्मक शासन-प्रणाली का लक्षण है।
(3) राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संविधान के संघात्मक स्वरूप का एकात्मक स्वरूप में परिवर्तित हो जाना एकात्मक शासन का लक्षण है।
(4) देश में एकीकृत न्याय व्यवस्था का होना भी एकात्मक शासन का लक्षण है।
(5) समूचे देश के लिए अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा व पुलिस सेवाएँ एवं एक ही चुनाव आयोग की व्यवस्था भी देश को एकात्मक शासन की ओर ले जाता है।
(6) देश के नागरिकों को केवल इकहरी नागरिकता प्रदान करना भी एकात्मक शासन का ही लक्षण है।
अतः संविधान में एकात्मक लक्षणों को देखने के पश्चात् यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय संविधान का स्वरूप संघात्मक होने के पश्चात् भी यह कहा जा सकता है कि यह एकात्मक स्वरूप की ओर झुका हुआ है।

अंशतः लचीला तथा अंशतः कठोर (Partly Flexible and Partly Rigid)-भारत का संविधान इतना कठोर नहीं है जितना कि संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान और न ही इतना लचीला है जितना कि इंग्लैण्ड का संविधान। यह अंशतः लचीला (Flexible) और अंशतः कठोर (Rigid) है। वास्तव में हमारे संविधान-निर्माताओं का उद्देश्य यह था कि संविधान इतना लचीला न हो कि यह बहु-संख्यक दल के हाथों में खिलौना बन जाए। दूसरी ओर यह इतना कठोर भी न हो कि इसे देश की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार बदला न जा सके, जिससे इसकी प्रगति के मार्ग में बाधा आए।

भारतीय संविधान में संशोधन के लिए तीन विभिन्न प्रणालियों को अपनाया गया है। सर्वप्रथम, संविधान में कुछ विषय ऐसे हैं जिनके सम्बन्ध में संशोधन संसद के दोनों सदनों के साधारण बहुमत से किया जा सकता है। इस श्रेणी में नए राज्यों का निर्माण, राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन तथा उनका पुनर्गठन, राज्य विधानमण्डलों का संगठन एक-सदनीय अथवा द्वि-सदनीय आधार पर करना तथा भारतीय नागरिकता से सम्बन्धित विषय शामिल हैं। दूसरे स्थान पर कुछ विषय ऐसे हैं जिनमें संशोधन करने के लिए दोनों सदनों के कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत द्वारा स्वीकार होने के पश्चात् इसका कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों द्वारा स्वीकृत होना आवश्यक है।

इस श्रेणी में राष्ट्रपति के चुनाव की ‘पद्धति, सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों से सम्बन्धित विषय तथा राज्यों के संसद में प्रतिनिधित्व आदि विषय आते हैं। संविधान में दिए गए शेष विषयों के सम्बन्ध में संशोधन करने के लिए संसद के प्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत द्वारा प्रस्ताव स्वीकृत होना आवश्यक है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारा संविधान न तो पूर्ण रूप से लचीला है और न ही पूर्ण रूप से कठोर, बल्कि इन दोनों के बीच का मार्ग अपनाता है। अब तक भारतीय संविधान में 104 (दिसम्बर, 2019 तक) संशोधन हो चुके हैं।

4. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)-भारतीय संविधान की एक अन्य विशेषता यह है कि इसके अनुसार, नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सुरक्षित किया गया है। ये वे अधिकार हैं जो एक मनुष्य को शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक विकास के लिए बहुत आवश्यक समझे जाते हैं। इस सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन अधिकारों की न केवल संविधान में घोषणा ही की गई है, वरन उन्हें लागू करने के लिए भी उचित साधन जुटाए गए हैं। ये अधिकार न्याययोग्य (Justiciable) हैं और सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को उनकी रक्षा का कार्य सौंपा गया है।

उन्हें विधानमण्डल द्वारा पास किए गए किसी भी कानून को अथवा कार्यपालिका द्वारा जारी किए गए किसी भी ऐसे अध्यादेश को अवैध घोषित करने तथा रद्द करने का अधिकार दिया गया है, जो इन अधिकारों का उल्लंघन करते हों। प्रत्येक नागरिक अपने इन अधिकारों को प्राप्त करने के लिए न्यायालयों की सहायता ले सकता है और उसका यह अधिकार, केवल संकटकालीन स्थिति को छोड़कर, कभी भी स्थगित नहीं किया जा सकता। .. संविधान के भाग तीन, अनुच्छेद 14 से 32 तक नागरिकों के निम्नलिखित छः अधिकारों का वर्णन किया गया है

  • समानता का अधिकार (Right to Equality)
  • स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Freedom)
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Exploitation)
  • धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion)
  • सांस्कृतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (Cultural and Educational Rights)
  • सवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)

मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में यह बात ध्यान देने योग्य है कि ये अधिकार असीमित नहीं हैं। इनके प्रयोग पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगे हुए हैं। इसके अतिरिक्त संसद इनमें संशोधन करके इन पर रोक लगा सकती है।

5. मौलिक कर्त्तव्य (Fundamental Duties)-संविधान के 42वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 51-A में नागरिकों के दस मौलिक कर्तव्य निश्चित किए गए हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में मूल कर्त्तव्यों का समावेश पूर्व सोवियत संघ के संविधान से प्रेरित होते हुए किए गए हैं। स्वर्ण सिंह समिति की अनुशंसा के पश्चात् भारतीय संविधान में निम्नलिखित दस मूल कर्तव्यों को समाविष्ट किया गया

  • संविधान का पालन करना तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज तथा राष्ट्रीय गान का सम्मान करना।
  • स्वतन्त्रता संग्राम को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को बनाए रखना तथा उनका पालन करना।
  • भारत की प्रभुसत्ता, एकता तथा अखण्डता का समर्थन एवं रक्षा करना।
  • देश की रक्षा करना और आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा करना।
  • धार्मिक, भाषायी तथा प्रादेशिक विभिन्नताओं को त्यागकर भारत के सभी लोगों में मेल-मिलाप तथा बन्धुत्व की भावना विकसित करना, स्त्रियों की प्रतिष्ठा के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करना।
  • अपनी मिली-जुली संस्कृति की सम्पन्न परम्परा का सम्मान करना तथा उसे सुरक्षित रखना।
  • वनों, झीलों, नदियों तथा अन्य जीवों सहित प्राकृतिक वातावरण की रक्षा और सुधार करना तथा जीव-जन्तुओं के प्रति दया की भावना रखना।।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवता, अन्वेषण और सुधार की भावना विकसित करना।
  • सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना तथा हिंसा का त्याग करना।
  • व्यक्तिगत तथा सामाजिक कार्य-कलापों के क्षेत्र में कुशलता लाने का प्रयत्न करना, ताकि राष्ट्र उपलब्धि के उच्च

शिखरों तक पहुँच सके। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सन् 2002 में 86वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा 14 वर्ष तक की आयु के बच्चे के माता-पिता या संरक्षकों को अपने बच्चे को शिक्षा दिलाने के अवसर उपलब्ध कराने संबंधी कर्त्तव्य को निश्चित किया गया है। इस प्रकार अब मूल कर्त्तव्यों की संख्या 11 हो गई है।

6. राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त (Directive Principles of State Policy):
भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों के साथ-साथ राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों का वर्णन संविधान के भाग IV, अनुच्छेद 36 से 51 तक किया गया है। इन सिद्धान्तों को अपनाने में हमारे संविधान निर्माताओं ने आयरलैण्ड के संविधान की नकल की है।

ये सिद्धान्त केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों के लिए पथ-प्रदर्शक के रूप में हैं और इनके द्वारा उन्हें यह आदेश दिया गया है कि वे अपनी नीति का निर्माण करते समय इनको ध्यान में रखें, क्योंकि इन सिद्धान्तों के पूर्ण रूप से अपनाए जाने पर ही भारत में एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना हो सकती है।

इन सिद्धान्तों का उद्देश्य भारत में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय की स्थापना करना है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त न्यायसंगत (Justiciable) नहीं हैं। इसका अर्थ यह है कि ये सिद्धान्त न्यायालयों द्वारा कानूनी तौर पर लागू नहीं किए जा सकते और यदि केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकारें उन्हें लागू नहीं करती अथवा उन्हें ध्यान में रखकर कार्य नहीं करतीं, तो नागरिकों को न्यायालय में जाकर उनके विरुद्ध न्याय माँगने का अधिकार नहीं है।

7. संयुक्त चुनाव-प्रणाली तथा वयस्क मताधिकार (Joint Electorate and Universal Adult Franchise):
भारत के नए संविधान के अनुसार पृथक् तथा साम्प्रदायिक प्रणाली (Separate and Communal Electorate), जिसका आरम्भ भारत में सन् 1909 के अधिनियम के द्वारा किया गया था और जिसका विस्तार सन् 1919 तथा 1935 के अधिनियमों के द्वारा किया गया था, को समाप्त कर दिया गया है और उसके स्थान पर संयुक्त चुनाव-प्रणाली की व्यवस्था की गई है। इसके द्वारा देश में साम्प्रदायिकता को कम करने के लिए एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया है।

इसके अतिरिक्त संविधान द्वारा वयस्क मताधिकार की व्यवस्था की गई है। स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में मताधिकार बहुत ही सीमित था, जो सम्पत्ति, शिक्षा तथा कर देने आदि की योग्यताओं पर आधारित था, परन्तु नए संविधान के अनुसार, इस प्रकार के सभी भेदभावों को समाप्त कर दिया गया है।

अब मताधिकार के लिए व्यक्ति की आयु ही एकमात्र योग्यता है कि भारत के प्रत्येक नागरिक को, जिसकी आयु 18 वर्ष अथवा उससे अधिक है, बिना किसी प्रकार के भेदभाव के यह अधिकार दिया गया है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मूल संविधान में मताधिकार की आयु 21 वर्ष रखी गई थी जोकि 61वें संवैधानिक संशोधन (1989) के द्वारा घटाकर 18 वर्ष कर दी गई है।

8. इकहरी नागरिकता (Single Citizenship):
भारत में संघीय शासन-व्यवस्था की स्थापना के बावजूद प्रत्येक नागरिक को इकहरी नागरिकता प्रदान की गई है। भारत का प्रत्येक नागरिक चाहे वह देश के किसी भी भाग में (किसी भी राज्य में) रहता हो, भारत का ही नागरिक है। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कुछ अन्य संघ-राज्यों में दोहरी नागरिकता के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में रहने वाला प्रत्येक नागरिक संयुक्त राज्य अमेरिका का नागरिक होने के साथ-साथ उस राज्य-विशेष का भी नागरिक है, जिसमें वह निवास करता है, परन्तु भारतीय संविधान के निर्माताओं का यह भी विचार था कि दोहरी नागरिकता देश की एकता को बनाए रखने में बाधक सिद्ध हो सकती है। अतः उन्होंने संघीय व्यवस्था की स्थापना करते हुए भी इकहरी नागरिकता के सिद्धान्त को अपनाया है।

9. स्वतन्त्र न्यायपालिका (Independent Judiciary):
भारतीय संविधान की एक विशेषता यह है कि इसके द्वारा न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुरक्षित किया गया है। संघात्मक शासन-व्यवस्था में संविधान की रक्षा के लिए न्यायपालिका का स्वतन्त्र होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु भी । न्यायपालिका की स्वतन्त्रता आवश्यक हो जाती है। इस कारण से हमारे संविधान में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए अनेक व्यवस्थाएँ की गई हैं।

10. द्वि-सदनीय विधानमण्डल (Bicameral Legislature):
संसार के अन्य संघीय संविधानों की भान्ति भारतीय संविधान के द्वारा भी संघीय स्तर पर द्वि-सदनीय विधानमण्डल की स्थापना की गई है। संसद के दो सदन हैं लोकसभा (House of the People) तथा राज्यसभा (Council of States)। लोकसभा संसद का निचला सदन है, जिसके सदस्यों का चुनाव लोगों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली के अनुसार किया जाता है।

इसके निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 550 तथा कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित किया गया है। राज्यसभा में अधिक-से-अधिक 250 सदस्य हो सकते हैं। इनमें से.12 सदस्य राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत (Nominate) किए जाते हैं और शेष सदस्य राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं। यह एक स्थायी सदन है। इसका प्रत्येक सदस्य 6 वर्ष के लिए चुना जाता है और प्रत्येक दो वर्ष के पश्चात् इसके 1/3 सदस्य सेवा-निवृत्त हो जाते हैं। इस प्रकार लोकसभा में देश की जनता तथा राज्यसभा में भारतीय संघ की इकाइयों (राज्यों) को प्रतिनिधित्व दिया गया है।

11. अल्पसंख्यकों तथा पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए विशेष व्यवस्था (Special Provisions for the Welfare of Minorities and Backward Classes):
संविधान के द्वारा अनुसूचित जातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। उनके लिए सरकारी नौकरियों, विधानसभाओं तथा स्थानीय संस्थाओं में स्थान आरक्षित रखे गए हैं।

79वें सवैधानिक संशोधन द्वारा यह अवधि 2010 तक तथा 95वें संशोधन द्वारा यह प्रावधान सन् 2020 तक बढ़ा दिया गया था जो 104वें संवैधानिक द्वारा आरक्षण सम्बन्धी प्रावधान जनवरी, 2030 तक बढ़ा दिया गया। पिछड़े वर्गों को यह सुविधा इसलिए दी गई है कि इनकी बहुत पिछड़ी स्थिति के कारण इन्हें विकास के लिए विशेष सुविधाओं की आवश्यकता है।

12. एक राष्ट्र भाषा (One National Language):
भारत एक विशाल देश है, जिसमें अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। इसलिए संविधान के द्वारा 22 भाषाओं (92वें संशोधन के पश्चात) को मान्यता दी गई है, परन्तु देश की एकता को बनाए रखने के लिए तथा विभिन्न भाषायी प्रान्तों में राष्ट्रीय भावनाओं का विकास करने के लिए एक राष्ट्रीय भाषा के महत्त्व को आवश्यक समझा गया, इसलिए हिन्दी को देवनागरी लिपि में राष्ट्र भाषा घोषित किया गया है। हिन्दी के विकास के लिए केन्द्र तथा राज्यों को विशेष उत्तरदायित्व सौंपे गए हैं।

13. कानून का शासन (Rule of Law):
भारत के संविधान की यह भी विशेषता है कि इसके द्वारा कानून के शासन की व्यवस्था की गई है। कानून के समक्ष सभी नागरिक बराबर हैं, कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। अमीर-गरीब, पढ़े-लिखे तथा अनपढ़, कमजोर और शक्तिशाली सभी देश के कानून के समक्ष बराबर हैं। कानून से ऊँचा कोई नहीं है। जो व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता है तो उसे कानून के द्वारा ही सजा दी जाती है। कानूनी कार्रवाई किए बिना किसी व्यक्ति को बन्दी नहीं बनाया जा सकता।

14. पंचायतों तथा नगरपालिकाओं की संवैधानिक व्यवस्था (Constitutional Provision of Panchayats and Municipalities):
संविधान के 73वें संशोधन द्वारा पंचायतों की तथा 74वें संशोधन द्वारा नगरपालिकाओं की संवैधानिक व्यवस्था की गई है। ये दोनों संशोधन सन 1992 में पारित किए गए। इन संशोधनों द्वारा पहली बार ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों की स्थानीय संस्थाओं को संविधान द्वारा मान्यता दी गई है।

15. विश्व-शान्ति का समर्थक (It Supports World Peace):
भारतीय संविधान विश्व-शान्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रबल समर्थक है। राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों में यह कहा गया है कि राज्य अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रबल समर्थक है तथा राज्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा की उन्नति और राष्ट्रों के बीच न्याय एवं सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाए रखने का प्रयत्न करेगा।

व्यवहार में भी भारत द्वारा विश्व-शान्ति बनाए रखने का हर सम्भव प्रयत्न किया गया है और युद्ध केवल उसी समय किए गए, जब आत्मरक्षा हेतु ऐसा करना आवश्यक हो गया था।

16. संकटकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers) भारतीय संविधान में हमारे संवैधानिक अध्यक्ष राष्ट्रपति को विशेष रूप से आपात्कालीन शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, जो निम्नलिखित हैं

(1) संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार यदि युद्ध, बाहरी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह के कारण या इनमें से किसी भी एक के होने की सम्भावना हो तो राष्ट्रपति पूरे देश में या देश के किसी भाग विशेष में संकटकालीन घोषणा कर सकता है। ऐसी घोषणा होने पर उसका नाममात्र का स्वरूप वास्तविक शासक के स्वरूप में बदल जाता है।

(2) किसी राज्य की संवैधानिक मशीनरी असफल होने या ऐसी सम्भावना होने पर भी उस राज्य में संविधान के अनुच्छेद 356 का प्रयोग करते हुए राज्य की शासन-व्यवस्था को राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति सीधे अपने हाथों में ले लेता है।

(3) संविधान के अनुच्छेद 360 के अन्तर्गत यदि देश में वित्तीय संकट का भय हो तो राष्ट्रपति आर्थिक संकट की घोषणा कर सकता है। अतः दिए गए सारभूत प्रावधान भारतीय संविधान के वैधानिक स्वरूप को स्पष्ट करने के साथ भारतीय समाज में नागरिकों हेतु शासन-व्यवस्था के स्वरूप एवं उद्देश्यों को भी स्पष्ट करते हैं। परन्तु यहाँ हम संविधान के मूल प्रावधानों के अतिरिक्त संविधान में की गई उन परिकल्पनाओं को जो संविधान-निर्माता भावी भारत के निर्माण के सन्दर्भ में रखते थे, का विवेचन करना भी बहुत उपयुक्त होगा। यहाँ हम उन्हीं परिकल्पनाओं का विवेचन कर रहे हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

प्रश्न 3.
प्रस्तावना (Preamble) से आप क्या समझते हैं? भारतीय संविधान की प्रस्तावना की व्याख्या करें।
उत्तर:
प्रस्तावना का अर्थ (Meaning of Preamble)-किसी भाषण अथवा लेख में प्रारम्भिक अथवा परिचयात्मक कथन को प्रस्तावना कहते हैं। प्रस्तावना किसी संविधान अथवा अधिनियम का वह प्रारम्भिक कथन है जिसमें उसके निर्माण के कारणों का उल्लेख किया जाता है तथा उन उद्देश्यों एवं आकांक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन किया जाता है जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है।

उसमें संविधान के स्रोत को इंगित किया जाता है तथा उस तिथि का उल्लेख किया जाता है जब संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित एवं आत्मार्पित किया जाता है। प्रस्तावना का स्थान प्रस्तावना का स्थान किसी संविधान अथवा अधिनियम के शीर्षक के बाद और उसके मुख्य भाग से पहले होता है। अतः संविधान की प्रस्तावना एक ऐसा झरोखा होती है, जिसमें संविधान के निर्माताओं की भावनाओं तथा उनकी आशाओं का दृश्य देखा जा सकता है। इसी कारण से भारतीय संविधान की प्रास्तावना को संविधान-निर्माताओं के दिलों की कुंजी’ कहा जाता है।

प्रस्तावना में संशोधन-प्रायः यह विचार प्रकट किया जाता था कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है और संसद को इसमें संशोधन करने का अधिकार नहीं था, परन्तु सन् 1973 में सर्वोच्च न्यायालय के केशवानन्द भारती बनाम भारत सरकार, नामक मुकद्दमे का फैसला देते हुए इसका स्पष्टीकरण कर दिया। जिसके अनुसार, प्रस्तावना संविधान का भाग है और संसद को, इसके मूल ढाँचे (Basic Structure) को छोड़कर अन्य भागों में संशोधन करने का अधिकार है।

इसके परिणामस्वरूप सन् 1976 में भारतीय संसद ने संविधान की प्रस्तावना में संशोधन करके इसमें समाजवादी (Socialist) तथा धर्म-निरपेक्ष (Secular) शब्द जोड़ दिए थे। इसके अतिरिक्त जहाँ ‘राष्ट्र की एकता’ के शब्द का प्रयोग किया गया, वहाँ ‘एकता तथा अखण्डता’ (Unity and Integrity) का भी प्रयोग किया गया है। इस प्रकार प्रस्तावना में यह शब्द जोड़कर यह सिद्ध किया गया है कि हम देश में समाजवाद लाने और राज्य को धर्म-निरपेक्ष बनाए रखने के लिए पूरी तरह उत्सुक हैं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान की प्रस्तावना निम्नलिखित है

“हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सभी में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष सप्तमी, सम्वत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्म-समर्पित करते हैं।” प्रस्तावना की विशेषताएँ या प्रस्तावना की व्याख्या-भारतीय संविधान की प्रस्तावना की विशेषताओं या इसकी व्याख्या करने के लिए हम उपर्युक्त प्रस्तावना को निम्नलिखित तीन शीर्षकों के अन्तर्गत विभाजित कर सकते हैं

  • संवैधानिक शक्ति के स्त्रोत (Source of Constitutional Authority),
  • भारतीय शासन का स्वरूप (Nature of Indian Government)
  • संविधान के उद्देश्य (Aims of the Constitution)। उपर्युक्त तीनों शीर्षकों का वर्णन भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अनुसार निम्नलिखित है

1. संवैधानिक शक्ति के स्रोत भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त प्रारम्भिक एवं अन्तिम शब्द, “हम भारत के लोग ……… संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित एवं आत्मार्पित करते हैं”, शब्दों से तीन बातें स्पष्ट होती हैं। प्रथम, संविधान के द्वारा अन्तिम प्रभुसत्ता भारत की जनता में निहित की गई है; द्वितीय, संविधान निर्माता भारतीय जनता के प्रतिनिधि हैं तथा तृतीय, संविधान निर्माता भारतीय जनता की इच्छा का परिणाम है और जनता द्वारा ही

इसे राष्ट्र को समर्पित किया गया है। इस सम्बन्ध में डॉ०बी०आर० अम्बेडकर (Dr. B.R. Ambedkar) ने संविधान सभा की बहस में ठीक ही कहा था, “मैं समझता हूँ कि प्रस्तावना इस सदन के प्रत्येक सदस्य की इच्छानुसार यह प्रकट करती है कि इस संविधान का आधार, इसकी शक्ति तथा प्रभुसत्ता इसे लोगों से ही प्राप्त हुई है।”

2. भारतीय शासन का स्वरूप संविधान की प्रस्तावना में भारत को सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रीय गणराज्य घोषित किया गया है, जो भारतीय शासन-व्यवस्था के स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। प्रस्तावना में प्रयुक्त भारतीय शासन-व्यवस्था के स्वरूप को स्पष्ट करने वाले शब्दों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है

(1) सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न का अर्थ है कि भारत पर आन्तरिक अथवा बाहरी दृष्टि से किसी विदेशी सत्ता का अधिकार नहीं है। इंग्लैण्ड, अमेरिका तथा रूस आदि देशों की भाँति भारत भी अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि अथवा समझौते को मानने के लिए बाध्य नहीं है। भारत का संयुक्त राष्ट्र संघ तथा राष्ट्रमण्डल का सदस्य होना इसकी प्रभुसत्ता पर कोई प्रभाव नहीं डालता।

(2) समाजवादी शब्द प्रस्तावना में 42वें संशोधन के द्वारा जोड़ा गया है। इसका अर्थ है कि भारत में शासन-व्यवस्था इस प्रकार चलाई जाए कि सभी वर्गों को विशेष रूप से पिछड़े हुए वर्गों को अपने विकास के लिए उचित वातावरण तथा परिस्थितियाँ मिलें, आर्थिक असमानता कम और देश के विकास का फल थोड़े से लोगों के हाथों में न होकर समाज के सभी लोगों को मिले।

(3) धर्म-निरपेक्ष शब्द भी प्रस्तावना में सन् 1976 में 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह है कि देश के सभी नागरिकों को अपनी इच्छानुसार, किसी भी धर्म को अपनाने तथा उसका प्रचार करने की स्वतन्त्रता है। राज्य धर्म के आधार पर नागरिकों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं कर सकता और राज्य किसी विशेष धर्म की किसी विशेष रूप से सहायता नहीं कर सकता। धर्म के आधार पर किसी सरकारी शिक्षा-संस्था में किसी को दाखिला देने से इन्कार नहीं किया जा सकता।

(4) लोकतन्त्रीय शब्द का अर्थ है कि शासन शक्ति किसी एक व्यक्ति या वर्ग के हाथों में न होकर समस्त जनता के हाथों में है। शासन चलाने के लिए जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है जो अपने कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। देश के प्रत्येक नागरिक को, चाहे वह किसी धर्म, जाति अथवा स्थान से सम्बन्ध रखता हो, राजनीतिक अधिकार समान रूप से प्रदान किए गए हैं। साम्प्रदायिक चुनाव-प्रणाली को समाप्त कर दिया गया है।

(5) गणराज्य का अर्थ यह है कि भारत में राज्य के अध्यक्ष का पद वंश-क्रमानुगत (Hereditary) नहीं है, बल्कि राज्य का अध्यक्ष, राष्ट्रपति एक निश्चित काल के लिए जनता के प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित किया जाता है। इंग्लैण्ड तथा जापान लोकतन्त्रीय राज्य होते हुए भी, गणराज्य नहीं हैं क्योंकि इन देशों में राजा का पद पैतृक आधार पर चलता है और वह जनता अथवा उनके प्रतिनिधियों द्वारा निश्चित काल के लिए निर्वाचित नहीं किया जाता।

3. संविधान के उद्देश्य भारतीय संविधान की प्रस्तावना से यह बात भी स्पष्ट होती है कि संविधान द्वारा कुछ विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति की आशा की गई है। ये उद्देश्य निम्नलिखित हैं

(1) न्याय-संविधान का उद्देश्य यह है कि देश के सभी नागरिकों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र- सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्रों में न्याय मिले। इस बहुमुखी न्याय से ही नागरिक अपने जीवन का पूर्ण विकास कर सकता है। .

(क) सामाजिक न्याय का अर्थ है किसी व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, जन्म-स्थान, रंग तथा लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए देश के सभी नागरिकों के लिए समानता का अधिकार संविधान के द्वारा सुरक्षित किया गया है। देश के सभी नागरिक कानून के सामने समान हैं। सार्वजनिक स्थानों पर जाने के लिए नागरिकों में रंग, जाति व धर्म आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। सरकारी नौकरी पाने के क्षेत्र में सभी के लिए समानता स्थापित करने का प्रयत्न किया गया है।

(ख) आर्थिक न्याय का यह अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को अपनी आजीविका कमाने के समान तथा उचित अवसर प्राप्त हों तथा उन्हें अपने कार्य के लिए उचित वेतन मिले। आर्थिक न्याय के लिए यह आवश्यक है कि उत्पादन तथा वितरण के साधन थोड़े-से व्यक्तियों के हाथों में न होकर समाज के हाथों में हों और उनका प्रयोग समस्त समाज के हितों को ध्यान में रखकर किया जाए। आर्थिक न्याय के इस लक्ष्य की प्राप्ति समाजवादी ढाँचे के समाज की स्थापना के आधार पर ही की जा सकती है।

(ग) राजनीतिक न्याय का अर्थ है कि राज्य के सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के सभी राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों। भारत में वयस्क मताधिकार प्रणाली को अपनाकर इस व्यवस्था को लागू किया गया है। धर्म, जाति, रंग तथा लिंग आदि के आधार पर नागरिकों को राजनीतिक अधिकार देने में कोई भेदभाव नहीं किया गया है और साम्प्रदायिक चुनाव-प्रणाली का अन्त कर दिया गया है।

(2) स्वतन्त्रता भारतीय संविधान का उद्देश्य नागरिकों को केवल न्याय दिलाना ही नहीं बल्कि स्वतन्त्रता को भी निश्चित करना है, जो व्यक्ति के जीवन के विकास के लिए आवश्यक मानी जाती है। संविधान की प्रस्तावना में नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास तथा उपासना (Thought, Expression, Faith and Worship) की स्वतन्त्रता का आश्वासन दिया गया है। इसकी पूर्ति संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के द्वारा की गई है।

(3) समानता प्रस्तावना में सामाजिक स्तर तथा अवसर (Social Status and Opportunity) का उल्लेख किया गया है। स्तर . की समानता का अर्थ यह है कि कानून की दृष्टि में देश के सभी नागरिक समान हैं तथा किसी को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नही हैं

संविधान का राजनीतिक दर्शन और धर्म, रंग, लिंग आदि के आधार पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। इन बातों का स्पष्टीकरण संविधान की धाराओं – 14-18 के द्वारा किया गया है। धारा 14 के अन्तर्गत सभी नागरिकों को कानून के सामने समानता तथा सुरक्षा प्रदान की गई है। धारा 15 में यह कहा गया है कि राज्य किसी नागरिक के साथ धर्म, रंग, जाति तथा लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा।

धारा 16 के द्वारा सभी नागरिकों को अवसर की समानता प्रदान की गई है। धारा 17 के द्वारा छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है तथा धारा 18 के द्वारा शिक्षा तथा सेना की उपाधियों को छोड़ अन्य सभी प्रकार की उपाधियों का अन्त कर दिया गया है।

(4) बन्धुता-संविधान की प्रस्तावना में बन्धुता की भावना को विकसित करने पर भी बल दिया गया है। भारत जैसे देश के लिए, जिसमें गुलामी के लम्बे काल के कारण धर्म, जाति व भाषा आदि के आधार पर भेदभाव उत्पन्न हो गए थे, बन्धुता की भावना के विकास का विशेष महत्त्व है। इसी उद्देश्य से ही साम्प्रदायिक चुनाव-प्रणाली तथा छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है।

इसके साथ ही प्रस्तावना में ‘व्यक्ति की गरिमा’ (Dignity of Individual) शब्दों का रखा जाना इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व बहुत पवित्र है। इसी धारणा से देश के सभी नागरिकों को समान मौलिक अधिकार दिए गए हैं।

(5) राष्ट्र की एकता व अखण्डता भारतीय संविधान के निर्माता अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो व शासन करो’ (Divide and Rule) की नीति से अच्छी प्रकार परिचित थे, इसलिए उनके मन और मस्तिष्क में राष्ट्र की एकता का विचार बहुत प्रबल था। इसी कारण से संविधान की प्रस्तावना में राष्ट्र की एकता को बनाए रखने की घोषणा की गई।

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ही भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है तथा इकहरी नागरिकता (Single Citizenship) के सिद्धान्त को अपनाया गया है। समस्त देश का एक ही संविधान है तथा संविधान में अनेक (22) भाषाओं को मान्यता दी गई है। 42वें संशोधन के द्वारा राष्ट्र की एकता के साथ अखण्डता शब्द जोड़ दिया गया है।

प्रश्न 4.
भारत के भावी संविधान (शासक-व्यवस्था) के बारे में संविधान सभा की परिकल्पनाएँ क्या थीं?
उत्तर:
भारत के संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा के सदस्यों की स्वतन्त्र भारत के भावी राज्य-प्रबन्ध के बारे में क्या परिकल्पनाएँ थीं। इनकी पृष्ठभूमि को सन् 1928 में प्रकाशित हुई नेहरू रिपोर्ट (Nehru Report, 1928) में देखा जा सकता है। डॉ० सरकारिया ने नेहरू रिपोर्ट को ‘वर्तमान संविधान की रूप-रेखा’ (Blue print of the Present (Indian) Constitution) कहा है।

यह रिपोर्ट भारतीयों द्वारा भारत के संविधान के निर्माण के लिए किया गया पहला प्रयत्न था। उसके पश्चात् संविधान सभा में पं० जवाहरलाल नेहरू थे जिन्होंने ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ (Objective Resolution) रखा। वह भी संविधान सभा के सदस्यों के विचारों का दर्पण था।

इसी तरह संविधान की प्रस्तावना में भी संविधान सभा के भावी भारत के राज्य-प्रबन्ध से सम्बन्धित धारणाओं के दर्शन किए जा सकते हैं। अतः उद्देश्य, प्रस्ताव और संविधान की प्रस्तावना उन उद्देश्यों और लक्ष्यों की ओर इंगित करते हैं जिनके आधार पर संविधान सभा के सदस्य भावी भारत की शासन-व्यवस्था का निर्माण करना चाहते थे। संविधान सभा के सदस्यों की भारत की भावी शासन-व्यवस्था से सम्बन्धित परिकल्पनाओं का वर्णन निम्नलिखित है-

1. सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राज्य की परिकल्पना-भारतीय नेता मुख्य रूप से उस वर्ग से सम्बन्ध रखते थे जिन्होंने अंग्रेज़ों की गुलामी देखी थी, इसलिए उनकी इच्छा भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राज्य देखने की थी। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु उन्होंने प्रस्तावना में भारत को प्रभुत्व सम्पन्न राज्य घोषित किया। इसका अभिप्राय यह है कि भारत पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है। वह किसी भी बाहरी शक्ति के अधीन नहीं है। प्रभुसत्ता जनता के पास है। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव स्वयं करे।

2. प्रजातन्त्र की परिकल्पना भारतीय संविधान सभा की दूसरी परिकल्पना यह थी कि भारत में प्रजातन्त्रात्मक शासन-व्यवस्था की स्थापना की जाए। संविधान सभा के अधिकांश सदस्य प्रजातन्त्र के समर्थक थे। अतः उन्होंने भारत के लिए प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था को अपनाया। इसका अर्थ यह है कि शासन की अन्तिम शक्ति जनता के हाथ में ही रहेगी।

लोग शासन चलाने के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं तथा निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। भारत के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार प्रदान किए गए हैं। प्रत्येक 18 वर्ष के नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मताधिकार दिया गया है और निर्वाचित होने का अधिकार भी दिया गया है। कानून के शासन की व्यवस्था तथा स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है।

3. समाजवाद की परिकल्पना-भारतीय संविधान सभा के सदस्यों पर समाजवाद की अवधारणा का प्रभाव था, इसलिए वे भारत में समाजवाद की स्थापना करना चाहते थे। नेहरू जी भारत में समाजवाद स्थापित करने के पक्ष में थे। उनका कहना था कि भारत के विकास का मार्ग केवल समाजवाद में ही निहित है। यद्यपि संविधान की मूल प्रस्तावना में समाजवाद शब्द को नहीं रखा गया था, लेकिन सन् 1976 में संविधान की प्रस्तावना में यह शब्द जोड़ दिया गया है। वास्तविकता में कांग्रेस पहले से ही भारत में प्रजातन्त्रीय समाजवाद की स्थापना का लक्ष्य घोषित कर चुकी थी। समाजवाद का अर्थ है कि भारत में इस प्रकार से

सन-व्यवस्था चलाई जाए जिसमें आर्थिक असमानता न हो तथा इस प्रकार का वातावरण उत्पन्न किया जाए जिसके द्वारा समाज के सभी वर्गों को अपना विकास करने के अवसर प्राप्त हों। देश के विकास का फल कुछ थोड़े-से लोगों के हाथ में न रहकर समाज के सभी वर्गों को बिना भेदभाव के प्राप्त हो। इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु, संविधान में राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों को अंकित किया गया है। यही नहीं समाजवाद के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 42वां संशोधन पास किया गया जिसके अन्तर्गत निदेशक सिद्धान्तों को मौलिक अधिकारों पर श्रेष्ठता प्रदान की गई है।

4. गणराज्य बनाने की परिकल्पना भारतीय संविधान निर्माताओं के समक्ष, किस प्रकार की शासन-व्यवस्था अपनाई जाए, इस सम्बन्ध में कई विकल्प थे। कुछ सदस्य अमेरिका की भाँति अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था अपनाने के पक्ष में थे। लगभग 8 सदस्यों ने शक्ति पृथक्करण के आधार पर अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली अपनाए जाने का समर्थन किया।

इसके विपरीत कुछ सदस्य संसदीय शासन-व्यवस्था को अंगीकार करने के पक्ष में थे। अन्त में संसदीय सरकार अपनाए जाने का निर्णय किया गया, परन्तु संसदीय सरकार जरूरी नहीं है कि वह गणराज्य भी हो; जैसे इंग्लैण्ड और जापान में संसदीय सरकार तो है, परन्तु गणराज्य नहीं है। इसलिए संविधान सभा के सदस्यों ने भारत में गणराज्य स्थापित करने का निर्णय लिया।

गणराज्य की प्रमुख विशेषता यह होती है कि उसमें राज्य का मुखिया नाममात्र का अधिकारी होता है, जिसे जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से निर्वाचित किया जाता है। भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचन-मण्डल द्वारा अप्रत्यक्ष विधि द्वारा किया जाता है।

5. धर्म-निरपेक्ष राज्य व्यवस्था की परिकल्पना-संविधान सभा के सदस्य इस बात से भली-भाँति परिचित थे कि भारत में अनेक प्रकार के धर्म, वर्ग व जाति के लोग रहते हैं। इन सभी लोगों में मधुर सम्बन्ध स्थापित करने का एकमात्र साधन धर्म-निरपेक्षता है। इसलिए उनकी यह हार्दिक इच्छा थी कि भारत की भावी शासन-व्यवस्था धर्म-निरपेक्षता की नींव पर आधारित हो।

अतः भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अन्तर्गत धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान किया गया है। यही नहीं धर्म-निरपेक्ष शब्द को 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में भी जोड़ा गया है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है। भारत का अपना कोई धर्म नहीं है। भारत में सभी लोगों को बिना किसी भेदभाव के अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को मानने की स्वतन्त्रता है। राज्य के लिए सभी धर्म समान हैं। राज्य किसी विशेष धर्म को संरक्षण प्रदान नहीं करेगा। सरकारी शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा और धार्मिक प्रचार पर रोक लगाई गई है।

6. कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना-राष्ट्रीय आन्दोलन राजनीति आन्दोलन होने के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक आन्दोलन भी था। राष्ट्रीय आन्दोलन के अन्तर्गत नेताओं द्वारा भारतीयों के सामाजिक व आर्थिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए अनेक प्रयत्न किए गए। इन सभी प्रयत्नों का संविधान सभा के सदस्यों पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने कामना की कि भारत एक ऐसा कल्याणकारी राज्य होना चाहिए जिसमें सभी को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय मिले।

कल्याणकारी राज्य की धारणा का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 38 में किया गया है। सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय को उद्देश्य, प्रस्ताव और संविधान की प्रस्तावना में भी देखा जा सकता है। सामाजिक न्याय का अर्थ है किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, लिंग, रंग आदि पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।

इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अनुच्छेद 14 के अनुसार कानून के समक्ष समानता का अधिकार प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार किसी भी नागरिक के विरुद्ध जाति, धर्म, वंश, लिंग व भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 17 के अनुसार छुआछूत के कलंक को समाप्त किया गया है। आर्थिक न्याय का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आजीविका कमाने के लिए समान अवसर प्राप्त हों एवं उसके कार्य के लिए उसे उचित वेतन मिले तथा उसका आर्थिक शोषण न हो।

इन्हीं उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु संविधान के अनुच्छेद 38 एवं 39 में राज्य-न की व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 41 के अनुसार बेकारी, बीमारी, बुढ़ापा तथा अंगहीन होने की अवस्था में राज्य की ओर से सहायता की व्यवस्था की गई है। राजनीतिक न्याय का तात्पर्य है कि सभी व्यक्तियों को जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के भेदभाव के बिना समान राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाएंगे।

7. शक्तिशाली केन्द्र की परिकल्पना-राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतागण तत्कालीन साम्प्रदायिक तत्त्वों तथा उनकी गतिविधियों से भली-भाँति अवगत थे और इसी साम्प्रदायिकता के कारण भारत का दो भागों में विभाजन हुआ। संविधान निर्माता ने ऐसा सोचा था कि विभाजन के बाद साम्प्रदायिकता का दानव समाप्त हो जाएगा, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। विभाजन शक्तियों ने अपना सिर फिर से उठाना आरम्भ कर दिया। उन्होंने अनुभव किया कि इसका एकमात्र उपचार शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार की व्यवस्था है।

