Class 11

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 6 मृदाएँ

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 6 मृदाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 6 मृदाएँ

HBSE 11th Class Geography मृदाएँ Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर का चयन करें-

1. मृदा का सर्वाधिक व्यापक और सर्वाधिक उपजाऊ प्रकार कौन-सा है?
(A) जलोढ़ मृदा
(B) काली मृदा
(C) लैटेराइट मृदा
(D) वन मृदा
उत्तर:
(A) जलोढ़ मृदा

2. रेगर मृदा का दूसरा नाम है।
(A) लवण मृदा
(B) शुष्क मृदा
(C) काली मृदा
(D) लैटेराइट मृदा
उत्तर:
(C) काली मृदा

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 6 मृदाएँ

3. भारत में मृदा के ऊपरी पर्त हास का मुख्य कारण है।
(A) वायु अपरदन
(B) अत्यधिक निक्षालन
(C) जल अपरदन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) जल अपरदन

4. भारत के सिंचित क्षेत्रों में कृषि निम्नलिखित में से किस कारण से लवणीय हो रही है?
(A) जिप्सम की बढ़ोतरी
(B) अति सिंचाई
(C) अति चारण
(D) रासायनिक खादों का उपयोग
उत्तर:
(B) अति सिंचाई

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
मृदा क्या है?
उत्तर:
अमेरिकी मिट्टी विशेषज्ञ डॉ० बैनेट के अनुसार, “मिट्टी भू-पृष्ठ पर मिलने वाले असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत है जो मूल चट्टानों अथवा वनस्पति के योग (ह्यूमस) से बनती है।” सरल शब्दों में, भू-पृष्ठ की सबसे ऊपरी परत, जो पौधों को उगने व बढ़ने के लिए जीवांश और खनिजांश प्रदान करती है, मृदा या मिट्टी कहलाती है।

अतः कहा जा सकता है कि मिट्टी ठोस, तरल व गैसीय पदार्थों का मिश्रण है जो चट्टानों के अपक्षय, जलवायु, पौधों व अनन्त जीवाणुओं के बीच होने वाली अन्तःक्रिया (Interaction) का परिणाम है।

प्रश्न 2.
मृदा-निर्माण के प्रमुख उत्तरदायी कारक कौन-से हैं?
उत्तर:
मृदा-निर्माण विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। इनके संयोग से मृदा आवरण में विभिन्नता उत्पन्न होती है। मृदा निर्माण के मुख्य उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं-

  • मूल पदार्थ।
  • उच्चावच।
  • जलवायु।
  • प्राकृतिक वनस्पति।

प्रश्न 3.
मृदा परिच्छेदिका के तीन संस्तरों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मृदा परिच्छेदिका के तीन संस्तर निम्नलिखित प्रकार के हैं-

  • ‘क’ संस्तर यह मिट्टी की सबसे ऊपरी परत है जिसे Top Soil कहा जाता है। इस भाग में पौधों की वृद्धि के लिए जैव पदार्थ, खनिज पदार्थ तथा पोषक तत्त्व पाए जाते हैं।
  • ‘ख’ संस्तर-यह बीच का संस्तर होता है जिसमें नीचे व ऊपर दोनों के पदार्थ प्राप्त होते हैं। इसमें कुछ जैव पदार्थ तथा खनिज पदार्थों का अपक्षय पाया जाता है।
  • ‘ग’ संस्तर-यह मिट्टी के बनने की पहली अवस्था को प्रदर्शित करता है जिसमें अपक्षय द्वारा निर्मित मूल चट्टानी पदार्थ होता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 6 मृदाएँ

प्रश्न 4.
मृदा अवकर्षण क्या होता है?
उत्तर:
मृदा की उर्वरता के ह्रास को मृदा अवकर्षण (Soil Degradation) कहते हैं। भारत में मृदा संसाधनों के क्षय का मुख्य कारक मृदा अवकर्षण है। इससे मृदा का पोषण स्तर गिर जाता है और मृदा की गहराई कम हो जाती है।

प्रश्न 5.
खादर और बांगर में क्या अंतर है?
उत्तर:
खादर और बांगर में निम्नलिखित अंतर है-

खादरबांगर
1. वह क्षेत्र जहाँ नवीन जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है, खादर कहलाता है।1. वह क्षेत्र जहाँ प्राचीन जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है, बांगर कहलाता है।
2. खादर क्षेत्र में प्रतिवर्ष बाढ़ आती है तथा नई जलोढ़ मिट्टी का निर्माण होता है।2. बांगर क्षेत्र में वर्तमान में बाढ़ नहीं आती। निरंतर जलोढ़ के जमाव के कारण वहाँ चबूतरा-सा बन जाता है, जो बाढ़ के मैदान से ऊँचा होता है।
3. खादर क्षेत्र बांगर की अपेक्षा अधिक उपजाऊ होता है।3. बांगर क्षेत्र कम उपजाऊ होता है। इसमें प्रतिवर्ष नई उपजाऊ मिट्टी नहीं आती।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
काली मृदाएँ किन्हें कहते हैं? इनके निर्माण तथा विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
काली मृदा या मिट्टी (Black Soil)-यह मिट्टी या मृदा काले रंग के बारीक कणों वाली होती है। इसमें महीन कण वाली मृत्तिका अधिक होती है। इस मिट्टी को ‘रेगर’ और कपास वाली काली मिट्टी भी कहा जाता है। काली मृदाएँ मृण्मय, गहरी व अपारगम्य होती हैं। इस प्रकार की मृदाओं का निर्माण ज्वालामुखी के लावा, लौहमय नीस और शिष्ट चट्टानों से होता है।

काली मृदा या मिट्टी की विशेषताएँ (Features of Black Soil) काली मृदा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • यह मिट्टी कपास के लिए उपयुक्त होती है।
  • इसमें नमी ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है।
  • इसमें सूखने पर दरारें पड़ जाती हैं।
  • इसमें अधिक जुताई करने की आवश्यकता नहीं होती।
  • इसमें चूना, पोटाश, मैग्नीशियम की मात्रा अधिक होती है।
  • गीली होने पर यह फूल जाती है तथा सूखने पर सिकुड़ जाती है।
  • इनमें मृदा के कण इकट्ठे हो सकते हैं।
  • इस मृदा का रंग गाढ़े काले और स्लेटी रंग के बीच की विभिन्न आभाओं का होता है।

प्रश्न 2.
मृदा संरक्षण क्या होता है? मृदा संरक्षण के कुछ उपाय सुझाइए।
उत्तर:
मिट्टी का संरक्षण (Preservation of Soil) भू-संरक्षण के अन्तर्गत भूमि-कटाव पर रोक या बचाव कृषि वैज्ञानिकों के लिए मुख्य समस्या बनती जा रही है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मिट्टियों की उचित व्यवस्था बहुत महत्त्वपूर्ण है, इसलिए भारत में मिट्टियों को अपरदित होने से रोकने के लिए वैज्ञानिक यान्त्रिक व जैवीय पद्धति अपना रहे हैं। भारत में केन्द्रीय मरुस्थल शोध संस्थान’ (Central Aridzone Research Institute, Jodhpur (Rajasthan) के अन्तर्गत वैज्ञानिक मृदा अपरदन को रोकने के प्रयास में कार्य कर रहे हैं।

मृदा संरक्षण के उपाय (Measures of Preservation of Soil)-मृदा संरक्षण के उपाय निम्नलिखित हैं-
1. यान्त्रिक पद्धति (Instrumental Method) इस पद्धति के अन्तर्गत निम्नलिखित तरीकों से भूमि कटाव को रोका जा सकता है-
(1) समोच्च बन्द (Contour Bonding)-विभिन्न ऊँचाई वाली समोच्च रेखाओं के आधार पर ढालों के सहारे दीवारें बाँध दी जाती हैं, जिससे मृदा अपरदन को रोका जा सकता है। इसमें दीवार बनाकर अन्दर का भाग मिट्टी से भर दिया जाता है। ढलानी भागों पर इस विधि को अपनाकर मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

(2) बाँध बनाना (Construction of Dam)-वर्षा के पानी को रोकने के लिए बाँध बना देते हैं, जिसके कारण मृदा अपरदन कम होने के साथ-साथ पानी का बहु-उपयोग भी होता है। इस विधि से जल के वेग में कमी आती है और मृदा अपरदन रुक जाता है। पहाड़ी भागों पर नदियों के सहारे कुछ नदियों पर बाँध बना देने चाहिएँ, जिससे पानी की गति अवरुद्ध हो जाती है तथा मृदा अपरदन कम होता है।

(3) प्रवाह नलियाँ (Drainage Channels)-बाँधों के अतिरिक्त पानी प्रवाह पर नियन्त्रित करके मिट्टी का अपरदन होने से बचाया जा सकता है। इन बाँधों द्वारा रोका हुआ पानी नहरों के द्वारा छोड़ा जाता है।

2. जैवीय पद्धति (Biological Method) इस पद्धति के अन्तर्गत जैवीय प्रक्रियाओं को नियमित करके मिट्टियों के कटाव को रोका जा सकता है। मिट्टी की भौतिक संरचना जैवीय प्रक्रियाओं का परिश्रम होती है। इन प्रक्रियाओं में विपरीत परिवर्तन मिट्टी का विघटन करता है, इसलिए ऐसी प्रक्रियाओं को रोककर मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

(1) वृक्षारोपण (Tree Planting)-इसके अन्तर्गत नए क्षेत्रों में वृक्षों को लगाना चाहिए। नए सिरे से वनस्पति का विकास कर जलवायु की अनुकूलता पैदा की जा सकती है। जिन प्रदेशों में मृदा अपरदन की समस्या गम्भीर हो गई है, वहाँ पर नए पेड़ लगाने चाहिएँ। हमें वनों के अन्धा-धुन्ध कटाव को रोकना चाहिए। वनों से मिट्टियों का जल संगठन बढ़ जाता है और नई वनस्पति के विकास में सहायक है। अतः वृक्षारोपण द्वारा मृदा अपरदन को रोका जा सकता है। वन विकास के अन्तर्गत जंगलों का आरक्षण किया जाता है। वनों को आग से बचाना चाहिए। वृक्षों को गिरने से बचाना चाहिए। उजड़े वनों के क्षेत्रों में पुनः वन लगाने चाहिएँ।

(2) पशुचारण पर प्रतिबन्ध (Restriction on Grazing)-पशुचारण के लिए खेतों से अलग चरागाहों की व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि खाली खेतों में पशु अपने खुरों से मिट्टी को ढीला कर देते हैं। विस्तृत ढाल के मैदान में भी पशुचारण सीमित करना चाहिए।

(3) मिट्टी को बाँधने वाले पौधे (Soil Binders)-मिट्टी को बाँधने के लिए कुछ विशेष प्रकार की झाड़ियाँ; जैसे मुर्या (Murya), सनडोन (Sundon), सेकरम (Sacharum) तथा स्पान्टेनियम (Spontenium) होती हैं, जिनके लगाने से मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

(4) विन्ड ब्रेकर रक्षक पेटी (Wind Breakers) हवा की गति को कम करने की विधि को विन्ड ब्रेकर (Wind Breaker) कहते हैं। हवा के मार्ग में ऐसे अवरोधक खड़े किए जाएँ, जिससे हवा की गति कम हो जाए। इसके लिए दीवार के रूप में कुछ रक्षक-क्षेत्र तैयार किए जाते हैं। इस विधि को अपनाकर मृदा अपरदन रोका जा सकता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 6 मृदाएँ

प्रश्न 3.
आप यह कैसे जानेंगे कि कोई मृदा उर्वर है या नहीं? प्राकृतिक रूप से निर्धारित उर्वरता और मानवकृत उर्वरता में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
उर्वरता मृदा का विशेष गुण है। ऐसी मृदा जिसमें नमी और जीवांश उपलब्ध होते हैं, उर्वर होती है। महीन कणों वाली लाल और पीली मृदाएँ सामान्यतः उर्वर होती हैं। उर्वर मृदा का पता मृदा में खेती की पैदावार से चलता है। जिस मृदा में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध तत्त्वों के होते हुए बिना किसी मानवीय प्रयास के अच्छी खेती या कृषि पैदा होती है, उस मृदा को उर्वर मृदा माना जाता है। इसके विपरीत मोटे कणों वाली उच्च मृदाओं को अनुर्वर मृदाएँ कहते हैं अर्थात् जिस मृदा में पैदावार नहीं होती, वह अनुर्वर मृदा कहलाती है। इसमें सामान्यतः नाइट्रोजन, फॉस्फोरस की कमी होती है।

प्राकृतिक रूप से निर्धारित उर्वरता और मानवकृत उर्वरता में अंतर

प्राकृतिक रूप से निर्धारित उर्वरतामानवकृत उर्वरता
1. प्राकृतिक रूप से मृदा की उर्वरता पोषक तत्त्चों की उपस्थिति पर निर्भर करती है।1. मानवकृत उर्वरता में मृदा में पोषक तत्त्वों की कमी को मानव निर्मित रसायनों की सहायता से दूर किया जाता है।
2. इसमें मृदा की उत्पादकता विभिन्न प्राकृतिक एवं भौतिक गुणों पर निर्भर करती है। इसमें बिना किसी रासायनिक उपचार के अच्छी कृषि पैदावार प्राप्त की जाती है।2. इसमें मृदा की उत्पादकता मानव निर्मित रसायनों; नाइट्रोजन, गंधक, पोटाश और श्रम पर निर्भर करती है। इसमें रासायनिक उपचार के माध्यम से कृषि पैदावार प्राप्त की जाती है।
3. इसमें मृदा की उर्वरता बनाने के लिए प्राकृतिक तरीकों को अपनाया जाता है।3. इसमें वैज्ञानिक तरीकों का अधिक प्रयोग किया जाता है।
4. इसमें रासायनिक खांद या कम्पोस्ट खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती।4. इसमें रासायनिक खाद या कम्पोस्ट खाद डालने की आवश्यकता होती है।
5. प्राकृतिक रूप से निर्धारित उर्वरता स्थायी होती है।5. मानवकृत उर्वरता अस्थायी होती है। इसमें बदलाव होता रहता है।

मृदाएँ HBSE 11th Class Geography Notes

→ मृदा (Soil) भू-पृष्ठ की सबसे ऊपरी परत, जो पौधों को उगने व बढ़ने के लिए जीवांश, खनिजांश व नमी प्रदान करती है, मृदा या मिट्टी कहलाती है।

→ मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile)-मृदा संस्तरों को दिखाने वाला चित्र मृदा परिच्छेदिका कहलाता है।

→ मृदा अवक्रमण (Soil Degradation) मृदा अवक्रमण का अभिप्राय मृदा की उर्वरता से है।

→ मृदा अपरदन (Soil Erosion)-जल तथा वायु के प्रभाव से मृदा की ऊपरी परत का बह जाना या उड़ जाना, मृदा अपरदन कहलाता है।

→ ह्यूमस (Humus) मृदा में पाए जाने वाले जीव-जन्तुओं व वनस्पति का सड़ा-गला अंश जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाता है।

→ मृदा-जनन (Pedogenesis)-मिट्टी के निर्माण की प्रक्रिया मृदा-जनन है।

→ pH मूल्य (pH Value) यह मृदा की अम्लीयता और क्षारीयता के निर्धारण का एक माप होता है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति

HBSE 11th Class Geography प्राकृतिक वनस्पति Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर का चयन करें-

1. चंदन वन किस तरह के वन के उदाहरण हैं?
(A) सदाबहार वन
(B) डेल्टाई वन
(C) पर्णपाती वन
(D) काँटेदार वन
उत्तर:
(C) पर्णपाती वन

2. प्रोजेक्ट टाइगर निम्नलिखित में से किस उद्देश्य से शुरू किया गया है?
(A) बाघ मारने के लिए
(B) बाघ को शिकार से बचाने के लिए
(C) बाघ को चिड़ियाघर में डालने के लिए
(D) बाघ पर फिल्म बनाने के लिए
उत्तर:
(B) बाघ को शिकार से बचाने के लिए

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति

3. नंदा देवी जीव मंडल निचय निम्नलिखित में से किस प्रांत में स्थित है?
(A) बिहार
(B) उत्तराखण्ड
(C) उत्तर प्रदेश
(D) ओडिशा
उत्तर:
(B) उत्तराखण्ड

4. निम्नलिखित में से भारत के कितने जीव मंडल निचय यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त हैं?
(A) एक
(B) दस
(C) दो
(D) चार
उत्तर:
(D) चार

5. वन नीति के अनुसार वर्तमान में निम्नलिखित में से कितना प्रतिशत क्षेत्र, वनों के अधीन होना चाहिए?
(A) 33%
(B) 55%
(C) 44%
(D) 22%
उत्तर:
(A) 33%

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
प्राकृतिक वनस्पति क्या है? जलवायु की किन परिस्थितियों में उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन उगते हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक वनस्पति-किसी स्थान पर मनुष्य के हस्तक्षेप के बिना अपने-आप प्राकृतिक रूप से उगने वाली वनस्पति; जैसे घास, झाड़ियाँ, वृक्ष आदि को प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं। सदाबहार वन उष्ण कटिबन्धीय जलवायु में पाए जाते हैं जहाँ वार्षिक वर्षा 200 सें०मी० से अधिक होती है तथा औसत वार्षिक तापमान 22° सेल्सियस से अधिक रहता है।

प्रश्न 2.
जलवायु की कौन-सी परिस्थितियाँ सदाबहार वन उगने के लिए अनुकूल हैं?
उत्तर:
सदाबहार वन उन प्रदेशों में पाए जाते हैं जहाँ उष्ण आर्द्र जलवायु पाई जाती है। सदाबहार वनों के लिए औसत वार्षिक वर्षा 200 सें०मी० से अधिक तथा वार्षिक तापमान 22°C होना चाहिए।

प्रश्न 3.
सामाजिक वानिकी से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सामाजिक वानिकी पर्यावरणीय, सामाजिक व ग्रामीण विकास में मदद के उद्देश्य से वनों का प्रबन्ध और सुरक्षा तथा ऊसर भूमि पर वनारोपण करना सामाजिक वानिकी कहलाता है। राष्ट्रीय कृषि उद्योग ने सामाजिक वानिकी को तीन वर्गों में बाँटा है-

  • शहरी वानिकी
  • ग्रामीण वानिकी और
  • फार्म वानिकी।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति

प्रश्न 4.
जीव मण्डल निचय को परिभाषित करें। वन क्षेत्र और वन आवरण में क्या अंतर है?
उत्तर:
जीव मण्डल निचय या आरक्षित क्षेत्र एक विशेष प्रकार के भौमिक और पारिस्थितिक तन्त्र हैं जिन्हें यूनेस्को के मानव और जीव मण्डल प्रोग्राम के अन्तर्गत मान्यता प्राप्त है। इसमें पशुओं के संरक्षण के साथ-साथ पौधों का भी संरक्षण किया जाता है। वन क्षेत्र और वन आवरण में अन्तर-वन क्षेत्र वह क्षेत्र होता है जो वन भूमि के लिए निश्चित है तथा वन आवरण वास्तव में वह क्षेत्र होता है जो वनों से ढका हुआ है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दें

प्रश्न 1.
वन संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
उत्तर:
भारत में वनों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय वन नीति बनाई गई है जिसके अन्तर्गत निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं-

  • देश के 33 प्रतिशत भू-भाग पर वन लगाना जो राष्ट्रीय स्तर से 6 प्रतिशत अधिक है।
  • पर्यावरण सन्तुलन बनाए रखना तथा पारिस्थितिक असन्तुलित क्षेत्रों में वन लगाना।
  • देश की प्राकृतिक धरोहर, जैव-विविधता तथा आनुवंशिक मूल का संरक्षण।
  • मृदा अपरदन तथा मरुस्थलीकरण को रोकना तथा बाढ़ व सूखे आदि पर नियन्त्रण रखना।
  • निम्नीकृत भूमि पर सामाजिक वानिकी एवं वन-रोपण द्वारा वन आवरण का विस्तार करना।
  • पेड़ लगाने को बढ़ावा देना, पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए जन-आन्दोलन चलाना।

प्रश्न 2.
वन और वन्य जीवन संरक्षण में लोगों की भागीदारी कैसे महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
मनुष्य का वन और वन्य प्राणियों से बड़ा गहरा सम्बन्ध रहा है। वन और वन्य जीवन हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक व सामाजिक लाभ पहुंचाते हैं। वन और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए मनुष्य की भागीदारी बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। औद्योगिक और तकनीकी विकास के कारण ही वन और वन्य जीवों की संख्या में कमी आ रही है। बहुत से वन्य प्राणियों की प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। अतः यह आवश्यक है कि मनुष्य ऐसा विकास करे जिससे वन और वन्य प्राणियों का संरक्षण हो सके। वनों के हित के लिए आन्दोलन चलाए जाएँ तथा जन-जागरूकता लाई जाए। इसी प्रकार वन्य जीवन की सुरक्षा के लिए भी संकटापन्न जातियों को संरक्षण प्रदान किया जाए। इस दिशा में मनुष्य की सहभागिता निम्नलिखित प्रकार से प्रभावी हो सकती है

  • वनों को कम-से-कम साफ किया जाना चाहिए, ताकि वन्य जीवों के आवास नष्ट न हों।
  • चारे, ईंधन और इमारती लकड़ी के लिए वनों से पेड़ नहीं काटने चाहिएँ।
  • व्यापारिक महत्त्व के लिए जंगली जानवरों का शिकार नहीं किया जाना चाहिए।

प्राकृतिक वनस्पति HBSE 11th Class Geography Notes

→ प्राकृतिक वनस्पति (Natural Vegetation) प्राकृतिक वनस्पति उन पेड़-पौधों को कहते हैं जो लम्बे समय तक बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के उगते हैं।

→ हरा सोना (Green Gold) वृक्षों को हरा सोना कहते हैं।

→ सामाजिक वानिकी (Social Forestry) पर्यावरणीय, सामाजिक व ग्रामीण विकास में मदद के उद्देश्य से वनों का प्रबन्ध और सुरक्षा तथा ऊसर भूमि पर वृक्षारोपण करना सामाजिक वानिकी कहलाता है।

→ वन्य जीवन (Wild Life)-प्राकृतिक आवास में रहने वाले सभी जीव सामूहिक रूप से वन्य जीवन कहलाते हैं।

→ जीवमण्डल निचय (Biosphere Reserves) यह एक विशेष प्रकार का भौमिक और तटीय पारिस्थितिक तंत्र है।

→ जीवमण्डल संरक्षित क्षेत्र ऐसा क्षेत्र जिसमें पौधों व प्राणियों को उनका प्राकृतिक आवास प्रदान किया जाता है।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग Important Questions and Answers.

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निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में प्रचलित तीन वर्ग कौन-से थे? इनकी प्रमुख विशेषताएँ क्या थी?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोपीय समाज तीन वर्गों में बँटा हुआ था। प्रथम वर्ग में पादरी, दूसरे वर्ग में कुलीन एवं तीसरे वर्ग में किसान सम्मिलित थे। प्रथम दो वर्गों में बहुत कम लोग सम्मिलित थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। समाज की अधिकाँश जनसंख्या तीसरे वर्ग से संबंधित थी। उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें अपने गुज़ारे के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। इन तीनों वर्गों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. पादरी वर्ग (The Clergy):
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में पादरी प्रथम वर्ग में सम्मिलित थे। इस वर्ग में पोप, आर्कबिशप एवं बिशप सम्मिलित थे। यह वर्ग बहुत शक्तिशाली एवं प्रभावशाली था। इसका चर्च पर पूर्ण नियंत्रण था। चर्च के अधीन विशाल भूमि होती थी, जिससे उसे बहुत आमदनी होती थी। लोगों द्वारा दिया जाने वाला दान भी चर्च की आय का एक प्रमुख स्रोत था।

इनके अतिरिक्त चर्च किसानों पर टीथ (tithe) नामक कर लगाता था। यह किसानों की कुल उपज का दसवाँ भाग होता था। चर्च की इस विशाल आय के चलते पादरी वर्ग बहुत धनी हो गया था। इस वर्ग का यूरोप के शासकों पर भी बहुत प्रभाव था। ये शासक पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं रखते थे। कुलीन वर्ग भी पादरी वर्ग का बहुत सम्मान करता था।

पादरी वर्ग को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे राज्य को किसी प्रकार का कोई कर नहीं देते थे। वे विशाल एवं भव्य महलों में रहते थे। यद्यपि वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने का उपदेश देते थे किन्तु वे स्वयं विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। वे चर्च की संपत्ति का दुरुपयोग करने से नहीं हिचकिचाते थे। लोगों को धर्मोपदेश देने का कार्य निम्न वर्ग के पादरी करते थे।

2. कुलीन वर्ग (The Nobility):
कुलीन वर्ग दूसरे वर्ग में सम्मिलित था। यूरोपीय समाज में इस वर्ग की विशेष भूमिका थी। केवल कुलीन वर्ग के लोगों को ही प्रशासन, चर्च एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। उन्हें अनेक प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। उनके पास विशाल जागीरें होती थीं। कुलीन इन जागीरों पर एक छोटे राजे के समान शासन करते थे।

वे अपने न्यायालय लगाते थे तथा मुकद्दमों का निर्णय देते थे। वे अपने अधीन सेना रखते थे। उन्हें सिक्के जारी करने का भी अधिकार प्राप्त था पर कर लगाने का भी अधिकार था। वे कृषकों से बेगार लेते थे। उनके पशु किसानों की खेती उजाड़ देते थे, किंतु इन पशुओं को रोकने का साहस उनमें नहीं था। कुलीन अपने क्षेत्र में आने वाले माल पर चुंगी लिया करते थे।

कलीन वर्ग बहत धनवान था। राज्य की अधिकाँश संपत्ति उनके अधिकार में थी। वे विशाल महलों में रहते थे। वे बहुत विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। उनकी सेवा में बड़ी संख्या में नौकर-नौकरानियाँ होती थीं। संक्षेप में कुलीन वर्ग की यूरोपीय समाज में उल्लेखनीय भूमिका थी। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० ई० स्वैन के अनुसार, “उच्च श्रेणी (कुलीन वर्ग) को अधिकाँश विशेषाधिकार प्राप्त थे तथा उसके पास अधिकाँश दौलत थी।

3. किसान (The Peasants):
किसान यूरोपीय समाज के तीसरे वर्ग से संबंधित थे। तीसरे वर्ग की गणना यूरोपीय समाज के सबसे निम्न वर्ग में की जाती थी। यूरोपीय समाज की कुल जनसंख्या का 85% से 90% भाग किसान थे। उस समय समाज में दो प्रकार के किसान थे। ये थे स्वतंत्र किसान एवं कृषकदास। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

(क) स्वतंत्र किसान (Free Peasants):
यूरोपीय समाज में स्वतंत्र किसानों की संख्या बहुत कम थी। यद्यपि वे अपनी भूमि सामंतों से प्राप्त करते थे किंतु वे इस पर अपनी इच्छानुसार खेती करते थे। सामंत इन किसानों से बेगार नहीं लेते थे। उन पर कृषकदासों की तरह प्रतिबंध नहीं लगे हुए थे। वे केवल निश्चित मात्रा में सामंतों को भूमि कर प्रदान करते थे।

(ख) कृषकदास (Serfs):
यूरोपीय समाज की अधिकाँश जनसंख्या कृषकदास से संबंधित थी। कृषकदासों का जीवन नरक के समान था। उनके प्रमुख कर्त्तव्य ये थे-

(1) वर्ष में कम-से-कम 40 दिन सामंत (लॉर्ड) की सेना में कार्य करना।

(2) उसे एवं उसके परिवार के सदस्यों को सप्ताह में तीन अथवा उससे कुछ अधिक दिन सामंत की जागीर पर जा कर काम करना पड़ता था। इस श्रम से होने वाले उत्पादन को श्रम अधिशेष (labour rent) कहा जाता था।

(3) वह मेनर में स्थित सड़कों, पुलों तथा चर्च आदि की मुरम्मत करता था।

(4) वह खेतों के आस-पास बाड़ बनाता था।

(5) वह जलाने के लिए लकड़ियाँ एकत्र करता था।

(6) वह अपने सामंत के लिए पानी भरता था, अन्न पीसता था तथा दुर्ग की मरम्मत करता था।

कृषकदास जानवरों से भी बदतर जीवन व्यतीत करते थे। 16 से 18 घंटे रोजाना कड़ी मेहनत करने के बावजूद उन्हें दो समय भरपेट खाना नसीब नहीं होता था। वे गंदी झोंपड़ियों में निवास करते थे। इन झोंपड़ियों में रोशनी का एवं गंदे पानी की निकासी का कोई प्रबंध नहीं था। वर्षा के दिनों में इन झोंपड़ियों में पानी भर जाता था। इससे बीमारियाँ फैलने का सदैव ख़तरा बना रहता था।

जब किसी वर्ष किसी कारण फ़सलें बर्बाद हो जाती थीं तो कृषकदासों की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक दयनीय हो जाती थी। ऐसे अवसरों पर वे बड़ी संख्या में मृत्यु का ग्रास बन जाते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० चौधरी के अनुसार, “किसानों की दशा संतोषजनक से कहीं दूर थी। किसानों पर उनकी पारिवारिक जिम्मेवारी बहुत अधिक थी तथा उनकी मांगों एवं स्रोतों में नियमित तौर पर बहुत अंतर था।”

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोप में किसानों की स्थिति का वर्णन करें। B.S.E.H. (Mar. 2016)
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में किसानों की स्थिति का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं० 1 के भाग 3 का उत्तर देखें।

प्रश्न 3.
सामंतवादी व्यवस्था में दूसरे वर्ग (अभिजात वर्ग) की स्थिति व महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया करके प्रश्न नं० 1 का भाग 2 का उत्तर देखें।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

प्रश्न 4.
सामंतवाद से आपका क्या अभिप्राय है ? इसकी प्रमुख विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
सामंतवाद ने मध्यकालीन यूरोप के समाज एवं अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डाले। यूरोप में इस संस्था का उदय 9वीं शताब्दी में हुआ था। 14वीं शताब्दी तक इसका फ्राँस, जर्मनी, इंग्लैंड एवं इटली आदि देशों पर व्यापक प्रभाव रहा।

I. सामंतवाद से अभिप्राय

सामंतवाद को मध्ययुगीन यूरोपीय सभ्यता का आधार स्तंभ कहा जाता है। यह जर्मन शब्द फ़्यूड (Feud) से बना है। इससे अभिप्राय है भूमि का एक टुकड़ा अथवा जागीर। इस प्रकार सामंतवाद का संबंध भूमि अथवा जागीर से है। सामंतवाद को समझना कोई सरल कार्य नहीं है। इसका कारण यह है कि सामंतवाद के विभिन्न देशों में लक्षणता में भिन्नता थी। प्रसिद्ध इतिहासकार डब्ल्यू० टी० हेन्स के अनुसार, “सामंतवाद वह प्रथा थी जिसमें लॉर्ड अपने अधीन सामंतों को सैनिक सेवा एवं व्यक्तिगत वफ़ादारी के बदले भूमि अनुदान में देता था।”

वास्तव में सामंतवाद एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें राजा अपने अधीन बड़े सामंतों को उनकी सैनिक एवं राजनीतिक सेवाओं के बदले बड़ी-बड़ी जागीरें देता था। ये बड़े सामंत आगे छोटे सामंतों को उनकी सेवाओं के बदले छोटी जागीरें बाँटते थे। इस प्रकार सामंतवादी व्यवस्था पूरी तरह भूमि के स्वामित्व तथा भूमि वितरण पर आधारित थी।

II. सामंतवाद की विशेषताएँ

सामंतवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-

1. राजा (The King):
सैद्धांतिक रूप में राजा समस्त भूमि का स्वामी होता था। सामंती अधिक्रम (hierarchy) में राजा का स्थान सर्वोच्च था। मध्यकाल में राजा के पास न तो स्थायी सेना होती थी एवं न ही उसके पास आय
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के पर्याप्त साधन होते थे। इसलिए राजा के लिए दूर के क्षेत्रों पर नियंत्रण रखना एवं अपने राज्य की सुरक्षा करना कठिन था। इसलिए उसने अपनी भूमि का एक बहुत बड़ा भाग अपने अधीन बड़े-बड़े सामंतों में बाँट दिया। इन सामंतों को लॉर्ड कहा जाता था। ये लॉर्ड राजा के प्रति वफादार रहने की सौगंध खाते थे। वे राजा को सैनिक एवं राजनीतिक सेवाएँ प्रदान करते थे।

ये लॉर्ड अपनी कुछ भूमि को छोटे सामंतों में बाँट देते थे। इसी प्रकार ये छोटे सामंत अपनी कुछ भूमि को नाइटों में बाँटते थे। इस प्रकार सामंतवादी व्यवस्था में राजा सबसे ऊपर एवं नाइट सबसे नीचे होता था।

2. सामंत (The Feudal Lords):
सामंत (लॉर्ड) अपनी जागीर के अंदर सर्वशक्तिशाली होता था। उसके अधीन एक सेना होती थी। वह इस सेना में बढ़ोत्तरी कर सकता था। वह बाहरी शत्रुओं से अपने अधीन सामंतों की रक्षा करता था। वह अपना न्यायालय भी लगाता था। वह अपनी जागीर में रहने वाले लोगों के मुकद्दमों का निर्णय देता था। उसके निर्णयों को अंतिम माना जाता था। किसी में भी उसके निर्णयों के विरुद्ध अपील करने का साहस नहीं होता था। वह अपनी मुद्रा भी प्रचलित कर सकता था।

यदि उसके अधीन कोई सामंत अपनी सेवाओं में असफल रहता तो वह उसकी जागीर छीन सकता था। कभी-कभी लॉर्ड इतने शक्तिशाली हो जाते थे कि वे राजा की परवाह नहीं करते थे। सामंत को अनेक कर्तव्यों का पालन करना पड़ता था। उसे समय-समय पर अपने स्वामी के दरबार में उपस्थित होना पड़ता था। दरबार में वह अपने स्वामी को विभिन्न मामलों में सलाह देता था।

वह अपने स्वामी को आवश्यकता पड़ने पर सैनिक सहायता भेजता था। उसे स्वयं युद्ध की स्थिति में 40 दिन सैनिक सेवा करनी पड़ती थी। उसे अपने स्वामी के दुर्ग की रक्षा के लिए भी प्रबंध करना पड़ता था।

3. मेनर (Manor):
लॉर्ड का आवास क्षेत्र मेनर कहलाता था। इसका आकार एक जैसा नहीं होता था। इसमें कुछ गाँवों से लेकर अनेक गाँव सम्मिलित होते थे। प्रत्येक मेनर में एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर सामंत का दुर्ग होता था। यह दुर्ग जितना विशाल होता था उससे उस लॉर्ड की शक्ति का आंकलन किया जाता था। इस दुर्ग की सुरक्षा के लिए चारों ओर एक चौड़ी खाई होती थी।

इसे सदैव पानी से भर कर रखा जाता था। प्रत्येक मेनर में एक चर्च, एक कारखाना एवं कृषकदासों की अनेक झोंपड़ियाँ होती थीं। मेनर में एक विशाल कृषि फार्म होता था।

इसमें सभी आवश्यक फ़सलों का उत्पादन किया जाता था। मेनर की चरागाह पर पशु चरते थे। मेनरों में विस्तृत वन होते थे। इन वनों में लॉर्ड शिकार करते थे। गाँव वाले यहाँ से जलाने के लिए लकड़ी प्राप्त करते थे। मेनर में प्रतिदिन के उपयोग के लिए लगभग सभी वस्तुएँ उपलब्ध होती थीं। इसके बावजूद मेनर कभी आत्मनिर्भर नहीं होते थे।

इसका कारण यह था कि कुलीन वर्ग के लिए विलासिता की वस्तुएँ, आभूषण एवं हथियार आदि तथा नमक एवं धातु के बर्तन बाहर से मंगवाने पड़ते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० ई० स्वैन के शब्दों में, “मेनर व्यवस्था ने आरंभिक मध्यकाल की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों पर प्रभुत्व स्थापित किया।

4. नाइट (The Knights):
नाइट का यूरोपीय समाज में विशेष सम्मान किया जाता था। 9वीं शताब्दी यूरोप में निरंतर युद्ध चलते रहते थे। इसलिए साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एक स्थायी सेना की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को नाइट नामक एक नए वर्ग ने पूर्ण किया। नाइट अपने लॉर्ड से उसी प्रकार संबंधित थे जिस प्रकार लॉर्ड राजा के साथ संबंधित था।

लॉर्ड अपनी विस्तृत जागीर का कुछ भाग नाइट को देता था। इसे फ़ीफ़ (Fief) कहा जाता था। इसका आकार सामान्य तौर पर 1000 एकड़ से 2000 एकड़ के मध्य होता था। कुछ फ़ीफें 5000 एकड़ तक बंड़ी होती थीं। इसे उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सकता था। प्रत्येक फ़ीफ़ में नाइट के लिए घर, चर्च, पनचक्की (watermill), मदिरा संपीडक (wine press) एवं किसानों के लिए झोंपडियाँ आदि की व्यवस्था होती थी।

नाइट को अपनी फ़ीफ़ में व्यापक अधिकार प्राप्त थे। फ़ीफ़ की सुरक्षा का प्रमुख उत्तरदायित्व नाइट पर था। उसके अधीन एक सेना होती थी। नाइट अपना अधिकाँश समय अपनी सेना के साथ गुजारते थे। वे अपने सैनिकों को प्रशिक्षण देते थे। वे अपनी सेना में अनुशासन पर विशेष बल देते थे। उनकी सेना की सफलता पर लॉर्ड की सफलता निर्भर करती थी क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर लॉर्ड उनकी सेना का प्रयोग करता था।

प्रसन्न होने पर लॉर्ड उनकी फ़ीफ़ में बढौत्तरी कर देता था। नाइट अपने अधीन फ़ीफ़ में कर एकत्र करता था एवं लोगों के मकद्दमों निर्णय देता था। फ़ीफ़ को जोतने का कार्य कृषकों द्वारा किया जाता था। नाइट फ़ीफ़ के बदले अपने लॉर्ड को युद्ध में उसकी तरफ से लड़ने का वचन देता था। वह उसे एक निश्चित धनराशि भी देता था।

गायक नाइट की वीरता की कहानियाँ लोगों को गीतों के रूप में सुना कर उनका मनोरंजन करते थे। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद के पतन के साथ ही नाइट वर्ग का भी पतन हो गया।

5. कृषकदास (Seris):
यूरोपीय समाज की अधिकाँश जनसंख्या कृषकदास से संबंधित थी। उनका जीवन जानवरों से भी बदतर था। वे अपने लॉर्ड अथवा नाइट की जागीर पर जा कर काम करते थे। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने लॉर्ड की आज्ञा के अनुसार अनेक अन्य कार्य भी करने पड़ते थे। इन कार्यों के लिए उन्हें किसी प्रकार का कोई वेतन नहीं मिलता था।

उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगे हुए थे। वे लॉर्ड की अनुमति के बिना उसकी जागीर छोड़ कर नहीं जा सकते थे। सामंत उन पर घोर अत्याचार करते थे। इसके बावजूद वे सामंतों के विरुद्ध कोई शिकायत नहीं कर सकते थे। कड़ी मेहनत के बावजूद वे अक्सर भूखे ही रहते थे। उनकी रहने की झोंपड़ियाँ गंदी होती थीं। वे नाममात्र के ही वस्त्र पहनते थे। संक्षेप में उनका जीवन नरक के समान था।

प्रश्न 5.
सामंतवाद के पतन के प्रमुख कारण क्या थे?
अथवा
सामंतवाद के पतन के मुख्य कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सामंत प्रथा के पतन के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे

1. लोगों की दयनीय स्थिति (Pitiable Condition of the People):
सामंतवाद के अधीन लोगों एवं विशेष तौर पर कृषकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। लोग सामंतों के घोर अत्याचारों के कारण बेहद दु:खी थे। वे सामंत के विरुद्ध किसी से कोई शिकायत नहीं कर सकते थे। दूसरी ओर सामंत अपने न्यायालय लगाते थे। इन न्यायालयों में सामंत अपनी इच्छानुसार लोगों के मुकद्दमों का निर्णय देता था।

इन निर्णयों को अंतिम माना जाता था। सामंत लोगों को अनेक प्रकार के कर देने के लिए बाध्य करते थे। उसके मेनर के लोग सामंत की इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य नहीं कर सकते थे। घोर परिश्रम के बाद लोगों को दो समय भरपेट खाना नसीब नहीं होता था। संक्षेप में लोगों में सामंतों के प्रति बढ़ता हुआ आक्रोश उनके पतन का एक प्रमुख कारण सिद्ध हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर हंस राज का यह कहना ठीक है कि, “सामंतवाद का पतन मुख्यतः इसलिए हुआ क्योंकि इसमें लोगों की भलाई की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया था।’

2. धर्मयुद्धों का प्रभाव (Impact of the Crusades):
11वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य यूरोप के ईसाइयों एवं मध्य एशिया के मुसलमानों के बीच जेरुसलम (Jerusalem) को लेकर युद्ध लड़े गए। ये युद्ध इतिहास में धर्मयुद्धों (crusades) के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन धर्मयुद्धों में पोप (Pope) की अपील पर बड़ी संख्या में सामंत अपने सैनिकों समेत सम्मिलित हुए। इन धर्मयुद्धों में जो काफी लंबे समय तक चले में बड़ी संख्या में सामंत एवं उनके सैनिक मारे गए। इससे उनकी शक्ति को गहरा आघात लगा। राजाओं ने इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाया तथा उन्होंने सुगमता से बचे हुए सामंतों का दमन कर दिया। इस प्रकार धर्मयुद्ध सामंतों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए।

3. कृषकों के विद्रोह (Peasants’ Revolts):
14वीं शताब्दी यूरोप में हुए कृषकों के विद्रोहों ने सामंतवादी प्रथा के पतन में प्रमुख भूमिका निभाई। 1347 ई० से 1350 ई० के दौरान यूरोप में भयानक ब्यूबोनिक प्लेग फैली। इसे ‘काली मौत’ (black death) के नाम से जाना जाता है। इसके चलते यूरोप की जनसंख्या का एक बड़ा भाग मृत्यु का ग्रास बन गया।

इसमें अधिकाँश संख्या कृषकों की थी। अतः बचे हुए कृषक अधिक मज़दूरी की मांग करने लगे। किंतु सामंतों ने उनकी इस उचित माँग को स्वीकार न किया। वे कृषकों का पहले की तरह शोषण करते रहे। अत: बाध्य होकर यूरोप में अनेक स्थानों पर कृषकों ने सामंतों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा गाड़ दिया।

इन विद्रोहों में 1358 ई० में फ्रांस के किसानों द्वारा किया गया विद्रोह जिसे जैकरी (jacquerie) विद्रोह कहा जाता था एवं 1381 ई० में इंग्लैंड के विद्रोह उल्लेखनीय हैं। यद्यपि इन विद्रोहों का दमन कर दिया गया था किंतु इन विद्रोहों के कारण किसानों में एक नवचेतना का संचार हुआ।

4. राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान (Rise of Nation States):
सामंतवाद के उदय के कारण राज्य की वास्तविक शक्ति सामंतों के हाथों में आ गई थी। सामंतों को अनेक अधिकार प्राप्त थे। उनके अधीन एक विशाल सेना भी होती थी। सामंतों के सहयोग के बिना राजा कुछ नहीं कर सकता था। धीरे-धीरे परिस्थितियों में बदलाव आया।

15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ में अनेक राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हुई। इन राज्यों के शासक काफी शक्तिशाली थे। उन्होंने अपने अधीन एक शक्तिशाली एवं आधुनिक सेना का गठन किया था। इस सेना को तोपों एवं बारूद से लैस किया गया। दूसरी ओर सामंतों के अधीन जो सेना थी उसकी लड़ाई के ढंग एवं हथियार परंपरागत थे। अत: नए शासकों को सामंतों की शक्ति कुचलने में किसी विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा।

5. मध्य श्रेणी का उत्थान (Rise of the Middle Class):
15वीं एवं 16वीं शताब्दी यूरोप में मध्य श्रेणी का उत्थान सामंतवादी व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। मध्य श्रेणी में व्यापारी, उद्योगपति एवं पूंजीपति सम्मिलित थे। इस काल में यूरोप में व्यापार के क्षेत्र में तीव्रता से प्रगति हो रही थी। इस कारण समाज में मध्य श्रेणी को विशेष सम्मान प्राप्त हुआ।

इस श्रेणी ने सामंतों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का अंत करने के लिए शासकों से सहयोग किया। शासक पहले ही सामंतों के कारण बहुत परेशान थे। अतः उन्होंने मध्य श्रेणी के लोगों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त करना आरंभ कर दिया। मध्य श्रेणी द्वारा दिए गए आर्थिक सहयोग के कारण ही शासक अपनी स्थायी एवं शक्तिशाली सेना का गठन कर सके। इससे सामंतों की शक्ति को एक गहरा आघात लगा।

6. मुद्रा का प्रचलन (Circulation of Money):
सामंतवादी काल में वस्तु-विनिमय (barter system) की प्रथा प्रचलित थी। मध्य युग में मुद्रा का प्रचलन आरंभ हुआ। यह कदम यूरोपीय अर्थव्यवस्था के लिए एक क्रांतिकारी परिवर्तन सिद्ध हुआ। अब प्रत्येक वस्तु मुद्रा के माध्यम से खरीदी जाने लगी। मुद्रा के प्रचलन से लोगों को सामंतों के जुल्मों से छुटकारा मिला।

इसका कारण यह था कि पहले वे अपनी लगभग सभी आवश्यकताओं के लिए सामंतों पर निर्भर थे। मुद्रा के प्रचलन से वे कहीं से भी वस्तु खरीद सकते थे। इसके अतिरिक्त मुद्रा के प्रचलन के कारण राजाओं के लिए अब स्थायी सेना रखना संभव हुआ।

7. नगरों का उत्थान (Rise of Towns):
15वीं शताब्दी में यूरोप में नगरों का उत्थान सामंतवाद के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। इस काल में जो नए नगर बने उनमें वेनिस, जेनेवा, फ्लोरेंस, पेरिस, लंदन, फ्रैंकफर्ट, एम्स्टर्डम एवं मीलान आदि के नाम उल्लेखनीय थे। ये नगर शीघ्र ही व्यापार एवं उद्योग के केंद्र बन गए। इन नगरों में रहने वाले लोगों को स्वतंत्रता प्राप्त थी।

इसलिए बहुत से कृषकदास (serfs) सामंतों के अत्याचारों से बचने के लिए नगरों में आ बसे। इन नगरों में उन्हें व्यवसाय के अच्छे अवसर प्राप्त थे। इसके अतिरिक्त गाँवों के अनेक लोग नगरों में इसलिए आ कर बस गए क्योंकि वहाँ बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध थीं। इस प्रकार नगरों के उत्थान से सामंतवाद को गहरा आघात लगा।

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प्रश्न 6.
सामंतवाद से आप क्या समझते हैं ? इसके पतन के क्या कारण थे?
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं0 4 का भाग I एवं प्रश्न नं. 5 का उत्तर देखें।

प्रश्न 7.
“मध्यकाल यूरोप में चर्च एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
यूरोप में चर्च और समाज के संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप के समाज पर जिस संस्था ने सर्वाधिक प्रभाव डाला वह चर्च थी। वास्तव में चर्च का जन्म से लेकर कब्र तक लोगों के जीवन पर पूर्ण नियंत्रण था। इसके अपने नियम एवं न्यायालय थे। इन नियमों का उल्लंघन करने का साहस कोई नहीं करता था। यहाँ तक कि राजे भी इन नियमों का पालन करने में अपनी भलाई समझते थे। यदि कोई व्यक्ति इन नियमों का उल्लंघन करता तो चर्च द्वारा उसे दंडित किया जाता था। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० ई० स्वैन का यह कथन ठीक है कि, “हमारे लिए यह कल्पना करना कठिन है कि मध्य युग में चर्च का प्रभाव कितना व्यापक था।”

1. चर्च के कार्य (Functions of the Church): मध्यकाल में चर्च अनेक प्रकार के कार्य करता था।

  • इसने सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों संबंधी अनेक नियम बनाए थे जिनका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक था।
  • चर्च की देखभाल के लिए अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी।
  • चर्च में धर्मोपदेश दिए जाते थे तथा सामूहिक प्रार्थना की जाती थी।
  • यहाँ विद्यार्थियों को शिक्षा भी दी जाती थी।
  • इसके द्वारा रोगियों, गरीबों, विधवाओं एवं अनाथों की देखभाल की जाती थी।
  • यहाँ विवाह की रस्में पूर्ण की जाती थीं।
  • यहाँ वसीयतों एवं उत्तराधिकार के मामलों की सुनवाई की जाती थी।
  • यहाँ धर्मविद्रोहियों के विरुद्ध मुकद्दमे चलाए जाते थे एवं उन्हें दंडित किया जाता था।
  • यह कृषकों से उनकी उपज का दसवाँ भाग कर के रूप में एकत्रित करता था। इस कर को टीथ (tithe) कहते थे।
  • यह श्रद्धालुओं से दान भी एकत्रित करता था। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० डी० हेज़न ने ठीक लिखा है कि, “इस प्रकार चर्च राज्य के भीतर एक राज्य था जो कि अनेक ऐसे कार्यों को करता था जो कि अधिकाँशतः आधुनिक समाज के सिविल अधिकारियों द्वारा किए जाते हैं।”

2. चर्च का संगठन (Organization of the Church):
चर्च में अनेक प्रकार के अधिकारी कार्य करते थे। इन अधिकारियों का समाज में बहत सम्मान किया जाता था। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे राज्य को किसी प्रकार का कर नहीं देते थे। उन्हें सैनिक सेवा से भी मुक्त रखा जाता था। उनके प्रमुख कार्यों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

(1) पोय (Pope)-पोप चर्च का सर्वोच्च अधिकारी था। वह रोम में निवास करता था। मध्यकाल में उसे शक्तियाँ प्राप्त थीं। उसे पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। वह चर्च से संबंधित सभी प्रकार के नियमों को बनाता था। वह चर्च की समस्त गतिविधियों पर अपना नियंत्रण रखता था। उसका अपना न्यायालय था जहाँ वह विवाह, तलाक, वसीयत एवं उत्तराधिकार से संबंधित मुकद्दमों के निर्णय देता था। उसके निर्णयों को अंतिम माना जाता था।

वह यूरोपीय शासकों को पदच्युत करने की भी क्षमता रखता था। वह चर्च से संबंधित विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति भी करता था। कोई भी यहाँ तक कि शासक भी पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करता था। संक्षेप में पोप की शक्तियाँ असीम थीं। प्रसिद्ध लेखकों डॉक्टर एफ० सी० कौल एवं डॉक्टर एच० जी० वारेन के अनुसार, “पोप निरंकुश शासक की तरह सर्वोच्च था तथा जिसके निर्णयों के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती थी।”

(2) आर्कबिशप (Archbishop):
पोप के बाद दूसरा स्थान आर्कबिशप का था। वह प्रांतीय बिशपों पर अपना नियंत्रण रखता था तथा उनके कार्यों की देखभाल करता था। उसका अपना न्यायालय होता था यहाँ वह बिशपों के निर्णयों के विरुद्ध की गई अपीलों को सुनता था। वह बिशपों की नियुक्ति भी करता था।

(3) बिशप (Bishop):
बिशप चर्च का एक महत्त्वपूर्ण अधिकारी होता था। प्रांत के सभी चर्च उसके अधीन होते थे। उनका अपना एक न्यायालय होता था। यहाँ वे चर्च से संबंधित विभिन्न मुकद्दमों की सुनवाई करते थे। वह पादरियों की नियुक्ति भी करते थे। ।

(4) पादरी (Priest):
मध्यकाल में चर्च में पादरी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। वह रविवार के दिन चर्च में आने वाले लोगों को धर्मोपदेश सनाता था। वह लोगों की दःख-तकलीफों को सनता था। वह लोगों के सखी जीवन के लिए सामूहिक प्रार्थनाएँ करता था। वह जन्म, विवाह एवं मृत्यु से संबंधित सभी प्रकार के संस्कारों को संपन्न करवाता था। वह पोप से प्राप्त सभी आदेशों का पालन करवाता था। पादरियों के लिए कुछ विशेष योग्यताएँ निर्धारित की गई थीं। पादरी विवाह नहीं करवा सकते थे। कृषकदास, अपंग व्यक्ति एवं स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकती थीं।

3. मठवाद (Monasticism):
मध्यकाल में लोगों पर चर्च का प्रभाव स्थापित करने में मठवाद ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उस समय कुछ ऐसे धार्मिक व्यक्ति थे जो एकांत का जीवन पसंद करते थे। अत: वे आबादी से दूर जिन भवनों में रहते थे उन्हें मठ (monasteries) अथवा ऐबी (abbeys) कहते थे। इनमें रहने वाले भिक्षुओं को मंक (monk) एवं भिक्षुणियों को नन (nun) कहा जाता था। कुछ मठों को छोड़ कर अधिकाँश मठों में भिक्षु एवं भिक्षुणियाँ अलग-अलग रहती थीं।

उन्हें अत्यंत कठोर नियमों का पालन करना पड़ता था। उन्हें पवित्रता का जीवन व्यतीत करना पड़ता था। वे विवाह नहीं करवा सकते थे। उन्हें संपत्ति रखने का कोई अधिकार नहीं था। वे ईश्वर अराधना में अपना जीवन व्यतीत करते थे। वे प्रसिद्ध पाँडुलिपियों की प्रतिलिपियाँ तैयार करते थे। वे लोगों को शिक्षा देने का कार्य करते थे। वे लोगों को उपदेश देते थे तथा उन्हें पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते थे।

वे रोगियों की सेवा करते थे। वे मठ में आने वाले यात्रियों की देखभाल करते थे। वे मठ को दान दी गई भूमि पर कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थे।

जे० एच० बेंटली एवं एच० एफ० जाईगलर के शब्दों में,
“क्योंकि मठवासियों द्वारा समाज में विभिन्न भूमिकाएं निभाई जाती थीं इसलिए वे ईसाई धर्म के प्रचार में शक्तिशाली कार्यकर्ता सिद्ध हुए।

(क) सेंट बेनेडिक्ट (St. Benedict):
मध्यकाल यूरोप में जिन मठों की स्थापना हुई उनमें 529 ई० इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट (St. Benedict) सर्वाधिक प्रसिद्ध था। इसकी स्थापना इटली के महान् सेंट बेनेडिक्ट (480-547 ई०) ने की थी। उसने बेनेडिक्टीन (Benedictine) मठों में रहने वाले भिक्षुओं के लिए एक हस्तलिखित पुस्तक लिखी। इसके 73 अध्याय थे। इसमें भिक्षुओं के मार्गदर्शन के लिए नियमों का वर्णन किया गया था। प्रमुख नियम ये थे-

  • प्रत्येक मठवासी विवाह नहीं करवा सकता था।
  • वे अपने पास संपत्ति नहीं रख सकते थे।
  • उन्हें मठ के प्रधान ऐबट (abbot) की आज्ञा का पालन करना पड़ता था।
  • उन्हें बोलने की आज्ञा कभी-कभी ही दी जानी चाहिए।
  • प्रत्येक भिक्षु-भिक्षुणी को कुछ समय रोज़ाना शारीरिक श्रम करना चाहिए।
  • प्रत्येक मठवासी को अपना अधिकाँश समय अध्ययन में व्यतीत करना चाहिए।
  • प्रत्येक मठवासी को पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए।
  • प्रत्येक मठवासी को एक निश्चित समय में खाना खाना चाहिए एवं सोना चाहिए।
  • प्रत्येक मठवासी को जनसाधारण को शिक्षा देनी चाहिए एवं रोगियों की सेवा करनी चाहिए।
  • प्रत्येक मठ इस प्रकार बनाना चाहिए कि आवश्यकता की समस्त वस्तुएँ-जल, चक्की, उद्यान, कार्यशाला सभी उसकी सीमा के अंदर हों। इन नियमों का पालन सदियों तक किया जाता रहा।

(ख) क्लूनी (Cluny):
मध्यकाल यूरोप में स्थापित होने वाला दूसरा प्रसिद्ध मठ क्लूनी थां। इसकी स्थापना 910 ई० में विलियम प्रथम ने फ्राँस में बरगंडी (Burgundi) नामक स्थान में की थी। इस मठ की स्थापना का कारण यह था कि मठों में भ्रष्टाचार एवं चरित्रहीनता का बोलबाला हो गया था। अतः इनमें सुधारों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी।

अतः क्लूनी मठ द्वारा सेंट बेनेडिक्ट के नियमों का कड़ाई से पालन पर बल दिया गया। इसने कछ नए नियम भी बनाए। शीघ्र ही क्लनी मठ बहत लोकप्रिय हो गया। इस मठ को लोकप्रिय बनाने में आबेस हिल्डेगार्ड (Abbess Hildegard) ने उल्लेखनीय योगदान दिया। वह बहुत प्रतिभाशाली थी। उसके प्रचार कार्य एवं लेखन ने लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव डाला।

उसने जर्मनी, फ्राँस तथा स्विट्जरलैंड में अथक प्रचार किया। उसने स्त्रियों की दशा सुधारने में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार आर० टी० मैथ्यू के अनुसार, “हिल्डेगार्ड बहुत प्रतिभाशाली थी एवं उसने एक उत्तम देन दी। उसने विशेषतः उस समय के प्रचलित विश्वास का खंडन किया कि स्त्रियों को पढ़ाना एवं लिखाना ख़तरनाक है।”

(ग) फ्रायर (Friars):
13वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप में भिक्षुओं (monks) नए समूह का उत्थान हुआ। ये भिक्षु फ्रायर कहलाते थे। वे मठों में रहने की अपेक्षा बाहर भ्रमण करते थे। वे ईसा मसीह (Jesus Christ) के संदेश को लोगों तक पहुँचाते थे। वे जनसाधारण की भाषा में प्रचार करते थे। उन्होंने चर्च के गौरव को स्थापित करने एवं लोगों में एक नई जागृति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। फ्रायर लोगों द्वारा दिए गए दान से अपनी जीविका चलाते थे। वे दो संघों (orders) में विभाजित थे।

इनके नाम थे फ्राँसिस्कन (Franciscan) एवं डोमिनिकन (Dominican)। फ्राँसिस्कन संघ की स्थापना असीसी (Assisi) के संत फ्रांसिस (St. Francis) ने की थी। उनकी गणना मध्य युग के श्रेष्ठ व्यक्तियों में की जाती थी। उन्होंने गरीबों, अनाथों एवं बीमारों की सेवा करने का संदेश दिया। उन्होंने शिष्टता के नियमों का पालन करने, शिक्षा के प्रसार एवं श्रम के महत्त्व पर विशेष बल दिया।

उन्होंने जर्मनी, फ्राँस, हंगरी, स्पेन एवं सुदूरपूर्व (Near East) की यात्रा कर लोगों को उपदेश दिया। उनके जादुई व्यक्तित्व से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोग उनके शिष्य बने। डोमिनिकन संघ के संस्थापक स्पेन (Spain) के संत डोमिनीक (St. Dominic) थे। उन्होंने जनभाषा में अपना किया।

उन्होंने पाखंडी लोगों की कटु आलोचना की। उन्होंने पुजारी वर्ग में फैली अज्ञानता को दूर करने का बीड़ा उठाया। उनके शिष्य बहुत विद्वान थे। वे विश्वविद्यालयों में दर्शनशास्त्र एवं धर्मशास्त्र पढ़ाने का कार्य करते थे। इस संघ का प्रभाव फ्रांसिस्कन संघ जितना व्यापक नहीं था। 14वीं शताब्दी में मठवाद का महत्त्व कुछ कम हो गया था। इसके दो प्रमुख कारण थे।

प्रथम, मठ में भ्रष्टाचार फैल गया था। दूसरा, भिक्षु, भिक्षुणी एवं फ्रायर ने अब विलासिता का जीवन व्यतीत करना आरंभ कर दिया था। इंग्लैंड के दो प्रमुख कवियों लैंग्लैंड (Langland) ने अपनी कविता पियर्स प्लाउमैन (Piers Plowman) तथा जेफ्री चॉसर

4. चर्च के प्रभाव (Effects of Church):
मध्य युग में चर्च का यूरोपीय समाज पर जितना व्यापक प्रभाव था उतना प्रभाव किसी अन्य संस्था का नहीं था। इसने लोगों को आपसी भाईचारे एवं प्रेम का संदेश दिया। इसने गरीबों एवं अनाथों को आश्रय प्रदान किया। इसने रोगियों की देखभाल के लिए अनेक अस्पताल बनवाए। इसने शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया।

चर्च एवं मठों के द्वारा लोगों को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती थी। अनेक चर्च अधिकारी विश्वविद्यालयों में अध्यापन का कार्य भी करते थे। इससे लोगों में एक नव जागृति का संचार हुआ। आबेस हिल्डेगार्ड ने स्त्रियों की दशा का उत्थान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चर्च ने लोगों को युद्ध की अपेक्षा शांति का पाठ पढ़ाया। संक्षेप में चर्च के यूरोपीय समाज पर दूरगामी एवं व्यापक प्रभाव पड़े। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर बी० वी० राव के अनुसार,”किसी भी अन्य संस्था ने मध्यकालीन यूरोप के लोगों को इतना प्रभावित नहीं किया जितना कि ईसाई चर्च ने।

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प्रश्न 8.
मध्यकाल में मठवाद के विकास के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं0 7 के भाग 3 का उत्तर देखें।

प्रश्न 9.
मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान के कारणों, विशेषताओं एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् यूरोप के अधिकाँश नगर लोप हो चुके थे। इसका कारण यह था कि रोमन साम्राज्य पर आक्रमण करने वाले बर्बर आक्रमणकारियों ने रोमन साम्राज्य के अनेक नगरों का विनाश कर दिया था। 11वीं शताब्दी से परिस्थितियों में परिवर्तन आना आरंभ हुआ। इससे मध्यकालीन यूरोप में अनेक नगरों का उत्थान हुआ। यद्यपि ये नगर आधुनिक नगरों की तुलना में भव्य एवं विशाल नहीं थे किंतु उन्होंने उस समय के समाज को काफी सीमा तक प्रभावित किया। बी० के० गोखले के अनुसार, “मध्यकालीन नगरों ने यूरोपीय संस्कृति एवं सभ्यता को महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।”

I. नगरों के उत्थान के कारण

मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. कृषि का विकास (Development of Agriculture):
रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् यूरोप में अराजकता का बोलबाला था। इससे कृषि एवं व्यापार को गहरा आघात लगा। अर्थव्यवस्था के तबाह हो जाने से बड़ी संख्या में नगर उजड़ गए थे। धीरे-धीरे परिस्थिति में परिवर्तन आया। इससे कृषि के विकास को बल मिला। फ़सलों के अधिक उत्पादन के कारण कृषक धनी हुए।

इन धनी किसानों को अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न को बेचने तथा अपने लिए एवं कृषि के लिए आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए एक बिक्री केंद्र की आवश्यकता हुई। शीघ्र ही बिक्री केंद्रों में दुकानों, घरों, सड़कों एवं चर्चों का निर्माण हुआ। इससे नगरों के विकास की आधारशिला तैयार हुई।

2. व्यापार का विकास (Development of Trade):
11वीं शताब्दी में यूरोप एवं पश्चिम एशिया के मध्य अनेक नए व्यापारिक मार्गों का विकास आरंभ हुआ। इससे व्यापार को एक नई दिशा मिली। इटली, जर्मनी, इंग्लैंड, पुर्तगाल एवं बेल्जियम के व्यापारियों ने मुस्लिम एवं अफ्रीका के व्यापारियों के साथ संबंध स्थापित किए। व्यापार में आई इस तीव्रता ने नगरों के विकास को एक नया प्रोत्साहन दिया।

3. धर्मयुद्ध (Crusades):
धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य 1096 ई० से 1272 ई० के मध्य लड़े गए थे। इन धर्मयुद्धों का वास्तविक उद्देश्य ईसाइयों द्वारा अपनी पवित्र भूमि जेरुसलम (Jerusalem) को मुसलमानों के अधिकार से स्वतंत्र करवाना था। इन धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे भव्य, मुस्लिम नगरों को देखकर चकित रह गए।

इन धर्मयुद्धों के कारण पश्चिम एवं पूर्व के मध्य व्यापार को एक नया प्रोत्साहन मिला। इसका कारण यह था कि यूरोपीय देशों में रेशम, मलमल, गरम मसालों एवं विलासिता की वस्तुओं की माँग बहुत बढ़ गई थी। इससे व्यापारी धनी हुए जिससे नगरों के विकास को बल मिला।।

4. नगरों की स्वतंत्रता (Freedom of Towns):
मध्यकाल में यह कहावत प्रचलित थी-नगर की हवा बनाती है। (town air makes free.) अनेक कृषकदास (serfs) जो स्वतंत्र होने की इच्छा रखते थे तथा जो अपने सामंत द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों से दुःखी थे नगरों में जाकर छिप जाते थे। यदि कोई कृषकदास अपने सामंत की नजरों से एक वर्ष तथा एक दिन तक छिपे रहने में सफल हो जाता तो उसे स्वतंत्र कर दिया जाता था।

वह नगर में रहने वाले विभिन्न विचारों वाले लोगों से मिलता था। यहाँ उसे अपनी स्थिति में सुधार करने के अनेक अवसर प्राप्त थे। वह किसी भी व्यवसाय को अपना सकता था। यहाँ वह कोई भी विलास सामग्री खरीद सकता था। कृषकदास रहते हुए वह इस संबंध में स्वप्न में भी नहीं सोच सकता था। संक्षेप में नगरों के स्वतंत्र जीवन ने नगरों के विकास में बहुमूल्य योगदान दिया।

एक अन्य प्रसिद्ध इतिहासकार मार्क किशलेस्की का यह कहना ठीक है कि, “अनेक कृषक जो अपने सामान्य जीवन से निराश थे के लिए नगर एक पनाहगाह थे।”

II. नगरों की विशेषताएँ

मध्यकाल यूरोप में अनेक नए नगरों का उत्थान हुआ। इन नगरों में प्रमुख थे वेनिस (Venice), फ्लोरेंस (Florence), मिलान (Milan), जेनेवा (Genoa), नेपल्स (Naples), लंदन (London), क्लोन (Cologne), प्रेग (Prague), वियाना (Vienna), बार्सिलोना (Barcelona), रोम (Rome), आग्स्बर्ग (Augusburg) आदि। इन नगरों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. आधारभूत सुविधाओं की कमी (Lack of Basic Amenities):
मध्यकालीन यूरोप में यद्यपि अनेक नगरों का उत्थान हुआ था किंतु ये प्राचीन काल अथवा आधुनिक काल में बने नगरों की तरह भव्य एवं विशाल नहीं थे। यहाँ तक कि इन नगरों में आधारभूत सुविधाओं की बहुत कमी थी।

ये नगर बिना किसी योजना के बनाए जाते थे। जहाँ कहीं जगह मिलती वहीं मकान बना दिए जाते थे। ये मकान लकड़ी के बने हुए होते थे तथा एक दूसरे से सटे हुए होते थे। अत: आग लग जाने की सूरत में संपूर्ण नगर के नष्ट होने का ख़तरा रहता था। नगरों की गलियाँ बहुत तंग होती थीं। सड़कें कम चौड़ी एवं कच्ची होती थीं।

लोगों को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं था। घरों से जल निकासी (drainage) का कोई प्रबंध नहीं था। लोग घरों का कूड़ा-कर्कट बाहर गलियों फेंक देते थे। इस कारण अक्सर महामारियाँ फैल जाती थीं एवं बड़ी संख्या में लोग मृत्यु का ग्रास हो जाते थे। इन कारणों के चलते नगरों में रहने वाले लोगों की संख्या बहुत कम थी।

2. सुरक्षा व्यवस्था (Defence Arrangements) :
मध्यकाल यूरोप को यदि युद्धों एवं आक्रमणों का काल कह दिया जाए तो इसमें कोई अतिकथनी नहीं होगी। इस अराजकता का चोरों एवं लुटेरों ने खूब फायदा उठाया। नगरों की सुरक्षा व्यवस्था की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था। इस उद्देश्य से नगरों के चारों ओर एक विशाल दीवार बनाई जाती थी। इस विशाल दीवार के अतिरिक्त नगर की सुरक्षा के लिए नगर के चारों ओर एक विशाल खाई बनाई जाती थी। इस खाई को सदैव पानी से भरा रखा जाता था। इसका उद्देश्य यह था कि कोई भी आक्रमणकारी सुगमता से नगर पर आक्रमण न कर सके।

3. श्रेणियों की भूमिका (Role of Guilds):
मध्यकालीन नगरों में रहने वाले अधिकाँश लोग व्यापारी थे। प्रत्येक शिल्प अथवा उद्योग ने व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अपनी-अपनी श्रेणियाँ संगठित कर ली थीं। ये श्रेणियाँ उत्पाद की गुणवत्ता, उसके मूल्य एवं बिक्री पर नियंत्रण रखती थीं। प्रत्येक श्रेणी का अपना एक प्रधान नियुक्त किया जाता था।

श्रेणी के नियमों का उल्लंघन करने वालों, घटिया माल का उत्पादन करने वालों एवं ग्राहकों से निर्धारित मूल्यों से अधिक वसूल करने वालों के विरुद्ध श्रेणी सख्त कदम उठाती थी। श्रेणी अपने अधीन कार्य करने वाले कारीगरों एवं शिल्पकारों के कल्याण के लिए बहुत कार्य करती थी। यह बीमारी, दुर्घटना एवं वृद्धावस्था के समय अपने सदस्यों को आर्थिक सहायता देती थी। यह विधवाओं एवं अनाथ बच्चों की भी देखभाल करती थी। यह अपने सदस्यों के लिए मनोरंजन की भी व्यवस्था करती थी।

4. कथील नगर (Cathedral Towns):
12वीं शताब्दी में फ्रांस में कथीड्रल कहे जाने वाले विशाल चर्चों का निर्माण कार्य आरंभ हुआ। शीघ्र ही यूरोप के अन्य देशों में भी कथीलों का निर्माण शुरू हुआ। इनके निर्माण के लिए धनी लोगों द्वारा दान दिया जाता था। सामान्यजन अपने श्रम द्वारा एवं अन्य वस्तुओं द्वारा इनके निर्माण में सहयोग देते थे। कथील बहुत विशाल एवं भव्य होते थे।

इन्हें पत्थर से बनाया जाता था। इनके निर्माण में काफी समय लगता था। अतः कथीड्रल के आस-पास अनेक प्रकार के लोग बस गए। उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बाज़ार भी स्थापित हो गए। इस प्रकार कथीलों ने नगरों का रूप धारण कर लिया। कथीलों का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि पादरी की आवाज, भिक्षुओं के गीत, लोगों की प्रार्थना की घंटियाँ दूर-दूर तक सुनाई पड़ें। कथील की खिड़कियों के लिए अभिरंजित काँच (stained glass) का प्रयोग किया जाता था।

III. नगरों का महत्त्व

मध्यकाल में नगरों ने यूरोपीय सभ्यता एवं संस्कृति पर गहन प्रभाव डाला। नगरों की उल्लेखनीय भूमिका के संबंध में हम निम्नलिखित तथ्यों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं

1. राजनीतिक क्षेत्र में देन (Contribution in the Political Field):
13वीं शताब्दी तक यूरोप के अनेक नगर बहुत समृद्ध हो गए थे। उन्होंने देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। समृद्ध नगर निवासी

1. उन्होंने राजा को स्थायी सेना के गठन में भी सहयोग दिया। इस कारण राजाओं की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। वे पहले की अपेक्षा शक्तिशाली हो गए। इससे सामंतों की शक्ति को गहरा आघात लगा। राजाओं ने अमीरों द्वारा दिए जाने वाले समर्थन के बदले उन्हें संसद में बैठने की अनमति दी। इन अमीरों ने शासन संबंधी सरकारी नीति को काफी सीमा तक प्रभावित किया। राजा ने कुछ अमीरों को नगर पर शासन करने के अधिकार पत्र भी दिए।

2. आर्थिक क्षेत्र में देन (Contribution in the Economic Field):
मध्यकालीन नगरों ने आर्थिक क्षेत्र में निस्संदेह उल्लेखनीय योगदान दिया। नगरों द्वारा अनेक ऐसी वस्तुओं का उत्पादन किया जाता था जो समाज के लिए आवश्यक थीं। व्यापारी अपने फालतू माल का विदेशों में निर्यात करते थे तथा वे आवश्यक माल का आयात भी करते थे। इससे नगरों की समृद्धि में वृद्धि हुई।

नगरों में लोगों की सुविधा के लिए अक्सर मेलों का आयोजन किया जाता था। इन मेलों में देशी एवं विदेशी प्रत्येक प्रकार का माल मिलता था। नगरों में व्यापार के कुशल संचालन के लिए श्रेणियों (guilds) का गठन किया गया था। ये श्रेणियाँ व्यापार के अतिरिक्त नगर शासन को भी प्रभावित करती थीं।

3. सामाजिक क्षेत्र में देन (Contribution in the Social Field):
मध्यकालीन नगरों ने यूरोप के सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। ये नगर सामंतों के प्रभाव से मुक्त थे। अतः यहाँ रहने वाले लोग अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यवसाय को अपना सकते थे अथवा अपनी मेहनत से किसी भी पद पर पहुँच सकते थे। वे विवाह करवाने के लिए स्वतंत्र थे।

वे जब चाहे कोई भी संपत्ति खरीद सकते थे अथवा उसे बेच सकते थे। नगरों में धन के एकत्र होने से लोगों के सामाजिक जीवन में भी परिवर्तन हुआ। धनी लोगों ने अपने लिए विशाल घर बना लिए थे। वे विलासिता का जीवन व्यतीत करने लगे थे। नगरों के उत्थान से यूरोप के समाज में दो नए वर्ग– श्रमिक वर्ग एवं मध्य वर्ग अस्तित्व में आए। मध्य वर्ग ने यूरोप के समाज को एक नई दिशा देने में प्रशंसनीय योगदान दिया।

4. सांस्कृतिक क्षेत्र में देन (Contribution in the Cultural Field):
नगरों के उत्थान के परिणामस्वरूप यूरोप ने सांस्कृतिक क्षेत्र में अद्वितीय प्रगति की। नगरों के धनी लोगों ने नगरों के सौंदर्य को बढ़ाने के उद्देश्य से अनेक उद्यान लगवाए। उन्होंने सड़क मार्गों एवं यातायात के साधनों का विकास किया। उन्होंने भवन निर्माण कला, चित्रकला एवं साहित्य को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप इन सभी क्षेत्रों में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। वास्तव में इसने यूरोप में पुनर्जागरण की आधारशिला रखी।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

प्रश्न 10.
मध्यकालीन यूरोप में सामाजिक एवं आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
मध्यकालीन यूरोप में कृषि प्रौद्योगिकी में आए मूलभूत परिवर्तनों को लिखिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में अनेक ऐसे परिवर्तन आए जिन्होंने सामाजिक एवं आर्थिक संबंधों पर गहन प्रभाव डाला। इन परिवर्तनों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. पर्यावरण (Environment):
5वीं शताब्दी से लेकर 10वीं शताब्दी तक यूरोप का अधिकाँश भाग विशाल जंगलों से घिरा हुआ था। इन जंगलों के कारण कृषि योग्य भूमि बहुत कम रह गई थी। अनेक कृषकदास अपने सामंतों के अत्याचारों से बचने के लिए जंगलों में जाकर शरण ले लेते थे। इस काल के दौरान संपूर्ण यूरोप जबरदस्त शीत लहर की चपेट में था।

इस शीत लहर के चलते फ़सलों की उपज का काल बहुत कम अवधि का रह गया था। इससे फ़सलों के उत्पादन में बहुत कमी आ गई। 11वीं शताब्दी में यूरोप के वातावरण में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आया। अब तापमान में वृद्धि होने लगी।

इससे फ़सलों के लिए आवश्यक तापमान उपलब्ध हो गया। इससे फ़सलों के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई। तापमान में वृद्धि के कारण यूरोप के अनेक भागों के वन क्षेत्रों में काफी कमी आई। परिणामस्वरूप कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

2. भूमि का उपयोग (Land Use):
प्रारंभिक मध्यकाल यूरोप में प्रचलित कृषि तकनीक बहुत पुरानी किस्म की थी। इसके बावजूद लॉर्ड अपनी आय को बढ़ाने का प्रयास करते रहते थे। यद्यपि कृषि के उत्पादन को बढ़ाना संभव नहीं था इसलिए कृषकों को मेनरों की जागीर (manorial estate) की समस्त भूमि को कृषि योग्य बनाने के लिए बाध्य किया जाता था।

इसके लिए उन्हें निर्धारित समय से भी अधिक समय तक काम करना पड़ता था। कृषक क्योंकि अपने लॉर्ड के अत्याचारों का खुल कर सामना नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध का सहारा लिया। वे अपने खेतों पर अधिक समय काम करने लगे और उपज का अधिकाँश भाग अपने पास रखने लगे। चरागाहों एवं वन भूमि के लिए भी कृषकों और लॉर्डों के मध्य विवाद आरंभ हो गए। इसका कारण यह था कि लॉर्ड इस भूमि को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति समझते थे जबकि कृषक इसे संपूर्ण समुदाय से संबंधित समझते थे।

3. नयी कृषि प्रौद्योगिकी (New Agricultural Technology):
11वीं शताब्दी तक यूरोप में नयी कृषि प्रौद्योगिकी के प्रमाण मिलते हैं। अब लकड़ी से बने हलों के स्थान पर लोहे के हलों का प्रयोग किया जाने लगा। ये हल भारी नोक वाले होते थे। इससे भूमि को अधिक गहरा खोदना संभव हुआ। अब साँचेदार पटरों (mould boards) का उपयोग किया जाने लगा।

इनके द्वारा उपरि मृदा को सुगमता से पलटा जा सकता था। अब हल को गले के स्थान पर बैलों के कंधों से बाँधा जाने लगा। इस तकनीकी परिवर्तन से बैलों की एक बड़ी परेशानी दूर हुई। इसके अतिरिक्त उन्हें पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शक्ति मिल गई। घोड़ों के खुरों पर अब लोहे की नाल लगाने का प्रचलन आरंभ हो गया। इससे उनके खुर अब सुरक्षित हो गए।

मध्यकालीन यूरोप में भूमि के उपयोग के तरीकों में परिवर्तन आया। कृषि के लिए पहले दो खेतों वाली व्यवस्था (two-field system) प्रचलित थी। इसके स्थान पर अब तीन खेतों वाली व्यवस्था का प्रयोग होने लगा। इस व्यवस्था के अधीन कृषक अपने खेतों को तीन भागों में बाँटते थे। एक भाग में शरद ऋतु में गेहूँ अथवा राई (rye) बो सकते थे।

दूसरे भाग में बसंत ऋतु में मटर (peas), सेम (beans) तथा मसूर (lentils) की खेती की जाती थी। इनका प्रयोग मनुष्यों द्वारा किया जाता था। घोड़ों के उपयोग के लिए जौ (oats) एवं बाजरे (barley) का उत्पादन किया जाता था। तीसरे खेत को खाली रखा जाता था। इसका प्रयोग चरागाह के लिए किया जाता था। इस प्रकार वे प्रत्येक वर्ष खेतों का प्रयोग बदल-बदल कर करने लगे। इससे फ़सलों के उत्पादन में हैरानीजनक वृद्धि हुई।

फ़सलों के उत्पादन में वृद्धि के महत्त्वपूर्ण परिणाम सामने आए। भोजन की उपलब्धता अब पहले की अपेक्षा दुगुनी हो गई। मटर, सेम एवं मसूर आदि के प्रयोग से अब लोगों को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में प्रोटीन मिलने लगा। जौ एवं बाजरा अब पशुओं के लिए एक अच्छा चारे का स्रोत बन गया। इससे वे अधिक ताकतवर बने। इस कारण वे अब अधिक कार्य करने योग्य हो गए।

कृषि के विकास के कारण यूरोप में जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि होने लगी। अत: लोगों द्वारा आवास की माँग बढ़ जाने के कारण कृषि अधीन क्षेत्र कम होने लगा। कृषि में हुए विकास के परिणामस्वरूप सामंतवाद पर गहरा प्रभाव पड़ा। व्यक्तिगत संबंध जो कि सामंतवाद की प्रमुख आधारशिला थे कमज़ोर पड़ने लगे।

प्रश्न 11.
किन कारणों के चलते यूरोपीय समाज को 14वीं शताब्दी में संकट का सामना करना पड़ा ?
अथवा
चौदहवीं सदी की शुरुआत तक यूरोप का आर्थिक विकास धीमा पड़ गया। क्यों ?
उत्तर:
14वीं शताब्दी में यूरोप में आए संकट के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

1. पर्यावरण में परिवर्तन (Change in Environment):
13वीं शताब्दी के अंत में उत्तरी यूरोप के पर्यावरण में पुनः परिवर्तन आया। इस कारण गर्मी का स्थान शीत ऋतु ने ले लिया। गर्मी का मौसम बहुत छोटा रह गया। इस कारण भूमि की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो गई। इससे घोर खाद्य संकट उत्पन्न हो गया। भयंकर तूफानों एवं सागरीय बाढ़ों ने भी कृषि अधीन काफी भूमि को नष्ट कर दिया। इसने स्थिति को अधिक विस्फोटक बना दिया।

इसके अतिरिक्त भू-संरक्षण (soil conservation) के अभाव के कारण भूमि की उपजाऊ शक्ति बहुत कम हो गई थी। दूसरी ओर जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण उपलब्ध संसाधन बहुत कम पड़ गए। इससे अकालों का जन्म हुआ।

1315 ई० और 1317 ई० के दौरान यूरोप में भयंकर अकाल पड़े। इस कारण बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हो गई। चरागाहों की कमी के कारण पशुओं को पर्याप्त चारा उपलब्ध न हो सका। परिणामस्वरूप 1320 ई० के दशक में बड़ी संख्या में पशु मारे गए।

2. चाँदी की कमी (Shortage of Silver):
14वीं शताब्दी में ऑस्ट्रिया एवं सर्बिया में चाँदी की कमी आ गई। इन दोनों देशों में विश्व की सर्वाधिक चाँदी की खानें थीं। यहाँ से अन्य यूरोपीय देशों को चाँदी का निर्यात किया जाता था। उस समय अधिकाँश यूरोपीय देशों में चाँदी की मुद्रा का प्रचलन था। अत: इस धातु की कमी के कारण यूरोपीय व्यापार को जबरदस्त आघात लगा। इसका कारण यह था कि चाँदी के अभाव में मिश्रित धातु की मुद्रा का प्रचलन किया गया। इसे व्यापारी स्वीकार करने को तैयार न थे।

3. ब्यूबोनिक प्लेग (Bubonic Plague):
14वीं शताब्दी में यूरोप में ब्यूबोनिक प्लेग ने भयंकर रूप धारण कर लिया था। यह एक संक्रामक बीमारी (contagious disease) थी जो चूहों से फैलती थी। इसे काली मौत (black death) कहा जाता था। इसका कारण यह था कि यह बीमारी जिस व्यक्ति को लगती थी उसका रंग काला पड जाता था।

इस बीमारी के प्रथम लक्षण 1347 ई० में सिसली (Sicily) में देखने को मिले। यहाँ एशिया से व्यापार के लिए आए जलपोतों के साथ चूहे भी आ गए थे। इससे वहाँ प्लेग फैल गई। शीघ्र ही यह 1348 ई० से 1350 ई० के दौरान यूरोप के अनेक देशों में फैल गई। यह बीमारी जिसे लग जाती थी उसकी मृत्यु निश्चित थी।

परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग मृत्यु का ग्रास बन गए। इस कारण यूरोप की जनसंख्या जो 1300 ई० में 730 लाख थी कम होकर 1400 ई० में 450 लाख रह गई। प्लेग के कारण व्यापक पैमाने पर सामाजिक विस्थापन हुआ। आर्थिक मंदी ने स्थिति को अधिक गंभीर बना दिया। इस कारण विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था को गहरा आघात लगा।

जनसंख्या में कमी के कारण मजदूरों की उपलब्धता बहुत कम हो गई। इस कारण मजदूरों की माँग बहुत बढ़ गई। इसके चलते मज़दूरी की दरों में 250 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई। दूसरी ओर मजदूरी की दरें बढ़ने तथा कृषि संबंधी मूल्यों में गिरावट के कारण लॉर्डों (सामंतों) की आय बहुत कम हो गई। इसके चलते उन्होंने मजदूरी संबंधी कृषकों से किए समझौतों का पालन करना बंद कर दिया।

इस कारण कृषकों एवं लॉर्डों के मध्य तनाव उत्पन्न हो गया। परिणामस्वरूप अनेक स्थानों पर कृषक विद्रोह करने के लिए बाध्य हो गए। इनमें से 1323 ई० में फलैंडर्स (Flanders), 1358 ई० में फ्राँस एवं 1381 ई० में इंग्लैंड में हुए विद्रोह प्रमुख थे। यद्यपि इन विद्रोहों का दमन कर दिया गया था किंतु इन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि कृषकों के साथ अब क्रूर व्यवहार नहीं किया जा सकता। प्रसिद्ध इतिहासकार रिचर्ड एल० ग्रीवस का यह कहना ठीक है कि, “प्लेग के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव बहुत प्रभावशाली थे।”

प्रश्न 12.
राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के कारणों एवं सफलताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
राष्ट्रीय राज्यों की विशेषताओं एवं सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। बाद में इन राज्यों का पतन क्यों हुआ?
उत्तर:
15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों (Nation States) का गठन हुआ। इसने आधुनिक युग का श्रीगणेश किया। राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के कारणों, विशेषताओं एवं सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित अनुसार हैं

I. राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के कारण

16वीं शताब्दी के आरंभ तक यूरोप में इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन एवं पुर्तगाल आदि में राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान हुआ। राष्ट्रीय राज्यों से अभिप्राय ऐसे राज्यों से था जिसके नागरिक अपने आपको एक राष्ट्र से संबंधित समझते थे। उनकी अपनी भाषा एवं साहित्य होता था। उनका अपने राष्ट्र के साथ विशेष प्यार होता था। वे अपने राष्ट्र के हितों के लिए सब कुछ कुर्बान करने को तैयार रहते थे। राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. सामंतवाद का पतन (Decline of Feudalism):
16वीं शताब्दी के आरंभ में सामंतवाद का पतन राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के लिए एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुआ। मध्यकाल सामंत बहुत शक्तिशाली थे। उनकी अपनी सेना होती थी। यहाँ तक कि राजा भी उनके प्रभावाधीन थे। लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियों में बदलाव आया।

सामंतों के घोर अत्याचारों के कारण लोग उनके विरुद्ध हो गए। धर्मयुद्धों में भाग लेने के कारण बड़ी संख्या में सामंत मारे गए। इनसे उनकी शक्ति को गहरा आघात लगा। सामंतों के पतन ने राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान की आधारशिला तैयार की। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ के अनुसार, “16वीं शताब्दी तक सामंतवाद का पतन हो रहा था एवं सामंत इस स्थिति में नहीं रहे कि वे शाही निरंकुशता का विरोध कर सकें।”

2. चर्च का प्रभाव (Influence of the Church):
मध्यकाल में चर्च का यूरोप के शासकों एवं लोगों पर गहन प्रभाव था। इसे असीम शक्तियाँ प्राप्त थीं। कोई भी व्यक्ति अथवा शासक चर्च की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं रखता था। क्योंकि चर्च के पास अपार संपत्ति थी इसलिए यह शीघ्र ही भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया। 16वीं शताब्दी के आरंभ तक यूरोप के लोगों का दृष्टिकोण विशाल हो गया था।

अतः वे चर्च में फैले भ्रष्टाचार को सहन करने के लिए तैयार नहीं थे। धर्मयुद्धों के दौरान पोप ने यूरोपीय देशों को नेतृत्व प्रदान किया था। इन युद्धों में अंततः यूरोपीयों को पराजय का सामना करना पड़ा। इससे चर्च के सम्मान को गहरा आघात लगा। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के लिए स्वर्ण अवसर प्राप्त हुआ।

3. धर्मयुद्ध (The Crusades):
धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य 11वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के दौरान लड़े गए। इन धर्मयुद्धों में बड़ी संख्या में सामंत मारे गए थे। इससे उनकी शक्ति को गहरा आघात लगा। चर्च के इन युद्धों के दौरान यूरोपीय शासकों को पूर्वी देशों में प्रचलित शासन व्यवस्था की जानकारी प्राप्त हई।

वे यहाँ प्रचलित निरंकश राजतंत्र (absolute monarchy) से बहत प्रभावित हए। अतः उन्होंने इस को यूरोपीय देशों में लागू करने का निर्णय किया। यूरोप में फैली अराजकता को दूर करने के उद्देश्य से लोगों ने इस दिशा में शासकों को पूर्ण सहयोग दिया। निस्संदेह यह कदम यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण प्रमाणित हुआ।

4. मध्य वर्ग का उत्थान (The Rise of the Middle Class):
मध्य वर्ग के उत्थान ने राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस वर्ग के लोग धनी एवं व्यापारी थे। उन्होंने अपने व्यापार एवं वाणिज्य के प्रोत्साहन एवं सुरक्षा हेतु निरंकुश राजतंत्र की स्थापना में बड़ा सक्रिय सहयोग दिया। उन्होंने सामंतों के घोर अत्याचारों से बचने एवं अराजकता के वातावरण को दूर करने के लिए निरंकुश राजाओं के हाथ मज़बूत करने का निर्णय किया।

क्योंकि उस समय संसद् में कुलीन वर्ग का बोलबाला था इसलिए मध्य वर्ग यह कामना करता था कि इस पर राजा की सर्वोच्चता स्थापित हो। इस उद्देश्य से मध्य वर्ग ने राजा को नियमित कर देने का वचन दिया।

इन करों के कारण राजा अपनी एक शक्तिशाली सेना का गठन कर सका। इस सेना के चलते राजा अपने राज्य के सामंतों का दमन कर सका। निस्संदेह मध्य वर्ग का उत्थान युरोपीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण मोड सिद्ध हआ। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ के अनुसार, “मध्य वर्ग का उत्थान एवं इसका राजाओं के साथ समझौता शायद मध्य काल से आधुनिक काल के बीच के परिवर्तन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता थी।”

5. शक्तिशाली शासकों का उत्थान (Rise of Powerful Rulers):
यह सौभाग्य ही था कि 15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप में अनेक शक्तिशाली शासकों का उत्थान हुआ। इनमें फ्राँस का लुई ग्यारहवाँ (Louis XI), इंग्लैंड का हेनरी सातवाँ (Henery VII), स्पेन के फर्जीनेंड (Ferdinand) एवं ईसाबेला (Isabella) तथा ऑस्ट्रिया के मैक्समिलन (Maximilian) के नाम उल्लेखनीय हैं।

इन शासकों ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया। इस सेना को बंदूकों एवं बड़ी तोपों से लैस किया गया। इस सेना के सहयोग से इन शासकों ने सामंतों की शक्ति का सुगमता से दमन किया। इसका कारण यह था कि सामंतों की सेना कमज़ोर थी। ये सैनिक अपने तीर एवं तलवारों के साथ तोपों का मुकाबला न कर सके।

6. विद्वानों के लेख (Writings of the Scholars):
15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ यूरोप में अनेक ऐसे विद्वान हुए जिन्होंने अपने लेखों द्वारा राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें इटली के लेखक मैक्यिावेली (Machiavelli), फ्रांसीसी लेखक बोदिन (Bodin) एवं इंग्लैंड के लेखक थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) के नाम उल्लेखनीय हैं। मैक्यिावेली का ग्रंथ दि प्रिंस (The Prince) 1513 ई० में प्रकाशित हुआ।

इस ग्रंथ ने शीघ्र ही संपूर्ण यूरोप में धूम मचा दी। इस ग्रंथ में लेखक ने निरंकुश राजतंत्र की खूब प्रशंसा की तथा इस प्रणाली को अन्य सभी प्रकार की प्रणालियों से उत्तम बताया। इसका कथन था कि केवल राजा ही अपने राज्य के हितों के बारे में बेहतर जानता है। इसलिए उसे सदैव लोगों द्वारा समर्थन दिया जाना चाहिए। इन ग्रंथों का लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा तथा वे राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना के समर्थन में आगे आए।

II. राष्ट्रीय राज्यों की विशेषताएँ

राष्ट्रीय राज्यों की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-

(1) ऐसा विश्वास किया जाता था कि उनका अपना राज्य सर्वोच्च है तथा किसी अन्य राज्य को उनके राज्य की प्रभुसत्ता एवं क्षेत्रीय अखंडता (territorial integrity) को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है।

(2) ऐसे राज्य में राजा ही सर्वोच्च होता है। वह ही कानून का निर्माण करता है एवं उसकी व्याख्या करता है। उसके निर्णयों को अंतिम समझा जाता है। किसी भी व्यक्ति को उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं होता। वास्तव में राजा की इच्छा को ही कानून समझा जाता है।

(3) ऐसे राज्यों में राजी ही राज्य की सुरक्षा एवं उसके विस्तार के लिए उत्तरदायी होता है। इसलिए उन्होंने अपने अधीन एक शक्तिशाली सेना का गठन किया। इस सेना को आधुनिक शस्त्रों से लैस किया जाता था।

(4) ऐसे राज्यों में व्यक्तियों को सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

(5) ऐसे राज्य राजनीतिक तौर पर स्वतंत्र होते हैं। इसके अतिरिक्त वे आर्थिक तौर पर आत्म-निर्भर (self-sufficient) होते हैं।

(6) ऐसे राज्यों में राजा को लोगों पर कर लगाने का अधिकार होता है। लोगों का यह कर्त्तव्य होता है कि वे इन करों की अदायगी समय पर करें।

(7) ऐसे राज्यों द्वारा सदैव विदेशों में अपने उपनिवेश (colonies) स्थापित करने के प्रयास किए जाते हैं।

III. राष्ट्रीय राज्यों की सफलताएँ

राष्ट्रीय राज्यों को अनेक सफलताएँ प्राप्त करने का श्रेय प्राप्त है।

  • उन्होंने सामंतों की शक्ति का दमन कर लोगों को उनके अत्याचारों से मुक्त किया।
  • उन्होंने अपने राज्यों में फैली अराजकता को दूर कर शाँति की स्थापना की।
  • उन्होंने लोगों को अपने शासकों का सम्मान करने एवं उन्हें पूर्ण सहयोग देने का सबक सिखाया।
  • उन्होंने लोगों में एक नई राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। इसके यूरोप के भावी इतिहास पर दूरगामी प्रभाव पड़े।
  • उन्होंने अपने-अपने राज्यों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से उल्लेखनीय पग उठाए। इससे देश की कृषि एवं उद्योगों को प्रोत्साहन मिला।
  • उन्होंने अपने राज्य की भाषा एवं साहित्य के विकास के लिए बहुमूल्य योगदान दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ के शब्दों में, “16वीं शताब्दी में राष्ट्रीय राजतंत्र के उत्थान के साथ यूरोपीय लोगों में राष्ट्रीय जागृति एवं राष्ट्रीय देशभक्ति उत्पन्न हुई।”

IV. राष्ट्रीय राज्यों के पतन के कारण

16वीं शताब्दी में यद्यपि यूरोप में अनेक राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हुई थी किंतु अनेक कारणों से बाद में इनका पतन हो गया। इन कारणों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

(1) आरंभ में राष्ट्रीय राज्यों के शासकों ने सामंतों का दमन कर आंतरिक शांति की स्थापना की। इससे उन्हें लोगों का पूर्ण सहयोग मिला। बाद में ये शासक अपने राज्यों के विस्तार के लिए दूसरे राज्यों के साथ लंबे युद्धों में उलझ गए। इस कारण पुनः अराजकता फैली। अत: लोग ऐसे राज्यों का अंत चाहने लगे।

(2) राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना के समय वहाँ के शासकों ने अनेक लोकप्रिय कार्य किए। इससे लोग बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें लंबे समय के पश्चात् अत्याचारी सामंतों से छुटकारा प्राप्त हुआ। सत्ता हाथ में आने के पश्चात् अनेक राष्ट्रीय शासक अपने कर्तव्यों को भूल गए। उन्होंने लोगों पर अनेक अनुचित कानून लाद दिए। अतः लोग ऐसे शासकों के विरुद्ध हो गए।

(3) राष्ट्रीय राज्यों के अनेक शासक सत्ता एवं धन हाथ आते ही विलासप्रिय हो गए। उन्होंने अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करना आरंभ कर दिया। ऐसे राज्यों का अंत निश्चित था।

(4) 1776 ई० में अमरीका की क्राँति एवं 1789 ई० में फ्रांसीसी क्राँति ने राष्ट्रीय राज्यों को एक गहरा आघात पहुँचाया।

क्रम संख्यावर्षघटना
1.529 ई०इटली में सेंट बेनेडिक्ट मठ की स्थापना।
2.768-814 ई०फ्राँस के शासक शॉर्लमेन का शासनकाल।
3.910 ई०बरगंडी में क्लूनी मठ की स्थापना।
4.1066 ई॰नारमंडी के विलियम द्वारा इंग्लैंड पर अधिकार।
5.1100 ई०फ्राँस में कथीड्रलों का निर्माण।
6.1315-1317 ई०यूरोप में भयंकर अकाल।
7.1323 ई०कृषकों का फलैंडर्स में विद्रोह।
8.1347-1350 ई०यूरोप में ब्यूबोनिक प्लेग का फैलना।
9.1358 ई०कृषकों का फ्राँस में विद्रोह।
10.1381 ई०कृषकों का इंग्लैंड में विद्रोह।
11.1337-1453 ई०इंग्लैंड एवं फ्राँस के मध्य सौ वर्षीय युद्ध।
12.1455-1485 ई०इंग्लैंड एवं फ्राँस के मध्य गुलाबों का युद्ध।
13.1461-1483 ई०फ्राँस में लुई ग्यारहवें का शासनकाल।
14.1469 ई०आरागान के युवराज फर्डीनेंड एवं कास्तील की राजकुमारी ईसाबेला का विवाह।
15.1485 ई०इंग्लैंड में हेनरी सप्तम द्वारा ट्यूडर वंश की स्थापना।
16.1485-1509 ई०इंग्लैंड के शासक हेनरी सप्तम का शासनकाल।
17.1492 ई०स्पेन का ग्रेनाडा पर अधिकार।
18.1494 ई०पुर्तगाल के शासक की स्पेन के साथ टार्डींसिलास की संधि।
19.1603 ई०जेम्स प्रथम द्वारा इंग्लैंड में स्टुअर्ट वंश की स्थापना।
20.1603-1625 ई०इंग्लैंड के शासक जेम्स प्रथम का शासनकाल।
21.1614 ई०फ्राँस के शासक लुई तेरहवें द्वारा एस्टेट्स जनरल को भंग करना।
22.1625-1649 ई०इंग्लैंड के शासक चार्ल्स प्रथम का शासनकाल।
23.1642-1649 ई०इंग्लैंड में गृहयुद्ध।
24.1789 ई०प्राँस की क्राँति।
25.1848 ई०जर्मनी की क्राँति।
26.1917 ई०रूस की क्राँति।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में प्रचलित तीन वर्ग कौन-से थे ? समाज पर इनके प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोपीय समाज तीन वर्गों-पादरी वर्ग, कुलीन वर्ग एवं किसान वर्ग में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान पादरी वर्ग को प्राप्त था। पादरियों को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि समझा जाता था। इसलिए समाज द्वारा उनका विशेष सम्मान किया जाता था। यहाँ तक कि राजा भी उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करते थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे।

वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। कृषकदास, अपाहिज व्यक्ति एवं स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकती थीं। कुलीन वर्ग को समाज में दूसरा स्थान प्राप्त था। इस वर्ग के लोग प्रशासन, चर्च एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त थे। उन्हें भी अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे भव्य महलों में रहते थे एवं विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे।

किसान यूरोपीय समाज के सबसे निम्न वर्ग में सम्मिलित थे। यूरोप की अधिकाँश जनसंख्या इस वर्ग से संबंधित थी। इनमें स्वतंत्र किसानों की संख्या बहुत कम थी। अधिकाँश किसान कृषकदास थे। उन्हें अपने गुज़ारे के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। वास्तव में उनका जीवन नरक के समान था।

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में पादरी वर्ग की क्या स्थिति थी ?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में पादरी प्रथम वर्ग में सम्मिलित थे। इस वर्ग में पोप, आर्कबिशप एवं बिशप सम्मिलित थे। यह वर्ग बहुत शक्तिशाली एवं प्रभावशाली था। इसका कारण यह था कि उनका चर्च पर पूर्ण नियंत्रण था। चर्च के अधीन विशाल भूमि होती थी, जिससे उसे बहुत आमदनी होती थी। लोगों द्वारा दिया जाने वाला दान भी चर्च की आय का एक प्रमुख स्त्रोत था।

इनके अतिरिक्त चर्च किसानों पर टीथ नामक कर लगाता था। चर्च की इस विशाल आय के चलते पादरी वर्ग बहुत धनी हो गया था। इस वर्ग का यूरोप के शासकों पर भी बहत प्रभाव था। ये शासक पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं रखते थे। कलीन वर्ग भी पादरी वर्ग का बहुत सम्मान करता था। पादरी वर्ग को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे।

वे राज्य को किसी प्रकार का कोई कर नहीं देते थे। वे विशाल एवं भव्य महलों में रहते थे। यद्यपि वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने का उपदेश देते थे किंतु वे स्वयं विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। दूसरी ओर लोगों को धर्मोपदेश देने का कार्य निम्न वर्ग के पादरी करते थे। उनके वेतन कम थे। उनकी दशा शोचनीय थी। पादरी वर्ग में यह असमानता वास्तव में इस वर्ग के माथे पर एक कलंक समान थी।

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प्रश्न 3.
मध्यकालीन समाज में कुलीन वर्ग की क्या स्थिति थी ?
उत्तर:
कुलीन वर्ग दूसरे वर्ग में सम्मिलित था। यूरोपीय समाज में इस वर्ग की विशेष भूमिका थी। केवल कुलीन वर्ग के लोगों को ही प्रशासन, चर्च एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। उन्हें अनेक प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। उनके पास विशाल जागीरें होती थीं। कुलीन इन जागीरों पर एक छोटे राजे के समान शासन करते थे।

वे अपने न्यायालय लगाते थे तथा मुकद्दमों का निर्णय देते थे। वे अपने अधीन सेना रखते थे। उन्हें सिक्के जारी करने का भी अधिकार प्राप्त था। उन्हें लोगों पर कर लगाने का भी अधिकार था। वे कृषकों से बेगार लेते थे। उनके पशु किसानों की खेती उजाड़ देते थे, किंतु इन पशुओं को रोकने का साहस उनमें नहीं था। कुलीन अपने क्षेत्र में आने वाले माल पर चुंगी लिया करते थे। कुलीन वर्ग बहुत धनवान् था। राज्य की अधिकाँश संपत्ति उनके अधिकार में थी। वे विशाल महलों में रहते थे। वे बहुत विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे।

प्रश्न 4.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में कृषकदासों के लिए कौन-से कर्त्तव्य निश्चित किए गए थे ?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में कृषक दासों के लिए निम्नलिखित कर्तव्य निश्चित किए गए थे

  • वर्ष में कम-से-कम 40 दिन सामंत (लॉर्ड) की सेना में कार्य करना।
  • उसे एवं उसके परिवार के सदस्यों को सप्ताह में तीन अथवा उससे कुछ अधिक दिन सामंत की जागीर पर जा कर काम करना पड़ता था। इस श्रम से होने वाले उत्पादन को श्रम अधिशेष कहा जाता था।
  • वह मेनर में स्थित सड़कों, पुलों तथा चर्च आदि की मुरम्मत करता था।
  • वह खेतों के आस-पास बाड़ बनाता था।
  • वह जलाने के लिए लकड़ियाँ एकत्र करता था।
  • वह अपने सामंत के लिए पानी भरता था, अन्न पीसता था तथा दुर्ग की मुरम्मत करता था।
  • वह अपने स्वामी को शत्रु द्वारा बंदी बनाए जाने पर उसे धन देकर छुड़ाता था।
  • वह राजा को टैली नामक कर भी देता था। इस कर की कोई निश्चित दर नहीं थी। यह राजा की इच्छा पर निर्भर करता था।
  • कृषकदास की स्त्रियाँ एवं बच्चे सूत कातने, वस्त्र बुनने, मोमबत्ती बनाने एवं मदिरा के लिए अंगूरों का रस निकालने का काम करते थे।

प्रश्न 5.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में प्रचलित सामंतवादी प्रथा पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
सामंतवाद मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप की एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी। इसमें राजा अपने बड़े सामंतों एवं बड़े सामंत अपने छोटे सामंतों में जागीरों का बंटवारा करते थे। ऐसा कुछ शर्तों के अधीन किया जाता था। रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् पश्चिमी यूरोप में फैली अराजकता एवं केंद्रीय सरकारों के कमजोर होने के कारण राजाओं के लिए सामंतों का सहयोग लेना आवश्यक हो गया था।

सामंतवाद का प्रसार यूरोप के अनेक देशों में हुआ। इनमें फ्राँस, इंग्लैंड, जर्मनी, इटली एवं स्पेन के नाम उल्लेखनीय थे। सामंतवाद के यूरोपीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इसने यूरोपीय समाज में कानून व्यवस्था लागू करने, कुशल प्रशासन देने, निरंकुश राजतंत्र पर नियंत्रण लगाने एवं कला एवं साहित्य को प्रोत्साहन देने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

सामंतवादी व्यवस्था ने दूसरी ओर शासकों को कमज़ोर किया। इसने किसानों का घोर शोषण किया। इसने युद्धों को प्रोत्साहित किया। यह राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बड़ी बाधा सिद्ध हुई। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद का अनेक कारणों के चलते पतन हो गया।

प्रश्न 6.
मेनर से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
लॉर्ड का आवास क्षेत्र मेनर कहलाता था। इसका आकार एक जैसा नहीं होता था। इसमें थोड़े से गाँवों से लेकर अनेक गाँव सम्मिलित होते थे। प्रत्येक मेनर में एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर सामंत का दुर्ग होता था। यह दुर्ग जितना विशाल होता था उससे उस लॉर्ड की शक्ति का आंकलन किया जाता था। इस दुर्ग की सुरक्षा के लिए चारों ओर एक चौड़ी खाई होती थी।

इसे सदैव पानी से भर कर रखा जाता था। प्रत्येक मेनर में एक चर्च, एक कारखाना एवं कृषकदासों की अनेक झोंपड़ियाँ होती थीं। मेनर में एक विशाल कृषि फार्म होता था। इसमें सभी आवश्यक फ़सलों का उत्पादन किया जाता था। मेनर की चरागाह पर पशु चरते थे। मेनरों में विस्तृत वन होते थे। इन वनों में लॉर्ड शिकार करते थे। गाँव वाले यहाँ से जलाने के लिए लकड़ी प्राप्त करते थे।

मेनर में प्रतिदिन के उपयोग के लिए लगभग सभी वस्तुएँ उपलब्ध होती थीं। इसके बावजूद मेनर कभी आत्मनिर्भर नहीं होते थे। इसका कारण यह था कि कुलीन वर्ग के लिए विलासिता की वस्तुएँ, आभूषण एवं हथियार आदि तथा नमक एवं धातु के बर्तन बाहर से मंगवाने पड़ते थे। इसके बावजूद मेनर सामंती व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी।

प्रश्न 7.
नाइट एक अलग वर्ग क्यों बने और उनका पतन कब हुआ ?
उत्तर:
नाइट का यूरोपीय समाज में विशेष सम्मान किया जाता था। 9वीं शताब्दी यूरोप में निरंतर युद्ध चलते रहते थे। इसलिए साम्राज्य की सरक्षा के लिए एक स्थायी सेना की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को नाइट नामक एक नए वर्ग ने पूर्ण किया। नाइट अपने लॉर्ड से उसी प्रकार संबंधित थे जिस प्रकार लॉर्ड राजा के साथ संबंधित था।

लॉर्ड अपनी विस्तृत जागीर का कुछ भाग नाइट को देता था। इसे फ़ीफ़ कहा जाता था। इसका आकार सामान्य तौर पर 1000 एकड़ से 2000 एकड़ के मध्य होता था। प्रत्येक फ़ीफ़ में नाइट के लिए घर, चर्च, पनचक्की, मदिरा संपीडक एवं किसानों के लिए झोंपड़ियाँ आदि की व्यवस्था होती थी। नाइट को अपनी फीफ़ में व्यापक अधिकार प्राप्त थे।

