Author name: Bhagya

HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्तनी

Haryana State Board HBSE 9th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Varthini वर्तनी Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Hindi Vyakaran वर्तनी

वर्तनी

वर्तनी हिंदी व्याकरण Class 9 Solutions HBSE प्रश्न 1.
हिन्दी वर्तनी का अर्थ बताते हुए उसकी परिभाषा और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘वर्तनी’ लिपि का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। वर्तनी का शाब्दिक अर्थ है-अक्षर-विन्यास, अक्षरन्यास, अक्षरी, वर्णन्यास आदि। “भाषिक ध्वनियों के लिए निर्धारित प्रतीक चिह्नों (लिपि वर्णो) के सार्थक, व्यवस्थित और व्यावहारिक अनुपयोग का आधारतत्त्व वर्तनी ही है।” वस्तुतः भाषा-लिपि-वर्तनी परस्पर पूर्णतः सम्बद्ध हैं। लिपि भाषा को दृश्य रूप देती है। भाषा के शब्दों, पदों, वाक्यों, वाक्यांशों का सही, शुद्ध उच्चरित और लिखित रूप उपयुक्त एवं संगत वर्तनी पर निर्भर करता है। सार में का जा सकता है, “शब्द के शुद्ध लेखन को वर्तनी कहते हैं।” डॉ० नरेश मिश्र ने वर्तनी की वैज्ञानिक परिभाषा देते हुए लिखा है, “शब्द के विभिन्न वर्गों की क्रमशः शुद्ध रूप में की जाने वाली प्रयोगव्यवस्था को वर्तनी कहते हैं।”

यहाँ कुछ शब्दों के उदाहरण से वर्तनी के स्वरूप को समझा जा सकता है-‘पाट’ और ‘पाठ’, ‘काल’ और ‘खाल’, ‘जरा’ और ‘ज़रा’, ‘अवधि’ और ‘अवधी’, ‘सुत’ और ‘सूत’ शब्द कुछ विशेष पदार्थों-प्रयोजनों के संवाहक शब्द हैं जिनका समावेश हिन्दी भाषा के अन्तर्गत है। प्, आ, ट, ठ, क्, ल, ज्, जू, इ (ि), ई (ी), उ ु(), ऊ (ू) आदि प्रतीक चिह्नों अर्थात् विशेष लिपि (देवनागरी) के माध्यम से ये साकार रूप में प्रत्यक्ष हो पाए हैं। किन्तु भाषिक रूपों के लिखित स्वरूप की सार्थकता अथवा संगति या उपयुक्तता सही वर्तनी के माध्यम से ही सम्भव है। यदि इस संगति या व्यवस्था में छोटी-सी भी भूल हो जाए या तनिक-सा उल्ट-फेर हो जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है; जैसे ‘अध्यापक पाट पढ़ाता है। वाक्य के ‘पाट’ शब्द में ‘ठ’ के स्थान पर ‘ट’ के आने से प्रयोजनीय अर्थ स्पष्ट नहीं होता। इसका कारण देवनागरी लिपि को सही वर्तनी में प्रयुक्त न किया जाना है। इस प्रकार लिपि और वर्तनी में अन्तःसम्बन्ध है।

प्रयोजनमूलक हिन्दी भाषा में पारिभाषिक शब्दों में तो एकरूपता का होना और भी आवश्यक है। आज ज्ञान-विज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण किया जा रहा है। ऐसे शब्दों की वर्तनी पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्तनी

स्वरूप: प्रयोजनमूलक हिन्दी के शब्दों की वर्तनी की शुद्धता के लिए निम्नांकित बातों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है-
1. हलन्त:
हिन्दी के परम्परागत तत्सम शब्दों में से अनेक शब्द व्यंजनान्त हो गए हैं अर्थात् उन शब्दों का अन्तिम अक्षर व्यंजन हो गया है; जैसे महान्, विद्वान्, भगवान् आदि। हिन्दी में अनेक व्यंजनान्त शब्द हैं, किन्तु उनमें हलन्त का प्रयोग नहीं किया जाता जैसे काम, नाम, राम, घनश्याम, मन, तन, धन आदि। इसी प्रकार पारिभाषिक शब्दों के व्यंजन होने पर भी उनमें हलन्त का प्रयोग नहीं किया जाता। उसी प्रकार परिभाषिक शब्दों के व्यंजनान्त होने पर उनमें हलन्त का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए; उदाहरणार्थ-
कमान – (Command)
प्रसार – (Expansion)
निगम – (Corporation)
जोखिम – (Risk)
अवमूल्यन – (Devaluation)
ग्राहक – (Client)
किन्तु संस्कृत शब्दों में आज भी हलन्त का प्रयोग किया जाता है; यथा-अभिवाक्, श्रीमन्, अभिषद् आदि।

2. अनुस्वार बिन्दु (ं):
हिन्दी में अनुस्वार का प्रयोग प्रायः पाँच वर्गों के अन्तिम वर्णों (ङ्, ञ, ण, न, म्) के अर्ध रूप के लिए किया जाता है। ऐसा करने से लेखन एवं मुद्रण में सरलता एवं एकरूपता का समावेश होता है। आज मानक हिन्दी में अनुस्वार के इसी रूप का प्रयोग किया जा रहा है-
ङ्- अंग, काव्यांग, रंगशाला, पतंग आदि।
ञ्- मंजन, मंचन, कुंजी आदि।
ण- टंडन, कंगन, बंटन आदि।
न्- हिंदी, बिंदी, चिंदी, पंत आदि।
म्- पंप, संभावना, संबंध आदि।
पारिभाषिक शब्दावली में भी यही मानक पद्धति अपनानी चाहिए-
ङ् – अङक पत्र (कवर्ग-ङ्) – अंक पत्र (Mark sheet)
रङ्गशाला (कवर्ग-ङ्) – रंगशाला (Theatre)

३ – बञ्जर (चवर्ग-ज्) – बंजर (Barren)
सर्व कुञ्जी (चवर्ग-ञ्) – सर्वकुंजी (Master Key)

ण् – बण्टन (टवर्ग-ण) – बंटन (Distribution)
भण्डारण (टवर्ग-ण) – भंडारण (Storage)

न्- अन्तरिम (तवर्ग-न) – अंतरिम (Interim)
(टवर्ग-न्) संदर्भ – (Context)

म्- आलम्ब (पवर्ग-म) – आलंब (Support)
प्रकाश स्तम्भ (पवर्ग-म्) – प्रकाश स्तम्भ (Light house)
कम्प्यूटर (पवर्ग-म्) – कम्प्यूटर (Computer)

किंतु जब कोई अर्ध नासिक्य व्यंजन उसी नासिक्य व्यंजन के पूर्ण रूप से पहले लगाया जाता है तो उसे अनुस्वार (-) में न लिखकर उसके मूल नासिक्य के अर्ध रूप में ही लिखा जाना चाहिए; यथा-सम्मेलन, सम्मति, अन्न आदि।

3. अनुनासिकता/अर्धचन्द्राकार (ँ):
जिस ध्वनि के उच्चारण में निश्वास मुख और नासिका से एक साथ निकले, उसे अनुनासिक ध्वनि (ँ) कहते हैं; जैसे चाँद, साँप, आँख आदि। आज सर्वत्र सरलीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। भाषा के क्षेत्र में भी इसके प्रयोग किए जा रहे हैं। अनुनासिक (ँ) के लिए अनुस्वार (-) का प्रयोग किया जाने लगा है, किन्तु इससे अर्थ की अभिव्यक्ति में रुकावट पड़ती है; जैसे हंस (पक्षी), हँस (हँसना), यदि दोनों को हंस-हंस लिख दिया जाए तो अर्थबोध अस्पष्ट हो जाएगा। मैं हंस रहा हूँ। इस वाक्य में हंस शब्द का अर्थ स्पष्ट नहीं होता।

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4. संयुक्त वर्ण-रचना:
हिन्दी एक ऐसी भाषा है जिसमें पूर्ण एवं अर्ध दोनों प्रकार के वर्गों का प्रयोग समान रूप से होता है। वर्णों की अर्ध-रूप रचना के लिए निम्नांकित आधार अपनाए जाने चाहिएं-
(i) जिन वर्णों के दाहिनी ओर खड़ी पाई होती है उसे हटा देना चाहिए। इससे वह अर्ध व्यंजन बन जाता है। इससे ही संयुक्त अक्षरों का निर्माण भी होता है; जैसे-
HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्तनी 1

(ii) जिन व्यंजनों के दाहिनी ओर अर्ध पाई हो तो उसे हटा देने से वह अर्धवर्ण बन जाता है; यथा-
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(iii) जिन व्यंजनों में पाई का प्रयोग नहीं किया जाता; जैसे ट, ड, ढ आदि। इन व्यंजनों के अर्धरूप बनाने के लिए हलन्त का प्रयोग किया जाता है; यथा-
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5. रकार के प्रमुख चार रूप-हिन्दी में रकार के चार रूप मिलते हैं-
HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्तनी 4
इस संबंध में भाषा-वैज्ञानिकों का मत है कि ‘र’ के इन सभी रूपों के स्थान पर स्वतन्त्र वर्ण ‘र’ का ही प्रयोग होना चाहिए। भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन के लिए यह सुझाव उपयोगी है, किन्तु प्रयोजनमूलक हिन्दी में इन चारों रूपों को पूर्ववत् अपनाना चाहिए।

उदाहरणार्थ ये शब्द देखिए-ट्रक, परस्पर, पार्ट, क्रय, अनिवार्य आदि। अर्ध ‘र’ वर्ण (.) को शब्द में जहाँ उच्चारण किया जाए, उसके आगे वाले पूर्ण वर्ण या अक्षर पर लगाना चाहिए; जैसे स्वीकार्य, अनिवार्य, पार्ट, वर्क्स आदि।

यहाँ ‘अनिवार्य’ में र् का उच्चारण ‘वा’ के बाद होता है, इसलिए ‘य’ में लगी ‘आ’ की मात्रा-‘I’ पर लगाया गया है। ‘वर्क्स’ में र् का उच्चारण ‘क’ के पूर्व होता है किन्तु ‘क’ र के आगे होने पर भी आधा अर्थात् स्वरविहीन है, इसलिए ‘स’ पर लगाया गया है।

6. य-श्रुति:
हिन्दी स्वर प्रधान भाषा है। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के निर्देशानुसार जिन शब्दों में ‘य’ ध्वनि क्षीण हो और उनमें ‘ई’ अथवा ‘ए’ सुनाई दे, तो उनमें स्वर रूप अपनाना चाहिए; यथा
अशुद्ध – शुद्ध
नयी – नई
मिठायी – मिठाई
लिये – लिए
आयिये – आइए
शब्द के मूल रूप होने पर स्वरात्मक परिवर्तन नहीं किया जाए; यथा-स्थायी, अव्ययीभाव, दायित्व आदि।

7. क्रिया पद:
हिन्दी में क्रिया पदों तथा सहायक क्रियाओं को अलग-अलग करके लिखा जाता है ‘मैं महाविद्यालय जा रहा था।’ इस वाक्य में ‘जा रहा था’ क्रिया पद है। इसमें ‘जा’ मूल क्रिया है और ‘रहा था’ सहायक क्रिया है। यहाँ इनको अलग-अलग करके लिखा गया है। ‘मैं पत्र लिखता हूँ।’ इस वाक्य में ‘लिखता हूँ क्रिया पद है। ‘लिखता’ मूल क्रिया तथा ‘हूँ’ सहायक क्रिया है जिन्हें अलग-अलग लिखा गया है।

8. विभक्ति चिह्न:
हिन्दी भाषा में विभक्ति चिह्न अर्थ तत्त्व से अलग लिखे जाते हैं; यथा-
राम ने पत्र लिखा।
आपने एक पुस्तक पढ़ी।
विद्यार्थी ने पुस्तक देखी।
इन वाक्यों में कर्ता राम, आप, विद्यार्थी आदि से अलग ‘ने’ विभक्ति चिह्न का प्रयोग किया गया है।

9. अंग्रेजी की ‘ऑ’ ध्वनि का प्रयोग:
आज हिन्दी में अंग्रेजी के अनेक शब्द अपनाए जा रहे हैं। उनके शुद्ध रूप को अपनाने के लिए हमें ॉ (ऑ) ध्वनि चिह्न को भी हिन्दी के ध्वनि चिह्नों में स्थान दे देना चाहिए। ऐसा करने से इन शब्दों का शुद्ध उच्चारण एवं लेखन सम्भव हो सकेगा। उदाहरणार्थ ये शब्द देखिए
डॉक्टर – Doctor
कॉलेज – College
ऑपरेशन – Operation
बॉक्स – Box
उपर्युक्त शब्दों में उच्चारित ऑ (आ और ओ) से भिन्न, किन्तु उनके मध्यवर्ती स्वर हैं।

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10. पुनरुक्ति:
जब भाव विशेष पर बल देने के लिए एक शब्द को दो या अधिक बार प्रयुक्त किया जाता है, उसे पुनरुक्ति कहते हैं। ऐसी स्थिति में कभी-कभी योजक (-) के साथ अंक-2 (दो) लिखा जाता है; जैसे चलते-चलते, रोते-रोते, बार-बार। ऐसा लिखना वैज्ञानिक पद्धति के अनुकूल नहीं है। इसे चलते-दो, रोते-दो तथा बार-दो पढ़ा जा सकता है। अतः पुनरुक्ति में सर्वत्र एक शब्द को दो बार लिखना चाहिए; जैसे मुझे बार-बार प्यास लग रही है।
वह चलते-चलते गिर पड़ा।
गीता रोते-रोते गा रही थी।

11. योजक चिहून:
योजक अंग्रेजी के ‘हाइफन’ का हिन्दी पर्यायवाची है। द्वन्द्व समास के दोनों पदों के बीच में योजक (-) चिह्न का प्रयोग करना नितान्त आवश्यक है; जैसे माता-पिता, दाल-रोटी, अमीरी-गरीबी, पढ़ना-लिखना आदि।

क्योंकि हिन्दी भाषा अत्यधिक लोगों द्वारा बोली जाती है और उसका क्षेत्र भी बहुत विस्तृत है। इसलिए हिन्दी भाषा के उच्चारण व कहीं-कहीं रूप में भी विविधता दिखाई देती है। वातावरण व मानसिक भिन्नता के कारण ऐसा होना स्वाभाविक है, किन्तु प्रयोजनमूलक हिन्दी में ऐसी भिन्नता उचित नहीं है। उसमें सर्वत्र वर्तनी के मानक रूप को ही अपनाना चाहिए। कम्प्यूटर में प्रयुक्त होने वाली प्रयोजनमूलक हिन्दी के लिए तो यह और भी जरूरी हो जाता है। अतः प्रयोजनमूलक हिन्दी में उसके मानक रूप को अपनाने से उसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिलेगा और उसे समझना भी सरल हो जाएगा।

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HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण

Haryana State Board HBSE 9th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Varn Prakaran वर्ण प्रकरण Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण

वर्ण प्रकरण

Varn Prakaran HBSE 9th Class प्रश्न 1.
वर्ण किसे कहते हैं? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
भाषा की सबसे छोटी ध्वनि को वर्ण कहते हैं। दूसरे शब्दों में, उस छोटी-से-छोटी ध्वनि को वर्ण कहते हैं, जिसके आगे टुकड़े न किए जा सकें; जैसे अ, इ, ऋ, क, ख, ड्र आदि। वर्गों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला में 46 वर्ण हैं। हिन्दी की वर्णमाला को मुख्यतः स्वर एवं व्यंजन दो भागों में बाँट सकते हैं। हिन्दी की वर्णमाला निम्नलिखित है
HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण 1
हिन्दी वर्णमाला के 46 अक्षर संस्कृत भाषा से आए हैं, जिनमें 13 स्वर हैं और शेष व्यंजन हैं। प्रश्न 2. संयुक्त व्यंजनों से क्या अभिप्राय है? सोदाहरण उत्तर दीजिए। उत्तर-जो व्यंजन एक से अधिक व्यंजनों के योग से बने हों, उन्हें संयुक्त व्यंजन कहते हैं; जैसे
HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण 2

HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण

वर्ण के भेद

Varn Prakaran Class 9 HBSE प्रश्न 3.
वर्ण के कितने भेद होते हैं? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
वर्ण के दो भेद होते हैं- स्वर एवं व्यंजन।
स्वर- अ, इ, उ, ऋ आदि।
व्यंजन- क, ख, प, फ आदि।

वर्ण प्रकरण Class 9 HBSE प्रश्न 4.
स्वर किसे कहते हैं? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
वह वर्ण जो बिना किसी अन्य वर्ण की सहायता से बोला जाए, उसे स्वर कहते हैं। मात्रा के अनुसार स्वरों के तीन भेद होते हैं-हस्व स्वर, दीर्घ स्वर और प्लुत स्वर।

वर्ण प्रकरण Class 9 Vyakaran HBSE प्रश्न 5.
उच्चारण की दृष्टि से स्वरों को कितने भागों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर:
उच्चारण के अनुसार स्वरों के निम्नलिखित दो भेद हैं
(1) सानुनासिक तथा
(2) निरनुनासिक।
1. सानुनासिक: जिनका उच्चारण मुख और नासिका से होता है, वे सानुनासिक स्वर कहलाते हैं; जैसे बाँटना, हँसना, दाँत आदि।
2. निरनुनासिक: जिनका उच्चारण केवल मुख से होता है, वे निरनुनासिक स्वर होते हैं; जैसे कौन, दीन आदि।

Hindi Varna HBSE 9th Class प्रश्न 6.
अनुस्वार एवं अनुनासिक किसे कहते हैं? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
अनुनासिक के उच्चारण में हवा नाक और मुख दोनों से निकलती है और अनुस्वार के उच्चारण में हवा केवल नाक से निकलती है। इसके उच्चारण में बल भी अधिक लगता है। अनुनासिक व्यंजन ध्वनि मानी जाती है, जबकि अनुस्वार स्वर माना जाता है। अनुस्वार का चिह्न ऊपर बिन्दु ( . ) है और अनुनासिक का चिह्न चन्द्रबिन्दु (ं) है।
अनुस्वार: गंगा, बंगाल, संधि, संभावना आदि।
अनुनासिक: मुँह, हँसी, बाँटना, दाँत आदि।

HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण

In 9th Standard HBSE प्रश्न 7.
मात्रा से क्या अभिप्राय है? सभी स्वरों के मात्रा रूप बताइए।
उत्तर:
जब किसी स्वर को व्यंजन के साथ जोड़ा जाता है तो स्वर के स्थान पर उसका जो चिह्न लगाया जाता है, उसे मात्रा कहते हैं। स्वरों की मात्राएँ निम्नलिखित हैं
HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण 3
वर्ण प्रकरण कक्षा 9 HBSE प्रश्न 8.
व्यंजन किसे कहते हैं? उसके कितने भेद हैं?
उत्तर:
जो वर्ण स्वरों की सहायता से बोले जाते हैं, उन्हें व्यंजन कहते हैं। ये स्वरों की सहायता के बिना नहीं बोले जा सकते। इनके उच्चारण में वायु रुकावट के साथ बाहर आती है; जैसे क् + अ = क । यही नियम सभी व्यंजनों पर लागू होता है। बिना स्वर के योग के सभी वर्गों के नीचे हलन्त लगता है; जैसे क्, ख, ग, ट्, त्, ड्, न आदि।

उच्चारण के अनुसार व्यंजनों के तीन भेद किए जा सकते हैं
(1) स्पर्श,
(2) अन्तःस्थ
(3) ऊष्म।

प्रश्न 9.
‘र’ और ‘ऋ’ में क्या अन्तर है? व्यंजनों के साथ ‘र’ लगाने के कौन-से नियम हैं ?
उत्तर:
र व्यंजन है और ऋ स्वर है। हिन्दी में रि और ऋ के उच्चारण में काफी समानता प्रतीत होती है। व्यंजनों के साथ ‘र’ लगाने के नियम निम्नलिखित हैं-
(1) यदि ‘र’ से पूर्व कोई स्वर रहित व्यंजन अर्थात् हलन्त वाला व्यंजन हो तो ‘र’ व्यंजन के नीचे आकर जुड़ जाता है; जैसे-
क् + र = क्र (क्रम),
म् + र = म्र (ताम्र),
द् + र = द्र (द्रव्य),
प् + र = प्र (प्रकाश)।

किन्तु ‘र’ से पूर्व यदि कोई टवर्ग का व्यंजन स्वर रहित (हलन्त) हो, तो इसका प्रयोग इस तरह किया जाएगा-
ट् + र = ट्र (ट्रक),
ड् + र = ड्र (ड्रामा)।

(2) यदि स्वर रहित ‘र’ अन्य वर्गों से पहले आए तो अपने से अगले व्यंजन के ऊपर (शिरोरेख के ऊपर) लगाया जाता है; जैसे
ध + र् + म = धर्म,
पू + र् + व = पूर्व,
सू + र् + य = सूर्य ।

(3) यदि ‘र’ के साथ ‘इ’ या ‘ई’ की मात्रा लगी हो, तो इसे मात्रा के बाद जोड़कर लिखा जाता है; जैसे कर्मी, फुर्ती, दर्शी, महर्षि, गर्वित।

(4) यदि ‘र’ संयुक्त अक्षर के साथ आए तो ‘र’ को संयुक्ताक्षर के अन्तिम वर्ण पर लगाया जाता है; जैसे मर्त्य, दुर्घर्ष।

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परीक्षोपयोगी महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वर्ण किसे कहते हैं? हिन्दी वर्णमाला में कितने वर्ण हैं? इनको हम कितने भागों में बाँट सकते हैं?
उत्तर:
भाषा की लघुतम इकाई को वर्ण कहते हैं या वह लघु ध्वनि जिसके आगे टुकड़े न हो सकें, उसे वर्ण कहते हैं; जैसे आ, इ, क, खु आदि। हिन्दी भाषा में 46 वर्ण होते हैं। वर्ण को हम दो भागों में बाँट सकते हैं-
(1) स्वर,
(2) व्यंजन।

प्रश्न 2.
स्वर किसे कहते हैं? मात्रा के अनुसार ये कितने प्रकार के हैं?
उत्तर:
वह वर्ण जो अन्य वर्ण की सहायता से बोला जा सके, स्वर कहलाता है। मात्रा के आधार पर इन्हें तीन भागों में बाँटा जा सकता है-
(1) ह्रस्व स्वर,
(2) दीर्घ स्वर,
(3) प्लुत स्वर।

प्रश्न 3.
ह्रस्व स्वर किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस स्वर के उच्चारण में थोड़ा अथवा एक मात्रा का समय लगे, उसे ह्रस्व स्वर कहते हैं। ये चार हैं-अ, इ, उ, ऋ। इन्हें एक मात्रिक स्वर भी कहते हैं।

प्रश्न 4.
दीर्घ स्वर किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस स्वर के उच्चारण में ह्रस्व से दुगुना समय लगे, उसे दीर्घ स्वर कहते हैं। ये सात हैं आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। इन्हें द्वि-मात्रिक स्वर भी कहते हैं।

HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण

प्रश्न 5.
प्लुत स्वरों की परिभाषा देते हुए उदाहरण भी लिखें।
उत्तर:
चिल्लाते या पुकारते समय जब किसी स्वर के उच्चारण में तीन गुणा समय लगे, तो वह स्वर प्लुत कहलाता है। जैसे- ओ३म्, हे राम आदि।

प्रश्न 6.
हिन्दी में दीर्घ स्वरों का क्या महत्व होता है? सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर:
हिन्दी में दीर्घ स्वरों का बहुत महत्व होता है। ये शब्द के अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं; जैसे-

ह्रस्व स्वर – दीर्घ स्वर
कल – काल
कम – काम
जाति – जाती
दिन – दीन
सुत – सूत
कुल – कूल
खल – खाल
पुत्र – पूत
नग – नाग
खिल – खील

नोट-
अंग्रेज़ी के डॉक्टर, कॉलेज, बॉल आदि शब्दों में आ और ओ ध्वनियों के मध्यवर्ती दीर्घ स्वर ‘ऑ’ का उच्चारण होता है। हिन्दी के इन दीर्घ स्वरों से इसको भिन्न लिखने और बोलने के कारण इसका प्रचलन हो गया है।

प्रश्न 7.
अनुस्वार एवं अनुनासिक में क्या अन्तर है?
उत्तर:
अनुस्वार के उच्चारण में वायु केवल नाक से निकलती है तथा अनुनासिक के उच्चारण में वायु नाक एवं मुख दोनों से निकलती है; यथा
अनुस्वार – कंगन, गंगा।
अनुनासिक – दाँत, चाँद ।

HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण

प्रश्न 8.
व्यंजन किसे कहते हैं? उच्चारण के विचार से इनके कितने भेद हैं?
उत्तर:
स्वरों की सहायता से बोले जाने वाले वर्ण को व्यंजन कहते हैं; जैसे क, ख, ग आदि। उच्चारण की दृष्टि से व्यंजन के तीन भेद होते हैं-
(1) स्पर्श व्यंजन,
(2) अन्तःस्थ व्यंजन,
(3) ऊष्म व्यंजन।

प्रश्न 9.
अंतःस्थ व्यंजन की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर:
जिन व्यंजनों के उच्चारण में जिह्वा पूरी तरह से मुख के किसी भाग का स्पर्श नहीं करती, उन्हें अंतःस्थ व्यंजन कहते हैं; जैसे य, र, ल, व। ये चार व्यंजन ही अंतःस्थ हैं।

प्रश्न 10.
स्पर्श व्यंजन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिन व्यंजनों के उच्चारण में जिह्वा मुख के विभिन्न भागों से पूरी तरह स्पर्श करती हो, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं। स्पर्श व्यंजन संख्या में 25 होते हैं; जैसे-
कवर्ग – क ख ग घ ङ
चवर्ग – च छ ज झ ञ
टवर्ग – ट ठ ड ढ ण
तवर्ग – त थ द ध न
पवर्ग – प फ ब भ म

प्रश्न 11.
ऊष्म व्यंजन किसे कहते हैं? इनकी कितनी संख्या होती है?
उत्तर:
जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय वायु रगड़ खाकर निकलती है अर्थात् वायु एक प्रकार से ऊष्म-सी हो जाती है, उन्हें ऊष्म व्यंजन कहते हैं; जैसे श, ष, स, ह। ये चार वर्ण ऊष्म कहलाते हैं।

प्रश्न 12.
इन शब्दों के पृथक्-पृथक् वर्ण लिखिएयूनिवर्सिटी, अमृतसर, पंजाब, मद्रास, कश्मीर।
उत्तर:
यूनिवर्सिटी – य् + ऊ + न् + इ + व् + अ + र् + स् + इ + ट् + ई।
अमृतसर – अ + म् + ऋ + त् + अ + स् + अ + र् + अ
पंजाब – प् + अं + ज् + आ + ब् + अ
मद्रास – म् + अ + द् + र् + आ + स् + अ
कश्मीर – क् + अ + श् + म् + ई + र् + अ

HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण

प्रश्न 13.
नीचे लिखे वर्गों के योग से बनने वाले शब्द लिखिए
(1) र् + आ + त् + अ
(2) स् + अ + त् + अ + ल् + उ + ज् + अ
(3) व् + ऐ + ज् + ञ् + आ + न् + इ + क् + अ
(4) क् + ऋ + प् + आ + ण् + अ
(5) त् + उ + ल् + अ + स् + ई।
उत्तर:
(1) रात
(2) सतलुज
(3) वैज्ञानिक
(4) कृपाण
(5) तुलसी।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित वर्गों को जोड़कर शब्द बनाओ
(1) ल् + अ + त् + आ
(2) अ +ध् + य् + आ + य् + अ
(3) म् + इ + त् + र् + अ
(4) क् + ष् + अ + म् + आ
(5) आ + ज् + ञ् + आ
उत्तर:
(1) लता
(2) अध्याय
(3) मित्र
(4) क्षमा
(5) आज्ञा।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित शब्दों को वर्गों में विभक्त करोश्लोक, ज्ञान, छात्र, विद्यालय, भारतवर्ष, भक्ति, कृष्ण, परिश्रम।
उत्तर:
श्लोक = श् + ल् + ओ + क् + अ।
ज्ञान = ज् + ञ् + आ + न् + अ।
छात्र = छ + आ + त् + र् + अ।
विद्यालय = व् + इ + द् + य् + आ + ल् + अ + य् + अ।
भारतवर्ष = भ् + आ + र् + अ + त् + अ + व् + र् + ष् + अ।
भक्ति = भु + अ + क + तु + इ।
कृष्ण = क् + ऋ + ष् + ण + अ।
परिश्रम = प् + अ + र् + इ + श् + र् + अ + म् + अ।

HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण

प्रश्न 16.
स्वर और व्यंजन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
स्वर:
स्वतन्त्र अर्थात् दूसरे वर्ण की सहायता के बिना बोले जाने वाले वर्ण को स्वर कहते हैं। स्वर ऐसी ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में सांस की हवा कंठ, जीभ और होंठों की सहायता के बिना बाहर निकल जाती है; जैसे अ, इ, उ।

व्यंजन:
जो वर्ण स्वरों की सहायता से बोले जाएं, उन्हें व्यंजन कहते हैं। इनके उच्चारण में सांस की हवा कंठ, जीभ और होंठ आदि मुख के अंगों में रुकावट पैदा करके निकलती है। ये क से लेकर ह तक तैंतीस व्यंजन हैं।

