Class 11

HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
12वीं शताब्दी में यायावरिता के स्वरूप का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मंगोल मध्य एशिया के आधुनिक मंगोलिया प्रदेश में रहने वाला एक यायावर समूह था। 12वीं शताब्दी में चंगेज़ खाँ के उत्थान से पूर्व मंगोल यायावरिता के स्वरूप की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. प्रमुख व्यवसाय (Chief occupations):
12वीं शताब्दी में यायावरी कबीलों का प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था। उस समय मंगोलिया में अनेक अच्छी चरागाहें थीं। अल्ताई पहाड़ों की बर्फीली चोटियों से निकलने वाले सैंकड़ों झरनों तथा ओनोन (Onon) एवं सेलेंगा (Selenga) नदियों के पानी के कारण यहाँ हरी घास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती थी।

मंगोल जिन पशुओं का पालन करते थे उनमें प्रमुख थे घोड़े एवं भेड़ें। इनके अतिरिक्त वे गायों, बकरियों एवं ऊँटों का पालन भी करते थे। इन पशुओं का प्रयोग वे दूध, माँस एवं ऊन प्राप्त करने के लिए तथा सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढोने के लिए करते थे। घोड़ों का प्रयोग वे घुड़सवारी के लिए करते थे। मंगोल घोड़ों पर सवार होकर ही युद्धों में भाग लेते थे।

कुछ मंगोल शिकार संग्राहक (hunter gatherers) थे। वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे एवं मछलियाँ पकडते थे। वे साइबेरियाई वनों में रहते थे। वे पशुपालक लोगों की तुलना में अधिक गरीब होते थे। उस समय मंगोलिया की भौगोलिक परिस्थितियाँ कृषि के अनुकूल नहीं थीं। अतः यायावरी कबीले कृषि कार्य नहीं करते थे। इस कारण यायावरी कबीलों की अर्थव्यवस्था घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों का भरण-पोषण करने में समर्थ नहीं थी। अतः यहाँ कोई नगर नहीं उभर पाया।

2. निवास स्थान (Dwellings):
यायावरी कबीले चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। अतः वे किसी स्थान में स्थाई रूप से नहीं रहते थे। मंगोल गोलाकार तंबुओं में रहते थे जिसे वे जर (ger) कहते थे। जनसाधारण लोगों के तंबू छोटे आकार के होते थे। धनी लोगों के तंबुओं का आकार बड़ा होता था। ये तंबु सन के बने होते थे। इन तंबुओं का प्रवेश द्वार दक्षिण की ओर होता था। इसका कारण यह था कि मंगोलिया में शीत हवाएँ उत्तर की ओर से आती थीं। तंबू को दो भागों में बाँटा जाता था। एक भाग मेहमानों के लिए होता था। दूसरा भाग घर के सदस्यों के लिए होता था।

3. समाज (Society):
यायावरी समाज की मूल इकाई परिवार थी। उस समय परिवार पितृपक्षीय (patriarchal) होते थे। परिवार का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति इसकी देखभाल करता था। धनी परिवार बहुत विशाल होते थे। उनके पास अधिक संख्या में पशु एवं चारागाहें होती थीं। इस कारण उनके अनेक अनुयायी होते थे तथा स्थानीय राजनीति में उनकी उल्लेखनीय भूमिका होती थी।

प्राकृतिक आपदाओं जैसे भीषण शीत ऋतु के दौरान एकत्रित की गई शिकार एवं अन्य सामग्रियों के समाप्त हो जाने की स्थिति में अथवा वर्षा न होने पर घास के मैदानों के सूख जाने की स्थिति चारागाहों की खोज में भटकना पड़ता था।

इस कारण वे लटपाट करने के लिए बाध्य हो जाते थे। अतः परिवारों के समूह अपनी रक्षा हेतु अधिक शक्तिशाली कुलों से मित्रता कर लेते थे तथा परिसंघ का गठन कर लेते थे। अधिकांश परिसंघ छोटे एवं अल्पकालिक होते थे। उस समय परिवार में पुत्र का होना बहुत आवश्यक माना जाता था।

उस समय मंगोल समाज में बहु-विवाह (polygamy) प्रथा प्रचलित थी। उस समय स्त्रियाँ समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। वे न केवल घरेलू कार्य करती थीं अपितु आवश्यकता पड़ने पर रणभूमि में दुश्मनों से लोहा लेती थीं।

4. भोजन (Diet) :
यायावरी लोगों का प्रमुख भोजन माँस एवं दूध था। मंगोल घोड़े का माँस खाने के बहुत शौकीन थे। वे गायों, भेड़ों एवं बकरियों का माँस भी खाते थे। इनके अतिरिक्त वे कुत्तों, लोमड़ियों, खरगोशों तथा चूहों का माँस भी खाते थे। वे सामान्य तौर पर पकाए हुए अथवा उबले हुए माँस का प्रयोग करते थे। कभी-कभी वे कच्चा माँस भी खा जाते थे। बचे हुए माँस को वे चमड़े के थैले में रख लेते थे।

वे खाने के बर्तनों की सफाई की ओर बहुत कम ध्यान देते थे। वे घोड़ी का दूध पीने के बहुत शौकीन थे। इसे कुम्मी (kumiss) कहा जाता था। धनी लोग शराब पीने के भी शौकीन थे। इसे. चीन से मंगवाया जाता था। इसके सेवन को बहुत सम्मानजनक समझा जाता था।

5. पोशाक (Dress):
यायावरी लोग सूती, रेशमी एवं ऊनी वस्त्र पहनते थे। वे सूती एवं रेशमी वस्त्रों का चीन से आयात करते थे। ऊनी वस्त्र वे स्वयं बनाते थे। जनसाधारण के वस्त्र सामान्य प्रकार के होते थे। धनी लोग बहुमूल्य वस्त्रों को धारण करते थे। सर्दियों से बचाव के लिए वे फर के कोट एवं टोप पहनते थे। स्त्रियों के वस्त्र एवं उनके सिर पर डालने वाला टोप विशेष प्रकार से बना होता था।

6. मृतकों का संस्कार (Disposal of the Dead):
यायावरी लोग रात्रि के समय अपने मृतकों का संस्कार करते थे। वे शवों को जमीन में दफ़न करते थे। मंगोल मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे। अतः वे शवों के साथ खाने-पीने की वस्तुएँ एवं बर्तनों आदि को भी रखते थे। धनी व्यक्तियों के साथ अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ, उसके घोड़ों, नौकरों एवं स्त्रियों को भी दफ़न किया जाता था। प्रायः शवों को उस स्थान पर दफ़न किया जाता था जिसका चुनाव उसने अपने जीवनकाल में किया हो अथवा जो स्थान उसे सबसे अधिक प्रिय हो।

7. व्यापार (Trade):
स्टेपी क्षेत्र अथवा मंगोलिया में संसाधनों की बहुत कमी थी। अतः यायावरी कबीले व्यापार के लिए अपने पड़ोसी देश चीन पर निर्भर करते थे। उनका व्यापार वस्तु-विनिमय (barter) पर आधारित था। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी थी। यायावर कबीले चीन से कृषि उत्पाद एवं लोहे के उपकरणों का आयात करते थे। इनके बदले वे घोड़ों, फर एवं शिकारी जानवरों का निर्यात करते थे।

कभी-कभी दोनों पक्ष अधिक लाभ कमाने हेतु सैनिक कार्यवाही कर बैठते थे एवं लूटपाट में भी सम्मिलित हो जाते थे। इस संघर्ष में यायावरों को कम हानि होती थी। इसका कारण यह था कि वे लूटपाट कर संघर्ष क्षेत्र से दूर भाग जाते थे। चीन को इन यायावरी आक्रमणों से बहुत क्षति पहुँचती थी। अतः चीनी शासकों ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए ‘चीन की महान् दीवार’ को अधिक मज़बूत किया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 2.
चंगेज़ खाँ कौन था? उसके प्रारंभिक जीवन एवं उत्थान के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ यायावर साम्राज्य अथवा मंगोलों का सबसे महान् एवं प्रसिद्ध शासक था। चंगेज़ खाँ के प्रारंभिक जीवन के बारे में हमें अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। प्राप्त स्रोतों के आधार पर हमें जो जानकारी प्राप्त हुई है उसका संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित अनुसार है

1. जन्म एवं माता-पिता (Birth and Parents):
चंगेज़ खाँ का जन्म कब हुआ इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। अधिकांश इतिहासकारों का कथन है कि चंगेज़ खाँ का जन्म 1162 ई० में हुआ। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि चंगेज खाँ का जन्म 1167 ई० में हुआ। चंगेज़ खाँ का जन्म मंगोलिया के उत्तरी भाग में ओनोन नदी के निकट हुआ था। उसके पिता का नाम येसूजेई (Yesugei) था। वह एक छोटे से कबीले कियात (Kiyat) का मुखिया था। वह बोरजिगिद (Borjigid) कुल से संबंधित था।

चंगेज खाँ की माता का नाम ओलुन-के (Oelun-eke) था। वह ओंगीरत (Onggirat) कबीले से संबंधित थी। चंगेज खाँ का बचपन का नाम तेमुजिन (Temujin) था। कहा जाता है कि जिस समय बालक का जन्म हुआ उस समय उसका पिता येसूजेई अपने एक विरोधी तातार (Tatar) कबीले के मुखिया तेमुजिन को पराजित कर वापस लौटा था। अत: मंगोलियाई परंपरा के अनुसार नव जन्मे बालक का नाम तेमुजिन रखा गया।

2. तेमुजिन की कठिनाइयाँ (DImculties of Temujin):
तेमुजिन की अल्पायु में उसके पिता येसूजेई की धोखे से तातार कबीले द्वारा हत्या कर दी गई थी। येसूजेई की हत्या का समाचार सुनकर तेमुजिन की माँ ओलुन इके पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने पाँच बच्चों को लेकर कहाँ जाए। कियात कबीले के लोग तेमुजिन को अपना मुखिया स्वीकार करने को तैयार नहीं थे क्योंकि वह स्वयं अभी एक बच्चा था।

इस संकट के समय में ओलुन-इके ने अपना धैर्य न खोया। वह शिकार कर एवं जंगली फल खाकर अपना एवं अपने बच्चों का गुजारा करती रही। वह तेमुजिन को अपने कबीले की गौरव गाथाएँ सुनाकर एक नई प्रेरणा स्रोत उत्पन्न करती रही।

3. तेमुजिन के बहादुरी भरे कारनामे (Acts of Bravery of Temujin):
तेमुजिन जब युवा हुआ तो उसमें अदम्य उत्साह था। एक बार उसके विरोधी कबीले वालों ने तेमुजिन पर अचानक आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया। निस्संदेह यह तेमुजिन के लिए सबसे विकट स्थिति थी।

ऐसे समय में तेमुजिन ने अपना धैर्य न खोया। एक दिन जब कबीले के लोग रंगरलियों में मस्त थे तो यह स्वर्ण अवसर देखकर तेमुजिन वहाँ से भागने में सफल हुआ। वह वापस अपने परिवार के सदस्यों के साथ आ मिला। यह घटना उसके जीवन में एक नया मोड़ सिद्ध हुई। एक दिन कुछ चोरों ने तेमुजिन के परिवार के आठ घोड़ों को चुरा लिया।

जब तेमुजिन को इसका पता चला तो वह फौरन अपने घोड़े पर अकेला ही उनके पीछे हो लिया। रास्ते में बोघूरचू (Boghurchu) नामक एक युवक उसके साथ हो लिया। इन दोनों ने चोरों को घेर लिया तथा अत्यंत बहादुरी से अपने घोड़ों को छुड़वा लिया। इस प्रकार बोधूरचू तेमुजिन का प्रथम मित्र बना। वे सदैव एक विश्वस्त साथी के रूप में एक-दूसरे के साथ रहे। जब तेमुजिन 18 वर्ष का हुआ तो उसका विवाह बोरटे के साथ हो गया। इस विवाह के कारण तेमुजिन की स्थिति कुछ सुदृढ़ हुई।

तेमुजिन ने जमूका (Jamuqa) को जो कि जजीरात (Jajirat) कबीले से संबंधित था को अपना सगा भाई (आंडा anda) बनाया। इसके पश्चात् तेमुजिन तुगरिल खाँ (Tughril Khan) अथवा ओंग खाँ (Ong Khan) से आशीर्वाद लेने उसके दरबार में पहुंचा।

वह कैराईट (Kereyite) कबीले का मुखिया था तथा तेमुजिन के पिता का सगा भाई (आंडा) बना था। तुगरिल खाँ ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। इसी समय के दौरान मेरकिट (Merkit) कबीले के मुखिया ने तेमुजिन के कैंप पर आक्रमण कर दिया तथा उसकी पत्नी बोरटे को बंदी बनाकर अपने साथ ले गया।

इस संकट के समय में जमूका एवं तुगरिल खाँ ने तेमुजिन की बहुमूल्य सहायता की। अत: वह अपनी पत्नी बोरटे को मेरकिट कबीले के चंगुल से छुड़ाने में सफल रहा। प्रसिद्ध इतिहासकार जॉर्ज वर्नडस्की के अनुसार, “मेरकिटों के विरुद्ध अभियान के दौरान तेमुजिन ने बहुत बहादुरी दिखायी तथा उसने अनेक नए मित्र बनाए। वास्तव में यह उसके जीवन में एक नया मोड़ प्रमाणित हुई।”

4. तेमुजिन का चंगेज खाँ बनना (Temujin became Genghis Khan):
अपनी आरंभिक सफलताओं न का साहस बढ़ गया था। इसी समय जमूका, तेमुजिन एवं तुगरिल खाँ के मध्य बढ़ते हुए मैत्रीपूर्ण संबंधों के कारण ईर्ष्या करने लगा। उसने तेमुजिन के सभी विरोधी कबीलों के साथ गठजोड़ आरंभ कर दिया था। तेमुजिन इसे सहन करने को तैयार नहीं था। अतः उसने तुगरिल खाँ के सहयोग से जमूका को कड़ी पराजय दी।

निस्संदेह यह तेमुजिन की एक महान् सफलता थी। इसके पश्चात् तेमुजिन ने शक्तिशाली तातार, नेमन एवं कैराईट कबीलों को पराजित किया। स्वयं तुगरिल खाँ जो बाद में तेमुजिन का शत्रु बन गया था उससे पराजित हुआ।

इस कारण तेमुजिन स्टेपी क्षेत्र की राजनीति में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में उभरा। तेमुजिन की इन महान् उपलब्धियों को देखते हुए कुरिलताई (quriltai) जो कि मंगोल सरदारों की एक सभा थी, ने 1206 ई० में उसे चंगेज़ खाँ (सार्वभौम शासक) की उपाधि से सम्मानित किया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 3.
चंगेज खाँ की विजयों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। उसकी सफलता के क्या कारण थे?
उत्तर:
1206 ई० में चंगेज़ खाँ मंगोलों का नया शासक बना। उसने सर्वप्रथम अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने की ओर ध्यान दिया। इस उद्देश्य से चंगेज़ खाँ ने अपनी एक विधि संहिता यास (Yasa) को लागू किया। इसके पश्चात् उसने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया। इस सेना के सहयोग से चंगेज खाँ ने महान् सफलताएँ प्राप्त की। इन सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. उत्तरी चीन की विजय (Conquest of Northern China):
चंगेज़ खाँ ने सर्वप्रथम अपना ध्यान चीन की ओर दिया। उस समय चीन तीन राज्यों में विभाजित था। प्रथम राज्य उत्तर-पश्चिमी प्रांत था। यहाँ तिब्बती मूल के सी सिआ (Hsi Hsia) लोगों का शासन था। दूसरे राज्य में चीन का उत्तरी क्षेत्र आता था। यहाँ चिन राजवंश का शासन था। तीसरे राज्य में चीन का दक्षिणी क्षेत्र सम्मिलित था। यहाँ शंग राजवंश का शासन था।

चीन पर आक्रमण करने से पूर्व चंगेज़ खाँ ने अपनी सेना को संबोधित करते हुए कहा, “चीन के शासकों ने हमारे पूर्वजों एवं मेरे संबंधियों का बहुत अपमान किया है। अब वह महान् परमात्मा मुझे यह भरोसा दिलाता है कि विजय हमारी होगी। चीन के इस राज्य में उसने मुझे अवसर एवं शक्ति दी है ताकि मैं अपने पूर्वजों के अपमान का बदला ले सकूँ।

चीन के विरुद्ध चंगेज़ खाँ का अभियान एक लंबे समय तक चला। 1209 ई० में चंगेज़ खाँ ने सर्वप्रथम सी सिआ लोगों को सुगमता से पराजित कर दिया। 1215 ई० में चंगेज़ खाँ ने पीकिंग (Peking) पर कब्जा करने में सफलता प्राप्त की। इसके पश्चात् चंगेज़ खाँ ने पीकिंग में भयंकर लूटमार मचाई। चिन शासक को भी बाध्य होकर अपनी एक पुत्री का विवाह चंगेज़ खाँ से करना पड़ा। चंगेज़ खाँ की यह विजय उसके लिए बहुत निर्णायक सिद्ध हुई।

2. करा खिता की विजय (Conquest of Qara Khita):
चंगेज़ खाँ ने उत्तरी चीन की विजय के पश्चात् अपना ध्यान करा खिता की विजय की ओर किया। इस उद्देश्य से उसने 1218 ई० में 20,000 सैनिकों को मंगोल सेनापति जेब (Jeb) की अधीनता में करा खिता भेजा। उस समय करा खिता में कुचलुग (Kuchlug) का शासन था।
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 5 iMG 1

जेब ने सुगमता से कुचलुग को पराजित कर करा खिता पर अधिकार कर लिया। इस विजय के कारण मंगोल साम्राज्य की सीमाएँ अमू दरिया (Amu Darya), तूरान (Turan) एवं ख्वारज़म (Khwarazm) राज्य तक फैल गईं।

3. ख्वारज़म शाह के विरुद्ध अभियान (The Campaign against the Khwarazm Shah):
1200 ई० में मुहम्मद (Muhammad) ख्वारज़म का नया शाह बना था। उसने अपने शासनकाल में अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर अपने साम्राज्य का काफी विस्तार कर लिया था। ऐसे शक्तिशाली साम्राज्य से टक्कर लेना चंगेज़ खाँ के लिए कोई सहज कार्य न था। 1218 ई० में चंगेज़ खाँ ने चार सदस्यों का एक व्यापारिक मंडल मुहम्मद के पास भेजा।

जब यह मंडल ख्वारजम साम्राज्य के ओट्रार (Otrar) नामक स्थान पर ठहरा तो वहाँ के गवर्नर इनाल खाँ (Inal Khan) ने मुहम्मद के इशारे पर इन सदस्यों का वध कर दिया तथा उनका सामान लूट लिया। जब यह समाचार चंगेज़ खाँ को मिला तो उसने मुहम्मद को संदेश भेजा कि वह इनाल खाँ के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करे तथा उसे बंदी बनाकर उसके दरबार में भेजे। मुहम्मद ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप चंगेज़ खाँ आग बबूला हो गया। उसने मुहम्मद को एक अच्छा सबक सिखाने का निर्णय किया।

उसने लगभग एक लाख सैनिकों की विशाल सेना के साथ ख्वारज़म साम्राज्य पर 1219 ई० में आक्रमण कर दिया। मंगोल सेना ने जिस ओर रुख किया वही भयंकर तबाही मचा दी। लाखों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया एवं अनेक नगरों एवं गाँवों का ऐसा विनाश किया गया कि जिसे सुनकर रूह भी काँप उठे। 1219 ई० से 1222 ई० के दौरान मंगोल सेना ने ओट्रार (1219 ई०), बुखारा (1220 ई०), समरकंद (1220 ई०), बल्ख (1221 ई०), मर्व (1221 ई०), निशापुर (1221 ई०) एवं हेरात (1222 ई०) पर कब्जा कर लिया। मुहम्मद ने मंगोल सेना का सामना करने का साहस न किया।

वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागता रहा। उसका पीछा करते हुए मंगोल सेनाएँ अज़रबैजान (Azerbaizan) तक चली गईं। यहाँ मंगोल सेना ने क्रीमिया (Crimea) में रूसी सेना को कड़ी पराजय दी। मुहम्मद का पुत्र जलालुद्दीन भाग कर भारत आ गया। चंगेज़ खाँ उसका पीछा करता हुआ 1221 ई० में भारत आ पहुँचा। यहाँ की भयंकर गर्मी के कारण एवं चंगेज़ खाँ के ज्योतिषी द्वारा दिए गए अशुभ संकेतों के कारण चंगेज़ खाँ ने वापस मंगोलिया लौटने का निर्णय किया।

4. साम्राज्य का विस्तार (Extent of the Empire):
चंगेज़ खाँ की 1227 ई० में मृत्यु हो गई थी। अपनी मृत्यु से पूर्व उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। उसका साम्राज्य अब फ़ारस से लेकर पीकिंग तक तथा साईबेरिया से लेकर सिंध तक फैला था। यह साम्राज्य इतना विशाल था कि किसी भी यात्री को मंगोल साम्राज्य की यात्रा एक सिरे से दूसरे सिरे तक करने के लिए दो वर्ष का समय लग जाता था। चंगेज़ खाँ ने कराकोरम (Karakoram) को मंगोल साम्राज्य की राजधानी घोषित किया था।

चंगेज़ खाँ की गणना विश्व के महान् विजेताओं में की जाती है। उसने 20 वर्ष के अल्प काल में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर सबको स्तब्ध कर दिया था। उसकी सफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे
1) चंगेज़ खाँ स्वयं जन्मजात सेनापति था। वह जिस ओर रुख करता सफलता उसके कदम चूमती थी।

2) चंगेज़ खाँ ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया था। यह सेना बहुत अनुशासित थी। इस सेना का मुकाबला करना कोई सहज कार्य न था।

3) चंगेज़ खाँ का जासूसी विभाग अत्यंत कुशल था। उनके द्वारा दी गई जानकारी उसके लिए बहुत बहुमूल्य सिद्ध होती थी।

4) चंगेज़ खाँ मनोवैज्ञानिक युद्ध (psychological warfare) के महत्त्व को भली-भाँति जानता था। अत: जब भी किसी स्थान के लोग उसकी सेना का मुकाबला करने का साहस करते तो उसकी सेना वहाँ इतना विनाश करती जिसे सुनकर लोग थर-थर काँपने लगते थे। अतः लोग बिना लड़ाई किए ही उसके समक्ष आत्म-समर्पण कर देते थे।

5) मंगोल सैनिक घुडसवारी एवं तीरंदाजी में इतने कशल थे कि शत्र भौचक्के रह जाते थे।

6) चंगेज़ खाँ आमतौर पर शीत ऋतु में अपने अभियान आरंभ करता था। इस ऋतु में नदियाँ बर्फ के कारण जम जाती थीं। अत: इन नदियों को पार करना सुगम हो जाता था।

7) चंगेज़ खाँ ने शत्रु दुर्गों को नष्ट करने के लिए घेराबंदी यंत्र (siege engine) एवं नेफ़था (naphtha) बमबारी का व्यापक प्रयोग किया। इनके युद्ध में घातक प्रभाव होते थे। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार,

“यद्यपि चंगेज़ ख़ाँ अनपढ़ था किंतु वह साइरस, डेरियस तथा सिकंदर से महान् सेनापति था तथा उसके कारनामों ने नेपोलियन तथा हिटलर को भी मात कर दिया था।”

प्रश्न 4.
मंगोल प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
अथवा
मंगोल प्रशासन के सैनिक एवं नागरिक प्रशासन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ यद्यपि अपना संपूर्ण जीवन युद्धों में ही उलझा रहा इसके बावजूद वह एक कुशल प्रशासक भी प्रमाणित हुआ। उसने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया। उसने नागरिक प्रशासन में भी अनेक उल्लेखनीय सुधार किए। उसका प्रशासन इतना अच्छा था कि यह लगभग उसी रूप में उसके उत्तराधिकारियों के समय में भी जारी रहा।

I. सैनिक प्रशासन
चंगेज़ खाँ एक महान् योद्धा था। अत: उसने मंगोल साम्राज्य के विस्तार एवं इसकी सुरक्षा के लिए सैनिक प्रशासन की ओर विशेष ध्यान दिया। मंगोलों के सैनिक प्रशासन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. भर्ती (Recruitment):
चंगेज़ खाँ के समय सभी स्वस्थ व्यक्तियों के लिए सेना में भर्ती होना अनिवार्य था। केवल पुरोहितों, डॉक्टरों एवं विद्वानों को इसमें छूट दी गई थी। अधिकारियों की भर्ती का कार्य केवल चंगेज़ खाँ के हाथों में था। प्रायः ऊँचे और बहुत ही विश्वसनीय अधिकारियों के पुत्रों को अफसर पद पर नियुक्त किया जाता था।

2. संगठन (Organization) :
चंगेज़ खाँ की सेना पुरानी दशमलव पद्धति के अनुसार गठित की गई थी। यह 10, 100, 1000 एवं 10,000 सैनिकों की इकाइयों में विभाजित थी। 10 सैनिकों की इकाई को पलाटून, 100 सैनिकों की इकाई को कंपनी, 1000 सैनिकों की इकाई को ब्रिगेड तथा 10,000 सैनिकों की इकाई को तुमन कहा जाता था। चंगेज़ खाँ से पूर्व एक इकाई में एक ही कुल (clan) अथवा कबीले (tribe) के सैनिक होते थे। चंगेज़ खाँ ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया। उसकी इकाइयों में विभिन्न कुलों एवं कबीलों के सैनिकों को सम्मिलित किया जाता था।

3. रचना (Composition):
चंगेज़ खाँ की सेना में विभिन्न मंगोल जनजातियों के लोग सम्मिलित थे। उसने विभिन्न देशों के लोगों को जिन्हें उसने अपने अधीन किया, को भी सेना में भर्ती किया। इसमें उसकी सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार करने वाले तुर्की मूल के उइगुर (Uighurs) लोग सम्मिलित थे। यहाँ तक कि चंगेज़ खाँ ने अपनी सेना में कैराईटों (Kereyits) को भी सम्मिलित किया। कैराईट चंगेज़ खाँ के कट्टर शत्र थे।

4. प्रशिक्षण (Training):
चंगेज़ खाँ ने सैनिकों के प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया। उसने संपूर्ण सेना को अपने चार पुत्रों के अधीन किया। वे विशेष कप्तानों को नियुक्त करते थे जिन्हें नोयान (noyans) कहा जाता था। इनके अतिरिक्त सैनिकों को प्रशिक्षण देने में ऐसे व्यक्तियों ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जिन्हें चंगेज़ खाँ अपना सगा भाई (आंडा) कहता था।

5. अनुशासन (Discipline):
चंगेज़ खाँ सेना में अनुशासन को विशेष महत्त्व देता था। उसने सेना में अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से अनेक नियम बनाए थे। इनका उल्लंघन करने वाले सैनिकों को मृत्यु दंड दिया जाता था। ये नियम थे-

  • युद्ध के आरंभ होने पर छुट्टी पर गए सभी सैनिक तुरंत रिपोर्ट करें।
  • सभी सैनिकों के लिए आवश्यक था कि वे अपने अधिकारियों के आदेश का पालन करें।
  • कोई भी सैनिक अपनी इकाई को छोड़कर किसी दूसरी इकाई में नहीं जा सकता था।
  • युद्ध में जाने से पहले सभी सैनिकों को अपने हथियारों का निरीक्षण कर लेना चाहिए।
  • कोई भी सैनिक अपने अधिकारियों की अनुमति के बिना लूटपाट न करे।
  • अधिकारियों द्वारा अनुमति मिलने पर ही लूटपाट आरंभ की जाए। लूट के धन से अधिकारियों एवं खाँ का हिस्सा दिया जाना चाहिए।

6. सेना की कुल संख्या (Total Strength of the Army):
चंगेज़ खाँ की सेना की कुल संख्या के बारे में इतिहासकारों में मतभेद हैं। इसका कारण यह है कि आरंभ में उसकी सेना की संख्या कम थी। जैसे-जैसे उसके साम्राज्य का विस्तार होता गया वैसे-वैसे उसके सैनिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती चली गई। अनुमानतयः यह 1 लाख से 1.5 लाख के मध्य थी।।

7. हथियार एवं सामान (Arms and Equipments):
उस समय घुड़सवार सेना का युग था। अतः प्रत्येक सैनिक के पास एक से अधिक घोड़े होते थे। ये घोड़े बहुत फुर्तीले थे। प्रत्येक घोड़ा एक दिन में सहजता से 100 मील दौड़ सकता था। हल्के घुड़सवार (light cavalry) सैनिकों के पास दो धनुष (bows) एवं दो तरकस (quivers) होते थे जिनमें अनेक तीर रखे जाते थे। मंगोल सैनिक तीरअंदाज़ी में बहुत कुशल थे।

उनके द्वारा छोड़े गए तीर 200 से 300 गज की दूरी तक तबाही मचाने की समर्था रखते थे। उनके तीर इतने नुकीले होते थे कि वे लोहे में भी सुराख कर सकते थे। ये तीर शत्रु सेना में तहलका मचा देते थे। भारी घुड़सवार (heavy cavalry) सैनिक तलवारों एवं भालों से लैस होते थे। मंगोल सैनिक इन्हें चलाने में बहुत दक्ष थे। इनके अतिरिक्त मंगोल सैनिक शत्रु के दुर्गों का विनाश करने के लिए घेराबंदी यंत्र (siege engine) एवं नेफ़था बमबारी (naphtha bombardment) का प्रयोग करते थे।

प्रत्येक मंगोल सैनिक लोहे का टोप (helmet) छाती एवं भुजाओं पर लोहे के कवच (armour) डालते थे। वे चमड़े के भारी बूट डालते थे। वे सर्दियों में फर का कोट एवं फर का टोप पहनते थे। प्रत्येक सैनिक के पास एक चमड़े का बैग होता था। इसमें कुछ खाने-पीने का सामान, व रखे जाते थे। घोड़ों की सुरक्षा के लिए उन्हें चमड़े का कवच पहनाया जाता था।

8. लड़ाई का ढंग (Mode of warfare):
कोई भी अभियान आरंभ करने से पूर्व मंगोल खानों द्वारा कुरिलताई की सभा का आयोजन किया जाता था। इसमें युद्ध के उद्देश्यों एवं योजना के संबंध में विस्तृत चर्चा की जाती थी। इस सभा में सभी कप्तान सम्मिलित होते थे तथा वे खाँ से विशेष निर्देश प्राप्त करते थे। युद्ध आरंभ होने से पूर्व मंगोल जासूसों द्वारा शत्रु देश में झूठी अफ़वाहें फैलाई जाती थीं। इसका उद्देश्य शत्रु सैनिकों के मनोबल को नीचा करना था। शत्रु देश के सैनिकों को बिना लड़ाई के आत्म-समर्पण करने अथवा विनाश की चेतावनी दी जाती थी।

मंगोल सैनिक जिस प्रदेश पर आक्रमण करना होता था उसे चारों ओर से घेरा डाल लेते थे। यदि किसी स्थान पर शत्रु सेना का सामना करना पड़ता तो मंगोल सैनिक वहाँ से पीछे भागने का नाटक करते। शत्रु सेना उन्हें भगौड़ा समझ कर उनका पीछा करती। निश्चित स्थान पर पहुँचने पर मंगोल सैनिक शत्रु सेना पर टूट पड़ते एवं उन्हें कड़ी 167 पराजय देते। इसके पश्चात् मंगोल वहाँ इतनी भयंकर लूटमार करते कि उनका नाम सुनते ही लोग भयभीत हो जाते थे। इससे मंगोलों की विजय का काम सुगम हो जाता था। प्रसिद्ध इतिहासकार जॉर्ज वनडस्की के अनुसार,

“13वीं शताब्दी में मंगोल सेना युद्ध का एक शक्तिशाली यंत्र थी। निस्संदेह यह उस समय के विश्व में सर्वोत्तम थी।”

II. नागरिक प्रशासन

मंगोल यायावर समाज से संबंधित थे। इसलिए उनका नागरिक प्रशासन न तो अधिक उत्तम था एवं न ही अच्छी प्रकार संगठित । इसके बावजूद यह उस समय की परिस्थितियों के अनुकूल था। मंगोलों के नागरिक प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. खाँ की स्थिति (Position of Khan):
मंगोल साम्राज्य में खाँ (सम्राट) की स्थिति सर्वोच्च थी। उसे असीम शक्तियाँ प्राप्त थीं। उसके द्वारा राज्य की सभी आंतरिक एवं बाह्य नीतियाँ तैयार की जाती थीं। राज्य की समस्त सेना उसके अधीन होती थी तथा उसके निर्देश अनुसार कार्य करती थी। राज्य के सभी उच्च पदों की नियुक्ति चाहे वे सैनिक हों अथवा असैनिक उसके द्वारा की जाती थी।

उसे किसी देश के साथ युद्ध करने अथवा उससे संधि करने का अधिकार प्राप्त था। वह प्रजा पर कोई भी नया कर लगा सकता था अथवा पुराने करों को हटा सकता था अथवा उन्हें कम या अधिक कर सकता था। उसके मुख से निकला प्रत्येक शब्द प्रजा के लिए कानून होता था। कोई भी व्यक्ति इसका उल्लंघन नहीं कर सकता था। ऐसा करने पर उसे मृत्यु दंड दिया जाता था। यद्यपि खाँ की शक्ति किसी तानाशाह से कम नहीं थी किंतु उसकी शक्तियों पर कुरिलताई द्वारा कुछ अंकुश ज़रूर लगाया जाता था।

2. नागरिक प्रशासकों की भूमिका (Role of Civil Administrators):
चंगेज़ खाँ स्वयं अनपढ़ था तथा वह यायावर समाज से संबंधित था। उसने अपनी बहादुरी से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। इसमें विभिन्न जातियों एवं सभ्य समाजों से संबंधित लोग थे। ऐसे लोगों पर शासन करना कोई सुगम कार्य न था। इस कार्य में मंगोल उसकी सहायता करने में असमर्थ थे।

अतः चंगेज़ खाँ ने अपने अधीन किए गए सभ्य समाजों में से नागरिक प्रशासकों को भर्ती किया। चंगेज़ खाँ उनकी भर्ती के समय केवल उनकी योग्यता को प्रमुख रखता था। वह उनकी जाति अथवा धर्म को कोई महत्त्व नहीं देता था। इन नागरिक प्रशासकों ने मंगोल साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ करने एवं उसे संगठित करने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

यहाँ तक कि इन्होंने मंगोल शासकों को प्रशासन के प्रति अपनी नीतियाँ बदलने में काफी सीमा तक प्रभाव डाला। इनमें चीनी मंत्री ये-लू-चुत्साई (Yeh-lu-Chut sai) तथा इल-खानी शासक गज़न खाँ के वज़ीर रशीदुद्दीन (Rashiduddin) के नाम उल्लेखनीय हैं।

3. उलुस (Ulus):
मंगोल प्रशासन की एक उल्लेखनीय विशेषता चंगेज़ खाँ द्वारा उलुस का गठन करना था। इसके अनुसार चंगेज़ खाँ ने नव-विजित क्षेत्रों पर शासन करने का उत्तरदायित्व अपने चारों पुत्रों को दे दिया। उलुस से भाव किसी निश्चित भू-भाग से नहीं था क्योंकि इनमें लगातार परिवर्तन होता रहता था। उलुस में चंगेज़ खाँ के पुत्रों की स्थिति उप-शासक जैसी थी।

उनके अधीन अलग-अलग सैन्य टुकड़ियाँ (तामा) थीं। वे अपने अधीन क्षेत्रों से लोगों को सेना में भर्ती कर सकते थे। उन्हें लोगों पर नए कर लगाने का अधिकार दिया गया था। इसके चलते बाद में जोची ने दक्षिणी रूस में गोल्डन होर्ड (Golden Horde) एवं तोलूई के वंशजों ने चीन में युआन वंश एवं ईरान में इल-खानी वंशों की स्थापना की।

4. याम (Yam) :
चंगेज़ खाँ की एक बहुमूल्य देन याम की स्थापना करना था। याम एक प्रकार की सैनिक चौकियाँ थीं। मंगोल साम्राज्य में प्रत्येक 25 मील की दूरी पर ऐसी चौकियाँ स्थापित की गई थीं। इन चौकियों में घुड़सवार संदेशवाहक तथा फुर्तीले घोड़े सदैव तैनात रहते थे।

घुड़सवार संदेशवाहक सभी प्रकार के सरकारी संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे। इन यामों में ठहरने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए उनके खाने पीने का पूरा इंतजाम किया जाता था। यात्रियों की सुरक्षा के लिए सरकार की तरफ से एक प्रकार के पास जारी किए जाते थे।

इन पासों को फ़ारसी में पैज़ा (paiza) तथा मंगोल भाषा में जेरेज़ (gerege) कहते थे। प्रत्येक याम में यात्रियों को इन पासों के अनुसार सुविधाएँ दी जाती थीं। इन चौकियों के कारण सड़क मार्गों को सुरक्षित बनाया जाता था। इस सुविधा के लिए व्यापारी सरकार को बाज़ (baz) नामक कर देते थे। इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मंगोल सरकार को अपने पशुओं का दसवाँ हिस्सा देते थे। इसे कुबकुर (kubcur) कहा जाता था।

इस संस्था का उद्देश्य मंगोल साम्राज्य के दूरस्थ स्थानों पर नियंत्रण रखना एवं संपूर्ण साम्राज्य की महत्त्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी प्राप्त करना था। याम संस्था अपने उद्देश्य में काफी सीमा तक सफल रही। जॉर्ज वर्नडस्की के अनुसार,

“यह (याम) बहुत ही लाभकारी तथा भली-भाँति संचालित संस्था थी।”

5. यास (Yasa):
मंगोल प्रशासन चलाने में यास की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। यास वे विधि नियम थे जिन्हें चंगेज़ खाँ के शासनकाल में 1206 ई० में कुरिलताई द्वारा पारित किया गया था। इन नियमों को 1218 ई० में अंतिम रूप दिया गया था। ये नियम उसके उत्तराधिकारियों के समय में भी जारी रहे। ये नियम मंगोल सेना, शिकार, डाक प्रणाली, नैतिक एवं सामाजिक व्यवस्था से संबंधित थे।

इन नियमों को मंगोलों ने पराजित लोगों पर भी लागू किया। वास्तव में यास ने मंगोलों को एक सूत्र में पिरोने, उनकी अपनी कबीलाई पहचान बनाए रखने, जटिल शहरी समाजों पर शासन करने तथा एक विश्वव्यापी मंगोल साम्राज्य की स्थापना में प्रशंसनीय योगदान दिया।

6. प्रजा का सुख (Welfare of the Subjects) :
मंगोल प्रशासन की एक अन्य विशेषता यह थी कि मंगोल शासक अपनी प्रजा के सुख का सदैव ध्यान रखते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि चंगेज़ खाँ एवं अन्य मंगोल शासकों ने अनेक प्रदेशों को विजित करने के उद्देश्य से वहाँ भयंकर विनाश किया।

किंतु इन प्रदेशों को अपने साम्राज्य में सम्मिलित करने के पश्चात् वहाँ नगरों का पुनः निर्माण किया तथा शांति व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक पग उठाए। मंगोल शासकों ने सड़क मार्गों को सुरक्षित बनाया। उन्होंने व्यापारियों को बहुत प्रोत्साहन दिया। लोगों पर बहुत कम कर लगाए गए थे।

7. धार्मिक नीति (Religious Policy):
मंगोल शासकों का धर्म में बहुत विश्वास था। वे मुख्य रूप से तेंगरी (Tengri) भाव सूर्य देवता की उपासना करते थे। वे इसे सर्वशक्तिमान् मानते थे। वे इसे प्रसन्न करने के लिए जानवरों एवं विशेषतः घोड़ों की बलियाँ देते थे। वे पवित्र धार्मिक लोगों जिन्हें शामन (shamans) कहा जाता था का विशेष सम्मान करते थे। मंगोल शासकों की विशेषता थी कि उन्होंने सभी धर्मों ईसाई, मुस्लिम, यहूदी, बौद्ध एवं ताओ आदि के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई।

उन्होंने सब धर्मों के लोगों को अपने रीति-रिवाजों का पालन करने की पूर्ण छूट दी थी। उनके साम्राज्य में नौकरियाँ बिना किसी धार्मिक मतभेद के योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। निस्संदेह यायावर समाज के शासकों द्वारा अपनाई गई धार्मिक सहनशीलता की नीति उस युग की एक महान् उपलब्धि थी। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर जे० जे० सांडर्स के अनुसार,

“एशिया के महाद्वीप में कभी भी इतनी धार्मिक स्वतंत्रता नहीं दी गई तथा विभिन्न मिशनरियों ने अपने धर्म का प्रचार करने का इतना प्रयास कभी नहीं किया।”
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 5 iMG 2

क्रम संख्यावर्षघटना
1.1162 ई०तेमुजिन का जन्म।
2.1206 ई。कुरिलताई द्वारा तेमुजिन को चंगेज़ खाँ घोषित करना। चंगेज़ खाँ द्वारा यास की घोषणा।
3.1209 ई०चीन के उत्तर-पश्चिमी प्राँत के सी-सिआ लोगों को पराजित करना।
4.1215 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा पीकिंग पर अधिकार करना।
5.1218 ई。चंगेज़ खाँ द्वारा करा रिता की विजय।
6.1219 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा ओट्रार पर अधिकार।
7.1220 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा बुखारा एवं समरकंद पर अधिकार।
8.1221 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा बल्ख, मर्व एवं निशापुर पर अधिकार।
9.1222 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा हेरात पर अधिकार।
10.1227 ई०चंगेज़ खाँ की मृत्यु।
11.1229-41 ई。ओगोदेई का शासनकाल।
12.1234 ई。ओगोदेई द्वारा चीन पर अधिकार।
13.1236-42 ई०चंगेज़ खाँ के पोते बाटू द्वारा रूस, हंगरी, पोलैंड एवं ऑस्ट्रिया पर अधिकार।
14.1246-48 ई०गुयूक का शासनकाल।
15.1251-59 ई०मोंके का शासनकाल।
16.1254 ई०फ्राँस के शासक लुई नौवें के राजदूत विलियम का मोंके के दरबार में पहुँचना।
17.1258 ई०मंगोलों का बगदाद पर अधिकार एवं अब्बासी वंश का अंत।
18.1260-94 ई०कुबलई खाँ का शासनकाल।
19.1260 ई०कुबलई खाँ द्वारा चीन में यूआन वंश की स्थापना।
20.1275-92 ई०वेनिस यात्री माक्को पोलो द्वारा चीन की यात्रा।
21.1295-1304 ई०गज़न खाँ का शासनकाल।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मंगोल कौन थे ? उनके समाज की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:
मंगोल मध्य एशिया में रहने वाला एक यायावर समूह था। ये लोग मूलतः घुमक्कड़ थे। वे पशुपालक एवं शिकार संग्राहक थे। उनका समाज विभिन्न कबीलों में विभाजित था। इन कबीलों में आपसी लड़ाइयाँ चलती रहती थीं। लूटमार करना उनकी जीवन शैली का एक अभिन्न अंग था। वे चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते रहते थे। वे तंबुओं में निवास करते थे। उनके परिवार पितृपक्षीय थे। अतः परिवार में पुत्र का होना आवश्यक समझा जाता था।

उस समय धनी परिवार बहुत विशाल होते थे। उस समय बहु-विवाह का प्रचलन था। उनका प्रमुख भोजन माँस एवं दूध था। वे सूती, रेशमी एवं ऊनी वस्त्र पहनते थे। मंगोल अपने मृतकों का रात्रि के समय संस्कार करते थे। वे शवों को जमीन में दफ़न करते थे तथा उनके साथ कुछ आवश्यक वस्तुएँ भी रखते थे। क्योंकि उस समय स्टेपी क्षेत्र में संसाधनों की बहुत कमी थी इसलिए मंगोलों ने चीन के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए थे।

प्रश्न 2.
मंगोल और बेदोइन समाज की यायावरी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए, यह बताइए कि आपके विचार में किस तरह ऐतिहासिक अनुभव एक-दूसरे से भिन्न थे ? इन भिन्नताओं से जुड़े कारणों को समझाने के लिए आप क्या स्पष्टीकरण देगें?
उत्तर:
मंगोल स्टेपी क्षेत्र के यायावर कबीले थे। यह क्षेत्र बहुत मनोरम एवं पहाड़ी था। दूसरी ओर बेदोइन अरब के रेगिस्तानी क्षेत्रों में रहते थे। वे अपने लिए भोजन एवं पशुओं के लिए चारे की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान आते-जाते रहते थे। उनका मुख्य भोजन खजूर एवं मुख्य पशु ऊँट था। इसके विपरीत मंगोल यायावरों के पास हरी-भरी विशाल चरागाहें थीं। उनके पास पानी की कोई कमी नहीं थी।

उनके प्रदेश में ओनोन तथा सेलेंगा जैसी नदियाँ तथा बर्फीली पहाड़ियों से निकलने वाले सैकड़ों झरने भी थे। उनके मुख्य पशु घोड़े एवं भेड़ें थीं। वे शिकारी संग्राहक थे। उनका मुख्य व्यवसाय व्यापार करना था। दूसरी ओर बेदोइन शिकारी संग्राहक नहीं थे। वे मुख्यतः पशुपालक थे। उनकी भिन्नता का मुख्य कारण उनके प्रदेश की भौगोलिक भिन्नताएँ थीं।

प्रश्न 3.
मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था ?
उत्तर:
स्टेपी क्षेत्र अथवा मंगोलिया में संसाधनों की बहुत कमी थी। अतः यायावरी कबीले व्यापार के लिए अपने पड़ोसी देश चीन पर निर्भर करते थे। उनका व्यापार वस्तु-विनिमय पर आधारित था। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी थी। यायावर कबीले चीन से कृषि उत्पाद एवं लोहे के उपकरणों का आयात करते थे। इनके बदले वे घोड़ों, फर एवं शिकारी जानवरों का निर्यात करते थे। कभी-कभी दोनों पक्ष अधिक लाभ कमाने हेतु सैनिक कार्यवाही कर बैठते थे एवं लूटपाट में भी सम्मिलित हो जाते थे। इस संघर्ष में यायावरों को कम हानि होती थी।

इसका कारण यह था कि वे लूटपाट कर संघर्ष क्षेत्र से दूर भाग जाते थे। चीन को इन यायावरी आक्रमणों से बहुत क्षति पहुँचती थी। अत: चीनी शासकों ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए ‘चीन की महान् दीवार’ को अधिक मज़बूत किया।

प्रश्न 4.
चंगेज़ खाँ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
चंगेज़ खाँ ने यायावर साम्राज्य की स्थापना में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उसका जन्म 1162 ई० में हुआ था। उसका बचपन का नाम तेमुजिन था। उसके पिता का नाम येसूजेई था तथा वह कियात कबीले का मुखिया था। उसकी माता का नाम ओलुन-इके था। तेमुजिन का विवाह बोरटे के साथ हुआ था। उसके बचपन में ही उसके पिता की एक विरोधी कबीले द्वारा हत्या कर दी गई थी। इसलिए उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

इसके बावजूद तेमुजिन ने अपना धैर्य न खोया। इस संकट के समय उसे बोघूरचू, जमूका तथा तुगरिल खाँ ने बहुमूल्य सहयोग दिया। तेमुजिन ने अनेक शक्तिशाली कबीलों को पराजित कर अपने नाम की धाक जमा दी। उसकी सफलताओं को देखते हुए कुरिलताई ने 1206 ई० में तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से सम्मानित किया।

चंगेज़ खाँ ने 1227 ई० तक शासन किया। अपने शासनकाल के दौरान चंगेज़ खाँ ने उत्तरी चीन एवं करा खिता को विजित किया। उसने ख्वारज़म के शाह मुहम्मद को पराजित कर उसके अनेक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। उसने कराकोरम को मंगोल साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। चंगेज़ खाँ ने मंगोल साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के उद्देश्य से अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया।

उसने नागरिक प्रशासन में भी अनेक उल्लेखनीय सुधार किए। उसकी महान् सफलताओं को देखते हुए उसे आज भी मंगोलिया के इतिहास में महान् राष्ट्र-नायक के रूप में स्मरण किया जाता है।

प्रश्न 5.
मंगोल कबीलों की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
(1) मंगोल कबीले नृजातीय और भाषायी संबंधी के कारण आपस में जुड़े हुए थे। परंतु उपलब्ध आर्थिक संसाधनों के अभाव के कारण उनका समाज अनेक पितृपक्षीय वंशों में विभाजित था।

(2) धनी-परिवार विशाल होते थे। उनके पास अधिक संख्या में पशु और चरण भूमि होती थी। स्थानीय राजनीति में भी उनका अधिक दबदबा होता था। इसलिए उनके अनेक अनुयायी होते थे।

(3) समय-समय पर आने वाली प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि भीषण शीत-ऋतु के दौरान उनके द्वारा एकत्रित शिकार-सामग्रियाँ तथा अन्य खाद्य भंडार समाप्त हो जाते थे। वर्षा न होने पर घास के मैदान भी सूख जाते थे। इसलिए उन्हें चरागाहों की खोज में भटकना पड़ता था।

(4) मंगोल कबीलों में आपसी संघर्ष भी होता था। पशुधन प्राप्त करने के लिए वे लूटपाट भी करते थे।

(5) प्रायः परिवारों के समूह आक्रमण करने अथवा अपनी रक्षा करने के लिए शक्तिशाली कुलों से मित्रता कर लेते थे और परिसंघ बना लेते थे।

प्रश्न 6.
चंगेज़ खाँ की सफलता के प्रमुख कारण क्या थे ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ की सफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे
1) चंगेज़ खाँ स्वयं जन्मजात सेनापति था। वह जिस ओर रुख करता सफलता उसके कदम चूमती थी। अतः उसका नाम सुनते ही शत्रु की रूह कॉप जाती थी।

2) चंगेज़ खा ने एक शक्तिशाली सेना का गठ यह सेना बहुत अनुशासित थी। इस सेना का मुकाबला करना कोई सहज कार्य न था।

3) चंगेज़ खाँ का जासूसी विभाग अत्यंत कशल था। उसके जासस कोई भी युद्ध आरंभ होने से पूर्व उसके शत्र के संबंध में प्रत्येक छोटी से-छोटी जानकारी उपलब्ध करवाते थे। यह जानकारी उसके लिए बहुत बहमुल्य सिद्ध होती थी।

4) चंगेज़ खाँ मनोवैज्ञानिक युद्ध के महत्त्व को भली-भाँति जानता था। अतः जब भी किसी स्थान के लोग उसकी सेना का मुकाबला करने का साहस करते तो उसकी सेना वहाँ इतना विनाश करती जिसे सुनकर लोग थर-थर काँपने लगते थे। अतः लोग बिना लड़ाई किए ही उसके समक्ष आत्म-समर्पण कर देते थे।

5) मंगोल सैनिक घुड़सवारी एवं तीरंदाज़ी में इतने कुशल थे कि शत्रु भौचक्के रह जाते थे।

6) चंगेज़ खाँ ने शत्रु दुर्गों को नष्ट करने के लिए घेराबंदी यंत्र एवं नेफ़था बमबारी का व्यापक प्रयोग किया। इनके युद्ध में घातक प्रभाव होते थे।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 7.
यास से आपका क्या अभिप्राय है ? इसके प्रमुख नियम क्या हैं ?
उत्तर:
यास वे विधि नियम थे, जिन्हें चंगेज़ खाँ के शासनकाल में कुरिलताई द्वारा पारित किया गया था। इसके प्रमुख नियम निम्नलिखित थे

1) लोगों को एक परमात्मा में विश्वास रखना चाहिए जो कि स्वर्ग एवं पृथ्वी का स्वामी है। वह ही जीवन एवं मृत्यु, अमीरी तथा ग़रीबी देता है।

2) धार्मिक नेताओं, परामर्शदाताओं, पुरोहितों, मस्जिदों की देखभाल करने वालों, डॉक्टरों एवं शवों को स्नान कराने वालों को राज्य की तरफ से मुफ्त भोजन दिया जाना चाहिए।

3) जो भी व्यक्ति कुरिलताई से मान्यता प्राप्त किए बिना अपने आपको खाँ घोषित करता है उसे मृत्यु दंड दिया जाना चाहिए।

4) जिन कबीलों ने मंगोलों की अधीनता स्वीकार कर ली हो उनके मुखिया महत्त्वपूर्ण उपाधियाँ धारण नहीं कर सकते।

5) जो कोई शासक अथवा कबीला मंगोलों की अधीनता स्वीकार नहीं करता उसके साथ किसी प्रकार का कोई समझौता न किया जाए।

6) सभी धर्मों का सम्मान किया जाए। सभी धर्मों के पुरोहितों को सभी प्रकार के करों से मुक्त रखा जाए।

7) किसी चलते हुए दरिया में वस्त्र धोकर अथवा मलमूत्र द्वारा गंदा करने पर कड़ा प्रतिबंध था। ऐसा करने वालों को मृत्यु दंड दिया जाता था।

प्रश्न 8.
चंगेज़ खाँ ने सेना में अनुशासन बनाए रखने के लिए कौन-से नियम बनाए ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ सेना में अनुशासन को विशेष महत्त्व देता था। वह अनुशासनहीन सेना को एक भीड़ मात्र समझता था। उसने सेना में अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से अनेक नियम बनाए थे। इनका उल्लंघन करने वाले सैनिकों को मृत्यु दंड दिया जाता था। ये नियम थे

  • युद्ध के आरंभ होने पर छुट्टी पर गए सभी सैनिक तुरंत रिपोर्ट करें।
  • सभी सैनिकों के लिए आवश्यक था कि वे अपने अधिकारियों के आदेश का पालन करें।
  • कोई भी सैनिक अपनी इकाई को छोड़कर किसी दूसरी इकाई में नहीं जा सकता था।
  • युद्ध में जाने से पहले सभी सैनिकों को अपने हथियारों का निरीक्षण कर लेना चाहिए।
  • कोई भी सैनिक अपने अधिकारियों की अनुमति के बिना लूटपाट न करे।
  • अधिकारियों द्वारा अनुमति मिलने पर ही लूटपाट आरंभ की जाए। लूट के धन से अधिकारियों एवं खाँ का हिस्सा दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 9.
चंगेज़ खाँ के सैनिक प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ के समय सभी स्वस्थ व्यक्तियों के लिए सेना में भर्ती होना अनिवार्य था। केवल पुरोहितों, डॉक्टरों एवं विद्वानों को इसमें छूट दी गई थी।
  • चंगेज़ खाँ की सेना पुरानी दशमलव पद्धति के अनुसार गठित की गई थी। यह 10,100, 1000 एवं 10,000 सैनिकों की इकाइयों में विभाजित थी।
  • चंगेज़ खाँ की सेना में विभिन्न मंगोल जनजातियों के लोग सम्मिलित थे।
  • चंगेज़ खाँ ने सैनिकों के प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया। उसने विशेष कप्तानों को नियुक्त किया था, जिन्हें नोयान कहा जाता था।
  • चंगेज़ खाँ सेना में अनुशासन को विशेष महत्त्व देता था। वह अनुशासनहीन सेना को एक भीड़ मात्र समझता था। उसने सेना में अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य में अनेक नियम बनाए थे।

प्रश्न 10.
चंगेज़ खाँ को मंगोलों का सबसे महान् शासक क्यों माना जाता था ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ को निम्नलिखित कारणों से मंगोलों का सबसे महान शासक माना जाता था

  • उसने मंगोलों को एक झंडे के अधीन एकत्रित किया।
  • उसने लंबे समय से चली आ रही कबीलाई लड़ाइयों का अंत किया।
  • उसने मंगोलों को चीनियों द्वारा किए जा रहे शोषण से मुक्ति दिलवाई।
  • उसने एक महान् साम्राज्य की स्थापना की।
  • उसके व्यापार द्वारा मंगोलों को समृद्ध बनाया।
  • उसने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया।

प्रश्न 11.
याम से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ की एक बहुमूल्य देन याम की स्थापना करना था। याम एक प्रकार की सैनिक चौकियाँ थीं। मंगोल साम्राज्य में प्रत्येक 25 मील की दूरी पर ऐसी चौकियाँ स्थापित की गई थीं। इन चौकियों में घुड़सवार संदेशवाहक तथा फुर्तीले घोड़े सदैव तैनात रहते थे। घुड़सवार संदेशवाहक सभी प्रकार के सरकारी संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे।

प्रत्येक घुड़सवार अपने घोड़े के गले में एक घंटी बाँध कर रखता था। जब वह किसी याम के निकट पहुँचता तो इस घंटी की आवाज़ सुन कर संदेशवाहक अपने घोड़े के साथ आगे गंतव्य तक बढ़ने के लिए तैयार हो जाता।

इन यामों में ठहरने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए उनके खाने-पीने का पूरा इंतजाम किया जाता था। यात्रियों की सुरक्षा के लिए सरकार की तरफ से एक प्रकार के पास जारी किए जाते थे। इन पासों को फ़ारसी में पैजा तथा मंगोल भाषा में जेरेज़ कहते थे। ये पास तीन प्रकार-सोने, चाँदी एवं लोहे के होते थे। प्रत्येक याम में यात्रियों को इन पासों के अनुसार सुविधाएँ दी जाती थीं। इन चौकियों के कारण सड़क मार्गों को सुरक्षित बनाया जाता था।

प्रश्न 12.
उलुस से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
मंगोल प्रशासन की एक उल्लेखनीय विशेषता चंगेज़ खाँ द्वारा उलुस का गठन करना था। इसके अनुसार चंगेज़ खाँ ने नव-विजित क्षेत्रों पर शासन करने का उत्तरदायित्व अपने चारों पुत्रों को दे दिया। उसके सबसे ज्येष्ठ पुत्र जोची को रूसी स्टेपी का प्रदेश दिया गया। उसके दूसरे पुत्र चघताई को तूरान का स्टेपी क्षेत्र तथा पामीर पर्वत का उत्तरी क्षेत्र दिया गया। चंगेज़ खाँ ने संकेत दिया कि उसका तीसरा पुत्र ओगोदेई उसका उत्तराधिकारी होगा।

उसके सबसे छोटे पुत्र तोलुई को मंगोलिया का क्षेत्र दिया गया। उलुस से भाव किसी निश्चित भू-भाग से नहीं था क्योंकि इनमें लगातार परिवर्तन होता रहता था। उलुस में चंगेज़ खाँ के पुत्रों की स्थिति उप-शासक जैसी थी। उनके अधीन अलग-अलग सैन्य टुकड़ियाँ (तामा) थीं। वे अपने अधीन क्षेत्रों से लोगों को सेना में भर्ती कर सकते थे। उन्हें लोगों पर नए कर लगाने का अधिकार दिया गया था।

प्रश्न 13.
मंगोलों की हरकारा पद्धति क्या थी?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ द्वारा स्थापित एक फुर्तीली संचार व्यवस्था को हरकारा पद्धति कहा जाता था। इस कारण राज्य के दूर स्थित स्थानों में आपसी संपर्क बना रहता था। निश्चित की गई दूरी पर निर्मित सैनिक, चौकियों में स्वस्थ एवं बलवान घोड़े एवं घुड़सवार तैनात रहते थे। इस संचार पद्धति के संचालन के लिए मंगोल यायावर अपने घोड़ों अथवा अन्य पशुओं का दसवां भाग प्रदान करते थे। इसे कुबकुर कर कहते थे। यायावर लोग यह कर अपनी इच्छा से प्रदान करते थे। इससे उन्हें अनेक लाभ प्राप्त होते थे। चंगेज़ खाँ की मृत्यु के पश्चात् मंगोलों ने इस पद्धति में और भी सुधार किए। इस कारण महान् खाँनों को अपने विस्तृत साम्राज्य के सुदूर स्थानों में होने वाली घटनाओं पर निगरानी रखने में सहायता मिलती थी।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 14.
विजित लोग अपने मंगोल शासकों को पसंद नहीं करते थे । क्यों?
उत्तर:
विजित लोग अपने मंगोल शासकों को निम्नलिखित कारणों से पसंद नहीं करते थे

  • मंगोलों ने अपने युद्धों के दौरान अनेक भव्य नगरों को नष्ट कर दिया था।
  • मंगोलों ने कृषि भूमि को भारी हानि पहुँचाई थी।
  • उनके आक्रमणों के दौरान विजित क्षेत्रों के व्यापार को व्यापक पैमाने पर क्षति पहुंची थी।
  • इन युद्धों के कारण दस्तकारी वस्तुओं का उत्पादन लगभग ठप्प हो गया था।
  • इन युद्धों के दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे तथा कइयों को दास बना लिया गया था।
  • इन युद्धों के दौरान समाज के प्रत्येक वर्ग के लोगों को भारी कष्टों का सामना करना पड़ा था।

प्रश्न 15.
कुबलई खाँ पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
कुबलई खाँ ने 1260 ई० में पीकिंग में यूआन वंश की स्थापना की घोषणा की। कुबलई खाँ ने 1294 ई० तक शासन किया। कुबलई खाँ एक योग्य एवं महान् शासक प्रमाणित हुआ। उसने सर्वप्रथम उत्तरी चीन में अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया। उसने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया। उसके पश्चात् उसने अरिक बुका को पराजित किया। 1280 ई० में कुबलई खाँ ने दक्षिण चीन के शुंग शासक को पराजित करने में सफलता प्राप्त की।

निस्संदेह यह कुबलई खाँ की एक महान् सफलता थी। इसके पश्चात् उसने बर्मा, चंपा एवं कंबोडिया के शासकों को पराजित किया। कुबलई खाँ ने न केवल अपने साम्राज्य का विस्तार ही किया अपितु इसे अच्छी प्रकार से संगठित भी किया। उसने चीन में प्रचलित परंपराओं को जारी रखा। उसने अनेक नई सड़कों का निर्माण किया एवं पुरानी की मुरम्मत करवाई। उसने सड़कों के किनारे छाया वाले वृक्ष लगवाए। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए सराएँ बनवाईं।

उसने शिक्षा को प्रोत्साहित किया। उसने सिविल सर्विस में उल्लेखनीय सुधार किए। उसने राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक कदम उठाए। उसने 1282 ई० में कागज़ की मुद्रा का प्रचलन किया। उसने अकालों से निपटने के लिए भी अनेक प्रयास किए। यद्यपि कुबलई खाँ का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर था किंतु उसने अन्य धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मंगोल कौन थे ?
उत्तर:
मंगोल मध्य एशिया के आधुनिक मंगोलिया प्रदेश में रहने वाला एक यायावर समूह था। यह समूह विभिन्न कबीलों में विभाजित था। इनमें प्रमुख थे मंगोल, तातार, नेमन एवं खितान । मंगोल पशुपालक एवं शिकार संग्राहक थे।

प्रश्न 2.
खानाबदोश या यायावर साम्राज्य से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
खानाबदोश या यायावर लोग मूलतः घुमक्कड़ होते हैं। ये सापेक्षिक तौर पर एक अविभेदित आर्थिक जीवन एवं प्रारंभिक राजनैतिक संगठन के साथ परिवारों के समूह में संगठित होते हैं।

प्रश्न 3.
मंगोलों का सबसे बहुमूल्य स्रोत किसे माना जाता है ? इसका रचयिता कौन था ?
उत्तर:

  • मंगोलों का सबसे बहुमूल्य स्रोत ‘मंगोलों का गोपनीय इतिहास’ को माना जाता है।
  • इसका रचयिता ईगोर दे रखेविल्ट्स था।

प्रश्न 4.
मंगोलों के समय में स्टेपी क्षेत्र में कोई नगर क्यों नहीं उभर पाया ?
उत्तर:

  • मंगोलों ने कृषि को नहीं अपनाया था।
  • मंगोलों की पशुपालक एवं शिकार संग्राहक अर्थव्यवस्थाएँ भी घनी आबादी वाले क्षेत्रों का भरण-पोषण करने में असमर्थ थीं।

प्रश्न 5.
मंगोलों के धनी परिवारों के अनेक अनुयायी क्यों होते थे ?
उत्तर:

  • उनके पास अधिक संख्या में पश एवं चारण भमि होती थी।
  • वे स्थानीय राजनीति में काफी प्रभावशाली होते थे।

प्रश्न 6.
मंगोल कबीलों को चरागाहों की खोज में क्यों भटकना पड़ता था ?
उत्तर:

  • शीत ऋतु में मंगोल कबीलों द्वारा एकत्रित की गई खाद्य सामग्री समाप्त हो जाती थी।
  • वर्षा न होने से घास मैदान सूख जाते थे।

प्रश्न 7.
मंगोलों के निवास स्थान को क्या कहा जाता था ? इसकी कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • मंगोलों के निवास स्थान को जर (तंबू) कहा जाता था।
  • इसका प्रवेश द्वार दक्षिण की ओर होता था ताकि उत्तर से आने वाली शीत हवाओं से बचा जा सके।
  • जर को दो भागों में बाँटा जाता था। एक भाग मेहमानों के लिए एवं दूसरा घर के सदस्यों के लिए होता था।

प्रश्न 8.
मंगोल कृषि कार्य क्यों नहीं करते थे ?
उत्तर:

  • उस समय स्टेपी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ कृषि के अनुकूल नहीं थीं।
  • वहाँ केवल सीमित काल में ही कृषि करना संभव था।

प्रश्न 9.
12वीं शताब्दी में मंगोल समाज की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उस समय परिवार पितृपक्षीय होते थे।
  • उस समय समाज में बहु-विवाह प्रणाली प्रचलित थी।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 10.
मंगोल अपने मृतकों का संस्कार कैसे करते थे ?
उत्तर:
मंगोल अपने मृतकों के शवों को जमीन में दफनाते थे। वे उनके साथ दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएँ एवं बर्तनों आदि को भी दफनाते थे। धनी लोगों के शवों के साथ अनेक बहुमूल्य वस्तुओं, घोड़ों, नौकरों एवं स्त्रियों आदि को भी दफ़न किया जाता था।

प्रश्न 11.
मंगोल कौन थे ? मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था ?
अथवा
मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था ?
अथवा
मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था ? कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:
मंगोल स्टेपी क्षेत्र में रहते थे। इस क्षेत्र में संसाधनों की बहुत कमी थी। उनके लिए व्यापार जीविका का एकमात्र साधन था। अतः मंगोलों के लिए व्यापार बहुत महत्त्वपूर्ण था।

प्रश्न 12.
मंगोल चीन से किन वस्तुओं का आयात-निर्यात करते थे ?
अथवा
चीन से मंगोलों को कौन-सी वस्तुएँ निर्यात की जाती थीं?
उत्तर:

  • मंगोल चीन से कृषि उत्पादों एवं लोहे के उपकरणों का आयात करते थे।
  • मंगोल चीन को घोड़े, फर एवं शिकारी जानवरों का निर्यात करते थे।

प्रश्न 13.
वाणिज्यिक क्रियाकलापों में मंगोलों को कभी-कभी तनाव का सामना क्यों करना पड़ता था ?
उत्तर:
कभी-कभी व्यापार करने वाले दोनों पक्ष अधिक लाभ कमाने की होड़ में सैनिक कार्यवाही कर देते थे एवं लूटपाट में सम्मिलित हो जाते थे। इस कारण उन्हें तनाव का सामना करना पड़ता था।

प्रश्न 14.
चीन की महान् दीवार क्यों बनवाई गई थी ?
उत्तर:
चीन की महान् दीवार इसलिए बनवाई गई थी क्योंकि यायावर कबीले चीन पर बार-बार आक्रमण करते रहते थे। इन आक्रमणों से चीन की सुरक्षा के लिए यह दीवार बनवाई गई थी।

प्रश्न 15.
चंगेज़ खाँ कौन था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ मंगोलों का सबसे महान् नेता था।
  • उसने 1206 ई० से 1227 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 16.
चंगेज़ खाँ का जन्म कब हुआ ? उसका प्रारंभिक नाम क्या था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ का जन्म 1162 ई० में हुआ।
  • उसका प्रारंभिक नाम तेमुजिन था।

प्रश्न 17.
चंगेज़ खाँ के पिता का नाम क्या था ? वह किस कबीले का मुखिया था ?
उत्तर:

  • चंगेज खाँ के पिता का नाम येसूजेई था।
  • वह कियात कबीले का मुखिया था।

प्रश्न 18.
चंगेज़ खाँ का नाम तेमुजिन क्यों रखा गया था ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ का नाम तेमुजिन इसलिए रखा गया था क्योंकि उसके जन्म के समय उसके पिता येसूजेई ने तातार कबीले के मुखिया तेमुजिन को पराजित किया था। अतः मंगोलियाई परंपरा के अनुसार नव-जन्में बालक का नाम तेमुजिन रखा गया।

प्रश्न 19.
आंडा (anda) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
आंडा से अभिप्राय ऐसे व्यक्तियों से है जिन्हें मंगोल सौगंध के आधार पर अपना सगा भाई बना लेते थे।

प्रश्न 20.
तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से कब तथा किसने सम्मानित किया था ? इससे क्या भाव था ?
उत्तर:

  • तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से 1206 ई० में कुरिलताई ने सम्मानित किया था।
  • इससे भाव था सार्वभौम शासक।

प्रश्न 21.
खाँ की उपाधि से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
खाँ की उपाधि से अभिप्राय है सार्वभौम शासक। कुरिलताई ने तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से 1206 ई० में सम्मानित किया था।

प्रश्न 22.
कुरिलताई से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
कुरिलताई प्रतिष्ठित मंगोल सरदारों के कबीले की एक सभा थी।

प्रश्न 23.
कुरिलताई के कोई दो प्रमुख कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • उत्तराधिकार संबंधी निर्णय लेना।।
  • राज्य के भविष्य एवं अभियानों संबंधी निर्णय लेना।

प्रश्न 24.
चंगेज़ खाँ की कोई दो महत्त्वपूर्ण विजयें बताएँ।
उत्तर:

  • उत्तरी चीन की विजय।
  • ख्वारज़म की विजय।

प्रश्न 25.
चंगेज़ खाँ ने पीकिंग पर कब अधिकार किया ? उस समय वहाँ किस राजवंश का शासन था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ ने पीकिंग पर 1215 ई० में अधिकार किया।
  • उस समय वहाँ चिन राजवंश का शासन था।

प्रश्न 26.
चंगेज खाँ ने खारजम पर आक्रमण कब किया ? इसका तात्कालिक कारण क्या था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ ने ख्वारज़म पर 1219 ई० में आक्रमण किया था।
  • इसका तात्कालिक कारण यह था कि ओट्रार के गवर्नर ने वारज़म शाह के इशारे पर चंगेज़ खाँ के एक व्यापारिक मंडल के चार सदस्यों की हत्या कर दी थी।

प्रश्न 27.
यदि इतिहास नगरों में रहने वाले साहित्यकारों के लिखित विवरणों पर निर्भर करता है तो यायावर समाजों के बारे में हमेशा प्रतिकूल विचार ही रखे जाएँगे। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ?
उत्तर:
हाँ, मैं इस कथन से सहमत हूँ। इसका कारण यह है कि यायावर नगरों में भयंकर लूटमार करते थे तथा उन्हें नष्ट कर देते थे।

प्रश्न 28.
क्या आप इसका कारण बताएँगे कि फ़ारसी इतिवृत्तकारों ने मंगोल अभियानों में मारे गए लोगों की इतनी बढ़ा-चढ़ा कर संख्या क्यों बताई है ?
उत्तर:
फ़ारसी इतिवृत्तकारों ने मंगोल अभियानों में मारे गए लोगों की संख्या इतनी बढ़ा-चढ़ा कर इसलिए बताई है क्योंकि वे मंगोलों को क्रूर हत्यारा दर्शाना चाहते थे।

प्रश्न 29.
चंगेज़ खाँ की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ की मृत्यु 1227 ई० में हुई।

प्रश्न 30.
चंगेज़ खाँ का साम्राज्य कहाँ से कहाँ तक फैला हुआ था ? उसकी राजधानी का नाम क्या था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ का साम्राज्य फ़ारस से लेकर पीकिंग तक तथा साईबेरिया से लेकर सिंध तक फैला था।
  • उसकी राजधानी का नाम कराकोरम था।

प्रश्न 31.
चंगेज़ खाँ की सफलता के दो प्रमुख कारण क्या थे ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ स्वयं एक महान् सेनापति था।
  • चंगेज़ खाँ ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया था।