इस प्रकार के वाद-विवाद के उपरान्त भारत में शक्तिशाली केन्द्र के अधीन संघात्मक शासन-व्यवस्था की स्थापना की गई। भारतीय संविधान में कुछ ऐसे तत्त्व पाए जाते हैं जिनके आधार पर भारतीय शासन-व्यवस्था संघात्मक है। इसके साथ-साथ कुछ ऐसे तत्त्व भी पाए जाते हैं जिनके आधार पर भारतीय शासन-व्यवस्था एकात्मक है। इसी सन्दर्भ में के०सी० वीयर (K.C. Weare) ने कहा है, “भारत एक एकात्मक राज्य है, जिसमें संघात्मक लक्षण हैं।” इसी प्रकार जैनिंग्स (Jennings) ने विचार व्यक्त किए हैं, “भारत शक्तिशाली केन्द्रीयकरण की प्रवृत्तियों वाला संघात्मक राज्य है।” पण्डित नेहरू ने भी संविधान सभा में बोलते हुए शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार की स्थापना का समर्थन किया था।

8. स्वतन्त्रता, समानता व बन्धुत्व की परिकल्पना मनुष्य की उन्नति व विकास के लिए केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता ही काफी नहीं है, बल्कि अन्य स्वतन्त्रताएँ, समानता व बन्धुत्व भी आवश्यक हैं। संविधान सभा के सदस्य स्वतन्त्रता, समानता व बन्धुत्व की भावना के महत्त्व से भली-भाँति अवगत. थे। अतः वे इनको भारत के संविधान में समावेश करने के पक्ष में थे। उद्देश्य, प्रस्ताव व संविधान की प्रस्तावना में स्वतन्त्रता, समानता व बन्धुत्व के महत्त्व पर बल दिया गया है। संविधान में नागरिकों को कई प्रकार की स्वतन्त्रताएँ प्रदान की गई हैं; जैसे विचार व्यक्त करने की स्वतन्त्रता, किसी भी धर्म को मानने की स्वतन्त्रता आदि। संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक में विभिन्न समानताओं का समावेश किया गया है;

जैसे कानून के समक्ष समानता, जाति, रंग, लिंग व भाषा के आधार पर कोई भेदभाव न करना, सरकारी नौकरी प्राप्त करने में समानता, शिक्षा व सैनिक उपाधियों को छोड़कर शेष उपाधियों की समाप्ति आदि । संविधान के निर्माता फ्रांस की क्रान्ति के नारे, स्वतन्त्रता, समानता के साथ-साथ बन्धुत्व के नारे से भी प्रभावित थे और उन्होंने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में बन्धुत्व की भावना को विकसित करने पर बल दिया।

डॉ०.अम्बेडकर (Dr. Ambedkar) के अनुसार, “बन्धुता एक ऐसा सिद्धान्त है जो सामाजिक जीवन को एकता और मजबूती प्रदान करता है।” इसी सन्दर्भ में एम०वी० पायली (M.V. Pylee) का कथन है, “न्याय, स्वतन्त्रता और समानता के आधार पर नए राष्ट्र का निर्माण करने का उद्देश्य था कि सब यह समझें कि वे एक ही धरती तथा एक ही जन्मभूमि की सन्तान हैं और आपस में बन्धु हैं।”

9. राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता की परिकल्पना संविधान को बनाने वाले अंग्रेज़ों की इस ‘फूट डालो और शासन करो’ (Divide and Rule) की नीति से भली-भाँति परिचित थे। अंग्रेजों की इसी नीति के आधार पर भारत का विभाजन हुआ था। इसलिए संविधान निर्माता भारत की एकता को बनाए रखने के पक्ष में थे। वस्तुतः संविधान की प्रस्तावना में राष्ट्र की एकता को बनाए रखने की घोषणा की गई तथा इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया गया। सभी नागरिकों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई।

समस्त भारत के लिए एक ही संविधान को अपनाया गया तथा 18 भारतीय भाषाओं को मान्यता दी गई, किन्तु अब भारतीय में संविधान में चार भाषाओं (मैथिली, डोगरी, बोडो और सन्थाली) को और जोड़ दिया गया है। अब भारतीय संविधान में 22 भाषाओं को मान्यता मिल गई है। नवम्बर, 1976 में हुए 42वें संशोधन के द्वारा प्रस्तावना में राष्ट्र की एकता के साथ अखण्डता (Integrity) शब्द जोड़ा गया है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि संविधान में नागरिकों के लिए मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई है तथापि इन्हें राष्ट्र की एकता और अखण्डता को बनाए रखने के लिए निलम्बित भी किया जा सकता है।

10. व्यक्तिगत गौरव विषयक परिकल्पना संविधान सभा के सदस्य अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के प्रति किए जाने वाले व्यवहार से भली-भाँति परिचित थे। स्वाधीनता से पहले अंग्रेजों ने भारतीयों के गौरव को मान्यता प्रदान नहीं की थी। विदेशों में भारतीयों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था। स्वाधीनता के बाद भारतीयों में गौरव को बनाए रखने के लिए प्रस्तावना में इस बात को अंकित किया गया है कि बिना गौरव अनुभव किए कोई भी राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकता।

इस तरह से संविधान की प्रस्तावना के द्वारा भारत में व्यक्तिगत गौरव को स्थापित किया जाएगा। भारतीय संविधान द्वारा सब व्यक्तियों को मौलिक अधिकार समान रूप से प्रदान करना, भारतीयों के व्यक्तिगत गौरव को ऊँचा उठाने के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम है। मौलिक अधिकारों के अलावा मताधिकार तथा चुनाव लड़ने का अधिकार भारतीयों में व्यक्तिगत गौरव एवं स्वाभिमान को प्रोत्साहित करने का प्रयत्न करता है।

11. अनुसूचित तथा पिछड़ी जातियों के हितों की रक्षा सम्बन्धी परिकल्पना स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में पिछड़ी जातियों व वर्गों .. की संख्या भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 1/5 भाग थी जिन्हें अपमान व तिरस्कार की नज़रों से देखा जाता था। श्री अम्बेडकर स्वयं इसी वर्ग से सम्बन्धित थे और उन्हें अपमान व तिरस्कार का कटु अनुभव था।

इसलिए वे पिछड़े वर्गों व जातियों के लिए कुछ करने के लिए कटिबद्ध थे। यही नहीं संविधान सभा के अन्य सदस्य भी पिछड़ी जातियों व वर्गों के उत्थान के लिए किए जाने वाली व्यवस्था के पक्ष में थे। भारतीय संविधान में अनुसूचित तथा पिछड़ी जातियों के हितों की सुरक्षा के विशेष अनुच्छेद लिखे गए हैं। इन श्रेणियों के लोगों के लिए संविधान में यह लिखा गया है कि केन्द्रीय सरकार तथा प्रान्तीय सरकारें उनके लिए कुछ सरकारी नौकरियाँ आरक्षित रखेंगी।

इसी तरह उनके लिए संसद तथा प्रान्तीय विधानपालिकाओं की कुछ सीटें भी आरक्षित की गई हैं। राष्ट्रपति को लोकसभा में दो ऐंग्लो-इण्डियन सदस्य मनोनीत करने का अधिकार प्राप्त है। शुरू में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित व पिछड़ी जातियों तथा कबीलों के लिए स्थान सुरक्षित रखने की व्यवस्था सन् 1960 तक की गई थी। बाद में दस-दस वर्ष करके इस अवधि को कई बार बढ़ा दिया गया।

अब 104वें संशोधन द्वारा इस अवधि को वर्ष 2030 तक बढ़ा दिया गया है। कुछ लोगों का मत है कि इनके लिए स्थान आरक्षित रखना समानता के विपरीत है। मण्डल आयोग की रिपोर्ट पर वी०पी० सिंह की सरकार सामाजिक एवं शिक्षा के आधार पर पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए केन्द्रीय सेवाओं के लिए नौकरियों में 28% स्थान सुरक्षित रखना चाहती थी, जिसके विरोध में भारत के अनेक युवकों को आत्मदाह करना पड़ा।

यह सरकार के लिए बहुत शर्म का विषय था। पी०वी० नरसिम्हा राव की सरकार ने सामाजिक एवं शिक्षा के आधार पर पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए केन्द्रीय सेवाओं के लिए आर्थिक स्थिति और जोड़ने की घोषणा की। इसके साथ ही 10 प्रतिशत स्थान उनके लिए भी आरक्षित किए जाएँगे जो आर्थिक कारण से तो कमज़ोर हैं, लेकिन उच्च जातीय वर्ग से सम्बन्ध रखते हैं। अभी तक इस जटिल समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।

12. अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा विषयक परिकल्पना स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में अनेक अल्पसंख्यक वर्ग थे और आज भी पाए जाते हैं। अल्पसंख्यकों को धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। मुस्लिम अपने-आपको अल्पसंख्यक मानते थे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार से मुस्लिम संरक्षण की माँग की।

सरकार ने उनकी माँग को मान लिया और कानून द्वारा उनके हितों की रक्षा का प्रावधान किया। विभाजन के समय अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों के कारण संविधान सभा के सदस्य भयभीत थे और वे स्वतन्त्र भारत में इसकी पुनरावृत्ति नहीं चाहते थे। इसलिए संवैधानिक सभा की एक समिति का गठन किया गया . जो भारतीय अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा सम्बन्धी समस्या पर विचार करेगी।

भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा हेतु विभिन्न प्रावधान दिए गए हैं। ऐंग्लो इण्डियन के लिए विधानपालिका में स्थान सुरक्षित किए गए हैं। भाषा व संस्कृति के आधार पर अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएँ खोलने का अधिकार दिया गया है।

13. संयुक्त चुनाव-प्रणाली विषयक परिकल्पना-संविधान सभा के सदस्य स्वतन्त्रता से पूर्व प्रचलित साम्प्रदायिक चुनाव-प्रणाली के कुप्रभावों से अवगत थे। मुस्लिम मतदाता मुस्लिम उम्मीदवार को तथा हिन्दू मतदाता हिन्दू उम्मीदवार को वोट डालते थे। इस चुनाव-प्रणाली के आधार पर हिन्दुओं और मुसलमानों में घृणा की भावना पैदा हुई, जिसके फलस्वरूप भारत का विभाजन हआ तथा पाकिस्तान राज्य की स्थापना हुई।

संविधान निर्माता इस प्रणाली को समाप्त करने के पक्ष में थे। भारतीय नवीन संविधान के द्वारा इस प्रणाली को समाप्त करके संयुक्त चुनाव-प्रणाली का प्रावधान किया गया है। अब भारत में सभी सम्प्रदाय मिल-जुलकर अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचित करते हैं।

14. विश्व शान्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा की परिकल्पना संविधान सभा के सदस्य दो विश्वयुद्धों का कटु अनुभव अपने साथ लिए हुए थे जिसमें लाखों लोगों की जानें गई थीं। उनकी इच्छा थी कि फिर से धरती पर ऐसा युद्ध न हो। उधर वे जापान की युद्ध-त्याग की नीति से भी प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने विश्व-शान्ति व अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा स्थापित करने का संकल्प लिया।

नवीन भारतीय संविधान विश्व-शान्ति का प्रतीक है। संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुसार भारत राष्ट्रों के बीच न्याय तथा समानतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा करेगा, अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए विधि एवं सन्धि बन्धनों के प्रति आदर का भाव रखेगा और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता के द्वारा सुलझाने का प्रयास करेगा। इस सन्दर्भ में पं० जवाहरलाल नेहरू जी की पंचशील नीति की सराहनीय भूमिका रही है। वास्तव में भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बनाए रखने के लिए विशेष भूमिका निभाई है। आज विश्व की राजनीति में भारत का प्रमुख स्थान है।

निष्कर्ष-उपरोक्त परिकल्पनाओं व दृष्टिकोणों का विस्तृत अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि संविधान निर्माताओं के मस्तिष्क में नवीन भारत की एक कल्पना थी जिसे वे कार्य रूप देना चाहते थे तथा उसी कल्पना के आधार पर उन्होंने एक संविधान का निर्माण किया। संविधान का निर्माण करते समय निर्माताओं ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि

ऐसा संविधान बने जिसे कार्यान्वित भी किया जा सके, क्योंकि कल्पनाओं व सपनों में बहकर कहीं ऐसा संविधान न बन जाए जो मात्र आदर्श बनकर रह जाए। अतः संविधान निर्माता वर्तमान संविधान में अपना उद्देश्य (जनता को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय) दिलवाने में सफल रहे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आरंभ निम्नलिखित शब्दों से होता है
(A) भारत एक समाजवाद……
(B) भारत के लोग……
(C) भारत को प्रभुसत्ता संपन्न
(D) हम भारत के लोग
उत्तर:
(D) हम भारत के लोग

2. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ तथा ‘धर्म-निरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए
(A) 42वें संशोधन द्वारा
(B) 44वें संशोधन द्वारा
(C) 46वें संशोधन द्वारा
(D) 52वें संशोधन द्वारा
उत्तर:
(A) 42वें संशोधन द्वारा

3. भारतीय संविधान लागू हुआ
(A) 15 अगस्त, 1947 को
(B) 26 जनवरी, 1946 को
(C) 26 जनवरी, 1950 को
(D) 26 जनवरी, 1952 को
उत्तर:
(C) 26 जनवरी, 1950 को

4. भारतीय संविधान में कुल अनुच्छेद हैं
(A) 395
(B) 238
(C) 138
(D) 295
उत्तर:
(A) 395

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

5. प्रस्तावना में वर्णन नहीं किया गया है
(A) प्रेस की स्वतंत्रता का
(B) पद और अवसर की समानता का
(C) विचारों की स्वतंत्रता का
(D) विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता का
उत्तर:
(A) प्रेस की स्वतंत्रता का

6. प्रस्तावना में किस न्याय का वर्णन नहीं है?
(A) सामाजिक न्याय
(B) आर्थिक न्याय
(C) राजनीतिक न्याय
(D) धार्मिक न्याय
उत्तर:
(D) धार्मिक न्याय

7. प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता है
(A) राष्ट्रपति द्वारा
(B) प्रधानमंत्री द्वारा
(C) संसद द्वारा
(D) राज्यपालों द्वारा
उत्तर:
(C) संसद द्वारा

8. प्रस्तावना में अब तक संवैधानिक विधि द्वारा संशोधन किया गया है
(A) दो बार
(B) चार बार
(C) एक बार
(D) तीन बार
उत्तर:
(C) एक बार

9. निम्नलिखित में कौन प्र में कौन प्रभुसत्ता संपन्न है?
(A) लोकसभा
(B) राष्ट्रपति
(C) जनता
(D) संविधान
उत्तर:
(C) जनता

10. संविधान में उद्देश्य का वर्णन करते हैं
(A) प्रस्तावना में
(B) मौलिक अधिकारों में
(C) संकटकालीन अनुच्छेदों में
(D) राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांतों में
उत्तर:
(A) प्रस्तावना में

11. प्रस्तावना में किस प्रकार के न्याय का वर्णन किया गया है?
(A) सामाजिक न्याय का
(B) सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय का
(C) आर्थिक न्याय का
(D) धार्मिक न्याय का
उत्तर:
(B) सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय का

12. संविधान की प्रस्तावना में निम्नलिखित में से कौन-से उद्देश्य घोषित नहीं हैं?
(A) सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय
(B) विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता
(C) व्यक्ति की गरिमा व अवसर की समानता
(D) इसमें तीन सूचियाँ संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची शामिल हैं
उत्तर:
(D) इसमें तीन सूचियाँ-संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची शामिल हैं

13. भारतीय संविधान में धर्म-निरपेक्षता का अर्थ है
(A) राज्य धर्म विरुद्ध है
(B) राज्य धार्मिक है
(C) राज्य अधार्मिक है
(D) राज्य का कोई राजधर्म नहीं है
उत्तर:
(D) राज्य का कोई राजधर्म नहीं है

14. संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त शब्द ‘सेक्यूलर’ का अर्थ है
(A) सभी नागरिकों को धर्म एवं उपासना की स्वतंत्रता
(B) एकेश्वरवाद
(C) बहुदेववाद
(D) सभी धर्मों को अस्वीकृत
उत्तर:
(A) सभी नागरिकों को धर्म एवं उपासना की स्वतंत्रता

15. भारतीय संविधान के किस काम को उसकी ‘आत्मा’ की संज्ञा दी जाती है?
(A) मौलिक अधिकारों को
(B) राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांतों को
(C) संविधान की प्रस्तावना को
(D) अनुसूचियों को
उत्तर:
(C) संविधान की प्रस्तावना को

16. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है ‘We, the people of India’ इससे निम्नलिखित में से क्या अर्थ निकलता है?
(A) भारतीय गणराज्य की प्रभुसत्ता जनता में निहित है
(B) संविधान निर्माता भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
(C) भारत का संविधान भारत की जनता की सहमति पर आधारित है
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

17. संविधान की प्रस्तावना में वर्णन मिलता है
(A) संविधान के मूल्यों का
(B) राष्ट्रपति की शक्तियों का
(C) नागरिकों के अधिकारों का
(D) नागरिकों के कर्त्तव्यों का
उत्तर:
(A) संविधान के मूल्यों का

18. भारत गणराज्य है
(A) लोकतंत्रीय व्यवस्था के कारण
(B) संघात्मक प्रणाली के कारण
(C) राज्याध्यक्ष निर्वाचित होने के कारण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) लोकतंत्रीय व्यवस्था के कारण

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दें

1. किसी देश में संविधान के मूल्यांकन के क्या आधार होते हैं?
उत्तर:
संविधान में निहित उद्देश्य, आदर्श एवं मूल्य संविधान के मूल्यांकन का आधार होते हैं।

2. क्या प्रस्तावना संविधान का कानूनी भाग होती है?
उत्तर:
संविधान में निहित उद्देश्य, आदर्श एवं मूल्य संविधान के मूल्यांकन का आधार होते हैं।

3. क्या भारतीय संविधान की प्रस्तावना में संसद संशोधन कर सकती है?
उत्तर:
हाँ।

4. भारतीय संविधान में मान्य सवैधानिक भाषाएँ कितनी हैं?
उत्तर:
22

5. भारतीय संविधान की प्रस्तावना का प्रारम्भ किन शब्दों से होता है?
उत्तर:
हम भारत के लोग ……….. शब्दों से होता है।

6. 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा राष्ट्र की एकता के साथ कौन-सा शब्द और जोड़ा गया?
उत्तर:
अखण्डता।

7. भारतीय संविधान में संशोधन प्रक्रिया का उल्लेख संविधान की किस धारा में किया गया है?
उत्तर:
368 में।

रिक्त स्थान भरें

1. भारतीय संविधान में राष्ट्रपति ………….. का प्रतीक है।
उत्तर:
गणराज्य

2. ……………. संशोधन द्वारा प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवादी शब्द जोड़े गए।
उत्तर:
42वें

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3. भारतीय संविधान में ……………. मान्य सवैधानिक भाषाएँ हैं।
उत्तर:
22

4. भारत में …………… नागरिकता दी गई है।
उत्तर:
इकहरी

5. ……………. सवैधानिक संशोधन द्वारा संविधान में आरक्षण की अवधि को सन 2030 तक बढ़ा दिया गया।
उत्तर:
104वें

6. भारत में ……………. निर्वाचन प्रणाली अपनाई गई है।
उत्तर:
संयुक्त

7. प्रस्तावना को संविधान की ……………. कहा जाता है।
उत्तर:
आत्मा

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HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 11th Class Political Science संविधान का राजनीतिक दर्शन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
नीचे कुछ कानून दिए गए हैं। क्या इनका संबंध किसी मूल्य से है? यदि हाँ, तो वह अंतर्निहित मूल्य क्या है? कारण बताएँ।
(क) पुत्र और पुत्री दोनों का परिवार की संपत्ति में हिस्सा होगा।
(ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री-कर का सीमांकन अलग-अलग होगा।
(ग) किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
(घ) ‘बेगार’ अथवा बंधुआ मजदूरी नहीं कराई जा सकती।
उत्तर:
(क) परिवार की संपति में से पुत्र और पुत्री दोनों को बराबर हिस्सा देना सामाजिक मूल्य से संबंधित है। यह संविधान में वर्णित समानता के मौलिक अधिकार के अनुरूप है, क्योंकि समानता के अधिकार के अंतर्गत लिंग, जाति, नस्ल, धर्म अथवा क्षेत्र आदि के आधार पर किसी के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा। अतः यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत के अनुरूप है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पुत्र और पुत्री को संपत्ति में बराबर का हक देना समानता पर आधारित और भेदभाव रहित समाज की स्थापना की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

(ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री-कर का सीमांकन अलग-अलग करने से आर्थिक न्याय के सिद्धांत का. पालन होता है, क्योंकि विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं का समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा उपयोग किया जाता है जिनकी कर-देय क्षमता भी अलग-अलग होती है।

(ग) किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा का न दिया जाना संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित धर्मनिरपेक्षता के मूल्य पर आधारित है। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य धार्मिक मामलों में न तो किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करेगा तथा न ही किसी प्रकार की सरकारी शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा प्रदान करेगा।

(घ) बेगार अथवा बंधुआ मजदूरी का निषेध सामाजिक न्याय के मूल्य पर आधारित है। यह संविधान के अनुच्छेद 23 में उल्लेखित शोषण के विरूद्ध अधिकार के अंतर्गत मानव के बालत् प्रतिरोध की व्यवस्था करता है। जिसके अंतर्गत समाज के किसी भी वर्ग द्वारा किसी भी अन्य वर्ग का शोषण दंडनीय अपराध ठहराया गया है।

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प्रश्न 2.
नीचे कुछ विकल्प दिए जा रहे हैं। बताएँ कि इसमें किसका इस्तेमाल निम्नलिखित कथन को पूरा करने में नहीं किया जा सकता? लोकतांत्रिक देश को संविधान की जरूरत
(क) सरकार की शक्तियों पर अंकुश रखने के लिए होती है।
(ख) अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से सुरक्षा देने के लिए होती है।
(ग) औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है।
(घ) यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि क्षणिक आवेग में दूरगामी के लक्ष्यों से कहीं विचलित न हो जाएँ।
(ङ) शांतिपूर्ण ढंग से सामाजिक बदलाव लाने के लिए होती है। .
उत्तर:
उपर्युक्त विकल्पों में से केवल (ग) में दिया गया विकल्प उपर्युक्त कथन को पूरा करने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में यह पूर्णतया गलत है कि औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है।

प्रश्न 3.
संविधान सभा की बहसों को पढ़ने और समझने के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं-(अ) इनमें से कौन-सा कथन इस बात की दलील है कि संविधान सभा की बहसें आज भी प्रासंगिक हैं? कौन-सा कथन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं हैं। (ब) इनमें से किस पक्ष का आप समर्थन करेंगे और क्यों?
(क) आम जनता अपनी जीविका कमाने और जीवन की विभिन्न परेशानियों के निपटारे में व्यस्त होती है। आम जनता इन बहसों की कानूनी भाषा को नहीं समझ सकती।

(ख) आज की स्थितियाँ और चुनौतियाँ संविधान बनाने के वक्त की चुनौतियों और स्थितियों से अलग हैं। संविधान निर्माताओं के विचारों को पढ़ना और अपने नए जमाने में इस्तेमाल करना दरअसल अतीत को वर्तमान में खींच लाना है।

(ग) संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझने की हमारी दृष्टि पूर्णतया नहीं बदली है। संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तर्क मिल सकते हैं कि कुछ सवैधानिक व्यवहार क्यों महत्त्वपूर्ण हैं। एक ऐसे समय में जब संवैधानिक व्यवहारों को चुनौती दी जा रही है, इन तर्कों को न जानना संवैधानिक व्यवहारों को नष्ट कर सकता है।
उत्तर:
अ. (क) जब आम जनता अपनी जीविका कमाने और जीवन की विभिन्न परेशानियों के निपटारे में व्यस्त होती है, तो यह कथन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि संविधान सभा की ये बहसें प्रासंगिक नहीं है, क्योंकि जीविका मनुष्य की पहली आवश्यकता है। इस प्रथम समस्या से ही जूझते व्यक्ति के लिए संविधान सभा की बहसों का कोई महत्त्व नहीं है।

(ख) आज की परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ संविधान निर्माण के समय की चुनौतियों और स्थितियों से बहुत अलग एवं भिन्न हैं। आज समय बहुत बदल गया है। अतः यह तर्क इस बात को स्पष्ट करता है कि ये बहसें आज के जमाने की बदलती स्थिति में प्रासंगिक नहीं हैं।

(ग) यह कथन इस तथ्य की पुष्टि करता है कि संसार की वर्तमान चुनौतियों को समझने और जानने के लिए संविधान सभा की बहसें प्रासंगिक हैं। वास्तव में ये तर्क वर्तमान परिस्थितियों को समझाने में सहायक हैं।

ब. (क) मैं इस बात से सहमत हूँ कि जीविका व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकता है। अतः अन्य कार्यों पर इसे प्राथमिकता दी जा सकती है।

(ख) मैं इस तथ्य से सहमत हूँ कि आज की स्थितियाँ संविधान निर्माण के समय से काफी बदल चकी हैं। संविधान के लाग होने से लेकर आज तक लगभग 70 वर्षों में संविधान में 104 संवैधानिक संशोधन स्वयं की पुष्टि करते हैं।

(ग) मैं इस बात से सहमत हूँ कि ये बहसें आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि समस्त चुनौतियाँ और यह संसार आज भी पूरी तरह नहीं बदले हैं। ऐसे में तर्कों को समझने की उपेक्षा से हम संवैधानिक व्यवहारों को नष्ट कर देंगे।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रसंगों के आलोक में भारतीय संविधान और पश्चिमी अवधारणा में अंतर स्पष्ट करें-
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ
(ख) अनुच्छेद 370 और 371
(ग) सकारात्मक कार्य-योजना या अफरमेटिव एक्शन
(घ) सार्वभौम वयस्क मताधिकार
उत्तर:
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ-भारत में धर्मनिरपेक्षता की धारणा पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा से काफी भिन्न है। पश्चिमी धारणा में व्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्ति की नागरिकता से संबंधित अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान का राजनीतिक दर्शन धर्मनिरपेक्षता को धर्म और राज्य के पारस्परिक निषेध के रूप में देखा गया हैं, जबकि भारत में धर्म व्यक्ति का अपना निजी विषय है।

राज्य की इसमें कोई भूमिका एवं हस्तक्षेप नहीं होता है। भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्षता के सम्बन्ध में सर्व-धर्म समभाव के सिद्धान्त को अपनाया गया है। इस सिद्धान्त के आधार पर देश में प्रचलित सभी धर्मों के साथ समानता के आधार . पर व्यवहार किया जाएगा। राज्य किसी धर्म को न तो संरक्षण देगा और न ही किसी धर्म को राज्य धर्म के रूप में मान्यता देगा। लेकिन कभी-कभी राज्य को धर्म के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करना पड़ता है।

राज्य इसलिए ऐसा राज्य धर्म के रूप में करता है क्योंकि इसमें व्यापक सार्वजनिक हित निहित होते हैं। जैसे सरकार द्वारा तीन तलाक कानून पास करके मुस्लिम महिलाओं को कानूनी समानता एवं स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान किया गया जबकि धार्मिक कट्टरपंथियों ने इसे धर्म में हस्तक्षेप. कहा। इसके अतिरिक्त संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 में धर्मनिरपेक्षता के संबंध में हमने व्यापक प्रावधान किए हैं।

(ख) अनुच्छेद 370 और 371-संविधान के अनुच्छेद 370 में जम्मू-कश्मीर राज्य संबंधी विशेष प्रावधान किया गया था। इसके अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्राप्त था। विशेष दर्जे का मुख्य कारण जम्मू तथा कश्मीर के भारत में विलय के समय भारतीय शासक द्वारा जम्मू तथा कश्मीर राज्य के तत्कालीन शासक से किए गए वायदे थे। इसके अंतर्गत जम्मू तथा कश्मीर का अपना एक विशेष संविधान था।

यद्यपि यह भारतीय संघ का अभिन्न अंग रहा परंतु अन्य राज्यों की तुलना में इसकी स्थिति भिन्न थी। यद्यपि अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी या संक्रमणकालीन व्यवस्था ही थी, जिसे दिसम्बर, 2019 में जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक के द्वारा पूर्णतः समाप्त कर दिया गया है और अब इसे जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के रूप में दो केंद्र-शासित प्रदेशों के रूप में विभाजित कर दिया गया है।

अतः पूर्व में अनुच्छेद 370वीं अस्थाई व्यवस्था को उग्र सवैधानिक संशोधन द्वारा समाप्त कर इस राज्य को भी भारत संघ के अन्य राज्यों के समान दर्जा दे दिया गया है। अनुच्छेद 371 का संबंध उत्तर-पूर्वी राज्यों से है। इसके अंतर्गत नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्रप्रदेश, सिक्किम, गोवा, मिजोरम तथा अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों के संबंध में विशेष प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 371 वाले राज्यों पर केंद्र का सीधा-साधा नियंत्रण है। दूसरे शब्दों में अनुच्छेद 371 में वर्णित या उल्लेखित राज्य एक निश्चित सीमा तक स्वायत्तता का उपयोग कर सकते हैं। ये व्यवस्थाएँ पश्चिमी अवधारणा से भिन्न हैं।

(ग) सकारात्मक कार्य योजना या अफरमेटिव एक्शन सकारात्मक कार्य योजना या अफरमेटिव एक्शन का अभिप्राय यह है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय संस्कृति के मूलमंत्र-‘वसु धैव कुटुम्बकम्’ के व्यापक सन्दर्भ में संविधान में राजनीतिक दर्शन के अंतर्गत लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, उदारवाद, समाजवाद, संघात्मकता, भ्रातृत्व जैसी धारणाओं को अपनाया है और समाज के सभी वर्गों की भावनाओं एवं संस्कृतियों का सम्मान करते हुए सम्बन्धित प्रावधान लागू किए हैं। इस प्रकार समाज के सभी वर्गों के विकास के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। यह पाश्चात्य अवधारणा से भिम्न रूप रखती है।

वयस्क मताधिकार-सार्वभौम वयस्क मताधिकार का तात्पर्य हमारे संविधान द्वारा सभी वयस्कों को बिना किसी भेदभाव, जाति, जन्म, वर्ग, वंश, कुल एवं लिंग के बिना समान रूप से मताधिकार प्रदान किया गया है। मूल संविधान में हमने 21 वर्ष का वयस्क माना था। जबकि 61वें संशोधन द्वारा इसे 18 वर्ष कर दिया गया है। इस प्रकार भारत में हमने महिलाओं को भी पुरुषों के समान मताधिकार प्रदान किया है। जबकि अनेक पश्चिमी देशों में स्त्रियों को मताधिकार संविधान लागू होने के काफी बाद दिया गया है। उन्हें संविधान निर्माण के समय यह अधिकार नहीं दिया गया था।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में धर्मनिरपेक्षता का कौन-सा सिद्धांत भारत के संविधान में अपनाया गया है?
(क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
(ख) राज्य का धर्म से नजदीकी रिश्ता है।
(ग) राज्य धर्मों के बीच भेदभाव कर सकता है।
(घ) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा।
(ङ) राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होगी।
उत्तर:
भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता के निम्नलिखित सिद्धांतों को अपनाया गया है (क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। (घ) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा। (ङ) राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होगी।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों को सुमेलित करें
(क) विधवाओं के साथ किए जाने वाले बरताव की आलोचना की आजादी। आधारभूत महत्व की उपलब्धि
(ख) संविधान-सभा में फैसलों का स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जाना। प्रक्रियागत उपलब्धि

व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्त्व को स्वीकार करना। लैंगिक-न्याय की उपेक्षा
(घ) अनुच्छेद 370 और 371 उदारवादी व्यक्तिवाद महिलाओं और बच्चों को परिवार की संपत्ति में असमान अधिकार। धर्म-विशेष की जरूरतों के प्रति ध्यान देना।
उत्तर:
(क) विधवाओं के साथ किए जाने वाले बरताव की अलोचना प्रक्रियागत उपलब्धि की आजादी। आधारभूत महत्त्व की उपलब्धि
(ख) संविधान सभा में फैसलों का स्वार्थ के आधार पर नहीं  बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जाना।
(ग) व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्त्व को स्वीकार करना। लैंगिक न्याय की उपेक्षा
(घ) अनुच्छेद 370 और 371 उदारवादी व्यक्तिवाद
(ङ) महिलाओं और बच्चों को परिवार की संपति में असमान अधिकार। ध्यान देना। धर्म-विशेष की जरूरतों के प्रति

प्रश्न 7.
यह चर्चा एक कक्षा में चल रही थी। विभिन्न तर्कों को पढ़ें और बताएँ कि आप इनमें से किस-से सहमत हैं और क्यों?
जयेश – मैं अब भी मानता हूँ कि हमारा संविधान एक उधार का दस्तावेज है।

सबा – क्या तुम यह कहना चाहते हो कि इसमें भारतीय कहने जैसा कुछ है ही नहीं? क्या मूल्यों और विचारों पर हम ‘भारतीय’ अथवा ‘पश्चिमी’ जैसा लेबल चिपका सकते हैं? महिलाओं और पुरुषों की समानता का ही मामला लो। इसमें ‘पश्चिमी’ कहने जैसा क्या है? और, अगर ऐसा है भी तो क्या हम इसे महज पश्चिमी होने के कारण खारिज कर दें?

जयेश – मेरे कहने का मतलब यह है कि अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ने के बाद क्या हमने उनकी संसदीय-शासन की व्यवस्था नहीं अपनाई?

नेहा – तुम यह भूल जाते हो कि जब हम अंग्रेजों से लड़ रहे थे तो हम सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ थे। अब इस बात का, शासन की जो व्यवस्था हम चाहते थे उसको अपनाने से कोई लेना-देना नहीं, चाहे यह जहाँ से भी आई हो।
उत्तर:
उपर्युक्त चर्चा में बहस का मुख्य विषय यह है कि भारतीय संविधान एक उधार का दस्तावेज़ है। संविधान के बहुत से प्रावधान हमने अन्य देशों; जैसे इंग्लैण्ड, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी एवं आयरलैंड आदि के संविधान से लिए. हैं। यद्यपि कुछ प्रावधान तो भारतीय शासन अधिनियम, 1935 से लिए गए हैं अतः संविधान में मौलिकता का अभाव है, परंतु यह आलोचना उचित नहीं है।

हमारे संविधान निर्माताओं ने विदेशी संविधानों से बहुत-सी बातें ली हैं जिनके परिणामस्वरूप कई बार इसे ‘उधार ली गई वस्तुओं का थैला’ (Beg of Borrowing) अथवा ‘विविध संविधानों की खिचड़ी’ (Hold Patch) कहकर पुकारा जाता है, परतु यह आलोचना न्यायसंगत नहीं है। वास्तव में उनके द्वारा विदेशी संविधानों की उन धारणाओं तथा व्यवस्थाओं को अपने संविधान में ग्रहण कर लिया गया जो उन देशों में सफलतापूर्वक कार्य कर रही थीं और भारत की परिस्थितियों के अनुकूल थीं।

इस प्रकार भारतीय संविधान विदेशों से उधार लिया हुआ संविधान नहीं, बल्कि विभिन्न विदेशी संविधानों की आदर्श व्यवस्थाओं का संग्रह है। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि यदि हम अन्य संविधानों से आदर्श व्यवस्थाएँ ग्रहण नहीं करते तो सम्भवतः अपने अहम् की संतुष्टि करते, परन्तु भारत की व्यावहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते।

इसके अतिरिक्त द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के समय तक संवैधानिक सिद्धान्तों का पर्याप्त विकास हो चुका था और ऐसी स्थिति में किसी मौलिक संविधान के निर्माण की बात सोचना सम्भव नहीं था। वास्तव में हमारे संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शिता का ही कार्य किया। मूंदकर नकल नहीं की गई है, बल्कि विभिन्न संविधानों की विशेषताओं के संग्रह से भारतीय संविधान में मौलिकता भी आ गई है। अतः भारतीय संविधान को ‘उधार ली गई वस्तुओं का थैला’ कहना सरासर गलत है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि हमारा संविधान जिन मूल आदर्शों एवं मूल्यों को लेकर निर्मित हुआ था, वास्तव में वे उस समय की तात्कालिक आवश्यकताएँ थीं और जिन पर चलकर हमारी शासन-व्यवस्था ने उनकी व्यावहारिकता को प्रमाणित किया है। अतः सबा के इस कथन से सहमत होने के पर्याप्त कारण हैं कि कोई भी मूल्य, मूल्य होता है; आदर्श, आदर्श होते हैं; हम इसे किसी विशेष श्रेणी में नहीं बाँट सकते, किसी सीमा में नहीं बाँध सकते। हम केवल इसी आधार पर किसी मूल्य अथवा आदर्श की अनदेखी नहीं कर सकते कि यह ‘भारतीय’ है अथवा ‘पाश्चात्य’।

यदि हम नेहा के तर्क को देखें कि जो बातें हमारे लिए उपयोगी और लाभदायक हैं, उसे केवल इस कारण अनदेखा कर देना कि यह पाश्चात्य अवधारणा है, बिलकुल ही गलत है। बल्कि अपनी आवश्यकताओं और स्थितियों के अनुरूप उसे ग्रहण कर लेना ही बुद्धिमानी है। संक्षेप में, ग्रेनविल ऑस्टिन के शब्दों में, “भारतीय संविधान के निर्माण में परिवर्तन के साथ चयन की कला को अपनाया गया है।”

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 10 संविधान का राजनीतिक दर्शन

प्रश्न 8.
ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय संविधान को बनाने की प्रक्रिया प्रतिनिधिमूलक नहीं थी? क्या इस कारण हमारा संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं रह जाता? अपने उत्तर का कारण बताएँ।
उत्तर:
भारतीय संविधान की आलोचना प्रायः इस आधार पर भी की जाती है कि यह प्रतिनिध्यात्मक नहीं है, अर्थात् इसका निर्माण एक ऐसी संविधान सभा द्वारा किया गया है जिसके प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने हुए नहीं थे, क्योंकि, 1946 में गठित इस संविधान सभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से राज्य विधानमंडलों द्वारा निर्वाचित किए गए थे। यहाँ यह स्पष्ट उल्लेखनीय है कि कुछ विद्वान इस कारण से इसे प्रतिनिध्यात्मक नहीं मानते क्योंकि इसका निर्माण करने वाली संविधान सभा का गठन ऐसे सदस्यों से हुआ था जिनका चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ था।

परन्तु संविधान निर्माण की प्रक्रिया का गहन विश्लेषण करने पर यह बात निराधार ही लगती है, क्योंकि संविधान सभा के निर्माण के समय प्रत्यक्ष चुनाव सम्भव नहीं थे। यद्यपि माँऊटबेटन योजना के आधार पर बनी हमारी संविधान सभा ने संविधान के हर प्रावधान पर गहन वाद-विवाद, तर्क-वितर्क और व्यापक विचार-विमर्श किया और तब जाकर उसे अंतिम रूप से स्वीकार किया गया।

प्रायः यह कहा जाता है कि भारतीय संविधान को लोकप्रिय स्वीकृति प्राप्त नहीं थी क्योंकि निर्मित संविधान को जनमत-संग्रह द्वारा अनुसमर्थित नहीं कराया गया था। परंतु सच्चाई यह है. कि यदि निर्मित संविधान का जनमत-संग्रह भी करवाया जाता तब भी संविधान के स्वरूप में विशेष परिवर्तन नहीं होना था। इस तथ्य की पुष्टि सन् 1952 में हुए प्रथम आम चुनाव से भी होती है, क्योंकि इस चुनाव में संविधान सभा के अधिकांश सदस्यों ने चुनाव लड़ा और संविधान का स्वरूप चुनाव का एक प्रमुख मुद्दा था। ये सदस्य अच्छे बहुमत से चुनाव में विजयी रहे। जो यह दर्शाता है कि संविधान सभा के सदस्यों ने जनता की इच्छानुसार कार्य किया है। अतः निष्कर्ष रूप में यह कहना गलत होगा कि हमारा संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं है।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान की एक सीमा यह है कि इसमें लैंगिक-न्याय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। आप इस आरोप की पुष्टि में कौन-सा प्रमाण देंगे। यदि आज आप संविधान लिख रहे होते, तो इस कमी उपाय के रूप में किन प्रावधानों की सिफारिश करते?
उत्तर:
भारत का संविधान विश्व का अनूठा, विस्तृत संविधान है जिसमें समाज और सरकार के विभिन्न अंगों की शक्तियों और अधिकारों की अलग-अलग व्याख्या की गई है। फिर भी भारतीय संविधान पूर्णतः दोषरहित नहीं है। यह एक संपूर्ण प्रलेखन ही है। इसमें सबसे बड़ी त्रुटि लैंगिक न्याय-विशेषतया परिवार की संपत्ति में बेटी और बेटे के साथ भेदभाव है।