प्रश्न 17.
अनुस्वार और अनुनासिक में क्या अन्तर है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अनुस्वार:
जिस ध्वनि के उच्चारण में सांस केवल नाक से निकले, उसे अनुस्वार ध्वनि कहते हैं। अनुस्वार का चिह्न बिन्दु (ं) है; जैसे संत, गंगा, व्यंजन आदि। हिन्दी वर्णमाला में ङ्, ञ्, ण, न और म् अनुस्वार ध्वनियाँ हैं।

अनुनासिक:
जब सांस की हवा कुछ तो नाक से निकल जाए और कुछ मुँह से निकले तो अनुनासिक स्वरों को बोला जाता है और उसका चिह्न चन्द्रबिन्दु (ँ) होता है; जैसे आँख, चाँद, माताएँ आदि। हिन्दी में अनुनासिकता अधिकतर दीर्घ स्वरों में ही मिलती है।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित वर्गों के उच्चारण स्थान उनके सामने दिए कोष्ठकों में लिखो
प् ( )
न ( )
ठ ( )
ज् ( )
घ् ( )
व ( )
औ ( )
ए ( )
उत्तर:
प् (ओष्ठ),
न् (नासिका),
ठ् (मूर्धा),
ज् (तालु),
घ् (कण्ठ),
व् (दन्तोष्ठ),
औ (कंठौष्ठ),
ए (कंठ तालु)।

प्रश्न 19.
टवर्ग, पवर्ग, कवर्ग, तवर्ग की नासिक्य ध्वनियाँ लिखो।
उत्तर:
टवर्ग – ण।
पवर्ग – म्।
कवर्ग – ङ्।
तवर्ग – न्।

HBSE 9th Class Hindi Vyakaran वर्ण प्रकरण

प्रश्न 20.
(क) कंठ-स्थान से बोला जाने वाला ऊष्म व्यंजन लिखो।
(ख) तालु-स्थान से बोला जाने वाला एक अंतस्थ व्यंजन लिखो।
उत्तर:
(क) ह
(ख) य।

प्रश्न 21.
अयोगवाह किसे कहते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
स्वरों एवं व्यंजनों के अतिरिक्त हिन्दी वर्णमाला में दो वर्ण और भी हैं, ये हैं अं और अः । अनुस्वार और विसर्ग ये दोनों स्वरों के बाद लिखे जाते हैं। स्वतंत्र गति न होने के कारण ये स्वरों की संख्या में नहीं आ सकते। इसलिए इन्हें अयोगवाह कहते हैं। न स्वरों के योग, न व्यंजनों से, फिर भी ध्वनि वहन करते हैं। अतः ये अयोगवाह हैं।

प्रश्न 22.
‘अक्षर’ की परिभाषा देते हुए हिन्दी भाषा के प्रमुख अक्षरों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
किसी एक ध्वनि या ध्वनि समूह की उच्चरित न्यूनतम इकाई को अक्षर कहते हैं। अक्षर केवल स्वर, स्वर तथा व्यंजन या अनुनासिकता सहित स्वर हो सकता है। दूसरे शब्दों में, वह छोटी-से-छोटी इकाई अक्षर है, जिसका उच्चारण वायु के एक झटके से होता है; जैसे आ, जी, क्या आदि। हिन्दी अक्षरों के कुछ प्रमुख उदाहरण देखिए
(1) केवल स्वर, औ, आ, ओ।
(2) स्वर व्यंजन, अब, आज्, आँख् ।
(3) व्यंजन स्वर, न, खा, हाँ।
(4) व्यंजन स्वर व्यंजन, घर, देर्, साँप् ।
(5) व्यंजन-व्यंजन स्वर, क्या, क्यों।
(6) व्यंजन-व्यंजन-व्यंजन स्वर, स्त्री।

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HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Shabd Roop शब्द-रूप Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

Class 9 Sanskrit शब्द-रूप HBSE

1. राम (राम)

विभक्ति प्रथमाएकवचनद्विवच्नबहुवचन
द्वितीयारामःरामौरामाः
तृतीयारामम्रामौरामान्
चतुर्थीरामेणरामाभ्याम्रामैः
पंचमीरामायरामाभ्याम्रामेभ्यः
षष्ठीरामात्रामाभ्याम्रामेभ्यः
सप्तमीरामस्यरामयो:रामाणाम्
सम्बोधन,रामेरामयो:रामेषु

शब्द-रूप In Sanskrit Class 9 HBSE

2. बालक (बच्चा)

प्रथमाबालक:बालकौबालका:
द्वितीयाबालकम्बालकौबालकान्
तृतीयाबालकेनबालकाभ्याम्बालकः:
चतुर्थीबालकायबालकाभ्याम्बालकेभ्य:
पंचमीबालकात्बालकाभ्याम्बालकेभ्य:
षष्ठीबालकस्यबालकयो:बालकानाम्
सप्तमीबालकेबालक्यो:बालकेषु
सम्बोधन,हे बालक!हे बालकौ!हे बालका:!

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

3. छात्र

प्रथमाछात्र:छात्रौछात्रा:
द्वितीयाछानम्छात्रौछात्रान्
तृतीयाछात्रेणछात्राभ्याम्छात्रै:
चतुर्थीछात्रायछात्राभ्याम्छात्रेभ्य:
पंचमीछात्रात्छात्राभ्याम्छात्रेभ्य:
षष्ठीछात्रस्यछात्रयोछात्राणाम्
सप्तमीछात्रेछात्रयो:छात्रेषु
सम्बोधन,हे छात्र!हे छात्रौ!हे छात्रा:!

4. रमा

प्रथमारमारमेरमाः
द्वितीयारमाम्रमेरमाः
तृतीयारमयारमाभ्याम्रमाभि:
चतुर्थीरमायैरमाभ्याम्रमाभ्य:
पंचमीरमायाःरमाभ्याम्रमाभ्य:
षष्ठीरमायाःरमयो:रमाणाम्
सप्तमीरमायाम्रमयो:रमासु
सम्बोधन,हे रमे!हे रमे!हे रमाः !

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

5. लता (बेल)

प्रथमालतालतेलता:
द्वितीयालताम्लतेलता:
तृतीयालतयालताभ्याम्लताभि:
चतुर्थीलतायैलताभ्याम्लताभ्य:
पंचमीलताया:लताभ्याम्लताभ्य:
षष्ठीलताया:लतयो:लतानाम्
सप्तमीलतायाम्लतयो:लतासु
सम्बोधन,हे लते!है लते!हे लता:!

6. विद्या

प्रथमाविद्याविद्येविद्या:
द्वितीयाविद्याम्विद्येविद्या:
तृतीयाविद्ययाविद्याभ्याम्विद्याभि::
चतुर्थीविद्यायैविद्याभ्याम्विद्याभ्य:
पंचमीविद्याया:विद्याभ्याम्विद्याभ्य:
षष्ठीविद्याया:विद्ययो:विद्यानाम्
सप्तमीविद्यायाम्विद्ययो:विद्यासु
सम्बोधन,हे विद्ये!हे विद्ये!है विद्या:

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

7. कवि

प्रथमाकविःकवीकवयः
द्वितीयाकविम्कवीकवीन
तृतीयाकविनाकविभ्याम्कविभिः
चतुर्थीकवयेकविभ्याम्कविभ्य:
पंचमीकवे:कविभ्याम्कविभ्य:
षष्ठीकवे:कव्योःकवीनाम्
सप्तमीकवौकव्यो:कविषु
सम्बोधन,हे कवे!है कवी!हे कवयः!

8. हरि

प्रथमाहरिःहरीहरयः
द्वितीयाहरिमूहरीहरीन्
तृतीयाहरिणाहरिभ्याम्हरिभिः
चतुर्थीहरयेहरिभ्याम्हरिभि:
पंचमीहरे:हरिभ्याम्हरिभि:
षष्ठीहरे:हर्यो:हरिणाम्
सप्तमीहरौहर्योःहरिष
सम्बोधन,हे हरे!हे हरी!हे हरय: !

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

9. भानु

विभक्तिएकवचनद्विवचन भानूबहुवचन
प्रथमाभानु:भानूभानवः
द्वितीयाभानुम्भानूभानू :
तृतीयाभान्वाभानुभ्यामुभानुभि:
चतुर्थीभान्वै, भानवेभानुभ्याम्भानुभ्य:
पंचमीभान्वा: भानवो:भानुभ्याम्भानुभ्य:
षष्ठीभान्वाः, भानो:भान्वो:भानुनाम्
सप्तमीभान्वाम्, भानौभान्दो:भानुष्
सम्बोधन,हे भानो!हे भानू !हे भानवः!

10. साधु (भला)

प्रथमासाधु:साधूसाधव:
द्वितीयासाधुम्साधूसाधून्
तृतीयासाधुनासाधुभ्याम्साधुभि:
चतुर्थीसाधवेसाधुभ्याम्साधुभ्यः
पंचमीसाधो:साधुभ्याम्साधुभ्य:
षष्ठीसाधो:साध्वो:साधूनाम्
सप्तमीसाधौसाध्वोःसाधुषु
सम्बोधन,हे साधो!हे साधू!है साधवः!

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

11. मनस् (मन )

प्रथमामन:मनसीमनांसि
द्वितीयामनःमनसीमनांसि
तृतीयामनसामनोभ्याम्मनोभि:
चतुर्थीमनसेमनोभ्याम्मनोभ्य:
पंचमीमनसःमनोभ्याम्मनोभ्य:
षष्ठीमनस:मनसो:मनसाम्
सप्तमीमनसिमनसो:मनस्सु
सम्बोधन,हे मन !हे मनसी!हे मनांसि!

सर्वनाम शब्द
1. अस्मद् (में)

विभक्तिएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथमाअहमूआवाम्वयम्
द्वितीयामाम्, माआवाम्, नौअस्मान्, नः
तृतीयामयाआवाभ्याम्अस्माभिः
चतुर्थीमह्यम्, मेआवाभ्यामू, नौअस्मभ्यम्, नः
पंचमीमत्आवाभ्याम्अस्मतू
षष्ठीमम, मेआवयोः, नौअस्माकमू, नः
सप्तमीमयिआवयोःअस्मासु

नोट-‘अस्मद्’ शब्द के तीनों लिड्गें में एक जैसे रूप होते हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

2. युष्मद् (तू)

विभक्तिएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथमात्वम्युवाम्यूयम्
द्वितीयात्वाम्, त्वायुवाम्, वाम्युष्मान्, वः
तृतीयात्वयायुवाभ्याम्युष्माभि:
चतुर्थीतुभ्यम्, तेयुवाभ्याम्, वाम्युष्मभ्यम्, वः
पंचमीत्वत्युवाभ्याम्युष्मत्
षष्ठीतव, तेयुवयो:, वाम्युष्माकम्, वः
सप्तमीत्वयियुवयो:युष्मासु

नोट-‘युष्मद्” शब्द के तीनों लिड़ों में एक जैसे रूप होते हैं।
3. (i) किम् (कौन), पुंल्लिडूग

विभक्तिएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथमाकःकौके
द्वितीयाकमकोकान
तृतीयाकेनकाभ्याम्कै:
चतुर्थीकस्मैका्यामूकेभ्यः
पंचमीकस्मात्काभ्यामकेभ्य:
षष्ठीकस्यक्यो:केषाम्
सप्तमीकस्मिन्कयो:केषु

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

(ii) किम् (कौन), स्त्रीलिडूग

विभक्तिएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथमाकाकेकाः
द्वितीयाकाम्केका:
तृतीयाकयाकाभ्यामकाभि:
चतुर्थीकस्थकाभ्यामकाम्य:
पंचमीकस्या:काभ्याम्काभ्य:
षष्ठीकस्या:क्यो:कासाम
सप्तमीकस्याम्कयो:कासु

(iii) किम् (कौन), नपुंसकलिड़्ग

प्रथमाकाकेकाः
द्वितीयाकाम्केका:

नोट-‘किम्’ नपुंसकलिड्ग के शेष रूप ‘किम्’ पुंल्लिड्ग के समान होते हैं।
4. (i) एतद् (यह), पुंल्लिडून

विभक्तिएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथमाएषःएतौएते
द्वितीयाएतम्एतौएतान्
तृतीयाएतेनएताभ्याम्एतै:
चतुर्थीएतस्मैएताभ्याम्एतेभ्यः
पंचमीएतस्मात्एताभ्याम्एतेभ्यः
षष्ठीएतस्यएतयो:एतेषाम्
सप्तमीएतस्मिन्एतयो:एतेषु

(ii) एतद् (यह), स्त्रीलिडून

विभक्तिएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथमाएषाएतेएता:
द्वितीयाएताम्एतेएताः
तृतीयाएतयाएताभ्याम्एताभि:
चतुर्थीएतस्यैएताभ्याम्एताभ्यः
पंचमीएतस्था:एताभ्याम्एताभ्य:
षष्ठीएतस्था:एतयो:एतासाम्
सप्तमीएतस्याम्एतयो:एतासु

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

(iii) एतदू (यह), नपुंसकलिडून्ग

प्रथमाएतत्एतेएतानि
द्वितीयाएतत्एतेएतानि

नोट-‘एतत्’ नपुंसकलिड्ग के शेष रूप ‘एतद्’ पुंल्लिड्न के समान होते हैं।
5. (i) तत् (वह), पुंद्रिज्ञाग

विभक्तिएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथमासःतौते
द्वितीयातम्तौतान्
तृतीयातेनताभ्याम्तै:
चतुर्थीतस्मैताभ्याम्तेभ्यः
पंचमीतस्मात्ताभ्याम्तेभ्यः
षष्ठीतस्यतयो:तेषाम्
सप्तमीतस्मिन्तयो:तेषु

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

(ii) तत् (वह), स्त्रीलिडून्ग

प्रथमासातेता:
द्वितीयाताम्तेताः
तृतीयातयाताभ्याम्ताभि:
चतुर्थीतस्यैताभ्याम्ताभ्य:
पंचमीतस्या:ताभ्याम्ताभ्यः
षष्ठीतस्या:तयो:तासाम्
सप्तमीतस्याम्तयोःतासु

(iii) तत् (वह), नपुंसकलिडूग

प्रथमातत्तेतानि
द्वितीयातत्तेतानि

नोट ‘तत्’ नपुंसकलिड्ग के शेष रूप ‘तत्’ पुंल्लिड्ग के समान होते हैं।
6. (i) यत् (जो), पुंल्लिड़ग

विभक्तिएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथमाय:यौये
द्वितीयायम्यौयान्
तृतीयायेनयाभ्याम्यैः
चतुर्थीयस्मैयाभ्याम्येथ्य
पंचमीयस्मात्याभ्याम्येभ्य:
षष्ठीयस्यययो:येषाम्
सप्तमीयस्मिन्ययो:येषु

(ii) यत् (जो), स्त्रीलिडूग

प्रथमायायेया:
द्वितीयायाम्येयाः
तृतीयाययायाभ्याम्याभिः
चतुर्थीयस्थैयाभ्याम्याभ्य:
पंचमीयस्याःयाभ्याम्याभ्य:
षष्ठीयस्याःययोःयासाम्
सप्तमीयस्याम्ययोःयासु

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् शब्द-रूप

(iii) यत् (जो), नपुंसकलिडून्ग

प्रथमायत्येयानि
द्वितीयायत्येयानि

 

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HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् कारक एवं उपपद विभक्ति

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Karak Evam Uppad Vibhakti कारक एवं उपपद विभक्ति Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit व्याकरणम् कारक एवं उपपद विभक्ति

Uppad Vibhakti Sanskrit Class 9 HBSE

(क) कारक एवं उपपद विभक्ति
किसी दूसरे के पद के समीप आ जाने के कारण जिस विभक्ति का प्रयोग किया जाता है, उसे उपपद विभक्ति कहते हैं; जैसेरामः देवेन सह विद्यालयं गच्छति। इस वाक्य में ‘सह’ के प्रयोग के कारण तृतीया विभक्ति आई है। अतः यह उपपद विभक्ति है। उपपद विभक्ति के लिए कारकों का ज्ञान अनिवार्य है। अतः उनका परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।

1. प्रथमा विभक्ति-सामान्यतया कर्तृवाच्य के कर्त्ता में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है; जैसे-रामः गृहं गच्छति (राम घर जाता है)। यहाँ ‘राम’ कर्ता है। इसलिए उसमें प्रथमा विभक्ति का प्रयोग किया गया है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित स्थानों पर प्रथमा विभक्ति होती है
(क) सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है; जैसे हे बालकाः! यूयं कुत्र गच्छथ? (हे बालको! तुम कहाँ जाते हो?)
(ख) कर्मवाच्य के कर्म में प्रथमा विभक्ति होती है; जैसे मया पाठः पठ्यते। (मेरे द्वारा पाठ पढ़ा जाता है।) यहाँ ‘पाठ’ में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग किया गया है।

2. द्वितीया विभक्ति-सामान्यतया कर्तृवाच्य में कर्ता में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है; जैसे-रामः वनं गच्छति (राम वन को जाता है)। यहाँ ‘वन’ कर्म है। इसलिए उसमें द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित स्थानों पर द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है
(क) अधि + शी (सोना), अधि + स्था (बैठना या रहना), अधि + आस् (बैठना) धातुओं के योग में द्वितीया विभक्ति होती है; जैसे
(i) सः पर्यङ्कमधिशेते। (वह पलंग पर सोता है।)
(i) राजा सिंहासनमधितिष्ठति। (राजा सिंहासन पर बैठता है।)
(iii) पुरोहितः आसनमध्यास्ते। (पुरोहित आसन पर बैठता है।)

(ख) प्रति, अनु, विना, परितः, सर्वतः, उभयतः, अभितः, धिक् इत्यादि के योग में अर्थात् इन शब्दों का प्रयोग हो तो द्वितीया विभक्ति होती है।
(i) प्रति (की ओर) कृष्णः पाठशाला प्रति गच्छति। (कृष्ण पाठशाला की ओर जाता है।)
(ii) अनु (पीछे) मातरमनुगछति पुत्रः। (पुत्र माता के पीछे जाता है।)
(iii) विना (बिना) दानं विना मुक्तिः नास्ति। (दान के बिना मुक्ति नहीं होती।)
(iv) परितः (चारों ओर)-नगरं परितः उपवनानि सन्ति । (नगर के चारों ओर बाग है।)
(v) सर्वतः (सब ओर)-ग्रामं सर्वतः जलं वर्तते। (गाँव में सब ओर जल है।)
(vi) उभयतः (दोनों ओर) – गृहमुभयतः वृक्षाः सन्ति। (घर के दोनों ओर वृक्ष हैं।)
(vii) अभितः (दोनों ओर)-ग्रामम् अभितः नदी वहति । (गाँव के दोनों ओर नदी बहती है।)
(viii) धिक् (धिक्कार)-धिक तम् दुर्जनम्। (दुर्जन को धिक्कार है।)

उपपद विभक्ति संस्कृत Class 9 HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् कारक एवं उपपद विभक्ति

3. तृतीया विभक्ति-जिस साधन के द्वारा कर्ता क्रिया को सिद्ध करता है, उस साधन में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है। इसे करण कारक भी कहते हैं; जैसे-रामः हस्तेन लिखति (राम हाथ से लिखता है)। यहाँ पर राम द्वारा लिखने की क्रिया हाथ से बताई गई है। इसलिए लिखने के साधन ‘हाथ’ में तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया गया है।
व्याकरण (कारक, उपपद विभक्ति, संख्या एवं अव्यय) इसके अतिरिक्त निम्नलिखित स्थानों पर भी तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है
(क) कर्मवाच्य तथा भाववाच्य के कर्ता में तृतीया विभक्ति होती है; जैसे कर्मवाच्य में-रामेण रावणः हन्यते। (राम के द्वारा रावण को मारा जाता है।) भाववाच्य में रामेण हस्यते। (राम के द्वारा हँसा जाता है।)
(ख) ‘प्रकृति’ इत्यादि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है; जैसे रामः प्रकृत्या विनीतः। (राम स्वभाव से नम्र है।) मोहनः स्वभावेन क्रूरः। (मोहन स्वभाव से क्रूर है।)
(ग) किसी शरीर के अंग-विकार में तृतीया विभक्ति होती है; जैसे सुरेशः नेत्रेण काणः अस्ति। (सुरेश आँख से काना है।)
(घ) सह, साकम्, सार्धम्, अलम्, हीनः शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
(i) सह (साथ) देवेन सह कृष्णः गच्छति। (देव के साथ कृष्ण जाता है।)
(ii) साकम् (साथ) त्वया साकम् अन्यः कः आगमिष्यति? (तुम्हारे साथ अन्य कौन आएगा?)
(iii) सार्धम् (साथ)-मया सार्धम् कविता पठ। (मेरे साथ कविता पढ़ो।)
(iv) अलम् (बस)-अलम् प्रलापेन! (प्रलाप मत करो!)
(v) हीनः (रहित)-नरः विद्याहीनः न शोभते। (विद्या से रहित मनुष्य शोभा नहीं पाता।)

4. चतुर्थी विभक्ति-सामान्यतया सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है अर्थात् जिसको कुछ दिया जाए, उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है; जैसे-रामः कृष्णाय धनं यच्छति (राम कृष्ण को धन देता है)। यहाँ कृष्ण को धन देने की बात कही गई है। इसलिए ‘कृष्ण’ में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया गया है इसके अतिरिक्त निम्नलिखित स्थानों पर चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
(क) नमः, स्वस्ति, स्वाहा के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है
(i) नमः (नमस्कार) देवाय नमः । (देवता को नमस्कार हो।)
(ii) स्वस्ति (कल्याण)-सर्वेभ्यः स्वस्ति अस्तु। (सबका कल्याण हो।)
(iii) स्वाहा (आहुति डालना)-रुद्राय स्वाहा। (रुद्र के लिए स्वाहा।)

(ख) रुच्, द्रुह् धातुओं के योग में चतुर्थी विभक्ति आती है।
(i) मह्यं क्षीरं रोचते। (मुझे दूध अच्छा लगता है।)
(ii) रामः मह्यं द्रुह्यति। (राम मुझसे द्रोह करता है।)

5. पञ्चमी विभक्ति-सामान्यतया (अपादान) अलग होने के अर्थ में पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है; जैसे-अहं गृहात् आगच्छामि (मैं घर से आता हूँ)। यहाँ ‘घर’ (जहाँ से मैं आता हूँ) में अपादान है। इसलिए उसमें पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग किया गया है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित स्थानों पर पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है
(क) पूर्व, ऋते, प्रभृति, बहिर्, ऊर्ध्वम् के योग में पञ्चमी विभक्ति आती है।
(i) पूर्व (पहले) मोहनः दश वादनात् पूर्व पाठशालां गच्छति। (मोहन दस बजे से पहले पाठशाला जाता है।)
(ii) ऋते (बिना)-ऋते धनात् न सुखम्। (धन के बिना सुख नहीं।)
(iii) प्रभृति (से लेकर)-जन्मनः प्रभृति स्वामी दयानन्दः ब्रह्मचारी आसीत् । (जन्म से लेकर स्वामी दयानन्द ब्रह्मचारी थे।)
(iv) बहिर् (बाहर)-ग्रामात् बहिर् उद्यानम् अस्ति। (गाँव से बाहर बगीचा है।)
(v) ऊर्ध्वम् (ऊपर)-भूमे ऊर्ध्वम् स्वर्गं वर्तते। (भूमि के ऊपर स्वर्ग है।)

Uppad Vibhakti Class 9 HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् कारक एवं उपपद विभक्ति

(ख) जुगुप्सा, विराम तथा प्रमादसूचक शब्दों के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है।
(i) जुगुप्सा (घृणा)-सत्पुरुषः पापात् जुगुप्सते। (सज्जन पाप से घृणा करते हैं।)
(ii) विरम (अनिच्छा)-रामः अध्ययनात् विरमति। (राम अध्ययन से अनिच्छा करता है।)
(iii) प्रमाद (विमुखता)-स धर्मात् प्रमादयति। (वह धर्म से विमुखता करता है।)

(ग) जिससे भय होता है तथा जिससे रक्षा की जाए, उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है।
(i) बालकः कुक्कुरात् बिभेति। (बालक कुत्ते से डरता है।)
(i) ईश्वरः मां पापात् रक्षति। (ईश्वर मुझे पाप से बचाता है।)

(घ) निवारण करना (रोकना) अर्थ वाली धातुओं के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है।
(i) मोहनः स्वमित्रं पापात् निवारयति। (मोहन अपने मित्र को पाप से रोकता है।)
(ii) कृषकः यवेभ्यः गां निवारयति। (किसान गाय को यवों से रोकता है।)

6. षष्ठी विभक्ति-सामान्यतया जिसका किसी से सम्बन्ध बताया जाए, उसमें षष्ठी विभक्ति होती है; जैसे-राज्ञः पुरुषः (राजा का पुरुष)। यहाँ पर ‘राजा’ का ‘पुरुष’ के साथ सम्बन्ध बताया गया है। इसलिए यहाँ षष्ठी विभक्ति का प्रयोग किया गया है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित स्थानों पर षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है
(क) ‘हेतु’ शब्द का प्रयोग होने पर षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है; जैसे पठनस्य हेतोः सोऽत्र वसति। (पढ़ने के लिए यह यहाँ रहता है।)

(ख) अधि + इ (पढ़ना), स्मृ (स्मरण करना) के योग में षष्ठी विभक्ति होती है।
(i) शिष्यः गुरोरधीते। (शिष्य गुरु से पढ़ता है।)
(ii) बालकः मातुः स्मरति। (बालक माता को स्मरण करता है।)

(ग) ‘तुल्य’ अर्थ वाले सम, सदृश इत्यादि शब्दों के योग में षष्ठी तथा तृतीया विभक्तियाँ होती हैं।
(i) तुल्य (समान)-देवः जनकस्य (जनकेन) तुल्यः । (देव पिता के समान है।)
(ii) सदृश (समान)-सा मातुः (मात्रा) सदृशी अस्ति। (वह माता के समान है।)

उपपद विभक्ति संस्कृत HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् कारक एवं उपपद विभक्ति

7. सप्तमी विभक्ति-अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है। आधार को अधिकरण कहते हैं अर्थात् जो जिसका आधार होता है, उसमें सप्तमी विभक्ति होती है; जैसे-वृक्षे काकः तिष्ठति (पेड़ पर कौआ बैठा है)। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित स्थानों पर सप्तमी विभक्ति होती है
(क) जिस वस्तु में इच्छा होती है, उसमें सप्तमी विभक्ति होती है। तस्य मोक्षे इच्छा अस्ति। (उसकी मोक्ष में इच्छा है।)
(ख) स्निह (स्नेह करना) धातु के योग में सप्तमी विभक्ति होती है। माता पुत्रे स्निह्यति। (माता पुत्र पर स्नेह करती है।)
(ग) युक्तः, व्यापृतः, तत्परः, निपुणः, कुशलः इत्यादि शब्दों के योग में सप्तमी विभक्ति होती है।
(i) युक्तः (नियुक्त)-सः अस्मिन् कार्ये नियुक्तोऽस्ति। (वह इस काम में नियुक्त है।)
(ii) व्यापृतः (संलग्न)-मोहनः निजकार्ये व्यापृतः अस्ति। (मोहन अपने काम में संलग्न है।)
(iii) तत्परः (प्रवृत्त)-सः पठने तत्परः अस्ति। (वह पढ़ने में प्रवृत्त है।)
(iv) निपुणः (निपुण)-रामः शिक्षणे निपुणः अस्ति। (राम शिक्षण में निपुण है।)
(v) कुशलः (दक्ष)-देवः अध्ययने कुशलः अस्ति। (देव अपने अध्ययन में दक्ष है।)

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HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् उपसर्ग

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Upasarg उपसर्ग Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit व्याकरणम् उपसर्ग

धातु से पूर्व लगने वाले शब्द को ‘उपसर्ग’ कहते हैं । वस्तुतः जो शब्द किसी धातु अथवा शब्द से पूर्व जुड़कर उनके अर्थों में परिवर्तन ला देते हैं, उन्हें ‘उपसर्ग’ कहते हैं। उदाहरण के लिए ‘ह’ धातु का अर्थ है हरण करना। परन्तु जब ‘ह’ से पूर्व ‘प्र’ उपसर्ग लग जाता है, तो उसका अर्थ प्र + ह = प्रहार (मारना) हो जाता है। आ + ह = आहार का अर्थ होता है भोजन करना। इसी प्रकार वि + ह = विहार, सम् + ह्न = संहार होता है। संस्कृत भाषा में उपसर्गों की संख्या 22 है। इनके उदाहरण निम्नलिखित रूप से प्रस्तुत हैं

क्रमांकउपसर्गधातुउपसर्ग से बने शब्द तथा अर्थवाक्य-प्रयोग
1याआयामि = आनाअहम् अम्बाला नगरात् आयामि।
2अतिक्राअतिक्रामति = लाँघनारामः समुद्रम् अतिक्रामति।
3अधिशीअधिशेते = रहनाईश्वरः स्वर्गम् अधिशेते।
4अनुगम्अनुगच्छति = पीछे जानाशिष्यः आचार्यम् अनुगच्छति।
5अपनीअपनयति = हटानाप्रकाशः अन्धकारम् अपनयति ।
6अपिधाअपिहितम् = बन्द करनादेवालयस्य द्वारम् अपिहितमू।
7अभिगम्अभिगच्छति = अभ्यास करनासः अध्येतुम् अभिगच्छति ।
8अवचिअवचिनोति = चुननाबालिका फलानि अवचिनोति।
9उत्पत्उत्पतन्ति = उड़नाआकाशे पक्षिणः उत्पतन्ति।
10उप्सृप्उपसर्पन्ति = पास आनाछात्रा: शिक्षकान् उपसर्पन्ति।
11दुस्कृदुष्करम् = मुश्किलवक्तुं सुकरं कर्तुं दुष्करम्।
12दुर्वि + हृदुर्व्यवह्रियते = बुरा व्यवहार करनादुष्टः संज्जनैः सह दुर्व्यवह्नियते।
13निवृत्निर्वतते = लौटनारमेशः विद्यालयात् निवर्तते।
14निर्गम्निर्गच्छति = निकलनासूर्यः पूर्वस्मिन् निर्गच्छति।
15निस्सृनिस्सरति = जाता हैबालक: ग्रामाद् निस्सरति।
16प्रहृप्रहरति = मारनासुरेशः मोहनं प्रहरति।
17प्रतिवद्प्रति वदति = जवाब देनासः स्वपितरं प्रति वदति।
18परिभ्रम्परिभ्रमति = घूमनाचन्द्र: पृथ्वीं परिभ्रमति।
19पराभूपराभवति = अपमानित करनारक्षक: तस्करं पराभवति।
20सु + आगम्स्वागत = स्वागत करनाछात्रा: आचार्यस्य स्वागतं कुर्वन्ति।
21सम्कृसंस्करोति = शुद्ध करनायन्त्रम् द्यृतं संस्करोति।
22विचर्विचरन्ति = घूमनाबालका: विद्यालये विचरन्ति।

Class 9 Sanskrit Upsarg HBSE

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् उपसर्ग

अभ्यासार्थ प्रश्नाः
I. अधोलिखितपदेषु प्रकृतिप्रत्ययविभाग/संयोगवा कुरुत
(i) हसन्तम् = ………………….. + …………………….
(ii) प्रकृतिः = ………………….. + …………………….
(iii) नि + सु + क्त + टाप् = ………………………….
(iv) नि + क्षिप् + ल्यप् = ……………………
(v) कार्यम् = ………………….. + …………………….
(vi) पेयम् = ………………….. + …………………….
(vii) लघुतम् = ………………….. + …………………….
(viii) आसनम् = ………………….. + …………………….
(ix) कृ + तव्यत् = ………………………
(x) धन + मतुप् = …………………………..