प्रश्न 32.
चंगेज़ खाँ की अलोकप्रियता के दो कारण लिखिए।
अथवा
चंगेज़ खाँ द्वारा विजित लोगों को अपने नवीन यायावर शासकों से कोई लगाव न था। इसके कोई दो कारण बताएँ।
अथवा
क्या कारण था कि 13वीं शताब्दी में चीन, ईरान और पूर्वी यूरोप के अनेक नगरवासी स्टेपी के गिरोहों को भय और घृणा की दृष्टि से देखते थे ?
उत्तर:

  • मंगोलों ने अपने युद्धों के दौरान अनेक नगरों का विनाश कर दिया था।
  • मंगोलों ने युद्धों के दौरान लाखों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।

प्रश्न 33.
यास से क्या अभिप्राय है ? इसका प्रचलन कब और किसने किया ?
अथवा
यांस से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • यास से अभिप्राय है विधि संहिता।
  • इसका प्रचलन 1206 ई० में चंगेज़ खाँ ने किया।

प्रश्न 34.
यास क्या था? इसके दो सैनिक नियम क्या थे?
उत्तर:

  • यास चंगेज़ खाँ की विधि संहिता थी।
  • युद्ध आरंभ होने की स्थिति में छुट्टी पर गए सभी सैनिक तुरंत रिपोर्ट करें।
  • कोई भी सैनिक अपने कमांडर की अनुमति के बिना लूटमार नहीं कर सकता।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 35.
यास के कोई दो महत्त्वपूर्ण नियम बताएँ।
उत्तर:

  • जो भी व्यक्ति कुरिलताई से मान्यता प्राप्त किए बिना अपने आपको खाँ घोषित करता है उसे मृत्यु दंड दिया जाना चाहिए।
  • सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए तथा उनके पुरोहितों को सभी प्रकार के करों से मुक्त रखा जाना चाहिए।

प्रश्न 36.
यास के बारे में परवर्ती मंगोलों का चिंतन किस तरह चंगेज़ खाँ की स्मृति के साथ जुड़े हुए उनके तनावपूर्ण संबंधों को उजागर करता है ?
उत्तर:
परवर्ती मंगोल यास को चंगेज़ खाँ की विधि संहिता कह कर पुकारते थे। वे स्वयं का यास लागू करना चाहते थे। इससे उनके तनावपूर्ण संबंध उजागर होते हैं।

प्रश्न 37.
चंगेज़ खाँ के सैनिक प्रशासन की कोई दो प्रमुख विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • उसने अपनी सेना को दशमलव पद्धति के अनुसार गठित किया।
  • उसकी सेना में न केवल विभिन्न मंगोल जनजातियों अपितु विभिन्न देशों के लोग सम्मिलित थे।

प्रश्न 38.
मंगोलों के नागरिक प्रशासन की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • मंगोल प्रशासन में खाँ की स्थिति सर्वोच्च थी।
  • मंगोलों ने अपने नागरिक प्रशासकों को योग्यता के आधार पर भर्ती किया था।

प्रश्न 39.
उलुस से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
उलुस का गठन चंगेज़ खाँ ने किया था। इसके अधीन चंगेज़ खाँ ने अपने पुत्रों को नव-विजित क्षेत्रों पर शासन करने का अधिकार दिया था। उलुस से भाव किसी निश्चित क्षेत्र से नहीं था क्योंकि इसमें लगातार परिवर्तन होता रहता था। उलुस में चंगेज़ खाँ के पुत्रों की स्थिति उप-शासकों जैसी थी।

प्रश्न 40.
ये-लू-चुत्साई कौन था ?
उत्तर:
ये-लू-चुत्साई एक चीनी मंत्री था। उसे मंगोलों ने 1215 ई० के आक्रमण के दौरान बँदी बना लिया था। उसने मंगोल प्रशासन को एक नया स्वरूप देने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

प्रश्न 41.
याम (yam) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
याम की स्थापना चंगेज़ खाँ ने की थी। यह एक प्रकार की सैनिक चौकियाँ थीं। यहाँ से घुड़सवार संदेशवाहक सरकारी संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे। इन यामों में यात्रियों के ठहरने का पूरा प्रबंध था।

प्रश्न 42.
कुबकुर से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
कुबकुर एक प्रकार का कर था। इसके अधीन मंगोल यायावर अपने पशु समूहों से अपने घोड़े अथवा अन्य पशुओं का दसवाँ हिस्सा सरकार को देते थे। मंगोल इन पशुओं का प्रयोग अपनी संचार व्यवस्था को बनाए रखने के लिए करते थे।

प्रश्न 43.
पैज़ा (paiza) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
पैज़ा एक प्रकार के पास थे जिन्हें यात्रियों की सुरक्षा एवं सुविधा के लिए मंगोल सरकार द्वारा जारी किया जाता था। ये पास तीन प्रकार सोने, चाँदी एवं लोहे के होते थे। इसे यात्री अपने माथे पर बाँधते थे। इन पासों के आधार पर ही इन यात्रियों एवं व्यापारियों को यामों में सुविधाएँ दी जाती थीं।

प्रश्न 44.
मंगोलों के धार्मिक जीवन की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • मंगोलों का प्रमुख देवता तेंगरी था। वे उसे सर्वशक्तिमान समझते थे।
  • मंगोल शासकों ने विभिन्न धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई।

प्रश्न 45.
चंगेज़ खाँ का उत्तराधिकारी कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ का उत्तराधिकारी ओगोदेई था।
  • उसने 1229 ई० से 1241 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 46.
ओगोदेई की कोई दो प्रमुख सफलताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उसने उत्तरी चीन में अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया।
  • उसने ईरान के शासक जलालुद्दीन को कड़ी पराजय दी।

प्रश्न 47.
ओगोदेई के कोई दो प्रमुख प्रशासनिक सुधार बताएँ।
उत्तर:

  • उसने मंगोल साम्राज्य में अनेक न्यायालयों की स्थापना की।
  • उसने करों को नियमित कर मंगोल अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया।

प्रश्न 48.
बाटू कौन था ?
उत्तर:
बाटू चंगेज़ खाँ का पोता था। उसने 1236 ई० से 1242 ई० तक अपने अभियानों के दौरान रूस, हंगरी, पोलैंड एवं ऑस्ट्रिया पर अधिकार कर मंगोल साम्राज्य के विस्तार में प्रशंसनीय योगदान दिया। उसने दक्षिण रूस में सुनहरा गिरोह की स्थापना की।

प्रश्न 49.
मोंके कौन था ?
उत्तर:
मोंके चंगेज़ खाँ का पोता एवं तोलूई का पुत्र था। वह 1251 ई० से 1259 ई० तक मंगोलों का महान् खाँ रहा। वह चंगेज़ खाँ के उत्तराधिकारियों में सबसे योग्य प्रमाणित हुआ।

प्रश्न 50.
कुबलई खाँ कौन था ?
उत्तर:
कुबलई खाँ चीन में मंगोलों का एक प्रसिद्ध शासक था। उसने 1260 ई० से 1294 ई० तक शासन किया। उसने दक्षिण चीन को अपने अधीन किया। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित किया एवं अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। उसकी राजधानी का नाम पीकिंग था।

प्रश्न 51.
प्रसिद्ध वेनिस यात्री मार्को पोलो ने चीन की यात्रा कब की तथा वह किसके दरबार में रहा ?
अथवा
मार्को पोलो कौन था ?
उत्तर:

  • प्रसिद्ध वेनिस यात्री मार्को पोलो ने चीन की यात्रा 1275 ई० से 1292 ई० तक की।
  • वह कुबलई खाँ के दरबार में रहा।
  • उसने कुबलई खाँ के शासनकाल के बारे में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला है।

प्रश्न 52.
हुलेगु ने बग़दाद पर कब अधिकार किया ? उसने किस खलीफ़ा का वध किया ? वह किस वंश से संबंधित था ?
उत्तर:

  • हुलेगु ने बग़दाद पर 1258 ई० में अधिकार किया।
  • उसने खलीफ़ा अल-मुस्तासिम का वध किया।
  • वह अब्बासी वंश से संबंधित था।

प्रश्न 53.
फ़ारसी का प्रसिद्ध इतिहासकार जुवाइनी किस शासक का दरबारी इतिहासकार था ? उसकी रचना का नाम क्या था ?
उत्तर:

  • फ़ारसी का प्रसिद्ध इतिहासकार जुवाइनी हुलेगु का दरबारी इतिहासकार था।
  • उसकी रचना का नाम हिस्ट्री ऑफ़ द कनकरर ऑफ़ द वर्ल्ड था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मंगोल कौन थे ?
उत्तर:
मध्य एशिया का एक यायावर समूह।

प्रश्न 2.
बर्बर शब्द यूनानी भाषा के किस शब्द से उत्पन्न हुआ है ?
उत्तर:
बारबोस।

प्रश्न 3.
मंगोल कहाँ का रहने वाला एक यायावर समूह था ?
उत्तर:
मध्य एशिया का।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 4.
मंगोलों का गोपनीय इतिहास का लेखक कौन था ?
उत्तर:
ईगोर दे रखेविल्ट्स।।

प्रश्न 5.
मंगोल जिन तंबुओं में रहते थे उन्हें क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
जर।

प्रश्न 6.
मंगोलों का सर्वाधिक प्रसिद्ध नेता कौन था ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ।

प्रश्न 7.
चंगेज़ खाँ का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर:
1162 ई० में।

प्रश्न 8.
चंगेज़ खाँ किस कुल से संबंधित था ?
उत्तर:
बोरजिगिद।

प्रश्न 9.
चंगेज खाँ के बचपन का नाम क्या था ?
उत्तर:
तेमुजिन।

प्रश्न 10.
मंगोलों के किस शासक को समुद्री खाँ की उपाधि दी गई थी ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ।

प्रश्न 11.
मंगोलों द्वारा बुखारा पर आधिपत्य कब स्थापित किया गया ?
उत्तर:
1221 ई०।

प्रश्न 12.
मंगोलों ने हिरात पर अपना अधिकार कब स्थापित किया ?
उत्तर:
1222 ई०।

प्रश्न 13.
चंगेज़ खाँ ने पीकिंग पर कब अधिकार किया था ?
उत्तर:
1215 ई० में।

प्रश्न 14.
चंगेज़ खाँ ने यास का प्रचलन कब किया था ?
उत्तर:
1206 ई० में।

प्रश्न 15.
चंगेज़ खाँ ने सैनिकों के प्रशिक्षण के लिए किन्हें नियुक्त किया था ?
उत्तर:
नोयान को।

प्रश्न 16.
ये-लू-चुत्साई कौन था ?
उत्तर:
एक चीनी मंत्री।

प्रश्न 17.
मंगोल साम्राज्य में व्यापारी अपनी सुरक्षा के लिए कौन-सा कर देते थे ?
उत्तर:
बाज़।

प्रश्न 18.
चंगेज़ खाँ का उत्तराधिकारी कौन था ?
उत्तर:
ओगोदेई।

प्रश्न 19.
मंगोलों ने बग़दाद पर कब अधिकार कर लिया था ?
उत्तर:
1258 ई० में।

प्रश्न 20.
पीकिंग में यूआन वंश का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
कुबलई खाँ ने।

प्रश्न 21.
इल-खानी वंश का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
हुलेगु।

प्रश्न 22.
हिस्ट्री-ऑफ़ द कनकरर ऑफ़ द वर्ल्ड का लेखक कौन था ?
उत्तर:
जुवाइनी।

प्रश्न 23.
मंगोलों ने अब्बासी वंश का अंत कब किया ?
उत्तर:
1258 ई०।

प्रश्न 24.
चीन में यूआन राजवंश का अंत कब हुआ ?
उत्तर:
1368 ई०।

प्रश्न 25.
गजन खाँ किस वंश का शासक था ?
उत्तर:
इल-खानी।

प्रश्न 26.
मंगोलों ने गोल्डन होर्ड की स्थापना कहाँ की थी ?
उत्तर:
दक्षिण रूस में।

रिक्त स्थान भरिए

1. चंगेज़ खाँ का जन्म .. ……………. ई० में हुआ।
उत्तर:
1162

2. चंगेज़ खाँ का प्रारंभिक नाम …………….. था।
उत्तर:
तेमुजिन

3. मंगोलों द्वारा चंगेज़ खाँ को …………….. तथा …………….. उपाधि से नवाजा गया।
उत्तर:
समुद्री खाँ, सार्वभौम शासक

4. मंगोलों का महानायक …………….. को घोषित किया गया।
उत्तर:
चंगेज़ खाँ

5. मंगोलों द्वारा निशापुर पर आधिपत्य …………….. ई० में किया गया।
उत्तर:
122

6. मंगोलों ने बग़दाद पर अधिकार व अब्बासी खिलाफ़त का अंत …………….. ई० में किया।
उत्तर:
1258

7. चीन में 1368 ई० में …………….. राजवंश का अंत हो गया।
उत्तर:
यूआन

8. मंगोलों द्वारा पीकिंग को ……………. ई० में लूटा गया।
उत्तर:
1215

9. ईरान में 1295-1304 ई० तक ……………. का शासन काल रहा।
उत्तर:
गज़न खाँ

10. गज़न खाँ सिंहासन पर …………….. ई० में बैठा।
उत्तर:
1295 ई०

11. जोची की मृत्यु …………….. ई० में हुई थी।
उत्तर:
1227

12. चंगेज़ खाँ के बड़े पुत्र जोची के पुत्र का नाम …………….. था।
उत्तर:
बाटू

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. 13वीं-14वीं शताब्दी में स्थापित विश्व का सबसे महत्त्वपूर्ण खानाबदोश साम्राज्य था
(क) मंगोल
(ख) हूण
(ग) हुआंग डी
(घ) गोवांग।
उत्तर:
(क) मंगोल

2. मंगोल कहाँ के निवासी थे ?
(क) मध्य एशिया के
(ख) भूमध्यसागर के
(ग) टुंड्रा के
(घ) चीन के।
उत्तर:
(क) मध्य एशिया के

3. यायावर से आपका क्या अभिप्राय है ?
(क) लुटेरे
(ख) कबीला
(ग) घुमक्कड़
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) घुमक्कड़

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

4. मंगोलों का प्रमुख व्यवसाय क्या था ?
(क) कृषि
(ख) पशुपालन
(ग) व्यापार
(घ) शिकार।
उत्तर:
(ख) पशुपालन

5. मंगोल निम्नलिखित में से किस जानवर को सबसे अधिक महत्त्व देते थे ?
(क) ऊँट
(ख) भेड़
(ग) घोड़ा
(घ) गाय।
उत्तर:
(ग) घोड़ा

6. मंगोलों के समय में स्टेपी क्षेत्र में कोई नगर क्यों नहीं उभर पाया ?
(क) मंगोलों ने कृषि को नहीं अपनाया था
(ख) मंगोलों की अर्थव्यवस्था घनी आबादी वाले क्षेत्रों का भरण-पोषण करने में असमर्थ थी
(ग) मंगोलों का निवास स्थाई नहीं था
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

7. मंगोलों ने कृषि कार्य को क्यों नहीं अपनाया ?
(क) क्योंकि वे कृषि को पसंद नहीं करते थे
(ख) क्योंकि वे अपनी सभी खाद्य वस्तुएँ चीन से मंगवाते थे
(ग) क्योंकि मंगोलिया की भौगोलिक परिस्थितियाँ कृषि के अनुकूल नहीं थीं
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ग) क्योंकि मंगोलिया की भौगोलिक परिस्थितियाँ कृषि के अनुकूल नहीं थीं

8. 12वीं शताब्दी में यायावरी समाज में धनी परिवार विशाल क्यों होते थे ?
(क) उनके पास बड़ी संख्या में पशु एवं चारण भूमि होती थी
(ख) उनके बड़ी संख्या में अनुयायी होते थे
(ग) उनका स्थानीय राजनीति में बहुत दबदबा होता था
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

9. मंगोलों को चरागाहों की खोज में क्यों भटकना पडता था ?
(क) क्योंकि मंगोलिया में चरागाहों की बहत कमी थी
(ख) वर्षा न होने पर घास के मैदान सूख जाते थे
(ग) क्योंकि मंगोल बड़ी संख्या में पशुपालन का कार्य करते थे
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ख) वर्षा न होने पर घास के मैदान सूख जाते थे

10. मंगोलों के लिए व्यापार क्यों महत्त्वपूर्ण था ?
(क) क्योंकि इनसे राज्य को काफी धन प्राप्त होता था
(ख) क्योंकि इससे व्यापारी बहुत प्रसन्न थे।
(ग) क्योंकि मंगोलिया में संसाधनों की बहुत कमी थी
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) क्योंकि मंगोलिया में संसाधनों की बहुत कमी थी

11. मंगोल साम्राज्य की स्थापना किसने की थी?
(क) रोमानोव
(ख) माँचू
(ग) तैमूर लंग
(घ) चंगेज़ खाँ।
उत्तर:
(घ) चंगेज़ खाँ।

12. चंगेज खाँ कौन था ?
(क) चीनियों का प्रसिद्ध नेता
(ख) मंगोलों का प्रसिद्ध नेता
(ग) ईरानियों का प्रसिद्ध नेता
(घ) जापानियों का प्रसिद्ध नेता।
उत्तर:
(ख) मंगोलों का प्रसिद्ध नेता

13. चंगेज़ खाँ का जन्म कब हुआ ?
(क) 1160 ई० में
(ख) 1162 ई० में
(ग) 1165 ई० में
(घ) 1167 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1162 ई० में

14. चंगेज़ खाँ का वास्तविक नाम क्या था ?
(क) तेमुजिन
(ख) माँचू
(ग) तातार
(घ) कगान।
उत्तर:
(क) तेमुजिन

15. कुरिलताई से क्या भाव है ?
(क) मंगोल सरदारों की सभा
(ख) मंगोलिया का प्रसिद्ध पर्वत
(ग) मंगोलिया की प्रसिद्ध नदी
(घ) मंगोलिया का प्रसिद्ध नेता।
उत्तर:
(क) मंगोल सरदारों की सभा

16. चंगेज़ खाँ मंगोलों का शासक कब बना ?
(क) 1203 ई० में
(ख) 1205 ई० में
(ग) 1206 ई० में
(घ) 1209 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1206 ई० में

17. चंगेज़ खाँ ने पीकिंग पर कब अधिकार किया था ?
(क) 1206 ई० में
(ख) 1209 ई० में
(ग) 1213 ई० में
(घ) 1215 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1215 ई० में।

18. चंगेज खाँ की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) कराकोरम
(ख) बुखारा
(ग) पीकिंग
(घ) हेरात।
उत्तर:
(क) कराकोरम

19. यास से आपका क्या अभिप्राय है?
(क) विधि संहिता
(ख) मंगोल प्राँत
(ग) मंगोल सेनापति
(घ) मंगोल हरकारा पद्धति।
उत्तर:
(क) विधि संहिता

20. यास का प्रचलन किसने किया ?
(क) ओगोदेई ने
(ख) अल-मुस्तासिम ने
(ग) चंगेज़ खाँ ने
(घ) जुवाइनी ने।
उत्तर:
(ग) चंगेज़ खाँ ने

21. ये-लू-चुत्साई कौन था ?
(क) फ़ारसी का प्रसिद्ध इतिहासकार
(ख) एक चीनी मंत्री
(ग) मंगोलों का प्रसिद्ध नेता
(घ) तातारों का प्रसिद्ध नेता।
उत्तर:
(ख) एक चीनी मंत्री

22. पैजा अथवा जेरेज़ क्या था ?
(क) यात्रियों को दिया जाने वाला पास
(ख) सेना का एक महत्त्वपूर्ण पद
(ग) प्रांत का मुखिया
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) यात्रियों को दिया जाने वाला पास

23. चंगेज़ खाँ की मृत्यु कब हुई थी?
(क) 1206 ई० में
(ख) 1226 ई० में
(ग) 1227 ई० में
(घ) 1237 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1227 ई० में

24. चंगेज़ खाँ के बाद मंगोलिया का शासक कौन बना ?
(क) ओगोदेई
(ख) जोची
(ग) तोलुई
(घ) चघताई।
उत्तर:
(क) ओगोदेई

25. ओगोदेई ने चीन पर कब अधिकार कर लिया था ?
(क) 1231 ई० में
(ख) 1232 ई० में
(ग) 1234 ई० में
(घ) 1241 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1234 ई० में

26. बाटू कौन था ?
(क) चंगेज़ खाँ का पोता
(ख) कुबलई खाँ का पोता
(ग) तैमूर का पुत्र
(घ) मोंके का पुत्र।
उत्तर:
(क) चंगेज़ खाँ का पोता

27. मोंके कौन था ?
(क) चंगेज़ खाँ का पोता
(ख) ओगोदेई का पोता
(ग) जमूका का पुत्र
(घ) ओंग खाँ का पुत्र।
उत्तर:
(क) चंगेज़ खाँ का पोता

28. मंगोलों के किस नेता ने बग़दाद पर अधिकार कर लिया था ?
(क) चंगेज़ खाँ
(ख) ओगोदेई
(ग) जोची
(घ) हुलेगु।
उत्तर:
(घ) हुलेगु।

29. यूआन वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) चंगेज़ खाँ
(ख) ओगोदेई
(ग) बाटू
(घ) कुबलई खाँ।
उत्तर:
(घ) कुबलई खाँ।

30. कुबलई खाँ की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) कराकोरम
(ख) पीकिंग
(ग) शंघाई
(घ) बगदाद।
उत्तर:
(ख) पीकिंग

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

31. कुबलई खाँ के दरबार में कौन-सा महान् यात्री पहुंचा था ?
(क) मार्कोपोलो
(ख) कोलंबस
(ग) ह्यनसांग
(घ) वास्कोडिगामा।
उत्तर:
(क) मार्कोपोलो

32. इल-खानी वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) ओगोदेई
(ख) कुबलई खाँ
(ग) हुलेगु
(घ) जोची।
उत्तर:
(ग) हुलेगु

33. जुवाइनी की प्रसिद्ध रचना का नाम क्या था ?
(क) हिस्ट्री ऑफ़ द कनकरर ऑफ़ द वर्ल्ड
(ख) मंगोलों का गोपनीय इतिहास
(ग) हिस्ट्री ऑफ़ द मंगोलस
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) हिस्ट्री ऑफ़ द कनकरर ऑफ़ द वर्ल्ड

34. गज़न खाँ किस वंश का प्रसिद्ध शासक था ?
(क) सी सिया
(ख) तातार
(ग) इल-खानी
(घ) यूआन।
उत्तर:
(ग) इल-खानी

35. गोल्डन होर्ड की स्थापना कहाँ की गई थी?
(क) रूसी स्टेपी क्षेत्र में
(ख) मंगोलिया में
(ग) ईरान में
(घ) जापान में।
उत्तर:
(क) रूसी स्टेपी क्षेत्र में

यायावर साम्राज्य HBSE 11th Class History Notes

→ मंगोल मध्य एशिया में रहने वाला एक यायावर समूह था। ये लोग मूलतः घुमक्कड़ थे। वे पशुपालक एवं शिकार संग्राहक थे। उनका समाज विभिन्न कबीलों में विभाजित था। इन कबीलों में आपसी लड़ाइयाँ चलती रहती थीं। लूटमार करना उनकी जीवन शैली का एक अभिन्न अंग था।

→ वे चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते रहते थे। वे तंबुओं में निवास करते थे। उनके परिवार पितृपक्षीय थे। अतः परिवार में पुत्र का होना आवश्यक समझा जाता था। उस समय धनी परिवार बहुत विशाल होते थे।

→ उस समय बहु-विवाह का प्रचलन था। उनका प्रमुख भोजन माँस एवं दूध था। वे सूती, रेशमी एवं ऊनी वस्त्र पहनते थे। मंगोल अपने मृतकों का रात्रि के समय संस्कार करते थे। वे शवों को जमीन में दफ़न करते थे तथा उनके साथ कुछ आवश्यक वस्तुएँ भी रखते थे।

→ क्योंकि उस समय स्टेपी क्षेत्र में संसाधनों की बहुत कमी थी इसलिए मंगोलों ने चीन के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए थे। मंगोलों एवं चीनियों द्वारा की जाने वाली लूटमार के कारण इनके संबंधों में आपसी दरार भी उत्पन्न हो जाती थी।

→ चंगेज़ खाँ ने यायावर साम्राज्य की स्थापना में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उसका जन्म 1162 ई० में हुआ था। उसका बचपन का नाम तेमुजिन था। उसके पिता का नाम येसूजेई था तथा वह कियात कबीले का मुखिया था।

→ उसकी माता का नाम ओलुन-इके था। तेमुजिन का विवाह बोरटे के साथ हुआ था। उसके बचपन में ही उसके पिता की एक विरोधी कबीले द्वारा हत्या कर दी गई थी। इसलिए उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद तेमुजिन ने अपना धैर्य न खोया।

→ इस संकट के समय उसे बोघूरचू, जमुका तथा तुगरिल खाँ ने बहुमूल्य सहयोग दिया। तेमुजिन ने अनेक शक्तिशाली कबीलों को पराजित कर अपने नाम की धाक जमा दी। उसकी सफलताओं को देखते हुए कुरिलताई ने 1206 ई० में तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से सम्मानित किया।

→ चंगेज़ खाँ ने 1227 ई० तक शासन किया। अपने शासनकाल के दौरान चंगेज़ खाँ ने उत्तरी चीन एवं करा खिता को विजित किया। उसने ख्वारज़म के शाह मुहम्मद को पराजित कर उसके अनेक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

→ उसने कराकोरम को मंगोल साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। चंगेज़ खाँ ने मंगोल साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के उद्देश्य से अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया। उसने नागरिक प्रशासन में भी अनेक उल्लेखनीय सुधार किए। उसकी महान् सफलताओं को देखते हुए उसे आज भी मंगोलिया के इतिहास में महान् राष्ट्र-नायक (national hero) के रूप में स्मरण किया जाता है।

→ चंगेज़ खाँ की मृत्यु के पश्चात् ओगोदेई (1229-41 ई०), गुयूक (1246-48 ई०) एवं मोंके (1251-59 ई०) ने शासन किया। उन्होंने मंगोल साम्राज्य के विस्तार एवं संगठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मोंके की मृत्यु के पश्चात् मंगोल साम्राज्य अनेक वंशों में विभाजित हो गया था।

→ इनमें चीन में कुबलई खाँ द्वारा स्थापित किया गया यूआन वंश, ईरान में हुलेगु द्वारा स्थापित किया गया इल-खानी वंश एवं दक्षिण रूस में बाटू द्वारा स्थापित किया गया गोल्डन होर्ड वंश उल्लेखनीय थे। स्टेपी निवासियों का अपना साहित्य लगभग न के बराबर था।

→ अतः यायावरी समाज के बारे हमारा ज्ञान मुख्य तौर पर इतिवृत्तों (chronicles), यात्रा वृत्तांतों (travelogues) तथा नगरीय साहित्यकारों के दस्तावेजों (documents produced by city based literateurs) से प्राप्त होता है। इन लेखकों की यायावरों के जीवन संबंधी सूचनाएँ अज्ञात एवं पूर्वाग्रहों (biased) से ग्रस्त हैं।

→ इनमें यायावर समुदायों को आदिम बर्बर (primitive barbarians) एवं मंगोलों को स्टेपी लुटेरों के रूप में पेश किया गया। मंगोलों पर सबसे बहुमूल्य शोध कार्य 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में रूसी विद्वानों ने किया।

→ इनमें बोरिस याकोवालेविच ब्लाडिमीरस्टॉव (Boris Yakovlevich Vladimirtsov) एवं वैसिली ब्लैदिमिरोविच बारटोल्ड (Vasily Vladimirovich Bartold) के नाम उल्लेखनीय हैं। हमें पारमहाद्वीपीय (transcontinental) मंगोल साम्राज्य के विस्तार से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारी चीनी, मंगोलियाई, फ़ारसी, अरबी, इतालवी, लातीनी, फ्रांसीसी एवं रूसी स्रोतों से मिलती है।

→ मंगोलों के इतिहास पर बहुमूल्य प्रकाश डालने वाले दो महत्त्वपूर्ण स्रोत ईगोर दे रखेविल्ट्स (Igor de Rachewiltz) की रचना मंगोलों का गोपनीय इतिहास (The Secret History of the Mongols) तथा मार्को पोलो (Marco Polo) का यात्रा वृत्तांत (travels) हैं।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

HBSE 11th Class Geography महासागरीय जल Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. उस तत्त्व की पहचान करें जो जलीय चक्र का भाग नहीं है।
(A) वाष्पीकरण
(B) वर्षण
(C) जलयोजन
(D) संघनन
उत्तर:
(C) जलयोजन

2. महाद्वीपीय ढाल की औसत गहराई निम्नलिखित के बीच होती है।
(A) 2-20 मी०
(B) 20-200 मी०
(C) 200-3,000 मी०
(D) 2,000-20,000 मी०
उत्तर:
(C) 200-3,000 मी०

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

3. निम्नलिखित में से कौन-सी लघु आकृति महासागरों में नहीं पाई जाती है?
(A) समुद्री टीला
(B) महासागरीय गंभीर
(C) प्रवाल द्वीप
(D) निमग्न द्वीप
उत्तर:
(B) महासागरीय गंभीर

4. लवणता को प्रति समुद्री मक (ग्राम) की मात्रा से व्यक्त किया जाता है-
(A) 10 ग्राम
(B) 100 ग्राम
(C) 1,000 ग्राम
(D) 10,000 ग्राम
उत्तर:
(C) 1,000 ग्राम

5. निम्न में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?
(A) हिंद महासागर
(B) अटलांटिक महासागर
(C) आर्कटिक महासागर
(D) प्रशांत महासागर
उत्तर:
(C) आर्कटिक महासागर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
हम पृथ्वी को नीला ग्रह क्यों कहते हैं?
उत्तर:
जल पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्रकार के जीवों के लिए आवश्यक घटक है। पृथ्वी के जीव सौभाग्यशाली हैं कि यह एक जलीय ग्रह है। पृथ्वी ही सौरमण्डल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जिसकी सतह पर 71% जल पाया जाता है। जल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी को नीला ग्रह या जलीय ग्रह कहा जाता है।

प्रश्न 2.
महाद्वीपीय सीमांत क्या होता है?
उत्तर:
महाद्वीपीय सीमांत प्रत्येक महादेश का विस्तृत किनारा होता है जोकि अपेक्षाकृत छिछले समुद्रों तथा खाड़ियों से घिरा भाग होता है। यह महासागर का सबसे छिछला भाग होता है, जिसकी औसत प्रवणता 1 डिग्री या उससे भी कम होती है। इस सीमा का किनारा बहुत ही खड़े ढाल वाला होता है।

प्रश्न 3.
विभिन्न महासागरों के सबसे गहरे गर्तों की सूची बनाइये।
उत्तर:
वर्तमान समय में लगभग 57 गर्मों की खोज हो चुकी है जो निम्नलिखित अनुसार हैं-
32 प्रशांत महासागर
19 अटलांटिक महासागर
6 हिंद महासागर

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

प्रश्न 4.
ताप-प्रवणता क्या है?
उत्तर:
यह सीमा समुद्री सतह से लगभग 100 से 400 मीटर नीचे प्रारंभ होती है, एवं कई सौ मीटर नीचे तक जाती है। वह सीमा क्षेत्र जहाँ तापमान में तीव्र गिरावट आती है, उसे ताप-प्रवणता (थर्मोक्लाइन) कहा जाता है।

प्रश्न 5.
समुद्र में नीचे जाने पर आप ताप की किन परतों का सामना करेंगे? गहराई के साथ तापमान में भिन्नता क्यों आती है?
उत्तर:
समुद्र में नीचे जाने पर हमें तीन परतों से गुजरना पड़ता है
1. पहली परत-

  • यह महासागरीय जल की सबसे उपरी परत होती है
  • यह परत 500 मीटर तक मोटी होती है
  • इसका तापमान 20° सेंटीग्रेड से -25° सेंटीग्रेड के बीच होता है।

2. दूसरी परत-

  • इसे तापप्रवणता परत कहा जाता है
  • यह पहली परत के नीचे स्थित होती है
  • ताप प्रवणता की मोटाई -500 से 1000 मीटर तक होती है।

3. तीसरी परत-

  • यह परत बहुत ठंडी होती है
  • यह परत गम्भीर महासागरीय तली तक विस्तृत होती है
  • आर्कटिक एवं अंटार्कटिक वृत्तों में सतही जल का तापमान 0° से० के निकट होता है और इसलिए गहराई के साथ तापमान में बहुत कम परिवर्तन आता है।

प्रश्न 6.
समुद्री जल की लवणता क्या है?
उत्तर:
सागरीय जल की मात्रा और उसमें घुले हुए लवणों की मात्रा के बीच पाए जाने वाले अनुपात को समुद्री जल की लवणता कहा जाता है। लवणता को प्रति हजार भागों में व्यक्त किया जाता है अर्थात् प्रति 1,000 ग्राम समुद्री जल में कितने ग्राम लवण की मात्रा है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलीय चक्र के विभिन्न तत्व किस प्रकार अंतर-संबंधित हैं?
उत्तर:
जल एक चक्रीय संसाधन है जिसका प्रयोग एवं पुनः प्रयोग किया जा सकता है। जब समुद्री जल वाष्प बनकर बादल का रूप धारण करता है और वो ही बादल जब वायुमंडलीय अवरोधों से टकराता है तो वर्षा करता है वर्षा का जल प्रवाहित होकर नदी, नालों से होते हुए सागरों में मिल जाता है। फिर सूर्यताप से सागरों के जल वाष्प बन जाते है। इस प्रक्रिया को जल चक्र कहा जाता है। इसी प्रकार जलीय चक्र में एक तत्व दूसरे तत्व से अंतर-संबंधित है।

जलीय चक्र पृथ्वी के जलमंडल में विभिन्न रूपों जैसे-गैस, तरल व ठोस में जल का परिसंचलन है। इसका संबंध महासागरों, वायुमंडल, भूपृष्ठ, स्तल एवं जीवों के बीच सतत् आदान-प्रदान से भी है। पर्यावरण में जल तीनों मण्डलों में तीनों अवस्थाओं (ठोस, तरल तथा गैस) में पाया जाता है। वर्षा होने तथा हिम पिघलने से जल का अधिकतर भाग ढाल के अनुरूप बहकर नदियों के द्वारा समुद्र में चला जाता है। इस जल का कुछ भाग महासागरों, झीलों तथा नदियों से जलवाष्प (Water Vapour) बनकर वायुमण्डल में लौट जाता है व कुछ भाग वनस्पति द्वारा अवशोषित होकर वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) द्वारा वायुमण्डल में जा मिलता है।

वर्षा और हिम के पिघले जल का शेष भाग रिसकर या टपक-टपककर भूमिगत हो जाता है। वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प संघनित (Condense) होकर बादलों का रूप धारण करते हैं। बादलों से वर्षा होती है और वर्षा का जल नदियों के रास्ते फिर से पहुँच जाता है। झरनों के माध्यम से भूमिगत जल भी कहीं-न-कहीं धरातल पर निकलकर नदियों से होता हुआ समुद्रों में जा पहुँचता है। “अतः महासागरों, वायुमण्डल तथा स्थलमण्डल में परस्पर होने वाला जल का समस्त आदान-प्रदान जलीय-चक्र कहलाता है।” इस जलीय चक्र में जल कभी रुकता नहीं और अपनी अवस्था (State) तथा स्थान बदलता रहता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

प्रश्न 2.
महासागरों के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
महासागरों के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-
स्थलमण्डल और वायुमण्डल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारकों की अपेक्षा जलमण्डल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक अधिक जटिल (Complex) होते हैं। महासागरों पर तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं

1. अक्षाश (Latitude)-भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् और ध्रुवों की ओर तिरछी पड़ती हैं। फलस्वरूप भूमध्यरेखीय क्षेत्र में महासागरीय जल का औसत वार्षिक तापमान अधिक रहता है और ध्रुवों की ओर जाने पर समुद्री जल का तापमान घटता जाता है। उदाहरणतः भूमध्य रेखा पर महासागरीय जल का औसत वार्षिक तापमान 26°C, 20° अक्षांश पर 23°C, 40° अक्षांश पर -14°C तथा 60° अक्षांश पर 1°C रह जाता है। 0°C की समताप रेखा ध्रुवीय क्षेत्रों के चारों ओर टेढ़ा-मेढ़ा वृत्त बनाती है और सर्दियों के मौसम में थोड़ा-सा भूमध्य रेखा की ओर खिसक आती है।

2. प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)-स्थल से जल की ओर बहने वाली प्रचलित पवनें समुद्री जल को तट से परे बहा ले जाती हैं। हटे हुए गर्म जल का स्थान लेने के लिए नीचे से समुद्र का ठण्डा पानी ऊपर आता रहता है। परिणामस्वरूप वहाँ सागरीय का तापमान कम हो जाता है। उदाहरणतः उष्ण कटिबन्ध से पूर्व से आने वाली सन्मार्गी पवनों (Trade Winds) के प्रभाव से महासागरों के पूर्वी तटों पर समुद्री जल का तापमान कम और पश्चिमी तटों पर समुद्री जल का तापमान अपेक्षाकृत अधिक होता है। इसके विपरीत शीतोष्ण कटिबन्ध में पछुवा पवनों (Westerlies) के प्रभाव से महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर समुद्री जल का तापमान कम और पूर्वी तटों पर समुद्री जल का तापमान अपेक्षाकृत अधिक होता है।

3. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)-महासागरीय जल के तापमान को वहाँ चलने वाली गर्म अथवा ठण्डी जल धाराएँ भी प्रभावित करती हैं। उदाहरणतः मैक्सिको की खाड़ी से चलने वाली गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream) नामक गर्म जल धारा उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट के पास तथा उत्तरी-पश्चिमी यूरोप के पास समुद्री जल के तापमान को बढ़ा देती है। इसी कारण नार्वे के तट पर 60° उत्तरी अक्षांश पर भी समुद्री जल जम नहीं पाता। इसके विपरीत लैब्रेडोर की ठण्डी जलधारा के कारण शीत ऋतु में उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पूर्वी तट पर 50° उत्तर अक्षांश पर ही तापमान हिमांक तक पहुँच जाता है।

4. समीपवर्ती स्थलखण्डों का प्रभाव (Effect ofAdjacent Land Masses) खुले महासागरों के तापमान सारा साल लगभग एक-जैसे रहते हैं, परन्तु पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से स्थल खण्डों से घिरे हुए समुद्रों का तापमान ग्रीष्म ऋतु में अधिक व शीत ऋतु में कम हो जाता है। ऐसे समुद्रों पर निकटवर्ती स्थल खण्डों का प्रभाव पड़ता है जो जल की अपेक्षा शीघ्र गर्म और शीघ्र ठण्डे हो जाते हैं। उदाहरणतः भूमध्य रेखा पर ग्रीष्म ऋतु में खुले महासागरीय जल का तापमान 26°C होता है जबकि लाल सागर (Red Sea) का तापमान उन्हीं दिनों 30°C तक पहुँचा होता है।

5. लवणता (Salinity)-प्रायः अधिक लवणता वाला महासागरीय जल अधिक ऊष्मा ग्रहण कर लेता है जिससे उसका तापमान भी बढ़ जाता है। इसके विपरीत समुद्र का कम खारा जल कम ऊष्मा ग्रहण करने के कारण अपेक्षाकृत ठण्डा रहता है।

6. प्लावी हिमखण्ड तथा प्लावी हिमशैल (Ice floes and Icebergs)-ध्रुवीय क्षेत्रों से टूटकर आने वाले बहुत अधिक प्लावी हिमखण्ड (Ice floes) और प्लावी हिमशैल (Icebergs) जिन महासागरों में मिलते हैं, वहाँ के जल का तापमान अपेक्षाकृत कम हो जाता है। उत्तरी ध्रुव के पास ग्रीनलैंड से टूटकर आने वाले हिमखण्ड और हिमशैल पर्याप्त दूरी तक अन्धमहासागर के जल का तापमान नीचे कर देते हैं। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव के पास अंटार्कटिका से टूटकर आने वाले हिमखण्ड व हिमशैल निकटवर्ती दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) के जल का तापमान कम कर देते हैं।

7. वर्षा का प्रभाव (Effect of Rain)-जिन समुद्री भागों में वर्षा अधिक होती है, वहाँ सतह (सागर की सतह) का तापक्रम अपेक्षाकृत कम तथा नीचे के जल का तापमान अधिक होता है। भूमध्य रेखीय महासागरों में अधिक वर्षा के कारण ऊपरी सतह का तापक्रम कम तथा नीचे गहराई में तापक्रम अधिक होता है अर्थात् तापक्रम की विलोमता देखने को मिलती है।

महासागरीय जल HBSE 11th Class Geography Notes

→ महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf) महाद्वीपीय मग्नतट महासागर का एक ऐसा निमज्जित प्लेटफॉर्म होता है जिस पर महाद्वीपीय उच्चावच स्थित है।

→ जलमग्न केनियन (Submarine Canyons) महासागरीय नितल पर तीव्र ढालों वाली गहरी व संकरी ‘V’ आकार की घाटियों या गॉর্जो को जलमग्न केनियन कहते हैं। जलमग्न कटक (Submarine Ridges) महासागरों की तली पर स्थित सैंकड़ों कि०मी० चौड़ी तथा हज़ारों कि०मी० लम्बी पर्वत श्रेणियों को जलमग्न कटक कहते हैं।

→ गाईऑट (Guyot)-सपाट शीर्ष वाले समुद्री पर्वतों को गाईऑट कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

→ महाद्वीपीय सीमान्त (Continental Margin) यह महाद्वीपों की पर्पटी की अंतः समुद्री सीमा है। इसमें महाद्वीपीय मग्नतट, ढाल और उत्थान शामिल हैं।

→ ग्रांड बैंक्स (Grand Banks)-कनाडा के न्यूफाउंडलैंड द्वीप के दक्षिण-पूर्व में विश्व के सर्वश्रेष्ठ मत्स्य-ग्रहण क्षेत्रों में से एक।

→ अयन वृत्त (Tropics)-कर्क रेखा (23.5° उ०) व मकर रेखा (23.5° द०) को अयन वृत्त कहा जाता है, क्योंकि यहाँ सूर्य का प्रखर प्रकाश पड़ता है।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. ट्रिवार्था के वर्गीकरण में वर्षण पर आधारित जलवायु वर्ग का नाम लिखो-
(A) A वर्ग
(B) C वर्ग
(C) B वर्ग
(D) H वर्ग
उत्तर:
(C) B वर्ग

2. अमेजन बेसिन में कौन-सी जलवायु पाई जाती है?
(A) भूमध्यरेखीय
(B) सवाना
(C) ध्रुवीय
(D) मानसूनी
उत्तर:
(A) भूमध्यरेखीय

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

3. विश्व की जलवायु के वर्गीकरण को कितने प्रकारों में बाँटा जा सकता है?
(A) 2
(B) 3
(C) 4
(D) 5
उत्तर:
(A) 2

4. वे काल्पनिक रेखाएँ जो समुद्रतल के अनुसार समानीत ताप वाले स्थानों को मिलाती हैं-
(A) समदाब रेखाएँ
(B) समताप रेखाएँ
(C) समान रेखाएँ
(D) सम समुद्रतल रेखाएँ
उत्तर:
(B) समताप रेखाएँ

5. वायुमंडल में उपस्थित ग्रीन हाऊस गैसों में सबसे अधिक सांद्रण किस गैस का है?
(A) CO2
(B) CFCs
(C) CHA
(D) NO
उत्तर:
(A) CO2

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

6. उपोष्ण मरुस्थलीय जलवायु दोनों गोलार्डों में कितने अक्षांशों के बीच पाई जाती है?
(A) 5°- 20°
(B) 15°- 30°
(C) 15°- 35°
(D) 30°- 40°
उत्तर:
(B) 15°- 30°

7. भारत में किस प्रकार की जलवायु पाई जाती है?
(A) उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र जलवायु
(B) उष्ण कटिबन्धीय मानसून जलवायु
(C) उपोष्ण कटिबन्धीय स्टैपीज
(D) भूमध्य सागरीय जलवायु
उत्तर:
(B) उष्ण कटिबन्धीय मानसून जलवायु

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
ट्रिवार्था ने विश्व की जलवायु को कितने प्रकारों में विभाजित किया है?
उत्तर:
16 प्रकारों में।

प्रश्न 2.
ट्रिवार्था के जलवायु वर्गीकरण का क्या आधार था?
उत्तर:
तापमान तथा वर्षण।

प्रश्न 3.
ट्रिवार्था ने विश्व की जलवायु को कितने मुख्य भागों में बाँटा?
उत्तर:
छह।

प्रश्न 4.
ट्रिवार्था के वर्गीकरण में वर्षण पर आधारित जलवायु वर्ग का नाम लिखो।
उत्तर:
B वर्ग।

प्रश्न 5.
अमेज़न बेसिन में कौन-सी जलवायु पाई जाती है?
उत्तर:
भूमध्य रेखीय जलवायु।

प्रश्न 6.
टैगा जलवायु में कौन-से वन मिलते हैं?
उत्तर:
शंकुधारी टैगा वन।

प्रश्न 7.
टैगा जलवायु में न्यूनतम तापमान कहाँ नापा गया है?
उत्तर:
वल्यान्सक (-50° सेल्सियस)।

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जलवायु वर्गीकरण की पद्धतियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
जलवायु का वर्गीकरण तीन वृहद उपागमों द्वारा किया गया है जो निम्नलिखित हैं-

  1. आनुभविक
  2. जननिक और
  3. अनुप्रयुक्त।

प्रश्न 2.
यूनानियों ने संसार को कौन-कौन से ताप कटिबन्धों में विभाजित किया था?
उत्तर:

  1. उष्ण
  2. शीतोष्ण तथा
  3. शीतकटिबन्ध।

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प्रश्न 3.
विश्व की जलवायु का वर्गीकरण करने वाले तीन वैज्ञानिकों के नाम बताओ।
उत्तर:
कोपेन, थार्नथ्वेट तथा ट्रिवार्था।

प्रश्न 4.
विश्व के सभी जलवायु वर्गीकरणों को कितने प्रकारों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर:
दो प्रकारों में-

  1. आनुभविक वर्गीकरण
  2. जननिक वर्गीकरण।

प्रश्न 5.
कोपेन ने अपने वर्गीकरण के लिए जलवायु के किन तत्त्वों को आधार बनाया?
उत्तर:

  1. तापमान
  2. वर्षा तथा
  3. वर्षा के मौसमी स्वभाव को।

प्रश्न 6.
थानथ्वेट ने अपने वर्गीकरण के लिए जलवायु के किन तत्त्वों को आधार बनाया?
उत्तर:

  1. वर्षण प्रभाविता
  2. तापीय दक्षता
  3. वर्षा का मौसमी वितरण।

प्रश्न 7.
ट्रिवार्था ने सवाना जलवायु तथा भूमध्य सागरीय जलवायु के लिए किन संकेताक्षरों का उपयोग किया है?
उत्तर:
A, C, D, E, H तथा B क्रमशः Aw तथा Cs।

प्रश्न 8.
प्रमुख ग्रीन हाऊस गैसों के नाम बताइए।
उत्तर:
कार्बन-डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, ओज़ोन व जलवाष्प।

प्रश्न 9.
भूमण्डलीय तापन क्या होता है?
उत्तर:
पृथ्वी के तापमान का औसत से अधिक होना।

प्रश्न 10.
ट्रिवार्था के जलवायु वर्गीकरण में ताप पर आधारित पाँच वर्ग कौन-से हैं?
उत्तर:
A, C, D, E तथा H वर्ग।

प्रश्न 11.
Aw प्रकार की जलवायु कौन-सी होती है?
उत्तर:
उष्ण कटिबन्धीय सवाना जलवायु।

प्रश्न 12.
Bwh प्रकार की जल न-सी होती है?
उत्तर:
उष्ण तथा उपोष्ण कटिबन्धीय गर्म मरुस्थल।

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प्रश्न 13.
किन्हीं दो उष्ण मरुस्थलों के नाम लिखो।
उत्तर:

  1. सहारा तथा
  2. थार।

प्रश्न 14.
ध्रुवीय जलवायु के कौन से दो प्रकार हैं?
उत्तर:

  1. टुण्ड्रा और
  2. ध्रुवीय हिमाच्छादित जलवायु।

प्रश्न 15.
उष्ण कटिबन्ध में पाई जाने वाली तीन प्रकार की जलवायु का नाम बताओ।
उत्तर:

  1. भूमध्य रेखीय
  2. सवाना
  3. मानसूनी।

प्रश्न 16.
भूमध्य सागरीय प्रदेश में सर्दियों में वर्षा होने का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर:
पवन पेटियों का खिसकना।

प्रश्न 17.
टैगा जलवायु कहाँ पाई जाती है?
उत्तर:
केवल 50° से 70° उत्तरी अक्षांशों में, दक्षिणी गोलार्द्ध में नहीं।

प्रश्न 18.
टैगा जलवायु में वार्षिक तापान्तर कितना होता है?
उत्तर:
65.5° सेल्सियस तथा इससे ज्यादा वार्षिक तापान्तर कहीं नहीं मिलता।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रीनहाऊस गैसों से आपका क्या अभिप्राय है? ग्रीनहाऊस प्रभाव बढ़ाने वाले प्रमुख तत्त्वों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ग्रीनहाऊस गैसें ऐसी गैसें जो धरती पर एक आवरण बनाकर कम्बल की भाँति काम करती हैं और धरती की ऊष्मा को बाहर जाने से रोकती हैं, ग्रीनहाऊस गैसें कहलाती हैं। ये पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में सहायक हैं। कार्बन-डाइ-ऑक्साइड के अतिरिक्त भूमण्डलीय तापन की प्रक्रिया को तेज करने वाले कुछ अन्य तत्त्व निम्नलिखित हैं
1. जलवाष्प तापमान बढ़ने से जल की वाष्पन दर बढ़ जाती है। ज्यादा जलवाष्प तापमान को और ज्यादा बढ़ाते हैं क्योंकि जलवाष्प एक प्राकृतिक ग्रीन हाऊस गैस है।

2. नाइट्रस ऑक्साइड-कृषि में नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग, पेड़-पौधों को जलाने, नाइट्रोजन वाले ईंधन को जलाने आदि के कारण वायुमण्डल में नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। इसका प्रत्येक अणु कार्बन डाइ-ऑक्साइड की तुलना में 250 गुना अधिक ताप प्रगृहित करता है।

3. मीथेन गैस-मीथेन गैस सागरों, ताजे जल, खनन कार्य, गैस ड्रिलिंग तथा जैविक पदार्थों के सड़ने से उत्पन्न होती है। पशु व दीमक आदि को भी मीथेन गैस छोड़ने का जिम्मेदार माना गया है।

4. क्लोरो-फ्लोरो कार्बन-ये संश्लेषित यौगिकों का समूह है जो वातानुकूलन व प्रशीतन की मशीनों, आग बुझाने के उपकरणों तथा छिड़काव यन्त्रों में प्रणोदक के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

प्रश्न 2.
जलवायु परिवर्तन के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जलवायु परिवर्तन के कारणों को दो वर्गों में बाँटा गया है-

  • खगोलीय कारण
  • पार्थिव कारण।

(1) खगोलीय कारणों में सौर कलंक जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख कारण है। सौर कलंक सूर्य पर काले धब्बे होते हैं जो एक चक्रीय ढंग से घटते-बढ़ते रहते हैं। मौसम वैज्ञानिक के अनुसार सौर कलंकों की संख्या बढ़ने पर मौसम ठण्डा और आर्द्र हो जाता है और तूफानों की संख्या बढ़ जाती है।

(2) पार्थिव कारणों में ज्वालामुखी क्रिया जलवायु परिवर्तन का एक अन्य प्रमुख कारण है। ज्वालामुखी उभेदन के दौरान वायुमण्डल में बड़ी मात्रा में ऐरोसोल छोड़ दिए जाते हैं। ये ऐरोसोल वायुमण्डल में लम्बे समय तक रहते हैं और पृथ्वी की सतह पर पहुंचने वाले सौर विकिरण को कम करते हैं, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान कुछ हद तक कम हो जाता है।

इसके अतिरिक्त ग्रीनहाऊस गैसों का सान्द्रण जलवाय को सबसे अधिक प्रभावित करता है। इससे पथ्वी का ता

प्रश्न 3.
भूमण्डलीय तापन में मनुष्य की भूमिका पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान युग में बढ़ता भूमण्डलीय तापन संसाधनों के अनियोजित उपयोग और हमारी भोगवादी जीवन शैली की देन है। चूल्हे से धमन भट्टी तक तथा जुगाड़ से रॉकेट तक हुआ तकनीकी विकास, बढ़ता औद्योगीकरण, नगरीकरण, परिवहन तथा कृषि के क्षेत्र में आए क्रान्तिकारी बदलावों, भूमि की जुताई तथा वनों के विनाश जैसी मनुष्य की गतिविधियों ने वायुमण्डल में ग्रीन हाऊस गैसों की मात्रा जरूरत से ज्यादा बढ़ा दी है। ये गैसें वायुमण्डल में एक कम्बल या काँच घर (Glass House) का कार्य करती हैं, जिसमें गर्मी आ तो जाती है पर आसानी से जाने नहीं पाती।

प्रश्न 4.
भूमण्डलीय तापन के दुष्परिणामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूमण्डलीय तापन के प्रमुख दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं-

  1. विश्व में औसत तापमान बढ़ने से हिमाच्छादित क्षेत्रों में हिमानियाँ पिघलेंगी।
  2. समुद्र का जल-स्तर ऊँचा उठेगा जिससे तटवर्ती प्रदेश व द्वीप जलमग्न हो जाएँगे। करोड़ों लोग शरणार्थी बन जाएँगे।
  3. वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज़ होगी। पृथ्वी का समस्त पारिस्थितिक तन्त्र प्रभावित होगा। शीतोष्ण कटिबन्धों में वर्षा बढ़ेगी और समुद्र से दूर उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा घटेगी।।
  4. आज के ध्रुवीय क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक गर्म हो जाएँगे।
  5. जलवायु के दो तत्त्वों तापमान और वर्षा में जब परिवर्तन होगा तो निश्चित रूप से धरातल की वनस्पति का प्रारूप (Patterm) बदलेगा।
  6. हरित गृह प्रभाव के कारण कृषि क्षेत्रों, फसल प्रारूप तथा कृषि प्राकारिकी (Topology) में परिवर्तन होना निश्चित है।

प्रश्न 5.
भूमण्डलीय जलवायविक परिवर्तन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वायुमण्डलीय दशाएँ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर ही नहीं बदलती वरन् ये समय के साथ-साथ भी बदल जाती हैं। अतः जलवायु परिवर्तन से आशय 30-35 वर्षों में या हजारों वर्षों में मिलने वाली जलवायवी भिन्नताओं के अध्ययन से नहीं है। वरन् इसमें लाखों वर्षों से चले आ रहे समय मापकों में होने वाली जलवायु की भिन्नताओं का अध्ययन शामिल किया जाता है।

प्रश्न 6.
जलवायु परिवर्तन के पार्थिव कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जलवायु परिवर्तन के पार्थिव कारक निम्नलिखित हैं-
1. महाद्वीपीय विस्थापन-भू-गर्भिक काल में महाद्वीपों के विखण्डन व विभिन्न दिशाओं में संचलन के कारण विभिन्न भू-खण्डों में जलवायु परिवर्तन हुए हैं। ध्रुवीय क्षेत्रों के समीप स्थित भू-भागों का भू-मध्य रेखा के निकट आने पर जलवायु परिवर्तन होना एक सामान्य प्रक्रिया है। दक्षिणी भारत में हिमनदों के चिह्नों तथा अंटार्कटिका में कोयले का मिलना इस जलवायु परिवर्तन के प्रमुख प्रमाण हैं।

2. पर्वत निर्माण प्रक्रिया यह जलवायु को दो प्रकार से प्रभावित करती है-(a) पर्वतों के उत्थान तथा घिसकर उनके नीचे हो जाने से स्थलाकृतियों की व्यवस्था भंग हो जाती है। इसका प्रभाव पवन प्रवाह, सूर्यातप तथा मौसमी तत्त्वों; जैसे तापमान एवं वर्षा के वितरण पर पड़ता है। (b) पर्वत निर्माण की प्रक्रिया से ज्वालामुखी उद्गार की सम्भावनाएँ प्रबल हो जाती हैं। ज्वालामुखी उद्गार से भारी मात्रा में वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें और जलवाष्प निष्कासित होते हैं। इससे वायुमण्डल की पारदर्शिता (Transparency) प्रभावित होती है, जिसका सीधा प्रभाव प्रवेशी सौर्य विकिरण तथा पार्थिव विकिरण पर पड़ता है। ये सभी प्रक्रियाएँ पृथ्वी के ऊष्मा सन्तुलन (Heat Balance) को भंग कर जलवायु परिवर्तन की भूमिका तैयार करती हैं।

3. मनुष्य के क्रिया-कलाप मनुष्य अपनी विकासात्मक गतिविधियों से हरित-गृह गैसों (कार्बन-डाइ-ऑक्साइड, ओजोन, जलवाष्प) की मात्रा वायुमण्डल में बढ़ाता रहता है। वायुमण्डल में इन अवयवों के प्राकृतिक संकेन्द्रण में भिन्नता आने से भूमण्डलीय ऊष्मा सन्तुलन प्रभावित होता है। इससे वायुमण्डल की सामान्य प्रणाली, जिस पर जलवायु भी निर्भर करती है, प्रभावित होती है।

प्रश्न 7.
जलवायु परिवर्तन के खगोलीय कारकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जलवायु परिवर्तन से जुड़े खगोलीय कारक तीन तथ्यों पर आधारित हैं-
1. पृथ्वी की कक्षा की उत्केन्द्रीयता (Ecentricity) में परिवर्तन-पृथ्वी की उत्केन्द्रीयता में लगभग 92 हजार वर्षों में परिवर्तन आ जाता है अर्थात् सूर्य के चारों ओर पृथ्वी के परिक्रमण पथ की आकृति कभी अण्डाकार तो कभी गोलाकार हो जाती है। उदाहरणतः वर्तमान में पृथ्वी की सूर्य के निकटतम रहने की स्थिति–उपसौर (Perihelion) जनवरी में आती है। यह उपसौर स्थिति 50 हजार वर्ष बाद जुलाई में आने लगेगी। इसका परिणाम यह होगा कि आगामी 50 हजार वर्षों में उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्मकाल अधिक गर्म व शीतकाल अधिक ठण्डा हो जाएगा।

2. पृथ्वी की काल्पनिक धुरी के कोण में परिवर्तन सूर्य की परिक्रमा करते समय पृथ्वी की धुरी (Axes) अपने कक्षा-पथ के साथ एक कोण बनाती है। वर्तमान युग में यह कोण 239° का है, लेकिन प्रत्येक 41-42 हजार वर्षों के बाद पृथ्वी की धुरी के कोण में 1.5° का अन्तर आ जाता है। कभी यह झुकाव 22° तो कभी 241/2° हो जाता है। पृथ्वी के झुकाव में परिवर्तन से मौसमी दशाओं व तापमान में तो अन्तर होंगे ही साथ ही भौगोलिक पेटियों की भिन्नताएँ कम या विलुप्त हो जाएँगी।

3. विषुव का पुरस्सरण (Precession)-वर्तमान में चार मौसमी दिवसों की स्थितियाँ इस प्रकार हैं-21 मार्च-बसन्त विषव, 23 सितम्बर-शरद विषुव, 21 जून-कर्क संक्रांति तथा 22 दिसम्बर मकर संक्रांति। प्रत्येक 22 हजार वर्षों में इन स्थितियों में परिवर्तन आता है जिसका सीधा प्रभाव जलवायु पर पड़ता है।

प्रश्न 8.
जलवायु परिवर्तन के प्रमुख प्रमाणों का संक्षिप्त ब्योरा दीजिए।
उत्तर:
जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी प्रमाणों को भी निम्नलिखित दो वर्गों में रखा जा सकता है-
1. भू-वैज्ञानिक अतीत काल में हुए जलवायु परिवर्तन के प्रमाण

  • अवसादी चट्टानों में प्राणियों और वनस्पति के जीवाश्म
  • गहरे महासागरों के अवसादों से प्राप्त प्राणियों और वनस्पति के जीवाश्म
  • वृक्षों के वलय
  • झीलों के अवसाद
  • चट्टानों की प्रकृति
  • हिमनदियों के आकार में परिवर्तन
  • समुद्रों तथा झीलों के जल-स्तर में परिवर्तन
  • भू-आकारों के प्रमाण।

2. ऐतिहासिक काल में हुए जलवायु परिवर्तन के प्रमाण-

  • अभिलेखों में जलवायु परिवर्तन के उल्लेख
  • पुराने पुस्तकालयों में मौसम सम्बन्धी जानकारी
  • फसलों के बोने तथा काटने के मौसम
  • सूखे व बाढ़ से जुड़ी लोक कथाएँ
  • पत्तनों के जल का जम जाना
  • सूखी झीलें, नदियाँ व नहरे
  • पुरानी बस्तियों के खण्डहर
  • लोगों का बड़े पैमाने पर प्रवास
  • लुप्त वन तथा अतीत में वनस्पति का वितरण।

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प्रश्न 9.
मनुष्य और जलवायु में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
प्राचीनकाल से ही मनुष्य और वातावरण का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। मानव का रहन-सहन, उसके अधिवास, आर्थिक क्रिया-कलाप आदि पर जलवायु का विशेष प्रभाव पड़ता है। यह प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से मानव के प्रत्येक क्रिया-कलाप को प्रभावित करता है। विश्व के कई क्षेत्रों में मनुष्य की लापरवाही से वनों की कटाई के कारण मृदा अपरदन होता है जिससे अधिकतर अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कुछ शताब्दियों से कोयले और तेल की खपत बढ़ जाने से वायुमण्डल में कार्बन-डाइऑक्साइड में वृद्धि हो गई है जिससे वायुमण्डल का तापमान भी अधिक हो गया है।

प्रश्न 10.
विश्व के मुख्य ताप कटिबन्धों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संसार की जलवायु के वर्गीकरण का संभवतः सबसे पहला प्रयास प्राचीन यूनानियों ने किया था। उन्होंने ताप को आधार मानते हुए संसार को तीन ताप अथवा जलवायु कटिबन्धों में बाँटा था

  • उष्ण कटिबन्ध-यह भूमध्य रेखा के दोनों और 23 1/2° उत्तर तथा 23 1/2° दक्षिण अक्षांशों के मध्य स्थित है। यहाँ सारा वर्ष ऊँचा तापमान रहता है।
  • शीतोष्ण कटिबन्ध-यह कटिबन्ध दोनों गोलार्डों में 23 1/2° उत्तर से 66 1/2° उत्तर तथा 23 1/2° दक्षिण से 66 1/2° दक्षिण अक्षांशों के मध्य स्थित है।
  • शीत कटिबन्ध यह कटिबन्ध उत्तर तथा दक्षिण में 66 1/2° से ध्रुवों तक फैला हुआ है। ध्रुवीय क्षेत्रों में तापमान वर्ष भर कम रहता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जलवायु का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? विस्तारपूर्वक उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्राकतिक पर्यावरण की रचना वायमण्डल, जलमण्डल, स्थलमण्डल और जैवमण्डल से मिलकर होती है। जलवाय इस प्राकृतिक पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण घटक (Constituent) होता है। जलवायु का प्रभाव मानव की समस्त क्रियाओं पर देखा जा सकता है।
1. मृदा-निर्माण-मूल चट्टान को मृदा में बदलने में जलवायु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मिट्टी का रंग, संरचना, बनावट, उपजाऊपन, कटाव और निक्षालन (Leaching) इत्यादि गुण जलवायु पर निर्भर करते हैं। मृदा ही अन्य कारकों के साथ कृषि की उत्पादकता का स्तर निर्धारित करती है।

2. वनस्पति और प्राणी-वनस्पतियों और प्राणियों का धरातल पर वितरण जलवायु ही करती है। इसी कारण वनस्पति को जलवायु का दर्पण (Mirror of Climate) कहा जाता है। मनुष्य के जीवन की बहुत सारी आवश्यकताएँ वनों और प्राणियों से पूरी होती हैं।

3. कृषि-कृषि, जो मानव और पशुओं के भोजन का आधार तथा अनेक उद्योगों के लिए कच्चे माल का स्रोत है। केवल अनुकूल जलवायुवी दशाओं में ही की जा सकती है।

4. जनसंख्या का वितरण-प्रतिकूल जलवायु वाले प्रदेशों में जनसंख्या विरल होती है, जबकि अनुकूल जलवायु वाले क्षेत्रों में जनसंख्या का सर्वाधिक सान्द्रण पाया जाता है।

5. आर्थिक उन्नति-जलवायु अपनी विशेषताओं के आधार पर मानव के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, जिसका अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक-आर्थिक उन्नति पर प्रभाव पड़ता है। यूरोप व उत्तरी अमेरिका की शीत व शीतोष्ण जलवायु में व्यक्ति फुर्तीला रहता है, जबकि भूमध्यरेखीय उष्ण व आर्द्र जलवायु में आदमी आलस्यपूर्ण हो जाता है।

6. शारीरिक बनावट-जलवायु के प्रकार शरीर की बनावट व चमड़ी के रंग को प्रभावित करते हैं। मध्य अफ्रीका में रहने वाली जन-जातियों का रंग काला और यूरोप में रहने वाली जन-जातियों का रंग गोरा जलवायु का ही परिणाम है।

7. सभ्यताओं का उदय-निर्बाध जलापूर्ति, उपजाऊ मिट्टी के साथ-साथ अनकल जलवायु ने विश्व में अनेक प्राचीन सभ्यताओं के उदय में भूमिका निभाई है। सामाजिक, सांस्कृतिक व वैज्ञानिक उन्नति में सुखद जलवायु का अत्यन्त महत्त्व होता है।

इनके अतिरिक्त सिंचाई, वन प्रबन्धन, भूमि उपयोग, परिवहन, भवन निर्माण तथा अनेकानेक आर्थिक कार्यक्रम प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जलवायु द्वारा प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 2.
कोपेन द्वारा प्रस्तुत जलवायु वर्गीकरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध जलवायुवेत्ता डॉ० व्लाडिमीर कोपेन का जलवायु वर्गीकरण अत्यधिक प्रचलित है। उन्होंने 1918 ई० में संसार की जलवायु का वर्गीकरण मूल रूप में प्रस्तुत किया जिसको बाद में उन्होंने संशोधित कर 1936 ई० में उसे अन्तिम रूप दिया। उनका उद्देश्य वर्गीकरण की एक ऐसी विधि विकसित करना था जो जलवायु तत्त्वों का संख्यात्मक आधार पर प्रदेशों का सीमांकन कर सके। उन्होंने तापमान, वर्षा और उनकी मौसमी विशेषताओं को महत्त्वपूर्ण स्थान देकर प्रदेशों का सीमांकन किया। उन्होंने अपना वर्गीकरण प्राकृतिक वनस्पति के वितरण को मद्देनज़र रखते हुए किया। उनका कहना था कि प्राकृतिक वनस्पति वर्षा की मात्रा तथा तापमान से प्रभावित होती है। जैसा कि उन्होंने कहा है, “Natural Vegetation is considered to be the best expression of the totality of the climate.”