परिवार की संपत्ति में स्त्री और बच्चों के साथ भी भेदभाव किया जाता है। यद्यपि सरकार द्वारा कानून बनाकर इस भेदभाव को अब समाप्त कर दिया गया है। परंतु संविधान के मूल में लैंगिक भेदभाव थे। वास्तव में ये व्यक्ति के मूल सामाजिक-आर्थिक अधिकार हैं। इन्हें मौलिक अधिकारों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। परंतु संविधान की सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि इन अधिकारों को राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों में सम्मिलित किया गया है जिसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, जबकि मौलिक अधिकार न्यायालय में वाद योग्य हैं।

यदि इन अधिकारों को मौलिक अधिकारों की श्रेणी में रखा जाता तो उन्हें न्यायालय में चुनौती दी जा सकती थी। भारतीय संविधान की सीमाओं में से एक यह भी है कि आज तक निरन्तर ‘मांग के पश्चात भी महिलाओं को संसद या विधानमंडल में से एक-तिहाई आरक्षण नहीं दिया गया। यदि आज की बदलती हुई परिस्थितियों में संविधान लिखा जाता तो निश्चित रूप से इन त्रुटियों को दूर करने के लिए प्रावधान किए जाते। विभिन्न सामाजिक-आर्थिक अधिकारों, जिनसे व्यक्ति और समाज का विकास प्रत्यक्षतः जुड़ा होता है, उन्हें मौलिक अधिकारों की श्रेणी में रखा जाता है।

प्रश्न 10.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि एक गरीब और विकासशील देश में कुछ एक बुनियादी सामाजिक-आर्थिक मौलिक अधिकारों की केंद्रीय विशेषता के रूप में दर्ज करने के बजाए राज्य की नीति-निदेशक तत्त्वों वाले खंड में क्यों रख दिए गए यह स्पष्ट नहीं है। आपके जानते सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को नीति-निर्देशक तत्त्व वाले खंड में रखने के क्या कारण रहे होंगे?
उत्तर:
भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक तत्त्व भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता है। इसके द्वारा भारत में लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का उद्देश्य रखा गया है जिसमें हम आयरलैंड के संविधान से प्रेरित हुए। इन सिद्धान्तों के द्वारा हमने भारत के समक्ष ऐसे सामाजिक-आर्थिक लक्ष्य रखे हैं जिन तक पहुँचकर भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाया जा सकता है। ये तत्त्व वास्तव में राज्य नैतिक कर्तव्य हैं। शासन के तत्त्वों में ये मूलभूत हैं। यह सर्वविदित है कि नीति-निर्देशक तत्त्वों का कोई कानूनी आधार नहीं है, फिर भी ये शासन संचालन के आधारभूत सिद्धांत हैं।

परन्तु इनका पालन राज्यों की इच्छा पर छोड़ा गया। महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इतने महत्त्वपूर्ण प्रावधानों के होते हुए भी संविधान निर्माताओं द्वारा इन्हें कानूनी आधार न देना और इन्हें राज्यों की इच्छा पर छोड़ देना कुछ व्यवहारिक नहीं कहा जा सकता। उल्लेखनीय बात यह है कि जब भारत स्वतंत्र हुआ था तो उस समय

इसकी आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि इन निर्देशक तत्त्वों का पालन करने की बाध्यता होने पर आर्थिक संकट उत्पन्न हो सकता था। इससे अन्य आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक समस्याएँ खड़ी हो सकती थीं। अतः तत्कालीन स्थिति की वास्तविकता को देखते हुए नीति-निर्देशक तत्त्वों के पालन को राज्य की इच्छा पर छोड़ दिया गया ताकि राज्यों पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त भार न पड़े और भविष्य में आर्थिक रूप से सक्षम होने पर इन। के अनुरूप कानून बनाकर भारत को कल्याणकारी राज्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास करें।

संविधान का राजनीतिक दर्शन HBSE 11th Class Political Science Notes

→ प्रत्येक देश का संविधान उस देश की शासित होने वाली जनता के लिए शासन-व्यवस्था के विभिन्न अंगों के द्वारा प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्यों के अनुरूप एक आधारभूत ढाँचे को निश्चित करता है।

→ अन्य देशों की तरह भारतीय संविधान निर्माताओं ने भी भावी भारतीय समाज के नागरिकों के लिए एक राजनीतिक दर्शन को अभिव्यक्त किया है। जैसा कि श्री गजेन्द्र गड़कर ने कहा है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना से संविधान के बुनियादी दर्शन का ज्ञान होता है।

→ यद्यपि कानूनी दृष्टि से प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं होती और न ही इसे न्यायालयों द्वारा लागू किया जा सकता है, लेकिन फिर भी प्रस्तावना संविधान का महत्त्वपूर्ण भाग है जो संविधान के मूल उद्देश्यों, विचारधाराओं, आदर्शों एवं सरकार के उत्तरदायित्वों पर प्रकाश डालती है।

→ इसी कारण प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा जाता है। अतः स्पष्ट है कि भारतीय संविधान रूपी दस्तावेज के पीछे प्रस्तावना रूपी नैतिक दृष्टि एक राजनीतिक दर्शन के रूप में काम कर रही है।

→ इस अध्याय में हम विशेषतः भारतीय संविधान के राजनीतिक दर्शन को स्पष्ट करने के लिए संविधान के राजनीतिक दर्शन के अर्थ की स्पष्टता के साथ-साथ संविधान के सारभूत प्रावधान तथा संविधान के प्रावधानों में अन्तर्निहित परिकल्पनाओं की विस्तार से चर्चा करेंगे।

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 6 न्यायपालिका

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायपालिका किसे कहते हैं?
उत्तर:
न्यायपालिका सरकार का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग है। इसका मुख्य कार्य कानूनों की व्याख्या करना तथा अपराधियों को दण्ड देना है।

प्रश्न 2.
न्यायपालिका का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “किसी शासन की श्रेष्ठता जानने के लिए उसके न्याय प्रबन्ध से बढ़िया कोई अन्य कसौटी नहीं।”

प्रश्न 3.
न्यायपालिका को स्वतन्त्र रखने के उपाय बताएँ।
उत्तर:

  • न्यायाधीशों का अच्छा वेतन।
  • न्यायाधीशों का लम्बा तथा निश्चित कार्यकाल।

प्रश्न 4.
न्यायाधीशों को अधिक वेतन देने के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर:

  • न्यायाधीशों को अधिक वेतन देने से वे रिश्वत और भ्रष्टाचार से बचे रह सकते हैं।
  • वे निष्पक्ष और स्वतंत्र निर्णय देने में सक्षम बन सकते हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 6 न्यायपालिका

प्रश्न 5.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि न्यायपालिका विधानमण्डल, कार्यपालिका तथा किसी अन्य व्यक्ति अथवा समूह के दबाव अथवा प्रभाव से पूरी तरह स्वतन्त्र हो।

प्रश्न 6.
संसार के विभिन्न देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कौन-कौन से तरीके अपनाए जाते हैं तथा उनमें से सबसे अच्छा तरीका कौन-सा है?
उत्तर:
संसार के विभिन्न देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रायः तीन तरीके अपनाए जाते हैं

  • जनता द्वारा चुनाव,
  • विधानमण्डल द्वारा चुनाव,
  • कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति।

इन तीनों तरीकों में से कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति ही अन्य दोनों तरीकों से अच्छी मानी गई है, क्योंकि इसमें न्यायाधीशों पर दबाव की सम्भावना कम-से-कम होती है।

प्रश्न 7.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को कुल कितना वेतन मिलता है?
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ₹ 2,80,000 तथा अन्य न्यायाधीशों को ₹ 2,50,000 मासिक वेतन मिलता है।

प्रश्न 8.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर नियुक्त होने के लिए कोई दो योग्यताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • वह कम-से-कम 5 वर्ष तक उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में अथवा कम-से-कम 10 वर्ष तक उच्च न्यायालय में वकील के रूप में कार्य कर चुका हो।

प्रश्न 9.
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति कौन करता है और किसकी सलाह से करता है?
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालयों के उन न्यायाधीशों, जिन्हें वह उचित समझता है, की सलाह से करता है। .

प्रश्न 10.
सर्वोच्च न्यायालय को किन दो मामलों में प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है?
उत्तर:

  • जब केन्द्र और राज्यों के बीच विवाद उत्पन्न हो जाए।
  • मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में।

प्रश्न 11.
सर्वोच्च न्यायालय को किन दो मामलों में अपीलीय क्षेत्राधिकार प्राप्त है?
उत्तर:

  • संविधान की व्याख्या के सम्बन्ध में।
  • उच्च न्यायालय ने अभियुक्त को मृत्यु-दण्ड की सजा दी हो।

प्रश्न 12.
सर्वोच्च न्यायालय के दो कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना।
  • संविधान की व्याख्या एवं रक्षा करना।

प्रश्न 13.
मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय कौन-कौन-से लेख जारी करता है?
उत्तर:

  • बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख,
  • परमादेश लेख,
  • प्रतिषेध लेख,
  • उत्प्रेषण लेख,
  • अधिकार-पृच्छा लेख।

प्रश्न 14.
किन्हीं ऐसे दो राज्यों के नाम बताइए जिसका एक ही (साझा) उच्च न्यायालय है? वह कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
हरियाणा तथा पंजाब का एक ही साझा उच्च न्यायालय है जो चण्डीगढ़ में स्थित है।

प्रश्न 2.
न्यायपालिका का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “किसी शासन की श्रेष्ठता जानने के लिए उसके न्याय प्रबन्ध से बढ़िया कोई अन्य कसौटी नहीं।

प्रश्न 3.
न्यायपालिका को स्वतन्त्र रखने के उपाय बताएँ।
उत्तर:

  • न्यायाधीशों का अच्छा वेतन।
  • न्यायाधीशों का लम्बा तथा निश्चित कार्यकाल।

प्रश्न 4.
न्यायाधीशों को अधिक वेतन देने के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर:

  • न्यायाधीशों को अधिक वेतन देने से वे रिश्वत और भ्रष्टाचार से बचे रह सकते हैं।
  • वे निष्पक्ष और स्वतंत्र निर्णय देने में सक्षम बन सकते हैं।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 6 न्यायपालिका

प्रश्न 5.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि न्यायपालिका विधानमण्डल, कार्यपालिका तथा किसी अन्य व्यक्ति अथवा समूह के दबाव अथवा प्रभाव से पूरी तरह स्वतन्त्र हो।

प्रश्न 6.
संसार के विभिन्न देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कौन-कौन-से तरीके अपनाए जाते हैं तथा उनमें से सबसे अच्छा तरीका कौन-सा है?
उत्तर:
संसार के विभिन्न देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रायः तीन तरीके अपनाए जाते हैं-

  • जनता द्वारा चुनाव,
  • विधानमण्डल द्वारा चुनाव,
  • कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति।

इन तीनों तरीकों में से कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति ही अन्य दोनों तरीकों से अच्छी मानी गई है, क्योंकि इसमें न्यायाधीशों पर दबाव की सम्भावना कम-से-कम होती है।

प्रश्न 7.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को कुल कितना वेतन मिलता है?
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ₹ 2,80,000 तथा अन्य न्यायाधीशों को ₹2,50,000 मासिक वेतन मिलता है।

प्रश्न 8.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर नियुक्त होने के लिए कोई दो योग्यताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • वह कम-से-कम 5 वर्ष तक उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में अथवा कम-से-कम 10 वर्ष तक उच्च न्यायालय में वकील के रूप में कार्य कर चुका हो।

प्रश्न 9.
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति कौन करता है और किसकी सलाह से करता है?
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालयों के उन न्यायाधीशों, जिन्हें वह उचित समझता है, की सलाह से करता है। .

प्रश्न 10.
सर्वोच्च न्यायालय को किन दो मामलों में प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है?
उत्तर:

  • जब केन्द्र और राज्यों के बीच विवाद उत्पन्न हो जाए।
  • मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में।

प्रश्न 11.
सर्वोच्च न्यायालय को किन दो मामलों में अपीलीय क्षेत्राधिकार प्राप्त है?
उत्तर:

  • संविधान की व्याख्या के सम्बन्ध में।
  • उच्च न्यायालय ने अभियुक्त को मृत्यु-दण्ड की सजा दी हो।

प्रश्न 12.
सर्वोच्च न्यायालय के दो कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना।
  • संविधान की व्याख्या एवं रक्षा करना।

प्रश्न 13.
मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय कौन-कौन-से लेख जारी करता है?
उत्तर:

  • बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख,
  • परमादेश लेख,
  • प्रतिषेध लेख,
  • उत्प्रेषण लेख,
  • अधिकार-पृच्छा लेख।

प्रश्न 14.
किन्हीं ऐसे दो राज्यों के नाम बताइए जिसका एक ही (साझा) उच्च न्यायालय है? वह कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
हरियाणा तथा पंजाब का एक ही साझा उच्च न्यायालय है जो चण्डीगढ़ में स्थित है।

प्रश्न 15.
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को कितना वेतन मिलता है?
उत्तर:
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ₹ 2,50,000 तथा अन्य न्यायाधीशों को ₹ 2,25,000 मासिक वेतन मिलता है।

प्रश्न 16.
किन्हीं दो मामलों में उच्च न्यायालय का प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार बताइए।
उत्तर:

  • मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में।
  • संविधान की व्याख्या सम्बन्धी।

प्रश्न 17.
चुनाव याचिकाएँ किस न्यायालय में पेश की जाती हैं?
उत्तर:
एम०एल०ए० (M.L.A.) तथा संसद सदस्य (M.P.) के चुनावों से सम्बन्धित चुनाव याचिकाएँ उच्च न्यायालय में पेश की जाती हैं। राष्ट्रपति व उप-राष्ट्रपति के चुनाव से सम्बन्धित चुनाव याचिकाएँ केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही पेश की जा सकती हैं।

प्रश्न 18.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के दो तरीके बताइए।
उत्तर:

  • न्यायाधीशों के वेतन व भत्तों में उनके कार्यकाल के दौरान कटौती नहीं की जा सकती।
  • न्यायाधीशों को संसद, महाभियोग के अतिरिक्त अन्य किसी तरीके से हटा नहीं सकती।

प्रश्न 19.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता को किन दो तरीकों से सुनिश्चित किया गया है?
उत्तर:

  • न्यायाधीशों को वेतन व भत्ते संचित निधि से दिए जाते हैं और उनके कार्यकाल के दौरान उनमें कटौती नहीं की जा सकती।
  • दुर्व्यवहार अथवा अक्षमता के आरोपों की निष्पक्ष जाँच-पड़ताल होने पर संसद महाभियोग के अतिरिक्त न्यायाधीशों को अन्य किसी तरीके से नहीं हटा सकती।

प्रश्न 20.
क्या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अवकाश-प्राप्ति के बाद वकालत कर सकते हैं? क्या उन्हें जाँच आयोग का सदस्य बनाया जा सकता है?
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अवकाश-प्राप्ति के बाद वकालत नहीं कर सकते, लेकिन उन्हें जाँच आयोग के सदस्य अथवा अध्यक्ष नियुक्त किया जा सकता है।

प्रश्न 21.
उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता कैसे स्थापित की गई है?
उत्तर:

  • उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियक्ति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से की जाती है।
  • उनको संसद महाभियोग के अतिरिक्त अन्य किसी तरीके से नहीं हटा सकती।

प्रश्न 22.
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अवकाश-प्राप्ति के बाद कहाँ वकालत कर सकते हैं ?
उत्तर:

  • सर्वोच्च न्यायालय में,
  • दूसरे राज्य के उच्च न्यायालय में।

प्रश्न 23.
ऐसे दो मामले बताइए जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक पुनरावलोकन के अधिकार का प्रयोग किया हो?
उत्तर:

  • ए०के० गोपालन केस, 1951,
  • मेनका गाँधी केस, 1980।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 6 न्यायपालिका

प्रश्न 24.
न्यायिक सक्रियता के तीन साधन लिखें।
उत्तर:
न्यायिक सक्रियता के तीन साधन हैं

  • न्यायिक पुनर्निरीक्षण,
  • मौलिक अधिकारों की व्याख्या,
  • संविधान की व्याख्या।

प्रश्न 25.
न्यायिक सक्रियता की आलोचना के तीन शीर्षक लिखें। अथवा न्यायिक सक्रियता के विपक्ष में तीन तर्क लिखिए।
उत्तर:

  • संसदीय व्यवस्था के विरुद्ध,
  • न्यायपालिका के प्राथमिक कार्य में बाधा,
  • प्रजातन्त्र के विरुद्ध।

प्रश्न 26.
न्यायिक क्रियाशीलता के पक्ष में तीन तर्क लिखें।
उत्तर:

  • सरकार को क्रियाशील बनाने के लिए आवश्यक,
  • मानवीय अधिकारों की रक्षा में सहायक,
  • लोगों का समर्थन।

प्रश्न 27.
सार्वजनिक हित के लिए मुकद्दमेबाजी का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब कोई व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह सार्वजनिक अथवा सामान्य हित के विषयों को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाता है तो उसे सार्वजनिक हित की मुकद्दमेबाजी (P.I.L) कहा जाता है।

प्रश्न 28.
न्यायपालिका कितने प्रकार के लेख (Writ) जारी कर सकती है?
उत्तर:
न्यायपालिका निम्नलिखित पाँच प्रकार के लेख (Writ) जारी कर सकती है

  • बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus),
  • परमादेश (Mandamus),
  • प्रतिषेध (Prohibition),
  • अधिकार पृच्छा (Quo-warranto),
  • उत्प्रेषण (Certiorari)।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायपालिका का महत्त्व बताएँ।
उत्तर:
न्यायपालिका सरकार का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग है। इसका मुख्य कार्य विधानमण्डल द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या करना तथा उन्हें तोड़ने वालों को दण्ड देना है। एक राज्य में विधानमण्डल तथा कार्यपालिका की व्यवस्था चाहे कितनी भी अच्छी तथा श्रेष्ठ क्यों न हो, परन्तु यदि न्याय-व्यवस्था दोषपूर्ण है अर्थात निष्पक्ष तथा स्वतंत्र नहीं है, तो नागरिकों का जीवन सुखी नहीं रह सकता। न्यायपालिका ही नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है और उन्हें सरकार के अत्याचार से बचाती है।

संघीय राज्यों में न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है और केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों के बीच उत्पन्न होने वाले झगड़ों का निपटारा करती है। लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce) ने ठीक ही लिखा है, “किसी शासन की श्रेष्ठता जानने के लिए उसकी न्याय व्यवस्था की कुशलता से बढ़कर और कोई अच्छी कसौटी नहीं है, क्योंकि किसी और वस्तु का नागरिक की सुरक्षा और हितों पर इतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना उसके इस ज्ञान से कि वह एक निश्चित, शीघ्र तथा निष्पक्ष न्याय व्यवस्था पर निर्भर करता है।”

प्रश्न 2.
न्यायपालिका के गठन पर प्रकाश डालो।
उत्तर:
न्यायपालिका का गठन भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न पाया जाता है। वास्तविकता में न्यायपालिका का गठन देश में पाई जाने वाली शासन-व्यवस्था पर निर्भर करता है। कई देशों में न्यायपालिका का एक निश्चित अवधि के लिए विधानपालिका द्वारा चुनाव किया जाता है। इसके विपरीत कुछ देशों में न्यायपालिका की कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति की जाती है और नियुक्ति का आधार न्यायाधीशों की योग्यताएँ होती हैं। न्यायाधीशों की अवधि भी भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न होती है; जैसे भारत में न्यायाधीश 65 वर्ष तक अपने पद पर रहते हैं।

प्रश्न 3.
स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष न्यायालय से क्या अभिप्राय है? संक्षेप में व्याख्या करें।
उत्तर:
ब्राइस का यह कथन सत्य है कि किसी भी सरकार की श्रेष्ठता की सबसे अच्छी कसौटी न्यायपालिका की दक्षता है। न्यायपालिका की दक्षता उसकी निष्पक्षता तथा स्वतन्त्रता से है। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि न्यायपालिका विधानमण्डल तथा कार्यपालिका से स्वतन्त्र हो। उस पर मतदाताओं तथा राजनीतिक दलों का नियन्त्रण और प्रभाव न हो।

न्यायाधीश पक्षपात तथा बाहरी दबाव के आधार पर निर्णय न करें। न्यायाधीशों के निर्णयों पर किसी प्रकार का प्रशासनिक, आर्थिक तथा राजनीतिक दबाव नहीं होना चाहिए। ऐसा तभी हो सकता है जब न्यायाधीश पूर्णरूप से स्वतन्त्र हों। वे बिना किसी भय, लालच . तथा पक्षपात के पूर्ण न्याय करने वाले हों। न्यायाधीश योग्य, ईमानदार, निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र हों। न्याय में देरी न हो। न्याय में देरी का अभिप्राय है-न्याय से इन्कार करना।।

प्रश्न 4.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता में सहायक चार तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर:
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता में निम्नलिखित चार तत्त्व सहायक हैं
1. पद की अवधि-न्यायाधीशों को प्रलोभन तथा पक्षपात से दूर रखने के लिए न्यायाधीशों का कार्यकाल लम्बा रखा जाए। भारत में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश 65 वर्ष तक अपने पद पर रहते हैं।

2. पद से हटना-न्यायाधीशों को मनमाने ढंग से न हटाया जा सके। पूरी छानबीन के पश्चात् ही एक विशेष विधि द्वारा उन्हें उनके पद से हटाया जाना चाहिए।

3. अच्छा वेतन-न्यायाधीशों को अच्छा वेतन मिलना चाहिए, जिससे वे अपने समकक्ष दूसरे अधिकारियों की तरह आर्थिक स्तर स्थापित कर सकें।

4. योग्यता के आधार पर नियुक्ति-न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय उनके ज्ञान, बुद्धि तथा योग्यता को ध्यान में रखना चाहिए।

प्रश्न 5.
शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त की संक्षेप में व्याख्या करें।
उत्तर:
किसी देश में कैसी भी शासन व्यवस्था की स्थापना क्यों न की गई हो, प्रत्येक सरकार के तीन. कार्य होते हैं; जैसे कानून बनाना, कानूनों को लागू करना तथा न्याय करना। विधानपालिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है तथा न्यायपालिका न्याय करती है। यदि सरकार की तीनों शक्तियों को अलग-अलग रखा जाए तो इस सिद्धान्त को शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त कहा जाता है। इस सिद्धान्त के मुख्य समर्थक मोण्टेस्क्यू का हना है कि सरकार की तीनों नहीं, दो शक्तियाँ भी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं होनी चाहिएँ। व्यक्तियों के अधिकार और स्वतन्त्रता की रक्षा तथा सरकार को निरंकुश होने से इस सिद्धान्त द्वारा ही रोका जा सकता है।

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प्रश्न 6.
शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त की आलोचना के चार आधार बताएँ।
उत्तर:
शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त की आलोचना के आधार इस प्रकार हैं

  • सरकार एक इकाई है तथा शरीर के अंगों के अनुसार कार्य करती है, अतः शक्तियों का पूर्ण पृथक्करण सम्भव नहीं है,
  • यह सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि शासन के सभी अंग एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं,
  • शक्तियों का पूर्ण पृथक्करण इसलिए भी सम्भव नहीं है, क्योंकि सरकार के तीनों अंग समान नहीं हैं,
  • मोण्टेस्क्यू का यह कथन उचित नहीं है कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा अधिकार के लिए शक्तियों का पृथक्करण अनिवार्य है।

प्रश्न 7.
न्यायिक पुनर्निरीक्षण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
न्यायालय का यह वह अधिकार है जिसके प्रयोग से वह संसद अथवा राज्य विधानमण्डलों द्वारा बनाए गए कानूनों तथा कार्यपालिका द्वारा जारी किए गए आदेशों की संवैधानिकता के बारे में निर्णय करता है और यदि वे संविधान के उल्लंघन में होते हैं तो उसे असंवैधानिक घोषित करके रद्द करने का अधिकार रखता है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को यह अधिकार प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय ने ‘प्रिवी पर्स’ (Privy Purses) तथा बैंकों के राष्ट्रीयकरण (Nationalization of Banks) के आदेशों को इसी शक्ति के आधार पर अवैध घोषित कर दिया गया था।

प्रश्न 8.
न्यायिक पुनर्निरीक्षण के किन्हीं दो गुणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
न्यायिक पुनर्निरीक्षण के गुण इस प्रकार हैं-
(1) भारत का संविधान लिखित है। लिखित संविधान की भाषा अथवा शब्दावली कहीं-कहीं अस्पष्ट तथा उलझी हुई हो सकती है। उसकी व्याख्या तथा स्पष्टीकरण करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का यह अधिकार बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। संघीय शासन-प्रणाली में केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन होता है। उनमें उत्पन्न होने वाले विवादों को निपटाने के लिए भी सर्वोच्च न्यायालय का यह अधिकार महत्त्वपूर्ण है,

(2) नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं की रक्षा के लिए भी न्यायालयों का यह अधिकार आवश्यक है, परन्तु यह बात भी ठीक है कि ये अधिकार असीमित नहीं हैं और राज्य की सुरक्षा अथवा सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए उन पर प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं, परन्तु प्रतिबन्ध उचित है अथवा अनुचित, इसकी जाँच भी न्यायालय ही कर सकते हैं।

प्रश्न 9.
न्यायपालिका तथा विधायिका के सम्बन्धों का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।
उत्तर:
न्यायपालिका तथा विधायिका के सम्बन्ध इस प्रकार हैं-
(1) विश्व के कई देशों में न्यायपालिका को विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों को रद्द करने का अधिकार है, यदि वे संविधान के उल्लंघन में बनाए गए हैं। भारत तथा अमेरिका में सर्वोच्च न्यायालयों को यह अधिकार दिया गया है,

(2) कई राज्यों में विधायिका न्यायपालिका के कई कार्यों का निष्पादन करती है। इंग्लैण्ड में संसद का उच्च सदन (हाउस ऑफ लॉर्ड्स) सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय के रूप में कार्य करता है। अमेरिका में सीनेट निचले सदन (प्रतिनिधि सदन) द्वारा दोषी बनाए गए कार्यपालिका के कर्मचारियों की जाँच की सुनवाई करती है,

(3) कई राज्यों (भारत) में विधायिका को न्यायाधीशों के विरुद्ध महाभियोग (Impeachment) का प्रस्ताव पास करने का भी अधिकार है।

प्रश्न 10.
न्यायपालिका द्वारा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे की जाती है?
उत्तर:
वर्तमान प्रजातन्त्रीय राज्यों में नागरिकों के विकास के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के अधिकार तथा स्वतन्त्रताएँ प्रदान की जाती हैं। न्यायपालिका नागरिकों के इन अधिकारों और स्वतन्त्रताओं की रक्षा करती है। भारतवर्ष में नागरिकों को जो मौलिक अधिकार दिए गए हैं उनकी रक्षा की जिम्मेदारी राज्यों के उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी गई है।

ये न्यायालय लेख (Writs) जारी करके नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हैं। इसके साथ-ही-साथ यदि विधानपालिका कोई ऐसा कानून बनाती है जोकि मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है तो ये न्यायालय उसे अवैध घोषित कर सकते हैं। इस प्रकार न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं की रक्षा करके विकास के अवसर प्रदान करती है।

प्रश्न 11.
न्यायपालिका संघीय ढाँचे के संरक्षक के रूप में कैसे कार्य करती है?
उत्तर:
जिस देश में संघीय शासन-प्रणाली की व्यवस्था की गई है वहाँ न्यायपालिका संविधान के संरक्षक के रूप में भी कार्य करती है। ऐसा शासन-प्रणाली में संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है और उसके द्वारा ही संघीय सरकार तथा राज्य सरकारों के अधिकारों व कार्य-क्षेत्र को निश्चित किया जाता है। जब कभी केन्द्र तथा राज्यों के बीच कोई झगड़ा उत्पन्न हो जाता है, तो न्यायालय ही संविधान की सही व्याख्या कर उसका निर्णय करता है।

यदि संघीय अथवा राज्य विधानमण्डल द्वारा कोई ऐसा कानून पास किया जाता है, जो संविधान का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका को उसे असंवैधानिक घोषित करके रद्द करने का अधिकार दिया जाता है। भारत तथा अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालयों को संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करने का अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 12.
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर नियुक्त होने के लिए अनिवार्य योग्यताएँ क्या हैं?
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद की नियुक्ति के लिए अनिवार्य योग्यताएँ दी गई हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • वह कम-से-कम पाँच वर्षों तक एक या एक से अधिक उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश के पद पर कार्य कर चुका हो। अथवा वह कम-से-कम दस वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय में वकील रह चुका हो,
  • वह राष्ट्रपति की दृष्टि में प्रसिद्ध विधि-विशेषज्ञ हो।

प्रश्न 13.
उच्चतम न्यायालय का संगठन क्या है? इसके न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर:
उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और 33 अन्य न्यायाधीश सहित कुल 34 न्यायाधीश हैं। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों व उच्च न्यायालय के उन न्यायाधीशों से सलाह करता है जिन्हें वह उचित समझता है। उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की सलाह लेता है।

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प्रश्न 14.
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन तथा भत्तों पर संक्षिप्त लेख लिखें। .
उत्तर:
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ₹ 2,80,000 मासिक वेतन मिलता है जबकि अन्य न्यायाधीशों को ₹ 2,50,000 मासिक वेतन मिलता है। इसके अतिरिक्त बिना किराए के मकान व अन्य सुविधाएँ मिलती हैं। न्यायाधीशों को वेतन संचित निधि से दिया जाता है जिस पर संसद की स्वीकृति मात्र औपचारिकता ही होती है। संसद न्यायाधीशों के कार्यकाल के दौरान उनके वेतन व भत्तों में कटौती नही कर सकती, हाँ, बढ़ा अवश्य सकती है। केवल वित्तीय संकट में उनके वेतन व भत्तों में कटौती की जा सकती है।

प्रश्न 15.
सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों की रक्षा कैसे करता है?
उत्तर:
यदि सरकार के किसी कार्य से नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है तो कोई भी उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है। उच्चतम न्यायालय उस कार्य को अवैध घोषित कर सकता है। इसी प्रकार से यदि संसद ऐसा कोई कानून बनाती है कि जिससे मौलिक अधिकार कम होते हो अथवा उनका हनन होता हो तो उच्चतम न्यायालय ऐसे कानूनों को भी अवैध घोषित कर सकता है। उच्चतम न्यायालय ने बैंक राष्ट्रीयकरण मामला, मेनका गाँधी मामला इत्यादि में मौलिक अधिकारों की रक्षा की है।

प्रश्न 16.
उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पद से कैसे हटाया जा सकता है?
उत्तर:
उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनका निश्चित कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है। इसके लिए पहले न्यायाधीश का दुर्व्यवहार अथवा असमर्थता का आरोप एक निष्पक्ष जाँच-पड़ताल द्वारा सिद्ध हो । उसके बाद संसद के दोनों सदन अलग-अलग रूप से सदन की कुल संख्या के बहुमत अथवा उपस्थित व मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों की संख्या के दो-तिहाई (2/3) बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देते हैं, तो वह प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है। राष्ट्रपति प्रस्ताव को स्वीकृति देकर न्यायाधीश को पद से हटा देता है।

प्रश्न 17.
उच्चतम न्यायालय की संविधान के संरक्षक की भूमिका पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
भारतीय संविधान उच्चतम न्यायालय को संविधान की व्याख्या तथा न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार प्रदान करता है, जिसके अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय कार्यपालिका तथा विधायिका के उन सभी कार्यों व कानूनों को अवैध घोषित करता है जो संविधान का उल्लंघन करते हों। भारतीय उच्चतम न्यायालय ने संविधान की रक्षा करने के उद्देश्य से संवैधानिक संशोधनों को भी अवैध घोषित किया है और अनेक मामलों में कहा है, “संसद ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती जिससे संविधान का मूलभूत ढाँचा विकृत होता हो अथवा नष्ट होता हो।”

प्रश्न 18.
न्यायिक पुनरावलोकन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ न्यायपालिका के उस अधिकार से है, जिसके अन्तर्गत न्यायपालिका संविधान के आधार पर कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के उन कार्यों व कानूनों को अवैध घोषित कर सकती है जो कि न्यायालय के विचार में संविधान अथवा संविधान में निहित व्यवस्था का उल्लंघन करते हों। भारतीय संविधान के अनेक प्रावधान जैसे अनुच्छेद 13 न्यायपालिका को न्यायिक पनरावलोकन का अधिकार प्रदान करते हैं। इसी प्रकार से न्यायपालिका न्यायिक पनरावलोकन के अधिकार के अन्तर्गत संघीय व राज्य सरकारों के ऐसे कानूनों को भी अवैध घोषित करती है जिनमें इन सरकारों ने अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया हो। इस प्रकार न्यायिक पुनरावलोकन का उद्देश्य संघात्मक व्यवस्था तथा संवैधानिक व्यवस्था व मूल्यों की रक्षा करना है।

प्रश्न 19.
उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन व भत्तों पर संक्षिप्त टिप्पणी करें।
उत्तर:
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ₹ 2,50,000 मासिक वेतन मिलता है। उच्च न्यायालयों के अन्य न्यायाधीशों को ₹ 2,25,000 मासिक वेतन मिलता है। वेतन के अतिरिक्त न्यायाधीशों को अनेक भत्ते व सुविधाएँ भी दी जाती हैं। न्यायाधीशों के वेतन व भत्ते संचित निधि से दिए जाते हैं। संसद न्यायाधीशों के कार्यकाल के दौरान उनके वेतन व भत्तों में कमी नहीं कर सकती, हाँ, बढ़ा अवश्य सकती है। केवल वित्तीय संकट में ही उनके (न्यायाधीशों के) वेतन व भत्तों में कटौती कर सकती है।

प्रश्न 20.
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए कौन-सी योग्यताएँ होना आवश्यक है?
उत्तर:
भारतीय संविधान उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए दी गई योग्यताएँ निर्धारित करता है-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • वह भारत में कम-से-कम 10 वर्षों तक किसी न्यायिक पद पर रह चुका हो अथवा किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय या एक से अधिक राज्यों के उच्च न्यायालयों में कम-से-कम 10 वर्षों तक वकील रह चुका हो।

प्रश्न 21.
न्यायपालिका मौलिक अधिकारों की रक्षा कैसे करती है?
उत्तर:
मौलिक अधिकारों की रक्षा करना न्यायपालिका का अति महत्त्वपूर्ण कार्य है। यदि कोई व्यक्ति या संस्था यह समझे कि सरकार ने उसके या किसी और व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है, तो वह अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय में अथवा अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। न्यायपालिका मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कई प्रकार के लेख; जैसे बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश इत्यादि जारी कर सकती है और किसी भी कार्य तथा कानून को अवैध घोषित कर सकती है।

प्रश्न 22.
संविधान किस प्रकार से न्यायपालिका की स्वतन्त्रता की स्थापना करता है ?
उत्तर:
संविधान दिए गए उपायों व प्रावधानों से न्यायपालिका की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करता है-

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ली जाती है,
  • न्यायाधीशों की नियुक्ति लम्बी अवधि के लिए की जाती है,
  • कार्यकाल के दौरान न्यायाधीशों के वेतन व भत्तों में कटौती नहीं की जा सकती,
  • न्यायाधीशों को समय से पूर्व केवल महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है,
  • न्यायाधीशों को संविधान में अनेक उन्मुक्तियाँ प्रदान की गई हैं।

प्रश्न 23.
उच्च न्यायालय की प्रशासन संबंधी शक्तियों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
उच्च न्यायालय को न्याय संबंधी अधिकारों के अतिरिक्त कुछ प्रशासन संबंधी अधिकार भी प्राप्त हैं, जो इस प्रकार हैं

  • उच्च न्यायालय अपने अधीन किसी भी न्यायालय के कागजों को मँगवाकर उनकी जाँच-पड़ताल कर सकता है,
  • उच्च न्यायालय किसी मुकद्दमे को एक न्यायालय से हटाकर निर्णय के लिए दूसरे न्यायालय में भेज सकता है,
  • यदि किसी न्यायालय में ऐसा मुकद्दमा चल रहा हो जिसमें भारतीय संविधान की व्याख्या का प्रश्न पैदा होता है, तो उच्च न्यायालय उस मुकद्दमे को अपने पास मँगवाकर निर्णय दे सकता है,
  • उच्च न्यायालय अपने अधीन न्यायालयों के शैरिफ, क्लर्क, वकील तथा अन्य कर्मचारियों की फीस निश्चित करता है। इसके अलावा उच्च न्यायालय अपने अधीन न्यायालयों के अधिकारियों की नियुक्ति, अवनति, उन्नति और छुट्टी के बारे में नियम बनाता है,
  • उच्च न्यायालय अपने अधीन न्यायालयों की कार्य-पद्धति, रिकॉर्ड, रजिस्टर बना सकता है तथा हिसाब-किताब देख सकताहै,
  • उच्च न्यायालय को राज्य के अन्य सभी न्यायालयों तथा न्यायाधिकरणों की देख-रेख करने तथा उन पर निरीक्षण रखने का अधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 24.
न्यायिक सक्रियता के कोई चार कारण लिखें।
उत्तर:
न्यायिक सक्रियता के मुख्य चार कारण निम्नलिखित हैं
1. सरकार व देश में फैला व्यापक भ्रष्टाचार-वर्तमान समय में कुछ ही ऐसे नेता हैं जिन पर भ्रष्टाचार का आरोप न लगा हो। भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है। न्यायालय भ्रष्ट लोगों का पर्दाफाश करने में लगा हुआ है।

2. संविधान के नियमों का उल्लंघन सरकार द्वारा राजनीतिक दलों द्वारा जब भी संविधान के नियमों की अवहेलना होती है तब न्यायपालिका ही हस्तक्षेप करके नियमों की या संविधान की रक्षा करती है।

3. लालसा-राजनेता जब सत्ता का स्वाद चख लेते हैं तो उनमें सत्ता में बने रहने की लालसा भ्रष्टाचार को जन्म देती है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका का सक्रिय होना स्वाभाविक है।

4. विधानमण्डलों में अनुशासनहीनता-विधानमण्डलों में अनुशासनहीनता राजनेताओं का दैनिक कार्य बन चुका है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए न्यायपालिका की सक्रियता के इलावा और कोई चारा नहीं है।

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प्रश्न 25.
न्याय सक्रियता के चार साधनों का वर्णन करो।
उत्तर:
1. न्यायिक पुनर्निरीक्षण न्यायिक पुनर्निरीक्षण न्यायिक सक्रियता का पहला एवं महत्त्वपूर्ण साधन है। इस प्रकार की शक्ति भारत में सर्वोच्च न्यायालय के पास है।।

2. मौलिक अधिकारों की व्याख्या-न्यायिक सक्रियता का दूसरा साधन मौलिक अधिकारों की व्याख्या से सम्बन्धित है। सर्वोच्च न्यायालय भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है।

3. संविधान की व्याख्या संविधान एक पवित्र पुस्तक मात्र है जो अपनी सुरक्षा नहीं कर सकता। न्यायपालिका का उत्तरदायित्व है कि संविधान के विरुद्ध बने कानूनों को गैर-कानूनी घोषित कर उसकी सुरक्षा करे।

4. कानून निर्माण-न्यायपालिका का कार्य कानून निर्माण करना नहीं है फिर भी कानून की नई व्याख्या कानून निर्माण का कार्य करती है। यह न्यायिक सक्रियता का स्पष्ट उदाहरण है।

प्रश्न 26.
सर्वोच्च न्यायालय के प्रांरभिक क्षेत्राधिकार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय के इस अधिकार क्षेत्र में वे मुकद्दमें आते हैं जो सीधे सर्वोच्च न्यायलय में ले जाए जा सकते हैं और जिनका सम्बन्ध संघीय व्यवस्था से है। ये इस प्रकार के हैं।

  • संघ सरकार तथा एक अथवा अधिक राज्यों के बीच झगड़े।
  • ऐसे झगड़े जिनमें संघीय सरकार तथा कुछ राज्य एक तरफ हों और कुछ अन्य राज्य तरफ हों।
  • राज्यों के आपसी झगड़े जिनका सम्बन्ध कानून अथवा संविधान की व्याख्या से हो।

