Class 9

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 5 नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया

Haryana State Board HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 5 नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 5 नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया

HBSE 9th Class Hindi नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया Textbook Questions and Answers

नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया प्रश्न उत्तर HBSE 9th Class प्रश्न 1.
बालिका मैना ने सेनापति ‘हे’ को कौन-कौन से तर्क देकर महल की रक्षा के लिए प्रेरित किया?
उत्तर-
बालिका मैना ने सर्वप्रथम तर्क देते हुए सेनापति ‘हे’ से कहा कि इस मकान को गिराने में आपका क्या उद्देश्य है ? दूसरा तर्क देते हुए मैना ने कहा कि जिन लोगों ने आपके विरुद्ध शस्त्र उठाए थे, वे दोषी हैं; परंतु इस जड़ पदार्थ मकान ने क्या अपराध किया है ? इसके अतिरिक्त अंतिम बात जो मैना ने कही और जो सेनापति ‘हे’ को अत्यधिक प्रभावित कर गई वह थी कि मैना और ‘हे’ की बेटी ‘मेरी’ दोनों सखियाँ थीं और दोनों सहपाठिनें भी थीं। ‘मेरी’ का एक पत्र उस समय भी उसके पास था। यह सब सुनकर सेनापति ‘हे’ उसके महल की रक्षा का प्रयास करने लगा था।
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नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया का सारांश HBSE 9th Class प्रश्न 2.
मैना जड़ पदार्थ मकान को बचाना चाहती थी पर अंग्रेज़ उसे नष्ट करना चाहते थे। क्यों?
उत्तर-
मैना उस मकान में रहती थी। उसके लिए वह केवल मकान नहीं, अपितु उसका घर था जिसमें पलकर वह बड़ी हुई थी। इसलिए उस मकान के प्रति उसके मन में अथाह प्रेम था। यही कारण था कि वह उस मकान को बचाना चाहती थी। दूसरी ओर, अंग्रेज़ अधिकारी नाना साहब से बदला लेने के लिए उससे संबंधित हर वस्तु को मिटा देना चाहते थे, क्योंकि उनके मन में बदले की आग जल रही थी। वे नाना साहब को तो गिरफ्तार न कर सके थे, किंतु उनके वंश के प्राणियों और मकान आदि को नष्ट करके अपने गुस्से व घृणा को शांत करना चाहते थे।

Class 9 Kshitij Chapter 5 Question Answer HBSE प्रश्न 3.
सर टामस ‘हे’ के मैना पर दया-भाव के क्या कारण थे?
उत्तर-
वस्तुतः सर टामस ‘हे’ को अंग्रेज़ सरकार का आदेश था कि नाना साहब का कोई वंशज मिल जाए तो उसे मार डाला जाए। उसकी सारी संपत्ति को भी नष्ट कर दिया जाए। अंग्रेज़ होने के नाते उसे भी नाना साहब पर क्रोध था, किंतु देवी मैना ने उसे बताया कि उसकी बेटी ‘मेरी’ और उसके बीच मित्रता का संबंध था और वे दोनों एक-दूसरे को बहुत चाहती थीं। उसे ‘मेरी’ की मृत्यु के समाचार से बहुत दुःख हुआ था। “आप भी हमारे यहाँ पहले कई बार आ चुके हैं। उसका एक पत्र मेरे पास अब तक है।” यह सब सुनकर सेनापति ‘हे’ अत्यंत प्रभावित हुआ तथा मैना के प्रति दया के भाव दिखाने लगा और कहा कि यद्यपि मैं सरकारी नौकर हूँ और सरकार की आज्ञा पालन करना मेरा कर्तव्य है, किंतु फिर भी मैं तुम्हारी रक्षा करने का प्रयास करूँगा।

Class 9th Kshitij Chapter 5 Question Answer HBSE प्रश्न 4.
मैना की अंतिम इच्छा थी कि वह उस प्रासाद के ढेर पर बैठकर जी भरकर रो ले लेकिन पाषाण हृदय वाले जनरल ने किस भय से उसकी इच्छा.पूर्ण न होने दी?
उत्तर-
एक बार अर्द्ध रात्रि की चाँदनी में देवी मैना स्वच्छ एवं उज्ज्वल वस्त्र पहनकर नाना साहब के महल के मलबे के ढेर पर बैठी रो रही थी। उसकी आवाज सुनकर अनेक अंग्रेज़ सैनिक और जनरल अउटरम वहाँ आ पहुँचे। जनरल अउटरम ने उसे पहचान लिया और कहा कि यह नाना साहब की बेटी मैना है। उसने उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया। तब मैना ने कहा कि मुझे कुछ समय दीजिए, जिसमें आज मैं यहाँ जी भरकर रो लूँ। यही उसकी अंतिम इच्छा थी, किंतु पाषाण हृदय जनरल अउटरम ने उसे ऐसा नहीं करने दिया क्योंकि उसे भय था कि कहीं मैना फिर आलोप न हो जाए और उसकी बदनामी होगी कि वह एक बालिका को गिरफ्तार नहीं कर सका। ऐसा करके वह सरकार की नज़रों में भी अच्छा बनना चाहता था।

Class 9 Hindi Chapter 5 Question Answer HBSE प्रश्न 5.
बालिका मैना के चरित्र की कौन-कौन सी विशेषताएँ आप अपनाना चाहेंगे और क्यों?
उत्तर-
बालिका मैना एक वीर और देशभक्त बालिका थी। वह इतनी बड़ी संख्या में अंग्रेज़ी सेना की उपस्थिति में तनिक नहीं डरी। उसके मन में अपने देश और अपने घर के प्रति अत्यधिक प्रेम था। इसलिए उसने अपने अकाट्य तर्कों के बल पर सेनापति ‘हे’ को भी अपने मकान और जीवन की रक्षा के लिए सहमत कर लिया था। कहने का भाव यह है कि बालिका मैना एक वीर, निडर, देशभक्त और तर्कशील कन्या थी। यही उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ हैं जिन्हें हम अपने जीवन में अपनाना चाहेंगे ताकि हम भी उसकी भाँति वीर, निडर, देशभक्त और तर्कशील कहलवा सकें।

Class 9 Hindi Shitish Chapter 5 Question Answer HBSE प्रश्न 6.
‘टाइम्स’ पत्र ने 6 सितंबर को लिखा था- ‘बड़े दुख का विषय है कि भारत सरकार आज तक उस दुर्दात नाना साहब को नहीं पकड़ सकी।’ इस वाक्य में ‘भारत सरकार’ से क्या आशय है?
उत्तर-
पत्र के ‘भारत सरकार’ शब्द से आशय है-तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी, जो भारत में शासन चला रही थी, वह नाना साहब को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी।

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रचना और अभिव्यक्ति

Chapter 5 Hindi Class 9 Kshitij HBSE प्रश्न 7.
स्वाधीनता आंदोलन को आगे बढ़ाने में इस प्रकार के लेखन की क्या भूमिका रही होगी?
उत्तर-
कहा गया है कि जो शक्ति तोप और तलवार में नहीं होती, वह शक्ति साहित्य में होती है। जो काम हम शक्ति का भय दिखाकर नहीं कर सकते, वही कार्य साहित्य सहज ही कर डालता है। कहने का भाव यह है कि ऐसे लेखन का जन-साधारण पर बहुत प्रभाव पड़ता है। वे देवी मैना जैसी कन्या के महान त्याग और बलिदान से प्रेरणा लेकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े होंगे अथवा जो पहले से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले रहे होंगे, उन्हें नई प्रेरणा व शक्ति मिली होगी और उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की गति को तीव्र कर दिया होगा जिससे देश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई है। अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ऐसे लेखन की स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने में मुख्य भूमिका रही होगी।

प्रश्न 8.
कल्पना कीजिए कि मैना के बलिदान की यह खबर आपको रेडियो पर प्रस्तुत करनी है। इन सूचनाओं के आधार पर आप एक रेडियो समाचार तैयार करें और कक्षा में भावपूर्ण शैली में पढ़ें।
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है, इसलिए विद्यार्थी इसे स्वयं तैयार करेंगे।

प्रश्न 9.
इस पाठ में रिपोर्ताज के प्रारंभिक रूप की झलक मिलती है लेकिन आज अखबारों में अधिकांश खबरें रिपोर्ताज की शैली में लिखी जाती हैं। आप
(क) कोई दो खबरें किसी अखबार से काटकर अपनी कॉपी में चिपकाइए तथा कक्षा में पढ़कर सुनाइए।
(ख) अपने आसपास की किसी घटना का वर्णन रिपोर्ताज शैली में कीजिए।
उत्तर-
ये प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं हैं।

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प्रश्न 10.
आप किसी ऐसे बालक/बालिका के बारे में एक अनुच्छेद लिखिए जिसने कोई बहादुरी का काम किया हो।
उत्तर-
दिनेश मेरे स्कूल की छठी कक्षा का विद्यार्थी है। उसे इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर बहादुरी के लिए राष्ट्रपति ने पुरस्कार दिया है, जिसे सुनकर न केवल नगर के अपितु पूरे राज्य के लोग उस पर गर्व करने लगे हैं। हुआ यह था कि एक दिन जब वह स्कूल से लौट रहा था तो एक घर में रोने-चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। ये आवाजें सुनकर उसने उस घर की घंटी बजाई तो भयंकर शक्ल वाला आदमी उसे डाँटने लगा। दिनेश ने यह समझ लिया था कि यह कोई चोर है। उसने कहा अंकल मुझे बड़ी प्यास लगी है, मुझे पानी पीना है। पानी के बहाने वह मना करने पर भी अंदर चला गया। उसने वहाँ देखा कि दो आदमी मकान मालिक की पत्नी का गला दबा रहे थे। दिनेश ने अपनी जान खतरे में डालकर एक आदमी की पीठ पर जोर से मुक्का मारा। वह आदमी औरत को छोड़कर उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ा, तब तक बाहर खड़ा आदमी भी दिनेश को पकड़ने में उसकी मदद करने के लिए आ गया, किंतु दिनेश इतनी तेजी से दौड़ा था कि उनकी पकड़ में नहीं आया और बाहर आकर उसने ‘चोर-चोर’ कहकर शोर मचा दिया। उसकी आवाज सुनकर रास्ते पर चलने वाले और आस-पड़ोस के लोग एकत्रित हो गए और चोरों पर टूट पड़े। दो चोर भागने में सफल हो गए, किंतु तीसरे को पकड़ लिया गया और पुलिस के हवाले कर दिया। इससे उस महिला की जान बच गई। दिनेश को उसकी इस बहादुरी के लिए पुरस्कार मिला।

भाषा-अध्ययन

प्रश्न 11.
भाषा और वर्तनी का स्वरूप बदलता रहता है। इस पाठ में हिंदी गय का प्रारंभिक रूप व्यक्त हुआ है जो लगभग 75-80 वर्ष पहले था। इस पाठ के किसी पसंदीदा अनुच्छेद को वर्तमान मानक हिंदी रूप में लिखिए।
“इके बाद कराल रूपधारी जनरल अउटरम भी वहाँ पहुँच गया। वह उसे तुरंत पहिचानकर बोला-“ओह! यह नाना की लड़की मैना है!” पर वह बालिका किसी ओर न देखती थी और न अपने चारों ओर सैनिकों को देखकर ज़रा भी डरी। जनरल अउटरम ने आगे बढ़कर कहा,-“अंगरेज़ सरकार की आज्ञा से मैंने तुम्हें गिरफ्तार किया।”
उत्तर-
इसके पश्चात भयंकर रूपधारी अउटरम भी वहाँ पहुँच गया। वह उसे तुरंत पहचान कर बोला, “ओह! यह नाना की बेटी मैना है। पर वह बालिका किसी की ओर नहीं देख रही थी और न ही चारों ओर खड़े सैनिकों को देखकर ज़रा भी डरी। जनरल अउटरम ने आगे बढ़कर कहा,-“अंग्रेज सरकार की आज्ञा से मैं तुम्हें गिरफ्तार करता हूँ।”

पाठेतर सक्रियता

अपने साथियों के साथ मिलकर बहादुर बच्चों के बारे में जानकारी देने वाली पुस्तकों की सूची बनाइए।
इन पुस्तकों को पढ़िए-
‘भारतीय स्वाधीनता संग्राम में महिलाएँ’-राजम कृष्णन, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली।
‘1857 की कहानियाँ’-ख्वाजा हसन निज़ामी, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली।
नोट-विद्यार्थी यह कार्य स्वयं करेंगे।
अपठित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
आज़ाद भारत में दुर्गा भाभी को उपेक्षा और आदर दोनों मिले। सरकारों ने उन्हें पैसों से तोलना चाहा। कई वर्ष पहले पंजाब में उनके सम्मान में आयोजित एक समारोह में तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने उन्हें 51 हज़ार रुपए भेंट किए। भाभी ने वे रुपए वहीं वापस कर दिए। कहा-“जब हम आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे, उस समय किसी व्यक्तिगत लाभ या उपलब्धि की अपेक्षा नहीं थी। केवल देश की स्वतंत्रता ही हमारा ध्येय था। उस ध्येय पथ पर हमारे कितने ही साथी अपना सर्वस्व निछावर कर गए, शहीद हो गए। मैं चाहती हूँ कि मुझे जो 51 हज़ार रुपए दिए गए हैं, उस धन से यहाँ शहीदों का एक बड़ा स्मारक बना दिया जाए, जिसमें क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास का अध्ययन और अध्यापन हो, क्योंकि देश की नई पीढ़ी को इसकी बहुत आवश्यकता है।”

मुझे याद आता है सन 1937 का ज़माना, जब कुछ क्रांतिकारी साथियों ने गाज़ियाबाद तार भेजकर भाभी से चुनाव लड़ने की प्रार्थना की थी। भाभी ने तार से उत्तर दिया-“चुनाव में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। अतः लड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता।”

मुल्क के स्वाधीन होने के बाद की राजनीति भाभी को कभी रास नहीं आई। अनेक शीर्ष नेताओं से निकट संपर्क होने के बाद भी वे संसदीय राजनीति से दूर ही बनी रहीं। शायद इसलिए अपने जीवन का शेष हिस्सा नई पीढ़ी के निर्माण के लिए अपने विद्यालय को उन्होंने समर्पित कर दिया।

(1) स्वतंत्र भारत में दुर्गा भाभी का सम्मान किस प्रकार किया गया ?
(2) दुर्गा भाभी ने भेंट स्वरूप प्रदान किए गए रुपए लेने से इंकार क्यों कर दिया ?
(3) दुर्गा भाभी संसदीय राजनीति से दूर क्यों रहीं ?
(4) आज़ादी के बाद उन्होंने अपने को किस प्रकार व्यस्त रखा ?
(5) दुर्गा भाभी के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषता आप अपनाना चाहेंगे?
उत्तर-
(1) स्वतंत्र भारत में दुर्गा भाभी का सम्मान उन्हें पंजाब के मुख्यमंत्री द्वारा 51 हजार रुपए भेंट करके व अनेक बड़े नेताओं द्वारा चुनाव लड़ने के लिए निमंत्रण देकर किया गया।
(2) दुर्गा भाभी ने भेंट स्वरूप प्रदान किए गए रुपए लेने से यह कहकर इंकार कर दिया कि उसने स्वतंत्रता आंदोलन में व्यक्तिगत लाभ के लिए भाग नहीं लिया था। इन रुपयों से यहाँ शहीदों का एक बड़ा स्मारक बना दिया जाए जिसमें क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास का अध्ययन और अध्यापन हो, जिसको नई पीढ़ी के लोग पढ़कर क्रांतिकारी आंदोलन से अवगत होंगे।
(3) दुर्गा भाभी संसदीय राजनीति से इसलिए दूर रहना चाहती थी ताकि वह अपने जीवन का शेष समय नई पीढ़ी के निर्माण में लगा सके।
(4) आजादी के पश्चात उन्होंने अपने-आपको व्यस्त रखने के लिए एक विद्यालय आरंभ किया था जहाँ वह नई पीढ़ी के निर्माण के लिए रात-दिन लगी रहती थी।
(5) दुर्गा भाभी के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, अपितु देश को स्वतंत्र करवाने के लिए भाग लिया था। इसलिए हमें भी सर्वप्रथम देश के हित की बात सोचनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत हित की।

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यह भी जानें

हिंदू-पंच-अपने समय की चर्चित पत्रिका हिंदू पंच का प्रकाशन 1926 में कलकत्ता से हुआ। इसके संपादक थे-ईश्वरीदत्त शर्मा। 1930 में इसका ‘बलिदान’ अंक निकला जिसे अंग्रेज़ सरकार ने तत्काल जब्त कर लिया। चाँद के ‘फाँसी’ अंक की तरह यह भी आज़ादी का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इस अंक में देश और समाज के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले व्यक्तियों के बारे में बताया गया है।

HBSE 9th Class Hindi नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया’, नामक पाठ के उद्देश्य (प्रतिपाद्य) को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
निश्चय ही यह पाठ महान उद्देश्य को लेकर लिखा गया है। मातृभूमि की स्वतंत्रता और उसकी रक्षा के लिए जिन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उनके जीवन का उत्कर्ष हमारे लिए गौरव और सम्मान की बात है। बहुत-से ऐसे वीर पुरुष व महिलाएँ हैं जिन्होंने अपना सब कुछ देश को स्वतंत्र करवाने में लगा दिया था। यहाँ तक कि अपने प्राणों की बाजी भी लगा दी। किंतु इतिहास में उन्हें कहीं कोई स्थान नहीं मिला। प्रस्तुत पाठ में नाना साहब की बेटी मैना के बलिदान का उल्लेख करके उनके प्रति श्रद्धा एवं सम्मान व्यक्त करना ही इसका प्रमुख लक्ष्य है। मैना चाहती तो समझौता करके आराम का जीवन जी सकती थी, किंतु वह एक वीर बालिका थी। उसने अंग्रेज़ों से जरा भी भय अनुभव नहीं किया और न ही अपने प्राणों की भीख ही माँगी। उसे अपने देश और अपनी आन से पूर्ण लगाव था। इसलिए उसने एक वीर बालिका की भाँति अपने जीवन का बलिदान किया। लेखिका ने इस पाठ के माध्यम से देश की नई पीढ़ी को अपने देश को आजाद करवाने वाले शहीदों के प्रति श्रद्धा एवं आदर का भाव रखने की प्रेरणा दी है। यही इस पाठ का प्रमुख लक्ष्य है जिसे व्यक्त करने में लेखिका को पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है।

प्रश्न 2.
‘नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया’ नामक पाठ को पढ़ने पर अंग्रेज़ों के प्रति जो आपकी धारणा बनती है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वर्णन के साथ-साथ देवी मैना के महान त्याग और बलिदान का उल्लेख किया गया है। इस पाठ में बताया गया है कि कानपुर की लड़ाई में असफल होने पर नाना साहब इतनी जल्दी में वहाँ से भाग निकले कि अपनी बेटी मैना को अपने साथ न ले जा सके। उनके जाने के बाद कानपुर के विद्रोह का दमन करने के पश्चात तत्कालीन अंग्रेज जनरल अउटरम ने नाना साहब के बिठूर वाले भवन को तहस-नहस इसलिए कर दिया कि वह नाना साहब का था। इतना ही नहीं, उनकी निर्दोष एवं निरीह बालिका मैना को उसकी इच्छा के विरुद्ध गिरफ्तार करके कानपुर के किले में कैद ही नहीं किया, अपितु उसे जलती हुई भीषण आग में जीवित जला डाला। यह सब कुछ बदले की भावना से किया गया था यद्यपि देवी मैना निर्दोष थी। इस प्रकार पाठ में वर्णित घटना से पता चलता है कि अंग्रेज़ लोग अत्यंत संकीर्ण एवं निर्दयी थे। बदले की भावना में वे मानवता को भी भूल गए थे।

प्रश्न 3.
पठित पाठ के आधार पर बालिका मैना का चरित्र-चित्रण सार रूप में कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में मैना के महान बलिदान का चित्रण किया गया है। पाठ के पढ़ने पर पता चलता है कि बालिका मैना अत्यंत सुंदर व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। लेखिका ने कहा है कि जब अंग्रेज़ सैनिकों ने महल को गिराने के लिए वहाँ तोपें लगाईं तो महल के बरामदे में एक अत्यंत सुंदर बालिका आकर खड़ी हो गई। इसी प्रकार इतिहासकार महादेव चिटनवीस ने भी उसे अनुपम बालिका कहा है। इससे सिद्ध है कि देवी मैना अत्यंत सुंदर बालिका थी।

देवी मैना के मन में अपने घर के प्रति अत्यंत स्नेह था। इसलिए उसने सेनापति ‘हे’ को उसे न गिराने का अनुरोध ही नहीं किया, अपितु अपने तर्कों द्वारा उसे सहमत भी कर लिया था।
उसके मन में अंग्रेज़ों द्वारा अपने परिवार एवं देश के लोगों को मार देने का दुःख था। इसलिए वह अपने महल के मलबे के ढेर पर बैठकर जी भरकर रोना चाहती थी। यही उसकी अंतिम इच्छा भी थी।

देवी मैना वीर एवं निडर थी। वह अंग्रेज़ सेनाधिकारी व सैनिकों को इतनी बड़ी संख्या में देखकर जरा भी नहीं डरी, अपितु उसने साहसपूर्वक अपनी बात उनके सामने रखी। मौत का भय दिखाने पर भी वह अपने इरादे से टस-से-मस न हुई।

मैना एक तर्कशील युवती थी। उसने अपने तर्कों के द्वारा सेनापति ‘हे’ को परास्त कर दिया था और वह महल और उसके जीवन की रक्षा के लिए तैयार ही नहीं हो गया था, अपितु उसने गवर्नर को तार भी लिख भेजा था।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया’ पाठ की लेखिका का क्या नाम है?
(A) चपला देवी
(B) महादेवी वर्मा
(C) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(D) हरिशंकर परसाई
उत्तर-
(A) चपला देवी

प्रश्न 2.
नाना साहब का पूरा नाम क्या है?
(A) नाना साहब
(B) धुंधूपंत नाना साहब
(C) श्रीपंत नाना साहब
(D) पंत नाना साहब
उत्तर-
(B) धुंधूपंत नाना साहब

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प्रश्न 3.
मैना किसकी पुत्री थी?
(A) मंगल पाण्डेय
(B) गंगाधर राव
(C) धुंधूपंत नाना साहब
(D) गजराजपंत
उत्तर-
(C) धुंधूपंत नाना साहब

प्रश्न 4.
कानपुर में भीषण हत्याकांड करने के बाद अंग्रेज़ों का सैनिक दल किस ओर गया था?
(A) बिठूर की ओर
(B) झाँसी की ओर
(C) लखनऊ की ओर
(D) बनारस की ओर
उत्तर-
(A) बिठूर की ओर

प्रश्न 5.
अंग्रेज़ अधिकारियों को किसको बरामदे में खड़े देखकर हैरानी हुई थी?
(A) नाना साहब को
(B) मैना देवी को
(C) झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को
(D) नाना साहब की पत्नी को
उत्तर-
(B) मैना देवी को

प्रश्न 6.
मैना ने अंग्रेज़ी अधिकारी से क्या करने के लिए कहा था?
(A) उसे रिहा करने को
(B) सेना को वापस ले जाने को
(C) महल पर गोले न बरसाने को
(D) उसकी रक्षा करने को
उत्तर-
(C) महल पर गोले न बरसाने को

प्रश्न 7.
मैना ने अंग्रेज़ अधिकारी से क्या प्रश्न किया था?
(A) क्या आप कृपा कर इस महल की रक्षा करेंगे
(B) क्या आप कृपा कर मेरी रक्षा करेंगे.
(C) क्या आप भारत छोड़कर नहीं जाएंगे।
(D) क्या तुम्हें निरीह प्राणियों पर दया आती है
उत्तर-
(A) क्या आप कृपा कर इस महल की रक्षा करेंगे

प्रश्न 8.
“कर्त्तव्य के अनुरोध से मुझे यह मकान गिराना ही होगा।”-ये शब्द किसने कहे थे?
(A) अउटरम ने
(B) सेनापति ‘हे’ ने
(C) लार्ड केनिंग ने
(D) सेनापति टोमस ने
उत्तर-
(B) सेनापति ‘हे’ ने

प्रश्न 9.
“नाना का स्मृति-चिह्न तक मिटा दिया जाए।”-ये शब्द किसने कहे थे?
(A) लॉर्ड केनिंग ने
(B) सेनापति ‘हे’ ने
(C) लंडन के मंत्रीमंडल ने
(D) सेनाध्यक्ष अउटरम ने
उत्तर-
(C) लंडन के मंत्रीमंडल ने

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प्रश्न 10.
उस समय लंडन का प्रसिद्ध अखबार कौन-सा था?
(A) नेशनल हेराल्ड
(B) टॉइम्स
(C) टॉइम्ज इंडिया
(D) हिन्दुस्तान टाइम्स
उत्तर-
(B) टाइम्स

प्रश्न 11.
“नाना की जिस कन्या के प्रति ‘हे’ ने दया दिखाई है, उसे उन्हीं के सामने फाँसी पर लटका देना चाहिए।” ये शब्द किसने कहे हैं?
(A) लंडन की महारानी ने
(B) लॉर्ड केनिंग ने
(C) हाउस ऑफ लार्ड्स ने
(D) भारतमंत्री ने
उत्तर-
(C) हाउस ऑफ लार्ड्स ने

प्रश्न 12.
नाना के भग्नावशिष्ट प्रासाद के ढेर पर बैठकर कौन रो रहा था?
(A) नाना साहब का बेटा
(B) नाना साहब की पत्नी
(C) नाना साहब का भाई
(D) नाना साहब की बेटी मैना
उत्तर-
(D) नाना साहब की बेटी मैना

प्रश्न 13.
मैना ने जनरल अउटरम के सामने अपनी कौन सी अंतिम इच्छा व्यक्त की थी?
(A) जी भरकर रोने की
(B) जी भरकर सोने की
(C) जी भरकर अपने नष्ट हुए महल को देखने की
(D) कुछ समय के लिए प्रार्थना करने की
उत्तर-
(A) जी भरकर रोने की

प्रश्न 14.
मैना की मृत्यु का समाचार किस अखबार में प्रकाशित हुआ था?
(A) मिलाप
(B) भारत मित्र
(C) बाखर
(D) टाइम्स
उत्तर-
(C) बाखर

प्रश्न 15.
लोगों ने जलती हुई मैना को देखकर उसे क्या समझकर प्रणाम किया था?
(A) देवी
(B) वीर पुत्री
(C) देशभक्त
(D) निडर भारतीय नारी
उत्तर-
(A) देवी

प्रश्न 16.
प्रस्तुत पाठ में नाना साहब के चरित्र की किस विशेषता को उजागर किया गया है?
(A) महान् योद्धा थे
(B) महान् देशभक्त थे
(C) महान् शासक थे
(D) महान् दानी थे
उत्तर-
(B) महान् देशभक्त थे

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नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या/भाव ग्रहण

1. सन 1857 ई० के विद्रोही नेता धुंधूपंत नाना साहब कानपुर में असफल होने पर जब भागने लगे, तो वे जल्दी में अपनी पुत्री मैना को साथ न ले जा सके। देवी मैना बिठूर में पिता के महल में रहती थी; पर विद्रोह दमन करने के बाद अंगरेज़ों ने बड़ी ही क्रूरता से उस निरीह और निरपराध देवी को अग्नि में भस्म कर दिया। उसका रोमांचकारी वर्णन पाषाण हृदय को भी एक बार द्रवीभूत कर देता है। [पृष्ठ 51]

शब्दार्थ-विद्रोही = क्रांतिकारी। दमन = समाप्त। क्रूरता = निर्दयता। निरीह = बेसहारा। निरपराध = बेकसूर। रोमांचकारी = रोंगटे खड़े कर देने वाला। पाषाण = पत्थर। द्रवीभूत = भावुक होना, पिघला देना।।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यावतरण हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 1 में संकलित ‘नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया’ नामक पाठ से उद्धृत है। इसकी लेखिका चपला देवी हैं। यह पाठ वस्तुतः एक रिपोर्ट है। इसमें देवी मैना के बलिदान का रोमांचकारी उल्लेख किया गया है। इन पंक्तियों में नाना साहब की विवशता और देवी मैना के बलिदान का एक साथ उल्लेख किया गया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखिका ने बताया है कि सन 1857 में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहब का महान योगदान था। वे अनेक मोर्चों पर लड़े थे। वे कानपुर की लड़ाई में असफल होने पर जब भागने लगे तो उनके पास इतना समय नहीं था कि वे अपनी पुत्री को महल से अपने साथ ले आते। देवी मैना बिठूर में अपने पिता के महल में रहती थी। अंग्रेजों ने कानपुर में क्रांति को दबाने के पश्चात बड़ी निर्दयतापूर्ण उस बेसहारा और बेकसूर देवी को आग में जलाकर भस्म कर दिया था। वह दृश्य ऐसा दर्दनाक था कि उसका वर्णन मात्र ही पत्थर हृदय वाले व्यक्तियों को भावुक बना देता है। उनके हृदय पिघल जाते हैं। कहने का भाव है कि देवी मैना को अत्यंत क्रूरतापूर्वक जलाया गया था।

विशेष-

  1. देवी मैना के महान बलिदान का उल्लेख अत्यंत भावनात्मकतापूर्ण शैली में किया गया है।
  2. लेखिका की देश-भक्ति और देवी मैना के प्रति श्रद्धा-भावना का बोध होता है।
  3. भाषा-शैली एक साधारण रिपोर्ताज जैसी है। – उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) मैना बिठूर के महल में कैसे रह गई ?
(2) मैना को जीवित जला डालने की सजा क्यों दी गई थी ?
(3) निरीह और निरपराध किसे और क्यों कहा गया है ?
(4) “उसका रोमांचकारी वर्णन पाषाण हृदय को भी एक बार द्रवीभूत कर देता है।” वाक्य का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर-
(1) जब नाना साहब कानपुर में रहकर स्वतंत्रता संग्राम का संचालन कर रहे थे तब उनकी बेटी मैना बिठूर के राजमहल में रह रही थी। नाना साहब कानपुर में असफल होने पर जब भागने लगे, तो वे जल्दी में अपनी पुत्री मैना को साथ न ले जा सके। इस कारण वह बिठूर के महल में रह गई।
(2) मैना का कसूर बस इतना था कि वह स्वतंत्रता सेनानी नाना साहब की बेटी थी। नाना साहब से बदला लेने के लिए उनकी बेटी मैना को जीवित ही आग में जला दिया गया था। यह अंग्रेज़ों का अमानवीय एवं नीच कर्म था।
(3) निरीह और निरपराध मैना को कहा गया है। उसे निरीह इसलिए कहा गया है कि वह महल में अकेली रह गई थी। निरपराध उसे इसलिए कहा गया है कि उसने कभी किसी को पीड़ा तक नहीं पहुँचाई थी। न ही किसी को उससे किसी प्रकार का भय था।
(4) इस वाक्य के माध्यम से लेखक ने बताया है कि नाना साहब की शत्रुता का बदला उसकी मासूम बेटी को जीवित आग में भस्म करके लेना अंग्रेज़ों की कायरता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

2. आपके विरुद्ध जिन्होंने शस्त्र उठाए थे, वे दोषी हैं; पर इस जड़ पदार्थ मकान ने आपका क्या अपराध किया है ? मेरा उद्देश्य इतना ही है, कि यह स्थान मुझे बहुत प्रिय है, इसी से मैं प्रार्थना करती हूँ, कि इस मकान की रक्षा कीजिये। [पृष्ठ 52]

शब्दार्थ-विरुद्ध = खिलाफ। दोषी = कसूरवार। जड़ पदार्थ = निर्जीव। अपराध = कसूर।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 1 में संकलित ‘नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इसकी लेखिका चपला देवी हैं। इस पाठ में देवी मैना की अंग्रेज़ सेनाधिकारी जनरल अउटरम द्वारा निर्ममतापूर्ण हत्या का वर्णन किया गया है। इन पंक्तियों में देवी मैना के अपने महल के प्रति स्वाभाविक स्नेह को अभिव्यक्त किया गया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-जब अंग्रेज सेनाधिकारी सर टामस ‘हे’ नाना साहब के बिठूर वाले महल को तोपों के गोलों से नष्ट करने वाले थे, तभी देवी मैना महल के बरामदे में आकर उनसे कहती है कि मैं मानती हूँ कि जिन लोगों ने अंग्रेज़ शासन के विरुद्ध शस्त्र उठाए थे अर्थात युद्ध किया वे कसूरवार हैं, आपके अपराधी हैं, किंतु इस जड़ पदार्थ मकान ने कौन-सा अपराध किया है जो आप इसे नष्ट करने पर तुले हुए हो। मेरी तो आपसे इतनी-सी प्रार्थना है कि आप इस मकान की रक्षा कीजिए। मेरे कहने का उद्देश्य यह है कि मुझे यह स्थान बहुत प्रिय है। इसलिए आप इसे नष्ट न करें।

विशेष-

  1. देवी मैना का अपने पैतृक मकान के प्रति स्वाभाविक लगाव का वर्णन किया गया है।
  2. देवी मैना की तर्कशीलता देखते ही बनती है।
  3. भाषा-शैली भावानुकूल एवं प्रभावशाली है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) ये शब्द किसने किससे कहे हैं ?
(2) प्रस्तुत पंक्तियों में मैना की किस भावना का बोध होता है ?
(3) अंग्रेजों द्वारा महल को गिराना उनकी किस भावना को उजागर करता है ?
(4) नाना साहब का यह महल कहाँ स्थित था ?
उत्तर-
(1) ये शब्द नाना साहब की बेटी मैना द्वारा अंग्रेज़ सेनापति ‘हे’ को कहे गए हैं।
(2) इन पंक्तियों में मैना की महल के प्रति स्नेह भावना एवं तर्कशीलता का पता चलता है।
(3) अंग्रेज़ों द्वारा नाना साहब के महल को गिराना उनकी क्रूरता एवं बदले की भावना को दर्शाता है।
(4) नाना साहब का यह महल बिठूर में स्थित था।

3. बड़े दुःख का विषय है, कि भारत सरकार आज तक उस दुर्दात नाना साहब को नहीं पकड़ सकी, जिस पर समस्त अंगरेज़ जाति का भीषण क्रोध है। जब तक हम लोगों के शरीर में रक्त रहेगा, तब तक कानपुर में अंगरेज़ों के हत्याकांड का बदला लेना हम लोग न भूलेंगे। [पृष्ठ 54]

शब्दार्थ-दुर्वांत = निडर। भीषण = भयंकर। हत्याकांड = किसी को मारने की घटना।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 1 में संकलित ‘नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया’ नामक पाठ से उद्धृत है। इसमें लेखिका चपला देवी ने देवी मैना के महान बलिदान और नाना साहब के अंग्रेज़ सत्ता पर छाए आतंक को चित्रित किया है। ये पंक्तियाँ तत्कालीन इंग्लैंड के प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘टाइम्स’ में प्रकाशित हुई थीं। इन पंक्तियों में अंग्रेज़ जाति के नाना साहब पर किए गए क्रोध को दर्शाया गया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-कानपुर में अंग्रेज़ सेना और भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में संघर्ष हुआ था। उसमें भारतीय सेनाएँ हार गई थीं और विद्रोह को दबा दिया गया था, किंतु इसकी कीमत अंग्रेज़ों को बहुत महँगी पड़ी थी। उसमें उनके स्त्री, पुरुष और बच्चे भी मारे गए थे। इसलिए अंग्रेज़ नाना साहब को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानने लगे थे। तत्कालीन भारत में अंग्रेज़ी सरकार नाना साहब को पकड़ नहीं सकी थी। इसलिए समाचार-पत्र में उनके ये विचार प्रकाशित हुए थे कि बड़े दुःख का विषय है कि भारत सरकार आज तक दुर्दात नाना साहब को पकड़ नहीं सकी, जिस पर समस्त अंग्रेज़ जाति का भयंकर क्रोध व्यक्त हो रहा था। उनका कहना था कि जब तक लोगों के शरीर में रक्त का प्रवाह रहेगा, तब तक कानपुर में हुए अंग्रेज़ों के हत्याकांड का बदला लेना हम लोग नहीं भूलेंगे।

विशेष-

  1. नाना साहब की देशभक्ति और बहादुरी का उल्लेख किया गया है। नाना साहब अंग्रेजों की आँख का काँटा बन गया था।
  2. भाषा सरल, सहज एवं स्वाभाविक है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) अंग्रेज़ जाति नाना साहब को दुर्दात क्यों मानती थी ?
(2) ये शब्द किसने और क्यों कहे थे ?
(3) इन पंक्तियों से अंग्रेजों की किस विशेषता का पता चलता है ?
(4) इन पंक्तियों में नाना साहब के जीवन की किस विशेषता का परिचय मिलता है ?
उत्तर-
(1) सन 1857 के संग्राम में कानपुर में अंग्रेज़ नर-नारियों की क्रूर हत्या की गई थी। इस हत्याकांड के लिए अंग्रेज़ लोग क्रांतिकारियों को दोषी मानते थे। अंग्रेज़ नाना साहब को क्रांतिकारियों का नेता समझते थे। इस हत्याकांड के लिए अंग्रेज़ नाना साहब को ही दोषी मानते थे। इसलिए वे उसे दुर्दीत अर्थात अत्याचारी कहते थे।
(2) ये शब्द ‘हाउस ऑफ़ लार्डस’ के सदस्यों द्वारा कहे गए थे जिन्हें तत्कालीन प्रमुख समाचार-पत्र ‘टाइम्स’ में प्रकाशित किया गया था।
(3) इन पंक्तियों से अंग्रेज़ जाति में बदले की भावना का पता चलता है। बदला लेने के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।
(4) इन पंक्तियों से पता चलता है कि नाना साहब एक महान देशभक्त थे। वे देश को स्वतंत्र करवाना चाहते थे। शत्रु भी उनके नाम से डरता था।

5. “कल कानपुर के किले में एक भीषण हत्याकांड हो गया। नाना साहब की एकमात्र कन्या मैना धधकती हुई आग में जलाकर भस्म कर दी गई। भीषण अग्नि में शान्त और सरल मूर्ति उस अनुपमा बालिका को जलती देख, सबने उसे देवी समझ कर प्रणाम किया।” [पृष्ठ 55]

शब्दार्थ-भीषण = भयंकर। हत्याकांड = हत्या का घृणित कार्य। अनुपमा = जिसकी कोई उपमा न हो।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य-पंक्तियाँ हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 1 में संकलित चपला देवी द्वारा रचित ‘नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया’ शीर्षक पाठ से उद्धृत हैं। इस पाठ में देवी मैना के देश-प्रेम और महान बलिदान का उल्लेख किया गया है। ये पंक्तियाँ महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध इतिहासकार महादेव चिटनवीस द्वारा प्रकाशित ‘बाखर’ नामक समाचार पत्र में प्रकाशित हुई थीं जिन्हें लेखिका ने उद्धृत किया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-श्री महादेव चिटनवीस ने लिखा है कि कल कानपुर के किले में एक भयंकर हत्याकांड हो गया अर्थात अग्नि में जलाकर मार देने की घटना घटित हुई। नाना साहब की एकमात्र कन्या मैना को धधकती हुई आग में जलाकर राख कर डाला। भीषण आग में बिना चिल्लाए शांत और सरल मूर्ति उस अत्यंत सुंदर बालिका को आग में जलते हुए देखकर सबने उसे देवी मानकर श्रद्धा भाव से प्रणाम किया। कहने का तात्पर्य है कि निरपराध बालिका को जीते जी आग में जलाने जैसा अमानवीय कार्य करना अंग्रेज़ जाति की संकीर्ण मनोवृत्ति को दर्शाता है।

विशेष-

  1. इस समाचार के माध्यम से देवी मैना के महान बलिदान का वर्णन किया गया है, साथ ही अंग्रेज़ शासन की क्रूरता को भी अभिव्यंजित किया गया है।
  2. भाषा-शैली भावों को अभिव्यंजित करने में पूर्णतः सक्षम है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 5 नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस समाचार-पत्र में प्रकाशित हुई थीं ?
(2) मैना को किस प्रकार मार डाला गया था ?
(3) कानपुरवासियों ने किसे देवी समझकर प्रणाम किया था ?
(4) इस गद्यांश के आधार पर अंग्रेज़ों की क्रूरता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
(1) प्रस्तुत पंक्तियाँ महादेव चिटनवीस के समाचार-पत्र ‘बाखर’ में प्रकाशित हुई थीं।
(2) मैना को धधकती हुई आग में जलाकर भस्म कर दिया गया था। इस प्रकार उसकी निर्ममतापूर्ण हत्या की गई थी।
(3) कानपुरवासियों ने नाना साहब की पुत्री मैना को धधकती हुई आग में भस्म होते हुए देखा। उन्होंने उस बालिका को देवी समझकर प्रणाम किया था।
(4) इस गद्यांश से पता चलता है कि अंग्रेज़ अत्यंत क्रूर एवं निर्दयी हैं। उन्होंने एक भोली-भाली बालिका मैना को धधकती हुई आग में भस्म कर डाला। उसका इतना-सा दोष था कि वह नाना साहब की बेटी थी। इससे यह भी पता चलता है कि अंग्रेज़ बदले की भावना से भी ग्रस्त थे।

नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया Summary in Hindi

नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया लेखक-परिचय

प्रश्न-
चपला देवी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
चपला देवी का संक्षिप्त साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर-
चपला देवी द्विवेदी युग की लेखिका थीं। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। इतना अवश्य है कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय पुरुष लेखकों व साहित्यकारों के साथ-साथ अनेक महिलाओं ने भी अपनी-अपनी साहित्यिक रचनाओं व अन्य लेखों से स्वतंत्रता आंदोलन को गति प्रदान की थी। उन्हीं महिला लेखिकाओं में से चपला देवी भी एक हैं। कई बार अनेक साहित्यकार इतिहास में स्थान नहीं पा सकते। चपला देवी भी उन्हीं साहित्यकारों में से एक हैं।

यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि सन 1857 की क्रांति के विद्रोही नेता धुंधूपंत नाना साहब ने देश को आजाद करवाने में अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था। बालिका मैना देवी नाना साहब की पुत्री थी जिसे क्रूर अंग्रेज़ों ने जिंदा जला दिया था। उस बालिका मैना देवी के महान बलिदान की कहानी को चपला देवी ने इस गद्य रचना में अभिव्यक्त किया है। यह गद्य रचना रिपोर्ताज का आरंभिक रूप है।

प्रस्तुत रचना को पढ़कर पता चलता है कि लेखिका चपला देवी ने इसमें अत्यंत सरल, सहज एवं व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है। वाक्य-रचना कुछ स्थलों को छोड़कर व्याकरण की दृष्टि से सही है। तद्भव शब्दावली का सुंदर एवं सार्थक प्रयोग किया गया है। भावात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। रिपोर्ताज में बालिका के बलिदान का चित्र सजीव हो उठता है। यही इस पाठ की सबसे बड़ी विशेषता है।

नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया पाठ-सार/गद्य-परिचय

प्रश्न-
‘नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया’ शीर्षक पाठ का सार/गद्य-परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
मातृभूमि को स्वतंत्र करवाने के लिए जिन देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहति दी थी, उनमें देवी मैना का नाम भी सदा आदर से लिया जाएगा। प्रस्तुत पाठ को पाठ्यपुस्तक में रखने का प्रमुख लक्ष्य नई पीढ़ी के लोगों को देश को स्वतंत्र करवाने वाले बलिदानियों के विषय में जानकारी देना है। सन 1857 में जब नाना साहब कानपुर में भीषण नरसंहार में असफल होकर वहाँ से निकलने लगे तो अपनी बेटी मैना को साथ न ला सके। देवी मैना बिठूर में अपने पिता के महल में रहती थी। विद्रोह के दमन के पश्चात अंग्रेज़ सैनिक अधिकारियों ने निरीह एवं निरपराध देवी को जीवित ही आग में जला डाला। उस दृश्य को देखकर तो कठोर दिल वालों का भी हृदय पिघल गया होगा।