II. अधोलिखितपदेषु मूलधातु प्रत्ययं च पृथक् कृत्वा लिखत
जनम्, श्रीमान, चलितः, प्रहरन्ती, धृतवान्, वृद्धा, विशीर्णा, दृष्ट्वा, निधार्य, पठितः।

III. शुद्ध उत्तरं चित्वा लिखत
(1) ‘गतः’ इति पदे कः प्रत्ययः?
(क) तल्
(ख) त्व
(ग) क्त
(घ) क्त्वा
उत्तरम्:
(ग) क्त

Upsarg In Sanskrit Class 9 HBSE

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् उपसर्ग

(ii) ‘ग्रामतः’ इति पदे कः प्रत्ययः?
(क) तव्यत्
(ख) तसिल
(ग) क्त
(घ) शत
उत्तरम्:
(ख) तसिल

(iii) ‘निक्षिप्य’ इति पदे कः प्रत्ययः?
(क) ल्यप्
(ख) ण्यत्
(ग) शतृ
(घ) क्त
उत्तरम्:
(क) ल्यप्

(iv) ‘प्रष्टुम्’ इति पदे कः प्रत्ययः?
(क) शतृ
(ख) तुमुन्
(ग) शानच्
(घ) मतुप्
उत्तरम्:
(ख) तुमुन्

(v) ‘लघ्वी’ इति पदे कः प्रत्ययः?
(क) शतृ
(ख) शानच्
(ग) ण्यत्
(घ) ङीप्
उत्तरम्:
(घ) ङीप्

(vi) ‘अश्व + टाप्’ इति संयोगे किं रूपम् ?
(क) अश्वनी
(ख) अश्वा
(ग) अश्वी
(घ) अश्वना
उत्तरम्:
(ख) अश्वा

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् उपसर्ग

(vii) ‘विभाति’ इति पदे उपसर्गपदं किम् ?
(क) वि
(ख) भाति
(ग) वी
(घ) भा
उत्तरम:
(क) वि

(vii) ‘उपलभ्यते’ इति पदे उपसर्गपदं किम्?
(क) उ
(ख) प
(ग) उप
(घ) लभ्यते
उत्तरम्:
(ग) उप

IV.
(क) अधोलिखितेषुपदेषु उपसर्गान् पृथक् कृत्वा लिखत
आसाद्य, बिभातिः, उद्भूताः, प्रहरन्ति, उपसर्पतु, परिरक्षिताः, निवसन्ति, समुपहरन्ति, प्रतिभाति, उपगता।
(ख) अधोलिखितोपसर्गानां सहायतया शब्दनिर्माणं कुरुत
प्रति, उप, प्र, अव, अभि, वि।

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HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Dhaatu Roop धातु-रूप Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

Dhaturupani In Sanskrit Class 9 HBSE

1. पठ् (पढ़ना)
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपठतिपठतःपठन्ति
मध्यम पुरुषपठसिपठथःपठथ
उत्तम पुरुषपठामिपठाव:पठाम:

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपठत्पठताम्पठन्तु
मध्यम पुरुषपठपठतम्पठत
उत्तम पुरुषपठानिपठावपठाम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअपठत्अपठताम्अपठन्
मध्यम पुरुषअपठ:अपठतमअपठत
उत्तम पुरुषअपठम्अपठावअपठाम

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपठेत्पठेताम्पठेयु:
मध्यम पुरुषपठे:पठेतम्पठेत
उत्तम पुरुषपठेयम्पठेवपठेम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपठिष्यतिपठिष्यतःपठिष्यन्ति
मध्यम पुरुषपठिष्यसिपठिष्यथःपठिष्यथ
उत्तम पुरुषपठिष्यामिपठिष्याव:पठिष्यामः

Class 9 Sanskrit Dhatu Roop HBSE

2. गम् (जाना)
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषगच्छतिगच्छतःगच्छन्ति
मध्यम पुरुषगच्छसिगच्छथःगच्छथ
उत्तम पुरुषगच्छामिगच्छावःगच्छामः

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषगच्छतुगच्छताम्गच्छन्तु
मध्यम पुरुषगच्छगच्छतम्गच्छत
उत्तम पुरुषगच्छानिगच्छावगच्छाम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअगच्छत्अगच्छताम्अगच्छन्
मध्यम पुरुषअगच्छःअगच्छतम्अगच्छत
उत्तम पुरुषअगच्छम्अगच्छावअगच्छाम

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषगच्छेत्गच्छेताम्गच्छेयु:
मध्यम पुरुषगच्छे:गच्छेतम्गच्छेत
उत्तम पुरुषगच्छेयम्गच्छेवगच्छेम

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषगमिष्यतिगमिष्यतःगमिष्यन्ति
मध्यम पुरुषगमिष्यसिगमिष्यथःगमिष्यथ
उत्तम पुरुषगमिष्यामिगमिष्यावःगमिष्यामः

धातु रूप HBSE 9th Class HBSE

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

3. स्था (बैठना/उहरना)
लट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषतिष्ठतितिष्ठतःतिष्ठन्ति
मध्यम पुरुषतिष्ठसितिष्ठथःतिष्ठथ
उत्तम पुरुषतिष्ठामितिष्ठावःतिष्ठामः

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषतिष्ठतुतिष्ठताम्तिष्ठन्तु
मध्यम पुरुषतिष्ठतिष्ठतम्तिष्ठत
उत्तम पुरुषतिष्ठानितिष्ठावतिष्ठाम

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअतिष्ठत्अतिष्ठताम्अतिष्ठन्
मध्यम पुरुषअतिष्ठ:अतिष्ठतमूअतिष्ठत
उत्तम पुरुषअतिष्ठम्अतिष्ठावअतिष्ठाम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषतिष्ठेत्तिष्ठेताम्तिष्ठेयु:
मध्यम पुरुषतिष्ठे:तिष्ठेतमूतिष्ठेत
उत्तम पुरुषतिष्ठेयम्तिष्ठेवतिष्ठेम

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषस्थास्यतिस्थास्यतःस्थास्यन्ति
मध्यम पुरुषस्थास्यसिस्थास्यथःस्थास्यथ
उत्तम पुरुषस्थास्यामिस्थास्यावःस्थास्याम

4. भू (भव) (होना)
लट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषभवतिभवतःभवन्ति
मध्यम पुरुषभवसिभवथःभवथ
उत्तम पुरुषभवामिभवावःभवामः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअभवत्अभवताम्अभवन्
मध्यम पुरुषअभवःअभवतम्अभवत
उत्तम पुरुषअभवम्अभवावअभवाम

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषभवतु, भवतात्भवताम्भवन्तु
मध्यम पुरुषभव, भवतात्भवतम्भवत
उत्तम पुरुषभवानिभवावभवाम

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषभवेत्भवेताम्भवेयुः
मध्यम पुरुषभवे:भवेतम्भवेत
उत्तम पुरुषभवेयम्भवेवभवेम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषभविष्यतिभविष्यतःभविष्यन्ति
मध्यम पुरुषभविष्यसिभविष्यथःभविष्यथ
उत्तम पुरुषभविष्यामिभविष्यावःभविष्यामः

5. पा (पीना)
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपिबतिपिबतःपिबन्ति
मध्यम पुरुषपिबसिपिबथःपिबथ
उत्तम पुरुषपिबामिपिबावःपिबाम:

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअपिबत्अपिबताम्अपिबन्
मध्यम पुरुषअपिबःअपिबतम्अपिबत
उत्तम पुरुषअपिबम्अपिबावअपिबाम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपिबतुपिबताम्पिबन्तु
मध्यम पुरुषपिबपिबतम्पिबत
उत्तम पुरुषपिबानिपिबावपिबाम

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपिबेत्पिबेताम्पिबेयु:
मध्यम पुरुषपिबे:पिबेतम्पिबेत
उत्तम पुरुषपिबेयम्पिबेवपिबेम

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपास्यतिपास्यतःपास्यन्ति
मध्यम पुरुषपास्यसिपास्यथःपास्यथ
उत्तम पुरुषपास्यामिपास्यावःपास्यामः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

6. प्रच्छू (पूछना)
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपृच्छतिपृच्छतःपृच्छन्ति
मध्यम पुरुषपृच्छसिपृच्छथःपृच्छथ
उत्तम पुरुषपृच्छामिपृच्छावःपृच्छामः

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपृच्छतुपृच्छताम्पृच्छन्तु
मध्यम पुरुषपृच्छपृच्छतम्पृच्छत
उत्तम पुरुषपृच्छानिपृच्छावपृच्छाम

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअपृच्छत्अपृच्छताम्अपृच्छन्
मध्यम पुरुषअपृच्छ:अपृच्छतम्अपृच्छत
उत्तम पुरुषअपृच्छम्अपृच्छावअपृच्छाम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपृच्छेत्पृच्छेताम्पृच्छेयुः
मध्यम पुरुषपृच्छे:पृच्छेतम्पृच्छेत
उत्तम पुरुषपृच्छेयम्पृच्छेवपृच्छेम

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषप्रक्ष्यतिप्रक्ष्यतःप्रक्ष्यन्ति
मध्यम पुरुषप्रक्ष्यसिप्रक्ष्यथःप्रक्ष्यथ
उत्तम पुरुषप्रक्ष्यामिप्रक्ष्यावःप्रक्ष्यामः

7. दृश्र (पश्य) देखना
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपश्यतिपश्यतःपश्यन्ति
मध्यम पुरुषपश्यसिपश्यथःपश्यथ
उत्तम पुरुषपश्यामिपश्यावःपश्याम:

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअपश्यत्अपश्यताम्अपश्यन्
मध्यम पुरुषअपश्यःअपश्यतम्अपश्यत
उत्तम पुरुषअपश्यम्अपश्यावअपश्याम

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपश्यतुपश्यताम्पश्यन्तु
मध्यम पुरुषपश्यपश्यतम्पश्यत
उत्तम पुरुषपश्यानिपश्यावपश्याम

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषपश्येत्पश्येताम्पश्येयु:
मध्यम पुरुषपश्ये:पश्येतम्पश्येत
उत्तम पुरुषपश्येयम्पश्येवपश्येम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषद्रक्ष्यतिद्रक्ष्यतःद्रक्ष्यन्ति
मध्यम पुरुषद्रक्ष्यसिद्रक्ष्यथःद्रक्ष्यथ
उत्तम पुरुषद्रक्ष्यामिद्रक्ष्यावःद्रक्ष्यामः

8. दा (देना)
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषददातिदत्तःददन्ति
मध्यम पुरुषददासिदत्थःदत्थ
उत्तम पुरुषददामिदद्व:दद्मः (दूदूम:)

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषददातु, दत्तात्दत्ताम्ददतु
मध्यम पुरुषदेहि, दत्तात्दत्तम्दत्त
उत्तम पुरुषददानिददावददाम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअददात्अदत्ताम्अददु:
मध्यम पुरुषअददाःअदत्तम्अदत्त
उत्तम पुरुषअददाम्अद्वअद्द्म

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषदद्यात्दद्याताम्दह्यु:
मध्यम पुरुषदद्या:दद्यातम्दद्यात
उत्तम पुरुषदद्याम्दद्यावदद्याम

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषदास्यतिदास्यतःदास्यन्ति
मध्यम पुरुषदास्यसिदास्यथःदास्यथ
उत्तम पुरुषदास्यामिदास्यावःदास्यामः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

9. कृ (करना)
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषकरोतिकुरुतःकुर्वन्ति
मध्यम पुरुषकरोषिकुरुथःकुरुथ
उत्तम पुरुषकरोमिकुर्व:कुर्म:

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअकरोत्अकुरुताम्अकुर्वन्
मध्यम पुरुषअकरो:अकुरुतम्अकुरुत
उत्तम पुरुषअकरवम्अकुर्वअकुर्म

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषकरोतुकुरुताम्कुर्वन्तु
मध्यम पुरुषकुरुकुरुतम्कुरुत
उत्तम पुरुषकरवाणिकरवावकरवाम

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषकुर्यात्कुर्याताम्कुर्यु:
मध्यम पुरुषकुर्या:कुर्यातम्कुर्यात
उत्तम पुरुषकुर्याम्कुर्यावकुर्याम

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषकरिष्यतिकरिष्यतःकरिष्यन्ति
मध्यम पुरुषकरिष्यसिकरिष्यथःकरिष्यिथ
उत्तम पुरुषकरिष्यामिकरिष्यावःकरिष्यामः

10. अस् (होना)
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअस्तिस्तःसन्ति
मध्यम पुरुषअसिस्थःस्थः
उत्तम पुरुषअस्मिस्वःस्मः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषआसीत्आस्ताम्आसन्
मध्यम पुरुषआसी:आस्तम्आस्त
उत्तम पुरुषआसम्आस्वआस्म

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअस्तुंस्ताम्सन्तु
मध्यम पुरुषएधिस्तम्स्त
उत्तम पुरुषअसानिअसावअसाम

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषस्यात्स्याताम्स्यु:
मध्यम पुरुषस्याःस्यातम्स्यात
उत्तम पुरुषस्याम्स्यावस्याम

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषभविष्यतिभविष्यतःभविष्यन्ति
मध्यम पुरुषभविष्यसिभविष्यथःभविष्यथ
उत्तम पुरुषभविष्यामिभविष्यावःभविष्यामः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

आत्मनेपदी धातु
1. सेव् (सेवा करना)
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषसेवतेसेवेतेसेवन्ते
मध्यम पुरुषसेवसेसेवेथेसेवध्वे
उत्तम पुरुषसेवेसेवावहेसेवामहे

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषसेवताम्सेवेताम्सेवन्ताम्
मध्यम पुरुषसेवस्वसेवेथाम्सेवध्वम्
उत्तम पुरुषसेवैसेवावहैसेवामहै

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअसेवतअसेवेताम्असेवन्त
मध्यम पुरुषअसेवथाःअसेवेथाम्असेवध्वम्
उत्तम पुरुषअसेवेअसेवावहिअसेवामहि

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषसेवेत्सेवेयाताम्सेवेरन्
मध्यम पुरुषसेवेथाःसेवेयाथाम्सेवेध्वम्
उत्तम पुरुषसेवेयसेवेवहिसेवेमहि

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषसेविष्यतेसेविष्येतेसेविष्यन्ते
मध्यम पुरुषसेविष्यसेसेविष्येथेसेविष्यध्वे
उत्तम पुरुषसेविष्येसेविष्यावहेसेवष्यिामहे

2. वृध् (बढ़ना)
लट्र लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषवर्धतेवर्धेतेवर्धन्ते
मध्यम पुरुषवर्धसेवर्धेथेवर्धध्वे
उत्तम पुरुषवर्धेवर्धेवहेवर्धेमहे

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लोट् लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषवर्धताम्वर्धेताम्वर्धन्ताम्
मध्यम पुरुषवर्धस्ववर्धेथाम्वर्धेध्वम्
उत्तम पुरुषवर्धैवर्धावहैवर्धामहै

लडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषअवर्धतअवर्धताम्अवर्धन्त
मध्यम पुरुषअवर्धेथाःअवर्धेथाम्अवर्धेध्वम्
उत्तम पुरुषअवर्धेवअवर्धावहिअवर्धामहि

विधिलिडू लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषवर्धेत्वर्धेयाताम्वर्धेरन्
मध्यम पुरुषवर्धथाःवर्धेयाथाम्वर्धेध्वम्
उत्तम पुरुषवर्धेयवर्धेवहिवर्धेमहि

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् धातु-रूप

लृट्श लकार

पुरुषएकबचनद्विवचनबहुबचन
प्रथम पुरुषवर्धिष्यतेवर्धिष्येतेवर्धिष्यन्ते
मध्यम पुरुषवर्धिष्यसेवर्धिष्येथेवर्धिष्यध्वे
उत्तम पुरुषवर्धिष्येवर्धिष्यावहेवर्धिष्यामहे

 

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HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Pratyay प्रत्यय Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

प्रत्यय एवं उपसर्ग
(क)  प्रत्यय
जो शब्दों एवं धातुओं के आगे जुड़कर उनके अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं, उन्हें प्रत्यय कहते हैं। संस्कृत भाषा में संज्ञा एवं विशेषण बनाने के लिए दो प्रकारों के प्रत्ययों का प्रयोग होता है-कृत् प्रत्यय एवं तद्धित प्रत्यय। धातुओं से जुड़ने वाले प्रत्ययों को कृत् प्रत्यय कहते हैं। प्रातिपदिक (संज्ञा शब्दों) से जुड़ने वाले प्रत्ययों को तद्धित प्रत्यय कहते हैं। इन्हीं प्रत्ययों का विवेचन प्रस्तुत है

Pratyay In Sanskrit Class 9 HBSE

1. कृत् प्रत्यय

कृत् प्रत्यय से निष्पन्न होने वाले शब्दों को ‘कृदंत’ शब्द कहते हैं। कृत् प्रत्यय में कुछ प्रत्यय भूतकालिक हैं, कुछ वर्तमानकालिक हैं तथा कुछ विधिवाचक प्रत्यय हैं

(क) भूतकालिक कृत् प्रत्यय
क्त, क्तवतु, क्त्वा, तुमुन्, ल्यप् आदि प्रत्ययों का प्रयोग भूतकालिक कृत् प्रत्ययों के रूप में होता

क्त – क्त प्रत्यय का प्रयोग कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य एवं भाववाच्य में किया जाता है। इस प्रत्यय का केवल ‘त’ शेष रहता है; जैसेसः गतः। यहाँ पर गम् धातु + क्त प्रत्यय = गम् + त (क्त) = गम् के मकार का लोप होकर ग + त = गतः बनता है।

क्तवतु क्तवतु प्रत्यय का प्रयोग केवल कर्तृवाच्य में होता है। इस प्रत्यय के लगने से क्रिया की समाप्ति का बोध होता है। क्तवतु प्रत्यय का ‘त्वत्’ शेष रहता है; जैसे-रामः पाठं पठितवान्। यहाँ पठ् धातु + क्तवतु = पठ् + त्वत् = पठितवान् बना। क्त तथा क्तवतु प्रत्ययों के रूप स्त्रीलिङ्ग, पुंल्लिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग, तीनों लिङ्गों में चलते हैं एवं विशेषण के अनुसार सातों विभक्तियों में इन प्रत्ययों के रूप चलते हैं। इन दोनों प्रत्ययों के उदाहरण तीनों लिङ्गों में नीचे दिखाए जा रहे हैं

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

क्त प्रत्यय

धातुपुंल्लिड्गनपुंसकलिडून्यस्त्रीलिडूग
गम्गतःगतम्गता
पठ्पठितःपठितम्पठिता
धाव्धावितःधावितम्धाविता
हस्हसितःहसितम्हसिता
पत्पतितःपतितम्पतिता
क्रीडक्रीडितःक्रीडितम्क्रीडिता
चल्चलितःचलितम्चलिता
खाद्खादितःखादितम्खादिता
पच्पक्वःपक्वम्पक्वा
नम्नतःनतम्नता

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

क्तवतु प्रत्यय

धातुपुंल्लिड्गनपुंसकलिडून्यस्त्रीलिडूग
गम्गतवान्गतवत्गतवत्री
पठ्पठितवान्पठितवत्पठितवती
धाव्धावितवान्धावितवत्धावितवती
हस्हसितवान्हसिवत्हसितवती
पत्पतितवान्पतितवत्पतितवती
क्रीडक्रीडितवानूकीडिवत्क्रीडितवती
चल्चलितवान्चलितवत्चलितवती
खाद्खादितवान्खदितवत्खादितवती
पच्पक्ववान्पक्ववत्पक्ववती
नम्नतवान्नतवत्नतवती

Pratyay Class 9 Sanskrit HBSE

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

क्त्वा तथा तमन् प्रत्यय

क्त्वा तथा तुमुन् दोनों प्रत्ययों का प्रयोग पूर्वकालिक क्रिया के रूप में होता है तथा इनसे निर्मित शब्द अव्यय के समान प्रयुक्त होते हैं। दोनों प्रत्ययों में अंतर यह है कि जहाँ ‘क्त्वा’ का अर्थ ‘करके’ है, वहीं तुमुन् का अर्थ ‘के लिए’ है। क्त्वा में ‘त्वा’ शेष रहता है। तुमुन् में ‘तुम्’ शेष रहता है।
क्त्वा प्रत्यय

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
पठ्पठित्वाकथूकथयित्वा
चल्चलित्वागण्गणयित्वा
हस्हसित्वाचुरचोरयित्वा
रक्षरक्षित्वापापीत्वा
रच्रचयित्वाज्ञाज्ञात्वा
भक्ष्भक्षयित्वाछिद्छित्वा
दादत्वायजइष्ट्वा
जिजित्वाप्रच्छ्प्रष्ट्वा
नीनीत्वाट्टश्दृष्ट्वा
भीभीत्वानश्नष्ट्वा
शीशयित्वास्पृश्स्पृष्ट्वा
भूभूत्वा

तुमुन् प्रत्यय

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
अर्च्अर्चयितुम्नशनष्टुम्
कुजकूजयितुम्भ्रम्भ्रमितुम्
भूभवितुम्तुष्तोष्टुम्
पठ्पठितुम्चुर्चोरयितुम्
स्थास्थातुम्कथ्कथयितुम्
गम्गन्तुम्भक्ष्भक्षयितुम्
ब्रूवक्तुम्क्षाल्क्षालयितुम्
नीनेतुम्चल्चलितुम्

Class 9 Sanskrit Pratyay HBSE

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

ल्यप् प्रत्यय
किसी धातु के आरंभ में उपसर्ग (प्र, परा, अप, सम आदि) लगा हो तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् हो जाता है। ल्यप् प्रत्यय का केवल ‘य’ शेष रहता है।

उपसर्गधातुप्रत्ययान्त शब्द उत्
उत्+स्थाउत्थाय
उत्+प्लुउत्प्लुत्य
प्र+हृप्रहत्य
सम्+हृसहत्य
परि+हृपरिहत्य
वि+ज्ञाविज्ञाय
+दाआदाय
प्र+नश्प्रणश्य
वि+स्मृविस्मृत्य
+वृत्आवृत्य
वि+कृविकीर्य
अव+तृअवतीर्य
अनु+भूअनुभूय

Pratyay Sanskrit Class 9 HBSE

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

(ख) वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय
वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय के अन्तर्गत शतृ तथा शानच् प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है। परस्मैपदी धातुओं से शतृ प्रत्यय तथा आत्मनेपदी धातुओं से शानच् जोड़ा जाता है। ‘करता हुआ’ अर्थ को बताने के लिए इन दोनों प्रत्ययों का प्रयोग होता है।
शतृ प्रत्यय
‘शतृ’ प्रत्यय का ‘अत्’ शेष बचता है।

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
भूभवत्स्थातिष्ठत्
पापिबत्पठ्पठत्
घ्राजिघ्रत्इशपश्यत्
गैगायत्गम्गच्छत्
तुष्तुष्यत्हस्हसत्
दायच्छत्क्रीड्क्रीडत्
खाद्खादत्वद्वदत्
सद्सीदत्स्मृस्मरत्
नम्नमत्त्यज्त्यजत्
रक्षरक्षत्नृत्नृत्यत्
पत्पतत्पच्पचत्
चल्चलत्श्रुश्रुण्वत्
चुर्चोरयत्इष्इच्छत्

शानच् प्रत्यय
शानच् प्रत्यय में ‘आन’ तथा ‘मान’ शेष बचता है। इनमें भ्वादिगण, दिवादिगण, तुदादिगण तथा चुरादिगण की धातुओं के साथ शानच् प्रत्यय के स्थान पर ‘मान’ जुड़ता है। शेष गणों में धातु के साथ ‘आन’ जुड़ता है।
1. भ्वादिगण

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
सेव्सेवमानःभाष्भाषमाण:
लभूलभमानःवृत्वर्तमानः
ईक्ष्ईक्षमाण:वृध्वर्धमानः

Sanskrit Pratyay Class 9 HBSE

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

2. दिवादिगण

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
मन्मन्यमानःखिद्द्खिद्यमानः
जनूजायमानःयुध्युध्यमानः
विद्विद्यमानःयुजूयुज्यमानः

3. तुदादिगण

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
मुच्मुल्चमानःमृम्रियमाणः
विद्विन्दमानःसिच्सिज्चमानः
तुद्तुदमानः

4. चुरादिगण

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
चुर्चोरयमाण:कथ्कथयमानः
भक्षभक्षयमाण:रच्रचयमाणः
दण्ड्दण्डयमानःतुल्तोलयमान:

5. तनादिगण

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
कृकुर्वाणःतन्तन्वानः
मन्मन्वातः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

6. अदादिगण

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
दुह्दुहान:शीशयानः
असआसीनः

7. जुहोत्यादिगण

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
धादधानःदाददानः

8. रुधादिगण

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
रुध्रुन्धानःभुज्भुज्जानः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

9. क्रयादिगण

धातुप्रत्ययान्त शब्दधातुप्रत्ययान्त शब्द
क्रीक्रीणानःज्ञाज्ञानान:
गृह्गृह्णानः

विधि कृदन्त प्रत्यय

चाहिए एवं योग्य अर्थ को प्रकट करने के लिए विधि कृदन्त प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है। इनमें दो प्रत्यय मुख्य हैं-तव्यत् प्रत्यय व अनीयर प्रत्यय। क्रिया-रूप में इनका प्रयोग कर्मवाच्य तथा भाववाच्य में होता है। तव्यत् में ‘तव्य’ एवं अनीयर में ‘अनीय’ शेष बचता है।

धातुतव्यत् प्रत्ययान्त रूपअनीयर् प्रत्ययान्त रूप
अर्चअर्चितव्यःअर्चनीयः
कूजूकूजितव्य:कूजनीय:
भूभवितव्यःभवनीयः
पठ्पठितव्य:पठनीय:
स्थास्थातव्यःस्थानीयः
पापातव्य:पानीयः
गम्गन्तव्यःगमनीयः
ब्रू (वच्)वक्तव्यःवचनीय:
नीनेतव्य:नयनीयः
टृश्द्रष्टव्य:दर्शनीयः
समृस्मर्तव्य:स्मरणीयः
दादातव्य:दानीयः
सह्सोढव्यःसहनीयः
इष्एष्ट्व्यःएषणीयः
स्पृश्स्प्रष्टव्यःस्पर्शनीयः
पृच्छ्प्रष्टव्यःप्रश्नीय:
दिव्देवितव्यःदेवनीय:
नृत्नर्तितव्यःनर्तनीय:
कृकर्तव्यकरणीयः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

2. तद्धित प्रत्यय

संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया-विशेषण तथा अव्यय में प्रत्यय लगाकर जो नए शब्द बनते हैं, वे तद्धित प्रत्ययान्त शब्द कहलाते हैं तथा उन प्रत्ययों को तद्धित प्रत्यय कहते हैं। तद्धित प्रत्यय लगने पर नए शब्दों के अर्थ भी मूल शब्दों से भिन्न हो जाते हैं। इनमें त्व, तल्, मतुप तथा ठक् प्रत्यय प्रमुख हैं।