कोपेन के वर्गीकरण को निम्नलिखित पाँ वर्गों में बाँटा गया है जिन्हें उन्होंने अंग्रेजी के बड़े अक्षरों के रूप में व्यक्त किया है-

कोपेन का वर्गीकरण
A – आर्द्र उष्ण कटिबन्धीय जलवायु1. उष्ण कटिबन्धीय प्रचुर वर्षा वाले क्षेत्र
2. सवाना जलवायु (Af)
3. मानसूनी जलवायु (Aw)
B – शुष्क जलवायु1. मरुस्थलीय जलवायु (BW)
2. स्टेपी जलवायु (BS)
C – आर्द्र शीतोष्ण कटिबन्धीय जलवायु1. भूमध्य सागरीय जलवायु (Cf)
2. चीनी प्रकार की जलवायु (Cs)
3. पश्चिमी यूरोपीय जलवायु (CW)
D – आर्द्र शीतोष्ण जलवायु1. टैगा जलवायु (Df)
2. शीत पूर्वी जलवायु (Dw)
3. महाद्वीपीय जलवायु (Dfb)
E – ध्रुवीय जलवायु
H – उच्च पर्वतीय जलवायु
1. टुण्ड्रा जलवायु (ET)
2. हिमाच्छादित प्रदेश जलवायु (Ef)
हिमाच्छादित उच्च भूमियाँ (H)

A – आर्द्र उष्ण कटिबन्धीय जलवायु।
B – शुष्क जलवायु।
C – आर्द्र शीतोष्ण कटिबन्धीय जलवायु [मृदु शीतकाल]।
D – आर्द्र शीतोष्ण जलवायु [कठोर शीतकाल]।
E – ध्रुवीय जलवायु।
इन अक्षरों के अतिरिक्त कुछ अन्य अक्षरों का भी प्रयोग किया गया है जोकि वर्षा की अवधि को प्रदर्शित करते हैं।
f- वर्ष भर वर्षा
s – ग्रीष्मकाल शुष्क
S – अर्द्ध-शुष्क या स्टेपी जलवायु।
W – शुष्क ऋतु।
आधुनिक समय में भी कोपेन का जलवायु वर्गीकरण सर्वमान्य है। जलवायु के मुख्य वर्ग अंग्रेजी के बड़े अक्षरों द्वारा तथा उप-वर्ग छोटे अक्षरों द्वारा दर्शाए गए हैं। यह एक सरल, महत्त्वपूर्ण तथा लाभदायक विधि है। वायुमण्डल परिसंचरण के अनुसार भी यह विधि उचित तथा सही है, परन्तु इस वर्गीकरण में भी कुछ निम्नलिखित त्रुटियाँ हैं जिससे विपक्षीय विचार प्रकट होते हैं

  • यह वर्गीकरण केवल वर्षा की प्रभावशीलता पर आधारित है।
  • इसमें समुद्री धाराओं, पवनों आदि जलवायु तत्वों के प्रभाव को ध्यान में नहीं रखा गया।
  • कोपेन ने जलवायु वर्गीकरण में कृषि जैसे महत्त्वपूर्ण कारक की अवहेलना की है।

प्रश्न 3.
ग्रीन हाऊस प्रभाव क्या होता है? विस्तारपूर्वक उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
“भू-तल के परावर्तित विकिरण द्वारा वायुमण्डल का अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होना ग्रीन हाऊस प्रभाव कहलाता है।” अत्यधिक ठण्डे देशों में उष्ण कटिबन्धीय पौधों को सुरक्षित रखने अथवा फल या सब्जियाँ उगाने के लिए काँच या पारदर्शी प्लास्टिक की दीवारों वाले घर बनाए जाते हैं। काँच ऊष्मा का अवशोषण तो करता है, लेकिन तापमान को बाहर नहीं जाने देता, जिसमें ठण्डे देशों में भी उच्च ताप प्राप्त कर पौधे जीवित रहते हैं, हरे रहते हैं, इसलिए उन्हें हरित-गृह कहते हैं। हम सभी जानते हैं कि सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली विकिरण ऊर्जा, जिसे हम सूर्यातप (Insolation) कहते हैं, लघु तरंगों (Short-waves) के रूप में होती है। इस प्रवेशी सौर विकिरण से पृथ्वी गर्म होती है, वायुमण्डल तो इस ऊर्जा का केवल 20 प्रतिशत भाग ही अवशोषित कर पाता है।

सरल शब्दों में, सूर्य की किरणों से वायुमण्डल सीधे गर्म नहीं होता, बल्कि पहले पृथ्वी गर्म होती है। जब पृथ्वी को प्राप्त यह ऊष्मा दीर्घ तरंगों (Long waves) के रूप में वापस लौटने लगती है तो वायुमण्डल में उपस्थित कुछ गैसें इसे अवशोषित कर लेती हैं और पृथ्वी का तापमान 15° सेल्सियस तक बनाए रखती हैं। इस प्रकार वायुमण्डल को गर्म करने का मुख्य स्रोत पार्थिव विकिरण (Terrestrial Radiation) है।

वायुमण्डल की इसी गर्मी के कारण धरती पर जीव-जन्तु, पेड़-पौधे इत्यादि जीवित रह सकते हैं। पृथ्वी पर वनस्पतियों तथा प्राणियों के जीने योग्य तापक्रम बनाए रखने की इस प्राकृतिक व्यवस्था को ही ग्रीन हाऊस प्रभाव कहा जाता है। वे सभी गैसें जो इस प्रक्रिया में सहायक होती हैं, ‘ग्रीन हाऊस गैसें’ कहलाती हैं। इनमें प्रमुख स्थान कार्बन-डाइऑक्साइड का है। अन्य प्रमुख गैसें मीथेन व सी०एफ०सी० गैसें तथा जलवाष्प हैं।

प्रश्न 4.
भू-वैज्ञानिक अतीतकाल तथा ऐतिहासिक काल में होने वाले भूमण्डलीय जलवायविक परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अभिप्राय (Meaning)-वायुमण्डल स्थिर न रहकर सदा गतिशील रहता है। वायुमण्डल की यह गत्यात्मकता इसके निचले स्तरों में बहुत ज्यादा जटिल है। वायमुण्डलीय विशेषताएँ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर ही नहीं बदलती वरन् ये समय के साथ-साथ भी बदल जाती हैं। पृथ्वी का भू-गर्भिक इतिहास इस बात का साक्षी है कि अतीत में हर युग की अपनी विशिष्ट जलवायुवी दशाएँ रही हैं। स्पष्ट है कि यहाँ जलवायु परिवर्तन से आशय 30-35 वर्षों में या हजारों वर्षों में मिलने वाली जलवायुवी भिन्नताओं के अध्ययन से नहीं है वरन् इसमें लाखों वर्षों से चले आ रहे समय मापकों में होने वाली जलवायु की भिन्नताओं का अध्ययन शामिल किया जाता है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब से वायुमण्डल बना है तब से जलवायु में परिवर्तन हो रहे हैं, लेकिन ये परिवर्तन स्थायी कभी नहीं रहे। एक परिवर्तन दूसरे परिवर्तन के लिए जगह बनाता आया है।

विश्व में जलवायुवी परिवर्तनों की पड़ताल दो खण्डों में की जा सकती है-

  • भू-वैज्ञानिक अतीत काल (Geological Past Period)
  • ऐतिहासिक काल (Historical Period)।

(A) भू-वैज्ञानिक अतीत काल (Geological Past Period)-
1. अनुमान है कि आज से 425 करोड़ साल पूर्व वायुमण्डल का तापमान 37° सेल्सियस रहा होगा। लगभग 250 करोड़ साल पहले ये तापमान घटकर 25° सेल्सियस हो गया। तापमान घटने का यह सिलसिला जारी रहा और 250 करोड़ से 180 करोड़ वर्ष पहले की अवधि के दौरान हिमयुग आया। हिमयुग के आने का संकेत हमें उस समय की हिमनदियों से बनी स्थलाकृतियों से मिलता है।

2. इसके बाद आने वाले 95 करोड़ वर्षों तक जलवायु उष्ण रही और हिमनदियाँ लुप्त हो गईं।

3. वैज्ञानिक अध्ययन प्रमाणित करते हैं कि कैम्ब्रियन युग (लगभग 60 करोड़ वर्ष पूर्व) से पहले भू-पटल से अधिकांश भागों पर हिम की चादर बिछी हुई थी, जिस कारण भू-पटल पर शीत जलवायु का प्रभुत्व था।

4. ओरडोविशियन कल्प (50 करोड़ वर्ष पहले) तथा सिल्युरियन कल्प (44 करोड़ वर्ष पहले) में जलवायु गर्म रही। यह जलवायु हमारी वर्तमान जलवायु जैसी थी।

5. इसी प्रकार जुरैसिक कल्प (18 करोड़ वर्ष पहले) में पृथ्वी की जलवायु वर्तमान समय की जलवायु की तुलना में अधिक गर्म थी।

6. इयोसीन युग (6 करोड़ वर्ष पहले) शीतोष्ण वनस्पति ध्रुवीय भागों के अधिक निकट थी। इसी प्रकार 60° अक्षांश रेखा पर प्रवालों के अवशेष प्रदर्शित करते हैं कि इयोसीन काल में इन अक्षांशीय क्षेत्रों के महासागरीय जल का तापमान वर्तमान तापमान से 10°F अधिक था।

7. प्लीस्टोसीन अर्थात् अत्यन्त नूतन युग (30 लाख साल पहले) में हिमनदियों का विस्तार हुआ। वर्तमान युग की हिम की टोपियाँ इस समय के हिम के अवशेष हैं।

8. विगत 20 लाख वर्षों में कई ठण्डी और गर्म जलवायु आईं और गईं।

9. उत्तरी गोलार्द्ध में अन्तिम हिमनदन का अन्तिम दौर आज से 18,000 वर्ष पहले अपनी चरम सीमा पर था। उस समय समुद्र तल आज की तुलना में 85 मीटर नीचे था।

(B) ऐतिहासिक काल (Historical Period)
1. अब से 16,000 वर्ष पूर्व हिम ने पिघलना शुरू किया। तापमान ऊँचा और वर्षा पर्याप्त होने लगी। 7,000 से 10,000 साल पहले जलवायु आज की तुलना में गर्म थी। आज जहाँ टुण्ड्रा प्रदेश है, वहाँ उस समय वन उगे हुए थे।

2.  सन् 1450 से 1850 के बीच की अवधि को लघु हिमयुग (Little Ice Age) कहा जाता है। इस युग में आल्पस पर्वतों पर हिमनदियों का विस्तार हुआ।

3. औद्योगिक क्रान्ति (सन 1780) के बाद मानव की बढती गतिविधियों के कारण ग्रीन हाऊस गैसों के सान्द्रण से वायुमण्डल का तापमान बढ़ने लगा है।

एल्सवर्थ हंटिंगटन (E. Huntington) ने अपनी पुस्तक सभ्यता एवं जलवायु (Civilization and Climate) में ऐतिहासिक काल में हुए भूमण्डलीय जलवायु परिवर्तन के तीन सन्दर्भ दिए हैं-

  • उन मरुस्थलीय भागों में जहाँ आज काफिले (Caravans) भी नहीं जा सकते, पुराने नगरों के अवशेष देखने को मिलते हैं।
  • अफ्रीका तथा अमेरिका के ऐसे भागों में नगरों के खण्डहर देखने को मिलते हैं, जहाँ इस समय पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं हैं।
  • आज कई ऐसे क्षेत्रों में कृषि, सिंचाई तथा नहरों के चिह्न देखने को मिलते हैं, जहाँ जल का अभाव है और वर्तमान में अति न्यून वर्षा होती है।

प्रश्न 5.
पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जलवायु परिवर्तन के कारकों को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  • पार्थिव कारक (Terrestrial Factors)
  • खगोलीय कारक (Astronomical Factors)
  • पार्थिवेत्तर कारक (Extra Terrestrial Factors)।

(A) पार्थिव कारक (Terrestrial Factors)
1. महाद्वीपीय विस्थापन भू-गर्भिक काल में महाद्वीपों के विखण्डन व विभिन्न दिशाओं में संचलन के कारण विभिन्न भू-खण्डों में जलवायु परिवर्तन हुए हैं। ध्रुवीय क्षेत्रों के समीप भू-भागों का भूमध्य रेखा के निकट आने पर जलवायु परिवर्तन होना एक सामान्य प्रक्रिया है। दक्षिणी भारत में हिमनदों के चिह्नों तथा अंटार्कटिका में कोयले का मिलना इस जलवायु परिवर्तन के प्रमुख प्रमाण हैं।

2. पर्वत निर्माण प्रक्रिया-यह जलवायु को दो प्रकार से प्रभावित करती हैं-
(a) पर्वतों के उत्थान तथा घिसकर उनके नीचे हो जाने से स्थलाकृतियों की व्यवस्था भंग हो जाती है। इसका प्रभाव पवन प्रवाह, सूर्यातप तथा मौसमी तत्त्वों; जैसे तापमान एवं वर्षा के वितरण पर पड़ता है।

(b) पर्वत निर्माण की प्रक्रिया से ज्वालामुखी उद्गार की सम्भावनाएँ प्रबल हो जाती हैं। ज्वालामुखी उद्गार से भारी मात्रा में वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें और जलवाष्प निष्कासित होते हैं। इससे वायुमण्डल की पारदर्शिता (Transparency) प्रभावित होती है, जिसका सीधा प्रभाव प्रवेशी सौर विकिरण तथा पार्थिव विकिरण पर पड़ता है। ये सभी प्रक्रियाएँ पृथ्वी के ऊष्मा सन्तुलन (Heat Balance) को भंग कर जलवायु परिवर्तन की भूमिका तैयार करती हैं।

3. मनुष्य के क्रिया-कलाप मनुष्य अपनी विकासात्मक गतिविधियों से हरित-गृह गैसों (कार्बन-डाइऑक्साइड, आज़ोन, जलवाष्प) की मात्रा वायुमण्डल में बढ़ाता रहता है। वायुमण्डल में इन अवयवों के प्राकृतिक संकेन्द्रण में भिन्नता आने से भूमण्डलीय ऊष्मा सन्तुलन प्रभावित होता है। इससे वायुमण्डल की सामान्य प्रणाली, जिस पर जलवायु भी निर्भर करती है, प्रभावित होती है।

(B) खगोलीय कारक (Astronomical Factors) जलवायु परिवर्तन से जुड़े खगोलीय कारक तीन तथ्यों पर आधारित हैं
1. पृथ्वी की कक्षा की उत्केन्द्रीयता (Ecentricity) में परिवर्तन-पृथ्वी की उत्केन्द्रीयता में लगभग 92 हजार वर्षों में परिवर्तन आ जाता है अर्थात् सूर्य के चारों ओर पृथ्वी के परिक्रमण पथ की आकृति कभी अण्डाकार तो कभी गोलाकार हो जाती है। उदाहरणतः वर्तमान में पृथ्वी की सूर्य के निकटतम रहने की स्थिति-उपसौर (Perihelion) जनवरी में आती है। यह उपसौर स्थिति 50 हजार वर्ष बाद जुलाई में आने लगेगी। इसका परिणाम यह होगा कि आगामी 50 वर्षों में उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्मकाल अधिक गर्म व शीतकाल अधिक ठण्डा होता जाएगा।

2. पृथ्वी की काल्पनिक धरी के कोण में परिवर्तन सर्य की परिक्रमा करते समय पृथ्वी की धरी (Axes) अपने कक्षा-पथ के साथ कोण बनाती है। वर्तमान युग में यह कोण 23/2° का है, लेकिन प्रत्येक 41-42 हजार वर्षों के बाद पृथ्वी की धुरी के कोण में 1.5° का अन्तर आ जाता है। कभी यह झुकाव 22° तो कभी 24% हो जाता है। पृथ्वी के झुकाव में परिवर्तन से मौसमी दशाओं व तापमान में तो अन्तर होंगे ही, साथ ही भौगोलिक पेटियों की भिन्नताएँ कम या विलुप्त हो जाएँगी।

3. विषुव का पुरस्सरण (Precession) वर्तमान में चार मौसमी दिवसों की स्थितियाँ इस प्रकार हैं-21 मार्च-बसन्त विषुव, 23 सितम्बर-शरद विषुव, 21 जून कर्क संक्रांति तथा 22 दिसम्बर मकर संक्रांति। प्रत्येक 22 हजार वर्षों में इन स्थितियों में परिवर्तन आता है जिसका सीधा प्रभाव जलवायु पर पड़ता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

(C) पार्थिवेत्तर कारक (Extra Terrestrial Factors) इन कारकों में पृथ्वी पर पहुँचने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा में परिवर्तनों को शामिल किया जाता है
1. सौर विकिरण की प्राप्ति में भिन्नता-पृथ्वी पर ऊर्जा का एकमात्र स्रोत सूर्य है। सूर्य में होने वाली उथल-पुथल से पृथ्वी को मिलने वाली ऊर्जा में अन्तर आ जाता है। सूर्यातप की मात्रा में परिवर्तन वायुमण्डल द्वारा सौर विकिरण के अवशोषण की मात्रा में परिवर्तन से भी हो सकता है।

2. सौर कलंक सूर्य के सौर कलंकों (Sun Spots) की संख्या में प्रत्येक 11 वर्षों बाद परिवर्तन आता रहता है। सौर कलंकों की संख्या बढ़ना अधिक उष्ण व तर (Cooler and Wetter) दशाओं से जुड़ा है, जबकि सौर कलंकों की संख्या में कमी, गर्म तथा शुष्क (Warm and Drier) दशाओं से सम्बन्धित होती है। यही नहीं सौर कलंकों की संख्या का प्रभाव सूर्य से निष्कासित होने वाली पराबैंगनी किरणों पर भी पड़ता है। इन्हीं पराबैंगनी किरणों की मात्रा में वायुमण्डल में ओज़ोन गैस की मात्रा निर्धारित होती है। वायुमण्डल में ओज़ोन गैस की मात्रा भू-मण्डल पर ताप सन्तुलन को प्रभावित करती है।

पृथ्वी एक जीवन्त जीव (Living Organism) की भाँति है। इसकी प्रक्रियाएँ (Processes) स्व-नियन्त्रित हैं। पृथ्वी बृहद् स्तर पर जलवायुवी सन्तुलन बनाए रखने में सक्षम है। लेकिन ये प्रक्रियाएँ अत्यन्त जटिल और सूक्ष्म भी हैं। तापमान वृद्धि के रूप में प्रकृति से की गई अनावश्यक छेड़छाड़ दुष्परिणाम ला सकती है।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ एक साम्राज्य

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ एक साम्राज्य Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ एक साम्राज्य

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
“ऑगस्ट्स का शासनकाल रोमन साम्राज्य के इतिहास का एक स्वर्ण काल था” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
ऑगस्ट्स रोमन साम्राज्य का प्रथम सम्राट् था। उसने 27 ई० पूर्व से 14 ई० तक शासन किया। उसने रोमन साम्राज्य में फैली अराजकता को दूर कर वहाँ शाँति की स्थापना की। उसने अनेक उल्लेखनीय प्रशासनिक, आर्थिक एवं धार्मिक सुधारों को लागू कर रोमन साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ किया। उसने रोम में भव्य एवं विशाल भवनों तथा मंदिरों का निर्माण किया। उसके शासनकाल में रोमन साहित्य का भी अद्वितीय विकास हुआ। संक्षेप में ऑगस्ट्स के शासनकाल में रोमन साम्राज्य ने विभिन्न क्षेत्रों में इतनी प्रगति की कि इसे ठीक ही रोमन इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है।

डॉक्टर आर्थर ई० आर० बोक ने ठीक कहा है कि, “उसका नाम रोम के अथवा वास्तव में मानव वंश के इतिहास के महान् शासकों में से एक के रूप में सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।” एक अन्य प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के शब्दों में, “उसने रोम को उसके इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय दिया जो कि प्रत्येक दृष्टिकोण से स्वर्ण युग कहलाने योग्य था।”

ऑगस्ट्स ने अपने शासनकाल के दौरान अनेक महत्त्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त की। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. रोमन शाँति :
ऑगस्ट्स (वास्तविक नाम ऑक्टेवियन) के सिंहासनारूढ़ के समय (27 ई० पू०) चारों ओर अराजकता का वातावरण था। 44 ई० पू० में रोमन सम्राट् जूलियस सीजर (Julius) की हत्या के कारण रोमन साम्राज्य में गृहयुद्ध भड़क उठा था। सीजर के हत्याकांड में ब्रटस (Brutus) तथा कैसियस (Casius) सम्मिलित थे।

इन हत्यारों को सबक सिखाने के उद्देश्य से ऑक्टेवियन (Octavian) जो कि जूलियस सीजर की बहन का पोता था ने एंटोनी (Antony) तथा लेपीडस (Lepidus) के साथ मिल कर एक त्रिगुट (Triumvirate) स्थापित किया। इस त्रिगुट ने जूलियस सीजर के हत्याकांड में सम्मिलित सभी दोषियों को यमलोक पहुँचा दिया। इसके शीघ्र पश्चात् ही इस त्रिगुट में सत्ता के लिए आपसी फूट पड़ गई।

ऑक्टेवियन ने एंटोनी को 31 ई० पू० में ऐक्टियम के युद्ध (Battle of Actium) में पराजित कर दिया। निस्संदेह यह ऑक्टेवियन की एक शानदार सफलता प्रमाणित हुई। इस युद्ध के पश्चात् रोमन साम्राज्य में शाँति स्थापित हुई।
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2. सैनेट से संबंध :
सैनेट रोमन गणतंत्र के समय रोम की सर्वाधिक प्रभावशाली संस्था थी। इसने अनेक शताब्दियों तक रोम के इतिहास में प्रमुख भूमिका निभाई। ऑगस्ट्स ने केवल रोम के धनी, ईमानदार एवं कर्त्तव्यपरायण लोगों को ही सैनेट में प्रतिनिधित्व दिया। उसने सदैव सैनेट के प्रति सम्मान प्रकट किया।

इसे देखते हुए सैनेट ने स्वेच्छा से सैन्य संचालन, सीमांत प्रदेशों के नियंत्रण, सुरक्षा, युद्ध एवं संधि संबंधी सभी अधिकार ऑगस्ट्स को सौंप दिए। परिणामस्वरूप ऑगस्ट्स ने शासन की इस सर्वोच्च संस्था पर नियंत्रण स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। डोनाल्ड कागन एवं एफ० एम० टर्नर के अनुसार, “यद्यपि ऑगस्ट्स को सभी शक्तियाँ प्राप्त थीं किंतु उसने सदैव सैनेट की प्रतिष्ठा एवं सम्मान का उचित ध्यान रखा।”

3. सैन्य सुधार:
ऑगस्ट्स ने अपने शासनकाल के दौरान रोमन सेना को एक नया स्वरूप प्रदान किया। ऑगस्ट्स से पूर्व रोमन सेना की कुल संख्या 6 लाख थी। रोमन साम्राज्य के विस्तार में उसकी भूमिका प्रमुख थी। ऑगस्ट्स क्योंकि शाँति का समर्थक था इसलिए उसने रोमन सेना की संख्या कम करके 3 लाख कर दी। इसके अतिरिक्त उसने 9 हज़ार प्रेटोरियन गॉर्ड (Praetorian guard) की स्थापना की।

इनका कार्य सम्राट की सुरक्षा करना था। ऑगस्ट्स ने एक स्थायी सेना का गठन किया। इसमें प्रत्येक सैनिक को न्यूनतम 25 वर्ष तक सेवा करनी पड़ती थी। इन सैनिकों को नियमित वेतन देने की व्यवस्था की गई। सेवा निवृत्त होने पर सैनिकों को पैंशन दी जाती थी। रोमन सेना के उच्च पदों पर केवल उन्हीं सैनिकों को नियुक्त किया जाता था जो ऑगस्ट्स के प्रति पूर्ण वफ़ादार थे। इन सैन्य सुधारों के कारण ऑगस्ट्स की प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि हुई।।

4. प्रांतीय प्रशासन :
ऑगस्ट्स ने प्रांतीय प्रशासन में अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने केवल ईमानदार लोगों को गवर्नर के पद पर नियुक्त किया। उन्हें प्रांतीय लोगों के कल्याण हेतु कदम उठाने के निर्देश दिए गए। ऑगस्ट्स ने उन सभी अधिकारियों को पदमुक्त कर दिया जो जनता पर अत्याचार करते थे। उसने प्रांतों में फैले भ्रष्टाचार को दूर किया।

उसने प्रांतीय लोगों पर लगे अनेक करों को कम किया। ऑगस्ट्स स्वयं प्राँतों का भ्रमण कर इन सुधारों का जायजा लेता था। संक्षेप में उसके सुधार प्रांतीय जनता के लिए एक वरदान सिद्ध हुए। रोबिन डब्ल्यू० विंकस के अनुसार,”रोमन प्रांतों का शासन निस्संदेह गणतंत्र के अधीन शासन से कहीं बेहतर था।”

5. आर्थिक सुधार:
ऑगस्ट्स के शासनकाल में आर्थिक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।

1. ऑगस्ट्स के शासनकाल में रोमन साम्राज्य में पूर्ण शाँति एवं व्यवस्था कायम रही।

2. उसने यातायात के साधनों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया। इससे साम्राज्य के विभिन्न भागों एवं विदेशों से संपर्क स्थापित करना एवं माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना सुगम हो गया।

3. उसने समुद्री डाकुओं का सफाया करने के उद्देश्य से एक स्थायी जल बेड़े का निर्माण करवाया।

4. उसने कृषि एवं उद्योगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अनेक प्रशंसनीय पग उठाए।

5. उसने रोमन साम्राज्य के अनेक देशों के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध स्थापित किए। ऑगस्ट्स के इन आर्थिक सुधारों के चलते रोमन लोग आर्थिक पक्ष से समृद्ध हुए।

6. कला तथा साहित्य को प्रोत्साहन:
ऑगस्ट्स कला तथा साहित्य का महान् प्रेमी था। इसलिए उसके शासनकाल में इन क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। उसने रोम में अनेक भव्य भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया। इनमें उसके द्वारा बनवाया गया पैंथियन (Pantheon) मंदिर सर्वाधिक प्रसिद्ध है। उसने ईंटों के स्थान पर संगमरमर का प्रयोग करके रोमन भवन निर्माण कला को एक नई दिशा प्रदान की। उसके शासनकाल में रोमन साहित्य ने एक नए शिखर को छुआ। लिवि, वर्जिल, होरेस तथा ओविड
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आदि ने ऑगस्ट्स के शासनकाल को चार चाँद लगा दिए। लिवि (Livy) रोमन साम्राज्य का सबसे महान् इतिहासकार था। वर्जिल (Virgil) ऑगस्ट्स के शासनकाल का सबसे महान् कवि था। होरेस तथा ओविड भी प्रसिद्ध कवि थे। बी० के० गोखले के अनुसार, “ऑगस्ट्स ने एक ऐसा प्रशासन दिया जो इतना कुशल था कि इसे आने वाली दो शताब्दियों से अधिक समय तक जारी रखा गया।”

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प्रश्न 2.
रोमन साम्राज्य के इतिहास में तीसरी शताब्दी में आए संकट के प्रमुख कारण क्या थे? संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य के इतिहास में सबसे भयंकर संकट का सामना करना पड़ा। इस संकट के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे

1. 224 ई० में ईरान में एक नया वंश ससानी (Sasanians) सत्ता में आया। इस वंश के शासक शापुर प्रथम (241-272 ई०) के एक प्रसिद्ध शिलालेख में इस बात का दावा किया गया है कि उसने 60,000 रोमन सेना का विनाश करके पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी एंटीओक (Antioch) को अपने अधीन कर लिया है।

2. तीसरी शताब्दी के दौरान जर्मन मूल की अनेक जनजातियों जिनमें एलमन्नाई (Almannai), फ्रैंक (Franks) तथा गोथ (Goth) प्रमुख थे ने अपने लगातार आक्रमणों द्वारा रोमन साम्राज्य को चैन की साँस नहीं लेने दी। यहाँ तक कि रोमवासियों को डेन्यूब (Danube) से आगे का क्षेत्र छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा।

3. तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य की राजनीतिक स्थिति अत्यंत डावाँडोल थी। स्थिति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 47 वर्षों के दौरान 25 सम्राट् सत्तासीन हुए। इन सभी सम्राटों की या तो हत्या की गई या वो गृह-युद्धों में मारे गए।

4. रोमन साम्राज्य में फैली अराजकता के कारण उद्योग एवं व्यापार चौपट हो गए। रोज़मर्रा की वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगीं। सरकार ने स्थिति पर नियंत्रण पाने के उद्देश्य से कुछ प्रयास किए किंतु वे विफल रहे।

5. प्रत्येक सम्राट् सेना के सहयोग से सत्ता में आता था। अत: सैनिकों का समर्थन पाने के उद्देश्य से उनकी तनख्वाहों एवं अन्य सुविधाओं में वृद्धि कर दी जाती थी। इससे रोमन अर्थव्यवस्था को गहरा आघात लगा।

6. रोमन साम्राज्य पर लगातार होने वाले बर्बर आक्रमणों तथा चोरों एवं डाकुओं आदि ने अपनी लूटमार द्वारा लोगों का जीवन दूभर बना दिया था।

7. रोमन साम्राज्य में फैली अराजकता का लाभ उठाते हुए अनेक प्रांतों ने स्वतंत्रता के लिए विद्रोह आरंभ कर दिए थे। इससे स्थिति अधिक विस्फोटक हो गई।

8. तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य को भयानक अकालों एवं प्लेगों का सामना करना पड़ा। इसमें लाखों की संख्या में लोगों की मृत्यु हो गई। इससे रोमन साम्राज्य को गहरा आघात लगा। थॉमस एफ० एक्स० नोबल के अनुसार, “तीसरी शताब्दी रोमन साम्राज्य एवं इसके शासकों के लिए अत्यंत कठिनाई का समय था। गृह-युद्धों एवं राजनीतिक हत्याओं का बोलबाला था। साम्राज्य की सीमाओं को सदैव ख़तरा था तथा कभी-कभी इनका उल्लंघन किया गया। अर्थव्यवस्था अव्यवस्थित थी।”

प्रश्न 3.
रोमन साम्राज्य के पतन के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. रोमन साम्राज्य की विशालता:
प्राचीनकाल में रोमन साम्राज्य बहुत विशाल था। उस समय रोमन साम्राज्य में रोम, इटली, स्पेन, फ्राँस, यूनान, सिसली, मिस्र, उत्तरी अफ्रीका तथा ब्रिटेन के कुछ हिस्से सम्मिलित थे। उस समय यातायात के साधन अधिक विकसित नहीं थे। अत: इतने विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रखना कोई सहज कार्य न था। इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाकर अनेक प्रांतों के गवर्नर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर देते थे। इससे रोमन साम्राज्य की एकता को गहरा आघात लगा।

2. रोमन शासकों की साम्राज्यवादी नीति :
रोमन शासकों की साम्राज्यवादी नीति भी रोमन साम्राज्य के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई। सभी रोमन शासकों ने साम्राज्यवादी नीति पर बहुत बल दिया। अतः उन्हें एक विशाल सेना का गठन करना पड़ा। इस सेना पर बहुत धन खर्च हुआ। लगातार युद्धों में जन तथा धन की भी अपार क्षति हुई। इससे लोगों में भारी असंतोष फैला। इसके अतिरिक्त रोमन शासकों की साम्राज्यवादी नीति ने अनेक देशों को भी अपना कट्टर शत्रु बना लिया। अतः उनकी दुश्मनी रोमन साम्राज्य को ले डूबी।

3. रोमन शासकों की विलासिता:
रोमन शासकों की विलासिता रोमन साम्राज्य के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई। कुछ रोमन शासकों को छोड़कर अधिकाँश रोमन शासक विलासप्रिय सिद्ध हुए। वे अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करते थे। इन पर वे देश का बहुमूल्य धन पानी की तरह बहा देते थे। रोमन रानियाँ भी अपनी विलासिता पर बहुत धन व्यय करती थीं।

दूसरी ओर रोमन शासकों ने लगातार कम हो रहे खजाने को भरने के लिए लोगों पर भारी कर लगा दिए। इससे लोगों में भारी असंतोष फैला तथा वे ऐसे साम्राज्य के विरुद्ध होते चले गए।

4. उत्तराधिकार कानून का अभाव :
रोमन साम्राज्य के पतन के महत्त्वपूर्ण कारणों में से एक उत्तराधिकार के कानून का अभाव था। अतः जब किसी शासक की आकस्मिक मृत्यु हो जाती तो यह पता नहीं होता था कि उसका उत्तराधिकारी कौन बनेगा। ऐसे समय में विभिन्न दावेदारों में गृह युद्ध आरंभ हो जाते थे। ये गृह-युद्ध अनेक बार भयंकर रूप धारण कर लेते थे। इन युद्धों के परिणामस्वरूप जन तथा धन की अपार क्षति होती थी।

इससे जहाँ एक ओर रोमन साम्राज्य की शक्ति क्षीण हुई वहीं दूसरी ओर इसने , बाहरी शत्रुओं को रोमन साम्राज्य पर आक्रमण करने का स्वर्ण अवसर प्रदान किया।

5. साम्राज्य का विभाजन :
रोमन शासक डायोक्लीशियन ने प्रशासनिक कुशलता के उद्देश्य से रोमन साम्राज्य को दो भागों-पूर्वी रोमन साम्राज्य एवं पश्चिमी रोमन साम्राज्य में विभाजित कर दिया। उसका यह निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुआ। इससे रोमन साम्राज्य की एकता को गहरा आघात लगा। इससे रोमन साम्राज्य राजनीतिक दृष्टिकोण से दुर्बल हो गया।

इसे देखते हुए बर्बर जनजातियों ने रोमन साम्राज्य पर अपने आक्रमण तीव्र कर दिए। इन आक्रमणों ने रोमन साम्राज्य के पतन का डंका बजा दिया।

6. दुर्बल सेना :
किसी भी साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार में उसकी सेना की प्रमुख भूमिका होती है। कुछ रोमन शासकों ने एक विशाल एवं शक्तिशाली सेना का गठन किया था। किंतु बाद के रोमन शासक अयोग्य एवं निकम्मे सिद्ध हुए। वे अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करते थे। अतः उन्होंने रोमन साम्राज्य की सेना की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया।

परिणामस्वरूप रोमन सेना कमज़ोर हो गई। इसके अतिरिक्त कुछ रोमन शासकों ने विदेशियों को भी रोमन सेना में भर्ती कर इसे खोखला बना दिया। ऐसे साम्राज्य के पतन को रोका नहीं जा सकता था।

7. आर्थिक पतन :
रोमन साम्राज्य का आर्थिक पतन उसके लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। रोमन शासकों की साम्राज्यवादी नीति एवं उनकी विलासिता ने रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पर घातक प्रहार किया। रोमन साम्राज्य में होने वाले युद्धों एवं विद्रोहों ने यहाँ की अर्थव्यवस्था को अधिक शोचनीय बना दिया। विदेशी आक्रमण भी रोमन अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हुए।

रोमन साम्राज्य में रोजाना वस्तुओं के भाव आसमान छूने लगे। इससे जनसाधारण में भारी असंतोष फैला। परिणामस्वरूप रोमन साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया।

बी० के० गोखले के अनुसार,
“आर्थिक नींव की कमजोरी ने साम्राज्य के विनाश में योगदान दिया।

8. विदेशी आक्रमण :
रोमन साम्राज्य के पतन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण विदेशी आक्रमण सिद्ध हुए। 378 ई० में जर्मन मूल के गोथों (Goths) ने एड्रियनोपोल में रोमन सेनाओं को कड़ी पराजय दी। इसने रोमन साम्राज्य के पतन का डंका बजा दिया। 410 ई० में विसिगोथों (Visigoths) ने अपने नेता आलारक (Alaric) के नेतृत्व में रोम को नष्ट कर दिया। इस पराजय से रोमन साम्राज्य के गौरव को गहरा आघात लगा।

428 ई० में जर्मन मूल के सैंडलों (Vandals) ने उत्तरी अफ्रीका पर अधिकार कर लिया। 451 ई० में हूण नेता अटिला (Attila) ने गॉल (Gaul) पर अधिकार कर लिया। 493 ई० में ऑस्ट्रोगोथों (Ostrogoths) ने इटली पर अधिकार कर लिया। 568 ई० में लोंबार्डों (Lombards) ने इटली पर आक्रमण कर वहाँ भारी विनाश किया। निस्संदेह इन विदेशी आक्रमणों ने रोमन साम्राज्य की नींव को डगमगा दिया।

प्रश्न 4.
रोमन साम्राज्य के सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ? संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं 1. तीन श्रेणियाँ (Three Classes)-रोमन समाज में प्रमुखतः तीन श्रेणियाँ प्रचलित थीं। ये श्रेणियाँ थीं उच्च श्रेणी, मध्यम श्रेणी एवं निम्नतर श्रेणी। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

(1) उच्च श्रेणी :
रोमन समाज की उच्च श्रेणी में अभिजात वर्ग के लोग सम्मिलित थे। इनमें प्रमुखतः सैनेटर एवं नाइट सम्मिलित थे। इन्हें सम्मिलित रूप से पैट्रिशियन (Patrisian) कहा जाता था। वे बहुत शक्तिशाली थे। वे रोमन साम्राज्य के समस्त उच्च पदों पर नियुक्त थे। वे काफी धनवान होते थे। वे आलीशान महलों में रहते थे। वे विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। उनकी देख-रेख के लिए बड़ी संख्या में नौकर एवं दास-दासियाँ होते थे।

(2) मध्यम श्रेणी :
इस श्रेणी में नौकरशाही एवं सेना से जुड़े लोग, व्यापारी और किसान सम्मिलित थे। इन्हें सामूहिक रूप से प्लीबियन (Plebeians) के नाम से जाना जाता था। वे भी प्रशासन के महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त थे। उनका जीवन भी सुखमय था। उनकी सेवा के लिए भी अनेक दास-दासियाँ होती थीं।

(3) निम्नतर श्रेणी :
रोमन समाज के अधिकाँश लोग निम्नतर श्रेणी से संबंधित थे। इनमें मज़दूर एवं दास सम्मिलित थे। इन्हें सामूहिक रूप से ह्यमिलिओरिस (Humiliores) कहा जाता था। उनकी दशा बहुत शोचनीय थी। वे गंदी झोंपड़ियों में रहते थे। उन्हें दो वक्त का खाना कभी नसीब नहीं होता था। उनके मालिक उन पर घोर अत्याचार करते थे। वास्तव में उनका जीवन पशुओं से भी बदतर था।

2. परिवार :
परिवार को रोमन समाज की आधारशिला माना जाता था। उस समय एकल परिवार प्रणाली (nuclear family) प्रचलित थी। परिवार में पति, पत्नी, बच्चे एवं दास सम्मिलित होते थे। उस समय परिवार पितृतंत्रात्मक (patriarchal) होते थे। परिवार में पिता परिवार का मुखिया होता था। उसके परिवार के सभी सदस्य उनके अधीन होते थे। वह अपने बच्चों की शिक्षा, उनके कार्यों तथा विवाह आदि का प्रबंध करता था।

परिवार के सभी सदस्य उसकी आज्ञा का पालन करते थे। इसके बावजूद परिवार का मुखिया स्वेच्छाचारी नहीं होता था। जे० एच० बेंटली एवं एच० एफ० जाईगलर के अनुसार, “यद्यपि रोमन पितृतंत्रात्मक परिवारों को कानूनी तौर पर विशाल शक्तियाँ प्राप्त थीं वे कम ही अपने अधीन सदस्यों पर अत्याचारी ढंग से शासन करते थे।”

3. स्त्रियों की स्थिति :
रोमन समाज में स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक थी। वे सार्वजनिक, धार्मिक एवं सामाजिक उत्सवों में बढ़-चढ़ कर भाग लेती थीं। संपन्न परिवार की लड़कियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करती थीं। उस समय लड़कियों का विवाह 16 से 23 वर्ष के मध्य किया जाता था। उस समय विवाह बहुत शानो-शौकत से किए जाते थे। उस समय दहेज प्रथा प्रचलित थी। पुत्री को अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार प्राप्त था।

विवाहिता का अपने परिवार पर काफी प्रभाव होता था। वह अपने बच्चों की शिक्षा तथा परिवार के अन्य कार्यों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। उस समय तलाक लेना अपेक्षाकृत आसान था। ऐसी सूरत में पति को अपनी नी से प्राप्त दहेज उसके पिता को वापस लौटाना होता था। उस समय रोमन समाज में वेश्यावृत्ति (prostitution) का प्रचलन था।

4. शिक्षा :
रोमन साम्राज्य में शिक्षा का प्रचलन बहुत कम था। पुरुषों में साक्षरता की दर (literacy rate) 20% एवं स्त्रियों में यह दर 10% थी। ग्रामीण क्षेत्रों जहाँ शहरों की अपेक्षा बहुत कम स्कूल थे यह दर इससे भी कम थी। साक्षरता की दर रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों में अलग-अलग थी। पोम्पई (Pompeii) नगर जो 79 ई० में ज्वालामुखी फटने से दफन हो गया था वहाँ काम चलाऊ साक्षरता (Casual literacy) विद्यमान थी।

इसके विपरीत मिस्त्र में बड़ी संख्या में पैपाइरस (Papyri) पाए गए हैं। इनसे हमें पता चलता है कि कुछ व्यक्ति बिल्कुल अनपढ़ थे। किंतु दूसरी ओर सैनिकों, सेना अधिकारियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों में साक्षरता दर बहुत ऊँची थी। ऑगस्ट्स, त्राजान एवं हैड्रियन ने शिक्षा के विकास के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण पग उठाए। एडवर्ड मैक्नल बर्नस के अनुसार, “बुद्धिमानी के तौर पर रोमनों का विकास बहुत धीरे हुआ।”

5. मनोरंजन :
रोमन साम्राज्य के लोग मनोरंजन के बहुत शौकीन थे। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ एक वर्ष में कम-से-कम 176 दिन कोई न कोई मनोरंजन कार्यक्रम अवश्य होता था। रोमन लोगों को सर्कस देखने एवं नृत्य एवं संगीत का बहुत शौक था। धनी वर्ग के लोग दासों के मध्य होने वाले युद्धों अथवा हिंसक जानवरों एवं दासों के मध्य होने वाले युद्धों को देखने के बहुत शौकीन थे।

इन युद्धों में पराजित होने वाले दास को मौत के घाट उतार दिया जाता था। इन युद्धों को देखने के लिए विशाल अखाड़े बनाए जाते थे जिन्हें कोलोसियम (colosseum) कहा जाता था। इनमें हजारों की संख्या में दर्शक बैठ सकते थे। उस समय नाटकों का भी प्रचलन था। बच्चे अपना मनोरंजन खिलौनों द्वारा करते थे। ये खिलौने मिट्टी, लकडी एवं धातुओं से बने होते थे।

6. सांस्कृतिक विविधता :
रोमन साम्राज्य में व्यापक सांस्कृतिक विविधता पाई जाती थी।

  • उस समय रोमन साम्राज्य में अनेक धार्मिक संप्रदायों एवं देवी-देवताओं की उपासना का प्रचलन था।
  • उस समय रोमन साम्राज्य में अनेक भाषाएँ-कॉप्टिक, प्यूनिक, बरबर, कैल्टिक ऊर्मिनियाई एवं लातीनी प्रचलित थीं।
  • उस समय वेशभूषा की विविध शैलियाँ प्रचलित थीं।
  • उस समय लोग विभिन्न प्रकार का भोजन खाते थे।
  • उस समय सामाजिक संगठनों एवं उनकी बस्तियों के विभिन्न रूपों का प्रचलन था।

प्रश्न 5.
रोमन साम्राज्य के आर्थिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के लोगों के आर्थिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. कृषि:
रोमन साम्राज्य के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। उस समय ज़मींदारों के पास विशाल जागीरें होती थीं। इस पर वे दासों की सहायता से खेती करते थे। खेतों की गहाई एवं बिजाई का कार्य हलों द्वारा किया जाता था। हलों को बैलों द्वारा जोता जाता था। उस समय फ़सलों के अधिक उत्पादन के लिए खादों का प्रयोग किया जाता था। सिंचाई के साधन भी उन्नत थे।

उस समय गैलिली में गहन् खेती का प्रचलन था। उस समय कैंपेनिया (Campania), सिसली (Sicily), फैय्यूम (Fayum), गैलिली (Galilee), बाइजैक्यिम (Byzacium), दक्षिणी गॉल (Southern Gaul) तथा बाएटिका (Baetica) फ़सलों के भरपूर उत्पादन के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। उस समय रोमन साम्राज्य में गेहूँ, जौ, मक्का, जैतून, विभिन्न प्रकार की दालों, सब्जियों एवं फलों का उत्पादन होता था। फलों में सबसे अधिक उत्पादन अंगूर का किया जाता था। उस समय अंगूर की शराब का बहुत प्रचलन था।

2. पशुपालन:
रोमन साम्राज्य के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। इसका कारण यह था कि उस समय रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों में अनेक उन्नत चरागाहें मौजूद थीं। नुमीडिया (आधुनिक अल्जीरिया) में बड़ी संख्या में भेड़-बकरियाँ पाली जाती थीं। यहाँ ऋतु प्रवास (transhumance) बहुत व्यापक पैमाने पर होता था। यहाँ चरवाहे (pastorals) एवं अर्ध यायावर (semi-nomadic) अपने साथ में अवन (oven) आकार की झोंपड़ियाँ (huts) लिए घूमते रहते थे। इन्हें मैपालिया (mapalia) कहा जाता था।

स्पेन में भी पशुपालन का धंधा काफी विकसित था। यहाँ चरवाहे पहाड़ियों की चोटियों पर बसे गाँवों में रहते थे। इन गाँवों को कैस्टेला (Castella) कहते थे। उस समय रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों के लोग भेड़-बकरियों के अतिरिक्त गाय, बैल, भैंस, घोड़े, सूअर एवं कुत्ते आदि जानवरों को भी पालते थे। इन पशुओं को खेती करने, बोझा ढोने, दूध-दही, मक्खन, माँस एवं ऊन आदि प्राप्त करने के उद्देश्य से पाला जाता था। निस्संदेह पशुपालन की रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

3. उद्योग (Industry):
रोमन साम्राज्य में विभिन्न उद्योगों ने भी उल्लेखनीय विकास किया था। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। प्रथम, रोमन सम्राटों ने उद्योगों के विकास के लिए विशेष पग उठाए। द्वितीय, रोमन साम्राज्य में विभिन्न प्रकार की धातुएँ–सोना, चाँदी, लोहा एवं टिन आदि भारी मात्रा में उपलब्ध थीं। तीसरा, रोमन साम्राज्य के उद्योगों के विकास में व्यापारिक संघों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उस समय रोमन साम्राज्य में जैतून का तेल (olive oil) निकालने तथा अंगूरी शराब (grape wine) बनाने के उद्योग प्रमुख थे। इनके प्रमुख केंद्र स्पेन, गैलिक प्राँत, उत्तरी अफ्रीका एवं मिस्त्र थे। जैतून का तेल, शराब तथा अन्य तरल पदार्थों की ढुलाई ऐसे मटकों अथवा कंटेनरों द्वारा की जाती थी जिन्हें एम्फ़ोरा (Amphora) कहते थे। रोम में मोंटी टेस्टैकियो (Monte Testaccio) नामक स्थल से इस प्रकार के 5 करोड़ से अधिक कंटेनरों के अवशेष पाए गए हैं। स्पेन में जैतून के तेल निकालने का उद्योग 140-160 ई० के दौरान अपने चरमोत्कर्ष पर था।

4. व्यापार (Trade):
रोमन साम्राज्य का आंतरिक एवं विदेशी व्यापार काफी उन्नत था। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे-

  • रोमन शासकों ने व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए विशेष पग उठाए।
  • ऑगस्ट्स के शासनकाल से लेकर आने वाले काफी समय तक संपूर्ण रोमन साम्राज्य में शांति एवं व्यवस्था बनी रही।
  • यातायात के साधनों का काफी विकास किया गया था। सड़क मार्गों एवं बंदरगाहों द्वारा रोमन साम्राज्य के महत्त्वपूर्ण नगरों को आपस में जोड़ा गया था।
  • सिक्कों के प्रचलन एवं बैंकों की स्थापना ने भी रोमन साम्राज्य के व्यापार के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया।
  • उस समय रोमन साम्राज्य की कृषि एवं उद्योग ने अद्वितीय प्रगति की थी।
  • रोमन पुलिस एवं नोसैना द्वारा सड़क मार्गों एवं समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए व्यापक प्रबंध किए गए थे।

रोमन साम्राज्य का विदेशी व्यापार अनेक यूरोपीय देशों, उत्तरी अफ्रीका, मिस्त्र, चीन, भारत, अरब एवं सीरिया आदि देशों के साथ होता था। रोमन साम्राज्य इन देशों को अंगूर की शराब, चाँदी का सामान, सोना, बहुमूल्य पत्थर, ताँबा एवं टिन आदि का निर्यात करता था। इसके बदले वह इन देशों से सूती एवं रेशमी वस्त्र, श्रृंगार का सामान, हाथी दाँत, गर्म मसाले, संगमरमर एवं कागज आदि का निर्यात करता था। निस्संदेह अनेक शताब्दियों तक रोमन साम्राज्य विश्व के व्यापार का एक प्रमुख केंद्र रहा।

5. श्रमिकों पर नियंत्रण (Controlling Workers)-रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था में दासों की उल्लेखनीय भूमिका थी। दासों से प्रतिदिन 16 से 18 घंटे कठोर कार्य लिया जाता था। इसके बावजूद उन्हें न तो कोई वेतन दिया जाता था तथा न ही भरपेट खाना। हाँ उन पर घोर अत्याचार ज़रूर किए जाते थे। पहली शताब्दी में जब रोमन साम्राज्य ने अपनी विस्तार की नीति का लगभग त्याग कर दिया तो दासों की आपूर्ति में कमी आने लगी। बाध्य होकर दास श्रम का प्रयोग करने वालों को दास प्रजनन (slave breeding) एवं वेतनभोगी मज़दूरों (wage labourers) का सहारा लेना पड़ा।

वेतनभोगी मज़दूर सस्ते पड़ते थे। इसका कारण यह था कि उन्हें आवश्यकता के अनुसार रखा एवं छोड़ा जा सकता था। दूसरी ओर वेतनभोगी मजदूरों के विपरीत दास श्रमिकों को वर्ष भर भोजन देना पड़ता था तथा अन्य खर्चे भी करने पड़ते थे। इससे दास श्रमिकों की लागत बहुत बढ़ जाती थी। दासों एवं मजदूरों पर घोर अत्याचारों के कारण एवं कर्जे के कारण वे भागने के लिए बाध्य हो जाते थे। 398 ई० के एक कानून में कहा गया है कि उस समय श्रमिकों को दागा जाता था ताकि यदि वे भागने का प्रयास करें तो उन्हें पहचाना जा सके।

6. सिक्के (Coins)-रोमन साम्राज्य में 366 ई० पू० में सिक्कों का प्रचलन आरंभ हुआ। ये सिक्के काँसे के बने होते थे। इन सिक्कों के प्रचलन से पूर्व वस्तुओं का लेन-देन वस्तु विनिमय (barter system) के आधार पर चलता था। सिक्कों के प्रचलन से आंतरिक एवं विदेशी व्यापार को एक नया प्रोत्साहन मिला। कुछ समय के पश्चात् रोमन साम्राज्य में चाँदी के सिक्कों का प्रचलन आरंभ हुआ।

इस सिक्के को दीनारियस (denarius) कहा जाता था। तीसरी शताब्दी में स्पेन की चाँदी की खानें खत्म हो गई थीं। अतः सरकार के पास चाँदी की धातु का भंडार समाप्त हो गया था। बाध्य होकर रोमन साम्राज्य को अपनी चाँदी की मुद्रा का प्रचलन छोड़ना पड़ा। चौथी शताब्दी में कांस्टैनटाइन ने सोने पर आधारित नई मुद्रा प्रणाली का प्रचलन किया। इसका नाम सॉलिडस (Solidus) रखा गया। यह 4.5 ग्राम शुद्ध सोने का बना होता था।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ एक साम्राज्य

प्रश्न 6.
रोमन साम्राज्य के लोगों के धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के लोगों में अनेक देवी-देवताओं की पूजा का प्रचलन था। वे अपने सम्राटों की भी देवता के रूप में उपासना करते थे। वे अनेक अंध-विश्वासों में भी विश्वास रखते थे। ईसाई धर्म का उदय इस काल की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। रोमन लोगों के धार्मिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं–

1. रोमन देवते (Roman Deities) रोमन लोग बहुदेववादी (polytheist) थे। वे अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। उनके कुछ प्रसिद्ध देवी-देवता निम्नलिखित थे

(1) जूपिटर (Jupiter)-जूपिटर रोमन लोगों का सबसे सर्वोच्च देवता था। वह आकाश का बड़ा देवता था। सूर्य, चंद्रमा एवं तारे सभी उसी की आज्ञा का पालन करते थे। वह विश्व की सभी घटनाओं को जानता था। वह पापियों को सज़ा भी देता था।

(2) मॉर्स (Mars)-मॉर्स युद्ध का देवता था। युद्ध में होने वाली पराजय अथवा विजय उसकी कृपा पर निर्भर करती थी।

(3) जूनो (Juno)-जूनो रोमन लोगों की प्रमुख देवी थी। उसे स्त्रियों की देवी समझा जाता था। लोगों का विश्वास था कि जूनो की कृपा होने पर ही स्त्रियाँ गर्भ धारण करती हैं। इस देवी की उपासना सभी घरों में की जाती थी।

(4) मिनर्वा (Minerva)—मिनर्वा को ज्ञान की देवी माना जाता था। उसकी कृपा से मनुष्य का अंधकार दूर होता था तथा वह ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करता था।

(5) डायना (Dyana) वह प्रेम की देवी थी।

(6) इसिस (Isis)-इसिस को स्त्रियों एवं परिवार से संबंधित देवी माना जाता था। वह पतियों को अपनी पत्नियों से प्यार करने तथा बच्चों को अपने माता-पिता का सम्मान करने के लिए बाध्य करती थी। इसिस की उपासना पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों द्वारा की जाती थी।

2. उपासना विधि (Method of Worship)-रोमन लोग अपने देवी-देवताओं की स्मृति में भव्य मंदिरों का निर्माण करते थे। इसमें वे विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित करते थे। इनकी उपासना बहुत धूमधाम से की जाती थी। देवी-देवताओं को विभिन्न प्रकार के चढ़ावे चढ़ाए जाते थे। इसके अतिरिक्त पशुओं की बलियाँ भी दी जाती थीं।

उस समय यह माना जाता था कि विधिवत् पूजा करने से देवता प्रसन्न होते हैं तथा मन की इच्छा पूर्ण होती है। नाराज़ होने पर देवता अनिष्ट करते हैं। अतः विधिवत् उपासना के उद्देश्य से बड़ी संख्या में पुरोहितों को नियुक्त किया जाता था। उनका समाज में बहुत सम्मान होता था।

3. सम्राटों की उपासना (Worship of Emperors)-रोमन सम्राट् ऑगस्ट्स ने सम्राटों की उपासना प्रथा को रोमन साम्राज्य में प्रचलित किया। इस प्रथा को प्रचलित करके वह रोमन साम्राज्य की विभिन्न जातियों के लोगों को एकता के सूत्र में बाँधना चाहता था। उसका यह प्रयास सफल प्रमाणित हुआ। अत: उसके उत्तराधिकारियों ने इस प्रथा को जारी रखा। डायोक्लीशियन (Diocletian) ने अपने आप को सूर्य देवता घोषित कर दिया। इन सम्राटों की स्मृति में भी विशाल एवं भव्य मंदिर बनाए जाते थे। यहाँ पुरोहितों द्वारा उनकी विधिवत् उपासना की जाती थी।

4. मिथ धर्म (Mithraism)–उस समय रोमन साम्राज्य में जो धर्म प्रचलित थे उनमें मिथ्र धर्म को भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। इस धर्म के लोग मुख्य रूप से सूर्य देवता की उपासना करते थे। स्त्रियों को इस धर्म में प्रवेश की अनुमति नहीं थी।

5. यहूदी धर्म (Judaism)—यहूदी धर्म रोमन साम्राज्य का एक लोकप्रिय धर्म था। इस धर्म का संस्थापक पैगंबर मूसा (Prophet Musa) था। यहूदी एकेश्वरवादी (monolith) थे। वे जेहोवा (Jehova) के अतिरिक्त किसी अन्य की उपासना नहीं करते थे। उनके विचारानुसार जेहोवा ने सृष्टि की रचना की है तथा वह ही इसकी पालना करता है। इस धर्म में मूर्ति पूजा पर प्रतिबंध है। यह धर्म आपसी भाईचारे एवं नैतिकता पर बल देता है। इस धर्म की पवित्र पुस्तक को तोरा (Torah) कहा जाता है। इस धर्म के मंदिर सिनेगोग (synegogue) कहलाते

6. ईसाई धर्म (Christianity)-ईसाई धर्म के संस्थापक ईसा मसीह (Jesus Christ) थे। ईसा मसीह के उपदेश बिल्कुल साधारण थे तथा उनका उद्देश्य मानव जाति का कल्याण करना था। उन्होंने लोगों को आपसी भाईचारे एवं प्रेम का संदेश दिया। वह एक परमात्मा में विश्वास रखते थे। उनका कथन था कि हमें सदैव ग़रीबों एवं असहायों की सहायता करनी चाहिए। वह सदाचार पर बहुत बल देते थे। वह अनैतिक कार्य करने एवं झूठ बोलने के विरुद्ध थे।

वह मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे। ईसाइयों की पवित्र पुस्तक बाईबल (Bible) कहलाती है। ईसाई गिरजाघरों (churches) में उपासना करते हैं। कांस्टैनटाइन ने 313 ई० में ईसाई धर्म को राज्य धर्म घोषित कर दिया। इससे ईसाई धर्म को एक नया प्रोत्साहन मिला। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के अनुसार, “रोमन बहुत धार्मिक थे तथा वे प्रथाओं और संस्कारों को बहुत महत्त्व देते थे।”

प्रश्न 7.
रोमन साम्राज्य में प्रचलित दास प्रथा तथा इसके प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दास प्रथा की रोमन समाज में एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। वास्तव में यह उनके समाज का एक अभिन्न अंग बन चुका था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ऑगस्टस के शासनकाल में इटली की 75 लाख की जनसंख्या में दासों की संख्या 30 लाख थी। जिस व्यक्ति के पास जितने अधिक दास होते थे समाज में उसे उतना सम्मान दिया जाता था। अतः अमीरों में अधिक-से-अधिक दास रखने की एक होड़ सी लगी रहती थी।

स्थिति इतनी भयावह थी कि साधारण से साधारण नागरिक भी अपने अधीन 7-8 दास रखता था। इनमें से अधिकांश दास युद्ध में बंदी बनाए गए होते थे। रोमन समाज में अवांछित बच्चों को उनके पिताओं द्वारा फेंक दिया जाता था। इन बच्चों को व्यापारियों द्वारा दास बना लिया जाता था। वास्तव में दास प्रथा रोमन समाज के माथे पर एक कलंक समान थी। प्रसिद्ध इतिहासकार डब्ल्यू० आर० ब्रोनलो के अनुसार, “जीवन के सभी पक्षों में दासों एवं जानवरों में एकरूपता थी।”

1. दासों की स्थिति (Position of Slaves)-रोमन समाज में दासों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। गाँवों में रहने वाले दास पशुओं से भी बदतर जीवन व्यतीत करते थे। दासों पर मालिक घोर अत्याचार करते थे। उन्हें जागीरों पर 16 से 18 घंटे प्रतिदिन कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता था। खेतों में काम करते समय दासों को एक दूसरे से जंजीरों से बाँधा जाता था ताकि वे भागने का दुस्साहस न करें। रात के समय उन्हें तहखानों में भेज दिया जाता था। यहाँ न तो कोई स्वास्थ्य का प्रबंध होता था तथा न ही कोई रोशनी का।

घोर मेहनत के बावजूद उन्हें भरपेट खाना भी नसीब नहीं होता था। शहरों में रहने वाले दासों की स्थिति भी अच्छी न थी। वे विभिन्न प्रकार करते थे। उदाहरण के तौर पर वे घरेल नौकर, दकानदारों के सहायक, मज़दर एवं व्यापारियों के एजेंट तौर पर कार्य करते थे। वे विभिन्न प्रकार से अपने मालिकों का मनोरंजन भी करते थे। दासों को किसी प्रकार का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। वे अपने मालिक की अनुमति के बिना विवाह तक नहीं करवा सकते थे।

वे अपने स्वामी को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकते थे। ऐसा प्रयास करने वाले दासों को मौत के घाट उतार दिया जाता था। दासों के साथ किए जाने वाले अपमानजनक व्यवहार के कारण अनेक बार दास सामहिक रूप से विद्रोह कर देते थे।

2. स्त्री दासों की स्थिति (Position of Female Slaves)-रोमन समाज में स्त्री दासों की संख्या भी काफी थी। समाज में उनकी स्थिति भी अच्छी न थी। वे पुरुषों का विभिन्न प्रकार से मनोरंजन करती थीं। पुरुष उन्हें केवल एक विलासिता की वस्तु समझते थे। उनका खुलेआम यौन शोषण किया जाता था। इंकार करने वाली दासी पर घोर अत्याचार किए जाते थे। घर में काम करने वाली दासियों को विभिन्न प्रकार के कार्य करने पड़ते थे। घरेलू कार्यों के अतिरिक्त वे अपनी मालकिनों को तैयार करती थीं। वे अपनी मालकिनों के बच्चों की देखभाल का कार्य भी करती थीं। इनके अतिरिक्त दासियों को घर में आने वाले मेहमानों को भी प्रसन्न रखना पड़ता था।

3. दास बच्चों की स्थिति (Position of Children Slaves)-रोमन समाज में दास बच्चों की स्थिति भी शोचनीय थी। दास बच्चों पर उनके माता-पिता का कोई अधिकार नहीं था। उन पर उनके मालिकों का पूर्ण अधिकार होता था। उस समय दास बच्चों को दहेज में देने की प्रथा भी प्रचलित थी।

दास बच्चों पर भी उनके मालिक घोर अत्याचार करते थे। 5-6 वर्ष के बच्चों को ख़तरनाक कामों पर लगा दिया जाता था। उन्हें भरपेट खाना नहीं दिया था तथा वे अर्धनग्न घूमते रहते थे। वास्तव में दास बच्चों का जीवन भी नरक समान था। इतिहासकार एच० टी० रोवेल के अनुसार, “दासों के बच्चे अपने मालिकों की उसी प्रकार संपत्ति थे जैसे कि बागों के सेब अथवा पशुओं के झुंड।”

4. दास व्यापार (Slave Trade)-रोमन साम्राज्य में दास प्रथा का व्यापक प्रचलन था। अतः दास व्यापार काफी जोरों पर था। युद्ध में बनाए गए सभी बंदियों को दास बना लिया जाता था। उन्हें दास व्यापारियों द्वारा खरीद लिया जाता था। एक दास पुरुष को 18 से 20 पौंड तथा एक दासी को 6 से 8 पौंड तक खरीदा जाता था। सुंदर दिखने वाली दासी की कीमत कुछ अधिक होती थी। क्योंकि उस समय प्रत्येक रोमन नाग अनुसार कुछ न कुछ दास अवश्य रखता था इसलिए प्रत्येक दुकानदार दास अवश्य रखता था। निस्संदेह दास व्यापार काफी लाभप्रद था।

5. दासता से मुक्ति (Manumission)-रोमन साम्राज्य में कुछ दयावान मालिक दास-दासियों की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें दासता से मुक्त कर देते थे। कुछ दास मालिक अपनी मृत्यु से पूर्व दान के रूप में कुछ दासों को मुक्त कर देते थे। कुछ दास अपने मालिकों को दासता से मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से कीमत देते थे। यह कीमत सामान्यतः 20 से 25 पौंड होती थी। कभी-कभी यह इससे भी ऊपर होती थी। दासों द्वारा यह धन अपने जीवन काल में थोड़ा-थोड़ा करके एकत्र किया जाता था।

कुछ दास मालिक अपनी दासियों से विवाह करने हेतु उन्हें दासता से मुक्त कर देते थे। यद्यपि दासों को मुक्त कर दिया जाता था किंतु फिर भी उन पर कुछ प्रतिबंध जारी रहते थे। वे रोमन साम्राज्य के उच्च पदों एवं सेना में भर्ती नहीं हो सकते थे। वे अपने मालिक के विरुद्ध अदालत में कोई गवाही नहीं दे सकते थे। मार्क किशलेस्की के अनुसार, “मुक्त दास भी अपने संपूर्ण जीवनकाल में अपने पूर्व मालिक के प्रति बाध्य रहता था।

वे उसका विशेष सम्मान करते थे तथा उसका अदालतों अथवा अन्य संघर्षों के समय विरोध नहीं कर सकते थे। ऐसा करने पर उसे सज़ा के तौर पर पुनः दास बनाया जा सकता था।

6. दास प्रथा के प्रभाव (Effects of Institution of Slavery) दास प्रथा के रोमन साम्राज्य पर गहन प्रभाव पड़े। इस प्रथा के व्यापक प्रचलन के कारण रोमन लोग विलासप्रिय बन गए। दासों पर लगे प्रतिबंधों एवं घोर अत्याचारों के कारण उनमें निराशा फैली। इससे विद्रोहों का जन्म हुआ। ये विद्रोह रोमन साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुए। रोमन लोगों को दासियों का यौन-शोषण करने की खुली छूट थी।

इस कारण लोगों का तीव्रता से नैतिक पतन हुआ। दास प्रथा के कारण रोमन साम्राज्य के छोटे स्वतंत्र किसानों का सर्वनाश हुआ। अतः उन्हें अपनी जमीनें बेचनी पड़ी। दास प्रथा का एक अच्छा प्रभाव यह पड़ा कि यूनानी दासों ने अपने देश की संस्कृति को रोमन साम्राज्य में फैलाया।

क्रम संख्यावर्षघटना
1.509 ई० पू०रोम में गणतंत्र की स्थापना।
2.27 ई० पू०रोम में गणतंत्र का अंत एवं ऑगस्ट्स द्वारा प्रिंसिपेट की स्थापना।
3.27 ई० पू० से 14 ई०रोमन साम्राज्य के प्रथम प्रिंसिपेट ऑगस्ट्स का शासनकाल।
4.14 ई० से 37 ई०ऑगस्ट्स के उत्तराधिकारी टिबेरियस का शासनकाल।
5.54 ई० से 68 ई०रोमन साम्राज्य के सर्वाधिक अत्याचारी शासक नीरो का शासनकाल।
6.64 ई०रोम में भयंकर आग।
7.66 ई०यहूदियों का विद्रोह।
8.69 ई०रोमन साम्राज्य पर चार सम्राटों ने शासन किया।
9.79 ई०विसूवियस ज्वालामुखी के फटने से पोम्पई का दफन। वरिष्ठ प्लिनी की मृत्यु।
10.98 ई० से 117 ई०त्राजान का शासनकाल।
11.113 ई०-117 ई०सम्राट् त्राजान का पार्थियन शासक के विरुद्ध अभियान। राजधानी टेसीफुन पर अधिकार।
12.117 ई० से 138 ई०हैड्रियन का शासनकाल।
13.161 ई० से 180 ई०मार्स्स आरेलियस का शासनकाल, मेडिटेशंस नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना।
14.193 ई० से 211 ई०सेप्टिमियस सेवेरस का शासनकाल।
15.224 ई०ईरान में ससानी वंश की स्थापना।
16.241 ई० से 272 ई०ईरान में शापुर प्रथम का शासन।
17.253 ई० से 268 ई०सम्राट् गैलीनस का शासनकाल।
18.233 ई० से 280 ई०रोमन साम्राज्य पर जर्मन बर्बरों के आक्रमण।
19.284 ई० से 305 ई०डायोक्लीशियन का शासनकाल, रोमन साम्राज्य को दो भागों में विभाजित करना।
20.301 ई०डायोक्लीशियन द्वारा सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें निश्चित करना।
21.309 ई० से 379 ई०ईरान में शापुर द्वितीय का शासनकाल।
22.306 ई० से 337 ई०कांस्टैनटाइन का शासनकाल।
23.313 ई०कांस्टैनटाइन ने ईसाई धर्म को स्वीकार किया।
24.330 ई०कांस्टैनटाइन ने कुंस्तुनतुनिया को रोमन साम्राज्य की दूसरी राजधानी घोषित किया।
25.408 ई० से 450 ई०थियोडोसियस द्वितीय का शासनकाल।
26.410 ईoविसिगोथों द्वारा रोम का विध्वंस।
27.428 ई०वैंडलों द्वारा अफ्रीका पर कब्ज़ा।
28.438 ईoथियोडोसियस कोड को जारी करना।
29.493 ई०ऑस्ट्रोगोथों द्वारा इटली में राज्य स्थापित करना।
30.527 ई० से 565 ई०जस्टीनियन का शासनकाल।
31.533 ई०जस्टीनियन कोड को जारी करना।
32.568 ई०लोंबार्डों द्वारा इटली पर आक्रमण।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
ऑगस्ट्स काल को रोमन साम्राज्य का स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है ?
अथवा
रोमन साम्राज्य के ऑगस्ट्स काल से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
ऑगस्ट्स की गणना रोमन साम्राज्य के महान् शासकों में की जाती है। उसने रोमन साम्राज्य पर 27 ई० पू० से 14 ई० तक शासन किया। उसके शासनकाल को निम्नलिखित कारणों से रोमन साम्राज्य का स्वर्ण युग कहा जाता है

  • उसने रोमन साम्राज्य में जुलियस सीज़र के पश्चात् फैली अराजकता को दूर कर शांति की स्थापना की।
  • उसने सैनेट जोकि रोमन साम्राज्य की सर्वाधिक शक्तिशाली संस्था थी, के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए।
  • उसने रोमन साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एक शक्तिशाली सेना का निर्माण किया। इसे आधुनिक शस्त्रों से लैस किया गया।
  • उसने प्रांतीय प्रशासन में अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए।
  • उसने रोमन साम्राज्य को अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया।
  • उसने कला तथा साहित्य के विकास के लिए अनेक कार्य किए।

प्रश्न 2.
ऑगस्ट्स के सैनेट के साथ किस प्रकार के संबंध थे ?
उत्तर:
ऑगस्ट्स रोमन साम्राज्य का एक महान् शासक था। यद्यपि राज्य की वास्तविक शक्तियाँ उसके हाथ में थीं किंतु उसने कभी भी अपने आपको निरंकुश शासक घोषित नहीं किया। वह अपने आपको केवल प्रिंसेप्स अथवा प्रथम नागरिक कहलाता था। ऐसा सैनेट के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए किया गया था। सैनेट रोमन गणतंत्र के समय रोम की सर्वाधिक प्रभावशाली संस्था थी। इसने अनेक शताब्दियों तक रोम के इतिहास में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। ऑगस्ट्स ने केवल रोम के धनी, ईमानदार एवं कर्त्तव्यपरायण लोगों को ही सैनेट में प्रतिनिधित्व दिया।

उसने सदैव सैनेट के प्रति सम्मान प्रकट किया। इसे देखते हुए सैनेट ने स्वेच्छा से सैन्य संचालन, सीमाँत प्रदेशों के नियंत्रण, सुरक्षा, युद्ध एवं संधि संबंधी सभी अधिकार ऑगस्ट्स को सौंप दिए। ऑगस्ट्स ने कुछ समय के पश्चात् सैनेट के सदस्यों की संख्या 1000 से कम कर के 600 कर दी। इस प्रकार उसने बड़ी चतुराई से सैनेट के अवांछित सदस्यों को हटा दिया। इस प्रकार ऑगस्ट्स ने सैनेट पर नियंत्रण स्थापित करने में सफलता प्राप्त की।

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प्रश्न 3.
रोमन साम्राज्य में सेना की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य में सेना की उल्लेखनीय भूमिका थी। इसे सम्राट् एवं सैनेट के पश्चात् प्रशासन की एक महत्त्वपूर्ण संस्था माना जाता था। रोमन सेना एक व्यावसायिक सेना थी। प्रत्येक सैनिक को कम-से-कम 25 वर्षों तक सेवा करनी पड़ती थी। प्रत्येक सैनिक को नकद वेतन दिया जाता था। चौथी शताब्दी तक इसमें 6 लाख सैनिक थे। सैनिक अधिक वेतन और अच्छी सेवा शर्तों के लिए लगातार आंदोलन करते रहते थे।

कभी-कभी ये आंदोलन सैनिक विद्रोहों का रूप भी ले लेते थे। सैनेट सेना से घृणा करती थी और उससे डरती भी थी। इसका कारण यह था कि सेना हिंसा का स्रोत थी। सम्राटों की सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि वे सेना पर कितना नियंत्रण रख पाते थे। जब सेनाएँ विभाजित हो जाती थीं तो इसका परिणाम गृह युद्ध होता था।

प्रश्न 4.
ऑगस्ट्स ने रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए कौन-से कदम उठाए ?
उत्तर:
ऑगस्ट्स के शासनकाल में आर्थिक क्षेत्र में अद्वितीय विकास किया। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। प्रथम, ऑगस्ट्स के शासनकाल में रोमन साम्राज्य में पूर्ण शाँति एवं व्यवस्था कायम रही। द्वितीय, उसने यातायात के साधनों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया। इससे साम्राज्य के विभिन्न भागों एवं विदेशों से संपर्क स्थापित करना एवं माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना सुगम हो गया।

तीसरा, उसने समुद्री डाकुओं का सफाया करने के उद्देश्य से एक स्थायी जल बेडे का निर्माण करवाया। चौथा. उसने कषि एवं उद्योगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। पाँचवां, उसने रोमन साम्राज्य के अनेक देशों के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध स्थापित किए। ऑगस्ट्स के इन आर्थिक सुधारों के चलते जहाँ एक ओर रोमन लोग आर्थिक पक्ष से समृद्ध हुए वहीं दूसरी ओर इससे रोमन साम्राज्य की नींव सुदृढ़ हुई।

प्रश्न 5.
ऑगस्ट्स ने कला तथा साहित्य को किस प्रकार प्रोत्साहित किया ?
उत्तर:
ऑगस्ट्स कला तथा साहित्य का महान् प्रेमी था। इसलिए उसके शासनकाल में इन क्षेत्रों में अद्वितीय प्रगति हुई। उसने रोम में अनेक भव्य भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया। इनमें उसके द्वारा बनवाया गया पैंथियन सर्वाधिक प्रसिद्ध है। उसने ईंटों के स्थान पर संगमरमर का प्रयोग करके रोमन भवन निर्माण कला को एक नई दिशा प्रदान की। उसके शासनकाल में रोमन साहित्य ने उल्लेखनीय विकास किया। लिवि, वर्जिल, होरेस तथा ओविड आदि ने ऑगस्ट्स के शासनकाल को चार चाँद लगा दिए।

लिवि रोमन साम्राज्य का सबसे महान् इतिहासकार था। उसने रोम के इतिहास को 142 जिल्दों में लिखा। वर्जिल ऑगस्ट्स के शासनकाल का सबसे महान् कवि था। उसकी सबसे प्रसिद्ध रचना का नाम ईनिड है। यह एक महाकाव्य है। इसमें रोम के संस्थापक ट्रोजन के साहसिक कार्यों का विवरण दिया गया है। होरेस ऑगस्ट्स के शासनकाल का एक अन्य प्रसिद्ध कवि था। उसने अपनी कविताओं में ऑगस्ट्स की बहुत प्रशंसा की है तथा उसे एक देवता माना है। ओविड भी एक महान् कवि था। उसकी कविताओं का मूल विषय प्रेम था।

प्रश्न 6.
नीरो को रोमन साम्राज्य के इतिहास का सबसे क्रूर शासक क्यों माना जाता है ?
उत्तर:
नीरो रोमन साम्राज्य का सबसे बदनाम शासक था। उसने 54 ई० से 68 ई० तक शासन किया। वह एक अत्यंत अयोग्य एवं क्रूर शासक प्रमाणित हुआ। वह बहुत शंकालु स्वभाव का था। इस कारण उसने राज्य के अनेक उच्च अधिकारियों को मौत के घाट उतार डाला। यहाँ तक कि उसने अपने सौतेले भाई ब्रिटानिक्स, अपने शिक्षक सेनेका, अपनी माँ अग्रीपिना तथा अपनी पत्नी ऑक्टेविया को भी मरवा डाला।

उसने अपनी अय्याशी एवं गलत कार्यों से रोम के खजाने को खाली कर दिया। उसने इसे भरने के उद्देश्य से जनता पर भारी कर लगा दिए। इससे लोगों में भारी रोष फैला। 64 ई० में रोम में एक भयंकर आग लग गई। इस कारण लगभग आधे से अधिक हो गया।

नीरो ने इस आग के लिए ईसाइयों को दोषी ठहराया तथा उन्हें बडी संख्या में मौत के घाट उतार डाला। उसने रोम को पुनः भव्य भवनों से सुसज्जित किया। इससे रोमन अर्थव्यवस्था को एक गहरा आघात लगा। उसके बढ़ते हुए अत्याचारों के कारण गॉल, स्पेन एवं अफ्रीका में विद्रोह भड़क उठे। इस कारण रोमन साम्राज्य की नींव डगमगा गई।