कानपुर पर कब्जा करने के पश्चात अंग्रेज़ सेना बिठूर के महल की ओर बढ़ी। वहाँ उन्होंने महल को लूटा, किंतु वहाँ उनके हाथ बहुत कम संपत्ति लगी। बाद में उस महल पर तोपों के गोले दागकर नष्ट करने की योजना बनाई गई। तब महल के बरामदे में एक सुंदर बालिका आकर खड़ी हो गई। उसने अंग्रेज़ सेना अधिकारी को गोले बरसाने से मना कर दिया और तर्क देते हुए कहा कि महल तो जड़ है। उसने किसी का क्या बिगाड़ा है। उसने अंग्रेज सेनापति ‘हे’ से महल की रक्षा करने के लिए कहा। किंतु सेनापति ने अपने कर्त्तव्य की दुहाई देते हुए अपनी असमर्थता व्यक्त की। देवी मैना ने एक अन्य तर्क देते हुए कहा कि उसकी बेटी ‘मेरी’, जो अब इस दुनिया में नहीं रही और उसमें बहत प्रेम था, उसका एक पत्र भी उसके पास है। यह सुनकर सेनापति का हृदय पसीज गया तथा उसने देवी मैना को पहचान भी लिया। उसने उसकी रक्षा के प्रयास करने का वचन भी दिया। किंतु उसी समय वहाँ प्रधान सेनापति जनरल अउटरम आ पहँचा। उसने बिगड़कर पूछा कि अभी तक महल क्यों नहीं उड़ाया गया। सेनापति ‘हे’ ने उससे महल को न उड़ाने का अनुरोध किया। किंतु जनरल अउटरम ने कहा कि नाना के वंश व महल पर दया दिखाना असंभव है। तभी उसने सेना को महल का द्वार तोड़कर अंदर घुसने के लिए आदेश दिया। ‘हे’ के चले जाने के बाद मैना छुप गई। सैनिक प्रयास करने पर भी उसे ढूँढ न सके। उसी समय लंडन के मंत्रिमंडल का तार भी आ गया कि वहाँ (लंडन की) की आज्ञा के विरुद्ध वे कुछ नहीं कर सकते। तभी तोपों के गोलों ने देखते-ही-देखते महल को मलबे के ढेर में बदल डाला, किंतु मैना का कहीं पता न चल सका।

उस समय लंडन के सुप्रसिद्ध समाचार पत्र ‘टाइम्स’ में 6 सितंबर, 1857 को एक लेख में लिखा गया था कि अत्यंत खेद का विषय है कि नाना साहब को आज तक भारत सरकार नहीं पकड़ सकी। संपूर्ण अंग्रेज़ जाति का उस पर भयंकर क्रोध है। वे उससे बदला लेना नहीं भूलेंगे। उस दिन पार्लमेंट की ‘हाउस ऑफ लार्ड्स’ की सभा में सर टामस ‘हे’ की उस रिपोर्ट का मज़ाक उड़ाया गया जिसमें उसने नाना की बेटी को क्षमा करने के लिए कहा था। इस रिपोर्ट को उन्होंने ‘हे’ का प्रेमालाप कहकर उसे अस्वीकार कर दिया।

सन 1857 की सितंबर मास की आधी रात के समय चाँदनी में एक बालिका स्वच्छ वस्त्र पहने हुए नाना साहब के महल के मलबे के ढेर पर बैठी हुई रो रही थी। उसकी रोने की आवाज सुनकर अंग्रेज़ सैनिक वहाँ आ गए। वह उनके किसी प्रश्न का उत्तर न देकर केवल रोती रही। उसी समय जनरल अउटरम भी वहाँ आ गया और उसने मैना को पहचान लिया तथा उसे गिरफ्तार कर लिया। वह सैनिकों के बीच घिरी हुई होने पर भी डरी नहीं। उसने इतना ही कहा कि मुझे जी भरकर रो लेने दीजिए। किसी ने उसकी नहीं सुनी और उसे कानपुर के किले में लाकर कैद कर दिया। उस समय के महान महाराष्ट्रीय इतिहासकार महादेव चिटनवीस के ‘बाखर’ नामक समाचार पत्र में छपा था, “कल कानपुर के किले में एक भीषण हत्याकांड हो गया। नाना साहब की एकमात्र कन्या मैना धधकती हुई आग में जलाकर भस्म कर दी गई। भीषण अग्नि में शांत और सरल मूर्ति उस अनुपमा बालिका को जलती देख, सबने उसे देवी समझकर प्रणाम किया।”

कठिन शब्दों के अर्थ –

[पृष्ठ-51] : विद्रोही = क्रांतिकारी। दमन करना = समाप्त करना। निरीह = बेसहारा। निरपराध = बेकसूर। अग्नि = आग। भस्म करना = जलाकर राख कर देना। पाषाण हृदय = पत्थर दिल, कठोर दिल। द्रवीभूत करना = पिघला देना। आश्चर्य = हैरानी। करुणापूर्ण = दयापूर्ण। अल्पवयस = कम उम्र।

[पृष्ठ 52] : उद्देश्य = लक्ष्य । वासस्थान = रहने का स्थान। विध्वंस = नष्ट। हृदय से चाहना = अत्यधिक प्रेम करना। होश उड़ना = अत्यधिक हैरान होना। सहचरी = सखी, सहेली। फिक्र = चिंता, सोच।

[पृष्ठ-53] : असंभव = जो हो न सके। फाटक = मुख्य द्वार। आशय = भाव, अर्थ। स्मृति-चिह्न = याद की पहचान। आज्ञा = आदेश। विरुद्ध = विपरीत। क्रूर = निर्दयी। मिट्टी में मिला देना = नाश कर देना।

[पृष्ठ-54-55] : भारत सरकार = उस समय के भारत में अंग्रेज़ी शासन को भारत सरकार कहा गया है। दुर्दीत = निडर। भीषण = भयंकर। कलंक = दोष । संहार करना = मार देना। वृद्धावस्था = बुढ़ापा। मोहित होना = आकृष्ट होना। प्रेमालाप = प्रेम की बातें। भग्नावशिष्ट = खंडहर। प्रासाद = महल। कराल = भयंकर। रूपधारी = रूप धारण करने वाला। कैद कर देना = बंदी बना देना। इतिहासवेत्ता = इतिहास को जानने वाला। हत्याकांड = किसी को मारने की घटना। अनुपमा = जिसकी कोई उपमा न हो।

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HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम्

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions रचना Chitra Adharit Vaakya Lekhanam चित्राधारित वाक्य-लेखनम् Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम्

Chitra Adharit Vakya Rachna In Sanskrit HBSE 9th Class

(ग) चित्राधारित वाक्य-लेखनम्
(क) चित्राणि दृष्ट्वा मञ्जूषातः पदानि अवचित्य रिक्तस्थानानि पूरयित्वा लिखत
1.
HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम् img-1

(क) अस्मिन् चित्रे त्रयः जनाः (i) ……… ।
(ख) अहं मन्ये एते तु (ii) …………… सीता च।
(ग) भरतः उपविष्टः यस्य हस्ते (iii) …………….. स्तः।
(घ) भरतः रामस्य (iv) ……………. करोति।
(ङ) अस्मिन् चित्रे भरतस्य (v) ……………. चरित्रं चित्रितम्।
मञ्जूषा
चरणवन्दना, पादुके, रामः लक्ष्मणः, श्लाघनीयं, स्थिताः
उत्तराणि:
(क) अस्मिन् चित्रे त्रयः जनाः (i) स्थिताः।
(ख) अहं मन्ये एते तु (ii) रामः लक्ष्मणः सीता च।
(ग) भरतः उपविष्टः यस्य हस्ते (iii) पादुके स्तः।
(घ) भरतः रामस्य (iv) चरणवन्दना करोति।
(ङ) अस्मिन् चित्रे भरतस्य (v) श्लाघनीयं चरित्रं चित्रितम्।

HBSE 9th Class चित्राधारित वाक्य-लेखनम्

HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम्

2.
HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम् img-2
(क) इदं चित्रं ………… (i) ……… अस्ति।
(ख) वने एकः ……….. (ii) ……… शोभते।
(ग) जलाशये … …. (iii) ……… विकसितानि सन्ति।
(घ) जलाशये ………… (iv) ……… अपि तरन्ति।
(ङ) तटे एकः ………. (v) …….. तिष्ठति।
मञ्जूषा
वर्तकाः, जलाशयः, वनस्य, मृगः, कमलानि
उत्तराणि:
(क) इदं चित्रं (i) वनस्य अस्ति।
(ख) वने एकः (ii) जलाशयः शोभते।
(ग) जलाशये (iii) कमलानि विकसितानि सन्ति।
(घ) जलाशये (iv) वर्तकाः अपि तरन्ति।
(ङ) तटे एकः (१) मृगः तिष्ठति ।

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3.
HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम् img-3
(क) इदं चित्रं (i) ………….. वर्तते।
(ख) तटे विविधाः (ii) ……………. सन्ति।
(ग), वृक्षेषु खगाः (iii) ……………. तिष्ठन्ति।
(घ) नद्याः (iv) ……………. निर्मलम् वर्तते।
(ङ) खगा: रात्रौ (v) ……………. निवसन्ति।
मञ्जूषाः
नीडेषु, जलम्, नदीतटस्य, वृक्षाः, इतस्ततः
उत्तराणि:
(क) इदं चित्रं (1) नदीतटस्य वर्तते।
(ख) तटे विविधाः (ii) वृक्षाः सन्ति।
(ग) वृक्षेषु खगाः (it) इतस्ततः तिष्ठन्ति।
(घ) नद्याः (iv) जलम् निर्मलम् वर्तते।
(ङ) खगाः रात्रौ (v) नीडेषु निवसन्ति।

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4.
HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम् img-4
(क) जन्तुशालायाम् अनेके (i) ……………..
(ख) कच्छपः (ii) …………… चलति।
(ग) मृगाः (iii) ……………. धावन्ति।
(घ) सिंहः (iv) …………….. जीवः अस्ति।
(ङ) कोकिलः (v) ………….. कूजति।।
मञ्जूषा
हिंसकः, पशवः, मधुरं, शनैःशनैः, वेगेन
उत्तराणि
(क) जन्तुशालायाम् अनेके (i) पशवः सन्ति।
(ख) कच्छपः (ii) शनैःशनैः चलति।
(ग) मृगाः (iii) वेगेन धावन्ति।
(घ) सिंहः (iv) हिंसकः जीवः अस्ति।
(ङ) कोकिलः (v) मधुरं कूजति।

5.
HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम् img-5
(क) चित्रमिदं आदर्शगृहस्य ……… (i) ……..।
(ख) चित्रे पुत्रः …….. (ii) …….. प्रणमति।
(ग) पिता ………. (iii) ……. आशीर्वादं ददाति।
(घ) भित्तौ ………. (iv) …….. लम्बते।
(ङ) गृहे बालिका ……… (v) ……. तिष्ठति।
मञ्जूषा
पितरं, अस्ति, अपि, वृक्षचित्रं, पुत्राय
उत्तराणि:
(क) चित्रमिदं आदर्शगृहस्य (i) अस्ति।
(ख) चित्रे पुत्रः (ii) पितरं प्रणमति।
(ग) पिता (ii) पुत्राय आशीर्वादं ददाति।
(घ) भित्तौ (iv) वृक्षचित्रं लम्बते।
(ङ) गृहे बालिका (v) अपि तिष्ठति।

HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम्

(ख) चित्राणि दृष्ट्वा मञ्जूषातः प्रदत्तशब्दैः पञ्चवाक्यानि लिखत
1.
HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम् img-6
मञ्जूषा
चत्वारः, उद्यानस्य, कन्या, पुष्पभाजनम्, मित्रैः
उत्तराणि:
(क) इदं चित्रम् उद्यानस्य वर्तते।
(ख) बालकः मित्रैः सह क्रीडति।
(ग) एका कन्या रज्वा क्रीडति।
(घ) अत्र पुष्पभाजनम् स्तः।
(ङ) चत्वारः बालकाः वेगेन धावन्ति।

HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम्

2.
HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम् img-7
मञ्जूषा
मात्रा, द्रुमः, कारयानम्, काष्ठकारैः, संरक्षणेन
(क) अस्मिन् चित्रे एकः द्रुमः एव अवशिष्टः ।
(ख) अन्ये वृक्षाः तु काष्ठकारैः छिन्नाः।
(ग) अत्र एकः बालकः मात्रा सह आगतः, भयभीतः च।
(घ) राजमार्गे धूम्र क्षिपन् एकं कारयानम् अपि गच्छति।
(ङ) वृक्षाणां संरक्षणेन हि पर्यावरणं रक्षणीयम्।

अभ्यासार्थ प्रश्नाः
1.
HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम् img-8
(क) एतत् (i) …………” दृश्यं अस्ति।
(ख) अत्र विविधाः शाकाः (ii) ……….. आलुकम् च वर्तते।
(ग) अत्र (iii) …………… अस्ति।
(घ) (iv) …………… विविधानां शाकानां मूल्यं पृच्छन्ति।
(ङ) (v) ………….. जनाः उच्चैः आह्वयन्ति।
मञ्जूषा
गृञ्जनम्-पलाण्डुः-करण्डकम्-भिण्डिः, शाक-आपणस्य, जनसम्मदः, क्रेतारः, विक्रेतारः

HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम्

2.
HBSE 9th Class Sanskrit रचना चित्राधारित वाक्य-लेखनम् img-9
(क) चित्रे (i) ………….. विशालः वृक्षः वर्तते।
(ख) (ii) …………… नृत्यति।
(ग) (iii) …………..” वृक्षस्य उपरि तिष्ठति।
(घ) एकः (iv) …………… जले स्नानं करोति।
(ङ) अनेके (v) …………… वृक्षे तिष्ठन्ति।
मञ्जूषा
मयूरः, पक्षिणः, एकः, नरः काकः

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HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions रचना Patra Lekhan पत्र-लेखनम् Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

Sanskrit Patra Lekhan Class 9 HBSE

रचनात्मक कार्यम्

मानव-मन के भावों की अभिव्यक्ति एवं विचारों के आदान-प्रदान का सरल साधन भाषा है। अतः जीवन की सफलता के लिए ज्ञान प्राप्त करना और ज्ञान-प्राप्ति के लिए भाषा को सीखना परम आवश्यक है। भाषा-शिक्षण में रचनात्मक कार्य का विशेष योगदान है, क्योंकि इसका प्रमुख उद्देश्य ही छात्रों की सृजनात्मक शक्ति का विकास करना है। इसके अन्तर्गत पत्र-लेखन, चित्र देखकर वाक्यांश-लेखन तथा लघु निबन्ध-लेखन को समाहित किया गया है।

(क) पत्र-लेखनम्

पत्रों का मानव-जीवन में अधिक महत्त्व है। संस्कृत भाषा में पत्र को लिखने के कुछ विशेष नियम हैं। इन नियमों को ध्यान में रखकर छात्र पत्र-लेखन में सहायता प्राप्त कर सकते हैं। प्रार्थना-पत्र को ‘सेवायाम्’ पद से प्रारम्भ किया जाता है। पुनः, ‘श्रीमन्तः’ पद के साथ कथ्य का शुभारम्भ किया जाता है। अन्त में ‘भवदीयः’ अथवा ‘भवतः आज्ञाकारी शिष्यः’ लिखकर अपना नाम, पता लिखा जाता है।

पारिवारिक तथा व्यक्तिगत पत्रों में प्रारम्भ में ‘परीक्षाभवनम् अथवा स्थान’ के बाद ‘पूज्याः/आदरणीयाः/सम्माननीयाः’ पद से पत्र का प्रारम्भ किया जाता है। मित्र के लिए ‘प्रिय मित्र’ लिखा जाता है। बड़े व्यक्ति के लिए ‘सादरं प्रणतिः’ तथा मित्र के लिए ‘नमस्ते’ लिखा जाता है। अन्त में ‘भवदीयः पुत्र/भ्राता/मित्रम्/सुहृद्’ जैसे सम्बन्धसूचक शब्दों के साथ अपना नाम एवं पता लिखना चाहिए। प्रार्थना-पत्र में दिनाङ्क पत्र के अन्त में और व्यावहारिक पत्र में प्रारम्भ में होता है।
HBSE 9th Class Sanskrit rachana Patra Lekhan img-1
1. प्रधानाचार्य प्रति शुल्कक्षमापनार्थं पत्रम्
प्रतिष्ठायां
प्रधानाचार्यमहोदय,
रोजरी विद्यालयः,
बड़ोदरा।
विषयः शुल्कक्षमापनार्थं निवेदनम्
श्रीमन्,
सविनयं निवेदनम् अस्ति यत् अहं भवतः विद्यालये नवमकक्षायाः छात्रः अस्मि। मम पिता एकः लिपिकः अस्ति। तस्य मासिक वेतनम् पञ्चसहस्ररूप्यकाणि मात्रमेव अस्ति। मम एकः भ्राता अष्टमकक्षायां भगिनी च पञ्चमकक्षायां पठति। अस्माकं कुटुम्बस्य निर्वाहः अतीव काठिन्येन भवति। अहं कक्षायां प्रतिवर्षं प्रथम स्थान प्राप्नोमि। अतः शुल्कक्षमापनार्थं प्रार्थये। आशासे अत्रभवान् मम एतां प्रार्थनां स्वीकृत्य अनुग्रहीष्यति।
सधन्यवादाः,
विनीतः शिष्यः,
क, ख, ग नवमकक्षास्थः,
अनुक्रमांकः षोडशः
दिनाङ्कः 5.04.20….

संस्कृत में पत्र लेखन Class 9 HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

2. दिनत्रयस्य अवकाशप्राप्त्यर्थं प्रधानाचार्यां प्रति प्रार्थनापत्रम्
श्रीमन्तः प्रधानाचार्या महोदयाः,
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयः,
करनाल नगरम्।
विषयः अवकाशप्राप्त्यर्थं प्रार्थनापत्रम्।
श्रीमती,
अहमद्य दिन त्रिभ्यः अतीव रूग्णोऽस्मि । विद्यालयमागन्तुम् न शक्नोमि। अतः दिवस त्रयस्यावकाशम् स्वीकृत्य मामनुग्रहीष्यन्ति।
भवतामाज्ञाकारी शिष्या,
सुनीता।
कक्षा नवम्, अनुक्रमांक अष्टादश
दिनाङ्क : 15.06.20……

3. स्वविद्यालयस्य वर्णनं कुर्वन् मित्रं प्रति पत्रम्
रामाकृष्णपुरम् सैक्टर-2
89/5, सोमविहारः
नव दिल्ली।
दिनाङ्क : 9.7.20…..
प्रिय वयस्य श्रीनिवास,
नमस्ते!
पितुः स्थानान्तरणवशात् वयं सकुटुम्बाः सकुशलं दिल्ली प्राप्ताः। मया अत्र एकस्मिन् प्रख्याते विविधशैक्षिक उपकरणसम्पन्ने ‘नवजीवन’ इति नाम्नि विद्यालये प्रवेशः लब्धः। प्रवेशं प्राप्य च भृशं प्रसन्नः अस्मि।

यद्यपि आंग्लभाषामाध्यमेन शिक्षा प्रदीयते तथापि संस्कृतपठनपाठनस्य विशिष्टा व्यवस्था वर्तते। 27 एकड़ भूमौ निर्मिते अस्मिन् विद्यालयभवने त्रयः विभागाः सन्ति – प्राथमिकः, माध्यमिकः, वरिष्ठमाध्यमिकः च।

अस्य विद्यालयस्य प्रमुखानि आकर्षणानि सन्ति — विशालानि क्रीडाक्षेत्राणि, निर्मलजलोपेतं तरणतालम्, विविधकलाकौशलप्रशिक्षणार्थं कार्यशालाः विज्ञानप्रयोगशालाः समृद्धाः संगणकप्रयोगशालाः, व्यायामशाला, बृहत्पुस्तकालयः इत्यादयः ।

एषः सहशिक्षाविद्यालयः। प्रधानाचार्यः अतीव विनम्रः परिश्रमी, कर्मठः सद्व्यवहारशीलः च अस्ति । शिक्षकः शिक्षिकाः च अतीव सुयोग्याः शिक्षणप्रवीणाः च सन्ति। विद्यार्थिनः सुसभ्याः अनुशासनप्रियाः परिश्रमिणः च वर्तन्ते। प्रतिवर्षं दशम-द्वादशकक्षयोः परीक्षापरिणामः शतप्रतिशतं भवति। नान्यः विशेषः। स्वाध्यायविषये विस्तरेण पत्रं लिखतु । स्वगृहे सर्वेभ्यः मम वन्दनं निवेदयतु।
तव अभिन्नं मित्रम्,
क, ख, ग
सेवायाम् …………….
द्वारा श्रीनिवासः
डॉ० राघवेन्द्रः
56, त्यागराजनगरम्
चेन्नई HBSE 9th Class Sanskrit rachana Patra Lekhan img-10

Patra Lekhan In Sanskrit HBSE Class 9

HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

4. विद्यालयस्य वार्षिकोत्सवं वर्णयन् सखी प्रति पत्रं लिखत।
छात्रावासः
डी०ए०वी० वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयः,
अम्बाला नगरम्।
दिनाङ्क : 15 जून, 20…..
प्रिय सखि वनिते,
सप्रेम नमोनमः।
अत्र कुशलं तत्रास्तु। अहं निज विद्यालयस्य वार्षिकोत्सवं वर्णयम तव प्रसादाय लिखामि। तस्मिन् अवसरे अस्माकम् विद्यालयः वधूरिव अलंकृतः। मार्गम् उभयतः ध्वजाः दोधूयन्ते स्म। निर्धारिते समये अध्यक्ष महोदयः आगतः। सर्वप्रथम बालैः स्वागतगीतिका गीता। शारीरिक कार्यक्रमस्य अनन्तरम् सांस्कृतिक कार्यक्रमः सम्पन्नः। प्रधानाचार्येण विद्यालयस्य विवरणम् अपि प्रस्तुतम् । पुरस्कार वितरणस्य पश्चात् प्रधानाचार्येण अध्यक्ष महोदयस्य धन्यवादम् कृतम्। समुचित जलपानोर्ध्वं सर्वं कार्यक्रमं सुसम्पन्नम्।
गृहे सर्वेभ्यो प्रणामाः।
तव प्रिया सखी
रमा

5. पर्वतीय स्थलस्य भ्रमणार्थं गतायाः सुतायाः मातरं प्रति पत्रम्
77 बादामी-उद्यानम्
श्रीनगरम्,
जम्मू-काश्मीर-राज्यम्।
दिनाङ्क : 7-9-20…..
श्रद्धेये मातृचरणे,
सादरं प्रणामाः।
भवत्याः आशीर्वादैः परह्यः सर्वे वयं जम्मूतः बसयानेन सकुशलं समागताः। यथाश्रुतं श्रीनगरं नूनं वसुन्धरायां नन्दनवनमिव विभाति।

जम्मूतः श्रीनगरस्य सम्पूर्णः मार्गः अतीव रमणीयः। ऊधमपुरतः ऊर्ध्वम् आरोहणं प्रारभते। मार्गे ‘कुद्द’ इति नामकं स्थानं अतीव रम्यं वर्तते। तत्रत्यम् च जलं पातुं दूरादपि जनाः आगच्छन्ति, स्वस्थाः च भवन्ति। ततः किंचिद्रे एकं “पत्नीटाप” नामकम् उच्चतमं शिखरस्थं पर्यटनस्थलं यात्रिजनान् आकर्षयतीव।।

श्रीनगरे अस्माकं वासः लालचौकस्य समीपे एकस्मिन् यात्रिनिवासे अस्ति।

अत्र शालीमार-चश्माशाही-निशातबाग-हारवन-नामधेयानि कृत्रिमनिर्झरसंवलितानि नाना-कुसुम-शबलानि च चत्वारि उद्यानानि काश्मीरम् अपरं देवलोकं कुर्वन्ति। काश्मीरस्य मध्ये “डललेक” विद्यते यत्र जलपोतसमानाः सर्वसुविधापूर्णाः गृहनौकाः (“हाउस-बोट”) पर्यटकेम्यः गृहनिवासानन्दं यच्छन्ति।

नवनववस्त्रैः सुसज्जिताः ‘शिकारा’ इति नाम्न्यः लघुनौकाः नववधू-समानाः सन्ति यत्र यात्रिणः जलविहारस्य आमोदम् अनुभवन्ति। डललेकम् उभयतः विशालानि विपणनकेन्द्राणि विद्यन्ते। “चारचिनार” नामकम् एकं कृत्रिमं पिकनिकस्थलं डललेकस्य मध्ये वर्तते। समीपे एव नेहरू-उद्यानमपि पर्यटकानां महत् आकर्षणकेन्द्रम् । दुर्गानाग-नामकात् निर्झरात् आरम्य 350 फुट-उपरि शंकराचार्यमन्दिरं काश्मीरं स्वयं गत्वा एव दर्शनीयम् । शेषं भ्रमणानन्तरं विस्तरेण लेखिष्ये।
पितृचरणयोः मे. प्रणामाः कथनीयाः
भवत्याः स्नेहमयी पुत्री
क, ख, ग।

Class 9 Sanskrit Patra Lekhan HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

6. पितरं प्रति पत्रं लिखत। यस्मिन् ग्रामस्य/नगरस्य/पर्वतीयस्थलस्य यात्रायाः वर्णनम् भवेत्।
छात्रावासः
एस.डी.वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयः
जीन्द नगरम्।
दिनाङ्क : 12-05-20……
आदरणीय पितृमहोदय,
सादरं नमोनमः,
अत्र कुशलं तत्रास्तु। सेवायाम् इदं निवेदनम् यत् भवतः आशीवदिन अहम् स्वमित्रैः सह विद्यालयपक्षतः आयोजिते शिमलानगरं प्रति पर्यटनकार्यक्रमे भागः गृहीतः। इयं मम प्रथम यात्रा आसीत्। तेषु दिनेषु हिमपातः अपिगातः। अस्माकम् वरिष्ठ-अध्यापकाः अस्माभिः सह गतः आसन्। पर्वतीय स्थलस्य इदम् यात्रा आनन्ददायकः आसीत्।
भवदीयः प्रिय सुतः
सुरेन्द्रः

7. पुस्तकप्रेषणविषये प्रकाशकं प्रति पत्रम्
सेवायाम् प्रतिष्ठायाम्
श्रीमतां प्रबन्धकमहोदयनाम्
श्री अक्षर-प्रकाशन-संस्था
रेलवे-मार्गः
रोहतक नगरम्
मान्याः,
अहं नवमकक्षायाः छात्रः अस्मि। भवद्भिः सद्यः प्रकाशितानि नवमकक्षायाः पाठ्यपुस्तकानि मया पुस्तकालये दृष्टानि । तेषु अहं कानिचित् क्रेतुम् इच्छामि। अधोलिखितानि. पाठ्यपुस्तकानि वी.पी.पी. द्वारा शीघ्रं प्रेषणीयानि
1. सरलसंस्कृतव्याकरणम्-रचनापद्धतिः
2. निबन्ध-प्रकाशः
3. संस्कृत-अभ्यास-पुस्तिका
एभिः पुस्तकैः सह अन्यसन्दर्भग्रन्थसूची अपि यदि प्रेष्यते तर्हि आत्मानम् अनुगृहीतं मन्ये।
सधन्यवादम्
भवतां विश्वासपात्रम्,
श्रीनाथघोषः
173 नीलिगिरीः अलकनन्दा
दिल्ली

Sanskrit Patra Lekhan HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

8. दूरभाषयन्त्रस्य निष्क्रियतां दूरीकर्तुं दूरभाषकेन्द्रस्य कर्मकराणां उदासीनताम् अधिकृत्य दैनिकसमाचारपत्रस्य सम्पादक – प्रति पत्रम् लिखत।
सकाशात्
सुरेन्द्र कुमार अग्रवालः
आर०एन० 8 महेशनगरम्
अम्बाला छावनी
दिनाङ्क : 22.06.20…..
सेवायाम्
सम्पादकः
पंजाब केसरी
अम्बाला छावनी।
विषयः दूरभाषकेन्द्रस्य कर्मकराणाम् उदासीनताम् ।
मान्यवर,
अस्माकं नगरे दूरभाषकेन्द्रस्य कर्मकराः जनानां प्रार्थना पत्राणाम् सर्वथा उपेक्षां कुर्वन्ति । वारम् वारम् कथनोपरान्तम् अपि ते दूरभाषस्य निष्क्रियतां दूरीकर्तुं न आगताः। अधिकारिणः अपि समुचितं अवधानम् न ददति । त्रयोः मासयोः अस्माकम् दूरभाषम् निष्क्रियम् अस्ति। भवदीये समाचारपत्रे अस्माकं निवेदनं यथोचितस्थाने प्रकाश्य अनुगृह्यताम् अयं जनः ।
सधन्यवादम्।
भवदीयः
सुरेन्द्र कुमार अग्रवालः
आर०एन० 8 महेश नगरम्
अम्बाला छावनी।

Patra Lekhan In Sanskrit Class 9 HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

अभिनन्दनपत्रम्/वर्धापनपत्रम्/निमन्त्रणपत्रम्

अद्यत्वे प्रायः नूतनवर्षस्य शुभारम्भे, दीपावलि-होलिकादि-उत्सवार्थम्, मित्राणां जन्मदिवसे शुभाकाङ्क्षापत्राणि अभिनन्दनपत्राणि च प्रेष्यन्ते। अन्तःपृष्ठे च शुभकामनासन्देशाः लिख्यन्ते। एतेषां निर्माणे पर्याप्तः अवसरः मौलिक-प्रतिभायाः प्रदर्शनार्थं लभ्यते। उपरिपृष्ठस्य सज्जायां कलाप्रदर्शनार्थं भवति। अन्तःपृष्ठे स्वकीय-मनोभावनानुसारम् अथवा काश्चन सूक्तयः अपि लिख्यन्ते। प्रायः तत्र विशिष्टाः औपचारिकताः न सन्ति । अधः प्रेषकस्य नाम एवं लिख्यते
यथा
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Sanskrit Class 9 Patra Lekhan HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

अतिरिक्त पत्राणि

1. प्रधानाचार्य प्रति लिखित शुल्क क्षमाप्रार्थनापत्रस्य रिक्तस्थानानि मंजूषापदैः पूरयत-
सेवायाम्
प्रधानाचार्य महोदयः
रा० व० मा० विद्यालयः,
सिरसानगरम्।
श्रीमान्!
सविनयं निवेदनम् ………. (i) ……….। मम जनकः जनस्वास्थ्यविभागे चतुर्थश्रेणी कर्मचारी अस्ति। तस्य मासिक (ii) ………. दशसहस्रमितानि रूप्यकाणि सन्ति। अस्माकं परिवारे पंच सदस्याः ………. (iii) ………. । गृहस्य निर्वाहः कठिनतया भवति। ……… (iv) ……… शुल्कं क्षमित्वा माम् अनुगृह्णन्तु भवन्तरू।
सधन्यवादम्
…….. (v) ……… आज्ञाकारी शिष्यः,
रामदेवः
अनु० – एकः
कक्षा – नवमी
मञ्जूषा
भवतः, कृपया, अस्ति, सन्ति, वेतनम्।
उत्तराणि
सेवायाम्
प्रधानाचार्य महोदयः
रा० व० मा० विद्यालयः,
सिरसानगरम्।
श्रीमान्!
सविनयं निवेदनम् (i) अस्ति। मम जनकः जनस्वास्थ्यविभागे चतुर्थश्रेणी कर्मचारी अस्ति। तस्य मासिकं (ii) वेतनम् दशसहस्रमितानि रूप्यकाणि सन्ति। अस्माकं परिवारे पंच सदस्याः (iii) सन्ति। गृहस्य निर्वाहः कठिनतया भवति। (iv) कृपया शुल्क क्षमित्वा माम् अनुगृह्णन्तु भवन्तः।
सधन्यवादम्
(v) भवतः आज्ञाकारी शिष्यः,
रामदेवः
अनु० – एकः
कक्षा – नवमी

2. विद्यालये प्रवेशार्थं निवेदनपत्रं मञ्जूषायां प्रदत्तैः पदैः सह पूरयत।
श्रीमन्तः प्रधानाध्यापक महोदयाः!
दयानन्द उच्य विद्यालयः,
अम्बालानगरम्।
महाभागाः!
(i) …………. इदं निवेदनं यत् अहम् अस्मिन् वर्षे पानीपतस्थः डी. ए. वी. विद्यालयतः माध्यमिक परीक्षायां (ii) ………… सफलता प्राप्तवान् अस्मि। मम पितुः अत्र आगमनम् जातम् । इदानीं भवतः लब्धप्रतिष्ठ-विद्यालये (iii)” ..” इच्छामि। अहं जानामि यत् भवतः विद्यालयः हरियाणा प्रान्ते अति प्रतिष्ठितः विद्यालयः अस्ति। अहम् अस्य विद्यालयस्य गुरुजनानां (iv) …………….. उपविश्य शिक्षा ग्रहीतुमिच्छामि।
आशासे भवान् मम प्रार्थनां स्वीकृत्य अकिञ्चनं मामनुग्रहीष्यति।
(v) ………………..,
शैलेन्द्रः।
दिनाङ्क : 12.08.20……
मञ्जूषा
चरणेषु, भवदीयः, प्रथम श्रेण्यां, पठितुम्, सविनयं
उत्तराणि
श्रीमन्तः प्रधानाध्यापक महोदयाः!
दयानन्द उच्च विद्यालयः,
अम्बालानगरम्।
महाभागाः!
(i) सविनयं इदं निवेदनं यत् अहम् अस्मिन् वर्षे पानीपतस्थः डी. ए. वी. विद्यालयतः माध्यमिक परीक्षायां (1) प्रथम श्रेण्यां सफलता प्राप्तवान् अस्मि । मम पितुः अत्र आगमनम् जातम् । इदानीं भवतः लब्धप्रतिष्ठ-विद्यालये (iii) पठितुम् इच्छामि। अहं जानामि यत् भवतः विद्यालयः हरियाणा प्रान्ते अति प्रतिष्ठितः विद्यालयः अस्ति। अहम् अस्य विद्यालयस्य गुरुजनानां (iv) चरणेषु उपविश्य शिक्षा ग्रहीतुमिच्छामि।
आशासे भवान् मम प्रार्थनां स्वीकृत्य अकिञ्चनं मामनुग्रहीष्यति।
(v) भवदीयः,
शैलेन्द्रः।
दिनाङ्क : 12.08.20…..

Patra Lekhan Sanskrit Class 9 HBSE

3. विद्यायाः महत्तां वर्णयन् अनुजं प्रति लिखिते पत्रे रिक्तस्थानानि उचित मंजूषापदैः पूरयत-
शिशुशिक्षानिकेतन
छात्रावासतः,
क, ख, ग।
प्रिंय अनुज ……… (i) …….. ! चिरंजीव।
अत्र कुशलं तत्रास्तु। तवपत्रं ……… (ii) ……. ! विद्यायाः महत्त्वं वर्णयन् पत्रं लिखामि। ……… (iii) …….. अनुभवामि“विद्याधनमेव सर्वधनं प्रधानमस्ति। अहंविश्वसिमि-” विद्वान् सर्वत्र पूज्यते । अतः ध्यानेन ……….. (iv) ……… पठित्वा जीवने सफलो भव। इति मम शुभाशीषः। मातृपितृचरणेषु प्रणामाः।
………. (v) …….. भ्राता, रामकेशः ।
मञ्जूषा
तव, भूषण!, प्राप्तम्, अहम्, विद्यां
उत्तराणि
शिशुशिक्षानिकेतन
छात्रावासतः,
क, ख, ग।
प्रिय अनुज (i) भूषण! चिरंजीव।
अत्र कुशलं तत्रास्तु। तवपत्रं (it) प्राप्तम्! विद्यायाः महत्त्वं वर्णयन् पत्रं लिखामि । (iii) अहम् अनुभवामि-“विद्याधनमेव सर्वधनं प्रधानमस्ति । अहंविश्वसिमि-” विद्वान् सर्वत्र पूज्यते। अतः ध्यानेन (iv) विद्यां पठित्वा जीवने सफलो भव। इति मम शुभाशीषः। मातृपितृचरणेषु प्रणामाः।
(v) तव भ्राता, रामकेशः ।

Patra Lekhan Sanskrit HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

4. प्रधानाचार्य प्रति अवकाशार्थप्रार्थनापत्रस्य रिक्तस्थानानि मञ्जूषापदैः पूरयत-
सेवायाम्,
प्रधानाचार्यः महोदयः,
रा० व० मा० विद्यालयः,
जयपुरनगरम्।
सविनयं निवेदनम् अस्ति । मम (i) ……. विवाह : मार्चमासस्य सप्तम्यां तिथौ भविष्यति। अहमपि (ii)…… गमिष्यामि। वरयात्रा (iii) ……. गमिष्यति। कृपया (iv) ……… अवकाशं दत्त्वा अनुग्रह्णातु भवान्। भवताम् महती अनुकम्पा भविष्यति।
भवदीयः शिष्यः
(v)………..।
अनुक्रमाङ्कः एकः
कक्षा नवमी
मञ्जूषा
दिवाकरः, दिनद्वयस्य, दिल्लीनगरम्, अग्रजस्य, तत्र
उत्तराणि
सेवायाम,
प्रधानाचार्यः महोदयः,
रा० व० मा० विद्यालयः,
जयपुरनगरम्।
सविनयं निवेदनम् अस्ति । मम (1) अग्रजस्य विवाहः मार्चमासस्य सप्तम्यां तिथौ भविष्यति। अहमपि (ii) तत्र गमिष्यामि। वरयात्रा (it) दिल्ली नगरम् गमिष्यति। कृपया (iv) दिनद्वयस्य अवकाशं दत्त्वा अनुग्रह्णातु भवान्। भवताम् महती अनुकम्पा भविष्यति।
भवदीयः शिष्यः
(v) दिवाकरः।
अनुक्रमाङ्कः एकः
कक्षा नवमी

5. भवान् नरेशः। विद्यालयस्य वार्षिकोत्सवः इति विषये मित्रं रमेशं प्रतिलिखितं पत्रं मञ्जूषायां प्रदत्तैः पदैः पूरयित्वा
परीक्षाभवनम्
प्रिय मित्र रमेश,
सप्रेम (i)…… अत्र कुशलं तत्रास्तु। अहं निजविद्यालयस्य (ii) ……………. वर्णनं करोमि। सप्ताहपूर्वम् एव विद्यालये सर्वे अध्यापकाः (iii) …………… च वार्षिकोत्सवस्य कार्येषु व्यस्ताः आसन्। हरियाणा-राज्यस्य शिक्षा-निदेशकः कार्यक्रमस्य (iv) ……………….. आसीत्। सः कार्यक्रमम् अतीव प्राशंसत्, योग्येभ्यः छात्रेभ्यः च (v)……………….. अयच्छत् ।
भवतः प्रियः,
नरेशः।
मञ्जूषा
पारितोषिकान्, नमस्ते, अध्यक्षः, छात्राः, वार्षिकोत्सवस्य
उत्तराणि
परीक्षाभवनम्
प्रिय मित्र रमेश,
सप्रेम (1) नमस्ते।
अत्र कुशलं तत्रास्तु। अहं निजविद्यालयस्य (ii) वार्षिकोत्सवस्य वर्णनं करोमि। सप्ताहपूर्वम् एव विद्यालये सर्वे अध्यापकाः (iii) छात्राः च वार्षिकोत्सवस्य कार्येषु व्यस्ताः आसन्। हरियाणा-राज्यस्य शिक्षा-निदेशकः कार्यक्रमस्य (iv) अध्यक्षः आसीत् । सः कार्यक्रमम् अतीव प्राशंसत्, योग्येभ्यः छात्रेभ्यः च (v) पारितोषिकान् अयच्छत् ।
भवतः प्रियः,
नरेशः।

6. भ्रमणाय गन्तुम् राशिम् प्राप्त्यार्थं जनकम् प्रति लिखितं पत्रं मञ्जूषायां प्रदत्तैः शब्दैः सह पूरयत।
छात्रावासः,
राजकीय विद्यालयः,
कोलकातः।
तिथि : 20.08.20………
(i) …पितृवर्याः,
भवतः पत्रं प्राप्तम्। मम प्रथमसत्रीया (ii) ………. समाप्ता। परीक्षापत्राणि अतिशोभनानि जातानि (iii) …. .. विद्यालयस्य अध्यापिकाः शैक्षिकभ्रमणाय (iv) ………….” नेष्यन्ति। अतः यदि अनुमतिः (v) ………….” अहम् अपि गच्छेयम्। पञ्चशतम् रुप्यकाणि दातव्यानि सन्ति। अतः कृपया राशिं प्रेषयित्वा माम् अनुगृहीतां कुर्वन्तु।
भवतां प्रिया पुत्री,
गीता।
मञ्जूषा
स्यात्, भुवनेश्वरं, मम, परीक्षा, माननीयाः
उत्तराणि-
छात्रावासः,
राजकीय विद्यालयः।
कोलकातः।
तिथि : 20.08.20…..
(i) माननीयाः पितृवर्याः,
भवतः पत्रं प्राप्तम्। मम प्रथमसत्रीया (ii) परीक्षा समाप्ता। परीक्षापत्राणि अतिशोभनानि जातानि (ii) मम विद्यालयस्य अध्यापिकाः शैक्षिकभ्रमणाय (iv) भुवनेश्वरं नेष्यन्ति। अतः यदि अनुमतिः (१) स्यात् अहम् अपि गच्छेयम्। पञ्चशतम् रुप्यकाणिं दातव्यानि सन्ति। अतः कृपया राशिं प्रेषयित्वा माम् अनुगृहीतां कुर्वन्तु।
भवतां प्रिया पुत्री,
गीता।

Patra Lekhan Class 9 Sanskrit HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

अभ्यासार्थ प्रश्नाः

1. रमा करनालनगरे वसति। तस्याः सखी श्यामा गुरुग्रामनगरे निवसति। रमायाः विद्यालये पर्यावरणविषये एका गोष्ठी जाता। गोष्ठी वर्णयन्ति रमा श्यामायै पत्रम् एकं लिखति। मञ्जूषातः समुचित पदानि चित्वा पत्रं पूरयन्तु।
20, प्रेमनगरः,
करनालतः।
दिनाङ्क : 20.08. ……
स्नेहस्निग्धे श्यामा,
नमस्ते।
ह्यः अस्माकं विद्यालये (i) …. ..एका गोष्ठी अभवत्। तत्र नगरेषु वर्धमानं प्रदूषणं दृष्ट्वा पर्यावरणस्य रक्षणाय उपायानां विषये परिचर्चा अभवत्। गोष्ठ्यां वक्तृणां विचारः आसीत् यत् गृहात् बहिः, (ii) …………….” रथ्यासु च अवकरः न क्षेपणीयः। जलप्रदूषण-निवारणाय समये समये जलशुद्धिः करणीया। मार्गेषु, उपवनेषु, विद्यालयेषु च अधिकाधिकं (iii) ………. आरोपणीयाः । जनचेतनार्थ “वृक्षो रक्षति रक्षितः”, “जलम् एव जीवनम्” एतादृशानि महावाक्यानि पट्टिकासु लिखित्वा यत्र तत्र टङ्कनीयानि
ध्वनिप्रदूषणं निवारयितुं ध्वनिप्रसारकयन्त्राणां (iv) ……….” प्रयोगः करणीयः । अस्मिन् विषये भवत्याः विद्यालये किं किं भवति इति मां सविस्तारेण लिखतु।
पितरौ वन्दनीयौ। भवत्याः सखी,
(v) ” ………|
मञ्जूषा
न्यूनतमः, रमा, नदी जलेषु, वृक्षाः, पर्यावरणविषये |