त्व प्रत्यय

शब्द के अन्त में ‘त्व’ जुड़ जाने पर वह शब्द नपुंसकलिंग में प्रयुक्त होता है। भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए त्व प्रत्यय लगाया जाता है।

शब्दप्रत्ययान्त शब्दशब्दप्रत्ययान्त शब्द
पशुपशुत्वम्महत्महत्चम्
नारीनारीत्वम्लघुलघुत्वम्
गुरुगुरुत्वम्जनजनत्वम्
मृदुमुदुत्वम्बन्धुबन्धुत्वम्
मित्रमित्रत्वम्मानवमानवत्वम्
सज्जनसज्जनत्वम्सुरसुरत्वम्

तल प्रत्यय

स्त्रीलिंग में भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए ‘तल्’ प्रत्यय भी लगाया जाता है। तल के स्थान पर ‘ता’ हो जाता है। प्रत्ययान्त शब्द शब्द

शब्दप्रत्ययान्त शब्दशब्दप्रत्ययान्त शब्द
शत्रुशत्तुताप्रियप्रियता
मधुरमधुरताहास्यहास्यता
बन्धुबन्धुताखिन्रखिन्नता
मुग्धमुग्धताशूद्रशूद्रता
गुरुगुरुतापृथुपृथुता

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

मतुप् प्रत्यय
इस प्रत्यय का प्रयोग ‘वाला’ अर्थ प्रकट करने के लिए किया जाता है। प्रत्यय का केवल ‘मत्’ ही शेष रह जाता है। यह अधिकतर इकारान्त, ईकारान्त, उकारान्त, ऊकारान्त और ओकारान्त आदि शब्दों में जुड़ता है।

इकारान्त शब्द

शब्दप्रत्ययान्त शब्दशब्दप्रत्ययान्त शब्द
अगिनअग्निमत्गतिगतिमत्
शक्तिशक्तिमत्बुद्धिबुद्धिमत्

ईकारान्त शब्द

शब्दप्रत्ययान्त शब्दशब्दप्रत्ययान्त शब्द
धीधीमत्श्रीश्रीमत्
हृीह्रीमत्

उकारान्त शब्द

शब्दप्रत्ययान्त शब्दशब्दप्रत्ययान्त शब्द
भनीभानुमत्अंशुअंशुमत्
मधुमधुमत्

ऊकारान्त शब्द
शब्द – प्रत्ययान्त शब्द
वधू – वधूमत्

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

ओकारान्त शब्द
शब्द – प्रत्ययान्त शब्द
गो – गोमत्

हलन्त शब्द

शब्दप्रत्ययान्त शब्दशब्दप्रत्ययान्त शब्द
धनुष्धनुष्मत्गुरुत्गुरुत्मत्
ककुद्ककुमत्

ठक् प्रत्यय

शब्द में ठक् के स्थान पर ‘अक्’ जुड़ जाता है। ठक् प्रत्यय का प्रयोग भाववाचक संज्ञा के अर्थ के रूप में होता है।

शब्दप्रत्ययान्त शब्दशब्दप्रत्ययान्त शब्द
धर्मधार्मिक:अस्तिआस्तिकः
समाजसामाजिक:पक्षिपाक्षिक:
अधर्मअधार्मिकःवर्षवार्षिक:
न्यायनैयायिक:सप्ताहसाप्ताहिक:
वेदवैदिक:हरिणहारिणिकः
इतिहासऐतिहासिकःमयूरमायूरिकः
भूतभौतिक:मासमासिक:

स्त्री प्रत्यय

संस्कृत में कुछ शब्द तो मौलिक रूप से ही पुंल्लिङ्ग या स्त्रीलिङ्ग होते हैं और कुछ शब्द प्रत्यय जोड़कर पुंल्लिङ्ग से स्त्रीलिङ्ग बनाए जाते हैं; जैसे

मूलतः स्त्रीलिङ्ग शब्द-लता, प्रजा, मति, बुद्धिः, गति, नदी, स्त्री, धेनू, वधु, नौ इत्यादि। जिन प्रत्ययों से स्त्रीलिङ्ग शब्द बना है, उन्हें स्त्री प्रत्यय कहते हैं। टाप् तथा ङीप् मुख्य स्त्री प्रत्यय हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

टाप् प्रत्यय

शब्दप्रत्ययान्त शब्दशब्दप्रत्ययान्त शब्द
सुतसुताअजअजा
अश्वअश्वाचटकचटका
क्षत्रियक्षत्रियाकृपणकृपण
सरलसरलाप्रथमपृथपण
चतुरचतुरादक्षदक्ष
अनुकूलअनुकूलामध्यममध्यम

ङीप प्रत्यय

ऋकारान्त और नकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों से स्त्रीलिङ्ग शब्द बनाने के लिए ङीप् (ई) प्रत्यय जोड़ देते हैं। ङीप् प्रत्यय का ‘ई’ शेष रह जाता है ‘ङ’ और ‘प्’ का लोप हो जाता है।

ऋकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्तनकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्त
धातृधात्रीदण्डिन्दण्डिनी
हन्तृहन्त्रीपयस्विन्पयस्विनी
नेतृनेत्रीयामिन्यामिनी
अभिनेत्रीअभिनेत्रीदामिन्दामिनी
कवयितृकवयित्रीभामिन्भामिनी
धातृधात्रीदण्डिन्दण्डिनी

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

मतुप, वतुप, ईयसुन, वस, क्तवतु प्रत्ययान्त शब्दों से स्त्रीलिङ्ग शब्द बनाने के लिए ङीप् (ई) प्रत्यय जोड़ देते हैं।

ऋकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्तनकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्त
श्रीमत्श्रीमतीविद्वस्विदुषी
भवत्भवतीभगवत्भगवती
रूपवत्रूपवतीगतवत्गतवती
प्रेयस्प्रेयसीगरीयस्गरीयसी

डीप से पूर्व ‘आनुक’ का भी आगम होता है। ‘आनुक’ के ‘आन’ में ‘ई’ प्रत्यय जोड़ देते हैं।

ऋकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्तनकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्त
शिवशिवानीइन्द्रइन्द्रानी
मातुलमातुलानीहिमहिमानी
आचार्यआचार्याणीअरण्यअरण्यानी

कुछ शब्दों से स्त्रीलिङ्ग शब्द बनाने के लिए अन्त में ‘ऊ’ प्रत्यय भी जोड़ते हैं।

ऋकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्तनकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्त
श्वसुरश्वश्रूकुरूकुरु
पंगूपंगूब्रह्मबन्धुब्रह्मबन्धू

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

अकारान्त शब्दों के पीछे ‘ई’ प्रत्यय जोड़कर ‘स्त्रीलिङ्ग’ शब्द बनते हैं।

ऋकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्तनकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्त
काककाकीसिंहसिंही
मृगमृगीहयहयी
शूकरशूकरीव्याघ्रव्याघ्री
सूरीशुकशुकीशुकी

प्रथम (आयु) के वाचक अकारान्त शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में डीप् (ई) प्रत्यय का प्रयोग होता है।

ऋकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्तनकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्त
कुमारकुमारीतरुणतरुणी
किशोरकिशोरीवधूटवधूटी

विशेषणवाचक उकारान्त शब्दों के ‘उ’ का ‘व’ हो जाता है तथा बाद में ‘ई’ प्रत्यय लगता है।

ऋकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्तनकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्त
लघुलघ्वीगुरुगुर्वी
पट्पट्वीमधुमधवी

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

शतृ प्रत्ययान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों से स्त्रीलिङ्ग शब्द बनाने के लिए भ्वादिगण, दिवादिगण और चुरादिगण की धातुओं से तथा णिजन्त धातुओं से ‘शतृ’ प्रत्यय करने पर ‘ई’ प्रत्यय लगाकर ‘त’ में ‘न’ जोड़ दिया जाता है।

ऋकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्तनकारान्त पुंल्लिङ्गस्त्री प्रत्ययान्त
भवत्भवन्तीपश्यत्पश्यन्ती
गच्छत्गच्छन्तीसीदत्सीदन्ती
कथयत्कथयन्तीहसत्हसन्ती
पतिपत्नीश्वन्शुनी
नटनटीसूर्यसूया
गौरगौरीसुन्दरसुन्दरी

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

3. अन्य प्रत्यय
(क) णिनि प्रत्यय
तुल्य वृद्धि या गुण के अर्थ में, अच्छा करने के अर्थ में तथा अपने को समझने के अर्थ में णिनि प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। इस प्रत्यय का ‘इन्’ शेष बचता है; जैसे
नि + वस् + णिनि = निवासी
गुण + णिनि = गुणिन्
प्र + वस् + णिनि = प्रवासी
दान + णिनि = दानिन्
उप + कृ + णिनि = उपकारी
कवच + णिनि = कवचिन्
अधि + कृ + णिनि = अधिकारी
कुशल + णिनि = कुशलिन्
पण्डित + मन् + णिनि = पण्डितमानी
धन + णिनि = धनिन्
ग्रह् + णिनि = ग्राही
दण्ड + णिनि = दण्डिन्
स्था + णिनि = स्थायी
मन्त्र + णिनि = मन्त्री

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

(ख) तरप एवं तमप्
दो की तुलना में विशेषण शब्द से तरप् (तर) और ईयसुन् (ईयस्) प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार ज्यादा में से एक की विशेषता बताने के अर्थ में तमप् (तम) और इष्ठन् (इष्ठ) प्रत्यय प्रयुक्त होते हैं। उदाहरणार्थ
पटु + तरप् = पटुतरः
पटु + ईयसुन् = पटीयान्
पटु + तमप् = पटुतमः
पटु + इष्ठन् = पटिष्ठः
श्रेष्ठ + ईयसुन् = श्रेयान्
श्रेष्ठ + इष्ठन् = श्रेष्ठः
गुरु + ईयसुन् = गरीयान्
गुरू + इष्ठन् = गरिष्ठः

(ग) तसिल् प्रत्यय
संज्ञा आदि शब्दों से पञ्चमी विभक्ति के अर्थ को प्रकट करने के लिए ‘तसिल्’ प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है; जैसे
ग्राम + तसिल = ग्रामतः (गाँव से)
आदि + तसिल् = आदितः (प्रारम्भ से)
विद्यालय + तसिल = विद्यालयतः (विद्यालय से)
गृह + तसिल् = गृहतः (घर से)
तन्त्र + तसिल = तन्त्रतः (तन्त्र से)
प्रथम + तसिल = प्रथमतः (प्रारम्भ से)
आरम्भ + तसित् = आरम्भतः (आरम्भ से)

(घ) च्चि प्रत्यय
च्चि प्रत्यय का प्रयोग केवल भू तथा कृ धातुओं के साथ होता है। जो वस्तु पहले न हो, उसके हो जाने में ‘च्चि’ प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है; जैसे
अङ्ग + च्चि + कृतम् = अङ्गीकृतम्
कृष्णः + च्चि + क्रियते = कृष्णीक्रियते
ब्रह्मः + च्वि + भवति = ब्रह्मी भवति
द्रवः + च्चि + क्रियते = द्रवीक्रियते

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् प्रत्यय

(ङ) मयट् प्रत्यय
प्राचुर्य अथवा आधिक्य के अर्थ को प्रकट करने के लिए शब्दों में मयट् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है; जैसे
पुल्लिङ्ग – स्त्रीलिङ्ग
शान्ति + मयट् = शान्तिमयः – शान्तिमयी
आनन्द + मयट् = आनन्दमयः – आनन्दमयी
सुख + मयट् = सुखमयः – सुखमयी
तेजः + मयट् = तेजोमयः – तेजोमयी

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HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् समासः

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Samasaha समासः Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit व्याकरणम् समासः

व्याकरणम् समासः HBSE 9th Class Sanskrit

समास- समसनं समासः
समास का शाब्दिक अर्थ होता है-संक्षेप। दो या दो से अधिक शब्दों के मिलने से जो तीसरा नया और संक्षिप्त रूप बनता है, वह समास कहलाता है। समास के मुख्यतः चार भेद हैं
1. अव्ययीभाव समास
2. तत्पुरुष
3. बहुब्रीहि
4. द्वन्द्व

1. अव्ययीभाव = पूर्वपद प्रधानः ‘अव्ययीभावः’।
इस समास में पहला पद अव्यय होता है और वही प्रधान होता है।
यथा निर्मक्षिकम्, मक्षिकाणाम् अभावः ।
यहाँ प्रथमपद निर है और द्वितीयपद मक्षिकम है।
यहाँ मक्षिका की प्रधानता न होकर मक्षिका का अभाव प्रधान है, अतः यहाँ अव्ययीभाव समास है। कुछ अन्य उदाहरण देखें
(i) उपग्रामम् – ग्रामस्य समीपे (समीपता की प्रधानता)
(ii) निर्जनम् – जनानाम् अभावः (अभाव की प्रधानता)
(iii) अनुरथम् – रथस्य पश्चात् (पश्चात् की प्रधानता)
(iv) प्रतिगृहम् गृहं गृहं प्रति (प्रत्येक की प्रधानता)
(v) यथाशक्ति – शक्तिम् अनतिक्रम्य (सीमा की प्रधानता)
(vi) सचक्रम् – चक्रेण सहितम् – (सहित की प्रधानता)

2. तत्पुरुष–’प्रायेण उत्तरपदप्रधानः तत्पुरुषः’ इस समास में प्रायः उत्तरपद की प्रधानता होती है और पूर्व पद उत्तरपद के विशेषण का कार्य करता है। समस्तपद में पूर्वपद की विभक्ति का लोप हो जाता है।
यथा राजपुरुषः अर्थात् राजा का पुरुष। यहाँ राजा की प्रधानता न होकर पुरुष की प्रधानता है और राजा शब्द पुरुष के विशेषण का कार्य करता है।
(i) दृष्टिपथम् – दृष्टेः पन्थाः
(ii) पुस्तकदासाः – पुस्तकानां दासाः
(iii) विद्याव्यसनी – विद्यायाः व्यसनी
(iv) भयापन्न – भयम् आपन्नः
(v) परोपकारः – परेषां उपकारः
(vi) गृहोद्याने – गृहस्य उद्याने
(vii) नयनयुगलं – नयनयोः युगलम्

तत्पुरुष समास के दो भेद हैं-कर्मधारय और द्विगु।
(i) कर्मधारय इस समास में एक पद विशेष्य तथा दूसरा पद पहले पद का विशेषण होता है।
यथा
पीताम्बरम् – पीतं च तत् अम्बरम्।
महापुरुषः – महान् च असौ पुरुषः।
कज्जलमलिनम् – कज्जलम् इव मलिनम्।
नीलकमलम् – नीलं च तत् कमलम्।
मीननयनम् – मीन इव नयनम्।
मुखकमलम् – कमलम् इव मुखम्।

HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् समासः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् समासः

(ii) द्विगु-‘संख्यापूर्वो द्विगुः’ इस समास में पहला पद संख्यावाची होता है और समाहार (अर्थात् एकत्रीकरण या समूह) अर्थ की प्रधानता होती है।
यथा- त्रिभुजम् -त्रयाणां भुजानां समाहारः ।
इसमें पूर्वपद ‘त्रि’ संख्यावाची है।
सप्तपदम् – सप्तानां पदानां समाहारः।
पंचवटी – पंचानां वटानां समाहारः। सप्तर्षिः
सप्तानां ऋषीणां समाहारः ।
चतुर्युगम् – चतुर्णां युगानां समाहारः।

3. बहुब्रीहि-‘अन्यपदप्रधानः बहुब्रीहिः’ इस समास में पूर्व तथा उत्तर पदों की प्रधानता न होकर किसी अन्य पद की प्रधानता होती है।
यथा
पीताम्बरः – पीतम् अम्बरम् यस्य सः (विष्णुः)। यहाँ न तो पीतम् शब्द की प्रधानता है और न अम्बरम्
शब्द की अपितु पीताम्बरधारी किसी अन्य व्यक्ति (विष्णु) की प्रधानता है। नीलकण्ठः नीलः कण्ठः यस्य सः (शिवः)।
दशाननः – दश आननानि यस्य सः (रावणः)।
विनितमनोरथः – विनितः मनोरथः यस्य सः।
विगलितसमृद्धिम् – विगलिता समृद्धिः यस्यं तम्।
दत्तदृष्टिः – दत्ता दृष्टिः येन सः ।

4. द्वन्द्व –’उभयपदप्रधानः द्वन्द्वः’ इस समास में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों की समान रूप से प्रधानता होती है। पदों के बीच में ‘च’ का प्रयोग विग्रह में होता है।
यथा
रामलक्ष्मणौ – रामश्च लक्ष्मणश्च।
पितरौ – माता च पिता च।
तेजो वायुः – तेजः वायुः च।
गिरिनिर्झराः – गिरयः निर्झराः च।
लतावृक्षौ – लता वृक्षः च।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् समासः

अभ्यासार्थ प्रश्नाः

I. उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितानां विग्रह-पदानां समस्तपदानि लिखत
यथा-मलेनसहितम् – समलम्
(क) चतुर्णां मुखानां समाहारः …………………
(ख) अक्षराणां ज्ञानम् …………………
(ग) दुर्दान्तैः दशनैः …………………
(घ) मक्षिकाणां अभावः …………………
(ङ) महत् च तत् कम्पनं …………………

II. उदाहरणमनुसृत्य समस्तपदानां विग्रहपदानि लिखत
यथा-निर्गुणम् – गुणानाम् अभावः
(क) राजहंसः = …………………
(ख) पत्रपुष्पे = …………………
(ग) अम्बरपथम् = …………………
(घ) पशुपक्षी = …………………
(ङ) तपश्चर्यया = …………………

III. शुद्ध उत्तरं चित्वा लिखत
(i) ‘पूर्वम् अनतिक्रम्य’ अत्र समस्तपदम् अस्ति
(क) पूर्वातिक्रम्य
(ख) अतिक्रम्यपूर्वम्
(ग) अतिक्रम्यपूर्व
(घ) यथापूर्वम्
उत्तरम्:
(घ) यथापूर्वम्

(ii) ‘शस्त्रेण आहतः’ अत्र समस्तपदम् अस्ति
(क) शस्त्रहतः
(ख) शस्त्रहत्
(ग) शस्त्राहतः
(घ) शस्त्रहातम्
उत्तरम्:
(ग) शस्त्राहतः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् समासः

(iii) ‘महान् चासौ राजा’ अत्र समस्तपदम् अस्ति
(क) महाराजः
(ग) महानराजा
(ग) महत्राज
(घ) महताजा
उत्तरम्:
(क) महाराजः

(iv) ‘सप्तानां पदानां समाहारः’ अत्र समस्तपदम् अस्ति
(क) सप्तपद
(ख) सप्तपादम्
(ग) सप्तपदी
(घ) सप्तपदे
उत्तरम्:
(ग) सप्तपदी

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् समासः

(v) ‘नगानां इन्द्रः’ अत्र समस्तपदम् अस्ति
(क) नागिन्द्रः
(ख) नगामिन्द्र:
(ग) नगिन्द्रः
(घ) नगेन्द्र:
उत्तरम्:
(घ) नगेन्द्रः

IV.
(i) ‘यथापूर्वक’ इति पदे कः समासः?
(क) तत्पुरुषः
(ख) अव्ययीभावः
(ग) कर्मधारयः
(घ) बहुब्रीहिः
उत्तरम:
(ख) अव्ययीभावः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् समासः

(ii) ‘त्रिलोकी’ इति पदे कः समासः?
(क) द्विगु
(ख) तत्पुरुषः
(ग) कर्मधारयः
(घ) द्वन्द्वः
उत्तरम्:
(क) द्विगु

(iii) ‘अखण्डिता’ इति पदे कः समासः?
(क) अव्ययीभावः
(ख) तत्पुरुषः
(ग) नञ् तत्पुरुषः
(घ) कर्मधारयः
उत्तरम्:
(ग) नञ् तत्पुरुषः

(iv) ‘धर्माधिकारी’ इति पदे कः समासः?
(क) कर्मधारयः
(ख) बहुब्रीहिः
(ग) द्वन्द्वः
(घ) तत्पुरुषः
उत्तरम्:
(क) कर्मधारयः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् समासः

(v) ‘जलप्रवाहे’ अत्र किं विग्रहपदम्?
(क) जलम् प्रवाहम्
(ख) जले प्रवाहे
(ग) जलस्य प्रवाहे
(घ) जलात् प्रवाहो
उत्तरम्:
(ख) जले प्रवाहे

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HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Sandhi सन्धिः Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

व्याकरणम् सन्धिः HBSE 9th Class Sanskrit

आपके द्वारा पढ़ा गया है कि वर्णों के योग से शब्द बनते हैं।
यथा-व् + अ + र् + ष् + आ = वर्षा
व् + इ + द् + व् + आ + न् = विद्वान्
इसी प्रकार निम्नलिखित वर्णों को जोड़कर शब्द-निर्माण किया गया है
(i) व् + इ + द् + य् + आ + ल् + अ + य् + अ = विद्यालय
(ii) ग् + र् + आ + म् + अ + म् = ग्रामम्
(iii) अ + ग् + अ + च् + छ् + अ + त् + अ = अगच्छत
(iv) ज् + इ + ज् + ञ् + आ + स् + आ = जिज्ञासा
(v) क् + ष् + अ + त् + र् + इ + य् + अ = क्षत्रिय

उपरिलिखित शब्दों में स्वर किस रूप में बदले गए हैं ? निश्चय ही मात्रा के रूप में व्यञ्जनों के साथ संयुक्त हैं। यह वर्ण संयोग होता है। इसी प्रकार निम्नलिखित पदों में वर्ण संयोग है।
यथा- ग्रामम् + अगच्छत् = ग्राममगच्छत्
(i) संस्कृतम् + अधीते = संस्कृतमधीते
(iii) विद्यालयम् + आगतः = विद्यालयमागतः
(v) धनार्थम् + अगच्छत् = धनार्थमगच्छत्
धनम् + आनयति = धनमानयति
(ii) ग्रन्थम् + अधीतवान् = ग्रन्थमधीतवान्
(iv) पठितुम् + इच्छति = पठितुमिच्छति

ये शब्द वर्ण संयोग से जोड़े गए हैं। अब निम्नलिखित दो पदों को देखें
(i) हिम + आलयः
(ii) विद्या + आलयः।
यहाँ हिम शब्द में अन्तिम वर्ण अ है।
इसी प्रकार विद्या शब्द में अन्तिम वर्ण आ है।
इसे वर्ण विश्लेषण करके देखते हैं
(i) हिम = ह् + इ + म् + अ = अन्तिमवर्ण = अ
(ii) विद्या = व् + इ + द् + य् + आ = अन्तिमवर्ण = आ

आलय शब्द में पूर्व वर्ण आ है।
आलय = आ + ल् + अ + य् + अ = पूर्ववर्ण = आ
अब दोनों पदों को जोड़ते हैं।
(i) हिम् + HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-1 + लयः = हिम् + आ + लयः = हिमालयः।
(ii) विद्य् + HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-1.1 + लयः = विठ् + आ + लयः = विद्यालयः।
अत्र अ + आ = आ, आ + आ = आ

उपरोक्त उदाहरण में अति निकट आने वाले जिन दो वर्गों के जुड़ने से जो विकार उत्पन्न हुआ है, उसे सन्धि कहते हैं। ‘सन्धि’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘जोड़’ या ‘मेल’ है। यह जोड़ या मेल दो वर्णों का होता है, जो क्रमशः पूर्ववर्ती व परवर्ती होते हैं । दोनों वर्ण आपस में जुड़कर एक नए वर्ण के रूप में परिवर्तित या विकृत हो जाते हैं; जैसे ‘देव + इन्द्र’ यहाँ पर देव के वकार का अकार तथा इन्द्र का इकार आपस में जुड़कर ‘ए’ के रूप में परिवर्तित हो गए हैं। इस कारण यहाँ देवेन्द्र’ शब्द बना है। संस्कृत व्याकरण में इसी प्रक्रिया को सन्धि के रूप में जाना जाता है।

HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

सन्धि की परिभाषा (लक्षण)-
“व्यवधान रहित दो वर्गों के मेल से जो विकार होता है, उसे सन्धि कहते हैं।”
सन्धि के मुख्य तीन भेद हैं
(क) स्वर सन्धि,
(ख) व्यञ्जन सन्धि तथा
(ग) विसर्ग सन्धि ।

(i) स्वर सन्धि
अत्यन्त समीपवर्ती दो स्वरों के आपस में मिलने पर जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं। इस सन्धि के पाँच भेद हैं-दीर्घ सन्धि, गुण सन्धि, वृद्धि सन्धि, यण् सन्धि, अयादि सन्धि।

(क) दीर्घ सन्धि:
जब ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ से परे क्रमशः ह्रस्व या दीर्घ अ, आ, इ, उ आ जाएँ तो उन दोनों के मेल से वह स्वर दीर्घ (आ, ई, ऊ, ऋ) हो जाता है। इसे दीर्घ सन्धि कहते हैं।
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-2
उपर्युक्त तालिका को देखकर निम्नलिखित पदों में सन्धि करें
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-3
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-4
इसलिए जहाँ स्वरों के योग से दीर्घ स्वर होता है, वहाँ दीर्घ सन्धि होती है।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ख) गुण सन्धि:
यदि ह्रस्व या दीर्घ अ के बाद ह्रस्व या दीर्घ इ, ई, उ, ऊ, ऋ में से कोई स्वर हो तो अ + इ मिलकर ‘ए’, अ + उ मिलकर ‘ओ’ तथा अ + ऋमिलकर ‘अर्’ हो जाता है। इसे गुण सन्धि कहते हैं।
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-5
अ, ए, ओ ये गुण स्वर भी कहलाते हैं।
जहाँ सन्धि स्वर गुण होता है, वहाँ गुण सन्धि होती है।
उपर्युक्त तालिका को देखकर निम्नलिखित में सन्धि करें
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-6
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-7
मिश्रितप्रश्न
1. निम्नलिखित में सन्धि करके सन्धि का नाम लिखें
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-8
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-9

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ग) वृद्धि सन्धि:
यदि ह्रस्व या दीर्घ ‘अ’ या ‘आ’ से परे ए’ या ‘ऐ’ हो तो दोनों मिलकर ‘ऐ’ हो जाते हैं। यदि अ या आ के बाद ‘ओ’ या ‘औ’ हो तो दोनों मिलकर ‘औ’ हो जाते हैं। यह वृद्धि सन्धि है।
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-10
उपर्युक्त नियमानुसार निम्नलिखित में सन्धि करें
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-11
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-12

मिश्रितप्रश्न
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-13

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(घ) यणू सन्धि-
यदि ह्रस्व अथवा दीर्घ इ, उ, ऋ, लृ, से परे कोई अन्य ( विजातीय) स्वर हो तो इ, उ, ऋ, लृ के स्थान पर क्रमशः य् व् र् ल् (यण्) हो जाता है, उसे यण् सन्धि कहते हैं।
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-14
निम्नलिखित दोनों पदों का विश्लेषण करें-
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-15
यहाँ ‘इ’ वर्ण से परे ‘ए’ स्वर है।
यहाँ ‘इ’ के स्थान पर ‘य’ वर्ण हो गया।
इसी प्रकार ‘उ’ के स्थान पर ‘व’ तथा ऋ के स्थान पर ‘र’ होता है, क्योंकि यु, व्, रू वर्ण यण् कहलाते हैं। अतः यणु सन्धि है; जैसे-
सु + आगतम् + स् + व् + आगतम् = स्वागतम्
पितृ + आदेशः + पि + त् + र् + आदेशः = पित्रादेशः
इसी प्रकार निम्नलिखित पदों में सन्धि करें-
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-16.1
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-16

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ङ) अयादि सन्धि
यदि ए, ऐ, ओ, औ स्वरों से परे कोई अन्य स्वर हो तो क्रमशः ‘ए’ के स्थान पर ‘अय्’, ‘ऐ’ के स्थान पर ‘अव्’ तथा ‘औ’ के स्थान पर ‘आव्’ आदेश हो जाते हैं।

पूर्वपद का अन्तिम भिन्न स्वरउत्तर पद का पूर्व स्वरसन्धि स्वर
ए/अ + ए

ऐ/अ + ऐ

ओ/अ + ओ

औ/अ + औ

ए + अ = अय

ऐ + अ = आय

औ + अ = अव

औ + अ = आव

आय्

आय्

अव्

अव्

उपर्युक्त तालिका देखकर निम्नलिखित पदों में सन्धि करें-
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-17
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-18
अयु, आय्, अव्, आव् ये परिवर्तन अयादि सन्धि के कारण हैं।

मिश्रितप्रश्न
1. निम्नलिखित रेखांकित पदों तथा सन्धियुक्ति पदों में सन्धिच्छेद करें-
(i) न यस्यादिःयस्यान्तः, यः मध्ये तस्य तिष्ठति।
तवाप्यस्ति, ममाप्यस्ति, यदि जानासि, तद् वद ॥
(ii) पीतं हयनेनापि पयः शिशुन्वे, कालेन भूयः परिसृप्तमुर्व्याम्।
क्रमेण भूत्वा च युवा वपुष्मान् क्रमेण तेनैव जरामुपेतः
(iii) परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम्।
(iv) सुखं हि दु:खान्यनुभूय शोभते।
उत्तर
(i) यस्य + आदिः, यस्य + अन्तः
तव + अपि + अस्ति, मम + अपि + अस्ति
(ii) हि + अनेन + अपि
तेन + एव, जराम् + उपेतः
(iii) पर + उपदेशे
(iv) दुःखानि + अनुभूय