प्रश्न 27.
न्यायिक क्रियाशीलता से क्या तात्पर्य है।
उत्तर:
न्यायिक सक्रियवाद का अर्थ यह है कि न्यायपालिका द्वारा उन कार्यों को करना जो उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि जो कार्य विधानपालिका या कार्यपालिका के क्षेत्र में आते हैं और वे न्यायपालिका द्वारा किए जाते हैं। न्यायपालिका अन्य सरकारी सदस्यों को कुछ कार्य करने के निर्देश देती है और उनका पालन करना अनिवार्य होता है। इस प्रकार न्यायिक सक्रियावाद का अभिप्राय न्यायपालिका द्वारा अपनी शक्तियों के क्षेत्र में क्रियाशील भूमिका निभाना नहीं है, बल्कि अपने क्षेत्र से बाहर होकर ऐसे काम करना है जो सरकार के अन्य अंगों के निर्धारित अधिकार क्षेत्र में होते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आधुनिक लोकतन्त्रीय राज्यों में न्यायपालिका के कार्यों तथा शक्तियों की व्याख्या करें।
उत्तर:
न्यायपालिका सरकार का तीसरा तथा महत्त्वपूर्ण अंग है। यद्यपि यह विभाग उतना चर्चित नहीं जितने अन्य दोनों विभाग, फिर भी इसका महत्त्व किसी भी प्रकार अन्य विभागों से कम नहीं है। न्यायपालिका ही लोगों के अधिकारों तथा उनकी स्वतन्त्रताओं की रक्षा करती है तथा उन्हें अधिकारियों की निरंकुशता से बचाती है।

1. गार्नर (Garmer) के अनुसार, “बिना न्याय विभाग के किसी सभ्य राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती है।” 2. लॉर्ड ब्राईस (Lord Bryce) का कथन है, “सरकार की उत्तमता की कसौटी उसकी न्यायपालिका की दक्षता है।” जिस राज्य के लोगों को निष्पक्ष तथा तुरन्त न्याय नहीं मिलता, वहाँ लोग सुखी नहीं रह सकते। इसलिए एक स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका का होना अति अनिवार्य है।

न्यायपालिका के कार्य (Functions of Judiciary)- न्यायालय का मुख्य कार्य लोगों में न्याय वितरित करना है। यद्यपि न्यायपालिका का मुख्य कार्य न्याय करना है तथा सार्वजनिक कानूनों को व्यक्तिगत मामलों में लागू करना है, परन्तु न्याय करने के अतिरिक्त भी न्यायपालिका को बहुत-से कार्य करने पड़ते हैं। न्यायपालिका के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं

1. अपराधियों को दण्ड देना-न्यायपालिका का कार्य अपराधियों को दण्ड देना है जिससे दूसरे व्यक्ति अपराध न करें। जब कोई व्यक्ति राज्य के कानूनों का उल्लंघन करता है तो न्यायालय उसे उपयुक्त दण्ड देता है।

2. विवादों का निर्णय करना-न्यायालय लोगों के आपसी दीवानी, फौजदारी तथा राजस्व सम्बन्धी विवादों का फैसला करता है। यदि निम्न न्यायालयों के निर्णय से कोई पक्ष असन्तुष्ट रहे तो उसे उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला दोनों पक्षों को मानना पड़ता है।

3. नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना-राज्य व्यक्ति को अपने विकास के लिए बहुत-से अधिकार प्रदान करता है। जिन देशों के संविधान लिखित होते हैं, वहाँ नागरिकों को संविधान द्वारा ही बहुत-से अधिकार प्रदान किए जाते हैं। नागरिकों के सभी अधिकारों की रक्षा करना न्यायपालिका का कार्य है। यदि न्यायपालिका द्वारा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा न की जाए तो अधिकार अर्थहीन बन जाते हैं।

4. कानून को व्यक्तिगत मामलों में लागू करना राज्य अलग-अलग लोगों तथा वर्गों के लिए अलग-अलग कानून नहीं बनाता। कानून सभी के लिए समान रूप से बनाए जाते हैं। न्यायपालिका सार्वजनिक कानूनों को व्यक्तिगत मामलों में लागू करते हैं।

5. कानूनों की व्याख्या विधानमण्डल द्वारा बनाए गए कानून सामान्य होते हैं। इनकी विस्तार सहित व्याख्या करना न्यायपालिका का कार्य है। विभिन्न पक्ष अपने-अपने ढंग से कानून का अर्थ लगाते हैं। ऐसे मामलों में न्यायालय ही उसकी सही व्याख्या करता है। न्यायालय की व्याख्या अन्तिम होती है, जिसे सबको मानना पड़ता है।

6. नए कानूनों का निर्माण-जब न्यायालय के सामने कोई ऐसा विवाद आता है, जिसके सम्बन्ध में कोई कानून नहीं है तो न्यायाधीश अपनी योग्यता व निष्पक्षता के आधार पर न्याय करते हैं। उनका यह निर्णय कानून बन जाता है। भविष्य में उसी के आधार पर न्याय किया जाता है। ऐसे कानूनों को न्यायाधीश द्वारा निर्मित कानून (Judge made Laws) कहा जाता है।

7. संविधान की रक्षा-न्यायालय देश के संविधान का संरक्षक होता है। यदि कार्यपालिका अथवा विधानपालिका द्वारा संविधान की धाराओं का उल्लंघन किया जाता है तो न्यायालय उनके कार्यों को अवैध घोषित करके निरस्त कर सकता है। संविधान की रक्षा करना न्यायालय का ही कार्य है। वह केन्द्र तथा राज्य सरकारों के संविधान विरोधी कार्यों को निरस्त कर देता है। इस प्रकार संविधान की सुरक्षा बनी रहती है।

8. परामर्श सम्बन्धी कार्य आवश्यकता पड़ने पर न्यायपालिका राज्याध्यक्ष को कानूनी सलाह भी देता है। भारत का राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से किसी भी मामले में कानूनी सलाह ले सकता है। न्यायालय के परामर्श को मानना अथवा न मानना राष्ट्रपति का कार्य है।

9. विविध कार्य-न्यायपालिका अन्य कई विविध कार्य भी करती है। आन्तरिक प्रबन्ध करना, अपने रिकॉर्ड सुरक्षित रखना, विविध प्रकार की आज्ञाएँ जारी करके अधिकारियों के किसी अनुचित कार्य को रोकना न्यायालय का कार्य है। नाबालिगों की सम्पत्ति के लिए ट्रस्टी नियुक्त करना, स्त्रियों तथा पागलों के लिए संरक्षक नियुक्त करना, व्यक्तियों की सम्पत्ति का प्रबन्ध करना, दिवालियों की सम्पत्ति के लिए रिसीवर नियुक्त करना भी न्यायालय के कार्य हैं। इनके अतिरिक्त विवाह तथा तलाक को मान्यता देना, विदेशियों को नागरिकता प्रदान करना आदि भी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इस तरह न्यायपालिका का काम न्याय करना ही नहीं, अन्य और भी बहुत से कार्य करना है।

प्रश्न 2.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का महत्त्व बताइए। न्यायपालिका को निष्पक्ष या स्वतन्त्र कैसे रखा जा सकता है ?
उत्तर:
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अभिप्राय है कि वह विधानमण्डल तथा कार्यपालिका के नियन्त्रण से मुक्त हो। उस पर मतदाताओं तथा राजनीतिक दलों का प्रभाव न हो। न्यायाधीश पक्षपातपूर्ण तथा किसी तरह के बाहरी दबाव में आकर न्याय न करें। न्यायाधीशों के निर्णयों पर किसी प्रकार का प्रशासनिक, आर्थिक, राजनीतिक प्रभाव नहीं होना चाहिए। ऐसा तभी हो सकता है जब न्यायाधीश पूर्णरूप से स्वतन्त्र हों। वे बिना किसी भय, लालच अथवा पक्षपात के पूर्ण न्याय करने वाले हों।

स्वतन्त्र न्यायपालिका का महत्त्व स्पष्ट है। देश के कानून चाहे कितने ही अच्छे क्यों न हों, वास्तविक न्याय तब तक नहीं हो सकता, जब तक न्यायाधीश योग्य, ईमानदार, निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र न हों। यदि न्याय करने में देरी लगती है या भेदभाव रखा जाता है तो लोगों के जान व माल की रक्षा सम्भव नहीं। स्वतन्त्र न्यायपालिका ही जनता के अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं की संरक्षक है।

यदि न्याय रूपी दीपक बुझ जाता है तो कितना गहन अन्धकार होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। – प्रजातन्त्र की सफलता भी इस बात पर निर्भर है, इसलिए लॉर्ड ब्राइस का यह कथन पूर्णतः सत्य है कि किसी भी सरकार की श्रेष्ठता की सबसे अच्छी कसौटी न्यायपालिका की दक्षता है। एक स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष न्याय व्यवस्था संगठित करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

1. न्यायाधीशों की नियुक्ति-न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए न्यायाधीशों का उचित ढंग से नियुक्त किया जाना बहुत अनिवार्य है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति के निम्नलिखित तीन तरीके प्रचलित हैं

(1) जनता द्वारा चुनाव-जनता द्वारा चुनाव करने की प्रथा रूस तथा अमेरिका में निम्नतर न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करने में अपनाई जाती है, परन्तु यह पद्धति अत्यन्त दोषपूर्ण है। जनता यह नहीं जानती कि कौन व्यक्ति न्यायाधीश बनने के योग्य है। दूसरे, न्यायाधीश अपने मतदाताओं को खुश रखने का प्रयत्न करेंगे जिससे निष्पक्ष न्याय नहीं होगा। तीसरे, इस विधि से केवल राजनीतिज्ञ ही न्यायाधीश बन सकेंगे जो किसी भी रूप में उचित नहीं है।

(2) विधानमण्डल द्वारा चुनाव-विधानमण्डल द्वारा चुनाव की पद्धति रूस तथा स्विट्ज़रलैण्ड के उच्च न्यायालयों के लिए अपनाई जाती है। यह विधि भी ठीक नहीं है, क्योंकि विधायक योग्य नहीं होते। विधानसभा में बहुमत दल का प्रभाव होता है, इससे न्यायाधीश भी दलबन्दी में फंसकर कार्य करेंगे। वे न्याय करने की जगह अपने निर्वाचकों को खुश करने के प्रयत्न में ही लगे रहेंगे।

(3) कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति सबसे अच्छी है। इसमें कार्यपालिका व्यक्ति की योग्यता के आधार पर नियुक्ति करेगी। भारत में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। यह कार्य राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर करता है।

2. पद की अवधि-न्यायाधीशों को प्रलोभन तथा पक्षपात से दूर रखने के लिए उनका सेवाकाल भी लम्बा रखा जाना अनिवार्य है। यदि न्यायाधीशों का कार्यकाल थोड़ा होगा तो वे भविष्य के लिए रिश्वत लेने से भी नहीं हिचकेंगे, इसलिए न्यायाधीशों का कार्यकाल लम्बा होना चाहिए जिससे वे अपने पद के दौरान अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकें। आज न्यायाधीश ‘सदाचार पर्यन्त पद’ (Good Behaviour Tenure) के सिद्धान्त पर एक लम्बे समय तक अपने पद पर बने रहते हैं। भारत में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते हैं।

3. न्यायाधीशों को पद से हटाने की विधि अयोग्य तथा दुराचारी व्यक्ति को न्याय के पद पर नहीं रहने देना चाहिए। यदि न्यायाधीश गलत काम करें तो उन्हें अपने पद से हटा देना चाहिए, परन्तु न्यायाधीशों का हटाया जाना इतना सरल तथा सुलभ न हो कि झूठा दोष लगाकर किसी भी न्यायाधीश को हटा दिया जाए। न्यायाधीशों को कार्यपालिका द्वारा विधानपालिका के दोषारोपण करने तथा उसकी जाँच-पड़ताल करने पर ही हटाया जाना चाहिए। भारत में संसद द्वारा महाभियोग सिद्ध होने पर ही राष्ट्रपति किसी न्यायाधीश को अपने पद से हटा सकता है, अन्यथा नहीं।

4. न्यायाधीशों का अच्छा वेतन-उचित न्याय के लिए न्यायाधीशों को प्रलोभनों से मुक्त रखा जाए। इसलिए उन्हें इतना वेतन अवश्य दिया जाए, जिससे वे अपने समकक्ष दूसरे अधिकारियों की तरह आर्थिक स्तर स्थापित कर सकें। उनको वेतन समय पर मिले तथा वेतन, भत्ते तथा अन्य सुविधाएँ उनके कार्यकाल में कम न किए जाएँ। ऐसा होने पर ही न्यायाधीशों से निष्पक्ष तथा ईमानदार होकर न्याय करने की अपेक्षा की जा सकती है।

5. योग्यता के आधार पर नियुक्ति न्यायाधीशों को नियुक्त करते समय उनके ज्ञान, बुद्धि तथा योग्यताएँ भी देखी जानी चाहिएँ। न्याय कार्य अन्य शासन कार्यों से भिन्न है। इसके लिए उन्हीं व्यक्तियों को नियुक्त किया जाना चाहिए जो कानून तथा न्याय सम्बन्धी पर्याप्त ज्ञान रखते हों। उन्हें देश के कानूनों तथा परम्पराओं का पर्याप्त ज्ञान हो।

6. सेवा निवृत्त होने पर वकालत की मनाही न्यायाधीशों के सम्मान तथा निष्पक्षता के लिए सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें वकालत करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होगा तो वर्तमान न्यायाधीश अपने पुराने साथियों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार कर सकते हैं।

7. विधानपालिका तथा कार्यपालिका से पृथक्कता-न्यायपालिका को विधानपालिका तथा कार्यपालिका से पृथक् रखा जाना चाहिए अन्यथा न्यायाधीश स्वतन्त्र रूप से न्याय नहीं कर सकेंगे। एक स्वतन्त्र न्यायालय जनता के अधिकारों व स्वतन्त्रता की रक्षा का दुर्ग है। भारत में न्यायपालिका को विधानपालिका तथा कार्यपालिका से स्वतन्त्र रखा गया है। न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा योग्यता के आधार पर नियुक्त किए जाते हैं तथा विधानपालिका ही महाभियोग द्वारा न्यायाधीशों को हटाने का प्रस्ताव पास कर सकती है।

तभी न्यायाधीश अपने पद से हटाए जा सकते हैं। निष्कर्ष-उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि इन विधियों को अपनाने से न्यायपालिका को स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष रखा जा सकता है। इन विधियों को अपनाए बिना न्यायपालिका का स्वतन्त्र रूप से कार्य करना सम्भव नहीं है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 6 न्यायपालिका

प्रश्न 3.
उच्चतम न्यायालय के संगठन एवं रचना का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान एक एकीकृत न्यायपालिका की स्थापना करता है जिसमें शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) है। इसके संगठन, शक्तियाँ तथा कार्य निम्नलिखित प्रकार से हैं रचना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है। सर्वोच्च न्यायालय में प्रारम्भ में एक मुख्य न्यायाधीश और 7 अन्य न्यायाधीश होते थे।

1957 में संसद में एक कानून पास हुआ, जिसके अनुसार मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर बाकी न्यायाधीशों की संख्या 7 से 10 कर दी गई। सन् 1960 में संसद ने अन्य न्यायाधीशों की संख्या 10 से बढ़ाकर 13 कर दी, परन्तु दिसम्बर, 1977 में संसद ने एक कानून पास किया, जिसके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या 13 से बढ़ाकर 17 कर दी गई। अप्रैल, 1986 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 17 से 25 कर दी गई।

21 फरवरी, 2008 को केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल के निर्णयानुसार उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन कर न्यायाधीशों की संख्या को 25 से 30 कर दी गई। जबकि संसद द्वारा (लोकसभा द्वारा 5 अगस्त एवं राज्य सभा द्वारा 7 अगस्त) पारित सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2019 के उपरान्त 10 अगस्त, 2019 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित 34 हो गई।

इस प्रकार अब एक मुख्य न्यायाधीश एवं 33 अन्य न्यायाधीशों के साथ कुल न्यायाधीशों की संख्या 34 हो गई है। वर्तमान में श्री शरद अरविंद बोबड़े सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हैं जिन्होंने श्री रंजन गोगोई के 17 नवम्बर, 2019 को सेवानिवृत होने के बाद 18 नवम्बर, 2019 को 47वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपना कार्यभार सम्भाला जो 23 अप्रैल, 2021 तक अपने पद पर रहेंगे।

न्यायाधीशों की नियुक्ति-उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 124 के अधीन राष्ट्रपति करता है। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों व उच्च न्यायाधीशों, जिन्हें वह उचित समझता है, से सलाह करता है। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में वरिष्ठता के सिद्धान्त के पालन’ की परम्परा विकसित करने का प्रयास किया गया है।

हालाँकि दो बार इस परम्परा का राजनीतिक कारणों से उल्लंघन किया गया है। 1973 में श्री हेगड़े, श्री शैल व श्री ग्रोवर की वरिष्ठता की उपेक्षा करके श्री ए०एन० रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह करता है। हालाँकि न्यायाधीशों की सलाह मानने के लिए राष्ट्रपति बाध्य नहीं है।

न्यायाधीशों की योग्यताएँ संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए निश्चित की गई योग्यताएँ इस प्रकार हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • वह किसी एक या दो अथवा दो से अधिक उच्च न्यायालयों का निरन्तर 5 वर्ष तक न्यायाधीश रह चुका हो,
  • वह कम-से-कम 10 वर्ष तक एक अथवा दो से अधिक उच्च न्यायालयों में वकालत कर चुका हो,
  • वह राष्ट्रपति के विचार में एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता (Jurist) हो।

शपथ उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीश अपना पद सम्भालने से पूर्व राष्ट्रपति अथवा उप-राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए व्यक्ति के सम्मुख यह शपथ लेते हैं, “भारतीय संविधान के प्रति निष्ठावान् रहेंगे, उसमें सच्चा विश्वास रखेंगे, अपने कार्य को अपनी पूर्ण योग्यता, ज्ञान एवं न्याय की भावना सहित और निर्भीक व निष्पक्ष, बिना प्रेम या बुरी इच्छा के साथ निष्ठा से निभाएँगे तथा भारतीय संविधान व कानून की पुष्टि करेंगे।”

वेतन-उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ₹ 2,80,000 तथा अन्य न्यायाधीशों को ₹ 2,50,000 मासिक वेतन दिए जाने की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त उन्हें अन्य भत्ते, अवकाश तथा निःशुल्क निवास स्थान भी मिलता है। किसी न्यायाधीश की नियुक्ति के पश्चात् संसद द्वारा उनके वेतन तथा अन्य सुविधाओं में कमी नहीं की जा सकती। सेवा से मुक्त होने के पश्चात् उन्हें पेन्शन (Pension) भी दी जाती है। उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों का वेतन केवल आर्थिक संकट की दशा में . ही कम किया जा सकता है। न्यायाधीशों का वेतन भारत की संचित निधि से दिया जाता है।

कार्यकाल-उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर रहते हैं। न्यायापालिका की स्वतन्त्रता को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति को यह अधिकार नहीं दिया कि वह अपनी इच्छानुसार किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटा सके। 65 वर्ष की आयु से पूर्व वह स्वयं त्यागपत्र दे सकता है या उसकी मृत्यु से उसका पद रिक्त हो सकता है।

इसके अतिरिक्त उन्हें बुरे व्यवहार व अयोग्यता के आधार पर ही 65 वर्ष की आयु से पूर्व उनके पद से हटाया जा सकता है। न्यायाधीशों को पद से हटाने की यह विधि महाभियोग के समान है। बुरे व्यवहार व अयोग्यता का यह प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग उनके कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से पास किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत एक ही अधिवेशन में संसद द्वारा न्यायाधीश के विरुद्ध प्रस्ताव पास हुए बिना राष्ट्रपति किसी न्यायाधीश को उसके पद से नहीं हटा सकता।

उच्चतम न्यायालय का कार्य स्थान साधारणतया उच्चतम न्यायालय का कार्य स्थान नई दिल्ली निश्चित किया गया है, परन्तु मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की स्वीकृति व पूर्वाज्ञा द्वारा इसकी बैठक किसी अन्य स्थान पर भी बुला सकता है। सेवा मुक्त होने के पश्चात् वकालत की मनाही-उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के पश्चात् भारत के किसी भी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकते, परन्तु उन्हें किसी आयोग के सदस्य, राज्यपाल, राजदूत आदि उच्च पदों पर नियुक्त किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
भारत के उच्चतम न्यायालय का संगठन, शक्तियों तथा कार्यों का वर्णन करो। अथवा उच्चतम न्यायालय के प्रारम्भिक तथा अपीलीय क्षेत्राधिकार का वर्णन कीजिए। अथवा सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों तथा क्षेत्राधिकार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान संघात्मक शासन-व्यवस्था की स्थापना के साथ-साथ एकीकृत न्यायिक व्यवस्था की स्थापना भी करता है जिसमें उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) शीर्ष पर है। भारतीय न्यायपालिका को संविधान-निर्माताओं ने स्वतन्त्र व निष्पक्ष बनाए रखने के लिए प्रावधान संविधान में ही कर दिए हैं।

संविधान में न्यायपालिका की संविधान की संरक्षक, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षक, लोकतन्त्र व जन-कल्याण में सहायक तन्त्र के रूप में भूमिका निर्धारित की गई है। संविधान न्यायपालिका को न्यायिक पुनराविलोकन (Judicial Review) का अधिकार भी सौंपता है जिसके अन्तर्गत न्यायपालिका किसी भी कानून को अवैध घोषित कर सकती है, लेकिन न्यायपालिका उच्च विधायिका (Super Legislature) नहीं है। भारत में उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार एवं शक्तियों का वर्णन निम्नलिखित है

उच्चतम न्यायालय का अधिकार क्षेत्र अथवा शक्ति (Power of Jurisdiction of Supreme Court)-श्री अल्लादी कृष्णा स्वामी अय्यर (Sh. Aladi Krishna SwamiAiyar) के अनुसार, “भारत के उच्चतम न्यायालय का अधिकार क्षेत्र विश्व के किसी भी संघात्मक राज्य के उच्चतम न्यायालय से अधिक है। यहाँ तक कि यह अमेरिका के उच्चतम न्यायालय से भी अधिक शक्तिशाली है।” उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँ इस प्रकार हैं-

  • प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार,
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार,
  • परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार,
  • संविधान का व्याख्याकार,
  • निर्णयों का पुनर्निरीक्षण,
  • अभिलेख का न्यायालय,
  • अन्य अधिकार,
  • संविधान का संरक्षक।

1. प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार-उच्चतम न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्रधिकार निम्नलिखित हैं
(क) संघीय मामले इस अधिकार क्षेत्र में वे मुकद्दमे आते हैं जो सीधे उच्चतम न्यायालय के पास ले जाए जा सकते हैं और जिनका सम्बन्ध संघीय व्यवस्था से है। इन्हें किसी निम्न न्यायालय में ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। संविधान के अनुच्छेद 136 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय का निम्नलिखित विषयों में एकमात्र प्रारम्भिक क्षेत्र है-

  • संघ सरकार तथा एक अथवा अधिक राज्यों के मध्य झगड़े,
  • ऐसे. झगड़े जिसमें संघ सरकार और कुछ राज्य एक ओर हों और कुछ राज्य दूसरी ओर हों,
  • राज्यों के पारस्परिक झगड़े जिनका सम्बन्ध कानून एवं संविधान की व्याख्या से हो।

अपवाद उपरोक्त विषयों से सम्बन्धित विषय किसी अन्य न्यायालय में पेश नहीं किए जा सकते, परन्तु निम्नलिखित प्रकार के विवाद उच्चतम न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार में नहीं आते

(1) उच्चतम न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार में केवल वही मुकद्दमे आते हैं जिनका सम्बन्ध कानूनी प्रश्न या तथ्य (Legal Question on Fact of Law) से हो अर्थात् राजनीतिक प्रकृति के विवाद उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार में नहीं आते,

(2) उच्चतम न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार में वे मामले नहीं आते जिनका सम्बन्ध किसी ऐसी सन्धि, समझौते आदि से हो जो संविधान के लागू होने से पहले किए गए हों और जो अब तक निरन्तर जारी हों अथवा जिनमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया हो कि उनके सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय को ऐसा अधिकार प्राप्त नहीं है। जैसे संविधान के.सातवें संशोधन के अनुसार भारत सरकार की देशी रियासतों के राजाओं से की हुई सन्धियाँ इस क्षेत्र में नहीं आतीं,

(3) उच्चतम न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार में वे विवाद भी नहीं आते जिनका सम्बन्ध अन्तर्राज्यीय नदियों (Inter-State Rivers), नदी घाटियों (River Valleys) तथा जल के वितरण आदि से हो,

(4) किसी नागरिक तथा किसी राज्य या भारत सरकार के बीच उत्पन्न होने वाले किसी भी झगड़े को सीधा उच्चतम न्यायालय में नहीं लाया जा सकता।

(ख) मौलिक अधिकारों का संरक्षक नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना भी उच्चतम न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार में आता है। उच्चतम न्यायालय नागरिकों के अधिकारों तथा संविधान का संरक्षक है। यदि किसी नागरिक के अधिकारों का सरकार तथा अन्य संस्था द्वारा उल्लंघन किया जाता है तो वह सीधे उच्चतम न्यायालय की शरण ले सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय को ऐसे निर्देश, आदेश या प्रतिलेख जारी करने की शक्ति प्रदान की गई है, जिनके द्वारा यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है। ये लेख हैं बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख (Writ of Habeas Corpus), प्रतिषेध लेख (Writ of Prohibition), परमादेश लेख (Writ of Mandamus), उत्प्रेषण लेख (Writ of Certiorari) तथा अधिकार पृच्छा लेख (Writ of Quo-Warranto)।

(ग) राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति के चुनाव सम्बन्धी झगड़े-राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के चुनाव से सम्बन्धित सभी विवादों के निर्णय केवल उच्चतम न्यायालय के द्वारा किए जाते हैं और इस प्रकार यह इसके प्रारम्भिक अधिकार के अन्तर्गत आता है।

(घ) संघीय लोक सेवा आयोग के सम्बन्ध में संघीय लोक सेवा आयोग के सदस्यों को महाभियोग के द्वारा तभी हटाया जा सकता है, जबकि इसके पूर्व उच्चतम न्यायालय सदस्यों पर लगे आरोपों की पुष्टि कर दे अर्थात् आयोग के सदस्यों के विरुद्ध लगे आरोपों की जाँच करने का एकमात्र अधिकार उच्चतम न्यायालय को प्राप्त है।

2. अपीलीय क्षेत्राधिकार-अपीलीय क्षेत्राधिकार से अभिप्राय उन विवादों से है जो आरम्भ तो उच्च न्यायालयों या निम्न न्यायालयों में होते हैं, लेकिन निर्णय के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है। उच्चतम न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार को चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।

(क) संवैधानिक मामले-किसी मुकद्दमे में अपना निर्णय देते हुए यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाण पत्र दे दे कि यह विवाद संविधान की व्याख्या से सम्बन्धित है तो उसके विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है। यदि उच्च न्यायालय ऐसा प्रमाण पत्र देने से इन्कार कर दे तो उच्चतम न्यायालय स्वयं भी संविधान के अनुच्छेद 132 के अन्तर्गत अपने सम्मुख अपील करने की आज्ञा दे सकता है।

(ख) फौजदारी मुकद्दमे-संविधान के अनुच्छेद 134 के अधीन फौजदारी मुकद्दमों में उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालयों के सामने उस समय अपील की जा सकती है यदि-

(1) किसी अभियुक्त को निम्न अदालत ने छोड़ दिया था, परन्तु उच्च न्यायालय ने अपील में उसे मृत्यु-दण्ड दिया हो तो अभियुक्त उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है,

(2) यदि उच्च न्यायालय किसी फौजदारी मामले को निम्न न्यायालय से अपने पास मँगवाकर अभियोग की सुनवाई स्वयं करे और अभियुक्त को मृत्यु-दण्ड दे दे,

(3) ऐसे फौजदारी मामलों की अपील भी उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है जिनके बारे में उच्च न्यायालय प्रमाण पत्र दे दे कि अमुक मामला उच्चतम न्यायालय के अधीन सुनवाई हेतु जा सकता है।

(ग) दीवानी अपीलें संविधान के अनुच्छेद 133 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय को दीवानी अभियोगों में उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें सुनने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन ऐसी अपील उसके सामने उसी समय की जा सकती है, जब उच्च न्यायायल यह प्रमाण पत्र दे कि इस मुकद्दमे में सार्वजनिक महत्त्व या हित का कोई कानूनी प्रश्न उलझा हुआ है और उसकी व्याख्या उच्चतम न्यायालय द्वारा की जानी आवश्यक है।

संविधान के 30वें संविधान संशोधन द्वारा बीस हजार रुपए वाली शर्त समाप्त कर दी गई है। दूसरे शब्दों में बीस हजार से कम या अधिक का कोई मामला तभी अपील के लिए उच्चतम न्यायालय में आएगा जब उसमें सामान्य हित का कोई कानूनी प्रश्न उलझा हुआ है।

1) विशेष अपीलें-संविधान के अनुच्छेद 136 के अधीन उच्चतम न्यायालय किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार के अभियोग के विषय में निम्न न्यायालय के विरुद्ध अपील करने की अनुमति दे सकता है, लेकिन उसे यह अधिकार सैनिक न्यायालयों के सम्बन्ध में प्राप्त नहीं है।

3. परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार-संविधान के अनुच्छेद 143 द्वारा राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी मामले पर उच्चतम न्यायालय से कानूनी सलाह माँग सकता है। ऐसे मामले पर कम-से-कम पाँच न्यायाधीश बैठकर विचार करते हैं और बहुमत से निर्णय करके निर्णय को राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है। राष्ट्रपति इस निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन अभी तक उच्चतम न्यायालय के इस परामर्शदात्री कार्य का राष्ट्रपति द्वारा बराबर सम्मान किया गया है। राष्ट्रपति ने सर्वप्रथम उच्चतम न्यायालय से सलाह 1958 में केरल शिक्षा विधेयक के बारे में माँगी थी। अब तक अनेक बार उच्चतम न्यायालय राष्ट्रपति को सलाह दे चुका है।।

4. संविधान का व्याख्याका-संविधान की अन्तिम व्याख्या करने का अधिकार उच्चतम न्यायालय को है। इस अधिकार के अन्तर्गत न्यायालय को पुनरावलोकन का अधिकार दिया गया है। उच्चतम न्यायालय संसद तथा राज्य विधान-मण्डलों द्वारा बनाए गए कानून तथा कार्यपालिका द्वारा जारी किए गए किसी अध्यादेश को असंवैधानिक घोषित कर सकता है।

5. निर्णयों का पुनर्निरीक्षण-संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा किए गए निर्णयों को दृष्टान्त या मिसाल के रूप में न मानकर कानून की नई व्याख्या करने की शक्ति दी गई है।

6. अभिलेख का न्यायालय उच्चतम न्यायालय अभिलेख का न्यायालय भी है। उसके निर्णय तथा कार्रवाई को भविष्य में उदाहरणार्थ पेश करने के लिए लिपिबद्ध करके रखा जाता है।

7. अन्य अधिकार-उच्चतम न्यायालय को अन्य दूसरे कार्य करने का अधिकार भी है। इन कार्यों में

  • उच्चतम न्यायालय उन लोगों को दण्ड दे सकता है जो इसका अपमान करें,
  • उच्चतम न्यायालय के आदेश और निर्णय भारत के सभी असैनिक न्यायालय तथा पदाधिकारियों को मानने पड़ते हैं,
  • भारत के सभी असैनिक न्यायालय इसके नियन्त्रण में हैं। यह किसी भी न्यायालय को कोई भी आदेश दे सकता है। अभियोगों को एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में भेजा जा सकता है। यह किसी भी तरह की सूचना मँगवा सकता है,
  • वह अपने अधीन काम करने वाले कर्मचारियों को नियुक्त करता है। उनके वेतन, भत्ते तथा सेवा की दूसरी शर्तों को निश्चित करता है,
  • उच्चतम न्यायालय किसी भी उच्च न्यायालय तथा अधीनस्थ न्यायालयों का निरीक्षण कर सकता है,
  • उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह लेता है,
  • उच्चतम न्यायालय निम्न न्यायालयों के फैसले, डिग्री, दण्ड, आज्ञा के विरुद्ध अपने आगे अपील करने की आज्ञा दे सकता है,
  • कोई भी नागरिक या सरकारी कर्मचारी न्यायालय के काम में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। ऐसा करने पर उसे दण्ड दिया जा सकता है।

8. संविधान का संरक्षक-उच्चतम न्यायालय को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शक्ति संविधान के संरक्षक के रूप में प्राप्त है। इसके अधीन उच्चतम न्यायालय कानूनों के साथ-साथ उन संविधान संशोधनों को भी अवैध घोषित कर सकता है जो उसके विचार में संविधान का उल्लंघन करते हों। अपने इस अधिकार के अन्तर्गत केशवानन्द भारती मामले सन् 1973 में उच्चतम न्यायालय ने संसद के संशोधन सम्बन्धी अधिकार को सीमित करते हुए कहा था, “संसद ऐसा कोई कानून या संविधान में संशोधन नहीं कर सकती कि जिससे संविधान का मूलभूत ढाँचा विकृत अथवा नष्ट होता हो।”

निष्कर्ष-उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँ तथा कार्य उसे भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में अति महत्त्वपूर्ण बना देते हैं। उच्चतम न्यायालय संघात्मक व्यवस्था के रक्षक, संविधान के रक्षक, संविधान के व्याख्याकार, मौलिक अधिकारों के रक्षक की भूमिका निभाने के साथ-साथ लोकतन्त्र व जनकल्याण के विकास में प्रभावशाली भूमिका निभाता है।

च्चतम न्यायालय दलित व गरीब लोगों के लिए न्याय का अन्तिम शरणगाह है। उच्चतम न्यायालय ने लोकहितवाद (Public Interest Litigation) के द्वारा अपने अधिकारों व शक्तियों में असीमित वृद्धि कर ली है। उच्चतम न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में कहा है, “न्यायपालिका कानूनों व संविधान की व्याख्याकार मात्र नहीं है, बल्कि न्याय की अन्तिम शरणस्थली है।” उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति द्वारा संसद व कार्यपालिका की शक्ति को सीमित करके लोकतन्त्र की रक्षा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

प्रश्न 5.
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, योग्यताओं, कार्यकाल तथा वेतन का वर्णन करो। अथवा राज्य के उच्च न्यायालय की रचना तथा क्षेत्राधिकार का वर्णन करो।
उत्तर:
परिचय (Introduction) भारत में एकल न्याय-व्यवस्था है, सबसे ऊँचा न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय है, उसके अधीन राज्यों में उच्च न्यायालय पाए जाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 214 के अन्तर्गत राज्य स्तर पर प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय (High Court) की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 231 में यह भी कहा गया है कि संसद दो या दो से अधिक राज्यों और केन्द्र-प्रशासित क्षेत्र के लिए एक ही उच्च न्यायालय की व्यवस्था कर सकती है। सन् 1966 के पंजाब पुनर्गठन कानून के द्वारा संसद ने पंजाब और हरियाणा राज्यों और चण्डीगढ़ के केन्द्र-प्रशासित क्षेत्र के लिए एक उच्च न्यायालय स्थापित किया, जो चण्डीगढ़ में है। राज्यों के ये उच्च न्यायालय अखिल भारतीय न्याय-व्यवस्था का अंग होते हुए भी अपने आप में स्वतन्त्र इकाइयाँ हैं।

उनके ऊपर अपने राज्यों के विधानमण्डल या कार्यपालिका का कोई नियन्त्रण नहीं है। मार्च, 2013 में मेघालय, मणिपुर एवं त्रिपुरा राज्य के अलग से उच्च न्यायालय अस्तित्व में आने पर कुल उच्च न्यायालयों की संख्या 21 से बढ़कर 24 हुई थी जो 1 जनवरी, 2019 को आन्ध्रप्रदेश की राजधानी अमरावती में आन्ध्रप्रदेश राज्य का अलग उच्च न्यायालय अस्तित्व में आने के बाद देश में कुल उच्च न्यायालयों की संख्या वर्तमान में 25 हो गई हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आन्ध्रप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के तहत आन्ध्रप्रदेश एवं तेलंगाना दो अलग-अलग राज्य बने थे .. जिनका हैदराबाद में संयुक्त उच्च-न्यायालय था। अब हैदराबाद उच्च-न्यायालय को तेलंगाना उच्च न्यायालय के नाम से जाना जाएगा। उच्च न्यायालय एक राज्य का सबसे बड़ा न्यायालय है और एक राज्य के अन्य सभी न्यायालय उसके अधीन होते हैं।

रचना (Composition)-उच्च न्यायालयों के गठन सम्बन्धी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 216 में हैं। प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) और कुछ अन्य न्यायाधीश होते हैं। इनकी संख्या सम्बन्धित राज्यों की जरूरतों को ध्यान में रखकर राष्ट्रपति द्वारा तय की जाती है। सभी उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की संख्या समान नहीं होती।

उनकी संख्या राष्ट्रपति द्वारा निश्चित की जाती है; जैसे हरियाणा एवं पंजाब उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की कुल संख्या 85 निश्चित की गई जबकि हिमाचल प्रदेश के उच्च न्यायालय में कुल संख्या 13 निश्चित की गई है। काम की अधिकता होने पर एक उच्च न्यायालय में अधिक-से-अधिक दो वर्षों के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश (Additional Judges) भी नियुक्त किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की स्वीकृति से उच्च न्यायालय के किसी सेवा-निवृत्त न्यायाधीश को भी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के लिए प्रार्थना कर सकता है।

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति-अनुच्छेद 223 के अन्तर्गत यदि किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो जाए या जब मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थित हो या अन्य किसी कारण से अपने पद के कर्त्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो तो राष्ट्रपति उस न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों में से किसी एक को उस पद के लिए कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करता है। अतिरिक्त तथा कार्यकारी न्यायाधीशों की नियुक्ति अनुच्छेद 224

(1) के अन्तर्गत यदि किसी उच्च न्यायालय में अस्थायी रूप में कार्य बढ़ गया है और राष्ट्रपति यह अनुभव करता है कि इस कार्य के लिए न्यायाधीशों की संख्या को अस्थायी रूप से बढ़ाना आवश्यक है तो वह उपयुक्त योग्यता रखने वाले व्यक्तियों को अधिक-से-अधिक दो वर्ष के लिए अतिरिक्त (Additional) न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कर सकता है।

इसी प्रकार अनुच्छेद 224 (2) के अन्तर्गत उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति उस काल के लिए कार्यकारी न्यायाधीश की नियुक्ति कर सकता है। – न्यायाधीशों का दूसरे राज्यों के उच्च न्यायालयों में स्थानान्तरण-अनुच्छेद 222 के अन्तर्गत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह से किसी न्यायाधीश को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानान्तरित करने का अधिकार है।

उच्चतम न्यायालय ने एस०पी० गुप्ता बनाम रतभा सरकार 1981 (न्यायाधीश मामला) में कहा, “सरकार का उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों का दूसरे राज्यों में तबादला करने का अधिकार पूर्णतः वैधानिक है।” इसके लिए सम्बन्धित न्यायाधीश की सहमति लेना आवश्यक नहीं है। निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न्यायाधीशों के स्थानान्तरण केवल जनहित (Public Interest) में ही किए जा सकते हैं, उन्हें दण्ड देने के लिए नहीं। इसके लिए देश के मुख्य न्यायाधीश से प्रभावी सलाह (Effective Consultation) लिया जाना आवश्यक है।

योग्यताएँ-अनुच्छेद 217 (2) में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की निम्नलिखित योग्यताएँ निश्चित की गई हैं-

(1) वह भारत का नागरिक हो,
(2) वह भारत में किसी न्याय के पद पर कम-से-कम पाँच वर्ष तक रह चुका हो। अथवा वह किसी उच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों में निरन्तर दस वर्ष तक वकील के रूप में कार्य कर चुका हो।