2. मार्गेषु दूषित-वस्तूनां समूहैः वातावरणं प्रदूषितम् इति विषयम् अवलम्ब्य नगरपालिकाध्यक्ष प्रति लिखित पत्रं मञ्जूषायां प्रदत्तैः शब्दैः सह पूरयत।
सेवायाम्,
नगरपालिकाध्यक्ष महानुभावः!
अम्बालानगरम्।
महोदयः!
अहं सादरं (1) ….. यत् मम गृहस्य समीपे मार्गेषु वीथिषु च दूषित-वस्तूनां समूहः अहर्निशं (ii) ………. दूषयति। अनेन कीटानां वृद्धया रोगाणं वृद्धिः जायते। अस्मिन् विषये अहं अनेकं बारं सम्बद्धाधिकारिणां ध्यानम् आकृष्टम्, परम् अद्यावधि तत् दूषणं दूरीकर्तुं कापि (iii)…. नाभवत् । अतः प्रार्थये यत् कृपया श्रीमन्तः (iv) …… … समुचितं व्यवस्थां कुर्वन्तु। अहं आशासे यत् मम (v) …………… विफलं न भविष्यति।
सधन्यवादः।
भवदीयः,
महेशः,
डी. ए. वी. महाविद्यालयः।
मञ्जूषा
व्यवस्था, वातावरणम्, निवेदये, निवेदनं, मार्गेषु

HBSE 9th Class Sanskrit रचना पत्र-लेखनम्

3. मित्रं प्रति दीपमालाविषये लिखितं पत्रं मञ्जूषायां प्रदत्तैः शब्दैः पूरयत।
अम्बालानगरम्।
दिनाङ्क : 10.11.20……
प्रिय मित्र महेशः,
(i) ………….. नमोनमः।
अहम् अद्य दीपमालाविषये लिखामि। मित्र! कुटुम्बमध्ये स्थित्वा (ii) .. सहर्षदीपमाला मानिता। अस्माकं गृहस्य अन्तः बहिश्च प्रकाशस्य पुञ्ज एव उद्गतः आसीत्। वीथीमध्ये बहुविधानां (iii) ….. .. विस्फोटनं महत् कुतूहलम् अजनयत् । विविधानि मिष्टान्नानि स्वयमपि अस्माभिः खादितानि वत्सलानां मित्राणं (iv) .. . च परिवेषितानि। मन्ये भवताऽपि समारोह (५) … परिजनैः सह मानिता भवेत् । पत्रोत्तरं देयम्।
भवन्तः मित्रम्,
रमेश कुमारः।
मञ्जूषा
दीपमाला, सप्रेम, मया, स्फोटानाम्, गृहेषु |

4. आवश्यक कार्य हेतु प्रधानाचार्य प्रति लिखितं पत्रं मञ्जूषायां प्रदत्तैः शब्दैः पूरयत।
सेवायाम्
प्रधानाचार्यः महोदय!
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयः,
करनालनगरम्।
महोदयः।
सविनयं निवेदनम् अस्ति यत् अद्यः (i) ………. अत्यावश्यक कार्यम् अस्ति। एतस्मात् कारणात् (ii) ……… आगन्तुं न शक्नोमि। अतः (iii) ……………. अवकाशं स्वीकृत्य माम् (iv) …………… भवदीयः शिष्यः
(v) ………………. कक्षा नवमी।
मञ्जूषाः
अङ्कुरः, एक दिवसस्य, मम गृहे, अनुगृहीष्यति, अद्य विद्यालयेः।

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HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् संख्या एवं अव्यय

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions व्याकरणम् Sankhya Evam Avyay संख्या एवं अव्यय Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit व्याकरणम् संख्या एवं अव्यय

एवं अव्यय Class 9 HBSE

(ख) संख्या
1. संख्यावाचक शब्द विशेषण होते हैं।
2. संख्यावाचक शब्दों में एक से लेकर चार संख्या तक (1-4) रूप तीनों लिङ्गों में पृथक्-पृथक् चलते हैं परन्तु पाँच से लेकर सभी संख्यावाचक शब्दों के रूप तीनों लिङ्गों में समान रूप से चलते हैं;
जैसे एक-शब्द का रूप (पु० एकः/स्त्री०-एका, नपुं-एकम्) एकवचन में होता है। द्वि-शब्द का रूप (द्वौ, द्वे, द्वे) द्विवचन में होता है। त्रि-शब्द का रूप (त्रयः, तिस्रः, त्रीणि) बहुवचन में होता है। पञ्चन्-आदि शब्दों के तीनों लिङ्गों में भिन्न-भिन्न रूप नहीं होते हैं।)

पुंल्लिडून्गस्रीलिडून्ग एकान्ुंंकलिडून
एक:द्वेएकम्
है।तिस्नद्वे
त्रयःचतस्तःत्रीणि
चत्वारःस्रीलिडून्ग एकाचत्वारि
संख्या (अंक)संख्यावाचक शब्द
1एक:
2द्वै
3त्रयः
4चत्वारः
5पर्च
6षट् (षड़)
7सप्त
8अष्ट
9नव
10दश
11एकादश
12द्वादश
13त्रयोदश
14चतुर्दश
15पञ्चदश
16षोडश
17सप्तदश
18अष्टादश
19नवदश (एकोनविंशति)
20विंशतिः
21एकविशतिः
22द्वाविंशतिः
23त्रयोविंशतिः
24चतुरविशशतः
25प््चविंशतिः
26षड्-विंशति:
27सप्तविंशतिः
28अष्टविंशतिः
29नवविंशतिः (एकोनत्रिशतु)
30त्रिंशत्
31एकत्रिशत्
32द्वात्रिशत्
33त्रयत्रिंशत्
34चतुस्त्रिंशत्
35पङ्चत्रिशत्
36षट्त्रिंशत्
37सप्तत्रिंशत्
38अष्टत्रिशत्
39नवत्रिशत् (एकोनचत्वारिशत्)
40चत्वारिंशत्
41एकचत्वारिंशत्
42द्विचत्वारिंशत्
43त्रिचत्वारिंशत्
44चतुश्चत्वारिंशत्
45पज्चचत्वारिशत्
46षट्चत्वारिंशत्
47सप्तचत्वारिशत्
48अष्टचत्वारिंशत्
49नवचत्वारिंशत् (एकोनपञ्चाशत्)
50पज्चाशत्
51एकपज्चाशत्
52द्विपञ्चाशत्
53त्रिपञ्चाशत्
54चतुष्पञ्चाशत्
55पञ्चपञ्चाशत्
56षट्पञ्चाशत्
57सप्तपज्चाशत्
58अष्टपज्चाशत्
59नवपञ्चाशत् (एकोनषष्टि:)
60षष्टि:
61एकषष्टि:
62द्विषष्टि:
63त्रिषष्टि:
64चतुष्पष्टि:
65पज्चषष्टि:
66षट्षष्टि:
67सप्तषष्टि:
68अष्टषष्टिः
69नवषष्टिः (एकोनसप्ततिः)
70सप्ततिः
71एकसप्ततिः
72द्विसप्ततिः
73त्रिसप्ततिः
74चतुष्सप्ततिः
75प््चसप्ततिः
76षट्सप्तति:
77सप्तसप्ततिः
78अष्टसप्ततिः
79नवसप्ततिः (एकोनाशीतिः)
80अशीतिः
81एकाशीतिः
82द्वयशीतिः
83त्रयशीतिः
84चतुरशीतिः
85पञ्चाशीतिः
86षडशीतिः
87सप्ताशीतिः
88अष्टाशीतिः
89नवाशीतिः (एकोननवतिः)
90नवतिः
91एकनवतिः
92द्विनवतिः
93त्रिणवतिः
94चतुर्णवतिः
95प््चनवतिः
96षण्णवतिः
97सप्तनवति:
98अष्टनवतिः
99नवनवतिः (एकोनशतम्)
100शतम्

Class 9 HBSE एवं अव्यय

HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् संख्या एवं अव्यय

(ग) अव्यय
संस्कृत भाषा में दो प्रकार के शब्द होते हैं
(क) विकारी शब्द; जैसे रामः रामौ रामाः इत्यादि और
(ख) अविकारी शब्द; जैसेशनैः इत्यादि। अविकारी शब्द को ही अव्यय कहते हैं। जो शब्द तीनों लिङ्गों में तथा सभी विभक्तियों में एवं सब वचनों में एक समान रहते हैं तथा जिनमें कोई परिवर्तन नहीं होता, वे शब्द अव्यय कहलाते हैं। कुछ प्रमुख अव्यय निम्नलिखित हैं-

अव्ययअर्थवाक्य-प्रयोग
पुराप्राचीन काल मेंपुरा रामः राजा आसीत्।
नूनम्निश्चय हीनूनम् सः अद्य आगमिष्यति।
अद्यआजअद्य अहं विद्यालयं न गमिष्याभि।
ह्यःबीता हुआ कलह्य: सोमवारः आसीत्।
श्वःआने वाला कलश्वः रविवारः भविष्यति।
एकदाएक बारएकदा रामः लक्ष्मणं कथयत्।
यदाजबयदा स आगमिष्यति तदाहं पठिष्यामि।
कदाकबसः कदा गमिष्यति?
तदातबतदा सः गृहमगच्छत् ।
सर्वदासदासः सर्वदा कार्यं करोति।
अधुनाअबअधुना वयं पत्रं लिखामि।
शीघ्रम्जल्दीदेवः शीघ्र कार्यं कुरु।
पुनःफिरसः पुनः पुनः अत्र आगच्छति।
औरत्वमेव माता च पिता त्वमेव।
अपिभीमया सह मोहनः अपि पठिष्यति।
सर्वत्रसब जगहईश्वरः सर्वत्र अस्ति।
अतिअधिकताजलम् अति शीतलं वर्तते ।
सम्प्रतिअबअहं सम्प्रति गृहं गमिष्यामि।
धिकधिक्कारधिकू दुष्टम्।
खलुनिश्चयोधकअत्र खलु बहवः वृक्षा: सन्ति।
यथा-तथाजैसा-वैसायथा राजा तथा प्रजा।
दिवदिन मेंदिवा निद्रा मा कुरुत।
अहर्निशम्दिन-रातसः अहर्निशम् पठति।
वृथाव्यर्थवृथा न गन्तव्यम्।
नक्तम्रात मेंसः नक्तम् चिरं पठति।
नानाबिना, अनेकविद्यालये नाना छात्राः पठन्ति।
विनाबिना, रहितविद्या विना मानवः पशुः अस्ति।
मृषाझूठमृषा न वक्तव्यम् ।
अथइसके बाद, अबअथ सः कथां करोति।
मामत, नहींकदापि असत्यं मा वद।
कुतःकहाँ सेभवान् इदानीम् कुतः आगच्छति ?
शनैःधीरे-धीरेसः शनैः लिखति।
उच्चै:ऊँचेवायुयानं उच्चैः गच्छति।
नीचैःनीचेसः वृक्षात् नीचैः अपतत्।

HBSE 9th Class Sanskrit व्याकरणम् संख्या एवं अव्यय

अभ्यासार्थ प्रश्नाः
I. कोष्ठकगतेषु पदेषु उचित विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) विष्णुः ……… अधिशेते। (पर्यङ्क)
(ख) अलं ………….. । (चिन्ता)
(ग) गङ्गा ……….. निर्गच्छति। (हिमालय)
(घ) …………. यावत् गृहम् उपैति। (सन्ध्या)
(ङ) सः ………….. खञ्जः अस्ति। (पाद)

II. शुद्ध उत्तरं चित्वा लिखत
(क) ‘धिक्’ इति उपपद योगे का विभक्तिः ?
(i) प्रथमा
(ii) द्वितीया
(iii) चतुर्थी
(iv) तृतीया

(ख) ‘नमः’ इति उपपद योगे का विभक्तिः ?
(i) चतुर्थी
(ii) पञ्चमी
(iii) तृतीया
(iv) षष्ठी

(ग) ‘विना’ इति उपपद योगे का विभक्तिः?
(i) प्रथमा
(ii) सप्तमी
(iii) तृतीया
(iv) चतुर्थी

(घ) ’40’ इति अंके किं संख्यावाचीपदम् ?
(i) चत्वारिंशत्
(ii) चत्वारिशत्
(iii) चतुरशत्
(iv) चतुर्दश

(ङ) ‘षष्टिः’ इति पदे का संख्या ?
(i) 16
(ii) 26
(iii) 60
(iv) 36

(च) ’35’ अङ्क स्थाने किं संख्यावाचीपदम् ?
(i) सप्तत्रिंशत्
(ii) अष्टत्रिंशत्
(iii) पञ्चत्रिंशत्
(iv) द्वात्रिंशत्

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HBSE 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Apathit Avbodhnam अपठित अवबोधनम् Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

Apathit Avbodhnam In Sanskrit Class 9 HBSE

‘अपठित’ शब्द का अर्थ है न पठित अर्थात् ऐसी विषयवस्तु, जो पाठ्यपुस्तक से भिन्न हो। अपठित गद्यांश में निपुणता प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है
(1) अपठित गद्यांश के प्रश्नों का उत्तर देने से पूर्व उसे दो-तीन बार अच्छी तरह से पढ़ना चाहिए।
(2) गद्यांश में प्रयुक्त कठिन शब्दों के अर्थ यदि स्पष्ट न हो रहे हों तो कठिन शब्दों वाले सम्पूर्ण वाक्य को ध्यान से पढ़कर भाव ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।
(3) गद्यांश में प्रयुक्त अव्ययों तथा विभक्तियों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। ऐसा न करने पर उत्तर प्रायः गलत हो सकते हैं।

अधोलिखितान् गद्यांशान् पठित्वा प्रश्नानां उत्तराणि लिखत

1. भारतदेशस्य उत्तरदिशि पर्वतराजः हिमालयः तिष्ठति। पुरा अत्र मुनयः तपन्ति स्म। एकस्मिन् आश्रमे एकः मुनिः अनेके शिष्याः च अवसन्। आश्रमे बहूनि पुष्पाणि फलानि च भवन्ति स्म। गुरुः शिष्यान् पाठयति स्म। शिष्याः गुरोः आश्रमस्य च सेवाम् अकुर्वन्।
(i) गद्यांशात् द्वे ‘अव्यय’ पदे चित्वा लिखत?
(ii) शिष्यान् कः पाठयति स्म?
(iii) गुरोः सेवां के अकुर्वन् ?
(iv) ‘सेवाम’ अत्र का विभक्तिः किं वचनं च?
(v) ‘तिष्ठति’ इति पदे कः धातुः कः लकारः च?
उत्तराणि:
(i) अत्र, च।
(ii) शिष्यान् गुरुः पाठयति स्म।
(iii) गुरोः सेवां शिष्याः अकुर्वन् ।
(iv) अत्र द्वितीया विभक्ति, एकवचनम् च।
(v) स्था धातु, लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचनम्।

HBSE 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

2. संस्कृत पुरा भारतीयानां लोकप्रिया जनभाषा आसीत्। रामायण-महाभारत काले संस्कृतम् एव जनभाषा-रूपेण प्रचलिता आसीत् । वाल्मीकिः रामायणे इमां भाषां ‘मानुषी’ इति नाम्ना निर्दिशति। संस्कृतम् एव आधुनिक प्रान्तीय भाषाणां जननी अस्ति। सर्वासु प्रान्तीय भाषासु प्रतिशतकं षष्टिः शब्दाः संस्कृतभाषायाः एव सन्ति। संस्कृतस्य ज्ञानादेव प्रान्तीय भाषाणां सम्यग् ज्ञानं भवति।।
(i) संस्कृत कदा भारतीयानां लोकप्रिया जनभाषा आसीत्?
(ii) संस्कृत केषां जननी अस्ति?
(iii) कस्मिन् ग्रन्थे संस्कृतभाषां ‘मानुषी’ इति कथितम्?
(iv) संस्कृतस्य ज्ञानात् केषां ज्ञानं भवति?
(v) भाषाणां’ इति पदे का विभक्तिः अस्ति ?
उत्तराणि:
(i) संस्कृत पुरा भारतीयानां लोकप्रिया जनभाषा आसीत्।
(ii) संस्कृतम् आधुनिक-प्रान्तीय भाषाणां जननी अस्ति।
(iii) वाल्मीकिः रामायणे संस्कृतभाषां ‘मानुषी’ इति कथितम्।
(iv) संस्कृतस्य ज्ञानात् प्रान्तीय भाषाणां ज्ञानं भवति।
(v) ‘भाषाणां’ इति पदे सप्तमी विभक्तिः अस्ति ।

3. कस्मिंश्चित् वने एकः महाचतुरकः नामकः शृगालः वसति स्म। सः कदाचित् वने एकं मृतं महागजम् अपश्यत्। सः तस्य कठिनां त्वचं भेतुम् अयतत् परं सफलो न अभवत्। अत्रान्तरे एकः सिंहः तत्रैव आगच्छत् । सिंहं दृष्ट्वा शृगालः अवदत्-स्वामिन्! अहं तव सेवकः । तवैव भोजनार्थं गजमिमं रक्षामि। सिंहः तम् एवं प्रणतं दृष्ट्वा अवदत्-अन्येन हतं जीवं नाहं खादामि। अहः इमं गजम् अहं तुभ्यमेव यच्छामि।
(i) शृगालः कुत्र वसति स्म?
(ii) शृगालः वने किम् अपश्यत् ?
(iii) सिंहः किम् अवदत् ?
(iv) सिंहं दृष्ट्वा शृगालः किम् अवदत्?
(v) कस्मिंश्चित् वने कः वसति स्म?
उत्तराणि:
(i) शृगालः कस्मिंश्चित् वने वसति स्म।
(ii) शृगालः वने एकं मृतं महागजम् अपश्यत्।
(iii) सिंहः अवदत्-यत् अन्येन हतं जीवं नाहं खादामि।
(iv) सिंहं दृष्ट्वा शृगालः अवदत्-स्वामिन् ! अहं तव सेवकः। तवैव भोजनार्थं गजमिमं रक्षामि।
(v) कस्मिंश्चित् वने एकः महाचतुरकः नामकः शृगालः वसति स्म।

अपठित अवबोधनम् संस्कृत Class 9 HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

4. देशाटनस्य बहवः लाभाः सन्ति। एतेन वयं सर्वेषां देशानां राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिकं च रूपं ज्ञातुं समर्थाः स्यामः, अद्यतनीयो व्यापारः अपि प्रायशः अन्तर्राष्ट्रिय-व्यापारः सञ्जातः। कस्मिन् देशे कदा किं च सुलभम् एतस्य ज्ञानं सर्वथा अनिवार्यम् । बहवः एतादृशः अपरिपक्वाः पदार्थाः सन्ति येषां प्राप्तिः पदार्थानां निर्माणाय अनिवार्य अस्ति। अतः तान् पदार्थान् प्राप्तुं देशाटनं कर्तव्यमेव।
(i) देशाटनेन वयं किं ज्ञातुं समर्थाः स्यामः?
(ii) पदार्थानां निर्माणाय किं अनिवार्यः अस्ति?
(iii) कान् प्राप्तुं देशाटनं कर्तव्यम् ?
(iv) देशाटनस्य कति लाभाः सन्ति?
(v) ‘प्राप्तुम्’ इति पदे कः प्रत्ययः प्रयुक्तः?
उत्तराणि:
(i) देशाटनेन वयं सर्वेषां देशानां राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिकं च रूपं ज्ञातुं समर्थाः स्यामः।
(ii) बहवः एतादृशः अपरिपक्वाः पदार्थाः सन्ति येषां प्राप्तिः पदार्थानां निर्माणाय अनिवार्य अस्ति।
(iii) पदार्थान प्राप्तुं देशाटनं कर्तव्यम्।
(iv) देशाटनस्य बहवः लाभाः सन्ति।
(v) ‘प्राप्तुम्’ इति पदे ‘तुमुन्’ प्रत्ययः अस्ति।

5. कदाचिद् वर्षास्वपि वृष्टेरभावात् तृषार्तो गजयूथो यूथपतिमाह “राजन, नास्त्यस्माकं जीविताशा। अस्मिन दारुणे जलाभावे निमज्जनाभावादार्ता वयं क्व यामः किं वा कुर्मः?” एवमुक्तो यूथपति तिदूरं गत्वा तानेकं प्रभूतसलिलं सरो दर्शितवान्। तत्र गच्छतां गजानां युगपद् अतिस्भसपादपाताहतिभिस्तस्य सरसस्तीरे शयानाः शशकाः लूनानां धान्यानां प्रकरा गोगणैरिव अवमर्दिता।
(i) तृषार्तो गजयूथो यूथपतिं किम् आह?
(ii) किं दर्शितवान्?
(iii) कीदृक् जलाभावः आसीत्?
(iv) के अवमर्दिता?
(v) ‘प्रभूतसलिलं’ इति पदयोः विशेषणपदम् किं अस्ति?
उत्तराणि:
(i) राजन्, नास्त्यस्माकं जीविताशा। अस्मिन् दारुणे जलाभावे निमज्जनाभावादार्ता वयं क्व यामः किं वा कुर्मः?
(ii) तान् एकं प्रभूतसलिलं सरो दर्शितवान्।
(iii) दारुणः जलाभावः आसीत्।
(iv) शयानाः शशकाः अवमर्दिताः।
(v) ‘प्रभूतः’ इति विशेषण पदम् अस्ति।

Apathit Avbodhnam HBSE 9th Class Sanskrit

HBSE 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

6. विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् इति सत्यमेव विद्याधनस्य इदं वैशिष्टयं, यत् अन्यत् धनं व्ययात् क्षयमाप्नोति परं विद्याधनं व्ययात् वृद्धिम् आप्नोति। कस्यचिदपि पदार्थस्य सम्यक् ज्ञानं विद्या इति कथ्यते। विद्यया वयं विनम्राः भवामः, विनयात् वयं पात्रतां प्राप्नुमः, पात्रत्वात् धनं प्राप्यते, धनात् धर्मकार्याणि निष्पद्यन्ते यैः अस्माभिः सुखं लभ्यते। विद्यया एव मानवः सर्वत्र प्रतिष्ठां लभते।
(i) विद्याधनं कीदृशं धनम् अस्ति?
(ii) विद्यया कथं कानि निष्पद्यन्ते?
(iii) विद्याधनं व्ययात् किम् आप्नोति?
(iv) पदार्थस्य सम्यक ज्ञानं किं कथ्यते?
(v) ‘सर्वत्र प्रतिष्ठां लभते’ अत्र किं अव्ययपदं?
उत्तराणि:
(i) विद्याधनं सर्वधनप्रधानं धनम् अस्ति।
(ii) विद्यया वयं विनम्राः भवामः, विनयात् वयं पात्रतां प्राप्नुमः, पात्रत्वात् धनं प्राप्यते, धनात् धर्मकार्याणि निष्पद्यन्ते।
(iii) विद्याधनं व्ययात् वृद्धिम् आप्नोति।
(iv) पदार्थस्य सम्यक् ज्ञानं विद्या इति कथ्यते।
(v) अत्र ‘सर्वत्र’ इति अव्यय पदम् अस्ति।

7. किम् अस्ति गीता ? ‘गीता’ उपनिषदां सारः अस्ति। श्रीकृष्णः कुरुक्षेत्रज्योतिसरस्तटे युद्धभूमौ विषादग्रस्ताय श्री वीर अर्जुनाय यदुपदिष्टं सा-एव गीता। गीतायाः अष्टादशअध्यायेषु 700 श्लोकाः सन्ति। एते मानवकल्याणाय सन्ति। अत्र सर्वासांसमस्यानां समाधानम् अस्ति।गतवर्षे गीता-मनीषी-स्वामी ज्ञानानन्द महाराजस्य प्रेरणया हरियाणा सर्वकारेण अन्तर्राष्ट्रीयः गीता-महोत्सवः आयोजितः। एतच्छधानीयमस्ति। अस्माभिः गीता नैव पठनीया अपितु आचरणीया।
(i) गीतायां कति अध्यायाः सन्ति?
(ii) कस्यां सन्ति 700 श्लोकाः?
(iii) श्रीकृष्णः गीतोपदेशं कस्मै अयच्छत्?
(iv) अस्माभिः किं करणीयम्?
(v) कस्य प्रेरणया गीता-महोत्सवः आयोजितः?
उत्तराणि:
(i) गीतायां अष्टादश अध्यायाः सन्ति ।
(ii) गीतायाम् 700 श्लोकाः सन्ति।
(iii) श्रीकृष्णः गीतोपदेशं अर्जुनाय अयच्छत्।
(iv) अस्माभिः गीता नैव पठनीया अपितु आचरणीया।
(v) गीता-मनीषी-स्वामी ज्ञानानन्द महाराजस्य प्रेरणया गीता-महोत्सवः आयोजितः।

अपठित अवबोधनम् HBSE 9th Class Sanskrit

HBSE 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

8. कस्मिंश्चिन्नगरे चत्वारो ब्राह्मण पुत्राः वसन्ति स्म। तेषां त्रयः शास्त्रपारङ्गताः परं व्यावहारिक-बुद्धिहीना आसन्, एकस्तु व्यवहारकुशलः शास्त्र-ज्ञान-विमुखः आसीत् । एकदा वने विचरन्तः ते कतिचिद् अस्थीनि अवलोकितवन्तः। तेषु एकः विज्ञानबलेन अस्थि-सञ्चयमकरोत् । द्वितीयाः तस्मिन् चर्म-मांस रुधिरं संयोजितवान् । तृतीयो यावत् तस्मिन् प्राण-सञ्चारं कर्तुमुद्यतः तावत् सुबुद्धि ते निषेधयन् अवदत्-भोः, तिष्ठतु भवान्। एष सिंहः क्रियते यदि एष जीविष्यति तर्हि सर्वानपि भक्षयिष्यति।
(i) ब्राह्मण पुत्राः कुत्र वसन्ति स्म?
(ii) एकदा ते कुत्र कानि अवलोकितवन्तः?
(iii) तेषु एकः केन बलेन अस्थि सञ्चयम् अकरोत् ?
(iv) तृतीयः किं कर्तुम् उद्यतः?
(v) ‘भविष्यति’ इति पदे को लकारः अस्ति?
उत्तराणि:
(i) ब्राह्मण पुत्राः कस्मिंश्चिन्नगरे वसन्ति स्म।
(ii) एकदा ते वने विचरन्तः कतिचिद् अस्थीनि अवलोकितवन्तः।
(iii) तेषु एकः विज्ञानबलेन अस्थिसञ्चमकरोत् ।
(iv) तृतीयः प्राणसञ्चारः कर्तुम् उद्यतः।
(v) ‘भविष्यति’ इति पदे ‘लृट् लकारः अस्ति।

9. यदस्माभिः स्वामिना विना नावस्थातव्यम् । भवांश्च सर्वैरपि स्वामिगुणैः सम्पन्नः। अतः एतस्य वनस्य राज्येऽभिषेक्तुं भवानेव योग्यः। ततो यथाभिषेकवेला नात्येति तथा सत्वरमायातु देवः। हस्ती प्रत्यवदत्-‘न खलु चिन्तयन्नपि निपुणं तमात्मनो गुणमवलोकयामि यस्यायमनुरूपोऽनुग्रहातिरेकः। तथाप्युदारजनादरो बहुमानमारोपयत्यवश्यम्, तद् अनुगृहीतोऽस्म्यहमनया वनवासिनां सम्भावनया। यथाजोषं क्रियताम् । सज्जोऽस्म्यभिषेकाय। तद् यदि नातिखेदकरं तर्हि अभिषेकमण्डलमार्गमादेशय।
(i) अस्माभिः केन विना नावस्थातव्यम् ?
(ii) तद् कि आदेशय?
(iii) गजः केषां सम्भावनया अनुगृहीतः अस्ति?
(iv) कस्य वेला न अत्येति?
(v) ‘योग्यः’ इति पदस्य विलोमपदं लिखत।
उत्तराणि:
(i) अस्माभिः स्वामिना विना नावस्थातव्यम्।
(ii) तद् नातिखेदकरं तर्हि अभिषेकमण्डलमार्गम आदेशय।
(iii) गजः वनवासिनां सम्भावनया अनुगृहीतः अस्ति।
(iv) अभिषेकस्य वेला न अत्येति।
(v) ‘योग्यः’ इति पदस्य विलोमपदम् ‘अयोग्यः’ अस्ति।

Pathit Avbodhnam In Sanskrit HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

10. पुरा भारते भरतः नाम प्रतापी नृपः आसीत् । तस्य राज्यं विस्तृतमासीत् । राज्यप्रबन्धे भरतः अतीव कुशलः आसीत्। सर्वे जनाः तस्य राज्ये सुखिनः आसन्। इदं कथ्यते यत् भरतस्य नाम्ना एव अस्य देशस्य नाम भारतम् अभवत्।
(i) भरतः कीदृशः नृपः आसीत् ?
(ii) भरतः कस्मिन् कुशलः आसीत् ?
(iii) के भरतस्य राज्ये सुखिनः आसन् ?
(iv) कस्य नाम्ना अस्य देशस्य नाम भारतम् अभवत्?
(v) अस्य गद्यांशस्य समुचितं शीर्षकं लिखत।
उत्तराणि:
(i) भरतः प्रतापी नृपः आसीत्।
(ii) भरतः राज्यप्रबन्धे कुशलः आसीत्।
(iii) भरतस्य राज्ये सर्वेजनाः सुखिनः आसन्।
(iv) भरतस्य नाम्ना अस्य देशस्य नाम भारतम् अभवत्।
(v) प्रतापी नृपः भरतः।

Apathit Avbodhnam In Sanskrit HBSE 9th Class

अभ्यासार्थ गद्यांश:

1. प्रकृतिः मनुष्यस्य उपकारिणी। मनुष्यैः सह तस्याः शाश्वतः सम्बन्धः। सा विविधरूपेषु अस्मिन् जगति आत्मानं प्रकटयति। पशवः, पक्षिणः, वनस्पतयः, च तस्याः एव अङ्गानि। निराशाः असहायाः जनाः तस्याः एव आश्रयं प्राप्नुवन्ति। सा स्वमनोहरेण सौन्दर्येण नीरसं हृदयम् अपि सरसं करोति । सूर्यः चन्द्रः च तस्याः नेत्रे । शस्य-श्यामला एषा भूमिः। विविधाः औषधयः सकलानि खनिजानि च प्रकृतेः एव शोभा। सा तु नित्यम् एव एतैः साधनैः सर्वेषाम् उपकारं करोति, परम् अधन्यः अयं जनः कृतज्ञतां विहाय असाधुसेवितं पथं गच्छति, विविधानि कष्टानि च अनुभवति। नरः शाश्वतं सुखं वाञ्छति चेत् तर्हि प्रकृतेः प्रतिकूलं कदापि न आचरेत् इति।
(i) प्रकृतेः शोभा का?
(ii) अस्य गद्यांशस्य शीर्षकं लिखत।
(iii) मनुष्यस्य उपकारिणी का?
(iv) मनुष्यैः सह कस्याः शाश्वतः सम्बन्ध?
(v) ‘नीरसं’ इत्यस्य विलोम पदं लिखत।

Sanskrit Apathit Avbodhnam HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

2. एकदा एकः कर्तव्यपरायणः नगररक्षकः इतस्ततः भ्रमन् एकम् अशीतिवर्षीयं महापुरुषम् अपश्यत्। सः आम्रवृक्षस्य आरोपणे तल्लीनः आसीत्। इदं दृष्ट्वा नगररक्षकः तं महापुरुषम् अवदत्-अवलोकनेन प्रतीयते यत् यदा एषः वृक्षः फलिष्यति तदा भवान् जीवितः न भविष्यति। अतः किमर्थं वृथा परिश्रमं कुर्वन्ति भवन्तः? महापुरुषः हसित्वा अवदत्पश्यन्तु एतान् फलयुक्तान् वृक्षान् । एतेषाम् आरोपणं मया न कृतं परं फलानि अहं खादित्वा सन्तुष्टः भवामि । अतः यदा मम आरोपितस्य वृक्षस्य फलानि अन्ये खादिष्यन्ति, अहं पुनः प्रसन्नः भविष्यामि । महापुरुषस्य वचनं श्रुत्वा तं च नमस्कृत्य नगररक्षकः उक्तवान अनुकरणीया एव सज्जनानां सज्जनता।
(i) नगररक्षकः अशीतिवर्षीयं महापुरुषम् कुत्र अपश्यत् ?
(ii) अस्य गद्यांशस्य शीर्षकं लिखत।
(iii) नगररक्षकः कीदृशः महापुरुषः आसीत्?
(iv) सज्जनानां सज्जनता कीदृशी भवति?
(v) ‘श्रुत्वा’ इति पदे कः प्रत्ययः अस्ति?

3. कश्चित् वानरः भूतले समागतं मकरं पृच्छति-भवान् किमर्थं भूतले समागतः? मकरः कथयति धन्याः भवादृशाः प्रियवादिनः ये स्थलोत्पन्नाः सन्ति। तच्छ्रुत्वा वानरः अतिथये पक्वफलानि अर्पयति। मकरेण फलानि निजदयितायै अर्पितानि। तानि भक्षयित्वा सा चिन्तयति-नित्यं मधुर फलानां सेवनेन वानरहृदयस्य मांसं अमृतोपमस्यात् । सा पतिं कथितवती-यदि त्वं मां जीवितां दृष्टुमिच्छसि, तदा वानरहृदय मांस भक्षणस्य कामना पूरय। मकरः समुद्रतटं गत्वा वानराय निवेदयति तव भातृजाया त्वामाकारयति। वानरः प्रार्थनां स्वीकरोति। वानरं समुद्रमध्ये नीत्वा मकरः यथावृत्तं तस्मै सूचयति। चतुरः वानरः वदति-‘मम हृदयं तु वृक्षे वर्तते । तत्र नीत्वा मुञ्च माम् येन स्वहृदयं गृहीत्वा पुनः आगमिष्यामि।’ तत्र नीतः वानरः तत्पृष्ठतः समुत्तीर्य शाखिनम् आरुह्य वदति-‘जल मार्गानुसारिणां स्थलजैः सङ्गतिः न भवति।’
(i) कस्मात् कारणात् वानरस्य हृदयं अमृतोपमंस्यात् ?
(ii) शाखिनम् आरुह्य वानरः किम् अवदत् ?
(iii) वानरः अतिथयेः किम् अर्पयति?
(iv) किं भक्षणाय मकरी पतिं कथितवती?
(v) ‘आगमिष्यामि’ इति पदे कः लकारः अस्ति?

HBSE 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

4. एकदा कौरव-पाण्डवानां शस्त्रपरीक्षा अभवत् । आचार्यः द्रोणः एक कृत्रिमं खगं वृक्षशाखायां स्थापितवान् । अयं कृत्रिमः खगः सर्वेषां लक्ष्यम् आसीत्। आचार्य द्रोणः तस्मिन् खगे बाणचालनात् पूर्वं युधिष्ठिरम् अपृच्छत्-त्वं किं किं पश्यसि? युधिष्ठिरः अब्रवीत्-अहं खगं, वृक्ष, भवन्तं, सर्वान् सहचरान् च पश्यामि । आचार्य द्रोणः तम् अपसारितवान्। पश्चात् सर्वे राजपुत्राः क्रमशः आहूताः पृष्टाश्च। सर्वेः तदेव कथितं यत् युधिष्ठिरेण कथितम् आसीत्। अन्ते अर्जुनः पृष्टः। सः अवदत् अहं केवलं खगं एव पश्यामि। आचार्यः प्रसन्नः भूत्वा लक्ष्यवेधाय तम् आदिशत्। अर्जुनः सफलः जातः।
(i) आचार्यः द्रोणः कं कुत्र स्थापितवान् ?
(ii) अस्य गद्यांशस्य शीर्षकं लिखत।
(iii) खगः कीदृशः आसीत्?
(iv) शस्त्र परीक्षायां कः सफलः जातः?
(v), ‘कृत्रिमः’ इति विशेषणस्यविशेष्यं किम् ?

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HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

Haryana State Board HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

HBSE 9th Class Hindi उपभोक्तावाद की संस्कृति Textbook Questions and Answers

उपभोक्तावाद की संस्कृति गद्यांश HBSE 9th Class प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार जीवन में ‘सुख’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
लेखक ने ‘सुख’ को व्यंग्यात्मक शैली में परिभाषित करते हुए कहा है कि आज उपभोग का भोग ही सुख है।

उपभोक्तावाद की संस्कृति के प्रश्न उत्तर HBSE 9th Class प्रश्न 2.
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है ?
उत्तर-
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को अनेक प्रकार से प्रभावित कर रही है। एक ओर इस संस्कृति में उपभोग की वस्तुओं का अत्यधिक निर्माण हो रहा है जिससे आकृष्ट होकर हम उसे बिना सोचे-समझे खरीदते चले जा रहे हैं। इससे संतुष्टि की अपेक्षा अशांति एवं अँधी होड़ की भावना बढ़ती है। दूसरी ओर, समाज के विभिन्न वर्गों में सद्भाव की अपेक्षा संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। सीमित साधनों का अपव्यय हो रहा है। सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। हम पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करने के कारण अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। इस उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास से हमारी अपनी संस्कृति के मूल्य खतरे में पड़ गए हैं।

उपभोक्तावाद की संस्कृति HBSE 9th Class प्रश्न 3.
गांधी जी ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है ?
उत्तर-
गांधी जी सदा भारतीय संस्कृति के पुजारी रहे हैं। वे चाहते थे कि हम नए विचारों को अपनाएँ, किन्तु अपनी संस्कृति की नींव से दूर न हटें अर्थात् अपनी संस्कृति का त्याग न करें। गांधी जी ने अनुभव कर लिया था कि उपभोक्ता संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को हिला रही है। यह हमारे समाज के लिए खतरा है। इसलिए गांधी जी ने इसे समाज के लिए चुनौती कहा है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

उपभोक्तावाद की संस्कृति Class 9 HBSE प्रश्न 4.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।
(ख) प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हों।
उत्तर-
(क) इस पंक्ति में लेखक ने उपभोक्तावाद की संस्कृति के विकास से उत्पन्न वातावरण के प्रभाव को चित्रित किया है। जाने-अनजाने आज के वातावरण में हमारा चरित्र बदल रहा है अर्थात् हमारी सोच में परिवर्तन आ रहा है। हम जिन बातों या विचारों को पहले उचित नहीं समझते थे, आज उन्हीं को करने में गर्व अनुभव करने लगे हैं। हम अपने-आपको उत्पाद के प्रति समर्पित करते जा रहे हैं अर्थात् उत्पादन ही हमारा सब कुछ बन गया है, मानवीय मूल्य गौण होते जा रहे हैं।

(ख) इस पंक्ति में लेखक ने आज के दिखावे की प्रतिष्ठा पर करारा व्यंग्य किया है। लेखक ने बताया है कि हम अपनी प्रतिष्ठा अर्थात् मान-सम्मान को बनाने के लिए तरह-तरह के ढंग अपना रहे हैं, भले ही वे हास्यास्पद ही क्यों न हों। कहने का तात्पर्य है कि हम साधनों की चिंता नहीं करते, वे कैसे भी हों हमें तो अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखनी है।

रचना और अभिव्यक्ति

Upbhoktavad Ki Sanskriti Prashn Uttar HBSE 9th Class प्रश्न 5.
कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी०वी० पर विज्ञापन देखकर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं, क्यों ?
उत्तर-
आज के युग में किसी भी वस्तु को खरीदने के लिए उसकी आवश्यकता का होना अनिवार्य नहीं है। कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं, जिन्हें हम विज्ञापन देखकर इसलिए खरीदते हैं, क्योंकि उन वस्तुओं को खरीदने से हमारी हैसियत का पता चलता है और समाज में प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। अतः स्पष्ट है कि हम दिखावे की शान को बनाए रखने के लिए ऐसी वस्तुओं को खरीदने के लिए लालायित होते हैं।

उपभोक्तावाद की संस्कृति Question And Answer HBSE 9th Class प्रश्न 6.
आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए या उसका विज्ञापन ? तर्क देकर स्पष्ट करें।
उत्तर-
हमारे अनुसार किसी भी वस्तु को खरीदने का प्रमुख आधार उसकी गुणवत्ता एवं उपयोगिता होनी चाहिए, न कि विज्ञापन। यदि हम केवल विज्ञापन को देखकर किसी वस्तु को खरीदते हैं तो यह आवश्यक नहीं है कि उसमें वे सभी गुण होंगे, जो हम चाहते हैं। इसलिए हमें किसी भी वस्तु को खरीदने के लिए उसके गुणों को देखना चाहिए। यही उचित एवं सार्थक होगा। विज्ञापन में तो केवल चमक-दमक ही अधिक दिखाई जाती है।

Upbhoktavad Ki Sanskriti Shabdarth HBSE 9th Class प्रश्न 7.
पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही ‘दिखावे की संस्कृति’ पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही दिखावे की संस्कृति का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है। सर्वप्रथम इस संस्कृति से हमारे धन का अपव्यय बढ़ा है। हम अधिकाधिक वस्तुओं को खरीदने के लिए लालायित हो उठते हैं। इस संस्कृति के विकास से भारतीय संस्कृति के मूल्यों को आघात पहुँचा है। हम उपभोक्तावाद के चक्कर में फँसकर अथवा झूठी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए मानवीय मूल्यों से दूर हटते जा रहे हैं। लेखक का यह भी मानना है कि उपभोक्तावादी युग में समाज के विभिन्न वर्गों की दूरियाँ कम होने की अपेक्षा बढ़ी हैं। सामाजिक सद्भावना व सहयोग की भावना की अपेक्षा अँधी प्रतिस्पर्धा का विकास हुआ है जिसमें दया, सहिष्णुता, ममता आदि सद्भावों के लिए कोई स्थान नहीं है।

Upbhoktavad Ki Sanskriti Ke Prashn Uttar HBSE 9th Class प्रश्न 8.
आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है ? अपने अनुभव के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर-
आज की उपभोक्ता संस्कृति न केवल हमारे दैनिक जीवन को, अपितु हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को भी प्रभावित कर रही है। इससे पूर्व रीति-रिवाज व त्योहार एक महान् उद्देश्य की पूर्ति हेतु मनाए जाते थे। उनसे आपस में प्रेम, सद्भाव, मेल-जोल आदि भावों का विकास होता था। यही उनका मुख्य लक्ष्य भी था, किन्तु आज उपभोक्ता संस्कृति के आने पर हम रीति-रिवाजों व त्योहारों पर अनेकानेक वस्तुएँ खरीदते हैं और प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए महँगे-महँगे उपहार देते हैं। दिखावे के लिए अनावश्यक वस्तुओं को खरीदते हैं। इससे समाज के लोगों में होड़ की भावना उत्पन्न होती है और धन का अपव्यय होता है। उदाहरणार्थ, दीपावली दीपों एवं सद्भावना का त्योहार है। हम दीप जलाने की अपेक्षा महँगे पटाखे, बम आदि चलाते हैं। अपने संबंधियों व पड़ोसियों को महँगे-महँगे तोहफे देते हैं। हम इस त्योहार के वास्तविक उद्देश्य से भटककर दिखावे की भावना में फँस जाते हैं। इस प्रकार उपभोक्ता की संस्कृति का हमारे रीति-रिवाजों व त्योहारों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

Class 9th Upbhoktavad Ki Sanskriti Prashn Uttar HBSE

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

भाषा-अध्ययन

प्रश्न 9.
धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है।
इस वाक्य -में ‘बदल रहा है’ क्रिया है। यह क्रिया कैसे हो रही है-धीरे-धीरे। अतः यहाँ धीरे-धीरे क्रिया-विशेषण है। जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, क्रिया-विशेषण कहलाते हैं। जहाँ वाक्य में हमें पता चलता है क्रिया कैसे, कब, कितनी और कहाँ हो रही है, वहाँ वह शब्द क्रिया-विशेषण कहलाता है।