II. निम्नलिखित पद जहाँ संयोग से जुड़े हुए हैं, उसके समक्ष कोष्ठक में (√) चिह्न अंकित करें अन्यथा (x) यथा-
(i) एकेनापि (x) (vi) तर्तुमेव (√)
(ii) भास्करेणैव (x) (vii) सकलमवधीत् (√)
(iii) सर्वेषामपि (√) (viii) तथोच्चैः (x)
(iv) नैवास्ति (x) (ix) विपरीतमेतत् ((√))
(v) योगिनामपि (√) (x) लिम्पतीव (x)

III. शुद्ध सन्धि पद को (√) चिहन से अंकित करें
(i) पितृ + इच्छा = पित्रेच्छा / पित्रिच्छा (√)
(ii) महा + ऋषिः = महर्षिः (√) / महार्षिः
(iii) देव + इन्द्रः = देविन्द्रः / देवेन्द्रः (√)
(iv) पर + उपकारः = परोपकारः (√) / परूपकारः
(v) कवि + ईश्वरः = कवेश्वरः / कवीश्वरः ((√)
(vi) अपि + एवम् = अप्येवम् (√) / अप्यैवम्
(vii). मधु + अत्र = मधूत्र / मध्वत्र (√)
निष्कर्ष

पूर्ववर्णपेरवर्णविकारउदाहरणसन्धिनाम
सन्धिच्छेदसन्धि
अ / आ

अ / आ

अ / आ

अ / आ

अ / आ

अ / आ

अ / आ

अ / आ

इ / ई

इ / ई

उ / ऊ

उ / ऊ

अ / आ

इ / ई

उ / ऊ

ॠ / ॠ

इ/ई

भिन्नस्वरः

उ/ऊ

भिन्नस्वरः

भिन्नस्वरः

दोनों के स्थान में ‘आ’

दोनों के स्थान में ‘ए’

दोनों के स्थान में ‘ओ’

दोनों के स्थान में ‘अर्’

दोनों के स्थान में ‘ऐ’

दोनों के स्थान में ‘ऐ’

दोनों के स्थान में ‘औ’

दोनों के स्थान में ‘औ’

दोनों के स्थान में ‘ई’

‘इ’ के स्थान में ‘य्’

दोनों के स्थान में ‘ऊ’

उकारस्थान में ‘व्’

दोनों के स्थान में ‘ऋ’

ऋ स्थान में ‘र्’

जल + आगमः

गज + इन्द्र:

चन्द्र + उदयः

महा + ऋषिः

जन + एकता

महा + ऐश्वर्यम्

तव + ओदनम्

महा + औदार्यम्

कवि + इन्द्र:

यदि + अपि

भानु + उदयः

लघु + इदम्

मातृ + ऋणम्

मातृ + आदेशः

जलागमः

गजेन्द्र:

चन्द्रोदयः

महर्षि:

जनैकता

महैश्वर्यम्

तवौदनम्

महौदार्यम्

कवीन्द्रः

यद्यपि

भानूदयः

लघ्विदम्

मातृणम्

मात्रादेशः

दीर्घः

गुणः

गुणः

गुणः

वृद्धिः

वृद्धिः

वृद्धिः

वृद्धिः

दीर्घः

यण्

दीर्घः

यण्

दीर्घः

यण्

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ii) व्यञ्जन सन्धि:
पूर्व पद के अन्त में यदि व्यञ्जन हो तथा उत्तर पद का प्रथम वर्ण स्वर या व्यञ्जन होता है, तब उन दोनों के मेल से जो विकार होता है, वह व्यञ्जन सन्धि होती है।

(क) ‘म्’ व्यञ्जन निश्चय ही व्यञ्जन से पूर्व हो तो अनुस्वार में बदल जाता है और यदि स्वर से पूर्व हो तो अनुस्वार में नहीं बदलता।
1. निम्नलिखित पदों में सन्धियुक्त पदों को रेखांकित किया गया है
(i) परोक्षे कार्यहन्तारं, प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्
(ii) सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः
(iii) आदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचामिव

2. उदाहरण देखकर निम्नलिखित अनुच्छेद में अपेक्षित सन्धि करके पुनः लिखोएकदा सिंहदम्पती भोजनम् न प्राप्तवन्तौ। तौ एकम् शृगालशिशुम् अपश्यताम् । सिंहः तम् मारयितुम् ऐच्छत्, परन्तु सिंही अवदत् मा मैवम् । एतम् न मारय। अयम् मम तृतीयः पुत्रः भविष्यति।
उत्तर:
एकदा सिंहदम्पती भोजनं न प्राप्तवन्तौ। तौ एकं शृगालशिशुम् अपश्यताम् । सिंहः तं मारयितुम् ऐच्छत्, परन्तु सिंही अवदत् मा मैवम् । एतम् न मारय। अयं मम तृतीयः पुत्रः भविष्यति।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ख) णत्वविधानम् (ऋ/ऋ/र्/ष्……न् → ण)
निम्नलिखित वाक्यों को पढ़ो
(i) देशरक्षा नराणां प्रथमं कर्त्तव्यम्।
(ii) वाटिकायां लतानां शोभा दर्शनीया।
उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित पदों में क्या विभक्ति है और कौन-सा वचन है ?
नराणाम् , विभक्ति-षष्ठी , वचन-बहुवचन
लतानाम् , विभक्ति-षष्ठी , वचन-बहुवचन
हम देखते हैं कि दोनों ही पदों में षष्ठी विभक्ति तथा बहुवचन है, तो उनमें क्या अन्तर है ? नराणाम् पद में ‘णाम्’ जुड़ा हुआ है तथा लतानाम् पद में ‘नाम्’ जुड़ा हुआ है। यह अन्तर किसलिए है ?
इसे पद विश्लेषण करके देखते हैं
नराणाम् = न् + अ + र् + आ + ण् + आ + म्।
लतानाम् = ल् + अ + त् + आ + न् + आ + म्।
इन दोनों पदों में किस पद में ‘नाम्’ प्रत्यय से पूर्व ‘र’ वर्ण है ? नराणाम् अथवा लतानाम् के बीच में ? निश्चय ही ‘नराणाम्’ के बीच में। इसलिए हम देखते हैं कि ‘र’ वर्ण से परे यदि समान पद में ‘न’ वर्ण है, तो उसके स्थान पर ‘ण’ होता है। इसी प्रकार ऋ/र्/ष् वर्गों से परे भी ‘न्’ वर्ण ‘ण’ वर्ण में बदल जाता है।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ख-1) निम्नलिखित पदों में ऋ/र्/ष् के बीच में किस कारण से न के स्थान पर ण हुआ है कोष्ठक में लिखो
उत्तर:
यथा

भ्रातृणाम्वृषेण
पुरुषेण(ऋ)
भीषणः(ष्)
वर्णनम्(ष्)
किरणा:(र्)
स्वस्णाम्(र्)
आकर्षणम्(ऋ)
श्रवणम्(ष्)
रामेण(र्)
शूर्पणखा(र्)
कर्ण:(र्)
पोषणम्(र्)
परिणामः(ष्)
वारिणि(र्)
अरिणा(र्)
कृष्णः(र्)
ऋणम्(ष्)

हमने जाना कि ऋ/र्/ष् वर्णों के कारण ‘न’ के स्थान पर ‘ण’ होता है, अब निम्नलिखित वाक्य पढ़िएरामान्, पितृन्, त्रीन, वृषान्, हरीन, ऋषीन्
इन पदों में ‘न’ वर्ण पद के किस स्थान पर प्रयुक्त हुआ है ? आदि/मध्य/अन्त में
यथा-
रामान् = र् + आ + म् + आ + न् . (अन्ते)
पितॄन् = प् + इ + त् + ऋ + न् (अन्ते)
त्रीन् = त् + र + ई + न् (अन्ते)
वृषान् = व् + ऋ + ष् + आ + न् (अन्ते)
हरीन् = ह् + अ + र् + ई + न (अन्ते)
ऋषीन् = ऋ + ष् + ई + न् (अन्ते)
हम देखते हैं कि यहाँ ‘न’ वर्ण सभी जगहों पर पद के अन्त में प्रयुक्त हुआ है।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ख-2) पदान्त में ‘न’ के स्थान पर ‘ण’ नहीं होता
(रिक्त स्थानों की पूर्ति न् या ण वर्ण से करें)
यथा-
परि णा मः
(i) भाष ………………. म्
(ii) रामचन्द्रे ……………….
(iii) पितृ ……………….
(iv) कारका ……………….
(v) महारा ………………..
(vi) सन्तोषे ………………..
(vii) विश्वस ………………..ीयम्
(viii) समुद्रे ………………..
(ix) गृहाई ………………..
(x) द्रव्या ……………….. एम्
उत्तराणि:
(i)भाष ण म्
(ii) रामचन्द्रे ण
(iii) पितृ न्
(iv) कारका न्
(v) महाराणा
(vi) सन्तोषे ण रामचन्द्रे ण
(vii) विश्वसनीयम्
(viii) समुद्रे ण
(ix) गृहाणि
(x) द्रव्याणम्

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ख-3) जहाँ ऋ, ऋ, र्, ष, तु है, परन्तु पदान्त के कारण ‘न्’ के स्थान पर ‘ण’ नहीं हुआ उसे कोष्ठक में (√) चिह्न से
अंकित करें।
देवान् (x)
(i) हरीन् (√)
(ii) गच्छन् (x)
(iii) रक्षन् (√)
(iv) साधून् (x)
(v) वर्धमानः (√)
दातॄन् (√)
(vi) स्पृशन् (√)
(vii) आरोहन् (√)
(viii) आरूढान् (√)
(ix) पालयन् (x)
(x) महर्षीन् (√)

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ख-4) ब्यवधानम्
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-19
निम्नलिखित स्तम्भों के पदों में क्या अन्तर है ?

‘क’ स्तम्भः‘ख’ स्तम्भः रचना
रचनारामायणम्
रत्नेनरूप्यकाणि
प्रवासेनरोगेण
प्रपख्चेनक्रमेण
रटन्तम्प्रयाणम्

हम देखते हैं कि ‘क’ स्तम्भ के पदों में न के स्थान पर ण नहीं हुआ है, जबकि वहाँ पर ‘र’ वर्ण है, परन्तु ‘ख’ स्तम्भ के सभी पदों में ‘न्’ के स्थान पर ‘ण’ हुआ है। वहाँ क्या कारण है ? सम्भवतः कुछ वर्ण ऐसे होते हैं, जिस कारण न वर्ण ण् वर्ण में नहीं बदलता।
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-20
निम्नलिखित पदों में र् तथा न के बीच में आए हुए वर्गों को कोष्ठकों में करें
पदम् – व्यवधानम्
यथा
रचना – र् + (अ + च् + अ) + न् + आ
रत्नेन – र् + (अ + त् + न् + ए) + न् + अ
प्रवासेन – प् + र् + (अ + व् + आ + स् + ए) + न् + अ
प्रपञ्चेन – प् + र् + (अ + प् + अ + ञ् + च् + ए) + न् + अ
रटन्तम् – र् + (अ + टू + अ) + न् + त् + अ + म्
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-21
र् तथा न् के बीच में आए हुए वर्णों को कोष्ठकों में करें
यथा-
रामायणम् – र् + (आ + म् + आ + य् + अ) + न् + अ + म्
रूप्यकाणि – र् + (ऊ + प् + य् + अ + क् + आ) + न् + इ
रोगेण – र् (ओ + ग् + ए) + न् + अ
क्रमेण – क् + र् + (अ + म् + ए) + न् + अ
प्रयाणम् – प् + र् + (आ + य् + अ) + न + त् + अ + म्
क्या निम्नलिखित वर्ण ‘क’ स्तम्भ के पदों में र् तथा न के बीच में हैं।
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-22
इस तालिका से हम देखते हैं कि निम्नलिखित वर्ण न् → ण बदलने में बाधक हैं
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-23

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ख-5) निम्नलिखित पदों में बाधक वर्गों को कोष्ठक में लिखोपद

पदबधिक वर्ण
प्रधानध्(तवर्गीयः)
(i) ईदृशेनश्(ऊष्म)
(ii) रक्तेनत्(तवर्गीय)
(iii) प्रलापेनल्(अन्तः:स्थ)
(iv) मारीचेनच्(चवर्गीय)
(v) दर्शनानिश्(ऊष्म)
(vi) परिवर्तनम्त्(तवर्गीय)
(vii) मूर्तीनाम्त्(तवर्गीय)
(viii) गृहस्थेनस्, थ्(ऊष्म, तवर्गीय)
(ix) प्रतिमानाम्त्(तवर्गीय)

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ग) हस्वस्वरः + र् + र् = दीर्घस्वरः + र्
निम्नलिखित सन्धिविच्छेद को देखो
नीरोगः = निर् + रोगः
= नीरुजः
नीरुजः = निर् + रुजः
= नीरुजः
पुनारमते = पुनरू + रमते
= पुनारमते
इनमें पूर्व ह्रस्व स्वर दीर्घ हो गया तथा प्रथम ‘रकार’ लुप्त हो गया।

(ग-1) सन्धि करेंय
था अन्तर् + राष्ट्रियः = अन्तराराष्ट्रियः
(i) नीरवः + गुरुर् = रक्षकः
(ii) गुरूर + रक्षकः = अन्तर्
(iii) अन्तरा + राज्यम् = अन्तराराज्यम्
(iv) निर् + रसः = नीरसः
(v) निर् + रजः = नीरजः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(घ) वर्ग के प्रथम अक्षरों का तृतीय अक्षर में परिवर्तन
वर्गों के पाँच वर्ग लिखिए
उत्तर-

‘क’ स्तम्भ‘ख’ स्तम्भ
पदअन्तिमवर्णपूर्ववर्णपद
(i) वाक्(कू)(अ)अर्थः
(ii) जगत्(त्)(ई)ईशः
(iii) अच्(चू)(अ)अन्तः
(iv) षट्(ट)(आ)आननः
(v) सुप्(प)(अ)अन्तः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(घ-1) ‘क’ स्तम्भ के पदों की ‘ख’ स्तम्भ के पदों के साथ सन्धि करें
(क) – (ख)
यथा-
(i) वाक् + अर्थः = वागर्थः (स्वर से पूर्व क्-ग)
(ii) जगत् + ईश = जगदीश (स्वर से पूर्व त्-द्)
(iii) अच् + अन्तः = अजन्तः (स्वर से पूर्व च्–ज्)
(iv) षट् + आननः = षडाननः (स्वर से पूर्व ट्-ड्)
(v) सुप् + अन्तः . = सुबन्तः (स्वर से पूर्व प्–ब्)
अतः स्वर से पूर्व वर्गों के प्रथम वर्ण तृतीय वर्गों में परिवर्तित होते हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(घ-2) ‘क’ स्तम्भ में निम्नलिखित पदों के अन्तिम वर्ण और ‘ख’ स्तम्भ में पदों के पूर्व वर्ण लिखिए
उत्तर:
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-24
‘क’ स्तम्भ में जो अन्तिम वर्ण हैं, वे वर्ग के कौन-से वर्ण हैं ?
उत्तर:
यथा-

क्कवर्गस्यप्रथमः
त्तवर्गस्यप्रथमः
प्पवर्गस्यप्रथमः
ट्टवर्गस्यप्रथमः

‘ख’ स्तम्भ में परपद के प्रथम वर्ण वर्ग के कौन-से वर्ण हैं ? ।
उत्तर:

द्तृतीयः
ग्तृतीय:
ब्तृतीय:
ज्तृतीयः
ध्चतुर्थः
द्तृतीयः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

‘ग’ स्तम्भ में सन्धि युक्त पदों में प्रथम वर्ग किस वर्ण में बदले हैं ?
उत्तर:
यथा-
(i) वाक् + दानम् = वाग्दानम् क – ग् (तृतीय वर्ण से पूर्व)
(ii) दिक् + गजः = दिग्गजः क – ग (तृतीय वर्ण से पूर्व)
(iii) जगत् + बन्धुः = . जगबन्धुः त् – द् (तृतीय वर्ण से पूर्व)
(iv) अप् + जः = अब्जः प् – ब् (तृतीय वर्ण से पूर्व)
(v) तत् + धनम् = तद्धनम् त् – द् (चतुर्थ वर्ण से पूर्व)
(vi) सत् + धर्मः = सद्धर्मः त् – द् (चतुर्थ वर्ण से पूर्व)
(vii) षट् + दर्शनम् = षड्दर्शनम् ट् – ड् (तृतीय वर्ण से पूर्व)

(घ-3) निम्नलिखित में सन्धि करें और कोष्ठक में कारण लिखेंउत्तर-यथा-
(i) सत् + आचारः . = सदाचारः (त् – द् स्वर से पूर्व) .
(ii) वाक् + देवता = वाग्देवता (क् – ग् तृतीय वर्ण से पूर्व)
(iii) अप् + धिः = अब्धिः (प् – ब् तृतीय वर्ण से पूर्व)
(iv) स्वर्गात् + अपि = स्वर्गादपि (त् – द् स्वर से पूर्व)
(v) जगत् + गुरुः = जगद्गुरुः (त् – द् तृतीय वर्ण से पूर्व)
(vi) षट् + अंगानि = षडंगानि (ट् – ड् तृतीय वर्ण से पूर्व)
(vii) अस्मत् + वचनम् = अस्मद्वचनम् (त् – द् तृतीय वर्ण से पूर्व)
(viii) जगत् + ईशः = जगदीशः (त् – द् स्वर से पूर्व)

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ङ) च वर्ण से पूर्व त् वर्ण च वर्ण में बदल जाता है।
निम्नलिखित सन्धि पदों में ‘त्’ वर्ण किस वर्ण में बदला है ?
उत्तर:
सत् + चित् = सच्चित् (त् – च)
तत् + चित्रम् = तच्चित्रम् (त् – च)
एतत् + चन्द्रम् = एतच्चन्द्रम् (त् – च)
इसी प्रकार सन्धि करें
अन्यत् + च = अन्यच्च (त् – च)
तत् + चिन्तयित्वा = तच्चिन्तयित्वा (त् – च)
एतत् + च = एतच्च (त् – च)
तत् + चक्राम = तच्चक्राम (त् – च)
शरत् + चन्द्रः = शरच्चन्द्रः (त् – च)
सत् + चरित्रम् = सच्चरित्रम् (त् – च)

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-25
उत् + लेखः = उल्लेखः|
(‘ल’ वर्ण से पूर्व त् वर्ण ल् वर्ण में बदल जाता है।)

इसी प्रकार निम्नलिखित पदों में सन्धि कीजिए
1. उत् + लिखितम् = उल्लिखितम्
2. उत् + लासः = उल्लासः
3. उत् + लचनम् = उल्लङ्घनम्
4. तत् + लाङ्गुलम् = तल्लाङ्गुलम्
5. तत् + लीनम् = तल्लीनम्

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

मिश्रितप्रश्न
1. निम्नलिखित कथा में स्थूल पदों में सन्धि करके पुनः लिखिए
अथ एकदा गुरुकुले सायङ्काले कृष्णः यज्ञ अर्थम् काष्ठानि आनेतुम् वनम् गतवान्। सहसा एव वृष्टिः आगता। मेघाः गर्जनम् कृतवन्तः। विद्युत् अपि अदीव्यत्। सर्वत्र अन्धकारः जातः । सर्वाम् रात्रिम् स तत्र एव वृक्षस्य अधः अतिष्ठत्। प्रातः काले तस्य गुरुः महा ऋषिः संदीपनिः तम् अन्विष्यन् तत्र आगतः। गुरुम् दृष्ट्वा कृष्णः उत् लसितः जातः । गुरुः अपि हृदये पुनः पुनः रमते।
उत्तर:
अथ एकदा गुरुकुले सायङ्काले कृष्णः यज्ञार्थम् काष्ठान्यानेतुंवनंगतवान् । सहसैव वृष्टिः आगता। मेघाः गर्जनम् कृतवन्तः। विद्युदप्यदीव्यत्। सर्वत्रान्धकारः जातः । सर्वाम् रात्रिम् स तत्रैव वृक्षस्याधः अतिष्ठत्। प्रातःकाले तस्य गुरुः महर्षिः संदीपनिः तम् अन्विष्यन् तत्रागतः। गुरुं दृष्ट्वा कृष्णः उल्लसितः जातः। गुरुः अपि हृदये पुनः पुनारमते।

2. निम्नलिखित पदों में वर्तनी संशोधन करके लिखिए
महर्षिना, पराजिताणाम्, प्रपनः वृक्षेन, पराण।
उत्तर:
महर्षिणा, पराजितानाम्, प्रपर्णः, वृक्षेण, परान्।

3. निम्नलिखित संवाद में प्रयुक्त रेखांकित पदों में सन्धिविच्छेद कीजिए
गुरु-सुधे! कथं त्वं विलम्बादागता। अद्य तु परीक्षादिवसः
सुधा-गुरुवर! रात्रौ अहं बहुचिरम् अपठम्। अतः प्रातर्जागरणे विलम्बः जातः ।
गुरु-त्वं तु एतज्जानासि यत् परीक्षासु रात्रौ अधिकं न पठनीयम् । पश्य वागीशः सत्यजिच्च प्रश्नानां समाधाने तल्लीनाः सन्ति। त्वमपि कमलया साकं संस्कृतवाङ्मयस्य प्रश्नानाम् उत्तराणि अथवा सदाचार-वसन्तर्तु, – कालिदासादिविषये कमपि एकम् निबंध लिखत।
उत्तर:
विलम्बात् + आगता। परि + ईक्षादिवसः ।
अहम् + बहुचिरम्। प्रातः + जागरणे।
एतत् + जानासि। अधिकम् + न।
वाक् + ईशः। सत्यजित् + च।
तत् + लीनाः। साकम् + संस्कृत
सत् + आचार। वसन्त + ऋतु।
कालिदास + आदि। कम् + अपि।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(iii) विसर्ग सन्धि:
HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः img-26
उपर्युक्त उदाहरणों में पूर्वपद में विसर्ग के बाद उत्तरपद में व्यञ्जन के आने से विसर्ग क्रमशः ओ, स्, ष् तथा ओऽ में परिवर्तित हो गया है। यह परिवर्तन विसर्ग सन्धि के कारण हुआ है। अतः हम कह सकते हैं कि दो वर्गों के समीप होने पर किसी वर्ण का विसर्ग हो जाना अथवा विसर्ग का कोई अन्य वर्ण हो जाना विसर्ग सन्धि है। इसके निम्नलिखित भेद हैं
(क) सत्व सन्धि
(i) विसर्ग (:) के बाद यदि च् या छ् हो तो विसर्ग का श्, ट् या ठ् हो तो ष्, त् या थ् होने पर स् हो जाता है; जैसे
मनः + तापः = मनस्तापः नमः + तुभ्यम् = नमस्तुभ्यम्
इतः + ततः = इतस्ततः विष्णुः + त्राता = विष्णुस्त्राता

(ख) शत्व तथा षत्व:
(ii) विसर्ग के बाद यदि श्, ए, स् आए तो विसर्ग (:) का क्रमशः श्, ष् और स् हो जाता है; जैसे
हरिः + शेते = हरिश्शेते निः + सारः = निस्सारः
निः + सन्देहः = निस्सन्देहः रामः + षष्ठः = रामष्षष्ठः

(iii) विसर्ग से पहले यदि इ या उ हो और बाद में क्, खु या पु, फ् में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग (:) के स्थान पर ष् हो जाता है; जैसे
निः + फलः = निष्फलः – निः + कपटः = निष्कपटः
दुः + कर्मः = दुष्कर्मः दुः + फलः = दुष्फलः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(ग) विसर्ग को उत्व
(ओ) होना यदि विसर्ग से पूर्व ‘अ’ हो और बाद में भी ह्रस्व ‘अ’ हो तो विसर्ग को ‘उ’ हो जाता है . तथा विसर्ग पूर्व ‘अ’ के साथ मिलकर ‘ओ’ हो जाता है। परवर्ती ‘अ’ का पूर्वरूप हो जाता है और उसके स्थान पर ऽ चिह्न रख दिया जाता है; जैसे
पुरुषः + अस्ति = पुरुषोऽस्ति रामः + अत्र = रामोऽत्र
एष + अब्रवीत् = एषोऽब्रवीत शिवः + अर्ध्यः = शिवोऽर्च्यः

(घ) विसर्ग को ‘ओ’ होना
यदि विसर्ग से पूर्व ‘अ’ हो किन्तु विसर्ग के बाद किसी वर्ग का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ वर्ग हो अथवा य, र, ल, व्, ह् में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग सहित ‘अ’ को ओ हो जाता है; जैसे
रामः + गच्छति = रामो गच्छति रामः + घोषति = रामो घोषति
रामः + जयति = रामो जयति रामः + ददाति = रामो ददाति

(ङ) विसर्ग का रुत्व होना
यदि विसर्ग से पहले अ ‘आ’ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो और बाद में कोई घोष वर्ग (वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण अथवा य, र, ल, व, ह) हो तो विसर्ग के स्थान पर ‘र’ हो जाता है; जैसे
हरिः + उवाच = हरिरुवाच गौः + याति = गौर्याति
मुनिः + गच्छति = मुनिर्गच्छति हरेः + इच्छा = हरेरिच्छा

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(च) विसर्ग का लोप
निम्नलिखित दशाओं में विसर्ग का लोप हो जाता है
(i) यदि विसर्ग से पूर्व ह्रस्व ‘अ’ हो और उसके बाद ह्रस्व ‘अ’ से भिन्न कोई स्वर हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है।
देवः + आयाति = देव आयाति अर्जुनः + उवाच = अर्जुन उवाच
कः + एति = क एति कः + एषः = क एषः ।

(ii) यदि विसर्ग के बाद ‘अ’ को छोड़कर कोई भी वर्ण हो तो. ‘सः’ और ‘एषः’ शब्दों के विसर्ग का लोप हो जाता है।
सः + इच्छति = स इच्छति
सः + भाषते = स भाषते
एषः + कथयति = एष कथयति
एषः + पठति = एष पठति

(iii) यदि विसर्ग से पहले ‘आ’ हो और बाद में कोई स्वर या घोष वर्ण (वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण अथवा य, र, ल, व, ह) हों तो विसर्ग का लोप हो जाता है।
देवाः + आयान्ति = देवा आयान्ति
बालाः + हसन्ति = बाला हसन्ति

(iv) सः और एषः के पश्चात् कोई व्यंजन हो तो इनके विसर्गों का लोप हो जाता है; जैसे
सः पठति = स पठति
एषः विष्णुः = एष विष्णुः ।

(v) यदि सः और एषः के पश्चात् ह्रस्व अ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो उसका भी लोप हो जाता है; जैसे
सः एति = स एति
एषः एति = एष एति
किन्तु यदि सः, एषः के परे ह्रस्व अ हो तो विसर्ग सहित अ को ओ हो जाता है; जैसे
सः + अस्ति = सोऽस्ति
एषः + अपि = एषोऽपि

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(vi) भोः, भगोः के विसर्गों का भी लोप हो जाता है यदि विसर्ग से परे कोई स्वर अथवा वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ तथा य, र, ल, व्, ह में से कोई वर्ण हो; जैसे
भोः + लक्ष्मी = भो लक्ष्मी
भगोः + नमस्ते = भगो नमस्ते

(vii) नमः, पुरः, तिरः शब्दों के विसर्ग को क् या के परे होने पर स् हो जाता है।
नमः + कारः = नमस्कारः
पुरः + कारः = पुरस्कारः
तिरः + कारः = तिरस्कारः
अयः + कारः = अयस्कारः

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

णत्व तथा षत्व विधान:

1. णत्व विधान-एक पद में र, ष् के बाद न आए तो ण् हो जाता है; जैसे चतुर्णाम्, पुष्णाति, जीर्णः इत्यादि। यदि ऋ के बाद भी न आए तो उसके स्थान पर भी ण् हो जाता है; जैसे नृणाम्, पितृणाम्, चतसृणाम् आदि। ऋ, र, ष् तथा न् के बीच में कोई स्वर अथवा कवर्ग, पवर्ग तथा ह्, य, व, र या अनुस्वार हो तो भी न के स्थान पर ण हो जाता है; जैसे
रामेण, मूर्खेण, गुरुणा, रामाणाम्, मूर्खाणाम् तथा हरिणा आदि; किन्तु दृढेन, रसेन, अर्थेन, रसानाम् में ण नहीं होता, क्योंकि यहाँ यहाँ र, ऋ तथा न के बीच उपर्युक्त अक्षरों के अतिरिक्त अक्षर आते हैं।
पदान्त के न् का ण नहीं होता। जैसे
देवान, रामान्, हरीन्, गुरून् आदि।

2. षत्व विधान-अ, आ को छोड़कर शेष स्वर तथा ह्, य, व्, र, ल् एवं कवर्ग के बाद में आने वाले अपदान्त प्रत्यय और आदेश के स के स्थान पर ष हो जाता है; जैसे
रामेषु, हरिषु, सर्वेषाम्, मातृषु, वधूषु, चतुर्षु इत्यादि।
यदि उपर्युक्त वर्णों तथा स् के मध्य में अनुस्वार, विसर्ग और श, ष, स् का व्यवधान भी हो तो भी स् के स्थान पर ष् हो . जाता है। जैसे
धनूंषि, आयूंषि, आशीःषु, चक्षुःषु, हवींषि।

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

अभ्यासार्थ प्रश्नाः

I. सन्धि विच्छेदं कुरुत
(क) अतैव ……………………. + …………………….
(ख) प्रोक्तम् ……………………. + …………………….
(ग) ततैव ……………………. + …………………….
(घ) खल्वेष ……………………. + …………………….
(ङ) यथेच्छयाः ……………………. + …………………….
(च) स्नानार्थम् ……………………. + …………………….
(छ) चादाय ……………………. + …………………….
(ज) कोऽपि ……………………. + …………………….
(झ) सज्जोऽस्मि ……………………. + …………………….
(ञ) हताश्वः ……………………. + …………………….