प्रश्न 7.
अगर सम्राट् बाजान भारत पर विजय प्राप्त करने में वास्तव में सफल रहे होते और रोमवासियों का इस देश पर अनेक सदियों तक कब्जा रहा होता, तो आप क्या सोचते हैं कि भारत वर्तमान समय के देश से किस प्रकार भिन्न होता ?
उत्तर:
यदि भारत अनेक सदियों तक रोमवासियों के कब्जे में रहा होता, तो भारत वर्तमान समय के देश से निम्नलिखित दृष्टियों से भिन्न होता

  • भारत में लोकतंत्र के स्थान पर राजतंत्र की स्थापना होती।
  • भारत में सोने के सिक्के प्रचलित होते।
  • ग्रामीण क्षेत्र नगरों के नियंत्रण में होते।
  • ग्रामीण क्षेत्र राज्य के राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत होता।
  • ईसाई धर्म देश का राजधर्म होता।
  • लोगों के मनोरंजन के मुख्य साधन सर्कस, थियेटर के तमाशे तथा जानवरों की लड़ाइयाँ होतीं।
  • देश में दास प्रथा का प्रचलन होता।

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प्रश्न 8.
तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य में उत्पन्न संकट के प्रमुख कारण क्या थे ?
अथवा
रोमन साम्राज्य में तीसरी शताब्दी का संकट क्या था ?
उत्तर:
तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य को अनेक संकटों का सामना करना पड़ा। इसके लिए निम्न कारण उत्तरदायी थे

(1) तीसरी शताब्दी के दौरान जर्मन मूल की अनेक जनजातियों जिनमें एलमन्नाई, फ्रैंक तथा गौथ प्रमुख थे, ने अपने लगातार आक्रमणों द्वारा रोमन साम्राज्य की नींव को डगमगा दिया।

(2) तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य की राजनीतिक स्थिति बहुत शोचनीय थी। 47 वर्षों के दौरान 25 शासक सिंहासन पर बैठे। इन सभी शासकों की या तो हत्या की गई या वो गृह-युद्ध में मारे गए।

(3) रोमन साम्राज्य में फैली अराजकता के कारण कृषि, उद्योग तथा व्यापार को गहरा आघात लगा। अतः दैनिक प्रयोग की सभी वस्तुओं की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि होने लगी। इसे लोग सहन करने को तैयार नहीं थे।

(4) प्रत्येक शासक सेना के सहयोग से सत्ता में आता था। अतः सैनिकों का समर्थन पाने के उद्देश्य से उनकी तनख्वाहों एवं अन्य सुविधाओं में वृद्धि कर दी जाती थी। इससे रोमन अर्थव्यवस्था को एक गहरा धक्का लगा।

(5) रोमन साम्राज्य में फैली अराजकता का लाभ उठाते हुए अनेक प्रांतों ने स्वतंत्रता के लिए विद्रोह आरंभ कर दिए थे। इससे स्थिति ने विस्फोटक रूप धारण कर लिया।

(6) तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य में अनेक भयानक अकाल पड़े एवं प्लेग फैली। इसमें बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हो गई। अतः रोमन साम्राज्य तीव्रता से विघटन की ओर बढ़ने लगा।

प्रश्न 9.
डायोक्लीशियन ने रोमन साम्राज्य के विकास के लिए कौन-से पग उठाए ?
उत्तर:
डायोक्लीशियन ने रोमन साम्राज्य के विकास के लिए निम्नलिखित पग उठाए

(1) डायोक्लीशियन ने सर्वप्रथम सम्राट् के सम्मान में वृद्धि की। उसने अपने आप को सूर्य देवता घोषित किया। उसने दरबार में नए नियमों को प्रचलित किया।

(2) उसने रोमन साम्राज्य पर नियंत्रण पाने के उद्देश्य से 285 ई० में रोमन साम्राज्य को दो भागों में विभाजित किया। पूर्वी साम्राज्य पर उसने स्वयं शासन किया।

(3) उसने निकोमेडिया को पूर्वी रोमन साम्राज्य की नयी राजधानी घोषित किया। उसने पश्चिमी रोमन साम्राज्य का प्रशासन चलाने के लिए मैक्सीमीअन को सम्राट तथा कांस्टैनटीयस को सहायक सम्राट नियुक्त किया।

(4) उसने रोमन साम्राज्य की सुरक्षा के उद्देश्य से सेना को अधिक शक्तिशाली बनाया तथा सीमाओं पर अनेक नए किलों का निर्माण करवाया।

(5) उसने 100 प्रांतों का गठन किया। उसने प्रांतों में शासन करने वाले अधिकारियों की संख्या में वृद्धि कर दी।

(6) उसनें रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक पग उठाए। उसने 301 ई० में एक आदेश द्वारा सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें निश्चित कर दी।

प्रश्न 10.
कांस्टैनटाइन की प्रमुख उपलब्धियों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कांस्टैनटाइन की गणना रोमन साम्राज्य के प्रसिद्ध शासकों में की जाती है। उसने 306 ई० से 337 ई० तक शासन किया। उसने अपने शासनकाल के दौरान रोमन साम्राज्य की स्थिति को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक उल्लेखनीय कार्य किए। उसने सर्वप्रथम अपना ध्यान रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था की ओर दिया। उसने रोमन साम्राज्य में तीन शताब्दियों से प्रचलित मौद्रिक प्रणाली में परिवर्तन किया।

उस समय में सभी मुद्राएँ चाँदी से बनी होती थीं। यह चाँदी स्पेन से रोमन साम्राज्य में आती थी। चाँदी की कमी के कारण सरकार के पास इस धातु का भंडार खत्म हो गया। इस स्थिति से निपटने के लिए कांस्टैनटाइन ने 310 ई० में सोने पर आधारित नई मुद्रा चलाई। इसका नाम सॉलिडस रखा गया। यह मुद्रा रोमन साम्राज्य के अंत के पश्चात् भी चलती रही।

कांस्टैनटाइन ने रोमन साम्राज्य में उद्योगों के विकास पर विशेष बल दिया। उसने यातायात के साधनों का विकास किया। उसने रोमन साम्राज्य के विदेशों के साथ व्यापार को भी प्रोत्साहित किया। कांस्टैनटाइन ने रोमन साम्राज्य की सरक्षा के लिए एक शक्तिशाली सेना का गठन किया।

उसकी एक अन्य महत्त्वपर्ण सफलता 313 ई० में ईसाई को रोमन साम्राज्य का राज्य धर्म घोषित करना था। इससे ईसाई धर्म के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। उसके शासनकाल का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य 330 ई० में कुंस्तुनतुनिया को रोमन साम्राज्य की दूसरी राजधानी घोषित करना था।

प्रश्न 11.
जस्टीनियन पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
जस्टीनियन पूर्वी रोमन साम्राज्य का सबसे प्रसिद्ध सम्राट् था। उसने 527 ई० से 565 ई० तक शासन किया। उसने रोमन साम्राज्य के गौरव को पुनः स्थापित करने में उल्लेखनीय योगदान दिया। जस्टीनियन ने सर्वप्रथम ईरान के ससानी शासक को पराजित किया। इसके पश्चात् उसने 533 ई० में उत्तरी अफ्रीका के सैंडलों को पराजित कर कार्थेज़ पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् उसने ऑस्ट्रोगोथों को पराजित कर इटली पर अधिकार कर लिया। जस्टीनियन ने प्रशासन को कुशल बनाने के उद्देश्य से अनेक पग उठाए।

उसने साम्राज्य में फैले भ्रष्टाचार को दूर करने के प्रयास किए। उसने लोक भलाई के अनेक कार्य किए। उसने अनेक भव्य एवं विशाल चर्चों का निर्माण करवाया। इनमें उसके द्वारा कुंस्तुनतुनिया में बनाया गया हागिया सोफ़िया नामक चर्च सर्वाधिक प्रसिद्ध था। उसके शासनकाल में लोग आर्थिक पक्ष से बहुत समृद्ध थे।

इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके शासनकाल में अकेला मित्र प्रतिवर्ष 25 लाख सॉलिडस की राशि करों के रूप में देता था। विश्व इतिहास में जस्टीनियन का नाम 533 ई० में उसके द्वारा जारी किए गए जस्टीनियन कोड के लिए विख्यात है। यह कोड अनेक यूरोपीय देशों के कानूनों की आधारशिला बना।

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प्रश्न 12.
रोमन साम्राज्य के पतन के क्या कारण थे ?
अथवा
रोमन सभ्यता के पतन के पाँच कारण बताओ।
उत्तर:
(1) रोमन साम्राज्य की विशालता-प्राचीनकाल में रोमन साम्राज्य बहुत विशाल था। उस समय यातायात के साधनों का विकास बहुत कम हुआ था। अतः इतने विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रखना कोई सहज कार्य न था। इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाकर अनेक प्रांतों के गवर्नर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर देते थे। इससे रोमन साम्राज्य की एकता को गहरा आघात लगा।

(2) रोमन शासकों की साम्राज्यवादी नीति-रोमन शासकों की साम्राज्यवादी नीति भी रोमन साम्राज्य के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई। सभी रोमन शासकों ने साम्राज्यवादी नीति पर बहुत बल दिया। अतः उन्हें एक विशाल सेना का गठन करना पड़ा। इस सेना पर धन पानी की तरह बहाया गया। लगातार युद्धों में जन तथा धन की भी अपार क्षति हुई।

(3) रोमन शासकों की विलासिता-रोमन शासकों की विलासिता रोमन साम्राज्य के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई। कुछ रोमन शासकों को छोड़कर अधिकाँश रोमन शासक विलासप्रिय सिद्ध हुए। वे अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करते थे। रोमन शासकों ने लगातार कम हो रहे खज़ाने को भरने के लिए लोगों पर भारी कर लगा दिए। इससे लोगों में भारी असंतोष फैला तथा वे ऐसे साम्राज्य के विरुद्ध होते चले गए।

(4) उत्तराधिकार कानून का अभाव-रोमन साम्राज्य के पतन के महत्त्वपूर्ण कारणों में से एक उत्तराधिकार के कानून का अभाव था। अतः जब किसी शासक की आकस्मिक मृत्यु हो जाती तो यह पता नहीं होता था कि उसका उत्तराधिकारी कौन बनेगा। ऐसे समय में विभिन्न दावेदारों में गृह-युद्ध आरंभ हो जाते थे। इन युद्धों के परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर रोमन साम्राज्य की शक्ति क्षीण हुई वहीं दूसरी ओर इसने बाहरी शत्रुओं को रोमन साम्राज्य पर आक्रमण करने का स्वर्ण अवसर प्रदान किया।

(5) दुर्बल सेना—किसी भी साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार में उसकी सेना की प्रमुख भूमिका होती है। कुछ रोमन शासकों ने एक विशाल एवं शक्तिशाली सेना का गठन किया था। किंतु बाद के रोमन शासक अयोग्य एवं निकम्मे सिद्ध हुए थे। उन्होंने रोमन साम्राज्य की सेना की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप रोमन सेना कमजोर हो गई। ऐसे साम्राज्य के पतन को रोका नहीं जा सकता था।

प्रश्न 13.
अध्याय को ध्यानपूर्वक पढ़कर उसमें से रोमन समाज और अर्थव्यवस्था को आपकी दृष्टि में आधुनिक दर्शाने वाले आधारभूत अभिलक्षण चुनिए।
उत्तर:
1. समाज

  • समाज में एकल परिवार का व्यापक प्रचलन था।
  • रोभ की महिलाओं को संपत्ति के स्वामित्व व संचालन के व्यापक कानूनी अधिकार प्राप्त थे।
  • उस समय पत्नी को पूर्ण वैधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। उस समय तलाक देना बेहद सुगम था।
  • उस समय लड़कियों का विवाह 16 से 23 वर्ष के मध्य एवं लड़कों का विवाह 28 से 32 वर्ष के मध्य किया जाता था।

2. अर्थव्यवस्था

  • उस समय के लोग बहुत समृद्ध थे। देश में स्वर्ण मुद्राएँ प्रचलित थीं।
  • रोमन साम्राज्य में बंदरगाहों, खानों एवं उद्योगों की संख्या काफ़ी अधिक थी।
  • उस समय गहन खेती का प्रचलन था।
  • रोमन साम्राज्य का व्यापार काफी विकसित था।
  • उस समय बैंकिंग व्यवस्था तथा धन का व्यापक रूप से प्रचलन था।

प्रश्न 14.
रोमन समाज में स्त्रियों की दशा कैसी थी ?
अथवा
रोमन साम्राज्य में सेंट ऑगस्टीन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
रोमन समाज में स्त्रियों की स्थिति को समूचे रूप से अच्छा कहा जा सकता है। समाज में उनका सम्मान किया जाता था। वे सार्वजनिक, धार्मिक एवं सामाजिक उत्सवों में बढ़-चढ़ कर भाग लेती थीं। संपन्न परिवार की लड़कियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करती थीं। उस समय लड़कियों का विवाह 16 से 23 वर्ष के बीच किया जाता था। लड़की का विवाह करना उसके पिता अथवा बड़े भाई का ज़रूरी कर्त्तव्य समझा जाता था। उस समय विवाह बहुत धूमधाम से किए जाते थे। उस समय दहेज प्रथा प्रचलित थी।

पुत्री को अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार प्राप्त था। विवाहिता का अपने परिवार पर काफी प्रभाव होता था। वह अपने बच्चों की शिक्षा तथा परिवार के अन्य कार्यों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। उस समय तलाक लेना अपेक्षाकृत आसान था। ऐसी सूरत में पति को अपनी पत्नी से प्राप्त दहेज उसके पिता को वापस लौटाना होता था। उत्तरी अफ्रीका के एक महान् बिशप सेंट ऑगस्टीन ने लिखा है कि उनका पिता अक्सर उनकी माता की पिटाई करता था। इस प्रकार की कुछ अन्य शिकायतों का उसने वर्णन किया है। उस समय रोमन समाज में वेश्यावृत्ति भी प्रचलित थी।

प्रश्न 15.
रोमन साम्राज्य में व्यापक सांस्कृतिक विविधता पाई जाती थी। प्रमाणित कीजिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य में व्यापक सांस्कृतिक विविधता निम्नलिखित तथ्यों से प्रमाणित होती है

  • रोमन साम्राज्य में धार्मिक संप्रदायों तथा स्थानीय देवी-देवताओं में भरपूर विविधता थी।
  • उस समय रोमन साम्राज्य में अनेक भाषाएँ-कॉप्टिक, कैल्टिक, प्यूनिक, बरबर, आमिनियाई तथा लातिनी प्रचलित थीं।
  • उस समय वेशभूषा की विविध शैलियाँ अपनाई जाती थीं।
  • उस समय के लोग विभिन्न प्रकार के भोजन खाते थे।
  • उस समय सामाजिक संगठनों के विभिन्न रूप प्रचलित थे।
  • उस समय बस्तियों के भी अनेक रूप प्रचलित थे।

प्रश्न 16.
रोमन साम्राज्य के लोगों के आर्थिक जीवन के संबंध में आप क्या जानते हैं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के आर्थिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं।
(1) उस समय के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। ज़मींदारों के पास विशाल जागीरें होती थीं। वे दासों की सहायता से खेती करते थे। गैलिली गहन् खेती के लिए प्रसिद्ध था। उस समय की प्रमुख फ़सलें गेहूँ, जौ, मक्का एवं जैतून थीं।

(2) रोमन साम्राज्य के लोगों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था। उस समय के लोग भेड़-बकरियाँ, गाय, बैल, भैंस, सूअर, घोड़े एवं कुत्ते आदि पालते थे। इन पशुओं को खेती करने, यातायात के लिए , दूध, माँस एवं ऊन आदि प्राप्त करने के लिए पाला जाता था।

(3) उस समय रोमन साम्राज्य का तीसरा प्रमुख व्यवसाय उद्योग था। उस समय जैतून का तेल बनाने एवं अंगूरी शराब बनाने के उद्योग सर्वाधिक प्रसिद्ध थे।

(4) उस समय रोम का आंतरिक एवं विदेशी व्यापार बहुत उन्नत था। यह व्यापार सड़क एवं समुद्री दोनों मार्गों से होता था। रोमन साम्राज्य शताब्दियों तक विश्व व्यापार का एक प्रसिद्ध केंद्र रहा।

(5) रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था में श्रमिकों की प्रमुख भूमिका थी। अधिकाँश श्रमिक दास होते थे। श्रमिकों पर उनके मालिकों द्वारा कठोर नियंत्रण रखा जाता था।

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प्रश्न 17.
रोमन साम्राज्य में व्यापारिक उन्नति के लिए कौन-से कारण उत्तरदायी थे ?
उत्तर:
रोमन साम्राज्य का आंतरिक एवं विदेशी व्यापार अपनी चरम सीमा पर था। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे-

  • रोमन शासकों ने व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए विशेष पग उठाए।
  • ऑगस्ट्स के शासनकाल से लेकर आने वाले काफी समय तक संपूर्ण रोमन साम्राज्य में शांति एवं व्यवस्था बनी रही।
  • यातायात के साधनों का काफी विकास किया गया था। सड़क मार्गों एवं बंदरगाहों द्वारा रोमन साम्राज्य के महत्त्वपूर्ण नगरों को आपस में जोड़ा गया था।
  • सिक्कों के प्रचलन एवं बैंकों की स्थापना ने भी रोमन साम्राज्य के व्यापार के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया।
  • उस समय रोमन साम्राज्य की कृषि एवं उद्योग ने अद्वितीय प्रगति की थी।
  • रोमन पुलिस एवं नोसैना द्वारा सड़क मार्गों एवं समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए व्यापक प्रबंध किए गए थे।

प्रश्न 18.
रोमन साम्राज्य में श्रमिकों पर किस प्रकार नियंत्रण रखा जाता था ?
उत्तर:
रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था में अधिकाँश श्रम दासों द्वारा किया जाता था। दासों से प्रतिदिन 16 से 18 घंटे कठोर कार्य लिया जाता था। इसके बावजूद उन्हें न तो कोई वेतन दिया जाता था तथा न ही भरपेट खाना। हाँ उन पर घोर अत्याचार ज़रूर किए जाते थे। पहली शताब्दी में जब रोमन साम्राज्य ने अपनी विस्तार की नीति का लगभग त्याग कर दिया तो दासों की आपूर्ति में कमी आने लगी।

बाध्य होकर दास श्रम का प्रयोग करने वालों को दास प्रजनन एवं वेतनभोगी मज़दूरों का सहारा लेना पड़ा। वेतनभोगी मज़दूर सस्ते पड़ते थे। इसका कारण थह था कि उन्हें आवश्यकता के अनुसार रखा एवं छोडा जा सकता था। दूसरी ओर वेतनभोगी मज़दूरों के विपरीत दास श्रमिकों को वर्ष भर भोजन देना पड़ता था तथा अन्य खर्चे भी करने पड़ते थे।

इससे दास श्रमिकों की लागत बहुत बढ़ जाती थी। दासों एवं मजदूरों पर घोर अत्याचारों के कारण एवं कर्जे के कारण वे भागने के लिए बाध्य हो जाते थे। ग्रामीण ऋणग्रस्तता इतनी व्यापक थी कि 66 ई० के यहूदी विद्रोह के दौरान क्रांतिकारियों ने लोगों का समर्थन प्राप्त करने के लिए साहूकारों के ऋण-पत्रों को नष्ट कर दिया। 398 ई० के एक कानून में कहा गया है कि उस समय श्रमिकों को दागा जाता था ताकि यदि वे भागने का प्रयास करें तो उन्हें पहचाना जा सके।

प्रश्न 19.
यूनान एवं रोमवासियों की पारंपरिक धार्मिक संस्कृति बहुदेववादी थी। उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) रोमन लोग बहुदेववादी थे। वे अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। उनके प्रमुख देवी देवताओं के नाम जपिटर, मॉर्स. जनो, मिनर्वा. डायना एवं इसिस थे।

(2) रोमन लोग आपने देवी-देवताओं की स्मृति में विशाल एवं भव्य मंदिरों का निर्माण करते थे। इसमें वे विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित करते थे। इनकी उपासना बहुत धूमधाम से की जाती थी।

(3) रोमन साम्राज्य के लोग आपने सम्राटों की देवी-देवताओं की तरह उपासना करते थे एवं इन सम्राटों की स्मृति में भी विशाल एवं भव्य मंदिर बनाते थे एवं मूर्तियों की भी स्थापना करते थे।

(4) उस समय रोमन साम्राज्य में जो धर्म प्रचलित थे उनमें मिथ्र धर्म को भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। इस धर्म के लोग मुख्य रूप में सूर्य देवता की उपासना करते थे।

(5) यहूदी धर्म रोमन साम्राज्य का एक लोकप्रिय धर्म था। इस धर्म का संस्थापक (पैगंबर मूसा) था। यहूदी एकेश्वरवादी थे। वे जोहोवा के अतिरिक्त किसी अन्य की उपासना नहीं करते थे।

प्रश्न 20.
रोमन साम्राज्य में प्रचलित दास प्रथा के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
दास प्रथा का रोमन समाज में व्यापक प्रचलन था। ऑगस्ट्स के शासनकाल में कुल 75 लाख की जनसंख्या में 30 लाख दास थे। उस समय अमीर लोग दास रखना अपनी एक शान समझते थे। उस समय युद्धबंदियों को दास बनाया जाता था। कुछ लोग गरीबी के कारण अपने बच्चों को दास के रूप में बेच देते थे। रोमन समाज में स्त्री दासों की संख्या बहुत अधिक थी। पुरुष उन्हें केवल एक विलासिता की वस्तु समझते थे।

दासों के मालिक अपने दासों के साथ अमानुषिक व्यवहार करते थे। अनेक बार दास बाध्य होकर विद्रोह भी कर देते थे। रोमन सम्राटों हैड्रियन, मार्क्स आरेलियस, कांस्टैनटाइन एवं जस्टीनियन ने दास प्रथा का अंत करने के प्रयास किए। दास प्रथा के रोमन साम्राज्य पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इस प्रथा के व्यापक प्रचलन के कारण रोमन लोग विलासप्रिय बन गए।

दासों पर लगे प्रतिबंधों एवं घोर अत्याचारों के कारण उनमें आत्म-सम्मान एवं आगे बढ़ने की आशा खत्म हो गई। दासों में फैली निराशा के कारण वे अनेक बार विद्रोह करने के लिए बाध्य हुए। ये विद्रोह रोमन साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुए। रोमन लोगों को दासियों का यौन-शोषण करने की खुली छूट थी। इस कारण लोगों का तीव्रता से नैतिक पतन हुआ।

प्रश्न 21.
रोमन सभ्यता की विश्व को क्या देन है ?
उत्तर:

  • रोमन सभ्यता ने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण करके अन्य देशों को विस्तृत साम्राज्य स्थापित करने का मार्ग दिखाया।
  • इसने विशाल रोमन साम्राज्य में शांति स्थापित करके अन्य देशों को एकता का महत्त्व बताया।
  • इसने विश्व के देशों को सहनशीलता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने राजनीति को सदैव धर्म से अलग रखा।
  • रोम ने विश्व विख्यात कानूनवेत्ता पैदा किए। इनके द्वारा बनाए गए कानूनों ने अन्य देशों के लिए मार्ग दर्शक का कार्य किया।
  • रोमन साम्राज्य ने ईसाई धर्म के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया।
  • रोमन साम्राज्य में अनेक विख्यात विद्वान् पैदा हुए। उन्होंने विश्व साहित्य को अमूल्य देन दी।
  • रोमन साम्राज्य ने विश्व को भवन निर्माण कला की नई शैलियों से परिचित करवाया।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
रोमन साम्राज्य किन तीन महाद्वीपों में फैला हुआ था ? नाम लिखिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य यूरोप, एशिया एवं अफ्रीका के महाद्वीपों में फैला हुआ था।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ एक साम्राज्य

प्रश्न 2.
रोमन साम्राज्य एवं ईरान के मध्य कौन-सी नदी बहती थी ?
उत्तर:
रोमन साम्राज्य एवं ईरान के मध्य फ़रात (Euphrates) नदी बहती थी।

प्रश्न 3.
किस सागर को रोमन साम्राज्य का हृदय माना जाता था ? यह कहाँ से कहाँ तक फैला हुआ था ?
उत्तर:

  • भूमध्यसागर को रोमन साम्राज्य का हृदय माना जाता था।
  • यह पश्चिम में स्पेन से लेकर पूर्व में सीरिया तक फैला हुआ था।

प्रश्न 4.
रोमन साम्राज्य के काल के दौरान ईरान में किन दो प्रसिद्ध राजवंशों ने शासन किया ?
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के काल के दौरान ईरान में पार्थियाई (Parthians) तथा ससानी (Sasanians) राजवंशों ने शासन किया।

प्रश्न 5.
रोम में गणतंत्र का प्रचलन कब से कब तक रहा ? उत्तर:रोम में गणतंत्र का प्रचलन 509 ई०पू० से 27 ई०पू० तक रहा। प्रश्न 6. पैपाइरस किसे कहते हैं ?
उत्तर:

  • यह एक सरकंडा जैसा पौधा था जो मिस्त्र में नील नदी के किनारे उत्पन्न होता था।
  • इससे लिखने वाले विद्वानों को पैपाइरोलोजिस्ट कहा जाता था।

प्रश्न 7.
वर्ष वृत्तांत (Annals) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
समकालीन इतिहासकारों द्वारा लिखा गया उस समय का इतिहास वर्ष वृत्तांत कहलाता था। इसे वार्षिक आधार पर लिखा जाता था।

प्रश्न 8.
जुलियस सीज़र कौन था ?
उत्तर:
जुलियस सीज़र रोम का एक महान् शासक था। उसने 49 ई० पू० से 44 ई० पू० तक शासन किया। उसने अपने शासनकाल के दौरान अनेक महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त की। वह एक तानाशाह की तरह शासन करने लगा। अतः 44 ई० पू० में ब्रटस एवं उसके साथियों ने सीज़र की हत्या कर दी।

प्रश्न 9.
प्रिंसिपेट से क्या अभिप्राय है ? इसकी स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:

  • प्रिंसिपेट से अभिप्राय उस राज्य से है जिसकी स्थापना ऑगस्ट्स ने की थी।
  • इसकी स्थापना 27 ई०पू० में की गई थी।

प्रश्न 10.
रोमन साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास के तीन प्रमुख खिलाड़ी कौन-कौन थे ?
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास के तीन प्रमुख खिलाड़ी सम्राट्, अभिजात वर्ग और सेना थे।

प्रश्न 11.
रोमन साम्राज्य का प्रथम प्रिंसिपेट कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य का प्रथम प्रिंसिपेट ऑगस्ट्स था।
  • उसका शासनकाल 27 ई०पू० से 14 ई० तक था।

प्रश्न 12.
ऑगस्ट्स के शासनकाल की कोई दो प्रमुख उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने रोमन साम्राज्य में शांति की स्थापना की।
  • उसने सैनेट के साथ अच्छे संबंध स्थापित किए।

प्रश्न 13.
ऑगस्टस के शासनकाल को रोमन साम्राज्य के इतिहास का स्वर्ण यग क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:

  • उसने रोमन साम्राज्य में फैली अराजकता को दर कर वहाँ शाँति की स्थापना की।
  • उसने रोमन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाया।
  • उसने कला तथा साहित्य को प्रोत्साहन दिया।

प्रश्न 14.
ऑगस्ट्स ने रोमन सैनेट में कौन-से दो प्रमुख सुधार किए ?
उत्तर:

  • उसने केवल रोम के धनी, ईमानदार एवं कर्त्तव्यपरायण लोगों को ही सैनेट में प्रतिनिधित्व दिया।
  • उसने सैनेट में अवांछित सदस्यों को हटा दिया।

प्रश्न 15.
ऑगस्ट्स ने रोमन सेना में कौन-से दो प्रमुख सुधार किए ?
उत्तर:

  • उसने एक स्थायी सेना का गठन किया।
  • उसने प्रोटोरियन गॉर्ड की स्थापना की।

प्रश्न 16.
ऑगस्ट्स ने प्रांतीय प्रशासन में कुशलता लाने हेतु कौन-से प्रमुख पग उठाए ?
उत्तर:

  • उसने केवल ईमानदार लोगों को गवर्नर के पद पर नियुक्त किया।
  • उसने प्रांतों में फैले भ्रष्टाचार को दूर किया।
  • उसने जनता पर अत्याचार करने वाले अधिकारियों को हटा दिया।

प्रश्न 17.
ऑगस्ट्स द्वारा किए गए कोई दो उल्लेखनीय आर्थिक सुधार लिखें।
उत्तर:

  • उसने कृषि तथा उद्योगों को प्रोत्साहित किया।
  • उसने अनेक देशों के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध स्थापित किए।

प्रश्न 18.
ऑगस्ट्स के शासनकाल का सबसे महान् इतिहासकार कौन था ? उसने रोमन साम्राज्य का इतिहास कितने जिल्दों में लिखा ?
उत्तर:

  • ऑगस्ट्स के शासनकाल का सबसे महान् इतिहासकार लिवि था।
  • उसने रोमन साम्राज्य का इतिहास 142 जिल्दों में लिखा।

प्रश्न 19.
ऑगस्ट्स के शासनकाल का सबसे प्रसिद्ध कवि एवं उसकी रचना का नाम लिखें।
उत्तर:

  • ऑगस्ट्स के शासनकाल के सबसे प्रसिद्ध कवि का नाम वर्जिल था।
  • उसकी प्रसिद्ध रचना का नाम ईनिड (Aenid) था।

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प्रश्न 20.
ऑगस्ट्स का उत्तराधिकारी कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • ऑगस्ट्स का उत्तराधिकारी टिबेरियस था।
  • उसका शासनकाल 14 ई० से लेकर 37 ई० तक था।

प्रश्न 21.
नीरो कौन था? वह क्यों अलोकप्रिय था? अथवा नीरो कौन था ?
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य का सबसे अत्याचारी शासक नीरो था।
  • उसका शासनकाल 54 ई० से लेकर 68 ई० तक था।
  • वह अपने अत्याचारों के कारण प्रजा में अलोकप्रिय था।

प्रश्न 22.
सम्राट् त्राजान ने पार्थियन के शासक के विरुद्ध कब अभियान चलाया ? इस अभियान के दौरान उसने किन क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था ?
उत्तर:

  • सम्राट् त्राजान ने पार्थियन के शासक के विरुद्ध 113 ई० से 117 ई० तक अभियान चलाया।
  • इस अभियान के दौरान उसने आरमीनिया, असीरिया, मेसोपोटामिया तथा पार्थियन राजधानी टेसीफुन पर अधिकार कर लिया था।

प्रश्न 23.
सम्राट् हैड्रियन के कोई दो महत्त्वपूर्ण सुधार बताएँ।
उत्तर:

  • उसने लोक भलाई के अनेक कार्य किए।
  • उसने सैनेट के साथ अच्छे संबंध स्थापित किए।

प्रश्न 24.
मार्क्स आरेलियस क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • उसने गरीबों एवं दासों की दशा सुधारने के लिए अनेक पग उठाए।
  • उसने पार्थियनों एवं जर्मन बर्बरों द्वारा रोमन साम्राज्य पर किए गए आक्रमणों को पछाड़ दिया।
  • उसने रोमन साम्राज्य के प्रसिद्ध सेनापति कैसियस के विद्रोह का दमन किया।

प्रश्न 25.
तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य में आए संकट के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य पर विदेशी बर्बरों के लगातार आक्रमण आरंभ हो गए थे।
  • इस शताब्दी के दौरान गह-यद्धों ने भयंकर रूप धारण कर लिया था। 47 वर्षों में रोमन साम्राज्य में 25 सम्राट् सत्तासीन हुए।।

प्रश्न 26.
सम्राट् डायोक्लीशियन ने रोमन साम्राज्य को छोटा क्यों कर दिया ?
उत्तर:
सम्राट् डायोक्लीशियन ने अनुभव किया कि साम्राज्य के अनेक प्रदेशों का कोई सामरिक अथवा आर्थिक महत्त्व नहीं है। अतः उसने इन प्रदेशों को छोड़ना बेहतर समझा।

प्रश्न 27.
डायोक्लीशियन के शासनकाल की कोई दो महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने रोमन साम्राज्य की सुरक्षा के उद्देश्य से रोमन सेना को अधिक शक्तिशाली बनाया।
  • उसने प्रांतीय प्रशासन की कुशलता के उद्देश्य से प्रांतों की संख्या 100 कर दी।

प्रश्न 28.
कांस्टैनटाइन का नाम रोमन साम्राज्य के इतिहास में क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर:

  • उसने सॉलिडस नामक एक नई मुद्रा का प्रचलन किया।
  • उसने 313 ई० में ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का राज्य धर्म घोषित किया।
  • उसने 330 ई० में कुंस्तुनतुनिया को रोमन साम्राज्य की दूसरी राजधानी घोषित किया।

प्रश्न 29.
कांस्टैनटाइन के दो प्रमुख आर्थिक सुधार बताएँ।
उत्तर:

  • उसने उद्योगों के विकास पर विशेष बल दिया।
  • उसने सॉलिडस नामक सोने की मुद्रा का प्रचलन किया।

प्रश्न 30.
कांस्टैनटाइन द्वारा चलाई गई नई मुद्रा का नाम क्या था ? यह किस धातु से बनी थी ?
अथवा सॉलिडस क्या था ?
उत्तर:

  • कांस्टैनटाइन द्वारा चलाई गई नई मुद्रा का नाम सॉलिडस था।
  • यह सोने की धातु की बनी थी।

प्रश्न 31.
दीनारियस क्या होता था ?
उत्तर:
दीनारियस रोमन साम्राज्य में प्रचलित चाँदी का सिक्का था। इसमें लगभग 4.5 ग्राम विशुद्ध चाँदी होती थी।

प्रश्न 32.
पूर्वी रोमन साम्राज्य का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • पूर्वी रोमन साम्राज्य का सबसे प्रसिद्ध शासक जस्टीनियन था।
  • उसका शासनकाल 527 ई० से 565 ई० तक था।

प्रश्न 33.
जस्टीनियन की प्रसिद्धि के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • उसने साम्राज्य में फैले भ्रष्टाचार को दूर किया।
  • उसने जस्टीनियन कोड का प्रचलन किया।

प्रश्न 34.
रोमन साम्राज्य के पतन के दो कारण लिखिए।
उत्तर:
रोमन सभ्यता के पतन के दो कारण निम्नलिखित थे :

  • रोमन साम्राज्य के शासकों की साम्राज्यवादी नीति ही उसके लिए विनाशकारी सिद्ध हुई।
  • रोमन शासकों की विलासिता रोमन साम्राज्य की नैया डुबोने में एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई।

प्रश्न 35.
रोमोत्तर राज्य (Post-Roman) किसे कहा जाता था ? किन्हीं दो ऐसे राज्यों के नाम बताइए।
उत्तर:

  • रोमोत्तर राज्य ऐसे राज्यों को कहा जाता था जिनकी स्थापना जर्मन बर्बरों द्वारा की गई थी।
  • दो ऐसे राज्य थे-स्पेन में विसिगोथों का राज्य एवं गॉल में फ्रैंकों का राज्य।

प्रश्न 36.
रोमन साम्राज्य के सामाजिक जीवन की कोई दो विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:

  • रोमन समाज तीन श्रेणियों में विभाजित था।
  • रोमन समाज में एकल परिवार प्रणाली प्रचलित थी।

प्रश्न 37.
रोमन समाज में स्त्रियों की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर:
रोमन समाज में स्त्रियों की स्थिति समूचे रूप से अच्छी थी। समाज में उनका सम्मान किया जाता था। वे उत्सवों में बढ़-चढ़ कर भाग लेती थीं। उन्हें शिक्षा एवं संपत्ति का अधिकार प्राप्त था। उस समय लड़कियों का विवाह 16 से 23 वर्ष के मध्य किया जाता था। उस समय समाज में दहेज प्रथा एवं वेश्यावृत्ति का प्रचलन था।

प्रश्न 38.
एकल परिवार से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
एकल परिवार से हमारा अभिप्राय एक ऐसे परिवार से है जिसमें पति-पत्नी एवं उनके बच्चे रहते हैं।

प्रश्न 39.
सेंट ऑगस्टीन कौन थे ?
अथवा सेंट ऑगस्टीन कौन था ? उसके किस कथन से स्पष्ट होता है कि उस समय पतियों का अपनी पत्नियों पर पूर्ण अधिकार था ?
उत्तर:

  • सेंट ऑगस्टीन उत्तरी अफ्रीका के एक महान् बिशप थे।
  • उसके इस कथन से-कि उसके पिता द्वारा नियमित रूप से उनकी माता की पिटाई की जाती थी स्पष्ट होता है कि उस समय पतियों का अपनी पत्नियों पर पूर्ण अधिकार था।

प्रश्न 40.
रोमन साम्राज्य में साक्षरता की दर क्या थी ?
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य में साक्षरता की दर विभिन्न भागों में अलग-अलग थी।
  • यह पुरुषों में सामान्यता: 20% एवं स्त्रियों में 10% थी।

प्रश्न 41.
रोमन साम्राज्य का पोम्पई नगर कब ज्वालामुखी के फटने से दफ़न हो गया था ? किन दो उदाहरणों से पता चलता है कि उस समय वहाँ कामचलाऊ साक्षरता का व्यापक प्रचलन था ?
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य का पोम्पई नगर 79 ई० में ज्वालामुखी के फटने से दफ़न हो गया था।
  • पोम्पई नगर की दीवारों पर अंकित विज्ञापनों तथा वहाँ पाए गए अभिरेखणों (Graffiti) से पता चलता है कि उस समय वहाँ कामचलाऊ साक्षरता का व्यापक प्रचलन था।

प्रश्न 42.
निकटवर्ती पूर्व (Near East) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • निकटवर्ती पूर्व से अभिप्राय है भूमध्यसागर के बिल्कुल पूर्व का प्रदेश।
  • इसमें सीरिया, फ़िलिस्तीन, मेसोपोटामिया तथा अरब के क्षेत्र सम्मिलित थे।

प्रश्न 43.
निकटवर्ती पूर्व एवं मिस्त्र में कौन-सी भाषाएँ बोली जाती थीं ?
उत्तर:

  • निकटवर्ती पूर्व में अरामाइक एवं
  • मिस्र में कैल्टिक भाषाएँ बोली जाती थीं।

प्रश्न 44.
उत्तरी अफ्रीका एवं स्पेन में कौन-सी भाषाएँ बोली जाती थीं ?
उत्तर:

  • उत्तरी अफ्रीका में प्यूनिक तथा बरबर भाषाएँ बोली जाती थीं।
  • स्पेन में कैल्टिक भाषा बोली जाती थी।

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प्रश्न 45.
कल्पना कीजिए कि आप रोम की एक गृहिणी हैं जो घर की ज़रूरत की वस्तुओं की खरीददारी की सूची बना रही हैं। अपनी सूची में आप कौन-सी वस्तुएँ शामिल करेंगी ?
उत्तर:
यदि मैं रोम की गृहिणी होती तो मैं घर की ज़रूरत की वस्तुओं की खरीददारी की सूची में ब्रेड, मक्खन, दूध, अंडे, माँस, तेल, फल, सब्जियाँ, विभिन्न प्रकार की दालों, नहाने एवं कपड़े धोने के साबुनों, सौंदर्य प्रसाधन, बच्चों की ज़रूरी वस्तुओं एवं दवाइयाँ आदि को शामिल करती।

प्रश्न 46.
रोमन साम्राज्य के लोगों के आर्थिक जीवन की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।
  • उस समय रोमन साम्राज्य के दो प्रमुख उद्योग जैतून का तेल निकालने तथा अंगूरी शराब बनाने के थे।

प्रश्न 47.
रोमन साम्राज्य की कृषि की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • उस समय कृषि दासों की सहायता से की जाती थी।
  • उस समय फ़सलों के अधिक उत्पादन के लिए खादों का प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 48.
रोमन साम्राज्य में सबसे अधिक किस फल का उत्पादन होता था ? इसका प्रयोग किस लिए किया जाता था ?
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य में सबसे अधिक उत्पादन अंगूर का किया जाता था।
  • इसका प्रयोग शराब बनाने के लिए किया जाता था।

प्रश्न 49.
रोमन साम्राज्य में सबसे अधिक भेड़-बकरियाँ कहाँ पाली जाती थीं ? यहाँ चरवाहे जिन झोपड़ियों में रहते थे उन्हें क्या कहा जाता था ?
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य में सबसे अधिक भेड़-बकरियाँ नुमीडिया में पाली जाती थीं।
  • यहाँ चरवाहे जिन झोपड़ियों में रहते थे उन्हें मैपालिया कहा जाता था।

प्रश्न 50.
रोमन साम्राज्य के किस प्रदेश में पशुपालन का धंधा बहुत विकसित था ? यहाँ चरवाहों के गाँवों को किस नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य के स्पेन प्रदेश में पशुपालन का धंधा बहुत विकसित था।
  • यहाँ चरवाहों के गाँवों को कैस्टेला के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 51.
मैपालिया एवं कैस्टेला से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • मैपालिया अवन आकार की झोंपड़ियाँ थीं जिन्हें चरवाहे इधर-उधर उठा कर घूमते रहते थे।
  • कैस्टेला स्पेन में चरवाहों के गाँवों को कहा जाता था। यह गाँव पहाड़ियों की चोटियों पर बने होते थे।

प्रश्न 52.
एम्फोरा (Amphora) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
एम्फोरा ढुलाई (transportation) के ऐसे मटके अथवा कंटेनर थे जिनमें शराब, जैतून का तेल तथा दूसरे तरल पदार्थ लाए एवं ले जाए जाते थे। रोम में मोंटी टेस्टैकियो नामक स्थल से ऐसे 5 करोड़ से अधिक एम्फोरा प्राप्त हुए हैं।

प्रश्न 53.
ड्रेसल 20 (Dressel 20) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • ड्रेसल 20 उन कंटेनरों को कहा जाता था जिनके द्वारा जैतून के तेल की ढुलाई की जाती थी।
  • इन कंटेनरों के अवशेष भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में अनेक उत्खनन स्थलों पर पाए गए हैं।

प्रश्न 54.
पाँचवीं एवं छठी शताब्दियों के मध्य रोमन साम्राज्य के चार केंद्रों के नाम बताएँ जो जैतून के तेल एवं अंगूरी शराब बनाने के लिए प्रसिद्ध थे।
उत्तर:

  • एगियन
  • दक्षिणी एशिया माइनर
  • सीरिया
  • फिलिस्तीन।

प्रश्न 55.
रोमन साम्राज्य के आंतरिक एवं विदेशी व्यापार के प्रफुल्लित होने के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य में काफी समय तक शांति एवं व्यवस्था बनी रही।
  • रोमन साम्राज्य में यातायात के साधन काफी विकसित थे।

प्रश्न 56.
दास प्रजनन से क्या अभिप्राय है ? रोमन साम्राज्य में दास प्रजनन की आवश्यकता क्यों हुई ?
उत्तर:

  • दास प्रजनन से अभिप्राय उस प्रथा से है जिसमें दासों को अधिक-से-अधिक बच्चे उत्पन्न करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
  • प्रथम शताब्दी में रोमन साम्राज्य ने अपनी विस्तार नीति का लगभग त्याग कर दिया था। इसलिए दासों की आपूर्ति (supply) में कमी आ गई।

प्रश्न 57.
रोमन साम्राज्य में सरकारी निर्माण कार्यों में दासों की अपेक्षा वेतनभोगी मज़दूरों का व्यापक प्रयोग क्यों किया जाता था ?
उत्तर:
रोमन साम्राज्य में सरकारी निर्माण कार्यों में दासों की अपेक्षा वेतनभोगी मजदूरों का व्यापक प्रयोग इसलिए किया जाता था क्योंकि वेतनभोगी मज़दूर सस्ते पड़ते थे। दूसरी ओर दास श्रमिकों को वर्ष भर खाना देना पड़ता था तथा अन्य खर्च करने पड़ते थे। इसलिए उनकी लागत बहुत बढ़ जाती थी।

प्रश्न 58.
रोमन साम्राज्य में श्रमिकों पर नियंत्रण किस प्रकार रखा जाता था ?
उत्तर:

  • उस समय श्रमिकों को दागा जाता था ताकि यदि वे भागें तो उन्हें पहचाना जा सके।
  • उन्हें जंजीरों द्वारा बाँध कर रखा जाता था।

प्रश्न 59.
रोमन साम्राज्य में प्रचलित दो प्रसिद्ध सिक्के कौन से थे ? ये किस धातु के बने थे ?
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य में प्रचलित दो प्रसिद्ध सिक्के दीनारियस एवं सॉलिडस थे।
  • ये सिक्के क्रमश: चाँदी एवं सोने के बने हुए थे।

प्रश्न 60.
आपको क्या लगता है कि रोमन सरकार ने चाँदी में मुद्रा को ढालना क्यों बंद किया होगा और वह सिक्कों के उत्पादन के लिए कौन-सी धातु का उपयोग करने लगी ?
उत्तर:

  • रोमन सरकार ने चाँदी में मुद्रा को ढालना इसलिए बंद किया क्योंकि स्पेन में चाँदी की खाने खत्म हो गईं। इसलिए रोमन साम्राज्य में चाँदी की कमी हो गई।
  • रोमन सरकार अब सिक्कों के लिए सोने का उपयोग करने लगी।

प्रश्न 61.
यदि आप रोमन साम्राज्य में रहे होते तो कहाँ रहना पसंद करते-नगरों में या ग्रामीण क्षेत्र में ? कारण बताइये।
उत्तर:
यदि मैं रोमन साम्राज्य में रहा होता तो निम्नलिखित कारणों से नगरों में रहना अधिक पसंद करता

  • नगरों में ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध थीं।
  • अकाल के दिनों में नगरों में अनाज की कोई कमी नहीं होती थी।
  • नगरों में ग्रामीण क्षेत्र की अपेक्षा यातायात के साधन अधिक विकसित थे।
  • नगरों में लोगों को उच्च स्तर के मनोरंजन उपलब्ध थे।

प्रश्न 62.
रोमन साम्राज्य के लोगों के धार्मिक जीवन की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य के लोग अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे।
  • वे अनेक प्रकार के अंध-विश्वासों में भी विश्वास रखते थे।

प्रश्न 63.
जूपिटर कौन था ?
उत्तर:
जूपिटर रोमन लोगों का सबसे सर्वोच्च देवता था। वह आकाश का देवता था। सूर्य, चंद्रमा एवं तारे सभी उसी की आज्ञा का पालन करते थे। वह विश्व की सभी घटनाओं की जानकारी रखता था। वह पापियों को सज़ा देता था।

प्रश्न 64.
जूनो और मिनर्वा कौन थी ?
उत्तर:

  • जूनो रोमन लोगों की प्रमुख देवी थी। उसे स्त्रियों की देवी समझा जाता था।
  • मिनर्वा रोमन लोगों की ज्ञान की देवी थी।

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प्रश्न 65.
मिथ्र धर्म मुख्य रूप से किसकी उपासना करता है ? यह धर्म सैनिकों में क्यों लोकप्रिय हुआ ?
उत्तर:

  • मिथ्र धर्म मुख्य रूप से सूर्य की उपासना करता है।
  • यह धर्म सैनिकों में इसलिए लोकप्रिय था क्योंकि इसमें शौर्य एवं अनुशासन पर बल दिया गया था।

प्रश्न 66.
यहूदी धर्म का संस्थापक कौन था ? इस धर्म की कोई दो शिक्षाएँ लिखें।
उत्तर:

  • यहूदी धर्म का संस्थापक पैगंबर मूसा था।
  • यह धर्म मूर्ति पूजा के विरुद्ध था।
  • यह धर्म कानून के पालन पर विशेष बल देता है।

प्रश्न 67.
यहूदी धर्म किसकी उपासना करता है ? इस धर्म की पवित्र पुस्तक एवं मंदिर क्या कहलाते हैं ?
उत्तर:

  • यहूदी धर्म जेहोवा की उपासना करता है।
  • इस धर्म की पवित्र पुस्तक तोरा एवं मंदिर सिनेगोग कहलाते हैं।

प्रश्न 68.
ईसाई धर्म का संस्थापक कौन था ? इस धर्म की पवित्र पुस्तक क्या कहलाती है ?
उत्तर:

  • ईसाई धर्म का संस्थापक ईसा मसीह था।
  • इस धर्म की पवित्र पुस्तक बाईबल कहलाती है।

प्रश्न 69.
ईसाई धर्म की कोई दो शिक्षाएँ लिखें।
उत्तर:

  • यह धर्म एक परमात्मा की उपासना में विश्वास रखता है।
  • यह धर्म आपसी भाईचारे का संदेश देता है।

प्रश्न 70.
रोमन दास प्रथा की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • रोमन समाज में जिस व्यक्ति के पास जितने दास होते थे समाज में उसे उतना ऊँचा दर्जा दिया जाता था।
  • दासों के मालिक उन पर घोर अत्याचार करते थे।

प्रश्न 71.
दास प्रथा के रोमन समाज पर पड़े कोई दो प्रभाव बताएँ।
उत्तर:

  • दास प्रथा के व्यापक प्रचलन के कारण उनके मालिक विलासप्रिय हो गए।
  • दासों पर किए जाने वाले घोर अत्याचारों के कारण वे विद्रोह करने के लिए बाध्य हुए। इससे समाज में अराजकता फैली।

प्रश्न 72.
रोमन सभ्यता की विश्व को क्या देन रही है ?
उत्तर:

  • इसने ईसाई धर्म के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया।
  • इसने विश्व को भवन निर्माण कला की नई शैलियों से परिचित करवाया।

एक शब्द या एक वाक्य वाले उत्तर

प्रश्न 1.
प्राचीन काल में रोमन साम्राज्य कितने महाद्वीपों में फैला हुआ था ?
उत्तर:
तीन महाद्वीपों में।

प्रश्न 2.
मिस्त्र में नील नदी के किनारे पैदा होने वाला प्रसिद्ध पौधा कौन-सा था ?
उत्तर:
पैपाइरस।

प्रश्न 3.
रोमन साम्राज्य में गणतंत्र की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर:
509 ई० पू० में।

प्रश्न 4.
ऑगस्टस कब सिंहासन पर बैठा था ?
उत्तर:
27 ई० पू० में।

प्रश्न 5.
ऑगस्टस का उत्तराधिकारी कौन था ?
उत्तर:
टिबेरियस।

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प्रश्न 6.
पार्थिया की राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर:
टेसीफुन।

प्रश्न 7.
रोमन साम्राज्य को किस शताब्दी में सबसे भयंकर संकट का सामना करना पड़ा था ?
उत्तर:
तीसरी शताब्दी में।

प्रश्न 8.
कांस्टैनटाइन द्वारा प्रचलित सोने की मुद्रा का नाम क्या था ?
उत्तर:
सॉलिडस।

प्रश्न 9.
रोमन साम्राज्य के किस शासक ने कुंस्तुनतुनिया को राजधानी बनाया ?
उत्तर:
कांस्टैनटाइन ने।

प्रश्न 10.
रोमन समाज कितनी श्रेणियों में विभाजित था ?
उत्तर:
तीन।

प्रश्न 11.
प्रेटोरियन गार्ड का प्रमुख उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:
सम्राट् की सुरक्षा करना।

प्रश्न 12.
ससानी वंश ईरान में कब सत्ता में आया था ?
उत्तर:
224 ई० में।

प्रश्न 13.
रोम में कब भयानक आग लगी थी ?
उत्तर:
64 ई० में।

प्रश्न 14.
रोमन साम्राज्य का कौन-सा नगर 79 ई० में ज्वालामुखी के फटने से नष्ट हो गया था ?
उत्तर:
पोम्पई नगर।

प्रश्न 15.
प्राचीन काल में रोमन साम्राज्य के दो प्रसिद्ध उद्योग कौन-से थे ?
उत्तर:
जैतून का तेल एवं अंगूरी शराब के उद्योग।

प्रश्न 16.
ड्रैसल 20 क्या था ?
उत्तर:
स्पेन में जैतून का तेल ले जाने वाले कंटेनर।

प्रश्न 17.
रोमन साम्राज्य का प्रमुख देवता कौन था ?
उत्तर:
जूपिटर।

प्रश्न 18.
रोम के किस शासक को प्रिंसिपेट कहा जाता था ?
उत्तर:
ऑगस्ट्स ।

प्रश्न 19.
27 ई० पू० में रोम का प्रथम सम्राट् कौन बना ?
उत्तर:
ऑगस्ट्स ।

प्रश्न 20.
पार्थियनों की राजधानी का क्या नाम था ?
उत्तर:
टेसीफुन।

प्रश्न 21.
भूमध्यसागर के तटों पर स्थापित दो बड़े शहरों के नाम क्या थे ?
उत्तर:
सिकंदारिया व एंटिऑक।

प्रश्न 22.
ईरान में 225 ई० में कौन-सा आक्रामक वंश उभर कर सामने आया था ?
उत्तर:
ससानी वंश।

प्रश्न 23.
एक दिनारियस (दीनार ) में लगभग कितने ग्राम चाँदी होती थी ?
उत्तर:
4.5 ग्राम।

प्रश्न 24.
रोमन समाज में किस प्रकार की परिवारिक प्रणाली का प्रचलन था ?
उत्तर:
एकल।

प्रश्न 25.
रोमन समाज में उत्तरी अफ्रीका में कौन-सी भाषा बोली जाती थी ?
उत्तर:
प्यूनिक।

प्रश्न 26.
रोमन समाज में स्पेन व उत्तर पश्चिमी में कौन-सी भाषा का प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर:
कैल्टिक।

प्रश्न 27.
रोमन साम्राज्य में तरल पदार्थों की ढुलाई में प्रयोग किए जाने वाले कंटेनरों को क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
एम्फोरा।

प्रश्न 28.
कांस्टैनटाइन ने ईसाई धर्म कब स्वीकार किया था ?
उत्तर:
313 ई०।

प्रश्न 29. लोंबार्डो द्वारा इटली पर आक्रमण कब किया गया ?
उत्तर:
568 ई०।

रिक्त स्थान भरिए

1. 27 ई० पू० में रोम का प्रथम सम्राट् ……………. बना।
उत्तर:
ऑगस्ट्स
2. ऑगस्ट्स रोम का प्रथम सम्राट् ……………. में बना।
उत्तर:
27 ई० पू०

3. रोम सम्राट् ऑगस्ट्स द्वारा स्थापित राज्य को …………….. कहा जाता था।
उत्तर:
प्रिंसिपेट

4. टिबेरियस …………….. ई० तक रोम का सम्राट रहा।
उत्तर:
14-37

5. पार्थियन की राजधानी का नाम …………….. था।
उत्तर:
टेसीफुन

6. ईरान में ससानी वंश की स्थापना …………… ई० में हुई।
उत्तर:
224

7. रोमन समाज ………. प्रधान समाज था।
उत्तर:
पुरुष

8. स्पेन व उत्तर पश्चिमी में ……………. भाषा बोली जाती थी।
उत्तर:
कैल्टिक

9. रोमन साम्राज्य में तरल पदार्थों की ढुलाई में प्रयोग किए जाने वाले कंटेनरो को ……. …… कहा जाता था।
उत्तर:
एम्फोरा

10. कांस्टैनटाइन द्वारा सोने का सिक्का ……………. ई० में चलाया गया।
उत्तर:
310

11. कुंस्तुनतुनिया नगर की स्थापना …………….. ने की।
उत्तर:
कांस्टैनटाइन

12. …………… में लोंबार्डो द्वारा इटली पर आक्रमण किया गया।
उत्तर:
568 ई०

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. उस साम्राज्य का नाम बताएँ जो तीन महाद्वीपों में फैला हुआ था ?
(क) यूनानी साम्राज्य
(ख) रोमन साम्राज्य
(ग) रूसी साम्राज्य
(घ) ब्रिटिश साम्राज्य।
उत्तर:
(ख) रोमन साम्राज्य

2. निम्नलिखित में से किस सागर को रोमन साम्राज्य का हृदय कहा जाता था ?
(क) भूमध्यसागर
(ख) लाल सागर
(ग) एगियन सागर
(घ) आयोनियन सागर।
उत्तर:
(क) भूमध्यसागर

3. निम्नलिखित में से कौन-सी भाषाएँ रोमन साम्राज्य की प्रशासनिक भाषाएँ थीं ?
(क) लातीनी एवं अंग्रेज़ी
(ख) लातीनी एवं यूनानी
(ग) यूनानी एवं फ्रांसीसी
(घ) रोमन एवं रूसी।
उत्तर:
(ख) लातीनी एवं यूनानी

4. रोमन साम्राज्य में गणतंत्र की स्थापना कब हुई थी ?
(क) 529 ई० पू० में
(ख) 519 ई० पू० में
(ग) 509 ई० पू० में
(घ) 27 ई० पू० में।
उत्तर:
(ग) 509 ई० पू० में

5. रोमन साम्राज्य में गणतंत्र का अंत कब हुआ ?
(क) 37 ई० पू० में
(ख) 27 ई० पू० में
(ग) 17 ई० पू० में
(घ) 27 ई० में।
उत्तर:
(ख) 27 ई० पू० में

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ एक साम्राज्य

6. रोम का प्रथम सम्राट् कौन था ?
(क) जूलियस सीजर
(ख) ट्राजन
(ग) टाईबेरियस
(घ) ऑगस्ट्स
उत्तर:
(घ) ऑगस्ट्स

7. ऑगस्ट्स कब सिंहासन पर बैठा था ?
(क) 27 ई० पू० में
(ख) 27 ई० में
(ग) 17 ई० पू० में
(घ) 14 ई० में।
उत्तर:
(क) 27 ई० पू० में

8. निम्नलिखित में से कौन रोमन साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास का मुख्य खिलाड़ी नहीं था ?
(क) सम्राट
(ख) सेना
(ग) अभिजात वर्ग
(घ) दास।
उत्तर:
(घ) दास।

9. प्रेटोरियन गॉर्ड का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
(क) दुर्ग की सुरक्षा करना
(ख) सम्राट् की सुरक्षा करना
(ग) प्रांतों की सुरक्षा करना
(घ) विदेशों पर आक्रमण करना।
उत्तर:
(ख) सम्राट् की सुरक्षा करना

10. ऑगस्ट्स की मृत्यु कब हुई थी ?
(क) 27 ई० पू० में
(ख) 17 ई० पू० में
(ग) 14 ई० में
(घ) 12 ई० में।
उत्तर:
(ग) 14 ई० में

11. ऑगस्ट्स का उत्तराधिकारी कौन था ?
(क) त्राजान
(ख) टिबेरियस
(ग) गैलीनस
(घ) मार्क्स आरेलियस।
उत्तर:
(ख) टिबेरियस

12. रोमन साम्राज्य का सबसे अत्याचारी शासक कौन था ?
(क) त्राजान
(ख) जूलियस सीज़र
(ग) नीरो
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) नीरो

13. सम्राट् बाजान ने फ़ारस के शासक के विरुद्ध अभियान के दौरान निम्नलिखित में से किस प्रदेश पर अधिकार किया ?
(क) आरमीनिया
(ख) असीरिया
(ग) टेसीफुन
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

14. ईरान में ससानी वंश की स्थापना कब हुई ?
(क) 224 ई० में
(ख) 225 ई० में
(ग) 234 ई० में
(घ) 241 ई० में।
उत्तर:
(क) 224 ई० में

15. ईरान के किस शासक ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी एंटिओक पर अधिकार कर लिया था ?
(क) शापुर प्रथम ने
(ख) शापुर द्वितीय ने
(ग) अट्टिला ने
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) शापुर प्रथम ने

16. ‘डायोक्लीशियन ने किसे पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी घोषित किया ?
(क) निकोमेडिया
(ख) टेसीफुन
(ग) दासिया
(घ) सिकंदरिया।
उत्तर:
(क) निकोमेडिया

17. किस रोमन सम्राट् ने 301 ई० में रोमन साम्राज्य में सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें निश्चित कर दी थी ?
(क) टिबेरियस
(ख) ऑगस्ट्स
(ग) गैलीनस
(घ) डायोक्लीशियन।
उत्तर:
(घ) डायोक्लीशियन।

18. कांस्टैनटाइन का नाम रोमन साम्राज्य के इतिहास में क्यों प्रसिद्ध है ?
(क) उसने ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का राज्य धर्म घोषित किया
(ख) उसने सॉलिडस नामक एक नई मुद्रा का प्रचलन किया
(ग) उसने कुंस्तुनतुनिया को रोमन साम्राज्य की दूसरी राजधानी घोषित किया
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

19. कांस्टैनटाइन द्वारा चलाई गई नई मुद्रा का नाम क्या था ?
(क) फ्रैंक
(ख) सॉलिडस
(ग) रूबल
(घ) रुपया।
उत्तर:
(ख) सॉलिडस

20. कांस्टैनटाइन ने किस धर्म को राज्य धर्म घोषित किया था ?
(क) हिंदू धर्म को
(ख) ईसाई धर्म को
(ग) इस्लाम को
(घ) यहूदी धर्म को।
उत्तर:
(ख) ईसाई धर्म को

21. कांस्टैनटाइन ने किसे रोमन साम्राज्य की दूसरी राजधानी घोषित किया था ?
(क) निकोमेडिया
(ख) दासिया
(ग) कुंस्तुनतुनिया
(घ) सॉलिडस।
उत्तर:
(ग) कुंस्तुनतुनिया

22. ‘जस्टीनियन कोड’ का प्रचलन कब हुआ ?
(क) 527 ई० में
(ख) 533 ई० में
(ग) 560 ई० में
(घ) 565 ई० में।
उत्तर:
(ख) 533 ई० में

23. रोमन साम्राज्य के पतन के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कारण उत्तरदायी था ?
(क) रोमन साम्राज्य की विशालता
(ख) दासों पर अत्याचार
(ग) उत्तराधिकार कानून का अभाव
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

24. रोमोत्तर राज्य किसे कहा जाता था ?
(क) ईरानी बर्बरों द्वारा स्थापित राज्य
(ख) मंगोलों द्वारा स्थापित राज्य
(ग) जर्मन बर्बरों द्वारा स्थापित राज्य
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) जर्मन बर्बरों द्वारा स्थापित राज्य

25. किस वर्ष रोमन साम्राज्य पूर्वी और पश्चिमी भागों में विभक्त हुआ था ?
(क) 285 ई०
(ख) 518 ई०
(ग) 565 ई०
(घ) 395 ई०
उत्तर:
(क) 285 ई०

26. निम्नलिखित में से किसने रोमोत्तर राज्य की स्थापना की थी ?
(क) गोथ
(ख) बैंडल
(ग) लोंबार्ड
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

27. बैंडलों ने उत्तरी अफ्रीका पर कब अधिकार किया ?
(क) 410 ई० में
(ख) 428 ई० में
(ग) 451 ई० में
(घ) 493 ई० में।
उत्तर:
(ख) 428 ई० में

28. रोमन समाज कितनी श्रेणियों में विभाजित था ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर:
(ख) तीन

29. निम्नलिखित में से कौन रोमन साम्राज्य का प्रसिद्ध इतिहासकार था ?
(क) टैसिटस
(ख) अल्बरुनी
(ग) मार्कोपोलो
(घ) जूलियस सीज़र।
उत्तर:
(क) टैसिटस

30. रोमन समाज में स्त्रियों को निम्नलिखित में से कौन-सा अधिकार प्राप्त था ?
(क) शिक्षा का अधिकार
(ख) संपत्ति का अधिकार
(ग) तलाक का अधिकार
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

31. सेंट ऑगस्टीन (St. Augustine) कहाँ का महान् बिशप था ?
(क) दक्षिणी अफ्रीका
(ख) उत्तरी अफ्रीका
(ग) जर्मनी
(घ) फ्राँस।
उत्तर:
(ख) उत्तरी अफ्रीका

32. रोमन साम्राज्य का पोम्पई नगर कब ज्वालामुखी फटने से दफ़न हो गया था ?
(क) 71 ई० में
(ख) 75 ई० में
(ग) 79 ई० में
(घ) 89 ई० में।
उत्तर:
(ग) 79 ई० में

33. निम्नलिखित में से कहाँ कॉप्टिक भाषा बोली जाती थी ?
(क) उत्तरी अफ्रीका में
(ख) स्पेन में
(ग) मिस्र में
(घ) जर्मनी में।
उत्तर:
(ग) मिस्र में

34. निम्नलिखित में से कौन-सी भाषा स्पेन में बोली जाती थी ?
(क) कॉप्टिक
(ख) बरबर
(ग) कैल्टिक
(घ) जर्मन।
उत्तर:
(ग) कैल्टिक

35. रोमन साम्राज्य के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
(क) कृषि
(ख) उद्योग
(ग) व्यापार
(घ) पशु-पालन।।
उत्तर:
(क) कृषि

36. रोमन साम्राज्य के किस प्रदेश में बड़ी संख्या में भेड़-बकरियाँ पाली जाती थीं ?
(क) नुमीडिया
(ख) गैलिली
(ग) बाइजैक्यिम
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(क) नुमीडिया

37. मैपालिया से आपका क्या अभिप्राय है ?
(क) ये अवन आकार की झोंपड़ियाँ थीं
(ख) ये पहाड़ों की चोटियों पर बसे हुए गाँव थे
(ग) ये रोमन साम्राज्य के प्रसिद्ध उद्योग थे
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) ये अवन आकार की झोंपड़ियाँ थीं

38. कैस्टेला किसे कहा जाता था ?
(क) रोमन साम्राज्य के प्रांतों को
(ख) रोमन साम्राज्य के पहाड़ों पर बसे हुए गाँवों को
(ग) रोमन साम्राज्य की प्रमुख फ़सल को
(घ) रोमन साम्राज्य के प्रमुख सिक्के को।
उत्तर:
(ख) रोमन साम्राज्य के पहाड़ों पर बसे हुए गाँवों को

39. रोमन साम्राज्य में जैतून का तेल जिन कंटेनरों में ले जाया जाता था उन्हें कहा जाता था
(क) ड्रेसल 10
(ख) ड्रेसल 20
(ग) एम्फोरा
(घ) मोंटी टेस्टैकियो।
उत्तर:
(ख) ड्रेसल 20

40. निम्नलिखित में से किस देश के साथ रोमन साम्राज्य का व्यापार चलता था ?
(क) उत्तरी अफ्रीका
(ख) मिस्त्र
(ग) सीरिया
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

41. निम्नलिखित में से किस लेखक ने रोमन साम्राज्य के श्रमिकों की दयनीय दशा का वर्णन किया है ?
(क) कोलूमेल्ला
(ख) ऐनस्टैसियस
(ग) गिब्बन
(घ) जे०एम० राबर्टस।
उत्तर:
(क) कोलूमेल्ला

42. रोमन साम्राज्य के किस शासक ने श्रमिकों को ऊँचे वेतन देकर पूर्वी सीमांत क्षेत्र में दारा शहर का निर्माण करवाया ?
(क) ऑगस्ट्स
(ख) कांस्टैनटाइन
(ग) ऐनस्टैसियस
(घ) जस्टीनियन।
उत्तर:
(ग) ऐनस्टैसियस

43. रोमन साम्राज्य में किस शासक ने सोने की मुद्रा का प्रचलन किया ?
(क) कांस्टैनटाइन
(ख) जस्टीनियन
(ग) गैलीनस
(घ) ऑगस्ट्स
उत्तर:
(क) कांस्टैनटाइन

44. रोमन साम्राज्य द्वारा चाँदी की मुद्रा का प्रचलन क्यों बंद किया गया था ?
(क) क्योंकि चाँदी के आभूषणों की माँग बहुत बढ़ गई थी
(ख) क्योंकि चाँदी का विदेशों में निर्यात किया जाने लगा था
(ग) क्योंकि स्पेन में चाँदी की खानें खत्म हो गई थीं
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ग) क्योंकि स्पेन में चाँदी की खानें खत्म हो गई थीं

45. रोमन लोगों का सबसे बड़ा देवता कौन था ?
(क) जूपिटर
(ख) मॉर्स
(ग) जूनो
(घ) मिनर्वा
उत्तर:
(क) जूपिटर

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 3 तीन महाद्वीपों में फैला हुआ एक साम्राज्य

46. रोमन लोगों की प्रमुख देवी कौन थी ?
(क) इसिस
(ख) डायना
(ग) जूनो
(घ) मिनर्वा।
उत्तर:
(ग) जूनो

47. निम्नलिखित में से कौन-सा धर्म रोमन सैनिकों में लोकप्रिय था ?
(क) मिथ्र धर्म
(ख) ईसाई धर्म
(ग) यहूदी धर्म
(घ) सिख धर्म।
उत्तर:
(क) मिथ्र धर्म

48. यहूदी धर्म का संस्थापक कौन था ?
(क) पैगंबर मूसा
(ख) हज़रत मुहम्मद
(ग) ईसा मसीह
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) पैगंबर मूसा

49. ईसाई धर्म की पवित्र पुस्तक क्या कहलाती है ?
(क) तोरा
(ख) गीता
(ग) बाईबल
(घ) गुरु ग्रंथ साहिब जी।
उत्तर:
(ग) बाईबल

तीन महाद्वीपों में फैला हुआ एक साम्राज्य HBSE 11th Class History Notes

→ प्राचीनकाल में रोमन साम्राज्य तीन महाद्वीपों यूरोप, पश्चिमी एशिया भाव उर्वर अर्द्धचंद्राकार क्षेत्र (Fertile Crescent) तथा उत्तरी अफ्रीका में फैला हुआ था। उस समय इस साम्राज्य में यद्यपि अनेक भाषाएँ बोली जाती थी किंतु प्रशासन द्वारा केवल लातीनी (Latin) एवं यूनानी (Greek) भाषाओं का प्रयोग किया जाता था।

→ रोमन साम्राज्य का अपने पड़ोसी साम्राज्य ईरान के साथ एक दीर्घकालीन संघर्ष चलता रहा था। ईरान में 224 ई० में ससानी राजवंश की स्थापना हुई थी। उस समय रोमन साम्राज्य एवं ईरान के मध्य फ़रात नदी बहा करती थी। रोमन साम्राज्य की उत्तरी सीमा का निर्धारण दो प्रसिद्ध नदियों राइन एवं डेन्यूब द्वारा होता था।

→ इसकी दक्षिणी सीमा का निर्धारण सहारा नामक विशाल रेगिस्तान द्वारा होता था। भूमध्यसागर को रोमन साम्राज्य का हृदय कहा जाता था।

→ रोमन साम्राज्य में गणतंत्र (Republic) की स्थापना 509 ई० पू० में हुई थी। यह 27 ई० पू० तक चला। 27 ई० पू० में जूलियस सीज़र के दत्तक पुत्र ऑक्टेवियन ने जो ऑगस्ट्स के नाम से प्रसिद्ध हुआ सत्ता संभाली। उसके राज्य को प्रिंसिपेट (Principate) कहा जाता था। उसने 14 ई० तक शासन किया। उसके शासनकाल में रोमन साम्राज्य ने सर्वपक्षीय प्रगति की। उसने सैनेट के साथ अच्छे संबंध स्थापित किए। उसने रोमन सेना को शक्तिशाली बनाया।

→ उसने अनेक प्रशासनिक, आर्थिक, धार्मिक एवं नैतिक सुधार किए। उसके शासनकाल में कला तथा साहित्य के क्षेत्रों में भी अद्वितीय प्रगति हुई। लिवि, वर्जिल, ओविड तथा होरेस जैसे लेखकों ने साहित्य के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया। निस्संदेह ऑगस्ट्स का शासनकाल रोमन साम्राज्य का स्वर्ण काल था।

→ ऑगस्ट्स के पश्चात् टिबेरियस ने 14 से 37 ई० तक शासन किया। वह एक अयोग्य शासक प्रमाणित हुआ। नीरो (54-68 ई०) रोमन साम्राज्य का सबसे अत्याचारी शासक प्रमाणित हुआ। उसने अपने शासनकाल में बड़ी संख्या में लोगों की हत्या करवा दी थी।

→ बाजान (98-117 ई०) रोमन साम्राज्य का एक प्रसिद्ध सम्राट् था। उसने दासिया, अरमीनिया, असीरिया, मेसोपोटामिया तथा पार्थियन राजधानी टेसीफुन पर अधिकार कर रोमन साम्राज्य का विस्तार किया।