फ़ीफ़ की सुरक्षा का प्रमुख उत्तरदायित्व नाइट पर था। उसके अधीन एक सेना होती थी। नाइट अपना अधिकाँश समय अपनी सेना के साथ गुजारते थे। वे अपने सैनिकों को प्रशिक्षण देते थे। वे बनावटी लड़ाइयों द्वारा अपने रणकौशल का अभ्यास करते थे। वे अपनी सेना में अनुशासन पर विशेष बल देते थे। उनकी सेना की सफलता पर लॉर्ड की सफलता निर्भर करती थी क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर लॉर्ड उनकी सेना का प्रयोग करता था।

प्रसन्न होने पर लॉर्ड उनकी फ़ीफ़ में बढ़ोत्तरी कर देता था। गायक नाइट की वीरता की कहानियाँ लोगों को गीतों के रूप में सुना कर उनका मनोरंजन भी करते थे। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद के पतन के साथ ही नाइट वर्ग का भी पतन हो गया।

प्रश्न 8.
सामंतवाद के प्रमुख गुण बताएँ।
उत्तर:
(1) कुशल प्रशासन-सामंतों ने मध्यकाल यूरोप में कुशल शासन व्यवस्था स्थापित की। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने यूरोप में फैली अराजकता को दूर करने में सफलता प्राप्त की। सामंतों ने राजा को सेना तैयार करने में उल्लेखनीय योगदान दिया। इसके अतिरिक्त सामंत अपने अधीन जागीर में राजा के एक अधिकारी के रूप में भी कार्य करते थे। वे अपनी जागीर में शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थे। वे अपने न्यायालय भी लगाते थे तथा लोगों के झगड़ों का निर्णय भी देते थे।

(2) निरंकुश राजतंत्र पर अंकुश-सामंतवाद की स्थापना से पूर्व यूरोप के शासक निरंकुश थे। उनकी शक्तियाँ असीम थीं। वे प्रशासन की ओर कम ध्यान देते थे। वे अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करते थे। अतः लोगों के कष्टों को सुनने वाला कोई न था। इन परिस्थितियों में सामंत आगे आए। उन्होंने निरंकुश शासकों एवं उन्हें जनता की भलाई करने के लिए बाध्य किया। निस्संदेह यह सामंतवाद की एक महान उपलब्धि थी।

(3) शूरवीरता को प्रोत्साहन-सामंतवाद में शूरवीरता के विकास पर विशेष बल दिया जाता था। सभी सामंत बहुत बहादुर होते थे। वे सदैव अपना रणकौशल दिखाने के लिए तैयार होते थे। वे रणक्षेत्र में विजय प्राप्त करने अथवा वीरगति को प्राप्त करने को बहुत गौरवशाली समझते थे। अतः सामंतवादी काल में बहादुरी दिखाने वाले सामंतों का समाज द्वारा विशेष सम्मान किया जाता था।

(4) कला तथा साहित्य को योगदान-सामंतवाद ने कला तथा साहित्य को बहुमूल्य योगदान दिया। सामंतों ने गोथिक शैली में दुर्गों एवं भवनों का निर्माण किया। उनके द्वारा बनवाए गए भवन अपनी सुंदरता एवं भव्यता के लिए विख्यात थे। उन्होंने चित्रकला को भी प्रोत्साहित किया। अत: इस काल में चित्रकला ने उल्लेखनीय विकास किया। इनके अतिरिक्त इस काल में साहित्य ने भी खूब प्रगति की।

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प्रश्न 9.
सामंतवाद के मुख्य दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) कमज़ोर शासक-सामंत प्रथा के अधीन शासक केवल नाममात्र के ही शासक रह गए थे। राज्य की वास्तविक शक्ति सामंतों के हाथों में आ गई थी। उनके अधीन एक विशाल सेना होती थी। वे ही अपने अधीन जागीर में कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थे। वे अपने न्यायालय लगाते थे तथा लोगों के मुकद्दमों का निर्णय देते थे। राजा अपने सभी कार्यों के लिए सामंतों की सहायता पर निर्भर करता था।

(2) किसानों का शोषण-सामंत प्रथा किसानों के लिए एक अभिशाप सिद्ध हुई। इस प्रथा के अधीन किसानों का घोर शोषण किया गया। किसानों को सामंत के खेतों में काम करने के लिए बाध्य किया जाता था। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने सामंत के कई प्रकार के अन्य कार्य भी करने पड़ते थे। इन कार्यों के लिए उन्हें कुछ नहीं दिया जाता था।

(3) युद्धों को प्रोत्साहन-सामंत प्रथा ने मध्यकालीन यूरोप में अराजकता फैलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। इसका कारण यह था कि वे अपने स्वार्थी हितों की पूर्ति के लिए आपसी युद्धों में उलझ जाते थे। सभी सामंतों के अधीन एक विशाल सेना होती थी। इसलिए उन पर नियंत्रण पाना बहुत कठिन होता था। सामंत अवसर देखकर राजा के विरुद्ध विद्रोह करने से भी नहीं चूकते थे। अराजकता के इस वातावरण में न केवल लोगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा अपितु इससे संबंधित देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी आघात पहँचता था।

(4) राष्ट्रीय एकता में बाधा-सामंत प्रथा राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बड़ी बाधा सिद्ध हई। इसका कारण यह था कि लोग अपने सामंत से जुड़े हुए थे। अतः वे अपने सामंत के प्रति अधिक वफ़ादार थे। वे अपने राजा से कोसों दूर थे। इसका कारण यह था कि उस समय लोगों में राष्ट्रीय चेतना न के बराबर थी। उनकी दुनिया तो उनके मेनर तक ही सीमित थी। मेनर के बाहर की घटनाओं का उन्हें कुछ लेना-देना नहीं था। निस्संदेह इसके हानिकारक परिणाम निकले।

प्रश्न 10.
फ्रांस के सर्फ और रोम के दास के जीवन की दशा की तुलना कीजिए।
उत्तर:
(1) फ्रांस के सर्फ-फ्रांस के सर्फ का जीवन जानवरों से भी बदतर था। वे अपने लॉर्ड अथवा नाइट की जागीर पर काम करते थे। इस कार्य के लिए उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता था। उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगे हुए थे। वे लॉर्ड की अनुमति के बिना उसकी जागीर को नहीं छोड़ सकते थे। सामंत उन पर घोर अत्याचार करते थे। इसके बावजूद वे सामंतों के विरुद्ध कोई शिकायत नहीं कर सकते थे।

(2) रोम के दास-रोम के दासों का जीवन भी नरक समान था। अमीरों के पास इन दासों की भरमार होती थी। अधिकाँश दास युद्धबंदी होते थे। अवांछित बच्चों को भी दास बनाया जाता था। दासों के मालिक उन पर घोर अत्याचार करते थे। उनमें जागीरों पर 16 से 18 घंटे प्रतिदिन कार्य लिया जाता था। दासों को एक-दूसरे से जंजीरों से बाँध कर रखा जाता था, ताकि वे भागने का दुस्साहस न करें। स्त्री दासों का यौन शोषण किया जाता था।

प्रश्न 11.
सामंतवाद के पतन के प्रमुख कारण बताएँ।
उत्तर:
(1) धर्मयुद्धों का प्रभाव-11वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य यूरोप के ईसाइयों एवं मध्य एशिया के मुसलमानों के बीच जेरुसलम को लेकर युद्ध लड़े गए। ये युद्ध इतिहास में धर्मयुद्धों के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन धर्मयुद्धों में पोप की अपील पर बड़ी संख्या में सामंत अपने सैनिकों समेत सम्मिलित हुए। इन धर्मयुद्धों में जो काफी लंबे समय तक चले में बड़ी संख्या में सामंत एवं उनके सैनिक मारे गए। इससे उनकी शक्ति को गहरा आघात लगा। राजाओं ने इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाया तथा उन्होंने सुगमता से बचे हुए सामंतों का दमन कर दिया। इस प्रकार धर्मयुद्ध सामंतों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए।

(2) राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान-सामंतवाद के उदय के कारण राज्य की वास्तविक शक्ति सामंतों के हाथों में आ गई थी। सामंतों को अनेक अधिकार प्राप्त थे। उनके अधीन एक विशाल सेना भी होती थी। सामंतों के सहयोग के बिना राजा कुछ नहीं कर सकता था। 15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ में अनेक राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हुई।

इन राज्यों के शासक काफी शक्तिशाली थे। उन्होंने अपने अधीन एक शक्तिशाली एवं आधुनिक सेना का गठन किया था। अत: नए शासकों को सामंतों की शक्ति कुचलने में किसी विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा।

(3) मध्य श्रेणी का उत्थान-15वीं एवं 16वीं शताब्दी यूरोप में मध्य श्रेणी का उत्थान सामंतवादी व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हआ। मध्य श्रेणी में व्यापारी, उद्योगपति एवं पंजीपति सम्मिलित थे। इस काल में यरोप में व्यापार के क्षेत्र में तीव्रता से प्रगति हो रही थी। इस कारण समाज में मध्य श्रेणी को विशेष सम्मान प्राप्त हुआ। इस श्रेणी ने सामंतों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का अंत करने के लिए शासकों से सहयोग किया।

शासक पहले ही सामंतों के कारण बहुत परेशान थे। अतः उन्होंने मध्य श्रेणी के लोगों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त करना आरंभ कर दिया। मध्य श्रेणी द्वारा दिए गए आर्थिक सहयोग के कारण ही शासक अपनी स्थायी एवं शक्तिशाली सेना का गठन कर सके। इससे सामंतों की शक्ति को एक गहरा आघात लगा।

प्रश्न 12.
मध्यकालीन मठों का क्या कार्य था ?
उत्तर:
मध्यकालीन मठों के प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे

  • मठों द्वारा लोगों को उपदेश देने का कार्य किया जाता था।
  • उनके द्वारा प्रसिद्ध पांडुलिपियों को तैयार करवाया जाता था।
  • वे लोगों को शिक्षा दने का कार्य करते थे।
  • वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते थे।
  • वे रोगियों की सेवा करते थे।
  • वे मठ में आने वाले यात्रियों की देखभाल करते थे।
  • वे मठ को दान में दी गई भूमि पर कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थे।
  • मठ के नियमों की उल्लंघना करने वाले को कठोर दंड दिए जाते थे।

प्रश्न 13.
मध्यकालीन यूरोप में चर्च के कार्य क्या थे ?
उत्तर:
मध्यकाल में चर्च अनेक प्रकार के कार्य करता था।

  • इसने सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों संबंधी अनेक नियम बनाए थे जिनका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक था।
  • चर्च की देखभाल के लिए अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी।
  • चर्च में धर्मोपदेश दिए जाते थे तथा सामूहिक प्रार्थना की जाती थी।
  • यहाँ विद्यार्थियों को शिक्षा भी दी जाती थी।
  • इसके द्वारा रोगियों, गरीबों, विधवाओं एवं अनाथों की देखभाल की जाती थी।
  • यहाँ विवाह की रस्में पूर्ण की जाती थीं।
  • यहाँ वसीयतों एवं उत्तराधिकार के मामलों की सुनवाई की जाती थी।
  • यहाँ धर्म विद्रोहियों के विरुद्ध मुकद्दमे चलाए जाते थे एवं उन्हें दंडित किया जाता था।
  • चर्च कृषकों से उनकी उपज का दसवाँ भाग कर के रूप में एकत्रित करता था। इस कर को टीथ (tithe) कहते थे।
  • चर्च श्रद्धालुओं से दान भी एकत्रित करता था।

प्रश्न 14.
पोप कौन था ? मध्यकालीन युग में उसकी क्या स्थिति थी ?
उत्तर:
पोप चर्च का सर्वोच्च अधिकारी था। वह रोम में निवास करता था। मध्यकाल में उसके हाथों में अनेक शक्तियाँ थीं। उसे पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। वह चर्च से संबंधित सभी प्रकार के नियमों को बनाता था। वह चर्च की समस्त गतिविधियों पर अपना नियंत्रण रखता था। उसका अपना न्यायालय था जहाँ वह विवाह, तलाक, वसीयत एवं उत्तराधिकार से संबंधित मुकद्दमों के निर्णय देता था।

उसके निर्णयों को अंतिम माना जाता था। वह यूरोपीय शासकों को पदच्युत करने की भी क्षमता रखता था। वह किसी भी सिविल कानून को जो उसकी नज़र में अनुचित हो, को रद्द कर सकता था। वह चर्च से संबंधित विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति भी करता था। कोई भी यहाँ तक कि शासक भी पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करता था। संक्षेप में पोप की शक्तियाँ असीम थीं।

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प्रश्न 15.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज पर चर्च के क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर:
मध्य युग में चर्च का यूरोपीय समाज पर जितना व्यापक प्रभाव था उतना प्रभाव किसी अन्य संस्था का नहीं था। इसने लोगों को आपसी भाईचारे एवं प्रेम का संदेश दिया। इसने गरीबों एवं अनाथों को आश्रय प्रदान किया।

इसने रोगियों की देखभाल के लिए अनेक अस्पताल बनवाए। इसने शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया। चर्च एवं मठों के द्वारा लोगों को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती थी। अनेक चर्च अधिकारी विश्वविद्यालयों में अध्यापन का कार्य भी करते थे। इससे लोगों में एक नव जागृति का संचार हुआ। चर्च ने असभ्य बर्बरों को ईसाई धर्म में सम्मिलित कर उन्हें सभ्य बनाया।

चर्च ने लोगों को युद्ध की अपेक्षा शांति का पाठ पढ़ाया। कोई भी शासक चर्च के आदेशों की उल्लंघना करने का साहस नहीं कर सकता था। 25 दिसंबर को ईसा मसीह के जन्म दिन को क्रिसमस एवं ईसा के शूलारोपण तथा उसके पुनर्जीवित होने को ईस्टर ने त्योहारों का रूप धारण कर लिया था। इन पवित्र दिनों में संपूर्ण यूरोप में छुट्टियाँ होती थीं।

अतः लोग मिल-जुल कर इनका आनंद लेते थे। इससे लोगों में एकता की भावना को बल मिला। संक्षेप में चर्च के यूरोपीय समाज पर दूरगामी एवं व्यापक प्रभाव पड़े।

प्रश्न 16.
मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
(1) कृषि का विकास-मध्यकाल यूरोप में कृषि के विकास को बल मिला। फ़सलों के अधिक उत्पादन के कारण कृषक धनी हुए। इन धनी किसानों को अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न को बेचने तथा अपने लिए एवं कृषि के लिए आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए एक बिक्री केंद्र की आवश्यकता हुई। शीघ्र ही बिक्री केंद्रों में दुकानों, घरों, सड़कों एवं चर्चों का निर्माण हुआ। इससे नगरों के विकास की आधारशिला तैयार हुई।

(2) व्यापार का विकास-11वीं शताब्दी में यूरोप एवं पश्चिम एशिया के मध्य अनेक नए व्यापारिक मार्गों का विकास आरंभ हुआ। इससे व्यापार को एक नई दिशा मिली। इटली, जर्मनी, इंग्लैंड, पुर्तगाल एवं बेल्जियम के व्यापारियों ने मुस्लिम एवं अफ्रीका के व्यापारियों के साथ संबंध स्थापित किए। व्यापार में आई इस तीव्रता ने नगरों के विकास को एक नया प्रोत्साहन दिया।

(3) धर्मयुद्ध-धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य 1096 ई० से 1272 ई० के मध्य लड़े गए थे। इन धर्मयुद्धों का वास्तविक उद्देश्य ईसाइयों द्वारा अपनी पवित्र भूमि जेरुसलम को मुसलमानों के आधिपत्य से मुक्त करवाना था। इन धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे भव्य मुस्लिम नगरों को देखकर चकित रह गए। इन धर्मयुद्धों के कारण पश्चिम एवं पूर्व के मध्य व्यापार को एक नया प्रोत्साहन मिला। इससे व्यापारी धनी हुए जिससे नगरों के विकास को बल मिला।

प्रश्न 17.
कथील नगरों से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
12वीं शताब्दी में फ्रांस में कथील कहे जाने वाले विशाल चर्चों का निर्माण कार्य आरंभ हुआ। शीघ्र ही यूरोप के अन्य देशों में भी कथीलों का निर्माण शुरू हुआ। इनका निर्माण मठों की देख-रेख में होता था। इनके निर्माण के लिए धनी लोगों द्वारा दान दिया जाता था। सामान्यजन अपने श्रम द्वारा एवं अन्य वस्तुओं द्वारा इनके निर्माण में सहयोग देते थे।

कथील बहुत विशाल एवं भव्य होते थे। इन्हें पत्थर से बनाया जाता था। इनके निर्माण में काफी समय लगता था। अत: कथीड्रल के आस-पास अनेक प्रकार के लोग बस गए। उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बाज़ार भी स्थापित हो गए। इस प्रकार कथीलों ने नगरों का रूप धारण कर लिया। कथीलों के भवन अत्यंत मनोरम थे।

इनका निर्माण इस प्रकार किया गया था कि पादरी की आवाज़, भिक्षुओं के गीत, लोगों की प्रार्थना की घंटियाँ दूर-दूर तक सुनाई पड़ें। कथीड्रल की खिड़कियों के लिए अभिरंजित काँच का प्रयोग किया जाता था।

इस कारण दिन के समय सूर्य की पर्याप्त रोशनी अंदर आ सकती थी। रात्रि के समय जब कथीड्रल में मोमबत्तियाँ जलाई जाती थीं तो खिड़कियों के शीशों पर बने ईसा मसीह के जीवन से संबंधित चित्रों को स्पष्ट देखा जा सकता था। निस्संदेह नगरों के विकास में कथीलों की उल्लेखनीय भूमिका थी।

प्रश्न 18.
किन कारणों से 14वीं शताब्दी यूरोप में संकट उत्पन्न हुआ ?
उत्तर:
(1) पर्यावरण में परिवर्तन-13वीं शताब्दी के अंत में उत्तरी यूरोप के पर्यावरण में पुन: परिवर्तन आया। इस कारण गर्मी का स्थान शीत ऋतु ने ले लिया। गर्मी का मौसम बहुत छोटा रह गया। इस कारण भूमि की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो गई। इससे घोर खाद्य संकट उत्पन्न हो गया। भयंकर तूफानों एवं सागरीय बाढ़ों ने भी कृषि अधीन काफी भूमि को नष्ट कर दिया। इसने स्थिति को अधिक विस्फोटक बना दिया। .

(2) चाँदी की कमी-14वीं शताब्दी में ऑस्ट्रिया एवं सर्बिया में चाँदी की कमी आ गई। इन दोनों देशों में विश्व की सर्वाधिक चाँदी की खानें थीं। यहाँ से अन्य यूरोपीय देशों को चाँदी का निर्यात किया जाता था। उस समय अधिकाँश यूरोपीय देशों में चाँदी की मुद्रा का प्रचलन था। अतः इस धातु की कमी के कारण यूरोपीय व्यापार को ज़बरदस्त आघात लगा। इसका कारण यह था कि चाँदी के अभाव में मिश्रित धातु की मुद्रा का प्रचलन किया गया। इसे व्यापारी स्वीकार करने को तैयार न थे।

(3) ब्यूबोनिक प्लेग-प्लेग के कारण व्यापक पैमाने पर सामाजिक विस्थापन हुआ। आर्थिक मंदी ने स्थिति को अधिक गंभीर बना दिया। इस कारण विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था को गहरा आघात लगा। जनसंख्या में कमी के कारण मजदूरों की उपलब्धता बहुत कम हो गई। इस कारण मजदूरों की माँग बहुत बढ़ गई। इसके चलते मज़दूरी की दरों में 250 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई।

दूसरी ओर मजदूरी की दरें बढ़ने तथा कृषि संबंधी मूल्यों में गिरावट के कारण लॉर्डों (सामंतों) की आय बहुत कम हो गई। इसके चलते उन्होंने मजदूरी संबंधी कृषकों से किए समझौतों का पालन बंद कर दिया। इस कारण कृषकों एवं लॉर्डों के मध्य तनाव उत्पन्न हो गया।

प्रश्न 19.
मध्य वर्ग के उत्थान ने यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में क्या भूमिका निभाई ?
उत्तर:
मध्य वर्ग के उत्थान ने राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस वर्ग के लोग धनी एवं व्यापारी थे। उन्होंने अपने व्यापार एवं वाणिज्य के प्रोत्साहन एवं सुरक्षा हेतु निरंकुश राजतंत्र की स्थापना में बड़ा सक्रिय सहयोग दिया। उन्होंने सामंतों के घोर अत्याचारों से बचने एवं अराजकता के वातावरण को दूर करने के लिए निरंकुश राजाओं के हाथ मज़बूत करने का निर्णय किया।

क्योंकि उस समय संसद् में कुलीन वर्ग का बोलबाला था। इसलिए मध्य वर्ग यह कामना करता था कि इस पर राजा की सर्वोच्चता स्थापित हो। इस उद्देश्य से मध्य वर्ग ने राजा को नियमित कर देने का वचन दिया। इन करों के कारण राजा अपनी एक शक्तिशाली सेना का गठन कर सका। इस सेना के चलते राजा अपने राज्य के सामंतों का दमन कर सका।

इसके अतिरिक्त मध्य वर्ग ने राजा को अनेक मेहनती अधिकारी प्रदान किए। इन अधिकारियों के सहयोग से राजा अपनी प्रजा को कुशल शासन प्रदान कर सका। निस्संदेह मध्य वर्ग का उत्थान यूरोपीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।

प्रश्न 20.
राष्ट्रीय राज्य की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:
राष्ट्रीय राज्यों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-

(1) ऐसा विश्वास किया जाता था कि उनका अपना राज्य सर्वोच्च है तथा किसी अन्य राज्य को उनके राज्य की प्रभुसत्ता एवं क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है।

(2) ऐसे राज्य में राजा ही सर्वोच्च होता है। वह ही कानून का निर्माण करता है एवं उसकी व्याख्या करता है। उसके निर्णयों को अंतिम समझा जाता है। किसी भी व्यक्ति को उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं होता। वास्तव में जो राजा को अच्छा लगता है उसे ही कानून समझा जाता है।

(3) ऐसे राज्यों में राजा ही राज्य की सुरक्षा एवं उसके विस्तार के लिए उत्तरदायी होता है। इसलिए उन्होंने अपने अधीन एक शक्तिशाली सेना का गठन किया। इस सेना को आधुनिक शस्त्रों से लैस किया जाता था।

(4) ऐसे राज्यों में व्यक्तियों को सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

(5) ऐसे राज्य राजनीतिक तौर पर स्वतंत्र होते हैं। इसके अतिरिक्त वे आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर होते हैं।

(6) ऐसे राज्यों में राजा को लोगों पर कर लगाने का अधिकार होता है। लोगों का यह कर्त्तव्य होता है कि वे इन करों की अदायगी समय पर करें।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकाल किसे कहते हैं ? इसकी प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • 5वीं शताब्दी ई० से लेकर 15वीं शताब्दी के आरंभ के काल को मध्यकाल कहा जाता है।
  • इस काल के दौरान बड़े-बड़े साम्राज्यों का पतन हो गया तथा छोटे-छोटे राज्य अस्तित्व में आए।
  • यह काल अशांति एवं अव्यवस्था का काल था।

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज के तीन वर्ग कौन-से थे ? ये समाज की किस श्रेणी में सम्मिलित थे ?
उत्तर:

  • मध्यकालीन यूरोपीय समाज के तीन वर्ग पादरी वर्ग, कुलीन वर्ग एवं किसान थे।
  • पादरी वर्ग समाज की प्रथम श्रेणी में, कुलीन वर्ग द्वितीय श्रेणी में एवं किसान तीसरी श्रेणी में सम्मिलित थे।

प्रश्न 3.
पादरी वर्ग को यूरोपीय समाज में क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता था ?
उत्तर:

  • इस वर्ग का चर्च पर पूर्ण नियंत्रण था।
  • शासक भी पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करते थे।
  • इस वर्ग को समाज में अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे।

प्रश्न 4.
‘टीथ’ से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
टीथ एक प्रकार का कर था। इसे चर्च द्वारा किसानों से लिया जाता था। यह किसानों की कुल उपज का दसवां भाग होता था। यह चर्च की आय का एक प्रमुख स्रोत था।

प्रश्न 5.
चर्च की आय के दो प्रमुख स्रोत कौन-से थे ?
उत्तर:

  • किसानों से प्राप्त किया जाने वाला टीथ नामक कर।
  • धनी लोगों द्वारा अपने कल्याण तथा मरणोपरांत अपने रिश्तेदारों के कल्याण के लिए दिया जाने वाला दान।

प्रश्न 6.
मध्यकालीन यूरोप में कुलीन वर्ग को कौन-से विशेषाधिकार प्राप्त थे ? कोई दो बताएँ।
उत्तर:

  • वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे।
  • वे अपने अधीन सेना रखते थे।

प्रश्न 7.
कृषकदासों के कोई दो कर्त्तव्य बताएँ।
उत्तर:

  • वे राजा को टैली नामक कर देते थे।
  • उन्हें वर्ष में कम-से-कम 40 दिन सामंत की सेना में कार्य करना पड़ता था।

प्रश्न 8.
कृषकदासों पर लगे कोई दो प्रतिबंध लिखें।
उत्तर:

  • वे सामंत की अनुमति के बिना उसकी जागीर नहीं छोड़ सकते थे।
  • वे अपने पुत्र-पुत्रियों के विवाह सामंत की अनुमति के बिना नहीं कर सकते थे।

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प्रश्न 9.
सामंतवाद से आपका क्या अभिप्राय है ?
अथवा
आर्थिक संदर्भ में सामंतवाद को समझाइए।
उत्तर:
सामंतवाद जर्मन भाषा के शब्द फ़्यूड से बना है। इससे अभिप्राय है, भूमि का एक टुकड़ा अथवा जागीर। इस प्रकार सामंतवाद का संबंध भूमि अथवा जागीर से है। इस व्यवस्था में राजा को समस्त भूमि का स्वामी समझा जाता था। वह कुछ शर्तों के साथ अपने बड़े सामंतों में भूमि बाँटता था। ये सामंत इसी प्रकार आगे अपने अधीन छोटे सामंतों को भूमि बाँटते थे। संपूर्ण व्यवस्था भूमि के स्वामित्व एवं वितरण पर निर्भर करती थी।

प्रश्न 10.
सामंतवाद के उदय के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् केंद्रीय शक्ति बहुत कमज़ोर हो गई थी।
  • विदेशी आक्रमणों के कारण पश्चिमी यूरोप में अराजकता का बोलबाला था।

प्रश्न 11.
शॉर्लमेन कौन था ?
उत्तर:
शॉर्लमेन फ्रांस का एक प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली शासक था। उसने 768 ई० से 814 ई० तक शासन किया। उसने फ्रांस में सामंतवादी व्यवस्था लागू की। उसने फ्रांस में उल्लेखनीय सुधार किए। उसे पोप लियो तृतीय ने 800 ई० में पवित्र रोमन सम्राट् की उपाधि से सम्मानित किया था।

प्रश्न 12.
फ्रांस के प्रारंभिक सामंती समाज के दो लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • सामंतों को अपनी जागीरों पर व्यापक न्यायिक एवं अन्य अधिकार प्राप्त थे।
  • कृषक सामंतों को श्रम सेवा प्रदान करते थे।

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प्रश्न 13.
विलियम कौन था ?
उत्तर:
वह फ्रांस के एक प्रांत नारमंडी का ड्यूक था। उसने 1066 ई० में इंग्लैंड के सैक्सन शासक हैरलड को हैस्टिंग्ज़ की लड़ाई में पराजित कर इंग्लैंड पर अधिकार कर लिया था। इस महत्त्वपूर्ण विजय के पश्चात् उसने इंग्लैंड में सामंतवादी व्यवस्था को लागू किया।

प्रश्न 14.
सामंतवादी व्यवस्था की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • राजा समस्त भूमि का स्वामी होता था। वह इसे कुछ शर्तों के आधार पर बड़े सामंतों में बाँटता था।
  • सामंत अपनी जागीर में सर्वशक्तिशाली होते थे। उन्हें असीम शक्तियाँ प्राप्त थीं।

प्रश्न 15.
मेनर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
मेनर लॉर्ड का आवास क्षेत्र होता था। इसका आकार एक जैसा नहीं होता था। इसमें प्रतिदिन के उपयोग की प्रत्येक वस्तु मिलती थी। यहाँ लॉर्ड का दुर्ग, कृषि फार्म, कारखाने, चर्च, वन एवं कृषकों की झोंपड़ियाँ होती थीं। कोई भी व्यक्ति लॉर्ड की अनुमति के बिना मेनर को छोड़कर नहीं जा सकता था।

प्रश्न 16.
नाइट एक अलग वर्ग क्यों बने और उनका पतन कब हुआ ?
उत्तर:
9वीं शताब्दी यूरोप में स्थानीय युद्ध एक सामान्य बात थी। इन युद्धों के लिए कुशल घुड़सवारों की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए नाइट एक अलग वर्ग बने। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद के पतन के साथ ही नाइट का पतन हुआ।

प्रश्न 17.
फ़ीफ़ क्या थी ?
उत्तर:
लॉर्ड द्वारा नाइट को जो जागीर दी जाती थी उसे फ़ीफ़ कहते थे। यह 1000 से 2000 एकड़ में फैली होती थी। फ़ीफ़ में नाइट के लिए घर, चर्च और उस पर निर्भर व्यक्तियों के लिए व्यवस्था होती थी। फ़ीफ़ को कृषक जोतते थे। इसकी रक्षा का भार नाइट पर होता था।

प्रश्न 18.
नाइट के कोई दो कर्त्तव्य बताएँ।
उत्तर:

  • वह अपने लॉर्ड को युद्ध में उसकी तरफ से लड़ने का वचन देता था।
  • वह अपने लॉर्ड को एक निश्चित धनराशि देता था।

प्रश्न 19.
सामंतवाद के कोई दो गुण बताएँ।
उत्तर:

  • इसने कानून एवं व्यवस्था की स्थापना की।
  • इसने निरंकुश राजतंत्र पर अंकुश लगाया।

प्रश्न 20.
सामंतवाद की कोई दो हानियाँ लिखें।
उत्तर:

  • इसने शासकों को कमजोर बनाया।
  • इसने युद्धों को प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 21.
सामंतवाद के पतन के लिए उत्तरदायी कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • कृषकों के विद्रोह।
  • राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान।

प्रश्न 22.
मध्यकाल में चर्च के प्रमुख कार्य क्या थे ?
उत्तर:

  • इसने सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों संबंधी अनेक नियम बनाए।
  • यहाँ विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती थी।
  • यहाँ गरीबों, अनाथों, रोगियों एवं विधवाओं की देखभाल की जाती थी।

प्रश्न 23.
पोप कौन था ?
उत्तर:
पोप चर्च का सर्वोच्च अधिकारी था। उसे पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। वह चर्च से संबंधित सभी प्रकार के नियमों को बनाता था। वह चर्च की समस्त गतिविधियों पर नियंत्रण रखता था। वह चर्च से संबंधित विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति भी करता था।

प्रश्न 24.
पादरी के प्रमुख कार्य क्या थे ?
उत्तर:

  • वह लोगों के सुखी जीवन के लिए चर्च में सामूहिक प्रार्थनाएँ करता था।
  • वह पोप से प्राप्त सभी आदेशों को लागू करवाता था।
  • वह जन्म, विवाह एवं मृत्यु से संबंधित सभी प्रकार के संस्कारों को संपन्न करवाता था।

प्रश्न 25.
मध्यकालीन मठों के क्या कार्य थे ?
उत्तर:

  • मठों द्वारा लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने पर बल दिया जाता था।
  • मठों द्वारा लोगों को शिक्षा दी जाती थी।
  • मठों द्वारा रोगियों की सेवा की जाती थी एवं यात्रियों की देखभाल की जाती थी।

प्रश्न 26.
सेंट बेनेडिक्ट की स्थापना कब और कहाँ हुई थी ?
उत्तर:
सेंट बेनेडिक्ट की स्थापना 529 ई० में इटली में हुई थी।

प्रश्न 27.
सेंट बेनेडिक्ट के भिक्षुओं के लिए बनाए गए कोई दो नियम लिखें।
उत्तर:

  • प्रत्येक मठवासी विवाह नहीं करवा सकता था।
  • उन्हें मठ के प्रधान ऐबट की आज्ञा का पालन करना पड़ता था।

प्रश्न 28.
क्लूनी मठ की स्थापना कब, कहाँ एवं किसने की थी ?
उत्तर:
क्लूनी मठ की स्थापना 910 ई० में फ्रांस में बरगंडी नामक स्थान पर विलियम प्रथम ने की थी।

प्रश्न 29.
आबेस हिल्डेगार्ड कौन थी ?
उत्तर:
आबेस हिल्डेगार्ड जर्मनी की एक प्रतिभाशाली भिक्षुणी थी। उसने क्लूनी मठ के विकास के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया। उसने चर्च की प्रार्थनाओं के लिए 77 सामुदायिक गायन लिखे। उसके प्रचार कार्य एवं लेखन ने लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव डाला।

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प्रश्न 30.
फ्रायर कौन थे ?
उत्तर:
13वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप में भिक्षुओं के एक नए समूह का उत्थान हुआ जिसे फ्रायर कहा जाता था। वे मठों में रहने की अपेक्षा बाहर भ्रमण करते थे। वे ईसा मसीह के संदेश को जनता तक पहुँचाते थे। वे जनसाधारण की भाषा में प्रचार करते थे। उन्होंने चर्च के गौरव को स्थापित करने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 31.
संत फ्राँसिस कौन थे ?
उत्तर:
संत फ्रांसिस असीसी के एक प्रसिद्ध संत थे। उन्होंने फ्रांसिस्कन संघ की स्थापना की थी। उन्होंने गरीबों, अनाथों एवं बीमारों की सेवा करने का संदेश दिया। उन्होंने शिष्टता के नियमों का पालन करने, शिक्षा का प्रचार करने एवं श्रम के महत्त्व पर विशेष बल दिया। उनका संघ बहुत लोकप्रिय हुआ।

प्रश्न 32.
संत डोमिनीक कौन थे ?
उत्तर:
संत डोमिनीक स्पेन के एक प्रसिद्ध संत थे। उन्होंने डोमिनिकन संघ की स्थापना की। उन्होंने जन-भाषा में अपना प्रचार किया। उन्होंने पाखंडी लोगों की कटु आलोचना की। उन्होंने पुजारी वर्ग में फैली अज्ञानता को दूर करने का निर्णय किया। उनके शिष्य बहुत विद्वान् थे। उन्होंने लोगों में एक नई जागृति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 33.
14वीं शताब्दी में मठवाद के महत्त्व के कम होने के दो प्रमुख कारण लिखें।
उत्तर:

  • मठों में भ्रष्टाचार बहुत फैल गया था।
  • भिक्षु-भिक्षुणियों ने अब विलासिता का जीवन व्यतीत करना आरंभ कर दिया था।

प्रश्न 34.
मध्यकाल में चर्च के यूरोपीय समाज पर क्या प्रमुख प्रभाव पड़े ?
उत्तर:

  • इसने लोगों को आपसी भाईचारे एवं प्रेम का संदेश दिया।
  • इसने गरीबों एवं अनाथों को आश्रय प्रदान किया।
  • इसने शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 35.
मध्यकालीन यूरोपीय नगरों की कोई दो विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:

  • इनमें आधारभूत सुविधाओं की कमी होती थी।
  • इन नगरों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध किया जाता था।

प्रश्न 36.
मध्यकालीन यूरोप में स्थापित श्रेणियों के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • श्रेणी द्वारा वस्तुओं के मूल्य निर्धारित किए जाते थे।
  • श्रेणी द्वारा व्यापार संबंधी नियम बनाए जाते थे।

प्रश्न 37.
कथीड्रल क्या थे ?
उत्तर:
12वीं शताब्दी में फ्रांस में विशाल चर्चों का निर्माण आरंभ हुआ। इन्हें कथीड्रल कहा जाता था। इनके निर्माण के लिए धनी लोगों द्वारा दान दिया जाता था। इनका निर्माण मठों की देख-रेख में होता था। इन्हें पत्थरों से बनाया जाता था। इनकी खिड़कियों के लिए अभिरंजित काँच का प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 38.
मध्यकालीन यूरोपीय नगरों का महत्त्व क्या था ?
उत्तर:

  • नगरों के उत्थान के कारण राजे शक्तिशाली हुए।
  • नगरों में लोग स्वतंत्र जीवन व्यतीत करते थे।
  • नगरों में व्यापार के कुशल संचालन के लिए श्रेणियों का गठन किया गया।

प्रश्न 39.
मध्यकालीन यूरोप के सामाजिक एवं आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने वाले दो महत्त्वपूर्ण कारक कौन-से थे ?
उत्तर:

  • पर्यावरण में परिवर्तन।
  • नई कृषि प्रौद्योगिकी।

प्रश्न 40.
11वीं शताब्दी में यूरोप के वातावरण में हुए परिवर्तन के क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर:

  • इस कारण तापमान में वृद्धि हो गई।
  • इस कारण फ़सलों के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई।
  • तापमान में वद्धि के कारण यरोप के अनेक भागों के वन क्षेत्रों में कमी आई।

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प्रश्न 41.
11वीं शताब्दी में यूरोप में नई कृषि प्रौद्योगिकी के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  • अब लोहे के हलों का प्रयोग आरंभ हुआ।
  • अब कृषि के लिए तीन खेतों वाली व्यवस्था का प्रचलन आरंभ हुआ।

प्रश्न 42.
मध्यकाल में फ़सलों के उत्पादन में वृद्धि के कारण कौन-से दो महत्त्वपूर्ण परिणाम सामने आए ?
उत्तर:

  • भोजन की उपलब्धता अब पहले की अपेक्षा दुगुनी हो गई।
  • पशुओं के लिए अब अच्छे चारे की उपलब्धता हो गई।

प्रश्न 43.
जनसंख्या के स्तर में होने वाले लंबी अवधि के परिवर्तन ने किस प्रकार यूरोप की अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित किया ?
उत्तर:

  • अच्छे आहार से जीवन अवधि लंबी हो गई।
  • लोगों द्वारा आवास की माँग बढ़ जाने के कारण कृषि अधीन क्षेत्र कम होने लगा।
  • इससे नगरों के उत्थान में सहायता मिली।

प्रश्न 44.
13वीं शताब्दी में नई कृषि प्रौद्योगिकी के कारण कौन-से दो प्रमुख लाभ हुए ?
उत्तर:

  • नई कृषि प्रौद्योगिकी के कारण किसानों को कम श्रम की आवश्यकता होती थी।
  • किसानों को अब अन्य गतिविधियों के लिए अवसर प्राप्त हुआ।

प्रश्न 45.
कृषि में हुए विकास के परिणामस्वरूप सामंतवाद पर क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर:

  • इससे व्यक्तिगत संबंधों को गहरा आघात लगा।
  • अब कृषक अपनी फ़सल को नकदी के रूप में बेचने लगे।
  • इससे बाजारों के विकास को प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 46.
14वीं शताब्दी यूरोप में आए संकट के कौन-से दो प्रमुख कारण उत्तरदायी थे ?
उत्तर:

  • पर्यावरण में परिवर्तन।
  • चाँदी की कमी।

प्रश्न 47.
13वीं शताब्दी में उत्तरी यूरोप में आए पर्यावरण परिवर्तन के क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर:

  • अब गर्मी का स्थान शीत ऋतु ने ले लिया।
  • गर्मी का मौसम छोटा होने से भूमि की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो गई।
  • इससे अकालों का दौर आरंभ हो गया।

प्रश्न 48.
14वीं शताब्दी में किन दो देशों में चाँदी की कमी आई? इसका मुख्य प्रभाव क्या पड़ा ?
उत्तर:

  • 14वीं शताब्दी में ऑस्ट्रिया एवं सर्बिया में चाँदी की कमी आ गई।
  • इस कारण व्यापार को जबरदस्त आघात पहुँचा।

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प्रश्न 49.
14वीं शताब्दी में किस बीमारी को काली मौत कहा जाता था ? यह यूरोप में कब फैली ?
उत्तर:

  • 14वीं शताब्दी में ब्यूबोनिक प्लेग को काली मौत कहा जाता था।
  • यह यूरोप में 1347 ई० से 1350 ई० के मध्य फैली।

प्रश्न 50.
14वीं शताब्दी में यूरोप के किसानों ने विद्रोह क्यों किए ?
उत्तर:
14वीं शताब्दी में यूरोप के किसानों ने इसलिए विद्रोह किए क्योंकि सामंतों ने किसानों से किए मजदूरी संबंधी समझौतों का पालन बंद कर दिया था।

प्रश्न 51.
16वीं शताब्दी में राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के प्रमुख कारण लिखें।
उत्तर:

  • सामंतवाद का पतन।
  • मध्य वर्ग का उत्थान।
  • चर्च का प्रभाव।

प्रश्न 52.
मैक्यिावेली के प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम क्या था ? यह कब प्रकाशित हुआ ?
उत्तर:

  • मैक्यिावेली के प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम ‘दि प्रिंस’ था।
  • इसका प्रकाशन 1513 ई० में हुआ था।

प्रश्न 53.
राष्ट्रीय राज्यों की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उनका अपना राज्य सर्वोच्च है।
  • राजा को असीम शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

प्रश्न 54.
इंग्लैंड में ट्यूडर वंश की स्थापना किसने तथा कब की ?
उत्तर:
इंग्लैंड में ट्यूडर वंश की स्थापना हेनरी सप्तम ने 1485 ई० में की।

प्रश्न 55.
गुलाबों का युद्ध कब तथा किसके मध्य चला ?
उत्तर:
गुलाबों का युद्ध 1455 ई० से 1485 ई० के मध्य इंग्लैंड एवं फ्रांस के मध्य चला।

प्रश्न 56.
सौ वर्षीय युद्ध कब तथा किन दो देशों के मध्य हुआ ?
उत्तर:
सौ वर्षीय युद्ध 1337 ई० से लेकर 1453 ई० तक इंग्लैंड एवं फ्रांस के मध्य चला।

प्रश्न 57.
लुई ग्यारहवाँ कहाँ का शासक था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • लुई ग्यारहवाँ फ्रांस का शासक था।
  • उसने 1461 ई० से 1483 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 58.
लुई ग्यारहवें की कोई दो सफलताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने सामंतों की शक्ति का दमन किया।
  • उसने चर्च पर अंकुश लगाया।

प्रश्न 59.
राष्ट्रीय राज्यों की कोई दो सफलताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उन्होंने सामंतों की शक्ति का दमन कर लोगों को उनके अत्याचारों से मुक्त किया।
  • उन्होंने लोगों में एक नई राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।

प्रश्न 60.
राष्ट्रीय राज्यों के पतन के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय राज्यों के शासक अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करने लगे।
  • राष्ट्रीय राज्यों के शासकों ने अनेक अनुचित कानून लागू किए। इस कारण लोग उनके विरुद्ध हो गए।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में कितने वर्ग प्रचलित थे ?
उत्तर:
तीन।

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज के प्रथम वर्ग में कौन सम्मिलित था ?
उत्तर:
पादरी।

प्रश्न 3.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज के द्वितीय वर्ग में कौन सम्मिलित था ?
उत्तर:
कुलीन वर्ग।

प्रश्न 4.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज के तृतीय वर्ग में कौन सम्मिलित था ?
उत्तर:
कृषक वर्ग।

प्रश्न 5.
टीथ क्या होता था ?
उत्तर:
टीथ किसानों द्वारा चर्च को दिया जाने वाला कर था।

प्रश्न 6.
मध्यकाल में क्या प्रत्येक व्यक्ति पादरी बन सकता था ?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में किन्हें विशेषाधिकार प्राप्त थे ?
उत्तर:
पादरी एवं कुलीन वर्ग को।

प्रश्न 8.
किस वर्ग के लोगों को प्रशासन एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था ?
उत्तर:
कुलीन वर्ग के।

प्रश्न 9.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज की अधिकाँश जनसंख्या किस वर्ग से संबंधित थी ?
उत्तर:
तृतीय वर्ग से।

प्रश्न 10.
राजा कृषकों पर कौन-सा कर लगाता था ?
उत्तर:
टैली।

प्रश्न 11.
कृषकदास को अपने सामंत की सेना में वर्ष में कम-से-कम कितने दिन कार्य करना पड़ता था ?
उत्तर:
40 दिन।

प्रश्न 12.
कृषकदास किस प्रकार का जीवन व्यतीत करते थे ?
उत्तर:
दयनीय।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

प्रश्न 13.
यूरोप में सामंतवादी व्यवस्था का उदय कब हुआ ?
उत्तर:
9वीं शताब्दी में।

प्रश्न 14.
फ़यूड शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जागीर।

प्रश्न 15.
किसी एक यूरोपीय देश का नाम बताएँ जहाँ मध्यकाल में सामंतवाद का प्रसार हुआ था ?
उत्तर:
फ्राँस।

प्रश्न 16.
फ्रांस के उस महान् विद्वान् का नाम बताएँ जिसने सामंतवादी व्यवस्था पर विस्तृत प्रकाश डाला है ?
उत्तर:
मार्क ब्लॉक।

प्रश्न 17.
जर्मनी की किस जनजाति ने 486 ई० में गॉल पर अधिकार कर लिया था ?
उत्तर:
फ्रैंक।

प्रश्न 18.
शॉर्लमेन फ्रांस का शासक कब बना ?
उत्तर:
768 ई० में।

प्रश्न 19.
पोप ने शॉर्लमेन को पवित्र रोमन सम्राट् की उपाधि से कब सम्मानित किया.था ?
उत्तर:
800 ई० में।

प्रश्न 20.
इंग्लैंड में सामंतवाद का प्रसार कब हुआ ?
उत्तर:
11वीं शताब्दी में।

प्रश्न 21.
हैस्टिग्ज की लड़ाई कब हुई ?
उत्तर:
1066 ई० में।

प्रश्न 22.
इंग्लैंड का नाम किसका रूपांतरण है ?
उत्तर:
एंजिललैंड का।

प्रश्न 23.
सामंतवादी व्यवस्था में मेनर क्या होता था ?
उत्तर:
लॉर्ड का आवास क्षेत्र।

प्रश्न 24.
सामंत द्वारा नाइट को दिए जाने वाला भूमि का टुकड़ा क्या कहलाता था ?
उत्तर:
फ़ीफ़।

प्रश्न 25.
नाइट का पतन कब हुआ ?
उत्तर:
15वीं शताब्दी में।

प्रश्न 26.
सामंतों ने किस शैली में दुर्गों एवं भवनों का निर्माण किया ?
उत्तर:
गोथिक।

प्रश्न 27.
क्या धर्मयुद्ध सामंतवादी व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए ?
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 28.
पोप कौन था ?
उत्तर:
चर्च का सर्वोच्च अधिकारी।

प्रश्न 29.
पोप कहाँ निवास करता था ?
उत्तर:
रोम में।

प्रश्न 30.
प्रांतीय बिशपों पर नियंत्रण कौन रखता था ?
उत्तर:
आर्क बिशप।

प्रश्न 31.
मठ का प्रधान कौन होता था ?
उत्तर:
ऐबट

प्रश्न 32.
मठों में कौन रहता था ?
उत्तर:
भिक्षु।

प्रश्न 33.
भिक्षुणियों को किस नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:
नन।

प्रश्न 34.
मठों को किस अन्य नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:
ऐबी।

प्रश्न 35.
इटली में सेंट बेनेडिक्ट नामक मठ की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
529 ई० में।

प्रश्न 36.
910 ई० में बरगंडी में किस प्रसिद्ध मठ की स्थापना की गई थी ?
उत्तर:
क्लूनी।

प्रश्न 37.
आबेस हिल्डेगार्ड कौन थी ?
उत्तर:
जर्मनी की एक प्रसिद्ध नन।

प्रश्न 38.
उन भिक्षुओं को क्या कहा जाता था जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देते थे ?
उत्तर:
फ्रायर।

प्रश्न 39.
फ्रायर किन दो संघों में विभाजित थे ?
उत्तर:
फ्राँसिस्कन एवं डोमिनिकन।

प्रश्न 40.
फ्रांसिस्कन संघ का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
संत फ्राँसिस।

प्रश्न 41.
डोमिनिकन संघ का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
संत डोमिनीक।

प्रश्न 42.
इंग्लैंड के किन दो प्रसिद्ध कवियों ने मठवासियों के जीवन पर पर्याप्त प्रकाश डाला है ?
उत्तर:
लैंग्लैंड एवं जेफ्री चॉसर।

प्रश्न 43.
विश्व में 25 दिसंबर क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर:
ईसा मसीह के जन्म के कारण।

प्रश्न 44.
मध्यकाल यूरोप में उदय होने वाले किन्हीं दो प्रसिद्ध नगरों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  • रोम
  • वेनिस।

प्रश्न 45.
कथील नगरों का निर्माण कहाँ शुरू हुआ ?
उत्तर:
फ्राँस में।

प्रश्न 46.
कथीड्रल की खिड़कियों में किस काँच का प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर:
अभिरंजित।

प्रश्न 47.
किस सदी से यूरोप के तापमान में वृद्धि होती चली गई ?
उत्तर:
11वीं सदी से।

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प्रश्न 48.
किस सदी तक विभिन्न कृषि प्रौद्योगिकियों में बदलाव के प्रमाण मिलते हैं ?
उत्तर:
11वीं सदी तक।

प्रश्न 49.
कोई एक उदाहरण दें जिससे कृषि प्रौद्योगिकी में बदलाव के प्रमाण मिलते हैं ?
उत्तर:
लोहे की भारी नोक वाले हलों का प्रयोग।

प्रश्न 50.
मध्यकालीन यूरोप में कितने खेतों वाली व्यवस्था का प्रयोग आरंभ हुआ ?
उत्तर:
तीन।

प्रश्न 51.
14वीं शताब्दी में यूरोप में आए घोर संकट का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर:
पर्यावरण में परिवर्तन।

प्रश्न 52.
मध्यकाल में यूरोप में सबसे भयंकर अकाल कब पड़े ?
उत्तर:
1315 से 1317 ई० के मध्य।

प्रश्न 53.
‘काली मौत’ किसे कहा जाता था ?
उत्तर:
प्लेग को।

प्रश्न 54.
यूरोप में सर्वप्रथम प्लेग कब फैली ?
उत्तर:
1347 ई० में।

प्रश्न 55.
फ्रांस में कृषकों ने कब विद्रोह किया ?
उत्तर:
1358 ई० में।

प्रश्न 56.
यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों का गठन कब आरंभ हुआ ?
उत्तर:
15वीं शताब्दी के अंत में।

प्रश्न 57.
लुई ग्यारहवाँ कहाँ का शासक था ?
उत्तर:
फ्राँस का।

प्रश्न 58.
ऑस्ट्रिया का प्रसिद्ध निरंकुश शासक कौन था ?
उत्तर:
मैक्समिलन।

प्रश्न 59.
हेनरी सातवाँ कहाँ का शासक था ?
उत्तर:
इंग्लैंड का।

प्रश्न 60.
इंग्लैंड में ट्यूडर राजवंश की स्थापना कब हुई ?
उत्तर:
1485 ई० में।

प्रश्न 61.
जेम्स प्रथम इंग्लैंड का शासक कब बना ?
उत्तर:
1603 ई० में।

प्रश्न 62.
चार्ल्स प्रथम को फाँसी कब दी गई ?
उत्तर:
1649 ई० में।

प्रश्न 63.
सौ वर्षीय युद्ध किन दो देशों के मध्य लड़ा गया था ?
उत्तर:
फ्राँस तथा इंग्लैंड।

प्रश्न 64.
लुई तेरहवें ने एस्टेट्स जनरल को कब भंग किया ?
उत्तर:
1614 ई० में।

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प्रश्न 65.
पुर्तगाल एवं स्पेन के मध्य टार्डीसिलास की संधि कब हुई ?
उत्तर:
1494 ई० में।

रिक्त स्थान भरिए

1. सामंतवाद जर्मन भाषा के शब्द ……………… से बना है।
उत्तर:
फ्यूड

2. फ्रांस में 768 ई० से 814 ई० तक ……………… ने शासन किया।
उत्तर:
शॉर्लमेन

3. फ्रांस के समाज के मुख्यतः तीन वर्ग पादरी, अभिजात तथा ……………… वर्ग थे।
उत्तर:
कृषक

4. लॉर्ड का आवास क्षेत्र ………………. कहलाता था।
उत्तर:
मेनर

5. फ्रांस की कुशल अश्वसेना को ……………….. कहा जाता था।
उत्तर:
नाइट

6. फ्रांस में लॉर्ड द्वारा नाइट को दी जाने वाली भूमि को ……………… कहते थे।
उत्तर:
फ़ीफ़

7. चर्च द्वारा कृषकों से लिए जाने वाले कर के अधिकार को ……………….. कहा जाता था।
उत्तर:
टीथ

8. पादरियों के निवास स्थान को ……………… कहा जाता था।
उत्तर:
मोनेस्ट्री

9. आर्थिक संस्था का आधार
उत्तर:
गिल्ड

10. फ्रांस में कृषकों का विद्रोह ……………….. ई० में चला।
उत्तर:
1381

11. फ्रांस एवं इंग्लैंड के मध्य ………………. युद्ध 1337 ई० से 1453 ई० तक चला।
उत्तर:
सौ वर्षीय

12. इंग्लैंड में हेनरी सप्तम द्वारा 1485 ई० में ……………….. वंश की स्थापना की गई।
उत्तर:
ट्यूडर

13. ……………. ई० में पुर्तगाल की स्पेन के साथ टार्डीसिलास की संधि हुई।
उत्तर:
1494

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. मध्यकालीन यूरोपीय समाज कितने वर्गों में विभाजित था ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर:
(ख) तीन

2. मध्यकालीन यूरोपीय समाज में किस वर्ग को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था ?
(क) कुलीन वर्ग
(ख) अध्यापक वर्ग
(ग) कृषक वर्ग
(घ) पादरी वर्ग।
उत्तर:
(घ) पादरी वर्ग।

3. चर्च किसानों पर जो कर लगाता था वह क्या कहलाता था ?
(क) फ़ीफ़
(ख) टीथ
(ग) ऐबी
(घ) टैली।
उत्तर:
(ख) टीथ

4. मध्यकालीन यरोपीय समाज की अधिकाँश जनसंख्या किस वर्ग से संबंधित थी ?
(क) कृषक वर्ग
(ख) कुलीन वर्ग
(ग) पादरी वर्ग
(घ) व्यापारी वर्ग।
उत्तर:
(क) कृषक वर्ग

5. कृषकदासों पर निम्नलिखित में से कौन-सा प्रतिबंध लगा हुआ था ?
(क) वे सामंत की अनुमति के बिना उसकी जागीर को नहीं छोड़ सकते थे।
(ख) वे अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह सामंत की अनुमति के बिना नहीं कर सकते थे।
(ग) वे अपने स्वामी के अत्याचारी होने पर उसके विरुद्ध कोई अपील नहीं सकते थे।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

6. फ़्यूड किस भाषा का शब्द है ?
(क) जर्मन
(ख) फ्रैंच
(ग) अंग्रेजी
(घ) फ़ारसी।
उत्तर:
(क) जर्मन

7. शॉर्लमेन किस देश का शासक था ?
(क) चीन
(ख) जापान
(ग) इंग्लैंड
(घ) फ्राँस।
उत्तर:
(घ) फ्राँस।

8. निम्नलिखित में से किस देश में सामंतवाद का सर्वप्रथम उदय हुआ ?
(क) फ्राँस
(ख) जर्मनी
(ग) ऑस्ट्रिया
(घ) स्पेन।
उत्तर:
(क) फ्राँस

9. लॉर्ड का आवास क्षेत्र क्या कहलाता था ?
(क) फ़ीफ़
(ख) नाइट
(ग) मेनर
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) मेनर

10. लॉर्ड अपनी जागीर में से नाइट को जो भाग देता था वह क्या कहलाता था ?
(क) फ़ीफ़
(ख) टैली
(ग) टीथ
(घ) मेनर।
उत्तर:
(क) फ़ीफ़

11. सामंतवाद का पतन किस सदी में हुआ ?
(क) 12वीं सदी में
(ख) 13वीं सदी में
(ग) 14वीं सदी में
(घ) 15वीं सदी में।
उत्तर:
(घ) 15वीं सदी में।

12. सामंतवाद के पतन के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कारण उत्तरदायी था ?
(क) धर्मयुद्धों का प्रभाव
(ख) राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान
(ग) मुद्रा का प्रचलन
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

13. निम्नलिखित में से किसे यूरोप में ‘काली मौत’ के नाम से जाना जाता था ?
(क) हैजा को
(ख) प्लेग को
(ग) कैंसर को
(घ) एड्स को।
उत्तर:
(ख) प्लेग को

14. मध्यकाल में निम्नलिखित में से कौन-सा चर्च का कार्य था ?
(क) सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों संबंधी नियम बनाना
(ख) विद्यार्थियों को शिक्षा देना
(ग) धर्म विद्रोहियों के विरुद्ध मुकद्दमे चलाना
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

15. चर्च का सर्वोच्च अधिकारी कौन था ?
(क) पादरी
(ख) बिशप
(ग) पोप
(घ) आर्क बिशप।
उत्तर:
(ग) पोप

16. कैथोलिक चर्च का मुखिया कौन होता था ?
(क) पोप
(ख) पादरी
(ग) कृषक
(घ) राजा।
उत्तर:
(क) पोप

17. पोप का निवास स्थान कहाँ था ?
(क) पेरिस
(ख) रोम
(ग) लंदन
(घ) जेनेवा।
उत्तर:
(ख) रोम

18. मध्यकाल यूरोप में भिक्षुओं के निवास स्थान क्या कहलाते थे ?
(क) मेनर
(ख) ऐबी
(ग) फ़ीफ़
(घ) जागीर।
उत्तर:
(ख) ऐबी

19. मठ का प्रधान क्या कहलाता था ?
(क) पादरी
(ख) पोप
(ग) आर्क बिशप
(घ) ऐबट।
उत्तर:
(घ) ऐबट।

20. बरगंडी में स्थापित प्रसिद्ध मठ कौन-सा था ?
(क) बेनेडिक्टीन
(ख) क्लूनी
(ग) ऐबी
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) क्लूनी

21. फ्रायर कौन थे ?
(क) चर्च अधिकारी
(ख) प्रांतीय अधिकारी
(ग) मेनर अधिकारी
(घ) भिक्षु।
उत्तर:
(घ) भिक्षु।

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22. क्लूनी मठ को लोकप्रिय बनाने में किसने उल्लेखनीय योगदान दिया ?
(क) आबेस हिल्डेगार्ड
(ख) सेंट बेनेडिक्ट
(ग) संत फ्राँसिस
(घ) संत डोमिनीक।
उत्तर:
(क) आबेस हिल्डेगार्ड

23. ‘पियर्स प्लाउमैन’ का लेखक कौन था ?
(क) जेफ्री चॉसर
(ख) लैंग्लैंड
(ग) आबेस हिल्डेगार्ड
(घ) शॉर्लमेन।
उत्तर:
(ख) लैंग्लैंड

24. ईसा मसीह का जन्म दिन किस दिन मनाया जाता है ?
(क) 15 दिसंबर को
(ख) 20 दिसंबर को
(ग) 25 दिसंबर को
(घ) 1 जनवरी को।
उत्तर:
(ग) 25 दिसंबर को

25. मध्यकालीन यूरोप में नगरों के विकास में किसने योगदान दिया ?
(क) कृषि का विकास
(ख) व्यापार का विकास
(ग) धर्मयुद्ध
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

26. कथील नगरों का निर्माण किस देश में आरंभ हुआ ?
(क) इंग्लैंड
(ख) फ्राँस
(ग) ऑस्ट्रेलिया
(घ) इटली।
उत्तर:
(ख) फ्राँस

27. नगरों में व्यापार के कुशल संचालन के लिए निम्नलिखित में से किसका गठन किया गया ?
(क) मठों का
(ख) मेनर का
(ग) श्रेणी का
(घ) कथीलों का।
उत्तर:
(ग) श्रेणी का

28. 11वीं शताब्दी में निम्नलिखित में से किस कारक ने सामाजिक-आर्थिक संबंधों को प्रभावित किया ?
(क) पर्यावरण के परिवर्तन ने
(ख) कृषि के लिए नई भूमि के उपयोग ने
(ग) नई कृषि प्रौद्योगिकी ने
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

29. 11वीं शताब्दी में कृषि प्रौद्योगिकी में कौन-सा परिवर्तन आया ?
(क) लकड़ी के स्थान पर लोहे के हलों का प्रयोग
(ख) साँचेदार पटरों का प्रयोग
(ग) घोड़े के खुरों पर अब लोहे के नाल लगायी जाने लगी
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

30. 14वीं शताब्दी में यूरोप में आए घोर संकट का प्रमुख कारण क्या था ?
(क) पर्यावरण में परिवर्तन
(ख) प्लेग का फैलना
(ग) चाँदी की कमी
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

31. ‘काली मौत’ के प्रथम लक्षण यूरोप में कब देखने को मिले थे ?
(क) 1347 ई० में
(ख) 1348 ई० में
(ग) 1350 ई० में
(घ) 1357 ई० में।
उत्तर:
(क) 1347 ई० में

32. यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान कब हुआ ?
(क) 14वीं शताब्दी में
(ख) 15वीं शताब्दी में
(ग) 16वीं शताब्दी में
(घ) 17वीं शताब्दी में।
उत्तर:
(ख) 15वीं शताब्दी में

33. निम्नलिखित में से किस देश में राष्ट्रीय राज्यों का सर्वप्रथम उत्थान हुआ ?
(क) फ्राँस
(ख) स्पेन
(ग) इंग्लैंड
(घ) पुर्तगाल।
उत्तर:
(ग) इंग्लैंड

तीन वर्ग HBSE 11th Class History Notes

→ 9वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक पश्चिमी यूरोप का समाज तीन वर्गों-पादरी वर्ग, कुलीन वर्ग एवं किसान वर्ग में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान पादरी वर्ग को प्राप्त था। पादरियों को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि समझा जाता था।

→ इसलिए समाज द्वारा उनका विशेष सम्मान किया जाता था। यहाँ तक कि राजा भी उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करते थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। कृषकदास, अपाहिज व्यक्ति एवं स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकती थीं। कुलीन वर्ग को समाज में दूसरा स्थान प्राप्त था।

→ इस वर्ग के लोग प्रशासन, चर्च एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त थे। उन्हें भी अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे भव्य महलों में रहते थे एवं विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। किसान यरोपीय समाज के सबसे निम्न वर्ग में सम्मिलित थे। यूरोप की अधिकाँश जनसंख्या इस वर्ग से संबंधित थी।

→ इनमें स्वतंत्र किसानों की संख्या बहुत कम थी। अधिकांश किसान कृषकदास थे। उन्हें अपने गुजारे के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। वास उनका जीवन नरक के समान था।

→ सामंतवाद मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप की एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी। इसमें राजा अपने बड़े सामंतों एवं बड़े सामंत अपने छोटे सामंतों में जागीरों का बँटवारा करते थे। ऐसा कुछ शर्तों के अधीन किया जाता था।

→ रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् पश्चिमी यूरोप में फैली अराजकता एवं केंद्रीय सरकारों के कमजोर होने के कारण राजाओं के लिए सामंतों का सहयोग लेना आवश्यक हो गया था। सामंतवाद का प्रसार यूरोप के अनेक देशों में हुआ।

→ इनमें फ्राँस, इंग्लैंड, जर्मनी, इटली एवं स्पेन के नाम उल्लेखनीय थे। सामंतवाद के यूरोपीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इसने यूरोपीय समाज में कानून व्यवस्था लागू करने, कुशल प्रशासन देने, निरंकुश राजतंत्र पर नियंत्रण लगाने एवं कला एवं साहित्य को प्रोत्साहन देने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

→ सामंतवादी व्यवस्था ने दूसरी ओर शासकों को कमज़ोर किया, किसानों का घोर शोषण किया, युद्धों को प्रोत्साहित किया एवं राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक प्रमुख बाधा सिद्ध हुई। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद का अनेक कारणों के चलते पतन हो गया।

→ मध्यकाल में पश्चिमी यूरोप में चर्च भी एक शक्तिशाली संस्था थी। इसका समाज पर गहन प्रभाव था। वास्तव में चर्च द्वारा ही सभी प्रकार के सामाजिक एवं धार्मिक नियम बनाए जाते थे। पोप चर्च का सर्वोच्च अधिकारी होता था। वह रोम में निवास करता था।

→ चर्च के अन्य अधिकारी-आर्कबिशप, बिशप एवं पादरी आदि पोप के निर्देशों के अनुसार कार्य करते थे। चर्च के विकास में मठवाद ने प्रशंसनीय योगदान दिया। मठ में रहने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए अनेक नियम बनाए गए थे, जिनका पालन करना आवश्यक था।

→ वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने, शिक्षा प्राप्त करने एवं गरीबों एवं रोगियों की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। 529 ई० में इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट एवं 910 ई० में बरगंडी में स्थापित क्लूनी मठ विशेष रूप से उल्लेखनीय थे।

→ क्लूनी मठ की स्थापना विलियम प्रथम ने की थी। इस मठ को लोकप्रिय बनाने में जर्मनी की भिक्षुणी आबेस हिल्डेगार्ड ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 13वीं शताब्दी में फ्रायर नामक भिक्षुओं का उत्थान हुआ।

→ वे मठों में रहने की अपेक्षा बाहर भ्रमण कर लोगों को ईसा मसीह के संदेश से अवगत करवाते थे। फ्रायर दो संघों फ्रांसिस्कन एवं डोमिनिकन में विभाजित थे। मध्यकाल में चर्च ने लोगों में एक नई जागति उत्पन्न करने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ मध्यकाल यरोप में नगरों का विकास एक महान उपलब्धि थी। इसका कारण यह था कि रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् यूरोप के अनेक नगर बर्बर आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिए गए थे। नगरों के उत्थान में कृषि एवं व्यापार के विकास, धर्मयुद्धों के प्रभाव एवं नगरों की स्वतंत्रता ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

→ इस काल में जिन नगरों का उत्थान हुआ उनमें महत्त्वपूर्ण वेनिस, मिलान, वियाना, प्रेग, रोम, लंदन, नेपल्स एवं जेनेवा आदि थे। इन नगरों की सुरक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था। इसका कारण यह था कि उस समय युद्ध एक साधारण बात थी।

→ इन नगरों में आधारभूत सुविधाओं की कमी थी। मध्यकालीन नगर व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे। व्यापार को प्रोत्साहित करने में श्रेणियों की प्रमुख भूमिका थी। 1100 ई० के पश्चात् फ्राँस में कथील नगरों का निर्माण हुआ। शीघ्र ही ऐसे नगर यूरोप के अन्य शहरों में भी बनाए जाने लगे।

→ इन नगरों में पत्थर के विशाल चर्च बनाए जाते थे। चर्च में खिड़कियों के लिए अभिरंजित काँच का प्रयोग किया जाता था। मध्यकालीन नगरों ने यूरोपीय सभ्यता एवं संस्कृति पर दूरगामी प्रभाव डाले।

→ 16वीं शताब्दी में यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान को यूरोप के इतिहास में एक युगांतरकारी घटना माना जाता है। इस काल में सामंतवाद के पतन, चर्च के प्रभाव, धर्मयुद्धों के कारण, मध्यवर्ग के उत्थान, शक्तिशाली शासकों के उदय एवं विद्वानों के लेखों के कारण राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में सहायता मिली।

→ राष्ट्रीय राज्य वे राज्य होते हैं जिसमें राजा सर्वोच्च होता है एवं उसकी शक्तियाँ असीम होती हैं। किसी भी व्यक्ति को उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं होता।

→ इंग्लैंड में राष्ट्रीय राज्य स्थापित करने में हेनरी सप्तम, जेम्स प्रथम एवं चार्ल्स प्रथम ने, फ्रांस में लुई ग्यारहवें ने, स्पेन में फर्डीनेंड एवं ईसाबेला ने एवं पुर्तगाल में राजकुमार हेनरी ने उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ इन राष्ट्रीय राज्यों ने अनेक उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त की। बाद में अनेक कारणों से इन राष्ट्रीय राज्यों का पतन हो गया।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई० Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
इस्लाम के उदय से पूर्व अरबों के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब में जाहिलिया (Jahiliya) अथवा अज्ञानता के युग का बोलबाला था। उस समय अरब में बदू (Bedouins) लोगों की प्रमुखता थी। बढ़े खानाबदोश कबीले थे। वे चरागाह की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। लूटमार करना एवं आपस में झगड़ना उनके जीवन की एक प्रमुख विशेषता थी।

उस समय अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। उन्हें केवल एक भोग-विलास की वस्तु समझा जाता था। समाज में अन्य अनेक कुप्रथाएँ भी प्रचलित थीं। उस समय अरब के लोग एक अल्लाह की अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। प्रत्येक कबीले का अपना अलग देवी देवता होता था। उस समय के लोग अनेक प्रकार के अंध-विश्वासों एवं जादू-टोनों में भी विश्वास रखते थे।

क्योंकि अरब का अधिकाँश क्षेत्र बंजर, वनस्पति रहित एवं दुर्गम था इसलिए अरबों का आर्थिक जीवन भी बहुत पिछड़ा हुआ था। अरबों का कोई व्यवस्थित राजनीतिक संगठन भी नहीं था। उनमें एकता एवं राष्ट्रीयता की भावना बिल्कुल नहीं थी। एडवर्ड मैक्नल बर्नस के अनुसार,

“अरब जो कि एक रेगिस्तानी प्रायद्वीप था इस्लाम की स्थापना से पूर्व इतना पिछड़ा हुआ था कि इसके दो प्रमुख पड़ोसी साम्राज्यों-रोम एवं ईरान ने अरब प्रदेशों में अपने साम्राज्य का विस्तार करना उचित नहीं समझा।

I. सामाजिक जीवन

सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब के सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. परिवार (Family):
परिवार अरबों के समाज का मूल आधार था। उस समय अरब में संयुक्त परिवार प्रणाली का प्रचलन था। उस समय परिवार पितृतंत्रात्मक होते थे। परिवार का सबसे वयोवृद्ध व्यक्ति इसका मुखिया होता था। वह समस्त परिवार पर नियंत्रण रखता था। परिवार के सभी सदस्य उसके आदेशों का पालन करते थे। परिवार में पुत्र का होना आवश्यक माना जाता था। मुखिया की मृत्यु के पश्चात् परिवार का दायित्व उसके ज्येष्ठ पुत्र पर आता था। डॉक्टर के० ए० फारिक के अनुसार,

“पिता को अपने परिवार पर निरंकुश शक्ति प्राप्त थी तथा वह उनके जीवन एवं मौत का स्वामी था।”

2. स्त्रियों की स्थिति (Position of Women):
पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति बहत बदतर थी। उस समय पत्री के जन्म को परिवार के लिए अपशगन समझा जाता था लड़कियों को जन्म लेते ही जमीन में दफन कर दिया जाता था।

निस्संदेह यह एक निंदनीय कुप्रथा थी। उस समय समाज में जो अधिकार पुरुषों को दिए गए थे स्त्रियों को उनसे वंचित रखा गया था। उस समय स्त्रियों को शिक्षा देने का प्रचलन नहीं था। अतः वे अनपढ़ रहती थीं। उनका विवाह बहुत कम उम्र में ही कर दिया जाता था।

उस समय समाज में बहु-विवाह प्रथा प्रचलित थी। इसके अतिरिक्त उस समय पुरुषों में अनेक रखैलें रखने की प्रथा भी प्रचलित थी। वास्तव में उस समय समाज में स्त्री को केवल एक भोग-विलास की वस्तु समझा जाता था। उस समय समाज में अनैतिकता का बोलबाला था। यहाँ तक कि पुत्र अपनी विधवा माँ के साथ एवं अपनी बहनों के साथ विवाह कर लेता था।

पति की मृत्यु के पश्चात् विधवा उसके निकटतम संबंधियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करने से नहीं हिचकिचाती थी। उस समय स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा गया था। इससे समाज में उनकी स्थिति अधिक दयनीय हो गई थी। प्रोफेसर के० अली का यह कहना उचित है कि, “उस समय स्त्रियों की स्थिति किसी भी समकालीन अन्य देश की स्त्रियों की स्थिति की अपेक्षा बहुत खराब थी।”

3. शिक्षा (Education):
अरब शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़े हुए थे। अधिकाँश अरब अनपढ़ थे। उस समय स्त्रियों को शिक्षा देने को कोई प्रचलन नहीं था। अनपढ़ता के कारण अरब समाज में व्यापक अंधविश्वास प्रचलित थे।

4. लोगों का नैतिक स्तर (Standard of People’s Morality):
उस समय अरब समाज में अनैतिकता का व्यापक प्रचलन था। उस समय लूटमार करना तथा लोगों के साथ धोखा करना एक सामान्य बात थी। लोगों में शराब पीने, अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने तथा जुआ खेलने का प्रचलन बहुत था। उस समय स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करना एक सामान्य बात मानी जाती थी। निस्संदेह यह अरब समाज के पतन का संकेत था।

5. मनोरंजन (Entertainments) :
उस समय अरब के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। उनके मनोरंजन का प्रमुख साधन नृत्य एवं गान था। वे बाँसुरी एवं गिटार के बहुत शौकीन थे। उस समय जुए का व्यापक प्रचलन था। वे पशुओं की लड़ाइयाँ भी देखते थे। वे शिकार खेलने के भी शौकीन थे।

6. वेश-भूषा एवं भोजन (Dress and Diet):
उस समय बदू लोगों में लंबे कुर्ते एवं पजामा पहनने का प्रचलन था। वे कुर्तों के ऊपर ऊँट की खाल से बना एक ढीला-ढाला चोगा (cloak) पहनते थे। इसके अतिरिक्त सिर पर पगड़ी बाँधते थे। उच्च वर्ग के लोगों के वस्त्र बहुत कीमती होते थे। स्त्रियाँ सलवार एवं कमीज़ पहनती थीं।

वे इसके ऊपर बुर्का पहनती थीं। उनका प्रमुख भोजन खजूर एवं दूध था। इसके अतिरिक्त वे गेहूँ, बाजरा, अंगूर, खुमानी, सेब, बादाम एवं केले आदि का भी प्रयोग करते थे। वे ऊँट, भेड़ एवं बकरियों का माँस खाते थे। उच्च वर्ग के लोगों में मदिरापान का बहुत प्रचलन था।

7. दास प्रथा (Slavery):
उस समय अरब समाज में दास प्रथा का काफी प्रचलन था। उस समय युद्ध में बंदी बनाए गए लोगों को दास बना लिया जाता था। उस समय दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था। उन्हें अपनी इच्छा से विवाह करने की अनुमति नहीं थी। ऐसा करने वाले दासों को कठोर दंड दिया जाता था।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

II. आर्थिक जीवन

इस्लाम के उदय से पूर्व अरबों का आर्थिक जीवन पिछड़ा हुआ था। यहाँ की अधिकाँश भूमि बंजर है। यहाँ वर्षा बहुत कम होती है। यहाँ जनसंख्या बहुत विरल है। यहाँ यातायात एवं संचार के साधन बहुत कम थे। इसके बावजूद अरब लोगों ने आर्थिक क्षेत्र में जो प्रगति की उसका संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित अनुसार है

1. कृषि (Agriculture):
अरब की भूमि रेतीली होने के कारण अनउपजाऊ है। यहाँ वर्षा नाम मात्र होती है। कई बार तो लगातार तीन अथवा चार वर्षों तक वर्षा नहीं होती। यहाँ नदियाँ भी बहुत कम हैं। ये नदियाँ भी सदैव नहीं बहतीं। अतः यहाँ सिंचाई के साधनों की बहुत कमी है। अत: यहां फ़सलों का उत्पादन बहुत कम होता है।

फ़सलों का उत्पादन केवल उन्हीं क्षेत्रों में होता है जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं तथा भूमि उपजाऊ है। यहाँ की प्रमुख फ़सल खजूर है। अल-हिजाज (al-Hijajh) तथा अल-मदीना (al-Madinah) खजूर उत्पादन के दो प्रसिद्ध केंद्र थे। खजूर का अरब लोगों के जीवन में विशेष महत्त्व है। यह अरब लोगों का प्रमुख खाद्य पदार्थ है। इसका पेय (beverage) बहुत स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।

इसकी गुठली (crushed stones) ऊँट के लिए रोज़ाना भोजन उपलब्ध करवाती है। खजूर के पेड़ की छाल से रस्सियाँ (ropes) तथा चटाइयाँ (mats) बनाई जाती हैं। इसकी लकड़ी आग जलाने का एकमात्र साधन है। प्रोफेसर के० अली का यह कथन बिल्कुल ठीक है कि,

“अरब में खजूर को पेड़ों की रानी कहा जाता है। यह गरीब तथा धनी दोनों की एक समान मित्र है जिसके बिना रेगिस्तान में जीवन के बारे सोचा नहीं जा सकता है।”

अरब में जौ (barley) का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसका चारा घोड़ों को खिलाया जाता है तथा आटा मनुष्यों के काम आता है। यमन में गेहूँ का उत्पादन बहुत बड़ी मात्रा में होता था। उमान में बाजरा (millet) तथा चावल का उत्पादन किया जाता था। इनके अतिरिक्त समुद्र तटीय क्षेत्रों (coastal areas) में अनेक प्रकार की सब्जियों तथा फलों का उत्पादन किया जाता था। फलों में अनार, सेब, खुमानी, बादाम तथा केले प्रसिद्ध थे।

2. पशुपालन (Cattle Rearing):
अरब लोगों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था। ऊँट, घोड़ा, भेड़, तथा बकरी उनके प्रमुख पालतू जानवर थे। इन जानवरों में ऊँट को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता था। उसे रेगिस्तान का जहाज़ (ship of the desert) कहा जाता है। उसके बिना रेगिस्तान में जीवन के बारे में सोचा नहीं जा सकता। ऊँट 57° सेंटीग्रेड के उच्च तापमान में भी एक दिन में 160 किलोमीटर का सफर तय कर सकता है। वह 300 किलोग्राम से अधिक का भार ढो सकता है।

वह कई दिनों तक बिना पानी पीये जीवित रह सकता है। यह बदू लोगों के यातायात का प्रमुख साधन है। लोग ऊँटनी का दूध पीते हैं, इसका माँस खाते हैं, इसकी खाल का तंबू बनाते हैं तथा इसके गोबर का आग के लिए प्रयोग करते हैं। इसके मूत्र से दवाइयाँ बनाई जाती हैं। इसे शेख़ की दौलत का प्रतीक माना जाता है। बद् इसे विवाह के अवसर पर दहेज के रूप में देते हैं। ऊँट के महत्त्व के संबंध में डॉक्टर ए० रहीम ने लिखा है कि, “ऊँट जिसे रेगिस्तान का जहाज़ कहा जाता है अरबों का सबसे उपयोगी पशु है।

ऊँट के बिना रेगिस्तानी जीवन के बारे में सोचा नहीं जा सकता।”

अरबी घोड़े विश्व में अपनी उत्तम नस्ल के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्हें दौलत का प्रतीक माना जाता था। बदुओं के जीवन में घोडे का विशेष महत्त्व था। उनके द्वारा किए जाने वाले आक्रमणों में घोड़ों की विशेष भूमिका होती थी। घोड़े तीव्र गति से इधर-उधर आ जा सकते थे। शिकार करते समय भी घोड़ों का प्रयोग किया जाता था। अरब लोग दूध एवं माँस के लिए भेड़ एवं बकरियाँ भी पालते थे। वे भेड़ों से ऊन भी प्राप्त करते थे।

3. व्यापार (Trade):
इस्लाम के उदय से पूर्व अरबों का आंतरिक एवं विदेशी व्यापार अधिक उन्नत न था। इसके लिए चार प्रमुख कारण उत्तरदायी थे। प्रथम, बदुओं की लूटमार द्वारा देश में अराजकता का वातावरण था। दूसरा, उस समय व्यापारिक मार्ग सुरक्षित न थे। तीसरा, उस समय अरब में उद्योग विकसित नहीं थे। चौथा, उस समय यातायात के साधन उन्नत न थे।

अरब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति शहरों में लगने वाली मंडियों से करते थे। इन मंडियों से वे खाद्य पदार्थ एवं पशु प्राप्त करते थे। कुछ धनी व्यापारी ईरान, मेसोपोटामिया, सीरिया, मिस्र एवं इथियोपिया आदि देशों के साथ व्यापार करते थे। वे इन देशों को ऊँटों, घोड़ों, फलों तथा शराब आदि का निर्यात करते थे।

III. धार्मिक जीवन

इस्लाम के उदय से पूर्व अरब निवासी धार्मिक रूप से भी बहुत पिछड़े हुए थे। वे एक अल्लाह की अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। प्रत्येक कबीले का अपना अलग देवी-देवता होता था। एक कबीले के लोग दूसरे कबीले के देवी-देवता से नफरत करते थे। वे अपने देवी-देवता को सर्वोच्च मानते थे। वे इन देवी-देवताओं की स्मृति में विशाल मस्जिदों का निर्माण करते थे तथा उनमें इनकी मूर्तियाँ रखी जाती थीं। अकेले मक्का में 360 देवी-देवताओं की मूर्तियाँ थीं। इसे अरब का सबसे पवित्र स्थान माना जाता था।

प्रत्येक वर्ष अरब के विभिन्न भागों व्या में लोग यहाँ लगने वाले उक्ज (ukaj) मेले के अवसर पर एकत्र होते थे। अरब लोग अपने देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जानवरों की बलियाँ देते थे। कभी-कभी मानव बलि भी दी जाती थी। हबल (Hubal) अरबों का सबसे प्रसिद्ध देवता था। अल-उज़्ज़ा (al-Uzza), अल-लत (al-Lat) एवं अल-मना (al Manah) को अल्लाह की तीन पुत्रियाँ माना जाता था। अतः इनकी उपासना विशेष श्रद्धा के साथ की जाती थी। प्रोफेसर जोसेफ हेल के अनुसार,

“अरब अभिलेखों में दिए गए विशाल देवताओं के नामों से पता चलता है कि वहाँ धर्म को कितना महत्त्व दिया जाता था। अरबों में अनेक प्रकार के अंध-विश्वास प्रचलित थे। वे सूर्य, चंद्रमा, तारों, पत्थरों एवं वृक्षों की भी उपासना करते थे। वे जादू-टोनों एवं भूत-प्रेतों में भी विश्वास करते थे। उनका मृत्यु के पश्चात् जीवन, कर्म तथा पुनर्जन्म में भी पूर्ण विश्वास था।

IV. राजनीतिक जीवन

इस्लाम उदय से पूर्व अरब के लोगों का राजनीतिक जीवन भी बहुत पिछड़ा हुआ था। उनका कोई व्यवस्थित राजनीतिक संगठन नहीं था। केंद्रीय सत्ता के अभाव के कारण जिसकी लाठी उसकी भैंस (might is right) का बोलबाला था। अरबों में पशुओं, चरागाहों, भूमि तथा पानी के लिए जातीय लड़ाइयाँ चलती रहती थीं। बढ़े लोग लूटपाट में लीन रहते थे।

उस समय अरब लोग अनेक कबीलों में बँटे हुए थे। प्रत्येक कबीला राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होता था। उस समय अरबों में राष्ट्रीय भावना का अभाव था। वे केवल अपने कबीले के प्रति वफ़ादार होते थे। प्रत्येक कबीले का अपना मुखिया होता था जिसे शेख़ (sheikh) कहा जाता था। उसका चुनाव व्यक्तिगत साहस, बुद्धिमत्ता एवं उदारता के आधार पर किया जाता था।

कबीले के लोग उसका बहुत सम्मान करते थे। वह अपने कबीले के लोगों की देखभाल करता था तथा उनके झगड़ों का निपटारा करता था। देश में कोई एक कानून नहीं था। प्रत्येक कबीले के अपने अलग कानून थे। उस समय ‘खून का बदला खून’ का नियम बहुत प्रचलित था। शेख़ कबीले के लोगों की प्रसन्नता तक अपने पद पर बना रह सकता था। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि इस्लाम के उदय से पूर्व अरब के लोग सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोणों से पिछड़े हुए थे। निस्संदेह इसने अरब में इस्लाम के उदय का आधार तैयार किया।

प्रश्न 2.
पैगंबर मुहम्मद के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद की गणना विश्व के महान् व्यक्तियों में की जाती है। उनके जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. जन्म तथा माता-पिता (Birth and Parentage):
पैगंबर मुहम्मद का जन्म 29 अगस्त, 570 ई० को मक्का में हुआ था। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला (Abdullah) था। वह अरब के एक प्रसिद्ध कबीले कुरैश (Quraysh) से संबंधित था। अब्दुल्ला एक छोटा व्यापारी था। मुहम्मद के जन्म समय अब्दुल्ला सीरिया में व्यापार के सिलसिले में गया था।

वापसी समय वह मदीना (Medina):
में बीमार पड़ गया तथा वहीं उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार मुहम्मद अपने पिता के प्यार से वंचित रह गया। उसकी माता का नाम अमीना (Amina) था। जब मुहम्मद 6 वर्ष के हुए तो उनकी माता ने भी इस संसार को सदैव के लिए अलविदा कह दी।

2. बचपन (Childhood):
मुहम्मद के माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् मुहम्मद की देखभाल का उत्तरदायित्व उनक चाचा अबू तालिब (Abu Talib) ने संभाला। उसने मुहम्मद का पालन-पोषण बहुत लाड-प्यार के साथ किया। उन्हें बचपन में ही भेड़ों एवं ऊँटों की रखवाली के काम पर लगा दिया गया था। मुहम्मद अपना अवकाश का समय प्रभु भक्ति में व्यतीत करते थे। वह अपने अच्छे स्वभाव एवं ईमानदारी के कारण लोगों में बहुत प्रिय थे।

3. विवाह (Marriages):
मुहम्मद का प्रथम विवाह 595 ई० में खदीज़ा (Khadija) से हुआ। उस समय मुहम्मद की आयु 25 वर्ष थी तथा खदीज़ा की आयु 40 वर्ष थी। खदीज़ा मक्का की एक धनी विधवा थी। वह ऊँटों का व्यापार करती थी। उसने मुहम्मद की ईमानदारी एवं विश्वसनीयता के संबंध में सुन रखा था। अत: उसने मुहम्मद को व्यापार के सिलसिले में अपने पास रख लिया।

उसने मुहम्मद को व्यापार के संबंध में सीरिया भेजा। यहाँ मुहम्मद ने अपनी योग्यता एवं ईमानदारी के बल पर अच्छा मुनाफा कमाया। इससे खदीज़ा बहुत प्रभावित हुई।

अतः खदीजा ने मुहम्मद से विवाह का प्रस्ताव रखा। मुहम्मद ने खदीज़ा के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। यह विवाह मुहम्मद के जीवन में एक नया मोड़ प्रमाणित हुआ। इस विवाह से मुहम्मद की प्रसिद्धि बढ़ गई। 619 ई० में खदीज़ा की मृत्यु के पश्चात् मुहम्मद ने कुछ अन्य विवाह किए थे। मुहम्मद की पत्नियों में आयशा (Aisha) सर्वाधिक प्रसिद्ध थी। वह इस्लाम के प्रथम खलीफ़ा अबू बकर (Abu Bakr) की पुत्री थी। डॉक्टर ए० रहीम के शब्दों में, “मुहम्मद का खदीज़ा के साथ विवाह उसके जीवन की एक अति महत्त्वपूर्ण घटना थी।”

4. इलहाम की प्राप्ति (Attainment of Enlightenment):
पैगंबर मुहम्मद मक्का में स्थित एक पहाड़ी में हीरा नामक गुफा में जाकर ध्यान लगाते थे। मुहम्मद को इलहाम (ज्ञान) की प्राप्ति हुई। इस रात को शक्ति की रात कहा जाता है। यह रात रमजान (Ramadan) के अंत में पड़ती है। उस समय मुहम्मद की आयु 40 वर्ष थी। इसके पश्चात् मुहम्मद पैगंबर मुहम्मद के नाम से लोकप्रिय हुए।

5. मक्का में प्रचार (Preaching in Mecca):
पैगंबर मुहम्मद ने इलहाम प्राप्त करने के पश्चात् अपना प्रचार कार्य अपने परिवार एवं रिश्तेदारों में किया। इसे सर्वप्रथम उसकी पत्नी खदीजा एवं पुत्रियों ने स्वीकार किया। 612 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश मक्का में दिया। उन्होंने लोगों को बताया कि अल्लाह एक है तथा मुहम्मद उसके पैगंबर (संदेशवाहक) हैं।

उन्होंने मूर्ति पूजा का कट्टर विरोध किया तथा इन्हें नष्ट करना मुसलमानों का प्रथम धार्मिक कर्त्तव्य बताया। उन्होंने केवल एक अल्लाह की इबादत पर बल दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को जिन्हें मुसलमान कहा जाता था, को अल्लाह के समक्ष आत्म-समर्पण करने के लिए प्रेरित किया। इसलिए उनके धर्म का नाम इस्लाम पड़ा।

6. मदीना को हिजरत (Emigration to Medina):
पैगंबर मुहम्मद की बढ़ती हुई लोकप्रियता के कारण मक्का के अनेक प्रभावशाली लोग उनसे ईर्ष्या करने लगे। इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, पैगंबर मुहम्मद मूर्ति पूजा के कटु आलोचक थे। दूसरा, पैगंबर मुहम्मद अरब समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों को दूर कर इसे एक नई दिशा देना चाहते थे। इसे मक्का के रूढ़िवादी लोग पसंद नहीं करते थे। अतः बाध्य होकर पैगंबर मुहम्मद 28 जून, 622 ई० को मक्का से मदीना कूच कर गए।

वह 2 जुलाई, 622 ई० को मदीना पहुँचे। इस घटना को मुस्लिम इतिहास में हिजरत कहा जाता है। यह घटना पैगंबर मुहम्मद के जीवन में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। इस वर्ष से मुस्लिम कैलेंडर का आरंभ हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर जोसेफ हेल के शब्दों में, “यह पैगंबर के जीवन एवं कार्य में एक निर्णायक मोड़ तथा इस्लाम के इतिहास में एक महान् मोड़ सिद्ध हुआ।”

7. बद्र की लड़ाई (Battle of Badr):
मुसलमानों जो कि पैगंबर मुहम्मद के अनुयायी थे तथा मक्का के कुरैशों के मध्य 13 मार्च, 624 ई० को मदीना के निकट एक निर्णायक लड़ाई हुई। यह लड़ाई इतिहास में बद्र की लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध है। मदीना में पैगंबर मुहम्मद के बढ़ते हुए प्रभाव को मक्का के कुरैश सहन न कर सके। कुरैश पैगंबर मुहम्मद को एक सबक सिखाना चाहते थे।

बद्र नामक स्थान पर हुई लड़ाई में पैगंबर मुहम्मद के सैनिकों ने रणक्षेत्र में वे जौहर दिखाए कि कुरैशी सैनिकों को कड़ी पराजय का सामना करना पड़ा। यह पैगंबर मुहम्मद की प्रथम निर्णायक विजय थी। डॉक्टर ए० रहीम के शब्दों में, “बद्र की लड़ाई के इस्लाम के इतिहास में दूरगामी प्रभाव पड़े।

यह उसी प्रकार महत्त्वपूर्ण थी जिस प्रकार बेस्तील के दुर्ग का फ्रांसीसी क्रांतिकारियों द्वारा नष्ट करना।” प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर के० ए० निज़ामी का यह कहना उचित है कि, “बद्र की लड़ाई इस्लाम के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।”

8. उहुद की लड़ाई (Battle of Uhud):
कुरैश बद्र की लड़ाई में हुई अपनी अपमानजनक पराजय का बदला लेना चाहते थे। अबू सूफयान ने मुसलमानों को पराजित करने का प्रण लिया। इसके अतिरिक्त कुरैश मदीना में पैगंबर मुहम्मद के बढ़ते हुए प्रभाव से चिंतित थे। इससे उनके राजनीतिक एवं व्यापारिक हितों को नुकसान पहुँच सकता था।

अतः अब सफयान के नेतृत्व में लगभग 3000 सैनिक मदीना की ओर चल पड़े। पैगंबर मुहम्मद ने उनका सामना करने का निर्णय किया। 21 मार्च, 625 ई० को दोनों सेनाओं के मध्य उहुद नामक पहाड़ी (Mount Uhud) पर लड़ाई हुई। इस लड़ाई में पैगंबर मुहम्मद घायल हो गए तथा उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

9. खंदक की लड़ाई (Battle of Ditch):
उहुद की लड़ाई में पराजित होने के पश्चात् भी मुसलमानों ने अपना धैर्य न खोया। उन्होंने अपनी पराजय का बदला लेने के उद्देश्य से अपनी सेना को संगठित किया। दूसरी ओर जब कुरैशों को मुसलमानों की सैनिक गतिविधियों की सूचना मिली तो वे इसे सहन न कर सके। अतः उन्होंने मुसलमानों को सबक सिखाने का निर्णय किया। पैगंबर मुहम्मद ने शत्रुओं का सामना करने के लिए एक योजना बनाई। इसके अधीन मदीना नगर के चारों ओर खाइयाँ खुदवा दीं।

जब 13 मार्च, 627 ई० को अबू सूफयान के नेतृत्व में गठजोड़ सैनिक मदीना पहुंचे तो वे खाइयों को देख कर भौंचक्के रह गए। यह स्वर्ण अवसर देख मुसलमानों ने उन पर आक्रमण कर दिया। खाई के कारण इस लड़ाई को खंदक की लड़ाई कहा जाता है। इस लड़ाई में मुसलमानों ने मक्का सैनिकों को पराजित कर दिया। इस कड़ी पराजय के पश्चात् मक्का सैनिकों की प्रतिष्ठा धूल में मिल गई। इस निर्णायक विजय से मुसलमानों का साहस बहुत बढ़ गया।

10. मक्का की विजय (Conquest of Mecca):
मक्का की विजय पैगंबर मुहम्मद की एक अन्य महत्त्वपूर्ण सफलता थी। इस लड़ाई का कारण यह था कि हुदेबिया की संधि के अनुसार कुरैशों ने मुसलमानों को मक्का की यात्रा करने की अनुमति न दी। अत: पैगंबर मुहम्मद ने उनसे दो-दो हाथ करने का निर्णय लिया। अत: उसने 1 जनवरी, 630 ई० को 10,000 सैनिकों के साथ मक्का पर आक्रमण कर दिया। मक्का में पैगंबर मुहम्मद का बहुत कम विरोध किया गया।

अतः पैगंबर मुहम्मद ने सुगमता से मक्का पर अधिकार कर लिया। मक्का को इस्लामी राज्य की धार्मिक राजधानी घोषित किया गया। इस निर्णायक विजय से पैगंबर महम्मद के नाम को चार चाँद लग गए। अनेक लोग इस्लाम में सम्मिलित हो गए। प्रसिद्ध इतिहासकार सर अब्दुल्ला सहरावर्दी के अनुसार, प्रोफेसर के० अली के शब्दों में, “मक्का की विजय ने इस्लाम में एक नए युग का आरंभ किया।”

11. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु (Death of Prophet Muhammad):
पैगंबर मुहम्मद की 8 जून, 632 ई० में मदीना में मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पूर्व पैगंबर मुहम्मद ने न केवल अणुओं के समान बिखरे हुए कबीलों में एकता स्थापित की अपितु अरब समाज को एक नई दिशा देने में सफलता भी प्राप्त की। उनके उल्लेखनीय योगदान के कारण इस्लाम के इतिहास में उनका नाम सदैव के लिए अमर रहेगा।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 3.
पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
इस्लाम की प्रमुख शिक्षाएं क्या थी ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद अथवा इस्लाम की शिक्षाएँ बहुत सरल एवं प्रभावशाली थीं। इन शिक्षाओं का लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा एवं वे बड़ी संख्या में इस्लाम में सम्मिलित हुए।

1. अल्लाह एक है (God is One):
पैगंबर मुहम्मद ने अपनी शिक्षाओं में बार-बार इस बात पर बल दिया कि अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है। वह जो चाहे कर सकता है। वह संसार की रचना करता है। वह इसकी पालना करता है। वह जब चाहे इसे नष्ट कर सकता है। उसकी अनुमति के बिना संसार का पत्ता तक नहीं हिल सकता।

वह अत्यंत दयावान् है । वह पापी लोगों के पापों को क्षमा कर सकता है। वह सदैव रहने वाला है। कोई भी अन्य देवी-देवता उसके सामने ऐसे है जैसे सूर्य के सामने तारा। अत: पैगंबर मुहम्मद ने केवल एक अल्लाह की इबादत का संदेश दिया।

2. इस्लाम के पाँच स्तंभ (Five Pillars of Islam):
इस्लाम में पाँच सिद्धांतों पर विशेष बल दिया गया है। इनका पालन करना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है। अतः इन्हें इस्लाम के पाँच स्तंभ कहा जाता है।

(1) कलमा पढना (Reciting Kalma):
प्रत्येक मसलमान का यह धार्मिक कर्तव्य है कि वह कलमा पढे। इसमें बताया गया है कि अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है। मुहम्मद साहब उसके रसूल (पैगंबर) हैं। कुरान को अल्लाह द्वारा भेजा गया है।

(2) नमाज़ (Namaz):
प्रत्येक मुसलमान का दूसरा कर्त्तव्य यह है कि वह दिन में पाँच बार नमाज़ अवश्य पढ़े। नमाज़ पढ़ने से व्यक्ति का अल्लाह से संपर्क हो जाता है। उसकी रहमत से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा वह मनभावन फल प्राप्त करता है।
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 4 iMG 1
(3) रोजा (Rauja):
रमजान के महीने रोज़ा (व्रत) रखना प्रत्येक मुसलमान का तीसरा धार्मिक कर्त्तव्य है। इस माह में सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ भी खाना-पीना वर्जित है। सूर्यास्त के पश्चात् ही मुसलमान कुछ खान-पान कर सकते हैं। इस माह के दौरान मुसलमानों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने पर विशेष बल दिया गया है।

(4) ज़कात (Zakat):
ज़कात का अर्थ है दान देना। इसके अधीन प्रत्येक मुसलमान का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी कुल आय का 2/2% दान दे। इसे गरीबों की सहायता, इस्लाम के प्रचार एवं मस्जिदों के निर्माण पर खर्च किया जाता है।

(5) हज (Hajj):
प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन में कम-से-कम एक बार हज़ करे भाव मक्का की यात्रा पर जाए। आर० टी० मैथियू एवं एफ० डी० प्लैट के अनुसार, पाँच स्तंभ मुसलमानों के धार्मिक जीवन का आधार हैं।”

3. कर्म सिद्धांत में विश्वास (Belief in Karma Theory):
इस्लाम में कर्म सिद्धांत पर विशेष बल दिया गया है। इसके अनुसार जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसा बीजोगे वैसा काटोगे। यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा। किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा। कुरान के अनुसार कयामत के दिन स्वर्ग एवं नरक का निर्णय इस जन्म में किए गए कर्मों के अनुसार ही होगा।

4. नैतिक सिद्धांत (Moral Principles):
कुरान में अनेक नैतिक नियमों का वर्णन किया गया है। इसमें कहा गया है कि-

  • सदैव सत्य बोलो।
  • सदैव अपने माता-पिता का सम्मान करो।
  • सदैव अपने अतिथियों का आदर करो।
  • सदैव अपने छोटों से प्यार करो।
  • सदैव सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करो।
  • पापों से सदैव दूर रहो।
  • कभी लालच एवं घृणा मत करो।
  • कभी किसी को धोखा एवं कष्ट न दो।
  • सदैव गरीबों, अनाथों एवं बीमारों की सेवा करो।
  • सदैव नशीले पदार्थों से दूर रहो।।

5. समानता में विश्वास (Faith in Equality):
इस्लाम में समानता को विशेष महत्त्व दिया गया है। इसके अनुसार सभी एक अल्लाह के बच्चे हैं। अतः सभी भाई-बहन हैं । इस्लाम में अमीर-गरीब, जाति, भाषा, लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सभी को एक समान अधिकार दिए गए हैं।

6. मूर्ति पूजा का खंडन (Denounced Idol Worship):
इस्लाम मूर्ति पूजा का कट्टर विरोधी है। पैगंबर मुहम्मद के समय में अरब देश में मूर्ति पूजा का बहुत प्रचलन था। केवल काबा में ही सैंकड़ों मूर्तियाँ स्थापित की गई थीं। पैगंबर मुहम्मद ने मूर्ति पूजा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने मक्का पर अधिकार करने के पश्चात् काबा में सभी मूर्तियों को नष्ट कर डाला। पैगंबर मुहम्मद का कथन था कि हमें केवल एक अल्लाह की उपासना करनी चाहिए।

7. स्त्रियों की स्थिति (Position of Women):
पैगंबर मुहम्मद से पूर्व अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें केवल मनोरंजन एवं भोग विलास की वस्तु समझा जाता था। समाज ने जो अधिकार पुरुषों को दिए थे स्त्रियों को उन सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था। पैगंबर मुहम्मद ने पुरुषों एवं स्त्रियों को बराबर अधिकार दिए जाने के पक्ष में प्रचार किया। उन्होंने मुसलमानों को यह संदेश दिया कि वे अपनी पत्नियों के साथ कभी भी दुर्व्यवहार करें।

उन्होंने बहु-विवाह पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से यह नियम बनाया कि कोई भी पुरुष एक समय में चार से अधिक पत्नियाँ नहीं रख सकता। उन्होंने विधवाओं को सम्मान देने के पक्ष में प्रचार किया। प्रसिद्ध लेखक डॉक्टर ए० रहीम के अनुसार “वास्तव में जो सम्मान पैगंबर मुहम्मद ने स्त्रियों को दिया वह विश्व द्वारा अभी प्राप्त किया जाना है”

प्रश्न 4.
इस्लाम के प्रथम चार खलीफ़ों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद ने अरब समाज को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय योगदान दिया। 632 ई० में उनकी मृत्यु से इस्लाम पर एक घोर संकट उत्पन्न हो गया। इसका कारण यह था कि पैगंबर मुहम्मद का अपना कोई पुत्र न था एवं उन्होंने किसी को भी अपना उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया था। अतः उम्मा (umma) ने निर्वाचन पद्धति द्वारा अबू बकर को पैगंबर मुहम्मद का उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इससे खिलाफ़त संस्था का उदय हुआ। पैगंबर मुहम्मद के उत्तराधिकारी खलीफ़ा कहलाए। खिलाफ़त के प्रमुख उद्देश्य थे-

  • इस्लाम की रक्षा एवं प्रसार करना,
  • कबीलों पर नियंत्रण कायम रखना,
  • राज्य के लिए संसाधन जुटाना,
  • पैगंबर द्वारा आरंभ किए गए कार्यों को जारी रखना,
  • आवश्यकता पड़ने पर जिहाद (धर्म युद्ध) की घोषणा करना,
  • गरीबों, अपाहिजों एवं यतीमों की सहायता करना। आरंभिक चार खलीफ़ों के पैगंबर मुहम्मद के साथ नज़दीकी एवं गहरे संबंध थे। उन्होंने 632 ई० से लेकर 661 ई० तक शासन किया। उन्ह वपूर्ण योगदान दिया। इसका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

I. अबू बकर : 632-634 ई०
अबू बकर खलीफ़ा के पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे। वह इस पद पर 632 ई० से 634 ई० तक रहे। वह पैगंबर मुहम्मद के ससुर थे। जिस समय वह खलीफ़ा के पद पर निर्वाचित हुए तो उस समय उन्हें अनेक विकट समस्याओं का सामना करना पड़ा। प्रथम, पैगंबर मुहम्मद ने किसी उत्तराधिकारी की नियुक्ति नहीं की थी।

इस कारण अरब के विभिन्न भागों में अनेक नकली पैगंबर प्रकट हो गए। दूसरा, मक्का एवं मदीना में अनेक ऐसे लोग थे जो इस्लाम का विरोध कर रहे थे तीसरा, ईसाई एवं यहूदी भी इस्लाम के लिए एक कड़ी चुनौती बने हुए थे। अबू बकर ने सर्वप्रथम नकली पैगंबरों के विद्रोहों का दमन किया। इससे अरब में शांति स्थापित हुई। इसके पश्चात् अबू बकर ने मुस्लिम साम्राज्य के विस्तार की योजना बनाई।

अतः उसने शीघ्र ही सीरिया, इराक, ईरान एवं बाइजेंटाइन साम्राज्यों पर विजय प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने मदीना (Madina) को अपनी राजधानी बनाए रखा। 634 ई० में अबू बकर की मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने उमर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

वास्तव में अपने दो वर्षों के शासनकाल में अबू बकर ने इस्लाम को संगठित एवं इसका प्रसार करने में बहुमूल्य योगदान दिया। डॉक्टर माजिद अली खाँ के अनुसार, “उसे इस्लाम के इतिहास में एक विशेष स्थान प्राप्त है।”

II. उमर : 634-644 ई०
उमर आरंभिक चार खलीफ़ाओं में से सबसे महान् थे। वह कुरैश कबीले से संबंधित थे तथा उनकी नियुक्ति अबू बकर द्वारा की गई थी। वह खलीफ़ा के पद पर 634 ई० में नियुक्त हुए। वह इस पद पर 644 ई० तक रहे। वह एक महान खलीफ़ा प्रमाणित हए। उन्होंने अपनी दरदष्टि से जान लिया था कि उम्मा को केवल व्यापार और साधारण करों के बल पर संगठित नहीं रखा जा सकता।

इसके लिए उन्हें अधिक धन की आवश्यकता थी। यह धन उन्हें केवल विजय अभियानों के रूप में मारे जाने वाले छापों से प्राप्त लूट से मिल सकता था इस उद्देश्य से तथा इस्लाम के प्रसार के लिए उन्होंने अबू बकर की विस्तारवादी नीति को जारी रखा। उस समय इस्लामी राज्य के पश्चिम में बाइजेंटाइन (Byzantine) तथा पूर्व में ससानी (Sasanian) साम्राज्य स्थित थे।

बाइजेंटाइन साम्राज्य ईसाई धर्म को एवं ससानी साम्राज्य ज़रतुश्त धर्म (Zoroastrianism) को संरक्षण (patronise) प्रदान करता था। इन दोनों साम्राज्यों की कुछ समय पूर्व तक बहुत धाक थी। किंतु अब धार्मिक संघर्षों तथा अभिजात वर्गों के विद्रोहों के कारण वे अपने पतन की ओर अग्रसर थे।

इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठा कर खलीफ़ा उमर ने 637 ई० से 642 ई० के समय के दौरान सीरिया, इराक, ईरान और मिस्र पर महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त की। उनके अधीन अरबों ने 643 ई० में उत्तरी अफ्रीका में त्रिपोली को अपने अधिकार में कर लिया। मुसलमानों की इन सफलताओं के लिए खलीफ़ा उमर की योजनाएँ, मुसलमानों का धार्मिक जोश, उनके अनुभवी सेनापति एवं विरोधियों की कमज़ोरियाँ उत्तरदायी थीं। खलीफ़ा उमर न केवल एक महान विजेता था अपित एक कशल प्रशासक भी था।

उन्होंने अपने इस्लामी साम्राज्य को 8 प्रांतों में विभाजित किया। प्रत्येक प्राँत एक गवर्नर के अधीन होता था। उसे अमीर अथवा वली कहा जाता था। उसे अनेक शक्तियाँ प्राप्त थीं तथा वह अपने कार्यों के लिए खलीफ़ा के प्रति उत्तरदायी था। प्राँतों को आगे जिलों में विभाजित किया गया था। जिले का अध्यक्ष आमिल कहलाता था। खलीफ़ा उमर ने केंद्रीय राज्यकोष जिसे बैत अल-माल (Bait al-mal) कहा जाता था, को सुदृढ़ करने के लिए अनेक पग उठाए। उसने कृषि में अनेक उल्लेखनीय सुधार किए।

उसने शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक स्कूल खुलवाए। उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों में अनेक मस्जिदों का निर्माण भी करवाया। उसने अपनी सेना को भी अच्छी प्रकार संगठित किया था। निस्संदेह खलीफ़ा उमर की उपलब्धियाँ महान् थीं। 3 नवंबर, 644 ई० को खलीफ़ा उमर की मदीना की मस्जिद में नमाज़ पढ़ते समय किसी ने हत्या कर दी। एक अन्य इतिहासकार डॉक्टर माजिद अली खाँ के अनुसार, “उसका खलीफ़ा काल निस्संदेह इस्लाम का स्वर्ण युग था।”

