Class 11

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सरकार के कितने अंग होते हैं? उनके नाम बताएँ।
उत्तर:
सरकार के तीन अंग होते हैं विधानपालिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका।

प्रश्न 2.
विधानपालिका के दो कार्य बताइए।
उत्तर:

  • कानूनों का निर्माण करना,
  • संविधान में संशोधन करना।

प्रश्न 3.
भारत में संघीय विधानमंडल को क्या कहा जाता है? उसके कितने सदन हैं?
उत्तर:
भारत में संघीय विधानमंडल को ‘संसद’ का नाम दिया गया है। इसके दो सदन हैं

  • राज्यसभा,
  • लोकसभा।

प्रश्न 4.
लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव कौन करता है?
उत्तर:
लोकसभा के सदस्यों का चुनाव जनता वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष रूप में करती है। राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य करते हैं।

प्रश्न 5.
लोकसभा व राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए कम-से-कम कितनी आयु होनी चाहिए?
उत्तर:
लोकसभा का सदस्य बनने के लिए कम-से-कम 25 वर्ष तथा राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए कम-से-कम 30 वर्ष की आयु होनी चाहिए।

प्रश्न 6.
लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को शपथ कौन दिलाता है?
उत्तर:
लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष अपने पद को ग्रहण करते समय कोई शपथ नहीं लेते। वे केवल प्रारम्भ में संसद सदस्य होने की शपथ ही लेते हैं।

प्रश्न 7.
यदि संसद के संयुक्त अधिवेशन के समय लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष दोनों ही अनुपस्थित हों तो संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता कौन करता है?
उत्तर:
संयुक्त अधिवेशन के समय लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के अनुपस्थित होने पर राज्यसभा का उप-सभापति दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता करता है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

प्रश्न 8.
लोकसभा का अध्यक्ष तथा राज्यसभा का सभापति बनने के लिए कम-से-कम कितनी आयु होनी चाहिए?
उत्तर:
लोकसभा का अध्यक्ष बनने के लिए कम-से-कम 25 वर्ष व राज्यसभा का सभापति बनने के लिए कम-से-कम 35 वर्ष की आयु होनी चाहिए।

प्रश्न 9.
लोकसभा व राज्यसभा का चुनाव कितने वर्ष के लिए होता है?
उत्तर:
लोकसभा का चुनाव साधारणतः 5 वर्ष के लिए तथा राज्यसभा के प्रत्येक सदस्य का चुनाव 6 वर्ष के लिए किया जाता है।

प्रश्न 10.
संसद की दो स्थायी समितियों के नाम लिखें।
उत्तर:
संसद की दो स्थायी समितियाँ हैं-लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति।

प्रश्न 11.
लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या कितनी हो सकती है और 17वीं लोकसभा में कितनी है?
उत्तर:
लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 550 हो सकती है। 17वीं लोकसभा, जिसके चुनाव सन् 2019 में हुए थे, के सदस्यों की संख्या 543 है।।

प्रश्न 12.
वर्तमान लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के कितने सांसद हैं?
उत्तर:
वर्तमान लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के 303 सांसद हैं।

प्रश्न 13.
राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या कितनी हो सकती है और वर्तमान में कितनी है?
उत्तर:
राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 हो सकती है और वर्तमान सदस्य संख्या 245 है।

प्रश्न 14.
राज्यसभा में कितने निर्वाचित सदस्य हो सकते हैं और कितने मनोनीत ?
उत्तर:
राज्यसभा में 238 निर्वाचित और 12 मनोनीत सदस्य हो सकते हैं।

प्रश्न 15.
लोकसभा में सबसे ज्यादा और सबसे कम सदस्य किन राज्यों से चुने जाते हैं?
उत्तर:
लोकसभा में सबसे ज्यादा 80 सदस्य उत्तर प्रदेश से और सबसे कम सिक्किम, मेघालय व मिजोरम से चुने जाते हैं, जिनका एक-एक प्रतिनिधि होता है।

प्रश्न 16.
लोकसभा में राज्यों से कितने और संघीय क्षेत्रों से कितने प्रतिनिधि चुने जा सकते है?
उत्तर:
लोकसभा के लिए राज्यों से 530 तथा संघीय क्षेत्रों से 20 सदस्य चुने जा सकते हैं।

प्रश्न 17.
उस संघीय क्षेत्र का नाम बताइए जिससे लोकसभा के लिए एक से अधिक सदस्य चुने जाते हों और कितने सदस्य चुने जाते हैं?
उत्तर:
लोकसभा के लिए संघीय क्षेत्र दिल्ली से सात (7) सदस्य चुने जाते हैं।

प्रश्न 18.
हरियाणा व पंजाब से लोकसभा के लिए कितने सदस्य चुने जाते हैं?
उत्तर:
लोकसभा के लिए हरियाणा से दस (10) तथा पंजाब से तेरह (13) सदस्य चुने जाते हैं।

प्रश्न 19.
हरियाणा से लोकसभा व राज्यसभा के लिए कितने सदस्य चुने जाते हैं?
उत्तर:
हरियाणा से लोकसभा के लिए दस (10) तथा राज्यसभा के लिए पाँच (5) सदस्य चुने जाते हैं।

प्रश्न 20.
पंजाब से लोकसभा व राज्यसभा के लिए कितने सदस्य चुने जाते हैं?
उत्तर:
पंजाब से लोकसभा के लिए तेरह (13) व राज्यसभा के लिए सात (7) सदस्य चुने जाते हैं।

प्रश्न 21.
राज्यसभा में सबसे ज्यादा सदस्य किस राज्य से चुने जाते हैं?
उत्तर:
राज्यसभा में सबसे ज्यादा सदस्य उत्तर प्रदेश से 31 सदस्य चुने जाते हैं।

प्रश्न 22.
लोकसभा के लिए पहला साधारण निर्वाचन कब हुआ था और इसकी पहली बैठक कब हुई थी?
उत्तर:
लोकसभा के लिए पहला निर्वाचन वर्ष 1951-52 में हुआ था और लोकसभा की पहली बैठक 13 मई, 1952 को हुई थी।

प्रश्न 23.
लोकसभा और राज्यसभा का संयुक्त अधिवेशन कब बुलाया जाता है? इसकी अध्यक्षता कौन करता है?
उत्तर:
जब किसी साधारण विधेयक पर लोकसभा व राज्यसभा में गतिरोध उत्पन्न हो जाए तो दोनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जा सकता है। संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा का अध्यक्ष करता है।

प्रश्न 24.
संसद के दो कार्य बताइए।
उत्तर:

  • देश के लिए कानून बनाना,
  • संविधान में संशोधन करना।

प्रश्न 25.
संसद की शक्तियों पर लगी दो सीमाएँ बताइए।
उत्तर:

  • संसद ऐसा कोई संविधान संशोधन नहीं कर सकती, जिससे कि संविधान का मूलभूत ढाँचा विकृत अथवा नष्ट होता हो।
  • संसद ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती, जिससे कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता हो।

प्रश्न 26.
संसद कार्यपालिका पर नियंत्रण कैसे रखती है?
उत्तर:
संसद बजट को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने के अधिकार तथा मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करने के अधिकार द्वारा कार्यपालिका को नियन्त्रित करती है।

प्रश्न 27.
राज्यसभा की दो विशिष्ट शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  • राज्यसभा 2/3 बहुमत से राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित कर सकती है।
  • राज्यसभा 2/3 बहमत से किसी नई अखिल भारतीय सेवा की स्थापना कर सकती है।

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प्रश्न 28.
अध्यक्ष की दो शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  • अध्यक्ष धन विधेयक का निर्धारण करता है।
  • अध्यक्ष सदन की बैठकों की अध्यक्षता करता है।

प्रश्न 29.
राज्यसभा के सभापति की कोई दो शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  • सभापति सदन में सदस्यों को विचार प्रकट करने की आज्ञा देता है।
  • सभापति आज्ञा न मानने वाले सदस्यों को सदन से बाहर जाने का आदेश दे सकता है।

प्रश्न 30.
अध्यक्ष को कौन हटा सकता है? क्या आज तक किसी अध्यक्ष को पद से हटाया गया है?
उत्तर:
अध्यक्ष को लोकसभा के सदस्य साधारण बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव पारित करके हटा सकते हैं। आज तक किसी भी अध्यक्ष को पद से हटाया नहीं गया है।

प्रश्न 31.
राज्यसभा के सभापति को कौन हटा सकता है? क्या कभी हटाया गया है?
उत्तर:
राज्यसभा के सभापति (उप-राष्ट्रपति) को दोनों सदन अलग-अलग 2/3 बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पारित करके हटा सकते हैं। आज तक किसी सभापति को हटाया नहीं गया है।

प्रश्न 32.
लोकसभा की सदस्यता के लिए आवश्यक दो योग्यताएँ लिखें।
उत्तर:

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • वह कम-से-कम 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।

प्रश्न 33.
राज्यसभा की सदस्यता के लिए आवश्यक दो योग्यताएँ लिखें।
उत्तर:

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • वह कम-से-कम 30 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।

प्रश्न 34.
लोकसभा और राज्यसभा के समान अधिकारों के दो उदाहरण लिखें।
उत्तर:

  • संविधान के संशोधन के संबंध में।
  • राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव के संबंध में।

प्रश्न 35.
धन-विधेयक किस सदन में पेश किया जा सकता है? राज्यसभा कितने दिन तक धन-विधयेक रोक सकती है?
उत्तर:
धन-विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तावित किया जा सकता है। राज्यसभा धन-विधेयक को 14 दिन तक रोक सकती है।

प्रश्न 36.
धन-विधेयक क्या है? इसका निर्धारण कौन करता है?
उत्तर:
कर लगाने, घटाने, समाप्त करने, ऋण लेने, अनुदान देने इत्यादि से संबंधित विधेयक धन-विधेयक होता है। इसका निर्धारण लोकसभा का अध्यक्ष करता है।

प्रश्न 37.
साधारण विधेयक किस सदन में पेश किया जाता है? राज्यसभा इसे कितने समय तक रोक सकती है?
उत्तर:
साधारण विधेयक लोकसभा अथवा राज्यसभा किसी में भी पेश किया जा सकता है। राज्यसभा छः महीने तक साधारण विधेयक को रोक सकती है।

प्रश्न 38.
क्या राष्ट्रपति साधारण विधेयक पर निषेधाधिकार (Veto) शक्ति रखता है?
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रपति के पास निषेधाधिकार शक्ति नहीं है, लेकिन वह विधेयक पर दोबारा विचार करने के लिए वापस संसद के पास भेज सकता है। यदि संसद दोबारा इसे पारित कर देती है तो उसे हस्ताक्षर करने ही होते हैं।

प्रश्न 39.
क्या राष्ट्रपति संविधान संशोधन पर निषेधाधिकार रखता है?
उत्तर:
नहीं, राष्ट्रपति को संविधान संशोधन पर हस्ताक्षर करने ही होते हैं। संविधान संशोधन को दोबारा विचार करने के लिए वापस भी नहीं भेज सकता।

प्रश्न 40.
यदि किसी साधारण विधेयक के विषय में दोनों सदनों में मतभेद उत्पन्न हो जाए तो निर्णय कैसे लिया जाता है ?
उत्तर:
राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है और निर्णय बहुमत से लिया जाता है।

प्रश्न 41.
दल-बदल विरोधी संबंधी कानून को तोड़ने से संबंधित मामले में निर्णय कौन लेता है? क्या उसके निर्णय को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है?
उत्तर:
दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित निर्णय सदन का अध्यक्ष लेता है। उसके निर्णय के विरुद्ध न्यायालय में अपील की जा सकती है।

प्रश्न 42.
किन्हीं चार राज्यों के नाम बताएँ, जहाँ पर विधानमंडल द्वि-सदनीय है।
उत्तर:

  • उत्तर प्रदेश,
  • महाराष्ट्र,
  • बिहार,
  • कर्नाटक।

प्रश्न 43.
द्वि-सदनीय विधानमंडल वाले राज्यों में दोनों सदनों को क्या नाम दिया गया है?
उत्तर:

  • विधानसभा,
  • विधान परिषद्

प्रश्न 44.
विधानसभा का कार्यकाल कितना होता है? क्या उसे पहले भी भंग किया जा सकता है?
उत्तर:
विधानसभा का साधारण कार्यकाल पाँच वर्ष निश्चित किया गया है परन्तु उससे पहले भी मुख्यमंत्री की सिफारिश पर राज्यपाल द्वारा भंग किया जा सकता है।

प्रश्न 45.
विधानसभा की बैठकों की अध्यक्षता कौन करता है? उसका चुनाव कैसे किया जाता है?
उत्तर:
विधानसभा की बैठक की अध्यक्षता अध्यक्ष करता है। उसका चुनाव विधानसभा के सदस्यों द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 46.
विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या कितनी हो सकती है?
उत्तर:
विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की संख्या के 1/3 से अधिक तथा 40 से कम नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न 47.
विधान परिषद् में राज्यपाल द्वारा कितने सदस्य मनोनीत किए जाते हैं?
उत्तर:
विधान-परिषद् की कुल सदस्य-संख्या का 1/6 भाग सदस्य राज्यपाल के द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।

प्रश्न 48.
हरियाणा में विधानमंडल एक-सदनीय है अथवा द्वि-सदनीय? हरियाणा विधानसभा के सदस्यों की संख्या कितनी निश्चित की गई है?
उत्तर:
हरियाणा में एक-सदनीय विधानमंडल है। हरियाणा विधानसभा के सदस्यों की संख्या 90 निश्चित की गई है।

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प्रश्न 49.
विधानसभा के एक वर्ष में कितने अधिवेशन होते हैं?
उत्तर:
विधानसभा के एक वर्ष में कम-से-कम दो अधिवेशन अवश्य होने चाहिएँ। इसके अतिरिक्त राज्यपाल को किसी भी समय विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुलाने का अधिकार है।।

प्रश्न 50.
ऐसे किन्हीं चार राज्यों के नाम बताएँ जिनमें विधानमंडल एक-सदनीय है।
उत्तर:

  • हरियाणा,
  • पंजाब,
  • हिमाचल प्रदेश तथा
  • राजस्थान।

प्रश्न 51.
राज्य विधानसभा का सदस्य बनने के लिए कोई दो योग्यताएँ बताइए।
उत्तर:

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।

प्रश्न 52.
विधान परिषद की अवधि कितनी होती है?
उत्तर:
विधान-परिषद् एक स्थायी सदन है। इसका प्रत्येक सदस्य 6 वर्ष के लिए चुना जाता है। 1/3 सदस्य प्रत्येक दो वर्ष के पश्चात् सेवानिवृत हो जाते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य चुन लिए जाते हैं।

प्रश्न 53.
एक साधारण विधेयक तथा धन संबंधी विधेयक को विधान परिषद् कितने समय तक रोक सकती है?
उत्तर:
विधान परिषद् एक साधारण विधेयक को 4 महीने तक तथा धन-संबंधी विधेयक (Money Bill) को 14 दिन तक रोक सकती है।

प्रश्न 54.
किस राज्य की विधानसभा में सबसे अधिक तथा कितने सदस्य हैं?
उत्तर:
सबसे अधिक सदस्य उत्तर प्रदेश की विधानसभा में हैं। यह संख्या 403 है।

प्रश्न 55.
राज्यपाल राज्य विधानसभा में एंग्लो-इंडियन जाति के कितने सदस्य मनोनीत कर सकता है? हरियाणा विधानसभा में इस जाति के कितने सदस्य मनोनीत किए गए हैं?
उत्तर:
राज्यपाल विधानसभा में एंग्लो-इंडियन जाति के अधिक-से-अधिक 2 सदस्य मनोनीत कर सकता है। हरियाणा विधानसभा में इस जाति का कोई भी सदस्य मनोनीत नहीं किया गया है।

प्रश्न 56.
विधान परिषद् की बैठकों की अध्यक्षता कौन करता है? उसका चुनाव कैसे किया जाता है?
उत्तर:
विधान-परिषद् की बैठकों की अध्यक्षता उसका अध्यक्ष (Chairman) करता है। उसका चुनाव विधान परिषद् के सदस्यों द्वारा किया जाता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विधानपालिका के कोई तीन कार्य लिखें।
उत्तर:
विधानपालिका के तीन मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं

1. कानून बनाना-विधानमंडल का मुख्य कार्य कानून बनाना है। इस क्षेत्र में वह नए कानून बनाती है, पुराने कानूनों में संशोधन करती है तथा अनावश्यक कानूनों को निरस्त करती है।

2. वित्त पर नियन्त्रण-विधानपालिका का धन पर पूर्ण नियन्त्रण होता है। सरकार विधानमंडल की स्वीकृति के बिना न तो एक पैसा खर्च कर सकती है और न ही कोई कर लगा सकती है, इसलिए प्रतिवर्ष कार्यपालिका अपना वार्षिक बजट विधानमंडल के सामने पेश करती है। विधानमंडल चाहे तो बजट को अस्वीकृत भी कर सकती है। सरकार के खर्च पर लेखा परीक्षक की रिपोर्ट भी विधानमंडल के सामने प्रस्तुत की जाती है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण-प्रजातन्त्र में कार्यपालिका पर विधानमंडल का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष नियन्त्रण रहता है। संसदीय सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी रहती है। विधानमंडल के प्रत्येक सदस्य को मंत्रियों से प्रश्न पूछने तथा उनकी आलोचना करने का अधिकार होता है। मंत्रियों को सन्तोषप्रद उत्तर देने पड़ते हैं। विधानमंडल मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर सकता है जिस पर मंत्रिमंडल को त्याग-पत्र देना पड़ता है। अध्यक्षात्मक सरकार में भी विधानमंडल बजट पर नियन्त्रण करके अथवा जाँच समिति नियुक्त करके कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखता है।

प्रश्न 2.
लोकसभा की रचना की संक्षेप में व्याख्या करें।
उत्तर:
लोकसभा संसद का निम्न सदन है, जिसके सदस्यों की संख्या 500 निश्चित की गई थी, परन्तु 1956 में इसके सदस्यों की संख्या 520 और 1963 में 525 कर दी गई, 1973 में इसकी संख्या 545 कर दी गई तथा 1987 में इसके सदस्यों की संख्या 550 की गई थी। एंग्लो-इण्डियन जाति के दो मनोनीत सदस्यों को मिलाकर अधिकतम संख्या 552 होगी। वर्तमान में लोकसभा में 545 सदस्य हैं।

इसमें से 543 निर्वाचित एवं 2 एंग्लो इण्डियन हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि दिसम्बर 2019 में पारित 104वें संवैधानिक संशोधन द्वारा एंग्लो इण्डियन जाति की मनोनयन प्रणाली को समाप्त करने का निर्णय किया गया है। ऐसी स्थिति में लोकसभा की अधिकतम संख्या 552 की जगह 550 ही रह जाएगी। सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है तथा 18 वर्ष के प्रत्येक नागरिक को वोट डालने तथा 25 वर्ष के प्रत्येक नागरिक को चुनाव लड़ने का अधिकार है। सदस्य पाँच वर्ष के लिए चुने जाते हैं।

प्रश्न 3.
लोकसभा की पाँच शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर:
लोकसभा की पाँच विशेष शक्तियाँ निम्नलिखित हैं

1. विधायी शक्तियाँ-लोकसभा का मुख्य कार्य कानून बनाना है। केन्द्रीय सूची तथा समवर्ती सूची में दिए गए विषयों पर लोकसभा कानून बनाती है। विशेष परिस्थिति में राज्य-सूची में दिए गए विषय पर भी कानून बनाया जा सकता है।

2. वित्त पर नियन्त्रण-लोकसभा का देश के वित्त पर पूरा नियन्त्रण होता है। बजट लोकसभा द्वारा पास किया जाता है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण-लोकसभा कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखती है। मन्त्रियों से पूरक प्रश्न पूछना, आलोचना करना तथा अविश्वास का प्रस्ताव पास करना लोकसभा के कार्य हैं।

4. चुनाव कार्य-लोकसभा के सदस्य राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति तथा अपने अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

5. न्यायिक कार्य-न्याय करने का काम न्यायपालिका का है, परन्तु संसद को न्यायिक शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा अन्य पदाधिकारियों को महाभियोग द्वारा हटाने का कार्य संसद का है।

प्रश्न 4.
लोकसभा के अध्यक्ष के मुख्य कार्य बताइए।
उत्तर:
लोकसभा अध्यक्ष के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं

  • लोकसभा का अध्यक्ष सदन की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
  • वह यह निर्णय करता है कि किस विधेयक पर किस दिन बहस होगी।
  • वह सदन का कार्यक्रम बनाता है, कार्रवाई के नियमों की व्याख्या करता है तथा उनसे सम्बन्धित झगड़ों का निपटारा करता है।
  • यदि किसी विधेयक पर यह विवाद हो जाए कि वह साधारण विधेयक है अथवा धन विधेयक तो लोकसभा के अध्यक्ष का निर्णय अन्तिम माना जाता है।
  • अध्यक्ष विधेयकों पर वाद-विवाद के पश्चात् मतदान करवाता है तथा निर्णय की घोषणा करता है।
  • वह सदन में विभिन्न प्रस्तावों को पेश करने की अनुमति देता है अथवा किसी प्रस्ताव को पेश करने से इनकार कर सकता है।
  • किसी विधेयक पर मतभेद की दशा में संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता स्पीकर करता है।
  • वह राष्ट्रपति के सन्देशों को पढ़कर सुनाता है।

प्रश्न 5.
धन विधेयक किसे कहा जाता है? संक्षेप में व्याख्या करें।
उत्तर:
धन विधेयक उस विधेयक को कहा जाता है, जिसका सम्बन्ध कर लगाने, बढ़ाने तथा कम करने, खर्च करने, ऋण लेने तथा ब्याज देने आदि से सम्बन्धित हो। यदि कभी इस बात पर विवाद हो जाए कि अमुक विधेयक धन विधेयक है अथवा साधारण विधेयक है तो इस बात का निर्णय लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा किया जाता है। उसका निर्णय अन्तिम होता है। यदि विधेयक धन विधेयक है तो वह केवल लोकसभा में ही पेश किया जाएगा, अन्यथा वह किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
राज्यसभा की पाँच विशेष शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर:
राज्यसभा की पाँच विशेष शक्तियाँ निम्नलिखित हैं

(1) राष्ट्रपति द्वारा आपात घोषणा की स्वीकृति राज्यसभा से भी 30 दिन के भीतर लेनी पड़ती है। लोकसभा के अधिवेशन न होने की दशा में आपात्काल की स्वीकृति राज्यसभा से ली जाती है। लोकसभा के अधिवेशन आरम्भ होने पर उसकी घोषणा पर अनुमोदन होना ज़रूरी है। यदि लोकसभा उस पर स्वीकृति नहीं देती तो 30 दिन के बाद यह घोषणा रद्द हो जाएगी।

(2) राज्यसभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित कर उस पर संसद को कानून बनाने का अधिकार सौंप सकती है।

(3) राज्यसभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके किसी नई अखिल भारतीय सेवा को स्थापित कर सकती है।

(4) राज्यसभा की स्वीकृति के बिना किसी मौलिक अधिकार में परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

(5) राष्ट्रपति द्वारा स्थापित आयोगों, यथा-संघीय लोक सेवा आयोग, अनुसूचित जातियों तथा कबीलों के आयोग, वित्त आयोग, अन्य आयोगों तथा महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट राज्यसभा में भी प्रस्तुत की जाती है तथा उस पर विचार किया जाता है।

प्रश्न 7.
लोकसभा की सदस्यता ग्रहण करने के लिए संवैधानिक योग्यताएँ बताएँ।
उत्तर:
लोकसभा का सदस्य बनने के लिए प्रत्याशी में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिएँ

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • उसकी न्यूनतम आयु 25 वर्ष होनी चाहिए,
  • उसमें वे सभी योग्यताएँ होनी चाहिएँ । जो समय-समय पर संसद द्वारा निश्चित की गई हैं,
  • वह पागल, दिवालिया, घोर अपराधी तथा लाभकारी पद पर आसीन न हो,
  • उसका नाम मतदाता सूची में हो,
  • वह छुआछूत के विरुद्ध कानून द्वारा दण्डित न हो,
  • उस पर कोई फौजदारी मुकद्दमा न चल रहा हो।

प्रश्न 8.
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए योग्यताओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए संविधान द्वारा कुछ योग्यताएँ निर्धारित की गई हैं जो निम्नलिखित हैं

  • वह भारत का नागरिक हो तथा उसकी आयु 30 वर्ष से कम न हो,
  • वह केन्द्र तथा राज्य सरकार के अधीन किसी लाभदायक पद पर न हो,
  • वह अपने राज्य का निवासी हो,
  • उसमें अन्य योग्यताएँ भी हों जो संसद कानून बनाकर निश्चित कर दे,
  • वह पागल, दिवालिया तथा अपराधी न हो,
  • संसद के किसी कानून द्वारा उसे चुनाव लड़ने के अयोग्य न ठहराया गया हो।

प्रश्न 9.
संसद के सदस्यों के विशेषाधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को निम्नलिखित विशेषाधिकार प्राप्त हैं
(1) संसद सदस्यों को सदन में, जिस सदन का वह सदस्य है, बोलने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त है।

(2) सदन में कही गई किसी भी बात के लिए किसी सदस्य के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता।

(3) सदन का अधिवेशन आरम्भ होने के 40 दिन पहले, अधिवेशन के दौरान तथा अधिवेशन समाप्त होने के 40 दिन बाद तक उनको किसी भी दीवानी मुकद्दमे में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। उन्हें फौजदारी मुकद्दमे में गिरफ्तार किया जा सकता है, परन्तु सदस्य के बन्दी बनाए जाने की सूचना शीघ्र ही सदन के अध्यक्ष को देनी होती है।

(4) संसद अपने सदस्यों के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति अथवा संस्था के विरुद्ध मान-हानि की कार्रवाई . कर सकती है और उसके लिए दण्ड निश्चित कर सकती है।

(5) संसद सदस्यों को समस्त देश में कहीं भी जाने के लिए प्रथम श्रेणी का मुक्त रेलवे पास मिलता है। उन्हें मकान तथा टेलीफोन आदि की सुविधाएँ भी प्राप्त होती हैं।

प्रश्न 10.
राज्यसभा के अध्यक्ष के कार्य बताएँ।
उत्तर:
भारत का उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष (Ex-officio Chairman) होता है। राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष होने के नाते उसे 4 लाख रुपए प्रति मास वेतन तथा रहने के लिए निवास स्थान मिलता है। राज्यसभा का अध्यक्ष निम्नलिखित कार्य करता है
(1) वह राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा सदन में शान्ति व्यवस्था बनाए रखता है।

(2) वह सदस्यों को सदन में बोलने की आज्ञा देता है।

(3) चूंकि वह राज्यसभा का सदस्य नहीं है, उसे मतदान का अधिकार नहीं है, परन्तु जब किसी विषय पर सदन में समान मत पड़ें तो उसे निर्णायक मत (Casting Vote) देने का अधिकार होता है।

(4) वह सदन में गणपूर्ति (Quorum) का निर्णय करता है।

(5) वह राज्यसभा के सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करता है।

(6) वह सदन द्वारा पास किए गए विधेयकों पर हस्ताक्षर करता है और उन्हें लोकसभा अथवा राष्ट्रपति के पास भेजता है।

प्रश्न 11.
भारतीय संसद की कोई पाँच शक्तियाँ अथवा कार्य बताएँ।
उत्तर:
भारतीय संसद की पाँच शक्तियाँ निम्नलिखित हैं
(1) संसद का प्रमुख कार्य कानूनों का निर्माण करना है।

(2) संसद का राष्ट्रीय वित्त पर नियन्त्रण होता है। वह वार्षिक बजट पास करती है।

(3) संसद मन्त्रिमण्डल पर नियन्त्रण बनाए रखती है। मन्त्रिमण्डल संसद के प्रति उत्तरदायी है। संसद मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास करके उसे पद से हटा भी सकती है।

(4) संसद संविधान के संशोधन में भाग लेती है।

(5) भारत में संसद द्वारा राष्ट्रीय नीतियाँ निर्धारित की जाती हैं। मन्त्रि-परिषद् को संसद द्वारा निर्धारित नीतियों का पालन करना पड़ता है।

(6) संसद राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति का चुनाव करती है। लोकसभा अपने अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव करती है। राज्यसभा अपने उपाध्यक्ष का चुनाव करती है।

प्रश्न 12.
भारतीय संसद की शक्तियों पर लगी कोई पाँच सीमाएँ बताएँ।
उत्तर:
भारतीय संसद की शक्तियों पर लगी सीमाएँ इस प्रकार हैं-

  • भारतीय संसद संविधान के उल्लंघन में कोई कानून नहीं बना सकती है,
  • संसद मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कोई कानून नहीं बना सकती,
  • संसद को संविधान की सभी धाराओं में अपनी इच्छानुसार संशोधन करने की शक्ति नहीं है। कई धाराओं में संशोधन के लिए उसे आधे राज्यों की स्वीकृति भी लेनी पड़ती है,
  • राष्ट्रपति को संसद द्वारा पास किए गए किसी भी विधेयक को अस्वीकार करने का अधिकार है,
  • भारत में शक्तियाँ केन्द्र तथा राज्य में बँटी हुई हैं और साधारणतः संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून नहीं बना सकती।

प्रश्न 13.
सार्वजनिक लेखा समिति पर संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
सार्वजनिक लेखा समिति के मुख्य कार्य बताएँ।
उत्तर:
यह संसद की एक महत्त्वपूर्ण समिति है। इसके कुल 22 सदस्य हैं जिनमें 15 लोकसभा तथा 7 राज्यसभा से लिए जाते हैं। इस समिति का अध्यक्ष प्रायः विरोधी दल का कोई सदस्य होता है जिसकी नियुक्ति समिति के सदस्यों में से लोकसभा के स्पीकर द्वारा की जाती है। इस समिति के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं-
(1) नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट पर विचार करना तथा इस बात का परीक्षण करना कि सरकार द्वारा खर्च बजट के अनुसार हुआ है अथवा नहीं,

(2) यह देखना है कि जिस अधिकारी द्वारा खर्च किया जाता है, वह अधिकारी खर्च करने का अधिकार भी रखता है अथवा नहीं,

(3) समिति सरकार के अधीन किसी भी संस्था के खर्च की जाँच-पड़ताल कर सकती है तथा उसकी रिपोर्ट संसद के सामने पेश करती है।

प्रश्न 14.
अनुमान (आंकलन) समिति पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
अनुमान समिति में 30 सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति लोकसभा के सदस्यों में से आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एक समय में एक वर्ष के लिए की जाती है। यह लोकसभा की एक बहुत महत्त्वपूर्ण समिति है। इसका गठन बजट में दिए गए विभिन्न अनुमानों का परीक्षण करने के लिए किया जाता है। इस समिति के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं

  • लोकसभा को प्रशासन में मितव्ययता (Economy) तथा कार्य-कुशलता लाने का सुझाव देना।
  • लोकसभा की वैकल्पिक नीतियाँ (Alternative Policies) पेश करना, जिससे प्रशासन में सुधार हो सके।
  • लोकसभा को प्रशासकीय कार्यों में लगे हुए धन की उपयोगिता के परीक्षण पर रिपोर्ट देना।

प्रश्न 15.
लेखानुदान तथा पूरक माँगों पर नोट लिखें।
उत्तर:
यदि किसी वित्तीय वर्ष के आरम्भ होने से पहले विनियोग विधेयक पास न किया जा सके तो सरकार के पास आवश्यक व्यय के लिए कोई धनराशि नहीं होगी, इसलिए यह व्यवस्था की गई है कि कुछ आवश्यक खर्चों के लिए सरकार को सीमित रकम दे दी जाए, उसे लेखानुदान कहते हैं। सन् 1991-92 के वित्तीय वर्ष के शुरू होने से पहले चन्द्रशेखर सरकार ने इसी का सहारा लिया था। यदि किसी कार्य के लिए बजट में निश्चित की हुई रकम या धनराशि कम प्रतीत हो तो लोकसभा के सामने पूरक अनुदान की माँग पेश की जाती है। इनको पास करने का तरीका वही है जो बजट या अन्य धन विधेयकों पर लागू होता है।

प्रश्न 16.
संसद के एक सदन में पास होने के लिए एक साधारण विधेयक को किन-किन अवस्थाओं में से गुजरना पड़ता है?
उत्तर:
साधारण विधेयक संसद के किसी भी सदन में आरम्भ किया जा सकता है। एक सदन में पास होने के लिए विधेयक को निम्नलिखित स्तरों में से होकर गुजरना पड़ता है

  • विधेयक का पेश करना तथा उस पर प्रथम वाचन,
  • द्वितीय वाचन,
  • समिति अवस्था,
  • रिपोर्ट अवस्था,
  • तृतीय वाचन

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

प्रश्न 17.
‘ध्यानाकर्षण प्रस्ताव’ क्या होता है?
उत्तर:
यदि सदन का कोई सदस्य सदन का ध्यान किसी महत्त्वपूर्ण विषय अथवा घटना की ओर आकर्षित करना चाहता है, तो वह सदन में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पेश करता है। ऐसे प्रस्ताव प्रायः सरकार अथवा किसी मन्त्री का ध्यान आकर्षित करने के लिए पेश किए जाते हैं।

प्रश्न 18.
विधान सभा का गठन किस प्रकार होता है?
उत्तर:
विधान सभा राज्य विधानमण्डल का निम्न सदन है जिसके सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है। संविधान ने देश के राज्यों की विधानसभाओं के लिए अलग-अलग संख्या तय की है। फिर भी एक राज्य की विधान सभा में अधिक-से-अधिक 500 तथा कम-से-कम 60 सदस्य हो सकते हैं। बाद में बहुत छोटे-छोटे राज्य, जैसे मिजोरम तथा गोवा स्थापित हो गए, जिनमें विधान सभा के सदस्य 40 हैं। अब किसी विधान सभा में कम-से-कम 32 (सिक्किम) सदस्य हैं और अधिक-से-अधिक (उत्तर प्रदेश में) 403 सदस्य हैं। सदस्यों का चुनाव 5 वर्ष के लिए किया जाता है।

प्रश्न 19.
विधान सभा की पाँच मुख्य शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर:
विधान सभा की पाँच मुख्य शक्तियाँ इस प्रकार हैं-

  • राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का कार्य विधान सभा का है। यदि किसी राज्य में दो सदन हैं तो विधान परिषद् के साथ मिलकर अन्यथा अकेली विधान सभा कानून बनाती है,
  • राज्य के वित्त पर विधान सभा का नियन्त्रण होता है। राज्य का वित्त मन्त्री प्रत्येक वर्ष बजट विधान सभा के समक्ष पेश करता है,
  • विधान सभा का राज्य मन्त्रिमण्डल पर पूरा नियन्त्रण होता है। मन्त्रिमण्डल को अविश्वास के प्रस्ताव द्वारा अपने पद से हटाया जा सकता है,
  • विधान सभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं। वे अपने सदस्यों में से एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष का चुनाव भी करते हैं,
  • विधान सभा विधान परिषद् के एक-तिहाई सदस्यों का चुनाव करती है।

प्रश्न 20.
विधान परिषद् की पाँच उपयोगिताएँ बताएँ।
उत्तर:
विधान परिषद् की पाँच उपयोगिताएँ इस प्रकार हैं-

  • विधान परिषद् विधेयक को शीघ्रता से पास नहीं होने देती, जिससे जनता विधेयक के गुण-दोषों पर विचार कर लेती है,
  • विधान परिषद् विधेयक की त्रुटियों को दूर करती है,
  • विधान परिषद में योग्य तथा अनुभवी व्यक्तियों को मनोनीत किया जा सकता है, जिससे उनके ज्ञान का सारे राज्य को लाभ पहुँच सके,
  • विधान परिषद् में योग्य तथा अनुभवी व्यक्तियों को मनोनीत किया जा सकता है,
  • विधान परिषद् विधान सभा को निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी बनने से रोकती है तथा शक्ति सन्तुलन बनाए रखती है।

प्रश्न 21.
विधान सभा के अध्यक्ष (स्पीकर) के पाँच कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
विधान सभा के अध्यक्ष (स्पीकर) के पाँच कार्य इस प्रकार हैं-

  • अध्यक्ष विधान सभा के अधिवेशनों की अध्यक्षता करता है तथा सदन में शान्ति व्यवस्था बनाए रखता है,
  • सभी सदस्य अध्यक्ष की अनुमति से सदन की कार्रवाई के नियमों की व्याख्या करता है,
  • विधेयकों पर वाद-विवाद करवाना, मतदान करवाना तथा परिणाम घोषित करना स्पीकर के कार्य हैं,
  • सदन में किसी विषय पर समान मत पड़ने की स्थिति में वह अपने निर्णायक मत (Casting Vote) का प्रयोग कर सकता है।

प्रश्न 22.
विधान परिषद् का सदस्य बनने की योग्यताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
विधान-परिषद् का सदस्य बनने के लिए दी गई योग्यताओं का होना आवश्यक है-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • उसकी आयु 30 वर्ष से कम न हो,
  • वह केन्द्र तथा राज्य सरकार के अधीन किसी लाभदायक पद पर न हो,
  • वह पागल, दिवालिया तथा चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित न किया गया हो,
  • वह विधान सभा तथा संसद के किसी सदन का सदस्य न हो।

प्रश्न 23.
राज्य विधान सभा तथा विधान परिषद् की शक्तियों में तुलना करें।
उत्तर:
(1) साधारण विधेयक दोनों में से किसी में भी प्रस्तावित किया जा सकता है। विधान परिषद् किसी भी साधारण विधेयक में अधिक-से-अधिक चार महीने की देरी कर सकती है,

(2) धन विधेयक केवल विधान सभा में ही प्रस्तावित किए जा सकते हैं। विधान परिषद् धन विधेयक को 14 दिन से अधिक नहीं रोक सकती,

(3) मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास करने का अधिकार केवल विधान सभा को ही प्राप्त है। विधान परिषद् मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती,

(4) राष्ट्रपति के निर्वाचन में केवल विधान सभा के सदस्य भाग लेते हैं। विधान परिषद् के सदस्यों को राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं है,

(5) विधान सभा 2/3 बहुमत से विधान परिषद् समाप्त करने का प्रस्ताव पारित कर सकती है।

प्रश्न 24.
राज्य विधान सभा के अध्यक्ष पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
अध्यक्ष का चुनाव विधान सभा द्वारा अपने सदस्यों में से किया जाता है। अध्यक्ष अधिकांशतया बहुमत दल का ही व्यक्ति बनता है। अध्यक्ष चुने जाने के बाद वह अपने दल से नाता नहीं तोड़ता, लेकिन दल की सक्रिय राजनीति से अलग रहता है। अध्यक्ष अपने पद पर विधान सभा में विश्वास प्राप्ति तक बना रहता है। विधान सभा उसको हटाने सम्बन्धी प्रस्ताव साधारण बहुमत से पारित कर सकती है, लेकिन ऐसा नोटिस कम-से-कम 14 दिन पूर्व देना आवश्यक है। अध्यक्ष सदन की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा सदन की कार्रवाई का संचालन करता है।

प्रश्न 25.
विधान परिषद् के सदस्यों की योग्यताएँ बताएँ।
उत्तर:
विधान-परिषद् के सदस्यों में दी गई योग्यताएँ होनी चाहिएँ-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • उसकी आयु 30 वर्ष से कम न हो,
  • वह संघीय सरकार अथवा राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो,
  • उसके पास वे सभी योग्यताएँ हों जो संसद कानून द्वारा समय-समय पर निर्धारित करे,
  • वह न्यायालय द्वारा अपराधी, दिवालिया अथवा पागल घोषित न किया गया हो।

प्रश्न 26.
विधान परिषद् के विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
विधान परिषद् के विपक्ष में दीए गए तर्क इस प्रकार हैं-

  • दोनों सदनों में गतिरोध उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है,
  • विधान परिषद् विधेयकों पर वाद-विवाद को मात्र दोहराती है,
  • यह आवश्यक नहीं है कि विधान-परिषद् में वाद-विवाद का स्तर ऊँचा हो,
  • योग्य व अनुभवी व्यक्ति विधान सभा के लिए भी चुने जाते हैं।

प्रश्न 27.
राज्यपाल की स्वविवेकी शक्तियों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
राज्यपाल कुछ शक्तियों का प्रयोग स्वेच्छा एवं स्व-विवेक से करता है, जो कि निम्नलिखित हैं
(1) जब विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो या बहुमत दल अपना नेता चुनने में असमर्थ हो तो राज्यपाल अपनी इच्छानुसार मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कर सकता है।

(2) राज्यपाल का यह देखना परम कर्त्तव्य है कि संघ सरकार के कानूनों, आदेशों तथा नीतियों का राज्य में ठीक प्रकार से पालन हो रहा है या नहीं।

(3) राज्य का राज्यपाल इस बात की रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजता है कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा रहा है। राज्यपाल साधारण बिलों पर पहली बार निषेधाधिकार (Veto Power) का प्रयोग कर सकता है। राज्यपाल किसी बिल को राष्ट्रपति की अन्तिम स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकता है। असम और नागालैण्ड के राज्यपाल के पास कबाइली इलाकों सम्बन्धी विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं। .

(4) जब राष्ट्रपति धारा 356 के अन्तर्गत संकटकाल की घोषणा करता है तो उस समय राज्यपाल राष्ट्रपति के एजेण्ट के रूप में कार्य करता है तथा मन्त्रि-परिषद् को समाप्त कर दिया जाता है।

(5) राज्यपाल को यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी भी समय मुख्यमन्त्री से शासन सम्बन्धी सूचना माँग सकता है। राज्यपाल किसी एक अकेले मन्त्री के निर्णय को वापस कर सकता है ताकि उस पर सारी मन्त्रि-परिषद् की राय जानी जाए।

इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि वास्तव में मन्त्रि-परिषद् और राज्यपाल के आपसी सम्बन्ध कई आधारों पर निर्भर करते हैं। अगर मन्त्रि-परिषद् एक ही दल का है तथा उसी दल की सरकार केन्द्र में है तो ऐसी स्थिति में राज्यपाल पूर्णतः संवैधानिक मुखिया होता है। अगर मन्त्रि-परिषद् को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं है तो ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है तथा वह वास्तविक शासक के रूप में कार्य करता है; जैसा कि चौथे आम चुनाव (1967) के बाद कई प्रान्तों में राज्यपालों को ऐसी स्थिति प्राप्त थी।

प्रश्न 28.
विधान सभा सदस्यों के पाँच विशेषाधिकार बताएँ।
उत्तर:
विधान सभा के सदस्यों के पाँच विशेषाधिकार इस प्रकार हैं-
(1) सदस्यों को सदन में भाषण देने की स्वतन्त्रता है,

(2) सदन में दिए गए भाषण के लिए सदस्य के विरुद्ध कोई मुकद्दमा नहीं किया जा सकता,

(3) सदस्यों को सदन का अधिवेशन शुरू होने से 40 दिन पहले, अधिवेशन के दौरान तथा अधिवेशन समाप्त होने के 40 दिन बाद तक किसी दीवानी मुकद्दमे में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता,

(4) सदस्यों को मासिक वेतन के अतिरिक्त निर्वाचन क्षेत्र भत्ता तथा यात्रा आदि की सुविधाएँ भी प्राप्त हैं,

(5) सदस्यों को रहने के लिए निःशुल्क निवास स्थान मिलता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संसद की रचना, उसकी शक्तियों तथा कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
रचना (Composition)-भारत की संघीय विधानपालिका को संसद का नाम दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 79 के अन्तर्गत, “संघ की एक संसद होगी, जिसमें राष्ट्रपति तथा दो सदन होंगे जिनका नाम लोकसभा तथा राज्यसभा होगा।” लोकसभा भारतीय संसद का निम्न सदन है। इसके सदस्यों की अधिक-से-अधिक संख्या 552 हो सकती है।

इनमें से 520 सदस्य राज्यों द्वारा तथा 30 सदस्य संघीय क्षेत्रों (Union Territories) द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त यदि एंग्लो-इण्डियन जाति का कोई व्यक्ति निर्वाचित न हुआ हो तो ऐसे दो सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत कर सकता है। इसके सदस्य पाँच वर्ष के लिए प्रत्यक्ष रूप से मतदाताओं द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं। पाँच वर्ष की अवधि से पूर्व भी लोकसभा को भंग किया जा सकता है। लोकसभा के सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

राज्यसभा संसद का उच्च सदन है, जिसमें 250 सदस्य होते हैं। इनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। इनको साहित्य, कला, विज्ञान, समाज-सेवा, शिक्षा आदि क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम करने वाले व्यक्तियों में से चुना जाता है। शेष धानसभाओं के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं। इसके सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं, परन्तु हर दूसरे वर्ष 1/3 सदस्य अपने पद से निवृत्त हो जाते हैं तथा उनकी जगह नए सदस्यों का चुनाव किया जाता है। भारत का उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष होता है। राज्यसभा के सदस्य अपने में से एक उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

संसद सदस्यों के वेतन, भत्ते तथा पेंशन (Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament)-संसद के . दोनों सदनों के सदस्यों को समान वेतन, भत्ते तथा पेंशन आदि मिलते हैं। वित्त मन्त्री अरुण जेटली के द्वारा 1 फरवरी, 2018 को बजट प्रस्तुत करते समय सांसदों के वेतन भत्तों में प्रस्तावित कानून के अनुरूप प्रत्येक 5 वर्ष में मुद्रास्फीति के अनुरूप सांसदों के वेतन में स्वतः संशोधन हो जाएगा। वित्तमन्त्री के संशोधित प्रस्ताव के

अनुसार मूल वेतन 50 हजार से बढ़ाकर 1 लाख, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 45 हजार से बढ़ाकर 70 हजार एवं सचिवालय भत्ता 30 हजार से बढ़ाकर 60 हजार, दैनिक भत्ता 2000 से बढ़ाकर 4000 करने का निर्णय लिया जो 1 अप्रैल, 2018 से लागू हुए। सांसदों को निःशुल्क आवास, परिवार सहित निःशुल्क चिकित्सा सुविधा, तीन लैंड लाइन टेलीफोन एवं एक बी०एस०एन०एल० मोबाइल तथा एक मोबाइल निर्वाचन क्षेत्र हेतु जिसमें एक लाख साठ हजार मुफ्त कॉलों के साथ 20 हजार अतिरिक्त मुफ्त कॉलें भी दी गई हैं।

प्रत्येक सांसद को कम्प्यूटर हेतु मुफ्त ब्राड बैंड सुविधा भी प्रदान की गई है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक सांसद को देश में लगभग 34 हवाई यात्राएँ भी निःशुल्क प्रदान की गई हैं। सांसदों को मिलने वाली पेंशन 20,000 रुपए मासिक के स्थान पर योगी आदित्यनाथ कमेटी ने इसे बढ़ाकर 35 हजार रुपए करने की सिफारिश की है।

इसके अतिरिक्त 1988 में पास किए गए अधिनियम द्वारा सांसद की उसके कार्यकाल के दौरान इसकी मृत्यु होने पर उसकी पत्नी या पति या उसके आश्रित को पेंशन की सुविधा प्रदान की गई थी। संसद की शक्तियाँ तथा कार्य (Powers and Functions of the Parliament) भारत की संसद संघीय विधानपालिका है। संघ की सभी वैधानिक शक्तियों का प्रयोग संसद द्वारा किया जाता है। कानून निर्माण के अतिरिक्त भी संसद को अन्य कई प्रकार के काम करने पड़ते हैं जो निम्नलिखित हैं:

1. वैधानिक शक्तियाँ (Legislative Powers):
संसद को कानून बनाने की व्यापक शक्ति प्राप्त है। संघीय सूची के सभी विषयों पर संसद को कानून बनाने का अधिकार है। विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची में दिए गए विषयों पर भी संसद कानून बना सकती है। समवर्ती सूची प कानून बनाने का अधिकार संसद तथा राज्य विधानसभाओं को प्राप्त है, परन्तु विवाद की दशा में संसद द्वारा बनाया गया कानून ही मान्य होगा।

2. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers):
संसद को वित्तीय क्षेत्र में भी शक्तियाँ प्राप्त हैं। प्रतिवर्ष वित्तमन्त्री संसद में बजट पेश करता है। संसद इस पर विचार करके इसको पास करती है। संसद की स्वीकृति के बिना सरकार जनता पर कोई कर नहीं लगा सकती तथा न ही कोई पैसा एकत्रित करके खर्च कर सकती है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive):
मन्त्रिमण्डल अपने सभी कार्यों के लिए व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होता है। संसद मन्त्रियों से प्रश्न पूछकर, उनकी आलोचना करके तथा अविश्वास के प्रस्ताव द्वारा मन्त्रिमण्डल पर नियन्त्रण रखती है। मन्त्रिमण्डल संसद में बहुमत रहने तक ही कार्यरत रह सकता है।

4. यिक कार्य (Judicial Functions):
न्याय करने का काम न्यायपालिका का है, परन्तु संसद को न्यायिक शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा अन्य पदाधिकारियों को महाभियोग द्वारा हटाने का कार्य संसद का है।

5. संविधान में संशोधन (Amendments in the Constitution):
संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार है। संविधान की कुछ धाराओं को साधारण बहुमत से, कुछ धाराओं को 2/3 बहुमत से तथा कुछ धाराओं को संशोधित करने के लिए 2/3 बहुमत के साथ-साथ आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति भी अनिवार्य है।

6. राष्ट्रीय नीतियों को निर्धारित करना (Determination of the National Policies):
भारत की संसद केवल कानून ही नहीं बनाती, बल्कि वह राष्ट्रीय नीतियाँ भी निर्धारित करती है। मन्त्रि-परिषद् को संसद द्वारा निर्धारित नीतियों का पालन करना पड़ता है, नहीं तो उन्हें संसद की तीव्र आलोचना सहनी पड़ती है। संसद सदस्य मन्त्रि-परिषद् से त्याग-पत्र देने की माँग भी कर सकते हैं।

7. विविध कार्य (Miscellaneous Functions)

  • संसद नए राज्यों का निर्माण करती है। सीमाओं में परिवर्तन करती है तथा उनके नामों में परिवर्तन करती है।
  • किसी राज्य में विधान परिषद् की स्थापना अथवा समाप्त करना संसद का काम है।
  • संसद, राष्ट्रपति की संकटकालीन घोषणा को स्वीकृति प्रदान करती है।
  • संसद को विस्तृत शक्तियाँ प्राप्त हैं, परन्तु फिर भी वह इंग्लैण्ड की संसद की तरह प्रभुसत्ता-सम्पन्न नहीं है।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारतीय संसद ब्रिटिश संसद का मुकाबला नहीं कर सकती। लेकिन फिर भी भारतीय संसद केवल कानून निर्माण ही नहीं करती, अपितु अन्य अनेक प्रकार के महत्त्वपूर्ण कार्य भी उसके द्वारा किए जाते हैं। भारतीय संसद के पास अनेक महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ तो हैं, परन्तु : ब्रिटिश संसद के समान प्रभुसत्ता सम्पन्न संसद (Sovereign Body) नहीं है क्योंकि इसकी शक्तियाँ सीमित हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि हमारी संसद का अधिकार क्षेत्र कितना भी सीमित क्यों न हो, फिर भी यह एक धुरी के समान है जिसके इर्द-गिर्द भारतीय सरकार की समस्त मशीनरी घूमती है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

प्रश्न 2.
राज्यसभा की रचना, कार्य तथा शक्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
राज्यसभा की रचना (Composition of Council of States) राज्यसभा भारतीय संसद का ऊपरी सदन (Upper House) है। संविधान द्वारा इसके सदस्यों की अधिक-से-अधिक संख्या 250 निश्चित की गई है, जिनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से मनोनीत किए जाते हैं जो साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज सेवा आदि के कारण प्रसिद्धि प्राप्त किए रहते हैं। जैसे जुलाई, 2018 में राष्ट्रपति द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शास्त्रीय नृत्यांगना डॉ० सोनल मानसिंह, प्रसिद्ध मूर्तिकार डॉ० रघुनाथ महापात्र, दलित नेता राम सकल एवं संघ विचारक राकेश सिन्हा को मनोनीत किया गया।

शेष सदस्य राज्यों की विधानसभाओं द्वारा एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) तथा आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) के आधार पर निर्वाचित किए जाते हैं। अनुच्छेद 80(5) के अनुसार, “संघ द्वारा प्रशासित क्षेत्र (Union Territories) के प्रतिनिधियों का चुनाव संसद के कानून द्वारा निश्चित की गई व्यवस्था के अनुसार किया जाता है।”

राज्यसभा में भारतीय संघ के विभिन्न राज्यों तथा संघीय क्षेत्रों को उनकी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक तथा कम जनसंख्या वाले राज्यों को कम प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है। इस सम्बन्ध में संविधान यह व्यवस्था करता है कि एक राज्य की जनसंख्या के प्रथम 50 लाख व्यक्तियों तक हर 10 लाख व्यक्तियों के लिए एक और उसके बाद 20 लाख पर एक के हिसाब से प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा। विभिन्न राज्यों तथा संघीय प्रदेशों की राज्यसभा में सदस्य संख्या संविधान की चौथी अनुसूची (IV Schedule) में लिखी गई है।

सदस्यों की योग्यताएँ (Qualifications of the Members):
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए संविधान द्वारा कुछ योग्यताएँ निर्धारित की गई है जो इस प्रकार हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो तथा उसकी आयु 30 वर्ष से कम न हो,
  • वह केन्द्र तथा राज्य सरकार के अधीन किसी लाभदायक पद पर न हो,
  • वह अपने राज्य का निवासी हो,
  • उसमें अन्य योग्यताएँ भी हों जो संसद कानून बनाकर निश्चित कर दे,
  • वह पागल, दिवालिया तथा अपराधी न हो,
  • संसद के किसी कानून द्वारा उसे चुनाव लड़ने के अयोग्यं न ठहराया गया हो।

अवधि (Term)-राज्यसभा एक स्थायी सदन है, जिसके सभी सदस्यों का चुनाव एक साथ नहीं होता तथा न ही सम्पूर्ण सदन को कभी भंग किया जाता है। सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष निश्चित किया गया है, परन्तु हर दूसरे वर्ष 1/3 सदस्य अपने पद से सेवानिवृत्त हो जाते हैं तथा उनकी जगह नए सदस्यों का चुनाव किया जाता है। सदस्यों को पुनर्निर्वाचित होने का अधिकार है। गणपूर्ति (Quorum) राज्यसभा की बैठकों की कार्रवाई चलाने के लिए इसके कुल सदस्यों के 1/10 भाग की उपस्थिति अनिवार्य है।

यदि इतने सदस्य उपस्थित नहीं हैं तो सदन की कार्रवाई नहीं चलेगी। 42वें संशोधन द्वारा राज्यसभा अपनी गणपूर्ति संख्या स्वयं निश्चित कर सकती है। राज्यसभा का सभापति (Chairman of Rajya Sabha) भारत का उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन (Ex-officio) सभापति होता है। इसी तरह अमेरिका का उप-राष्ट्रपति सीनेट का पदेन (Ex-officio) सभापति होता है। राज्यसभा का एक उप-सभापति भी अपने सदस्यों में से निर्वाचित किया जाता है। सभापति का प्रमुख उद्देश्य सदन की अध्यक्षता करना तथा अनुशासन को बनाए रखना है।

प्रायः उप-राष्ट्रपति अपने वोट का प्रयोग नहीं करता, लेकिन दोनों पक्षों के बराबर मत होने पर, वह अपने निर्णायक मत (Casting Vote) का प्रयोग करता है। सभापति अथवा उप-राष्ट्रपति के वेतन तथा भत्ते संसद द्वारा निश्चित किए जाते हैं। सभापति को 4 लाख रुपए प्रति मास वेतन मिलता है। राज्यसभा के सदस्यों द्वारा अपने सदन से ही किसी भी सदस्य को उप-सभापति निर्वाचित किया जाता है जो सभापति की अनुपस्थिति में सदन की कार्रवाई का संचालन करता है। जब सभापति तथा उप-सभापति दोनों ही अनुपस्थित हों, तब ऐसा व्यक्ति सदन की अध्यक्षता करता है, जिसे सदन नियुक्त करे। आजकल राज्यसभा के अध्यक्ष श्री एम० वेंकैया नायडू (11 अगस्त, 2017 से) हैं तथा उप-सभापति श्री हरिवंश नारायण सिंह (10 अगस्त, 2018 से) हैं।

राज्यसभा के सदस्यों के विशेषाधिकार (Privileges of Members of Rajya Sabha) राज्यसभा के सदस्यों को अपने विचार प्रकट करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। सदन में दिए गए भाषणों के कारण उनके खिलाफ किसी भी न्यायालय के द्वारा कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसके अलावा अधिवेशन के दिनों में तथा उससे 40 दिन पूर्व अथवा बाद में भी उनको किसी दीवानी अभियोग के कारण गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

सदन अपने विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के खिलाफ मान-हानि की कार्रवाई कर सकता है। . सदस्यों के वेतन तथा भत्ते (Salaries and Allowances of the Members)-राज्यसभा के सदस्यों को वेतन व भत्तों की सुविधा लोकसभा के सदस्यों के समान प्राप्त है। लोकसभा एवं राज्यसभा के सदस्यों के वेतन व भत्ते समय-समय पर संसद द्वारा निर्धारित विधि के अनुसार दिए जाएँगे।

राज्यसभा के कार्य व शक्तियाँ (Functions and Powers of Council of States)-राज्यसभा भारत की संसद का दूसरा अथवा उच्च सदन है। राज्यसभा को निम्नलिखित अधिकार व शक्तियाँ प्राप्त हैं

1. कानून-निर्माण का कार्य (Legislative Functions):
भारत में संघात्मक सरकार की स्थापना की गई है। संघात्मक सरकारयों का विभाजन होता है। भारत में सारी शक्तियाँ संघ-सूची, राज्य-सूची तथा समवर्ती सूची में बाँटी गई हैं। राज्यसभा को संघ-सूची तथा समवर्ती सूची में दिए गए सभी साधारण विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है। राज्य सूची में दिए गए विषयों पर भी विशेष स्थिति में राज्यसभा कानून बनाने का कार्य कर सकती है। साधारण विधेयक किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।

राज्यसभा में पास होने पर उसे लोकसभा के पास भेजा जाता है। लोकसभा की स्वीकृति मिलने पर उसे अन्तिम स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। यदि किसी विधेयक पर दोनों सदनों में मतभेद हो जाए तो राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुला सकता है। संयुक्त अधिवेशन में लोकसभा के सदस्यों की संख्या अधिक होने के कारण साधारणतः लोकसभा की बात मानी जाती है, परन्तु ऐसा हर समय आवश्यक नहीं है। संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा का अध्यक्ष करता है। सन् 1986 तक दोनों सदनों की संयुक्त बैठक दो बार 1961 और 1978 में बुलाई गई थी और उसमें लोकसभा की बात मानी गई थी।

2. वित्तीय कार्य (Financial Functions):
वित्तीय क्षेत्र में राज्यसभा की शक्तियाँ बहुत ही सीमित हैं। कोई भी धन विधेयक राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता। धन विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति से पहले लोकसभा में पेश किया जाता है। लोकसभा में धन विधेयक पास होने पर उसे राज्यसभा में भेजा जाता है, परन्तु राज्यसभा किसी भी धन विधेयक को अपने पास अधिक-से-अधिक 14 दिन तक रोक सकती है। इस अवधि के पश्चात् लोकसभा द्वारा पास विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पास समझा जाता है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control Over Executive):
यद्यपि मन्त्रि-परिषद् लोकसभा के प्रति ही सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है, परन्तु राज्यसभा को भी मन्त्रि-परिषद् पर नियन्त्रण रखने का अधिकार प्राप्त है, फिर भी उसका यह अधिकार सीमित है। राज्यसभा मन्त्रियों से प्रश्न व पूरक प्रश्न पूछने, आलोचना करने, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव लाने व पास करने का अधिकार रखती है। इसमें राज्यसभा को मन्त्रि-परिषद् पर नियन्त्रण रखने का अधिकार प्राप्त हो जाता है, परन्तु राज्यसभा के पास मन्त्रि-परिषद के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास करने का अधिकार नहीं है। केन्द्रीय मन्त्रि-परिषद् में राज्यसभा के कुछ सदस्य होने से वह उसे प्रभावित करती रहती है।

4. चुनाव सम्बन्धी कार्य (Electoral Functions):
राज्यसभा को चुनाव सम्बन्धी अधिकार भी दिए गए हैं। राज्यसभा अपने सदस्यों में से उप-सभापति का चुनाव करती है। राष्ट्रपति के चुनाव में राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य तथा उप-राष्ट्रपति के चुनाव में सभी सदस्य भाग लेते हैं।

5. संविधान में संशोधन (Amendment in the Constitution):
संविधान में संशोधन करने का अधिकार दोनों सदनों को समान रूप से प्राप्त है। संशोधन प्रस्ताव किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। जब तक दोनों सदन सहमत न हों, संविधान में संशोधन नहीं हो सकता। दोनों सदनों में मतभेद होने की दशा में वह निरस्त कर दिया जाता है। व्यावहारिक रूप में संशोधन के विषय में दोनों सदनों में दो बार मतभेद हुआ है।

1970 में राजाओं के प्रिवीपर्स को बन्द करने के संशोधन को राज्यसभा ने अस्वीकार कर दिया था तथा दूसरी ओर 1974 में 45वें संशोधन को राज्यसभा ने कुछ संशोधनों के साथ पास किया था और लोकसभा को उसे अस्वीकार करना पड़ा था।

6. न्यायिक कार्य (Judicial Functions):
राज्यसभा को न्यायिक कार्य करने का अधिकार भी प्राप्त है। राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों तथा अन्य वे अधिकारी जो न्यायालय द्वारा दण्डित नहीं किए जाते, उनके विरुद्ध महाभियोग चलाकर उन्हें अपने पद से हटाने का लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा को भी समान अधिकार प्राप्त है।

7. अन्य कार्य व अधिकार (Miscellaneous Functions and Rights or Powers):
उपर्युक्त शक्तियों के अतिरिक्त राज्यसभा को अन्य बहुत से कार्य, अधिकार तथा शक्तियाँ प्राप्त हैं जो निम्नलिखित हैं

(1) राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की घोषणा की स्वीकृति राज्यसभा से भी 30 दिन के भीतर लेनी पड़ती है। लोकसभा के अधिवेशन न होने की दशा में आपात्काल की स्वीकृति राज्यसभा से ली जाती है। लोकसभा के अधिवेशन आरम्भ होने पर उसकी घोषणा पर अनुमोदन होना ज़रूरी है। यदि लोकसभा उस पर स्वीकृति नहीं देती तो 30 दिन के बाद यह घोषणा निरस्त हो जाएगी।

(2) राज्यसभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित कर उस पर संसद को कानून बनाने का अधिकार सौंप सकती है।

(3) राज्यसभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके किसी नई अखिल भारतीय सेवा को स्थापित करना राष्ट्रहित में उचित घोषित कर सकती है। ऐसी अवस्था में संसद में कानून बनाकर ऐसी सेवा स्थापित कर सकती है।

(4) राज्यसभा की स्वीकृति के बिना किसी मौलिक अधिकार में परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

(5) राष्ट्रपति द्वारा स्थापित आयोगों, यथा-संघीय लोक सेवा आयोग, अनुसूचित जातियों तथा कबीलों के आयोग, वित्त आयोग, अन्य आयोगों तथा महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट राज्यसभा में भी प्रस्तुत की जाती है तथा उस पर विचार किया जाता है। ऊपर वर्णित तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि राज्यसभा को कई प्रकार के कार्य करने की शक्तियाँ प्राप्त हैं। वह कार्यपालिका तथा वित्तीय क्षेत्र को छोड़कर शेष कार्यों में लोकसभा के समान ही शक्तियाँ रखती है।

प्रश्न 3.
राज्यसभा एक गौण सदन नहीं, महत्त्वपूर्ण सदन है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत की संघीय संसद में राज्यसभा दूसरा अथवा उच्च सदन है। राज्यसभा को भले ही उच्च सदन कहा जाता हो, परन्तु इसका स्थान लोकसभा से निम्न है। कुछ राजनीतिक विचारक इसे दूसरा नहीं, वरन् दूसरे दर्जे का सदन मानते हैं, कुछ इसे सजावट का सदन मानते हैं। उनके ऐसा मानने के पीछे तर्क यह है कि धन विधेयकों, कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखने, सरकार को बनाने-बिगाड़ने आदि मामलों में उसकी शक्ति बहुत कम है।

कानून-निर्माण क्षेत्र में भी प्रायः लोकसभा की ही महत्ता रहती है। केवल अपवादस्वरूप स्थिति में ही इसके विपरीत हो सकता है। इसमें सन्देह नहीं कि राज्यसभा निचले सदन की भांति एक शक्तिशाली संस्था नहीं है, मन्त्रि-परिषद् पर भी इसका कोई प्रभावी नियन्त्रण नहीं है तथा वित्तीय मामलों में इसके बहुत ही सीमित अधिकार हैं। फिर भी यह निरर्थक सदन नहीं है। यह एक उपयोगी सदन है। इसकी उपयोगिता निम्नलिखित है

1. विधेयकों का पुनर्निरीक्षण (Revision of the Bills):
राज्यसभा का प्रथम लाभ यह है कि यह लोकसभा द्वारा शीघ्रतापूर्वक बिना विचार किए गए विधेयकों पर रोक लगाती है। आधुनिक युग में विधेयकों की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि हो रही है। लोकसभा की व्यस्तता तथा कम समय होने के कारण विधेयकों को जल्दी में पास कर दिया जाता है। इसका नतीजा यह निकलता है कि विधेयकों में कई त्रुटियाँ रह जाती हैं। लेकिन राज्यसभा विधेयकों पर अधिक विचार-विमर्श करके कमियों को दूर करने का हर सम्भव प्रयास करती है। 1979 में राज्यसभा ने लोकसभा द्वारा पारित विशेष न्यायालय विधेयक में महत्त्वपूर्ण संशोधन किए जिसे लोकसभा ने उसी समय मान लिया।

2. विवादहीन विधेयकों का पेश होना (Introduction of Non-Controversial Bills):”
अधिकतर महत्त्वपूर्ण विधेयक लोकसभा में ही पेश किए जाते हैं लेकिन विवादहीन विधेयक प्रायः राज्यसभा में ही पेश किए जाते हैं। राज्यसभा ऐसे विधेयकों पर अच्छी तरह विचार-विमर्श करती है तथा इसके बाद विधेयकों को लोकसभा के पास भेजती है। वस्तुतः ऐसे विधेयकों पर लोकसभा का अधिक समय बर्बाद नहीं होता है। इस तरह राज्यसभा लोकसभा के बहुमूल्य समय को बचाती है जिससे लोकसभा इस समय का सदुपयोग अन्य महत्त्वपूर्ण विधेयकों पर करती है।

3. वाद-विवाद का स्तर ऊँचा (High Standard to Discussion):
राज्यसभा में वाद-विवाद का स्तर लोकसभा की अपेक्षा अधिक ऊँचा है। राज्यसभा में प्रत्येक विधेयक पर शान्तिपूर्वक विचार होता है। राज्यसभा में सदस्यों की संख्या लोकसभा के सदस्यों की तुलना में कम है एवं इसके सदस्य अधिक अनुभवी व कुशल होते हैं। राज्यसभा कनाडा के सीनेट की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली तथा उपयोगी है। वह अपने विवादों तथा सरकार की आलोचना द्वारा जनता पर अधिक प्रभाव डालती है। राज्यसभा को हम आदर्श द्वितीय सदन कह सकते हैं। यह लोकसभा पर नियन्त्रण का कार्य करती है तथा लोकप्रिय सदन के मार्ग में अड़चनें पैदा नहीं करती है।।

4. स्थायी सदन तथा विशेष अधिकार (Permanent House and Special Powers):
राज्यसभा एक स्थायी सदन है। स्थायी सदन होने के कारण राज्यसभा उस समय भी जनमत का प्रतिनिधित्व करती है जब लोकसभा भंग होती है। 21 जून, 1977 को राज्यसभा की 25वीं वर्षगाँठ के अवसर पर प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई ने कहा कि हमारी इस सवैधानिक व्यवस्था में राज्यसभा एक ऐसा निकाय है जिसे भंग नहीं किया जा सकता और जो लगातार बना रहता है।

कई विषयों में राज्यसभा को लोकसभा से कहीं अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं; जैसे अनुच्छेद 249 के अन्तर्गत राज्यसभा अपने प्रस्ताव के द्वारा राज्य-सूची के किसी विषय को संसद के अधिकार-क्षेत्र में ला सकती है। इसके अलावा राज्यसभा के परामर्श पर केन्द्रीय सरकार नई अखिल भारतीय सेवाओं, अखिल भारतीय न्यायिक सेवाओं की व्यवस्था कर सकती है।

5. योग्य व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व (Representation of Able Persons):
इसमें देश के अनुभवी प्रतिनिधि होते हैं। राष्ट्रपति 12 ऐसे सदस्यों को मनोनीत करते हैं जिन्होंने विज्ञान, कला, साहित्य, देश-सेवा आदि क्षेत्रों में विशेष योग्यता प्राप्त की होती है।

6. संशोधन की समान शक्ति (Equal Amendment Powers):
संविधान में संशोधन करने की शक्ति राज्यसभा को लोकसभा के समान है। संविधान में संशोधन राज्यसभा की स्वीकृति के बिना सम्भव नहीं हो सकता। अगस्त, 1978 में राज्यसभा ने 44वें संशोधन प्रस्ताव की छह महत्त्वपूर्ण धाराओं को निरस्त कर दिया था और दिसम्बर, 1978 में लोकसभा ने 44वें संशोधन विधेयक को उसी तरह पास किया जिस तरह राज्यसभा ने पास किया।

7. आपात्कालीन घोषणा की स्वीकृति (Approval of Proclamation of Emergency):
भारत का राष्ट्रपति अनुच्छेद 352, 356, 360 के अन्तर्गत संकटकाल की घोषणा कर सकता है जिसकी स्वीकृति संसद से लेनी आवश्यक होती है। ऐसी स्थिति में यदि लोकसभा भंग हो तो उसकी स्वीकृति राज्यसभा के द्वारा ली जाती है। इसके अलावा जब राष्ट्रपति लोकसभा को भंग कर  देता है तब भी राज्यसभा बनी रहती है।

8. उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पदच्युत करने में राज्यसभा को समान शक्ति (Equal Powers of Rajya Sabha for the Removal of the Judges of Supreme Court and High Courts):
उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को सेवानिवृत्त होने से पहले केवल महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है।

न्यायाधीशों को महाभियोग द्वारा हटाने के लिए आवश्यक है कि संसद के दोनों सदन लोकसभा एवं राज्यसभा अलग-अलग अपनी कुल सदस्य-संख्या के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 बहमत से न्यायाधीश के विरुद्ध प्रस्ताव पास करके राष्ट्रपति को भेजें।

9. भारतीय संवैधानिक प्रणाली के अनुकूल (InAccordance with Indian Constitutional System):
ब्रिटिश शासनकाल में भारत में संसदीय संस्थाओं का विकास हुआ था। ब्रिटिश शासनकाल में भी केन्द्रीय विधानमण्डल के दो सदनों की स्थापना की गई थी। अतः संविधान निर्माताओं ने चली आ रही परम्परा का पालन करना ही अच्छा समझा।

10. संघीय सिद्धान्त के अनुकूल (According to Federalism):
भारत में संघीय प्रणाली को अपनाया गया है। संघीय प्रणाली में इकाइयों को प्रतिनिधित्व देने के लिए दूसरे सदन का होना जरूरी होता है। इसलिए राज्यसभा इस शर्त को पूरा करने में सहायता करता है।

इस प्रकार राज्यसभा एक दूसरा उपयोगी सदन है। यह लोकसभा पर ब्रेक का कार्य करती है। भारत की राज्यसभा ब्रिटेन की लॉर्ड सभा तथा कनाडा की सीनेट से अधिक शक्तिशाली तथा उपयोगी सदन है। भारत की राज्यसभा अमेरिका की सीनेट की तरह शक्तिशाली नहीं है। अन्त में हम एम०वी० पायली (M.V. Paylee) के कथन से सहमत हैं कि राज्यसभा एक निरर्थक अथवा कानून पर रोक लगाने वाला सदन ही नहीं है। वास्तव में राज्यसभा शासन-तन्त्र का एक आवश्यक अंग है, केवल दिखावे मात्र का दूसरा सदन नहीं है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

प्रश्न 4.
लोकसभा की रचना, कार्य तथा शक्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रचना (Composition)-आरम्भ में लोकसभा के सदस्यों की अधिक-से-अधिक संख्या 500 निश्चित की गई थी। सन् 1956 में इसे बढ़ाकर 520 तथा सन् 1963 में इसे 525 कर दिया गया। सन् 1973 में संविधान के 31वें संशोधन द्वारा, इसके निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 545 कर दी गई। सन् 1987 में पास किए गए ‘गोवा, दमन तथा दीव पुनर्गठन अधिनियम’ (Goa, Daman and Div Re-organization Act, 1987) द्वारा इसे 550 कर दिया गया।

इनमें से 530 सदस्य राज्यों में से तथा 20 सदस्य केन्द्र द्वारा प्रशासित क्षेत्रों (Union Territories) में से चुने जाएंगे। इसके अतिरिक्त यदि राष्ट्रपति यह अनुभव करे कि चुनाव के द्वारा एंग्लो-इण्डियन जाति को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका, तो वह अनुच्छेद 331 के अधीन इस जाति के दो सदस्यों को लोकसभा में मनोनीत कर सकता है। इस प्रकार अब लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 हो सकती है। वर्तमान लोकसभा में 545 सदस्य हैं।

इनमें से 543 सदस्य निर्वाचित सदस्य हैं और 2 एंग्लो-इण्डियन सदस्य होते हैं जिन्हें राष्ट्रपति मनोनीत करता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि दिसम्बर, 2019 में पारित 104वें संवैधानिक संशोधन द्वारा एंग्लो-इण्डियन जाति की मनोनयन प्रणाली को समाप्त करने का निर्णय किया गया है। ऐसी स्थिति में लोकसभा की अधिकतम संख्या 552 की जगह 550 ही रह जाएगी।

यद्यपि इस संशोधन को भारत संघ के आधे राज्य एवं केन्द्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित किए जाने के बाद क्रियान्वित करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति मिलेगी। … सदस्यों की योग्यताएँ (Qualifications of Members)-संविधान द्वारा लोकसभा के प्रत्याशी के लिए दी गई योग्यताएँ होनी आवश्यक हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • उसकी आयु 25 वर्ष से कम न हो,
  • वह संसद द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताएँ रखता हो,
  • वह संघ तथा राज्य सरकार के अधीन किसी लाभदायक पद पर न हो,
  • वह पागल, दिवालिया तथा अपराधी न हो।

कार्यकाल (Tenure) लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष है, परन्तु इसका यह कार्यकाल निश्चित नहीं है। प्रधानमन्त्री के परामर्श पर राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को समय से पूर्व भी भंग किया जा सकता है। 1979 में चौधरी चरण सिंह ने समय से पूर्व लोकसभा भंग करवा दी थी। इस तरह नौवीं लोकसभा भी समय से पूर्व श्री चन्द्रशेखर ने भंग करवा दी थी। ग्यारहवीं व बारहवीं लोकसभा को भी समय से पहले भंग कर दिया गया था।

15वीं लोकसभा को राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 85 के अन्तर्गत भंग किया और 16वीं लोकसभा के चुनाव सन् 2014 में हुए। लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया भी जा सकता है। ऐसा केवल संकटकाल में ही किया जा सकता है। एक बार में लोकसभा की अवधि एक वर्ष के लिए बढ़ाई भी जा सकती है। 1975 में संकटकाल के कारण चुनाव 1976 की बजाए 1977 में हुए थे। आपात्काल के समाप्त होते ही 6 महीने के अन्दर नया चुनाव करवाना अनिवार्य है।

गणपूर्ति (Quorum) लोकसभा की कार्रवाई चलाने के लिए कुल सदस्य संख्या का कम-से-कम 1/10 सदस्यों का सदन में उपस्थित होना आवश्यक है। इसके बिना इसकी कार्रवाई स्थगित कर दी जाएगी। अधिवेशन (Sessions of the House)-संविधान के अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति जब और जहाँ उचित समझे, संसद के दोनों सदनों अथवा एक सदन का अधिवेशन बुला सकता है, परन्तु पहले और दूसरे अधिवेशन के बीच 6 महीने से अधिक का समय नहीं होना चाहिए। इसका अभिप्राय यह है कि लोकसभा के वर्ष में दो अधिवेशन अवश्य होते हैं, परन्तु वास्तव में कई
अधिवेशन होते हैं।

सदन के पदाधिकारी (House Officer)-संविधान के अनुसार, लोकसभा की बैठक जारी रखने के लिए लोकसभा के कुल सदस्यों में से स्पीकर व डिप्टी-स्पीकर का चुनाव करती है। ये दोनों इन पदों पर उसी समय तक बने रह सकते हैं, जब तक वे सदन के सदस्य रहते हैं। सदन की सदस्यता समाप्त होते ही उन्हें अपने पदों से अलग होना पड़ता है। जैसे 17वीं लोकसभा चुनाव 2019 में भारतीय जनता पार्टी अकेले 303 लोकसभा स्थानों पर विजय प्राप्त कर पुनः स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आने पर अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव में निर्णायक स्थिति में आ गई।

इसी कारण 19 जून, 2019 को लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में भाजपा के लोकसभा सदस्य श्री ओम बिड़ला के नाम का प्रस्ताव प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रखा गया तथा गृहमंत्री श्री अमित शाह, रक्षा मन्त्री श्री राजनाथ सिंह एवं कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने उनके नाम का समर्थन किया। इस प्रकार श्री ओम बिड़ला को स्पीकर पद पर सर्वसम्मति से निर्वाचित किया गया।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि लोकसभा के अध्यक्ष इस पद को ग्रहण करते समय इस पद के लिए कोई शपथ नहीं लेते। अध्यक्ष प्रारम्भ में केवल संसद सदस्य होने की शपथ लेते हैं। संसद सदस्यों के वेतन, भत्ते तथा पेंशन (Salary,Allowances and Pension of Members of Parliament)-संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को समान वेतन, भत्ते तथा पेंशन आदि मिलते हैं।

वित्त मन्त्री अरुण जेटली के द्वारा 1 फरवरी, 2018 को बजट प्रस्तुत करते समय सांसदों के वेतन भत्तों में प्रस्तावित कानून के अनुरूप प्रत्येक 5 वर्ष में मुद्रास्फीति के अनुरूप सांसदों के वेतन में स्वतः संशोधन हो जाएगा। वित्तमन्त्री के संशोधित प्रस्ताव के अनुसार मूल वेतन 50 हजार से बढ़ाकर 1 लाख, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 45 हजार से बढ़ाकर 70 हजार एवं सचिवालय भत्ता 30 हजार से बढ़ाकर 60 हजार, दैनिक भत्ता 2000 से बढ़ाकर 4000 करने का निर्णय लिया जो 1 अप्रैल, 2018 से लागू हुए।

सांसदों को निःशुल्क आवास, परिवार सहित निःशुल्क चिकित्सा सुविधा, तीन लैंड लाइन टेलीफोन एवं एक बी०एस०एन०एल० मोबाइल तथा एक मोबाइल निर्वाचन क्षेत्र हेतु जिसमें एक लाख साठ हजार मुफ्त कॉलों के साथ 20 हजार अतिरिक्त मुफ्त कॉलें भी दी गई हैं। प्रत्येक सांसद को कम्प्यूटर हेतु मुफ्त ब्राड बैंड सुविधा भी प्रदान की गई है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक सांसद को देश में लगभग 34 हवाई यात्राएँ भी निःशुल्क प्रदान की गई हैं।

सांसदों को मिलने वाली पेंशन 20,000 रुपए मासिक के स्थान पर योगी आदित्यनाथ कमेटी ने इसे बढ़ाकर 35 हजार रुपए करने की सिफारिश की है। इसके अतिरिक्त 1988 में पास किए गए अधिनियम द्वारा सांसद की उसके कार्यकाल के दौरान इसकी मृत्यु होने पर उसकी पत्नी या पति या उसके आश्रित को पेंशन की सुविधा प्रदान की गई थी।

संसद सदस्यों के विशेषाधिकार (Privileges of Members of Parliament)-संसद सदस्य अपने कर्त्तव्य का उचित रूप से पालन कर सकें, इसके लिए उन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं-
(i) संसद अथवा उसकी किसी समिति में कही गई बात पर सदस्य के विरुद्ध किसी न्यायालय में किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जा सकती।

(ii) संसद का अधिवेशन आरम्भ होने के 40 दिन पहले तथा अधिवेशन समाप्त होने के 40 दिन बाद तक उन्हें किसी भी दीवानी मुकद्दमे में बन्दी नहीं बनाया जा सकता, परन्तु फौजदारी मुकद्दमे में उन्हें पकड़ा जा सकता है।

(iii) संसद के प्रत्येक सदस्य को स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के अन्तर्गत अपने चुनाव क्षेत्र में विकास कार्यों पर प्रति वर्ष 5 करोड़ रुपए खर्च करने का अधिकार है। 6 मार्च, 2011 से यह लागू की गई है। लोकसभा की शक्तियाँ तथा कार्य (Powers and Functions of Lok Sabha) संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में लोकसभा की महत्त्वपूर्ण शक्तियों का वर्णन किया गया है। लोकसभा के कार्य व शक्तियाँ निम्नलिखित हैं

1. विधायी शक्तियाँ (Legislative Functions):
लोकसभा का मुख्य कार्य कानून बनाना है। कानून-निर्माण में लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा को भी अधिकार दिया गया है। संघ सूची तथा समवर्ती सूची के सभी विषयों पर लोकसभा को कानून बनाने का अधिकार है। यद्यपि समवर्ती सूची पर कानून बनाने का अधिकार राज्य विधानमण्डलों को भी है, परन्तु विवाद की दशा में अन्तिम निर्णय संसद का होता है। विशेष परिस्थिति में राज्य सूची में दिए गए विषयों पर भी लोकसभा कानून बना सकती है, यदि

  • राज्यसभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास कर दे,
  • दो अथवा दो से अधिक राज्यों की प्रार्थना पर,
  • राष्ट्रपति द्वारा संकटकाल की घोषणा की गई हो,
  • किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया हो।

2. राष्ट्रीय वित्त पर नियन्त्रण (Controlover National Finance):
राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था पर लोकसभा को पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त है। धन विधेयक पहले लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। राज्यसभा धन विधेयक को केवल 14 दिनों तक पास होने से रोक सकती है। इस तरह सरकार को धन देने तथा खर्च करने की स्वीकृति देने वाला सदन लोकसभा ही है।

लोकसभा मन्त्रिमण्डल द्वारा प्रस्तुत बजट को निरस्त कर सकती है, कम कर सकती है, परन्तु उसे बढ़ा नहीं सकती। यदि सरकार का बजट निरस्त कर दिया जाए तो यह सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव समझा जाएगा। ऐसी अवस्था में मन्त्रिमण्डल को त्याग-पत्र देना पड़ेगा।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control Over Executive):
लोकसभा का मन्त्रिमण्डल पर पूरा नियन्त्रण होता है। मन्त्रिमण्डल अपने कार्यकाल तथा कार्यों के लिए लोकसभा के प्रति उत्तरदायी ठहराया गया है। लोकसभा के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछकर, काम रोको प्रस्ताव पास करके, वेतन में कटौती करके तथा अविश्वास का प्रस्ताव पास करके उन पर नियन्त्रण रखती है।

मन्त्री लोकसभा में बहुमत-प्राप्ति तक ही अपने पदों पर रह सकते हैं। बहुमत समाप्त होते ही उन्हें अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है। लोकसभा मन्त्रियों के विभागों की जाँच-पड़ताल के लिए समिति नियुक्त कर सकती है। इस प्रकार लोकसभा की मन्त्रियों पर कड़ी निगरानी रहती है।

4. चुनाव कार्य (Electoral Functions):
लोकसभा के सदस्य अपने सदस्यों में से एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। इसके अतिरिक्त वे राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं।

5. न्यायिक कार्य (Judicial Functions):
लोकसभा को राज्यसभा के समान ही राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति, सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, महालेखा परीक्षक आदि पर महाभियोग तथा अन्य कार्रवाई द्वारा हटाने का अधिकार है। राज्यसभा के दोषारोपण की जाँच-पड़ताल लोकसभा करती है। उन्हें दोषी पाए जाने पर अपने कुल सदस्यों की संख्या की उपस्थिति तथा मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके उन्हें उनके पद से हटा सकती है।

में संशोधन (Amendment in the Constitution) लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर संविधान में संशोधन करती है। संविधान में संशोधन के लिए कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थिति तथा मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत अनिवार्य हैं। संवैधानिक संशोधनों के प्रति दोनों सदनों में मतभेद को दूर करने के लिए संयुक्त अधिवेशन बुलाने की व्यवस्था नहीं है। राष्ट्रपति को संवैधानिक संशोधनों के विषय में निषेधाधिकार (Veto Power) प्राप्त नहीं हैं।