(क) ऊपर दिए गए उदाहरण को ध्यान में रखते हुए क्रिया-विशेषण से युक्त लगभग पाँच वाक्य पाठ में से छाँटकर लिखिए।
उत्तर-

  1. आपको लुभाने की जी तोड़ कोशिश में निरंतर लगी रहती हैं।
  2. हम सांस्कृतिक अस्मिता की बात कितनी ही करें।
  3. विकास के विराट उद्देश्य पीछे हट रहे हैं।
  4. नैतिक मानदंड ढीले पड़ रहे हैं।
  5. शीघ्र ही शायद कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी बन जाए।

(ख) धीरे-धीरे, जोर से, लगातार, हमेशा, आजकल, कम, ज्यादा, यहाँ, उधर, बाहर-इन क्रिया-विशेषण शब्दों का प्रयोग करते हुए वाक्य बनाइए।
उत्तर-
धीरे-धीरे – मोहन धीरे-धीरे चल रहा है।
जोर से – जोर से मत बोलो।
लगातार – वह लगातार दौड़ रहा है।
हमेशा – प्रभु शर्मा हमेशा गाता है।
आजकल – तुम आजकल पढ़ते नहीं हो।
कम – तुम कम तोलते हो।
ज्यादा – वह ज्यादा हँसता है।
यहाँ – राम यहाँ सोता है।
उधर – वह उधर रहता है।
बाहर – सीता बाहर देख रही थी।

(ग) नीचे दिए गए वाक्यों में से क्रिया-विशेषण और विशेषण शब्द छाँटकर अलग लिखिए-

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति 1
उत्तर-
क्रिया-विशेषण– विशेषण
(1) निरंतर — कल
(2) मुँह में पानी आ गया — पके
(3) जोरों की — हलकी
(4) उतना ही — जितनी
(5) भरा — आजकल

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

पाठेतर सक्रियता

‘दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों का बच्चों पर बढ़ता प्रभाव’ विषय पर अध्यापक और विद्यार्थी के बीच हुए वार्तालाप को संवाद शैली में लिखिए।
इस पाठ के माध्यम से आपने उपभोक्ता संस्कृति के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की। अब आप अपने अध्यापक की सहायता से सामंती संस्कृति के बारे में जानकारी प्राप्त करें और नीचे दिए गए विषय के पक्ष अथवा विपक्ष में कक्षा में अपने विचार व्यक्त करें।

क्या उपभोक्ता संस्कृति सामंती संस्कृति का ही विकसित रूप है।

आप प्रतिदिन टी.वी. पर ढेरों विज्ञापन देखते-सुनते हैं और इनमें से कुछ आपकी ज़बान पर चढ़ जाते हैं। आप अपनी पसंद की किन्हीं दो वस्तुओं पर विज्ञापन तैयार कीजिए।
उत्तर-
ये प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं हैं। विद्यार्थी इन्हें अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करेंगे।

HBSE 9th Class Hindi उपभोक्तावाद की संस्कृति Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक पाठ का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ नामक इस निबन्ध में लेखक का उद्देश्य यह बताना है कि आज के बदलते युग की नवीन . जीवन-शैली के साथ-साथ उपभोक्तावादी संस्कृति भी पनप रही है। आज उपभोक्तावादी जीवन-दर्शन में सुख की परिभाषा बदल गई हैं। मानव का चरित्र भी बदल रहा है। लेखक ने मानव को विलासिता की वस्तुओं व दिखावे का जीवन न जीने का उपदेश दिया है। विज्ञापनों की चकाचौंध में न आकर अपनी आवश्यकताओं पर ध्यान देना चाहिए। भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं के अवमूल्यन के प्रति भी हमारा ध्यान आकृष्ट करना लेखक का प्रमुख लक्ष्य है। दिखावे की संस्कृति से निरन्तर अशांति बढ़ती है, इसलिए दिखावे को त्यागकर सत्य का दामन थामना चाहिए उसी से ही शांति मिल सकती है। लेखक ने उपभोक्तावादी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के प्रति चिंता व्यक्त की है तथा हमें उसके प्रति सचेत किया है। यह इस निबन्ध का परम लक्ष्य है।

प्रश्न 2.
आधुनिक युग में आम आदमी के जीवन में विज्ञापन का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
आधुनिक युग में आम आदमी का जीवन अत्यंत व्यस्त हो गया है। हर वस्तु की जाँच-पड़ताल करना उसके लिए असंभव हो गया है। इसलिए वह अपनी इस कमी को विज्ञापन की सहायता से पूरा करता है। वह विज्ञापन के द्वारा वस्तुओं के गुणों, उनके प्रयोग आदि की जानकारी हासिल करता है। विज्ञापन ही आम व्यक्ति के सामने वस्तुओं के कई-कई विकल्प प्रस्तुत करता है जिससे वह अपनी पसंद की वस्तु प्राप्त कर सकता है। विज्ञापन आम आदमी के लिए कई बार हानिकारक भी सिद्ध होता है। वह आम आदमी के मन में नई वस्तुओं के लिए लालच उत्पन्न करता है। तब उसे पुरानी वस्तुएँ व्यर्थ लगने लगती हैं। इससे फिजूलखर्ची बढ़ती है।

प्रश्न 3.
लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?
उत्तर-
लेखक का मानना है कि हम नए विचारों को अपनाने के साथ-साथ अपनी संस्कृति की नींव से दूर न हटें अर्थात् अपनी संस्कृति का त्याग न करें। परन्तु उपभोक्ता संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को हिला रही है। आपसी दूरी बढ़ती जा रही है। नैतिकता पीछे छूटती जा रही है। स्वार्थ परमार्थ पर भारी पड़ता जा रहा है। यह हमारे समाज के लिए खतरा है। इसलिए लेखक ने इसे समाज के लिए चुनौती कहा है।

प्रश्न 4.
हम भारतीय लक्ष्य-भ्रम की पीड़ा से पीड़ित हैं। कैसे ?
उत्तर-
प्राचीनकाल से भारत के लोगों का उच्च विचार साधारण जीवन-शैली में विश्वास था। इस प्रकार हर व्यक्ति शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता था। किन्तु आज हम आधुनिकता की चमक-दमक में फँस गए हैं। हम अपने जीवन का लक्ष्य भूल गए हैं। भारतीय जीवन के पुराने संस्कार जो हमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि के लिए जीना सिखाते थे, हम उन्हें पूरी तरह भूल चुके हैं। हम पश्चिमी जीवन के उपभोक्तावाद के समर्थक बन बैठे हैं जिसमें कही संतुष्टि व शांति नहीं है। इस दिखावे व चमक-दमक के छलावे में फँसकर जीवन के वास्तविक लक्ष्य से भ्रमित हो गए हैं। हर समय दिखावे व उपभोक्तावाद की भावना से ग्रसित रहने के कारण हमारे जीवन में अशांति व दुःख ही छाए रहते हैं। इसलिए हम लक्ष्य-भ्रम की पीड़ा से पीड़ित रहने लगे हैं।

प्रश्न 5.
उपभोक्तावादी युग में विशिष्ट जन समाज का सामान्य जन पर क्या प्रभाव पड़ा है ?
उत्तर-
उपभोक्तावादी संस्कृति एवं सभ्यता के प्रचार-प्रसार से समाज का हर वर्ग प्रभावित हुआ है। जिनके पास अधिक धन है वे उपभोक्तावादी समाज के उच्च वर्ग के लोग हैं। इन्हें ही विशिष्ट जन भी कहते हैं। इस वर्ग के लोगों के सुख व वैभवपूर्ण जीवन को देखकर सामान्य जन भी उनका अनुकरण करने लगता है। वह भी उपभोक्तावादी संस्कृति की ओर लालायित हो उठता है। किन्तु उनकी आय सीमित होती है। वे उपभोक्तावादी संस्कृति में अपने आपको चाहते हुए भी सम्मिलित नहीं कर सकते इसलिए तनावपूर्ण जीवन जीने के लिए विवश हो जाते हैं।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

प्रश्न 6.
भारत में उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास कौन और क्यों कर रहा है? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में बताया गया है कि भारत में उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास करने में सामंती संस्कृति का योगदान रहा है। भारत में भले ही सामंत बदल गए हैं, किन्तु उनके गुण व आदतें अब तक वहीं हैं। इसके अतिरिक्त पाश्चात्य संस्कृति और सभ्यता का अंधानुकरण भी उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है। विज्ञापन का प्रचार-प्रसार भी उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास का एक प्रमुख कारण है। इसके अतिरिक्त आधुनिकता और दिखावे की अंधी दौड़ भी कुछ हद तक उपभोक्तावादी संस्कृति को प्रोत्साहित करने के लिए जिम्मेदार है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ पाठ के लेखक कौन हैं ?
(A) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
(B) प्रेमचंद
(C) महादेवी वर्मा
(D) श्यामाचरण दुबे
उत्तर-
(D) श्यामाचरण दुबे

प्रश्न 2.
श्यामाचरण दुबे का जन्म कब हुआ था ?
(A) सन् 1912 में
(B) सन् 1922 में
(C) सन् 1932 में
(D) सन् 1942 में
उत्तर-
(B) सन् 1922 में

प्रश्न 3.
श्यामाचरण दुबे की मृत्यु कब हुई ? .
(A) सन् 1986 में
(B) सन् 1990 में
(C) सन् 1992 में
(D) सन् 1996 में
उत्तर-
(D) सन् 1996 में

प्रश्न 4.
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ है एक
(A) निबंध
(B) कहानी
(C) एकांकी
(D) संस्मरण
उत्तर-
(A) निबंध

प्रश्न 5.
नए जीवन-दर्शन को लेखक ने कौन-सा दर्शन कहा है ?
(A) समाज-दर्शन
(B) उपभोक्तावाद का दर्शन
(C) साहित्य-दर्शन
(D) शिक्षा का दर्शन
उत्तर-
(B) उपभोक्तावाद का दर्शन

प्रश्न 6.
लेखक के अनुसार चारों ओर किस बात पर जोर दिया जा रहा है ?
(A) गीत गाने पर
(B) अधिक खर्च करने पर
(C) उत्पादन बढ़ाने पर ।
(D) बचत करने पर
उत्तर-
(C) उत्पादन बढ़ाने पर

प्रश्न 7.
लेखक के अनुसार आज किसे सुख समझा जाता है ?
(A) ईश्वर-भक्ति को
(B) उपभोग-भोग को
(C) अधिक धन को
(D) अत्यधिक वस्तुएँ खरीदने को
उत्तर-
(B) उपभोग-भोग को

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

प्रश्न 8.
बाजार कैसी सामग्री से भरा पड़ा है ?
(A) आवश्यकता की
(B) विलासिता की
(C) हवन की
(D) पूजा की
उत्तर-
(B) विलासिता की

प्रश्न 9.
नए डिज़ाइन के परिधान कैसे हैं ?
(A) सस्ते
(B) सुंदर और टिकाऊ
(C) महँगे
(D) घटिया
उत्तर-
(C) महँगे

प्रश्न 10.
उपभोक्तावादी समाज को कौन ललचाई दृष्टि से देखते हैं ?
(A) कंजूस लोग
(B) अमीर लोग
(C) साधारण लोग
(D) गरीब लोग
उत्तर-
(C) साधारण लोग

प्रश्न 11.
हमारी नई संस्कृति कैसी संस्कृति बन गई है ?
(A) अनुकरण की
(B) त्याग की
(C) उपभोग की
(D) पैसे की
उत्तर-
(A) अनुकरण की

प्रश्न 12.
हम कौन-सी दासता को स्वीकार करते जा रहे हैं ?
(A) धन की दासता
(B) बौद्धिक दासता
(C) भाषा की दासता
(D) सभ्यता की दासता
उत्तर-
(B) बौद्धिक दासता

प्रश्न 13.
कौन-सी शक्तियों के अभाव में हम दिग्भ्रमित होते जा रहे हैं ?
(A) संस्कृति की नियंत्रक शक्ति
(B) चारित्रिक शक्ति
(C) वैराग्य की शक्ति
(D) संस्कृति के परिवर्तन की शक्ति
उत्तर-
(A) संस्कृति की नियंत्रक शक्ति

प्रश्न 14.
हमारी मानसिक शक्ति कौन बदल रहा है ?
(A) सरकार
(B) विज्ञापन और प्रसार के तंत्र
(C) फैशन
(D) उद्योगपति
उत्तर-
(B) विज्ञापन और प्रसार के तंत्र

प्रश्न 15.
उपभोक्तावाद की संस्कृति में किसका घोर अपव्यय हो रहा है ?
(A) सीमित साधनों का
(B) भावनाओं का
(C) धर्म का
(D) पारस्परिक संबंधों का
उत्तर-
(A) सीमित साधनों का

प्रश्न 16.
लेखक ने ‘सुख’ किसे कहा है ?
(A) उपभोग सुख
(B) मानसिक व शारीरिक आराम
(C) धन की प्राप्ति
(D) वैराग्य सुख
उत्तर-
(A) उपभोग सुख

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

प्रश्न 17.
सांस्कृतिक अस्मिता का अर्थ है-
(A) सांस्कृतिक पहचान
(B) सांस्कृतिक विकास
(C) सांस्कृतिक पतन
(D) सांस्कृतिक मेल
उत्तर-
(A) सांस्कृतिक पहचान

प्रश्न 18.
दूसरों को श्रेष्ठ समझकर उनकी बौद्धिकता के प्रति बिना आलोचनात्मक दृष्टि अपनाए उसे स्वीकार कर लेना कहलाता है-
(A) बौद्धिक दासता
(B) बौद्धिक विलास
(C) बौद्धिक उन्नति
(D) बौद्धिक दिवालिया
उत्तर-
(A) बौद्धिक दासता

प्रश्न 19.
संभ्रांत महिलाओं की ड्रेसिंग टेबल पर कितने हजार की सौंदर्य सामग्री का होना मामूली बात है ?
(A) दस
(B) बीस
(C) तीस
(D) चालीस
उत्तर-
(C) तीस

प्रश्न 20.
सामान्य जन किस समाज को ललचाई दृष्टि से देखते हैं ?
(A) पूँजीपति समाज
(B) विशिष्टजन समाज
(C) संत-समाज
(D) वेतनभोगी समाज
उत्तर-
(B) विशिष्टजन समाज

प्रश्न 21.
लेखक के अनुसार भारत में अशांति और आक्रोश का प्रमुख कारण क्या है ?
(A) दिखावे की संस्कृति का विकास
(B) संस्कृति को भूल जाना
(C) संस्कृति का परिवर्तन
(D) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव
उत्तर-
(A) दिखावे की संस्कृति का विकास

प्रश्न 22.
भारतीय संस्कृति के पुराने संस्कार सिखाते हैं-
(A) संतोषमय जीवन जीना
(B) आवेशमय जीवन जीना
(C) आक्रोशमय जीवन जीना
(D) प्रतियोगितामय जीवन जीना
उत्तर-
(A) संतोषमय जीवन जीना

प्रश्न 23.
आधुनिक चकाचौंध में भारतीय किस पीड़ा से पीड़ित हैं ?
(A) वियोग की
(B) लक्ष्य भ्रम की
(C) अपव्यय की
(D) धन की बचत होने की
उत्तर-
(B) लक्ष्य भ्रम की

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

उपभोक्तावाद की संस्कृति प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या/भाव ग्रहण

1. धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है। एक नयी जीवन-शैली अपना वर्चस्व स्थापित कर रही है। उसके साथ आ रहा है एक नया जीवन-दर्शन-उपभोक्तावाद का दर्शन। उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर है चारों ओर। यह उत्पादन आपके लिए है; आपके भोग के लिए है, आपके सुख के लिए है। ‘सुख’ की व्याख्या बदल गई है। उपभोग-भोग ही सुख है। एक सूक्ष्म बदलाव आया है नई स्थिति में। उत्पाद तो आपके लिए हैं, पर आप यह भूल जाते हैं कि जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं। [पृष्ठ 35]

शब्दार्थ-जीवन-शैली = जीवन जीने का ढंग। वर्चस्व = प्रमुखता। जीवन-दर्शन = जीवन संबंधी विचारधारा। उत्पादन = निर्माण। माहौल = वातावरण। समर्पित होना = अपने-आपको सौंप देना।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इसके रचयिता श्री श्यामाचरण दुबे हैं। इस पाठ में लेखक ने आज की उपभोक्तावादी संस्कृति और विज्ञापन की चमक-दमक से भ्रमित समाज आदि के प्रश्नों पर प्रकाश डाला है। इन पंक्तियों में बताया गया है कि उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के विकास के कारण सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव आ गया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने बताया है कि आज भौतिक विकास के कारण समाज में धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है। आज एक नए जीवन जीने के ढंग की प्रमुखता स्थापित हो रही है। जीवन के प्रति नई सोच, विचारधारा, दर्शन अथवा उपभोक्तावाद का दर्शन आ रहा है। चारों ओर उत्पादन बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है अर्थात अधिक-से-अधिक वस्तुओं का निर्माण किया जा रहा है। यह उत्पादन आपके उपभोग के लिए है। आप इन सब वस्तुओं का प्रयोग करके सुख प्राप्त कर सकते हैं। आज के युग में सुख की परिभाषा बदल गई है। पहले सुख संतुष्टि या संतोष से संयमपूर्वक जीवन जीने से प्राप्त होता था। अब उपभोग-भोग ही सुख है अर्थात् अधिक-से-अधिक वस्तुओं का उपभोग ही सुख है। इस प्रकार इन परिस्थितियों में जीवन में एक सूक्ष्म बदलाव आया है। जीवन जीने के मानदंड अथवा मूल्य ही बदल गए हैं। अधिकाधिक भोग में संतुष्टि नहीं है। उपभोग की कामनाएँ बढ़ती ही जाती हैं। निश्चय ही, सभी उत्पादन हमारे लिए हैं, किन्तु हम यह भूल गए हैं जाने-अनजाने आज के वातावरण में हमारा चरित्र भी बदल गया है। हम आज उत्पादनों के प्रति अपने-आपको अर्पित कर रहे हैं। वस्तुतः विकास के साथ-साथ हमारे चरित्र का भी विकास होना चाहिए था, परन्तु ऐसा लगता है कि जैसे हम केवल उत्पादकों के भोग के लिए जी रहे हैं। यही हमारे जीवन का लक्ष्य बन गया है।

विशेष-

  1. लेखक ने आज की उपभोक्तावादी परिस्थितियों पर करारा व्यंग्य किया है।
  2. भौतिकवाद की कमियों की ओर संकेत किया गया है।
  3. उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास के साथ-साथ मानव चरित्र में आई गिरावट का उद्घाटन करना भी लेखक का लक्ष्य है।
  4. भाषा-शैली सरल, सहज एवं भावानुकूल है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) धीरे-धीरे क्या बदल रहा है ?
(2) उपभोक्तावाद किसे कहते हैं ?
(3) सुख की व्याख्या में क्या परिवर्तन आया है ?
(4) हम क्या भूल जाते हैं ?
उत्तर-
(1) धीरे-धीरे हमारा वातावरण बदल रहा है। एक नई संस्कृति पनप रही है। जीने का नया ढंग हम पर हावी हो रहा है।
(2) उपभोग को ही जीवन का सब कुछ मान लेना, उपभोक्तावाद कहलाता है। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि मनुष्य उपभोग को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान लेता है।
(3) पहले सुख के अंतर्गत शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक हर प्रकार का आनंद व संतुष्टि आती थी। किन्तु अब तो केवल उपभोग के साधनों को भोगना ही सुख कहलाता है।
(4) हम भूल जाते हैं कि जाने-अनजाने में आज के माहौल में हमारा चरित्र बदल रहा है। हम उत्पादन को समर्पित होते जा रहे हैं। हम उत्पादों के पूर्णतः गुलाम बनते जा रहे हैं।

2. संभ्रांत महिलाओं की ड्रेसिंग टेबल पर तीस-तीस हज़ार की सौंदर्य सामग्री होना तो मामूली बात है। पेरिस से परफ्यूम मँगाइए, इतना ही और खर्च हो जाएगा। ये प्रतिष्ठा-चिह्न हैं, समाज में आपकी हैसियत जताते हैं। पुरुष भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। पहले उनका काम साबुन और तेल से चल जाता था। आफ्टर शेव और कोलोन बाद में आए। अब तो इस सूची में दर्जन-दो दर्जन चीजें और जुड़ गई हैं। [पृष्ठ 36]

शब्दार्थ-संभ्रांत = अमीर। सौंदर्य = सुंदरता। परफ्यूम = सुगंधित तेल । प्रतिष्ठा = सम्मान। आफ्टर शेव = शेव करने के बाद लगाया जाने वाला पदार्थ।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित एवं श्री श्यामाचरण दुबे द्वारा रचित ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक निबंध से लिया गया है। इस पाठ में लेखक ने आज के युग में बढ़ती हुई उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के दुष्परिणामों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। इन पंक्तियों में अमीर वर्ग की स्त्रियों द्वारा सौंदर्य प्रसाधनों पर किए गए फिजूलखर्च का वर्णन किया गया है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास में अंधी प्रतिस्पर्धा का उल्लेख करते हुए कहा है कि आज अमीर वर्ग की नारियाँ केवल अपने-आपको श्रेष्ठ दिखाने की ललक में महँगे-से-महँगे सौंदर्य प्रसाधन खरीदती हैं। एक संभ्रांत महिला के ड्रेसिंग टेबल पर तीस-तीस हजार की सौंदर्य सामग्री का होना उसके लिए साधारण-सी बात है। ये लोग पेरिस से सुगंधित तेल मँगवाते हैं, जो इतनी ही कीमत में आते हैं। ऐसे महँगे सौंदर्य प्रसाधनों की आवश्यकता नहीं, अपितु ये तो प्रतिष्ठा के चिह्न हैं। समाज में अमीर होने के भाव को प्रदर्शित करते हैं तथा उनकी हैसियत भी बताते हैं कि उनमें कितना धन खर्च करने की शक्ति है। यह बात स्त्रियों पर ही लागू नहीं, अपितु पुरुष भी आज इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। पहले पुरुष केवल साबुन और तेल का ही प्रयोग करते थे। अब तो आफ्टर शेव, कोलोन आदि तरह-तरह के सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग भी खूब करते हैं। अब तो सौंदर्य प्रसाधनों की सूची में दर्जन-दो-दर्जन चीजें और जुड़ गई हैं। कहने का तात्पर्य है कि उपभोक्तावादी संस्कृति में कुछ वस्तुएँ तो पहले की भाँति अनिवार्य हैं किन्तु कुछ समाज में अपनी हैसियत का प्रदर्शन करने के लिए खरीदी जाती हैं।

विशेष-

  1. लेखक ने अमीर वर्ग के लोगों की प्रदर्शनप्रिय वृत्ति पर व्यंग्य किया है।
  2. उपभोक्तावादी संस्कृति फिजूलखर्ची को अधिक बढ़ावा देती है।
  3. अन्य प्रतिस्पर्धाओं की भाँति सौंदर्य प्रसाधनों के प्रयोग की प्रतिस्पर्धा पर भी प्रकाश डाला गया है।
  4. भाषा व्यंग्यात्मक एवं प्रभावशाली है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) संभ्रांत महिलाएँ कौन हैं ? उनकी किस वृत्ति पर कटाक्ष किया गया है ?
(2) सौंदर्य प्रसाधन क्या बनते जा रहे हैं ?
(3) पुरुष वर्ग भी किस दौड़ से पीछे नहीं और कैसे ?
(4) प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(1) अमीर परिवारों की महिलाओं को संभ्रांत महिलाएँ कहा जाता है। लेखक ने उनकी फिजूलखर्ची पर कटाक्ष किया है। उनकी ड्रेसिंग टेबल पर तीस-चालीस हजार की सामग्री का होना तो मामूली बात है।
(2) सौंदर्य प्रसाधन आज के समाज की झूठी प्रतिष्ठा के प्रतीक बनते जा रहे हैं। इससे समाज में आपकी हैसियत का पता चलता है।
(3) पुरुष वर्ग भी सौंदर्य प्रसाधन प्रयोग की अंधी दौड़ में पीछे नहीं रहा। पहले पुरुष साबुन व तेल से काम चला लेते थे। अब तो वे भी इस तरह साबुन, शैंपू, आफ्टर शेवलोशन, कोलोन आदि का प्रयोग करते हैं। उनकी इस सूची में और भी कई वस्तुएँ जुड़ गई हैं।
(4) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बताया है कि उपभोक्तावाद के इस युग में जहाँ फिजूलखर्ची बड़ी वहीं दिखावे की भावना ने भी जन्म लिया। कुछ ऐसी वस्तुएँ हैं जिनका वास्तव में इतना प्रयोग नहीं होता अपितु अपनी प्रतिष्ठा बनाने के लिए उन्हें महँगे दामों में खरीदकर रखा जाता है। इस दौड़ में स्त्रियों के साथ-साथ पुरुष भी आगे बढ़ रहे हैं।

3. हम सांस्कृतिक अस्मिता की बात कितनी ही करें; परंपराओं का अवमूल्यन हुआ है, आस्थाओं का क्षरण हुआ है। कड़वा सच तो यह है कि हम बौद्धिक दासता स्वीकार कर रहे हैं, पश्चिम के सांस्कृतिक उपनिवेश बन रहे हैं। हमारी नई संस्कृति अनुकरण की संस्कृति है। [पृष्ठ 37]

शब्दार्थ-अस्मिता = अस्तित्व, सत्ता। अवमूल्यन = मूल्यों में गिरावट आना। आस्था = विश्वास। क्षरण = विनाश । दासता = गुलामी। अनुकरण = पीछे चलने वाली।

प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक निबंध में से उद्धृत है। इसके रचयिता श्री श्यामाचरण दुबे हैं। इस निबंध में लेखक ने आज के युग में पनपती ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ के दुष्परिणामों से सावधान किया है। इन पंक्तियों में लेखक ने बताया है कि इस संस्कृति के विकास से मानवीय जीवन-मूल्यों को हानि पहुँची है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक का मत है कि आज हम भले ही अपने सांस्कृतिक जीवन की कितनी ही बातें क्यों न करें, किन्तु इसमें संदेह नहीं है कि इस नई संस्कृति के विकास से अर्थात् उपभोक्तावादी संस्कृति से हमारी परंपराओं के मूल्य में गिरावट अवश्य आई है। हमारे विश्वासों का भी. विनाश हुआ है। आज हम केवल भौतिक विकास की बात तो करते हैं, किन्तु इससे भावात्मक संबंधों के टूटने की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। यह कटु सत्य है कि हम बौद्धिक दासता को स्वीकार करते जा रहे हैं अर्थात् मानसिकता के स्तर पर हम दूसरों के गुलाम बनते जा रहे हैं। हमारी अपनी सोच व जीवन-शैली समाप्त हो रही है। पश्चिम देशों के लोगों ने अपने सांस्कृतिक उपनिवेश बना लिए हैं। आज की उपभोक्तावाद की नई संस्कृति वस्तुतः हमारी संस्कृति नहीं रही, अपितु वह दूसरों की नकल की संस्कृति बन गई है। कहने का भाव है कि आज की उपभोक्तावादी सोच के कारण हमारी भारतीय संस्कृति के मूल्यों को आघात पहुँचा है और हम पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति के मानसिक तौर पर गुलाम बनते जा रहे हैं।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

विशेष-

  1. लेखक ने उपभोक्तावाद की संस्कृति से उत्पन्न खतरों के प्रति हमें सचेत एवं सावधान किया है।
  2. भाषा-शैली विषयानुकूल एवं विश्लेषणात्मक है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) ‘सांस्कृतिक अस्मिता’ से आप क्या समझते हैं ?
(2) कड़वा सच क्या है ?
(3) कौन और कैसे बौद्धिक दास बने हैं ?
(4) सांस्कृतिक उपनिवेश क्या होते हैं ?
उत्तर-
(1) सांस्कृतिक अस्मिता, इन दोनों शब्दों के अर्थ अलग-अलग हैं। सांस्कृतिक का अर्थ है संस्कृति से संबंधित या विशेष जीवन-शैली जिसे अपनाकर लोग जीवन व्यतीत करते हैं। अस्मिता का अर्थ है-पहचान। इस प्रकार सांस्कृतिक अस्मिता का तात्पर्य है एक ऐसी जीवन-शैली जिससे किसी समाज विशेष की पहचान होती है।
(2) लेखक ने इस बात को कड़वा सच बताया है कि हम भारतीय अपनी परंपराओं एवं विचारधाराओं से हटकर पश्चिम से आई उपभोक्तावादी संस्कृति को स्वीकार करते जा रहे हैं।
(3) भारतवासी पश्चिम देशों की बौद्धिकता के दास बनते जा रहे हैं अर्थात हम भारतीय अपनी विचारधारा व सोच को हेय समझते हैं। पश्चिमी विचारों को श्रेष्ठ समझकर उन्हें अपना रहे हैं। इस प्रकार दूसरों की सोच को सही मानकर हम उनके बौद्धिक दास बन रहे हैं।
(4) जब कोई शक्तिशाली देश विजेता के रूप में दूसरे देश पर अपनी संस्कृति या जीवन-शैली को बलात् थोपता है और वहाँ के लोग उसे स्वीकार करके अपनी पहचान भूल जाते हैं, तब वह देश विजेता देश का सांस्कृतिक उपनिवेश बन जाता है। कहने का भाव है कि अपनी संस्कृति व विचारधारा तथा जीवन-शैली का प्रचार-प्रसार करके अपनी तरह की एक और कॉलोनी बना लेना।

4. समाज में वर्गों की दूरी बढ़ रही है, सामाजिक सरोकारों में कमी आ रही है। जीवन स्तर का यह बढ़ता अंतर आक्रोश और अशांति को जन्म दे रहा है। जैसे-जैसे दिखावे की यह संस्कृति फैलेगी, सामाजिक अशांति भी बढ़ेगी। हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का हास तो हो ही रहा है, हम लक्ष्य-भ्रम से भी पीड़ित हैं। विकास के विराट उद्देश्य पीछे हट रहे हैं, हम झूठी तुष्टि के तात्कालिक लक्ष्यों का पीछा कर रहे हैं। [पृष्ठ 38]

शब्दार्थ-सरोकार = संबंध, मेल-मिलाप। अंतर = भीतरी। आक्रोश = विरोध। अस्मिता = अस्तित्व, पहचान। हास = विनाश। लक्ष्य-भ्रम = उद्देश्य से भटकना। पीड़ित = दुखी। विराट = महान् । तुष्टि = संतुष्टि, पूर्ति । तात्कालिक = क्षणिक, उसी समय का।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक पाठ से अवतरित है। इस पाठ के लेखक श्री श्यामाचरण दुबे हैं। इस प्राठ में लेखक ने उपभोक्तावाद की संस्कृति से उत्पन्न खतरों के प्रति हमें सावधान किया है। इन पंक्तियों में बताया गया है कि आज उपभोक्तावाद के विकास से सामाजिक संबंधों में बिखराव आया है और मानसिक अशांति भी बढ़ी है। हम अपने जीवन के महान उद्देश्यों को भूल गए हैं।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने बताया है कि हम उपभोक्तावाद की इस संस्कृति के विकास से समाज में विद्यमान वर्गों की दूरियाँ बढ़ी हैं अर्थात् अमीर और अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और गरीब। मालिक और नौकर तथा कारखानेदार और मजदूर में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है। आपसी सद्भाव की भावना समाप्त होती जा रही है। एक ओर जीवन स्तर बढ़ता जा रहा है तो दूसरी ओर मन की शांति समाप्त होती जा रही है। हर व्यक्ति विकास के लिए व्याकुल है। लोगों के मन में आक्रोश की भावना बढ़ती जा रही है। लेखक का मत है कि जैसे-जैसे उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रसार एवं विकास होगा, वैसे-वैसे सामाजिक अशांति बढ़ेगी। उपभोक्तावाद के विकास से प्रतिस्पर्धा का जन्म होता है और प्रतिस्पर्धा में कभी किसी को चैन नहीं मिलता। इससे समाज में अशांति को बढ़ावा मिलता है। हमारे सांस्कृतिक जीवन का विनाश हो रहा है। हम अपनी संस्कृति को भूलकर उपभोक्तावाद की संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। आज हम अपने लक्ष्य से भटकने की पीड़ा से पीड़ित हैं। हमारे सामने कोई स्पष्ट एवं महान् उद्देश्य नहीं है, इसलिए हम भटकने की स्थिति में फँस गए हैं। हम झूठी तुष्टि के क्षणिक लक्ष्यों को अपनाते जा रहे हैं। तात्कालिक लक्ष्यों की पूर्ति से कभी भी स्थायी शांति प्राप्त नहीं हो सकती।

विशेष-

  1. लेखक ने उपभोक्तावाद से उत्पन्न नई संस्कृति में समाज के विभिन्न वर्गों में उत्पन्न संघर्ष व दूरियों की स्थिति पर प्रकाश डाला है।
  2. तात्कालिक व क्षणिक लक्ष्यों की अपेक्षा अपने जीवन में विराट एवं उदात्त लक्ष्यों की अपनाने की प्रेरणा दी गई है।
  3. भाषा-शैली अत्यंत सरल, स्पष्ट एवं भावानुकूल है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-

(1) आज के समाज की सबसे बड़ी चिंता क्या है ?
(2) समाज में आक्रोश और अशांति क्यों बढ़ रही है ?
(3) हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का हास कैसे हो रहा है ?
(4) ‘झूठी तुष्टि के तात्कालिक लक्ष्य’ का क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
(1) आज के समाज की सबसे बड़ी चिंता यह है कि समाज के विभिन्न वर्गों की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। सामाजिक संबंध बिखरते जा रहे हैं।
(2) जीवन स्तर के बढ़ते अंतर के कारण समाज में अशांति और आक्रोश बढ़ रहा है। आज अमीर अधिक अमीर होता जा रहा है। आम आदमी की खरीदने की क्षमता कम होती जा रही है। इस वर्ग के मन में इसलिए अशांति और आक्रोश है और धनी वर्ग में आपसी प्रतियोगिता की भावना के कारण अशांति है।
(3) आज हम अपनी जीवन-शैली, रहन-सहन व सोच को त्यागकर पश्चिम की जीवन-शैली और सोच को अपनाते जा रहे हैं। इसलिए हमारी सांस्कृतिक अस्मिता (पहचान) का ह्रास (हानि) हो रहा है।
(4) मानव को भोग के साधनों के उपभोग से कभी संतुष्टि नहीं हो सकती। इनके उपभोग की इच्छा बढ़ती ही जाती है। फिर वह इन्हीं को सुख मानकर मन को सांत्वना दे देता है। इसे ही ‘झूठी तुष्टि’ कहते हैं। इस झूठी तुष्टि को प्राप्त करने का तात्कालिक लक्ष्य है-उपभोग के आधुनिक साधन; जैसे एल.इ.डी., फ्रिज, कंप्यूटर, कार, मोबाइल फोन आदि।

उपभोक्तावाद की संस्कृति Summary in Hindi

उपभोक्तावाद की संस्कृति लेखक-परिचय

प्रश्न-
श्री श्यामाचरण दुबे का संक्षिप्त जीवन परिचय देते हुए उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री श्यामाचरण दुबे का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय-श्री श्यामाचरण दुबे का नाम सामाजिक वैज्ञानिकों में बड़े आदर से लिया जाता है। उन्होंने भारतीय समाज की बदलती परिस्थितियों पर जमकर लिखा है। ऐसे गंभीर चिंतक का जन्म सन् 1922 में मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में हुआ। उन्होंने आरंभिक शिक्षा स्थानीय पाठशाला में प्राप्त की। बाद में उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से मानव-विज्ञान में पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त की। वे भारत के अग्रणी समाज-वैज्ञानिक रहे हैं। उन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया तथा अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर भी सफलतापूर्वक कार्य किया। इसके साथ ही आजीवन लेखन-कार्य भी किया। ऐसे महान् लेखक का निधन सन् 1996 में हुआ।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

2. प्रमुख रचनाएँडॉ० श्यामाचरण दुबे ने अनेक ग्रंथों की रचना की है। उनमें से हिंदी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं’मानव और संस्कृति’, ‘परंपरा और इतिहास बोध’, ‘संस्कृति तथा शिक्षा’, ‘समाज और भविष्य’, ‘भारतीय ग्राम’, ‘संक्रमण की पीड़ा’, ‘विकास का समाज-शास्त्र’, ‘समय और संस्कृति’ आदि।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-डॉ० श्यामाचरण दुबे जहाँ महान् समाजशास्त्री हैं, वहीं साहित्यकार भी हैं। उन्होंने आजीवन अध्यापन कार्य किया। उन्होंने अपने युग के समाज, जीवन और संस्कृति का गहन अध्ययन किया है। उनसे संबंधित ज्वलंत विषयों पर उनके विश्लेषण और स्थापनाएँ उल्लेखनीय हैं। डॉ० -दुबे ने आज के बदलते जीवन मूल्यों में आ रही गिरावट पर चिंता व्यक्त की है। वे परिवर्तन के विरोधी नहीं हैं, अपितु गलत दिशा में हो रहे परिवर्तनों का उन्हें बेहद दुःख है। आज के भौतिकतावादी और प्रतियोगिता की अंधी दौड़ के युग में वे चाहते हैं कि हमें विकास तो करना चाहिए, किन्तु अपनी सभ्यता और संस्कृति का मूल्य चुकाकर नहीं। व्यक्तिगत विकास व सुख के साथ-साथ परोपकार की भावना को नहीं भूलना चाहिए। ऐसा उनका स्पष्ट मत है।
भारत की जन-जातियों और ग्रामीण समुदायों पर केंद्रित उनके लेखों ने बृहत समुदाय का ध्यान आकृष्ट किया है। वे जानते हैं कि भारतवर्ष की संस्कृति की जड़ें यहाँ के ग्रामीण जीवन में ही फँसी हुई हैं। यदि हम अपनी संस्कृति के वास्तविक रूप को देखना चाहते हैं तो हमें ग्रामीण जीवन-शैली को समझना होगा।

4. भाषा-शैली-श्री श्यामाचरण दुबे के साहित्य की भाषा-शैली अत्यंत सरल, सहज एवं स्वाभाविक है। वे जटिल विचारों को तार्किक विश्लेषण के साथ सहज भाषा में व्यक्त करने की कला में कुशल हैं। उनकी भाषा में वाक्य-गठन अत्यंत सरल एवं स्पष्ट है। उन्होंने लोक प्रसिद्ध मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग भी विषयानुकूल किया है।

उपभोक्तावाद की संस्कृति पाठ-सार/गद्य-परिचय

प्रश्न-
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक पाठ का सार/गद्य-परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ आज के जीवन की समस्या को उजागर करने वाला निबंध है। यह पाठ बाजार की गिरफ्त में आ रहे समाज की वास्तविकता को प्रस्तुत करता है। आज का युग तीव्र गति से बदल रहा है। इस बदलते युग में एक नई जीवन-शैली का उद्भव हो रहा है। इसके साथ ही उपभोक्तावादी जीवन-दर्शन भी आ रहा है। चारों ओर उत्पादन के बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है। यह सब हमारे सुख के लिए तथा भोग के लिए हो रहा है। आज सुख की परिभाषा भी बदल गई है। वस्तुओं का भोग ही सुख समझा जाने लगा है। नई परिस्थितियों में जाने-अनजाने में हमारा चरित्र ही बदलता जा रहा है। हम अपने-आपको उत्पाद को अर्पित करते जा रहे हैं।

आज बाजार विलासिता की वस्तुओं से भरा पड़ा है। आज हमें लुभाने के लिए दैनिक जीवन मे काम आने वाली वस्तु के तरह-तरह के विज्ञापन दिए जा रहे हैं। उदाहरणार्थ, टूथ-पेस्ट को ही ले लीजिए। कितने ही प्रकार के टूथ-पेस्ट आ गए हैं।

प्रत्येक टूथ-पेस्ट के अलग-अलग गुण बताकर हमें लुभाया जा रहा है। इसी प्रकार टूथ-ब्रश के लिए भी तरह-तरह के विज्ञापन दिए जा रहे हैं। इससे हम इनके प्रति आकृष्ट होकर आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ खरीद लेते हैं। इसी प्रकार सौंदर्य प्रसाधन की वस्तुओं को देख सकते हैं। प्रति माह बाजार में नए-नए उत्पादन आ रहे हैं। उच्चवर्ग की महिलाएँ तो अपने ड्रेसिंग टेबल पर तीस-तीस हजार रुपए का सामान खरीदकर रख लेती हैं। यह सब उनके उपभोग के लिए कम और प्रतिष्ठा के लिए अधिक है। पुरुष भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहते।

इसी प्रकार वस्त्रों की दुनिया में भी यही दशा है। जगह-जगह बुटीक खुल गए हैं। नए-नए डिजाइन के परिधान बाजार में आ गए हैं। प्रतिदिन नए-नए डिज़ाइन आते हैं और पहले वाले परिधान व्यर्थ लगने लगते हैं। इसी प्रकार घड़ी का काम समय बताना है। चार-पाँच सौ रुपए की घड़ी भी यह काम करती है, किन्तु अपनी प्रतिष्ठा दिखाने के लिए पचास-साठ हजार रुपए की ही नहीं लाख, डेढ़ लाख रुपए की घड़ियाँ भी खरीदी जाती हैं। इसी प्रकार म्यूजिक सिस्टम और कंप्यूटर आदि वस्तुएँ भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने के लिए खरीदी जाती हैं। यह बात उच्च वर्ग के लिए ही नहीं है, अपितु मध्य वर्ग के लोग भी पीछे नहीं रहते। अतः समाज में उपभोक्तावाद की संस्कृति के युग में अंधी होड़ से समाज में जीवन-स्तर भले ऊपर उठ रहा हो, किन्तु सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं।

आज बात भोजन खाने की हो या फिर बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलवाने की हो, पाँच सितारा होटल या स्कूल का होना अनिवार्य है। बीमार पड़ने पर पाँच सितारा अस्पतालों में जाना भी प्रतिष्ठा का प्रदर्शन है। इतना ही नहीं, अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में तो स्वयं मरने से पहले ही अपने अंतिम संस्कार और अनंत विश्राम का प्रबंध भी कर सकते हैं, किन्तु एक विशेष मूल्य चुकाकर। आने वाले समय में यह कार्य भारत में भी हो सकता है। प्रतिष्ठा के अनेक रूप हो सकते हैं, भले ही वे हास्यास्पद ही क्यों न हों। यह उदाहरण विशिष्टजन समाज (धनी लोगों) का है, किन्तु साधारण व्यक्ति भी इसे ललचाई हुई दृष्टि से देखते हैं तथा अपने मन की शांति को खो बैठते हैं।

भारतवर्ष में धनी लोग अर्थात् सामंती संस्कृति के तत्त्व पहले भी रहे हैं, किन्तु आज सामंती संस्कृति के अर्थ बदल गए हैं। आज हम सांस्कृतिक अस्मिता की बात भले ही करें, किन्तु सच्चाई यह है कि परंपराओं का अवमूल्यन हो रहा है और आस्थाएँ टूट रही हैं। हम पश्चिम की बौद्धिक दासता को तेज गति से अपनाने में लगे हुए हैं। आज की नई संस्कृति केवल ढोंग है। यह तो अनुकरण संस्कृति है। प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में हम अपने को खोकर छदम आधुनिकता की गिरफ्त में आते जा रहे हैं, दिग्भ्रमित हो रहे हैं। हमारा समाज ही दूसरे से निर्देशित हो गया है। विज्ञापन और प्रसार के साधनों ने हमारी मानसिकता बदल डाली है।