III. उथमान : 644-656 ई०
उथमान मुसलमानों का तीसरा खलीफ़ा था। वह इस पद पर 644 ई० से 656 ई० तक रहा। उसका संबंध उमय्यद वंश के कुरैश परिवार से था। उथमान भी अन्य खलीफ़ाओं की तरह महत्त्वाकांक्षी था। अतः सिंहासन पर बैठते ही उसने सर्वप्रथम इस्लामी साम्राज्य के विस्तार की ओर ध्यान दिया। इस उद्देश्य से उसने अपनी सेना को संगठित किया।

उसने अपने शासनकाल में साइप्रस, खुरासान, काबुल, गज़नी, हेरात, ट्यूनीशिया तथा लीबिया आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की। उसने प्रजा की भलाई के लिए भी अनेक कार्य किए।

उसने प्रशासन पर अधिक नियंत्रण रखने के उद्देश्य से अपने निकट संबंधियों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त किया। इससे लोगों में उनके शासन के विरुद्ध असंतोष फैला। परिणामस्वरूप 17 जून, 656 ई० को उथमान की हत्या कर दी गई। डॉक्टर ए० रहीम के अनुसार, “खलीफ़ा उथमान की हत्या इस्लाम के इतिहास की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी।

खलीफ़ा उथमान की हत्या के पश्चात् 24 जून, 656 ई० को अली मुसलमानों के चौथे खलीफ़ा बने। वह 661 ई० तक इस पद पर रहे। वह कुरैश कबीले के बानू हाशिम परिवार से संबंधित थे। वह पैगंबर मुहम्मद के चाचा अबू तालिब के पुत्र थे। खलीफ़ा बनने के शीघ्र पश्चात् अली ने अपनी राजधानी मदीना से बदल कर कुफा (Kufa) बना ली। अली के शासनकाल में मुसलमान दो संप्रदायों में विभाजित हो गए। उसके समर्थक शिया कहलाए जबकि उसके विरोधी सुन्नी।

9 दिसम्बर, 656 ई० को अली एवं उसके विरोधियों के मध्य ऊँटों की लड़ाई (Battle of Camels) हुई। इस लड़ाई में अली के विरोधियों का नेतृत्व पैगंबर मुहम्मद की पत्नी आयशा (Aishah) ने किया। इस लड़ाई में यद्यपि अली विजित हुआ किंतु इससे उसकी समस्याएँ कम न हुईं। प्रसिद्ध इतिहासकार पी० के० हिट्टी के अनुसार, “वंशानुगत लड़ाइयों ने जिन्होंने समय-समय पर इस्लाम में उथल-पुथल की तथा जिन्होंने इसकी आधारशिला को हिला दिया था, का आरंभ हुआ।”

अली के शासनकाल में सीरिया का गवर्नर मुआविया (Muawiyah) था। वह उथमान का संबंधी था तथा वह उसकी हत्या के लिए अली को उत्तरदायी समझता था। अली ने उसका दमन करना चाहा। अतः दोनों के मध्य 28 जुलाई, 657 ई० को सिफ्फिन की लड़ाई (Battle of Siffin) हुई। इस लड़ाई में अली पराजित हुआ तथा उसे संधि के लिए बाध्य होना पड़ा।

इस कारण उसके अनुयायी दो धड़ों में बँट गए। एक धड़ा उसके प्रति वफ़ादार रहा। दूसरा धड़ा उसके विरुद्ध हो गया। यह धड़ा खरजी (Kharjis) कहलाया। खरजी धड़े के एक सदस्य द्वारा 24 जनवरी, 661 ई० को कुफा (इराक) की एक मस्जिद में अली की हत्या कर दी गई। इस प्रकार खलीफ़ा अली का दुःखद अंत हुआ।

प्रश्न 5.
उमय्यद वंश के उत्थान एवं पतन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उमय्यद वंश की गणना इस्लाम के इतिहास के महत्त्वपूर्ण राजवंशों में की जाती है। इस वंश की स्थापना 661 ई० में मुआविया ने की थी। इस वंश के शासकों ने 750 ई० तक शासन किया। इस वंश के उत्थान एवं पतन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-

I. उमय्यदों का उत्थान

उमय्यदों के उत्थान एवं विकास में निम्नलिखित खलीफ़ों ने प्रशंसनीय योगदान दिया

1. मुआविया 661-680 ई० (Muawiyah 661-680 CE):
उमय्यद वंश का संस्थापक मुआविया था। खलीफ़ा बनने से पूर्व वह सीरिया का गवर्नर था। वह 661 ई० से 680 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। जिस समय वह खलीफ़ा बना उस समय उसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ थीं। वह एक दृढ़ निश्चय का व्यक्ति था।

अतः उसने इन चुनौतियों का साहसपूर्ण सामना किया। उसने सर्वप्रथम दमिश्क (Damascus) को अपनी राजधानी बनाया। उसने 663 ई० में खरिजाइटों (Kharijites) जिन्होंने खलीफ़ा के विरुद्ध कुफा (Kufa) में विद्रोह कर दिया था, का सख्ती के साथ दमन किया। लगभग इसी समय खलीफ़ा अली के समर्थकों ने इराक में विद्रोह कर दिया।

मुआविया ने एक विशाल सेना भेजकर उनके विद्रोह का दमन किया। 667 ई० में मुआविया के प्रसिद्ध सेनापति उकाबा (Ukaba) ने उत्तरी अफ्रीका के अधिकाँश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। मुआविया न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी सिद्ध हुआ। उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी रस्मों तथा प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाया। उसने खलीफ़ा पद के गौरव में बहुत वृद्धि की। वह प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने डाक-व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार किए।

ऐसा करके उसने साम्राज्य के सभी हिस्सों को एक-दूसरे के साथ जोड़ा। उसने अपराधियों पर नियंत्रण रखने के उद्देश्य से पुलिस विभाग की स्थापना की। उसने न्याय प्रणाली में महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक पग उठाए। उसने एक शक्तिशाली नौसेना का भी गठन किया। प्रोफेसर के० अली के अनुसार, “उसने एक कुशल सरकार का गठन किया तथा अराजकता का कायाकल्प कर एक अनुशासित मुस्लिम समाज की स्थापना की। मुआविया की सफलताओं के कारण उसे मुस्लिम जगत के महान् शासकों में से एक माना जाता है।”

2. याजिद 680-683 ई० (Yazid 680-683 CE):
680 ई० में मुआविया की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र याजिद उसका उत्तराधिकारी बना। मुआविया ने उसे अपने जीवनकाल में ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। वह 683 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। उसके खलीफ़ा बनते ही पूर्व खलीफ़ा अली के पुत्र हुसैन (Husayn) ने उसका विरोध किया। अत: उसका सामना करने के लिए याजिद ने उमर-बिन-सेद (Umar bin-Said) के नेतृत्व में 4000 सैनिक भेजे।

दोनों के मध्य 10 अक्तूबर, 680 ई० को करबला की लड़ाई (Battle of Karbala) हुई। इस लड़ाई में हुसैन पराजित हुआ। उसे गिरफ्तार कर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। इससे शिया मुसलमान उमय्यद वंश के कट्टर विरोधी बन गए। प्रसिद्ध इतिहासकार एलेक्जेंडर पापाडोपोउलो के शब्दों में, “यद्यपि उसकी (हुसैन की) मौत का कम राजनीतिक प्रभाव पड़ा किंतु इसने उसे शिआओं का महान् शहीद बना दिया।”

इस अराजकता का लाभ उठाकर अब्दुल्ला-इब्न-जुबैर (Abdullah-ibn-Zubayr) ने मक्का में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। उसके भड़काने पर मदीना के लोगों ने भी खलीफ़ा के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निस्संदेह यह खलीफ़ा की शक्ति के लिए एक गंभीर चुनौती थी। अतः याजिद ने उकबा (Uqbah) के नेतृत्व में 12,000 की सेना मदीना भेजी। इस सेना ने मदीना के विद्रोह का दमन किया। यहाँ तीन दिनों तक भयंकर लूटमार की गई। इसके पश्चात् मक्का को घेरा डाल दिया गया।

इस घेरे के दौरान काबा में आग लग गई। इस कारण मुसलमानों में रोष फैल गया। अतः घेरे को उठा लिया गया। इसके शीघ्र पश्चात् ही याजिद की मृत्यु हो गई। उसका शासनकाल वास्तव में इस्लाम के इतिहास में एक कलंक सिद्ध हुआ।

3. मुआविया द्वितीय एवं मारवान 683-685 ई० (Muawiyah II and Marwan 683-685 CE):
683 ई० में याजिद की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र मुआविया द्वितीय नया खलीफ़ा बना। वह एक नम्र स्वभाव का व्यक्ति था। कुछ माह के शासन के पश्चात् 684 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। अतः मारवान को 684 ई० में नया खलीफ़ा बनाया गया। वह मुआविया प्रथम का चचेरा भाई था। उसकी भी एक वर्ष पश्चात् मृत्यु हो गई। अत: उसके शासनकाल को इस्लाम के इतिहास में कोई विशेष महत्त्व प्राप्त नहीं है।

4. अब्द-अल-मलिक 685-705 ई० (Abd-al-Malik 685-705 CE)-अब्द-अल-मलिक की गणना हान् खलीफ़ाओं में की जाती है। वह 685 ई० से 705 ई० तक खलीफा के पद पर रहा। अब्द 17. अल-मलिक ने सर्वप्रथम इराक में अल-मुख्तियार बिन अबू उबैद (Al-Mukhtiar bin Abu Ubayed) के विद्रोह का दमन किया। इसके पश्चात् उसने अपना ध्यान एक अन्य प्रमुख शत्रु इन जुबैर (Ibn Zubayr) की ओर किया। इब्न जुबैर ने मक्का में अपने खलीफ़ा होने की घोषणा कर दी थी।

वह 692 ई० में अब्द-अल-मलिक के साथ हुई एक लड़ाई में मारा गया था। अब्द-अल-मलिक ने बाइजेंटाइन साम्राज्य के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। इसके पश्चात् अब्द-अल-मलिक के सेनापति हसन इब्न नूमैन (Hasan Ibn Numan) ने पश्चिमी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार अब्द-अल-मलिक के शासनकाल में इस्लामी साम्राज्य का खूब विस्तार हुआ। अब्द-अल-मलिक न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी था।

उसने इस्लामी साम्राज्य को संगठित करने के लिए अनेक उल्लेखनीय उपाय भी किए। उसने अरबी (Arabic) को राज्य की भाषा घोषित किया। उसने इस्लामी सिक्कों को जारी किया। इनमें सोने के सिक्के को दीनार एवं चाँदी के सिक्के को दिरहम कहा जाता था। ये सिक्के रोमन सिक्के दिनारियस (denarius) तथा ईरानी सिक्के द्राख्या (drachm) की नकल थे। इन सिक्कों पर अरबी भाषा लिखी गई थी। इन सिक्कों पर एक तरफ अब्द-अल-मलिक का नाम तथा उसकी तस्वीर अंकित थी।

इसकी दूसरी तरफ यह लिखा था कि ‘अल्लाह के सिवाय कोई अन्य खुदा नहीं है और अल्लाह का कोई शरीक नहीं है।’ (There is no God but Allah and he had no partner.) अब्द-अल मलिक के ये सिक्के बहुत लोकप्रिय हुए तथा आने वाली कई शताब्दियों तक जारी रहे। उसने साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण पग उठाए।

उसे कला से भी बहुत प्यार था। जेरुसलम (Jerusalem) में उसके द्वारा बनवाई गई डोम ऑफ़ दी रॉक (Dome of the Rock) इस्लामी वास्तुकला का प्रथम महत्त्वपूर्ण नमूना है। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर ए० रहीम के शब्दों में, “उसके अधीन अरब साम्राज्य का विस्तार एवं उसकी समृद्धि अपनी चरम सीमा पर थी”

5. वालिद प्रथम 705-715 ई० (Walid I 705-715 CE)—वालिद प्रथम उमय्यद वंश का एक अन्य प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली शासक था। वह अब्द-अल-मलिक का पुत्र था। वह 705 ई० में खलीफ़ा के पद पर नियुक्त हुआ था। वह इस पद पर 715 ई० तक रहा। उसने इस्लामी साम्राज्य के विस्तार एवं इसके संगठन में प्रशंसनीय योगदान दिया।

वालिद प्रथम ने सर्वप्रथम मध्य एशिया के अनेक प्रदेशों बुखारा (Bukhara), समरकंद (Samarkand) आदि में इस्लामी झंडा फहराया। 711-12 ई० में वालिद प्रथम के सेनापति मुहम्मद-बिन-कासिम (Muhammad bin-Qasim) ने सिंध के शासक दाहिर को पराजित कर सिंध पर अधिकार कर लिया।

वालिद प्रथम के समय मित्र के गवर्नर मूसा-इन-नूसैर (Musa-ibn-Nusayr) ने पश्चिमी अफ्रीका के अनेक प्रदेशों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। 711-12 ई० में वालिद प्रथम के दो सेनापतियों तारिक (Tariq) एवं मूसा (Musa) ने स्पेन पर अधिकार कर लिया। निस्संदेह इसे वालिद प्रथम के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता माना जाता है।

वालिद प्रथम ने इस्लामी साम्राज्य को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक प्रजा हितकारी कार्य किए। उसने अनेक सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों एवं मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसने कृषि तथा व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक उल्लेखनीय पग उठाए। निस्संदेह वालिद प्रथम के शासनकाल ने इस्लाम के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया। अंत में हम प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर के० अली के इन शब्दों से सहमत हैं,

“उसका (वालिद प्रथम का) शासनकाल शाँति एवं खुशहाली का काल था।”20 6. सुलेमान 715-717 ई० (Sulayman 715-717 CE)-715 ई० में वालिद प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसका भाई सुलेमान नया खलीफ़ा बना। वह 717 ई० तक इस पद पर रहा। उसके शासनकाल का इस्लाम के इतिहास में कोई विशेष महत्त्व नहीं है। उसका केवल एक महत्त्वपूर्ण कार्य अपनी मृत्यु से पहले अपने पुत्र उमर द्वितीय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करना था।

7. उमर द्वितीय 717-720 ई० (Umar II 717-720 CE)-उमर द्वितीय 717 ई० से 720 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। अपने अल्प शासनकाल में उसने इस्लामी साम्राज्य के विस्तार की अपेक्षा इसके संगठन की ओर विशेष ध्यान दिया। उसने मवालियों (mawalis) के प्रति उदार नीति अपनाई एवं मुसलमानों के बराबर अधिकार दिए।

मवाली वे गैर-अरबी मुसलमान थे जिन्होंने इस्लाम को ग्रहण कर लिया था। उसने इस्लाम के प्रसार के उद्देश्य से इसे ग्रहण करने वाले लोगों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की। उसने साम्राज्य में फैले भ्रष्टाचार को दूर किया। उसने लोगों को निष्पक्ष न्याय देने का प्रयास किया। उसने साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण पग उठाए। निस्संदेह उमर द्वितीय के शासनकाल को इस्लाम के इतिहास का शाँति काल कहा जा सकता है।

II. उमय्यद वंश का पतन

उमय्यद शासक वंश के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।
(1) उमय्यद वंश के कुछ खलीफ़ों को छोड़कर अधिकाँश खलीफ़ों ने प्रशासन की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अतः ऐसे साम्राज्य का डूबना निश्चित था।

(2) उमय्यद वंश के शासक साम्राज्य के हितों की अपेक्षा अपने स्वार्थी हितों में अधिक व्यस्त रहते थे। ऐसे साम्राज्य के सूर्य को अस्त होने से कोई रोक नहीं सकता था।

(3) उमय्यद शासक गैर-अरबों के साथ बहुत मतभेद करते थे। इससे वे उमय्यद वंश के घोर विरोधी हो गए।

(4) उमय्यद वंश के शासक अपनी सेना को नियमित तन्खवाह न दे सके। इस कारण सैनिक भी अपने शासकों से रुष्ट रहते थे। ऐसा साम्राज्य कभी स्थायी नहीं हो सकता।

(5) शिया वंश के लोग उमय्यदों के कट्टर दुश्मन थे। अत: वे उमय्यदों से बदला लेने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे।

(6) उमय्यद साम्राज्य में फैली अराजकता का लाभ उठाते हुए अब्बासियों (Abbasids) ने दवा (dawa) नामक एक सुनियोजित आंदोलन चलाया। इस आंदोलन ने उमय्यद वंश के पतन का डंका बजा दिया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 6.
अब्बासी वंश के उत्थान एवं पतन के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन कीजिए। उत्तर

I. अब्बासियों का उत्थान

अब्बासियों के उत्थान में निम्नलिखित खलीफ़ों ने उल्लेखनीय योगदान दिया

1. अबू-अल-अब्बास 750-754 ई० (Abu-al-Abbas 750-754 CE) अबू-अल-अब्बास ने 750 ई० में अब्बासी वंश की स्थापना की। जिस समय वह सिंहासन पर बैठा उस समय अरब की राजनीतिक दशा बहुत शोचनीय थी। साम्राज्य के अनेक स्थानों पर विद्रोहियों ने उत्पात मचा रखा था। वे अबू-अल-अब्बास को खलीफ़ा स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इस कारण नए खलीफ़ा ने सर्वप्रथम अपना ध्यान उमय्यद विद्रोहियों की ओर किया तथा उनका निर्ममता से दमन किया गया। वह इतना क्रूर था कि उसने अल-सफा (Al-Saffah) (रक्तपात करने वाला) की उपाधि धारण की। 754 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

2. अल-मंसूर 754-775 ई० (AI-Mansur 754-775 CE)-754 ई० में अबू-अल-अब्बास की मृत्यु के पश्चात् उसका भाई अल-मंसूर नया खलीफ़ा बना। उसका वास्तविक नाम अबू जफ़र (Abu Jafar) था। उसने अब्बासी वंश को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक उल्लेखनीय पग उठाए। उसने सर्वप्रथम विद्रोहियों को सबक सिखाया। उसने 762 ई० में बग़दाद (Baghdad) को अब्बासियों की राजधानी घोषित किया। उसने बाइजेंटाइन आक्रमण को भी सफलतापूर्वक रोका। अब्बासी अल-मंसूर ने न केवल अपनी योग्यता से साम्राज्य का विस्तार किया अपितु इसका कुशलतापूर्वक संगठन भी किया।

उसने अपने साम्राज्य को अनेक प्रांतों में विभाजित कि का शासन चलाने के लिए अत्यंत योग्य गवर्नरों को नियुक्त किया गया। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से साम्राज्य में अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। उसे कला से भी बहुत प्यार था। उसने अपनी राजधानी बग़दाद को अनेक महलों, मस्जिदों, भवनों एवं उद्योगों से सुसज्जित किया। उसने अपने दरबार में अनेक विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। उसने न्याय व्यवस्था को अधिक कुशल बनाया।

उसने कृषि तथा व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए उल्लेखनीय पग उठाए। अल-मंसूर की इन शानदार सफलताओं को देखते हुए उसे ठीक ही अब्बासी साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार पी० के० हिट्टी के अनुसार, “अल-मंसूर अब्बासियों के महान् खलीफ़ाओं में से एक था। उसने न कि अल शफा ने नए वंश की सुदृढ़ता से स्थापना की।”

3. अल-महदी 775-785 ई० (AI-Mahdi 775-785 CE)-775 ई० में अल-मंसूर की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अल महदी अब्बासियों का नया खलीफ़ा बना। वह 785 ई० तक इस पद पर रहा। उसने अपने शासनकाल में लोक भलाई के अनेक कार्य किए। उसने अनेक सड़कों का निर्माण किया। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए अनेक कुओं एवं सराओं का निर्माण करवाया। उसने शिक्षा को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से अनेक मकतब एवं मदरसे खुलवाए। उसने गरीबों, अपाहिजों एवं विधवाओं की धन द्वारा सहायता की।

उसने बुजुर्गों के लिए पैंशन निश्चित की। उसने डाक-व्यवस्था का विकास किया। उसने अनेक भवनों एवं मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसने कला तथा साहित्य को प्रोत्साहित किया। उसने कृषि तथा व्यापार के विकास के लिए अनेक पग उठाए। उसने सीरिया एवं खुरासान के विद्रोहों का दमन किया। उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य के शासक कांस्टैनटाइन छठे (Constantine VI) को पराजित कर उसे एक अपमानजनक संधि करने के लिए बाध्य किया।

4. अल-हादी 785-786 ई० (AI-Hadhi 785-786 CE)-785 ई० में अल-हादी नया खलीफ़ा बना। वह अल-महदी का पुत्र था। वह केवल एक वर्ष तक इस पद पर रहा। उसके शासनकाल का अब्बासियों के इतिहास में कोई विशेष महत्त्व नहीं है।

5. हारुन-अल-रशीद 786-809 ई० (Harun-al-Rashid 786-809 CE) हारुन-अल-रशीद अब्बासियों का सबसे महान् एवं शक्तिशाली खलीफ़ा था। वह खलीफ़ा अल-हादी का छोटा भाई था। वह 786 ई० से 809 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। उसने अब्बासी वंश के गौरव को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक उल्लेखनीय कार्य किए।

उसने अपनी तलवार के बल पर न केवल आंतरिक विद्रोहों का दमन किया अपितु अब्बासी साम्राज्य का दूर-दूर तक विस्तार किया। उसने उस समय के शक्तिशाली फ्रैंक (Frank) शासक शॉर्लमेन (Charlemagne) के साथ मित्रतापूर्वक संबंध स्थापित किए। हारुन-अल-रशीद ने अपने साम्राज्य को संगठित करने के उद्देश्य से प्रशासन में उल्लेखनीय सुधार किए।

उसने प्रजा की भलाई के लिए अनेक पग उठाए। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित किया। उसने अनेक प्रसिद्ध विद्वानों, संगीतकारों एवं गायकों को अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया था। उसके शासनकाल में लिखी गई सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक एक हजार एक रातें (The Thousand and One Nights) थी। उसने अनेक अस्पतालों एवं सरायों का निर्माण करवाया। उसने अपनी राजधानी में अनेक विशाल महल, भवन, मस्जिदें एवं बाग बनवाए। वह प्रजा के दुःखों को दूर करने के लिए सदैव तैयार रहता था।

वास्तव में उसके शासनकाल में अब्बासी साम्राज्य में इतनी प्रगति हुई कि ‘इसे स्वर्ण युग’ के नाम से स्मरण किया जाता है। निस्संदेह हारुन-अल-रशीद एक महान् शासक था। प्रसिद्ध लेखक प्रोफेसर मासूदुल हसन के अनुसार, “हारुन-अल-रशीद के अधीन अब्बासी राज्य अपनी उन्नति के शिखर पर पहुँच गया था 122 डॉक्टर ए० रहीम के अनुसार, “खलीफ़ा हारुन इतिहास के सर्वाधिक सफल शासकों में से एक था।”

6. अल-अमीन 809-813 ई० (Al-Amin 809-813 CE)-अल-अमीन 809 ई० से 813 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। वह एक अयोग्य एवं विलासी खलीफ़ा प्रमाणित हुआ। इसलिए वह जनसाधारण की सहानुभूति खो बैठा था। इस कारण 809 ई० में अल-अमीन एवं उसके भाई अल-मामुन के मध्य गृह-युद्ध आरंभ हो गया। यह गृह-युद्ध 813 ई० तक चलता रहा। इस गृह-युद्ध के अंत में अल-अमीन पराजित हुआ एवं वह मारा गया। इस प्रकार अल-अमीन के यशहीन शासन का अंत हुआ।

7. अल-मामुन 813-833 ई० (AI-Mamun 813-833 CE)-813 ई० में अल-मामुन अब्बासी वंश का नया खलीफ़ा बना। वह 833 ई० तक इस पद पर रहा। वह एक महान् सेनापति एवं योग्य शासक प्रमाणित हुआ। जिस समय वह सिंहासन पर बैठा उस समय अब्बासी साम्राज्य के चारों ओर अराजकता एवं विद्रोह का वातावरण था। अल-मामुन इन समस्याओं से घबराने वाला व्यक्ति नहीं था। उसने ईरान, मिस्र, सीरिया, अर्मीनिया, खुरासान एवं यमन में खिलाफ़त के विरुद्ध उठने वाले विद्रोहों का दमन किया।

उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य के विरुद्ध अपनी सेना का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। उसने अपने साम्राज्य में शाँति स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उसने प्रजा की भलाई के लिए अनेक पग उठाए। अत: उसके शासनकाल में प्रजा बहुत खुशहाल थी। उसने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई। उसे कला एवं साहित्य से बहुत प्यार था। उसके दरबार में अनेक प्रसिद्ध कवियों, इतिहासकारों एवं विद्वानों ने उसके नाम को चार चाँद लगाए।

8. बाद के खलीफ़े (Later Caliphs)-अल-मामुन की मृत्यु के साथ ही अब्बासी राजवंश का पतन आरंभ हो गया था। इसका कारण यह था कि उसके पश्चात् आने वाले सभी खलीफ़े अल-वथिक (al-Wathiq), अल-मुतव्वकिल (al-Mutawakkil) तथा मुनतासिर (Muntasir) आदि सभी अयोग्य एवं निकम्मे निकले। अब्बासी वंश का अंतिम खलीफ़ा अल-मुस्तासिम (al-Mustasim) था। 1258 ई० में चंगेज़ खाँ के पोते हुलेगू (Hulegu) ने बग़दाद पर आक्रमण कर अब्बासी राजवंश का अंत कर दिया।

II. अब्बासी वंश का पतन

अब्बासी वंश के खलीफ़ों ने 750 ई० से 1258 ई० तक शासन किया। इस वंश के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे–
(1) अल-मामुन के सभी उत्तराधिकारी अयोग्य एवं निकम्मे निकले। उन्होंने प्रशासन की ओर अपना ध्यान नहीं दिया। ऐसे साम्राज्य का पतन निश्चित था

(2) 9वीं शताब्दी में बग़दाद का दूर के प्रांतों पर नियंत्रण कम हो गया। इससे विद्रोहों को प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप अब्बासी साम्राज्य में अराजकता फैली।

(3) 9वीं शताब्दी में अब्बासी साम्राज्य में अनेक गुटों एवं छोटे-छोटे राजवंशों का उदय हो गया था। इनकी आपसी लड़ाइयाँ अब्बासी साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुईं।

(4) अब्बासी खलीफ़ों ने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। ऐसे साम्राज्य के पतन को भला कौन रोक सकता था।

(5) अरबों एवं गैर-अरबों के मध्य चलने वाले लगातार संघर्ष ने अब्बासी साम्राज्य को खोखला बना दिया।

(6) अब्बासी खलीफ़ों ने अपनी विलासिता के लिए लोगों पर भारी कर लगा दिए। इससे लोगों में असंतोष फैला एवं वे उनके विरुद्ध हो गए।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन इस्लामी दुनिया की अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन इस्लामी दुनिया की अर्थव्यवस्था काफी अच्छी थी। इस काल में मुसलमानों ने अनेक नए क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था। इन क्षेत्रों की भूमि बहुत उपजाऊ थी। अतः कृषि को बहुत प्रोत्साहन मिला।

इस काल में अनेक उद्योग धंधों ने बहुत उन्नति कर ली थी। इससे वाणिज्य एवं व्यापार को एक नई दिशा मिली। उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों ने एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था को स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक प्रशंसनीय पग उठाए। निस्संदेह इससे लोगों का आर्थिक जीवन बहुत समृद्ध हुआ।

1. कृषि (Agriculture)—मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों ने कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने सिंचाई साधनों का विकास, किया।

उन्होंने साम्राज्य के अनेक भागों में बाँधों, नहरों एवं कुओं का निर्माण किया। उन्होंने उन किसानों को भू-राजस्व एवं अन्य करों में रियायत दी जो कृषि के अधीन नयी भूमि को लाते थे। कृषि भूमि पर राज्य का सर्वोपरि नियंत्रण होता था। राज्य द्वारा भू-राजस्व निश्चित किया जाता था एवं इसे एकत्र किया जाता था। अरबों ने जिन नए ।

प्रदेशों को जीता था उन प्रदेशों में जहाँ भूमि गैर-मुसलमानों के हाथों में रही वहीं उन्हें खराज कर देना पड़ता था। यह पैदावार के अनुसार 20% से लेकर 50% होता था। जो कृषि योग्य भूमि मुसलमानों के अधीन होती थी उस पर उन्हें 10% भू-राजस्व कर देना पड़ता था। इस भेदभाव के चलते अनेक गैर-मुसलमानों ने इस्लाम को ग्रहण कर लिया था।

इससे राज्य की आय कम हो गयी। इस स्थिति से निपटने के लिए खलीफ़ाओं ने पहले धर्मांतरण को निरुत्साहित किया एवं बाद में भू-राजस्व की दर एक समान कर दी।

उत्तरी अफ्रीका, उत्तरी इराक, सीरिया एवं मिस्त्र के मैदान अनाज की भरपूर पैदावार के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। अरब एवं इराक खजूरों की पैदावार के लिए विख्यात थे। इस काल में अनेक नयी फ़सलों जैसे कपास, नील, आम, संतरा, केला, तरबूज, पालक (spinach) तथा बैंगन (brinjals) का उत्पादन आरंभ किया गया। इन फ़सलों को यूरोप में निर्यात किया जाता था।

2. उद्योग (Industries)-उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों के शासनकाल में उद्योग के क्षेत्र में बहुमुखी विकास हुआ। उस समय समरकंद (Samarkand) कागज़ उद्योग के लिए विशेष रूप से विख्यात था। उस समय बग़दाद काँच के सामान, आभूषण तथा रेशम उद्योग के लिए प्रसिद्ध था। बुखारा दरियों के उद्योग के लिए, दमिश्क इस्पात उद्योग के लिए, कुफा रेशम उद्योग के लिए, कोरडोबा (Cordoba) चमड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध केंद्र थे। इनके अतिरिक्त उस समय आभूषण, सूती एवं ऊनी वस्त्र, फर्नीचर एवं दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं के उद्योग भी स्थापित थे।

3. वाणिज्य एवं व्यापार (Trade and Commerce)–अरबों का आंतरिक एवं विदेशी व्यापार दोनों उन्नत थे। आंतरिक व्यापार के लिए मुख्यतः ऊँटों का प्रयोग किया जाता था। इनके अतिरिक्त घोड़ों एवं गधों का भी प्रयोग किया जाता था। विदेशी व्यापार जल एवं स्थल दोनों मार्गों से किया जाता था। अरबी साम्राज्य के यूरोप, अफ्रीका, भारत एवं चीन के देशों के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध थे। पाँच शताब्दियों तक अरबी एवं ईरानी व्यापारियों का समुद्री व्यापार पर एकाधिकार रहा।

उस समय व्यापार के लिए लाल सागर, फ़ारस की खाड़ी एवं रेशम मार्ग प्रसिद्ध थे। रेशम मागे चीन से भारत होता हुआ बगदाद तक जाता था। अरबी व्यापारी विदेशों का कागज़, सूती एवं ऊनी वस्त्र, काँच का सामान, चीनी, खजूर एवं बारूद का निर्यात करते थे। इनके बदले वे विदेशों से रेशम, चाय, गर्म 1, सोना, विलासिता का सामान, हाथी दाँत एवं गुलामों का आयात करते थे। उस समय व्यापार संतुलन इस्लामी साम्राज्य के पक्ष में था।

4. शहरीकरण (Urbanization)-इस्लामी साम्राज्य के विस्तार, कृषि एवं उद्योगों के विकास ने शहरीकरण की प्रक्रिया को तीव्र किया। अत: अनेक नए शहर अस्तित्व में आए । इन शहरों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य अरब सैनिकों को बसाना था। ये सैनिक स्थानीय प्रशासन चलाने एवं उनकी पुरक्षा में प्रमुख भूमिका निभाते थे।

इन फ़ौजी शहरों को मिस्त्र (misr) कहा जाता था। इन शहरों में इराक में स्थित कुफा, बसरा एवं बग़दाद, मिस्र में स्थित काहिरा एवं फुस्तात एवं स्पेन में स्थित कोरडोबा नामक शहर प्रसिद्ध थे। ये सभी शहर व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे। एक शहर का दूसरे शहर के साथ परस्पर संपर्क स्थापित किया गया था। इससे व्यापार को बहुत प्रोत्साहन मिला।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 8.
सूफ़ी मत से आपका क्या अभिप्राय है ? इसकी प्रमुख शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:

I. सूफ़ी मत से अभिप्राय

मध्यकाल में इस्लाम में धार्मिक विचारों वाले लोगों का एक नया समूह अस्तित्व में आया जिसे सूफी कहा जाता था। सूफ़ी शब्द से क्या अभिप्राय है इससे संबंधित विद्वानों के विचारों में विभिन्नता है। कुछेक विद्वानों के विचारानुसार उनको सूफ़ी इसलिए कहा जाता था, क्योंकि वे साफ़ (शुद्ध) हृदय वाले थे। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार उनको सूफ़ी इसलिए कहा जाता था क्योंकि परमात्मा के दरबार में वे प्रथम सफ़ (पंक्ति) में खड़े होते थे।

II. सूफ़ी मत की शिक्षाएँ

सूफी मत की प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित अनुसार हैं

1. अल्लाह एक है (Unity of Allah)-सूफ़ियों के अनुसार परमात्मा एक है जिसको वे अल्लाह कहते हैं। वह सर्वोच्च, शक्तिशाली तथा सर्वव्यापक है। प्रत्येक स्थान पर उसका आदेश चलता है तथा कोई भी उसकी आज्ञा के विरुद्ध नहीं जा सकता। वह प्रत्येक स्थान पर उपस्थित है। वह अमर है तथा आवागमन के चक्करों से मुक्त है। वह ही इस सृष्टि का रचयिता, इसकी सुरक्षा करने वाला तथा इसको नष्ट करने वाला है। इन कारणों से सूफी एक अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की पूजा नहीं करते हैं।

2. पूर्ण आत्म-त्याग (Complete Self-surrender)-अल्लाह के समक्ष पूर्ण आत्म-त्याग सूफ़ी मत के प्रमुख सिद्धांतों में से एक है। उनके अनुसार प्रत्येक सूफ़ी को साँसारिक मोह-माया तथा अपनी इच्छाओं को मिटाकर स्वयं को अल्लाह के समक्ष समर्पित कर देना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य उस अल्लाह की दया प्राप्त कर सकता है तथा उसके बिगड़े हुए कार्य ठीक हो सकते हैं।

3. पीर (Pir)-सूफी मत में पीर या गुरु को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है। वह अपने मुरीदों की रूहानी उन्नति पर पूर्ण दृष्टि रखता है, ताकि वे इस भवसागर से पार हो सकें तथा अल्लाह के साथ एक हो सकें। एक सच्चा पीर जो स्वयं साँसारिक लगाव से दूर हो तथा जिसने रूहानी ज्ञान प्राप्त कर लिया हो, वह ही अपने शिष्यों को अंधकार से ज्योति की ओर ले जा सकता है।

4. इबादत (Worship)-सूफ़ी अल्लाह की इबादत (पूजा) पर जोर देते हैं। उनके अनुसार मात्र अल्लाह की इबादत करने से ही मनुष्य इस संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। उनके अनुसार अल्लाह की इबादत नमाज़ द्वारा, रोज़े रखकर, दान करके तथा मक्का की यात्रा करके की जा सकती है। मनुष्य को शुद्ध हृदय से अल्लाह की इबादत करनी चाहिए।

5. नमाज़ (Prayer) सूफ़ियों के अनुसार नमाज़ पढ़ना मनुष्य का सर्वोत्तम कर्त्तव्य है। इसके द्वारा मनुष्य अपनी आत्मा की आवाज़ परमात्मा तक पहुँचा सकता है। ऐसी नमाज़ सच्चे हृदय से पढ़ी जानी चाहिए। अशुद्ध हृदय से पढ़ी गयी नमाज को पूर्ण रूप से व्यर्थ बताया गया है तथा कुरान में ऐसे व्यक्ति की कड़े शब्दों में आलोचना की गई है।

6. रोजे रखना (Fasting)-सूफ़ी रोज़े रखने में विश्वास रखते थे। ऐसा करने वाले व्यक्ति की आत्मा शुद्ध होती है। रोज़ा रखने से अभिप्राय मात्र खाने-पीने की वस्तुओं से परहेज़ करने को ही नहीं, बल्कि प्रत्येक प्रकार की बुराइयों से दूर रहने के लिए कहा गया है।

7. दान (Charity)-संसार के समस्त धर्मों में दान देने के संबंध में प्रचार किया गया है, परंतु सूफ़ी धर्म वालों ने इसको आवश्यक माना है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए जिसकी अपनी आवश्यकता से अधिक आय है को कुछ भाग दान देना आवश्यक है। ऐसा एकत्रित किया गया धन निर्धनों तथा ज़रूरतमंद लोगों में बाँटा जाता है। मनुष्यों से सहानुभूति करने को दान का ही एक भाग समझा गया है। कुरान में निर्धनों की सेवा करने तथा गुलामों को आज़ाद करने को बहुत अच्छा बताया गया है।

8. मक्का की यात्रा (Pilgrimage to Mecca)-मक्का की यात्रा करने को सूफ़ी विशेष महत्त्व देते हैं। सत्य हृदय से की गई इस यात्रा से मनुष्य इस संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है तथा उसके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।

9. भक्ति संगीत (Devotional Music)-सूफ़ी भक्ति संगीत पर बहुत जोर देते हैं। उनका यह पूर्ण विश्वास है कि भक्ति संगीत मानवीय हृदयों में अल्लाह के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। इसके प्रभाव के कारण मनुष्य के बुरे विचार नष्ट हो जाते हैं तथा वह अल्लाह के समीप पहुँच जाता है। सूफ़ियों की धार्मिक संगीत सभाओं को समा कहा जाता है।

10. मानवता से प्रेम (Love of Mankind)-मानवता की सेवा करना सूफ़ी अपना परम कर्त्तव्य मानते हैं। इससे संबंधित वे मनुष्यों के बीच किसी जाति-पाति, रंग या नस्ल आदि का भेदभाव नहीं करते। उनके अनुसार सभी मनुष्य एक ही अल्लाह की संतान हैं। इसलिए उनके बीच किसी प्रकार का भेदभाव करना । का अपमान करना है।

प्रश्न 9.
केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों में साहित्य के विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकाल में केंद्रीय इस्लामी देशों ने साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय प्रगति की। अनेक लेखकों ने साहित्य के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया। कुछ महत्त्वपूर्ण लेखकों के योगदान का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. इन सिना (Ibn Sina)—इब्न सिना मध्य काल अरब का एक महान् दार्शनिक एवं चिकित्सक था। उसे यूरोप में एविसेन्ना (Avicenna) के नाम से जाना जाता था। उसका जन्म 980 ई० में बुखारा में हुआ था। इब्न सिना ने चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसकी रचना अल-कानून-फिल-तिब (al-Qanun fil-Tibb) विश्व में बहुत लोकप्रिय हुई। इसमें चिकित्सा सिद्धांतों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है।

इसमें इब्न सिना के प्रयोगों एवं अनुभवों की जानकारी दी गई है। इस पुस्तक का प्रयोग यूरोप में अनेक वर्षों तक एक प्रमाणिक पाठ्य-पुस्तक के रूप में किया जाता रहा है। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर के० अली के अनुसार, “इब्न सिना की कानून’ कई शताब्दियों तक चिकित्सा की बाईबल रही।”24

2. अबू नुवास (Abu Nuwas)—अबू नुवास खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद का प्रसिद्ध दरबारी कवि था। उसने दरबारी जीवन पर अनेक कविताएँ लिखीं। उसने शराब एवं प्रेम जैसे नए विषयों को छुआ। उसकी कविताओं में ईरानी कवियों की छाप देखी जा सकती है। उसे आधुनिक अरबी कविता का एक महान् कवि माना जाता है।

3. रुदकी (Rudki)-रुदकी समानी दरबार का एक महान् कवि था। उसे नयी फ़ारसी कविता का जनक माना जाता है। वह प्रथम कवि था जिसने ग़ज़ल (lyrical poems) एवं रुबाइयाँ (quatrains) लिखीं। रुबाई चार पंक्तियों वाले छंद को कहते हैं। इसका प्रयोग प्रियतम के सौंदर्य का वर्णन करने, संरक्षक की प्रशंसा करने एवं दार्शनिक विचारों का वर्णन करने के लिए किया जाता है।

4. उमर खय्याम (Umar Khayyam)-उमर खय्याम एक महान् कवि, खगोल वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ था। उसका जन्म 1048 ई० में निशापुर (Nishapur) जो कि सल्जुक साम्राज्य की राजधानी थी, में हुआ। उमर खय्याम की गणना विश्व के प्रसिद्ध फ़ारसी कवियों में की जाती है। उसकी रुबाइयों ने लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव छोड़ा। इसी कारण आज विश्व की अनेक भाषाओं में उसकी रुबाइयों का अनुवाद किया जा चुका है। उसने गणित एवं खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उसने रिसाला (Risala) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की।

5. फिरदौसी (Firdausi) फिरदौसी महमूद गज़नवी का सर्वाधिक प्रसिद्ध फ़ारसी का दरबारी कवि था। उसका जन्म 950 ई० में खरासान में हुआ था। उसने 30 वर्ष की अथक मेहनत के पश्चात् शाहनामा (Shahnama) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें 60,000 पद दिए गए हैं। इसे इस्लामी साहित्य की एक सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। इसमें प्रारंभ से लेकर अरबों की विजय तक ईरान के इतिहास का काव्यात्मक शैली में वर्णन किया गया है। फिरदौसी के काव्य क्षेत्र में दिए गए उल्लेखनीय योगदान के कारण उसे ठीक ही ‘फ़ारस का होमर’ (Homer of Persia) कहा जाता है।

6. एक हजार एक रातें (The Thousand and One Nights)—यह अनेक प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह है। इन कहानियों को अनेक लेखकों द्वारा विभिन्न समयों में लिखा गया था। यह संग्रह मूल रूप से भारतीय-फ़ारसी भाषा में था। दसवीं शताब्दी में इसका अनुवाद अरबी भाषा में बग़दाद में किया गया था। इन कहानियों को शहरज़ाद (Shahrzad) द्वारा अपने पति को हरेक रात को एक-एक करके सुनाया गया था।

इस कारण इस संग्रह को अरबी रातें (The Arabian Nights) के नाम से भी जाना जाता है। बाद में मामलुक काल में इसमें और कहानियाँ जोड़ दी गईं। इन कहानियों को मनुष्य को शिक्षा देने एवं मनोरंजन करने के उद्देश्य से लिखा गया था। ये कहानियाँ अरबी साहित्य में प्रमुख स्थान रखती हैं।

अल-जद्रीज (AIL Iahim) अल-जहीज़ बसरा का एक प्रसिद्ध लेखक था। वह यनानी दर्शन से बहत प्रभावित था। उसने विभिन्न विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों में किताब-अल-बखाला (Kitab-al Bukhala) एवं किताब-अल-हैवान (Kitab-al-Hayawan) सर्वाधिक प्रसिद्ध थीं। प्रथम पुस्तक में कंजूसों की कहानियाँ दी गई हैं तथा लालच के बारे में बताया गया है। द्वितीय पुस्तक में जानवरों की कहानियाँ दी गई हैं। इसके अतिरिक्त इसमें अरबी परंपराओं एवं अंध-विश्वासों का वर्णन किया गया है। अल-जहीज़ के लेखों ने आने वाले लेखकों पर गहन प्रभाव डाला है।

8. ताबरी (Tabari)—ताबरी की गणना अरब के महान् इतिहासकारों में की जाती है। उसकी तारीख-अल रसूल वल मुलक (Tarikh-al-Rasul Wal Muluk) एक अमर रचना है। इसमें उसने संसार की रचना से लेकर 915 ई० तक समूचे मानव इतिहास का वर्णन किया है। इसमें उसने इस्लामी धर्म प्रचारकों एवं राजाओं के इतिहास का विशेष वर्णन किया है। ताबरी ने अपनी पुस्तक में क्रमानुसार घटनाओं का वर्णन किया है। अतः इसे अरबी इतिहास की सबसे प्रामाणिक पुस्तक माना जाता है।

9. अल्बरुनी (Alberuni)-अल्बरुनी ग्यारहवीं शताब्दी का एक महान् विद्वान् एवं इतिहासकार था। उसका जन्म 973 ई० में खीवा (Khiva) में हुआ था। उसने खगोल विज्ञान, गणित, भूगोल, दर्शन, इतिहास एवं धर्म का गहन अध्ययन किया था। जब महमूद गजनवी ने 1017 ई० में खीवा पर विजय प्राप्त की तो अल्बरुनी को बंदी बना लिया गया।

अल्बरुनी को गज़नी लाया गया। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर महमूद गजनवी ने उसे अपने दरबार का रत्न बनाया। वह महमूद गज़नवी के भारतीय आक्रमणों के समय उसके साथ भारत आया। भारत में उसने जो कुछ अपनी आँखों से देखा उसके आधार पर उसने एक बहुमूल्य पुस्तक तहकीक-मा-लिल हिंद (Tahqiq ma-lil Hind) की रचना की।

इसे तारीख-ए-हिंद (Tarikh-i-Hind) के नाम से भी जाना जाता है। इसे अरबी भाषा में लिखा गया था। यह 11वीं शताब्दी के भारतीय इतिहास को जानने के लिए हमारा एक विश्वसनीय एवं प्रमाणिक स्रोत है। उसके इस बहुमूल्य योगदान के कारण भारतीय इतिहास में उसे सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर जे० एस० मिश्रा के अनुसार, “तहकीक-मा-लिल हिंद उसके (अल्बरुनी) महान् कार्यों में से एक था, जिसमें उसने भारतीय विषयों जैसे विज्ञान, गणित, भूगोल, दर्शन, इतिहास एवं धर्म का बहुत स्पष्ट ढंग से वर्णन किया है।”

प्रश्न 10.
धर्मयुद्धों के बारे में आप क्या जानते हैं ? इनके क्या परिणाम निकले ? .
उत्तर:
मध्यकालीन विश्व इतिहास में धर्मयुद्धों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ये धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य 1096 ई० से 1272 ई० के मध्य लड़े गए। इन धर्मयुद्धों की कुल संख्या 8 थी। इन धर्मयुद्धों का उद्देश्य ईसाइयों द्वारा अपनी पवित्र भूमि जेरुसलम (Jerusalem) को मुसलमानों के आधिपत्य से मुक्त करवाना था। इन धर्मयुद्धों के दूरगामी परिणाम निकले।

ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य धर्मयुद्धों के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. अरबों द्वारा जेरुसलम पर अधिकार (Occupation of Jerusalem by the Arabs)—जेरुसलम ईसा मसीह के जीवन से संबंधित था। इसलिए यह ईसाइयों के लिए बहुत पवित्र भूमि थी। 638 ई० में अरबों ने जेरुसलम पर अधिकार कर लिया था। ईसाइयों के लिए इसे सहन करना कठिन था। अत: वे इसे वापस प्राप्त करने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की तलाश में थे।

2. सल्जुक तुर्कों के ईसाइयों पर अत्याचार (Atrocities of Saljuk Turks on Christians)-सल्जुक तुर्कों ने 1071 ई० में जेरुसलम पर अपना अधिकार कर लिया था। वे कट्टर सुन्नी मुसलमान थे। अत: वे अपने साम्राज्य में ईसाई धर्म की उन्नति को सहन नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने ईसाइयों पर घोर अत्याचार शुरू कर दिए। जेरुसलम में रहने वाले ईसाइयों पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए गए। ईसाइयों को तलवार के बल पर इस्लाम धर्म में सम्मिलित किया जाता।

इस्लाम धर्म स्वीकार न करने वाले ईसाइयों को अनेक प्रकार के कर देने के लिए बाध्य किया गया। निस्संदेह इससे स्थिति विस्फोटक हो गई। डॉक्टर एफ० सी० कौल एवं डॉक्टर एच० जी० वारेन के अनुसार, “इस प्रकार सल्जुक तुर्कों को जंगली जानवर समझा जाने लगा जिससे पवित्र शहर (जेरुसलम) को मुक्त करवाना आवश्यक समझा गया।”26

3. तात्कालिक कारण (Immediate Cause)-ईसाइयों का खून मुसलमानों से बदला लेने के लिए खौल रहा था। वास्तव में युद्ध के लिए बारूद पूर्ण रूप से तैयार था। उसे केवल एक चिंगारी दिखाने की आवश्यकता थी। 1092 ई० में सल्जुक सुलतान मलिक शाह की मृत्यु के पश्चात् उसके साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया। बाइजेंटाइन सम्राट् एलेक्सियस प्रथम (Alexius I) ने यह स्वर्ण अवसर देख कर जेरुसलम एवं अन्य क्षेत्रों पर अधिकार करने की योजना बनाई।

इस उद्देश्य से उसने पोप अर्बन द्वितीय (Pope Urban II) को सहयोग देने की अपील की। पोप अर्बन द्वितीय इसके लिए तुरंत तैयार हो गया। ऐसा करके वह अपने प्रभाव में वृद्धि करना चाहता था। उसने 26 नवंबर, 1095 ई० को फ्रांस के क्लेयरमांट (Clermont) नामक नगर में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया। इसमें उसने ईसा मसीह के पवित्र स्थान जेरुसलम की रक्षा के लिए समस्त ईसाइयों को धर्मयुद्ध में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया।

I. प्रथम धर्मयुद्ध : 1096-1099 ई०

प्रथम धर्मयुद्ध का आरंभ 1096 ई० में हुआ। पोप अर्बन द्वितीय के भाषण से उत्तेजित होकर लगभग 70 हजार धर्मयोद्धा (Crusaders) पीटर दा हरमिट (Peter the Hermit) के नेतृत्व में जेरुसलम को मुसलमानों से मुक्त कराने के लिए चल पड़े। इन धर्मयोद्धाओं ने कुंस्तुनतुनिया (Constantinople) पर आक्रमण कर वहाँ लूटमार आरंभ कर दी।

तुर्क मुसलमानों ने जो कि अत्यधिक संगठित थे ने, अधिकाँश धर्मयोद्धाओं को मौत के घाट उतार दिया। इसी दौरान फ्राँस, जर्मनी एवं इटली के शासकों ने एक विशाल सेना गॉडफ्रे (Godfrey) के नेतृत्व में जेरुसलम की ओर रवाना की। इन सैनिकों ने एडेस्सा (Edessa) एवं एंटीओक (Antioch) पर अधिकार कर लिया।

उन्होंने 15 जुलाई, 1099 ई० में जेरुसलम पर अधिकार कर लिया। निस्संदेह यह उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण सफलता थी। जेरुसलम पर अधिकार करने के पश्चात् धर्मयोद्धाओं ने बड़ी संख्या में मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। इसके साथ ही प्रथम धर्मयुद्ध का अंत हो गया। गॉडफ्रे को जेरुसलम का शासक घोषित कर दिया गया।

इस प्रदेश को आउटरैमर (Outremer) भाव समुद्रपारीय भूमि का नाम दिया गया। ए० जे० ग्रांट एवं डी० पी० जे० फिंक के अनुसार, “प्रथम धर्मयुद्ध प्रत्येक पक्ष से सबसे महान् एवं सर्वाधिक सफल था।”

II. द्वितीय धर्मयुद्ध : 1147-1149 ई०

मुसलमानों ने 25 दिसंबर, 1144 ई० को एडेस्सा (Edessa) पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् मुसलमानों ने इस नगर में भयंकर लूटमार की। एडेस्सा का पतन निस्संदेह धर्मयोद्धाओं के लिए एक घोर अपमान की बात थी। इससे संपूर्ण यूरोप में मुसलमानों के विरुद्ध एक रोष लहर फैल गई। संत बर्नार्ड (St. Bernard) ने जेरुसलम की सुरक्षा के लिए धर्मयोद्धाओं में एक नई स्फूर्ति का संचार किया।

इससे द्वितीय धर्मयुद्ध के लिए विस्फोट तैयार हो गया। इस धर्मयुद्ध में फ्रांस के शासक लुई सप्तम (Louis VII) एवं जर्मनी के शासक कोनार्ड तृतीय (Conard III) ने हिस्सा लिया। दोनों शासकों की संयुक्त सेनाएँ 1147 ई० में सीरिया की ओर चल पड़ी।

इससे द्वितीय धर्मयुद्ध आरंभ हो गया। ये सैनिक एंटीओक (Antioch) पहुँचे। यहाँ दमिशक (Damascus) को घेरा डालने का निर्णय किया गया। यह घेरा कई माह तक चलता रहा। इस समय के दौरान जर्मनी एवं फ्रांस के शासकों के मध्य गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए। परिणामस्वरूप उनके सैनिक वापस लौट गए एवं द्वितीय धर्मयुद्ध विफल हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकारों एफ० सी० कौल एवं एच० जी० वारेन का यह कहना ठीक है कि, “द्वितीय धर्मयुद्ध बिना कुछ प्राप्त किए समाप्त हो गया सिवाए इसके कि इसने व्यक्तिगत लालच एवं असमर्थता प्रकट की। 28

III. तृतीय धर्मयुद्ध 1189-1192 ई०

1171 ई० में सलादीन (Saladin) ने मिस्र में सत्ता हथिया ली थी। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता 1187 ई० में जेरुसलम पर अधिकार करना था। जेरुसलम पर अधिकार से संपूर्ण ईसाई जगत् में तहलका फैल गया। अतः यूरोप के ईसाइयों ने जेरुसलम पर पुनः अधिकार करने का निर्णय किया। इस उद्देश्य से जर्मनी के सम्राट फ्रेडरिक बारबरोसा (Fraderick Barbarosa),

फ्रांस के सम्राट फिलिप ऑगस्ट्स (Philip Augustus) तथा इंग्लैंड के सम्राट रिचर्ड (Richard) ने संयुक्त रूप से आक्रमण करने का निर्णय किया। अतः उन्होंने 1189 ई० में तीसरे धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी। किंतु उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली। अंत बाध्य होकर रिचर्ड ने 1192 ई० में सलादीन के साथ समझौता कर लिया। इस समझौते के अधीन सलादीन ने ईसाइयों को जेरुसलम में उपासना की आज्ञा दे दी। प्रसिद्ध लेखक पी० एस० फ्राई के अनुसार, “यह सलादीन की उदारता का प्रतिरूप था।”

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

IV. अन्य धर्मयुद्ध 1202-72 ई०

1202 ई० से 1272 ई० के मध्य ईसाइयों एवं यूरोपियों के मध्य पाँच अन्य धर्मयुद्ध हुए। चौथा धर्मयुद्ध 1202 ई० से 1204 ई०, पाँचवां धर्मयुद्ध 1216 ई० से 1220 ई०, छठा धर्मयुद्ध 1228 ई०, सातवां धर्मयुद्ध 1249 ई० से 1254 ई० एवं आठवां धर्मयुद्ध 1270 ई० से 1272 ई० के मध्य हुआ। इन धर्मयुद्धों के दौरान ईसाइयों को बहुत कम सफलताएँ मिलीं। अंततः वे अपने उद्देश्यों में विफल रहे। 1291 ई० में मिस्त्र के शासकों ने पूर्ण रूप से ईसाइयों को फिलिस्तीन से बाहर निकालने में सफलता प्राप्त की।

V. धर्मयुद्धों के परिणाम

धर्मयोद्धा पवित्र भूमि जेरुसलम पर अधिकार करने में विफल रहे किंतु इसके दूरगामी परिणाम निकले।

  • धर्मयुद्धों के कारण पोप की प्रतिष्ठा एवं गौरव में बहुत वृद्धि हुई।
  • धर्मयुद्धों के कारण सामंतों की शक्ति का पतन हुआ एवं राजाओं की शक्ति में वृद्धि हुई।
  • धर्मयुद्धों के दौरान मुसलमानों एवं ईसाइयों ने एक-दूसरे के क्षेत्रों में भारी लूटमार की। इससे दोनों समुदायों के मध्य नफ़रत की भावना फैली।
  • धर्मयुद्धों में यूरोपीय स्त्रियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस कारण उनकी स्थिति में सुधार आया एवं उनका दृष्टिकोण विशाल हुआ।
  • धर्मयुद्धों के कारण सामंतों के प्रभाव में कमी आई। इससे लोगों को उनके अत्याचारों से छुटकारा मिला।
  • धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे मुस्लिम नगरों एवं विज्ञान के क्षेत्रों में हुई प्रगति को देखकर चकित रह गए।
  • धर्मयुद्धों के कारण पश्चिम एवं पूर्व के मध्य व्यापार को एक नया प्रोत्साहन मिला।
  • व्यापार के विकास ने भौगोलिक खोजों को प्रोत्साहित किया।
  • धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों एवं मुसलमानों का एक-दूसरे से संपर्क हुआ। वे एक-दूसरे की संस्कृति से प्रभावित हुए।
  • धर्मयुद्धों ने युद्ध कला को भी प्रभावित किया।

इस काल में सुरक्षा के उद्देश्य से विशाल दुर्गों का निर्माण किया गया। इन दुर्गों को ध्वस्त करने के लिए नए हथियारों एवं बारूद की खोज की गई। धर्मयुद्धों के प्रभाव के बारे में लिखते हुए प्रोफेसर के० अली का कथन है कि, “विश्व के इतिहास में धर्मयुद्धों के महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े।”

क्रम संख्यावर्षघटटना
1.570 ई०पैंगंबर मुहम्मद का मक्का में जन्म।
2.595 ई०पैगंबर मुल्तम्मद का खदीज़ा से विवाहा।
3.610 ई०पैगंबर मुहम्मद को इलहाम (ज्ञान) प्राप्त हुआ।
4.612 ई०पैगंबर मुहम्मद द्वारा प्रथम सार्वर्जनिक उपदेश।
5.622 ई०पैगंबर मुहम्पद द्वारा मक्का से मदीना हिजरत।
6.624 ई०बढ़ की लड़ाई।
7.625 ई०उहुद की लड़ाई।
8.627 ई०खंदक की लड़ाई।
9.628 ई०प्रेद्षेविया की संधि।
10.630 ई०मक्का की विजय।
11.632 ई०पैंगंबर मुहम्मद की मदीना में मृत्यु।
12.632-634 ई०प्रथन खली फ़्रो अबू बकर का शासनकाल।
13.634-644 ई०दिलीय खलीक़ा उभर का श्रासनकाल।
14.638 ई०अरबों द्वारा जेरस्सलम पर अधिकार।
15.644-656 ई०तृतीय बलीफ़ा उथमान का शासनकाल।
16.650 ई०कुरान का संकलन।
17.656-661 ई०चतुर्थ खलीफ़ा अली का श्रासनकाल।
18.656 ई०रैंटों की लड़ाई।
19.657 ई०सिष्सिन की लड़ाई।
20.680 ई०करवला की लक़ाई।
21.685-705 ई०अब्द-अल-यलिक का शासनकाल। अरबी को साम्राज्य की भाषा घोषित करना एवं इस्लामी सिक्के जारी करना। जैल्सलय में ‘डोम आँफ़ दी रॉक नामक प्रसिद्ध मस्जिद का निर्माण।
22.750 ई०उमय्यद वंश का अंत। अबू-अल-अब्बास द्वारा अख्बासी वेश की स्थापना।
23.750-754 ई०अस्बू-अल-अब्यास का शासनकाल।
24.786-809 ई०हारन-अल-रशीद का शासनकाल।
25.801 ई०बसरा की प्रसिद्ध सूकी संत राबिया की मृत्यु।
26.809 ई०अल-अमीन एवं अल-मामुन के मध्य गृहु युद्ध का आरंभ।
27.820 ई०ताहिरी वंश की बुरासान में ताहिर द्वारा स्थापना। निशापुर को राजधानी बनाना।
28.850 ई०समारा में अल-मुतव्वकिल नामक मस्जिद का निर्माण।
29.861 ई०धुलनुन मिस्री की मिस्र में मृत्यु।
30.868 ई०अहमद-इब्न-तुलुन द्वारा तुलुनी वंश की मिस्न में स्थापना।
31.873 ई०ताहिरी वंश का याकूब द्वारा अंत।
32.874-999 ई०समानी वंश का शासन।
33.909 ई०अल-महदी द्वारा फ़ातिमी वंश की स्थापना।
34.932 ई०मुइज-उद्-दौला द्वारा डेलाम में बुवाही वंश की स्थापना। शिराज को राजधानी घोषित करना।
35.945 ई०बुवाहियों द्वारा बग़ाद पर कब्ज़ा।
36.969 ई०फ़ातिमी खलीफ़ा द्वारा बग़दाद पर अधिकार।
37.973 ई०काहिरा को फ़ातिमी साम्राज्य की राजधानी घोषित करना।
38.962-1186 ई०गज़नी वंश का शासन।
39.980 ई०इब्न सिना (एविसेन्ना) का बुखारा में जन्म।
40.1030 ई०महमूद गज़नवी की मृत्यु।
41.1037 ई०तुग़रिल बेग़ एवं छागरी बेग़ द्वारा सल्जुक वंश की स्थापना।
42.1055 ई०सल्जुक तुर्कों द्वारा बग़दाद पर अधिकार। बुवाही वंश का अंत।
43.1063-1072 ई०सल्जुक सुल्तान अल्प अरसलन का शासनकाल।
44.1092 ई०सल्जुक सुल्तान मलिक शाह की मृत्यु।
45.1095 ई०पोप अर्बन द्वितीय द्वारा प्रथम धर्मयुद्ध का आह्वान।
46.1096-1099 ई०प्रथम धर्मयुद्ध।
47.1099 ई०जेरुसलम पर ईसाइयों का अधिकार।
48.1144 ई०तुर्कों द्वारा एडेस्सा पर अधिकार।
49.1147-49 ई०दूसरा धर्मयुद्ध।
50.1171 ई०सलादीन मिस्र का शासक बना।
51.1187 ई०मुसलमानों द्वारा जेरुसलम पर पुन: अधिकार।
52.1189-1192 ई०तीसरा धर्मयुद्ध।
53.1192 ई०इंग्लैंड के शासक रिचर्ड द्वारा सलादीन के साथ समझौता।
54.1258 ई०मंगोलों द्वारा बग़दाद पर कब्ज़ा।
55.1291 ई०मिस्न के शासकों द्वारा ईसाइयों को फिलिस्तीन से बाहर निकालना।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
सातवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में बदूओं के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं ?
उत्तर:
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब में जाहिलिया अथवा अज्ञानता के युग का बोलबाला था। उस समय अरब में बदू लोगों की प्रमुखता थी। बद् खानाबदोश कबीले थे। वे चरागाह की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। लूटमार करना एवं आपस में झगड़ना उनके जीवन की एक प्रमुख विशेषता थी।

उस समय अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। उन्हें केवल एक भोग-विलास की वस्तु समझा जाता था। समाज में अन्य अनेक कुप्रथाएँ भी प्रचलित थीं। उस समय अरब के लोग एक अल्लाह की अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। प्रत्येक कबीले का अपना अलग देवी-देवता होता था।

उस समय के लोग अनेक प्रकार के अंध-विश्वासों एवं जादू-टोनों में भी विश्वास रखते थे। क्योंकि अरब का अधिकाँश क्षेत्र बंजर, वनस्पति रहित एवं दुर्गम था इसलिए अरबों का आर्थिक जीवन भी बहुत पिछड़ा हुआ था। अरबों का कोई व्यवस्थित राजनीतिक संगठन भी नहीं था। उनमें एकता एवं राष्ट्रीयता की भावना बिल्कुल नहीं थी।

प्रश्न 2.
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम से पूर्व अरब की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर:
सातवीं वीं शताब्दी ई० में इस्लाम से पूर्व अरब की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक स्थिति बहुत शोचनीय थी। अरब के बदू लोग खानाबदोशी जीवन व्यतीत करते थे। वे लूटमार करते थे एवं आपस में झगड़ते रहते थे। समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें केवल एक विलासिता की वस्तु समझा जाता था। उन्हें किसी प्रकार का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था।

लोग नैतिक दृष्टि से बहुत गिर चुके थे। लोगों के साथ धोखा करना, भ्रष्टाचार एवं स्त्रियों की इज्जत लूटना एक सामान्य बात थी। समाज में दासों पर घोर अत्याचार किए जाते थे। उस समय अरब में कृषि, उद्योग एवं व्यापार बहुत पिछड़े हुए थे। अरब लोगों में मूर्ति पूजा का व्यापक प्रचलन था तथा वे अंध-विश्वासों में विश्वास रखते थे। उस समय अरब लोग अनेक कबीलों में बँटे हुए थे। उनमें एकता एवं राष्ट्रीय भावना का अभाव था।

प्रश्न 3.
इस्लाम के उदय से पूर्व अरब कबीलों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
इस्लाम के उदय से पूर्व अरब कबीलों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं
(1) उस समय अरब लोग कबीलों में बँटे हुए थे। प्रत्येक कबीले का मुखिया शेख कहलाता था। उसका चुनाव कुछ हद तक पारिवारिक संबंधों के आधार परंतु मुख्य रूप से व्यक्तिगत साहस तथा बुद्धिमत्ता के आधार पर किया जाता था।

(2) प्रत्येक कबीले के अपने देवी-देवता होते थे। इनका मूर्तियों के रूप में मस्जिदों में उपासना की जाती थी।

(3) अधिकांश कबीले खानाबदोश होते थे। वे अपने लिए भोजन तथा ऊँटों के लिए चारे की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान में आते-जाते रहते थे।

(4) कुछ कबीले स्थायी रूप से शहरों में बस गये थे। ये कबीले व्यापार अथवा कृषि का कार्य करते थे।

(5) गैर-अरब व्यक्ति (मवाली) धर्मांतरण के बाद कबीले का सदस्य बन सकता था, किंतु उसके साथ समानता का व्यवहार नहीं किया जाता था।

प्रश्न 4.
इस्लाम के उदय से पूर्व अरब समाज के सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:
(1) अरबों के समाज का मूल आधार परिवार था। उस समय संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित थी। परिवार पितृतंत्रात्मक होते थे।

(2) मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। पुत्री के जन्म को परिवार के लिए अपशगुन माना जाता था। समाज में जो अधिकार पुरुषों को दिए गए थे, स्त्रियों को उन सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था।

(3) उस समय शिक्षा के क्षेत्र में अरब लोग पिछड़े हुए थे। अधिकाँश अरब अनपढ़ थे। स्त्रियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।

(4) उस समय अरब समाज में अनैतिकता का बोलबाला था। लूटमार करना तथा लोगों के साथ धोखा करना। उस समय एक सामान्य बात थी। स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करना एक गर्व की बात मानी जाती थी।

(5) उस समय अरब के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। नृत्य एवं गान उनके मनोरंजन का प्रमुख साधन था।

(6) उस समय बदुओं का प्रमुख भोजन खजूर एवं दूध था। वे इसके अतिरिक्त गेहूँ, बाजरा, अंगूर, खुमानी, सेब, बादाम एवं केले आदि का भी प्रयोग करते थे। वे ऊँट, भेड़ एवं बकरियों का माँस खाते थे।

(7) उस समय अरब समाज में दास प्रथा का व्यापक प्रचलन था। युद्ध में बंदी बनाए गए लोगों को दास बना लिया जाता था। दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था।

प्रश्न 5.
अरब लोगों में ऊँट का क्या महत्त्व था ?
उत्तर:
अरब लोगों के जीवन में ऊँट को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता था। उसे रेगिस्तान का जहाज़ कहा जाता है। उसके बिना रेगिस्तान में जीवन के बारे में सोचा नहीं जा सकता। ऊँट 57° सेंटीग्रेड के उच्च तापमान में भी एक दिन में 160 किलोमीटर का सफर तय कर सकता है। वह 300 किलोग्राम से अधिक का भार ढो सकता है। वह कई दिनों तक बिना पानी पीये जीवित रह सकता है।

यह बदू लोगों के यातायात का प्रमुख साधन है। लोग ऊँटनी का दूध पीते हैं, इसका माँस खाते हैं, इसकी खाल का तंबू बनाते हैं तथा इसके गोबर का आग के लिए प्रयोग करते हैं। इसके मूत्र से दवाइयाँ बनाई जाती हैं। इसे शेख़ की दौलत का प्रतीक माना जाता है। बढ़े इसे विवाह के अवसर पर दहेज के रूप में देते हैं। ऊँट के महत्त्व के संबंध में खलीफ़ा उमर ने लिखा है कि, “अरबवासी वहीं फलते-फूलते हैं जहाँ ऊँट होता है।”

प्रश्न 6.
पैगंबर मुहम्मद के जीवन पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद इस्लाम के संस्थापक थे। उनका जन्म 570 ई० में कुरैश कबीले में हुआ। उनके माता पिता की शीघ्र मृत्यु हो गई थी। अत: उनका बचपन अनेक कठिनाइयों में व्यतीत हुआ। उनका 595 ई० में खदीज़ा के साथ विवाह हुआ। 610 ई० में पैगंबर मुहम्मद को मक्का की हीरा नामक गुफा में नया ज्ञान प्राप्त हुआ। यह ज्ञान उन्हें महादूत जिबरील द्वारा दिया गया।

612 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का में अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश दिया। इस अवसर पर उन्होंने एक नए समाज का गठन किया जिसे उम्मा का नाम दिया गया। मक्का के लोग पैगंबर मुहम्मद के विचारों से सहमत न थे। अतः वे उसके कट्टर विरोधी बन गए। विवश होकर 622 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से मदीना को हिजरत की। उन्होंने 630 ई० में मक्का पर विजय प्राप्त की।

यह उनके जीवन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। पैगंबर मुहम्मद ने लोगों को एक अल्लाह, आपसी भाईचारे, सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने एवं स्त्रियों का सम्मान करने का संदेश दिया। उनकी सरल शिक्षाओं से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए एवं वे इस्लाम में सम्मिलित हुए। 632 ई० में पैगंबर मुहम्मद जन्नत (स्वर्ग) चले गए।

प्रश्न 7.
पैगंबर मुहम्मद ने हिजरत क्यों की ? इसका इस्लाम में क्या महत्त्व था ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद की बढ़ती हुई लोकप्रियता के कारण मक्का के अनेक प्रभावशाली लोग उनसे ईर्ष्या करने लगे। इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, पैगंबर मुहम्मद मूर्ति पूजा के कटु आलोचक थे। उस समय मक्का में काबा नामक स्थान पर 360 देवी-देवताओं की मूर्तियाँ थीं। इनके दर्शनों के लिए प्रत्येक वर्ष लाखों लोग मक्का की यात्रा पर आते थे।

यह काबा पर नियंत्रण करने वाले पुजारी वर्ग तथा कुरैश कबीले के लोगों के लिए आय का एक प्रमुख स्रोत था। अत: पैगंबर मुहम्मद द्वारा मूर्ति पूजा की आलोचना उनके लिए एक गंभीर ख़तरे की चेतावनी थी। दूसरा, पैगंबर मुहम्मद अरब समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों को दूर कर इसे एक नई दिशा देना चाहते थे। इसे मक्का के रूढ़िवादी लोग पसंद नहीं करते थे। अतः उन्होंने अपने स्वार्थी हितों को देखते हुए लोगों को पैगंबर मुहम्मद

के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया। इन लोगों ने अनेक बार पैगंबर मुहम्मद को जान से मारने का प्रयास किया तथा उनके अनुयायियों को कठोर यातनाएँ दीं। अतः बाध्य होकर पैगंबर मुहम्मद 28 जून, 622 ई० को मक्का से मदीना कूच कर गए। वह 2 जुलाई, 622 ई० को मदीना पहुँचे। इस घटना को मुस्लिम इतिहास में हिजरत कहा जाता है। यह घटना पैगंबर मुहम्मद के जीवन में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। इस वर्ष से मुस्लिम कैलेंडर का आरंभ हुआ।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 8.
हज़रत मुहम्मद साहिब कौन थे ? उनकी प्रमुख शिक्षाएँ क्या थी ?
अथवा
पैगंबर मुहम्मद की मुख्य शिक्षाओं को लिखिए।
उत्तर:
हज़रत मुहम्मद साहिब इस्लाम के संस्थापक थे। उनकी प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं–

(1) अल्लाह एक है-पैगंबर मुहम्मद ने अपनी शिक्षाओं में बार-बार इस बात पर बल दिया कि अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है। वह जो चाहे कर सकता है। वह संसार की रचना करता है। वह इसकी पालना करता है। वह जब चाहे इसे नष्ट कर सकता है। संसार की सभी वस्तुएँ उसके नियंत्रण में हैं। उसकी अनुमति के बिना संसार का पत्ता तक नहीं हिल सकता। वह अत्यंत दयावान् है।

(2) कर्म सिद्धांत में विश्वास-इस्लाम में कर्म सिद्धांत पर विशेष बल दिया गया है। इसके अनुसार जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसा बीजोगे वैसा काटोगे। यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा। किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकरा नहीं मिलेगा। कुरान के अनुसार कयामत के दिन स्वर्ग एवं नरक का निर्णय इस जन्म में किए गए कर्मों के अनुसार ही होगा।

(3) समानता में विश्वास-इस्लाम में समानता को विशेष महत्त्व दिया गया है। इसके अनुसार सभी एक अल्लाह के बच्चे हैं। अत: सभी भाइ-बहन हैं। इस्लाम में अमीर-गरीब, जाति, भाषा, लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सभी को एक समान अधिकार दिए गए हैं।

(4) मूर्ति पूजा का खंडन-इस्लाम मूर्ति पूजा का कट्टर विरोधी है। पैगंबर मुहम्मद के समय में अरब देश में मूर्ति पूजा का बहुत प्रचलन था। केवल काबा में ही सैंकड़ों मूर्तियाँ स्थपित की गई थीं। पैगंबर मुहम्मद ने मूर्ति पूजा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने मक्का पर अधिकार करने के पश्चात् काबा में सभी मूर्तियों को नष्ट कर डाला। पैगंबर मुहम्मद का कथन था कि हमें केवल एक अल्लाह की उपासना करनी चाहिए।

प्रश्न 9.
इस्लाम के पाँच स्तंभ क्या हैं ?
उत्तर:
इस्लाम में पाँच सिद्धांतों पर विशेष बल दिया गया है। इनका पालन करना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है। अतः इन्हें इस्लाम के पाँच स्तंभ कहा जाता है।

(1) कलमा पढ़ना-प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्तव्य है कि वह कलमा पढ़े। इसमें बताया गया है कि अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है। मुहम्मद साहब उसके रसूल (पैगंबर) हैं। कुरान को अल्लाह द्वारा भेजा गया है।

(2) नमाज-प्रत्येक मुसलमान का दूसरा कर्त्तव्य यह है कि वह दिन में पाँच बार नमाज़ अवश्य पढ़े। नमाज़ पढने से व्यक्ति का अल्लाह से संपर्क हो जाता है। उसकी रहमत से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा वह मनभावन फल प्राप्त करता है। नमाज़ से पहले हाथ-पाँव एवं मुँह को धोना ज़रूरी है। नाबालिगों एवं पागलों को छोड़कर अन्य सभी मुसलमानों के लिए नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है।

(3) रोज़ा-रमजान के महीने रोज़ा (व्रत) रखना प्रत्येक मुसलमान का तीसरा धार्मिक कर्त्तव्य है। इस माह में सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ भी खाना-पीना वर्जित है। सूर्यास्त के पश्चात् ही मुसलमान कुछ खान-पान कर सकते हैं। इस माह के दौरान मुसलमानों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने पर विशेष बल दिया गया है।

(4) ज़कात-ज़कात का अर्थ है दान देना। इसके अधीन प्रत्येक मुसलमान का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी कुल आय का 272% दान दे। इसे गरीबों की सहायता, इस्लाम के प्रचार एवं मस्जिदों के निर्माण पर खर्च किया जाता है।

(5) हज-प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन में कम-से-कम एक बार हज करे भाव मक्का की यात्रा पर जाए।

प्रश्न 10.
कुरान पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
कुरान अरबी भाषा का शब्द है। इससे अभिप्राय है पुस्तक। कुरान इस्लाम की पवित्र पुस्तक है। इसे सम्मान से कुरान शरीफ़ कहा जाता है। इसकी रचना अरबी भाषा में की गई है। इसमें 114 अध्याय हैं। इनकी लंबाई क्रमिक रूप से घटती जाती है। इसका आखिरी अध्याय सबसे छोटा है। इसमें इस्लाम की शिक्षाओं एवं नियमों का वर्णन किया गया है।

मुस्लिम परंपरा के अनुसार कुरान उन संदेशों का संग्रह है जो खुदा ने अपने दूत जिबरील द्वारा पैगंबर मुहम्मद को 610 ई० से 632 ई० के मध्य मक्का में एवं मदीना में दिए। इसका संकलन 650 ई० में किया गया। आज जो सबसे प्राचीन कुरान हमारे पास है वह 9वीं शताब्दी से संबंधित है। कुरान शरीफ़ का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। मुसलमान कुरान को ख़ुदा की वाणी मानते हैं एवं इसका विशेष सम्मान करते हैं।

प्रश्न 11.
खिलाफ़त संस्था का निर्माण कैसे हुआ ? इसके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
632 ई० में पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् कोई भी व्यक्ति वैध रूप से इस्लाम का अगला उत्तराधिकारी होने का दावा नहीं कर सकता था। अत: इस्लामी राजसत्ता उम्मा को सौंप दी गई। इससे नयी प्रक्रियाओं के लिए अवसर उत्पन्न हुए। किंतु इससे मुसलमानों में गहरे मतभेद भी पैदा हो गए। इससे खिलाफ़त संस्था का निर्माण हुआ।

इसमें समुदाय का नेता (अमीर-अल-मोमिनिन) पैगंबर का प्रतिनिधि (खलीफ़ा) बन गया। प्रथम चार खलीफ़ाओं ने पैगंबर के साथ अपने गहरे नज़दीकी संबंधों के आधार पर अपनी शक्तियों का औचित्य स्थापित किया। उन्होंने पैगंबर द्वारा दिए मार्ग-निर्देशों के अनुसार उनके कार्य को आगे बढ़ाया। खिलाफ़त के दो प्रमुख उद्देश्य थे। प्रथम, उम्मा के कबीलों पर नियंत्रण स्थापित करना। द्वितीय, राज्य के लिए संसाधन जुटाना।

प्रश्न 12.
आरंभिक खलीफ़ाओं के अधीन अरब सम्राज्य के प्रशासनिक ढाँचे की मुख्य विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • प्रांतों का अध्यक्ष गवर्नर और कबीलों के मुखिया को बनाया गया।
  • केंद्र के राजस्व के दो मुख्य स्रोत थे। प्रथम मुसलमानों द्वारा अदा किए जाने वाले कर तथा आक्रमणों के दौरान मिलने वाली लट से प्राप्त हिस्सा।
  • खलीफ़ा के सैनिक रेगिस्तान के किनारे बसे शहरों कुफ़ा और बसरा में शिविरों में रहते थे ताकि वे खलीफ़ा के नियंत्रण में बने रहें।
  • शासक वर्ग और सैनिकों को लूट में से हिस्सा मिलता था और मासिक अदायगियाँ प्राप्त होती थीं।
  • गैर-मुस्लिम लोगों द्वारा करों को अदा करने पर उन्हें राज्य के संरक्षित लोग (धिम्मीस) माना जाता था तथा उन्हें काफ़ी अधिक स्वायत्तता दी जाती थी।

प्रश्न 13.
अबू बकर कौन था ? उसकी प्रमुख उपलब्धियों का वर्णन करें।
उत्तर:
अबू बकर खलीफ़ा के पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे। वह इस पद पर 632 ई० से 634 ई० तक रहे। जिस समय वह खलीफ़ा के पद पर निर्वाचित हुए तो उस समय उन्हें अनेक विकट समस्याओं का सामना करना पड़ा। अबू बकर इन समस्याओं से घबराने वाला व्यक्ति नहीं था। उसने अपनी योग्यता एवं अथक प्रयासों से इन समस्याओं पर नियंत्रण पाया।

अबू बकर ने सर्वप्रथम नकली पैगंबरों के विद्रोहों से निपटने के लिए एक शक्तिशाली संघ का गठन किया। इसका नेतृत्व खालिद इब्न-अल-वालिद को सौंपा। खालिद ने 6 माह के दौरान ही इन नकली पैगंबरों को एक ऐसा सबक सिखाया कि उन्होंने पुनः विद्रोह करने का कभी साहस नहीं किया। इससे मुसलमानों में जहाँ एक ओर नव-स्फूर्ति का संचार हुआ वहीं दूसरी ओर अरब में शाँति स्थापित हुई।

इसके पश्चात् अबू बकर ने मुस्लिम साम्राज्य के विस्तार की योजना बनाई। अतः उसने शीघ्र ही सीरिया, इराक, ईरान एवं बाइजेंटाइन साम्राज्यों पर विजय प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। इन विजयों में खालिद ने उल्लेखनीय योगदान दिया। इसलिए उसे अल्लाह की तलवार की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने मदीना को अपनी राजधानी बनाए रखा। 634 ई० में अबू बकर की मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने उमर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

प्रश्न 14.
मुआविया कौन था ? उसकी प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थी ?
उत्तर:
उमय्यद वंश का संस्थापक मुआविया था। वह 661 ई० से 680 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। जिस समय वह खलीफ़ा बना उस समय उसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ थीं। वह एक दृढ़ निश्चय वाला व्यक्ति था। अत: उसने इन चुनौतियों का साहसपूर्ण सामना किया। उसने सर्वप्रथम दमिश्क को अपनी राजधानी बनाया। उसने 663 ई० में खरिजाइटों जिन्होंने खलीफ़ा के विरुद्ध कुफा में विद्रोह कर दिया था, का सख्ती के साथ दमन किया।

लगभग इसी समय खलीफ़ा अली के समर्थकों ने इराक में विद्रोह कर दिया। ये लोग बहुत शक्तिशाली थे। इसके बावजूद मुआविया ने अपना धैर्य न खोया। उसने एक विशाल सेना भेजकर उनके विद्रोह का दमन किया। इस प्रकार मुआविया की एक बड़ी सिरदर्दी दूर हुई। 667 ई० में मुआविया के प्रसिद्ध सेनापति उकाबा ने उत्तरी अफ्रीका के अधिकाँश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

मुआविया बाइजेंटाइन साम्राज्य को अपने अधीन करना चाहता था किंतु उसकी यह इच्छा अनेक कारणों से पूर्ण न हो सकी। मुआविया के सैनिक तुर्किस्तान पर अधिकार करने में सफल रहे। मुआविया न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी सिद्ध हुआ। उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी रस्मों तथा प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाया। उसने खलीफ़ा पद के गौरव में बहुत वृद्धि की।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 15.
अब्द-अल-मलिक उमय्यद वंश का सबसे महान खलीफ़ा था। सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
अब्द-अल-मलिक की गणना उमय्यद वंश के महान् खलीफ़ाओं में की जाती है। वह मारवान का पुत्र था। वह 685 ई० में खलीफ़ा के पद पर नियुक्त हुआ। वह 705 ई० तक इस पद पर रहा। उसे अपने शासनकाल के आरंभ में घोर समस्याओं का सामना करना पड़ा था। उसने न केवल इन समस्याओं पर नियंत्रण पाया अपितु मुस्लिम साम्राज्य को संगठित करने में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। अब्द-अल-मलिक की शक्ति को सर्वप्रथम इराक में अल-मुख्तियार बिन अबू उबैद ने चुनौती दी। अब्द-अल-मलिक ने बड़ी कुश्लता से इस विद्रोह का दमन किया।

इसके पश्चात् उसने अपना ध्यान एक अन्य प्रमुख शत्रु इन जुबैर की ओर किया। इन जुबैर ने मक्का में अपने खलीफ़ा होने की घोषणा कर दी थी। वह 692 ई० में अब्द-अल-मलिक के साथ हुई एक लड़ाई में मारा गया था। अब्द-अल-मलिक ने बाइजेंटाइन साम्राज्य के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। वह न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी था। उसने इस्लामी साम्राज्य को संगठित करने के लिए अनेक उल्लेखनीय उपाय भी किए। उसने अरबी को राज्य की भाषा घोषित किया।

उसने इस्लामी सिक्कों को जारी किया। इनमें सोने के सिक्के को दीनार एवं चाँदी के सिक्के को दिरहम कहा जाता था। इन सिक्कों पर अरबी भाषा लिखी गई थी। अब्द-अल-मलिक के ये सिक्के बहुत लोकप्रिय हुए तथा आने वाली कई शताब्दियों तक जारी रहे।

प्रश्न 16.
अब्बासी क्रांति से आपका क्या तात्पर्य है ?
अथवा
अब्बासी क्रांति के महत्त्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
750 ई० में अब्बासियों के आगमन ने इस्लाम के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया। उमय्यद वंश के अधिकाँश खलीफ़े अपना समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करते थे। इस कारण वे प्रशासन की ओर अपना कोई ध्यान नहीं दे सके। इसके अतिरिक्त मवालियों (यह गैर अरबी मुसलमान थे) को अरबी मुसलमानों के तिरस्कार का शिकार होना पड़ा था। अत: वे उमय्यदों को सत्ता से बाहर निकालने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे।

उमय्यद साम्राज्य में फैली अराजकता का लाभ उठाते हुए अबू मुस्लिम ने खुरासान में 747 ई० में उमय्यद वंश के विरुद्ध दवा नामक आंदोलन आरंभ किया। इस आंदोलन का उद्देश्य उमय्यद वंश को सत्ता से बाहर करना था। इस आंदोलन ने उमय्यद शासन को अत्याचारी एवं इस्लामी सिद्धांतों के विरुद्ध बताया। 750 ई० में अबू-अल-अब्बास ने कुफा में अपने खलीफ़ा होने की घोषणा कर दी।

उमय्यद खलीफ़ा मारवान द्वितीय इसे सहन न कर सका। अत: वह 12,000 सैनिकों के साथ अबू-अल-अब्बास का मुकाबला करने के लिए चल पड़ा। उसका सामना करने के लिए अबू-अल-अब्बास ने अपने चाचा अब्दुल्ला-इब्न-अली के नेतृत्व में एक सेना को भेजा।

5 जनवरी, 750 ई० में हुई जबकि लड़ाई में खलीफ़ा मारवान द्वितीय की पराजय हुई। इससे उमय्यद वंश का अंत हुआ। इस प्रकार अब्बासी क्रांति सफल हुई तथा अब्बासियों का शासन स्थापित हुआ।

प्रश्न 17.
अब्बासी शासन का महत्त्व क्या था ?
उत्तर:
अब्बासी शासन निम्नलिखित कारणों से अति महत्त्वपूर्ण था

  • इससे अरबों के प्रभाव में गिरावट आई जबकि ईरानी संस्कृति का महत्त्व बढ़ गया।
  • अब्बासियों ने इराक और खुरासान की अपेक्षाकृत अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सेना एवं नौकरशाही का पुनर्गठन गैर-कबीलाई आधार पर किया।
  • अब्बासी शासकों ने खिलाफ़त की धार्मिक स्थिति और कार्यों को मज़बूत बनाया तथा इस्लामी संस्थाओं और विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया।
  • उन्होंने सरकार और साम्राज्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए राज्य के केंद्रीय स्वरूप को बनाए रखा।
  • उन्होंने उमय्यदों के शानदार शाही वास्तुकला और राजदरबार के व्यापक समारोहों की परंपराओं को जारी रखा।

प्रश्न 18.
हारुन-अल-रशीद को अब्बासी वंश का सबसे महान् खलीफ़ा क्यों माना जाता है ?
उत्तर:
हारुन-अल-रशीद अब्बासी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा था। वह 786 ई० से 809 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। उसने अब्बासी वंश के गौरव को पुनः स्थापित करने के लिए अथक प्रयास किए। उसने न केवल आंतरिक विद्रोहों को कुचला अपितु अब्बासी साम्राज्य का दूर-दूर तक विस्तार किया। उसने सर्वप्रथम अफ्रीका के लोगों द्वारा वहाँ अरब खलीफ़ा के गवर्नर के विरुद्ध भड़के विद्रोह को कठोरता से कुचला। याहिया बिन-अब्दुल्ला जो कि खलीफ़ा अली से संबंधित था, ने अपने आपको डेलाम में खलीफ़ा घोषित कर दिया था।

निस्संदेह यह हारुन-अल-रशीद की सत्ता के लिए एक गंभीर ख़तरा था। हारुन-अल-रशीद ने एक योजना के अधीन उसे बंदी बना लिया एवं बाद में मौत के घाट उतार दिया। उसने अर्मीनिया में खारिजियों तथा खुरासान के विद्रोह का दमन किया। उसने उस समय के शक्तिशाली फ्रैंक शासक शॉर्लमेन के साथ मित्रतापूर्वक संबंध स्थापित किए। उसने अपने साम्राज्य को संगठित करने के उद्देश्य से प्रशासन में उल्लेखनीय सुधार किए। उसने प्रजा की भलाई के लिए अनेक पग उठाए। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित किया।

उसने अनेक प्रसिद्ध विद्वानों, संगीतकारों एवं गायकों को अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया था। उसने अनेक अस्पतालों एवं सरायों का निर्माण करवाया। उसने अपनी राजधानी में अनेक विशाल महल, भवन, मस्जिदें एवं बाग बनवाए। वास्तव में उसके शासनकाल में अब्बासी साम्राज्य में इतनी प्रगति हुई कि इसे ‘स्वर्ण युग’ के नाम से स्मरण किया जाता है।

प्रश्न 19.
इस्लाम धर्म के शीघ्र फैलने के प्रमुख क्या कारण थे ?
उत्तर:

  • अरबवासियों में इस्लाम के प्रसार के लिए विशेष धार्मिक जोश था।
  • पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाएँ बहुत सरल थीं। इनका लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा।
  • इस्लाम में अमीर-ग़रीब एवं जाति-पाति का कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। इससे यह धर्म शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।
  • इस्लाम के प्रसार में अनेक खलीफ़ों ने उल्लेखनीय योगदान दिया।
  • इस्लाम के उदय के समय रोमन साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो चुका था।

प्रश्न 20.
फ़ातिमी वंश के उत्थान एवं पतन की संक्षिप्त चर्चा करें।
उत्तर:
फ़ातिमी वंश एक प्रसिद्ध राजवंश था। इस वंश की स्थापना 909 ई० में अल-महदी ने उत्तरी अफ्रीका में की थी। यह वंश अपने आपको पैगंबर मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशज मानते हैं। यह मुसलमानों के शिया संप्रदाय से संबंधित है। अल-महदी ने 909 ई० से 934 ई० तक शासन किया। उसने अनेक प्रदेशों- एलेक्जेंडरिया, सीरिया, माल्टा, सारडीनिया एवं कोर्सिका आदि को अपने अधीन किया।

उसने महदीया को अपनी राजधानी घोषित किया। फ़ातिमी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध सुल्तान अल-मुइज़ था। उसने 965 ई० से 975 ई० तक शासन किया। उसके शासनकाल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सफलता 969 ई० में मिस्त्र पर विजय प्राप्त करना था। 973 ई० में काहिरा को फ़ातिमी साम्राज्य की नई राजधानी घोषित किया गया। इसकी स्थापना मंगल ग्रह के उदय होने के दिन की गई थी।

अल-मुइज़ ने न केवल फ़ातिमी साम्राज्य का विस्तार ही किया अपितु इसे अच्छी प्रकार से संगठित भी किया। अल-मुइज़ के उत्तराधिकारियों ने 1171 ई० तक शासन किया। 1171 ई० में सालादीन ने अल-अज़िद को पराजित कर फ़ातिमी वंश का अंत कर दिया।

प्रश्न 21.
सल्जुक वंश के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
गज़नवी वंश के खंडहरों पर सल्जुक वंश की स्थापना हुई। इस वंश की स्थापना तुग़रिल बेग एवं उसके भाई छागरी बेग ने 1037 ई० में खुरासान को जीत कर की थी। उन्होंने निशापुर को अपनी राजधानी घोषित किया। वे तुर्क जाति से संबंधित थे। तुग़रिल बेग ने सल्जुक साम्राज्य के विस्तार में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता 1055 ई० में बग़दाद पर अधिकार करना था। इससे बग़दाद में बुवाही शासन का अंत हुआ एवं इस पर पुनः सुन्नी मुसलमानों का शासन स्थापित हो गया।

इससे प्रभावित होकर खलीफ़ा अल-कायम ने तुगरिल बेग को सुल्तान की उपाधि से सम्मानित किया। 1063 ई० में तुगरिल बेग की मृत्यु के पश्चात् उसका भतीजा अल्प अरसलन नया सुल्तान बना। उसने 1072 ई० तक शासन किया। वह एक योग्य शासक प्रमाणित हुआ। उसके शासनकाल में सल्जुक साम्राज्य का विस्तार अनातोलिया तक हो गया। उसका पुत्र मलिक शाह भी एक योग्य सुल्तान था।

उसने 1072 ई० से 1092 ई० तक शासन किया। उसके वज़ीर निजाम-उल-मुलक ने सल्जुक साम्राज्य के विस्तार एवं संगठन में उल्लेखनीय योगदान दिया। मलिक शाह की मृत्यु के पश्चात् सल्जुक साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया तथा इसका अंत 1300 ई० में हो गया।

प्रश्न 22.
मध्यकालीन इस्लामी दुनिया की अर्थव्यवस्था की कोई तीन विशेषताएँ लिखो।
उत्तर:
(1) कृषि-मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों ने कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने सिंचाई साधनों का विकास किया। उन्होंने साम्राज्य के अनेक भागों में बाँधों, नहरों एवं कुओं का निर्माण किया। उन्होंने उन किसानों को भू-राजस्व एवं अन्य करों में रियायत दी जो कृषि के अधीन नयी भूमि को लाते थे। कृषि भूमि पर राज्य का सर्वोपरि नियंत्रण होता था।

(2) उद्योग-उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों के शासनकाल में उद्योग के क्षेत्र में बहुमुखी विकास हुआ। उस समय समरकंद कागज़ उद्योग के लिए विशेष रूप से विख्यात था। बाद में कागज़ उद्योग के केंद्र मेसोपोटामिया, ईरान, अरब, मिस्र एवं स्पेन में भी स्थापित किए गए। उस समय बग़दाद काँच के सामान, आभूषण तथा रेशम उद्योग के लिए प्रसिद्ध था। बुखारा दरियों के उद्योग के लिए, दमिश्क इस्पात उद्योग के लिए, कुफा रेशम उद्योग के लिए, कोरडोबा चमड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध केंद्र थे। इनके अतिरिक्त उस समय आभूषण, सूती एवं ऊनी वस्त्र, फर्नीचर एवं दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं के उद्योग भी स्थापित थे।

(3) वाणिज्य एवं व्यापार-अरबों का आंतरिक एवं विदेशी व्यापार दोनों उन्नत थे। आंतरिक व्यापार के लिए मुख्यतः ऊँटों का प्रयोग किया जाता था। विदेशी व्यापार जल एवं स्थल दोनों मार्गों से किया जाता था। अरबी साम्राज्य के यूरोप, अफ्रीका, भारत एवं चीन के देशों के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध थे। अरबी व्यापारी विदेशों को कागज़, सूती एवं ऊनी वस्त्र, काँच का सामान, चीनी, खजूर एवं बारूद का निर्यात करते थे विदेशों से रेशम, चाय, गर्म मसाले, सोना, विलासिता का सामान, हाथी दाँत एवं गुलामों का आयात करते थे। उस समय व्यापार संतुलन इस्लामी साम्राज्य के पक्ष में था।

प्रश्न 23.
इस्लामी साम्राज्य में स्थापित शहरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:
इस्लामी साम्राज्य में स्थापित शहरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ अग्रलिखित हैं

(1) ये सभी शहर व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे। एक शहर का दूसरे शहर के साथ परस्पर संपर्क स्थापित किया गया था। इससे व्यापार को बहुत प्रोत्साहन मिला।

(2) इन सभी शहरों में विशाल जनसंख्या रहती थी तथा इनमें तीव्रता से वृद्धि होती रहती थी। 850 ई० के लगभग बग़दाद की जनसंख्या 10 लाख हो गई थी।

(3) इन सभी शहरों के केंद्र में एक विशाल एवं भव्य मस्जिद का निर्माण किया जाता था। यहाँ सामूहिक नमाज़ पढ़ी जाती थी। इसके अतिरिक्त नागरिकों एवं सैनिकों के घरों के निकट भी मस्जिदों, गिरजाघरों एवं सिनेगोगों की स्थापना की गई थी। मस्जिद मुसलमानों के, गिरजाघर ईसाइयों के तथा सिनेगोग यहूदियों के प्रार्थना घर थे।

(4) प्रत्येक शहर में मंडियों की अच्छी व्यवस्था की जाती थी। इन मंडियों में विभिन्न प्रकार की दुकानें होती थीं।

(5) शहर के बाहर कब्रिस्तान बनाए जाते थे। कसाई की दुकानों एवं चमड़े की वस्तुएँ बनाने वाली दुकानों को भी शहर से बाहर रखा जाता था।

(6) शहरों में नागरिकों को अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थीं तथा यहाँ नौकरी के अवसर अधिक होते थे। इसलिए लोग शहरों में रहना पसंद करते थे।

प्रश्न 24.
सूफी मत को परिभाषित कीजिए। इसकी शिक्षाएँ क्या थी ? ।
अथवा
सूफ़ी मत से आपका क्या अभिप्राय है ? इसकी शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सूफ़ी मत से अभिप्राय-सूफ़ी मत इस्लाम का एक संप्रदाय था। वे बहुत उदार विचारों वाले थे। वे 12 सिलसिलों अथवा वर्गों में बँटे हुए थे। प्रत्येक सिलसिला एक पीर के अधीन होता था। सूफ़ी मत की प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित थीं

(1) अल्लाह एक है-सूफ़ियों के अनुसार परमात्मा एक है जिसको वे अल्लाह कहते हैं। वह सर्वोच्च, शक्तिशाली तथा सर्वव्यापक है। प्रत्येक स्थान पर उसका आदेश चलता है तथा कोई भी उसकी आज्ञा के विरुद्ध नहीं जा सकता। वह प्रत्येक स्थान पर उपस्थित है। वह अमर है तथा आवागमन के चक्करों से मुक्त है। वह ही इस सृष्टि का रचयिता, इसकी सुरक्षा करने वाला तथा इसको नष्ट करने वाला है। इन कारणों से सूफ़ी एक अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की पूजा नहीं करते हैं।

(2) पीर-सूफ़ी मत में पीर या गुरु को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है। वह अपने मुरीदों की रूहानी उन्नति पर पूर्ण दृष्टि रखता है, ताकि वे इस भवसागर से पार हो सकें तथा अल्लाह के साथ एक हो सकें। एक सच्चा पीर जो स्वयं साँसारिक लगाव से दूर हो तथा जिसने रूहानी ज्ञान प्राप्त कर लिया हो, वह ही अपने शिष्यों को अंधकार से ज्योति की ओर ले जा सकता है।

(3) भक्ति संगीत-सूफ़ी भक्ति संगीत पर बहुत ज़ोर देते हैं। उनका यह पूर्ण विश्वास है कि भक्ति संगीत मानवीय हृदयों में अल्लाह के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। इसके प्रभाव के कारण मनुष्य के बुरे विचार नष्ट हो जाते हैं तथा वह अल्लाह के समीप पहुँच जाता है। सूफ़ियों की धार्मिक संगीत सभाओं को समा कहा जाता है।

(4) मानवता से प्रेम-मानवता की सेवा करना सूफ़ी अपना परम कर्त्तव्य मानते हैं। इससे संबंधित वे मनुष्यों के बीच किसी जाति-पाति, रंग या नस्ल आदि का भेदभाव नहीं करते। उनके अनुसार सभी मनुष्य एक ही अल्लाह की संतान हैं। इसलिए उनके बीच किसी प्रकार का भेदभाव करना उस सर्वोच्च अल्लाह का अपमान करना है।

प्रश्न 25.
इल सिना कौन था ? वह क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
इब्न सिना मध्य काल अरब का एक महान् दार्शनिक एवं चिकित्सक था। उसे यूरोप में एविसेन्ना के नाम से जाना जाता था। उसका जन्म 980 ई० में बुखारा में हुआ था। उसका दर्शन यूनानी दर्शन से प्रभावित था। वह इस्लाम के इस सिद्धांत में विश्वास नहीं रखता था कि कयामत के दिन व्यक्ति फिर से जिंदा हो जाता है। इस कारण उसे कट्टर मुसलमानों के घोर विरोध का सामना करना पड़ा। इब्न सिना ने चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसकी रचना अल-कानून-फिल-तिब विश्व में बहुत लोकप्रिय हुई।

इसमें चिकित्सा सिद्धांतों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। इसमें इब्न सिना के प्रयोगों एवं अनुभवों की जानकारी दी गई है। इसमें 760 प्रमुख औषधियों का उल्लेख किया गया है। इसमें पानी से फैलने वाले संक्रामक रोगों का वर्णन किया गया है। इसमें जलवायु और पर्यावरण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक का प्रयोग यूरोप में अनेक वर्षों तक एक प्रमाणिक पाठ्य-पुस्तक के रूप में किया जाता रहा है।

प्रश्न 26.
अल्बरुनी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
अल्बरुनी ग्यारहवीं शताब्दी का एक महान् विद्वान् एवं इतिहासकार था। उसका जन्म 973 ई० में खीवा में हुआ था। उसने खगोल विज्ञान, गणित, भूगोल, दर्शन, इतिहास एवं धर्म का गहन अध्ययन किया था। जब महमूद गज़नवी ने 1017 ई० में खीवा पर विजय प्राप्त की तो अल्बरुनी को बंदी बना लिया गया।

अल्बरुनी को गज़नी लाया गया। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर महमद गज़नवी ने उसे अपने दरबार का रत्न बनाया। वह महमद गज़नवी के भारतीय आक्रमणों के समय उसके साथ भारत आया। भारत में जो कुछ अपनी आँखों से देखा उसके आधार पर उसने एक बहुमूल्य पुस्तक तहकीक-मा-लिल हिंद की रचना की।

इसे तारीख-ए-हिंद के नाम से भी जाना जाता है। इसे अरबी भाषा में लिखा गया था। यह 11वीं शताब्दी के भारतीय इतिहास को जानने के लिए हमारा एक विश्वसनीय एवं प्रामाणिक स्रोत है। उसके इस बहुमूल्य योगदान के कारण भारतीय इतिहास में उसे सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।

प्रश्न 27.
रोमन साम्राज्य के वास्तुकलात्मक रूपों से इस्लामी वास्तुकलात्मक रूप कैसे भिन्न थे?
उत्तर:
(1) रोमन वास्तुकला-रोमन सम्राटों को वास्तुकला से विशेष लगाव था। उन्होंने विशाल संख्या में महलों, भवनों तथा कोलोसियमों का निर्माण किया था। इन भवनों के निर्माण के लिए पत्थरों, संगमरमर तथा लकड़ी का प्रयोग किया जाता था। इन भवनों को मेहराबों, विशाल गुम्बदों तथा गोलाकार छतों द्वारा सुंदर बनाया जाता था। उनके भवन यूनानी भवन निर्माण कला से प्रेरित थे।

(2) इस्लामी वास्तुकला-इस्लामी वास्तुकला ईरानी वास्तुकला से प्रेरित थी। इस्लामी शासकों ने विशाल संख्या में महलों, मस्जिदों तथा अन्य भवनों को निर्माण करवाया। उनके भवनों में पत्थरों, चट्टानों, संगमरमर तथा लकड़ी का प्रयोग किया जाता था। उनके भवनों को गुम्बदों, मीनारों, मेहराबों तथा स्तंभों से सुसज्जित किया जाता था। इन भवनों की दीवारों पर विभिन्न चित्र बनाए जाते थे।

प्रश्न 28.
धर्मयुद्ध किनके मध्य हुए? इनके लिए कौन-से कारण उत्तरदायी थे?
उत्तर:
धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य हुए। इन धर्मयुद्धों के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे–

(1) जेरुसलम ईसाइयों के लिए बहुत पवित्र भूमि थी। इसका संबंध ईसा के क्रूसीकरण तथा पुनः जीवित होने से था। इस स्थान पर अरबों ने 638 ई० में अधिकार कर लिया था। ईसाई इसे सहन करने को तैयार नहीं थे।

(2) सल्जुक तुर्कों ने 1071 ई० में जेरुसलम पर अपना अधिकार कर लिया था। वे कट्टर सुन्नी मुसलमान थे। अतः वे अपने साम्राज्य में ईसाई धर्म की उन्नति को सहन नहीं कर सकते थे। अत: उन्होंने ईसाइयों पर घोर अत्याचार शुरू कर दिए।

(3) 1092 ई० में सल्जक सल्तान मलिक शाह की मत्य के पश्चात उसके साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया। बाइजेंटाइन सम्राट एलेक्सियस प्रथम ने यह स्वर्ण देखकर जेरुसलम पर अधिकार करने की योजना बनाई।

(4) पोप अर्बन द्वितीय ने 1095 ई० में फ्राँस के क्लेयरमांट नामक नगर में ईसाइयों को जेरुसलम की रक्षा के लिए समस्त ईसाइयों को धर्मयुद्ध में सम्मिलित होने की अपील की। इसका ईसाइयों पर जादुई प्रभाव पड़ा तथा वे युद्ध के लिए तैयार हो गए।

प्रश्न 29.
प्रथम धर्मयुद्ध पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
प्रथम धर्मयुद्ध का आरंभ 1096 ई० में हुआ। पोप अर्बन द्वितीय के भाषण से उत्तेजित होकर लगभग 70 हज़ार धर्मयोद्धा पीटर दा हरमिट के नेतृत्व में जेरुसलम को मुसलमानों से मुक्त कराने के लिए चल पड़े। सम्राट आलेक्सियस प्रथम ने उन्हें धैर्य से काम लेने तथा सैनिकों के वहाँ पहुँचने तक इंतज़ार करने के लिए कहा। किंतु इन धर्मयोद्धाओं ने जो धार्मिक जोश से प्रेरित थे, इस परामर्श को ठुकरा दिया। इन धर्मयोद्धाओं ने कुंस्तुनतुनिया पर आक्रमण कर वहाँ लूटमार आरंभ कर दी।

तुर्क मुसलमानों ने जो कि अत्यधिक संगठित थे, ने अधिकाँश धर्मयोद्धाओं को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना से धर्मयोद्धाओं के प्रोत्साहन में कोई कमी नहीं आई। फ्राँस, जर्मनी एवं इटली के शासकों ने एक विशाल सेना गॉडफ्रे के नेतृत्व में जेरुसलम की ओर रवाना की। इन सैनिकों ने एडेस्सा एवं एंटीओक पर अधिकार कर लिया। उन्होंने 15 जुलाई, 1099 ई० में जेरुसलम पर अधिकार कर लिया। निस्संदेह यह उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सफलता थी। जेरुसलम पर अधिकार करने के पश्चात् धर्मयोद्धाओं ने बड़ी संख्या में मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। इसके साथ ही प्रथम धर्मयुद्ध का अंत हो गया।

प्रश्न 30.
यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
यूरोप एवं एशिया पर धर्मयुद्धों के निम्नलिखित प्रभाव पड़े

(1) धर्मयुद्धों के कारण पोप की प्रतिष्ठा काफी बढ़ गई। जर्मनी, फ्राँस, इंग्लैंड एवं हंगरी आदि के शासक पोप के निर्देशों का पालन करने के लिए सदैव तैयार रहते थे। परिणामस्वरूप दो शताब्दियों तक पोप ने यूरोप की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई।

(2) धर्मयुद्धों के कारण सामंतों की शक्ति का पतन हुआ एवं राजाओं की शक्ति में वृद्धि हुई।

(3) धर्मयुद्धों के सफल संचालन के लिए लोगों ने दिल खोल कर चर्च को दान दिए। इस कारण चर्चों के पास अपार दौलत एकत्र हो गई। इस धन के चलते धीरे-धीरे चर्चों में भ्रष्टाचार फैल गया।

(4) धर्मयुद्धों के दौरान मुसलमानों एवं ईसाइयों ने एक-दूसरे के क्षेत्रों में भारी लूटमार की। इससे दोनों समुदायों के मध्य नफ़रत की भावना फैली।

(5) धर्मयुद्धों में यूरोपीय स्त्रियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस कारण उनकी स्थिति में सुधार आया एवं उनका दृष्टिकोण विशाल हुआ।