7. सदन के विशेषाधिकारों के उल्लंघन करने के विषय में शक्ति (Power for Safe guarding the Privileges) लोकसभा को किसी भी ऐसे व्यक्ति को दण्ड देने का अधिकार है, चाहे वह सदन का सदस्य ही क्यों न हो, जो लोकसभा के किसी विशेषाधिकार का उल्लंघन करता है। इसी शक्ति के अधीन 15 नवम्बर, 1978 को लोकसभा की विशेष अधिकारों की समिति ने श्रीमती इन्दिरा गाँधी को सदन के विशेष अधिकारों को भंग करने तथा उसका अपमान करने का दोषी ठहराया था तथा दण्ड के रूप में उनकी सदस्यता समाप्त करके उन्हें अधिवेशन के विसर्जन तक कैद में रखने का आदेश दिया था।

8. विविध कार्य (Miscellaneous Functions)-लोकसभा राज्यसभा के साथ मिलकर दूसरे विविध कार्य भी करती है जो इस प्रकार हैं-

  • राष्ट्रपति की संकटकालीन घोषणा की स्वीकृति लोकसभा से ली जाती है,
  • लोकसभा विभिन्न आयोगों की रिपोर्टों पर विचार करती है,
  • राज्यसभा के प्रस्ताव पर अखिल भारतीय सेवा स्थापित करने की
  • जनता की शिकायतें सरकार के सामने रखती है तथा उन्हें दूर करवाती है,
  • सदन की कार्रवाई के नियम बनाती है,
  • संघ में नए राज्यों को सम्मिलित करना, उनके नामों तथा सीमाओं में परिवर्तन करना,
  • उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में परिवर्तन करना,
  • अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के लिए कानून बनाती है,
  • दो अथवा दो से अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग तथा उच्च न्यायालय स्थापित करती है।

लोकसभा की ऊपर वर्णित शक्तियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कानून निर्माण में यह सर्वोपरि है। वित्तीय क्षेत्र में उसकी स्थिति महान है। उसकी अनुमति के बिना सरकार न तो कोई कर लगा सकती है और न ही धन एकत्रित करके खर्च कर सकती है। मन्त्रिमण्डल पर लोकसभा का नियन्त्रण अन्तिम होता है।

वह अपने सभी कार्यों के लिए लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होता है। हमारे देश में यह प्रथा विकसित हो चुकी है कि प्रधानमन्त्री लोकसभा से ही लिया जाना चाहिए। प्रधानमन्त्री प्रायः लोकसभा के बहुमत दल का नेता ही होता है। श्री एम०पी० शर्मा के शब्दों में, “यदि संसद राज्य का सर्वोच्च अंग है तो लोकसभा संसद का सर्वोपरि भाग है। व्यावहारिक रूप से लोकसभा ही सभी निर्माणात्मक कार्यों के लिए सर्वोच्च है।”

प्रश्न 5.
लोकसभा के अध्यक्ष के कार्य तथा स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर:
संविधान के अनुसार लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करने के लिए एक अध्यक्ष (Speaker) तथा एक उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) की व्यवस्था की गई है। सामान्यतः लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता अध्यक्ष करता है। उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष या डिप्टी अध्यक्ष सदन की अध्यक्षता करता है।

अध्यक्ष का निर्वाचन (Election of the Speaker):
लोकसभा अपने सदस्यों में से अध्यक्ष का चुनाव करती है। साधारणतया शासक दल का नेता विरोधी दल के नेताओं से विचार करके अध्यक्ष का चुनाव सर्वसम्मति से करवाने का प्रयास करता है। वर्तमान लोकसभा के द्वारा श्री ओम बिड़ला को स्पीकर पद पर सर्वसम्मति से निर्वाचित किया गया।

2. कार्यकाल (Tenure):
अध्यक्ष का कार्यकाल लोकसभा के कार्यकाल के समान 5 वर्ष है। लोकसभा भंग होने पर अध्यक्ष तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक नई लोकसभा अपने अध्यक्ष का चुनाव न कर ले।

3. अध्यक्ष के पद का रिक्त होना (Vacancy in Speaker’s Office):
लोकसभा के अध्यक्ष का पद उसके अपने पद से त्याग-पत्र देने से रिक्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त यदि उसकी सदस्यता समाप्त हो जाए, उसकी मृत्यु हो जाए, बीमारी अथवा असमर्थता की अवस्था में उसे उसके पद से हटा दिया जाए की स्थिति में उसका पद रिक्त माना जाता है। उसे पद से हटाने का प्रस्ताव सदन में प्रस्तुत करने से पहले उसे 14 दिन का नोटिस दिया जाता है। यदि सदन के कुल सदस्यों के स्पष्ट बहुमत से हटाए जाने का प्रस्ताव पास हो जाए तो अध्यक्ष को अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है। जब लोकसभा उसके हटाए जाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही हो तो वह बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता।

वेतन (Salary)-स्पीकर को संसद द्वारा निर्धारित वेतन तथा कई भत्ते मिलते हैं। वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष को 4,00,000 रुपए मासिक वेतन मिलता है। उसे निःशुल्क सरकारी निवास स्थान भी दिया जाता है। ये वेतन तथा भत्ते भारत की संचित निधि से दिए जाते हैं। अभिप्राय यह है कि स्पीकर के वेतन तथा भत्ते उसके कार्यकाल में कम नहीं किए जा सकते। स्पीकर के वेतन तथा भत्ते निश्चित करने का अधिकार केवल संसद को प्राप्त है। इस तरह लोकसभा के स्पीकर का पद बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसका देश के सर्वोच्च पदाधिकारियों की सूची में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समान सातवाँ स्थान है।

अध्यक्ष के कार्य (Functions of the Speaker) लोकसभा के अध्यक्ष के कार्य निम्नलिखित हैं

  • वह सदन की बैठकों की अध्यक्षता करता है,
  • वह यह निर्णय करता है कि किस विधेयक पर किस दिन बहस हो,
  • वह सदस्यों के बोलने का क्रम निश्चित करता है। यदि एक ही समय दो या दो से अधिक सदस्य बोलने के लिए खड़े हो जाएँ तो पहले कौन बोलेगा, उसका निर्णय अध्यक्ष करता है। यदि कोई सदस्य उसकी आज्ञा का पालन न करे तो वह उसे सदन से बाहर जाने को कह सकता है। अध्यक्ष की आज्ञा न मानने पर सदस्य को मार्शल की मदद से बाहर निकलवा सकता है तथा सदस्य को अधिवेशन में भाग लेने से भी रोक सकता है,
  • वह सदन का कार्यक्रम बनाता है, कार्रवाई के नियमों की व्याख्या करता है तथा उनसे सम्बन्धित झगड़ों का निपटारा करता है, (
  • यदि किसी विधेयक पर विवाद हो जाए कि यह साधारण विधेयक है अथवा धन विधेयक तो अध्यक्ष का निर्णय अन्तिम होता है,
  • अध्यक्ष विधेयकों पर वाद-विवाद के पश्चात् मतदान करवाता है तथा निर्णय की घोषणा करता है,
  • वह सदन में विभिन्न प्रस्तावों को पेश करने की अनुमति देता है अथवा किसी प्रस्ताव को पेश करने से इन्कार कर सकता है,
  • किसी विधेयक पर मतभेद की दशा में दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता अध्यक्ष करता है,
  • वह राष्ट्रपति के सन्देशों को पढ़कर सुनाता है,
  • वह सदन की ओर से राज्यपाल तथा राष्ट्रपति के साथ पत्र-व्यवहार करता है,
  • वह सदन में विभिन्न समितियों का गठन करता है तथा कुछ की अध्यक्षता भी करता है,
  • वह विधेयकों पर मतदान में भाग नहीं लेता, परन्तु मत बराबर होने की दशा में उसे निर्णायक मत देने का अधिकार है,
  • सदन में सभी सदस्य उसकी अनुमति से तथा उसको सम्बोधित करके बोलते हैं,
  • वह सदन में अव्यवस्था होने पर सदन की कार्रवाई स्थगित कर सकता है,
  • सदस्य संसदीय भाषा का प्रयोग करें। अनुचित शब्दों को कार्रवाई से निकलवाने का अध्यक्ष को पूर्ण अधिकार है,
  • यदि कोई व्यक्ति सदन की मानहानि करता है तो उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्य करना अध्यक्ष का अधिकार है,
  • वह सदन के विशेषाधिकारों का संरक्षक है।

अध्यक्ष की स्थिति (Position of the Speaker) लोकसभा के अध्यक्ष को बहुत अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं। उसका पद बहुत महत्त्वपूर्ण, गरिमाशाली तथा सम्मान वाला है। एम०वी० पायली का कथन है, “अध्यक्ष सदस्यों के व्यक्तिगत दलीय आधार पर प्राप्त तथा विशेषाधिकारों का संरक्षक है। संक्षेप में अध्यक्ष स्वय सदन की शक्तियों, कारवाई व सम्मान का प्रतीक है।”

भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने कहा था “अध्यक्ष सदन का प्रतिनिधित्व करता है। वह सदन के गौरव तथा स्वतन्त्रता का प्रतिनिधित्व करता है और क्योंकि सदन राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, अतः अध्यक्ष राष्ट्र की स्वतन्त्रता तथा स्वाधीनता का प्रतीक बन जाता है।” भूतपूर्व अध्यक्ष जी०वी० मावलंकर ने तो यहाँ तक कहा था “सदन में उसकी शक्तियाँ सर्वोच्च हैं।”

भारत के अध्यक्ष को बहुत अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं, परन्तु फिर भी भारतीय अध्यक्ष को ब्रिटिश अध्यक्ष की तरह मान्यता प्राप्त नहीं है। ब्रिटेन में एक बार का अध्यक्ष सदा का अध्यक्ष होता है। (Once a Speaker, always a speaker.) वह कॉमन सदन के लिए निर्विरोध चुना जाता है। भारत में ऐसी प्रथाएँ स्थापित नहीं हुई हैं। फिर भी अभी तक जितने भी अध्यक्ष चुने गए हैं, उन्होंने अपनी निष्पक्षता व कार्यकुशलता से इस पद का सम्मान बढ़ाया है।

निष्कर्ष (Conclusion) लोकसभा के अध्यक्ष की शक्तियों व स्थिति का अध्ययन करने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि लोकसभा के अध्यक्ष की स्थिति बड़ी गौरवशाली है। लोकसभा के अध्यक्ष की तुलना ब्रिटिश हाऊस ऑफ कॉमन्स के अध्यक्ष से की जा सकती है तथा इस रूप में यह कहा जा सकता है कि भारतीय अध्यक्ष को हाऊस ऑफ अध्यक्ष से अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं। वह भिन्न-भिन्न समितियों की नियुक्ति करता है और स्वयं तीन महत्त्वपूर्ण समितियों का अध्यक्ष भी होता है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

प्रश्न 6.
लोकसभा तथा राज्यसभा के आपसी सम्बन्धों का वर्णन करें।
अथवा
राज्यसभा दूसरा नहीं, दूसरे दर्जे का सदन है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि सैद्धान्तिक रूप में संसद के दोनों सदनों को समान अधिकार प्रदान किए गए हैं, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। राज्यसभा को लोकसभा की तुलना में कुछ अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं तो कुछ कार्यों में राज्यसभा की शक्तियाँ कम हैं। कुछ शक्तियाँ दोनों सदनों को समान रूप से प्राप्त हैं। इसलिए राज्यसभा को दूसरा सदन कहना तो उचित होगा, परन्तु दूसरे दर्जे का सदन कहना उचित नहीं है। निम्नलिखित तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है

1. साधारण विधेयक (Ordinary Bills):
साधारण विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। दोनों सदनों की स्वीकृति से ही विधेयक पास होगा, परन्तु अन्तिम शक्ति लोकसभा को प्राप्त है। राज्यसभा साधारण विधेयक को 6 महीने तक रोक सकती है। संयुक्त अधिवेशन की दशा में भी लोकसभा का ही प्रभुत्व रहता है।

2. धन विधेयक (Money Bills):
धन विधेयक पर राज्यसभा का नियन्त्रण बहुत कम है। धन विधेयक लोकसभा में ही पेश हो सकता है। राज्यसभा धन विधेयक को केवल 14 दिनों तक रोक सकती है। राज्यसभा के सुझावों को स्वीकार करना अथवा न करना लोकसभा का अधिकार है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control Over Executive):
मन्त्रिमण्डल अपने कार्यों के लिए व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होता है। यद्यपि दोनों सदनों के सदस्यों को मन्त्रियों से प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार है। दोनों सदन मन्त्रियों के कार्यों की आलोचना करते हैं, परन्तु अन्तिम शक्ति लोकसभा की है। लोकसभा मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास करके उसे हटा सकती है, राज्यसभा नहीं, इसलिए कार्यपालिका पर अन्तिम नियन्त्रण लोकसभा का है, राज्यसभा का नहीं।

4. न्यायिक कार्य (Judicial Functions):
राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को अपने पद से हटाने में दोनों सदनों को समान अधिकार प्राप्त हैं। महाभियोग कोई भी सदन लगा सकता है तथा दूसरा सदन जाँच-पड़ताल करता है। महाभियोग तभी प्रभावकारी होगा यदि दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से प्रस्ताव प

5. चुनाव कार्य (Electoral Functions):
राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के चुनावों में दोनों सदनों के सदस्य भाग लेते हैं। राष्ट्रपति के चुनाव में केवल निर्वाचित सदस्यों को भाग लेने का अधिकार होता है, जबकि उप-राष्ट्रपति के चुनाव में मनोनीत सदस्यों को भी मतदान में भाग लेने का अधिकार होता है।

6. संविधान में संशोधन (Constitutional Amendments):
संविधान में संशोधन का अधिकार लोकसभा तथा राज्यसभा को समान रूप से प्रदान किया गया है। संशोधन प्रस्ताव किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। यदि दोनों सदनों में मतभेद हो जाए तो संशोधन प्रस्ताव निरस्त किया जाता है।

7. अखिल भारतीय सेवा की स्थापना (Creation of an All India Service):
देश में यदि कोई नई अखिल भारतीय सेवा की स्थापना की जानी है तो इस आशय का प्रस्ताव राज्यसभा पास करती है, तभी संसद नई अखिल भारतीय सेवा की स्थापना करती है।

8. राज्य-सूची पर कानून बनाना (Enactment on the Subject of State List):
शक्तियों के विभाजन के आधार पर राज्य सूची में दिए गए सभी विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य विधानसभाओं का है, परन्तु राज्यसभा के प्रस्ताव पास करने पर राज्य-सूची में दिए गए विषयों पर संसद को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

9. आपातकाल की स्वीकृति (Consent on the Proclamation of Emergency):
राष्ट्रपति को संकटकाल की घोषणा की स्वीकृति संसद से लेनी आवश्यक है। यदि लोकसभा भंग हो चुकी हो तो राज्यसभा की स्वीकृति लेना आवश्यक है।

10. दोनों सदनों की अपनी विशेषताएँ (Peculiar Features of the Both Houses):
उक्त साझेदारी के अतिरिक्त प्रत्येक सदन की कुछ अलग-अलग विशेषताएँ भी हैं, जैसे

  • लोकसभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से तथा राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं,
  • राज्यसभा में 12 व्यक्ति राष्ट्रपति मनोनीत करता है,
  • लोकसभा अपने सदस्यों में से अध्यक्ष का चुनाव करती है। उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष होता है,
  • लोकसभा अपने अध्यक्ष को हटा सकती है, राज्यसभा को ऐसा कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। उसे लोकसभा की स्वीकृति भी लेनी पड़ती है,
  • धन विधेयक तथा साधारण विधेयक पर विवाद की दशा में अन्तिम निर्णय लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा किया जाता है,
  • दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा का अध्यक्ष करता है,
  • राज्यसभा एक स्थायी सदन है जिसके 1/3 सदस्य प्रति दूसरे वर्ष अपने पद से निवृत्त हो जाते हैं तथा नए सदस्यों का चुनाव किया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion) ऊपर वर्णित तथ्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि लोकसभा और राज्यसभा का आपस में गहरा सम्बन्ध है। एक सदन सारे कार्य नहीं कर सकता। भारत में दोनों सदनों में न कोई सदन अधिक शक्तिशाली है और न ही कोई सदन कम शक्तिशाली है। यदि कुछ कार्यों में लोकसभा अधिक शक्तिशाली है तो कुछ कार्यों में राज्यसभा।

कुछ कार्य ऐसे भी हैं जिनमें दोनों सदनों को समान अधिकार प्राप्त हैं। अतः भारतीय लोकसभा और राज्यसभा संसद के अभिन्न अंग हैं। इनकी तुलना एक मनुष्य की दो भुजाओं से की जाती है। लोकसभा की तुलना दाएँ हाथ से तथा राज्यसभा की तुलना बाएँ हाथ से की जा सकती है।

प्रश्न 7.
भारत की संसद में अपनाई जाने वाली विधायनी प्रक्रिया का वर्णन करें। अथवा कोई साधारण विधेयक कानून बनने के लिए जिन अवस्थाओं में से गुजरता है, उनका वर्णन करें। अथवा एक विधेयक कैसे अधिनियम बनता है?
उत्तर:
कानून बनाने के लिए जो प्रस्ताव संसद के सामने प्रस्तुत किया जाता है, उसे विधेयक कहा जाता है। जब यह कर दिया जाता है तथा उस पर राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाती है तब वह अधिनियम अर्थात् कानून बन जाता है। विधेयक दो प्रकार के होते हैं सरकारी विधेयक तथा गैर-सरकारी विधेयक। जो विधेयक सरकार की ओर से अर्थात् मन्त्री द्वारा पेश किया जाता है, उसे सरकारी विधेयक कहा जाता है और जो विधेयक मन्त्री के अतिरिक्त किसी और द्वारा पेश किया जाता है, उसे गैर-सरकारी विधेयक कहा जाता है।

विधेयक चाहे सरकारी हो अथवा गैर-सरकारी, दो तरह के होते हैं-साधारण विधेयक तथा धन विधेयक। साधारण विधेयक सामान्य लोकहित के बारे में होते हैं। प्रशासन को चलाने के लिए कानून बनाने से उनका सम्बन्ध होता है। धन विधेयक उसे कहा जाता है जो कर लगाने तथा सरकारी कोष से धन निकलवाकर खर्च करने के बारे में हो अथवा उनका सम्बन्ध राजस्व से हो। विधेयकों के विभाजन को इस आकृति से आसानी से समझा जा सकता है
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एक विधेयक अधिनियम कैसे बनता है? (How does a Bill become an Act ?)

1. विधेयक पेश करना तथा प्रथम वाचन (Introduction and First Reading):
साधारण विधेयक किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। जो भी व्यक्ति विधेयक पेश करना चाहता है, वह इस उद्देश्य की सूचना एक.मास पूर्व अध्यक्ष को देता है। मन्त्रियों पर एक महीने की अवधि लागू नहीं होती। अध्यक्ष उस विधेयक पर कोई तिथि निश्चित कर देता है। निश्चित तिथि को विधेयक पेश करने वाला सदस्य अध्यक्ष की अनुमति से विधेयक पेश करता है। वह विधेयक का शीर्षक पढ़ता है। वह विधेयक के सम्बन्ध में भाषण भी देता है।

यदि शीर्षक के सम्बन्ध में मतभेद हो तो विरोधी दल को अपने विचार रखने का समय दिया जाता है। विधेयक को सरकारी गजट में छाप दिया जाता है। इस विधि को ही विधेयक का पेश करना तथा प्रथम वाचन कहा जाता है। कभी-कभी अध्यक्ष विधेयक को सीधे सरकारी गजट में छापने का आदेश दे सकता है।

इस अवस्था में विधेयक को प्रथम वाचन के लिए सदन में प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होती तथा उसका सरकारी गजट में छाप दिया जाना ही प्रथम वाचन मान लिया जाता है। विधेयक के प्रथम वाचन के पश्चात् विधेयक पेश करने वाले सदस्य के सुझाव पर तथा सदन की आज्ञानुसार विधेयक के दूसरे वाचन को आरम्भ करने के लिए तिथि निश्चित की जाती है।

2. दूसरा वाचन (Second Reading):
निश्चित तिथि पर विधेयक पर दूसरा वाचन आरम्भ होता है। विधेयक पेश करने वाला विधेयक पर धारावाहिक बहस करने अथवा विधेयक को किसी समिति के पास भेजने की सिफारिश करता है। विधेयक पर वाद-विवाद केवल विधेयक के साधारण सिद्धान्तों तथा उद्देश्यों तक सीमित रहता है। विधेयक की प्रत्येक धारा पर विस्तारपूर्वक बहस नहीं होती और न ही कोई संशोधन पेश किया जा सकता है। विधेयक पेश करने वाले सदस्य की बात को मानते हुए विधेयक को सम्बन्धित समिति के पास भेज दिया जाता है। विधेयक की कापियाँ सदस्यों में बाँटी जाती हैं।

3. समिति अवस्था (Committee Stage):
विधेयक जिस प्रवर समिति अथवा संयुक्त समिति के पास भेजा जाता है, उसमें सदन के विभिन्न राजनीतिक दलों को सदस्यों के अनुपात से प्रतिनिधित्व दिया जाता है। एक समिति में 20 से 30 तक सदस्य लिए जाते हैं। विधेयक पेश करने वाले को समिति में अवश्य लिया जाता है। समिति में विधेयक पर विस्तार से विचार किया जाता है।

समिति किसी भी व्यक्ति, संस्था तथा समूह को यदि उसके पास विधेयक सम्बन्धी कोई जानकारी है तो उसे अपने पास बुला सकती है। आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों की राय भी ली जा सकती है। विधेयक पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने के बाद समिति विधेयक को संशोधन सहित अथवा बिना संशोधन के निश्चित समय के अन्दर सदन को वापिस भेज देती है।

4. रिपोर्ट अवस्था (Report Stage) समिति की रिपोर्ट के पश्चात् विधेयक पेश करने वाला प्रस्ताव रख सकता है कि समिति की रिपोर्ट के साथ विधेयक पर विचार किया जाए। उस अवस्था में विधेयक पर व्यापक वाद-विवाद होता है। विधेयक की प्रत्येक धारा पर चर्चा होती है। संशोधन पेश किए जाते हैं। प्रत्येक संशोधन और प्रत्येक धारा को सदन के सामने मतदान के लिए रखा जाता है।

यदि मतदान में धारा स्वीकृत हो जाती है तो वह विधेयक का भाग बन जाती है। जब विधेयक की सभी धाराओं पर विचार पूरा हो जाता है तो मतदान करवाया जाता है। यदि मतदान में विधेयक को बहुमत का समर्थन प्राप्त हो जाए तो उसे पास समझा जाता है अन्यथा वह निरस्त हो जाता है। यह विधेयक की सबसे महत्त्वपूर्ण अवस्था होती है। यही विधेयक का दूसरा वाचन होता है। यदि मन्त्री द्वारा रखा गया विधेयक निरस्त हो जाए तो यह समझा जाएगा कि मन्त्रिमण्डल का बहुमत नहीं है तथा उसे त्याग-पत्र देना पड़ता है। साधारणतया विधेयक इस अवस्था में पास हो जाता है।

5. तीसरा वाचन (Third Reading):
जब विधेयक का दूसरा वाचन समाप्त हो जाता है तो निश्चित तिथि पर विधेयक का तीसरा वाचन आरम्भ होता है। यह केवल औपचारिकता है। इस अवस्था में कोई नया संशोधन प्रस्ताव पेश नहीं किया जाता और न ही प्रत्येक धारा पर बहस होती है। विधेयक के सामान्य सिद्धान्तों पर केवल बहस होती है। इसके बाद विधेयक पर एक बार मतदान करवाया जाता है। इस अवस्था में विधेयक प्रायः स्वीकार ही कर लिया जाता है। इसके साथ ही विधेयक एक सदन में पास समझा जाता है।

6. विधेयक दूसरे सदन में (Bill in the other House):
एक सदन में पास होने के पश्चात् विधेयक को दूसरे सदन में भेजा जाता है। दूसरे सदन में भी विधेयक उन्हीं अवस्थाओं से गुजरता है, जिन अवस्थाओं से पहले सदन में गुजरा था। यदि दूसरा सदन विधेयक को उसी तरह पास कर दे तो विधेयक दोनों सदनों में पास समझा जाता है। मतभेद होने की दशा में राज्यसभा किसी भी साधारण विधेयक को 6 महीने तक रोक सकती है।

गतिरोध की दशा में राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन भी बुला सकता है। संयुक्त अधिवेशन में भी लोकसभा की बात को ही स्वीकार किया जाता है। लोकसभा के सदस्यों की संख्या भी अधिक होती है। संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा का अध्यक्ष करता है।

7. राष्ट्रपति की स्वीकृति (Assent of the President):
संसद के दोनों सदनों में विधेयक पास होने पर उसे अन्तिम स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाने पर वह विधेयक कानून बन जाता है तथा उसे भारतीय गजट में छाप दिया जाता है। राष्ट्रपति को निषेधाधिकार प्राप्त है, जिसके अन्तर्गत वह किसी विधेयक को संसद को दोबारा विचार करने के लिए भेज सकता है। यदि संसद राष्ट्रपति के सुझाव को स्वीकार करते हुए अथवा अस्वीकार करते हुए विधेयक को दोबारा बहुमत से पास कर दे तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी पड़ती है। राष्ट्रपति बिना स्वीकृति दिए एक विधेयक को अपने पास कितने समय तक रोक सकता है, इस विषय में देश का संविधान मौन है।

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प्रश्न 8.
भारत की संसद में धन विधेयक कैसे पास होता है? अथवा वित्त विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया का वर्णन करें।
उत्तर:
वित्त विधेयक को पारित करने की विधि साधारण विधेयक की विधि से भिन्न है। वित्त विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं। दूसरे, धन विधेयक सरकारी विधेयक होता है जो वित्तमन्त्री अथवा उसकी अनुपस्थिति में किसी और मन्त्री द्वारा पेश किया जाता है। धन विधेयक उस विधेयक को कहा जाता है जिसका निम्नलिखित विषयों से सम्बन्ध होता है-

  • किसी प्रकार का कर लगाना, घटाना, बढ़ाना तथा समाप्त करना,
  • भारत सरकार द्वारा ऋण लेने, गारण्टी देने तथा वित्तीय उत्तरदायित्व के लिए कानून बनाना,
  • भारत की संचित निधि से किसी व्यय के लिए धनराशि देना,
  • भारत की संचित निधि तथा आकस्मिक निधि का संरक्षण या निधि में धन जमा करना या निकालना,
  • किसी सरकारी खर्च को भारत की संचित निधि में से खर्च योग्य घोषित करना अथवा उसमें से किसी व्यय के लिए धन-राशि देना।

संक्षेप में, धन विधेयक का सम्बन्ध सरकार से धन प्राप्त करने अथवा खर्च करने अथवा सरकारी निधियों के संरक्षण या उसमें से व्यय से होता है। धन विधेयक लोकसभा में ही पेश किया जाता है तथा किसी विधेयक पर विवाद की दशा में लोकसभा के अध्यक्ष का निर्णय अन्तिम होता है। राज्यसभा धन विधेयक को 14 दिन के अन्दर अपनी सिफारिशों व सुझावों सहित लोकसभा को वापिस लौटा देती है। लोकसभा राज्यसभा के सुझावों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। राष्ट्रपति धन विधेयक पर हस्ताक्षर करने से इन्कार नहीं कर सकता, क्योंकि धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से ही लोकसभा में पेश किया जाता है।

साधारणतया धन विधेयक बजट के रूप में पेश किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त धन की माँग के लिए बजट पास होने से पहले तथा बाद में भी धन विधेयक के रूप में विधेयक पेश किया जा सकता है। बजट को वार्षिक वित्तीय विवरण (Annual Financial Statement) भी कहा जाता है। प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए सरकार बजट तैयार करती है जिसे राष्ट्रपति की ओर से वित्तमन्त्री लोकसभा में पेश करता है। बजट के मुख्य रूप से दो भाग होते हैं-आमदनी का भाग तथा खर्च का भाग। खर्चे के अनुमान दो भागों में दिखाए जाते हैं। एक भाग में संचित निधि से किया जाने वाला खर्च होता है।

इन खर्चों पर संसद में मतदान नहीं होता। दूसरे भाग में अनुदान सम्बन्धी माँग (Demand for Grants) होती है। इन्हें साधारण खर्च भी कहा जाता है। अनुदान सम्बन्धी माँगों पर संसद में बहस होती है। संसद इन माँगों को स्वीकार तथा अस्वीकार कर सकती है। इन माँगों में कटौती भी की जा सकती है।

राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, संघीय लोक सेवा आयोग के सदस्य, नियन्त्रक तथा महालेखा परीक्षक, भारत सरकार द्वारा दिए गए कर्जे, लोकसभा के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, राज्यसभा के उपाध्यक्ष तथा अन्य अधिकारियों के वेतन, भत्ते तथा पेन्शन आदि भारत की संचित निधि से दिए जाते हैं। बजट राष्ट्रपति के अभिभाषण से आरम्भ होता है। राष्ट्रपति दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में भाषण देता है जिसमें सरकार की नीतियों की चर्चा की जाती है।

बजट को पारित होने के लिए निम्नलिखित अवस्थाओं में से गुजरना पड़ता है

1. बजट को पेश करना (Introduction of the Budget):
वित्तमन्त्री लोकसभा में बजट पेश करता है। वित्तमन्त्री बजट के सम्बन्ध में भाषण देता है जिसमें बजट की प्रकृति और आर्थिक नीति पर प्रकाश डाला जाता है। इसके बाद बजट भाषण प्रतियाँ राज्यसभा में भेज दी जाती हैं।

2. बजट पर सामान्य वाद-विवाद (General Discussion on Budget):
वित्तमन्त्री के बजट भाषण के दो-तीन दिन पश्चात् बजट पर सामान्य वाद-विवाद होता है। सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की जाती है। इस समय उन खर्चों पर भी वाद-विवाद होता है जो संचित निधि से किए जाने हैं।

3. माँगों पर मतदान (Demand for Grants):
सामान्य वाद-विवाद समाप्त होने के पश्चात लोकसभा अनुदान सम्बन्धी माँगों पर विचार करती है। प्रत्येक मन्त्रालय की माँगों पर अलग-अलग विचार किया जाता है। मन्त्रालय के पिछले वर्ष के कार्य की समीक्षा की जाती है। मोरिस,जोन्स का कहना है कि यह ऐसा अवसर होता है कि जिस पर सदन अपने मन की बात खुलकर कह सकता है तथा इस अवसर पर सरकार को यह पता चल जाता है कि वित्तीय सुझावों की माँगों को किस रूप में स्वीकार किया जाएगा। लोकसभा को इन अनुदानों को स्वीकार करने, अस्वीकार करने तथा कम करने का अधिकार होता है। लोकसभा माँगों को कम कर सकती है, बढ़ा नहीं सकती।

4. विनियोग विधेयक (Appropriation Bill):
जब अनुदान सम्बन्धी माँगें लोकसभा द्वारा स्वीकृत हो जाती हैं तो संचित निधि से होने वाले खर्चों के साथ ये माँगें एक विनियोग विधेयक के रूप में लोकसभा में पेश की जाती हैं। इसका अर्थ यह होता है कि लोकसभा द्वारा स्वीकृत सभी माँगों तथा संचित निधि पर पारित खर्चे को खर्च करने का अधिकार सरकार को मिल गया है। इस विधेयक के स्वीकृत हुए बिना सरकार कोई पैसा खर्च नहीं कर सकती।

5. वित्त विधेयक (Finance Bill):
विनियोग विधेयक के पास हो जाने पर सरकार को खर्च करने का अधिकार मिल जाता है, परन्तु इन खर्चों के लिए पैसों की आवश्यकता पड़ती है इसलिए सरकार वित्त विधेयक पेश करती है जिसमें करों तथा अन्य साधनों की व्यवस्था की जाती है। प्रस्तावित करों तथा साधनों के विषय में लोकसभा में विचार होता है तथा संशोधन भी रखे – जाते हैं। नए करों को स्वीकार तथा अस्वीकार किया जा सकता है। लोकसभा करों की माँग को बढ़ा नहीं सकती। विधेयक के पास होने पर सरकार को जनता पर नए कर लगाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

6. बजट राज्यसभा में (Budget in the Rajya Sabha):
बजट लोकसभा में पास होने के पश्चात् राज्यसभा को भेजा जाता है। राज्यसभा धन विधेयक को 14 दिन तक विचार के लिए रख सकती है। राज्यसभा को सुझाव देने का अधिकार है, परन्तु सुझावों को मानना अथवा न मानना लोकसभा का कार्य है।

7. राष्ट्रपति की स्वीकृति (Assent of the President):
दोनों सदनों में पास होने के पश्चात विधेयक को अन्तिम स्वीकति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। धन विधेयकों पर राष्ट्रपति को निषेधाधिकार प्राप्त नहीं हैं, क्योंकि धन विधेयक उसकी पूर्व स्वीकृति से ही लोकसभा में पेश किए जाते हैं। ऊपर वर्णित प्रक्रिया द्वारा भारत की संसद में धन विधेयक अथवा बजट पास होता है।

लेखानुदान तथा पूरक अनुदान (Vote on Account and Supplementary Grants):
यदि किसी वित्तीय वर्ष के आरम्भ होने से पहले विनियोग विधेयक पास न किया जा सके तो सरकार के पास आवश्यक व्यय के लिए कोई धनराशि नहीं होगी, इसलिए यह व्यवस्था की गई है कि कुछ आवश्यक खर्चों के लिए सरकार को सीमित रकम दे दी जाए, इसे लेखानुदान कहते हैं। वर्ष 1991-92 के वित्तीय वर्ष के शुरू होने से पहले चन्द्रशेखर सरकार ने इसी का सहारा लिया था।

यदि किसी कार्य के लिए निश्चित की हुई रकम या धनराशि कम प्रतीत हो तो लोकसभा के सामने पूरक अनुदान (Supplementary Grants) की माँग पेश की जाती है। इनको पास करने का तरीका वही है जो बजट या अन्य धन विधेयकों पर लागू होता है।

प्रश्न 9.
राज्य विधान सभा की रचना, शक्तियों तथा कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
सभी राज्यों में कानून निर्माण के लिए विधानमण्डल की व्यवस्था की गई है। कुछ राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं और कुछ में केवल एक ही सदन है। विधान सभा विधानमण्डल का निम्न सदन है जो जनता का प्रतिनिधित्व करता है।

विधानसभा का संगठन (Composition of Legislative Assembly):
संविधान के अनुसार राज्य विधानसभा के सदस्यों की संख्या निश्चित नहीं की गई है। अनुच्छेद 170 में केवल इतना कहा गया है कि किसी राज्य की विधानसभा के सदस्यों की संख्या 500 से अधिक तथा 60 से कम नहीं होगी। प्रत्येक जनगणना के पश्चात् राज्य की विधानसभा के सदस्यों की संख्या राज्य की जनसंख्या के आधार पर निश्चित की जाती है।

इस कारण से यह संख्या भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न है। संविधान के 42वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि सन 2000 के पश्चात होने वाली प्रथम जनगणना तक प्रत्येक राज्य के चुनाव-क्षेत्रों के विभाजन के लिए वही आँकड़े लिए जाएँगे जो 1971 की जनगणना के अनुसार निश्चित तथा प्रकाशित हो चुके हैं।

31 अगस्त, 2000 को केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के तहत महत्त्वपूर्ण निर्णय एवं संसद द्वारा अगस्त 2001 में पास किए संवैधानिक संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई कि लोकसभा व विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या सन् 2026 तक बढ़ाए बिना उनका परिसीमन किया जाएगा जिससे विभिन्न क्षेत्रों में मतदाताओं और प्रतिनिधियों के अनुपात में समानता लाई जा सके।

इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या का आबादी के आधार पर पुनर्निर्धारण करने का निर्णय भी हुआ जो 1991 की जनसंख्या के आधार पर लागू होगा। यहाँ यह भी स्पष्ट है कि दिसम्बर, 2019 में पास किए गए 104वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार लोकसभा के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं में भी आरक्षण की व्यवस्था को 25 जनवरी, 2030 तक 10 वर्षों के लिए पूर्व की भाँति बढ़ा दिया गया है।

राज्यों में विधानसभा के सदस्यों की संख्या

राज्य का नामसदस्यों की संख्या
1. आन्ध्र प्रदेश175
2. असम126
3. बिहार243
4. गुजरात182
5. हरियाणा90
6. हिमाचल प्रदेश68
7. कर्नाटक224
8. केरल140
9. मध्य प्रदेश230
10. महाराष्ट्र288
11. मणिपुर60
12. मेघालय60
13. नागालैण्ड60
14. ओडिशा147
15. पंजाब117
16. राजस्थान200
17. सिक्किम32
18. तमिलनाडु234
19. तेलंगाना119
20. त्रिपुरा60
21. उत्तर प्रदेश403
22. पश्चिम बंगाल294
23. मिज़ोरम40
24. अरुणाचल प्रदेश60
25. गोवा40
26. छत्तीसगढ़90
27. उत्तराखण्ड70
28. झारखण्ड81
संघ क्षेत्र
1. अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह
2. चण्डीगढ़
3. दादरा नागर हवेली और दमन दीव
4. लक्षद्वीप
5. पुद्दुचेरी30
6. दिल्ली50
7. जम्मू-कश्मीर107
8. लद्दाख

विधान सभा के सदस्यों का चुनाव (Election of the members of Legislative Assembly)-राज्य की विधान सभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होता है। यह चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर राज्य की जनता द्वारा किया जाता है। प्रत्येक 18 वर्ष का या इससे अधिक आयु का नागरिक विधान सभा के सदस्यों के चुनाव में मत देने का अधिकार रखता है, परन्तु विदेशी, पागल, दिवालिए तथा भयंकर अपराधियों को इस चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं है।

यह चुनाव संयुक्त चुनाव प्रणाली के आधार पर होता है, परन्तु कुछ पिछड़ी जातियों और कबीलों के लिए विधान सभा में कुछ सीटें सुरक्षित कर दी गई हैं। इसके अतिरिक्त यदि राज्यपाल यह अनुभव करे कि एंग्लो-इण्डियन जाति को विधान सभा में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो वह इस जाति के एक व्यक्ति को जिसे हे योग्य समझे, विधान सभा के सदस्य के रूप में मनोनीत कर सकता है।

एंग्लो-इण्डियन अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लिए स्थान सुरक्षित रखने की व्यवस्था सन् 2000 तक की गई थी, लेकिन अब दिसंबर, 2019 को लोकसभा ने सर्वसम्मति से 104वें संवैधानिक संशोधन पास किया जिसके द्वारा अनुसूचित जातियों व जनजातियों के स्थानों को सुरक्षित करने की व्यवस्था को वर्ष 2030 तक बढ़ा दिया गया है।

योग्यताएँ (Qualifications) संविधान में राज्य विधान सभा का सदस्य चुने जाने वाले व्यक्ति में दी गई योग्यताएँ होनी चाहिए-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो,
  • वह संघ सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर कार्य न कर रहा हो,
  • उसका नाम उस राज्य के मतदाताओं की सूची में हो,
  • वह पागल या दिवालिया । न हो,
  • वह किसी न्यायालय द्वारा इस पद के लिए अयोग्य घोषित न किया गया हो,
  • इसके अतिरिक्त समय-समय पर विधान सभा द्वारा निश्चित की गई सभी योग्यताएँ उसमें हों,
  • जुलाई, 1996 में जन-प्रतिनिधि कानून में संशोधन करके यह व्यवस्था की गई कि स्वतन्त्र उम्मीदवार तभी चुनाव लड़ सकता है, यदि उसका नाम दस मतदाताओं द्वारा प्रस्तावित किया गया हो।

कार्यकाल (Tenure) लोकसभा की तरह ही राज्यों की विधान सभाओं का चुनाव पाँच वर्ष के लिए होता है। 42वें संशोधन के अनुसार विधान सभा की अवधि 6 वर्ष कर दी गई थी लेकिन 44वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार फिर यह अवधि 5 वर्ष कर . दी गई है। विधान सभा को अवधि समाप्त होने से पहले भी भंग किया जा सकता है। राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह से अथवा बिना सलाह के भी विधान सभा को भंग कर सकता है और नए चुनाव करा सकता है।

जैसे हरियाणा में श्री बंसी लाल की सरकार से भारतीय जनता पार्टी के द्वारा अपना समर्थन वापस लिए जाने पर सरकार अल्पमत में आ गई तथा राज्यपाल ने मुख्यमन्त्री को सदन के पटल पर बहुमत सिद्ध करने के लिए कहा था। श्री बंसी लाल बहुमत सिद्ध नहीं कर पाए और सरकार गिर गई। तत्पश्चात् श्री ओम प्रकाश चौटाला मुख्यमन्त्री बने और उन्होंने दिसम्बर, 1999 में राज्यपाल को विधान सभा भंग करने की सिफारिश की। इस प्रकार विधान सभा को उसकी अवधि समाप्त होने से पहले भंग कर दिया गया।

गणपूर्ति (Quorum):
विधान सभा की बैठकों में कार्रवाई प्रारम्भ होने के लिए यह आवश्यक है कि विधान सभा की कुल सदस्य-संख्या का 1/10वाँ भाग उपस्थित हो।

अधिवेशन (Session):
राज्यपाल विधान सभा और विधान परिषद् के अधिवेशन किसी समय भी बुला सकता है, परन्तु दो अधिवेशनों के बीच 6 मास से अधिक समय का अन्तर नहीं होना चाहिए। राज्यपाल दोनों सदनों का सत्रावसान भी कर सकता है।

वेतन एवं भत्ते (Salary and Allowances):
राज्य विधानसभा के सदस्यों के वेतन एवं भत्ते राज्य विधानमण्डल के द्वारा समय-समय पर पारित विधेयकों के द्वारा निश्चित किए जाते हैं। इसलिए प्रत्येक राज्य में वेतन एवं भत्ते अलग-अलग होंगे; जैसे दिल्ली विधानसभा के सदस्यों को 50,000 मूल वेतन सहित कुल 2,35,000 रुपए मासिक वेतन मिलता है।

इसी तरह 5 मई, 2017 को हरियाणा विधानसभा (सदस्य वेतन, भत्ते तथा पेंशन) संशोधन विधेयक, 2017 के द्वारा किए गए संशोधन अनुसार विधानसभा सदस्यों को 60 हजार रुपए मासिक वेतन, कार्यालय भत्ता 20,000 रुपए, दैनिक भत्ता 2000 रुपए प्रतिदिन जो अधिकतम 30,000 रुपए आदि प्रदान किए जाते हैं। यहाँ यह भी स्पष्ट है कि प्रत्येक राज्य में विधानमण्डल के द्वारा अपने सदस्यों के वेतन भत्तों के संबंध में अलग-अलग प्रस्ताव पारित किए जाते हैं। इसलिए सभी राज्यों में राज्य विधानमण्डल के सदस्यों (MLA) के वेतन भत्ते भी अलग-अलग होते हैं।

विधान सभा का अध्यक्ष (Speaker) लोकसभा के सदस्यों की भांति विधान सभा के सदस्य भी अपने में से एक अध्यक्ष (Speaker) तथा एक उपाध्यक्ष चुनते हैं। साधारणतः अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष अगली विधान सभा के बनने तक अपने पद पर बने रहते हैं, परन्तु विधान सभा के सदस्य अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को बहुमत के प्रस्ताव पास करके उनको पद से हटा सकते हैं।

ऐसा प्रस्ताव पास करने से 14 दिन पहले इसकी सूचना देनी आवश्यक होती है। विधान सभा के अध्यक्ष की शक्तियाँ और कार्य लोकसभा के अध्यक्ष के समान ही हैं। वह विधान सभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है। वह सदस्यों को बोलने, प्रश्न पूछने तथा प्रस्ताव पेश करने की आज्ञा देता है। विधेयकों पर मतदान कराकर परिणाम की घोषणा करता है। कोई विधेयक धन-विधेयक है या नहीं, इसका फैसला भी अध्यक्ष ही करता है। साधारणतया वह मतदान में भाग नहीं लेता, परन्तु उसे एक निर्णायक मत डालने का अधिकार होता है।

विधान सभा की शक्तियाँ तथा कार्य (Powers and Functions of the Legislative Assembly):
जिन राज्यों में केवल विधान सभा है, वहाँ विधानमण्डल की सभी शक्तियाँ विधान सभा प्रयोग करती है। जहाँ विधान परिषद् है, वहाँ भी वास्तविक शक्तियाँ विधान सभा के पास ही हैं। ये शक्तियाँ निम्नलिखित हैं

1. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers):
विधान सभा को राज्य सूची के 66 विषयों तथा समवर्ती सूची के 52 विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार है। समवर्ती सूची पर बनाया गया कानून यदि संघीय संसद द्वारा बनाए गए कानून का विरोध करता हो तो वह निरस्त समझा जाएगा। यदि विधानमण्डल द्वि-सदनीय है तो विधेयक वहाँ से विधान परिषद् के पास जाता है। विधान परिषद् यदि उसे निरस्त कर दे या तीन महीने तक उस पर कोई कार्रवाई न करे या उसमें ऐसे संशोधन कर दे जो विधान सभा को स्वीकृत न हों तो विधान सभा उस विधेयक को दोबारा पास कर सकती है और उसे दोबारा विधान परिषद् के पास भेजा जाता है।

यदि विधान परिषद् उस विधेयक पर दोबारा एक महीने तक कोई कार्रवाई न करे या उसे निरस्त कर दे या उसमें ऐसे संशोधन कर दे जो विधान सभा को स्वीकृत न हों तो तीनों अवस्थाओं में यह विधेयक संसद के दोनों सदनों में पास हुआ समझा जाता है। यदि राज्य में विधान परिषद् नहीं है जैसे हरियाणा में, तो विधान सभा के पास होने के बाद ही अन्यथा दोनों सदनों से पास होने पर विधेयक राज्यपाल को भेजा जाता है। राज्यपाल उस पर अपनी स्वीकृति दे सकता है, उसे दोबारा विचार करने के लिए वापस भेज सकता है और राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भी भेज सकता है। यदि विधानमण्डल उसे दोबारा पास करके भेजे तो राज्यपाल को अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

2. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers):
वित्तीय विधेयक केवल विधान सभा में ही पेश हो सकता है। राज्य की आमदनी व खर्च पर विधान सभा का पूरा नियन्त्रण होता है। विधान परिषद् वित्त या धन विधेयक को अधिक-से-अधिक 14 दिन तक रोक सकती है। यदि इसके बाद विधान परिषद् उसे निरस्त कर दे या उसमें कुछ संशोधन कर दे तो भी वह विधेयक उसी रूप में पास समझा जाता है जिस रूप में विधान सभा में पास हुआ था। इसके बाद धन विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। राज्यपाल धन विधेयक पर अपनी स्वीकृति देने से इन्कार नहीं कर सकता, क्योंकि धन विधेयक उसकी पूर्व स्वीकृति से ही पेश होते हैं।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive):
राज्य की मन्त्रिपरिषद् विधान सभा के प्रति उत्तरदायी है। विधान सभा में बहुमत दल अथवा दलीय गठबन्धन का नेता ही मुख्यमन्त्री पद सम्भालता है। अधिकांश मन्त्री विधान सभा से लिए जाते हैं। विधान सभा अविश्वास का प्रस्ताव पास कर मन्त्रि-परिषद् को पद से हटा सकती है। विधान सभा मन्त्रियों से उनके कार्यों तथा नीतियों के बारे में प्रश्न पूछती है।

यदि मन्त्रि-परिषद् द्वारा पेश किए गए किसी विधेयक को विधान सभा निरस्त कर दे तो मन्त्रिपरिषद् को त्याग-पत्र देना पड़ता है। विधान सभा मन्त्रियों के वेतन में कटौती करके अथवा किसी सरकारी विधेयक को अस्वीकार करके भी मन्त्रि-परिषद् को त्याग-पत्र देने के लिए मजबूर कर सकती है।

4. चुनाव सम्बन्धी शक्तियाँ (Electoral Powers):
विधान सभा के सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं। विधान सभा के सदस्यों द्वारा ही राज्यसभा के सदस्य चुने जाते हैं। यदि राज्य में विधान परिषद् हो तो उसके 1/3 सदस्य विधान सभा द्वारा चुने , जाते हैं। विधान सभा के सदस्य अपने में से ही एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष का निर्वाचन करते हैं।

5. संविधान संशोधन में भाग (Participation in Constitutional Amendment):
संविधान के कुछ महत्त्वपूर्ण अनुच्छेदों में संशोधन करने के लिए संसद के दोनों सदनों से 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास होने के बाद उस पर कम-से-कम आधे राज्यों का समर्थन आवश्यक है। इस प्रकार संविधान के एक भाग में संशोधन प्रक्रिया में विधान सभा भाग लेती है। राज्य विधान सभाओं को संशोधन प्रस्ताव पेश करने का अधिकार नहीं है।

6. अन्य शक्तियाँ (Other Powers):
राज्य की विधान सभाओं को कुछ और भी कार्य करने पड़ते हैं जो कि इस प्रकार हैं

(1) विधान सभा 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पास करके विधान परिषद् की स्थापना या समाप्ति की प्रार्थना कर सकती है और संसद इस प्रार्थना के अनुसार कानून बनाती है। फरवरी, 1989 में तमिलनाडु की विधान सभा ने विधान परिषद् की स्थापना के लिए प्रस्ताव पारित किया था,

(2) विधान सभा विधान परिषद् के साथ मिलकर (यदि विधान परिषद् हो) लोक सेवा आयोग की शक्तियों को बढ़ा सकती है,

(3) विधान सभा विधान परिषद् के साथ मिलकर आकस्मिक कोष स्थापित कर सकती है,

(4) राज्य की विधान सभा किसी व्यक्ति को सदन के विशेषाधिकारों के उल्लंघन करने पर दण्ड दे सकती है,

(5) यदि कोई सदस्य विधान सभा का अनुशासन भंग करता है और सदन की कार्रवाई शान्तिपूर्वक नहीं चलाने देता, तब सदन उस सदस्य को सदन से निलम्बित कर सकता है,

(6) विधान सभा विरोधी दल के नेता को सरकारी मान्यता और अन्य सुविधाएँ देने के लिए विधेयक पास कर सकती है।

विधान सभा की स्थिति (Position of the Legislative Assembly) राज्यों में विधान सभा की स्थिति बड़ी महत्त्वपूर्ण है। यह राज्य की सभी विधायी शक्तियों का प्रयोग करती है। जहाँ विधान परिषद् है तो भी वह इतनी शक्तिशाली नहीं है कि विधान सभा के रास्ते में रुकावट बन सके। विधान परिषद् का जीवन विधान सभा की इच्छा पर निर्भर करता है।

विधान सभा की शक्तियों पर सीमाएँ (Limitations on the Powers of Legislative Assembly)-विधान सभा उतनी शक्तिशाली नहीं जितनी कि केन्द्र में संसद है। इसकी शक्तियों तथा कार्यों पर दी गई कुछ सीमाएँ इस प्रकार हैं-

(1) राज्य विधान सभा या विधानमण्डल द्वारा पास किए गए कुछ विधेयकों पर राज्यपाल अपनी स्वीकृति नहीं दे सकता, बल्कि उन्हें राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजता है, जैसे भूमि या सम्पत्ति को हस्तगत करने वाला विधेयक,

(2) कुछ विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति के. बिना राज्य विधानमण्डल में पेश नहीं किए जा सकते, जैसे कि अन्तर्राज्यीय व्यापार को नियन्त्रण करने वाला विधेयक,

(3) राज्यपाल किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज सकता है, यदि वह समझे कि ऐसा करना उचित है,

(4) राज्यसभा प्रस्ताव पास करके राज्य सूची के किसी विषय पर एक वर्ष के लिए कानून बनाने का अधिकार संसद को दे सकती है,

(5) आपात् काल के समय उसकी सभी शक्तियाँ संसद के पास चली जाती हैं।

प्रश्न 10.
विधान परिषद् की रचना, शक्तियों तथा कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
विधान परिषद् की रचना (Composition of Legislative Council) भारत के 28 राज्यों में से केवल 6 राज्यों में विधान परिषद् की स्थापना की गई है। संविधान के अनुसार किसी भी राज्य में विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या विधानसभा के सदस्यों के 1/3 से अधिक तथा 40 से कम नहीं हो सकती। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के द्वारा जम्मू-कश्मीर को 8वें एवं लद्दाख को 9वें केन्द्र-शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर केन्द्र शासित प्रदेश को विधानसभा वाला केन्द्र-शासित प्रदेश बनाने की घोषणा भी की गई।

यद्यपि यहाँ यह उल्लेखनीय है कि दादरा नगर हवेली और दमन दीव का विलय कर इन्हें एक ही केन्द्रशासित क्षेत्र के रूप में रूपान्तरित करने के लिए दादरा नगर हवेली और दमन-दीप (संघ राज्य क्षेत्रों का विलय) विधेयक, 2019 को संसद द्वारा पास करने के उपरान्त 9 दिसम्बर, 2019 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के पश्चात् 26 जनवरी, 2020 को यह विलय प्रभावी हो गया, जिसके परिणामस्वरूप केन्द्र शासित प्रदेशों की संख्या 9 से घटकर 8 हो गई है। इस तरह जम्मू-कश्मीर में पूर्व में गठित विधानपरिषद् स्वतः ही समाप्त हो गई है।

राज्य विधान परिषद के कुल सदस्यों में से:
(1) लगभग 1/3 सदस्य स्थानीय संस्थाओं के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं,

(2) लगभग 1/12 सदस्य राज्य में रहने वाले ऐसे स्नातक मतदाताओं द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं जिनको भारत के किसी विश्वविद्यालय से डिग्री प्राप्त किए तीन वर्ष हो चुके हों,

(3) लगभग 1/12 सदस्य राज्य के हायर सैकेण्डरी स्कूलों अथवा इससे उच्च शिक्षा संस्थाओं में से कम-से-कम तीन वर्ष से कार्य कर रहे उन अध्यापकों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं,

(4) लगभग 1/3 सदस्य सम्बन्धित राज्य की विधान सभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं,

(5) 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। राज्यपाल केवल उन्हीं व्यक्तियों को मनोनीत कर सकता है जिन्हें विज्ञान, कला, साहित्य, सहकारिता आन्दोलन तथा समाज-सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान अथवा ख्याति प्राप्त हो।

विभिन्न राज्यों की विधान परिषद् (Legislative Council) के सदस्यों की संख्या इस प्रकार है

क्रम संख्याराज्य का नामकुल सदस्य संख्या
1.बिहार96
2.कर्नाटक Har75
3.उत्तर प्रदेश100
4.महाराष्ट्र78
5.आन्ध्रप्रदेश50
6.तेलंगाना40

योग्यताएँ (Qualifications):
संविधान ने विधान परिषद् के सदस्यों की योग्यताएँ इस प्रकार हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • उसकी आयु 30 वर्ष से कम न हो,
  • उसके पास वे सब योग्यताएँ हों जो संसद कानून द्वारा समय-समय पर निर्धारित करे,
  • वह संघीय सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो,
  • वह पागल, दिवालिया या अन्य कारणवश अयोग्य घोषित न किया गया हो।

कार्यकाल (Term of Office):
विधान परिषद् एक स्थायी सदन है जो कभी भंग नहीं होता। प्रत्येक 2 वर्ष के बाद इसके एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं। इस प्रकार एक व्यक्ति 6 वर्ष तक विधान परिषद् का सदस्य रह सकता है।

अध्यक्ष (Chairman):
विधान-परिषद् के सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष चुनते हैं। विधान परिषद् बहुमत से प्रस्ताव पारित कर इन पदाधिकारियों को इनके पदों से हटा सकती है, परन्तु ऐसा करने से पहले उन्हें इसकी 14 दिन पहले सूचना देनी पड़ती है। इस मामले में अध्यक्ष को वोट बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत देने का अधिकार है। अधिवेशन (Sessions)-विधान-परिषद् की बैठक राज्यपाल बुलाता है। एक वर्ष में इसकी कम-से-कम दो बैठकें अवश्य होनी चाहिएं और पहली तथा दूसरी बैठक के बीच 6 महीने से अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए।

गणपूर्ति (Quorum):
विधान परिषद् की कुल गणपूर्ति इसके कुल सदस्यों का दसवाँ भाग या कम-से-कम दस सदस्य निश्चित की गई है। विधान परिषद् की बैठकें तभी जारी रह सकती हैं यदि सदस्यों की गणपूर्ति पूरी हो।

वेतन तथा भत्ते (Salary and Allowances)-राज्य विधान परिषद् के सदस्यों को विधान सभा के सदस्यों के समान वेतन व भत्ते मिलते हैं जो समय-समय पर दोनों सदनों के द्वारा निश्चित किए जाते हैं। यह वेतन तथा भत्ते सभी राज्यों में एक जैसे नहीं होते। विधान परिषद् के सदस्यों को मासिक वेतन के अतिरिक्त उन्हें अन्य प्रकार के भत्ते भी दिए जाते हैं। सदस्यों के विशेषाधिकार (Privileges of Members)

(1) संसद के सदस्यों की भाँति राज्य विधानमण्डल के सदस्यों को भी सदन में भाषण देने की स्वतन्त्रता दी गई है। उनके द्वारा सदन में कहे गए शब्दों के लिए उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती।

(2) किसी भी सदस्य को अधिवेशन के आरम्भ होने से 40 दिन पहले तथा समाप्त होने के 40 दिन बाद तक किसी दीवानी मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यदि किसी अन्य मामले में उसे गिरफ्तार किया जाए, तो उसकी सूचना सदन के अध्यक्ष .. को भेजनी पड़ती है।

विधान परिषद् की स्थापना (Creation of the Legislative Council):
राज्य विधान सभा अपने कुल सदस्यों के बहुमत से तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई (2/3) बहुमत से प्रस्ताव पारित करके विधान परिषद् की स्थापना अथवा समाप्ति के लिए केन्द्रीय संसद से प्रार्थना कर सकता है। केन्द्रीय संसद राज्य विधान सभा की ऐसी प्रार्थना के अनुसार कानून का निर्माण कर देती है।

विधान परिषद की स्थिति (Position of the Legislative Council):
विधान-परिषद राज्य विधानमण्डल का ऊपरी सदन है, परन्त वास्तव में इस सदन के पास कोई वास्तविक शक्ति या अधिकार नहीं है। यह न तो विधान सभा द्वारा बनाए गए कानून निरस्त कर सकती है और न ही विधान सभा की स्वीकृति के बिना कोई कानून बना सकती है। साधारण विधेयक को अधिक-से-अधिक 4 महीने तक रोक सकती है। वित्तीय मामलों में तो इसकी शक्ति ‘नहीं’ के बराबर है। वित्तीय विधेयक विधान परिषद् में प्रस्तावित नहीं किया जा सकता।

वित्तीय विधेयक को विधान परिषद् अधिक-से-अधिक 14 दिन तक रोक सकती है। मन्त्रि-परिषद् पर इसका कोई विशेष नियन्त्रण नहीं होता, परन्तु इस ऊपरी सदन का महत्त्व यह है कि इसमें सदस्य अधिक अनुभवी होते हैं। विधान सभा में जल्दबाजी में पास हुए विधेयक पर जब विधान परिषद् विचार करती है तो वह बहुत-सी त्रुटियों को विधान सभा के सामने रख सकती है और उसमें संशोधन के सुझाव भी दे सकती है। इस प्रकार दो सदनों में वाद-विवाद के बाद बने कानून में त्रुटियाँ होने की कम सम्भावना होती है।

विधान परिषद् की शक्तियाँ तथा कार्य (Powers and Functions of the Legislative Council)-विधान परिषद् को निम्नलिखित शक्तियाँ प्राप्त हैं

1. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers):
विधान सभा में प्रस्तावित किया जा सकने वाला कोई भी साधारण विधेयक विधान परिषद् में पेश किया जा सकता है। विधान परिषद् में पेश हुआ विधेयक पास होकर विधान सभा में भेज दिया जाता है। वह तब तक पास नहीं समझा जाता, जब तक कि विधान सभा उसे पास न कर दे। विधान सभा द्वारा निरस्त किए गए विधेयक . को विधान परिषद् दोबारा पास करने का अधिकार नहीं रखती। विधान सभा द्वारा पास किए गए किसी भी साधारण विधेयक को विधान परिषद् अधिक-से-अधिक 4 महीने तक रोक सकती है।

2. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers):
विधान परिषद् को कुछ वित्तीय शक्तियाँ भी प्रदान की गई हैं, परन्तु उनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है। संविधान के अनुसार वित्त विधेयक विधान परिषद् में प्रस्तुत नहीं किए जा सकते। विधान सभा में पारित होने के बाद वित्त विधेयक को विधान-परिषद् के सुझावों के लिए भेजा जाता है। यदि विधान परिषद् उस पर 14 दिन तक कोई कार्रवाई न करे अथवा उसको निरस्त कर दे अथवा विधेयक के प्रति कुछ ऐसे सुझाव दे जो विधान सभा को स्वीकार न हों तो इन स्थितियों में वित्त विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण (Control over the Executive):
विधान परिषद् का कार्यपालिका पर कोई विशेष नियन्त्रण नहीं होता। विधान परिषद् के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं, परन्तु अविश्वास का प्रस्ताव पास कर मन्त्रि-परिषद् को पद से नहीं हटा सकते। यह अधिकार केवल विधान सभा को ही प्राप्त है।

4. संविधान में संशोधन (Constitutional Amendments):
जिन संविधान संशोधनों को राज्य के अनुमोदन के लिए भेजा जाता है, उनका अनुमोदन विधान परिषद् से विधान सभा के समान कराना होता है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

प्रश्न 11.
राज्य विधानमण्डल में साधारण कानून पारित करने की प्रक्रिया का वर्णन करें।
उत्तर:
विधानमण्डल का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य कानुन बनाना है। साधारण विधेयक विधानमण्डल के किसी भी सदन में प्रस्तावित किया जा सकता है। साधारण विधेयक दो प्रकार के होते हैं-सरकारी तथा गैर-सरकारी। सरकारी विधेयक वे होते हैं जिन्हें कोई मन्त्री प्रस्तावित करता है और गैर-सरकारी विधेयक वे विधेयक होते हैं जिन्हें मन्त्रियों को छोड़कर अन्य विधायक प्रस्तावित करते हैं और गैर-सरकारी विधेयक प्रस्तावित करने के लिए प्रस्तावक को एक महीने का नोटिस तथा उसके साथ विधेयक की एक प्रति सदन के अध्यक्ष को देनी होती है। यदि अध्यक्ष चाहे तो कम समय के नोटिस पर भी विधेयक को प्रस्तावित करने की अनुमति दे सकता है, लेकिन सरकारी विधेयक के लिए पूर्व नोटिस की आवश्यकता नहीं होती।

साधारण विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया (Procedure Regarding Ordinary Bills)-साधारण विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन संविधान में दिया गया है जो निम्नलिखित स्तरों (Stages) से गुजरता है

1. विधेयक प्रस्तुत करना और प्रथम वाचन (Introduction and First Reading of the Bill) साधारण विधेयक किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जाता है, परन्तु प्रायः 85 से 90 प्रतिशत विधेयक विधान सभा में पेश होते हैं। जिस सदन में भी विधेयक पेश करना हो तो उस सदन को एक महीने का नोटिस देना पड़ता है।

निश्चित तिथि को विधेयक को प्रस्तुत करने वाला सदस्य प्रस्तावक अपने स्थान पर खड़ा होकर उस विधेयक को पेश करने की आज्ञा माँगता है और विधेयक के शीर्षक को पढ़ता है और विधेयक के सिद्धान्त व उद्देश्य बताता है। इस स्तर पर विधेयक का विरोध नहीं होता। इसके पश्चात् विधेयक सरकारी गजट में छाप दिया जाता है। सरकारी विधेयक के लिए नोटिस की भी आवश्यकता नहीं होती, सरकारी गजट में छाप दिया जाना ही काफी समझा जाता है। इस स्तर पर अधिक वाद-विवाद नहीं होता। यही प्रथम वाचन कहलाता है।

2. दूसरा वाचन (Second Reading)-प्रथम वाचन के पश्चात् विधेयक पेश करने वाला दूसरे वाचन के लिए प्रार्थना करता है। उसकी प्रार्थना पर दूसरे वाचन की तिथि सदन के सभापति द्वारा निश्चित कर दी जाती है। निश्चित तिथि को प्रस्तावक दिए गए प्रस्तावों में से एक प्रस्ताव पेश करता है कि-

  • विधेयक पर सदन में तुरन्त विचार किया जाए,
  • विधेयक को किसी प्रवरस भेज दिया जाए,
  • विधेयक दोनों सदनों की संयुक्त समिति को भेजा जाए,
  • विधेयक के विषय में लोगों के विचार जानने के लिए विधेयक को प्रस्तावित किया जाए।

बहुत-से महत्त्वपूर्ण विधेयकों पर तुरन्त विचार आरम्भ कर दिया जाता है अन्यथा विधेयक को किसी-न-किसी प्रवर समिति के पास भेजा जाता है। यदि सदन दोनों सदनों की संयुक्त समिति के पास विधेयक भेजने पर सहमत हो तो विधेयक को दूसरे सदन की सहमति के लिए भेजा जाता है तथा उसकी सहमति प्राप्त हो जाने के पश्चात् विधेयक दोनों सदनों की संयुक्त प्रवर समिति के पास भेजा जाता है। उसी विधेयक को जनमत जानने के लिए उसे प्रस्तावित किया जाता है जो सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक क्षेत्र में उथल-पुथल लाने वाला हो, वरना विधेयक सदा प्रवर समिति को ही भेजा जाता है।

प्रवर समिति में विधेयक के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क व सुझाव प्रस्तुत किए जाते हैं। समिति विधेयक से सम्बन्धित लोगों को बुलाकर उनसे जानकारी प्राप्त कर सकती है तथा सरकार के रिकॉर्ड तथा पत्रों का निरीक्षण कर सकती है। इस समय विधेयक की एक-एक धारा पर विचार होता है और समिति विधेयक के शीर्षक को छोड़कर सम्पूर्ण विधेयक को बदल सकती है। विधेयक पर विचार करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट सहित विधेयक को वापस सदन में भेज देती है।

समिति की रिपोर्ट आ जाने पर सम्बन्धित विधेयक पर विस्तार से विचार किया जाता है और एक-एक धारा पर विचार करके उसे स्वीकृत या अस्वीकृत कर दिया जाता है। अन्त में विधेयक को सदन द्वारा मन्जूर करने पर उसका तीसरा वाचन होता है।

3. तीसरा वाचन (Third Reading):
जब विधेयक की रिपोर्ट अवस्था समाप्त हो जाती है तो इसके पश्चात् इसका तीसरा वाचन शुरू होता है। यह औपचारिक अवस्था होती है। इस स्तर पर विधेयक की शब्दावली की अशुद्धियों को ही दूर किया जाता है। इसके पश्चात् सम्पूर्ण मतदान करवाया जाता है और विधेयक पास कर दिया जाता है।

4. विधेयक दूसरे सदन में (Bill in the Second House):
यदि राज्य में एक ही सदन है तो विधेयक सदन में पास होने के पश्चात् स्वीकृति के लिए राज्यपाल के पास भेज दिया जाता है। दो सदन होने की दशा में विधान सभा में विधेयक पहले सदन की तरह भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में से गुजरता है। इसके लिए उसे तीन महीने का समय दिया जाता है।

इस अवधि के दौरान वह अपने सुझावों सहित विधेयक विधान सभा को वापस भेज देता है। यदि विधान सभा विधान परिषद् के सुझावों को स्वीकार न करे तो विधान सभा पुनः विधेयक को पास करके विधान परिषद् के पास भेजती है। अब विधान परिषद् एक मास तक विधेयक को कानून बनाने से रोक सकती है। इस अवधि के पश्चात् विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है। इस प्रकार विधान परिषद् किसी विधेयक को कानून बनने से अधिक-से-अधिक चार महीने तक रोक सकती है।

5. राज्यपाल की स्वीकृति (Assent by the Governor):
जब विधेयक दोनों सदनों द्वारा पास कर दिया जाता है तो उसे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। राज्यपाल उसे स्वीकृत कर सकता है या उसे विधानमण्डल के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकता है। यदि विधानमण्डल उस प्रस्ताव को दोबारा साधारण बहुमत से पास कर दे तो वह विधेयक बिना राज्यपाल की स्वीकृति के पास माना जाता है। राज्यपाल किसी विधेयक को स्वीकृति के लिए भी सुरक्षित रख सकता है। ऐसे विधेयक राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति देने पर ही कानून बनते हैं।

प्रश्न 12.
राज्य विधानमण्डल में धन विधेयक अथवा बजट पारित करने की प्रक्रिया का वर्णन करें।
उत्तर:
राज्य विधानमण्डल में धन विधेयक पारित करने की विधि संसद द्वारा धन विधेयक पारित करने की प्रक्रिया के समान है। धन विधेयक से तात्पर्य उस विधेयक से है जिसका सम्बन्ध किसी प्रकार के कर (Tax) लगाने, कर कम करने, बढ़ाने तथा राज्य कोष से धन व्यय करने से हो। वित्तीय विधेयक के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं-

  • धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व-अनुमति से ही विधानमण्डल में प्रस्तावित किया जा सकता है,
  • धन विधेयक केवल विधान सभा में ही प्रस्तावित किया जा सकता है, विधान परिषद् में नहीं,
  • धन विधेयक मन्त्री द्वारा ही प्रस्तावित किया जा सकता है,
  • विधानमण्डल धन विधेयकों की माँगों को अस्वीकार कर सकता है, कम कर सकती है, लेकिन बढ़ा नहीं सकता,
  • धन विधेयक का निर्धारण विधान सभा का अध्यक्ष करता है। उसका निर्णय अन्तिम होता है,
  • विधान परिषद् धन विधेयक को अस्वीकार नहीं कर सकती,
  • विधान परिषद् धन विधेयक को ज्यादा-से-ज्यादा 14 दिन तक रोक सकती है। धन विधेयक या बजट को पारित करने की प्रक्रिया इस प्रकार से है बजट को पारित करने की प्रक्रिया (Procedure of Passing the Budget)-बजट को पारित करने की प्रक्रिया निम्नलिखित है

1. बजट की तैयारी (Preparation of Budget):
सर्वप्रथम वित्त मन्त्री अन्य मन्त्रियों से आगामी वर्ष के लिए उनके विभागों की आवश्यकताओं व माँगों की जानकारी लेता है। उसके बाद वित्त मन्त्री बजट तैयार करता है जिस पर पूरा मन्त्रिमण्डल विचार करता है और बजट को अन्तिम रूप देता है। .

2. बजट को प्रस्तावित करना (Introduction of Budget):
राज्यपाल की पूर्व अनुमति से वित्त मन्त्री बजट को विधान सभा में प्रस्तावित करता है। बजट के दो भाग होते हैं-

  • व्यय का भाग तथा
  • आय का भाग।

व्यय का भाग पुनः दो वर्गों में बँटा होता है-

  • राज्य की संचित निधि से होने वाले व्यय तथा
  • अन्य व्यय।

संचित निधि से किए जाने वाले खर्चों पर विचार तो किया जाता है, लेकिन मतदान नहीं होता। गों पर विधान सभा में विभागीय आधार पर विचार किया जाता है। विधान सभा में खर्चों में कटौती के प्रस्ताव रखे जा सकते हैं। विधान सभा खर्चों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती। यदि विधान सभा कटौती का प्रस्ताव पारित कर देती है अथवा बजट को अस्वीकार कर देती है तो इसे सरकार की पराजय समझा जाता है और उसे त्याग-पत्र देना पड़ता है।

3. विनियोग विधेयक (Appropriation Bill):
जब अन्य खर्चों को विधान सभा मान लेती है तो इन खर्चों व संचित निधि से होने वाले खर्चों को मिलाकर एक विनियोग विधेयक विधान सभा में प्रस्तावित किया जाता है, जिसे सदन पारित करता है। इस विधेयक के पारित हो जाने पर ही सरकार को खर्च करने का अधिकार मिलता है।

4. वित्त विधेयक (Finance Bill):
सदन द्वारा विनियोग विधेयक पारित कर देने के बाद वित्तमन्त्री बजट के दूसरे भाग-आमदनी के भाग को एक विधेयक के रूप में सदन में प्रस्तावित करता है जिसमें आय के साधनों का वर्णन होता है। इस वित्त विधेयक के पारित हो जाने पर बजट विधान सभा द्वारा पारित माना जाता है।

5. बजट दूसरे सदन में (Budget in the Second House):
जिन राज्यों में विधानमण्डल का दूसरा सदन-विधान परिषद् होती है, उन राज्यों में विधान सभा द्वारा पारित बजट विधान परिषद् में भेजा जाता है। विधान परिषद् बजट को अस्वीकार नहीं कर सकती, अधिक-से-अधिक 14 दिन तक रोक सकती है। इस अवधि के पश्चात् बजट विधान-परिषद् द्वारा पारित माना जाता है।

6. राज्यपाल की स्वीकृति (AssentofGovernor):
विधानमण्डल द्वारा बजट पारित होने के बाद स्वीकृति के लिए राज्यपाल दिया जाता है। राज्यपाल इसको अस्वीकार नहीं कर सकता। वास्तव में राज्यपाल की स्वीकृति एक औपचारिकता ही होती है, क्योंकि धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व-अनुमति के बिना प्रस्तावित ही नहीं किया जा सकता अर्थात् राज्यपाल अपनी स्वीकृति तो वास्तव में पहले ही दे चुका होता है। राज्यपाल की स्वीकृति के बाद बजट को सरकारी गजट में छाप दिया जाता है और वह कानून बन जाता है।

प्रश्न 13.
राज्य विधान सभा के अध्यक्ष की शक्तियों व कार्यों का वर्णन करें।
अथवा
राज्य विधान सभा के अध्यक्ष के चुनाव, शक्तियों, कार्यों व स्थिति का वर्णन करो।
उत्तर:
विधान सभा में सदन का सभापति अध्यक्ष कहलाता है जो विधान सभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है।

चुनाव (Election)-विधान सभा के अध्यक्ष का चुनाव विधान सभा के सदस्य अपने में से ही करते हैं। अध्यक्ष बहुमत प्राप्त दल अथवा दलीय गठबन्धन की इच्छानुसार ही चुना जाता है, क्योंकि यदि चुनाव होता है तो बहुमत होने के कारण सत्तारूढ़ दल अथवा दलीय गठबन्धन को अपना उम्मीदवार जिताने में कोई कठिनाई नहीं आती।

कार्यकाल (Tenure)-विधान सभा के अध्यक्ष का कार्यकाल विधान सभा के कार्यकाल से जुड़ा होता है। यदि विधान सभा समय से पूर्व भंग हो जाती है तो अध्यक्ष अपने पद पर तब तक बना रहता है जब तक चुनावों के बाद नई विधान सभा नहीं बन जाती है और अपना अध्यक्ष नहीं चुन लेती है। अध्यक्ष स्वयं भी त्याग-पत्र दे सकता है। विधान सभा में अध्यक्ष को हटाए जाने सम्बन्धी प्रस्ताव भी प्रस्तावित किया जा सकता है। ऐसे प्रस्ताव की सूचना कम-से-कम 14 दिन पूर्व देनी आवश्यक है। यदि विधान सभा साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देती है तो अध्यक्ष को त्याग-पत्र देना पड़ता है।

वेतन तथा भत्ते (Salary and Allowances)-विधान सभा के अध्यक्ष के वेतन व भत्ते विधानमण्डल द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। अध्यक्ष को मासिक वेतन व भत्तों के अलावा अन्य सुविधाएँ भी प्राप्त होती हैं। विधानमण्डल अध्यक्ष के कार्यकाल के तों में कटौती नहीं कर सकती है। विधान सभा के अध्यक्ष के वेतन व भत्ते प्रत्येक राज्य में भिन्न-भिन्न होते हैं। अध्यक्ष की शक्तियाँ तथा कार्य (Powers and Functions of the Speaker)-अध्यक्ष को विभिन्न शक्तियाँ प्राप्त हैं जिनके आधार पर अध्यक्ष अनेक प्रकार के कार्य करता है जो इस प्रकार से हैं-

  • अध्यक्ष सदन के नेता की सलाह से सदन की कार्रवाई का कार्यक्रम बनाता है,
  • सदन में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखना अध्यक्ष का अधिकार व उत्तरदायित्व है,
  • अध्यक्ष सदन की कार्रवाई के नियमों की व्याख्या करता है,
  • अध्यक्ष की आज्ञा से ही सदस्य सदन में बोल सकते हैं। अध्यक्ष सदस्यों को विचार प्रकट करने की आज्ञा देता है,
  • यदि कोई सदस्य अध्यक्ष की आज्ञा का उल्लंघन करता है, उसके बार-बार मना करने पर भी सभा में गड़बड़ करता है तो अध्यक्ष मार्शल को, उस सदस्य को सदन से बाहर निकालने का आदेश दे सकता है,
  • सदन में व्यवस्था स्थापित करने में असफल रहने पर वह सदन की कार्रवाई को स्थगित (Adjourn) भी कर सकता है,
  • काम रोको प्रस्ताव को स्वीकार अथवा अस्वीकार करता है,
  • धन विधेयक का निर्धारण करता है। उसका निर्णय अन्तिम होता है,
  • सदन में गणपूर्ति है अथवा नहीं, इसका निर्धारण करता है,
  • प्रस्तावों पर मतदान कराता है और परिणाम की घोषणा करता है,
  • यदि किसी प्रस्ताव पर पक्ष तथा विपक्ष में समान वोट आते हैं तो अपना निर्णायक वोट (Casting Vote) डालता है,
  • अध्यक्ष सदन के सदस्यों की जानकारी के लिए अथवा विशेष महत्त्व के मामलों पर सदन को सम्बोधित करता है,
  • सदस्यों द्वारा प्रयुक्त असंसदीय भाषा व शब्दों को सदन की कार्रवाई से निकालने का आदेश देता है,
  • यदि कोई सदस्य बार-बार अध्यक्ष की आज्ञा का उल्लंघन करता है तो वह सदस्य को निलम्बित (Suspend) भी कर सकता है,
  • यदि सदन किसी व्यक्ति को सदन के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने के आरोप में दण्ड दे तो उस दण्ड को लागू करवाना अध्यक्ष का कार्य है,
  • अध्यक्ष विधान सभा द्वारा पारित विधेयक को राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए अपने हस्ताक्षर करके भेजता है,
  • किसी सदस्य ने दल-बदल किया है अथवा नहीं, इसका फैसला अध्यक्ष करता है,
  • सदन में किसी दल का दल-विभाजन हुआ है अथवा नहीं, का फैसला भी अध्यक्ष ही करता है।

स्थिति (Position)-विधान सभा के अध्यक्ष की स्थिति लोकसभा के अध्यक्ष के समान है। उसका पद बड़ा ही गरिमामय, सम्मानजनक समझा जाता है। उससे निष्पक्षता की आशा की जाती है। जब से अध्यक्ष को दल-बदल के सम्बन्ध में अधिकार प्राप्त हुए हैं, उसका पद राजनीतिक रूप से भी अति महत्त्वपूर्ण बन गया है।

प्रश्न 14.
विधान सभा व विधान परिषद् की शक्तियों की तुलना करें।
उत्तर:
जिन राज्यों में एक सदनीय विधानमण्डल है, वहाँ सभी शक्तियाँ विधान सभा में निहित होती हैं और जिन राज्यों में दो सदन होते हैं। उन राज्यों में शक्तियाँ दोनों के पास होती हैं। साधारणतः दूसरे सदनों को कम शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। दोनों सदनों के सम्बन्धों का वर्णन इस प्रकार है

1. कानून के क्षेत्र में सम्बन्ध (Relation in the field of Law Making) साधारण विधेयक दोनों सदनों में से किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। फिर भी विधान परिषद् वैधानिक क्षेत्र में विधान सभा की अपेक्षा एक शक्तिहीन संस्था है। क्योंकि विधान सभा को वैधानिक क्षेत्र में प्रभुत्व प्राप्त है। साधारण विधेयक को विधान परिषद् अपने पास केवल 4 मास तक रख सकती है। विधान सभा के पास विधान परिषद् को समाप्त करने की शक्ति है।

2. वित्त सम्बन्धी क्षेत्र में सम्बन्ध (Relation in the field of Finance) वित्तीय क्षेत्र में भी विधान सभा सर्वोपरि है। धन विधेयक केवल विधान सभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। धन विधेयक के विधान सभा द्वारा पास होने के बाद विधान परिषद् के पास भेजा जाता है। विधान परिषद् धन विधेयक को अपने पास केवल 14 दिन के लिए रोक सकती है। 14 दिन के अन्दर-अन्दर स्वीकृति न मिलने पर विधेयक को पास माना जाता है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण के क्षेत्र में (In the field of Control over Executive) मन्त्रिपरिषद् विधान सभा के प्रति उत्तरदायी है। विधान परिषद् का तो केवल नाममात्र का नियन्त्रण है। जहाँ विधान सभा अविश्वास का प्रस्ताव (Vote of Non-confidence) पास करके मन्त्रियों को हटा सकती है, वहाँ विधान-परिषद् प्रश्न व अनुपूरक प्रश्न पूछ सकती है तथा मन्त्रियों की आलोचना कर सकती है। इससे स्पष्ट है कि कार्यपालिका पर भी विधान सभा का ही नियन्त्रण है। इस क्षेत्र में विधान सभा के अधिकार विधान परिषद् से अधिक व्यापक है।

4. चुनाव सम्बन्धी क्षेत्र में (In the field of Electoral Powers)-चुनाव के क्षेत्र में केवल विधान सभा को अधिकार प्राप्त है, विधान परिषद् को नहीं। राष्ट्रपति के चुनाव में केवल विधान सभा के सदस्य ही भाग लेते हैं। विधान परिषद् के 1/3 सदस्य भी विधान सभा द्वारा ही निर्वाचित किए जाते हैं। इस प्रकार चुनाव के क्षेत्र में विधान सभा को अधिकार प्राप्त है। विधान सभा व विधान परिषद् के अधिकार के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट है कि विधान सभा एक शक्तिशाली व प्रभावशाली सदन है। विधान परिषद् एक दुर्बल सदन है इसीलिए विद्वान विधान परिषद् को समाप्त करने के पक्ष में हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. लोकसभा में संघीय क्षेत्रों (Union Territories) के प्रतिनिधियों की अधिक-से-अधिक संख्या हो सकती है
(A) 15
(B) 20
(C) 25
(D) 30
उत्तर:
(B) 20

2. राष्ट्रपति राज्यसभा में कितने सदस्य मनोनीत करता है?
(A)7
(B) 11
(C) 10
(D) 12
उत्तर:
(D) 12

3. संसद के दोनों सदनों में सबसे अधिक सदस्य कौन-से प्रांत के होते हैं?
(A) केरल
(B) हरियाणा
(C) मध्य प्रदेश
(D) उत्तर प्रदेश
उत्तर:
(D) उत्तर प्रदेश

4. एक सदन द्वारा पास किए गए साधारण विधेयक पर दूसरे सदन द्वारा कार्रवाई करनी आवश्यक है
(A) तीन महीने के अंदर
(B) छह महीने के अंदर
(C) चार महीने के अंदर
(D) आठ महीने के अंदर
उत्तर:
(B) छह महीने के अंदर

5. लोकसभा में अनुसूचित जातियों के लिए कितने स्थान आरक्षित हैं?
(A) 79
(B) 84
(C) 86
(D) 90
उत्तर:
(B) 84

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

6. राज्यसभा में निर्वाचित सदस्य अधिक-से-अधिक कितने हो सकते हैं?
(A) 250
(B) 238
(C) 235
(D) 245
उत्तर:
(B) 238

7. भारत में संघीय विधानपालिका को नाम दिया गया है
(A) संसद
(B) लोकसभा
(C) राज्यसभा
(D) विधानसभा
उत्तर:
(A) संसद

8. लोकसभा का साधारण कार्यकाल कितना निश्चित किया गया है?
(A) 4 वर्ष
(B) 5 वर्ष
(C) 6 वर्ष
(D) 3 वर्ष
उत्तर:
(B) 5 वर्ष

9. लोकसभा में प्रांतों के प्रतिनिधियों की संख्या अधिक-से-अधिक कितनी हो सकती है?
(A) 520
(B) 525
(C) 530
(D) 545
उत्तर:
(C) 530

10. लोकसभा और राज्यसभा की गणपूर्ति (Quorum) उनके अपने कुल सदस्यों का कितना भाग निश्चित किया गया है?
(A) 1/3 भाग
(B) 1/5 भाग
(C) 1/10 भाग
(D) 1/15 भाग
उत्तर:
(C) 1/10 भाग

11. राज्यसभा के कितने सदस्य प्रत्येक दो वर्ष के बाद रिटायर हो जाते हैं?
(A) 1/2 भाग
(B) 1/3 भाग
(C) 1/4 भाग
(D) 1/6 भाग
उत्तर:
(B) 1/3 भाग

12. राज्यसभा के अधिकतम सदस्य हो सकते हैं
(A) 230
(B) 240
(C) 250
(D) 260
उत्तर:
(C) 250

13. संसद की स्थिति क्या है?
(A) सर्वोच्च है
(B) शक्तियाँ सीमित हैं
(C) शक्तियाँ असीमित हैं
(D) बहुत शक्तिहीन है
उत्तर:
(B) शक्तियाँ सीमित हैं

14. लोकसभा में निर्णायक मत (Casting Vote) देने का अधिकार है
(A) प्रधानमंत्री को
(B) उप-राष्ट्रपति को
(C) स्पीकर को
(D) राष्ट्रपति को
उत्तर:
(C) स्पीकर को

15. लोकसभा के अध्यक्ष का चुनाव करते हैं
(A) संसद के सदस्य
(B) लोकसभा तथा राज्यसभा के सदस्य
(C) लोकसभा के सदस्य
(D) राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री
उत्तर:
(C) लोकसभा के सदस्य