→ उसने अनेक प्रशंसनीय सुधार भी लागू किए। उसके पश्चात् तीसरी शताब्दी तक हैड्रियन (117 138 ई०), मार्क्स आरेलियस (161 -180 ई०), सेप्टिमियस सेवेरस (193 -211 ई०) तथा गैलीनस (253-268 ई०) नामक महत्त्वपूर्ण शासकों ने शासन किया।

→ तीसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य को सबसे भयंकर संकट का सामना करना पड़ा। ससानी वंश के शासक शापुर प्रथम ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी एंटिओक पर कब्जा कर लिया था। इस काल में जर्मन मूल की अनेक जातियों ने अपने आक्रमणों के कारण रोमन साम्राज्य को गहरा आघात पहुँचाया। इस समय रोमन साम्राज्य राजनीतिक पक्ष से भी बहुत कमजोर हो चुका था।

→ केवल 47 वर्षों के दौरान वहाँ 25 सम्राट सिंहासन पर बैठे। रोमन साम्राज्य में फैली अराजकता के कारण वहाँ विद्रोह एवं लूटमार एक सामान्य बात हो गई थी। वहाँ फैले भयानक अकालों एवं प्लेग ने स्थिति को अधिक विस्फोटक बना दिया था।

→ सम्राट् डायोक्लीशियन ने अपने शासनकाल (284-305 ई०) के दौरान रोमन साम्राज्य के गौरव को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक प्रशंसनीय पग उठाए। उसने प्रशासन की कुशलता के उद्देश्य से 285 ई० में रोमन साम्राज्य को दो भागों में विभाजित किया।

→ उसने निकोमेडिया को पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। कांस्टैनटाइन परवर्ती पुराकाल के सम्राटों में सर्वाधिक प्रसिद्ध था। उसने 306 ई० से 337 ई० तक शासन किया। उसने रोमन साम्राज्य की आर्थिक दशा को सुदृढ़ बनाया।

→ इस उद्देश्य से उसने यातायात के साधनों, उद्योगों एवं विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित किया। उसने सॉलिडस नामक सोने की मुद्रा चलाई। उसने 313 ई० में ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का राज्य धर्म घोषित किया। उसने 330 ई० में कुंस्तुनतुनिया को रोमन साम्राज्य की राजधानी बनाया।

→ निस्संदेह रोमन साम्राज्य के गौरव को स्थापित करने में उसने उल्लेखनीय योगदान दिया। बाद में अनेक कारणों से रोमन साम्राज्य का पतन हो गया। रोमन समाज तीन श्रेणियों में विभाजित था। प्रथम श्रेणी में अभिजात वर्ग के लोग सम्मिलित थे।

→ वे बहत ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। मध्य श्रेणी में सैनिक, व्यापारी एवं किसान सम्मिलित थे। वे भी अच्छा जीवन व्यतीत करते थे। रोमन समाज का अधिकाँश वर्ग निम्नतर श्रेणी से संबंधित था। इसमें मज़दूर एवं दास सम्मिलित थे। वे अधिक मेहनत के बावजूद नरक समान जीवन व्यतीत करते थे। उस समय रोमन समाज में एकल परिवार प्रणाली प्रचलित थी। परिवार में पत्र का होना आवश्यक समझा जाता था।

→ उस समय रोमन समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी। वे शिक्षित होती थीं। उन्हें संपत्ति का अधिकार प्राप्त था। रोम के लोग आर्थिक पक्ष से एक खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे। इसका कारण यह था कि उस समय कृषि, उद्योग एवं व्यापार काफी उन्नत थे। उस समय रोम के लोग अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे।

→ जूपिटर उनका प्रमुख देवता था। उस समय रोमन लोग अपने सम्राट की उपासना भी करते थे। उस समय रोमन साम्राज्य में मिथ्र धर्म एवं यहूदी धर्म प्रचलित थे। ईसाई धर्म का उत्थान इस काल की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। दास प्रथा का रोमन समाज में व्यापक प्रचलन था।

→ ऑगस्ट्स के शासनकाल में कुल 75 लाख की जनसंख्या में 30 लाख दास थे। उस समय अमीर लोग दास रखना अपनी एक शान समझते थे। उस समय युद्धबंदियों को दास बनाया जाता था। कुछ लोग ग़रीबी के कारण अपने बच्चों को दास के रूप में बेच देते थे।

→ रोमन समाज में स्त्री दासों की संख्या बहुत अधिक थी। पुरुष उन्हें केवल एक विलासिता की वस्तु समझते थे। दासों के मालिक अपने दासों के साथ अमानुषिक व्यवहार करते थे। अनेक बार दास बाध्य होकर विद्रोह भी कर देते थे। रोमन सम्राटों हैड्रियन, मार्क्स आरेलियस, कांस्टैनटाइन एवं जस्टीनियन ने दास प्रथा का अंत करने के प्रयास किए। दास प्रथा के रोमन साम्राज्य पर दूरगामी प्रभाव पड़े। रोमन साम्राज्य के इतिहास की जानकारी के लिए हमारे पास अनेक प्रकार के स्रोत उपलब्ध हैं।

→ इन स्रोतों को तीन वर्गों-पाठ्य सामग्री (texts), दस्तावेज (documents) एवं भौतिक अवशेष (material remains) में विभाजित किया जाता है। पाठ्य स्रोतों में समकालीन व्यक्तियों द्वारा लिखा गया उस काल का इतिहास सम्मिलित था। इसे वर्ष वृत्तांत (Annals) कहा जाता था क्योंकि यह प्रत्येक वर्ष लिखा जाता था। इसके अतिरिक्त इसमें पत्र, व्याख्यान (speeches), प्रवचन (sermons) एवं कानून आदि भी सम्मिलित थे।

→ दस्तावेजी स्रोत मुख्य रूप से पैपाइरस पेड़ के पत्तों पर पाँडुलिपियों के रूप में मिलते हैं। इन्हें लिखने वाले विद्वानों को पैपाइरोलोजिस्ट (papyrologists) अथवा पैपाइरस शास्त्री कहा जाता है। पैपाइरस एक प्रकार का पौधा था जो मिस्र में नील नदी के किनारे बड़ी मात्रा में उपलब्ध था। भौतिक अवशेषों में भवन, स्मारक, सिक्के, बर्तन आदि सम्मिलित हैं।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 7 प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 7 प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 7 प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ

HBSE 11th Class Geography प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर का चयन करें-

1. निम्नलिखित में से भारत के किस राज्य में बाढ़ अधिक आती है?
(A) बिहार
(B) पश्चिमी बंगाल
(C) असम
(D) उत्तर प्रदेश
उत्तर:
(A) बिहार

2. उत्तरांचल अब उत्तराखण्ड के किस जिले में मालपा भूस्खलन आपदा घटित हुई थी?
(A) बागेश्वर
(B) चंपावत
(C) अल्मोड़ा
(D) पिथौरागढ़
उत्तर:
(D) पिथौरागढ़

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 7 प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ

3. निम्नलिखित में से कौन-से राज्य में सर्दी के महीनों में बाढ़ आती है?
(A) असम
(B) पश्चिमी बंगाल
(C) केरल
(D) तमिलनाडु
उत्तर:
(D) तमिलनाडु

4. इनमें से किस नदी में मजौली नदीय द्वीप स्थित है?
(A) गंगा
(B) बह्मपुत्र
(C) गोदावरी
(D) सिंधु
उत्तर:
(B) बह्मपुत्र

5. बर्फानी तूफान किस प्रकार की प्राकृतिक आपदा है?
(A) वायुमंडलीय
(B) जलीय
(C) भौमिकी
(D) जीवमंडलीय
उत्तर:
(A) वायुमंडलीय

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
संकट किस दशा में आपदा बन जाता है?
उत्तर:
संकट से हमारा तात्पर्य उन प्राकृतिक तत्त्वों से है जिनमें जान-माल को क्षति पहुँचाने की सम्भाव्यता होती है जैसे नदी के तट पर बसे लोगों के लिए नदी एक संकट है क्योंकि नदी में कभी भी बाढ़ आ सकती है। संकट उस समय आपदा बन जाता है, जब वह अचानक उत्पन्न हो और उससे निपटने के लिए पूर्ण तैयारी भी न हो।

प्रश्न 2.
हिमालय और भारत के उत्तर:पूर्वी क्षेत्रों में अधिक भूकम्प क्यों आते हैं?
उत्तर:
इसका कारण यह है कि इण्डियन प्लेट उत्तर और उत्तर:पूर्व दिशा में 1 सें०मी० खिसक रही है और यूरेशियन प्लेट से टकराकर ऊर्जा निर्मुक्त करती है जिससे इस क्षेत्र में भूकम्प आते हैं।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 7 प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबन्धीय तूफान की उत्पत्ति के लिए कौन-सी परिस्थितियाँ अनुकूल हैं?
उत्तर:
उष्ण कटिबन्धीय तूफान की उत्पत्ति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. महासागरीय तल का तापमान 27°C से अधिक हो ताकि तूफान को अधिक मात्रा में आर्द्रता मिल सके जिससे बहुत बड़ी मात्रा में गुप्त ऊष्मा निर्मुक्त हो।
  2. तीव्र कॉरियालिस बल जो केन्द्र के निम्न वायुदाब को भरने न दे।
  3. क्षोभमंडल में अस्थिरता जिससे स्थानीय स्तर पर निम्न वायुदाब क्षेत्र बनते जाते हैं।

प्रश्न 4.
पूर्वी भारत की बाढ़, पश्चिमी भारत की बाढ़ से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
पूर्वी भारत की नदियों में बाढ़ बार-बार आती है जिसका कारण है वहाँ मानसून की तीव्रता, जबकि पश्चिमी भारत में बाढ़ कभी-कभी आती है। इसके अतिरिक्त पूर्वी भारत में बाढ़ अधिक विनाशकारी होती है जबकि पश्चिमी भारत की बातें कम विनाशकारी होती हैं।

प्रश्न 5.
पश्चिमी और मध्य भारत में सूखे ज्यादा क्यों पड़ते हैं?
उत्तर:
पश्चिमी और मध्य भारत में वर्षा बहुत कम होती है जिसके कारण भूतल पर जल की कमी हो जाती है। पश्चिमी भाग मरुस्थलीय और मध्यवर्ती भाग पठारी लेने के कारण भी सूखे के स्थिति पैदा होती है। अतः कम वर्षा, अत्यधिक वाष्पीकरण और जलाशयों तथा भूमिगत जल के अत्यधिक प्रयोग से सूखे की स्थिति पैदा होती है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
भारत में भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करें और इस आपदा से निवारण के कुछ उपाय बताएँ।
उत्तर:
भारत में भू-स्खलन प्रभावित क्षेत्रों को निम्नलिखित भागों में बाँटा गया है-
1. अत्यधिक सुभेद्यता वाले क्षेत्र-अस्थिर हिमालय की युवा पर्वत श्रृंखलाएँ, अण्डमान और निकोबार, पश्चिमी घाट और अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, उत्तर:पूर्वी क्षेत्र, भूकम्प प्रभावी क्षेत्र और अत्यधिक मानव गतिविधियों वाले क्षेत्र अत्यधिक सुभेद्यता क्षेत्र के अन्तर्गत रखे गए हैं।

2. अधिक सुभेद्यता वाले क्षेत्र इस क्षेत्र में हिमालय क्षेत्र के सारे राज्य और उत्तर:पूर्वी भाग (असम को छोड़कर) शामिल किए गए हैं।

3. मध्यम और कम सुभेद्यता वाले क्षेत्र-इसके अन्तर्गत ट्रांस हिमालय के कम वृष्टि वाले क्षेत्र, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में कम वर्षा वाले क्षेत्र, पश्चिमी व पूर्वी घाट के व दक्कन पठार के वृष्टि छाया क्षेत्र शामिल हैं। जहाँ कभी-कभी भू-स्खलन होता है।

4. अन्य क्षेत्र अन्य क्षेत्रों में राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग को छोड़कर) असम और दक्षिण प्रान्तों के तटीय क्षेत्र भी भू-स्खलन युक्त हैं।

भू-स्खलन निवारण के उपाय-भू-स्खलन निवारण के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग उपाय होने चाहिएँ, जो निम्नलिखित हैं-

  • अधिक भू-स्खलन वाले क्षेत्रों में सड़क और बाँध निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध होना चाहिए।
  • स्थानान्तरी कृषि वाले क्षेत्रों में (उत्तर:पूर्वी भाग) सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि की जानी चाहिए।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में वनीकरण को बढ़ावा देना चाहिए।
  • जल-बहाव को कम करने के लिए बाँधों का निर्माण किया जाना चाहिए।

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प्रश्न 2.
सुभेद्यता क्या है? सूखे के आधार पर भारत को प्राकृतिक आपदा भेद्यता क्षेत्रों में विभाजित करें और इसके निवारण के उपाय बताएँ।
उत्तर:
सुभेद्यता का अर्थ सुभेद्यता किसी व्यक्ति, जन-समूह या क्षेत्र में हानि पहुँचाने का भय है जिससे वह व्यक्ति, जन-समूह या क्षेत्र प्रभावित होता है।

भारत के प्राकृतिक आपदा भेद्यता क्षेत्रों का विभाजन-भारत को सूखे के आधार पर निम्नलिखित प्राकृतिक आपदा वाले भेद्यता क्षेत्रों में बाँटा गया है-
(1) अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र-राजस्थान का अधिकांश भाग विशेषकर अरावली के पश्चिम में स्थित मरुस्थली और गुजरात का कच्छ क्षेत्र अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र है। यहाँ 90 मि०मी० से कम औसत वार्षिक वर्षा होती है।

(2) अधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र-इसमें राजस्थान का पूर्वी भाग, मध्य प्रदेश के अधिकांश भाग, महाराष्ट्र के पूर्वी भाग, आन्ध्र प्रदेश के अन्दरूनी भाग, कर्नाटक का पठार, तमिलनाडु के उत्तरी भाग, झारखण्ड के दक्षिणी भाग और ओ आते हैं।

(3) मध्यम सूखा प्रभावित क्षेत्र इस वर्ग में राजस्थान के पूर्वी भाग, हरियाणा, उत्तर:प्रदेश के दक्षिणी जिले, कोंकण को छोड़कर महाराष्ट्र, झारखण्ड, तमिलनाडु में कोयम्बटूर पठार और आन्तरिक कर्नाटक शामिल हैं।

भारत के शेष भाग में बहुत कम या न के बराबर सूखा पड़ता है।
सूखा निवारण के उपाय-

  • सूखा निवारण के लिए सरकार द्वारा राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अनेक योजनाएँ चलानी चाहिए।
  • भूजल के भंडारों की खोज के लिए सुदूर संवेदन, उपग्रह मानचित्रण तथा भौगोलिक सूचना तंत्र जैसी विविध युक्तियों का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • लोगों के सक्रिय सहयोग से वर्षा के जल संग्रहण के समन्वित कार्यक्रम भी अपनाए जाने चाहिए।
  • जल संग्रह के लिए छोटे बाँधों का निर्माण, वन रोपण तथा सूखारोधी फसलें उगानी चाहिए।

प्रश्न 3.
किस स्थिति में विकास कार्य आपदा का कारण बन सकता है?
उत्तर:
विकास कार्य निम्नलिखित परिस्थितियों में संकट का कारण बन सकते हैं-

  1. मानव द्वारा ऊँचे बाँधों का निर्माण गम्भीर संकट पैदा कर सकता है। यदि इस प्रकार का बाँध टूट जाए तो निकटवर्ती क्षेत्र डूब सकता है।
  2. पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क निर्माण कार्य भू-स्खलन का प्रमुख कारण बन सकता है।
  3. बड़े स्तर पर पेड़ों की कटाई से कई प्रकार के संकट पैदा होते हैं। इससे अपरदन क्रिया तेज होती है तथा पारिस्थितिक सन्तुलन बिगड़ सकता है।
  4. नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की बढ़ती प्रवृत्तियाँ सारे वायुमंडल को प्रदूषित कर रही हैं। उद्योगों से CO2 गैस और CFC का विसर्जन गम्भीर संकट पैदा कर सकता है।
  5. उद्योगों से अर्थव्यवस्था का विकास होता है लेकिन औद्योगिक दुर्घटना कई बार आपदा का रूप ले लेता है; जैसे भोपाल गैस कांड में काफी लोग मारे गए थे।

प्राकृतिक संकट तथा आपदाएँ HBSE 11th Class Geography Notes

→ आपदा (Disaster) जल, स्थल अथवा वायुमंडल में उत्पन्न होने वाली ऐसी घटना या बदलाव जिसके कुप्रभाव से विस्तृत क्षेत्र में जान-माल की हानि और पर्यावरण का अवक्रमण होता है, आपदा कहलाती है।

→ संकट (Hazards) वह वस्तु या हालात जिससे आपदा आ सकती है, संकट कहलाती है।

→ भूकम्प (Earthquake)-पृथ्वी की भीतरी हलचलों के कारण जब धरातल का कोई भाग अकस्मात काँप उठता है तो उसे भूकम्प कहते हैं।

→ सुनामी (Tsunami) बंदरगाह पर आने वाली ऊँची लहरें अथवा भूकम्पीय लहरें।

→ भूस्खलन (Landslide)-पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभावाधीन पर्वतीय क्षेत्रों में छोटी शिलाओं से लेकर काफी बढ़े भू-भाग के ढलान के नीचे की तरफ सरकने या खिसकने की क्रिया को भूस्खलन कहा जाता है।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. जैव-विविधता में शामिल हैं
(A) पेड़-पौधे
(B) अति सूक्ष्म जीवाणु
(C) जीव-जंतु
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. भारत में लगभग कितनी पादप प्रजातियाँ पाई जाती हैं?
(A) लगभग 25,000
(B) लगभग 30,000
(C) लगभग 45,000
(D) लगभग 50,000
उत्तर:
(C) लगभग 45,000

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

3. भारत में कितनी जीव प्रजातियाँ पाई जाती हैं?
(A) लगभग 75,261
(B) लगभग 81,251
(C) लगभग 85,271
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) लगभग 81,251

4. समान भौतिक लक्षणों वाले जीवों के समूह को क्या कहते हैं?
(A) समाज
(B) प्रजाति
(C) जीन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) प्रजाति

5. भारत में पाई जाने वाली कुल पक्षी प्रजातियों में से कितने % स्थानिक हैं?
(A) 12%
(B) 14%
(C) 18%
(D) 25%
उत्तर:
(B) 14%

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

6. ‘World Wild Life Fund’ की स्थापना कब की गई?
(A) 1950
(B) 1952
(C) 1955
(D) 1962
उत्तर:
(B) 1952

7. ‘World Wild Life Fund’ -WWF का मुख्यालय है-
(A) न्यूयार्क
(B) लंदन
(C) पेरिस
(D) स्विट्ज़रलैंड
उत्तर:
(D) स्विट्ज़रलैंड

8. 1992 में ब्राजील के रियो-डी-जेनेरो में जैव-विविधता के पृथ्वी शिखर सम्मेलन में कितने देशों ने हस्ताक्षर किए?
(A) 152
(B) 154
(C) 156
(D) 158
उत्तर:
(C) 156

9. भारत में कितने जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए गए हैं?
(A) 12
(B) 14
(C) 16
(D) 18
उत्तर:
(B) 14

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
जैव-विविधता का संरक्षण किसके लिए महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
सभी जीवधारियों के लिए।

प्रश्न 2.
समान. भौतिक लक्षणों वाले जीवों के समूह को क्या कहते हैं?
उत्तर:
प्रजाति।

प्रश्न 3.
‘World Wild Life Fund’ की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
सन् 1962 में।

प्रश्न 4.
‘World Wild Life Fund’ (WWF) का मुख्यालय कहाँ है?
उत्तर:
स्विट्ज़रलैंड में।

प्रश्न 5.
जीवन-निर्माण के लिए एक मूलभूत इकाई बताएँ।
उत्तर:
जीवन-निर्माण के लिए जीन (Gene) एक मूलभूत इकाई है।

प्रश्न 6.
भारत में वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम कब पास हुआ?
उत्तर:
भारत में वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम सन् 1972 में पास हुआ।

प्रश्न 7.
पंजाब में स्थित एक तराई क्षेत्र का नाम बताएँ।
उत्तर:
हरिके तराई क्षेत्र (Wetland)।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

प्रश्न 8.
जैव-विविधता विश्व सम्मेलन कब और कहाँ हआ?
उत्तर:
यह 1922 ई० में रियो डी जेनेरो में हुआ।

प्रश्न 9.
जैव-विविधता के संरक्षण का एक उपाय बताएँ।
उत्तर:
जैव-विविधता संरक्षण का एक उपाय कृत्रिम संरक्षण है।

प्रश्न 10.
मानव आनुवांशिक रूप से किस प्रजाति से संबंधित है?
उत्तर:
मानव आनुवांशिक रूप से होमोसेपियन प्रजाति से संबंधित है।

प्रश्न 11.
भारत में तट-रेखा की लम्बाई बताएँ।
उत्तर:
भारत की तट-रेखा लगभग 7500 किलोमीटर लम्बी है।

प्रश्न 12.
किन्हीं दो संकटापन्न प्रजातियों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. रेड पांडा
  2. बाघ

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
टैक्सोनोमी क्या है?
उत्तर:
जीवों के वर्गीकरण के विज्ञान को टैक्सोनोमी कहते हैं।

प्रश्न 2.
तप्त स्थल क्या है?
उत्तर:
संसार के जिन क्षेत्रों में प्रजातीय विविधता पाई जाती है, उन्हें विविधता के ‘तप्त स्थल’ कहा जाता है।

प्रश्न 3.
आनुवंशिकी क्या है?
उत्तर:
आनुवंशिक लक्षणों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरण की विधियों और कारणों के अध्ययन को आनुवंशिकी कहते हैं।

प्रश्न 4.
आनुवंशिकता क्या है?
उत्तर:
जीवधारियों की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में विभिन्न लक्षणों के प्रेक्षण या संचरण को आनुवंशिकता कहते हैं।

प्रश्न 5.
प्रजाति का विलुप्त होना क्या है?
उत्तर:
प्रजाति के विलुप्त होने का अभिप्राय है कि उस प्रजाति का अन्तिम सदस्य भी मर गया है।

प्रश्न 6.
भारत के प्राचीनतम राष्ट्रीय उद्यान (National Park) का नाम लिखें। इसकी स्थापना कब की गई थी?
उत्तर:
भारत का प्राचीनतम राष्ट्रीय उद्यान कोर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (Corbet National Park) है। इसकी स्थापना सन् 1936 में की गई थी।

प्रश्न 7.
जैव-विविधता के विभिन्न स्तर क्या हैं?
उत्तर:
जैव-विविधता को निम्नलिखित तीन स्तरों पर समझा जाता है-

  1. आनुवांशिक जैव-विविधता
  2. प्रजातीय जैव-विविधता
  3. पारितन्त्रीय जैव-विविधता।

प्रश्न 8.
जैव-विविधता संरक्षण के मुख्य उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:

  1. जैव-विविधता का संरक्षण तथा संवर्द्धन।
  2. पारिस्थितिकीय प्रक्रियाओं और जैव भू-रसायन चक्रों को बनाए रखना।
  3. पारितन्त्रों की उत्पादकता एवं प्रजातियों के स्थायी उपयोग को निश्चित करना।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मानव अस्तित्व के लिए जैव-विविधता अति आवश्यक है।’ अपने तर्क देकर स्पष्ट करें।
अथवा
जैव विविधता का संक्षिप्त महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
मानव पर्यावरण एक प्रमुख घटक है। जैव-मण्डल में वह एक उपभोक्ता की भूमिका भी निभाता है। वस्तुतः मानव का अस्तित्व जैव-विविधता पर ही आधारित है, क्योंकि जीवन की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति जैव-विविधता से ही होती है; जैसे खाद्य सामग्री, प्राणदायिनी ऑक्सीजन, ईंधन, जीवन रक्षक दवाइयाँ और जीवनोपयोगी अन्य समान भी उसे वनस्पति और जीव-जन्तुओं से ही प्राप्त होता है।

प्रश्न 2.
मनुष्य को जैव-विविधता से खाद्य पदार्थ किस प्रकार प्राप्त होते हैं?
उत्तर:
विभिन्न पारितन्त्रों में रहने वाले मानवों की खाद्य आदतें (Food Habits) काफी हद तक उस पारितन्त्र में मिलने वाले खाद्य पदार्थ से बनती हैं। उदाहरण के लिए समुद्रों के समीप रहने वाले लोग समुद्री जीवों (मछली आदि) का भक्षण करते हैं। इसी प्रकार मैदानों में रहने वाले लोग वहाँ पैदा होने वाले अनाजों से अपना भोजन ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार वनों में रहने वाले लोग वनों में उपलब्ध फलों तथा पशु-पक्षियों को खाकर अपना पेट भरते हैं। संक्षेप में, कहा जाए तो सभी प्रकार के अनाज, फल, सब्जियाँ, माँस, मसाले, तेल, चाय, कॉफी व अन्य खाद्य पदार्थों की आपूर्ति जीवों व वनस्पतियों से ही होती है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

प्रश्न 3.
‘प्राणदायिनी ऑक्सीजन का आधार भी जैव-विविधता ही है।’ उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य भोजन व पानी के बगैर तो कुछ समय तक जीवित रह सकता है, परन्तु ऑक्सीजन के बिना तो वह कुछ मिनट भी नहीं जी सकता। वस्तुतः मानव सहित सभी जीवों का अस्तित्व प्राणदायिनी ऑक्सीजन पर निर्भर है। यह प्राणदायिनी ऑक्सीजन हमें वृक्षों से प्राप्त होती है। वृक्षों से जीवों को ऑक्सीजन प्राप्त होती है तथा वृक्ष पर्यावरण से कार्बन-डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं। यदि हम वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई करते हैं तो इसका अवसर पर्यावरण में उपस्थित ऑक्सीजन व अन्य गैसों पर भी पड़ेगा, जिसका असर मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

प्रश्न 4.
“जैव-विविधता औषधियों के लिए खजाना है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जैव-विविधता से हमें अनेक प्रकार की औषधियाँ प्राप्त होती हैं। मनुष्य प्रागैतिहासिक काल से ही जड़ी-बूटियों तथा जीवों का औषधियों के लिए प्रयोग करता रहा है। कहते हैं कि सर्वप्रथम चीन में वनस्पतियों का औषधियों के लिए प्रयोग किया गया। हमारे ऋग्वेद व अन्य वेदों में सैकड़ों जड़ी-बूटियों का उल्लेख है, जो हमें वनस्पतियों से मिलती थीं। चरक संहिता में वनस्पतियों की औषधियों से गम्भीर रोगों के निदान के फार्मूले दिए गए हैं। आयुर्वेद में जड़ी-बूटियों से विभिन्न औषधियों द्वारा रोगों का निदान किया जाता रहा है। आज भारत और विश्व में अनेक रोगों से सम्बन्धित औषधियाँ वनस्पति जीवों से प्राप्त की जा रही हैं।

प्रश्न 5.
जैव-विविधता के संरक्षण की आवश्यकता क्यों है?
अथवा
जैव-विविधता के संरक्षण के उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
मानव सहित पृथ्वी का भविष्य जैव-विविधता पर निर्भर है परन्तु पिछली तीन शताब्दियों से प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया गया है, इससे जैव-विविधता को खतरा उत्पन्न हो गया है। अतः जैव-विविधता का संरक्षण पर्यावरण और मानव के लिए अत्यधिक जरूरी है। जैव-विविधता के संरक्षण के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं–

  • जैव-विविधता का संरक्षण तथा संवर्द्धन।
  • पारिस्थितिकीय प्रक्रियाओं और जैव भू-रसायन चक्रों को बनाए रखना।
  • पारितन्त्रों की उत्पादकता एवं प्रजातियों के स्थायी उपयोग को निश्चित करना।

प्रश्न 6.
खतरे में पड़ चुके जैव-विविधता क्षेत्र का क्या अर्थ है?
उत्तर:
विश्व की जैव-विविधता विशेष भौगोलिक परिस्थितियों तथा जलवायु के कारण विशेष प्रकार के इकोलोजिकल क्षेत्रों में विभाजित है। परन्तु मानवीय गतिविधियों खासतौर पर औद्योगिक क्रान्ति के बाद जैव-विविधता के अन्धाधुन्ध दोहन से ऐसे क्षेत्र खतरे में पड़ चुके हैं। उदाहरण के लिए भारतीय पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्व क्षेत्र तथा अण्डमान-निकोबार खतरे में पड़ चुके क्षेत्र हैं।

प्रश्न 7.
‘सभी भौतिक तत्त्व सजीवों (Living Organism) को प्रभावित करते हैं। बताइए कैसे?
उत्तर:
पारिस्थितिक तन्त्र क्रियाशील रहता है अर्थात पारितन्त्र के घटकों में आपस में अन्तक्रिया सदैव चलती रहती है। पारितन्त्र की इस क्रियाशीलता में ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow), पोषक तत्त्वों का चक्र, जीवों की अन्तक्रिया तथा पर्यावरण नियन्त्रण शामिल होता है जो सामूहिक रूप से इस तन्त्र को चलाते हैं। यह सारी क्रिया एक चक्र के रूप में चलती रहती है, जिसे जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) के नाम से जाना जाता है। जैव भू-रासायनिक चक्र में सूर्य ऊर्जा का प्रमुख स्रोत होता है, जो जलवायु व्यवस्था के अनुसार ऊर्जा प्रदान करता है। इन भौतिक तत्त्वों से ही सजीव तत्त्व अपना भोजन बनाते हैं या प्राप्त करते हैं। वस्तुतः प्रकृति के भौतिक तत्त्व सजीवों को जीवन का आधार प्रदान करते हैं।

प्रश्न 8.
आवासों की क्षति का जैव-विविधता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
प्रकृति का वह स्थान जहाँ जीव वास एवं अपना विकास करते हैं, आवास स्थान कहलाता है। कृषि क्षेत्र के विस्तार, औद्योगीकरण तथा अनेक विकास योजनाओं के परिणामस्वरूप आज तेजी से जीवों के आवास स्थल नष्ट हो रहे हैं। जंगल नष्ट होने से हाथी, शेर व अन्य छोटे-मोटे सभी जानवरों की प्रजातियाँ खतरे में पड़ गई हैं। इसी प्रकार जल-प्रदूषण व विकास योजनाओं के कारण नदी, झील व समुद्र के आवास भी नष्ट होते जा रहे हैं। पानी के जीवों की दुनिया भी उजड़ रही है।

प्रश्न 9.
‘प्रदूषण जैव-विविधता के लिए खतरनाक है।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण प्रदूषण जैव-विविधता के लिए प्रमुख खतरा बन गया है। इससे प्राकृतिक आवासों में बदलाव आने से इकोसिस्टम की कार्य-प्रणाली प्रभावित होती है। नदियों के प्रदूषित होने से नदियों तथा डेल्टा के प्राणियों का अत्यधिक नुकसान हुआ है। इसी प्रकार झीलों, तालाबों, समुद्रों इत्यादि के पानी में भी पीड़क, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन और तेल से जलीय जीव खतरे में पड़ रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण से मौसम में परिवर्तन, तापमान में वृद्धि, ओजोन परत में छेद सभी जैव-विविधता के लिए खतरे का कारण बनते जा रहे हैं।

प्रश्न 10.
प्रकृति में सन्तुलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
लाखों-करोड़ों वर्षों के अन्तराल में पृथ्वी पर प्राकृतिक व्यवस्था कायम हुई तथा इसमें सन्तुलन बनता चला गया। धरातलीय परिवर्तन, मौसम में परिवर्तन, जीवों की पुरानी प्रजातियाँ विलुप्त हुईं तथा नई प्रजातियाँ आईं। ये सभी घटनाएँ प्राकृतिक थीं-चाहे वे विपदाएँ हों या विकास की घटनाएँ या मौसम में परिवर्तन या प्रजातियों का लुप्त होना या उनका विकास इत्यादि। ये घटनाएँ एक लम्बे अन्तराल में हुआ करती थीं। इसलिए उन्हें पुनः परस्पर सन्तुलित होने, आपसी समन्वय और समायोजन का जैव-विविधता एवं संरक्षण अवसर मिल जाया करता था। एक प्रजाति विलुप्त होती थी तो उसकी जगह नई प्रजाति स्वयं ही पैदा हो जाती थी। इस प्रकार जैव-विविधता व परस्पर उनकी निर्भरता बनी रहती थी। हम कह सकते हैं कि प्राकृतिक कारणों से प्रकृति मूलतः नष्ट नहीं हुआ करती। उसका स्वरूप बदल जाया करता है। मसलन अपने विकास के बाद धरती पर जंगल कभी नष्ट नहीं हुए, हाँ उनका स्वरूप जरूर बदल गया।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जैव-विविधता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जैव-विविधता-जैव-विविधता से तात्पर्य पृथ्वी पर (जैवमण्डल में) जीवन की सम्पूर्ण विविधता से है अर्थात् स्थल व जल में सभी प्रकार के सूक्ष्मजीवों (Micro Organisms), वनस्पति जगत (Plants) व जानवरों का जोड़ ही जैव-विविधता है। विश्व संसाधन संस्थान (World Resources Institute) द्वारा जैव-विविधता की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया है कि जैव-विविधता विश्व में जीवों की विविधता है, जिसमें आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) तथा उनके द्वारा बनाया गया समुच्चय शामिल होता है।

यह प्राकृतिक जैव सम्पदा का पर्याय है, जो मानव जीवन व उसके कल्याण में सहायक है। इस अवधारणा में आनुवंशिक प्रजातियों व पारितन्त्रों के बीच पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धता झलकती है। उल्लेखनीय है कि गुणसूत्र (Genes) प्रजातियों के घटक होते हैं तथा प्रजातियाँ पारितन्त्रों की घटक होती हैं। अतः इनमें से किसी भी स्तर में कोई भी परिवर्तन दूसरे को बदल देता है। वस्तुतः प्रजातियाँ जैव-विविधता की अवधारणा का केन्द्र बिन्दु हैं।

रियो डी जेनेरो (1992 ई०) ने जैव-विविधता के विश्व सम्मेलन (Global Convention on Biological Diversity) में जैव-विविधता को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है-“Biological diversity is the variability among living organisms from all sources including inter alia, terrestrial, marine and other aquatic. Eco-systems and the ecological complexes of which they are a part, this includes diversity with in species and eco-system.”

‘जैव-विविधता’ अपेक्षाकृत नया शब्द है। यह जैविक विविधता (Biological Diversity) का संक्षिप्त रूप है। ‘जैविक विविधता’ शब्द का प्रयोग 1980 ई० के आसपास एक क्षेत्र में उपस्थित प्रजातियों के सन्दर्भ में ई.ओ. विल्सन (E.O. Wilson) द्वारा किया गया। जबकि ‘जैव-विविधता’ की परिकल्पना में बहुत-सी बातें शामिल हैं। विशेष रूप से प्रजातियाँ व आवासों की हानि, जैविक संस्थाओं का उपयोग, महत्त्व तथा प्रबन्धन विषय इसके अन्तर्गत आते हैं। जैव-विविधता में इसके संरक्षण के लिए तत्काल कार्रवाई को भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है। वस्तुतः रियो पृथ्वी सम्मेलन में जैव-विविधता की अवधारणा ने जन-साधारण का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।

प्रश्न 2.
‘मानव हस्तक्षेप ने प्राकृतिक सन्तुलन में गड़बड़ी पैदा कर दी है।’ कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आज प्रकृति में मानव के हस्तक्षेप के कारण प्राकृतिक सन्तुलन में गड़बड़ी पैदा हो चुकी है। उसके विभिन्न अंगों, घटकों को जोड़ने वाली कड़ियाँ टूट चुकी हैं। निरन्तर जटिल प्रक्रियाओं वाली प्रकृति से कई प्रक्रियाएँ लुप्त हो चुकी हैं। पर्यावरण में बड़ी तेजी से हानिकारक एवं जहरीले पदार्थ फैलते जा रहे हैं, जो प्राकृतिक नहीं बल्कि कृत्रिम प्रक्रियाओं की देन है।

जो प्राकृतिक विनाश पहले लाखों-करोड़ों वर्षों से होता था, अब वह केवल कुछ ही सदियों, यहाँ तक कि मात्र कुछ दशकों में ही हो रहा है। विनाश की अवधि कम हो रही है, उसकी तीव्रता एवं व्यापकता बढ़ती जा रही है। बड़े पैमाने पर प्रकृति का विनाश मूलतः औद्योगिक क्रान्ति से आरम्भ हुआ। जनसंख्या में वृद्धि एवं प्रकृति-दोहन की नित-नई तकनीक ने इस विनाश को असाधारण रूप से बढ़ा दिया है।

इस प्रकार आज मानव-जनित प्रदूषण तथा प्रकृति विनाश कोई स्वाभाविक-प्राकृतिक प्रक्रिया न होकर कृत्रिम सामाजिक प्रक्रिया है। यह विनाश एवं प्रदूषण अब ऐसे बिन्दु पर बड़ी तेजी से पहुँचता जा रहा है, जहाँ से वापस लौटना असम्भव-सा होगा, कुछ अर्थों और क्षेत्रों में वह बिन्दु पहुँच भी चुका है। इसलिए आज जब हम प्रकृति के विनाश और प्रदूषण की बात कर रहे हैं तो मानव-जनित प्रक्रिया की बात कर रहे हैं। प्रकृति एवं पर्यावरण में फैलता प्रदूषण हर प्रकार से जीवों के लिए खतरा बन चुका है। प्राणियों एवं वनस्पतियों की समाप्ति का खतरा पैदा हो गया है।

प्रश्न 3.
जैव-विविधता पर्यावरण को स्वस्थ बनाए रखने में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
जैसा कि हम जानते हैं कि पर्यावरण में मुख्यतः तीन घटक हैं-(1) भौतिक घटक, (2) जैविक घटक व (3) ऊर्जा । भूमि, जल, वायु, मुद्रा, तापमान, वर्षा, आर्द्रता आदि पर्यावरण के भौतिक घटक हैं जबकि पृथ्वी पर उपस्थित पादप व जीव जैव घटक का निर्माण करते हैं। सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा से यह पर्यावरण चलायमान होता है। वस्तुतः ये तीनों घटक आपस में अन्तः सम्बन्धित और परस्पर निर्भर होते हैं। यदि जैविक पयाँवरण (घटक) में कुछ असामान्यता आती है तो उसका प्रतिकूल प्रभाव निश्चित। रूप से पर्यावरण के भौतिक घटकों पर भी पड़ता है। उदाहरण के लिए, वनों की अन्धाधुन्ध कटाई से, जल-चक्र, ऑक्सीजन की मात्रा, मृदा के उपजाऊपन आदि पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

इसी तरह वनों की कटाई से पृथ्वी के तापमान, वर्षा आदि भी प्रभावित होते हैं। वनों की कटाई से जीवों के आवास नष्ट होते हैं तथा प्रजातियाँ समाप्त होती हैं। पर्यावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती हैं। इससे वायुमण्डल, जलमण्डल बुरी तरह से प्रभावित होते हैं। इसका मानव स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। यह भी उल्लेखनीय है कि मानव सहित सभी जीवों को ऊर्जा पादपों के माध्यम से ही प्राप्त होती है। संक्षेप में, वनस्पति व जीव जगत पर्यावरण का अभिन्न अंग है एवं उसे स्वस्थ बनाए रखने में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वस्तुतः इसी पर मानव का अस्तित्व भी निर्भर है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

प्रश्न 4.
‘जैव-विविधता असीमित नहीं है।’ टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
जैव-विविधता मानव के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। मानव को भोजन, ऑक्सीजन व जीवन के लिए अन्य उपयोगी सामान जैव-विविधता से ही प्राप्त होता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मानव का अस्तित्व और उसकी समृद्धि पूरी तरह से जैव-विविधता पर निर्भर है। वनस्पति से एक ओर, जहाँ जीवनोपयोगी उपज प्राप्त होती है तो दूसरी ओर, समस्त जैविक व मानवीय विकास के लिए पादप, कल्याणकारी पर्यावरण की रचना करते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से मानवीय हस्तक्षेप के कारण आज. जैव-विविधता संकट में है, क्योंकि मानव ने इसे असीमित समझकर इसका अन्धाधुन्ध उपयोग करना शुरू कर दिया है।

इससे कई प्रजातियाँ आज विश्व-परिदृश्य से लुप्त हो चुकी हैं तथा कुछ लुप्त होने के कगार पर हैं। दूसरे शब्दों में, यदि कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि लाखों करोड़ों वर्षों में पृथ्वी पर पैदा हुआ ‘जीवन’ मौत के कगार पर है। विश्व पर्यावरण आयोग के अनुसार प्राचीनकाल में पृथ्वी पर पौधों व जीवों की कोई पाँच अरब प्रजातियाँ थीं, जो घटते-बढ़ते वर्तमान में कुछ लाख ही रह गई हैं। विश्व संसाधन संस्थान की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र वनों की कटाई इस प्रकार निर्बाध रूप से जारी रही तो जल्द ही भूमण्डल के 5 से 10 प्रतिशत तक पादप व वन्य जीव विलुप्त हो जाएँगे।

1. वनस्पति प्रजातियों का कम होना-वनों के बड़े पैमाने पर काटे जाने के कारण कुछ वनस्पतियाँ और वृक्ष प्रजातियाँ आज विलुप्त होने के कगार पर हैं। एक अनुमान के मुताबिक वृक्षों की कम-से-कम 20 प्रजातियाँ आज विलोपन के खतरे से जूझ रही हैं।

2. जीवों का कम होना-वनों की कटाई से वन्य जीवों के आवास स्थान नष्ट होते जा रहे हैं। साथ ही प्राणियों के अवैध शिकार व पारितन्त्रों में प्रदूषण के कारण वन्य तथा जलीय जीवों की संख्या कम होती जा रही है। भारत में भी अनेक प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त होने के कगार पर हैं। उदाहरण के लिए कश्मीरी हिरण, एशियाई शेर, भारतीय गोरखर, सोन चिड़ियाँ, चीता, हिमाचली बटेर, गलाबी सिर वाली बत्तख आदि पश-पक्षी विलुप्त होते जा रहे हैं। प्राकृतिक संग्रहालय, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तिका “वर्ल्ड ऑफ मैमल्स” के आँकड़ों के अनुसार लगभग 44 वन्य जीवों को संकटग्रस्त जीवों की सूची में रखा गया है, जिससे उपरोक्त पशु-पक्षियों के अलावा गगीय डॉल्फिन, लाल पाण्डा, जंगली भैंसा, एशियाई हाथी, सफेद सारस, चिंकारा, अजगर, गेंडा, हिम तेन्दुआ, बाघ, भूरा बारहसिंघा, भूरी बिल्ली आदि मुख्य हैं। इनके अतिरिक्त सुनहरी बिल्ली, जंगली गधा, ओरंग ऊटान, चिम्पैंजी बबून आदि भी शामिल हैं।

प्रश्न 5.
विभिन्न प्रजातियाँ एक-दूसरे पर किस प्रकार अन्तःनिर्भर हैं? अथवा भोजन शृंखला व खाद्य जाल का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जैसा कि हम जानते हैं कि करोड़ों वर्षों के जैविक विकास के दौरान धरती पर विभिन्न पारितन्त्रों का विकास हुआ है। यह पारितन्त्र जीवों की विविधता व ऊर्जा प्रवाह के कारण स्वयं सन्तुलित और गतिमान है। इनमें एक जीव प्रजाति दूसरी प्रजाति पर निर्भर है। यह निर्भरता मुख्यतः उनकी भोजन की जरूरत से विकसित हुई है। सूर्य की ऊर्जा से पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। पौधों से जीव प्रजातियाँ अपना भोजन प्राप्त करती हैं। फिर जीव दूसरे जीवों को खाकर अपना पेट भरते हैं। इस प्रकार यह भोजन श्रृंखला सभी प्रजातियों को एक-दूसरे से जोड़ती है एवं अन्तः निर्भरता का निर्माण करती है। प्रजातियों में इस अन्तः निर्भरता को हम अग्रलिखित आहार श्रृंखलाओं व आहार जाल से भली-भाँति समझ सकते हैं-
1. भोजन शृंखला (Food Chain) जीवों में ऊर्जा का प्रवाह भोजन शृंखला के माध्यम से होता है। जीवों द्वारा ऊर्जायुक्त पदार्थ या भोजन ग्रहण करने की अपनी आदतें एवं आवश्यकताएँ होती हैं। इससे जीवों में पोषण-स्तर का निर्माण होता है। ऊर्जा का भोजन के माध्यम से एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में प्रवेश प्रकृति के नियमों के अनुसार होता है। इससे भोजन श्रृंखला का निर्माण होता है।

यह तो सब जानते हैं कि छोटी मछली को बड़ी मछली खाती है और बड़ी मछली को उससे बड़ी मछली खा जाती है, सार रूप में यही भोजन श्रृंखला है। दूसरे शब्दों में “किसी पारिस्थिति तन्त्र में एक जीवधारी से दूसरे जीवधारी में खाद्य ऊर्जा का प्रवाह ही भोजन श्रृंखला है।” हरे पौधे जमीन पोषित तत्त्वों (Nutrients) तथा सूर्य से प्रकाश प्राप्त कर प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन तैयार करते हैं। यह उनका अपना भोजन होता है। इस रूप में पौधे प्रथम पोषी तथा जैविक जगत् में उत्पादक कहे जाते हैं।

पौधे से ऊर्जा भोजन के माध्यम से आगे बढ़ती है। पौधों पर शाकाहारी जीव निर्भर हैं। इस प्रकार पौधों से ऊर्जा शाकाहारी जीवों में पहुँचती है। शाकाहारी जीवों से ऊर्जा शाकाहारी जीवों को खाने वाले माँसाहारी जीवों में पहुँचती है। अन्त में ऊर्जा सर्वाहारी जीवों में पहुँचती है। सर्वाहारी जीवों से अभिप्राय है, जो पेड़-पौधों से भी भोजन प्राप्त करते हैं तथा साथ ही शाकाहारी तथा माँसाहारी जीवों को भी ग्रहण करते हैं। एक पारिस्थितिक तन्त्र में भोजन शृंखला ऊर्जा के एकल मार्गीय प्रवाह मार्ग को दर्शाती है। कुछ भोजन शृंखलाओं के उदाहरण निम्नलिखित प्रकार से दर्शाए जा सकते हैं-
पौधे → शाकाहारी → माँसाहारी → सर्वाहारी
पादप → हिरण → शेर
घास → हिरण → मेंढक → सर्प → बाज

2. खाद्य जाल (Food Webs) भोजन श्रृंखला एक जटिल प्रक्रिया है, जो जीवों की खाद्य आदतों के अनुसार चलती है। प्रकृति में यह बहुत ही कम होता है कि खाद्य शृंखलाएँ सीधी ही चलें। एक जीव कई प्रकार से भोजन ग्रहण कर सकता है। यहाँ तक कि एक जीव को अनेक जीवों द्वारा भोजन के रूप में खाया जा सकता है। संक्षेप में, एक पारितन्त्र में भोजन शृंखलाएँ आपस में गुंथी होती हैं, जिससे इन भोजन श्रृंखलाओं का एक जाल बन जाता है। इस प्रकार खाद्य जाल का निर्माण होता है। स्पष्ट है कि भोजन श्रृंखला तथा खाद्य जाल से सभी जीव एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।

प्रश्न 6.
जैव-विविधता के संरक्षण में ‘प्राकृतिक संरक्षण’ का तरीका कितना कारगर है? वर्णन कीजिए। अथवा प्राकृतिक संरक्षण के लाभ व दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राकृतिक संरक्षण (In-Situ Conservation) की प्रणाली के द्वारा प्रजातियों का संरक्षण उनके प्राकृतिक वातावरण में ही किया जाता है। इस प्रणाली में वातावरण में मौजूद उन कारकों को समाप्त करने का प्रयास किया जाता है, जिसके कारण जीवों को संकट पैदा होता है, बाकी सम्पूर्ण व्यवस्था प्राकृतिक ही होती है। इस विधि के तहत राष्ट्रीय पार्क (National Park), वन्य जीव अभ्यारण्य (Wild Life Sanctuary) एवं जैवमण्डल संरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves) का निर्माण कर प्रजातियों को संरक्षण प्रदान किया जाता है। इस विधि से तराई क्षेत्रों (Wetland), मेंग्रोवस (Mangroves) तथा समुद्रों में प्रवाल भित्ति (Coral Reefs) की पहचान कर संरक्षण प्रदान किया जा रहा है।

प्राकृतिक संरक्षण के लाभ/महत्त्व/उपयोगिता-प्राकृतिक संरक्षण के लाभ निम्नलिखित हैं-

  • यह संरक्षण प्रणाली सरल एवं सस्ती है। इसमें मानव एक सहायक के रूप में कार्य करता है।
  • इस प्रणाली से एक साथ अनेक जीव-जन्तुओं की प्रजातियों का संरक्षण किया जा सकता है।
  • इस प्रकार संरक्षण से प्राणी न केवल जीवित रहते हैं, अपितु नए प्रकार के जीवों की उत्पत्ति की प्रक्रिया भी जारी रहती है।

प्राकृतिक संरक्षण के दोष-प्राकृतिक संरक्षण के दोष निम्नलिखित हैं-

  • स्वस्थाने या प्राकृतिक संरक्षण में बड़े भू-खण्ड की आवश्यकता होती है।
  • पारितन्त्र की विशाल जैव-विविधता के कारण संरक्षण के पैमानों को निश्चित करने में कठिनाई होती है।
  • इस प्रकार के संरक्षण से वन में रहने वाले मानव समुदाय को स्थानान्तरित करना पड़ता है।
  • ऐसे संरक्षित क्षेत्रों में चोरी छिपे मानव हस्तक्षेप की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं जिससे संकटापन्न प्रजातियों को खतरा बना रहता है।फिर भी यह स्वीकार किया जा सकता है कि प्राकृतिक संरक्षण प्रजातियों के संरक्षण का आदर्श तरीका है।

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प्रश्न 7.
जैव-विविधता के संरक्षण के किसी एक तरीके का वर्णन कीजिए।
अथवा
जैव विविधता संरक्षण के उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कृत्रिम संरक्षण के लाभ व दोषों को समझाइए।
अथवा
कृत्रिम संरक्षण क्या है? इसके लाभ व दोषों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जैव-विविधता पर मानव सहित सभी जीव-जन्तुओं, वनस्पति तथा अन्ततः हमारी पृथ्वी का भविष्य निर्भर है, परन्तु पिछली दो तीन शताब्दियों से (विशेष तौर पर औद्योगिक क्रान्ति के बाद) प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया गया है। इससे सभी प्राकृतिक संसाधनों, जिसमें वनस्पति और जीव-जन्तु भी शामिल हैं, को संकटापन्न की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। पृथ्वी से अनेक जीव विलुप्त हो चुके हैं तथा विलोपन की प्रक्रिया अत्यधिक तीव्र हो गई है। ऐसी स्थिति में विश्व में जैव-विविधता को बचाने तथा बनाए रखने के प्रयास भी शुरू हो गए हैं।

जैव-विविधता संरक्षण के उद्देश्य-

  • जैव-विविधता का संरक्षण तथा संवर्द्धन।
  • पारिस्थितिकीय प्रक्रियाओं और जैव भू-रसायन चक्रों को बनाए रखना।
  • पारितन्त्रों की उत्पादकता एवं प्रजातियों के स्थायी उपयोग को निश्चित करना।

जैव-विविधता के संरक्षण के तरीके (Methods of Conservation of Biodiversity) वर्तमान में जैव-विविधता को संरक्षित करने के दो तरीके अपनाए जाते हैं

  • कृत्रिम संरक्षण (Ex-Situ Conservation)
  • स्वस्थाने या प्राकृतिक संरक्षण (In-Situ Conservation)।

इनमें से कृत्रिम संरक्षण का संक्षेप में विवरण निम्नलिखित प्रकार से दिया जा सकता है-
कृत्रिम संरक्षण (Ex-Situ Conservation)-इस विधि से विलुप्त हो सकने वाली प्रजातियों (वनस्पति एवं जीव-जन्तु) को नियन्त्रित दशाओं; जैसे बगीचे, नर्सरी, चिड़ियाघर या प्रयोगशाला आदि में रखकर संरक्षण प्रदान किया जाता है अर्थात् विलुप्त होने के खतरे से बचाने के लिए प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास स्थान से हटाकर नियन्त्रित आवास स्थान पर रखा जाता है।

कृत्रिम संरक्षण प्रणाली में चिड़ियाघरों की स्थापना, वनस्पति, बगीचों की स्थापना या ऐक्वेरियम आदि की स्थापना की जाती है। चिड़ियाघरों में स्तनपायी जानवरों, पक्षियों, सरीसृपों आदि को रखा जाता है। वर्तमान में विश्व में चिड़ियाघरों में लगभग 5,00,000 इस प्रकार के विलुप्त हो सकने वाले प्राणियों को संरक्षण प्रदान किया जा रहा है।

कृत्रिम संरक्षण के लाभ (Merits of Ex-Situ Conservation) कृत्रिम संरक्षण के लाभ निम्नलिखित हैं-

  • संरक्षण स्थल पर जीवों की संख्या कम होने के कारण सभी जीवों का समान रूप से ध्यान रखा जा सकता है तथा उनका संरक्षण सुरक्षित ढंग से किया जा सकता है।
  • इस विधि में भोजन, धन व अन्य संसाधनों का सुनिश्चित तथा उचित उपयोग किया जा सकता है।
  • कभी-कभी संरक्षण प्रक्रिया के बाद जीवों को उनके प्राकृतिक आवासों में छोड़ना सफलतापूर्ण होता है।

कृत्रिम संरक्षण के दोष (Demerits of Ex-Situ Conservation)-प्राकृतिक वातावरण से दूर होने के कारण इस संरक्षण प्रणाली में जीवों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस संरक्षण प्रणाली के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं

  • इस प्रणाली से विलुप्त होने का खतरा झेल रही बहुत कम प्रजातियों को ही संरक्षण प्रदान किया जा सकता है।
  • संरक्षित किए गए प्राणियों की क्षमता में परिवर्तन हो जाता है। वे प्राकृतिक आवासों में रहने की योग्यता खो देते हैं। उदाहरण के लिए शिकारी जीव की शिकार करने की क्षमता में कमी आ जाती है।
  • इस विधि को सुचारु रूप से चलाने के लिए अत्यधिक संसाधनों तथा धन की आवश्यकता होती है।
  • कभी-कभी संरक्षण स्थल पर त्रासदी (आग लगने, भूकम्प, बाढ़ आदि) होने पर बड़े पैमाने पर जानवरों की मृत्यु हो जाती है।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन Important Questions and Answers.

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निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मेसोपोटामिया से आपका क्या अभिप्राय है? इसकी प्रमुख भौगोलिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

I. मेसोपोटामिया से अभिप्राय

मेसोपोटामिया जिसे आजकल इराक कहा जाता है भौगोलिक विविधता का देश है। मेसोपोटामिया नाम यूनानी भाषा के दो शब्दों मेसोस (Mesos) भाव मध्य तथा पोटैमोस (Potamos) भाव नदी से मिलकर बना है। इस प्रकार मेसोपोटामिया का अर्थ है दो नदियों के बीच का प्रदेश। ये नदियाँ हैं दजला (Tigris) एवं फ़रात (Euphrates) । इन नदियों को यदि मेसोपोटामिया सभ्यता की जीका रेखा कह दिया जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

II. मेसोपोटामिया की भौगोलिक विशेषताएँ

1. दजला एवं फ़रात नदियाँ :
दजला एवं फ़रात नदियों का उद्गम आर्मीनिया के उत्तरी पर्वतों तोरुस (Torus) से होता है। इन पर्वतों की ऊँचाई लगभग 10,000 फुट है। यहाँ लगभग सारा वर्ष बर्फ जमी रहती है। इस क्षेत्र में वर्षा भी भरपूर होती है। दजला 1850 किलोमीटर लंबी है। इसका प्रवाह तीव्र है तथा इसके तट ऊँचे एवं अधिक कटे-फटे हैं।

इसलिए प्राचीनकाल में इस नदी के तटों पर बहुत कम नगरों की स्थापना हुई थी। दूसरी ओर फ़रात नदी ने मेसोपोटामिया के इतिहास में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। यह नदी 2350 किलोमीटर लंबी है। इसका प्रवाह कम तीव्र है। इसके तट कम ऊँचे एवं कम कटे-फटे हैं। इस कारण प्राचीनकाल में मेसोपोटामिया के प्रसिद्ध नगरों की स्थापना इस नदी के तटों पर हई।

2. मैदान :
मेसोपोटामिया के पूर्वोत्तर भाग में ऊँचे-नीचे मैदान हैं। ये मैदान बहुत हरे-भरे हैं। यहाँ अनेक प्रकार के जंगली फल पाए जाते हैं। यहाँ के झरने (streams) बहत स्वच्छ हैं। इन मैदानों में कषि के लिए आवश्यक वर्षा हो जाती है। यहाँ 7000 ई० पू० से 6000 ई० पू० के मध्य खेती आरंभ हो गई थी। मेसोपोटामिया के उत्तर में ऊँची भूमि (upland) है जिसे स्टेपी (steppe) के मैदान कहा जाता है। इन मैदानों में घास बहुत होती है। अतः यह पशुपालन के लिए अच्छा क्षेत्र है।

पूर्व में मेसोपोटामिया की सीमाएँ ईरान से मिली हुई थीं। दज़ला की सहायक नदियाँ (tributaries) ईरान के पहाड़ी क्षेत्रों में जाने का उत्तम साधन हैं। मेसोपोटामिया का दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है। यहाँ सबसे पहले मेसोपोटामिया के नगरों एवं लेखन कला का विकास हुआ। इन रेगिस्तानों में नगरों के विकास का कारण यह था कि दजला एवं फ़रात नदियाँ उत्तरी पर्वतों से निकल कर अपने साथ उपजाऊ मिट्टी लाती थीं।

इस उपजाऊ मिट्टी के कारण एवं नदियों से सिंचाई के लिए निकाली गई नहरों के कारण यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता था। यद्यपि यहाँ फ़सल उपजाने के लिए आवश्यक वर्षा की कुछ कमी रहती थी इसके बावजूद दक्षिणी मेसोपोटामिया में रोमन साम्राज्य सहित सभी प्राचीन सभ्यताओं में से सर्वाधिक फ़सलों का उत्पादन होता था। यहाँ की प्रमुख फ़सलें गेहूँ, जौ, मटर (peas) एवं मसूर (lintel) थीं।

3. कृषि संकट :
मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि अनेक बार संकटों से घिर जाती थी। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। प्रथम, दजला एवं फ़रात नदियों में कभी-कभी भयंकर बाढ़ आ जाती थी। इस कारण फ़सलें नष्ट हो जाती थीं। दूसरा, कई बार पानी की तीव्र गति के कारण ये नदियाँ अपना रास्ता बदल लेती थीं। इससे सिंचाई व्यवस्था चरमरा जाती थी।

मेसोपोटामिया में वर्षा की कमी होती थी। अतः फ़सलें सूख जाती थीं। तीसरा, नदी के ऊपरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग नहरों का प्रवाह अपने खेतों की ओर मोड़ लेते थे। इस कारण निचले क्षेत्रों में बसे हुए गाँवों को खेतों के लिए पानी नहीं मिलता था। चौथा, ऊपरी क्षेत्रों के लोग अपने हिस्से की सरणी में से मिट्टी (silt from their stretch of the channel) नहीं निकालते थे। इस कारण निचले क्षेत्रों में पानी का बहाव रुक जाता था। अत: पानी के लिए गाँववासियों में अनेक बार झगड़े हुआ करते थे।

4. समृद्धि के कारण :
मेसोपोटामिया में पशुपालन का धन्धा काफ़ी विकसित था। मेसोपोटामिया के लोग स्टेपी घास के मैदानों, पूर्वोत्तरी मैदानों एवं पहाड़ों की ढालों पर भेड़-बकरियाँ एवं गाएँ पालते थे। इनसे वे दूध एवं माँस प्राप्त करते थे। नदियों से बड़ी संख्या में मछलियाँ प्राप्त की जाती थीं। मेसोपोटामिया में खजूर (date palm) का भी उत्पादन होता था। इन सबके कारण मेसोपोटामिया के लोग समृद्ध हुए। मेसोपोटामिया की समृद्धि के कारण इसे प्राचीन काल में अनेक विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

प्रश्न 2.
नगरीकरण से आपका क्या अभिप्राय है? मेसोपोटामिया में नगरीकरण के प्रमुख कारण क्या थे?
अथवा
मेसोपोटामिया में नगरीकरण के कारणों तथा महत्त्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
मेसोपोटामिया नगर की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
I. नगरीकरण से अभिप्राय

नगर किसे कहते हैं इसकी कोई एक परिभाषा देना अत्यंत कठिन है। साधारणतया नगर उसे कहते हैं जिसके अधीन एक विशाल क्षेत्र हो, जहाँ काफी जनसंख्या हो, जहाँ के लोग पक्के मकानों में रहते हों, जहाँ की सड़कें पक्की हों, जहाँ यातायात एवं संचार के साधन विकसित हों, जहाँ लोगों को प्रत्येक प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त हों तथा जहाँ लोगों को पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो। विश्व में नगरों का सर्वप्रथम विकास मेसोपोटामिया में हुआ।

यहाँ नगरों का निर्माण 3000 ई० पू० में कांस्य युग में आरंभ हुआ। यहाँ तीन प्रकार के नगरों का निर्माण हुआ। प्रथम, धार्मिक नगर थे जो मंदिरों के चारों ओर विकसित हुए। दूसरा, व्यापारिक नगर थे जो प्रसिद्ध व्यापारिक मार्गों एवं बंदरगाहों के निकट स्थापित हुए। तीसरा, शाही नगर थे जहाँ राजा, राज परिवार एवं प्रशासनिक अधिकारी रहते थे। ये नगर ऐसे स्थान पर होते थे जहाँ से संपूर्ण साम्राज्य पर नियंत्रण रखा जा सकता था। इन नगरों का विशेष महत्त्व होता था।

II. नगरीकरण के कारण

मेसोपोटामिया में नगरीकरण के विकास के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. अत्यंत उत्पादक खेती:
मेसोपोटामिया में नगरीकरण के विकास में सर्वाधिक उल्लेखनीय योगदान अत्यंत उत्पादक खेती ने दिया। यहाँ की भूमि में प्राकृतिक उर्वरता थी। इससे खेती को बहुत प्रोत्साहन मिला। प्राकृतिक उर्वरता के कारण पशुओं को चारे के लिए कोई कमी नहीं थी। अत: पशुपालन को भी बल मिला। खेती एवं पशुपालन के कारण मानव जीवन स्थायी बन गया क्योंकि उसे भोजन की तलाश में स्थान-स्थान पर घूमने की ज़रूरत नहीं थी। इससे नए-नए व्यवसाय आरंभ हो गए। इससे नगरीकरण की प्रक्रिया को बहुत प्रोत्साहन मिला।

2. जल-परिवहन :
नगरीकरण के विकास के लिए कुशल जल-परिवहन का होना अत्यंत आवश्यक है। भारवाही पशुओं तथा बैलगाड़ियों के द्वारा नगरों में अनाज एवं अन्य वस्तुएँ लाना तथा ले जाना बहुत कठिन होता था। इसके तीन कारण थे। प्रथम, इसमें बहुत समय लग जाता था। दूसरा, इस प्रक्रिया में खर्चा बहुत आता था। तीसरा, रास्ते में पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी करनी पड़ती थी। नगरीय अर्थव्यवस्था इतना खर्च उठाने के योग्य नहीं होती। दूसरी ओर जल-परिवहन सबसे सस्ता साधन होता था।

3. धातु एवं पत्थर की कमी :
किसी भी नगर के विकास में धातुओं एवं पत्थर की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। धातुओं का प्रयोग विभिन्न प्रकार के औजार, बर्तन एवं आभूषण बनाने के लिए किया जाता है। औज़ारों से पत्थर को तराशा जाता है। बर्तन सभ्य समाज की निशानी हैं। इनका प्रयोग खाद्य वस्तुएँ बनाने, उन्हें खाने एवं संभालने के लिए किया जाता है।

नगरों की स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के आभूषण पहनने की शौकीन होती हैं। पत्थरों का प्रयोग भवनों, मंदिरों, मूर्तियों एवं पुलों आदि के निर्माण के लिए किया जाता है। मेसोपोटामिया में धातओं एवं पत्थरों की कमी थी। इसके चलते मेसोपोटामिया ने तर्की, ईरान एवं खाडी पार के देशों से ताँबा, टिन. सोना, चाँदी. सीपी एवं विभिन्न प्रकार के पत्थरों का आयात करके इनकी कमी को दर किया।

4. श्रम विभाजन :
श्रम विभाजन को नगरीय विकास का एक प्रमुख कारक माना जाता है। नगरों के लोग आत्मनिर्भर नहीं होते। उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के लिए एक पत्थर की मुद्रा (stone seal) बनाने वाले को पत्थर पर उकेरने के । औजारों (bronze tools) की आवश्यकता होती है। ऐसे औजारों का वह स्वयं निर्माण नहीं करता।

इस प्रकार नगर के लोग अन्य लोगों पर उनकी सेवाओं के लिए अथवा उनके द्वारा उत्पन्न की गई वस्तुओं पर निर्भर करते हैं। संक्षेप में श्रम विभाजन को शहरी जीवन का एक प्रमुख आधार माना जाता है।
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 2 iMG 1

5. मुद्राओं का प्रयोग:
मेसोपोटामिया के नगरों से हमें बड़ी संख्या में मुद्राएँ मिली हैं। ये मुद्राएँ पत्थर की होती थीं तथा इनका आकार बेलनाकार (cylinderical) था। इन्हें अत्यंत कुशल कारीगरों द्वारा उकेरा जाता था। इन मुद्राओं पर कभी-कभी इसके स्वामी का नाम, उसके देवता का नाम तथा उसके रैंक आदि का वर्णन भी किया जाता था।

इन मुद्राओं का प्रयोग व्यापारियों द्वारा अपना सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित भेजने के लिए किया जाता था। इस प्रकार यह मुद्रा उस सामान की प्रामाणिकता का प्रतीक बन जाती थी। यदि यह मुद्रा टूटी हुई पाई जाती तो पता लग जाता कि रास्ते में सामान के साथ छेड़छाड़ की गई है अन्यथा भेजा गया सामान सुरक्षित है। निस्संदेह मुद्राओं के प्रयोग ने नगरीकरण के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

III. नगरीकरण का महत्त्व

मेसोपोटामिया में नगरों के निर्माण ने समाज के विकास में उल्लेखीय भूमिका निभाई। नगरों के निर्माण के कारण लोगों को सुविधाएँ देने के लिए अनेक संस्थाएँ अस्तित्व में आईं। नगरों में सुविधाओं के कारण लोग गाँवों को छोड़कर नगरों में बसने लगे। नगरों में कुशल परिवहन व्यवस्था, शिक्षण संस्थाएँ एवं स्वास्थ्य संबंधी देखभाल केंद्र स्थित थे। नगरों के कारण उद्योगों एवं व्यापार को प्रोत्साहन मिला। नगरों के लोग पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं थे।

उन्हें खाद्यान्न के लिए गाँवों पर निर्भर रहना पड़ता था। इसलिए उनमें आपसी लेन-देन होता रहता था। नगरों में भव्य मदिरों का निर्माण हुआ। मंदिरों के निर्माण के कारण बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ। नगरों के निर्माण ने श्रम विभाजन को प्रोत्साहित किया। नगरों के लोग अधिक सुरक्षित महसूस करते थे। नगरों में विभिन्न समुदायों के लोग रहते थे। इससे आपसी एकता एवं विभिन्न संस्कृतियों के विकास को बल मिला।

प्रश्न 3.
मेसोपोटामिया के प्रसिद्ध नगरों एवं उनके महत्त्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
मेसोपोटामिया सभ्यता में विभिन्न प्रकार के शहरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन काल मेसोपोटामिया में नगरीकरण की प्रक्रिया 3000 ई० पू० में आरंभ हुई थी। इस काल के कुछ प्रसिद्ध नगरों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. उरुक :
उरुक मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर था। यह नगर आधुनिक इराक की राजधानी बग़दाद से 250 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व की ओर फ़रात (Euphrates) नदी के तट पर स्थित था। इसका उत्थान 3000 ई० पू० में हुआ था। इसकी गणना उस समय विश्व के सबसे विशाल नगरों में की जाती थी। यह उस समय 250 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था। 2800 ई० पू० के आस-पास इसका आकार बढ़ कर 400 हैक्टेयर हो गया था।

इस नगर की स्थापना सुमेरिया के प्रसिद्ध शासक एनमर्कर (Enmerkar) ने की थी। उसने इस नगर में प्रसिद्ध इन्नाना देवी (Goddess Inanna) के मंदिर का निर्माण किया था। उरुक के एक अन्य प्रसिद्ध शासक गिल्गेमिश (Gilgamesh) ने इसे अपने साम्राज्य की राजधानी घोषित किया था।

उसने इस नगर की सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर एक विशाल दीवार का निर्माण किया था। इस नगर के उत्खनन (excavation) का वास्तविक कार्य जर्मनी के जूलीयस जोर्डन (Julius Jordan) ने 1913 ई० में आरंभ किया। 3000 ई० पू० के आस-पास उरुक नगर ने तकनीकी क्षेत्र में अद्वितीय विकास किया। इसका अनुमान इस बात से लगाया जाता है कि उस समय के लोगों ने अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औज़ारों का प्रयोग आरंभ कर दिया था।

इसके अतिरिक्त वास्तुविदों (architects) ने ईंटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया था। इससे भवन निर्माण कला के क्षेत्र में एक नयी क्राँति आई। उस समय बड़ी संख्या में लोग चिकनी मिट्टी के शंकु (clay cones) बनाने एवं पकाने का कार्य करते थे। इन शंकुओं को भिन्न-भिन्न रंगों से रंगा जाता था। इसके पश्चात् इन्हें मंदिरों की दीवारों पर लगाया जाता था।

इससे मंदिरों की सुंदरता बहुत बढ़ जाती थी। उरुक नगर के लोगों ने मूर्तिकला के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति की। इसका अनुमान 3000 ई० पू० में उरुक नगर से प्राप्त वार्का शीर्ष (Warka Head) से लगाया जा सकता है। यह एक स्त्री का सिर था। इसे सफ़ेद संगमरमर को तराश कर बनाया गया था। कम्हार के चाक (potter’s wheel) के निर्माण से प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया। इस कारण बड़ी संख्या में एक जैसे बर्तन बनाना सुगम हो गया।

2. उर:
उर मेसोपोटामिया का एक अन्य प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण नगर था। यह बग़दाद से 300 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व की ओर स्थित था। यह फ़रात नदी से केवल 15 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित था। इस नगर की सबसे पहले खुदाई एक अंग्रेज़ जे० ई० टेलर (J. E. Taylor) द्वारा 1854-55 ई० में की गई। इस नगर की व्यापक स्तर पर खुदाई का कार्य 1920 एवं 1930 के दशक में की गई।

उर नगर की खुदाई से जो निष्कर्ष सामने आता है उससे यह पता चलता है कि इसमें नगर योजना का पालन नहीं किया गया था। इसका कारण यह था कि इस नगर की गलियाँ संकरी एवं टेढ़ी-मेढ़ी थीं। अतः पहिए वाली गाड़ियों का घरों तक पहुँचना संभव न था। अतः अनाज के बोरों तथा ईंधन के गट्ठों को संभवतः गधों पर लाद कर पहुँचाया जाता था। उर नगर में मोहनजोदड़ो की तरह जल निकासी के लिए गलियों के किनारे नालियाँ नहीं थीं।

ये नालियाँ घरों के भीतरी आँगन में पाई गई हैं। इससे यह सहज अनुमान लगाया जाता है कि घरों की छतों का ढलान भीतर की ओर होता था। अत: वर्षा के पानी का निकास नालियों के माध्यम से आँगन के भीतर बनी हुई हौजों (sumps) में ले जाया जाता था।