लेखक ने इस संस्कृति के फैलाव व प्रसार के परिणाम के प्रति गंभीर चिंता व्यक्त की है। हमारे सीमित साधनों का अपव्यय हो रहा है। जीवन की गुणवत्ता आलू के चिप्स से नहीं सुधर सकती और न ही नए बहुविज्ञापित शीतल पेयों से। आज उपभोक्तावाद की संस्कृति के उदय के कारण आपसी दूरी बढ़ती जा रही है। जीवन का बढ़ता हुआ स्तर मानव-जीवन में अशांति और आक्रोश को जन्म दे रहा है। दिखावे की संस्कृति से अशांति बढ़ेगी तथा सांस्कृतिक अस्मिता का विनाश होगा। हमारे विराट उद्देश्य धुंधले पड़ गए हैं तथा मर्यादाएँ टूट रही हैं। नैतिकता पीछे छूटती जा रही है। स्वार्थ परमार्थ पर भारी पड़ता जा रहा है। भोग की कामनाएँ आकाश को छू रही हैं। इनकी कोई सीमा दिखाई नहीं देती।

गांधी जी ने कहा था कि स्वस्थ सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाज़े-खिड़की खुले रखें पर अपनी बुनियाद पर कायम रहें। उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमारी सामाजिक नींव को ही हिलाकर रख दिया है। यह हमारे लिए चिंता एवं चुनौती का विषय है।

कठिन शब्दों के अर्थ –

(पृष्ठ-35) : वर्चस्व = प्रधानता। स्थापित होना = बनना। जीवन-दर्शन = जीवन के प्रति विचारधारा, सोच। उत्पादन = वस्तुओं का निर्माण। सूक्ष्म = बारीक । बदलाव = परिवर्तन। माहौल = वातावरण, परिस्थितियाँ । विलासिता = ऐश्वर्य। लुभाना = आकृष्ट करना। दुर्गंध = बदबू। मैजिक फार्मूला = जादुई तरीका। बहुविज्ञापित = अत्यधिक प्रचारित/सूचित। कीमती ब्रांड = महँगी वस्तु। सौंदर्य प्रसाधन = सुंदरता बढ़ाने वाली सामग्री।

(पृष्ठ-36) : जर्स = सूक्ष्म कीटाणु। संभ्रांत औरतें = अमीर महिलाएँ। प्रतिष्ठा-चिहून = सम्मानसूचक। परिधान = पहनने के वस्त्र। बुटीक = वस्त्र भंडार। ट्रेंडी = रिवाज के। म्यूज़िक सिस्टम = संगीत के साधन।

(पृष्ठ-37) : हास्यास्पद = हँसी के योग्य। विशिष्टजन = विशेष व्यक्ति (अमीर लोग)। निगाहें = नज़रें । सामंत = अमीर लोग। मुहावरा बदलना = अर्थ में परिवर्तन होना। अस्मिता = पहचान, अस्तित्व। अवमूल्यन = मूल्य गिरा देना।
प्रतिस्पर्धा = होड़। उपनिवेश = वह विजित देश, जिसमें विजेता राष्ट्र के लोग आकर बस गए हों।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

(पृष्ठ-38) : गिरफ्त = पकड़। नियंत्रक = नियंत्रण करने वाली। क्षीण = कमजोर। दिग्भ्रमित = दिशाहीन, रास्ते से भटकना। वशीकरण = वश में करना। अपव्यय = फिजूलखर्च। आक्रोश = गुस्सा। तात्कालिक = उसी समय का। परमार्थ = दूसरों की भलाई। हावी होना = प्रभाव पड़ना। आकांक्षाएँ = इच्छाएँ। आसमान को छूना = बहुत अधिक बढ़ना। बुनियाद = नींव।

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HBSE 9th Class Sanskrit रचना लघु निबंध-लेखनम्

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions रचना Laghu Nibandh Lekhanam लघु निबंध-लेखनम् Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit रचना लघु निबंध-लेखनम्

निबंध-लेखनम् Class 9 HBSE

(ख) लघु निबन्ध लेखनम्
1. परोपकारः
1. परेषां हित साधनम् एव परोपकारः कथ्यते।
2. संसारे परोपकारस्य भावना सर्वत्र दृश्यते।
3. संसारस्य प्रत्येक पदार्थः परोपकारे संलग्नः अस्ति।
4. वृक्षाः परोपकाराय एव फलन्ति।
5. नद्यः परोपकाराय एव प्रवहन्ति।
6. भारतवर्षे अनेकाः परोपकारिणः पुरुषाः अभवन्।
7. स्वामी दयानन्दः स्वजीवनम् परोपकाराय त्यक्तवान्।
8. सत्यं कथितम् परोपकाराय सतां विभूतयः।

2. दीपावली
1. दीपावली भारतवर्षस्य प्राचीनतमं पर्वः अस्ति।
2. दीपानाम् अवलिः इति दीपावली कथ्यते।
3. अस्मिन् दिने सर्वत्र पवित्रता विराजते।
4. जनाः स्वगृहाणि विद्युत प्रकाशैः। दीपानां प्रकाशैः सुसज्जयन्ति।
5. अस्य पर्वस्य ऐतिहासिक महत्त्वम् अपि अस्ति।
6. अस्मिन् एवं दिने श्रीरामचन्द्रः रावणं हत्या अयोध्यायाम् आगतवान् ।
7. अतः वयम् आनन्देन दीपावलीम् मानयेन।

Class 9 HBSE निबंध-लेखनम्

HBSE 9th Class Sanskrit रचना लघु निबंध-लेखनम्

3. सदाचारः
1. सज्जनानाम् आचारः सदाचारः कथ्यते।
2. जीवने सदाचारस्य स्थानं महत्त्वपूर्णम् अस्ति।
3. आचारवान् पुरुषः सर्वत्र पूज्यते।
4. सदाचारात् एव मनुष्यः दीर्घमायुः वैभवं च प्राप्नोति।
5. आचारहीनाः जनाः अपवित्राः भवन्ति।
6. उक्तं च-“आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः।”
7. . अतः एव सदाचरणं सर्वेषां कृते अत्यावश्यकम् अस्ति।

4. अनुशासनम्
1. नियम-पालनं आज्ञापालनं वा अनुशासनं भवति।
2. अनुशासनं जीवने परमम् आवश्यकम् अस्ति।
3. परिवारे, विद्यालये, समाजे, राष्ट्रे सर्वत्र अस्य आवश्यकता वर्तते।
4. अनुशासनस्य पालनेन उन्नतिः भवति।
5. नियम पालनस्य अभावे जीवनं दुष्करं भवेत्।
6. अद्य छात्रेषु अनुशासनस्य अभावः अस्ति।
7. छात्राः गुरोः आज्ञां न पालयन्ति न च पित्रोः आदेशं स्वीकुर्वन्ति।

HBSE 9th Class Sanskrit रचना लघु निबंध-लेखनम्

5. विद्यायाः महत्त्वम्
1. विद्या धनं सर्व धनेषु प्रधानम् अस्ति।
2. अस्याः कोशः अनुपमः अस्ति।
3. विद्या मानवानां विनयं ददाति।
4. अस्याः प्रभावेण नरः उन्नतिं प्राप्नोति।
5. विद्यया एव नरः ज्ञान-विज्ञानादीनां सम्यक् ज्ञानम् आप्नोति।
6. विद्याभ्यासः ज्ञाने उन्नतिं करोति।
7. विद्याविहीनः नरः पशुतुल्यः अस्ति।

अभ्यासार्थ प्रश्नाः

1. अधोलिखित-विषयेषु लघु-निबन्धं लिखत.
संस्कृतस्य महत्त्वम्, मम विद्यालयः, सत्संगति।

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HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 लौहतुला

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 लौहतुला Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 लौहतुला

HBSE 9th Class Sanskrit लौहतुला Textbook Questions and

लौहतुला पाठ का सारांश HBSE 9th Class

I. अधोलिखितानां सूक्तिानां भावं हिन्दी भाषायां लिखत
(निम्नलिखित सूक्तियों के भाव हिन्दी भाषा में लिखिए)
(क) विभवहीनो यो वसेत् स पुरुषाधमः।
(ख) त्वदीया तुला मूषकैक्षिता।
(ग) नदीतटात्स श्येनेन हृतः।
उत्तराणि:
(क) भावार्थ-प्रस्तुत सूक्ति महाकवि विष्णुशर्मा विरचित ‘पञ्चतन्त्र’ नामक कथा ग्रन्थ से संकलित पाठ ‘लौहतुला’ में से उद्धृत है। इस संसार में धनहीन मनुष्य सबसे निम्न कोटि का मनुष्य माना जाता है, क्योंकि धन-ऐश्वर्य से हीन रहने वाला मनुष्य नीच पुरुष होता है। निर्धनता मनुष्य को बुरे-से-बुरा कर्म करने के लिए मजबूर कर देती है। विशेषकर उस व्यक्ति की स्थिति और भी चिन्तनीय हो जाती है जो अमीर होकर समय के चलते कुछ दिन बाद निर्धन हो जाता है। इस प्रकार के निर्धन व्यक्ति का यही प्रयास होता है कि वह किसी-न-किसी प्रकार से धन संग्रह करे। यही सोचकर जीर्णधन धन कमाने की इच्छा से किसी दूसरे देश में जाना चाहता है।

(ख) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति महाकवि विष्णुशर्मा विरचित ‘पञ्चतन्त्र’ नामक कथा ग्रन्थ से संकलित पाठ ‘लौहतुला’ में से उद्धृत है। जीर्णधन नामक वणिक् पुत्र अपनी लोहे की तराजू किसी सेठ के घर रख देता है। जब विदेश से धन संग्रह के बाद वापस आकर जीर्णधन सेठ से अपनी तराजू माँगता है तो सेठ कहता है कि तुम्हारी तराजू को चूहे खा गए। सेठ की बातों से ही उसका झूठ पकड़ा जा रहा है, क्योंकि लोहे की वस्तु को चूहे खा ही नहीं सकते। वस्तुतः सेठ निर्धन को तराजू वापस देना ही नहीं। चाहता। इसलिए चूहों द्वारा तराजू के खाने की बात करता है।

(ग) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति महाकवि विष्णुशर्मा विरचित ‘पञ्चतन्त्र’ नामक कथा ग्रन्थ से संकलित पाठ ‘लौहतला’ में से उद्धृत है। जीर्णधन ने सेठ से बदला लेने के लिए उसके पुत्र को पर्वत की गुफा में छिपाकर गुफा के द्वार को एक बड़े पत्थर से बन्द कर दिया। जब सेठ ने अपने पुत्र के विषय में जीर्णधन से पूछा तो उसने कहा कि नदी के तट से उसे बाज उठाकर ले गया। जिस प्रकार लोहे की तराजू को चूहे नहीं खा सकते, उसी प्रकार शिशु को बाज उठाकर नहीं ले जा सकता। परन्तु यहाँ ‘जैसे को तैसा’ वाली कहावत सही प्रतीत होती है। जैसा जवाब जीर्णधन को सेठ ने दिया था, वैसा ही जवाब जीर्णधन ने सेठ को दिया।

लौहतुला HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 लौहतुला

II. अधोलिखितान गद्यांशान पठित्वा प्रदत्त प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतपूर्णवाक्येन लिखत
(निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्यों में लिखिए)
(1) तस्य च गृहे लौहघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुला आसीत्। तां च कस्यचित् श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं प्रस्थितः। ततः सुचिरं कालं देशान्तरं यथेच्छया भ्रान्त्वा पुनः स्वपुरम् आगत्य तं श्रेष्ठिनम् अवदत्-“भोः श्रेष्ठिन् ! दीयतां मे सा निक्षेपतुला।” सोऽवदत्-“भोः! नास्ति सा, त्वदीया तुला मूषकैः भक्षिता” इति।
लौहतुला
(क) तस्य गृहे लौहघटिता का आसीत् ?
(ख) किम् कृत्वा सः देशान्तरं प्रस्थितः?
(ग) ‘खादिता’ इति क्रियापदस्य अत्र किं पर्यायपदं प्रयुक्तम्?
(घ) श्रेष्ठी जीर्णधन किम् उवाच?
(ङ) स्वपुरम् आगत्य कः श्रेष्ठिनम् उवाच?
उत्तराणि:
(क) तस्य गृहे लौहघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुलासीत्।
(ख) सः लौहतुलां कस्यचित् श्रेष्ठिनः गृहेनिक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं प्रस्थितः।
(ग) ‘खादिता’ इति क्रियापदस्य पर्यायपदं अत्र ‘भक्षिता’ इति प्रयुक्तम्।
(ङ) स्वपुरम् आगत्य जीर्णधनः श्रेष्ठिनम् उवाच।
(घ) श्रेष्ठी जीर्णधन उवाच ‘भोः श्रेष्ठिन्! दीयतां मे सा निक्षेपतुला।

(2) जीर्णधनः अवदत्-“भोः श्रेष्ठिन्! नास्ति दोषस्ते, यदि मूषकैः भक्षितता। ईदृशः एव अयं संसारः।
न किञ्चिदत्र शाश्वतमस्ति। परमहं नद्यां स्नानार्थं गमिष्यामि। तत् त्वम् आत्मीयं एनं शिशुं धनदेवनामानं मया सह स्नानोपकरणहस्तं प्रेषय” इति।
(क) नास्ति ते दोषः इति कः आह?
(ख) नद्यां स्नानार्थं कः गमिष्यति?
(ग) ‘गुणः’ इति पदस्य अत्र किं विलोमपदं प्रयुक्तम्?
(घ) मया सह कं प्रेषय?
(ङ) धनदेवः कस्य पुत्रः अस्ति?
उत्तराणि:
(क) नास्ति ते दोषः इति जीर्णधनः आह।
(ख) नद्यां स्नानार्थं जीर्णधनः गमिष्यति।
(ग) ‘गुणः’ इति पदस्य अत्र ‘दोषः’ विलोमपदं प्रयुक्तम्।
(घ) मया सह शिशुं प्रेषय।
(ङ) धनदेवः श्रेष्ठिनः पुत्रः अस्ति।

(3) “भोः सत्यवादिन् ! यथा श्येनो बालं न नयति, तथा मूषका अपि लौहघटितां तुलां न भक्षयन्ति। तदर्पय मे तुलाम्, यदि दारकेण प्रयोजनम्।” इति।
एवं विवदमानौ तौ द्वावपि राजकुलं गतौ । तत्र श्रेष्ठी तारस्वरेण प्रोवाच-“भोः! वञ्चितोऽहम् ! वञ्चितोऽहम् ! अब्रह्मण्यम् ! अनेन चौरेण मम शिशः अपहृतः” इति।
(क) श्येनः कं न नयति?
(ख) लौहघटितां तुलां के न भक्षयन्ति?
(ग) ‘पुत्रेण’ इति पदस्य अत्र किं पर्यायपदं प्रयुक्तम् ?
(घ) श्रेष्ठी तारस्वरेण किं प्रोवाच?
(ङ) तौ द्वावपि कुत्र गतौ?
उत्तराणि:
(क) श्येनः बालं न नयति।
(ख) लौहघटितां तुलां मूषकाः न भक्षयन्ति।
(ग) ‘पुत्रेण’ इति पदस्य अत्र ‘दारकेण’ प्रयुक्तम्।
(घ) श्रेष्ठी तारस्वरेण प्रोवाच-‘भोः! अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्! मम शिशुरनेन चौरेणापहृतः’ ।
(ङ) तौ द्वावपि राजकुलं गतौ।

Shemushi Sanskrit Class 9 Chapter 8 Solutions HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 लौहतुला

III. स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूल पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए)
(क) जीर्णधनस्य गृहे लौहघटिता तुलासीत्।
(ख) त्वदीया तुला मूषकैर्भक्षिता।
(ग) इदृक् एव अयं संसारः।
(घ) वणिक् पुत्रः अभ्यागतेन सह प्रस्थितः ।
(ङ) श्येनः बालं न नयति।
उत्तराणि:
(क) कस्य गृहे लौहघटिता तुलासीत् ?
(ख) त्वदीया का मूषकै क्षिता?
(ग) इदृक् एव अयं कः?
(घ) वणिक् पुत्रः केन सह प्रस्थितः?
(ङ) श्येनः कं न नयति?

9th Class Sanskrit Chapter 8 Question Answer HBSE

IV. अधोलिखितानि वाक्यानि घटनाक्रमानुसारं पुनः लिखत
(निम्नलिखित वाक्यों को घटनाक्रम के अनुसार दोबारा लिखिए)
(अ) (क) ईदृशः एव अयं संसारः। न किञ्चिदत्र शाश्वतमस्ति।
(ख) ततः सुचिरं कालं देशान्तरं यथेच्छया भ्रान्त्वा पुनः स्वपुरम् आगत्य।
(ग) आसीत् कस्मिंश्चिद् अधिष्ठाने जीर्णधनो नाम वणिक्पुत्रः।
(घ) श्रेष्ठिनो आह–“भोः श्रेष्ठिन्! नास्ति दोषस्ते, यदि मूषकैर्भक्षितेति।”
(ङ) ‘जीर्णधनो गृहे लौहघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुलासीत् ।
उत्तराणि:
(ग) आसीत् कस्मिंश्चिद् अधिष्ठाने जीर्णधनो नाम वणिक्पुत्रः।
(ङ) जीर्णधनो गृहे लौहघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुलासीत्।
(ख) ततः सुचिरं कालं देशान्तरं यथेच्छया भ्रान्त्वा पुनः स्वपुरम् आगत्य।
(घ) श्रेष्ठिनो आह–“भोः श्रेष्ठिन् ! नास्ति दोषस्ते, यदि मूषकैक्षितेति।”
(क) ईदृशः एव अयं संसारः। न किञ्चिदत्र शाश्वतमस्ति।

(ब)
(क). अथ धर्माधिकारिणः तम् अवदन्-“भोः! समर्प्यतां श्रेष्ठिसुतः” ।
(ख) एवं विवदमानौ तौ द्वावपि राजकुलं गतौ।
(ग) तेन वणिजा पृष्ट–“भोः! अभ्यागत! कथ्यतां कुत्र मे शिशुः यः त्वया सह नदीं गतः” ?
(घ) तत्र श्रेष्ठी तारस्वरेण प्रोवाच-“भोः! अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम् ! मम शिशुरनेन चौरेणापहृतः” इति।
(ङ) यथा श्येनो बालं न नयति, तथा मूषका अपि लौहघटितां तुलां न भक्षयन्ति।
उत्तराणि:
(ग) तेन वणिजा पृष्ट-“भोः! अभ्यागत! कथ्यतां कुत्र मे शिशुः यः त्वया सह नदीं गतः” ?
(ङ) यथा श्येनो बालं न नयति, तथा मूषका अपि लौहघटितां तुलां न भक्षयन्ति।
(ख) एवं विवदमानौ तौ द्वावपि राजकुलं गतौ।
(घ) तत्र श्रेष्ठी तारस्वरेण प्रोवाच-“भोः! अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्! मम शिशुरनेन चौरेणापहृतः” इति।
(क) अथ धर्माधिकारिणः तम् अवदन् – “भोः! समर्म्यतां श्रेष्ठिसुतः”।

Class 9th Sanskrit Chapter 8 HBSE

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v. अधोलिखित प्रश्नानाम् चतुषु वैकल्पिक-उत्तरेषु उचितमुत्तरं चित्वा लिखत- ।
(निम्नलिखित प्रश्नों के दिए गए चार विकल्पों में से उचित उत्तर का चयन कीजिए)
1. वणिक् पुत्रस्य नाम किम् आसीत् ?
(i) जीर्णधनः
(ii) धनदेवः
(iii) अजीर्णधनः
(iv) अधनदेव
उत्तरम्:
(i) जीर्णधनः

2. मूषकैः का भक्षिता?
(i) अन्नैः
(ii) तुला
(iii) फलानि
(iv) आम्राणि
उत्तरम्:
(ii) तुला

3. वणिक शिशुः केन सह प्रस्थितः?
(i) बालकेन
(ii) अभ्यागतेन
(iii) पितृणा
(iv) जनन
उत्तरम्:
(ii) अभ्यागतेन

4. विवदमानौ तौ कुत्र गतौ?
(i) देवालयं
(ii) न्यायालयं
(iii) राजकुलं
(iv) धर्मालय
उत्तरम्:
(iii) राजकुलं

5. जीर्णधनः गिरिगुहा द्वारं कया आच्छाद्य गृहमागतः?
(i) बृहच्छिलया
(ii) लौहतुलया
(iii) श्येनेन
(iv) वृक्षकाष्ठेन
उत्तरम्:
(i) बृहच्छिलया

6. ‘द्वौ + अपि’ अत्र सन्धियुक्तपदम् अस्ति
(i) द्वौऽपि
(ii) द्वयोपि
(iii) द्वावपि
(iv) द्वयोऽपि
उत्तरम्:
(iii) द्वावपि

7. ‘तुलासीत्’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदम् अस्ति
(i) तुलां + आसीत्
(ii) तुला + ऽसीत्
(iii) तुलाः + आसीत्
(iv) तुला + आसीत्
उत्तरम्:
(iv) तुला + आसीत्

8. ‘भ्रान्त्वा’ इति पदे कः प्रत्ययः अस्ति?
(i) क्त्वा
(ii) तुमुन्
(iii) शत
(iv) क्तवतु
उत्तरम्:
(i) क्त्वा

9. ‘शिशुः’ इति पदस्य किं पर्यायपदम् ?
(i) बालिका
(ii) जनकः
(iii) बालकः
(iv) पितरः
उत्तरम्:
(iii) बालकः.

10. “पृष्ट च तेन वणिजा” इति वाक्ये अव्ययपदम् अस्ति
(i) तेन
(ii) पृष्टः
(iii) च
(iv) वणिजा
उत्तरम्:
(ii) च

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योग्यताविस्तारः

यह पाठ विष्णुशर्मा द्वारा रचित ‘पञ्चतन्त्रम्’ नामक कथाग्रन्थ से ‘मित्रभेद’ नामक तन्त्र से सङ्कलित है। इसमें विदेश से लौटकर जीर्णधन नामक व्यापारी अपनी धरोहर (तराजू) को सेठ से माँगता है। ‘तराजू चूहे खा गये हैं ऐसा सुनकर जीर्णधन उसके पुत्र को स्नान के बहाने नदी तट पर ले जाकर गुफा में छिपा देता है। सेठ द्वारा अपने पुत्र के विषय में पूछने पर जीर्णधन कहता है कि ‘पुत्र को बाज उठा ले गया है। इस प्रकार विवाद करते हुए दोनों न्यायालय पहुँचते हैं जहाँ धर्माधिकारी उन्हें समुचित न्याय प्रदान करते हैं।

ग्रन्थ परिचय-महाकवि विष्णुशर्मा (200 ई० से 600 ई० के मध्य) ने राजा अमरसिंह के पुत्रों को राजनीति में पारंगत करने के उद्देश्य से ‘पञ्चतन्त्रम्’ नामक सुप्रसिद्ध कथाग्रन्थ की रचना की थी। यह ग्रन्थ पाँच भागों में विभाजित है। इन्हीं भागों को ‘तन्त्र’ कहा गया है। पञ्चतन्त्र के पाँच तन्त्र हैं-मित्रभेदः, मित्रसंप्राप्तिः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः और अपरीक्षितकारकम्। इस ग्रन्थ में अत्यन्त सरल शब्दों में लघुकथाएँ दी गई हैं। इनके माध्यम से ही लेखक ने नीति के गूढ़ तत्त्वों का प्रतिपादन किया है।

भावविस्तारः

‘लौहतुला’ नामक कथा में दी गई शिक्षा के सन्दर्भ में इन सूक्तियों को भी देखा जाना चाहिए।
1. न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्यचिद् रिपुः।
व्यवहारेण जायन्ते. मित्राणि रिपवस्तथा ॥
उत्तराणि:
अर्थात् न तो कोई किसी का मित्र होता है और न ही कोई किसी का शत्रु होता है। शत्रु अथवा मित्र तो व्यवहार से ही उत्पन्न होते हैं।

2. आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
उत्तराणि:
अपनी आत्मा के प्रतिकूल दूसरों के साथ आचरण नहीं करना चाहिए।

भाषिकविस्तारः

1. तसिल प्रत्यय-पञ्चमी विभक्ति के अर्थ में तसिल प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है।
यथा- ग्रामात् ~ ग्रामतः (ग्राम + तसिल्)
आदेः – आदितः (आदि + तसिल)
यथा – छात्रः विद्यालयात् आगच्छति।
छात्रः विद्यालयतः आगच्छति।

इसी प्रकार – गृह + तसिल – गृहतः – गृहात्।
तन्त्र + तसिल् – तन्त्रतः – तन्त्रात्।
प्रथम + तसिल् – प्रथमतः – प्रथमात्।
आरम्भ + तसिल् – आरम्भतः – आरम्भात् ।

2. अभितः, परितः, उभयतः, सर्वतः, समया, निकषा, हा और प्रति के योग में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
यथा- 1. गृहम् अभितः वृक्षाः सन्ति।
2. विद्यालयम् परितः द्रुमाः सन्ति।
3. ग्रामम् उभयतः नद्यौ प्रवहतः।
4. हा दुराचारिणम्।
5. क्रीडाक्षेत्रम् निकषा तरणतालम् अस्ति।
6. बालकः विद्यालयम् प्रति गच्छति।
7. नगरम् समया औषधालयः विद्यते।
8. ग्रामम् सर्वतः गोचारणभूमिः अस्ति।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 लौहतुला

HBSE 9th Class Sanskrit लौहतुला Important Questions and Answers

लौहतुला गद्यांशों के सप्रसंग हिन्दी सरलार्थ एवं भावार्थ

1. आसीत् कस्मिंश्चिद् अधिष्ठाने जीर्णधनो नाम वणिक्पुत्रः। स च विभवक्षयात् देशान्तरं गन्तुमिच्छन् व्यचिन्तयत्
यत्र देशेऽथवा स्थाने भोगा भुक्ताः स्ववीर्यतः।
तस्मिन विभवहीनो यो वसेत् स पुरुषाधमः ॥
तस्य च गृहे लौहघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुला आसीत्। तां च कस्यचित् श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं प्रस्थितः। ततः सुचिरं कालं देशान्तरं यथेच्छया भ्रान्त्वा पुनः स्वपुरम् आगत्य तं श्रेष्ठिनम् अवदत्-“भोः श्रेष्ठिन् ! दीयतां मे सा निक्षेपतुला।” सोऽवदत्-“भोः! नास्ति सा, त्वदीया तुला मूषकैः भक्षिता” इति।

जीर्णधनः अवदत्-“भोः श्रेष्ठिन् ! नास्ति दोषस्ते, यदि मूषकैः भक्षिता। ईदृशः एव अयं संसारः। न किञ्चिदत्र शाश्वतमस्ति। परमहं नद्यां स्नानार्थं गमिष्यामि। तत् त्वम् आत्मीयं एनं शिशुं धनदेवनामानं मया सह स्नानोपकरणहस्तं प्रेषय” इति। स श्रेष्ठी स्वपुत्रम् अवदत्-“वत्स! पितृव्योऽयं तव, स्नानार्थं यास्यति, तद् अनेन साकं गच्छ” इति। अथासौ श्रेष्ठिपुत्रः धनदेवः स्नानोपकरणमादाय प्रहृष्टमनाः तेन अभ्यागतेन सह प्रस्थितः। तथानुष्ठिते स वणिक् स्नात्वा तं शिशुं गिरिगुहायां प्रक्षिप्य, तद्द्वारं बृहत् शिलया आच्छाद्य सत्त्वरं गृहमागतः।

अन्वय-यत्र देशे अथवा स्थाने स्ववीर्यतः भोगाः भुक्ताः तस्मिन् विभवहीनः यः वसेत् सः अधमः पुरुषः।

शब्दार्थ-अधिष्ठाने = स्थान पर नगर में। वणिक्पुत्रः = बनिए का पुत्र। विभवक्षयात् = धन की कमी के कारण। गन्तुमिच्छन् (गन्तुम् + इच्छन्) = जाने की इच्छा से। व्यचिन्तयत् (वि + अचिन्तयत्) = सोचने लगा। स्ववीर्यतः = अपने पराक्रम के द्वारा। विभवहीनो = धन-ऐश्वर्य से हीन। पुरुषाधमः = नीच पुरुष । लौहघटिता = लोहे से बनी हुई। पूर्वपुरुषोपार्जिता = पूर्वजों के द्वारा खरीदी गई। तुला आसीत् = तराजू थी। श्रेष्ठिनो = सेठ। निक्षेपभूतां = जमा-राशि/धरोहर के रूप में। सूचिरं कालं = बहुत समय तक। भ्रान्त्वा = घूमकर। शाश्वतम् = सदा रहने वाला। स्नानोपकरणहस्तं = नहाने का सामान हाथ में लिए हुए। प्रेषय = भेज दो। पितृव्योऽयं = चाचा, ताऊ। यास्यति = वह जाएगा। अनेन साकं = उसके साथ। प्रहृष्टमनाः = प्रसन्न मन वाला। अभ्यागतेन = अतिथि। गिरिगुहायां = पर्वत की गुफा में। बृहत् शिलया = विशाल शिला से। आच्छाद्य = ढककर। सत्त्वरं = शीघ्र। गृहमागतः (गृहम् + आगतः) = घर आ गया।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘लौहतुला’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन महाकवि विष्णुशर्मा द्वारा रचित ‘पञ्चतन्त्र’ के ‘मित्रभेद’ नामक तन्त्र से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस गद्यांश में बताया गया है कि सेठ के पास धरोहर के रूप में रखी गई अपनी लोहे की तुला के न मिलने पर जीर्णधन ने नदी में स्नान कराने के बहाने सेठ के पुत्र को गुफा में छुपा दिया।

सरलार्थ-किसी स्थान पर जीर्णधन नामक बनिए का पुत्र रहता था। धन की कमी के कारण विदेश जाने की इच्छा से उसने सोचा-जिस देश अथवा स्थान पर अपने पराक्रम के द्वारा भोगों का भोग किया, वहाँ धन-ऐश्वर्य से हीन होकर जो निवास करता है, वह मनुष्य सबसे नीच होता है।

भाव यह है कि जिस स्थान पर मनुष्य अपने पराक्रम से एकत्रित सम्पत्ति ऐश्वर्य से आराम करता है, वहीं यदि वह निर्धन हो जाता है तो उसे नीच पुरुष माना जाता है।

उसके घर पर उसके पूर्वजों द्वारा खरीदी गई लोहे से बनी एक तराजू थी। उसे किसी सेठ के घर धरोहर के रूप में रखकर वह दूसरे देश को चला गया। इसके बाद दीर्घकाल तक इच्छानुसार दूसरे देश में घूमकर पुनः अपने नगर को वापस आकर उसने सेठ से कहा-“हे सेठ! धरोहर के रूप में रखी मेरी वह तराजू दे दो।” उसने कहा-“अरे! वह तो नहीं है, तुम्हारी तराजू को चूहे खा गए।”

जीर्णधन ने कहा-“हे सेठ! यदि चूहे खा गए तो इसमें तुम्हारा दोष नहीं है। यह संसार ही ऐसा है। यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है। परंतु मैं नदी पर स्नान के लिए जा रहा हूँ। इसलिए तुम अपने धनदेव नामक इस पुत्र को स्नान की वस्तुएँ हाथ में देकर मेरे साथ भेज दो।” . वह सेठ अपने पुत्र से बोला-“बेटा! ये तुम्हारे चाचा हैं, स्नान के लिए जा रहे हैं, तुम इनके साथ जाओ।”

इस प्रकार वह बनिए का पुत्र स्नान की वस्तुएँ हाथ में लेकर प्रसन्न मन से उस अतिथि के साथ चला गया। तब वह बनिया-पुत्र वहाँ पहुँचकर और स्नान करके उस शिशु को पर्वत की गुफा में रखकर द्वार को एक बड़े पत्थर से ढक कर शीघ्र घर आ गया।।

भावार्थ-संस्कृत में एक कहावत है-“शठे शाढ्यं समाचरेत्।” अर्थात् धूर्त के साथ धूर्त ही बनना चाहिए। सेठ ने जीर्णधन के · साथ धूर्तता का आचरण किया। उसका जवाब देने के लिए उसने सेठ के पुत्र को पर्वत की गुफा में छुपा दिया।

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2. सः श्रेष्ठी पृष्टवान्–“भोः! अभ्यागत! कथ्यतां कुत्र मे शिशुः यः त्वया सह नदीं गतः”? इति।
स अवदत्-“तव पुत्रः नदीतटात् श्येनेन हृतः” इति। श्रेष्ठी अवदत्-“मिथ्यावादिन! किं क्वचित् श्येनो बालं
हर्तुं शक्नोति? तत् समर्पय मे सुतम् अन्यथा राजकुले निवेदयिष्यामि।” इति।
सोऽकथयत्-“भोः सत्यवादिन् ! यथा श्येनो बालं न नयति, तथा मूषका अपि लौहघटितां तुलां न भक्षयन्ति।
तदर्पय मे तुलाम्, यदि दारकेण प्रयोजनम्।” इति।
एवं विवदमानौ तौ द्वावपि राजकुलं गतौ। तत्र श्रेष्ठी तारस्वरेण प्रोवाच“भोः! वञ्चितोऽहम् ! वञ्चितोऽहम् !
अब्रह्मण्यम् ! अनेन चौरेण मम शिशुः अपहृतः” इति।
अथ धर्माधिकारिणः तम् अवदन्-“भोः! समर्म्यतां श्रेष्ठिसुतः”।

शब्दार्थ-पृष्ठवान् = और पूछा। कप्यतां = बताओ। कुत्र = कहाँ। श्येनेन = बाज के द्वारा। हृतः = ले जाया गया। मिथ्यावादिन = झूठ बोलने वाले। समर्पय = लौटा दो। अन्यथा = नहीं तो। विवदमानौ = झगड़ा करते हुए। तारस्वरेण = जोर से। अब्रह्मण्यम् = घोर अन्याय, अनुचित । अपहृतः = चुरा लिया गया है।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘लौहतुला’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन महाकवि विष्णुशर्मा द्वारा रचित ‘पञ्चतन्त्र’ के ‘मित्रभेद’ नामक तन्त्र से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस गद्यांश में बताया गया है कि सेठ तथा जीर्णधन दोनों आपस में झगड़ते हुए राजकुल में जाते हैं।

सरलार्थ-उस व्यापारी (सेठ) द्वारा पूछा गया-“हे अतिथि! बताइए मेरा पुत्र कहाँ है जो तुम्हारे साथ नदी पर गया था?” उसने (जीर्णधन) कहा-“नदी के तट से उसे बाज उठाकर ले गया।” सेठ ने कहा-“हे झूठे! क्या कहीं बाज बालक को ले जा सकता है? तो मेरा पुत्र लौटा दो अन्यथा मैं राजकुल में शिकायत करूँगा।”

उसने कहा-“अरे सच बोलने वाले! जैसे बाज बालक को नहीं ले जाता, वैसे ही चूहे भी लोहे से निर्मित तराजू नहीं खाते। यदि पुत्र को वापस चाहते हो तो मेरी तराजू लौटा दो।”

इस प्रकार झगड़ते हुए वे दोनों राजकुल चले गए। वहाँ सेठ ने जोर से कहा-“अरे! अनुचित हो गया! अनुचित! मेरे पुत्र को इस चोर ने चुरा लिया है।” तब न्यायकर्ताओं ने उससे (जीर्णधन) कहा-“अरे! सेठ का पुत्र लौटा दो।” ।

भावार्थ-जिस प्रकार जीर्णधन को पता था कि तराजू सेठ के पास है, उसी प्रकार सेठ को भी पता था कि उसका पुत्र जीर्णधन के पास ही है। आपस में फैसला न होने के कारण वे न्यायाधीश के पास जाते हैं।

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3. सोऽवदत्-“किं करोमि? पश्यतो मे नदीतटात् श्येनेन शिशुः अपहृतः” । इति।
तच्छ्रुत्वा ते अवदन्-भोः! भवता सत्यं नाभिहितम्-किं श्येनः शिशुं हर्तुं समर्थो भवति?
सोऽवदत्-भोः भोः! श्रूयतां मद्वचः
तुलां लौहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषकाः।
राजन्तत्र हरेच्छ्येनो नात्र संशयः॥
ते अपृच्छन्-“कथमेतत्”।
ततः स श्रेष्ठी सभ्यानामग्रे आदितः सर्वं वृत्तान्तं न्यवेदयत्। ततः न्यायाधिकारिणः विहस्य, तौ द्वावपि सम्बोध्य
तुला-शिशुप्रदानेन तोषितवन्तः।

अन्वय-राजन्! यत्र लौहसहस्रस्य मूषकाः खादन्ति तत्र श्येनः बालकं हरेत, अत्र संशयः न।

शब्दार्थ-पश्यतो मे = मेरे देखते हुए। नदीतटात् = नदी के तट से। नाभिहितम् = कहा गया है। हरेत् = चुरा सकता है। ले जा सकता है। संशयः = सन्देह । सभ्यानामग्रे = सभासदों के सम्मुख। आदितः = आरम्भ से। सर्वं वृत्तान्तं = सारी घटना। विहस्य = हँसकर। सम्बोध्य = समझा-बुझाकर। तोषितवन्तः = सन्तुष्ट किए गए।
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘लौहतुला’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन महाकवि विष्णुशर्मा द्वारा रचित ‘पञ्चतन्त्र’ के ‘मित्रभेद’ नामक तन्त्र से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस गद्यांश में बताया गया है कि सेठ तथा जीर्णधन फैसले के लिए राजकुल में गए, जहाँ पर न्यायाधीश ने फैसला सुनाया।

सरलार्थ-उसने (जीर्णधन) कहा–“क्या करूँ? मेरे देखते-देखते बालक को बाज नदी के तट से ले गया।” यह सुनकर वे सब बोले-अरे! आपने सच नहीं कहा-क्या बाज बालक को उठा ले जाने में समर्थ होता है? उसने (जीर्णधन) कहा-अरे-अरे! मेरी बात सुनिए

हे राजन्! जहाँ लोहे से निर्मित तराजू को चूहे खा सकते हैं, वहाँ बाज बालक को उठा ले जा सकता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

उन्होंने कहा-“यह कैसे हो सकता है?”
इससे उस सेठ ने सभासदों के सामने आरम्भ से सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तब हँसकर उन्होंने उन दोनों को समझा-बुझाकर तराजू और बालक का आदान-प्रदान करके उन दोनों को सन्तुष्ट किया।

भावार्थ-इस गद्यांश में न्याय के महत्त्व को बताया गया है। वादी-प्रतिवादी दोनों को पता होता है कि दोषी कौन है, परन्तु दोष निर्धारण के लिए न्यायाधीश का फैसला सर्वमान्य होता है। सेठ तथा जीर्णधन को न्यायाधीश द्वारा दिए गए फैसले को मानना पड़ा।

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अभ्यासः

1. एकपदेन उत्तरं लिखत
(एक पद में उत्तर लिखिए)
(क) वणिक्पुत्रस्य किं नाम आसीत्?
(ख) तुला कैः भक्षिता आसीत् ?
(ग) तुला कीदृशी आसीत्?
(घ) पुत्रः केन हृतः इति जीर्णधनः वदति?
(ङ) विवदमानौ तौ द्वावपि कुत्र गतौ?
उत्तराणि:
(क) जीर्णधनः,
(ख) मूषकैः,
(ग) लौहघटिता,
(घ) श्येनेन,
(ङ) राजकुलं ।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) देशान्तरं गन्तुमिच्छन् वणिक्पुत्रः किं व्यचिन्तयत् ?
(ख) स्वतुलां याचमानं जीर्णधनं श्रेष्ठी किम् अकथयत् ?
(ग) जीर्णधनः गिरिगुहाद्वारं कया आच्छाद्य गृहमागतः?
(घ) स्नानानन्तरं पुत्रविषये पृष्टः वणिक्पुत्रः श्रेष्ठिनं किम् अवदत् ?
(ङ) धर्माधिकारिणिः जीर्णधनश्रेष्ठिनौ कथं तोषितवन्तः?
उत्तराणि:
(क) देशान्तरं गन्तुम् इच्छन् वणिक्पुत्रः व्यचिन्तयत्-यत्र स्ववीर्यतः भोगाः भुक्ताः तस्मिन् स्थाने यः विभवहीनः वसेत् सः पुरुषाधमः।
(ख) स्वतुलां याचमानं जीर्णधनं श्रेष्ठी अकथयत्-भोः! त्वदीया तुला मूषकैः भक्षिता।
(ग) जीर्णधनः गिरिगुहाद्वारं बृहच्छिलया आच्छाद्य गृहमागतः।
(घ) स्नानानन्तरं पुत्रविषये पृष्टः वणिक्पुत्रः श्रेष्ठिनं अवदत्-“नदी तटात् सः बालः श्येनेन हृतः” इति।
(ङ) धर्माधिकारिणिः जीर्णधनश्रेष्ठिनौ परस्परं संबोध्य तुला-शिशु-प्रदानेन तोषितवन्तः।

3. स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूल पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए)
(क) जीर्णधनः विभवक्षयात् देशान्तरं गन्तुमिच्छन् व्यचिन्तयत्।
(ख) श्रेष्ठिनः शिशुः स्नानोपकरणमादाय अभ्यागतेन सह प्रस्थितः ।
(ग) वणिक् गिरिगुहां बृहच्छिलया आच्छादितवान्।
(घ) सभ्यैः तौ परस्परं संबोध्य तुला-शिशु-प्रदानेन सन्तोषितौ।
उत्तराणि:
(क) कः विभवक्षयात् देशान्तरं गन्तुमिच्छन् व्यचिन्तयत् ?
(ख) श्रेष्ठिनः शिशुः स्नानोपकरणमादाय केन सह प्रस्थितः?
(ग) वणिक् गिरिगुहां कस्मात् आच्छादितवान्?
(घ) सभ्यैः तौ परस्परं संबोध्य केन सन्तोषितौ?