16. लोकसभा में विधि-नियमों की व्याख्या करता है
(A) लोकसभा का सैक्रेटरी जनरल
(B) भारत का सर्वोच्च न्यायालय
(C) लोकसभा का स्पीकर
(D) भारत का प्रधानमंत्री
उत्तर:
(C) लोकसभा का स्पीकर

17. विधानसभा के अधिक-से-अधिक सदस्य हो सकते हैं
(A) 400
(B) 450
(C) 500
(D) 525
उत्तर:
(C) 500

18. निम्नलिखित संसद का कार्य है
(A) कानूनों का निर्माण करना
(B) शासन करना
(C) युद्ध की घोषणा करना
(D) नियुक्तियां करना
उत्तर:
(A) कानूनों का निर्माण करना

19. लोकसभा को कौन भंग कर सकता है?
(A) राष्ट्रपति
(B) अध्यक्ष
(C) प्रधानमंत्री
(D) मंत्रिमंडल
उत्तर:
(A) राष्ट्रपति

20. संसद तथा राष्ट्रपति में कड़ी है
(A) प्रधानमंत्री
(B) स्पीकर
(C) उप-राष्ट्रपति
(D) भारत का मुख्य न्यायाधीश
उत्तर:
(B) स्पीकर

21. लोकसभा में अध्यक्ष को मासिक वेतन मिलता है
(A) 80,000 रुपए
(B) 1,25,000 रुपए
(C) 4,00,000 रुपए
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) 4,00,000 रुपए

22. विधानसभा का कार्यकाल है
(A) 4 वर्ष
(B) 5 वर्ष
(C) 7 वर्ष
(D) 8 वर्ष
उत्तर:
(B) 5 वर्ष

23. लोकसभा के स्पीकर को पदच्युत किया जा सकता है
(A) राष्ट्रपति द्वारा
(B) संसद द्वारा
(C) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा
(D) लोकसभा के बहुमत द्वारा
उत्तर:
(D) लोकसभा के बहुमत द्वारा

24. कार्यपालिका निम्नलिखित साधनों से उत्तरदायी बनाई जा सकती है
(A) प्रश्न पूछकर
(B) बहस द्वारा
(C) स्थगन प्रस्ताव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

25. विधानसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है
(A) राज्यपाल
(B) मुख्यमंत्री
(C) स्पीकर
(D) उप-राष्ट्रपति
उत्तर:
(C) स्पीकर

26. विधानसभा और विधान परिषद की कम-से-कम गणपूर्ति कितनी है?
(A) 5 सदस्य
(B) 10 सदस्य
(C) 20 सदस्य
(D) 15 सदस्य
उत्तर:
(B) 10 सदस्य

27. विधानसभा द्वारा पास किए गए धन विधेयक को विधान परिषद् अधिक से अधिक कितने समय के लिए अपने पास रख सकती है?
(A) 10 दिन
(B) 14 दिन
(C) 15 दिन
(D) 20 दिन
उत्तर:
(B) 14 दिन

28. राज्य विधान-परिषद् के कुल सदस्यों का 1/6 भाग नियुक्त किया जाता है
(A) राष्ट्रपति द्वारा
(B) प्रधानमंत्री द्वारा
(C) मुख्यमंत्री द्वारा
(D) राज्यपाल द्वारा
उत्तर:
(D) राज्यपाल द्वारा

29. विधानसभा में धन विधेयक पेश करने के लिए अंतिम स्वीकृति आवश्यक है
(A) मुख्यमंत्री की
(B) प्रधानमंत्री की
(C) राष्ट्रपति की
(D) राज्यपाल की
उत्तर:
(D) राज्यपाल की

30. विधानसभा का अध्यक्ष किस प्रकार निर्वाचित किया जाता है?
(A) राज्यपाल द्वारा
(B) मुख्यमंत्री द्वारा
(C) सदन के सदस्यों द्वारा
(D) जनता के द्वारा
उत्तर:
(C) सदन के सदस्यों द्वारा

31. निम्नलिखित में से किस राज्य में विधान परिषद् नहीं है?
(A) हरियाणा
(B) बिहार
(C) उत्तर प्रदेश
(D) कर्नाटक
उत्तर:
(A) हरियाणा

32. मंत्रिमंडल को निश्चित कार्यकाल समाप्त होने से पहले भंग किया जा सकता है
(A) प्रधानमंत्री द्वारा
(B) राज्यपाल द्वारा
(C) राष्ट्रपति द्वारा
(D) संसद द्वारा
उत्तर:
(B) राज्यपाल द्वारा

33. दल-बदल विरोधी कानून पारित किया गया
(A) वर्ष 1986 में
(B) वर्ष 1985 में
(C) वर्ष 1987 में
(D) वर्ष 1984 में
उत्तर:
(B) वर्ष 1985 में

34. दल-बदल कानून को प्रभावी बनाने हेतु सन् 2003 में कौन-सा संवैधानिक संशोधन पास किया गया?
(A) 85वाँ
(B) 91वाँ
(C) 92वाँ
(D) 95वाँ
उत्तर:
(B) 91वाँ

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दें

1. संसद में कौन-कौन शामिल हैं?
उत्तर:
संसद में लोकसभा, राज्यसभा व राष्ट्रपति शामिल हैं।

2. लोकसभा का अधिवेशन कौन बुलाता है और इसकी अध्यक्षता कौन करता है?
उत्तर:
लोकसभा का अधिवेशन राष्ट्रपति बुलाता है और लोकसभा अध्यक्ष इसकी अध्यक्षता करता है।

3. लोकसभा को कब और कौन भंग कर सकता है?
उत्तर:
लोकसभा को प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति भंग कर सकता है।

4. अध्यक्ष का चुनाव कौन करता है?
उत्तर:
अध्यक्ष का चुनाव केवल लोकसभा के सदस्य करते हैं।

5. राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष कौन होता है?
उत्तर:
उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष होता है।

6. संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता कौन करता है ?
उत्तर:
लोकसभा का अध्यक्ष।

7. वर्तमान में राज्यसभा के सभापति कौन हैं?
उत्तर:
श्री एम० वैंकेया नायडू।

8. अब तक कितनी लोकसभा के चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं?
उत्तर:
17 लोकसभा के।

9. 17वीं लोकसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार के नेतृत्व में स्पीकर की भूमिका कौन निभा रहा है?
उत्तर:
श्री ओम बिड़ला।

10. संसद के संयुक्त अधिवेशन के समय यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हो तो अध्यक्षता कौन करता है?
उत्तर:
लोकसभा का उपाध्यक्ष।

11. लोकसभा प्रत्याशी को जमानत की राशि के रूप में कितने रुपए जमा करवाने होते हैं?
उत्तर:
25,000 रुपए।

12. लोकसभा चुनाव में आरक्षित जाति के उम्मीदवार को जमानत की राशि के रूप में कितने रुपए जमा करवाने होते हैं?
उत्तर:
12,500 रुपए।

13. जमानत की राशि बचाने के लिए लोकसभा चुनाव में कितने मत प्राप्त करने आवश्यक हैं?
उत्तर:
कुल पड़े मतों का 1/6 प्रतिशत मत प्राप्त करने आवश्यक हैं।

14. सांसद को स्थानीय विकास योजना के अन्तर्गत कितना खर्च प्रतिवर्ष करने का अधिकार है?
उत्तर:
5 करोड़ रुपए।

15. राज्यसभा के सदस्य का कार्यकाल कितने वर्ष का होता है?
उत्तर:
6 वर्ष का।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 5 विधायिका

16. राज्यसभा के सभापति का मासिक वेतन कितना है?
उत्तर:
4 लाख रुपए प्रतिमाह।

17. विधान परिषद् के कितने सदस्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं ?
उत्तर:
विधान परिषद् के 1/3 सदस्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं।

रिक्त स्थान भरें

1. भारतीय संसद की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद …………. में की गई है।
उत्तर:
79

2. हरियाणा विधानसभा के स्पीकर ……………. हैं।
उत्तर:
श्री ज्ञानचन्द गुप्ता

3. हरियाणा में उप-मुख्यमन्त्री पद पर ……………. हैं।
उत्तर:
दुष्यन्त चौटाला

4. लोकसभा के अधिकतम निर्वाचन सदस्य ……………. हो सकते है।
उत्तर:
550

5. लोकसभा के वर्तमान अध्यक्ष ……………. हैं।
उत्तर:
श्री ओम बिड़ला

6. वर्तमान भारत में संघीय ……………. राज्य एवं …………… केन्द्र शासित प्रदेश हैं।
उत्तर:
28 एवं 8

7. ……………. राज्यसभा का पदेन अध्यक्ष होता है।
उत्तर:
उप-राष्ट्रपति

8. वर्तमान में राज्यसभा के उपसभापति ……………. हैं।
उत्तर:
श्री हरिवंश नारायण सिंह

9. लोकसभा अध्यक्ष अपना त्यागपत्र ……………. को देता है।
उत्तर:
उपाध्यक्ष

10. राज्यसभा को संसद का ……………. सदन कहा जाता है।
उत्तर:
ऊपरी

11. राज्यसभा के सदस्य हेतु न्यूनतम आयु ……………. वर्ष होनी चाहिए।
उत्तर:
30

12. ……………. संवैधानिक संशोधन दल-बदल विरोधी कानून, 1985 में लागू हुआ।
उत्तर:
52वां

13. राज्यसभा के ……………. सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष के बाद सेवानिवृत हो जाते हैं।
उत्तर:
1/3

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 4 कार्यपालिका

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 4 कार्यपालिका Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 4 कार्यपालिका

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्यपालिका का क्या अर्थ है?
उत्तर:
कार्यपालिका सरकार का वह अंग है जो विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करती है।

प्रश्न 2.
ऐसे दो राज्यों के नाम बताइए जिनमें इकहरी कार्यपालिका है।
उत्तर:

  • भारत तथा
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में इकहरी कार्यपालिका है।

प्रश्न 3.
ऐसे दो राज्यों के नाम बताइए जिनमें बहुल कार्यपालिका है।
उत्तर:

  • स्विट्ज़रलैंड तथा
  • रूस में बहुल कार्यपालिका है।

प्रश्न 4.
कार्यपालिका के कोई दो प्रकार बताएँ।
उत्तर:

  • एकल कार्यपालिका,
  • बहुल कार्यपालिका।

प्रश्न 5.
एकल कार्यपालिका से क्या अभिप्राय है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
यदि कार्यकारी शक्तियाँ किसी एक व्यक्ति को अर्पित की जाएँ, तो वह एकल कार्यपालिका होती है; जैसे भारत तथा अमेरिका में एकल कार्यपालिका है।

प्रश्न 6.
बहुल कार्यपालिका से क्या अभिप्राय है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
यदि कार्यकारी शक्तियाँ कुछ व्यक्तियों के समूह अथवा समिति को प्रदान की जाएँ तो उसे बहुल कार्यपालिका कहा जाता है; जैसे स्विट्ज़रलैंड तथा रूस में बहुल कार्यपालिका है।

प्रश्न 7.
पैतृक कार्यपालिका किसे कहा जाता है? दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
पैतृक कार्यपालिका में राजा का पद पैतृक अथवा वंशज होता है; जैसे इंग्लैंड तथा जापान में पैतृक कार्यपालिका है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 4 कार्यपालिका

प्रश्न 8.
मनोनीत कार्यपालिका किसे कहते हैं? कोई उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
जब राज्याध्यक्ष किसी उच्च राज्याध्यक्ष द्वारा मनोनीत किया जाए तो उसे मनोनीत कार्यपालिका कहा जाता है; जैसे भारत में राज्यों के राज्यपाल।

प्रश्न 9.
वास्तविक कार्यपालिका किसे कहते हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वास्तविक कार्यपालिका वह है जो वास्तविक रूप में कार्यपालिका की शक्तियों का प्रयोग करती है। भारत में प्रधानमंत्री तथा मंत्रिमंडल और अमेरिका में राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका है।

प्रश्न 10.
नाममात्र की कार्यपालिका से क्या अभिप्राय है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
जब संविधान द्वारा प्राप्त शक्तियों का प्रयोग स्वयं न करके उसके नाम पर अन्य व्यक्ति अथवा संस्था शक्तियों का प्रयोग करते हैं; जैसे भारत में राष्ट्रपति, इंग्लैण्ड में राजा अथवा रानी। उसे नाममात्र की कार्यपालिका कहा जाता है।

प्रश्न 11.
राजनीतिक कार्यपालिका किसे कहा जाता है?
उत्तर:
राजनीतिक कार्यपालिका ऐसी कार्यपालिका को कहा जाता है जो कुछ समय के लिए चुनाव अथवा अन्य साधन द्वारा नियुक्त की जाती है।

प्रश्न 12.
स्थाई कार्यपालिका से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्थाई कार्यपालिका कुछ शैक्षणिक अथवा तकनीकी योग्यता के आधार पर एक लंबी अवधि के लिए नियुक्त की जाती है। इसमें नौकरशाही तथा अन्य सरकारी कर्मचारी शामिल होते हैं।

प्रश्न 13.
भारत में संसदीय शासन प्रणाली के अपनाए जाने के दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • उत्तरदायित्व तथा स्थिरता,
  • वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना।

प्रश्न 14.
भारत में संसदीय शासन प्रणाली की दो मुख्य विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • विधानपालिका तथा कार्यपालिका में घनिष्ठ संबंध,
  • व्यक्तिगत उत्तरदायित्व।

प्रश्न 15.
भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में कौन-से सदस्य होते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रपति के निर्वाचक-मंडल में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य होते हैं।

प्रश्न 16.
राष्ट्रपति पद की दो अयोग्यताएँ बताएँ।
उत्तर:
राष्ट्रपति पद पर ऐसा व्यक्ति आसीन नहीं हो सकता, जिसमें निम्नलिखित दो अयोग्यताएँ हों-

  • वह दिवालिया या पागल घोषित किया जा चुका हो,
  • वह सरकार के किसी लाभ के पद पर कार्यरत हो।

प्रश्न 17.
राष्ट्रपति की चुनाव प्रणाली की दो कमियाँ बताइए।
उत्तर:
राष्ट्रपति की चुनाव प्रणाली की निम्नलिखित दो कमियाँ हैं-

  • यह प्रणाली अलोकतांत्रिक है क्योंकि इसमें जनता प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लेती,
  • यह प्रणाली बड़ी जटिल है।।

प्रश्न 18.
राष्ट्रपति का कार्यकाल कितना होता है? क्या उसको समय से पूर्व हटाया जा सकता है?
उत्तर:
राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष होता है और उसे संसद महाभियोग द्वारा समय से पूर्व हटा सकती है।

प्रश्न 19.
राष्ट्रपति को कौन और किस आधार पर हटा सकता है?
उत्तर:
राष्ट्रपति को संविधान की रक्षा न कर पाने के आरोप में संसद महाभियोग द्वारा हटा सकती है।

प्रश्न 20.
राष्ट्रपति का पारिश्रमिक तथा अवकाश प्राप्ति पर पेन्शन बताइए।
उत्तर:
राष्ट्रपति को 5 लाख रुपए मासिक धनराशि तथा सेवानिवृत्त होने पर मूल वेतन का 50% पैंशन मिलती है।

प्रश्न 21.
क्या राष्ट्रपति को दोबारा चुना जा सकता है? क्या कोई दोबारा राष्ट्रपति चुना गया है?
उत्तर:
राष्ट्रपति को दोबारा चुना जा सकता है और अब तक केवल एक बार डॉ० राजेंद्र प्रसाद को दोबारा राष्ट्रपति चुना गया था।

प्रश्न 22.
राष्ट्रपति के दो विशेषाधिकार बताइए।
उत्तर:
राष्ट्रपति के निम्नलिखित दो विशेषाधिकार हैं-

  • राष्ट्रपति अपनी शक्तियों के प्रयोग के लिए न्यायपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं है,
  • राष्ट्रपति पर कार्यकाल के दौरान दीवानी मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता है।

प्रश्न 23.
राष्ट्रपति की दो कार्यपालिका शक्तियाँ बताएँ।
उत्तर:
राष्ट्रपति की दो कार्यपालिका शक्तियाँ हैं-

  • राष्ट्रपति प्रधानमंत्री व अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है,
  • राष्ट्रपति तीनों सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति है।

प्रश्न 24.
राष्ट्रपति की दो न्यायिक शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:
राष्ट्रपति की दो न्यायिक शक्तियाँ हैं-

  • सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करना,
  • संवैधानिक मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लेना।

प्रश्न 25.
राष्ट्रपति की दो विधायी शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:
राष्ट्रपति के दो वैधानिक अधिकार या विधायी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं-

  • संसद का अधिवेशन बुलाना.व सत्रावसान करना,
  • विधेयकों को स्वीकृति देना।

प्रश्न 26.
राष्ट्रपति को कितने प्रकार की संकटकालीन शक्तियाँ प्राप्त हैं? उनमें से किसी एक शक्ति को लिखें।
उत्तर:
राष्ट्रपति को तीन प्रकार की संकटकालीन शक्तियाँ प्राप्त हैं। जब देश में वित्तीय संकट उत्पन्न हो जाए तो राष्ट्रपति वित्तीय संकट की उद्घोषणा कर सकता है।

प्रश्न 27.
राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपास्थिति कब लागू कर सकता है? अब तक कितनी बार ऐसी आपात स्थिति लागू की जा चुकी है?
उत्तर:
जब देश की सुरक्षा को युद्ध, बाह्य आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह से संकट उत्पन्न हो जाए तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के अधीन, राष्ट्रीय आपात स्थिति की उद्घोषणा कर सकता है। ऐसी आपास्थिति अब तक तीन बार 1962, 1971 तथा 1975 में लागू की जा चुकी है।

प्रश्न 28.
राष्ट्रपति अध्यादेश कब जारी कर सकता है? अध्यादेश कितनी देर प्रभावी रह सकता है?
उत्तर:
जब संसद का अधिवेशन न चल रहा हो और देश में संकटकालीन परिस्थिति उत्पन्न हो जाए, तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है। अध्यादेश अधिक-से-अधिक 6 महीने तक प्रभावी रह सकता है।

प्रश्न 29.
उप-राष्ट्रपति को हटाने संबंधी प्रस्ताव किस सदन में प्रस्तावित किया जा सकता है और उसे कैसे हटाया जा सकता है?
उत्तर:
उप-राष्ट्रपति को हटाने संबंधी प्रस्ताव केवल राज्य सभा में ही प्रस्तावित किया जा सकता है। जब संसद के दोनों सदन अलग-अलग सदन की कुल संख्या के बहुमत तथा उपस्थित व मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित कर दें तो उप-राष्ट्रपति को उसी समय पद छोड़ना पड़ता है।

प्रश्न 30.
राष्ट्रपति राज्य सभा के कितने सदस्य मनोनीत कर सकता है ?
उत्तर:
राष्ट्रपति राज्य सभा में बारह (12) सदस्य मनोनीत कर सकता है।

प्रश्न 31.
उप-राष्ट्रपति के पद की दो योग्यताएँ बताइए।
उत्तर:
उप-राष्ट्रपति के पद की दो आवश्यक योग्यताएँ हैं

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • वह कम-से-कम 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।

प्रश्न 32.
राष्ट्रपति पद के लिए कितने सदस्य नाम प्रस्तावित करते हैं और कितने अनुमोदित करते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए निर्वाचक-मंडल के कम-से-कम पचास (50) सदस्य नाम प्रस्तावित करते हैं और पचास (50) सदस्य ही अनुमोदित करते हैं।

प्रश्न 33.
उप-राष्ट्रपति को कितने प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं?
उत्तर:
उपराष्ट्रपति को दो प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं

  • उप-राष्ट्रपति के रूप में,
  • राज्य सभा के सभापति के रूप में।

प्रश्न 34.
उप-राष्ट्रपति के राज्य सभा अध्यक्ष के रूप में दो कार्य बताइए।
उत्तर:

  • वह राज्य सभा के अधिवेशनों की अध्यक्षता करता है,
  • वह राज्य सभा की कार्रवाई का संचालन करता है।

प्रश्न 35.
राष्ट्रपति राज्य में आपातस्थिति कब और संविधान के किस अनुच्छेद के अधीन लगा सकता है? ।
उत्तर:
राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 356 के अधीन राज्य में आपास्थिति लागू कर सकता है, जब राज्यपाल की रिपोर्ट पर अथवा अन्य किसी सूत्र प्राप्त सूचना के आधार पर राष्ट्रपति को विश्वास हो जाए कि राज्य में संवैधानिक तन्त्र असफल हो गया है।

प्रश्न 36.
मंत्रिमंडल के दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • मंत्रिमंडल देश का प्रशासन चलाता है,
  • मंत्रिमंडल देश की आर्थिक, गृह व विदेश-नीति इत्यादि तय करता है।

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प्रश्न 37.
भारतीय मंत्रिमंडलीय प्रणाली की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • राष्ट्रपति नाममात्र का संवैधानिक अध्यक्ष है। वास्तविक शक्तियाँ प्रधानमंत्री के हाथों में हैं,
  • मंत्रिमंडल संसद के प्रति उत्तरदायी है।

प्रश्न 38.
प्रधानमन्त्री के मंत्रिमंडल के नेता के रूप में दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है,
  • प्रधानमंत्री मंत्रियों के बीच विभागों का बँटवारा करता है।

प्रश्न 39.
राष्ट्रपति की दो वित्तीय शक्तियाँ लिखें।।
उत्तर:

  • राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बिना संसद में कोई धन-विधेयक पेश नहीं किया जा सकता,
  • राष्ट्रपति वित्त आयोग की नियुक्ति करता है।

प्रश्न 40.
राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों के दो दोष बताइए।
उत्तर:

  • नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थगित किए जा सकते हैं,
  • संघात्मक ढाँचा एकात्मक में बदल जाता है।

प्रश्न 41.
प्रधानमन्त्री के कार्यकाल की अवधि बताइए।
उत्तर:
प्रधानमंत्री के कार्यकाल की अवधि निश्चित नहीं होती है। प्रधानमंत्री तब तक अपने पद पर बना रहता है, जब तक उसे लोक सभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है।

प्रश्न 42.
भारत में वित्तीय आपात् स्थिति संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत लागू की जाती है? उसे अब तक कितनी बार लागू किया जा चुका है?
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 360 के अन्तर्गत वित्तीय आपात स्थिति लागू की जाती है। भारत में अभी तक वित्तीय आपात स्थिति लागू नहीं की गई है।

प्रश्न 43.
उप-राष्ट्रपति को कितना वेतन मिलता है?
उत्तर:
उप-राष्ट्रपति को अपने उप-राष्ट्रपति पद के रूप में कोई वेतन नहीं मिलता। उन्हें केवल उप-सभापति के रूप में 4 लाख रुपए मासिक वेतन मिलता है।

प्रश्न 44.
राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बनने के लिए उसके नाम का प्रस्ताव कितने सदस्यों द्वारा प्रस्तावित, अनुमोदित होना आवश्यक है?
उत्तर:
राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तावित प्रत्याशी बनने के लिए उनके नाम का प्रस्ताव 50 सदस्यों द्वारा प्रस्तावित एवं 50 सदस्यों के द्वारा अनुमोदित होना चाहिए।

प्रश्न 45.
उप-राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बनने के लिए उसके नाम का प्रस्ताव कितने सदस्यों द्वारा प्रस्तावित एवं अनुमोदित होना चाहिए?
उत्तर:
उप-राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनने के लिए उसके नाम का प्रस्ताव 20 सदस्यों द्वारा प्रस्तावित एवं 20 के द्वारा ही अनुमोदित होना चाहिए।

प्रश्न 46.
भारत में मन्त्रिमण्डल के दो लक्षण बताएँ।
उत्तर:

  • राष्ट्रपति मंत्रिमंडल का सदस्य नहीं होता। वह उसकी बैठकों में भाग नहीं लेता,
  • मंत्रिमंडल संसद के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।

प्रश्न 47.
मन्त्रियों की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर:
मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के परामर्श के अनुसार की जाती है।

प्रश्न 48.
प्रधानमंत्री की नियुक्ति कैसे की जाती है?
उत्तर:
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति द्वारा प्रायः उसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है जिसे लोक सभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है।

प्रश्न 49.
प्रधानमन्त्री के कोई दो कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • वह मंत्रिमंडल की बैठकें बुलाता है तथा उनकी अध्यक्षता करता है,
  • वह राष्ट्रपति का मुख्य सलाहकार होता है।

प्रश्न 50.
राज्यपाल बनने के लिए आवश्यक दो योग्यताएँ बताइए।
उत्तर:

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • उसकी आयु 35 वर्ष से कम न हो।

प्रश्न 51.
सरकारिया आयोग द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध में दी गई दो सिफारिशें लिखें।
उत्तर:

  • राज्यपाल की नियुक्ति संबंधित राज्य सरकार के साथ सलाह-मशविरा करने के बाद ही की जाए,
  • निकट भूतकाल में सक्रिय दलीय राजनीति से जुड़े व्यक्ति को राज्यपाल न बनाया जाए।

प्रश्न 52.
राज्यपाल की दो कार्यपालिका शक्तियाँ लिखें।
उत्तर:

  • मुख्यमंत्री व मंत्रियों की नियुक्ति करना,
  • मंत्रि-परिषद् की सलाह से राज्य में उच्च अधिकारियों की नियुक्ति करना।

प्रश्न 53.
राज्यपाल की दो विधायी शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  • राज्यपाल विधानमंडल का अधिवेशन बुला सकता है और स्थगित भी कर सकता है,
  • राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है।

प्रश्न 54.
राज्यपाल की दो न्यायिक शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में सलाह देना,
  • जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति करना।

प्रश्न 55.
राज्यपाल की दो न्यायिक उन्मक्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  • राज्यपाल पर उसके कार्यकाल के दौरान फौजदारी मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता,
  • राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान किसी भी न्यायालय द्वारा उसे नज़रबंद करने की आज्ञा नहीं दी जा सकती।

प्रश्न 56.
राज्यपाल की दो स्व-विवेकी शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  • राज्यपाल अनुच्छेद 356 के अधीन राज्य में आपात स्थिति की सिफारिश कर सकता है,
  • वह किसी भी राज्य विधेयक को राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेज सकता है।

प्रश्न 57.
राज्यपाल किन दो परिस्थितियों में विधान सभा को समय से पहले भंग कर सकता है?
उत्तर:

  • जब ऐसा करने की सलाह मुख्यमंत्री दे,
  • जब विधान सभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो और कोई भी दल सरकार बनाने की स्थिति में न हो।

प्रश्न 58.
राज्य कार्यपालिका का नाममात्र व वास्तविक अध्यक्ष कौन है?
उत्तर:
राज्य कार्यपालिका का नाममात्र का अध्यक्ष राज्यपाल होता है और वास्तविक अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है।

प्रश्न 59.
राज्यपाल का कार्यकाल कितना निश्चित किया गया है? क्या उसे पहले भी पद से हटाया जा सकता है?
उत्तर:
राज्यपाल का कार्यकाल पाँच वर्ष निश्चित किया गया है। राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त होने से पहले भी उसे पद से हटाया जा सकता है।

प्रश्न 60.
राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर:
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्यमंत्री के परामर्श के अनुसार की जाती है।

प्रश्न 61.
मुख्यमंत्री की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है?
उत्तर:
मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। राज्यपाल द्वारा उसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त किया जाता है जो राज्य विधान सभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है।

प्रश्न 62.
मुख्यमन्त्री का कार्यकाल कितना होता है?
उत्तर:
मुख्यमंत्री का कार्यकाल निश्चित नहीं होता। वह उतने समय तक अपने पद पर बना रहता है, जब तक उसे विधान सभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त रहता है।

प्रश्न 63.
राजनीतिक कार्यपालिका तथा स्थाई कार्यपालिका में दो अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:

  • राजनीतिक कार्यपालिका की नियुक्ति राजनीतिक आधार पर तथा स्थाई कार्यपालिका की नियुक्ति कर्मचारियों की योग्यता के आधार पर की जाती है,
  • राजनीतिक कार्यपालिका नीतियाँ बनाती है, स्थाई कार्यपालिका उन्हें लागू करती है।

प्रश्न 64.
अच्छी प्रशासनिक सेवा के दो गुण बताएँ।
उत्तर:

  • लोक-सेवक कर्त्तव्यनिष्ठ होने चाहिएँ,
  • उन्हें जनता के हितों का ध्यान रखना चाहिएँ।

प्रश्न 65.
नौकरशाही से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
तकनीकी दृष्टि से कुशल कर्मचारियों का संगठन जो निष्पक्ष होकर राज्य का कार्य करता है, उसे नौकरशाही कहा जाता है।

प्रश्न 66.
नौकरशाही की दो विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:

  • नौकरशाही राजनीतिक रूप से तटस्थ होती है,
  • वह नियमानुसार कार्य करती है।

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प्रश्न 67.
नौकरशाही के कोई दो कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • मंत्रियों को परामर्श देना,
  • सरकार की नीतियों को लागू करना।

प्रश्न 68.
वचनबद्ध नौकरशाही का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वचनबद्ध नौकरशाही का अर्थ है कि नौकरशाही किसी विशेष राजनीतिक दल के सिद्धान्तों एवं नीतियों से बँधी रहती है और उस दल के निर्देशों के अनुसार ही कार्य करती है।

प्रश्न 69.
नौकरशाही के दो दोष बताइए।
उत्तर:

  • लाल फीताशाही,
  • जन-साधारण की माँगों की उपेक्षा।

प्रश्न 70.
वचनबद्ध नौकरशाही के पक्ष में कोई तर्क दीजिए।
उत्तर:
वचनबद्ध नौकरशाही में सरकार की नीतियों तथा कार्यक्रमों को दृढ़ता से लागू किया जा सकता है।

प्रश्न 71.
वचनबद्ध नौकरशाही के विपक्ष में (विरुद्ध) कोई तर्क दीजिए।
उत्तर:
वचनबद्ध नौकरशाही अपना कार्य निष्पक्ष रूप से नहीं कर सकती।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्यपालिका के कोई पाँच कार्य बताएँ।
उत्तर:
कार्यपालिका के मुख्य पाँच कार्य इस प्रकार हैं-

  • कार्यपालिका का मुख्य कार्य कानूनों को लागू करना तथा देश में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखना है,
  • कार्यपालिका अनेक उच्च अधिकारियों की नियुक्ति करती है,
  • कार्यपालिका देश की आन्तरिक तथा विदेश नीति का निर्माण करती है,
  • कार्यपालिका सरकार का वार्षिक बजट तैयार करती है और उसे विधानमण्डल से पास करवाती है,
  • कार्यपालिका अन्य देशों के साथ सम्बन्ध स्थापित करती है, वह अन्य देशों में जाने वाले राजदूतों की नियुक्ति करती है तथा अन्य देशों से आने वाले राजदूतों का स्वागत करती है। कार्यपालिका ही अन्य देशों के साथ सन्धियाँ एवं समझौते करती है।

प्रश्न 2.
एकल तथा बहुकार्यपालिका में भेद स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यदि संविधान द्वारा समस्त शक्तियाँ एक ही व्यक्ति (अधिकारी) में निहित होती हैं, तो उसे एकल कार्यपालिका कहते हैं। भारत तथा अमेरिका के राष्ट्रपति एकल कार्यपालिका के उदाहरण हैं। इन दोनों देशों में कार्यपालिका की सारी शक्तियाँ राष्ट्रपति के हाथों में दी गई हैं। इसके दूसरी ओर जब कार्यपालिका शक्तियाँ एक व्यक्ति में निहित न होकर, कुछ व्यक्तियों अथवा किसी समिति में निहित होती हैं, तो उसे बहु-कार्यपालिका कहा जाता है। स्विट्ज़रलैण्ड की संघीय परिषद् (Federal Council), जिसमें 7 सदस्य हैं, इस प्रकार की कार्यपालिका का उदाहरण है।

प्रश्न 3.
कार्यपालिका के अध्यक्ष के प्रत्यक्ष निर्वाचन के गुण तथा अवगुण बताइए।
उत्तर:
कार्यपालिका का अध्यक्ष प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा अर्थात् सीधा जनता द्वारा चुना जा सकता है। इसके गुण तथा अवगुण निम्नलिखित हैं
गुण-

  • यह विधि अधिक लोकतान्त्रिक है,
  • इससे जनता की सार्वजनिक मामलों में रुचि बढ़ती है,
  • प्रत्यक्ष चुनाव में जनता उसी व्यक्ति को चुनती है जिसकी योग्यता तथा ईमानदारी पर उसे पूरा विश्वास होता है।

अवगुण-

  • चुनाव क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत होने से जनता को उम्मीदवार के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती,
  • इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 4.
संसदीय कार्यपालिका की पाँच विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
संसदीय कार्यपालिका की पाँच विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(1) संसदीय सरकार में दो तरह की कार्यपालिका होती है। एक वास्तविक कार्यपालिका तथा दूसरी नाममात्र की कार्यपालिका। एक राज्याध्यक्ष तथा दूसरा सरकार का अध्यक्ष,

(2) संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होता है। मन्त्रिमण्डल का व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोहरा उत्तरदायित्व होता है,

(3) संसदीय कार्यपालिका में विधानपालिका तथा कार्यपालिका में गहरा सम्बन्ध होता है। दोनों एक-दूसरे पर नियन्त्रण रखते हैं,

(4) संसदीय कार्यपालिका में मन्त्रिमण्डल के सदस्यों में राजनीतिक विचारों की एकरूपता तथा समानता होती है,

(5) संसदीय कार्यपालिका का कार्यकाल निश्चित नहीं होता। कार्यपालिका के सदस्य उतने समय तक अपने पद पर बने रहते हैं, जब तक उन्हें विधानमण्डल में बहमत का समर्थन प्राप्त रहता है। जब वे यह समर्थन खो बैठते हैं, तो उन्हें अपना त्यागपत्र देना पड़ता है।

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प्रश्न 5.
कार्यपालिका के विधायी (कानून सम्बन्धी) कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि कानून बनाना विधानमण्डल का कार्य है, परन्तु कार्यपालिका को भी कुछ कानून-सम्बन्धी अधिकार प्राप्त होते हैं। ये इस प्रकार हैं-
(1) जिन देशों में संसदीय सरकार की स्थापना की गई है, उन देशों में कार्यपालिका का अध्यक्ष ही संसद का अधिवेशन बुलाता है तथा उसे स्थगित करता है,

(2) कार्यपालिका के अध्यक्ष को संसद के निचले सदन को उसका निश्चित कार्यकाल समाप्त होने से पहले भी भंग करने का अधिकार होता है,

(3) कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) के सभी सदस्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं। वे विधानमण्डल की बैठकों में भाग लेते हैं, विधेयकों को पेश करते हैं तथा उन्हें पास करवाते हैं,

(4) जिस समय विधानमण्डल का अधिवेशन न चल रहा हो, कार्यपालिका के अध्यक्ष को अध्यादेश (Ordinance) जारी करने का अधिकार होता है,

(5) कई देशों में कार्यपालिका के अध्यक्ष को विधानमण्डल में कुछ सदस्य मनोनीत करने का अधिकार प्राप्त होता है। भारत का राष्ट्रपति राज्य सभा में 12 सदस्य मनोनीत करता है।

प्रश्न 6.
कार्यपालिका की शक्ति के विस्तार के कोई पाँच कारण बताएँ।
उत्तर:
कार्यपालिका की शक्तियों में वृद्धि के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. दलीय पद्धति-आधुनिक लोकतन्त्रीय राज्यों में सरकार दलीय-पद्धति के आधार पर चलाई जाती है, जिस राजनीतिक दल को विधानमण्डल में बहुमत प्राप्त हो जाता है, वह सरकार का गठन करता है। दलीय अनुशासन के कारण कार्यपालिका को विधानमण्डल में बहुमत का समर्थन प्राप्त होने के कारण संसद में कुछ भी पास करवाना आसान होता है।

2. निम्न सदन को भंग करने का अधिकार-संसदीय शासन-प्रणाली में कार्यपालिका के अध्यक्ष को संसद के निम्न सदन को भंग करने का अधिकार होता है। विधानमण्डल इस भय के कारण कार्यपालिका की नीतियों एवं कानूनों को स्वीकृति दे देती है।

3. जन-कल्याणकारी राज्य की धारणा-वर्तमान युग में राज्य को जन-कल्याणकारी संस्था समझा जाता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य जनता की भलाई के लिए अनेक कार्य करता है, जिससे कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में बहुत वृद्धि हो गई है।

4. प्रदत्त व्यवस्थापन-काम की अधिकता, विशेष ज्ञान की कमी व समय की कमी के कारण विधानमण्डल के लिए प्रत्येक कानून को पूरे विस्तृत रूप में पास करना सम्भव नहीं होता। इसके परिणामस्वरूप, विधानमण्डल कानून की रूपरेखा का निर्माण करके विस्तृत नियम तथा अधिनियम बनाने का कार्य कार्यपालिका पर छोड़ देती है।

इस सम्बन्ध में कार्यपालिका द्वारा बनाए गए नियम तथा अधिनियम भी उसी प्रकार से लागू होते हैं; जैसे संसद द्वारा पास किए गए कानून । इससे भी कार्यपालिका की शक्ति में वृद्धि हुई है। नियोजन आज का युग नियोजन का युग है। सभी देश अपने विकास के लिए योजनाएँ बनाते हैं। ये योजनाएँ तैयार करना, इन्हें लागू करना तथा इनका मूल्यांकन करना कार्यपालिका द्वारा ही सम्पन्न होता है। इससे कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार हुआ है।

प्रश्न 7.
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव कैसे किया जाता है?
उत्तर:
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मण्डल द्वारा किया जाता है जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं। यदि निर्वाचित मण्डल में कुछ स्थान रिक्त भी हों, तो भी राष्ट्रपति का चुनाव निश्चित तिथि पर होता है। संसद के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य तथा प्रत्येक राज्य के विधान सभा के सदस्य के मत का मूल्य अलग-अलग होता है। यह चुनाव एकल-संक्रमणीय मत-पद्धति के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा कराया जाता है। चुनाव जीतने के लिए एक उम्मीदवार को मतों की एक निश्चित संख्या, जिसे कोटा कहते हैं, प्राप्त करना होता है।

प्रश्न 8.
राष्ट्रपति पद के लिए कौन-सी योग्यताएँ अनिवार्य हैं?
उत्तर:
राष्ट्रपति पद के लिए आवश्यक योग्यताएँ इस प्रकार हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो,
  • वह किसी सरकारी लाभ के पद पर न हो,
  • वह लोक सभा का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो,
  • उसके नाम का प्रस्ताव निर्वाचक मण्डल के 50 सदस्य करें तथा अन्य 50 ही अनुमोदन करें,
  • वह 15,000 रुपए जमानत राशि के रूप में जमा कराए।

प्रश्न 9.
भारत के निर्वाचित राष्ट्रपतियों के नाम बताइए।
उत्तर:
भारत में अब तक निम्नलिखित निर्वाचित राष्ट्रपति हुए हैं

  • डॉ० राजेन्द्र प्रसाद,
  • डॉ० राधाकृष्णन,
  • डॉ० जाकिर हुसैन,
  • श्री वी०वी० गिरि,
  • श्री फखरुद्दीन अली अहमद,
  • श्री नीलम संजीवा रेड्डी,
  • ज्ञानी जैल सिंह,
  • श्री आर० वेंकटरमन,
  • डॉ० शंकर दयाल शर्मा,
  • श्री के०आर० नारायणन,
  • डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम,
  • श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल,
  • श्री प्रणब मुखर्जी,
  • श्री रामनाथ कोविंद।

प्रश्न 10.
राष्ट्रपति के वेतन तथा भत्ते लिखें।
उत्तर:
भारत के राष्ट्रपति को 5 लाख रुपए मासिक वेतन मिलता है। इसके अतिरिक्त उसे रहने के लिए बिना किराए के निवास-स्थान (राष्ट्रपति भवन) तथा कई अन्य भत्ते भी मिलते हैं। सेवानिवृत्त होने पर उसे मूल वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन भी मिलती है। उसे निजी कार्यालय के लिए भत्ता तथा निःशुल्क बिजली, पानी, कार तथा टेलीफोन आदि की सुविधाएँ भी उपलब्ध होती हैं। राष्ट्रपति के वेतन तथा भत्ते भारत की संचित निधि में से दिए जाते हैं, जिन्हें उसके कार्यकाल के दौरान घटाया नहीं जा सकता।

प्रश्न 11.
राष्ट्रपति को पद से हटाने का क्या तरीका है?
उत्तर:
राष्ट्रपति को संविधान की रक्षा न कर पाने के कारण महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है। महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में प्रस्तावित किया जा सकता है। इसके लिए सदन के 1/4 सदस्य हस्ताक्षर सहित नोटिस दें। नोटिस कम-से-कम 14 दिन पहले दिया जाना चाहिए। इसके बाद सदन महाभियोग प्रस्ताव पर विचार करेगा।

यदि सदन, सदन की कुल संख्या के बहुमत तथा उपस्थित व मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देता है तो वह प्रस्ताव सदन द्वारा पारित समझा जाता है। इसके बाद प्रस्ताव दूसरे सदन में भेज दिया जाता है। यदि दूसरा सदन भी सदन की कुल संख्या के बहुमत तथा उपस्थित व मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देता है तो महाभियोग प्रस्ताव संसद द्वारा पारित माना जाएगा और राष्ट्रपति को अपने पद से हटना पड़ेगा।

प्रश्न 12.
राष्ट्रपति के निषेधाधिकार (Veto) का क्या अर्थ है?
उत्तर:
निषेधाधिकार (Veto Power) का अर्थ राष्ट्रपति के उस अधिकार से होता है, जिसके अन्तर्गत राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित विधेयक पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दे जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार प्राप्त है। भारत के राष्ट्रपति को अमेरिकी राष्ट्रपति की भाँति निषेधाधिकार प्राप्त नहीं है। भारत का राष्ट्रपति हस्ताक्षर करने में देरी कर सकता है अथवा विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद में वापस भेज सकता है। यदि संसद विधेयक को उसी रूप में भी साधारण बहुमत से ही दोबारा पारित कर देती है तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

प्रश्न 13.
राष्ट्रपति के पाँच कार्यपालिका अधिकार व कार्य बताइए।
उत्तर:
राष्ट्रपति के पाँच कार्यपालिका अधिकार व कार्य इस प्रकार हैं-

  • प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करना,
  • प्रधानमन्त्री की सलाह से मन्त्रि-परिषद् के अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करना,
  • प्रधानमन्त्री की सलाह से मन्त्रियों में विभागों का बँटवारा करना,
  • प्रधानमन्त्री की सलाह से मन्त्रियों के विभागों में परिवर्तन करना, मन्त्रियों का त्यागपत्र स्वीकार करना अथवा मन्त्रियों को पद से हटाना,
  • राष्ट्रपति देश की सेनाओं (जल, थल व वायु सेना) का सर्वोच्च अधिकारी होता है। सेना में उच्च पदों पर नियुक्तियाँ राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं।

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प्रश्न 14.
राष्ट्रपति की कोई पाँच विधायी शक्तियाँ लिखें।
उत्तर:
राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ इस प्रकार हैं-

  • राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों का अधिवेशन बुलाने तथा उसे स्थगित करने का अधिकार है,
  • राष्ट्रपति संसद के एक अथवा दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में भाषण दे सकता है,
  • राष्ट्रपति लोक सभा को उसका निश्चित कार्यकाल समाप्त होने से पहले भंग कर सकता है,
  • राष्ट्रपति को राज्य सभा में 12 सदस्य मनोनीत करने का अधिकार है,
  • राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों द्वारा पास किए गए विधेयकों को स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार है। वह ऐसे किसी विधेयक को वीटो (Veto) भी कर सकता है तथा उसे संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकता है।

प्रश्न 15.
अध्यादेश का अर्थ समझाइए।
उत्तर:
जब संसद का अधिवेशन न चल रहा हो और देश में ऐसी परिस्थिति अथवा आवश्यकता उत्पन्न हो जाए कि जिसके लिए तुरन्त कानून की आवश्यकता हो तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है, जिसका प्रभाव कानून के समान होता है। अध्यादेश की अधिकतम अवधि 6 महीने तक हो सकती है, लेकिन यदि संसद अध्यादेश को मंजूरी दे दे तो अध्यादेश कानून बन जाता है। अध्यादेश संसद का अधिवेशन शुरू होने पर शीघ्र ही मंजूरी के लिए संसद के सामने रखा जाता है। यदि अध्यादेश संसद में न रखा जाए अथवा संसद अध्यादेश पर कोई कार्रवाई न करे तो अध्यादेश अधिवेशन शुरू होने की तारीख से 6 सप्ताह बाद अपने आप समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 16.
राष्ट्रपति किन परिस्थितियों में संकटकाल स्थिति की घोषणा कर सकता है? राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय संकटकाल की घोषणा अब तक कितनी बार की जा चकी है ?
उत्तर:
राष्ट्रपति निम्नलिखित तीन परिस्थितियों में संकटकाल की घोषणा कर सकता है
(1) युद्ध, बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह या आन्तरिक अशान्ति अथवा उनमें से किसी के भय की स्थिति में (अनुच्छेद 352) इस प्रकार की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा अब तक तीन बार की जा चुकी है-

  • सन् 1962 में भारत पर चीन के आक्रमण के कारण,
  • सन् 1971 में भारत पर पाकिस्तान के आक्रमणों के कारण,
  • सन् 1975 में आन्तरिक अशान्ति के कारण।

(2) किसी राज्य में संवैधानिक तन्त्र के विफल हो जाने की स्थिति में। ऐसी घोषणा राष्ट्रपति द्वारा भारत के विभिन्न राज्यों में अब तक 100 से अधिक बार की जा चुकी है। (अनुच्छेद-356)

(3) वित्तीय संकट (अनुच्छेद 360) के कारण। जब राष्ट्रपति यह अनुभव करे कि देश में वित्तीय स्थिति बहुत खराब हो गई है और देश की वित्तीय साख खतरे में है, तो वह वित्तीय संकट की घोषणा कर सकता है। इस प्रकार की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा अभी तक नहीं की गई है।

प्रश्न 17.
राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ लिखें।
उत्तर:
राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ निम्नलिखित हैं
1. बजट-संसद में बजट राष्ट्रपति के नाम पर ही पेश किया जाता है जिसमें संघ सरकार की आय-व्यय का ब्यौरा होता है।

2. धन विधेयक संसद में कोई भी धन विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के बिना पेश नहीं किया जा सकता। यह काम राष्ट्रपति के नाम पर किसी मन्त्री के द्वारा किया जाता है।

3. आकस्मिक निधि-भारत की आकस्मिक निधि राष्ट्रपति के अधीन है और उसमें से धन खर्च करने का अधिकार राष्ट्रपति को है।

4. वित्त आयोग की नियुक्ति हर पाँच वर्ष के पश्चात् राष्ट्रपति को वित्त आयोग नियुक्त करने का अधिकार है जो वित्तीय मामलों पर अपनी सिफारिश देता है।

प्रश्न 18.
भारत के उप-राष्ट्रपति का चुनाव कैसे किया जाता है?
उत्तर:
भारत के उप-राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मण्डल द्वारा किया जाता है जिसमें संसद के दोनों सदनों के सदस्य शामिल होते हैं। संसद के मनोनीत सदस्यों को भी उप-राष्ट्रपति के चुनाव में मतदान करने का अधिकार है, जबकि राष्ट्रपति के चुनाव में ऐसे सदस्यों को मतदान करने का अधिकार नहीं है। उसका चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा गुप्त मतदान की रीति से होता है।

प्रश्न 19.
संघीय मन्त्रिपरिषद् का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर:
राष्ट्रपति लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल अथवा दलीय गठबन्धन के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है। प्रधानमन्त्री की सलाह के अनुसार राष्ट्रपति अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है तथा उनमें विभागों का बँटवारा करता है। संघीय मन्त्रिपरिषद् के निर्माण में राष्ट्रपति की भूमिका औपचारिक मात्र है। हाँ, यदि लोक सभा में किसी दल अथवा दलीय गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो तो राष्ट्रपति अपने स्वविवेक से किसी को भी प्रधानमन्त्री पद के दावेदार को प्रधानमन्त्री नियुक्त कर सकता है और उसे. एक निश्चित अवधि में लोक सभा में बहुमत सिद्ध करने का आदेश दे सकता है।

प्रश्न 20.
मन्त्रिपरिषद् में कितने प्रकार के मन्त्री होते हैं ? बताइए।
उत्तर:
मन्त्रि-परिषद् में निम्नलिखित प्रकार के मन्त्री होते हैं
1. कैबिनेट मन्त्री-ये मन्त्रि-परिषद् के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मन्त्री होते हैं। इनके पास शासन के महत्त्वपूर्ण विभाग होते हैं। ये मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते हैं और शासन की नीतियों को बनाते हैं।

2. राज्य मन्त्री-ये मन्त्रिमण्डल के सदस्य नहीं होते। आमतौर पर ये केबिनेट मन्त्री के सहायक होते हैं, लेकिन इन्हें विभागों का स्वतन्त्र रूप से कार्यभार सौंपा जा सकता है।

3. उप-मन्त्री-ये तीसरी श्रेणी के मन्त्री होते हैं। ये मन्त्रिमण्डल के सदस्य नहीं होते। इन्हें विभागों का स्वतन्त्र रूप से कार्यभार नहीं सौंपा जाता।

प्रश्न 21.
मन्त्रिमण्डल तथा मन्त्रिपरिषद् में क्या अन्तर है?
उत्तर:
प्रायः मन्त्रिमण्डल तथा मन्त्रि-परिषद् को एक ही समझा जाता है, परन्तु इन दोनों में अन्तर है। यह निम्नलिखित बातों से स्पष्ट है
(1) मन्त्रि-परिषद् को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है अर्थात् इसकी स्थापना संविधान द्वारा की गई है, परन्तु मन्त्रिमण्डल की रचना संवैधानिक सुविधा के लिए की जाती है,

(2) मन्त्रि-परिषद् में सभी प्रकार के मन्त्री मन्त्रिमण्डलीय मन्त्री, राज्य मन्त्री तथा उप-मन्त्री शामिल होते हैं। परन्तु मन्त्रिमण्डल में केवल पहली प्रकार के ही (मन्त्रिमण्डलीय) मन्त्री शामिल होते हैं। दूसरे शब्दों में परिषद् का एक भाग होता है। मन्त्रिमण्डल में प्रायः 15-20 तक मन्त्री होते हैं जबकि मन्त्रि-परिषद् में 50-60 कई ससे भी अधिक मन्त्री होते हैं,

(3) मन्त्रिमण्डल का प्रत्येक सदस्य मन्त्रि-परिषद् का सदस्य होता है, परन्तु कुछ महत्त्वपूर्ण विभागों के अध्यक्ष ही मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते हैं।

प्रश्न 22.
भारतीय मन्त्रिमण्डल प्रणाली की पाँच विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भारतीय मन्त्रिमण्डल प्रणाली की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  • राष्ट्रपति नाममात्र का अध्यक्ष है,
  • मन्त्री संसद के दोनों सदनों में से लिए जाते हैं,
  • प्रधानमन्त्री मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व करता है,
  • मन्त्रिमण्डल लोक सभा के प्रति प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी है,
  • मन्त्रिमण्डल सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त के आधार पर कार्य करता है।

प्रश्न 23.
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् के पाँच कार्य संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
केन्द्रीय मन्त्रि-परिषद के कार्य इस प्रकार हैं–

  • देश में कानून व्यवस्था तथा शान्ति व्यवस्था बनाए रखना मन्त्रि-परिषद् का उत्तरदायित्व है,
  • देश की विदेश-नीति तय करना,
  • राष्ट्रपति को विभिन्न विषयों पर सलाह देना,
  • बजट तैयार करना,
  • मन्त्रि-परिषद् कानून-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 24.
मन्त्रिमण्डल के सामूहिक उत्तरदायित्व पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
भारत में संसदीय शासन-प्रणाली होने के कारण मन्त्रिमण्डल का सामूहिक उत्तरदायित्व रहता है। इसका अर्थ यह है कि मन्त्री अपने कार्यों के लिए संसद के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी हैं। मन्त्रिमण्डल में बहुमत द्वारा लिया गया निर्णय समस्त मन्त्रिमण्डल का निर्णय माना जाता है और संसद यदि किसी एक मन्त्री अथवा प्रधानमन्त्री के विरुद्ध भी अविश्वास का प्रस्ताव पास कर दे तो समस्त मन्त्रिमण्डल को अपना त्यागपत्र देना पड़ता है। सभी मन्त्री एक ही साथ तैरते हैं और एक ही साथ डूबते हैं।

प्रश्न 25.
‘मन्त्रियों के व्यक्तिगत उत्तरदायित्व’ पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
मन्त्रियों के सामूहिक उत्तरदायित्व के साथ-साथ उनका व्यक्तिगत उत्तरदायित्व भी होता है। प्रत्येक मन्त्री एक अथवा अधिक विभागों का अध्यक्ष होता है, जिनका प्रशासन चलाने के लिए वह व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता है अथवा मन्त्रालय के शासन का संचालन सुचारु रूप से नहीं होता, तो उसके लिए उस विभाग का मन्त्री व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता है। वह अपने विभाग के असैनिक अधिकारियों को उसके लिए उत्तरदायी नहीं ठहरा सकता। अपने विभाग के किसी गलत कार्य के लिए उसे त्यागपत्र भी देना पड़ सकता है। उदाहरणस्वरूप, श्री लाल बहादुर शास्त्री ने रेलवे मन्त्री के रूप में एक रेल दुर्घटना के लिए स्वयं को नैतिक रूप से उत्तरदायी ठहराते हुए अपना त्यागपत्र दे दिया था।

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प्रश्न 26.
राष्ट्रपति तथा मन्त्रिमण्डल में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
संविधान के अनुसार मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति राष्ट्रपति को परामर्श देने के लिए की जाती है। राष्ट्रपति ही प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है, प्रधानमन्त्री की सलाह से वह अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है। संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि मन्त्रिमण्डल या मन्त्रि-परिषद् के सदस्य तभी तक अपने पद पर रह सकते हैं जब तक राष्ट्रपति की इच्छा उन्हें उनके पद पर रखने की है।

वास्तव में राष्ट्रपति नाममात्र का अध्यक्ष है। वह राज्य का अध्यक्ष है, शासन का नहीं। परन्तु यह हमारे संविधान का सैद्धांतिक रूप है। व्यावहारिक परम्परा यह है कि राष्ट्रपति संसद में बहुसंख्यक दल के नेता को ही प्रधानमन्त्री पद सम्भालने के लिए कहता है। मन्त्रियों का चुनाव वास्तव में प्रधानमन्त्री ही करता है।

राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की बैठकों में भाग नहीं लेता। उनकी अध्यक्षता प्रधानमन्त्री ही करता है। प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में ही की गृह-नीति, विदेश-नीति, वित्तीय-नीति आदि को निर्धारित करता है। प्रधानमन्त्री का यह कर्तव्य है कि वह मन्त्रिमण्डल द्वारा किए गए सब फैसलों की सूचना राष्ट्रपति को दे। राष्ट्रपति यदि चाहे तो किसी भी मन्त्रिमण्डल के फैसले को फिर से विचार करने के लिए वापस भेज सकता है। राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल द्वारा दिए गए परामर्श को मानने के लिए बाध्य है।

प्रश्न 27.
प्रधानमन्त्री की नियुक्ति कैसे की जाती है?
उत्तर:
प्रधानमन्त्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, परन्तु यह कार्य राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार नहीं करता। प्रधानमन्त्री के पद पर राष्ट्रपति द्वारा प्रायः उसी व्यक्ति को नियुक्त किया जाता है, जो लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है। यदि लोक सभा में किसी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत का समर्थन प्राप्त न हो तो राष्ट्रपति किसी भी ऐसे व्यक्ति को प्रधानमन्त्री नियुक्त कर सकता है जो उसकी दृष्टि में स्थायी सरकार की स्थापना करने के योग्य हो।

प्रश्न 28.
किन परिस्थितियों में प्रधानमन्त्री की नियुक्ति राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार कर सकता है?
उत्तर:
साधारणतः प्रधानमन्त्री के पद पर राष्ट्रपति द्वारा उसी व्यक्ति को नियुक्त किया जाता है जो लोक सभा में बहुसंख्यक दल का नेता हो। परन्तु निम्नलिखित परिस्थितियों में राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार प्रधानमन्त्री की नियुक्ति कर सकता है

  • जब लोक सभा में किसी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त न हो,
  • जब लोक सभा का बहुसंख्यक दल अपने नेता का निश्चय न कर सके,
  • जब कई दल मिलकर भी संयुक्त सरकार का निर्माण न कर सके।

इन परिस्थितियों में राष्ट्रपति किसी भी ऐसे व्यक्ति को प्रधानमन्त्री के पद पर नियुक्त कर सकता है जो उसकी दृष्टि में स्थायी सरकार की स्थापना करने के योग्य होता है।

प्रश्न 29.
प्रधानमन्त्री के कोई पाँच कार्य बताएँ।।
उत्तर:
प्रधानमन्त्री के पाँच कार्य इस प्रकार हैं-

  • प्रधानमन्त्री अपने मन्त्रि-परिषद् का निर्माण करता है,
  • वह विभिन्न मन्त्रियों के बीच विभागों का विभाजन करता है तथा उसमें अपनी इच्छानुसार किसी भी समय फेर-बदल कर सकता है,
  • वह मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता करता हैं,
  • वह शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय बनाए रखता है,
  • वह राष्ट्रपति का मुख्य सलाहकार होता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्यपालिका से क्या तात्पर्य है? इसके कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
कार्यपालिका सरकार का महत्त्वपूर्ण अंग है। यह राज्य की उन इच्छाओं को कार्यान्वित करती है, जिन्हें कानून का रूप दिया जाता है। प्रायः कार्यपालिका सरकार का प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला सबसे अधिक क्रियाशील अंग है। कार्यपालिका सरकार की वह शाखा है जो कानून द्वारा व्यक्त की गई लोगों की इच्छा को लागू करती है, इसलिए साधारण व्यक्ति इसे ही सम्पूर्ण सरकार मानता है। कार्यपालिका के दो रूप हैं-संकुचित तथा व्यापक।

संकुचित अर्थों में कार्यपालिका के अन्तर्गत राज्याध्यक्ष तथा मन्त्री ही आते हैं, परन्तु व्यापक अर्थ में कार्यपालिका के अन्तर्गत राज्याध्यक्ष, मन्त्रिमण्डल सभी प्रशासनिक कर्मचारी सम्मिलित हैं। इस प्रकार राष्ट्रपति (सीमित राजतन्त्र में राजा) से लेकर एक सिपाही तक तथा एक चपरासी तक कार्यपालिका के सदस्य हैं। राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी का केवल कार्यपालिका के संकुचित अर्थ से ही सम्बन्ध है। कार्यपालिका का अर्थ अग्रलिखित परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है

1. गिलक्राइस्ट (Gilchrist) के अनुसार, “कार्यपालिका शासन का वह अंग है जो विधियों के रूप में निर्मित जन इच्छा को क्रियान्वित करता है।”

2. सी०एच० हिडलन (C.H. Hidlon) के अनुसार, “कार्यपालिका से आशय शासन के उस प्राधिकारी से है जो विधियों को क्रियान्वित करता है, प्रशासित करता है या प्रभावी बनाता है।”

3. गार्नर (Garner) के मतानुसार, “व्यापक और सामूहिक अर्थ में कार्यपालिका में वे सभी राज्य कर्मचारी और एजेन्सियाँ शामिल हैं जिनका सम्बन्ध राज्य की उन इच्छाओं को क्रियान्वित करने से है जिन्हें कानून के रूप में सुनिश्चित करके अभिव्यक्त किया जा चुका है।” उपरोक्त परिभाषाओं से कार्यपालिका का अर्थ स्पष्ट हो जाता है।

कार्यपालिका के कार्य (Functions of the Executive)-आधुनिक युग में राज्य और सरकार का स्वरूप बदल चुका है और इसने कल्याणकारी रूप धारण कर लिया है। इसके फलस्वरूप सरकार के एक प्रमुख अंग कार्यपालिका का कार्यक्षेत्र विस्तृत हो गया है और कार्यक्षेत्र लगातार बढ़ता जा रहा है। आधुनिक समय में कार्यपालिका को निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं

1. कूटनीतिक कार्य (Diplomatic Functions) कार्यपालिका को अन्य देशों से सम्बन्ध स्थापित करने पड़ते हैं। इस क्षेत्र में विदेशों में राजदूत तथा अन्य राजनीतिक प्रतिनिधि भेजना, विदेशों से आए राजदूत को अपने यहाँ मान्यता देना, अन्य राज्यों को मान्यता देना अथवा न देना, सन्धि तथा समझौते करना, युद्ध तथा शान्ति की घोषणा करना आदि कार्य शामिल हैं। यह ठीक है कि इन कार्यों पर विधानमण्डल का निरीक्षण तथा निर्देशन भी रहता है, लेकिन फिर भी राज्य के विदेशी सम्बन्धों में कार्यपालिका ही सबसे अधिक प्रभावशाली है।

2. प्रशासनिक कार्य (Administrative Functions) कार्यपालिका का मुख्य कार्य विधानमण्डल द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन करवाना तथा शासन चलाना है। इस कार्य के लिए अलग-अलग प्रशासनिक विभागों का गठन किया जाता है।

3. सैनिक कार्य (Military Functions) कार्यपालिका को देश की रक्षा के लिए सैनिक कार्य करने पड़ते हैं। बाहरी आक्रमण तथा आन्तरिक उपद्रवों से राज्य की रक्षा करने के लिए जल, थल, वायु तीनों प्रकार की सेनाएँ संगठित की जाती हैं। कार्यपालिका युद्ध काल में सेना का सफलतापूर्वक संचालन करती है। यद्यपि तीनों सेनाओं के सेनापति होते हैं, परन्तु राज्याध्यक्ष ही सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति होता है। वह ही युद्ध आरम्भ तथा समाप्त करने की घोषणा करता है। आन्तरिक विद्रोह दबाने के लिए भी वह सेना का प्रयोग कर सकता है।

4. न्यायिक कार्य (Judicial Functions) कार्यपालिका न्याय करने का अधिकार भी रखती है। न्यायालय द्वारा दण्डित व्यक्तियों को राज्याध्यक्ष क्षमा-दान दे सकता है, सजा को कम कर सकता है अथवा कुछ समय के लिए रुकवा सकता है। वह किसी अवसर पर आम माफी की घोषणा भी कर सकता है जिससे बड़ी संख्या में कैदियों की मुक्ति हो जाती है। कार्यपालिका न्यायालयों का संगठन करती है तथा न्यायाधीशों की नियुक्ति भी करती है।

5. विधायनी कार्य (Legislative Functions) कार्यपालिका विधायनी क्षेत्र में भी अधिकार रखती है। वही विधानमण्डल के अधिवेशन बुलाती, स्थगित करती तथा निम्न सदन को भंग करके नए चुनाव करवाती है। यद्यपि कानून विधानमण्डल ही बनाता है, परन्तु अधिकांश विधेयक कार्यपालिका द्वारा ही पेश किए जाते हैं तथा उन्हें पास करवाने में भी मन्त्रियों का विशेष प्रभाव रहता है। कार्यपालिका अध्यक्ष की स्वीकृति दिए बिना कोई विधेयक कानून नहीं बनता। राज्याध्यक्ष अध्यादेश भी जारी कर सकता है। इस प्रकार कार्यपालिका कानून बनाने में भी सहायक सिद्ध होती है।

6. वित्तीय कार्य (Financial Functions) कार्यपालिका ही सरकार का बजट तैयार करती है तथा उसे संसद में पेश करके पास करवाती है। कानून के अनुसार कर, ऋण तथा माल गुजारी एकत्रित करती है। विभिन्न प्रशासनिक विभागों के खर्च के लिए धन की स्वीकृति विधान-मण्डल से पास करवाती है।

7. विविध कार्य (Miscellaneous Functions)-प्रो० गार्नर ने कार्यपालिका अध्यक्ष के कुछ विभिन्न कार्यों का उल्लेख भी किया है। कुछ देशों के राज्याध्यक्षों को व्यावसायिक उपाधियाँ प्रदान करने, विदेशियों को नागरिकता देने, अधिकारियों की विधवाओं तथा अनाथ बच्चों को पेन्शन तथा भत्ते दिलाने, प्राइवेट नियमों को कानूनी करार देने अथवा निरस्त करने तथा राज्य की सुरक्षा के लिए यथोचित कदम उठाने आदि के भी अधिकार प्राप्त हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)-उपर्युक्त वर्णित कार्यों से स्पष्ट होता है कि कार्यपालिका को विभिन्न कार्य करने पड़ते हैं, परन्तु कार्यपालिका का मुख्य कार्य शासन का प्रबन्ध करना और कानूनों को लागू करना है। शासन का क लिए उसको और भी काम सौंपे जाते हैं। प्रत्येक देश में एक जैसी कार्यपालिका नहीं है, अतः कार्य भी एक जैसे नहीं हैं।

प्रश्न 2.
कार्यपालिका के विभिन्न रूपों का वर्णन करो।
उत्तर:
कार्यपालिका एक तरह की नहीं कई प्रकार की होती है। आज विश्व में सरकार एक तरह की नहीं है। अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरह की सरकारें हैं। इसलिए कार्यपालिकाएँ भी एक नहीं, भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं जो निम्नलिखित हैं

1. नाममात्र की कार्यपालिका (Nominal Executive)-जब शासन का कार्य किसी व्यक्ति के नाम पर चलाया जाता है तथा वास्तविक शक्तियों का प्रयोग कोई और करता है तो उसे नाममात्र की कार्यपालिका कहा जाता है। इंग्लैण्ड की रानी और भारत का राष्ट्रपति नाममात्र के कार्यपालिका अध्यक्ष हैं। इनकी सभी संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल करता है। अध्यक्ष का केवल नाम ही रहता है।

2. वास्तविक कार्यपालिका (Real Executive)-जब कोई व्यक्ति वास्तविक रूप से सभी कार्यपालिका की शक्तियों का प्रयोग करता है जो संविधान तथा कानून द्वारा उसको दी गई है तो उसे वास्तविक कार्यपालिका कहा जाता है। अमेरिका का राष्ट्रपति, भारत तथा इंग्लैण्ड के मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका हैं।

3. एकल कार्यपालिका (Single Executive)-जब शासन की सारी शक्तियों का प्रयोग एक ही व्यक्ति करता है तो उसे एकल कार्यपालिका कहा जाता है। अमेरिका, चिल्ली, मैक्सिको, पीरू, ब्राजील आदि देशों में एकल कार्यपालिका है। इन देशों के तियों को ही सम्पूर्ण शासन सत्ता प्राप्त है। इनके विधानमण्डल भी हैं, परन्तु मन्त्रिमण्डल के सदस्य राष्ट्रपति के निजी सचिवों के रूप में कार्य करते हैं।

4. बहुसंख्यक कार्यपालिका (Plural Executive) बहुसंख्यक कार्यपालिका में कार्यपालिका शक्तियाँ एक से अधिक व्यक्तियों में निहित होती हैं। रूस तथा स्विट्ज़रलैण्ड में बहुसंख्यक कार्यकारिणी परिषद् है।

5. अध्यक्षात्मक कार्यपालिका (Presidential Executive) अध्यक्षात्मक कार्यपालिका में एक निर्वाचित राष्ट्रपति प्रमख शासनाध्यक्ष होता है। सारे शासन के लिए वही उत्तरदायी होता है। वह अपनी सहायता के लिए सचिव अथवा मन्त्री नियुक्त करता है, परन्तु इन मन्त्रियों का विधानमण्डल से कोई सम्बन्ध नहीं होता तथा न ही वे विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा दक्षिणी अमेरिका के देशों में अध्यक्षात्मक कार्यपालिका है।

6. संसदीय कार्यपालिका (Parliamentary Executive) संसदीय कार्यपालिका उसे कहा जाता है जिसमें मुख्य कार्यपालिका अध्यक्ष नाममात्र की सत्ता रखता है तथा वास्तविक सत्ता का प्रयोग मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है। मन्त्रिमण्डल अपने सभी कार्यों – के लिए व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होता है। दोनों एक दूसरे पर नियन्त्रण रखते हैं। भारत, इंग्लैण्ड, कनाडा, जापान आदि देशों में संसदीय कार्यपालिका की स्थापना की गई है।

7. वंशानुगत कार्यपालिका (Hereditary Executive)-जिस राज्य में राजतन्त्र स्थापित है, वहाँ वंशानुगत अथवा पैतृक कार्यपालिका होती है। एक राजा अथवा रानी के मरने के पश्चात् उसका बेटा अथवा बेटी गद्दी पर बैठती है तो समस्त कार्यपालिका शक्तियाँ उसको प्राप्त होती हैं।

8. निर्वाचित कार्यपालिका (Elected Executive)-जिस राज्य में कार्यपालिका अध्यक्ष जनता द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से एक निश्चित अवधि के लिए निर्वाचित किया जाता है, उसे निर्वाचित कार्यपालिका कहा जाता है। भारत, अमेरिका आदि देशों में निर्वाचित कार्यपालिका है।

9. मनोनीत कार्यपालिका (Nominated Executive)-उपनिवेशों तथा संघ की इकाइयों में कार्यपालिका अध्यक्ष किसी उच्च सत्ता द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड के गवर्नर राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। भारतीय संघ में भी राज्यों के गवर्नर राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।

10. राजनीतिक कार्यपालिका (Political Executive)-अस्थायी अथवा राजनीतिक कार्यपालिका मन्त्रिमण्डल के सदस्य हैं जो बहुमत तक अपने पदों पर बने रहते हैं। विधानमण्डल इन्हें पहले भी अपने पद से हटा सकते हैं। इनका पद अस्थायी होता है। इनकी नियुक्ति राजनीतिक दलों से होने के कारण इन्हें राजनीतिक कार्यपालिका भी कहा जाता है। इनका पद स्थायी नहीं होता, ये कभी भी स्वयं अपने पद से त्यागपत्र दे सकते हैं अथवा इन्हें एक निश्चित अवधि से पहले भी हटाया जा सकता है, इसलिए इन्हें अस्थायी कार्यपालिका कहा जाता है।

11. स्थायी कार्यपालिका (Permanent Executive)-प्रशासन के अधिकारी तथा अन्य कर्मचारी स्थायी कार्यपालिका कहलाते हैं। इन्हें एक निश्चित आयु पर नौकरी दी जाती है और निश्चित आयु तक वे अपने पद पर बने रहते हैं। पद से निवृत्त होने पर उन्हें पेन्शन दी जाती है। सरकार के बदलने पर भी ये अपने पद पर बने रहते हैं।

12. तानाशाही कार्यपालिका (Dictatorial Executive) यदि कोई सैनिक अधिकारी सैनिक क्रान्ति के बल पर शासन सत्ता अपने नियन्त्रण में ले लें तो वह तानाशाह कहलाता है। आज भी बहुत-से देशों में किसी-न-किसी रूप में तानाशाही सरकारें हैं। तानाशाह का वंशानुगत अथवा संवैधानिक आधार नहीं होता। – निष्कर्ष (Conclusion)-इस प्रकार कार्यपालिका के विविध रूपों का अध्ययन करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वर्तमान युग में सैद्धान्तिक तौर पर कार्यपालिका के रूपों को स्थायी रूप में निश्चित करना सरल नहीं है। प्रत्येक देश की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति भिन्न है, इसलिए सब देशों में एक-सी कार्यपालिका नहीं है। आज कार्यपालिका विशुद्ध रूप में नहीं है, वह अनेक रूपों का मिश्रण है।

प्रश्न 3.
कार्यपालिका की सत्ता के विस्तार के लिए उत्तरदायी मुख्य कारकों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सैद्धान्तिक दृष्टि से विधानपालिका सर्वोच्च है और कार्यपालिका उसके अधीन होती है। संसदीय शासन-प्रणाली में तो विधानमण्डल का कार्यपालिका पर पूरा नियन्त्रण होता है और विधानमण्डल को कार्यपालिका के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास करके उसे पद से हटाने का अधिकार होता है, परन्तु व्यवहार में आजकल कार्यपालिका की शक्तियों में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

इंग्लैण्ड में तो संसद मन्त्रिमण्डल के हाथों का खिलौना मात्र बनकर रह गई है। रैम्जे म्यूर (Ramsay Muir) का कहना है कि इंग्लैण्ड में मन्त्रिमण्डल की शक्तियों का इतना विस्तार हो गया है कि वहाँ मन्त्रिमण्डल की तानाशाही स्थापित हो गई है। कार्यपालिका की शक्तियों में वृद्धि के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. दलीय पद्धति (Party System)-आधुनिक लोकतन्त्रीय राज्यों में सरकार दलीय पद्धति के आधार पर चलाई जाती है। जिस राजनीतिक दल को विधानमण्डल में बहुमत प्राप्त हो जाता है, उसी दल की सरकार बनती है। दलीय अनुशासन के कारण कार्यपालिका को विधानमण्डल में बहुमत का समर्थन प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती। उसके द्वारा संसद में कुछ भी पास करवाया जा सकता है।

2. निम्न सदन को भंग करने का अधिकार (Power of Dissolution of the Lower House)-संसदीय शासन-प्रणाली में कार्यपालिका के अध्यक्ष को संसद के निम्न सदन को भंग करने का अधिकार होता है। विधानमण्डल इस भय के कारण कार्यपालिका की नीतियों एवं काननों को स्वीकृति दे देती है।

3. जन-कल्याणकारी राज्य की धारणा (Concept of Welfare State)-वर्तमान युग में राज्य को जन-कल्याणकारी संस्था समझा जाता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य जनता की भलाई के लिए अनेक कार्य करता है, जिससे कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में बहुत वृद्धि हो गई है।

4. प्रदत्त व्यवस्थापन (Delegated Legislation) काम की अधिकता, विशेष ज्ञान की कमी व समय की कमी के कारण विधानमण्डल के लिए प्रत्येक कानून को पूरे विस्तृत रूप में पास करना सम्भव नहीं होता। इसके परिणामस्वरूप, विधानमण्डल कानून .. की रूपरेखा का निर्माण करके विस्तृत नियम तथा अधिनियम बनाने का कार्य कार्यपालिका पर छोड़ देती है। इस सम्बन्ध में कार्यपालिका द्वारा बनाए गए नियम तथा अधिनियम भी उसी प्रकार से लागू होते हैं जैसे संसद द्वारा पास किए गए कानून। इससे भी कार्यपालिका की शक्ति में वृद्धि हुई है।

5. नियोजन (Planning)-आज का युग नियोजन का युग है। सभी देश अपने विकास के लिए योजनाएँ बनाते हैं। ये योजनाएँ तैयार करना, इन्हें लागू करना तथा इनका मूल्यांकन करना कार्यपालिका द्वारा ही सम्पन्न होता है। इससे कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार हुआ है।

6. आधुनिक समस्याओं की जटिलता (Complicated Nature of Moderm Problems)- वर्तमान समय में राज्य को अनेक जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ता है. जिसके लिए विशेष ज्ञान, योग्यता तथा अनुभव की आवश्यकता होती है। विधानमण्डल के सामान्य योग्यता के निर्वाचित सदस्य इन जटिल समस्याओं को समझने तथा उन्हें सुलझाने की योग्यता नहीं रखते। कार्यपालिका ही इन सभी समस्याओं को निपटाती है, जिससे उसके महत्व में काफी वृद्धि हुई है। उपरोक्त कारणों से कार्यपालिका की शक्तियों का विस्तार हुआ है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 4 कार्यपालिका

प्रश्न 4.
भारत के राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
अथवा
अनुच्छेद 54 तथा 55 के अन्तर्गत भारत के राष्ट्रपति के चुनाव की क्या प्रक्रिया बताई गई है? अब तक राष्ट्रपति पद के लिए कितनी बार चुनाव हुए हैं?
अथवा
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होता है?
उत्तर:
भारत में संघीय सरकार की सभी कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति को प्रदान की गई हैं। अनुच्छेद 53 में कहा गया है कि केन्द्र की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जिसका प्रयोग वह सीधे या अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के माध्यम से करेगा। संघ का सारा शासन राष्ट्रपति के नाम पर चलाया जाता है। वह राज्य का अध्यक्ष है, परन्तु वह नाममात्र का अध्यक्ष है और अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग मन्त्रिमण्डल के परामर्श से करता है। राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।

योग्यताएँ (Qualifications)-राष्ट्रपति पद के लिए निश्चित की गई योग्यताएँ इस प्रकार हैं-

  • वह भारत का नागरिक हो,
  • वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो,
  • वह संसद का सदस्य बनने की योग्यता रखता हो,
  • वह भारत सरकार, राज्य सरकार या इनके नियन्त्रण में किसी स्थानीय सरकार के अधीन किसी लाभकारी पद पर आसीन न हो। राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, राज्यपाल, मन्त्री आदि के पद लाभकारी पद नहीं माने जाते,
  • वह राष्ट्रपति चुने जाने के पश्चात् संसद या राज्य विधान-मण्डल के किसी सदन का सदस्य नहीं रह सकता,
  • उसे नामांकन-पत्र के साथ 15000 रुपए की धनराशि सुरक्षा निधि के रूप में जमा करवानी पड़ती है,
  • उसके नाम का प्रस्ताव 50 निर्वाचकों द्वारा किया जाना चाहिए और 50 निर्वाचकों द्वारा अनुमोदित होना चाहिए।

राष्ट्रपति का चुनाव (Election of the President)-संविधान की धारा 54 के अनुसार, “राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष रीति से एक निर्वाचक मण्डल द्वारा होगा जिसमें संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेंगे।” इस प्रकार संसद के दोनों सदनों तथा राज्य विधानसभाओं के मनोनीत (Nominated) सदस्यों को राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं दिया गया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राज्यों में द्वितीय सदन विधानपरिषद् के सदस्यों को भी राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं है क्योंकि विधान परिषद् के साथ में दूसरा सदन सभी राज्यों में नहीं है।

संसद तथा राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति का चुनाव एक विशेष चुनाव पद्धति, जिसे संविधान द्वारा ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत पद्धति’ (Proportional Representation and Single Transferable Vote System) का नाम दिया गया है, के अनुसार करेंगे। चुनाव गुप्त मतदान द्वारा होगा। इसके अतिरिक्त केन्द्र प्रशासित प्रदेशों, संघीय क्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली एवं पाण्डिचेरी विधानसभा को सन् 1997 में कानून बनाकर भाग लेने का अधिकार दिया गया।

राष्ट्रपति को वस्तुतः राष्ट्र के प्रतिनिधि का रूप देने के लिए संविधान में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने वाले, राज्य विधानसभाओं के सदस्यों तथा संसद के सदस्यों के मतों में समानता हो और जहाँ तक हो सके सभी राज्यों के प्रतिनिधित्व में एकरूपता हो। राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों की संख्या समान न होने के कारण तथा विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या संसद के निर्वाचित सदस्यों की संख्या से बहुत अधिक होने के कारण राज्यों में एकरूपता और संघ तथा राज्यों में समानता के उद्देश्य की पूर्ति एक व्यक्ति को एक मत देने के सिद्धान्त द्वारा नहीं हो सकती, इसलिए इसके स्थान पर एक मतदाता को कई मत देने के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

एक मतदाता के मतों की संख्या को जानने के लिए एक नई विधि की व्यवस्था की गई है। इस विधि के अनुसार किसी राज्य की विधानसभा का प्रत्येक सदस्य उतने मत दे सकता है जितने राज्य की जनसंख्या को विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग करके और भागफल को 1000 से भाग करके जो शेषफल आए। यदि भाग करने के पश्चात् शेषफल 500 से कम न हो तो मतों की संख्या में एक और मत की वृद्धि की जाती है। साधारणतः एक राज्य की विधानसभा के सदस्यों के मतों की संख्या इस प्रकार निश्चित की जाती है
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संविधान के मसौदे में मुम्बई राज्य का हवाला देकर इस विधि (Formula) की व्याख्या की गई है, जिसके अनुसार उस समय मुम्बई राज्य की जनसंख्या 2,08,49,840 तथा विधानसभा के सदस्यों की संख्या 208 थी।
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अधिकार है, क्योंकि शेष 239 पाँच सौ से कम हैं, इसलिए उन्हें छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक सदस्य 100 मत दे सकता है। संघ तथा राज्यों में समानता लाने के लिए संसद के सभी निर्वाचित सदस्यों को उतने ही मत देने का अधिकार प्राप्त होता है जितने मत सभी राज्य की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा दिए जाते हैं। इस प्रकार संसद का प्रत्येक निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में उतने मत डाल सकता है जितने कि राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के लिए नियत सम्पूर्ण मत संख्या को संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की सम्पूर्ण संख्या से भाग देने से आए।
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यदि भाग देने पर शेष आधा या आधे से अधिक हो तो इसे एक मानकर प्रत्येक संसद सदस्य के मतों की संख्या में एक मत और जोड़ वधान के मसौदे में दिए गए उदाहरण के अनुसार यदि यह मान लिया जाए कि सभी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मतों की कुल संख्या 74,940 है तथा संसद के निर्वाचित सदस्यों की संख्या 750 है तो संसद के प्रत्येक सदस्य को \(\frac{74,940}{750}=99 \frac{23}{25}\) मत देने का अधिकार होगा, क्योंकि \(\frac{23}{25}\) आधे से अधिक है, इसलिए संसद का प्रत्येक सदस्य 100 मत दे सकता है।

राष्ट्रपति के चुनाव का प्रबन्ध चुनाव आयोग (Election Commission) द्वारा किया जाता है। विधानसभाओं के सदस्य अपने-अपने राज्य की राजधानी में मतदान करते हैं, जबकि संसद सदस्य नई दिल्ली में मतदान करते हैं।

राष्ट्रपति चुनाव में एक विधायक के मत का मूल्य निम्न विधि से निकालते हैं
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राष्ट्रपति चुनाव में एक सांसद के मत का मूल्य
राज्य के कुल निर्वाचित विधायकों के मतों का मूल्य ………………………………………..5,49,474
लोकसभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या …………………………………………543
राज्यसभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या ………………………………………… 233
कुल सांसदों की संख्या …………………………………………543+233=776
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=708.085 यानी 776 सांसदों के कुल मतों का मूल्य =708 × 776 = 5,49,408
चौदहवें राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेने वाले कुल मतदाताओं की संख्या =
कुल विधायक (4120)+ कुल सांसद (776)=4,896
सभी मतदाताओं के कुल मतों का मूल्य =549474+549408=10,98,882

मतदान तथा मतगणना की विधि (The System of Polling and Counting of Votes)-राष्ट्रपति का निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व चुनाव प्रणाली (Proportional Representation and Single Transferable Vote System) के आधार पर होता है। साधारणतः इस प्रणाली का प्रयोग एक व्यक्ति के चुनाव के लिए नहीं किया जाता। भारत में राष्ट्रपति के चुनाव के लिए इस प्रणाली को इसलिए अपनाया गया है कि निर्वाचित होने वाले व्यक्ति को वास्तविक बहसंख्या मत प्राप्त हों।

इस प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक मतदाता अपनी पसन्द (Preference) जाहिर करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक मतदाता जितने राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार खड़े हों, उतनी पसन्दें जाहिर कर सकता है। व्यवहार में प्रत्येक मतदाता को मतदान करने के लिए एक-एक पर्ची दी जाती है और उस पर्ची पर सभी उम्मीदवारों के नाम लिखे होते हैं।

प्रत्येक मतदाता क्रमानुसार इन उम्मीदवारों के नामों के सामने नम्बर डालकर अपनी पसन्द प्रकट करता है और जो उम्मीदवार आवश्यक मत प्राप्त कर ले उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। इस प्रणाली में आवश्यक मतों की संख्या. इस प्रकार निश्चित की जाती है कि सबसे पहले अशुद्ध मतों को रद्द कर दिया जाता है और फिर शुद्ध मतों के आधार पर कोटा निश्चित किया जाता है जो निम्न प्रकार से है
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इस प्रणाली की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है। यदि यह मान लिया जाए कि कुल मतों की संख्या 10,000 है तथा राष्ट्रपति पद के लिए चार उम्मीदवार ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ तथा ‘घ’ हैं और उन्हें पहली पसन्द में इस प्रकार मत प्राप्त हुए हैं
क = 4,000
ख = 3,000
ग = 1,600
घ = 1,400

साधारणतः बहुमत प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर इनमें से ‘क’ को चुना जाना चाहिए था, परन्तु आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार ऐसा नहीं होता। इसके अनुसार यदि आवश्यक मतों की संख्या (Quota) को देखा जाए तो जीतने वाले उम्मीदवार के लिए \(\frac{10000}{1+1}+1=5001\) मतों को प्राप्त करना आवश्यक है। इस स्थिति में इनमें से किसी भी उम्मीदवार को सफल घोषित नहीं किया जा सकता।

इस दशा में सबसे कम मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को असफल समझकर चुनाव क्षेत्र से निकाल दिया जाता है तथा उसके मतों को मतदाताओं की दूसरी पसन्द के आधार पर दूसरे उम्मीदवारों को हस्तान्तरित कर दिया जाता है। वर्तमान स्थिति में ‘घ’ को पहली पसन्द में सबसे कम मत प्राप्त हुए हैं, इसलिए उसे निर्वाचन क्षेत्र से निकाल दिया जाएगा और उसके मतों को दूसरी पसन्द के आधार पर ‘क’, ‘ख’ तथा ‘ग’ में विभक्त कर दिया जाएगा। यदि ‘घ’ के 1400 मतदाताओं की दूसरी पसन्द इस प्रकार हो ‘क’ = 200, ‘ख’ = 800, ‘ग’ = 400 तो इन मतों को हस्तान्तरित करने के बाद तीनों उम्मीदवारों की स्थिति इस प्रकार होगी
क = 4000 + 200 = 4200
ख = 3000 + 800 = 3800
ग = 1600 + 400 = 2000