(6) धर्मयुद्धों के कारण सामंतों के प्रभाव में कमी आई। इससे लोगों को उनके अत्याचारों से राहत मिली।

(7) धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे मुस्लिम नगरों एवं विज्ञान के क्षेत्रों में हुई प्रगति को देखकर चकित रह गए।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
इग्नाज़ गोल्डजिहर (Ignaz Goldziher) कौन था ?
उत्तर:

  • वह हंगरी का एक यहूदी था।
  • उसने काहिरा के इस्लामी कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की थी।
  • उसने जर्मन भाषा में इस्लाम से संबंधित अनेक पुस्तकों की रचना की।

प्रश्न 2.
सातवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में बेदुइओं के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं ?
उत्तर:

  • वे खानाबदोश जीवन व्यतीत करते थे।
  • वे लूटमार करते थे एवं आपस में झगड़ते रहते थे।
  • ऊँट उनका प्रमुख साथी था एवं खजूर उनका प्रमुख खाद्य पदार्थ था।

प्रश्न 3.
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब समाज की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • उस समय अरब के अधिकाँश लोग अनपढ थे।
  • उस समय अरब समाज में अनैतिकता का बोलबाला था।

प्रश्न 4.
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब परिवार कैसे थे ?
उत्तर:

  • उस समय सयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित थी।
  • उस समय परिवार पितृतंत्रात्मक होते थे।
  • परिवार में पुत्र का होना आवश्यक माना जाता था।

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प्रश्न 5.
पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। कैसे ?
उत्तर:

  • अधिकाँश लड़कियों को जन्म लेते ही मार दिया जाता था।
  • स्त्रियों को लगभग सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता था।
  • उन्हें केवल एक भोगविलास की वस्तु समझा जाता था।

प्रश्न 6.
पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरब समाज में अनैतिकता का बोलबाला था। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ?
उत्तर:

  • उस समय लूटमार करना एवं धोखा देना एक सामान्य बात थी।
  • उस समय शराब पीने एवं जुआ खेलने का प्रचलन बहुत था।
  • स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करना एक गर्व की बात मानी जाती थी।

प्रश्न 7.
सातवीं शताब्दी ई० में दासों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता था ?
उत्तर:

  • उस समय दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था।
  • उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए थे।

प्रश्न 8.
सातवीं शताब्दी ई० में अरबों के आर्थिक जीवन की दो प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:

  • उस समय अरबों का आर्थिक जीवन बहुत पिछड़ा हुआ था।
  • यहाँ की जनसंख्या बहुत विरल थी।

प्रश्न 9.
अरबों के जीवन में खजूर का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:

  • यह अरब लोगों का प्रमुख खाद्य पदार्थ है।
  • इसका पेय बहुत स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।
  • इसकी गुठली ऊँट का प्रमुख भोजन है।

प्रश्न 10.
अरबों के जीवन में ऊँट को क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता है ?
उत्तर:

  • ऊँटों को रेगिस्तान का जहाज़ कहा जाता है।
  • वह बदू लोगों के यातायात का प्रमुख साधन है।
  • इसका माँस खाया जाता है, दूध पीया जाता है एवं खालों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
सातवीं शताब्दी ई० में अरबों का व्यापार उन्नत क्यों न था ? कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • उस समय अरब में अराजकता का वातावरण था।
  • उस समय उद्योगों का विकास नहीं हुआ था।

प्रश्न 12.
पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरबों के धार्मिक जीवन की दो प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:

  • उस समय लोग एक अल्लाह की अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे।
  • लोग एक-दूसरे के देवी-देवता से घृणा करते थे।

प्रश्न 13.
अरब कबीलों की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • प्रत्येक कबीला राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होता था।
  • प्रत्येक कबीले का मुखिया शेख़ कहलाता था।

प्रश्न 14.
इस्लाम का संस्थापक किसे माना जाता है ? उनका जन्म कब और कहाँ हुआ ?
अथवा
हज़रत मुहम्मद साहिब का जन्म कब और कहाँ हुआ था ?
उत्तर:

  • इस्लाम का संस्थापक पैगंबर मुहम्मद को माना जाता है।
  • उनका जन्म 29 अगस्त, 570 ई० को मक्का में हुआ था।

प्रश्न 15.
पैगंबर मुहम्मद का संबंध किस कबीले से था तथा यह कबीला कहाँ रहता था?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद का संबंध कुरैश कबीले से था।
  • यह कबीला मक्का में रहता था।

प्रश्न 16.
खदीजा कौन थी ? पैगंबर मुहम्मद का उससे विवाह कब हुआ ?
उत्तर:

  • खदीज़ा मक्का की एक धनी विधवा थी।
  • पैगंबर मुहम्मद का उससे 595 ई० में विवाह हुआ।

प्रश्न 17.
पैगंबर मुहम्मद को इलहाम (ज्ञान) कहाँ प्राप्त हुआ था ? उस समय उनकी आयु क्या थी ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद को इलहाम (ज्ञान) मक्का में स्थित हीरा नामक एक गुफ़ा में प्राप्त हुआ।
  • उस समय उनकी आयु 40 वर्ष की थी।

प्रश्न 18.
उस महादूत का नाम बताओ जिसने पैगंबर मुहम्मद को अल्लाह का संदेश दिया था। उस रात को इस्लाम में किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:

  • उस महादूत का नाम जिबरील था जिसने पैगंबर मुहम्मद को अल्लाह का संदेश दिया था।
  • उस रात को इस्लाम में ‘शक्ति की रात’ कहा जाता है।

प्रश्न 19.
पैगंबर मुहम्मद ने किस धर्म की स्थापना की? इस धर्म की पवित्र पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद ने इस्लाम धर्म की स्थापना की।
  • इस धर्म की पवित्र पुस्तक का नाम कुरान है।

प्रश्न 20.
पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश कहाँ और कब दिया ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश मक्का में 612 ई० में दिया।

प्रश्न 21.
उम्मा (Umma) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद द्वारा स्थापित समाज को उम्मा का नाम दिया गया।
  • इसमें सभी को एक समान अधिकार प्राप्त थे।
  • इसमें लोग धर्म द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए थे।

प्रश्न 22.
मक्का के लोग पैगंबर मुहम्मद के विरुद्ध क्यों हुए ? कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद मूर्ति पूजा के कटु आलोचक थे।
  • रूढ़िवादी पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं को पसंद नहीं करते थे।

प्रश्न 23.
पैगंबर मुहम्मद मक्का से मदीना कब पहुँचे ? इस घटना को इस्लाम में किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद मक्का से मदीना 2 जुलाई, 622 ई० को पहुँचे।
  • इस घटना को इस्लाम में हिज़रत के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 24.
हिज़रत से क्या अभिप्राय है ? इस्लाम में इसका क्या महत्त्व है ?
अथवा
हिज़रत से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद द्वारा मक्का से मदीना जाने की घटना को हिज़रत कहा जाता है। यह घटना 622 ई० में हुई।
  • इस वर्ष मुस्लिम कैलेंडर लागू हुआ।

प्रश्न 25.
बद्र की लड़ाई कब एवं किसके मध्य हुई ? इसमें कौन विजयी रहा ?
उत्तर:

  • बद्र की लड़ाई 13 मार्च, 624 ई० को पैगंबर मुहम्मद एवं कुरैशों के मध्य हुई।
  • इसमें पैगंबर मुहम्मद विजयी रहे।

प्रश्न 26.
पैगंबर मुहम्मद ने मक्का पर कब विजय प्राप्त की ? इस विजय का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद ने मक्का पर 1 जनवरी, 630 ई० में विजय प्राप्त की।
  • इस शानदार विजय से पैगंबर मुहम्मद की प्रतिष्ठा में बहुत वृद्धि हुई।

प्रश्न 27.
इस्लाम धर्म के संस्थापक कौन थे ? उनकी दो शिक्षाएँ बताइए।
उत्तर:

  • इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगंबर मुहम्मद थे।
  • अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च है।
  • लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए।

प्रश्न 28.
इस्लाम के कोई दो स्तंभ बताएँ।
उत्तर:

  • प्रत्येक मुसलमान को एक दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़नी चाहिए।
  • प्रत्येक मुसलमान को अपने जीवन काल में एक बार हज की यात्रा करनी चाहिए।

प्रश्न 29.
इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ का क्या नाम है ? यह किस भाषा में है ?
अथवा
कुरान क्या है?
उत्तर:

  • इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ का नाम कुरान है।
  • यह अरबी भाषा में है।

प्रश्न 30.
पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु कब और कहाँ हुई ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु 8 जून, 632 ई० को मदीना में हुई।

प्रश्न 31
उलेमा से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उलेमा मुसलमानों के धार्मिक विद्वान् थे। वे अपना समय कुरान पर टीका लिखने और मुहम्मद की प्रामाणिक उक्तियों को लेखबद्ध करने में लगाते थे। वे लोगों को शरीआ के अनुसार जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करते थे।

प्रश्न 32.
खलीफा किसे कहा जाता था ?
उत्तर:
खलीफ़ा हज़रत मुहम्मद साहिब के उत्तराधिकारियों को कहा जाता था। उनका प्रमुख कार्य इस्लाम की रक्षा एवं प्रसार करना था।

प्रश्न 33.
पहले चार खलीफ़ाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
पहले चार खलीफ़ाओं के नाम अबू बकर, उमर, उथमान एवं अली थे।

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प्रश्न 34.
मुसलमानों का प्रथम खलीफ़ा कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • मुसलमानों का प्रथम खलीफ़ा अबू बकर था ।
  • उसका शासनकाल 632 ई० से 634 ई० तक था।

प्रश्न 35.
अबू बकर की कोई दो महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने नकली पैगंबरों के विद्रोहों का दमन किया।
  • उसने सीरिया, इराक, ईरान एवं बाइजेंटाइन साम्राज्य पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 36.
मुसलमानों का दूसरा खलीफ़ा कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • मुसलमानों का दूसरा खलीफ़ा उमर था।
  • उसका शासनकाल 634 ई० से 644 ई० तक था।

प्रश्न 37.
खलीफ़ा उमर की कोई दो महत्त्वपूर्ण सफलताएँ लिखें।
उत्तर:

  • उसने ससानी साम्राज्य एवं बाइजेंटाइन साम्राज्य पर महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त की।
  • उसने एक कुशल प्रशासन की स्थापना की।

प्रश्न 38.
हिजरी सन् से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
इस्लामी पंचांग का वर्णन कीजिए।
अथवा
इस्लामी कैलेंडर के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
हिजरी सन् की स्थापना खलीफ़ा उमर ने की थी। इसका प्रथम वर्ष 622 ई० में पड़ता है। हिजरी सन् की तारीख को जब अंग्रेज़ी में लिखा जाता है तो वर्ष के बाद ए० एच० लगाया जाता है। हिज़री वर्ष चंद्र वर्ष है तथा यह 354 दिनों का होता है।

प्रश्न 39.
जकात से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
जज़िया क्या था ?
अथवा
जकात एवं जज़िया से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • जकात एक धार्मिक कर था जो मुसलमानों से प्राप्त किया जाता था। यह उनकी आय का 212% होता था।
  • जज़िया एक कर था जो गैर-मुसलमानों पर लगाया जाता था। इसके बदले सरकार उन्हें उनकी संपत्ति एवं जीवन की सुरक्षा का वचन देती थी।

प्रश्न 40. धिम्मीस कौन थे ?
उत्तर:
धिम्मीस वे संरक्षित लोग थे जिन्हें अपनी संपत्ति एवं जीवन की सुरक्षा के लिए सरकार को जजिया कर देना पड़ता था।

प्रश्न 41.
खलीफ़ा उथमान की हत्या कब और क्यों की गई ?
उत्तर:

  • खलीफ़ा उथमान की हत्या 17 जून, 656 ई० में की गई।
  • इसका कारण यह था कि उसने अपने निकट संबंधियों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त कर दिया था।

प्रश्न 42.
ऊँटों की लड़ाई कब एवं किनके मध्य हुई ? इसमें कौन विजयी रहा ?
उत्तर:

  • ऊँटों की लड़ाई 9 दिसंबर, 656 ई० को खलीफ़ा अली एवं पैगंबर मुहम्मद की पत्नी आयशा (Aishah) के मध्य हुई।
  • इसमें विजय अली की हुई।

प्रश्न 43.
उमय्यद वंश का संस्थापक कौन था ? इस वंश का शासनकाल बताएँ।
उत्तर:

  • उमय्यद वंश का संस्थापक मुआविया था।
  • इस वंश ने 661 ई० से 750 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 44.
उमय्यद वंश के संस्थापक का नाम एवं उसका शासनकाल बताएँ।
उत्तर:

  • उमय्यद वंश के संस्थापक का नाम मुआविया था।
  • उसने 661 ई० से 680 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 45.
मुआविया की दो प्रमुख उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी रस्मों एवं प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाया।
  • उसने अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक पग उठाए।

प्रश्न 46.
उमय्यद वंश का सबसे महान् खलीफ़ा कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • उमय्यद वंश का सबसे महान् खलीफ़ा अब्द-अल-मलिक था।
  • उसका शासनकाल 685 ई० से 705 ई० तक था।

प्रश्न 47.
अब्द-अल-मलिक की दो महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने अरबी को प्रशासन की भाषा बनाया।
  • उसने इस्लामी सिक्के जारी किए।

प्रश्न 48.
अब्द-अल-मलिक द्वारा जारी सिक्कों की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • इन सिक्कों पर अरबी भाषा अंकित थी।
  • इन सिक्कों पर अब्द-अल-मलिक का नाम एवं उसकी तस्वीर अंकित थी।

प्रश्न 49.
डोम ऑफ़ दी रॉक नामक मस्जिद का निर्माण किसने तथा कहाँ किया था ?
उत्तर:
डोम ऑफ़ दी रॉक नामक मस्जिद का निर्माण अब्द-अल-मलिक द्वारा जेरुसलम में किया गया।

प्रश्न 50.
उमय्यद वंश के पतन के लिए जिम्मेवार कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • अधिकाँश उमय्यद खलीफ़े विलासप्रिय थे। अतः उन्होंने प्रशासन की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया।
  • उनके अधिकारी स्वार्थी हितों में अधिक व्यस्त रहते थे ।

प्रश्न 51.
अब्बासी क्राँति से आपका क्या तात्पर्य है ?
अथवा
अब्बासी क्राँति से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
अब्बासी क्राँति से हमारा तात्पर्य उस क्राँति से है जिसके अधीन अबू मुस्लिम ने खुरासान से दवा नामक आंदोलन आरंभ किया। इस क्राँति ने 750 ई० में उमय्यद वंश का अंत कर दिया एवं अब्बासी वंश की स्थापना की।

प्रश्न 52.
अब्बासी वंश की स्थापना किसने तथा कब की ?
उत्तर:
अब्बासी वंश की स्थापना 750 ई० में अबू-अल-अब्बास ने की थी।

प्रश्न 53.
खलीफ़ा अल-मंसूर की कोई दो महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने बग़दाद को अब्बासी साम्राज्य की राजधानी घोषित किया।
  • उसने कला एवं शिक्षा को प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 54.
खलीफ़ा अल-महदी का शासनकाल क्या था ? उसका शासनकाल किस लिए प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • खलीफ़ा अल-महदी का शासनकाल 775 ई० से 785 ई० था।
  • उसका शासनकाल लोक भलाई कार्यों के लिए प्रसिद्ध था।

प्रश्न 55.
अब्बासी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • अब्बासी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद था ।
  • उसका शासनकाल 786 ई० से 809 ई० तक था।

प्रश्न 56.
खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद की दो प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थी ?
उत्तर:

  • उलने अफ्रीका के गवर्नर याहिया-बिन-अब्दुल्ला के विद्रोह का दमन किया।
  • उसने शक्तिशाली फ्रैंक शासक शॉर्लमेन (Charlemagne) से मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित किए।

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प्रश्न 57.
खलीफ़ा अल-मामुन का शासनकाल क्या था ? उसकी कोई एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताएँ।
उत्तर:

  • खलीफ़ा अल-मामुन ने 813 ई० से 833 ई० तक शासन किया।
  • उसने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई।

प्रश्न 58.
अब्बासी वंश के पतन के दो प्रमुख कारण लिखें।
उत्तर:

  • अल-मामुन के सभी उत्तराधिकारी अयोग्य एवं निकम्मे निकले।
  • अब्बासी साम्राज्य के गुटों में चलने वाले लगातार संघर्षों ने इसके पतन की प्रक्रिया को तीव्र कर दिया।

प्रश्न 59.
फ़ातिमी वंश का संस्थापक कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • फ़ातिमी वंश का संस्थापक अल-महदी था।
  • उसका शासनकाल 909 ई० से 934 ई० तक था।

प्रश्न 60.
गज़नवी वंश का संस्थापक कौन था ? उसने इस वंश की स्थापना कब तथा कहाँ की थी ?
उत्तर:

  • गज़नवी वंश का संस्थापक अल्पतिगीन था।
  • उसने इस वंश की स्थापना 962 ई० में गज़नी में की थी।

प्रश्न 61.
गज़नवी वंश का सबसे महान् सुल्तान कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • गज़नवी वंश का सबसे महान् सुल्तान महमूद गज़नी था।
  • उसने 998 ई० से 1030 ई० तक शासन किया

प्रश्न 62.
सल्जुक वंश की स्थापना किसने तथा कब की थी ?
उत्तर:
सल्जुक वंश की स्थापना तुग़रिल बेग एवं उसके भाई छागरी बेग ने 1037 ई० में की थी।

प्रश्न 63.
मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य की अर्थव्यवस्था की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • उस समय के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था।
  • इस काल में वाणिज्य एवं व्यापार का अभूतपूर्व विकास हुआ।

प्रश्न 64.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों की कृषि की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • कृषि भूमि पर राज्य का सर्वोपरि नियंत्रण होता था।
  • सरकार द्वारा कृषि को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से किसानों को विशेष सहूलतें दी जाती थीं।

प्रश्न 65.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों में स्थित किन्हीं चार प्रसिद्ध उद्योगों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  • कागज़ उद्योग
  • आभूषण उद्योग
  • रेशम उद्योग
  • चमड़ा उद्योग।

प्रश्न 66.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों द्वारा विदेशों को निर्यात की जाने वाली किन्हीं चार वस्तुओं के नाम लिखें।
उत्तर:

  • कागज़
  • चीनी
  • खजूर
  • बारूद।

प्रश्न 67.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों द्वारा विदेशों से आयात की जाने वाली किन्हीं चार वस्तुओं के नाम लिखें।
उत्तर:

  • रेशम
  • चाय
  • गर्म मसाले
  • सोना।

प्रश्न 68.
मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य में नए शहरों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्या था ? इन शहरों को किस नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:

  • मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य में नए शहरों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य अरब सैनिकों को बसाना था।
  • इन शहरों को मिस्र के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 69.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों में अस्तित्व में आए चार नए शहरों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  • कुफा
  • बसरा
  • काहिरा
  • बग़दाद।

प्रश्न 70.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों के शहरीकरण की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • इन शहरों के केंद्र में एक विशाल एवं भव्य मस्जिद का निर्माण किया जाता था।
  • प्रत्येक शहर में एक केंद्रीय मंडी एवं अन्य छोटी मंडियों का निर्माण किया जाता था।

प्रश्न 71.
सिनेगोग से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
सिनेगोग यहूदियों के प्रार्थना घर को कहा जाता था।

प्रश्न 72.
अरबों, ईरानियों व तुर्कों द्वारा स्थापित राज्यों की बहुसंस्कृति के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(i) अरब साम्राज्य में मुस्लिम, ईसाई एवं यहूदी धर्म के लोग रहते थे।
(ii) ईरानी साम्राज्य में मुस्लिम तथा एशियाई संस्कृतियों का विकास हुआ।
(iii) तुर्की साम्राज्य में मिस्री, इरानी, सीरियाई तथा भारतीय संस्कृतियों का विकास हुआ।

प्रश्न 73.
सूफ़ी कौन थे? उनकी दो शिक्षाएँ लिखें।
उत्तर:

  • सूफ़ी इस्लाम से संबंधित एक संप्रदाय था।
  • अल्लाह एक है। वह सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिशाली है।
  • सूफी मत में पीर को विशेष महत्त्व दिया जाता है। वह अपने शिष्यों को अंधकार से ज्योति की ओर ले जाता है।

प्रश्न 74.
राबिया कौन थी ?
उत्तर:

  • वह सूफ़ी मत से संबंधित प्रथम प्रसिद्ध महिला संत थी।
  • वह बसरा की रहने वाली थी।
  • उसने अल्लाह की प्रशंसा में अनेक छोटी कविताएँ लिखीं।

प्रश्न 75.
बयाज़िद बिस्तामी क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • वह ईरान का एक प्रसिद्ध सूफ़ी संत था।
  • उसके समकालीन प्रसिद्ध सूफी संतों के साथ गहरे संबंध थे।
  • उसने फ़ना (खुदा में लीन) का उपदेश दिया।

प्रश्न 76.
धुलनुन मिस्त्री कौन था ?
उत्तर:

  • वह मिस्र का एक प्रसिद्ध सूफी संत था।
  • उसने लोगों को मानवता के साथ प्रेम का संदेश दिया।
  • उसकी 861 ई० में मिस्र में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 77.
इब्न सिना कौन था ?
उत्तर:

  • वह मध्यकाल में अरब का एक महान् दार्शनिक एवं चिकित्सक था।
  • उसने अल-कानून-फिल-तिब नामक प्रसिद्ध चिकित्सक ग्रंथ लिखा।
  • उसे यूरोप में एविसेन्ना के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 78.
अबू नुवास क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • वह खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद का प्रसिद्ध दरबारी कवि था।
  • उसने दरबारी जीवन पर अनेक कविताएँ लिखीं।
  • उसने शराब एवं प्रेम जैसे अनेक इस्लाम में प्रतिबंधित विषयों को छुआ।

प्रश्न 79.
रुदकी कौन था ?
उत्तर:

  • वह समानी दरबार का एक महान् कवि था।
  • उसे नयी फ़ारसी कविता का जनक माना जाता है।
  • उसने अनेक गज़लें एवं रुबाइयाँ लिखीं।

प्रश्न 80.
उमर खय्याम क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • वह अरब का एक महान् कवि, खगोल वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ था।
  • उसने फ़ारसी में अनेक उच्च कोटि की रुबाइयाँ लिखीं।
  • उसने रिसाला नामक ग्रंथ की रचना की।

प्रश्न 81.
फिरदौसी कौन था? उसकी रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:

  • वह महमूद गजनवी का प्रसिद्ध दरबारी कवि था।
  • उसने फ़ारसी में प्रसिद्ध ग्रंथ शाहनामा की रचना की।

प्रश्न 82.
कलीला व दिमना क्या है ?
उत्तर:
कलीला व दिमना एक पुस्तक का नाम है। इसमें जानवरों की कहानियों का संग्रह है। इब्न-अल मुक्फ्फा ने इस पुस्तक का पहलवी से अरबी में अनुवाद किया। यह मूल रूप से संस्कृत की प्रसिद्ध पुस्तक पंचतंत्र का अनुवाद है।

प्रश्न 83.
‘एक हजार एक रातें’ क्या है ?
उत्तर:
यह अनेक प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह है। इसे अरबी रातें के नाम से भी जाना जाता है। इन कहानियों को शहरजाद द्वारा अपने पति को सुनाया गया था। इन कहानियों का उद्देश्य मनोरंजन एवं शिक्षा देना था।

प्रश्न 84.
अल-जहीज कौन था ?
उत्तर:
वह बसरा का एक प्रसिद्ध लेखक था। वह यूनानी दर्शन से बहुत प्रभावित था। उसने किताब-अल बुखाला एवं किताब-अल-हैवान नामक प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं। इनमें कंजूसों एवं जानवरों की कहानियाँ दी गई हैं।

प्रश्न 85.
ताबरी क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
वह अरब का एक महान इतिहासकार था। उसने तारीख-अल-रसल-वल मलक नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें संसार के आरंभ से लेकर 915 ई. तक के इतिहास का वर्णन किया गया है। इसे एक प्रामाणिक एवं विश्वसनीय ग्रंथ माना जाता है। इसका अंग्रेजी में 38 खंडों में अनुवाद किया गया है।

प्रश्न 86.
अल्बरुनी कौन था? उसकी रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
वह 11वीं शताब्दी का एक महान् विद्वान् एवं इतिहासकार था। वह महमूद गजनवी का प्रसिद्ध दरबारी था। वह महमूद गज़नवी के साथ भारत आया था। उसने आँखों देखी घटनाओं के आधार पर तहकीक-मा-लिल हिंद नामक ग्रंथ की रचना की। इसे तारीख-ए-हिंद के नाम से भी जाना जाता है। यह 11वीं शताब्दी भारतीय इतिहास को जानने का एक प्रमुख स्रोत है।

प्रश्न 87.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों में बनाई गई मस्जिदों की कोई दो विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:

  • प्रत्येक मस्जिद में एक खुला बरामदा होता था। यहाँ लोग नमाज पढ़ते थे।
  • प्रत्येक मस्जिद के साथ एक मीनार होती थी। यहाँ मुल्ला चढ़ कर बाँग देता था ताकि लोग नमाज़ के लिए एकत्र हो सकें।

प्रश्न 88.
धर्मयुद्ध किनके मध्य चले ? इन धर्मयुद्धों की संख्या कितनी थी ?
उत्तर:

  • धर्मयुद्ध ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य चले।
  • इन धर्मयुद्धों की संख्या 8 थी।

प्रश्न 89.
धर्मयों के कोई दो प्रमख कारण लिखें।
उत्तर:

  • अरबों ने 638 ई० में जेरुसलम पर अधिकार कर लिया था। ईसाई इसे सहन करने को तैयार नहीं
  • सल्जुक तुर्क जेरुसलम में रहने वाले ईसाइयों पर घोर अत्याचार कर रहे थे।

प्रश्न 90.
प्रथम धर्मयुद्ध कब से लेकर कब तक चला ? इस धर्मयुद्ध में कौन विजयी रहा ?
उत्तर:

  • प्रथम धर्मयुद्ध 1096 ई० से 1099 ई० तक चला।
  • इस धर्मयुद्ध में ईसाई विजयी रहे।

प्रश्न 91.
द्वितीय धर्मयद्ध कब आरंभ हआ ? यह कब तक चला ?
उत्तर:

  • द्वितीय धर्मयुद्ध 1147 ई० में आरंभ हुआ।
  • यह 1149 ई० तक चला।

प्रश्न 92.
तृतीय धर्मयुद्ध कब आरंभ हुआ ? इसमें सम्मिलित किन्हीं दो यूरोपीय शासकों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • तृतीय धर्मयुद्ध 1189 ई० में आरंभ हुआ।
  • इसमें सम्मिलित दो यूरोपीय शासकों के नाम जर्मनी का शासक फ्रेडरिक बारबरोसा एवं फ्रांस का शासक फिलिप ऑगस्ट्स था।

प्रश्न 93.
यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का क्या प्रभाव पड़ा ?
अथवा
धर्मयुद्धों के क्या परिणाम निकले ?
उत्तर:

  • धर्मयुद्धों के कारण पोप की प्रतिष्ठा में बहुत वृद्धि हुई।
  • इसने यूरोप में सामंतवाद के पतन की प्रक्रिया को तीव्र कर दिया।
  • धर्मयुद्धों के कारण ईसाइयों एवं मुसलमानों के संबंधों में कटुता आ गई।

रिका स्थान भरिए

1. अरब में इस्लाम का उदय …………….. ई० में हुआ।
उत्तर:
612

2. पैंगबर मुहम्मद का जन्म ……………. ई० में हुआ।
उत्तर:
570

3. पैगंबर मुहम्मद ने …………… के विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
उत्तर:
इस्लाम

4. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु …………….. ई० में हुई।
उत्तर:
632

5. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् …………… संस्था का निर्माण हुआ।
उत्तर:
खिलाफ़त

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

6. बाइजेंटाइन साम्राज्य …………….. धर्म को बढ़ावा देता था।
उत्तर:
ईसाई

7. ससानी साम्राज्य …………… धर्म को संरक्षण देता था।
उत्तर:
ज़रतुश्त

8. अरब साम्राज्य में गैर-मुस्लिम लोगों को …………….. तथा …………….. कर अदा करने पड़ते थे।
उत्तर:
खराज, जज़िया

9. अरब साम्राज्य में ‘ऊँटों की लड़ाई’ …………… ई० में हुई।
उत्तर:
656

10. अब्बासी क्रांति अरब में …………….. ई० में आई।
उत्तर:
750

11. अब्बासियों ने ……………. को अपनी राजधानी घोषित किया।
उत्तर:
बग़दाद

12. गज़नी सल्तनत की स्थापना …………….. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
अल्पतिगीन

13. खलीफ़ा अल-कायम ने ……………. को सुलतान की उपाधि प्रदान की।
उत्तर:
तुगरिल बेग

14. प्रथम धर्मयुद्ध का आरंभ …………….. ई० में हुआ।
उत्तर:
1096

15. ……………. ई० में तीसरे धर्मयुद्ध का आरंभ हुआ।
उत्तर:
1189

16. अरब साम्राज्य के लोगों का मुख्य व्यवसाय …………….. था।
उत्तर:
कृषि

17. बयाज़िद बिस्तामी सूफी संत …………….. का रहने वाला था।
उत्तर:
ईरान

18. शाहनामा नामक पुस्तक की रचना …………….. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
फिरदौसी

19. बसरा के अल-जहीज ने …………….. पुस्तक की रचना की।
उत्तर:
किताब अल-बुखाला,

20. मंगोलों ने बगदाद पर ………….. ई० में अधिकार किया।
उत्तर:
1258

बह-विकल्पीय प्रश्न

1. केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों की जानकारी का हमारा प्रमुख स्त्रोत क्या है ?
(क) तवारीख
(ख) कुरान
(ग) जीवनियाँ
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

2. प्रशासनिक इतिहास का बढ़िया स्त्रोत किसे माना जाता है ?
(क) पेपाइरस
(ख) सिक्के
(ग) शिलालेख
(घ) हदीथ।
उत्तर:
(क) पेपाइरस

3. इस्लाम के उदय से पूर्व अरबों के धार्मिक जीवन की प्रमुख विशेषता क्या थी ?
(क) अरब अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे
(ख) अरब मूर्तियों की उपासना करते थे ।
(ग) अरबों की तीन प्रमुख देवियां अल-उज्जा, अल-लत एवं अल-मना थीं
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

4. अरब में कबीले का मुखिया क्या कहलाता था ?
(क) शेख
(ख) मवाली
(ग) उम्मा
(घ) मुरव्वा।
उत्तर:
(क) शेख

5. अरब में किन लोगों की प्रमुखता थी ?
(क) कुरैश
(ख) बदू
(ग) मुसलमान
(घ) मवाली।
उत्तर:
(ख) बदू

6. इस्लाम का संस्थापक कौन था ?
(क) पैगंबर मुहम्मद
(ख) अबू बकर
(ग) चंगेज़ खाँ
(घ) उथमान।
उत्तर:
(क) पैगंबर मुहम्मद

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

7. इस्लाम की स्थापना कब की गई थी ?
(क) 7वीं शताब्दी में
(ख) 8वीं शताब्दी में
(ग) 9वीं शताब्दी में
(घ) 10वीं शताब्दी में।
उत्तर:
(क) 7वीं शताब्दी में

8. पैगंबर मुहम्मद का जन्म कब हुआ था ?
(क) 570 ई० पू० में
(ख) 570 ई० में
(ग) 610 ई० में
(घ) 612 ई० में।
उत्तर:
(ख) 570 ई० में

9. पैगंबर मुहम्मद का जन्म कहाँ हुआ था ?
(क) मदीना में
(ख) मक्का में
(ग) कुफा में
(घ) दमिश्क में।
उत्तर:
(ख) मक्का में

10. पैगंबर मुहम्मद का संबंध किस कबीले से था ?
(क) हाशिम
(ख) अब्बास
(ग) कुरैश
(घ) उमय्यद।
उत्तर:
(क) हाशिम

11. पैगंबर मुहम्मद को जब इलहाम प्राप्त हुआ तो उस समय उनकी आयु क्या थी ?
(क) 30 वर्ष
(ख) 35 वर्ष
(ग) 40 वर्ष
(घ) 42 वर्ष।
उत्तर:
(ग) 40 वर्ष

12. मुहम्मद साहिब ने अपने पैगंबर होने की घोषणा कब की ?
अथवा
पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रचार कार्य कब आरंभ किया ?
(क) 610 ई० में
(ख) 612 ई० में
(ग) 615 ई० में
(घ) 622 ई० में।
उत्तर:
(ख) 612 ई० में

13. पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रथम प्रवचन कहाँ किया ?
(क) मक्का में
(ख) मदीना में
(ग) ईरान में
(घ) बद्र में।
उत्तर:
(क) मक्का में

14. इस्लाम में किस घटना को हिजरत कहा जाता है ?
(क) जब पैगंबर मुहम्मद का जन्म हुआ
(ख) जब पैगंबर मुहम्मद को ज्ञान प्राप्त हुआ
(ग) जब पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रचार आरंभ किया
(घ) जब पैगंबर महम्मद मक्का से मदीना गए।
उत्तर:
(घ) जब पैगंबर महम्मद मक्का से मदीना गए।

15. पैगंबर मुहम्मद मक्का से मदीना कब गए ?
अथवा
पैगंबर मुहम्मद ने हिजरत कब की ?
(क) 612 ई० में
(ख) 615 ई० में
(ग) 622 ई० में
(घ) 632 ई० में।
उत्तर:
(ग) 622 ई० में

16. इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत कब से हुई ?
(क) 622 ई० में
(ख) 632 ई० में
(ग) 570 ई० में
(घ) 612 ई० में।
उत्तर:
(क) 622 ई० में

17. बद्र की लड़ाई कब हुई थी ?
(क) 612 ई० में
(ख) 622 ई० में
(ग) 624 ई० में
(घ) 634 ई० में।
उत्तर:
(ग) 624 ई० में

18. पैगंबर महम्मद ने मक्का पर कब विजय प्राप्त की ?
(क) 627 ई० में
(ख) 628 ई० में
(ग) 630 ई० में
(घ) 635 ई० में।
उत्तर:
(ग) 630 ई० में

19. पैगंबर मुहम्मद ने किसे इस्लामी साम्राज्य की राजधानी घोषित किया ?
(क) काबा को
(ख) मक्का को
(ग) मदीना को
(घ) जेरुसलम को।
उत्तर:
(ग) मदीना को

20. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु कब हुई थी ?
(क) 612 ई० में
(ख) 622 ई० में
(ग) 632 ई० में
(घ) 637 ई० में।
उत्तर:
(ग) 632 ई० में

21. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु कहाँ हुई थी ?
(क) ईरान में
(ख) मदीना में
(ग) मक्का में
(घ) सीरिया में।
उत्तर:
(ख) मदीना में

22. इस्लाम की धार्मिक पुस्तक है
(क) सुन्नत
(ख) हदीस
(ग) कुरान
(घ) कयास।
उत्तर:
(ग) कुरान

23. कुरान किस भाषा में लिखी गई थी ?
(क) उर्दू में
(ख) फ़ारसी में
(ग) अरबी में
(घ) अंग्रेजी में।
उत्तर:
(ग) अरबी में

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24. पैगंबर मुहम्मद के उपदेशों का संग्रह किस नाम से जाना जाता है ?
(क) कुरान
(ख) हदीस
(ग) सुन्नत
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(क) कुरान

25. पैगंबर मुहम्मद की शिक्षा थी
(क) अल्लाह एक है
(ख) मूर्ति पूजा मत करो
(ग) पवित्र जीवन व्यतीत करो
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

26. प्रत्येक मुसलमान के लिए एक दिन में कितनी बार नमाज पढ़ना आवश्यक है ?
(क) एक बार
(ख) दो बार
(ग) पाँच बार
(घ) सात बार।
उत्तर:
(ग) पाँच बार

27. खिलाफ़त का उद्देश्य क्या था ?
(क) इस्लाम की रक्षा एवं प्रसार करना
(ख) कबीलों पर नियंत्रण स्थापित करना
(ग) राज्य के लिए संसाधन जुटाना
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

28. मुसलमानों का प्रथम खलीफ़ा कौन था ?
(क) अबू बकर
(ख) उमर
(ग) अली
(घ) उथमान।
उत्तर:
(क) अबू बकर

29. अबू बकर मुसलमानों का प्रथम खलीफ़ा कब नियुक्त हुआ था ?
(क) 622 ई० में
(ख) 632 ई० में
(ग) 634 ई० में
(घ) 642 ई० में।
उत्तर:
(ख) 632 ई० में

30. निम्नलिखित में से कौन-सा कर गैर-मुसलमानों से प्राप्त किया जाता था ?
(क) जकात
(ख) जज़िया
(ग) फे
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) जज़िया

31. भिम्मीस से क्या अभिप्राय है ?
(क) ये संरक्षित लोग थे
(ख) ये जिला अधिकारी थे
(ग) ये भू-राजस्व अधिकारी थे
(घ) ये शासक वर्ग से संबंधित थे।
उत्तर:
(क) ये संरक्षित लोग थे

32. ऊँटों की लड़ाई कब हुई ?
(क) 644 ई० में
(ख) 645 ई० में
(ग) 656 ई० में
(घ) 657 ई० में।
उत्तर:
(ग) 656 ई० में

33. उमय्यद वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) अली
(ख) उथमान
(ग) मुआविया
(घ) अल मंसूर।
उत्तर:
(ग) मुआविया

34. निम्नलिखित में से किस खलीफ़ा ने दमिश्क को अपनी राजधानी बनाया ?
(क) मुआविया
(ख) अली
(ग) अब्द-अल-मलिक
(घ) याजिद।
उत्तर:
(क) मुआविया

35. उमय्यद वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा कौन था ?
(क) मुआविया
(ख) अब्द-अल-मलिक
(ग) याजिद
(घ) सुलेमान।
उत्तर:
(ख) अब्द-अल-मलिक

36. उस खलीफ़ा का नाम बताएं जिसे ‘राजाओं का पिता’ कहा जाता था।
अथवा
उस खलीफ़ा का नाम बताएँ जिसने इस्लामी सिक्कों का प्रचलन किया।
(क) अब्द-अल-मलिक
(ख) अल मंसूर
(ग) अल महदी
(घ) उथमान।
उत्तर:
(क) अब्द-अल-मलिक

37. अब्द-अल-मलिक ने ‘डोम ऑफ़ दी रॉक’ नामक प्रसिद्ध मस्जिद का निर्माण कहाँ करवाया था ?
(क) मदीना में
(ख) समारा में
(ग) जेरुसलम में
(घ) बग़दाद में।
उत्तर:
(ग) जेरुसलम में

38. अब्द-अल-मलिक के सिक्कों पर कौन-सी भाषा अंकित थी ?
(क) उर्दू
(ख) अरबी
(ग) फ़ारसी
(घ) पहलवी।
उत्तर:
(ख) अरबी

39. उमय्यद वंश का अंतिम खलीफ़ा कौन था ?
(क) मुआविया
(ख) अब्द-अल-मलिक
(ग) वालिद द्वितीय
(घ) मारवान द्वितीय।
उत्तर:
(घ) मारवान द्वितीय।

40. उमय्यद वंश के पतन के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कारण उत्तरदायी था ?
(क) उमय्यद वंश के अधिकाँश खलीफे विलासप्रिय थे
(ख) उमय्यद वंश के अधिकारी स्वार्थी थे
(ग) शिया वंश के लोग उमय्यद शासन के कट्टर विरोधी थे
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

41. किस आंदोलन ने उमय्यद वंश को उखाड़ फेंका ?
(क) दवा
(ख) धर्मयुद्ध
(ग) जिहाद
(घ) मवाली।
उत्तर:
(क) दवा

42. अब्बासी वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) अबू बकर
(ख) अली
(ग) मुआविया
(घ) अबू-अल-अब्बास।
उत्तर:
(घ) अबू-अल-अब्बास।

43. अब्बासी कौन थे ?
(क) पैगंबर मुहम्मद के चाचा अल-अब्बास के वंशज
(ख) पैगंबर मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशज
(ग) अबू बकर के वंशज
(घ) अब्बास नगर के निवासी।
उत्तर:
(क) पैगंबर मुहम्मद के चाचा अल-अब्बास के वंशज

44. अब्बासियों की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) बग़दाद
(ख) कुफा
(ग) मक्का
(घ) मदीना।
उत्तर:
(क) बग़दाद

45. अब्बासी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा कौन था ?
(क) अबू-अल-अब्बास
(ख) हारुन-अल-रशीद
(ग) अल-अमीन
(घ) अल-मामुन।
उत्तर:
(ख) हारुन-अल-रशीद

46. किस मंगोल नेता ने 1258 ई० में बग़दाद पर कब्जा कर लिया था ?
(क) चंगेज़ खाँ ने
(ख) हुलेगू ने
(ग) अब्दुल्ला ने
(घ) कुबलई खाँ ने।
उत्तर:
(ख) हुलेगू ने

47. ताहिरी वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) ताहिर
(ख) याकूब
(ग) तलहा
(घ) अल्पतिगीन।
उत्तर:
(क) ताहिर

48. तुलुनी वंश की स्थापना कहाँ हुई थी ?
(क) मिस्र में
(ख) खुरासान में
(ग) ट्रांसोक्सियाना में
(घ) समरकंद में।
उत्तर:
(क) मिस्र में

49. बुवाही वंश की स्थापना कहाँ की गई थी ?
(क) डेलाम में
(ख) काहिरा में
(ग) समरकंद में
(घ) फुस्तात में।
उत्तर:
(क) डेलाम में

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50. फ़ातिमी वंश की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) बग़दाद
(ख) कुफा
(ग) काहिरा
(घ) दमिश्क।
उत्तर:
(ग) काहिरा

51. फ़ातिमा कौन थी ?
(क) पैगंबर मुहम्मद की बेटी
(ख) खलीफ़ा उमर की बेटी
(ग) फ़ातिमी वंश की संस्थापक
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) पैगंबर मुहम्मद की बेटी

52. गजनवी वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) सुबकतिगीन
(ख) अल्पतिगीन
(ग) महमूद गज़नवी
(घ) अल्प अरसलन।
उत्तर:
(ख) अल्पतिगीन

53. सल्जुक तुर्कों ने किसे अपनी राजधानी घोषित किया था ?
(क) बग़दाद को
(ख) काहिरा को
(ग) निशापुर को
(घ) मक्का को।
उत्तर:
(ग) निशापुर को

54. केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
(क) कृषि
(ख) व्यापार
(ग) उद्योग
(घ) पशुपालन।
उत्तर:
(क) कृषि

55. अरब की सबसे प्रसिद्ध पैदावार क्या थी ?
(क) खजूर
(ख) कपास
(ग) चाय
(घ) पटसन।
उत्तर:
(क) खजूर

56. मध्यकाल में समरकंद किस उद्योग के लिए प्रसिद्ध था ?
(क) कागज़ उद्योग
(ख) आभूषण उद्योग
(ग) वस्त्र उद्योग
(घ) चमड़ा उद्योग।
उत्तर:
(क) कागज़ उद्योग

57. केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों में निम्नलिखित में से कौन-सा नगर व्यापार के लिए प्रसिद्ध था ?
(क) बगदाद
(ख) दमिश्क
(ग) अलेपो
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

58. बसरा शहर कहाँ स्थित है ?
(क) ईरान में
(ख) इराक में
(ग) मिस्र में
(घ) चीन में।
उत्तर:
(ख) इराक में

59. काहिरा शहर कहाँ स्थित है ?
(क) फ्राँस में
(ख) इराक में
(ग) इटली में
(घ) मिस्र में।
उत्तर:
(घ) मिस्र में।

60. केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों में किस प्रकार के सिक्के प्रचलित थे ?
(क) स्वर्ण
(ख) चाँदी
(ग) ताँबा
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

61. केंद्रीय इस्लामी प्रदेश स्वर्ण कहाँ से प्राप्त करते थे ?
(क) एशिया से
(ख) अफ्रीका से
(ग) अमरीका से
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ख) अफ्रीका से

62. गेनिज़ा अभिलेख कहाँ से प्राप्त हुए थे ?
(क) फुस्तात से
(ख) काहिरा से
(ग) बग़दाद से
(घ) समरकंद से।
उत्तर:
(क) फुस्तात से

63. राबिया कहाँ की प्रसिद्ध महिला संत थी ?
(क) कुफा की
(ख) बसरा की
(ग) बग़दाद की
(घ) समरकंद की।
उत्तर:
(ख) बसरा की

64. बयाजिद बिस्तामी का संबंध किस देश से था ?
(क) ईरान से
(ख) इराक से
(ग) स्पेन से
(घ) अफ़गानिस्तान से।
उत्तर:
(क) ईरान से

65. निम्नलिखित में से कौन काहिरा का प्रसिद्ध सूफी संत था ?
(क) बयाज़िद बिस्तामी
(ख) धुलनुन मिस्त्री
(ग) इन-अल-फ़रीद
(घ) मंसूर-अल-हल्लाज।
उत्तर:
(ग) इन-अल-फ़रीद

66. इब्न सिना को यूरोप में किस नाम से जाना जाता था ?
(क) ताबरी
(ख) बालाधुरी
(ग) एविसेन्ना
(घ) अबू नुवास।
उत्तर:
(ग) एविसेन्ना

67. उमर ख्य्याम का नाम क्यों प्रसिद्ध है ?
(क) नाटकों के लिए
(ख) कहानियों के लिए
(ग) गज़लों के लिए
(घ) रुबाइयों के लिए।
उत्तर:
(घ) रुबाइयों के लिए।

68. उमर खय्याम द्वारा लिखित पुस्तक का नाम क्या था ?
(क) शाहनामा
(ख) पंचतंत्र
(ग) एक हजार एक रातें
(घ) रिसाला।
उत्तर:
(घ) रिसाला।

69. शाहनामा का लेखक कौन था ?
(क) फिरदौसी
(ख) रुदकी
(ग) मसूदी
(घ) अल-जहीज।
उत्तर:
(क) फिरदौसी

70. ‘एक हजार एक रातें’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना किस भाषा में की गई थी ?
(क) फ़ारसी में
(ख) अरबी में
(ग) पहलवी में
(घ) उर्दू में।
उत्तर:
(क) फ़ारसी में

71. अल-जहीज़ कहाँ का प्रसिद्ध लेखक था ?
(क) काहिरा का
(ख) कुफा का
(ग) बग़दाद का
(घ) बसरा का।
उत्तर:
(घ) बसरा का।

72. अरब का महान् इतिहासकार किसे माना जाता है ?
(क) ताबरी को
(ख) अल्बरुनी को
(ग) मुकदसी को
(घ) अल-जहीज को।
उत्तर:
(क) ताबरी को

73. ताबरी की प्रसिद्ध रचना का नाम क्या है ?
(क) तहकीक मा लिल हिंद
(ख) तारीख अल-रसूल वल मुलक
(ग) किताब-अल-हैवान
(घ) अहसान-अल-तकसीम।
उत्तर:
(ख) तारीख अल-रसूल वल मुलक

74. ‘तहकीक-मा-लिल हिंद’ का लेखक कौन था ?
(क) अल्बरुनी
(ख) मसूदी
(ग) बालाधुरी
(घ) अल-जहीज।
उत्तर:
(क) अल्बरुनी

75. डोम ऑफ़ दी रॉक नामक प्रसिद्ध मस्जिद का निर्माण कहाँ किया गया था ?
(क) बगदाद में
(ख) काहिरा में
(ग) जेरुसलम में
(घ) कुफा में।
उत्तर:
(ग) जेरुसलम में

76. धर्मयुद्ध किनके मध्य हुए?
(क) यहूदियों एवं ईसाइयों के मध्य
(ख) ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य
(ग) पारसियों एवं मुसलमानों के मध्य
(घ) मुसलमानों एवं हिंदुओं के मध्य।
उत्तर:
(ख) ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य

77. किस स्थान को लेकर ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य धर्मयुद्ध हुए ?
(क) बगदाद
(ख) मक्का
(ग) मदीना
(घ) जेरुसलम।
उत्तर:
(घ) जेरुसलम।

78. प्रथम धर्मयुद्ध कब आरंभ हुआ?
(क) 1095 ई० में
(ख) 1096 ई० में
(ग) 1097 ई० में
(घ) 1098 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1096 ई० में

79. प्रथम धर्मयुद्ध के दौरान निम्नलिखित में से किसकी पराजय हुई ?
(क) ईसाइयों की
(ख) मुसलमानों की
(ग) पारसियों की
(घ) यहूदियों की।
उत्तर:
(ख) मुसलमानों की

80. द्वितीय धर्मयुद्ध कब से लेकर कब तक चला?
(क) 1144 ई० से 1149 ई० तक
(ख) 1145 ई० से 1147 ई० तक
(ग) 1146 ई० से 1150 ई० तक
(घ) 1147 ई० से 1149 ई० तक।
उत्तर:
(घ) 1147 ई० से 1149 ई० तक।

81. सलादीन कहाँ का शासक था?
(क) मिस्र का
(ख) बग़दाद का
(ग) रोम का
(घ) फ्राँस का।
उत्तर:
(क) मिस्र का

82. तृतीय धर्मयुद्ध कब आरंभ हुआ था?
(क) 1187 ई० में
(ख) 1189 ई० में
(ग) 1191 ई० में
(घ) 1291 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1189 ई० में

83. ईसाइयों एवं मुसलमानों में कुल कितने धर्मयुद्ध हुए थे?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) आठ।
उत्तर:
(घ) आठ।

इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई० HBSE 11th Class History Notes

→ सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में बहुत पिछड़ा हुआ था। अरब के बदू लोग खानाबदोशी जीवन व्यतीत करते थे। लूटमार करना एवं आपस में झगड़ना उनके लिए एक सामान्य बात थी।

→  समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। लोगों का नैतिक स्तर अपने न्यूनतम स्तर पर था।

→ समाज में दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था। उस समय अरब में कृषि, उद्योग एवं व्यापार उन्नत न थे। अरब लोगों में मूर्ति पूजा का व्यापक प्रचलन था तथा वे अंध-विश्वासों में विश्वास रखते थे।

→ उस समय अरब लोग अनेक कबीलों में बँटे हुए थे। प्रत्येक कबीले का मुखिया एक शेख होता था। उसका चुनाव व्यक्तिगत साहस एवं बुद्धिमत्ता के आधार पर किया जाता था।

→ 570 ई० में इस्लाम के संस्थापक पैगंबर मुहम्मद का जन्म कुरैश कबीले में हुआ। माता-पिता की शीघ्र मृत्यु के कारण उनका बचपन अनेक कठिनाइयों में व्यतीत हुआ। 595 ई० में खदीजा के साथ उनका विवाह उनके जीवन में एक नया मोड़ प्रमाणित हुआ। 610 ई० में पैगंबर मुहम्मद को मक्का की हीरा नामक गुफ़ा में नया ज्ञान प्राप्त हुआ।

→ यह ज्ञान उन्हें महादूत जिबरील ने दिया। 612 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का में अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश दिया। इस अवसर पर उन्होंने एक नए समाज का गठन किया जिसे उम्मा का नाम दिया गया।

→ मक्का के लोग पैगंबर मुहम्मद के विचारों से सहमत न थे। अत: वे उसके दुश्मन बन गए। बाध्य होकर 622 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से मदीना को हिज़रत की। 630 ई० में उन्होंने मक्का पर विजय प्राप्त की। निस्संदेह यह उनके जीवन की एक महान् सफलता थी।

→ पैगंबर मुहम्मद ने लोगों को एक अल्लाह, आपसी भाईचारे, सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने एवं स्त्रियों का सम्मान करने का संदेश दिया। उनकी इन शिक्षाओं का लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा एवं वे बड़ी संख्या में इस्लाम में सम्मिलित हुए। 632 ई० में पैगंबर मुहम्मद हमें सदैव के लिए अलविदा कह गए।

→ पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् खिलाफ़त संस्था का उदय हुआ। इसका प्रमुख उद्देश्य इस्लाम का प्रसार करना एवं कबीलों पर नियंत्रण रखना था। 632 ई० से लेकर 661 ई० के मध्य चार खलीफ़ों-अबू बकर, उमर, उथमान एवं अली ने शासन किया। इन खलीफ़ों ने इस्लाम के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ ये सभी खलीफ़े पैगंबर मुहम्मद के निकट संबंधी थे। 661 ई० में मुआविया ने उमय्यद वंश की स्थापना की। उसने दमिश्क को इस्लामी साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। उमय्यद वंश का सबसे महान् खलीफ़ा अब्द-अल-मलिक था। उसने 685 ई० से 705 ई० तक शासन किया।

→ उसने इस्लामी सिक्के चलाए, अरबी को राज्य की भाषा घोषित किया एवं जेरुसलम में प्रसिद्ध डोम ऑफ़ दी रॉक नामक मस्जिद का निर्माण किया। उमय्यद वंश के शासकों ने 750 ई० तक

→ शासन किया। 750 ई० में अबू-अल-अब्बास ने अब्बासी वंश की स्थापना की। इस वंश के शासकों ने 1258 ई० तक शासन किया। हारुन-अल-रशीद (786-809 ई०) अब्बासी वंश का सबसे महान् खलीफ़ा प्रमाणित हुआ। 9वीं शताब्दी में अब्बासी साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया था।

→ अतः अनेक सल्तनतों का उदय हुआ। इनमें ताहिरी वंश (820-873 ई०), समानी वंश (874-999 ई०), तुलुनी वंश (868-905 ई०), बुवाही वंश (932-1055 ई०), फ़ातिमी वंश (909-1171 ई०), गज़नवी वंश (962-1186 ई०) एवं सल्जुक वंश (1037-1300 ई०) के नाम उल्लेखनीय हैं।

→ मध्यकालीन इस्लामी देशों की अर्थव्यवस्था काफी प्रफुल्लित थी। इसका कारण यह था कि उन्होंने कृषि एवं उद्योग के क्षेत्र में काफी प्रगति कर ली थी। इस कारण उनके व्यापार को एक नई दिशा प्राप्त हुई। इस काल में सूफ़ी मत का उत्थान हुआ। राबिया, बयाज़िद बिस्तामी, धुलनुन मिस्त्री, मंसूर-अल-हल्लाज़ एवं इब्न-अल-फरीद सूफी मत के लोकप्रिय संत थे।

→ सूफ़ी मत की शिक्षाएँ अत्यंत साधारण थीं। अत: इनका लोगों पर जादुई प्रभाव पड़ा। इस काल में साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय प्रगति हुई। इब्न सिना, अबु नुवास, रुदकी, उमर खय्याम, फिरदौसी, इब्न अल-मुक्फ्फा , अल जहीज, बालाधुरी, ताबरी एवं मसूदी आदि लेखकों ने साहित्य के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया।

→ 1096 ई० से 1272 ई० के मध्य ईसाइयों एवं मुसलमानों में 8 धर्मयुद्ध लड़े गए। इन धर्मयुद्धों का उद्देश्य ईसाइयों द्वारा अपनी पवित्र भूमि जेरुसलम को मुसलमानों के कब्जे से स्वतंत्र करवाना था। इन धर्मयुद्धों के अंत में ईसाई विफल रहे। इन धर्मयुद्धों के दूरगामी परिणाम निकले।

→ 600 ई० से 1200 ई० के दौरान केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों के इतिहास की जानकारी के लिए हमें बड़ी संख्या में विभिन्न स्रोत उपलब्ध हैं। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय ऐतिहासिक एवं अर्ध-ऐतिहासिक रचनाएँ हैं। इनमें से अधिकाँश रचनाएँ अरबी (Arabic) भाषा में हैं।

→ इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय ताबरी (Tabri) की तारीख अल रसूल वल मुलक (Tarikh al-Rasul-Wal Muluk) है। इसमें इस्लामी इतिहास पर बहुमूल्य प्रकाश डाला गया है। अरबी की तुलना में फ़ारसी में लिखे गए ऐतिहासिक ग्रंथ बहुत कम हैं।

→ ये ग्रंथ ईरान एवं मध्य एशिया के इतिहास के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं। सीरियाक (Syriac) भाषा में लिखे गए ईसाई ग्रंथ भी कम संख्या में हैं किंतु ये आरंभिक इस्लाम के इतिहास के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। अर्ध-ऐतिहासिक रचनाओं में जीवन चरित (biographies), पैगंबर मुहम्मद के कथनों एवं कार्यों के रिकॉर्ड (हदीथ) एवं कुरान की टीकाएँ (commentaries) सम्मिलित हैं।

→ इनके अतिरिक्त उस समय की प्रसिद्ध कानूनी पुस्तकें, भूगोल, यात्रा वृतांत एवं साहित्यिक रचनाएँ भी इस्लामी इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान करती हैं।

→ दस्तावेज़ी साक्ष्य (documentary evidence) भी इस्लामी इतिहास के बारे में महत्त्वपूर्ण रोशनी डालते हैं। इनसे हमें उस काल की महत्त्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक जानकारी प्राप्त होती है। इनका महत्त्व इस बात में है कि ये अपने मूल रूप में उपलब्ध हैं तथा इनमें मनमाने ढंग से परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

→ प्रशासनिक इतिहास की जानकारी के लिए यूनानी एवं अरबी पैपाइरस (papyri) तथा गेनिज़ा अभिलेख (Geniza records) काफी उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं। मुद्राशास्त्र (सिक्कों का अध्ययन) तथा पुरालेखशास्त्र (शिलालेखों का अध्ययन) उस काल के आर्थिक, राजनीतिक एवं कला इतिहास की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।

→ वास्तव में इस्लाम के इतिहास ग्रंथ लिखे जाने का कार्य 19वीं शताब्दी में जर्मनी एवं नीदरलैंड के विश्वविद्यालयों के अध्यापकों द्वारा आरंभ किया गया। फ्राँसीसी एवं ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने भी औपनिवेशिक हितों के चलते इस्लाम का अध्ययन किया। ईसाई पादरियों ने भी इस्लाम से संबंधित कुछ पुस्तकें लिखीं।

→ इनका उद्देश्य यद्यपि इस्लाम का ईसाई धर्म से तुलना करना था। इग्नाज़ गोल्डज़िहर (Ignaz Goldziher) जो कि हंगरी का एक प्रसिद्ध यहूदी था

→ हिरा के इस्लामी कॉलेज में अध्ययन किया। उसने जर्मन भाषा में इस्लाम से संबंधित अनेक पुस्तकों की रचना की। इन विद्वानों को अरबी एवं फ़ारसी भाषा की अच्छी जानकारी थी। इन्हें प्राच्यविद (Orientalists) कहा जाता है।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. गारो और खासी पहाड़ियाँ निम्नलिखित में से किसका भाग हैं?
(A) शिवालिक का
(B) नीलगिरि का
(C) दक्कन के पठार का
(D) हिमालय का
उत्तर:
(D) हिमालय का

2. नई दिल्ली की अक्षांश रेखा के दक्षिण में स्थित सबसे ऊंची चोटी का नाम है-
(A) माउंट एवरेस्ट
(B) गुरु शिखर
(C) धूपगढ़
(D) दोदा बेटा
उत्तर:
(A) माउंट एवरेस्ट

3. कश्मीर को शेष भारत से जोड़ने वाला दर्रा है-
(A) कराकोरम
(B) बनिहाल
(C) जोजिला
(D) नाथूला
उत्तर:
(B) बनिहाल

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

4. हिमालय पर्वत का निर्माण निम्नलिखित में से किसके परिणामस्वरूप हुआ था?
(A) महासागर-महासागर प्लेटों के अभिसरण द्वारा
(B) महाद्वीप-महाद्वीप प्लेटों के अभिसरण द्वारा
(C) महाद्वीप-महासागर प्लेटों के अभिसरण द्वारा
(D) महाद्वीप-द्वीपीय चाप के अभिसरण द्वारा
उत्तर:
(B) महाद्वीप-महाद्वीप प्लेटों के अभिसरण द्वारा

5. निम्नलिखित में से किस नगर की पहाड़ी सही नहीं दर्शाई गई है?
(A) ऊटकमंड-नीलगिरि पहाड़ियाँ
(B) माउंट आबू-अन्नामलाई पहाड़ियाँ
(C) कोडाईकनाल-अन्नामलाई पहाड़ियाँ
(D) शिमला-पीरपंजाल पहाड़ियाँ
उत्तर:
(D) शिमला-पीरपंजाल पहाड़ियाँ

6. निम्नलिखित में से किस पर्वत का निर्माण सबसे पहले हुआ था?
(A) विंध्याचल
(B) अरावली
(C) सतपुड़ा
(D) नीलगिरि
उत्तर:
(B) अरावली

7. चंडीगढ़ किस पहाड़ी के नीचे बसी हुई राजधानी है?
(A) सोलन पहाड़ी
(B) मोरनी हिल्स
(C) शिवालिक पहाड़ी
(D) चंडी हिल्स
उत्तर:
(C) शिवालिक पहाड़ी

8. भारत का प्राचीनतम पर्वतक्रम कौन-सा है?
(A) सतपुड़ा
(B) अरावली
(C) विंध्याचल
(D) हिमालय
उत्तर:
(B) अरावली

9. जोजिला दर्रा निम्नलिखित में से किसको जोड़ता है?
(A) कश्मीर एवं तिब्बत
(B) नेपाल एवं तिब्बत
(C) लेह एवं श्रीनगर
(D) लेह एवं करगिल
उत्तर:
(C) लेह एवं श्रीनगर

10. छोटा नागपुर पठार की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है
(A) धूपगढ़
(B) पंचमढ़ी
(C) पारसनाथ
(D) महाबलेश्वर
उत्तर:
(C) पारसनाथ

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

11. तमिलनाडु का सबसे ऊंचा पर्वत शिखर है-
(A) दोदा बेट्टा
(B) धूपगढ़
(C) महेंद्रगिरि
(D) कोडाई कनाल
उत्तर:
(A) दोदा बेट्टा

12. कलिमपोंग को ल्हासा से जोड़ने वाला दर्रा है-
(A) जेलेपला
(B) नाथूला
(C) बोमडिला
(D) शिपकीला
उत्तर:
(A) जेलेपला

13. मिकिर पहाड़ियाँ किस राज्य में विस्तृत हैं?
(A) मेघालय
(B) सिक्किम
(C) असम
(D) झारखंड
उत्तर:
(C) असम

14. मानसरोवर झील व कैलाश के दर्शन करने वाले भारतीय यात्री किन दरों से होकर निकलते हैं?
(A) शिपकीला
(B) माना और नीति दर्रे
(C) कराकोरम
(D) बोलन दर्रा
उत्तर:
(B) माना और नीति दर्रे

15. शिवालिक की अत्यधिक कटी-फटी और बंजर दक्षिणी ढलानों को किस राज्य में ‘चो’ कहा जाता है?
(A) उत्तर प्रदेश
(B) पंजाब
(C) हिमाचल प्रदेश
(D) सिक्किम
उत्तर:
(C) हिमाचल प्रदेश

16. भारत की सबसे ऊंची पर्वत चोटी का नाम है-
(A) माउंट एवरेस्ट
(B) गाडविन ऑस्टिन (K²)
(C) नामचा बरवा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) गाडविन ऑस्टिन (K²)

17. बालटोरो, हिस्पर, बतूरा और बिफाओं क्या हैं?
(A) फर वाले हिमालयी जंतु
(B) तिब्बत हिमालय की चोटियाँ
(C) ट्रांस हिमालय की हिमनदियाँ
(D) कराकोरम की श्रेणियाँ
उत्तर:
(C) ट्रांस हिमालय की हिमनदियाँ

18. केरल के तट पर मिलने वाले लैगून को क्या कहा जाता है?
(A) पयार
(B) बुग्याल
(C) मर्ग
(D) कयाल
उत्तर:
(D) कयाल

19. शिवालिक के गिरिपद क्षेत्र में पहुंचकर जहां छोटी-छोटी नदियां अवसाद के नीचे विलुप्त हो जाती हैं, उसे क्या कहते हैं?
(A) तराई
(B) भाबर
(C) खादर
(D) डेल्टाई प्रदेश
उत्तर:
(B) भाबर

20. निम्नलिखित में से कौन-सा उत्तर से दक्षिण की ओर सही क्रम में है?
(A) विंध्याचल, सतपुड़ा, नीलगिरि, ताप्ती
(B) विंध्याचल, नर्मदा, सतपुड़ा, ताप्ती
(C) नर्मदा, विंध्याचल, ताप्ती, सतपुड़ा
(D) विंध्याचल, ताप्ती, नर्मदा, सतपुड़ा
उत्तर:
(B) विंध्याचल, नर्मदा, सतपुड़ा, ताप्ती

21. धूपगढ़ किस पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी है?
(A) सतपुड़ा
(B) विंध्याचल
(C) अरावली
(D) पूर्वी घाट
उत्तर:
(A) सतपुड़ा

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22. कौन-सी पहाड़ियाँ पश्चिमी घाट से संबंधित नहीं हैं?
(A) नीलगिरि
(B) अन्नामलाई
(C) पालकोंडा
(D) इलायची
उत्तर:
(C) पालकोंडा

23. मुंबई-कोलकाता रेलमार्ग किस दर्रे से होकर निकलता है?
(A) थालघाट
(B) भोर घाट
(C) पाल घाट
(D) शेनकोटा गैप
उत्तर:
(A) थालघाट

24. निम्नलिखित में से सबसे ऊंची चोटी कौन-सी है?
(A) माउंट आबू
(B) महाबलेश्वर
(C) दोदा बेट्टा
(D) अनाईमुड़ी
उत्तर:
(D) अनाईमुड़ी

25. भारत में कोरोमण्डल तट कहाँ विस्तृत है?
(A) कृष्णा से कावेरी तक
(B) महानदी से कृष्णा तक
(C) गोवा से मंगलौर तक
(D) मंगलौर से कन्याकुमारी तक
उत्तर:
(A) कृष्णा से कावेरी तक

26. निम्नलिखित में से कौन-सी पर्वत चोटी भारत में स्थित नहीं है?
(A) के-2
(B) कामेट
(C) माउंट एवरेस्ट
(D) नन्दा देवी
उत्तर:
(C) माउंट एवरेस्ट

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
हिमालय की उत्पत्ति के बारे में नवीनतम तथा सर्वमान्य सिद्धान्त कौन-सा है?
उत्तर:
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त।

प्रश्न 2.
शिलांग का पठार किस भू-आकृतिक विभाग का अंग है?
उत्तर:
प्रायद्वीपीय पठार।

प्रश्न 3.
भारत के पठारी भाग में भ्रंश घाटी से बहने वाली किसी एक नदी का नाम बताओ।
उत्तर:
नर्मदा।

प्रश्न 4.
कश्मीर की पुरानी झीलों की तली के निक्षेपों को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
करेवा।

प्रश्न 5.
भारत के अवशिष्ट पर्वत का नाम बताइए।
उत्तर:
अरावली।

प्रश्न 6.
हिमालय और अरावली में दो समानताएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. दोनों मोड़दार हैं
  2. दोनों का जन्म भू-अभिनति (Geosyncline) से हुआ है।

प्रश्न 7.
भारतीय भू-पृष्ठ का सबसे प्राचीन भाग अथवा वृद्धावस्था की भू-आकृति वाला भाग कौन-सा है?
उत्तर:
प्रायद्वीपीय पठार।

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प्रश्न 8.
भारत का कौन-सा भू-भाग क्रमिक अपरदन चक्र के कारण घिसकर जीर्णावस्था में पहुंच चुका है?
उत्तर:
प्रायद्वीपीय पठार।।

प्रश्न 9.
प्रायद्वीपीय पठारों का जन्म किस युग में हुआ था?
उत्तर:
पूर्व-कैम्ब्रियन युग में।

प्रश्न 10.
पूर्व-कैम्ब्रियन युग कब शुरू हुआ था?
उत्तर:
60 करोड़ वर्ष पूर्व।

प्रश्न 11.
नूतन युग की शुरुआत कब हुई थी?
उत्तर:
अब से सात करोड़ वर्ष पूर्व।

प्रश्न 12.
अरावली पर्वत-श्रेणी का जन्म कब हुआ था?
उत्तर:
विन्ध्य महाकल्प (पैल्योजोइक) में लगभग 40 करोड़ साल पहले।

प्रश्न 13.
प्रायद्वीपीय पठार में अवतलन के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
गोदावरी, महानदी, दामोदर, नर्मदा, ताप्ती, मालाबार व मेकरान के तट भ्रंश घसाव (अवतलन) के उदाहरण हैं।

प्रश्न 14.
प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर-पश्चिमी लावा प्रदेश में कौन-सी मिट्टी पाई जाती है?
उत्तर:
काली मिट्टी।

प्रश्न 15.
अरब सागर का निर्माण किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग के धंसने से।

प्रश्न 16.
आज से सात करोड़ साल पहले वर्तमान हिमालय के स्थान पर क्या था?
उत्तर:
टेथीस सागर जो एक भू-अभिनति था।

प्रश्न 17.
टेथीस सागर के उत्तर व दक्षिण में कौन-से भूखण्ड थे?
उत्तर:
उत्तर में अंगारालैण्ड व दक्षिण में गोण्डवाना लैण्ड।

प्रश्न 18.
हिमालय का जन्म किस दौर में हुआ था?
उत्तर:
टरश्यरी दौर अथवा आल्पाइन दौर में।

प्रश्न 19.
हिमालय का सर्वमान्य विस्तार किन दो नदियों के बीच है?
उत्तर:
सिन्धु तथा ब्रह्मपुत्र।

प्रश्न 20.
पूर्व-पश्चिम दिशा में हिमालय की कुल कितनी लम्बाई है?
उत्तर:
2,400 कि०मी०।

प्रश्न 21.
भारत की सबसे ऊँची पर्वत चोटी का नाम तथा उसकी स्थिति बताइए।
उत्तर:
K2 कराकोरम पर्वत श्रेणी में।

प्रश्न 22.
दो नदियों के बीच का भू-भाग क्या कहलाता है?
उत्तर:
दोआब।

प्रश्न 23.
‘बारी’ दोआब किन दो नदियों के बीच फैला है?
उत्तर:
ब्यास और रावी।

प्रश्न 24.
प्रायद्वीपीय भारत की सबसे ऊँची चोटी का नाम क्या है?
उत्तर:
अनाईमुड़ी।

प्रश्न 25.
नीलगिरि के दक्षिण में पश्चिमी घाट में स्थित दो दरों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. पाल घाट तथा
  2. शेनकोटा गैप।

प्रश्न 26.
प्रायद्वीपीय पठार की औसत ऊँचाई कितनी है?
उत्तर:
600 से 900 मीटर।

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प्रश्न 27.
अण्डमान तथा निकोबार द्वीप-समूह में कितने द्वीप हैं?
उत्तर:
204

प्रश्न 28.
भारत में ज्वालामुखी कहाँ पाए जाते हैं?
उत्तर:
बैरन द्वीप, अण्डमान तथा निकोबार द्वीप समूह में।

प्रश्न 29.
भारत का कौन-सा तटीय मैदान अपेक्षाकृत अधिक चौड़ा है?
उत्तर:
पूर्वी तटीय मैदान।

प्रश्न 30.
भारत के प्रवाल द्वीप कहाँ पाए जाते हैं?
उत्तर:
लक्षद्वीप; अरब सागर में।

प्रश्न 31.
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में स्थित प्रायद्वीपीय पठार का हिस्सा कौन-सा है?
उत्तर:
शिलांग पठार।

प्रश्न 32.
हिमालय पर्वतमाला किस पर्वत प्रणाली का अंग है?
उत्तर:
पामीर की गाँठ।

प्रश्न 33.
शिवालिक श्रेणी के दो अन्य नाम बताइए।
उत्तर:

  1. उप हिमालय तथा
  2. बाह्य हिमालय।

प्रश्न 34.
किस पर्वत श्रेणी को तिब्बत के पठार की रीढ़ कहा जाता है?
उत्तर:
कराकोरम श्रेणी को।

प्रश्न 35.
कराकोरम श्रेणी की दो प्रमख चोटियों के नाम लिखो।
उत्तर:
गाडविन आस्टिंन (K²), हिडन पीक।

प्रश्न 36.
कराकोरम पर्वत की दो श्रेणियों के नाम लिखो।
उत्तर:

  1. अघील
  2. मुजताध।

प्रश्न 37.
कराकोरम श्रेणी की दो प्रमुख हिमनदियों के नाम लिखो।
उत्तर:

  1. बालटोरो
  2. हिस्पर।

प्रश्न 38.
कराकोरम दर्रा किनके बीच द्वार का काम करता है?
उत्तर:
भारत तथा तारिम बेसिन के बीच।

प्रश्न 39.
पंजाब हिमालय कहाँ से कहाँ तक विस्तृत है?
उत्तर:
सिन्धु नदी से सतलुज नदी तक।

प्रश्न 40.
असम हिमालय कहाँ से कहाँ तक है?
उत्तर:
तिस्ता नदी से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के दिहांग दर्रे तक।

प्रश्न 41.
भाबर में अवसाद कौन-सी चट्टानें बनाती हैं?
उत्तर:
पारगम्य चट्टानें।

प्रश्न 42.
भारतीय प्रायद्वीप में विविधता और जटिलता के कौन-से दो कारण हैं?
उत्तर:

  1. भ्रंशन
  2. विभंजन।

प्रश्न 43.
अरावली का उच्चतम शिखर कौन-सा है?
उत्तर:
गुरु शिखर।

प्रश्न 44.
सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी कौन-सी व कहाँ है?
उत्तर:
धूपगढ़ (1350 मीटर)। यह चोटी महादेव पर्वत पर है।

प्रश्न 45.
धुआँधार जलप्रपात किस नदी ने बनाया है और यह कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
नर्मदा नदी ने जबलपुर के पास बनाया है।

प्रश्न 46.
भारत के मुख्य पठार तथा शिलांग के पठार के बीच फैले काँप के निम्न मैदान को क्या कहते हैं?
उत्तर:
गारो-राजमहल खड्ड।

प्रश्न 47.
थालघाट दर्रे से कौन-सा रेलमार्ग निकलता है?
उत्तर:
मुम्बई-कोलकाता रेलमार्ग।

प्रश्न 48.
भोरघाट से कौन-सा रेलमार्ग निकलता है?
उत्तर:
मुम्बई-चेन्नई रेलमार्ग।

प्रश्न 49.
पालघाट से कौन-सा स्थल-मार्ग निकलता है?
उत्तर:
केरल को तमिलनाडु से मिलाने वाली सड़क।

प्रश्न 50.
अण्डमान व निकोबार द्वीप समूह को अलग करने वाले समुद्री भाग का नाम बताओ।
उत्तर:
10° चैनल।

प्रश्न 51.
सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानों में जलोढ़ की औसत गहराई कितनी है?
उत्तर:
1000 से 2000 मीटर।

प्रश्न 52.
मणिपुर घाटी के मध्य में कौन-सी मील स्थित है?
उत्तर:
लोकताक झील।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

प्रश्न 53.
भारत के भूगर्भिक इतिहास को कितने कालों में बाँटा गया है?
उत्तर:
चार।

प्रश्न 54.
नूतन जलोढ़ का क्षेत्र किसे कहा जाता है?
उत्तर:
खादर प्रदेश को।

प्रश्न 55.
पुराना जलोढ़ का क्षेत्र किसे कहा जाता है?
उत्तर:
बाँगर प्रदेश को।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय उपमहाद्वीप के तीन भू-आकृतिक विभागों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. हिमालय तथा उससे संबद्ध पर्वत श्रृंखलाएँ
  2. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान
  3. प्रायद्वीपीय पठार।

प्रश्न 2.
हिमालय की युवावस्था को सिद्ध करने वाले तीन प्रमाण बताइए।
उत्तर:

  1. करेवा
  2. स्तनपायी जीवों के अवशेष
  3. नदी वेदिकाएँ।

प्रश्न 3.
उत्खण्ड क्या होता है?
उत्तर:
पृथ्वी पर ऊपर उठा प्रखण्ड जो पठार के रूप में भ्रंशों के बीच से ऊपर उठता है।

प्रश्न 4.
पठार के भू-स्थलों के उत्थान के दो प्रमाण दीजिए।
अथवा
दक्षिण भारत की जीर्ण एवं वृद्ध स्थलाकृति पर युवा लक्षणों के प्रादुर्भाव के कोई दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. पलनी तथा
  2. नीलगिरि पहाड़ियों का उत्थान।

प्रश्न 5.
हिमालय को वलित पर्वत क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि हिमालय का निर्माण टेथीस सागर की तली में एकत्रित तलछट के वलित होकर ऊपर उठने से हुआ है।

प्रश्न 6.
समस्त भूपटल किन छह मुख्य अथवा प्राचीन प्लेटों में बँटा हुआ है?
उत्तर:

  1. प्रशांती प्लेट
  2. यूरेशियाई प्लेट
  3. अमरीकी प्लेट
  4. भारतीय प्लेट
  5. अफ्रीकी प्लेट
  6. अण्टार्कटिका प्लेट।

प्रश्न 7.
भारत के उत्तरी मैदान का विस्तार कहाँ-से-कहाँ तक है?
उत्तर:
पश्चिम में सिन्धु नदी के डेल्टा से पूर्व में गंगा नदी के डेल्टा तक है।

प्रश्न 8.
भू-अवनति से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जल के उथले लम्बे भाग जिसमें तलछट का जमाव होता है।

प्रश्न 9.
द्रोणी घाटी का अर्थ बताइए।
उत्तर:
भ्रंशन के उपरान्त धरती के धंसाव या निकटवर्ती खण्डों के उत्थान से बनी नदी घाटी द्रोणी घाटी कहलाती है।

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प्रश्न 10.
भारत के पाँच भौतिक विभागों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. हिमालय पर्वत समूह
  2. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान
  3. प्रायद्वीपीय पठार
  4. तटीय मैदान
  5. द्वीप।

प्रश्न 11.
हिमालय की तीन समान्तर श्रेणियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. बृहत् हिमालय
  2. लघु हिमालय
  3. बाह्य हिमालय।

प्रश्न 12.
हिमालय पर्वत समूह के चार तरंगित मैदानों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. अक्साईचिन
  2. दिपसांग
  3. लिंगजिताग (लद्दाख) तथा
  4. देवसाई (नंगा पर्वत के दक्षिण-पूर्व में कश्मीर में)।

प्रश्न 13.
8000 मीटर से ऊँची हिमालय की चार चोटियों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. एवरेस्ट
  2. कंचनजंगा
  3. मकालू
  4. धौलागिरि।

प्रश्न 14.
धाया क्या होता है?
उत्तर:
पंजाब के मैदान में नदियों द्वारा जलौढ़ राशि को तोड़कर बनाए गए वप्र धाया होते हैं।

प्रश्न 15.
पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले तीन दरों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. थाल घाट
  2. पाल घाट
  3. भोर घाट।

प्रश्न 16.
दक्कन पठार की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं के नाम बताएँ।
उत्तर:
पूर्वी सीमा पर राजमहल पहाड़ियाँ तथा पश्चिमी सीमा पर अरावली पर्वत।

प्रश्न 17.
किसी देश के भौतिक विकास में किन तीन दशाओं की निर्णायक भूमिका होती है?
उत्तर:

  1. भौगोलिक संरचना
  2. प्रक्रम
  3. विकास की अवस्था।

प्रश्न 18.
बृहत् हिमालय की औसत ऊँचाई व औसत चौड़ाई बताइए।
उत्तर:
औसत ऊँचाई 6,000 मीटर तथा औसत चौड़ाई 25 कि०मी०।

प्रश्न 19.
दून या दुआर किन्हें कहते हैं?
उत्तर:
लघु हिमालय और शिवालिक के बीच विस्तृत घाटियों को पश्चिम में दून और पूर्व में दुआर कहते हैं।

प्रश्न 20.
‘चौ’ कौन-सी भूमियाँ होती हैं?
उत्तर:
शिवालिक की बंजर व अत्यधिक कटी-फटी दक्षिणी ढलान ‘चौ’ भूमियाँ कहलाती हैं।

प्रश्न 21.
उत्तरी भारत के विशाल मैदान की लम्बाई व चौड़ाई बताइए।
उत्तर:
यह मैदान पश्चिम से पूर्व की ओर 3,200 कि०मी० लम्बा है व इसकी चौड़ाई 150 से 300 कि०मी० है।

प्रश्न 22.
गंगा के मैदान में बिछे तलछट की मोटाई कितनी है?
उत्तर:
समुद्र तल से 3,050 मीटर नीचे तथा पृथ्वी की ऊपरी सतह से 4,000 मीटर नीचे तक।

प्रश्न 23.
खादर प्रदेश उपजाऊ क्यों होते हैं?
उत्तर:
प्रतिवर्ष नदियों की बाढ़ से नए जलौढ़ बिछाने के कारण।

प्रश्न 24.
हिमाद्रि के दक्षिण में स्थित हिमालय की बीच वाली श्रृंखला को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
हिमाद्रि के दक्षिण में स्थित हिमालय की बीच वाली श्रृंखला को हिमाचल के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 25.
हिमालय के किस भाग को पंजाब हिमालय के नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
हिमालय के सतलुज और सिंधु के बीच के भाग को पंजाब हिमालय के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 26.
भाबर क्या है?
उत्तर:
शिवालिक की तलहटी में नदियों द्वारा निक्षेपित भूमि को भाबर कहते हैं।

प्रश्न 27.
भांगर (बांगर) क्या है?
उत्तर:
नदियों के बाढ़ वाले मैदानों के ऊपरी भागों में स्थित भूमियों को बांगर कहते हैं।

प्रश्न 28.
भूड़ क्या होते हैं?
उत्तर:
बाँगर भूमि में पाए जाने वाले बालू के ढेरों को भूड़ कहते हैं।

प्रश्न 29.
शंकुपाद मैदानों का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर:
जब किसी क्षेत्र में शंक व अन्तः शंक मिल जाते हैं।

प्रश्न 30.
अरावली श्रेणी की लम्बाई व ऊँचाई बताइए।
उत्तर:
अरावली श्रेणी 800 कि०मी० लम्बी व इसकी ऊँचाई समुद्र तल से 800 मीटर है।

प्रश्न 31.
लैगून (अनूप) क्या होते हैं?
उत्तर:
लैगून खारे पानी की झीलें होती हैं।

प्रश्न 32.
लैगूनों की रचना कैसे होती है?
उत्तर:
लैगूनों की रचना तट के पास समुद्री जल का एक हिस्सा रोधिका और भू-जिह्वा द्वारा अलग हो जाता है।

प्रश्न 33.
कोंकण तट किसे कहते हैं?
उत्तर:
पश्चिमी तटीय मैदान का दमन से गोवा तक का भाग कोंकण तट कहलाता है।

प्रश्न 34.
कनारा या कन्नड़ तट किसे कहते हैं?
उत्तर:
पश्चिमी तटीय मैदान का गोआ से मंगलौर तक का भाग कन्नड़ तट कहलाता है।

प्रश्न 35.
मालाबार तट किसे कहते हैं?
उत्तर:
मंगलौर से कन्याकुमारी के बीच का पश्चिमी तटीय मैदान मालाबार तट कहलाता है।

प्रश्न 36.
उत्तरी सरकार और कोरोमण्डल तट किसे कहते हैं?
उत्तर:
पूर्वी तटीय मैदान का महानदी से कृष्णा तक का उत्तरी भाग उत्तरी सरकार तथा कृष्णा से कावेरी तक का दक्षिणी भाग कोरोमण्डल तट कहलाता है।

प्रश्न 37.
पूर्वी तट पर पाए जाने वाले प्रमुख लैगूनों का नाम लिखिए।
उत्तर:
चिलका, कोल्लेरू तथा पुलीकट।

प्रश्न 38.
भारत को भू-गर्भीय अजायबघर क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
भारत में सभी महाकल्पों, कल्पों व युगों में उत्पन्न विविध प्रकार की भू-गर्भिक संरचनाएँ एवं भू-आकार देखने को मिलते हैं। इसी आधार पर भारत भू-गर्भीय अजायबघर कहलाता है।

प्रश्न 39.
बृहत् स्तर पर भारत में पाई जाने वाली तीन प्रमुख भू-गर्भिक इकाइयों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. प्रायद्वीपीय पठार
  2. हिमालय की पर्वत श्रेणियाँ
  3. सिन्धु-गंगा एवं ब्रह्मपुत्र का मैदान।

प्रश्न 40.
भारत के प्रायद्वीपीय पठार की उत्खण्ड से तुलना क्यों की जाती है?
उत्तर:
यह पठार प्राचीनतम भू-पर्पटी शैलों से बना हुआ है जिनका जन्म पूर्व कैम्ब्रियन युग में निक्षेपित अवसादों के समुद्र की सतह से ऊपर उठने से हुआ था। एक बार समुद्र से ऊपर उठने के पश्चात् भारत का यह भू-भाग फिर कभी समुद्र में नहीं डूबा। आज तक सपाट भूमि एक दृढ़, अगम्य व अलचीले खण्ड के रूप में कायम है। इसलिए इस पठार की तुलना उत्खण्ड (Horst) से की जाती है।

प्रश्न 41.
भू-अभिनति से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
भू-अभिनति भू-पर्पटी में एक बृहत् गर्त अथवा द्रोणी या सैकड़ों किलोमीटर तक फैली एक गहरी खाई होती है जिसका तल दोनों भू-खण्डों से अपरदित मलबे के निक्षेपण के कारण धीरे-धीरे धंसता जाता है, फलस्वरूप अवसादी शैलों की मोटी परतों का निर्माण होता है। टेथीस सागर भी इसी प्रकार की एक भू-अभिनति था।

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प्रश्न 42.
करेवा क्या है? यह क्या सिद्ध करता है?
उत्तर:
हिमालय के पीरपंजाल क्षेत्र में 1500 से 1850 मीटर की ऊँचाई पर स्थित झीलों की तली में पाए जाने वाली नए अवसादों की परतों को करेवा कहा जाता है। करेवा का होना सिद्ध करता है कि हिमालय एक नवीन वलित पर्वत है जिसके निर्माण की प्रक्रिया प्लीस्टोसीन काल तक होती रही है।

प्रश्न 43.
महाखड्ड क्या होते हैं? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
महाखड्ड उच्च भूमियों या पर्वतों में गम्भीर और विवर होते हैं जिनमें प्रायः नदी बहती है।
उदाहरण-

  • संयुक्त राज्य अमेरिका की कोलेरेडो नदी का महाखड्ड तथा
  • भारत में सिन्धु नदी का महाखड्ड।

प्रश्न 44.
‘दून’ किसे कहते हैं? हिमालय से इसके तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
लघु हिमालय और शिवालिक के बीच कहीं-कहीं सपाट, तलछटी, संरचनात्मक विस्तृत घाटियाँ पाई जाती है जिन्हें पश्चिम में दून (Doon) व पूर्व की ओर दुआर (द्वार) (Duar) कहा जाता है जो वास्तव में हिमालय के प्रवेश द्वार हैं। देहरादून, कोथरीदून, पटलीदून, ऊधमपुर, कोटली, चौखम्भा व ऊना इसी प्रकार की घाटियों में स्थित हैं।

प्रश्न 45.
तराई से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
तराई भाबर के दक्षिण में मैदान का वह भाग होता है जहाँ भाबर की लुप्त नदियाँ पुनः भूतल पर प्रकट होती हैं। परिणामस्वरूप इस प्रदेश में अत्यधिक नमी व दलदल पाए जाते हैं। तराई की रचना बारीक कंकड, पत्थर, रेत और चिकनी मिट्टी से हुई है। पहले यहाँ घने वन और वन्य प्राणी पाए जाते थे परन्तु अब अधिकांश क्षेत्रों में कृषि होने लगी है। यहाँ ऊँची घास, कांस, हाथी घास, भाबर घास और वृक्ष इत्यादि पाए जाते हैं।

प्रश्न 46.
बाँगर प्रदेश क्या होता है?
उत्तर:
पुरानी जलौढ़ मिट्टी के निक्षेप से बने प्रदेश को बाँगर कहा जाता है। यह मैदान का वह ऊँचा उठा हुआ भाग होता है जहाँ नदियों की बाढ़ का जल नहीं पहुंच पाता। इस भाग में कैल्सियमी संग्रथनों जैसे कंकड़ की अधिकता होती है।

प्रश्न 47.
डेल्टा किसे कहते हैं? भारत में इसके चार उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
नदियों के मुहाने पर तलछट के निक्षेप से बनी भू-आकृति को डेल्टा कहते हैं। यह अधिकतर त्रिभुजाकार स्थल-रूप होता है। यह एक समतल उपजाऊ क्षेत्र होता है। भारत में चार मुख्य डेल्टा हैं-

  • गंगा नदी का डेल्टा
  • महानदी का डेल्टा
  • ब्रह्मपुत्र का डेल्टा
  • कावेरी नदी का डेल्टा।

प्रश्न 48.
पामीर की गाँठ से निकलने वाली प्रमुख पर्वत श्रेणियों के नाम बताओ।
उत्तर:
भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित पामीर की गाँठ से अनेक पर्वत श्रेणियाँ बाहर निकलती हैं। पामीर की गाँठ को हम ‘संसार की छत’ (Roof of the World) भी कहते हैं।

  • महान हिमालय
  • कराकोरम श्रेणी
  • हिन्दुकुश पर्वत
  • कुनलुन पर्वत
  • तियेनशान पर्वत
  • पामीर पर्वत
  • अलाय पर्वत।

प्रश्न 49.
हिमालय का प्रादेशिक वर्गीकरण किस विद्वान ने किया था? हिमालयी प्रदेशों के नाम भी बताइए।
उत्तर:
सर्वप्रथम सर सिडीन बुराई ने हिमालय को पश्चिम से पूर्व की ओर चार प्रादेशिक भागों में विभाजित किया। इस विभाजन का आधार नदी घाटियाँ हैं। इन प्रदेशों के नाम हैं-

  • पंजाब हिमालय
  • कुमाऊँ हिमालय
  • नेपाल हिमालय
  • असम हिमालय।

प्रश्न 50.
पूर्वी तटीय मैदान तथा पश्चिमी तटीय मैदान में कोई दो अंतर बताइए।
उत्तर:

  1. पूर्वी तटीय मैदान अपेक्षाकृत अधिक समतल व चौड़ा है, जबकि पश्चिमी तटीय मैदान बहुत ही असमान एवं संकुचित है।
  2. पूर्वी तटीय मैदान में कई नदी डेल्टा हैं। इसके विपरीत, पश्चिमी तटीय मैदान में कई ज्वारनदमुख हैं।

प्रश्न 51.
प्रायद्वीपीय पठार तथा उत्तर के विशाल मैदानों में कोई दो अंतर बताएँ।
उत्तर:

  1. उत्तर के विशाल मैदानों का निर्माण जलोढ़ मिट्टी से हुआ है, जबकि प्रायद्वीपीय पठार का निर्माण प्राचीन ठोस चट्टानों से हुआ है।
  2. उत्तर के विशाल मैदानों की समुद्र तल से ऊँचाई दक्षिणी पठार की अपेक्षा बहुत कम है।

प्रश्न 52.
अरब सागर कैसे बना?
उत्तर:
जिस समय हिमालय का निर्माण हो रहा था, उस समय दो अन्य महत्त्वपूर्ण घटनाओं ने प्रायद्वीपीय पठार को प्रभावित किया। पठार के उत्तरी-पश्चिमी भाग में एक विस्तृत ज्वालामुखी उद्गार हुआ। इसके अतिरिक्त पठार का पश्चिमी भाग टूटकर निमज्जित हो गया। हिंद महासागर का जल इस निमज्जित गर्त में भर गया और इस प्रकार अरब सागर का जन्म हुआ।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
दिल्ली के आस-पास के इलाके को जल-विभाजक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
दिल्ली और राजमहल की पहाड़ियों के बीच के इलाके में मिट्टी के जमाव की गहराई आस-पास के मैदानी क्षेत्र से अधिक मानी गई है। दिल्ली के आस-पास (अम्बाला, सहारनपुर तथा लुधियाना) का इलाका गंगा-यमुना के मैदान का सबसे अधिक ऊँचा उठा हुआ भाग है। इस भाग के पूर्व की तरफ की नदियाँ बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम की नदियाँ अरब सागर में गिरती हैं। यही कारण है कि इस ऊँचे उठे भाग को जल-विभाजक (Water Divide) कहा जाता है।

प्रश्न 2.
“हिमालय का जन्म भू-अभिनति से हुआ था।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
आज से 7 करोड़ वर्ष पूर्व मेसोजोइक युग (Mesozoic Syncline) में वर्तमान हिमालय के स्थान पर भू-अभिनति (Geo Syncline) के रूप में एक सागर था जिसे टेथिस सागर (Tethys Sea) के नाम से जाना जाता है। उस समय उत्तरी मैदान समेत समस्त हिमालय क्षेत्र टेथिस सागर की सतह (Sea Level) से नीचे था। इस सागर के उत्तर में अंगारालैण्ड (Angaraland) व दक्षिण में गोंडवानालैण्ड (Gondwanaland) नामक दो भू-खण्ड थे।

इन दोनों स्थलीय भागों से आने वाली नदियों ने टेथिस सागर की तली में तलछट का निक्षेपण किया। मेसोजोइक युग के अन्त में कुछ भू-गर्भिक हलचलों के कारण सागर के उत्तर व दक्षिण में स्थित स्थलीय भाग अंगारालैण्ड व गोंडवानालैण्ड एक-दूसरे की ओर बढ़ने लगे। इस संपीडन (compression) के कारण टेथिस सागर की तली में एकत्रित तलछट वलित होकर धीरे-धीरे ऊपर उठने लगे। तलछट के समुद्री सतह से ऊपर उठने से हिमालय पर्वतों का निर्माण हुआ।

प्रश्न 3.
हिमालय पर्वतों की तीन समानांतर शृंखलाओं के नाम लिखें और प्रत्येक की एक-एक विशेषता बताएँ।
उत्तर:
1. सर्वोच्च हिमालय या हिमाद्रि-यह हिमालय की उत्तरी तथा सबसे ऊँची श्रेणी है। हिमालय के सर्वोच्च शिखर इसी श्रेणी में हैं। मांउट एवरेस्ट शिखर संसार का सर्वोच्च शिखर है।

2. मध्य या लघु हिमालय-यह पर्वत श्रेणी हिमालय के दक्षिण में फैली है। इसमें डलहौज़ी, धर्मशाला, शिमला, मसूरी, नैनीताल और दार्जिलिंग आदि प्रमुख पर्वतीय नगर स्थित हैं।

3. बाह्य हिमालय या शिवालिक श्रेणी-यह हिमालय की सबसे दक्षिणी श्रेणी है। यह जलोढ़ अवसादों से बनी है। इस भाग में प्रायः भूकंप आते रहते हैं तथा भूस्खलन होते हैं।

प्रश्न 4.
शिवालिक में अधिक भू-स्खलन क्यों होता है?
उत्तर:

  1. शिवालिक की श्रेणियाँ जलोढ़ अवसादों से बनी हैं। अतः यहाँ प्रायः भू-स्खलन होता रहता है।
  2. दूसरे इन श्रेणियों से बहकर गुजरने वाली नदियाँ इन पहाड़ियों की नींव को कमज़ोर करती रहती हैं, फलस्वरूप ये पहाड़ियाँ खिसक जाती हैं।
  3. मानव द्वारा छेड़छाड़ भी इन पहाड़ियों में भू-स्खलन का एक कारण है।

प्रश्न 5.
सर्वोच्च हिमालय किसे कहते हैं? इसकी कोई दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
हिमालय पर्वत की सबसे उत्तरी श्रृंखला को सर्वोच्च हिमालय के नाम से जाना जाता है। इसकी दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. पर्वत श्रृंखला सबसे ऊँची है तथा सदैव बर्फ से ढकी रहती है। यहाँ से निकलने वाली नदियाँ सदानीरा हैं।
  2. विश्व की सर्वोच्च चोटी माऊंट एवरेस्ट इसी श्रृंखला में स्थित है। इसकी ऊँचाई 8848 मीटर हैं।

प्रश्न 6.
हिमालय की युवावस्था को सिद्ध करने के लिए भू-वैज्ञानिकों एवं पुरातत्त्ववेताओं द्वारा दिए गए प्रमाणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
हिमालय की युवावस्था को इंगित करने वाले अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं-
1. कश्मीर में पीर-पंजाल के पार्श्व में 1500-1850 मीटर की ऊँचाई पर स्थित झीलों की तली में अवसादों की नई परतें, जिन्हें करेवा कहते हैं, संकेत करती हैं कि हिमालय में उत्थान की क्रिया प्लिओसीन (Pliocene) तथा प्लीस्टोसीन (Pleistocene) कालों तक होती रही है।

2. उप-हिमालय के गिरिपदीय क्षेत्रों में तृतीय कल्प (Tertiary) के स्तनपायी जीवों (Mammals) के अवशेषों का पाया जाना भी सिद्ध करता है कि इस क्षेत्र का उत्थान प्लीस्टोसीन काल तक होता रहा है।

3. बृहत् हिमालय के तलछटों का शिवालिक बेसिन में निक्षेप भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है।

4. हिमालय की नदियों की कई वेदिकाओं से मिले उपकरणों से संकेत मिलता है कि हिमालय के उत्थान का एक चरण उस समय पूरा हुआ होगा जब वहाँ मानव का आविर्भाव हो चुका था।

प्रश्न 7.
भारत के उत्तरी विशाल मैदान का निर्माण किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
भू-गर्भशास्त्री सुवेस (Suess) के अनुसार, हिमालय के निर्माण के बाद हिमालय व पठार के बीच एक गर्त (Depression) बन गया था जिसे टेथिस सागर के जल ने भर दिया और कालान्तर में इसी गर्त को सिन्धु, गंगा, ब्रह्मपुत्र व इनकी सहायक नदियों तथा प्रायद्वीपीय भारत से आने वाली नदियों ने अपने निक्षेप से भर दिया और एक विशाल मैदान बना दिया। सर सिडनी बुराई एवं कुछ अन्य भू-वैज्ञानिकों का मत है कि इस मैदान का निर्माण एक भ्रंश घाटी के भराव से हुआ है। इस घाटी का जन्म पटल विरूपणी हलचलों द्वारा हुए चट्टानों के विभंजन से हुआ था। इस मत का अनेक विद्वानों ने खण्डन किया है।

प्रश्न 8.
हिमालय के निर्माण के सम्बन्ध में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के अनुसार, पर्वत निर्माणकारी घटनाओं का सम्बन्ध प्लेटों की गति से है। समस्त भू-पटल 6 मुख्य प्लेटों अथवा प्राचीन शील्डों में बँटा है। ये प्लेटें धीमी गति से अर्ध-द्रवीय सतह पर सरक रही हैं। प्लेटों का आपसी टकराव उनमें तथा ऊपर की महाद्वीपीय चट्टानों में प्रतिबलों को जन्म देता है जिसके कारण वलन, भ्रंशन व आग्नेय क्रियाएँ होती हैं।

हिमालय पर्वत का निर्माण भारतीय प्लेट के उत्तर दिशा में सरकने और यूरेशियन प्लेट को नीचे से धक्का देने से हुआ। लगभग साढ़े छह से सात करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट के उत्तर में खिसकने के कारण टेथिस सागर सिकुड़ने लगा। लगभग तीन से छः करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय व यूरेशियाई प्लेटें एक-दूसरे के काफी निकट आ गईं। परिणामस्वरूप टेथिस क्षेपकार (Thrust Edges) विभंगित होने लगे। लगभग 2 से 3 करोड़ वर्ष पूर्व हिमालय की पर्वत-श्रेणियाँ टेथिस सागर की सतह से ऊपर उभरने लगीं।

प्रश्न 9.
भारत-भूमि के भू-आकृतिक विभाजनों के लक्षणों में अन्तर पाया जाता है। कारण बताइए।
उत्तर:
भारत के मुख्य भू-आकृतिक विभाजनों के लक्षणों में अन्तर पाए जाने का मुख्य कारण इन भू-भागों की अलग-अलग संरचना तथा अलग ही भू-गर्भिक इतिहास का होना है। हिमालय पर्वत का जन्म भौतिक इतिहास के अन्तिम चरण में भू-संचालनों के कारण हआ जबकि भारत का दक्षिण का पठार पूर्व कैम्ब्रियन महाकल्प में निक्षेपित अवसादों के समुद्र की सतह से ऊपर उठ जाने से हुआ। इसी प्रकार भारत के उत्तरी मैदान की रचना, हिमालय पर्वत के बनने के बाद यहाँ से निकलने वाली विशाल नदियों द्वारा लाए गए तलछट के जमाव से हुआ है और आज भी यह क्रम जारी है जो गंगा के सुन्दरवन डेल्टा के निरन्तर बढ़ने से साबित होता है। इस प्रकार इन भू-आकृतियों का निर्माण अलग-अलग कालों में हुआ है। अतः यह स्वाभाविक ही है कि इन मुख्य भागों के लक्षणों में अन्तर पाया जाए।

प्रश्न 10.
भारत के प्रायद्वीपीय पठार को उत्खण्ड (Horst) की संज्ञा क्यों दी गई है?
उत्तर:
भारत का दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार इस उप-महाद्वीप के प्राचीन भू-खण्डों में से एक है। एक बार समद्र से बाहर आने के बाद यह कभी भी पानी में नहीं डूबा। यह उच्च सम-भूमि हमेशा दृढ़ तथा अगम्य खण्ड के रूप में स्थिर रही इसलिए इसकी तुलना प्रायः उत्खण्ड से की जाती है। उत्खण्ड, लगभग दो समानान्तर भ्रंशों के बीच की भूमि होती है जो भ्रंश रेखाओं के सहारे अपने आसपास की भूमि से ऊपर उठ गई हैं। भारतीय प्रायद्वीपीय पठार में जन्म से ही भ्रंशन तथा विभंजन होते रहे हैं; जैसे पुराजीवी-विंध्य महाकाल्प में भू-अभिनति के कारण अरावली पर्वतों का निर्माण होना तथा दक्षिणी भारत के पश्चिमी भाग के धंसने के कारण पश्चिमी घाटों का एक दीवार के रूप में खड़ा रहना।

प्रश्न 11.
प्रायद्वीपीय पठार की उत्पत्ति पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारतीय प्रायद्वीप गोंडवाना भू-खण्ड का ही भाग है। यह अगम्य चट्टानों का उत्खण्ड प्रदेश रहा है जो पूरी तरह से कभी जलमग्न नहीं हुआ। भूगोलवेत्ताओं का विचार है कि इसकी उत्पत्ति आज से 50 करोड़ वर्ष पूर्व हुई। यह भू-भाग, पर्वत-निर्माणकारी भू-संचलन क्रियाओं से पूरी तरह मुक्त रहा है। परन्तु भू-गर्भिक हलचलों के प्रमाण लम्ब रूप में अवश्य मिलते हैं, क्योंकि कई स्थानों पर इस भाग में भ्रंश घाटियाँ तथा हार्ट मिलते हैं। नर्मदा, ताप्ती तथा दामोदर नदियाँ भ्रंश घाटियों के प्रमुख उदाहरण हैं। एक ज्वालामुखी उदभेदन के कारण इसका लगभग 2 लाख वर्ग कि०मी० क्षेत्र लावा से ढका गया, जिससे दक्कन ट्रेप का निर्माण हुआ।

प्रश्न 12.
पूर्वी घाट तथा पश्चिमी घाट में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
पूर्वी घाट तथा पश्चिमी घाट में अंतर निम्नलिखित हैं-

पूर्वी घाटपश्चिमी घाट
1. दक्कन के पठार की पूर्वी सीमा पर मंद ढाल वाली पहाड़ियों की लंबी पर्वतमाला को पूर्वी घाट कहते हैं।1. दक्कन के पठार की पश्चमी सीमा पर उत्तर से दक्षिण की ओर खम्बात की खाड़ी से कन्याकुमारी तक फैली लंबी पर्वतमाला पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला कहलाती है।
2. पूर्वी घाट अपेक्षाकृत कम ऊँचे हैं।2. पश्चिमी घाट की ऊँचाई दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है।
3. पूर्वी घाट को महानदी, गोदावरी, कृष्गा तथा कावेरी नदियों ने काट दिया है।3. पश्चिमी घाट सहयाद्रि, नीलगिरि, अन्ना मलाई तथा कार्डामम के रूप में एक सतत पर्वत शृंखला है।
4. पूर्वी घाट पर कम वर्षा होती है।4. पश्चिमी घाट पर अत्यधिक वर्षा होती है।

प्रश्न 13.
भारतीय पठार और हिमालय पर्वत के उच्चावच लक्षणों में वैषम्य बताइए।
उत्तर:
भारतीय पठार और हिमालय पर्वत के उच्चावच लक्षणों में निम्नलिखित वैषम्यता दिखाई देती है-
1. भारतीय पठार-यह एक अनियमित त्रिभुजाकार पठार है। इसके उच्चावच के वर्तमान लक्षणों का विकास भू-गर्भिक इतिहास काल में हुआ। यह पठार अधिकांश समय से अपना अस्तित्व सागर की सतह से ऊपर बनाए हुए है इसलिए करोड़ों वर्षों तक अपरदन-बलों ने इसे प्रभावित किया है। उत्थान और निमज्जन की क्रियाओं की पुनरावृति तथा भ्रशन और विमगन के कारण उच्च भूमि में विविधता दिखाई देती है।

2. हिमालय पर्वत-यह क्षेत्र अभिनव भू-गर्भिक समय तक सागरीय सतह से नीचे रहा। पृथ्वी पर पर्वत निर्माण क्रिया के अन्तिम चरण में टेथिस सागर में निक्षेपित अवसादों के वलन के कारण हिमालय पर्वत तथा इसकी अन्य शृंखलाओं का निर्माण हुआ। इसमें भू-अभिनति में निक्षेपित अवसादों के संरचनात्मक विस्थापन के कारण भू-पर्पटी का काफी कमजोर क्षेत्र बन गया।

प्रश्न 14.
भाबर क्या है? भाबर पट्टी के तीन प्रमुख लक्षण बताइए।
उत्तर:
हिमालय पर्वत की शिवालिक की पहाड़ियों के दक्षिणी तलहटी प्रदेश को भाबर का मैदान कहते हैं। यह पारगम्य चट्टानों का बना हुआ है। पर्वतीय क्षेत्र में बहने वाली कई नदियाँ भाबर में लुप्त हो जाती हैं।

भाबर के लक्षण-

  • भाबर का मैदान एक संकरी पट्टी के रूप में 8 से 16 कि०मी० की चौड़ाई में मिलता है।
  • यह अत्यधिक नमी का क्षेत्र है, इसलिए यहाँ सघन वन और अनेक प्रकार के वन्य प्राणी मिलते हैं।
  • इसमें बजरी तथा पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े निक्षेपित हैं।

प्रश्न 15.
दोआब से आप क्या समझते हैं? भारतीय उपमहाद्वीप से चार उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
दो नदियों के मध्य के भू-खण्ड को दोआब कहते हैं। इसका निर्माण नदियों द्वारा लाई गई पुरानी कांप मिट्टी से होता है। यह प्रदेश इन नदियों को एक-दूसरे से अलग करता है। भारतीय महाद्वीप में निम्नलिखित दोआब हैं-

  • रावी-चेनाब के मध्य रचना दोआब।
  • रावी-व्यास के मध्य बारी दोआब।
  • व्यास-सतलुज के मध्य स्थित जालन्धर दोआब।
  • गंगा-यमुना के मध्य दोआब।

प्रश्न 16.
“हिमालय का मूल उच्चावच नदियों तथा हिमनदियों के निरन्तर कार्य से रूपान्तरित हुआ है।” व्याख्या कीजिए।
अथवा
हिमालय के उच्चावच के रूपान्तरण पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
अनेक नदियों व हिमनदियों ने हिमालय के उत्थान के साथ ही अपनी अपरदन शक्ति से इन पर्वतों के मूल उच्चावच को व्यापक रूप से रूपान्तरित करना आरम्भ कर दिया था। अनाच्छादन के उपर्युक्त दोनों साधनों के प्रभावशाली कार्यों के निम्नलिखित प्रमाण हैं-
1. सिन्धु, गंगा, ब्रह्मपुत्र इत्यादि अनेक नदियों ने हिमालय में हज़ारों मीटर गहरे महाखड्ड (Gorges), कैनियन (Canyon) व गहरी घाटियों (Valleys) का निर्माण कर हिमालय के मूल स्वरूप को प्रभावित किया है।

2. हिमंनदियों ने विशाल शिला-खण्डों को ऊँचे शिखरों से हजारों मील दूर धकेल दिया है।