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4. अधोलिखितानां श्लोकानाम् अपूर्णोऽन्वयः प्रदत्तः पाठमाधृत्य तं पूरयत
(निम्नलिखित श्लोकों का अपूर्ण अन्वय दिया गया है। पाठ के आधार पर उसे पूर्ण कीजिए)
(क) यत्र देशे अथवा स्थाने ……… भोगाः भुक्ता …….. विभवहीनः यः ……… स पुरुषाधमः।
(ख) राजन् ! यत्र लौहसहस्रस्य ……… मूषकाः ……… तत्र श्येनः ……… हरेत् अत्र संशयः न।
उत्तराणि
(क) यत्र देशे अथवा स्थाने स्ववीर्यतः भोगाः भुक्ता तस्मिन् विभवहीनः यः वसेत् स पुरुषाधमः।
(ख) राजन्! यत्र लौहसहस्रस्य तुलाम् मूषकाः खादन्ति तत्र श्येनः बालकम् हरेत् अत्र संशयः न।

5. तत्पदं रेखाङ्कित कुरुत यत्र
(उस शब्द को रेखांकित कीजिए, यहाँ)
(क) ल्यप् प्रत्ययः नास्ति
विहस्य, लौहसहस्रस्य, संबोध्य, आदाय।
(ख) यत्र द्वितीया विभक्तिः नास्ति
श्रेष्ठिनम्, स्नानोपकरणम्, सत्त्वरम्, कार्यकारणम्।
(ग) यत्र षष्ठी विभक्तिः नास्ति
पश्यतः, स्ववीर्यतः, श्रेष्ठिनः, सभ्यानाम् ।
उत्तराणि:
(क) लौहसहस्रस्य,
(ख) सत्त्वरम्,
(ग) स्ववीर्यतः

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6. सन्धिना सन्धिविच्छेदेन वा रिक्तस्थानानि पूरयत
(सन्धि अथवा सन्धिविच्छेद के द्वारा रिक्त स्थान पूरे कीजिए)
(क) श्रेष्ठ्याह = …….. + आह
(ख) …………….. = द्वौ + अपि
(ग) पुरुषोपार्जिता = पुरुष + …………….
(घ) …………….. = यथा + इच्छया
(ङ) स्नानोपकरणम् = ……………. + उपकरणम्
(च) ……………. = स्नान + अर्थम्
उत्तराणि:
(क) श्रेष्ठ्याह = श्रेष्ठी + आह
(ख) द्वावपि = द्वौ + अपि
(ग) पुरुषोपार्जिता = पुरुष + उपार्जिता
(घ) यथेच्छया = यथा + इच्छया
(ङ) स्नानोपकरणम् = स्नान + उपकरणम्
(च) स्नानार्थम् = स्नान + अर्थम्

7. समस्तपदं विग्रहं वा लिखत
(समस्तपद अथवा विग्रह लिखिए)
विग्रहः – समस्तपदम्
(क) स्नानस्य उपकरणम् = ………………….
(ख) …………………., …………………. = गिरिगुहायाम्
(ग) धर्मस्य अधिकारी = ………………….
(घ) …………………., …………………. = विभवहीनाः
उत्तराणि:
विग्रहः – समस्तपदम्
(क) स्नानस्य उपकरणम् – स्नानोपकरणम्
(ख) गिरेः गुहायाम् – गिरिगुहायाम्
(ग) धर्मस्य अधिकारी – धर्माधिकारी
(घ) विभवेन हीनाः – विभवहीनाः

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(अ) यथापेक्षम् अधोलिखितानां शब्दानां सहायता “लौहतुला” इति कथायाः सारांश संस्कृतभाषया लिखत
(निम्नलिखित शब्दों की सहायता से ‘लौहतुला’ कथा का सारांश संस्कृत भाषा में लिखिए)

वणिक्पुत्रःस्नानार्थम्लौहतुलाअयाचत्वृत्तान्तं
ज्ञात्वाश्रेष्ठिनंप्रत्यागतःगतःप्रदानम्

उत्तराणि-संस्कृत भाषा-एकदा जीर्णधन नाम वणिक् पुत्रः विभवक्षयात् देशान्तरं गन्तुम् अचिन्तयत्। तस्य गृहे एका लौहतुला आसीत् । तां कस्यचित् श्रेष्ठिनः गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा सः देशान्तरं प्रस्थितः। सुचिरं कालं देशान्तरं भ्रान्त्वा स्वनगरम् प्रत्यागत्य सः तुलाम् अयाचत्। सः श्रेष्ठी प्रत्युवाच-“तुलां तु मूषकैः भक्षिता।” ।

ततः जीर्णधनः श्रेष्ठिनः पुत्रेण सह स्नानार्थं गतः। स्नात्वा सः श्रेष्ठिपुत्रं गिरिगुहायां प्रक्षिप्य, तद्द्वारं बृहच्छिलयाच्छाद्य गृहम् आगतः। ततः सः वणिक् श्रेष्ठिनं स्वपुत्रविषये अपृच्छत् । वणिक् उवाच-‘नदी तटात् सः श्येनेन हृतः।” इति। सः शीघ्रमाह-‘श्येनः बालं हर्तुं न शक्नोति। अतः समर्पय मे सुतम्।’ एवं विवदमानौ तौ राजकुलं गतौ । सर्वं वृत्तान्तं ज्ञात्वा धर्माधिकारिभिः तुला-शिशु-प्रदानेन तौ द्वौ सन्तोषितौ।

लौहतुला (लोहे की तराजू) Summary in Hindi

लौहतुला पाठ-परिचय

प्रस्तुत पाठ संस्कृत साहित्य के सर्वप्रमुख कथाग्रन्थ ‘पञ्चतन्त्र’ के ‘मित्रभेद’ नामक तन्त्र (अध्याय) से सङ्कलित है। ‘पञ्चतन्त्र’ महाकवि विष्णुशर्मा द्वारा रचित एक विशाल ग्रन्थ है। 200 ई० से 600 ई० के मध्य विद्वानों के समाज में विशेष रूप से प्रसिद्ध महाकवि पण्डित विष्णुशर्मा ने राजा अमरसिंह के पुत्रों को राजनीति में पारङ्गत करने के उद्देश्य से ‘पञ्चतन्त्र’ नामक सुप्रसिद्ध कथाग्रन्थ की रचना की थी। यह ग्रन्थ पाँच भागों में विभक्त है। इन्हीं भागों को ‘तन्त्र’ के नाम से जाना जाता है। इन पाँच तन्त्रों के नाम क्रमशः-मित्रभेदः, मित्रसंप्राप्तिः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः और अपरीक्षितकारकम् हैं। इन्हीं पाँचों के संग्रह को ‘पञ्चतन्त्र’ के नाम से जाना जाता है। इस ग्रन्थ में अत्यन्त सरल शब्दों में लघुकथाएँ दी गई हैं। उन कथाओं के माध्यम से लेखक ने नीति के गूढ तत्त्वों का प्रतिपादन किया है।

पाठ में वर्णित कथा के अनुसार जीर्णधन नामक व्यापारी अपने धन के समाप्त हो जाने पर पुनः धन कमाने की इच्छा से किसी देश में जाने के विषय में सोचने लगा। उसके घर में एक लोहे की तराजू थी। जीर्णधन अपनी उस लोहे की तराजू को किसी सेठ के घर में ‘धरोहर’ के रूप में रखकर विदेश चला गया। विदेश से लौटकर वह अपनी धरोहर (तराजू) को सेठ से माँगता है। सेठ ने कहा कि “तराजू चूहे खा गए”। ऐसा सुनकर जीर्णधन उसके पुत्र को स्नान के बहाने नदी तट पर ले जाकर गुफा में छिपा देता है। जब सेठ अपने पुत्र के विषय में जीर्णधन से पूछता है तो वह कहता है कि पुत्र को बाज उठाकर ले गया है। जीर्णधन के जवाब को सुनकर सेठ कहता है कि बाज बच्चे का हरण नहीं कर सकता। अतः मेरे पुत्र को मुझे दे दो। इस प्रकार विवाद करते हुए दोनों न्यायालय पहुँचते हैं जहाँ धर्माधिकारी उन्हें समुचित न्याय प्रदान करते हैं।

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HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम्

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम्

HBSE 9th Class Sanskrit प्रत्यभिज्ञानम् Textbook Questions and

प्रत्यभिज्ञानम् के प्रश्न उत्तर HBSE 9th Class

I. अधोलिखितानां सूक्तिानां भाव हिन्दी भाषायां लिखत
(निम्नलिखित सूक्तियों के भाव हिन्दी भाषा में लिखिए)
(क) अयमपरः कः विभात्युमावेषमिवाश्रितो हरः ।
(ख) तरुणस्य कृतास्त्रस्य युक्तो युद्धपराजयः।
(ग) मम तु भुजौ एव प्रहरणम्।
(घ) नीतः कृष्णोऽतदर्हताम्।
उत्तराणि:
(क) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति महाकवि भास विरचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से संकलित पाठ ‘प्रत्यभिज्ञानम्’ में से उद्धृत है। दुर्योधनादि कौरव वीरों ने राजा विराट की गायों का अपहरण कर लिया। विराट-पुत्र उत्तर बृहन्नला (छद्मवेषी अर्जुन) को सारथी बनाकर कौरवों से युद्ध करने जाता है। कौरवों की ओर से अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु भी युद्ध के मैदान में जाता है। अभिमन्यु बृहन्नला (अर्जुन) के मुखमण्डल की आभा को देखकर कहता है कि यह दूसरा कौन है जिसे देखकर ऐसा लग रहा है जैसे महादेव भगवान् शिव ने उमा का वेश धारण किया हो। अर्जुन के मुखमण्डल का तेज भगवान् शिव के मुखमण्डल से मिल रहा था। परन्तु उनकी वेशभूषा पार्वती से मिलती थी। इसी कारण अभिमन्यु को शिव एवं पार्वती की आभा दिखाई पड़ रही थी।

(ख) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति महाकवि भास विरचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से संकलित पाठ ‘प्रत्यभिज्ञानम्’ में से उद्धृत है। युद्ध के मैदान में बृहन्नला के रूप में अर्जुन को बहुत समय बाद पुत्र-मिलन का अवसर प्राप्त हुआ। वे अपने पुत्र अभिमन्यु से बात करना चाहते हैं। परन्तु अपने अपहरण से क्षुब्ध अभिमन्यु उनके साथ बात करना नहीं चाहता। तब अर्जुन उसे उत्तेजित करने की भावना से इस प्रकार व्यंग्यात्मक वचन कहते हैं – तुम्हारे पिता अर्जुन हैं, मामा श्रीकृष्ण हैं तथा तुम शस्त्रविद्या से सम्पन्न होने के साथ-ही-साथ तरुण भी हो, ऐसे तुम्हारे लिए युद्ध में परास्त होना क्या उचित है? अर्थात् ऐसे गुणों वाले तुम्हें युद्ध में बन्दी बनाया जाना उचित नहीं है।

(ग) भावार्थ-प्रस्तुत सूक्ति महाकवि भास विरचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से संकलित पाठ ‘प्रत्यभिज्ञानम्’ में से उद्धृत है। अभिमन्यु क्षुब्ध है कि उसे धोखे से शस्त्रविहीन भीम ने पकड़ लिया है। भीम इसका स्पष्टीकरण करते हैं कि अस्त्र-शस्त्र तो दुर्बल व्यक्तियों द्वारा ग्रहण किए जाते हैं-“मेरी तो भुजा ही मेरा शस्त्र है।” अर्थात् मेरी भुजाओं में ही इतनी ताकत है कि उसके सामने सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बेकार हैं। अतः मुझे किसी अन्य आयुध को धारण करने की आवश्यकता नहीं है।

(घ) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति महाकवि भास विरचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से संकलित पाठ ‘प्रत्यभिज्ञानम्’ में से उद्धृत है। श्रीकृष्ण ने जरासंध के जामाता (दामाद) कंस का वध किया था। इससे क्रुद्ध जरासन्ध ने यदुवंशियों के विनाश की प्रतिज्ञा की थी। इसलिए उसने बार-बार मथुरा पर आक्रमण भी किया था। उसने श्रीकृष्ण को कई बार पकड़ा भी परन्तु किसी-न-किसी प्रकार श्रीकृष्ण वहाँ से निकल गए। वस्तुतः उचित अवसर पाकर ही श्रीकृष्ण जरासन्ध को मारना चाहते थे, परन्तु भीम ने जरासन्ध का वध करके उसकी पात्रता स्वयं ले ली। जो कार्य श्रीकृष्ण द्वारा करणीय था उसे भीमसेन ने कर दिया और श्रीकृष्ण को जरासन्ध के वध का अवसर ही नहीं दिया।

प्रत्यभिज्ञानम् HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम्

II. अधोलिखितान् नाट्यांशान् पठित्वा प्रदत्त प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतपूर्णवाक्येन लिखत
(निम्नलिखित नाट्यांशों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्यों में लिखिए)
(1) भटः – रथमासाद्य निश्शङ्कं बाहुभ्यामवतारितः। (प्रकाशम्) इत इतः कुमारः।
अभिमन्युः – भोः को नु खल्वेषः? येन भुजैकनियन्त्रितो बलाधिकेनापि न पीडितः अस्मि।
बृहन्नला – इत इतः कुमारः।
अभिमन्युः – अये! अयमपरः कः विभात्युमावेषमिवाश्रितो हरः।।
(क) रथम् आसाद्य काभ्याम् अवतारितः?
(ख) निश्शङ्कः कस्मात् अवतारितः?
(ग) अत्र ‘महादेवः’ इति पदस्य किं पर्यायपदं प्रयुक्तम् ?
(घ) अयम् अपरः कः विभाति?
(ङ) भुजैकनियन्त्रितः बलाधिकेनापि कः पीडितः अस्ति?
उत्तराणि:
(क) रथम् आसाद्य बाहुभ्यामवतारितः।
(ख) निश्शङ्कः रथात् अवतारितः।
(ग) अत्र ‘महादेवः’ इति पदस्य ‘हरः’ पर्यायपदं प्रयुक्तम्।
(घ) अयम् अपरः उमावेषमिवाश्रितः हरः विभाति।
(ङ) भुजैकनियन्त्रितः बलाधिकेन अपि अभिमन्युः पीडितः अस्ति।

(2) अभिमन्युः – अलं स्वच्छन्दप्रलापेन! अस्माकं कुले आत्मस्तवं कर्तुमनुचितम्। रणभूमौ हतेषु शरान् पश्य, मदृते अन्यत् नाम न भविष्यति।
बृहन्नला – एवं वाक्यशौण्डीर्यम् । किमर्थं तेन पदातिना गृहीतः?
अभिमन्युः – अशस्त्रं मामभिगतः। पितरम् अर्जुनं स्मरन् अहं कथं हन्याम्। अशस्त्रेषु मादृशाः न प्रहरन्ति। अतः अशस्त्रोऽयं मां वञ्चयित्वा गृहीतवान्।
(क) अस्माकं कुले किम् अनुचितम्?
(ख) रणभूमौ कान् पश्य?
(ग) अत्र ‘मातरम्’ इति पदस्य किं विलोमपदं प्रयुक्तम्?
(घ) अशस्त्रोऽयं कथं गृहीतवान्?
(ङ) मादृशाः किं न कुर्वन्ति?
उत्तराणि:
(क) अस्माकं कुले आत्मस्तवं अनुचितम्।
(ख) रणभूमौ हतेषु शरान् पश्य।
(ग) अत्र ‘मातरम्’ इति पदस्य ‘पितरम्’ विलोमपदं प्रयुक्तम्।
(घ) अशस्त्रोऽयं मां वञ्चयित्वा गृहीतवान्।
(ङ) मादृशाः अशस्त्रेषु प्रहारं न कुर्वन्ति।

3. उत्तरः – अथ किम् श्मशानाद्धनुरादाय तूणीराक्षयसायके। नृपा भीष्मादयो भग्ना वयं च परिरक्षिताः॥
राजा – एवमेतत्।
उत्तरः – व्यपनयतु भवाञ्छङ्काम् । अयमेव अस्ति धनुर्धरः धनञ्जयः।
बृहन्नला – यद्यहं अर्जुनः तर्हि अयं भीमसेनः अयं च राजा युधिष्ठिरः।
(क) के भग्नाः ?
(ख) श्मशानात् किं आदाय वयं परिरक्षिताः?
(ग) अत्र ‘अर्जुन’ इति पदस्य किं पर्यायपदं प्रयुक्तम् ?
(घ) यदि अहं अर्जुनः तर्हि अयं कः अस्ति?
(ङ) अयम् एव कः अस्ति?
उत्तराणि:
(क) भीष्मादयो नृपाः भग्नाः।
(ख) श्मशानात् तूणीराक्षयसायके धनुः आदाय वयं परिरक्षिताः।
(ग) अत्र ‘अर्जुन’ इति पदस्य ‘बृहन्नला’ पर्यायपदं प्रयुक्तम्।
(घ) यदि अहं अर्जुनः तर्हि अयं भीमसेनः अयं च राजा युधिष्ठिरः अस्ति।
(ङ) अयम् एव धनुर्धरः धनञ्जयः अस्ति।

Shemushi Sanskrit Class 9 Chapter 7 Solutions HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम्

III. अधोलिखितानां अव्ययानां सहायता रिक्तस्थानानि पूरयत
(निम्नलिखित अव्ययों की सहायता से रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए)
तर्हि, अलं, एव, खलु, अपि।
(क) धनुस्तु दुर्बलैः …………….. गृह्यते।
(ख) यदि अहम् अर्जुनः …………… अयं भीमसेनः।
(ग) …………….. कुशली देवकीपुत्रः केशवः?
(घ) भोः को न …………….. एषः?
(ङ) …………….. स्वच्छन्द प्रलापेन?
उत्तराणि:
(क) एव,
(ख) तर्हि,
(ग) अपि,
(घ) खलु,
(ङ) अलं।

IV. स्थूलपदमावृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूल पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए)
(क) भटः सौभद्रस्य ग्रहणम् अकरोत् ।
(ख) अयम् उमावेषमिव आश्रितः हरः विभाति।
(ग) उत्सिक्तः खलु अयं क्षत्रियकुमारः।
(घ) अहं अस्य दर्पप्रशमनम् करोमि।
(ङ) धनुः तु दुर्बलैः एव गृह्यते।
उत्तराणि:
(क) भटः कस्य ग्रहणम् अकरोत् ?
(ख) अयम् उमावेषमिव आश्रितः कः विभाति?
(ग) उसिक्तः खलु अयं कः?
(घ) अहं अस्य किं करोमि?
(ङ) धनुः तु कैः एव गृह्यते?

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम्

v. अपोलिखित प्रश्नानाम् चतुषु वैकल्पिक उत्तरेषु उचितमुसरं वित्वा लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के दिए गए चार विकल्पों में से उचित उत्तर का चयन कीजिए)
1. सौभद्रस्य ग्रहणं कः अकरोत्?
(i) अर्जुनः
(ii) भीमः
(iii) भटः
(iv) उत्तरः
उत्तरम्:
(iii) भटः

2. भुजी एवं कस्य प्रहरणम् ?
(i) अर्जुनस्य
(ii) भीमस्य
(iii) वीरस्य
(iv) भटस्य
उत्तरम्:
(ii) भीमस्य

3. जरासन्यस्य वध केन कृतम्?
(i) अर्जुनेन
(ii) श्रीकृष्णेन
(iii) भीमेन
(iv) उत्तरेण
उत्तरम्:
(iii) भीमेन

4. पदातिना कः गृहीतः?
(i) अभिमन्युः
(ii) बृहन्नला
(iii) उत्तरः
(iv) भीमसेनः
उत्तरम्:
(i) अभिमन्युः

5. दिष्ट्रया किं स्वन्तम् अस्ति?
(i) युद्धः
(ii) पराजयः
(iii) गोग्रहणम्
(iv) अभिमन्यु ग्रहणम्
उत्तरम:
(iii) गोग्रहणम्

6. ‘यदि + अहम्’ अत्र सन्धियुक्तपदम् अस्ति
(i) यदिअहम्
(ii) अदीहम्
(iii) यदिऽहम्
(iv) यद्यहम्
उत्तरम्:
(iv) यद्यहम्

7. ‘खल्वयं इति पदस्य सन्धिविच्छेदः अस्ति
(i) खल् + अयं
(ii) खलु + अयं
(iii) खल्व + यं
(iv) खलौ + अयं
उत्तरम्:
(ii) खलु + अयं

8. ‘बञ्चयित्वा’ इति पदे कः प्रत्ययः अस्ति?
(i) ल्यप्
(ii) शत्र
(iii) क्त
(iv) क्त्वा
उत्तरम्:
(iv) क्त्वा

9. ‘अभिमन्युः’ इति पदस्य किं पर्यायपदम्?
(i) धनुर्धरः
(ii) केशवः
(iii) धनञ्जयः
(iv) सौभद्रः
उत्तरम्:
(iv) सौभद्रः

10. ‘अपि कुशली देवकीपुत्रः केशवः।’ इति वाक्ये अव्ययपदम् अस्ति
(i) अपि
(ii) केशवः
(iii) कुशली
(iv) देवकीपुत्रः
उत्तरम्
(i) अपि

योग्यताविस्तारः

प्रस्तुत पाठ भासरचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से सम्पादित कर, लिया गया है। दुर्योधन आदि कौरव वीरों ने राजा विराट की गायों का अपहरण कर लिया। विराट-पुत्र उत्तर बृहन्नला (छद्मवेषी अर्जुन) को सारथी बनाकर कौरवों से युद्ध करने जाता है। कौरवों की ओर से अभिमन्यु (अर्जुन-पुत्र) भी युद्ध करता है। युद्ध में कौरवों की पराजय होती है। इसी बीच विराट को सूचना मिलती है, वल्लभ (छद्मवेषी भीम) ने रणभूमि में अभिमन्यु को पकड़ लिया है। अभिमन्यु भीम तथा अर्जुन को नहीं पहचान पाता और उनसे उग्रतापूर्वक बातचीत करता है। दोनों अभिमन्यु को महाराज विराट के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। वहीं भगवान राम से कहे जाने वाले पाण्डवाग्रज युधिष्ठिर भी उपस्थित है। अभिमन्यु उन्हें प्रणाम नहीं करता। उसी समय राजकुमार उत्तर वहाँ पहुँचता है, जिसके रहस्योद्घाटन से अर्जुन तथा भीम आदि पाण्डवों के छद्मवेष का उद्घाटन हो जाता है।

कवि परिचय-संस्कृत नाटककारों में “महाकवि भास” का नाम अग्रगण्य है। भास रचित तेरह रूपक निम्नलिखित हैंदूतवाक्यम्, कर्णभारम्, उरुभङ्गम्, दूतघटोत्कचम्, मध्यमव्यायोगः, पञ्चरात्रम्, अभिषेकनाटकम्, बालचरितम्, अविमारकम्, प्रतिमानाटकम्, प्रतिज्ञायौगन्धरायणम्, स्वप्नवासवदत्तम् तथा चारुदत्तम्।

ग्रन्थ परिचय–पञ्चरात्रम् की कथावस्तु महाभारत के विराट पर्व पर आधारित है। पाण्डवों के अज्ञातवास के समय दुर्योधन एक यज्ञ करता है और यज्ञ की समाप्ति पर आचार्य द्रोण को गुरुदक्षिणा देना चाहता है। द्रोण गुरुदक्षिणा के रूप में पाण्डवों का राज्याधिकार चाहते हैं। दुर्योधन कहता है कि यदि गुरु द्रोणाचार्य पाँच रातों में पाण्डवों का पता लगा दें तो उनकी पैतृक सम्पत्ति का भाग उन्हें दिया जा सकता है। इसी आधार पर इस नाटक का नाम ‘पञ्चरात्रम्’ है।

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भावविस्तारः

तरुणस्य कृतास्त्रस्य युक्तो युद्धपराजयः-अज्ञातवास में बृहन्नला के रूप में अर्जुन को बहुत समय के बाद पुत्र-मिलन का अवसर प्राप्त हुआ। वह अपने पुत्र से बात करना चाहता है, परन्तु (अपने अपहरण से) क्षुब्ध अभिमन्यु उनके साथ बात करना ही नहीं चाहता। तब अर्जुन उसे उत्तेजित करने की भावना से इस प्रकार के व्यंग्यात्मक वचन कहते हैं

तुम्हारे पिता अर्जुन हैं, मामा श्रीकृष्ण हैं तथा तुम शस्त्रविद्या से सम्पन्न होने के साथ ही साथ तरुण भी हो, तुम्हारे लिए युद्ध में परास्त होना क्या उचित है। अर्थात् उपरोक्त विशेषताओं वाले तुम्हें युद्ध में कदापि पराजित नहीं होना चाहिए।

मम तु भुजौ एव प्रहरणम्-अभिमन्यु क्षुब्ध है कि उसे धोखे से शस्त्रविहीन भीम ने निगृहीत किया है। भीम इसका स्पष्टीकरण करता है कि अस्त्र-शस्त्र तो दुर्बल व्यक्तियों द्वारा ग्रहण किए जाते हैं। मेरी तो भुजा ही मेरा शस्त्र है। अतः मुझे किसी अन्य आयुध की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार का भाव अन्य नाटकों में भी उपलब्ध है; जैसे
(क) अयं तु दक्षिणो बाहुरायुधं सदृशं मम। (मध्यमव्यायोगः)
(ख) भीमस्यानुकरिष्यामि शस्त्रं बाहुभविष्यति। (मृच्छकटिकम्)
(ग) वयमपि च भुजायुद्धप्रधानाः। (अविमारकम्)

नीतः कृष्णोऽतदर्हताम्-श्रीकृष्ण ने जरासन्ध के जामाता (दामाद) कंस का वध किया था। इससे क्रुद्ध जरासन्ध ने यदुवंशियों के विनाश की प्रतिज्ञा की थी। इसीलिए उसने बार-बार मथुरा पर आक्रमण भी किया था। उसने श्रीकृष्ण को कई बार पकड़ा भी परन्तु किसी-न-किसी प्रकार श्रीकृष्ण वहाँ से निकल गए। वस्तुतः उचित अवसर पाकर श्रीकृष्ण जरासन्ध को मारना चाहते थे, परन्तु भीम ने जरासन्ध का वध करके उनकी पात्रता स्वयं ले ली। जो कार्य श्रीकृष्ण द्वारा करणीय था उसे भीमसेन ने कर दिया और श्रीकृष्ण को जरासन्ध के वध का अवसर ही नहीं दिया।

प्रत्यय से बने शब्द विशेषण के रूप में ही प्रयुक्त होते हैं।
HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम् img-1
‘क्तवतु’ भी भूतकालिक प्रत्यय है। इसका प्रयोग सदैव कर्तृवाच्य में होता है। क्तवतु प्रत्ययान्त शब्द भी तीनों लिङ्गों में होते हैं।
यथा-पठ् + क्तवतु = पठितवत्
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वाच्यपरिवर्तनम्
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HBSE 9th Class Sanskrit प्रत्यभिज्ञानम् Important Questions and Answers

प्रत्यभिज्ञानम् नाट्यांशों के सप्रसंग हिन्दी सरलार्थ एवं भावार्थ 
1.
भटः – जयतु महाराजः।
राजा – अपूर्व इव ते हर्षो ब्रूहि केनासि विस्मितः?
भटः – अश्रद्धेयं प्रियं प्राप्तं सौभद्रो ग्रहणं गतः ॥
राजा – कथमिदानीं गृहीतः?
भटः – रथमासाद्य निश्शङ्कं बाहुभ्यामवतारितः।
राजा – केन?
भट – यः किल एष नरेन्द्रेण विनियुक्तो महानसे। (अभिमन्युमुद्दिश्य) इत इतः कुमारः।
अभिमन्युः – अभिमन्युः – भोः को नु खल्वेषः? येन भुजैकनियन्त्रितो बलाधिकेनापि न पीडितः अस्मि।
बृहन्नला – इत इतः कुमारः।
अभिमन्युः – अये! अयमपरः कः विभात्युमावेषमिवाश्रितो हरः।
बृहन्नला – आर्य, अभिभाषणकौतूहलं मे महत् । वाचालयत्वेनमार्यः।
वल्लभः – (अपवार्य) बाढम् (प्रकाशम्) अभिमन्यो !
अभिमन्युः – अभिमन्युर्नाम?
वल्लभः – रुष्यत्येष मया, त्वमेवैनमभिभाषय।
बृहन्नला – अभिमन्यो!
अभिमन्युः – कथं कथम्। अभिमन्यु माहम्। भोः! किमत्र विराटनगरे क्षत्रियवंशोभूताः नीचैः अपि नामभिः अभिभाष्यन्ते अथवा अहं शत्रुवशं गतः। अतएव तिरस्क्रियते।

शब्दार्थ-अपूर्व = अद्भुत । ब्रूहि = बताइए। अश्रद्धेयं = अविश्वसनीय। सौभद्रः = सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु। ग्रहणं गतः = बन्दी बना लिया गया है, पकड़ लिया गया है। कथम् = कैसे। आसाद्य = पास पहुँचकर। बाहुभ्यामवतारितः (बाहुभ्याम् + अवतारितः) = भुजाओं द्वारा उतार लिया गया है। निःशङ्कं = बिना किसी संकोच के। भुजैकनियन्त्रितः = एक भुजा से पकड़ा हुआ। बलाधिकेन = अधिक बलशाली होकर। न पीडितः अस्मि = मुझे पीड़ित नहीं किया। विभाति = ऐसा प्रतीत होता है। हरः = भगवान् शिव ने। अपवार्य = एक ओर को। अभिभाषण = बात करने की। कौतूहलम् = उत्सुकता। बाढम् = ठीक है। रुष्यति = क्रुद्ध होता है। अभिभाषय = बात करने के लिए प्रेरित करो। नामभिः = नाम लेकर। अभिभाष्यन्ते = पुकारे जाते हैं। शत्रुवशं = शत्रुओं के वश में। तिरस्क्रियते = अपमान किया जाता है, उपेक्षा की जाती है।

प्रसंग प्रस्तुत नाट्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘प्रत्यभिज्ञानम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन महाकवि भास द्वारा रचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश इस नाट्यांश में बताया गया है कि छद्मवेषधारी भीम युद्ध के मैदान से अभिमन्यु को पकड़कर विराट के महल में लाता है।
सरलार्थ
भटः – महाराज की जय हो।
राजा – तुम्हारी प्रसन्नता अद्भुत-सी प्रतीत हो रही है, अतः बताओ किस कारण से प्रसन्न हो?
भट – अविश्वसनीय प्रिय (समाचार) प्राप्त हो गया है, सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु पकड़ लिया गया है।
राजा – किस प्रकार से पकड़ लिया गया है?
भट – रथ के पास पहुँचकर बिना किसी संकोच के भुजाओं के द्वारा रथ से उतार लिया गया है। राजा
राजा – किसके द्वारा?
भट – जो इस राजा के द्वारा रसोईघर में नियुक्त किया गया है (अभिमन्यु की तरफ इशारा करके) कुमार इधर से, इधर से
अभिमन्यु – अरे! यह कौन है? जिसने एक हाथ से पकड़कर अधिक बलशाली होकर भी मुझे पीड़ित नहीं किया।
बृहन्नला – कुमार इधर से, इधर से।
अभिमन्यु – अरे! यह दूसरा कौन है, ऐसा लग रहा है जैसे भगवान् शिव ने उमा (पार्वती) का वेश ग्रहण किया हो।
बृहन्नला – आर्य! मुझे इससे बात करने की बहुत उत्सुकता हो रही है। आप इसे बोलने के लिए प्रेरित कीजिए।
वल्लभ – (एक ओर मुँह करके) अच्छा (प्रकट रूप से) अभिमन्यु!
अभिमन्यु – अभिमन्यु नाम?
वल्लभ – यह मुझसे चिढ़ता है, आप ही इसे बात करने के लिए प्रेरित कीजिए।
बृहन्नला – अभिमन्यु!
अभिमन्यु – क्यों, क्यों मेरा नाम अभिमन्यु है। अरे! क्या यहाँ विराटनगर में क्षत्रियकुल में उत्पन्न होने वाले कुमारों को नीच लोगों द्वारा (नौकर-चाकरों के द्वारा) भी नाम के द्वारा अर्थात् नाम लेकर बुलाया जाता है अथवा मैं शत्रुओं के अधीन हो गया हूँ, इसलिए मुझे अपमानित किया जा रहा है।

भावार्थ-भीमसेन युद्ध के मैदान से अभिमन्यु को पकड़कर महाराज विराट के महल में लाते हैं। भीम तथा अर्जुन दोनों अज्ञातवास के कारण अपने वास्तविक रूप में नहीं हैं। इसलिए अभिमन्यु उन्हें नीच शब्द से सम्बोधित करता है। अर्जुन की अभिमन्यु के प्रति पुत्र-प्रेम की भावना को भी दिखाया गया है।

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2.
बृहन्नला – अभिमन्यो! सुखमास्ते ते जननी?
अभिमन्युः – कथं कथम्? जननी नाम? किं भवान् मे पिता अथवा पितृव्यः? कथं मां पितृवदाक्रम्य स्त्रीगतां कथां पृच्छति?
बृहन्नला – अभिमन्यो! अपि कुशली देवकीपुत्रः केशवः?
अभिमन्युः – कथं कथम्? तत्रभवन्तमपि नाम्ना। अथ किम् अथ किम्? (बृहन्नलावल्लभौ परस्परमवलोकयतः)
अभिमन्युः – कथमिदानीं सावज्ञमिव मां हस्यते?
बृहन्नला – न खलु किञ्चित्।
पार्थं पितरमुद्दिश्य मातुलं च जनार्दनम् ।
तरुणस्य कृतास्त्रस्य युक्तो युद्धपराजयः॥
अभिमन्युः – अलं स्वच्छन्दप्रलापेन! अस्माकं कुले आत्मस्तवं कर्तुमनुचितम् । रणभूमौ हतेषु शरान् पश्य, मदृते अन्यत् नाम न भविष्यति।
बृहन्नला – एवं वाक्यशौण्डीर्यम् । किमर्थं तेन पदातिना गृहीतः?
अभिमन्युः – अशस्त्रं मामभिगतः। पितरम् अर्जुनं स्मरन् अहं कथं हन्याम्। अशस्त्रेषु मादृशाः न प्रहरन्ति। अतः अशस्त्रोऽयं मां वञ्चयित्वा गृहीतवान्।
राजा – त्वर्यतां त्वर्यतामभिमन्युः।
बृहन्नला – इत इतः कुमारः। एष महाराजः। उपसर्पतु कुमारः।
अभिमन्युः – आः| कस्य महाराजः?
राजा – एह्येहि पुत्र! कथं न मामभिवादयसि? (आत्मगतम्) अहो! उत्सिक्तः खल्वयं क्षत्रियकुमारः। अहमस्य दर्पप्रशमनं करोमि। (प्रकाशम्) अथ केनायं गृहीतः?

अन्वय-पितरम् पार्थं मातुलं जनार्दनं च उद्दिश्य कृतास्त्रस्य तरुणस्य युद्धपराजयः युक्तः।

शब्दार्थ-सुखमास्ते (सुखम् + आस्ते) = सुख से हैं। पितृव्यः = चाचा। पितृवद् = पिता की तरह। आक्रम्य = अधिकार, दिखाकर। स्त्रीगतां कथां = माता के विषय में प्रश्न । कुशली = सकुशल । तत्रभवन्तम् = आदरणीय को भी। अथ किम् अथ किम् = और क्या और क्या अर्थात् निश्चित रूप से। परस्परमवलोकयतः = एक-दूसरे को देखते हुए। मातुलं = मामा। जनार्दनम् = श्रीकृष्ण को। उद्दिश्य = याद करके। तरुणस्य = युवक के। कृतास्त्रस्य = धनुर्विद्या में निपुण। आत्मस्तवं = अपनी प्रशंसा। मद्रते (मद् + ऋते) = मेरे सिवाय। वाक्यशौण्डीर्यम् = वाणी की वीरता। पदातिना = पैदल । त्वर्यताम् = शीघ्र बुलाइए। उपसर्पतु = समीप आएँ। एह्येहि (एहि + एहि) = आओ, आओ। न अभिवादयसि = प्रणाम नहीं करते। उत्सिक्तः = घमंडी। दर्पप्रशमनं = घमंड का नाश।

प्रसंग प्रस्तुत नाट्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘प्रत्यभिज्ञानम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन महाकवि भास द्वारा रचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश इस नाट्यांश में बताया गया है कि बृहन्नला (वेशधारी अर्जुन) अभिमन्यु से उसके माता-पिता तथा श्रीकृष्ण का समाचार पूछ रहे हैं।

सरलार्थ:
बृहन्नला – हे अभिमन्यु! क्या तुम्हारी माता कुशलपूर्वक हैं?
अभिमन्यु – क्या, क्या? माता? क्या आप मेरे पिता या चाचा हैं? आप क्यों मुझ पर पिता की तरह अधिकार दिखाकर माता के सम्बन्ध में पूछ रहे हैं?
बृहन्नला – हे अभिमन्यु ! क्या देवकी-पुत्र केशव सकुशल हैं?
अभिमन्यु – क्या आदरणीय कृष्ण को भी नाम से…..? और क्या और क्या (कुशल हैं) (बृहन्नला और वल्लभ दोनों एक-दूसरे की ओर देखते हैं)
अभिमन्य – ये मेरे ऊपर तिरस्कार की भाँति क्यों हँस रहे हैं? बृहन्नला क्या कुछ ऐसा ही नहीं है। पिता अर्जुन तथा मामा श्रीकृष्ण वाला युवक धनुर्विद्या में निपुण होकर भी युद्ध में परास्त कैसे हो जाता है।

भावार्थ भाव यह है कि हे अभिमन्यु! तुम्हारे पिता अर्जुन हैं तथा मामा श्रीकृष्ण हैं। तुम धनुर्विद्या में निपुण भी हो फिर तुम युद्ध में कैसे पराजित हो गए, जिसके कारण बन्दी बनाकर तुम्हें यहाँ लाया गया है।

अभिमन्यु – स्वच्छन्द बकवास करना बन्द करो। हमारे कुल में अपनी प्रशंसा करना अनुचित है। युद्धभूमि में मेरे बाणों से मारे हुए सैनिकों के शरीरों को देखिए (बाणों पर) मेरे अतिरिक्त दूसरा नाम नहीं होगा।
बृहन्नला – अरे बाणों की ऐसी वीरता! फिर उन्होंने तुम्हें पैदल ही क्यों पकड़ लिया?
अभिमन्यु – वे मेरे सामने बिना शस्त्र के आए। पिता अर्जुन को याद करके मैं उन्हें कैसे मारता। शस्त्रहीनों पर मुझ जैसे लोग प्रहार नहीं करते। अतः इस शस्त्रहीन ने मुझे धोखा देकर पकड़ लिया।
राजा – तुम अभिमन्यु को शीघ्र बुला लाओ।
बृहन्नला – कुमार इधर आइए। ये महाराज (विराट) हैं। राजकुमार इनके पास जाइए।
अभिमन्यु – आह! किसके महाराज? ।
राजा – आओ, आओ पुत्र! मेरा अभिवादन क्यों नहीं करते हो? (मन में)
अरे! यह क्षत्रिय कुमार बहुत घमण्डी है। मैं इसका घमण्ड शान्त करता हूँ। (प्रकट रूप से) तो इसे किसने पकड़ा?