अभी भी किसी उम्मीदवार को आवश्यक संख्या में मत प्राप्त नहीं हुए। इस दशा में ‘ग’ को निर्वाचन क्षेत्र से निकाल दिया जाएगा और उसके 2000 मतों को तीसरे पसन्द के आधार पर ‘क’ तथा ‘ख’ में बाँट दिया जाएगा। यदि तीसरे पसन्द में ‘क’ को 700 तथा ‘ख’ को 1300 मत प्राप्त हों तो हस्तान्तरण करने के पश्चात् स्थिति इस प्रकार होगी
क = 4200 + 700 = 4900
ख = 3800 + 1300 = 5100

परिणामस्वरूप, क्योंकि ‘ख’ को आवश्यक संख्या से अधिक मत प्राप्त हो गए हैं, इसलिए उसे निर्वाचित घोषित किया जाएगा। इस विधि का विशेष लाभ यह है कि इससे अधिक-से-अधिक मतदाताओं की पसन्द का पता चलता है और कोई भी व्यक्ति संसद में बहुमत दल से सम्बन्धित न होने पर भी राष्ट्रपति चुना जा सकता है।

इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि केवल पहली पसन्द में अधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार ही नहीं चुना जा सकता, कोई दूसरा उम्मीदवार भी चुना जा सकता है; जैसे उपर्युक्त उदाहरण में पहली पसन्द में ‘क’ को सबसे अधिक मत मिले, परन्तु अन्त में ‘ख’ को चुना गया। इसके विपरीत यदि तीसरी पसन्द में ‘क’ को 801 मत प्राप्त होते और ‘ख’ को 1199 मत प्राप्त होते तो परिणाम ‘क’ के पक्ष में होता, क्योंकि इस दशा में ‘क’ को आवश्यक संख्या में मत प्राप्त हो जाते हैं। जिस प्रकार
क = 4200 + 801 = 5001
ख = 3800 + 1199 = 4999

इस प्रक्रिया को पहली बार अगस्त, 1969 में राष्ट्रपति डॉ० जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात् राष्ट्रपति के चुनाव के लिए अपनाया गया, क्योंकि इससे पहले चारों चुनावों में निर्णय पहली पसन्द के आधार पर ही होता रहा और निर्वाचित उम्मीदवारों को पहली पसन्द में आवश्यक संख्या में मत प्राप्त होते रहे, परन्तु सन् 1969 के चुनाव में पहली पसन्द के आधार पर किसी भी उम्मीदवार को आवश्यक मत प्राप्त न होने के कारण दूसरी पसन्द के आधार पर निर्णय किया गया जिसके अनुसार राष्ट्रपति श्री वी०वी० गिरि निर्वाचित हुए।

15वें राष्ट्रपति का चुनाव, (14वाँ कार्यकाल) जुलाई, 2017 (The 15th Presidential Election, (14th Tenure) July, 2017) भारत के 15वें राष्ट्रपति का चुनाव 17 जुलाई, 2017 को सम्पन्न हुआ। इस चुनाव में सतारूढ़ एन०डी०ए० प्रत्याशी श्री रामनाथ कोविंद तथा यू०पी०ए० समर्थित प्रत्याशी श्रीमती मीरा कुमार मुख्य प्रतिद्वन्द्वी थे। इस चुनाव में निर्वाचक मण्डल के कुल सदस्यों 4896 (सांसद 776 एवं विधायकों 4120) में से कुल 4851 (768 सांसद एवं 4083 विधायकों) सदस्यों ने अपने मत का प्रयोग किया, जिनके मतों का कुल मूल्य 10,90,300 था। इनमें से 77 मत पत्र जिनके मतों का मूल्य 20,942, था, अवैध घोषित किए गए।

इस प्रकार वैध मत पत्रों की संख्या 4774 रही. जिनका कुल मत मूल्य 10,69,358 था। इनमें से विजयी प्रत्याशी श्री रामनाथ कोविंद को 7,02,044 (65.65%) मत एवं श्रीमती मीरा कुमार को 3,67,314 (34.35%) मत प्राप्त हुए। इस प्रकार राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित होने के लिए 50% से अधिक मत प्राप्त होने की आवश्यक शर्त को 20 जुलाई, 2017 को हुई मतगणना में पूर्ण करने के पश्चात श्री रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति चुनाव में विजयी घोषित किया गया जिन्हें 25 जुलाई, 2017 को तात्कालिक मुख्य न्यायाधीश जे०एस० खेहर के द्वारा संसद के केन्द्रीय कक्ष में आयोजित समारोह में उन्हें देश के सर्वोच्च पद की शपथ दिलाई।

भारत के नवनियुक्त राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद का जन्म 1 अक्टूबर, 1945 को उत्तर प्रदेश के कानपुर के निकट परौंख में हुआ था, जो राष्ट्रपति का कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व 16 अगस्त, 2015 से 20 जून, 2017 तक बिहार के राज्यपाल पद पर थे। चुनाव प्रक्रिया की आलोचना (Criticism of the Method of Election)-राष्ट्रपति के पद के लिए अपनाई गई चनाव-प्रणाली की निम्नलिखित बातों के आधार पर आलोचना की गई है-(1) राष्ट्रपति के चनाव के लिए अपनाई गई।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation) कहना गलत है। यह प्रणाली केवल वहीं अपनाई जा सकती है जहाँ निर्वाचित होने वाले सदस्यों की संख्या कम-से-कम तीन हो । डॉ० एम०पी० शर्मा के अनुसार इस प्रणाली को ‘विकल्पनात्मक मत प्रणाली’ (Alternative Vote System) कहना अधिक उचित है, (2) राष्ट्रपति की चुनाव-प्रणाली बहुत जटिल है। साधारण व्यक्ति इसे आसानी से नहीं समझ सकता।

यद्यपि राष्ट्रपति की चुनाव-प्रणाली में कई त्रुटियाँ हैं, परन्तु ये मुख्यतः सैद्धान्तिक हैं, व्यावहारिक नहीं। राष्ट्रपति के पद के लिए अभी तक हुए चुनावों में ये कठिनाइयाँ सामने नहीं आई हैं। राष्ट्रपति का कार्यकाल (Tenure of President)-भारत के राष्ट्रपति का चुनाव पाँच वर्ष के लिए होता है। यह समय उस शुरू होता है जिस दिन राष्ट्रपति अपना पद सम्भालता है। एक व्यक्ति कितनी ही बार इस पद के लिए चुना जा सकता है। राष्ट्रपति चाहे तो वह पाँच वर्ष से पहले भी अपने पद से त्याग-पत्र दे सकता है।

राष्ट्रपति पर महाभियोग (Impeachment of President)-राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष है, लेकिन संसद केवल उसे महाभियोग के द्वारा ही उसके पद से हटा सकती है, जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 61 में किया गया है। इस विधि के अंतर्गत संसद के दोनों सदनों में से जो सदन आरोप लगाना चाहता है, उसको 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षरों सहित इस प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास 14 दिन पूर्व भेजना पड़ता है। जब सदन में महाभियोग विषय पर चर्चा चल रही होती है, तो राष्ट्रपति ऐसे समय पर स्वयं उपस्थित होकर या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा आरोपों का जवाब सदन में दे सकता है।

यदि वह सदन 2/3 बहुमत से यह प्रस्ताव पारित कर दे तो दूसरा सदन उन आरोपों की जाँच-पड़ताल करता है। यदि दूसरा सदन भी.2/3 बहुमत से उन आरोपों को सही मान ले, तो राष्ट्रपति को अपना पद रिक्त करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उप-राष्ट्रपति, राष्ट्रपति का कार्यभार संभालता है, लेकिन 6 महीने के अंदर-अंदर नए राष्ट्रपति का निर्वाचन अनिवार्य है।

वेतन तथा भत्ते (Salary and Allowances) वर्तमान में राष्ट्रपति का मासिक वेतन 5 लाख रुपए प्रतिमाह निश्चित किया गया तथा मूल वेतन का 50 प्रतिशत सेवानिवृत्ति पर पेंशन के रूप में प्राप्त होगा जो कि 1 जनवरी, 2016 से प्रभावी किया गया है। इसके अतिरिक्त उसे कई प्रकार के भत्ते तथा सुविधाएँ भी दी जाती हैं, जिन्हें समय-समय पर संसद निश्चित करती है। उसके निवास के लिए बिना किराए का सरकारी भवन दिया जाता है, जिसे ‘राष्ट्रपति भवन’ कहते हैं।

इसके अतिरिक्त उसे जीवन-पर्यन्त सरकार की ओर से चिकित्सा की सहायता दी जाती है। राष्ट्रपति का वेतन तथा भत्ते भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) में से दिए जाते हैं जिस पर संसद का मतदान नहीं होता। संसद राष्ट्रपति के वेतन तथा भत्तों में परिवर्तन कर सकती है, परन्तु इन्हें राष्ट्रपति के कार्यकाल में कम नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति अपनी इच्छा से ऐच्छिक वेतन समर्पण कानून, 1950 (Voluntary Surrender of Salaries Act, 1950) के अनुसार अपने वेतन का कुछ भाग त्याग सकता है जिस प्रकार डॉ० राजेन्द्र प्रसाद तथा डॉ० राधाकृष्णन केवल 2,500 तथा श्री नीलम संजीवा रेड्डी 3,000 रुपए मासिक वेतन के रूप में लेते थे। राष्ट्रपति के वेतन पर आयकर भी लगता है।

इसके अतिरिक्त यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि मई, 2000 में संसद द्वारा पारित विधेयक के अनुसार पूर्व राष्ट्रपति की मृत्यु के पश्चात् उसकी पत्नी को आजीवन पेन्शन और सरकारी मकान उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की गई है। इससे पूर्व ऐसा प्रावधान नहीं था। विधेयक के अनुसार, पूर्व राष्ट्रपति को मिलने वाली पेन्शन का आधा भाग उसकी पत्नी को आजीवन प्राप्त होगा।

राष्ट्रपति द्वारा शपथ (Oath by the President)-प्रत्येक राष्ट्रपति और प्रत्येक उस व्यक्ति को, जो राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा हो अथवा उसके कृत्यों का निर्वाह करता हो, अपना पद ग्रहण करने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष निम्नलिखित रूप में शपथ लेनी पड़ती है। शपथ का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 60 में किया गया है।

“मैं (नाम) ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं श्रद्धापूर्वक भारत के राष्ट्रपति पद का कार्यपालन (अथवा राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वाहन) करूँगा तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण तथा प्रतिरक्षण करूँगा और मैं भारत की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहूँगा।”

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 4 कार्यपालिका

प्रश्न 5.
भारत के राष्ट्रपति की शक्तियों की विवेचना कीजिए। अथवा भारत के राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रपति राज्य का अध्यक्ष है और राष्ट्र का शासन उसी के नाम पर चलाया जाता है। राष्ट्रपति एक संवैधानिक अध्यक्ष है और अपनी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल की सलाह के अनुसार करता है।

राष्ट्रपति की शक्तियाँ (Powers of the President)-राष्ट्रपति की शक्तियों को हम दो भागों में बाँट सकते हैं

(क) शान्तिकालीन शक्तियाँ तथा
(ख) आपातकालीन शक्तियाँ।

(क) शान्तिकालीन शक्तियाँ (Powers in Peace Time)-राष्ट्रपति की शान्तिकालीन शक्तियाँ निम्नलिखित हैं

  • कार्यकारी शक्तियाँ (Executive Powers) राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं
  • राज्य का अध्यक्ष (Head of the State)-राष्ट्रपति राज्य का अध्यक्ष है और भारत का समस्त शासन उसके नाम पर चलता है। सभी कानून उसके नाम से लागू होते हैं।

(1) मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति (Appointment of Council of Ministers):
राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है और उसकी सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है। प्रधानमन्त्री की सलाह से राष्ट्रपति मन्त्रियों में विभागों का बँटवारा करता है और बाद में भी उनके विभाग बदल सकता है। राष्ट्रपति मन्त्रियों को प्रधानमन्त्री की सिफारिश पर पदच्युत भी कर सकता है। प्रधानमन्त्री केवल उसी व्यक्ति को नियुक्त किया जाता है जो लोकसभा में बहुमत का नेता हो।

(2) उच्च अधिकारियों की निय क्ति (Appointment of High Officers):
राष्ट्रपति को कुछ महत्त्वपूर्ण नियुक्तियाँ करने का अधिकार है जैसे कि राज्यपाल, उप-राज्यपाल, महालेखा परीक्षक, संघीय लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य, भारत का मुख्य न्यायाधीश तथा उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, चुनाव आयुक्त, महान्यायवादी (Advocate General), वित्त आयोग के सदस्य आदि, परन्तु ये नियुक्तियाँ भी राष्ट्रपति अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि मन्त्रिमण्डल की सलाह से करता है।

(3) सैनिक शक्तियाँ (Military Powers):
राष्ट्रपति भारत की सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति (Supreme Commander of the Armed Forces):
है और सशस्त्र सेनाओं के तीनों भागों (Army, Navy and Air Force) के सेनाध्यक्षों की नियक्ति करता है तथा समस्त सेना उसी के अधीन मानी जाती है।

(4) विदेशी मामलों से सम्बन्धित शक्तियाँ (Powers Relating to Foreign Affairs):
राष्ट्रपति विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरे देशों में भेजे जाने वाले राजदूत राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं और दूसरे देशों से आने वाले राजदूत राष्ट्रपति को ही अपने नियुक्ति-पत्र पेश करते हैं तथा वहीं उनको स्वीकृत करता है। राष्ट्रपति ही दूसरे देशों के साथ युद्ध तथा शान्ति की घोषणा करता है और सभी सन्धियाँ उसके नाम पर की जाती हैं।

(5) केन्द्र शासित प्रदेशों का प्रशासक (Administrator of Union Territories):
केन्द्र प्रशासित प्रदेशों; जैसे दिल्ली, पुद्दचेरी, अरुणाचल प्रदेश का प्रशासन राष्ट्रपति के नाम पर चलता है और उन प्रदेशों के उच्च अधिकारी राष्ट्रपति के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं।

(6) राज्यों को निर्देश देना (To Issue Directions to the States):
राष्ट्रपति को राज्यपालों को निर्देश देने की शक्ति प्राप्त है। वह राज्य सरकार को संघीय कानूनों के पालन के लिए, उनके आपसी सम्बन्धों में समन्वय लाने के लिए तथा कुछ राज्यपालों को जन-जातियों के विकास के लिए आवश्यक निर्देश जारी कर सकता है और इनका पालन करते हुए राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होता है।

(7) राष्ट्रपति कुछ आयोगों वित्त आयोग, चुनाव आयोग, राज्य भाषा आयोग तथा पिछड़े वर्गों की दशा को सुधारने से सम्बन्धित आयोग आदि-की भी नियुक्ति करता है।

(8) राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह प्रधानमन्त्री से उसके मन्त्रिमण्डल द्वारा लिए गए निर्णयों के सम्बन्ध में सूचना प्राप्त कर सकता है। वह अपनी किसी बात को प्रधानमन्त्री द्वारा मन्त्रिमण्डल के पास पहुंचा सकता है।

2. विधायिनी शक्तियाँ (Legislative Powers)-राष्ट्रपति को कुछ विधायिनी शक्तियाँ भी प्राप्त हैं

(1) राष्ट्रपति संसद का एक अंग है (President is a part of the Parliament):
संघ की विधायिनी शक्तियाँ संसद को प्राप्त हैं और राष्ट्रपति उसका एक अभिन्न अंग है। अनुच्छेद 79 के अन्तर्गत यह स्पष्ट है कि राष्ट्रपति तथा लोकसभा व राज्यसभा नामक दोनों सदनों से मिलकर ही संसद बनती है।

(2) संसद का अधिवेशन बुलाना तथा स्थगित करना (To Summon and Prorogue the Session of Parliament):
राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के अधिवेशन एक ही समय में या अलग-अलग समय में बुला सकता है। अधिवेशन को बढ़ा सकता है और उसे स्थगित भी कर सकता है। उसे 6 महीने के अन्दर संसद का दूसरा अधिवेशन भी अवश्य बुलाना पड़ता है। यह काम वह मन्त्रिमण्डल की सलाह से करता है।

(3) संसद को सम्बोधित करना (To Address the Parliament):
राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों को इकट्ठा या अलग-अलग भी सम्बोधित कर सकता है। संसद का पहला और वर्ष का पहला अधिवेशन राष्ट्रपति के अभिभाषण से ही आरम्भ होता है, जिसमें वह सरकार की नीति और आवश्यकताओं पर प्रकाश डालता है। राष्ट्रपति का भाषण सरकार ही तैयार करती है।

(4) ससद में कुछ सदस्यों को मनोनीत करना (Nomination of Some Members in the Parliament):
संसद में कुछ सदस्य मनोनीत करने का अधिकार है। इस अधिकार का प्रयोग वह मन्त्रिमण्डल की सलाह से करता है। वह राज्यसभा में 12 सदस्य ऐसे मनोनीत करता है, जिन्होंने विज्ञान, साहित्य, कला, समाज सेवा आदि के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त की हो। राष्ट्रपति लोकसभा में भी एंग्लो-इण्डियन समुदाय के दो सदस्य मनोनीत कर सकता था। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि दिसम्बर, 2019 में पारित 104वें संवैधानिक संशोधन द्वारा एंग्लो-इण्डियन जाति की मनोनयन प्रणाली को समाप्त करने का निर्णय किया गया।

(5) लोकसभा को भंग करना (Power to Dissolve the Lok Sabha):
राष्ट्रपति लोकसभा को इसकी अवधि पूरी होने से पहले भी भंग करके दोबारा चुनाव करवा सकता है, परन्तु इस शक्ति का प्रयोग भी राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह से ही करता है, अपनी इच्छा से नहीं। 1991 में चन्द्रशेखर सरकार के परामर्श पर तत्कालीन राष्ट्रपति आर० वेंकटरमन ने लोकसभा भंग की थी। इसी प्रकार तत्कालीन राष्ट्रपति श्री० के०आर० नारायणन ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के परामर्श पर । वर्ष 1999 में लोकसभा को भंग किया था।

(6) विधेयकों पर स्वीकृति (Assent on the Bills):
संसद द्वारा पास किया गया कोई भी विधेयक उस समय तक कानून नहीं बन सकता, जब तक उस पर राष्ट्रपति की स्वीकृति न हो जाए। राष्ट्रपति चाहे तो उस पर अपनी स्वीकृति देने की बजाए उसे संसद के पास पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है। संसद ऐसी स्थिति में उस विधेयक पर राष्ट्रपति की सिफारिशों के सम्बन्ध में पुनः विचार करती है और यदि संसद उस विधेयक को मूल रूप में ही दोबारा पास कर दे तो उस पर राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत का राष्ट्रपति अमेरिकी राष्ट्रपति की भाँति विधेयक को अस्वीकार नहीं कर सकता। वह ज्यादा-से-ज्यादा स्वीकृति देने में देरी कर सकता है। राज्यों के राज्यपाल भी कुछ विशेष विषयों से सम्बन्धित विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज सकते हैं। संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

(7) कुछ विधेयकों को संसद में पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति (Prior approval of the President for Introducing Certain Bills in Parliament):
संसद में कुछ विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति के बिना पेश नहीं किए जा लिए नए राज्यों को बनाने वर्तमान राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करने, राज्यों के नाम बदलने वाले विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकति के बाद ही संसद में पेश किए जा सकते हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति श्री आर० वेंकटरमन ने सांसदों के पेन्शन सम्बन्धी विधेयक को इसीलिए स्वीकार करने से मना कर दिया था, क्योंकि उस पर उनकी पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई थी।

(8) अध्यादेश जारी करना (To Issue Ordinances):
अनुच्छेद 123 के अन्तर्गत यह व्यवस्था है कि जब संसद का अधिवेशन न हो रहा हो तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है। ये अध्यादेश कानून की तरह ही लागू होते हैं, परन्तु संसद का अधिवेशन आरम्भ होते ही इन्हें संसद के सामने रखा जाना आवश्यक है। ये अध्यादेश संसद का अधिवेशन आरम्भ होने की तिथि से 6 सप्ताह तक लागू रह सकते हैं। संसद इसे पहले भी अस्वीकार कर सकती है। संसद के द्वारा स्वीकृत होने पर यह कानून का रूप ले लेता है।

3. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers) राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ निम्नलिखित हैं
(1) बजट (Budget)-संसद में बजट राष्ट्रपति के नाम पर ही पेश किया जाता है, जिसमें संघ सरकार की आय-व्यय का ब्यौर होता है।
(2) धन विधेयक (Money Bill)-संसद में कोई भी धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बिना पेश नहीं किया जा सकता।
(3) आकस्मिक निधि (Contingency Fund) भारत की आकस्मिक निधि राष्ट्रपति के अधीन है और उसमें से धन खर्च करने का अधिकार राष्ट्रपति को है।
(4) वित्त आयोग की नियुक्ति (Appointment of Finance Commission) हर पाँच वर्ष के पश्चात् राष्ट्रपति को वित्त आयोग नियुक्त करने का अधिकार है जो वित्तीय मामलों पर अपनी सिफारिशें देता है।

4. न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers):
राष्ट्रपति को बहुत-सी न्यायिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं जिनमें से कुछ प्रमुख न्यायिक शक्तियाँ निम्नलिखित हैं

(1) (न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of Judges):
राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का अधिकार है। वह इसका प्रयोग मन्त्रिमण्डल की सलाह से ही करता है। .

(2) क्षमादान का अधिकार (Power of Pardon):
अनुच्छेद 72 के अधीन राष्ट्रपति किसी व्यक्ति को जिसे न्यायालय द्वारा दण्डित किया गया हो, क्षमादान दे सकता है। उसके दण्ड के स्वरूप को बदल सकता है, दण्ड को कुछ समय के लिए लागू होने से रोक सकता है।

(3) उच्चतम न्यायालय से सलाह लेना (To seek advice from the Supreme Court):
राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह किसी मामले पर उच्चतम न्यायालय की सलाह ले सकता है और उच्चतम न्यायालय को अपना परामर्श देना पड़ता है, परन्तु इसके अनुसार चलने के लिए वह बाध्य नहीं है।

4) विशेषाधिकार (Privileges):
राष्ट्रपति को कुछ न्यायिक विशेषाधिकार भी प्राप्त हैं जैसे कि राष्ट्रपति अपने अधिकार और शक्तियों के प्रयोग के सम्बन्ध में किसी भी न्यायालय के सामने उत्तरदायी नहीं है। कोई न्यायालय उसके विरुद्ध उसके कार्यकाल में कोई फौजदारी कार्रवाई नहीं कर सकता और उसे बन्दी नहीं बनाया जा सकता। राष्ट्रपति के विरुद्ध दीवानी मुकद्दमा चलाने के लिए भी उसे कम-से-कम दो महीने की पूर्व सूचना दी जानी आवश्यक है। .

(ख) आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers)-संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत युद्ध, विदेशी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह से उत्पन्न संकट का सामना करने के लिए राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल के लिखित परामर्श से राष्ट्रीय आपात्काल की घोषणा कर सकता है। अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राज्य में संवैधानिक तन्त्र विफल हो जाने पर राष्ट्रपति उस राज्य में आपातकाल लागू कर सकता है। अनुच्छेद 360 के अन्तर्गत राष्ट्रपति वित्तीय आपास्थिति की घोषणा मन्त्रिमण्डल के परामर्श से कर सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हैं, लेकिन संसदात्मक व्यवस्था होने के नाते राष्ट्रपति की इन शक्तियों का उपयोग प्रधानमन्त्री सहित मन्त्रिमण्डल करता है, लेकिन राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होने के कारण विशेष गरिमा रखता है।

प्रश्न 6.
भारत के राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों का वर्णन करो।
अथवा
राष्ट्रपति की आपात्कालीन शक्तियों का विवरण दीजिए।
अथवा
भारत के राष्ट्रपति की आपात्कालीन शक्तियों का आलोचनात्मक निरीक्षण कीजिए।
उत्तर:
संकटकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers)-संकटकाल में प्रशासन संबंधी सारी शक्तियाँ राष्ट्रपति के हाथों में केन्द्रित हो जाती हैं। ये शक्तियाँ बहुत अधिक और व्यापक हैं। इन शक्तियों का प्रयोग भी अन्य शक्तियों की भांति वह प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह से करता है। संकट तीन प्रकार का माना गया है-
(क) युद्ध, बाह्य आक्रमण या देश में सशस्त्र विद्रोह से पैदा हुआ संकट,
(ख) किसी राज्य में सवैधानिक व्यवस्था के विफल होने से उत्पन्न संकट,
(ग) वित्तीय स्थिति के बिगड़ने से पैदा हुआ संकट।

बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह या आन्तरिक अशान्ति से उत्पन्न संकट (EmergencyArising Out of War, External Invasion, Armed Rebellion or Internal Disturbance) यदि राष्ट्रपति को इस बात का विश्वास हो जाए कि भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा युद्ध, विदेशी आक्रमण अथवा आन्तरिक सशस्त्र विद्रोह के कारण खतरे में है तो वह संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत आपात्कालीन घोषणा कर सकता है।

सन् 1978 में पारित 44वें संशोधन के पश्चात् अनुच्छेद 352 में कहा गया है कि इस प्रकार की घोषणा मंत्रि-परिषद् द्वारा लिखित सिफारिश पर ही की जाएगी। राष्ट्रपति इस लिखित सिफारिश को दोबारा विचार करने के लिए मंत्रि-परिषद् के पास वापस भेज सकता है। अन्त में, मंत्रि-परिषद् की बात को राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार करना पड़ता है।

संसद का अनुमोदन (Approval of the Parliament)-राष्ट्रपति की इस उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा 30 दिन के अन्दर स्वीकृति प्रदान कर दी जानी चाहिए। यदि लोकसभा का अधिवेशन नहीं हो रहा है तो राज्यसभा स्वीकृति प्रदान कर सकती है। जैसे ही लोकसभा का अधिवेशर आरम्भ होता है तो 30 दिन के अन्दर राष्ट्रपति की घोषणा को स्वीकृति प्रदान की जा सकती है। एक समय में यह घोषणा 6 महीने तक लागू हो सकती है। यदि संसद 6 महीने के पश्चात् स्वीकृति प्रदान नहीं करती तो यह घोषणा समाप्त हो जाएगी।

44वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था भी की गई है कि यदि लोकसभा के 1/10 सदस्य लिखित रूप में घोषणा को समाप्त करने का नोटिस देते हैं तो इस पर विचार करने के लिए 14 दिन के अन्दर लोकसभा का अधिवेशन बुलाया जाना अनिवार्य है और यदि इस अधिवेशन में लोकसभा के उपस्थित एवं मतदान देने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित कर दिया जाता है तो ऐसी उद्घोषणा की समाप्ति राष्ट्रपति द्वारा आदेश जारी करके कर दी जाती है।

उद्घोषणा का प्रभाव (Effects of the Proclamation)-राष्ट्रपति की इस आपात्कालीन घोषणा का निम्नलिखित प्रकार से बहुत व्यापक प्रभाव होता है-
(1) इस घोषणा से सम्पूर्ण देश का शासन राष्ट्रपति के हाथों में आ जाता है,

(2) राज्य-सूची में दिए गए विषयों पर संसद को कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है,

(3) संघ सरकार किसी भी राज्य को आदेश दे सकती है कि वह अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग किस प्रकार करे और राज्यपाल राष्ट्रपति की आज्ञानुसार कार्य करे,

(4) संविधान के 19वें अनुच्छेद द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकार-विचार और भाषण की स्वतन्त्रता, शान्तिपूर्वक एकत्रित होने का अधिकार, संघ या समुदाय बनाने की स्वतन्त्रता, देश में कहीं भी निवास का अधिकार, आने-जाने की स्वतन्त्रता का अधिकार तथा आजीविका चलाने या व्यापार के अधिकार आदि को स्थगित किया जा सकता है,

(5) राष्ट्रपति को अधिकार होगा कि वह किसी अन्य मौलिक अधिकार को अमल में लाने के लिए नागरिकों को न्यायालय में जाने से रोक सकता है,

(6) वह संघ तथा राज्यों के बीच राजस्व के बँटवारे में इच्छानुसार परिवर्तन कर सकता है,

(7) इन सबका परिणाम यह होता है कि राज्यों की आन्तरिक स्वायत्तता नष्ट हो जाती है और केन्द्रीय सरकार का राज्यों की सरकारों पर नियन्त्रण स्थापित हो जाता है। देश में संघात्मक सरकार की जगह एकात्मक सरकार स्थापित हो जाती है।

युद्ध संबंधी आपात्कालीन घोषणा पहली बार चीन के आक्रमण के कारण 26 अक्तूबर, 1962 को राष्ट्रपति द्वारा लागू की गई थी। पाकिस्तान के सन् 1965 में आक्रमण के कारण यह घोषणा समाप्त नहीं की जा सकी। सन् 1967 के चुनाव के पश्चात् 10 जनवरी, 1968 को यह घोषणा समाप्त की गई। दिसम्बर, 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के कारण राष्ट्रपति को दोबारा राष्ट्रीय आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी।

अभी बाह्य संकट की घोषणा समाप्त भी नहीं हुई थी कि जून, 1975 में आन्तरिक आपातकाल की घोषणा कर दी गई। सन् 1977 में लोकसभा के चुनावों में जनता पार्टी की सफलता के पश्चात दोनों तरह की आपात्कालीन स्थितियों को 21 मार्च, 1977 को समाप्त कर दिया गया।

(ख) राज्यों में संवैधानिक सरकार की विफलता (Failure of Constitutional Machinery in the States)-जब राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा दी गई सूचना से अथवा किसी और सूत्र से यह विश्वास हो जाए कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा रहा है अथवा नहीं चलाया जा सकता, तो राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार उस राज्य में संवैधानिक आपात स्थिति की घोषणा करके राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता है।

संसद से स्वीकृति (Approval from Parliament)-राष्ट्रपति की इस घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा दो मास के अन्दर स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए अन्यथा दो मास के पश्चात् यह समाप्त हो जाएगी। 44वें संशोधन में यह व्यवस्था की गई है कि ऐसी घोषणा 6-6 मास करके एक वर्ष के लिए लागू की जा सकती है।

विशेष परिस्थितियों में 3 वर्ष तक इस घोषणा की अवधि को बढ़ाया जा सकता है। इसमें चुनाव आयोग द्वारा चुनाव न करा पाने की स्थिति भी शामिल है। पंजाब में इसी कारण से राष्ट्रपति शासन लगभग पाँच वर्ष तक चलता रहा जिसके लिए संविधान में सन् 1990 और 1991 में क्रमशः 67वाँ एवं 68वाँ संवैधानिक संशोधन करना पड़ा। अब तक भारतीय संघ के विभिन्न राज्यों में लगभग 130 से भी अधिक बार सवैधानिक आपात् स्थिति के अन्तर्गत राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है।

घोषणा के प्रभाव (Effects of the Proclamation)

(1) राष्ट्रपति सम्बन्धित राज्य के प्रशासन को पूर्ण या आंशिक रूप से अपने हाथ में ले लेता है। राज्य का मंत्रिमंडल भंग हो जाता है और राज्य के प्रशासनिक कार्यों को वह राज्यपाल या अन्य किसी
(2) राज्य के विधानमंडल को भंग करके या स्थगित करके उसकी शक्तियाँ संसद को दे सकता है,
(3) इस उद्घोषणा से राज्य अथवा राज्यों की आन्तरिक स्वायत्तता समाप्त हो जाती है,
(4) राष्ट्रपति संसद को अथवा अन्य किसी अधिकारी को उस राज्य के सम्बन्ध में कानून बनाने की शक्ति सौंप सकता है।

(ग) वित्तीय आपात स्थिति (Financial Emergency) यदि राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि देश की आर्थिक स्थिति अथवा साख को खतरा है तो संविधान के अनुच्छेद 360 के अन्तर्गत वह वित्तीय आपात स्थिति की घोषणा कर सकता है। यह घोषणा भी दो महीने के लिए होती है और इस अवधि में संसद की स्वीकृति लेनी पड़ती है। संसद की स्वीकृति मिल जाने पर यह घोषणा तब तक लागू रहेगी जब तक कि राष्ट्रपति इसे दूसरी घोषणा द्वारा समाप्त नहीं कर देता।

उद्घोषणा का प्रभाव (Effects of the Proclamation)

(1) वित्तीय आपात स्थिति की घोषणा के समय राष्ट्रपति राज्यों और संघ के सभी कर्मचारियों के, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी शामिल हैं, वेतन तथा भत्ते कम कर सकता है,

(2) राज्यों के धन-विधेयकों को अपनी स्वीकृति के लिए मंगवा सकता है,

(3) केन्द्र तथा राज्यों की साख को दोबारा स्थापित करने के लिए अन्य आवश्यक कदम उठा सकता है,

(4) राष्ट्रपति राज्यों के प्रति ऐसे कदम उठा सकता है जो उसकी दृष्टि में वित्तीय साख बनाए रखने के लिए आवश्यक हों। अभी तक भारत में वित्तीय आपात की घोषणा करने का अवसर नहीं आया है।

राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों का मूल्यांकन (Evaluation of the Emergency Powers of the President)- राष्ट्रपति की उपर्युक्त संकटकालीन शक्तियों को देखकर प्रायः यह विचार प्रकट किया जाता है कि इन शक्तियों के दुरुपयोग से देश में लोकतन्त्र समाप्त किया जा सकता है। इस विचारधारा का समर्थन करते हुए संविधान सभा के अनेक सदस्यों ने संविधान के अनुच्छेदों की कड़ी आलोचना की थी।

के०टी० शाह (K.T. Shah) ने राष्ट्रपति के इन अधिकारों को संविधान में “सबसे अधिक प्रतिक्रियात्मक अध्याय का आखिरी एवं शानदार आभूषण कहा है।” इसी प्रकार श्री एच०वी० कामथ (Sh. H.V. Kamath) ने कहा है, “विश्व के लोकतांत्रिक देशों के किसी भी संविधान में इस संकटकालीन अध्याय के समान अन्य कहीं कोई अध्याय नहीं मिलता।”

इन शक्तियों की संविधान सभा में आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था, “मुझे डर है कि इस अकेले अध्याय से हम तानाशाही राज्य, पुलिस-राज्य अथवा एक ऐसे राज्य की स्थापना करने जा रहे हैं जो उन सब आदर्शों और सिद्धान्तों के विपरीत होगा जिन्हें हम पिछले कई वर्षों से समक्ष रखे हुए हैं, ऐसा राज्य जहाँ पर लाखों मासूम पुरुषों तथा स्त्रियों के अधिकार तथा स्वतन्त्रता पर निरन्तर आघात होगा; एक ऐसा राज्य जहाँ यदि शांति होगी तो यह शांति केवल श्मशान एवं मरुस्थल की शांति होगी।”

राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों की निम्नलिखित बातों के आधार पर आलोचना की गई है

1. मौलिक अधिकार अर्थहीन हो जाएंगे (Fundamental rights will become Meaningless):
राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि ये मौलिक अधिकारों को अर्थहीन बना देती हैं। इन शक्तियों के द्वारा राष्ट्रपति छेद 19 में वर्णित सातों स्वतन्त्रताओं और अनच्छेद 32 को भी निलंबित कर सकता है। राष्ट्रपति की इन शक्तियों को किसी न्यायालय में भी चुनौती नहीं दी जा सकती। अतः सत्तालोभी व्यक्ति इन शक्तियों का प्रयोग तानाशाह बनने के लिए कर सकता है।

2. राज्यों की आर्थिक स्वतन्त्रता समाप्त हो जाएगी (The Financial Autonomy of the States will be Nullified):
संकटकालीन समय में राष्ट्रपति राज्य सरकारों को वित्तीय मामलों में विभिन्न प्रकार के आदेश दे सकता है, जिनसे राज्य की आर्थिक स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है। इसी सम्बन्ध में हृदयनाथ कुंजरू (H.N. Kunzru) ने कहा था, “इनसे राज्य की वित्तीय स्वतन्त्रताओं को बड़ा धक्का पहुंचेगा।”

3. राज्यों में विरोधी दलों की सरकार का दमन हो सकता है (Opposition Governments in States can be Suppressed):
विरोधी दलों को प्रारम्भ से ही यह लगता था कि सत्ताधारी दल के द्वारा राज्यों में विरोधी दल की सरकार को दबाने के लिए राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग कर सकता है। वह राज्य सरकार को पदच्युत करने की धमकी देकर उसे डरा सकता है या उसे पदच्युत भी कर सकता है। राष्ट्रपति ने इस शक्ति के प्रयोग द्वारा 1969 ई० में केरल की साम्यवादी दल की सरकार को भंग किया था।

4. न्यायपालिका के अधिकारों को सीमित किए जाने की व्यवस्था खतरनाक है (Provision for limitation of Judicial Power is Dangerous):
राष्ट्रपति द्वारा की गई संकटकालीन घोषणा को राज्य के किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। अगर राष्ट्रीय हित में संकटकाल सम्बन्धी अनुच्छेदों को उचित मान भी लिया जाए तो भी न्यायपालिका के अधिकारों को कम किए जाने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए थी।

संविधान के 38वें संशोधन के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई थीं कि अनुच्छेद 352 तथा 356 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा की गई। आपात्काल की घोषणाओं के औचित्य को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, लेकिन अब 44वें संशोधन के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा संकटकाल की घोषणा को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

5. संघीय विरोधी (Anti-Federal):
यह भी बड़े आश्चर्य का विषय है कि संकटकाल की घोषणा के समय संघीय ढाँचा . एकात्मक सरकार में बदल जाए और इकाइयों की सरकारें समाप्त कर दी जाएँ। इसी कारण संविधान सभा में टी०टी० कृष्णमाचारी (T.T.Krishnamachari) ने कहा था, “भारतीय संविधान साधारण काल में संघात्मक तथा युद्ध एवं अन्य संकटकालीन परिस्थितियों में एकात्मक रूप धारण कर लेता है।”

6. न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए नकारात्मक सिद्धान्त (Negative Principle in respect of Independence of Judiciary):
वित्तीय संकटकाल की अवस्था में राष्ट्रपति न्यायाधीशों के वेतन को कम करके उनकी स्वतन्त्रता को हानि पहुँचा सकता है। उपर्युक्त आलोचनाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि संविधान निर्माता राष्ट्रीय सुरक्षा को नागरिकों की स्वतन्त्रताओं और अधिकारों से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे, इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति को अधिक शक्तियाँ प्रदान की।

शक्तियों का औचित्य (Justification of Emergency Powers)-इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियाँ बहुत अधिक विस्तृत एवं विशाल हैं, लेकिन इसके बावजूद भी इन शक्तियों को संविधान में स्थान देना अनिवार्य समझा गया है। इसके आधार अग्रलिखित हैं

1. ऐतिहासिक अनुभव (Historical Experience):
भारत का प्राचीन इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब कभी भी भारत की केन्द्र सरकार कमज़ोर पड़ गई, तभी हमें हानि उठानी पड़ी, इसलिए केन्द्र सरकार को शक्तिशाली बनाना आवश्यक है।

2. राष्ट्रीय सुरक्षा का भार केन्द्र सरकार पर है (National Security depends upon the Federal Government):
भारत में संघीय प्रणाली को अपनाया गया है, लेकिन देश में संघीय रूप का इतना महत्त्व नहीं है, जितना कि राष्ट्रीय सुरक्षा का है। देश की सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत हित का त्याग कर देना चाहिए। डॉ० अम्बेडकर (Dr. Ambedkar) के शब्दों में, “केवल केन्द्र ही समस्त देश की एक समान भलाई के लिए कार्य कर सकता है। इसलिए केन्द्र को संकटकाल में राज्य सरकारों की शक्तियाँ ग्रहण करने का अधिकार देना कोई अन्याय नहीं है।”

3. महाभियोग (Impeachment):
यदि राष्ट्रपति एक निरंकुश तथा वास्तविक शासक बनने का प्रयास करेगा, तब संसद उसे महाभियोग का दोष लगाकर हटा भी सकती है।

4. राष्ट्रपति एक संवैधानिक मुखिया है (President a Constitutional Head):
भारत में इंग्लैण्ड की भाँति संसदीय प्रणाली अपनाई गई है तथा भारत का राष्ट्रपति एक संवैधानिक मुखिया है। राष्ट्रपति को प्रधानमन्त्री एवं मन्त्रिमण्डल की सलाह से ही शासन के कार्य का संचालन करना होता है। व्यावहारिक (Practical) रूप में ऐसा कोई अवसर पैदा हो ही नहीं सकता, जब राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह के बिना देश के शासन का संचालन कर सके।

5. संसद की स्वीकृति (Approval of the Parliament):
जब भारत के राष्ट्रपति के द्वारा संकटकालीन घोषणा की जाती है, तो उसके बाद निश्चित समय में संसद की स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है। अगर संसद राष्ट्रपति की संकटकाल की घोषणा को स्वीकृति प्रदान न करे, तो संकटकाल की घोषणा उसी समय समाप्त हो जाती है। इसके अलावा संविधान के 44वें संशोधन द्वारा यह भी व्यवस्था की गई है कि लोकसभा एक प्रस्ताव पास करके किसी भी समय आपात्कालीन घोषणा को समाप्त कर सकती है।

6. मौलिक अधिकारों से देश की सुरक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण (Security of the Country is more important than ntal Rights):
जब हमारे देश में संकटकाल की घोषणा लागू होती है, तब संविधान के 19वें अनुच्छेद द्वारा दी गई स्वतन्त्रताएँ भंग की जा सकती हैं, लेकिन मौलिक अधिकारों के स्थगन का यह अभिप्राय नहीं है कि संकटकाल की घोषणा से मौलिक अधिकार स्वयंमेव रद्द हो जाते हैं। विपत्ति के समय मौलिक अधिकारों की अपेक्षा देश की सुरक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।

7. वित्तीय संकटकालीन शक्तियों का होना आवश्यक है (Financial Powers are also very Essential):
संविधान में … वित्तीय संकट का प्रावधान करना भी उचित है। जब संविधान का निर्माण किया जा रहा था, उस समय भारत की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी, तब हमारे संविधान बनाने वालों ने दूरदर्शिता का परिचय दिया।

क्या संकटकाल में राष्ट्रपति तानाशाह बन सकता है? (Can the President become a Dictator during Emergency?)-उपर्युक्त संकटकालीन शक्तियों के अध्ययन से यह मालूम पड़ता है कि भारतीय राष्ट्रपति संकटकाल में तानाशाह बन सकता है। वह सीज़र, जार या फ्यूरर का स्थान ले सकता है। संकटकालीन शक्तियों के उपबन्ध राष्ट्रपति को इतना शक्तिशाली बना देते हैं कि वह केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों को अपने अधीन कर लेता है। भारतीय राष्ट्रपति संकटकाल की घोषणा केवल वास्तविक संकट आने पर ही नहीं करता, बल्कि संकटकाल की आशंका मात्र पर भी ऐसा कर सकता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति का मात्र संतुष्ट होना ही काफी है और वह मन्त्रिमण्डल की सलाह भी नहीं लेता।

वह लोकसभा को भंग करके 6-8 महीने तक मनमाने ढंग से शासन कर सकता है। वह नागरिकों के अधिकारों व स्वतन्त्रताओं का हनन कर सकता है। कार्यपालिका व विधानपालिका क्षेत्र में उसकी शक्तियाँ असीमित हो जाती हैं। केन्द्र और राज्यों की वित्तीय व्यवस्था पर उसका नियंत्रण काफी मात्रा में बढ़ जाता है।

इस प्रकार आलोचकों ने भारतीय राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों की तुलना जर्मनी के वाईमर संविधान से की है जिसके आधार पर हिटलर तानाशाह बन गया था। कुछ लोगों का कहना यह है कि राष्ट्रपति केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल से गुप्त मंत्रणा (Confidential Meeting) करके लम्बी अवधि तक संकटकालीन समय को जारी रख सकता है और हर बार लोकसभा को भंग करके तानाशाह बन सकता है। इस प्रकार यह ठीक है कि इन्हीं संकटकालीन शक्तियों के आधार पर ही यह आशंका व्यक्त की गई है कि वह एक तानाशाह बन सकता है।

यह आशंका उचित नहीं है, यह तो मात्र बॉल की खाल उतारने वाली बात है। भारत में संसदीय प्रणाली की व्यवस्था की गई है। कोई भी राष्ट्रपति तानाशाह बनने की सोचेगा ही नहीं। इस प्रकार की कल्पना करना ही गलत है कि राष्ट्रपति तानाशाह बनेगा। यही नहीं, कोई भी प्रधानमन्त्री या मन्त्रिमण्डल इन उपबन्धों के आधार पर राष्ट्रपति को तानाशाह बनने में सहायता नहीं करेगा। राष्ट्रपति बिना संसद की सहायता के एक दिन भी प्रशासन नहीं चला सकता।

निष्कर्ष (Conclusion)-अतः यह कहा जा सकता है कि संकटकालीन शक्तियों के बारे में जो सन्देह प्रकट किए गए हैं, वे निराधार हैं। यह बिल्कुल सत्य है कि भारत के राष्ट्रपति को जितनी संकटकालीन शक्तियाँ प्रदान की गई हैं उतनी किसी भी प्रजातान्त्रिक देश के अध्यक्ष को प्रदान नहीं की गई हैं। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि इन शक्तियों से अधिकारों एवं स्वतन्त्रताओं का हनन होता है। इनसे प्रजातन्त्र की आधारशिला को धक्का पहुँचता है। इससे राज्यों की स्वतन्त्रता को भी आघात पहुँचता है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि देश रहेगा तो सब-कुछ रहेगा। अधिकार और स्वतन्त्रता की तुलना में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है। किसी भी कीमत पर राष्ट्रीय एकता और अस्तित्व को बनाए रखना है।

ध्यान रहे इन आपात्कालीन शक्तियों का होना जरूरी है, लेकिन उतना ही आवश्यक है इन शक्तियों पर अंकुश लगाना, इसलिए 44वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 352 पर अंकुश लगाया है और उसके दुरुपयोग की सम्भावना तो समाप्त हो गई है, परन्तु अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई-न-कोई प्रबन्ध करना पड़ेगा।

अगर ऐसा न किया गया तो किसी भी दल की केन्द्रीय सरकार अपने राजनीतिक लोगों के लिए और विपक्षी दलों को आघात पहुँचाने के लिए सक्रिय हो सकती है। अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकारिया आयोग ने सुझाव दिए हैं कि इस अनुच्छेद का कम-से-कम प्रयोग हो। राज्य सरकारों को पहले चेतावनी देनी चाहिए। राज्यपाल की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में रखी जानी चाहिए। वास्तविकता यह है कि यदि विरोधी दल अपनी भूमिका के प्रति सजग हैं और जनता में अपने राजनीतिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक हैं तो इन संकटकालीन उपबन्धों का गलत प्रयोग हो ही नहीं सकता।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 4 कार्यपालिका

प्रश्न 7.
भारत के राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान गणराज्यीय व्यवस्था स्थापित करता है, जिसमें राष्ट्रपति को व्यापक रूप से शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। उसे संविधान के रक्षक की भूमिका दी गई है, वह राज्य का अध्यक्ष है और समस्त कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियाँ उसके अधीन हैं। संसद से अभिप्राय राष्ट्रपति सहित संसद है लेकिन भारतीय संविधान गणराज्य के साथ-साथ संसदात्मक व्यवस्था भी स्थापित करता है, जिसमें राज्याध्यक्ष तो नाममात्र का अध्यक्ष होता है, वास्तविक शक्तियाँ तो प्रधानमन्त्री सहित मन्त्रिमण्डल में पाई जाती हैं।

भारतीय राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति क्या है? यह प्रारम्भ से ही विवाद का विषय रहा है। संविधान सभा में इसके अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने आशा व्यक्त की थी कि भारतीय राष्ट्रपति संसदात्मक पद्धति वाले देशों की भाँति राज्याध्यक्ष की भूमिका निभाएगा। संविधान के अनुच्छेद 74 में कहा गया कि राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मन्त्रि-परिषद् होगी जिसका प्रधान प्रधानमन्त्री होगा, लेकिन

इसमें स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया था कि राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह को मानने के लिए बाध्य होगा। डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने 1959 में राष्ट्रपति के रूप में विधि-विशेषज्ञों से कहा था कि वे देखें कि क्या भारतीय संविधान में राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह मानने के लिए बाध्य है अथवा किन्हीं क्षेत्रों में स्व-विवेकी अधिकार भी रखता है?

इस विवाद को समाप्त करने तथा राष्ट्रपति तथा मन्त्रिमण्डल के बीच सम्बन्धों को पूर्णतया विवाद रहित बनाने के उद्देश्य से 42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा अनुच्छेद 74 में संशोधन किया गया जिसमें कहा गया कि राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल द्वारा दिए गए परामर्श के अनुसार कार्य करेगा, लेकिन जनता पार्टी की सरकार ने 1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 74 को ज्यों-का-त्यों रखते हुए राष्ट्रपति को अधिकार दिया कि राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल को दी गई सलाह पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकता है और राष्ट्रपति पुनर्विचार करने के बाद दी गई सलाह के अनुसार कार्य करेगा।

इस प्रकार 42वें व 44वें संविधान संशोधनों के बाद आशा थी कि राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति के बारे में विवाद समाप्त हो जाएगा, लेकिन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह और प्रधानमन्त्री श्री राजीव गाँधी के मध्य रिश्तों ने इस विवाद को समाप्त नहीं होने दिया। सवैधानिक व व्यावहारिक राजनीति में अभी भी ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें राष्ट्रपति स्व-विवेक का प्रयोग कर सकता है अथवा अपने प्रभाव का सफलतापूर्वक प्रयोग कर सकता है। राष्ट्रपति के स्व-विवेकी अधिकार (Discreationary Powers of the President)-राष्ट्रपति के स्व-विवेकी अधिकार निम्नलिखित हैं

1. लोकसभा में अस्पष्टता की स्थिति में प्रधानमन्त्री की नियुक्ति (Appointment of the Prime Minister in case of Lack of a Majority of any Party in Lok Sabha):
जब लोकसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो राष्ट्रपति अपने स्वविवेक का प्रयोग कर सकता है, जैसे 1989 में जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था तो पहले सबसे बड़े दल के नेता होने के नाते राष्ट्रपति श्री वेंकटरमन ने श्री राजीव गाँधी को सरकार बनाने के लिए कहा। उनके मना करने पर वी०पी० सिंह को आमन्त्रित किया।

इसी प्रकार 1991 के चुनावों में भी श्री नरसिम्हा राव को सबसे बड़े दल का नेता होने के नाते ही प्रधानमन्त्री नियुक्त किया गया था लेकिन दोनों मामलों में राष्ट्रपति ने 30 दिन के भीतर लोकसभा में बहुमत सिद्ध करने के लिए कहा था। 1984 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह ने श्री राजीव गाँधी को अपने स्व-विवेक के आधार पर ही प्रधानमन्त्री नियुक्त किया था। मार्च 1998 में हुए लोकसभा चुनावों के पश्चात् भी भूतपूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की नियुक्ति इसी प्रकार की गई।

2. लोकसभा को भंग करना (Dissolution of Lok Sabha):
सामान्यतया राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह पर लोकसभा को भंग करता है और इस मामले में राष्ट्रपति को कोई स्व-विवेकी अधिकार प्राप्त नहीं है, लेकिन जब ऐसा प्रधानमन्त्री लोकसभा भंग करने की सलाह देता है तो आवश्यक नहीं कि राष्ट्रपति उसकी सलाह को माने। हालांकि 1979 में चौधरी चरणसिंह तथा 1991 में चन्द्रशेखर की सलाह पर लोकसभा भंग तो की गई थी, लेकिन श्री नीलम संजीवा रेड्डी ने बाद में स्पष्ट कर दिया था कि उन्होंने चौधरी चरणसिंह की सलाह पर नहीं, बल्कि अपने स्व-विवेक का प्रयोग करते हुए ऐसा किया था।

इसी प्रकार से 1991 में राष्ट्रपति श्री आर० वेंकटरमन ने लोकसभा इसलिए भंग की थी, क्योंकि अन्य कोई दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं था। 2014 में प्रधानमन्त्री डॉ० मनमोहन सिंह के परामर्श पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा को भंग करके 16वीं लोकसभा के चुनाव घोषित किए थे।

3. विधेयक पर हस्ताक्षर करना अथवा पुनर्विचार करने के लिए वापस भेजना (To Assent the Bill or Return it for Re-consideration):
राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित किसी भी विधेयक को पुनर्विचार करने के लिए संसद के पास वापस भेज सकता है। इस मामले में राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 111 में यद्यपि राष्ट्रपति को वीटो शक्ति प्राप्त नहीं है, लेकिन संसद अथवा मन्त्रिमण्डल किसी विधेयक पर एक निश्चित समयावधि में हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।

यह पूर्णतया राष्ट्रपति के स्व-विवेक पर निर्भर करता है कि वो कब विधेयक को स्वीकृति दे। राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह तथा आर० वेंकटरमन ने 1986 में पारित पोस्टल संशोधन विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इस विवाद का अन्त तभी हुआ कि जब चन्द्रशेखर सरकार के समय संसद ने इस विधेयक को वापस ले लिया।

4. उच्चतम न्यायालय से सलाह माँगना (To Seek Advice from Supreme Court):
राष्ट्रपति संविधान के तहत कानून से सम्बन्धित किसी भी विषय पर परामर्श माँग सकता है। सामान्यतया राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह के अनुसार ही मामलों को उच्चतम न्यायालय के पास सलाह के लिए भेजता है, लेकिन अनेकों विधि-विशेषज्ञों का मानना है कि इस अधिकार का प्रयोग राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार कर सकता है और इस बारे में उसे मन्त्रिमण्डल की सलाह मानने की कोई आवश्यकता नहीं है।

5. महान्यायाधिवक्ता से परामर्श (To Seek Advice FromAttroney General):
संविधान व कानून से सम्बन्धित किसी भी प्रश्न पर राष्ट्रपति महान्यायाधिवक्ता से सलाह माँग सकता है। इस बारे में राष्ट्रपति को मन्त्रिमण्डल से सलाह करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जैसे श्री आर० वेंकटरमन ने पोस्टल संशोधन विधेयक 1986 पर महान्यायाधिवक्ता से परामर्श करने के बाद ही हस्ताक्षर नहीं किए थे। इन स्व-विवेकी अधिकार क्षेत्रों के अतिरिक्त गणराज्य का अध्यक्ष व राष्ट्र का प्रथम नागरिक होने के नाते भी वह निम्नलिखित विशेषाधिकारों व अधिकारों का प्रयोग स्वतन्त्रतापूर्वक करता है

1. सलाह देना (To Advise):
राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री को विभिन्न मामलों पर सलाह देता है। सामान्यतया प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति की सलाह की अनदेखी नहीं करता है, क्योंकि राष्ट्रपति राजनीतिक दलबन्दी से ऊपर उठकर सलाह देता है।

2. प्रशासन पर नियन्त्रण (To Encourage):
राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री सहित मन्त्रिमण्डल को प्रोत्साहित करता है। जैसे नेहरू जी अक्सर श्री राधाकृष्णन से परामर्श करते थे। उनका मार्गदर्शन लेते थे। फलस्वरूप डॉ० राधाकृष्णन उन्हें (नेहरू जी को प्रोत्साहित किया करते थे।

3. चेतावनी देना (To Warm):
यदि प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति की सलाह की अनदेखी करता है तो राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री को चेतावनी दे सकता है और इसके गम्भीर परिणामों की ओर संकेत कर सकता है, जैसे ज्ञानी जैलसिंह ने राजीव गाँधी को चेतावनी देते हुए 1986 व 1987 में बाकायदा पत्र तक लिख डाले थे, लेकिन चेतावनी का यह अर्थ कदापि नहीं कि वह प्रधानमन्त्री को हटाने की धमकी दे सकता है।

यही नहीं, वह सरकार को भी उसके कार्यों के लिए चेतावनी दे सकता है। जैसे वर्ष 2000 के प्रारम्भ में श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संविधान पर पुनः विचार (Review)करने के लिए एक आयोग का गठन करने की घोषणा की। तत्कालीन राष्ट्रपति श्री के०आर० नारायणन ने संविधान की 50वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में बोलते हुए कहा कि सरकार को संविधान की आधारभूत बनावट (Basic Structure) में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं करना चाहिए।

4. सूचना पाने का अधिकार (To Get Information):
संविधान में प्रधानमन्त्री से अपेक्षा की गई है कि वह समय-समय पर राष्ट्रपति को प्रशासन के बारे में सूचित करता रहे। नेहरू जी 15 दिनों के पश्चात् राष्ट्रपति को सूचनाएँ देते और सलाह करते थे। इसलिए माना जाता है कि राष्ट्रपति को प्रधानमन्त्री व मन्त्रिमण्डल से सूचना पाने का अधिकार है, लेकिन ज्ञानी जैलसिंह के बार-बार कहने तथा लिखकर देने के बावजूद ठक्कर आयोग की रिपोर्ट राजीव गाँधी सरकार ने नहीं दिखाई थी।

इस प्रकार भारत का राष्ट्रपति संसदात्मक व्यवस्था होने के नाते तानाशाह बनने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि 44वें संविधान संशोधन के बाद तो वह आपात्कालीन अधिकारों का दुरुपयोग भी नहीं कर सकता है, लेकिन वह निश्चित रूप से ब्रिटेन के राजा से अधिक अच्छी स्थिति में है, क्योंकि वह गणराज्य का निर्वाचित अध्यक्ष है और संविधान के

अन्तर्गत उसे ‘संविधान का रक्षक’ (Defender of the Constitution) …. बनाया गया है जिस कारण उसे कुछ स्व-विवेकी अधिकार भी मिल गए हैं। राष्ट्रपति की स्थिति को नेहरू जी ने ठीक ही इन शब्दों में व्यक्त किया है, “हमने अपने राष्ट्रपति को कोई वास्तविक शक्ति नहीं दी, बल्कि उसके पद को बड़ा शक्तिशाली और
सम्मानजनक बनाया है।”

प्रश्न 8.
भारत के उप-राष्ट्रपति की चुनाव-पद्धति, शक्तियों व कार्यों का वर्णन करो। अथवा उप-राष्ट्रपति की शक्तियों व स्थिति की व्याख्या करें।
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 63 के अन्तर्गत राष्ट्रपति की सहायता के लिए एक उप-राष्ट्रपति की व्यवस्था की गई है। उप-राष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा एक संयुक्त बैठक में आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा किया जाता है।

राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति की चुनाव पद्धति में भिन्नता होने का कारण यह है कि मुख्य कार्यपालक होता है तथा उसके निर्वाचन के लिए संघीय संसद एवं राज्य विधानपालिकाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं। इसके विपरीत उप-राष्ट्रपति साधारणतः केवल राज्यसभा के अध्यक्ष के रूप में कार्य करता है और उसे राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उसके स्थान पर काम करने के बहुत कम अवसर प्राप्त होते हैं।
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1. योग्यताएँ (Qualifications):
उप-राष्ट्रपति के पद पर चुने जाने वाले व्यक्ति के लिए की गई योग्यताएँ इस प्रकार हैं निश्चित की गई हैं

  • वह भारत का नागरिक होना चाहिए,
  • उसकी आयु कम-से-कम 35 वर्ष हो,
  • उसके पास वे सभी योग्यताएँ हों जो राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए आवश्यक हैं,
  • वह केन्द्रीय अथवा किसी राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर कार्य न कर रहा हो,
  • उप-राष्ट्रपति संसद अथवा राज्य विधानसभा का सदस्य नहीं होना चाहिए।यदि वह इनमें से किसी का सदस्य है तो उप-राष्ट्रपति चुने जाने पर उसे इसकी सदस्यता से त्याग-पत्र देना पड़ता है,
  • 5 जून, 1997 को राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए एक अध्यादेश के अनुसार उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के लिए जमानत की राशि 15,000 रुपए कर दी गई है,
  • इसी अध्यादेश के द्वारा ही यह व्यवस्था की गई है कि उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार का नाम संसद के 20 सदस्यों द्वारा प्रस्तावित तथा अन्य 20 सदस्यों द्वारा अनुमोदित होना चाहिए।

2. उप-राष्ट्रपति का चुनाव (Election of Vice-President):
देश के वर्तमान उपराष्ट्रपति का चुनाव 5 अगस्त, 2017 को संपन्न हुआ। इस चुनाव में सतारूढ़ एन०डी०ए० (NDA) के प्रत्याशी श्री वेंकैया नायडू एवं यू०पी०ए० (UPA) गठबन्धन के प्रत्याशी श्री गोपाल कृष्ण गाँधी के बीच मुख्य मुकाबला था।

इस चुनाव में निर्वाचक मण्डल के कुल सदस्यों की संख्या 790 थी जिनमें से 771 सदस्यों ने मतदान में भाग लिया। इनमें से 11 सदस्यों के मत अवैध घोषित हुए और शेष पड़े 760 मतों में से 516 मत एन०डी०ए० प्रत्याशी श्री वेंकैया नायडू को प्राप्त हुए तथा 244 मत यू०पी०ए० गठबन्धन के प्रत्याशी श्री गोपाल कृष्ण गाँधी को प्राप्त हुए। इस प्रकार इस चुनाव में विजयी प्रत्याशी श्री वेंकैया नायडू को 11 अगस्त, 2017 को राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।

इस प्रकार श्री वेंकैया नायडू भारत के 15वें उपराष्ट्रपति तथा इस पद पर रहे व्यक्तियों की संख्या की दृष्टि से 13वें उपराष्ट्रपति बनें।

3. उप-राष्ट्रपति का कार्यकाल (Term of the Office of the Vice-President):
राष्ट्रपति की भांति उप-राष्ट्रपति का चुनाव भी 5 वर्ष के लिए होता है। यदि उप-राष्ट्रपति चाहे तो इस अवधि से पहले भी राष्ट्रपति को लिखकर अपने पद से त्याग-पत्र दे सकता है। उप-राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए राज्यसभा के उपस्थित सदस्यों के बहुमत से उसके हटाने का प्रस्ताव पास करना होता है और लोकसभा को उस प्रस्ताव का समर्थन करना होता है।

4. वेतन तथा भत्ते (Salary and Allowances):
फरवरी, 2018 में किए गए नवीन संशोधन के अनुसार उप-राष्ट्रपति को राज्य सभा के पदेन अध्यक्ष के रूप में 4 लाख रुपए प्रतिमाह प्राप्त होंगे और सेवानिवृत्ति पर उन्हें मूल वेतन का 50 प्रतिशत प्रतिमाह पेंशन के रूप में प्राप्त होंगे। इसके अतिरिक्त निःशुल्क सुसज्जित निवास-स्थान, मुफ्त डॉक्टरी सहायता, संसद सदस्य के समान निःशुल्क टेलीफोन कॉलें तथा निःशुल्क रेलवे एवं हवाई यात्राओं की सुविधा भी उप-राष्ट्रपति को प्रदान की गई है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीय उप-राष्ट्रपति को उप-राष्ट्रपति के नाते वेतन नहीं दिया जाता है, बल्कि राज्यसभा के सभापति के रूप में वेतन दिया जाता है। जब उप-राष्ट्रपति किसी कारणवश राष्ट्रपति के पद पर कार्य करता है, तब उसे राष्ट्रपति के पद से सम्बन्धित वेतन-भत्ते और अन्य सुविधाएँ मिलती हैं।

शपथ (Oath) राष्ट्रपति की भांति उप-राष्ट्रपति को भी अपना पद ग्रहण करते समय राष्ट्रपति अथवा उस द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारियों के सामने निम्नलिखित शपथ लेनी पड़ती है

“मै……….ईश्वर की शपथ लेता हूँ सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा र गा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूँ उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूँगा।”-(धारा 69) उप-राष्ट्रपति की शक्तियाँ तथा कार्य (Powers and Functions of the Vice-President)-संवैधानिक रूप में उप-राष्ट्रपति की शक्तियों का स्पष्ट विवेचन नहीं किया गया है, फिर भी इसका स्थान राष्ट्रपति के बाद दूसरे क्रम पर निर्धारित किया गया है। सामान्य रूप में उप-राष्ट्रपति के कार्य निम्नलिखित हो सकते हैं

1. राष्ट्रपति के रूप में (As a President):
उप-राष्ट्रपति के रूप में उसे कोई विशेष अधिकार नहीं दिए गए। हाँ, जब राष्ट्रपति का पद किसी कारणवश खाली हो जाए तो वह अस्थायी रूप से राष्ट्रपति के सभी कार्यों को सम्भालता है। जब तक नए राष्ट्रपति का निर्वाचन नहीं हो जाता। यदि मृत्यु अथवा त्याग-पत्र अथवा महाभियोग के कारण जब राष्ट्रपति का पद खाली होता है तो वह उस पद पर अधिक-से-अधिक छह मास तक रहता है। इस बीच नए राष्ट्रपति का चुनाव हो जाना आवश्यक होता है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जब उप-राष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है तो उसे राष्ट्रपति की सभी शक्तियों, उन्मुक्तियों, उपबन्धियों, भत्तों और विशेष अधिकारों का अधिकार प्राप्त होगा। संसद का ‘प्रेसीडेन्ट सक्सेशन एक्ट, 1969’ यह व्यवस्था करता है कि यदि उप-राष्ट्रपति किसी कारणवश उपलब्ध नहीं है तो उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या उसके न रहने पर उसी न्यायालय का वरिष्ठतम न्यायाधीश जो उस समय उपलब्ध हो, राष्ट्रपति के कार्यों को सम्पादित करेगा।

2. राज्यसभा के अध्यक्ष के रूप में (AsChairman of the Rajya Sabha):
भारत का उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। इस कारण वह राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है। अध्यक्ष के नाते उसके निम्नलिखित कार्य इस प्रकार हैं-

  • वह राज्यसभा के अधिवेशन में सभापतित्व करता है,
  • राज्यसभा में कानून व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है, जो व्यक्ति सदन के अनुशासन को भंग करता है, उप-राष्ट्रपति उसे सदन से बाहर निकाल सकता है,
  • वह सदस्यों को बोलने की आज्ञा देता है,
  • उप-राष्ट्रपति को साधारणतः वोट देने का अधिकार नहीं है, लेकिन उसे निर्णायक मत (Casting Vote)का अधिकार है,
  • वह किसी भी बिल पर मतदान करा सकता है तथा गिनती के बाद परिणाम घोषित करता है,
  • जब बिल को राज्यसभा पास कर देती है, तब उप-राष्ट्रपति उस पर हस्ताक्षर करता है,
  • वह किसी भी सदस्य को असंसदीय भाषा का प्रयोग करने की मनाही कर सकता है।

3. सहयोगी कार्य (To provide co-operation to the President):
उप-राष्ट्रपति राष्ट्रपति के उन कार्यों को भी सम्पादित करता है जिनके बारे में राष्ट्रपति उप-राष्ट्रपति से सहयोग की अपेक्षा करता है। अतः इस आधार पर यह स्पष्ट होता है कि निःसन्देह उप-राष्ट्रपति की शक्तियाँ नगण्य मात्र हैं।

उप-राष्ट्रपति की स्थिति (Position of the Vice-President) संवैधानिक दृष्टि से उप-राष्ट्रपति को कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं हैं, लेकिन मान-सम्मान की दृष्टि से उसका देश में दूसरा स्थान है। उसका पद गरिमा का पद है, अतः उप-राष्ट्रपति की स्थिति उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करती है। उदाहरणस्वरूप, डॉ० राधाकृष्णन, डॉ० शंकरदयाल शर्मा तथा श्री के०आर० नारायणन ने सभी राजनीतिक दलों, राजनीतिक नेताओं तथा साधारण जनता से बहुत सम्मान प्राप्त किया है।

प्रश्न 9.
संघीय मन्त्रि-परिषद् की रचना तथा कार्यों का राष्ट्रपति तथा संसद के सन्दर्भ में विवेचन कीजिए। अथवा संघीय मन्त्रिपरिषद् की रचना, शक्तियों व कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संघ की सभी कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति को दी गई हैं, परन्तु वह नाममात्र का अध्यक्ष है और इन शक्तियों का प्रयोग मन्त्रि-परिषद् की सलाह से करता है। संविधान के अनुच्छेद 74 में मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था की गई है जो राष्ट्रपति को उसके कार्यों में सलाह तथा सहयोग देती है। संविधान के 42वें तथा 44वें संशोधन ने स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् की सलाह मानने के लिए बाध्य है। अधिक-से-अधिक वह मन्त्रिमण्डल को अपनी सलाह पर पुनः विचार करने के लिए कह सकता है।

मन्त्रिपरिषद् का निर्माण (Composition of Council of Ministers) सर्वप्रथम राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है। नए चुनाव के बाद लोकसभा में जिस दल को अथवा दलीय गठबन्धन को बहुमत प्राप्त होता है, उसके नेता को ही प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाता है। जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो तो राष्ट्रपति अपने विवेक का प्रयोग कर सकता है, परन्तु उस समय भी ऐसे व्यक्ति को ही प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाना आवश्यक है जो बहुमत अपने पक्ष में कर सके। जैसे सितम्बर-अक्तूबर, 1999 के लोकसभा के चुनाव में किसी दल को बहुमत प्राप्त न होने की स्थिति में राष्ट्रपति ने 24 राजनीतिक दलों के गठबन्धन द्वारा निर्वाचित नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमन्त्री नियुक्त किया था और उसे अपना मन्त्रिमण्डल निर्माण करने को कहा था।

अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह से करता है। वास्तव में प्रधानमन्त्री अन्य मन्त्रियों की सूची राष्ट्रपति को देता है और राष्ट्रपति उसी के अनुसार मन्त्रियों की नियुक्ति करता है। वह इसमें अपनी इच्छा से कोई परिवर्तन नहीं कर सकता। मन्त्री बनने के लिए यह योग्यता निश्चित है कि उसे 6 महीने के अन्दर-अन्दर संसद के किसी सदन का सदस्य बन जाना चाहिए नहीं तो वह अपने पद पर नहीं रह सकता। राष्ट्रपति मन्त्रियों में विभागों का बँटवारा प्रधानमन्त्री की सलाह के अनुसार ही करता है।

मन्त्रियों की विभिन्न श्रेणियाँ (Categories of the Ministers) मंत्रिपरिषद् में विभिन्न स्तर के मंत्री होते हैं। पहले स्तर के मंत्रियों को कैबिनेट स्तर के मंत्री कहा जाता है। ये मंत्री किसी-न-किसी विभाग के अध्यक्ष होते हैं और इनकी संख्या प्रायः 20 से 30 तक होती है। 17वीं लोकसभा के चुनावों के बाद श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गठित नई सरकार (30 मई, 2019) में 25 कैबिनेट मंत्री, 23 राज्य मंत्री तथा 11 स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री शामिल किए गए।

दूसरे स्तर के मंत्री राज्यमंत्री (Minister of State) होते हैं। ये विशेष विभागों से संबंधित होते हैं। ये कैबिनेट स्तर के मंत्रियों को सहायता पहुँचाते हैं। इनके नीचे तीसरे स्तर के उप-मंत्री तथा संसदीय सचिव होते हैं। ये विभागीय मंत्रियों को प्रशासन और संसदीय कार्यों के संबंध में सहायता पहुँचाते हैं।

इसके अतिरिक्त कुछ विभाग-रहित मंत्री (Ministers without Portfolio) भी होते हैं, जिनका काम प्रशासन चलाने में सहायता करना होता है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जनवरी, 2004 में 91वें संविधान संशोधन अधिनियम के पारित होने के पश्चात् मंत्रिपरिषद् (संघ एवं राज्यों) के सदस्यों की अधिकतम संख्या निम्न सदन की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। 30 मई, 2019 में 25 कैबिनेट, 23 राज्य मन्त्री तथा 11 स्वतन्त्र प्रभार वाले राज्य मंत्री शामिल किए गए।

मन्त्रिपरिषद् का कार्यकाल (Term of Office)-मन्त्रि-परिषद् का कोई निश्चित कार्यकाल नहीं है। संविधान में कहा गया है कि वे राष्ट्रपति के प्रसाद-पर्यन्त अपने पद पर रहते हैं, परन्तु वास्तव में वे उस समय तक अपने पद पर बने रहते हैं जब तक लोकसभा का बहुमत उनके साथ है। यदि लोकसभा मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास कर दे तो मन्त्रिमण्डल को त्यागपत्र देना पड़ता है। जैसे 7 नवम्बर, 1990 को लोकसभा में वी०पी० सिंह मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित किया था।

प्रधानमन्त्री यदि त्यागपत्र दे दे तो समस्त मन्त्रि-परिषद् का त्यागपत्र माना जाता है जैसे मार्च, 1991 में श्री चन्द्रशेखर ने तथा 1997 में श्री इन्द्र कुमार गुजराल ने प्रधानमन्त्री पद से त्यागपत्र दे दिया था। वर्ष, 1999 में भी लोकसभा ने प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के विरुद्ध अविश्वास का पत्र पास किया और प्रधानमन्त्री ने त्यागपत्र दे दिया। साथ ही मन्त्रिपरिषद् का कार्यकाल भी समाप्त हो गया। राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह पर किसी भी मन्त्री को हटा सक का कार्यकाल अनिश्चित है।

मन्त्रिमण्डल की बैठकें (Meetings of the Cabinet)-मन्त्रिमण्डल की समय पर बैठकें होती हैं और इनकी अध्यक्षता प्रधानमन्त्री द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति इनमें भाग नहीं लेता। मन्त्रि-परिषद् के कार्य तथा शक्तियाँ (Powers and Functions of the Council of Ministers)-मन्त्रि-परिषद को निम्नलिखित शक्तियाँ प्राप्त हैं

1. नीति-निर्धारण (Formation of National Policy) :
मन्त्रि-परिषद् का पहला कार्य राष्ट्र की नीति का निर्धारण करना है पर उसे देश की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा अन्य समस्याओं का समाधान करना और देश का विकास करना है।

2. प्रशासन पर नियन्त्रण (Control over the Administration):
संघ की समस्त शक्तियों का प्रयोग मन्त्रि-परिषद् करती है और इस प्रकार वह प्रशासन पर नियन्त्रण रखती है। प्रशासन का प्रत्येक विभाग किसी-न-किसी मन्त्री के अधीन होता है जो मन्त्रिमण्डल के निर्णयों तथा राष्ट्रीय नीति के अनुसार उसका संचालन करता है तथा उसके सुचारु रूप से संचालन के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होता है। सभी सरकारी कर्मचारी मन्त्रियों के अधीन कार्य करते हैं और कानूनों को लागू करते हैं।

3. विदेशों से सम्बन्ध स्थापित करना (To Maintain Foreign Relations):
मन्त्रिमण्डल ही अपनी विदेश नीति के अनुसार दूसरे देशों से सम्बन्ध स्थापित करता है, दूसरे देशों को भेजे जाने वाले राजदूतों का निर्णय करता है और दूसरे देशों से सन्धियाँ तथा समझौते करता है। युद्ध तथा शान्ति की घोषणा के बारे में निर्णय मन्त्रि-परिषद् द्वारा किया जाता है।

4. वैधानिक शक्तियाँ (Legislative Powers):
मन्त्रिमण्डल को वैधानिक शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। संसद में अधिकतर विधेयक मन्त्रि-परिषद् द्वारा पेश किए जाते हैं और उसके दल अथवा दलीय गठबन्धन का बहुमत होने के कारण उसकी इच्छा के अनुसार ही कानून बनते हैं। मन्त्रि-परिषद् की इच्छा के विरुद्ध कोई विधेयक कानून नहीं बन सकता।

5. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers):
मन्त्रिमण्डल को वित्तीय शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। बजट के बारे में सबसे पहले मन्त्रिमण्डल में निर्णय होता है और संसद में बजट तथा अन्य धन विधेयक मन्त्री ही पेश कर सकते हैं, साधारण सदस्य नहीं। का प्रस्ताव, पराने करों में कमी अथवा बढोतरी या उन्हें समाप्त करने के प्रस्ताव आदि के विधेयक मन्त्रि-परिषद निश्चित करती है और लोकसभा में उसका बहुमत होने के कारण वह पास हो जाता है। इस प्रकार वित्तीय विधेयक पर वास्तविक नियन्त्रण मन्त्रिमण्डल का है, संसद का नहीं।।

6. नियुक्तियाँ (Appointments):
देश में की जाने वाली बड़ी-बड़ी नियुक्तियों के बारे में सर्वप्रथम निर्णय मन्त्रिमण्डल में ही होता है। इन पदों में मुख्य हैं-राज्यपाल, न्यायाधीश, राजदूत, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य, चुनाव आयुक्त, भारत का महाविधिवेत्ता, महालेखा परीक्षक तथा नियन्त्रक, विभिन्न आयोगों के अध्यक्ष तथा सदस्य। ये सब नियुक्तियाँ राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह के अनुसार ही करता है।

7. लोकसभा को भंग करने की शक्ति (Power to Dissolve the Lok Sabha):
मन्त्रिमण्डल को यह अधिकार है कि वह लोकसभा की अवधि समाप्त होने से पहले भी उसे भंग करने की सलाह राष्ट्रपति को दे सकती है। यह अधिकार इतना प्रभावशाली होता है कि लोकसभा आसानी से मन्त्रिमण्डल का विरोध नहीं कर सकती है।

8. संकटकालीन स्थिति का निर्णय (Decision Regarding the Proclamation of Emergency):
राष्ट्रपति संकटकाल की उद्घोषणा मन्त्रिमण्डल की सलाह से ही करता है। संकट की स्थिति पैदा हो चुकी है या होने की सम्भावना है, इसका निर्णय मन्त्रिमण्डल में ही होता है। इस प्रकार व्यवहार में राष्ट्रपति की आपात्कालीन शक्तियों का प्रयोग भी मन्त्रिमण्डल ही करता है।

9. उपाधियाँ देना (To Give Titles):
राष्ट्रपति नागरिकों तथा कर्मचारियों को विभिन्न उपाधियों-भारत रत्न, पद्म विभूषण, पदमश्री इत्यादि से विभूषित करता है। मन्त्रिपरिषद् की स्थिति (Position of Council of Ministers) संसदात्मक व्यवस्था में वास्तव में कार्यपालिका की समस्त शक्तियाँ मन्त्रि-परिषद् में ही निहित हैं। व्यावहारिक रूप में मन्त्रिपरिषद् की शक्तियों व कार्यों में वृद्धि हुई है, क्योंकि संसद के पास समय की कमी होती है।

संसद तो मुख्य रूप से नीतियों पर ही विचार करती है। कानून बनाने का उत्तरदायित्व व्यावहारिक रूप में मन्त्रि-परिषद् को ही प्रदान कर देती है। इसी प्रकार अधिकांश प्रस्ताव सरकारी प्रस्ताव होते हैं जिन्हें मन्त्री ही प्रस्तावित करते हैं। इन शक्तियों के अलावा आपास्थिति को लागू करवाने की शक्ति तथा लोकसभा भंग कराने की शक्ति मन्त्रि-परिषद् की स्थिति को मजबूत बना देती है।

लेकिन मन्त्रि-परिषद् भले ही कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उस पर संसदीय नियन्त्रण सदैव बना रहता है। कोई भी मन्त्रिपरिषद् संसद की अनदेखी नहीं कर सकती विशेषकर लोकसभा की। यदि कोई मन्त्रि-परिषद् संसद की अवहेलना करती है तो उसके विरुद्ध लोकसभा अविश्वास पारित करके मन्त्रि-परिषद् को हटा सकती है। इसके अलावा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में मन्त्रि-परिषद् तानाशाह नहीं बन सकती, क्योंकि संसद के अतिरिक्त न्यायपालिका व जनता का दबाव भी रहता है जिसकी अनदेखी या उपेक्षा करना आत्महत्या के समान होता है।

प्रश्न 10.
भारत के प्रधानमन्त्री की नियुक्ति, शक्तियों, कार्यों तथा स्थिति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। अथवा भारत के प्रधानमन्त्री की भूमिका पर 150 शब्दों में एक नोट लिखें।
अथवा
“आधुनिक समय में भारत के प्रधानमन्त्री की शक्तियों में बढ़ोतरी हुई है।” इस कथन को ध्यान में रखकर भारत के प्रधानमन्त्री की शक्तियाँ और स्थिति बताइए।
उत्तर:
राष्ट्रपति राज्य का नाममात्र का अध्यक्ष है और वास्तविक कार्यपालिका मन्त्रि-परिषद् है। प्रधानमन्त्री शासनाध्यक्ष है और संसदीय व्यवस्था में शासन की वास्तविक शक्तियाँ तथा अधिकार प्रधानमन्त्री के पास होते हैं, न कि राष्ट्रपति के पास। भारत में प्रधानमन्त्री के सम्बन्ध में संविधान में निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं

प्रधानमन्त्री की नियुक्ति (Appointment of the Prime Minister) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 के अंतर्गत यह व्यवस्था की गई है, “प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाएगी।”

इस प्रकार इस अनुच्छेद से स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी, लेकिन यह सच नहीं है, क्योंकि राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत दल के नेता को ही प्रधानमंत्री नियुक्त करता है। जैसे 17वीं लोकसभा चुनाव, 2019 के बाद भाजपा नेतृत्व वाले एन.डी.ए. को 353 स्थानों में अकेले भाजपा को 303 वोटों के साथ

स्पष्ट बहुमत प्राप्त होने पर बहुमत दल के निर्वाचित नेता श्री नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद द्वारा 30 मई, 2019 को प्रधानमन्त्री पद की शपथ दिलाई गई। राष्ट्रपति अपने विवेक और सूझ-बूझ का उस स्थिति में प्रयोग करता है जब लोकसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता।

ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है जो केंद्र में स्थाई सरकार बना सके। राष्ट्रपति ने ऐसा सन 1989 में किया जब लोकसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं था। उस समय राष्ट्रीय मोर्चे के नेता श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था। फिर मई-जून, 1991 में लोकसभा चुनाव हुए उसमें भी किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ तो राष्ट्रपति ने सबसे बड़े दल के नेता श्री पामुलपति वेंकट नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।

सन् 1996 में संपन्न हुए 11वीं लोकसभा के चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। राष्ट्रपति ने पिछली परंपराओं के आधार पर लोकसभा में सबसे बड़े दल के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया और उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त किया। साथ ही तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा वाजपेयी को 15 दिन के अंदर संसद में बहुमत सिद्ध करने को कहा। श्री वाजपेयी बहुमत सिद्ध नहीं कर पाए और उन्होंने 13 दिन बाद अपना त्याग-पत्र दे दिया। इसके बाद 1 जून, 1996 । हर्दनहल्ली डोडागौड़ा देवेगौड़ा, जो संयुक्त मोर्चे के नेता बनें, उन्हें राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। श्री देवेगौड़ा ।

जून, 1996 को लोकसभा में बहुमत सिद्ध कर प्रधानमत्री के पद पर आसीन रहे, लेकिन कुछ समय पश्चात् बहुमत के 11 अप्रैल, 1997 को देवगौड़ा द्वारा त्याग-पत्र देने के बाद 21 अप्रैल, 1997 से श्री इंद्रकुमार गुजराल इस पद पर विराजमान रहे। इन्हें भी कुछ समय पश्चात् बहुमत के अभाव में अपना त्याग-पत्र देना पड़ा।

फरवरी-मार्च, 1998 में हुए 12वीं लोकसभा के चुनावों में भी किसी राजनीतिक दल अथवा गठबंधन को लोकसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ, चूंकि भारतीय जनता पार्टी तथा उसके सहयोगी दलों को लोकसभा में अन्य दलों तथा गठबंधनों से अधिक स्थान प्राप्त थे, इसलिए राष्ट्रपति द्वारा भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार का गठन करने के लिए आमंत्रित किया गया।

श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अन्य सहयोगी दलों के सहयोग से केंद्र में मिली-जुली सरकार (Coalition Government) का गठन किया। सितंबर-अक्तूबर, 1999 में हुए 13वीं लोकसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (N.D.A.) (जो 24 दलों से मिलकर बना था) को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। राजग ने श्री वाजपेयी जी को अपने गठबंधन का नेता चुना। राष्ट्रपति द्वारा श्री वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। श्री वाजपेयी ने 13 अक्तूबर, 1999 को शपथ ग्रहण की।

मई, 2004 में हुए 14वें लोकसभा चुनाव में फिर किसी भी राजनीतिक दल एवं गठबंधन को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं मिला था लेकिन काँग्रेस गठबंधन सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरकर सामने आया। परिणामस्वरूप तत्कालिक राष्ट्रपति ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम ने गठबंधन दल के नेता डॉ० मनमोहन सिंह को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था।

यही स्थिति मई, 2009 के चुनाव में रही। डॉ० मनमोहन सिंह को पुनः देश के प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। यद्यपि 16वीं लोकसभा चुनाव 2014 एवं 17वीं लोकसभा चुनाव, 2019 में क्रमशः 282 एवं 303 सीटों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने पर तात्कालिक राष्ट्रपति की ओर से श्री नरेन्द्र मोदी को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित किया गया और राष्ट्रपति द्वारा श्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ दिलाई गई।

प्रधानमंत्री के लिए संसद का सदस्य होना अनिवार्य (To be a Member of Parliament is Essential for the Prime Minister)-संविधान के अनुच्छेद 75 (5) में यह व्यवस्था की गई है कि, “कोई गैर-सदस्य भी मंत्रिपरिषद् में शामिल किया जा सकता है, परंतु ऐसे सदस्य के लिए यह अनिवार्य है कि वह 6 महीने में संसद के किसी भी सदन का सदस्य अवश्य बने।” इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद् के सभी सदस्यों के लिए यह अनिवार्य है कि वह संसद के दोनों सदनों में से किसी एक सदन के सदस्य अवश्य हों।

21 जून, 1991 को जब काँग्रेस के नेता श्री पी०वी० नरसिम्हाराव को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था तो वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे लेकिन उन्होंने 6 महीने की शर्त के अंदर ही नवंबर, 1991 में नांदयाल लोकसभा क्षेत्र (आंध्रप्रदेश) से विजयी होकर संसद सदस्यता की शर्त को पूर्ण कर दिया। वैसे भारतीय संसदीय इतिहास में वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जो प्रधानमंत्री की नियुक्ति के समय संसद के किसी सदन के सदस्य नहीं थे। 1 जून, 1996 को श्री एच०डी० देवगौड़ा को जब प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था, तब वे भी संसद के किसी सदन के नेता नहीं थे।

इन्होंने ने भी सदस्यता हेतु निश्चित अवधि के भीतर कर्नाटक राज्य विधानसभा में 20 सितंबर, 1996 को राज्यसभा की सदस्यता प्राप्त की। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में यह दूसरा अवसर था जब राज्यसभा का सदस्य प्रधानमंत्री पद पर विराजमान था। इससे पूर्व लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पश्चात् 1966 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थीं तो वे भी राज्यसभा की ही सदस्या थीं।

तीसरा अवसर तब आया जब 21 अप्रैल, 1997 को संयुक्त मोर्चा के नेता श्री इंद्रकुमार गुजराल भारत के प्रधानमंत्री बनें। श्री गुजराल भी उस समय राज्यसभा के सदस्य थे। भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में चौथा एवं पाँचवां इस प्रकार का अवसर तब आया जब क्रमशः 22 मई, 2004 एवं 22 मई, 2009 को डॉ. मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने। डॉ. मनमोहन सिंह भी प्रधानमंत्री की नियुक्ति के समय राज्य सभा के सदस्य थे। लेकिन 2014 एवं 2019 में प्रधानमंत्री बने श्री नरेन्द्र मोदी वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए थे।

इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति संसद के दोनों सदनों में से किसी की भी सदस्यता वाले व्यक्ति की हो सकती है। यद्यपि सन् 1966 तक हमारे देश में लोकसभा के सदस्य को ही प्रधानमन्त्री पद पर नियुक्त किया जाता रहा। कार्यकाल (Term) संविधान के अनुच्छेद 75 के अंतर्गत यह व्यवस्था की गई है, “मंत्री राष्ट्रपति के प्रसाद-पर्यंत अपने पद पर बने रहेंगे।”

लेकिन व्यवहार में स्थिति बिल्कुल भिन्न है। प्रधानमंत्री 5 वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है, उसे लोकसभा में बहुमत प्राप्त है, वह अपने पद पर बना रहेगा। अभिप्राय यह है कि प्रधानमंत्री का कार्यकाल निश्चित नहीं है। लोकसभा के अविश्वास प्रस्ताव के द्वारा प्रधानमंत्री को हटाया जा सकता है।

10 जुलाई, 1979 को लोकसभा के विरोधी दल के नेता यशवन्त राव चहाण ने प्रधानमंत्री देसाई के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होने से पूर्व ही प्रधानमंत्री देसाई ने 15 जुलाई, 1979 को त्याग-पत्र दे दिया, क्योंकि जनता पार्टी के अधिकतर सदस्यों ने जनता पार्टी को छोड़ दिया था। यह पहला अवसर था जब किसी प्रधानमंत्री को अविश्वास प्रस्ताव के कारण त्याग-पत्र देना पड़ा।

इसी प्रकार 13 अप्रैल, 1998 को राष्ट्रपति के०आर० नारायण ने प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सुश्री जयललिता द्वारा समर्थन वापस लिए जाने की स्थिति में लोकसभा का विश्वास प्राप्त करने के लिए कहा। श्री वाजपेयी की सरकार एक वोट से विश्वास मत प्रस्ताव में हार गई। अंततः प्रधानमंत्री को अपनी 13 माह पुरानी सरकार से त्याग-पत्र देना पड़ा। अतः स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री का कार्यकाल निश्चित नहीं है।

प्रधानमन्त्री की शक्तियाँ तथा कार्य (Powers and Functions of Prime Minister) इंग्लैंड के प्रधानमंत्री के बारे में, श्री ग्लैडस्टोन (Glaodstone) ने कहा था, “कहीं भी इतने छोटे पदार्थ की इतनी बड़ी छाया नहीं है।” इसी प्रकार से श्री ग्रीब्स ने कहा था, “उसकी शक्तियाँ एक तानाशाह जैसी दिखाई पड़ती हैं।” यदि इन दोनों उक्तियों को भारत के प्रधानमंत्री पर लागू किया जाए तो ये बिल्कुल ठीक बैठती हैं। भारत में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है, जिसे इतनी व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हों। भारतीय प्रधानमंत्री की शक्तियों एवं कार्यों का विवरण निम्नलिखित है

1.मंत्रिपरिषद् का निर्माण (Formation of Council of Ministers):
संघीय मंत्रिपरिषद् में राष्ट्रपति द्वारा सर्वप्रथम प्रधानमंत्री की नियुक्ति होने के बाद प्रधानमंत्री का सर्वप्रमुख कार्य मंत्रिपरिषद् का निर्माण करना है। संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार, “मंत्रिपरिषद् के मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री के परामर्श पर राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है।”

इस अनुच्छेद के माध्यम से यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री अपने सहयोगी मंत्रियों की सूची तैयार करके राष्ट्रपति को सौंपता है और राष्ट्रपति प्रधानमंत्री द्वारा सुझाए गए व्यक्तियों को मंत्री के रूप में शपथ दिलाने का कार्य करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि राष्ट्रपति के द्वारा मंत्रियों की नियुक्ति एक औपचारिक कार्रवाई है क्योंकि राष्ट्रपति न तो अपनी इच्छानुसार किसी.व्यक्ति को मंत्री नियुक्त कर सकता है और न ही किसी मंत्री की नियुक्ति के संबंध में प्रधानमंत्री की सिफारिश को ठुकरा सकता है।

अतः यह निर्णय करना भी प्रधानमंत्री का कार्य है कि मंत्रिपरिषद् में किसे किस स्तर (कैबिनेट, राज्य एवं उपमंत्री) का मंत्री बनाना है। प्रायः प्रधानमंत्री का मंत्रिपरिषद् का गठन जितना आसान माना जाता है, व्यवहार में यह बहुत कठिन होता है क्योंकि मंत्रिपरिषद् के गठन के समय उन्हें अनेक बातों जैसे लोकप्रिय एवं प्रभावशाली जन कार्यपालिका नेता की ध्वनि, विषय विशेषज्ञ, प्रशासनिक दक्षता, अनुभवी नेता, विभिन्न क्षेत्रों एवं वर्गों को प्रतिनिधित्व आदि बातों का ध्यान रखना पड़ता है। जैसे 30 मई, 2019 को श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बने एन०डी०ए० के मंत्रिपरिषद् का ..46 सदस्यीय 25 कैबिनेट एवं 34 राज्य-मंत्री मंत्रिपरिषद् में उपर्युक्त बातों का ध्यान रखा गया।

2. विभागों का बँटवारा (Distribution of Portfolios):
न केवल प्रधानमंत्री मंत्रियों को नियुक्त करता है, अपितु वह उनमें विभागों का बँटवारा भी करता है। यह निर्णय वही करता है कि कौन-सा मंत्री किस विभाग का अध्यक्ष होगा तथा कौन-सा मंत्री कैबिनेट मंत्री होगा और कौन-सा मंत्री राज्य-मंत्री अथवा उप-मंत्री। विभाग बाँटने की शक्ति को प्रधानमंत्री की स्वेच्छाचारी शक्ति कहा जा सकता है। यह ठीक है कि उसे पार्टी के नेताओं को संतुष्ट रखना होता है तथा देश के प्रत्येक क्षेत्र को प्रतिनिधित्व देना… होता है, परंतु एक दृढ़ तथा लोकप्रिय नेता प्रधानमंत्री के रूप में अपनी इच्छानुसार मंत्रिपरिषद् को रूप दे सकता है।

3. लोकसभा का नेतृत्व करता है (Leader of the Lok Sabha):
इंग्लैंड की भाँति भारत का प्रधानमंत्री लोकसभा का नेतृत्व करता है। वह सदन में सरकार की नीति से संबंधित महत्त्वपूर्ण घोषणाएँ करता है और प्रश्नों का उत्तर देता है। वह लोकसभा में वाद-विवाद को आरंभ करता है तथा मंत्रियों की सदन में आलोचना से सुरक्षा करता है। वह अपने दल के सदस्यों को सचेतक (Whips) द्वारा आदेश तथा निर्देश भेजता है तथा उन पर निगरानी और नियंत्रण रखता है। सदन के वैधानिक कार्यों पर उसका विशेष प्रभाव होता है। वह स्पीकर के साथ मिलकर सदन का कार्य करता है तथा सदन में अनुशासन बनाए रखने के लिए स्पीकर की सहायता करता है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यदि प्रधानमंत्री लोकसभा का सदस्य न हो तो वह अपने दल के किसी अन्य व्यक्ति को लोकसभा का नेता नियुक्त करता है। जैसे 14वीं लोकसभा चुनाव के बाद नियुक्त प्रधानमंत्री 22 मई, 2004 एवं 15वीं लोकसभा चुनाव के बाद पुनः 22 मई, 2009 को नियुक्त प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने दल के अन्य सदस्य श्री प्रणब मुखर्जी को लोकसभा का नेता नियुक्त किया था, क्योंकि प्रधानमंत्री स्वयं लोकसभा के सदस्य नहीं थे, बल्कि राज्य सभा के सदस्य थे। श्री प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बन जाने पर गृहमन्त्री श्री सुशील कुमार शिंदे को लोकसभा का नेता नियुक्त किया गया था।

4. राष्ट्रपति तथा मंत्रिमंडल में कड़ी का काम करता है (Link between the President and the Cabinet):
प्रधानमंत्री राष्ट्रपति तथा मंत्रिमंडल के मध्य कड़ी का काम करता है। वह राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल के द्वारा किए गए निर्णय की सूचना देता है तथा राष्ट्रपति के विचार मंत्रिमंडल के समक्ष रखता है। राष्ट्रपति उसे किसी एक मंत्री द्वारा व्यक्तिगत रूप से किए गए निर्णयों पर मंत्रिमंडल का निर्णय लेने के लिए कह सकता है। वह राष्ट्रपति का मुख्य सलाहकार होता है। यदि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के परामर्श से सहमत न हो तो भी उसे परामर्श मानना पड़ता है। .