3.  कश्मीर घाटी में निक्षेपित करेवा (Karewa) में हिमनदीय मृत्तिका व अनेक प्रकार की हिमोढ़ सामग्री इंगित करती है कि हिमनदियाँ कभी विस्तृत क्षेत्रों पर कार्यरत थीं।

4. वर्तमान हिमनदियों से बहुत नीचे, कम ऊँचाई पर ‘U’ आकार की घाटियों व लटकती घाटियों (Hanging Valleys) का मिलना प्रमाणित करता है कि हिमालय क्रमिक रूप से हिमनद की अनेक चक्रीय अवस्थाओं में से गुज़रा है।।

5. अनेक नदी-घाटियों के किनारों के साथ-साथ विस्तृत हिमोढ़ों ने विकसित वेदिकाओं (Terraces) का निर्माण किया है। उपर्युक्त तथ्यों से पुष्टि होती है कि हिमालय का मूल उच्चावच जल व हिमनदियों से रूपान्तरित होता रहा है।

प्रश्न 17.
हिमालय के महत्त्वपूर्ण दरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हिमालय के कुछ प्रसिद्ध दरें निम्नलिखित हैं-
1. खैबर दर्रा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच स्थित यह दर्रा उपमहाद्वीप का सबसे महत्त्वपूर्ण दर्रा है जिसने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। सदियों से आक्रमणकारी भारत पर आक्रमण करने के लिए इसी मार्ग का प्रयोग करते रहे।

2. बोलन दर्रा-पाकिस्तान स्थित यह दर्रा प्राचीन समय से महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग रहा है। अब इसमें से एक रेलमार्ग व एक महामार्ग गुज़रता है।

3. कराकोरम दर्रा-भारत के जम्मू और कश्मीर में कराकोरम श्रेणी में स्थित यह एक अत्यन्त ऊँचा व कठिन दरों में से एक है।

4. जोजिला-यह दर्रा भी भारत के जम्मू और कश्मीर में स्थित है। यह श्रीनगर से लेह का मार्ग है।

5. शिपकी ला यह हिमाचल प्रदेश में है। शिमला से तिब्बत जाने का मार्ग यहीं से गुज़रता है।

6. माना और नीति-इन दरों से होकर भारतीय यात्री मानसरोवर झील व कैलाश के दर्शन करने जाते हैं।

प्रश्न 18.
हिमालय का भू-वैज्ञानिक विभाजन किस आधार पर किया गया है?
उत्तर:
चट्टानों के रचनाकाल एवं उनके प्रकारों के आधार पर हिमालय के निम्नलिखित चार भू-वैज्ञानिक विभाजन हैं-
1. तिब्बती क्षेत्र-इस भाग का विस्तार बृहत् हिमालय के उत्तर में तिब्बत व निकटवर्ती क्षेत्रों पर है। यहाँ जीवाश्म वाली अवसादी चट्टानें मिलती हैं।

2. वलनों वाला हिमालयी क्षेत्र-इस क्षेत्र में लघु हिमालय व बृहत् हिमालय के कुछ भाग सम्मिलित किए जाते हैं। इस क्षेत्र में रवेदार (Crystalline) तथा रूपान्तरित (Metamorphic) शैलें; जैसे ग्रेनाइट, शिस्ट तथा नीस चट्टानें भी पाई जाती हैं।

3. प्रतिवलनों तथा क्षेप भ्रंशों का हिमालयी क्षेत्र-इस जटिल क्षेत्र में प्राचीन चट्टानों के विशाल समूह स्थानान्तरित होकर एक बड़े क्षेत्र में शयान वलनों (Recumbent Folds) के साथ-साथ नवीन चट्टानों पर धकेल दिए गए हैं। परिणामस्वरूप य ग्रीवा-खण्डों (Nappes) का निर्माण हुआ है। ऐसे लक्षण कश्मीर, हिमाचल तथा गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों में मिलते हैं।

4. बाह्य या उपहिमालयी क्षेत्र-शिवालिक का निर्माण भी इसी काल में हुआ था। विद्वानों का मत है कि ये अवसाद हिमालय की अपरदित सामग्री से बने हैं।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

प्रश्न 19.
“पश्चिमी हिमालय में पर्वत श्रेणियों की एक क्रमिक श्रृंखला पाई जाती है।”-स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हिमालय में अनेक पर्वत श्रेणियाँ हैं जो एक-दूसरे के समानान्तर पाई जाती हैं। इन श्रेणियों को ‘दून’ या. ‘दुआर’ नामक घाटियाँ आपस में अलग करती हैं। पश्चिमी हिमालय में हमें इन श्रेणियों के स्पष्ट क्रम देखने को मिलते हैं। हरियाणा और पंजाब के मैदानों के बाद पहली श्रेणी शिवालिक के रूप में उपस्थित होती है। इसके बाद सिन्धु की सहायक नदियों की घाटियाँ हैं। दूसरी श्रेणी के रूप में पीर-पंजाल व धौलाधार की लघु हिमालयी श्रेणियाँ मिलती हैं। पीर-पंजाल और बृहत् हिमालय के बीच कश्मीर घाटी है। तीसरी श्रेणी के रूप में बृहत् हिमालय की जास्कर श्रेणी पाई जाती है। इसके बाद लद्दाख व कराकोस्म की श्रेणियाँ पाई जाती हैं जिनके बीच सिन्धु घाटी पाई जाती है।

प्रश्न 20.
तटीय मैदानों का भारत के लिए क्या आर्थिक महत्त्व है?
उत्तर:
1. इन तटों की उपजाऊ मिट्टी के व्यापक स्तर पर चावल की खेती की जाती है। यहाँ बड़े पैमाने पर काजू, सुपारी, रबड़, गर्म मसाले, अग्नि व लेमन घास तथा फल उगाए जाते हैं। तटों पर उगाने वाले नारियल की जटाओं से अनेक प्रकार की उपयोगी वस्तुएँ बनती हैं।

2. तट से घाट की ओर पाए जाने वाले ढाल पर चाय और कॉफी के बागान मिलते हैं। ये हमारी निर्यात प्रधान उपजें हैं।

3. भारत का 98 प्रतिशत विदेशी व्यापार तटों पर स्थित प्रमुख बन्दरगाहों द्वारा होता है।

4. केरल तट तथा पूर्वी तट की नदियों के डेल्टाई क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में मछलियाँ पकड़ी जाती हैं।

5. खनिज सम्पदा की दृष्टि से भारत के दोनों तट सम्पन्न हैं। अरब सागर में महाद्वीपीय मग्नतट पर मुम्बई हाई में खनिज तेल पाया जाता है। केरल तट पर मोनोज़ाइट, थोरियम तथा जिरकन (Zircan) नामक बहुमूल्य खनिज मिलते हैं। इनसे परमाणु शक्ति प्राप्त होती है।

6. तटीय क्षेत्रों, विशेष रूप से गुजरात में समुद्री जल का वाष्पीकरण करके नमक बनाया जाता है।

7. तटों पर विकसित अनेक बन्दरगाह नगरों में जलयान निर्माण, तेलशोधन तथा सूती वस्त्र जैसे महत्त्वपूर्ण उद्योग स्थापित हो गए हैं।

8. तट पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इससे स्थानीय लोगों को रोज़गार व देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।

प्रश्न 21.
भारत में बंगाल की खाड़ी के द्वीपों का भौगोलिक विवरण दीजिए।
उत्तर:
निकटवर्ती द्वीपों में पाम्बन द्वीप, न्यू मरे द्वीप, श्री हरिकोटा द्वीप हैं। सुदूरवर्ती द्वीपों में अण्डमान व निकोबार द्वीप समूह हैं। ये 300 कि० मी० की लम्बाई में एक अर्धचन्द्राकार आकृति में फैले हैं। इनका क्षेत्रफल 8,300 वर्ग कि० मी० है। इस द्वीप समूह में कटे-फटे द्वीप हैं जिनकी अधिकतम ऊंचाई 730 मीटर है। इनमें से कुछ की उत्पत्ति ज्वालामुखी उद्गारों से हुई है। इन पर दो ज्वालामुखी द्वीप-बैरन द्वीप (Barren Island) व नरकोण्डम द्वीप (Narcon-dam Island) हैं जो पोर्ट ब्लेयर के उत्तर में स्थित हैं। अण्डमान द्वीप समूह के दक्षिण में 19 द्वीपों का निकोबार द्वीप समूह है जिसके उत्तरी भाग को कार निकोबार व दक्षिणी भाग को महान् निकोबार कहा जाता है। यह द्वीप समूह 6°30′ उत्तरी तथा 9°30′ अक्षांशों के बीच स्थित है। अण्डमान व निकोबार द्वीप समूह गहरे समुद्र द्वारा अलग किए गए हैं। इस समुद्र को ’10° चैनल’ कहा जाता है क्योंकि यह 10° उत्तरी अक्षांश रेखा से संपात (Coincide) होता है। महान् निकोबार के अन्तिम बिन्दु को इन्दिरा प्वाइण्ट (Indira Point) कहा जाता है। यह भारत का सुदूरतम दक्षिणी बिन्दु है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के प्रमुख भू-आकृतिक विभाग कौन-से हैं? हिमालय क्षेत्र तथा प्रायद्वीपीय पठार के उच्चावच लक्षणों में क्या अंतर है?
उत्तर:
भारत के प्रमुख भू-आकृतिक विभाग निम्नलिखित हैं
1. उत्तर के विशाल पर्वत-हिमालय विश्व के सर्वोच्च नवीन वलित पर्वत हैं। इनमें तीन स्पष्ट पर्वत श्रेणियाँ हैं, जो एक-दूसरे के समानांतर फैली हैं। इनमें सबसे उत्तर वाली श्रेणी को ‘विशाल हिमालय’ अथवा ‘हिमाद्रि’ कहते हैं। हिमाद्रि के दक्षिण में ‘मध्य हिमालय’ अथवा ‘हिमाचल श्रेणी’ स्थित हैं। इसकी तीसरी व दक्षिणतम श्रेणी को ‘बाह्य हिमालय’ अथवा ‘शिवालिक की पहाड़ियाँ’ भी कहा जाता है।

2. उत्तर भारत का मैदान-उत्तर भारत के मैदान का निर्माण उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियों द्वारा लाकर जमा की गई जलोढ़ गाद से हुआ है। यह संसार का बहुत ही विस्तृत एवं अत्यंत उपजाऊ मैदान है। इसके उच्चावच में बहुत कम अंतर है। उच्चावच के अंतर के आधार पर मैदानी भाग को चार भागों (1) भाबर, (2) तराई, (3) बांगर तथा (4) खादर में विभक्त किया जाता है।

3. प्रायद्वीपीय पठार-प्रायद्वीपीय पठार देश का सबसे प्राचीन भाग है। इस पठार को दो उपभागों-मध्यवर्ती उच्चभूमि तथा दक्कन का पठार में विभाजित किया जा सकता है। नर्मदा नदी की घाटी इसे दो भागों में विभाजित करती है। प्रायद्वीपीय पठार (मध्यवर्ती-उच्चभूमि) का उत्तरी भाग अनेक पठारों, अनाच्छादित पर्वत श्रेणियों तथा नीची पहाड़ियों द्वारा निर्मित है। यह भाग कठोर आग्नेय शैलों द्वारा बना है।
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान 1
दक्कन का पठार उत्तर में सतपुड़ा, महादेव तथा मैकाल पहाड़ियों से दक्षिण की ओर प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे तक विस्तृत है। इसका उत्तरी-पश्चिमी भाग मुख्यतः लावा निक्षेपों से बना है।

हिमालय क्षेत्र तथा प्रायद्वीपीय पठार के उच्चावच लक्षणों में अंतर निम्नलिखित हैं-

हिमालय क्षेत्रप्रायद्वीपीय पठार
1. हिमालय अपेक्षाकृत नए तथा युवा वलित पर्वत हैं।1. प्रायद्वीपीय पठार बहुत ही प्राचीन भू-खंड हैं। इसका निर्माण चट्टानों से हुआ है।
2. हिमालय पर्वत पूर्व में अरुणाचल प्रदेश से लेकर पश्चिमी कश्मीर तक 2400 कि०मी० की लंबाई में फैले हैं।2. प्रायद्वीपीय पठार उत्तर-पश्चिम में अराबली पर्वत श्रेणी से लेकर उत्तर-पूर्व में शिलांग के पठार तक तथा दक्षिण से कन्याकुमारी तक फैला हुआ है।
3. हिमालय पर्वत का निर्माण तलछटी चट्टानों से हुआ है। यह संसार का सबसे युवा पर्वत है। इसकी औसत ऊँचाई 6000 मीटर है।3. प्रायद्धीपीय पठार का निर्माण लगभग 50 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ है। यह आग्नेय चट्टानों से बना है।
4. हिमाचल को तीन स्पष्ट श्रेणियों-विशाल हिमालय, मध्य हिमालय तथा बाह्य हिमालय में बाँटा जा सकता है।4. प्रायद्वीपीय पठार को मुख्यतः दो भागों-मालवा का पठार तथा दक्षिण का पठार में बाँटा जा सकता है।
5. हिमालय पर्वत से निकलने वाली नदियाँ बारहमासी हैं।5. प्रायद्वीपीय पठार की नदियाँ बरसाती हैं। इनमें गर्मियों में पानी नहीं रहता।
6. हिमालय पर्वत क्षेत्र में खनिजों की कमी है।6. प्रायद्वीपीय पठार खनिज पदार्थों से भरपूर है।

प्रश्न 2.
“उपमहाद्वीप के वर्तमान भू-आकृतिक विभाग एक लम्बे भू-गर्भिक इतिहास के दौर में विकसित हुए हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
अथवा
भारत के भू-आकृतिक खण्ड की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वृहत स्तर पर भारत को मुख्य रूप से तीन भू-आकृतिक इकाइयों में बाँटा जा सकता है-

  • हिमालय पर्वत तथा इसकी शाखाएँ
  • उत्तरी भारत का मैदान
  • प्रायद्वीपीय पठार।

उप-महाद्वीप की ये तीनों भू-आकृतियाँ एक लम्बे भू-गर्भिक इतिहास के दौर में विकसित हुई हैं। कई भू-वैज्ञानिकों ने इनके निर्माण के सम्बन्ध में बहुत-से प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। परन्तु इसके अतीत का पूर्ण रूप से अनावरण नहीं हो पाया है। इनका वर्णन इस प्रकार है
1. हिमालय पर्वत तथा इसकी शाखाएँ-यह एक नवीन वलित पर्वत है। विद्वानों के अनुसार लगभग सात करोड़ वर्ष पहले मध्यजीवी पुराकल्प (Mesozoic) में हिमालय पर्वत के स्थान पर टेथिस सागर नामक एक विशाल भू-अभिनति थी। इसके उत्तर में अंगारालैण्ड तथा दक्षिण में गोंडवानालैण्ड था।

इन दोनों भू-भागों से अनेक नदियों ने इस सागर में तलछट का निक्षेप किया तथा यह क्रम बहुत लम्बे समय तक चलता रहा। मेसोजोइक युग के अन्त में इस क्षेत्र में भू-गर्भीय हलचलें हुईं तथा संपीडन के कारण, टेथिस सागर की तली में एकत्रित पदार्थ धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा जिससे हिमालय पर्वतों का निर्माण होता गया। भू-गर्भिक सर्वेक्षण के अध्ययन से पता चला है कि हिमालय पर्वतों में पर्वत निर्माण कार्य की पहली हलचल अल्प नूतन युग में, दूसरी अवस्था मध्य नूतन युग में और तीसरी अवस्था उत्तर अभिनूतन युग में हुई। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार उत्थान तथा वलन का क्रम अभी तक जारी है।

2. उत्तरी भारत का मैदान यह मैदान हिमालय पर्वत और दक्षिणी पठार के मध्य स्थित है। यह एक समतल तथा काँप के निक्षेपों से निर्मित उपजाऊ मैदान है। हिमालय के निर्माण के पश्चात्, हिमालय तथा दक्षिणी पठार के बीच एक गर्त बन गया था जिसे टेथिस सागर ने जल से भर दिया था। इस गर्त में हिमालय पर्वत तथा दक्षिणी पठार से बहने वाली नदियाँ तथा उनकी सहायक नदियाँ इसे भरती चली गईं और इसने एक विशाल मैदान का रूप धारण कर लिया। यह मैदान युगों तक नदियों द्वारा लाए गए तथा जमा किए गए पदार्थों से बना है और यह क्रम अब भी जारी है। सुन्दरवन का निरन्तर बढ़ना इस बात का प्रमाण है।

3. प्रायद्वीपीय पठार-भू-गर्भ शास्त्रियों के अनुसार यह प्राचीनतम भू-खण्ड है, जिसकी रचना कैम्ब्रियन-पूर्व युग में हुई। कुछ विद्वानों के मतानुसार यह एक उत्खण्ड है। इसका उत्थान सागर से हुआ। इसके पश्चिमी भाग में अरावली पर्वत तथा दक्षिण में अन्नामलाई पर्वतमाला का उत्थान विंध्य महायुग में हुआ। इसके पश्चात् दक्षिणी पठारी क्षेत्र में एक लम्बे समय तक संपीडन तथा वलन का क्रम चलता गया तथा तनाव के कारण इस क्षेत्र में भ्रंशन तथा विभाजन होते रहे।

हिमालय पर्वत के निर्माण के पश्चात् प्लिओसीन युग में पठार के उत्तर:पश्चिमी भाग में धंसने के कारण अरब सागर का निर्माण हुआ तथा पश्चिमी घाट एक दीवार की भाँति समुद्र की ओर खड़े रह गए। एक धारणा के अनुसार पूर्वी तटों की तट रेखा पर पुराजीव काल के पश्चात् कोई परिवर्तन नहीं आया है। यह पठार विशाल गोंडवाना महाद्वीप का एक भाग माना जाता है।

प्रश्न 3.
विभिन्न भू-गर्भिक प्रक्रियाओं द्वारा विकसित प्रायद्वीपीय पठार की भौतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत के प्रायद्वीपीय पठार की भौतिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) आदि गोण्डवाना से अलग हुआ यह प्रखण्ड तीन ओर से समुद्र द्वारा घिरा होने के कारण प्रायद्वीपीय पठार कहलाता है।

(2) क्रमिक अपरदन चक्र के कारण घिसकर जीर्ण अवस्था में पहुंच चुका है। खड़ी कटकें व द्रोणी घाटियाँ यहाँ के अपरदित धरातल की एकरूपता को भंग करती हैं।

(3) जिस मुख्य प्लेट पर हमारा पठार स्थित है उसे भारतीय प्लेट (Indian Plate) कहते हैं। इस चापाकार प्रायद्वीप के पूर्वी कोने पर शिलांग का पठार व पश्चिमी कोने पर केराना की पहाड़ियाँ हैं। वर्तमान में ये दोनों भाग मुख्य पठार से अलग दिखाई पड़ते हैं क्योंकि नदियों ने इन्हें प्रायद्वीप से काटकर वहाँ निक्षेप जमा कर दिए हैं।

(4) यह पठार प्राचीनतम भू-पर्पटी शैलों से बना हुआ है जिनका जन्म पूर्व कैम्ब्रियन युग में निक्षेपित अवसादों के समुद्र की सतह से ऊपर उठने से हुआ था।

(5) एक बार समुद्र से ऊपर उठने के पश्चात् भारत का यह भू-भाग फिर कभी समुद्र में नहीं डूबा। आज तक सपाट भूमि एक दृढ़, अगम्य व अलचीले खण्ड के रूप में कायम है। इसलिए इस पठार की तुलना उत्खण्ड (Horst) से की जाती है।

(6) प्रायद्वीपीय पठार के संरचनात्मक इतिहास की प्रथम प्रमुख घटना विन्ध्य महाकल्प (पैल्योजोइक) (Vindhyan Palaeozoic) में घटी जब अरावली क्षेत्र की भू-अभिनति में जमे अवसाद से विशाल अरावली पर्वत-श्रेणी का निर्माण हुआ।

(7) सम्भवतः अरावली के जन्म-काल के समय ही दक्षिण की नल्लामलाई पर्वत-श्रेणी (Nallamalai Range) का विकास हुआ था।

(8) इसके बाद प्रायद्वीपीय भारत एक लम्बे समय तक संपीडन तथा वलन क्रियाओं से मुक्त रहा। यद्यपि पृथ्वी में तनाव से उत्पन्न ऊर्ध्वाधर हलचलों के कारण भ्रंशन तथा विभंजन होते रहे।

(9) नए उत्थानों के कारण नई अपरदन-क्रिया हुई जिसके कारण यहाँ की जीर्ण और वृद्ध स्थलाकृति पर युवा लक्षणों का प्रादुर्भाव भी होता रहा। पलनी तथा नीलगिरि की पहाड़ियाँ नए उत्थानों के प्रमाण हैं। दूसरी ओर भू-भागों के अवतलन के प्रमाण गोदावरी, महानदी तथा दामोदर घाटियों के द्रोणी भ्रंश तथा नर्मदा, ताप्ती, मालाबार और मेकरान तटों के भ्रंश धंसाव से मिलते हैं।

(10) हिमालय के उत्थान के समय प्रायद्वीपीय पठार पर निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटी

  • पठार के उत्तरी तथा पश्चिमी भागों पर विस्तृत ज्वालामुखी उद्भेदन हुआ जिसके कारण यहाँ का लगभग 5 लाख वर्ग कि० मी० क्षेत्र लावा से ढक गया। इसी लावा प्रदेश की काली उपजाऊ मिट्टी पर कपास की कृषि होती है।
  • दक्षिणी पठार का पश्चिमी भाग धंस गया जिससे अरब सागर का निर्माण हुआ।
  • भूमि के इस निमज्जन ने पश्चिमी घाट को उभारकर पर्वतमाला का रूप दे दिया और भू-आकृतिक विषमता प्रदान की।
  • अरब सागर की आयु के बारे में भू-गर्भ शास्त्रियों में सहमति है कि इसकी उत्पत्ति प्लिओसीन (Pliocene Age) से पहले नहीं हुई थी।

प्रश्न 4.
हिमालय पर्वत की उत्पत्ति कैसे हुई? वर्णन कीजिए। अथवा हिमालय पर्वत श्रेणियों की उत्पत्ति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
हिमालय पर्वत श्रेणियों की उत्पत्ति-हिमालय की चट्टानों से प्रमाणित होता है कि इस पर्वत का जन्म समुद्र के नीचे हुआ था। भू-गर्भ शास्त्रियों के अनुसार आज से 7 करोड़ वर्ष पूर्व मेसोजोइक युग (Mesozoic Syncline) में वर्तमान हिमालय के स्थान पर भू-अभिनति (Geo Syncline) के रूप में एक सागर था जिसे टेथिस सागर (Tethys Sea) के नाम से जाना जाता है। उस समय उत्तरी मैदान समेत समस्त हिमालय क्षेत्र टेथिस सागर की सतह (Sea Level) से नीचे था। इस सागर के उत्तर में अंगारालैण्ड (Angaraland) व दक्षिण में गोंडवानालैण्ड (Gondwanaland) नामक दो भू-खण्ड थे।

इन दोनों स्थलीय भागों से आने वाली नदियों ने टेथिस सागर की तली में तलछट का निक्षेपण किया। मेसोजोइक युग के अन्त में कुछ भू-गर्भिक हलचलों के कारण सागर के उत्तर व दक्षिण में स्थित स्थलीय भाग अंगारालैण्ड व गोंडवानालैण्ड एक-दूसरे की ओर बढ़ने लगे। इस संपीडन (Compression) के कारण टेथिस सागर की तली में एकत्रित तलछट वलित होकर धीरे-धीरे ऊपर उठने लगे। तलछट के समुद्री सतह से ऊपर उठने से हिमालय पर्वतों का निर्माण हुआ। इन पर्वतों का उत्थान धीरे-धीरे अनेक युगों में होता रहा। विद्वानों का मत है कि वर्तमान में ठ रहे हैं। हिमालय पर्वत का निर्माण टरश्यरी दौर में हुआ। अतः इस दौर को अल्पाइन दौर (Alpine Age) भी कहा जाता है क्योंकि यूरोप के आल्पस पर्वत का उत्थान भी इसी काल में हुआ था।

हिमालय व आल्प्स पर्वत के निर्माण सम्बन्धी टेथिस भू-अभिनति सिद्धान्त की मान्यता अब कम हो गई है। इस सिद्धान्त की अपेक्षा प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonic) के सिद्धान्त को वैज्ञानिक अधिक महत्त्व दे रहे हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार पर्वत निर्माणकारी घटनाओं का सम्बन्ध प्लेटों की गति से है। समस्त भू-पटल 6 मुख्य प्लेटों अथवा प्राचीन शील्डों (Ancient Shields) में बँटा है। ये प्लेटें प्रशांती प्लेट, यूरेशियाई प्लेट, अमरीकी प्लेट, भारतीय प्लेट, अफ्रीकी प्लेट तथा अण्टार्कटिका प्लेट के नाम से विख्यात हैं।

ये प्लेटें धीमी गति से अर्ध-द्रवीय सतह पर सरक रही हैं। प्लेटों का आपसी टकराव उनमें तथा ऊपर की महाद्वीपीय चट्टानों में प्रतिबलों को जन्म देता है जिसके कारण वलन (Folding), भ्रंशन (Faulting) व आग्नेय क्रियाएँ (Igneous Activities) होती हैं।

हिमालय पर्वत का निर्माण भारतीय प्लेट के उत्तर दिशा में सरकने और यूरेशियन प्लेट को नीचे से धक्का देने से हुआ। लगभग साढ़े छः से सात करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट के उत्तर में खिसकने के कारण टेथिस सागर सिकुड़ने लगा। लगभग तीन से छः करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय व यूरेशियाई प्लेटें एक-दूसरे के काफी निकट आ गईं। परिणामस्वरूप टेथिस क्षेपकार (Thrust Edges) विभंगित होने लगे। लगभग 2 से 3 करोड़ वर्ष पूर्व हिमालय की पर्वत-श्रेणियाँ टेथिस सागर की सतह से ऊपर उभरने लगीं।

प्रश्न 5.
उच्चावच के आधार पर भारत को कितने भागों में बाँटा जा सकता है? इनमें से किसी एक भाग का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
अथवा
हिमालय पर्वत समूह का विस्तृत भौगोलिक वर्णन कीजिए। उत्तर:उच्चावच के आधार पर भारत को निम्नलिखित पाँच भागों में बाँटा जा सकता है-

  • उत्तरी पर्वतीय प्रदेश
  • सिन्धु-गंगा, ब्रह्मपुत्र का मैदान
  • प्रायद्वीपीय पठार
  • तटीय मैदान
  • द्वीप।

उत्तरी पर्वतीय प्रदेश अथवा हिमालय पर्वत समह भारत के उत्तरी भाग में स्थित पर्व-पश्चिमी दिशा में फैली हिमालय पर्वत-मालाएँ तीन समानान्तर तथा चाप की आकृति में दीवार की भाँति पाई जाती हैं। ये लगभग 2,400 कि०मी० लम्बे तथा 160 से 400 कि०मी० चौड़े क्षेत्र में पाए जाते हैं, जिनका अध्ययन इस प्रकार से है-
1. बृहत हिमालय (Great Himalayas)-ये हिमालय की बहुत ऊँची पर्वत-श्रेणियाँ हैं, जिनकी मध्यमान ऊँचाई 6,000 मीटर। तथा चौड़ाई 25 कि०मी० है। संसार की उच्चतम तथा प्रमुख चोटियाँ इसी क्षेत्र में पाई जाती हैं। यहाँ की महत्त्वपूर्ण चोटियाँ एवरेस्ट, कंचनजंगा, धौलागिरि, मैकालू, नन्दादेवी, अन्नपूर्णा आदि हैं जो सदा बर्फ से ढकी रहती हैं। इसी कारण बृहत हिमालय को ‘हिमाद्रि’ कहा जाता है।

2. मध्य हिमालय (Middle Himalayas) इन्हें लघु हिमालय भी कहते हैं। ये बृहत् हिमालय के दक्षिण में इनके समानान्तर, पूर्व-पश्चिम दिशा में लगभग 80 से 100 कि०मी० की चौड़ाई में फैले हुए हैं। इनकी औसत ऊँचाई 3,500 से 5,000 मीटर तक है। इन पर्वतों की कई शाखाएँ हैं; जैसे पीर-पंजाल तथा धौलाधार आदि। इन पर्वतों में लम्बी-चौड़ी घाटियाँ भी पाई जाती हैं; जैसे कश्मीर घाटी तथा नेपाल की काठमाण्डू घाटी आदि। भारत के अधिकतर स्वास्थ्य-वर्धक तथा रमणीक स्थल इन्हीं पर्वतों में पाए जाते हैं। इस क्षेत्र में ऊबड़-खाबड़ मैदान; जैसे अक्साईचीन, देवसाई, दिपसांग आदि पाए जाते हैं।

3. बाह्य हिमालय (Outer Himalayas)-इन्हें शिवालिक की पहाड़ियाँ भी कहते हैं। ये भी पूर्व-पश्चिम दिशा में लघु हिमालय के समानान्तर 10 से 50 कि०मी० की चौड़ाई में फैले हुए हैं। इनकी औसत ऊँचाई 1,000 से 1,500 मीटर है। मध्य हिमालय तथा बाह्य हिमालय के बीच कुछ घाटियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें ‘दून’ कहते हैं। इनको पूर्व में ‘दुआर’ कहते हैं। देहरादून, पटलीदून, कोटली, चौखम्भा व ऊना इसी प्रकार की घाटियों में स्थित हैं।

हिमालय की उत्तरी ढलान पर हिम-नदियों का जमाव अधिक होता है क्योंकि उत्तरी ढलान मन्द है। इसके विपरीत, दक्षिणी ढलान कगार की भाँति तीव्र है। इसी प्रकार पूर्वी तथा पश्चिमी भागों में भी इन पर्वतों की ढाल में अन्तर पाया जाता है। पूर्वी भाग की ओर बिहार तथा पश्चिमी बंगाल की तरफ पर्वतों की ढाल तीव्र है।

हिमालय का प्रादेशिक विभाजन-सर सिडीन बुराई महोदय ने सिन्धु नदी तथा ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित भारतीय हिमालय पर्वत को निम्नलिखित चार भागों में बाँटा है-
1. पंजाब हिमालय-यह हिमालय पर्वत-श्रृंखला पश्चिम में सिन्धु नदी से लेकर पूर्व में सतलुज नदी तक फैली हुई है। ये पर्वत अधिकतर जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल राज्यों में फैले हुए हैं। पर्वतों के इस भाग की लम्बाई लगभग 560 कि०मी० है। यहाँ मुख्य पर्वत-श्रेणियाँ धौलाधार तथा पीर-पंजाल हैं। यहाँ का मुख्य दर्रा जोजिला है।

2. कुमाऊँ हिमालय-यह भाग सतलुज नदी से लेकर नेपाल की सीमा पर स्थित काली नदी तक विस्तृत है। इस भाग की लम्बाई 320 कि०मी० है। ये अधिक ऊँचे पर्वत हैं जहाँ अनेक हिमनद झीलें पाई जाती हैं। यहाँ स्वास्थ्य-वर्धक स्थल; जैसे मसूरी, नैनीताल, शिमला, अल्मोड़ा आदि स्थित हैं। यहाँ प्रसिद्ध चोटियाँ बद्रीनाथ, केदारनाथ तथा नन्दा देवी हैं। नीतीपास यहाँ का महत्त्वपूर्ण दर्रा है। गंगा तथा यमुना नदियों के उद्गम-स्थल भी इन्हीं पर्वतों में स्थित हैं।

3. नेपाल हिमालय-ये पर्वत पश्चिम में काली नदी से लेकर पूर्व में तिस्ता नदी तक फैले हुए हैं तथा ये नेपाल देश में स्थित हैं। इनकी लम्बाई लगभग 800 कि०मी० है। इस क्षेत्र में हिमालय की सर्वाधिक ऊँची चोटियाँ मिलती हैं; जैसे एवरेस्ट, कंचनजंगा, धौलागिरि आदि।
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4. असम हिमालय ये पर्वत-श्रेणियाँ पश्चिम में तिस्ता नदी से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक फैली हुई हैं तथा लगभग 700 कि०मी० लम्बी हैं। यहाँ पर्वतों की ऊँचाई कुछ कम पाई जाती है। नामचा बरवा तथा कुला कांगड़ी यहाँ की मुख्य चोटियाँ हैं।

हिमालय का भू-वैज्ञानिक विभाजन-हिमालय पर्वत का यह विभाजन चट्टानों के समूहों तथा उनके प्रकार पर आधारित है। इस आधार पर इन पर्वत को चार भू-वैज्ञानिक भागों में बाँटा गया है
1. तिब्बती क्षेत्र-ये क्षेत्र बृहत् हिमालय के उत्तर में स्थित हैं ये पुराजीवी महाकल्प से लेकर आदिनूतन महाकल्प के जीवाश्म वाली चट्टानों से निर्मित हैं, जो तलछटी हैं।

2. वलनों वाला बृहत् हिमालय क्षेत्र-बृहत् हिमालय के साथ-साथ इस वर्ग में कुछ लघु हिमालय भी शामिल हैं और यह क्षेत्र रवेदार तथा कायांतरित चट्टानों; जैसे ग्रेनाइट तथा शिस्ट आदि चट्टानों का बना हुआ है। पुराने क्रम की तलछटी चट्टानें भी यहाँ मिलती हैं।

3. प्रतिवलनों तथा अधिक्षेप भ्रंशों का क्षेत्र यह एक जटिल (Complex) क्षेत्र है जहाँ प्रतिवलन (Overturned Folds) तथा अधिक्षेप भ्रंशों (Overthrust Faults) के समूह बहुत मिलते हैं। प्राचीन चट्टानों के भौतिक रूप से स्थानान्तरण के कारण नवीन चट्टानों के ऊपर आने से शयान वलनों (Recumbent Folds) का निर्माण यहाँ पाया जाता है। ग्रीवा-खण्ड (Nappes) भू-आकृति विशेष रूप से कश्मीर, हिमाचल तथा गढ़वाल क्षेत्र में पाई जाती है।

4. बाह्य या उपहिमालयी क्षेत्र यह क्षेत्र तृतीयक काल के तलछटी निक्षेपों से बना हुआ है। अनुमान है कि ये तलछट मुख्य हिमालय की पर्वत-श्रेणियों से लाए गए हैं। हिमालय का मूल धरातल नदियों तथा हिम नदियों द्वारा रूपान्तरित होता रहा है। अपरदन शक्ति के महत्त्वपूर्ण प्रभाव तथा उनसे बनी भू-आकृतियाँ यहाँ विशेषतया दिखाई देती हैं। विभिन्न क्षेत्रों में बिखरे शिला-खण्ड (Erratic Blocks) काफी दूर-दूर तक पाए जाते हैं और अनेक U-आकार तथा लटकती घाटियों का मिलना प्रभावशाली हिम नदी के प्रभाव को दर्शाते हैं। ऐसा लगता है कि हिमालय क्षेत्र हिमानीकरण (Glaciation) के अनेक चरणों में से गुजरा है। बीच-बीच में उष्ण युगों का आना भी यहाँ नदी-वेदिकाओं से जाहिर होता है।

प्रश्न 6.
सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र के विशाल मैदान का प्रादेशिक प्रारूप का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत की भू-आकृति विज्ञान को बतलाते हुए सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदानों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
उत्तर भारत का विशाल मैदान पूर्व में बर्मा (म्याँमार) की सीमा से पश्चिम में पाकिस्तान तक फैला है। असम में ब्रह्मपुत्र एवं उसकी सहायक नदियों का यह मैदानी भाग संकरा है, लेकिन पश्चिम में इसकी चौड़ाई अधिक है। पूर्व में यह मैदान 150 कि०मी०। तथा मध्य में इलाहाबाद के आसपास 280 कि०मी० चौड़ा है। लाखों वर्षों से हिमालय से निकलने वाली नदियों ने इसमें अवसाद (तलछट) की मोटी परत बिछा दी है तथा कहीं-कहीं पर इसकी मोटाई 2,000 मीटर तक मापी गई है। जलौढ़ मिट्टी के जमाव के कारण यह मैदानी भाग विश्व के उपजाऊ प्रदेशों में से एक है। इसलिए इसे भारत की ‘रोटी की टोकरी’ (Bread Basket) कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। भू-आकृतिक दृष्टि से पंजाब से असम तक के मैदान की ऊँचाई तथा उच्चावच में काफी असमानताएँ पाई जाती हैं जो निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित की जा सकती हैं-
(1) भाबर-यह शिवालिक श्रेणियों के गिरिपद (Foot hill) पर एक संकरी पट्टी के रूप में विस्तृत है। इस क्षेत्र में नदियों द्वारा पत्थर, कंकड़ तथा बलुई मिट्टी का जमाव किया जाता है तथा छोटी नदियाँ भूमिगत हो जाती हैं।

(2) तराई-भाबर के दक्षिण में अपेक्षाकृत कोमल एवं चिकनी मिट्टी का क्षेत्र है, जहाँ भाबर की लुप्त सरिताएँ पुनः धरातल पर अवतरित हो जाती हैं। परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में आर्द्रता की अधिकता एवं उपजाऊ मिट्टी पाई जाती है। इस क्षेत्र में दलदल एवं वनों तथा वन्य प्राणियों की अधिकता पाई जाती है।

(3) बांगर-बांगर पुरानी जलौढ़ मिट्टी का क्षेत्र है जहाँ बाढ़ का पानी नहीं पहुंच पाता है। यह अपेक्षाकृत ऊँचा उठा हुआ भू-भाग है।

(4) खादर-यह क्षेत्र नीचा है, जहाँ प्रतिवर्ष नदियों की बाढ़ का पानी पहुँच जाता है तथा प्रतिवर्ष जलौढ़ मिट्टी की नई परत बिछती जाती है जिसके फलस्वरूप इस क्षेत्र का उपजाऊपन प्राकृतिक रूप से बना रहता है।

उत्तर के विशाल मैदान का प्रादेशिक विभाजन-उत्तर का विशाल मैदान उच्चावच की दृष्टि से विभिन्नता रखता है। पश्चिम में सिन्ध नदी से लेकर पूर्व में असम तक इसमें प्रादेशिक विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। इन विभिन्नताओं के आधार पर इस मैदान को निम्नलिखित तीन भागों (प्रदेशों) में बाँटा जा सकता है-
1. पंजाब तथा हरियाणा का मैदान-उत्तरी-पश्चिमी भारत की पाँच नदियों द्वारा निर्मित इस मैदानी भाग को पंजाब का मैदान कहते हैं जिसमें तीन राज्य (पंजाब, हरियाणा तथा दिल्ली) सम्मिलित हैं। पाँच नदियों के बीच का क्षेत्र, जिसे ‘दोआब’ कहते हैं, इसी से निर्मित है। यह मैदानी भाग अपनी उर्वरता के लिए प्रसिद्ध है। ब्यास, सतलुज, रावी, चेनाब तथा झेलम नदियों द्वारा लाई तलछट के जमाव से इस मैदानी भाग का निर्माण हुआ है। शिवालिक नदियों के साथ-साथ अपरदन अधिक होने के फलस्वरूप बड़ी संख्या में खड्डे मिलते हैं, जिन्हें ‘चो’ (Chos) कहते हैं। दक्षिण में इस मैदानी भाग की सीमा अरावली तथा पश्चिम में राजस्थान के बालू के टिब्बों तथा पूर्व में यमुना नदी द्वारा बनती है। इस मैदान का उत्तरी भाग अपेक्षाकृत अधिक आर्द्र एवं उपजाऊ है।

2. गंगा का मैदान उत्तर:पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आरम्भ होकर पश्चिमी बंगाल तक विस्तृत है, जिसकी उत्तरी सीमा शिवालिक तथा दक्षिणी सीमा दक्कन के पठारी भाग द्वारा निर्धारित होती है। उत्तर में हिमालय से निकलने वाली गंगा, यमुना, रामगंगा, गोमती, गंडक, घाघरा तथा कोसी और दक्षिणी पठारी भाग से उत्तर की ओर बहने वाली नदियों में चम्बल, बेतवा, केन और सोन नदियों के तलछट के जमाव द्वारा इस मैदानी भाग का निर्माण हुआ है। इस मैदान को भूगोल-वेत्ताओं ने प्रादेशिक आधार पर तीन भागों ऊपरी गंगा का मैदान, गंगा का मध्यवर्ती मैदान तथा गंगा का निचला मैदान, में बाँटा है। इन सब में ऊपरी गंगा का मैदान (गंगा तथा यमुना का दोआब) सबसे अधिक उपजाऊ है। यहाँ तलछट की मोटाई 1,000 मीटर से 2,000 मीटर तक है। सम्पूर्ण उत्तर के विशाल मैदान का ढाल उत्तर:पश्चिम से पूर्व की ओर है।

3. ब्रह्मपुत्र का मैदान ब्रह्मपुत्र के मैदान का अधिकांश हिस्सा असम राज्य में सम्मिलित है। असम घाटी (मैदान) धुबरी (Dhubri) से सदिया तक 640 कि०मी० लम्बी है और इसकी चौड़ाई लगभग 100 किलोमीटर है। बीच में मैदान की चौड़ाई कम हो जाती है। मैदान के दक्षिण में पहाड़ियों के ढाल साधारण हैं, जबकि उत्तर में हिमालय का ढाल तीव्र है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

प्रश्न 7.
प्रायद्वीपीय पठार का भौगोलिक वर्णन कीजिए।
अथवा
दक्षिणी भारत की भू-आकृतिक संरचना का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर:
उत्तरी मैदान के दक्षिण में पठारी प्रदेश तीन ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण प्रायद्वीपीय पठार कहलाता है। यह एक त्रिभुजाकार प्रदेश है जिसका आधार दिल्ली एवं राजमहल की पहाड़ियों के बीच तथा शीर्ष दक्षिण में कन्याकुमारी पर स्थित है। शिलांग की पहाडियाँ इसके उत्तरी विस्तार के प्रमाण हैं। नर्मदा तथा ताप्ती की सँकरी घाटियों ने इसे दो असमान भागों में बाँट दिया है। उत्तर में इसे मालवा पठार तथा दक्षिण में दक्कन ट्रेप कहते हैं।

मालवा का पठार-यह पठार नर्मदा, ताप्ती नदियों के उत्तर में तथा विन्ध्य पर्वत के उत्तर:पश्चिम में त्रिभुज आकृति में फैला हुआ है। इसके उत्तर:पश्चिम में अरावली पर्वत तथा उत्तर:पूर्व में गंगा का मैदान है तथा यह ग्रेनाइट चट्टानों का बना हुआ है। यह ऊबड़-खाबड़ तथा बड़े-बड़े बीहड़ एवं खड्ड वाला प्रदेश है। इस पठार की औसत ऊँचाई 800 मी० है। यहाँ विंध्याचल पर्वत की औसत ऊँचाई 730 मीटर तथा एक भ्रंश पर्वत है। इसके दक्षिण में नर्मदा-ताप्ती नदियों के बीच सतपुड़ा पर्वत है, जिसकी लम्बाई 1,120 कि०मी० है। यहाँ सबसे ऊँचा शिखर धूपगढ़ 1,350 मीटर ऊँचा है। ताप्ती नदी का उद्गम-स्थल महादेव पूर्व में स्थित है तथा महादेव के पूर्व में मैकालू है, जहाँ से नर्मदा नदी निकलती है।

अरावली की पहाड़ियाँ मालवा पठार के उत्तर:पश्चिम में स्थित हैं जो अहमदाबाद से दिल्ली तक फैली हुई हैं। ये अवशिष्ट पर्वत हैं। इस पर्वत की सबसे ऊँची चोटी गुरुशिखर, माऊण्ट आबू (राजस्थान) में है और 1,722 मीटर ऊँची है।

मुख्य पठार या दक्कन ट्रेप-यह पठार त्रिभुजाकार में है तथा इसके उत्तर:पश्चिम में सतपडा एवं विंध्याचल, उत्तर में महादेव तथा मैकालू, पूर्व में पूर्वी घाट तथा पश्चिम में पश्चिमी घाट है। यह लावे का बना हुआ है जिसकी औसत ऊँचाई 600 मीटर है। इस 2 लाख वर्ग कि०मी० क्षेत्र में फैले पठार की ढाल पूर्व की ओर है। इस पठार पर बहने वाली मुख्य नदियों-महानदी, संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी, ने पूर्व की ओर बहते हुए अपनी घाटियों को बहुत गहरा किया है तथा समूचे पठार को छोटे-छोटे भागों में विभाजित किया है।

पश्चिमी घाट ये उत्तर में ताप्ती नदी की घाटी से लेकर दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक फैले हुए हैं जो लगभग 1,600 कि०मी० लम्बे हैं तथा इनको सहयाद्रि कहा जाता है। इनको पार करने के लिए थाल घाट, भोर घाट तथा पाल घाट नामक दरों का प्रयोग किया जाता है। पश्चिमी ढलान की ओर सीढ़ियों के रूप में होने के कारण इन पर्वतों को घाट कहा जाता है। इस घाट के दक्षिण में नीलगिरि, पलनी, अन्नामलाई तथा इलायची की पहाड़ियाँ हैं। दक्षिणी भारत का सबसे ऊँचा शिखर अनाईमुड़ी, पलनी की पहाड़ियों में स्थित है, जो 2,695 मीटर ऊँचा है। नीलगिरि में सबसे ऊँची चोटी दोदाबेट्टा है।

पूर्वी घाट-ये घाट ओडिशा के उत्तर:पूर्वी भाग से शुरू होकर नीलगिरि की पहाड़ियों में जा मिलते हैं। इनकी औसत चौड़ाई उत्तर में 200 कि०मी० तथा दक्षिण में 100 कि०मी० है तथा औसत ऊँचाई 600 मीटर है। यहाँ सबसे ऊँची चोटी तिमाइगिरि की ऊँचाई 1,515 मी० है। ये घाट टूटी-फूटी अवशिष्ट पहाड़ियों की श्रृंखला हैं।।

प्रश्न 8.
भारत के तटीय मैदानों का भौगोलिक विवरण दीजिए।
उत्तर:
पश्चिमी तथा पूर्वी घाटों व समुद्र के बीच दो संकरे समुद्र तटीय मैदान हैं, जिन्हें क्रमशः पश्चिमी तटीय मैदान और पूर्वी तटीय मैदान कहते हैं।
1. पश्चिमी तटीय मैदान (Western Coastal Plain)-पश्चिमी घाट और अरब सागर के तट के बीच स्थित यह एक लम्बा, संकरा मैदानी प्रदेश है जो उत्तर में खम्भात की खाड़ी (Bay of Cambay) से दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक विस्तृत है। इस मैदान की औसत चौड़ाई 65 कि० मी० है। इसका उत्तरी भाग चौड़ा व दक्षिणी भाग संकरा है। दमन से गोआ तंक के 500 कि० मी० तक के प्रदेश को कोंकण तट, मध्य भाग में गोआ से मंगलौर तक के 225 कि० मी० के विस्तार को कन्नड़ या कनारा तटीय मैदान तथा मंगलौर व कन्याकुमारी के बीच के 500 कि० मी० क्षेत्र को मालाबार तट कहते हैं।

पश्चिमी घाट से अरब सागर में गिरने वाली असंख्य छोटी-छोटी तीव्रगामी नदियों ने पश्चिमी समुद्री तट को काट-छाँट दिया है। ऐसी स्थिति प्राकृतिक बन्दरगाहों के लिए बहुत अनुकूल होती है। इस मैदान के दक्षिण में मालाबार तट पर बालू के टिब्बे व अनूप (Lagoons) पाए जाते हैं। इन अनूपों को स्थानीय भाषा में कयाल (Kayals) कहा जाता है। अनूप खारे पानी की झीलें होती हैं जिन्हें बालू की रोधिका तथा भू-जिह्वा समुद्र से अलग करती हैं। कोचीन बन्दरगाह एक ऐसे ही अनूप पर स्थित है।

2. पूर्वी तटीय मैदान (Eastern Coastal Plain) यह मैदान पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के बीच स्थित है। उत्तर में स्वर्ण रेखा नदी से दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक विस्तृत यह मैदान पश्चिमी तटीय मैदान की अपेक्षा अधिक चौड़ा है। इस मैदान में महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी इत्यादि नदियों ने उपजाऊ डेल्टाओं का निर्माण किया है। इस मैदान के उत्तरी भाग अर्थात् महानदी से कृष्णा तक को उत्तरी सरकार कहते हैं। इसका दक्षिणी भाग अर्थात् कृष्णा से कावेरी तक का भाग कोरोमण्डल (Coromandal) या कर्नाटक (Carnatic) तट कहलाता है। पूर्वी तटीय मैदान में अनेक अनूप (Lagoons) पाए जाते हैं, जिनमें चिल्का, कोल्लेरू व पुलीकट झीलें प्रसिद्ध हैं। ये तटीय मैदान काफी उपजाऊ हैं।

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HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

भाग-I : सही विकल्प का चयन करें

1. अपवाह शब्द व्याख्या करता है
(A) नदी तंत्र की
(B) पर्वत श्रृंखला की
(C) वायुमंडल की
(D) प्राणी मंडल की
उत्तर:
(A) नदी तंत्र की

2. भारतीय नदियों को कितने अपवाह तंत्रों में बाँटा गया है?
(A) 1
(B) 2
(C) 3
(D) 4
उत्तर:
(B) 2

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र

3. हिमालय से निकलने वाली नदी है-
(A) सिंधु
(B) ब्रह्मपुत्र
(C) गंगा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

4. सिंधु नदी का उद्गम होता है
(A) गंगोत्री से
(B) यमुनोत्री से
(C) मानसरोवर झील के निकट तिब्बत से
(D) अमरकंटक से
उत्तर:
(C) मानसरोवर झील के निकट तिब्बत से

5. गंगा का उद्गम स्थल है
(A) देवप्रयाग
(B) अमरकंटक
(C) मानसरोवर
(D) गंगोत्री
उत्तर:
(D) गंगोत्री

6. यमुना का उद्गम स्थल है
(A) यमुनोत्री
(B) गंगोत्री
(C) देवप्रयाग
(D) इलाहाबाद
उत्तर:
(A) यमुनोत्री

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र

7. प्रायद्वीपीय उच्च भूमि से आने वाली गंगा की प्रमुख सहायक नदियाँ हैं
(A) चंबल
(B) बेतवा
(C) सोन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

8. ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल है-
(A) अमरकंटक
(B) गंगोत्री
(C) तिब्बत में मानसरोवर झील के पूर्व में
(D) नेपाल में
उत्तर:
(C) तिब्बत में मानसरोवर झील के पूर्व में

9. खारे पानी की झील है
(A) डल झील
(B) चिल्का झील
(C) सांभर झील
(D) पुलीकट झील
उत्तर:
(C) सांभर झील

10. निम्नलिखित में से कौन-सी मीठे पानी की झील है?
(A) डल
(B) भीमताल
(C) बड़ापानी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

11. निम्नलिखित में से कौन-सी मानव-निर्मित झील है?
(A) गुरुगोबिंद सागर झील
(B) डल झील
(C) वूलर झील.
(D) भीमताल
उत्तर:
(A) गुरुगोबिंद सागर झील

12. प्रायद्वीपीय भारत की कौन-सी नदी पूर्व की ओर बहती है?
(A) ताप्ती
(B) महानदी
(C) नर्मदा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) महानदी

13. गंगा नदी पर कौन-सी प्रांतीय राजधानी स्थित है?
(A) पटना
(B) कोलकाता
(C) लखनऊ
(D) भुवनेश्वर
उत्तर:
(A) पटना

14. जोग प्रपात किस नदी से संबंधित है?
(A) गोदावरी
(B) महानदी
(C) शरवती
(D) नर्मदा
उत्तर:
(C) शरवती

15. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी अरब सागर में गिरती है?
(A) गोदावरी
(B) महानदी
(C) कृष्णा
(D) माही
उत्तर:
(D) माही

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र

16. ‘दक्षिण की गंगा’ या ‘वृद्ध गंगा’ किस नदी को कहा जाता है?
(A) गोदावरी
(B) कृष्णा
(C) महानदी
(D) कावेरी
उत्तर:
(A) गोदावरी

17. निम्नलिखित में से कौन-सी खारे पानी की झील है?
(A) सांभर
(B) वूलर
(C) डल
(D) गोविंद सागर
उत्तर:
(A) सांभर

18. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी मैकाल श्रेणी से नहीं निकलती?
(A) तापी
(B) नर्मदा
(C) सोन
(D) महानदी
उत्तर:
(A) तापी

19. कौन-सी नदी गंगा के बाएं किनारे पर नहीं मिलती है?
(A) चंबल
(B) गोमती
(C) घाघरा
(D) कोसी
उत्तर:
(A) चंबल

20. काली और तिस्ता नदियों के बीच हिमालय का कौन-सा भाग पड़ता है?
(A) पंजाब हिमालय
(B) कुमाऊं हिमालय
(C) नेपाल हिमालय
(D) असम हिमालय
उत्तर:
(C) नेपाल हिमालय

21. अमरकंटक पठार से कौन-सी नदी नहीं निकलती?
(A) सोन
(B) गोदावरी
(C) नर्मदा
(D) महानदी
उत्तर:
(B) गोदावरी

22. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी डेल्टा नहीं बनाती?
(A) गंगा
(B) गोदावरी
(C) तापी/ताप्ती
(D) महानदी
उत्तर:
(C) तापी/ताप्ती

23. हिमालय से निकलने वाली निम्नलिखित नदियों में से कौन-सी एक पूर्ववर्ती नदी है?
(A) घाघरा
(B) घाघर
(C) यमुना
(D) सतलुज
उत्तर:
(D) सतलुज

24. चेमयुंगडुंग हिमनद से कौन-सी नदी निकलती है?
(A) घाघरा
(B) ब्रह्मपुत्र
(C) लोहित
(D) बूढ़ी दिहिंग
उत्तर:
(B) ब्रह्मपुत्र

25. चिल्का झील स्थित है-
(A) कर्नाटक तट पर
(B) उत्तरी सरकार तट पर
(C) कोंकण तट पर
(D) मालाबार तट पर
उत्तर:
(B) उत्तरी सरकार तट पर

26. ‘दक्षिण का उद्यान’ कहा जाने वाला तंजाऊर जिला किस नदी के डेल्टा में बसा है?
(A) पेन्नार
(B) कावेरी
(C) बैगाई
(D) कृष्णा
उत्तर:
(B) कावेरी

भाग-II : एक शब्द या वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
भारत की नदियों के दो बड़े वर्ग कौन-से हैं?
उत्तर:

  1. हिमालय की नदियाँ
  2. प्रायद्वीपीय नदियाँ।

प्रश्न 2.
सिन्धु नदी का उद्गम क्षेत्र बताइए।
उत्तर:
तिब्बत में मानसरोवर झील के निकट।

प्रश्न 3.
ब्रह्मपुत्र नदी ने किस पर्वत-चोटी के पास महाखण्ड (Gorge) बनाया है?
उत्तर:
नामचा बरवा।

प्रश्न 4.
बांग्लादेश में ब्रह्मपुत्र नदी किस नाम से प्रवेश करती है?
उत्तर:
जमना।

प्रश्न 5.
गंगा की उन दो शीर्ष नदियों के नाम बताइए, जो देवप्रयाग में एक-दूसरे से मिलती हैं?
उत्तर:
अलकनन्दा तथा भागीरथी।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र

प्रश्न 6.
गंगा किस स्थान पर मैदानी भाग में प्रवेश करती है?
उत्तर:
हरिद्वार।

प्रश्न 7.
गंगा के बाएँ किनारे की मुख्य सहायक नदियों के नाम बताइए।
अथवा
गंगा नदी की दो सहायक नदियों के नाम लिखें।
उत्तर:
रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी।

प्रश्न 8.
प्रायद्वीपीय भारत का सबसे बड़ा तंत्र कौन-सा है?
उत्तर:
गोदावरी।

प्रश्न 9.
प्रायद्वीपीय भारत की कौन-सी नदी को ‘वृद्ध गंगा’ या ‘दक्षिणी गंगा’ कहा जाता है?
उत्तर:
गोदावरी।

प्रश्न 10.
प्रायद्वीपीय भारत की अरब सागर में गिरने वाली दो सबसे बड़ी नदियों के नाम बताएँ।
उत्तर:
नर्मदा, ताप्ती।

प्रश्न 11.
तिब्बत में सिंधु नदी को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
सिंगी खंबान या शेरमुख।

प्रश्न 12.
दरार घाटियों में बहने वाली दो नदियों के नाम लिखें।
उत्तर:
नर्मदा और ताप्ती।

प्रश्न 13.
उत्तरी भारत की नदियों तथा प्रायद्वीपीय भारत की नदियों के मध्य जल-विभाजक का नाम बताएँ।
उत्तर:
विन्ध्य-सतपुड़ा श्रेणी।

प्रश्न 14.
एक ट्रांस हिमालयी नदी का नाम बताएँ जो सिन्धु की सहायक नदी बनती है?
उत्तर:
सतलुज।

प्रश्न 15.
प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लम्बी नदी का नाम बताएँ।
उत्तर:
गोदावरी।

प्रश्न 16.
दक्षिणी भारत की कौन-सी नदी ज्वारनदमुख बनाती है?
उत्तर:
नर्मदा।

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प्रश्न 17.
कृष्णा नदी कहाँ-से निकलती है?
उत्तर:
महाबलेश्वर से।

प्रश्न 18.
बांग्लादेश में गंगा नदी किस नाम से बहती है?
उत्तर:
पद्मा के नाम से।

प्रश्न 19.
प्रायद्वीपीय भारत की बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों के नाम लिखें।
उत्तर:
महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी।

प्रश्न 20.
जल संभर क्षेत्र के आकार के आधार पर भारतीय अपवाह द्रोणियों को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
तीन भागों में।

प्रश्न 21.
पूर्ववर्ती जल-प्रवाह के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
सिन्धु नदी, ब्रह्मपुत्र नदी, सतलुज नदी इत्यादि।

प्रश्न 22.
झेलम नदी कहाँ से निकलती है?
उत्तर:
यह नदी शेषनाग झील से निकलकर अन्त में वूलर झील में मिलती है।

प्रश्न 23.
नदियाँ अपनी घाटी को पीछे कैसे सरकाती हैं?
उत्तर:
शीर्ष कटाव व सरिता-हरण से।

प्रश्न 24.
हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों में से कौन-सी नदियाँ पुरानी हैं?
उत्तर:
प्रायद्वीपीय नदियाँ।

प्रश्न 25.
सतलुज नदी का उद्गम स्थल बताइए।
उत्तर:
कैलाश पर्वत के दक्षिण में मानसरोवर झील के निकट राक्षस ताल से निकलती है।

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प्रश्न 26.
डेल्टाई मैदान में गंगा किन नामों से जानी जाती है?
उत्तर:
भागीरथी व हुगली।

प्रश्न 27.
सन्दरवन डेल्टा का निर्माण कौन-सी नदी करती है?
उत्तर:
गंगा।

प्रश्न 28.
साबरमती नदी का उद्गम क्षेत्र बताइए।
उत्तर:
अरावली की पहाड़ियों में डूंगरपुर ज़िला।

प्रश्न 29.
अन्तःस्थलीय अपवाह का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
घग्घर नदी।

प्रश्न 30.
हिमालय की नदियों की प्रवृत्ति कैसी है?
उत्तर:
मानसूनी भी और हिमनदीय भी।

प्रश्न 31.
प्रायद्वीपीय नदियों की प्रवृत्ति कैसी है?
उत्तर:
मानसूनी।

प्रश्न 32.
खम्भात की खाड़ी में गिरने वाली किसी नदी का नाम बताइए।
उत्तर:
माही।

प्रश्न 33.
प्रायद्वीपीय नदियों के मुख्य जल विभाजक का नाम क्या है?
उत्तर:
पश्चिमी घाट।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रायद्वीपीय पठार की नदियों की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
इन नदियों ने चौड़ी, संतुलित व उथली घाटियों का निर्माण किया है। यहाँ की सभी नदियाँ आधार तल को प्राप्त कर चुकी हैं।

प्रश्न 2.
नदी तन्त्र क्या है?
उत्तर:
मुख्य नदी तथा उसकी सहायक नदियों से मिलकर बना तन्त्र नदी तन्त्र कहलाता है।

प्रश्न 3.
अपवाह-तन्त्र क्या है?
उत्तर:
स्थान विशेष में एक निश्चित क्रम में प्रवाहित होने वाली नदियों एवं उनकी शाखाओं के सम्मिलित अध्ययन को अपवाह-तन्त्र कहते हैं।

प्रश्न 4.
अपवाह द्रोणी क्या है?
उत्तर:
धरातल का वह क्षेत्र जिसका जल एक ही नदी तन्त्र द्वारा बहाकर ले जाया जाता है, अपवाह द्रोणी कहलाता है।

प्रश्न 5.
अन्तःस्थलीय अपवाह क्या होता है?
उत्तर:
ऐसी नदियाँ जो किसी सागर में न गिरकर स्थलमण्डल की किसी झील अथवा मरूभूमि में विलीन हो जाती हैं।

प्रश्न 6.
नदी प्रवृत्ति क्या होती है?
उत्तर:
नदी में ऋतुवत् जल-विसर्जन को उसकी प्रवृत्ति कहा जाता है।

प्रश्न 7.
नर्मदा नदी कौन-सा विख्यात जल-प्रपात बनाती है और कहाँ बनाती है?
उत्तर:
जबलपुर के नीचे भेड़ाघाट की संगमरमर शैलों को काटते हुए मनोरम धुआँधार प्रपात बनाती है।

प्रश्न 8.
जल विभाजक का क्या कार्य है? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
जल विभाजक का कार्य दो पड़ोसी प्रवाह श्रेणियों को अलग करना है। यह विभाजक अपनी एक ओर की ढाल पर बहने वाली नदियों को एक ओर तथा दूसरी ढाल पर बहने वाली नदियों को दूसरी ओर मोड़ देता है। हिमालय पर्वत एक प्रमुख जल विभाजक है।

प्रश्न 9.
भारत में सबसे विशाल नदी द्रोणी कौन-सी है?
उत्तर:
भारत की सबसे विशाल नदी द्रोणी गंगा नदी द्रोणी है। इसकी लंबाई लगभग 2500 कि०मी० है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र

प्रश्न 10.
सिंधु एवं गंगा नदियाँ कहाँ से निकलती हैं?
उत्तर:
सिंधु नदी तिब्बत में मानसरोवर झील के निकट से निकलती है और गंगा नदी गंगोत्री नामक हिमानी से निकलती है।

प्रश्न 11.
गंगा की दो मुख्य धाराओं के नाम लिखिए। ये कहाँ पर एक-दूसरे से मिलकर गंगा नदी का निर्माण करती हैं?
उत्तर:
गंगा नदी की दो मुख्य धाराएँ हैं-भागीरथी और अलकनंदा। ये दोनों धाराएँ उत्तराखंड के देवप्रयाग में आपस में मिलकर गंगा नदी का निर्माण करती हैं।

प्रश्न 12.
हिमालय के तीन प्रमुख अपवाह-तन्त्रों के नाम बताइए।
उत्तर:
हिमालय पर्वत की विभिन्न श्रेणियों से अनेक नदियाँ उतरकर भारत की ओर प्रवाहित होती हैं। इन समस्त नदियों को तीन अपवाह-तन्त्रों में विभाजित किया जाता है

  1. सिन्धु अपवाह-तन्त्र
  2. गंगा अपवाह-तन्त्र
  3. ब्रह्मपुत्र अपवाह-तन्त्र।

प्रश्न 13.
किसी देश का अपवाह-तन्त्र किन कारकों पर निर्भर करता है?
उत्तर:
किसी भी देश का अपवाह-तन्त्र वहाँ की धरातलीय रचना, भूमि के ढाल, शैलों के स्वभाव, विवर्तनिक क्रियाओं, जल की प्राप्ति एवं अपवाह क्षेत्र के भू-गर्भिक इतिहास पर निर्भर करता है।

प्रश्न 14.
गंगा तथा महानदी डेल्टा के बीच बहने वाली नदियों के नाम लिखें।
उत्तर:
गंगा नदी का डेल्टा पश्चिमी बंगाल में तथा महानदी का डेल्टा ओडिशा में फैला हुआ है। इनके बीच फैले राज्यों बिहार, झारखण्ड, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में ब्राह्मणी तथा स्वर्णरेखा नदियाँ बहती हैं।

प्रश्न 15.
गंगा अपवाह-तन्त्र की रचना कौन-सी नदियाँ करती हैं?
उत्तर:
गंगा अपवाह-तन्त्र का निर्माण हिमालय एवं प्रायद्वीपीय उच्च भागों से निकलने वाली नदियों द्वारा होता है। हिमालय के हिमाच्छादित भागों से आने वाली गंगा, यमुना, घाघरा, गंडक, गोमती तथा कोसी नदियाँ और प्रायद्वीपीय उच्च भागों से निकलने वाली चम्बल, बेतवा, टोंस, केन, सोन, इत्यादि नदियाँ गंगा अपवाह-तन्त्र का निर्माण करती हैं।

प्रश्न 16.
अपवाह किसे कहते हैं?
उत्तर:
निश्चित वहिकाओं के माध्यम से हो रहे जल-प्रवाह को अपवाह कहते हैं।

प्रश्न 17.
वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब किसी अपवाह की आकृति वृक्ष के समान हो तो ऐसे अपवाह के प्रतिरूप को वृक्षाकार अपवाह प्रारूप कहते हैं।

प्रश्न 18.
जालीनुमा अपवाह प्रतिरूप किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब मुख्य नदियाँ एक-दूसरे के समानांतर प्रवाहित होती हो और सहायक नदियाँ उनसे समकोण पर मिलती हो तो अपवाह के ऐसे प्रारूप को जालीनुमा अपवाह प्रारूप कहते हैं।

प्रश्न 19.
नमामी गंगे परियोजना क्या है?
उत्तर:
यह भारत सरकार का एक एकीकृत जल संरक्षण मिशन है। इसमें राष्ट्रीय नदी गंगा से संबंधित दो महत्त्वपूर्ण उद्देश्य हैं-

  • प्रदूषण को कम करना
  • इसके संरक्षण और कायाकल्प को पूरा करना।

प्रश्न 20.
नदी प्रवृत्ति क्या होती है?
उत्तर:
नदियों में अलग-अलग मौसम में जल का बहाव भी अलग-अलग होता है। नदी में जल के मौसमी बहाव अर्थात् ऋतुवत् जल-विसर्जन को नदी प्रवृत्ति कहा जाता है।

प्रश्न 21.
जल-विसर्जन क्या होता है?
उत्तर:
किसी समय विशेष पर किसी नदी में बहने वाली जल-राशि को जल-विसर्जन कहा जाता है। जल-विसर्जन के मापने की इकाई को क्यूसेक्स अर्थात् घन फुट प्रति सैकिण्ड अथवा क्यूमेक्स अर्थात् घन मीटर प्रति सैकिण्ड कहते हैं।

प्रश्न 22.
कोसी नदी को ‘बिहार का शोक’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
यह नदी कंचनजंगा से निकलकर बिहार में प्रवेश करती है। यह नदी कई धाराओं में बहती है। रास्ता बदलना तथा आकस्मिक बाढ़ लाना इसका स्वभाव रहा है। यह नदी बिहार में धन, जन तथा फसलों को बाढ़ के कारण अपार क्षति पहुँचाती है। इसलिए इस नदी को बिहार का दुःख या शोक कहा जाता है।

प्रश्न 23.
तटीय नदी तन्त्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रायद्वीपीय पश्चिमी तटीय मैदान में छोटी-छोटी लगभग 600 नदियाँ बहती हैं। इन नदियों के मैदान सँकरे व तल सामान्यतः खड़े ढाल वाले हैं। ये नदियाँ बड़ी मात्रा में तलछट बहाकर लाती हैं। तीव्र गति वाली होने के कारण ये नदियाँ समुद्र तट पर तलछट जमा नहीं कर पातीं। अतः ये नदियाँ डेल्टा बनाने में असमर्थ हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की सभ्यता, संस्कृति एवं आर्थिक विकास में नदियों के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन काल से भारत की नदियाँ सिंचाई, जल-विद्युत् उत्पादन, मत्स्योत्पादन, जल-परिवहन एवं व्यापार का महत्त्वपूर्ण साधन रही हैं। भारतीय नदियों के तटों पर अनेक धार्मिक, सांस्कृतिक एवं व्यापारिक केन्द्र स्थापित हुए। नदियों की उपजाऊ घाटियों एवं डेल्टा प्रदेशों में सघन जनसंख्या का निवास पाया जाता है। उपर्युक्त कारणों से भारत की सभ्यता, संस्कृति एवं आर्थिक विकास में नदियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

प्रश्न 2.
उत्पत्ति के आधार पर भारत की नदियों के दो मुख्य तथा दो गौण वर्ग कौन-से हैं?
उत्तर:
उत्पत्ति के आधार पर भारत की नदियों के दो मुख्य वर्ग हैं-

  • हिमालय की नदियाँ तथा
  • प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ।

इनके अतिरिक्त दो गौण नदी-तन्त्र है-

  • तटीय नदी तन्त्र
  • अन्तः स्थली अपवाह।

प्रश्न 3.
सिंधु एवं गंगा अपवाह में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
सिंधु एवं गंगा अपवाह में निम्नलिखित अंतर हैं

सिंधु अपवाहगंगा अपवाह
1. सिन्धु अपवाह की नदियाँ गॉर्ज का निर्माण करती हैं।1. गंगा अपवाह की नदियाँ विशाल मैदानी भाग का निर्माण करती हैं।
2. इसमें दोआब पाए जाते हैं।2. इसमें संगम पाए जाते हैं।
3. इस अपवाह में बहने वाली नदियाँ मुख्यतः अरब सागर में गिरती हैं।3. इस अपवाह में बहने वाल्की नदियाँ मुख्यतः बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय प्रवाह तंत्र का उल्लेख कीजिए
अथवा
भौगोलिक आधार पर भारतीय प्रवाह तंत्र को सूचीबद्ध करें।
उत्तर:
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र 1

प्रश्न 5.
गोदावरी को अक्सर ‘वृद्ध गंगा’ या ‘दक्षिणी गंगा’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
गोदावरी दक्षिणी भारत की सबसे बड़ी नदी है। इसका उद्गम स्थान महाराष्ट्र का नासिक ज़िला है। यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसका अपवाह क्षेत्र 1,36,090 वर्ग कि० मी० है और इसका जल-ग्रहण क्षेत्र महाराष्ट्र, कर्नाटक, ओडिशा तथा आन्ध्र प्रदेश तक है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ प्रवरा, पेनगंगा, वेनगंगा, इन्द्रावती, वर्षा, मनेर आदि हैं। अतः इसका आकार तथा विस्तार बहत विशाल है। इसी विशालता, पवित्रता व प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण इसे ‘वृद्ध गंगा’ या ‘दक्षिण की गंगा’ कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र

प्रश्न 6.
पश्चिमी तट पर नदियाँ डेल्टा क्यों नहीं बनाती, जबकि वे बड़ी मात्रा में तलछट बहाकर लाती हैं?
उत्तर:
पश्चिमी घाट से निकलने वाली मुख्य नदियाँ नर्मदा, ताप्ती व अनेक छोटी-छोटी नदियाँ बहुत तेज़ गति से बहकर अरब सागर में गिरती हैं। इसका कारण अरब सागर की ओर पश्चिमी घाट के ढाल का तीव्र होना है। ये नदियाँ अपनी तेज़ गति के कारण अपने साथ बहाकर लाए गए अवसाद को गहरे सागर में ले जाती हैं, उनका तट पर जमाव नहीं कर पातीं। नर्मदा और ताप्ती नदियाँ भ्रंश घाटियों में बहती हैं। ये नदियाँ अपने अवसाद को मूल दरारों में भरती रहती हैं। इस कारण ये नदियाँ डेल्टा नहीं बनातीं। इन नदियों के मुहानों पर आने वाला ज्वार-भाटा भी इनके अवसादों को गहरे समुद्र में बहा ले जाता है। एक और कारण भी है-अरब सागर का निर्माण प्रायद्वीपीय खण्ड के पश्चिमी पार्श्व के अवतलन के कारण हुआ था। अतः पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों की घाटियाँ भी जल में डूब गई थीं।

प्रश्न 7.
गॉर्ज किसे कहते हैं? भारत की कौन-सी नदियों ने गॉर्ज बनाए हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
पर्वतीय प्रदेशों में नदी युवावस्था में होती है और अपनी लम्बवत् अपरदन क्रिया द्वारा बहुत गहरी तथा संकरी घाटी का निर्माण करती हैं जिसे गॉर्ज़ कहते हैं। गॉर्ज के किनारे खड़े ढालों वाले होते हैं। ये ऐसे क्षेत्रों में बनते हैं, जहाँ चट्टानें कठोर व संक्षारण-प्रतिरोधी होती हैं। विशाल आकार वाले महाखड्ड को कैनयन (Canyon) कहते हैं। सिन्धु, सतलुज, अलकनन्दा, गंडक, कोसी और ब्रह्मपुत्र नदियों ने हिमालय में गॉर्ज बनाए हैं।

प्रश्न 8.
सहायक नदी और वितरिका में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सहायक नदी और वितरिका में अंतर निम्नलिखित हैं-

सहायक नदीवितरिका
1. जब एक छोटी नदी एक मुख्य नदी में मिलती है तो वह सहायक नदी कहलाती है।1. डेल्टा क्षेत्र में अवसादों की रुकावट के कारण जब नदी कई शाखाओं में बँट जाती है तो उन शाखाओं को वितरिकाएँ कहा जाता है।
2. सहायक नदी मुख्य नदी में कहीं भी मिल सकती है।2. वितरिका सदैव डेल्टा प्रदेश में ही मिलती है।
3. परिवहन तथा सिंचाई दोनों के लिए सहायक नदी का उपयोग किया जाता है।3. मुख्यतः परिवहन के लिए वितरिका उपयोगी होती है।
4. सहायक नदी मुख्य नदी में अपना जल डालती हैं।4. वितरिका मुख्य नदी से जल ले जाती है और दोबारा नदी में नहीं मिलती।
5. गंगा नदी की सहायक नदी यमुना है।5. गंगा नदी की वितरिका हुगली है।

प्रश्न 9.
अन्तःस्थलीय अपवाह का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसका उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
अन्तःस्थलीय अपवाह में उन नदियों को सम्मिलित किया जाता है जो किसी सागर में न गिरकर स्थलमण्डल पर ही किसी झील में विलीन हो जाती हैं अथवा मरुभूमि में ही विलीन हो जाती हैं। आन्तरिक अपवाह प्रदेश उत्तरी कश्मीर, दक्षिण-पूर्वी असम, पश्चिमी राजस्थान और हरियाणा तक सीमित है। राजस्थान की लूनी, माही और साबरमती नदियों को छोड़कर अन्य सभी नदियाँ मरुभूमि में ही विलीन हो जाती हैं अथवा साँभर झील में गिर जाती हैं। हरियाणा की घग्घर नदी भी अन्तःस्थलीय अपवाह का उदाहरण है।

प्रश्न 10.
सिन्धु नदी का उद्गम स्थल कहाँ है? इसकी पाँच सहायक नदियों के नाम बताइए।
उत्तर:
सिन्धु नदी का उद्गम स्थल कैलाश पर्वत-श्रेणी के उत्तरी ढलान से तिब्बत में लगभग 5,000 मीटर की ऊँचाई पर मानसरोवर झील है। अपने स्रोत से यह उत्तर तथा उत्तर:पश्चिम दिशा में लगभग 320 कि०मी० बहने के बाद जम्मू-कश्मीर में से भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करती है। इसकी सहायक नदियाँ हैं-

  • सतलुज
  • व्यास
  • रावी
  • चिनाब
  • झेलम।

प्रश्न 11.
प्रायद्वीपीय भारत की पश्चिम की ओर बहने वाली दो मुख्य नदियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
प्रायद्वीपीय भारत का सामान्य ढाल पूर्व की ओर है। इसलिए अधिकांश नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर खाड़ी बंगाल में प्रवेश करती हैं। पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ अरब सागर में गिरती हैं। उनमें दो प्रमुख नदियाँ निम्नलिखित हैं

  • नर्मदा नदी-यह मध्य प्रदेश में अमरकंटक पहाड़ी से निकलकर अरब सागर की खम्भात की खाड़ी में जा गिरती है। इसकी लम्बाई 1,300 कि०मी० है।
  • ताप्ती नदी-यह मध्य प्रदेश में महादेव की पहाड़ियों से निकलकर खम्भात की खाड़ी में गिर जाती है। इसकी लम्बाई 338 कि०मी० है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
हिन्द ब्रह्म नदी अवधारणा की व्याख्या कीजिए। उन मुख्य तर्कों का विवरण दीजिए जिनके आधार पर इस अवधारणा पर आपत्ति की गई है।
उत्तर:
हिन्द-ब्रह्म नदी अवधारणा-भू-गर्भ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि शिवालिक पहाड़ियों के संस्तरों का निक्षेपण एक ऐसी विशाल नदी द्वारा किया गया था जो मायोसीन काल में असम से हिमालय के गिरिपद के साथ-साथ अनुदैर्ध्य विस्तार में बहती हुई सुलेमान, किरथर के सहारे उत्तर:पश्चिम कोने तक पहुँचकर दक्षिण में मुड़कर अरब सागर में जा मिलती थी। पेस्को ने इस नदी को हिन्द-ब्रह्म तथा पिलग्रिम ने शिवालिक का नाम दिया। ऐसा विश्वास है कि हिन्द-ब्रह्म नदी सिन्धु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र सहित हिमालय से निकलने वाली सभी नदियों के समस्त जल को अरब सागर तक ले जाती थी। कालान्तर में यह ऐतिहासिक नदी निम्नलिखित तन्त्रों व उपतन्त्रों में बँट गई

  • सिन्धु नदी
  • पंजाब में सिन्धु नदी की पाँचों सहायक नदियाँ (सतलुज, रावी, चिनाब, ब्यास व झेलम)
  • गंगा तथा हिमालय से निकलने वाली उसकी सहायक नदियाँ
  • ब्रह्मपुत्र का वह भाग जो असम में है व हिमालय से निकलने वाली उसकी सहायक नदियाँ।

हिन्द-ब्रह्म नदी का उपर्युक्त विच्छेदन निम्नलिखित कारणों से हुआ-

  • अत्यन्त नूतन या प्लिस्टोसीन युग में हुई भू-गर्भिक हलचलें जिनमें पोतवार पठार का उत्थान भी सम्मिलित है।
  • इस नदी की निचली घाटी में इसकी सहायक नदियों द्वारा शीर्षाभिमुख अपरदन।

इन परिवर्तनों से हिन्द-ब्रह्म नदी की प्रवाह-दिशा में प्रत्यावर्तन हुआ। नदी का उत्तरी-पश्चिमी भाग सिन्धु नदी के रूप में विकसित हुआ तथा मध्य में विच्छेदित हुआ मुख्य धारा का शेष भाग वर्तमान गंगा के रूप में प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में गिरने लगा। गंगा ने यमुना को अपनी सहायक नदी के रूप में मिला लिया। इस घटना से पूर्व यमुना सम्भवतः दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती थी और सिन्धु की सहायक नदी थी। सिन्धु तथा गंगा तन्त्रों के बीच सहायक नदियों का विनिमय उनके मध्य स्थित प्रदेश में पिछले प्राअभिनव काल की सामान्य घटना रही है। इस प्रकार हिन्द-ब्रह्म ही वह मूल नदी थी जिससे हिमालय के वर्तमान नदी-तन्त्रों का विकास हुआ है।

HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र

प्रश्न 2.
प्रायद्वीपीय भारत की नदियों का विस्तृत वर्णन कीजिए। अथवा प्रायद्वीपीय नदी तंत्र का वर्णन करें।
अथवा
बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में गिरने वाली नदियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दक्षिण भारत में अनेक छोटी-बड़ी नदियाँ हैं। इनमें से अधिकांश बंगाल की खाड़ी में, कुछ अरब सागर में व कुछ अन्य खम्भात की खाड़ी में गिरती हैं। पठार की प्रायः सभी नदियाँ करोड़ों वर्षों से अपने मार्गों को काटती चली आ रही हैं। अतः इनकी घाटियाँ चौड़ी और छिछली हैं। नगण्य ढाल क्रम के कारण इन नदियों की अपरदन शक्ति नष्टप्रायः हो चुकी है।

I. बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ-
1. महानदी-यह नदी कोयना और संख नदियों के संगम से मिलकर छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में सिहावा के निकट निकलती है और छत्तीसगढ़ व आन्ध्र प्रदेश से होती हुई ओडिशा में बड़ा डेल्टा बनाती है। इस नदी की कुल लम्बाई 880 कि० मी० है और अपवाह-क्षेत्र लगभग 1,41,600 वर्ग कि० मी० है। प्रसिद्ध हीराकुड बाँध इसी नदी पर बना हुआ है।

2. गोदावरी यह प्रायद्वीपीय नदियों में सबसे लम्बी नदी है जिसकी लम्बाई 1,465 कि० मी० है। यह महाराष्ट्र के नासिक जिले में पश्चिमी घाट से निकलती है और आन्ध्र प्रदेश में बंगाल की खाड़ी में जा गिरती है। गोदावरी का कुल अपवाह-क्षेत्र 3,12,812 वर्ग कि० मी० है। अपनी पवित्रता, सौन्दर्य, उपयोगिता, विशाल आकार एवं विस्तार के कारण इसे वृद्ध गंगा तथा दक्षिण गंगा के नाम से भी पुकारा जाता है।

3. कृष्णा-इस नदी का उद्गम महाराष्ट्र में पश्चिमी घाट पर स्थित महाबलेश्वर के निकट है। गोदावरी के बाद यह प्रायद्वीप की दूसरी सबसे बड़ी नदी है जिसकी लम्बाई 1,400 कि०मी० लम्बी है। इस नदी का कुल अपवाह-क्षेत्र 2,58,948 वर्ग कि०मी० है जो महाराष्ट्र, कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश में विस्तृत है। कोयना, तुंगभद्रा, घाटप्रभा, मालप्रभा, भीमा व मूसी इत्यादि इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।

4. कावेरी यह नदी कर्नाटक के कुर्ग जिले में पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि श्रेणी से निकलती है और तमिलनाडु राज्य में पत्तनम के निकट बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करती है। 800 कि० मी० लम्बी इस नदी का अपवाह-क्षेत्र लगभग 87,900 वर्ग कि० मी० है, जो केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों में फैला है। मैसूर के पठार पर बहते समय यह नदी अनेक सुन्दर जल-प्रपात बनाती है जिनमें शिवसमुद्रम तथा होगेनकाल प्रपात दर्शनीय हैं। इस नदी पर मैटूर सहित अनेक बाँध बनाए गए हैं। कावेरी के डेल्टा में बसा तंजाऊर जिला अपने उपजाऊपन के कारण दक्षिण का उद्यान कहलाता है।

II. अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ
1. नर्मदा यह नदी मध्य प्रदेश में अमरकंटक पहाड़ी से निकलकर विन्ध्याचल और सतपुड़ा पर्वत-श्रेणियों के बीच पश्चिम की ओर बहती हुई भड़ौच के निकट अरब सागर की खम्भात की खाड़ी (Bay of Cambay) में जा मिलती है। इस नदी की लम्बाई 1,300 कि० मी० और अपवाह-क्षेत्र 98,796 वर्ग कि० मी० है। मध्य प्रदेश में जबलपुर के नीचे भेड़ाघाट की संगमरमर चट्टानों में नर्मदा का महाखड्डु और कपिलधारा प्रपात मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

2. ताप्ती-यह नदी मध्य प्रदेश के बेतूल जिले में महादेव की पहाड़ियों से निकलती है। सतपुड़ा श्रेणी के दक्षिण में स्थित दरार घाटी (Rift Valley) में नर्मदा के समानान्तर पश्चिम की ओर बहती हुई खम्भात की खाड़ी में मिल जाती है। ताप्ती नदी 724 कि०मी० लम्बी है। इस नदी का अपवाह-क्षेत्र 65,145 वर्ग कि० मी० है जो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा गुजरात में विस्तृत है।

3. माही नदी-इसकी उत्पत्ति विन्ध्याचल के पश्चिमी भाग से हुई है। यह गुजरात में बहती हुई खम्भात की खाड़ी में गिरती है।

4. साबरमती नदी राजस्थान के डूंगरपुर जिले में अरावली की पहाड़ियाँ इसका उद्गम स्थान है, जो 300 कि०मी० बहने के बाद खम्भात की खाड़ी में गिरती है। इसका अपवाह क्षेत्र 21,600 वर्ग कि०मी० है जो राजस्थान तथा गुजरात में फैला है।।

5. लूनी नदी-यह नदी राजस्थान के अजमेर के दक्षिण-पश्चिम से निकलकर 300 किलोमीटर बहने के बाद कच्छ की खाड़ी में गिरती है।

उपरोक्त नदियों के अतिरिक्त प्रायद्वीपीय भारत की नदियों में चम्बल, केन, बेतवा तथा सोन प्रमुख नदियाँ हैं, जो प्रायद्वीपीय पठार से निकलकर यमुना तथा गंगा में मिलती हैं, इनकी प्रवाह दिशा दक्षिण से उत्तर की ओर है। चम्बल, केन तथा बेतवा नदियाँ बीहड़-खड्डों से प्रवाहित होती हैं। प्रायद्वीपीय पठार का ढाल उत्तर में सतलुज-गंगा के मैदान की ओर होने के कारण ये नदियाँ उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होती हैं तथा गंगा और यमुना को जल प्रदान करती हैं।

प्रश्न 3.
हिमालय की नदियों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
अथवा
उत्तर भारतीय नदियों का वर्णन करें।
अथवा
सिन्धु अपवाह तंत्र का वर्णन कीजिए।
अथवा
गंगा अपवाह तंत्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उत्तर भारतीय नदी तंत्र को हिमालयी अपवाह तंत्र भी कहा जाता है। हिमालय की नदियों के अपवाह तंत्र को निम्नलिखित तीन वर्गों में रखा जा सकता है-

  • सिन्धु अपवाह तंत्र
  • गंगा अपवाह तंत्र
  • ब्रह्मपुत्र अपवाह तंत्र

(1) सिन्धु अपवाह तंत्र-इस तंत्र के अन्तर्गत उत्तरी भारत की प्रमुख नदियाँ सिन्धु, झेलम, चेनाब, सतलुज, रावी और व्यास सम्मिलित हैं।
1. सिन्धु नदी-यह नदी तिब्बत में 5,180 मीटर की ऊँचाई पर मानसरोवर के निकट से निकलती है। यह अपने उद्गम स्थान से उत्तर:पश्चिम दिशा में 320 किलोमीटर बहने के बाद भारतीय क्षेत्र में पहुँचती है। लद्दाख तथा गिलगित से होकर यह नदी एटक के निकट मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है। सिन्धु नदी की लम्बाई लगभग 2,900 कि०मी० तथा जलग्रहण क्षेत्र लगभग 11,66,700 वर्ग कि०मी० है, जिसमें से 3,21,300 वर्ग कि०मी० भारत में है। पाकिस्तान के साथ हुए सिन्धु जल-सन्धि के अनुसार भारत सिन्धु नदी का केवल 20% पानी प्रयुक्त कर सकता है।

2. झेलम नदी-यह नदी कश्मीर की शेषनाग झील से निकलकर 120 किलोमीटर उत्तर:पश्चिम दिशा में बहती हुई वूलर झील से मिलती है। इसकी लम्बाई 400 किलोमीटर तथा अपवाह क्षेत्र 28,500 कि०मी० है।

3. चेनाब नदी-यह नदी हिमाचल से निकलती है, जहाँ दो नदियाँ चन्द्र और भागा मिलती हैं। हिमाचल में इसे चन्द्रभागा नदी कहते हैं। यह नदी पश्चिम की ओर पीर-पंजाल के समानान्तर बहती है और अखनूर के पास मैदान में प्रवेश करती है तथा कुछ दूर जाने पर पाकिस्तान में चली जाती है। भारत में यह लगभग 1,200 कि०मी० तक बहती है।
HBSE 11th Class Geography Important Questions Chapter 3 अपवाह तंत्र 2

4. सतलुज नदी-यह नदी मानसरोवर झील के निकट राक्षस ताल से लगभग 4,555 मीटर की ऊंचाई से निकलती है। 1,440 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद यह नदी व्यास नदी में मिल जाती है। शिपकी-ला दर्रे के निकट यह भारत में प्रवेश करती है। पर्वतीय क्षेत्र की यात्रा करने के पश्चात् रूपनगर (रोपड़) के पास यह पंजाब में प्रवेश करती है। भारत की प्रमुख बहु-उद्देश्यीय ‘भाखड़ा-नांगल परियोजना’ इसी नदी पर निर्मित है।

5. रावी नदी-यह पंजाब की सबसे छोटी नदी है, जो धौलपुर पर्वतमाला के उत्तरी तथा पीर-पंजाल में दक्षिण ढालों से बहती हुई मैदानी भाग में प्रवेश करती है।

6. व्यास नदी-यह नदी हिमाचल में स्थित रोहतांग दर्रे के व्यास कुण्ड से निकलती है। यह हिमाचल में कुल्लू, मण्डी और कांगड़ा जिलों से बहती हुई पंजाब में अमृतसर तथा कपूरथला जिलों से बहती हुई कपूरथला के निकट सतलुज में मिल जाती है। इसका अपवाह क्षेत्र 25,900 वर्ग किलोमीटर है तथा कुल लम्बाई 615 किलोमीटर है।

(2) गंगा अपवाह तंत्र-गंगा अपवाह तंत्र उत्तरी भारत का प्रमुख तंत्र है जिसमें गंगा तथा उसकी सहायक नदियाँ सम्मिलित हैं।
1. गंगा नदी-यह नदी अलकनन्दा एवं भागीरथी का सम्मिलित नाम है, जो क्रमशः उत्तराखण्ड के गढ़वाल हिमालय से बद्रीनाथ के निकट तथा गोमुख से निकलकर देवप्रयाग में आपस में मिलकर गंगा के नाम से जानी जाती है। अलकनन्दा बद्रीनाथ के निकट तिब्बत की सीमा से 7,800 मीटर की ऊंचाई से निकलकर विष्णुप्रयाग में धौलीगंगा, नन्दप्रयाग में नन्दाकिनी, कर्णप्रयाग में पिण्डर तथा रुद्रप्रयाग में मन्दाकिनी नदियों का जल ग्रहण कर देवप्रयाग में भागीरथी से मिलती है, जबकि भागीरथी 6,600 मीटर की ऊँचाई से गंगोत्री ग्लेशियर से निकलकर टिहरी में मिलंगना नदी को अपने साथ मिलाकर देवप्रयाग में अलकनन्दा से मिलती है। गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी भाग में प्रवेश करती है। इलाहाबाद में यमुना इसमें मिलती है और इसकी दिशा पूर्वी हो जाती है। बिहार तथा बंगाल होती हुई अन्त में यह बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

2. यमुना नदी यह गंगा की प्रमुख सहायक नदी है जो गढ़वाल में यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलती है। ताजेवाला नामक स्थान से यह उत्तरी मैदान में प्रवेश करती है और यह इलाहाबाद में गंगा में विलीन हो जाती है। चम्बल, बेतवा तथा केन नदियाँ, जो विन्ध्याचल से निकलकर दक्षिण से उत्तर की ओर बहती हैं, यमुना में मिल जाती हैं।

3. घाघरा नदी-पहाड़ी क्षेत्र में इसे करनाली नदी कहते हैं। यह हिमालय में मप्सातुंग ग्लेशियर से निकलती है, नेपाल के बाद यह भारत में प्रवेश करती है तो शारदा नदी का जल लेकर छपरा के निकट गंगा नदी में मिल जाती है। यह उत्तर प्रदेश के अयोध्या, फैजाबाद और बलिया जिलों में बहती है।

4. गंडक नदी-यह चीन तथा तिब्बत की सीमा से निकलकर नेपाल से होती हुई बिहार से पटना के पास गंगा में मिल जाती है। नेपाल में इसे नारायणी नदी कहते हैं।

5. कोसी नदी-यमुना के बाद यह नदी गंगा की दूसरी बड़ी सहायक नदी है। यह 730 कि०मी० लम्बी है इस नदी में बाढ़ें अधिक आती हैं तथा अपार जन-धन की हानि होती है, इसलिए इसे ‘बिहार का शोक’ (Sorrow of Bihar) कहते हैं।

(3) ब्रह्मपुत्र अपवाह तंत्र यह तिब्बत में मानसरोवर झील के दक्षिण-पूर्व में 85 किलोमीटर की दूरी से निकलती है। तिब्बत में इसकी दिशा हिमालय के समानान्तर पश्चिम से पूर्व की ओर है, जहाँ इसे साँपो (Tsangpo) कहते हैं। भारत में यह नामचा बरवा के निकट दक्षिण की ओर मुड़ जाती है, जहाँ इसे दिहांग (अरुणाचल प्रदेश में) कहते हैं।

उसके बाद असम में प्रवेश करने पर इसे ब्रह्मपत्र के नाम से जाना जाता है। गारो पहाडियों से मडकर यह दक्षिण दिशा में बहती हई दक्षिण-पर्व में मेघना नदी में मिल जाती है। यह भारत की सबसे लम्बी नदी है, जिसकी लम्बाई लगभग 2,900 किलोमीटर है। इसकी सहायक नदियों में मुख्य रूप से सबनसीरी, भारेली तथा मनास जो इसके दाहिने किनारे मिलती हैं। बाएं किनारे मिलने वाली सहायक नदियों में लुहित, दिहिंग, बूढ़ी दिहिंग तथा कापिली प्रमुख नदियाँ हैं।

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Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 3 अपवाह तंत्र Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 11th Class Geography अपवाह तंत्र Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर का चयन करें-

1. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी ‘बंगाल का शोक’ के नाम से जानी जाती थी?
(A) गंडक
(B) कोसी
(C) सोन
(D) दामोदर
उत्तर:
(D) दामोदर

2. निम्नलिखित में से किस नदी की द्रोणी भारत में सबसे बड़ी है?
(A) सिंधु
(B) बह्मपुत्र
(C) गंगा
(D) कृष्णा
उत्तर:
(C) गंगा

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 3 अपवाह तंत्र

3. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी पंचनद में शामिल नहीं है?
(A) रावी
(B) सिंधु
(C) चेनाब
(D) झेलम
उत्तर:
(B) सिंधु

4. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी भ्रंश घाटी में बहती है?
(A) सोन
(B) यमुना
(C) नर्मदा
(D) लूनी
उत्तर:
(C) नर्मदा

5. निम्नलिखित में से कौन-सा अलकनंदा व भागीरथी का संगम स्थल है?
(A) विष्णु प्रयाग
(B) रूद्र प्रयाग
(C) कर्ण प्रयाग
(D) देव प्रयाग
उत्तर:
(D) देव प्रयाग

अंतर स्पष्ट करें-
(i) नदी द्रोणी और जल-संभर
(ii) वृक्षाकार और जालीनुमा अपवाह प्रारूप
(iii) अपकेंद्रीय और अभिकेंद्रीय अपवाह प्रारूप
(iv) डेल्टा और ज्वारनदमुख।
उत्तर:
(i) नदी द्रोणी और जल-संभर

नदी द्रोणीजल संभर
1. बड़ी नदियों के जल-ग्रहण क्षेत्र को नदी द्रोणी संभर (River Basin) कहते हैं।1. छोटी नदियों या नालों द्वारा अप्रवाहित क्षेत्र को जल (Water shed) कहते हैं।
2. इसका आकार विशाल होता है।2. इसका आकार नदी द्रोणी से छोटा होता है।

(ii) वृक्षाकार और जालीनुमा अपवाह प्रारूप

वृक्षाकार अपवाह प्रारूपजालीनुमा अपवाह प्रारूप
1. जब किसी अपवाह की आकृति वृक्ष के समान हो तो ऐसे अपवाह के प्रतिरूप को वृक्षाकार अपवाह प्रारूप कहते हैं।1. जब मुख्य नदियाँ एक-दूसरे के समानांतर प्रवाहित होती हो और सहायक नदियाँ उनसे समकोण पर मिलती हो तो अपवाह के ऐसे प्रारूप को जालीनुमा अपवाह प्रारूप कहते हैं।
2. इसमें एक मुख्य नदी धारा से विभिन्न शाखाओं में उपधाराएँ प्रवाहित होती हैं।2. इसमें प्राथमिक सहायक नदियाँ समांतर और गैण शाखाएँ या नदियाँ समकोण पर काटती हुई प्रवाहित होती हैं।

(iii) अपकेंद्रीय और अभिकेंद्रीय अपवाह प्रारूप

अपरैद्रीय अपवाह प्रारूपअभिकेंद्रीय अपवाह प्रारूप
1. जब नदियाँ किसी उच्च भाग या पर्वत से निकलकर सभी दिशाओं में प्रवाहित होती हैं तो उसे अपकेंद्रीय अपवाह प्रारूप कहते हैं। इसको अरीय अपवाह प्रतिरूप भी कहते हैं।1. जब नदियाँ सभी दिशाओं में बहकर किसी झील या दलदल में मिल जाती हैं तो उसे अभिकेंद्रीय अपवाह प्रारूप कहते हैं।
2. ऐसे प्रारूप किसी ज्वालामुखी पर्वत, गुम्बद या उसे टीलों पर विकसित होते हैं।2. रेगिस्तानी या मरुस्थलीय क्षेत्रों में जहाँ अंतःस्थानीय प्रवाह मिलता है, ऐसी अपवाह प्रणाली देखने को मिलती है अर्थात् मरुस्थलीय भागों में बहने वाली नदियाँ इस प्रकार के प्रारूप बनाती हैं।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 3 अपवाह तंत्र

(iv) डेल्टा और ज्वारनद्मुख

डेल्टाज्वारनदमुख
1. जब नदियों द्वारा समुद्री मुहाने पर मिट्टी एवं बालू के महीन कणों से त्रिभुजाकार अवसाद बनते हैं, जिन्हें डेल्टा (Delta) कहते हैं।1. जब नदियाँ अपने साथ लाए हुए अवसाद को अपने मुहाने पर जमा नहीं करती, बल्कि इनको समुद्र में बहा देती. हैं। इससे नदियाँ डेल्टाओं का निर्माण नहीं कर पातीं। ऐसी नदियों के मुहाने ज्यारनदमुख कहलाते हैं।
2. इसका आकार त्रिभुजाकार, पंखाकार व पंजाकार होता है।2. इसका कोई भी स्वरूप या आकार नहीं बनता।
3. नदी के मुहाने पर मलबा जमा रहता है, क्योंकि नदी मंद गति से प्रवाहित होती है।3. नदी के मुहाने साफ रहते हैं, क्योंकि नदी तेज गति से प्रवाहित होती है।

निम्नलिखित प्रश्नों के लगभग 30 शब्दों में उत्तर दें

प्रश्न 1.
भारत में नदियों को आपस में जोड़ने के सामाजिक-आर्थिक लाभ क्या है?
उत्तर:
भारत में अनेक नदियाँ बहती हैं। इनमें से कुछ नदियों में साल-भर पानी बहता है और कुछ में साल-भर पानी नहीं बहता। ये नदियाँ प्रतिवर्ष जल की विशाल मात्रा वहन करती हैं परन्तु देश में जल का प्रवाह समान नहीं है। यह अंतर समय और स्थान की दृष्टि से है।

वर्षा ऋतु के समय अधिकांश जल बाढ़ में व्यर्थ हो जाता है और समुद्र में बह जाता है। ग्रीष्म ऋतु में देश के कुछ क्षेत्र सूखाग्रस्त हो जाते हैं। इस प्रकार देश : छ भाग में बाढ़ जाती है तो कुछ सूखाग्रस्त हो जाता है। यदि सभी नदियों को आपस में जोड़ दिया जाए तो इससे निम्नलिखित सामाजिक-आर्थिक लाभ होंगे-

  • बाढ़ और सूखे की समस्या से राहत मिलेगी।
  • पीने के पानी की समस्या हल होगी।
  • फसलों की पैदावार में वृद्धि होगी और किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी।
  • जल की व्यवस्था करने में खर्च होने वाले करोड़ों रुपए की बचत होगी।

प्रश्न 2.
प्रायद्वीपीय नदी के तीन लक्षण लिखें।
उत्तर:
प्रायद्वीपीय नदी के लक्षण निम्नलिखित हैं-

  • प्रायद्वीपीय नदी/नदियाँ मुख्यतः वर्षा से जल प्राप्त करती हैं। ये बारहमासी न होकर मौसमी होती हैं।
  • इनकी जलग्रहण क्षमता हिमालय अपवाह तंत्र की नदियों से कम है।
  • ये टेढ़ी-मेढ़ी नहीं बहतीं और विसर्प नहीं बनातीं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
उत्तर भारतीय नदियों की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ क्या हैं? ये प्रायद्वीपीय नदियों से किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर:
उत्तर भारतीय नदियों को हिमालयी-प्रवाह तंत्र के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि अधिकांश उत्तर भारत की नदियाँ हिमालय से निकलती हैं। इसी कारण ये नित्यवाही एवं शुष्ककाल में भी जल प्रदान करती रहती हैं। उत्तर भारतीय नदियों की विशेषताएँ और प्रायद्वीप नदियों से भिन्नता अग्रलिखित प्रकार से हैं-

उत्तर भारतीय नदियाँप्रायद्धीपीय नदियाँ
1. उत्तर भारत की अधिकांश नदियाँ बारहमासी हैं अर्थात् इनमें साल-भर पानी बहता है, क्योंकि ये हिमालय से निकलती हैं।1. प्रायद्दीपीय नटियाँ मौसरी हैं अर्थात् से मौसम या वर्घा से जल ग्रहण करती हैं। कुछ नदियों पटारी भागों से भी जस्ष ग्रहण करती है जिनका जल गर्मी में सूल जाता है।
2. अधिकांश उत्तर भारतीय नदियों मैदानी भागों में बहती हैं और इनसे अनेक छोटी-छोटी नदियों, नहरें एवं नाले निकलते हैं।2. ये नदियों न तो समतल भागों में बहती हैं और न ही इनसे नहरें, नाले निकाले जा सकते है।
3. इन नदियों की उत्पत्ति हिमानियों से हुई है।3. इन नदियों की उत्पत्ति मध्ययत्ती उध्य भूमि खा पठारों से हुई है।
4. ये नदियाँ सिंचाई के लिए अधिक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी हैं।4. ये नदियाँ विद्युत उत्पादन की दृष्टि से अधिक उप्योगी है।
5. इन नदियों का अपयाह क्षेत्र अधिक विशाल है और इनकी जल-ग्रहण क्षमता भी अधिक है। इसमें सम्मिलित मुख्य नदियाँ हैं- गंगा, यमुना, कोसी, सिंधु, सतलुज, रावी, झेलम, घाघरा, चिनाब, व्यास, रामगंगा, सोन, ब्रह्मपुत्र, गंडक, दिवांग आदि।5. इन नदियों का अपवाह क्षेत्र अधिक घोटा है और इनकी जल-ग्रहण क्षमता भी कम है। इसमें सम्मिलित मुख्य नदियों हैं-ताप्ती, गोदाबरी, कृष्गा, कावेरी, दामोदर, हुगली, स्वर्णरेखा, पैनार, ज्ञावती आदि।
6. ये नदियों विशाल डेल्टाओं का निर्माण करती हैं।6. ये नदियाँ मुख्यतः ज्वारनदमुख बनाती हैं।
7. इन नदियों में धार्मिक केंद्र और संगम अधिक पाए जाते हैं।7. इन नदियों में घाट और प्रफात “अधिक पाए जाते हैं।
8. इन नदियों को जल की प्राप्ति मुख्यतः बर्फ के पिघलने से होती है।8. इन नदियों को जल्त की प्राप्ति मुख्यतः वर्षा से होती है।
9. इन नदियों को सिन्धु, गंगा और ब्रह्यपुत्र नदी क्रम के रूप में विभाजित किया गया है।9. इन नदियों को बंगाल की खाड़ी और अरव सागर में गिरने बाल्ती नदियों के रूप में विभाजित किया गया है।
10. ये नदियाँ गहरी घाटियों एवं गॉर्ज से होकर गुजरती हैं।10. ये नदियां कम गहरी घाटियों से होकर गुज़ती है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 3 अपवाह तंत्र

प्रश्न 2.
मान लीजिए आप हिमालय के गिरिपद के साथ-साथ हरिद्वार से सिलीगुड़ी तक यात्रा कर रहे हैं। इस मार्ग में आने वाली मुख्य नदियों के नाम बताएँ। इनमें से किसी एक नदी की विशेषताओं का भी वर्णन करें।
उत्तर:
यदि हम हिमालय के गिरिपद के साथ-साथ हरिद्वार से सिलीगुड़ी तक यात्रा कर रहे हैं तो हमें उत्तर भारत की अधिकांश नदियों और बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों को पार करना होगा। इस मार्ग में आने वाली मुख्य नदियाँ इस प्रकार होंगी-

  • गंगा
  • यमुना
  • रामगंगा
  • गोमती
  • सरयू
  • शारदा
  • गंडक
  • कमला
  • कोसी
  • महानदी आदि।

गंगा नदी की विशेषताएँ-गंगा नदी की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • गंगा उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गोमुख के निकट गंगोत्री हिमनद से निकलती है।
  • इसकी लम्बाई लगभग 2525 कि०मी० है।
  • यह हरिद्वार के समीप मैदान में प्रवेश करती है।
  • भारतीय संस्कृति के अनुसार गंगा नदी को एक पवित्र नदी माना जाता है और इसको ‘राष्ट्रीय नदी’ का दर्जा प्राप्त है।
  • उत्तर-भारत की लगभग 85 प्रतिशत कृषि व्यवस्था इस नदी पर निर्भर करती है। इसी कारण यह भारत की जीवन रेखा कहलाती है।
  • इस नदी की मुख्य सहायक नदियाँ हैं यमुना, सोन, घाघरा, गोमती, गंडक, कोसी आदि।
  • गंगा अपनी द्रोणी और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्त्व की दृष्टि से भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी है।

अपवाह तंत्र HBSE 11th Class Geography Notes

→ अपवाह-तंत्र (Drainage System)-स्थान विशेष में एक निश्चित क्रम में प्रवाहित होने वाली नदियों एवं उनकी शाखाओं के सम्मिलित अध्ययन को अपवाह-तंत्र कहते हैं। शीर्ष-कटाव (Headward Erosion) नदी का पीछे की ओर कटाव जिससे वह अपनी घाटी को ऊर्ध्वप्रवाह की ओर लंबा करती है तथा उसका उद्गम स्थान पीछे की ओर हटता जाता है।

→ सरिता हरण (River Capture)-शीर्ष-कटाव करती नदी का उद्गम स्थान जब पीछे को हटता है तो कभी-कभी वह किसी अन्य नदी को अपने में मिला लेती है। इसे नदी अपहरण या सरिता हरण कहते हैं।

→ अनुवर्ती नदियां (Consequent Rivers)-ऐसी नदियां जो जल-विभाजक के समानांतर या भूमि के मूल ढाल के अनुरूप बहती हों।

→ पूर्ववर्ती नदियां (Antecedent Rivers)-वे नदियां जो स्थल-खंड के उत्थान से पहले भी बहती थीं तथा स्थल-खंड के उत्थान के बाद उसे काटकर अपने मार्ग को यथावत बनाए रखती हैं।

→ ज्वारनदमुख (Estuary)-नदी का ज्वार (Tide) में मिलने वाला हिस्सा (मुंह) जिसमें ताजा व लवण-युक्त पानी आपस में मिलते हैं।

→ लंबवत अपरदन (Vertical Erosion)-नदी द्वारा किनारों की अपेक्षा तली में किया गया ज्यादा अपरदन, जिसमें घाटी गहरी होती है।

→ पाश्विक अपरदन (Lateral Erosion)-तली की अपेक्षा नदी द्वारा किनारों पर किया गया अधिक अपरदन जिसमें घाटी चौड़ी होती है।

→ डेल्टा (Delta)-जलोढ़ भूमि का लगभग त्रिकोणीय भू-भाग जो नदी के मुहाने पर निर्मित होता है। गंगा-ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा तथा कावेरी डेल्टा भारत के प्रसिद्ध डेल्टा हैं।

→ महाखड्ड (Gorge)-खड़े पावों वाली एक गहरी एवं संकीर्ण चट्टानी नदी घाटी।

→ सुंदरवन (Sundarbans)-गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा को ही सुंदरवन डेल्टा कहते हैं। यहां सुंदरी नामक वृक्ष बहुत मात्रा में पाए जाते हैं।