भावार्थ-अभिमन्यु क्षत्रिय कुमार है। क्षत्रियों की मर्यादा रही है कि वे शस्त्रहीनों पर प्रहार नहीं करते। इसी कारण युद्ध के मैदान में उसने शस्त्रों से रहित छद्मवेषधारी भीम पर बाण नहीं चलाया। भीम ने उसे अपनी भुजाओं से पकड़ लिया।

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3. भीमसेनः – महाराज! मया।
अभिमन्युः – अशस्त्रेणेत्यभिधीयताम्।
भीमसेनः – शान्तं पापम् । धनुस्तु दुर्बलैः एव गृह्यते। मम तु भुजौ एव प्रहरणम्।
अभिमन्युः – मा तावद् भोः! किं भवान् मध्यमः तातः यः तस्य सदृशं वचः वदति।
भगवान् – पुत्र! कोऽयं मध्यमो नाम?
अभिमन्युः – योक्त्रयित्वा जरासन्धं कण्ठश्लिष्टेन बाहुना।
असह्यं कर्म तत् कृत्वा नीतः कृष्णोऽतदर्हताम् ॥
राजा – न ते क्षेपेण रुष्यामि, रुष्यता भवता रमे।
किमुक्त्वा नापराद्धोऽहं, कथं तिष्ठति यात्विति ॥
अभिमन्युः – यद्यहमनुग्राह्यः
पादयोः समुदाचारः क्रियतां निग्रहोचितः।
बाहुभ्यामाहृतं भीमः बाहुभ्यामेव नेष्यति ॥
(ततः प्रविशत्युत्तरः)
उत्तरः – तात! अभिवादये!
राजा – आयुष्मान् भव पुत्र। पूजिताः कृतकर्माणो योधपुरुषाः।
उत्तरः – पूज्यतमस्य क्रियतां पूजा।
राजा – पुत्र! कस्मै?
उत्तरः – इहात्रभक्ते धनञ्जयाय।
राजा – कथं धनञ्जयायेति?
उत्तरः – अथ किम्
श्मशानाद्धनुरादाय तूणीराक्षयसायके।
नृपा भीष्मादयो भग्ना वयं च परिरक्षिताः॥ _
राजा – एवमेतत्।
उत्तरः . – व्यपनयतु भवाञ्छङ्काम्। अयमेव अस्ति धनुर्धरः धनञ्जयः।
बृहन्नला – यद्यहं अर्जुनः तर्हि अयं भीमसेनः अयं च राजा युधिष्ठिरः।
अभिमन्युः – इहात्रभवन्तो मे पितरः। तेन खलु …..
न रुष्यन्ति मया क्षिप्ता हसन्तश्च क्षिपन्ति माम् ।
दिष्ट्या गोग्रहणं स्वन्तं पितरो येन दर्शिताः॥
(इति क्रमेण सर्वान् प्रणमति, सर्वे च तम् आलिङ्गन्ति।)

अन्वय–(1) कण्ठश्लिष्टेन बाहुना जरासन्धं योक्त्रयित्वा तत् असह्यम् कर्म कृत्वा (भीमसेनः) कृष्णः अदर्हतां नीतः।
(2) पादयोः निग्रहः उचितः समुदाचारः क्रियताम्, बाहुभ्याम् आहृतं भीमः बाहुभ्याम् एव नेष्यति।
(3) मया क्षिप्ता न रुष्यन्ति, हसन्तः च माम् क्षिपन्ति। दिष्ट्या गोग्रहणं स्वन्तम् येन पितरः दर्शिताः।

शब्दार्थ-इत्यभिधीयताम् (इति + अभिधीयताम्) = ऐसा कहिए। भुजौ = दोनों भुजाएँ। प्रहरणम् = शस्त्र। योक्त्रयित्वा = बाँधकर । क्षेपेण = अपमान के द्वारा। रमे = मैं आनन्दित होता हूँ। अपराद्धः = अपराधी। अनुग्राह्यः = कृपा करने योग्य। निग्रहः = बंधन। योधपुरुषाः = योद्धा। पूज्यतमस्य = सबसे अधिक पूज्य । तूणीर = तरकश। भग्नाः = परास्त किए गए। व्यपनयतु = दूर करें। क्षिप्ता = आक्षेपयुक्त होने पर। दिष्ट्या = सौभाग्य से। गोग्रहणम् = गायों का अपहरण । स्वन्तं = सुखान्त। आलिङ्गन्ति = आलिंगन करते हैं।

प्रसंग प्रस्तुत,नाट्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘प्रत्यभिज्ञानम्’ में से उद्धृत है। इस पाठ का संकलन महाकवि भास द्वारा रचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस नाट्यांश में बताया गया है कि विराट नगर में पाण्डवों का अज्ञातवास पूरा होता है और सभी पाण्डव अपने पूर्व रूप में आ जाते हैं, जिन्हें अभिमन्यु तथा महाराज विराट आदि सभी पहचान लेते हैं।

सरलार्थ
भीमसेन – महाराज! मैंने।
अभिमन्यु – ‘शस्त्रहीन होकर पकड़ा’ ऐसा कहना चाहिए।
भीमसेन – शान्त हो जाइए। धनुष तो दुर्बलों के द्वारा उठाया जाता है। भुजाएँ ही मेरा शस्त्र हैं।
अभिमन्यु – नहीं, तो अरे! क्या आप हमारे मध्यम (मझले) तात (भीम) हैं, जो उनके समान वचन बोल रहे हैं।
भगवान् – पुत्र! यह मध्यम तात कौन हैं?
अभिमन्यु – (जिसने) अपनी भुजाओं से जरासंध को गले से पकड़कर बाँध करके जोकि कृष्ण के लिए भी उचित अवसर न आने के कारण असम्भव कर्म था, उसे करके लाए थे।
भावार्थ – जरासंध को मारने का कार्य श्रीकृष्ण को करना था, परन्तु उनके द्वारा करणीय कार्य को भीमसेन ने अपनी भुजाओं से पकड़कर पूरा किया।
राजा – तुम्हारे निन्दापूर्ण वचनों से मैं कुपित नहीं हूँ। तुम्हारे कुपित होने से मुझे आनन्द प्राप्त होता है। तुम यहाँ क्यों खड़े हो। जाओ यहाँ से अगर मैं ऐसा कहूँ तो क्या मैं अपराधी नहीं होऊँगा?
अभिमन्यु – यदि आप मुझ पर कृपा करना चाहते हैं तो मेरे पैर बाँधकर मुझे उचित दण्ड दीजिए। मैं हाथों से पकड़कर लाया गया हूँ। मेरे मध्यम तात भीम मुझे हाथों से ही छुड़ाकर ले जाएँगे। (इसके बाद ‘उत्तर’ का प्रवेश)
उत्तर – तात! मैं प्रणाम करता हूँ।
राजा – दीर्घायु हो पुत्र! युद्ध में वीरता दिखाने वाले वीरों का सत्कार कर दिया गया है।
उत्तर – अब सबसे अधिक पूज्य की पूजा कीजिए। राजा
राजा – किसकी पूजा पुत्र?
उत्तर – यहाँ उपस्थित अर्जुन की।
राजा – क्या अर्जुन यहाँ आए हैं?
उत्तर – और क्या? पूज्य अर्जुन नेश्मशान से अपना धनुष तथा अक्षय तरकश लेकर भीष्म आदि राजाओं को पराजित कर दिया तथा हम लोगों की रक्षा की।
राजा – ऐसी बात है?
उत्तर – आप अपना सन्देह दूर करें। धनुर्विद्या में प्रवीण अर्जुन यही हैं।
बृहन्नला – यदि मैं अर्जुन हूँ तो यह भीमसेन हैं और यह राजा युधिष्ठिर हैं।
अभिमन्यु – आप मेरे पिता हैं, इसीलिए-
मेरे निन्दापूर्ण वचनों से ये क्रोधित नहीं होते और हँसते हुए मुझे चिढ़ाते हैं। गौ-अपहरण की यह घटना सौभाग्य से सुखांत हुई है। इसी के कारण मुझे अपने सभी पिताओं के दर्शन हो गए। (ऐसा कहकर क्रम से सबको प्रणाम करता है और सब उसका आलिंगन करते हैं।)

भावार्थ-कौरवों द्वारा विराट की गौओं के अपहरण का एक विशेष प्रयोजन था। इसके माध्यम से दुर्योधन पाण्डवों के अज्ञातवास का पता लगाना चाहता था। इसी कारण इस घटना को अभिमन्यु अपने लिए सौभाग्यकारक मानता है क्योंकि इसी घटना के माध्यम से उसे अपने पिताओं (अर्जुन, भीम आदि) के दर्शन होते हैं।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम्

अभ्यासः
1. एकपदेन उत्तरं लिखत
(एक पद में उत्तर लिखिए)
(क) कः उमावेषमिवाश्रितः भवति?
(ख) कस्याः अभिभाषणकौतूहलं महत् भवति?
(ग) अस्माकं कुले किमनुचितम्?
(घ) कः दर्पप्रशमनं कर्तुमिच्छति?
(ङ) कः अशस्त्रः आसीत्?
(च) कया गोग्रहणम् अभवत् ?
(छ) कः ग्रहणं गतः आसीत्?
उत्तराणि:
(क) बृहन्नला/अर्जुनः,
(ख) बृहन्नलायाः,
(ग) आत्मस्तवं,
(घ) अभिमन्युः,
(ङ) अभिमन्युः,
(च) दिष्ट्या,
(छ) सौभद्रः

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम्

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) भटः कस्य ग्रहणम् अकरोत्?
(ख) अभिमन्युः कथं गृहीतः आसीत्?
(ग) कः वल्लभ-बृहन्नलयोः प्रश्नस्य उत्तरं न ददाति?
(घ) अभिमन्युः स्वग्रहणे किमर्थम् आत्मानं वञ्चितम् अनुभवति?
(ङ) कस्मात् कारणात् अभिमन्युः गोग्रहणं सुखान्तं मन्यते?
उत्तराणि:
(क) भटः सौभद्रस्य ग्रहणम् अकरोत्।
(ख) अभिमन्युः अशस्त्रः वञ्चयित्वा गृहीतः।
(ग) , अभिमन्युः वल्लभ-बृहन्नलयोः प्रश्नस्य उत्तरं न ददाति।
(घ) अभिमन्युः स्वग्रहणे आत्मानं वञ्चितम् इव अनुभवति यतः सः अशस्त्रः वञ्चयित्वां गृहीतः।
(ङ) अभिमन्युः गोग्रहणं सुखान्तं मन्यते यतः अनेनैव तस्य पितरः दर्शिताः ।

3. अधोलिखितवाक्येषु प्रकटितभावं चिनुत
(निम्नलिखित वाक्यों में से प्रकटितभाव चुनिए)
(क) भोः को नु खल्वेषः? येन भुजैकनियन्त्रितो बलाधिकेनापि न पीडितः अस्मि। (विस्मयः, भयम्, जिज्ञासा)
(ख) कथं कथं! अभिमन्यु माहम्। (आत्मप्रशंसा, स्वाभिमानः, दैन्यम्)
(ग) कथं मां पितृवदाक्रम्य स्त्रीगतां कथां पृच्छसे? (लज्जा, क्रोधः, प्रसन्नता)
(घ) धनुस्तु दुर्बलैः एव गृह्यते मम तु भुजौ एव प्रहरणम्। (अन्धविश्वासः, शौर्यम्, उत्साहः)
(ङ) बाहुभ्यामाहृतं भीमः बाहुभ्यामेव नेष्यति। (आत्मविश्वासः, निराशा, वाक्संयमः)
(च) दिष्ट्या गोग्रहणं स्वन्तं पितरो येन दर्शिताः। (क्षमा, हर्षः, धैर्यम्) ।
उत्तराणि:
(क) विस्मयः
(ख) स्वाभिमानः
(ग) क्रोधः,
(घ) शौर्यम्,
(ङ) आत्मविश्वासः,
(च) हर्षः।

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4. यथास्थानं रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत
(यथास्थान रिक्तस्थान की पूर्ति कीजिए)
(क) खलु + एषः = …………………..
(ख) बल + ……….. + अपि = बलाधिकेनापि
(ग) विभाति + उमावेषम् + इव + आश्रितः = बिभात्युमावेषम्
(घ) …………. + एनम् = वाचालयत्वेनम्
(ङ) रुष्यति + एष = रुष्यत्येष
(च) त्वमेव + एनम् = …………………..
(छ) यातु + …………. = यात्विति
(ज) …………. + इति = धनञ्जयायेति।
उत्तराणि:
(क) खलु + एषः = खल्वेषः
(ख) बल + अधिकेन + अपि = बलाधिकेनापि
(ग) विभाति + उमावेषम् = भात्युमावेषम्
(घ) वाचालयत् + एनम् = वाचालयत्वेनम्
(ङ) रुष्यति + एष = रुष्यत्येष
(च) त्वमेव + एनम् = त्वमेवैनम्
(छ) यातु + इति = यात्विति
(ज) धनञ्जयाय + इति = धनञ्जयायेति

5. अधोलिखितानि वचनानि कः कं प्रति कथयति
(निम्नलिखित वाक्यों में कौन किसे कह रहा है)
HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम् img-4
उत्तराणि:
HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम् img-5

6. अधोलिखितानि स्थूलानि सर्वनामपदानि कस्मै प्रयुक्तानि
(निम्नलिखित स्थूल सर्वनाम शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुए हैं)
(क) वाचालयतु एनम् आर्यः।
(ख) किमर्थ तेन पदातिना गृहीतः।
(ग) कथं न माम् अभिवादयसि।
(घ) मम तु भुजौ एव प्रहरणम् ।
(ङ) अपूर्व इव अत्र ते हर्षो ब्रूहि केन विस्मितः असि?
उत्तराणि:
(क) अभिमन्यवे,
(ख) भीमाय,
(ग) राजे,
(घ) भीमसेनाय,
(ङ) भटाय।

7. श्लोकानाम् अपूर्णः अन्वयः अधोदत्तः। पाठमाधृत्य रिक्तस्थानानि पूरयत
(श्लोकों का अपूर्ण अन्वय नीचे दिया गया है। पाठ के आधार पर रिक्त स्थान पूरे कीजिए)
(क) पार्थं पितरं मातुलं ………… च उद्दिश्य कृतास्त्रस्य तरुणस्य ……….. युक्तः।
(ख) कण्ठश्लिष्टेन …………. जरासन्धं योक्त्रयित्वा तत् असह्यं …………. कृत्वा। (भीमेन) कृष्णः अतदर्हतां नीतः।
(ग) रुष्यता …………. रमे। ते क्षेपेण न रुष्यामि, किं …………. अहं नापराद्धः, कथं (भवान्) तिष्ठति, यातु इति।
(घ) पादयोः निग्रहोचितः समुदाचारः …………. । बाहुभ्याम् आहृतम् (माम्) ………….. बाहुभ्याम् एव नेष्यति।
उत्तराणि:
(क) पार्थं पितरम् मातुले जनार्दनं च उद्दिश्य कृतास्त्रस्य तरुणस्य युद्धपराजयः युक्तः।
(ख) कण्ठश्लिष्टेन बाहुना जरासन्धं योक्त्रयित्वा तत् असह्यं कर्म कृत्वा। (भीमेन) कृष्णः अतदर्हतां नीतः।
(ग) रुष्यता भवता रमे। ते क्षेपेण न रुष्यामि, किं उक्त्वा अहं नापराद्धः, कथं (भवान्) तिष्ठति, यातु इति।
(घ) पादयोः निग्रहोचितः समुदाचारः क्रियताम्। बाहुभ्याम् आहृतम् (माम्) भीमः बाहुभ्याम् एव नेष्यति।

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(अ) अधोलिखितेभ्यः पदेभ्यः उपसर्गान् विचित्य लिखत
(नीचे लिखे पदों से उपसर्ग चुनकर लिखिए)
पदानि यथा- आसाद्य
(क) अवतारितः – ………………….
(ख) विभाति – ………………….
(ग) अभिभाषय – ………………….
(घ) उद्भूताः – ………………….
(ङ) उसिक्तः – ………………….
(च) प्रहरन्ति – ………………….
(छ) उपसर्पतु – ………………….
(ज) परिरक्षिताः – ………………….
(झ) प्रणमति – ………………….
उत्तराणि:
पदानि – उपसर्गः
(क) अवतारितः – अव
(ख) विभाति – वि
(ग) अभिभाषय – अभि
(घ) उद्भूताः – उत्
(ङ) उत्सिक्तः – उत्
(च) प्रहरन्ति – प्र
(छ) उपसर्पतु – उप
(त) परिरक्षिताः – परि
(झ) प्रणमति – प्र

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम्

प्रत्यभिज्ञानम् (पहचान) Summary in Hindi

प्रत्यभिज्ञानम् पाठ-परिचय

प्रस्तुत पाठ भासरचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से सम्पादित किया गया है। संस्कृत के नाटककारों में महाकवि ‘भास’ का नाम अग्रगण्य है। ‘पञ्चरात्रम्’ की कथावस्तु महाभारत के विराट पर्व पर आधारित है। पाण्डवों के अज्ञातवास के समय दुर्योधन एक यज्ञ करता है और यज्ञ की समाप्ति पर आचार्य द्रोण को गुरु-दक्षिणा देना चाहता है। द्रोणाचार्य गुरु-दक्षिणा के रूप में पाण्डवों का राज्याधिकार चाहते हैं। इसके लिए दुर्योधन पाँच रातों में पाण्डवों को ढूँढने की शर्त रखता है। इसी कारण इस नाटक का नाम ‘पञ्चरात्रम्’ रखा गया है।

पाठ में वर्णित कथा के अनुसार दुर्योधन आदि कौरव वीरों ने राजा विराट की गायों का अपहरण कर लिया। विराट-पुत्र उत्तर बृहन्नला (छद्मवेषी अर्जुन) को सारथी बनाकर कौरवों से युद्ध करने जाता है। कौरवों की ओर से अभिमन्यु (अर्जुन-पुत्र) भी युद्ध करता है। युद्ध में कौरवों की पराजय होती है। इसी बीच विराट को सूचना मिलती है, वल्लभ (छद्मवेषी भीम) ने युद्धभूमि में अभिमन्यु को पकड़ लिया है। अभिमन्यु भीम तथा अर्जुन को नहीं पहचान पाता और उनसे उग्रतापूर्वक बातचीत करता है। दोनों अभिमन्यु को महाराज विराट के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। अभिमन्यु महाराज विराट को भी प्रणाम नहीं करता। उसी समय राजकुमार उत्तर वहाँ पहुँचता है, जिसके रहस्योद्घाटन से अर्जुन तथा भीम आदि पाण्डवों के छद्मवेष का पता चल जाता है।

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HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्

HBSE 9th Class Sanskrit सूक्तिमौक्तिकम् Textbook Questions and

सूक्तिमौक्तिकम् HBSE 9th Class

I. अधोलिखितानां सूक्तिानां भावं हिन्दी भाषायां लिखत
(निम्नलिखित सूक्तियों के भाव हिन्दी भाषा में लिखिए)
(क) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
(ख) परोपकाराय सतां विभूतयः।
(ग) छायेव मैत्री खल सज्जनानाम् ।
(घ) आस्वायतोयाः प्रवहन्ति नद्यः।
उत्तराणि
(क) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति ‘चाणक्यनीति’ से संकलित श्लोक ‘सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ में से उद्धृत है। मधुर वचन बोलने से सभी प्रसन्न होते हैं। अतः हर मनुष्य को मृदुभाषी होना चाहिए। उसकी वाणी में इतनी मिठास हो कि उसे सुनते ही उसके शत्रु का हृदय भी पिघल जाए। मधुर बोली में एक ऐसा जादू होता है जो हर एक को अपना बना लेता है। अतः मनुष्य को सदैव मधुर वचन ही बोलने चाहिएँ।

(ख) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ नामक ग्रन्थ से संकलित श्लोक ‘सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ में से उद्धृत है। सज्जनों की सम्पत्तियाँ परोपकार के लिए होती हैं। सज्जन पुरुष अपनी सम्पत्ति स्वयं पर न खर्च करके जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए खर्च करते हैं। जिस प्रकार नदियाँ अपने जल को स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फलों को स्वयं नहीं खाते तथा बादल अपनी वर्षा के जल से उत्पन्न किए गए फसलों के अनाज स्वयं नहीं खाते अपितु इन सबका उपयोग जरूरतमंद समाज के लोग ही करते हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुष अपनी सम्पत्ति से जरूरतमंदों की सहायता करते हैं।

(ग) भावार्थ-प्रस्तुत सूक्ति ‘नीतिशतकम्’ से संकलित श्लोक ‘सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ में से उद्धृत है। दुष्ट एवं सज्जनों की मित्रता छाया के समान होती है। दुष्ट व्यक्ति भी मित्रता करता है और सज्जन व्यक्ति भी मित्रता करता है। परन्तु दोनों की मैत्री, दिन के पूर्वार्द्ध एवं परार्द्ध कालीन छाया की भाँति होती है। जिस प्रकार छाया दिन की शुरुआत में बड़ी होती है तथा फिर आहिस्ता-आहिस्ता छोटी होती जाती है, उसी प्रकार दुष्टों की मित्रता पहले गहरी होती है और धीरे-धीरे कम हो जाती है। इसके विपरीत जिस प्रकार दोपहर में छाया छोटी होती है, धीरे-धीरे बढ़ती है, इसी प्रकार सज्जनों की मित्रता पहले कम तथा धीरे-धीरे दूसरे के गुण-स्वभाव आदि समझकर बढ़ती है।

(घ) भावार्थ-प्रस्तुत सूक्ति ‘हितोपदेश’ नामक ग्रन्थ से संकलित श्लोक ‘सूक्तिमौक्तिकम्’ नामक पाठ में से उद्धृत है। खारे समुद्र में मिलने पर स्वादिष्ट जल वाली नदियों का जल अपेय हो जाता है। जैसी संगति होती है वैसे ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है। यदि मनुष्य गुणवानों के बीच में रहता है तो उनके गुणों के प्रभाव से गुणवान बन जाता है। परन्तु यदि गुणहीनों के बीच गुणयुक्त व्यक्ति भी चला जाए तो उसके गुण दुर्गुण में बदल जाते हैं। इसी बात को समझाने के लिए कहा गया है कि नदियों का जल पीने योग्य होता है परन्तु खारे जल वाले समुद्र में नदियाँ मिल जाती हैं तो उनका स्वादिष्ट जल भी खारा हो जाता है।

सूक्तिमौक्तिकम् प्रश्न उत्तर HBSE 9th Class

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्

II. अधोलिखितान् श्लोकान् पठित्वा एतदाधारितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतपूर्णवाक्येन लिखत
(निम्नलिखित श्लोकों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्यों में लिखिए)
(1) वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः॥ -मनुस्मृतिः
(क) यत्नेन किं रक्षेत्?
(ख) किम् एति याति च?
(ग) कस्मात् क्षीणः अक्षीणः?
उत्तराणि:
(क) यत्नेन वृत्तं रक्षेत्।
(ख) वित्तम् एति याति च।
(ग) वित्ततः क्षीणः अक्षीणः।

(2) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्माद् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥
(क) प्रियवाक्येन के तुष्यन्ति?
(ख) सर्वे जन्तवः केन तुष्यन्ति?
(ग) तस्मात् किम् एव वक्तव्यम्?
उत्तराणि:
(क) प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे जन्तवः तुष्यन्ति।
(ख) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे जन्तवः तुष्यन्ति।
(ग) तस्माद् प्रियवाक्यम् एव वक्तव्यम्।

(3) गुणेष्वेव हि कर्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा।
गुणयुक्तो दरिद्रोऽपि नेश्वरैरगुणैः समः॥
(क) सदा गुणेषु कैः प्रयत्नः कर्तव्यः?
(ख) सदा पुरुषैः केषु प्रयत्नः कर्तव्यः?
(ग) ईश्वरैः अगुणैः समः कः न अस्ति?
उत्तराणि:
(क) सदा गुणेषु पुरुषैः प्रयत्नः कर्तव्यः।
(ख) सदा पुरुषैः गुणेषु प्रयत्नः कर्तव्यः ।
(ग) दरिद्रः अपि गुणयुक्तः ईश्वरैः अगुणैः समः न अस्ति।

Sanskrit 9 Class Chapter 5 HBSE

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III. स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत.
(स्थूल पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए)
(क) यत्नेन वृत्तं रक्षेत्।
(ख), पुरुषैः गुणेषु प्रयत्नः कर्तव्यः।
(ग) मरालैः वियोगेण सरोवराणां हानिः भवति।
(घ) नद्यः आस्वाद्यतोयाः प्रवहन्ति।
(ङ) सतां विभूतयः परोपकाराय भवन्ति।
उत्तराणि:
(क) यत्नेन किं रक्षेत?
(ख) पुरुषैः केषु प्रयत्नः कर्तव्यः?
(ग) कैः वियोगेण सरोवराणां हानिः भवति?
(घ) काः आस्वाद्यतोयाः प्रवहन्ति?
(ङ) केषां विभूतयः परोपकाराय भवन्ति?

Shemushi Sanskrit Class 9 Chapter 5 Solutions HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्

IV. अधोलिखित प्रश्नानाम् चतुषु वैकल्पिक उत्तरेषु उचितमुत्तरं चित्वा लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के दिए गए चार विकल्पों में से उचित उत्तर का चयन कीजिए)
1. यत्नेन किं रक्षेत?
(i) वित्तं
(ii) वृन्तं
(iii) वृत्तं
(iv) विन्तं
उत्तरम्:
(iii) वृत्तं

2. पुरुषैः केषु प्रयत्नः कर्तव्यः?
(i) धनेषु
(ii) वित्तेषु
(iii) वृत्तेषु
(iv) गुणेषु
उत्तरम्:
(iv) गुणेषु

3. गुणज्ञेषु के गुणाः भवन्ति?
(i) गुणाः
(ii) धनाः
(iii) जनाः
(iv) नराः
उत्तरम्:
(i) गुणाः

4. कैः सह सरोवराणां हानिः भवति?
(i) विद्वानैः
(ii) शृगालैः
(iii) मरालैः
(iv) श्वानैः
उत्तरम्
(iii) मरालैः

5. जन्तवः केन तुष्यन्ति?
(i) प्रियवाक्येन
(ii) प्रियफलेन
(iii) प्रियधनेन
(iv) प्रियमित्रेण
उत्तरम्
(i) प्रियवाक्येन

6. ‘कुत्रापि’ इति पदे कः सन्धिविच्छेदः?
(i) कु + त्रापि
(ii) कुत्र + आपि
(iii) कुत्रा + पि
(iv) कुत्र + अपि
उत्तरम्
(iv) कुत्र + अपि

7. ‘छाया + इव’ इति पदे सन्धियुक्त पदम्
(i) छायाय
(ii) छायाऽइव
(iii)छायेव
(iv) छायैव
उत्तरम्:
(iii) छायेव

8. ‘खलसज्जनानाम्’ इति पदे कः समासः?
(i) तत्पुरुषः
(ii) द्वन्द्वः
(iii) द्विगुः
(iv) बहुव्रीहिः
उत्तरम्:
(ii) द्वन्द्वः

9. ‘सह’ पदस्य योगे का विभक्तिः ?
(i) चतुर्थी
(ii) तृतीया
(iii) पञ्चमी
(iv) द्वितीया
उत्तरम्:
(ii) तृतीया

10. ‘वृत्तं पदस्य पर्यायवाची पदं लिखत
(i) वित्तं
(ii) चरित्रं
(iii) धनमं
(iv) दुर्गुणं
उत्तरम्:
(ii) चरित्रं

Class 9 Sanskrit Chapter 5 Question Answer HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्

योग्यताविस्तारः

संस्कृत साहित्य में नीति-ग्रन्थों द्वारा नैतिक शिक्षाएँ दी गई हैं, जिनका उपयोग करके मनुष्य अपने जीवन को सफल और समृद्ध बना सकता है। ऐसे ही बहुमूल्य सुभाषित यहाँ संकलित हैं, जिनमें सदाचरण की महत्ता, प्रियवाणी की आवश्यकता, परोपकारी पुरुष का स्वभाव, गुणार्जन की प्रेरणा, मित्रता का स्वरूप और उत्तम पुरुष के सम्पर्क से होने वाली शोभा की प्रशंसा और सत्संगति की महिमा आदि विषयों का प्रतिपादन किया गया है। संस्कृत-साहित्य में सारगर्भित, लौकिक पारलौकिक एवं नैतिकमूल्यों वाले सुभाषितों की बहुलता है जो देखने में छोटे प्रतीत होते हैं, किन्तु गम्भीर भाव वाले होते हैं। मानव-जीवन में इनका अतीव महत्त्व है।

Class 9 Shemushi Chapter 5 Solutions HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्

भावविस्तारः
(क) आस्वाद्यतोयाः प्रवहन्ति नद्यः समुद्रमासाथ भवन्त्यपेयाः।
खारे समुद्र में मिलने पर स्वादिष्ट जलवाली नदियों का जल अपेय हो जाता है। इसी भावसाम्य के आधार पर कहा गया है कि “संसर्गजाः दोषगुणाः भवन्ति।”

(ख) छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् ।
दुष्ट व्यक्ति मित्रता करता है और सज्जन व्यक्ति भी मित्रता करता है। परन्तु दोनों की मैत्री, दिन के पूर्वार्द्ध एवं परार्द्ध कालीन छाया की भाँति होती है। वास्तव में दुष्ट व्यक्ति की मैत्री के लिए श्लोक का प्रथम चरण “आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण” कहा गया है तथा सज्जन की मैत्री के लिए द्वितीय चरण ‘लम्वीपुरा वृद्धिमती च पश्चात्’ कहा गया है।

Class 9 Sanskrit Chapter 5 Solutions HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्

भाषिकविस्तारः
(1) वित्ततः वित्त शब्द से तसिल् प्रत्यय किया गया है। पंचमी विभक्ति के अर्थ में लगने वाले तसिल् प्रत्यय का तः ही शेष रहता है। उदाहरणार्थ-सागर + तसिल् = सागरतः, प्रयाग + तसिल = प्रयागतः, देहली + तसिल = देहलीतः आदि। इसी प्रकार वृत्ततः शब्द में भी तसिल् प्रत्यय लगा करके वृत्ततः शब्द बनाया गया है। .

(2) उपसर्ग-क्रिया के पूर्व जुड़ने वाले प्र, परा आदि शब्दों को उपसर्ग कहा जाता है। जैसे-‘ह’ धातु से उपसर्गों का योग होने पर निम्नलिखित रूप बनते हैं
प्र + ह – प्रहरति, प्रहार (हमला करना)
वि + ह – विहरति, विहार (भ्रमण करना)
उप + हृ – उपहरति, उपहार (भेंट देना)
सम् + हृ – संहरति, संहार (मारना)

(3) शब्दों को स्त्रीलिङ्ग में परिवर्तित करने के लिए स्त्री प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। इन प्रत्ययों में टापू व ङीप् । मुख्य हैं।
जैसे- बाल + टाप् – बाला
अध्यापक + टाप् – अध्यापिका
लघु + ङीप् – लघ्वी
गुरु + ङीप् – गुर्वी

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्

HBSE 9th Class Sanskrit सूक्तिमौक्तिकम् Important Questions and Answers

(क) परोपकारविषयकं श्लोकद्वयम् अन्विष्य स्मृत्वा च कक्षायां सस्वरं पठ।
1. परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः।
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः।
परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥

2.श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन,
दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन।
विभाति कायः करुणापराणां,
परोपकारेण न चन्दनेन।

उत्तरम् छात्र इन श्लोकों को याद करें तथा अध्यापक के सहयोग से उनका कक्षा में सस्वर पाठ करें।

(ख) नद्याः एकं सुन्दरं चित्रं निर्माय संकलय्य वा वर्णयत यत् तस्याः तीरे मनुष्याः पशवः खगाश्च निर्विघ्नं जलं पिबन्ति।

उत्तरम् छात्र अध्यापक की सहायता से नदी का चित्र बनाएँ तथा वर्णन करें कि उसके तट पर मनुष्य, पशु, पक्षी सभी बिना कष्ट के पानी पी रहे हैं।

सूक्तिमौक्तिकम्  श्लोकों के सप्रसंग हिन्दी सरलार्थ एवं भावार्थ

1. वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः॥ -मनुस्मृतिः

अन्वय-वृत्तं यत्नेन संरक्षेत वित्तम् एति च याति च, वित्ततः क्षीणः अक्षीणः वित्तः हतः तु हतः।

शब्दार्थ-वृत्तं = चरित्र। यत्नेन = प्रयत्नपूर्वक। संरक्षेद् = रक्षा करनी चाहिए। वित्तमेति (वित्तम् + एति) = पैसा आता है। याति = जाता है। क्षीणः = नष्ट हुआ। अक्षीणः = नष्ट न हुआ।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘सूक्तिमौक्तिकम्’ से उद्धृत है। इस श्लोक का संकलन ‘मनुस्मृति’ से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस सूक्ति में चरित्र की रक्षा के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ-चरित्र की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए क्योंकि धन तो आता-जाता रहता है। धन से हीन (नष्ट) व्यक्ति तो सम्पन्न (नष्ट न हुआ) हो सकता है, परन्तु चरित्र से हीन व्यक्ति तो पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

भावार्थ-इस जीवन में मनुष्य के लिए सबसे मूल्यवान वस्तु उसका चरित्र है। क्योंकि अन्य वस्तुएँ तो जाने या विनष्ट होने के बाद पुनः प्राप्त हो सकती हैं। परन्तु चरित्र के नष्ट होने पर उसकी पुनः प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः मनुष्य को अपने चरित्र की रक्षा हर स्थिति में करनी चाहिए।

2. श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥ -विदुरनीतिः

अन्वय-धर्मसर्वस्वं श्रूयतां श्रुत्वा च अवधार्यताम् एव। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।

शब्दार्थ धर्मसर्वस्वं = धर्म का सार। अवधार्यताम् = ग्रहण करो, पालन करो। आत्मनः = अपने से। प्रतिकूलानि = प्रतिकूल व्यवहार का। परेषां = दूसरों के प्रति। समाचरेत् = आचरण नहीं करना चाहिए।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘सूक्तिमौक्तिकम’ से उद्धृत है। इस सूक्ति का संकलन महान् नीतिज्ञ विदुर द्वारा रचित ‘विदुरनीति’ से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस श्लोक में अपने प्रतिकूल दूसरों के प्रति आचरण न करने के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ-धर्म का सार सुनो और सुनकर उसे ग्रहण करो अर्थात् उसका पालन करो। अपने से प्रतिकूल व्यवहार का आचरण दूसरों के प्रति कभी नहीं करना चाहिए।

भावार्थ धर्म का सार यही है कि हमें कभी भी दूसरों के प्रति अपने से विपरीत आचरण नहीं करना चाहिए।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्

3. प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्माद् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥ -चाणक्यनीतिः

अन्वय सर्वे जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति तद् तस्माद् एव वक्तव्यं, वचने का दरिद्रता।

शब्दार्थ-प्रियवाक्यप्रदानेन = प्रिय वाक्य बोलने से। तुष्यन्ति = सन्तुष्ट होते हैं। वक्तव्यम् = कहने चाहिए। वचने = बोलने में। दरिद्रता = कंजूसी, निर्धनता।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ सूक्तिमौक्तिकम्’ से उद्धृत है। यह श्लोक ‘चाणक्यनीति’ नामक ग्रन्थ से संकलित है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस श्लोक में बताया गया है कि हमें मधुर वाणी ही बोलनी चाहिए।

सरलार्थ-सभी प्राणी मधुर वाक्य बोलने से सन्तुष्ट होते हैं, अतः मधुर वचन ही बोलने चाहिएँ तथा बोलने में कैसी दरिद्रता या निर्धनता।

भावार्थ-प्रत्येक मानव को मृदुभाषी होना चाहिए। उसकी वाणी में इतनी मिठास हो कि उसे सुनते ही उसके शत्रु का हृदय भी पिघल जाए। मीठे बोल में एक ऐसा जादू होता है जो हर एक को अपना बना लेता है। मधुर वाणी बोलने में कुछ भी धन नहीं लगता। मीठी वाणी का मूल्य तो केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही लगा सकता है।

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4. पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः
स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः
परोपकाराय सतां विभूतयः ॥ -सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

अन्वय-नद्यः स्वयमेव अम्भः न पिबन्ति, वृक्षाः स्वयं फलानि न खादन्ति। वारिवाहाः खलु सस्यं न अदन्ति, सतां विभूतयः परोपकाराय (भवन्ति)।

शब्दार्थ-नाम्भः (न + अम्भः) = पानी नहीं। खादन्ति = खाते हैं। अदन्ति = खाते हैं। सस्यम् = अन्न, फसल। वारिवाहाः = । बादल । सतां = सज्जनों की। विभूतयः = सम्पत्तियाँ।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘सूक्तिमौक्तिकम्’ से उद्धृत है। यह श्लोक ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम’ से संकलित है।
सन्दर्भ-निर्देश इस श्लोक में परोपकारी पुरुष के स्वभाव के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ-नदियाँ स्वयं जल नहीं पीती हैं, वृक्ष स्वयं फल नहीं खाते हैं। बादल निश्चय ही फसल का भक्षण नहीं करते। इसी प्रकार सज्जनों की सम्पत्तियाँ भी दूसरों के उपकार के लिए होती हैं।

भावार्थ-नदियों में बहता हुआ जल नदी के काम न आकर देश और समाज के काम आता है। वृक्ष में लगे हुए फल स्वयं वृक्ष के उपयोग नहीं आता अपितु कोई अन्य ही उसका उपयोग करता है। इसी प्रकार बादल की वर्षा से जो अनाज पैदा होता है उसे बादल नहीं खाते। समाज के लोग ही उस अनाज को खाते हैं। इसी प्रकार सज्जनों की जो भी सम्पत्ति होती है, उसका उपयोग सज्जन स्वयं न करके समाज के लोगों की सहायता में लगा देते हैं। क्योंकि सज्जनों की सबसे बड़ी सम्पत्ति तो दूसरों का उपकार करना है।

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5. गुणेष्वेव हि कर्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा।
गुणयुक्तो दरिद्रोऽपि नेश्वरैरगुणैः समः॥ -मृच्छकटिकम्

अन्वय पुरुषैः सदा गुणेषु एव हि प्रयलः कर्त्तव्यः । गुणयुक्त दरिद्रः अपि अगुणैः ईश्वरैः समः न (अपितु तेभ्योऽधिक इति भावः)

शब्दार्थ-गुणेष्वेव (गुणेषु + एव) = गुणों में ही। अगुणैः = गुणहीनों से। ईश्वरैः = ऐश्वर्यशाली। समः = समान।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘सूक्तिमौक्तिकम् से उद्धत है। यह श्लोक महाकवि शूद्रक विरचित ‘मृच्छकटिकम्’ नामक नाटक से संकलित है।

सन्दर्भ-निर्देश इस श्लोक में गुणों को प्राप्त करने की प्रेरणा के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ-मनुष्य को सदा गुणों को प्राप्त करने का ही प्रयास करना चाहिए। दरिद्र होता हुआ भी गुणवान व्यक्ति ऐश्वर्यशाली गुणहीन के समान नहीं हो सकता।

भावार्थ मनुष्यों को सदा गुणों के अर्जन में ही प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि गुणवान् निर्धन व्यक्ति भी गुणहीन धनिकों से बढ़कर है। अर्थात् निर्धन गुणवान् व्यक्ति धनवान् गुणहीन व्यक्ति से श्रेष्ठ है। क्योंकि गुणवान् व्यक्ति अपने गुणों से धन एकत्रित कर सकता है, जबकि गुणहीन व्यक्ति धन का नाश करता है।

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6. आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण
लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् ॥ -नीतिशतकम्

अन्वय-खल सज्जनानाम् मैत्री आरम्भगुर्वी, क्रमेण क्षयिणी पुरा लध्वी पश्चात् वृद्धिमती च दिनस्य पूर्वार्द्ध-परार्द्ध भिन्ना छाया इव (भवति)।

शब्दार्थ खल सज्जनानाम् = दुर्जनों और सज्जनों की। मैत्री = मित्रता। आरम्भगुर्वी = आरम्भ में बड़ी, क्रमेण । क्षयिणी = क्रम से क्षीण होने वाली। पुरा लघ्वी = पहले छोटी। पश्चात् वृद्धिमती च = और पीछे बढ़ने वाली। दिनस्य = दिन के। पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना = पूर्वार्द्ध और अपरार्द्ध में भिन्न रूप वाली। छाया इव = छाया की तरह होती है।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘सूक्तिमौक्तिकम्’ से उद्धृत है। यह ‘भर्तृहरि’ द्वारा रचित ‘नीतिशतकम्’ नामक ग्रन्थ से संकलित है। .

सन्दर्भ-निर्देश-प्रस्तुत श्लोक में दुर्जनों और सज्जनों की मित्रता में अन्तर के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ-दुर्जनों की मित्रता प्रारम्भ में अधिक दिन के पूर्वार्द्ध के समान तथा क्रम से क्षीण होने वाली तथा सज्जनों की मित्रता पहले कम और बाद में बढ़ने वाली दिन के उत्तरार्द्ध की छाया की तरह होती है।

भावार्थ-दुर्जनों की मित्रता दिन के प्रथम आधे भाग में रहने वाली छाया की तरह प्रारम्भ में अधिक और फिर धीरे-धीरे कम होती जाती है एवं सज्जनों की मित्रता उत्तरार्ध की छाया की तरह पहले कम और बाद में बढ़ने वाली होती है।

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7. यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु
हँसा महीमण्डलमण्डनाय।
हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां
येषां मरालैः सह विप्रयोगः ॥ -भामिनीविलासः

अन्वय महीमण्डलमण्डनाय हंसाः यत्रापि कुत्रापि गता भवेयुः हि हानिः तु तेषां सरोवराणाम् येषां मरालैः सह विप्रयोगः (भवति)।

शब्दार्थ-मण्डनाय = सुशोभित करने के लिए। हंसा = हंस। मराला = हंस । सरोवराणां = तालाबों का। विप्रयोगः = वियोग, अलग होना। हानि = हानि।

प्रसंग प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘सूक्तिमौक्तिकम्’ से उद्धृत है। यह श्लोक पं० जगन्नाथ द्वारा रचित ‘भामिनीविलास’ नामक ग्रन्थ से संकलित है।

सन्दर्भ-निर्देश इस श्लोक में उत्तम पुरुष के सम्पर्क से होने वाली शोभा की प्रशंसा के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ पृथ्वीमण्डल को सुशोभित करने के लिए हंस जहाँ-कहीं भी अर्थात् सभी जगह प्रवेश करने में समर्थ हैं, हानि तो उन सरोवरों की ही है जिनका उन हंसों से वियोग हो जाता है।

भावार्थ-इस श्लोक में कवि ने हंसों के माध्यम से उत्तम पुरुष की प्रशंसा की है। हंस जिस सरोवर में रहते हैं, उस सरोवर की शोभा अपने-आप बढ़ जाती है। उसी प्रकार उत्तम पुरुष जिस स्थान पर रहते हैं उस स्थान का महत्त्व अपने-आप ही बढ़ जाता है। परिस्थितिवश जब हंस तालाब को छोड़कर जाता है तो उसके जाने का दुःख तालाब को सहन करना पड़ता है। उसी प्रकार जब उत्तम पुरुष किसी अन्य स्थान पर जाने लगते हैं तो उनके जाने का दुःख उस स्थान के लोगों को सहना पड़ता है। हंस के समान उत्तम पुरुष पृथ्वी पर सभी जगह अपना स्थान बना लेते हैं।

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8. गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति ।
ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः।
आस्वाद्यतोयाः प्रवहन्ति नद्यः
समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः ॥ -हितोपदेशः

अन्वय-गुणज्ञेषु गुणाः गुणाः भवन्ति, निर्गुणं प्राप्य ते दोषाः भवन्ति। नद्यः आस्वाद्यतोयाः प्रवहन्ति समुद्रम् आसाद्य अपेयाः भवन्ति।

शब्दार्थ-गुणज्ञेषु = गुणों को जानने वालों में । दोषाः = दुर्गुण । आस्वायतोयाः = स्वादयुक्त जल वाली। आसाद्य = प्राप्त करके। अपेयाः = न पीने योग्य।

प्रसंग-प्रस्तुत श्लोक संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘सूक्तिमौक्तिकम्’ से लिया गया है। इस श्लोक का संकलन पं० नारायण द्वारा रचित ‘हितोपदेश’ से किया गया है।

सन्दर्भ-निर्देश इस श्लोक में गुणवान लोगों के सम्पर्क में रहने के लाभ के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ गुणों को जानने वाले लोगों में रहने के कारण ही गुण, गुण होते हैं। गुणहीनों को प्राप्त करके वे (गुण) दोष बन जाते हैं। नदियाँ स्वादयुक्त जल वाली होती हैं, परन्तु समुद्र को प्राप्त करके न पीने योग्य हो जाती हैं।

भावार्थ-दोष और गुण संसर्ग से ही उत्पन्न होते हैं। गुणवानों के बीच में यदि कोई निर्गुण व्यक्ति भी रहता है तो वह उनके सम्पर्क से गुणवान बन जाता है। दूसरी ओर, निर्गुणों के सम्पर्क में आकर गुणवान् व्यक्ति भी निर्गुण बन जाता है। जैसे स्वादिष्ट जल वाली नदियों का पानी जब समुद्र में मिलता है तो उसके सम्पर्क में स्वादिष्ट जल भी खारा बन जाता है।

अभ्यासः

1. एकपदेन उत्तरं लिखत
(एक पद में उत्तर लिखिए)
(क) वित्ततः क्षीणः कीदृशः भवति?
(ख) कस्य प्रतिकूलानि कार्याणि परेषां न समाचरेत्?
(ग) कुत्र दरिद्रता न भवेत्?
(घ) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति?
(ङ) का पुरा लघ्वी भवति?
उत्तराणि:
(क) अक्षीणः,
(ख) आत्मनः,
(ग) वचने,
(घ) फलानि,
(ङ) दिनस्य छाया।

2. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषयां लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) यत्नेन किं रक्षेत् वित्तं वृत्तं वा?
(ख) अस्माभिः (किं न समाचरेत्) कीदृशम् आचरणं न कर्त्तव्यम्?
(ग) जन्तवः केन तुष्यन्ति?
(घ) सज्जनानां मैत्री कीदृशी भवति?
(ङ) सरोवराणां हानिः कदा भवति?
उत्तराणि:
(क) यत्नेन वृत्तं रक्षेत्।
(ख) अस्माभिः आत्मनः प्रतिकूलम् आचरणं न कर्त्तव्यम्।
(ग) जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति।
(घ) सज्जनानां मैत्री पुरा लध्वी पश्चात् च वृद्धिमती भवति।
(ङ) मरालैः सह वियोगेण सरोवराणां हानिः भवति।

3. ‘क’ स्तम्भे विशेषणानि ‘ख’ स्तम्भे च विशेष्याणि दत्तानि, तानि यथोचितं योजयत
(स्तम्भ ‘क’ में विशेषण शब्द व स्तम्भ ‘ख’ में विशेष्य शब्द दिए गए हैं, उन्हें यथोचित जोडिए)
‘क’ स्तम्भः – ‘ख’ स्तम्भः
(क) आस्वायतोयाः (1) खलानां मैत्री
(ख) गुणयुक्तः (2) सज्जनानां मैत्री
(ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना (3) नद्यः
(घ) दिनस्य परार्द्धभिन्ना (4) दरिद्रः
उत्तराणि:
‘क’ स्तम्भः – ‘ख’ स्तम्भः
(क) आस्वाद्यतोयाः (3) नद्यः
(ख) गुणयुक्तः (4) दरिद्रः
(ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना (1) खलानां मैत्री
(घ) दिनस्य परार्द्धभिन्ना (2) सज्जनानां मैत्री

4. अधोलिखितयोः श्लोकद्वयोः आशयं हिन्दीभाषया आङ्ग्लभाषया वा लिखत
(निम्नलिखित दो श्लोकों के आशय (भावार्थ) हिन्दी भाषा अथवा अंग्रेजी भाषा में लिखिए)
(क) आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण
लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् ॥

(ख) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥
उत्तराणि:

(क) भावार्थ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य भर्तृहरि ने दुष्टों और सज्जनों की मित्रता में अन्तर स्पष्ट करते हुए कहा है कि जिस प्रकार छाया दिन की शुरुआत में बड़ी होती है तथा फिर आहिस्ता-आहिस्ता छोटी होती जाती है, उसी प्रकार दुष्टों की मित्रता पहले गहरी होती है और धीरे-धीरे कम होती जाती है। इसके विपरीत जिस प्रकार दोपहर में छाया छोटी होती है, धीरे-धीरे बढ़ती है, इसी प्रकार सज्जनों की मित्रता पहले कम तथा धीरे-धीरे दूसरे के गुण-स्वभाव आदि समझकर बढ़ती है।

(ख) भावार्थ-प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने वचन के महत्त्व के विषय में कहा है कि मधुर वचन बोलने से सभी प्रसन्न होते हैं, अतः मनुष्य को सदैव मधुर वचन बोलने में कृपणता नहीं करनी चाहिए।

5. अधोलिखितपदेभ्यः भिन्नप्रकृतिकं पदं चित्वा लिखत
(निम्नलिखित शब्दों से भिन्न प्रकृति वाले शब्द चुनकर लिखें)
(क) वक्तव्यम्, कर्तव्यम्, सर्वस्वम्, हन्तव्यम्।
(ख) यत्नेन, वचने, प्रियवाक्यप्रदानेन, मरालेन।
(ग) श्रूयताम्, अवधार्यताम्, धनवताम्, क्षम्यताम्।
(घ) जन्तवः, नद्यः, विभूतयः, परितः।
उत्तराणि:
(क) सर्वस्वम्,
(ख) मरालेन,
(ग) धनवताम्,
(घ) परितः।

6. स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्नवाक्यनिर्माणं कुरुत
(स्थूल पदों के आधार पर प्रश्न वाक्य का निर्माण कीजिए)
(क) वृत्ततः क्षीणः हतः भवति।
(ख) धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा अवधार्यताम्।
(ग) वृक्षाः फलं न खादन्ति।
(घ) खलानाम् मैत्री आरम्भगुर्वी भवति।
उत्तराणि:
(क) कस्मात् क्षीणः हतः भवति?
(ख) किं श्रुत्वा अवधार्यताम् ?
(ग) के फलं न खादन्ति?
(घ) केषाम् मैत्री आरम्भगुर्वी भवति?