कार्यकाल-उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष पूर्ण होने तक अपने पद पर रह सकेंगे। इसके अतिरिक्त दी गई अवस्थाओं में कोई न्यायाधीश पद-मुक्त हो सकता है-
(1) यदि उसकी पदोन्नति करके उच्चतम न्यायालय में स्थानान्तरित कर दिया जाए,

(2) यदि भ्रष्टाचार या अयोग्यता के आधार पर संसद अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से दोनों सदनों में अलग-अलग किन्तु संसद के एक ही सत्र (Session) में उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पारित कर दे,

(3) स्वयं त्यागपत्र देने पर,

(4) अवकाश-प्राप्ति के पश्चात् वह अपने न्यायालय के अतिरिक्त किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में वकालत कर सकता है।

वेतन-उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को समस्त भारत में समान वेतन देने की व्यवस्था की गई है। उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को ₹ 2,50,000 तथा अन्य न्यायाधीशों को ₹ 2,25,000 मासिक वेतन व भत्ते तथा रहने के लिए बिना किराए का निवास स्थान मिलता है। नियुक्ति के बाद उनके वेतन व भत्तों में कमी नहीं की जा सकती। न्यायाधीशों को वेतन संचित निधि में से दिया जाता है। वित्तीय आपातस्थिति में ही उनके वेतन में कमी की जा सकती है। उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र भारत के उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है

1. साधारण अधिकार क्षेत्र-अनुच्छेद 225 के द्वारा भारत के उच्च न्यायालयों को वे सभी अधिकार क्षेत्र प्राप्त हैं जो संविधान के लागू होने से पूर्व उच्च न्यायालयों को प्राप्त थे। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि इस संविधान के उपबन्धों के अधीन रहते हुए तथा इस संविधान द्वारा विधान-मण्डल को प्रदत्त शक्तियों के आधार पर विधानमण्डल द्वारा बनाई गई किसी समुचित विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए किसी वर्तमान उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार और उसमें प्रशासित विधि तथा उस न्यायालय में न्याय के प्रशासन के सम्बन्ध में उसके न्यायाधीशों की अपनी-अपनी शक्तियाँ, जिनके अन्तर्गत न्यायालय के नियम बनाने का तथा उस न्यायालय की बैठकों की शक्तियाँ वैसी ही रहेंगी, जैसी इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले थीं।।

2. प्रारम्भिक अधिकार क्षेत्र-कई मुकद्दमे सीधे उच्च न्यायालय में पेश किए जा सकते हैं। निम्नलिखित मामलों में उच्च न्यायालयों को आरम्भिक क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं

(1) संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन मूल अधिकारों से सम्बन्धित कोई भी मामला उच्चतम न्यायालय की तरह उच्च न्यायालय में भी लाया जा सकता है। मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए उच्च न्यायालय को कई तरह के लेख (Writs)
जारी करने का अधिकार है; जैसे बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख (Writ of Habeas Corpus),
परमादेश लेख (Writ of Mandamus)
प्रतिषेध लेख (Writ of Prohibition),
अधिकार पृच्छा लेख (Writ of Quo-warranto),
उत्प्रेषण लेख (Writ of Certiorari),

(2) यदि राज्य विधान-मण्डल ने कोई कानून संविधान के विरुद्ध बनाया है तो उसको उच्च न्यायालय अवैध घोषित कर सकता है। यद्यपि उसके फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है,

(3) तलाक, विवाह, वसीयत, न्यायालय का अपमान, . कम्पनी कानून आदि के मुकद्दमे भी उच्च न्यायालय द्वारा सीधे सुने जाते हैं,

(4) यदि उच्च न्यायालय ठीक समझे तो अधीनस्थ न्यायालयों से कोई मुकद्दमा सीधे अपने पास मंगवाकर उसकी सुनवाई कर सकता है,

(5) चुनाव सम्बन्धी मामले भी उच्च न्यायालय में सीधे लाए जाते हैं,

(6) मुम्बई, चेन्नई तथा कोलकाता के उच्च न्यायालयों को कुछ अधिक प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं।

3. अपीलीय अधिकार क्षेत्र-उच्च न्यायालयों को निम्न न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध दीवानी तथा फौजदारी अभियोगों में अपीलें सुनने का अधिकार भी प्राप्त है-

(1) जिस मुकद्दमे में पाँच हजार या उससे अधिक राशि अथवा इतने ही मूल्य की सम्पत्ति का प्रश्न हो तो ऐसे दीवानी मुकद्दमों की अपील उच्च न्यायालय द्वारा सुनी जा सकती है,

(2) फौजदारी मामलों में सत्र न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील उच्च न्यायालय में की जा सकती है, यदि न्यायालय ने अपराधी को 4 वर्ष अथवा इससे अधिक कैद की सजा दी है,

(3) यदि अभियुक्त को मृत्यु-दण्ड दिया गया है,

(4) दीवानी क्षेत्र में पेटेन्ट (Patent) तथा डिज़ाइन (Design) उत्तराधिकार, भूमि-प्राप्ति, दिवालियापन और संरक्षकता आदि मामलों में उच्च न्यायालय अपील सुन सकता है,

(5) राजस्व सम्बन्धी मामलों में निम्न न्यायालयों और आय कर से सम्बन्धित मामलों में आय-कर अधिकारियों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें सुनी जा सकती हैं।

4. प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र-देश के उच्च न्यायालयों को अपने-अपने राज्य में अधीनस्थ सभी न्यायालयों एवं न्यायाधिकरणों . पर निरीक्षण (Superintendence) का अधिकार है। 42वें संशोधन ने उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से अधिकरणों को निकाल , दिया था, किन्तु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम ने अनुच्छेद 227 में संशोधन करके न्यायाधिकरणों को पुनः उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में दे दिया। उच्च न्यायालय अपने क्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों पर अपना पूर्ण नियन्त्रण रखता है। यह नियन्त्रण इस प्रकार से स्थापित किया जा सकता है-

  • कार्रवाई का विवरण माँग सकता है,
  • अधीनस्थ न्यायालयों में कर्मचारियों की नियुक्ति, वेतन, भत्ते, अवकाश की शर्ते आदि निश्चित करता है,
  • निम्न न्यायालय उच्च न्यायालय की इच्छानुसार तथा आदेश-निर्देश के अनुसार कार्य करते हैं,
  • उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों के कागजात माँगकर जाँच-पड़ताल कर सकता है,
  • उनके रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था कर सकता है,
  • किसी एक न्यायालय में किसी एक मुकद्दमे को हटाकर दूसरे अधीनस्थ न्यायालयों में विचार के लिए भेज सकता है।

5. न्यायिक पुनरावलोकन-उच्चतम न्यायालय की तरह राज्य के उच्च न्यायालय को न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार प्राप्त है। विधानसभा द्वारा पारित कानून यदि संविधान के निश्चित नियमों के विरुद्ध हो तो उच्च न्यायालय के सामने मुकद्दमा आने पर अपनी इस शक्ति का प्रयोग करते हुए वह उस कानून को गैर-कानूनी घोषित कर सकता है। उच्च न्यायालय के ऐसे निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है।

6. प्रमाण-पत्र देने का अधिकार उच्च न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में तभी अपील की जा सकती है. यदि उच्च न्यायालय ऐसा प्रमाण-पत्र जारी करे। विशेष परिस्थिति में उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय के प्रमाण-पत्र के बिना भी अपील की अनुमति दे सकता है।

7. अभियोगों को स्थानान्तरित करना यदि उच्च न्यायालय को यह विश्वास हो कि किसी निम्न न्यायालय में चल रहे अभियोग में कानून की व्याख्या की आवश्यकता है अथवा अभियुक्त को किसी कारण पूरा न्याय मिलने की आशा नहीं है तो उच्च न्यायालय मुकद्दमा अपने पास मँगवा सकता है अथवा किसी दूसरे न्यायालय में भेज सकता है अथवा कानून की व्याख्या कर सकता है। ऐसी स्थिति में निम्न न्यायालय को उच्च न्यायालय की व्याख्या को ध्यान में रखकर निर्णय करना पड़ता है।

8. अभिलेख न्यायालय राज्य का उच्च न्यायालय अभिलेख का न्यायालय भी होता है। उसके सभी निर्णयों को रिकॉर्ड के रूप में रखा जाता है तथा उन्हें प्रकाशित किया जाता है। इसमें निर्णय दृष्टान्त के रूप में विभिन्न आदेश में पेश किए जाते हैं। उच्च न्यायालय अपनी अवमानना करने (Contempt of Court) के लिए भी किसी व्यक्ति को दण्ड दे सकता है। उच्च न्यायालय की स्थिति-उच्च न्यायालय (High Court) न्यायिक मामलों में राज्य का उच्चतम न्यायालय है।

उसे प्रारम्भिक तथा अपीलीय क्षेत्राधिकार के साथ-साथ मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में कई प्रकार के लेख (Writ) जारी करने का अधिकार प्राप्त है, जिससे वह कार्यपालिका को नियन्त्रित करता है। उच्च न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के अधीन संसद व राज्य विधानसभा द्वारा बनाए गए कानूनों को अवैध घोषित कर सकता है। राज्य के अन्य अधीनस्थ न्यायालय उसके नियन्त्रण में होते हैं, लेकिन उच्च न्यायालय न्यायिक शक्ति का शिखर नहीं है। उसके निर्णयों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 6 न्यायपालिका

प्रश्न 6.
भारतीय न्यायपालिका की स्वतन्त्रता पर एक निबन्ध लिखें।
अथवा
उच्चतम न्यायालय की स्वतन्त्रता पर एक लेख लिखें।
उत्तर:
लोकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था के लिए स्वतन्त्र व निष्पक्ष न्यायपालिका का होना अनिवार्य है, ताकि कानून के शासन को बनाए रख सके तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर सके। संघात्मक व्यवस्था वाले राज्यों में स्वतन्त्र भूमिका और भी बढ़ जाती है। न्यायपालिका ही इस बात की गारन्टी करती है कि संघीय सरकार व राज्य सरकारें अपने-अपने क्षेत्राधिकारों में ही रहें। संविधान की सर्वोच्चता को स्वतन्त्र न्यायपालिका ही बनाए रख सकती है।

अर्थ-न्यायपालिका की स्वतन्त्रता से अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से है जिसमें कार्यपालिका अथवा विधायिका न्यायाधीशों के निर्णयों को प्रभावित अथवा दुष्प्रभावित न कर सके। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता से अभिप्राय है कि न्यायाधीश अपने निर्णय निर्भीक होकर निष्पक्ष रूप से देने की स्थिति में हों, उन्हें कोई प्रभावित कर सकने की स्थिति में न हो। भारतीय संविधान-निर्माताओं ने न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित प्रावधान संविधान में किए हैं

1. न्यायाधीशों की नियुक्ति-संविधान के अनुच्छेद 124 के अधीन राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालय के उन न्यायाधीशों की सलाह करके (जिन्हें वह सलाह लेने के उपयुक्त समझता है) करता है, और उच्चतम न्यायालय में अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश की सलाह से करता है। इस प्रकार न्यायाधीशों की नियुक्ति में जनता अथवा विधायिका की कोई भूमिका नहीं है। यद्यपि संसदात्मक व्यवस्था होने के कारण सलाह अवश्य करता है, लेकिन वह न्यायाधीशों की सलाह की आमतौर पर उपेक्षा नहीं कर पाता है। इस प्रकार न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका अधिक प्रभावी है, न कि कार्यपालिका अथवा विधायिका।

2. न्यायाधीशों की योग्यता संविधान में ही न्यायाधीशों की योग्यता निर्धारित की गई है, ताकि केवल अनुभवी विधि-विशेषज्ञ ही उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जा सकें और सरकार मनमाने राजनीतिक आधार पर किसी को भी न्यायाधीश नियुक्ति न कर सके। एक उच्च कोटि के विद्वान् से सदैव यह आशा की जाती है कि वह अपना कार्य स्वतन्त्रता-पूर्वक व निर्भीक होकर करता है, उसे कोई सरकार प्रभावित नहीं कर सकती।

3. लम्बी अवधि-न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के लिए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की कार्य-अवधि लम्बी रखी गई है, जबकि सामान्यतया सरकारी कर्मचारी 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद पर बने रहते हैं।

4. पद की सुरक्षा न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के लिए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को पद की सुरक्षा प्रदान की गई है। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीशों को महाभियोग जैसी जटिल पद्धति से ही हटाया जा सकता है। इसके लिए न्यायाधीश के विरुद्ध कदाचार (बरा व्यवहार) अथवा अयोग्यता का आरोप स्वतन्त्र व निष्पक्ष जाँच-पड़ताल द्वारा सिद्ध करना होता है

और उसके बाद संसद के दोनों सदन अपने-अपने सदन के कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित व मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव का समर्थन करते हैं तो न्यायाधीश को अपने पद से हटना होगा। महाभियोग की इस प्रक्रिया की जटिलता का ज्ञान इसी तथ्य से हो जाता है कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश श्री रामास्वामी के विरुद्ध महाभियोग सम्बन्धी आरोप-पत्र 1990 में 101 सांसदों ने दिया था, जिस पर अभी तक विवाद चल रहा । है और महाभियोग सम्बन्धी प्रक्रिया शुरु भी नहीं हो पाई है।

5. वेतन व भत्तों की सुरक्षा संविधान में ही न्यायाधीशों के वेतन व भत्तों की सुरक्षा की गई है। संसद न्यायाधीशों के . कार्यकाल के दौरान उनके वेतन व भत्तों में कटौती नहीं कर सकती, हाँ, बढ़ा अवश्य सकती है। भत्ते भारत की संचित निधि से दिए जाते हैं जिस पर संसद की स्वीकृति मात्र औपचारिकता होती है। न्यायाधीशों के वेतन व भत्तों में केवल वित्तीय संकट के दौरान ही कटौती की जा सकती है।

6. कर्मचारी वर्ग पर नियन्त्रण उच्चतम न्यायालय में राष्ट्रपति केवल न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। उच्चतम न्यायालय के अन्य सभी कर्मचारियों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश करता है और उन पर उच्चतम न्यायालय का नियन्त्रण होता है, न कि सरकार का।

7. नियम बनाना-उच्चतम न्यायालय अपनी कार्य प्रणाली के लिए संसदीय कानूनों के अनुसार नियम स्वयं बनाता है। नियमों के बनाने में संसद की कोई भूमिका नहीं होती, लेकिन ये नियम उच्चतम न्यायालय के साथ-साथ भारत के अन्य सभी न्यायालयों में मान्य होते हैं।

8. अवकाश-प्राप्ति के बाद वकालत की मनाही-न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को बनाए रखने के लिए संविधान में ही व्यवस्था की गई है कि उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश अवकाश ग्रहण करने के बाद देश के किसी भी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकता, लेकिन वह किसी आयोग का सदस्य अथवा अध्यक्ष बन सकता है।

9. उन्मुक्तियाँ-न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के लिए न्यायाधीशों को कुछ उन्मुक्तियाँ व विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जैसे न्यायाधीशों की आलोचना उनके द्वारा किए गए निर्णयों के कारण नहीं की जा सकती। संसद न्यायाधीशों के ऐसे कार्यों . पर, जिसे उन्होंने अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए किया है, विचार-विमर्श नहीं कर सकती। धान-निर्माताओं ने व्यापक व विस्तृत रूप से न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने की कोशिश की है, लेकिन व्यवहार में ऐसे अनेक तथ्य सामने आए हैं जिनसे न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को खतरा उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न 7.
न्यायिक क्रियाशीलता से आपका क्या तात्पर्य है? इसके मुख्य साधनों की व्याख्या करो।
उत्तर:
सरकार के तीन महत्त्वपूर्ण अंग-विधानपालिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका हैं। विधानपालिका कानून बनाने, कार्यपालिका कानूनों को लागू करने तथा न्यायपालिका निर्णय देने का कार्य करती है। मान्टेस्क्यू ने शक्ति विभाजन के सिद्धान्त में यह बताया है कि इन तीनों अंगों को अपने उप-क्षेत्र में काम करना चाहिए तथा एक-दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

भारत में इसी प्रकार की व्यवस्था है कि सरकार के तीनों अंग अपने-अपने क्षेत्रों में काम करते हैं और एक-दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। परन्तु पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका ने कार्यपालिका व विधानपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया है और इसी हस्तक्षेप को विभिन्न कानूनवेताओं, राजनीतिकों और संवैधानिक विशेषज्ञों ने न्यायिक क्रियाशीलता का नाम दिया है।

न्यायिक क्रियाशीलता का अर्थ (Meaning of Judicial Activism) न्यायिक क्रियाशीलता भारत में एक नवीन अवधारणा है। इसलिए इसकी ठीक ढंग से व्याख्या करना कठिन है। न्यायपालिका का मुख्य कार्य निर्णय देना है। जब निर्णय संविधान अथवा कानून के अनुसार दिए जाते हैं तो इसे न्यायिक क्रियाशीलता का नाम नहीं दिया जाता। परन्तु जब न्यायपालिका अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर विधानपालिका और कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करती है तब इसे न्यायिक क्रियाशीलता कहा जाता है। इस प्रकार न्यायपालिका द्वारा नीतियों और कार्यक्रमों को निश्चित कर और उन्हें लागू करने के आदेश देना। योजनाओं के संचालन को अपने हाथ में लेना, स्वाधीन संस्थाओं की कार्य-प्रणाली में हस्तक्षेप करना।

कानून का निर्माण करने के लिए विधानपालिका को निर्देश देना आदि, न्यायिक क्रियाशीलता के प्रतीक माने जाते हैं। साधारण शब्दों में, न्यायपालिका की किसी भी कार्रवाई को न्यायिक क्रियाशीलता की संज्ञा दी जा सकती है। जिसके द्वारा न्यायपालिका की प्राथमिकता स्थापित होती है। अतः न्यायिक क्रियाशीलता का अर्थ न्यायपालिका द्वारा अपने क्षेत्र में क्रियाशील भूमिका निभाना न होकर क्षेत्राधिकार से बाहर क्रियाशील भूमिका निभाने व कहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश पी०बी० सावंत (P.B. Swant) के शब्दों में, “कानून की व्याख्या करने और इसे लागू करते समय सवैधानिक सीमा की अवहेलना करना, शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त की अवहेलना करते हुए विधानपालिका के कार्यों को अपने हाथ में लेने को न्यायिक क्रियाशीलता कहा जाता है।”

न्यायिक क्रियाशीलता की आवश्यकता (Need of Judicial Activism)-प्रशासन एक इकाई है सरकार के तीनों अंग अलग-अलग होते हुए मिलकर कार्य करते हैं तभी एक योग्य प्रशासन सम्भव होता है, परन्तु जब सरकार अपने दायित्वों को निभाने में ढीलापन अथवा अनियमितता दिखाता है, तब कानून का शासन स्थापित करना कठिन हो जाता है। हर तरफ भ्रष्टाचार फैल जाता है। नौकरशाही तथा राजनीतिज्ञों द्वारा अपनी विशिष्ट स्थिति का गलत प्रयोग किया जाता है और उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं अर्थात् एक तरह का जंगल राज होता है।

ऐसी स्थिति में न्यायपालिका को क्रियाशील होना ही पड़ता है। न्यायमूर्ति जे०एस० वर्मा के शब्दों में, “न्यायिक क्रियाशीलता की आवश्यकता केवल तब ही होती है जब अन्य अक्रियाशील होते हैं। एक स्थान पर जे०एस० वर्मा ने फिर कहा है, “न्यायिक क्रियाशीलता अक्रियाशीलता को क्रियाशील बनाती है।” अतः दूसरों की अक्रियाशीलता ही न्यायिक क्रियाशीलता को जन्म देती है। न्यायिक क्रियाशीलता के साधन (Means (Devices) of Judicial Activism)-न्यायिक क्रियाशीलता के साधन निम्नलिखित हैं

1. न्यायिक पुनर्निरीक्षण-न्यायिक पुनर्निरीक्षण शक्ति न्यायिक क्रियाशीलता का प्रथम व महत्त्वपूर्ण साधन है। भारतीय संविधान द्वारा न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति भारतीय सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के पास है। न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति के अधीन सर्वोच्च न्यायालयों व उच्च न्यायालयों को उन कानूनों व कार्यपालिका के आदेशों को रद्द करने का अधिकार है जो संविधान की इच्छा के विरुद्ध है। न्यायपालिका न्यायिक पुनर्निरीक्षण से ऐसे सिद्धान्त निश्चित करती है जो सरकार के अन्य अंगों पर बाध्यकारी होते हैं। इस तरह न्यायिक पुनर्निरीक्षण न्यायिक क्रियाशीलता का एक साधन है; जैसे 1973 का केशवानन्द भारती का मुकद्दमा।

2. मौलिक अधिकारों की व्याख्या-न्यायिक क्रियाशीलता का द्वितीय साधन मौलिक अधिकार की व्याख्या है। भारतीय संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं तथा धारा 31 में संवैधानिक उपचारों का अधिकार प्राप्त है। इस अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति मौलिक अधिकारों की अवहेलना होने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है और अपने-अपने अधिकारों की सुरक्षा कर सकता है।

न्यायपालिका अधिकारों की रक्षा करते समय कुछ ऐसे निर्देश जारी करती है जो न्यायिक क्रियाशीलता का उदाहरण होते हैं; जैसे 4 फरवरी, 1993 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि 14 वर्ष की आयु तक प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक भारतीय बालक का मौलिक अधिकार है। इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त करना नागरिक का मौलिक अधिकार है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय संविधान धारा 21 की नई व्याख्या न्यायिक क्रियाशीलता का स्पष्ट प्रमाण है।

3. कानून निर्माण साधारणतः कानून निर्माण न्यायपालिका का कार्य नहीं है, परन्तु अनेक बार न्यायपालिका कानून निर्माण भी करती है जो न्यायिक क्रियाशीलता का स्पष्ट उदाहरण है; जैसे कई बार न्यायपालिका के समक्ष ऐसा विचित्र झगड़ा पेश होता है जिस पर विधानपालिका का कोई कानून नहीं तो न्यायाधीश अपनी सूझ-बूझ, अनुभव तथा योग्यता के आधार पर जो निर्णय कर देते हैं वह कानून का एक अंग बन जाता है। न्यायाधीशों द्वारा इस प्रकार दिए गए निर्णयों को न्यायाधीशों द्वारा निर्मित कानून (Judge Maker) या केस लॉ (Case Law) कहा जाता है ये निर्णय न्यायिक प्रमाण (Judicial Precedent) बन जाते हैं और अन्य न्यायालयों पर भी बाध्य होते हैं। ऐसे निर्णय न्यायपालिका की क्रियाशीलता के उदाहरण है।

4. संविधान की व्याख्या न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक कहा जाता है। लिखित संविधान में संविधान की अनेक धाराओं से सम्बन्धित अंतिम व्याख्या न्यायपालिका का दायित्व होता है। संविधान की व्याख्या करते समय सर्वोच्च न्यायालय नवीन कानून सिद्धान्त, नियम व विधियाँ आदि निर्धारित करती हैजैसे 6 अक्तूबर, 1998 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय किया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका को कार्यपालिका की तुलना में प्राथमिकता दी जाएगी। अतः संविधान की व्याख्या न्यायिक क्रियाशीलता का एक अन्य साधन है।

5. सार्वजनिक हित के लिए मुकद्दमेबाजी-सार्वजनिक हित के लिए मुकद्दमेबाजी न्यायिक क्रियाशीलता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। साधारणतः कानून के अन्तर्गत के केवल प्रभावित व्यक्ति ही न्यायालय में मुकद्दमा कर सकते हैं। दूसरे किसी व्यक्ति को मुकद्दमा दायर करने का अधिकार नहीं है, परन्तु सार्वजनिक हित के मुकद्दमेबाजी में कोई व्यक्ति सार्वजनिक विषय के सम्बन्ध में न्यायालय में मुकद्दमा दायर कर सकता है तथा उस मुकद्दमे से उस व्यक्ति का सम्बन्धित होना आवश्यक नहीं है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39 (क) वह स्रोत है जो सार्वजनिक हित के विवादों की अवधारणा को पर्याप्त सीमा तक मान्यता प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक हित के न्याय के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। यदि कोई व्यक्ति पोस्ट कार्ड पर भी आवेदन-पत्र लिखकर या अन्याय की शिकायत सर्वोच्च न्यायालय में करता है तो शिकायत दर्ज हो जाती है; जैसे कमजोर वर्ग, मज़दूरों, स्त्रियों व बच्चों की शिकायतों को विशेष महत्त्व दिया जाता है।

निष्कर्ष-भारत में न्यायिक क्रियाशीलता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कुछ इसके पक्ष में और अन्य इसके विपक्ष में हैं। भारत में न्यायिक क्रियाशीलता का महत्त्वपूर्ण साधन सार्वजनिक हित के सम्बन्ध में मुकद्दमेबाजी है। इसमें न्यायालय कार्यपालिका सरकार को या संस्थाओं को कुछ ऐसे आदेश या निर्देश देती है जो उन्हें मानने पड़ते हैं न मानने पर न्यायपालिका की अवहेलना होने का डर है। न्यायिक क्रियाशीलता में असंख्य पीड़ित बालकों, स्त्रियों व श्रमिकों को लाभ हुआ है। न्यायिक क्रियाशीलता से समाज की कई बुराइयों का अन्त भी हुआ है; जैसे बन्धुआ मजदूरी का अन्त आदि।

प्रश्न 8.
न्यायपालिका की सक्रियता के कारणों या तत्त्वों का वर्णन करो।
उत्तर:
न्यायिक क्रियाशीलता के तत्त्व या कारण (Causes or Elements of Judicial Activism)-संवैधानिक रूप में न्यायिक क्रियाशीलता का केवल एक ही तत्त्व-न्यायिक पुनर्निरीक्षण है, परन्तु इसके अतिरिक्त कुछ अन्य तत्त्व भी हैं जिन्होंने न्यायिक क्रियाशीलता को बढ़ावा दिया है। ऐसे तत्त्वों का विवरण निम्नलिखित है

1. यदि प्रत्येक व्यक्ति या विभाग अपने दायित्वों को निभाता रहे तो दूसरे के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं। किसी दूसरों के मामलों में हस्तक्षेप की आवश्यकता तब अवश्य हो जाती है जब कोई अपने दायित्वों को नहीं निभाता। ऐसा न्यायपालिका की स्थिति में हुआ है। न्यायपालिका ने कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप उसकी कर्त्तव्य विमुखता और पथ भ्रमिता के कारण किया। कार्यपालिका न केवल केन्द्रीय स्तर पर, बल्कि राज्य स्तर पर भी अपने कर्तव्यों को निभाने में असफल रही है। कार्यपालिका के इस कर्त्तव्य न निभाने की प्रवृत्ति ने लोगों को हताश कर दिया है।

अतः न्यायक्रियाशीलता का प्रारम्भ हुआ। कार्यपालिका की अक्रियाशीलता के कारण न्यायपालिका की क्रियाशीलता के लिए यह उदाहरण दिए जा सकते हैं। जब सन् 1994 में उत्तर प्रदेश (उत्तराखण्ड) में प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को मनवाने के लिए आन्दोलन कर रहे थे तो आन्दोलन के दौरान प्रशासन द्वारा उन पर अत्याचार किए गए। यहाँ तक कि महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ भी घटीं। परन्तु राज्य व केन्द्रीय सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की, तब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस सम्बन्ध में जाँच के आदेश दिए। इसी प्रकार बिहार में चारा घोटाला के मामले में भी राज्य सरकार को वहाँ के उच्च न्यायालय ने ही जाँच के आदेश दिए। अतः स्पष्ट है कि कार्यपालिका की अनदेखी अक्रियाशीलता ही न्यायिक क्रियाशीलता का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

2. जनहित मुकद्दमे-जनहित के मुकद्दमे भी न्यायिक क्रियाशीलता का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। साधारणतः व्यक्ति अपने हित की रक्षा हेतु ही मुकद्दमा कर सकता है, किसी अन्य व्यक्ति की रक्षा के लिए नहीं। इस प्रकार कोई व्यक्ति सार्वजनिक हित की प्राप्ति के लिए कोई मुकद्दमा नहीं लड़ सकता। परन्तु हाल ही में जनहित के मुकद्दमों की धारणा सामने आई है।

जिसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति या वर्ग किसी कारण से हितों या अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकता तो किसी भी व्यक्ति या संस्था को उनके अधिकारों या हितों की रक्षा के लिए मुकद्दमा डालने का अधिकार है। जनहित की पद्धति का आरम्भ न्यायमूर्ति श्री० पी०एन० भगवती ने किया इस पद्धति ने गरीब, अनपढ़ और अनजान लोगों के लिए न्याय का रास्ता खोला है। अतः स्पष्ट है कि जनहित के मुकद्दमों ने न्यायिक क्रियाशीलता को बढ़ावा दिया है। ताजमहल को प्रदूषण से बचाना, शहरी आवास आबंटन घोटाला, बिहार (भागलपुर) क्षेत्र के मामले, श्रमिकों के शोषण के मामले आदि जनहित मुकद्दमों के कतिपय उदाहरण हैं।

3. स्वतन्त्र न्यायपालिका-न्यायपालिका की स्वतन्त्रता भी न्यायिक क्रियाशीलता का महत्त्वपूर्ण तत्त्व या कारण है। स्वतन्त्र न्यायपालिका का अर्थ है कि न्यायपालिका पर कोई आन्तरिक व बाह्य दबाव नहीं होता। न्यायपालिका निर्भीकता से कार्य करती है। इससे न्यायपालिका की कार्यशीलता बढ़ती है। इस प्रकार न्यायपालिका स्वतन्त्र रूप से किसी भी बड़े-से-बड़े पदाधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई कर सकती है। अतः स्पष्ट है कि कर्त्तव्यपरायण, निर्भीक और प्रखर न्यायाधीश ही न्यायपालिका को सक्रियता प्रदान कर सकते हैं।

4. जनता का कार्यपालिका के प्रति घटता विश्वास जनता के कार्यपालिका के प्रति घटते विश्वास ने भी न्यायिक क्रियाशीलता को जन्म ही नहीं दिया, बल्कि उसको बढ़ावा भी दिया है। पिछले दशक में न्यायिक अस्थिरता ने कार्यपालिका के प्रति जनता के विश्वास को घटाया है और वह निरन्तर घटता ही जा रहा है। इसके विपरीत न्यायपालिका ने कार्यपालिका को उसकी कर्तव्य विमुखता उदासीनता के लिए चेतावनी दी है जिससे आम जनता में न्यायपालिका के प्रति विश्वास बढ़ा है और आम जनता विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक सुधारों के लिए न्यायपालिका से आशा लगाए बैठी है। यही नहीं न्यायपालिका ने जनता के दुःख-दर्द को पहचाना है और उसे दूर करने के लिए अपने दायित्व को निभाया है। अतः इससे न्यायिक क्रियाशीलता का बढ़ना स्वाभावि न्यायिक पनर्निरीक्षण की शक्ति-न्यायिक क्रियाशीलता का एक और महत्त्वपूर्ण कारण है-न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति।

5. भारतीय संविधान के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय को न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति प्रदान की गई है। इस शक्ति के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय संविधान के विरुद्ध बने कानूनों को रद्द कर सकती है। इससे न्यायालय को अपनी शक्तियों का प्रयोग करने का अवसर मिलता है। इसके अतिरिक्त भारत में संघीय व्यवस्था को अपनाया गया है। इस व्यवस्था में भी न्यायपालिका को अपनी शक्तियों का प्रयोग करने का सही अवसर प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक मामलों में न्यायपालिका ने संविधान की व संघात्मक व्यवस्था की रक्षा के लिए अपने अधिकारों का प्रयोग करके न्यायिक क्रियाशीलता का प्रदर्शन किया है।

6. राजनीतिक अस्थिरता राजनीतिक अस्थिरता भी न्यायिक क्रियाशीलता या न्यायिक सक्रियता का महत्त्वपूर्ण कारण है। कभी एक समान या संसद में एक दल को बहुमत प्राप्त हो जाता था और सरकार स्थायी व सुचारू रूप से कार्य करती थी, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से संसद में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ है। परिणामस्वरूप साँझा सरकारें बनी हैं। साँझा सरकार में निश्चित रूप से सरकार की गुणात्मक शक्ति को धक्का लगा है। संसद की क्रियात्मक शक्तियों का ह्रास हुआ है। अतः संसद की शक्ति कमजोर होने से न्यायपालिका की शक्तियों को बढ़ावा मिला है। जिसे न्यायिक क्रियाशीलता ही कहा जा सकता है।

7. राजनीतिक नेताओं की छलिया राजनीति राजनीतिक नेताओं की छलिया राजनीति ने भी न्यायिक सक्रियता को जन्म दिया है। राजनीतिक नेताओं की कपटी गतिविधियों के कारण न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है। कई बार तो न्यायपालिका को न चाहते हुए भी क्रियाशील होना पड़ता है। आजकल राजनीतिक नेता जिन मामलों को स्वयं सुलझा नहीं सकते हैं और जिन मामलों को सुलझाने में बुराई या भलाई दोनों मिल सकती है तो

इसलिए वे बुराई मिलने के भय से उस मामले को सुलझाने का दायित्व न्यायपालिका पर छोड़ देते हैं। जिससे राजनीतिक नेता साफ बच जाते हैं। अतः स्पष्ट है कि अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए न्यायपालिका को सक्रिय होने पर विवश कर देते हैं। उपर्यक्त विवेचन से यह सिद्ध होता है कि न्यायिक क्रियाशीलता के कई कारण हैं और इन कारणों या तत्त्वों ने न्यायपालिका को सक्रिय होने में अहम भूमिका निभाई है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इस प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं, जिनसे न्यायिक क्रियाशीलता के बढ़ने की अधिक सम्भावना है।

प्रश्न 9.
न्यायिक सक्रियता से आप क्या समझते हैं? इसके पक्ष व विपक्ष में तर्क दीजिए। अथवा न्यायिक क्रियाशीलता के पक्ष व विपक्ष में तर्क दीजिए। अथवा न्यायिक क्रियाशीलता की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सामान्यतः संसदीय जनतन्त्र में संसद को सर्वोच्च स्थान प्राप्त होता है किन्तु भारत में यही बात संविधान के ऊपर लागू होती है। यहाँ संविधान को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है और न्यायपालिका अपने न्यायिक पुनरावलोकन के अधिकार के बल पर संसद से उच्च सिद्ध हो जाती है। हालाँकि भारतीय संविधान में कहीं भी न्यायिक पुनरावलोकन का अलग से कोई उल्लेख नहीं किया गया है।

किन्तु वहीं पर इस बात का उल्लेख अवश्य मिलता है कि यदि कोई भी क्रिया-कलाप मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तो उसे संवैधानिक घोषित किया जा सकता है और इस घोषणा को करने का अधिकार न्यायिक पुनरावलोकन के तहत न्यायपालिका को प्राप्त है।

आरम्भ में न्यायपालिका का यह अधिकार सिर्फ इस बात की समीक्षा तक ही सीमित था कि कार्यपालिका अथवा विधायिका द्वारा लिए गए किसी निर्णय अथवा उठाए गए किसी कदम से कहीं मौलिक अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा है किन्तु धीरे-धीरे न्यायपालिका ने अपने इस अधिकार का विस्तार करना शुरु कर दिया और सामाजिक मुद्दों से जुड़े सवालों, पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं तथा जनताँत्रिक संगठनों के क्रिया-कलापों की भी समीक्षा करनी प्रारम्भ कर दी। न्यायपालिका की इसी सक्रियता को न्यायिक सक्रियतावाद कहा जाता है।

न्यायिक क्रियाशीलता के विपक्ष में तर्क (Arguments in Against of Judicial Activism)-न्यायिक क्रियाशीलता की आलोचना निम्नलिखित आधारों पर की जा सकती है

1. यह शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है-शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त के अनुसार सरकार के तीनों अंग अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से कार्य करते हैं। विधानपालिका कानून बनाने, कार्यपालिका कानूनों को लागू करने तथा न्यायपालिका निर्णय देने का कार्य करती है। किसी भी अंग को दूसरे अंग के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होता तथा हस्तक्षेप असवैध माना जाता है।

संविधान में न्यायपालिका को एक सीमा तक विधानपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार प्राप्त है, यदि विधानपालिका संविधान की इच्छा के विरुद्ध कानून बनाती है, तब न्यायपालिका को ऐसे कानूनों को अवैध घोषित करने का अधिकार प्राप्त है। परन्तु न्यायिक क्रियाशीलता में न्यायपालिका अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर विधानपालिका और कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप करती है। परिणामस्वरूप सरकार के सुचारू रूप से चलने में बाधा उत्पन्न होती है, अतः न्यायिक क्रियाशीलता शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है।

2. उत्तरदायित्व के सिद्धान्त के विरुद्ध न्यायिक क्रियाशीलता की आलोचना उत्तरदायित्व की अवधारणा के विरुद्ध है। उत्तरदायित्व की अवधारणा का अर्थ है कि किसी का किसी के प्रति उत्तरदायी होना। कार्यपालिका और विधानपालिका दोनों लोगों के प्रति उत्तरदायी है। लोग विधानपालिका और कार्यपालिका दोनों का समय-समय पर मूल्याँकन करते रहते हैं; जैसे मन्त्रिमण्डल लोगों द्वारा निर्वाचित संसद के प्रति अपने क्रियाकलापों के लिए उत्तरदायी है।

मन्त्रिमण्डल तभी तक सत्ता में रह सकता है जब तक उसे संसद का विश्वास प्राप्त होता है। इसी प्रकार विधानपालिका अर्थात् संसद के सदस्य भी जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। जनता ऐसे सांसदों का दुबारा निर्वाचित नहीं करती जो उनकी कसौटी पर खरे नहीं उतरते अर्थात् मन्त्रियों और सांसदों के लिए दोबारा चुनाव जीतना कठिन हो जाता है, जो लोगों की आशाओं पर पूर्ण नहीं उतरते हैं, परन्तु न्यायपालिका विधानपालिका या कार्यपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं है।

यहाँ तक न्यायाधीश भी जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं है। न्यायपालिका न्यायिक क्रियाशीलता में किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं। इस प्रकार अनुत्तरदायित्व की भावना से न्यायपालिका अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य कर लेती है वैसे भी एक अनुत्तरदायी संस्था उत्तरदायी संस्थाओं को आदेश दे, यह अनुचित है।

3. संसदीय व्यवस्था के विरुद्ध न्यायिक क्रियाशीलता को संसदीय व्यवस्था के विरुद्ध मानकर उसकी आलोचना की जाती है। संसदीय व्यवस्था में कानून बनाने का कार्य विधानपालिका करती है। न्यायपालिका को संविधान द्वारा केवल यह अधिकार दिया गया है कि विधानपालिका द्वारा संविधान के विरुद्ध बनाए गए कानूनों को अवैध घोषित करें।

न्यायपालिका को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त नहीं है लेकिन न्यायिक क्रियाशीलता के अन्तर्गत न्यायपालिका ने तो संसद को कानून बनाने के आदेश देने आरम्भ कर दिए हैं। न्यायपालिका विधानपालिका का तीसरा सदन बनने का प्रयत्न कर रही है जो संसदीय व्यवस्था की आत्मा के विरुद्ध है अर्थात न्यायिक क्रियाशीलता ससंदीय लोकतन्त्र की कार्य-प्रणाली पर बुरा प्रभाव डालेगी।

4. न्यायपालिका के कार्यों पर कुप्रभाव न्यायिक क्रियाशीलता की इस आधार पर भी आलोचना की गई है कि यह न्यायपालिका की दैनिक कार्य-प्रणाली पर बुरा प्रभाव डालती है। न्यायिक क्रियाशीलता सार्वजनिक हित के मुकद्दमेबाजी को प्रोत्साहन देती है। न्यायिक क्रियाशीलता से न्यायपालिका ने सार्वजनिक हित के मुकद्दमों का अम्बार लग जाएगा, न्यायालय या उच्च न्यायालय में सार्वजनिक हित के मुकद्दमे को ले जाना आसान हो गया है।

इस प्रकार यह उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के कार्यों में वृद्धि कर देगी, जबकि उच्च और सर्वोच्च न्यायालय पहले से ही अधिक काम के बोझ के नीचे दबे हुए हैं। आज की तिथि में भी लाखों मुकद्दमें न्यायालयों में पड़े हुए हैं जिनको समय के अभाव के कारण से निपटाया नहीं जा सका है। न्यायिक क्रियाशीलता न्यायपालिका के दैनिक कार्यों को भी और बढ़ा देगी जिससे न्यायपालिका की कार्य-प्रणाली पर बुरा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