ऐसा इसलिए किया गया था ताकि तीव्र वर्षा के कारण घरों के बाहर बनी कच्ची गलियों में कीचड़ न एकत्र हो जाए। नगर की खुदाई से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उस समय के लोग अपने घर का सारा कूड़ा-कचरा बाहर गलियों में फैंक देते थे। इस कारण गलियों की सतहें ऊँची उठ जाती थीं। इस कारण कुछ समय बाद घरों के बरामदों को भी ऊँचा करना पड़ता था ताकि वर्षा के दिनों में बाहर से पानी एवं कूड़ा बह कर घरों के अंदर न आ जाए। उर नगर के घरों की एक अन्य विशेषता यह थी कि कमरों के अंदर रोशनी खिड़कियों से नहीं अपितु दरवाज़ों से होकर आती थी।

ये दरवाज़े आँगन में खुला करते थे। इससे घरों में परिवारों की गोपनीयता (privacy) बनी रहती थी। उस समय घरों के बारे में उर के लोगों में अनेक प्रकार के अंध-विश्वास प्रचलित थे। जैसे यदि घर की दहलीज़ (threshold) ऊँची उठी हुई हो तो धन-दौलत प्राप्त होता है। यदि सामने का दरवाजा किसी दूसरे के घर की ओर न खुले तो वह सौभाग्य प्रदान करता है। किंतु यदि घर का मुख्य दरवाजा बाहर की ओर खुले तो पत्नी अपने पति के लिए एक सिरदर्द बनेगी।

उर नगर की खुदाई से जो हमें सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु मिली है वह थी शाही कब्रिस्तान । यहाँ से 16 राजाओं एवं रानियों की कब्र प्राप्त हुई हैं। इन कब्रों में शवों के साथ सोना, चाँदी एवं बहुमूल्य पत्थरों को दफनाया गया है। इसके अतिरिक्त उनके प्रसिद्ध राजदरबारियों, सैनिकों, संगीतकारों, सेवकों एवं खाने-पीने की वस्तुओं को भी उनके शवों के साथ दफनाया गया था।

इससे अनुमान लगाया जाता है कि उर के लोग मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे। साधारण लोगों के शवों को वैसे ही दफ़न कर दिया जाता था। कुछ लोगों के शव घरों के फ़र्शों के नीचे भी दफ़न पाए गए थे।

3. मारी:
मारी प्राचीन मेसोपोटामिया का एक अन्य महत्त्वपूर्ण नगर था। यह नगर 2000 ई० पू० के पश्चात् खूब फला-फूला। मारी में लोग खेती एवं पशुपालन का धंधा करते थे। पशुचारकों को जब अनाज एवं धातु 431 के औज़ारों आदि की आवश्यकता पड़ती थी तो वे अपने पशुओं, माँस एवं चमड़े के बदले इन्हें प्राप्त करते थे। पशुओं के गोबर की खाद फ़सलों के अधिक उत्पादन के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होती थी। यद्यपि किसान एवं गड़रिये एक-दूसरे पर निर्भर थे फिर भी उनमें आपसी लड़ाइयाँ होती रहती थीं।

इन लड़ाइयों के मुख्य कारण ये थे-प्रथम. गडरिये अक्सर अपनी भेड-बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए हए खेतों में से गज़ार कर ले जाते थे। इससे फ़सलों को बहुत नुकसान पहुँचता था। दूसरा, कई बार ये गड़रिये जो खानाबदोश होते थे, किसानों के गाँवों पर आक्रमण कर उनके माल को लूट ले जाते थे। तीसरा, अनेक बार किसान इन पशुचारकों का रास्ता रोक लेते थे तथा उन्हें अपने पशुओं को जल स्रोतों तक नहीं ले जाने देते थे। गड़रियों के कुछ समूह फ़सल काटने वाले मज़दूरों अथवा भाड़े के सैनिकों के रूप में आते थे। समृद्ध होने पर वे यहीं बस जाते थे।

मारी में अक्कदी, एमोराइट, असीरियाई तथा आर्मीनियन जाति के लोग रहते थे। मारी के राजा एमोराइट समुदाय से संबंधित थे। उनकी पोशाक वहाँ के मूल निवासियों से भिन्न होती थी। मारी के राजा मेसोपोटामिया के विभिन्न देवी-देवताओं का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने डैगन (Dagan) देवता की स्मृति में मारी में एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था। इस प्रकार मारी में विभिन्न जातियों एवं समुदायों के मिश्रण से वहाँ एक नई संस्कृति का जन्म हआ।

मारी में क्योंकि विभिन्न जन-जातियों के लोग रहते थे इसलिए वहाँ के राजाओं को सदैव सतर्क रहना पड़ता था। खानाबदोश पशुचारकों की गतिविधियों पर विशेष नज़र रखी जाती थी। मारी के प्रसिद्ध शासक ज़िमरीलिम (Zimrilim) ने वहाँ एक विशाल राजमहल का निर्माण (1810 1760 ई० पू०) करवाया था। यह 2.4 हैक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ था। इसके 260 कमरे थे। यह अपने समय में न केवल अन्य राजमहलों में सबसे विशाल था अपितु यह अत्यंत सुंदर भी था।

इसका निर्माण विभिन्न रंगों के सुंदर पत्थरों से किया गया था। इस राजमहल में लगे भित्ति चित्र (wall paintings) इतने आकर्षक थे कि इसे देखने वाला व्यक्ति चकित रह जाता था। इस राजमहल की भव्यता को अपनी आँखों से देखने सीरिया एवं अलेप्पो (Aleppo) के शासक स्वयं आए थे। मारी नगर व्यापार का एक प्रसिद्ध केंद्र भी था। इसके न केवल मेसोपोटामिया के अन्य नगरों अपितु विदेशों, ती. सीरिया. लेबनान.ईरान आदि देशों के साथ व्यापारिक संबंध थे।

मारी में आने-जाने वाले जहाजों के सामान की अधिकारियों द्वारा जाँच की जाती थी। वे जहाजों में लदे हुए माल की कीमत का लगभग 10% प्रभार (charge) वसूल करते थे। मारी की कुछ पट्टिकाओं (tablets) में साइप्रस के द्वीप अलाशिया (Alashiya) से आने वाले ताँबे का उल्लेख मिला है। यह द्वीप उन दिनों ताँबे तथा टिन के व्यापार के लिए विशेष रूप से जाना जाता था। मारी के व्यापार ने निस्संदेह इस नगर की समृद्धि में उल्लेखनीय योगदान दिया था।

4. निनवै :
निनवै प्राचीन मेसोपोटामिया के महत्त्वपूर्ण नगरों में से एक था। यह दज़ला नदी के पूर्वी तट पर स्थित था। यह 1800 एकड़ भूमि में फैला हुआ था। इसकी स्थापना 1800 ई० पू० में नीनस (Ninus) ने की थी। असीरियाई शासकों ने निनवै को अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया था। सेनाचारिब (Sennacharib) ने अपने शासनकाल (705 ई० पू० से 681 ई० पू०) में निनवै का अद्वितीय विकास किया। उसने यहाँ एक विशाल राजमहल का निर्माण करवाया। यह 210 मीटर लंबा एवं 200 मीटर चौड़ा था। इसमें 80 कमरे थे। इसे अत्यंत सुंदर मूर्तियों एवं चित्रकारी से सुसज्जित किया गया था। इस राजमहल में अनेक फव्वारे एवं उद्यान लगाए गए थे।

इसके अतिरिक्त उसने निनवै में अनेक भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया। उसने यातायात के साधनों का विकास किया। उसने कृषि के विकास के लिए अनेक नहरें खुदवाईं। उसने निनवै की सुरक्षा के लिए चारों ओर एक विशाल दीवार का निर्माण करवाया। निनवै के विकास में दूसरा महत्त्वपूर्ण योगदान असुरबनिपाल (Assurbanipal) ने दिया। उसने 668 ई० पू० से 627 ई० पू० तक शासन किया था। उसे भवन निर्माण कला से विशेष प्यार था।

अतः उसने अपने साम्राज्य से अच्छे कारीगरों एवं कलाकारों को निनवै में एकत्र किया। उन्होंने अनेक भव्य भवनों एवं मंदिरों का निर्माण किया। पुराने भवनों एवं मंदिरों की मुरम्मत भी की गई। अनेक उद्यान स्थापित किए गए। इससे निनवै की सुंदरता में एक नया निखार आ गया। उसे साहित्य से विशेष लगाव था। अतः उसकी साहित्य के विकास में बहुत दिलचस्पी थी। उसने निनवै में नाबू (Nabu) के मंदिर में एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की थी। इस पुस्तकालय में उसने अनेक प्रसिद्ध लेखकों को बुला कर उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों को रखवाया था।

इस पुस्तकालय में लगभग 1000 मूल ग्रंथ एवं 30,000 पट्टिकाएँ (tablets) थीं। इन्हें विषयानुसार वर्गीकृत किया गया था। इनमें प्रमुख विषय ये थे इतिहास, महाकाव्य, ज्योतिष, दर्शन, विज्ञान एवं कविताएँ। असुरबनिपाल ने स्वयं भी अनेक पट्टिकाएँ लिखीं। असुरबनिपाल के पश्चात् निनवै ने अपना गौरव खो दिया।

5. बेबीलोन :
बेबीलोन दज़ला नदी के उत्तर-पश्चिम में स्थित था। इसकी राजधानी का नाम बेबीलोनिया था। इस नगर ने प्राचीन काल मेसोपोटामिया के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस नगर की स्थापना अक्कद (Akkad) के शासक सारगोन (Sargon) ने अपने शासनकाल (2370 ई० पू०-2315 ई० पू०) के दौरान की थी। उसने यहाँ अनेक भवनों का निर्माण करवाया। उसने देवता मर्दुक (Marduk) की स्मृति में एक विशाल मंदिर का निर्माण भी करवाया। हामूराबी के शासनकाल (1780 ई० पू०-1750 ई० पू०) में बेबीलोन ने उल्लेखनीय विकास किया।

बाद में असीरिया के शासक तुकुती निर्ता (Tukuti Ninarta) ने बेबीलोन पर अधिकार कर लिया था। 625 ई० पू० में नैबोपोलास्सर (Nabopolassar) ने बेबीलोनिया को असीरियाई शासन से स्वतंत्र करवा लिया था। इस प्रकार नैबोपोलास्सर ने बेबीलोन में कैल्डियन वंश की स्थापना की। उसके एवं उसके उत्तराधिकारियों के अधीन बेबीलोन में एक गौरवपूर्ण युग का आरंभ हुआ। इसकी गणना विश्व के प्रमुख नगरों में की जाने लगी।

उस समय इसका क्षेत्रफल 850 हैक्टेयर से अधिक था। इसके चारों ओर एक तिहरी दीवार (triple wall) बनाई गई थी। इसमें अनेक विशाल एवं भव्य राजमहलों एवं मंदिरों का निर्माण किया गया था। एक विशाल ज़िगुरात (Ziggurat) भाव सीढ़ीदार मीनार (stepped tower) बेबीलोन के आकर्षण का मुख्य केंद्र था।

बेबीलोन एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र भी था। इस नगर ने भाषा, साहित्य, विज्ञान एवं चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। 331 ई० पू० में सिकंदर ने बेबीलोन पर अधिकार कर लिया था। नैबोनिडस (Nabonidus) स्वतंत्र बेबीलोन का अंतिम शासक था।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया सभ्यता के ‘मारी नगर’ का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया करके प्रश्न नं० 3 के भाग 3 का उत्तर देखें।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों के स्वरूप की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
मेसोपोटामिया के शहरी जीवन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शहरी जीवन की शुरुआत 3000 ई० पू० में मेसोपोटामिया में हुई थी। उर, उरुक, मारी, निनवै एवं बेबीलोन आदि मेसोपोटामिया के प्रमुख शहर थे। प्रारंभिक शहरी समाजों के स्वरूप के बारे में हम अग्रलिखित तथ्यों से अनुमान लगा सकते हैं

1. नगर योजना:
मेसोपोटामिया के नगर एक वैज्ञानिक योजना के अनुसार बनाए गए थे। नगरों में मज़बूत भवनों का निर्माण किया जाता था। अत: मकानों की नींव में पकाई हुई ईंटों का प्रयोग किया जाता था। उस समय अधिकतर घर एक मंजिला होते थे। इन घरों में एक खुला आँगन होता था। इस आँगन के चारों ओर कमरे बनाए जाते थे। गर्मी से बचने के लिए धनी लोग अपने घरों के नीचे तहखाने बनाते थे।

मकानों में प्रकाश के लिए खिड़कियों का प्रबंध होता था। उर नगर के लोग परिवारों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए खिड़कियाँ नहीं बनाते थे। पानी की निकासी के लिए नालियों का प्रबंध किया जाता था। नगरों में यातायात की आवाजाही के लिए सड़कों का उचित प्रबंध किया जाता था। प्रशासन सड़कों की सफाई की ओर विशेष ध्यान देता था। सड़कों पर रोशनी का भी प्रबंध किया जाता था।

2. प्रमुख वर्ग :
उस समय प्रारंभिक शहरी समाजों में सामाजिक असमानता के भेद का प्रचलन हो चुका था। उस समय समाज में तीन प्रमुख वर्ग प्रचलित थे। प्रथम वर्ग कुलीन लोगों का था। इसमें राजा, राज्य के अधिकारी, उच्च सैनिक अधिकारी, धनी व्यापारी एवं पुरोहित सम्मिलित थे। इस वर्ग को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। इस वर्ग के लोग बहुत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। वे भव्य महलों एवं भवनों में रहते थे। वे बहुमूल्य वस्त्रों को पहनते थे।

वे अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाते थे। उनकी सेवा में अनेक दास-दासियाँ रहती थीं। दूसरा वर्ग मध्य वर्ग था। इस वर्ग में छोटे व्यापारी, शिल्पी, राज्य के अधिकारी एवं बुद्धिजीवी सम्मिलित थे। इनका जीवन स्तर भी काफी अच्छा था। तीसरा वर्ग समाज का सबसे निम्न वर्ग था। इसमें किसान, मजदूर एवं दास सम्मिलित थे। यह समाज का बहुसंख्यक वर्ग था।

इस वर्ग की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। उर में मिली शाही कब्रों में राजाओं एवं रानियों के शवों के साथ अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ विशाल मात्रा में मिली हैं। दूसरी ओर साधारण लोगों के शवों के साथ केवल मामूली वस्तुओं को दफनाया जाता था। इससे स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय धन-दौलत का अधिकाँश हिस्सा एक छोटे-से वर्ग में केंद्रित था।

3. परिवार :
परिवार को समाज की आधारशिला माना जाता था। प्राचीन काल में मेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार (nuclear family) का प्रचलन अधिक था। इस परिवार में पुरुष, उसकी पत्नी एवं उनके बच्चे सम्मिलित होते थे। पिता परिवार का मुखिया होता था। परिवार के अन्य सदस्यों पर उसका पूर्ण नियंत्रण होता था। अतः परिवार के सभी सदस्य उसके आदेशों का पालन करते थे। उस समय परिवार में पुत्र का होना आवश्यक माना जाता था। माता-पिता अपने बच्चों को बेच सकते थे। बच्चों का विवाह माता-पिता की सहमति से होता था। उस समय विवाह बहुत हर्षोल्लास के साथ किए जाते थे।

4. स्त्रियों की स्थिति:
प्रारंभिक शहरी समाज में स्त्रियों की स्थिति काफी अच्छी थी। उन्हें अनेक अधिकार प्राप्त थे। वे पुरुषों के साथ धार्मिक एवं सामाजिक उत्सवों में समान रूप से भाग लेती थीं। पति की मृत्यु होने पर वह पति की संपत्ति की संरक्षिका मानी जाती थीं। पत्नी को पती से तलाक लेने एवं पुनः विवाह करने का अधिकार प्राप्त था। वे अपना स्वतंत्र व्यापार कर सकती थीं।

वे अपने पथक दास-दासियाँ रख सकती थीं। वे पुरोहित एवं समाज के अन्य उच्च पदों पर नियुक्त हो सकती थी। उस समय समाज में देवदासी प्रथा प्रचलित थी। उस समय पुरुष एक स्त्री से विवाह करता था किंतु उसे अपनी हैसियत के अनुसार कुछ उप-पत्नियाँ रखने का भी अधिकार प्राप्त था।

5. दासों की स्थिति :
प्रारंभिक शहरी समाजों में दासों की स्थिति सबसे निम्न थी। उस समय दास तीन प्रकार के थे-(i) युद्धबंदी (ii) माता-पिता द्वारा बेचे गये बच्चे एवं (iii) कर्ज न चुका सकने वाले व्यक्ति । दास बनाए गए व्यक्तियों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था। इन दासों को किसी प्रकार का कोई अधिकार प्राप्त न था। उन्हें अपने स्वामी के आदेशों का पालन करना पड़ता था। ऐसा न करने वाले दास अथवा दासी को कठोर दंड दिए जाते थे। यदि कोई दास भागने का प्रयास करते हुए पकड़ा जाता तो उसे मृत्यु दंड दिया जाता था।

स्वामी जब चाहे किसी दास की सेवा से प्रसन्न होकर उसे मुक्त कर सकता था। कोई भी दास अपने स्वामी को धन देकर अपनी मुक्ति प्राप्त कर सकता था। कोई भी स्वतंत्र नागरिक अपनी दासी को उप-पत्नी बना सकता था। दासी से उत्पन्न संतान को स्वतंत्र मान लिया जाता था।

6. मनोरंजन :
प्रारंभिक शहरी समाजों के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। नृत्य गान उनके जीवन का एक अभिन्न अंग था। मंदिरों में भी संगीत एवं नृत्य-गान के विशेष सम्मेलन होते रहते थे। वे शिकार खेलने, पशु-पक्षियों की लड़ाइयाँ देखने एवं कुश्तियाँ देखने के भी बहुत शौकीन थे। वे शतरंज खेलने में भी बहुत रुचि लेते थे। खिलौने बच्चों के मनोरंजन का मुख्य साधन थे।

प्रश्न 6.
दक्षिणी मेसोपोटामिया के मंदिरों तथा उनके महत्त्व के बारे में आप क्या जानते हैं ?
अथवा
दक्षिणी मेसोपोटामिया के मंदिरों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
दक्षिणी मेसोपोटामिया के मंदिरों ने यहाँ के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मेसोपोटामिया के लोग अपने देवी-देवताओं की स्मृति में अनेक मंदिरों का निर्माण करते थे। इनमें प्रमुख मंदिर नन्ना (Nanna) जो चंद्र देव था, अनु (Anu) जो सूर्य देव था, एनकी (Enki) जो वायु एवं जल देव था तथा इन्नाना (Inanna) जो प्रेम एवं युद्ध की देवी थी, के लिए बनाए गए थे। इनके अतिरिक्त प्रत्येक नगर का अपना देवी-देवता होता था जो अपने नगर की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहते थे।

1. आरंभिक मंदिर :
दक्षिणी मेसोपोटामिया में आरंभिक मंदिर छोटे आकार के थे तथा ये कच्ची ईंटों के बने हुए थे। समय के साथ-साथ जैसे-जैसे इन मंदिरों का महत्त्व बढ़ता गया वैसे-वैसे ये मंदिर विशाल एवं भव्य होते चले गए। इन मंदिरों को पर्वतों के ऊपर बनाया जाता था। उस समय मेसोपोटामिया के लोगों की यह धारणा थी कि देवता पर्वतों में निवास करते हैं। ये मंदिर पक्की ईंटों से बनाए जाते थे।

इन मंदिरों की विशेषता यह थी कि मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ खास अंतरालों के पश्चात् भीतर और बाहर की ओर मुड़ी होती थीं। साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं। इन मंदिरों के आँगन खुले होते थे तथा इनके चारों ओर अनेक कमरे बने होते थे। प्रमुख कमरों में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं। कुछ कमरों में मंदिरों के परोहित निवास करते थे। अन्य कमरे मंदिर में आने वाले यात्रियों के लिए थे।

2. मंदिरों के क्रियाकलाप :
दक्षिणी मेसोपोटामिया के समाज में मंदिरों की उल्लेखनीय भूमिका थी। उस समय मंदिरों को बहुत-सी भूमि दान में दी जाती थी। इस भूमि पर खेती की जाती थी एवं पशु पालन किया जाता था। इनके अतिरिक्त इस भूमि पर उद्योगों की स्थापना की जाती थी एवं बाजार स्थापित किए जाते थे। इस कारण मंदिर बहुत धनी हो गए थे।

मेसोपोटामिया के मंदिरों में प्राय: विद्यार्थियों को शिक्षा भी दी जाती थी। शिक्षा का कार्य पुरोहितों द्वारा किया जाता था। अनेक मंदिरों में बड़े-बड़े पुस्तकालय भी स्थापित किए गए थे। मंदिरों द्वारा सामान की खरीद एवं बिक्री भी की जाती थी। मंदिरों द्वारा व्यापारियों को धन सूद पर दिया जाता था। इस कारण मंदिरों ने एक मुख्य शहरी संस्था का रूप धारण कर लिया था।

3. उपासना विधि:
दक्षिणी मेसोपोटामिया के लोग परलोक की अपेक्षा इहलोक की अधिक चिंता करते थे। वे अपने देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए अन्न, दही, खजूर एवं मछली आदि भेंट करते थे। इनके अतिरिक्त वे बैलों, भेड़ों एवं बकरियों आदि की बलियाँ भी देते थे। इन्हें विधिपूर्ण पुरोहितों के सहयोग से देवी-देवताओं को भेंट किया जाता था। उस समय मेसोपोटामिया के लोगों के कर्मकांड न तो अधिक जटिल थे एवं न ही अधिक खर्चीले। इसके बदले उपासक यह आशा करते थे कि उनके जीवन में कभी कष्ट न आएँ।

4. मनोरंजन के केंद्र :
दक्षिणी मेसोपोटामिया के मंदिर केवल उपासना के केंद्र ही नहीं थे अपितु वे मनोरंजन के केंद्र भी थे। इन मंदिरों में स्थानीय गायक अपनी कला से लोगों का मनोरंज करते थे। इन मंदिरों में समूहगान एवं लोक नृत्य भी हुआ करते थे। यहाँ नगाड़े एवं अन्य संगीत यंत्रों को बजाया जाता था। त्योहारों के अवसरों पर यहाँ बड़ी संख्या में लोग आते थे। वे एक-दूसरे के संपर्क में आते थे तथा उनमें एक नया प्रोत्साहन उत्पन्न होता था।

5. लेखन कला के विकास में योगदान :
दक्षिणी मेसोपोटामिया में लेखन कला के विकास में मंदिरों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। लेखन कला के अध्ययन एवं अभ्यास के लिए अनेक मंदिरों में पाठशालाएँ स्थापित की गई थीं। यहाँ विद्यार्थियों को सर्वप्रथम संकेतों की नकल करना सिखाया जाता था। धीरे-धीरे वे कठिन शब्दों को लिखने में समर्थ हो जाते थे। क्योंकि उस समय बहत कम लोग लिपिक का कार्य कर सकते थे इसलिए समाज में इस वर्ग की काफी प्रतिष्ठा थी।

प्रश्न 7.
लेखन पद्धति के विकास के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
लेखन पद्धति के विकास के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानव इतिहास पर लेखन कला का क्या प्रभाव पड़ा ?
अथवा
लेखन कला की दुनिया को सबसे बड़ी देन क्या है ?
उत्तर:
I. लेखन कला का विकास

किसी भी देश की सभ्यता के बारे में जानने के लिए हमें उस देश की लिपि एवं भाषा का ज्ञात होना अत्यंत आवश्यक है। प्रारंभिक नगरों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि लेखन कला का विकास था। इसे सभ्यता के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पग माना जाता है। मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम लिपि की खोज सुमेर में 3200 ई० पू० में हुई। इस लिपि का आरंभ वहाँ के मंदिरों के पुरोहितों ने किया। उस समय मंदिर विभिन्न क्रियाकलापों और व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे। इन मंदिरों की देखभाल पुरोहितों द्वारा स्वतंत्र रूप से की जाती थी।

पुरोहित मंदिरों की आय-व्यय तथा व्यापार का पूर्ण विवरण एक निराले ढंग से रखते थे। वे मिट्टी की पट्टिकाओं पर मंदिरों को मिलने वाले सामानों एवं जानवरों के चित्रों जैसे चिह्न बनाकर उनकी संख्या भी लिखते थे। हमें मेसोपोटामिया के दक्षिणी नगर उरुक के मंदिरों से संबंधित लगभग 5000 सूचियाँ मिली हैं। इनमें बैलों, मछलियों एवं रोटियाँ आदि के चित्र एवं संख्याएँ दी गई हैं। इससे वस्तुओं को स्मरण रखना सुगम हो जाता था। इस प्रकार मेसोपोटामिया में चित्रलिपि (pictographic script) का जन्म हुआ।

मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं (tablets of clay) पर लिखा करते थे। लिपिक चिकनी मिट्टी को गीला करता था। इसके पश्चात् उसे गूंध कर एक ऐसे आकार की पट्टी का रूप दे देता था जिसे वह सुगमता से अपने हाथ में पकड़ सके। इसके बाद वह सरकंडे की तीली की तीखी नोक से उसकी नम चिकनी सतह पर कीलाकार चिह्न (cuneiform) बना देता था। इसे बाएं से दाएँ लिखा जाता था। इस लिपि का प्रचलन 2600 ई० पू० में हुआ था। 1850 ई० पू० में कीलाकार लिपि के अक्षरों को पहचाना एवं पढ़ा गया। ये पट्टिकाएँ विभिन्न आकारों की होती थीं। जब इन पट्टिकाओं पर लिखने का कार्य पूर्ण हो जाता था तो इन्हें पहले धूप में सुखाया जाता था तथा फिर आग में पका लिया जाता था।

इस कारण वे पत्थर की तरह कठोर हो जाया करती थीं। इसके तीन लाभ थे। प्रथम, वे पेपिरस (pepirus) की तरह जल्दी नष्ट नहीं होती थीं। दूसरा, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित ले जाया जा सकता था। तीसरा, एक बार लिखे जाने पर इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करना संभव नहीं था। इस लिपि का प्रयोग अब मंदिरों को दान में प्राप्त वस्तुओं का ब्योरा रखने के लिए नहीं अपितु शब्द कोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता देने तथा राजाओं के कार्यों का वर्णन करने के लिए किया जाने लगा।

मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन (Sumerian) थी। 2400 ई० पू० के आस-पास सुमेरियन भाषा का स्थान अक्कदी (Akkadi) भाषा ने ले लिया। 1400 ई० पू० से धीरे-धीरे अरामाइक (Aramaic) भाषा का प्रचलन आरंभ हुआ। 1000 ई० पू० के पश्चात् अरामाइक भाषा का प्रचलन व्यापक रूप से होने लगा। यद्यपि मेसोपोटामिया में लिपि का प्रचलन हो चुका था किंतु इसके बावजूद यहाँ साक्षरता (literacy) की दर बहुत कम थी।

इसका कारण यह था कि केवल चिह्नों की संख्या 2000 से अधिक थी। इसके अतिरिक्त यह भाषा बहुत पेचीदा थी। अतः इस भाषा को केवल विशेष प्रशिक्षण प्राप्त लोग ही सीख सकते थे। मेसोपोटामिया की लिपि के कारण ही इतिहासकार इस सभ्यता पर विस्तृत प्रकाश डाल सके हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार रिचर्ड एल० ग्रीवस का यह कथन ठीक है कि, “सुमेरियनों की सबसे महत्त्वपूर्ण एवं दीर्घकालीन सफलता उनकी लेखन कला का विकास था।”1

II. लेखन कला की देन

मेसोपोटामिया में लेखन कला के आविष्कार को मानव इतिहास की एक अति महत्त्वपूर्ण घटना माना जाता था। यह मानव सभ्यता के विकास में एक मील का पत्थर सिद्ध हुई। लेखन कला के कारण सम्राट के आदेशों, उनके समझौतों तथा कानूनों को दस्तावेज़ों का रूप देना संभव हुआ। मेसोपोटामिया ने विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों-गणित, खगोल विद्या तथा औषधि विज्ञान में आश्चर्यजनक उन्नति की थी। उनके लिखित दस्तावेजों के कारण विश्व को उनके अमूल्य ज्ञान का पता चला।

उनके द्वारा दी गई वर्ग, वर्गमूल, चक्रवृद्धि ब्याज, गुणा तथा भाग, वर्ष का 12 महीनों में विभाजन, 1 महीने का 4 हफ्तों में विभाजन, 1 दिन का 24 घंटों में तथा 1 घंटे का 60 मिनटों में विभाजन, सूर्य ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण, आकाश में तारों तथा तारामंडल की स्थिति को आज पूरे विश्व में मान्यता दी गई है। लेखन कला के विकास के कारण मेसोपोटामिया में शिक्षा एवं साहित्य के विकास में आशातीत विकास हुआ। निनवै से प्राप्त हुआ एक विशाल पुस्तकालय इसकी पुष्टि करता है। इस कारण लोगों में नव-चेतना का संचार हुआ। संक्षेप में इसने मेसोपोटामिया के समाज पर दूरगामी प्रभाव डाले।

क्रम संख्या

क्रम संख्याकालघटना
1.7000-6000 ई० पू०मेसोपोटामिया में कृषि का आरंभ।
2.3200 ई० पू०मेसोपोटामिया में लेखन कला का विकास।
3.3050 ई० पू०लगश के प्रथम शासक उरनिना का सिंहासन पर बैठना।
4.3000 ई० पू०मेसोपोटामिया में नगरों का उत्थान, उरुक नगर का आरंभ, वार्का शीर्ष का प्राप्त होना।
5.2000-1759 ई० पू०मारी नगर का उत्थान।
6.2800-2370 ई० पू०किश नगर का विकास।
7.2670 ई० पू०मेसनीपद का उर के सिंहासन पर बैठना।
8.2600 ई० पू०कीलाकार लिपि का प्रचलन।
9.2400 ई० पू०सुमेरियन के स्थान पर अक्कदी भाषा का प्रयोग।
10.2200 ई० पू०एलमाइटों द्वारा उर नगर का विनाश।
11.2000 ई० पू०गिल्गेमिश महाकाव्य को 12 पट्टिकाओं पर लिखवाना।
12.1810-1760 ई० पू०ज़िमरीलिम के मारी स्थित राजमहल का निर्माण।
13.2400 ई० पू०सुमेरियन भाषा का प्रचलन बंद होना।
14.1800 ई० पू०नीनस द्वारा निनवै की स्थापना।
15.1780-1750 ई० पू०हामूराबी का शासनकाल।
16.1759 ई० पू०हामूराबी द्वारा मारी नगर का विनाश।
17.1400 ई० पू०अरामाइक भाषा का प्रचलन।
18.705-681 ई० पू०निनवै में सेनाचारिब का शासनकाल।
19.668-627 ई० पू०असुरबनिपाल का शासनकाल।
20.625 ई० पू०नैबोपोलास्सर द्वारा बेबीलोनिया को असीरियाई शासन से स्वतंत्र करवाना।
21.612 ई० पू०नैबोपोलास्सर द्वारा निमरुद नगर का विनाश।
22.1840 ईमेसोपोटामिया में पुरातत्त्वीय खोजों का आरंभ।
23.1845-1851 ई०हेनरी अस्टेन लैयार्ड द्वारा निमरुद नगर का उत्खनन।
24.1850 ईकीलाकार लिपि के अक्षरों को पहचाना एवं पढ़ा गया। जुलीयस जोर्डन द्वारा उरुक नगर की खुदाई।
25.1913 ई०सर लियोनार्ड वूले द्वारा उर नगर की खुदाई।
261920-1930 ई。फ्रांसीसियों द्वारा मारी नगर का उत्खनन।
27.1933 ई०नैबोपोलास्सर द्वारा निमरुद नगर का विनाश।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
दजला एवं फ़रात नदियों ने मेसोपोटामिया के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कैसे ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया से अभिप्राय है दो नदियों के मध्य का प्रदेश। ये नदियाँ हैं दजला एवं फ़रात । इन नदियों को मेसोपोटामिया सभ्यता की जीवन रेखा कहा जाता है। दजला एवं फ़रात नदियों का उद्गम आर्मीनिया के उत्तरी पर्वतों तोरुस से होता है। इन पर्वतों की ऊँचाई लगभग 10,000 फुट है। यहाँ लगभग सारा वर्ष बर्फ जमी रहती है। इस क्षेत्र में वर्षा भी पर्याप्त होती है। दजला 1850 किलोमीटर लंबी है।

इसका प्रवाह तीव्र है तथा इसके तट ऊँचे एवं अधिक कटे-फटे हैं। इसलिए प्राचीनकाल में इस नदी के तटों पर बहुत कम नगरों की स्थापना हुई थी। दूसरी ओर फ़रात नदी ने मेसोपोटामिया के इतिहास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

यह नदी 2350 किलोमीटर लंबी है। इसका प्रवाह कम तीव्र है। इसके तट कम ऊँचे एवं कम कटे-फटे हैं। इस कारण प्राचीनकाल के प्रसिद्ध नगरों की स्थापना इस नदी के तटों पर हुई। दजला एवं फ़रात नदियाँ उत्तरी पर्वतों से निकल कर अपने साथ उपजाऊ मिट्टी लाती थीं। इस उपजाऊ मिट्टी के कारण एवं नहरों के कारण यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता था।

प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन के बावजूद कृषि अनेक बार संकट से घिर जाती थी। क्यों ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि अनेक बार संकटों से घिर जाती थी। इसके अनेक कारण थे। प्रथम, दजला एवं फ़रात नदियों में कभी-कभी भयंकर बाढ़ आ जाती थी। इस कारण फ़सलें नष्ट हो जाती थीं। दूसरा, कई बार पानी की तीव्र गति के कारण ये नदियाँ अपना रास्ता बदल लेती थीं। इससे सिंचाई व्यवस्था चरमरा जाती थी। मेसोपोटामिया में वर्षा की कमी होती थी।

अतः फ़सलें सूख जाती थीं। तीसरा, नदी के ऊपरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग नहरों का प्रवाह अपने खेतों की ओर मोड़ लेते थे। इस कारण निचले क्षेत्रों में बसे हुए गाँवों को खेतों के लिए पानी नहीं मिलता था। चौथा, ऊपरी क्षेत्रों के लोग अपने हिस्से की सरणी में से मिट्टी नहीं निकालते थे। इस कारण निचले क्षेत्रों में पानी का बहाव रुक जाता था। इस कारण पानी के लिए गाँववासियों में अनेक बार झगड़े हुआ करते थे।

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प्रश्न 3.
आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया में शहरीकरण के विकास में प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर का बहुमूल्य योगदान था। यहाँ की भूमि में प्राकृतिक उर्वरता थी। इससे खेती को बहुत प्रोत्साहन मिला। प्राकृतिक उर्वरता के कारण पशुओं को चारे के लिए कोई कमी नहीं थी। अत: पशुपालन को भी प्रोत्साहन मिला। पशुओं से न केवल दूध, माँस एवं ऊन प्राप्त किया जाता था अपितु उनसे खेती एवं यातायात का कार्य भी लिया जाता था। खेती एवं पशुपालन के कारण मानव जीवन स्थायी बन गया।

अत: उसे भोजन की तलाश में स्थान-स्थान पर घूमने की आवश्यकता नहीं रही। स्थायी जीवन होने के कारण मानव झोंपड़ियाँ बना कर साथ-साथ रहने लगा। इस प्रकार गाँव अस्तित्व में आए। खाद्य उत्पादन के बढ़ने से वस्तु विनिमय की प्रक्रिया आरंभ हो गई। इस कारण नये-नये व्यवसाय आरंभ हो गए। इससे नगरीकरण की प्रक्रिया को बहुत बल मिला।

प्रश्न 4.
नगरीय विकास में श्रम विभाजन का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
श्रम विभाजन को नगरीय विकास का एक महत्त्वपूर्ण कारक माना जाता है। नगरों के लोग आत्मनिर्भर नहीं होते। उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के लिए एक पत्थर की मुद्रा बनाने वाले को पत्थर पर उकेरने के लिए काँसे के औज़ारों की आवश्यकता होती है। ऐसे औजारों का वह स्वयं निर्माण नहीं करता। इसके अतिरिक्त वह मुद्रा बनाने के लिए आवश्यक रंगीन पत्थर के लिए भी अन्य व्यक्तियों पर निर्भर करता है।

वह व्यापार करना भी नहीं जानता। उसकी विशेषज्ञता तो केवल पत्थर उकेरने तक ही सीमित होती है। इस प्रकार नगर के लोग अन्य लोगों पर उनकी सेवाओं के लिए अथवा उनके द्वारा उत्पन्न की गई वस्तुओं पर निर्भर करते हैं। संक्षेप में श्रम विभाजन को शहरी जीवन का एक महत्त्वपूर्ण आधार माना जाता है।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया में मुद्राएँ किस प्रकार बनाई जाती थीं तथा इनका क्या महत्त्व था ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के नगरों से हमें बड़ी संख्या में मुद्राएँ मिली हैं। ये मुद्राएँ पत्थर की होती थीं तथा इनका आकार बेलनाकार था। ये बीच में आर-पार छिदी होती थीं। इसमें एक तीली लगायी जाती थी। इसे फिर गीली मिट्टी के ऊपर घुमा कर चित्र बनाए जाते थे। इन्हें अत्यंत कुशल कारीगरों द्वारा उकेरा जाता था। इन मुद्राओं पर कभी-कभी इसके स्वामी का नाम, उसके देवता का नाम तथा उसके रैंक आदि का वर्णन भी किया जाता था।

इन मुद्राओं का प्रयोग व्यापारियों द्वारा अपना सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित भेजने के लिए किया जाता था। ये व्यापारी अपने सामान को एक गठरी में बाँध कर ऊपर गाँठ लगा लेते थे। इस गाँठ पर वह मुद्रा का ठप्पा लगा देते थे। इस प्रकार यह मुद्रा उस सामान की प्रामाणिकता का प्रतीक बन जाती थी। यदि यह मुद्रा टूटी हुई पाई जाती तो पता लग जाता कि रास्ते में सामान के साथ छेड़छाड़ की गई है अन्यथा भेजा गया सामान सुरक्षित है। निस्संदेह मुद्राओं के प्रयोग ने नगरीकरण के विकास में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

प्रश्न 6.
3000 ई० पू० में उरुक नगर ने तकनीकी क्षेत्र में अद्वितीय विकास किया गया। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ?
उत्तर:
3000 ई० पू० के आस-पास उरुक नगर ने तकनीकी क्षेत्र में अद्वितीय विकास किया। इसका अनुमान इस बात से लगाया जाता है कि उस समय के लोगों ने अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औज़ारों का प्रयोग आरंभ कर दिया था। इसके अतिरिक्त वास्तुविदों ने ईंटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया था। इससे भवन निर्माण कला के क्षेत्र में एक नयी क्राँति आई।

इसका कारण यह था कि उस समय बड़े-बड़े कमरों की छतों के बोझ को संभालने के लिए शहतीर बनाने के लिए उपयुक्त लकड़ी उपलब्ध नहीं थी। बड़ी संख्या में लोग चिकनी मिट्टी के शंकु बनाने एवं पकाने का कार्य करते थे। इन शंकुओं को भिन्न-भिन्न रंगों से रंगा जाता था। इसके पश्चात् इन्हें मंदिरों की दीवारों पर लगाया जाता था।

इससे मंदिरों की सुंदरता बहुत बढ़ जाती थी। उरुक नगर के लोगों ने मूर्तिकला के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति की। इसका अनुमान 3000 ई० पू० में उरुक नगर से प्राप्त वार्का शीर्ष से लगाया जा सकता है। यह एक स्त्री का सिर था। इसे सफ़ेद संगमरमर को तराश कर बनाया गया था। इसके सिर के ऊपर एक खाँचा बनाया गया था जिसे शायद आभूषण पहनने के लिए बनाया गया था। कुम्हार के चाक के निर्माण से प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया। इस कारण बड़ी संख्या में एक जैसे बर्तन बनाना सुगम हो गया।

प्रश्न 7.
उर नगर में नगर योजना का पालन नहीं किया गया था। उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
उर नगर के उत्खनन से जो निष्कर्ष सामने आता है उससे यह ज्ञात होता है कि इसमें नगर योजना का पालन नहीं किया गया था। इस नगर की गलियाँ संकरी एवं टेढ़ी-मेढ़ी थीं। अतः पहिए वाली गाड़ियों का घरों तक पहुँचना संभव न था। अतः अनाज के बोरों तथा ईंधन के गट्ठों को संभवतः गधों पर लाद कर पहुँचाया जाता था।

उर नगर में मोहनजोदड़ो की तरह जल निकासी के लिए गलियों के किनारे नालियाँ नहीं थीं। ये नालियाँ घरों के भीतरी आँगन में पाई गई हैं। इससे यह सहज अनुमान लगाया जाता है कि घरों की छतों का ढलान भीतर की ओर होता था। अत: वर्षा के पानी का निकास नालियों के माध्यम से आँगन के भीतर बनी हुई हौजों में ले जाया जाता था। ऐसा इसलिए किया गया था ताकि तीव्र वर्षा के कारण घरों के बाहर बनी कच्ची गलियों में कीचड़ न एकत्र हो जाए।

उर नगर की खुदाई से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उस समय के लोग अपने घर का सारा कूड़ा कचरा बाहर गलियों में फेंक देते थे। इस कारण गलियों की सतहें ऊँची उठ जाती थीं। इस कारण कुछ समय बाद घरों के बरामदों को भी ऊँचा करना पड़ता था ताकि वर्षा के दिनों में बाहर से पानी एवं कूड़ा बह कर घरों के अंदर न आ जाए।

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प्रश्न 8.
मारी नगर क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
1) मारी में अक्कदी, एमोराइट, असीरियाई तथा आर्मीनियन जाति के लोग रहते थे। मारी के राजा एमोराइट समुदाय से संबंधित थे। उनकी पोशाक वहाँ के मूल निवासियों से भिन्न होती थी। मारी के राजा मेसोपोटामिया के विभिन्न देवी-देवताओं का बहुत सम्मान करते थे। इस प्रकार मारी में विभिन्न जातियों एवं समुदायों के मिश्रण से वहाँ एक नई संस्कृति का जन्म हुआ।

2) मारी के प्रसिद्ध शासक ज़िमरीलिम ने वहाँ एक विशाल राजमहल का निर्माण करवाया था। यह 2.4 हैक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ था। इसके 260 कमरे थे। यह अपने समय में न केवल अन्य राजमहलों में सबसे विशाल था अपितु यह अत्यंत सुंदर भी था। इसका निर्माण विभिन्न रंगों के सुंदर पत्थरों से किया गया था।

3) मारी नगर व्यापार का एक प्रसिद्ध केंद्र भी था। इसके न केवल मेसोपोटामिया के अन्य नगरों अपितु विदेशों, तुर्की, सीरिया, लेबनान, ईरान आदि देशों के साथ व्यापारिक संबंध थे। मारी में आने-जाने वाले जहाजों के सामान की अधिकारियों द्वारा जाँच की जाती थी। वे जहाजों में लदे हुए माल की कीमत का लगभग 10% प्रभार वसूल करते थे।

प्रश्न 9.
यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए ख़तरा थे ?
उत्तर:
खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए एक ख़तरा थे। इसके निम्नलिखित कारण थे।

  • गड़रिये आमतौर पर अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए हुए खेतों में से गुज़ार ले जाते थे। इससे फ़सलों को भारी क्षति पहुँचती थी।
  • कई बार ये गड़रिये जो खानाबदोश होते थे, किसानों के गाँवों पर आक्रमण कर उनके माल को लूट लेते थे। इससे शहरी अर्थव्यवस्था को आघात पहुँचता था।
  • अनेक बार किसान इन पशुचारकों का रास्ता रोक लेते थे तथा उन्हें पशुओं को जल स्रोतों तक नहीं ले जाने देते थे। इस कारण उनमें आपसी झगड़े होते थे।
  • कुछ गड़रिये फ़सल काटने वाले मजदूरों अथवा भाड़े के सैनिकों के रूप में शहर आते थे। समृद्ध होने पर वे वहीं बस जाते थे।
  • खानाबदोश समुदायों के पशुओं के अतिचारण से बहुत-ही उपजाऊ जमीन बंजर हो जाती थी।

प्रश्न 10.
मारी स्थित ज़िमरीलिम के राजमहल के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
मारी के प्रसिद्ध शासक ज़िमरीलिम ने मारी में एक भव्य राजमहल का निर्माण (1810-1760 ई० पू०) करवाया था। यह 2.4 हैक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ था। इसके 260 कमरे थे। यह अपने समय में न केवल अन्य राजमहलों में सबसे विशाल था अपितु यह अत्यंत सुंदर भी था। इसका निर्माण विभिन्न रंगों के सुंदर पत्थरों से किया गया था। इस राजमहल में लगे भित्ति चित्र बहुत सुंदर एवं सजीव थे।

इस राजमहल की भव्यता को अपनी आँखों से देखने सीरिया एवं अलेप्पो के शासक स्वयं आए थे। यह राजमहल वहाँ के शाही परिवार का निवास स्थान था। यह प्रशासन का मुख्य केंद्र था। यहाँ कीमती धातुओं के आभूषणों का निर्माण भी किया जाता था। इस राजमहल का केवल एक ही द्वार था जो उत्तर की ओर बना हुआ था।

प्रश्न 11.
असुरबनिपाल पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
असुरबनिपाल की गणना निनवै के महान् शासकों में की जाती है। उसने 668 ई० पू० से 627 ई० पू० तक शासन किया था। वह महान् भवन निर्माता था। अतः उसने अपने साम्राज्य में अनेक भव्य भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया। उसने पुराने भवनों एवं मंदिरों की मुरम्मत भी करवाई। उसने अनेक उद्यान स्थापित किए। इससे निनवै की सुंदरता को चार चाँद लग गए। वह महान् साहित्य प्रेमी भी था।

उसने निनवै में नाबू मंदिर में एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की थी। इस पुस्तकालय में उसने अनेक प्रसिद्ध लेखकों को बुला कर उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों को रखवाया था। इस पुस्तकालय में लगभग 1000 मूल ग्रंथ एवं 30,000 पट्टिकाएँ थीं। इन्हें विषयानुसार वर्गीकृत किया गया था। इनमें प्रमुख विषय ये थे-इतिहास, महाकाव्य, ज्योतिष, दर्शन, विज्ञान एवं कविताएँ। असुरबनिपाल ने स्वयं भी अनेक पट्टिकाएँ लिखीं।

प्रश्न 12.
मेसोपोटामिया के नगर बेबीलोन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
बेबीलोन दजला नदी के उत्तर-पश्चिम में स्थित था। इसकी राजधानी का नाम बेबीलोनिया था। इस नगर ने प्राचीन काल मेसोपोटामिया के इतिहास में अत्यंत उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। इस नगर की स्थापना अक्कद के शासक सारगोन ने की थी। उसने यहाँ अनेक भवनों का निर्माण करवाया। हामूराबी के शासनकाल में बेबीलोन ने अद्वितीय विकास किया। बाद में असीरिया ने बेबीलोन पर अधिकार कर लिया था। 625 ई० पू० में नैबोपोलास्सर ने बेबीलोनिया को असीरियाई शासन से स्वतंत्र करवा लिया था। उसके एवं उसके उत्तराधिकारियों के अधीन बेबीलोन में एक गौरवपूर्ण युग का आरंभ हुआ।

इसकी गणना विश्व के प्रमुख नगरों में की जाने लगी। इसका क्षेत्रफल 850 हैक्टेयर से अधिक था। इसके चारों ओर एक तिहरी दीवार बनाई गई थी। इसमें अनेक विशाल एवं भव्य राजमहलों एवं मंदिरों का निर्माण किया गया था। बेबीलोन एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र भी था। इस नगर ने भाषा, साहित्य, विज्ञान एवं चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। नगर में एक ज़िगुरात यानी सीढ़ीदार मीनार थी एवं नगर के मुख्य अनुष्ठान केंद्र तक शोभायात्रा के लिए एक विस्तृत मार्ग बना हुआ था।

प्रश्न 13.
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में सामाजिक असमानता का भेद आरंभ हो चुका था। कैसे ?
उत्तर:
उस समय प्रारंभिक शहरी समाजों में सामाजिक असमानता का भेद आरंभ हो चुका था। उस समय समाज में तीन प्रमुख वर्ग प्रचलित थे। प्रथम वर्ग कुलीन लोगों का था। इसमें राजा, राज्य के अधिकारी, उच्च सैनिक अधिकारी, धनी व्यापारी एवं पुरोहित सम्मिलित थे। इस वर्ग को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। इस वर्ग के लोग बहुत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। वे सुंदर महलों एवं भवनों में रहते थे।

वे मूल्यवान वस्त्रों को पहनते थे। वे अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाते थे। उनकी सेवा में अनेक दास-दासियाँ रहती थीं। दूसरा वर्ग मध्य वर्ग था। इस वर्ग में छोटे व्यापारी, शिल्पी, राज्य के अधिकारी एवं बुद्धिजीवी सम्मिलित थे। इनका जीवन स्तर भी काफी अच्छा था। तीसरा वर्ग समाज का सबसे निम्न वर्ग था। इसमें किसान, मजदूर एवं दास सम्मिलित थे।

यह समाज का बहुसंख्यक वर्ग था। इस वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उर में मिली शाही कब्रों में राजाओं एवं रानियों के शवों के साथ अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ जैसे आभूषण, सोने के पात्र, सफेद सीपियाँ और लाजवर्द जड़े हुए लकड़ी के वाद्य यंत्र, सोने के सजावटी खंजर आदि विशाल मात्रा में मिले हैं। दूसरी ओर साधारण लोगों के शवों के साथ केवल मामूली से बर्तनों को दफनाया जाता था। इससे स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय धन-दौलत का अधिकांश हिस्सा एक छोटे-से वर्ग में केंद्रित था।

प्रश्न 14.
शहरी अर्थव्यवस्था में एक सामाजिक संगठन का होना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर:
शहरी अर्थव्यवस्था में एक सामाजिक संगठन का होना निम्नलिखित कारणों से ज़रूरी है
1) शहरी विनिर्माताओं के लिए ईंधन, धातु, विभिन्न प्रकार के पत्थर तथा लकड़ी इत्यादि आवश्यक वस्तुएँ विभिन्न स्थानों से आती हैं। इसके लिए संगठित व्यापार और भंडारण की आवश्यकता होती है।

2) शहरों में अनाज एवं अन्य खाद्य पदार्थ गाँवों से आते हैं। अतः उनके संग्रहण एवं वितरण के लिए व्यवस्था की आवश्यकता होती है।

3) अनेक प्रकार के क्रियाकलापों में तालमेल की ज़रूरत होती है। उदाहरण के लिए मोहरों को बनाने वालों को केवल पत्थर ही नहीं, अपितु उन्हें तराश्ने के लिए औज़ार भी चाहिए।

4) शहरी अर्थव्यवस्था में अपना हिसाब-किताब भी लिखित रूप में रखना होता है।

5) ऐसी प्रणाली में कुछ लोग आदेश देते हैं एवं दूसरे उनका पालन करते हैं।

प्रश्न 15.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे।
उत्तर:
इसमें कोई संदेह नहीं कि मेसोपोटामिया के कुछ मंदिर घर जैसे ही थे। ये मंदिर छोटे आकार के थे तथा ये कच्ची ईंटों के बने हुए थे। समय के साथ-साथ जैसे-जैसे इन मंदिरों का महत्त्व बढ़ता गया वैसे-वैसे ये मंदिर विशाल एवं भव्य होते चले गए। इन मंदिरों को पर्वतों के ऊपर बनाया जाता था। उस समय मेसोपोटामिया के लोगों की यह धारणा थी कि देवता पर्वतों में निवास करते हैं। ये मंदिर पक्की ईंटों से बनाए जाते थे।

इन मंदिरों की विशेषता यह थी कि मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ खास अंतरालों के पश्चात् भीतर और बाहर की ओर मुड़ी होती थीं। साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं। इन मंदिरों के आँगन खुले होते थे तथा इनके चारों ओर अनेक कमरे बने होते थे। प्रमुख कमरों में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं। कुछ कमरों में मंदिरों के पुरोहित निवास करते थे। अन्य कमरे मंदिर में आने वाले यात्रियों के लिए थे।

प्रश्न 16.
गिल्गेमिश के महाकाव्य के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
गिल्गेमिश के महाकाव्य को विश्व साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है। गिलोमिश रुक का एक प्रसिद्ध शासक था जिसने लगभग 2700 ई० पू० वहाँ शासन किया था। उसके महाकाव्य को 2000 ई० पू० में 12 पट्टिकाओं पर लिखा गया था। इस महाकाव्य में गिल्गेमिश के बहादुरी भरे कारनामों एवं मृत्यु की मानव पर विजय का बहुत मर्मस्पर्शी वर्णन किया गया है। गिल्गेमिश उरुक का एक प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली शासक था।

वह एक महान् योद्धा था। उसने अनेक प्रदेशों को अपने अधीन कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। जहाँ एक ओर गिल्गेमिश बहुत बहादुर था वहीं दूसरी ओर वह बहुत अत्याचारी भी था। उसके अत्याचारों से देवताओं ने उसके अत्याचारों से प्रजा को मुक्त करवाने के उद्देश्य से एनकीडू को भेजा। दोनों के मध्य एक लंबा युद्ध हुआ।

इस युद्ध में दोनों अविजित रहे। इस कारण दोनों में मित्रता स्थापित हो गई। इसके पश्चात् गिल्गेमिश एवं एनकीडू ने अपना शेष जीवन मानवता की सेवा करने में व्यतीत किया। कुछ समय के पश्चात् एनकोडू एक सुंदर नर्तकी के प्रेम जाल में फंस गया। इस कारण देवता उससे नाराज़ हो गए एवं दंडस्वरूप उसके प्राण ले लिए। एनकीडू की मृत्यु से गिल्गेमिश को गहरा सदमा लगा। वह स्वयं मृत्यु से भयभीत रहने लगा।

इसलिए उसने अमृत्तव की खोज आरंभ की। वह अनेक कठिनाइयों को झेलता हुआ उतनापिष्टिम से मिला। अंतत: गिल्गेमिश के हाथ निराशा लगी। उसे यह स्पष्ट हो गया कि पृथ्वी पर आने वाले प्रत्येक जीव की मृत्यु निश्चित है। अत: वह इस बात से संतोष कर लेता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र एवं उरुक निवासी जीवित रहेंगे।

प्रश्न 17.
मेसोपोटामिया की लेखन प्रणाली के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा करते थे। लिपिक चिकनी मिट्टी को गीला करता था। इसके पश्चात् उसे गूंध कर एक ऐसे आकार की पट्टी का रूप दे देता था जिसे वह सुगमता से अपने हाथ में पकड़ सके। इसके बाद वह सरकंडे की तीली की तीखी नोक से उसकी नम चिकनी सतह पर कीलाकार चिह्न बना देता था। इसे बाएँ से दाएँ लिखा जाता था।

इस लिपि का प्रचलन 2600 ई० पू० में हुआ था। 1850 ई० पू० में कीलाकार लिपि के अक्षरों को पहचाना एवं पढ़ा गया। ये पट्टिकाएँ विभिन्न आकारों की होती थीं। जब इन पट्टिकाओं पर लिखने का कार्य पूर्ण हो जाता था तो इन्हें पहले धूप में सुखाया जाता था तथा फिर आग में पका लिया जाता था। इस कारण वे पत्थर की तरह कठोर हो जाया करती थीं। इसके तीन लाभ थे।

प्रथम, वे पेपिरस की तरह जल्दी नष्ट नहीं होती थीं। दूसरा, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित ले जाया जा सकता था। तीसरा, एक बार लिखे जाने पर इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करना संभव नहीं था। इस लिपि का प्रयोग अब मंदिरों को दान में प्राप्त वस्तुओं का ब्योरा रखने के लिए नहीं अपितु शब्द कोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता देने तथा राजाओं के कार्यों का वर्णन करने के लिए किया जाने लगा।

प्रश्न 18.
विश्व को मेसोपोटामिया की क्या देन है?
उत्तर:
विश्व को मेसोपोटामिया ने निम्नलिखित क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान दिया

  • उसकी कालगणना तथा गणित की विद्वत्तापूर्ण परंपरा को आज तार्किक माना जाता है।
  • उसने गुणा और भाग की जो तालिकाएँ, वर्ग तथा वर्ममूल और चक्रवृद्धि ब्याज की जो सारणियाँ दी हैं उन्हें आज सही माना जाता है।
  • उन्होंने 2 के वर्गमूल का जो मान दिया है वह आज के वर्गमूल के मान के बहुत निकट है।
  • उन्होंने एक वर्ष को 12 महीनों, एक महीने को 4 हफ्तों, एक दिन को 24 घंटों तथा एक घंटे को 60 मिनटों में विभाजित किया है। इसे आज पूर्ण विश्व द्वारा अपनाया गया है।
  • उनके द्वारा सूर्य एवं चंद्र ग्रहण, तारों और तारामंडल की स्थिति को आज तार्किक माना जाता है।
  • उन्होंने आधुनिक विश्व को लेखन कला के अवगत करवाया।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मेसोपोटामिया से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया यूनानी भाषा के दो शब्दों ‘मेसोस’ तथा ‘पोटैमोस’ से बना है। मेसोस से भाव है मध्य तथा पोटैमोस का अर्थ है नदी। इस प्रकार मेसोपोटामिया से अभिप्राय है दो नदियों के मध्य स्थित प्रदेश।

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प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया का आधुनिक नाम क्या है ? यह किन दो नदियों के मध्य स्थित है ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया का आधुनिक नाम इराक है।
  • यह दजला एवं फ़रात नदियों के मध्य स्थित है।

प्रश्न 3.
मेसोपोटामिया के बारे में ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में क्या लिखा हुआ है ?
उत्तर:
यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया इसलिए महत्त्वपूर्ण था क्योंकि बाईबल के प्रथम भाग ओल्ड टेस्टामेंट में मेसोपोटामिया का उल्लेख अनेक संदर्भो में किया गया है। ओल्ड टेस्टामेंट की ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ में ‘शिमार’ का उल्लेख हैं जिसका अर्थ सुमेर ईंटों से बने शहरों की भूमि से हैं।

प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया के पूर्वोत्तर भाग में हरे-भरे, ऊँचे-नीचे मैदान हैं। यहाँ 7000 ई० पू० से 6000 ई० पू० के मध्य खेती शुरू हो गई थी।
  • मेसोपोटामिया के उत्तर में स्टेपी घास के मैदान हैं। यहाँ पशुपालन का व्यवसाय काफी विकसित हैं।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया का दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है। इसके बावजूद यहाँ नगरों का विकास क्यों हुआ ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के दक्षिणी भाग में नगरों का विकास इसलिए हुआ क्योंकि यहाँ दजला एवं फ़रात नदियाँ पहाड़ों से निकल कर अपने साथ उपजाऊ मिट्टी लाती हैं। अतः यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता है। इसे नगरों के विकास के लिए रीढ़ की हड्डी माना जाता है।

प्रश्न 6.
मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि अनेक बार संकटों से क्यों घिर जाती थी ? कोई दो कारण बताएँ।
अथवा
मेसोपोटामिया में कृषि संकट के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • दजला एवं फ़रात नदियों में बाढ़ के कारण फ़सलें नष्ट हो जाती थीं।
  • कई बार वर्षा की कमी के कारण फ़सलें सूख जाती थीं।

प्रश्न 7.
मेसोपोटामिया में नगरों का विकास कब आरंभ हुआ ? किन्हीं दो प्रसिद्ध नगरों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया में नगरों का विकास 3000 ई०पू० में आरंभ हुआ।
  • मेसोपोटामिया के दो प्रसिद्ध नगरों के नाम उरुक एवं मारी थे।

प्रश्न 8.
मेसोपोटामिया में कितने प्रकार के नगरों का निर्माण हुआ ? इनके नाम क्या थे ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया में तीन प्रकार के नगरों का निर्माण हुआ।
  • इनके नाम थे-धार्मिक नगर, व्यापारिक नगर एवं शाही नगर।

प्रश्न 9.
मेसोपोटामिया में नगरीकरण के उत्थान के कोई दो कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • अत्यंत उत्पादक खेती।।
  • जल-परिवहन की कुशल व्यवस्था।

प्रश्न 10.
आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे ?
उत्तर:

  • प्राकृतिक उर्वरता के कारण कृषि एवं पशुपालन को प्रोत्साहन मिला।
  • खाद्य उत्पादक बन जाने के कारण मनुष्य का जीवन स्थायी बन गया।
  • प्राकृतिक उर्वरता एवं खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ने नए व्यवसायों को आरंभ किया। ]

प्रश्न 11.
श्रम विभाजन से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
श्रम विभाजन से अभिप्राय उस व्यवस्था से है जब व्यक्ति आत्मनिर्भर नहीं रहता। इसे विभिन्न सेवाओं के लिए विभिन्न व्यक्तियों पर आश्रित होना पड़ता है।

प्रश्न 12.
मेसोपोटामिया के लोग किन देशों से कौन-सी वस्तुएँ मंगवाते थे ? इन वस्तुओं के बदले वे क्या निर्यात करते थे ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया के लोग तुर्की, ईरान एवं खाड़ी पार के देशों से लकड़ी, ताँबा, सोना, चाँदी, टिन एवं पत्थर मँगवाते थे।
  • इन वस्तुओं के बदले वे कपड़ा एवं कृषि उत्पादों का निर्यात करते थे।

प्रश्न 13.
मेसोपोटामिया की मुद्राओं की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • ये मुद्राएँ पत्थर की बनी होती थीं।
  • इनका आकार बेलनाकार होता था।

प्रश्न 14.
मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर कौन-सा था ? इसका उत्थान कब हुआ ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर उरुक था।
  • इसका उत्थान 3000 ई० पू० में हुआ था।

प्रश्न 15.
उरुक नगर का संस्थापक कौन था ? इसे किस शासक ने अपनी राजधानी घोषित किया था ?
उत्तर:

  • उरुक नगर का संस्थापक एनमर्कर था।
  • इसे गिल्गेमिश ने अपने साम्राज्य की राजधानी घोषित किया था।

प्रश्न 16.
3000 ई० पू० के आसपास उरुक नगर ने तकनीकी क्षेत्र में अद्वितीय विकास किया। कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • उरुक में अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औज़ारों का प्रयोग आरंभ हो गया था।
  • यहाँ के वास्तुविदों ने ईंटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया था।

प्रश्न 17.
वार्का शीर्ष की मूर्ति कहाँ से प्राप्त हुई है ? इसकी कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • वार्का शीर्ष की मूर्ति उरुक नगर से प्राप्त हुई है।
  • इसे सफेद संगमरमर को तराश कर बनाया गया था।
  • इसके सिर के ऊपर एक खाँचा बनाया गया था।

प्रश्न 18.
उर नगर का संस्थापक कौन था ? इस नगर ने किस राजवंश के अधीन उल्लेखनीय विकास किया ?
उत्तर:

  • उर नगर का संस्थापक मेसनीपद था।
  • इस नगर ने चालदी राजवंश के अधीन उल्लेखनीय विकास किया।

प्रश्न 19.
उर नगर में नियोजन पद्धति का अभाव था। कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • इस नगर की गलियाँ संकरी एवं टेढ़ी-मेढ़ी थीं।
  • जल निकासी के लिए घरों के बाहर नालियों का प्रबंध नहीं था।

प्रश्न 20.
उर नगर की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उर नगर में नियोजन पद्धति का अभाव था।
  • उर नगर के लोगों में कई प्रकार के अंध-विश्वास प्रचलित थे।

प्रश्न 21.
उर नगर में घरों के बारे में प्रचलित कोई दो अंध-विश्वास लिखें।
उत्तर:

  • यदि घर की दहलीज ऊँची उठी हुई हो तो वह धन-दौलत लाती है।
  • यदि घर के सामने का दरवाज़ा किसी दूसरे के घर की ओर न खुले तो वह सौभाग्य प्रदान करता

प्रश्न 22.
उरुक एवं उर नगरों के प्रमुख देवी-देवता का नाम बताएँ।
उत्तर:

  • उरुक नगर की प्रमुख देवी इन्नाना थी।
  • उर नगर का प्रमुख देवता नन्ना था।

प्रश्न 23.
मेसोपोटामिया के किस नगर से हमें एक कब्रिस्तान मिला है ? यहाँ किनकी समाधियाँ पाई गई
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया के उर नगर से हमें एक कब्रिस्तान मिला है।
  • यहाँ शाही लोगों एवं साधारण लोगों की समाधियाँ पाई गई हैं।

प्रश्न 24.
मारी नगर की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • मारी शासक एमोराइट वंश से संबंधित थे।
  • मारी लोगों के दो प्रमुख व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन थे।

प्रश्न 25.
यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए ख़तरा थे ? कोई दो कारण लिखें।
अथवा
क्या खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए ख़तरा थे ?
उत्तर:

  • खानाबदोश पशुचारक अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए गए खेतों से गुज़ार कर ले जाते थे। इससे फ़सलों को क्षति पहुँचती थी।
  • खानाबदोश पशुचारक कई बार आक्रमण कर लोगों का माल लूट लेते थे।

प्रश्न 26.
मारी स्थित ज़िमरीलिम के राजमहल की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • यह 2.4 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था।
  • यह बहत विशाल था तथा इसके 260 कमरे थे।

प्रश्न 27.
लगश की राजधानी का नाम क्या था ? इसके दो प्रसिद्ध शासक कौन-से थे ?
उत्तर:

  • लगश की राजधानी का नाम गिरसू था।
  • इसके दो प्रसिद्ध शासक इनन्नातुम द्वितीय एवं उरुकगिना थे।

प्रश्न 28.
मेसोपोटामिया में जलप्लावन के पश्चात् स्थापित होने वाला प्रथम नगर कौन-सा था ? इसके प्रथम शासक का नाम बताएँ।
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया में जलप्लावन के पश्चात् स्थापित होने वाला प्रथम नगर किश था।
  • इसके प्रथम शासक का नाम उर्तुंग था।

प्रश्न 29.
असुरबनिपाल क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • उसने अपने साम्राज्य में भव्य भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया।
  • उसने नाबू के मंदिर में एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की।

प्रश्न 30.
बेबीलोन नगर की कोई दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • यह नगर 850 हैक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला था।
  • इसमें अनेक विशाल राजमहल एवं मंदिर बने हुए थे।

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प्रश्न 31.
मेसोपोटामिया की नगर योजना की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • उस समय घरों में एक खुला आँगन होता था जिसके चारों ओर कमरे होते थे।
  • नगरों में यातायात की आवाजाही के लिए सड़कों का उचित प्रबंध किया गया था।

प्रश्न 32.
मेसोपोटामिया में धन-दौलत का ज्यादातर हिस्सा समाज के एक छोटे से वर्ग में केंद्रित था। इस बात की पुष्टि किस तथ्य से होती है ?
उत्तर:
उर में राजाओं एवं रानियों की कुछ कब्रों में शवों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ दफ़नाई गई थीं जबकि जनसाधारण लोगों के शवों के साथ मामूली सी वस्तुओं को दफनाया गया था। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि मेसोपोटामिया में धन-दौलत का ज्यादातर हिस्सा समाज के एक छोटे से वर्ग में केंद्रित था।

प्रश्न 33.
एकल परिवार से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
एकल परिवार से हमारा अभिप्राय ऐसे परिवार से है जिसमें पति, पत्नी एवं उनके बच्चे रहते हैं।

प्रश्न 34.
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी अच्छी थी। कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • वे पुरुषों के साथ सामाजिक एवं धार्मिक उत्सवों में समान रूप से भाग लेती थीं।
  • उन्हें पति से तलाक लेने तथा पुनः विवाह करने का अधिकार प्राप्त था।

प्रश्न 35.
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में दासों की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में दासों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उन्हें पशुओं की तरह खरीदा एवं बेचा जा सकता था। उन्हें किसी प्रकार का कोई अधिकार प्राप्त न था।

प्रश्न 36.
शहरी जीवन शुरू होने पर कौन-कौन सी नयी संस्थाएँ अस्तित्व में आईं ? आपके विचार में कौन सी संस्थाएँ राजा के पहल पर निर्भर थीं ?
उत्तर:

  • शहरी जीवन शुरू होने पर व्यापार, मंदिर, लेखन कला, मूर्ति कला एवं मुद्रा कला नामक संस्थाएँ अस्तित्व में आईं।
  • इनमें व्यापार, मंदिर एवं लेखन कला राजा के पहल पर निर्भर थीं।

प्रश्न 37.
मेसोपोटामिया में युद्ध एवं प्रेम की देवी तथा चंद्र देव कौन था ?
उत्तर:

  • प्राचीनकाल मेसोपोटामिया में युद्ध एवं प्रेम की देवी इन्नाना थी।
  • प्राचीन काल मेसोपोटामिया में चंद्र देव नन्ना था।

प्रश्न 38.
मेसोपोटामिया के लोगों के कोई दो धार्मिक विश्वास बताएँ।
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया के लोग अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे।
  • वे मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 39.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे?
उत्तर:

  • पुराने मंदिर घरों की तरह छोटे आकार के थे।
  • ये कच्ची ईंटों के बने होते थे।
  • इन मंदिरों के आँगन घरों की तरह खुले होते थे तथा इनके चारों ओर कमरे बने होते थे।

प्रश्न 40.
प्राचीन काल मेसोपोटामिया के मंदिरों के कोई दो कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • मंदिरों द्वारा विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती थी।
  • मंदिरों की भूमि पर खेती की जाती थी।

प्रश्न 41.
प्राचीन काल मेसोपोटामिया में पुरोहितों के शक्तिशाली होने के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • इस काल में मेसोपोटामिया के मंदिर बहुत धनी थे।
  • पुरोहितों ने लोगों से विभिन्न करों को वसलना आरंभ कर दिया था।

प्रश्न 42.
गिल्गेमिश कौन था ?
उत्तर:
गिल्गेमिश उरुक का एक प्रसिद्ध शासक था। वह 2700 ई० पू० में सिंहासन पर बैठा था। वह एक महान् योद्धा था तथा उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। उसके महाकाव्य को विश्व साहित्य में एक प्रमुख स्थान प्राप्त है।

प्रश्न 43.
मेसोपोटामिया की लिपि की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • यह लिपि मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखी जाती थी।
  • इस लिपि को बाएँ से दाएँ लिखा जाता था।

प्रश्न 44.
मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा कौन-सी थी ? 2400 ई० पू० में इसका स्थान किस भाषा ने लिया ?
उत्तर:

  • मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन थी।
  • 2400 ई० पू० में इसका स्थान अक्कदी भाषा ने ले लिया।

प्रश्न 45.
लेखन कला का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:

  • इससे शिक्षा के प्रसार को बल मिला।
  • इससे व्यापार को प्रोत्साहन मिला।
  • इस कारण मंदिरों को दान में प्राप्त वस्तुओं का ब्योरा रखा जाने लगा।

प्रश्न 46.
विश्व को मेसोपोटामिया की क्या देन है?
अथवा
मेसोपोटामिया सभ्यता की विश्व को क्या देन है ?
उत्तर:

  • इसने विश्व को सर्वप्रथम शहर दिए।
  • इसने विश्व को सर्वप्रथम लेखन कला की जानकारी दी।
  • इसने विश्व को सर्वप्रथम कानून संहिता प्रदान की।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन काल में ईराक को किस नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:
मेसोपोटामिया।

प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया यूनानी भाषा के किन शब्दों से मिलकर बना है ?
उत्तर:
मेसोस व पोटैमोस।

प्रश्न 3.
मेसोपोटामिया में नगरों का विकास कब आरंभ हुआ ?
उत्तर:
3000 ई० पू०।

प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया की दो प्रमुख नदियाँ कौन-सी हैं ?
उत्तर:
दज़ला एवं फ़रात।

प्रश्न 5.
मेसोपोटामिया में पुरातत्वीय खोजों का आरंभ कब किया गया था ?
उत्तर:
1840 ई०।

प्रश्न 6.
मेसोपोटामिया का प्रसिद्ध फल कौन-सा है ?
उत्तर:
खजूर।

प्रश्न 7.
मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर कौन-सा था ?
उत्तर:
उरुक।

प्रश्न 8.
बाईबल के किस भाग में मेसोपोटामिया के बारे में उल्लेख किया गया है ?
उत्तर:
ओल्ड टेस्टामेंट।

प्रश्न 9.
मेसोपोटामिया के उत्तरी भाग में किस प्रकार की घास के मैदान पाए जाते थे ?
उत्तर:
स्टैपी घास।