→ नदी-प्रवृत्ति (River Regime) नदी में जल के मौसमी बहाव को नदी प्रवृत्ति कहा जाता है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

HBSE 11th Class Geography संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर का चयन करें-

1. करेवा भू-आकृति कहाँ पाई जाती है?
(A) उत्तरी-पूर्वी हिमालय
(B) पूर्वी हिमालय
(C) हिमाचल-उत्तराखण्ड हिमालय
(D) कश्मीर हिमालय
उत्तर:
(D) कश्मीर हिमालय

2. निम्नलिखित में से किस राज्य में ‘लोकताक’ झील स्थित है?
(A) केरल
(B) मणिपुर
(C) उत्तराखण्ड
(D) राजस्थान
उत्तर:
(B) मणिपुर

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3. अंडमान और निकोबार को कौन-सा जल क्षेत्र अलग करता है?
(A) 11° चैनल
(B) 10° चैनल
(C) मन्नार की खाड़ी
(D) अंडमान सागर
उत्तर:
(B) 10° चैनल

4. डोडाबेटा चोटी निम्नलिखित में से कौन-सी पहाड़ी श्रृंखला में स्थित है?
(A) नीलगिरि
(B) कार्डामम
(C) अनामलाई
(D) नल्लामाला
उत्तर:
(A) नीलगिरि

निम्नलिखित प्रश्नों के लगभग 30 शब्दों में उत्तर दें

प्रश्न 1.
यदि एक व्यक्ति को लक्षद्वीप जाना हो तो वह कौन-से तटीय मैदान से होकर जाएगा और क्यों?
उत्तर:
लक्षद्वीप अरब सागर में स्थित है। यह केरल तट से 280 से 480 कि०मी० की दूरी पर स्थित है। केरल तट मालाबार तट का ही भाग है। इनके बीच की दूरी 280 कि०मी० है। यदि किसी व्यक्ति को लक्षद्वीप जाना हो तो उसे मालाबार तट के मैदानी भाग से होकर जाना होगा, क्योंकि यही उसके लिए निकटतम दूरी वाला रास्ता होगा।

प्रश्न 2.
भारत में ठंडा मरुस्थल कहाँ स्थित है? इस क्षेत्र की मुख्य श्रेणियों के नाम बताएँ।
उत्तर:
भारत में ठंडा मरुस्थल कश्मीर हिमालय के उत्तरी-पूर्वी भाग में लद्दाख श्रेणी में स्थित है जो वृहत हिमालय और कराकोरम श्रेणियों के बीच स्थित है। वर्ष-भर तापमान निम्न रहने के कारण यह संपूर्ण क्षेत्र हिमाच्छादित रहता है। इसलिए यह क्षेत्र ठंडा मरुस्थल कहलाता है। इस क्षेत्र की मुख्य श्रेणियों के नाम हैं-कराकोरम श्रेणी, जास्कर श्रेणी, लद्दाख श्रेणी, पीरपंजाल श्रेणी आदि।

प्रश्न 3.
पश्चिमी तटीय मैदान पर कोई डेल्टा क्यों नहीं है?
उत्तर:
पश्चिमी तट पर बहने वाली मुख्य नदियाँ नर्मदा एवं ताप्ती हैं जो अरब सागर में गिरती हैं। ये नदियाँ डेल्टा न बनाकर ज्वारनदमुख बनाती हैं। इसलिए पश्चिमी तटीय मैदान पर कोई भी डेल्टा नहीं है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-

  • इन नदियों का अधिक तेजी से बहना।
  • इन नदियों के मार्ग की जल प्रवणता अधिक होना।
  • इन नदियों का एक भाग में बहना।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूहों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करें।
उत्तर:
अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूहों का तुलनात्मक विवरण इस प्रकार है-

अरब सागर में स्थित द्वीप समूहबंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूह
1. अरब सागर में स्थित प्रमुख द्वीप समूह हैं-लक्षद्वीप और मिनिकॉय।1. बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूह हैं-उत्तर में अंडमान और दक्षिण में निकोबार।
2. अरब सागर में लगभग 36 द्वीप हैं।2. बंगाल की खाड़ी में लगभग 572 द्वीप हैं।
3. अरब सागर में स्थित द्वीप समूह 80° 12° उत्तर और 71° पूर्व से 74° पूर्व के बीच स्थित हैं।3. बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूह 6° उत्तर से 14° उत्तर और 92° पूर्व से 94° पूर्व के बीच स्थित हैं।
4. अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप और मिनिकॉय का निर्माण प्रवाल निक्षेप से हुआ है।4. बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूह में जमग्न पर्वतों का हिस्सा है।
5. अरब सागर में स्थित द्वीप समूह पर तूफान निर्मित पुलिन हैं जिन पर अबद्ध गुटिकाएँ, शिंगिल गोलशिमकाएँ तथा गोलाश्म पूर्वी समुद्र तट पाए जाते हैं।5. ये द्वीप असंगठित, कंकड़, पत्थरों व गोलाश्मों से बने हैं।
6. 9 डिग्री चैनल लक्षद्वीप कवरत्ती को मिनिकॉय से अलग करती है और 8 डिग्री चैनल मिनिकॉय द्वीप को मालद्वीप से अलग करती है।6. 10 डिग्री चैनल लिटिल अण्डमान एवं कार निकोबार के बीच है। यह अण्डमान को निकोबार से अलग करती है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान

प्रश्न 2.
नदी घाटी मैदान में पाए जाने वाली महत्त्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ कौन-सी हैं? इनका विवरण दें।
उत्तर:
नदी जब पर्वतीय भाग से उतरकर मैदानी भागों में बहती है तो कई प्रकार की स्थलाकृतियों का निर्माण करती है। अतः नदी घाटी मैदान में पाए जाने वाली महत्त्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ इस प्रकार हैं-
1. जलोढ़ पंख तथा जलोढ़ शंकु (Alluvial Fans and Alluvial Cones) जब नदी पर्वतीय प्रदेश को छोड़कर मैदानी भाग में प्रवेश करती है तो एकदम मन्द हो जाता है जिससे जल की गति भी मन्द हो जाती है। इससे नदी की भार ढोने की शक्ति कम हो जाती है और उच्च पर्वतीय प्रदेशों से लाया हुआ तलछट वहीं पर जलोढ़ पंख जमा हो जाता है। परिणामस्वरूप नदी अपने नद-भार को पर्वतीय कंदरा के बाहर एक अर्धचन्द्राकार अथवा अर्ध वृत्ताकार रूप में फैला देती है जिसे जलोढ़ पंख कहते हैं।
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान 1

जलोढ़ पंख की चोटी (Apex) कन्दरा के मुख पर होती है। यहाँ पर नदी अपने आपको कई शाखाओं में बाँट लेती है। जलोढ़ पंखों के अनेक उदाहरण हिमालय, एण्डीज तथा आल्पस पर्वतों के गिरिपदीय क्षेत्रों में मिलते हैं। कई बार जलोढ़ पंखों पर नद-भार अधिक मात्रा में जमा हो जाता है जिससे इसका ढाल तीव्र हो जाता है। इस प्रकार की आकृति को जलोढ़ शंकु कहते हैं। जलोढ़ शंकु प्रायः अर्ध-शुष्क प्रदेशों में पाए जाते हैं।
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान 2

2. गुंफित नदी (Braided River)-नदी के निचले भाग में नदी की भार वहन क्षमता बहुत कम हो जाती है जिसके कारण नदी अपने तल पर ही निक्षेपण करने लगती है और उसकी धारा अवरुद्ध होने लगती है। इस प्रकार नदी की धारा अनेक शाखाओं में विभक्त होने लग जाती है तथा इन धाराओं का एक जाल-सा बन बिजलोट को जाता है जिसे गुंफित नदी कहा जाता है।

3. नदी विसर्प तथा गोखुर झील (River Meanders and Oxbow Lake)-जब नदी समतल मैदान में बहती है तो उसकी गति मंद हो जाती है। ऐसी स्थिति में यदि उसके रास्ते में थोड़ी-सी भी रुकावट पड़ जाए तो उसमें मोड़ पड़ जाता है। इन मोड़ों के अवतल किनारे पर नदी का वेग अधिक होता है जबकि उत्तल किनारे पर नदी अवतल किनारे पर अपरदन करती है तथा उत्तल किनारे पर निक्षेपण करती है। अतः एक बार मोड़ पड़ जाने पर उसमें वृद्धि होती रहती है। जब नदी में कई मोड़ पड़ जाते हैं तो वह साँप की भाँति बल खाती जाती है। इसलिए इसे नदी विसर्प कहा जाता है।
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान 3
गोखुर झील कालान्तर में विसर्प अधिक बड़े तथा घुमावदार हो जाते हैं और दो मोड़ों के बीच चित्र : नदी-विसर्प तथा गोखर पतली-सी ग्रीवा रह जाती है। जब पतली ग्रीवा कट जाती है तो छोड़े हुए भाग के मुख अवसादी झीलों का विकास निक्षेपण से बन्द हो जाते हैं। ऐसा छोड़ा हुआ भाग अपनी आकृति के कारण गोखुर झील कहलाता है। गंगा के मार्ग में कई गोखुर झीलें देखने को मिलती हैं।

4. प्राकृतिक तटबन्ध तथा बाढ़ का मैदान (Natural Levees and Flood Plains)-नदी का वेग किनारों पर कम तथा मध्य में अधिक होता है। अतः मैदानी भागों में नदी अपने तलछट का बहुत-सा भाग किनारों पर जमा करती है। किनारों पर निरन्तर तलछट के जमाव से वे ऊँचे हो जाते हैं और उनकी आकृति बाँधों जैसी हो जाती है। प्रकृति द्वारा बनाए गए नदी के उन बाँधों के आकार के किनारों को प्राकृतिक तटबन्ध (Natural Levees) कहते हैं। चीन की ह्वांग-हो नदी तथा संयुक्त राज्य अमेरिका की मिसीसिपी नदी के प्राकृतिक तटबन्ध विश्वविख्यात हैं।
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 2 संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान 4
जब कभी वर्षा ऋतु में नदी में बाढ़ आती है तो नदी का जल प्राकृतिक तटबन्धों को पार करके या तोड़कर दूर-दूर तक फैल जाता है और अपने साथ लाई हुई सामग्री को बिछा देता है। इस प्रकार एक विस्तृत उपजाऊ मैदान का निर्माण होता है जिसे बाढ़ का मैदान (Flood Plains) कहते हैं; जैसे भारत में गंगा का मैदान तथा चीन में हांग-हो का मैदान।

5. डेल्टा (Delta)-नदी अपने मुहाने पर अपने साथ लाई हुई मिट्टी, कंकड़, पत्थर आदि जमा करती है। धीरे-धीरे उसके मुहाने पर मिट्टी की परत के ऊपर परत जमती चली जाती है और मुहाना चीरकर नई दलदली भूमि समुद्र में से बाहर निकल आती है जो डेल्टा कहलाती है।

प्रश्न 3.
यदि आप बद्रीनाथ से सुंदरवन डेल्टा तक गंगा नदी के साथ-साथ चलते हैं तो आपके रास्ते में कौन-सी मुख्य स्थलाकृतियाँ आएँगी?
उत्तर:
बद्रीनाथ उत्तराखण्ड के चमोली जिले की फूलों की घाटी के समीप है। यदि हम बद्रीनाथ से गंगा नदी के साथ-साथ सुंदरवन डेल्टा के लिए चलें तो हमें अनेक प्रकार की भू-आकृतियों से होकर जाना पड़ेगा। पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित ऊँची-ऊँची चोटियों, गहरी घाटियों और 4 तीव्र ढाल वाले रास्तों या क्षेत्रों को पार करना पड़ेगा। रास्ते में आने वाली स्थलाकृतियाँ इस प्रकार होंगी

  • जब गंगा नदी हिमाचल पर्वत पर बहती है तो ‘V’ आकार की घाटी का निर्माण करती है।
  • जब यह नदी ‘V’ आकार की घाटी को गहरा करती है तो महाखड्ड का निर्माण करती है। इसके अतिरिक्त हिमालय पर्वत पर जल प्रपात और क्षिप्रिकाओं का भी निर्माण होता है।
  • जब गंगा नदी हिमाचल पर्वत से हरिद्वार के पास मैदानी भाग में उतरती है तो अनेक छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर जमा करती है जिनसे जलोढ़ पंख का निर्माण होता है।
  • जैसे-जैसे यह नदी आगे बढ़ती है अपने दोनों किनारों पर अवसादों को जमा करती है जिनसे तटबंध का निर्माण होता है।
  • जब इसका बहाव कम हो जाता है तो यह टेढ़ी-मेढ़ी बहने लगती है जिससे विसर्प का निर्माण होता है। इसके अलावा रोधिका, गोखुर झीलों और गुंफित नदियों का भी निर्माण करती है।
  • जब गंगा नदी अपने मुहाने पर पहुँचती है तो विभिन्न शाखाओं में विभक्त होकर डेल्टा का निर्माण करती है।

इस प्रकार बद्रीनाथ से सुंदरवन डेल्टा तक हमें गंगा नदी द्वारा बनाई गई उपर्युक्त स्थलाकृतियाँ मिलेंगी। हरिद्वार के पास हमारा पर्वतीय मार्ग समाप्त हो जाएगा और मैदानी मार्ग आरंभ हो जाएगा। अंत में हम गंगा नदी निर्मित स्थलाकृतियों को पार कर सुंदरवन डेल्टा पहुँचेंगे।

संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान HBSE 11th Class Geography Notes

→ अनुदैर्घ्य घाटी (Longitudinal Valley)-किसी पर्वत श्रृंखला के समानांतर एक घाटी जो शैल-स्तर के नतिलंब (Strike) के समानांतर पाई जाती है।

→ द्रोणी घाटी (Rift Valley)-भ्रंशन के उपरांत धरती के धंसाव या निकटवर्ती खंडों के उत्थान से बनी नदी घाटी।

→ उत्खंड (Horst)-पृथ्वी पर ऊपर उठा प्रखंड जो पठार के रूप में भ्रंशों के बीच से ऊपर उठता है।

→ भू-अभिनति (Syncline)-जल के उथले लंबे भाग जिसमें तलछटों का जमाव होता है।

→ वलन (Fold)-भू-पर्पटी के संपीडन बलों द्वारा उत्पन्न शैल-स्तर में एक मोड़।

→ संपीडन (Compression)-शैल-स्तरों पर विपरीत दिशाओं में पड़ने वाले बलों से उत्पन्न संकुचन।

→ भ्रंशन (Faulting)-पृथ्वी की आंतरिक हलचलों से शैलों में पड़ने वाली दरार।

→ निमज्जन (Subsidence)-भू-खंड का आन्तरिक हलचलों के कारण धंसाव।

→ विभंजन (Fracture)-तनाव या खिंचाव के कारण शैलों की परतों क टूटना।

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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 1 मानचित्र का परिचय Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. रेखाओं एवं आकृतियों के मानचित्र कहे जाने के लिए निम्नलिखित में से क्या अनिवार्य है?
(A) मानचित्र रूढ़ि
(B) प्रतीक
(C) उत्तर दिशा
(D) मानचित्र मापनी
उत्तर:
(D) मानचित्र मापनी

2. एक मानचित्र जिसकी मापनी 1:4,000 एवं उससे बड़ी है, उसे कहा जाता है
(A) भूसंपत्ति मानचित्र
(B) स्थलाकृतिक मानचित्र
(C) भित्ति मानचित्र
(D) एटलस मानचित्र
उत्तर:
(A) भूसंपत्ति मानचित्र

3. निम्नलिखित में से कौन-सा मानचित्र के लिए अनिवार्य नहीं है?
(A) मानचित्र प्रक्षेप
(B) मानचित्र व्यापकीकरण
(C) मानचित्र अभिकल्पना
(D) मानचित्रों का इतिहास
उत्तर:
(D) मानचित्रों का इतिहास

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

4. मानचित्र में व्यापकीकरण का अर्थ है
(A) मानचित्र में ज्यादा से ज्यादा लक्षण दिखाना
(B) मानचित्र में विस्तृत क्षेत्रों का प्रदर्शन
(C) प्रदर्शित किए जाने वाली सूचनाओं व आंकड़ों का सरलीकरण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) प्रदर्शित किए जाने वाली सूचनाओं व आंकड़ों का सरलीकरण

5. स्थलाकृतिक मानचित्रों के संबंध में कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
(A) इनमें बस्तियां, धार्मिक स्थल, संचार के साधन, नहरें, कुएं आदि दिखाए जाते हैं
(B) इनकी मापनी 1:25,000 से 1:250,000 तक होती है
(C) इन्हें राज्य सरकारें प्रकाशित करती हैं
(D) इनमें प्राकृतिक लक्षणों का भी प्रदर्शन किया जाता है
उत्तर:
(C) इन्हें राज्य सरकारें प्रकाशित करती हैं

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानचित्र किसे कहते हैं ? अथवा मानचित्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी सहित किसी भी खगोलीय पिंड अथवा उसके किसी भाग का मापनी के अनुसार समतल सतह पर प्रतीकात्मक निरूपण मानचित्र कहलाता है।

प्रश्न 2.
गोलाकार पृथ्वी का सही और शुद्ध प्रदर्शन किस चीज़ से होता है?
उत्तर:
ग्लोब द्वारा।

प्रश्न 3.
ग्लोब क्या है?
उत्तर:
ग्लोब, पृथ्वी अथवा किसी खगोलीय पिंड का मानव द्वारा निर्मित छोटे आकार का एक त्रि-विस्तारीय मॉडल है।

प्रश्न 4.
विस्तृत क्षेत्रों के मानचित्र ग्लोब इतने शुद्ध क्यों नहीं होते?
अथवा
सभी मानचित्र मूलतः दोषपूर्ण क्यों होते हैं?
उत्तर:
मानचित्र सपाट कागज पर बनाए जाते हैं, जबकि पृथ्वी गोलाकार है। किसी गोल आकृति को एकदम सपाट बनाना संभव नहीं होता। इसी कारण बड़े क्षेत्रों के मानचित्र प्रायः विरूपित (Distorted) अथवा दोषपूर्ण होते हैं।

प्रश्न 5.
मानचित्र को धरातल का आलेखी (Graphic) अथवा प्रतीकात्मक निरूपण क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि मानचित्र पर धरातलीय लक्षणों को प्रतीकों और अक्षरों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 6.
मानचित्र के मुख्य घटक या अंग या अवयव या भाग कौन-से होते हैं?
उत्तर:
शीर्षक, मापक, संकेत, दिशा, प्रक्षेप और रूढ़ चिह्न मानचित्र के छः आवश्यक अवयव (Elements) होते हैं।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

प्रश्न 7.
मानचित्रों के दो प्रमुख वर्गीकरण कौन-से होते हैं?
उत्तर:

  1. मापक के अनुसार।
  2. विषय-वस्तु अथवा उद्देश्य अथवा प्रकार्य के अनुसार।

प्रश्न 8.
मापक के अनुसार मानचित्र कितने प्रकार के होते हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
मापक के अनुसार मानचित्र दो प्रकार के होते हैं-(1) बृहत मापक पर बने मानचित्र; जैसे भूकर मानचित्र और स्थलाकृतिक मानचित्र। (2) लघु मापक पर बने मानचित्र; जैसे दीवारी मानचित्र और एटलस मानचित्र।

प्रश्न 9.
बृहत मापक के मानचित्र और लघु मापक के मानचित्र में क्या अंतर होता है ?
उत्तर:
बृहत मापक के मानचित्र-बृहत मापक पर बने मानचित्र एक कागज़ पर अपेक्षाकृत थोड़े क्षेत्र को दिखाते हैं। अतः इनमें विस्तृत विवरण दिखाए जा सकते हैं। उदाहरणतः 1:50,000 के मापक पर बना भारतीय सर्वेक्षण विभाग का स्थलाकृतिक मानचित्र बृहत मापक पर बना होता है।

लघु मापक के मानचित्र-लघु मापक पर बना मानचित्र उसी आकार के कागज़ पर अपेक्षाकृत बड़े क्षेत्र का प्रदर्शन करता है। इसमें सीमित विवरण होते हैं। महाद्वीपों और देशों के मानचित्र लघु मापक पर बने होते हैं।

प्रश्न 10.
मानचित्र अलग-अलग मापकों पर क्यों बनाए जाते हैं?
उत्तर:
मानचित्र के लिए मापक का चयन हमारे उद्देश्य पर निर्भर करता है। यदि हम एक विस्तृत क्षेत्र में प्रमुख शहरों, बंदरगाहों व प्रमुख भू-आकारों का प्रदर्शन करना चाहते हैं तो हम लघु मापक का मानचित्र बनाएंगे और यदि हम एक छोटे क्षेत्र को विस्तार से दिखाना चाहते हैं तो हम बृहत मापक वाला मानचित्र बनाएंगे।

प्रश्न 11.
भूकर या कैडस्ट्रल मानचित्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
ये बृहत मापक पर बने ऐसे मानचित्र होते हैं जो सार्वजनिक स्थानों एवं प्रत्येक भवन अथवा व्यक्तिगत क्षेत्रों की सीमाएं दर्शाते हैं। इनसे भूमि कर या लगान इकट्ठा किया जाता है। इन्हें प्लान भी कहते हैं।

प्रश्न 12.
उद्देश्य के अनुसार मानचित्रों के दो प्रमुख वर्ग कौन-से होते हैं?
उत्तर:

  1. भौतिक या प्राकृतिक मानचित्र
  2. सांस्कृतिक या मानवीय मानचित्र।

प्रश्न 13.
भौतिक तथा सांस्कृतिक मानचित्रों में अंतर बताइए।
उत्तर:
भौतिक मानचित्र प्राकृतिक तत्त्वों को दर्शाते हैं; जैसे धरातल, जलवायु, नदियां, वनस्पति, मिट्टी आदि। सांस्कृतिक मानचित्र मानवीय तत्त्वों को दर्शाते हैं; जैसे जनसंख्या, कृषि, उद्योग, परिवहन इत्यादि।

प्रश्न 14.
मानचित्रों का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
मानचित्रों के बिना भू-तल पर भौतिक तथा सांस्कृतिक तत्त्वों के वितरण और उनके बीच संबंधों का प्रदर्शन नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 15.
मानचित्र और प्लान में क्या अंतर है?
उत्तर:
मानचित्र बड़े क्षेत्र को छोटे मापक द्वारा प्रदर्शित करते हैं, जबकि प्लान में छोटे क्षेत्र को बड़े मापक द्वारा दिखाया जाता है। मानचित्र में कागज़ का 1 सें०मी० धरती के 2 कि०मी० को प्रदर्शित कर सकता है, जबकि प्लान में कागज़ का 1 सें०मी० धरती के 1 अथवा कुछ मीटरों को ही दिखाता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्लोब और मानचित्र में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
ग्लोब और मानचित्र में निम्नलिखित अंतर होता है-

ग्लोबमानचित्र
1. ग्लोब, संपूर्ण पृथ्वी अथवा किसी खगोलीय पिंड का छोटा-सा मॉडल होता है।1. मानचित्र, पृथ्वी या किसी खगोलीय पिंड अथवा उसके किसी भाग को प्रदर्शित करता है।
2. बड़े ग्लोबों का निर्माण, रख-रखाव, प्रयोग और उनका लाना, ले-जाना कठिन होता है।2. मानचित्र का प्रयोग और रख-रखाव आसान है। इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है।
3. कम जगह होने के कारण ग्लोब पर सभी महत्त्वपूर्ण स्थान व आकृतियां नहीं दिखाई जा सकतीं।3. मानचित्र पर छोटे क्षेत्रों का विस्तृत प्रदर्शन संभव है।
4. ग्लोब पर महाद्वीपों और महासागरों के आकार और आकृति (Size and shape) का विरूपण नहीं होता।4. मानचित्रों में बड़े क्षेत्रों के आकार और आकृति में अत्यधिक विरूपण आ जाता है।
5. संपूर्ण पृथ्वी का प्रदर्शन करने के लिए ग्लोब सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं।5. पृथ्वी अथवा उसके किसी भाग; जैसे गांव, ज़िला, प्रांत, देश अथवा महाद्वीप का प्रदर्शन करने के लिए मानचित्र सर्वश्रेष्ठ होते हैं।
6. ग्लोब पर पृथ्वी या किसी खगोलीय पिंड का केवल आधा भाग ही एक समय में दिखाई पड़ता है।6. मानचित्र पर पृथ्वी या किसी खगोलीय पिंड को संपूर्ण रूप में एक ही समय में देखा जा सकता है।

प्रश्न 2.
ग्लोब द्वारा पृथ्वी के लिए किए जाने वाले श्रेष्ठ प्रदर्शन के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
ग्लोब द्वारा पृथ्वी के लिए किए जाने वाले श्रेष्ठ प्रदर्शन के कारण निम्नलिखित हैं-

  1. पृथ्वी की भांति ग्लोब भी अपने अक्ष पर स्वतंत्रतापूर्वक घूर्णन (Rotation) कर सकता है।
  2. ग्लोब पर खींची गई अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के जाल (Graticule) से विभिन्न स्थानों की स्थिति सुगमतापूर्वक मालूम की जा सकती है।
  3. केवल ग्लोब पर ही महाद्वीपों के सापेक्षिक आकार और स्थिति का परिशुद्ध (Precise) निरूपण संभव हो पाता है।
  4. पृथ्वी पर दूरियों और दिशाओं के सही प्रदर्शन के लिए ग्लोब एक सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।

प्रश्न 3.
ग्लोब के प्रयोग में आने वाली कठिनाइयों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ग्लोब के प्रयोग में निम्नलिखित कठिनाइयाँ आती हैं-

  1. ग्लोब पर जगह (Space) कम होने के कारण किसी क्षेत्र विशेष का विस्तृत अध्ययन नहीं किया जा सकता।
  2. यदि ग्लोब बड़े भी बना लिए जाएँ तो उनका निर्माण, प्रयोग, रख-रखाव और उनका एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाना, ले-जाना अत्यंत कठिन होगा।
  3. एक समय में ग्लोब का केवल आधा भाग ही देखा जा सकता है। अतः विश्व के आपस में दूर स्थित भागों के अध्ययन के लिए हमें दो ग्लोबों की आवश्यकता पड़ेगी।
  4. यदि विश्व के किसी एक भाग का ही अध्ययन करना हो तो हमें पूरे ग्लोब का प्रयोग करना पड़ता है।
  5. गोलीय (Spherical) होने के कारण ग्लोब पर किन्हीं दो स्थानों के बीच की दूरियां मापना अपेक्षाकृत कठिन है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानचित्र को परिभाषित करते हुए इसके अनिवार्य तत्त्वों का वर्णन कीजिए। अथवा मानचित्र के अनिवार्य (आवश्यक) तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानचित्र की परिभाषा (Definition of a Map) संपूर्ण पृथ्वी अथवा उसके किसी भाग का समतल पृष्ठ पर समानीत मापनी द्वारा वरणात्मक, प्रतीकात्मक तथा व्यापकीकृत निरूपण मानचित्र कहलाता है। आजकल तो खगोलीय पिंडों के भी मानचित्र – बनने लगे हैं।

एफजे० मोंकहाऊस (F.J. Monkhouse) के अनुसार, “निश्चित मापनी के अनुसार, धरातल के किसी भाग के लक्षणों को समतल सतह पर प्रदर्शन करने को मानचित्र कहते हैं।” (“Map is a representation on a plane su features of part of the Earth’s surface, drawn to some specific scale.”)

बिना मापनी के खींची गई रेखाओं तथा बहुभुज को मानचित्र नहीं कहा जाता बल्कि इसे रेखाचित्र (Sketch) कहा जाता है मानचित्र के अनिवार्य तत्त्व (Essentials of a Map) मानचित्रकला (Cartography) मानचित्रों को बनाने की कला एवं
तो मानचित्र अनेक प्रकार के होते हैं किंत उनकी रचना संबंधी कछ प्रक्रियाएं या तत्त्व ऐसे होते हैं जो समान होते हैं। इनमें से यदि एक भी प्रक्रिया या तत्त्व हट जाए तो मानचित्र शुद्ध नहीं रह जाता।
1. मानचित्र शीर्षक (Map Title) शीर्षक से हमें ज्ञात होता है कि मानचित्र किस बारे में है और किस क्षेत्र का बनाया गया है। उदाहरणतः एशिया का भौतिक मानचित्र, भारत का जनसंख्या घनत्व मानचित्र अथवा भारत का वायुदाब (जुलाई) मा इत्यादि।

2. मानचित्र मापनी (Map Scale)-मापनी मानचित्र पर दर्शाए गए विभिन्न स्थानों के बीच दूरियों और प्रदर्शित क्षेत्र के क्षेत्रफल की गणना में मदद करता है। इससे मानचित्र को छोटा या बड़ा भी किया जा सकता है।

आप जानते हैं कि सभी मानचित्र लघुकरण होते हैं। मानचित्र बनाने के लिए सबसे पहले मापनी का चुनाव करना पड़ता है। किसी मानचित्र की मापनी इस बात को निर्धारित करती है कि उस मानचित्र में कितनी सूचनाओं, विषय-वस्तु एवं वास्तविकताओं का समावेश किस हद तक संभव है।

3. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)-आप जानते हैं कि जीऑयड की सतह सभी ओर से वक्रित (curved) है, जिसका समतल कागज पर सरल प्रदर्शन करना अर्थात् मानचित्र बनाना एक चुनौती है। विमाओं (Dimensions) के इस प्रकार बदलाव में जीऑयड के वास्तविक स्वरूप, दिशाओं, दूरियों, क्षेत्रों तथा आकारों में अनिवार्य परिवर्तन आता है। एक गोलाकार सतह को समतल सतह पर दर्शाने की प्रणाली को प्रक्षेप कहा जाता है। इस प्रणाली में अक्षांश और देशांतर रेखाओं का जाल होता है जिससे किसी स्थान की वास्तविक स्थिति निश्चित करने में मदद मिलती है। इसलिए प्रक्षेपों के चयन, उपयोग तथा निर्माण मानचित्र बनाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण होते हैं।

4. व्यापकीकरण (Generalisation) हर मानचित्र किसी-न-किसी उद्देश्य के लिए बनाया जाता है। कुछ मानचित्र सामान्य उद्देश्य वाले होते हैं जो सामान्य सूचनाओं को दर्शाते हैं; जैसे उच्चावच, अपवाह, मृदा, वनस्पति, परिवहन इत्यादि। लेकिन कुछ मानचित्र विशेष उद्देश्य वाले होते हैं जो एक से अधिक चुनी गई वस्तुओं को दर्शाते हैं; जैसे जनसंख्या का घनत्व, मिट्टी के प्रकार या उद्योगों की स्थिति इत्यादि। क्योंकि मानचित्र लघुकृत मापनी पर तैयार किया जाता है, इसलिए जरूरी है कि उसकी विषय-वस्तु को सावधानीपूर्वक नियोजित किया जाए और उसे व्यापकीकृत किया जाए। ऐसा करने के लिए विषय-वस्तु से संबंधित सूचनाओं (आंकड़ों) को जरूरत के अनुसार सरल कर लेना चाहिए।

5. मानचित्र अभिकल्पना (Map Design) मानचित्र अभिकल्पना में मानचित्रों की आलेखी विशिष्टताओं (Graphic Characteristics) को योजनाबद्ध किया जाता है, जिसमें शामिल हैं-उचित संकेतों का चयन, उनके आकार एवं प्रकार, लिखावट का तरीका, रेखाओं की चौड़ाई का निर्धारण, रंगों का चयन, मानचित्र में मानचित्र अभिकल्पना के विभिन्न तत्त्वों की व्यवस्था और रूढ़ चिह्न। अतः मानचित्र अभिकल्पना मानचित्र बनाने की एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें उन सिद्धांतों की गहन जानकारी की आवश्यकता होती है, जो आलेखी संचार के प्रभावों को नियंत्रित करती है।

6. मानचित्र निर्माण तथा उत्पादन (Map Construction and Production)-पुराने समय में मानचित्र बनाने एवं उनके पुनरुत्पादन का कार्य हाथों से किया जाता था। कलम एवं स्याही से मानचित्र बनाकर उनको मशीनों द्वारा छापते थे। किंतु मानचित्र बनाने तथा उनकी छपाई की तकनीकों में कंप्यूटर की सहायता मिलने के कारण मानचित्र निर्माण एवं पुनरुत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

प्रश्न 2.
मानचित्रण के इतिहास पर लेख लिखिए।
उत्तर:
मानचित्रण का इतिहास (History of Map Making) मानचित्र बनाने की कला बहुत प्राचीन है। ईसा से 2,800 साल पहले मार्शल द्वीपवासी अपने द्वीपों की सापेक्षिक स्थिति दिखाने के लिए नरकटों, वृक्षों की टहनियों तथा घोंघों आदि की सहायता से चार्ट बनाया करते थे। विश्व का सबसे पुराना मानचित्र मैसोपोटामिया में बेबीलोन नगर से 320 कि०मी० उत्तर की ओर गासुर नगर के ध्वंसावशेषों को खोदने पर मिला था। आज यह मानचित्र हॉवर्ड विश्वविद्यालय के म्यूजियम में सुरक्षित है। यह मानचित्र ईसा से 2,500 वर्ष पुराना है और चिकनी मिट्टी की आग में पकी हुई टिकिया (Tablet) पर बना है। इस मानचित्र में उत्तरी ईराक प्रदेश और फरात (Euphrates) नदी दिखाई गई हैं। बेबीलोनिया के लोगों ने ही वृत्त को 360 अंशों में बांटना सिखाया।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय 1
100 ई० के लगभग चीनियों ने कागज का आविष्कार कर लिया और मानचित्र बनाने लगे। पी.सिन (Pei-Hsin) को चीनी मानचित्र कला का जनक कहा जाता है।

आधुनिक मानचित्र कला की नींव अरब एवं यूनान के भूगोलवेत्ताओं द्वारा रखी गई। इन विद्वानों ने पृथ्वी की परिधि का माप तथा मानचित्र बनाने में भौगोलिक निर्देशांक (Geographical Co-ordinates) की पद्धति के उपयोग; जैसे कई महत्त्वपूर्ण योगदान दिए। इस काल के ज्ञाता मानचित्रकार एनेक्ज़ीमेंडर, इरेटॉस्थेनीज, हिपारकस और टॉलमी थे। टॉलमी ने विश्व मानचित्र बनाकर मानचित्रकला को उन्नति के शिखर पर पहुंचाया।

आधुनिक काल के आरंभिक दौर में मानचित्र बनाने की कला एवं विज्ञान को पुनर्जीवित किया गया। इसमें प्रयास किया गया कि जीऑयड को समतल सतह पर दर्शाने से होने वाली त्रुटियों को कम किया जाए। सही दिशा, दूरी एवं क्षेत्रफल के परिशुद्ध माप के लिए विभिन्न प्रक्षेपों पर मानचित्रों को खींचा गया था। वायव (Aerial) फोटोग्राफी से सतह पर होने वाले सर्वेक्षणों के तरीकों को सहयोग मिला तथा वायव फोटो के उपयोग ने 19वीं एवं 20वीं शताब्दी में मानचित्र बनाने के कार्य को और भी अधिक तेज़ कर दिया।

भारत में मानचित्र कला का विकास-भारत में मानचित्र बनाने का कार्य वैदिक काल में ही शुरु हो गया था, जब खगोलीय यथार्थता तथा ब्रह्मांडिकी रहस्योद्घाटन के प्रयत्न किए गए थे। आर्यभट्ट, वाराहमिहिर तथा भास्कर आदि के पौराणिक ग्रंथों में इन अभिव्यक्तियों को सिद्धांत या नियम के निश्चित रूप में दिखाया गया था। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने पूरे विश्व को सात द्वीपों में बांटा (चित्र 1.3)। महाभारत में माना गया था कि यह गोलाकार विश्व चारों ओर से जल से घिरा है (चित्र 1.4)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय 2
टोडरमल ने भू-सर्वेक्षण तथा मानचित्र बनाने के कार्य को लगान वसूली प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग बना दिया था। इसके अतिरिक्त, शेरशाह सूरी के लगान मानचित्रों ने मध्य काल में मानचित्र बनाने के कार्य को और अधिक समृद्ध किया। पूरे देश के तत्कालीन मानचित्रों को बनाने के लिए गहन स्थलाकृतिक सर्वेक्षण 1767 में सर्वे ऑफ इंडिया की स्थापना के साथ किया गया, जिसके चरम बिंदु के रूप में 1785 में हिंदुस्तान का मानचित्र बनकर तैयार हुआ। आज सर्वे ऑफ इंडिया विभिन्न मापनियों के आधार पर पूरे देश का मानचित्र तैयार करता है।

प्रश्न 3.
मानचित्रों के वर्गीकरण का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानचित्रों के विभिन्न प्रकारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps) मानचित्र अनेक प्रकार के होते हैं। सामान्यतः इनका वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है-

  • मापक के अनुसार (According to Scale)
  • विषय-वस्तु अथवा उद्देश्य अथवा प्रकार्य के अनुसार (According to Purpose or Function)।

A. मापक के अनुसार (According to Scale) मानचित्र दो प्रकार के होते हैं-

  • बृहत मापक पर बने मानचित्र (Large Scale Maps)
  • लघु मापक पर बने मानचित्र (Small Scale Maps)।

(a) बृहत मापक पर बने मानचित्र (Large Scale Maps)-बृहत मापक पर बने मानचित्र दो प्रकार के होते हैं-
1. भूकर मानचित्र अथवा प्लान (Cadastral Maps or Plan)-कैडस्ट्रल फ्रांसीसी भाषा के कैडस्टर (Cadestre) शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘संपत्ति रजिस्टर’ से होता है। बृहत मापक पर बनाए गए नगरों के प्लान जिनमें नागरिकों के भवनों की सीमाएं अंकित हों या पटवारियों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला सिजरा (Village Map) जिसमें सार्वजनिक स्थान तथा भूमि की व्यक्तिगत मानचित्र का परिचय मल्कियत दर्शाई गई हो भूकर अथवा कैडस्ट्रल मानचित्र कहलाते हैं।

ये मानचित्र सरकार द्वारा नागरिकों से भूमि, भवन जैसी अचल संपत्ति पर लगान वसूल करने के लिए बनाए जाते हैं। भू-संपत्ति मानचित्र कानूनी उद्देश्यों के लिए भू-संपत्ति की सीमाओं के निर्धारण, प्रशासन, कर (Tax) व भू-संपत्ति के प्रबंधन के लिए अत्यंत उपयोगी होते हैं। इन मानचित्रों का मापक 1″ से 110 गज़ या 1″ से 55 गज़ होता है। गांवों का भूसंपत्ति मानचित्र 1 : 4000 की मापनी पर तथा नगरों का मानचित्र 1 : 2000 और इससे अधिक मापनी पर बनाए जाते हैं।

2. स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Maps)- ये भी बड़ी मापनी पर बने मानचित्र होते हैं जिन्हें वास्तविक निरीक्षण व परिशुद्ध सर्वेक्षण के बाद बनाया जाता है। भारत में स्थलाकृतिक मानचित्रों का प्रकाशन भारतीय सर्वेक्षण विभाग (Survey of India) करता है। पहले इन मानचित्रों को 1 इंच : 4 मील, 1 इंच : 2 मील तथा 1 इंच : 1 मील मापक पर बनाया जाता था, किंतु देश में मीट्रिक प्रणाली अपनाए जाने के बाद अब इन्हें 1:2,50,000, 1:50,000 तथा 1:25,000 की मापनियों पर बनाया जाता है।

ये बहुउद्देशीय (Multi-Purpose) मानचित्र होते हैं जिनमें प्राकृतिक (Natural) और मानवीय (Cultural) लक्षणों को प्रदर्शित किया जाता है। प्राकृतिक तत्त्वों में उच्चावच (पर्वत, पठार व मैदान), जल-प्रवाह, जलाशय, वन, मिट्टियों व दलदल इत्यादि दिखाए जाते हैं, जबकि मानवीय अथवा सांस्कृतिक तत्त्वों में नगर, गांव, मार्ग, संचार के साधन व नहरें, कुएं, धार्मिक स्थल आदि विस्तारपूर्वक प्रदर्शित किए जाते हैं। योजना, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं पर्यटन आदि उद्देश्यों के लिए स्थलाकृतिक मानचित्रों का कोई मुकाबला नहीं।

(b) लघु मापक पर बने मानचित्र (Small Scale Maps)-लघु मापक पर बने मानचित्र भी दो प्रकार के होते हैं-
1. दीवारी या भित्ति मानचित्र (Wall Maps)-स्कूल, कॉलेज अथवा दफ्तरों की दीवारों पर लटकाए जाने के कारण इन्हें दीवारी मानचित्र कहते हैं। इनका मापक 1 सें०मी० से 5 कि०मी० (1:5,00,000) से लेकर 1 सें०मी० से 40 कि०मी० (1:40,00,000) या इससे भी छोटा हो सकता है। अन्य शब्दों में इनकी मापनी स्थलाकृतिक मानचित्र से छोटी, एटलस मानचित्र से बड़ी होती है। इन्हें बड़े अक्षरों में छापा जाता है ताकि वांछित सूचना दूर से पढ़ी जा सके और समझाई जा सके। ये मानचित्र पृथ्वी के विस्तृत क्षेत्रों का प्रदर्शन करते हैं; जैसे समस्त संसार, कोई महाद्वीप, देश या राज्य इत्यादि।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय 3

2. एटलस मानचित्र (Atlas Maps)-पुस्तक के रूप में मानचित्रों के क्रमबद्ध तथा व्यवस्थित संग्रह को एटलस या मानचित्रावली कहते हैं। एटलस मानचित्रों का मापक बहुत-ही छोटा होता है जो प्रायः 1:15,00,000 से कम होता है। मापनी छोटी होने के कारण ये मानचित्र केवल प्रमुख लक्षणों को ही दर्शाते हैं तथा इनमें महत्त्वहीन तत्त्वों को छोड़ दिया जाता है। एटलस मानचित्र विश्व, महाद्वीपों, देशों या क्षेत्रों की भौगोलिक जानकारियों के आलेखी (Graphic) विश्वकोश हैं जिनके वितरण को हम एक ही नज़र में देख सकते हैं। इन मानचित्रों में उपयुक्त रंगों का प्रयोग किया जाता है जिस कारण एटलस मानचित्रों का दृश्य प्रभाव (Visual impact) ज़बरदस्त होता है।

B. विषय-वस्तु अथवा उद्देश्य अथवा प्रकार्य के अनुसार (According to Purpose or Function)भी मानचित्रों के दो वर्ग होते हैं-

  • भौतिक मानचित्र (Physical Maps)
  • सांस्कृतिक मानचित्र (Cultural Maps)

(a) भौतिक अथवा प्राकृतिक मानचित्र (Physical Maps)-इसके अंतर्गत आने वाले प्रमुख मानचित्र निम्नलिखित हैं
1. उच्चावच मानचित्र (Relief Maps)-इन मानचित्रों में पर्वत, पठार, मैदान और अपवाह तंत्र इत्यादि सामान्य स्वरूपों का चित्रण किया जाता है।

2. भू-गर्भीय मानचित्र (Geological Maps)-इन मानचित्रों में किसी क्षेत्र की भू-गर्भीय संरचना व शैल प्रकारों इत्यादि को दिखाया जाता है।

3. जलवायु मानचित्र (Climatic Maps)-इन मानचित्रों पर जलवायु के विभिन्न तत्त्वों; जैसे तापमान, वायुदाब, सापेक्षिक आर्द्रता, बादलों, वर्षा, पवनों की दिशा एवं गति तथा मौसम के अन्य तत्त्वों के वितरण को दिखाया जाता है।

4. मौसम मानचित्र (Weather Maps)-ये मानचित्र देश के मौसम विभाग द्वारा प्रकाशित किए जाते हैं जो दिन के निर्दिष्ट समय पर मौसम संबंधी अवस्थाओं को दिखाते हैं।

5. मृदा मानचित्र (Soil Maps)-इन मानचित्रों पर किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विविध प्रकार की मिट्टियों तथा उनके वितरण को दर्शाया जाता है।

6. वनस्पति मानचित्र (Vegetation Maps)-इन मानचित्रों पर धरातल पर पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पति का वितरण प्रदर्शित किया जाता है।

(b) सांस्कृतिक मानचित्र (Cultural Maps) इनमें अधिक महत्त्वपूर्ण मानचित्र निम्नलिखित हैं-
1. राजनीतिक मानचित्र (Political Maps) इन मानचित्रों पर देश, प्रांत व जिलों की सीमाएं दिखाई जाती हैं। इन मानचित्रों का प्रशासनिक महत्त्व बहुत होता है।

2. जनसंख्या मानचित्र (Population Maps) इनमें जनसंख्या की विशेषताएं; जैसे वितरण, घनत्व, वृद्धि, स्थानांतरण इत्यादि को दर्शाया जाता है।

3. जातियों का मानचित्र (Racial Maps)-इन मानचित्रों में विभिन्न प्रदेशों में रहने वाली जातियों का वितरण दिखाया जाता है।

4. भाषा मानचित्र (Language Maps) ये मानचित्र भिन्न-भिन्न प्रदेशों में बोली जाने वाली भाषाओं का वितरण दिखाते हैं।

5. आर्थिक मानचित्र (Economic Maps)-इन मानचित्रों में औद्योगिक, व्यापारिक और कृषि संबंधी आर्थिक गतिविधियों के वितरण और उनसे जुड़े प्रमुख केंद्रों को दर्शाया जाता है।

6. परिवहन मानचित्र (Transport Maps)-इन मानचित्रों में सड़क-मार्ग, रेल-मार्ग, वायु-मार्ग, समुद्री-मार्ग तथा पाइप लाइनों को दर्शाया जाता है। पर्यटकों के लिए ये मानचित्र महत्त्वपूर्ण होते हैं।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

प्रश्न 4.
मानचित्रों द्वारा किए जाने वाले मापनों का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानचित्रों के उपयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूगोलवेत्ताओं के अतिरिक्त अन्य विषयों के विशेषज्ञ भी मानचित्रों का अधिकाधिक उपयोग कर रहे हैं। इस उपयोग के दौरान वे दूरी, दिशा एवं क्षेत्र को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न प्रकार के मापन करते हैं-
1. दूरी का मापन (Measuring Distance)-मानचित्र पर दिखाए गए रैखिक लक्षण दो प्रकार के होते हैं-

  • सीधी रेखाएं (Straight Lines)
  • टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं (Irregular lines)

सीधी रेखा वाले लक्षणों; जैसे सड़कें, रेल की पटरियां एवं नहरों इत्यादि को मापना आसान होता है। मानचित्र की सतह पर एक मापनी (फुटा) रखकर इन्हें मापा जा सकता है। किंतु दूरियों को मापने की आवश्यकता प्रायः अव्यवस्थित रास्तों; जैसे तटीय किनारों, नदियों तथा धाराओं को मापने में होती है। इस प्रकार की आकृतियों दूरियों को मापने के लिए धागे का एक छोर प्रारंभिक बिंदु पर रखकर धागे को टेढ़े मार्ग पर रखा जाता है और आखिरी छोर पर पहुंच जाने के बाद धागे को फैलाकर उसकी सही दूरी को मापा जाता है। एक साधारण यंत्र वक्ररेखामापी के द्वारा भी यह मापी जा सकती है। दूरी को मापने के लिए वक्ररेखामापी के पहिए को रास्ते के साथ-साथ घुमाया जाता है।

2. दिशा का मापन (Measuring Direction)-दिशा, मानचित्र पर एक काल्पनिक सीधी रेखा है, जो एक समान आधार से दिशा की कोणीय स्थिति को प्रदर्शित करती है। उत्तर दिशा की ओर संकेत करने वाली रेखा बिंदु को शून्य दिशा या आधार दिशा रेखा कहते हैं। एक मानचित्र सदैव उत्तर दिशा को दर्शाता है। अन्य सभी दिशाओं का निर्धारण इसके संबंध से किया जाता है। सामान्यतः चार दिशाएं मानी जाती हैं (उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम) इन्हें प्रधान दिग्बिंदु (कार्डिनल प्वाइंट) भी कहा जाता है। प्रधान दिग्बिंदुओं के बीच कई अन्य मध्यवर्ती दिशाएं होती हैं।

3. क्षेत्र का मापन (Measuring Area)-प्रशासनिक एवं भौगोलिक इकाइयों जैसी आकृतियों का मापन मानचित्र की सतह पर किया जाता है। मानचित्र उपयोगकर्ताओं द्वारा क्षेत्रों को विभिन्न तरीकों से मापा जाता है। वर्गों की एक नियमित शैली के द्वारा किसी क्षेत्र की माप की जा सकती है, हालांकि यह विधि अधिक परिशद्ध नहीं होती है। इस विधि द्वारा क्षेत्र को मापने के लिए एक प्रदीप्त (Illuminated) ट्रेसिंग टेबल के ऊपर मानचित्र के नीचे एक ग्राफ (आलेख) पेपर रखकर मानचित्र को वर्गों से ढंक लें अथवा स्क्वायर शीट पर उस क्षेत्र को ट्रेस कर लें। ‘संपूर्ण वर्गों की संख्या को ‘आंशिक वर्गों के साथ जोड़ लिया जाता है। इसके बाद एक साधारण समीकरण द्वारा क्षेत्रफल मापा जाता है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय 4
क्षेत्रफल की गणना स्थिर ध्रुवीय प्लेनीमीटर की सहायता से भी की जा सकती है।

प्रश्न 5.
भूगोल में मानचित्रों के महत्त्व (उपयोग/आवश्यकता) को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भूगोल में मानचित्रों का महत्त्व (उपयोग/आवश्यकता) (Importance of Maps in Geography)-सूचना क्रांति के आधुनिक युग में मानचित्रों का उपयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। भूगोल ही नहीं, ज्ञान-विज्ञान का शायद है मानचित्रों की उपयोगिता का महत्त्व न अनुभव किया गया हो। मानचित्र सूचनाओं का अगाध स्रोत माने जाते हैं।

ये विभिन्न तकनीकों व विधियों के द्वारा भू-तल पर प्राकृतिक और मानवकृत लक्षणों की विविधता को शानदार ढंग से प्रदर्शित करते हैं। इनसे पृथ्वी तल पर पाए जाने वाले विभिन्न तत्त्वों के बीच अंतर्संबंधों का पता चलता है। जलवायु, वनस्पति, मृदा, जनसंख्या, बस्ती प्रारूपों, प्रवाह-प्रणालियों तथा भूमि-उपयोग संबंधी किसी भी मानवीय अथवा भौतिक पक्ष की खोज (Research) मानचित्रों के बिना संभव नहीं है।

यदि विश्व के सभी भागों का स्वयं भ्रमण करके भी किसी तथ्य का अध्ययन किया जाए तो भी मानचित्र आवश्यक हैं, क्योंकि तथ्यों का क्षेत्रीय स्तर पर तुलनात्मक अध्ययन और प्राप्त ज्ञान का प्रदर्शन मानचित्रों द्वारा ही संभव होता है। विश्व में जनसंख्या विस्फोट के चलते प्राकृतिक संसाधनों की खोज और उनका अंकन मानचित्रों के बिना संभव नहीं।

मानचित्रों के बिना भूगोल को न ही समझा जा सकता है और न ही उसे रोचक बनाया जा सकता है। मानचित्र हैं तो भूगोल है। एक अच्छा मानचित्र हमें इतनी सूचना, सामग्री और विचार देता है जिन्हें हम जीवन भर घूम-घूम कर भी एकत्रित नहीं कर सकते। एक मानचित्र पस्तक के सैकड़ों पन्नों के समान हो सकता है। एच०आर० मिल ने उचित कहा है, “भगोल में हमें यह सिद्धांत मान लेना चाहिए कि जिसका मानचित्र नहीं बनाया जा सकता, उसका वर्णन भी नहीं किया जा सकता।”

कहा जाता है कि ‘Either map it or scrap it’ इसी कारण मानचित्र भूगोलवेत्ता की आशुलिपि (Short hand) मानी जाती है। युद्धों में हमेशा विजय उन्हीं राष्ट्रों की हुई जिन्होंने मानचित्र बनाने और उनका अध्ययन करने में दक्षता प्राप्त की। संभवतः इसी भरोसे पर हिटलर कहा करता था, “मुझे किसी भी देश का विस्तृत मानचित्र दो और मैं उस देश पर विजय प्राप्त कर लूंगा।”

इसीलिए कहा जाता है, “मानचित्र एक भूगोलवेत्ता के मुख्य उपकरण (Tools) हैं। मानचित्रों के बिना भूगोलवेत्ता शस्त्रहीन योद्धा के समान होता है।” (“Maps are the main tools of a Geographer and without maps he is like a warrior without weapons”.)

आज मानचित्रों का उपयोग केवल भूगोल तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मानव जीवन के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पक्षों को उजागर करने वाला एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। सैनिक गतिविधियों, नाविकों, वायुयान चालकों, पर्यटकों, अन्वेषकों, योजनाकारों, नीति-निर्धारकों, राजनीतिज्ञों, प्रशासकों, विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों सभी को अपने-अपने उद्देश्य के अनुसार मानचित्रों की आवश्यकता पड़ती है। समाचारों में भी घटना स्थलों का मानचित्रों द्वारा प्रदर्शन बढ़ रहा है। अब तो विज्ञापन का क्षेत्र भी मानचित्रों से अछूता नहीं रहा। अब कंप्यूटरों द्वारा पहले से बेहतर व शुद्ध मानचित्र अत्यंत थोड़े समय में तैयार किए जा सकते हैं। इससे अध्ययन और अध्यापन के क्षेत्र में और अधिक गुणात्मक परिवर्तन आने की संभावना है।

मानचित्र का परिचय HBSE 11th Class Geography Notes

→ जीऑयड (Geoid)-एक लध्वक्ष गोलाभ, जो पृथ्वी के वास्तविक आकार के अनुरूप हो।

→ प्रधान दिग्बिदु-उत्तर (N), दक्षिण (S), पूर्व (E) तथा पश्चिम (W)।

→ भूसंपत्ति मानचित्र बृहत मापनी पर निर्मित मानचित्र, जो कि 1:500 से 1:4,000 की मापनी पर भूसंपत्ति परिसीमा दर्शाने के लिए निर्मित किया जाता है। इसमें प्रत्येक भूमि खंड को एक संख्या द्वारा व्यक्त किया जाता है। मानचित्र कला (Map Art) मानचित्र, चार्ट, खाका तथा अन्य प्रकार के ग्राफ बनाने की कला, विज्ञान तथा तकनीक और उनका अध्ययन तथा उपयोग।

→ मानचित्र क्रम (Map Series)-किसी देश या क्षेत्र के लिए समान मापनी, प्रकार तथा विशिष्टता के साथ बनाए गए मानचित्रों का समूह।

→ मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection) गोलाकार सतह को समतल सतह पर प्रदर्शित करने की प्रणाली।

→ रेखाचित्र-वास्तविक मापनी या अभिविन्यास के बिना मुक्त-हस्त द्वारा खींचे गए सरल मानचित्र।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पुनर्जागरण से आपका क्या अभिप्राय है? इसके उत्थान के क्या कारण थे?
उत्तर:
I. पुनर्जागरण का अर्थ

पुनर्जागरण का अंग्रेज़ी रूप रेनेसाँ है जो कि मूल रूप से फ्रांसीसी भाषा का शब्द है। रिनेसाँ का अर्थ है फिर जागना। इतिहास में इसे नया जन्म, नई जागृति, बौद्धिक चेतना तथा सांस्कृतिक जागृति के नामों से भी जाना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के अनुसार, “शाब्दिक रूप में पुनर्जागरण से अभिप्राय बाहरी किसी एजेंसी के नियंत्रण के बिना विचारों एवं उस पर कार्य करने की स्वतंत्रता है।”

II. पुनर्जागरण के उत्थान के कारण

पुनर्जागरण के उत्थान के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे

1. सामंतवाद का पतन (Decline of Feudalism):
सामंतवाद के पतन ने पुनर्जागरण की आधारशिला तैयार की। मध्यकालीन समाज में सामंतवाद का व्यापक प्रचलन था। परंतु 14वीं शताब्दी के पश्चात् इसका पतन होना आरंभ हो गया था। इसका पतन मध्य वर्ग की शक्ति के कारण हुआ। इसी मध्य वर्ग ने अपने सम्राटों को सेना के संगठन के लिए आवश्यक धन-राशि प्रदान की थी।

अतः सम्राट् सामंतों पर निर्भर न रहे। व्यापार तथा वाणिज्य में उन्नति होने से मध्य वर्ग के व्यापारियों को बहुत लाभ हुआ। परंतु सामंतों की भूमि के किराये में कोई विशेष वृद्धि न हुई। इस कारण सामंतों को इन व्यापारियों से कर्ज लेने पड़े। इस कर्जे के कारण कई सामंत दीवालिए हो गए और उन्हें अपनी ज़मीनें बेचनी पड़ी। परिणामस्वरूप सामंतवाद को भारी धक्का लगा तथा उसका पतन हो गया।

2. धर्मयुद्ध (Crusades):
11वीं शताब्दी के अंत से लेकर 13वीं शताब्दी के मध्य तक ईसाई मत के पवित्र स्थान जेरुसलम के कारण मुसलमानों तथा ईसाइयों के बीच लगातार युद्ध लड़े गए। इन्हें धर्मयुद्ध का नाम दिया जाता के दौरान पश्चिमी देशों के विद्वान् पूर्वी देशों की सभ्यता के संपर्क में आए। उस समय पूर्वी देशों की सभ्यता पश्चिमी देशों की सभ्यता से प्राचीन तथा विकसित थी। धर्मयुद्धों में भाग लेने वाले व्यक्तियों ने पूर्व के नवीन विचार ग्रहण किये।

इससे उनका बौद्धिक स्तर अधिक उन्नत हो गया। मध्य युग में प्रायः लोगों का विश्वास था कि व्यक्ति के इस लोक तथा परलोक की सभी आवश्यकताएँ केवल चर्च तथा ईसाई धर्म के द्वारा पूर्ण हो सकती हैं। परंतु धर्मयुद्धों से लौटने वाले लोगों ने इस विश्वास का खंडन किया। इस तरह लोगों के मस्तिष्क पर चर्च का प्रभाव कम होने लगा। धर्मयुद्धों के माध्यम से ही यूनान के वैज्ञानिक ग्रंथ, अरबी अंक, बीजगणित, नवीन दिग्दर्शक यंत्र और कागज़ पश्चिमी यूरोप में पहुँचे।

अतः स्पष्ट है कि धर्मयुद्धों ने नवीन विचारों तथा धारणाओं का प्रसार किया और पुराने विचारों, विश्वासों तथा संस्थाओं पर प्रहार किया। फलस्वरूप पुनर्जागरण का प्रारंभ हुआ। विख्यात इतिहासकार बी० के० गोखले का यह कहना ठीक है कि, “धर्मयुद्धों ने ईसाइयों के दृष्टिकोण को परिवर्तित किया तथा उन्हें चर्च के बाहर झांकने के लिए बाध्य किया।”

3. व्यापारिक समृद्धि (Commercial Prosperity):
पुनर्जागरण का एक प्रेरक तत्त्व था-व्यापार का उदय एवं विकास। धर्मयुद्धों के कारण जहाँ नवीन विचारधाराएँ पनपीं, वहाँ यूरोप के पूर्वी देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित हुए। अनेक यूरोपीय व्यापारी जेरुसलम तथा एशिया माइनर के तटों पर बस गये। इनके कारण व्यापार में पर्याप्त वृद्धि हुई। व्यापारिक समृद्धि के कारण यूरोपीय व्यापारी विभिन्न देशों में पहुंचे।

उन्हें नये विचारों तथा प्रगतिशील तत्त्वों की जानकारी हुई। स्वदेश वापस लौटने पर ये व्यापारी नये विचारों को अपने साथ लाए। व्यापारी वर्ग ने चर्च की आलोचना करके उसके महत्त्व को कम करने का प्रयास किया। चर्च सूद लेने को पाप मानता था, परंतु व्यापारी वर्ग सूद को व्यापारिक उन्नति के लिए आवश्यक समझता था। इसलिए व्यापारियों ने चर्च का विरोध किया।

4. छापेखाने का आविष्कार (Invention of Press):
यूरोप के लोगों ने अरबवासियों से कागज़ बनाने की कला सीखी। पंद्रहवीं शताब्दी से पूर्व कागज़ पर छपाई कठिन भी थी और महँगी भी, परंतु इसके पश्चात् स्थिति में परिवर्तन आया।

1455 ई० में जर्मनी के जोहानेस गटेनबर्ग (Johannes Gutenberg) नामक व्यक्ति ने एक ऐसी टाइप मशीन का आविष्कार किया जो आधुनिक प्रेस की अग्रदूत कही जा सकती है। मुद्रण यंत्र के इस चमत्कारी आविष्कार ने बौद्धिक विकास का द्वार खोल दिया। इस छापेखाने में 1455 ई० में बाईबल की 150 प्रतियाँ छपी। धीरे-धीरे इस

स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आए। अब पुस्तकें अधिक और सस्ती छपने लगीं। इस प्रकार ज्ञान के प्रसार से अंध विश्वास तथा रूढियों के बँधन ढीले पड़ने लगे और उनमें आत्म-विश्वास जागने लगा। अत: स्पष्ट है कि छापेखाने का आविष्कार पुनर्जागरण का प्रमुख प्रेरक तत्त्व बना। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० वी० राव के अनुसार,

“छापेखाने के आविष्कार ने जो यूरोप में पद्रहवीं शताब्दी के मध्य में हुआ था, को सर्वाधिक महत्त्व का माना जाना चाहिए। यदि छापेखाने का आविष्कार न होता तो संभवतः शेष यूरोप में पुनर्जागरण इतनी शीघ्र न फैलता।”

5. कुंस्तुनतुनिया पर तुर्कों का अधिकार (Occupation of Constantinople by the Turks):
1453 ई० में तुर्कों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य (बाइजेंटाइन) की राजधानी कुंस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया था। यह एक युग प्रवर्तक घटना सिद्ध हुई। पहला, कुंस्तुनतुनिया पर तुर्कों का अधिकार हो जाने से यूरोप से पूर्वी देशों में जाने वाले स्थल मार्ग पर अब तुर्कों का अधिकार हो गया। तुर्क लोग व्यापारियों को लूट लिया करते थे।

अत: यूरोप का पूर्वी देशों के साथ होने वाला व्यापार बंद हो गया। अत: यूरोप के लोग किसी नए व्यापारिक मार्ग की खोज के लिए आतर हो उठे। परिणामस्वरूप अमरीका की खोज हुई तथा भारत और पूर्वी देशों में जलमार्ग ढूँढ निकाला गया। दूसरा, कुंस्तुनतुनिया पिछले दो सौ वर्षों से ज्ञान, दर्शन तथा कला का महान् केंद्र था। तुर्कों के लिए तलवार का तो महत्त्व था परंतु उनके लिए ज्ञान की न कोई उपयोगिता थी और न ही कोई महत्त्व।

अत: इस विख्यात नगर से आजीविका की खोज में हजारों यूनानी विद्वान्, दार्शनिक तथा कलाकार इटली, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड आदि देशों में चले गए। वे अपने साथ प्राचीन रोम तथा यूनान का ज्ञान-विज्ञान तथा नई चिंतन पद्धति भी ले गये। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कुंस्तुनतुनिया पर तुर्कों का अधिकार पुनर्जागरण के उत्थान का कारण बना।

6. मंगोल साम्राज्य का उदय (Rise of Mongol Empire):
मंगोल साम्राज्य के उदय से पुनर्जागरण की धारा को बल मिला। तेरहवीं शताब्दी में प्रसिद्ध मध्य एशियाई विजेता चंगेज़ खाँ की मृत्यु हो गई। उसके बाद कुबलई खाँ ने एक विशाल परंतु शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की। इस विशाल मंगोल साम्राज्य में रूस, पोलैंड, हंगरी आदि प्रदेश सम्मिलित थे। यहाँ विद्वानों, धर्म प्रचारकों और व्यापारियों का सम्मान था। इस संपर्क ने विचार-विनिमय और ज्ञान के आदान-प्रदान का मार्ग खोला। इससे यूरोप के लोगों पर काफी प्रभाव पड़ा।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 2.
किन कारणों के चलते इटली में पुनर्जागरण का जन्म हुआ?
उत्तर:
यूरोप में पुनर्जागरण का वास्तविक आरंभ इटली से हुआ था। इसके पश्चात् यह यूरोप के अन्य देशों में फैला। इटली में पुनर्जागरण के आरंभ के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित
अनुसार है

1. इटली का एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र होना (Italy was a famous Trade Centre):
इटली एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र था। इटली का विदेशी व्यापार बडा उन्नत था। इटली की स्थिति ने इसे विशिष्टता प्रदान की। मध्यकाल में अरब व्यापारियों का एशियाई सामान इसी देश में बिकता था। यहीं से फिर ये वस्तुएँ अन्य यूरोपीय देशों
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 7 iMG 1
को भेजी जाती थीं। इसके अतिरिक्त उत्तरी यूरोप से आने वाले व्यापारी भी इटली हो कर ही पश्चिम एशिया जाते थे। इस प्रकार इटली एक सुप्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इटली के इस बढ़ते व्यापार तथा उसकी समृद्धि ने पुनर्जागरण की प्रवृत्तियों को बल प्रदान किया।

2. प्राचीन रोमन सभ्यता का जन्म स्थान (Birth Place of Ancient Roman Civilisation):
इटली में पुनर्जागरण के पनपने का एक अन्य कारण यह भी था कि यह प्राचीन रोमन सभ्यता का जन्म स्थान रहा था। इटली के नगरों में विद्यमान प्राचीन रोमन सभ्यता के अनेक स्मारक आज भी लोगों को पुनर्जागरण की याद दिलाते हैं।

वे इटली को प्राचीन रोम की भाँति महान् देखना चाहते थे। इस तरह प्राचीन रोमन संस्कृति पुनर्जागरण के लिए प्रेरणा का स्रोत सिद्ध हुई। सर्वप्रथम दाँते की रचनाओं में इस प्रेरणा के चिह्न देखने को मिले हैं।

3. ईसाई धर्म का प्रसिद्ध केंद्र (Famous Centre of Christianity):
रोम सारे पश्चिमी यरोपीय ईसाई जगत का केंद्र था। पोप यहीं निवास करता था। कुछ पोप पुनर्जागरण की भावना से प्रेरित होकर विद्वानों को रोम लाए और उनसे यूनानी पांडुलिपियों का लातीनी भाषा में अनुवाद कराया। पोप निकोलस पंचम (1447-1455 ई०) के कार्य सराहनीय हैं।

उसने वैटिकन पुस्तकालय की स्थापना की। संत पीटर का गिरजाघर भी उसने बनाया। कहते हैं कि उसके अधीन लगभग सारा रोम निर्मित हुआ। इन कार्यों का प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ना स्वाभाविक था।

4. उपयुक्त राजनीतिक दशा (Favourable Political Condition):
राजनीतिक दृष्टि से इटली पुनर्जागरण के लिए उपयुक्त था। पवित्र रोमन साम्राज्य का पतन हो रहा था। उत्तरी इटली में अनेक स्वतंत्र नगर-राज्यों का उदय हो चुका था। इसके अतिरिक्त इटली में सामंती प्रथा भी अधिक दृढ़ नहीं थी। परिणामस्वरूप इन नगर-राज्यों में स्वतंत्रता एवं स्वच्छंदता का वातावरण था। इससे वहाँ के नागरिकों ने नवीन विचारों का स्वागत किया और नवीन विचारों को जन्म दिया।

5. शिक्षा का प्रसार (Spread of Education):
मध्यकालीन यूरोप में शिक्षा पर धर्म का प्रभाव था। परंतु इटली में व्यापार के विकास के कारण शिक्षा धर्म के बंधनों से मुक्त थी। यहाँ पाठ्यक्रम में व्यावसायिक ज्ञान, भौगोलिक ज्ञान आदि को उपयुक्त स्थान प्राप्त था। परिणामस्वरूप विज्ञान तथा तर्क को बल मिला।

यहाँ मध्यकाल में यूरोप के सर्वप्रथम विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई थी। इनमें बोलोनिया, पादुआ, रोम एवं फ्लोरेंस विश्वविद्यालयों के नाम प्रसिद्ध हैं। इन्होंने इटली के लोगों में एक नई जागृति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

6. तुर्कों का कुंस्तुनतुनिया पर अधिकार (Occupation of Constantinople by the Turks):
1453 ई० में तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया। वहाँ के अधिकाँश यूनानी विद्वान्, कलाकार और व्यापारी भाग कर सबसे पहले इटली के नगरों में आए और यहाँ पर आश्रय लिया और कालांतर में वहीं बस गए।

ये विद्वान् अपने साथ प्राचीन यूनानी साहित्य की अनेक अनमोल पांडुलिपियाँ भी लाए। यूरोप के लोगों को इन ग्रंथों में समाए ज्ञान का कोई परिचय नहीं था। इसके अतिरिक्त इन विद्वानों में से अनेक इटली के विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षक नियुक्त

प्रश्न 3.
पुनर्जागरण काल में साहित्य के क्षेत्र में हुए विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय विकास हुआ। इस काल में यूरोप में अनेक ऐसे विद्वान् हुए जिन्होंने साहित्य के विकास में चार चाँद लगा दिए। उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. फ्रांसिस्को पेट्रार्क 1304-1374 ई० (Francesco Petrarch 1304-1374 CE):
फ्रांसिस्को पेट्रार्क को पुनर्जागरण का पिता (Father of Renaissance) कहा जाता है। उसका जन्म 1304 ई० में इटली के नगर फ्लोरेंस में हुआ था। उसने अपनी शिक्षा बोलोनिया (Bologna) विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। उसने अपना अधिकाँश समय प्राचीन लातीनी ग्रंथों के अध्ययन में लगाया।

उसने संपूर्ण यूरोप में मानवतावादी विचारधारा को प्रोत्साहित किया। उसने लौरा (Laura) नामक एक स्त्री जिसे वह बेहद प्यार करता था पर अनेक कविताएँ लिखीं। साहित्य के क्षेत्र में उसके उल्लेखनीय योगदान के कारण उसे 1341 ई० में रोम में ‘राजकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर अरुण भट्टाचार्जी के अनुसार, “वह मानवतावाद को प्रोत्साहित करने वाला प्रथम व्यक्ति था तथा उसका समकालीनों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

2. दाँते अलिगहियरी 1265-1321 ई० (Dante Alighieri 1265-1321 CE):
दाँते अलिगहियरी की गणना इटली के महान् कवियों में की जाती है। उसका जन्म 1265 ई० में फ्लोरेंस के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। यद्यपि उसका चर्च में पूर्ण विश्वास था किंतु उसने पादरियों के भ्रष्टाचारी जीवन की कटु आलोचना की। उसने अनेक पुस्तकों की रचना की।

इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय डिवाईन कॉमेडी (Divine Comedy) थी। इस काल्पनिक कथा में दाँते ने नर्क तथा स्वर्ग की यात्रा का वर्णन किया है। दाँते के उल्लेखनीय योगदान के कारण उसे ठीक ही प्राचीन एवं आधुनिक दुनिया के मध्य एक पुल माना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले का यह कहना ठीक है कि, “उसे (दाँते को) ठीक ही पुनर्जागरण साहित्य का सुबह का तारा कहा जाता है।”

3. जोवान्ने बोकासियो 1313-1375 ई० (Giovanni Boccaccio 1313-1375 CE):
जोवान्ने बोकासियो 14वीं शताब्दी का एक महान् साहित्यकार एवं मानवतावादी था। उसका जन्म 1313 ई० में पेरिस में हुआ था। किंतु उसने अपना जीवन फ्लोरेंस में व्यतीत किया था। वह फ्राँसिस्को पेट्रार्क का शिष्य था। वह एक प्रसिद्ध कहानीकार था।

उसकी सबसे महान् रचना का नाम डेकामेरोन (Decameron) था। इसे इतालवी भाषा में लिखा गया था तथा इसमें 100 कहानियों का वर्णन किया गया है। इसके प्रकाशन से उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। इन कहानियों में उसने सामंतवाद एवं समाज में फैले नैतिक भ्रष्टाचार का बाखूबी से वर्णन किया है। वास्तव में बोकासियो का गद्य क्षेत्र में वही स्थान है जो पेट्रार्क एवं दाँते का कविता के क्षेत्र में।

4. जोवान्ने पिको देल्ला मिरांदोला 1463-1494 ई० (Giovanni Pico della Mirandola 1463 1494 CE):
वह फ्लोरेंस का एक महान् मानवतावादी था। वह प्लेटो के विचारों से बहुत प्रभावित था। अत: उसने फ्लोरेंस में मार्सिलो फीसिनो (Marsilo Ficino) के साथ मिलकर प्लेटोनिक अकेडमी (Platonic Academy) की स्थापना की।

इसमें विभिन्न विद्वानों एवं लेखकों को गोष्ठियों के लिए आमंत्रित किया जाता था। उसने 1486 ई० में औरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन (Oration on the Dignity of Man) की रचना की। इसमें उसने मानव एवं वाद-विवाद के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।

5. निकोलो मैक्यिावेली 1469-1527 ई० (Niccolo Machiavelli 1469-1527 CE):
निकोलो मैक्यिावेली इटली का एक महान् विद्वान् एवं देशभक्त था। उसका जन्म 1469 ई० में फ्लोरेंस में हुआ था। उसने चर्च में प्रचलित बुराइयों की कटु आलोचना की। वह इटली की दयनीय राजनीतिक स्थिति को दूर कर उसके प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करना चाहता था।

उसने 1513 ई० में दि प्रिंस (The Prince) नामक एक ग्रंथ की रचना की। यह शीघ्र ही बहुत लोकप्रिय हुआ। इसका यूरोप की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया था। इसमें उसने उस समय इटली में प्रचलित राजनीतिक दशा एवं राजाओं द्वारा प्रशासन में अपनाए जाने वाले नियमों का विस्तृत वर्णन किया है। इस कारण इस ग्रंथ को राजाओं की बाईबल (Bible of the Kings) कहा जाता है। यह ग्रंथ आने वाले शासकों के लिए भी एक प्रेरणा स्रोत रहा।

6. जेफ्री चॉसर 1340-1400 ई० (Geoffrey Chaucer 1340-1400 CE):
जेफ्री चॉसर की गणना इंग्लैंड के महान् कवियों में की जाती है। वास्तव में यह जेफ्री चॉसर ही था जिसे इंग्लैंड में पुनर्जागरण की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। उसने 1390 ई० में दि कैंटरबरी टेल्स (The Canterbury Tales) की रचना की। इससे हमें मध्यकालीन इंग्लैंड के समाज की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

इस ग्रंथ के अध्ययन से जेफ्री चॉसर की प्रतिभा का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। यह ग्रंथ शीघ्र ही विश्व में बहुत लोकप्रिय हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकारों डॉक्टर एफ० सी० कौल एवं डॉक्टर एच० जी० वारेन के अनुसार, “चॉसर का अंग्रेजी भाषा के लिए वही योगदान था जो कि इतालवी भाषा के लिए दाँते एवं पेट्रार्क का था।”

7. सर टॉमस मोर 1478-1533 ई० (Sir Thomas More 1478-1533 CE):
सर टॉमस मोर इंग्लैंड का एक महान् लेखक था। वह इंग्लैंड के जान कोलेट (John Colet) एवं हालैंड के डेसीडेरियस इरेस्मस (Desiderius Erasmus) से बहुत प्रभावित था। उसकी रचना यूटोपिया (Utopia) जिसका प्रकाशन 1516 ई० में किया गया था ने एक तहलका मचा दिया।

इसमें उसने समकालीन समाज तथा शासन में प्रचलित बुराइयों की कटु आलोचना की तथा एक आदर्श समाज की तस्वीर प्रस्तुत की है। इसे लेखक ने लातीनी भाषा में लिखा था। बाद में इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया गया।

8. डेसीडेरियस इरेस्मस 1466-1536 ई० (Desiderius Erasmus 1466-1536 CE):
डेसीडेरियस इरेस्मस हालैंड का सर्वाधिक श्रेष्ठ साहित्यकार था। उसने यूनानी एवं लातीनी भाषाओं का गहन अध्ययन किया था। उसने अनेक पुस्तकों की रचना की। इनमें से सर्वाधिक प्रसिद्ध दि प्रेज़ ऑफ़ फॉली (The Praise of Folly) थी।

इसका प्रकाशन 1509 ई० में हुआ था। इसमें उसने चर्च में फैले भ्रष्टाचार का विस्तृत वर्णन किया है। उसने पादरियों के विलासी जीवन की कटु आलोचना की है। इरेस्मस में व्यंग्य कसने की अद्भुत योग्यता थी।

प्रश्न 4.
पुनर्जागरण काल में कला के क्षेत्र में हुए विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। मध्यकाल में कला का अपना स्वतंत्र स्थान नहीं था। इसमें मौलिकता एवं सुंदरता का अभाव था। पुनर्जागरण काल में कला धार्मिक बँधनों से मुक्त हो गई तथा यह यथार्थवादी (realistic) बन गई। वास्तव में कला ने पुनर्जागरण काल में एक नए युग में प्रवेश किया।

1. चित्रकला (Painting):
मध्यकाल में चित्रकला धर्म की जंजीरों से जकड़ी हुई थी। उस समय केवल ईसाई धर्म से संबंधित चित्र ही बनाए जाते थे। ये चित्र बिल्कुल सादा होते थे। इनमें केवल कुछ निश्चित रंगों का ही प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार चित्रकला का क्षेत्र सीमित था। पुनर्जागरण काल में चित्रकला के क्षेत्र में एक नई क्राँति आई। इस काल में चित्रकारों ने धार्मिक नियमों का त्याग कर दिया।

उन्होंने मानव जीवन एवं प्राकृतिक दृश्यों से संबंधित अत्यंत सुंदर चित्र बनाए। अब ये गिरजाघरों के लिए नहीं अपितु व्यक्तिगत भवनों की सजावट के लिए बनाए जाने लगे। इनमें मानवतावाद एवं धर्मनिरपेक्षता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। इन चित्रों को पूर्व की तुलना में अधिक रंगीन एवं चटख बनाया गया। अब चित्रकारी के लिए तेल रंगों (oil painting) का प्रयोग किया जाने लगा। ये रंग पक्के होते थे। अब त्रि-आयामी

(1) जोटो 1267-1337 ई० (Giotto 1267-1337 CE):
जोटो इटली का एक महान् चित्रकार था। उसने चित्रकला को एक नई दिशा प्रदान करने में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसने अत्यंत सुंदर प्राकृतिक चित्र बनाए। ये चित्र देखने में बिल्कुल सजीव लगते थे। उसका सर्वाधिक प्रसिद्ध चित्र असिसि (Assis) था। इसमें बाल ईसा मसीह को दिखाया गया है।

उसने चर्च की दीवारों पर भी अनेक चित्र बनाए। उसने चित्रों की पृष्ठभूमि के लिए कुछ नए रंगों का प्रयोग किया। उसके चित्रों ने आने वाले चित्रकारों को एक नई प्रेरणा दी।

(2) लियोनार्डो दा विंसी 1452-1519 ई० (Leonardo da Vinci 1452-1519 CE):
लियोनार्डो दा विंसी बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति था। वह विश्व में एक चित्रकार के रूप में अधिक लोकप्रिय हुआ। उसका जन्म इटली के फ्लोरेंस नगर में 1452 ई० में हुआ था। उसने अपने जीवनकाल में अनेक चित्र बनाए।

इन चित्रों को देख कर उसकी प्रतिभा का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उसके बनाए चित्रों मोना लीसा (Mona Lisa) एवं दि लास्ट सपर (The Last Supper) ने विश्व ख्याति प्राप्त की।

ये चित्र देखने में बिल्कुल सजीव लगते हैं। मोना लीसा एक साधारण स्त्री का चित्र है। इस चित्र को बनाने में लियोनार्डो को चार वर्ष लगे। इस चित्र में मोना लीसा की मुस्कान इतनी मधुर है कि इसे देखने वाला व्यक्ति आज भी चकित रह जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के शब्दों में, “मोना लीसा एक ऐसा चित्र है जिससे उत्कृष्ठ चित्र आज तक नहीं बनाया जा सका।”

दि लास्ट सपर नामक चित्र मिलान स्थित सेंट मेरिया के गिरजाघर की दीवार पर बनाया गया है। इसमें ईसा मसीह को अपने साथियों के साथ एक मेज़ पर अपना अंतिम भोजन करते हुए दिखाया गया है। यह चित्र उच्च कोटि की मानवतावादी भावनाओं को प्रकट करता है। निस्संदेह लियोनार्डो दा विंसी पुनर्जागरण काल का सबसे महान् चित्रकार था। प्रसिद्ध इतिहासकार सी०.जे० एच० हेज़ के अनुसार, “लियोनार्डो ने अन्य कलाकारों के मुकाबले अपने युग को सबसे अधिक प्रभावित किया।”

(3) अल्बर्ट ड्यूरर 1471-1528 ई० (Albrecht Durer 1471-1528 CE):
अल्बर्ट ड्यूरर की गणना जर्मनी के महान् चित्रकारों में की जाती है। उसे बचपन से ही चित्रकारी में विशेष रुचि थी। 1494 ई० में अपनी इटली यात्रा के दौरान वह वहाँ के चित्रकारों से बहुत प्रभावित हुआ।

उसने प्रकृति से एवं मानव से संबंधित अनेक चित्र बनाए। उसके बनाए चित्रों में 1508 ई० में बनाया गया प्रार्थना रत हस्त (Praying Hands) बहुत लोकप्रिय हुआ। इससे 16वीं शताब्दी की इतालवी संस्कृति का आभास होता है।

(4) माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती 1475-1564 ई० (Michael Angelo Buonarroti 1475-1564 CE):
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती इटली का एक अन्य प्रतिभाशाली व्यक्ति था। वह एक श्रेष्ठ चित्रकार, प्रवीण मूर्तिकार, कुशल भवन निर्माता एवं उच्च कोटि का कवि था। वास्तव में वह प्रत्येक क्षेत्र में असाधारण प्रदर्शन करने की योग्यता रखता था। उसका नाम रोम के

1. सिस्टीन चैपल (Sistine Chapel) की भीतरी छत पर बनाए 145 चित्रों के कारण सदैव के लिए अमर हो गया है। इन चित्रों से माईकल ऐंजेलो के कौशल एवं प्रतिभा का प्रमाण मिलता है। इसी चर्च की दीवार पर माईकल ऐंजेलो ने लास्ट जजमेंट (Last Judgement) नामक एक उच्च कोटि का चित्र को बनाया।

2. भवन निर्माण कला (Architecture):
पुनर्जागरण काल में भवन निर्माण कला के क्षेत्र में भी एक नयी क्राँति आई। इस काल में मध्यकाल में प्रचलित गौथिक शैली को छोड दिया गया। इस काल में भवन निर्माण कला की शास्त्रीय शैली (classical style) को अपनाया गया। इस शैली में डिज़ाइन, सजावट, विशालता एवं भव्यता पर विशेष बल दिया गया। इस काल में शिल्पकारों एवं चित्रकारों ने भवनों को गुंबदों, चित्रों एवं मूर्तियों से सुसज्जित किया।

(1) फिलिप्पो ब्रूनेलेशी 1377-1446 ई० (Philippo Brunelleschi 1377-1446 CE):
फिलिप्पो ब्रूनेलेशी फ्लोरेंस का एक प्रसिद्ध भवन निर्माता था। वह प्रथम ऐसा व्यक्ति था जिसने गौथिक शैली की अपेक्षा शास्त्रीय शैली (classical style) को अपनाया। उसने भवन निर्माण कला के संबंध में काफी गहन अध्ययन किया था।

उसने 1436 ई० में फ्लोरेंस के कथीड्रल में दि ड्यूमा नामक गुंबद तैयार किया। इसने उसका नाम सदैव के लिए अमर कर दिया। यह गुंबद बहुत भव्य एवं विशाल था। इससे आने वाले भवन निर्माताओं को एक नई प्रेरणा मिली।

(2) दोनातल्लो 1386-1466 ई० (Donatello 1386-1466 CE):
दोनातल्लो इटली का एक महान् मूर्तिकार था। उसने 1416 ई० में मूर्तिकला के क्षेत्र में एक नई शैली का विकास किया। उसने यूनानी एवं रोमन मूर्तियों का गहन अध्ययन किया था। उसके द्वारा निर्मित मूर्तियों में से फ्लोरेंस में बनाई गई यंग ऐंजलस (Young Angels) नामक मूर्ति, पादुआ के जनरल गाटामेलाटा (Gattamelata) एवं वेनिस के सेंट मार्क (St. Mark) नामक मूर्तियों के नाम उल्लेखनीय हैं। ये मूर्तियाँ दोनातल्लो की दक्षता का प्रमाण देती हैं।

(3)माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती 1475-1564 ई० (Michael Angelo Buonarroti 1475-1564CE):
इटली के माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती न केवल एक महान् चित्रकार थे अपितु वह अपनी मूर्तिकला एवं भवन निर्माण कला के लिए भी प्रसिद्ध थे। माईकल ऐंजेलो ने अनेक भव्य एवं सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया था। इनमें दो मूर्तियाँ दि पाइटा (The Pieta) एवं डेविड (David) के नाम उल्लेखनीय हैं।

इसमें मेरी को ईसा मसीह के मृतक शरीर को गोद में लिए हुए दिखाया गया है। उसकी दूसरी मूर्ति डेविड के नाम से जानी जाती है इन दोनों मूर्तियों को पुनर्जागरण काल की सर्वश्रेष्ठ मूर्तियाँ माना जाता है। इनके अतिरिक्त माईकल ऐंजेलो ने सेंट पीटर गिरजाघर के गुंबद का भव्य डिज़ाइन बनाया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 5.
पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में क्या विकास हुआ?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में अद्वितीय विकास हुआ। मध्यकाल में लोगों के जीवन पर चर्च का जबरदस्त प्रभाव था। इस काल में मानव जीवन का उद्देश्य परमात्मा को पाना एवं परलोक के बारे सोचना था। अत: इस काल में लोगों की विज्ञान में कोई दिलचस्पी नहीं थी। पुनर्जागरण काल में लोगों के दृष्टिकोण में भारी परिवर्तन आ गया।

वे प्रत्येक वस्तु को तर्क की कसौटी पर परखने लगे। इससे नवीन खोजों का मार्ग प्रशस्त हुआ। लोगों को वास्तविक ज्ञान की जानकारी देने के उद्देश्य से 1662 ई० में लंदन में रॉयल सोसाइटी (Royal Society) तथा 1666 ई० में फ्राँस में पेरिस अकादमी (Paris Academy) की स्थापना की गई। संक्षेप में वैज्ञानिक खोजों ने लोगों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिए।

1. निकोलस कोपरनिकस 1473-1543 ई० (Nicholas Copernicus 1473-1543 CE):
निकोलस कोपरनिकस पोलैंड का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने खगोल विज्ञान (astronomy) के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया। उसने उस समय प्रचलित इस सिद्धांत को असत्य सिद्ध किया कि पृथ्वी सभी ग्रहों का केंद्र है तथा सूर्य एवं अन्य ग्रह इसके इर्द-गिर्द चक्कर काटते हैं।

कोपरनिकस ने सिद्ध किया कि पृथ्वी गोल है तथा यह अन्य ग्रहों की तरह सर्य की परिक्रमा करती है। चर्च ने कोपरनिकस के इस सिद्धांत की कट आलोचना की तथा इसे बाईबल की शिक्षा के विरुद्ध माना। यही कारण था कि कोपरनिकस के विचारों संबंधी पस्तक दि रिवल्यशनिबस (De Revolutionibus) का प्रकाशन उसकी मृत्यु के पश्चात् हुआ। निस्संदेह कोपरनिकस के इस सिद्धांत ने विज्ञान के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात किया।

2. अंड्रीयस वेसेलियस 1514-1564 ई० (Andreas Vesalius 1514-1564 CE):
अंड्रीयस वेसेलियस इटली के पादुआ विश्वविद्यालय में आयुर्विज्ञान का प्राध्यापक था। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ (dissection) की। निस्संदेह यह एक महान् वैज्ञानिक उपलब्धि थी। इससे आधुनिक शरीर-क्रिया विज्ञान (physiology) का आरंभ हुआ। उसने 1543 ई० में ऑन एनॉटमी (On Anatomy) नामक एक बहुमूल्य ग्रंथ की रचना की।

3. गैलिलियो गैलिली 1564-1642 ई० (Galileo Galilei 1564-1642 CE):
गैलिलियो गैलिली इटली का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने कोपरनिकस के इस सिद्धांत का समर्थन किया कि सूर्य ही ब्रह्मांड का केंद्र है तथा पृथ्वी एवं अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। उसने 1609 ई० में दूरबीन (Telescope) तैयार की जिससे सूर्य तथा चाँद आदि ग्रहों को देखा जा सकता था।

निस्संदेह यह एक महान् उपलब्धि थी। गैलिलियो ने दि मोशन (The Motion) नामक एक बहुमूल्य ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने यह सिद्ध किया कि भारी एवं हल्की वस्तुएँ एक ही गति से पृथ्वी पर गिरती हैं। गैलिलियो को अपने विचारों के लिए चर्च की कटु आलोचना का शिकार होना पड़ा।

4. जोहानेस कैप्लर 1571-1630 (Johannes Kepler 1571-1630 CE):
जोहानेस कैप्लर जर्मनी का एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। वह जर्मन विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान का प्रोफैसर था। उसने कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री (Cosmographical Mystery) नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने खगोलीय रहस्य के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला है। इसमें उसने कोपरनिकस के सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया। इसमें उसने यह सिद्ध किया कि सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्ताकार (circles) के रूप में नहीं अपितु अंडाकार गति से घूमते हैं।

5. विलियम हार्वे 1578-1657 ई० (William Harvey 1578-1657 CE):
विलियम हार्वे इंग्लैंड का एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने 1628 ई० में यह सिद्ध किया कि रक्त हृदय से चलकर धमनियों तथा नाड़ियों से होता हुआ पुनः वापस हृदय में पहुँच जाता है। इसे रुधिर परिसंचरण (Blood circulation) कहा जाता है। निस्संदेह चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में यह एक क्रांतिकारी देन थी।

6. आइज़क न्यूटन 1642-1717 ई० (Issac Newton 1642-1717 CE):
आइज़क न्यूटन इंग्लैंड का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने 1687 ई० में प्रिंसिपिया मैथेमेटिका (Principia Mathematica) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ का प्रकाशन किया। इस | विज्ञान के अनेक नए सिद्धांतों की खोज का वर्णन किया है। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Law of Gravitation) था। इसमें उसने सिद्ध किया कि पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के कारण प्रत्येक वस्तु ऊपर से नीचे की ओर खींचती है।

प्रश्न 6.
पुनर्जागरण के यूरोपीय समाज पर पड़े विभिन्न प्रभावों पर प्रकाश डालें।
अथवा
पुनर्जागरण के सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जागरण को विश्व इतिहास में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण आंदोलन माना जाता है। इस आंदोलन के कारण लोगों का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन बहुत प्रभावित हुआ। इन प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

I. सामाजिक तथा धार्मिक प्रभाव

1. जिज्ञासा की भावना (Spirit of Inquiry):
पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह पड़ा कि लोगों में जिज्ञासा की भावना उत्पन्न हुई तथा उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो गया। अब उन्होंने शताब्दियों से प्रचलित अंध विश्वासों तथा रीति-रिवाजों को त्याग दिया। वे अब प्रत्येक विचार को तर्क की कसौटी पर परखने लगे। उनमें अधिक-से-अधिक ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा पैदा हुई। परिणामस्वरूप नए-नए आविष्कार हुए जिससे लोगों की जीवन पद्धति परिवर्तित हो गई।

2. मानवतावाद की भावना (Spirit of Humanism):
मानवतावाद की भावना का उत्पन्न होना पुनर्जागरण की एक अन्य महत्त्वपूर्ण देन है। इस काल के साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में मनुष्य से संबंधित विषयों को प्रमुख स्थान दिया तथा मनुष्य के कल्याण पर बल दिया। उन्होंने धर्म द्वारा मनुष्य पर लगाए गए अनुचित प्रतिबंधों की घोर आलोचना की। उन्होंने मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन किया। पेट्रार्क, दाँते तथा इरेस्मस उस काल के प्रसिद्ध मानवतावादी थे।

3. स्त्रियों की स्थिति में सुधार (Uplift of Women):
पुनर्जागरण से पूर्व स्त्रियों की स्थिति बहुत बदतर थी। उन्हें समाज में कोई सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं था। पुनर्जागरण काल में स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार आया तथा उन्हें पुरुषों के समान स्थान प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप उनमें जागृति आई। अब वे शिक्षा ग्रहण करने लगीं। साहित्य के अध्ययन से उनका दृष्टिकोण विशाल हो गया।

4. नैतिकता का पतन (Decline of Morality) :
पुनर्जागरण का समाज पर एक बुरा प्रभाव यह पड़ा कि लोगों की नैतिकता का पतन हो गया। पुनर्जागरण से पूर्व लोग प्रायः धार्मिक होते थे। परंतु अब वे भौतिकवादी बन गए। इससे लोगों के पास काफी धन एकत्र हो गया तथा वे विलासी जीवन बिताने लगे। इस प्रभाव से पादरी भी अछूते न रहे तथा वे भी भ्रष्ट एवं चरित्रहीन हो गए।

5. चर्च के महत्त्व में कमी (Decline in the Importance of Church):
पुनर्जागरण के कारण लोगों का दृष्टिकोण विशाल हो गया था। अब वे आँखें मूंद कर चर्च पर विश्वास नहीं करते थे। इस कारण चर्च की प्रतिष्ठा को चोट पहुँची। विज्ञान में हुए नए-नए आविष्कारों के कारण लोगों में तर्कशीलता की भावना पैदा हुई। अब वे खोखले रीति-रिवाजों तथा अंध-विश्वासों का अनुसरण करने को तैयार न रहे। परिणामस्वरूप चर्च की बुराइयाँ लोगों के सामने आने लगीं तथा समाज में चर्च का महत्त्व कम होने लगा।

II. सांस्कृतिक प्रभाव

1. साहित्य का विकास (Development of Literature):
पुनर्जागरण के कारण साहित्य के क्षेत्र में आश्चर्य विकास हआ। इस विकास के परिणामस्वरूप अनेक नई पस्तकों की रचना हई। इतालवी. फ्राँसीसी. अंग्रेजी, स्पेनी, जर्मन, डच आदि भाषाओं में अनेकों विद्वानों ने अपनी रचनाएँ लिखीं। इस काल के साहित्यकारों में दाँते, पेट्रार्क, बोकासियो, मैक्यिावेली, मिरांदोला, जेफ्री चॉसर, टॉमस मोर तथा इरेस्मस आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में मानवतावादी विचारों का प्रसार किया तथा साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

2. शिक्षा का विकास (Progress of Education):
पुनर्जागरण से पूर्व शिक्षा केवल चर्च द्वारा ही प्रदान की जाती थी। पुनर्जागरण के कारण शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। विभिन्न देशों में नए-नए स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों की स्थापना होने लगी। अब लोग चर्च से शिक्षा ग्रहण करने की अपेक्षा इन नए शिक्षण संस्थानों में जाने लगे। परिणामस्वरूप आधुनिक शिक्षा का विकास होने लगा। छापेखाने का आविष्कार हो जाने से लोगों को अब शीघ्र तथा सस्ती पुस्तकें प्राप्त होने लगीं।

3. ललित कलाओं का विकास (Development of Fine Arts):
पुनर्जागरण काल में चित्रकला के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ। इस काल के चित्रकारों ने मानव जीवन से संबंधित चित्र बनाने आरंभ कर दिये थे तथा इन चित्रों में धर्म-निरपेक्षता की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी। इस काल में चित्रों के लिए प्रयोग होने वाले रंगों में भी परिवर्तन आया।

लियोनार्डो द विंसी, माईकल ऐंजेलो, राफेल, ब्रूनेलेशी, दोनातल्लो आदि ने चित्रकला में अपना विशेष योगदान दिया। इस काल में मूर्तिकला के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ। इस काल के मूर्तिकारों में लोरेंजो जिबर्टी, दोनातल्लो, माईकल ऐंजेलो आदि के नाम वर्णनीय हैं।

4. वैज्ञानिक आविष्कार (Scientific Inventions):
पुनर्जागरण काल में लोगों का दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो गया था। परिणामस्वरूप नए-नए वैज्ञानिक आविष्कार हुए। कोपरनिकस, केप्लर, गैलिलियो आदि ने अपनी खोजों से यह सिद्ध किया कि सूर्य ब्रह्मांड का केंद्र है तथा शेष सभी ग्रह इसके गिर्द चक्कर लगाते हैं। इससे पूर्व यह धारणा थी कि सभी ग्रह पृथ्वी के गिर्द घूमते हैं। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत पेश किया। छापाखाना, गोला बारूद तथा कंपास आदि के आविष्कारों ने भी मानव जीवन पर क्रांतिकारी प्रभाव डाले।

5. भौगोलिक खोजें (Geographical Discoveries):
पुनर्जागरण काल में हुई भौगोलिक खोजों से एक नए युग का प्रादुर्भाव हुआ। इस काल में अनेक देशों के नाविकों ने समुद्री यात्राएँ की तथा नए-नए समुद्री मार्गों का पता लगाया। कोलंबस, वास्को-डी-गामा, मैगलन, कैबट, लैबरोडोर इस काल के प्रसिद्ध नाविक थे। इन्होंने अमरीका, भारत, कनाडा, अफ्रीका तथा चीन आदि देशों तक पहुँचने के लिए नए-नए समुद्री मार्गों की खोज की। इन भौगोलिक खोजों के कारण यूरोपीय देशों के व्यापार में बड़ी वृद्धि हुई तथा उपनिवेशवाद को प्रोत्साहन मिला।

II. आर्थिक प्रभाव

1. व्यापार तथा वाणिज्य का विकास (Development of Trade and Commerce):
पुनर्जागरण से पूर्व लोग धार्मिक विचारों में विश्वास रखते थे परंतु अब वे तर्कशील तथा भौतिकवादी बन गए थे। वे अपना परलोक सुधारने की अपेक्षा वर्तमान जीवन को सुखी तथा आनंदपूर्ण बनाने की ओर ज्यादा ध्यान देने लगे। उनकी रुचि अब धन-दौलत इकट्ठी करने की हो गई। उनकी यह प्रवृत्ति व्यापार तथा वाणिज्य के विकास में बड़ी सहायक सिद्ध हुई।

2. उद्योगों का विकास (Development of Industry):
पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप पैदा हुए वातावरण के कारण उद्योगों के क्षेत्र में भी पर्याप्त विकास हुआ। अमीर वर्ग अपने धन का प्रयोग करके और अधिक धन कमाना चाहता था। उनकी इसी लालसा ने उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन दिया। उद्योगों का विकास होने के परिणामस्वरूप पूँजीवाद का जन्म हुआ।

3. उपनिवेशवाद को प्रोत्साहन (Impetus to Colonialism):
पुनर्जागरण काल में उद्योगों का विकास होने के कारण उद्योगों में अधिक मात्रा में माल बनने लगा। उद्योगपति अपना माल बेच कर अधिक-से-अधिक पैसा कमाना चाहते थे। इस माल को बेचने के लिए उन्हें मंडियों की आवश्यकता थी। अत: विभिन्न देशों के सम्राटों ने अपने नाविकों को दूर-दूर के स्थानों पर जाने के लिए नए समुद्री मार्गों को खोजने के लिए प्रेरित किया। परिणामस्वरूप इन नाविकों ने नए समुद्री मार्गों की खोज की तथा अमरीका, एशिया तथा अफ्रीका आदि में पहुँचने में सफल हुए। वहाँ पर इन देशों ने अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए।

IV. राजनीतिक प्रभाव

1. प्रबल राजतंत्र का उदय (Rise of Strong Monarchy):
पुनर्जागरण काल में हुए साहित्य के विकास के कारण लोगों के राजनीतिक विचारों में बड़ा परिवर्तन आया। प्राचीन रोमन साहित्य के अध्ययन से यूरोपीय शासकों को प्राचीन रोमन साम्राज्य की शक्ति तथा शानो-शौकत का पता चला तो उनके मन में भी शक्तिशाली राज्य स्थापित करने का विचार आया।

उनमें यह विचार प्रचलित हो गया था कि नैतिकता के मूल्यों की परवाह किए बिना उन्हें उचित अनुचित ढंग अपना कर अपने राज्यों का विस्तार करना चाहिए। गोला-बारूद का आविष्कार हो जाने के कारण सामंतों का पतन हो चुका था तथा सम्राटों की स्थिति मज़बूत हो गई थी। अब तक चर्च भी शक्तिहीन हो गया था। इन सभी परिस्थितियों ने शक्तिशाली राजतंत्रों के उत्थान को संभव बना दिया।

2. सामंतवाद का पतन (Downfall of Feudalism) :
मध्यकाल में सामंतवाद का बोल-बाला था। सामंत बहुत ही शक्तिशाली थे तथा सम्राट सेना के लिए उन पर ही निर्भर करते थे। परंतु गोला-बारूद के आविष्कार के परिणामस्वरूप स्थिति में परिवर्तन आ गया। इस कारण सम्राट् शक्तिशाली हो गए तथा उनकी सामंतों पर निर्भरता समाप्त हो गई। अब सम्राट विद्रोही सामंतों को कुचलने में सक्षम हो गए।

3. युद्ध के नवीन ढंग (New Mode of Warfare):
मध्यकाल में प्रायः युद्ध में तलवारों, नेजों तथा भालों आदि का ही प्रयोग किया जाता था। परंतु पुनर्जागरण काल में बारूद का आविष्कार हो जाने के कारण युद्ध के ढंग में युद्धों में तोपखाने का प्रयोग होने लगा। इसी शक्तिशाली सेना की सहायता से विभिन्न यूरोपीय सम्राट विभिन्न स्थानों पर विजय प्राप्त करके अपने उपनिवेश स्थापित करने में सफल रहे।

प्रश्न 7.
धर्म सुधार आंदोलन से आपका क्या अभिप्राय है? इसके कारणों तथा उद्देश्यों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म-सुधार आंदोलन पुनर्जागरण के बाद आधुनिक युग की दूसरी महानतम् घटना मानी जाती है। इस आंदोलन का उदय पुनर्जागरण की कोख से ही हुआ। यह आंदोलन वास्तव में पोप तथा चर्च के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया थी जो 16वीं शताब्दी में यूरोप के देशों में हुई।

एक अन्य इतिहासकार फर्डिनांड शेविल के अनुसार, “वास्तव में यह एक प्रकार का दोहरा आंदोलन था जिसका उद्देश्य एक ओर ईसाइयों के जीवन का नैतिक उत्थान करना था तथा दूसरी ओर पोप की सत्ता को धार्मिक क्षेत्र में कम करना था।”

I. धर्म सुधार आंदोलन से अभिप्राय

16वीं शताब्दी से पूर्व चर्च ग्रीक आर्थोडॉक्स तथा रोमन कैथोलिक नामक दो भागों में बँटा हुआ था। ग्रीक आर्थोडॉक्स का पूर्वी यूरोप तथा रोमन कैथोलिक का पश्चिमी यूरोप में प्रभुत्व था। ग्रीक आर्थोडॉक्स चर्च का केंद्र कुंस्तुनतुनिया था जबकि रोमन कैथोलिक चर्च का केंद्र रोम था। 1453 ई० में तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया सहित पूर्वी यूरोप के बहुत बड़े भाग पर अधिकार कर लिया था।

परिणामस्वरूप आर्थोडॉक्स चर्च का महत्त्व कम हो गया। परंतु रोमन कैथोलिक का महत्त्व अभी भी बना हुआ था। वस्तुतः धर्म-सुधार आंदोलन रोम कैथोलिक चर्च तथा इसको संचालित करने वाले पोप के विरुद्ध ही चलाया गया था।

कैथोलिक चर्च एक शक्ति संपन्न संस्था थी। इसके अनुयायियों पर इसका पूर्ण नियंत्रण था। जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्ति की सभी रस्में चर्च के नियमों के अनुसार ही होती थीं। कोई भी व्यक्ति चर्च के नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता था। पोप की शक्ति के आगे तो सम्राटों की शक्ति भी फीकी पड़ जाती थी। सम्राट् तथा उसकी प्रजा चर्च के अधीन ही होते थे।

चर्च की अपनी सरकार होती थी तथा उसने अपने कानून, अपने न्यायालय एवं अपनी ही पुलिस स्थापित की होती थी। प्रत्येक व्यक्ति को चर्च को कर देना पड़ता था।

सम्राट अपने राज्य के कानून चर्च पर लागू नहीं कर सकता था। यदि कोई चर्च के नियमों का उल्लंघन करता था तो उसे धर्म से निष्कासित कर दिया जाता था। यदि कोई सम्राट् चर्च के विरुद्ध कार्य करता था तो पोप उसे सिंहासन से उतार सकता था। इस प्रकार पोप असीम शक्तियों का स्वामी था। जॉन मैरीमेन के अनुसार, “चर्च एक अर्ध-स्वतंत्र संस्था थी जो लोगों के राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के प्रत्येक पक्ष में हस्तक्षेप करता था।”

पोप धर्म का मुखिया तो था ही, इसके साथ-साथ वह राजनीतिक मामलों में भी हस्तक्षेप करता रहता था। परिणामस्वरूप राजाओं के साथ उसके संबंध सुखद नहीं रहते थे। उनमें व्यापक तनाव रहता था। सम्राट् पोप के प्रभाव से मुक्त होने के यत्न करते रहते थे। धीरे-धीरे चर्च में कई दोष आ गए तथा वहाँ पाप के अड्डे बन गए।

पादरी चरित्रहीन हो गए तथा विलासी जीवन बिताने लगे। इस कारण लोगों में रोष उत्पन्न हुआ तथा उन्होंने चर्च के विरुद्ध आवाज़ उठानी आरंभ कर दी। परिणामस्वरूप 16वीं शताब्दी में धर्म-सुधार आंदोलन आरंभ हुआ जिसे सम्राटों तथा जनता ने अपना पूर्ण सहयोग दिया।

II. धर्म-सुधार आंदोलन के कारण

धर्म-सुधार आंदोलन के उदय तथा विकास में जिन कारणों ने सहायता पहुँचाई उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. चर्च की बुराइयाँ (Evils of the Church):
धर्म-सुधार आंदोलन का मुख्य कारण चर्च में व्याप्त बुराइयाँ थीं जिनके कारण लगभग पिछले 200 वर्षों से चर्च बदनाम हो रहा था। चर्च के संगठन में भ्रष्टाचार तथा दुराचार का बोलबाला था। उच्च अधिकारी से लेकर पादरी तक सभी का चरित्र पतित हो चुका था। चर्च के अधिकारी अपने कर्तव्यों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे तथा बड़े लालची हो गए थे।

वे विलासी जीवन व्यतीत करने लगे थे तथा हर समय रंगरलियों में डूबे रहते थे। कई पादरियों ने शराब पीना, जुआ खेलना तथा शिकार खेलना आरंभ कर दिया था। पादरियों के इन्हीं अनैतिक कार्यों के कारण जन-साधारण चर्च के विरुद्ध हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के अनुसार, “चर्च के नैतिक पतन से लोगों का विश्वास डगमगा गया।”

2. पोप तथा पादरियों के विशेषाधिकार (Privileges of the Pope and the Priests):
यूरोप की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार पादरियों को विशेषाधिकार प्राप्त थे। देश का कोई भी कानून उन पर लागू नहीं होता था। कोई अपराध करने पर भी उनके ऊपर किसी न्यायालय में मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता था। मध्यकाल में पोप बिल्कुल निरंकुश होते थे तथा उनकी शक्ति पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता था।

वे अपनी शक्तियों का दुरप्रयोग करने लगे थे। इस काल के पोपों ने धन इकट्ठा करने के साथ भोग-विलास का जीवन भी आरंभ कर दिया था। धर्म के सबसे बड़े व्यक्ति के इस प्रकार के चरित्र से लोगों के मन को बड़ी ठेस पहुँची। इसने धर्म-सुधार आंदोलन का आधार तैयार किया।

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3. चर्च की विशाल धन-संपत्ति (Vast Wealth of the Church) :
यूरोप के विभिन्न देशों में चर्च ने विशाल संपत्ति इकट्ठी कर ली थी। इसी प्रकार फ्राँस तथा अन्य देशों में भी चर्च ने काफी संपत्ति इकट्ठी कर ली थी। चर्च की संपत्ति बढ़ने के कई साधन थे जैसे चर्च को दान दी गई भूमि। चर्च किसानों से उनके उत्पादन का दसवाँ भाग कर के रूप में लेता था।