5. विभिन्न विभागों में एक कड़ी (As a Link between Different Departments):
कैबिनेट का प्रधान होने के नाते वह एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। वह विभिन्न विभागों में उत्पन्न होने वाली आपसी समस्याओं, झगड़ों तथा मतभेदों को इस तरह सुलझाता है, जिससे प्रशासनिक कुशलता बनी रहे। कुशल प्रशासन के लिए यह आवश्यक है कि सरकार के विभिन्न विभागों में आपसी सहयोग तथा साधनों का समन्वय हो। ऐसे उद्देश्य के लिए प्रधानमंत्री विभिन्न विभागों में कड़ी की तरह कार्य करता है। वह अंतर्विभागीय मतभेदों को दूर करने के लिए मध्यस्थ तथा निर्णायक के रूप में भी कार्य करता है।

6. राष्ट्रपति का मुख्य सलाहकार (Chief Advisor of the President):
प्रधानमंत्री राष्ट्रपति का मुख्य सलाहकार है। राष्ट्रपति प्रत्येक मामले पर प्रधानमंत्री की सलाह लेता है और उसके द्वारा दी गई सलाह के अनुसार ही कार्य करता है। वह उसकी सलाह को मानने के लिए बाध्य है। राष्ट्रपति को प्रशासन के बारे में किसी भी प्रकार की सूचना प्राप्त करनी हो, तो वह किसी अन्य मंत्री से सीधा बात न करके प्रधानमंत्री से ही बात करता है तथा सूचना प्राप्त करता है।

7. दल का नेता (Leader of the Party):
प्रधानमंत्री अपने दल का नेता होता है। दल की नीतियों तथा कार्यक्रमों को तैयार करने में उसका मुख्य हाथ होता है। आम चुनाव के समय दल के उम्मीदवारों को खड़ा करना, उन्हें टिकटें देना तथा उन्हें चुनाव जीताने में वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उस समय वह समस्त देश का दौरा करके जनता से उसके दल के उम्मीदवारों के पक्ष में मत देने की अपील करता है।

8. सदन के नेता के रूप में (Leader of the House):
दल का नेता होने के साथ-साथ वह सदन का भी नेता होता है। प्रधानमंत्री ही संसद के अधिवेशन बुलाने की तिथि निश्चित करता है। लोकसभा की कार्रवाई चलाने का उत्तरदायित्व उस पर ही होता है। कौन-सा बिल कब प्रस्तुत किया जाएगा और कौन-सा बाद में, किस बिल पर कितना वाद-विवाद होगा, यदि विरोधी दल बिल पेश करना चाहता है तो उस पर वाद-विवाद कब होगा,

इन सब बातों का निर्णय स्पीकर प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता से सलाह करके है। प्रधानमंत्री ही सदन में महत्त्वपूर्ण नीतियों की घोषणा करता है। प्रधानमंत्री ही सरकार की नीतियों को सदन में पेश करता है। यदि विरोधी दल द्वारा इन नीतियों की आलोचना की जाती है, तो वह उन आलोचनाओं का उत्तर देता है। विशेषकर प्रधानमंत्री की महत्ता और भी बढ़ जाती है, जब वह अविश्वास के प्रस्ताव के नाजुक समय में अपने दल की रक्षा करता है।

9. प्रधानमंत्री राष्ट्र के नेता के रूप में (As the Leader of the Nation):
प्रधानमंत्री राष्ट्र का नेता है। सारा राष्ट्र प्रधानमंत्री की ओर अच्छे प्रशासन व पथ-प्रदर्शन के लिए निगाहें लगाए हुए होता है। साधारणतः चुनाव भी प्रधानमंत्री के नाम पर लडे जाते हैं; जैसे सन् 1980 में इंदिरा गांधी ने चुनाव जीता, ऐसे ही सन् 1989 में श्री वी०पी० सिंह ने जनता को विश्वास दिलाया था कि वह राष्ट्र को साफ-सुथरी सरकार देंगे। इसी प्रकार 13वीं लोकसभा चुनाव में यह नारा दिया गया है कि “अब की बारी अटल बिहारी” अर्थात् मतदाता दल को महत्त्व देते हैं, लेकिन साथ में इसके नेता को भी महत्त्व देते हैं।

इसी तरह 16वीं लोकसभा चुनाव, 2014 में भाजपा के नेता श्री नरेन्द्र मोदी ने ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे के साथ मतदाताओं को आकर्षित किया तो पुनः 2019 के 17वीं लोकसभा चुनाव में ‘सबका साथ सबका विकास एवं सबका विश्वास’ के साथ पुनः एक बार फिर मोदी सरकार के नारे मा को मोदी जी के नेतृत्व में पुनः स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। अतः मतदाताओं ने मोदी जी को राष्ट्रीय नेतृत्व के रूप में पूर्णतः आस्था व्यक्त की। प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नेता के रूप में महत्त्व संकटकालीन समय में और भी बढ़ जाता है तथा सारा राष्ट्र देश के प्रधानमंत्री की ओर देखता है और जनता उसके विचारों को बड़े ध्यान से सुनती है।

10. लोकसभा को भंग कराने का अधिकार (Power to get Lok Sabha Dissolved):
इंग्लैंड के प्रधानमंत्री को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि वह कॉमंस सभा को भंग करवाकर देश में चुनाव करवा सकता है अर्थात उसे कॉमंस सभा को भंग करने का अधिकार प्राप्त है। इस मामले में उसे मंत्रिमंडल की सलाह लेने की आवश्यकता नहीं होती। इसी प्रकार का अधिकार भारत के प्रधानमंत्री को दिया गया है। वह राष्ट्रपति को सलाह देकर लोकसभा को भंग करवा सकता है।

जैसा कि सन् 1977 में राष्ट्रपति श्री फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर लोकसभा को भंग किया था। राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की सलाह को मानना पड़ेगा, ऐसा प्रावधान संविधान के 42 संशोधन में किया गया था।

इसलिए वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने 17 अप्रैल, 1999 को लोकसभा में विश्वास प्रस्ताव पास न करवा पाने के कारण उत्पन्न स्थिति में राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने की सलाह दे दी। परिणामस्वरूप 12वीं लोकसभा 26 अप्रैल, 1999 को राष्ट्रपति द्वारा भंग कर दी गई थी। इसी तरह के परामर्श द्वारा समय पूर्व अटल जी ने 13वीं लोकसभा को 6 फरवरी, 2004 को भंग करवा दिया गया था।

11. प्रधानमंत्री की आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers of the Prime Minister):
भारतीय संविधान के अंतर्गत अनुच्छेद 352, 356, 360 के द्वारा भारत के राष्ट्रपति को तीन प्रकार की संकटकालीन शक्तियाँ दी गई हैं, लेकिन वास्तविक रूप में राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार ही करता है; जैसे अक्तूबर, 1962 में चीन के आक्रमण के समय, 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान के आक्रमण के समय तथा 26 जून, 1975 को आंतरिक व्यवस्था के खराब होने पर अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सलाह से ही आपातकालीन स्थिति की घोषणा की थी।

इसी प्रकार अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राज्यों में राष्ट्रपति शासन भी प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार लगाया जाता है। 44वें संशोधन के अनुसार, राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के अंतर्गत संकटकाल की घोषणा तभी कर सकता है, यदि मंत्रिमंडल संकटकाल की घोषणा करने की लिखित सलाह दे। अप्रैल, 1977 में कार्यवाहक राष्ट्रपति श्री बी०डी० जत्ती ने प्रधानमंत्री की सलाह पर नौ विधानसभाओं को भंग किया था।

प्रधानमन्त्री की स्थिति (Position of Prime Minister) संविधान तथा व्यवहार में प्राप्त शक्तियों व अधिकारों के आधार पर प्रधानमन्त्री देश का सर्वाधिक शक्तिशाली अधिकारी है जो राष्ट्र, संसद व जनता का नेता है जिसकी इच्छा, विचारधारा सर्वाधिक महत्व रखती है इसलिए संविधान सभा में डॉ० अम्बेडकर ने कहा भी था, “यदि हमारे देश में किसी अधिकारी की तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति से की जा सकती है तो वह प्रधानमन्त्री की है न कि राष्ट्रपति की।”

इसी प्रकार से संविधान सभा में प्रधानमन्त्री की शक्तियों व अधिकारों को देखते हुए श्री के०टी० शाह ने डर व आशंका व्यक्त की थी, “यदि वह चाहे तो किसी भी समय देश का तानाशाह बन सकता है।” केन्टी० शाह का यह डर 1975-77 की आन्तरिक आपास्थिति ने सत्य भी सिद्ध कर दिया था, लेकिन इसे अपवाद ही कहा जा सकता है अन्यथा प्रधानमन्त्री के पास कितने भी अधिकार क्यों न हों, उसमें तानाशाह बनने की सम्भावना कम ही है, क्योंकि उसकी स्थिति अनेक बातों पर निर्भर करती है। उस पर अनेक निम्नलिखित प्रतिबन्ध हैं

1. दल में स्थिति (Position in Party):
प्रधानमन्त्री की स्थिति मुख्यतया इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी अपने दल में क्या स्थिति है? यदि उसका अपने दल पर नियन्त्रण है तो उसकी स्थिति बहुत मजबूत होती है जैसे नेहरू, इन्दिरा गाँधी तथा राजीव गाँधी की थी। यदि उसका अपने दल पर नियन्त्रण कम है तो उसकी स्थिति कमजोर होती है, जैसे मोरारजी देसाई, वी०पी० सिंह की थी।

उदाहरणार्थ जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गाँधी या राजीव गाँधी ने जिसे चाहा अपने मन्त्रिमण्डल में लिया और जब चाहा निकाल दिया। इसके विपरीत मोरारजी देसाई को अपने मन्त्रिमण्डल में वाजपेयी को विदेश मन्त्री, चरणसिंह को गृहमन्त्री के रूप में लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था। कार्यपालिका

2. दल की संसद में स्थिति (Position of Party in Parliament):
प्रधानमन्त्री की स्थिति इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसके दल की संसद में क्या स्थिति है? यदि उसके दल को संसद में भारी भरकम बहुमत प्राप्त है तो उसकी स्थिति बहुत मजबूत हो जाती है जैसे नेहरू जी की थी या 1971 के बाद इन्दिरा गाँधी की हो गई थी और बाद में राजीव गाँधी की थी कि जब काँग्रेस को लोकसभा में दो तिहाई या उससे अधिक भी अधिक स्थान प्राप्त थे, लेकिन वी०पी० सिंह, चन्द्रशेखर की स्थिति कमजोर थी, क्योंकि इनके दलों को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत भी प्राप्त नहीं था और अन्य दलों पर निर्भर करते थे।

3. जनता में लोकप्रियता (Popularity in Public):
प्रधानमन्त्री की स्थिति इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह जनता में कितना लोकप्रिय है? यदि वह जनता में अति लोकप्रिय है तो उसकी स्थिति बहुत मजबूत होती है? जैसे नेहरू, इन्दिरा गाँधी अथवा राजीव गाँधी की थी। यदि वह जनता में बहुत लोकप्रिय नहीं है तो उसकी स्थिति कमजोर होती है, जैसे मोरारजी देसाई, चरणसिंह, वी०पी० सिंह या चन्द्रशेखर की थी।

4. व्यक्तित्व (Personality):
प्रधानमन्त्री का व्यक्तित्व भी उसकी स्थिति निर्धारित करता है। करिश्माई व्यक्तित्व वाले प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गाँधी, राजीव गाँधी अपने व्यक्तित्व के कारण मज़बूत प्रधानमन्त्री सिद्ध हुए, जबकि मोरारजी देसाई, चरणसिंह, वी०पी० सिंह, चन्द्रशेखर का व्यक्तित्व करिश्माई नहीं था, अतः उनकी स्थिति कभी भी मज़बूत नहीं रही।

5. निष्कर्ष (Conclusion):
इस प्रकार प्रधानमन्त्री की स्थिति अनेक बातों पर निर्भर करती है और कोई भी प्रधानमन्त्री अब तानाशाह नहीं बन सकता है। 1977 में इन्दिरा गाँधी की करारी हार ने सिद्ध कर दिया था कि भारतीय जनमत जागरूक है और वह किसी भी करिश्माई व्यक्तित्व वाले व्यक्ति की तानाशाही को सहन करने के लिए तैयार नहीं हैं। इस प्रकार प्रधानमन्त्री पर उसके दल, संसद व जनमत का दबाव रहता है। उसकी स्थिति ‘समकक्षों में प्रथम’ (First Among Equals) की है, तानाशाह की नहीं।

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प्रश्न 11.
राष्ट्रपति के मन्त्रिपरिषद् तथा संसद के साथ सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान संसदात्मक व्यवस्था की स्थापना करता है। इस कारण राष्ट्रपति का मन्त्रि-परिषद् व संसद से प्रत्यक्ष एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है। राष्ट्रपति तथा मन्त्रिपरिषद् में सम्बन्ध (Relationship Between President and the Council of Ministers) राष्ट्रपति तथा मन्त्रि-परिषद् में निम्नलिखित प्रकार से सम्बन्ध पाए जाते हैं

1. राष्ट्रपति तथा मन्त्रिपरिषद् का गठन (President and Composition of Council of Ministers):
राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की नियक्ति करता है, लेकिन राष्ट्रपति का यह अधिकार औपचारिकता मात्र है, क्योंकि राष्ट्रपति को उसी व्यक्ति को प्रधानमन्त्री बनाना पड़ता है जिसे लोकसभा का विश्वास अर्थात् बहुमत का समर्थन प्राप्त होता है, लेकिन जब किसी भी प्रधानमन्त्री पद के दावेदार को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो तो राष्ट्रपति अपने स्वविवेक का प्रयोग कर सकता है,

जैसे 1979 में मोरारजी देसाई और चरणसिंह में से राष्ट्रपति ने चरणसिंह को प्रधानमन्त्री बनाया था और 1990 में चन्द्रशेखर को प्रधानमन्त्री बनाया था। अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री के परामर्श से करता है। राष्ट्रपति को उन व्यक्तियों को भी प्रधानमन्त्री की इच्छानुसार मन्त्री नियुक्त करना पड़ता है जिन्हें वो व्यक्तिगत रूप से भले ही नापसन्द करता हो। मन्त्रियों के विभागों का बंटवारा भी राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह के अनुरूप करता है।

2. राष्ट्रपति तथा मन्त्रि-परिषद् का विघटन (President and Dismissal of the Council of Ministers):
संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार, “मन्त्री अपने पद पर राष्ट्रपति के प्रसाद-पर्यन्त रहते हैं” अर्थात् जब तक राष्ट्रपति चाहे तभी तक मन्त्री अपने पद पर रह सकते हैं, लेकिन संसदात्मक व्यवस्था होने के नाते राष्ट्रपति के इस अधिकार का प्रयोग वास्तव में प्रधानमन्त्री करता  हैं, न कि राष्ट्रपति । व्यवहार में राष्ट्रपति उस प्रधानमन्त्री को उसके पद से नहीं हटा सकता जिसे लोकसभा का विश्वास प्राप्त है।

इसी प्रकार से अपनी इच्छा से वह किसी मन्त्री को भी नहीं हटा सकता यदि उस मन्त्री को प्रधानमन्त्री का समर्थन प्राप्त है, लेकिन कभी-कभी ऐसी परिस्थिति भी उत्पन्न हो जाती है जबकि प्रधानमन्त्री को राष्ट्रपति की इच्छा को देखते हुए किसी मन्त्री से त्यागपत्र देने के लिए कहना पड़ता है, जैसे 1987 में प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी को राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की इच्छा को देखते हुए श्री के०के० तिवारी से मन्त्री पद त्यागने के लिए कहना पड़ा था।

3. राष्ट्रपति तथा मन्त्रि-परिषद् की सलाह (President and Advice of the Council of Ministers):
संविधान के अनुच्छेद 74 में कहा गया है कि राष्ट्रपति की सहायता एवं सलाह के लिए एक मन्त्रि-परिषद् होगी। संसदात्मक व्यवस्था होने के कारण राष्ट्रपति मन्त्रि-परिषद् द्वारा दी गई सलाह के अनुसार कार्य करता है। 42वें तथा 44वें संविधान संशोधनों के द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया है कि राष्ट्रपति मन्त्रि-परिषद् को दी गई सलाह पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकता है और पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह को मानने के लिए राष्ट्रपति बाध्य है।

4. प्रशासन के लिए राष्ट्रपति नहीं, मन्त्रिपरिषद् उत्तरदायी (The Council of Ministers, not the President is Responsible for Administration):
यद्यपि संविधान में समस्त कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित हैं, लेकिन देश के प्रशासन के लिए राष्ट्रपति उत्तरदायी नहीं है। देश के प्रशासन के लिए संसदात्मक व्यवस्था होने के नाते मन्त्रि-परिषद् उत्तरदायी है जिस कारण राष्ट्रपति की कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग वास्तव में मन्त्रि-परिषद् करती है।

5. राष्ट्रपति का मन्त्रि-परिषद् को सलाह देने, चेतावनी देने व उत्साहित करने का अधिकार (Presidential Right to Advice, Encourage and Warn the Council of Ministers):
राष्ट्रपति ब्रिटिश राज्य की भांति मन्त्रि-परिषद् को सलाह दे सकता है, उत्साहित कर सकता है और जो मन्त्रि-परिषद् उसकी सलाह की अनदेखी करे, उसे चेतावनी दे सकता है, लेकिन महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वह मन्त्रिपरिषद् को भंग नहीं कर सकता।

6. राष्ट्रपति का सूचना पाने का अधिकार (Presidential Right to be Informed):
राष्ट्रपति प्रधानन्त्री से देश के शासन व प्रशासन से सम्बन्धित सूचनाएँ माँग सकता है। वास्तव में राष्ट्रपति का सूचना पाने का अधिकार ही ऐसा अधिकार है जो राष्ट्रपति को उसके कर्तव्यों का वहन करने में सक्षम बनाता है।

राष्ट्रपति तथा संसद में सम्बन्ध (Relationship between the President and the Parliament):
संसदात्मक व्यवस्था के अन्तर्गत राष्ट्रपति तथा संसद में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, “संघ की एक संसद होगी जो राष्ट्रपति तथा दोनों सदनों लोकसभा व राज्य सभा से मिलकर बनेगी।” इस प्रकार संसद से अभिप्राय राष्ट्रपति सहित संसद से है। यद्यपि राष्ट्रपति लोकसभा अथवा राज्यसभा का सदस्य नहीं हो सकता, लेकिन राष्ट्रपति का संसद से निम्नलिखित प्रकार से घनिष्ठ सम्बन्ध है ।

1. राष्ट्रपति का निर्वाचन (Election of the President):
राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचन मण्डल करता है जिसमें लोकसभा तथा राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं।

2. राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा हटाना (Impeachment of the President):
राष्ट्रपति को संविधान की रक्षा न कर पाने के आरोप में महाभियोग द्वारा हटाने का एकमात्र अधिकार संसद को प्राप्त है।

3. संसद में सदस्यों को मनोनीत करना (Nomination of Members in the Parliament):
भारतीय संविधान राष्ट्रपति को राज्यसभा में ऐसे 12 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार देता है जिनका समाज सेवा या साहित्य के किसी क्षेत्र में नाम हो। राष्ट्रपति लोकसभा में भी स्वेच्छा से दो एंग्लो-इण्डियन जाति के सदस्यों को मनोनीत कर सकता था। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि दिसम्बर, 2019 में पारित 104वें संवैधानिक संशोधन द्वारा एंग्लो-इण्डियन जाति की मनोनयन प्रणाली को समाप्त करने का निर्णय किया गया।

4. संसद का सत्र बुलाना और सत्रावसान करना (To Call the Session and Adjournment Sine Die):
राष्ट्रपति ही संसद के सत्रों को समय-समय पर बुलाता है। वह संसद के अधिवेशनों का समय बढ़ा सकता है, स्थगित कर सकता है और सत्रावसान करता है। राष्ट्रपति ही संसद के दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाता है।

5. संसद को सम्बोधित करना (ToAddress the Parliament):
राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों को अलग-अलग अथवा संयुक्त रूप से सम्बोधित कर सकता है। नई संसद का पहला तथा वर्ष का पहला अधिवेशन राष्ट्रपति के अभिभाषण से ही प्रारम्भ होता है।

6. सन्देश भेजना (To Send Message):
संविधान के अन्तर्गत राष्ट्रपति संसद में किसी भी सदन को सन्देश भेज सकता है और सदन उस सन्देश पर शीघ्र ही विचार करता है।

7. अनेक आयोगों की रिपोर्ट संसद में पेश करना (To Put the Reports of the Various Commissions Before the Parliament):
राष्ट्रपति अनेक आयोगों जैसे वित्त आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश करता है। ये आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को . प्रस्तुत करते हैं और राष्ट्रपति इन रिपोर्टों को संसद में मन्त्रियों के द्वारा प्रस्तुत करता है।

8. राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior permission of the President):
कुछ विधेयक जैसे धन विधेयक, नए राज्यों को बनाने, वर्तमान राज्यों के नाम व सीमा में परिवर्तन सम्बन्धी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही संसद में प्रस्तावित किए जा सकते हैं।

9. विधेयकों पर स्वीकृति (Assent on the Bills):
संसद द्वारा पारित विधेयक स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजे जाते हैं। जब तक राष्ट्रपति हस्ताक्षर नहीं कर देता, तब तक विधेयक कानून का रूप नहीं ले पाता है।

10. अध्यादेश जारी करना (To Issue Ordinances):
जब संसद का अधिवेशन न चल रहा हो और किसी कानून की तुरन्त जरूरत हो तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी करता है। यह अस्थायी प्रबन्ध है।

11. लोकसभा भंग करना (To Dissolve the Lok Sabha):
राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह पर लोकसभा को भंग भी कर सकता है। इस प्रकार राष्ट्रपति के मन्त्रिपरिषद् व संसद से घनिष्ठ सम्बन्ध होते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. अध्यक्षात्मक कार्यपालिका में वास्तविक शक्तियाँ किसके पास हैं?
(A) राष्ट्रपति
(B) प्रधानमंत्री
(C) मंत्रिमंडल
(D) जनता
उत्तर:
(A) राष्ट्रपति

2. भारत में संसदीय शासन प्रणाली में निम्नलिखित दोष है
(A) संगठित विरोधी दल का अभाव
(B) संसद सदस्यों की निष्क्रिय भूमिका
(C) प्रधानमंत्री की प्रमुख स्थिति
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

3. भारत की समस्त सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति है
(A) प्रधानमंत्री
(B) रक्षामंत्री
(C) राष्ट्रपति
(D) उप-राष्ट्रपति
उत्तर:
(C) राष्ट्रपति

4. निम्नलिखित में से किस राज्य में इकहरी (Singular) कार्यपालिका है?
(A) स्विट्जरलैंड
(B) रूस
(C) अमेरिका
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) अमेरिका

5. राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार का नाम कितने निर्वाचकों द्वारा प्रस्तावित होना आवश्यक है?
(A) 40
(B) 50
(C) 30
(D) 60
उत्तर:
(B) 50

6. राष्ट्रपति को उसके पद से हटाया जा सकता है?
(A) साधारण मुकद्दमे द्वारा
(B) महाभियोग द्वारा
(C) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा
(D) प्रधानमंत्री द्वारा
उत्तर:
(B) महाभियोग द्वारा

7. उप-राष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है
(A) जनता द्वारा
(B) राष्ट्रपति द्वारा
(C) संसद के दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा
(D) राज्य विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा
उत्तर:
(C) संसद के दोनों सदनों के सदस्यों द्वारा

8. भारत का राष्ट्रपति चुना जाता है
(A) निर्वाचक मंडल द्वारा
(B) संसद द्वारा
(C) जनता द्वारा
(D) सभी राज्य विधानसभाओं द्वारा
उत्तर:
(A) निर्वाचक मंडल द्वारा

9. भारत के वर्तमान राष्ट्रपति हैं
(A) श्री प्रणब मुखर्जी
(B) श्री रामनाथ कोविंद
(C) श्रीमती प्रतिभा पाटिल
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) श्री रामनाथ कोविंद

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 4 कार्यपालिका

10. राष्ट्रपति को पद की शपथ दिलाता है
(A) उप-राष्ट्रपति
(B) प्रधानमन्त्री
(C) संसद
(D) सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
उत्तर:
(D) सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश

11. यदि राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति दोनों के पद रिक्त हों तो कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा
(A) दिल्ली उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
(B) लोकसभा का अध्यक्ष
(C) भारत के सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) भारत के सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश

12. राष्ट्रपति के पास निम्नलिखित परिस्थिति में संकटकालीन घोषणा करने का अधिकार है
(A) विदेशी आक्रमण अथवा सशस्त्र क्रान्ति के समय
(B) जब देश की वित्तीय साख को खतरा हो
(C) किसी राज्य में संवैधानिक मशीनरी के विफल होने
(D) उपर्युक्त सभी की स्थिति में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

13. राष्ट्रपति का पद खाली होने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति (Acting President) के रूप में कौन कार्य करता है?
(A) सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
(B) लोकसभा का अध्यक्ष
(C) उप-राष्ट्रपति
(D) प्रधानमन्त्री
उत्तर:
(C) उप-राष्ट्रपति

14. निम्नलिखित में से उप-राष्ट्रपति का कार्य है
(A) लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करना
(B) राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करना
(C) प्रधानमन्त्री को पद से हटाना
(D) संसद को भंग करना
उत्तर:
(B) राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करना

15. भारत के उप-राष्ट्रपति के चुनाव हेतु न्यूनतम आयु होनी चाहिए.
(A) 32 वर्ष
(B) 35 वर्ष
(C) 25 वर्ष
(D) 18 वर्ष
उत्तर:
(B) 35 वर्ष

16. भारत का राष्ट्रपति अपना त्याग-पत्र निम्नलिखित में से किसे सौंपता है?
(A) लोकसभा अध्यक्ष
(B) भारत के मुख्य न्यायाधीश
(C) उप-राष्ट्रपति
(D) प्रधानमन्त्री
उत्तर:
(C) उप-राष्ट्रपति

17. वित्त आयोग की नियुक्ति की जाती है?
(A) प्रधानमंत्री द्वारा
(B) उप-राष्ट्रपति द्वारा
(C) राष्ट्रपति द्वारा
(D) मंत्रिपरिषद् द्वारा
उत्तर:
(C) राष्ट्रपति द्वारा

18. मंत्रि-परिषद् अपने कार्यों व कार्यकाल के लिए सामूहिक रूप से निम्नलिखित में से किस एक के प्रति उत्तरदायी है?
(A) राष्ट्रपति
(B) प्रधानमंत्री
(C) लोकसभा
(D) राज्यसभा
उत्तर:
(C) लोकसभा

19. निम्नलिखित संशोधन के अनुसार यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति मंत्रिमंडल के सुझाव को पुनर्विचार के लिए भेज सकता है
(A) 45वें
(B) 43वें
(C) 42वें
(D) 44वें
उत्तर:
(D) 44वें

20. मंत्रिमंडल उत्तरदायी है
(A) संसद के प्रति
(B) प्रधानमंत्री के प्रति
(C) राष्ट्रपति के प्रति
(D) स्पीकर के प्रति
उत्तर:
(A) संसद के प्रति

21. भारत की संघीय मंत्रि-परिषद् में निम्नलिखित में से कौन शामिल होते हैं?
(A) राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति
(B) प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्री
(C) राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्री

22. संघीय मंत्रिमंडल का नेता है
(A) राष्ट्रपति
(B) प्रधानमंत्री
(C) उप-राष्ट्रपति
(D) लोकसभा अध्यक्ष
उत्तर:
(B) प्रधानमंत्री

23. प्रधानमंत्री को बहुमत का विश्वास प्राप्त होना चाहिए
(A) लोकसभा में
(B) राज्यसभा में
(C) राज्य विधान परिषद् में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) लोकसभा में

24. प्रधानमंत्री का कार्यकाल कितना है?
(A) 5 वर्ष
(B) 6 वर्ष
(C) 4 वर्ष
(D) लोकसभा के बहुमत के समर्थन पर निर्भर है
उत्तर:
(D) लोकसभा के बहुमत के समर्थन पर निर्भर है

25. वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री निम्नलिखित में से कौन हैं?
(A) श्री अमित शाह
(B) श्री राजनाथ सिंह
(C) श्री नरेन्द्र मोदी
(D) डॉ० मनमोहन सिंह
उत्तर:
(C) श्री नरेन्द्र मोदी

26. निम्नलिखित में से राज्य की कार्यपालिका का कौन अध्यक्ष होता है?
(A) राष्ट्रपति
(B) उप-राष्ट्रपति
(C) प्रधानमंत्री
(D) राज्यपाल
उत्तर:
(D) राज्यपाल

27. राज्य के राज्यपाल को मासिक वेतन मिलता है
(A) 80,000 रुपए
(B) 1,10,000 रुपए
(C) 1,25,000 रुपए
(D) 3,50,000 रुपए
उत्तर:
(D) 3,50,000 रुपए

28. वर्तमान में हरियाणा के राज्यपाल निम्नलिखित में से कौन हैं?
(A) श्री जगन्नाथ पहाड़िया
(B) श्री सत्यदेव नारायण आर्य
(C) श्री कप्तान सिंह सोलंकी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) श्री सत्यदेव नारायण आर्य

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दें

1. कार्यपालिका अध्यक्ष की नियुक्ति के कोई दो तरीके बताइए।
उत्तर:

  • जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव,
  • संसद अथवा निर्वाचन-मंडल द्वारा चुनाव।

2. 17वीं लोकसभा में विरोधी दल के नेता कौन हैं?
उत्तर:
कोई भी नहीं।

3. भारत में कौन-सी शासन प्रणाली अपनाई गई है?
उत्तर:
संसदीय शासन प्रणाली।

4. भारत के प्रथम व वर्तमान राष्ट्रपति का नाम लिखें।
उत्तर:
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद थे तथा वर्तमान राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद हैं।

5. भारत के उप-राष्ट्रपति का चुनाव कौन करता है?
उत्तर:
भारत के उप-राष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों द्वारा किया जाता है।

6. भारत के वर्तमान उप-राष्ट्रपति का नाम लिखें।
उत्तर:
भारत के वर्तमान उप-राष्ट्रपति श्री एम० बैंकेया नायडू हैं।

रिक्त स्थान भरें

1. संघीय कार्यपालिका का वास्तविक अध्यक्ष ……… है।
उत्तर:
प्रधानमन्त्री

2. संघीय कार्यपालिका का नाममात्र संवैधानिक अध्यक्ष ………… है।
उत्तर:
राष्ट्रपति

3. राज्य का संवैधानिक कार्यपालिका अध्यक्ष ………….. होता है।
उत्तर:
राज्यपाल

4. वर्तमान में हरियाणा के राज्यपाल …………… एवं मुख्यमंत्री ……………. है।
उत्तर:
श्री सत्यदेव नारायण आर्य एवं श्री मनोहर लाल खट्टर

5. वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति ………….. हैं।
उत्तर:
श्री रामनाथ कोविंद

6. वर्तमान में भारत के उप-राष्ट्रपति ………….. हैं।
उत्तर:
श्री वैंकेया नायडू

7. राष्ट्रपति का मासिक वेतन ………….. रुपए हैं।
उत्तर:
5 लाख

8. उप-राष्ट्रपति को मासिक वेतन के रूप में ……………. मिलता है।
उत्तर:
कोई वेतन नहीं

9. राज्यपाल का मासिक वेतन …………. रुपए है।
उत्तर:
3.50 लाख

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 4 कार्यपालिका

10. राष्ट्रपति को ………….. के द्वारा शपथ दिलाई जाती है।
उत्तर:
मुख्य न्यायाधीश

11. राष्ट्रपति को अनुच्छेद ………… के अन्तर्गत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की शक्ति प्राप्त है।
उत्तर:
352

12. राष्ट्रपति को भारत की ………. में से वेतन दिया जाता है।
उत्तर:
संचित निधि

13. उप-राष्ट्रपति ………… की कार्यवाही का संचालन करता है।
उत्तर:
राज्यसभा

14. केन्द्रीय मंत्री परिषद् अपने कार्यों के लिए सामूहिक रूप से …………. के प्रति उत्तरदायी होती है।
उत्तर:
लोकसभा

15. राष्ट्रपति के चुनाव हेतु न्यूनतम आयु ………. होनी चाहिए।
उत्तर:
35 वर्ष

16. भारत में ………… शासन-प्रणाली अपनाई गई है।
उत्तर:
संसदीय

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HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Solutions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

HBSE 11th Class Political Science संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़ Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा वाक्य सही है संविधान में समय-समय पर संशोधन करना आवश्यक होता है क्योंकि
(क) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।
(ख) किसी समय विशेष में लिखा गया दस्तावेज़ कुछ समय पश्चात् अप्रासंगिक हो जाता है।
(ग) हर पीढ़ी के पास अपनी पसंद का संविधान चुनने का विकल्प होना चाहिए।
(घ) संविधान में मौजूदा सरकार का राजनीतिक दर्शन प्रतिबिंबित होना चाहिए।
उत्तर:
(क) संविधान में समय-समय पर संशोधन करना आवश्यक होता है क्योंकि परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों के सामने सही/गलत का निशान लगाएँ।
(क) राष्ट्रपति किसी संशोधन विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता।
(ख) संविधान में संशोधन करने का अधिकार केवल जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास ही होता है।
(ग) न्यायपालिका सवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती परंतु उसे संविधान की व्याख्या करने का अधिकार है। व्याख्या के द्वारा वह संविधान को काफी हद तक बदल सकती है।
(घ) संसद संविधान के किसी भी खंड में संशोधन कर सकती है।
उत्तर:
(क) सही,
(ख) गलत,
(ग) सही,
(घ) गलत।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं? इस प्रक्रिया में ये कैसे शामिल होते हैं?
(क) मतदाता,
(ख) भारत का राष्ट्रपति,
(ग) राज्य की विधान सभाएँ,
(घ) संसद,
(ङ) राज्यपाल,
(च) न्यायपालिका
उत्तर:
(क) मतदाता भारतीय संविधान के संशोधन की प्रक्रिया में इनकी कोई सक्रिय भागीदारी नहीं होती; यद्यपि मतदाताओं द्वारा निर्वाचित किए गए जन प्रतिनिधि संशोधन प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका अवश्य निभाते हैं।

(ख) भारत का राष्ट्रपति-संविधान संशोधन की प्रक्रिया में राष्ट्रपति की एक निश्चित भूमिका रहती है। संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद अन्य विधेयकों की भाँति संशोधन विधेयक भी राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है जिसकी स्वीकृति मिलने पर वह संविधान का हिस्सा बन जाता है। परंतु इस सम्बन्ध में यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संसद द्वारा पारित संवैधानिक संशोधन पर राष्ट्रपति का अधिकार सीमित है। वह इसे संसद को पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता।

(ग) राज्य की विधान सभाएँ संविधान के कुछ विशिष्ट अनुच्छेद एवं विषय, जो संघ एवं राज्य दोनों से सम्बन्धित हैं, को संशोधित कराने के लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ ही आधे राज्यों की विधानमंडलों की स्वीकृति भी आवश्यक होती है। अतः राज्यों की आवश्यक स्वीकृति मिलने पर ही उन्हें राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।

(घ) संसद भारतीय संविधान में किसी भी प्रकार की संशोधन प्रक्रिया में संसद की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। संसद की भागीदारी के बिना संविधान में संशोधन प्रक्रिया की प्रक्रिया का प्रारम्भ ही नहीं हो सकता, चाहे साधारण बहुमत से संशोधन हो, दो-तिहाई बहुमत से संशोधन हो या अति विशेष बहुमत के अन्तर्गत संसद से पारित होने के बाद आधे राज्यों द्वारा स्वीकृति आवश्यकता हो, संसद की भूमिका सदैव महत्त्वपूर्ण बनी रहती है। अभिप्राय यह है कि किसी भी विषय पर किसी भी अनुच्छेद में या किसी भी प्रक्रिया द्वारा संशोधन संसद द्वारा ही प्रारम्भ किया जा सकता है। अतः संसद ही संशोधन प्रक्रिया का केंद्र होता है।

(ङ) राज्यपाल-संविधान संशोधन की प्रक्रिया में राज्यपाल की भूमिका बहुत सीमित होती है। जिन अनुच्छेदों एवं विषयों पर संशोधन करने के लिए आधे राज्यों की विधानमंडलों द्वारा सहमति लेनी आवश्यकता होती है, उन संशोधन विधेयकों के विधान मंडलों द्वारा पारित होने के बाद उन पर राज्यपाल के हस्ताक्षर होते हैं तभी राज्य विधानमंडलों में संविधान संशोधन की स्वीकृति की प्रक्रिया पूर्ण मानी जाती है।

(च) न्यायपालिका-संविधान संशोधन में न्यायपालिका की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती। हाँ, संविधान द्वारा न्यायपालिका को संविधान संशोधन की व्याख्या करने का अधिकार अवश्य दिया गया है। इस मुद्दे पर कई बार सरकार और न्यायपालिका के बीच हैं; जैसे संसद द्वारा न्यायिक आयोग गठन सम्बन्धी किए गए सवैधानिक संशोधन को न्यायपालिका द्वारा निरस्त किया गया था।

प्रश्न 4.
इस अध्याय में आपने पढ़ा कि संविधान का 42वाँ संशोधन अब तक का सबसे विवादास्पद संशोधन रहा है। इस विवाद के क्या कारण थे?
(क) यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान किया गया था। आपातकाल की घोषणा अपने आप में ही एक विवाद का मुद्दा था।
(ख) यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित नहीं था।
(ग) इसे राज्य विधानपालिकाओं का समर्थन प्राप्त नहीं था।
(घ) संशोधन के कुछ उपबंध विवादास्पद थे।
उत्तर:
भारतीय संविधान में किया गया 42वाँ संशोधन एक बहुत बड़ा और विवादास्पद संशोधन था। अनेक कारणों में एक प्रमुख कारण इस संशोधन का राष्ट्रीय आपात्काल की घोषणा के समय किया जाना था जो अपने आप में ही एक विवाद का विषय बना। इस संशोधन में अनेक विवादास्पद प्रावधान थे। एक महत्त्वपूर्ण विवादास्पद प्रावधान यह था कि इसके द्वारा संविधान संशोधन में संसद की भूमिका को विस्तृत कर दिया गया।

इसके अनुसार संसद को संविधान के किसी भी भाग में किसी भी प्रकार का संशोधन करने का अधिकार प्रदान किया गया तथा संसद द्वारा किए गए किसी संशोधन पर न्यायपालिका में चुनौती देने पर अंकुश लगाया गया। एक प्रकार से यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानंद मामले में दिए गए निर्णय को भी चुनौती थी। इसके अतिरिक्त लोकसभा की अवधि 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दी गई।

यह संशोधन न्यायपालिका की न्यायिक पुनर्निरीक्षण की शक्ति पर भी अंकुश लगाता है। इस संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना सातवीं अनुसूची तथा संविधान के 53वें अनुच्छेद आदि में परिवर्तन किए गए। अतः यह कहा जाता है कि इस संशोधन के द्वारा संविधान के बड़े मौलिक हिस्से को ही बदलने का प्रयास किया गया। इसके साथ-साथ यहाँ यह भी स्पष्ट है कि जब यह संशोधन संसद में पास किया गया तो विरोधी दलों के बहुत-से सांसद जेल में थे। इस प्रकार यह संशोधन विवाद का केन्द्र ही रहा।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों में कौन-सा वाक्य विभिन्न संशोधनों के संबंध में विधायिका और न्यायपालिका के टकराव की सही व्याख्या नहीं करता
(क) संविधान की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है।
(ख) खंडन-मंडन बहस और मतभेद लोकतंत्र के अनिवार्य अंग होते हैं। संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़ के रूप में
(ग) कुछ नियमों और सिद्धांतों को संविधान में अपेक्षा कृत ज्यादा महत्त्व दिया गया है। कतिपय संशोधनों के लिए संविधान में विशेष बहुमत की व्यवस्था की गई है।
(घ) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।
(ङ) न्यायपालिका केवल किसी कानून की संवैधानिकता के बारे में फैसला दे सकती है। वह ऐसे कानूनों की वांछनीयता से जुड़ी राजनीतिक बहसों का निपटारा नहीं कर सकती।
उत्तर:
उपर्युक्त कथनों में से (ङ) में दिया गया कथन विभिन्न संशोधनों के संबंध में विधायिका और न्यायपालिका के टकराव की सही व्याख्या नहीं करता है किसी भी कानून की सवैधानिकता निर्धारित करने की शक्ति संविधान द्वारा न्यायपालिका में निहित की गई है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 9 संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़

प्रश्न 6.
बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत के बारे में सही वाक्य को चिन्हित करें। गलत वाक्य को सही करें। (क) संविधान में बुनियादी मान्यताओं का खुलासा किया गया है। (ख) बुनियादी ढाँचे को छोड़कर विधायिका संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर सकती है।
(ग) न्यायपालिका ने संविधान के उन पहलुओं को स्पष्ट कर दिया है जिन्हें बुनियादी ढाँचे के अंतर्गत या उसके बाहर रखा जा सकता है।
(घ) यह सिद्धांत सबसे पहले केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित किया गया है।
(ङ) इस सिद्धांत से न्यायपालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं। सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।
उत्तर:
(क) यह कथन सही नहीं है कि संविधान में बुनियादी मान्यताओं का खुलासा किया गया है, क्योंकि संविधान में कहीं भी अलग से मूल ढाँचे की कोई व्याख्या नहीं की गई है। वास्तव में यह एक ऐसा विचार है जो न्यायिक व्याख्याओं से उत्पन्न हुआ है। इस धारणा का सर्वप्रथम प्रतिपादन सर्वोच्च न्यायालय के केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के वाद में हुआ था। बाद में मिनर्वा मिल्ज़ मामले में यह निर्णय दिया गया कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन पर कर सकती है, परन्तु संविधान के मूल ढाँचे में संशोधन नहीं कर सकती। इस प्रकार बुनियादी मान्यताओं के सिद्धांत ने संविधान के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

(ख) यह कथन सही है क्योंकि विधायिका बुनियादी ढाँचे को छोड़कर संविधान के सभी हिस्से में संशोधन कर सकती है। इस बात की पुष्टि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केशवानन्द भारती एवं मिनर्वा मिल्ज़ विवाद में किया गया।

(ग) यह कथन सही है कि बुनियादी ढाँचे की किसी अवधारणा का उल्लेख संविधान में नहीं मिलता। यह तो न्यायिक व्याख्याओं की उपज है। संविधान की बुनियादी मान्यताओं का आशय है कि वे संविधान कुछ व्यवस्थाओं की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण है, वे संविधान के मूल ढाँचे के सक्षम हैं और समस्त सवैधानिक व्यवस्था उन पर ही आधारित है।

(घ) यह कथन निश्चित रूप से सही है कि बुनियादी ढाँचे का सिद्धांत सर्वप्रथम सन् 1973 के केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित किया गया।

(ङ) निश्चित रूप से इस सिद्धान्त द्वारा न्यायपालिका की शक्ति में वृद्धि हुई और इस सिद्धान्त को सरकार एवं राजनीतिक दलों की सहमति प्राप्त हुई। केशवानंद भारती विवाद के बाद से इस सिद्धांत का संविधान की व्याख्या में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अतः यह कथन पूर्णतः सत्य है

प्रश्न 7.
सन 2000-2003 के बीच संविधान में अनेक संशोधन किए गए। इस जानकारी के आधार पर आप निम्नलिखित में से कौन-सा निष्कर्ष निकालेंगे
(क) इस काल के दौरान किए गए संशोधनों में न्यायपालिका ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
(ख) इस काल के दौरान एक राजनीतिक दल के पास विशेष बहुमत था।
(ग) कतिपय संशोधनों के पीछे जनता का दबाव काम कर रहा था।
(घ) इस काल में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच कोई वास्तविक अंतर नहीं रह गया था।
(ङ) संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी।
उत्तर:
उपर्युक्त निष्कर्षों में से संविधान संशोधनों के विषय में (ग) और (ङ) में उल्लिखित निष्कर्ष सही हैं, क्योंकि उस समय संशोधन के लिए जनता का दबाव था तथा राजनीतिक दलों के बीच भी संशोधन के विषय और प्रकृति के संबंध में पर्याप्त सहमति थी, जिसके कारण संशोधन में कोई बाधा नहीं आई। संशोधन प्रस्ताव पर प्रायः राजनीतिक दलों में आम राय थी।

प्रश्न 8.
संविधान में संशोधन करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता क्यों पड़ती है? व्याख्या करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान के अन्तर्गत अनुच्छेद 368 में दी गई संशोधन विधि के अंतर्गत संविधान के जो विषय अत्याधिक महत्त्वपूर्ण जैसे मूल एवं निर्देशक सिद्धान्तों से सम्बन्धित तथा संघ एवं राज्य से सम्बन्धित सवैधानिक भाग हैं उन्हें संशोधित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। विशेष बहुमत से अभिप्राय यह है कि किसी भी प्रस्ताव को संसद द्वारा पारित होने के लिए विधेयक के पक्ष में मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या सदन के कुल सदस्यों की संख्या का स्पष्ट बहुमत होना चाहिए। इसके अतिरिक्त संशोधन का समर्थन करने वाले सदस्यों की संख्या मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों की दो-तिहाई होनी चाहिए।

संशोधन को संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग पारित होना आवश्यक होता है। संविधान संशोधन के लिए विशेष बहमत का प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि प्रस्तावित विधेयक पर जब तक सदस्यों यानी सत्तारूढ़ एवं विपक्षी दलों के बीच पर्याप्त सहमति नहीं बन जाती, तब तक उसे पारित नहीं किया जा सकता।

इसके लिए संविधान निर्माताओं का उद्देश्य किसी भी संशोधन प्रस्ताव के पीछे अप्रत्यक्ष जन-समर्थन की भावना का सम्मान तथा राजनीतिक दलों और सांसदों की व्यापक भागीदारी को सुनिश्चित करना था। इसके अतिरिक्त संशोधन प्रक्रिया के राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति इसलिए सम्मिलित की गई कि राज्यों से सम्बन्धित संविधान के संशोधित विषयों के बारे में राज्यों को भी पता चल जाए ताकि संवैधानिक व्यवस्थाओं की ठीक प्रकार से पालना हो सके। इसके अतिरिक्त संविधान के महत्त्वपूर्ण भाग में संसद मनमाना परिवर्तन भी न कर सके।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान में अनेक संशोधन न्यायपालिका और संसद की अलग-अलग व्याख्याओं का परिणाम रहे हैं। उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान की व्याख्या प्रायः एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। संसद और न्यायपालिका द्वारा विभिन्न संशोधनों की है। वास्तव में संविधान में संशोधन इसी मतभेद का परिणाम है। सन 1951 में मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित किए गए पहले संविधान संशोधन के पीछे भी यही कारण था। संविधान की व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जा रही थी और संविधान की विभिन्न प्रक्रियाओं की व्यवस्था भी लोगों द्वारा भिन्न-भिन्न तरीके से की जा रही थी।

प्रश्न 10.
अगर संशोधन की शक्ति जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होती है तो न्यायपालिका को संशोधन की वैधता पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। क्या आप इस बात से सहमत हैं? 100 शब्दों में व्याख्या करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान में संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया एक विवादास्पद विषय रहा है। यह विधायिका और न्यायपालिका के बीच परस्पर टकराव का विषय भी रहा। विधायिका के संशोधन के अधिकार के पक्ष में प्रायः यह तर्क दिया जाता है कि जब संशोधन जनता की इच्छानुसार जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है, तो न्यायपालिका को इसमें हस्तक्षेप कर जनता की इच्छाओं को दबाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। परंतु इस तर्क से असहमति के कारण हैं; जैसे 70 के दशक में होने वाले अनेक संशोन विशेषकर आपातकाल के दौरान किए गए संशोधन बहुत ही विवादास्पद रहे।

इसके पीछे कारण यह था कि ये संशोधन प्रस्ताव 38वाँ, 39वाँ एवं 42वाँ तब पारित किए जब अनेक विपक्षी नेता जेल में थे। इन प्रस्तावों द्वारा संविधान के मूल ढाँचे को ही बदला गया। ऐसी स्थिति में यदि न्यायपालिका सक्रिय न होती तो संसद के तानाशाही व्यवहार पर नियंत्रण करना कठिन होता। जन-प्रतिनिधियों के निरंकुश व्यवहार के कारण जनता की अपूरणीय क्षति होती। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका का हस्तक्षेप सर्वथा उचित और न्यायसंगत कहा जा सकता है।

संविधान : एक जीवंत दस्तावेज़ HBSE 11th Class Political Science Notes

→ किसी भी देश का संविधान उस देश की राजनीतिक व्यवस्था के संचालन के आदर्शों, सिद्धान्तों एवं लक्ष्यों को प्रतिबिम्बित करने वाला होता है। समय एवं परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ-साथ उस समाज एवं राजनीतिक व्यवस्था के आदर्शों एवं लक्ष्यों में परिवर्तन करना भी अपरिहार्य हो जाता है।

→ इसीलिए प्रत्येक देश के संविधान निर्माता सदैव इस बात को ध्यान में रखते हैं कि प्रगतिशील देश की आवश्यकताओं के अनुरूप इसमें परिवर्तन या संशोधन का प्रावधान अवश्य होना चाहिए, अन्यथा ऐसे देश में क्रान्ति की सम्भावना सदैव बनी रहती है।

→ इसीलिए अन्य देशों की तरह भारतीय संविधान निर्माताओं ने भी इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 368 में संशोधन विधि का उल्लेख किया है।

→ मल्फोर्ड (Mulford) के कथन को यहाँ उद्धृत करना उपयुक्त होगा जिसमें उन्होंने कहा था, “ऐसा संविधान जिसमें संशोधन नहीं किया जा सकता है, उसे बुरे समय की बुरी-से-बुरी निरंकुशता कहा जा सकता है।”

→ अतः यह कैसे सम्भव था कि हम इस आधुनिक लोकतान्त्रिक युग में एक जीवंत एवं गतिशील संविधान के प्रारूप को न अपनाते।

→ इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए भारतीय संविधान को नए समय की आवश्यकतानुरूप संशोधित करने के लिए एवं संविधान की जीवंतता को बनाए रखने के लिए लचीली एवं कठोर विधि का सुन्दर समन्वय करने का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप संविधान में अनावश्यक संशोधनों से भी बचा जा सके और आवश्यक संशोधनों को आसानी से अमली जामा पहनाया जा सके।

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HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

HBSE 11th Class Political Science विधायिका Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
आलोक मानता है कि किसी देश को कारगर सरकार की जरूरत होती है जो जनता की भलाई करे। अतः यदि हम सीधे-सीधे अपना प्रधानमंत्री और मंत्रिगण चुन लें और शासन का काम उन पर छोड़ दें, तो हमें विधायिका की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।
उत्तर:
आलोक का उक्त विचार उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि सीधे-सीधे प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल चुनने से शासन का संचालन जनहित की अपेक्षा स्वहित के लिए होगा। शासक वर्ग निरंकुश हो जाएगा। इसलिए विधायिका का होना अत्यंत जरूरी है। विधायिका ही कार्यपालिका को नियंत्रित करती है और उसके अनुचित एवं मनमाने कार्यों की आलोचना करती है। विधायिका के ऐसे नियन्त्रण से ही कार्यपालिका जन-कल्याण के कार्य करने के लिए बाध्य होती है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

प्रश्न 2.
किसी कक्षा में द्वि-सदनीय प्रणाली के गुणों पर बहस चल रही थी। चर्चा में निम्नलिखित बातें उभरकर सामने आयीं। इन तर्कों को पढ़िए और इनसे अपनी सहमति-असहमति के कारण बताइए।
(क) नेहा ने कहा कि द्वि-सदनीय प्रणाली से कोई उद्देश्य नहीं सधता।
(ख) शमा का तर्क था कि राज्यसभा में विशेषज्ञों का मनोनयन होना चाहिए।
(ग) त्रिदेव ने कहा कि यदि कोई देश संघीय नहीं है, तो फिर दूसरे सदन की जरूरत नहीं रह जाती।
उत्तर:
(क) मैं नेहा के तर्क पर असहमति व्यक्त करता हूँ क्योंकि नेहा के अनुसार द्वि-सदनीय व्यवस्था से कोई उद्देश्य नहीं सधता, जबकि ऐसा नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में द्वितीय सदन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए विश्व में केवल सभ्यवादी देशों को छोड़कर सभी जगह द्वि-सदनीय विधानमंडल ही पाया जाता है। भारत में द्वि-सदनीय विधानमंडल की व्यवस्था को अपनाया गया है जिसके द्वारा दूसरा सदन प्रथम सदन के मनमाने निर्णय लेने पर अंकुश लगाता है वहाँ निर्विवाद बिलों पर पहले विचार-विमर्श कर प्रथम सदन के समय को भी बचाता है। अतः द्वि-सदनीय प्रणाली अपने उद्देश्य में सफल हो जाती है।

(ख) मैं शमा के तर्क पर सहमति व्यक्त करते हुए यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि दूसरे सदन में मनोनयन की प्रणाली सही है जैसे कि भारत में ऐसी व्यवस्था है। राष्ट्रपति उन 12 सदस्यों को राज्यसभा में मनोनीत करते हैं, जिन्हें कला, विज्ञान, साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त होती है। ये मनोनीत सदस्य विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञ होने के कारण संसद में विशेष क्षेत्रों सम्बन्धी नीति-निर्माण करवाने में अपने-अपने अनुभवों एवं ज्ञान के माध्यम से विशेष योगदान दे सकते हैं।

(ग) त्रिदेव के अनुसार संघीय शासन में ही द्वितीय सदन की आवश्यकता होती है अन्यथा यह निरर्थक है। यह तर्क उचित प्रतीत होता है। साधारणतः संघीय व्यवस्था वाले राज्यों में द्वितीय सदन संघ की इकाइयों (प्रदेशों) का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि गैर-संघात्मक देशों में भी द्वितीय सदन पाया जाता है। परन्तु यह प्रथम सदन की अपेक्षा कमजोर होता है।

यह जनहित के लिए कोई भी कार्य नहीं करता। हालाँकि कानून निर्माण में इसकी भी भूमिका होती है। कोई भी विधेयक इसकी स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। परन्तु उस विधेयक पर इसका निर्णय अंतिम नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त धन विधेयक पर इसकी स्वीकृति औपचारिक मात्र ही होती है। साधारण विधेयक को यह सदन 6 माह से अधिक नहीं रोक सकता है। इस प्रकार गैर-संघात्मक राज्यों में द्वितीय अनावश्यक कार्य में विलम्ब एवं शक्तिहीन प्रतीत होता है।

प्रश्न 3.
लोकसभा कार्यपालिका को राज्यसभा की तुलना में क्यों कारगर ढंग से नियंत्रण में रख सकती है?
उत्तर:
लोकसभा कार्यपालिका को राज्यसभा की तुलना में इसलिए अधिक कारगर ढंग से नियंत्रित करती है, क्योंकि कार्यपालिका संघीय विधायिका के निम्न सदन लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है और लोकसभा में जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि होने के कारण लोकसभा को जनता के प्रति भी उत्तरदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त लोकसभा में बहुमत दल का नेता प्रधानमंत्री होता है। प्रधानमंत्री ही राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद् की नियुक्ति करता है।

मंत्रिपरिषद् में भी लोकसभा के ही सदस्य होते हैं। परन्तु, फिर भी मंत्रिपरिषद् को अपने प्रत्येक कार्य एवं निर्णय के लिए लोकसभा को विश्वास में लेना आवश्यक है। यदि लोकसभा मंत्रिपरिषद् के किसी निर्णय के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव बहुमत से पास कर दे तो उसे अपना त्यागपत्र देना पड़ता है जबकि राज्यसभा को ऐसा अविश्वास प्रस्ताव पारित करने का अधिकार नहीं होता। इसलिए यह कार्यपालिका को राज्यसभा की तुलना में अधिक आसानी से नियंत्रित कर लेता है।

प्रश्न 4.
लोकसभा कार्यपालिका पर कारगर ढंग से नियंत्रण रखने की नहीं बल्कि जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है। क्या आप इससे सहमत हैं? कारण बताएँ।
उत्तर:
हाँ, निश्चित रूप से मैं लोकसभा को ऐसा मंच मानता हूँ जहाँ जनभावनाओं का सम्मान किया जाता है और उसकी । इच्छा के अनुरूप कार्य किया जाता है, क्योंकि लोकसभा वास्तविक रूप से जनता की ही सभा है। जनता यहाँ अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचित करके भेजती है। ये प्रतिनिधि जन-अभिव्यक्ति के साधन होते हैं अर्थात् यह न केवल कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है बल्कि जन-सामान्य के कल्याण एवं विकास के लिए भी सदैव तत्पर रहती है। इस तरह लोकसभा को एक विचारशील मंच भी कहा जाता है, जिसमें जनहितों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं पर विचार-विमर्श कर नीतियों का निर्माण किया जाता है।

प्रश्न 5.
नीचे संसद को ज़्यादा कारगर बनाने के कुछ प्रस्ताव लिखे जा रहे हैं। इनमें से प्रत्येक के साथ अपनी सहमति या असहमति का उल्लेख करें। यह भी बताएँ कि इन सुझावों को मानने के क्या प्रभाव होंगे?
(क) संसद को अपेक्षाकृत ज़्यादा समय तक काम करना चाहिए।
(ख) संसद के सदस्यों की सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी जानी चाहिए।
(ग) अध्यक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि सदन की कार्यवाही में बाधा पैदा करने पर सदस्य को दंडित कर सकें।
उत्तर:
(क) संसद को अपेक्षाकृत अधिक समय तक काम करना चाहिए। इस पर सहमति व्यक्त की जा सकती है। वर्तमान में यदि देखा जाए तो संसद की बैठकों की अवधि का कार्य दिवस निरन्तर कम होता जा रहा है। संसद की बैठकों का अधिकांश समय धरने, बहिष्कार, सदन की कार्यवाही को स्थगित करने में ही निकल जाता है, जबकि महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर पर्याप्त विचार-विमर्श ही नहीं हो पाता और महत्त्वपूर्ण विधेयक भी बिना बहस के ही पास हो जाता है। इसलिए यदि संसद की कार्य अवधि को हम बढ़ाएंगे तो सदन में पर्याप्त संघ से जनहित के मुद्दों पर विचार-विमर्श होगा एवं कार्यपालिका की स्वेच्छाचारिता पर भी अंकुश लगेगा।

(ख) दूसरे तर्क पर सहमति व्यक्त करते हुए यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि सांसद की उपस्थिति अनिवार्य करनी चाहिए, क्योंकि जनता अपना बहुमूल्य मत देकर इन्हें देश एवं अपने हितों की रक्षा करने के लिए निर्वाचित कर संसद में भेजती है। वास्तव में जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी से ही उत्तरदायी शासन की स्थापना की जा सकती है।

(ग) तीसरे कथन के सन्दर्भ में यह कहने में कोई आपत्ति नहीं कि लोकसभा के स्पीकर को यह अधिकार होना चाहिए कि वह सदन में व्यवधान उत्पन्न करने वाले सदस्य को दंडित करे। स्पीकर का कार्य होता है कि वह सदन में शांति स्थापित करे, परंतु आजकल जिस तरह लोकसभा में सांसद अनुचित एवं असंसदीय आचरण करते हैं और सदन की कार्यव हैं, इससे संसद सत्र का बहुमूल्य समय नष्ट होता है। यदि स्पीकर को यह अधिकार देने से संसद निःसंदेह सदस्य अनुचित व्यवहार करने से डरेंगे और सदन में भी अनुशासन के साथ कार्यवाही का संचालन सम्भव हो सकेगा।।

प्रश्न 6.
आरिफ यह जानना चाहता था कि अगर मंत्री ही अधिकांश महत्त्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत करते हैं और बहुसंख्यक दल अकसर सरकारी विधेयक को पारित कर देता है, तो फिर कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की भूमिका क्या है? आप आरिफ को क्या उत्तर देंगे?
उत्तर:
आरिफ के प्रश्न के उत्तर में मैं यह कह सकता हूँ कि कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। धन विधेयक को छोड़कर शेष विधेयक किसी भी सदन में पेश किए जा सकते हैं। यह एक सदन से पारित होने के उपरांत दूसरे सदन में जाता है। इस संदर्भ में स्पष्टता हेतु यह उल्लेखनीय है कि प्रत्येक सदन में किसी विधेयक को विभिन्न अवस्थाओं या चरणों से पास होना पड़ता है;

जैसे प्रथम वाचन, द्वितीय वाचन, तृतीय वाचन, समिति स्तर, रिपोर्ट स्तर। इन सभी अवस्थाओं/चरणों से पास होने के बाद विधेयक अंतिम स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास जाता है। राष्ट्रपति भी संसद का अभिन्न अंग होता है जिनकी स्वीकृति मिलने पर पारित विधेयक कानून का रूप ले लेता है। इस प्रकार विधि निर्माण में संसद की भूमिका पर अंगुली उठाने का कोई औचित्य नज़र नहीं आता। वास्तव में कानून निर्माण में संसद की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रश्न 7.
आप निम्नलिखित में से किस कथन से सबसे ज्यादा सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण दें।
(क) सांसद/विधायकों को अपनी पसंद की पार्टी में शामिल होने की छूट होनी चाहिए।
(ख) दलबदल विरोधी कानून के कारण पार्टी के नेता का दबदबा पार्टी के सांसद विधायकों पर बढ़ा है।
(ग) दलबदल हमेशा स्वार्थ के लिए होता है और इस कारण जो विधायक/सांसद दूसरे दल में शामिल होना चाहता है उसे आगामी दो वर्षों के लिए मंत्री-पद के अयोग्य करार कर दिया जाना चाहिए।
उत्तर:
(क) सांसद विधायकों को किसी दल के चुनाव चिह्न पर या निर्दलीय निर्वाचित होने पर अपनी पसंद की पार्टी में शामिल होने की छूट नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ऐसी छूट देने से राजनीतिक अस्थिरता बनी रहेगी। जिन सांसदों या विधायकों को जिस दल में अपना स्वार्थ सिद्ध होता या भविष्य सुनहरा होता नज़र आएगा, वे उसी दल में शामिल हो जाएँगे, जैसा कि आजकल हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप न केवल राजनीतिक मूल्यों का ह्रास होगा बल्कि अस्थाई एवं दुर्बल सरकार का निर्माण होगा। ऐसी स्थिति निश्चित ही लोकसभा के प्रति एक प्रश्न चिह्न लगाएगी।

(ख) दलबदल विरोधी कानून के अस्तित्व में आने के बाद भी इस दलबदल की राजनीति पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। है क्योंकि अब दलबदल सामूहिक रूप से बढ़ा है। हाँ, इससे नेताओं का दबदबा अवश्य बढ़ा है। इन्हें अपने नेता द्वारा जारी किए गए आदेश को मानना पड़ता है अन्यथा दलबदल कानून के अंतर्गत उनकी सदस्यता समाप्ति की कार्यवाही की जा सकती है।

(ग) तीसरे कथन से मैं सबसे अधिक सहमत हूँ, क्योंकि इस कथन के अनुसार दलबदल करने पर किसी सांसद या विधायक को मंत्री-पद के आयोग्य घोषित करने से इस प्रथा पर कुछ हद तक रोक लगेगी। जैसा कि प्रायः देखने में आता है कि अधिकतर दलबदल सरकार बनाने या सरकार में शामिल होने के लिए होते हैं। दलबदल की प्रक्रिया पूरी करने हेतु सांसद या विधायक को मंत्री-पद का प्रलोभन दिया जाता है। अतः इस दलबदल की बुराई को रोकने के लिए इस प्रकार का प्रावधान प्रभावी सिद्ध हो सकता है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 5 विधायिका

प्रश्न 8.
डॉली और सुधा में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि मौजूदा वक्त में संसद कितनी कारगर और प्रभावकारी है। डॉली का मानना था कि भारतीय संसद के कामकाज में गिरावट आयी है। यह गिरावट एकदम साफ दिखती है क्योंकि अब बहस-मुबाहिसे पर समय कम खर्च होता है और सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने अथवा वॉकआउट (बहिर्गमन) करने में ज़्यादा। सुधा का तर्क था कि लोकसभा में अलग-अलग सरकारों ने मुँह की खायी है, धराशायी हुई है। आप सुधा या डॉली के तर्क के पक्ष या विपक्ष में और कौन-सा तर्क देंगे?
उत्तर:
भारत में पिछले कुछ वर्षों में संसद में जिस तरह अप्रिय घटनाएँ एवं असंसदीय व्यवहार हो रहा है, उससे तो यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि संसद का बहुमूल्य समय नष्ट हो रहा है। इसलिए इस बात में कोई दोराय नहीं है कि हाल ही के दिनों में संसद की कार्यकुशलता एवं क्षमता पर प्रश्न-चिह्न लगा है, यद्यपि ऐसा कुछ सदस्य ही करते हैं। उस संदर्भ में डॉली का तर्क उचित नहीं है। संसद के अधिकांश सदस्य सदन में उचित रूप से कार्य करते हैं। सदन तो वाद-विवाद का मंच है। यहाँ सभी सदस्य अपने विचारों एवं तर्कों को रखते हैं, जिन पर बहस होती है। संसद देश की कानून बनाने की सर्वोच्च संस्था है। इसी कार्य से संसद की गरिमा बनी रहेगी और देश का विकास भी होगा।

प्रश्न 9.
किसी विधेयक को कानून बनने के क्रम में जिन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है उन्हें क्रमवार सजाएँ।
(क) किसी विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।
(ख) विधेयक भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है बताएँ कि वह अगर इस पर हस्ताक्षर नहीं करता/करती है, तो क्या होता है?
(ग) विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और वहाँ इसे पारित कर दिया जाता है।
(घ) विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में हुआ है उसमें यह विधेयक पारित होता है।
(घ) विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
(च) विधेयक उप-समिति के पास भेजा जाता है – समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है।
(छ) संबद्ध मंत्री विधेयक की जरूरत के बारे में प्रस्ताव करता है।
(ज) विधि-मंत्रालय का कानून-विभाग विधेयक तैयार करता है।
उत्तर:
किसी विधेयक को कानून बनाने के लिए निम्नलिखित क्रम से विभिन्न अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है

(क) किसी विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।

(ख) विधेयक भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इस पर राष्ट्रपति की स्वीकृति अति आवश्यक है। कोई विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद ही कानून बनता है। परंतु राष्ट्रपति चाहे तो इसे पुनः विचार के लिए वापिस कर स लेकिन यदि संसद पुनः उसे पारित कर दे तो राष्ट्रपति को हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

(ग) विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और वहाँ इसे पारित कर दिया जाता है।

(घ) विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में हुआ है उसमें यह विधेयक पारित होता है। (ङ) विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है। और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।

(च) विधेयक उप-समिति के पास भेजा जाता है-समिति उसमें कुछ फेरबदल करती है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है।

(छ) संबद्ध मंत्री विधयेक की ज़रूरत के बारे में प्रस्ताव करता है।

(ज) विधि-मंत्रालय का कानून-विभाग विधेयक तैयार करता है।

प्रश्न 10.
संसदीय समिति की व्यवस्था से संसद के विधायी कामों के मूल्यांकन और देखरेख पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
संसदीय समिति व्यवस्थापिका के समस्त कार्यों का निरीक्षण करने के कारण एक महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता है। संसदीय समिति का गठन विधायी कार्यों को उचित ढंग से निपटाने के लिए ही किया गया है, क्योंकि संसद केवल अधिवेशन के दौरान ही बैठती है। इसलिए उसके पास समय बहुत कम जबकि काम बहुत अधिक होता है। अतः ऐसी स्थिति में संसदीय समितियाँ विभिन्न मामलों की जाँच एवं निरीक्षण का कार्य करती हैं। ये समितियाँ विभिन्न मंत्रालयों के अनुदान माँगों का अध्ययन करती हैं।

संसद के दोनों सदनों में व्यवस्था कुछ मामलों में छोड़कर एक-जैसी है। ये समितियाँ दो प्रकार की होती हैं तदर्थ और स्थायी। इसमें स्थायी समितियाँ विभिन्न विभागों के कार्यों, उनके बजट, व्यय तथा संबंधित विधेयक की देखरेख करती हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विधायी कार्यों पर इन समितियों का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। संसदीय समितियों द्वारा की जाने वाली जाँच और आलोचना के भय से अधिकारी अनुचित निर्णय लेने से घबराते हैं एवं सचेत भी रहते हैं। सरकार द्वारा इसे बहुत प्रोत्साहन दिया जाता है और इसके सुझावों को सरकार स्वीकार भी करती है।

विधायिका HBSE 11th Class Political Science Notes

→ साधारण शब्दों में, सरकार उस व्यवस्था का नाम है जो शासन चलाती है। राजतन्त्र में कानून बनाने व उन्हें लागू करने की शक्ति राजा या सम्राट के पास होती है।

→ परन्तु आधुनिक लोकतन्त्र के युग में सरकार का निर्माण जनता के प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। प्रजातन्त्र में सरकार के तीन अंग होते हैं कार्यपालिका, विधानपालिका तथा न्यायपालिका। तीनों अंगों में विधानपालिका अधिक महत्त्वपूर्ण है।

→ विधानपालिका का मुख्य कार्य कानूनों का निर्माण करना होता है। कार्यपालिका विधानपालिका द्वारा निर्मित कानूनों को लागू करने का कार्य करती है। अतः विधानपालिका सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है।

→ वह जनता की इच्छाओं का दर्पण है। इस अध्याय में अध्ययन का विषय रहेगा कि निर्वाचित विधायिकाएँ कैसे काम करती हैं और प्रजातान्त्रिक सरकार बनाए रखने में कैसे सहायता करती हैं? भारत में संसद और राज्यों की विधायिकाओं की संरचना और कार्यों तथा लोकतान्त्रिक शासन में उनके महत्त्व का अध्ययन करेंगे।

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HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

HBSE 11th Class Political Science कार्यपालिका Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
संसदीय कार्यपालिका का अर्थ होता है
(क) जहाँ संसद हो वहाँ कार्यपालिका का होना
(ख) संसद द्वारा निर्वाचित कार्यपालिका
(ग) जहाँ संसद कार्यपालिका के रूप में काम करती है
(घ) ऐसी कार्यपालिका जो संसद के बहुमत के समर्थन पर निर्भर हो
उत्तर:
(घ) ऐसी कार्यपालिका जो संसद के बहुमत के समर्थन पर निर्भर हो।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

प्रश्न 2.
निम्नलिखित संवाद पढ़ें। आप किस तर्क से सहमत हैं और क्यों?
अमित – संविधान के प्रावधानों को देखने से लगता है कि राष्ट्रपति का काम सिर्फ ठप्पा मारना है।
शमा – राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है। इस कारण उसे प्रधानमंत्री को हटाने का भी अधिकार होना चाहिए।
राजेश – हमें राष्ट्रपति की ज़रूरत नहीं। चुनाव के बाद, संसद बैठक बुलाकर एक नेता चुन सकती है जो प्रधानमंत्री बने।
उत्तर:
उक्त तीनों संवादों से पता चलता है कि संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति की स्थिति पर चर्चा की गई है। प्रथम संवाद के अनुसार राष्ट्रपति को रबर स्टांप बताया गया है। उक्त कथन को हमें संसदीय शासन प्रणाली के अनुरूप देखना चाहिए जिसमें राष्ट्रपति की भूमिका संवैधानिक मुखिया के रूप में निश्चित की गई है। इसलिए संविधान में प्रदत अपनी शक्तियों का प्रयोग वह वास्तविक मुखिया प्रधानमंत्री के परामर्श पर ही करता है। इसी कारण उसकी स्थिति संदेहात्मक हो जाती है। लेकिन उसका पद गौरव और गरिमा का पद है।

दूसरा कथन प्रधानमंत्री की नियुक्ति पदच्युति पर राष्ट्रपति के अधिकारों की स्थिति के सम्बन्ध में है। इस कथन के सम्बन्ध में मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति देश के राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। इस नियक्ति के संबंध में वस्ततः राष्ट्रपति के अधिकार सीमित है क्योंकि संसदीय प्रणाली के सिद्धांत के अनुसार राष्ट्रपति लोकसभा में बहमत दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।

यद्यपि कुछ विशेष परिस्थिति में राष्ट्रपति को स्वैच्छिक शक्ति का प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त है; जैसे यदि लोकसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो तो ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार संसद के किसी भी सदन के सदस्य को जिस पर उन्हें लोकसभा में बहुमत सिद्ध करने का विश्वास हो उसे प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है। यद्यपि उन्हें एक ‘निश्चित’ अवधि में बहुमत सिद्ध करने के लिए कहा जाता है। इसी क्रम यह कहना कि राष्ट्रपति को विशेष परिस्थिति में प्रधानमंत्री को हटाने का अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए ताकि वह परिस्थिति के अनुसार उसका प्रयोग कर सके।

यहाँ मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि प्रधानमंत्री को लोकसभा के प्रति उत्तरदायी ठहराया गया है। ऐसे में विशेष परिस्थिति में भी यह अधिकार जनता के प्रतिनिधियों को ही होना चाहिए न कि राष्ट्रपति को हटाने का अधिकार दिया जाए। तीसरे संवाद के अनुसार राष्ट्रपति की उपस्थिति व्यर्थ बताई गई है। परंतु इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि आज जिस तरह छोटे-छोटे दल उभर रहे हैं और कई बार किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

राष्ट्रपति अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए संसद के किसी भी सदन के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकता है। इसके अतिरिक्त हमने संविधान में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया है जिसमें दो प्रकार की कार्यपालिका-संवैधानिक एवं वास्तविक होनी अनिवार्य है। प्रधानमंत्री हमारी वास्तविक कार्यपालिका अध्यक्ष है तो राष्ट्रपति संवैधानिक कार्यपालिका की पूर्ति करता है। इसलिए हम राष्ट्रपति के पद को समाप्त नहीं कर सकते।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित को सुमेलित करें
(क) भारतीय विदेश सेवा जिसमें बहाली हो उसी प्रदेश में काम करती है।
(ख) प्रादेशिक लोक सेवा केंद्रीय सरकार के दफ्तरों में काम करती है जो या तो देश की राजधानी में होते हैं या देश में कहीं ओर।
(ग) अखिल भारतीय सेवाएँ जिस प्रदेश में भेजा जाए उसमें काम करती है, इसमें प्रतिनियुक्ति पर केंद्र में भी भेजा जा सकता है।
(घ) केंद्रीय सेवाएँ भारत के लिए विदेशों में कार्यरत।
उत्तर:
(क) भारतीय विदेश सेवा – भारत के लिए विदेशों में कार्यरत।
(ख) प्रादेशिक लोक सेवा – जिसमें बहाली हो उसी प्रदेश में काम करती है।
(ग) अखिल भारतीय सेवाएँ – जिस प्रदेश में भेजा जाए उसमें काम करती है। इसमें प्रतिनियुक्ति पर केंद्र में भी भेजा जा सकता है।
(घ) केंद्रीय सेवाएँ – केंद्रीय सरकार के दफ्तरों में काम करती है जो या तो देश की राजधानी में होते हैं या देश में कहीं ओर।