प्रश्न 10.
मेसोपोटामिया के प्राचीनतम नगरों का तथा कांस्य युग के निर्माण का आरंभ कब हुआ था ?
उत्तर:
3000 ई० पू०

प्रश्न 11.
वार्का शीर्ष क्या था ?
उत्तर:
3000 ई० पू० उरुक नगर में जिस स्त्री का सिर संगमरमर को तराशकर बनाया गया था उसे वार्का शीर्ष कहा जाता था।

प्रश्न 12.
मेसोपोटामिया में लेखन कार्य पद्धति का आरंभ कब हुआ था ?
उत्तर:
3200 ई० पू०।

प्रश्न 13.
मेसोपोटामिया में कीलाकार लिपि का विकास कब हुआ था ?
उत्तर:
2600 ई० पू०।

प्रश्न 14.
दक्षिणी मेसोपोटामिया में सबसे प्राचीन मंदिरों का निर्माण कब किया गया था ?
उत्तर:
5000 ई० पू०।

प्रश्न 15.
चालदी कहाँ का प्रसिद्ध राजवंश था ?
उत्तर:
उर का।

प्रश्न 16.
मारी किस समुदाय के थे ?
उत्तर:
एमोराइट।

प्रश्न 17.
ज़िमरीलियम का राजमहल कहाँ स्थित था ?
उत्तर:
मारी में।

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प्रश्न 18.
किश नगर पर शासन करने वाली प्रथम रानी कौन थी ?
उत्तर:
कू-बबा।

प्रश्न 19.
असुरबनिपाल कहाँ का शासक था ?
उत्तर:
निनवै का।

प्रश्न 20.
बेबीलोन की राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर:
बेबीलोनिया।

प्रश्न 21.
बेबीलोनिया का अंतिम राजा कौन था ?
उत्तर:
असुरबनिपाल।

प्रश्न 22.
गिल्गेमिश कौन था ?
उत्तर:
उरुक का एक प्रसिद्ध शासक।

प्रश्न 23.
मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम लिपि की खोज कब हुई थी ?
उत्तर:
3200 ई० पू० में।

प्रश्न 24.
मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा कौन-सी थी ?
उत्तर:
सुमेरियन।

प्रश्न 25.
मेसोपोटामिया में अक्कदी भाषा का प्रचलन कब आरंभ हुआ ?
उत्तर:
2400 ई० पू० में।

प्रश्न 26.
सिकंदर ने बेबीलोन को कब विजित किया था ?
उत्तर:
331 ई० पू०।

प्रश्न 27.
मेसोपोटामिया नगर में हौज़ क्या था ?
उत्तर:
घरों के बरामदे में बना छोटा गड्डा जहाँ गंदा पानी एकत्र होता था।

प्रश्न 28.
स्टेल क्या होते हैं ?
उत्तर:
पट्टलेख।

प्रश्न 29.
मेसोपोटामिया समाज में किस प्रकार के परिवार को आदर्श परिवार माना जाता था ?
उत्तर:
एकल परिवार।

प्रश्न 30.
मारी में स्थित जिमरीलिम के राजमहल की क्या मुख्य विशेषता थी ?
उत्तर:
यह प्रशासन व उत्पादन तथा कीमती धातुओं के आभूषणों के निर्माण का मुख्य केंद्र था।

प्रश्न 31.
मेसोपिटामिया की संस्कृति का वर्णन किस महाकाव्य से प्राप्त होता है ?
उत्तर:
गिल्गेमिश।

प्रश्न 32.
मेसोपोटामिया की खुदाई के समय अलाशिया द्वीप किन वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
ताँबे व टिन।

रिक्त स्थान भरिए

1. मेसोपोटामिया यूनानी भाषा के दो शब्दों ……………. तथा ……………. से मिलकर बना है।
उत्तर:
मेसोस, पोटैमोस

2. मेसोपोटामिया …………….. तथा …………….. नामक दो नदियों के मध्य स्थित है।
उत्तर:
फ़रात, दजला

3. मेसोपोटामिया में पुरातत्वीय खोजों का आरंभ ……………. ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
1840

4. मेसोपोटामिया में …………….. तथा …………….. की खेती की जाती थी।
उत्तर:
जौ, गेहूँ

5. मेसोपोटामिया के प्राचीनतम नगरों का तथा कांस्य युग के निर्माण का आरंभ …………… में हुआ था।
उत्तर:
3000 ई० पू०

6. मेसोपोटामिया में लेखन कार्य का आरंभ ……………. ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
3200

7. मेसोपोटामिया में कीलाकार लिपि का विकास …………… ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
2600

8. मेसोपोटामिया की सबसे प्राचीन भाषा सुमेरियन का स्थान …………….. ई० पू० के पश्चात् अक्कदी भाषा ने ले लिया था।
उत्तर:
2400

9. दक्षिणी मेसोपोटामिया में सबसे पुराने मंदिरों का निर्माण ……………. ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
5000

10. उरुक नामक नगर का एक विशाल नगर के रूप में विकास …………….. ई० पू० में हुआ।
उत्तर:
3000

11. मारी नगर ……………. तथा ……………. के निर्माण का मुख्य केंद्र था।
उत्तर:
कीमती धातुओं, आभूषणों

12. गणितीय मूलपाठों की रचना ……….. ई० पू० में की गई थी।
उत्तर:
1800

13. मेसोपोटामिया में असीरियाई राज्य की स्थापना ……………. में हुई थी।
उत्तर:
1100 ई० पू०

14. मेसोपोटामिया में लोहे का प्रयोग ……………. पू० में हुआ था।
उत्तर:
1000 ई०

15. सिकंदर ने बेबीलोन पर ……………. में अधिकार कर लिया था।
उत्तर:
331 ई० पू०

16. बेबीलोनिया का अंतिम राजा …………….. था।
उत्तर:
असुरबनिपाल

17. असुरबनिपाल ने अपनी राजधानी ……………. में एक पुस्तकालय की स्थापना की थी।
उत्तर:
निनवै

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. आधुनिक काल में मेसोपोटामिया को किस नाम से जाना जाता है?
(क) ईरान
(ख) इराक
(ग) कराकोरम
(घ) पीकिंग।
उत्तर:
(ख) इराक

2. मेसोपोटामिया निम्नलिखित में से किन दो नदियों के मध्य स्थित है?
(क) गंगा एवं यमुना
(ख) दजला एवं फ़रात
(ग) ओनोन एवं सेलेंगा
(घ) हवांग हो एवं दज़ला।
उत्तर:
(ख) दजला एवं फ़रात

3. मेसोपोटामिया की सभ्यता क्यों प्रसिद्ध थी?
(क) अपनी समृद्धि के लिए
(ख) अपने शहरी जीवन के लिए
(ग) अपने साहित्य, गणित एवं खगोलविद्या के लिए
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

4. मेसोपोटामिया में प्राकृतिक उपजाऊपन होने के बावजूद कृषि अनेक बार संकटों से क्यों घिर जाती थी?
(क) दजला एवं फ़रात नदियों में आने वाली बाढ़ के कारण
(ख) वर्षा की कमी हो जाने के कारण
(ग) निचले क्षेत्रों में पानी का अभाव होने के कारण
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

5. मेसोपोटामिया का दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है। इसके बावजूद यहाँ नगरों का विकास क्यों हुआ?
(क) क्योंकि यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता था
(ख) क्योंकि यहाँ के दृश्य बहुत सुंदर थे
(ग) क्योंकि यहाँ बहुत मज़दूर उपलब्ध थे
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) क्योंकि यहाँ फ़सलों का भरपूर उत्पादन होता था

6. मेसोपोटामिया में नगरों का निर्माण कब आरंभ हुआ?
(क) 3000 ई० पू० में
(ख) 3200 ई० पू० में
(ग) 4000 ई० पू० में
(घ) 5000 ई० पू० में।
उत्तर:
(क) 3000 ई० पू० में

7. मेसोपोटामिया सभ्यता थी?
(क) काँस्य युगीन
(ख) ताम्र युगीन
(ग) लौह युगीन
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) काँस्य युगीन

8. निम्नलिखित में से कौन-सा मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर था?
(क) उर
(ख) मारी
(ग) उरुक
(घ) लगश।
उत्तर:
(ग) उरुक

9. उरुक नगर का संस्थापक कौन था ?
(क) असुरबनिपाल
(ख) एनमर्कर
(ग) गिल्गेमिश
(घ) सारगोन।
उत्तर:
(ख) एनमर्कर

10. हमें वार्का शीर्ष की मूर्ति मेसोपोटामिया के किस नगर से प्राप्त हुई है?
(क) मारी
(ख) उरुक
(ग) किश
(घ) निनवै।
उत्तर:
(ख) उरुक

11. मारी के राजा किस समुदाय के थे?
(क) अक्कदी
(ख) एमोराइट
(ग) असीरियाई
(घ) आर्मीनियन।
उत्तर:
(ख) एमोराइट

12. मारी नगर के शासकों ने किस देवता की स्मृति में एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था?
(क) डैगन
(ख) नन्ना
(ग) इन्नना
(घ) अनु।
उत्तर:
(क) डैगन

13. मारी नगर के किसानों एवं पशुचारकों में लड़ाई का प्रमुख कारण क्या था?
(क) पशुचारक किसानों की फ़सलों को नष्ट कर देते थे
(ख) पशुचारक किसानों के गाँवों पर आक्रमण कर उन्हें लूट लेते थे
(ग) अनेक बार किसान पशुचारकों को जल स्रोतों तक जाने नहीं देते थे
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

14. साइप्रस का द्वीप अलाशिया (Alashiya) निम्नलिखित में से किस वस्तु के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था?
(क) ताँबा
(ख) लोहा
(ग) सोना
(घ) चाँदी।
उत्तर:
(क) ताँबा

15. जलप्लावन (flood) के पश्चात् स्थापित होने वाला प्रथम नगर कौन-सा था?
(क) लगश
(ख) मारी
(ग) किश
(घ) निनवै।
उत्तर:
(ग) किश

16. लगश का सबसे महान् शासक कौन था?
(क) गुडिया
(ख) उरनिना
(ग) उरुकगिना
(घ) इनन्नातुम द्वितीय।
उत्तर:
(क) गुडिया

17. असुरबनिपाल क्यों प्रसिद्ध था?
(क) उसने एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की थी
(ख) उसने अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया
(ग) उसने अपनी राजधानी निनवै को अनेक भव्य भवनों से सुसज्जित किया
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

18. मेसोपोटामिया के समाज में कितने प्रमुख वर्ग थे?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर:
(ख) तीन

19. उर में मिली शाही कब्रों में निम्नलिखित में से कौन-सी वस्तु प्राप्त हुई है?
(क) आभूषण
(ख) सोने के सजावटी खंजर
(ग) लाजवर्द
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

20. मेसोपोटामिया में धन-दौलत का ज्यादातर हिस्सा समाज के एक छोटे-से वर्ग में केंद्रित था। इस बात की पुष्टि किस तथ्य से होती है?
(क) उर में मिली शाही कब्रों से
(ख) ज़िमरीलिम के राजमहल से
(ग) व्यापारी वर्ग से
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(क) उर में मिली शाही कब्रों से

21. निम्नलिखित में से कौन मेसोपोटामिया की प्रेम एवं युद्ध की देवी थी?
(क) इन्नाना
(ख) नन्ना
(ग) एनकी
(घ) अनु।
उत्तर:
(क) इन्नाना

22. मेसोपोटामिया में चंद्र देवता को किस नाम से पुकारा जाता था?
(क) नन्ना
(ख) अनु
(ग) गिल्गेमिश
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) नन्ना

23.. गिल्गेमिश कौन था?
(क) उर का प्रसिद्ध लेखक
(ख) उरुक का प्रसिद्ध शासक
(ग) अक्कद का प्रमुख अधिकारी
(घ) लगश का महान् शासक।
उत्तर:
(ख) उरुक का प्रसिद्ध शासक

24. मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम लिपि की खोज कब हुई?
(क) 3200 ई० पू० में
(ख) 3000 ई० पू० में
(ग) 2800 ई० पू० में
(घ) 2500 ई० पू० में
उत्तर:
(क) 3200 ई० पू० में

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

25. मेसोपोटामिया की ज्ञात सबसे प्राचीन भाषा कौन-सी थी ?
(क) हिब्रू
(ख) अक्कदी
(ग) सुमेरियन
(घ) अरामाइक
उत्तर:
(ग) सुमेरियन

26. 2400 ई० पू० में मेसोपोटामिया में किस भाषा का प्रचलन आरंभ हुआ?
(क) अक्कदी
(ख) अरामाइक
(ग) अंग्रेजी
(घ) फ्रांसीसी।
उत्तर:
(क) अक्कदी

लेखन कला और शहरी जीवन HBSE 11th Class History Notes

→ आधुनिक इराक को प्राचीन काल में मेसोपोटामिया के नाम से जाना जाता था। यहाँ की विविध भौगोलिक विशेषताओं ने यहाँ के इतिहास पर गहन प्रभाव डाला है। मेसोपोटामिया की सभ्यता के विकास में यहाँ की दो नदियों दजला एवं फ़रात ने उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ 3000 ई० प० में मेसोपोटामिया में नगरों का विकास आरंभ हुआ। यहाँ 1840 ई० के दशक में पुरातत्त्वीय खोजों की शुरुआत हुई थी। मेसोपोटामिया में तीन प्रकार के नगर धार्मिक नगर, व्यापारिक नगर एवं शाही नगर अस्तित्व में आए थे। इन नगरों के उत्थान के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।

→ मेसोपोटामिया में जिन नगरों का उत्थान हुआ उनमें उरुक, उर, मारी, किश, लगश, निनवै, निमरुद एवं बेबीलोन बहुत प्रसिद्ध थे। इन नगरों ने मेसोपोटामिया के इतिहास को एक नई दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मेसोपोटामिया के प्रारंभिक शहरी समाजों में सामाजिक असमानता का भेद आरंभ हो गया था।

→  उस समय समाज में तीन प्रमुख वर्ग प्रचलित थे। प्रथम वर्ग जो अभिजात वर्ग कहलाता था बहुत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता था। दूसरा वर्ग जो मध्य वर्ग कहलाता था का भी जीवन सुगम था।

→ तीसरा वर्ग जो निम्न वर्ग कहलाता था में समाज का बहुसंख्यक वर्ग सम्मिलित था। इनकी दशा बहुत दयनीय थी। उस समय मेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार प्रचलित थे। परिवार में पुत्र का होना आवश्यक माना जाता था। उस समय समाज में स्त्रियों का सम्मान किया जाता था। उन्हें अनेक प्रकार के अधिकार प्राप्त थे। निस्संदेह ऐसे अधिकार आज के देशों के अनेक समाजों में स्त्रियों को प्राप्त नहीं हैं। मेसोपोटामिया के समाज के माथे पर दास प्रथा एक कलंक समान थी। दासों की स्थिति पशुओं से भी बदतर थी।

→ उन्हें अपने स्वामी की आज्ञानुसार काम करना पड़ता था। उस समय के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। मेसोपोटामिया के समाज में मंदिरों की उल्लेखनीय भूमिका थी। ये मंदिर आरंभ में घरों जैसे छोटे आकार एवं कच्ची ईंटों के थे।

→ किंतु धीरे-धीरे ये मंदिर बहुत विशाल एवं भव्य बन गए। ये मंदिर धनी थे तथा उनके क्रियाकलाप बहुत व्यापक थे। अत: इन मंदिरों की देखभाल करने वाले पुरोहित भी बहुत शक्तिशाली हो गए थे। इन मंदिरों ने व्यापार एवं लेखन कला के विकास में प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

→ विश्व साहित्य में गिल्गेमिश के महाकाव्य को विशेष स्थान प्राप्त है। इसे 2000 ई० पू० में 12 पट्टिकाओं पर लिखा गया था। गिल्गेमिश उरुक का सबसे प्रसिद्ध शासक था। वह एक महान् एवं बहादुर योद्धा था। दूसरी ओर वह बहुत अत्याचारी था।

→  उसके अत्याचारों से प्रजा को मुक्त करवाने के उद्देश्य से देवताओं ने एनकीडू को भेजा। दोनों के मध्य एक लंबा युद्ध हुआ जिसके अंत में दोनों मित्र बन गए। इसके पश्चात् गिल्गेमिश एवं एनकीडू ने अपना शेष जीवन लोक भलाई कार्यों में लगा दिया। कुछ समय के पश्चात् एनकीडू एक नर्तकी के प्रेम जाल में फंस गया।

→ इस कारण देवताओं ने रुष्ट होकर उसके प्राण ले लिए। एनकीडू जैसे शक्तिशाली वीर की मृत्यु के बारे में सुन कर गिल्गेमिश स्तब्ध रह गया। अत: उसे अपनी मृत्यु का भय सताने लगा। इसलिए उसने अमरत्व की खोज आरंभ की। वह अनेक कठिनाइयों को झेलता हुआ उतनापिष्टिम से मिला।

→ अंततः गिल्गेमिश के हाथ निराशा लगी। उसने यह निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी पर आने वाला प्रत्येक जीव मृत्यु के चक्कर से नहीं बच सकता। वह केवल इस बात से संतोष कर लेता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र एवं उरुक निवासी जीवित रहेंगे।

→ मेसोपोटामिया में 3200 ई० पू० में लेखन कला का विकास आरंभ हुआ। इसके विकास का श्रेय मेसोपोटामिया के मंदिरों को दिया जाता है। इन मंदिरों के पुरोहितों को मंदिर की आय-व्यय का ब्यौरा रखने के लिए लेखन कला की आवश्यकता महसूस हुई। आरंभ में मेसोपोटामिया में चित्रलिपि का उदय हुआ।

→ यह लिपि बहुत कठिन थी। इस लिपि को मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा जाता था। इस पर कोलाकार चिह्न बनाए जाते थे जिसे क्यूनीफार्म कहा जाता था। जब इन पट्टिकाओं पर लेखन कार्य पूरा हो जाता था तो उन्हें धूप में सुखा लिया जाता था। मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन थी। 2400 ई० पू० में अक्कदी ने इस भाषा का स्थान ले लिया। 1400 ई० पू० में अरामाइक भाषा का भी प्रचलन आरंभ हो गया।

→ मेसोपोटामिया लिपि की जटिलता के कारण मेसोपोटामिया में साक्षरता की दर बहुत कम रही। यूरोपवासियों के लिए मेसोपोटामिया का विशेष महत्त्व रहा है। इसका कारण यह था कि बाईबल के प्रथम भाग ओल्ड टेस्टामेंट में मेसोपोटामिया का उल्लेख अनेक संदर्भो में किया गया है। मेसोपोटामिया सभ्यता की जानकारी हमें अनेक स्रोतों से प्राप्त होती है। इनमें से प्रमुख हैं-भवन, मंदिर, मूर्तियाँ, आभूषण, औज़ार, मुद्राएँ, कब्र एवं लिखित दस्तावेज़।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

HBSE 11th Class Geography वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. यदि धरातल पर वायुदाब 1,000 मिलीबार है तो धरातल से 1 कि०मी० की ऊँचाई पर वायुदाब कितना होगा?
(A) 700 मिलीबार
(B) 900 मिलीबार
(C) 1,100 मिलीबार
(D) 1,300 मिलीबार
उत्तर:
(B) 900 मिलीबार

2. अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र प्रायः कहाँ होता है?
(A) विषुवत् वृत्त के निकट
(B) कर्क रेखा के निकट
(C) मकर रेखा के निकट
(D) आर्कटिक वृत्त के निकट
उत्तर:
(A) विषुवत् वृत्त के निकट

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

3. उत्तरी गोलार्ध में निम्नवायुदाब के चारों तरफ पवनों की दिशा क्या होगी?
(A) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के अनुरूप
(B) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत
(C) समदाब रेखाओं के समकोण पर
(D) समदाब रेखाओं के समानांतर
उत्तर:
(B) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत

4. वायुराशियों के निर्माण के उद्गम क्षेत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है-
(A) विषुवतीय वन
(B) साइबेरिया का मैदानी भाग
(C) हिमालय पर्वत
(D) दक्कन पठार
उत्तर:
(B) साइबेरिया का मैदानी भाग

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुदाब मापने की इकाई क्या है? मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक क्यों घटाया जाता है?
उत्तर:
वायदाब मापने की इकाई ‘मिलीबार’ है जिसे किलो पास्कल (hpa) लिखा जाता है। वायुदाब के क्षैतिज वितरण का अध्ययन समान अंतराल पर खींची समदाब रेखाओं द्वारा किया जाता है। समदाब रेखाएँ वे रेखाएँ है जो समुद्रतल से एक समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलती है। दाब पर ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने और तुलनात्मक बनाने के लिए, वायुदाब मापने के बाद इसे समुद्रतल के स्तर पर घटाया जाता है।

प्रश्न 2.
जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात् उपोष्ण उच्च दाब से विषुवत वृत्त की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्णकटिबंध में पवनें उत्तरी पूर्वी क्यों होती हैं?
उत्तर:
जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्ण कटिबंध में पवनें उत्तर-पूर्वी होती हैं क्योंकि पवनों की दिशा कॉरिआलिस बल से प्रभावित होती है।

प्रश्न 3.
भूविक्षेपी पवनें क्या हैं?
उत्तर:
जब समदाब रेखाएँ सीधी हों तथा घर्षण का प्रभाव न हो तो दाब प्रणवता बल कॉरिआलिस बल से सन्तुलित हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप पवनें समदाब रेखाओं के समानान्तर बहती हैं, जिन्हें ‘भू-विक्षेपी पवनें’ कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 4.
समुद्र व स्थल समीर का वर्णन करें।
उत्तर:
स्थलीय समीर-रात्रि को जब सूर्य का प्रभाव नहीं होता तो स्थल और समुद्र दोनों ही ठण्डे होने लगते हैं। परन्तु स्थल, समुद्र की अपेक्षा अधिक ठण्डा हो जाता है। इस प्रकार स्थल पर जल की अपेक्षा तापमान कम तथा वायुभार अधिक होता है। इसलिए रात्रि के समय स्थल से समुद्र की ओर ठण्डी वायु चलती है जिसे स्थलीय समीर (Land Breeze) कहते हैं।

समुद्री समीर-दिन के समय सूर्य से ऊष्मा प्राप्त करके स्थल तथा जल दोनों ही गरम होना शुरू कर देते हैं, परन्तु स्थल, जल की अपेक्षा शीघ्र एवं अधिक गरम हो जाता है। फलस्वरूप स्थलीय भाग का तापमान अधिक तथा जलीय भाग का तापमान कम होता है। अतः समुद्र पर स्थल की अपेक्षा वायु का भार अधिक है। इससे ठण्डी हवा समुद्र से स्थल की ओर चलना आरम्भ कर देती है जिसे जलीय या समुद्री समीर (Sea Breeze) कहते हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारण बताएँ।
उत्तर:
पवन की उत्पत्ति, दिशा और वेग को नियन्त्रित करने वाले कारक (Factors Affecting the Velocity, Direction and Origin of Wind)
1. दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force)-दो बिन्दुओं के बीच वायुदाब में परिवर्तन की दर को दाब प्रवणता कहा जाता है। अतः दो स्थानों के बीच दाब प्रवणता जितनी अधिक होगी, वायु की गति उतनी ही तीव्र होगी। दाब प्रवणता से प्रेरित होकर ही वायु उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है।

2. विक्षेपण बल (Deflection Force)-शुरू में तो पवनें दाब प्रवणता के अनुसार बहती हैं। लेकिन जैसे ही बहने लगती हैं उनकी दिशा पृथ्वी के घूर्णन तथा उसके साथ सापेक्ष वायुमंडल के घूर्णन के प्रभाव से विक्षेपित होने लगती हैं। इसे कॉरिआलिस प्रभाव (Coriolis Effect) कहते हैं जिसके प्रभावाधीन उत्तरी गोलार्द्ध में पवनें अपने दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बाईं ओर मुड़ जाती हैं। कॉरिआलिस प्रभाव भूमध्य रेखा पर शून्य होता है और ध्रुवों की ओर उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है।

3. भू-घर्षण (Land Friction)-महाद्वीपों पर पाई जाने वाली धरातलीय विषमताओं; जैसे पर्वत, पठार और मैदान के कारण पवनों के मार्ग में अवरोध और घर्षण पैदा हो जाते हैं जिससे पवनों की गति और दिशा दोनों प्रभावित होते हैं। महासागरों पर किसी प्रकार का अवरोध न होने के कारण वहाँ पवनें तेज़ी से बहती हैं और उनकी दिशा भी स्पष्ट होती है।

4. अपकेन्द्री बल (Centrifugal Force)-इस बल के प्रभावाधीन किसी भी वक्राकार पथ पर चलती हुई पवनें, धाराएँ या कोई भी गतिमान वस्तु वक्र के केन्द्र से बाहर की ओर छूटने या जाने की प्रवृत्ति रखती है। पवन मार्ग के वक्र के छोटा होने तथा पवन की गति बढ़ने पर अपकेन्द्री बल भी बढ़ने लगता है अर्थात् पवनें और अधिक तेजी से वक्र मार्ग से बाहर की ओर जाने का प्रयास करती हैं।

प्रश्न 2.
पृथ्वी पर वायुमंडलीय सामान्य परिसंचरण का वर्णन करते हुए चित्र बनाएँ। 30° उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब के संभव कारण बताएँ।
उत्तर:
वायुमंडल का सामान्य परिसंचरण-वायुमंडलीय पवनों के प्रवाह प्रारूप को ही वायुमंडलीय सामान्य परिसंचरण कहा जाता है। यह वायुमंडलीय परिसंचरण महासागरीय जल को गतिमान करता है जो पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करता है। भूमंडलीय पवनों का प्रारूप मुख्यतः निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है

  • वायुमंडलीय तापन में अक्षांशीय भिन्नता
  • वायुदाब पट्टियों की उपस्थिति
  • वायुदाब पट्टियों का सौर किरणों के साथ विस्थापन
  • महासागरों व महाद्वीपों का वितरण
  • पृथ्वी का घूर्णन।

उच्च सूर्यातप व निम्न वायुदाब के कारण भू-मंडलीय वायु संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती है। उष्ण कटिबंधों से आने वाली पवनें इस निम्न-दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं। यह वाय क्षोभमंडल के ऊपर 14 कि०मी० की ऊँचाई तक ऊपर चढ़ती है। फिर ध्रुवों की तरफ प्रवाहित होती है। इसके परिणामस्वरूप 30° उत्तर व 30° दक्षिण अक्षांश पर वायु एकत्रित हो जाती है। इस एकत्रित वायु का अवतलन होता है जिसके कारण उपोष्ण कटिबंधीय उच्च-दाब क्षेत्र बनता है।

वायुमंडल का सामान्य परिसंचरण महासागरों को भी प्रभावित करता है। वायुमंडल में वृहत पैमाने पर चलने वाली पवनें धीमी तथा अधिक गति की महासागरीय धाराओं को प्रवाहित करती हैं।

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर ही क्यों होती है? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के किस भाग में मूसलाधार वर्षा होती है और उच्च वेग की पवनें चलती हैं और क्यों?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आक्रामक तूफान हैं जिनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के महासागरों पर होती है। क्योंकि इनका जन्म प्रायः अधिक गर्मी पड़ने से ही होता है और ये तटीय क्षेत्रों की तरफ गतिमान होते हैं। ये चक्रवात आक्रामक पवनों के कारण विस्तृत विनाश, अत्यधिक वर्षा और तूफान लाते हैं।

हिन्द महासागर में ‘चक्रवात’ अटलांटिक महासागर में ‘हरीकेन’, पश्चिम प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में ‘टाइफन’ तथा पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ‘विली-विलीज’ के नाम से जाने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति व विकास के लिए अनुकूल स्थितियाँ हैं।

  • बृहत् समुद्री सतह; जहाँ तापमान 27° से० अधिक हो
  • कोरिऑलिस बल
  • ऊर्ध्वाधर पवनों की गति में अंतर कम होना
  • कमजोर निम्न दाब क्षेत्र या निम्न स्तर का चक्रवातीय परिसंचरण का होना
  • समुद्री तल तंत्र पर ऊपरी अपसरण।

वे चक्रवात जो प्रायः 20° उत्तरी अक्षांश से गुजरते हैं, उनकी दिशा अनिश्चित होती है और ये अधिक विध्वंसक होते हैं। एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की विशेषता इसके केंद्र के चारों तरफ प्रबल सर्पिल पवनों का परिसंचरण है, जिसे इसकी आँख कहा जाता है। इस परिसंचरण प्रणाली का व्यास 150 से 250 कि०मी० होता है। इसके केंद्र में वायु शान्त होती है। अक्षु के चारों तरफ अक्षुभिति होती है जहाँ वायु का प्रबल व वृत्ताकार रूप से आरोहण होता है, यह आरोहण क्षोभसीमा की ऊँचाई तक पहुँचता है। इसी क्षेत्र में पवनों का वेग अधिकतम होता है, जो 250 कि०मी० प्रति घंटा तक होता है। इन चक्रवातों से मूसलाधार वर्षा होती है।

वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ HBSE 11th Class Geography Notes

→ वायुदाब (Air Pressure)-किसी स्थान पर ऊपर स्थित वायु के सम्पूर्ण स्तंभ का भार वायुदाब कहलाता है।

→ पछुवा पवनें (Westerlies) उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंधों से उपध्रुवीय निम्न-दाब कटिबंधों की तरफ वर्ष-भर चलने वाली पवनें पछुवा पवनें कहलाती हैं।

→ ध्रुवीय पवनें (Polar Winds)-ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्रों से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंधों की ओर वर्ष भर चलने वाली पवनों को ध्रुवीय पवनें कहते हैं।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

→ मिस्ट्रल (Mistral)-शीत ऋतु में आल्प्स पर्वत से भूमध्य-सागर की तरफ फ्रांस और स्पेन के तटों पर बहने वाली तेज, शुष्क व ठण्डी पवन को मिस्ट्रल कहते हैं।

→ चक्रवात (Cyclones) चक्रवात वायु की वह राशि है जिसके मध्य में न्यून वायुदाब होता है तथा बाहर की तरफ वायुदाब बढ़ता जाता है।

→ वाताग्र जनन (Frontogenesis)-वातारों के बनने की प्रक्रिया को वाताग्र जनन कहा जाता है।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. सूर्य द्वारा ऊष्मा की प्रसारण क्रिया को कहा जाता है
(A) ऊष्मा प्रसार
(B) सौर विकिरण
(C) सूर्यातप
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) सौर विकिरण

2. पृथ्वी तक पहुँचने वाली सूर्य की ऊष्मा को क्या कहा जाता है?
(A) सौर विकिरण
(B) पार्थिव विकिरण
(C) सूर्यातप
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सूर्यातप

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

3. सूर्य से पृथ्वी की दूरी है
(A) 5 करोड़ कि०मी०
(B) 8 करोड़ कि०मी०
(C) 12 करोड़ कि०मी०
(D) 15 करोड़ कि०मी०
उत्तर:
(D) 15 करोड़ कि०मी०

4. पृथ्वी पर सौर विकिरण का कितना भाग पहुँचता है?
(A) 1 अरबवाँ भाग
(B) 2 अरबवाँ भाग
(C) 3 अरबवाँ भाग
(D) 4 अरबवाँ भाग
उत्तर:
(B) 2 अरबवाँ भाग

5. वायुमंडल की सबसे ऊपरी सतह पर प्राप्त ऊष्मा में से वायुमंडल और पृथ्वी द्वारा अवशोषित इकाइयों को क्या कहते हैं?
(A) भौमिक विकिरण
(B) पृथ्वी का एल्बिडो
(C) प्रभावी सौर विकिरण
(D) प्रवेशी सौर विकिरण
उत्तर:
(C) प्रभावी सौर विकिरण

6. सूर्य की किरणों की गति क्या है?
(A) 1 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
(B) 2 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
(C) 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
(D) 4 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
उत्तर:
(C) 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड

7. निम्नलिखित में से सर्वाधिक तापमान कब अंकित किया जाता है?
(A) दोपहर 12 बजे
(B) दोपहर बाद 1 बजे
(C) दोपहर बाद 2 बजे
(D) दोपहर बाद 3 बजे
उत्तर:
(C) दोपहर बाद 2 बजे

8. वायुमंडल की ऊपरी सतह पर पहुँचने वाले सूर्यातप का कितना भाग भूतल पर पहुँचता है?
(A) 21%
(B) 31%
(C) 41%
(D) 51%
उत्तर:
(D) 51%

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

9. किसी स्थान विशेष के औसत तापमान और उसके अक्षांशीय तापमान के औसत के बीच के अंतर को कहा जाता है-
(A) तापीय व्युत्क्रमण
(B) तापक्रमीय विसंगति
(C) अक्षांशीय विसंगति
(D) तापीय अनुकूलता
उत्तर:
(B) तापक्रमीय विसंगति

10. वह काल्पनिक रेखा जो समुद्रतल के समानीत समान तापमान वाले स्थानों को मिलाती है, उसे कहते हैं
(A) समताप रेखा
(B) समदाब रेखा
(C) समानीत रेखा
(D) सम समुद्रतल रेखा
उत्तर:
(A) समताप रेखा

11. किसी स्थान के मध्यमान या सामान्य तापमान का अर्थ है-
(A) दिन का औसत तापमान
(B) महीने का औसत तापमान
(C) वर्ष का औसत तापमान
(D) 35 वर्षों के वार्षिक औसत तापमानों का औसत
उत्तर:
(D) 35 वर्षों के वार्षिक औसत तापमानों का औसत

12. एल्बिडो है-
(A) संयुक्त राज्य अमेरिका एवं कनाडा की सीमा पर स्थित झील
(B) उच्च कपासी बादलों का उपनाम
(C) किसी सतह को प्राप्त होने वाली एवं उससे परावर्तित विकिरण ऊर्जा की मात्रा का अनुपात
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) किसी सतह को प्राप्त होने वाली एवं उससे परावर्तित विकिरण ऊर्जा की मात्रा का अनुपात

13. सुबह और शाम की तुलना में दोपहर में गर्मी अधिक क्यों होती है?
(A) क्योंकि सर्य की किरणें दोपहर में सीधी पडती हैं।
(B) क्योंकि पृथ्वी गर्मी को सोखकर उसे दोपहर को छोड़ती है
(C) दोपहर के वक्त समुद्र से गर्म पवनें चलती हैं
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) क्योंकि सर्य की किरणें दोपहर में सीधी पडती हैं।

14. विश्व में सर्वाधिक ठंडा स्थान कौन-सा है जिसका तापमान सर्दियों में -50°C तक गिर जाता है?
(A) कारगिल
(B) वोयान्सक
(C) द्रास
(D) बर्जन
उत्तर:
(B) वोयान्सक

15. हिमालय तथा आल्प्स की किन ढलानों पर अधिक तापमान के कारण मानव बस्तियाँ और कृषि कार्य केंद्रित हैं?
(A) उत्तरी ढाल
(B) दक्षिणी ढाल
(C) पूर्वी ढाल
(D) पश्चिमी ढाल
उत्तर:
(B) दक्षिणी ढाल

16. समुद्रतल से 900 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक शहर का जुलाई का औसत मासिक तापमान 22°C है। समुद्रतल पर इस शहर का समानीत तापमान कितना होगा?
(A) 27.5°C
(B) 16.5°C
(C) 22°C
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) 27.5°C

17. कौन-सी मिट्टी जल्दी गरम और जल्दी ठण्डी हो जाती है?
(A) जलोढ़ मिट्टी
(B) काली मिट्टी
(C) रेतीली मिट्टी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) रेतीली मिट्टी

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर सौर विकिरण का कितना भाग पहुँचता है?
उत्तर:
दो अरबवाँ भाग।

प्रश्न 2.
सूर्यातप को किस इकाई में मापते हैं?
उत्तर:
कैलोरी में।

प्रश्न 3.
मानचित्र पर तापमान का क्षैतिज वितरण किन रेखाओं द्वारा दर्शाया जाता है?
उत्तर:
समताप रेखाओं द्वारा।

प्रश्न 4.
पृथ्वी पर ऊष्मा का सबसे बड़ा स्रोत कौन-सा है?
उत्तर:
सूर्य।

प्रश्न 5.
उत्तरी गोलार्द्ध में पर्वतों के कौन-से ढाल सूर्य के सामने पड़ते हैं?
उत्तर:
दक्षिणी ढाल।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 6.
दक्षिणी गोलार्द्ध में पर्वतों के कौन-से ढाल सूर्य के सामने पड़ते हैं?
उत्तर:
उत्तरी ढाल।

प्रश्न 7.
ऊँचाई के साथ तापमान घटने की जगह यदि बढ़ने लग जाए तो उसे क्या कहा जाता है?
उत्तर:
तापमान की विलोमता।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर पहुँचने वाले सूर्यातप का कितना भाग भूतल तक पहुँचता हैं?
उत्तर:
51 प्रतिशत भाग अथवा 100 में से 51 इकाइयाँ।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल के गरम होने की प्रक्रियाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
विकिरण, संचालन तथा संवहन।

प्रश्न 3.
सूर्य क्या है?
उत्तर:
धधकती हुई गैसों का गोला जो ऊष्मा को अन्तरिक्ष में चारों ओर प्रसारित करता रहता है।

प्रश्न 4.
सूर्य से पृथ्वी की दूरी कितनी है?
उत्तर:
लगभग 15 करोड़ कि०मी०।

प्रश्न 5.
सूर्य की किरणों की गति क्या है?
उत्तर:
3 लाख कि०मी० प्रति सैकिण्ड।

प्रश्न 6.
तापमान मापने की दो प्रमुख इकाइयाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
डिग्री सेल्सियस व डिग्री फारेनहाइट।

प्रश्न 7.
दैनिक अधिकतम तापमान कब रिकॉर्ड किया जाता है?
उत्तर:
दोपहर में 2.00 बजे के लगभग।

प्रश्न 8.
जब सूर्य की क्षैतिज से ऊँचाई केवल 4° होती है तो सूर्य की किरणों को कितने मोटे वायुमण्डल से गुजरना पड़ता है?
उत्तर:
12 गुणा मोटे वायुमण्डल से।

प्रश्न 9.
तापमान की सामान्य हास दर क्या है?
उत्तर:
1°C प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर।

प्रश्न 10.
सूर्यातप आधिक्य वाले क्षेत्र कौन-से होते हैं?
उत्तर:
जहाँ धूप की लम्बी अवधि और रातें छोटी होती हैं, सूर्यातप आधिक्य वाले क्षेत्र कहलाते हैं।

प्रश्न 11.
ऊष्मा-हानि वाले क्षेत्र कौन-से होते हैं?
उत्तर:
जहां दिन छोटे और रातें लम्बी हों अर्थात् सूर्यातप की मात्रा कम और विकिरित हुई ऊष्मा अधिक हो उन्हें ऊष्मा-हानि वाले क्षेत्र कहते हैं।

प्रश्न 12.
ऊँचा दैनिक तापान्तर किन क्षेत्रों में पाया जाता है?
उत्तर:
मरुस्थलों तथा महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में।

प्रश्न 13.
कम दैनिक तापान्तर किन क्षेत्रों में पाया जाता है?
उत्तर:

  1. तटों के पास
  2. मेघाच्छादित क्षेत्रों में।

प्रश्न 14.
कैलोरी क्या होती है?
उत्तर:
समुद्रतल पर उपस्थित वायुदाब की दशा में एक ग्राम जल का तापमान 1°C बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा को कैलोरी कहा जाता है।

प्रश्न 15.
दिन छोटे-बड़े क्यों होते रहते हैं? कारण बताओ।
उत्तर:

  1. पृथ्वी का 66/2° पर झुका अक्ष।
  2. पृथ्वी की दैनिक व वार्षिक गति।

प्रश्न 16.
सौर कलंक क्या होते हैं?
उत्तर:
सूर्य के तल पर काले रंग के गहरे व उथले बनते-बिगड़ते धब्बों को सौर कलंक कहा जाता है।

प्रश्न 17.
सौर कलंकों की संख्या व सौर विकिरण में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
इन कलंकों की संख्या बढ़ने और घटने पर सूर्यातप की मात्रा बढ़ती और घटती है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 18.
उपसौरिका (Perihelion) की स्थिति क्या होती है?
उत्तर:
3 जनवरी को जब पृथ्वी सूर्य से 14.70 करोड़ किलोमीटर की निकटतम दूरी पर होती है।

प्रश्न 19.
अपसौरिका (Aphelion) की स्थिति क्या होती है?
उत्तर:
4 जुलाई को जब पृथ्वी सूर्य से 15.20 करोड़ कि०मी० की अधिकतम दूरी पर होती है।

प्रश्न 20.
उष्ण कटिबन्ध का विस्तार बताइए।
उत्तर:
231/2° उत्तर से 231/2° दक्षिण अक्षांश।

प्रश्न 21.
शीतोष्ण कटिबन्ध का क्या विस्तार है?
उत्तर:
23/2° से 66/2° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांश।

प्रश्न 22.
शीत कटिबन्ध कहाँ से कहाँ तक विस्तृत है?
उत्तर:
661/2° से ध्रुवों तक दोनों गोलार्डों में।

प्रश्न 23.
पृथ्वी पर सूर्यातप के वितरण को कौन-से दो प्रमुख कारक नियन्त्रित करते हैं?
उत्तर:

  1. सूर्य की किरणों का सापेक्षिक झुकाव
  2. दिन की अवधि।

प्रश्न 24.
विश्व में औसत तापमान क्यों बढ़ रहे हैं?
उत्तर:
जैव-ईंधन के बढ़ते उपयोग तथा वनों की कटाई के कारण।

प्रश्न 25.
सूर्य के सामने पड़ी ढालों पर सूर्यातप व तापमान अधिक क्यों प्राप्त होता है?
उत्तर:
सूर्य की सीधी किरणों के कारण।

प्रश्न 26.
सूर्य से विपरीत दिशा में स्थित ढालों पर सूर्यातप व तापमान कम क्यों रहते हैं?
उत्तर:
सूर्य की तिरछी किरणों के कारण।

प्रश्न 27.
कौन-सी मिट्टियाँ सूर्यातप का अवशोषण करके अपने क्षेत्र के तापमान को बढ़ा देती हैं?
उत्तर:
काली अथवा गहरी मिट्टियाँ तथा रेत से ढके भू-पृष्ठ।

प्रश्न 28.
समताप रेखाएँ क्या होती हैं?
उत्तर:
जिन स्थानों पर सूर्यातप की मात्रा समान होती है, उन स्थानों का तापमान भी समान होता है। समुद्र तल से समान तापमान वाले स्थानों को आपस में मिलाने वाली रेखा को समताप रेखा कहते हैं।

प्रश्न 29.
भौमिक विकिरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सौर ऊर्जा भूतल से टकराकर दीर्घ तरंगों के रूप में वापस लौट जाती है जिसे भौमिक विकिरण कहते हैं। यही कारण है कि वायुमण्डल नीचे से ऊपर की ओर गरम होता है। वायुमण्डल के गरम होने का प्रमुख स्रोत भौमिक विकिरण है।

प्रश्न 30.
सौर स्थिरांक किसे कहते हैं?
उत्तर:
भू-वैज्ञानिकों के मतानुसार पृथ्वी प्रति मिनट 2 कैलोरी ऊर्जा प्रति वर्ग सें०मी० प्राप्त करती है जिसे सौर स्थिरांक कहते हैं। ऊर्जा की यह मात्रा बदलती नहीं है बल्कि स्थिर रहती है।

प्रश्न 31.
ऊष्मा तथा तापमान में क्या अन्तर होता है?
उत्तर:
ऊष्मा ऊर्जा का वह रूप है जो वस्तुओं को गरम करती है। तापमान ऊष्मा की मात्रा का माप है। ऊष्मा की मात्रा घटने या बढ़ने से तापमान घटता और बढ़ता है।

प्रश्न 32.
किसी स्थान के तापमान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी स्थान पर मानक अवस्था में मापी गई भूतल से लगभग चार फुट ऊँची वायु की गर्मी को उस स्थान का तापमान कहते हैं। प्रायः तापमान और सूर्यातप को पर्यायवाची के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। वास्तव में ये दो शब्द दो भिन्न अवधारणाएँ हैं।

प्रश्न 33.
तापीय भूमध्य रेखा क्या होती है?
उत्तर:
ग्लोब के निम्न आक्षांशों के चारों ओर प्रत्येक देशान्तर के मध्यमान उच्चतम तापमान वाले बिन्दुओं को मिलाने वाली कल्पित रेखा को तापीय भूमध्य रेखा कहते हैं। यह रेखा वास्तविक भूमध्य रेखा के उत्तर में रहती है क्योंकि उत्तरी गोलार्द्ध में स्थलखण्ड अधिक हैं जो समुद्रों की अपेक्षा अधिक ऊष्मा का अवशोषण करते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सौर विकिरण से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पृथ्वी पर ऊष्मा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। यह धधकती हुई गैसों का एक विशाल गोला है जो ऊष्मा को अन्तरिक्ष में चारों ओर निरन्तर प्रसारित करता रहता है। सूर्य द्वारा ऊष्मा की प्रसारण क्रिया को सौर विकिरण कहा जाता है।

प्रश्न 2.
सूर्यातप क्या है?
उत्तर:
प्रवेशी सौर विकिरण को सूर्यातप कहते हैं अर्थात् पृथ्वी पर पहुंचने वाली सूर्य की ऊष्मा को सूर्यातप कहा जाता है। सूर्य से लगभग 15 करोड़ कि०मी० दूर स्थित पृथ्वी सूर्य से विकिरित होने वाली समस्त ऊष्मा का केवल 2 अरबवाँ भाग ही प्राप्त कर पाती है। सौर ऊर्जा सूर्य से लघु तरंगों के रूप में 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिण्ड की गति से पृथ्वी पर पहुँचती है।

प्रश्न 3.
तापमान के ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समुद्र तल से ऊँचाई की ओर वितरण को तापमान का ऊर्ध्वाधर वितरण कहा जाता है। वायुमण्डल में ऊँचाई की ओर जाने पर तापमान कम होता है। यह तापमान 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेल्सियस की दर से कम होता है। इसे तापमान की सामान्य पतन दर कहते हैं। यह ह्रास (पतन) दर क्षोभमण्डल तक ही रहती है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 4.
तापमान के क्षैतिज वितरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
तापमान के क्षैतिज वितरण से अभिप्राय तापमान के अक्षांशीय वितरण से है। भूमध्य रेखा से दोनों गोलार्डों में ध्रुवों की ओर जाने पर तापमान में क्रमशः कमी होती जाती है जिसे तापमान का क्षैतिज वितरण कहते हैं। इसे समताप रेखाओं द्वारा ही प्रकट किया जाता है। तापमान के क्षैतिज वितरण के आधार पर ही पृथ्वी को उष्ण कटिबन्ध, शीतोष्ण कटिबन्ध तथा शीत कटिबन्ध नामक तीन ताप कटिबन्धों में बाँटा जाता है।

प्रश्न 5.
दैनिक तापान्तर किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी स्थान के 24 घण्टे या एक दिन के अधिकतम तापमान तथा न्यूनतम तापमान के अन्तर को दैनिक तापान्तर या दैनिक ताप परिसर कहते हैं। उदाहरणार्थ, किसी स्थान A पर किसी दिन विशेष का अधिकतम तापमान 35° सेल्सियस तथा न्यूनतम तापमान 22° सेल्सियस रहा हो तो स्थान A का दैनिक तापान्तर 35°-22° = 13° सेल्सियस होगा। दैनिक तापान्तर तटीय क्षेत्रों में कम होता है तथा आन्तरिक स्थलीय भागों और मरुस्थलीय क्षेत्रों में अधिक होता है।

प्रश्न 6.
वार्षिक तापान्तर किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी स्थान के सबसे ठण्डे मास के औसत तापमान और सबसे गरम मास के औसत तापमान के अन्तर को वार्षिक तापान्तर कहते हैं। दैनिक तापान्तर की भाँति वार्षिक तापान्तर भी स्थलीय भागों में अधिक तथा सागरीय भागों में कम रहता है। उत्तरी भारत के जिन भागों में शीतकाल में सबसे ठण्डे मास का तापमान 10° सेल्सियस रहता है, वहीं ग्रीष्मकाल में तापमान 40° सेल्सियस रहता है, परन्तु सागरीय तटीय भागों में तापमान कम रहता है। सबसे अधिक वार्षिक तापान्तर साइबेरिया में वोयान्सक में 38° सेल्सियस रहता है।

प्रश्न 7.
पृथ्वी के ऊष्मा बजट से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी सूर्य से जितनी ऊष्मा प्राप्त करती है, उतनी ऊष्मा का वह त्याग भी कर देती है। इसलिए पृथ्वी पर औसत तापमान सदा एक-जैसा बना रहता है। पृथ्वी द्वारा प्राप्त सूर्यातप और उस द्वारा छोड़े जाने वाले भौमिक विकिरण के खाते को पृथ्वी का ऊष्मा बजट कहा जाता है। पृथ्वी के इसी बजट को पृथ्वी का ऊष्मा सन्तुलन भी कहा जाता है।

प्रश्न 8.
अक्षांशीय ऊष्मा सन्तुलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
हमारी पृथ्वी का आकार गोलाकार है जिसके कारण पृथ्वी पर सूर्य की किरणों का झुकाव अलग-अलग है इसलिए प्रत्येक अक्षांश पर सूर्यातप तथा भौमिक विकिरण में विभिन्नता दिखाई देती है। भूमध्य रेखीय क्षेत्रों के आस-पास ऊष्मा अधिक तथा ध्रुवीय प्रदेशों में ऊष्मा कम होती है । वायुमण्डल तथा महासागरों में ऊष्मा का आदान-प्रदान होता रहता है। इसी प्रकार ऊष्मा निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर स्थानान्तरित होती रहती है, जिसे अक्षांशीय ऊष्मा संतुलन कहते हैं।

प्रश्न 9.
सूर्यातप की मात्रा सूर्य की किरणों के आपतन कोण से किस प्रकार सम्बन्धित है?
उत्तर:
भूतल पर पहुँचने वाले सौर विकिरण को सूर्यातप कहते हैं। इसकी मात्रा सूर्य की किरणों के आपतन कोण पर निर्भर करती है। आपतन किरणें दो प्रकार की होती हैं

  • लम्बवत् किरणें।
  • तिरछी अथवा आड़ी किरणें।

लम्बवत् किरणें तिरछी किरणों की तुलन में भूतल का कम क्षेत्र घेरती हैं जिससे प्रति इकाई क्षेत्र को अधिक ताप प्राप्त होता है तथा तापमान अधिक हो जाता है। इसी प्रकार लम्बवत् किरणों को तिरछी किरणों की अपेक्षा कम वायुमण्डल पार करना पड़ता है जिससे वायुमण्डल की गैसें तथा जलवाष्प द्वारा अवशोषण, परावर्तन और बिखराव द्वारा सूर्यातप की बहुत कम मात्रा नष्ट होती है जिससे उस स्थान का तापमान तिरछी किरणों की तुलना में अधिक होता है।

प्रश्न 10.
सूर्यातप को जलवायु का प्रमुख नियन्त्रक कारक क्यों कहते हैं?
उत्तर:
सूर्यातप जलवायु का प्रमुख नियन्त्रक है। इसके निम्नलिखित कारण हैं-

  1. सूर्यातप पर बहुत-सी भौतिक क्रियाएँ आधारित हैं।
  2. इसी के कारण पवनें तथा समुद्री धाराएँ चलती हैं।
  3. सूर्यातप की मात्रा के कारण ही ऋतु-परिवर्तन होता है।
  4. सूर्यातप पर वायुमण्डलीय गतियाँ और वायुराशियाँ आधारित हैं। इस प्रकार सूर्य जलवायु के सभी तत्त्वों एवं पक्षों पर नियन्त्रण करता है।

प्रश्न 11.
विभिन्न अक्षांशों पर प्राप्त सूर्यातप की मात्रा भिन्न क्यों होती है?
उत्तर:
सूर्यातप की मात्रा मुख्य रूप से सूर्य की किरणों के आपतन कोण तथा दिन की अवधि पर निर्भर करती है। विभिन्न अक्षांशों पर पृथ्वी की वार्षिक गति तथा पृथ्वी के अक्ष के 22/5° पर झुकाव के कारण सूर्य की किरणों का आपतन कोण तथा दिन की अवधि भिन्न-भिन्न होती है। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लगभग लम्बवत् रूप से चमकती हैं, परन्तु भूमध्य रेखा से ध्रुवों करणें तिरछी होती जाती हैं तथा दिन की अवधि भी अधिक हो जाती है इसलिए विभिन्न अक्षांशों पर सूर्यातप की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है, परन्तु एक ही अक्षांश के सभी स्थानों पर सूर्यातप की मात्रा समान होती है।

प्रश्न 12.
वायुमण्डल सूर्यातप की अपेक्षा भौमिक विकिरण से अधिक गरम क्यों होता है?
उत्तर:
सूर्य की किरणें प्रत्यक्ष रूप से वायुमण्डल को गरम नहीं करतीं। ये किरणे लघु तरंगों के रूप में वायुमण्डल में से गुज़रती हैं। वायुमण्डल इन तरंगों को अपने अंदर समाने में अर्थात् अवशोषित करने में असमर्थ होता है। पहले सौर ऊर्जा से पृथ्वी गरम होती है, इसे पार्थिव या भौमिक विकिरण कहते हैं। भूतल को उष्णता लम्बी तरंगों के रूप में प्राप्त होती है जिसका 90% भाग १ रातल अवशोषित कर लेता है। इससे वायुमण्डल गरम होता रहता है। पार्थिव विकिरण द्वारा वायुमण्डल की निचली परतें ही गरम होती हैं। अधिक ऊँचाई पर इसका प्रभाव बहुत कम होता है इसलिए वायुमण्डल नीचे से ऊपर गरम होता है।

प्रश्न 13.
समताप रेखाओं की दिशा अधिकतर पूर्व-पश्चिम क्यों रहती है?
उत्तर:
प्रत्येक अक्षांश रेखा पर स्थित सभी स्थानों पर सूर्य की किरणों का आपतन कोण तथा दिन की अवधि समान होती है इसलिए ये सभी स्थान समान मात्रा में सूर्यातप की मात्रा प्राप्त करते हैं जिससे इन सभी स्थानों का तापमान समान होता है। समान तापमान वाले स्थानों को एक रेखा से मिलाते हैं जिसे समताप रेखा कहते हैं। अक्षांश पूर्व-पश्चिम दिशा में फैले हुए हैं, इसलिए समताप रेखाओं तथा अक्षांश रेखाओं में अनुरूपता दिखाई पड़ती है। इसलिए ये रेखाएँ अक्षांश रेखाओं का अनुकरण करते हुए पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली हुई हैं।

प्रश्न 14.
समताप रेखाएँ मौसम के अनुसार उत्तर और दक्षिण की ओर क्यों खिसकती हैं?
उत्तर:
समताप रेखाओं की स्थिति मख्य रूप से सर्यातप की अधिकतम मात्रा पर आधारित होती है। मौसम के अनुसार इन किरणों में परिवर्तन होता रहता है। उदाहरण के लिए, जून मास में सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत् रूप से चमकता है जिससे ग्रीष्मकाल में सूर्यातप की अधिकतम मात्रा उत्तरी गोलार्द्ध में होती है, परन्तु दिसम्बर मास में सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत् रूप से चमकता है। जिससे शीतकाल में सूर्यातप की अधिकतम मात्रा दक्षिणी गोलार्द्ध में होती है, इसलिए ग्रीष्मकाल में समताप रेखाएँ उत्तर दिशा की ओर तथा शीतकाल में दक्षिण दिशा की ओर खिसक जाती हैं।

प्रश्न 15.
समताप रेखाएँ सबसे अधिक कहाँ खिसकती हैं? स्थल पर या जल पर? इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समताप रेखाएँ जल की अपेक्षा स्थल पर अधिक खिसकती हैं, क्योंकि स्थल तथा जल में गरम होने की क्षमता में विभिन्नता पाई जाती है। स्थल शीघ्र गरम हो जाते हैं तथा शीघ्र ही ठण्डे हो जाते हैं, परन्तु जल देर से गरम होता है और देर से ही ठण्डा होता है। इसलिए मौसम के अनुसार जलीय क्षेत्रों की तुलना में स्थलीय क्षेत्रों के तापमान में अधिक अन्तर पाया जाता है, परन्तु तापमान का यह अन्तर सागरों तथा महासागरों पर कम होता है। इसलिए स्थलीय क्षेत्रों पर मौसम के अनुसार समताप रेखाएँ अधिक खिसकती हैं।

प्रश्न 16.
दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ अधिक अनियमित क्यों होती हैं?
उत्तर:
स्थलीय क्षेत्रों तथा जलीय क्षेत्रों में गरम होने की क्षमता में विभिन्नता पाई जाती है इसलिए समताप रेखाएँ महासागरों से महाद्वीपों अथवा महाद्वीपों से महासागरों की ओर आते समय मुड़ जाती हैं। ये समताप रेखाएँ जुलाई मास में उत्तरी गोलार्द्ध में महाद्वीपों से गुजरते समय भूमध्य रेखा की ओर मुड़ जाती हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थिति इसके विपरीत होती है। मुख्य रूप से इसके दो निम्नलिखित कारण हैं

  • जल तथा स्थल क्षेत्रों का असमान वितरण।
  • स्थल तथा जल के गरम होने की क्षमता में विभिन्नता।

उत्तरी गोलार्द्ध में स्थलीय क्षेत्रों का विस्तार अधिक है, परन्तु दक्षिणी गोलार्द्ध में जलीय क्षेत्रों का विस्तार अधिक है। इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ अनियमित हैं, परन्तु दक्षिणी गोलार्द्ध में नियमित तथा सीधी हैं।

प्रश्न 17.
यद्यपि न्यूयार्क 40°N तथा बर्लिन 52°N पर स्थित है, परन्तु जनवरी मास का औसत तापमान लगभग समान क्यों रहता है?
उत्तर:
यद्यपि बर्लिन तथा न्यूयार्क में 52°- 40° = 12° अक्षांश का अन्तर है। बलिन न्यूयार्क से 12° उत्तर में स्थित है। उत्तर की ओर जाते समय तापमान में कमी आती है, परन्तु बर्लिन के निकट उत्तरी अन्ध-महासागर की गरम धारा बहती है जो इस स्थान के तापमान को बढ़ा देती है। इसलिए बर्लिन उच्च अक्षांशों में स्थित होते हा भी इसका तापमान जनवरी में न्यूयार्क के समान होता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 18.
मनुष्य एवं प्रकृति के लिए सौर्मिक ऊर्जा के महत्त्व का उल्लेख करें।
उत्तर:
इस पथ्वी पर सभी प्रकार के जीवन और हर प्रकार की गति और संचरण के पीछे एक ही शक्ति है- सौर्यिक ऊर्जा।

  1. पाला रहित दिनों की संख्या ही फसलों के पकने की अवधि तय करती है। फसलों के पकने की अवधि भूमध्य रेखा से दूर जाने पर घटती जाती है।
  2. सूर्यातप की मात्रा निर्धारित करती है कि उस क्षेत्र में किस प्रकार की फसलें, वनस्पति और जीव-जगत होगा।
  3. वायुमण्डल के सामान्य संचरण के लिए सूर्यातप ही जिम्मेदार है। आँधी, तूफान, चक्रवात, पवनें सभी सौर्यिक ऊर्जा के कारण होते हैं।
  4. समुद्री जल की गति भी सूर्यातप से जुड़ी हुई है। नदियों का होना भी सूर्य के कारण है।
  5. सूर्यातप चट्टानों के भौतिक अपक्षय में सहयोग देता है।
  6. पृथ्वी पर नित्य बदलता भू-दृश्य प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सौर्यिक ऊर्जा की ही उपज है।

प्रश्न 19.
विभिन्न अक्षांश सूर्यातप की भिन्न-भिन्न मात्रा क्यों प्राप्त करते हैं?
उत्तर:
किसी स्थान पर सूर्यातप की मात्रा सूर्य की किरणों के आपतन कोण तथा दिन की अवधि पर निर्भर करती है। पृथ्वी के अक्ष के झुकाव तथा पृथ्वी की वार्षिक गति के कारण भिन्न-भिन्न अक्षांशों पर सूर्य की किरणों का आपतन कोण भिन्न-भिन्न होता है तथा दिन की अवधि भी एक-समान नहीं होती। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन बढ़ता सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान जाता है और साथ ही दिन की अवधि भी बढ़ती जाती है। लेकिन किरणों के तिरछेपन के कारण सूर्यातप की मात्रा घटती जाती है। इसलिए भिन्न-भिन्न अक्षांशों पर सूर्यातप की मात्रा अलग-अलग पाई जाती है। हाँ, एक ही अक्षांश पर सूर्यातप की मात्रा सभी स्थानों पर एक-समान होती है।

प्रश्न 20.
दैनिक उच्चतम तापमान क्या होता है और यह कब होता है?
उत्तर:
किसी विशेष दिन के अधिकतम तापमान को उस दिन का उच्चतम तापमान कहा जाता है। दिन में दोपहर के समय सूर्य आकाश में सबसे ऊँचा होता है तथा सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं। इससे धरातल गरम होने लगता है। भूतल के सम्पर्क में आने वाला वायुमण्डल पार्थिव विकिरण अर्थात् पृथ्वी द्वारा छोड़ी गई ऊष्मा से गरम हो जाता है। इसलिए वायुमण्डल का उच्चतम तापमान दोपहर बाद दिन के 2.00 बजे होता है। यह सत्य भी है कि दोपहर की अपेक्षा ‘दोपहर बाद’ तापमान अधिक होता है।

प्रश्न 21.
दैनिक न्यूनतम तापमान क्या होता है? यह कब होता है?
उत्तर:
दिन भर में सबसे कम तापमान को दैनिक न्यूनतम तापमान कहते हैं। न्यूनतम तापमान रात के 12 बजे नहीं होता अपितु प्रातः 4 बजे होता है। धरातल द्वारा गर्मी छोड़ने की क्रिया ‘विकिरण’ (Radiation) सुबह तक होती रहती है। जब पृथ्वी पूर्ण रूप से ठण्डी हो जाती है तो वायुमण्डल में न्यूनतम ताप होता है।

प्रश्न 22.
मध्यमान दैनिक तापमान क्या होता है और यह कैसे निकलता है?
उत्तर:
किसी भी दिन के उच्चतम तथा न्यूनतम तापमान की औसत को मध्यमान दैनिक तापमान कहते हैं।
Mean, Daily Tempt. = \(\frac { Max. Temp. + Min. Temp. }{ 2 }\)
यदि किसी स्थान का किसी विशेष दिन का अधिकतम तापमान 38°C तथा न्यूनतम तापमान 28°C है तो उस स्थान का मध्यमान दैनिक तापमान = \(\frac{38^{\circ} \mathrm{C}+28^{\circ} \mathrm{C}}{2}\) = 33°C

प्रश्न 23.
किसी स्थान के मध्यमान तापमान से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
एक लम्बे समय (पिछले 35 वर्षों) के मध्यमान वार्षिक तापमान को जोड़कर 35 से भाग देने पर किसी स्थान का औसत तापमान निकल आता है। इसे किसी स्थान का सामान्य तापमान भी कहते हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि किसी स्थान की जलवायु गरम है या ठण्डी।

प्रश्न 24.
सूर्यातप और तापमान में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सूर्यातप और तापमान में निम्नलिखित अन्तर हैं-

सूर्यातपतापमान
1. सूर्यातप ऊर्जा का एक रूप है जो वस्तुओं को गरम करती है।1. तापमान किसी पदार्थ की गरमी या ठंडक की माप है।
2. सूर्यातप को जूल और कैलोरी में प्रकट किया जाता है।2. तापमान आवश्यकतानुसार कई पैमानों पर मापा जाता है लेकिन इसमें सेल्सियस और फारेनहाइट प्रमुख हैं।
3. सूर्यातप का संचार/स्थानांतरण चालन, संवहन और विकिरण द्वारा होता है।3. तापमान का संचरण नहीं होता।
4. सूर्यातप या ऊष्मा पदार्थों को गरम करती है। इससे ठोस पदार्थ तरल और गैस अवस्था में बदल जाते हैं।4. पदार्थों को ऊष्मा मिलने से उनका तापमान बढ़ता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सूर्यातप क्या है? भूतल पर सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
सूर्यातप का अर्थ पृथ्वी पर पहुँचने वाली सूर्य की ऊष्मा को सूर्यातप कहा जाता है। यह ऊर्जा सूर्य से लघु तरंगों के रूप में 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिण्ड की गति से पृथ्वी पर पहुँचती है।

सूर्यातप को प्रभावित करने वाले कारक:
भू-तल पर सभी जगह सूर्यातप की मात्रा एक समान नहीं होती। सूर्यातप के वितरण को अनेक कारक नियन्त्रित करते हैं जिनका वर्णन अग्रलिखित प्रकार से है-
1. सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य झुकाव-सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर इन किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है। सूर्य की किरणों का तिरछापन धरातल पर पहुँचने वाली सूर्यातप की मात्रा को दो प्रकार से प्रभावित करता है
(क) क्षेत्रफल-जब सूर्य लगभग मध्याह्न में होता है तो उसकी किरणें धरातल पर लम्बवत् पड़ती हैं। लम्बवत् किरणें भू-पृष्ठ की अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल पर फैलती हैं जिसके कारण उस स्थान का प्रति इकाई ताप भी अधिक हो जाता है। तिरछी किरणों का उतना ही समूह भू-पृष्ठ के अधिक क्षेत्रफल को घेरता है। अधिक क्षेत्रफल को गर्म करने के कारण वहाँ प्रति इकाई सूर्यातप की तीव्रता भी कम हो जाती है।

(ख) वायुमण्डल की मोटाई-सीधी किरणों की अपेक्षा तिरछी किरणों को वायुमण्डल की मोटी परत पार करनी पड़ती है। उदाहरणतः जब सूर्य की क्षैतिज से ऊँचाई केवल 4° होती है तो सूर्य की किरणों को 12 गुना मोटे वायुमण्डल से गुजरना पड़ता है। वायुमण्डल में सूर्य की किरणें जितनी अधिक दूरी तय करेंगी उनका बिखराव, परावर्तन और अवशोषण भी उतना ही अधिक होगा। परिणामस्वरूप पृथ्वी पर कम सूर्यातप पहुँचेगा।

2. दिन की अवधि-जिन स्थानों पर दिन लम्बे और रातें छोटी होती हैं वहाँ प्राप्त होने वाला सूर्यातप अधिक और रात को भू-पृष्ठ से विकरित होकर अन्तरिक्ष में जाने वाली ऊष्मा अपेक्षाकृत कम होती है। ऐसे क्षेत्र सूर्यातप-आधिक्य वाले क्षेत्र कहलाते हैं। इसके विपरीत जिन स्थानों पर दिन छोटे और रातें लम्बी होती हैं वहाँ सूर्यातप की मात्रा कम और विकरित होकर नष्ट हुई ऊष्मा। की मात्रा अधिक होती है। ऐसे क्षेत्रों को ऊष्मा-हानि वाले क्षेत्र कहा जाता है। दिन की अवधि ऋतु और अक्षांश द्वारा निर्धारित होती है। वास्तव में सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य झुकाव और दिन की अवधि दोनों मिलकर पृथ्वी पर सूर्यातप के वितरण को नियन्त्रित करते हैं। अकेले दिन की अवधि से बात नहीं बनती। उदाहरणतः उत्तरी गोलार्द्ध के उच्च अक्षांशों में दिन की अवधि 6 मास की होने के बावजूद सूर्यातप की मात्रा न्यूनतम होती है और वहाँ बर्फ जमी रहती है। इसके लिए सूर्य की किरणों का तिरछापन उत्तरदायी है।

3. वायमण्डल की पारगम्यता-जिन क्षेत्रों में वायमण्डल में आर्द्रता. बादल और धलकण जैसी परिवर्तनशील दशाएँ अधिक पाई जाती हैं वहाँ परावर्तन, अवशोषण व प्रकीर्णन द्वारा सूर्यातप का हास होता रहता है। इसके विपरीत जहाँ वायुमण्डल निर्मल होता है वहाँ अपेक्षाकृत अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है। यही कारण है कि अफ्रीका के सहारा मरुस्थल में मेघ-रहित आकाश होने के कारण अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है जबकि भूमध्य रेखा पर स्थित ज़ायरे बेसिन (अफ्रीका) में मेघाच्छन्न आकाश के कारण बहुत मात्रा में सूर्यातप परावर्तित हो जाता है।

सूर्यातप को प्रभावित करने वाले गौण कारक-
4. भूमि का ढाल-पर्वतों के जो ढाल सूर्य के सामने पड़ते हैं उन पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं और वहाँ अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है। जो ढाल सूर्य से विमुख होते हैं, वहाँ पड़ने वाली सूर्य की तिरछी किरणें कम सूर्यातप दे पाती हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में, पर्वतों के दक्षिणी ढाल सूर्य के सामने और उत्तरी ढाल से विमुख पड़ते हैं।

5. सौर कलंकों की संख्या-सूर्य के तल पर काले रंग के गहरे व उथले अनेक धब्बे बनते और बिगड़ते रहते हैं, उन्हें सौर कलंक हते हैं। सौर विकिरण और सौर कलंकों की संख्या में गहरा सम्बन्ध होता है। इन कलंकों की संख्या के बढ़ने और घटने पर पृथ्वी पर सूर्यातप की मात्रा बढ़ती और घटती है।

6. पृथ्वी की सूर्य से दूरी-सूर्य के चारों ओर अण्डाकार पथ पर परिक्रमण करती हुई पृथ्वी कभी सूर्य से दूर व कभी सूर्य के पास आ जाती है। 4 जुलाई को अपसौरिका की स्थिति में पृथ्वी सूर्य से 15.20 करोड़ किलोमीटर की अधिकतम दूरी पर होती है। 3 जनवरी को उपसौरिका की स्थिति में पृथ्वी सूर्य से 14.70 करोड़ किलोमीटर की निकटतम दूरी पर होती है। इस प्रकार 3 जनवरी को 4 जुलाई की अपेक्षा पृथ्वी को लगभग 7% अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है।

7. जल-स्थल का वितरण-धरातल का तीन-चौथाई भाग जल से तथा एक-चौथाई भाग स्थल से ढका हुआ है। जल और स्थल भिन्न-भिन्न तापमान पर गरम और ठण्डे होते हैं। जल की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होने के कारण वह देर से गरम और देर से ठण्डा होता है। इस प्रकार जल और स्थल का वितरण भी सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करता है।

8. धरातल की प्रकृति धरातल पर कुछ वस्तुएँ सूर्यातप का अधिक अवशोषण करती हैं व अन्य कुछ कम। जहाँ सूर्यातप का अवशोषण अधिक होता है वहाँ सूर्यातप की मात्रा अधिक पाई जाती है; जैसे काली व गहरे रंग की मिट्टियों के क्षेत्र । बर्फीले व पथरीले प्रदेश सूर्यातप की अधिकांश मात्रा का प्रतिबिम्बन कर देते हैं। अतः ऐसे क्षेत्रों में कम सूर्यातप प्राप्त होता है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी के ऊष्मा बजट का विस्तृत सचित्र विवरण दीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी सूर्य से जितनी ऊष्मा प्राप्त करती है, उतनी ऊष्मा का वह त्याग भी कर देती है। इसलिए पृथ्वी पर औसत तापमान सदा एक जैसा बना रहता है। पृथ्वी द्वारा प्राप्त सूर्यातप और उसके द्वारा छोड़े जाने वाले भौमिक विकिरण (Terrestrial Radiation) के खाते को पृथ्वी का ऊष्मा बजट कहा जाता है।
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान 1
मान लीजिए वायुमण्डल की सबसे ऊपरी सतह पर प्राप्त होने वाली ऊष्मा 100 इकाई है। इनमें से 35 इकाइयाँ धरातल पर पहुँचने से पहले ही अन्तरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं। इन 35 इकाइयों में से 6 इकाइयाँ धूलकणों से प्रकीर्णन (Scatterring) द्वारा, 27 इकाइयाँ मेघों द्वारा और शेष 2 इकाइयाँ बर्फ से ढके क्षेत्रों द्वारा परावर्तित होकर अन्तरिक्ष में लौट जाती हैं (6+27 + 2 = 35)। सौर विकिरण की यह परावर्तित मात्रा पृथ्वी की एल्बिडो (Albedo of the earth) कहलाती है।