II. सन्धि कुरुत
(क) नि + अवसत् = ………………..
(ख) सूर्य + उदयः = ………………..
(ग) इति + उक्त्वा = ………………..
(घ) यथा + इच्छुम् = ………………..
(ङ) न + अस्ति = ………………..
(च) मया + एतत् = ………………..
(छ) यातु + इति = ………………..
(ज) द्वौ + अपि = ………………..
(झ) श्रेष्ठी + आह = ………………..
(ञ) बालः + अपि = ………………..

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

III. शुद्ध उत्तरं चित्वा लिखत
(i) ‘यन्न’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति
(क) यन् + न्
(ख) यत + न्
(ग) यन् + न
(घ) यत् + न
उत्तरम्:
(घ) यत् + न

(ii) ‘सेवयैव’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति
(क) सेवया + एव
(ख) सेवा + यैव
(ग) सेवा + एव
(घ) सेवाया + एव
उत्तरम्:
(क) सेवया + एव

(iii) ‘प्रत्येव’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति
(क) प्रत् + एव
(ख) प्रति + एव
(ग) प्रत् + येव
(घ) प्रत्य + एव
उत्तरम्:
(ख) प्रति + एव

(iv) ‘कश्चन’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति
(क) कश + चन
(ख) कश + चन
(ग) कः + श्चन्
(घ) कः + चन
उत्तरम्:
(घ) कः + चन

(v) ‘स्नानार्थम्’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति
(क) स्ना + थम्
(ख) स्ना + अर्थम
(ग) स्नान + अर्थम्
(घ) स्ना + नार्थम्
उत्तरम्:
(ग) स्नान + अर्थम्

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

IV.
(i) ‘तस्य + उपचारे’ अत्र सन्धिपदम् अस्ति
(क) तस्योपचारे
(ख) तस्यौपचारे
(ग) तस्यओपचारे
(घ) तस्याऔपचारे
उत्तरम्:
(क) तस्योपचारे

(ii) ‘इति + उक्त्वा’ अत्र सन्धिपदम् अस्ति
(क) इत्यक्त्वा
(ख) इतीयूक्त्वा
(ग) इतीउक्त्वा
(घ) इत्युक्त्वा
उत्तरम्:
(घ) इत्युक्त्वा

HBSE 10th Class Sanskrit व्याकरणम् सन्धिः

(iii) ‘अद्य + अपि’ अत्र सन्धिपदम् अस्ति
(क) अद्यपि
(ख) अद्यापि
(ग) अद्यऽपि
(घ) अद्यअपि
उत्तरम्:
(ख) अद्यापि

(iv) ‘वृत्तिः + भव’ अत्र सन्धिपदम् अस्ति
(क) वृत्तिः भव
(ख) वृत्तिराभव
(ग) वृतिर्भव
(घ) वृत्तिरोभव
उत्तरम्:
(ग) वृतिर्भव

(v) ‘कः + इयम्’ अत्र सन्धिपदम् अस्ति
(क) केयम्
(ख) कीयम
(ग) कयम्
(घ) कियम्
उत्तरम्:
(क) केयम्

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HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 पर्यावरणम्

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 पर्यावरणम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 पर्यावरणम्

HBSE 9th Class Sanskrit पर्यावरणम् Textbook Questions and

Class 9 Sanskrit Chapter 11 HBSE

I. अधोलिखितानां सूक्तिानां भावं हिन्दीभाषायां लिखत
(निम्नलिखित सूक्तियों के भाव हिन्दी भाषा में लिखिए)
(क) “आवियते परितः समन्तात् लोकोऽनेनति पर्यावरणम्।”
(ख) प्रकृतिरेव तेषां विनाशकी सजाता।
(ग) धर्मो रक्षति रक्षितः इत्यार्षवचनम्।
(घ) “प्रकृतिरक्षयैव सम्भवति लोकरक्षेति न संशयः।”
उत्तराणि:
(क) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘पर्यावरणम्’ में से उद्धृत है। ‘पर्यावरण’ शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि संसार जिसके द्वारा सब ओर से आच्छादित किया जाता है, वह पर्यावरण कहलाता है। इस पर्यावरण का निर्माण पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश इन पाँच तत्त्वों से होता है। दार्शनिक ग्रन्थों में इन्हें ही ‘पञ्चमहाभूत’ कहा गया है। पर्यावरण में ये पाँचों तत्त्व समाहित हैं। इन पाँचों तत्त्वों के माध्यम से पर्यावरण हमारी उसी प्रकार सुरक्षा करता है जिस प्रकार अजन्मे बच्चे की रक्षा माता की कोख करती है।

(ख) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘पर्यावरणम्’ में से उद्धृत है। प्रकृति सभी प्राणियों की रक्षा के लिए प्रयास करती है। अन्न, जल, वायु, फल, फूल, ईंधन ये सभी जीवन की मूलभूत सुविधाएँ हैं। इन सबकी प्राप्ति हमें प्रकृति के माध्यम से ही होती है। परन्तु स्वार्थ में अन्धा हुआ मनुष्य इन्हीं के विनाश में लगा हुआ है। नदियों का जल विषैला बन गया है। बिना सोचे-समझे वृक्षों की कटाई की जा रही है। इस कारण प्रकृति विकारयुक्त होकर मनुष्यों के विनाश का कारण बन गई है।

(ग) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘पर्यावरणम्’ में से उद्धृत है। हमें प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए। इससे पर्यावरण अपने-आप सुरक्षित हो जाएगा। हमारे ऋषियों ने कहा है कि “रक्षा किया गया धर्म ही रक्षा करता है।” अतः पर्यावरण की रक्षा करना भी धर्म का ही अंग है। समाजसेवी लोग समय-समय पर कुएँ, बावड़ी, तालाब, प्याऊ आदि का निर्माण करवाते हैं। इसके साथ ही धर्मशालाओं का निर्माण करवाते हैं। ये सभी कार्य धर्म-सिद्धि के साधन के रूप में माने गए हैं। इनके निर्माण से हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।

(घ) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘पर्यावरणम्’ में से उद्धृत है। प्रकृति सभी प्राणियों की रक्षा के लिए प्रयास करती है। यह विभिन्न प्रकारों से सबको पुष्ट करती है तथा सुख-साधनों से तृप्त करती है। अतः हमारा यह दायित्व है कि इस प्रकृति की हम सभी रक्षा करें। इसके लिए समय-समय पर वृक्षारोपण करें। नदियों के जल को कलुषित न होने दें, वनों को उजड़ने न दें। इसके साथ ही कुत्ते, सूअर, साँप, नेवले आदि स्थलचरों तथा मछली, कछुए एवं मगरमच्छ आदि जलचरों की रक्षा करनी चाहिए; क्योंकि ये सभी पृथ्वी तथा जल की मलिनता को दूर करने वाले हैं। ऐसा करने से हम प्रकृति को सुरक्षित रख सकते हैं। प्रकृति को सुरक्षित रखने पर संसार की सुरक्षा हो सकती है। इसमें कोई सन्देह नहीं है।

पर्यावरणम् In Sanskrit HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 पर्यावरणम्

II. अधोलिखितान गद्यांशान पठित्वा प्रदत्त प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतपूर्णवाक्येन लिखत
(निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्यों में लिखिए)
(1) प्रकृतिः समेषां प्राणिनां संरक्षणाय यतते। इयं सर्वान् पुष्णाति विविधैः प्रकारैः, सुखसाधनैः च तर्पयति। पृथिवी, जलम्, तेजः, वायुः, आकाशः च अस्याः प्रमुखानि तत्त्वानि। तान्येव मिलित्वा पृथक्तया वाऽस्माकं पर्यावरणं रचयन्ति। आवियते परितः समन्तात् लोकः अनेन इति पर्यावरणम् ।
(क) प्रकृतिः केषां संरक्षणाय यतते?
(ख) प्रकृतिः सर्वान् कैः तर्पयति?
(ग) अत्र ‘गगनः’ इति पदस्य किं पर्यायपदं प्रयुक्तम्?
(घ) किं पर्यावरणम्?
(ङ) प्रकृतेः प्रमुख तत्त्वानि कानि सन्ति?
उत्तराणि:
(क) प्रकृतिः समेषां प्राणिनां संरक्षणाय यतते।
(ख) इयं प्रकृतिः सर्वान् विविधैः प्रकारैः पुष्णाति तर्पयति च।
(ग) अत्र ‘गगनः’ इति पदस्य पर्यायपदम् ‘आकाशः’ प्रयुक्तम्।
(घ) आवियते परितः समन्तात् लोकः अनेन इति पर्यावरणम्।
(ङ) पृथिवी, जलम्, तेजो, वायुः, आकाशश्चेति प्रकृत्याः प्रमुख तत्त्वानि सन्ति।

2. अत एव अस्माभिः प्रकृतिः रक्षणीया। तेन च पर्यावरणं रक्षितं भविष्यति। प्राचीनकाले लोकमङ्गलाशंसिन ऋषयो वने निवसन्ति स्म। यतो हि वने सुरक्षितं पर्यावरणमुपलभ्यते स्म। तत्र विविधा विहगाः कलकूजिश्रोत्ररसायनं : गति।
(क) अस्माभिः किं करणीयाः?
(ख) वने के निवसन्ति स्म?
(ग) “खगाः’ इति पदस्य अत्र किं पर्यायपदं प्रयुक्तम् ?
(घ) तत्र श्रोत्ररसायनं के ददति?
(ङ) वने किम् उपलभ्यते स्म?
उत्तराणि:
(क) अस्माभिः प्रकृतिः रक्षणीयाः।
(ख) लोकमंगलाशंसिनः ऋषयः वने निवसन्ति स्म।
(ग) अत्र ‘खगाः’ इति पदस्य पर्यायपदं ‘विहगाः’ प्रयुक्तम्।
(घ) तत्र कलकूजितैः विविधाः विहगाः श्रोत्ररसायनं ददति।
(ङ) वने सुरक्षितं पर्यावरणम् उपलभ्यते स्म।

Sanskrit Class 9 Chapter 11 HBSE

2. स्वल्पलाभाय जना बहुमूल्यानि वस्तूनि नाशयन्ति। जनाः यन्त्रागाराणां विषाक्तं जलं नद्यां निपातयन्ति। तेन मत्स्यादीनां जलचराणां च क्षणेनैव नाशो भवति। नदीजलमपि तत्सर्वथाऽपेयं जायते। मानवाः व्यापारवर्धनाय वनवृक्षान् निर्विवेकं छिन्दन्ति। तस्मात् अवृष्टिः प्रवर्धते, वनपशवश्च शरणरहिता ग्रामेषु उपद्रवं विदधति। शुद्धवायुरपि वृक्षकर्तनात् सङ्कटापन्नो जायते।
(क) जनाः स्वल्पलाभाय किं कुर्वन्ति?
(ख) नद्यां किं निपात्यते?
(ग) ‘अवृष्टिः’ इति पदस्य किं विलोमपदम् ?
(घ) शरणरहिताः के उपद्रवं कुर्वन्ति?
(ङ) वनवृक्षाः किमर्थं छिद्यन्ते?
उत्तराणि:
(क) जनाः स्वल्पलाभाय बहुमूल्यानि वस्तूनि नाशयन्ति।
(ख) नद्यां यन्त्रागाराणां विषाक्तं जलं निपात्यते।
(ग) ‘अवृष्टिः’ इति पदस्य ‘वृष्टिः’ विलोमपदं प्रयुक्तम्।
(घ) शरणरहिताः वनपशवः ग्रामेषु उपद्रवं कुर्वन्ति।

4. धर्मो रक्षति रक्षितः इत्यार्षवचनम्। पर्यावरणरक्षणमपि धर्मस्यैवाङ्गमिति ऋषयः प्रतिपादितवन्तः। अत एव. वापीकूपतडागादिनिर्माणं देवायतन-विश्रामगृहादिस्थापनञ्च धर्मसिद्धेः स्रोतो रूपेण अङ्गीकृतम्। कुक्कुर-सूकर-सर्प-नकुलादि-स्थलचराः, मत्स्य-कच्छप-मकरप्रभृतयः जलचराश्च अपि रक्षणीयाः, यत ते स्थलमलानाम् अपनोदिनः जलमलानाम् अपहारिणश्च । प्रकृतिरक्षया एव लोकरक्षा सम्भवति इत्यत्र नास्ति संशयः।
(क) कीदृशः धर्मः रक्षति?
(ख) धर्मस्य अङ्गं किमस्ति?
(ग) के प्राणिनः जलचराः कथिताः?
(घ) कुक्कुरसूकरसर्पनकुलादयः कीदृशाः प्राणिनः कथिताः?
(ङ) कया लोकरक्षा सम्भवति?
उत्तराणि:
(क) रक्षतिः धर्मः रक्षति।
(ख) पर्यावरणरक्षणम् धर्मस्य अङ्गं अस्ति।
(ग) मत्स्यकच्छप प्रभृतयो प्राणिनः जलचराः कथिताः।
(घ) कुक्कुरसूकरसर्पनकुलादयः स्थलचराः प्राणिनः कथिताः ।
(ङ) प्रकृतिरक्षयैव लोकरक्षा सम्भवति।

पर्यावरणम् HBSE 9th Class Sanskrit

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 पर्यावरणम्

III. स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूल पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए)
(क) स्वार्थान्धः मानवः पर्यावरणम् नाशयति।
(ख) वनपशवः ग्रामेषु उपद्रवं विदधति।
(ग) प्रकृतिः एव तेषां विनाशकी सजाता।
(घ) पर्यावरणरक्षणम् अपि धर्मस्य एव अङ्गम्।
(ङ) विहगाः कलकूजितैः श्रोत्ररसायनं ददति।
उत्तराणि:
(क) स्वार्थान्धः कः पर्यावरणम् नाशयति?
(ख) के ग्रामेषु उपद्रवं विदधति?
(ग) प्रकृतिः एव तेषां का सञ्जाता?
(घ) पर्यावरणरक्षणम् अपि कस्य एव अङ्गम् ?
(ङ) के कलकूजितैः श्रोत्ररसायनं ददति?

IV. अधोलिखितानि वाक्यानि घटनाक्रमानुसारं पुनः लिखत
(निम्नलिखित वाक्यों को घटनाक्रम के अनुसार दोबारा लिखिए)
(अ)
(क) पृथिवी, जलम्, तेजः, वायुः, आकाशः च अस्याः प्रमुखानि तत्त्वानि।
(ख) यथा अजातश्शिशुः मातृगर्भे सुरक्षितः तिष्ठति तथैव मानवः पर्यावरणकुक्षौ ।
(ग) प्रकृतिः समेषां प्राणिनां संरक्षणाय यतते।
(घ) आवियते परितः समन्तात् लोकः अनेन इति पर्यावरणम् ।
(ङ) प्रकृतिः सर्वान् पुष्णाति विविधैः प्रकारैः, तर्पयति।
उत्तराणि:
(ग) प्रकृतिः समेषां प्राणिनां संरक्षणाय यतते।
(ङ) प्रकृतिः सर्वान् पुष्णाति विविधैः प्रकारैः, तर्पयति।
(क) पृथिवी, जलम्, तेजः, वायुः, आकाशः च अस्याः प्रमुखानि तत्त्वानि।
(घ) आवियते परितः समन्तात् लोकः अनेन इति पर्यावरणम्।।
(ख) यथा अजातश्शिशुः मातृगर्भे सुरक्षितः तिष्ठति तथैव मानवः पर्यावरणकुक्षौ।

(ब)
(क) सरितो गिरिनिर्झराश्च अमृतस्वादु निर्मलं जलं प्रयच्छन्ति।
(ख) प्राचीनकाले लोकमङ्गलाशंसिन ऋषयो वने निवसन्ति स्म।
(ग) शीतलमन्दसुगन्धवनपवना औषधकल्पं प्राणवायुं वितरन्ति।
(घ) विविधा विहगाः कलकूजिश्रोत्ररसायनं ददति।
(ङ) अस्माभिः प्रकृतिः रक्षणीया।
उत्तराणि:
(ङ) अस्माभिः प्रकृतिः रक्षणीया।
(ख) प्राचीनकाले लोकमङ्गलाशंसिन ऋषयो वने निवसन्ति स्म।
(घ) विविधा विहगाः कलकूजिश्रोत्ररसायनं ददति।।
(क) सरितो गिरिनिर्झराश्च अमृतस्वादु निर्मलं जलं प्रयच्छन्ति।
(ग) शीतलमन्दसुगन्धवनपवना औषधकल्पं प्राणवायुं वितरन्ति।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 पर्यावरणम्

v. अधोलिखित प्रश्नानाम् चतुषु वैकल्पिक उत्तरेषु उचितमुत्तरं चित्वा लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के दिए गए चार विकल्पों में से उचित उत्तर का चयन कीजिए)
1. स्वार्थान्धः मानवः कं नाशयति?
(i) धनं
(ii) पर्यावरणं
(iii) जनं
(iv) धर्म
उत्तरम्
(ii) पर्यावरणं

2. प्रकृतिः समेषां केषां रक्षणाय यतते?
(i) वनानां
(ii) वृक्षाणां
(iii) प्राणिनां
(iv) लतानां
उत्तरम्:
(ii) प्राणिनां

3. अस्माभिः का रक्षणीया?
(i) प्रकृतिः
(ii) सुकृतिः
(iii) विकृतिः
(iv) आकृतिः
उत्तरम्
(i) प्रकृतिः

4. शीतलमन्दसुगन्धपवना किं वितरन्ति?
(i) जलवायु
(ii) प्राणवायु
(iii) वनवायु
(iv) शीतलवायु
उत्तरम्:
(ii) प्राणवायुं

5. मत्स्यकच्छपमकर प्रभृतयो के रक्षणीयाः?
(i) स्थलचराः
(ii) वायुचराः
(ii) जलचराः
(iv) गगनचराः
उत्तरम्:
(ii) जलचराः

6. ‘प्रकृतिः + एव’ अत्र सन्धियुक्तपदम् अस्ति
(i) प्रकृतिएंव
(ii) प्रकृतिः एव
(iii) प्रकृतिरेव
(iv) प्रकृतिरैव
उत्तरम्:
(iii) प्रकृतिरेव

7. ‘इत्यार्ष’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदः अस्ति
(i) इत्या + र्ष
(ii) इति + आर्ष
(iii) इत् + यार्ष
(iv) इती + आर्ष
उत्तरम्:
(ii) इति + आर्ष

8. ‘प्रकृतिः’ इति पदे कः प्रत्ययः अस्ति?
(i) शतृ
(ii) क्त
(iii) यत्
(iv) क्तिन्
उत्तरम्:

(iv) क्तिन् ‘खगाः’ इति पदस्य किं पर्यायपदम् ?
(i) गगनः
(ii) पशवः
(iii) आकाशः
(iv) विहगाः
उत्तरम्:
(iv) विहगाः

10. “धर्मो रक्षति रक्षितः इति आर्षवचनम्।” इति वाक्ये अव्ययपदम् अस्ति
(i) इति
(ii) रक्षति
(iii) आर्ष
(iv) रक्षितः
उत्तरम्:
(i) इति

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 पर्यावरणम्

योग्यताविस्तारः

यह पाठ पर्यावरण को ध्यान में रखकर लिखा गया एक लघु निबन्ध है। वर्तमान युग में प्रदूषित वातावरण मानव-जीवन के लिए भयङ्कर अभिशाप बन गया है। नदियों का जल कलुषित हो रहा है, वन वृक्षों से रहित हो रहे हैं, मिट्टी का कटाव बढ़ने से बाढ़ की समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। कल-कारखानों और वाहनों के धुएँ से वायु विषैली हो रही है। वन्य-प्राणियों की जातियाँ भी नष्ट हो रही हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार वृक्षों एवं वनस्पतियों के अभाव में मनुष्यों के लिए जीवित रहना असम्भव प्रतीत होता है। पत्र, पुष्प, फल, काष्ठ, छाया एवं औषधि प्रदान करने वाले पादपों एवं वृक्षों की उपयोगिता वर्तमान समय में पूर्वापेक्षया अधिक है।

(क) निम्नलिखित शब्दयुग्मों के भेद देखने योग्य हैं
सङ्कल्पः-सत्सङ्कल्पः
आचारः-सदाचारः
जनः-सज्जनः
सङ्गतिः-सत्सङ्गतिः
मतिः-सन्मतिः
(ख) आर्षवचन-ऋषि के द्वारा कहा गया वचन ‘आर्षवचन’ कहलाता है।
(ग) पञ्चतत्त्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इन पाँच तत्त्वों से ही यह शरीर बनता है।
समानान्तर श्लोक व सूक्तियाँ
पर्यावरण से सम्बन्धित निम्न उक्तियाँ एवं श्लोक पढ़ने योग्य तथा याद करने योग्य हैं
हमारी संस्कृति में वृक्ष वन्दनीय हैं इसलिए वृक्षों को काटना, उखाड़ना वर्जित है।

दशकूपसमा वापी दशवापीसमो हृदः।
दशहदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः ॥ (मत्स्यपुराणम्)

तुलसी का पौधा भारतीय संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अङ्ग है। न केवल धार्मिक अपितु चिकित्सा की दृष्टि से भी यह रक्षा करने योग्य है। इसीलिए घर के आँगन में इसके रोपण का महत्त्व है। पुराण और वैद्यक ग्रन्थों के अनुसार तुलसी का पौधा वायु प्रदूषण को दूर करता है। कहा गया है

‘तुलसी’ कानने चैव गृहे यस्यावतिष्ठते।
तद्गृहं तीर्थमित्याहुः नायान्ति यमकिङ्कराः ॥
तुलसीगन्धमादाय यत्र गच्छति मारुतः।
दिशो दश पुनात्याशु भूतग्रामांश्चतुर्विधान् ॥ (पद्योत्तरखण्डम्)

तुलसी का रस तीव्रज्वर को नष्ट करता है। कहा गया है
पीतो मरीचिचूर्णेन तुलसीपत्रजो रसः ।
द्रोणपुष्परसोप्येवं निहन्ति विषम ज्वरम् ॥ (शार्ङ्गधर)

वृक्षारोपण का महत्त्व
तारयेद् वृक्षरोपी तु तस्माद् वृक्षान् प्ररोपयेत् ।
तस्य पुत्रा भवन्त्येव पादपा नात्र शंसयः॥

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HBSE 9th Class Sanskrit 11 पर्यावरणम् Important Questions and Answers

(क) विद्यालयप्राङ्गणे स्थितस्य उद्यानस्य वृक्षाः पादपाश्च कथं सुरक्षिताः स्युः तदर्थं प्रयत्नः करणीय इति सप्तवाक्येषु लिखत।
उत्तरम्:
(1) सर्वप्रथमं वृक्षान् पादपान् वा प्रति रक्षाजालस्य व्यवस्था भवितव्या।
(2) वृक्षपादपानां संरक्षणाय मालाकाराणामपि व्यवस्था भवितव्या।
(3) तेषां जलसिञ्चनस्य पूर्णः प्रबन्धः स्यात्।
(4) वृक्षाणां पादपानां च स्पर्शस्य निषेधः स्यात्।
(5) तेषां पुष्पाणामपि स्पर्शस्य निषेधः भवितव्यः ।
(6) वृक्षलतापुष्पविनाशकं प्रति दण्डस्य व्यवस्था स्यात् ।
(7) वृक्षाणां फलानाम् अपि हानिः न भवितव्या।

(ख) अभिभावकस्य शिक्षकस्य वा सहयोगेन एकस्य वृक्षस्य आरोपणं करणीयम्। (यदि स्थानम् अस्ति।) तर्हि विद्यालय प्राङ्गणे, नास्ति चेत् स्वस्मिन् प्रतिवेशे, गृहे वा। कृतं सर्वं दैनन्दिन्यां लिखित्वा शिक्षकं दर्शयत।

उत्तरम्- छात्र अपने-अपने कक्षा अध्यापक के सहयोग से अपने-अपने विद्यालय के प्राङ्गण में वृक्ष लगाएँ तथा अपनी डायरी में लिखें कि वे उसकी रक्षा के लिए प्रतिदिन क्या-क्या करते हैं। यह सब वे अपने अध्यापक को भी लिखकर दिखाएँ।

पर्यावरणम् गद्यांशों के सप्रसंग हिन्दी सरलार्थ एवं भावार्थ

1. प्रकृतिः समेषां प्राणिनां संरक्षणाय यतते। इयं सर्वान् पुष्णाति विविधैः प्रकारैः, सुखसाधनैः च तर्पयति। पृथिवी, जलम्, तेजः, वायुः, आकाशः च अस्याः प्रमुखानि तत्त्वानि। तान्येव मिलित्वा पृथक्तया वाऽस्माकं पर्यावरणं रचयन्ति। आवियते परितः समन्तात् लोकः अनेन इति पर्यावरणम्। यथा अजातश्शिशुः मातृगर्भे सुरक्षितः तिष्ठति तथैव मानवः पर्यावरणकुक्षौ। परिष्कृतं प्रदूषणरहितं च पर्यावरणम् अस्मभ्यं सांसारिक जीवनसुखं, सद्विचारं, संत्यसङ्कल्पं माङ्गलिकसामग्रीञ्च प्रददाति। प्रकृतिकोपैः आतङ्कितो जनः किं कर्तुं प्रभवति? जलप्लावनैः, अग्निभयैः, भूकम्पैः, वात्याचक्रः, उल्कापातादिभिश्च सन्तप्तस्य मानवस्य क्व मङ्गलम्?