प्रश्न 4.
उस मंत्रालय की पहचान करें जिसने निम्नलिखित समाचार को जारी किया होगा। यह मंत्रालय प्रदेश की सरकार का है या केंद्र सरकार का और क्यों?
(क) आधिकारिक तौर पर कहा गया है कि सन् 2004-05 में तमिलनाडु पाठ्यपुस्तक निगम कक्षा 7, 10 और 11 की नई पुस्तकें जारी करेगा।

(ख) भीड़ भरे तिरूवल्लुर-चेन्नई खंड में लौह-अयस्क निर्यातकों की सुविधा के लिए एक नई रेल लूप लाइन बिछाई जाएगी। नई लाइन लगभग 80 कि०मी० की होगी। यह लाइन पुटुर से शुरू होगी और बंदरगाह के निकट अतिपटू तक जाएगी।

(ग) रमयमपेट मंडल में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं की पुष्टि के लिए गठित तीन सदस्यीय उप-विभागीय समिति ने पाया कि इस माह आत्महत्या करने वाले दो किसान फ़सल के मारे जाने से आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहे थे।
उत्तर:
(क)उक्त प्रश्न में प्रथम समाचार राज्य मंत्रिमंडल द्वारा जारी किया गया है, जो राज्य सरकार के अधीन शिक्षा मंत्रालय के कार्यक्षेत्र में आता है। ये पुस्तकें इसलिए जारी करेगा क्योंकि सन् 2004-05 में नए सत्र का आरंभ होगा जिसमें तमिलनाडु पाठ्यपुस्तक निगम कक्षा 7, 10 और 11 में नई पुस्तकें होंगी। शिक्षा संघ एवं राज्य दोनों का विषय है।

(ख) दूसरा समाचार रेल मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है। यह कार्य केंद्र सरकार के अधीन रेल मंत्रालय द्वारा लौह-अयस्क निर्यातकों की सुविधा को ध्यान में रखकर किया गया है। रेल सम्बन्धी विषय संघ सूची के अन्तर्गत केन्द्र सरकार के अधीन आता है।

(ग) तीसरा समाचार भी राज्य मंत्रिमण्डल के अधीन कृषि मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है। यद्यपि यह विषय समवर्ती सूची के अन्तर्गत आता है। उस आधार पर केंद्र सरकार राज्य सरकार के माध्यम से किसानों को विभिन्न प्रकार की योजनाओं के द्वारा सहायता प्रदान करने का कार्य भी कर सकती है।

प्रश्न 5.
प्रधानमंत्री की नियुक्ति करने में राष्ट्रपति
(क) लोकसभा के सबसे बड़े दल के नेता को चुनता है।
(ख) लोकसभा में बहुमत अर्जित करने वाले गठबंधन-दलों में सबसे बड़े दल के नेता को चुनता है।
(ग) राज्यसभा के सबसे बड़े दल के नेता को चुनता है।
(घ) गठबंधन अथवा उस दल के नेता को चुनता है जिसे लोकसभा के बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।
उत्तर:
(घ) गठबंधन अथवा उस दल के नेता को चुनता है जिसे लोकसभा के बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।

प्रश्न 6.
इस चर्चा को पढ़कर बताएँ कि कौन-सा कथन भारत पर सबसे ज्यादा लागू होता है
आलोक – प्रधानमंत्री राजा के समान है। वह हमारे देश में हर बात का फ़ैसला करता है।
शेखर – प्रधानमंत्री सिर्फ ‘बराबरी के सदस्यों में प्रथम’ है। उसे कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं। सभी मंत्रियों और प्रधानमंत्री के अधिकार बराबर हैं।
बॉबी – प्रधानमंत्री को दल के सदस्यों तथा सरकार को समर्थन देने वाले सदस्यों का ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन कुल मिलाकर देखें तो नीति-निर्माण तथा मंत्रियों के चयन में प्रधानमंत्री की बहुत ज्यादा चलती है।
उत्तर:
उपर्युक्त कथनों में बॉबी द्वारा व्यक्त किया गया कथन भारत पर सबसे ज्यादा लागू होता है क्योंकि देश का प्रधानमंत्री बहुमत दल का नेता होने के साथ-साथ लोकसभा का नेता भी होता है। प्रधानमंत्री की शक्तियाँ एवं अधिकार व्यापक है।

प्रश्न 7.
क्या मंत्रिमंडल की सलाह राष्ट्रपति को हर हाल में माननी पड़ती है? आप क्या सोचते हैं? अपना उत्तर अधिकतम 100 शब्दों में लिखें।
उत्तर:
भारत में संसदीय शासन-प्रणाली होने के कारण राष्ट्रपति नाममात्र का अध्यक्ष है। भारतीय संविधान के निर्माण के समय डॉ० बी० आर० अम्बेडकर (Dr. B.R. Ambedkar) ने कहा था, “राष्ट्रपति की वैसी ही स्थिति है जैसी ब्रिटिश संविधान में सम्राट की है। वह राज्य का मुखिया है, कार्यपालिका का नहीं।” इसी विचार का समर्थन करते हुए भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) ने कहा था,

“यद्यपि संविधान में कोई ऐसी धारा नहीं रखी गई है जिसके अनुसार राष्ट्रपति के लिए मंत्रिमंडल की सलाह मानना आवश्यक हो, परन्तु यह आशा की जाती है कि जिस संवैधानिक परम्परा के अनुसार इंग्लैण्ड में सम्राट् सदा ही अपने मंत्रियों का परामर्श मानता है, उसी प्रकार की परम्परा भारत में भी स्थापित की जाएगी और राष्ट्रपति एक सवैधानिक शासक अर्थात् मुखिया बन जाएगा।”

इसके बावजूद भी कुछ विद्वानों का यह मत था कि राष्ट्रपति मंत्रिमंडल के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं है। परन्तु अब संविधान के 42वें संशोधन (1976) द्वारा राष्ट्रपति की स्थिति को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया गया है। अब संविधान के अनुच्छेद 74 में संशोधन करके इसे इस प्रकार बना दिया गया है, “राष्ट्रपति को परामर्श तथा सहायता देने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रि-परिषद् होगा तथा राष्ट्रपति उसके परामर्श के अनुसार कार्य करेगा।” इस प्रकार अब राष्ट्रपति केवल सवैधानिक मुखिया (Constitutional Head) है और वह मंत्रि-परिषद् के परामर्श के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।

प्रश्न 8.
संसदीय-व्यवस्था में कार्यपालिका को नियंत्रण में रखने के लिए विधायिका को बहुत-से अधिकार दिए हैं। कार्यपालिका को नियंत्रित करना इतना जरूरी क्यों है? आप क्या सोचते हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान के अनुसार देश में संसदीय शासन की व्यवस्था की गई है। संसदीय शासन व्यवस्था विशेषतः विधानमंडल एवं कार्यपालिका के घनिष्ठ सम्बन्धों पर आधारित होती है। इन्हीं सम्बन्धों के आधार पर ब्रिटेन की तरह भारत में भी मंत्रिमंडल का निर्माण संसद में से किया जाता है। संसद के निम्न सदन लोकसभा में जिस राजनीतिक दल अथवा दलीय गठबन्धन को पूर्ण बहुमत प्राप्त हो जाता है उस दल के नेता को राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है और फिर प्रधानमंत्री के परामर्श के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति की जाती है।

इसके साथ-साथ विधानमंडल के प्रति मंत्रिमंडल का सामूहिक उत्तरदायित्व संसदीय शासन-प्रणाली की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 में कहा गया है, “मंत्रि-परिषद् सामूहिक रूप में लोकसभा के सामने उत्तरदायी है।” इसका अर्थ यह है कि मंत्रिमंडल जो भी निर्णय संसद तथा देश के सामने रखता है प्रत्येक मंत्री उसके लिए उत्तरदायी होता है। मंत्रिमंडल तब तक ही कार्य करता है जब तक वह विधायिका के निम्न सदन लोकसभा के प्रति पूर्णतः उत्तरदायित्व का निर्वाह करता है। इसके अतिरिक्त संसद के पास भी कार्यपालिका पर नियन्त्रण रहते अनेक अधिकार; जैसे अधिवेशन के दौरान प्रश्न पूछकर, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव एवं अविश्वास प्रस्ताव आदि दिए गए हैं।

ऐसा करना आवश्यक भी है, क्योंकि कार्यपालिका देश के शासन का सबसे प्रमुख अंग है। इसकी शक्ति असीमित है। इसका वास्तविक अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। चूंकि प्रधानमंत्री जनता द्वारा निर्वाचित होता है अत: वह जनता के प्रति उत्तरदायी भी होना चाहिए, जो वह लोकसभा के प्रति उत्तरदायित्व के आधार पर निभाता है।

यदि कार्यपालिका को विधायिका नियंत्रण में न रखे तो इसके निरंकुश होने की संभावना अत्यधिक हो सकती है और वह कोई भी असंवैधानिक कार्य कर सकता है। परंतु विधायिका का नियंत्रण होने से उसमें यह भय बना रहता है कि यदि ऐसा किया गया तो संसद अथवा विधायिका अविश्वास का प्रस्ताव पारित कर संघीय मन्त्रि-परिषद् एवं उसके मुखिया प्रधानमंत्री को त्यागपत्र देने के लिए बाध्य कर सकती है। अतः इसीलिए संसदीय शासन को उत्तरदायी शासन कहा जाता है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 4 कार्यपालिका

प्रश्न 9.
कहा जाता है कि प्रशासनिक-तंत्र के कामकाज में बहुत ज्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप होता है। सुझाव के तौर पर कहा जाता है कि ज्यादा से ज्यादा स्वायत्त एजेंसियाँ बननी चाहिए जिन्हें मंत्रियों को जवाब न देना पड़े।
(क) क्या आप मानते हैं कि इसमें प्रशासन ज्यादा जन-हितैषी होगा?
(ख) क्या आप मानते हैं कि इससे प्रशासन की कार्य कुशलता बढ़ेगी?
(ग) क्या लोकतंत्र का अर्थ यह होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण हो?
उत्तर:
(क) जैसा कि सर्वविदित है कि भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है, जहाँ प्रशासनिक तंत्र जनता और सरकार के बीच एक कड़ी का काम करता है। सरकार द्वारा जनहित में बनाए गए कानून इसी तंत्र के द्वारा क्रियान्वित कर जनता तक पहुँचाए जाते हैं। दूसरी ओर यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि प्रशासनिक तंत्र अथवा नौकरशाही में अहंभाव एवं मालिक बनने की भावना होती है जिससे जनसाधारण प्रशासनिक अधिकारियों तक नहीं पहुँच पाते है तथा नौकरशाही भी आम नागरिकों की माँगों और आशाओं के प्रति संवेदनशील नहीं होती है।

इसी कारण लोकतंत्रीय ढंग से निर्वाचित सरकार का महत्त्व नौकरशाही को नियंत्रित करने एवं जन समस्याओं को प्रभावी तरीके से हल करने में बढ़ जाता है। परंतु इसका दूसरा परिणाम यह भी होता है कि इससे नौकरशाही राजनीतिज्ञों के हाथों की कठपुतली बन जाती है। अत: तमाम समस्याओं के निदान के लिए यह सुझाव दिया जा सकता है कि स्वायत्त एजेंसियाँ स्थापित होनी चाहिए। इस तरह की एजेंसियाँ प्रायः सरकार अथवा राजनीतिज्ञ हस्तक्षेप से मुक्त रहती है जिससे प्रशासन के जन-हितैषी बनने की अधिक सम्भावनाएँ होगी।

(ख) स्वायत्त एजेंसियाँ स्थापित होने से प्रशासन की कार्य कुशलता अवश्य बढ़ेगी, क्योंकि राजनीतिक हस्तक्षेप से इनका कार्य बहुत प्रभावित होता है और प्रशासनिक अधिकारी कोई भी कार्य स्वतंत्र एवं निष्पक्ष वातावरण में नहीं कर पाते हैं। स्वायत्त एजेंसियों के स्थापित होने से ये अपना कार्य अधिक से अधिक कुशलता पूर्वक करने में सफल हो सकते हैं।

(ग) लोकतंत्र का अर्थ जनता द्वारा निर्वाचित हुई सरकार से होता है, जहाँ शासन का संचालन जनता की इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के अनुरूप हो। परंतु प्रतिनिधियों का प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण हो, यह उचित नहीं है। क्योंकि प्रशासनिक तंत्र एक स्वतंत्र निकाय है। यह सरकार द्वारा बनाई गई नई नीतियों को क्रियात्मक रूप प्रदान करता है। यदि यह राजनीतिज्ञों के नियंत्रण में हो जाएगा तो पूरी व्यवस्था अव्यवस्थित हो जाएगी और जनता के हितों की उपेक्षा होने लगेगी। जिससे प्रशासन का वास्तविक उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

प्रश्न 10.
नियुक्ति आधारित प्रशासन की जगह निर्वाचन आधारित प्रशासन होना चाहिए – इस विषय पर 200 शब्दों में एक लेख लिखो।
उत्तर:
इस प्रश्न के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि नियुक्ति आधारित प्रशासन की जगह निर्वाचन आधारित प्रशासन होना सर्वथा अनुचित होगा, क्योंकि भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश, जहाँ कि जनसंख्या ही लगभग 130 करोड़ से अधिक है और जहाँ ..कि लोकतांत्रिक व्यवस्था अभूतपूर्व है लेकिन प्रशासनिक कार्य कुशलता की दृष्टि से निम्न श्रेणी में आता हो वहाँ निर्वाचन पद्धति को आधार बनाकर नियुक्ति करने का कोई औचित्य नहीं है। इसके अतिरिक्त ऐसी पद्धति से सत्ता में बैठे भ्रष्ट नेताओं को, जो अपने-अपने क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, अपने चेहतों एवं समर्थकों को प्रशासनिक अधिकारी बनाने का मौका मिल जाएगा।

जिसके द्वारा वे प्रशासनिक मामले में ज्यादा से ज्यादा हस्तक्षेप करने लगेंगे। जिसके परिणामस्वरूप प्रशासनिक भ्रष्टाचार जाएगी। अतः ऐसा करना बिल्कुल भी सही नहीं होगा क्योंकि अपराध से ग्रस्त इस देश में अपराधी न सिर्फ खुली हवा में इन नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से घूम सकेंगे बल्कि इससे अपराध का ग्राफ भी काफी बढ़ जाएगा।

अन्य महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति एक स्वतंत्र निकाय के द्वारा परीक्षाओं के माध्यम से होने से प्रतिभागियों की विभागीय क्षमता और प्रशासनिक कार्य कुशलता को आँका जाता है। इसके साथ-साथ उनसे ये अपेक्षा भी की जाती है कि वे विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी इस विशाल देश की जनता की भावनाओं और संवेदनाओं का आदर करते हुए अपनी कार्यक्षमता का परिचय देंगे और विषम से विषम परिस्थितियों का सामना भी सफलतापूर्वक करेंगे, जो निर्वाचन आधारित प्रशासन के . द्वारा कतई संभव नहीं लगता है।

कार्यपालिका HBSE 11th Class Political Science Notes

→ सरकार राज्य का आवश्यक तत्त्व है। यह राज्य का कार्यवाहक यन्त्र है जो राज्य की इच्छा को निर्धारित, व्यक्त व क्रियान्वित करता है। सरकार के बिना राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि सरकार राज्य का मूर्त रूप है।

→ सरकार को राज्य की आत्मा कहा जा सकता है। सरकार राज्य का वह यन्त्र है जिस पर राज्य को कानून बनाने, उन्हें क्रियान्वित तथा उनकी व्याख्या करने की जिम्मेवारी होती है।

→ सरकार के तीनों अंगों में से कार्यपालिका सरकार का दूसरा महत्त्वपूर्ण अंग है, जो विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करता है। वास्तव में यह वह धुरी है जिसके चारों ओर राज्य का शासन तन्त्र घूमता है।

→ विशाल अर्थों में ‘कार्यपालिका’ शब्द का प्रयोग सरकार के उन सभी अधिकारियों के लिए किया जाता है जो विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करने का कार्य करते हैं।

→ इस प्रकार राज्य के अध्यक्ष से लेकर छोटे-से-छोटे कर्मचारी तक कार्यपालिका में आ जाते हैं परन्तु राजनीतिक विज्ञान में कार्यपालिका का विशेष अर्थ है।

→ इस अध्याय में हम कार्यपालिका के अर्थ, प्रकार, कार्य तथा भारत की संसदीय व्यवस्था के अधीन संघीय एवं राज्य स्तरीय कार्यपालिका के गठन एवं इसके कार्यों का उल्लेख करते हुए नौकरशाही रूपी कार्यपालिका पर भी दृष्टिपात करेंगे।

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे? Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
संविधान उन मौलिक नियमों, सिद्धांतों तथा परम्पराओं का संग्रह होता है, जिनके अनुसार राज्य की सरकार का गठन, सरकार के कार्य, नागरिकों के अधिकार तथा नागरिकों और सरकार के बीच संबंधों को निश्चित किया जाता है।

प्रश्न 2.
लिखित संविधान किसे कहा जाता है?
उत्तर:
लिखित संविधान वह संविधान होता है जो एक गठित संविधान सभा द्वारा बनाया जाए और एक निश्चित तिथि को लागू हो; जैसे अमेरिका, भारत, जापान, आयरलैण्ड आदि देशों के संविधान लिखित संविधान कहलाते हैं।

प्रश्न 3.
अलिखित संविधान किसे कहा जाता है?
उत्तर:
अलिखित संविधान ऐसा संविधान होता है जो प्रायः रीति-रिवाजों, परम्पराओं तथा समय-समय पर दिए गए न्यायिक निर्णयों पर आधारित होता है जिनका धीरे-धीरे विकास होता है। ऐसे संविधान के लिए न संविधान सभा निर्मित होती है और ही उन्हें लागू करने की निश्चित शर्त को पूर्ण करना होता है। इंग्लैण्ड का संविधान अलिखित संविधान है।

प्रश्न 4.
संविधान हमारे लिए क्यों आवश्यक है? कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • संविधान ऐसे मौलिक नियमों को निश्चित करता है जो समाज में रहने वाले लोगों में समन्वय तथा आपसी विश्वास की स्थापना करते हैं।
  • संविधान समाज में सरकार के वर्तमान एवं भविष्य में सरकार के संचालन के मूल सिद्धांतों एवं आदर्शों पर प्रकाश डालता है।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान सभा में प्रारम्भ में कुल सदस्यों की संख्या कितनी थी?
उत्तर:
भारतीय संविधान सभा में प्रारम्भ में कुल सदस्यों की संख्या 389 थी जिसमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 चीफ कमिश्नर प्रांतों के तथा 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे।

प्रश्न 6.
संविधान सभा के प्रथम स्थायी अध्यक्ष कौन थे? उन्हें कब स्थायी अध्यक्ष चुना गया?
उत्तर:
संविधान सभा के प्रथम स्थायी अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद थे, जिन्हें 11 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा द्वारा निर्विरोध चुना गया था।

प्रश्न 7.
भारत की स्वाधीनता एवं विभाजन के बाद संविधान सभा के सदस्यों की संख्या कितनी रह गई?
उत्तर:
भारत की स्वाधीनता एवं विभाजन के बाद संविधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या 324 रह गई जिसमें 235 प्रांतों के प्रतिनिधि तथा 89 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे।

प्रश्न 8.
भारतीय संविधान सभा के किन्हीं चार सदस्यों के नाम बताइए।
उत्तर:

  • डॉ० राजेन्द्र प्रसाद,
  • जवाहरलाल नेहरू,
  • सरदार पटेल,
  • डॉ० बी०आर० अम्बेडकर।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान सभा में उद्देश्य संबंधी प्रस्ताव कब और किसके द्वारा प्रस्तुत किया गया?
उत्तर:
भारतीय संविधान सभा में 13 दिसम्बर, 1946 को पं० जवाहरलाल नेहरू ने उद्देश्य संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान सभा में प्रस्तुत उद्देश्य प्रस्ताव संबंधी किन्हीं दो बातों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • संविधान सभा भारत को एक प्रभुसत्ता सम्पन्न प्रजातंत्रीय गणराज्य घोषित करने के दृढ़-निश्चय की घोषणा करती है।
  • यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना उचित तथा सम्मानित स्थान ग्रहण करती है और मानव-कल्याण व विश्व शांति के विस्तार में अपना पूर्ण तथा ऐच्छिक योगदान करती है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान सभा द्वारा निर्मित विभिन्न समितियों में से किन्हीं चार समितियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • संघीय संविधान समिति,
  • संघीय शक्तियाँ समिति,
  • प्रांतीय संविधान समिति,
  • अल्पसंख्यकों तथा मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित समिति।

प्रश्न 12.
भारतीय संविधान सभा की मसौदा समिति में कुल कितने सदस्य थे?
उत्तर:
भारतीय संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष सहित कुल सात सदस्य थे, जिनमें दो सदस्य गोपाल स्वामी आयंगर एवं के०एम० मुन्शी थे।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान सभा द्वारा पारित संविधान पर कब और किसके अन्तिम हस्ताक्षर हुए थे?
उत्तर:
भारतीय संविधान सभा द्वारा पारित संविधान पर 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के अन्तिम हस्ताक्षर हुए थे।

प्रश्न 14.
भारतीय संविधान सभा के द्वारा संविधान के निर्माण हेतु कितने अधिवेशन हुए एवं कुल कितने दिन विचार-विमर्श हुआ?
उत्तर:
भारतीय संविधान सभा के द्वारा संविधान निर्माण हेतु कुल 11 अधिवेशन हुए और उन्होंने 165 दिनों तक विचार-विमर्श किया।

प्रश्न 15.
भारतीय संविधान सभा के किन सदस्यों को संविधान सभा का आन्तरिक वर्ग (Inner Circle) कहा जाता है?
उत्तर:
पं० जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ० अब्दुल कलाम आज़ाद, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, सीता रमैया, गोविंद बल्लभ पन्त, डॉ० अम्बेडकर, एन०सी० आयंगर, के०एम० मुन्शी, आयर एवं सत्यनारायण सिन्हा सहित कुल 11 सदस्यों को संविधान सभा के आन्तरिक-वर्ग (Inner-circle) में शामिल किया जाता था।

प्रश्न 16.
संविधान सभा के प्रतिनिधित्व के स्वरूप की आलोचना किन आधारों पर की जाती है? कोई दो आधार लिखें।
उत्तर:

  • संविधान के प्रतिनिधियों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ।
  • संविधान सभा में एक विशेष जाति हिन्दुओं को प्रतिनिधित्व दिया गया था।

प्रश्न 17.
संविधान सभा में निर्णय लेने की प्रक्रिया का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संविधान सभा में निर्णय की प्रक्रिया सहमति एवं समायोजन के सिद्धांत पर आधारित थी जो कि पूर्णतः लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी।

प्रश्न 18.
भारतीय संविधान के किन्हीं दो स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • भारत सरकार अधिनियम, 1935 तथा,
  • विदेशी संविधानों का प्रभाव।

प्रश्न 19.
भारतीय संविधान पर कनाडा के संविधान के पड़ने वाले किन्हीं दो प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • भारतीय संविधान में कनाडा की भाँति भारत को ‘राज्यों का संघ’ कहा है।
  • संघात्मक ढाँचे के साथ-साथ केन्द्र को शक्तिशाली बनाना भी कनाडा के संविधान की देन है।

प्रश्न 20.
भारतीय संविधान में राज्य-नीति के निर्देशक सिद्धांतों संबंधी प्रावधान किस देश के संविधान से प्रभावित होकर किया गया है?
उत्तर:
आयरलैण्ड के संविधान से प्रभावित होकर किया।

प्रश्न 21.
भारतीय संविधान के संचालन में भूमिका निभाने वाली किन्हीं दो राजनीतिक प्रथाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • राष्ट्रपति के पद पर दो बार से अधिक एक ही व्यक्ति का न रहना भी प्रथा पर आधारित है क्योंकि संविधान कोई ऐसी पाबन्दी नहीं लगाता है।
  • राज्यपाल के पद पर नियुक्त होने वाला व्यक्ति उस राज्य का निवासी नहीं होना चाहिए। यह भी प्रथा पर आधारित है।

प्रश्न 22.
भारतीय संविधान 26 जनवरी को ही क्यों लागू किया गया?
उत्तर:
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 26 जनवरी को पूर्ण स्वराज्य दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया गया था। इस तिथि को विशेष महत्त्व देने एवं यादगार बनाने हेतु नया संविधान 26 जनवरी, 1950 को ही लागू किया गया।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान की कोई दो परिभाषाएँ दीजिए। उत्तर-संविधान की दो परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

1. गिलक्राइस्ट (Gilchrist) के अनुसार, “संविधान लिखित अथवा अलिखित नियमों अथवा कानूनों का वह समूह होता है जिनके द्वारा सरकार का संगठन, सरकार की शक्तियों का विभिन्न अंगों में वितरण और इन शक्तियों के प्रयोग के सामान्य सिद्धांत निश्चित किए जाते हैं।”

2. लार्ड ब्राईस (Lord Bryce) के अनुसार, “संविधान ऐसे निश्चित नियमों का संग्रह होता है, जिसमें सरकार की कार्यविधि निहित होती है और जिनके द्वारा उसका संचालन होता है।”

प्रश्न 2.
लिखित एवं अलिखित संविधान में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लिखित संविधान-लिखित संविधान वह संविधान है जो पूर्ण रूप से या जिसका अधिकांश भाग लिखित होता है। इसके अंतर्गत सरकार के रूप और उसके संगठन के बारे में तथा सरकार के तीनों अंगों के पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट रूप में लिख दिया जाता है। इसके अतिरिक्त नागरिकों के अधिकारों तथा उनके सरकार से संबंधों के बारे में लिख दिया जाता है।

लिखित संविधान में उस प्रणाली का भी वर्णन किया जा सकता है जिसके द्वारा संविधान में संशोधन किया जा सकता है। ऐसा संविधान प्रायः एक संविधान सभा द्वारा बनाया जाता है जो कुछ समय लगाकर उसे एक निश्चित लेख के रूप में तैयार करती है और ऊपर दिए गए सभी विषयों पर निर्णय लेकर उन्हें लिखित रूप देती है। कई बार कुछ उदार शासकों द्वारा स्वयं ही कुछ लोगों को यह प्रदान किया जाता है. या लोग स्वयं राजा की निरंकुश शक्तियों का बलपूर्वक विरोध करके उसे ऐसा करने पर विवश कर देते हैं।

अलिखित संविधान इसके विपरीत अलिखित संविधान वह संविधान है जिसका अधिकतर भाग अलिखित होता है। ऐसा संविधान प्रायः रीति-रिवाजों, परंपराओं तथा समय-समय पर दिए गए न्यायिक निर्णयों पर आधारित होता है। इसमें शासन का रूप, सरकार की शक्तियाँ तथा नागरिकों के अधिकार आदि मुख्यतः रीति-रिवाजों पर ही आधारित होते हैं जिनका धीरे-धीरे विकास हुआ है।

वहाँ पर संविधान में संशोधन के लिए भी कोई विशेष प्रणाली नहीं अपनाई जाती, बल्कि बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार उसमें आसानी से परिवर्तन कर लिया जाता है। ऐसा संविधान न तो किसी संविधान सभा द्वारा एक निश्चित समय पर बनाया जाता है और न ही किसी सम्राट् द्वारा प्रदान किया जाता है, बल्कि इसका आवश्यकता के अनुसार विकास होता है। इसका मुख्य उदाहरण इंग्लैण्ड का संविधान है जिसका कभी निर्माण नहीं किया गया और जो मुख्यतः रीति-रिवाज़ों पर आधारित है।

प्रश्न 3.
संविधान सभा में निर्णय लेने की प्रक्रिया का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संविधान सभा में काँग्रेस दल के सदस्यों का एक बहुत बड़ा बहुमत था, लेकिन इस दल ने कभी किसी भी फैसले को बहुमत के आधार पर लादने का प्रयास नहीं किया। अगर किसी भी संवैधानिक प्रश्न पर नेहरू एवं पटेल दोनों ही सहमत होते थे, तो उस विषय में निर्णय बहुत सुगमता के साथ ले लिया जाता था। अगर उन दोनों में आपस में मतभेद होता था तो उनके समर्थक एक-दूसरे का समर्थन करते थे।

संविधान सभा में लंबी-लंबी बहसें होती थीं तथा जब तक नेहरू एवं पटेल अपने मतभेदों को समाप्त नहीं कर पाते थे, तब तक कोई निर्णय नहीं हो पाता था। लेकिन ये दोनों विभूतियाँ जल्दी ही विषय पर सहमति प्रकट कर देती थीं। इसके अलावा संविधान सभा में काँग्रेस दल के सदस्यों की महत्त्वपूर्ण विषयों पर बैठक होती थी, खुलकर वाद-विवाद होता था, मतदान भी हो जाता था एवं अंत में विषय पर निर्णय ले लिया जाता था।

प्रत्येक महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने में अल्पतंत्र वर्ग के नेताओं का विशेष महत्त्व होता था। इस प्रकार यह स्पष्ट विदित हो जाता है कि इन नेताओं ने प्रजातंत्रीय सिद्धांतों के आधार पर संविधान सभा में निर्णय सहमति के द्वारा ही लिए थे। यही कारण है कि हमारा संविधान इतना व्यावहारिक बन सका है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान पर पड़े किन्हीं चार अमेरिकी संविधान के प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत के संविधान पर संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) के संविधान का भी काफी प्रभाव है जैसे

(1) हमारे संविधान के आरम्भ से पूर्व एक प्रस्तावना है। इसमें अमेरिका के संविधान की प्रस्तावना की भान्ति यह लिखा गया है कि संविधान का निर्माण करने वाले ‘हम भारत के लोग’ (‘We the People of India’) हैं।

(2) हमारे मौलिक अधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका के बिल ऑफ राईट्स (Bill of Rights) से मिलते-जुलते हैं।

(3) भारत की सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) के कार्य और दर्जा अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट जैसे हैं।

(4) न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सिद्धांत।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान पर पड़े किन्हीं चार ब्रिटिश संविधान के प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान में सबसे अधिक प्रभाव ब्रिटिश संविधान का है। यह शायद इस कारण है कि अंग्रेजों ने स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व लगभग 200 वर्ष तक भारत पर शासन किया और इस बीच भारतीयों को उनकी राजनीतिक संस्थाओं का काफी अनुभव हुआ। ब्रिटिश संविधान से हमने निम्नलिखित बातें अपनाई हैं

  • इंग्लैण्ड के सम्राट की भान्ति भारत का राष्ट्रपति नाममात्र का तथा संवैधानिक मुखिया है।
  • संसदीय प्रणाली इंग्लैण्ड की नकल है।
  • मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री का श्रेष्ठ स्थान है तथा मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है जैसे कि ब्रिटेन में है।
  • संसद का द्विसदनीय विधानमंडल होना और लोकसभा इंग्लैण्ड के कॉमन सदन की भान्ति अधिक शक्तिशाली है।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान के विकास में भूमिका निभाने वाले संसद द्वारा पारित किन्हीं पाँच अधिनियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संविधान के अनुसार अनेक शासकीय व्यवस्थाओं को पूरा करने के लिए संसद को कानून बनाने का अधिकार दिया गया है। इसके अधीन संसद द्वारा बनाए गए निम्नलिखित कानून उल्लेखनीय हैं

  • निरोधक नजरबन्दी अधिनियम, 1950,
  • 1950, 1951 का जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम,
  • 1951 का वित्त आयोग का अधिनियम,
  • 1951 का राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति चुनाव अधिनियम,
  • भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 ।

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान के निर्माण पर पड़े ‘भारत सरकार अधिनियम, 1935’ के किन्हीं पाँच प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत के वर्तमान संविधान का अधिकांश भाग भारत सरकार अधिनियम, 1935 पर आधारित है। यह निम्नलिखित बातों से स्पष्ट है

  • वर्तमान संविधान में संघीय शासन की व्यवस्था सन् 1935 के अधिनियम पर आधारित है।
  • केन्द्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन भी इसी अधिनियम पर आधारित है। उस एक्ट की भान्ति नए संविधान में शासन-शक्तियों का तीन सूचियों
    (a) संघीय सूची,
    (b) राज्य सूची तथा
    (c) समवर्ती सूची में विभाजन किया गया है।
  • सन् 1935 के एक्ट की भान्ति नए संविधान में भी केन्द्रीय सरकार को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है।
  • सन् 1935 के एक्ट की भान्ति नए संविधान द्वारा भी केन्द्र में द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना की गई है।
  • नए संविधान की धारा 356 के अंतर्गत राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने की व्यवस्था का आधार सन 1935 के एक्ट का सैक्शन 93 है।

प्रश्न 8.
भारतीय संविधान के विकास के स्रोत के रूप में भूमिका निभाने वाले किन्हीं पाँच सवैधानिक विशेषज्ञों की टिप्पणियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सवैधानिक विशेषज्ञों के विचार और टिप्पणियाँ भी हमारे संविधान का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इन विशेषज्ञों ने संविधान के बारे में अपने-अपने विचार अपने संवैधानिक लेखों में व्यक्त किए हैं। चाहे इन विचारों को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं फिर भी इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। इन विचारकों का प्रभाव हमारे कानून निर्माताओं तथा न्यायाधीशों पर अवश्य पड़ सकता है। इस श्रेणी के विशेषज्ञों व उनके संवैधानिक लेखों के नाम निम्नलिखित हैं

  • D.D. Basu : Commentary on the Constitution of India.
  • V.N. Rao : The Constitution of India.
  • K.V. Rao : Parliamentary Democracy of India.
  • N.A. Palkivala : Our Constitution : Defaced and Defiled.
  • M.C. Setelvad : The Indian Constitution.

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘संविधान’ शब्द से क्या अभिप्राय है? हमें संविधान की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:
प्रत्येक राज्य का प्रायः एक संविधान होता है। साधारण शब्दों में, संविधान उन मौलिक नियमों, सिद्धांतों तथा परंपराओं का संग्रह होता है, जिनके अनुसार राज्य की सरकार का गठन, सरकार के कार्य, नागरिकों के अधिकार तथा नागरिकों और सरकार के बीच संबंध को निश्चित किया जाता है। शासन का स्वरूप लोकतांत्रिक हो या अधिनायकवादी, कुछ ऐसे नियमों के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता जो राज्य में विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं तथा शासकों की भूमिका को निश्चित करते हैं।

इन नियमों के संग्रह को ही संविधान कहा जाता है। संविधान में शासन के विभिन्न अंगों तथा उनके पारस्परिक संबंधों का विवरण होता है। इन संबंधों को निश्चित करने हेतु कुछ नियम बनाए जाते हैं, जिनके आधार पर शासन का संचालन सुचारू रूप से संभव हो जाता है तथा शासन के विभिन्न अंगों में टकराव की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। संविधान के अभाव में शासन के सभी कार्य निरंकुश शासकों की इच्छानुसार ही चलाए जाएँगे जिससे नागरिकों पर अत्याचार होने की संभावना बनी रहेगी।

ऐसे शासक से छुटकारा पाने के लिए नागरिकों को अवश्य ही विद्रोह का सहारा लेना पड़ेगा जिससे राज्य में अशांति तथा अव्यवस्था फैल जाएगी। इस प्रकार एक देश के नागरिकों हेतु एक सभ्य समाज एवं कुशल तथा मर्यादित सरकार का अस्तित्व एक संविधान की व्यवस्थाओं पर ही निर्भर करता है।

संविधान की दो परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
1. गिलक्राइस्ट (Gilchrist) के अनुसार, “संविधान लिखित अथवा अलिखित नियमों अथवा कानूनों का वह समूह होता है जिनके द्वारा सरकार का संगठन, सरकार की शक्तियों का विभिन्न अंगों में वितरण और इन शक्तियों के प्रयोग के सामान्य सिद्धांत निश्चित किए जाते हैं।”

2. लार्ड ब्राईस (Lord Bryce) के अनुसार, “संविधान ऐसे निश्चित नियमों का संग्रह होता है, जिसमें सरकार की कार्यविधि निहित होती है और जिनके द्वारा उसका संचालन होता है।”

हमारे लिए संविधान क्यों आवश्यक है? (Why do we need a Constitution?)-किसी भी देश के लिए उसका संविधान बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। यह सरकार की शक्तियों को निश्चित करता है तथा उन पर अंकुश लगाता है। संविधान सरकार के । विभिन्न अंगों की शक्तियों को भी निश्चित करता है जिससे उनमें झगड़े की संभावना नहीं रहती। यह नागरिकों के अधिकारों तथा सरकार के साथ नागरिकों के संबंध भी निश्चित करता है।

संविधान के द्वारा लोग अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं तथा सरकार पर अंकुश लगा सकते हैं। संविधान के अभाव में शासन के सभी कार्य शासकों की इच्छानुसार ही चलाए जाएँगे, जिससे नागरिकों पर अत्याचार होने की संभावना बनी रहेगी। ऐसे शासक से छुटकारा पाने के लिए नागरिकों को विद्रोह का सहारा लेना पड़ेगा जिससे देश में अशांति व अव्यवस्था का वातावरण बना रहेगा। प्रो० जैलीनेक (Prof. Jellineck) ने लिखा है, “संविधान के बिना राज्य नहीं रहेगा, बल्कि अराजकता होगी।”

संविधान समाज के लिए निम्नलिखित कार्य करता है
(1) सर्वप्रथम, संविधान कुछ ऐसे मौलिक नियम निश्चित करता है जो समाज में रहने वाले लोगों में समन्वय तथा आपसी विश्वास की स्थापना करते हैं। संविधान के द्वारा ही किसी राज्य के स्वरूप को निश्चित किया जा सकता है।

(2) संविधान ही सरकार के विभिन्न अंगों पर नियंत्रण स्थापित करता है और उन्हें तानाशाह होने से बचाता है।

(3) संविधान ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों की रक्षा करता है। यह नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberties) की धरोहर है। व्यवहार में इन अधिकारों पर कुछ पाबंदियाँ लगानी आवश्यक होती हैं। संविधान ही उन परिस्थितियों को निश्चित करता हैं, जिनमें सरकार द्वारा नागरिकों के अधिकारों को छीना जा सकता है। भारत में भी राष्ट्रीय संकट के समय सरकार को नागरिकों पर पाबंदी लगाने का अधिकार दिया गया है।

(4) संविधान एक ध्रुव तारे के समान है, जो शासक को हमेशा दिशा-निर्देश देता है और उसका मार्गदर्शन करता है।

(5) संविधान ही सरकार के विभिन्न अंगों के बीच संबंध बनाए रखता है और उनमें जो मनमुटाव पैदा होता है, उसे स्पष्ट करता है।

(6) संविधान एक ऐसा आईना (Mirror) है जिसमें उस देश के भूत, वर्तमान और भविष्य की झलक मिलती है।

(7) विश्व के अधिकतर पुराने संविधान ऐसे हैं जिनमें केवल सरकार के गठन तथा शक्तियों और उन पर लगे प्रतिबंधों की ही व्यवस्था की गई है, परंतु, 20वीं शताब्दी में बने अनेक ऐसे संविधान हैं, जिनमें इन बातों के अतिरिक्त सरकार से नागरिकों की भलाई के लिए कुछ सकारात्मक कार्य करने के लिए भी कहा गया है। भारतीय संविधान भी एक ऐसा ही संविधान है।

इसके द्वारा भारतीय समाज में मौजूदं सामाजिक असमानता को समाप्त करने के लिए व्यवस्था की गई है। सरकार द्वारा कानून पास करके छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है। इस प्रकार संविधान द्वारा सरकार को बच्चों की शिक्षा तथा नागरिकों के स्वास्थ्य की देखभाल करने की जिम्मेवारी भी सौंपी गई है।

सरकार को नागरिकों के लिए रोज़गार की व्यवस्था करने तथा उनको इतने आर्थिक साधन जुटाने के लिए भी कहा गया है, जिससे नागरिक एक सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें। इसी प्रकार दक्षिण अफ्रीका का संविधान सरकार को यह निर्देश देता है कि वह देश में लंबे समय से चली आ रही जातीय भेदभाव की नीति को समाप्त करे तथा सभी के लिए मकान तथा स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराए। इंडोनेशिया का संविधान भी सरकार को राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था (National Education System) की व्यवस्था करने का निर्देश देता है।

प्रश्न 2.
भारत की संविधान सभा के गठन का वर्णन कीजिए। भारतीय संविधान के उद्देश्य-प्रस्ताव की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत के वर्तमान संविधान का निर्माण एक संविधान सभा ने किया, जिसकी स्थापना 1946 में मंत्रिमंडल मिशन योजना के अंतर्गत की गई थी। इस संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई, जिसमें से 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 चीफ कमिश्नर वाले प्रांतों के तथा 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि होने थे।

प्रांतों के 296 सदस्यों के चुनाव जुलाई, 1946 में करवाए गए। इनमें से 212 स्थान काँग्रेस को, 73 मुस्लिम लीग को एवं 11 स्थान अन्य दलों को प्राप्त हुए। काँग्रेस की इस शानदार सफलता को देखकर मुस्लिम लीग को बड़ी निराशा हुई और उसने संविधान सभा का बहिष्कार करने का निर्णय किया। 9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा का विधिवत् उद्घाटन हुआ और भारत के भविष्य के संविधान का निर्माण करने के लिए प्रतिनिधि पहली बार इकट्ठे हुए, लेकिन मुस्लिम लीग के किसी भी सदस्य ने इसमें भाग नहीं लिया और उसने पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा की माँग शुरू कर दी।

संविधान सभा का अधिवेशन सच्चिदानन्द सिन्हा, जो संविधान सभा के सबसे वयोवृद्ध सदस्य थे, की अध्यक्षता में शुरू हुआ। 11 दिसम्बर, 1946 को डॉ० राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का निर्विरोध रूप से स्थायी अध्यक्ष चुन लिया गया। संविधान सभा के अधिवेशन चलते रहे, लेकिन मुस्लिम लीग ने उनमें भाग नहीं लिया। राजनीतिक गतिविधियों के कारण माऊंट बैटन योजना 3 जून, 1947 के अनुसार भारत स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया गया।

इस कानून के अनुसार भारत दो डोमिनियन राज्यों भारत और पाकिस्तान में विभाजित हो गया। इस विभाजन के कारण जहाँ संविधान सभा के गठन में भी परिवर्तन हुआ, वहाँ संविधान सभा के स्तर में भी परिवर्तन हो गया। स्वतंत्रता-प्राप्ति और विभाजन के बाद संविधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या 324 रह गई, जिनमें से 235 प्रांतों के प्रतिनिधि और 89 रियासतों के प्रतिनिधि थे।

पंजाब और बंगाल के दो भाग, जो भारत में रह गए थे, उनके लिए फिर से चुनाव हुआ। इन सदस्यों ने 14 जुलाई, 1947 को संविधान सभा में स्थान ग्रहण किया। स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद संविधान सभा पूरी तरह से प्रभुता-संपन्न हो गई थी, क्योंकि कैबिनेट मिशन योजना 1946 के द्वारा उस पर जो प्रतिबंध लगाए गए थे, वे समाप्त हो गए थे। इस संविधान सभा ने संविधान बनाने का कार्य 26 नवम्बर, 1949 को पूरा कर लिया था।

26 जनवरी की यादगार को हमेशा बनाए रखने के लिए संविधान निर्माताओं ने जान-बूझकर संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया। 26 जनवरी का दिन ‘भारत में गणतंत्र दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस तरह से भारत का संविधान भारतीयों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के द्वारा निर्मित किया गया है। इस संविधान सभा में देश के प्रसिद्ध नेता, वकील तथा राजनीतिज्ञ शामिल थे।

इनमें मुख्य-मुख्य के नाम इस प्रकार थे-डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल, गोविंद बल्लभ पंत, अल्लादी कृष्ण स्वामी अय्यर, डॉ० बी०आर० अम्बेडकर, आचार्य कृपलानी, सच्चिदानन्द सिन्हा, गोपाल स्वामी आयंगर, सर फजरूल्ला खां, सर फिरोज शाहनून आदि।

उद्देश्य संबंधी प्रस्ताव (Objective Resolution):
13 दिसम्बर, 1946 को पं० जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य संबंधी प्रस्ताव पेश किए, जो इस प्रकार थे

(1) “संविधान सभा भारत को एक प्रभुसत्ता सम्पन्न प्रजातंत्रीय गणराज्य (Sovereign Democratic Republic) घोषित करने और उसके भविष्य के शासन के लिए संविधान बनाने के अपने दृढ़ और पवित्र निश्चय की घोषणा करती है, तथा

(2) जो क्षेत्र इस समय ब्रिटिश भारत में या भारतीय रियासतों के अंतर्गत हैं एवं भारत के ऐसे अन्य भाग जो ब्रिटिश भारत तथा रियासतों के बाहर हैं, वे सभी अगर प्रभुसत्ता सम्पन्न भारत में मिलना चाहते हैं, तो सभी मिलकर एक संघ का निर्माण करेंगे, तथा

(3) जिसमें उपरोक्त क्षेत्रों का अपनी वर्तमान सीमाओं सहित या ऐसी सीमाओं सहित जो संविधान सभा द्वारा और उसके बाद संविधान की विधि द्वारा निश्चित की जाएगी, स्वायत्त इकाइयों का पद मिलेगा और वह सरकार शासन की सभी शक्तियों का प्रयोग करेगी, सिवाय उन अधिकारों के जो संघ को दिए गए हैं तथा

(4) जिसमें प्रभुसत्ता सम्पन्न स्वतंत्र भारत, इसके संगठित भागों और सरकार के अंगों की समस्त शक्ति तथा अधिकार जनता से प्राप्त किए गए हैं, तथा

(5) जिसमें भारत के सभी लोगों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, पद तथा अवसर व कानून के समक्ष समानता, विचार, विश्वास, धर्म, पूजा, व्यवसाय, समुदाय बनाने की, कानून तथा सार्वजनिक नैतिकता के अनुसार स्वतंत्रता मिली हुई हो और सुरक्षित हो, तथा

(6) जिसमें अल्पसंख्यक वर्गों, पिछड़े हुए कबीलों और जातियों को काफी सुरक्षा की व्यवस्था होगी, तथा

(7) जिसके द्वारा सभ्य राष्ट्रों के कानून तथा न्याय के अनुसार गणतंत्र के स्थायित्व जल, थल व वायु पर अधिकार होगा।

(8) यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना उचित तथा सम्मानित स्थान ग्रहण करती है और मानव-कल्याण व विश्व-शांति के विस्तार में अपना पूर्ण तथा ऐच्छिक योगदान करती है।”

इस प्रस्ताव के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इनमें उन आधारभूत उद्देश्यों की घोषणा की गई थी जिनके आधार पर भारत के नए संविधान का निर्माण किया जाना था। इसमें भारत को सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न लोकतंत्रीय गणराज्य घोषित करना, जनता को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय, समानता तथा अन्य स्वतंत्रताएँ मिलें, पिछड़ी हुई तथा अनुसूचित जातियों के विकास के लिए कुछ संरक्षण हों तथा भारत में ऐसा संघ स्थापित हो जिसमें ब्रिटिश प्रांत, देशी रियासतें तथा अन्य भारतीय क्षेत्र शामिल हों, जो विश्व-शांति को बढ़ावा दें, आदि मुख्य बातें थीं।

इसके महत्त्व की चर्चा करते हुए के०एम० मुन्शी ने कहा था, “नेहरू का उद्देश्य संबंधी यह प्रस्ताव ही हमारे स्वतंत्र गणराज्य की जन्म कुंडली है।” (“Objective resolution cast the horoscope of our Sovereign Democratic Republic.”) इस उद्देश्य-प्रस्ताव को संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी, 1947 को सर्वसम्मति से पास कर दिया गया।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान के स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान एक ऐसा संविधान है जिसमें संसार के अनेक संविधानों के अच्छे तत्त्वों को अपनाया गया है। हमारे संविधान के निर्माताओं का उद्देश्य किसी आदर्श अथवा मौलिक संविधान का निर्माण करना नहीं था, वे तो देश के लिए एक व्यावहारिक तथा कामचलाऊ संविधान का निर्माण करना चाहते थे। अतः भारतीय संविधान के निर्माण में अनेक स्रोतों की सहायता ली गई। भारतीय संविधान के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं

1. भारत सरकार अधिनियम, 1935 (Government of India Act, 1935):
भारत के वर्तमान संविधान का अधिकांश भाग भारत सरकार अधिनियम, 1935 पर आधारित है। यह निम्नलिखित बातों से स्पष्ट है

  • वर्तमान संविधान में संघीय शासन की व्यवस्था सन् 1935 के अधिनियम पर आधारित है।
  • केन्द्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन भी इसी अधिनियम पर आधारित है। उस एक्ट की भान्ति नए संविधान में शासन-शक्तियों का तीन सूचियों
    (a) संघीय सूची,
    (b) राज्य सूची तथा
    (c) समवर्ती सूची में विभाजन किया गया है।
  • सन 1935 के एक्ट की भान्ति नए संविधान में भी केन्द्रीय सरकार को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है।
  • सन 1935 के एक्ट की भान्ति नए संविधान द्वारा भी केन्द्र में द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना की गई है।
  • नए संविधान की धारा 356 के अंतर्गत राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने की व्यवस्था का आधार सन 1935 के एक्ट का सैक्शन 93 है।
  • नए संविधान की धारा 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति को प्राप्त संकटकालीन शक्तियाँ सन 1935 के एक्ट के सैक्शन 10 की नकल है।

2. विदेशी संविधानों का प्रभाव (Influence of Foreign Constitutions) भारत के संविधान पर विश्व के विभिन्न देशों के संविधानों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने संसार के अनेक देशों के संविधानों का अध्ययन किया और अपने देश का संविधान बनाते समय उन देशों में प्रचलित सवैधानिक प्रणालियों में से वे बातें अपनाईं जो हमारे देश की परिस्थितियों के अनुकूल थीं. मुख्य विदेशी संविधान जिनका प्रभाव विशेष रूप से पड़ा है, निम्नलिखित हैं

(क) ब्रिटिश संविधान (British Constitution)-भारतीय संविधान में सबसे अधिक प्रभाव ब्रिटिश संविधान का है। यह शायद इस कारण है कि अंग्रेजों ने स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व लगभग 200 वर्ष तक भारत पर शासन किया और इस बीच भारतीयों को उनकी राजनीतिक संस्थाओं का काफी अनुभव हुआ। ब्रिटिश संविधान से हमने निम्नलिखित बातें अपनाई हैं

  • इंग्लैण्ड के सम्राट की भान्ति भारत का राष्ट्रपति नाममात्र का तथा संवैधानिक मुखिया है।
  • संसदीय प्रणाली इंग्लैण्ड की नकल है।
  • मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री का श्रेष्ठ स्थान है तथा मंत्रिमंडल वास्तविक कार्यपालिका है जैसे कि ब्रिटेन में है।
  • मंत्रिमंडल सामूहिक तौर पर लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है।
  • संसद का द्विसदनीय विधानमंडल होना और लोकसभा इंग्लैण्ड के कॉमन सदन की भान्ति अधिक शक्तिशाली है।।
  •  कानून के शासन का होना (Rule of Law)।

परंतु भारत और ब्रिटेन के संविधानों में इन सब बातों में एकरूपता होते हुए भी मूल अंतर इस बात का है कि इंग्लैण्ड में इन सबके बारे में कोई लिखित व्यवस्था नहीं की गई जबकि भारत में उन्हें लिखित संविधान द्वारा अपनाया गया है।

(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान (Constitution of the U.S.A.):
भारत के संविधान पर संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) के संविधान का भी काफी प्रभाव है; जैसे

  • हमारे संविधान के आरम्भ से पूर्व एक प्रस्तावना है। इसमें अमेरिका के संविधान की प्रस्तावना की भान्ति यह लिखा गया है कि संविधान का निर्माण करने वाले ‘हम भारत के लोग’ ‘We the People of India’ हैं।
  • हमारे मौलिक अधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका के बिल ऑफ राईट्स (Bill of Rights) से मिलते-जुलते हैं।
  • भारत की सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) के कार्य और दर्जा अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट जैसे हैं।
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सिद्धांत।
  • उप-राष्ट्रपति के कार्य और दर्जा।

(ग) कनाडा का संविधान (Canadian. Constitution) कुछ बातें हमने कनाडा के संविधान से भी अपनाई हैं; जैसे

  • कनाडा की भान्ति हमने भारत को राज्यों का संघ (Union of States) माना है।
  • संघात्मक ढाँचा अपनाने के साथ-साथ केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया है।
  • शेष शक्तियाँ केन्द्र को दी गई हैं।

(घ) ऑस्ट्रेलिया का संविधान (Australian Constitution)-ऑस्ट्रेलिया की भान्ति हमारे संविधान में समवर्ती-सूची की व्यवस्था और केन्द्र तथा राज्यों में झगड़ों का निपटारा करने की विधि (अनुच्छेद 251) अपनाई गई है।

(ङ) आयरलैण्ड का संविधान (The Irish Constitution)-राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत, राष्ट्रपति के एक विशेष निर्वाचन मंडल द्वारा चुनाव की व्यवस्था, राज्यसभा के सदस्यों में मनोनीत सदस्यों की व्यवस्था आदि आयरलैण्ड के संविधान पर आधारित है।

(च) अन्य संविधान (Other Constitutions)-उपरोक्त संविधानों के अतिरिक्त कई अन्य संविधानों ने भी हमारे संविधान को प्रभावित किया है; जैसे राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों का स्रोत जर्मनी का संविधान है। इसी प्रकार संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया तथा राज्यसभा के सदस्यों की निर्वाचन विधि दक्षिणी अफ्रीका के संविधान की देन है।

3. संसद द्वारा पास किए गए अधिनियम (Statutes)-संविधान के अनुसार अनेक शासकीय व्यवस्थाओं को पूरा करने के लिए संसद को कानून बनाने का अधिकार दिया गया है। इसके अधीन संसद द्वारा बनाए गए निम्नलिखित कानून उल्लेखनीय हैं–

  • निरोधक नजरबन्दी अधिनियम, 1950,
  • 1950, 1951 का जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम,
  • 1951 का वित्त आयोग का अधिनियम,
  • 1951 का राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति चुनाव अधिनियम,
  • भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955,
  • सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) अधिनियम, 1956,
  • सरकारी भाषा अधिनियम, 1963,
  • पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966,
  • 1971 का आन्तरिक सुरक्षा स्थापित रखने संबंधी एक्ट,
  • 1977 का प्रधानमंत्री तथा स्पीकर के चुनाव-विवादों के संबंध में अधिनियम,
  • 1977 का राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव के विवाद के संबंध में अधिनियम,
  • 1981 का राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी कानून,
  • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार कानून, 1992,
  • पोटा, 2002

4. मसौदा संविधान, 1948 (Draft Constitution of 1948)-भारतीय संविधान का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत सन 1948 का मसौदा संविधान है, जिसे डॉ० अम्बेडकर की अध्यक्षता में स्थापित की गई मसौदा समिति ने तैयार किया। इसमें 315 अनुच्छेद तथा 8 सूचियाँ थीं। इस पर संविधान सभा में खूब वाद-विवाद हुआ। सदस्यों द्वारा इसमें 7635 संशोधन पेश किए गए जिनमें से 2473 पर विचार किया गया। नए संविधान के अधिकांश अनुच्छेद इसी मसौदा संविधान में से ही लिए गए हैं।

5. संविधान सभा के विवाद (Debates of Constituent Assembly) भारत के वर्तमान संविधान की रूप-रेखा निर्धारित करने में संविधान सभा में हुए वाद-विवाद भी विशेष महत्त्व रखते हैं। इन विवादों में उच्चकोटि के विद्वानों, कानून शास्त्रियों तथा राजनीतिज्ञों ने भाग लिया जो संविधान सभा के सदस्य थे। गोपालन बनाम मद्रास राज्य (Gopalan V/s State of Madras) के मुकद्दमें में उच्चतम न्यायालय में संविधान सभा की रिपोर्ट का उदाहरण दिया गया था।

6. न्यायिक निर्णय (Judicial Decisions) भारतीय संविधान के विकास में सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के निर्णय भी विशेष महत्त्व रखते हैं और ये भी हमारे संविधान का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इन न्यायालयों ने संविधान के रक्षक और व्याख्याता होने के नाते कई प्रसिद्ध फैसले दिए हैं जो अब संविधान का भाग बन गए हैं; जैसे (Gopalan V/s State of Madras के मुकद्दमे में सुप्रीम कोर्ट ने निजी स्वतंत्रता के क्षेत्र की व्याख्या की।

इसी प्रकार Madras V/s Champkan के मुकद्दमे में न्यायालय ने यह फैसला दिया कि राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांत मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं। I.C.,Golaknath V/s State of Punjab के मुकद्दमे में यह कहा गया कि संसद मौलिक अधिकारों को नहीं बदल सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने सन् 1973 के प्रसिद्ध Fundamental Rights Case में अपने सन 1967 के फैसले को बदल दिया और संसद के संविधान के किसी भी भाग में संशोधन । करने के अधिकार को मान्यता दी।

7. सवैधानिक विशेषज्ञों के विचार (Views of Constitutional Experts)-संवैधानिक विशेषज्ञों के विचार और टिप्पणियाँ भी हमारे संविधान का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इन विशेषज्ञों ने संविधान के बारे में अपने-अपने विचार अपने संवैधानिक लेखों में व्यक्त किए हैं। चाहे इन विचारों को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं फिर भी इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। इन विचारकों का प्रभाव हमारे कानून निर्माताओं तथा न्यायाधीशों पर अवश्य पड़ सकता है।

8. संवैधानिक संशोधन (Constitutional Amendments)-संविधान के लागू होने के समय से लेकर अब तक इसमें लगभग 104 संशोधन (दिसम्बर, 2019 तक) हो चुके हैं, जो अब संविधान के अभिन्न अंग हैं तथा एक मुख्य स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इन संशोधनों द्वारा मूल संविधान में बहुत परिवर्तन आए हैं।

इनसे बहुत-सी बातों को संविधान से निकाल दिया गया है। प्रथम संशोधन द्वारा नागरिकों के स्वतन्त्रता के अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाने की व्यवस्था की गई है। 15वें संशोधन द्वारा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पदावधि 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई। 22वें संशोधन द्वारा सिन्धी भाषा को भी भारतीय भाषाओं की सूची में जोड़ दिया गया है। 24वें संशोधन द्वारा संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह संविधान के किसी भी भाग में, जिसमें मौलिक अधिकारों वाला भाग भी शामिल है, संशोधन कर सकती है।

26वें संशोधन के अनुसार राजा-महाराजाओं के प्रिवी पर्सी (Privy Purses) को समाप्त कर दिया गया। 27वें संशोधन द्वारा मणिपुर तथा मेघालय को पूर्ण राज्य का स्तर दे दिया गया। 42वें संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में संशोधन करके भारत को प्रभुसत्ता सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य (Sovereign, Socialist, Secular, Democratic Republic) घोषित किया गया और संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्य से जोड़ दिया गया।

44वें संशोधन के अनुसार, ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकारों की सूची से निकाल दिया गया। केन्द्र एवं राज्यों में प्रधानमन्त्री/मुख्यमन्त्री सहित मन्त्रियों की कुल संख्या निचले सदन में सदस्यों की संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। 95वें संशोधन द्वारा अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए लोकसभा तथा विधानसभाओं आदि में आरक्षण की अवधि बढ़ाकर 25 जनवरी, 2020 तक कर दी गई।

संविधान में किए गए 96 व 97वें संशोधन सहकारी समितियों (Co-operative Societies) के संबंध में हैं। इनके द्वारा सहकारी समितियों की आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देना है जिससे वे ग्रामीण भारत के विकास में सहायता कर सकें। 98वें (2013) संशोधन द्वारा कर्नाटक के राज्यपाल को यह शक्ति दी गई है कि हैदराबाद-कर्नाटक खण्ड (Hyderabad- Karnataka Region) के विकास के लिए कदम उठा सकें।

सन् 2015 में हुए 99वें संशोधन द्वारा भारत तथा बांग्लादेश के बीच हुई सन्धि के अन्तर्गत दोनों देशों के बीच भू-भाग परिवर्तन के परिणामस्वरूप उन क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्तियों को नागरिकता देने के अधिकार से संबंधित है। . ‘वस्तु एवं सेवा कर’ सम्बन्धी 101वां संशोधन अधिनियम राज्यसभा एवं लोकसभा में क्रमशः 3 अगस्त एवं 8 अगस्त, 2016 – को पारित करने के उपरान्त 8 सितम्बर, 2016 को राष्ट्रपति ने अपनी स्वीकृति प्रदान की।

यद्यपि उक्त संशोधन अधिनियम संख्या की दृष्टि से 122वां था, परन्तु पूर्व में संसद द्वारा 100 संशोधन विधेयक पारित किए जा चुके थे अतः संशोधन की दृष्टि से 101वां संशोधन विधेयक था। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा देने सम्बन्धी 123वाँ संविधान संशोधन विधेयक संसद से पारित होने के पश्चात् राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर 11 अगस्त, 2018 को लागू हुआ जो संशोधन की संख्या दृष्टि से 102वां संशोधन विधेयक था।

इसी क्रम में 124वां संविधान संशोधन विधेयक के रूप में 9 जनवरी, 2019 को संसद द्वारा पारित करने के पश्चात् 12 जनवरी, 2019 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षा एवं रोजगार में 10 प्रतिशत आरक्षण देने सम्बन्धी संशोधन विधेयक लागू किया गया जो संवैधानिक संशोधन की संख्या दृष्टि से 103वाँ संशोधन विधेयक है। इसी क्रम में 104वें सवैधानिक संशोधन (संशोधन प्रस्ताव संख्या 126) द्वारा दिसम्बर, 2019 में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के साथ-साथ सरकारी सेवाओं में भी आरक्षण की अवधि को दस वर्ष बढ़ाकर 25 जनवरी, 2030 तक कर दिया गया है।

इस प्रकार संविधान के लागू होने के समय से लेकर अब तक (दिसम्बर, 2019) इसमें कुल 104 संशोधन हो चुके हैं। इस प्रकार इन संशोधनों द्वारा बहुत परिवर्तन हुए हैं और इनका अध्ययन किए बिना संविधान की पूरी जानकारी प्राप्त नहीं हो सकती।

9. प्रथाएँ (Conventions) यद्यपि भारतीय संविधान एक लिखित संविधान है, फिर भी इस देश में महत्त्वपूर्ण प्रथाएँ विकसित हुई हैं, जो संविधान के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें से कुछ प्रथाएँ इस प्रकार हैं

(1) राज्यपाल की नियुक्ति करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है, परंतु प्रथा के आधार पर संघीय सरकार किसी राज्यपाल की नियुक्ति करते समय सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री की सलाह लेती है।

(2) अब यह भी प्रथा बन गई है कि राज्यपाल के पद पर नियुक्त होने वाला व्यक्ति उस राज्य का निवासी नहीं होना चाहिए।

(3) लोकसभा तथा विधानमंडलों के अध्यक्ष (स्पीकर) निष्पक्षता के साथ अपना कार्य करते हैं चाहे वे किसी भी दल से सम्बन्धित क्यों न हों।

(4) प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है, परंतु प्रथा के आधार पर राष्ट्रपति उसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त करता है जो लोकसभा में बहुसंख्यक दल का नेता होता है। राष्ट्रपति उसकी नियुक्ति करते समय स्वेच्छा से काम नहीं करता।

(5) राष्ट्रपति का दो बार से अधिक एक ही व्यक्ति का न रहना भी प्रथा पर आधारित है। संविधान के द्वारा ऐसी कोई पाबन्दी नहीं लगाई गई है। निष्कर्ष (Conclusion) ऊपर दिए गए विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भारतीय संविधान के अनेक स्रोत हैं। हमारे संविधान के निर्माताओं ने विदेशी संविधानों से बहुत-सी बातें ली हैं जिसके परिणामस्वरूप कई बार इसे ‘उधार ली का थैला’ (Bag of Borrowings) अथवा विविध संविधानों की खिचड़ी (Hotch-Potch) कहकर पुकारा जाता है, परंतु यह आलोचना न्यायसंगत नहीं है।

वास्तव में, संविधान निर्माताओं द्वारा विदेशी संविधानों की केवल उन धाराओं तथा व्यवस्थाओं को अपने संविधान में अपना लिया गया जो उन देशों में सफलतापूर्वक कार्य कर चुकी थीं और भारत की परिस्थितियों के अनुकूल थीं।

वस्तु निष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. निम्नलिखित देश का संविधान अलिखित है
(A) चीन
(B) फ्रांस
(C) स्विटज़रलैंड
(D) इंग्लैंड
उत्तर:
(D) इंग्लैंड

2. भारतीय संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा की स्थापना हुई
(A) 1947 ई०
(B) 1946 ई०
(C) 1949 ई०
(D) 1950 ई०
उत्तर:
(B) 1946 ई०

3. मूल रूप में संविधान सभा के सदस्यों की संख्या निश्चित की गई थी
(A) 389
(B) 360
(C) 272
(D) 420
उत्तर:
(A) 389

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

4. भारतीय संविधान का निर्माण किया गया
(A) संविधान सभा द्वारा
(B) ब्रिटिश संसद द्वारा
(C) भारतीय संसद द्वारा
(D) ब्रिटिश सम्राट द्वारा
उत्तर:
(A) संविधान सभा द्वारा

5. भारतीय संविधान
(A) लचीला है
(B) कठोर है
(C) अंशतः लचीला तथा अंशतः कठोर है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) अंशतः लचीला तथा अंशतः कठोर है

6. संविधान सभा की प्रथम बैठक हुई
(A) 7 दिसंबर, 1947
(B) 9 दिसंबर, 1946
(C) 3 जून, 1947
(D) 14 जुलाई, 1947
उत्तर:
(B) 9 दिसंबर, 1946

7. निम्नलिखित देश का संविधान लिखित है
(A) भारत
(B) संयुक्त राज्य अमेरिका
(C) चीन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

8. निम्नलिखित देश का संविधान लचीला है
(A) भारत
(B) संयुक्त राज्य अमेरिका
(C) इंग्लैंड
(D) स्विटजरलैंड
उत्तर:
(C) इंग्लैंड

9. भारतीय संविधान
(A) सरकार के विभिन्न अंगों के गठन तथा
(B) सरकार के विभिन्न अंगों पर नियंत्रण स्थापित करता है शक्तियों को निश्चित करता है। और उन्हें तानाशाह बनने से रोकता है।
(C) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है
(D) उपर्युक्त तीनों कार्य करता है।
उत्तर:
(D) उपर्युक्त तीनों कार्य करता है।

10. निम्नलिखित देश का संविधान कठोर है
(A) चीन
(B) इंग्लैंड
(C) संयुक्त राज्य अमेरिका
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) संयुक्त राज्य अमेरिका

11. निम्नलिखित राजनीतिक दल के सदस्यों द्वारा संविधान सभा का बहिष्कार किया गया था
(A) कांग्रेस
(B) अकाली दल
(C) मुस्लिम लीग
(D) भारतीय जनता पार्टी
उत्तर:
(C) मुस्लिम लीग

12. संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव किया गया था
(A) वयस्क मताधिकार के आधार पर
(B) जातीय आधार पर
(C) सांप्रदायिक आधार पर
(D) ब्रिटिश सम्राट द्वारा
उत्तर:
(C) सांप्रदायिक आधार पर

13. भारतीय संविधान में अनुसूचियाँ हैं
(A) 7
(B) 8
(C) 10
(D) 12
उत्तर:
(D) 12

14. संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव (Objective Resolution) निम्न सदस्य द्वारा पेश किया गया था
(A) जवाहरलाल नेहरू
(B) सरदार पटेल
(C) आचार्य कृपलानी
(D) मौलाना आज़ाद
उत्तर:
(A) जवाहरलाल नेहरू

15. निम्नलिखित भारतीय संविधान का स्रोत नहीं है
(A) भारत सरकार अधिनियम, 1935
(B) इंग्लैंड का संविधान
(C) चीन का संविधान
(D) संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान
उत्तर:
(C) चीन का संविधान

16. भारतीय संविधान बनकर तैयार हो गया था
(A) 26 जनवरी, 1950
(B) 14 नवंबर, 1949
(C) 26 नवंबर, 1949
(D) 30 नवंबर, 1950
उत्तर:
(C) 26 नवंबर, 1949

17. भारत का संविधान लागू हुआ
(A) 26 नवंबर, 1949
(B) 26 जनवरी, 1950
(C) 26 जनवरी, 1949
(D) 15 अगस्त, 1947
उत्तर:
(B) 26 जनवरी, 1950

18. स्वतंत्रता प्राप्ति तथा देश के विभाजन के पश्चात् संविधान सभा के सदस्यों की संख्या रह गई थी
(A) 280
(B) 324
(C) 213
(D) 235
उत्तर:
(B) 324

19. भारतीय संविधान सभा में निम्नलिखित राजनीतिक दल को भारी बहुमत प्राप्त था
(A) कांग्रेस
(B) मुस्लिम लीग
(C) अकाली दल
(D) हिंदू महासभा
उत्तर:
(A) कांग्रेस

20. निम्नलिखित संविधान सभा की मसौदा समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष थे
(A) डॉ० राजेंद्र प्रसाद
(B) डॉ० अंबेडकर
(C) जवाहरलाल नेहरू
(D) के०एम० मुंशी
उत्तर:
(B) डॉ० अंबेडकर

21. भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष थे
(A) जवाहरलाल नेहरू
(B) डॉ० अंबेडकर
(C) डॉ० राजेंद्र प्रसाद
(D) सरदार पटेल
उत्तर:
(C) डॉ० राजेंद्र प्रसाद

22. भारतीय संविधान सभा के निर्माण में लगे
(A) 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन
(B) पूरे 3 वर्ष
(C) 2 वर्ष तथा 4 महीने
(D) 2 वर्ष 6 महीने तथा 15 दिन
उत्तर:
(A) 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन

23. भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का वर्णन संविधान के निम्नलिखित अनुच्छेद में किया गया है
(A) अनुच्छेद 324
(B) अनुच्छेद 368
(C) अनुच्छेद 370
(D) अनुच्छेद 326
उत्तर:
(B) अनुच्छेद 368

24. भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों को जोड़ने की प्रेरणा निम्नलिखित संविधान से मिली
(A) संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से
(B) इंग्लैंड के संविधान से
(C) जर्मनी के संविधान से
(D) कनाडा के संविधान से
उत्तर:
(A) संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से

25. भारतीय संविधान में दिए गए राज्यनीति के निदेशक सिद्धांतों पर निम्नलिखित देश के संविधान की छाप है
(A) इंग्लैंड के संविधान की
(B) आयरलैंड के संविधान की
(C) जर्मनी के संविधान की
(D) कनाडा के संविधान की
उत्तर:
(B) आयरलैंड के संविधान की

26. निम्नलिखित भारतीय संविधान का स्रोत है
(A) इंग्लैंड का संविधान
(B) संवैधानिक संशोधन
(C) संसद द्वारा पारित अधिनियम
(D) उपर्युक्त तीनों संविधान
उत्तर:
(D) उपर्युक्त तीनों संविधान

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में –

1. भारतीय संविधान सभा का गठन कब किया गया?
उत्तर:
सन् 1946 में।

2. भारतीय संविधान सभा की प्रथम बैठक कब हुई?
उत्तर:
9 दिसम्बर, 1946 को।

3. संविधान सभा के प्रथम अस्थायी अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
डॉ० सच्चिदानन्द

4. प्रारम्भ से ही किस राजनीतिक दल ने संविधान सभा की बैठकों का बहिष्कार किया?
उत्तर:
मुस्लिम लीग ने।

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5. भारतीय संविधान सभा ने संविधान बनाने का कार्य कब पूर्ण किया?
उत्तर:
26 नवम्बर, 1949 को।

6. भारतीय संविधान कब लागू हुआ?
उत्तर:
26 जनवरी, 1950 को।

7. भारतीय संविधान सभा के किसी एक प्रमुख संवैधानिक परामर्शदाता का नाम लिखिए।
उत्तर:
बी०एन० राव।

8. भारतीय संविधान सभा के मसौदा समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
डॉ० बी०आर० अम्बेडकर।

9. भारतीय संविधान सभा की मसौदा समिति में कुल कितने सदस्य थे?
उत्तर:
अध्यक्ष सहित कुल सात सदस्य थे।

10. भारतीय संविधान का निर्माण करने में कितना समय लगा?
उत्तर:
2 वर्ष, 11 महीने एवं 18 दिन।

11. ‘The Indian Constitution-Corner stone of a Nation’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
उत्तर:
जी० ऑस्टिन।

12. वर्तमान संविधान में कितने अनुच्छेद एवं कितनी अनुसूचियाँ हैं?
उत्तर:
वर्तमान संविधान में 395 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियाँ हैं।

13. भारतीय संविधान में राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों का प्रावधान किस देश के संविधान से प्रभावित होकर किया है?
उत्तर:
जर्मनी के संविधान से।

14. भारतीय संविधान में राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांतों संबंधी प्रावधान किस देश के संविधान से प्रभावित होकर किया गया है?
उत्तर:
आयरलैण्ड के संविधान से।

15. उद्देश्य प्रस्ताव को संविधान सभा द्वारा कब स्वीकृति प्रदान की गई थी?
उत्तर:
22 जनवरी, 1947 को।

16. डॉ० अम्बडेकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति का गठन कब किया गया?
उत्तर:
29 अगस्त, 1947 को।

17. संविधान सभा की अन्तिम बैठक कब हुई?
उत्तर:
24 जनवरी, 1950 को।

18. मूल भारतीय संविधान में कुल कितने अनुच्छेद, अनुसूचियाँ एवं भाग थे?
उत्तर:
395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियाँ एवं 22 भाग थे।

19. संविधान सभा के सदस्यों ने संविधान पर अन्तिम रूप में हस्ताक्षर कब किए?
उत्तर:
24 जनवरी, 1950 को।

20. संविधान सभा के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
डॉ० राजेन्द्र प्रसाद

रिक्त स्थान भरें

1. भारतीय संविधान में कुल ………….. अनुच्छेद हैं।
उत्तर:
395

2. भारतीय संविधान सभा के कुल ………….. अधिवेशन हुए हैं।
उत्तर:
12

3. भारतीय संविधान सभा का गठन ……………. में हुआ।
उत्तर:
1946

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4. ……………. भारतीय संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष थे।
उत्तर:
डॉ० सच्चिदानन्द

5. संविधान सभा की प्रथम बैठक ……………. को हुई।
उत्तर:
9 दिसम्बर, 1946

6. ………….. मसौदा समिति के अध्यक्ष थे।
उत्तर:
डॉ० अम्बेडकर

7. मूल संविधान में कुल ………….. अनुसूचियाँ थी।
उत्तर:
8

8. भारतीय संविधान …………… को लागू हुआ।
उत्तर:
26 जनवरी, 1950

9. ………….. संविधान सभा के प्रथम स्थायी अध्यक्ष थे।
उत्तर:
डॉ० राजेन्द्र प्रसाद

10. संविधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या ………….. निर्धारित की गई थी।
उत्तर:
389

11. संविधान में …………. सदस्य अनुसूचित जाति के थे।
उत्तर:
26

12. संविधान में ……………. सवैधानिक सलाहकार थे।
उत्तर:
बी.एन. राव

13. संविधान सभा की प्रान्तीय संविधान समिति के अध्यक्ष ………….. थे।
उत्तर:
सरदार पटेल

14. भारतीय संविधान को ………….. द्वारा अपनाया गया।
उत्तर:
संविधान सभा

15. संविधान सभा की अन्तिम एवं 12वीं बैठक ……………. को हुई थी।
उत्तर:
24 जनवरी, 1950

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Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे? Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

HBSE 11th Class Political Science संविधान : क्यों और कैसे? Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
इनमें कौन-सा संविधान का कार्य नहीं है?
(क) यह नागरिकों के अधिकार की गारंटी देता है।
(ख) यह शासन की विभिन्न शाखाओं की शक्तियों के अलग-अलग क्षेत्र का रेखांकन करता है।
(ग) यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता में अच्छे लोग आयें।
(घ) यह कुछ साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करता है।
उत्तर:
(ग) यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता में अच्छे लोग आयें।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन इस बात की एक बेहतर दलील है कि संविधान की प्रमाणिकता संसद से यादा है?
(क) संसद के अस्तित्व में आने से कहीं पहले संविधान बनाया जा चुका था।
(ख) संविधान के निर्माता संसद के सदस्यों से कहीं ज्यादा बड़े नेता थे।
(ग) संविधान ही यह बताता है कि संसद कैसे बनायी जाये और इसे कौन-कौन-सी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।
(घ) संसद, संविधान का संशोधन नहीं कर सकती।
उत्तर:
(ग) संविधान ही यह बताता है कि संसद कैसे बनायी जाये और इसे कौन-कौन-सी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।

प्रश्न 3.
बतायें कि संविधान के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत?
(क) सरकार के गठन और उसकी शक्तियों के बारे में संविधान एक लिखित दस्तावेज़ है।
(ख) संविधान सिर्फ लोकतांत्रिक देशों में होता है और उसकी जरूरत ऐसे ही देशों में होती है।
(ग) संविधान एक कानूनी दस्तावेज़ है और आदर्शों तथा मूल्यों से इसका कोई सरोकार नहीं।
(घ) संविधान एक नागरिक को नई पहचान देता है।
उत्तर:
(क) सही,
(ख) गलत,
(ग) गलत,
(घ) सही।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

प्रश्न 4.
बतायें कि भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में निम्नलिखित अनुमान सही हैं या नहीं? अपने उत्तर का कारण बतायें।
(क) संविधान-सभा में भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई। इसका निर्वाचन सभी नागरिकों द्वारा नहीं हुआ था।

(ख) संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया क्योंकि उस समय नेताओं के बीच संविधान की बुनियादी रूपरेखा के बारे में आम सहमति थी।

(ग) संविधान में कोई मौलिकता नहीं है क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा दूसरे देशों से लिया गया है।
उत्तर:
(क) भारत की संविधान सभा का निर्माण कैबिनेट मिशन योजना, 1946 के अनुसार किया गया था। इस योजना के अनुसार पहले प्रांतों की विधानसभाओं के चुनाव हुए। विधानसभा के चुने हुए सदस्यों के द्वारा प्रांतों में संविधान सभा के प्रतिनिधियों को निर्वाचित किया गया। देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को देशी रियासतों के राजाओं के द्वारा मनोनीत किया गया था।

भारतीय संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई, जिसमें से 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 चीफ कमिश्नर वाले प्रांतों के तथा 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि होते थे। प्रांतों के 296 सदस्यों के चुनाव जुलाई, 1946 में करवाए गए। इनमें से 212 स्थान काँग्रेस को, 73 मुस्लिम लीग को एवं 11 स्थान अन्य दलों को प्राप्त हुए।

काँग्रेस की इस शानदार सफलता को देखकर मुस्लिम लीग को बड़ी निराशा हुई और उसने संविधान सभा का बहिष्कार करने का निर्णय किया। 9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा का विधिवत उद्घाटन हुआ। प्रायः संविधान सभा के गठन के लिए यह आरोप लगाया जाता है कि इसके प्रतिनिधियों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ था, लेकिन उस समय की परिस्थितियों के अनुसार यह अनिवार्य था कि संविधान सभा को शीघ्र गठित किया जाए। अगर मान लिया जाए कि चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर भी होता तो भी यही प्रतिनिधि निर्वाचित होकर आने थे, क्योंकि काँग्रेस देश में एक बहुत ही शक्तिशाली एवं प्रभावशाली संस्था बन चुकी थी। जिसमें समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रतिनिधित्व था।

इसके अतिरिक्त इसमें भी तनिक सन्देह नहीं कि देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को भी संविधान सभा में मनोनीत किया गया था और यह पद्धति प्रजातंत्र सिद्धांतों के विपरीत थी, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों को मद्देनजर रखते हुए ऐसा करना आवश्यक था, अन्यथा देशी रियासतों के राजा संविधान सभा में शामिल ही नहीं होते। अतः भारतीय संविधान सभा हर दृष्टि से भारत की एक सच्ची प्रतिनिधित्व सभा थी। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि इसमें भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई।

(ख) यदि देखा जाए तो किसी भी विविधतापूर्ण एवं व्यापक प्रतिनिध्यात्मक संस्था में सदस्यों के बीच मतभेद का होना अस्वाभाविक नहीं है। भारतीय संविधान सभा में भी सदस्यों के बीच वैचारिक मतभेद होते थे लेकिन वे मतभेद वास्तव में वैध सैद्धान्तिक आधार पर होते थे। भारतीय संविधान सभा में व्यापक मतभेद के पश्चात् भी संविधान का केवल एक ही प्रावधान ऐसा है, जो बिना किसी वाद-विवाद के पास हुआ। यह प्रावधान सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार था, जिस पर वाद-विवाद आवश्यकह सदस्यों के लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा का ही सचक था। अत: यह कहना सही नहीं है कि संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया, क्योंकि उस समय नेताओं के बीच संविधान की बुनियादी रूपरेखा के बारे में सामान्यतया आम सहमति थी।

(ग) यह कहना सही नहीं है कि भारतीय संविधान में कोई मौलिकता नहीं है, क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा विश्व के दूसरे देशों से लिया गया है। वास्तविकता तो यह है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने विभिन्न देशों के संविधान के आदर्शों, मूल्यों एवं परंपराओं से बहुत कुछ सीखने अथवा ग्रहण करने का प्रयास किया।जो उन देशों में सफलतापूर्वक कार्य कर रही थीं और भारत की परिस्थितियों के अनुकूल थीं। इस प्रकार भारतीय संविधान विदेशों से उधार लिया हुआ संविधान नहीं, बल्कि विभिन्न विदेशी संविधानों की आदर्श-व्यवस्थाओं का संग्रह है।

वास्तव में हमारे संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शिता का ही कार्य किया। विदेशी संविधान की आँख मूंदकर नकल नहीं की गई है, बल्कि विभिन्न संविधानों की विशेषताओं को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल संशोधित कर अपनाने से भारतीय संविधान में मौलिकता भी आ गई है। वैसे भी संवैधानिक व्यवस्थाओं पर किसी भी देश का एकाधिकार नहीं है और कोई भी देश किसी भी सवैधानिक व्यवस्था को अपना सकता है। ऐसे में भारतीय संविधान निर्माताओं द्वारा भी विश्व की किसी संवैधानिक व्यवस्था को अपनाने से भारतीय संविधान की मौलिकता के प्रति कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाना चाहिए।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान के बारे में निम्नलिखित प्रत्येक निष्कर्ष की पुष्टि में दो उदाहरण दें।
(क) संविधान का निर्माण विश्वसनीय नेताओं द्वारा हुआ। उनके लिए जनता के मन में आदर था।
(ख) संविधान ने शक्तियों का बँटवारा इस तरह किया कि इसमें उलट-फेर मुश्किल है।
(ग) संविधान जनता की आशा और आकांक्षाओं का केंद्र है।
उत्तर:
(क) भारतीय संविधान का निर्माण एक ऐसी संवैधानिक सभा द्वारा किया गया था जिसका निर्माण समाज के सभी वर्गों, जातियों, धर्मों और समुदायों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के द्वारा ये प्रतिनिधि सक्रिय रूप से भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन से भी जुड़े हुए थे। अतः स्वाभाविक रूप से उन्हें जनता की अपेक्षाओं, आशाओं, आकांक्षाओं और समस्याओं का पूर्ण ज्ञान था।

संविधान निर्माण के क्रम में इन नेताओं द्वारा समस्त तथ्यों का गहन विश्लेषणात्मक अध्ययन कर देश के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए संविधान का निर्माण किया गया। इन नेताओं के प्रति जनता के मन में आदर होना बिल्कुल स्वाभाविक है। जनता के इसी आदर भाव के कारण लोकसभा संविधान लागू होने के बाद हुए प्रथम आम लोकसभा चुनाव, 1952 में संविधान सभा के लगभग सभी सदस्यों ने चुनाव लड़ा और जिनमें अधिकांश विजयी हुए। अतः जनता द्वारा उनको विजयी बनाना संविधान सभा के सदस्यों के प्रति आदर भाव को ही व्यक्त करना है।

(ख) संविधान में विभिन्न संस्थाओं और अंगों की शक्तियों और दायित्वों का स्पष्ट और पृथक वितरण किया गया है ताकि सरकार के विभिन्न अंगों-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के कार्य-संचालन में किसी प्रकार की समस्या एवं टकराहट उत्पन्न न हो। इसके साथ-साथ संविधान में शक्ति-वितरण में नियंत्रण एवं संतुलन के सिद्धांत को अपनाया गया और जन-कल्याण के लिए प्रतिबद्धता को भी दर्शाया गया।

संविधान सभा ने शक्ति के समुचित और संतुलित वितरण के लिए संसदीय शासन व्यवस्था और संघात्मक व्यवस्था को स्वीकार किया तथा न्यायपालिका को स्वतंत्र एवं सर्वोच्च रखा और उसे संसद तथा समीक्षा का अधिकार भी दिया गया। इस प्रकार किसी भी प्रकार के टकराहट और उलट-फेर को रोकने का पर्याप्त प्रावधान भारतीय संविधान में किया गया है।