5. प्रजातन्त्र के विरुद्ध-न्यायिक क्रियाशीलता को प्रजातन्त्र के विरुद्ध माना जाता है। प्रजातन्त्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और उन प्रतिनिधियों के द्वारा प्रशासन चलाया जाता है तथा ये निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। साथ ही प्रशासन एक कला है जिसे केवल प्रशासनिक कला में माहिर लोगों के द्वारा ही चलाया जा सकता है। माना न्यायाधीश द्धजीवी होते हैं परन्तु वे कानून के क्षेत्र में ही माहिर होते हैं। प्रशासन से उनका कुछ लेना-देना नहीं होता।

इसलिए यदि न्यायाधीश न्यायिक क्रियाशीलता के अन्तर्गत प्रशासन में हस्तक्षेप करते हैं तो यह उचित नहीं होगा और साथ में यह प्रजातन्त्र विरोधी भी होगा क्योंकि प्रशासन चलाना प्रशासकों का काम है न कि न्यायाधीशों का। हाँ यदि प्रशासन दोषपूर्ण है तो कानून द्वारा उसमें सुधार करवाने के लिए न्यायपालिका अवश्य ही सकारात्मक भूमिका निभा सकती है परन्तु न्यायिक क्रियाशीलता द्वारा शासन को अपने हाथों में लेना निश्चित रूप से प्रजातन्त्र के विरुद्ध है।

6. न्यायिक निरंकुशता को प्रोत्साहन-न्यायिक क्रियाशीलता की इस आधार पर भी आलोचना की जा सकती है कि यह न्यायिक निरंकुशता को प्रोत्साहित करती है। न्यायिक क्रियाशीलता से न्यायपालिका की निरंकुशता स्थापित होने का भय बना रहता है। न्यायिक क्रियाशीलता यहाँ तक तो सही है कि यह विधानपालिका और कार्यपालिका को अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए आगाह करती है।

परन्तु एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि यदि न्यायपालिका अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करती तो उसे कौन अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए कहेगा। न्यायपालिका के कार्यों को कौन असंवैधानिक घोषित करेगा अर्थात् न्यायपालिका पर कोई अंकुश नहीं है और उसके निरंकुश बनने की पूरी सम्भावना है। अतः न्यायपालिका की निरंकुशता भी अन्य निरंकुशताओं की तरह होगी, जिसमें लोगों के अधिकार छीन लिए जाएँगें परन्तु लोग न्यायपालिका की निरंकुशता को सहन नहीं करेंगे और उसके विरुद्ध विद्रोह कर बैठेंगे।

न्यायिक क्रियाशीलता के पक्ष में तर्क (Arguments in favour of Judicial Activism)-न्यायिक क्रियाशीलता के विपक्ष . में तर्क देखने के पश्चात् ऐसा लगता है कि न्यायिक क्रियाशीलता अनुचित है परन्तु न्यायिक क्रियाशीलता ने भारतीय राजनीति को कई प्रकार से प्रभावित किया है इसलिए न्यायिक क्रियाशीलता के पक्ष में कुछ तर्क दिए जा सकते हैं। इन तर्कों का विवरण निम्नलिखित है

1. सरकार को क्रियाशील बनाने के लिए आवश्यक न्यायिक क्रियाशीलता के पक्ष में प्रथम और महत्त्वपूर्ण तर्क यह दिया जाता है कि यह सरकार के विभिन्न अंगों को सक्रिय बनाने में सहायता करती है। साधारणतः यह देखा गया है कि सरकार के अंग विधानपालिका और कार्यपालिका अपने कर्तव्यों के प्रति विमुख हो जाते हैं।

भारत का अब तक का इतिहास इस बात का गवाह है कि कार्यपालिका, विधानपालिका व अन्य संस्थाओं ने अपने कर्तव्यों की ओर से मुँह मोड़ लिया था। वह अपने उत्तरदायित्व को ईमानदारी से नहीं निभा रहे थे। काफी समय तक न्यायपालिका ने इस क्षेत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं किया परन्तु कुछ वर्षों से न्यायपालिका ने इस अक्रियाशीलता के क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है और उसके हस्तक्षेप से बहुत से घोटाले सामने आए हैं। यही नहीं कुछ भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के विरुद्ध कार्रवाई भी की गई है। अतः स्पष्ट है कि न्यायिक क्रियाशीलता से सरकार की क्रियाशीलता को सक्रिय बनाया जा सकता है।

2. राजनीतिक प्रणाली की सही स्थिति जानने में सहायक-न्यायिक क्रियाशीलता के पक्ष में एक और तर्क यह दिया जाता है कि यह देश की राजनीतिक प्रणाली की क्रियाशीलता को जानने में या उसका सही रूप पहचानने में सहायता करती है। न्यायपालिका स्वतन्त्र होती है। न्यायपालिका पर कार्यपालिका या विधानपालिका का किसी भी प्रकार से नियन्त्रण नहीं होता।

इसलिए न्यायपालिका कार्यपालिका और विधानपालिका को निर्देश दे सकती है और उन्हें इसके निर्देशों का पालन करना पड़ता है। न्यायपालिका की क्रियाशीलता से अनेक घोटालों का पर्दाफाश हुआ है। भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के भ्रष्टाचार सामने आए हैं। न्यायपालिका की क्रियाशीलता के कारण ही लोगों को हैरान कर देने वाली बातों का पता लगा है। अतः स्पष्ट है कि न्यायिक क्रियाशीलता की वजह से ही सरकार की अक्रियाशीलता और राजनीतिक प्रणाली का सही रूप देखने को मिलता है।

3. संविधान की सुरक्षा-न्यायिक कार्यशीलता के पक्ष में एक अन्य महत्त्वपूर्ण तर्क यह है कि यह संविधान की सुरक्षा करती है। यह कानून के शासन को स्थापित करने में सहायता प्रदान करती है। संविधान में विधानपालिका को अधिकार-क्षेत्र का वर्णन होता है और उसके लिए यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने-अपने क्षेत्राधिकार में रहकर कार्य करें।

यदि कार्यपालिका या विधानपालिका अपने अधिकार-क्षेत्र की अवहेलना करती है तो न्यायपालिका उनके ऐसे कार्यों को अवैध घोषित करके न्यायिक क्रियाशीलता का परिचय देती है। अतः स्पष्ट है कि कार्यपालिका और विधानपालिका द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन करने की स्थिति में न्यायपालिका निर्देश दे सकती है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि कानून के शासन व संविधान की रक्षा के लिए न्यायिक क्रियाशीलता की आवश्यकता है।

4. कानूनों की व्याख्या में सहायक-न्यायिक क्रियाशीलता के पक्ष में एक और तर्क यह भी दिया जाता है कि इससे कानूनों की व्याख्या करने में सहायता मिलती है। यही नहीं कई बार क्रियाशील न्यायपालिका नए कानून बनाने और पुराने कानूनों की त्रुटियों को दूर करने में भी सहायता करती है। कानून साधारणतः विधानपालिका के द्वारा बनाए जाते हैं। विधानपालिका के सदस्य कानून-वेता नहीं होते, बल्कि साधारण व्यक्ति होते हैं जिनके द्वारा अस्पष्ट कानूनों का निर्माण किया जा सकता है।

कई बार कानूनों की भाषा इस प्रकार की होती है कि उसके एक में से अधिक अर्थ निकलते हैं। ऐसी स्थिति में क्रियाशील न्यायपालिका ही कानूनों की सही व्याख्या करती है। यह कानूनों की त्रुटियों को दूर करने में सहायता करती है। क्रियाशील न्यायपालिका नवीन धारणाओं और कानूनों का जन्म देती है। अतः न्यायिक क्रियाशील के अभाव में कानूनों की त्रुटियों को दूर नहीं किया जा सकता।

5. भावी कानूनों के निर्माण में सहायक निःसन्देह विधानपालिका मनुष्यों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कानूनों का निर्माण करती है, परन्तु समय बदलता रहता है। कई बार जीवन में विचित्र प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उन परिस्थितियों से निपटने के लिए कोई कानून नहीं होता। इसका अर्थ यह लगाना चाहिए जब तक कोई कानून नहीं बनेगा, तब तक कोई निर्णय होगा।

ऐसी स्थिति में न्यायाधीश अपनी बुद्धिमता के अनुसार निर्णय देता है। वे अपनी न्याय भावना का प्रयोग करके अमुक मुकद्दमे का फैसला कर देते हैं। अतः स्पष्ट है कि जिस क्षेत्र में किसी प्रकार कानून बना नहीं होता। वहाँ न्यायिक क्रियाशीलता की सहायता से मामले को निपटा दिया जाता है। इस प्रकार न्यायिक क्रियाशीलता निर्णय करने में सहायता प्रदान करती है।

6. मानवीय अधिकारों की रक्षा में सहायक-न्यायिक क्रियाशीलता ने मानवीय अधिकारों की रक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। न्यायिक क्रियाशीलता के अभाव में गैर-कानूनी नज़रबन्दी बच्चों के शोषण के मामले, स्त्रियों के शोषण के मामले, स्त्रियों के अनैतिक व्यापार के मामले आदि जनता के सामने नहीं आते। यद्यपि भारतीय संविधान में लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा का अधिकार प्राप्त है।

वे अधिकारों की अवहेलना की स्थिति में न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा सकते हैं, परन्तु कितने लोग ऐसा करते हैं? बहुत कम! क्योंकि उनके पास इतने साधन नहीं होते। धन के अभाव तथा जानकारी के अभाव में लोगों के अधिकारों का लगातार हनन होता रहता है। लेकिन न्यायिक क्रियाशीलता ने सार्वजनिक हित की मुकद्दमेबाजी (Public Interest Litigation) को जन्म दिया है जिसके द्वारा आम जनता के अधिकार की या मानवाधिकारों की रक्षा होती है।

7. लोगों का समर्थन-न्यायिक क्रियाशीलता के पक्ष में अन्तिम तर्क यदि दिया जा सकता है कि इसे जनता का समर्थन प्राप्त हुआ है। लोगों ने हार्दिक दिल से न्यायिक क्रियाशीलता का समर्थन किया है। क्योंकि इसके कारण बहुत से घोटाले, भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के कारनामें, उच्च अधिकारियों की वास्तविक तस्वीर सामने आई है। आम जनता कार्यपालिका व नौकरशाही की लाल फीताशाही से तंग आ चुकी थी। केवल न्यायिक क्रियाशीलता ने लोगों को एक निष्पक्षता की किरण दिखाई। जनता ने यह समझ लिया है कि न्यायपालिका की क्रियाशीलता ही उन्हें भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और अधिकारियों से छुटकारा दिला सकती है।

निष्कर्ष-न्यायिक क्रियाशीलता के पक्ष व विपक्ष के तकों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत जैसे विकासशील देश में न्यायिक क्रियाशीलता की आवश्यकता है। भारत के विगत वर्षों के प्रशासन ने यह साबित कर दिया है कि भारत में नौकरशाही व भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला। राजनीतिक नेताओं ने जनता की सहायता करने की बजाय अपने घरों को भरने का प्रयत्न किया है।

अतः वर्तमान स्थिति में न्यायिक क्रियाशीलता की अत्यन्त आवश्यकता है ताकि बढ़ते भ्रष्टाचार व नौकरशाही पर रोक लगाई जा सके, परन्तु जहाँ जरूरत हो वहाँ न्यायिक क्रियाशीलता पर रोक की भी आवश्यकता है। न्यायपालिका को केवल सरकार के दूसरे अंगों को क्रियाशील बनाने में आवश्यक रूप से हस्तक्षेप करना चाहिए परन्तु स्वयं अधिक क्रियाशील नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार की न्यायिक क्रियाशीलता न्यायपालिका की निरंकुशता को जन्म दे सकती है तथा निरंकुशता तो किसी की भी क्यों न हो, अच्छी नहीं होती।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. निम्नलिखित में से न्यायपालिका का कार्य है
(A) कानूनों को लागू करना
(B) चोरों को पकड़ना
(C) खेती को बढ़ावा देना
(D) झगड़ों का निपटारा करना
उत्तर:
(D) झगड़ों का निपटारा करना

2. निम्नलिखित में से न्यायपालिका का कार्य नहीं है
(A) मुकद्दमों का फैसला करना
(B) अन्य देशों के साथ सम्बन्ध स्थापित करना
(C) कानूनों की व्याख्या करना
(D) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना
उत्तर:
(B) अन्य देशों के साथ सम्बन्ध स्थापित करना

3. न्यायपालिका की स्वतंत्रता आवश्यक है
(A) लोकतंत्र की रक्षा के लिए
(B) संविधान के संरक्षण के लिए
(C) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 6 न्यायपालिका

4. निम्नलिखित न्यायपालिका की स्वतंत्रता का साधन है
(A) न्यायाधीशों की नियुक्ति का उचित तरीका
(B) अच्छे वेतन
(C) न्यायाधीशों को पद से हटाने का कठिन तरीका
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की कुल संख्या कितनी है?
(A) 30
(B) 26
(C) 31
(D) 34
उत्तर:
(D) 34

6. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है
(A) प्रधानमन्त्री
(B) उप-राष्ट्रपति
(C) राष्ट्रपति
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) राष्ट्रपति

7. उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अपने पद पर रह सकते हैं
(A) 62 वर्ष
(B) 65 वर्ष
(C) 70 वर्ष
(D) 60 वर्ष
उत्तर:
(B) 65 वर्ष

8. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को मासिक वेतन मिलता है
(A) ₹ 1,00,000
(B) ₹ 2,50,000
(C) ₹ 2,80,000
(D) ₹ 1,25,000
उत्तर:
(C) ₹ 2,80,000

9. सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों को मासिक वेतन मिलता है
(A) ₹ 1,00,000
(B) ₹ 90,000
(C) ₹ 1,50,000
(D) ₹2,50,000
उत्तर:
(D) ₹ 2,50,000

10. राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करता है
(A) लोकसभा अध्यक्ष को
(B) राज्यसभा के अध्यक्ष को
(C) किसी प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ को
(D) किसी प्रसिद्ध विधिवेत्ता को
उत्तर:
(D) किसी प्रसिद्ध विधिवेत्ता को

11. सर्वोच्च न्यायालय से किसी मामले सम्बन्धी कानूनी परामर्श ले सकता है
(A) प्रधानमन्त्री
(B) राष्ट्रपति
(C) उप-राष्ट्रपति
(D) लोकसभा अध्यक्ष
उत्तर:
(B) राष्ट्रपति

12. भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अन्तिम रक्षक कौन है?
(A) राष्ट्रपति
(B) उप-राष्ट्रपति
(C) संसद
(D) सर्वोच्च न्यायालय
उत्तर:
(D) सर्वोच्च न्यायालय

13. भारत के सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है
(A) संसद द्वारा
(B) संविधान द्वारा
(C) राष्ट्रपति के आदेश द्वारा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) संविधान द्वारा

14. भारत का सर्वोच्च न्यायालय किस स्थान पर स्थित है?
(A) मुम्बई में
(B) चंडीगढ़ में
(C) नई दिल्ली में
(D) चेन्नई में
उत्तर:
(C) नई दिल्ली में

15. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से किस प्रकार हटाया जा सकता है?
(A) राष्ट्रपति के आदेश द्वारा
(B) प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा
(C) सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा
(D) संसद के दोनों सदनों के महाभियोग द्वारा
उत्तर:
(D) संसद के दोनों सदनों के महाभियोग द्वारा

16. राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई सलाह को मानने के लिए
(A) बाध्य है
(B) बाध्य नहीं है
(C) सीमित रूप से बाध्य है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) बाध्य नहीं है

17. निम्नलिखित में से कौन भारत में सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय है?
(A) संसद
(B) राष्ट्रपति
(C) सर्वोच्च न्यायालय
(D) सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय
उत्तर:
(C) सर्वोच्च न्यायालय

18. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति करता है
(A) राष्ट्रपति
(B) प्रधानमंत्री
(C) संसद
(D) मुख्य न्यायाधीश
उत्तर:
(A) राष्ट्रपति

19. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अपने पद पर रह सकते हैं
(A) 58 वर्ष तक
(B) 60 वर्ष तक
(C) 62 वर्ष तक
(D) 65 वर्ष तक
उत्तर:
(D) 65 वर्ष तक

20. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को मासिक वेतन मिलता है
(A) ₹ 1,00,000
(B) ₹ 2,50,000
(C) ₹ 2,80,000
(D) ₹ 1,50,000
उत्तर:
(B) ₹ 2,50,000

21. उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों को मासिक वेतन मिलता है
(A) ₹ 90,000
(B) ₹ 1,00,000
(C) ₹2,50,000
(D) ₹ 2,25,000
उत्तर:
(D) ₹ 2,25,000

22. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश
(A) सेवा-निवृत्त होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में वकालत कर सकते हैं
(B) उच्च न्यायालय में वकालत कर सकते हैं
(C) सेवा-निवृत्त होने के बाद वकालत नहीं कर सकते
(D) 65 वर्ष से पूर्व हटाए नहीं जा सकते
उत्तर:
(C) सेवा-निवृत्त होने के बाद वकालत नहीं कर सकते

23. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला (Transfer) कर सकता है
(A) राष्ट्रपति
(B) राज्यपाल
(C) संसद
(D) मुख्यमंत्री
उत्तर:
(A) राष्ट्रपति

24. पंजाब और हरियाणा का उच्च न्यायालय स्थित है
(A) हिसार में
(B) पटियाला में
(C) अमृतसर में
(D) चंडीगढ़ में
उत्तर:
(D) चंडीगढ़ में

25. 23 अप्रैल, 2021 तक सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कौन रहे? ।
(A) श्री दीपक मिश्रा
(B) श्री जगदीश सिंह खेहर
(C) श्री रंजन गोगोई
(D) श्री शरद अरविंद बोबड़े
उत्तर:
(D) श्री शरद अरविंद बोबड़े

26. उच्च न्यायालय का निम्नलिखित प्रारंभिक क्षेत्राधिकार है
(A) मौलिक अधिकार के मामले
(B) फौजदारी मामले
(C) अपीलें सुनना
(D) कानून निर्माण
उत्तर:
(A) मौलिक अधिकार के मामले

27. उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में कौन वृद्धि कर सकता है?
(A) राष्ट्रपति
(B) राज्यपाल
(C) प्रधानमंत्री
(D) संसद
उत्तर:
(D) संसद

28. भारत में इस समय कुल उच्च न्यायालय हैं
(A) 23
(B) 24
(C) 25
(D) 26
उत्तर:
(C)25

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दें

1. किन्हीं ऐसे दो देशों के नाम बताएँ, जिनमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता।
उत्तर:

  • चीन,
  • रूस।

2. भारत के सर्वोच्च न्यायालय में कुल कितने न्यायाधीश हैं?
उत्तर:
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में इस समय एक मुख्य न्यायाधीश तथा 33 अन्य न्यायाधीश (कुल 34) हैं।

3. भारत में इस समय कुल कितने उच्च न्यायालय हैं?
उत्तर:
भारत में इस समय कुल 25 उच्च न्यायालय हैं।

4. किन्हीं ऐसे दो राज्यों के नाम बताइए जिनका एक ही (साझा) उच्च न्यायालय है। वह कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
हरियाणा तथा पंजाब का एक ही साझा उच्च न्यायालय है जो चण्डीगढ़ में स्थित है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 6 न्यायपालिका

5. उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में वृद्धि करने का अधिकार किसके पास है ?
उत्तर:
उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में वृद्धि करने का अधिकार संसद के पास है।

6. भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है?
उत्तर:
अनुच्छेद 124 में।

7. सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश द्वारा तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति किसकी पूर्व अनुमति से की जा सकती है?
उत्तर:
राष्ट्रपति की।

8. संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हेतु कितनी न्यूनतम आयु निश्चित की गई है?
उत्तर:
न्यूनतम आयु का कोई उल्लेख नहीं है।

9. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को वेतन कहाँ से दिया जाता है?
उत्तर:
भारत की संचित निधि से।

10. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को शपथ कौन दिलाता है?
उत्तर:
राष्ट्रपति।

11. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश कितने वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं?
उत्तर:
65 वर्ष।

12. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पद से हटाने की क्या विधि है?
उत्तर:
महाभियोग विधि।

13. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश कितने वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं?
उत्तर:
65 वर्ष।

14. भारत में किसे अभिलेख न्यायालय माना गया है?
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय को।

15. उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की शक्ति किसके पास है?
उत्तर:
संसद के पास।

16. न्यायायिक सक्रियता की आवश्यकता के दो कारण लिखें।
उत्तर:
सरकार की कमजोरी एवं देश में फैला व्यापक भ्रष्टाचार ।

रिक्त स्थान भरें

1. “सर्वोच्च न्यायालय ने समस्त संघात्मक ढाँचे को संबद्ध रखने में सीमेंट का काम किया है।” यह कथन का है।
उत्तर:
हरमन फ़ाइनर

2. सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था अनुच्छेद …………….. में की गई है।
उत्तर:
124

3. भारत में सर्वोच्च न्यायालय का उद्घाटन ………….. को हुआ।
उत्तर:
28 जनवरी, 1950

4. सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा ……………. को सलाह दी जाती है।
उत्तर:
राष्ट्रपति

5. पंजाब और हरियाणा का उच्च न्यायालय ……………. में स्थित है।
उत्तर:
चण्डीगढ़

6. संघीय व्यवस्था का संरक्षक ………….. होता है।
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय

7. उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अपने पद पर …………… वर्ष तक रह सकते हैं।
उत्तर:
65

8. मौलिक अधिकारों की रक्षा ………………. के द्वारा की जाती है।
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय

9. भारत में सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति ………………. प्रणाली द्वारा की जाती है।
उत्तर:
कॉलेजियम

10. सर्वोच्च न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति ………………. द्वारा की जाती है।
उत्तर:
मुख्य न्यायाधीश

11. भारत में इस समय कुल ………………. उच्च न्यायालय हैं।
उत्तर:
25

12. ………………. भारत में सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय है।
उत्तर:
सर्वोच्च न्यायालय

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Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 6 न्यायपालिका Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Solutions Chapter 6 न्यायपालिका

HBSE 11th Class Political Science न्यायपालिका Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के विभिन्न तरीके कौन-कौन से हैं? निम्नलिखित में जो बेमेल हो उसे छाँटें।
(क) सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ली जाती है।
(ख) न्यायाधीशों को अमूमन अवकाश प्राप्ति की आयु से पहले नहीं हटाया जाता।
(ग) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में नहीं किया जा सकता।
(घ) न्यायाधीशों की नियुक्ति में संसद का दखल नहीं है।।
उत्तर:
न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के विभिन्न तरीके निम्नलिखित हैं
(क) सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ली जाती है।
(ख) न्यायाधीशों को अमूमन अवकाश प्राप्ति की आयु से पहले नहीं हटाया जा सकता है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता के महत्त्वपूर्ण तरीके हैं। लंबी कार्यावधि उसकी स्वतंत्रता में सहायक है।
(ग) प्रश्न के अन्तर्गत दिए गए बिंदुओं में से (ग) बेमेल है जो निम्नलिखित है-उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला दूसरे उच्च न्यायालय में नहीं किया जा सकता।
(घ) न्यायाधीशों की नियुक्ति में संसद का कोई दखल नहीं है। इस प्रकार न्यायपालिका को व्यवस्थापिका से स्वतंत्र रखा गया है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 6 न्यायपालिका

प्रश्न 2.
क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि न्यायपालिका किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। अपना उत्तर अधिकतम 100 शब्दों में लिखें।
उत्तर:
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्र न्यायपालिका का होना बहुत आवश्यक है। भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए संविधान में अनेक प्रावधान दिए गए हैं। परंतु उसका यह अर्थ नहीं है कि वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं है। हमने संविधान में सरकार के तीनों अंगों में सन्तुलन एवं नियंत्रण स्थापित किया है।

हमने संविधान में न्यायपालिका को भी विधायिका प्रति उत्तरदायी बनाया है। यदि न्यायपालिका अपनी सीमा से बाहर जाकर कोई कार्य करती है तो विधायिका के विधि अथवा संविधान में संशोधन करके न्यायपालिका के कार्य को निरस्त कर सकती है। अतः न्यायपालिका की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ यह है कि यह बिना किसी राजनीति, आर्थिक, सामाजिक हस्तक्षेप के प्रत्येक विवाद पर निष्पक्ष एवं स्वतंत्र होकर अपना निर्णय देने का कार्य करे।

प्रश्न 3.
न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए संविधान के विभिन्न प्रावधान कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने तथा उसे विधानपालिका व कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त रखने के लिए निम्नलिखित प्रावधानों की व्यवस्था की गई है

1. कार्य-अवधि की सुरक्षा- संविधान के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को ‘पद की सुरक्षा’ (Security) प्रदान की गई है। सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते हैं। उस अवधि के समाप्त होने से पहले इन्हें केवल अयोग्य तथा दुराचार आदि के आधार पर केवल महाभियोग की विधि द्वारा ही पद से हटाया जा सकता है।

2. पर्याप्त वेतन-न्यायाधीशों को स्वतंत्र बनाने के लिए भारतीय संविधान में उनके लिए पर्याप्त वेतन तथा भत्ते की व्यवस्था की गई है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 2,80,000 रुपए तथा अन्य न्यायाधीशों को 2,50,000 रुपए मासिक वेतन मिलता है। इस प्रकार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को 2,50,000 रुपए मासिक तथा अन्य न्यायाधीशों को 2,25,000 रुपए मासिक वेतन मिलता है। यह राशि इतनी पर्याप्त है जिससे कि वे अपने खर्च को ठीक प्रकार से चला सकते हैं। न्यायाधीशों के वेतन तथा भत्ते भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) में से दिए जाते हैं। उनमें केवल उस समय कमी की जा सकती है जब राष्ट्रपति देश में वित्तीय संकट (Financial Emergency) की घोषणा कर दे।

3. उच्च योग्यताएँ न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए यह भी आवश्यक है कि केवल योग्य तथा कानुन को ठीक प्रकार से जानने वाले व्यक्ति ही न्यायाधीशों के पद पर नियुक्त होंगे। हमारे संविधान में भी सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के … न्यायाधीशों के पद पर नियुक्त होने के लिए निश्चित योग्यताएँ निर्धारित की गई हैं।

4. शपथ ग्रहण-संविधान में यह व्यवस्था की गई है कि अपने पद को ग्रहण करते समय न्यायाधीशों को एक शपथ लेनी पड़ती है कि वे बिना किसी दबाव या ‘पक्षपात’ या ‘द्वेष’ के न्याय करेंगे तथा देश के संविधान’ तथा ‘कानून’ का पालन करेंगे। इस व्यवस्था में उनसे यह आशा की जाती है कि वे न्याय करते समय किसी प्रकार का भेदभाव नहीं बरतेंगे और निष्पक्ष होकर कार्य करेंगे।

5. न्यायाधीशों की नियुक्ति इसलिए हमारे देश में सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति यद्यपि राष्ट्रपति करता है तो भी इस कार्य में वह मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों से परामर्श लेता है। ऐसी स्थिति में दलीय आधार पर न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं होती। उस पर किसी अधिकारी का दबाव नहीं रहता और वह अपने कर्त्तव्य का उचित रूप से पालन करने में समर्थ होता है।

6. वकालत पर प्रतिबन्ध-न्यायाधीशों की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए यह व्यवस्था की गई है कि सेवा-निवृत्त होने के पश्चात् सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश देश के किसी भी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकते और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश केवल सर्वोच्च न्यायालय या अन्य उच्च न्यायालयों (उस उच्च न्यायालय को छोड़कर जिसमें उसने न्यायाधीश के पद पर काम किया है।) में ही वकालत कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
नीचे दी गई समाचार-रिपोर्ट पढ़ें और उनमें निम्नलिखित पहलुओं की पहचान करें।
(क) मामला किस बारे में है?
(ख) इस मामले में लाभार्थी कौन है?
(ग) इस मामले में फरियादी कौन है?
(घ) सोचकर बताएँ कि कंपनी की तरफ से कौन-कौन से तर्क दिए जाएँगे?
(ङ) किसानों की तरफ से कौन-से तर्क दिए जाएँगे?

सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस से दहानु के किसानों को 300 करोड़ रुपए देने को कहा-निजी कारपोरेट ब्यूरो, 24 मार्च 2005 मुंबई – सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस एनर्जी से मुंबई के बाहरी इलाके दहानु में चीकू फल उगाने वाले किसानों को 300 करोड़ रुपए देने के लिए कहा है। चीकू उत्पादक किसानों ने अदालत में रिलायंस के ताप-ऊर्जा संयंत्र से होने वाले प्रदूषण के विरुद्ध अर्जी दी थी।

अदालत ने इसी मामले में अपना फैसला सुनाया है। दहानु मुंबई से 150 कि०मी० दूर है। एक दशक पहले तक इस इलाके की अर्थ व्यवस्था खेती और बागवानी के बूते आत्मनिर्भर थी और दहानु की प्रसिद्धि यहाँ के मछली-पालन तथा जंगलों के कारण थी। सन् 1989 में इस इलाके में ताप-ऊर्जा संयंत्र चालू हुआ और इसी के साथ शुरू हुई इस इलाके की बर्बादी। अगले साल इस उपजाऊ क्षेत्र की फसल पहली दफा मारी गई।

कभी महाराष्ट्र के लिए फलों का टोकरा रहे दहानु की अब 70 प्रतिशत फसल समाप्त हो चुकी है। मछली पालन बंद हो गया है और जंगल विरल होने लगे हैं। किसानों और पर्यावरणविदों का कहना है कि ऊर्जा संयंत्र से निकलने वाली राख भूमिगत जल में प्रवेश कर जाती है और पूरा पारिस्थितिकी-तंत्र प्रदूषित हो जाता है। दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने ताप-ऊर्जा संयंत्र को प्रदूषण नियंत्रण की इकाई स्थापित करने का आदेश दिया था ताकि सल्फर का उत्सर्जन कम हो सके।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्राधिकरण के आदेश के पक्ष में अपना फैसला सुनाया था। इसके बावजूद सन् 2002 तक प्रदूषण नियंत्रण का संयंत्र स्थापित नहीं हुआ। सन् 2003 में रिलायंस ने ताप-ऊर्जा संयंत्र को हासिल किया और सन् 2004 में उसने प्रदूषण नियंत्रण संयंत्र लगाने की योजना के बारे में एक खाका प्रस्तुत किया। प्रदूषण नियंत्रण संयंत्र चूँकि अब भी स्थापित नहीं हुआ था इसलिए दहानु तालुका पर्यावरण सुरक्षा प्राधिकरण ने रिलायंस से 300 करोड़ रुपए की बैंक-गारंटी देने को कहा।
उत्तर:
उपर्युक्त रिपोर्ट पढ़ने के पश्चात् ज्ञात होता है कि-
(क) यह रिलायंस ताप-ऊर्जा संयंत्र द्वारा उत्पन्न प्रदूषण से सम्बन्धित मामला है,
(ख) इस मामले में किसान लाभार्थी है,
(ग) इस मामले में किसान ही फरयादी है,
(घ) इस विवाद पर कंपनी की तरफ से उक्त क्षेत्र में ताप-ऊर्जा संयंत्र से होने वाले लाभों का तर्क दिया जाएगा,
(ङ) जबकि किसानों की ओर से यह तर्क दिया जाएगा कि इस ताप-ऊर्जा संयंत्र से न केवल चीकू की फसल खराब हुई अपितु मत्स्य पालन का धंधा भी चौपट हो गया जिसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र के लोग भी बेरोजगार हो गए।

प्रश्न 5.
नीचे की समाचार-रिपोर्ट पढ़ें और चिह्नित करें कि रिपोर्ट में किस-किस स्तर की सरकार सक्रिय दिखाई देती है।
(क) सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका की निशानदेही करें।
(ख) कार्यपालिका और न्यायपालिका के कामकाज की कौन-सी बातें आप इसमें पहचान सकते हैं?
(ग) इस प्रकरण से संबद्ध नीतिगत मुद्दे, कानून बनाने से संबंधित बातें, क्रियान्वयन तथा कानून की व्याख्या से जुड़ी बातों की पहचान करें।
सीएनजी – मुद्दे पर केंद्र और दिल्ली सरकार एक साथ स्टाफ रिपोर्टर, द हिंदू, सितंबर 23, 2001 राजधानी के सभी गैर-सीएनजी व्यावसायिक वाहनों को यातायात से बाहर करने के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय का सहारा लेंगे।

दोनों सरकारों में इस बात की सहमति हई है। दिल्ली और केंद्र की सरकार ने परी परिवहन व्यवस्था को एकल ईंधन प्रणाली से चलाने के बजाय दोहरे ईंधन-प्रणाली से चलाने के बारे में नीति बनाने का फैसला किया है क्योंकि एकल ईंधन प्रणाली खतरों से भरी है और इसके परिणामस्वरूप विनाश हो सकता है।

राजधानी के निजी वाहन धारकों ने सीएनजी के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने का भी फैसला किया गया है। दोनों सरकारें राजधानी में 0.05 प्रतिशत निम्न सल्फर डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में दबाव डालेंगी। इसके अतिरिक्त अदालत से कहा जाएगा कि जो व्यावसायिक वाहन यूरो-दो मानक को पूरा करते हैं उन्हें महानगर में चलने की अनुमति दी जाए। हालाँकि केंद्र और दिल्ली सरकार अलग-अलग हलफनामा दायर करेंगे लेकिन इनमें समान बिंदुओं को उठाया जाएगा। केंद्र सरकार सीएनजी के मसले पर दिल्ली सरकार के पक्ष को अपना समर्थन देगी।

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री श्री राम नाईक के बीच हुई बैठक में ये फैसले लिए गए। श्रीमती शीला दीक्षित ने कहा कि केंद्र सरकार अदालत से विनती करेगी कि डॉ० आरए मशेलकर की अगुआई में गठित उच्चस्तरीय समिति को ध्यान में रखते हुए अदालत बसों को सीएनजी में बदलने की आखिरी तारीख आगे बढ़ा दे क्योंकि 10,000 बसों को निर्धारित समय में सीएनजी में बदल पाना असंभव है। डॉ० मशेलकर की अध्यक्षता में गठित समिति पूरे देश के ऑटो ईंधन नीति का सुझाव देगी। उम्मीद है कि यह समिति छः माह में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि अदालत के निर्देशों पर अमल करने के लिए समय की जरूरत है। इस मसले पर समग्र दृष्टि अपनाने की बात कहते हुए श्रीमती दीक्षित ने बताया- ‘सीएनजी से चलने वाले वाहनों की संख्या, सीएनजी की आपूर्ति करने वाले स्टेशनों पर लगी लंबी कतार की समाप्ति, दिल्ली के लिए पर्याप्त मात्रा में सीएनजी ईंधन जुटाने तथा अदालत के निर्देशों को अमल में लाने के तरीके और साधनों पर एक साथ ध्यान दिया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने – सीएनजी के अतिरिक्त किसी अन्य ईंधन से महानगर में बसों को चलाने की अपनी मनाही में छूट देने से इन्कार कर दिया था लेकिन अदालत का कहना था कि टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के लिए भी सिर्फ सीएनजी इस्तेमाल किया जाए, इस बात पर उसने कभी जोर नहीं डाला।

श्री राम नाईक का कहना था कि केंद्र सरकार सल्फर की कम मात्रा वाले डीजल से बसों को चलाने की अनुमति देने के बारे में अदालत से कहेगी, क्योंकि पूरी यातायात व्यवस्था को सीएनजी पर निर्भर करना खतरनाक हो सकता है। राजधानी में सीएनजी की आपूर्ति पाईपलाइन के जरिए होती है और इसमें किसी किस्म की बाधा आने पर पूरी सार्वजनिक यातायात प्रणाली अस्त-व्यस्त हो जाएगी।
उत्तर:
दी गई रिपोर्ट को पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि उक्त समस्या पर केंद्र और राज्य स्तर की सरकारें सक्रिय दिखाई देती हैं केन्द्र सरकार और राज्य स्तर (दिल्ली) की सरकार अर्थात् दिल्ली की सरकारें सर्वोच्च न्यायालय को सीएनजी विवाद पर संयुक्त रूप से अपना पक्ष प्रस्तुत करने को सहमत हैं।

(क) प्रदूषण से बचने के लिए यह निश्चित किया गया कि राजधानी में सरकारी तथा निजी दोनों प्रकार की बसों में सीएनजी के प्रयोग से छूट देने पर रोक लगाई जाएगी, परंतु टैक्सी और ऑटो-रिक्शा के लिए न्यायालय ने कभी सीएनजी के लिए दबाव नहीं डाला।

(ख) राजधानी में प्रदूषण हटाने हेतु सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया कि केवल सीएनजी वाली बसें ही महानगर में चलाई जाएँ। साथ-ही-साथ यह भी किया गया कि निजी वाहनों के मालिक को सीएनजी के प्रयोग के लिए प्रेरित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार तथा दिल्ली सरकार दोनों को अलग-अलग शपथ पत्र दाखिल करने को कहा गया।

(ग) प्रस्तुत रिपोर्ट में नीतिगत मुद्दा प्रदूषण हटाने से संबंधित है। सभी व्यावसायिक वाहन जो यूरो-2 मानक को पूरा करते हैं, उन्हें शहर में चलाने की अनुमति दी जाए। साथ ही सरकार यह भी चाहती थी कि समय-सीमा बढ़ाई जाए, क्योंकि 10,000 बसों को एक निश्चित अवधि में सीएनजी में परिवर्तित करना आसान काम नहीं है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 6 न्यायपालिका

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथन इक्वाडोर के बारे में है। इस उदाहरण और भारत की न्यायपालिका के बीच आप क्या समानता अथवा असमानता पाते हैं? सामान्य कानूनों की कोई संहिता अथवा पहले सुनाया गया कोई न्यायिक फैसला मौजूद होता तो पत्रकार के अधिकारों को स्पष्ट करने में मदद मिलती। दुर्भाग्य से इक्वाडोर की अदालत इस रीति से काम नहीं करती। पिछले मामलों में उच्चतर अदालत के न्यायाधीशों ने जो फैसले दिए हैं उन्हें कोई न्यायाधीश उदाहरण के रूप में मानने के लिए बाध्य नहीं है।

संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत इक्वाडोर (अथवा दक्षिण अमेरिका में किसी और देश) में जिस न्यायाधीश के सामने अपील की गई है उसे अपना फैसला और उसका का आधार लिखित रूप में नहीं देना होता। कोई न्यायाधीश आज एक मामले में कोई फैसला सुनाकर कल उसी मामले में दूसरा फैसला दे सकता है और इसमें उसे यह बताने की जरूरत नहीं कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।
उत्तर:
उक्त उदाहरण और भारत की न्यायपालिका में बहुत असमानता है। भारत में न्यायिक निर्णय एक अभिलेख बन जाता है। सर्वोच्च न्यायालय अथवा प्रसिद्ध न्यायाधीशों के निर्णय दूसरे न्यायालयों में उदाहरण बन जाते हैं। भारत के न्यायाधीश संविधान के अनुसार अपने विवेक से, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होकर निर्णय देते हैं। आवश्यकता पड़ने पर कानून अथवा संविधान में संशोधन करते हैं। इक्वाडोर की अदालत में इस प्रकार से कार्य नहीं किया जाता। वहाँ की कार्य-प्रणाली भारत से बिल्कुल विपरीत है। वहाँ अदालत बिना कोई कारण बताए एक दिन एक तरह से तो दूसरे दिन दूसरी तरह से निर्णय देती है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथनों को पढ़िए और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अमल में लाए जाने वाले विभिन्न क्षेत्राधिकार मसलन – मूल, अपीली और परामर्शकारी – से इनका मिलान कीजिए।
(क) सरकार जानना चाहती थी कि क्या वह पाकिस्तान – अधिग्रहीत जम्मू-कश्मीर के निवासियों की नागरिकता के संबंध में कानून पारित कर सकती है।
(ख) कावेरी नदी के जल. विवाद के समाधान के लिए तमिलनाडु सरकार अदालत की शरण लेना चाहती है।
(ग) बांध स्थल से हटाए जाने के विरुद्ध लोगों द्वारा की गई अपील को अदालत ने ठुकरा दिया।
उत्तर:

कयनक्षेत्राधिकार
(क) सरकार जानना …………………. पारित कर सकती है?परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार
(ख) कावेरी नदी के जल वियाद …………………. लेना चाहती है।मूल क्षेत्राधिकार
(ग) बाँध स्थल से हटाए जाने के …………………. ठुकरा दिया।अपीलीय क्षेत्राधिकार

प्रश्न 8.
जनहित याचिका किस तरह गरीबों की मदद कर सकती है?
उत्तर:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अधीन न्याय पाने का अधिकार उसी व्यक्ति को होता है जिसके मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण होता है, परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 32 को बहुत व्यापक कर दिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि न्यायिक प्रक्रिया लोकहित में सरल और सुलभ हो गई और दलित, निर्धन, पिछड़े, निरक्षर एवं अक्षम लोगों को शीघ्र न्याय मिलने लगा।

इस प्रकार न्यायिक सक्रियता का इतिहास जन-हित के लिए की गई मुकद्दमेबाजी से जुड़ा है। इस दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण शुरुआत 1978 ई० में विख्यात ठग चार्ल्स शोभराज के उच्चतम न्यायालय को लिखे उस पत्र से हुई जिसमें उसने यह शिकायत की थी कि उसे व उसके साथियों को जेल-खाने में भयंकर यन्त्रणा से गुजरना पड़ रहा है।

न्यायालय ने उस पत्र के आधार पर जेल-खानों की दशा की जाँच का आदेश दिया। बाद में सामाजिक न्यायिक संगठनों द्वारा उठाए गए मुद्दों को लेकर और भी बहुत-से मा की जाँच-पड़ताल की गई। उन दिनों उच्चतम न्यायालय के दो प्रमुख न्यायाधीशों (न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर और जस्टिस भगवती) ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कि जन-हित के मामलों में यह नहीं देखा जाएगा कि दुःख या कष्ट सहने वाला व्यक्ति स्वयं न्यायालय के द्वार पर दस्तक देता है या उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति या संगठन अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं।

अभिप्राय यह है कि कोई भी जनहितैषी व्यक्ति या संस्था जन-हित के मामले को न्यायालय में उठा सकते हैं। गरीब, अनपढ़ और सताए गए लोगों की एवज में दूसरे व्यक्ति भी न्याय माँगने का अधिकार रखते हैं। इतना ही नहीं जागरूक नागरिकों का यह कर्त्तव्य बनता है कि वे देश के अभागे लोगों के मामलों को न्यायालय में उठाने के लिए तैयार हों। इससे गरीबों और आरक्षित लोगों को अपने अधिकारों को लागू करवाने के लिए न्यायालयों में पहुंच पाने के अवसर मिलेंगे। इस तरह जनहित याचिका की स्वीकृति है। न्याय व्यवस्था अधिक लोकतांत्रिक बनी और गरीबों के लिए न्याय प्राप्ति के द्वार खुले।

प्रश्न 9.
क्या आप मानते हैं कि न्यायिक सक्रियता से न्यायपालिका और कार्यपालिका में विरोध पनप सकता है? क्यों?
उत्तर:
न्यायपालिका की न्यायिक सक्रियता के कारण कार्यपालिका और न्यायपालिका में न केवल विरोध पनपा है बल्कि इसको लेकर कार्यपालिका और विधायिका में भय भी पैदा हुआ है। संविधान के अनुसार न्यायपालिका एवं विधायिका द्वारा निर्मित कानूनों का न्यायिक पुनर्वालोकन कर सकती है और यह देख सकता हैं कि विधायिका द्वारा निर्मित कानून संविधान के अनुकूल है या नहीं। कानून के संविधान के प्रतिकूल पाए जाने पर न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है।

जैसे संसद द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति सम्बन्धी राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन से सम्बन्धी संवैधानिक संशोधन को न्यायपालिका ने असंवैधानिक घोषित किया। ऐसी स्थिति में कार्यपालिका निश्चित रूप से असहज की स्थिति में भी आ गई और इसे सरकार ने बढ़ती न्यायिक सक्रियता की चिन्ता जाहिर की। अतः स्पष्ट है कि न्यायपालिका की ऐसी शक्ति से दोनों अंगों के बीच विरोध पनपा है। इसी प्रकार, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में अपनी शक्तियों का अतिक्रमण करने वाली कार्यपालिका, न्यायपालिका द्वारा नियंत्रित की जा सकती है।

हाँ, दूसरी तरफ जब न्यायपालिका अपने सीमा क्षेत्र का अतिक्रमण करती है, तो विधायिका, विधि या संविधान में संशोधन करके न्यायपालिका के कार्य का परिसीमन कर सकती है। संविधान में तीनों अंगों में नियंत्रण एवं संतुलन कायम किया जाता है। अतः सरकार के तीनों अंगों को मिल-जुलकर कार्य करना चाहिए। जिससे टकराव की स्थिति पैदा ही न हो; जैसे दिल्ली – में सीएनजी बसों का चालन, वायु प्रदूषण, भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच, चुनाव सुधार जैसे मुद्दों पर।

प्रश्न 10.
न्यायिक सक्रियता मौलिक अधिकारों की सुरक्षा से किस रूप में जुड़ी है? क्या इससे मौलिक अधिकारों के विषय-क्षेत्र को बढ़ाने में मदद मिली है?
उत्तर:
न्यायिक सक्रियता ने मानवीय अधिकारों की रक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। न्यायिक क्रियाशीलता के अभाव में गैर-कानूनी, नजरबन्दी, बच्चों के शोषण के मामले, स्रियों के शोषण के मामले, स्त्रियों के अनैतिक व्यापार के मामले आदि जनता के सामने नहीं आते। यद्यपि भारतीय संविधान में लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा का अधिकार प्राप्त है। वे अधिकारों की अवहेलना की स्थिति में न्यायपालिका का दरवाजा खटखटा सकते हैं। परन्तु बहुत कम लोग ऐसा करते हैं।

क्योंकि उनके पास इतने साधन नहीं होते। धन के अभाव तथा जानकारी के अभाव में लोगों के अधिकारों का लगातार हनन होता रहता है। लेकिन न्यायिक क्रियाशीलता ने सार्वजनिक हित की मुकद्दमेबाजी को जन्म दिया है जिसके द्वारा आम जनता के अधिकारों या मानवाधिकारों की रक्षा होती है। इसके अतिरिक्त यहाँ यह भी स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मान्यता पर बल देता है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन का अर्थ केवल भौतिक अस्तित्व की सुरक्षा मात्र नहीं है बल्कि उसकी समस्त नैसर्गिक शक्तियाँ भी हैं। मानव प्रतिष्ठा के साथ-साथ जीवनयापन के अधिकार को इस मौलिक अधिकार के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है।

न्यायपालिका HBSE 11th Class Political Science Notes

→ भूमिका न्यायपालिका सरकार का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग है। इसका मुख्य कार्य विधानमण्डल द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या करना तथा उन्हें तोड़ने वालों को दण्ड देना है।

→ एक राज्य में विधानमण्डल तथा कार्यपालिका की व्यवस्था चाहे कितनी भी अच्छी तथा श्रेष्ठ क्यों न हो, परन्तु यदि न्याय-व्यवस्था दोषपूर्ण है अर्थात् निष्पक्ष तथा स्वतंत्र नहीं है, तो नागरिकों का जीवन सुखी नहीं रह सकता।

→ न्यायपालिका ही नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है और उन्हें सरकार के अत्याचारों से बचाती है। संघीय राज्यों में न्यायपालिका का महत्त्व और अधिक होता है, क्योंकि न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है और केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों के बीच उत्पन्न होने वाले झगड़ों का निपटारा करती है।

→ लॉर्ड ब्राईस (Lord Bryce) ने ठीक ही लिखा है, “किसी शासन की श्रेष्ठता जानने के लिए उसकी न्याय-व्यवस्था की कुशलता से बढ़कर और कोई अच्छी कसौटी नहीं है, क्योंकि किसी और वस्तु का नागरिक की सुरक्षा और हितों पर इतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना उसके इस ज्ञान से कि वह एक निश्चित, शीघ्र तथा निष्पक्ष न्याय व्यवस्था पर निर्भर करता है।”

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़ Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

अति लघूत्तंरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान एक जीवंत प्रलेख के रूप में कैसे कार्य कर रहा है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की जीवंत निरन्तरता के लिए संविधान निर्माताओं ने भविष्य की आवश्यकता के अनुरूप संशोधन प्रक्रिया का उल्लेख अनुच्छेद 368 में किया जिसके अनुसार संविधान में समाज की आवश्यकता के अनुरूप संशोधन सम्भव हो सके। इसके साथ-साथ संविधान की व्याख्या में बहुत अधिक लचीलेपन ने भी संविधान के वास्तविक कार्यकरण को निरन्तर बनाए रखा। यही कारण है कि भारतीय संविधान एक कठोर, स्थिर संविधान न होकर एक जीवंत प्रलेख के रूप में कार्य कर रहा है।

प्रश्न 2.
विगत लगभग आठ दशकों से हमारा संविधान उसी मूल रूप में कार्य कर रहा है, कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • हमें विरासत के रूप में सशक्त संविधान मिला है और संविधान की मूल संरचना हमारे देश के बहुत अनुकूल है,
  • हमारे संविधान निर्माता बहुत दूरदर्शी थे जिन्होंने भविष्य की आने वाली परिस्थितियों के अनुरूप संविधान में अनेक समाधान किए।

प्रश्न 3.
क्या भारतीय संविधान एक ऐसा पवित्र दस्तावेज है कि कोई इसे परिवर्तित नहीं कर सकता? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
भारतीय संविधान कोई स्थायी एवं कठोर प्रलेख नहीं है। यह प्रत्येक व्यवस्था के सम्बन्ध में अन्तिम शब्द नहीं है। यह अपरिवर्तनीय नहीं है। वास्तव में भारतीय संविधान एक ऐसा पवित्र दस्तावेज है जो समय एवं समाज की आवश्यकता के अनुरूप निश्चित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार परिवर्तनीय है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का वर्णन संविधान के किस अनुच्छेद में किया जाता है? भारतीय संविधान लचीला है अथवा कठोर?
उत्तर:
भारतीय संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 368 में किया गया है। भारतीय संविधान न तो पूर्ण रूप से लचीला है और न ही पूर्ण रूप से कठोर है। यह अंशतः लचीला व अंशतः कठोर है।

प्रश्न 5.
ऐसे दो संवैधानिक संशोधन बताओ जिन पर विचार-विमर्श चल रहा है?
उत्तर:

  • संसद तथा राज्य विधानमंडलों में एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित करना,
  • अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा संस्थाओं में स्थान आरक्षित करना। .

प्रश्न 6.
ऐसे चार विषयों के नाम बताओ जिनमें संशोधन करने के लिए संसद की मन्जूरी के साथ-साथ आधे राज्यों की मन्जूरी लेना आवश्यक होता है।
उत्तर:
ऐसे चार विषय इस प्रकार हैं-

  • राष्ट्रपति के चुनाव का ढंग,
  • संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार,
  • राज्यों की कार्यपालिका शक्ति की सीमा,
  • केंद्र द्वारा प्रशासित क्षेत्रों (Union Territories) के लिए उच्च न्यायालयों की व्यवस्था।

प्रश्न 7.
संसद द्वारा साधारण बहुमत से संविधान में संशोधन किए जाने वाले कोई दो विषय लिखिए।
उत्तर:

  • नए राज्यों को भारतीय संघ में शामिल करना, नए राज्यों की स्थापना करना, उनके क्षेत्र, सीमाओं तथा नामों में परिवर्तन करना (अनुच्छेद 2, 3 एवं 4),
  • किसी राज्य की विधानसभा की सिफारिश पर उस राज्य में विधान परिषद् स्थापित करना अथवा उसे समाप्त करना (अनुच्छेद 169)।

प्रश्न 8.
भारतीय संविधान में दो-तिहाई बहुमत द्वारा संशोधन किस भाग में किया जा सकता है?
उत्तर:
भारतीय संविधान के भाग तीन (मौलिक अधिकार) एवं भाग चार (राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांत) में संशोधन दो-तिहाई बहुमत वाली विधि से किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान में किए गए संशोधनों को किन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर:
संशोधनों को दी गई तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है

  • तकनीकी एवं प्रशासनिक समस्याओं से संबंधित संशोधन,
  • न्यायपालिका एवं विधायिका (संसद) के बीच उत्पन्न मतभेद सम्बन्धी संशोधन,
  • राजनीतिक सर्वसम्मति से किए गए संशोधन।

प्रश्न 10.
संविधान के तकनीकी संशोधन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
संविधान के तकनीकी या प्रशासनिक संशोधन प्रायः ऐसे संशोधन होते हैं जो संविधान के मूल उपबन्धों को स्पष्ट करने । तथा उनकी व्याख्या करने से संबंधित छोटे-मोटे संशोधन होते हैं। वास्तव में इन संशोधनों से कोई विशेष बदलाव नहीं होते, बल्कि ये संशोधन किन्हीं विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए ही किए गए हैं। इसीलिए इन्हें तकनीकी संशोधनों का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान के किन्हीं दो तकनीकी संशोधनों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) भारतीय संविधान में प्रारम्भ में की गई अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा एवं राज्य की विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण प्रावधान को प्रत्येक 10 वर्षों के बाद विभिन्न संवैधानिक संशोधनों द्वारा सन् 2030 तक बढ़ाना,

(2) 54वें संवैधानिक संशोधन द्वारा सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते, पैंशन एवं सेवानिवृत्ति सम्बन्धी प्रावधानों में उल्लेखनीय सुधार करना।

प्रश्न 12.
भारतीय संविधान में राजनीतिक सर्वसम्मति के आधार पर किए गए किन्हीं दो संशोधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • दल-बदल विरोधी कानून, 1985 राजनीतिक सर्वसम्मति के आधार पर हुआ संवैधानिक संशोधन था,
  • मूल संविधान में मतदाता की आयु 21 वर्ष से घटाकर 61वें संवैधानिक संशोधन द्वारा 18 वर्ष करना भी राजनीतिक सर्वसम्मति का ही परिणाम कहा जाता है।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान के किन संशोधनों को अवसरवादी अधिनियम कहकर पुकारा गया?
उत्तर:
स्व० इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व में आपात्काल के दौरान विशेषकर अपने तानाशाही एवं स्वेच्छाचारी व्यवहार के आधार पर विशेषकर 38वें, 39वें एवं 42वें संवैधानिक संशोधनों द्वारा संविधान के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ के आधार पर किए गए संशोधनों को ‘अवसरवादी अधिनियम’ वाले संशोधनों के नाम आलोचकों के द्वारा दिए गए थे।

प्रश्न 14.
38वाँ संवैधानिक संशोधन विशेषतः न्यायपालिका के किस क्षेत्र पर प्रतिबन्ध लगाने वाला था?
उत्तर:
जुलाई, 1975 में पारित 38वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा विशेषकर राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं उप-राज्यपाल के द्वारा जारी किए गए अध्यादेशों एवं राष्ट्रपति की आपात्कालीन शक्तियों को न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर उनकी शक्तियों पर प्रतिबन्ध लगाया गया था।

प्रश्न 15.
42वें संवैधानिक संशोधन की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • राष्ट्रपति के लिए संघीय मंत्रिपरिषद् के दिए गए परामर्श को मानना आवश्यक होगा,
  • भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ एवं ‘समाजवाद’ शब्द को जोड़ा गया,
  • लोकसभा एवं राज्य विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष किया गया था।

प्रश्न 16.
भारतीय संविधान में किए गए 44वें संशोधन की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • संपत्ति के मूल अधिकार को एक साधारण कानूनी अधिकार में परिवर्तित कर दिया गया,
  • स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत अनुच्छेद 19(1) एफ को भी समाप्त कर दिया गया।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

प्रश्न 17.
संविधान में न्यायिक निर्णयों के परिणामस्वरूप हुए किन्हीं दो संशोधनों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा जनवरी, 2004 को यह व्यवस्था की गई कि भारत में नागरिकों को सम्मान एवं प्रतिष्ठा के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराना संविधान के अनुच्छेद 19(1) में उनका एक मौलिक अधिकार है,

(2) सर्वोच्च न्यायालय ने जीवन के अधिकार की एक व्यापक व्याख्या करते हुए जीवन के अधिकार के अंतर्गत भोजन का अधिकार, शुद्ध पेयजल का अधिकार एवं आश्रय के अधिकार को भी शामिल किया है।

प्रश्न 18.
भारतीय संविधान के संदर्भ में ‘संविधान समीक्षा’ की बहस क्यों आरम्भ हुई?
उत्तर:
भारतीय संविधान के संदर्भ में नब्बे के दशक में ‘संविधान समीक्षा’ के पक्षधरों का कहना है कि विश्व अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के दौर के परिणामस्वरूप देश की परिस्थितियाँ एवं वातावरण भी तेजी के साथ बदल रहा है। ऐसी स्थिति में भारत में सामाजिक-आर्थिक परिपेक्ष्य में संरचनात्मक सुधार के रास्ते में संविधान की अनेक धाराएँ मेल नहीं खाती हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि नवीन परिस्थितियों के अनुरूप पूरे संविधान की ही समीक्षा की जाए।

प्रश्न 19.
भारत सरकार ने कब और किसकी अध्यक्षता में ‘संविधान समीक्षा’ आयोग का गठन किया था?
उत्तर:
भारत सरकार ने 22 फरवरी, 2000 को सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश श्री वेंकटचलैया की अध्यक्षता में 11 सदस्यीय आयोग का गठन किया था।

प्रश्न 20.
भारतीय लोकतंत्र को शक्तिशाली बनाने में किन्हीं दो गैर-संवैधानिक व्यवस्थाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • विपक्षी दलों द्वारा सत्ताधारी दल की अनुचित एवं जनविरोधी नीतियों का डटकर विरोध करना,
  • भारतीय लोगों का संवैधानिक साधनों के प्रति आस्था का होना।

प्रश्न 21.
सामाजिक तनाव एवं हिंसा भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा है, क्यों?
उत्तर:
भारत में जाति, धर्म, धन तथा सामाजिक असमानता के कारण समय-समय पर उत्पन्न हिंसात्मक घटनाओं के कारण जहाँ शांति व्यवस्था भंग होती है, वहाँ लोगों के बीच तनाव एवं वैमनस्यता की भावना होती है जो किसी भी लोकतान्त्रिक पद्धति के लिए खतरे का संकेत होती है। यही बात भारतीय लोकतंत्र पर लागू होती है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान लचीला है अथवा कठोर। कारणों सहित बताएँ।
उत्तर:
भारतीय संविधान की एक मुख्य विशेषता यह है कि यह न तो पूर्ण रूप से लचीला है और न ही पूर्ण रूप से कठोर है। यह अंशतः लचीला तथा अंशतः कठोर (Partly Flexible and Partly Rigid) है। इसका कारण यह है कि संशोधन के लिए भारतीय संविधान को तीन भागों में बाँटा गया है, जो इस प्रकार हैं

1. संसद द्वारा साधारण बहुमत द्वारा संशोधन-संविधान की कुछ धाराएँ ऐसी हैं, जिनमें संसद अपने साधारण बहुमत से परिवर्तन कर सकती है। इस दृष्टि से हमारा संविधान लचीला है। इस श्रेणी में शामिल विषय इस प्रकार हैं-

  • नए राज्यों को भारतीय संघ में शामिल करना, नए राज्यों की स्थापना करना, उनके क्षेत्र, सीमाओं तथा नामों में परिवर्तन करना,
  • भारत की नागरिकता सम्बन्धी विषय निश्चित करना,
  • किसी राज्य की विधानसभा की सिफारिश पर उस राज्य में विधानपरिषद् स्थापित करना अथवा उसे समाप्त करना।

2. संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडल द्वारा स्वीकृति-द्विवतीय ढंग में विधेयक को संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। उसे संसद के प्रत्येक सदन को समस्त संख्या के साधारण बहुमत तथा उपस्थित व मतदान संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़ के रूप में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 (दो-तिहाई) बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक है।

संसद के दोनों सदनों द्वारा जब वह प्रस्ताव पास हो जाता है, तो उसे आधे राज्यों के विधानमंडल द्वारा स्वीकृति मिलनी चाहिए। उसके पश्चात् इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है, जिसकी स्वीकृति मिलने पर वह संशोधन लागू हो जाता है। संविधान संशोधन की यह प्रक्रिया निम्नलिखित विषयों के संबंध में अपनाई जाती है

  • राष्ट्रपति के चुनाव का ढंग,
  • संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार,
  • राज्यों की कार्यपालिका शक्ति की सीमा,
  • केन्द्र द्वारा प्रशासित क्षेत्रों (Union Territories) के लिए उच्च न्यायालयों की व्यवस्था,
  • राज्यों के उच्च न्यायालयों सम्बन्धी व्यवस्था।

3. संसद द्वारा दो-तिहाई बहुमत से संशोधन-संविधान के संशोधन की तीसरी प्रणाली दूसरी प्रणाली से कुछ कम कठोर है। इसके अन्तर्गत संविधान में संशोधन सम्बन्धी बिल संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और यदि वह सदन की कुल संख्या के साधारण बहुमत द्वारा या उपस्थित व मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत द्वारा पास हो जाता है तो उसे दूसरे सदन में स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। संविधान के जिन विषयों का वर्णन ऊपर प्रथम तथा दूसरे वर्ग में किया गया है, उनको छोड़कर सभी विषयों में परिवर्तन इसी प्रक्रिया से किया जा सकता है।

संसद में बिल पास होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। संविधान में संशोधन 24 के अनुसार राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी पड़ती है। ऊपर दिए गए विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में संविधान संशोधन के लिए संविधान के अलग-अलग भागों के लिए कठोर एवं लचीली प्रक्रिया दोनों अपनाई गई हैं; इसलिए भारतीय संविधान न पूर्ण रूप से लचीला है और न ही पूर्णतः कठोर है। यह अंशतः लचीला तथा अंशतः कठोर है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

प्रश्न 2.
कोई चार ऐसे संशोधन बताइए जो राजनीतिक सर्वसम्मति से किए गए हैं?
उत्तर:
संविधान के कुछ संशोधन ऐसे भी हैं जो राजनीतिक सर्वसम्मति के आधार पर संविधान के भाग बने हैं। ऐसे संशोधन वास्तव में तत्कालीन राजनीतिक दर्शन एवं समाज की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति माने जाते हैं। ऐसे संशोधनों के कुछ उदाहरण हम निम्नलिखित प्रकार से दे सकते हैं

1. 52वां संवैधानिक संशोधन भारतीय राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दल-बदल की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए लाया गया दल-बदल निरोधक कानून, 1985 वास्तव में राजनीतिक आम सहमति का ही परिणाम था। इसके अतिरिक्त 52वें संशोधन की कुछ कमियों को दूर करने के लिए पुनः 91वां संशोधन (2003) भी वास्तव में राजनीतिक सर्वसम्मति की ही देन कहा जा सकता है।

इस संशोधन द्वारा विशेषकर दल-बदल को निरुत्साहित करने के लिए मन्त्रिमंडल के आकार को सीमित किया गया जिसके द्वारा निश्चित किया गया कि मन्त्री पदों की संख्या लोकसभा या राज्य विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। जैसा कि सर्वविदित है दल-बदल का मुख्य कारण सत्ता प्रलोभन रहा है। ऐसे कानून ऐसी प्रवृत्ति के राजनेताओं पर एक महत्त्वपूर्ण अंकुश के रूप में काम करेगा।

2. 61वां संवैधानिक संशोधन इसके द्वारा मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करना भी आम राजनीतिक सहमति का ही परिणाम था।

3. 73वां एवं 74वां संवैधानिक संशोधन-इन संशोधनों के द्वारा संपूर्ण भारत में पंचायती राज को लागू करना भी आम राजनीतिक सहमति का अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है।

4. 93 वां संवैधानिक संशोधन इसके द्वारा उच्च शिक्षण संस्थाओं में पिछड़े वर्गों को आरक्षण देना भी आम राजनीतिक सहमति का ही उदाहरण कहा जा सकता है।

अतः स्पष्ट है कि संविधान में कुछ महत्त्वपूर्ण संशोधन राजनीतिक आम सहमति के परिणामस्वरूप किए गए। ऐसे संशोधन तत्कालिक राजनीतिक दर्शन एवं समाज की महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करते हुए संविधान को जीवंत या गतिशील बनाए रखते हैं।

प्रश्न 3.
संविधान के बुनियादी ढाँचे (Basic Structure of the Constitution) पर नोट लिखें।
उत्तर:
बुनियादी या मूलभूत ढाँचा एक सैद्धांतिक बात है जो स्वयं में एक जीवंत संविधान का उदाहरण है। संविधान में इस अवधारणा का कोई उल्लेख नहीं मिलता। वास्तव में यह एक ऐसा विचार है जो न्यायिक व्याख्याओं से उत्पन्न हुआ है। मौलिक अधिकारों से संबंधित केशवानन्द भारती के विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत (मूल ढाँचे का सिद्धांत) का प्रतिपादन किया था। इस निर्णय ने संविधान के विकास में निम्नलिखित सहयोग दिया

(1) इस निर्णय द्वारा संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्तियों की सीमाएँ निर्धारित की गईं।

(2) यह निर्णय संविधान के किसी भी या संपूर्ण भागों के किसी भी प्रकार के संशोधन की स्वीकृति देता है। यहाँ तक कि मूल अधिकारों में भी संशोधन की पूर्ण स्वीकृति दी गई है। अतः संविधान के मूल ढाँचे में संशोधन किए बिना संविधान के किसी भी भाग में संसद द्वारा संशोधन या परिवर्तन किया जा सकता है।

(3) इस निर्णय से यह भी स्पष्ट है कि संविधान के मूल ढाँचे में उल्लंघन करने वाले संशोधन के संबंध में अन्तिम निर्णय करने का अधिकार न्यायपालिका का होगा। यद्यपि मूल ढाँचा क्या है? यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभी स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन समय-समय पर विभिन्न विवादों में दिए गए निर्णयों से संविधान के मूलभूत ढाँचे के सम्बन्ध में कुछ बिन्दु उभरकर सामने आए हैं जो इस प्रकार हैं-

  • संविधान की सर्वोच्चता,
  • संविधान का धर्म-निरपेक्ष स्वरूप,
  • शासन का लोकतन्त्रात्मक एवं गणतन्त्रीय रूप,
  • कानून का शासन एवं न्यायिक समीक्षा,
  • संविधान का संघीय स्वरूप,
  • स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका,
  • कार्यपालिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका के मध्य स्थापित समीकरण,
  • भारत की प्रभुसत्ता,
  • देश की अखंडता आदि।

इस प्रकार मूल संरचना या ढाँचे का सिद्धांत संविधान की कठोरता एवं लचीलेपन की मिश्रित व्यवस्था को इंगित करता है। संविधान के मूल ढांचे को संविधान संशोधन प्रक्रिया के दायरे से बाहर रखने की व्यवस्था संविधान की कठोरता को व्यक्त करता है। दूसरे शब्दों में, संविधान का मल ढाँचे से संबंधित भाग अपरिवर्तनीय रहेगा जिसे कभी भी नहीं बदला जा सकता. जबकि दसरी तरफ संविधान के कुछ भागों को संशोधन प्रक्रिया के अधीन करने की व्यवस्था लचीलेपन को व्यक्त करती है। इस तरह हमारा संविधान अंशतः लचीले एवं अंशतः कठोर स्वरूप वाला कहा जाता है।

प्रश्न 4.
संविधान के मूल ढाँचे पर संविधान समीक्षा की स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में नब्बे के दशक के अन्तिम वर्षों में एक अन्य विचार विशेषकर संविधान समीक्षा को लेकर भी उभरा। ऐसा विचार रखने वाले विचारकों का कहना है कि देश का वातावरण एवं परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं और इन विशेष परिस्थितियों से संविधान की अनेक धाराएँ मेल नहीं खाती हैं। इसके अतिरिक्त विश्व अर्थव्यवस्था में भी उदारीकरण का नया दौर प्रारम्भ हुआ है।

इसलिए भारत में भी आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में आर्थिक-सामाजिक परिपेक्ष्य में संरचनात्मक सुधार का सिलसिला प्रारंभ करना आवश्यक है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि नवीन परिस्थितियों के अनुरूप पूरे संविधान की ही समीक्षा की जाए। ने 22 फरवरी, 2000 को सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश श्री वेंकटचलैया की अध्यक्षता में 11 सदस्यीय संविधान समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया। संविधान समीक्षा आयोग ने 31 मार्च, 2002 को अपना प्रतिवेदन भारत सरकार को सौंप दिया। कुल मिलाकर आयोग की रिर्पोट के 1976 पृष्ठों में 249 सिफारशें की गई हैं।

58 अनुशंसाएँ संविधान में संशोधन करने, 86 अनुशंसाएँ विधायी कार्रवाई करने और 106 अनुशंसाएँ कार्यकारी कार्रवाई के माध्यम से क्रियान्वित करने का सुझाव दिया है। परन्तु इसमें सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस आयोग ने संविधान के बुनियादी ढाँचे पर पूर्ण विश्वास जताया है और इसमें किसी ऐसे परिवर्तन की सिफारिश नहीं की जो इसके मूल ढाँचे पर प्रतिकूल प्रभाव डाले। अतः स्पष्ट है संविधान का मूल ढाँचा पूर्व में हुए निर्णयों के अनुरूप अपरिवर्तित ही रहेगा।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान की संशोधन विधि की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
(1) संविधान में संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है, परंतु संशोधन विधेयक दोनों सदनों में अलग-अलग रूप में पास होना आवश्यक है,

(2) संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों में मतभेद होने पर विधेयक गिर जाएगा, क्योंकि असहमति की स्थिति में दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन बुलाने की व्यवस्था का संविधान में उल्लेख नहीं किया गया है,

(3) राज्य विधानमंडलों को संशोधन प्रस्ताव पेश करने का अधिकार नहीं है। राज्यों को केवल तीसरी विधि के अंतर्गत किए गए संशोधनों पर स्वीकृति देने की शक्ति प्रदान की गई है। इसमें भी केवल आधे राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति की आवश्यकता पड़ती है, परंतु इनके द्वारा दी जाने वाली स्वीकृति के लिए कोई सीमा निश्चित नहीं की गई है,

(4) संसद द्वारा पारित किए गए संशोधन विधेयकों को स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। जिस पर राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी पड़ती है,

(5) संसद संविधान के किसी भी भाग में अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधन कर सकती है, बशर्ते ऐसा संशोधन संविधान के मूल ढाँचे में परिवर्तन न करता हो,

(6) संसद द्वारा किए गए संवैधानिक संशोधन की वैधता की न्यायपालिका को जांच करने का अधिकार है,

(7) संविधान में किए जाने वाले संशोधनों पर जनमत संग्रह कराए जाने की व्यवस्था नहीं है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। अथवा भारतीय संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान की एक मुख्य विशेषता यह है कि यह न तो पूर्णरूप से लचीला है और न ही पूर्ण रूप से कठोर। यह अंशतः लचीला तथा अंशतः कठोर (Partly Flexible and Partly Rigid) है। प्रो० वीयर (Prof. Viyar) के शब्दों में, “यह संविधान चरम कठोरता तथा अत्यन्त लचीलेपन में एक अच्छा सन्तुलन स्थापित करता है।”

संविधान के निर्माण के समय श्री जवाहरलाल नेहरू (Sh. Jawaharlal Nehru) ने इस सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करते हुए कहा था, “यद्यपि हम इस संविधान को इतना ठोस तथा स्थायी बनाना चाहते हैं जितना कि हम बना सकते हैं, परन्तु संविधान का स्थायी होना वांछनीय है। उसमें कुछ लचीलापन अवश्य होना चाहिए। यदि आप किसी वस्तु को पूर्ण रूप से स्थायी और कठोर बना देंगे तो इससे राष्ट्र का विकास रुक जाएगा क्योंकि राष्ट्र जीवित प्राणियों का समूह है। किसी भी स्थिति में हम अपने संविधान को इतना कठोर नहीं बना सकते कि वह बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप बदल न सके।”

संघीय शासन-व्यवस्था के लिए संविधान का कठोर होना आवश्यक है, ताकि केन्द्रीय सरकार में सत्ताधारी दल उसमें अपनी इच्छानुसार परिवर्तन न कर सके, परन्तु संविधान इतना कठोर भी नहीं होना चाहिए कि बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार उसे बदला न जा सके। इसी कारण से हमारा संविधान न तो पूर्ण रूप से कठोर और न ही पूर्ण रूप से लचीला बनाया गया है।

भारतीय संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया का वर्णन अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत किया गया है। इसके अनुसार संशोधन के कार्य के लिए संविधान को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा गया है

1. संसद द्वारा साधारण बहुमत से संशोधन (Amendment by the Parliament bya Simple Majority)-संविधान की कुछ धाराएँ ऐसी हैं, जिनमें संसद अपने साधारण बहुमत से परिवर्तन कर सकती है। इस दृष्टि से हमारा संविधान लचीला है। इस श्रेणी में ये विषय शामिल हैं

  • नए राज्यों को भारतीय संघ में शामिल करना, नए राज्यों की स्थापना करना, उनके क्षेत्र, सीमाओं तथा नामों में परिवर्तन करना,
  • भारत की नागरिकता सम्बन्धी विषय,
  • किसी राज्य की विधानसभा की सिफारिश पर उस राज्य में विधानपरिषद् स्थापित करना अथवा उसे समाप्त करना,
  • राष्ट्रभाषा सम्बन्धी विषय,
  • संसद तथा राज्य विधानमण्डलों के सदस्यों के लिए योग्यताएँ निश्चित करना,
  • संसद के सदस्यों को वेतन, भत्ते तथा अन्य सुविधाएँ प्रदान करना,
  • उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या,
  • अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा पिछड़े हुए कबीलों के प्रशासन आदि से संबंधित विषयों में परिवर्तन।

2. संसद के बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमण्डलों द्वारा स्वीकृति (By a Special Majority of Parliament and Ratification by the Legislatures of at least fifty percent States) दूसरी श्रेणी में वे विषय शामिल किए गए हैं जो वास्तव में संघ एवं राज्यों से सम्बन्धित हैं। इनमें संशोधन करने के लिए अत्यन्त कठोर प्रणाली अपनाई गई है।

इन विषयों के सम्बन्ध में संशोधन के प्रस्ताव को दो चरण पार करने होते हैं। सर्वप्रथम, संशोधन विधेयक को संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। उसे संसद के प्रत्येक सदन की समस्त जनसंख्या के साधारण बहुमत तथा उपस्थित व मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 (दो-तिहाई बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक है। संसद द्वारा ऊपर दी गई प्रक्रियानुसार जब वह प्रस्ताव पास हो जाता है तो उसे राज्यों की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है।

उस विधेयक को कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों द्वारा स्वीकृति मिलनी चाहिए। उसके पश्चात् राष्ट्रपति की स्वीकृति से संविधान में आवश्यक संशोधन लागू होता है। संविधान संशोधन की यह प्रक्रिया दिए गए विषयों के सम्बन्ध में अपनाई जाती है-

  • राष्ट्रपति के चुनाव का ढंग,
  • संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार,
  • राज्यों की कार्यपालिका शक्ति की सीमा,
  • केन्द्र द्वारा प्रशासित क्षेत्रों (Union Territories) के लिए उच्च न्यायालयों की व्यवस्था,
  • राज्यों के उच्च न्यायालयों सम्बन्धी व्यवस्था,
  • संघ तथा राज्यों के विधायी सम्बन्ध,
  • संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व,
  • संघीय न्यायपालिका सम्बन्धी व्यवस्था,
  • संविधान में संशोधन की प्रक्रिया।

3. संसद द्वारा दो-तिहाई बहुमत से संशोधन (Amendment by Parliament by a two-third Majority)-संविधान में संशोधन की तीसरी प्रणाली दूसरी प्रणाली से कुछ कम कठोर है। इसके अन्तर्गत संविधान में संशोधन सम्बन्धी विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और यदि वह सदन की कुल संख्या के साधारण बहुमत द्वारा या

उपस्थित व मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत द्वारा पास हो जाता है तो उसे दूसरे सदन में स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। दूसरे सदन में भी यदि वह ऊपर दिए गए ढंग से पास हो जाता है तो उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। संविधान के जिन विषयों का वर्णन ऊपर प्रथम या दूसरे वर्ग में किया गया है, उनको छोड़कर शेष सभी विषयों में परिवर्तन इसी प्रक्रिया से किया जा सकता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि हमारा संविधान एक कठोर संविधान है, परन्तु यह इतना कठोर नहीं है कि इसमें देश की बदलती परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन न किया जा सके। संशोधन प्रक्रिया की आलोचना (Criticism of the Procedure of Amendment) भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया की निम्नलिखित बातों के आधार पर आलोचना की गई है

(1) संविधान में संशोधन का प्रस्ताव केवल संघीय संसद में ही आरम्भ किया जा सकता है, राज्यों अथवा जनता के पास इस कार्य में पहल करने का अधिकार नहीं है।

(2) संविधान इस बारे में स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित संशोधन को संसद के द्वारा पास होने के पश्चात् जब राज्यों के पास भेजा जाता है तो उनकी स्वीकृति कितने समय में मिल जानी चाहिए। अमेरिका में जब कांग्रेस किसी संशोधन विधेयक को पास करके राज्यों के पास स्वीकृति के लिए भेजती है तो वह उसके लिए समय निश्चित कर देती है

(3) संविधान में इस बात को भी स्पष्ट नहीं किया गया था कि संविधान में संशोधन का प्रस्ताव जब तक संसद के दोनों सदनों से पास होने के पश्चात् राष्ट्रपति के पास जाता है तो क्या राष्ट्रपति को उस पर निषेधाधिकार (Veto Power) प्राप्त है अथवा उसे स्वीकृति देनी ही पड़ेगी, परन्तु अब संविधान के 24वें संशोधन द्वारा इस अस्पष्टता को दूर कर दिया गया है। इस संवैधानिक संशोधन में यह कहा गया है कि जब कोई संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों से पास होकर राष्ट्रपति के पास उसकी अनुमति के लिए भेजा जाए तो राष्ट्रपति को उस पर अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ेगी।

(4) संविधान में इस बात को भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि किसी संविधान संशोधन के प्रस्ताव को पास करने के बारे में संसद के दोनों सदनों में मतभेद उत्पन्न हो जाए तो उसे कैसे सुलझाया जाएगा। अधिकांश लोगों का विचार है कि उस गतिरोध को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में सुलझाया जाएगा (जैसे किसी साधारण विधेयक के पास करने के सम्बन्ध में किया जाता है)।

(5) संविधान में कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं, जिनको संशोधन प्रस्ताव पास किए बिना ही बदला जा सकता है। संघीय सरकार किसी विदेशी सन्धि अथवा समझौते की शर्तों को पूरा करने के लिए राज्य-सूची में दिए गए विषयों के सम्बन्ध में भी कानून बना सकती है। इसी प्रकार यदि राज्यसभा अपने 2/3 बहुमत से यह प्रस्ताव पास कर दे कि राज्य-सूची में दिया गया कोई विषय राष्ट्रीय महत्त्व का हो गया है तो संसद उस पर भी कानून बना सकती है। यह व्यवस्था संघीय प्रणाली के विरुद्ध है।।