शब्दार्थ-समेषां = सभी का। प्राणिनां = प्राणियों की। संरक्षणाय = रक्षा के लिए। यतते = प्रयत्न करती है। पुष्णाति = पुष्ट करती है। तर्पयति = संतुष्ट करती है। सुखसाधनैः = सुख-साधनों के द्वारा । तत्त्वानि = तत्त्व । रचयन्ति = बनाते हैं। आवियते = आच्छादित किया जाता है। समन्तात् = अच्छी प्रकार से। लोकः = संसार। अजातश्शिशः = पैदा न हुआ शिशु । मातृगर्भे = माता के गर्भ में। पर्यावरणकुक्षौ = पर्यावरण की कोख में। परिष्कृतं = स्वच्छ, साफ-सुथरा। सद्विचारं (सद् + विचारम्) = अच्छे विचार। सङ्कल्पं = अच्छे संकल्प। माङ्गलिक सामग्री = शुभ कार्यों के लिए सामग्री। आतङ्किताः = व्याकुल। प्रभवति = समर्थ है। जलप्लावनैः = बाढ़। भूकम्पैः = भूचालों से। वात्याचक्रैः = आँधी-तूफान आदि से। उल्कापातादिभिः = उल्का आदि के गिरने से। सन्तप्तस्य = पीड़ित, दुःखी। क्व = कहाँ।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘पर्यावरणम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ में पर्यावरण के संरक्षण के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

सन्दर्भ-निर्देश-प्रस्तुत गद्यांश में प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रमुख तत्त्वों एव उनके महत्त्व के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ प्रकृति सभी प्राणियों की रक्षा के लिए प्रयास करती है। यह विभिन्न प्रकारों से सबको पुष्ट करती है तथा सुख-साधनों से सन्तुष्ट करती है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश ये इसके प्रमुख तत्त्व हैं। वे ही मिलकर अथवा भिन्न-भिन्न हमारे पर्यावरण को बनाते हैं। संसार जिसके द्वारा सब ओर से आच्छादित किया जाता है, वह पर्यावरण कहलाता है। जिस प्रकार पैदा न हुआ शिशु अपनी माता के गर्भ में सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार मनुष्य पर्यावरण की कोख में (सुरक्षित रहता है)। साफ-सुथरा तथा प्रदूषण से रहित पर्यावरण हमें सांसारिक जीवन-सुख, अच्छे विचार, अच्छे संकल्प तथा मांगलिक सामग्री (पूजा-पाठ की सामग्री) देता है। प्रकृति के क्रोधों से व्याकुल मनुष्य क्या कर सकता है? बाढ़, अग्नि-भय, भूकम्पों, आँधी-तूफानों से तथा उल्का आदि के गिरने से दुःखी मनुष्य का कहाँ कल्याण है? अर्थात् कहीं नहीं।

भावार्थ-पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश ये पर्यावरण के पाँच प्रमुख तत्त्व हैं। इनसे ही पर्यावरण का निर्माण होता है, जिसने संसार को चारों तरफ से आच्छादित कर रखा है, वही पर्यावरण है। इसके द्वारा ही हमारा जीवन सुरक्षित है।

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2. अत एव अस्माभिः प्रकृतिः रक्षणीया। तेन च पर्यावरणं रक्षितं भविष्यति। प्राचीनकाले लोकमङ्गलाशंसिन ऋषयो वने निवसन्ति स्म । यतो हि वने सुरक्षितं पर्यावरणमुपलभ्यते स्म । तत्र विविधा विहगाः कलकूजिश्रोत्ररसायनं ददति। सरितो गिरिनिर्झराश्च अमृतस्वादु निर्मलं जलं प्रयच्छन्ति। वृक्षा लताश्च फलानि पुष्पाणि इन्धनकाष्ठानि च बाहुल्येन समुपहरन्ति। शीतलमन्दसुगन्धवनपवना औषधकल्पं प्राणवायु वितरन्ति।

शब्दार्थ-रक्षणीया = रक्षा करनी चाहिए। लोकमङ्गलाशंसिन = जनता का कल्याण करने वाले। निवसन्ति स्म = रहते थे। विहगाः = पक्षी। कलकूजितैः = मधुर दूंजन से। श्रोत्ररसायनम् = कानों को अच्छा लगने वाला। ददति = देते हैं। सरितः = नदियाँ। गिरिनिर्झराः = पर्वतीय झरने। अमृतस्वादु = अमृत के समान स्वादिष्ट। इन्धनकाष्ठानि = जलाने के लिए लकड़ियाँ। औषधकल्पं = औषधि के समान। प्राणवायुं = ऑक्सीजन।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘पर्यावरणम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ में पर्यावरण के संरक्षण के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

सन्दर्भ-निर्देश प्रस्तुत गद्यांश में वनों के महत्त्व के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ इसलिए हमें प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए। इससे पर्यावरण अपने-आप सुरक्षित हो जाएगा। प्राचीनकाल में लोक-कल्याण चाहने वाले ऋषि वन में ही रहते थे। क्योंकि वन में ही सुरक्षित पर्यावरण उपलब्ध था। विभिन्न प्रकार के पक्षी अपने मधुर पूजन से वहाँ कानों को अमृत प्रदान करते थे।

नदियाँ तथा पर्वतीय झरने अमृत के समान स्वादिष्ट एवं पवित्र जल देते हैं। वृक्ष तथा लताएँ फल, फूल तथा ईंधन की लकड़ी बहुत मात्रा में देते हैं। शीतल, मन्द तथा सुगन्धित वन-वायु औषधि के समान ऑक्सीजन वितरित करती है।

भावार्थ-प्रकृति के संरक्षण एवं संवर्धन से हमारा जीवन खुशहाल बन सकता है। फल, फूल, ईंधन, सुगन्धित वायु तथा स्वादिष्ट जल हमें प्रकृति के माध्यम से ही प्राप्त होते हैं।

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3. परन्तु स्वार्थान्धो मानवः तदेव पर्यावरणम् अद्य नाशयति। स्वल्पलाभाय जना बहुमूल्यानि वस्तूनि नाशयन्ति। जनाः यन्त्रागाराणां विषाक्तं जलं नद्यां निपातयन्ति। तेन मत्स्यादीनां जलचराणां च क्षणेनैव नाशो भवति। नदीजलमपि तत्सर्वथाऽपेयं जायते। मानवाः व्यापारवर्धनाय वनवृक्षान् निर्विवेकं छिन्दन्ति। तस्मात् अवृष्टिः प्रवर्धते, वनपशवश्च शरणरहिता ग्रामेषु उपद्रवं विदधति। शुद्धवायुरपि वृक्षकर्तनात् सङ्कटापन्नो जायते। एवं हि स्वार्थान्धमानवैः विकृतिम् उपगता प्रकृतिः एव सर्वेषां विनाशक: भवति। विकृतिमुपगते पर्यावरणे विविधाः रोगाः भीषणसमस्याश्च सम्भवन्ति। तत्सर्वमिदानी चिन्तनीयं प्रतिभाति।

शब्दार्थ-स्वार्थान्धः = स्वार्थ में अन्धा। नाशयति = नष्ट कर रहा है। स्वल्पलाभाय = थोड़े-से लाभ के लिए। यन्त्रागाराणां = कारखानों के। विषाक्तं = विषैला। निपातयन्ति = फेंका जाता है। अपेयम् = न पीने योग्य। निर्विवेकं = बिना विचार किए। छिन्दन्ति = काटे जा रहे हैं। अवृष्टिः = वर्षा की कमी। प्रवर्धते = बढ़ती जा रही है। शरणरहिता = आश्रय से रहित होकर। उपद्रवं = भय तथा अशान्ति। विदधति = करते हैं। सङ्कटापन्नः = संकटयुक्त। विकृतिम् उपगता = विकारयुक्त। प्रकृतिः एव (प्रकृतिः + एव) = प्रकृति ही। विनाशकी = विनाश करने वाली। प्रतिभाति = प्रतीत हो रहा है।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘पर्यावरणम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ में पर्यावरण के संरक्षण के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस गद्यांश में बताया गया है कि स्वार्थ में अन्धा बना हुआ मनुष्य पर्यावरण को नष्ट कर रहा है, जिससे उसका जीवन संकटापन्न हो गया है।
सरलार्थ-परन्तु स्वार्थ में अन्धा हुआ मनुष्य उसी पर्यावरण को आज नष्ट कर रहा है। थोड़े-से लाभ के लिए मनुष्य बहुमूल्य वस्तुओं को नष्ट कर रहा है। कारखानों का विषैला जल नदियों में गिराया जा रहा है, जिससे मछली आदि जलचरों का पल भर में ही नाश हो जाता है। नदियों का जल भी सर्वथा न पीने योग्य हो जाता है। व्यापार बढ़ाने के लिए वन के वृक्ष बिना विचार किए (अंधाधुंध) काटे जा रहे हैं, जिससे वर्षा की कमी बढ़ती जा रही है तथा वन के पशु आश्रय से रहित होकर गाँवों में भय तथा अशान्ति उत्पन्न कर रहे हैं।

वृक्षों के कट जाने से शुद्ध वायु भी दुर्लभ हो गई है। इस प्रकार स्वार्थ में अन्धे मनुष्यों के द्वारा विकारयुक्त की गई प्रकृति ही उनकी विनाशिनी हो गई है। पर्यावरण में विकार आ जाने से विभिन्न रोग तथा भीषण समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। इसलिए अब सब कुछ चिन्तायुक्त प्रतीत हो रहा है। . भावार्थ मनुष्य अपने लाभ के लिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। कारखानों से छोड़े गए विषैले जल से नदियों का जल प्रदूषित हो रहा है। वनों के वृक्षों की कटाई से वर्षा की कमी हो रही है, जिससे मनुष्य का जीवन संकटों से घिरता जा रहा है।

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4. धर्मो रक्षति रक्षितः इत्यार्षवचनम्। पर्यावरणरक्षणमपि धर्मस्यैवाङ्गमिति ऋषयः प्रतिपादितवन्तः। अत एव वापीकूपतडागादिनिर्माणं देवायतन-विश्रामगृहादिस्थापनञ्च धर्मसिद्धेः स्रोतो रूपेण अङ्गीकृतम्। कुक्कुर-सूकर-सर्प-नकुलादि-स्थलचराः, मत्स्य-कच्छप-मकरप्रभृतयः जलचराश्च अपि रक्षणीयाः, यत ते स्थलमलानाम् अपनोदिनः जलमलानाम् अपहारिणश्च । प्रकृतिरक्षया एव लोकरक्षा सम्भवति इत्यत्र नास्ति संशयः।

शब्दार्थ-रक्षति = रक्षा करता है। रक्षितः = रक्षा किया गया। वापी = बावड़ी। कूपः = कुएँ। तडागादिनिर्माणं = तालाब आदि बनवाना। देवायतन = मन्दिर। विश्रामगृहस्थापनम् = विश्रामगृह बनवाना। धर्मसिद्धेः = धर्म की सिद्धि। अङ्गीकृतम् = माने गए हैं। कुक्कुरः = कुत्ता। सूकरः = सूअर । नकुलः = नेवला। स्थलचराः = पृथ्वी पर चलने वाले जीव। कच्छप = कछुए। मकरः = मगरमच्छ। स्थलमलानाम् अपनोदिनः = पृथ्वी की गन्दगी को दूर करने वाले। सम्भवति = संभव है। संशयः = सन्देह।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘पर्यावरणम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ में पर्यावरण के संरक्षण के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

सन्दर्भ-निर्देश इस गद्यांश में बताया गया है कि पर्यावरण की रक्षा करना भी धर्म की रक्षा करने के समान है।

सरलार्थ-रक्षा किया गया धर्म ही रक्षा करता है, यह ऋषियों का कथन है। पर्यावरण की रक्षा करना भी धर्म का ही अंग हैऐसा ऋषियों ने प्रतिपादित किया। इसीलिए कुएँ, बावड़ी, तालाब आदि बनवाना, मन्दिर, विश्रामगृह (धर्मशाला) आदि की स्थापना धर्मसिद्धि के साधन के रूप में माने गए हैं। कुत्ते, सूअर, साँप, नेवले आदि स्थलचरों तथा मछली, कछुए, मगरमच्छ आदि जलचरों की भी रक्षा करनी चाहिए; क्योंकि वे पृथ्वी तथा जल की मलिनता को दूर करने वाले हैं। प्रकृति की रक्षा के द्वारा ही संसार की रक्षा हो सकती है-इसमें सन्देह नहीं है।

भावार्थ-पर्यावरण की रक्षा करना भी धर्म का भाग है। धर्म की रक्षा करने वाले मनुष्य की धर्म रक्षा करता है। अर्थात् जो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, उस मनुष्य की रक्षा धर्म के द्वारा अवश्य की जाती है। अतः मनुष्य को पर्यावरण की रक्षा धर्म समझकर करनी चाहिए। पर्यावरण की रक्षा से प्रकृति की रक्षा होगी जिससे संसार की रक्षा हो सकती है।

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अभ्यासः

1. एकपदेन उत्तरं लिखत
(एक पद में उत्तर लिखिए)
(क) मानवः कुत्र सुरक्षितः तिष्ठति?
(ख) सुरक्षितं पर्यावरणं कुत्र उपलभ्यते स्म?
(ग) आर्षवचनं किमस्ति? ।
(घ) पर्यावरणमपि कस्य अङ्गमिति ऋषयः प्रतिपादितवन्तः?
(ङ) लोकरक्षा कया सम्भवति?
(च) अजातशिशुः कुत्र सुरक्षितः तिष्ठति?
(छ) प्रकृतिः केषां संरक्षणाय यतते?
उत्तराणि:
(क) पर्यावरणकुक्षौ,
(ख) वने,
(ग) “धर्मो रक्षति रक्षितः” इति,
(घ) धर्मस्य,
(ङ) प्रकृतिरक्षया,
(च) मातृगर्भे,
(छ) समेषां प्राणिनां।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) प्रकृतेः प्रमुखतत्त्वानि कानि सन्ति?
(ख) स्वार्थान्धः मानवः किं करोति?
(ग) पर्यावरणे विकृते जाते किं भवति?
(घ) अस्माभिः पर्यावरणस्य रक्षा कथं करणीया?
(ङ) लोकरक्षा कथं संभवति?
(च) परिष्कृतं पर्यावरणम् अस्मभ्यं किं किं ददाति?
उत्तराणि:
(क) पृथिवी-जलं-तेजो वायुकाशश्चेति प्रकृत्याः प्रमुखतत्त्वानि सन्ति।
(ख) स्वार्थान्धः मानवः पर्यावरणं नाशयति।
(ग) पर्यावरणे विकृते जाते विविधाः रोगाः भीषण-समस्याश्च जायन्ते।
(घ) अस्माभिः वापीकूपतडागादिनिर्माणं कृत्वा, कुक्कुरसूकरसर्पनकुलादिस्थलचराणां, मत्स्यकच्छपमकरप्रभृतीनां जलचराणां रक्षणेन पर्यावरणस्य रक्षा करणीया।
(ङ) प्रकृतिरक्षया एव लोकरक्षा सम्भवति।
(च) परिष्कृतं पर्यावरणम् अस्मभ्यं सांसारिक जीवनसुखं, सद्विचारं, सत्यसङ्कल्पं, माङ्गलिकसामग्रीञ्च ददाति।

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3. स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूल पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए)
(क) वनवृक्षाः निर्विवेकं छिद्यन्ते।
(ख) वृक्षकर्तनात् शुद्धवायुः न प्राप्यते।
(ग) प्रकृतिः जीवनसुखं प्रददाति।
(घ) अजातश्शिशुः मातृगर्भे सुरक्षितः तिष्ठति।
(ङ). पर्यावरणरक्षणं धर्मस्य अङ्गम् अस्ति।
उत्तराणि:
(क) के निर्विवेकं छिद्यन्ते?
(ख) कस्मात् शुद्धवायुः न प्राप्यते?
(ग) प्रकृतिः किं प्रददाति?
(घ) अजातश्शिशुः कुत्र सुरक्षितः तिष्ठति?
(ङ) पर्यावरणरक्षणं कस्य अङ्गम् अस्ति? .

4. उदाहरणमनुसृत्य पदरचनां कुरुत- 
(उदाहरण का अनुसरण करके पद रचना कीजिए)
(क) यथा- जले चरन्ति इति – जलचरा:
स्थले चरन्ति इति – ………………..
निशायां चरन्ति इति – ………………..
व्योम्नि चरन्ति इति – ………………..
गिरौ चरन्ति इति – ………………..
भूमौ चरन्ति इति – ………………..
उत्तराणि:
(क) स्थले चरन्ति इति – स्थलचराः
(ख) निशायां चरन्ति इति – निशाचराः
(ग) व्योम्नि चरन्ति इति – व्योमचराः
(घ) गिरौ चरन्ति इति – गिरिचराः
(ङ) भूमौ चरन्ति इति – भूमिचराः

(ख) यथा- न पेयम् इति – अपेयम्
न वृष्टि इति – ………………….
न सुखम् इति – ………………….
न भावः इति – ………………….
न पूर्णः इति – ………………….
उत्तराणि:
(क) न वृष्टि इति – अवृष्टिः
(ख) न सुखम् इति – असुखम्
(ग) न भावः इति – अभावः
(घ) न पूर्णः इति – अपूर्णः

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5. उदाहरणमनुसृत्य पदनिर्माणं कुरुत
(उदाहरण का अनुसरण करते हुए पद निर्माण कीजिए)
यथा- वि + कृ + क्तिन् = विकृतिः
(क) प्र + गम् + क्तिन् = …………………….
(ख) दृश् + क्तिन् = …………………….
(ग) गम् + क्तिन् = …………………….
(घ) मन् + क्तिन् = …………………….
(ङ) शम् + क्तिन् = …………………….
(च) भी + क्तिन् = …………………….
(छ) जन् + क्तिन् = …………………….
(ज) भज् + क्तिन् = …………………….
(झ) नी + क्तिन् = …………………….
उत्तराणि:
(क) प्र + गम् + क्तिन् = प्रगतिः
(ख) दृश् + क्तिन् = दृष्टिः
(ग) गम् + क्तिन् = गतिः
(घ) मन् + क्तिन् = मतिः
(ङ) शम् + क्तिन = शान्तिः
(च) भी + क्तिन = भीतिः
(छ) जन् + क्तिन् = जातिः
(ज) भज् + क्तिन् = भक्तिः
(झ) नी + क्तिन् = नीतिः

6. निर्देशानुसारं परिवर्तयत
(निर्देश अनुसार बदलाव कीजिए)
यथा- स्वार्थान्धो मानवः अद्य पर्यावरणं नाशयति (बहुवचने)।
स्वार्थान्धाः मानवाः अद्य पर्यावरणं नाशयन्ति।
(क) सन्तप्तस्य मानवस्य मङ्गलं कुतः? (बहुवचने)
(ख) मानवाः पर्यावरणकुक्षौ सुरक्षिताः भवन्ति। (एकवचने)
(ग) वनवृक्षाः निर्विवेकं छिद्यन्ते। (एकवचने)
(घ) गिरिनिर्झराः निर्मलं जलं प्रयच्छन्ति। (द्विवचने)
(ङ) सरित् निर्मलं जलं प्रयच्छति। (बहुवचने)
उत्तराणि:
(क) सन्तप्तानां मानवानां मङ्गलं कुतः?
(ख) मानवः पर्यावरणकुक्षौ सुरक्षितः भवति।
(ग) वनवृक्षः निर्विवेकं छिद्यते।
(घ) गिरिनिर्झरौ निर्मलं जलं प्रयच्छन्ति।
(ङ) सरितः निर्मलं जलं प्रयच्छन्ति।

(अ) पर्यावरणरक्षणाय भवन्तः किं करिष्यन्ति इति विषये पञ्च वाक्यानि लिखत।
(पर्यावरण बचाने के लिए आप क्या करेंगे इस विषय पर पाँच वाक्य लिखिए)
यथा- अहं विषाक्तम् अवकरं नदीषु न पातयिष्यामि।
(क) …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………
(ख) …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………
(ग) …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………
(घ) …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………
(ङ) …………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………
उत्तराणि:
(क) अहं निर्विवेकं वृक्षच्छेदनं न करिष्यामि।
(ख) अहं समय-समये वृक्षारोपणं करिष्यामि।
(ग) अहं कुक्कुरसूकरनकुलादिस्थलचराणां संरक्षणं करिष्यामि।
(घ) अहं पशु-पक्षिणाम् आखेटं न करिष्यामि।
(ङ) अहं वापीकूपतडागादिनिर्माणं करिष्यामि।

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7. उदाहरणमनुसृत्य उपसर्गान् पृथक्कृत्वा लिखत
(उदाहरण के अनुसार उपसर्ग अलग-अलग करके लिखिए)
यथा- संरक्षणाय – सम्
(i) प्रभवति – ……………………
(ii) उपलभ्यते – ……………………
(ii) निवसन्ति – ……………………
(iv) समुपहरन्ति – ……………………
(v) वितरन्ति – ……………………
(vi) प्रयच्छन्ति – ……………………
(vii) उपगता – ……………………
(vii) प्रतिभाति – ……………………
उत्तराणि:
(i) प्रभवति – प्र
(ii) उपलभ्यते – उप
(iii) निवसन्ति – नि
(iv) समुपहरन्ति – सम् + उप
(v) वितरन्ति – वि
(vi) प्रयच्छन्ति – प्र
(vii) उपगता – उप
(viii) प्रतिभाति – प्रति

(अ) उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितानां समस्तपदानां विग्रहं लिखत
(उदाहरण के अनुसार निम्नलिखित समस्त पदों का विग्रह लिखिए)
यथा – तेजोवायुः – तेजः वायुः च।
गिरिनिर्झराः – गिरयः निर्झराः च।
(i) पत्रपुष्पे – ………………..
(ii) लतावृक्षौ – ………………..
(iii) पशुपक्षी – ………………..
(iv) कीटपतङ्गौ – ………………..
उत्तराणि:
(i) समस्तपद – विग्रहपद
(ii) पत्रपुष्पे – पत्रं पुष्पं च
(iii) लतावृक्षौ – लता वृक्षः च
(iv) पशुपक्षी – पशुः पक्षी च
(v) कीटपतङ्गौ – कीटः पतंगः च

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पर्यावरणम् (पर्यावरण) Summary in Hindi

पर्यावरणम् पाठ-परिचय

प्रस्तुत पाठ पर्यावरण को ध्यान में रखकर लिखा गया एक लघु निबन्ध है। वर्तमान युग में प्रदूषित वातावरण मानव-जीवन के लिए भयङ्कर अभिशाप बन गया है।
इस पाठ में बताया गया है कि प्रकृति सभी प्राणियों की रक्षा के लिए प्रयास करती है। यह विभिन्न प्रकारों से सबको पुष्ट करती है तथा सुख-साधनों से तृप्त करती है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश रूपी पञ्चमहाभूत प्रकृति के महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं।

इन्हीं से पर्यावरण का निर्माण होता है। संसार जिसके द्वारा सब ओर से आच्छादित किया जाता है, उसे ही ‘पर्यावरण’ कहते हैं। परन्तु स्वार्थ में अन्धा हुआ मनुष्य उसी पर्यावरण को आज नष्ट कर रहा है। नदियों का जल कलुषित हो रहा है। वन वृक्षों से रहित हो रहे हैं। मिट्टी का कटाव बढ़ने से बाढ़ की समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। कल-कारखानों और वाहनों के धुएँ से वायु विषैली हो रही है। वन्य-प्राणियों की जातियाँ भी नष्ट हो रही हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार वृक्षों एवं वनस्पतियों के अभाव में मनुष्यों के लिए जीवित रहना असम्भव प्रतीत हो रहा है। पत्र, पुष्प, फल, काष्ठ, छाया एवं औषधि प्रदान करने वाले पदार्थ एवं वृक्षों की उपयोगिता वर्तमान समय में पहले की अपेक्षा अधिक है। ऐसी परिस्थिति में हमारा कर्त्तव्य है कि हम पर्यावरण के संरक्षणार्थ उपाय करें। हम वृक्षों के रोपण, नदी-जल की स्वच्छता, ऊर्जा के संरक्षण, वापी, कूप, तड़ाग, बाग-बगीचे आदि के निर्माण और उसको स्वच्छ रखने में प्रयत्नशील हों, ताकि हमारा जीवन सुखमय एवं उपद्रव रहित हो सके।

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HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 जटायोः शौर्यम्

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 जटायोः शौर्यम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 जटायोः शौर्यम्

HBSE 9th Class Sanskrit जटायोः शौर्यम् Textbook Questions and

Sanskrit Class 9 Chapter 10 जटायोः शौर्यम् HBSE

I. अधोलिखितानां सूक्तिानां भावं हिन्दी भाषायां लिखत
(निम्नलिखित सूक्तियों के भाव हिन्दी भाषा में लिखिए)
(क) जटायो पश्य मामार्य हियमाणामनाथवत्।
(ख) वनस्पतिगतः श्रीमान्व्याजहार शुभां गिरम्।
(ग) निवर्तय मतिं नीचां परदाराभिमर्शनात्।
(घ) चरणाभ्यां महातेजा बभजास्य महद्धनुः।
उत्तराणि:
(क) भावार्थ-प्रस्तुत सूक्ति आदिकवि महर्षि वाल्मीकि विरचित ‘रामायणम्’ महाकाव्य से संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। रावण के द्वारा अपहृत सीता ने विशाल वृक्ष पर स्थित जटायु को देखकर विलाप करते हुए कहा कि हे आर्य जटायु! यह राक्षसराज रावण मुझे अनाथ की भाँति अपहृत करके ले जा रहा है। वस्तुतः सीता यह बताना चाहती है कि इस पापाचारी को श्रीराम-लक्ष्मण के पराक्रम का ज्ञान नहीं है। इसीलिए इसने मेरा अपहरण किया है। इस बात की सूचना आप ज्यों-की-त्यों राम-लक्ष्मण को बता दीजिए; क्योंकि मेरे पतिदेव में इतना पराक्रम है कि वे मुझे यमराज से भी छुड़ा सकते हैं।

(ख) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति आदिकवि महर्षि वाल्मीकि विरचित ‘रामायणम्’ महाकाव्य से संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। वृक्ष पर आधे सोए हुए जटायु ने सीता की करुण पुकार सुनी। सुनते ही जटायु ने तुरन्त आँख खोलकर सीता तथा रावण को देखा। पेड़ पर बैठे-बैठे उन्होंने रावण को लक्ष्य करके सुन्दर वचनों के माध्यम से उसे समझाने का प्रयास किया। गृध्रराज जटायु बड़े ही धर्मात्मा तथा नीतिज्ञ थे। वे महाराज दशरथ के मित्र भी थे। इस दृष्टि से सीता उनकी पुत्रवधू थी। कई सौ वर्षों से वे पर्वत-शिखर के महान् वृक्ष पर बैठे थे। अतः अपहृत सीता को देखकर नीति एवं धर्म के ज्ञाता होने के कारण सुन्दर वचनों के माध्यम से रावण को समझाने लगे।

(ग) भावार्थ-प्रस्तुत सूक्ति आदिकवि महर्षि वाल्मीकि विरचित ‘रामायणम्’ महाकाव्य से संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। अपहृत सीता के करुण क्रन्दन को सुनकर पक्षिराज जटायु ने रावण को समझाते हुए कहा हे रावण! पराई स्त्री के स्पर्श से जो नीच गति प्राप्त होने वाली है, उससे अपने आप से दूर हटा लो, क्योंकि अपने धर्म में स्थिर रहने वाला कोई भी राजा भला पराई स्त्री का स्पर्श कैसे कर सकता है? महाबली रावण! राजाओं को सभी स्त्रियों की विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए। जिस प्रकार पराये पुरुषों के स्पर्श से अपनी स्त्री की रक्षा की जाती है; उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों की भी रक्षा करनी चाहिए। अतः तुम्हारा यह कार्य निन्दनीय है। ऐसा कर्म करने से निश्चय ही तुम्हारा विनाश होगा। इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम सीता को छोड़ दो।

(घ) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति आदिकवि महर्षि वाल्मीकि विरचित ‘रामायणम्’ महाकाव्य से संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। पक्षिश्रेष्ठ जटायु ने रावण को राजधर्म एवं नीति की बातों से समझाने का प्रयास किया। परन्तु जब रावण नहीं माना तो उस महान् तेजस्वी जटायु ने अपने दोनों पैरों से प्रहार करके रावण के विशाल धनुष को तोड़ दिया। रावण ने जटायु को मारने की इच्छा से धनुष-बाण से प्रहार करना चाहा। तब महातेजस्वी जटायु ने अपने दोनों पंखों से ही धनुष के बाणों को उड़ा दिया और पंजों की मार से पुनः उसके धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर डाले। यहाँ जटायु के अतिशय पराक्रम एवं वीरता का परिचय मिलता है।

जटायोः शौर्यम् Chapter 10 HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 जटायोः शौर्यम्

II. अधोलिखितान् श्लोकान् पठित्वा प्रदत्त प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतपूर्णवाक्येन लिखत
(निम्नलिखित श्लोकों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्यों में लिखिए)
(1) तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे।
निरीक्ष्य रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श सः॥
(क) अवसुप्तः कः आसीत् ?
(ख) जटायुः किं शुश्रुवे?
(ग) सः कां ददर्श?
उत्तराणि:
(क) अवसुप्तः जटायुः आसीत्।
(ख) जटायुः तं शब्दं शुश्रुवे।
(ग) सः रावणं निरीक्ष्य क्षिप्रं वैदेहीं ददर्श ।

2. निवर्तय मतिं नीचां परदाराभिमर्शनात् ।
न तत्समाचरेद्धीरो यत्परोऽस्य विगर्हयेत् ॥
(क) परदाराभिमर्शनात कां निवर्तय?
(ग) धीरः किं न समाचरेत् ?
उत्तराणि:
(क) परदाराभिमर्शनात नीचां मतिं निवर्तये।
(ख) नीचां मतिं परदाराभिमर्शनात निवर्तय।
(ग) धीरः तत् न समाचरेत् यत् परः अस्य विगर्हयेत्।

3. वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथः कवची शरी।
न चाप्यादाय कुशली वैदेहीं मे गमिष्यसि ॥
(क) वृद्धः कः अस्ति?
(ख) रावणः कीदृशः अस्ति?
(ग) कथं कुशली न गमिष्यसि?
उत्तराणि:
(क) वृद्धः जटायुः अस्ति।
(ख) रावणः युवा कवची, धन्वी शरी सरथः चास्ति।
(ग) मे वैदेहीम् आदाय कुशली न गमिष्यसि।

HBSE 9th Class जटायोः शौर्यम् Chapter 10

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 जटायोः शौर्यम्

III. स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूलपदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए)
(क) ‘जटायो! पश्य’ इति सीता वदति।
(ख) पतगेश्वरः रावणस्य चापं बभञ्ज।
(ग) परदाराभिमर्शनात् नीचां मतिं निवर्तय।
(घ) अरिन्दमः दशवामबाहून व्यपाहरत्।
उत्तराणि:
(क) ‘जटायो! पश्य’ इति का वदति?
(ख) कः रावणस्य चापं बभज?
(ग) कस्मात् नीचां मतिं निवर्तय?
(घ) अरिन्दमः कान् व्यपाहरत्?