(ग) भारतीय संविधान बहुत ही संतुलित एवं न्यायपूर्ण स्वरूप का है। इसमें समाज के विभिन्न वर्गों के व्यापक हितों के अनुरूप अनेक विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसमें समाज के उपेक्षित, दलित, शोषित और कमजोर वर्गों के लिए अलग से विशेष प्रावधान किए गए हैं। संविधान में जन-कल्याण को पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। संविधान निर्माण में न्याय के बुनियादी सिद्धांत का पालन किया गया है।

इसके अतिरिक्त वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार एवं राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के माध्यम से जनता की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को साकार करने की व्यवस्था भी की गई है। अतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान जनता की आशाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप है और उनका केंद्र भी है।

प्रश्न 6.
किसी देश के लिए संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों का साफ-साफ निर्धारण क्यों जरूरी है? इस तरह का निर्धारण न हो तो क्या होगा?
उत्तर:
किसी भी संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों और कार्यों का स्पष्ट और संतुलित विभाजन बहुत आवश्यक है क्योंकि इसके अभाव में इन संस्थाओं के बीच परस्पर टकराहट और तनाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। संविधान में सरकार के तीनों अंगों के बीच शक्ति का निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि उनमें शक्ति संतुलन बना रहे और उनका आचरण संविधान की मर्यादाओं के विरुद्ध न हो; जैसे यदि विधायिका द्वारा अपने अधिकार का दुरुपयोग किया जाता है अथवा किसी प्रकार संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण किया जाता है, तो न्यायपालिका को यह अधिकार प्राप्त है कि वह इसके द्वारा बनाए कानून को ही असंवैधानिक घोषित कर सकती है।

उसी प्रकार, विधायिका कार्यपालिका के कार्यों को; जैसे प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव आदि द्वारा नियंत्रण रख सकती है। इस प्रकार वह सभी संस्थाएँ स्वतंत्र एवं सुचारु रूप से अपना कार्य कर सकती हैं, परन्तु अपने-अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं कर सकती हैं। यदि इनके द्वारा अतिक्रमण का प्रयास किया जाता है तो दूसरी संस्थाओं द्वारा उस पर संविधान द्वारा नियंत्रण का पर्याप्त प्रावधान किया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने अत्यंत सूझबूझ एवं दूरदर्शिता के साथ विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के उत्तरदायित्वों का निर्धारण किया है।

हाँ, इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट है कि यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो इन संवैधानिक संस्थाओं द्वारा परस्पर अतिक्रमण की संभावनाएँ हो सकती थी जिसके परिणामस्वरूप अराजकता एवं अव्यवस्था की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। ऐसी स्थिति में जनता के अधिकार एवं स्वतंत्रताएँ भी असुरक्षित हो सकती हैं। अतः इससे देश का संवैधानिक ढाँचा ही असफलता की ओर अग्रसर हो सकता है।

प्रश्न 7.
शासकों की सीमा का निर्धारण करना संविधान के लिए क्यों ज़रूरी है? क्या कोई ऐसा भी संविधान हो सकता है जो नागरिकों को कोई अधिकार न दें।
उत्तर:
किसी भी शासन में शासकों की निरंकुश तथा असीमित शक्ति पर नियंत्रण लगाने के लिए संविधान द्वारा शासकों की सीमाओं का निर्धारण किया जाता है। समाज में नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखना संविधान का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। कई बार संसद या मंत्रिमंडल के सदस्यों द्वारा मनमाना कानून बनाकर जनता की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास किया जाता है। ऐसी स्थिति में संसद अथवा मंत्रिमंडल की इस शक्ति पर अंकुश लगाना आवश्यक होता है। इसीलिए संविधान में शासकों की शक्तियों पर अंकुश लगाने के व्यापक प्रावधान किए गए हैं।

किसी भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में इस शक्ति का उपयोग एक निश्चित अवधि के पश्चात् होने वाले चुनाव में जनता द्वारा मताधिकार के रूप में किया जाता है। संविधान शासकों की सीमाओं को संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का स्पष्ट प्रावधान करके भी नियंत्रित कर सकता है। क्योंकि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कोई भी सरकार नहीं कर सकती है। इस प्रकार शासकों की शक्ति पर सीमाएँ लगाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ यह भी स्पष्ट है कि विश्व में कोई ऐसी संवैधानिक व्यवस्था नहीं है जिसमें नागरिकों के मौलिक अधिकारों का प्रावधान नहीं किया गया हो। यहाँ तक कि साम्यवादी व्यवस्था वाले देशों; जैसे चीन के संविधान में भी मौलिक अधिकारों का . प्रावधान किया गया है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

प्रश्न 8.
जब जापान का संविधान बना तब दूसरे विश्व युद्ध में पराजित होने के बाद जापान अमेरिकी सेना के कब्जे में था। जापान के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान होना असंभव था, जो अमेरिकी सेना को पसंद न हो। क्या आपक लगता है कि संविधान को इस तरह बनाने में कोई कठिनाई है? भारत में संविधान बनाने का अनुभव किस तरह इससे अलग है?
उत्तर:
जापान का संविधान-निर्माण करते समय जापान पर अमेरिकी सेना का नियंत्रण था। इसलिए संवैधानिक प्रावधानों पर अमेरिकी प्रभाव का होना स्वाभाविक सी बात है। इसीलिए जापान के संविधान का कोई भी प्रावधान अमेरिका की सरकार की आकांक्षाओं एवं इच्छाओं के विरुद्ध नहीं था। इसमें अमेरिका के हितों एवं प्राथमिकताओं को पर्याप्त महत्त्व दिया गया। यहाँ यह भी स्पष्ट है कि किसी भी देश के संविधान का निर्माण किसी दूसरे देश के प्रभाव में करना निश्चित रूप से बहुत ही कठिन कार्य है।

संविधान निर्माण की प्रक्रिया पर अन्य देश का नियंत्रण होने के कारण स्वयं उस देश की जनता की अपेक्षाओं एवं आशाओं की अनदेखी की जाती है। अतः ऐसा संविधान जनता की इच्छाओं पर खरा नहीं उतर सकता है। दूसरी तरफ, भारतीय संविधान का निर्माण सर्वथा भिन्न परिस्थितियों में निर्मित हुआ था। भारतीय संविधान का निर्माण एक प्रतिनिध्यात्मक संविधान सभा द्वारा किया गया था।

विभिन्न विषयों के लिए संविधान सभा में अलग-अलग समितियाँ थीं। सदस्यों द्वारा विभिन्न विषयों पर व्यापक तर्क-वितर्क एवं गहन विचार-विमर्श के बाद ही अधिकांशतः सर्वसम्मति के आधार पर अंतिम निर्णय लिया गया। ऐसे में कहा जा सकता है कि संविधान का निर्माण लोकतांत्रिक आधार पर किया गया।

यद्यपि सदस्यों के बीच कुछ विषयों पर मत-भेद थे, तथापि देश के व्यापक हितों के मद्देनजर सहमति एवं समायोजन के सिद्धांत के आधार पर फैसले लिए गए। भारतीय संविधान का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है। भारतीय संविधान के निर्माण में 2 वर्ष, 11 महीने एवं 18 दिन लगे। संविधान निर्माण में राष्ट्रीय आंदोलनों के क्रम में उभरी जनता की इच्छाओं और अपेक्षाओं को भी प्राथमिकता दी गई।

इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान में समाज के सभी वर्गों के व्यापक हितों का ध्यान रखा गया है। अतः संविधान में समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की विलक्षण क्षमता है। अतः संविधान निर्माण का भारतीय अनुभव दूसरे देशों से सर्वथा भिन्न था।

प्रश्न 9.
रजत ने अपने शिक्षक से पूछा- “संविधान एक पचास साल पुराना दस्तावेज़ है और इस कारण पुराना पड़ चुका है। किसी ने इसको लागू करते समय मुझसे राय नहीं माँगी। यह इतनी कठिन भाषा में लिखा हुआ है कि मैं इसे समझ नहीं सकता। आप मुझे बतायें कि मैं इस दस्तावेज़ की बातों का पालन क्यों करूँ?” अगर आप शिक्षक होते तो रजत को क्या उत्तर देते?
उत्तर:
रजत के प्रश्न का उत्तर यह है कि संविधान पचास साल पुराना दस्तावेज़ मात्र नहीं है बल्कि यह नियमों एवं कानूनों का एक ऐसा संग्रह है जिसका पालन समाज के व्यापक हितों की दृष्टि से बहुत आवश्यक है। जैसा कि हम जानते हैं कि कानूनों के कारण ही समाज में शांति और व्यवस्था कायम रहती है। लोगों का जीवन एवं संपत्ति सुरक्षित रहती है तथा व्यक्तिगत एवं सामाजिक विकास के लिए उचित वातावरण सम्भव होता है।

इसके अतिरिक्त संविधान सरकार के तीनों अंगों-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की शक्तियों का स्रोत है। संविधान द्वारा ही सरकार के तीन अंगों का गठन होता है तथा इनकी शक्तियों का विभाजन होता है। इसके द्वारा ही जनता के अधिकारों को सुरक्षित एवं कर्त्तव्य निश्चित किया जाता है। संविधान ही सरकार के निरंकुश स्वच्छेचारी आचरण पर अंकुश लगाता है।

इसके अतिरिक्त यह कहना गलत है कि संविधान पचास साल पुराना दस्तावेज़ हो चुका है और इसकी उपयोगिता समाप्त हो गई है। वास्तविकता तो यह है कि भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह कठोर और लचीले संशोधन विधि का मिश्रित रूप है। इसमें समय, परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तन किया जा सकता है।

संविधान में विषयानुरूप संशोधन की अलग-अलग प्रक्रियाओं का प्रावधान है। कुछ विषयों में संसद के स्पष्ट बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव के आधार पर संशोधन किया जा सकता है। परंतु कुछ विषयों में संशोधन की प्रक्रिया जटिल है। इसके लिए कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों से प्रस्ताव का अनुमोदित होना आवश्यक है।

दूसरे शब्दों में, भारतीय संविधान एक ऐसा संविधान है जो कभी भी पुराना नहीं पड़ सकता, क्योंकि इसके प्रावधानों को समय और परिस्थिति के अनुकूल संशोधित किया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मात्र लगभग 70 वर्षों में ही संविधान में 104 संशोधन किए जा चुके हैं। इस प्रकार समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए संविधान में पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं। अतः हमारा संविधान एक जीवन्त प्रलेख है जो सदैव गतिमान रहता है। इसलिए हमें संविधान की पालना अवश्य करनी चाहिए।

प्रश्न 10.
संविधान के क्रिया-कलाप से जुड़े अनुभवों को लेकर एक चर्चा में तीन वक्ताओं ने तीन अलग-अलग पक्ष लिए
(क) हरबंस-भारतीय संविधान एक लोकतांत्रिक ढाँचा प्रदान करने में सफल रहा है।

(ख) नेहा-संविधान में स्वतंत्रता, समता और भाईचारा सुनिश्चित करने का विधिवत् वादा है। चूँकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए संविधान असफल है।

(ग) नाजिमा संविधान असफल नहीं हुआ, हमने उसे असफल बनाया। क्या आप इनमें से किसी पक्ष से सहमत हैं, यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो आप अपना पक्ष बतायें।
उत्तर:
वाद-विवाद के द्वारा इन वक्ताओं ने संविधान की सार्थकता, उपयोगिता और सफलता पर अलग-अलग प्रश्न उठाने का प्रयास किया है। प्रथम वक्ता हरबंस के अनुसार भारतीय संविधान लोकतांत्रिक शासन का ढाँचा तैयार करने में सफल रहा है, तो दूसरे वक्ता नेहा के अनुसार संविधान में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के वायदे किए गए, परन्तु ये पूरे नहीं हुए।

इस कारण संविधान असफल रहा, जबकि तीसरे वक्ता नाजिमा का दृष्टिकोण है कि संविधान स्वयं असफल नहीं हुआ, बल्कि हमने ही इसे असफल बनाया। इस तथ्य को हम सब स्वीकार करते हैं कि भारतीय संविधान का निर्माण तत्कालीन समय के योग्यतम, अनुभवी एवं दूरदर्शी नेताओं द्वारा व्यापक विचार-विमर्श एवं गहन तर्क-वितर्क के आधार पर ही किया गया था।

इसमें जनता की अपेक्षाओं, आशाओं का पूरा ध्यान रखा गया। इसके अतिरिक्त जन सामान्य के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए इसमें मौलिक अधिकारों का प्रावधान किया गया तथा न्यायपालिका को इन मूल अधिकारों के संरक्षण का दायित्व सौंपा गया है। संविधान द्वारा व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को मौलिक अधिकारों के द्वारा सुनिश्चित किया गया।

वास्तविक सत्ता का केंद्र जनता में निहित किया गया है। जिसका प्रयोग जनता अपने मताधिकार के माध्यम से करती है, क्योंकि जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से ही सरकार का गठन एवं संचालन किया जाता है। संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया है।

इन सबके मूल में एक प्रमुख उद्देश्य यह था कि भारत में लोकतांत्रिक ढाँचा सशक्त बने । जिसमें हमें काफी हद तक सफलता भी मिली है, जिसका प्रमाण यह है कि यहाँ अब तक 17 लोकसभा एवं अनेक राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हो चुके हैं। जनता द्वारा मताधिकार का प्रयोग किया जाता रहा है।

या है कि चुनाव के समय धन और बाहुबलियों द्वारा चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है जिससे संविधान की मूल भावना को ठेस भी पहुँची है। नेहा के अनुसार संविधान असफल रहा, क्योंकि संविधान में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए गए वायदे सफल नहीं हुए। लेकिन वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है।

क्योंकि जनता द्वारा विभिन्न स्तरों पर व्यापक स्वतंत्रता का उपयोग किया जाता है। कुछ विशेष स्थितियों में ही सरकार द्वारा नागरिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। समाज के सभी वर्गों को शिक्षा, रोजगार तथा अन्य प्रकार की समानता प्राप्त है। छुआछूत और भेदभाव की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा है। यद्यपि इसमें हमें पूर्ण सफलता प्राप्त करना शेष है। परन्तु फिर भी स्थिति में सुधार हुआ है।

तीसरी वक्ता नाजिमा का विश्वास है कि संविधान असफल नहीं हुआ बल्कि हमने इसे असफल बनाया। हाँ, नाजिमा के तर्क से सहमत होने के कारण पर्याप्त हैं, क्योंकि व्यक्ति अपने संकीर्ण हितों के मद्देनजर संविधान के मूल ढाँचे से भी छेड़छाड़ करने से नहीं चूकते हैं। यद्यपि संविधान में विभिन्न परिस्थितियों और परिवर्तनों तथा चुनौतियों का सामना करने के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं तथापि संविधान में छुआछूत की समाप्ति, बाल-श्रम उन्मूलन, समान कार्य के लिए समान वेतन इत्यादि अनेक प्रावधानों के होते हुए भी व्यवहार में अमल न करना यही दर्शाता है कि हमने संवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रावधानों को पूर्ण सच्चाई और ईमानदारी से लागू नहीं किया है।

संविधान में समाजवादी ढाँचे को अपनाया है, लेकिन आजादी के 70 वर्षों के बाद भी देश की जनसंख्या का लगभग 26 प्रतिशत भाग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहा है। आज भी देश के विभिन्न भागों में लोग भुखमरी एवं कुपोषण के शिकार हैं। ये सारे तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि कहीं न कहीं हमारी कार्यप्रणाली में दोष है। इन सबके बावजूद देश में हो रहे चहुंमुखी विकास, साक्षरता की बढ़ती दर, लोक-स्वास्थ्य की बेहतर स्थिति, गिरती मृत्यु दर, बढ़ती औसत आयु आदि ऐसे संकेत हैं, जो भारत के सुखद भविष्य की ओर संकेत कर रहे हैं।

संविधान : क्यों और कैसे? HBSE 11th Class Political Science Notes

→ आधुनिक समय में प्रत्येक राज्य का प्रायः एक संविधान होता है। साधारण शब्दों में, संविधान उन मौलिक नियमों, सिद्धांतों तथा परंपराओं का संग्रह होता है, जिनके अनुसार राज्य की सरकार का गठन, सरकार के कार्य, नागरिकों के अधिकार तथा नागरिकों और सरकार के बीच संबंध को निश्चित किया जाता है।

→ शासन का स्वरूप लोकतांत्रिक हो या अधिनायकवादी, कुछ ऐसे नियमों के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता जो राज्य में विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं तथा शासकों की भूमिका को निश्चित करते हैं।

→ इन नियमों के संग्रह को ही संविधान कहा जाता है। संविधान में शासन के विभिन्न अंगों तथा उनके पारस्परिक संबंधों का विवरण होता है।

→ इन संबंधों को निश्चित करने हेतु कुछ नियम बनाए जाते हैं, जिनके आधार पर शासन का संचालन सुचारू रूप से संभव हो जाता है तथा शासन के विभिन्न अंगों में टकराव की संभावनाएँ कम हो जाती हैं।

→ संविधान के अभाव में शासन के सभी कार्य निरंकुश शासकों की इच्छानुसार ही चलाए जाएँगे जिससे नागरिकों पर अत्याचार होने की संभावना बनी रहेगी।

→ ऐसे शासक से छुटकारा पाने के लिए नागरिकों को अवश्य ही विद्रोह करना पड़ेगा जिससे राज्य में अशांति तथा अव्यवस्था फैल जाएगी।

→ इस प्रकार एक देश के नागरिकों हेतु एक सभ्य समाज एवं कुशल तथा मर्यादित सरकार का अस्तित्व एक संविधान की व्यवस्थाओं पर ही निर्भर करता है।

→ इसीलिए हम इस अध्याय में संविधान के अर्थ को जानने के पश्चात् संविधान की आवश्यकता एवं संविधान के निर्माण की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए संविधान के विभिन्न स्रोतों का भी हम उल्लेख करेंगे।

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions and Answers

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions in Hindi Medium

HBSE 11th Class Political Science Important Questions: भारत का संविधान-सिद्धांत और व्यवहार

HBSE 11th Class Political Science Important Questions: राजनीतिक-सिद्धान्त

HBSE 11th Class Political Science Important Questions in English Medium

HBSE 11th Class Political Science Important Questions: Indian Constitution at Work

  • Chapter 1 Constitution: Why and How? Important Questions
  • Chapter 2 Rights in the Indian Constitution Important Questions
  • Chapter 3 Election and Representation Important Questions
  • Chapter 4 Executive Important Questions
  • Chapter 5 Legislature Important Questions
  • Chapter 6 Judiciary Important Questions
  • Chapter 7 Federalism Important Questions
  • Chapter 8 Local Governments Important Questions
  • Chapter 9 Constitution as a Living Document Important Questions
  • Chapter 10 The Philosophy of the Constitution Important Questions

HBSE 11th Class Political Science Important Questions: Political Theory

  • Chapter 1 Political Theory: An Introduction Important Questions
  • Chapter 2 Freedom Important Questions
  • Chapter 3 Equality Important Questions
  • Chapter 4 Social Justice Important Questions
  • Chapter 5 Rights Important Questions
  • Chapter 6 Citizenship Important Questions
  • Chapter 7 Nationalism Important Questions
  • Chapter 8 Secularism Important Questions
  • Chapter 9 Peace Important Questions
  • Chapter 10 Development Important Questions

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HBSE 11th Class Political Science Solutions in Hindi Medium

HBSE 11th Class Political Science Part 1 Indian Constitution at Work (भारत का संविधान-सिद्धांत और व्यवहार भाग-1)

HBSE 11th Class Political Science Part 2 Political Theory (राजनीतिक-सिद्धान्त भाग-2)

HBSE 11th Class Political Science Solutions in English Medium

HBSE 11th Class Political Science Part 1 Indian Constitution at Work

  • Chapter 1 Constitution: Why and How?
  • Chapter 2 Rights in the Indian Constitution
  • Chapter 3 Election and Representation
  • Chapter 4 Executive
  • Chapter 5 Legislature
  • Chapter 6 Judiciary
  • Chapter 7 Federalism
  • Chapter 8 Local Governments
  • Chapter 9 Constitution as a Living Document
  • Chapter 10 The Philosophy of the Constitution

HBSE 11th Class Political Science Part 2 Political Theory

  • Chapter 1 Political Theory: An Introduction
  • Chapter 2 Freedom
  • Chapter 3 Equality
  • Chapter 4 Social Justice
  • Chapter 5 Rights
  • Chapter 6 Citizenship
  • Chapter 7 Nationalism
  • Chapter 8 Secularism
  • Chapter 9 Peace
  • Chapter 10 Development

HBSE 11th Class Political Science Question Paper Design

Class: XI
Subject: Political Science
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 80
Time: 3 Hours

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKUASTotal
Percentage of Marks503515100
Marks40281280

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions31081637
Marks Allotted1830161680
Estimated Time35705025180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
1. राजनीतिक सिद्धांत-एक परिचय4
2. स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय8
3. अधिकार4
4. नागरिकता3
5. राष्ट्रवाद3
6. धर्मनिरपेक्षता2
7. शांति, विकास8
8. संविधान-क्यों और कैसे?4
9. भारतीय संविधान में अधिकार6
10. चुनाव और प्रतिनिधित्व6
11. कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका15
12. संघवाद5
13. स्थानीय शासन6
14. संविधान-एक जीवंत दस्तावेज3
15. संविधान का राजनीतिक दर्शन3
Total80

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice in Long Answer Question i.e. Essay Type.

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% Marks
Average: 50% Marks
Easy: 40% Marks

Abbreviations: K (Knowledge), U (Understanding), A (Application), E (Essay Type), SA (Short Answer Type), VSA (Very Short Answer Type), O (Objective Type)

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HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

HBSE 11th Class Political Science चुनाव और प्रतिनिधित्व Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सबसे नजदीक बैठता है?
(क) परिवार की बैठक में होने वाली चर्चा
(ख) कक्षा-संचालक (क्लास-मॉनीटर) का चुनाव
(ग) किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने उम्मीदवार का चयन
(घ) मीडिया द्वारा करवाये गये जनमत-संग्रह
उत्तर:
(ख) कक्षा-संचालक (क्लास-मॉनीटर) का चुनाव

प्रश्न 2.
इनमें कौन-सा कार्य चुनाव आयोग नहीं करता?
(क) मतदाता-सूची तैयार करना
(ख) उम्मीदवारों का नामांकन
(ग) मतदान केंद्रों की स्थापना
(घ) आचार-संहिता लागू करना
(ङ) पंचायत के चुनावों का पर्यवेक्षण
उत्तर:
(ङ) पंचायत के चुनावों का पर्यवेक्षण

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में कौन-सी राज्य सभा और लोक सभा के सदस्यों के चुनाव की प्रणाली में समान है?
(क) 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य है।
(ख) विभिन्न प्रत्याशियों के बारे में मतदाता अपनी पसंद को वरीयता क्रम में रख सकता है।
(ग) प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है।
(घ) विजयी उम्मीदवार को आधे से अधिक मत प्राप्त होने चाहिएँ।
उत्तर:
(क) 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य है।

प्रश्न 4.
फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली में वही प्रत्याशी विजेता घोषित किया जाता है जो
(क) सर्वाधिक संख्या में मत अर्जित करता है।
(ख) देश में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले दल का सदस्य हो।
(ग) चुनाव-क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत हासिल करता है।
(घ) 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है।
उत्तर:
(ग) चुनाव-क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत हासिल करता है।

प्रश्न 5.
पृथक निर्वाचन-मंडल और आरक्षित चुनाव-क्षेत्र के बीच क्या अंतर है? संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मंडल को क्यों स्वीकार नहीं किया?
उत्तर:
पृथक निर्वाचन-मंडल एक ऐसी व्यवस्था को कहते हैं जिसके अंतर्गत किसी जाति-विशेष के प्रतिनिधि के चुनाव में केवल उसी वर्ग के लोग मतदान कर सकते हैं। भारत में अंग्रेजों के शासन काल में 1909 के एक्ट द्वारा मुसलमानों के लिए यह व्यवस्था लागू की गई थी। जबकि दूसरी तरफ आरक्षित चुनाव-क्षेत्र का अर्थ है कि चुनाव में सीट जिस वर्ग के लिए आरक्षित है, प्रत्याशी उसी वर्ग-विशेष अथवा समुदाय का होगा परंतु मतदान का अधिकार समाज के सभी वर्गों को प्राप्त होगा।

अब प्रश्न यह उठता है कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मंडल को क्यों स्वीकार नहीं किया तो इस संदर्भ में सबसे विशेष तर्क यह है कि यह अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति पर आधारित थी। यह राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को चुनौती देने में सहायक सिद्ध हो रही थी। इसके अतिरिक्त यह व्यवस्था पूरे देश को जाति के आधार पर विभाजित करने वाली थी इस व्यवस्था में प्रत्याशी अपने समुदाय के हितों का ही प्रतिनिधित्व करता है।

इसके विपरीत, आरक्षित निर्वाचन व्यवस्था में प्रत्याशी समाज के सभी वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है और पूरे समाज के विकास पर बल देता है। इसलिए भारतीय संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मंडल व्यवस्था में व्याप्त दोषों को देखते हुए देश विभाजन के साथ ही इस व्यवस्था को ही अस्वीकार कर दिया और आरक्षित चुनाव क्षेत्र की व्यवस्था करते हुए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था को लागू किया।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन गलत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द अथवा पद को बदलकर, जोड़कर अथवा नये क्रम में सजाकर इसे सही करें।
(क) एक फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (सर्वाधिक मत से जीत वाली) प्रणाली का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।
(ख) चुनाव आयोग पंचायत और नगरपालिका के चुनावों का पर्यवेक्षण नहीं करता।
(ग) भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता।
(घ) चुनाव आयोग में एक से ज्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य है।
उत्तर:
(ग) भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता। यह कथन गलत है, क्योंकि भारत का राष्ट्रपति चुनाव आयुक्त को अपने पद से हटा सकता है।

HBSE 11th Class Political Science Solutions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

प्रश्न 7.
भारत की चुनाव-प्रणाली का लक्ष्य समाज के कमजोर तबके की नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना है। लेकिन हमारी विधायिका में महिला सदस्यों की संख्या केवल 12 प्रतिशत तक पहुँची है। इस स्थिति में सुधार के लिए आप क्या उपाय सुझायेंगे?
उत्तर:
भारतीय संविधान में आरक्षण की व्यवस्था को समाज के विशेष पिछड़े वर्गों को समाज के अन्य वर्गों के बराबर लाने के उद्देश्य से की गई है। संविधान के अनुसार किसी भी वर्ग को आरक्षण प्रदान करने के लिए आवश्यक है कि वह वर्ग सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ा हो तथा उसे राज्याधीन पदों पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व न प्राप्त हो। यदि उपर्युक्त सन्दर्भ में देखा जाए तो राजनीतिक क्षेत्र में संघ एवं राज्यों के स्तर पर महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय है। देश की जनसंख्या के अनुपात में इनकी स्थिति बहुत खराब है।

संघीय संसद जो देश की कानून निर्मात्री संस्था है। वहाँ इतनी बड़ी जनसंख्या की उपेक्षा करना, राष्ट्र के विकास की दृष्टि से अनुचित है। इसके अतिरिक्त यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में समानता के अधिकार पर बल दिया गया है और स्त्री-पुरुष में किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं किया गया है। इसलिए भारत में पिछले कई वर्षों से महिला संगठनों द्वारा माँग की जा रही है कि महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान किया जाए ताकि देश के कानून निर्माण में उन्हें भी भागीदार बनाया जा सके। महिला एवं पुरुषों की जब समान भागीदारी होगी तभी कोई समाज अथवा राष्ट्र पूर्ण रूप से विकसित एवं समृद्ध हो सकता है।

प्रश्न 8.
एक नये देश के संविधान के बारे में आयोजित किसी संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्नलिखित आशाएँ जतायीं। प्रत्येक कथन के बारे में बताएं कि उनके लिए फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (सर्वाधिक मत से जीत वाली)प्रणाली उचित होगी या समानुपातिक प्रतिनिधित्व वाली प्रणाली?
(क) लोगों को इस बात की साफ-साफ जानकारी होनी चाहिए कि उनका प्रतिनिधि कौन है ताकि वे उसे निजी तौर पर जिम्मेदार ठहरा सकें।
(ख) हमारे देश में भाषाई रूप से अल्पसंख्यक छोटे-छोटे समुदाय हैं और देश भर में फैले हैं, हमें इनकी ठीक-ठीक नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना चाहिए।
(ग) विभिन्न दलों के बीच सीट और वोट को लेकर कोई विसंगति नहीं रखनी चाहिए।
(घ) लोग किसी अच्छे प्रत्याशी को चुनने में समर्थ होने चाहिए भले ही वे उसके राजनीतिक दल को पसंद न करते हों।
उत्तर:
उपर्युक्त कथनों में
(क) इसके लिए समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली उचित होगी।
(ख) इसके लिए फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली उचित होगी।
(ग) इसके लिए समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली उचित होगी।
(घ) इसके लिए फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली उचित होगी।

प्रश्न 9.
एक भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस मसले पर कई विचार सामने आये। एक विचार यह था कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतंत्र नागरिक है। उसे किसी राजनीतिक दल में होने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसे विकल्प की संभावना कायम रखने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होगी। इस कारण, भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप इसमें किस पक्ष से सहमत हैं और क्यों?
उत्तर:
भारत विश्व का सबसे बड़ा एक लोकतांत्रिक देश है। इस लोकतंत्र को सफल एवं सुचारू रूप से चलाने के लिए समय-समय पर चुनाव आयोग द्वारा एक निश्चित अवधि के पश्चात् चुनाव कराने की व्यवस्था की गई है। हमारा वर्तमान चुनाव आयोग बहु-सदस्यीय है जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य चुनाव आयुक्त हैं। देश में चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र वातावरण में हों, यह चुनाव आयोग के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की सफलता की आवश्यकता शर्त है। चुनाव प्रणाली को पारदर्शी बनाने में मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त छः वर्ष का कार्यकाल या अधिकतम 65 वर्ष की आयु पूर्ण होने पर सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या सेवानिवृत्ति के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति देनी चाहिए या नहीं? ऐसी स्थिति में इस संदर्भ में ऊपर दिए गए कथनों में पहला कथन उचित एवं सही है। मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति मिलनी चाहिए, क्योंकि वह भी देश का अन्य नागरिकों की तरह एक स्वतंत्र नागरिक है। इसलिए एक साधारण नागरिक को चुनाव लड़ने के जो अधिकार संविधान द्वारा प्राप्त हैं, उन्हें भी होने चाहिएँ। यद्यपि राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ने से जनसाधारण में यह भ्रम उत्पन्न हो सकता है कि इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित होती है, परंतु ऐसी कोई बात नहीं होती। उसकी स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता पर कोई आँच नहीं आएगी क्योंकि चुनाव लड़ने वाला मुख्य चुनाव आयुक्त अपना कार्यकाल पूरा करके ही चुनाव लड़ता है।

उसके पास एक लंबा कार्य-अनुभव तथा व्यावहारिक ज्ञान होता है। निर्वाचित होने पर संसद सदस्य के रूप में वह अपने बहुमूल्य सुझावों के द्वारा चुनाव सुधारों एवं राष्ट्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। इसलिए भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति देनी चाहिए और इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न 10.
भारत का लोकतंत्र अब अनगढ़ ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिध्यिात्मक प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार हो चुका है’ क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
भारतीय संविधान सभा द्वारा जब भारत के संविधान का निर्माण किया जा रहा था तभी इस विषय पर विवाद उत्पन्न हो गया था जिसके परिणामस्वरूप स्थिति का अवलोकन करते हुए भारत के चुनाव में ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ अर्थात् सर्वाधिक मत से विजय वाली प्रणाली को स्वीकार किया गया। इस प्रणाली के अन्तर्गत एक निर्वाचन-क्षेत्र में एक उम्मीदवार जिसे अन्य उम्मीदवारों की अपेक्षा सबसे अधिक मत मिलते हैं, चाहे उसे कुल मतों का एक छोटा-सा भाग ही मिले, को विजयी घोषित कर दिया जाता है। दूसरे शब्दों में, विजय स्तम्भ (Post) चुनावी दौड़ का अन्तिम बिन्दु बचता है और जो उम्मीदवार इसे पहले पार कर लेता है, वही विजेता होता है।

पक्ष में तर्क (Arguments in Favour)-इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क हैं

(1) यह प्रणाली बहुत ही सरल है, जिसे सभी मतदाता आसानी से समझ सकते हैं। एक मतदाता किसी भी दल अथवा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान कर सकता है, जिसे वह सबसे अच्छा समझता है। इस प्रणाली पर आधारित निर्वाचन-क्षेत्रों में मतदाता जानते हैं कि उनका प्रतिनिधि कौन है और उसे उत्तरदायी ठहरा सकते हैं।

(2) इस प्रणाली के अन्तर्गत सदन में किसी एक दल के पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के अवसर बढ़ जाते हैं, जिससे एक स्थायी सरकार की स्थापना करना सम्भव हो जाता है।

(3) इस प्रणाली में द्वि-दलीय प्रणाली के विकास को बल मिलता है, लेकिन भारत में अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है।
विपक्ष में तर्क (Arguments in Against)-कई विद्वानों द्वारा चुनाव की इस प्रणाली की आलोचना की जाती है। उनका कहना है कि यह प्रणाली अलोकतान्त्रिक और अनुचित है क्योंकि इसके अन्तर्गत यह आवश्यक नहीं है कि निर्वाचित व्यक्ति उस निर्वाचन-क्षेत्र के मतदाताओं का बहुमत प्राप्त करने वाला हो। उदाहरणस्वरूप, चुनाव में चार उम्मीदवार खड़े होते हैं और उन्हें मत प्राप्त हुए-
(क) एक लाख,
(ख) 80,000,
(ग) 70,000 तथा
(घ) 50,000
इस चुनाव में ‘क’ को निर्वाचित घोषित कर दिया जाएगा, जिसे केवल एक-तिहाई मतदाताओं ने अपना मत दिया है। उदाहरणस्वरूप, सन् 1984 में हुए लोकसभा चुनावों में काँग्रेस पार्टी को कुल 48.1 प्रतिशत वोट मिले, परन्तु उसने लोकसभा के 76 प्रतिशत स्थानों पर विजय प्राप्त की। इस चुनाव में भाजपा 7.4 प्रतिशत मत लेकर दूसरे स्थान पर रही, परन्तु लोकसभा की 542 सीटों में से उसे केवल 2 स्थानों पर ही विजय प्राप्त हुई।

इसके विपरीत मार्क्सवादी साम्यवादी दल को 5.8 प्रतिशत मत मिले और उसे लोकसभा में 22 स्थान प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त इस प्रणाली का एक दोष यह भी है कि यह अल्पसंख्यकों तथा छोटे और कम शक्तिशाली राजनीतिक दलों के हितों के विरुद्ध है, क्योंकि इसके अन्तर्गत, उन्हें जितने मत प्राप्त होते हैं, उस अनुपात में उन्हें स्थान (सीटें) प्राप्त नहीं होते। अत: उपर्युक्त पक्ष एवं विपक्ष के तर्कों के उपरान्त यह कहा जा सकता है कि समानुपातिक प्रणाली की जटिल व्यवस्था को भारत में अपनाना कठिन है इसलिए सरलता की दृष्टि से फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली ही उपयुक्त है।

चुनाव और प्रतिनिधित्व HBSE 11th Class Political Science Notes

→ आधुनिक युग लोकतन्त्र का युग है। लोकतन्त्र में शासनाधिकार जनता के हाथों में होता है। वास्तविक प्रभुसत्ता जनता के हाथों में होती है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शासन में भागीदार होती है।

→ प्राचीन समय में छोटे-छोटे नगर-राज्य होते थे जिनकी जनसंख्या बहुत कम होने के कारण सभी नागरिकों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से शासन में भाग लिया जाता था। धीरे-धीरे नगर-राज्यों के स्थान पर बड़े-बड़े राष्ट्र-राज्यों का निर्माण हुआ जिनकी जनसंख्या अरबों तक पहुंच गई है।

→ इसके परिणामस्वरूप सभी नगारिकों के लिए प्रत्यक्ष रूप से शासन चलाने में भाग लेना सम्भव नहीं रहा और प्रत्यक्ष लोकतन्त्र के स्थान पर प्रतिनिधिक लोकतन्त्र (Representative Democracy) प्रणाली का उदय हुआ।

→ इस प्रणाली में जनता शासन में अपने द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से भाग लेती है। इस शासन-प्रणाली के दो आधार होते हैं। प्रथम, मताधिकार जिसके आधार पर जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है।

→ जिन व्यक्तियों को मतदान करने का अधिकार होता है, उन्हें मतदाता (Voter) कहते हैं। प्रतिनिधियों को चुनने की विधि को चुनाव अथवा निर्वाचन-व्यवस्था कहते हैं।

→ मतदान करने की व्यवस्था को निर्वाचन-व्यवस्था (Election System) कहा जाता है। वोट किसे दिया जाए और इसका प्रयोग किस प्रकार से किया जाए, यह विषय राजनीति-विज्ञान के विद्वानों के बीच वाद-विवाद का विषय रहा है।

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HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

Haryana State Board HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मताधिकार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
एक देश के नागरिकों को अपने प्रतिनिधियों को चुनने के अधिकार को मताधिकार कहा जाता है। भारत में प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान करने का अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 2.
निर्वाचकगण (Electorate) किसे कहते हैं?
उत्तर:
वे व्यक्ति जिन्हें मतदान करने का अधिकार होता है, उनके सामूहिक रूप को निर्वाचकगण कहा जाता है।

प्रश्न 3.
प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जिस चुनाव-प्रणाली में साधारण मतदाता स्वयं अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं, उसे प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली कहा जाता है। लोकसभा के सदस्यों का चुनाव इसी प्रणाली द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 4.
अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली का क्या अर्थ है?
उत्तर:
ऐसे प्रतिनिधि जो जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से न चुने जाकर जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हों, उस प्रणाली को अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली कहा जाता है। राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के चुनाव इस प्रणाली द्वारा कराए जाते हैं।

प्रश्न 5.
प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली के दो गुण लिखिए।
उत्तर:

  • यह लोकतान्त्रिक सिद्धांतों के अनुसार है,
  • लोगों को राजनीतिक शिक्षा प्राप्त होती है।

प्रश्न 6.
अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली के दो दोष बताइए।
उत्तर:

  • यह अलोकतांत्रिक है,
  • इसमें भ्रष्टाचार की संभावना होती है।

प्रश्न 7.
वयस्क मताधिकार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
एक विशेष आयु प्राप्त करने वाले व्यक्तियों को यदि वोट का अधिकार दिया जाए तो उसे वयस्क मताधिकार कहते हैं। वोट देने की आयु विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न होती है। भारत में मतदान की आयु 18 वर्ष निश्चित की गई है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

प्रश्न 8.
वयस्क मताधिकार के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:

  • यह समानता पर आधारित है,
  • इसमें सभी को राजनीतिक शिक्षा प्राप्त होती है।

प्रश्न 9.
वयस्क मताधिकार के दो दोष बताइए।
उत्तर:

  • वयस्क मताधिकार गुणों की अपेक्षा संख्या को महत्त्व देता है और अशिक्षित तथा अज्ञानियों का, जिनकी संख्या अधिक है, शासन स्थापित हो जाता है,
  • यह अप्राकृतिक है क्योंकि प्रकृति ने सबको समान न बनाकर कुछ को बुद्धिमान तथा कुछ को कम बुद्धिमान बनाया है।

प्रश्न 10.
एक-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
एक-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र का अर्थ है कि एक निर्वाचन-क्षेत्र से एक ही प्रतिनिधि चुना जाएगा।

प्रश्न 11.
एक-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र के दो गुण बताइए।
उत्तर:

  • यह तरीका बड़ा सरल है और आम व्यक्ति इसे समझ सकता है,
  • प्रतिनिधि और मतदाता के बीच सीधा संपर्क होता है क्योंकि चुनाव-क्षेत्र छोटा होता है।

प्रश्न 12.
बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
बह-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र से तात्पर्य उस निर्वाचन-क्षेत्र से है, जहाँ से एक से अधिक सदस्य निर्वाचित होते हैं।

प्रश्न 13.
बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र के दो अवगुण बताइए।
उत्तर:

  • यह खर्चीली प्रणाली है,
  • प्रतिनिधियों व मतदाताओं में संपर्क का अभाव रहता है।

प्रश्न 14.
बहु-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र के दो गुण बताइए।
उत्तर:

  • मतदाता की पसंद सीमित नहीं होती और वह अपनी पसंद के प्रतिनिधि का चुनाव कर सकता है,
  • इस प्रकार से एक योग्य प्रतिनिधि का चयन होता है।

प्रश्न 15.
प्रादेशिक चुनाव-प्रणाली का क्या अर्थ है?
उत्तर:
प्रादेशिक चुनाव-प्रणाली में सारे देश को समान प्रादेशिक क्षेत्रों में विभाजित कर दिया जाता है और प्रत्येक चुनाव-क्षेत्र विधानमंडल में अपने प्रतिनिधि को चुनकर भेजता है।

प्रश्न 16.
प्रादेशिक चुनाव-प्रणाली के कोई दो गुण लिखिए।
उत्तर:

  • यह साधारण प्रणाली है,
  • स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है।

प्रश्न 17.
प्रादेशिक चुनाव क्षेत्र के दो अवगुण लिखिए।
अथवा
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व की दो मूलभूत सीमा लिखिए।
उत्तर:

  • क्षेत्रीयवाद को बढ़ावा मिलता है,
  • विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व नहीं होता।

प्रश्न 18.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व का अर्थ बताइए।
उत्तर:
आनुपातिक प्रतिनिधित्व से तात्पर्य है कि प्रत्येक वर्ग, राजनीतिक दल व अल्पसंख्यक वर्ग आदि को उनके मतों की संख्या अनुपात में प्रतिनिधित्व प्रदान करना।

प्रश्न 19.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की दो विधियों के नाम बताइए।
उत्तर:

  • इकहरी परिवर्तनीय मत प्रणाली तथा
  • सूची प्रणाली।

प्रश्न 20.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के दो गुण लिखिए।
उत्तर:

  • प्रत्येक वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व का मिलना,
  • लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित।

प्रश्न 21.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के दो दोष बताइए।
उत्तर:

  • यह जटिल प्रणाली है,
  • बड़े देशों में लागू नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 22.
संग्रहीत मत-प्रणाली (Cumulative Vote System) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
इस प्रणाली के लिए बहु-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र अनिवार्य है। एक मतदाता को उतने वोट दिए जाते हैं, जितने स्थान भरे जाने हैं। मतदाता अपने सारे मत एक उम्मीदवार को दे सकता है और यदि वह चाहे तो अपने मत अलग-अलग उम्मीदवारों को भी दे सकता है।

प्रश्न 23.
क्षेत्रीय (Territorial) और कार्यात्मक प्रतिनिधित्व (Functional Representation) में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  • क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व में क्षेत्रीय आधार पर प्रतिनिधित्व दिया जाता है जबकि कार्यात्मक प्रतिनिधित्व का आधार व्यवसाय होता है,
  • क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व में प्रतिनिधि अपने निर्वाचन-क्षेत्र के सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि कार्यात्मक प्रतिनिधित्व व्यवसाय के लोगों का ही प्रतिनिधित्व करता है।

प्रश्न 24.
उप-चुनाव (Bye-Election) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
विधानपालिका के रिक्त स्थान को भरने के लिए करवाए गए चुनाव को उप-चुनाव कहा जाता है।

प्रश्न 25.
मध्यावधि चुनाव (Mid-Term Election) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यदि लोकसभा व विधानसभा को उसके निश्चित कार्यकाल से पहले ही भंग कर दिया जाए तो उस स्थिति में जो चुनाव करवाने पड़ते हैं, उसे मध्यावधि चुनाव कहा जाता है।

प्रश्न 26.
भारत में मतदाता कौन हो सकता है?
उत्तर:
भारत में प्रत्येक नागरिक को, जिसकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक हो, मताधिकार प्राप्त है। चुनाव में उसी नागरिक को मत डालने दिया जाता है जिसका नाम मतदाता सूची में हो।।

प्रश्न 27.
भारतीय मतदाता में कौन-कौन-सी दो योग्यताएँ होनी चाहिएँ?
उत्तर:

  • वह भारत का नागरिक होना चाहिए,
  • उसकी आयु कम-से-कम 18 वर्ष होनी चाहिए।

प्रश्न 28.
चुनाव आयोग क्या है?
उत्तर:
भारत एक लोकतंत्रीय राज्य है जिसमें समय-समय पर चुनाव होते रहते हैं। यह चुनाव निष्पक्ष रूप से हों, इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत चुनाव आयोग के गठन की व्यवस्था की गई है जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा कुछ अन्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं।

प्रश्न 29.
चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति कैसे की जाती है?
उत्तर:
संविधान में की गई व्यवस्था के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों (वर्तमान स्थिति में दो) की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

प्रश्न 30.
चुनाव आयुक्त को अथवा मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से कैसे हटाया जा सकता है?
उत्तर:
चुनाव आयुक्त को संसद में महाभियोग चलाकर उसके पद से हटाया जा सकता है।

प्रश्न 31.
चुनाव आयोग के सदस्यों का कार्यकाल कितना है?
उत्तर:
चुनाव आयोग के आयुक्तों (सदस्यों) का कार्यकाल साधारणतः 6 वर्ष होता है, लेकिन राष्ट्रपति द्वारा इस कार्यकाल को बढ़ाया भी जा सकता है।

प्रश्न 32.
भारतीय चुनाव आयोग के सदस्यों के नाम लिखें।
उत्तर:
भारतीय चुनाव आयोग बहु-सदस्यीय है। इसके मुख्य चुनाव आयुक्त श्री सुशील चंद्रा तथा अन्य दो चुनाव आयुक्त हैं।

प्रश्न 33.
भारतीय चुनाव-प्रणाली की तीन मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • वयस्क मताधिकार,
  • एक-सदस्यीय चुनाव-प्रणाली,
  • गुप्त मतदान।

प्रश्न 34.
गुप्त मतदान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
गुप्त मतदान का अर्थ है कि चुनाव अधिकारियों द्वारा मतदान के समय ऐसा प्रबंध किया जाता है कि यह मालूम न पड़े कि मतदाता ने अपने मताधिकार का प्रयोग किसके पक्ष में किया है या नहीं किया है।

प्रश्न 35.
चुनाव आयोग के कोई दो कार्य लिखिए।
उत्तर:

  • चुनाव आयोग संसद तथा राज्य विधानसभाओं के चुनावों की व्यवस्था करता है,
  • चुनाव आयोग को चुनाव संबंधी सभी मामलों पर निरीक्षण तथा निर्देशन का अधिकार है।

प्रश्न 36.
चुनाव याचिका का वर्णन करें। अथवा भारत में चुनाव-याचिका की सुनवाई कौन करता है?
उत्तर:
चुनावों के समय यदि किसी उम्मीदवार के द्वारा कोई अनियमितता बरती गई है, या कोई उम्मीदवार कानून के विरुद्ध कार्य करके चुनाव जीत गया है, तो उसका चुनाव रद्द करवाने के लिए कोई भी अन्य उम्मीदवार या कोई भी मतदाता याचिका दायर कर सकता है। यह याचिका सीधे उच्च न्यायालय में दी जाती है और वह स्वयं इसे सुनता है। यदि निर्वाचित उम्मीदवार के विरुद्ध लगाए गए आरोप सही सिद्ध हो जाएँ तो उच्च न्यायालय उसका चुनाव रद्द कर सकता है तथा संबंधित आरोपों के आधार पर उसे चुनाव के अयोग्य भी ठहरा सकता है।

प्रश्न 37.
भारतीय संविधान में निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण के प्रावधान पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
भारत के संविधान में सांप्रदायिक चुनाव-प्रणाली को समाप्त करके संयुक्त चुनाव-प्रणाली की व्यवस्था की गई है परंतु अनुच्छेद 330 के द्वारा समाज के पिछड़े वर्गों अनुसूचित जातियों (SC) तथा अनुसूचित जनजातियों (ST) के सदस्यों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इस समय लोकसभा में 84 सीटें अनुसूचित जातियों तथा 47 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। 104वें संशोधन द्वारा आरक्षित स्थानों की अवधि सन् 2030 तक बढ़ा दी गई है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

प्रश्न 38.
भारतीय चुनाव-प्रणाली की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • वयस्क मताधिकार,
  • एक सदस्य निर्वाचन-क्षेत्र,
  • गुप्त मतदान,
  • अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए स्थान सुरक्षित रखना।

प्रश्न 39.
भारतीय चुनाव-प्रणाली के दो दोष लिखें।
उत्तर:

  • चुनावों में धन की बढ़ती हुई भूमिका,
  • चुनाव में बाहुबल तथा हिंसा का प्रयोग।

प्रश्न 40.
भारतीय चुनाव-प्रणाली में सुधार के दो सुझाव दीजिए।
उत्तर:

  • चुनाव आयोग को अधिक शक्तिशाली तथा प्रभावी बनाया जाना चाहिए। उन्हें चुनावों में होने वाले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अधिक शक्तियाँ दी जाएँ,
  • सभी मतदाताओं को परिचय-पत्र (Identity Cards) दिए जाने चाहिएँ ताकि गलत (Bogus) मतदान को रोका जा सके।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली तथा अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली साधारण शब्दों में, प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली उस चुनाव व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें साधारण मतदाता प्रत्यक्ष रूप से (स्वयं) अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं। प्रत्येक मतदाता चुनाव-स्थान पर जाकर स्वयं अपनी पसन्द के उम्मीदवार के पक्ष में, अपने मत का प्रयोग करता है और जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं, उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है।

भारत में लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली द्वारा किया जाता है। अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली-अप्रत्यक्ष चुनाव वह चुनाव व्यवस्था है जिसमें साधारण मतदाता कुछ प्रतिनिधियों (निर्वाचकों) का चुनाव करते हैं और वे निर्वाचक प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं। प्रतिनिधि के चुनाव में साधारण मतदाता प्रत्यक्ष रूप से अपने मत का प्रयोग नहीं करते। भारत में राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के चुनाव के लिए इस चुनाव-प्रणाली को अपनाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के पक्ष में चार तर्क (लाभ) लिखें।
उत्तर:
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के पक्ष में चार तर्क निम्नलिखित हैं

1. अधिक लोकतन्त्रीय प्रणाली-इस प्रणाली में जनता को स्वयं प्रत्यक्ष रूप से मतदान करके अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलता है। अतः यह प्रणाली अधिक लोकतान्त्रिक है।

2. मतदाताओं तथा प्रतिनिधियों में सीधा सम्पर्क-इस प्रणाली में मतदाता तथा उम्मीदवार सीधे रूप से सम्पर्क में आते हैं तथा मतदाता उम्मीदवारों को भली-भांति जान सकते हैं। उम्मीदवार भी अपनी नीतियाँ तथा कार्यक्रम जनता के सामने रख सकते हैं।

3. राजनीतिक शिक्षा-इस प्रणाली में मतदाताओं तथा उम्मीदवारों में सीधा सम्पर्क होता है। इससे मतदाताओं को राजनीतिक शिक्षा मिलती है और उनमें राजनीतिक जागरूकता की भावना का भी उदय होता है।

4. अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान-इस प्रणाली के अन्तर्गत सामान्य जनता को मताधिकार तथा अन्य अधिकारों का ज्ञान प्राप्त होता है तथा कर्तव्यों की भी जानकारी मिलती है।

प्रश्न 3.
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व किसे कहते हैं?
उत्तर:
लोकतन्त्रीय राज्यों में चुनाव के लिए निर्वाचन-क्षेत्रों का गठन भौगोलिक आधार पर किया जाता है। समस्त राज्य को एक-सदस्य अथवा बहु-सदस्य निर्वाचन-क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। एक चुनाव-क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों को उस चुनाव-क्षेत्र का निवासी होने के नाते अपने प्रतिनिधि चुनने के अधिकार को ही प्रादेशिक प्रतिनिधित्व कहा जाता है। संक्षेप में, सामान्य प्रतिनिधियों का निर्वाचन जब प्रादेशिक आधार पर हो, तो उस प्रणाली को प्रादेशिक प्रतिनिधित्व कहा जाता है। भारत, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका आदि राज्यों में इसी प्रणाली को लागू किया गया है।

प्रश्न 4.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व का क्या अर्थ है? इसकी दो पद्धतियों के नाम लिखें।
उत्तर:
आनुपातिक प्रतिनिधित्व का अर्थ है प्रत्येक जाति या वर्ग को उसकी जनसंख्या के अनुपात में संसद या प्रतिनिधि सभा में प्रतिनिधित्व का मिलना। जैकी का कहना है, “अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व देने का महत्त्व अतिशय महान है। यदि किसी निर्वाचन-क्षेत्र के दो तिहाई मतदाता एक दल को मत दें और शेष मतदाता किसी दूसरे दल को, तो स्पष्ट है कि बहुसंख्यक वर्ग को दो-तिहाई और अल्पसंख्यक वर्ग को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व प्राप्त होना चाहिए।” अर्थात प्रत्येक वर्ग, जाति या दल को उसके समर्थकों के अनुपात के अनुसार प्रतिनिधित्व का मिलना ही आनुपातिक प्रतिनिधित्व कहलाता है।

प्रश्न 5.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व के चार गुण बताइए। उत्तर-आनुपातिक प्रतिनिधित्व के चार गुण निम्नलिखित हैं
1. सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व इस प्रणाली का यह गुण है कि समाज के सभी वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व मिल जाता है। कोई वर्ग प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं रहता और सबको संतुष्टि मिलती है।

2. अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की भावना-इस प्रणाली का यह गुण है कि सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिलने से उनके हितों की रक्षा होती है और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग स्वयं को सुरक्षित समझते हैं। वे स्वयं को बहुसंख्यक वर्ग की तानाशाही का शिकार नहीं समझते।

3. मतदाताओं को मतदान में अधिक सुविधा इस प्रणाली में मतदाता को अपनी पसन्द के कई उम्मीदवारों के पक्ष में मत डालने का अवसर मिलता है। उसे एक ही व्यक्ति के पक्ष में मत डालने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। इससे उसे अपनी पसन्द के उम्मीदवार को मत देने में सुविधा हो जाती है।

4. निर्वाचन के लिए निर्धारित मत प्राप्त करना आवश्यक है इस प्रणाली में यह सम्भावना नहीं रहती कि कोई उम्मीदवार थोड़े-से प्रतिशत मत लेकर भी चुन लिया जाएगा। इस प्रणाली में चुने जाने के लिए उम्मीदवार को एक निश्चित संख्या में मत प्राप्त करना आवश्यक होता है अर्थात् चुने जाने के लिए उम्मीदवार को एक निश्चित संख्या के मतदाताओं का समर्थन प्राप्त करना आवश्यक है।

प्रश्न 6.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व के चार अवगुण लिखें।
उत्तर:
आनुपातिक प्रतिनिधित्व के चार अवगुण निम्नलिखित हैं

1. जटिल प्रणाली आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली बहुत जटिल है। साधारण मतदाता इसे समझ नहीं सकता।

2. राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अन्तर्गत छोटे-छोटे दलों को प्रोत्साहन मिलता है। अल्पसंख्यक जातियाँ भी अपनी भिन्नता बनाए रखती हैं और दूसरी जातियों के साथ अपने हितों को मिलाना नहीं चाहतीं। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्र छोटे-छोटे वर्गों और गुटों में बँट जाता है और राष्ट्रीय एकता पनप नहीं पाती।

3. राजनीतिक दलों को अधिक महत्त्व आनुपातिक प्रतिनिधित्व की सूची प्रणाली के अन्तर्गत राजनीतिक दलों का महत्त्व बहुत अधिक होता है। मतदाता को किसी-न-किसी दल के पक्ष में वोट डालना होता है क्योंकि इस प्रणाली के अन्तर्गत निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकते।

4. उत्तरदायित्व का अभाव इस प्रणाली के अन्तर्गत निर्वाचन-क्षेत्र बहु-सदस्यीय होते हैं और एक क्षेत्र में कई प्रतिनिधि होते हैं। चूंकि एक क्षेत्र का प्रतिनिधि निश्चित नहीं होता, इसलिए प्रतिनिधियों में उत्तरदायित्व की भावना पैदा नहीं होती।

प्रश्न 7.
अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व समस्या का क्या अर्थ है?
उत्तर:
आधुनिक युग प्रजातान्त्रिक युग है और वास्तविक प्रजातन्त्र वही होता है जिसमें समाज के प्रत्येक वर्ग को समुचित प्रतिनिधित्व मिले। समुचित प्रतिनिधित्व से हमारा तात्पर्य यह है कि प्रत्येक वर्ग, धर्म या जाति के प्रतिनिधि विधानमण्डल में होने चाहिएँ, ताकि वे भी अपना पक्ष रख सकें। यदि इस प्रकार का प्रतिनिधित्व नहीं होता तो विधानमण्डल को ‘जनमत का दर्पण’ नहीं कहा जा सकेगा। परन्तु आधुनिक लोकतन्त्र प्रणाली इस प्रकार की है कि उसमें अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।

साधारणतः आजकल प्रायः सभी देशों में एक-सदस्यीय चुनाव क्षेत्रों के आधार पर होने वाले चुनावों में बहुमत प्राप्त वर्ग को अधिकतर क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व मिलता है और अल्पसंख्यक वर्गों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर प्राप्त नहीं होता। परिणामस्वरूप बहुसंख्यक वर्ग को अपनी जनसंख्या के अनुपात में काफी अधिक स्थान विधानमण्डन में मिल जाते हैं और अल्पसंख्यक बिना प्रतिनिधित्व के रह जाते हैं; जैसे एक दल को 60% मत प्राप्त होते हैं तो उस दल को 60% स्थान प्राप्त हो जाते हैं और उनकी सरकार बन जाती है परन्तु 40% लोग बिना किसी प्रतिनिधित्व के रह जाते हैं और उनके हितों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। इसी को अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की समस्या कहते हैं।

प्रश्न 8.
सीमित मत प्रणाली पर नोट लिखें।
उत्तर:
सीमित मत-प्रणाली (Limited Vote System) के अन्तर्गत सारा देश बहुत-से निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजित होता है। प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र में से कम-से-कम 3 प्रतिनिधियों का निर्वाचन हो सकता है। इस प्रणाली में मतदाताओं को उम्मीदवारों की निश्चित संख्या से कम वोट देने का अधिकार होता है। उदाहरण के लिए, यदि हिसार निर्वाचन-क्षेत्र में से 5 उम्मीदवार चुने जाने हैं तो प्रत्येक मतदाता को 3 या 4 वोट देने का अधिकार होगा, परन्तु एक मतदाता एक उम्मीदवार को एक से अधिक मत नहीं दे सकता।

मतों की संख्या सीमित होने के कारण सभी स्थान बहुसंख्यक दल द्वारा पूरित नहीं होंगे, परिणामस्वरूप अल्पसंख्यकों को भी प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। लेकिन जनसंख्या के अनुपात में उन्हें प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हो पाता। इसके द्वारा बड़े तथा सुसंगठित अल्पमत वर्गों को ही प्रतिनिधित्व मिल सकता है।

प्रश्न 9.
वयस्क मताधिकार के पक्ष में चार तर्क (गुण) दीजिए।
उत्तर:
व्यस्क मताधिकार के पक्ष में चार तर्क निम्नलिखित हैं

1. लोक प्रभुसत्ता के सिद्धान्त के अनुकूल लोक प्रभुसत्ता का अर्थ है कि सर्वोच्च शक्ति जनता में निहित है। लोकतन्त्र तब तक वास्तविक लोकतन्त्र नहीं हो सकता जब तक कि प्रतिनिधियों के चुनाव में प्रत्येक नागरिक का योगदान न हो। अतः प्रतिनिधियों का चुनाव सामान्य जनता द्वारा किया जाना चाहिए।

2. यह समानता पर आधारित है लोकतन्त्र का मुख्य आधार है-समानता। सभी व्यक्ति समान हैं और विकास के लिए सभी को मताधिकार देना भी आवश्यक है। जिन नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं होता, उनके हितों तथा अधिकारों की सरकार तनिक भी परवाह नहीं करती। इसलिए प्रत्येक वयस्क को मत देने का अधिकार होना चाहिए। नों का प्रभाव सभी पर पड़ता है-राज्य के कानूनों तथा नीतियों का प्रभाव सभी व्यक्तियों पर पड़ता है। उसे निश्चित करने में भी सबका भाग होना चाहिए।

4. नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है वयस्क मताधिकार होने से सभी नागरिक समय-समय पर देश में होने वाले चुनावों में भाग लेते रहते हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता अपने दल की नीति का लोगों में प्रचार करते हैं और देश की समस्याओं के बारे में उनको जानकारी देते रहते हैं। इससे नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है।

प्रश्न 10.
वयस्क मताधिकार के चार अवगुण लिखें।
उत्तर:
व्यस्क मताधिकार के चार अवगुण निम्नलिखित हैं

1. अशिक्षित व्यक्तियों को मताधिकार देना अनुचित है-प्रत्येक देश में अधिकतर जनता अशिक्षित तथा अज्ञानी होती है। वे उम्मीदवार के गुणों को न देखकर जाति, धर्म तथा मित्रता आदि के आधार पर अपने मत का प्रयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति राजनीतिक नेताओं के जोशीले भाषणों से भी शीघ्र प्रभावित हो जाते हैं। अतः अशिक्षित व्यक्तियों को मताधिकार देना उचित नहीं है।

2. भ्रष्टाचार को बढ़ावा-वयस्क मताधिकार प्रणाली में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। निर्धन व्यक्ति थोड़े-से लालच में पड़कर अपना मत स्वार्थी तथा भ्रष्टाचारी उम्मीदवारों के हाथों में बेच देते हैं।

3. प्रशासन तथा देश की समस्याएँ जटिल- आधुनिक युग में शासन संबंधी प्रश्न तथा समस्याएँ दिन-प्रतिदिन जटिल होती जा रही हैं, जिन्हें समझ पाना साधारण व्यक्ति के बस की बात नहीं है। प्रायः साधारण मतदाता अयोग्य व्यक्ति को चुन लेते हैं क्योंकि उनके पास देश की समस्याओं पर विचार करने तथा उन्हें समझने के लिए समय ही नहीं होता।

4. साधारण जनता रूढ़िवादी होती है वयस्क मताधिकार के विरुद्ध एक तर्क यह प्रस्तुत किया जाता है कि साधारण जनता रूढ़िवादी होती है। उनके द्वारा आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्र में प्रगतिशील नीतियों का विरोध किया जाता है। अतः मताधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों को ही मिलना चाहिए जो इसका उचित प्रयोग करने की योग्यता रखते हों।

प्रश्न 11.
चुनाव आयोग के कोई चार कार्य लिखें।
उत्तर:
चुनाव आयोग के चार कार्य निम्नलिखित हैं

1. चुनाव प्रबन्धन, निर्देशन व नियन्त्रण चुनाव आयोग का प्रमुख कार्य निष्पक्ष चुनाव करवाना है, इसलिए सम्पूर्ण चुनाव व्यवस्था चुनाव आयोग के अधीन है। यह चुनावों का प्रबन्ध, निर्देशन व नियन्त्रण करता है तथा चुनावों से सम्बन्धित समस्याओं का समाधान करता है।

2. मतदाता सूचियाँ तैयार करना चुनाव आयोग चुनाव से पूर्व चुनाव क्षेत्र के आधार पर मतदाता सूचियाँ तैयार करवाता है, जिसके लिए यथासम्भव उन सभी वयस्क नागरिकों को मतदाता सूची में सम्मिलित करने का प्रयास किया जाता है जो मतदाता बनने की योग्यता रखते हैं।

3. राजनीतिक दलों को निर्वाचन में ठीक व्यवहार रखने के निर्देश-चुनाव आयोग चुनाव के समय उचित वातावरण बनाए रखने के लिए सभी राजनीतिक दलों और साधारण जनता के लिए आचार संहिता बना सकता है; जैसे मत प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दल जातिवाद या सांप्रदायिकता की भावना को नहीं भड़काएँगे तथा भ्रष्ट तरीकों को नहीं अपनाएँगे।

4. चुनाव की तिथि की घोषणा करना-चुनाव आयोग उम्मीदवारों के लिए नामांकन-पत्र भरने, नाम वापस लेने तथा नामांकन-पत्रों की जांच करने की तिथि निश्चित करता है। यह आयोग उस तिथि की भी घोषणा करता है, जिस दिन आम चुनाव होने होते हैं और नागरिकों को अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग करना होता है।

प्रश्न 12.
चुनाव आयोग का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
भारतीय चुनाव आयोग की महत्ता का विवरण निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है

1. भारतीय लोकतन्त्र के लिए आवश्यक-भारत में लोकतन्त्र की स्थापना की गई है। लोकतन्त्र स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनावों पर आधारित है। भारत के संविधान निर्माताओं ने भारत में स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग का गठन किया। अतः चुनाव आयोग स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव करवाकर भारतीय लोकतन्त्र की सुरक्षा करता है।

2. राजनीतिक दलों पर नियन्त्रण के लिए आवश्यक-चुनाव आयोग चुनाव के दिनों में राजनीतिक दलों के कार्यों को निर्देशित व नियंत्रित करने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चुनाव आयोग ही विभिन्न राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करता है एवं उनकी मान्यता को रद्द भी करता है। इसके साथ ही चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के लिए आचार संहिता को निश्चित करता है। आचार संहिता की अवहेलना करने वाले दलों के या उनके सदस्यों के विरुद्ध कार्रवाई भी करता है।

3. भारतीय चुनाव राजनीति को प्रदूषित होने से बचाने वाली संस्था के रूप में चुनाव आयोग भारतीय चुनाव राजनीति को प्रदूषित होने से बचाने वाली संस्था के रूप में अहम भूमिका निभाता है। चुनाव आयोग समय-समय पर सन् 1951 के भारतीय प्रतिनिधित्व अधिनियम के अन्तर्गत भिन्न-भिन्न आदेश देता है जिससे चुनाव प्रक्रिया को भ्रष्ट होने से बचाया जा सकता है; जैसे प्रत्येक उम्मीदवार को चुनाव के बाद चुनाव में हुए खर्च का ब्यौरा देना होता है, शासक दल सरकारी मशीनरी का प्रयोग नहीं कर सकता, चुनाव के दौरान कोई घोषणा नहीं की जा सकती आदि।

4. सरकारों पर नियन्त्रण की भूमिका चुनाव आयोग केंद्र सरकार व राज्य सरकारों पर नियन्त्रण रखने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में बहुमत प्राप्त दल सरकार का निर्माण करता है। सत्तारूढ़ दल अपनी शक्ति का प्रयोग करके चुनाव के लिए धन एकत्रित कर सकता है, जबकि विरोधी दल ऐसा नहीं कर सकता। इसलिए आयोग आदर्श आचार संहिता के अन्तर्गत सरकारों को निर्देश देता है और उन पर नियन्त्रण रखता है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

प्रश्न 13.
भारतीय चुनाव प्रणाली की कोई चार विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
भारतीय चुनाव प्रणाली की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. वयस्क मताधिकार-भारतीय चुनाव व्यवस्था की प्रमुख विशेषता वयस्क मताधिकार है। इसका अर्थ यह है कि देश के प्रत्येक नागरिक, जिसकी आयु 18 वर्ष अथवा उससे अधिक है, को मतदान में भाग लेने का अधिकार है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि 61वें संवैधानिक संशोधन द्वारा मताधिकार की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई थी। इसके अतिरिक्त भारत में जाति, धर्म, वर्ण, लिंग, शिक्षा आदि के आधार पर किसी भी व्यक्ति को मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

2. अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा एंग्लो-इंडियन जाति के सदस्यों के लिए स्थान सुरक्षित रखना भारतीय संविधान के अनुसार संसद, राज्यों के विधानमण्डलों तथा स्थानीय स्वशासन की इकाइयों में पिछड़ी हुई जातियों, अनुसूचित जातियों तथा एंग्लो-इंडियन जाति के सदस्यों के लिए स्थान सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है। आरंभ में यह व्यवस्था केवल 10 वर्ष के लिए अर्थात् 1960 तक थी, परन्तु दस-दस वर्ष के लिए बढ़ाकर इसे लागू रखा गया है। अब यह व्यवस्था 104वें संवैधानिक संशोधन द्वारा सन् 2030 तक कर दी गई है।

3. एक-सदस्यीय चनाव क्षेत्र भारतीय चनाव व्यवस्था की एक अन्य विशेषता एक-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र का होना है। चुनाव के समय प्रत्येक राज्य को लगभग बराबर जनसंख्या वाले क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है और एक निर्वाचन क्षेत्र से एक ही प्रतिनिधि चुना जाता है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पूर्व चुनाव में कुछ क्षेत्र दो सदस्यों वाले भी होते थे-एक साधारण जनता के लिए और दूसरा आरक्षित स्थान से । परन्तु अब इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है।

4. गुप्त मतदान स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष चुनाव के लिए गुप्त मतदान आवश्यक है। भारत में भी लोकसभा, विधानसभा आदि के चुनाव के लिए गुप्त मतदान प्रणाली को अपनाया गया है। मत डालने वाले के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति को इस बात का पता नहीं लगता कि उसने अपना मतदान किस उम्मीदवार को दिया है। इससे भ्रष्टाचार में भी कमी होती है।

प्रश्न 14.
भारतीय चुनाव-प्रणाली की कोई चार त्रुटियाँ लिखें।
उत्तर:
भारतीय चुनाव-प्रणाली की चार त्रुटियाँ निम्नलिखित हैं

1. मतदाता सूचियों के बनाने में लापरवाही यह भी देखा गया है कि भारत में मतदाता सूचियों के बनाने में बड़ी लापरवाही से काम लिया जाता है और कई बार जान-बूझकर तथा कई बार अनजाने में पूरे-के-पूरे मोहल्ले सूचियों से गायब हो जाते हैं। मतदाता सूचियाँ अधिकतर राज्य सरकार के कर्मचारियों द्वारा बनाई जाती हैं और वे इसे फिजूल का काम समझते हैं।

विभिन्न विभागों के सामान्य कर्मचारियों विशेषतः पटवारियों तथा स्कूल के अध्यापकों से यह काम करवाया जाता है। प्रायः यह भी देखने में आता है कि नई मतदाता सूची बनाते समय नए मतदाताओं के नाम तो जोड़ दिए जाते हैं परन्तु स्वर्गवासी हो चुके मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में ज्यों के त्यों बने रहते हैं। इस प्रकार मतदाता सूचियों में अंकित नामों एवं वास्तविक नामों में पर्याप्त अन्तर हो जाता है। अतः मतदाता सूचियों को समय-समय पर संशोधित करने एवं चुनावी प्रक्रिया के प्रथम कार्य को सावधानीपूर्वक करने की आवश्यकता है।

2. सरकारी तन्त्र का दुरुपयोग भारतीय चुनाव व्यवस्था की एक और गम्भीर त्रुटि सामने आई है। मन्त्रियों द्वारा दलीय लाभ के लिए सरकारी तंत्र का प्रयोग किया जाता है। वोट बटोरने के लिए मन्त्रियों द्वारा लोगों को तरह-तरह के आश्वासन दि हैं। विभिन्न वर्गों के लिए अनेकानेक रियायतें और सुविधाओं की घोषणा की जाती है।

अनेक प्रकार की विकास योजनाओं की घोषणा की जाती है; जैसे कारखानों, स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों व पुलों के शिलान्यास आदि की घोषणा करना। सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्ते आदि में वृद्धि की जाती है। कर्जे माफ किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त सरकारी गाड़ियों तथा अन्य सुविधाओं का प्रयोग किया जाता है। यद्यपि चुनाव सम्बन्धी अधिनियम के अनुसार ऐसा करना भ्रष्ट व्यवहार में सम्मिलित है परन्तु फिर भी चुनावी प्रक्रिया के दौरान यह सब देखने को मिलता है।

3. राजनीतिक दलों को मतों के अनुपात से स्थानों की प्राप्ति न होना यह भी देखा गया है कि चुनावों में राजनीतिक दलों को उस अनुपात में विधानमण्डलों में स्थान प्राप्त नहीं होते, जिस अनुपात में उन्हें मत प्राप्त होते हैं। जैसे भारत में 13वीं लोकसभा के चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी को 182 स्थान मिले और मतों का प्रतिशत 23.70 प्रतिशत रहा, जबकि काँग्रेस को 28.42 प्रतिशत मत मिलने के पश्चात् भी 114 स्थान ही प्राप्त हुए, फिर भी काँग्रेस का मत-प्रतिशत भाजपा से 5 प्रतिशत अधिक है। इससे दलों में मायूसी का पैदा होना स्वाभाविक है। इस प्रकार एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत इस स्थिति को न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

4. चुनाव नियमों में दोष यह भी देखा गया है कि चुनाव सम्बन्धी नियमों में बड़ी कमियाँ हैं और इसी कारण चुनाव में बरती गई अनियमितताओं को न्यायालय के सामने सिद्ध करना बड़ा कठिन हो जाता है। लगभग सभी दल धर्म और जाति के आधार पर अपने उम्मीदवार चुनते हैं तथा इसी के नाम पर वोट माँगते हैं, परन्तु इसको सिद्ध करना कठिन है। सभी उम्मीदवार मतदाताओं को लाने व ले जाने के लिए गाड़ियों का प्रयोग करते हैं, परन्तु यह बात चुनाव-याचिका की सुनवाई के समय सिद्ध नहीं हो पाती।

प्रश्न 15.
भारतीय चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए कोई तीन सुझाव दें।
उत्तर:
भारतीय चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए तीन सुझाव निम्नलिखित हैं

1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली शुरू करना-भारत में चुनाव-प्रणाली का सबसे बड़ा दोष यह है कि कई बार राजनीतिक दल कम मत प्राप्त करते हैं, परन्तु उन्हें अधिक स्थान प्राप्त हो जाते हैं। उदाहरणतः सन् 1980 में काँग्रेस को लोकसभा के लिए केवल 42.6% मत मिले, परन्तु संसद में 67% स्थान मिले। इस बुराई को समाप्त करने के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का सुझाव दिया गया है। यद्यपि भारत में इसे लागू करना कठिन कार्य है।

2. चुनाव याचिकाओं के बारे में सुझाव-गत अनेक वर्षों से चुनाव याचिकाएँ उच्च न्यायालयों के समक्ष आई हैं, जिनका निपटारा करने में कई वर्ष लगे हैं। चुनाव याचिकाएँ चुनावों से भी अधिक खर्चीली तथा कष्टमय बन गई हैं। इसलिए इन याचिकाओं का निपटारा शीघ्र होना चाहिए, ताकि इसके दोनों पक्षों को बेकार की मुसीबत तथा खर्च से छुटकारा मिल सके।

3. निर्दलीय उम्मीदवारों पर रोक-निर्दलीय उम्मीदवार निष्पक्ष चुनावों के लिए एक समस्या हैं। इसलिए निर्दलीय उम्मीदवारों पर रोक लगनी चाहिए। यद्यपि कानून द्वारा स्वतन्त्र उम्मीदवारों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन फिर भी ऐसा कुछ अवश्य होना चाहिए कि मजाक के लिए चुनाव लड़ने वालों पर रोक लगे। इस संबंध में यह सुझाव दिया है कि एक तो जमानत की राशि को बढ़ा देना चाहिए। दूसरे यह व्यवस्था होनी चाहिए कि जिस निर्दलीय उम्मीदवार को निश्चित प्रतिशत से कम वोट प्राप्त होते हैं उसे अगले चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं होगा। इस प्रकार की व्यवस्था से निश्चित रूप से निर्दलीय उम्मीदवारों पर रोक लगेगी।

प्रश्न 16.
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व के चार गुण लिखें।
उत्तर:
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व के चार गुण निम्नलिखित हैं
1. प्रतिनिधियों का उत्तरदायित्व प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होता है। एक क्षेत्र के सभी मतदाताओं का प्रतिनिधि होने के कारण वह अपने उत्तरदायित्व से इन्कार नहीं कर सकता।

2. क्षेत्रीय हितों की रक्षा प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में क्षेत्रीय हितों की अच्छी तरह पूर्ति होती है। प्रतिनिधि अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं को अच्छी तरह समझते हैं क्योंकि उनका अपने मतदाताओं व क्षेत्र से समीप का संबंध होता है। अतः प्रतिनिधि अपने निर्वाचन-क्षेत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भरसक प्रयत्न करते हैं। यदि प्रतिनिधि अपने मतदाताओं के हितों की रक्षा नहीं करता, तो ऐसे प्रतिनिधि को मतदाता दोबारा नहीं चुनते। इसलिए प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के हितों की उपेक्षा नहीं कर सकता।

3. अधिक विकास की सम्भावना प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में अधिक विकास की सम्भावना बनी रहती है। इसका कारण यह है कि इस प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक प्रतिनिधि अपने क्षेत्र का अधिक-से-अधिक विकास करना चाहता है क्योंकि भावी चुनाव में वह अपनी सीट को सुनिश्चित कर लेना चाहता है। सभी क्षेत्रों के विकास से देश का विकास होना स्वाभाविक है।

4. कम खर्चीली इस प्रणाली में चुनाव कम खर्चीला होता है और उम्मीदवार को भी चुनाव में कम खर्च करना पड़ता है।

प्रश्न 17.
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व के चार अवगुण लिखें।
उत्तर:
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व के चार अवगुण निम्नलिखित हैं

1. क्षेत्रीयवाद की भावना-इस प्रणाली द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है। प्रतिनिधि अपने को एक क्षेत्र विशेष का प्रतिनिधि समझने लगते हैं और उसी क्षेत्र के विकास की बात सोचते तथा करते हैं और उसके लिए प्रयत्नशील रहते हैं। इससे राष्ट्रीय हितों की अवहेलना होने लगती है।

2. सीमित पसन्द-कई बार मतदाताओं की पसन्द सीमित हो जाती है क्योंकि चुनाव लड़ने वाले प्रायः उसी क्षेत्र के निवासी होते हैं और यदि उस क्षेत्र में अच्छे उम्मीदवार न हों तो मतदाताओं को इच्छा न होते हुए भी किसी-न-किसी उम्मीदवार के पक्ष में मत डालना ही पड़ता है।

3. भ्रष्ट होना मतदाताओं को भ्रष्ट किए जाने की सम्भावना रहती है क्योंकि मतदाता कम होते हैं और धनी उम्मीदवार धन के बल पर वोट खरीदने का प्रयत्न करने लगते हैं।

4. अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व न मिलना-इस प्रणाली में अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व आसानी से नहीं मिलता। एक क्षेत्र से एक उम्मीदवार चुना जाता है और स्वाभाविक है कि बहुमत वर्ग का उम्मीदवार ही चुना जाता है। इस प्रकार अल्पसंख्यक वर्ग के प्रतिनिधि लगभग सभी चुनाव क्षेत्रों में हार जाते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से आप क्या समझते हैं? इसके पक्ष तथा विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
साधारण शब्दों में, प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली उस चुनाव व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें साधारण मतदाता प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं। प्रत्येक मतदाता चुनाव-स्थान पर जाकर स्वयं अपनी पसन्द के उम्मीदवार के पक्ष में, अपने मत का प्रयोग करता है और जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं, उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है।

भारत में लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली द्वारा किया जाता है। इस प्रणाली के पक्ष तथा विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के पक्ष में तर्क (Arguments in Favour of Direct Method of Election)-प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली .. की पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

1. अधिक लोकतन्त्रीय प्रणाली (More Democratic System):
इस प्रणाली में जनता को स्वयं प्रत्यक्ष रूप से मतदान करके अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलता है। अतः यह प्रणाली अधिक लोकतान्त्रिक है।

2. मतदाताओं तथा प्रतिनिधियों में सीधा सम्पर्क (Direct link between the voters and their Representatives):
इस प्रणाली में मतदाता तथा उम्मीदवार सीधे रूप से सम्पर्क में आते हैं तथा मतदाता उम्मीदवारों को भली-भांति जान सकते हैं। उम्मीदवार भी अपनी नीतियाँ तथा कार्यक्रम जनता के सामने रख सकते हैं।

3. राजनीतिक शिक्षा (Political Education):
इस प्रणाली में मतदाताओं तथा उम्मीदवारों में सीधा सम्पर्क होता है। इससे मतदाताओं को राजनीतिक शिक्षा मिलती है और उनमें राजनीतिक जागरूकता की भावना का भी उदय होता है।

4. अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान (Knowledge of Rights and Duties):
इस प्रणाली के अन्तर्गत सामान्य जनता को मताधिकार तथा अन्य अधिकारों का ज्ञान प्राप्त होता है तथा कर्तव्यों की भी जानकारी मिलती है।

5. राजनीतिक दलों के लिए आसानी (Convenient for Political Parties):
इस प्रणाली में राजनीतिक दलों के लिए भी आसानी होती है और जो राजनीतिक दल अधिक प्रभावशाली होता है उसके लिए अधिक मत प्राप्त करना तथा बहुमत प्राप्त करना सरल हो जाता है।

6. मतदाताओं में आत्म-सम्मान की भावना आती है (It brings sense of Self-respect among the Voters):
प्रत्येक चुनाव-प्रणाली के अनुसार प्रत्येक मतदाता को निर्वाचन में भाग प्राप्त होता है, जिसके फलस्वरूप मतदाताओं में आत्म-सम्मान की भावना जन्म लेती है। वे अपने-आप को शासन-तन्त्र का अंश अनुभव करते हैं और राजनीतिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।

7. प्रतिनिधि सभी लोगों के सामने उत्तरदायित्व निभाते हैं (Representatives owe Responsibility to All):
वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली द्वारा चुने गए प्रतिनिधि अपने-आपको जनता के सामने अधिक उत्तरदायी महसूस करते हैं क्योंकि वे कुछ मतदाताओं द्वारा नहीं, बल्कि सभी मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं।

प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के विपक्ष में तर्क (Arguments Against of Direct Method of Election) प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली . के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

1. साधारण मतदाताओं में मतं का उचित प्रयोग करने की क्षमता का अभाव (Ordinary Voters cannot exercise the Right to Vote Properly): प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली के आलोचकों का कहना है कि साधारण मतदाताओं में अपने मत का उचित प्रयोग करने की क्षमता नहीं होती। वे झूठे प्रचारों और जोशीले भाषणों के प्रभाव में बह जाते हैं और अयोग्य उम्मीदवारों को अपना वोट डाल देते हैं।

2. अनुचित प्रचार (False Propaganda):
इस प्रणाली के अन्तर्गत निर्वाचन अभियान में झूठे प्रचार का सहारा लिया जाता है। उम्मीदवार एक-दूसरे की निन्दा करते हैं और एक-दूसरे पर झूठे आरोप लगाते हैं जिसके परिणामस्वरूप मतदाता पथ-भ्रष्ट हो सके।

3. अधिक खर्चीली प्रणाली (More Expensive System):
प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली अधिक खर्चीली मानी गई है। इसके अन्तर्गत चुनाव कराने वाले अभिकरण को भी बहत खर्चा करना पड़ता है और उम्मीदवारों को भी बहत खर्चा करना पड़ता है।

4. अव्यवस्थाजनक (Causes Disruption):
यह चुनाव-प्रणाली एक ऐसी चुनाव-प्रणाली है जिसमें अव्यवस्था हो जाती है। अधिक जोश-खरोश के कारण दंगे-फसाद और अन्य प्रकार की अव्यवस्थाजनक स्थितियाँ सामने आ जाती हैं जिनका समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

5. दलगत भावना को बढ़ावा (Encourages Partisan Spirit):
प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली राजनीतिक दलों का अखाड़ा बन जाती है, जिसमें राजनीतिक दल एक-दूसरे के विरुद्ध आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं।

प्रश्न 2.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के विभिन्न तरीकों या रूपों का वर्णन करें।
उत्तर:
अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए यह प्रणाली सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसकी विशेषता यह है कि इसका उद्देश्य प्रत्येक दल को कुछ प्रतिनिधित्व दिलाना है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक दल को उसके मतदान की शक्ति के अनुपात में ही प्रतिनिधित्व दिया जाता है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व के मुख्य दो रूप हैं-

  • एकल संक्रमणीय मत-प्रणाली (Single Transferable Vote System) और
  • सूची-प्रणाली (List System)। ये दोनों प्रणालियाँ अल्पसंख्यकों को उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार प्रतिनिधित्व दिलाती हैं।

1. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote System) इस प्रणाली को हेयर प्रणाली (Hare System) भी कहा जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम इसका वर्णन एक अंग्रेज़ विद्वान थॉमस हेयर (Thomas Hare) ने सन् 1851 में अपनी पुस्तक ‘प्रतिनिधियों का चुनाव’ (Election of Representatives) में किया था।

सन् 1855 में डेनमार्क के एक मन्त्री एंड्रे (Andrae) द्वारा इसे पहली बार लागू किया गया। इसे अधिमान्य प्रणाली (Preferential System) भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें मतदाता मत-पत्र (Ballot-Paper) पर अपने अधिमानों (Preferences) का संकेत दे सकता है। भारतवर्ष में राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव इसी प्रणाली के द्वारा किया जाता है। इस प्रणाली के अनुसार चुनाव जीतने के लिए जितने मत प्राप्त करने आवश्यक हैं, उनकी संख्या एक सूत्र (Formula) के अनुसार निश्चित की जाती है। इसे कोटा (Quota) कहा जाता है। इसकी गणना निम्नलिखित प्रकार से की जाती है
HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 Img 1
मतदान-पत्र (Ballot Paper) में निर्वाचन के लिए खड़े सभी उम्मीदवारों के नाम लिखे हुए होते हैं। निर्वाचन के लिए जितने उम्मीदवार खड़े होते हैं, मतदाता को उतने ही अधिमान या पूर्वाधिकार (Preferences) देने का अधिकार होता है। उसे अपने अधिमानों (Preferences) को 1, 2, 3, 4, 5, 6 आदि के रूप में लिखना पड़ता है। . जब मतदान की प्रक्रिया (Polling) समाप्त हो जाती है तो सभी उम्मीदवारों को प्राप्त हुए प्रथम अधिमानों (First Preferences) को गिन लिया जाता है।