निष्कर्ष (Conclusion)-ऊपर दी गई सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हम यही कह सकते हैं कि भारतीय संविधान लचीला भी है और कठोर भी। संकटकाल में यह लचीला और एकात्मक बन जाता है। शान्तिकाल में इसका कुछ भाग काफी लचीला कुछ भाग कठोर हो जाता है। इस प्रकार भारतीय संविधान न तो इंग्लैण्ड के संविधान की तरह पूर्ण रूप से लचीला है और न ही अमेरिकन संविधान की भाँति बहुत कठोर है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान के लागू होने से लेकर अब तक संविधान में कौन-से मुख्य परिर्वतन किए गए हैं? अथवा भारतीय संविधान में हुए परिवर्तनों ने किस प्रकार इसके रूप को बदला है? कुछ उदाहरणों सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
जनवरी, 2019 तक हमारे संविधान को लागू हुए लगभग 70 वर्ष से अधिक हो गए हैं। इन थोड़े से वर्षों में ही हमारे संविधान में 104 संशोधन (दिसम्बर, 2019) तक हो चुके हैं। जबकि 1789 में लागू होने वाले अमेरिकन संविधान में मात्र 27 संशोधन ही हुए हैं। यहाँ पर यही प्रश्न हमारे मस्तिष्क में आता है कि इतने थोड़े से समय में भारतीय संविधान में संशोधन करने के क्या कारण रहे हैं और इसके निहितार्थ क्या हैं: यहाँ यह तथ्य उल्लेखनीय है कि संविधान लागू होने के प्रथम दस वर्षों में केवल 9 संशोधन हुए और आगामी 60 वर्षों में लगभग 93 संशोधन हो गए। यदि संविधान संशोधनों के इतिहास पर नजर डालें तो यह भी स्पष्ट हो जाता है कि संविधान में किए जाने वाले संशोधनों का भारत की राजनीतिक परिस्थितियों से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है।

संसद द्वारा संविधान में किया गया प्रत्येक संशोधन समय की आवश्यकता थी। संविधान में संसद द्वारा संशोधन तब ही किए गए जब न्यायिक निर्णयों के द्वारा संविधान के कुछ विशेष अनुच्छेदों में कमी बताई गई या संविधान निर्माताओं की महत्त्वाकांक्षाओं की गलत तरीके से व्याख्या की गई, जैसे संसद द्वारा मूल अधिकारों के सम्बन्ध में किए गए संशोधन का कारण समाजवादी समाज के रास्ते में बाधा का होना रहा तो कुछ संशोधनों का ध्येय राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप देना रहा।

कई संशोधन भूमि-सुधार एवं गरीबों को न्यायपालिका की कार्य-पद्धति द्वारा शीघ्र न्याय दिलवाने में असमर्थता के कारण हुए। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि इन विभिन्न संवैधानिक संशोधनों के पीछे केवल सत्ताधारी दल की राजनीतिक सोच ही बहुत मायने नहीं रखती थी, बल्कि विभिन्न सवैधानिक संशोधन उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों एवं समाज और संविधान के आदर्शों के अनुरूप ही किए गए। हम भारतीय संविधान में हुए संशोधनों की विषय-वस्तु को समझने के लिए इसे अग्रलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित करके स्पष्ट कर सकते हैं

1. तकनीकी एवं प्रशासनिक समस्याओं से संबंधित संशोधन (Amendments Regarding Technical and Administrative Problems)-तकनीकी या प्रशासनिक प्रकृति के संशोधन प्रायः ऐसे संशोधन होते हैं जो संविधान के मूल उपबन्धों को स्पष्ट करने, उनकी व्याख्या करने से संबंधित छोटे-मोटे संशोधन होते हैं।

वास्तव में इन संशोधनों से कोई विशेष बदलाव नहीं होते, बल्कि ये किन्हीं विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए ही किए जाते हैं। इसीलिए इन्हें तकनीकी या प्रशासनिक संशोधनों का नाम दिया जाता है। संविधान में किए गए ऐसे तकनीकी संशोधनों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित रूप में बताए जा सकते हैं

(1) आरक्षण की व्यवस्था से संबंधित भारतीय संविधान में प्रारम्भ में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में सीटों का आरक्षण केवल 10 वर्षों के लिए किया गया था। परंतु इस वर्ग के लोगों के आर्थिक पिछडेपन के मध्यनजर प्रत्येक दस वर्ष के बाद आगामी दस वर्षों तक आरक्षण की अवधि को बढ़ाने के लिए संविधान में पाँच बार संशोधन किए जा चुके हैं।

जैसे 8वाँ संशोधन 1960 में, 23वाँ संशोधन 1969 में, 45वाँ संशोधन 1980 में, 62वाँ संशोधन 1989 में तथा 79वाँ संशोधन 1999 में 95वें संशोधन 2020 में किया गया। वर्तमान में इस वर्ग के आरक्षण प्रावट पान को 104वें संवैधानिक संशोधन (दिसम्बर, 2019) द्वारा 25 जनवरी, 2030 तक रखने की व्यवस्था कर दी गई है।

(2) 15वें संवैधानिक संशोधन द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु को 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष तक करना।

(3) 54वें संवैधानिक संशोधन द्वारा सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन, भत्तों, पेंशन एवं सेवा-निवृत्ति सम्बन्धी प्रावधानों में उल्लेखनीय सुधार करना।

(4) 21वाँ संशोधन, 1966 इस संशोधन के द्वारा संविधान की 8वीं अनुसूची में परिवर्तन करके सिन्धी भाषा को भी राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया गया जिससे 8वीं अनुसूची में 17 भाषाएँ हो गई थी।

(5) 71वाँ संशोधन, 1992-इस संशोधन के द्वारा मणिपुरी, कोंकणी व नेपाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया जिससे 8वीं अनुसूची में कुल 18 भाषाएँ हो गई थी।

(6) 92वाँ संशोधन, 2003-इस संवैधानिक संशोधन के द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में संशोधन किया गया तथा बोडो, डोगरी, मैथिली एवं संथाली भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया है। इस प्रकार अब संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं हो गई हैं।

(7) 96वाँ संशोधन इस संशोधन को राष्ट्रपति द्वारा 23 सितम्बर, 2011 को स्वीकृति दी गई। इस संशोधन द्वारा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में अंकित भाषा ‘ओरिया’ (Oriya) के स्थान पर ‘ओडिया’ (Odia) नाम परिवर्तित किया गया।

(8) 85वाँ संशोधन, 2002-इस संवैधानिक संशोधन (सन् 2002) के द्वारा अनुच्छेद 16 (4A) में परिवर्तन करते हुए सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के अभ्यर्थियों के लिए पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था का प्रावधान किया गया।

(9) 89वाँ संशोधन, 2003–इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद 338 के तुरन्त बाद अनुच्छेद 338क जोड़कर अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग से राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के गठन करने का प्रावधान किया गया है। इस आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष एवं तीन अन्य सदस्य होंगे तथा इनकी सेवा शर्तों एवं पदावधि के सम्बन्ध में निर्णय राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किए जाएंगे।

(10) 41वें संशोधन द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग एवं संयुक्त लोक सेवा आयोग के सदस्यों की सेवा-निवृत्ति आयु को 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष करना आदि। अतः उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि उपर्युक्त संशोधनों से संविधान के मूल उपबन्धों में कोई परिवर्तन नहीं आया। इसीलिए हम ऐसे संशोधनों को तकनीकी या प्रशासनिक संशोधनों का नाम देते हैं जो किन्हीं विशेष परिस्थितियों एवं समस्याओं के समाधान हेतु किए गए हैं।

2. राजनीतिक सर्वसम्मति से किए गए संशोधन (Amendments by Political Unanimity):
संविधान के कुछ संशोधन ऐसे भी हैं जो राजनीतिक सर्वसम्मति के आधार पर संविधान के भाग बने हैं। ऐसे संशोधन वास्तव में तत्कालीन राजनीतिक दर्शन एवं समाज की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति माने जाते हैं। ऐसे संशोधनों के कुछ उदाहरण हम निम्नलिखित प्रकार से दे सकते हैं

(1) 52वाँ संवैधानिक संशोधन भारतीय राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दल-बदल की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए लाया गया दल-बदल निरोधक कानून, 1985 वास्तव में राजनीतिक आम सहमति का ही परिणाम था। इसके अतिरिक्त 52वें संशोधन की कुछ कमियों को दूर करने के लिए पुनः 91वाँ संशोधन (2003) भी वास्तव में राजनीतिक सर्वसम्मति की ही देन कहा जा सकता है।

इस संशोधन द्वारा विशेषकर दल-बदल को निरुत्साहित करने के लिए मंत्रिमंडल के आकार को सीमित किया गया जिसके द्वारा निश्चित किया गया कि मंत्री पदों की संख्या लोकसभा या राज्य विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। जैसा कि सर्वविदित है, दल-बदल का मुख्य कारण सत्ता प्रलोभन रहा है। ऐसे कानून ऐसी प्रवृत्ति के राजनेताओं पर एक महत्त्वपूर्ण अंकुश के रूप में काम करेगा।

(2) 61वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करना भी आम राजनीतिक सहमति का ही परिणाम था।

(3) 73वाँ एवं 74वाँ सवैधानिक संशोधन-इन संशोधनों के द्वारा सम्पूर्ण भारत में पंचायती राज को लागू करना भी आम राजनीतिक सहमति का अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है।

(4) 102वाँ सवैधानिक संशोधन-राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग विधेयक, 2017 को लोकसभा द्वारा 10 अप्रैल, 2017 तथा राज्यसभा द्वारा 11 अप्रैल, 2017 को राज्यसभा की सिलेक्ट कमेटी को सौंपा गया। जिसने 19 जुलाई, 2017 को अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसके उपरान्त 6 अगस्त, 2018 को इसे पास किया गया। इस विधेयक के पारित होने पर आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलने के कारण संविधान में अनुच्छेद 342 (क) जोड़कर नए पिछड़े वर्ग आयोग को सिविल न्यायालय के समकक्ष अधिकार प्राप्त होंगे जिसमें आयोग को पिछड़े वर्ग की शिकायतों का निवारण करने का अधिकार भी मिल जाएगा।

संविधान के अनुच्छेद 338
(क) के बाद नया अनुच्छेद 338
(ख) जोड़ा गया।

इसमें सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग नामक एक नया आयोग होगा। संसद द्वारा पास किए गए विधेयक के अधीन इस आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं तीन अन्य सदस्य होंगे। इनकी पदावधि, सेवा एवं शर्ते आदि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित होगी। आयोग को अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी। आयोग को संविधान के अधीन सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए उपबंधित सुरक्षा उपाय से सम्बन्धित मामलों की जांच और निगरानी करने का अधिकार होगा।

(5) 103वाँ संवैधानिक संशोधन सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षा एवं रोजगार में 10% आरक्षण देने से सम्बन्धित 124वाँ संशोधन विधेयक (संख्या की दृष्टि से 103वाँ संशोधन विधेयक) लोकसभा द्वारा 8 जनवरी, 2019 को 323-3 मतान्तर से एवं राज्यसभा द्वारा 9 जनवरी, 2019 को 165-7 मतान्तर से पास होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा गया जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा 12 जनवरी, 2019 को स्वीकार करने पर सरकारी गजट में इसे 103वाँ संविधान संशोधन अधिनियम के रूप में 14 जनवरी, 2019 को सूचीबद्ध किया गया।

(6) 101वाँ संवैधानिक संशोधन भारतीय संविधान में वस्तु एवं सेवा कर (जी एस टी) से सम्बन्धित 101वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा द्वारा 8 अगस्त, 2016 को एवं राज्यसभा द्वारा 3 अगस्त, 2016 को सर्वसम्मति के साथ पारित किया गया। संविधान संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति से पूर्व आधे से अधिक राज्यों के विधानमण्डलों द्वारा इसका समर्थन किया जाना आवश्यक था। इस आवश्यक शर्त की पूर्ति होने के पश्चात् 8 सितम्बर, 2016 को राष्ट्रपति द्वारा इस विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इसी के साथ संविधान का 101वाँ संशोधन अधिनियम, 2016 में लागू हुआ।

(7) 93वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा उच्च शिक्षण संस्थाओं में पिछड़े वर्गों को आरक्षण देना भी आम राजनीतिक सहमति का ही उदाहरण कहा जा सकता है। अतः स्पष्ट है कि संविधान में कुछ महत्त्वपूर्ण संशोधन राजनीतिक आम सहमति के परिणामस्वरूप किए गए। ऐसे संशोधन तत्कालिक राजनीतिक दर्शन एवं समाज की महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करते हुए संविधान को जीवंत या गतिशील बनाए रखते हैं।

3. न्यायपालिका एवं विधायिका (संसद) के बीच उत्पन्न मतभेद सम्बन्धी संशोधन (Amendment Regarding Controversy Arise between Judiciary and Parliament)-न्यायपालिका एवं विधायिका (संसद) के बीच उत्पन्न मतभेद सम्बन्धी संशोधन इस प्रकार हैं-

1. मौलिक अधिकारों सम्बन्धी विवाद-बुनियादी या मूलभूत ढाँचा एक सैद्धान्तिक बात है जो स्वयं में एक जीवंत संविधान का उदाहरण है। संविधान में इस अवधारणा का कोई उल्लेख नहीं मिलता। वास्तव में यह एक ऐसा विचार है जो न्यायिक व्याख्याओं हुआ है। मौलिक अधिकारों से संबंधित केशवानंद भारती के विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इस सिद्धांत (मूल ढाँचे का सिद्धांत) का प्रतिपादन किया था। इस निर्णय ने संविधान के विकास में निम्नलिखित सहयोग दिया

(1) इस निर्णय द्वारा संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्तियों की सीमाएँ निर्धारित की गईं।
संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़ के रूप में

(2) यह निर्णय संविधान के किसी भी या सम्पूर्ण भागों के किसी भी प्रकार के संशोधन की स्वीकृति देता है। यहाँ तक कि मूल अधिकारों में भी संशोधन की पूर्ण स्वीकृति दी गई है। अतः संविधान के मूल ढाँचे में संशोधन किए बिना संविधान के किसी भी भाग में संसद द्वारा संशोधन या परिवर्तन किया जा सकता है।

(3) इस निर्णय से यह भी स्पष्ट है कि संविधान के मूल ढाँचे में उल्लंघन करने वाले संशोधन के सम्बन्ध में अन्तिम निर्णय करने का अधिकार न्यायपालिका का होगा। यद्यपि मूल ढाँचा क्या है? यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभी स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन समय-समय पर विभिन्न विवादों में दिए गए निर्णयों से संविधान के मूलभूत ढाँचे के सम्बन्ध में निम्नलिखित कुछ बिंदु उभरकर सामने आए हैं

  • संविधान की सर्वोच्चता,
  • संविधान का धर्म-निरपेक्ष स्वरूप,
  • शासन का लोकतंत्रात्मक एवं गणतन्त्रीय रूप,
  • कानून का शासन एवं न्यायिक समीक्षा,
  • संविधान का संघीय स्वरूप,
  • स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका,
  •  कार्यपालिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका के मध्य स्थापित समीकरण,
  • भारत की प्रभुसत्ता,
  • देश की अखण्डता आदि।

इस प्रकार मूल संरचना या ढाँचे का सिद्धांत संविधान की कठोरता एवं लचीलेपन की मिश्रित व्यवस्था को इंगित करता है। संविधान के मूल ढाँचे को संविधान संशोधन प्रक्रिया के दायरे से बाहर रखने की व्यवस्था संविधान की कठोरता को व्यक्त करता है। दूसरे शब्दों में, संविधान का मूल ढाँचे से संबंधित भाग अपरिवर्तनीय रहेगा जिसे कभी भी नहीं बदला जा सकता। जबकि दूसरी तरफ संविधान के कुछ भागों को संशोधन प्रक्रिया के अधीन करने की व्यवस्था लचीलेपन को व्यक्त करती है। इस तरह हमारा संविधान अंशतः लचीले एवं अंशतः कठोर स्वरूप वाला कहा जाता है।

2. 86वाँ संशोधन, 2002-इस संशोधन के द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किया गया है। इस संशोधन के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 21 के तुरन्त बाद खण्ड 21क जोड़ा गया। इसमें यह व्यवस्था की गई कि 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार राज्य निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा। इसी संशोधन में अनुच्छेद 51क में खण्ड (1) जोड़कर यह भी व्यवस्था की गई कि अभिभावकों का यह कर्त्तव्य है कि वे 6 से 14 वर्ष के अपने बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करें।

3. 99वाँ संशोधन-99वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए चली आ रही कॉलेजियम प्रणाली के स्थान पर राष्ट्रीय न्यायिक नियक्ति आयोग का गठन किया गया। जिसे लोकसभा एवं राज्यसभा द्वारा पारित करने एवं 30 दिसम्बर, 2014 को राष्ट्रपति द्वारा इसे स्वीकृति देने के बाद केन्द्र सरकार द्वारा 13 अप्रैल, 2015 को अधिसूचित किया गया।

परन्तु इस संशोधन विधेयक को दी गई चुनौतियों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा 16 अक्टूबर, 2015 को इस सवैधानिक संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। इस प्रकार न्यायाधीशों की नियुक्ति सम्बन्धी गठित राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के स्थान पर पूर्व प्रचलित कॉलेजियम प्रणाली को ही कायम रखा गया है।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान में किए गए कुछ विवादस्पद संशोधनों (Controversial Amendments) का वर्णन करें।
उत्तर:
यदि हम संवैधानिक संशोधन के दृष्टिकोण से सत्तर से अस्सी के दशक में हुए संशोधनों पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि इस दौरान हुए संशोधनों को लेकर विधि और राजनीति के दायरों में भारी बहस छिड़ी थी। वर्ष 1971 से 1976 के इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में हुए विशेषकर 38वें, 39वें एवं 49वें संशोधनों की विधि-विशेषज्ञों के साथ-साथ विपक्षी दलों ने भी भारी आलोचना की।

कई विद्वानों ने तो ऐसे संशोधनों को ‘अवसरवादी अधिनियम’ (Acts of Opportunism) भी कहकर पुकारा। विपक्षी दलों का तो यहाँ तक मानना था कि ऐसे संशोधनों के माध्यम से सत्तारूढ़ दल संविधान के मूल स्वरूप को ही बिगाड़ना चाहते हैं। इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व में हुए ऐसे संशोधनों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है

(1) 38वां संवैधानिक संशोधन, 1975 जुलाई, 1975 में पारित इस संशोधन ने राष्ट्रपति, राज्यपाल तथा उप-राज्यपाल द्वारा जारी किए गए अध्यादेशों और राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों को न्यायपालिका के अधिकार-क्षेत्र से बाहर कर दिया।

(2) 39वां संवैधानिक संशोधन, 1975 अगस्त, 1975 में आपातकाल के दौरान पास हुए इस अधिनियम ने राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और प्रधानमन्त्री के चुनाव को न्यायालय के क्षेत्र से बाहर करके उसके लिए संसद की अलग से एक समिति गठित करने की व्यवस्था की। इसने 1951 के जन-प्रतिनिधित्व कानून में 1974 और 1975 में किए गए संशोधनों, आन्तरिक सुरक्षा कानून (MISA) आदि 37 अन्य कानूनों को भी नौवीं अनुसूची में शामिल करके उन्हें न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर कर दिया।

(3) 40वां संवैधानिक संशोधन, 1975-संविधान का यह संशोधन यह व्यवस्था करता है कि राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध, उनके कार्यकाल में या अवकाश ग्रहण करने पर, उनके शासन-सम्बन्धी विषयों के बारे में का कोई फौजदारी या दीवानी मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकेगा। वास्तव में ये सभी संशोधन आपातकाल के दौरान विशेषकर जून, 1975 के पश्चात् किए गए। इनमें सबसे अधिक विवादित संशोधन 42वां रहा है, जिसका उल्लेख निम्नलिखित है

(4) 42वां संशोधन, 1976-59 अनुभागों (Sections) वाला यह ‘लघु संविधान’ (Mini Constitution) सन् 1976 में आपातकाल के दौरान पास किया गया। इसने

  • राष्ट्रपति के लिए मन्त्रि-परिषद् की सलाह मानना आवश्यक बनाने,
  • लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल 6 वर्ष करने,
  • संसद की सर्वोच्चता कायम करने,
  • उद्देशिका या प्रस्तावना में समाजवादी, धर्म-निरपेक्षता (Socialist, Secular) शब्द बढ़ाने,
  • केन्द्र-राज्य संबंध में परिवर्तन करने,
  • मौलिक अधिकारों के ऊपर राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्तों को प्रमुखता देने,
  • न्यायपालिका की न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति को निष्प्रभावी बनाने और
  • राज्यों में सशस्त्र सेनाएँ भेजने तथा देश के किसी एक भाग में आपात स्थिति लागू करने आदि की व्यवस्था की गई।

भूतपूर्व महान्यायवादी सी० के० दफ्तरी और एन० ए० पालकीवाला जैसे कानून शास्त्रियों ने इस संवैधानिक संशोधन कानून को प्रधानमन्त्री पद में पूरी राज्य सत्ता को निहित करना बताया था। इसके अतिरिक्त आलोचकों ने इन संशोधनों को न्यायपालिका की शक्ति को कम करने तथा लोकतन्त्र एवं कानून के शासन को नष्ट करने का एक प्रयास भी बताया।

इस प्रकार इन्दिरा गांधी की तानाशाही एवं स्वेच्छाचारी व्यवहार के अनुरूप किए गए संशोधनों ने राजनीतिक एवं वैधानिक क्षेत्र में नए विवादों को जन्म दिया। परन्तु इन्दिरा गांधी के तानाशाही शासन की समाप्ति के उपरांत सन् 1975 में हुए लोकसभा चुनावों में नवीन सत्तारूढ़ दल ने ऐसे विवादित संशोधनों की व्यवस्थाओं में पुनः संशोधन किया जो विशेषतः 43वें एवं 44वें संशोधन के द्वारा हुआ। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है

(5) 43वां संशोधन, 1978-जनता सरकार ने अपनी चुनावी घोषणा के अनुसार 43वां संशोधन बिल पेश किया, परन्तु राज्यसभा के विरोध के कारण उसे वापिस लेना पड़ा। इसलिए 44वां संशोधन बिल पेश किया गया जिसे कि 13 अप्रैल, 1978 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल गई और जो संविधान का 43वां संशोधन बन गया। इस संशोधन में 10 अनुच्छेद हैं और इसमें कुछ व्यवस्थाएँ निम्नलिखित हैं

(1) 42वें संशोधन द्वारा निर्मित 31D अनुच्छेद को समाप्त कर दिया, जिसके अनुसार संसद राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के लिए कानून बना सकती है,
(2) सर्वोच्च न्यायालय के लिए संसद के कानूनों की वैधानिकता को देखने के लिए कम-से-कम 7 न्यायाधीशों की पीठ की व्यवस्था 42वें संशोधन द्वारा की गई थी, वह समाप्त कर दी गई है,
(3) नए संशोधन बिल के अनुसार राज्य के उच्च न्यायालयों को देखने का अधिकार है,
(4) उच्च न्यायालयों के लिए कानूनों की वैधानिकता देखने के लिए जो 5 न्यायाधीशों की पीठ की व्यवस्था थी, वह समाप्त कर दी गई है।

(vi) 44वां संशोधन, 1979-जनता पार्टी की सरकार ने, जिसने कि मार्च, 1977 के लोकसभा चुनाव में सत्ता प्राप्त की थी, अपने चुनाव घोषणा-पत्र में कांग्रेस सरकार द्वारा पारित 42वें संशोधन को समाप्त करने का जनता को आश्वासन दिया था। उसी के अनुसार 45वां संशोधन बिल मई, 1978 में लोकसभा में पेश किया गया था, जिसमें 45 अनुच्छेद थे।

चूंकि राज्यसभा में विरोधी दलों का बहुमत था, इसलिए उसने इस संशोधन की कुछ धाराओं को अस्वीकृत करके शेष बिल पास कर दिया गया, जो दोबारा लोकसभा द्वारा पास किया गया। तत्पश्चात् संविधान की व्यवस्था के अनुसार इस बिल को 12 राज्यों की विधानसभाओं ने स्वीकृति दे दी। 30 अप्रैल, 1979 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करने के बाद यह 45वां संशोधन विधेयक संविधान का 44वां संशोधन बन गया। इस संशोधन के अन्तर्गत

(1) सम्पत्ति के अधिकार को कानूनी अधिकार बना दिया गया है। किसी व्यक्ति को उसकी सम्पत्ति से कानून के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है।

(2) अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत राष्ट्रपति संकटकाल की घोषणा तभी कर सकता है, यदि मन्त्रिमण्डल राष्ट्रपति को संकटकाल की घोषणा करने की लिखित सलाह दे। संविधान के अनुच्छेद 352 से आन्तरिक अशान्ति शब्द की जगह सशस्त्र विद्रोह उपबन्ध जोड़ा गया। इस प्रकार अब संकटकाल की घोषणा तभी की जा सकती है, यदि भारत को अथवा भारत के किसी भाग की सुरक्षा को युद्ध अथवा बाहरी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion) से खतरा हो।

(3) जीवन और स्वतन्त्रता के अधिकार को सुरक्षित बनाने के लिए यह व्यवस्था की गई कि संकटकाल में भी इन अधिकारों के संबंध में न्यायालय में अपील करने के अधिकार को स्थगित नहीं किया जा सकता।

(4) राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव से संबंधित सभी सन्देह और विवादों की जांच तथा निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किए जाएंगे और सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अन्तिम होगा।

(5) लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की अवधि 6 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष किए जाने की व्यवस्था की गई।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

प्रश्न 4.
भारत में लोकतान्त्रिक परम्पराओं को मजबूत बनाने वाले तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्रीय राज्य है जहाँ लोकतन्त्रीय शासन पद्धति अनेक वर्षों से सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। यद्यपि भारत की इस व्यवस्था में ऐसे भी तत्त्व हैं, जो लोकतन्त्र के विकास में बाधक हैं, परन्तु भारत में संवैधानिक और गैर-सवैधानिक ऐसी लोकतन्त्रीय परम्पराएँ विकसित हो रही हैं जो लोकतन्त्र को दृढ़ता प्रदान करती हैं।

दूसरे शब्दों में, भारत में इस प्रकार के तत्त्व पाए जाते हैं जो लोकतन्त्र को सफल बनाने में सहायक होते हैं। गत वर्षों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में लोकतन्त्र इतना मजबूत है कि वह सभी प्रकार की कठिनाइयों-राजनीतिक, अन्तर्राष्ट्रीय, आर्थिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक, क्षेत्रीय तथा आतंकवाद का मुकाबला सफलतापूर्वक कर सकता है। भारतीय लोकतन्त्र को जिन लोकतन्त्रीय परम्पराओं ने शक्तिशाली बनाने में योगदान दिया है, उनका वर्णन निम्नलिखित भागों में किया जा सकता है

(क) संवैधानिक व्यवस्थाएँ (Constitutional System):
संविधान निर्माताओं ने एक पूर्णरूपेण लोकतन्त्रीय संविधान का निर्माण किया। इसके द्वारा जो व्यवस्थाएँ निश्चित की गईं, उनका उल्लेख निम्नलिखित भागों में स्पष्ट किया जा सकता है

1. प्रस्तावना (Preamble):
संविधान की प्रस्तावना द्वारा संविधान के आदर्शों व उद्देश्यों का स्पष्टीकरण होता है। इसके अनुसार भारत एक लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए दृढ़-संकल्प है। इसके साथ-साथ संविधान सभी नागरिकों को राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक न्याय प्रदान करने की घोषणा करता है।

2. मौलिक अधिकार तथा राज्य के नीति निदेशक तत्त्व (Fundamental Rights and Directive Principles of State Policy):
नागरिकों के विकास के लिए जहां मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, वहां उनकी सुरक्षा के लिए निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र न्यायपालिका की स्थापना की गई है। इस व्यवस्था से जहां नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा होती है वहाँ सरकार पर भी रोक लगती है। आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों द्वारा व्यवस्था की गई है। इस क्षेत्र में कुछ कार्य तो हुआ है, परन्तु अभी और कार्य करना शेष है।’

3. उत्तरदायी शासन (Responsible Government):
लोकतन्त्र शासन में सरकार का जनता के प्रति उत्तरदायी होना बहुत आवश्यक होता है। भारत में संघ तथा राज्यों में संसदीय प्रणाली अपनाई गई है। मन्त्रिपरिषद् अपने शासन-सम्बन्धी कार्यों के लिए जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी होती है।

4. वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव (Elections based on Adult Franchise):
मौलिक प्रभुसत्ता के सिद्धांत के अनुसार 18 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को मत देने का अधिकार प्राप्त है। एक निश्चित आयु प्राप्त करने पर प्रत्येक नागरिक चुनाव में भी भाग ले सकता है। इस प्रकार सभी नागरिकों को राजनीतिक समानता प्रदान की गई है जो लोकतन्त्र का एक प्रमुख तत्त्व है।

5. निष्पक्ष चुनाव के लिए निष्पक्ष चुनाव आयोग की व्यवस्था (Provision of Impartial Election Commission):
भारत में सन् 1952 से लेकर अब तक लोकसभा के 16 चुनाव और राज्यों की विधानसभाओं के अनेक चुनाव सफलतापूर्वक हो चुके हैं।

6. कानून का शासन (Rule of Law):
संविधान द्वारा सभी नागरिकों को कानूनी समानता प्रदान की गई है। कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं। कानून व्यक्ति-व्यक्ति में भेदभाव नहीं करता। इस प्रकार संविधान द्वारा ऐसी व्यवस्थाएँ की गई हैं जो लोकतन्त्रीय परम्पराओं को शक्तिशाली बनाती हैं। इसके अलावा गैर-संवैधानिक संस्थाओं ने भी लोकतन्त्रीय परम्पराओं के विकास में सहायता दी है।

(ख) गैर-सवैधानिक व्यवस्थाएँ (Extra-constitutional Provisions):
ये वे व्यवस्थाएँ एवं परम्पराएँ हैं जिनका प्रत्यक्ष रूप से संविधान में उल्लेख नहीं है। ये इस प्रकार हैं

1. लोकतांत्रिक विरासत (Democratic Legacy):
भारतीय लोकतन्त्र की अब तक सफलता के मूल में भारत की जनता का लोकतन्त्र में अटूट विश्वास निहित है। अत्यन्त प्राचीन काल से ही हमने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के विभिन्न रूपों का सफल प्रयोग किया है। सर्वसत्ता-सम्पन्न, केन्द्रीयकृत तथा अधिनायकवादी शासनों का जनता ने सदा ही विरोध किया है। इसी लोकतांत्रिक विरासत (Legacy) के प्रभाव के कारण ही अनेक विपरीत परिस्थितियों तथा समस्याओं के होते हुए लोकतन्त्र का सफलतापूर्वक संचालन कर रहे हैं।

2. महान् नेताओं का नेतृत्व (Leadership of Great Leaders):
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय भारत को डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आदि ऐसे महान् नेताओं का नेतृत्व प्राप्त हुआ जो लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखते थे और उन्होंने लोगों में इन मूल्यों के प्रति आस्था पैदा की।

3. भारतीय जनता की जागरूकता (Awakening of Indian People):
भारतीय जनता ने सन् 1952 से 2014 तक हुए सभी चुनावों में पूर्ण जागरूकता का प्रदर्शन किया है। सन् 1975 की संकटकालीन घोषणा के विरोध में जनता ने जो मतदान किया, उससे यह स्पष्ट हो गया था कि वे लोकतन्त्र विरोधी कार्यों को सहन नहीं कर सकेंगे।

4. आर्थिक योजनाएँ (Economic Plans):
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार द्वारा देश के सामाजिक विकास के लिए जो कदम उठाए गए हैं, वे भी लोकतन्त्र में लोगों के विश्वास के लिए उत्तरदायी हैं। देश के आर्थिक विकास के लिए दस पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं और 12वीं पंचवर्षीय योजना भी अप्रैल, 2012 में प्रारम्भ हुई है। संघ तथा राज्यों की सरकारें इस बारे में प्रयत्नशील हैं कि सभी लोगों को रोजगार मिले, कृषि-उत्पादन बढ़े, औद्योगिक विकास हो और सामाजिक तथा आर्थिक असमानता दूर हो।

5. सवैधानिक उपायों में विश्वास (Faith in Constitutional Means):
भारत की जनता की सांस्कतिक धरोहर ने संवैधानिक उपायों का उपयोग करने के लिए निरन्तर प्रेरित किया है। छोटी समस्याओं से लेकर शासन के प्रति आक्रोश तक को यहां सवैधानिक उपायों से ही सुलझाने को समाज की स्वीकृति प्राप्त है।

असवैधानिक व हिंसक उपायों का उपयोग विदेशी विचारधाराओं से प्रेरित लोग करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि भारत के मूल चिन्तन को बढ़ावा दिया जाए तथा लोकतन्त्र के इस मौलिक सिद्धांत में आस्था को स्थायी बनाया जाए। शान्तिपूर्ण उपायों से हुआ परिवर्तन व विकास स्थायी व कल्याणकारी होता है।

6. विरोधी दलों का योगदान (Contribution byOpposition Parties):
यद्यपि भारत में विरोधी दल बहुत शक्तिशाली नहीं रहे हैं, परन्तु उन्होंने लोकतांत्रिक परंपराओं को बनाए रखने में योगदान अवश्य दिया है। जहां तक भी सम्भव हो सका है उन्होंने सत्ताधारी दल की अनुचित नीतियों का डटकर मुकाबला किया है। दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि भारत में लोकतांत्रिक परंपराओं को शक्तिशाली बनाने वाले अनेक तत्त्व मौजूद हैं और कसित हो रहे हैं, जिससे यह आशा की जा सकती है कि भारत में लोकतन्त्र पहले से और अधिक मजबूत होगा और लोकतन्त्र के उद्देश्यों एवं लोकतांत्रिक राजनीति के अन्तिम लक्ष्य समाज एवं जनता की समृद्धि एवं जन-कल्याण के व्यापक स्वरूप को व्यावहारिकता दे पाएँगे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का वर्णन संविधान के निम्नलिखित अनुच्छेद में किया गया है
(A) अनुच्छेद 372
(B) अनुच्छेद 368
(C) अनुच्छेद 374
(D) अनुच्छेद 376
उत्तर:
(B) अनुच्छेद 368

2. “यह संविधान चरम कठोरता एवं अत्यंत लचीलेपन में एक अच्छा संतुलन स्थापित करता है।” ये शब्द किस विद्वान के हैं?
(A) एम०पी० शर्मा
(B) डी०डी० बसु
(C) प्रो० के०सी० ह्वीयर
(D) वी०एन० शुक्ला
उत्तर:
(C) प्रो. के०सी० बीयर

3. भारतीय संविधान में संशोधन का प्रस्ताव आरंभ किया जा सकता है
(A) केवल संसद में
(B) जनता द्वारा
(C) केवल आधे राज्यों द्वारा
(D) संसद तथा आधे राज्यों द्वारा
उत्तर:
(A) केवल संसद में

4. साधारण बहुमत से निम्नलिखित अनुच्छेद में संवैधानिक संशोधन किया जा सकता है
(A) अनुच्छेद 3 में
(B) अनुच्छेद 343 में
(C) अनुच्छेद 106 में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या 545 निम्नलिखित संशोधन द्वारा निश्चित की गई
(A) 17वें संशोधन द्वारा
(B) 25वें संशोधन द्वारा
(C) 31वें संशोधन द्वारा
(D) 42वें संशोधन द्वारा
उत्तर:
(D) 42वें संशोधन द्वारा

6. निम्नलिखित सवैधानिक संशोधन ने संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी तथा धर्म-निरपेक्ष शब्द जोड़े हैं
(A) 41वें संशोधन द्वारा
(B) 42वें संशोधन द्वारा
(C) 43वें संशोधन द्वारा
(D) 44वें संशोधन द्वारा
उत्तर:
(B) 42वें संशोधन द्वारा

7. भारतीय संविधान में अब तक कुल संशोधन हो चुके हैं
(A) 103
(B) 102
(C) 104
(D) 105
उत्तर:
(C) 104

8. भारतीय संविधान में दो-तिहाई बहुमत द्वारा संशोधन किस भाग में किया जा सकता है?
(A) भाग तीन
(B) भाग पाँच
(C) भाग दो
(D) भाग सात
उत्तर:
(A) भाग तीन

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

9. निम्नलिखित संशोधन ने मताधिकार की आयु 18 वर्ष की है
(A) 54वाँ संशोधन
(B) 55वाँ संशोधन
(C) 63वाँ संशोधन
(D) 64वाँ संशोधन
उत्तर:
(B) 55वाँ संशोधन

10. निम्नलिखित संशोधन द्वारा अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की अवधि 2020 तक कर दी है
(A) 54वाँ संशोधन
(B) 55वाँ संशोधन
(C) 95वाँ संशोधन
(D) 78वाँ संशोधन
उत्तर:
(C) 95वाँ संशोधन

11. भारतीय संविधान में संशोधन करने का अधिकार
(A) राष्ट्रपति के पास है
(B) प्रधानमंत्री के पास है
(C) केवल संसद के पास है
(D) संसद तथा राज्यों के विधानमंडल, दोनों इसमें भाग लेते हैं
उत्तर:
(C) केवल संसद के पास है

12. भारतीय संघ में नए राज्यों को शामिल करने से संबंधित संशोधन
(A) संसद अपने दोनों सदनों के साधारण बहुमत से कर सकती है
(B) संसद दोनों सदनों के 2/3 बहुमत से कर सकती है
(C) राष्ट्रपति कर सकता है
(D) संसद के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत व आधे राज्यों की स्वीकृति से किया जा सकता है
उत्तर:
(A) संसद अपने दोनों सदनों के साधारण बहुमत से कर सकती है

13. राष्ट्रपति के निर्वाचन के ढंग से संबंधित संशोधन
(A) संसद अपने साधारण बहुमत से कर सकती है
(B) संसद के दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत से किया जा सकता है
(C) संसद के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत व आधे राज्यों की स्वीकृति से किया जा सकता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) संसद के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत व आधे राज्यों की स्वीकृति से किया जा सकता है

14. भारतीय लोकतंत्र को प्रभावित करने वाले सामाजिक एवं आर्थिक कारक निम्नलिखित हैं
(A) गरीबी
(B) निरक्षरता
(C) बेरोज़गारी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:

15. लोकतंत्रीय परंपराओं को शक्तिशाली बनाने वाले तत्त्व हैं
(A) प्रस्तावना
(B) लोकतांत्रिक विरासत
(C) आर्थिक योजनाएँ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

16. भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में वर्तमान में कितनी भाषाओं को मान्यता दी गई है?
(A) 20 भाषाओं को
(B) 22 भाषाओं को
(C) 24 भाषाओं को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) 22 भाषाओं को

17. संपत्ति के अधिकार का वर्तमान स्वरूप कैसा है?
(A) संवैधानिक अधिकार
(B) नैतिक अधिकार
(C) मूल अधिकार
(D) सामाजिक अधिकार
उत्तर:
(A) संवैधानिक अधिकार

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दें

1. कौन-से सवैधानिक संशोधन के द्वारा अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की अवधि सन् 2030 तक बढ़ाई गई?
उत्तर:
104वें सवैधानिक संशोधन के द्वारा।

2. क्या संसद मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती है?
उत्तर:
हाँ, संसद मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती है, परंतु संविधान के मूल ढाँचे में परिवर्तन नहीं कर सकती।

3. संपत्ति के अधिकार का वर्तमान स्वरूप संविधान में कैसा है?
उत्तर:
संपत्ति के अधिकार का वर्तमान स्वरूप संविधान में अब एक कानूनी तथा संवैधानिक अधिकार के रूप में है, मूल अधिकार के रूप में नहीं है।

4. संविधान के किस संशोधन को ‘लघु संविधान’ (Mini Constitution) कहकर पुकारा जाता है?
उत्तर:
संविधान में किए गए 42वें संशोधन को ‘लघु संविधान’ कहकर पुकारा जाता है।

5. भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में वर्तमान में कितनी भाषाओं को मान्यता दी गई है?
उत्तर:
22 भाषाओं को वर्तमान में सवैधानिक मान्यता प्राप्त है।

रिक्त स्थान भरें

1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद ………. में संशोधन विधि का उल्लेख किया गया है।
उत्तर:
368

2. भारतीय संविधान में अब तक कुल ……………. संशोधन हो चुके हैं।
उत्तर:
104

3. दिसम्बर, 2019 में भारतीय संविधान में ………….. संवैधानिक संशोधन हुआ।
उत्तर:
एस.सी. एवं एस.टी आरक्षण सम्बन्धी

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

4. भारतीय संविधान अंशतः …………… और अंशतः ……………. है।
उत्तर:
लचीली एवं कठोर

5. भारतीय संविधान में सम्पत्ति का अधिकार एक …………. है।
उत्तर:
साधारण कानूनी अधिकार

6. ……………. मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती है।
उत्तर:
संसद

7. भारतीय संविधान में मतदान आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष ………… संवैधानिक संशोधन द्वारा की गई है।
उत्तर:
61वें

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