IV. अधोलिखितेषु पदेषु विशेषण-विशेष्यान् पृथक् कृत्वा लिखत
(निम्नलिखित पदों में विशेषण-विशेष्य पृथक् करके लिखिए)
वनस्पतिगतं गृध्रम्, अवसुप्तः जटायुः, पर्वतशृङ्गाभः तीक्ष्णतुण्डः, पापकर्मणा राक्षसेन्द्रेण, मुक्तामणिविभूषितं चापम्
उत्तराणि:
विशेषणपदम् – विशेष्यपदम्
वनस्पतिगतम् – गृध्रम्
अवसुप्तः – जटायुः
पर्वतशृङ्गाभः – तीक्ष्णः
पापकर्मणा – राक्षसेन्द्रेण
मुक्तामणिविभूषितम् – चापम्

v. अधोलिखित प्रश्नानाम् चतुषु वैकल्पिक उत्तरेषु उचितमुत्तरं चित्वा लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के दिए गए चार विकल्पों में से उचित उत्तर का चयन कीजिए)
1. अवसुप्तः जटायुः तव किं शुश्रुवे?
(i) दुःखं
(ii) शब्दं
(iii) गीतं
(iv) क्रोधं
उत्तरम्:
(ii) शब्दं

2. जटायुः रावणं निरीक्ष्यं का ददर्श?
(i) रथां
(ii) वाणं
(iii) वैदेही
(iv) शास्त्रं
उत्तरम्:
(iii) वैदेहीं

3. तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः कः अस्ति?
(i) श्येनः
(ii) जटायुः
(iii) गरुडः
(iv) सर्पराजः
उत्तरम्:
(ii) जटायुः

4. युवा धन्वी सरथः कवची शरी च कः अस्ति?
(i) जटायुः
(ii) खगोत्तमः
(iii) वैदेही
(iv) रावणः
उत्तरम्:
(iv) रावणः

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5. पतगसत्तमः कस्य गात्रे बहुधा व्रणान् चकार?
(i) वानरस्य
(i) रावणस्य
(iii) सीतायाः
(iv) सुग्रीवस्य
उत्तरम्:
(ii) रावणस्य

6. ‘माम् + आर्य’ अत्र सन्धियुक्तपदम् अस्ति
(i) मामर्य
(ii) मामाऽर्य
(iii) मामार्य
(iv) ममार्य
उत्तरम्:
(iii) मामार्य

7. ‘खगोत्तमः’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदः अस्ति
(i) खगो + तमः
(ii) खग + ओत्तमः
(iii) खगोत्त + मः
(iv) खग + उत्तमः
उत्तरम्:
(iv) खग + उत्तमः

8. ‘निरीक्ष्य’ इति पदे कः प्रत्ययः अस्ति?
(i) क्त
(ii) ठक्
(iii) क्त्वा
(iv) ल्यप्
उत्तरम्:
(iv) ल्यप्

9. ‘वैदेहीं’ इति पदस्य किं पर्यायपदम्?
(i) विदेहं
(ii) जानकी
(iii) विदेहीं
(iv) जानकं
उत्तरम्:
(ii) जानकी

10. “तदा अरिन्दमः दशवामबाहून व्यपाहरत्” इति वाक्ये अव्ययपदम् अस्ति
(i) तदा
(ii) अरिन्दमः
(iii) बाहून
(iv) दश
उत्तरम्:
(i) तदा

11. “महाबलः जटायुः” अत्र विशेष्यपदं किम्?
(i) महा
(ii) बलः
(iii) जटायुः
(iv) महाबलः
उत्तरम्:
(iii) जटायुः

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योग्यताविस्तारः
यह पाठ्यांश आदिकवि वाल्मीकि-प्रणीत रामायणम् के अरण्यकाण्ड से उद्धृत किया गया है जिसमें जटायु और रावण के युद्ध का वर्णन है। पंचवटी कानन में सीता का करुण विलाप सुनकर पक्षिश्रेष्ठ जटायु उनकी रक्षा के लिए दौड़े। वे महाबली जटायु अपने तीखे नखों तथा पञ्जों से रावण के शरीर में अनेक घाव कर देते हैं, जिसके कारण रावण विरथ होकर पृथ्वी पर गिर पड़ता है। कुछ ही क्षणों बाद क्रोधांध रावण जटायु पर प्राणघातक प्रहार करता है परंतु पक्षिश्रेष्ठ जटायु उससे अपना बचाव कर उस पर चञ्चु-प्रहार करते हैं, उसके बायें भाग की दशों भुजाओं को क्षत-विक्षत कर देते हैं।

(क) कवि परिचय-महर्षि वाल्मीकि आदिकाव्य रामायण के रचयिता हैं। कहा जाता है कि वाल्मीकि का हृदय, एक व्याध द्वारा क्रीडारत क्रौञ्चयुगल (पक्षियों के जोड़े) में से एक के मार दिए जाने पर उसकी सहचरी के विलाप को सुनकर द्रवित हो गया तथा उनके मुख से शाप के रूप में जो वाणी निकली वह श्लोक के रूप में थी। वही श्लोक लौकिक संस्कृत का आदिश्लोक माना जाता है
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥

(ख) भाव विस्तार-जटायु–सूर्य के सारथी अरुण के दो पुत्र थे-सम्पाती और जटायु । जटायु पञ्चवटी वन के पक्षियों का राजा था जहाँ अपने पराक्रम एवं बुद्धिकौशल से शासन करता था। पञ्चवटी में रावण द्वारा अपहरण की गई सीता के विलाप को सुनकर जटायु ने सीता की रक्षा के लिए रावण के साथ युद्ध किया और वीरगति पाई। इस प्रकार राज-धर्म की रक्षा में अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले जटायु को भारतीय संस्कृति का महान नायक माना जाता है।

(ग) सीता विषयक सूचना देते हुए जटायु ने राम से जो वचन कहे वे इस प्रकार हैं
यामोषधीमिवायुष्मन्नन्वेषसि महावने। सा च देवी मम प्राणाः रावणेनोभयं हृतम् ॥

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भाषिकविस्तारः

(क) वाक्य प्रयोग
गिरम्-छात्रः मधुरां गिरम् उवाच ।
पतगेश्वरः-पक्षिराजः जटायुः पतगेश्वरः अपि कथ्यते।
शरी-शरी रावणः निःशस्त्रेण जटायुना आक्रान्तः।
विधूय-वीरः शत्रुप्रहारान् विधूय अग्रे अगच्छत्।
व्रणान्-चिकित्सकः औषधेन व्रणान् विरोपितान् अकरोत् ।
व्यपाहरत्-जटायुः रावणस्य बाहून् व्यपाहरत्।
आशु-स्वकार्यम् आशु सम्पादय।

(ख) स्त्रीप्रत्यय
टाप् प्रत्यय-करुणा, दुःखिता, शुभा, निम्ना, रक्षणीया
ङीप् प्रत्यय-विलपन्ती, यशस्विनी, वैदेही, कमलपत्राक्षी
ति प्रत्यय युवतिः
पुंल्लिङ्गः शब्दों से स्त्रीलिङ्गः पद निर्माण में टाप्-डीप्-ति प्रत्यय प्रयुक्त होते हैं। टाप् प्रत्यय का ‘आ’ तथा
ङीप् प्रत्यय का ‘ई’ शेष रहता है।
यथा
मूषक + टाप् = मूषिका
बालक + टाप् = बालिका
वत्स + टाप् = वत्सा
हसन् + डीप = हसन्ती
मानिन् + डीप = मानिनी
विद्वस् + डीप = विदुषी
श्रीमत् + ङीप् = श्रीमती
युवन् + ति = युवतिः

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HBSE 9th Class Sanskrit जटायोः शौर्यम् Important Questions and Answers

जटायोः शौर्यम् श्लोकों के सप्रसंग हिन्दी सरलार्थ एवं भावार्थ

1. सा तदा करुणा वाचो विलपन्ती सुःखिता।
वनस्पतिगतं गृभं ददर्शायतलोचना ॥1॥

अन्वय-तदा सुदुःखिता करुणा वाचः विलपन्ती आयतलोचना सा वनस्पतिगतं गृधं ददर्श।

शब्दार्थ-वाचः = वाणी। विलपन्ती = विलाप करती हुई। सुदुःखिता = अत्यन्त दुःखी। वनस्पतिगतं = वृक्ष पर बैठे हुए। गृ = जटायु को। ददर्श = देखा। आयतलोचना = विशाल नेत्रों वाली।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस श्लोक में बताया गया है कि रावण द्वारा अपहृत सीता ने गृध्रराज जटायु को देखा।
सरलार्थ-उस समय अत्यन्त दुःखी हो, करुणाजनक बातें कहकर विलाप करती हुई विशाल नेत्रों वाली उसने (सीता) एक वृक्ष पर बैठे हुए गृध्रराज जटायु को देखा। ‘

भावार्थ-रावण सीता का अपहरण करके उन्हें आकाश मार्ग से लंका की ओर ले जा रहा था। विलाप करती हुई सीता ने एक वृक्ष पर पक्षिराज जटायु को बैठे देखा।

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2. जटायो पश्य मामार्य हियमाणामनाथवत्।
अनेन राक्षसेन्द्रेण करुणं पापकर्मणा ॥2॥

अन्चय-आर्य जटायो! अनेन पापकर्मणा राक्षसेन्द्रेण अनाथवत् ह्रियमाणाम् करुणं माम् पश्य।

शब्दार्थ-जटायो = हे जटायु । ह्रियमाणाम् = हरकर ले जाई जाती हुई। अनाथवत् = अनाथ की भाँति । राक्षसेन्द्रेण = राक्षसों के राजा द्वारा। पापकर्मणा = नीच कर्म करने वाले। माम् पश्य = मुझे देखो।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस श्लोक में बताया गया है कि जटायु को देखकर सीता करुण क्रन्दन करते हुए कहती हैं कि
सरलार्थ-हे जटायु! देखो, यह नीच कर्म करने वाला राक्षसराज रावण, अनाथ की भाँति दुःखी मुझे निर्दयतापूर्वक हरकर लिए जा रहा है।

भावार्थ भाव यह है कि रावण अनाथ की भाँति सीता का अपहरण करके ले जा रहा है। वे जटायु को बताना चाहती हैं कि इसकी सूचना आप मेरे स्वामी को दे देना। क्योंकि रावण बहुत ही बलवान् है। इससे युद्ध करना आपके सामर्थ्य से बाहर है।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 जटायोः शौर्यम्

3. तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे।।
निरीक्ष्य रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श सः ॥3॥

अन्वय-अथ.तु अवसुप्तः जटायुः तं शब्दं शुश्रुवे। सः च रावणं निरीक्ष्य क्षिप्रं वैदेहीं ददर्श।

शब्दार्थ-अथ = इसके बाद । अवसुप्तः = आधे सोए हुए। शुश्रुवे = सुना। निरीक्ष्य = देखकर। क्षिप्रम् = जल्दी, शीघ्र ही। वैदेहीं = सीता को। ददर्श = देखा।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। .. इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश इस श्लोक में बताया गया है कि विलाप करती हुई सीता के रोने की आवाज सुनकर सोया हुआ जटायु जाग गया।

सरलार्थ-इसके बाद आधे सोए हुए पक्षिराज जटायु ने उस शब्द को सुना और रावण को अच्छी प्रकार से देखकर उन्होंने शीघ्र ही सीता को देखा।

” भावार्थ-सीता का करुण विलाप सुनकर पक्षिश्रेष्ठ जटायु ने देखा कि लंकापति रावण सीता को लेकर जा रहा है। शीघ्र ही उन्होंने सीता की तरफ देखा तथा उनकी सहायता के लिए दौड़ पड़े।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 जटायोः शौर्यम्

4. ततः पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः।
वनस्पतिगतः श्रीमान्व्याजहार शुभां गिरम् ॥4॥

अन्वय-ततः पर्वतशृङ्गाभः तीक्ष्णतुण्डः वनस्पतिगतः श्रीमान् खगोत्तमः शुभां गिरम् व्याजहार |

शब्दार्थ-पर्वतशृङ्गाभः = पर्वत के शिखर की शोभा वाले। श्रीमान् = शोभायुक्त। खगोत्तमः = श्रेष्ठ पक्षी। वनस्पतिगतः = वृक्ष पर स्थित। व्याजहार = बोले। गिरम् = वाणी।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि
रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश इस श्लोक में बताया गया है कि सीता के विलाप को सुनकर पक्षिश्रेष्ठ जटायु ने क्या किया।

सरलार्थ-पर्वत के शिखर की शोभा वाले, तीक्ष्ण चोंच वाले, वृक्ष पर स्थित, शोभायुक्त उस श्रेष्ठ पक्षी जटायु ने सुन्दर वाणी में इस प्रकार कहा।
भावार्थ पक्षियों में श्रेष्ठ श्रीमान् जटायु का शरीर पर्वत-शिखर के समान ऊँचा था और उनकी चोंच बड़ी ही तीखी थी। वे पेड़ पर बैठे-बैठे ही रावण को लक्ष्य करके यह वचन बोले।

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5. निवर्तय मतिं नीचां परदाराभिमर्शनात् ।
न तत्समाचरेधीरो यत्परोऽस्य विगर्हयेत् ॥5॥

अन्वय-परदाराभिमर्शनात् नीचां मतिं निवर्तय, धीरः न तत्समाचरेत् यत् परः अस्य विगर्हयेत्।

शब्दार्थ-निवर्तय = हटा लो। मतिं = बुद्धि को। नीचां = नीच, अनुचित। परदाराभिमर्शनात् = पराई स्त्री के स्पर्श से। समाचरेत् = आचरण करना चाहिए। धीरः = धैर्यवान्, बुद्धिमान। परः = अन्य लोग। विगर्हयेत् = निन्दा करें।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस श्लोक में बताया गया है कि पक्षिश्रेष्ठ जटायु ने रावण को समझाते हुए कहा सरलार्थ हे रावण! पराई स्त्री के स्पर्श के दोष से अपनी अनुचित बुद्धि को हटा लो। बुद्धिमान् को ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए, जिससे अन्य लोग उसकी निन्दा करें।

भावार्थ हे रावण! पराई स्त्री के स्पर्श से जो नीच गति प्राप्त होने वाली है, उससे तुम अपने-आपको दूर हटा लो क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य को वैसा कर्म नहीं करना चाहिए जिससे अन्य लोग उसकी निन्दा करें।

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6. वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्ची सरथः कवची शरी।
न चाप्यादाय कुशली वैदेही मे गमिष्यसि ॥6॥

अन्वय-अहं वृद्धः, त्वं धन्ची, शरी कवची, सरथः युवा, च अपि मे वैदेही आदाय कुशली न गमिष्यसि।

शब्दार्थ युवा = युवक। धन्ची = धनुर्धारी। सरथः = रथयुक्त। कवची = कवचधारी। शरी = बाणधारी । आदाय = लेकर। वैदेहीं = सीता को। मे = मेरे (पास से)। कुशली = कुशलतापूर्वक । गमिष्यसि = तुम जाओगे।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश इस श्लोक में बताया गया है कि जटायु रावण को सावधान करते हुए कहते हैं कि

सरलार्थ मैं तो वृद्ध हूँ, किन्तु तुम धनुष-बाण धारण करने वाले, कवचधारी और रथ पर सवार युवक हो, फिर भी तुम सीता को लेकर यहाँ से (मेरे पास से) कुशलतापूर्वक नहीं जा सकते।

भावार्थ-जटायु रावण से कहते हैं कि मैं वृद्ध हो चुका हूँ जबकि तुम अस्त्र-शस्त्र सम्पन्न युवक हो, फिर भी तुम सीता को आसानी से नहीं ले जा सकते। तुम मेरे सामने विदेह नन्दिनी सीता का बलपूर्वक अपहरण नहीं कर सकते।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 जटायोः शौर्यम्

7. तस्य तीक्ष्णनखाभ्यां तु चरणाभ्यां महाबलः।
चकार बहुधा गात्रे व्रणान्पतगसत्तमः ॥7॥

अन्वय-पतगसत्तमः महाबलः तु तीक्ष्णनखाभ्यां चरणाभ्याम् तस्य गात्रे बहुधा व्रणान् चकार।

शब्दार्थ-तीक्ष्णनखाभ्याम् = तेज नाखूनों से। चरणाभ्याम् = दोनों पैरों से। महाबलः = अत्यन्त बलशाली। चकार = कर दिए। तस्य गात्रे = उसके (रावण के) शरीर पर। व्रणान् = घाव। पतगसत्तमः = पक्षियों में श्रेष्ठ।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्” में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस श्लोक में बताया गया है कि जटायु ने रावण पर किस प्रकार से प्रहार किया।
सरलार्थ-पक्षियों में श्रेष्ठ अत्यन्त शक्तिशाली पक्षी (जटायु) ने अपने तेज नाखूनों तथा दोनों पैरों से उसके (रावण) शरीर पर प्रहारों से अनेक प्रकार के घाव कर दिए।

भावार्थ भाव यह है कि पक्षिश्रेष्ठ जटायु ने अपने पंखों एवं नाखूनों से प्रहार करके अत्यन्त बलशाली रावण को घायल कर दिया।

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8. तोऽस्य सशरं चापं मुक्तामणिविभूषितम्।
चरणाभ्यां महातेजा बभजास्य महद्धनुः ॥8॥

अन्वय-ततः महातेजा मुक्तामणिविभूषितम् अस्य सशरं चापं महद्धनुः चरणाभ्यां बभञ्ज।

शब्दार्थ-सशरं चापं = बाण सहित धनुष। मुक्तामणिविभूषितम् = मोतियों की मणियों से विभूषित। महातेजा = महान तेजस्वी। चरणाभ्यां = दोनों पैरों से। बभज = तोड़ दिया। महद्धनः = विशाल धनुष को।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस श्लोक में जटायु की वीरता का वर्णन किया गया है।

सरलार्थ महान् तेजस्वी पक्षिराज जटायु ने मोतियों की मणियों से विभूषित बाण सहित रावण के विशाल धनुष को दोनों पैरों से प्रहारकर तोड़ दिया।
भावार्थ मोती की मणियों से सुशोभित रावण के विशाल धनुष को जटायु ने अपने पैरों के प्रहार से ही तोड़ दिया। इससे जटायु के अतिशय पराक्रम का पता चलता है।

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9. स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।
तलेनाभिजघानाशु जटायु क्रोधमूर्छितः ॥७॥

अन्वय-क्रोधमूर्छितः हतसारथिः विरथः हताश्वः भग्नधन्वा स जटायुं तलेन आशु अभिजघान।

शब्दार्थ-भग्नधन्वा = टूटे हुए धनुष वाला। विरथः = रथ-विहीन। हताश्वः = मारे गए घोड़ों वाला। हतसारथिः = मारे जा चुके सारथी वाला। तलेन = तलवार की मूठ से। अभिजधान = प्रहार किया। आशु = शीघ्र। क्रोधमूर्छितः = क्रोध से पागल।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश इस श्लोक में बताया गया है कि क्रोध में अंधा रावण जटायु पर प्रहार करता है।

सरलार्थ-टूटे हुए धनुष वाला, रथविहीन, मारे गए अश्वों एवं सारथी वाले रावण ने तलवार की मूठ से शीघ्र ही जटायु पर खतरनाक प्रहार किया।

भावार्थ-जटायु ने रावण पर प्रहार करके उसके धनुष एवं रथ को तोड़ दिया। अश्वों तथा सारथी को भी मौत के घाट उतार दिया। जटायु के प्रहार से घबराए हुए रावण ने अपने बचाव के लिए जटायु पर उलट वार किया। उसने अपने तलवार की मूठ से ही उस (जटायु) पर प्रहार किया।

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10. जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः।
वामबाहून्दश तदा व्यपाहरदरिन्दमः ॥10॥

अन्वय-तदा अरिन्दमः खगाधिपः तम् अतिक्रम्य तुण्डेन अस्य दशवामबाहून व्यपाहरत्।

शब्दार्थ-अतिक्रम्य = अतिक्रमण करके उस प्रहार से बचकर। तुण्डेन = चोंच से। दशवामबाहून = दसों बाईं भुजाओं को। व्यापहरत् = नष्ट कर दिया। अरिन्दमः = शत्रुविनाशक।।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘जटायोः शौर्यम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित ‘रामायणम्’ के अरण्यकाण्ड से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश इस श्लोक में बताया गया है कि रावण के प्रहार से बचकर जटायु ने रावण की दसों भुजाओं को खण्डित कर दिया।

सरलार्थ-इसके बाद उस प्रहार से बचकर शत्रु विनाशक पक्षिराज जटायु ने अपनी चोंच से उसकी (रावण की) बाईं ओर की दसों भुजाओं को नष्ट कर दिया।

भावार्थ-क्रोध में अंधा बना हुआ रावण जब अपनी तलवार की मूठ से जटायु पर प्रहार करता है, उस समय जटायु अपना बचाव कर लेते हैं। वे पुनः अपनी चोंच से मार-मारकर रावण की बाईं ओर की दसों भुजाओं को छिन्न-भिन्न कर देते हैं।

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अभ्यासः

1. एकपदेन उत्तरं लिखत
(एक पद में उत्तर लिखिए)
(क) आयतलोचना का अस्ति?
(ख) सा कं ददर्श?
(ग) खगोत्तमः कीदृशीं गिरं व्याजहार?
(घ) जटायुः काभ्यां रावणस्य गात्रे व्रणं चकार?
(ङ) अरिन्दमः खगाधिपः कति बाहून् व्यपाहरत्?
उत्तराणि:
(क) वैदेही सीता,
(ख) गृधं,
(ग) शुभां,
(घ) तीक्ष्णनखाभ्यां,
(ङ) वामदशबाहून्।

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2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) “जटायो! पश्य” इति का वदति?
(ख) जटायुः रावणं किं कथयति?
(ग) क्रोधवशात् रावणः किं कर्तुम् उद्यतः अभवत् ?
(घ) पतगेश्वरः रावणस्य कीदृशं चापं सशरं बभज?
(ङ) जटायुः केन वामबाहुं दंशति?
उत्तराणि:
(क) “जटायो! पश्य” इति सीता वदति।
(ख) जटायुः रावणं अकथयत्-‘परदाराभिमर्शनात् नीचां मतिं निवर्तय। धीरः न तत् समाचरेत् यत् परः – अस्य विगर्हयेत्।
(ग) क्रोधवशात् रावणः जटायुं हन्तुम् उद्यतः अभवत्।
(घ) पतगेश्वरः रावणस्य मुक्तामणिविभूषितं सशरं चापं बभञ्ज।
(ङ) जटायुः तुण्डेन वामबाहुं दंशति।

3. उदाहरणमनुसत्य णिनि-प्रत्ययप्रयोगं कृत्वा पदानि रचयत
(उदाहरण के अनुसार णिनि प्रत्यय का प्रयोग करके शब्द बनाइए)
गुण + णिनि – गुणिन् (गुणी)
दान + णिनि – दानिन् (दानी)
(क) कवच + णिनि – …………………….
(ख) शर + णिनि – …………………….
(ग) कुशल + णिनि – …………………….
(घ) धन + णिनि – …………………….
(ङ) दण्ड + णिनि – …………………….
उत्तराणि:
(क) कवच + णिनि – कवचिन् (कवची)
(ख) शर + णिनि शरिन् (शरी)
(ग) कुशल + कुशलिन् (कुशली)
(घ) धन + णिनि – धनिन् (धनी)
(ङ) दण्ड + णिनि – दण्डिन् (दण्डी)

(अ) रावणस्य जटायोश्च विशेषणानि सम्मिलितरूपेण लिखितानि तानि पृथक्-पृथक् कृत्वा लिखत
(रावण और जटायु के विशेषण शब्द सम्मिलित रूप में दिए गए हैं। उन्हें अलग-अलग करके लिखिए)
युवा, सशरः, वृद्धः, हताश्वः, महाबलः, पतगसत्तमः, भग्नधन्वा, महागृध्रः, खगाधिपः, क्रोधमूर्छितः, पतगेश्वरः, सरथः, कवची, शरी
यथा
रावणः – जटायुः
युवा – वृद्धः
………………., ……………………….
………………., ……………………….
………………., ……………………….
………………., ……………………….
उत्तराणि

रावणःजटायु:
सशरःमहाबल:
हताश्वःपतगसत्तमः
भग्नधन्वामहागृध्र:
क्रोधमूर्च्छितःखगाधिप:
सरथःपतगेश्वर:
कवची
शरी

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4. ‘क’ स्तम्भे लिखितानां पदानां पर्यायाः ‘ख’ स्तम्भे लिखिताः। तान् यथासमक्षं योजयत
(स्तम्भ ‘क’ में लिखे गए शब्दों के पर्यायवाची शब्द स्तम्भ ‘ख’ में लिखे गए हैं। उन्हें ठीक एक-दूसरे के सामने जोड़िए)

(क) कवचीअपतत्
(ख) आशुपक्षिश्रेष्ठ:
(ग) विरथःपृथिव्याम्
(घ) पपातकवचधारी
(ङ) भुविशीप्रम्
(च) पतगसत्तमःरथविहीनः

उत्तराणि

(क) कवची(1) कवचधारी
(ख) आशु(2) शीघ्रम
(ग) विरथः(3) रथविहीन:
(घ) पपात(4) अपतत्
(ङ) भुवि(5) पृथिव्याम्
(च) पतगसत्तमः(6) पक्षिश्रेष्ठ:

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5. अधोलिखितानां पदानां/विलोमपदानि मञ्जूषायां दत्तेषु पदेषु चित्वा यथासमक्षं लिखत
(निम्नलिखित शब्दों विलोम शब्दों के ठीक सामने मञ्जूषा में दिए गए शब्दों में से चुनकर लिखिए)
मन्दम् पुण्यकर्मणा हसन्ती अनार्य अनतिक्रम्य देवेन्द्रेण प्रशंसेत् दक्षिणेन युवा
पदानि – विलोमशब्दाः
(क) विलपन्ती …………………….
(ख) आर्य …………………….
(ग) राक्षसेन्द्रेण …………………….
(घ) पापकर्मणा …………………….
(ङ) क्षिप्रम् …………………….
(च) विगर्हयेत् …………………….
(छ) वृद्धः …………………….
(ज) वामेन …………………….
(झ) अतिक्रम्य …………………….
उत्तराणि:
पदानि – विलोमशब्दाः
(क) विलपन्ती – हसन्ती
(ख) आर्य – अनार्य
(ग) राक्षसेन्द्रेण – देवेन्द्रेण
(घ) पापकर्मणा – पुण्यकर्मणा
(ङ) क्षिप्रम् – मन्दम्
(च) विगर्हयेत् – प्रशंसेत्
(छ) वृद्धः – युवा
(ज) वामेन – दक्षिणेन
(झ) अतिक्रम्य – अनतिक्रम्य

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6. (अ) अधोलिखितानि विशेषणपदानि प्रयुज्य संस्कृतवाक्यानि रचयत
(निम्नलिखित विशेषण शब्दों का प्रयोग करके संस्कृत में वाक्य बनाइए)
(क) शुभाम्
(ख) खगाधिपः
(ग) हतसारथिः
(घ) वामेन
(ङ) कवची
उत्तराणि:
(क) शुभाम् (सुन्दर)-जटायुः रावणं शुभां गिरं व्याजहार।
(ख) खगाधिपः (पक्षिराज)-जटायुः खगाधिपः आसीत्।।
(ग) हतसारथिः (मारे गए सारथी वाला)-हतसारथिः रावणः भुवि अपतत्।
(घ) वामेन (बायीं)-नीतिः वामेन हस्तेन लिखति।
(ङ) कवची (कवचधारी)-रावणः कवची आसीत्।

(आ) उदाहरणमनुसृत्य समस्तं पदं रचयत
(उदाहरण के अनुसार समस्तपद बनाइए)
यथा त्रयाणां लोकानां समाहारः – त्रिलोकी
(क) पञ्चानां वटानां समाहारः – ………………………..
(ख) सप्तानां पदानां समाहारः – ………………………..
(ग) अष्टानां भुजानां समाहारः – ………………………..
(घ) चतुर्णां मुखानां समाहारः – ………………………..
उत्तराणि:
(क) पञ्चानां वटानां समाहारः – पञ्चवटी
(ख) सप्तानां पदानां समाहारः – सप्तपदी
(ग) अष्टानां भुजानां समाहारः – अष्टभुजी
(घ) चतुर्णा मुखानां समाहारः – चतुर्मुखी

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जटायोः शौर्यम् (जटायु की वीरता) Summary in Hindi

जटायोः शौर्यम् पाठ-परिचय

प्रस्तुत पाठ संस्कृत-साहित्य के आदिकवि महर्षि वाल्मीकि-प्रणीत ‘रामायणम्’ के ‘अरण्यकाण्ड’ से उद्धृत है। ऐसा माना जाता है कि वाल्मीकि का हृदय एक व्याध द्वारा क्रीडारत क्रौञ्चयुगल में से एक के मार दिए जाने पर उसकी सहचरी के विलाप को सुनकर द्रवित हो गया था। आर्तहृदय वाले उनके मुख से शाप के रूप में जो वाणी निकली थी, वही वाणी रूपी श्लोक लौकिक संस्कृत-साहित्य का आदिश्लोक माना जाता है। इसी कारण वाल्मीकि को आदिकवि तथा उनके द्वारा रचित ‘रामायणम्’ को आदिकाव्य माना जाता है।

दशम श्लोकों वाले प्रस्तुत पाठ में जटायु और रावण के युद्ध का वर्णन है। पंचवटी वन में सीता के करुण विलाप को सुनकर पक्षिश्रेष्ठ जटायु उनकी रक्षा के लिए दौड़े। वे रावण को दूसरे की स्त्री के स्पर्श से दोषयुक्त, निन्द्य एवं दुष्कर्म से विरत होने के लिए कहते हैं। रावण की अपरिवर्तित मनोवृत्ति को देखकर वे उस पर भयावह आक्रमण करते हैं। महाबली जटायु अपने तीखे नाखूनों एवं पंजों से रावण के शरीर में अनेक घाव कर देते हैं। यहाँ तक कि पंजों के प्रहार से उसके विशाल धनुष को भी खंडित कर देते हैं। टूटे धनुष, मारे गए सारथी एवं अश्वों वाला क्रोध से अंधा बना रावण जटायु पर प्राण घातक प्रहार करता है, परन्तु पक्षिश्रेष्ठ जटायु अपना बचाव कर उस पर चोंचों से प्रहार करते हैं और उसके बाएँ भाग की दसों भुजाओं को क्षत-विक्षत कर देते हैं।

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