7. अधोलिखितानि वाक्यानि लोट्लकारे परिवर्तयत
(निम्नलिखित वाक्यों का लोट्लकार में परिवर्तन कीजिए)
यथा-सः पाठं पठति। – सः पाठं पठतु।
(क) नद्यः आस्वाद्यतोयाः सन्ति। ……………………………..
(ख) सः सदैव प्रियवाक्यं वदति। ……………………………..
(ग) त्वं परेषां प्रतिकूलानि न समाचरसि। ……………………………..
(घ) ते वृत्तं यत्नेन संरक्षन्ति। ……………………………..
(ङ) अहम् परोपकाराय कार्यं करोमि। ……………………………..
उत्तराणि:
(क) नद्यः आस्वाद्यतोयाः सन्ति। नद्यः आस्वाधतोयाः सन्तु।
(ख) · सः सदैव प्रियवाक्यं वदति। सः सदैव प्रियवाक्यं वदतु।
(ग) त्वं परेषां प्रतिकूलानि न समाचरसि। त्वं परेषां प्रतिकूलानि न समाचर।
(घ) . ते वृत्तं यत्नेन संरक्षन्ति। ते वृत्तं यत्नेन संरक्षन्तु।
(ङ) अहं परोपकाराय कार्यं करोमि। अहं परोपकाराय कार्यं करवाणि।

सूक्तिमौक्तिकम् (सुन्दर वचन रूपी मोती) Summary in Hindi

सूक्तिमौक्तिकम् पाठ-परिचय 

प्रस्तुत पाठ का संकलन संस्कृत साहित्य के विभिन्न नीतिग्रन्थों से किया गया है। संस्कृत साहित्य में नीतिग्रन्थों की समृद्ध परम्परा रही है। इनमें सारगर्भिता और सरल रूप में नैतिक शिक्षाएँ दी गई हैं, जिनका उपयोग करके मनुष्य अपने जीवन को समृद्ध बना सकता है। ऐसे ही मनोहारी और बहुमूल्य सुभाषित यहाँ संकलित हैं।

इस पाठ में कुल आठ सूक्तियों का संकलन किया गया है। पहली सूक्ति ‘मनुस्मृति’ से संकलित है। इस सूक्ति में चरित्र के संरक्षण पर बल दिया गया है। दूसरी सूक्ति ‘विदुरनीति’ से संकलित है, जिसमें अपने से प्रतिकूल आचरण न करने के विषय में बताया गया है। मधुर वचन बोलने की शिक्षा देने वाली तीसरी सूक्ति ‘चाणक्यनीति’ से संकलित है। परोपकार के महत्त्व की शिक्षा देने वाली चौथी सूक्ति ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ से ली गई है।

पाँचवीं सूक्ति में गुण के महत्त्व के विषय में बताया गया है जिसका संकलन ‘मृच्छकटिकम्’ से किया गया है। सज्जनों एवं दुर्जनों की मित्रता में अन्तर बताने वाली छठी सूक्ति ‘नीतिशतकम्’ से ली गई है। सातवीं सूक्ति ‘भामिनीविलास’ से संकलित है। इस सूक्ति में सज्जनों की तुलना हंस से की गई है। अन्तिम सूक्ति ‘हितोपदेश’ से संकलित है। इस सूक्ति में गुणवान् लोगों के पास रहने पर बल दिया गया है।

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HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 कल्पतरूः

Haryana State Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 कल्पतरूः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 कल्पतरूः

HBSE 9th Class Sanskrit कल्पतरूः Textbook Questions and Answers

Shemushi Sanskrit Class 9 Chapter 4 Solutions HBSE

I. अधोलिखितानां सूक्तिानां भावं हिन्दी भाषायां लिखत
(निम्नलिखित सूक्तियों के भाव हिन्दी भाषा में लिखिए)
(क) संसारसागरे आशरीरमिदं सर्वं धन वीचिवच्चञ्चलम्।
(ख) एकः परोपकार एवास्मिन् संसारेऽनश्वरः। .
(ग) यथा पृथ्वीमदरिद्रां पश्यामि, तथा करोतु देव।
उत्तराणि:
(क) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति ‘वेतालपञ्चविंशतिः’ से संकलित पाठ ‘कल्पतरुः’ में से उद्धृत है। महापुरुषों ने इस संसार को समुद्र कहा है। इस संसार में शरीर सहित जो कुछ धन-धान्यादि है, वह नाशवान है। जिस प्रकार समुद्र में लहरें उठती हैं और थोड़ी देर बाद उसी में विलीन हो जाती हैं; उसी प्रकार इस संसार रूपी समुद्र में मनुष्य का शरीर, उसकी धन-सम्पत्ति आदि लहरों की भाँति नाशवान है। संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर है। केवल मनुष्य के द्वारा किया गया सत्कर्म ही स्थिर है।

(ख) भावार्थ-प्रस्तुत सूक्ति ‘वेतालपञ्चविंशतिः’ से संकलित पाठ ‘कल्पतरुः’ में से उद्धृत है। इस संसार में एक परोपकार ही अनश्वर है, जो युग के अन्त तक यश फैलाता है। दूसरों की भलाई के लिए किया गया कार्य परोपकार है। मनुष्य द्वारा एकत्रित की गई धन-सम्पत्ति, सुख-ऐश्वर्य आदि सभी वस्तुएँ नश्वर हैं। न तो मनुष्य इन वस्तुओं को साथ लेकर पैदा होता है और न ही मृत्यु
के समय इन्हें साथ लेकर जाता है। जो मनुष्य दूसरों की भलाई के लिए कोई कार्य करता है, वह कार्य अमर हो जाता है। उस कार्य को याद करके लोग युगों तक उस परोपकारी मनुष्य को याद करते हैं। इसलिए परोपकार की भावना से किए गए कार्यों के द्वारा मनुष्य की ख्याति युगों-युगों तक बनी रहती है।

(ग) भावार्थ प्रस्तुत सूक्ति ‘वेतालपञ्चविंशतिः’ से संकलित पाठ ‘कल्पतरुः’ में से उद्धृत है। जीमूतवाहन ने अपने पिता की आज्ञा से अपने पूर्वजों द्वारा सुरक्षित कल्पवृक्ष से प्रार्थना की कि हे देव! तुमने हमारे पूर्वजों की अभीष्ट इच्छाएँ पूरी की हैं। इसलिए मेरी प्रार्थना के अनुसार इस पृथ्वी को निर्धनों से रहित कर दो। पौराणिक मान्यता के अनुसार कल्पवृक्ष एक ऐसा वृक्ष है जिसके नीचे बैठकर की जाने वाली कल्पना पूरी होती है। जीमूतवाहन ने सारी पृथ्वी की निर्धनता मिटाने के लिए कल्पवृक्ष से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना को सुनकर कल्पवृक्ष ने इतने धन की वर्षा की कि इस पृथ्वी पर कोई भी निर्धन नहीं रहा।

9 Class Sanskrit Chapter 4 HBSE

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 कल्पतरूः

II. अधोलिखितान् गद्यांशान् पठित्वा एतदाधारितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतपूर्णवाक्येन लिखत
(निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्यों में लिखिए)
(1) अस्ति हिमवान् नाम सर्वरत्नभूमिः नगेन्द्रः। तस्य सानोः उपरि विभाति कञ्चनपुरं नाम नगरम्। तत्र जीमूतकेतुः इति श्रीमान् विद्याधरपतिः वसति स्म। तस्य गृहोद्याने कुलक्रमागतः कल्पतरुः स्थितः। स राजा जीमूतकेतुः तं कल्पतरुम् आराध्य तत्प्रसादात् च बोधिसत्वांशसम्भवं जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत्।
(क) कञ्चनपुरं नाम नगरं कुत्र विभाति?
(ख) हिमालयस्य सानोः उपरि किं नाम नगरं विभाति?
(ग) ‘विद्याधरपतिः’ इति पदस्य समास विग्रहं कुरुत।
(घ) तत्र कः वसति स्म?
(ङ) राजा कस्मात् प्रसादात् जीमूतवाहनं नाम पुत्र प्राप्नोत् ?
उत्तराणि:
(क) कञ्चनपुरं नाम नगरं हिमवानस्य सानोः उपरि विभाति।
(ख) हिमालयस्य सानोः उपरि कञ्चनपुरं नाम नगरं विभाति।
(ग) विद्याधराणां पतिः।
(घ) तत्र जीमूतकेतुः इति नाम श्रीमान् विद्याधरपतिः वसति स्म।
(ङ) राजा कल्पतरुम् आराध्य तत् प्रसादात् जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत्।

(2) “अहो ईदृशम् अमरपादपं प्राप्यापि पूर्वैः पुरुषैः अस्माकं तादृशं फलं किमपि न प्राप्तम्। किन्तु केवलं कैश्चिदेव कृपणैः कश्चिदपि अर्थः अर्थितः। तदहम् अस्मात् कल्पतरोः अभीष्टं साधयामि” इति। एवम् आलोच्य सः पितुः अन्तिकम् आगच्छत् ।
(क) अस्माकं पूर्वजैः किं प्राप्यापि किमपि न प्राप्तम्?
(ख) अस्माकं कैः तादृशं फलं न प्राप्तम् ?
(ग) ‘अर्थोऽर्थितः’ इति पदस्य सन्धिच्छेदं कुरुत।
(घ) अस्मात् अहं किं साधयामि?
(ङ) सः जीमूतवाहनः कुत्र आगच्छत् ?
उत्तराणि:
(क) अस्माकं पूर्वजैः ईदृशम् अमरपादपं प्राप्यापि किमपि न प्राप्तम्।
(ख) अस्माकं पूर्वः पुरुषैः तादृशं फलं न प्राप्तम्।
(ग) अर्थः + अर्थः
(घ) अहं अस्मात् कल्पतरोः अभीष्टं साधयामि।
(ङ) जीमूतवाहनः पितुः अन्तिकम् आगच्छत् ।

Chapter 4 कल्पतरूः 9 Class Sanskrit HBSE

(3) “देव! त्वया अस्मत्पूर्वेषाम् अभीष्टाः कामाः पूरिताः, तन्ममैकं कामं पूरय। यथा पृथिवीम् अदरिद्राम्
पश्यामि, तथा करोतु देव” इति। एवंवादिनि जीमूतवाहने “त्यक्तस्त्वया एषोऽहं यातोऽस्मि” इति वाक् तस्मात् तरोः उदभूत्।
(क) दरिद्रा का अस्ति?
(ख) त्वया केषाम् अभीष्टाः पूरिताः?
(ग) ‘करोतु’, इति पदे कः लकारः?
(घ) जीमूतवाहनः कल्पतरुना किम् अयाचत्?
(ङ) कल्पतरुः किम् उक्त्वा उद्भूत?
उत्तराणि:
(क) दरिद्रा पृथ्वी अस्ति।
(ख) त्वया अस्मत् पूर्वेषाम् अभीष्टाः कामाः पूरिताः ।
(ग) लोट् लकार, प्रथमपुरुषैकवचनः।
(घ) जीमूतवाहनः कल्पतरुना अयाचत् यत्-“यथा पृथिवीम् अदरिद्राम् पश्यामि, तथा करोतु देव।”
(ङ) त्यक्तस्त्वया एषोऽहं यातोऽस्मि इति उक्त्वा कल्पतरुः उद्भूत्।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 कल्पतरूः

III. स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूल पदों के आधार पर प्रश्न निर्माण कीजिए)
(क) उद्याने कल्पतरुः स्थितः।
(ख) अस्मान् शक्रः अपि बाधितु न शक्नुयात्।
(ग) परोपकारः एव संसारे अनश्वरः।
(घ) जीमूतवाहनः कल्पतरुम् उपगम्य उवाच।
(ङ) कल्पतरुः भुवि वसूनि अवर्षत्।
उत्तराणि:
(क) कुत्र कल्पतरुः स्थितः?
(ख) अस्मान् कः अपि बाधितु न शक्नुयात् ?
(ग) कः एव संसारे अनश्वरः?
(घ) जीमूतवाहनः कम् उपगम्य उवाच?
(ङ) कल्पतरुः कुत्र वसूनि अवर्षत् ?

IV. अधोलिखितानि वाक्यानि घटनाक्रमानुसारं पुनः लिखत
(निम्नलिखित वाक्यों को घटनाक्रम के अनुसार दोबारा लिखिए)
(अ)
(क) तत्र जीमूतकेतुः श्रीमान् विद्याधरपतिः वसति स्म।
(ख) स्वसचिवैः प्रेरितः राजा तं यौवराज्ये अभिषिक्तवान्।
(ग) जीमूतवाहनः महान् दानवीरः सर्वभूतानुकम्पी च अभवत् ।
(घ) हिमवानस्य उपरि कञ्चनपुरं नाम नगरं विभाति।
(ङ) सः बोधिसत्वांशसम्भवं जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत् ।
उत्तराणि:
(घ) ‘हिमवानस्य उपरि कञ्चनपुरं नाम नगरं विभाति।
(क) तत्र जीमूतकेतुः श्रीमान् विद्याधरपतिः वसति स्म।
(ङ) सः बोधिसत्वांशसम्भवं जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत्।
(ग) जीमूतवाहनः महान् दानवीरः सर्वभूतानुकम्पी च अभवत्।
(ख) स्वसचिवैः प्रेरितः राजा तं यौवराज्ये अभिषिक्तवान्।

(ब)
(क) जीमूतकेतुः कल्पतरोः प्रासादात् जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत्।
(ख) कल्पतरुः दिवं समुत्पत्य भुवि वसूनि अवर्षत्।
(ग) जीमूतकेतोः गृहोद्याने कुलक्रमागतः कल्पतरुः स्थितः।
(घ) ततः जीमूतवाहनस्य सर्वजीवानुकम्पया सर्वत्र यशः प्रथितम्।
(ङ) जीमूतवाहनः कल्पतरुम् उपगम्य उवाच यथा पृथिवीम् अदरिद्राम् पश्यामि तथा करोतु देव।
उत्तराणि:
(ग) जीमूतकेतोः गृहोद्याने कुलक्रमागतः कल्पतरुः स्थितः।
(क) जीमूतकेतुः कल्पतरोः प्रासादात् जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत्।।
(ङ) जीमूतवाहनः कल्पतरुम् उपगम्य उवाच-यथा पृथिवीम् अदरिद्राम् पश्यामि तथा करोतु देव।
(ख) कल्पतरुः दिवं समुत्पत्य भुवि वसूनि अवर्षत्।
(घ) ततः जीमूतवाहनस्य सर्वजीवानुकम्पया सर्वत्र यशः प्रथितम्।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 कल्पतरूः

v. अधोलिखित प्रश्नानाम् चतुषु वैकल्पिक उत्तरेषु उचितमुत्तरं चित्वा लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के दिए गए चार विकल्पों में से उचित उत्तर का चयन कीजिए)
1. हिमवानस्य सानोरुपरि किं नाम नगरं विभाति?
(i) सज्जनपुरम्
(ii) चन्दनपुरम्
(iii) कञ्चनपुरम्
(iv) अमरपुरम्
उत्तरम्:
(iii) कञ्चनपुरम्

2. कुलक्रमागत् कल्पतरुः कुत्र स्थितः?
(i) राजप्रासादे
(ii) गृहोद्याने
(iii) राजोपवने
(iv) देवोद्याने
उत्तरम्:
(ii) गृहोद्याने

3. संसारसागरे किं वीचिवच्चञ्चलम् ?
(i) वनम्
(ii) जनम्
(iii) धनम्
(iv) सर्वम्
उत्तरम्:
(iii) धनम्

4. अस्मिन् संसारे एकः कः अनश्वरः?
(i) परोपकारः
(ii) जीवनः
(iii) नामः
(iv) शरीरः
उत्तरम्:
(i) परोपकारः

5. कल्पतरुः दिवं समुत्पत्य भुवि कानि अवर्षत् ?
(i) जलानि
(ii) वसूनि
(iii) हिमानि
(iv) अन्नानि
उत्तरम्:
(ii) वसूनि

6. ‘परोपकारः’ अत्र किं विग्रहपदम्?
(i) परषाम् उपकारः
(ii) परेषाम् अपकारः
(iii) परेषा उपकारः
(iv) परेषाम् उपकारः
उत्तरम्:
(iv) परेषाम् उपकारः

7. ‘गृहोद्याने’ इति पदे कः समासः?
(i) तत्पुरुषः
(ii) कर्मधारयः
(iii) द्वन्द्वः
(iv) अव्ययीभावः
उत्तरम्:
(i) तत्पुरुषः

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8. ‘गुण + मतुप्’ इति संयोगे किं रूपम्?
(i) गुणवान्
(ii) गूणवान्
(iii) गणवान्
(iv) गुणवानः
उत्तरम्:
(i) गुणवान्

9. ‘स्वस्ति’ शब्दस्य योगे का विभक्तिः स्यात् ?
(i) तृतीया
(ii) चतुर्थी
(iii) पञ्चमी
(iv) षष्ठी
उत्तरम्:
(ii) चतुर्थी

10. ‘इन्द्रः’ इति पदस्य पर्यायपदं किम्?
(i) देवः
(ii) शिवः
(iii) शक्रः
(iv) शुक्रः
उत्तरम्:
(ii) शक्रः

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11. ‘विद्याधराणां पतिः’ अत्र किं समस्तपदम?
(i) विद्यधरापतिः
(ii) विद्यधारापतिः
(iii) विद्याधारपतिः
(iv) विद्याधरपतिः
उत्तरम्:
(iv) विद्याधरपतिः

12. ‘अनश्वरः’ इति पदस्य विशेष्य पदं किम्?
(i) कल्पतरुः
(ii) परोपकारः
(iii) दानवीरः
(iv) राजा
उत्तरम्:
(ii) परोपकारः

13. ‘जीमूतवाहनः’ इति पदस्य विशेषणपदं किम्?
(i) परोपकारः
(ii) दानवीरः
(iii) अनश्वरः
(iv) कल्पतरुः
उत्तरम्:
(i) दानवीरः

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योग्यताविस्तारः

यह पाठ ‘वेतालपञ्चविंशतिः’ नामक कथा संग्रह से लिया गया है, जिसमें मनोरञ्जक एवम् आश्चर्यजनक घटनाओं के माध्यम से जीवनमूल्यों का निरूपण किया गया है। इस कथा में जीमूतवाहन अपने पूर्वजों के काल से गृहोद्यान में आरोपित कल्पवृक्ष से सांसारिक द्रव्यों को न माँगकर संसार के प्राणियों के दुःखों को दूर करने का वरदान माँगता है क्योंकि, धन तो पानी की लहर के समान चंचल है, केवल परोपकार ही इस संसार का सर्वोत्कृष्ट तथा चिरस्थायी तत्त्व है।

(क) ग्रन्थ परिचय “वेतालपञ्चविंशतिका” पच्चीस कथाओं का संग्रह है। इस नाम की दो रचनाएँ पाई जाती हैं। एक शिवदास (13वीं शताब्दी) द्वारा लिखित ग्रन्थ है जिसमें गद्य और पद्य दोनों विधाओं का प्रयोग किया गया है। दूसरी जम्भलदत्त की रचना है जो केवल गद्यमयी है। इस कथा में कहा गया है कि राजा विक्रम को प्रतिवर्ष कोई तान्त्रिक सोने का एक फल देता है। उसी तान्त्रिक के कहने पर राजा विक्रम श्मशान से शव लाता है। जिस पर सवार होकर एक वेताल मार्ग में राजा के मनोरंजन के लिए कथा सुनाता है। कथा सुनते समय राजा को मौन रहने का निर्देश देता है। कहानी के अन्त में वेताल राजा से कहानी पर आधारित एक प्रश्न पूछता है। राजा उसका सही उत्तर देता है। शर्त के अनुसार वेताल पुनः श्मशान पहुँच जाता है। इस तरह पच्चीस बार ऐसी ही घटनाओं की आवृत्ति होती है और वेताल राजा को एक-एक करके पच्चीस कथाएँ सुनाता है। ये कथाएँ अत्यन्त रोचक, भाव-प्रधान और विवेक की परीक्षा लेने वाली हैं।

(ख) क्त क्तवतु प्रयोगः
क्त-इस प्रत्यय का प्रयोग सामान्यतः कर्मवाच्य में होता है।
क्तवतु इस प्रत्यय का प्रयोग कर्तृवाच्य में होता है।
क्त प्रत्ययः
जीमूतवाहनः हितैषिभिः मन्त्रिभिः उक्तः।
कृपणैः कश्चिदपि अर्थः अर्थितः।
त्वया अस्मत्कामाः पूरिताः।
तस्य यशः प्रथितम् (कर्तृवाच्य में क्त)
क्तवतु प्रत्ययः
सा पुत्रं यौवराज्यपदेऽभिषिक्तवान्।
एतदाकर्ण्य जीमूतवाहनः चिन्तितवान्।
स सुखासीनं पितरं निवेदितवान्।
जीमूतवाहनः कल्पतरुम् उक्तवान्।

(ग) लोककल्याण-कामना-विषयक कतिपय श्लोक
(1) सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥
अर्थात् सभी सुखी हों, सभी नीरोग रहें, सभी कल्याण को देखें, किसी को भी दुःख की प्राप्ति न हो।

(2) सर्वस्तरतु दुर्गाणि, सर्वो भद्राणि पश्यतु।
सर्वः कामानवाप्नोतु, सर्वः सर्वत्र नन्दतु ॥
अर्थात् सभी दुर्ग को पार कर जाएँ, सभी कल्याण देखें, सभी की कामनाएँ पूरी हों, सभी सब जगह प्रसन्न रहें।

(3) न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं न पुनर्भवम् ।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥
अर्थात् न तो मुझे राज्य की इच्छा है, न स्वर्ग की और न ही पुनः जन्म लेने की। मैं तो केवल यही कामना करता हूँ कि दुःख से सन्तप्त प्राणियों के दुखों का विनाश हो जाए।
अध्येतव्यः ग्रन्थःवेतालपञ्चविंशतिकथा, अनुवादक, दामोदर झा, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी, 1968

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 कल्पतरूः

HBSE 9th Class Sanskrit कल्पतरूः Important Questions and Answers

कल्पतरूः  गद्यांशों के सप्रसंग हिन्दी सरलार्थ एवं भावार्थ

1. अस्ति हिमवान् नाम सर्वरत्नभूमिः नगेन्द्रः। तस्य सानोः उपरि विभाति कञ्चनपुरं नाम नगरम् । तत्र जीमूतकेतुः इति श्रीमान् विद्याधरपतिः वसति स्म। तस्य गृहोद्याने कुलक्रमागतः कल्पतरुः स्थितः। स राजा जीमूतकेतुः तं कल्पतरुम् आराध्य तत्प्रसादात् च बोधिसत्वांशसम्भवं जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत्। सः जीमूतवाहनः महान् दानवीरः सर्वभूतानुकम्पी च अभवत्। तस्य गुणैः प्रसन्नः स्वसचिवैश्च प्रेरितः राजा कालेन सम्प्राप्तयौवनं तं यौवराज्ये अभिषिक्तवान् । कदाचित् हितैषिणः पितृमन्त्रिणः यौवराज्ये स्थितं तं जीमूतवाहनं उक्तवन्तः–“युवराज! योऽयं सर्वकामदः कल्पतरुः तवोद्याने तिष्ठति स तव सदा पूज्यः। अस्मिन् अनुकूले स्थिते सति शक्रोऽपि अस्मान् बाधितुं न शक्नुयात्” इति।

शब्दार्थ-हिमवान = हिमालय। नगेन्द्रः = पर्वतों का राजा। सानोः उपरि = चोटी के ऊपर। विभाति = सशोभित है। कुलक्रमागतः = कुल परंपरा से प्राप्त हुआ। आराध्य = आराधना करके। दानवीरः = दानी। सर्वभूतानुकम्पी = सब प्राणियों पर दया करने वाला। सचिवैः = मन्त्रियों द्वारा। प्रेरितः = प्रेरणा से। अभिषिक्तवान् = अभिषेक कर दिया। यौवराज्ये = युवराज के पद पर। हितैषिणः = हित चाहने वालों के द्वारा। सर्वकामदः = सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला। शक्रः = इन्द्र। न शक्नुयात् = समर्थ नहीं होगा। बाधितुं = कष्ट पहुँचाने में।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘कल्पतरुः’ में से उद्धृत है। यह पाठ संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कथा ग्रन्थ ‘वेतालपञ्चविंशतिः’ से संकलित है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस गद्यांश में जीमूतवाहन के घर के उद्यान में स्थित कल्पवृक्ष के महत्व के विषय में बताया गया है।

सरलार्थ-सभी रत्नों की भूमि पर्वतों का राजा हिमालय है। उसकी चोटी पर कञ्चनपुर नामक नगर सुशोभित है। वहाँ श्रीमान् विद्याधरपति जीमूतकेतु रहता था। उसके घर के उद्यान में वंश परम्परा से प्राप्त कल्पवृक्ष लगा हुआ था। राजा जीमूतकेतु ने उस कल्पवृक्ष की पूजा करके तथा उसकी कृपा से बोधिसत्व के अंश से उत्पन्न जीमूतवाहन नामक पुत्र को प्राप्त किया। वह महानु,

दानवीर तथा सब प्राणियों पर दया करने वाला था। उसके गुणों से प्रसन्न तथा मन्त्रियों से प्रेरित राजा ने उचित समय पर यौवन सम्पन्न अपने पुत्र जीमूतवाहन का युवराज के पद पर अभिषेक कर दिया। युवराज के पद पर स्थित उस जीमूतवाहन से उसके हितैषी पिता एवं मन्त्रियों ने कहा-“हे युवराज! जो यह सारी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष तुम्हारे उद्यान में स्थित है, वह तुम्हारे लिए सदा पूज्य है। इसके अनुकूल रहने पर इन्द्र भी हमें कोई बाधा नहीं पहुँचा सकता।”

भावार्थ-पौराणिक मान्यता के अनुसार कल्पवृक्ष एक ऐसा वृक्ष है, जो याचकों (माँगने वालों) की इच्छा की पूर्ति करता है। जीमूतवाहन के उद्यान में भी वही कल्पवृक्ष स्थित था। वह देवतुल्य था। इसलिए जीमूतवाहन के पिता ने कहा कि यह वृक्ष तुम्हारे लिए सदा पूजनीय है। इस वृक्ष की कृपा से इन्द्र भी तुम्हें पराजित नहीं कर सकते।

2 एतत् आकर्ण्य जीमूतवाहनः अचिन्तयत्-“अहो ईदृशम् अमरपादपं प्राप्यापि पूर्वैः पुरुषैः अस्माकं तादृशं फलं किमपि न प्राप्तम्। किन्तु केवलं कैश्चिदेव कृपणैः कश्चिदपि अर्थः अर्थितः। तदहम् अस्मात् कल्पतरोः अभीष्टं साधयामि” इति। एवम् आलोच्य सः पितुः अन्तिकम् आगच्छत्। आगत्य च सुखमासीनं पितरम् एकान्ते न्यवेदयत्-“तात! त्वं तु जानासि एव यदस्मिन् संसारसागरे आशरीरम् इदं सर्वं धनं वीचिवत् चञ्चलम्। एकः परोपकार एव अस्मिन् संसारे अनश्वरः यो युगान्तपर्यन्तं यशः प्रसूते। तद् अस्माभिः ईदृशः कल्पतरुः किमर्थं रक्ष्यते? यैश्च पूर्वैरयं ‘मम मम’ इति आग्रहेण रक्षितः, ते इदानी कुत्र गताः?” तेषां कस्यायम? अस्य वा के ते? तस्मात् परोपकारैकफलसिद्धये त्वदाज्ञया इमं कल्पपादपम् आराधयामि।

शब्दार्थ-आकर्ण्य + एतत् = यह सुनकर। प्राप्यापि (प्राप्य + अपि) = प्राप्त करके भी। अमरपादपं = अमर वृक्ष को। पूर्वैः पुरुषैः = पूर्वजों के द्वारा । नासादितम् = नहीं प्राप्त किया। कृपणैः = कंजूस लोगों के द्वारा । साधयामि = मैं सिद्ध करता हूँ। अर्थितः = मांगा गया। अन्तिकम् = समीप। वीचिवत् = लहरों की भाँति । चञ्चलम् = नश्वर, क्षणिक। परोपकार = दूसरों का उपकार । यशः = यश। आराधयामि = मैं पूजा करता हूँ।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘कल्पतरुः’ से उद्धृत है। यह पाठ संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कथा ग्रन्थ ‘वेतालपञ्चविंशतिः’ से संकलित है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस गद्यांश में बताया गया है कि अपने पूर्वजों से प्राप्त कल्पतरु के द्वारा जीमूतवाहन ने परोपकार करने की इच्छा व्यक्त की।

सरलार्थ यह सुनकर जीमूतवाहन ने मन में विचार किया-“अरे! आश्चर्य है। ऐसे अमर वृक्ष को प्राप्त करके भी हमारे पूर्वजों ने ऐसा कोई भी फल प्राप्त नहीं किया और सिर्फ कुछ कंजूस लोगों के द्वारा थोड़ा धन ही माँगा गया। अतः मैं इस वृक्ष से अभीष्ट मनोरथ सिद्ध करता हूँ।” ऐसा सोचकर वह पिता के पास आया। आकर सुखपूर्वक बैठे हुए पिता से एकान्त में निवेदन किया-“पिता जी! आप तो जानते हैं कि इस संसार रूपी सागर में शरीर सहित सारा धन लहरों की भाँति चंचल (नश्वर) होता है। इस संसार में एक परोपकार ही अनश्वर है, जो युग के अन्त तक यश फैलाता है। यदि ऐसा है तो हम ऐसे कल्पवृक्ष की रक्षा क्यों कर रहे हैं?” जिन पूर्वजों ने ‘मेरा मेरा’ कहकर इस वृक्ष की रक्षा की, वे अब कहाँ गए? उनमें से यह किसका है? या इसके वे कौन हैं? तो आपकी आज्ञा से ‘परोपकार’ की फल सिद्धि के लिए मैं इस कल्पवृक्ष की आराधना करता हूँ।

भावार्थ-यह संसार समुद्र के समान है। इसमें धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य आदि लहरों की तरह क्षणभंगुर हैं। इस संसार में केवल परोपकार ही एक ऐसी वस्तु है जो कभी समाप्त नहीं होती। प्रत्येक युग में परोपकारी मनुष्य का यश फैलता रहता है।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 कल्पतरूः

3. अथ पित्रा ‘तथा’ इति अभ्यनुज्ञातः स जीमूतवाहनः कल्पतरुम् उपगम्य उवाच-“देव! त्वया अस्मत्पूर्वेषाम् अभीष्टाः कामाः पूरिताः, तन्ममैकं कामं पूरय। यथा पृथ्वीम् अदरिदाम् पश्यामि, तथा करोतु देव” इति। एवंवादिनि जीमूतवाहने “त्यक्तस्त्वया एषोऽहं यातोऽस्मि” इति वाक् तस्मात् तरोः उदभूत्। क्षणेन च स कल्पतरुः दिवं समुत्पत्य भुवि तथा वसूनि अवर्षत् यथा न कोऽपि दुर्गत आसीत्। ततस्तस्य जीमूतवाहनस्य सर्वजीवानुकम्पया सर्वत्र यशः प्रथितम्।

शब्दार्थ-अभ्यनुज्ञातः (अभि + अनुज्ञातः) = अनुमति प्राप्त कर। कामाः = कामनाएँ, इच्छाएँ। पूरिताः = पूरी की गईं। अदरिद्राम् = दरिद्रता से रहित, सम्पन्न। वाक् = वाणी, शब्द। दिवम् = स्वर्ग में। समुत्पत्य = उड़कर। भुवि = पृथ्वी पर। वसूनि = धन। अवर्षत् = बरसाया। दुर्गत = पीड़ित। सर्वजीवानुकम्पया = सब जीवों पर दया करने से। प्रथितम् = प्रसिद्ध हो गया।

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत विषय की पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी प्रथमो भागः’ में संकलित पाठ ‘कल्पतरुः’ से उद्धृत है। यह पाठ संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कथा ग्रन्थ ‘वेतालपञ्चविंशतिः’ से संकलित है।

सन्दर्भ-निर्देश-इस गद्यांश में बताया गया है कि जीमूतवाहन की प्रार्थना से कल्पवृक्ष ने स्वर्ग की ओर उड़ते हुए पृथ्वी पर अत्यधिक धन की वर्षा की।

सरलार्थ-पिता के द्वारा ‘अच्छा ठीक है’ इस प्रकार अनुमति पाकर कल्पवृक्ष के पास पहुँचकर जीमूतवाहन ने कहा-“हे देव! तुमने हमारे पूर्वजों की अभीष्ट इच्छाएँ पूरी की हैं तो मेरी एक इच्छा भी पूरी कर दो। आप इस पृथ्वी को निर्धनों से रहित कर दो देव।” जीमूतवाहन के ऐसा कहते ही उस वृक्ष से वाणी निकली, “तुम्हारे द्वारा इस तरह त्यागा हुआ मैं जा रहा हूँ।” उस कल्पवृक्ष ने क्षणभर में ही स्वर्ग की ओर उड़ कर पृथ्वी पर इतने धन की वर्षा की कि कोई भी निर्धन नहीं रहा। इस प्रकार सब प्राणियों पर दया करने से उस जीमूतवाहन का यश सब जगह फैल गया।

भावार्थ-दयालु एवं परोपकारी व्यक्ति सदा-सदा के लिए अमर हो जाता है। जीमूतवाहन ने परोपकार एवं निर्धनों पर दया करके अपने पूर्वजों की धरोहर कल्पवृक्ष का त्याग किया जिससे उसका यश सर्वत्र फैल गया।

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अभ्यासः
1. एकपदेन उत्तरं लिखत
(एक पद में उत्तर लिखिए)
(क) जीमूतवाहनः कस्य पुत्रः अस्ति?
(ख) संसारेऽस्मिन् कः अनश्वरः भवति?
(ग) जीमूतवाहनः परोपकारैकफलसिद्धये कम् आराधयति?
(घ) जीमूतवाहनस्य सर्वभूतानुकम्पया सर्वत्र किं प्रथितम्?
(ङ) कल्पतरुः भुवि कानि अवर्षत् ?
उत्तराणि:
(क) जीमूतकेतोः,
(ख) परोपकारः,
(ग) कल्पपादपम्,
(घ) यशः,
(ङ) वसूनि

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत भाषा में लिखिए)
(क) कञ्चनपुरं नाम नगरं कुत्र विभाति स्म?
(ख) जीमूतवाहनः कीदृशः आसीत्?
(ग) कल्पतरोः वैशिष्ट्यमाकर्ण्य जीमूतवाहनः किम् अचिन्तयत्?
(घ) हितैषिणः मन्त्रिणः जीमूतवाहनं किम् उक्तवन्तः?
(ङ) जीमूतवाहनः कल्पतरुम् उपगम्य किम् उवाच?
उत्तराणि:
(क) कञ्चनपुरं नाम नगरं हिमालय पर्वतस्य सानोः उपरि विभाति स्म।
(ख) जीमूतवाहनः महान् दानवीरः सर्वभूतानुकम्पी च आसीत्।
(ग) कल्पतरोंः वैशिष्ट्यमाकर्ण्य जीमूतवाहनः अचिन्तयत्-‘परोपकारैकफलसिद्धये इमं कल्पपादपम् आराधयामि।’
(घ) हितैषिणः मन्त्रिणः जीमूतवाहनं उक्तवन्तः यत्-‘युवराज! योऽयं सर्वकामदः कल्पतरुः तवोद्याने तिष्ठति स तव
सदा पूज्यः। अस्मिन् अनुकूले स्थिते सति शक्रोऽपि अस्मान् बाधितुं न शक्नुयात्।’
(ङ) जीमूतवाहनः कल्पतरुम् उपगम्य उवाच-‘यत्-“देव! त्वया अस्मत्पूर्वेषाम् अभीष्टाः कामाः पूरिताः तन्ममैकं कामं ..
पूरय। यथा पृथिवीम् अदरिद्राम् पश्यामि, तथा करोतु देव”।

HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 कल्पतरूः

3. अधोलिखितवाक्येषु स्थूलपदानि कस्मै प्रयुक्तानि?
(निम्नलिखित वाक्यों में स्थूल पद किसके लिए प्रयुक्त किए गए हैं)
(क) तस्य सानोरुपरि विभाति कञ्चनपुरं नाम नगरम्।
(ख) राजा सम्प्राप्तयौवनं तं यौवराज्ये अभिषिक्तवान्।
(ग) अयं तव सदा पूज्यः।।
(घ) तात! त्वं तु जानासि यत् धनं वीचिवच्चञ्चलम् ।
उत्तराणि:
(क) हिमवते,
(ख) जीमूतवाहनाय,
(ग) कल्पवृक्षाय,
(घ) जीमूतकेतवे।

4. अधोलिखितानां पदानां पर्यायपदं पाठात चित्वा लिखत
(निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द पाठ से चुनकर लिखिए)
(क) पर्वतः = …………………………….
(ख) भूपतिः = = …………………………….
(घ) धनम् = …………………………….
(ङ) इच्छितम् = …………………………….
(च) समीपम् = …………………………….
(छ). धरित्रीम् = …………………………….
(ज) कल्याणम् = …………………………….
(झ) वाणी = …………………………….
(ञ) वृक्षः = …………………………….
उत्तराणि:
(क) पर्वतः . = नगेन्द्रः
(ख) भूपतिः = राजा
(ग) इन्द्रः = शक्रः
(घ) धनम् = अर्थ
(ङ). इच्छितम् = अर्थित
(च) समीपम् = अन्तिकम्
(छ) धरित्रीम् = पृथ्वीम्
(ज): कल्याणम् = हितम्
(झ) वाणी = वाक्
(ञ) वृक्षः = तरुः

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5. ‘क’ स्तम्भे विशेषणानि ‘ख’ स्तम्भे च विशेष्याणि दत्तानि। तानि समुचितं योजयत
(स्तम्भ ‘क’ में विशेषण व ‘ख’ स्तम्भ में विशेष्य पद दिए गए हैं, उन्हें उचित ढंग से जोड़िए)
‘क’ स्तम्भ – ‘ख’ स्तम्भ
कुलक्रमागतः = परोपकारः
दानवीरः = मन्त्रिभिः
हितैषिभिः = जीमूतवाहनः
वीचिवच्चञ्चलम् = कल्पतरुः
अनश्वरः = धनम्
उत्तराणि:
‘क’ स्तम्भ – ‘ख’ स्तम्भ
कुलक्रमागतः – कल्पतरुः
दानवीरः – जीमूतवाहनः
हितैषिभिः – मन्त्रिभिः
वीचिवच्चञ्चलम् – धनम्
अनश्वरः – परोपकारः

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6. स्थूल पदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूलपदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए)
(क). तरोः कृपया सः पुत्रम् अप्राप्नोत् ।
(ख) सः कल्पतरवे न्यवेदयत्।
(ग) धनवृष्ट्या कोऽपि दरिद्रः नातिष्ठत्।
(घ) कल्पतरुः पृथिव्यां धनानि अवर्षत्।
(ङ) जीवानुकम्पया जीमूतवाहनस्य यशः प्रासरत् ।
उत्तराणि:
(क) कस्य कृपया सः पुत्रम् अप्राप्नोत्?
(ख) सः कस्मै न्यवेदयत्?
(ग) कया कोऽपि दरिद्रः नातिष्ठत्?
(घ) कल्पतरुः कुत्र धनानि अवर्षत् ?
(ङ) कया जीमूतवाहनस्य यशः प्रासरत् ?

7. “स्वस्ति तुभ्यम्” स्वस्ति शब्दस्य योगे चतुर्थी विभक्तिः भवति। इत्यनेन नियमेन अत्र चतुर्थी विभक्तिः प्रयुक्ता। एवमेव (कोष्ठकगतेषु पदेषु) चतुर्थी विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत
(“स्वस्ति तुभ्यम्” स्वस्ति शब्द के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है। यहाँ इस नियम में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। इसी प्रकार (कोष्ठक में दिए शब्दों में) चतुर्थी विभक्ति प्रयोग करके रिक्त स्थान पूर्ण कीजिए)
(i) स्वस्ति …………….. (राजा)
(ii) स्वस्ति ……………… (प्रजा)
(iii) स्वस्ति …………….. (छात्र)
(iv) स्वस्ति …………….. (सर्वजन)
उत्तराणि:
(i) स्वस्ति राजे
(ii) स्वस्ति प्रजायै
(iii) स्वस्ति छात्राय
(iv) स्वस्ति सर्वजनाय

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(ख) , कोष्ठकगतेषु पदेषु षष्ठी विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत
(कोष्ठक में दिए शब्दों में छठी विभक्ति का प्रयोग करके रिक्त स्थान पूरे कीजिए)
(i) तस्य …………….. उद्याने कल्पतरुः आसीत्। (गृह)
(ii) सः …………….. अन्तिकम् अगच्छत् । (पित)
(iii) ……………. सर्वत्र यशः प्रथितम् । (जीमूतवाहन)
(iv). अयं …………….. तरुः? (किम्)
उत्तराणि:
(i) तस्य गृहस्य उद्याने कल्पतरुः आसीत्।
(ii) सः पितुः अन्तिकम् अगच्छत्।
(iii) जीमूतवाहनस्य सर्वत्र यशः प्रथितम्।
(iv) अयं कस्य तरुः?

कल्पतरुः (कल्प का वृक्ष) Summary in Hindhi

कल्पतरुः पाठ-परिचय

प्रस्तुत पाठ आधुनिक संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कथा ग्रन्थ ‘वेतालपञ्चविंशतिः’ से संकलित है। यह ग्रन्थ पच्चीस कथाओं का संग्रह है। इस कथा में वेताल राजा विक्रम को एक-एक करके पच्चीस कथाएँ सुनाता है। ये कथाएँ अत्यन्त रोचक, भाव प्रधान और विवेक की परीक्षा लेने वाली हैं।

पाठ में वर्णित कथा के अनुसार विद्याधरपति जीमूतकेतु के घर के उद्यान में एक कल्पवृक्ष लगा हुआ था। जीमूतकेतु ने अपने पुत्र जीमूतवाहन को युवराज के पद पर बैठा दिया और कहा कि उद्यान में स्थित कल्पवृक्ष तुम्हारे लिए सदा पूज्य है। परोपकारी ‘जीमूतवाहन ने सोचा मैं इस वृक्ष से अभीष्ट मनोरथ सिद्ध करूँगा। कल्पवृक्ष के पास पहुँचकर उसने कहा हे देव! तुमने हमारे पूर्वजों

की अभीष्ट इच्छाएँ पूरी की हैं, तो मेरी भी एक इच्छा पूरी कर दो। आप इस पृथ्वी को निर्धनों से रहित कर दो। उस कल्पवृक्ष ने पलभर में ही स्वर्ग की ओर उड़कर पृथ्वी पर इतने धन की वर्षा की कि कोई भी निर्धन नहीं रहा। इस प्रकार जीमूतवाहन ने कल्पवृक्ष से सांसारिक द्रव्यों को न माँगकर संसार के प्राणियों के दुःखों को दूर करने का वरदान माँगा। क्योंकि धन तो पानी की लहर के समान चंचल है, केवल परोपकार ही इस संसार का सर्वोत्कृष्ट तथा चिरस्थायी तत्त्व है।

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