बची हुई ऊष्मा की 65 इकाइयों में से 14 इकाइयाँ वायुमण्डल द्वारा और 51 इकाइयाँ पृथ्वी द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं (14+ 51 = 65)। ऊष्मा की इस मात्रा को प्रभावी सौर विकिरण कहा जाता है। इस प्रकार सूर्य से प्राप्त ऊष्मा के छोटे-से अंश का भी लगभग आधा भाग ही पृथ्वी पहुँच पाता है।

पृथ्वी द्वारा अवशोषित 51 इकाइयाँ पुनः भौमिक विकिरण के रूप में वापस शून्य में लौट जाती हैं। इन 51 इकाइयों में से 17 इकाइयाँ सीधे अन्तरिक्ष में चली जाती हैं और 34 इकाइयाँ वायुमण्डल द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं- (17+ 34 = 51)। इन 34 इकाइयों में से 6 इकाइयाँ स्वयं वायुमण्डल द्वारा, 9 इकाइयाँ संवहन द्वारा व 19 इकाइयाँ गुप्त ऊष्मा द्वारा अवशोषित हो जाती हैं।

इस प्रकार वायुमण्डल 48 इकाइयों का अवशोषण करके (34 भौमिक विकिरण की व 14 सौर विकिरण की) उन्हें अन्तरिक्ष में लौटा देता है। पृथ्वी और वायुमण्डल दोनों मिलकर 17 + 48 = 65 इकाइयों को अन्तरिक्ष में भेजते हैं। इससे पृथ्वी और वायुमण्डल द्वारा अवशोषित 51 + 14 = 65 इकाइयों का हिसाब बराबर हो जाता है। इसी को पृथ्वी का ऊष्मा बजट अथवा ऊष्मा सन्तुलन कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 3.
तापमान को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किसी स्थान के तापमान को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं-
1. अक्षांश अथवा भूमध्य रेखा से दूरी पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण सूर्य की किरणें सारा वर्ष भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं। भूमध्य रेखा से दूर ध्रुवों की ओर जाने पर सूर्य की किरणें अधिकाधिक तिरछी होती जाती हैं। लाम्बिक या सीधी किरणें तिरछी किरणों की अपेक्षा अधिक ऊष्मा प्रदान करती हैं, क्योंकि वे तिरछी किरणों की अपेक्षा कम क्षेत्रफल को गरम करती हैं और अपेक्षाकृत परतें वायुमण्डल से गुजरती हैं। अतः भूमध्य रेखा के निकट स्थित स्थानों का तापमान ऊँचा होता है जबकि भूमध्य रेखा से दूर स्थित स्थानों का तापमान कम होता है, यहाँ तक कि ध्रुवों पर तापमान हिमांक से नीचे गिर जाता है।

2. समुद्र तल से ऊँचाई-वायुमण्डल धूलकणों, गैस व अशुद्धियों द्वारा अवशोषित ऊष्मा से गरम होता है। ऊँचाई के साथ वायु विरल होती जाती है और उसका घनत्व भी घटता जाता है। परिणामस्वरूप ऊँचाई के साथ वायु में अवशोषित होने वाली ऊष्मा की मात्रा भी घटती जाती है। सामान्यतः वायु की निचली परतों में 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेल्सियस अथवा 1 किलोमीटर की ऊँचाई पर 6.4° सेल्सियस तापमान गिर जाता है। ऊँचाई के साथ तापमान का यह ह्रास विभिन्न स्थानों और विभिन्न ऋतुओं में अलग-अलग होता है। इसी कारण पर्वतीय प्रदेश मैदानों की अपेक्षा अधिक ठण्डे होते हैं।

3. समुद्र तट से दूरी-उच्चतर विशिष्ट ऊष्मा के कारण जल देर से गरम और देर से ठण्डा होता है जबकि स्थलीय भाग शीघ्र गरम और शीघ्र ठण्डे हो जाते हैं। इसी कारण समुद्र तटीय प्रदेशों का तापमान भीतरी प्रदेशों की अपेक्षा अधिक समान रहता है। तटीय स्थानों पर सर्दियों में कम सर्दी, गर्मियों में कम गर्मी और वार्षिक तापान्तर कम होता है जबकि समुद्र से दूर स्थित भीतरी प्रदेशों में सर्दियों में अधिक सर्दी, गर्मियों में अधिक गर्मी और वार्षिक तापान्तर भी अधिक रहता है।

4. समुद्री धाराएँ-समुद्री धाराएँ भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर ऊष्मा का और ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर ठण्ड का स्थानान्तरण करती रहती हैं। गरम या ठण्डी धाराएँ जिन तटीय क्षेत्रों के पास से गुजरती हैं वे वहाँ का तापमान उसी के अनुरूप अधिक या कम कर देती हैं। इसका कारण यह है कि इन धाराओं के ऊपर से बहने वाली पवनें अपने साथ गर्म या ठण्डी धाराएँ तटीय क्षेत्रों में ले आती हैं। उदाहरणतः उत्तर:पश्चिमी यूरोप के तट के साथ बहने वाली गरम गल्फ स्ट्रीम या उत्तर अटलाण्टिक ड्रिफ्ट वहाँ के तटीय भागों का तापमान ऊँचा रखती है जिससे वहाँ के बन्दरगाह साल भर खुले रहते हैं। इसके विपरीत उन्हीं अक्षांशों पर स्थित उत्तर:पूर्वी कनाडा के लैब्रेडोर तट पर लैब्रेडोर की ठण्डी धारा बहती है जिससे वहाँ का तापमान हिमांक से भी नीचे हो जाता है और वर्ष के 8-9 महीने बन्दरगाहें बर्फ से जमी रहने के कारण बन्द रहती हैं।

5. प्रचलित पवनें हवाओं की दिशा भी किसी स्थान के तापमान को प्रभावित करती है। उष्ण कटिबन्धों से आने वाली तप्त पवनें तापमान को बढ़ा देती हैं जबकि ध्रुवीय प्रदेशों से आने वाली ठण्डी पवनें तापमान को कम कर देती हैं। समुद्र से आने वाली पवनें आर्द्र होती हैं और वर्षा लाती हैं और तापमान की विषमता को कम करती हैं जबकि महाद्वीपों के आंतरिक भागों से आने वाली
शुष्क पवनें तापमान की विषमता को बढ़ा देती हैं।

6. भूमि का ढाल-उत्तरी गोलार्द्ध में पर्वतों के दक्षिणी ढाल और दक्षिणी गोलार्द्ध में पर्वतों के उत्तरी ढाल सूर्य के सामने पड़ते हैं। सूर्य के सामने पड़ी ढालों पर किरणें सीधी पड़ती हैं जो अधिक सूर्यातप प्रदान करती हैं जिससे तापमान बढ़ता है। सूर्य से विपरीत दिशा में स्थित ढालों पर किरणें तिरछी पड़ती हैं जिससे वहाँ कम सूर्यातप व कम तापमान रहता है। यही कारण है कि हिमालय और आल्पस की दक्षिणी ढलानों पर अधिक तापमान के कारण मानव बस्तियाँ व कृषि कार्य केन्द्रित हैं जबकि उत्तरी ठण्डे ढालों पर केवल सघन वन पाए जाते हैं।

7. भू-तल का स्वभाव-किसी स्थान का तापमान वहाँ प्राप्त सूर्यातप के अवशोषण और प्रतिबिम्बन की मात्रा पर निर्भर करता है। हिम तथा वनस्पति से ढके प्रदेश सूर्यातप की अधिकांश मात्रा को प्रतिबिम्बित करके वापस वायुमण्डल में लौटा देते हैं जिस कारण इन प्रदेशों का तापमान कम रहता है। इसके विपरीत काली अथवा गहरी मिट्टियों और रेत से ढके भू-पृष्ठ के भाग सूर्यातप की अधिकांश मात्रा को अवशोषित करके वहाँ के तापमान को ऊँचा कर देते हैं।

8. मेघ तथा वर्षा-जिन प्रदेशों में आकाश अधिकतर बादलों से ढका रहता है और वहाँ वर्षा भी अधिक होती है। वहाँ तापमान बहुत अधिक नहीं हो पाता क्योंकि बादल सूर्य की किरणों को पृथ्वी तल तक नहीं पहुँचने देते और उन्हें वापिस प्रतिबिम्बित कर देते हैं। यही कारण है कि भूमध्यरेखीय प्रदेश में सूर्य की किरणें सारा वर्ष सीधी पड़ने के बावजूद वहाँ तापमान इतना अधिक नहीं हो पाता जितना कि मेघ-रहित उष्ण मरुस्थलों में।

9. पर्वतों का अवरोध-पर्वत ठण्डी हवाओं को रोककर दूसरी ओर स्थित क्षेत्र को ठण्ड से बचाते हैं जिससे तापमान नीचे नहीं गिर पाता। उदाहरणतः कोलकाता और चीन का कैण्टन दोनों तटीय नगर हैं और एक ही अक्षांश पर स्थित हैं। कैण्टन कोलकाता की अपेक्षा ठण्डा है। इसका कारण यह है कि हिमालय कोलकाता को मध्य एशिया से आने वाली ठण्डी पवनों से बचा लेता है जबकि कैण्टन के पास पर्वतीय अवरोध न होने के कारण वहाँ भयंकर ठण्ड होती है। इसी प्रकार यूरोप में आल्पस पर्वत इटली को ध्रुवीय ठण्डी पवनों से बचाते हैं।

प्रश्न 4.
समताप रेखाएँ क्या हैं? इनकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
समताप रेखाएँ-समताप रेखाएँ वे काल्पनिक रेखाएँ हैं जो मानचित्र पर समान तापक्रम वाले स्थानों को मिलाती हैं। समताप रेखाओं की विशेषताएँ-समताप रेखाओं में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं-
(1) धरातल पर एक अक्षांश पर सूर्यातप की मात्रा लगभग समान पाई जाती है, इसलिए तापक्रम भी एक अक्षांश पर बराबर रहता है। यही वजह है कि समताप रेखाएँ पूर्व-पश्चिम दिशा में एक-दूसरे के लगभग समानान्तर तथा अक्षांशों के समानान्तर खींची जाती हैं।

(2) समताप रेखाओं के बीच की दूरी से ताप प्रवणता ज्ञात की जाती है। यदि समताप रेखाओं के बीच की दूरी कम है तो इसका तात्पर्य है कि दो स्थानों के तापक्रम में तीव्र वृद्धि हो रही है अर्थात् ताप प्रवणता अधिक है और यदि उनके बीच की दूरी अधिक है तो ताप प्रवणता कम होगी।

(3) जल तथा स्थल का तापक्रम भिन्न-भिन्न होता है, इसलिए जब समताप रेखाएँ तटीय भागों पर आती हैं तो एकदम मुड़ जाती हैं। इसका तात्पर्य है कि तापक्रम में अचानक परिवर्तन आ जाता है।

(4) दक्षिणी गोलार्द्ध जलीय गोलार्द्ध है जिसमें जल की प्रधानता है इसलिए समताप रेखाएँ कम मुड़ती हैं, जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता के कारण ये अधिक टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं।

(5) भूमध्य रेखीय एवं उष्ण कटिबन्धीय भागों में समताप रेखाओं का मान अधिक होता है, जबकि ध्रुवों की ओर जाने पर इनका मान क्रमशः घटता जाता है।

(6) स्थलीय भाग से समुद्र की ओर जाते समय समताप रेखाएँ शीतकाल में भूमध्य रेखा की ओर तथा ग्रीष्मकाल में ध्रुवों की ओर मुड़ जाती हैं, क्योंकि शीतकाल में स्थलीय भाग समुद्रों से अधिक ठण्डे (कम तापक्रम) होते हैं।

प्रश्न 5.
जनवरी तथा जुलाई के तापमान के वितरण के मुख्य लक्षण क्या हैं?
उत्तर:
संसार में जनवरी तथा जुलाई के महीने प्रायः न्यूनतम तथा अधिकतम तापक्रम वाले महीने होते हैं इसलिए इन दो महीनों के तापक्रम का विश्लेषण आवश्यक है।
1. जनवरी के तापमान का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Temperature of January) जनवरी के महीने में सूर्य की स्थिति दक्षिणायन होती है अर्थात् मकर रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं इसलिए दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय ग्रीष्म ऋतु होती है। इस समय ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी मध्य अफ्रीका तथा उत्तरी-पश्चिमी अर्जेन्टीना में तापमान लगभग 30° सेल्सियस के आस-पास रहता है, जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में तापमान की स्थिति इसके विपरीत होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में शीत ऋतु होती है, रातें बड़ी होती हैं और तापक्रम कम होता है। साइबेरिया में वोयान्सक विश्व का सबसे ठण्डा क्षेत्र है जहाँ पर जनवरी महीने का तापमान -50° सेल्सियस तक गिर जाता है।

उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता है और तापमान स्थलीय भागों में कम रहता है, इसलिए समताप रेखाएँ जैसे ही स्थलों से महासागरों में पहुँचती हैं तो भूमध्य रेखा की ओर मुड़ जाती हैं क्योंकि सागरीय भागों में तापक्रम अपेक्षाकृत अधिक रहता है। अतः उत्तरी गोलार्द्ध में ताप प्रवणता अधिक रहती है। (क्योंकि समताप रेखाओं के बीच की दूरी कम रहती है।) दक्षिणी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ महासागरीय प्रभाव के कारण दूर-दूर रहती हैं और महाद्वीपों से गुजरते समय दक्षिणी ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं। समताप रेखाएँ उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में अधिक नियमित होती हैं।

2. जुलाई के तापमान का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Temperature of July)-जुलाई के माह में उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर लम्बवत होती हैं, इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लम्बी तथा ग्रीष्म ऋतु होती है, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में शीत ऋतु होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में 10° से 40° अक्षांशों के मध्य अधिकतम तापक्रम रहता है। तापक्रम का औसत 30° सेल्सियस से अधिक रहता है। समताप रेखाएँ एक-दूसरे से दूर-दूर स्थित होती हैं।

जब ये रेखाएँ स्थलीय भागों से महासागरों की ओर जाती हैं तो महासागर की सीमा से दक्षिण की ओर भूमध्य रेखा की ओर स्थल की ओर गुजरते समय ध्रुवों की ओर मुड़ जाती हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी स्थिति अत्यधिक अनियमित होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिणी-पश्चिमी एशिया, उत्तरी-पश्चिमी भारत, अमेरिका का दक्षिणी-पूर्वी भाग तथा अफ्रीका में सहारा मरुस्थल का तापमान अत्यधिक अर्थात् 35° सेल्सियस से अधिक रहता है। न्यूनतम तापमान ध्रुवीय क्षेत्रों में पाया जाता है। पाकिस्तान तथा उत्तरी-पश्चिमी भारत ग्रीष्म ऋतु में ‘लू’ की चपेट में आ जाते हैं, लेकिन जुलाई के प्रथम सप्ताह में वर्षा के कारण तापक्रम में कुछ कमी आ जाती है।

प्रश्न 6.
तापमान के क्षैतिज वितरण का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
तापमान के क्षैतिज वितरण का आशय अंक्षाशीय वितरण से है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर (दोनों गोलार्डों में) जाने पर तापमान में क्रमशः कमी होती जाती है। इस क्षैतिज वितरण के आधार पर पृथ्वी को तीन कटिबन्धों या मण्डलों में विभक्त किया जाता है
1. उष्ण-कटिबन्ध (Torrid Zone) यह कटिबन्ध दोनों गोलार्डों में 237° उत्तरी तथा 237° दक्षिणी अक्षांशों के बीच का क्षेत्र है अर्थात् कर्क और मकर रेखा के बीच के क्षेत्र को उष्ण कटिबन्ध कहा जाता है। यहाँ साल भर सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं जिससे तापक्रम ऊँचा रहता है। भूमध्य रेखा के आस-पास तो शीत ऋतु होती ही नहीं, वहाँ औसत तापक्रम ऊँचा रहता है।

2. शीतोष्ण कटिबन्ध (Temperature Zone)-यह कटिबन्ध दोनों गोलार्डों में 23/2° से 66/2° अक्षांशों के मध्य स्थित है। इस प्रदेश में दिन-रात की अवधि मौसम के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। जब सूर्य की स्थिति उत्तरायण होती है तो उस समय उत्तरी गोलार्द्ध में दिन बड़े तथा रातें छोटी हैं और ग्रीष्म ऋतु होती है, लेकिन जब सूर्य की स्थिति दक्षिणायन होती है तो दक्षिणी . गोलार्द्ध में दिन बड़े तथा रातें छोटी होती हैं और उत्तरी गोलार्द्ध में इसके विपरीत स्थिति होती है।

3. शीत कटिबन्ध (Frigid Zone)-इस कटिबन्ध का विस्तार दोनों गोलार्डों में 66%° से ध्रुवों (90°) तक है। यहाँ सूर्य की किरणे अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं जिसके कारण दिन की अवधि छोटी होती है। जब सूर्य की किरणें दक्षिणायन होती हैं तो उत्तरी गोलार्द्ध के ध्रुवों पर 6 महीने की रात तथा जब सूर्य की स्थिति उत्तरायण होती है तो ऐसी दशा में दक्षिणी ध्रुव पर 6 महीने की रात होती है। 6 महीने की रात के कारण सूर्यातप बहुत कम प्राप्त होता है जिससे तापक्रम साल भर नीचा तथा हिमांक से कम रहता है अर्थात् तापक्रम दोनों ध्रुवों पर कम पाया जाता है।

प्रश्न 7.
वायुमंडल के तापन और शीतलन की विधियों का वर्णन कीजिए। अथवा वायुमंडल उष्मा संचरण की कौन-सी विधियों से गरम और ठण्डा होता है? इनका संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायुमंडल के गर्म तथा ठण्डा होने में पार्थिव या भौमिक शक्ति (Terrestrial Force) महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस पार्थिव शक्ति के कारण कुछ भौतिक क्रियाएं होती हैं जिनके कारण वायुमण्डल गर्म तथा ठण्डा होता रहता है। ये भौतिक विधियाँ निम्नलिखित हैं
1. विकिरण (Radiation) सूर्य से आने वाली तरंगों के द्वारा वायुमण्डल का गर्म होना विकिरण (Radiation) कहलाता है। सूर्य से प्राप्त सौर ऊर्जा द्वारा वायुमण्डल तथा पृथ्वी दोनों ही गर्म होते हैं। पृथ्वी पर प्राप्त सौर ऊर्जा से पृथ्वी गर्म होती है। इसे पार्थिव या भौमिक विकिरण (Terrestrial Radiation) कहते हैं। भू-तल को उष्णता लम्बी तरंगों के रूप में प्राप्त होती है जिसका 90% धरातल अवशोषित कर लेता है और वायुमण्डल गर्म होता रहता है। पार्थिव विकिरण द्वारा वायुमण्डल की निचली परतें ही गर्म होती हैं। अधिक ऊँचाई पर इसका प्रभाव बहुत कम होता है।

2. परिचालन (Conduction) जब दो असमान प्रकृति वाली वस्तुएँ एक-दूसरे के सम्पर्क में आती हैं तो जो अधिक तापमान वाली वस्तु है, वह कम तापमान वाली वस्तु की ओर प्रवाहित होती है अर्थात् अधिक तापमान वाली वस्तु से तापमान का संचालन कम तापमान वाली वस्तु की ओर होता है और यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक दोनों वस्तुओं का तापमान एक-जैसा या समान न हो जाए। इसे संचालन भी कहते हैं। वायु ऊष्मा की कुचालक है, अतः वायुमण्डल में ऊष्मा का संचालन आसानी से नहीं होता। केवल वायुमण्डल की निचली परत पर ही ऊष्मा का संचालन होता है अथवा वायुमण्डल की निम्न परत ही गर्म होती है। ऊपरी परतों पर इसका प्रभाव नगण्य होता है। प्रकृति का यह नियम है कि वह प्रत्येक वस्तु में समानता चाहती है, इसलिए गर्म एवं तप्त सूर्य पृथ्वी को लगातार अपनी किरणों द्वारा ताप प्रदान करता रहता है। यह ताप वायुमण्डल की विभिन्न परतों से धरातल पर आने का प्रयास करता है जिससे सूर्यातप में धरातल पर समानता बनी रहे।

3. संवहन (Convection) सूर्यातप के विकिरण द्वारा धरातल की वायु गर्म होती है। गर्म वायु हल्की होकर ऊपर उठती है तथा फैलती है लेकिन वायुमण्डल में ऊँचाई पर जाने पर तापमान की कमी के कारण यही वायु ठण्डी हो जाती है। ठण्डी होने के कारण यह भारी होकर पुनः धरातल पर नीचे उतर जाती है और पुनः धरातल से गर्म होकर ऊपर उठती है। इसी प्रक्रिया के कारण वायुमण्डल में संवहन (Convection) शुरू हो जाता है तथा लम्बवत् रूप में संवहनिक तरंगें चलने लगती हैं। इस प्रकार की क्रियाएँ उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांशों में अधिक होती हैं। इस प्रकार वायुमण्डल में या तरल पदार्थ में जो ऊष्मा का एक भाग से दूसरे भाग में स्थानान्तरण होता है, उसे संवहन कहा जाता है।

4. अभिवहन (Advection)अभिवहन वह क्रिया है जिसमें ऊष्मा का स्थानान्तरण क्षैतिज रूप में होता है। जब भूमध्य रेखीय या उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों की गर्म वायुराशियाँ मध्य महाद्वीपों या उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में पहुँचती हैं तो वहाँ की ठण्डी वायुराशियों को कम कर देती हैं। इसी प्रकार गर्म समुद्री धाराएँ, जो उष्ण प्रदेशों से उत्पन्न होती हैं और ठण्डे प्रदेशों में प्रवेश करती हैं तो वहाँ के तापमान में वृद्धि कर देती हैं। इस क्रिया को ही अभिवहन कहते हैं।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. वायुमंडल में जलवाष्प का अनुपात कितना होता है?
(A) 0 – 4%
(B) 4 – 8%
(C) 8 – 12%
(D) 12 – 16%
उत्तर:
(A) 0 – 4%

2. कोहरे में अधिकतम दृश्यता कितनी होती है?
(A) एक कि०मी० से कम
(B) 2 कि०मी० से अधिक
(C) 3 कि०मी० से अधिक
(D) 4 कि०मी० से अधिक
उत्तर:
(A) एक कि०मी० से कम

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3. ओसांक पर वायु की सापेक्ष आर्द्रता कितनी होती है?
(A) 25%
(B) 50%
(C) 75%
(D) 100%
उत्तर:
(D) 100%

4. सापेक्ष आर्द्रता को किस इकाई में मापा जाता है?
(A) मीटर में
(B) कि०मी० में
(C) प्रतिशत में
(D) सें०मी० में
उत्तर:
(C) प्रतिशत में

5. मौसमी घटनाओं के लिए वायुमंडल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक कौन-सा है?
(A) ऑक्सीजन
(B) धूलकण
(C) नाइट्रोजन
(D) जलवाष्प
उत्तर:
(D) जलवाष्प

6. शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में सामान्यतः किस प्रकार की वर्षा होती है?
(A) संवहनीय
(B) चक्रवातीय
(C) पर्वतीय
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) चक्रवातीय

7. निम्नलिखित में से कौन-से बादल अधिक वर्षा करते हैं?
(A) कपासी
(B) कपासी वर्षा
(C) वर्षा-स्तरी
(D) पक्षाभ-स्तरी
उत्तर:
(C) वर्षा-स्तरी

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8. प्रायः समुद्री किनारों और झीलों के तटों पर पाया जाने वाला कोहरा होता है
(A) वाताग्री कोहरा
(B) अभिवहन कोहरा
(C) विकिरण कोहरा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) अभिवहन कोहरा

9. ‘4 बजे वाली वर्षा’ किसे कहा जाता है?
(A) यूरोप में सायंकाल में होने वाली स्थानीय वर्षा को
(B) पवनाभिमुखी ढालों पर होने वाली पर्वतकृत वर्षा को
(C) वाताग्री वर्षा को
(D) भूमध्य रेखीय प्रदेशों में होने वाली संवहनीय वर्षा को
उत्तर:
(D) भूमध्य रेखीय प्रदेशों में होने वाली संवहनीय वर्षा को

10. जलवृष्टि व हिमवृष्टि के मिले-जुले रूप को कहते हैं-
(A) ओलावृष्टि
(B) हिमवृष्टि
(C) सहिम वृष्टि
(D) वर्षा
उत्तर:
(C) सहिम वृष्टि

11. बिना तरल अवस्था में आए वाष्प का हिम में बदलना कहलाता है-
(A) ऊर्ध्वपातन
(B) द्रवण
(C) संघनन
(D) परिवर्तन
उत्तर:
(A) ऊर्ध्वपातन

12. सांध्यकालीन सर्वाधिक रंगीन मेघ है-
(A) कपासी
(B) पक्षाभ
(C) स्तरी
(D) बर्फीले
उत्तर:
(A) कपासी

13. एलनीनो, के दौरान असामान्य रूप से बाढ़ की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं
(A) इक्वेडोर में
(B) उत्तरी पीरू में
(C) मध्य चिली में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

14. एलनीनो के दौरान असामान्य रूप से सूखे की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं-
(A) इंडोनेशिया में
(B) ऑस्ट्रेलिया में
(C) उत्तर:पूर्वी दक्षिण अमेरिका में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

15. निम्नलिखित में से किसे उच्च बादलों में शामिल नहीं किया जाता?
(A) पक्षाभ
(B) पक्षाभ स्तरी
(C) स्तरी कपासी
(D) पक्षाभ कपासी
उत्तर:
(C) स्तरी कपासी

16. किसी स्थान की वर्षा निर्भर करती है-
(A) पर्वतों की दिशा पर
(B) समुद्री जल के वाष्पीकरण पर
(C) ग्रीष्मकाल की अवधि पर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) पर्वतों की दिशा पर

17. वायुमंडल की कौन-सी प्रक्रिया ठोस पदार्थों के अभाव में नहीं हो सकती है?
(A) संतृप्तीकरण
(B) संघनन
(C) वाष्पीकरण
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(B) संघनन

18. यदि किसी स्थान के तापमान में अचानक वृद्धि हो जाए तो वहाँ की सापेक्षिक आर्द्रता-
(A) बढ़ेगी
(B) घटेगी
(C) समान रहेगी
(D) घटती-बढ़ती रहेगी
उत्तर:
(B) घटेगी

19. जलवाष्प की मात्रा समान रहने पर वायु के ताप में कमी होने पर सापेक्षिक आर्द्रता-
(A) बढ़ेगी
(B) घटेगी
(C) समान रहेगी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) बढ़ेगी

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20. ओस किस प्राकृतिक घटना का उदाहरण है?
(A) वाष्पीकरण
(B) सूर्य की तिरछी किरणें
(C) संघनन
(D) वाष्पोत्सर्जन
उत्तर:
(C) संघनन

21. भारत में अधिकतर वर्षा कौन-सी होती है?
(A) पर्वतकृत वर्षा
(B) चक्रवातीय वर्षा
(C) संवहनीय वर्षा
(D) वाताग्री वर्षा
उत्तर:
(A) पर्वतकृत वर्षा

22. सर्दियों में उत्तर:पश्चिमी भारत में होने वाली वर्षा किस प्रकार की होती है?
(A) पर्वतकृत
(B) चक्रवातीय
(C) संवहनीय
(D) वाताग्री
उत्तर:
(B) चक्रवातीय

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
जलवाष्प का प्रमुख स्रोत कौन-सा है?
उत्तर:
महासागर।

प्रश्न 2.
जलीय चक्र को ऊर्जा कहाँ से मिलती है?
उत्तर:
सूर्य से।

प्रश्न 3.
सापेक्ष आर्द्रता को किस इकाई में मापा जाता है?
उत्तर:
प्रतिशत में।

प्रश्न 4.
ओसांक पर वायु की सापेक्ष आर्द्रता कितनी होती है?
उत्तर:
100 प्रतिशत।

प्रश्न 5.
वायुमण्डलीय आर्द्रता को किस यन्त्र से मापते हैं?
उत्तर:
हाइग्रोमीटर से।

प्रश्न 6.
भारत में अधिकतर वर्षा कौन-सी होती है?
उत्तर:
पर्वतकृत वर्षा।

प्रश्न 7.
पवनविमुखी पर्वतीय ढाल पर स्थित शुष्क प्रदेश को क्या कहते हैं?
उत्तर:
वृष्टिछाया प्रदेश।

प्रश्न 8.
कोहरे में अधिकतम दृश्यता कितनी होती है?
उत्तर:
एक किलोमीटर से कम।

प्रश्न 9.
वायुमण्डल में जलवाष्प का अनुपात कितना होता है?
उत्तर:
शून्य से 4 प्रतिशत तक।

प्रश्न 10.
महासागर के अतिरिक्त जलवाष्प के अन्य स्रोत कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
सागर, झीलें, नदियाँ।

प्रश्न 11.
विकिरण कोहरा प्रायः कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
विस्तृत मैदानी भागों में।

प्रश्न 12.
वर्षा को मापने वाले यन्त्र का नाम बताएँ।
उत्तर:
रेन गेज या वर्षा-मापी यन्त्र।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्द्रता को व्यक्त करने की तीन विधियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. निरपेक्ष आर्द्रता
  2. विशिष्ट आर्द्रता और
  3. सापेक्ष आर्द्रता।

प्रश्न 2.
सापेक्ष आर्द्रता ज्ञात करने का सूत्र बताइए।
उत्तर:
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प्रश्न 3.
कोहरे के प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. विकिरण
  2. अभिवहन तथा
  3. वाताग्री।

प्रश्न 4.
संघनन के कौन-कौन-से रूप होते हैं?
उत्तर:
ओस, पाला, कोहरा, कुहासा और बादल।

प्रश्न 5.
वाष्पीकरण को नियन्त्रित करने वाले कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. तापमान
  2. स्वच्छ आकाश
  3. वायु की शुष्कता
  4. पवनों की गति
  5. जल के तल का विस्तार।

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प्रश्न 6.
वाष्पीकरण में क्या होता है?
उत्तर:
जल द्रव अवस्था से गैस (जलवाष्प) में बदल जाता है।

प्रश्न 7.
संघनन या द्रवीकरण क्या है?
उत्तर:
जल की गैसीय अवस्था से तरलावस्था या ठोसावस्था में बदलने की प्रक्रिया द्रवीकरण कहलाती है।

प्रश्न 8.
ओसांक क्या होता है?
उत्तर:
वह तापमान जिस पर वायु अपने में विद्यमान जलवाष्प से संतृप्त हो जाती है।

प्रश्न 9.
संघनन कितने तापमान पर होता है?
उत्तर:
संघनन तब होता है जब वायु का ताप ओसांक या ओसांक से नीचे गिर जाता है।

प्रश्न 10.
आर्द्रताग्राही कण या संघनन केन्द्र क्या होते हैं?
उत्तर:
वायु में विद्यमान ठोस कण जिनके चारों ओर संघनन की प्रक्रिया आरम्भ होती है।

प्रश्न 11.
आर्द्रताग्राही कण कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:
समुद्री नमक के कण, धूएँ की कालिख के कण व धूलकण इत्यादि।

प्रश्न 12.
तापमान ओसांक से नीचे किन दो कारणों से गिरता है?
उत्तर:

  1. वायु के ठण्डा होने से
  2. वायु की सापेक्ष आर्द्रता बढ़ने पर।

प्रश्न 13.
अभिवहन कोहरा कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
सागरीय किनारों व झीलों के तटों पर।

प्रश्न 14.
वाताग्री कोहरा कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
वायुराशियों को अलग करने वाले वातानों पर।

प्रश्न 15.
4 बजे वाली वर्षा कौन-सी होती है और कहाँ होती है?
उत्तर:
संवहनीय वर्षा; यह भूमध्य रेखीय प्रदेशों में होती है।

प्रश्न 16.
भारत में स्थित किसी एक वृष्टिछाया प्रदेश का नाम बताएँ।
उत्तर:
दक्कन पठार जो पश्चिमी घाट का वृष्टिछाया प्रदेश है।

प्रश्न 17.
सर्दियों में उत्तर-पश्चिमी भारत में होने वाली वर्षा किस प्रकार की वर्षा होती है?
उत्तर:
सर्दियों में उत्तर-पश्चिमी भारत में होने वाली चक्रवातीय वर्षा होती है।

प्रश्न 18.
कौन-सा प्राकृतिक प्रदेश अधिकतर सर्दियों में वर्षा प्राप्त करता है?
उत्तर:
भूमध्य सागरीय प्रदेश अधिकतर सर्दियों में वर्षा प्राप्त करता है।

प्रश्न 19.
ऊर्ध्वपातन क्या होता है?
उत्तर:
बिना तरलावस्था में आए वाष्प का हिम में बदलना या हिम का वाष्प में बदलना ऊर्ध्वपातन कहलाता है।

प्रश्न 20.
गुप्त ऊष्मा क्या होती है?
उत्तर:
वस्तु की अवस्था (State) बदलने पर ऊष्मा का खर्च होना या मुक्त होना गुप्त ऊष्मा कहलाता है, क्योंकि इस प्रक्रिया में वस्तु के तापमान में कोई अन्तर नहीं होता।

प्रश्न 21.
वाष्पोत्सर्जन क्या होता है?
उत्तर:
भूमि तथा वनस्पति से होने वाला वाष्पन। इसमें जलाशयों (नदी, झील, तालाब), मिट्टियों, शैलों के पृष्ठों और पौधों से वाष्प के रूप में नमी की क्षति भी सम्मिलित है।

प्रश्न 22.
ऊँचे बादलों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. पक्षाभ
  2. पक्षाभ कपासी।

प्रश्न 23.
मध्य बादलों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. स्तरी मध्य
  2. कपासी मध्य।

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प्रश्न 24.
कम ऊँचाई वाले बादलों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. स्तरी वर्षा मेघ
  2. कपासी वर्षा मेघ

प्रश्न 25.
वर्षण के कौन-कौन-से रूप होते हैं?
उत्तर:
हिमपात, सहिम वर्षा, ओला वृष्टि और वर्षा।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्द्रता किसे कहते हैं?
अथवा
वायुमण्डलीय आर्द्रता क्या होती है? यह कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
आर्द्रता का अर्थ-वायुमण्डल में गैस रूप में उपस्थित अदृश्य जलवाष्प की मात्रा को वायुमण्डल की आर्द्रता कहा जाता है। वायुमण्डल में जलवाष्प बहुत ही कम अनुपात में (शून्य से 4 प्रतिशत तक) होता है। जलवाष्प वाष्पीकरण क्रिया द्वारा महासागरों, सागरों, नदियों तथा झीलों आदि से प्राप्त होता है। स्थान और समय की दृष्टि से जलवाष्प की मात्रा सदा एक-जैसी नहीं रहती बल्कि बदलती रहती है।

वायुमण्डलीय आर्द्रता के प्रकार-वायुमण्डलीय आर्द्रता तीन प्रकार की होती है-

  • निरपेक्ष आर्द्रता
  • विशिष्ट आर्द्रता तथा
  • सापेक्ष आर्द्रता।

प्रश्न 2.
आर्द्रता अथवा जलवाष्प का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
1. वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा द्रवण और वर्षण के सभी रूपों का स्रोत है। वर्षा, हिमपात, कोहरा व बादल जैसी मौसमी घटनाएँ जलवाष्प के कारण ही सम्भव होती हैं।

2. जलवाष्प सूर्य से आने वाली ऊष्मा (Incoming Solar Radiation) व पृथ्वी के विकिरण द्वारा निकलने वाली ऊष्मा का कुछ अंश अवशोषित करके पृथ्वी पर ताप की दशाओं को नियन्त्रित करता है।

3. जलवाष्प का वायुमण्डल में लम्बवत् वितरण एवं मात्रा गुप्त ऊष्मा की मात्रा को निर्धारित करते हैं जो तूफानों और विक्षोभों के विकास में मदद करती है।

4. वायुमण्डल में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा मौसम के अनुसार मानव शरीर के ठण्डा होने की दर को प्रभावित करती है। जल का वाष्पन प्राकृतिक जलीय चक्र (Hydrologic Cycle) का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

प्रश्न 3.
प्राकृतिक जलीय चक्र में जलवाष्प की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी पर जल का प्राथमिक स्रोत महासागर हैं। वायुमण्डल को अपने जलवाष्प का अधिकांश भाग पृथ्वी के तीन-चौथाई भाग पर व्याप्त महासागरों, झीलों, नदियों, हिम क्षेत्रों व हिमनदों से प्राप्त होता है। इन स्रोतों के अतिरिक्त गिरती हुई वर्षा की बूंदों तथा नम भूमियों (Swamps and Wet Lands) से वाष्पीकरण द्वारा, पेड़-पौधों की पत्तियों से बाष्पोत्सर्जन द्वारा तथा जीव-जन्तुओं द्वारा साँस लेने की क्रिया से उत्पन्न जलवाष्प वायुमण्डल में जा मिलता है। जलवाष्प संघनित होकर बादलों का रूप धारण करते हैं। पवनों द्वारा बादलों के रूप में यह आर्द्रता एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानान्तरित होती है।

अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर संघनित जलवाष्प वर्षा और हिम के रूप में भू-पृष्ठ पर गिरता है जो वृष्टि संयोग से महासागरों पर होती है उसका तो एक चक्र तभी पूरा हो जाता है और दूसरा आरम्भ भी हो जाता है। जो वर्षा स्थलखण्डों पर होती है उसका चक्र कुछ देर से पूरा होता है। ऐसे जल का कुछ भाग मिट्टी सोख लेती है व कुछ भाग पौधे अवशोषित कर लेते हैं जिसे वे बाद में वाष्पोत्सर्जन क्रिया द्वारा वायुमण्डल में छोड़ देते हैं।

शेष जल भूमिगत जल और धरातलीय प्रवाह के रूप में अन्ततः महासागरों में पुनः पहुँच जाता है और जलीय चक्र का फिर से हिस्सा बन जाता है। इस प्रकार भूमण्डलीय ताप सन्तुलन की तरह जलीय चक्र के माध्यम से प्रकृति में भूमण्डलीय जल सन्तुलन बना रहता है।

प्रश्न 4.
वाष्पीकरण क्या है? वाष्पीकरण की मात्रा और दर किन कारकों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
वाष्पीकरण-जल के तरलावस्था अथवा ठोसावस्था से गैसीय अवस्था में परिवर्तन होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं। वाष्पीकरण की दर तथा मात्रा निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है

  • तापमान भूतल पर तापमान (Temperature) के बढ़ने से वाष्पीकरण की क्रिया तेजी से होती है तथा तापमान के घटने से इस क्रिया की दर में कमी आ जाती है।
  • शुष्कता-शुष्क (Aridity) वायु में जलवाष्प अधिक मात्रा में समा सकते हैं, परन्तु आर्द्र वायु की जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता कम होती है।
  • वायु परिसंचरण-चलती वायु में वाष्पीकरण अधिक मात्रा में होता है।
  • जल के स्रोत-महासागरों तथा सागरों पर महाद्वीपों की तुलना में बहुत अधिक वाष्पीकरण होता है।

प्रश्न 5.
संघनन क्या है और यह कब और कैसे होता है? अथवा संघनन का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा संघनन की प्रक्रिया को नियन्त्रित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संघनन-जल के गैसीय अवस्था से तरलावस्था या ठोसावस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन या द्रवीकरण कहते हैं। जैसे-जैसे आर्द्र हवा ठण्डी होने लगती है, वैसे-वैसे उसकी जलवाष्प धारण करने की क्षमता भी घटती जाती है। एक समय ऐसा आता है जिसमें एक विशेष ताप पर वह वायु संतृप्त हो जाती है, जिस तापमान पर वायु अपने में विद्यमान जलवाष्प से संतृप्त हो जाती है, उस तापमान को ओसांक (Dew Point) कहा जाता है। ओसांक पर वायु की सापेक्ष आर्द्रता 100 प्रतिशत होती है। संघनन तब होता है जब वायु का ताप ओसांक से भी नीचे गिर जाता है।

ऐसा दो कारणों से हो सकता है-

  • वायु के ठण्डा होने से
  • वायु की सापेक्ष आर्द्रता बढ़ने पर।

उपर्युक्त दोनों घटनाएँ नीचे दी गई चार परिस्थितियों में से किसी-न-किसी एक के साथ जुड़कर सम्भव होती हैं-

  • जब वायु का तापमान घटकर ओसांक तक पहुँच जाए किन्तु उसका आयतन वही रहे।
  • जब वायु का आयतन ऊष्मा की मात्रा बढ़ाए बिना ही बढ़ जाए।
  • जब वायु की आर्द्रता धारण करने की क्षमता, तापमान और वायु के आयतन के संयुक्त रूप से घटने के कारण घट जाए और वायु में उपस्थित आर्द्रता की मात्रा से भी कम हो जाए।
  • जब वाष्पीकरण द्वारा वायु में आर्द्रता की अतिरिक्त मात्रा मिल जाए। जलवाष्प के संघनन की सबसे अनुकूल स्थिति तापमान के घटने से उत्पन्न होती है।

प्रश्न 6.
ओस किसे कहते हैं?
अथवा
ओस कैसे बनती है?
उत्तर:
ओस-जाड़े की रातों में जब आकाश स्वच्छ होता है तो तीव्र भौमिक विकिरण से धरातल ठण्डा हो जाता है। ठण्डे धरातल पर ठहरी वायुमण्डल की आर्द्र निचली परतें भी ठण्डी होने लगती हैं। धीरे-धीरे यह वायु ओसांक तक ठण्डी हो जाती है। इससे वायु में विद्यमान जलवाष्प संघनित हो जाता है और नन्हीं-नन्हीं बूंदों के रूप में घास व पौधों की पत्तियों पर जमा हो जाता है। वाष्प से बनी जल की इन बूंदों को ओस कहते हैं।

प्रश्न 7.
ओस पड़ने के लिए किन-किन दशाओं का होना आवश्यक है?
उत्तर:
ओस पड़ने के लिए निम्नलिखित दशाओं का होना आवश्यक है-

  1. रातें ठण्डी और लम्बी हों, ताकि भूतल से देर तक विकिरण हो और भूतल पर ठहरी वायु ठण्डी होकर ओसांक तक पहुँचे।
  2. आकाश मेघ-विहीन हो, ताकि भू-तल से होने वाली ऊष्मा का विकिरण निर्बाध गति से सम्पन्न हो सके। तभी भूतल और उसके सम्पर्क में आई हवा ठण्डी हो पाएगी।
  3. वायु शान्त हो, ताकि वह ठण्डे भूतल पर अधिक देर तक ठहरकर स्वयं भी ठण्डी हो जाए। इससे ओसांक जल्दी प्राप्त होगा।
  4. वायु में सापेक्ष आर्द्रता का प्रतिशत ऊँचा हो, ताकि थोड़ा-सा तापमान गिरते ही वायु संतृप्त (Saturate) हो जाए।
  5. ओसांक हिमांक से ऊपर हो, ताकि जलवाष्प जल के बिन्दुओं में परिवर्तित हो जाएँ। यदि ओसांक हिमांक (0°C) से नीचे गिर जाएगा तो वाष्प के जम जाने से पाला पड़ेगा, ओस नहीं।

प्रश्न 8.
कोहरा और कुहासा (धुंध) कैसे बनते हैं?
उत्तर:
कोहरा और कुहासा (Fog and Mist) वास्तव में बादल होते हैं जो पृथ्वी के धरातल के पास बनते हैं। जब भू-तल के निकट वायु के ठण्डा होने से वायु की सापेक्ष आर्द्रता 100 प्रतिशत से बढ़ जाए तो वाष्प-कण संघनित होकर जल के अति सूक्ष्म कणों या हिमकणों में परिवर्तित होकर हवा की निचली परतों में लटके हुए ठोस कणों के चारों ओर एकत्रित हो जाते हैं। इससे जाता है और दृश्यता कम हो जाती है। कोहरे और कुहासे में केवल दृश्यता के विस्तार का अन्तर है। कोहरा घना होता है जिसमें एक किलोमीटर से परे दिखाई नहीं पड़ता। सघन कोहरे (Thick Fog) में तो 200 मीटर तक देख पाना कठिन होता है। कुहासा (धुन्ध) कुछ हल्का होता है जिसमें एक से दो किलोमीटर तक की चीजें दिखाई देती हैं।

प्रश्न 9.
मेघ कैसे बनते हैं? औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों के तीन प्रकार बताइए।
उत्तर:
मेघों का बनना-मेघ काफ़ी ऊँचाई पर वायु में लटके हुए ठोस कणों पर संघनित हुए जल बिन्दुकों या हिमकणों के विशाल समूह होते हैं। मेघ ऊपर उठती हुई गर्म व आर्द्र वायुराशियों के रुद्धोष्म प्रक्रिया द्वारा ठण्डे होने पर उसके तापमान के ओसांक से नीचे गिरने से बनते हैं। इस दृष्टि से मेघ वायुमण्डल की ऊँचाइयों पर बनने वाला कोहरा माना जा सकता है। अतः मेघों का निर्माण वायु में उपस्थित महीन धूलकणों के केन्द्रकों के चारों ओर जलवाष्प के संघनित होने से होता है।

औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों के प्रकार-औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों के तीन प्रकार निम्नलिखित हैं-
1. निचले मेघ इनकी ऊँचाई भूतल से 2,000 मीटर होती है। निचले मेघ निम्नलिखित तरह के होते हैं-

  • स्तरीय कपासी मेघ
  • स्तरी मेघ
  • कपासी मेघ
  • वर्षा स्तरी मेघ
  • वर्षा कपासी मेघ आदि।

2. मध्यम ऊँचाई वाले मेघ-इनकी ऊँचाई भू-तल से 2,000 मीटर से 6,000 मीटर तक होती है। मध्यम ऊँचाई वाले मेघ निम्नलिखित तरह के होते हैं-

  • मध्य स्तरी मेघ
  • मध्यम कपासी मेघ आदि।

3. ऊँचे मेघ–इनकी ऊँचाई भू-तल से 6,000 मीटर से 12,000 मीटर तक होती है। ऊँचे मेघ निम्नलिखित तरह के होते हैं-

  • पक्षाभ मेघ
  • पक्षाभ स्तरी मेघ
  • पक्षाभ कपासी मेघ आदि।

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प्रश्न 10.
संवहनीय वर्षा कैसे होती है?
उत्तर:
भूतल के गर्म हो जाने पर उसके सम्पर्क में आने वाली वायु भी गर्म हो जाती है। वायु गर्म होकर फैलती है और हल्की हो जाती है। हल्की होकर वायु ऊपर की ओर उठती है। इससे संवहनी धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। ऊपर जाकर वायु ठण्डी हो जाती है और उसमें अधिक जलवाष्प का संघनन होने लगता है। बादलों की गर्जन व बिजली की चमक के साथ मूसलाधार वर्षा होती है। भूमध्य रेखीय प्रदेशों में होने वाली वर्षा इसी प्रकार की संवहनीय वर्षा होती है।

प्रश्न 11.
पर्वत-कृत वर्षा कैसे होती है?
उत्तर:
आर्द्रता से भरी हुई गर्म पवनें जब किसी पर्वत या पठार के सहारे ऊपर उठती हैं तो वे ठण्डी हो जाती हैं। वायु के संतृप्त होने पर जलवाष्प का संघनन व बाद में वर्षा होने लगती है। इस प्रकार की वर्षा को पर्वतकृत वर्षा कहते हैं। भारत में अधिकतर वर्षा इसी प्रकार की होती है।

प्रश्न 12.
चक्रवाती अथवा वाताग्री वर्षा कैसे होती है?
उत्तर:
ऐसी वर्षा चक्रवातों के कारण होती है। शीतोष्ण कटिबन्धों में जब भिन्न-भिन्न तापों व आर्द्रता वाली वायुराशियाँ टकराती हैं तो ठण्डी वायुराशि गर्म वायुराशि को ऊपर की ओर धकेल देती है। इसके परिणामस्वरूप वायु में भीषण उथल-पुथल और तूफानी दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं और वातानों पर वर्षा होने लगती है। इस प्रकार की वर्षा को वाताग्री अथवा चक्रवाती वर्षा कहते हैं।

प्रश्न 13.
विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity) क्या होती है? इसका प्रयोग कब किया जाता है?
उत्तर:
विशिष्ट आर्द्रता वायु के प्रति इकाई भार में जलवाष्प के भार को विशिष्ट आर्द्रता कहते हैं। इसे ग्राम प्रति किलोग्राम द्वारा व्यक्त किया जाता है। आता को व्यक्त करने का यह कुछ बेहतर तरीका है क्योंकि इस पर तापमान और वायुदाब के परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। विशिष्ट आर्द्रता का प्रयोग किसी विशाल वायुराशि के आर्द्रता सम्बन्धी लक्षणों का वर्णन करने के लिए किया जाता है; जैसे

  • सर्दियों में आर्कटिक प्रदेशों में अत्यधिक ठण्डी, शुष्क वायु की विशिष्ट आर्द्रता 0.2 ग्राम प्रति किलोग्राम होती है।
  • भूमध्यरेखीय खण्ड में अत्यधिक उष्ण एवं आर्द्र वायु की विशिष्ट आर्द्रता 18 ग्राम प्रति किलोग्राम होती है।

प्रश्न 14.
विश्व में वर्षा के वार्षिक वितरण के बारे में संक्षेप में लिखें।
उत्तर:
सम्पूर्ण विश्व में वर्षा समान रूप से नहीं होती। विश्व के कई मरुस्थली क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ वर्षा बहुत कम होती है। दूसरी ओर भारत में मौसिनराम (चेरापूंजी के निकट), मेघालय में लगभग 1140 सें०मी० औसत वार्षिक वर्षा होती है। वर्षा की दृष्टि से विश्व को निम्नलिखित भागों में बाँट सकते हैं-
1. विषुवतीय अत्यधिक वर्षा वाली पेटियाँ यहाँ औसत वर्षा 200 सें०मी० से अधिक है। यह क्षेत्र भूमध्य रेखा से 1° अक्षांश उत्तर और दक्षिण के मध्य स्थित है। यहाँ प्रतिदिन दोपहर के बाद वर्षा होती है।

2. उष्ण कटिबन्धीय प्रदेश-इन प्रदेशों में महाद्वीपों के पूर्वी क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा होती है, परन्त पश्चिमी क्षेत्रों में वर्षा 25 सें०मी० से कम होती है। इसलिए उष्ण कटिबन्ध के पश्चिम में मरुस्थल पाए जाते हैं।

3. शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेश इन क्षेत्रों में चक्रवाती वर्षा होती है। यहाँ औसत वर्षा 100 सें०मी० से 125 सें०मी० तक होती है।

4. शीत कटिबन्धीय प्रदेश-यहाँ वर्षा हिमपात के रूप में होती है। यहाँ वर्षा 25 सें०मी० से कम होती है।

प्रश्न 15.
हिमपात तथा सहिम वृष्टि किसे कहते हैं?
उत्तर:
हिमपात-जब वायुमण्डल में जलवाष्प संघनन की प्रक्रिया द्वारा वायु का तापक्रम हिमांक बिन्दु से नीचे चला जाता है तो ऐसी स्थिति में वृष्टि ठोस रूप में होती है, जिसे हिमपात (Snowfall) कहते हैं। षट्कोण के आकार के बर्फ के टुकड़े रुई के समान धरातल पर गिरते हैं तो इन्हें हिमलव या हिमतूल (Snow Flakes) कहते हैं। इनका निर्माण हिम क्रिस्टलों के जुड़ने से होता है।

सहिम वृष्टि या कारकापात-जमाव बिन्दु के तापमान के साथ जब वायु की एक परत सतह के नजदीक आधी जमी हुई परत पर गिरती है तब सहिम वृष्टि (Sleet) होती है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार की वर्षा में जल की बूंदें और हिमकण साथ-साथ बरसती हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायु की आर्द्रता से क्या अभिप्राय है? निरपेक्ष और सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वायु की आर्द्रता (Humidity of Wind) वायु में उपस्थित जलवाष्प को वायु की आर्द्रता कहते हैं। वायु में आर्द्रता वाष्पीकरण द्वारा प्राप्त होती है। समुद्रों, झीलों, नदियों, तालाबों तथा अन्य जलाशयों से सदा जल का वाष्पीकरण होता रहता है। वाष्पीकरण द्वारा जितना भी जल वाष्पीय अवस्था में वायुमण्डल में प्रवेश करता है वह वायुमण्डल में आर्द्रता उत्पन्न करता है। वायुमण्डल में औसत आर्द्रता 2% होती है यद्यपि यह लगभग शून्य से 4% तक पायी जा सकती है।

वायु की जलवाष्प को शोषित करने की एक निश्चित सीमा होती है। यह सीमा तापमान के बढ़ने पर बढ़ जाती है। किसी निश्चित तापमान पर एक घन मीटर वायु कितने जलवाष्प की मात्रा का शोषण कर सकती है उसे वायु की वाष्प शोषण करने की क्षमता कहते हैं। जब वायु अपनी पूरी क्षमता जितना जलवाष्प अपने अन्दर शोषित कर ले तो वह संतृप्त वायु (Saturated Air) कहलाती है। इससे अधिक जलवाष्प की उपस्थिति में संघनन (Condensation) होना आरम्भ हो जाता है। एक घन मीटर वायु द्वारा विभिन्न तापमानों पर अधिकतम जलवाष्प को सम्भालने की क्षमता को निम्नलिखित तालिका से ज्ञात किया जा सकता है-

निरपेक्ष आर्द्रतातापमानसापेक्ष आर्द्रता
10 ग्रा० प्रति घन मीटर15°15%
10 ग्रा० प्रति घन मीटर10°62.5%
16. ग्रा० प्रति घन मीटर15°80%

1. निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity)-वायु के किसी आयतन में निश्चित समय पर उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे प्रायः ग्रेन प्रति घन फुट अथवा ग्राम प्रति घन मीटर में प्रकट किया जाता है। उदाहरणतः यदि किसी समय एक घन मीटर में 15 ग्राम जलवाष्प है तो निरपेक्ष आर्द्रता 15 ग्राम प्रति घन मीटर होगी। यह वाष्पीकरण की मात्रा पर निर्भर टर होगी। यह वाष्पीकरण की मात्रा पर निर्भर करती है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर निरपेक्ष आर्द्रता घटती जाती है। इसी प्रकार समुद्र से दूरी बढ़ने पर भी निरपेक्ष आर्द्रता घटती है।

2. सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity)-किसी निश्चित तापमान पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा तथा उसी तापमान पर उसी वायु को संतृप्त करने के लिए आवश्यक जलवाष्प की मात्रा के अनुपात को सापेक्ष (आपेक्षिक) आर्द्रता (Relative Humidity) कहते हैं। इसको प्रतिशत में प्रकट किया जाता है।

प्रश्न 2.
संघनन किसे कहते हैं? संघनन के विभिन्न रूपों के नाम बताते हुए किसी एक का वर्णन करें। अथवा बादल के विभिन्न रूपों का वर्णन करें।
उत्तर:
संघनन का अर्थ (Meaning of Condensation)-जिस क्रिया द्वारा वायु में उपस्थित जलवाष्प गैस अवस्था से द्रव अवस्था में परिवर्तित होता है, उसे संघनन कहते हैं। (Change of water vapour into water is called condensation)। वाय होने से जलवाष्प की शोषण करने की क्षमता कम हो जाती है। अतः तापमान कम हो जाने पर वायु में पहले से ही उपस्थित जलवाष्प की मात्रा से वायु संतृप्त हो जाती है। जिस तापमान पर वायु संतृप्त हो जाती है उसे ओसांक (Dew Point) कहते हैं। वायुमण्डल में सूक्ष्म धूल के कण, धुआँ तथा समुद्री नमक के महीन कण संघनन के केन्द्र होते हैं इन्हें संघनन केन्द्रक कहा जाता है। इन्हीं के द्वारा संघनन की प्रक्रिया होती है। संघनन की प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित तत्त्व उत्तरदायी हैं

  • जब तापमान में कमी आ जाती है तो वह ओसांक बिन्दु तक पहुँच जाता है।
  • जब वायु की आर्द्रता धारण करने की क्षमता घटकर विद्यमान आर्द्रता की मात्रा से कम हो जाए।
  • जब वाष्पीकरण द्वारा वायु में आता की मात्रा में अतिरिक्त वृद्धि हो जाए।

संघनन के रूप (Forms of Condensation)-संघनन द्वारा निम्नलिखित स्वरूप विकसित होते हैं-

  • ओस
  • तुषार या पाला
  • कुहासा एवं कोहरा
  • बादल या मेघ

बादल या मेघ (Clouds)-वायुमण्डल में ऊँचाई पर जलकणों या हिमकणों के जमाव एवं संघनन को बादल कहते हैं। मेघों का निर्माण वायु के ऊपर उठने वाली वायु के ठण्डा होने से होता है। मेघ कोहरे का बड़ा रूप है जो वायुमण्डल में वायु के रुद्धोष्म प्रक्रिया द्वारा उसका तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे आने से बनते हैं। बादलों की आकृति उनकी निर्माण प्रक्रिया पर आधारित है, लेकिन उनकी ऊँचाई, आकृति, रंग, घनत्व तथा प्रकाश के परावर्तन के आधार पर बादलों को निम्नलिखित चार रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है
1. पक्षाभ बादल (Cirrus Clouds) इस प्रकार के बादल आकाश में सबसे अधिक ऊँचाई पर रेशों की भाँति दिखाई देते हैं। ये सफेद रुई के समान बिखरे होते हैं। इनमें से सूर्य की किरणें आसानी से पार हो जाती हैं। जब ये बादल आकाश में झुण्ड के रूप में एकत्रित हो जाते हैं तो चक्रवात के आने की सम्भावना होती है।

2. कपासी बादल (Cumulus Clouds) कपास के ढेर के समान फैले हुए बादलों को कपासी बादल कहते हैं। कभी-कभी ये बादल लहरदार आकृति में भी देखने को मिलते हैं। इनकी ऊँचाई भी पक्षाभ बादलों के समान अधिक होती है। ये चपटे आधार वाले होते हैं।

3. स्तरी बादल (Startus Clouds)-दो विपरीत स्वभाव वाली पवनों के आपस में मिलने से इस प्रकार के बादलों का निर्माण होता है। ये आकाश में चादर की भाँति 2 कि०मी० की ऊँचाई तक फैले होते हैं। इनका निर्माण शीतोष्ण कटिबन्ध में शीत ऋतु में होता है।

4. वर्षा बादल (Nimbus Clouds) ये काले तथा घने रूप में कम ऊँचाई पर फैले होते हैं। इनसे पर्याप्त वर्षा होती है और वर्षा से पूर्व घने रूप में ये काली छटा के रूप में आकाश में फैल जाते हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 11 वायुमंडल में जल

प्रश्न 3.
वर्षा के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वर्षा के तीन प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

  • संवहनीय वर्षा
  • पर्वतीय वर्षा
  • चक्रवातीय वर्षा।

1. संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall) धरातल पर सूर्यातप के कारण वायु गर्म एवं हल्की होकर वायुमण्डल में उठती है और ऊपर जाकर फैलती है। फैलने से वायु के ठण्डी होने से उसका संघनन आरम्भ हो जाता है जिसके फलस्वरूप वर्षा होती है, इसे संवहनीय वर्षा कहते हैं। वायु के गर्म होकर ऊपर उठने से वायुमण्डल में संवहनीय धाराएँ चलने लगती हैं, इसलिए इसे संवहनीय वर्षा कहते हैं। विषुवतीय प्रदेशों में प्रतिदिन सुबह के समय धरातल गर्म होने से हवाएँ गर्म एवं हल्की होकर ऊपर उठती हैं, जिससे संवहनिक धाराएँ चला करती हैं और प्रतिदिन दोपहर बाद वर्षा होती है। भूमध्य रेखीय प्रदेशों में तापक्रम एवं आर्द्रता की अधिकता के कारण प्रत्येक दिन इस प्रकार की वर्षा होती है।

2 पर्वत-कृत वर्षा अथवा पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall) जब गर्म वायु किसी समुद्री भाग के ऊपर से गुजरती है तो उसकी आर्द्रता ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है और वह पर्याप्त आर्द्रता के साथ आगे बढ़ती है। जब उसके मार्ग में कोई पर्वत श्रेणी अथवा पर्वत चोटी आ जाती है, तो वह गर्म तथा आर्द्र हवा पर्वत के सहारे ऊपर चढ़ती है और ऊँचाई पर संघनन के कारण पर्वताभिमुखी ढाल पर (Windward Slope) पर्याप्त वर्षा करती है, लेकिन जैसे-जैसे ये हवाएँ पर्वत शिखर को पार करके पवनविमुखी ढाल की ओर उतरती हैं तो उनकी आर्द्रता समाप्त हो जाती है और ये शुष्क हो जाती हैं, इसलिए वर्षा नहीं करतीं। अतः दूसरी ओर का ढाल (पवनविमुखी) (Leeward Slope) वृष्टि छाया प्रदेश में आ जाता है। अरब सागर से वाष्प भरी हवाएँ मुम्बई में अधिक वर्षा करती हैं, लेकिन महाबलेश्वर पर्वत को पार करने के बाद उनकी आर्द्रता कम हो जाती है, इसलिए पुणे में मुम्बई की अपेक्षा बहुत कम वर्षा होती है।

3. चक्रवातीय वर्षा (Cyclonic Rainfall)-दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियों के अभिसरण (Convergence) के कारण चक्रवाती वर्षा होती है। मध्य अक्षांशों (शीतोष्ण कटिबन्धों) में जब उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों से गर्म एवं आर्द्र हवाएँ और ध्रुवीय क्षेत्रों की ठण्डी एवं भारी हवाएँ आती हैं तो गर्म तथा उष्ण हवाएँ हल्की होने के कारण शीतल एवं भारी हवाओं के ऊपर चली जाती हैं तथा वायुमण्डल में ऊँचाई पर जाने से संघनन द्वारा वर्षा करती हैं, उसे चक्रवातीय वर्षा कहते हैं। शीत ऋतु में उत्तरी-पश्चिमी भारत में इस प्रकार की वर्षा होती है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

HBSE 11th Class Geography सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्न में से किस अक्षांश पर 21 जून की दोपहर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं?
(A) विषुवत् वृत्त पर
(B) 23.5° उ०
(C) 66.5° द०
(D) 66.5° उ०
उत्तर:
(B) 23.5° उ०

2. निम्न में से किन शहरों में दिन ज्यादा लंबा होता है?
(A) तिरुवनंतपुरम
(B) हैदराबाद
(C) चंडीगढ़
(D) नागपुर
उत्तर:
(A) तिरुवनंतपुरम

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

3. निम्नलिखित में से किस प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल मुख्यतः गर्म होता है?
(A) लघु तरंगदैर्ध्य वाले सौर विकिरण से
(B) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से
(C) परावर्तित सौर विकिरण से
(D) प्रकीर्णित सौर विकिरण से
उत्तर:
(B) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से

4. निम्न पदों को उसके उचित विवरण के साथ मिलाएँ।

1. सूर्यातप(अ) सबसे कोष्ण और सबसे शीत महीनों के मध्य तापमान का अंतर
2. एल्बिडो(ब) समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा
3. समताप रेखा(स) आनेवाला सौर विकिरण
4. वार्षिक तापांतर(द) किसी वस्तु के द्वारा परावर्तित दृश्य प्रकाश का प्रतिशत

उत्तर:
1. (स)
2. (द)
3. (ब)
4. (अ)

5. पृथ्वी के विषुवत् वृत्तीय क्षेत्रों की अपेक्षा उत्तरी गोलार्ध के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान अधिकतम होता है, इसका मुख्य कारण है-
(A) विषवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कम बादल होते हैं।
(B) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लंबाई विषुवतीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।
(C) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ‘ग्रीन हाऊस प्रभाव’ विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा ज्यादा होता है।
(D) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा महासागरीय क्षेत्र के ज्यादा करीब है।
उत्तर:
(B) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लंबाई विषुवतीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण किस प्रकार जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है?
उत्तर:
तापमान जलवायु और मौसम का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। तापमान का वायुमण्डल के दाब से सीधा सम्बन्ध है। यदि तापमान कम होगा तो वायुदाब अधिक होगा और यदि तापमान अधिक होगा तो वायुदाब कम होगा। वायुदाब किसी स्थान के मौसम और जलवायु को प्रभावित करता है। अतः पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है।

प्रश्न 2.
वे कौन से कारक हैं, जो पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

  1. स्थल व जल-जलीय भागों की अपेक्षा स्थलीय भागों में सूर्य का ताप अधिक देखने को मिलता है।
  2. ऊँचाई-165 मी० की ऊँचाई पर 1° सेंटीग्रेड तापमान घटता है। इसलिए पर्वतीय भागों में मैदानी भागों से कम तापमान मिलता है।
  3. अक्षांश-अप्रैल से जून तक उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्यातप अधिक रहता है तथा सितंबर से मार्च में विषुवत् रेखा पर सूर्यातप क्रम होता है।

प्रश्न 3.
भारत में मई में तापमान सर्वाधिक होता है, लेकिन उत्तर अयनांत के बाद तापमान अधिकतम नहीं होता। क्यों?
उत्तर:
भारत में मई में दिन की लम्बाई अधिक होने से सूर्यातप अधिक प्राप्त होता है लेकिन उत्तर अयनान्त के बाद सूर्य की किरणें तिरछी होना आरम्भ करती है जिससे तापमान अधिकतम नहीं हो पाता।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 4.
साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापांतर सर्वाधिक होता है। क्यों?
उत्तर:
साइबेरिया उत्तरी गोलार्द्ध के स्थलीय भाग का अत्यधिक ठण्डा प्रदेश है। सर्दियों में वहाँ सबसे ठण्डे महीने का तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है जबकि गर्मियों में कोष्ण महासागरीय धाराएँ बहती हैं, इससे सबसे गर्म महीने का औसत तापमान काफी बढ़ जाता है। इसलिए साइबेरिया में वार्षिक तापान्तर सर्वाधिक होता है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष का झुकाव किस प्रकार पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली विकिरण की मात्रा को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
सूर्य की किरणें 0° अक्षांश या विषुवत् रेखा पर सालों भर लंबवत् पड़ती हैं। 0° अक्षांश से 2372° उत्तरी और 23% दक्षिणी अक्षांशों के बीच सूर्य ऊपर-नीचे होता रहता है। 21 मार्च से 21 जून तक सूर्य उत्तरायन होता है, कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें लंबवत् होती हैं तथा उस वक्त ग्रीष्म ऋतु होती है तथा मकर रेखा पर शीत ऋतु होती है। 23 सितंबर से 22 दिसंबर तक सूर्य दक्षिणायन होता है तथा मकर पर सूर्य की किरणें लंबवत् पड़ती हैं तथा उस वक्त कर्क रेखा पर शीत ऋतु होती है।

कर्क रेखा के उत्तर में तथा मकर रेखा के दक्षिण में जैसे-जैसे हम बढ़ते हैं, वहाँ का तापमान घटता जाता है। इसी कारण 66° उत्तरी अक्षांश तथा 66° दक्षिण अक्षांश के ऊपरी भाग में शीत कटिबंध पाया जाता है जहाँ वर्ष-भर निम्न ता है तथा बर्फ जमी रहती है। इसका मख्य कारण है कि यहाँ सर्य की किरणें तिरछी पडती हैं जो विकिरण की मात्रा को प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 2.
उन प्रक्रियाओं की व्याख्या करें जिनके द्वारा पृथ्वी तथा इसका वायुमंडल ऊष्मा संतुलन बनाए रखते हैं।
उत्तर:
पृथ्वी पर सूर्यातप का असमान वितरण है। सूर्य पृथ्वी को गर्म करता है और पृथ्वी वायुमंडल को गर्म करती है। परिणामस्वरूप पृथ्वी न तो अधिक समय के लिए गर्म होती है और न ही अधिक ठंडी। अतः हम यह पाते हैं कि पृथ्वी के अलग-अलग भागों में प्राप्त ताप की मात्रा समान नहीं होती।

इसी भिन्नता के कारण वायुमंडल के दाब में भिन्नता होती है एवं इसी कारण पवनों के द्वारा ताप का स्थानांतरण एक स्थान से दूसरे स्थान पर होता है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में अधिक गर्मी पड़ने के कारण वहाँ की वायु गर्म होकर ऊपर उठ जाती है और उस स्थान को भरने के लिए उपोष्ण कटिबंध से हवाएँ उष्ण कटिबंध की ओर चलती हैं, जिससे उष्ण कटिबंध के तापमान में ज्यादा वृद्धि नहीं हो पाती।

इसी तरह से उपोष्ण कटिबंध क्षेत्र में शीतोष्ण कटिबंध से हवाएँ चलकर इन क्षेत्रों के तापमान में संतुलन बनाती हैं। इसी तरह वायुमंडल एक क्षेत्र के तापमान को ज्यादा बढ़ने नहीं देता तथा शीत कटिबंधीय और शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्म महासागरीय धाराएँ चलती हैं। ये धाराएँ इन क्षेत्रों के तापमान को बढ़ा देती हैं। उष्ण कटिबंध क्षेत्रों में ठंडी धाराएँ चलती हैं और उन क्षेत्रों के तापमान को कम कर देती हैं। इसी तरह पृथ्वी की महासागरीय धाराएँ और वायुमंडल संतुलन में बने रहते हैं।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

प्रश्न 3.
जनवरी में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के बीच तापमान के विश्वव्यापी वितरण की तुलना करें।
उत्तर:
उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता है और तापमान स्थलीय भागों में कम रहता है। इसलिए समताप रेखाएँ जैसे ही स्थलों से महासागरों में पहुँचती हैं तो भूमध्य रेखा की ओर मुड़ जाती हैं क्योंकि सागरीय भागों में तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहता है। अतः उत्तरी गोलार्द्ध में ताप प्रवणता अधिक रहती है (समताप रेखाओं के बीच की दूरी कम रहती है) दक्षिणी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ महासागरीय प्रभाव के कारण दूर-दूर रहती हैं और महाद्वीपों से गुजरते समय दक्षिणी ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं। समताप रेखाएँ उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में अधिक नियमित होती हैं।

जनवरी में उत्तरी गोलार्द्ध में सर्दी और दक्षिणी गोलार्द्ध ग्रीष्म ऋतु होती है जिसका मुख्य कारण सूर्य का दक्षिणायन में होता है। जिस कारण सूर्य की किरणें दक्षिणी गोलार्द्ध में लंबवत् पड़ती है। जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं।

विषुवत रेखा के समीपवर्ती क्षेत्रों में तापमान 27° सेंटीग्रेड तथा कर्क रेखा पर 15° सेंटीग्रेड और शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में तापमान 10° सेंटीग्रेड होता है। उदाहरण के लिए साइबेरिया के वोयान्सक में -32 सेंटीग्रेड, दक्षिणी गोलार्द्ध में आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ्रीकी देशों और दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के अर्जेन्टाइना में जनवरी में तापमान औसतन 30° सेंटीग्रेड होता है।

दक्षिणी भाग जैसे चिली और अर्जेन्टाइना में तापमान 15 से 20° सेंटीग्रेड होता है। इस तरह से जनवरी में उत्तरी गोलार्द्ध में कम तापमान और दक्षिणी गोलार्द्ध में अधिक तापमान देखने को मिलता है।

सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान HBSE 11th Class Geography Notes

→ सौर विकिरण (Solar Radiation)-सूर्य ऊष्मा को अंतरिक्ष में चारों तरफ निरन्तर प्रसारित करता रहता है। सूर्य द्वारा ऊष्मा की प्रसारण क्रिया को सौर विकिरण कहा जाता है।

→ कैलोरी (Calorie)-समुद्रतल पर उपस्थित वायुदाब की दशा में एक ग्राम जल का तापमान 1° सेल्सियस बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा को कैलोरी कहा जाता है।

→ एल्बिडो (Albedo)-किसी पदार्थ की परिवर्तनशीलता या परावर्तन गुणांक। इसे दशमलव या प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।

→ संचालन (Conduction) आण्विक सक्रियता के द्वारा पदार्थ के माध्यम से ऊष्मा का संचार संचालन कहलाता है।

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