यह कर भी उसकी आय का एक बड़ा साधन था। सम्राट् चर्च की संपत्ति पर कर नहीं लगा सकते थे। इस विशाल संपत्ति के कारण पादरी भ्रष्ट हो गये थे। उन्होंने धार्मिक कार्यों तथा निर्धनों की सहायता करने की अपेक्षा स्वार्थी हितों की पूर्ति करनी आरंभ कर दी थी। इस कारण लोग चर्च के विरुद्ध हो गए।

4. राजनीतिक क्षेत्र में पोप का हस्तक्षेप (Pope’s Interference in the Political Affairs):
पोप केवल धार्मिक दृष्टि से ही निरंकुश शासक नहीं था, अपितु राजनीतिक क्षेत्र में भी उसका पूरा प्रभाव था। वह स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि समझता था। ईसाई राज्यों पर अपना कड़ा नियंत्रण रखने के उद्देश्य से उसने अपने एजेंट नियुक्त किए हुए थे।

ये एजेंट पोप के आदेशों का पालन करवाने का कार्य करते थे। यदि कोई सम्राट् पोप के आदेशों के विपरीत कार्य करता था तो पोप उसे दंड दे सकता था। वह सम्राट को पदच्युत कर सकता था।

चर्च की संपत्ति के कारण भी कई बार पोप तथा सम्राटों में झगड़ा हो जाता था। पोप का यह विश्वास था कि चर्च की संपत्ति पर कर लगाने का अधिकार किसी सम्राट के पास नहीं है। परंतु कई सम्राटों ने पोप की इस धारणा को चनौती दी। इन सम्राटों ने पोप के आदेशों की कोई परवाह न की तथा चर्च पर कर लगा दिए।

इससे पोप की प्रतिष्ठा तथा शक्ति को गहरा आघात पहँचा। फलस्वरूप पोप की स्थिति दर्बल हो गई और लोग धर्म सधार के लिए प्रेरित हए। फर्डीनांड शेविल के अनुसार, “पोप द्वारा धन इकट्ठा करने तथा उसके राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करने के कारण यूरोप के लोगों ने उसका विरोध किया।”

5. राष्ट्रीय राज्यों का उदय (Rise of Nation States) :
पुनर्जागरण से पर्व यरोप के कई देशों में सामंतवाद का प्रभुत्व था। इस सामंती व्यवस्था में अनेकों दोष व्याप्त थे। इन दोषों को दूर करने के उद्देश्य से कई राज्यों में शासकों ने सामंतों को शक्तिहीन करने के सफल प्रयास किए। परिणामस्वरूप इंग्लैंड, फ्राँस, पुर्तगाल, स्पेन, हंगरी, पोलैंड, हालैंड, स्काटलैंड, डेनमार्क आदि राष्ट्रीय राज्य उदय हुए।

ये राष्ट्रीय राज्य चर्च के प्रभाव से मुक्ति पाना चाहते थे। इस कार्य के लिए फ्राँस. इंग्लैंड तथा स्पेन के सम्राट आगे आए। उन्होंने अपने राज्य में स्थित चर्च की संपत्ति पर कर लगाया। उनके अनुसार किसी सम्राट को पदच्युत करने का पोप द्वारा दिया जाने वाला आदेश अनुचित है।

6. पुनर्जागरण का प्रभाव (Influence of the Renaissance):
पनर्जागरण एक ऐसी क्रांति थी जिसने धार्मिक अंध-विश्वासों एवं रूढ़िवादी मान्यताओं पर कड़ा प्रहार किया और यूरोपवासियों में एक नई चेतना जागृत की। इसके प्रभाव से यरोप के लोगों का दष्टिकोण आलोचनात्मक एवं तार्किक हो गया। अब वे तर्क की कसौटी पर कसे बिना किसी भी तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। छापेखाने के आविष्कार के कारण उनमें नवचेतना का संचार हुआ। वे चर्च में फैले भ्रष्टाचार से अवगत हुए। अत: उनमें व्याप्त असंतोष आक्रोश में बदल गया। इस बात ने धर्म-सुधार आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया।

7. धर्म-सुधारकों द्वारा पोप का विरोध (Opposition of Pope by the Religious Reformers):
धर्म-सुधार आंदोलन के आरंभ तथा प्रसार में यूरोप के धर्म-सुधारकों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। इन धर्म-सुधारकों ने लोगों के सामने तत्कालीन धार्मिक व्यवस्था के दोषों का भांडा फोड़ दिया। इन धर्म-सुधारकों में सबसे प्रसिद्ध जॉन वार्डक्लिफ (John Wvcliffe) था।

उसने तथा उसके शिष्य जॉन हस्स (John Huss) ने पोप तथा चर्च के विरुद्ध जोरदार प्रचार किया। चर्च का विरोध करने के कारण पोप ने उन्हें ईसाई धर्म से निकाल दिया। डरेस्मस (Erasmus) एक अन्य विद्वान था। उसने बाईबल की गलतियों में संशोधन किया तथा उसका लातीनी भाषा में रूपांतर तैयार किया। उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘इन प्रेज़ ऑफ़ फॉली’ (In Praise of Folly) में चर्च की भ्रष्टाचारी प्रथाओं का खंडन किया। इस पुस्तक के कारण पोप की प्रतिष्ठा को गहरी चोट पहुँची।

8. तात्कालिक कारण : पाप स्वीकारोक्ति पत्रों की बिक्री (Immediate Cause-Sale of Indulgences):
पोप द्वारा पाप स्वीकारोक्ति पत्रों की बिक्री धर्म-सुधार आंदोलन का तात्कालिक कारण बना। उन दिनों पोप को रोम में सेंट पीटर गिरजाघर के निर्माण के लिए धन चाहिए. था। उसने धन इकट्ठा करने के लिए पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचना आरंभ कर दिया।

इन पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को खरीद कर कोई भी व्यक्ति अपने पापों से मुक्त हो सकता था। 1517 ई० में जोहानन टेट्ज़ेल (Johanan Tetzel) नामक एक पादरी पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचने के लिए विटेनबर्ग पहुँचा। जब वह वहाँ यह पाप स्वीकारोक्ति पत्र बेच रहा था तो मार्टिन लूथर ने उसका विरोध किया।

मार्टिन लूथर विटेनबर्ग में एक प्रोफेसर था। चर्च में व्याप्त दोषों के कारण उसके मन में पहले ही चर्च विरुद्ध तूफान उठ रहा था। मार्टिन लूथर ने इन पाप स्वीकारोक्ति पत्रों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इसने धर्म सुधार आंदोलन का श्रीगणेश किया।

III. धर्म सुधार आंदोलन का उद्देश्य

धर्म-सुधार आंदोलन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित अनुसार थे

  • पोप तथा अन्य धर्म अधिकारियों के असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाना।
  • चर्च अधिकारियों का नैतिक जीवन में सुधार लाना।
  • चर्चों में फैले भ्रष्टाचार को समाप्त करना तथा धर्म अधिकारियों का ध्यान आध्यात्मिकता की ओर लगाना।
  • राष्ट्रीय चर्च की स्थापना पर बल देना।
  • जनसाधारण को मोक्ष-प्राप्ति के लिए पोप पर आश्रित न रख कर परमात्मा पर आश्रित बनाना।
  • प्रत्येक मानव को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करना।

इन सब उद्देश्यों के होते हए भी यह कहा जा सकता है कि मल रूप से यह आंदोलन यरोप की प्राचीन रूढिवादिता को समाप्त करने के लिए चलाया गया जिसके लिए 13वीं शताब्दी में प्रयास किये जा रहे थे। डब्ल्यू० के० फरग्युसन एवं जी ब्रन के शब्दों में, “यद्यपि 13वीं शताब्दी में चर्च की व्यवस्था में कुछ परिवर्तन हुए थे, परंतु ये परिवर्तन आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं थे।”

प्रश्न 8.
यूरोप के विभिन्न देशों में चले धर्म सुधार आंदोलनों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म-सुधार आंदोलन के प्रसार में मुख्य भूमिका जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान् मार्टिन लूथर ने निभाई। मार्टिन लूथर के अतिरिक्त उलरिक ज्विंगली, जौं कैल्विन, जॉन वाईक्लिफ तथा इग्नेशियस लोयोला ने भी उल्लेखनीय योगदान दिया। धर्म-सुधार आंदोलन में विभिन्न नेताओं द्वारा दिए योगदान का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. मार्टिन लूथर 1483-1546 ई० (Martin Luther 1483-1546 CE)-मार्टिन लूथर ने जर्मनी में धर्म सुधार आंदोलन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उसका जन्म 10 नवंबर, 1483 ई० को जर्मनी के एक निर्धन किसान के घर हुआ था। प्रारंभ में लूथर पोप विरोधी नहीं था, परंतु 1517 ई० में एक ऐसी घटना घटी जिससे वह पोप विरोधी हो गया।

लूथर ने देखा कि विटेनबर्ग में टेट्ज़ेल नामक एक पादरी लोगों को पाप स्वीकारोक्ति-पत्र बेच रहा था। टेट्ज़ेल यह प्रचार कर रहा था कि कोई भी व्यक्ति जो इन पाप स्वीकारोक्ति-पत्र को खरीद लेगा वह अपने पापों से मुक्त हो जाएगा तथा सीधे स्वर्ग को जाएगा। भोली-भाली जनता के साथ इस प्रकार किए जा रहे मजाक तथा शोषण के विरुद्ध मार्टिन लूथर ने आवाज़ उठाई।

उसने विटेनबर्ग के चर्च के द्वार पर अपने 95 थिसेज़ लटका दिए। इन थिसेज़ों में उसने चर्च के भ्रष्ट उपायों द्वारा धन इकट्ठा करने की कड़ी आलोचना की। उसने धर्म शास्त्रियों को इन थिसेज़ों के बारे में बहस करना की चुनौती दी। लेकिन पोप ने लूथर के विरोध को कोई महत्त्व नहीं दिया। लूथर ने 1519 ई० में लिपजिग में एक वाद-विवाद में मनुष्य तथा ईश्वर के बीच पोप की मध्यस्थता को निरर्थक बताया।

यह मार्टिन लथर की चर्च की निरंकशता को खली चनौती थी। इसका लोगों के मनों पर गहरा प्रभाव पडा तथा वे चर्च के विरोधी हो गए। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर अरुण भट्टाचार्जी के अनुसार, “मार्टिन लूथर आधुनिक समय के महान् धार्मिक व्यक्तियों में से एक था।

2. उलरिक ज्विंगली 1484-1531 ई० (Ulrich zwingli 1484-1531 CE):
उलरिक ज्विंगली स्विट्ज़रलैंड में हुआ। उसने बेसेल विश्वविद्यालय से एम० ए० की डिग्री प्राप्त की तथा एक पादरी बन गया। 1518 ई० में वह ज्यूरिख के चर्च का पादरी नियुक्त हुआ। परंतु चर्च में फैले भ्रष्टाचार तथा अंध-विश्वासों के कारण शीघ्र ही उसका मन असंतुष्ट हो गया। उस पर मार्टिन लूथर का बहुत प्रभाव था। उसने चर्च में फैले भ्रष्टाचारों एवं दोषों की कड़े शब्दों में आलोचना की। उसने पोप की सर्वोच्चता को मानने से इंकार कर दिया।

उसका कथन था कि लोग चर्च की अपेक्षा बाईबल को अपने जीवन का मार्गदर्शक बनाएँ। उसने उन सभी दूषित प्रथाओं को बंद करने की माँग की जिनके विरुद्ध जर्मनी में मार्टिन लूथर ने आंदोलन चलाया था। उसने लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। उसकी 1531 ई० में कैथोलिकों (Catholics) के साथ हुए एक संघर्ष में मृत्यु हो गई।

3. जौं कैल्विन 1509-64 ई० (Jean Calvin 1509-64 CE):
जौं कैल्विन ने फ्राँस में धर्म-सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया था। वह भी मार्टिन लूथर की भाँति 16वीं शताब्दी का एक महान् सुधारक था। जौं कैल्विन का जन्म फ्रांस के नोपॅन (Noyon) नगर में 10 जुलाई, 1509 ई० को हुआ था। वह एक मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखता था। बचपन से ही उसकी धार्मिक विचारों में रुचि थी। उसने अपनी उच्च शिक्षा पेरिस विद्यालय से प्राप्त की। यहाँ उसने कानून की शिक्षा के साथ-साथ धर्मशास्त्रों का भी गहन अध्ययन किया।

उसके मन पर लूथर के विचारों का बड़ा प्रभाव पड़ा था। उसका ईश्वर की सर्वोच्चता में दृढ़ विश्वास था। उसका विचार था कि ईश्वर सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान है तथा उसने इस सृष्टि की रचना की है। वह मनुष्य को ईश्वर का ही रूप मानता था। चर्च तथा राज्य के संबंध में उसके विचार मार्टिन लूथर से कुछ भिन्न थे। मार्टिन लूथर राज्यों को सर्वोच्च मानता था। परंतु जौं कैल्विन का मानना था कि चर्च का ईश्वर की सर्वोच्चता के प्रतिनिधि के रूप में महत्त्व होना चाहिए। वह चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार का विरोधी था।

1533 ई० में जौं कैल्विन कैथोलिक धर्म त्याग कर स्विट्ज़रलैंड में स्थित बेसेल नगर में आ गया। यहाँ रहते हुए 1536 ई० में उसने ‘इंस्टीच्यूट ऑफ़ क्रिश्चियन रिलिजन’ (‘The Institute of the Christian Religion’) नामक प्रसिद्ध पुस्तक प्रकाशित की। यह पुस्तक बहुत लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक में उसने ईसाई धर्म की बड़ी सुंदर ढंग से व्याख्या की तथा लोगों को पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा दी। जौं कैल्विन पादरियों द्वारा पवित्र जीवन जीने तथा भोग-विलास से दूर रहने पर बल देता था। प्रसिद्ध इतिहासकार ए० जे० ग्रांट के अनुसार, “कुछ ही वर्षों में कैल्विन की प्रसिद्धि महाद्वीप के बहुत से भागों में फैल गई थी।”

4. जॉन वाईक्लिफ 1320-84 ई० (John Wycliffe 1320-84 CE):
चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा अन्य दोषों के विरुद्ध आवाज़ इंग्लैंड में तो जर्मनी से पहले ही उठने लगी थी। इंग्लैंड में सर्वप्रथम चर्च के विरुद्ध आवाज़ जॉन वाईक्लिफ ने उठाई थी। वह पोप को धरती पर ईश्वर का प्रतीक नहीं मानता था क्योंकि उसके अनुसार पोप द्वारा अपनाया गया जीवन का ढंग धर्म के सिद्धांतों के विपरीत था।

वह तीर्थ स्थानों की यात्रा को व्यर्थ मानता था। उसका मानना था कि भ्रष्ट पादरियों के द्वारा दर्शाए गए रास्ते को अपना कर कोई भी व्यक्ति मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। उसका महान् कार्य बाईबल का अंग्रेजी में अनुवाद करना था। इसमें उसने लोगों को ईसाई मत के सच्चे सिद्धांतों को अपनाने के लिए कहा।

1384 ई० में जॉन वाईक्लिफ की मृत्यु हो गई। उसके शिष्य लोलार्ड (Lollards) कहलाए। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के अनुसार, “जॉन वाईक्लिफ समाज के सभी वर्गों पर प्रभावशाली प्रभाव डालने में सफल हुआ।”

5. इग्नेशियस लोयोला 1493-1566 ई० (Ignatius Loyola 1493-1566 CE):
इग्नेशियस लोयोला स्पेन का निवासी था। उसने 1540 ई० में सोसाइटी ऑफ़ जीसस (Society of Jesus) की स्थापना की। इसका उद्देश्य रोमन कैथोलिक चर्च के प्रभाव को पुनः स्थापित करना एवं प्रोटेस्टेंटों के बढ़ रहे प्रभाव को रोकना था।

इसके सदस्य बहुत ईमानदार, शिक्षित तथा अनुशासित थे। उन्होंने ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए अथक प्रयास किए। परिणामस्वरूप यह सोसाइटी न केवल स्पेन अपितु विश्व भर में लोकप्रिय हुई। इग्नेशियस लोयोला के अनुयायी जेसुइट (Jesuits) कहलाए।

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प्रश्न 9.
धर्म सुधार आंदोलनों के विभिन्न प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म-सुधार आंदोलन के यूरोपीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। निस्संदेह इस आंदोलन ने यूरोपीय समाज को एक नई दिशा देने में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। डॉक्टर अरुण भट्टाचार्जी का यह कहना ठीक है कि, “धर्म-सुधार आंदोलन फ्रांस की क्रांति की तरह एक महान् सामाजिक-राजनीतिक घटना थी जिसके यूरोप के इतिहास पर दूरगामी प्रभाव पड़े।”

1. चर्च में फूट (Schism in the Church):
धर्म-सुधार आंदोलन का यूरोपीय लोगों के जीवन पर एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह पडा कि चर्च दो भागों में विभाजित हो गया। अब यह कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट नामक शाखाओं में बँट गया। कैथोलिक शाखा वाले पोप की सर्वोच्चता में विश्वास रखते थे जबकि प्रोटेस्टेंट वालों का मानना था कि पोप अथवा पादरी किसी व्यक्ति को मुक्ति प्राप्त करने में कोई सहायता नहीं कर सकते।

व्यक्ति को मुक्ति केवल बाईबल के सिद्धांतों के अनुसार चल कर ही मिल सकती है। चर्च में पड़ी यह दरार धीरे-धीरे इतनी पक्की हो गई कि यूरोप के भिन्न-भिन्न देशों में कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट लोगों की विभिन्न शाखाएँ स्थापित हो गई।

2. धार्मिक अत्याचार (Religious Persecution):
धर्म-सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप यूरोप के लोग दो विरोधी संप्रदायों में विभाजित हो गए। धीरे-धीरे इन दोनों संप्रदायों में विरोधी भावनाएँ बढ़ने लगीं। इन विरोधी भावनाओं ने इतना गंभीर रूप धारण कर लिया कि वे धार्मिक असहनशीलता का प्रदर्शन करने लगे। प्रोटेस्टेंट तथा कैथोलिक दोनों संप्रदाय अपने ही ढंग से अपने-अपने सिद्धांतों का प्रचार करने लगे। दोनों संप्रदाय एक-दूसरे की निंदा करने लगे। शासक भी केवल अपने मत के लोगों से सहनशीलता का प्रदर्शन करते थे तथा विरोधी पर बहुत अत्याचार करते थे।

3. गृह युद्ध तथा विद्रोह (Civil Wars and Rebelions):
धर्म-सुधार आंदोलन के कारण प्रोटेस्टेंट तथा कैथोलिक एक-दूसरे के शत्रु बन गए। उनमें शत्रुता इतनी बढ़ गई कि वे एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गए। परिणामस्वरूप विभिन्न देशों में धर्म के नाम पर युद्ध हुए जिनमें हजारों लोगों को अपने प्राण गँवाने पड़े।

4. शिक्षा का प्रसार (Spread of Education):
धर्म-सुधार आंदोलन के पश्चात् शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रसार हुआ। ईसाई मत की दोनों शाखाओं के समर्थकों ने अधिक-से-अधिक लोगों को अपने अनुयायी बनाने के लिए शिक्षा पर अधिक बल दिया। प्रोटेस्टेंटों ने शिक्षा के प्रसार के लिए बहुत प्रयत्न किए ताकि अधिक-से-अधिक लोग शिक्षित हो कर बाईबल को पढ़ें तथा उसके सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाएँ।

5. देशी भाषाओं का विकास (Development of Vernacular Languages):
धर्म-सुधार आंदोलन ने विभिन्न देशी भाषाओं के विकास में भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। क्योंकि सभी सुधारक लोगों को ईसाई धर्म का वास्तविक ज्ञान दिलाना चाहते थे इस लिए उन्होंने अपने प्रचार के लिए देशी भाषाओं को ही माध्यम बनाया। विभिन्न देशी भाषाओं में बाईबल का अनुवाद किया गया।

6. कला तथा साहित्य का विकास (Development of Art and Literature):
मध्यकाल में कला तथा साहित्य पर चर्च का बहुत प्रभाव था। उस समय कलाकृतियाँ तथा चित्र केवल धर्म से संबंधित ही बनाए जाते थे। गिरजाघरों, ईसा मसीह तथा संतों के चित्रों का कार्य केवल पोप की देख-रेख में ही किया जाता था। धर्म-सुधार आंदोलन के पश्चात् इस क्षेत्र में परिवर्तन आ गया।

अब कला का विषय धार्मिक न हो कर धर्म-निरपेक्ष हो गया। अब साधारण मनुष्य के जीवन से संबंधित कलाकृतियाँ बनाई जाने लगीं। इसी प्रकार साहित्य के क्षेत्र में भी परिवर्तन आ गया। अनेक सुधारकों ने प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने तथा देशी भाषाओं में अनुवाद करने की प्रेरणा दी। परिणामस्वरूप अनेक नवीन ग्रंथ रचे गए।

7. व्यापार तथा वाणिज्य का विकास (Development of Trade and Commerce):
पुरातन कैथोलिकों की यह विचारधारा थी कि अधिक धन संचित करना तथा उसे ब्याज के लिए देना धर्म के विरुद्ध कार्य है। परंतु धर्म सुधारक इस विचारधारा को गलत मानते थे। जौं कैल्विन के अनुसार अधिक धन कमाना तथा ब्याज पर उधार देना उचित है।

उसके इस विचार का व्यापारियों, उत्पादकों तथा बैंकरों ने स्वागत किया तथा व्यापार एवं वाणिज्य को विकसित करने के लिए प्रेरित हुए। परिणामस्वरूप विभिन्न यूरोपीय देशों में इसका बहुत विकास हुआ। कई प्रोटेस्टेंट शासकों ने व्यापारियों तथा उद्योगपतियों को संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने कैथोलिकों के विचारों की कोई परवाह न की।

8. धार्मिक युद्ध (Religious wars):
धर्म-सुधार आंदोलन के पश्चात् कई देशों ने प्रोटेस्टेंट धर्म को राजकीय धर्म घोषित कर दिया। परंतु दूसरी ओर कई अन्य देशों में प्राचीन कैथोलिक धर्म ही प्रचलित था। इन दोनों धर्मों के देश आपस में शत्रु बन गए। परिणामस्वरूप 16वीं तथा 17वीं शताब्दी में इनमें कई धर्म-युद्ध हुए। इसके विनाशकारी परिणाम निकले।

9. राष्ट्रीय राज्यों की शक्ति में वृद्धि (Strengthening of the Nation States):
राष्ट्रीय राज्यों का उदय धर्म-सुधार आंदोलन से पूर्व ही हो चुका था। धर्म-सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप उनकी शक्ति में और वृद्धि हो गई। नव स्थापित प्रोटेस्टेंट देशों के शासकों ने पोप तथा चर्च की शक्ति को समाप्त करके राष्ट्रीय चर्च स्थापित किए और उन्हें अपने अधीन कर लिया। उन्होंने पोप को भेजी जाने वाली राशि भी बंद कर दी। अब वे इतने शक्तिशाली हो गए कि उनके राज्यों में पोप का हस्तक्षेप बंद हो गया।

क्रम संख्यावर्षघटना
1.1300 ई०इटली के पादुआ विश्वविद्यालय में मानवतावाद को पढ़ाया जाने लगा।
2.1304 ई०फ्राँसिस्को पेट्रार्क का फ्लोरेंस में जन्म।
3.1341 ई०फ्राँसिस्को पेट्रार्क को रोम में राजकवि की उपाधि से सम्मानित करना।
4.1390 ई०जेफ्री चॉसर द्वारा दि कैंटरबरी टेल्स का प्रकाशन।
5.1436 ई०फिलिप्पो ब्रूनेशेशी द्वारा फ्लोरेंस में डयूमा तैयार करना।
6.1455 ई०जोहानेस गुटेनबर्ग द्वारा बाईबल का प्रकाशन।
7.1486 ई०जोवान्ने पिको देल्ला मिरांदोला द्वारा ‘ऑरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन’ का प्रकाशन।
8.1495 ई०लियोनार्डों द विंसी द्वारा दि लास्ट सपर नामक चित्र तैयार करना।
9.1508 ई०अल्बर्ट ड्यूरर द्वारा प्रार्थना रत हस्त नामक चित्र को तैयार करना।
10.1509 ई०डेसीडेरियस इरस्मस द्वारा दि प्रेज़ ऑफ़ फ़ॉली का प्रकाशन।
11.1513 ई०निकोलो मैक्यिावेली द्वारा दि प्रिंस नामक ग्रंथ का प्रकाशन।
12.1517 ई०जर्मनी के मार्टिन लूथर द्वारा कैथोलिक चर्च के विरुद्ध अभियान छेड़ना।
13.1543 ई०अंड्रीयस वेसेलियस द्वारा ऑन एनॉटमी नामक ग्रंथ की  रचना।
14.1540 ई०इग्नेशियस लोयोला द्वारा स्पेन में सोसाइटी ऑफ़ जीसस नामक संस्था की स्थापना।
15.1628 ई०विलियम हार्वे द्वारा ह्वदय को रुधिर परिसंचरण से जोड़ना।
16.1662 ई०रॉयल सोसाइटी लंदन की स्थापना।
17.1666 ई०पेरिस अकादमी की स्थापना।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पुनर्जागरण के उत्थान के लिए कौन-से प्रमुख कारण उत्तरदायी थे?
उत्तर:
(1) सामंतवाद का पतन-सामंतवाद का पतन पुनर्जागरण के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कारणों में से एक था। मध्यकालीन समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामंती प्रथा थी। परंतु 14वीं शताब्दी के पश्चात् इसका पतन होना आरंभ हो गया था। इसका पतन मध्य वर्ग की शक्ति के कारण हुआ। इसी मध्य वर्ग ने अपने-अपने सम्राटों को सेना के संगठन के लिए आवश्यक धन-राशि प्रदान की थी जिस कारण सम्राट् सामंतों पर निर्भर न रहे।

(2) धर्मयद-धर्मयद्धों ने यरोप को नवीनता प्रदान की। धर्मयद्धों के माध्यम से ही यनान के वैज्ञानिक ग्रंथ. अरबी अंक, बीजगणित, नवीन दिग्दर्शक यंत्र और कागज़ पश्चिमी यूरोप में पहुँचे। अतः स्पष्ट है कि धर्मयुद्धों ने नवीन विचारों तथा धारणाओं का प्रसार किया और पुराने विचारों, विश्वासों तथा संस्थाओं पर प्रहार किया। फलस्वरूप पुनर्जागरण का प्रारंभ हुआ।

(3) व्यापारिक समृद्धि-पुनर्जागरण का एक प्रेरक तत्त्व था-व्यापार का उदय एवं विकास। धर्मयुद्धों के कारण जहाँ नवीन विचारधाराएँ पनपीं, वहाँ यूरोप के पूर्वी देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित हुए। अनेक यूरोपीय व्यापारी जेरुसलम तथा एशिया माइनर के तटों पर बस गये। इनके कारण व्यापार में पर्याप्त वृद्धि हुई। व्यापारिक समृद्धि के कारण यूरोपीय व्यापारी विभिन्न देशों में पहुंचे। उन्हें नये विचारों तथा प्रगतिशील तत्त्वों की जानकारी हुई। स्वदेश वापस लौटने पर ये व्यापारी नये विचारों को अपने साथ लाए।

(4) छापेखाने का आविष्कार-1455 ई० में जर्मनी के जोहानेस गुटेनबर्ग ने एक ऐसी टाइप मशीन का आविष्कार किया जो आधुनिक प्रेस की अग्रदूत कही जा सकती है। मुद्रण यंत्र के इस चमत्कारी आविष्कार ने बौद्धिक विकास का द्वार खोल दिया। कैक्सटन ने 1477 ई० में ब्रिटेन में छापाखाना स्थापित किया। धीरे-धीरे इस यंत्र का प्रयोग इटली, जर्मनी, स्पेन, फ्राँस आदि देशों में आरंभ हो गया। कागज़ और मुद्रण यंत्र के आविष्कार से स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आए।

प्रश्न 2.
पुनर्जागरण का आरंभ इटली में क्यों हुआ?
अथवा
मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ?
उत्तर:
(1) इटली महान् रोमन साम्राज्य का केंद्र रहा था। अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण यह व्यापार एवं ज्ञान का एक प्रसिद्ध केंद्र था। 1453 ई० में कुंस्तुनतुनिया के पतन के पश्चात् वहाँ से अनेक यूनानी विद्वान् पलायन कर इटली आ बसे थे। इससे इटली में पुनर्जागरण आंदोलन का आधार तैया

(2) इटली के पूर्वी देशों से बढ़ रहे व्यापार के कारण यहाँ के व्यापारियों को काफ़ी धनी बना दिया था। इन धनी व्यापारियों ने कलाकारों एवं साहित्यकारों की खुले दिल से सहायता की। निस्संदेह इससे इटली में पुनर्जागरण को प्रोत्साहन मिला।

(3) इटली प्राचीन रोमन सभ्यता का केंद्र था। इटली के लोग अपने प्राचीनकाल के गौरव को पुनः स्थापित करना चाहते थे। इससे इटली में पुनर्जागरण की एक नई प्रेरणा मिली।

(4) इटली में एक लंबे समय तक शांति का वातावरण रहा। इससे कला तथा साहित्य के विकास को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।

(5) रोम के कुछ पोप भी विद्वानों एवं कलाकारों का सम्मान करते थे। उन्होंने कुछ प्रसिद्ध यूनानी पांडुलिपियों का लातीनी भाषा में अनुवाद करवाया। पोप निकोलस पंचम (1447-1455 ई०) ने वैटिकन पुस्तकालय की स्थापना की एवं संत पीटर का गिरजाघर भी बनवाया। निस्संदेह पोप के इन कार्यों ने इटली में पुनर्जागरण आंदोलन के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 3.
मानवतावाद से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर:
मानवतावाद पुनर्जागरण काल की एक प्रमुख विशेषता थी। इसका उदय सर्वप्रथम 14वीं शताब्दी में इटली में हुआ। इसका कारण यह था कि इटली में शिक्षा के प्रसार के कारण लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न हो गई थी। इटली के लोग आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत खुशहाल थे। उनके विदेशों से बढ़ते हुए संपर्क ने मानवतावादी विचारधारा को जन्म दिया।

मानवतावाद का अर्थ है मानव जीवन में रुचि लेना, मानव की समस्याओं का अध्ययन करना, मानव का आदर करना, मानव जीवन के महत्त्व को स्वीकार करना तथा उसके जीवन को सुखी, समृद्ध एवं उन्नत बनाना। मानवतावादी धर्म द्वारा मनुष्य पर लगाए गए अनुचित बँधनों को समाप्त करके उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में थे।

इसलिए मानवतावादी धर्मशास्त्र के अध्ययन के स्थान पर मानवतावादी अध्ययन पर अधिक बल देते थे। 15वीं शताब्दी के आरंभ में मानवतावादी शब्द उन अध्यापकों के लिए प्रयुक्त होता था जो व्याकरण, अलंकारशास्त्र, कविता, इतिहास एवं नीतिदर्शन विषय पढ़ाते थे। फ्रांसिस्को पेट्रार्क को मानवतावाद का पिता कहा जाता है।

प्रश्न 4.
पुनर्जागरण से क्या अभिप्राय है?
अथवा
नवजागरण की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
नवजागरण की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
14वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक के समय के दौरान यूरोप की सांस्कृतिक परंपराओं में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए। इससे पूर्व मध्यकाल में यूरोप के लोगों पर चर्च का प्रभाव था। इस काल में लोग इहलोक की अपेक्षा परलोक की अधिक चिंता करते थे। पुनर्जागरण लोगों के लिए एक नए युग का संदेश लेकर आया।

यह आंदोलन सर्वप्रथम इटली में आरंभ हुआ था। इटली के फ्लोरेंस, वेनिस एवं रोम नामक नगरों ने, जो कला एवं विद्या के विश्वविख्यात केंद्र बने लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न करने में उल्लेखनीय योगदान दिया। वास्तव में इटली ने जो चिंगारी जलायी वह शीघ्र ही संपूर्ण यूरोप में एक मशाल का रूप धारण कर गई।

यूरोप के साहित्यकारों एवं कलाकारों ने यूरोपीय साहित्य एवं कला को एक नई दिशा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनका उद्देश्य मानवतावाद का प्रसार करना था। मानवतावाद में मनुष्य को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया था। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में जो प्रगति हुई उसने मनुष्य के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन कर दिए।

प्रश्न 5.
फ्रांसिस्को पेट्रार्क को पुनर्जागरण का पिता क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
फ्रांसिस्को पेट्रार्क को पुनर्जागरण का पिता कहा जाता है। उसका जन्म 1304 ई० में इटली के नगर फ्लोरेंस में हुआ था। उसने अपनी शिक्षा बोलोनिया विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। उसने कुछ समय वकालत की नौकरी की। किंतु उसकी साहित्य में अधिक दिलचस्पी थी। अतः उसने अपनी नौकरी छोड़ दी तथा अपना अधिकाँश समय प्राचीन लातीनी ग्रंथों के अध्ययन में लगाया।

वह रोमन लेखकों सिसरो एवं वर्जिल से बहुत प्रभावित हुआ था। उसने संपूर्ण यूरोप में मानवतावादी विचारधारा को प्रोत्साहित किया। उसने लौरा नामक एक स्त्री जिसे वह बेहद प्यार करता था पर अनेक कविताएँ लिखीं। साहित्य के क्षेत्र में उसके उल्लेखनीय योगदान के कारण उसे 1341 ई० में रोम में ‘राजकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

प्रश्न 6.
निकोलो मैक्यिावेली कौन था? वह क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर:
निकोलो मैक्यिावेली (1469-1527 ई०) इटली का एक महान् विद्वान् एवं देशभक्त था। उसका जन्म 1469 ई० में फ्लोरेंस में हुआ था। उसने यूनानी एवं लातीनी साहित्य का गहन अध्ययन किया था। उसने चर्च में प्रचलित बुराइयों की कटु आलोचना की। वह इटली की दयनीय राजनीतिक स्थिति को दूर कर उसके प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करना चाहता था।

उसने 1513 ई० में दि प्रिंस नामक एक ग्रंथ की रचना की। यह शीघ्र ही बहुत लोकप्रिय हुआ। इसका यूरोप की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया था। इसमें उसने उस समय इटली में प्रचलित राजनीतिक दशा एवं राजाओं द्वारा प्रशासन में अपनाए जाने वाले नियमों का विस्तृत वर्णन किया है। इस कारण इस ग्रंथ को राजाओं की बाईबल कहा जाता है। यह ग्रंथ आने वाले शासकों के लिए भी एक प्रेरणा स्रोत रहा।

प्रश्न 7.
लियोनार्डो दा विंसी कौन था? वह क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर:
लियोनार्डो दा विंसी बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति था। वह न केवल एक महान् चित्रकार अपितु एक कुशल इंजीनियर, वैज्ञानिक, मूर्तिकार एवं संगीतकार भी था। वह विश्व में एक चित्रकार के रूप में अधिक लोकप्रिय हुआ। उसका जन्म इटली के फ्लोरेंस नगर में 1452 ई० में हुआ था। उसे बचपन से ही चित्रकला में विशेष रुचि थी। उसने अपने जीवनकाल में अनेक चित्र बनाए ।

इन चित्रों को देख कर उसकी प्रतिभा का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उसके चित्रों में प्रकाश एवं छाया, रंगों का चयन एवं मानव शरीर के विभिन्न अंगों का प्रदर्शन बहुत सोच समझ कर किया गया है। उसके बनाए चित्रों मोना लीसा एवं दि लास्ट सपर ने विश्व ख्याति प्राप्त की। ये चित्र देखने में बिल्कुल सजीव लगते हैं। मोना लीसा एक साधारण स्त्री का चित्र है।

इस चित्र को बनाने में लियोनार्डो को चार वर्ष लगे। इस चित्र में मोना लीसा की मुस्कान इतनी मधुर है कि इसे देखने वाला व्यक्ति आज भी चकित रह जाता है। दि लास्ट सपर नामक चित्र मिलान स्थित सेंट मेरिया के गिरजाघर की दीवार पर बनाया गया है।

प्रश्न 8.
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती कौन था? उसने चित्रकला के क्षेत्र क्या योगदान दिया?
उत्तर:
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती इटली का एक अन्य प्रतिभाशाली व्यक्ति था। वह एक श्रेष्ठ चित्रकार, प्रवीण मूर्तिकार, कुशल भवन निर्माता एवं उच्च कोटि का कवि था। वास्तव में वह प्रत्येक क्षेत्र में असाधारण प्रदर्शन करने की योग्यता रखता था। उसका नाम रोम के सिस्टीन चैपल की भीतरी छत पर बनाए 145 चित्रों के कारण सदैव के लिए अमर हो गया है।

इन चित्रों को उसने 1508 ई० से 1512 ई० तक बनाया। इन चित्रों से माईकल ऐंजेलो के कौशल एवं प्रतिभा का प्रमाण मिलता है। इन चित्रों को देखकर आज भी कला प्रेमी चकित रह जाते हैं। इसी चर्च की दीवार पर माईकल ऐंजेलो ने लास्ट जजमेंट नामक चित्र को बनाया। इस चित्र को बनाने में उसे 8 वर्ष लगे। निस्संदेह यह संसार का एक उच्च कोटि का चित्र है।

प्रश्न 9.
पुनर्जागरण के समाज पर पड़े प्रमुख प्रभाव बताएँ।
उत्तर:
(1) जिज्ञासा की भावना-पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह पड़ा कि लोगों में जिज्ञासा की भावना उत्पन्न हुई तथा उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो गया। अब उन्होंने शताब्दियों से प्रचलित अंध-विश्वासों तथा रीति-रिवाजों को त्याग दिया। वे अब प्रत्येक विचार को तर्क की कसौटी पर परखने लगे।

(2) मानवतावाद की भावना-मानवतावाद की भावना का उत्पन्न होना पुनर्जागरण की एक अन्य महत्त्वपूर्ण देन है। इस काल के साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में मनुष्य से संबंधित विषयों को प्रमुख स्थान दिया तथा मनुष्य के कल्याण पर बल दिया। उन्होंने धर्म द्वारा मनुष्य पर लगाए गए अनुचित प्रतिबंधों की घोर आलोचना की। उन्होंने मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन किया।

(3) स्त्रियों की स्थिति में सुधार-पुनर्जागरण से पूर्व स्त्रियों की स्थिति बहुत बदतर थी। उन्हें समाज में कोई सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं था। पुनर्जागरण काल में स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार आया तथा उन्हें पुरुषों के समान स्थान प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप उनमें जागृति आई। अब वे शिक्षा ग्रहण करने लगीं। साहित्य के अध्ययन से उनका दृष्टिकोण विशाल हो गया।

(4) साहित्य का विकास-पुनर्जागरण के कारण साहित्य के क्षेत्र में आश्चर्यजनक विकास हुआ। इस विकास के परिणामस्वरूप अनेक नई पुस्तकों की रचना हुई। इतालवी, फ्रांसीसी, अंग्रेजी, स्पेनी, जर्मन, डच आदि भाषाओं में अनेकों विद्वानों ने अपनी रचनाएँ लिखीं। इस काल के साहित्यकारों में दाँते, पेट्रार्क, बोकासियो, मैक्यिावेली, मिरांदोला, जेफ्री चॉसर, टॉमस मोर तथा इरेस्मस आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में मानवतावादी विचारों का प्रसार किया तथा साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 10.
सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपीयों को विश्व किस प्रकार भिन्न लगा ? उसका एक सुचिंतित विवरण दीजिए।
उत्तर:
सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीयों को विश्व निम्नलिखित भागों में भिन्न लगा

  • इस शताब्दी में यूरोप के अनेक देशों में नगरों की संख्या में तीव्रता से बढ़ौतरी हो रही थी।
  • नगरों के लोग यह सोचने लगे थे कि वे गाँवों के लोगों से अधिक सभ्य हैं।
  • फ्लोरेंस, वेनिस और रोम जैसे नगर कला तथा विद्या के केंद्र बन गए थे।
  • मुद्रण के आविष्कार के कारण लोगों में नव चेतना का संचार हुआ।
  • चर्च के बारे में लोगों के विचारों में परिवर्तन आ गया था।

प्रश्न 11.
धर्म-सुधार आंदोलन से आपका क्या अभिप्राय है? उस आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?
अथवा
प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार का अर्थ बताइए।
उत्तर:
(1) अभिप्राय-धर्म-सुधार आंदोलन से अभिप्राय उस आंदोलन से है जो 16वीं एवं 17वीं शताब्दियों में यूरोप में चर्च में प्रचलित कुरीतियों को दूर करने के लिए चलाया गया था।
(2) उद्देश्य-धर्म-सुधार आंदोलन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित अनुसार थे-

  • पोप तथा अन्य धर्म अधिकारियों के असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाना।
  • उनके नैतिक जीवन में सुधार लाना।
  • चर्चों में फैले भ्रष्टाचार को समाप्त करना तथा धर्म अधिकारियों का ध्यान आध्यात्मिकता की ओर लगाना।
  • राष्ट्रीय चर्च की स्थापना पर बल देना।
  • जनसाधारण को मोक्ष-प्राप्ति के लिए पोप पर आश्रित न रख कर परमात्मा पर आश्रित बनाना।
  • प्रत्येक मानव को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करना।

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प्रश्न 12.
धर्म-सुधार आंदोलन के उदय के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
(1) चर्च में व्याप्त बुराइयाँ-धर्म-सुधार आंदोलन का मुख्य कारण चर्च में व्याप्त बुराइयाँ थीं। चर्च के संगठन में भ्रष्टाचार तथा दुराचार का बोलबाला था। उच्च अधिकारी से लेकर पादरी तक सभी का चरित्र पतित हो चुका था। चर्च के अधिकारी अपने कर्तव्यों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे तथा बड़े लालची हो गए थे। वे विलासी जीवन व्यतीत करने लगे थे तथा हर समय रंगरलियों में डूबे रहते थे। कई पादरियों ने शराब पीना, जुआ खेलना तथा शिकार खेलना आरंभ कर दिया था। पादरियों के इन्हीं अनैतिक कार्यों के कारण जन-साधारण चर्च के विरुद्ध हो गया।

(2) राजनीतिक क्षेत्र में पोप का हस्तक्षेप-चर्च की संपत्ति के कारण भी कई बार पोप तथा सम्राटों में झगड़ा हो जाता था। पोप का यह विश्वास था कि चर्च की संपत्ति पर कर लगाने का अधिकार किसी सम्राट् के पास नहीं है। परंतु कई सम्राटों ने पोप की इस धारणा को चुनौती दी। इन सम्राटों ने पोप के आदेशों की कोई परवाह न की तथा चर्च पर कर लगा दिए। इससे पोप की प्रतिष्ठा तथा शक्ति को गहरा आघात पहुँचा। फलस्वरूप पोप की स्थिति दुर्बल हो गई और लोग धर्म सुधार के लिए प्रेरित हुए।

(3) राष्ट्रीय राज्यों का उदय-पुनर्जागरण से पूर्व यूरोप के कई देशों में सामंतवाद का प्रभुत्व था। सभी प्रशासकीय शक्तियों का प्रयोग अधिकतर सामंत ही करते थे। इस सामंती व्यवस्था में अनेकों दोष व्याप्त थे। इन दोषों को दूर करने के उद्देश्य से कई राज्यों में शासकों ने सामंतों को शक्तिहीन करने के सफल प्रयास किए। परिणामस्वरूप इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, हंगरी, पोलैंड, हालैंड, स्काटलैंड तथा डेनमार्क आदि राष्ट्रीय राज्य उदय हुए। ये राष्ट्रीय राज्य चर्च के प्रभाव से मुक्ति पाना चाहते थे।

(4) तात्कालिक कारण-पोप द्वारा पाप स्वीकारोक्ति पत्रों की बिक्री धर्म-सुधार आंदोलन का तात्कालिक कारण बनी। उन दिनों पोप को रोम में सेंट पीटर गिरजाघर के निर्माण के लिए धन चाहिए था। उसने धन इकटा करने के लिए पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचना आरंभ कर दिया। इन पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को खरीद कर कोई भी व्यक्ति अपने पापों से मुक्त हो सकता था। 1517 ई० में टेट्जेल नामक एक पादरी पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचने के लिए विटेनबर्ग पहुँचा। जब वह वहाँ यह पाप स्वीकारोक्ति पत्र बेच रहा था तो मार्टिन लूथर ने उसका विरोध किया।

प्रश्न 13.
मार्टिन लूथर कौन था? उसने धर्म-सुधार आंदोलन में क्या योगदान दिया?
अथवा
मार्टिन लूथर की मुख्य शिक्षाओं को लिखें।
उत्तर:
मार्टिन लूथर ने जर्मनी में धर्म-सुधार आंदोलन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उसका जन्म 10 नवंबर, 1483 ई० को जर्मनी के एक निर्धन किसान के घर हुआ था। प्रारंभ में लूथर पोप विरोधी नहीं था, परंतु 1517 ई० में एक ऐसी घटना घटी जिससे वह पोप विरोधी हो गया। लूथर ने देखा कि विटेनबर्ग में टेट्ज़ेल नामक एक पादरी लोगों को पाप स्वीकारोक्ति-पत्र बेच रहा था।

टेट्ज़ेल यह प्रचार कर रहा था कि कोई भी व्यक्ति जो इन पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को खरीद लेगा वह अपने पापों से मुक्त हो जाएगा तथा सीधे स्वर्ग को जाएगा। भोली-भाली जनता के साथ इस प्रकार किए जा रहे मजाक तथा शोषण के विरुद्ध मार्टिन लूथर ने आवाज़ उठाई। उसने विटेनबर्ग के चर्च के द्वार पर अपने 95 थिसेज़ लटका दिए। इन थिसेज़ों में उसने चर्च द्वारा भ्रष्ट उपायों द्वारा धन इकट्ठा करने की कड़ी आलोचना की।

उसने धर्म शास्त्रियों को इन थिसेजों के बारे में बहस करने की चुनौती दी। लेकिन पोप ने लूथर के विरोध को कोई महत्त्व नहीं दिया। मार्टिन लूथर ने 1519 ई० में लिपजिग में एक वाद-विवाद में मनुष्य तथा ईश्वर के बीच पोप की मध्यस्थता को निरर्थक बताया। यह मार्टिन लूथर की चर्च की निरंकुशता को खुली चुनौती थी। इसका लोगों के मनों पर गहरा प्रभाव पड़ा तथा वे चर्च के विरोधी हो गए।

प्रश्न 14.
ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
15वीं एवं 16वीं शताब्दियों में अनेक कारणों से ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद आरंभ हो गया था। इस काल में उत्तरी यूरोप के विश्वविद्यालयों के अनेक विद्वान् मानवतावादी विचारों की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने ईसाई धर्म ग्रंथों के अध्ययन पर अधिक ध्यान दिया। ईसाई चर्च के अनेक सदस्य मानवतावादी सिद्धांत की ओर आकर्षित हुए।

उन्होंने ईसाइयों को आवश्यक कर्मकांडों को त्यागने के लिए प्रेरित किया एवं इनकी कड़ी आलोचना की। वे मानव को एक मुक्त विवेकपूर्ण कर्ता समझते थे। उनका कथन था मानव को अपनी खुशी इसी संसार में वर्तमान में मिलेगी। इंग्लैंड के टॉमस मोर एवं हालैंड के इरेस्मस ने चर्च को जन साधारण की लूट-खसूट करने वाली एक संस्था बताया।

पाप स्वीकारोक्ति नामक दस्तावेज़ यात्रियों द्वारा लोगों को ठगने का सबसे सरल तरीका था। किसान चर्च द्वारा लगाए गए अनेक प्रकार के करों से परेशान थे। राजा भी चर्च की दखलअंदाजी को पसंद नहीं करते थे। अत: 1517 ई० में जर्मनी के मार्टिन लूथर ने कैथोलिक चर्च के विरुद्ध एक ज़ोरदार अभियान चलाया।

प्रश्न 15.
विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में अरबियों का क्या योगदान था ?
उत्तर:
विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में अरबियों का उल्लेखनीय योगदान था। 14वीं शताब्दी में अनेक यूरोपीय विद्वानों ने प्लेटो एवं अरस्तु द्वारा लिखे ग्रंथों के अनुवादों को पढ़ना आरंभ किया। इन ग्रंथों का अनुवाद यूरोपीय विद्वानों ने नहीं अपितु अरब विद्वानों ने किया था। अरबी भाषा में प्लेटो को अफलातून एवं एरिसटोटिल को अरस्तु के नामों से जाना जाता था।

यनानी विद्वानों ने अरबियों के प्राकतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, औषधि विज्ञान एवं रसायन विज्ञान से संबंधित ग्रंथों का अनुवाद करके उनके ज्ञान को यूरोपियों तक पहुँचाया। मुस्लिम लेखकों जिनमें अरबी हकीम इब्न सिना तथा आयुविज्ञान विश्वकोष के लेखक अल-राज़ी सम्मिलित थे जो इटली में बहुत प्रसिद्ध थे। स्पेन के अरबी दार्शनिक इब्न रुश्द के दार्शनिक ज्ञान को ईसाई दार्शनिकों ने न केवल अपनाया अपितु इसकी बहुत प्रशंसा की।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
रेनेसाँ से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
रेनेसाँ एक फ्रांसीसी शब्द है जिससे. अभिप्राय है पुनर्जन्म अथवा पुनर्जागरण। यह आंदोलन 14वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य यूरोप के अनेक देशों में चला। इस आंदोलन ने कला तथा साहित्य को एक नया प्रोत्साहन दिया। इसने लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न की।

प्रश्न 2.
जैकब बहार्ट (Jacob Burckhardt) कौन था ?
उत्तर:
जैकब बर्कहार्ट स्विट्जरलैंड के ब्रेसले विश्वविद्यालय का एक प्रसिद्ध इतिहासकार था। उन्होंने 1860 ई० में ‘दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसाँ इन इटली’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की। इसमें उन्होंने इटली में साहित्य, वास्तुकला एवं चित्रकला के क्षेत्रों में हुए विकास पर प्रकाश डाला है।

प्रश्न 3.
कार्डिनल गेसपारो कोंतारिनी कौन था ?
उत्तर:
कार्डिनल गेसपारो कोंतारिनी वेनिस का एक प्रसिद्ध अधिकारी था। उसने 1534 ई० में ‘दि कॉमनवेल्थ एंड गवर्नमेंट ऑफ़ वेनिस’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की। इसमें लेखक ने वेनिस के संयुक्तमंडल (Commonwealth) के संबंध में विस्तृत जानकारी प्रदान की है।

प्रश्न 4.
पुनर्जागरण के उत्थान के लिए उत्तरदायी कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • सामंतवाद का पतन।
  • छापेखाने का आविष्कार।

प्रश्न 5.
धर्मयुद्ध किस प्रकार पुनर्जागरण लाने में सहायक सिद्ध हुए ?
उत्तर:

  • यूरोपवासी पूर्वी देशों के लोगों एवं सभ्यता के संपर्क में आए।
  • इन युद्धों ने भौगोलिक खोजों को प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 6.
जोहानेस गुटेनबर्ग कौन था ?
उत्तर:
जोहानेस गुटेनबर्ग मेन्ज़ (जर्मनी) के निवासी थे। उन्होंने 1455 ई० में छापेखाने का आविष्कार किया। इस छापेखाने में 1455 ई० में बाईबल की 150 प्रतियाँ छपी। बौद्धिक क्रांति लाने में छापेखाने का आविष्कार एक मील पत्थर सिद्ध हुआ।

प्रश्न 7.
छापेखाने के आविष्कार ने किस प्रकार पुनर्जागरण में सहायता दी ? कोई दो बिंदु लिखिए।
उत्तर:

  • इससे साहित्य एवं ज्ञान का प्रसार हुआ।
  • इससे लोगों में एक नई जागृति आई।

प्रश्न 8.
पुनर्जागरण यूरोप के किस देश से आरंभ हुआ था ?
उत्तर:
पुनर्जागरण यूरोप के इटली देश से आरंभ हुआ था।

प्रश्न 9.
इटली में पुनर्जागरण के आरंभ होने के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • इटली के अनेक नगर वाणिज्य एवं व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे।
  • इटली के अनेक विद्वानों ने अंध-विश्वासों का खंडन किया एवं मानवतावाद का प्रचार किया।

प्रश्न 10.
पादुआ और बोलोनिया विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र थे। क्यों ?
उत्तर:
पादआ और बोलोनिया व्यापार एवं वाणिज्य के प्रसिद्ध केंद्र थे। अत: यहाँ वकीलों एवं नोटरी की बहत अधिक आवश्यकता होती थी। वे नियमों को लिखते, उनकी व्याख्या करते एवं समझौते तैयार करते थे। अत: यहाँ के विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र बन गए।

प्रश्न 11.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए।
उत्तर:
वेनिस इटली का एक प्रसिद्ध गणराज्य था। यह चर्च एवं सामंतों के प्रभाव से मुक्त था। नगर के धनी व्यापारी एवं महाजन नगर के प्रशासन में मुख्य भूमिका निभाते थे। दूसरी ओर फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र स्थापित था। यहाँ के आम नागरिक सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित थे।

प्रश्न 12.
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्त्वों को पुनर्जीवित किया गया ?
उत्तर:
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के धार्मिक, साहित्यिक तथा कलात्मक तत्त्वों को पुनर्जीवित किया गया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 13.
मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ ?
उत्तर:

  • इटली में सर्वप्रथम ऐसे विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई जहाँ मानवतावादी विषयों को पढ़ाया जाता था।
  • इटली के विद्वानों ने अनेक मानवतावादी ग्रंथों की रचना की।

प्रश्न 14.
मानवतावाद से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मानवतावाद से अभिप्राय एक ऐसे आंदोलन से है जिसमें परलोक की अपेक्षा मानव के महत्त्व पर अधिक बल दिया जाता है। इसमें मानव जीवन में रुचि, मानव की समस्याओं का अध्ययन, मानव का सम्मान, मानव जीवन को सुखी, समृद्ध एवं उन्नत बनाने पर विशेष बल दिया गया है। 15वीं शताब्दी में मानवतावाद यूरोप में बहुत लोकप्रिय हुआ।

प्रश्न 15.
फ्रांसिस्को पेट्रार्क कौन था?
उत्तर:
फ्रांसिस्को पेट्रार्क फ्लोरेंस का एक प्रसिद्ध लेखक था। उसे पुनर्जागरण का पिता के नाम से जाना जाता है। उसने साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसने मानवतावादी विचारों का प्रसार किया।

प्रश्न 16.
जोटो कौन था?
उत्तर:
जोटो इटली के नगर फ्लोरेंस का एक प्रसिद्ध कलाकार था। उसने ऐसे चित्र बनाए जो देखने में बिल्कुल सजीव लगते थे। उससे पहले कलाकार जिन चित्रों को बनाते थे वे बेजान-से होते थे।

प्रश्न 17.
दाते अलिगहियरी कौन था ? उसकी प्रसिद्ध रचना का नाम लिखें।
उत्तर:

  • दाँते अलिगहियरी फ्लोरेंस का एक प्रसिद्ध कवि था।
  • उसकी प्रसिद्ध रचना का नाम डिवाईन कॉमेडी था।

प्रश्न 18.
‘रेनेसों व्यक्ति’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘रेनेसा व्यक्ति’ का प्रयोग उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हों तथा जो अनेक कलाओं में कुशल हो। पुनर्जागरण काल में ऐसे अनेक महान् लोग हुए जो अनेक रुचियों रखते थे और कई कलाओं में कुशल थे। इनमें लियोनार्डो दा विंसी, फिलिप्पो ब्रूनेलेशी एवं लोरेंजो वल्ला आदि थे।

प्रश्न 19.
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को नए युग का नाम क्यों दिया ?
उत्तर:
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को मध्यकाल से अलग करने के लिए नए युग का नाम दिया। उनका यह तर्क था कि मध्य युग में चर्च ने लोगों की सोच को बुरी तरह जकड़ रखा था इसलिए वे वास्तविक ज्ञान से कोसों दूर थे। 15वीं शताब्दी में लोगों को इस ज्ञान की पुनः जानकारी हुई।

प्रश्न 20.
अल्बर्ट ड्यूरर कौन था ?
उत्तर:
अल्बर्ट ड्यूरर इटली का एक प्रसिद्ध चित्रकार था। उसने 1508 ई० में ‘प्रार्थना रत हस्त’ नामक चित्र बनाया। यह चित्र बहुत लोकप्रिय हुआ। यह चित्र 16वीं शताब्दी की इतालवी संस्कृति का आभास कराता है जब यहाँ के लोग बहुत धार्मिक विचारों के थे।

प्रश्न 21.
दोनातल्लो का नाम क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
दोनातल्लो फ्लोरेंस का एक महान् मूर्तिकार था। उसने 1416 ई० में अनेक भव्य मूर्तियाँ बनाई। इनमें यंग ऐंजलस, सेंट मार्क एवं गाटामेलाटा नामक मूर्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुईं। ये मूर्तियाँ देखने में बिल्कुल सजीव लगती हैं।

प्रश्न 22.
अंडीयस वेसेलियस क्यों प्रसिद्ध थे ?
उत्तर:
अंड्रीयस वेसेलियस पादुआ विश्वविद्यालय में आयुर्विज्ञान के प्राध्यापक थे। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ की। इससे आधुनिक शरीर क्रिया विज्ञान (Physiology) का प्रारंभ हुआ।

प्रश्न 23.
लियोनार्द्ध दा विंसी कौन था ? उसके दो प्रसिद्ध चित्रों के नाम बताएं।
अथवा
लियोनाङ्के दा विंसी कौन था ?
उत्तर:

  • लियोनार्डो दा विंसी फ्लोरेंस का एक महान् चित्रकार एवं मूर्तिकार था।
  • उसके दो प्रसिद्ध चित्रों के नाम मोना लीसा एवं दि लास्ट सपर थे।

प्रश्न 24.
पुनर्जागरण काल में बने चित्रों की कोई दो विशेषताएं लिखिए।
उत्तर:

  • इस काल में बने चित्र अधिक रंगीन एवं चटख थे।
  • इन चित्रों में धर्म-निरपेक्षता की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

प्रश्न 25.
यथार्थवाद से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में शरीर विज्ञान, रेखागणित, भौतिकी एवं सौंदर्य की उत्कृष्ट भावना ने इतालवी कला को एक नया रूप प्रदान किया। इसे यथार्थवाद के नाम से जाना जाने लगा। यथार्थवाद की यह परंपरा 19वीं शताब्दी तक चलती रही।

प्रश्न 26.
पुनर्जागरण काल की वास्तुकला की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • इस काल में शास्त्रीय शैली (classical style) के अनुसार भवनों का निर्माण किया गया।
  • इस काल के चित्रकारों और शिल्पकारों ने भवनों को चित्रों एवं मूर्तियों से सुसज्जित किया।

प्रश्न 27.
माईकल ऐंजेलो बुआनारोती क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर:
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती पुनर्जागरण काल का सर्वाधिक प्रसिद्ध मूर्तिकार, चित्रकार एवं भवन निर्माता था। उसकी प्रतिभा का प्रमाण हमें रोम के सिस्टीन नामक गिरजाघर के भीतर बनाए गए चित्रों, दि पाइटा नामक प्रतिमा, दि लास्ट जजमेंट नामक चित्र एवं सेंट पीटर गिरजे के गुंबद के डिजाइन को देखने से मिलता है।

प्रश्न 28.
फिलिप्पो ब्रूनेलेशी कौन था ?
उत्तर:
फिलिप्पो ब्रूनेलेशी पुनर्जागरण काल का एक प्रसिद्ध मूर्तिकार एवं भवन निर्माता था। उसने फ्लोरेंस के कथीड्रल के गुंबद का डिजाइन बनाया था। इसे ‘दि ड्यूमा’ के नाम से जाना जाता है। यह अपनी उच्च कोटि की कला शैली के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 29.
जेफ्री चॉसर कौन था ?
उत्तर:
जेफ्री चॉसर इंग्लैंड का प्रसिद्ध लेखक था। उसने 1390 ई० में दि कैंटरबरी टेल्स का प्रकाशन किया। यह ग्रंथ अनेक कहानियों का संग्रह है। इससे हमें मध्यकालीन इंग्लैंड के समाज के संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। यह ग्रंथ संपूर्ण विश्व में बहुत लोकप्रिय हुआ।

प्रश्न 30.
निकोलो मैक्यिावेली क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
वह पुनर्जागरण काल का इटली का सबसे प्रसिद्ध विद्वान् था। उसने 1513 ई० में दि प्रिंस नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने उस समय की राजनीतिक समस्याओं का वर्णन किया है एवं शासन संबंधी नियमों पर प्रकाश डाला है।

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प्रश्न 31.
निकोलस कोपरनिकस कौन था ?
अथवा
कोपरनिकस क्रांति पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
निकोलस कोपरनिकस पोलैंड का प्रसिद्ध खगोल विज्ञानी था। उसने इस प्रचलित मत को अपनी पुस्तक ‘दि रिवल्यूशनिबस’ में यह असत्य सिद्ध किया कि पृथ्वी सभी ग्रहों का केंद्र है और अन्य ग्रह इसके इर्द-गिर्द चक्कर काटते हैं। उसने यह प्रमाणित किया कि पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर काटते हैं।

प्रश्न 32.
जोहानेस कैप्लर क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
जोहानेस कैप्लर जर्मनी का एक प्रसिद्ध खगोल विज्ञानी था। उसने ‘कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने सिद्ध किया कि पृथ्वी एवं अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्ताकार रूप से नहीं अपितु अंडाकार गति से घूमते हैं।

प्रश्न 33.
गैलिलियो गैलिली कौन था ?
उत्तर:
गैलिलियो गैलिली इटली का एक महान् वैज्ञानिक एवं गणितकार था। उसने दि मोशन नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने प्रमाणित किया कि सूर्य ही ब्रह्मांड का केंद्र है और पृथ्वी एवं अन्य ग्रह इसके इर्द गिर्द चक्कर काटते हैं।

प्रश्न 34.
आइज़क न्यूटन कौन था ?
उत्तर:
आइज़क न्यूटन 17वीं शताब्दी इंग्लैंड का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने 1687 ई० में ‘प्रिंसिपिया मैथेमेटिका’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ का प्रकाशन किया। इसमें उसने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का वर्णन किया था। इस कारण उसकी विश्व में ख्याति बहुत बढ़ गई।

प्रश्न 35.
अंड्रीयस वेसेलियस कौन था ?
उत्तर:
अंड्रीयस वेसेलियस 16वीं शताब्दी इटली का एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने 1543 ई० में ऑन एनॉटमी नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने शरीर रचना विज्ञान पर विस्तृत प्रकाश डाला है।

प्रश्न 36.
विलियम हार्वे क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
विलियम हार्वे (1578-1657 ई०) इंग्लैंड का एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने 1628 ई० में यह सिद्ध किया कि रक्त हृदय से चलकर धमनियों तथा नाड़ियों से होता हुआ पुनः हृदय में पहुँच जाता है। इसे रुधिर परिसंचरण (blood circulation) का नाम दिया गया।

प्रश्न 37.
मानवतावादी युग में व्यापारी परिवारों में स्त्रियों की स्थिति के कोई दो बिंदु बताएँ।
उत्तर:

  • दुकानदारों की स्त्रियाँ दुकानों को चलाने में उनकी सहायता करती थीं।
  • व्यापारी परिवार की स्त्रियाँ परिवार के कारोबार को संभालती थीं।

प्रश्न 38.
कसांद्रा फेदले कौन थी ?
उत्तर:
वह वेनिस की एक प्रसिद्ध महिला थी। वह मानवतावादी विचारों की पक्षधर थी। उसने सभी महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। उसने पादुआ विश्वविद्यालय में भाषण दिया था।

प्रश्न 39.
ईसाबेला दि इस्ते कौन थी ?
उत्तर:
वह मंटुआ की एक प्रतिभाशाली महिला थी। उसने अपने पति की अनुपस्थिति में अपने राज्य पर शासन किया था। उसका दरबार बौद्धिक प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध था। उसने पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं को अपनी पहचान बनाए रखने पर बल दिया।

प्रश्न 40.
पुनर्जागरण के कोई दो प्रमुख प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इस कारण सामंतवाद को गहरा आघात लगा।
  • इस कारण कला एवं साहित्य को एक नया प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 41.
धर्म-सुधार आंदोलन क्या था ? इस आंदोलन के दो कारण लिखो।
उत्तर:

  • धर्म-सुधार आंदोलन से अभिप्राय मध्यकालीन समाज में आई धार्मिक कुरीतियों को दूर करने के लिए चलाए गए आंदोलन से है।
  • चर्च में भ्रष्टाचार बहत फैल गया था।
  • पोप द्वारा पाप स्वीकारोक्ति पत्र की बिक्री।

प्रश्न 42.
धर्म-सुधार आंदोलन के कोई दो उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:

  • चर्च में फैले भ्रष्टाचार को समाप्त करना।
  • लोगों के जीवन में नैतिक सुधार करना।

प्रश्न 43.
पाप स्वीकारोक्ति (Indulgences) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
पाप स्वीकारोक्ति एक ऐसा दस्तावेज़ था जो किसी व्यक्ति द्वारा किए गए उसके सभी पापों से मुक्ति दिलवा सकता था। यह वास्तव में पादरियों द्वारा जन-साधारण से धन ऐंठने का एक नया ढंग निकाला गया था। इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति पादरी को धन देकर इसे प्राप्त कर सकता था एवं पापों से छुटकारा पा सकता था।

प्रश्न 44.
मार्टिन लूथर क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर:
मार्टिन लूथर ने जर्मनी में धर्म-सुधार आंदोलन का सफल नेतृत्व किया था। उसने 1517 ई० में कैथोलिक चर्च में फैले भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए एक जोरदार आंदोलन का आरंभ किया था। उसका यह आंदोलन काफी सीमा तक सफल रहा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
14वीं शताब्दी में यूरोपीय इतिहास की जानकारी देने वाले किसी एक प्रमुख स्त्रोत का नाम लिखें।
उत्तर:
मुद्रित पुस्तकें।

प्रश्न 2.
रेनेसाँ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
पुनर्जन्म।

प्रश्न 3.
‘दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसाँ इन इटली’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
जैकब बर्कहार्ट।

प्रश्न 4.
जैकब बर्कहार्ट किस जर्मन इतिहासकार का शिष्य था ?
उत्तर:
लियोपोल्ड वॉन रांके।

प्रश्न 5.
पुनर्जागरण का उत्थान किस शताब्दी में हुआ ?
उत्तर:
14वीं शताब्दी में।

प्रश्न 6.
पुनर्जागरण सर्वप्रथम किस देश में आरंभ हुआ ?
उत्तर:
इटली में।

प्रश्न 7.
छापेखाने का आविष्कार किसने किया ?
उत्तर:
जोहानेस गुटेनबर्ग ने।

प्रश्न 8.
छापेखाने का आविष्कार कब हुआ था ?
उत्तर:
1455 ई० में।

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प्रश्न 9.
‘दि कॉमनवेल्थ एंड गवर्नमेंट ऑफ़ वेनिस’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
कार्डिनल गेसपारो कोंतारिनी।

प्रश्न 10.
11वीं शताब्दी में इटली के दो प्रसिद्ध विश्वविद्यालय कौन-से थे ?
उत्तर:
बोलोनिया एवं पादुआ।

प्रश्न 11.
पुनर्जागरण का पिता किसे माना जाता है ?
उत्तर:
फ्रांसिस्को पेट्रार्क को।

प्रश्न 12.
फ्राँसिस्को पेट्रार्क इटली में किस नगर का निवासी था ?
उत्तर:
फ्लोरेंस।

प्रश्न 13.
डिवाईन कॉमेडी का लेखक कौन था ?
उत्तर:
दाँते अलिगहियरी।

प्रश्न 14.
किसी एक प्रसिद्ध मानवतावादी का नाम लिखें।
उत्तर:
फ्रांसिस्को पेट्रार्क।

प्रश्न 15.
जोवान्ने बोकासियो की महान् रचना का नाम क्या था ?
उत्तर:
डेकामेरोन।

प्रश्न 16.
किस वर्ष जोवान्ने पिको देल्ला मिरांदोला की रचना औरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन प्रकाशित हुई ?
उत्तर:
1486 ई०।

प्रश्न 17.
निकोलो मैक्यिावेली की प्रसिद्ध रचना का नाम क्या था ?
उत्तर:
दि प्रिंस।

प्रश्न 18.
दि कैंटरबरी टेल्स का लेखक कौन था ?
उत्तर:
जेफ्री चॉसर।

प्रश्न 19.
सर टॉमस मोर की रचना यूटोपिया का प्रकाशन कब हुआ था ?
उत्तर:
1516 ई०।

प्रश्न 20.
दि प्रेज़ ऑफ फॉली का लेखक कौन था ?
उत्तर:
डेसीडेरियस इरेस्मस।

प्रश्न 21.
जोटो किस देश का प्रसिद्ध चित्रकार था ?
उत्तर:
इटली।

प्रश्न 22.
किस प्रसिद्ध चित्रकार ने ‘मोना लीसा’ एवं ‘दि लास्ट सपर’ नामक प्रसिद्ध चित्र बनाए ?
उत्तर:
लियोनार्डो दा विंसी।

प्रश्न 23.
मोना लीसा कौन थी ?
उत्तर:
एक साधारण स्त्री।

प्रश्न 24.
अल्बर्ट ड्यूरर के प्रसिद्ध चित्र का नाम क्या था ?
उत्तर:
प्रार्थना रत हस्त।

प्रश्न 25.
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती किस देश का निवासी था ?
उत्तर:
इटली।

प्रश्न 26.
फिलिप्पो ब्रूनेलेशी ने भवनों के निर्माण के लिए किस शैली को अपनाया ?
उत्तर:
शास्त्रीय शैली।

प्रश्न 27.
‘दि पाइटा’ एवं ‘डेविड’ नामक प्रसिद्ध चित्रों का निर्माण किसने किया ?
उत्तर:
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती।

प्रश्न 28.
लंदन में रॉयल सोसाइटी की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
1662 ई० में।

प्रश्न 29.
फ्रांस में पेरिस अकादमी की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
1666 ई० में।

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प्रश्न 30.
पुनर्जागरण काल के किसी एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक का नाम लिखें।
उत्तर:
आइज़क न्यूटन।

प्रश्न 31.
निकोलस कोपरनिकस किस देश का प्रसिद्ध विज्ञानी था ?
उत्तर:
पोलैंड का।

प्रश्न 32.
‘ऑन एनॉटमी’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
अंड्रीयस वेसेलियस।।

प्रश्न 33.
जोहानेस कैप्लर ने किस प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी ?
उत्तर:
कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री।

प्रश्न 34.
विलियम हार्वे ने ‘रुधिर परिसंचरण’ का आविष्कार कब किया ?
उत्तर:
1628 ई० में।

प्रश्न 35.
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत किस विज्ञानी से जुड़ा है ?
उत्तर:
आइज़क न्यूटन।

प्रश्न 36.
पुनर्जागरण काल की किसी एक प्रसिद्ध स्त्री का नाम लिखें।
उत्तर:
कसांद्रा फेदेले।

प्रश्न 37.
ईसाबेला दि इस्ते कहाँ की निवासी थी ?
उत्तर:
मंटुआ की।

प्रश्न 38.
यूरोप में धर्म सुधार आंदोलन कब आरंभ हुआ ?
उत्तर:
16वीं शताब्दी में।

प्रश्न 39.
यूरोप में धर्म सुधार आंदोलन को आरंभ करने का प्रमुख कारण क्या था ?
उत्तर:
चर्च में व्याप्त बुराइयाँ।

प्रश्न 40.
‘इन प्रेज़ ऑफ़ फॉली’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
डेसीडेरियस इरेस्मस।

प्रश्न 41.
जर्मनी में धर्म सुधार आंदोलन का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
मार्टिन लूथर।

प्रश्न 42.
वर्मज की सभा कब हुई ?
उत्तर:
18 अप्रैल, 1521 ई०।

प्रश्न 43.
मार्टिन लूथर की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर:
1546 ई० में।

प्रश्न 44.
उलरिक ग्विंगली किस देश से संबंधित था ?
उत्तर:
स्विट्जरलैंड।

प्रश्न 45.
इंस्टीच्यूट ऑफ क्रिश्चियन रिलिजन का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
जाँ कैल्विन।

प्रश्न 46.
जॉन वाइक्लिफ के शिष्य क्या कहलाए ?
उत्तर:
लोलार्ड।

प्रश्न 47.
सोसाइटी ऑफ़ जीसस की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
1540 ई० में।

बह-विकल्पीय प्रश्न

1. 14वीं शताब्दी में फ्लोरेंस, वेनिस तथा रोम …………….. तथा …………… के मुख्य केंद्र बन गए थे।
उत्तर:
कला, विद्या

2. 19वीं शताब्दी में स्विट्जरलैंड के प्रसिद्ध इतिहासकार …………. ने पुनर्जागरण शब्द पर अत्यधिक बल दिया।
उत्तर:
जैकब बर्कहार्ट

3. ‘दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसाँ इन इटली’ नामक पुस्तक की रचना …………….. ने की थी।
उत्तर:
जैकब बहार्ट

4. बहार्ट द्वारा ‘दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसौं इन इटली’ नामक पुस्तक की रचना ……………….. ई० ___ में की गई।
उत्तर:
1860

5. “दि कॉमनवेल्थ एंड गवर्नमेंट ऑफ़ वेनिस’ नामक ग्रंथ की रचना …………….. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
कार्डिनल गेसपारो

6. पेट्रार्क को रोम में ……………….. ई० में राजकवि की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
उत्तर:
1341

7. दि कैंटरबरी टेल्स का प्रकाशन ……………….. द्वारा किया गया।
उत्तर:
जेफ्री चॉसर

8. कोलंबस ……………… ई० में अमेरिका पहुँचे।
उत्तर:
1492

9. लियोनार्डो दा विंसी की प्रसिद्ध रचना ……………….. है।
उत्तर:
मोना लीसा

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10. 11वीं शताब्दी में ‘पादुआ’ तथा ……………… विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र रहे।
उत्तर:
बोलोनिया

11. फ्लोरेंस ……………….. के सबसे जीवंत बौद्धिक नगर के रूप में जाना जाता था।
उत्तर:
इटली

12. फलोरेंस के मानवतावादी जोवान्ने पिको देल्ला मिरांढोला ने …………….. पुस्तक की रचना की।
उत्तर:
औरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन

13. बेल्जियम मूल के ………………. ने सूक्ष्म-परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ की।
उत्तर:
अंड्रीयस वेसेलियस

14. जोहानेस गुटेनबर्ग ………………. के रहने वाले थे।
उत्तर:
जर्मनी

15. निकोलो मैक्यावेली ने ……………… ग्रंथ की रचना की।
उत्तर:
दि प्रिंस

16. मटुंआ राज्य की सर्वाधिक प्रतिभाशाली स्त्री का नाम …………… था।
उत्तर:
ईसाबेला दि इस्ते

17. मार्टिन लूथर द्वारा ……………….. ई० में कैथोलिक चर्च के विरुद्ध अभियान आरंभ किया गया।
उत्तर:
1517

18. इग्नेशियस लोयोला ने 1540 ई० में …………….. नामक संस्था की स्थापना की।
उत्तर:
सोसायटी ऑफ़ जीसस

19. ………….. ने यह घोषणा की कि पृथ्वी समेत सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।
उत्तर:
निकोलस कोपरनिकस

20. फ्रांस में पेरिस अकादमी की स्थापना ………….. में की गई थी।
उत्तर:
1666 ई०

रिका स्थान भरिए

1. छापेखाने का आविष्कारक किसे माना जाता है ?
(क) फाँसिस्को पेट्रार्क को
(ख) सर टामस मोर को
(ग) फिलिप्पो ब्रूनेलेशी को
(घ) जोहानेस गुटेनबर्ग को।
उत्तर:
(घ) जोहानेस गुटेनबर्ग को।

2. गुटेनबर्ग किस देश का रहने वाला था?
(क) फ्रॉस
(ख) इंग्लैंड
(ग) चीन
(घ) जर्मनी।
उत्तर:
(घ) जर्मनी।

3. तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया पर कब अधिकार किया था ?
(क) 1433 ई० में
(ख) 1453 ई० में
(ग) 1463 ई० में
(घ) 1473 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1453 ई० में

4. पुनर्जागरण का आरंभ किस देश से हुआ था ?
(क) इंग्लैंड
(ख) फ्राँस
(ग) इटली
(घ) जर्मनी।
उत्तर:
(ग) इटली

5. मानवतावाद का पिता किसे कहा जाता है ?
(क) फ्राँसिस्को पेट्रार्क
(ख) जोवान्ने बोकासियो
(ग) दाँते अलिगहियरी
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) फ्राँसिस्को पेट्रार्क

6. डिवाईन कॉमेडी की रचना किसने की है ?
(क) गुटेनबर्ग ने
(ख) दाँते ने
(ग) कोपरनिकस ने
(घ) लूथर ने।
उत्तर:
(ख) दाँते ने

7. औरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन का प्रकाशन किस वर्ष हुआ था ?
(क) 1476 ई० में
(ख) 1480 ई० में
(ग) 1485 ई० में
(घ) 1486 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1486 ई० में।

8. दि प्रिंस का लेखक कौन था ?
(क) निकोलो मैक्यिावेली
(ख) सर टॉमस मोर
(ग) दोनातल्लो
(घ) मार्टिन लूथर।
उत्तर:
(क) निकोलो मैक्यिावेली

9. जेफ्री चॉसर ने किस प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की ?
(क) यूटोपिया
(ख) दि प्रिंस
(ग) दि कैंटरबरी टेल्स
(घ) दि प्रेज ऑफ़ फॉली।
उत्तर:
(ग) दि कैंटरबरी टेल्स

10. यूटोपिया का लेखक कौन था ?
(क) डेसीडेरियस इरेस्मस
(ख) सर टॉमस मोर
(ग) फिलिप्पो ब्रूनेलेशी
(घ) अल्बर्ट ड्यूरर।
उत्तर:
(ख) सर टॉमस मोर

11. दि प्रेज़ ऑफ़ फॉली का प्रकाशन किस वर्ष हुआ था ?
(क) 1309 ई० में
(ख) 1409 ई० में
(ग) 1509 ई० में
(घ) 1609 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1509 ई० में

12. जोटो किस देश का महान् चित्रकार था ?
(क) जर्मनी
(ख) फ्राँस
(ग) ऑस्ट्रेलिया
(घ) इटली।
उत्तर:
(घ) इटली।

13. ‘मोना लीसा’ नामक चित्र किसने बनाया था ?
(क) लियोनार्डो दा विंसी
(ख) माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती
(ग) फिलिप्पो ब्रूनेलेशी
(घ) दोनातल्लो ।
उत्तर:
(क) लियोनार्डो दा विंसी

14. अल्बर्ट ड्यूरर ने प्रार्थना रत हस्त चित्र को कब बनाया था ?
(क) 1507 ई० में
(ख) 1508 ई० में
(ग) 1509 ई० में
(घ) 1512 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1508 ई० में

15. निम्नलिखित में से किस कलाकार ने दि पाइटा नामक मूर्ति का निर्माण किया ?
(क) माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती
(ख) दोनातल्लो
(ग) लियोनार्डो दा विंसी
(घ) जोटो।
उत्तर:
(क) माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

16. रॉयल सोसाइटी की स्थापना कहाँ की गई थी ?
(क) लंदन
(ख) पेरिस
(ग) रोम
(घ) नेपल्स।
उत्तर:
(क) लंदन

17. ‘स्फटिक प्रासाद’ कहाँ स्थित है ?
(क) लंदन में
(ख) पेरिस में
(ग) मास्को में
(घ) सिडनी में।
उत्तर:
(क) लंदन में

18. पेरिस अकादमी की स्थापना कब की गई थी ?
(क) 1662 ई० में
(ख) 1666 ई० में
(ग) 1675 ई० में
(घ) 1680 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1666 ई० में

19. निकोलस कोपरनिकस किस देश का महान् विज्ञानी था ?
(क) इंग्लैंड
(ख) चीन
(ग) पोलैंड
(घ) भारत।
उत्तर:
(ग) पोलैंड

20. ऑन एनॉटमी का लेखक कौन था ?
(क) निकोलस कोपरनिकस
(ख) जोहानेस कैप्लर
(ग) आइज़क न्यूटन
(घ) अंड्रीयस वेसेलियस।
उत्तर:
(घ) अंड्रीयस वेसेलियस।

21. निम्नलिखित में से किसने दूरबीन का आविष्कार किया ?
(क) विलियम हार्वे
(ख) जोहानेस कैप्लर
(ग) गैलिलियो गैलिली
(घ) अंड्रीयस वेसेलियस।
उत्तर:
(ग) गैलिलियो गैलिली

22. जोहानेस कैप्लर द्वारा लिखित पुस्तक का नाम लिखें।
(क) दि रिवल्यूशनिबास
(ख) ऑन एनॉटमी
(ग) दि मोशन
(घ) कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री।
उत्तर:
(घ) कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री।

23. विलियम हार्वे ने रुधिर परिसंचरण को कब सिद्ध किया ?
(क) 1618 ई० में
(ख) 1628 ई० में
(ग) 1638 ई० में
(घ) 1648 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1628 ई० में

24. किस विज्ञानी ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया ?
(क) आइज़क न्यूटन
(ख) विलियम हार्वे
(ग) निकोलस कोपरनिकस
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) आइज़क न्यूटन

25. कसांद्रा फेदेले कहाँ की निवासी थी ?
(क) पादुआ
(ख) वेनिस
(ग) मंटुआ
(घ) रोम।
उत्तर:
(ख) वेनिस

26. मार्टिन लूथर किस देश का निवासी था ?
(क) जर्मनी
(ख) फ्राँस
(ग) अमरीका
(घ) इटली।
उत्तर:
(क) जर्मनी

27. मार्टिन लूथर ने कैथोलिक चर्च के विरुद्ध अभियान कब छेड़ा ?
(क) 1507 ई० में
(ख) 1517 ई० में
(ग) 1527 ई० में
(घ) 1537 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1517 ई० में

28. उलरिक धिंगली किस देश से संबंधित था ?
(क) जर्मनी
(ख) इटली
(ग) फ्राँस
(घ) स्विट्जरलैंड।
उत्तर:
(घ) स्विट्जरलैंड।

29. लोलार्ड किसके शिष्य थे ?
(क) जॉन वाईक्लिफ
(ख) जौं कैल्विन
(ग) इग्नेशियस लोयोला
(घ) मार्टिन लूथर।
उत्तर:
(क) जॉन वाईक्लिफ

30. सोसाइटी ऑफ़ जीसस का संस्थापक कौन था ?
(क) जौं कैल्विन
(ख) उलरिक ज्विंगली
(ग) इग्नेशियस लोयोला
(घ) जॉन वाईक्लिफ।
उत्तर:
(ग) इग्नेशियस लोयोला

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ HBSE 11th Class History Notes

→ 14वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक के समय के दौरान यूरोप की सांस्कृतिक परंपराओं में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए। इससे पूर्व मध्यकाल में यूरोप के लोगों पर चर्च का प्रभाव था। इस काल में लोग इहलोक की अपेक्षा परलोक की अधिक चिंता करते थे।

→ पुनर्जागरण लोगों के लिए एक नए युग का संदेश लेकर आया। यह आंदोलन सर्वप्रथम इटली में आरंभ हुआ था। इटली के फ्लोरेंस, वेनिस एवं रोम नामक नगरों ने, जो कला एवं विद्या के विश्वविख्यात केंद्र बने लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न करने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ वास्तव में इटली ने जो चिंगारी जलायी वह शीघ्र ही संपूर्ण यूरोप में एक मशाल का रूप धारण कर गई। यूरोप के साहित्यकारों एवं कलाकारों ने यूरोपीय साहित्य एवं कला को एक नई दिशा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनका उद्देश्य मानवतावाद का प्रसार करना था।

→ मानवतावाद में मनुष्य को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया था। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में जो प्रगति हुई उसने मनुष्य के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन कर दिए।

→ इसी काल में यूरोप में धर्म-सुधार आंद का उदय हुआ। इसका उद्देश्य चर्च में फैली बुराइयों को दूर करना था। इस आंदोलन को सफल बनाने में जर्मनी के मार्टिन लूथर, स्विटज़रलैंड के उलरिक ज्विंगली एवं फ्रांस के जौं कैल्विन का उल्लेखनीय योगदान था।

→ वास्तव में पुनर्जागरण एवं धर्म-सुधार आंदोलन ने यूरोपीय समाज की सांस्कृतिक परंपराओं को बदलने में प्रमुख भूमिका निभाई। इस काल के यूरोपीय इतिहास की जानकारी के लिए बहुत अधिक सामग्री दस्तावेजों, पुस्तकों, चित्रों, मूर्तियों, भवनों एवं वस्त्रों से प्राप्त होती है।

→ इन्हें यूरोप तथा अमरीका के अभिलेखागारों, कला चित्रशालाओं एवं संग्रहालयों में सुरक्षित रखा हुआ है। स्विट्जरलैंड के ब्रेसले विश्वविद्यालय के इतिहासकार जैकब बर्कहार्ट (Jacob Burckhardt) ने रेनेसाँ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1860 ई० में प्रकाशित अपनी पुस्तक दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसाँ इन इटली (The Civilisation of the Renaissance in Italy) में किया है। वह जर्मन इतिहासकार लियोपोल्ड वॉन रांके (Leopold Von Ranke) का विद्यार्थी था।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक क्राँति से आपका क्या अभिप्राय है? यह क्राँति सर्वप्रथम इग्लैंड में क्यों आई?
अथवा
औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम ब्रिटेन में ही क्यों आई ? कारण बताइए।
उत्तर:
इंग्लैंड विश्व का प्रथम ऐसा देश था जहाँ 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ। इस क्राँति के कारणों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

I. औद्योगिक क्रांति से अभिप्राय

औद्योगिक क्राँति वह क्राँति थी जिसका आरंभ 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड से हुआ। इस क्राँति से अभिप्राय उस क्राँति से था जिसमें वस्तुओं का उत्पादन हाथों की अपेक्षा बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा किया जाता था।

II. औद्योगिक क्रांति के कारण

इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. राजनीतिक स्थिरता एवं शाँति (Political Stability and Peace):
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में राजनीतिक स्थिरता एवं शाँति थी। इससे इंग्लैंड में उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ। इंग्लैंड के शासक जॉर्ज तृतीय (George III) ने अपने शासनकाल (1760 ई०-1820 ई०) के दौरान इंग्लैंड को एक औद्योगिक देश बनाने के अनेक प्रयास किए। उसके ये प्रयास काफी सीमा तक सफल सिद्ध हए।

2. शक्तिशाली नौसेना (Powerful Navy):
उस समय इंग्लैंड के पास अन्य यूरोपीय देशों के मुकाबले सबसे अधिक शक्तिशाली नौसेना थी। इसलिए उसे ‘समुद्रों की रानी’ (Mistress of the Seas) कहा जाता था। इस नौसेना के कारण वह एक ओर अपनी विदेशी आक्रमणों से सुरक्षा कर सका वहीं दूसरी ओर वह सुगमता से अपने निर्मित माल का विदेशों को निर्यात कर सका। इससे औद्योगिकीकरण को एक नया प्रोत्साहन मिला।

3. इंग्लैंड के उपनिवेश (England’s Colonies):
इंग्लैंड विश्व की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति था। अतः उसके यूरोप, एशिया एवं अफ्रीका में अनेक उपनिवेश थे। इन उपनिवेशों से उसे इंग्लैंड के उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल सस्ती दरों पर सुगमता से प्राप्त हो जाता था। दूसरी ओर इंग्लैंड के उद्योगों द्वारा निर्मित माल को यहाँ ऊँची दरों पर बलपूर्वक बेचा जाता था। इस कारण इंग्लैंड के उद्योगों ने अभूतपूर्व उन्नति की।

4. पूँजी (Capital):
किसी भी देश में उद्योगों के विकास में पूँजी की प्रमुख भूमिका होती है। उस समय इंग्लैंड में पूंजी की कोई कमी नहीं थी। इसके तीन कारण थे। प्रथम, उस समय इंग्लैंड की कृषि ने उल्लेखनीय विकास किया था। दसरा, इंग्लैंड का विश्व व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित था। तीसरा, ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से व्यापक पैमाने पर धन का दोहन किया।

अतः पूँजी की प्रचुरता ने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर एस० एन० सेन के शब्दों में, “ब्रिटेन में उद्योगों के विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण कारक 18वीं शताब्दी के दूसरे मध्य में पूँजी का एकत्र होना था। आर्थिक विकास की गति में तीव्रता तब आई जब पूँजी को कम ब्याज पर उपलब्ध कराया गया।

5. कषि क्राँति (Agricultural Revolution):
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति से पर्व कषि क्रांति आई। इसके दो महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े। प्रथम, इस क्राँति के कारण फ़सलों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई। इस कारण उद्योगों की स्थापना के लिए आवश्यक धन प्राप्त हुआ। दूसरा, कृषि क्राँति की सफलता के लिए खेतों की बाढ़बंदी (enclosure of fields) की गई।

इस कारण बडे ज़मींदारों ने अपने खेतों के आस-पास स्थित छोटे किसानों की जमीनें खरीद लीं। इस कारण ज़मींदारों के अधीन खेतों के क्षेत्र में वृद्धि हो गई। इन खेतों में कृषि के आधुनिक ढंगों को अपनाना सुगम हो गया। किंतु दूसरी ओर इससे भूमिहीन किसानों की संख्या में तीव्रता से वृद्धि होने लगी। बेकार हो जाने के कारण वे काम की तलाश में शहरों की ओर गये। यहाँ वे कारखानों में कम मज़दूरी पर काम करने के लिए बाध्य हुए। कम वेतन पर मजदूरों की उपलब्धता ने औद्योगिक क्रांति को प्रोत्साहित किया।

6. कुशल बैंक व्यवस्था (Efficient Banking System):
इंग्लैंड की कुशल बैंक व्यवस्था ने औद्योगिक क्रांति लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहाँ बैंक ऑफ़ इंग्लैंड (Bank of England) की स्थापना 1694 ई० में हुई थी। यह इंग्लैंड का केंद्रीय बैंक था। 1820 ई० तक इंग्लैंड में 600 से अधिक प्राँतीय बैंकों की स्थापना हुई। केवल लंदन में ही 100 से अधिक बैंक थे। इन बैंकों द्वारा बड़े-बड़े उद्योगों को स्थापित करने एवं उन्हें चलाने के लिए कम दरों पर धन उपलब्ध करवाया जाता था। इससे इंग्लैंड में औद्योगीकरण को बहुत प्रोत्साहन मिला।

7. विशाल बाज़ार (Vast Market):
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड आर्थिक रूप से बहुत खुशहाल था। इसका कारण यह था कि इंग्लैंड के पास घरेलू एवं विदेशों में बहुत बड़ा बाज़ार उपलब्ध था। अतः इंग्लैंड के उद्योगों द्वारा तैयार माल की सुगमता से खपत हो जाती थी। कीमतों के कम होने के कारण उनके माल की बहुत माँग थी।

8. खनिज पदार्थ (Minerals):
इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति में वहाँ उपलब्ध खनिज पदार्थों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहाँ कोयला एवं लोहा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। सौभाग्यवश ये दोनों खनिज एक-दूसरे के निकट ही मिल जाते थे। इन्होंने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति का आधार तैयार किया। इनके अतिरिक्त यहाँ सीसा, ताँबा एवं टिन भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था।

9. जनसंख्या में वृद्धि (Increase in Population):
इंग्लैंड में जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हो रही थी। यूरोप के जिन 19 शहरों की जनसंख्या 1750 ई० से 1800 ई० के मध्य दोगुनी हुई उनमें से 11 ब्रिटेन में थे। इनमें लंदन सबसे बड़ा शहर था। जनसंख्या में वृद्धि से वस्तुओं की माँग बहुत बढ़ गई। इससे उत्पादन में वृद्धि करना आवश्यक हो गया। इससे औद्योगीकरण को बहुत प्रोत्साहन मिला।

10. वैज्ञानिक उन्नति (Scientific Progress):
इंग्लैंड यूरोप का प्रथम ऐसा देश था जहाँ अनेक नवीन आविष्कार हुए। परिणामस्वरूप अनेक नए यंत्रों एवं मशीनों का आविष्कार हुआ। ये आविष्कार औद्योगिक क्रांति के लिए एक रीढ़ की हड्डी सिद्ध हुए। यातायात एवं संचार के साधनों में हुई क्राँति ने औद्योगिक क्राँति को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रांति के दौरान होने वाले आविष्कार एवं तकनीकी परिवर्तनों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
18वीं शताब्दी को आविष्कारों का काल कहा जाता है। इस शताब्दी में कुल मिलाकर 26,000 आविष्कार हुए। इनमें से आधे से अधिक आविष्कार 1782 ई० से 1800 ई० के मध्य हुए थे। इन आविष्कारों ने कोयला एवं लोहा, कपास की कताई एवं बुनाई, भाप की शक्ति तथा नहरों और रेलों के विकास में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। अत: इस अध्याय में केवल इनसे संबंधित विषयों पर ही चर्चा की जाएगी।

1. कोयला एवं लोहा (Coal and Iron):
किसी भी देश में औद्योगिक क्रांति संभव नहीं है जब तक वहाँ पर्याप्त मात्रा में कोयला एवं लोहा उपलब्ध न हो। कोयले से शक्ति उत्पन्न की जाती है। इसके महत्त्व को देखते हुए इसे काला सोना (Black Gold) एवं उद्योगों की जननी (Mother of Industries) कहा जाता है। लोहे से उद्योगों में प्रयोग की जाने वाली सभी मशीनों का निर्माण किया जाता है।

इंग्लैंड इस मामले में सौभाग्यशाली था कि वहाँ कोयला एवं लौह अयस्क (iron ore) पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था। इसके बावजूद 18वीं शताब्दी तक वहाँ इस्तेमाल योग्य लोहे की कमी थी। लोहा प्रगलन (smelting) की प्रक्रिया द्वारा लौह खनिज में से शुद्ध तरल धातु (pure liquid metal) के रूप में निकाला जाता है। अनेक शताब्दियों तक प्रगलन प्रक्रिया के लिए काठ कोयले (charcoal) का प्रयोग किया जाता था। किंतु इससे अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता था। प्रथम, काठ कोयला लंबी दूरी तक ले जाते समय टूट जाया करता था।

दूसरा, काठ कोयले की अशुद्धता के कारण घटिया किस्म के लोहे का उत्पादन होता था। तीसरा, काठ कोयला पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं था क्योंकि जंगलों की बड़े पैमाने पर सफ़ाई कर दी गई थी। चौथा, काठ कोयला उच्च तापमान उत्पन्न करने में असमर्थ था।

(1) अब्राहम डर्बी प्रथम 1677-1717 ई० (Abraham Darby 1 1677-1717 CE) अब्राहम डर्बी प्रथम श्रीपशायर (Shropshire) का एक प्रसिद्ध लोह उस्ताद था। 1709 ई० में उसने लोहे के प्रगलन के लि सर्वप्रथम कोक (Coke) का प्रयोग किया। कोक कोयले का शुद्ध रूप था। इसके अनेक लाभ हुए। प्रथम, यह काठ कोयले से बहुत सस्ता पड़ता था।

दूसरा, इस कारण लोह उत्पादकों के लिए बड़ी धमन भट्ठियाँ (Blast furnance) लगाना संभव हुआ। इससे लोहे के उत्पादन में बहुत वृद्धि हो गई। तीसरा, इन भट्ठियों से जो पिघला हुआ लोहा निकलता था उसकी गुणवत्ता (quality) पहले की अपेक्षा बहुत बढ़िया थी। इस आविष्कार के परिणामस्वरूप इंग्लैंड में लोहे का उत्पादन बहुत बढ़ गया। 1737 ई० में इंग्लैंड में लोहे का उत्पादन कुल 12,000 से 15,000 टन था। 1800 ई० में यह उत्पादन बढ़कर 2,50,000 टन हो गया। निस्संदेह इस आविष्कार ने इंग्लैंड के उद्योगों के लिए एक नए युग का श्रीगणेश किया।

(2) अब्राहम डर्बी द्वितीय 1711-1763 ई० (Abraham Darby II 1711-63 CE):
वह अब्राहम डर्बी प्रथम का पुत्र था। उसने 1755 ई० में ढलवाँ लोहे (pig-iron) से पिटवाँ लोहे (wrought iron) का विकास किया। यह लोहा ढलवाँ लोहे से कम भंगुर (less brittle) होता था। यह आविष्कार इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के विकास में एक महत्त्वपूर्ण पग सिद्ध हुआ।

(3) जोन विल्किसन 1728-1808 ई० (John Wilkinson 1728-1808 CE):
जोन विल्किसन प्रथम व्यक्ति था जिसने अपनी धमन भट्ठी (blast furnance) के लिए 1776 ई० में जेम्स वाट के स्टीम इंजन (steam engine) का प्रयोग किया। यह प्रयोग बेहद सफल रहा। उसने सर्वप्रथम लोहे की कुर्सियाँ (iron chairs), शराब की भट्ठियों (distilleries) के लिए टंकियाँ (vats) तथा लोहे की अनेक प्रकार की पाइपें (pipes) बनाईं। इससे इंग्लैंड के लोहा उद्योग को एक नई दिशा मिली।

(4) हेनरी कोर्ट 1740-1800 ई० (Henry Court 1740-1800 CE):
हेनरी कोर्ट ने 1784 ई० में आलोड़न भट्ठी (puddling furmance) का आविष्कार किया जिसके द्वारा अधिक शुद्ध और अच्छा लोहा बनाना संभव हो गया। इससे लोहा उत्पादन के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। इस लोहे से अनेक प्रकार की नवीन मशीनें बनाना सुगम हो गया। इसका कारण यह था कि यह लोहा अधिक टिकाऊ था।

इसे रोज़मर्रा की वस्तुएँ एवं मशीनें बनाने के लिए लकड़ी का बेहतर विकल्प माना जाने लगा। लकड़ी के जल सकने एवं कटने-फटने (splinter) का ख़तरा रहता था। दूसरी ओर लोहे के भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्म (properties) को नियंत्रित किया जा सकता था।

(5) अब्राहम डर्बी तृतीय 1750-91 ई० (Abraham Darby III 1750-91 CE):
वह अब्राहम डर्बी द्वितीय का पुत्र था। उसने 1779 ई० में कोलबुकडेल (Coalbrookdale) में सेवन (Severn) नदी पर विश्व का प्रथम लोहे का पुल बनाया। बाद में यह गाँव ‘आइरनब्रिज’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

(6) हैं फरी डेवी 1778-1829 ई० (Hamphry Davy 1778-1829 CE):
हैं फरी डेवी ने 1815 ई० में सेफ़टी लैंप (safety lamp) का आविष्कार किया। यह आविष्कार खानों में काम करने वाले मजदूरों के जीवन को सुरक्षित बनाने में बहुमूल्य प्रमाणित हुआ।
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 9 iMG 1
(7) हेनरी बेस्सेमर 1813-98 ई० (Henry Bessemer 1813-98 CE) :
हेनरी बेस्सेमर ने 1856 ई० में लोहे को शुद्ध करके इस्पात (steel) बनाने की विधि खोज निकाली। यह बेस्सेमर प्रक्रिया (Bessemer converter) के नाम से प्रसिद्ध हुई। शीघ्र ही इस्पात का उत्पादन बहुत बढ़ गया। इसने लोहे का स्थान ले लिया। लोहे से बनी मशीनें वज़नदार होती थीं। इनमें जंग भी लग जाता था। इस्पात अपेक्षाकृत हल्का एवं मजबूत होता था। इसमें जंग लगने की कोई संभावना नहीं होती थी।

उपरोक्त आविष्कारों के चलते ब्रिटेन के लोहा उद्योग ने हैरानीजनक प्रगति की। उसने 1800 ई० से 1830 ई० के मध्य अपने उत्पादन में चार गुना वृद्धि की। उसका लोहा यूरोप में अन्य देशों से सबसे सस्ता था। 1820 ई० में एक टन ढलवाँ लोहा (pig iron) बनाने के लिए 8 टन कोयले की आवश्यकता होती थी। 1850 ई० तक केवल 2 टन कोयले से ही एक टन ढलवाँ लोहा बनाया जाने लगा। इस समय तक ब्रिटेन में विश्व का सबसे अधिक लोहा पिघलाया (smelting) जाने लगा था।

2. कपास की कताई एवं बुनाई (Cotton Spinning and Weaving):
औद्योगिक क्रांति का आरंभ वस्त्र उद्योग से हुआ। यद्यपि यह उद्योग बहुत पुराना था किंतु इसमें शताब्दियों तक कोई विशेष उन्नति नहीं हुई थी। इसका कारण यह था कि सूत कातने (spinning) के लिए चरखे अथवा तकली का प्रयोग किया जाता था। एक व्यक्ति एक ही समय में केवल एक ही धागा बना सकता था। अत: एक बुनकर (weaver) को व्यस्त रखने के लिए आवश्यक धागा कातने वालों की ज़रूरत होती थी।

इसलिए कातने वाले दिन भर कताई के काम में लगे रहते थे जबकि बुनकर बुनाई के लिए धागे का इंतज़ार करते रहते थे। इस प्रक्रिया में बहुत समय बर्बाद होता था। धागा कातने का अधिकाँश काम स्त्रियों द्वारा किया जाता था। वे कड़ी मेहनत के बावजूद बहुत कम धागा बुन पाती थीं। अत: यह उद्योग वस्त्रों की बढ़ी हुई माँग की पूर्ति कर पाने में समर्थ नहीं था। 18वीं शताब्दी के मध्य में प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण आविष्कार हुए। इनके चलते वस्त्र उद्योग में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए।

अब उत्पादन का काम कताईगरों (spinners) एवं बुनकरों (weavers) के घरों से हट कर कारखानों में होने लगा। प्रसिद्ध इतिहासकार रैम्जे म्योर के अनुसार, “लंकाशायर के वस्त्र उद्योग में सबसे विलक्षण परिवर्तन देखने को मिला, यह अब तक अंग्रेजों की एक महत्त्वहीन कऊँटी थी जो कि अब इंग्लैंड के सबसे महत्त्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित हुई।

(1) जॉन के 1704-64 ई० (John Kay 1704-64 CE):
जॉन के ने 1733 ई० में फ़लाइंग शटल (flying shuttle) का आविष्कार किया। इस आविष्कार ने वस्त्र उद्योग में एक क्रांति लाने का कार्य किया। इसकी सहायता से बहुत कम समय में अधिक चौड़ा कपड़ा तैयार करना संभव हो गया। इससे बुनकरों का कार्य बहुत सुगम हो गया। इस कारण उनके द्वारा किए जाने वाले चरखे का प्रयोग शीघ्र ही अलोप हो गया।

(2) जेम्स हरग्रीन 1720-78 ई० (James Hargreaves 1720-78 CE):
फ़लाइंग शटल के आविष्कार के कारण कपड़े का उत्पादन बहुत तीव्रता से होने लगा। इस कारण धागे की माँग बहुत बढ़ गई। इस समस्या से निपटने के लिए जेम्स हरग्रीब्ज़ ने 1764 ई० में स्पिनिंग जैनी (spinning jenny) का आविष्कार किया।

जैनी, जेम्स हरग्रीब्ज की पत्नी का नाम था। स्पिनिंग जैनी एक साथ आठ से दस धागे कात सकती थी। इससे बुनकरों को आवश्यक धागा समय पर मिलने लगा। निस्संदेह इस आविष्कार ने इंग्लैंड के वस्त्र उद्योग को एक नई दिशा प्रदान की।

(3) रिचर्ड आर्कराइट 1732-92 ई० (Richard Arkwright 1732-92 CE):
स्पिनिंग जैनी में एक कमी थी। उसके द्वारा काता गया सूत कच्चा होता था। इस कारण यह बुनाई करते समय बार-बार टूटता रहता था। इस कमी को दूर करने के उद्देश्य से रिचर्ड आर्कराइट ने 1769 ई० में वॉटर फ्रेम (water frame) का आविष्कार
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किया। यह सर्वप्रथम सूत कातने वाली ऐसी मशीन थी जो कि हाथ की अपेक्षा जल शक्ति से चलती थी। इसके अनेक लाभ हुए। प्रथम, इससे धागे की कताई एवं बुनाई बहुत तेजी से की जाने लगी। दूसरा, इस मशीन द्वारा बनाया जाने वाला धागा पहले की अपेक्षा अधिक मजबूत था। तीसरा, इस मशीन को चलाने के लिए किसी विशेष कारीगर की आवश्यकता नहीं थी।

उसके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए ब्रिटेन के सम्राट् जॉर्ज तृतीय (George III) ने उसे सर (Sir) की उपाधि से सम्मानित किया। प्रसिद्ध इतिहासकार एच० ए० एल० फिशर का कहना ठीक है कि, “बहुत कम अंग्रेजों ने सभ्यता पर इतना गहन प्रभाव छोड़ा जितना कि इस उत्साही लंकाशायर ने।”

(4) सैम्यूअल काम्पटन 1753-1827 ई० (Samuel Crompton 1753-1827 C.E.):
सैम्यूअल क्राम्पटन ने 1779 ई० में स्पिनिंग जैनी एवं वॉटर फ्रेम को मिला कर म्यूल (mule) नामक एक महत्त्वपूर्ण मशीन का आविष्कार किया। यह बहुत बारीक एवं मज़बूत धागा कातती थी। अतः अब बढ़िया किस्म का एवं महीन कपड़ा तैयार किया जाने लगा। इसके द्वारा तैयार किया कपड़ा शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।

प्रसिद्ध इतिहासकार मार्क किशलेस्की के अनुसार, “यह सूत उत्पादन के क्षेत्र में एक निर्णायक आविष्कार था।”4 जे० एच० बेंटली एवं एच० एफ० जाईगलर के शब्दों में, “म्यूल द्वारा मज़बूत एवं उत्तम प्रकार का बढ़िया धागा तैयार किया गया जो किसी भी मानव द्वारा चरखे से तैयार नहीं किया जा सकता था तथा यह बहुत तीव्रता से तैयार होता था।

एक मजदूर जो शक्ति चालित म्यूल का प्रयोग करता था औद्योगीकरण से पूर्व किसी मज़दूर द्वारा चरखे पर काते गए सूत से सौ गुना अधिक होता था।”

( एडमंड कार्टराइट 1743-1823ई0 (Edmund Cartwright 1743-1823 CE) एडमंड कार्टराइट एक पादरी था। उसने 1785 ई० में पॉवरलूम (powerloom) का आविष्कार किया था। इसे चलाना बहुत सुगम था। यह मशीन जब भी धागा टूटता अपने आप काम करना बंद कर देती थी। इस मशीन द्वारा किसी भी प्रकार के धागे की बुनाई की जा सकती थी। इसके द्वारा बहुत तेजी से कताई एवं बुनाई की जाती थी। अतः इंग्लैंड में बढ़िया किस्म का कपड़ा बहुत सस्ता मिलने लगा।

उपरोक्त आविष्कारों ने इंग्लैंड के वस्त्र उद्योग में एक क्रांति ला दी। 1815 ई० में इंग्लैंड में 2,50,000 बुनक हथकरघे (handloom) पर कार्य करते थे। नई मशीनों के आविष्कार के कारण 1860 ई० में इनकी संख्या कम होकर केवल 3,000 रह गई। वस्त्र उद्योग इंग्लैंड का एक शक्तिशाली उद्योग सिद्ध हुआ। 1830 ई० में इस उद्योग में 5 लाख लोग कार्यरत थे। यह उद्योग प्रमुखतः स्त्रियों एवं बच्चों पर निर्भर था। इस उद्योग के लिए कच्चे माल के रूप में आवश्यक कपास संपूर्ण रूप से आयात की जाती थी।

जब इसका कपड़ा तैयार हो जाता था तो इसका अधिकांश भाग उपनिवेशों के बाजारों में बेचने के लिए भेज दिया जाता था। मार्क किशलेस्की के अनुसार, “कपास उद्योग के कारखानों में संगठित होने से वहाँ के आर्थिक जीवन में भारी परिवर्तन हआ।” एक अन्य विख्यात इतिहासकार रैम्जे म्योर के अनुसार, “इन आविष्कारों का परिणाम यह हुआ कि लंकाशायर ने शुद्ध कपास से उत्तम वस्त्रों का उत्पादन आरंभ कर दिया एवं जिसने भारतीय उत्पादों को पछाड़ दिया। अब बुनकरों को धागा पर्याप्त मात्रा एवं इतना सस्त उपलब्ध हो गया कि वे अब पूरा समय काम में व्यस्त रहने लगे तथा उनका वेतन भी बहुत बढ़ गया।”

3. भाप की शक्ति (Steam Power):
भाप की शक्ति का आविष्कार निस्संदेह औद्योगिक क्रांति के लिए एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। जल भी शताब्दियों तक द्रवचालित शक्ति (hydraulic power) के रूप में ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत रहा था। किंतु इस शक्ति का प्रयोग कुछ विशेष प्रदेशों, मौसमों एवं जल प्रवाह की गति (speed of flow of the water) के अनुसार सीमित रूप में ही किया जाता था। किंतु अब इसका प्रयोग भाप की शक्ति के रूप में किया जाने लगा। इससे अनेक प्रकार की मशीनों को चलाया जा सकता था। इसके अतिरिक्त इस पर खर्चा भी कम आता था।

(1) थॉमस सेवरी 1650-1715 ई० (Thomas Savery 1650-1715 CE):
भाप की शक्ति का सर्वप्रथम प्रयोग खनन उद्योगों (mining industries) के लिए किया गया। इस समय तक कोयले एवं धातुओं की माँग में बहुत वृद्धि हो रही थी। अतः उन्हें और भी अधिक गहरी खानों से निकालने के लिए प्रयास तीव्र हो गए। किंतु ऐसा करते समय एक विकट समस्या सामने आई।

यह समस्या थी कि जब खानों की गहराई की जाती थी तब वे अचानक पानी से भर जाती थीं। खानों के पानी को बाहर निकालने के लिए 1698 ई० में थॉमस सेवरी ने माइनर्स फ्रेंड (Miner’s Friend) नामक एक स्टीम इंजन बनाया। यह प्रयोग अधिक सफल नहीं रहा। इसके दो कारण थे-प्रथम, यह छिछली गहराइयों (shallow depths) में बहुत धीरे-धीरे काम करता था। दूसरा, दबाव के अधिक हो जाने के कारण उसका बॉयलर फट जाता था।

(2) थॉमस न्यूकॉमेन 1663-1729 ई० (Thomas Newcomen 1663-1729 CE):
थॉमस न्यूकॉमेन ने 1712 ई० में भाप का एक अन्य इंजन तैयार किया। इसका उद्देश्य भी खानों में से पानी बाहर निकालना था। यह भी अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल नहीं हुआ। यह बहुत भारी था एवं इसकी बनावट बहुत भद्दी थी। इसमें काफी मात्रा में ईंधन नष्ट होता था। अतः यह लोकप्रिय न हो सका।

(3) जेम्स वॉट 1736-1819 ई० (James Watt 1736-1819 CE):
जेम्स वॉट एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने थॉमस न्यूकॉमेन के इंजन के दोषों का गहन अध्ययन किया। उसने 1769 ई० में एक नए भाप इंजन का निर्माण किया। इसमें न्यूकॉमेन के इंजन के सभी दोषों को दूर करने में सफलता प्राप्त की गई। इंजन कम खर्चीला था। यह बहुत उपयोगी एवं व्यावहारिक था।

इसका प्रयोग न केवल कोयला खानों अपितु दूसरे उद्योगों द्वारा भी किया गया। निस्संदेह यह एक महान् उपलब्धि थी। इसने औद्योगिक क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात किया। प्रसिद्ध इतिहासकार रैम्जे म्योर के शब्दों में, “एक नई एवं असीम शक्ति जो कि नई सभ्यता के लिए एक शक्तिशाली साधन सिद्ध हुई मानवता की सेवा के लिए प्रस्तुत की गई।”एक अन्य लेखक आर० एम० रेनर के अनुसार, “जेम्स वॉट एक महान् मार्गदर्शक था जिसने एक ऐसे इंजन का निर्माण किया जो अभी तक के इंजनों में सबसे शक्तिशाली था तथा जिसमें ईंधन बहुत कम लगता था।”

(4) मैथ्यू बॉल्टन 1728-1809 ई० (Matthew Boulton 1728-1809 CE):
मैथ्यू बॉल्टन एक धनी कुशल व्यापारी था। उसने 1775 ई० में जेम्स वॉट के साथ मिल कर बर्मिघम में ‘सोहो फाउँडरी’ (Soho Foundary) की स्थापना की। इसमें जेम्स वॉट द्वारा तैयार किए स्टीम इंजन बड़ी संख्या में तैयार किए जाने लगे। 1800 ई० तक ऐसे 289 इंजनों को तैयार कर बेचा गया था।

मैथ्यू बॉल्टन ने इन इंजनों के निर्माण के लिए आवश्यक पूँजी जेम्स वॉट को उपलब्ध करवायी थी। इन इंजनों ने इंग्लैंड में औद्योगिक क्राँति को एक नई दिशा प्रदान की। इसके महत्त्व का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1840 ई० में ब्रिटेन में बने भाप के इंजन ही संपूर्ण यूरोप में आवश्यक ऊर्जा की 70 प्रतिशत से अधिक अश्व शक्ति (horse power) का उत्पादन कर रहे थे। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० जी० कोफिन के अनुसार, “स्टीम इंजन प्रारंभिक 19वीं शताब्दी में औद्योगिक विस्तार में निस्संदेह निर्णायक थे।”10

4. नहरें एवं रेलें (Canals and Railways) :
इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के विकास में नहरों एवं रेलों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। वास्तव में इनके बिना इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति संभव ही न थी। इनके द्वारा ही उद्योगों द्वारा तैयार माल को तीव्र गति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर तथा कम खर्चे में पहुँचाया जा सका। प्रसिद्ध इतिहासकार रैम्जे म्योर के अनुसार, “ब्रिटिश लोग यातायात के साधनों के विकास के बिना धन उत्पादन की नई शक्तियों का पूर्ण लाभ नहीं उठा सकते थे।”

प्रश्न 3.
इंग्लैंड में वस्त्र उद्योग में क्रांति पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया करके प्रश्न नं 2 का भाग 2 देखें।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 4.
नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्षित लाभ क्या-क्या हैं ?
अथवा
इंग्लैंड में नहरों एवं रेलों के विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के विकास में नहरों एवं रेलों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। वास्तव में इनके बिना इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति संभव ही न थी। इनके द्वारा ही उद्योगों द्वारा तैयार माल को तीव्र गति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर तथा कम खर्चे में पहुँचाया जा सका। प्रसिद्ध इतिहासकार रैम्जे म्योर के अनुसार, “ब्रिटिश लोग यातायात के साधनों के विकास के बिना धन उत्पादन की नई शक्तियों का पूर्ण लाभ नहीं उठा सकते थे।”

1. नहरों का विकास

18वीं शताब्दी के दूसरे मध्य में इंग्लैंड में नहरों का निर्माण आरंभ हुआ। इनका प्रमुख उद्देश्य कोयले को शहरों में स्थित उद्योगों तक पहुँचाना था। इसमें सड़क मार्ग की अपेक्षा कम समय लगता था एवं खर्चा भी कम आता था। इंग्लैंड में नहरों के निर्माण में ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट (Duke of Bridgewater) एवं जेम्स ब्रिडले (James Brindley) ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई। ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवा की वर्सले (Worsley) में अनेक कोयला खाने थीं। वह यहाँ से अपने कोयले को निकट स्थित मैनचेस्टर (Manchester) में स्थापित उद्योगों तक कम खर्च में पहँचाना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने 1758 ई० में जेम्स ब्रिडले जो कि एक प्रसिद्ध इंजीनियर था के साथ परामर्श किया।

जेम्स ब्रिडले ने उसे वर्सले से मैनचेस्टर तक एक नहर का निर्माण करने का परामर्श दिया। ब्रिजवार ने इस परामर्श को स्वीकार किया तथा इस कार्य के लिए आवश्यक पूँजी जेम्स ब्रिडले को उपलब्ध करवायी। जेम्स ब्रिडले ने 1759 ई० में वर्सले कैनाल (Worsley Canal) का निर्माण कार्य आरंभ किया। इस नहर द्वारा वर्सले को मैनचेस्टर के साथ जोड़ा गया। यह नहर 10 मील लंबी थी। 1761 ई० में इस नहर का निर्माण कार्य पूरा हुआ तथा इसे यातायात के लिए खोला गया। यह इंग्लैंड की प्रथम नहर थी।

निस्संदेह यह जेम्स ब्रिडले की एक महान सफलता थी। इस नहर के कारण कोयले की कीमतें आधी हो गईं। वर्सले कैनाल की महान् सफलता को देखते हुए जेम्स ब्रिडले ने मैनचेस्टर (Manchester) से लेकर लिवरपूल (Liverpool) तक एक अन्य नहर का निर्माण कार्य आरंभ किया। इसका निर्माण कार्य 1772 ई० पूर्ण हुआ। यह नहर 28 मील लंबी थी। इससे दोनों नगरों के मध्य की दूरी काफी कम हो गयी तथा सफ़र का खर्चा केवल छठा भाग ही रह गया। इससे जेम्स ब्रिडले की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। दुर्भाग्यवश उसकी 1772 ई० में मृत्यु हो गई।

जेम्स ब्रिडले की मृत्यु के पश्चात् इंग्लैंड में नहरों का निर्माण कार्य जारी रहा। नहरों के निर्माण के अनेक लाभ थे। प्रथम, ये नहरें जिन स्थानों पर बनीं वहाँ भूमि के मूल्य बहुत बढ़ गए। दूसरा, नहरों के कारण अनेक नए शहर अस्तित्व में आए। तोसरा, इससे उद्योगों को बहुत लाभ पहुंचा। चौथा, इनसे कृषि को बहुत प्रोत्साहन मिला। पाँचवां, यह नहरों एवं नावों का निर्माण करने वालों के लिए भी बहुत लाभकारी प्रमाणित हुईं।

1770 ई० के दशक से लेकर 1830 ई० के दशक को इंग्लैंड की नहरों के इतिहास का सुनहरा काल (Golden Age) अथवा नहरोन्माद (Canal mania) के नाम से जाना जाता है। इस काल के दौरान इंग्लैंड में अनेकानेक नहरें बनाई गईं तथा इस कार्य पर बहुत धन व्यय किया गया। इस काल के दौरान 4000 मील लंबी नहरों का निर्माण किया गया। इन नहरों में से मरसी (Mersey), ट्रेंट (Trent), सेवन (Severn) एवं थेम्स (Thames) नामक नहरें बहुत प्रसिद्ध हुईं। प्रसिद्ध इतिहासकार क्रिस हरमन “अंग्रेजों की नहरी व्यवस्था जिसने जल यातायात का कार्य किया ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के लिए उस समय प्रमुख भूमिका निभाई जब सड़कों का निर्माण कार्य आरंभ ही हुआ था।”

1830 ई० के पश्चात् जब रेलों का निर्माण आरंभ हो गया तो नहरों का महत्त्व कम हो गया। इसके अतिरिक्त नहरों के कुछ हिस्सों में जलपोतों की भीड़भाड़ के कारण परिवहन की गति धीमी पड़ गई। पाले, बाढ़ या सूखे के कारण नहरों का प्रयोग का समय भी सीमित हो गया।

II. रेलों का विकास

19वीं शताब्दी में इंग्लैंड में रेलों के विकास ने एक नए युग का सूत्रपात किया। इसके ब्रिटेन के समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े।

1. रिचर्ड ट्रेविथिक 1771-1833 ई० (Richard Travithick 1771-1833 CE):
रिचर्ड ट्रेविथिक इंग्लैंड का एक प्रसिद्ध इंजीनियर था। उसने 1801 ई० में एक इंजन का निर्माण किया जिसे ‘पफिंग डेविल’ (puffing devil) कहा जाता था। यह इंजन ट्रकों (trucks) को कॉर्नवाल में उस खान के चारों ओर खींचकर ले जाता था जहाँ रिचर्ड काम करता था। यह इंजन बहुत भारी था।

अत: यह लंबी दूरी तय करने में विफल रहा। 1804 ई० में ट्रेविथिक विश्व का प्रथम स्टीम इंजन तैयार करने में सफल रहा। इस इंजन को पेनीडारेन (penydarren) नाम दिया गया। यह इंजन 7 टन भारी था। प्रथम दिन इसने 9 मील का सफर तय किया। इसमें 5 रेल डिब्बे थे तथा इसमें 70 यात्री सवार थे। इसे भी विशेष सफलता प्राप्त न हुई।

इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, यह रेल इंजन भी बहुत भारी था। अत: यह कमज़ोर रेल लाइनों को तोड़ देता था। दूसरा, यह अधिक समय तक अपने में भाप नहीं रख सकता था। इसके बावजूद रिचर्ड ट्रेविथिक ने इंग्लैंड में रेलों की नींव रख कर एक महान् कार्य किया।

2. जॉर्ज स्टीफेनसन 1781-1848 ई० (George Stephenson 1781-1848 CE):
जॉर्ज स्टीफेनसन इंग्लैंड का एक महान् इंजीनियर था। रेलों के विकास में उसके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उसे ‘रेलों का पितामा’ (Father of Railways) कहा जाता है। उसने 1814 ई० में भाप से चलने वाला ब्लचर (blutcher) नामक इंजन तैयार किया। इसे केवल कोयला ढोने के लिए तैयार किया गया था।

यह इंजन 30 टन भार का कोयला 4 मील प्रति घंटा की रफ्तार से एक पहाड़ी पर ले जा सकता था। यात्रियों के लिए सर्वप्रथम रेल 1825 ई० में स्टॉकटन (Stockton) एवं डालिंगटन (Darlington) शहरों के मध्य चलाई गई। इसके इंजन को रॉकेट (rocket) का नाम दिया गया। यह भाप से चलता था। यात्रियों के लिए इसमें 30 डिब्बे लगाए गए थे।

इस इंजन को जॉर्ज स्टीफेनसन ने स्वयं प्रथम 9 मील तक चलाया था। इस यात्रा को तय करने में उसे 2 घंटे लगे थे। बाद में इस इंजन को 15 मील प्रति घंटा की रफ्तार से चलाया गया। निस्संदेह यह एक महान् घटना थी। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ के अनुसार, “इस साहसिक कार्य की सफलता ने रेलों का एक बड़े पैमाने पर निर्माण का युग आरंभ किया।”

1830 ई० में लिवरपल एवं मैनचेस्टर को रेलमार्ग द्वारा जोड़ा गया। 15 सितंबर, 1830 ई० को इस रेलमार्ग को इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ड्यूक ऑफ़ विलिंगटन (Duke of Wellington) द्वारा खोला गया। यहाँ चलने वाली रेलगाड़ी ने 30 मील प्रति घंटा की रफ्तार प्राप्त की। दुर्भाग्यवश पहले ही दिन जब इस रेलमार्ग को चलाया गया था तो इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध सांसद हसकिरस्न (Huskirson) की इस रेल इंजन से टकरा कर मृत्यु हो गई थी।

जॉर्ज स्टीफेनसन ने जो सफलता प्राप्त की उस कारण वह शीघ्र ही बहुत लोकप्रिय हो गया तथा उसे रेलवे के चीफ़ इंजीनियर के पद से सम्मानित किया गया। 1848 ई० में जेम्स स्टीफेनसन की मृत्यु हो गई।

3. स्टीफेनसन के बाद रेलों का विकास (The Developments of Railways after Stephenson):
जॉर्ज स्टीफेनसन की मृत्यु के पश्चात् भी रेलों के निर्माण का कार्य जारी रहा। 1830 ई० से 1850 ई० के मध्य ब्रिटेन में दो चरणों में 6,000 मील लंबे रेलमार्ग का निर्माण किया गया। आई० के० बरुनल (I.K. Brunel) ने रेल मागों के रास्ते में आने वाले पुलों एवं सुरंगों (tunnels) का निर्माण किया। 1841 ई० में ब्राडशाह ने यात्रियों की सुविधा के लिए प्रथम रेलवे टाइम टेबल को बनाया। 1846 ई० में ब्रिटेन की सरकार द्वारा रेलवे के संबंध में कुछ नियम पारित किए गए।

4. प्रभाव (Effects):
रेलों के आगमन से ब्रिटेन के समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इनके कारण ब्रिटेन में शहरीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई। अतः अनेक बड़े-बड़े शहर अस्तित्व में आए। इनमें लंदन, ब्रिस्टल, मैनचेस्टर, लीड्स, लिवरपूल, वेल्स, बर्मिंघम एवं यार्कशायर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इस कारण ब्रिटेन में गाँवों एवं छोटे शहरों का महत्त्व कम हो गया। रेलों के कारण लोगों के लिए कम खर्च एवं कम समय में सफर करना सुगम हो गया। इस कारण बड़ी संख्या में गाँवों के लोग नौकरी की तलाश में शहरों में आ गए।

अनेक लोग शहरों में ही बस गए। नए स्थान पर आने से उनके सामाजिक बंधन ढीले हो गए। रेलों के कारण लोग छुट्टियों में दूर सैर-सपाटे के लिए जाने लगे। यह उनके मनोरंजन के लिए एक बढ़िया साधन सिद्ध हुआ। रेलों द्वारा उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल कोयला, लोहा, कपास आदि कम खर्च पर पहुँचाना सुगम हो गया। इससे इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति को एक नया बल मिला। रेलों के कारण ही इंग्लैंड के उद्योगों द्वारा तैयार माल को दूर स्थानों तक पहुँचाया जा सका। रेलों के निर्माण कार्य में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ। निस्संदेह रेलों ने ब्रिटेन के समाज को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 5.
औद्योगिक क्रांति के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति विश्व की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस क्रांति के दूरगामी परिणाम निकले। प्रसिद्ध इतिहासकार चार्ल्स ब्रयूनिंग के अनुसार, “औद्योगिक क्रांति ने निस्संदेह यूरोपियों के जीवन को इतना प्रभावित किया जितना कि फ्रांसीसी क्रांति ने भी नहीं किया था।”

1. सामाजिक प्रभाव (Social Effects)-औद्योगिक क्रांति के उल्लेखनीय सामाजिक प्रभाव पड़े।

(1) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन की जनसंख्या में असाधारण वृद्धि हुई। इसका कारण यह था कि अनेक वैज्ञानिक खोजों के कारण मृत्यु दर में काफ़ी कमी आ गई थी।

(2) औद्योगिक क्रांति के कारण पारिवारिक जीवन छिन्न-भिन्न हो गया। लोगों को रोजगार की तलाश में गाँवों को छोड़ कर शहरों में आना पड़ा। यहाँ परिवार के जिस सदस्य को जिस कारखाने में नौकरी मिलती वहीं काम करने लगता। इससे परिवार का विभिन्न सदस्यों पर नियंत्रण समाप्त हो गया।

(3) औद्योगिक क्रांति के कारण शहरों में जनसंख्या में तीव्रता से बढ़ौतरी से कारखानों फ आस-पास मजदूरों के बस जाने से वहाँ गंदी बस्तियों की स्थापना हुई।

(4) औद्योगिक क्रांति के कारण मशीनों का प्रचलन बढ़ गया। अतः मजदूरों को कम वेतन पर कार्य करने के लिए विवश होना पड़ा।

(5) उद्योगों में छोटे छोटे बच्चे एवं स्त्रियाँ भी काम करती थीं। उनसे भी बहुत भयावह परिस्थितियों में काम कराया जाता था। काम करते समय यदि उनकी मृत्यु हो जाती तो कारखाना मालिक उन्हें किसी प्रकार का कोई मुआवजा नहीं देता था।

(6) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन का समाज दो वर्गों पूँजीपतियों एवं मजदूरों में बँट गया था। दोनों वर्गों के जीवन स्तर में बहुत अंतर था।

2. आर्थिक प्रभाव (Economic Effects):
औद्योगिक क्रांति के महत्त्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव पड़े।

(1) औद्योगिक क्रांति के कारण बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन मशीनों द्वारा किया जाने लगा। अत: लोगों को उत्तम वस्तुएँ सस्ते मूल्य पर उपलब्ध होने लगी। इससे लोगों के जीवन स्तर में पहले की अपेक्षा काफ़ी सुधार हुआ।

(2) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप लघु उद्योगों का अंत हो गया।

(3) औद्योगिक क्राँति ने कृषि क्रांति को प्रोत्साहन दिया। अतः फ़सलों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हो गई।

(4) उत्पादन में वृद्धि के कारण घरेलू एवं विदेशी व्यापार को एक नई दिशा मिली। इससे लोग बहुत समृद्धशाली हुए।

(5) औद्योगिक क्रांति के कारण यातायात के साधनों में अद्वितीय विकास हुआ। इससे जहाँ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की एवं माल की आवाजाही भी सुविधाजनक हो गयी।

(6) औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन को अपने कारखानों के लिए कच्चे माल की तथा तैयार माल को बेचने के लिए मंडियों की आवश्यकता हुई। अतः ब्रिटेन ने साम्राज्यवादी नीति को अपनाया

(7) औद्योगिक क्रांति के कारण अनेक ऐसी वस्तुओं का उत्पादन हुआ जिन्होंने मानव जीवन को सुखी एवं सुविधाजनक बना दिया।

(8) औद्योगिक क्रांति ने पूँजीवाद एवं बैंक प्रणाली को जन्म दिया।

3. राजनीतिक प्रभाव (Political Effects) औद्योगिक क्राँति ने ब्रिटेन के राजनीतिक जीवन को एक नई दिशा प्रदान की।

(1) औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन एक धनी एवं शक्तिशाली देश बना। इस कारण वह फ्रांस एवं नेपोलियन के साथ दीर्घकालीन युद्ध करने में सक्षम हुआ। नेपोलियन के पतन में ब्रिटेन की प्रमुख भूमिका थी।

(2) औद्योगिक क्रांति के कारण अनेक नए नगर अस्तित्व में आए। इन नगरों को संसद् में प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं था। अतः संसदीय सुधारों की माँग बल पकड़ने लगी।

(3) औद्योगिक क्रांति के कारण यातायात के साधनों का विकास हुआ। इससे राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन मिला।

(4) औद्योगिक क्राँति ने स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय एवं समाजवाद आदि नए राजनीतिक विचारों को जन्म दिया।

(5) औद्योगिक क्राँति ने साम्राज्यवाद की भावना को जन्म दिया। इस कारण विभिन्न साम्राज्यवादी देशों में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित करने के लिए एक होड़ सी लग गयी। इस होड़ के विनाशकारी परिणाम निकले।

(6) पूँजीपतियों द्वारा मजदूरों का घोर शोषण किया गया। इससे उनमें एक नई जागृति उत्पन्न हुई। अतः उन्होंने अपनी मांगों के समर्थन में श्रमिक संघों (Trade Unions) के निर्माण के लिए एक लंबा संघर्ष चलाया। अंततः उन्हें सफलता प्राप्त हुई।

प्रश्न 6.
ब्रिटेन में स्त्रियों के भिन्न-भिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रांति का क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
ब्रिटेन में स्त्रियों के भिन्न-भिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रांति का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप स्त्रियों की दशा भी अत्यंत दयनीय हो गई। इस क्राँति से पूर्व स्त्रियाँ कृषि कार्यों में सक्रिय हिस्सा लेती थीं। वे पशुओं की देखभाल करती थीं। वे वनों से लकड़ियाँ इकट्ठी करती थीं। वे अपने घरों में चरखे चला कर सूत कातने का कार्य भी करती थीं। औद्योगिक क्रांति के कारण उनके जीवन में भारी परिवर्तन आया। पुरुषों को शहरों में स्थापित कारखानों में मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

क्योंकि उनका वेतन इतना कम था कि परिवार का पालन-पोषण करना उनके बस की बात नहीं थी अतः स्त्रियों को भी कारखानों में काम करने के लिए विवश होना पड़ा। कारखानों में स्त्रियों को बहुत भयानक परिस्थितियों में काम करना पड़ता था। उन्हें यहाँ एक ही प्रकार का कार्य 16 से 18 घंटों तक करना पड़ता था। यद्यपि वे कठोर परिश्रम करती थीं अपितु उन्हें पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम वेतन मिलता था। कारखानों के मालिक अपना दिल बहलाने के लिए अक्सर उनका यौन शोषण करते थे।

गर्भवती होने पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता था क्योंकि वे कुशलतापूर्वक काम करने के योग्य नहीं रहती थीं। कुछ स्त्रियों कोयला खानों में भी काम करती थीं। यहाँ काम करने की परिस्थितियाँ कारखानों से भी भयानक थीं। यहाँ उन्हें घोर अंधेरे में कार्य करना पड़ता था। उन्हें अपनी पीठ पर रख कर कोयले का भारी वज़न भी ढोना पड़ता था।

खानों में विस्फोट हो जाने से अक्सर उनकी मृत्यु हो जाती थी अथवा वे घायल हो जाती थीं। ऐसी स्थिति में खानों के मालिक उन्हें किसी प्रकार का कोई मुआवजा नहीं देते थे। इनके अतिरिक्त अनेक स्त्रियाँ घरों में नौकरानियों के तौर पर अथवा दुकानों में सहायक के तौर पर कार्य करती थीं। घरों के मालिक अथवा उनके पुत्र एवं दुकानदार उनके साथ नाजायज संबंध स्थापित कर लेते थे। इंकार करने वाली स्त्रियों को नौकरी से निकाल दिया जाता था।

अनेक स्त्रियाँ मज़बूरीवश वेश्यावृत्ति के दलदल में फंस गई थीं। स्त्रियों को अपने कार्य के अतिरिक्त अपने घरों का कार्य भी देखना पड़ता था। अतः उन्हें आराम करने का अवसर बहुत कम प्राप्त होता था। आय के कम होने के कारण प्रायः पति-पत्नी एवं बच्चों में झगड़े होते रहते थे। संक्षेप में, औद्योगिक क्रांति के दौरान स्त्रियों की स्थिति नरक समान थी।

प्रश्न 7.
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के दौरान हुए विरोध आंदोलन की चर्चा कीजिए।
अथवा
औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन में हुए श्रमिक आंदोलनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इंग्लैंड में औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप वहाँ कारखानों एवं खानों में काम करने वाले मजदूरों की दशा पशुओं से भी बदतर हो गई। अतः वे अन्य मांगों के अतिरिक्त मताधिकार प्राप्त करने के लिए आंदोलन कर रहे थे। ब्रिटेन की सरकार मजदूरों के किसी प्रकार के आंदोलन को सहन करने को तैयार नहीं थी। अतः उसने मजदूरों के प्रति दमनकारी नीति अपनाई।

1. जुड़वाँ अधिनियम 1799-1800 ई० (Combination Acts 1799-1800 CE):
ब्रिटेन की सरकार ने 1799 ई० एवं 1800 ई० में दो नियम पारित किए। इन्हें जुड़वाँ अधिनियम कहा जाता है। इन अधिनियमों के अधीन ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अब मजदूर अपनी मजदूरी बढ़ाने के लिए अथवा काम के घंटों को कम करने के लिए एक-दूसरे को सहयोग नहीं कर सकते थे।

वे भाषण या लेखन द्वारा सम्राट्, संविधान अथवा सरकार के विरुद्ध नफ़रत नहीं फैला सकते थे। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंड देने की व्यवस्था की गई। 1824 ई० में सरकार ने जुड़वाँ अधिनियम को रद्द कर दिया। अब मजदूरों को ब्रिटेन में ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार प्राप्त हो गया।

2. अनाज कानून 1815 ई० (Corn Laws 1815 CE):
1815 ई० में ब्रिटेन की सरकार ने अनाज कानून पारित किए। इन कानूनों के अधीन जब तक ब्रिटेन में अनाज की कीमत में एक स्वीकृत स्तर तक वृद्धि न हो जाए तब तक विदेश से अनाज के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन में अनेक वस्तुओं का अभाव हो गया एवं उनकी कीमतों में बहु जीवन को और भी अधिक भर बना दिया। अतः वे अनाज कानून पर लगे प्रतिबंध को हटाने की माँग करने लगे।

उस समय अधिकाँश सांसद भू-स्वामी थे इसलिए उन्होंने अनाज कानून का समर्थन किया। अत: विवश हो कर मजदूरों ने मैनचेस्टर में 1839 ई० में अनाज कानून विरोधी लीग (Anti-Corn Laws League) का निर्माण किया। इस लीग के दो प्रमुख सदस्य रिचर्ड काब्डन एवं जॉन ब्राइट (John Bright) थे। इस लीग ने अनाज कानून को रद्द किए जाने की अपनी माँग को जारी रखा। अंत में उनका आंदोलन सफल रहा तथा प्रधानमंत्री राबर्ट पील (Robert Peel) ने 1845 ई० में अनाज कानून को रद्द करने की घोषणा की।

3. ब्रैड के लिए दंगे (Riots for Bread):
औद्योगिक क्रांति के कारण शहरों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या में भारी वृद्धि हो गई थी। उन्हें कारखानों में जिन भयावह परिस्थितियों में काम करना पड़ता था उस कारण उनमें घोर रोष था। 1793 ई० में इंग्लैंड का फ्रांस के साथ एक दीर्घकालीन युद्ध आरंभ हो गया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप ब्रिटेन में ब्रैड जो कि गरीबों का मुख्य आहार था की कीमतें आसमान छूने लगीं। इससे मजदूरों के धैर्य का बाँध टूट गया। उन्होंने ब्रैड के लिए सारे देश में दंगे आरंभ कर दिए। ऐसे दंगों का सिलसिला 1840 ई० के दशक तक चलता रहा।

4. बाड़ा पद्धति (Enclosure):
1770 ई० के दशक में ब्रिटेन में पारित किए गए बाड़ा पद्धति अथवा चकबंदी अधिनियमों ने वहाँ के गरीब लोगों में घोर रोष उत्पन्न किया। इनके अधीन शक्तिशाली ज़मींदारों ने छोटे छोटे किसानों के फार्मों को अपने बडे फार्मों में मिला लिया। इस बाडा पद्धति के कारण बडे जमींदारों को बहत लाभ पहुँचा। दूसरी ओर यह छोटे किसानों के लिए बहुत विनाशकारी सिद्ध हुई।

इस कारण वे बेरोजगार हो गए। वे न्यूनतम वेतन पर कारखानों में काम करने के लिए बाध्य हुए। इससे उनका जीवन दूभर हो गया। 1790 के दशक से वे अपने वेतन में वृद्धि की माँग करने लगे। संसद् ने उनकी माँग को स्वीकार न किया। अत: वे हड़ताल पर चले गए। सरकार ने उन्हें जबरन खदेड़ दिया।

5. लुडिज्म 1811-17 ई० (Luddism 1811-17 CE):
लुडिज्म 1811 ई० से 1817 ई० के मध्य इंग्लैंड में चलने वाला एक प्रसिद्ध आंदोलन था। इस आंदोलन को इंग्लैंड के कपड़ा मजदूरों द्वारा चलाया गया था। इस आंदोलन का नेतृत्व जनरल नेड लुड (General Ned Ludd) ने किया। इस आंदोलन की अनेक माँगें थीं

  • मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दी जाए।
  • स्त्रियों एवं बच्चों के काम करने के समय को कम किया जाए एवं उन्हें ख़तरनाक मशीनों पर न लगाया जाए।
  • मजदूरों को ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार हो ।

सरकार के विरुद्ध अपना विरोध प्रकट करने के उद्देश्य से उन्होंने वस्त्र मशीनों को नष्ट किया। वे इन मशीनों को उनके सभी कष्टों के लिए उत्तरदायी मानते थे। लुडिवादी (Luddites) अपने चेहरे को ढक कर रखते थे तथा वे अपनी कार्यवाही प्रायः रात के समय करते थे। उन्हें साधारण लोगों का काफी समर्थन प्राप्त था।

इस आंदोलन का आरंभ 1811 ई० में नोटिंघम (Notingham) से हुआ था। इसके पश्चात् यह ब्रिटेन के अनेक अन्य प्रसिद्ध शहरों में फैल गया। आंदोलनकारियों ने अनेक सूती एवं ऊनी वस्त्र की मिलों पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट कर दिया। सरकार इसे कभी सहन करने को तैयार नहीं थी। अत: उसने दमन की नीति अपनाते हुए 1813 ई० में 14 लुडिवादियों को फाँसी पर चढ़ा दिया तथा अनेकों को बंदी बना कर ऑस्ट्रेलिया में भेज दिया।

6. पीटरलू नरसंहार 1819 ई० (Peterloo Massacre 1819 CE):औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप मजदूरों का जीवन नरक समान हो गया था। 16 से 18 घंटे प्रतिदिन कड़ी मेहनत करने के बावजूद उन्हें दो वक्त भर पेट खाना नसीब नहीं होता था। वे गंदी बस्तियों में निवास करते थे। वे अर्द्धनग्न घूमते रहते थे। उन्हें वोट के अधिकार से वंचित रखा गया था।

16 अगस्त, 1819 ई० को 80,000 लोग मैनचेस्टर के सेंट पीटर्स (St. Peters) के मैदान में शांतिपूर्वक एकत्र हुए। उनका उद्देश्य अनाज कानूनों के विरुद्ध अपना विरोध जारी करना था तथा वोट के अधिकार, ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार, सार्वजनिक सभाएँ करने तथा प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार की माँग करना था। इस आंदोलन के प्रसिद्ध नेता रिचर्ड कारलाइल (Richard Carlile), जॉन कार्टराइट (John Cartwright) तथा हेनरी हंट (Henry Hunt) थे। सरकार इस शाँतिमय जनसभा को भी सहन करने को तैयार नहीं थी।

अतः सरकार ने वहाँ घुड़सवार सेना भेज दी। इस सेना ने वहाँ लोगों को तितर-बितर (disperse) करने के उद्देश्य से गोलियाँ चला दीं। इसे पीटरलू नरसंहार के नाम से जाना जाता है। इसमें 11 लोगों की मृत्यु हुई एवं 400 से अधिक घायल हुए। इस नरसंहार के कारण संपूर्ण ब्रिटेन में रोष की लहर फैल गई।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 8.
इंग्लैंड में कानूनों के जरिये मजदूरों की दशा सुधारने के लिए क्या प्रयास किए गए ? क्या ये सफल सिद्ध हुए ?
उत्तर:
ब्रिटेन में काम करने वाले सभी मज़दूर जिनमें स्त्रियाँ एवं बच्चे भी सम्मिलित थे बहुत शोचनीय जीवन व्यतीत कर रहे थे। दिनभर कठोर परिश्रम करने के बावजूद उन्हें दो समय भर पेट खाना नसीब नहीं होता था। वे गंदी बस्तियों में रहते थे। उनकी दशा सुधारने हेतु इंग्लैंड की सरकार द्वारा अनेक कानून पारित किए गए। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. कारखाना अधिनियम 1802 ई० (Factory Act of 1802 CE):
इंग्लैंड में कारखानों में काम करने वाले मजदूरों विशेष तौर पर स्त्रियों एवं बच्चों की दशा सुधारने के उद्देश्य से 1802 ई० में प्रथम कारखाना अधिनियम पारित किया गया था। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • कारखाना मालिकों को नियमों की पालना अवश्य करनी चाहिए।
  • कारखानों के सभी कमरे हवादार हों।
  • किसी भी बच्चे से 12 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • किसी भी बच्चे को रात्रि में कारखानों में काम पर न लगाया जाए।
  • रविवार के दिन सभी बच्चों को दो घंटे ईसाई धर्म के बारे में जानकारी देनी चाहिए।

मिल मालिक इस बात का ध्यान रखें कि उनके कारखाने में किसी प्रकार की कोई महामारी न फैले। यदि कोई कारखाना मालिक उपरोक्त नियमों की पालना नहीं करता है तो उस पर 2 से 5 पौंड तक जुर्माना लगाया जाए। निस्संदेह 1802 ई० का कारखाना अधिनियम मजदूरों की दशा सुधारने के लिए किया गया एक अच्छा प्रयास था। किंतु यह अधिनियम अपने उद्देश्य में अधिक सफल न रहा। इसका कारण यह था कि कारखानों की निष्पक्ष जाँच करने के लिए इंस्पेक्टरों का उचित प्रबंध न था।

2. कारखाना अधिनियम 1819 ई० (Factory Act of 1819 CE):
1819 ई० में दूसरा कारखाना अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • 9 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर लगाने की पाबंदी लगा दी गई।
  • 9 से 16 वर्ष के बच्चों से 12 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • बच्चों को रात्रि में काम पर न लगाया जाए।
  • बच्चों को भोजन के लिए 1.30 घंटे का विश्राम दिया जाए।

3. कारखाना अधिनियम 1833 ई० (Factory Act of 1833 CE):
1832 ई० में इंग्लैंड में प्रथम सधार अधिनियम पारित किया गया था। इस अधिनियम द्वारा मजदूरों की माँगों की उपेक्षा की गई थी। इस कारण उनमें घोर असंतोष था। उन्हें संतुष्ट करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने 1833 ई० में एक अन्य कारखाना अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • 13 से 17 वर्ष के बच्चों से 10 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • 9 से 13 वर्ष के बच्चों से 9 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • 9 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर न लगाया जाए।
  • बच्चों को कम-से-कम 2 घंटे स्कूल भेजना अनिवार्य कर दिया गया।
  • कारखानों के निरीक्षण के लिए नियमित इंस्पेक्टर नियुक्त किए गए। उन्हें कारखाना मालिकों को नियमों की उल्लंघना करने पर दंड देने का अधिकार दिया गया।

4. खान अधिनियम 1842 ई० (Mines Act of 1842 CE):
उपरोक्त सभी कारखाना अधिनियम वस्त उद्योगों पर लागू होते थे। खानों में काम करने वालों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया था। वे बहुत भयाव स्थितियों में काम करते थे। लॉर्ड एशले (Lord Ashley) की प्रार्थना पर सरकार ने 1842 ई० में एक शाही कमीश का गठन किया। इस कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने 1842 ई० में खान अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • इसने खानों में स्त्रियों के काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • इसने 10 वर्ष से कम बच्चों के खानों में काम करने की मनाही कर दी।
  • खानों का निरीक्षण करने के लिए नियमित इंस्पेक्टरों को नियुक्त किया गया।

इस अधिनियम का विशेष महत्त्व है। इसके अनुसार खानों में काम करने वालों की दशा में सुधार करने हेतु सरकार ने प्रथम प्रयास किया था।

5. कारखाना अधिनियम 1844 ई० (Factory Act of 1844 CE):
1844 ई० में ब्रिटेन की सरकार ने एक अन्य कारखाना अधिनियम पारित किया था। यह अधिनियम भी वस्त्र उद्योग से संबंधित था। इस अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • 8 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर नहीं लगाया जा सकता।
  • 8 वर्ष से 13 वर्ष के बच्चों से एक दिन में 6.30 घंटों से अधिक काम नहीं लिया जा सकता।
  • स्त्रियों एवं युवकों से एक दिन में 12 घंटों से अधिक काम नहीं लिया जा सकता। इस समय के दौरान उन्हें भोजन के लिए 1.30 घंटे का अवकाश होगा।
  • ख़तरनाक मशीनों के चारों ओर जंगले (fence) लगाए जाएँ।
  • बच्चों को ख़तरनाक मशीनों की सफाई के काम पर न लगाया जाए।
  • कारखानों में काम करने वालों की आयु संबंधी जाँच की जाए।
  • कारखानों में होने वाली सभी दुर्घटनाओं की जाँच होनी चाहिए।

6. कारखाना अधिनियम 1847 ई० (Factory Act of 1847 CE):
इंग्लैंड में मजदूर काफी समय से 10 घंटे काम की माँग कर रहे थे। अंत में सरकार ने उनकी यह माँग स्वीकार कर ली। अत: 1847 ई० का कारखाना अधिनियम पारित किया गया। इसके अनुसार कारखानों में काम करने वाले पुरुषों एवं स्त्रियों के लिए 10 घंटे प्रतिदिन निश्चित कर दिए गए।

7. कारखाना अधिनियम 1867 ई० (Factory Act of 1867 CE):
1867 ई० में ब्रिटेन की सरकार ने एक अन्य कारखाना अधिनियम पारित किया। इसका विशेष महत्त्व इस बात में है कि इस अधिनियम को सभी प्रकार के कारखानों में लागू किया गया था। इसके अनुसार वस्त्र उद्योग में लागू सभी नियम अब अन्य उद्योगों पर भी लागू होते थे।

8. कारखाना अधिनियम 1878 ई० (Factory Act of 1878 CE):
1878 ई० के कारखाना अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • 10 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर न लगाया जाए।
  • 10 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य हो।
  • 10 से 14 वर्ष तक के बच्चों से 5 घंटे तक काम लिया जा सकता था।
  • स्त्रियों के लिए सप्ताह में काम करने के लिए 56 घंटे निश्चित कर दिए गए।

उपरोक्त अधिनियमों के द्वारा कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की दशा सुधारने का सरकार द्वारा प्रयास किया गया। किंतु इन प्रयासों को कोई विशेष सफलता प्राप्त न हुई। इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, कारखानों में नियमों के प्रावधानों को लागू करवाने के लिए इंस्पेक्टरों को नियुक्त किया गया था। इन इंस्पेक्टरों के वेतन बहुत कम थे।

अत: वे कारखाना मालिकों से रिश्वत ले लेते थे एवं उनके विरुद्ध कोई रिपोर्ट नहीं देते थे। दूसरा, बच्चों के माता-पिता भी उनकी आयु के बारे में झूठ बोल कर उन्हें काम पर लगवा देते थे। ऐसा वे घर का खर्च चलाने में सहायता के लिए करते थे। प्रसिद्ध इतिहासकारों डब्ल्यू० के० फर्गुसन एवं जी० बरुन के शब्दों में, “ऐसे सुधार एक गहरी बुराई के लिए कमज़ोर उपाय थे।”

प्रश्न 9.
क्या इंग्लैंड में औद्योगिक क्राँति हुई थी? इस विषय पर बहस कीजिए।
उत्तर:
क्या 18वीं एवं 19वीं शताब्दी ब्रिटेन में हुई औद्योगिक क्राँति वास्तविक रूप में एक क्रांति थी। इस संबंध में इतिहासकारों के दो पक्ष हैं। प्रथम पक्ष वाले इसे क्राँति नहीं मानते हैं। दूसरे पक्ष वाले इसे निस्संदेह एक क्रांति मानते हैं।

1. प्रथम पक्ष (First View):
कुछ इतिहासकार ब्रिटेन में आई औद्योगिक क्राँति को एक क्रांति स्वीकार नहीं करते। उनका कथन है कि औद्योगीकरण की यह प्रक्रिया बहुत धीमी थी। अतः औद्योगिक क्रांति से संबंधित परिवर्तन अचानक नहीं हुए। इसलिए इसे क्रांति की संज्ञा देना उचित प्रतीत नहीं होता। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ का कथन है कि,

“यह (औद्योगिक विकास का क्रम) 15वीं शताब्दी में आरंभ हो गया था और यह अब भी जारी है जिसके विकास में पाँच शताब्दियों का समय लगा, उसे क्राँति नहीं कहा जा सकता।”19वीं शताब्दी शुरू होने के काफी समय बाद तक भी इंग्लैंड के एक बड़े भाग में उद्योगों की स्थापना नहीं हुई थी। वहाँ जो उद्योग स्थापित हुए थे, वे प्रमुखतः लंदन, मैनचेस्टर, बर्मिंघम एवं न्यूकासल आदि शहरों में थे। इस सीमित विकास के कारण इसे क्राँति कहना ठीक नहीं है।

1760 ई० के दशक से 1820 ई० के दशक तक इंग्लैंड के सूती कपड़ा उद्योग का विकास हुआ। यह एक ऐसे कच्चे माल अर्थात् कपास पर निर्भर करता था जो कि बाहर एवं विशेष तौर पर भारत से मंगवाया जाता था। जो माल वहाँ तैयार होता था उसकी खपत इंग्लैंड में कम एवं विदेशों में अधिक होती थी। इसके अतिरिक्त इंग्लैंड में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक धातु से बनी मशीनें एवं भाप की शक्ति दुर्लभ रहीं। अत: इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्राँति को क्राँति नहीं कहा जा सकता।

क्राँति उसे कहा जाता है जो अचानक हो एवं जिसके समाज पर दूरगामी प्रभाव हों। उदाहरण के तौर पर 1776 ई० की अमरीकी क्रांति, 1789 ई० की फ्रांसीसी क्राँति, 1911 ई० की चीनी क्राँति एवं 1917 ई० की रूसी क्राँति ने बहुत कम समय में समाज में उल्लेखनीय परिवर्तन किए। दूसरी ओर औद्योगिक क्राँति ने समाज को परिवर्तित करने में काफी समय लिया। इसलिए इसे क्राँति नहीं कहा जा सकता।

2. दूसरा पक्ष (Second View) :
अनेक इतिहासकार औद्योगिक क्रांति को एक क्रांति मानते हैं। उनका कथन है कि इस क्राँति ने समाज को व्यापक रूप से प्रभावित किया। इंग्लैंड के प्रसिद्ध दार्शनिक एवं अर्थशास्त्री ऑरनॉल्ड टॉयनबी (Arnold Toynbee) ने ब्रिटेन में हुए औद्योगिक विकास के लिए अपनी पुस्तक लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड (Lectures on the Industrial Revolution in England) में जो 1884 ई० में प्रकाशित हुई प्रथम बार औद्योगिक परिवर्तनों के लिए क्राँति शब्द का प्रयोग किया। इसके पश्चात् इस शब्द का प्रचलन व्यापक हो गया।

इस पक्ष के इतिहासकारों का कहना है कि यद्यपि औद्योगिक परिवर्तन आने में काफी समय लग गया तथापि इन परिवर्तनों ने समाज को इतना प्रभावित किया कि इन्हें क्रांति कहना गलत न होगा। अपने पक्ष में तर्क देते हुए उनका कहना है कि

(1) उत्पादन के जो कार्य पहले हाथों से किए जाते थे वे अब मशीनों द्वारा किए जाने लगे।

(2) मशीनों को चलाने के लिए जल शक्ति की अपेक्षा भाप शक्ति का प्रयोग आरंभ हो गया।

(3) कृषि के लिए मशीनों का प्रयोग आरंभ हो गया। इस कारण कृषि के उत्पादन में काफी वृद्धि हुई।

(4) यातायात के साधनों में सुधार हुआ। पक्की सड़कों एवं नहरों का निर्माण हुआ। रेलों का प्रचलन बढ़ गया। इससे माल के आयात एवं निर्यात का कार्य सुगम एवं सस्ता हो गया। यात्रियों को भी एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने की सुविधा हो गई।

(5) रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग शहरों में आ गए।

(6) बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण अनेक नए शहर, बीमा एवं बैंकिंग सेवाएँ अस्तित्व में आई।

(7) उत्पादन में वृद्धि के कारण देश में खुशहाली आई।

(8) इसने लघु उद्योगों का अंत कर दिया एवं विशाल कारखानों की स्थापना की।

(9) इस कारण पूँजी के उपयोग में बहुत वृद्धि हुई।

(10) इसने कारखानों में काम करने वाले मजदूरों, स्त्रियों एवं बच्चों का जीवन दूभर बना दिया।

(11) इस कारण ब्रिटेन की जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि होने लगी।

(12) इसने विज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान में नवीन खोजों को प्रोत्साहित किया।

(13) श्रमिक वर्ग ने ट्रेड यूनियन एवं राजनीतिक अधिकारों की माँग की। निस्संदेह औद्योगिक परिवर्तनों ने समाज पर इतने दूरगामी प्रभाव डाले कि इन्हें क्रांति कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

क्रम संख्या

क्रम संख्यावर्षघटना
1.1694 ई०बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना।
2.1698 ई०थॉमस सेवरी द्वारा माइनर्स फ्रेंड का आविष्क़ार।
3.1709 ई०अब्राहम डर्बी द्वारा लोहे के प्रगलन में कोक का सर्वप्रथम प्रयोग।
4.1712 ई०थॉमस न्यूकॉमेन द्वारा भाप के इंजन का आविष्कार।
5.1733 ई०जॉन के द्वारा फ़लाइंग शटल का आविष्कार।
6.1755 ई०अब्राहम डर्बी द्वितीय द्वारा ढलवाँ लोहे से पिटवाँ लोहे का विकास।
7.1759 ई०जेम्स ब्रिंडले द्वारा वर्सले नहर का निर्माण।
8.1760-1820 ई०प्रथम औद्योगिक क्राँति।
9.1761 ई०वर्सले नहर को खोला जाना।
10.1764 ई०जेम्स हरग्रीज़ द्वारा स्पिनिंग जेनी का आविष्कार।
11.1769 ई०रिचर्ड आर्कराइट द्वारा वॉटर फ्रेम का आविष्कार।
12.1769 ई०जेम्स वॉट द्वारा भाप के इंजन का आविष्कार।
13.1775 ई०मैथ्यू बॉल्टन द्वारा सोहो की बर्मिघम में स्थापना।
14.1776 ई०जोन विल्किसन द्वारा अपनी धमन भट्ठी के लिए भाप इंजन का प्रयोग।
15.1779 ईअब्राहम डर्बी तृतीय द्वारा कोलब्नुकडेल में सेवर्न नदी पर विश्व का प्रथम लोहे का पुल बनाना।
16.1779 ई०सैम्यूअल क्राम्पटन द्वारा म्यूल का आविष्कार।
17.1784 ई०हेनरी कोर्ट द्वारा आलोड़न भट्ठी का आविष्कार।
18.1785 ई०एडमंड कार्टराइट द्वारा पॉवरलूम का आविष्कार।
19.1793-1815 ई०इंग्लैंड का फ्रॉंस के साथ युद्ध।
20.1799-1800 ई०ब्रिटेन द्वारा जुड़वाँ अधिनियम पारित करना।
21.1795-1840 ई०इंग्लैंड में ब्रेड के लिए दंगे।
22.1801 ई०रिचर्ड ट्रेविथिक द्वारा पफिंग डेविल न्ञामक रेल इंजन का निर्माण।
23.1802 ई०प्रथम कारखाना अधिनियम।
24.1814 ई०जॉर्ज स्टीफेनसन द्वारा ब्लचर नामक रेल इंजन का निर्माण।
25.1815 ई०हैंफरी डेवी द्वारा सेफ़टी लैंप का आविष्कार।
26.1815 ई०ब्रिटेन द्वारा अनाज कानून पारित करना।
27.1819 ई०पीटरलू नरसंहार, कारखाना अधिनियम।
28.1825 ई०सर्वप्रथम रेलवे का स्टॉकटन से डार्लिगटन तक आरंभ।
29.1830 ई०लिवरपूल एवं मैनचेस्टर को रेल द्वारा जोड़ा गया।
30.1833 ई०कारखाना अधिनियम।
31.1839 ई०मैनचेस्टर में अनाज विरोधी लीग की स्थापना।
32.1841 ई०ब्राडशाह द्वारा प्रथम रेलवे टाइम टेबल का प्रकाशन।
33.1842 ई०प्रथम खान अधिनियम।
34.1847 ई०10 घंटा अधिनियम।
35.1850 ई० के बादद्वितीय औद्योगिक क्राँति।
36.1856 ई०हेनरी बेस्सेमर द्वारा इस्पात की खोज।
37.1884 ई०ऑरनॉल्ड टॉयनबी की पुस्तक लेकचर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड का प्रकाशन।

संक्षिप्त उत्तरा वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक क्राँति से आप क्या समझते हो? किन कारणों के चलते इंग्लैंड में सबसे पहले औद्योगिक क्रांति शुरू हुई ?
अथवा
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के लिए कौन-से प्रमुख कारण उत्तरदायी थे?
उत्तर:
(1) अभिप्राय-औद्योगिक क्रांति से अभिप्राय उस क्राँति से है जो इंग्लैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों में 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में औद्योगिक क्षेत्र में हुई। इस कारण वस्तुओं का उत्पादन अब बहुत तीव्रता से एवं बड़ी बड़ी मशीनों द्वारा कारखानों में किया जाने लगा।

(2) राजनीतिक स्थिरता एवं शांति-18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में राजनीतिक स्थिरता एवं शांति थी। इससे इंग्लैंड में उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ। इंग्लैंड के शासक जॉर्ज तृतीय ने अपने शासनकाल (1760 ई०-1820 ई०) के दौरान इंग्लैंड को एक औद्योगिक देश बनाने के अथक प्रयास किए। उसके ये प्रयास काफी सीमा तक सफल सिद्ध हुए।

(3) शक्तिशाली नौसेना-उस समय इंग्लैंड के पास अन्य यूरोपीय देशों के मुकाबले सबसे अधिक शक्तिशाली नौसेना थी। इसलिए उसे ‘समुद्रों की रानी’ कहा जाता था। इस नौसेना के कारण वह एक ओर अपनी विदेशी आक्रमणों से सुरक्षा कर सका वहीं दूसरी ओर वह सुगमता से अपने निर्मित माल का विदेशों को निर्यात कर सका। इससे औद्योगिकीकरण को एक नया प्रोत्साहन मिला।

(4) इंग्लैंड के उपनिवेश-इंग्लैंड विश्व की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति था। अत: उसके यूरोप, एशिया एवं अफ्रीका में अनेक उपनिवेश थे। इन उपनिवेशों से उसे इंग्लैंड के उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल सस्ती दरों पर सुगमता से प्राप्त हो जाता था। दूसरी ओर इंग्लैंड के उद्योगों द्वारा निर्मित माल को यहाँ ऊँची दरों पर बलपूर्वक बेचा जाता था। इस कारण इंग्लैंड के उद्योगों ने अभूतपूर्व उन्नति की।

(5) पूँजी-किसी भी देश में उद्योगों के विकास में पूँजी की प्रमुख भूमिका होती है। उस समय इंग्लैंड में पूँजी की कोई कमी नहीं थी। इसके तीन कारण थे। प्रथम, उस समय इंग्लैंड की कृषि ने उल्लेखनीय विकास किया था। दूसरा, इंग्लैंड का विश्व व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित था। तीसरा, ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से व्यापक पैमाने पर धन का दोहन किया। अतः पूँजी की प्रचुरता ने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 2.
बताइए कि ब्रिटेन के औद्योगीकरण के स्वरूप पर कच्चे माल की आपूर्ति का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
औद्योगीकरण के कारण ब्रिटेन में बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना हुई। इन उद्योगों को चलाने हेतु कच्चे माल की अत्यधिक मात्रा में आवश्यकता थी। यह कच्चा माल बाहरी लोगों से मंगवाने की आवश्यकता पड़ी। क्योंकि हर प्रकार का कच्चा माल देश के अंदर मिलना संभव न था। इसलिए ब्रिटेन ने उन देशों के साथ मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया था, जहाँ से उन्हें कच्चा माल अधिक मात्रा में मिल सकता था।

अधिक लाभ कमाने के लिए वे इन देशों से कच्चा माल काफी सस्ते मूल्य पर खरीदते थे। शुरू-शुरू में ब्रिटेन के लोग व्यापारियों के रूप में एशिया तथा अफ्रीका के अनेक भागों में गए, परंतु बाद में उनकी कमज़ोर राजनीतिक स्थिति और पिछड़ेपन का लाभ उठाकर उन देशों पर अपना अधिकार कर लिया।

प्रश्न 3.
इस अवधि में किए गए आविष्कारों की दिलचस्प विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:

  • अब्राहम डर्बी द्वारा कोक का प्रयोग बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ। इससे लोहे के उत्पादन में वृद्धि हुई एवं उसकी गुणवत्ता बढ़ गई।
  • हैंफरी डेवी के सेफ़टी लैंप के कारण खानों में काम करने वाले मजदूरों का जीवन सुरक्षित हो गया।
  • जॉन के द्वारा किए गए फ़लाइंग शटल के आविष्कार के कारण बहुत कम समय में अधिक चौड़ा कपड़ा तैयार करना संभव हुआ।
  • जेम्स हरग्रीब्ज के स्पिनिंग जैनी के आविष्कार के कारण एक साथ आठ से दस धागे कातना संभव हुआ।
  • जेम्स वॉट का भाप इंजन कोयला एवं अन्य उद्योगों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ।

प्रश्न 4.
इंग्लैंड में नहरों के निर्माण में ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट्र एवं जेम्स ब्रिडले ने क्या योगदान दिया ?
उत्तर:
इंग्लैंड में नहरों के निर्माण में ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट एवं जेम्स ब्रिडले ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई। ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट्र की वसले में अनेक कोयला खानें थीं। वह यहाँ से अपने कोयले को निकट स्थित मैनचेस्टर में स्थापित उद्योगों तक कम खर्च में पहुँचाना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने 1758 ई० में जेम्स ब्रिडले जो कि एक प्रसिद्ध इंजीनियर था के साथ परामर्श किया।

जेम्स ब्रिडले ने उसे वर्सले से मैनचेस्टर तक एक नहर का निर्माण करने का परामर्श दिया। ब्रिजवाट ने इस परामर्श को स्वीकार किया तथा इस कार्य के लिए आवश्यक पूँजी जेम्स ब्रिडले को उपलब्ध करवायी। जेम्स ब्रिडले ने 1759 ई० में वर्सले कैनाल का निर्माण कार्य आरंभ किया।

इस नहर द्वारा वर्सले को मैनचेस्टर के साथ जोड़ा गया। यह नहर 10 मील लंबी थी। 1761 ई० में इस नहर का निर्माण कार्य पूरा हुआ तथा इसे यातायात के लिए खोला गया। यह इंग्लैंड की प्रथम नहर थी। निस्संदेह यह जेम्स बिंडले की एक महान् सफलता थी। इस नहर के कारण कोयले की कीमतें आधी हो गईं।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 5.
जॉर्ज स्टीफेनसन कौन था ? रेलवे के विकास में उसने क्या योगदान दिया ?
उत्तर:
जॉर्ज स्टीफेनसन इंग्लैंड का एक महान इंजीनियर था। रेलों के विकास में उसके उल्लेखनीय योगदा को देखते हए उसे ‘रेलों का पितामा’ कहा जाता है। उसने 1814 ई० में भाप से चलने वाला ब्लचर नामक इंजन तैयार किया। इसे केवल कोयला ढोने के लिए तैयार किया गया था। यह इंजन 30 टन भार का कोयला 4 मील प्रति घंटा की रफ्तार से एक पहाड़ी पर ले जा सकता था।

यात्रियों के लिए सर्वप्रथम रेल 1825 ई० में स्टॉकटन एवं डार्लिंगटन शहरों के मध्य चलाई गई। इसके इंजन को रॉकेट का नाम दिया गया। यह भाप से चलता था। यात्रियों के लिए इसमें 30 डिब्बे लगाए गए थे। इस इंजन को जॉर्ज स्टीफेनसन ने स्वयं प्रथम 9 मील तक चलाया था। इस यात्रा को तय करने में उसे 2 घंटे लगे थे। बाद में इस इंजन को 15 मील प्रति घंटा की रफ्तार से चलाया गया। निस्संदेह यह एक महान् घटना थी।

प्रश्न 6.
नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्षिक लाभ क्या-क्या हैं ?
उत्तर:
नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्षिक लाभ निम्नलिखित हैं

  • नहरों के कारण उद्योगों को बहुत लाभ पहुंचा। इसका कारण यह था कि माल की आवाजाई पर ख़र्च बहुत कम हो गया।
  • नहरों के निर्माण के कारण कृषि को बहुत प्रोत्साहन मिला। नहरों द्वारा सिंचाई के कारण फ़सलों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई।
  • इससे नहरों एवं नावों के निर्माण में लगे लोगों को बहुत लाभ पहुंचा।
  • रेलों के कारण लोगों को कम ख़र्च एवं कम समय में सफर करना सुगम हो गया।
  • रेलों के कारण औद्योगिक क्राँति को एक नया बल मिला।

प्रश्न 7.
औद्योगिक क्रांति के सामाजिक प्रभाव लिखिए।
उत्तर:
(1) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन की जनसंख्या में असाधारण वृद्धि हुई। यह 1871 ई० में 2.5 करोड़ थी जो 1901 ई० में बढ़ कर 4 करोड़ हो गई। इसका कारण यह था कि अनेक वैज्ञानिक खोजों के कारण मृत्यु दर में काफी कमी आ गई थी।

(2) औद्योगिक क्रांति के कारण पारिवारिक जीवन छिन्न-भिन्न हो गया। लोगों को रोजगार की तलाश में गाँवों को छोड़ कर शहरों में आना पड़ा। यहाँ परिवार के जिस सदस्य को जिस कारखाने में नौकरी मिलती वहीं काम करने लगता। इससे परिवार का विभिन्न सदस्यों पर नियंत्रण समाप्त हो गया। इससे समाज में अनेक कुरीतियों एवं अपराधों को प्रोत्साहन मिला।

(3) औद्योगिक क्रांति के कारण लंकाशायर, मैनचेस्टर, बर्मिंघम, लिवरपूल एवं लीड्स आदि शहर अस्तित्व में आए। शहरों में जनसंख्या में तीव्रता से बढ़ौतरी से सफ़ाई, स्वच्छ पेय-जल, यातायात एवं शिक्षा आदि की विभिन्न समस्याएँ उत्पन्न हुईं। कारखानों के आस-पास मज़दूरों के बस जाने से वहाँ गंदी बस्तियों की स्थापना हुई।

(4) उद्योगों में छोटे-छोटे बच्चे एवं स्त्रियाँ भी काम करती थीं। उनसे भी बहुत भयावह परिस्थितियों में काम कराया जाता था। वास्तव में उनका जीवन जानवरों से भी बदतर था।

प्रश्न 8.
औद्योगिक क्रांति के प्रमुख आर्थिक प्रभाव लिखें।
उत्तर:
(1) औद्योगिक क्राँति के कारण बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन मशीनों द्वारा किया जाने लगा। अतः लोगों को उत्तम वस्तुएँ सस्ते मूल्य पर उपलब्ध होने लगीं। इससे लोगों के जीवन स्तर में पहले की अपेक्षा काफी सुधार हुआ।

(2) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप लघु उद्योगों का अंत हो गया।

(3) औद्योगिक क्रांति ने कृषि क्राँति को प्रोत्साहन दिया। अतः फ़सलों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हो गई।

(4) उत्पादन में वृद्धि के कारण घरेलू एवं विदेशी व्यापार को एक नई दिशा मिली। इससे लोग बहुत समृद्धशाली हुए।

(5) औद्योगिक क्रांति के कारण यातायात के साधनों में अद्वितीय विकास हुआ। संपूर्ण ब्रिटेन में सड़कों, पुलों, नहरों एवं रेलों का निर्माण किया गया। इससे जहाँ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की सुगमता हो गई वहीं पर यह पहले की अपेक्षा काफी सस्ता हो गया। इससे माल की आवाजाही भी सुविधाजनक हो गयी।

(6) औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन को अपने कारखानों के लिए कच्चे माल की तथा तैयार माल को बेचने के लिए मंडियों की आवश्यकता हुई। अतः ब्रिटेन ने साम्राज्यवादी नीति को अपनाया।

प्रश्न 9.
औद्योगिक क्रांति के इंग्लैंड के श्रमिकों पर कैसा प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
औद्योगिक क्राँति से मजदूर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुआ। मजदूरों को प्रतिदिन काफी लंबे समय तक काम करने के लिए बाध्य किया जाता था। उन्हें कोई अवकाश नहीं दिया जाता था। काम के दौरान यदि कोई मजदूर सुस्त हो जाता अथवा नींद आ जाती तो उसे निर्दयता से पीटा जाता था। मालिक जब चाहता वह किसी भी मज़दूर को नौकरी से निकाल सकता था।

अत: मज़दूर के सामने अपने मालिक की शर्तों का पालन करने के अलावा कोई अन्य रास्ता न था। बीमार होने पर अथवा किसी अन्य कारण से काम पर न आने के कारण उस पर भारी जुर्माना लगाया जाता था। मज़दरों को अत्यंत भयावह स्थिति में काम करना पड़ता था। इस कारण वे भयानक बीमारियों के शिकार हो जाते थे।

यदि काम करते समय उसके साथ कोई दुर्घटना हो जाती तो कारखाना मालिक उसे किसी प्रकार का कोई मुआवज़ा नहीं देता था। संक्षेप में औद्योगिक क्रांति के कारण मजदूर वर्ग की स्थिति नरक समान हो गयी थी।

प्रश्न 10.
इंग्लैंड 1793 से 1815 ई० तक कई युद्धों में लिप्त रहा। इससे इंग्लैंड के उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
इंग्लैंड 1793 ई० से लेकर 1815 ई० तक कई युद्धों में लिप्त रहा। इसका इंग्लैंड के उद्योगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। इस कारण इंग्लैंड एवं यूरोप के मध्य चलने वाला व्यापार छिन्न-भिन्न हो गया। अत: अनेक उद्योगों को बाध्य होकर बंद करना पड़ा। इससे बेरोज़गारी में बढ़ौतरी हुई। खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छूने लगीं। परिणामस्वरूप ग़रीबों एवं मजदूरों के लिए जीवन दूभर हो गया। स्त्रियों एवं बच्चों की दशा पहले की अपेक्षा अधिक शोचनीय हो गई।

प्रश्न 11.
जुड़वाँ अधिनियम क्या थे ?
उत्तर:
ब्रिटेन की सरकार ने 1799 ई० एवं 1800 ई० में दो नियम पारित किए। इन्हें जुड़वाँ अधिनियम कहा जाता है। इन अधिनियमों के अधीन ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अब मज़दूर अपनी मज़दूरी बढ़ाने के लिए अथवा काम के घंटों को कम करने के लिए एक-दूसरे को सहयोग नहीं कर सकते थे। वे भाषण या लेखन द्वारा सम्राट.

संविधान अथवा सरकार के विरुद्ध नफ़रत नहीं फैला सकते थे अथवा लोगों को उकसा नहीं सकते थे। 50 से अधिक लोगों की अनाधिकत सार्वजनिक बैठकों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंड देने की व्यवस्था की गई। 1824 ई० में सरकार ने जुड़वाँ अधिनियम को रद्द कर दिया। अब मज़दूरों को ब्रिटेन में ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार प्राप्त हो गया।

प्रश्न 12.
लुडिज्म आंदोलन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
लुडिज्म आंदोलन इंग्लैंड में 1811 ई० से 1817 ई० के मध्य चला। इस आंदोलन को इंग्लैंड के कपड़ा मजदूरों द्वारा चलाया गया था। इस आंदोलन का नेतृत्व जनरल नेड लुड ने किया। इस आंदोलन की अनेक माँगें थीं-

  • मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दी जाए।
  • स्त्रियों एवं बच्चों के काम करने के समय को कम किया जाए एवं उन्हें ख़तरनाक मशीनों पर न लगाया जाए।
  • मजदूरों को ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार हो।

सरकार के विरुद्ध अपना विरोध प्रकट करने के उद्देश्य से उन्होंने वस्त्र मशीनों को नष्ट किया। वे इन मशीनों को उनके सभी कष्टों के लिए उत्तरदायी मानते थे। लुडिवादी अपने चेहरे को ढक कर रखते थे तथा वे अपनी कार्यवाही प्रायः रात के समय करते थे। उन्हें साधारण लोगों का काफी समर्थन प्राप्त था। इस आंदोलन का आरंभ 1811 ई० में नोटिंघम से हुआ था।

इसके पश्चात् यह ब्रिटेन के अनेक अन्य प्रसिद्ध शहरों में फैल गया। आंदोलनकारियों ने अनेक सूती एवं ऊनी वस्त्र की मिलों पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट कर दिया। सरकार ने दमन की नीति अपनाते हुए इस आंदोलन को कुचल दिया।

प्रश्न 13.
पीटरलू नरसंहार पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप मज़दूरों का जीवन नरक समान हो गया था। 16 से 18 घंटे प्रतिदिन जी तोड़ मेहनत करने के बावजूद उन्हें दो वक्त भर पेट खाना नसीब नहीं होता था। वे गंदी बस्तियों में निवास करते थे। वे अर्द्धनग्न घूमते रहते थे। उन्हें वोट के अधिकार से वंचित रखा गया था। 16 अगस्त, 1819 ई० को 80,000 लोग मैनचेस्टर के सेंट पीटर्स के मैदान में शांतिपूर्वक एकत्र हुए। उनका उद्देश्य अनाज कानूनों के विरुद्ध अपना विरोध जारी करना था तथा वोट के अधिकार, ट्रेड युनियन बनाने के अधिकार, सार्वजनिक सभाएँ करने तथा प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार की माँग करना था।

इस आंदोलन के प्रसिद्ध नेता रिचर्ड कारलाइल, जॉन कार्टराइट तथा हेनरी हंट थे। सरकार इस शांतिमय जनसभा को भी सहन करने को तैयार नहीं थी। अत: सरकार ने वहाँ घुड़सवार सेना भेज दी। इस सेना ने वहाँ लोगों को तितर-बितर करने के उद्देश्य से गोलियाँ चला दी। इस नरसंहार को पीटरलू के नाम से जाना जाता है। इसमें 11 लोगों की मृत्यु हुई एवं 400 से अधिक घायल हुए। इस नरसंहार के कारण संपूर्ण ब्रिटेन में रोष की लहर फैल गई।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.

औद्योगिक क्राँति से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति से अभिप्राय उस क्राँति से है जो इंग्लैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों में 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में औद्योगिक क्षेत्र में हुई। अतः वस्तुओं का उत्पादन अब घरों की अपेक्षा विशाल कारखानों में मशीनों द्वारा किया जाने लगा।

प्रश्न 2.
ऑरनॉल्ड टॉयनबी कौन था ? उसने किस प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की ? इसका प्रकाशन कब हुआ ?
उत्तर:

  • ऑरनॉल्ड टॉयनबी ब्रिटेन का प्रसिद्ध दार्शनिक एवं अर्थशास्त्री था।
  • उसने लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड की रचना की।
  • इसका प्रकाशन 1884 ई० में हुआ था।

प्रश्न 3.
सर्वप्रथम किस देश में औद्योगिक क्रांति आई तथा कब ?
उत्तर:

  • सर्वप्रथम औद्योगिक क्राँति ब्रिटेन में आई।
  • यह क्राँति 1760 ई० से 1820 ई० के मध्य आई।

प्रश्न 4.
ब्रिटेन में सर्वप्रथम औद्योगिक क्रांति क्यों आई ? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • ब्रिटेन के विश्व में स्थापित अनेक उपनिवेश।
  • ब्रिटेन के लोगों के पास पर्याप्त पूँजी का उपलब्ध होना।

प्रश्न 5.
बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना कब हुई थी ? 1820 ई० तक वहाँ कितने प्रांतीय बैंकों की स्थापना हो चुकी थी ?
उत्तर:

  • बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना 1694 ई० में हुई थी।
  • 1820 ई० तक इंग्लैंड में 600 प्राँतीय बैंकों की स्थापना हो चुकी थी।

प्रश्न 6.
किन्हीं चार खनिज पदार्थों के नाम बताएँ जिन्होंने इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति में प्रमुख भूमिका निभाई ?
उत्तर:
इंग्लैंड की औद्योगिक क्राँति में कोयला, लोहा, सीसा एवं ताँबा ने प्रमुख भूमिका निभाई।

प्रश्न 7.
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड के किन चार प्रसिद्ध उद्योगों ने औद्योगिक क्रांति लाने में प्रशंसनीय योगदान दिया ?
उत्तर:
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड के कोयला और लोहा उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, भाप की शक्ति एवं रेलों के उद्योग ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

प्रश्न 8.
किस खनिज को ‘काला सोना’ एवं ‘उद्योगों की जननी’ के नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
कोयले को काला सोना एवं उद्योगों की जननी के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 9.
लोहा प्रगलन के लिए काठ कोयले के प्रयोग की कोई दो समस्याएँ लिखें।
उत्तर:

  • काठ कोयला लंबी दूरी तक ले जाते समय टूट जाता था।
  • कोयले की अशुद्धता के कारण घटिया किस्म के लोहे का उत्पादन होता था।

प्रश्न 10.
लोहा प्रगलन में कोक का प्रयोग किस प्रकार लाभकारी सिद्ध हुआ ?
उत्तर:

  • कोक में उच्च तापमान उत्पन्न करने की शक्ति थी।
  • यह काठ कोयले से बहुत सस्ता पड़ता था।
  • इसका प्रयोग बड़ी धमन भट्ठियों में किया जाना संभव हुआ।

प्रश्न 11.
जोन विल्किनसन ने लोहे का प्रयोग किन वस्तुओं के निर्माण के लिए किया ?
उत्तर:

  • उसने लोहे की कुर्सियाँ बनाईं।
  • उसने शराब की भट्ठियों के लिए टंकियाँ बनाईं।
  • उसने विभिन्न आकारों की लोहे की पाइपें बनाईं।

प्रश्न 12.
सेफ़टी लैंप का आविष्कार किसने तथा कब किया था ?
उत्तर:
सेफ़टी लैंप का आविष्कार हैंफरी डेवी ने 1815 ई० में किया था।

प्रश्न 13.
फ़लाइंग शटल का आविष्कार किसने तथा कब किया ?
उत्तर:
फ़लाइंग शटल का आविष्कार जॉन के ने 1733 ई० में किया।

प्रश्न 14.
स्पिनिंग जेनी का आविष्कार किसने तथा कब किया था ?
उत्तर:
स्पिनिंग जेनी का आविष्कार जेम्स हरग्रीव्ज़ ने 1764 ई० में किया था।

प्रश्न 15.
वॉटर फ्रेम का आविष्कार किसने तथा कब किया था ? इसका क्या लाभ हुआ ?
उत्तर:

  • वॉटर फ्रेम का आविष्कार रिचर्ड आर्कराइट ने 1769 ई० में किया था।
  • इससे धागे की कताई एवं बुनाई बहुत तेजी से की जाने लगी।

प्रश्न 16.
सैम्यअल काम्पटन किस आविष्कार के लिए प्रसिद्ध थे ? इसका क्या लाभ हआ ?
उत्तर:

  • सैम्यूअल क्राम्पटन म्यूल आविष्कार के लिए प्रसिद्ध थे।
  • इससे कता हुआ धागा बहुत मज़बूत और बढ़िया होता था।

प्रश्न 17.
पॉवरलूम का आविष्कार किसने तथा कब किया था ?
उत्तर:
पॉवरलूम का आविष्कार एडमंड कार्टराइट ने 1785 ई० में किया था।

प्रश्न 18.
किन्हीं दो आविष्कारों के नाम बताएँ जिन्होंने वस्त्र उद्योग में क्रांति ला दी। इनके आविष्कारकों के नाम भी बताएँ।
उत्तर:

  • जॉन के की फ़लाइंग शटल।
  • जेम्स हरग्रीब्ज की स्पिनिंग जेनी।

प्रश्न 19.
भाप की शक्ति के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:

  • इससे अनेक प्रकार की मशीनों को चलाया जा सकता था।
  • इस पर खर्चा भी कम आता था।

प्रश्न 20.
अश्व शक्ति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
अश्व शक्ति माप की इकाई थी। यह एक घोड़े की एक मिनट में एक फुट तक 33,000 पौंड वज़न उठाने की क्षमता के समकक्ष थी। इसका आविष्कार जेम्स वॉट ने किया था।

प्रश्न 21.
माइनर्स फ्रेंड का आविष्कार किसने तथा कब किया ? इसका क्या उपयोग था ?
उत्तर:

  • माइनर्स फ्रेंड का आविष्कार थॉमस सेवरी ने 1698 ई० में किया।
  • इसका प्रयोग खानों से पानी बाहर निकालने के लिए किया जाता था।

प्रश्न 22.
माइनर्स फ्रेंड क्यों असफल रहा ? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • यह छिछली गहराइयों में बहुत धीरे-धीरे काम करता था।
  • दबाव के अधिक हो जाने के कारण उसका बॉयलर फट जाता था।

प्रश्न 23.
थॉमस न्यूकॉमेन के भाप के इंजन के कोई दो दोष लिखें।
उत्तर:

  • यह बहुत भारी था।
  • इसमें काफी मात्रा में ईंधन नष्ट होता था।

प्रश्न 24.
जेम्स वॉट ने भाप के इंजन का आविष्कार कब किया ? इसका कोई एक लाभ (utility) बताएँ।
उत्तर:

  • जेम्स वॉट ने भाप के इंजन का आविष्कार 1769 ई० में किया।
  • यह बहुत व्यावहारिक एवं कम खर्चीला था।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 25.
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में नहरें किस उद्देश्य के साथ बनायी गई थीं ?
उत्तर:
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में नहरें कोयले को शहरों में स्थित उद्योगों तक पहुँचाने के लिए बनाई गई थीं। इसका कारण यह था कि इसमें सड़क मार्ग की अपेक्षा कम समय लगता था एवं खर्चा भी कम आता था।

प्रश्न 26.
वर्सले कैनाल का निर्माण किसने तथा कब किया था ? इसका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • वर्सले कैनाल का निर्माण जेम्स ब्रिडले ने 1759 ई० में किया था।
  • इसका उद्देश्य वर्सले से मैनचेस्टर तक कम खर्चे पर कोयले को पहुँचाना था।

प्रश्न 27.
वर्सले कैनाल को कब खोला गया था ? इसका क्या महत्त्व था ?
उत्तर:

  • वर्सले कैनाल को 1761 ई० में खोला गया था।
  • इस कारण इंग्लैंड में कोयले की कीमतें आधी हो गईं।

प्रश्न 28.
इंग्लैंड में नहरों के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:

  • नहरों के निर्माण से अनेक नए शहर अस्तित्व में आए।
  • नहरों का निर्माण जिन क्षेत्रों में हुआ वहाँ भूमि के मूल्य बहुत बढ़ गए।

प्रश्न 29.
जॉर्ज स्टीफेनसन ने 1814 ई० में किस रेल इंजन का निर्माण किया ? इसकी रफ्तार कितनी थी ?
उत्तर:

  • जॉर्ज स्टीफेनसन ने 1814 ई० में ब्लचर नामक रेल इंजन का निर्माण किया था।
  • इसकी रफ्तार 4 मील प्रति घंटा थी।

प्रश्न 30.
इंग्लैंड में सर्वप्रथम रेलगाडी कब तथा किन दो शहरों के मध्य चलाई गई थी ?
उत्तर:
इंग्लैंड में सर्वप्रथम रेलगाड़ी 1825 ई० में स्टॉकटन एवं डार्लिंगटन शहरों के मध्य चलाई गई थी।

प्रश्न 31.
ब्रिटेन में रेलों के विकास के कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इससे माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना सुगम हो गया।
  • लोगों के लिए सफर करना अब आसान एवं कम खर्चीला हो गया।

प्रश्न 32.
नहर और रेलवे के परिवहन के साधन के रूप में क्या-क्या लाभ हैं ?
उत्तर:

  • इससे शहरीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई।
  • इससे माल को एक स्थान से दसरे स्थान पर ले जाना कम खर्चीला हो गया।
  • इससे लोगों के लिए सफर करना सुगम हो गया।

प्रश्न 33.
औद्योगिक क्रांति के कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इस कारण ब्रिटेन की जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई।
  • अब बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन मशीनों द्वारा किया जाने लगा।

प्रश्न 34.
औद्योगिक क्रांति के कोई दो सामाजिक प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • औद्योगिक क्रांति के कारण शहरी जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई।
  • इस क्राँति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन का समाज दो वर्गों पूँजीपतियों एवं मजदूरों में बँट गया।

प्रश्न 35.
औद्योगिक क्रांति के कोई दो आर्थिक प्रभाव बताएँ।
उत्तर:

  • औद्योगिक क्राँति ने कृषि क्राँति को प्रोत्साहित किया।
  • इससे ब्रिटेन के घरेलू एवं विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 36.
औद्योगिक क्रांति के कोई दो राजनीतिक प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • औद्योगिक क्राँति के कारण ब्रिटेन फ्राँस एवं नेपोलियन के साथ युद्धों का डट कर सामना कर सका।
  • मज़दूरों ने श्रमिक संघों के निर्माण के लिए एक लंबा संघर्ष चलाया।

प्रश्न 37.
कारखाना पद्धति से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
कारखाना पद्धति से अभिप्राय उस पद्धति से है जिसके अंतर्गत उत्पादन घरों की अपेक्षा कारखानों में होने लगा। इनमें हाथों की अपेक्षा मशीनों द्वारा उत्पादन किया जाता था।

प्रश्न 38.
ब्रिटेन के कारखानों में प्रायः स्त्रियों एवं बच्चों को काम पर क्यों लगाया जाता था ? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • स्त्रियों एवं बच्चों को पुरुषों की अपेक्षा कम मजदूरी देनी पड़ती थी।
  • वे काम की घटिया परिस्थितियाँ होने के बावजूद कम आंदोलित होते थे।

प्रश्न 39.
कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर:

  • उन्हें कठोर अनुशासन में बहुत भयावह परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।
  • उनका वेतन इतना कम था कि उन्हें दो वक्त भर पेट खाना नसीब नहीं होता था।

प्रश्न 40.
ब्रिटेन में विरोध आंदोलन आरंभ होने के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • कारखानों में काम करने की कठोर परिस्थितियाँ।
  • श्रमजीवी लोगों को मताधिकार प्राप्त न होना।

प्रश्न 41.
इंग्लैंड का फ्राँस के साथ युद्ध कब से कब तक चला ? इस युद्ध का कोई एक प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इंग्लैंड का फ्रांस के साथ युद्ध 1793 ई० से 1815 ई० तक चला।
  • इस कारण इंग्लैंड एवं यूरोप के मध्य चलने वाला व्यापार छिन्न-भिन्न हो गया।

प्रश्न 42.
ब्रिटेन 1793 ई० से 1815 ई० तक कई युद्धों में लिप्त रहा। इसका ब्रिटेन के उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:

  • अनेक उद्योगों को बंद करना पड़ा।
  • बेरोज़गारी में वृद्धि हुई।
  • खाद्य पदार्थों की कीमतें बहुत बढ़ गईं।

प्रश्न 43.
ब्रिटेन की सरकार द्वारा जुड़वाँ अधिनियम कब पारित किए गए ? इनका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • ब्रिटेन की सरकार द्वारा जुड़वाँ अधिनियम 1799-1800 ई० में पारित किए गए।
  • इनका उद्देश्य श्रमिक संघों पर प्रतिबंध लगाना था।

प्रश्न 44.
ब्रिटेन में अनाज कानून कब पारित किए गए ? इनका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • ब्रिटेन में अनाज कानून 1815 ई० में पारित किए गए।
  • इनका उद्देश्य जब तक ब्रिटेन में अनाज की कीमत में एक स्वीकृत स्तर तक वृद्धि न हो जाए तब तक विदेश से अनाज के आयात पर प्रतिबंध लगाया जाए।

प्रश्न 45.
अनाज विरोधी कानून लीग की स्थापना कब और कहाँ की गई ? इसके दो महत्त्वपूर्ण सदस्यों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • अनाज विरोधी कानून लीग की स्थापना 1839 ई० में मैनचेस्टर में की गई।
  • इसके दो महत्त्वपूर्ण सदस्यों के नाम रिचर्ड काब्डन एवं जॉन ब्राइट थे।

प्रश्न 46.
ब्रिटेन में ब्रेड के लिए दंगे क्यों हुए. ? ये कब से लेकर कब तक चले ?
उत्तर:

  • ब्रिटेन में ब्रेड के लिए दंगे इसलिए हुए क्योंकि उनके मूल्यों में बहुत वृद्धि हो गई थी।
  • ऐसे दंगे 1795 ई० से लेकर 1840 ई० तक चले।

प्रश्न 47.
बाड़ा पद्धति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
बाड़ा पद्धति से अभिप्राय शक्तिशाली ज़मींदारों द्वारा छोटे-छोटे खेतों को अपने बड़े फार्मों में सम्मिलित करना था। ब्रिटेन में ऐसा 1770 ई० के दशक में किया गया।

प्रश्न 48.
ब्रिटेन में लुडिज्म आंदोलन कब चला ? इस आंदोलन का प्रसिद्ध नेता कौन था ?
उत्तर:

  • ब्रिटेन में लुडिज्म आंदोलन 1811 ई० से 1817 ई० तक चला।
  • इस आंदोलन का प्रसिद्ध नेता जनरल नेड लुड था।

प्रश्न 49.
लुडिज्म आंदोलन की कोई दो माँगें लिखें।
उत्तर:

  • मज़दूरों को न्यूनतम मजदूरी दी जाए।
  • मजदूरों को श्रमिक संघ बनाने की अनुमति दी जाए।

प्रश्न 50.
लडिज्म आंदोलन क्या था ?
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं0 48 तथा 49 का उत्तर देंखे।

प्रश्न 51.
पीटरलू नरसंहार कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर:
पीटरलू नरसंहार 1819 ई० में मैनचेस्टर में हुआ।

प्रश्न 52.
ब्रिटेन में प्रथम कारखाना अधिनियम कब पारित किया गया था ? इसकी कोई एक धारा लिखें।
उत्तर:

  • ब्रिटेन में प्रथम कारखाना अधिनियम 1802 ई० में पारित किया गया।
  • किसी भी बच्चे से 12 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 53.
कारखाना कानून ( 1819 ई०) क्या था ?
उत्तर:

  • 9 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर न लगाया जाए।
  • बच्चों को भोजन के लिए 1.30 घंटे का विश्राम दिया जाए।

प्रश्न 54.
1833 ई० के कारखाना अधिनियम की कोई दो धाराएँ लिखें।
उत्तर:

  • 13 से 17 वर्ष तक के बच्चों से 10 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • कारखानों के निरीक्षण के लिए इंस्पैक्टर नियुक्त किए गए।

प्रश्न 55.
1842 ई० के खान अधिनियम की कोई दो धाराएँ लिखें।
उत्तर:

  • इसने खानों में स्त्रियों के काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • इसने खानों के निरीक्षण के लिए नियमित इंस्पैक्टर नियुक्त किए।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम किस देश में आई ?
उत्तर:
इंग्लैंड।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्राँति कब आई ?
उत्तर:
1760 ई०-1820 ई० के मध्य।

प्रश्न 3.
औद्योगिक क्रांति का अंग्रेज़ी में प्रथम बार उपयोग किसने किया ?
उत्तर:
ऑरनॉल्ड टॉयनबी ने।।

प्रश्न 4.
ऑरनॉल्ड टॉयनबी द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक का नाम लिखें।
उत्तर:
लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड।

प्रश्न 5.
औद्योगिक क्रांति के समय इंग्लैंड में किसका शासन था ?
उत्तर:
जॉर्ज तृतीय।

प्रश्न 6.
विश्व की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति कौन था ?
उत्तर:
इंग्लैंड।

प्रश्न 7.
बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना कब हुई ?
उत्तर:
1694 ई० में।

प्रश्न 8.
काला सोना किसे कहा जाता है ?
उत्तर:
कोयले को।

प्रश्न 9.
लोहे के प्रगलन के लिए सर्वप्रथम लोहे का प्रयोग किसने किया ?
उत्तर:
अब्राहम डर्बी प्रथम ने।

प्रश्न 10.
ढलवाँ लोहे से पिटवाँ लोहे का विकास कब हुआ ?
उत्तर:
1755 ई० में।

प्रश्न 11.
आलोड़न भट्ठी का आविष्कार किसने किया ?
उत्तर:
हेनरी कोर्ट ने।

प्रश्न 12.
विश्व में लोहे का पहला पुल कब बनाया गया ?
उत्तर:
1779 ई० में।

प्रश्न 13.
विश्व में पहला लोहे का पुल कहाँ बनाया गया था ?
उत्तर:
कोलबुकडेल में।

प्रश्न 14.
हैंफरी डेवी किस आविष्कार के लिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर:
सेफ़टी लैंप।

प्रश्न 15.
सेफ़टी लैंप का आविष्कार कब हुआ था ?
उत्तर:
1815 ई० में।

प्रश्न 16.
किस विज्ञानी ने लोहे को शुद्ध करके इस्पात बनाने की विधि खोज निकाली थी ?
उत्तर:
हेनरी बेस्सेमर ने।

प्रश्न 17.
जॉन के ने किसका आविष्कार किया था ?
उत्तर:
फ़लाइंग शटल का।

प्रश्न 18.
जेम्स हरग्रीब्ज़ ने स्पिनिंग जेनी का आविष्कार कब किया था ?
उत्तर:
1764 ई० में।

प्रश्न 19.
वॉटर फ्रेम का आविष्कार किसने किया था ?
उत्तर:
रिचर्ड आर्कराइट ने।

प्रश्न 20.
सैम्यूअल क्राम्पटन ने म्यूल का आविष्कार कब किया था ?
उत्तर:
1779 ई० में।

प्रश्न 21.
पॉवरलूम का आविष्कार किसने किया था ?
उत्तर:
एडमंड कार्टराइट ने।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 22.
माइनर्स फ्रेंड का आविष्कार किसने किया था ?
उत्तर:
थॉमस सेवरी ने।

प्रश्न 23.
भाप इंजन का आविष्कार किसने किया था ?
उत्तर:
जेम्स वॉट ने।

प्रश्न 24.
जेम्स वॉट ने भाप इंजन का आविष्कार कब किया था ?
उत्तर:
1769 ई० में।

प्रश्न 25.
सोहो फाउँडरी का निर्माण कहाँ किया गया था ?
उत्तर:
बर्मिंघम में।

प्रश्न 26.
वर्सले कैनाल का निर्माण किसने किया था ?
उत्तर:
जेम्स ब्रिडले ने।

प्रश्न 27.
वर्सले कैनाल को किस वर्ष चालू किया गया ?
उत्तर:
1761 ई० में।

प्रश्न 28.
रिचर्ड ट्रेविथिक ने 1801 ई० में किस इंजन का निर्माण किया था ?
उत्तर:
पफिंग डेविल का।

प्रश्न 29.
‘रेलों का पितामा’ किसे कहा जाता है ?
उत्तर:
जॉर्ज स्टीफेनसन को।

प्रश्न 30.
भाप इंजन का आविष्कार कब हुआ ?
उत्तर:
1769 ई० में।

प्रश्न 31.
इंग्लैंड में प्रथम रेल को कब चलाया गया ?
उत्तर:
1825 ई० में।

प्रश्न 32.
इंग्लैंड एवं फ्रांस के मध्य एक दीर्घकालीन युद्ध कब से कब तक चला ?
उत्तर:
1793 ई० से 1815 ई० तक।

प्रश्न 33.
ब्रिटेन की सरकार ने जुड़वाँ अधिनियम कब पारित किए ?
उत्तर:
1799-1800 ई०।

प्रश्न 34.
ब्रिटेन की सरकार ने अनाज कानून कब पारित किए ?
उत्तर:
1815 ई०।

प्रश्न 35.
अनाज कानून विरोधी लीग के किसी एक नेता का नाम लिखिए।
उत्तर:
रिचर्ड काब्डन।

प्रश्न 36.
इंग्लैंड में ब्रैड के लिए दंगे कब शुरू हुए ?
उत्तर:
1795 ई० में।

प्रश्न 37.
इंग्लैंड में चलने वाले लुडिज्म आंदोलन का नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर:
जनरल नेड लुड ने।

प्रश्न 38.
पीटरलू नरसंहार कब हुआ ?
उत्तर:
1819 ई० में।

प्रश्न 39.
इंग्लैंड की सरकार ने प्रथम कारखाना अधिनियम कब पारित किया था ?
उत्तर:
1802 ई० में।

प्रश्न 40.
इंग्लैंड में प्रथम खान अधिनियम कब पारित हुआ था?
उत्तर:
1842 ई० में।

प्रश्न 41.
किस अधिनियम के अधीन मज़दूरों द्वारा 10 घंटे प्रतिदिन काम की माँग को स्वीकार कर लिया गया ?
उत्तर:
कारखाना अधिनियम 1847 ई०।

रिक्त स्थान भरिए

1. ………………. पहला देश था जिसने सर्वप्रथम औद्योगिकीकरण का अनुभव किया था।
उत्तर:
इंग्लैंड

2. औद्योगिक क्राँति शब्द का अंग्रेजी में प्रयोग सर्वप्रथम ………………. ने किया था।
उत्तर:
ऑरनॉल्ड टॉयनबी

3. उजड़ा गाँव अंग्रेज़ी के सुप्रसिद्ध लेखक ……………… की कविता है।
उत्तर:
ओलिवर गोल्डस्मिथ

4. काला सोना ……………….. को कहा जाता था।
उत्तर:
कोयला

5. धमनभट्टी का आविष्कार ……………….. ई० में किया गया था।
उत्तर:
1709

6. धमनभट्टी का आविष्कार ……………… द्वारा किया गया था।
उत्तर:
अब्राहम डर्बी

7. आलोडन भट्टी का आविष्कार ……………….. ने किया था।
उत्तर:
हेनरी कोर्ट

8. फलाइंग शटल का निर्माण ……………….. द्वारा किया गया था।
उत्तर:
जॉन के

9. जेम्स हरग्रीब्ज द्वारा ……………….. का आविष्कार किया गया था।
उत्तर:
स्पीनिंग मशीन

10. वॉटर फ्रेम का आविष्कार ……………….. द्वारा किया गया था।
उत्तर:
रिचर्ड आर्कराइट

11. सैम्यूअल क्राम्पटन द्वारा म्यूल का आविष्कार ……………….. ई० में किया गया।
उत्तर:
1779

12. भाप इंजन का आविष्कार ………….. द्वारा किया गया था।
उत्तर:
जेम्स वॉट

13. इंग्लैंड की पहली नहर का नाम ……………….. था।
उत्तर:
वर्सले कैनाल

14. इंग्लैंड में पहली नहर का निर्माण ……………… द्वारा किया गया था।
उत्तर:
जेम्स ब्रिडले

15. इंग्लैंड में सर्वप्रथम रेल …………….. में चलाई गई थी।
उत्तर:
1825 ई०

16. प्रथम कारखाना अधिनियम ……………….. ई० में पारित किया गया।
उत्तर:
1802

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. औद्योगिक क्रांति का आरंभ कब हुआ ?
(क) 15वीं शताब्दी में
(ख) 16वीं शताब्दी में
(ग) 17वीं शताब्दी में
(घ) 18वीं शताब्दी में।
उत्तर:
(घ) 18वीं शताब्दी में।

2. औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम किस देश में आरंभ हुई ?
(क) फ्राँस
(ख) इंग्लैंड
(ग) रूस
(घ) जर्मनी।
उत्तर:
(ख) इंग्लैंड

3. इंग्लैंड के शासक जॉर्ज तृतीय का शासनकाल कब आरंभ हुआ ?
(क) 1720 ई० में
(ख) 1750 ई० में
(ग) 1760 ई० में
(घ) 1820 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1760 ई० में

4. किस देश को ‘समुद्रों की रानी’ कहा जाता था ?
(क) भारत
(ख) चीन
(ग) इराक
(घ) इंग्लैंड।
उत्तर:
(घ) इंग्लैंड।

5. बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना कब हुई थी ?
(क) 1605 ई० में
(ख) 1694 ई० में
(ग) 1705 ई० में
(घ) 1734 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1694 ई० में

6. 19वीं शताब्दी के आरंभ में इंग्लैंड का कौन-सा शहर जनसंख्या के दृष्टिकोण से सबसे बड़ा था ?
(क) लंदन
(ख) लीड्स
(ग) लिवरपूल
(घ) मैनचेस्टर।
उत्तर:
(क) लंदन

7. निम्नलिखित में से किसे उद्योगों की जननी कहा जाता है ?
(क) लोहा
(ख) इस्पात
(ग) कोयला
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ग) कोयला

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

8. निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने सर्वप्रथम कोक का प्रयोग किया ?
(क) अब्राहम डर्बी प्रथम
(ख) अब्राहम डर्बी द्वितीय
(ग) जॉन के
(घ) थॉमस सेवरी।
उत्तर:
(क) अब्राहम डर्बी प्रथम

9. आलोड़न भट्ठी का आविष्कार किसने किया ?
(क) अब्राहम डर्बी तृतीय ने
(ख) हेनरी कोर्ट ने ।
(ग) हैम्फरी डेवी ने
(घ) एडमंड कार्टराइट ने।
उत्तर:
(ख) हेनरी कोर्ट ने ।

10. विश्व का प्रथम लोहे का पुल किस नदी पर बनाया गया था ?
(क) थेम्स
(ख) सेवन
(ग) गँगा
(घ) अमेजन।
उत्तर:
(ख) सेवन

11. हैंफरी डेवी ने सेफ़टी लैंप का आविष्कार कब किया था ?
(क) 1805 ई० में
(ख) 1810 ई० में
(ग) 1815 ई० में
(घ) 1835 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1815 ई० में

12. हेनरी बेस्सेमर ने लोहे को शुद्ध करके इस्पात बनाने की विधि कब खोज निकाली ?
(क) 1815 ई० में
(ख) 1825 ई० में
(ग) 1836 ई० में
(घ) 1856 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1856 ई० में।

13. फ़लाइंग शटल का आविष्कारक किसने किया ?
(क) हरग्रीब्ज ने
(ख) जेम्स वॉट ने
(ग) रिचर्ड आर्कराइट ने
(घ) जॉन के ने।
उत्तर:
(घ) जॉन के ने।

14. म्यूल का आविष्कार किसने किया था ?
(क) सैम्यूअल क्राम्पटन
(ख) जॉन के
(ग) जेम्स हरग्रीव्ज
(घ) रिचर्ड आर्कराइट।
उत्तर:
(ग) जेम्स हरग्रीव्ज

15. रिचर्ड आर्कराइट ने वॉटर फ्रेम का आविष्कार कब किया ?
(क) 1733 ई० में
(ख) 1764 ई० में
(ग) 1765 ई० में
(घ) 1769 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1769 ई० में।

16. पावरलूम का आविष्कार किसने किया था ?
(क) सैम्यूअल क्राम्पटन ने
(ख) एडमंड कार्टराइट ने
(ग) जॉन के ने
(घ) रिचर्ड आर्कराइट ने।
उत्तर:
(ख) एडमंड कार्टराइट ने

17. जेम्स वॉट ने निम्नलिखित में से किसका आविष्कार किया ?
(क) पावरलूम
(ख) म्यूल
(ग) वॉटर फ्रेम
(घ) भाप इंजन।
उत्तर:
(घ) भाप इंजन।

18. वर्सले कैनाल के निर्माण में निम्नलिखित में से किसने योगदान दिया ?
(क) मैथ्यू बॉल्टन
(ख) थॉमस न्यूकॉमेन
(ग) जेम्स ब्रिडले
(घ) रिचर्ड ट्रेविथिक।
उत्तर:
(ग) जेम्स ब्रिडले

19. वर्सले कैनाल को यातायात के लिए किस वर्ष खोला गया था ?
(क) 1759 ई० में
(ख) 1761 ई० में
(ग) 1767 ई० में
(घ) 1771 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1761 ई० में

20. पफिंग डेविल नामक इंजन का आविष्कार किसने किया था ?
(क) रिचर्ड ट्रेविथिक ने
(ख) जेम्स वॉट ने
(ग) जॉर्ज स्टीफेनसन ने
(घ) थॉमस सेवरी ने।
उत्तर:
(क) रिचर्ड ट्रेविथिक ने

21. ‘रेलों का पितामा’ किसे कहा जाता है ?
(क) रिचर्ड ट्रेविथिक को
(ख) जॉर्ज स्टीफेनसन को
(ग) ड्यूक ऑफ़ विलिंगटन को
(घ) आई० के० बरुनल को।
उत्तर:
(ख) जॉर्ज स्टीफेनसन को

22. इंग्लैंड में प्रथम रेल को कब चलाया गया ?
(क) 1805 ई० में
(ख) 1814 ई में
(ग) 1825 ई० में
(घ) 1841 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1825 ई० में

23. इंग्लैंड की प्रथम रेल किन दो शहरों के मध्य चलाई गई ?
(क) स्टॉकटन एवं डार्लिंगटन
(ख) लंदन एवं लीड्स
(ग) लंदन एवं मैनचेस्टर
(घ) स्टॉकटन एवं लिवरपूल।
उत्तर:
(क) स्टॉकटन एवं डार्लिंगटन

24. ‘सड़क-निर्माता’ किसे कहा जाता है ?
(क) जेम्स ब्रिडले को
(ख) जॉन के को
(ग) जॉन मेटकॉफ को
(घ) एडमंड कार्टराइट को।
उत्तर:
(ग) जॉन मेटकॉफ को

25. औद्योगिक क्रांति के समय मैनचेस्टर में मजदूरों का जीवनकाल क्या था ?
(क) 12 वर्ष
(ख) 15 वर्ष
(ग) 17 वर्ष
(घ) 21 वर्ष।
उत्तर:
(ग) 17 वर्ष

26. इंग्लैंड का फ्रांस के साथ एक दीर्घकालीन युद्ध कब आरंभ हुआ ?
(क) 1792 ई० में
(ख) 1793 ई० में
(ग) 1795 ई० में
(घ) 1799 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1793 ई० में

27. इंग्लैंड की सरकार ने जुड़वाँ अधिनियम को कब रद्द किया ?
(क) 1799 ई० में
(ख) 1800 ई० में
(ग) 1815 ई० में
(घ) 1824 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1824 ई० में।

28. अनाज कानून विरोधी लीग की स्थापना कहाँ की गई थी ?
(क) लीड्स में
(ख) लंदन में
(ग) मैनचेस्टर में
(घ) बर्मिंघम में।
उत्तर:
(ग) मैनचेस्टर में

29. इंग्लैंड में ब्रैड के लिए दंगों का सिलसिला कब तक चला ?
(क) 1793 ई० तक
(ख) 1795 ई० तक
(ग) 1830 ई० तक
(घ) 1840 ई० तक।
उत्तर:
(घ)

30. लुडिज्म आंदोलन का नेतृत्व किसने किया ?
(क) जनरल नेड लुड ने
(ख) रिचर्ड काब्डन
(ग) जॉन ब्राइट
(घ) आई० के० बरुनल।
उत्तर:
(क) जनरल नेड लुड ने

31. पीटरलू नरसंहार कब हुआ था ?
(क) मार्च 1793 में
(ख) जून 1807 में
(ग) अमरर, 1819 में
(घ) दिसंबर 1830 में।
उत्तर:
(ग) अमरर, 1819 में

32. पीटरलू नरसंहार कहाँ हुआ ?
(क) लंदन में
(ख) मैनचेस्टर में
(ग) लिवरपूल में
(घ) वेल्स में।
उत्तर:
(ख) मैनचेस्टर में

33. निम्नलिखित में से कौन-सा नेता पीटरलू नरसंहार से संबंधित नहीं था ?
(क) जॉन ब्राइट
(ख) रिचर्ड कारलाइल
(ग) जॉन कार्टराइट
(घ) हेनरी हंट।
उत्तर:
(क) जॉन ब्राइट

34. इंग्लैंड में प्रथम कारखाना अधिनियम कब पारित हुआ था ?
(क) 1801 ई० में
(ख) 1802 ई० में
(ग) 1819 ई० में
(घ) 1833 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1802 ई० में

35. किस अधिनियम के अधीन इंग्लैंड के कारखानों में 9 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम करने की मनाही कर दी गई थी ?
(क) 1802 ई० के
(ख) 1819 ई० के
(ग) 1833 ई० के
(घ) 1842 ई० के।
उत्तर:
(ख) 1819 ई० के

36. किस अधिनियम के अधीन इंग्लैंड में श्रमिकों के लिए 10 घंटे का दिन निश्चित कर दिया गया ?
(क) 1833 ई०
(ख) 1842 ई०
(ग) 1844 ई०
(घ) 1847 ई०।
उत्तर:
(घ) 1847 ई०।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

37. इंग्लैंड में प्रथम खान अधिनियम कब पारित हआ था ?
(क) 1833 ई० में
(ख) 1842 ई० में
(ग) 1847 ई० में
(घ) 1867 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1842 ई० में

38. ऑरनॉल्ड टॉयनबी की पुस्तक लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड का प्रकाशन … कब हुआ था ?
(क) 1842 ई० में
(ख) 1847 ई० में
(ग) 1867 ई० में
(घ) 1884 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1884 ई० में।

39. कार्ल मार्क्स एक:
(क) चिकित्सक थे
(ख) वैज्ञानिक थे
(ग) अर्थशास्त्री थे
(घ) दार्शनिक थे।
उत्तर:
(घ) दार्शनिक थे।

औद्योगिक क्रांति HBSE 11th Class History Notes

→ औद्योगिक क्रांति की गणना विश्व की प्रभावशाली क्राँतियों में की जाती है। इस क्राँति ने विश्व इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया। यह क्राँति सर्वप्रथम 1760 ई० से 1820 ई० के मध्य इंग्लैंड में आई। इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के उदय एवं विकास के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।

→ इनमें इंग्लैंड की राजनीतिक स्थिरता एवं शांति, उसकी शक्तिशाली नौसेना, उसके उपनिवेशों, उपलब्ध पूँजी, कृषि क्राँति, बैंकिंग व्यवस्था, विशाल बाजार, खनिज पदार्थों, वैज्ञानिक उन्नति एवं संसद् द्वारा किए गए प्रयासों ने उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ औद्योगिक क्रांति के दौरान इंग्लैंड के जिन उद्योगों ने प्रमख भमिका निभाई उनमें कोयला एवं लोहा उद्योग एवं बुनाई उद्योग, भाप की शक्ति तथा नहरों एवं रेलों के उद्योग प्रसिद्ध थे।

→ कोयला एवं लोहा उद्योग के विकास में अब्राहम डर्बी प्रथम, अब्राहम डर्बी द्वितीय, अब्राहम डर्बी तृतीय, जोन विल्किसन, हेनरी कोर्ट, हैम्फरी डेवी एवं हेनरी बेस्सेमर ने, कपास की कताई एवं बुनाई उद्योग के विकास में जॉन के, जेम्स हरग्रीव्ज, रिचर्ड आर्कराइट, सैम्यूअल क्राम्पटन एवं एडमंड कार्टराइट ने, भाप की शक्ति के विकास में थॉमस सेवरी, थॉमस न्यूकॉमेन, जेम्स वॉट एवं मैथ्यू बॉल्टन ने, नहरों के विकास में ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट एवं जेम्स ब्रिडले ने, रेलों के विकास में रिचर्ड ट्रेविथिक एवं जॉर्ज स्टीफेनसन ने उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ औद्योगिक क्रांति के दूरगामी एवं महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। इसने न केवल ब्रिटेन अपितु यूरोप के समाज के स्वरूप को बदल कर रख दिया। जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई। इसने पारिवारिक जीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया।

→ समाज दो वर्गों पूँजीपतियों एवं मज़दूरों में बँट गया। पूँजीपतियों जो कि जनसंख्या का बहुत कम भाग था, के हाथ समस्त उद्योग थे। वे ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। दूसरी ओर समाज का अधिकाँश भाग मज़दर वर्ग से संबंधित था। कारखानों में जो उनकी दुर्दशा थी वह जानवरों से भी बदतर थी।

→ यहाँ तक कि स्त्रियाँ एवं बच्चे भी नरक समान जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य थे। औद्योगिक क्रांति के कारण वस्तुओं के उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई। इससे ब्रिटेन के घरेलू एवं विदेशी व्यापार को बहुत प्रोत्साहन मिला। औद्योगिक क्रांति के कारण साम्राज्यवादी भावना को बल मिला।

→ इस क्राँति के चलते ब्रिटेन फ्राँस एवं नेपोलियन के युद्धों का सामना करने में सफल हुआ। ब्रिटेन में मजदूरों ने अपनी मांगों के समर्थन में अनेक विरोध आंदोलन किए। अंततः ब्रिटेन आंदोलन किए। अंततः ब्रिटेन की सरकार ने अनेक कारखाना अधिनियमों द्वारा उनकी दशा सुधारने की चेष्टा की।

→ निस्संदेह यह ब्रिटेन के मजदूरों की एक महान् सफलता थी। औद्योगिक क्रांति पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश फ्रांस के जॉर्जिस मिशले (Georges Michelet), जर्मनी के फ्रॉइड्रिक एंजेल्स (Friedrich Engles), ब्रिटेन के ऑरनॉल्ड टॉयनबी (Arnold Toynbee), टी० एस० एश्टन (T.S. Ashton), पॉल मंतृ (Paul Mantoux) एवं एरिक हॉब्सबाम (Eric Hobsbawm) ने डाला।

→ ऑरनॉल्ड टॉयनबी ने अंग्रेजी में प्रथम बार क्राँति शब्द का प्रयोग अपनी प्रसिद्ध पस्तक लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड (Lectures on the Industrial Revolution in England) में किया था। इस पुस्तक का प्रकाशन उस की मृत्यु के पश्चात् 1884 ई० में हुआ था।

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