जो उम्मीदवार निश्चित कोटा प्राप्त कर लेते हैं, उन्हें शीघ्र ही निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। ऐसे उम्मीदवार निश्चित कोटे से कुछ अधिक वोट भी प्राप्त कर सकते हैं। इन अतिरिक्त (Additional) वोटों का उनके लिए कुछ भी महत्त्व नहीं होता। इसीलिए इन अतिरिक्त (Additional) वोटों को मत-पत्र (Ballot Paper) में लिखे गए अधिमानों (Preferences) के क्रम के अनुसार दूसरे उम्मीदवारों को दे दिया जाता है अर्थात् हस्तांतरित कर दिया जाता है।

इस प्रकार का हस्तांतरण उस समय तक जारी रहता है, जब तक कोटा प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों की संख्या निर्वाचन-क्षेत्र से चुने जाने वाले उम्मीदवारों की संख्या के बराबर न हो जाए। जिस समय यह संख्या समान हो जाती है तो उस समय हस्तांतरण की प्रक्रिया बन्द कर दी जाती है और निर्वाचन परिणाम घोषित कर दिया जाता है।

2. सूची प्रणाली (List System)-आनुपातिक प्रतिनिधित्व का दूसरा रूप सूची प्रणाली है। यह प्रणाली बहु-सदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्र में, जिसमें कम-से-कम तीन सीटें हों, लागू की जा सकती है। इस प्रणाली के अन्तर्गत चुनाव में जो उम्मीदवार खड़े होते हैं, उनकी अपने-अपने दलों के अनुसार अनुसूचियाँ बना ली जाती हैं। प्रत्येक मतदाता को उतने मत देने का अधिकार होता है जितने कि सदस्य उस निर्वाचन-क्षेत्र से चुने जाते हैं, परन्तु वह एक उम्मीदवार को एक से अधिक मत नहीं दे सकता।

उदाहरणस्वरूप, यदि किसी निर्वाचन-क्षेत्र में 4 सीटें हैं तो प्रत्येक मतदाता को 4 मत देने का अधिकार होगा। इस प्रणाली में चुनाव का परिणाम अलग-अलग उम्मीदवारों को प्राप्त हुए मतों के अनुसार नहीं निकाला जाता, बल्कि प्रत्येक सूची के उम्मीदवारों के मत इकट्ठे जोड़ लिए जाते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि मतदाता अपना मत उम्मीदवार को नहीं देते, बल्कि सूची को देते हैं।

इसके अन्तर्गत भी उपर्युक्त एकल संक्रमणीय प्रणाली में दिए गए फार्मूले के अनुसार कोटा (Quota) निकाला जाता है और एक स्थान से चुनाव जीतने के लिए न्यूनतम मतों की संख्या को निश्चित किया जाता है, इसके पश्चात प्रत्येक सूची को कितने स्थान मिलने चाहिएँ, यह उस सूची को दिए गए मतों की कुल संख्या को कोटा से विभाजित करके निकाल लिया जाता है। उदाहरणस्वरूप, एक आएगा।
HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 2 Img 2
यदि चुनाव में तीन दल भाग ले रहे हैं और उनको मत इस प्रकार मिले हैं जनता दल 4,200, काँग्रेस 3,000 और साम्यवादी दल 2,800 तो उस समय जनता दल को दो स्थान, काँग्रेस को एक स्थान तथा साम्यवादी दल को एक स्थान प्राप्त हो जाएगा। यदि इसमें किसी दल को कोटे से कम मत प्राप्त होते हैं तो बची हुई सीट उस दल को दी जाएगी, जिसके शेष मतों की संख्या सबसे अधिक है। इस प्रकार प्रत्येक दल को उसकी मत-संख्या के अनुपात से प्रतिनिधित्व मिल जाता है। यह प्रणाली नार्वे, स्वीडन तथा बेल्जियम आदि देशों में अपनाई गई है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

प्रश्न 3.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के पक्ष में तर्क (Arguments in Favour of System of Proportional Representation)-आधुनिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के पक्ष में तर्क निम्नलिखित हैं

1. सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व (Representation to All Classes):
इस प्रणाली का यह गुण है कि समाज के सभी वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व मिल जाता है। कोई वर्ग प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं रहता और सबको संतुष्टि मिलती है।

2. अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की भावना (Feeling of Protection among Minorities):
इस प्रणाली का यह गुण है कि सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिलने से उनके हितों की रक्षा होती है और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग स्वयं को सुरक्षित समझते हैं। वे स्वयं को बहुसंख्यक वर्ग की तानाशाही का शिकार नहीं समझते।

3. मतदाताओं को मतदान में अधिक सुविधा (More Scope of Choice for Voters):
इस प्रणाली में मतदाता को अपनी पसन्द के कई उम्मीदवारों के पक्ष में मत डालने का अवसर मिलता है। उसे एक ही व्यक्ति के पक्ष में मत डालने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। इससे उसे अपनी पसन्द के उम्मीदवार को मत देने में सुविधा हो जाती है।

4. निर्वाचन के लिए निर्धारित मत प्राप्त करना आवश्यक है (Quota is Necessary to Win the Election):
इस प्रणाली भावना नहीं रहती कि कोई उम्मीदवार थोड़े-से प्रतिशत मत लेकर भी चुन लिया जाएगा। इस प्रणाली में चुने जाने के लिए उम्मीदवार को एक निश्चित संख्या में मत प्राप्त करना आवश्यक होता है, अर्थात् चुने जाने के लिए उम्मीदवार को एक निश्चित संख्या के मतदाताओं का समर्थन प्राप्त करना आवश्यक है।

5. मत व्यर्थ नहीं जाते (Votes do not go Waste):
इस प्रणाली का यह भी गुण है कि इसमें कोई भी मत व्यर्थ नहीं जाता। मतदाता का मत यदि पहली पसन्द के अनुसार काम नहीं आता है, तो वह दूसरी या तीसरी या चौथी पसन्द के पक्ष में अवश्य काम आता है। मतदाता को भी यह तसल्ली रहती है कि. उसके मत का मूल्य है।

6. विधानमण्डल जनमत का सही प्रतिनिधित्व करता है (Legislature becomes Real Mirror of Public Opinion):
इस प्रणाली से विधानमण्डल जनमत का सही प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि इसमें सभी वर्गों और जातियों के लोग अपने अनुपात से विधानमण्डल में स्थान प्राप्त कर लेते हैं।

7. बहु-दलीय प्रणाली के लिए उपयोगी (Useful in case of Multi-party System):
जिस देश में कई राजनीतिक दल हैं, उसमें यह प्रणाली बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है क्योंकि इसके अन्तर्गत सभी राजनीतिक दलों को प्रतिनिधित्व मिल जाता है और किसी एक दल की तानाशाही स्थापित नहीं हो पाती।

8. लोगों को अधिक राजनीतिक शिक्षा (More Political Education to People):
इस प्रणाली का यह भी गुण है कि इससे लोगों को राजनीतिक शिक्षा अधिक मिलती है। लोगों को मत डालते समय काफी सोच-विचार के बाद अपनी पसन्द का प्रयोग करना पड़ता है और मतगणना के समय भी काफी सोच-समझ से काम लेना पड़ता है, इसलिए यह प्रणाली लोगों को अधिक राजनीतिक शिक्षा देती है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के विपक्ष में तर्क (Arguments Against the System of Proportional Representation) आधुनिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के विपक्ष में तर्क निम्नलिखित हैं

1. जटिल प्रणाली (Complicated System):
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली बहुत जटिल है। साधारण मतदाता इसे समझ नहीं सकता। वोटों पर पसन्द अंकित करना, कोटा निश्चित करना, वोटों की गिनती करना और वोटों को पसन्द के अनुसार हस्तांतरित करना आदि ये सब बातें एक साधारण पढ़े-लिखे व्यक्ति समझ नहीं पाते।

2. राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध (Against National Unity):
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अन्तर्गत छोटे-छोटे दलों को प्रोत्साहन मिलता है। अल्पसंख्यक जातियाँ भी अपनी भिन्नता बनाए रखती हैं और दूसरी जातियों के साथ अपने हितों को मिलाना नहीं चाहतीं। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्र छोटे-छोटे वर्गों और गुटों में बँट जाता है और राष्ट्रीय एकता पनप नहीं पाती।

3. राजनीतिक दलों को अधिक महत्त्व (More Importance to Political Parties):
आनुपातिक प्रतिनिधित्व की सूची प्रणाली के अन्तर्गत राजनीतिक दलों का महत्त्व बहुत अधिक होता है। मतदाता को किसी-न-किसी दल के पक्ष में वोट डालना होता है क्योंकि इस प्रणाली के अन्तर्गत निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकते।

4. उत्तरदायित्व का अभाव (Lack of Responsibility):
इस प्रणाली के अन्तर्गत निर्वाचन-क्षेत्र बहु-सदस्यीय होते हैं और एक क्षेत्र में कई प्रतिनिधि होते हैं। चूंकि एक क्षेत्र का प्रतिनिधि निश्चित नहीं होता, इसलिए प्रतिनिधियों में उत्तरदायित्व की भावना पैदा नहीं होती।

5. मतदाता और प्रतिनिधि में सम्पर्क का अभाव (Lack of Contact between Voters and Representatives):
इस प्रणाली में चुनाव-क्षेत्र बड़े-बड़े होते हैं, जिस कारण से मतदाताओं को उम्मीदवारों की पूरी जानकारी प्राप्त नहीं होती और उनमें घनिष्ठ संबंध होना असम्भव-सा हो जाता है। परिणाम यह निकलता है कि प्रतिनिधियों का लोगों के साथ सम्पर्क नहीं हो पाता।

6. मतदाताओं की पसन्द सीमित हो जाती है (Voter’s Choice is Limited):
कई बार मतदाता की पसन्द का व्यक्ति नहीं चुना जाता। मान लो कि एक मतदाता ने किसी सूची में चौथे नंबर पर लिखे हुए उम्मीदवार के कारण अपना मत उस सूची के पक्ष में डाला, परन्तु उस सूची के हिस्से में केवल दो सीटें आईं तो ऐसी दशा में उस मतदाता की पसन्द अर्थहीन हो गई।

7. सरकार की अस्थिरता (Government is Unstable):
इस प्रणाली के अन्तर्गत देश में बहुत-से दल बन जाते हैं और सभी दल विधानमण्डल में कुछ-न-कुछ सीटें प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। जिन देशों में इस चुनाव-प्रणाली को अपनाया गया है, उनके विधानमण्डलों में किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हो पाता और प्रायः मिली-जुली सरकार बनती है जो अधिक देर तक स्थिर नहीं रहती।

8. उप-चुनाव करवाने में कठिनाई (Difficulty in holding By-election):
इस प्रणाली के अधीन निर्वाचन-क्षेत्र का बहु-सदस्यीय होना बहुत आवश्यक है, परन्तु यदि आम चुनाव के बाद किसी क्षेत्र में एक सीट खाली हो जाए तो उसका उप-चुनाव कैसे किया जाए, यह एक ऐसी समस्या है, जिसे आसानी से सुलझाया नहीं जा सकता।

निष्कर्ष (Conclusion)-आनुपातिक प्रतिनिधित्व के पक्ष और विपक्ष का अध्ययन करने के पश्चात् यह निष्कर्ष निकालना आसान है कि यह प्रणाली केवल ऐसे देश में लागू हो सकती है जहाँ लोग अधिक पढ़े-लिखे हों, साथ ही यह प्रणाली ऐसे राज्य के लिए कदाचित उचित नहीं ठहराई जा सकती, जहाँ पर संसदीय शासन लागू हो। इस चुनाव-प्रणाली का एक गुण तो सराहनीय है कि यह अल्पसंख्यक जातियों को प्रतिनिधित्व दिलाने में बहुत सहायक सिद्ध हो सकती है। भारत में विधानपालिका के ऊपरी सदनों के चुनाव इसी प्रणाली के अनुसार होते हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय चुनाव-प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय चुनाव-प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का विवरण निम्नलिखित है

1. वयस्क मताधिकार (Adult Franchise):
भारतीय चुनाव-प्रणाली की प्रमुख विशेषता यह है कि यहाँ वयस्क मत्तधिकार प्रणाली को लागू किया गया है। 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले प्रत्येक नागरिक को संसद, विधानमण्डल, नगरपालिका, पंचायत आदि के चुनावों में मत डालने का अधिकार दिया गया है।

मताधिकार के लिए जाति, धर्म, वंश, रंग, लिंग आदि के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। हाँ, मतदान क्षेत्र (Constituency) में एक निश्चित अवधि तक रहने, मतदाता-सूची में नाम होने आदि की शर्ते निश्चित की गईं हैं, परन्तु अमीर-गरीब, छूत-अछूत, हिन्दू-मुसलमान आदि के आधार पर किसी को मताधिकार से वंचित नहीं किया गया है।

वयस्क मताधिकार में लोकतान्त्रिक सहभागिता के सिद्धान्त को लागू किया गया है और लगभग 50% से अधिक जनसंख्या को मत डालने का अधिकार मिला हुआ है। सितम्बर-अक्तूबर, 1999 के लोकसभा चुनाव के समय भारत में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 62.04 करोड़ थी, जो 14वीं लोकसभा चुनाव (अप्रैल-मई, 2004) के समय बढ़कर लगभग 67.5 करोड़ हो गई थी।

15वीं लोकसभा चुनाव (अप्रैल-मई, 2009) में मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 71 करोड़ 40 लाख, 16वीं लोकसभा चुनाव (अप्रैल-मई, 2014) में लगभग 83.41 करोड़ थी जो अप्रैल-मई, 2019 में हुए 17वीं लोकसभा में बढ़कर लगभग 89 करोड़ 78 लाख हो गई। इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में जनता के एक बहुत बड़े भाग को चुनावों में अपनी सहभागिता निभाने का अधिकार प्राप्त है।

2. प्रत्यक्ष चुनाव (Direct Election):
भारतीय चुनाव-प्रणाली की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ जनता के प्रतिनिधि जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। केवल राज्यसभा तथा विधान परिषदों के सदस्य ही अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं और ये संस्थाएँ इतनी शक्तिशाली नहीं हैं। वास्तविक शक्ति-प्राप्त संस्थाएँ लोकसभा, राज्य विधानसभा, पंचायत, नगरपालिका हैं और इन सबके प्रतिनिधि जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। इनमें मनोनीत किए जाने की व्यवस्था भी नाममात्र है।

3. संयुक्त निर्वाचन (Joint Election):
भारत में चुनाव अब पृथक् निर्वाचन के आधार पर नहीं होते, बल्कि संयुक्त निर्वाचन के आधार पर होते हैं। एक चुनाव-क्षेत्र में रहने वाले सभी मतदाता, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म से सम्बन्ध रखते हैं, अपना एक प्रतिनिधि चुनते हैं। संविधान के अनुच्छेद 325 के अनुसार प्रत्येक प्रादेशिक चुनाव के लिए संसद के सदस्य चुनने के लिए एक सामान्य निर्वाचक सूची होगी और कोई भी भारतीय धर्म, जाति तथा लिंग के आधार पर सूची में नाम लिखवाने के अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक निर्वाचन क्षेत्र के समस्त मतदाता मिलकर संयुक्त रूप से अपने एक प्रतिनिधि का निर्वाचन करते हैं।

4. गुप्त मतदान (Secret Voting):
भारत में गुप्त मतदान की व्यवस्था की गई है। निष्पक्ष और स्वतन्त्र चुनाव के लिए गुप्त मतदान की व्यवस्था आवश्यक है। इस व्यवस्था में मत डालने वाले व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति को इस बात का पता नहीं चलता कि उसने अपना मत किसको दिया है। इस प्रकार आपसी झगड़े और शत्रुता की सम्भावना कम हो जाती है तथा देश में शान्ति और व्यवस्था बनी रहती है।

5. एक-सदस्यीय चुनाव-क्षेत्र (Single-Member Constituencies):
भारत में एक-सदस्यीय चुनाव-क्षेत्र बनाए जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि चुनाव के समय सारे भारत या उस राज्य को, जिसमें कि चुनाव होना हो, बराबर जनसंख्या वाले चुनाव-क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है और प्रत्येक क्षेत्र में से एक प्रतिनिधि चुना जाता है। पहले चुनावों में कुछ क्षेत्र दो सदस्यों वाले भी होते थे एक सदस्य साधारण जनता में से और दूसरा सुरक्षित स्थान से, परन्तु अब जिन क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों अथवा जनजातियों की संख्या अधिक होती है, उस इलाके से उस जाति का एक ही सदस्य चुना जाता है और उसे सभी मतदाता चुनते हैं। इस प्रकार अब सभी चुनाव-क्षेत्र एक-सदस्यीय हैं। वर्तमान में भारतीय संघ को 543 संसदीय क्षेत्रों में बाँटा गया है।

6. आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Proportional Representation and Single Transferable Vote System):
भारत में इस प्रकार की चुनाव-प्रणाली का प्रयोग भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए किया जाता है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार संसद व राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को अनुपात के अनुसार समान मूल्य के मत देने का अधिकार होता है।

एकल संक्रमणीय प्रणाली के अनुसार मतदाता को उम्मीदवारों के नाम के आगे अपनी पसन्द लिखनी होती है। मतगणना के समय यदि प्रथम पसन्द वाला कोई व्यक्ति नहीं चुना जाता तो द्वितीय या उससे अगली पसन्द वालों के नाम मतों का संक्रमण हो जाता है। इस प्रकार किसी मतदाता का कोई मत व्यर्थ नहीं जाता।

7. चुनाव आयोग (Election Commission):
भारतीय संविधान द्वारा चुनावों के सुचारू रूप से संचालन के लिए चुनाव आयोग की व्यवस्था की गई है, जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। वर्तमान में श्री सुशील चंद्रा मुख्य निर्वाचन आयुक्त हैं एवं अन्य दो चुनाव आयुक्त बहु-सदस्यीय आयोग में कार्यरत हैं। इसी तरह भारत में बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग कार्य कर रहा है।

8. स्थानों का आरक्षण (Reservation of Seats):
भारत में सभी नागरिकों को समानता का अधिकार दिया गया है। इसके साथ ही पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए संसद, विधानसभाओं, नगरपालिकाओं तथा पंचायतों में स्थान आरक्षित किए गए हैं। कुछ निर्वाचन-क्षेत्र ऐसे रखे जाते हैं, जिनसे किसी पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति अथवा जनजाति का सदस्य ही चुनाव लड़ सकता है।

आरम्भ में यह व्यवस्था केवल 10 वर्ष के लिए अर्थात् 1960 तक थी, परन्तु दस-दस वर्ष बढ़ाकर इसे लागू रखा गया। वर्तमान में 104वें संशोधन के द्वारा इसे बढ़ाकर 2030 तक कर दिया गया। यह व्यवस्था समाज के पिछड़े वर्ग को सुविधा प्रदान करके उन्हें शेष वर्गों के समान स्तर पर लाने के अभिप्राय से की गई है। यह व्यवस्था लोकतन्त्र के सिद्धान्तों के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसे वास्तविक व व्यावहारिक बनाने के लिए की गई है।

9. चनाव याचिका (Election Petition):
भारत में चनाव सम्बन्धी झगडों को निपटाने के लिए चनाव याचिका की व्यवस्था की गई है। इसके अनुसार कोई भी उम्मीदवार या मतदाता यदि किसी चुनाव से सन्तुष्ट नहीं है या वह महसूस करता है कि किसी चुनाव-विशेष में भ्रष्ट साधन अपनाए गए हैं, तो वह अपनी याचिका सीधे उच्च न्यायालय के पास भेज देता है। यदि यह सिद्ध हो जाए कि किसी प्रतिनिधि ने चुनाव के समय भ्रष्ट साधन अपनाए हैं, तो न्यायालय उसके चुनाव को रद्द घोषित कर सकता है।

10. परिणाम साधारण बहुमत के आधार पर (Result on the basis of Simple Majority):
भारत के संविधान निर्माताओं , ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत के लिए ब्रिटेन में 16वीं शताब्दी में प्रचलित चुनाव प्रणाली, जिसे ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम’ (First Past the Post System) या एकल बहुमत प्रणाली (Single Plurality System) कहा जाता है, को अपनाना अधिक उचित समझा। इस प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों में से सबसे अधिक मत पाने वाला उम्मीदवार लोकसभा/राज्यसभा विधानसभा विधान-परिषद्/स्थानीय नगर निकायों/पंचायत राज संस्थाओं के लिए निर्वाचित हो जाता है।

11. ऐच्छिक मतदान (Optional Voting):
चुनावों में प्रत्येक मतदाता द्वारा अपने मत का प्रयोग करना एवं न करना उसकी इच्छा पर निर्भर करता है। वह कानून द्वारा वोट डालने के लिए बाध्य नहीं है। यद्यपि गुजरात सरकार द्वारा स्थानीय स्तर (पंचायती राज संस्थाओं) पर मतदान के अनिवार्य सम्बन्धी कानून पास करके भारत में एक बार पुनः चर्चा का विषय बना दिया गया है कि . मतदान की अनिवार्यता के कानून को लागू करना कितना व्यावहारिक एवं सार्थक है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सन् 2014 में लागू किए गए मतदान की अनिवार्यता सम्बन्धी कानून को लागू करने वाला गुजरात राज्य भारत का प्रथम राज्य बन गया है।

12. नोटा का प्रावधान (Provision of NOTA):
भारतीय चुनाव प्रणाली में नोटा (None of the Above) के प्रावधान को लागू करके चुनाव में एक नए विकल्प को भी जनता के लिए प्रदान किया गया है। इस विकल्प द्वारा मतदाता चुनाव में खड़े हुए सभी प्रत्याशियों को नकार सकता है। इस तरह यदि मतदाता चुनाव में खड़े हुए सभी प्रत्याशियों को अयोग्य या भ्रष्ट प्रवृत्ति का समझते हैं तो वे अपनी भावना को व्यक्त करने का पूर्ण अधिकार रखते हैं।

भारत में हुए 16वीं लोकसभा चुनाव, 2014 में प्रथम बार नकारात्मक मतदान के लिए नोटा (NOTA) विकल्प मतदाताओं को उपलब्ध करवाया गया। 16वीं लोकसभा चुनाव में कुल 59,97,054 मतदाताओं ने इस विकल्प का प्रयोग किया। यह सभी 543 लोकसभा सीटों के लिए पड़े कुल मतों का लगभग 1.1% है। यह व्यवस्था निश्चित जन-प्रतिनिधियों को जहाँ उत्तरदायित्वपूर्ण बना सकती है, वहाँ उन्हें इस बात के लिए भी प्रेरित कर सकती है कि वे वास्तव में समाज में एक सच्चे जन-सेवक के आदर्श के रूप में अपने-आपको प्रस्तुत करें, अन्यथा जनता उन्हें नकार भी सकती है।

प्रश्न 5.
भारतीय चुनाव-प्रणाली की मुख्य त्रुटियों (दोषों) का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है। अब यहाँ लगभग 89 करोड़ 78 लाख से अधिक मतदाता अपने मत का प्रयोग करने का अधिकार रखते हैं और आने वाली सरकार का निर्णय करते हैं। भारत में अब तक लोकसभा के 17 चुनाव हो चुके हैं तथा विभिन्न राज्य विधानसभाओं के चुनाव हो चुके हैं। इन चुनावों की आम प्रशंसा भी हुई है, परन्तु भारतीय चुनाव-प्रणाली में कुछ उभरे दोषों सम्बन्धी तथ्य अब छिपे हुए नहीं हैं।

सामान्य तौर पर उम्मीदवारों की अपराधिक पृष्ठभूमि, अवैध तरीके से जमा की गई प्रत्याशियों की अचूक सम्पत्ति, अपराधिक व्यक्तियों से प्रत्याशियों की साँठ-गाँठ, मतदान केन्द्रों पर जबरन कब्जा कर लेने, फायरिंग करके या डरा-धमका कर वैध मतदाताओं को मतदान करने से रोकने पर फर्जी मतदान करने जैसी घटनाएँ एवं दोष भारतीय चुनाव प्रणाली में प्रायः देखी जा सकती है।

इसलिए भारत में चुनाव सुधार का मुद्दा सबसे अधिक चर्चित विषय रहता है। यद्यपि इस सम्बन्ध में भारतीय चुनाव आयोग, सरकार एवं न्यायपालिका ने समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार अपना-अपना सहयोग दिया है, परन्तु अब भी चुनाव-सुधार के लिए वास्तविक क्रिया चयन हेतु महत्त्वपूर्ण कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। यहाँ हम चुनाव-सुधार सम्बन्धी सुझावों पर चर्चा करने से पूर्व भारतीय चुनाव प्रणाली के दोषों पर दृष्टिपात कर रहे हैं जो निम्नलिखित हैं

1. चुनावों में धन की बढ़ती हुई भूमिका (The Increasing Role of Money in Elections):
भारतीय चुनाव-प्रणाली का सबसे बड़ा दोष चुनावों में धन की बढ़ती हुई भूमिका है। भारतीय चुनावों में धन के अन्धाधुन्ध प्रयोग और दुरुपयोग ने भारत की राजनीति को काफी भ्रष्ट किया है। भारत में काले धन का बड़ा बोलबाला है और उसका चुनावों में दिल खोलकर प्रयोग किया जाता है।

मतदाताओं के लिए शराब के दौर चलाए जाते हैं, मत खरीदे जाते हैं, उम्मीदवारों को धनी लोगों द्वारा खड़ा किया जाता है और पैसे के बल पर उम्मीदवारों को बैठाया जाता है तथा मतदाताओं को लाने व ले जाने के लिए गाड़ियों का प्रयोग किया जाता है। आज का चुनाव पैसे के बल पर ही जीता जा सकता है और इस धन ने मतदाताओं, राजनीतिक दलों तथा प्रतिनिधियों आदि सबको भ्रष्ट बना दिया है।

सार्वजनिक जीवन से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्तियों का कहना है कि लोकसभा के एक उम्मीदवार ने 2 से 10 करोड़ रुपए तक खर्च किए हैं अर्थात् इतना चुनाव खर्च राजनीतिक व आर्थिक स्थिति को दूषित कर रहा है। एक अनुमान के अनुसार, समय के साथ भारत में लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनावों की लागत (राजकोष पर भारित) तथा उम्मीदवारों एवं राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले खर्च का परिमाण सन् 1952 के खर्चों की तुलना में सन् 2014 में बढ़कर लगभग 328 गुना हो गया।

यहाँ तक कि राजनीतिक दलों एवं उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले व्यय में तो 500 गुना से भी अधिक वृद्धि हो गई है। एक तथ्य के अनुसार सन् 1952 के लोकसभा चुनावों पर मात्र 10.45 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे जिससे प्रति व्यक्ति चुनाव खर्च लगभग 0.60 रुपए था तथा सन् 2019 के 17वीं लोकसभा चुनाव में कुल खर्च लगभग 70 हजार करोड़ रुपए अनुमानित है जिससे प्रति व्यक्ति खर्च बढ़कर लगभग 60 रुपए हो गया है।

भारतीय लोकतन्त्र धीरे-धीरे ऐसे दौर में पहुंच गया है जहाँ किसी भी सामान्य पृष्ठभूमि के कार्यकर्ता के लिए किसी राजनीतिक दल का टिकट प्राप्त करना तथा चुनाव लड़ना लगभग असम्भव हो गया है। एक तथ्य के अनुसार, 17वीं लोकसभा में 88 प्रतिशत सांसदों की सम्पत्ति औसतन एक-एक करोड़ रुपए से अधिक थी जबकि सन् 2004, 2009 एवं 2014 में करोड़पति सांसदों का औसत क्रमशः लगभग 30 प्रतिशत एवं 82 प्रतिशत था।

इस तरह स्पष्ट है कि राजनीति में धनाढ्य लोगों का ही प्रभुत्व बनता जा रहा है जो भारतीय लोकतन्त्र एवं चुनाव प्रणाली के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता। निश्चित ही चुनाव प्रबंधन में काले धन के उपयोग से भारतीय चुनाव परिदृश्य अत्यन्त भ्रष्ट, कलुषित, फिजूलखर्ची एवं हिंसक होता जा रहा है।

2. जाति और धर्म के नाम पर वोट (Voting on the basis of Caste and Religion):
भारत में साम्प्रदायिकता का बड़ा प्रभाव है। जाति और धर्म के नाम पर खुले रूप से मत माँगे और डाले जाते हैं। राजनीतिक दल भी अपने उम्मीदवार खड़े करते समय इस बात को ध्यान में रखते हैं और उसी जाति और धर्म का उम्मीदवार खड़ा करने का प्रयत्न करते हैं, जिस जाति का उस निर्वाचन-क्षेत्र में बहुमत हो। भारत में अब तक जो चुनाव हुए हैं, उनके आँकड़े भी इस बात का समर्थन करते हैं।

यद्यपि 16वीं एवं 17वीं लोकसभा चुनाव में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के चमत्कारिक नेतृत्व को मिला अपार जनसमर्थन यह दर्शा रहा है कि भारत में भ्रष्टाचार को समाप्त करने एवं विकास तथा सुशासन के लिए आम जनता ने जाति एवं धर्म के आधार से ऊपर उठकर मतदान किया है। यही कारण है कि 16वीं लोकसभा चुनाव के बाद लगभग 30 वर्षों के बाद भारत में एक दल वाली स्पष्ट बहुमत की सरकार बनी। वहाँ 17वीं लोकसभा चुनाव के बाद मोदी नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को पुनः पूर्णतः स्पष्ट जनसमर्थन मिला।

3. राजनीतिक दलों को मतों के अनुपात से स्थानों की प्राप्ति न होना (Political Parties not get the seats in Proportion to Votes):
यह भी देखा गया है कि चुनावों में राजनीतिक दलों को उस अनुपात में विधानमण्डलों में स्थान प्राप्त नहीं होते, जिस अनुपात में उन्हें मत प्राप्त होते हैं। जैसे भारत में 13वीं लोकसभा के चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी को 182 स्थान मिले और मतों का प्रतिशत 23.70 प्रतिशत रहा, जबकि काँग्रेस को 28.42 प्रतिशत मत मिलने के पश्चात् भी 114 स्थान ही प्राप्त हुए, फिर भी काँग्रेस का मत-प्रतिशत भाजपा से 5 प्रतिशत अधिक है। इससे दलों में मायूसी का पैदा होना स्वाभाविक है। इस प्रकार एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत इस स्थिति को न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

4. मतदाताओं की अनुपस्थिति (Absence of the Voters):
चुनावों में बहुत-से मतदाता चुनावों में रुचि लेते ही नहीं। उनके लिए वोट डालना एक समस्या बन गई है। वे मतपत्र का प्रयोग करते ही नहीं। मत का प्रयोग न करना एक प्रकार से लोकतन्त्र को धोखा देना ही है। अक्सर देखने में आता है कि मतदान लगभग 60% होता है। मतदान का प्रतिशत कई चुनावों में तो 60% से भी कम रहता है।

इससे यह होता है कि कम वोट प्राप्त करने वाले दल को अधिक सीटें मिल जाती हैं; जैसे 13वीं लोकसभा के चुनाव, जो सन् 1999 में हुए, में 59.30 प्रतिशत मतदाताओं ने 14वीं लोकसभा चुनाव में 58 प्रतिशत मतदाताओं ने, 15वीं लोकसभा चुनाव, 2009 में भी 71 करोड़ 40 लाख मतदाताओं में से केवल 42 करोड़ 80 लाख मतदाताओं ने, 16वीं लोकसभा चुनाव में कुल पंजीकृत 83.41 करोड़ मतदाताओं में से केवल 66.4 प्रतिशत मतदाताओं ने तथा 17वीं लोकसभा चुनाव, 2019 में 89.78 करोड़ मतदाताओं में से 67.11 प्रतिशत मतदाताओं ने ही भाग लिया।

यानि चुनाव आयोग एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रयास के बावजूद आज भी लगभग 33 प्रतिशत मतदाता अपने पवित्र एवं अमूल्य मताधिकार के प्रति जागरूक नहीं हैं। ऐसी स्थिति में यह कहना बहत कठिन है कि जीतने वाला प्रत्याशी लोकतान्त्रिक भावना के अनुरूप बहमत

5. चुनाव नियमों में दोष (Defective Election Rules):
यह भी देखा गया है कि चुनाव सम्बन्धी नियमों में बड़ी कमियाँ हैं और इसी कारण चुनाव में बरती गई अनियमितताओं को न्यायालय के सामने सिद्ध करना बड़ा कठिन हो जाता है। लगभग सभी दल धर्म और जाति के आधार पर अपने उम्मीदवार चुनते हैं तथा इसी के नाम पर वोट माँगते हैं, परन्तु इसको सिद्ध करना कठिन है। सभी उम्मीदवार मतदाताओं को लाने व ले जाने के लिए गाड़ियों का प्रयोग करते हैं, परन्तु यह बात चुनाव-याचिका की सुनवाई के समय सिद्ध नहीं हो पाती।

6. राजनीति का अपराधीकरण (Criminalization of Politics):
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय चुनाव-प्रणाली में एक और दोषपूर्ण मोड़ आया है। प्रायः सभी राजनीतिक दलों ने ऐसे बहुत-से उम्मीदवार चुनाव में खड़े किए, जिनका अपराधों की दनिया में नाम था। ऐसे व्यक्तियों ने राजनीति में अपराधीकरण को बढ़ावा देने का काम किया और लोगों को भय दिखाकर वोट माँगे। जब अपराधी, तस्कर और लुटेरे पहले किसी दल के सक्रिय सदस्य तथा बाद में विधायक बन जाएँ तो उस देश के भविष्य के उज्ज्वल होने की आशा नहीं की जा सकती।

यदि एक तथ्य पर नजर डाली जाए तो राजनीति में अपराधीकरण की प्रवृत्ति स्वतः ही स्पष्ट हो जाती है; जैसे 14वीं लोकसभा में 128 सांसद ऐसे थे जिन पर विभिन्न मामलों पर अपराधिक मामले चल रहे थे जबकि 15वीं लोकसभा में यह संख्या बढ़कर 162 हो गई। जो कुल सांसदों का 30 प्रतिशत थी। एक तथ्य के अनुसार 162 में से 78 सांसदों के विरुद्ध गम्भीर अपराधिक मामले दर्ज थे।

इसके अतिरिक्त 16वीं लोकसभा, (2014) के निर्वाचित सांसदों पर ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्स’ के द्वारा निर्वाचित सांसदों के दिए गए शपथ पत्रों के विश्लेषण के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष के अनुसार 34 प्रतिशत सांसदों (185) के विरुद्ध विभिन्न न्यायालयों में अपराधिक मामले लम्बित हैं। इनमें से 112 सांसदों के विरुद्ध तो हत्या, हत्या का प्रयास, आगजनी, अपहरण जैसे गम्भीर प्रवृत्ति के मामले दर्ज हैं।

सन् 2019 में हुए 17वीं लोकसभा चुनाव में लगभग 233 सांसदों के विरुद्ध आपराधिक मामले लम्बित हैं जिनमें बीजेपी के 116, कांग्रेस के 29, जनता दल के 13, डी.एम.के. के 10 एवं टी०एम०सी० के 9 सांसद सम्मिलित हैं जो कुल सांसदों का 43 प्रतिशत हैं। इनमें से 29 प्रतिशत सांसदों पर गम्भीर जुर्म (हत्या, घर में घुसना, डकैती, फिरौती की मांग, धमकाने आदि) के आरोप हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति में अपराधीकरण की प्रवृत्ति निरन्तर बढ़ती जा रही है जो कि चिन्तनीय है।

7. जाली वोट की समस्या (Problem of Impersonation):
भारतीय चुनाव-प्रणाली का एक और महत्त्वपूर्ण दोष है जाली मतदान। चुनावों में जाली मतदान किया जाता है। यहाँ तक कि मृत व्यक्तियों के वोटों का भुगतान भी होता है। वास्तविकता यह है कि जाली मतदान भारतीय लोकतन्त्र के लिए खतरा बनता जा रहा है। इससे बड़ा खतरा तो यह है कि जाली मतदान विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा संगठित तौर पर करवाया जाता है।

8. बहुत अधिक चुनाव प्रत्याशी (Too many Candidates for Election):
भारतीय चुनाव-प्रणाली में एक और दोष है उम्मीदवारों की बढ़ती हुई संख्या। सन् 1996 के लोकसभा के चुनावों में उम्मीदवारों की संख्या 13,952 थी, जो फरवरी-मार्च, 1998 के आम चुनावों में बढ़कर 47,501 हो गई।

1999 में हुए 13वीं लोकसभा के चुनावों में भी कुल प्रत्याशियों की संख्या 4,648 थी जोकि 15वीं लोकसभा चुनाव में कुल प्रत्याशियों की संख्या बढ़कर 8070 हो गई और अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा चुनाव में कुल प्रत्याशियों की संख्या बढ़कर 8251 हो गई। यद्यपि 17वीं लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों की संख्या 8040 ही रही जो कि 16वीं लोकसभा से कम है।

17वीं लोकसभा चुनाव के समय 7 राष्ट्रीय एवं 59 राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल थे परन्तु अत्यधिक प्रत्याशियों के कारण जनमत का ठीक प्रदर्शन नहीं हो पाता। वोटें अधिक भागों में बंट जाती हैं। बहुत कम वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार की जीतने की संभावना रहती है। इस समस्या को निर्दलीय उम्मीदवारों की बढ़ती हुई संख्या ने और भी जटिल बना दिया है। यद्यपि सन् 1999, 2004, 2009, 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या में कमी अवश्य हुई है फिर भी निर्दलीय प्रत्याशियों का अस्तित्व जनमत विभाजन की दृष्टि से निश्चित ही हानिकारक माना जाता है।

9. प्रतिनिधियों को वापस बुलाने की व्यवस्था का न होना (No Provision for Recall of Representatives):
प्रतिनिधियों को अपने उत्तरदायित्व का आभास करवाने के लिए उन्हें वापस बुलाने की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे प्रतिनिधि वापस बुलाए जाने के भय से अपने कर्तव्यों का ठीक ढंग से पालन करेंगे। इस प्रकार की व्यवस्था स्विट्ज़रलैण्ड में है, जबकि भारत में .इस व्यवस्था का अभाव है।

10. अत्यधिक राजनीतिक दल (Too many Political Parties):
भारत एक बहुदलीय प्रणाली वाला देश है। भारत की बहुदलीय प्रणाली के कारण हुए जनमत विभाजन के परिणामस्वरूप सन् 2014 के 16वीं लोकसभा से पूर्व तक पिछले तीन दशकों से भारत में गठबन्धन सरकार का युग रहा ।

यद्यपि 17वीं लोकसभा चुनाव में गठबन्धन सरकार के बावजूद एन०डी०ए० गठबन्धन का नेतृत्व कर रही भारतीय जनता पार्टी को अकेले. ही 303 लोकसभा सीटों पर स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ, परन्तु फिर भी भारतीय राजनीति में अत्यधिक राजनीतिक दलों का होना जिनमें से अधिकांश राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय भी नहीं होते कोई अधिक शुभ संकेत नहीं है।

एक तथ्य के अनुसार 17वीं लोकसभा चुनाव, 2019 के समय चुनाव आयोग के पास लगभग 2293 राजनीतिक दल पंजीकृत थे, जिसमें केवल 7 राष्ट्रीय स्तर एवं 59 राज्य स्तरीय राजनीतिक दल थे। शेष राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की मान्यता प्राप्त नहीं थी। इससे स्पष्ट है कि भारत में बने अधिकांश राजनीतिक दल ऐसे हैं जो राजनीतिक सक्रियता नहीं रखते हैं। अतः भारतीय चुनाव प्रणाली की यह अपनी ही ऐसी व्यवस्था बन गई है जिसमें गैर-मान्यता प्राप्त दल भी चुनावों में भाग लेते हैं।

11. चुनावों में हिंसा का प्रयोग (Use of Violence in Elections):
भारतीय चुनाव प्रणाली का एक अन्य महत्त्वपूर्ण दोष . यह भी है कि चुनावी प्रक्रिया में हिंसा की घटनाएँ होती रहती हैं। हिंसा एवं शारीरिक बल से कई जगह मतदान केन्द्रों पर जबरन कब्जे की कोशिश की जाती है जिसके कारण कई बार कुछ मतदान केन्द्रों पर पुनर्मतदान भी करवाना पड़ता है। इस तरह हिंसक घटनाओं से जहाँ राजनीतिक वातावरण दूषित होता है वहाँ आम जनता का भी लोकतन्त्रीय प्रणाली से मोह भंग होता है।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

प्रश्न 6.
भारतीय चुनाव प्रणाली की त्रुटियों को दूर करने के लिए सुझाव दीजिए।
उत्तर:
भारत में वर्तमान चुनाव पद्धति 1952 से कार्य करती चली आ रही है। इस चुनाव पद्धति में अनेक दोष देखने को मिले हैं। समय-समय पर राजनीतिक विद्वानों व राजनीतिज्ञों ने विभिन्न सुधार एवं सुझाव प्रस्तुत किए हैं। भारतीय चुनावों के दोषों को दूर करने के लिए दिए गए सुझावों का ब्यौरा अग्रलिखित है

1. चुनाव आयोग को अधिक शक्तिशाली और प्रभावी बनाया जाना (Making Election Commission more Powerful and Effective):
चुनावी अनियमितताओं को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक है कि चुनाव आयोग को अधिक प्रभावी और शक्तिशाली बनाया जाए। सरकार इस सुझाव पर विचार कर रही है कि चुनाव आयोग को दीवानी न्यायालयों (Civil Courts) द्वारा प्रयुक्त निम्नलिखित शक्तियाँ प्रदान की जाएँ

(1) ऐसी शक्ति जिससे वह यह निर्णय दे सके कि चुनावी भ्रष्टाचार के कारण कोई व्यक्ति संसद या विधानसभा का सदस्य बना रहने के योग्य नहीं है।

(2) चुनावी अनियमितताओं की जांच-पड़ताल करने का अधिकार ।

(3) चुनावी अपराध सिद्ध हो जाने पर लोगों को दंडित करने का अधिकार, जिसमें जुर्माना वसूल करना या हर्जाना दिलाना शामिल है। एक सुझाव यह दिया जा सकता है कि ‘चुनाव आयोग’ के पास अपनी ‘स्वतन्त्र निधि’ होनी चाहिए जिससे हर छोटी-बड़ी बात के लिए उसे राज्य सरकारों का मुंह न ताकना पड़े।

2. चुनाव आयोग का पुनर्गठन (Reorganization of Election Commission):
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार चुनाव आयोग बहु-सदस्यीय हो सकता है; परन्तु काफी समय तक चुनाव आयोग एक-सदस्यीय रहा। इसे बहु-सदस्यीय बनाने की माँग जोर पकड़ती गई और इसे अब बहु-सदस्यीय बना दिया गया है। वर्तमान चुनाव आयोग के सदस्य मुख्य निर्वाचन आयुक्त सहित तीन हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमन्त्री के परामर्श पर की जाती है।

इसके लिए सुझाव दिया गया है कि चुनाव आयोग का गठन वैसे ही किया जाए, जैसे संघ लोक सेवा आयोग का होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए एक समिति बनाई जाए, जिसमें प्रधानमन्त्री, मुख्य न्यायाधीश व संसद में प्रतिपक्ष का नेता हो। मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य आयुक्तों की योग्यताएँ संविधान में निर्धारित की जाएँ। मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य आयुक्तों का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित किया गया है।

इनकी पुनः नियुक्ति राष्ट्रपति व प्रधानमन्त्री पर आधारित है। वे जितनी बार चाहें, उन्हें पुनः नियुक्त कर सकते हैं। संविधान में यह धारा चुनाव आयोग की स्वतन्त्रता के विरुद्ध है। इसके कारण मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य आयुक्तों की ईमानदारी पर सन्देह किया जा सकता है। इस कारण सुझाव दिया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य आयुक्तों का निश्चित कार्यकाल हो।

3. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली शुरू करना (To Start Proportional Representation System):
भारत में चुनाव प्रणाली का सबसे बड़ा दोष यह है कि कई बार राजनीतिक दल कम मत प्राप्त करते हैं, परन्तु उन्हें अधिक स्थान प्राप्त हो जाते हैं। उदाहरणतः सन् 1980 में काँग्रेस को लोकसभा के लिए केवल 42.6% मत मिले, परन्तु संसद में 67% स्थान मिले। इस बुराई को समाप्त करने के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का सुझाव दिया गया है। यद्यपि भारत में इसे लागू करना कठिन कार्य है।

4. मतदाता पहचान-पत्र (Identity Cards for the Voters):
चुनाव आयोग के द्वारा 28 अगस्त, 1993 को मतदान हेतु अनिवार्य पहचान-पत्र बनाने का निर्णय लिया गया था। इस सम्बन्ध में मुख्य चुनाव आयुक्त ने राज्य सरकारों से कहा है कि मतदाताओं को पहचान-पत्र जारी कर दें। इस सुझाव के सम्बन्ध में सभी पार्टियाँ सहमत हैं जैसे कि पूर्व चुनावों की भाँति 17वीं लोकसभा चुनाव, 2019 में भी पहचान-पत्र मतदाता के लिए अनिवार्य कर दिया गया, हालांकि चुनाव आयोग द्वारा पहचान-पत्र सभी मतदाताओं को उपलब्ध न कराए जाने के कारण पहचान के लिए नए प्रमाण-पत्र; जैसे राशन-कार्ड, बस-पास, विद्यार्थी पहचान पत्र, अंक तालिका आदि को भी मान्य कर दिया गया है।

17वीं लोकसभा चुनाव में इसका आशातीत परिणाम सामने आया और फर्जी मतदान रोकने में विशेष सहायता मिली। पहचान-पत्र की उपयोगिता मतदान केन्द्रों तक ही सीमित नहीं। बैंक, अदालत, सरकारी सेवा और सरकारी कार्य व्यवहार में भी इससे अनुकूल सहायता मिल सकती है और नागरिकों की कई कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं। अतः भारतीय लोकतन्त्र की सुरक्षा एवं निष्पक्ष चुनाव करवाने की दृष्टि से हमें सभी मतदाताओं के फोटोयुक्त पहचान-पत्र बनाने के लिए निरन्तर सरकारी तन्त्र की ओर से सार्थक प्रयास करना बहुत आवश्यक है जिससे प्रत्येक मतदाता की चुनाव में निष्पक्ष एवं सही सहभागिता सुनिश्चित की जा सके।

5. सरकारी तन्त्र का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए (There should not be misuse of the Official Machinery):
चुनावों के अवसर पर प्रायः शासन-तन्त्र का दुरुपयोग किया जाता है। वोट बटोरने के लिए मन्त्रियों द्वारा लोगों को तरह-तरह के आश्वासन दिए जाते हैं तथा उद्घाटन और शिलान्यास के बहाने सरकारी गाड़ियों और दूरदर्शन सुविधाओं का दुरुपयोग किया जाता है।

सन् 1968 में उच्चतम न्यायालय ने ‘घासी बनाम दलसिंह’ नामक केस में यह कहा था कि चुनाव से पूर्व पानी, बिजली, सड़कों की सफाई आदि पर राजकोष से व्यय करके चुनावों को प्रभावित करना ‘बुरा आचरण’ (Bad Practice) है। सरकारी खर्च से विज्ञापन छपवाना या सरकारी तन्त्र का चुनाव-कार्य के लिए प्रयोग पूरी तरह से निषिद्ध किया जाए।

6. चुनावों के व्यय के बारे में सुझाव (Suggestions about the Expenditure of Elections):
चुनाव आयोग ने समय-समय पर होने वाले चुनाव पर होने वाले व्यय को निर्धारित किया है। पहले दो चुनावों में विधानसभा के लिए अधिकतम सात हजार व लोकसभा के लिए 25 हजार रुपए निर्धारित किए गए थे।

जबकि समय-समय किए गए संशोधनों के पश्चात् वर्तमान में 1 मार्च, 2014 से प्रभावी नवीन संशोधन के अनुसार व्यय राशि को बढ़ाकर लोकसभा चुनाव हेतु इन राज्यों; जैसे आंध्र प्रदेश, असम बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु तथा दिल्ली आदि के लिए 70 लाख रुपए जबकि राज्य विधानसभा चुनाव के लिए उपर्युक्त राज्यों के अतिरिक्त उत्तराखण्ड एवं हिमाचल प्रदेश के लिए 28 लाख रुपए की व्यय राशि निर्धारित की गई।

शेष राज्यों के लोकसभा चुनावों के लिए 54 लाख रुपए, जबकि शेष राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए 20 लाख रुपए की व्यय राशि निर्धारित की गई इसके अतिरिक्त इस चुनाव खर्च को रोकने के लिए विभिन्न सुझाव दिए गए हैं

(1) राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव पर किया गया खर्च उम्मीदवार के खर्चे की सीमा में शामिल किया जाना चाहिए।

(2) राजनीतिक दलों के आय-व्यय विवरण की विधिवत जांच की जानी चाहिए। प्रत्येक राजनीतिक दल के लिए आय-व्यय का समस्त विवरण रखा जाना अनिवार्य किया जाए और उसकी जांच मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा नियुक्ति किए गए लेखा परीक्षक द्वारा होनी चाहिए।

(3) चुनाव प्रचार की अवधि में कमी करनी चाहिए, ताकि चुनाव खर्च कम हो सके। सुझाव है कि अवधि 10 दिन से भी कम होनी चाहिए।

(4) संसद और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ होने चाहिएँ। सन् 1996 के चुनावों में यह प्रयत्न किया गया था कि लोकसभा व विधानसभा के चुनाव साथ-साथ हों।

(5) चुनाव अवधि में सार्वजनिक संस्थाओं को अनुदान देने पर रोक लगानी चाहिए।

(6) चुनाव खर्च का कुछ भाग राज्य द्वारा वहन किया जाना चाहिए। वर्तमान समय में विश्व के कुछ देशों के राज्य चुनाव के सारे खर्च वहन करते हैं; जैसे स्वीडन, फ्राँस आदि में। कुछ देशों में मिश्रित चुनाव व्यय की व्यवस्था है जिसमें सरकार खर्च का कुछ भाग देती है।

(7) पार्टियों को चन्दा मात्र चैक द्वारा दिया जाना चाहिए।

7. चुनाव याचिकाओं के बारे में सुझाव (Suggestions about the Election Petitions):
गत अनेक वर्षों से चुनाव याचिकाएँ उच्च न्यायालयों के समक्ष आई हैं, जिनका निपटारा करने में कई वर्ष लगे हैं। चुनाव याचिकाएँ चुनावों से भी अधिक खर्चीली तथा कष्टमय बन गई हैं। इसलिए इन याचिकाओं का निपटारा शीघ्र होना चाहिए, ताकि इसके दोनों पक्षों को बेकार की मुसीबत तथा खर्च से छुटकारा मिल सके।

8. निर्दलीय उम्मीदवारों पर रोक (Restrictions on Independent Candidates):
निर्दलीय उम्मीदवार निष्पक्ष चुनावों के लिए एक समस्या हैं, इसलिए निर्दलीय उम्मीदवारों पर रोक लगनी चाहिए। यद्यपि कानून द्वारा स्वतन्त्र उम्मीदवारों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन फिर भी ऐसा कुछ अवश्य होना चाहिए कि मज़ाक के लिए चुनाव लड़ने वालों पर रोक लगे।

इस सम्बन्ध में यह सुझाव दिया है कि एक तो जमानत की राशि को बढ़ा देना चाहिए। जुलाई, 1996 में चुनाव आयोग की एक बैठक हुई, जिसमें जमानत की राशि बढ़ाने का फैसला लिया गया और लोकसभा के लिए यह राशि बढ़ाकर 25,000 रुपए और विधानसभा के लिए 10,000 रुपए कर दी गई है।

दूसरे यह व्यवस्था होनी चाहिए कि जिस निर्दलीय उम्मीदवार को निश्चित प्रतिशत से कम वोट प्राप्त होते हैं उसे अगले चुनाव में भाग लेने का अधिकार नहीं होगा। इस प्रकार की व्यवस्था से निश्चित रूप से निर्दलीय उम्मीदवारों पर रोक लगेगी। जैसे 15वीं लोकसभा चुनाव में केवल 9 सदस्य, 16वीं एवं 17वीं लोकसभा के चुनावों में भी केवल 3-3 प्रत्याशी ही निर्दलीय तौर पर विजयी रहे। स्पष्ट है कि निर्दलीय प्रत्याशियों के प्रति जनता का रुझान कम हुआ है।

9. वोटिंग मशीनों का प्रयोग (Use of Voting Machines):
सामान्यतः देखा गया है कि तस्कर, माफ़िया और गुंडा तत्त्व को तथाकथित कुछ जन-प्रतिनिधियों का संरक्षण प्राप्त होता है और वे शासन पर हावी हो जाते हैं। इस स्थिति को दूर करने के लिए सुझाव दिया गया है कि संवेदनशील केंद्रों पर सुरक्षा को बढ़ा दिया जाना चाहिए और चुनाव में वोटिंग मशीनों का प्रयोग किया ।

जा सकता है। सन् 1999 में 13वीं लोकसभा के चुनावों में राज्यों के 46 निर्वाचन क्षेत्रों में वोटिंग मशीन का प्रयोग कर सफल मतदान सम्भव करवाया गया। 22 फरवरी, 2000 को हुए हरियाणा राज्य के विधानसभा चुनावों में भी 90 निर्वाचन क्षेत्रों में से 45 निर्वाचन क्षेत्रों में वोटिंग मशीन का प्रयोग किया गया। ऐसे में हरियाणा भारत का पहला राज्य बन गया, जहाँ वोटिंग मशीन द्वारा चुनाव सम्पन्न हुआ। 14वीं, 15वीं, 16वीं एवं 17वीं लोकसभा के चुनाव भी पूर्णतः वोटिंग मशीन द्वारा सम्पन्न हुए थे।

10. अपराधीकरण पर अंकुश (Check on Criminalization):
भारतीय राजनीति में बढ़ती अपराधीकरण की प्रवृत्ति ने भारतीय लोकतन्त्र को सबसे अधिक प्रभावित किया है। इसलिए लोकतन्त्र की रक्षा हेतु आवश्यक है कि ऐसी प्रवृत्ति पर अंकुश हेतु तुरन्त कानून बनाया जाए। पूर्व राष्ट्रपति डॉ० के०आर० नारायणन ने भी कहा था कि, “आपराधिक पृष्ठभूमि और माफिया से संबंध रखने वाले लोगों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए कानून बनाया जाए।” अतः ऐसी प्रवृत्ति पर अंकुश आवश्यक है।

11. अन्य प्रयास (Other Efforts):
भारतीय चुनाव-प्रणाली में सुधार किए जाने का सिलसिला जारी है। इस संबंध में तारकुंडे समिति, गोस्वामी समिति तथा चुनाव आयुक्त आर०के० द्विवेदी ने कुछ सुझाव दिए। इसके अतिरिक्त 23 जुलाई, 1996 को चनाव आयोग और राजनीतिक दलों की एक बैठक हुई, जिसमें कछ सधारों पर विचार किया गया तथा कछ सुधारों पर सहमा हो गई।

इस बैठक में कुछ निर्णय लिए गए और चुनाव संशोधन किए गए। जन-प्रतिनिधि अधिनियम (The Representation of the People Act) में संशोधन किया गया है। इस संशोधन को राष्ट्रपति ने 1 अगस्त, 1996 को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है। कुछ मुख्य संशोधन निम्नलिखित प्रकार से हैं-

(1) इस चुनाव सुधार संशोधन द्वारा चुनाव प्रचार का समय 21 दिन से घटाकर 14 दिन कर दिया गया है। उम्मीदवारों के लिए जमानत की राशि बढ़ा दी गई है,

(2) लोकसभा के उम्मीदवार के लिए जमानत की राशि बढ़ाकर 25,000 रुपए और विधानसभा के उम्मीदवार के लिए 10,000 रुपए कर दी गई है। आरक्षित लोकसभा चुनाव क्षेत्र के लिए जमानत की राशि 12,500 रुपए तथा विधानसभा चुनाव क्षेत्र के लिए 5,000 रुपए निश्चित की गई है,

(3) इसके साथ ही अरुचिकर उम्मीदवारों (Non-serious Candidates) की संख्या कम करने के लिए नाम पेश करने वालों की संख्या बढ़ाकर 10 कर दी गई है,

(4) चुनाव अधिकारियों या चुनाव पर्यवेक्षकों को मतदान केंद्र के कब्जे के मामले में गिनती रोकने के अधिकार दे दिए गए हैं,

(5) नए कानून के अधीन चुनाव से 48 घंटे पहले शराब के बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है तथा मत के पास शस्त्र लेकर घूमना अपराध घोषित कर दिया गया है।

12. चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए नए दिशा-निर्देश (New Guidelines issued by the Election Commission):
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आधार पर 1 अप्रैल, 2003 को चुनाव आयोग ने एक आदेश जारी किया है जिसके अनुसार संसद तथा विधानसभाओं के चुनावों में उम्मीदवार को नामांकन-पत्र के साथ एक हलफ़नामा (Affidavit) देना जरूरी होगा जिसमें उसे अपने क्रिमिनल बैकग्राऊंड (Criminal Background) का भी उल्लेख करना होगा।

नामांकन-पत्र के साथ ही उसे अपनी सम्पत्ति और देनदारी तथा शैक्षिक योग्यता की जानकारी भी हलफनामे में देनी होगी। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई उम्मीदवार नामांकन के समय यह जानकारी हलफनामे में नहीं देगा तो यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन माना जाएगा और चुनाव अधिकारी को जांच के समय उस नामांकन-पत्र को रद्द करने का अधिकार होगा।

आयोग ने यह भी कहा कि प्रत्येक उम्मीदवार को यह शपथ-पत्र प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट, नोटरी पब्लिक (Notary Public) अथवा शपथ आयुक्त (Oath Commissioner) के समक्ष विधिवत शपथ लेकर प्रस्तुत करना होगा।

13. निर्वाचन एवं अन्य सम्बन्धित अधिनियम (संशोधन) विधेयक, 2003 (Election and Other Related Laws Amendment Bill, 2003)-राजनीतिक दलों द्वारा चन्दा लिए जाने की प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं को भी अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से निर्वाचन एवं अन्य सम्बन्धित अधिनियम संशोधन विधेयक, 2003 (Election and Other Related laws Amendment Bill, 2003) को संसद के दोनों सदनों ने पारित कर दिया है। वरिष्ठ काँग्रेसी नेता प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति की सिफारिशों को विधेयक में समाहित कर लिया गया। विधेयक के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं-

(1) राजनीतिक दलों के लिए 20 हजार रुपए या अधिक राशि के चन्दों की रिपोर्टिंग अनिवार्य (अभी यह सीमा 10 हजार रुपए थी),

(2) रिपोर्टिंग न करने वाले दलों को इन राशियों पर आयकर में छूट नहीं होगी,

(3) राजनीतिक दलों को प्रदत्त चन्दे पर सम्बन्धित कंपनी को आयकर अधिनियम के तहत छूट। लाभांश का अधिकतम 5 प्रतिशत ही चन्दे के रूप में देने की अनुमति होगी,

(4) मतदाताओं व मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को कुछेक सामग्री चुनाव आयोग द्वारा उपलब्ध कराने का प्रावधान। दूसरे शब्दों में, चुनावों के आंशिक सरकारी वित्तीय सहायता की शुरुआत।

प्रश्न 7.
वयस्क मताधिकार प्रणाली के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
वयस्क मताधिकार से तात्पर्य मतदान करने की ऐसी व्यवस्था से हैं जिसमें प्रत्येक नागरिक को, बिना किसी प्रकार के भेदभाव के, एक निश्चित आयु पूरी करने पर मतदान का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस प्रणाली में शिक्षा, लिंग, सम्पत्ति, जन्म-स्थान अथवा अन्य आधार पर नागरिकों में भेदभाव नहीं किया जा सकता। केवल पागल, दिवालिए तथा कुछ विशेष प्रकार के अपराधी व विदेशियों को ही मतदान के अधिकार से वंचित किया जाता है। संसार के विभिन्न देशों में वयस्क होने की आयु भिन्न-भिन्न है। भारत, अमेरिका तथा इंग्लैण्ड में यह 18 वर्ष, नार्वे में 23 वर्ष तथा जापान में यह 25 वर्ष है। वयस्क मताधिकार के पक्ष तथा विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

पक्ष में तर्क (Arguments in Favour)-वयस्क मताधिकार के पक्ष में प्रायः निम्नलिखित तर्क पेश किए जाते हैं

1. लोक प्रभुसत्ता के सिद्धान्त के अनुकूल (In Harmony with the Principle of Popular Sovereignty):
लोक प्रभुसत्ता का अर्थ है कि सर्वोच्च शक्ति जनता में निहित है। लोकतन्त्र तब तक वास्तविक लोकतन्त्र नहीं हो सकता जब तक कि प्रतिनिधियों के चुनाव में प्रत्येक नागरिक का योगदान न हो। अतः प्रतिनिधियों का चुनाव सामान्य जनता द्वारा किया जाना चाहिए।

2. यह समानता पर आधारित है (It is based on Equality):
लोकतन्त्र का मुख्य आधार है-समानता। सभी व्यक्ति समान हैं और विकास के लिए सभी को मताधिकार देना भी आवश्यक है। जिन नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं होता, उनके हितों तथा अधिकारों की सरकार तनिक भी परवाह नहीं करती। इसलिए प्रत्येक वयस्क को मत देने का अधिकार होना चाहिए।

3. कानूनों का प्रभाव सभी पर पड़ता है (Laws AffectAll):
राज्य के कानूनों तथा नीतियों का प्रभाव सभी व्यक्तियों पर पड़ता है। उसे निश्चित करने में भी सबका भाग होना चाहिए।

4. नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है (Citizens get Political Education):
वयस्क मताधिकार होने से सभी नागरिक समय-समय पर देश में होने वाले चुनावों में भाग लेते रहते हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता अपने दल की नीति का लोगों में प्रचार करते हैं और देश की समस्याओं के बारे में उनको जानकारी देते रहते हैं। इससे नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है।

5. सभी के अधिकार सुरक्षित रहते हैं (Rights of all are Safeguarded):
वयस्क मताधिकार प्रणाली में देश के सभी नागरिकों के लिए अपने अधिकारों की रक्षा करना सम्भव होता है। मतदाता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं तथा उन पर नियन्त्रण बनाए रखते हैं। सरकार नागरिकों के भय से उनके अधिकारों को छीन नहीं सकती।

6. यह स्वाभिमान जागृत करती है (It awakens Self-respect):
वयस्क मताधिकार नागरिकों में स्वाभिमान की भावना को जागृत करता है। जब बड़े-बड़े नेता उनके पास वोट माँगने के लिए आते हैं तो उन्हें अपनी वास्तविक शक्ति का ज्ञान होता है और उनकी सोई हुई आत्मा जागती है। उन्हें इस बात का अनुभव होता है कि देश के शासन में उनका भी योगदान है। इससे उनके मन में स्वाभिमान की भावना जागृत होती है।

7. सार्वजनिक कार्यों में रुचि उत्पन्न करती है (It creates Interest in Public Matters):
वयस्क मताधिकार प्रणाली नागरिकों में सार्वजनिक कार्यों में रुचि उत्पन्न करती है। उन्हें यह अनुभव होता है कि शासन में उनका भी कुछ हाथ है और वे भी देश के कानून तथा नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। वे राष्ट्रहितों के कार्यों का समर्थन करते हैं तथा राष्ट्र-विरोधी कार्यों का विरोध करते हैं। इससे नागरिकों में राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्र-प्रेम की भावना जागृत होती है।

8. अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा (Protection of the Interests of the Minorities):
यह एक ऐसी प्रणाली है जिसमें अल्पसंख्यकों को भी अपने प्रतिनिधि भेजने का अवसर मिल जाता है। उनके द्वारा वे अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं।

9. धन का प्रभाव बहुत कम होता है (Less Influence of Money):
इस प्रणाली में सभी वयस्क नागरिकों को मतदान करने का अधिकार होता है, मतों का खरीदना सम्भव नहीं होता। इस प्रकार यह प्रणाली चुनाव में धन के प्रभाव को बहुत कम कर देती है।

10. क्रांति की कम सम्भावना (Less Chance of Revolution):
वयस्क मताधिकार प्रणाली में शांति तथा व्यवस्था की स्थापना की सम्भावना अधिक रहती है क्योंकि नागरिक अपने द्वारा चुनी गई सरकार के विरुद्ध क्रांति नहीं करते।

11. सार्वजनिक हित की दृष्टि से वांछनीय (Necessary for Welfare of All):
लोकतन्त्र का शुद्ध रूप वही होता है जिसमें सार्वजनिक हित की कामना की जाती है। सब वर्गों के हितों और उनके अधिकारों का उचित संरक्षण तभी हो सकता है, जब प्रत्येक वर्ग के लोगों को अपने मत द्वारा शासन की नीतियों और उसके कार्यों को प्रभावित करने का अवसर प्राप्त हो। ऐसा अवसर अधिक-से-अधिक वर्गों को केवल वयस्क मताधिकार द्वारा ही प्राप्त करवाया जा सकता है। अतः वयस्क मताधिकार वर्ग हित की दृष्टि से वांछनीय है।

12. इससे राष्ट्रीय एकता में वृद्धि होती है (It Increases National Unity):”
प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के मताधिकार देने से राष्ट्रीय एकता में वृद्धि होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में कोई भी व्यक्ति अपने-आप को सर्वश्रेष्ठ नहीं समझता, क्योंकि सब व्यक्तियों को जीवन का विकास करने के लिए समान अवसर प्राप्त होते हैं।

यदि किसी एक विशेष वर्ग या जाति को मताधिकार दिया जाए तो राष्ट्रीय एकता के नष्ट होने की सम्भावना हो सकती है। राष्ट्रीय एकता के साथ-साथ यह नागरिकों में देश-प्रेम की भावना को भी जागृत करता है क्योंकि प्रत्येक नागरिक स्वयं को सरकार का अंग समझता है और उसके मन में अपने देश के प्रति सम्मान पैदा होता है।

विपक्ष में तर्क (Arguments Against)-वयस्क मताधिकार के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए गए हैं

1. अशिक्षित व्यक्तियों को मताधिकार देना अनुचित है (It is not proper to give Right to Vote to the Ignorants):
प्रत्येक देश में अधिकतर जनता अशिक्षित तथा अज्ञानी होती है। वे उम्मीदवार के गुणों को न देखकर जाति, धर्म तथा मित्रता आदि के आधार पर अपने मत का प्रयोग करते हैं। ऐसे व्यक्ति राजनीतिक नेताओं के जोशीले भाषणों से भी शीघ्र प्रभावित हो जाते हैं। अतः अशिक्षित व्यक्तियों को मताधिकार देना उचित नहीं है।

2. भ्रष्टाचार को बढ़ावा (Encourages Corruption):
वयस्क मताधिकार प्रणाली में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। कुछ निर्धन व्यक्ति थोड़े-से लालच में पड़कर अपना मत स्वार्थी तथा भ्रष्टाचारी उम्मीदवारों के हाथों में बेच देते हैं।

3. प्रशासन तथा देश की समस्याएँ जटिल (Administration and Problems of the Country are Complicated):
आधुनिक युग में शासन संबंधी प्रश्न तथा समस्याएँ दिन-प्रतिदिन जटिल होती जा रही हैं, जिन्हें समझ पाना साधारण व्यक्ति के बस की बात नहीं है। प्रायः साधारण मतदाता अयोग्य व्यक्ति को चुन लेते हैं क्योंकि उनके पास देश की समस्याओं पर विचार करने तथा उन्हें समझने के लिए समय ही नहीं होता।

4. साधारण जनता रूढ़िवादी होती है (Masses are Conservative):
वयस्क मताधिकार के विरुद्ध एक तर्क यह प्रस्तुत किया जाता है कि साधारण जनता रूढ़िवादी होती है। उनके द्वारा आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्र में प्रगतिशील नीतियों का विरोध किया जाता है। अतः मताधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों को ही मिलना चाहिए जो इसका उचित प्रयोग करने की योग्यता रखते हों।

5. मताधिकार प्राकृतिक अधिकार नहीं है (Right to Vote is not a Natural Right):”
वयस्क मताधिकार के आलोचकों द्वारा यह तर्क पेश किया जाता है कि मताधिकार कोई प्राकृतिक अधिकार नहीं है जो प्रत्येक नागरिक को प्राप्त होना चाहिए। उनके अनुसार मताधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों को ही दिए जाने चाहिएँ जो उनका उचित प्रयोग करने की योग्यता रखते हैं। मताधिकार के बारे में तो यह बात और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह एक ऐसा अधिकार है जो देश के भविष्य को उज्ज्वल भी बना सकता है और मिट्टी में भी मिला सकता है। अतः मताधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों को दिया जाना चाहिए, जो इसके योग्य हों।

6. सभी नागरिक समान नहीं होते (AIICitizens are not Equal):
वयस्क मताधिकार के विरुद्ध एक तर्क यह दिया जाता है कि सभी नागरिक किसी भी दृष्टि से समान नहीं होते, इसलिए उन सभी को समानता के आधार पर मतदान का अधिकार देना उचित नहीं है।

प्रश्न 8.
भारत के चुनाव आयोग (Election Commission) पर नोट लिखें।
उत्तर:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव व्यवस्था के अधीक्षण, निर्देशन एवं नियन्त्रण का कार्य भारत में संवैधानिक मान्यता प्राप्त, स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव आयोग को सौंपा है जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। संविधान के अनुच्छेद 324 में यह भी प्रावधान है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की सलाह के लिए राष्ट्रपति द्वारा अन्य आयुक्तों की नियुक्ति की जा सकती है।

भारत में 1951 में पहली बार संविधान के अन्तर्गत एक सदस्यीय निर्वाचन आयोग का गठन किया गया, परन्तु केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने 16 अक्तूबर, 1989 को राष्ट्रपति वेंकटरमन द्वारा अन्य चुनाव और प्रतिनिधित्व दो निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करवाते हुए निर्वाचन आयोग को पहली बार बहु-सदस्यीय आयोग बनाते हुए इसे व्यापक स्वरूप प्रदान किया, लेकिन 2 जनवरी, 1990 को राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार ने चुनाव आयोग को फिर से एक-सदस्यीय बना दिया।

2 अक्तूबर, 1993. में भारत के राष्ट्रपति ने अध्यादेश जारी करके चुनाव आयोग में दो अन्य सदस्यों (एम०एस० गिल एवं जी०वी०जी० कृष्णामूर्ति) की नियुक्ति कर दी। 20 दिसम्बर, 1993 में संसद ने एक विधेयक पास करके चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय बना दिया और दो अन्य आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बराबर दर्जा प्रदान किया गया।

14 जुलाई, 1995 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में अन्य दो आयुक्तों की स्थिति को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की स्थिति के बराबर दर्जा देने को वैध ठहराया। अतः इस समय चुनाव आयोग बहु-सदस्यीय है और मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य दो चुनाव आयुक्तों की स्थिति बराबर है। इस समय चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री सुशील चंद्रा हैं। इसके अतिरिक्त दो अन्य चुनाव आयुक्त हैं।

नियुक्ति (Appointment)-संविधान के अनुच्छेद 324 (2) के अनुसार चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति एवं संसद द्वारा निर्धारित विधि के अनुसार की जाती है। प्रान्तीय व क्षेत्रीय चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति द्वारा ही की जाती है।

योग्यताएँ (Qualifications) भारतीय संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों की नियुक्ति सम्बन्धी योग्यताओं का संविधान में कोई उल्लेख नहीं किया गया है अर्थात् इस सम्बन्ध में हमारा संविधान मौन है।

कार्यकाल (Term)-भारतीय संसद ने सन् 1995 में चुनाव आयोग के कार्यकाल सम्बन्धी एक कानून पास किया है, जिसके अनुसार चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष होगा। इस कानून में यह भी व्यवस्था की गई है कि यदि चुनाव आयुक्त की आयु 6 वर्ष की अवधि से पहले 65 वर्ष की हो जाती है, तो वह अपने पद से अवकाश ग्रहण कर लेता है अर्थात् 6 वर्ष की अवधि या 65 वर्ष की आयु दोनों में से जो पहले पूरी हो, तब तक चुनाव आयुक्त अपने पद पर बने रहते हैं। विशेष परिस्थितियों में मुख्य चुनाव आयुक्तों की अवधि को बढ़ाया जा सकता है, जैसा कि श्री सुकुमार सेन व श्री एस०पी० सेन वर्मा का कार्यकाल 6 वर्ष से अधिक बढ़ाया गया था।

चुनाव आयुक्तों को पदच्युत करना (Removal of Election Commissioners) भारतीय संविधान में चुनाव आयुक्तों को पद से हटाने की व्यवस्था भी की गई है। संविधान के अनुच्छेद 324 (5) के अनुसार चुनाव आयुक्तों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की विधि द्वारा ही हटाया जा सकता है अर्थात् चुनाव आयुक्तों को उनके पद से हटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाए जाने की विधि को ही अपनाया गया है।

इसका अभिप्राय यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्तों को तभी हटाया जा सकता है, जब संसद के दोनों सदन अलग-अलग अपने कुल सदस्यों के बहुमत से तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से महाभियोग को पारित कर दें। अन्य चुनाव आयुक्तों या क्षेत्रीय चुनाव आयुक्तों को तो राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त की सलाह से ही उनके पद से हटाता है अर्थात् मुख्य चुनाव की मंजूरी के बिना चुनाव आयुक्तों या क्षेत्रीय चुनाव आयुक्तों को उनके पद से हटाया नहीं जा सकता।

सन् 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त श्री एन० गोपालास्वामी द्वारा चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पक्षपात करने के आधार पर पद से हटाने की सिफारिश की गई थी, परन्तु डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा इसे स्वीकार नहीं किया गया और उसने राष्ट्रपति को इसके लिए कोई सलाह नहीं भेजी। इसके बावजूद श्री नवीन चावला को नया मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया गया था।

वेतन तथा सेवा शर्ते (Salary and Terms of Service)-चुनाव आयुक्तों के वेतन, भत्ते व सेवा शर्ते समय-समय पर संसद द्वारा निश्चित की जाती हैं। इनके वेतन व भत्ते भारत सरकार की संचित निधि में से दिए जाते हैं। निर्वाचन आयुक्तों के वेतन, भत्तों व सेवा शर्तों में इनके कार्यकाल में कटौती नहीं की जा सकती। 1 अक्तूबर, 1993 में संसद द्वारा पास किए गए एक विधेयक द्वारा चुनाव आयुक्तों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन के समान वेतन दिए जाने की व्यवस्था कर दी गई अर्थात् वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों को 2,50,000 रुपए मासिक वेतन दिया जाता है।

चुनाव आयोग के लिए कर्मचारी (Staff for Election Commission) संविधान के अनुच्छेद 324 (6) के अनुसार चुनाव आयोग अपने कार्यों को पूरा करने के लिए राष्ट्रपति एवं राज्यों के मुखिया राज्यपालों से आवश्यकतानुसार कर्मचारियों की माँग कर सकता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति तथा राज्यपालों का यह कर्त्तव्य है कि वे चुनाव आयुक्तों व क्षेत्रीय आयुक्तों की प्रार्थना पर

उचित स्टाफ का प्रबन्ध करें। चुनाव आयोग को अपने दायित्व का पालन करने के लिए राज्य व जिला स्तर पर बहुत-से कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। मतदान केन्द्रों के लिए प्रधान पदाधिकारी (Presiding Officers) व पोलिंग अधिकारी (Polling Officers) चाहिए। इसके अतिरिक्त मतदान केन्द्रों की सुरक्षा एवं व्यवस्थित रूप से संचालन के लिए आवश्यक पुलिस बल चाहिए। अतः केन्द्र में राष्ट्रपति तथा राज्यों में राज्यपाल का कर्त्तव्य है कि चुनाव आयोग की सिफारिश पर आवश्यकतानुसार सुविधाएँ जुटाई जाएँ।

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

प्रश्न 9.
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से आप क्या समझते हैं? इसके पक्ष तथा विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व का अर्थ (Meaning of Territorial Representation)-लोकतन्त्रीय राज्यों में चुनाव के लिए निर्वाचन-क्षेत्रों का गठन भौगोलिक आधार पर किया जाता है। समस्त राज्य को एक-सदस्य अथवा बहु-सदस्य निर्वाचन-क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। एक चुनाव-क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों को उस चुनाव-क्षेत्र का निवासी होने के नाते अपने प्रतिनिधि चुनने के अधिकार को ही प्रादेशिक प्रतिनिधित्व कहा जाता है।

संक्षेप में, सामान्य प्रतिनिधियों का निर्वाचन जब प्रादेशिक आधार पर हो, तो उस प्रणाली को प्रादेशिक प्रतिनिधित्व कहा जाता है। भारत, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका आदि राज्यों में इसी प्रणाली को लागू किया गया है। प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के गुण अथवा पक्ष में तर्क (Arguments in Favour of Territorial Representation) प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए गए हैं

1. सरल चुनाव-प्रणाली (Simple Electoral System):
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि यह प्रणाली अति सरल है। इस प्रणाली में मतदाताओं की सूचियाँ बड़ी सरलता से तैयार की जाती हैं और प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र की एक मतदाता सूची होती है। एक चुनाव-क्षेत्र में कई उम्मीदवार खड़े होते हैं, मतदाता को किसी एक उम्मीदवार को मत डालना होता है और जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं, उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। साधारण जनता के लिए भी इस प्रणाली को समझना आसान होता है।

2. लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों पर आधारित (Based on Democratic Principles):
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों पर आधारित है। लोकतन्त्र का मुख्य सिद्धान्त यह है कि सभी व्यक्ति समान हैं तथा उनमें जाति, धर्म, रंग तथा लिंग आदि किसी भी आधार पर कोई भेदभाव न किया जाए। इस प्रणाली में एक निर्वाचन-क्षेत्र में रहने वाले सभी मतदाता समानता के आधार पर अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं। वह प्रतिनिधि अपने निर्वाचन-क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।

3. राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा (Promotes National Unity):
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलता है। देश के विधानमण्डल में समस्त राष्ट्र के प्रतिनिधि होते हैं न कि विभिन्न वर्गों या व्यवसायों के। ऐसे प्रतिनिधि अपने-आपको किसी वर्ग अथवा व्यवसाय का प्रतिनिधि न मानकर समस्त राष्ट्र का प्रतिनिधि मानते हैं और राष्ट्रीय हितों को प्रधानता देते हैं। इसका प्रभाव जनता पर भी पड़ता है। उनका दृष्टिकोण भी राष्ट्रीय बनता है तथा राष्ट्रीय एकता में वृद्धि होती है।

4. प्रतिनिधियों तथा मतदाताओं में निकटता का संबंध (Close Relation between Representatives and Voters):
प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्र प्रायः छोटे होते हैं और एक निर्वाचन-क्षेत्र से प्रायः एक ही सदस्य चुना जाता है, जिससे मतदाताओं और प्रतिनिधियों में निकटता का संबंध स्थापित होने की अधिक सम्भावना रहती है। प्रतिनिधि प्रायः उसी निर्वाचन-क्षेत्र का निवासी होता है, जिस क्षेत्र का वह प्रतिनिधित्व कर रहा होता है।

मतदाता और प्रतिनिधि प्रायः एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते होते हैं। अतः प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के मतदाताओं की इच्छाओं और आवश्यकताओं को अच्छी तरह समझता है और उन्हें पूरा करने के लिए प्रयास करता है।

5. प्रतिनिधियों का उत्तरदायित्व (Fixed Responsibility):
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होता है। एक क्षेत्र के सभी मतदाताओं का प्रतिनिधि होने के कारण वह अपने उत्तरदायित्व से इन्कार नहीं कर सकता।

6. क्षेत्रीय हितों की रक्षा (Safeguards Territorial Interests):
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में क्षेत्रीय हितों की अच्छी तरह पूर्ति होती है। प्रतिनिधि अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं को अच्छी तरह समझते हैं क्योंकि उनका अपने मतदाताओं व क्षेत्र से समीप का संबंध होता है। अतः प्रतिनिधि अपने निर्वाचन-क्षेत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भरसक प्रयत्न करते हैं। यदि प्रतिनिधि अपने मतदाताओं के हितों की रक्षा नहीं करता, तो ऐसे प्रतिनिधि को मतदाता दोबारा नहीं चुनते। इसलिए प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के हितों की उपेक्षा नहीं कर सकता।

7. अधिक विकास की सम्भावना (Possibility of Greater Development):
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में अधिक विकास की सम्भावना बनी रहती है। इसका कारण यह है कि इस प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक प्रतिनिधि अपने क्षेत्र का अधिक-से-अधिक विकास करना चाहता है क्योंकि भावी चुनाव में वह अपनी सीट को सुनिश्चित कर लेना चाहता है। सभी क्षेत्रों के विकास से देश का विकास होना स्वाभाविक है।

8. कम खर्चीली (Less Expensive):
इस प्रणाली में चुनाव कम खर्चीला होता है और उम्मीदवार को भी चुनाव में कम खर्च करना पड़ता है। क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व प्रणाली के दोष अथवा विपक्ष में तर्क (DemeritsArguments against of Territorial Representation) कई विद्वानों ने क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व प्रणाली की कड़ी आलोचना की है। ड्यूगी (Duguit), जी०डी०एच० कोल (GD.H. Cole) और ग्राहम वालास (Graham Wallas) ने इस प्रणाली की कटु आलोचना की है। इस प्रणाली में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं

1. क्षेत्रीयवाद की भावना (Feeling of Regionalism):
इस प्रणाली द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है। प्रतिनिधि अपने को एक क्षेत्र विशेष का प्रतिनिधि समझने लगते हैं और उसी क्षेत्र के विकास की बात सोचते तथा करते हैं और उसके लिए प्रयत्नशील रहते हैं। इससे राष्ट्रीय हितों की अवहेलना होने लगती है।

2. सीमित पसन्द (Limited Choice):
कई बार मतदाताओं की पसन्द सीमित हो जाती है क्योंकि चुनाव लड़ने वाले प्रायः उसी क्षेत्र के निवासी होते हैं और यदि उस क्षेत्र में अच्छे उम्मीदवार न हों तो मतदाताओं को इच्छा न होते हुए भी किसी-न-किसी उम्मीदवार के पक्ष में मत डालना ही पड़ता है।

3. भ्रष्ट होना (Corruption):
मतदाताओं को भ्रष्ट किए जाने की सम्भावना रहती है क्योंकि मतदाता कम होते हैं और धनी उम्मीदवार धन के बल पर वोट खरीदने का प्रयत्न करने लगते हैं।

4. अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व न मिलना (Minorities fail to get proper Representation):
इस प्रणाली में अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व आसानी से नहीं मिलता। एक क्षेत्र से एक उम्मीदवार चना जाता है और स्वाभाविक है कि बहमत वर्ग का उम्मीदवार ही चुना जाता है। इस प्रकार अल्पसंख्यक वर्ग के प्रतिनिधि लगभग सभी चुनाव क्षेत्रों में हार जाते हैं।

वस्तु निष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दिए गए विकल्पों में से उचित विकल्प छाँटकर लिखें

1. निम्न में से कौन-सा अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली का गुण है?
(A) यह अधिक लोकतांत्रिक है
(B) खर्च अधिक होता है।
(C) केवल योग्य तथा बुद्धिमान व्यक्तियों को चुना जाता है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) केवल योग्य तथा बुद्धिमान व्यक्तियों को चुना जाता है

2. भारत में अपनाई गई है
(A) वयस्क मताधिकार प्रणाली
(B) धर्म पर आधारित मत प्रणाली
(C) शिक्षा पर आधारित मत प्रणाली
(D) जाति के आधार पर मत प्रणाली
उत्तर:
(A) वयस्क मताधिकार प्रणाली

3. भारत में निम्न का चुनाव प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली द्वारा किया जाता है
(A) राष्ट्रपति
(B) उप-राष्ट्रपति
(C) राज्यपाल
(D) लोकसभा के सदस्य
उत्तर:
(D) लोकसभा के सदस्य

4. वह चुनाव-प्रणाली जिसमें साधारण मतदाता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं, कहलाती है
(A) प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली
(B) अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली
(C) सीमित मत प्रणाली
(D) सूची प्रणाली
उत्तर:
(A) प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली

5. वयस्क मताधिकार प्रणाली में मतदान के अधिकार का आधार होता है
(A) शिक्षा
(B) संपत्ति
(C) आयु
(D) व्यवसाय
उत्तर:
(C) आयु

6. भारत की चुनाव-प्रणाली की विशेषता है
(A) वयस्क मताधिकार
(B) एक-सदस्य निर्वाचन क्षेत्र
(C) सीटों का आरक्षण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

7. निम्न वयस्क मताधिकार का अवगुण है
(A) राजनीतिक शिक्षा मिलती है
(B) भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है
(C) इस प्रणाली में महिलाओं को भी मतदान का
(D) इस प्रणाली में गरीबों को भी मतदान का अधिकार अधिकार होता है होता है।
उत्तर:
(B) भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है

8. भारत में मतदान के लिए न्यूनतम आयु निश्चित की गई है
(A) 18 वर्ष
(B) 21 वर्ष
(C) 25 वर्ष
(D) 20 वर्ष
उत्तर:
(A) 18 वर्ष

9. निम्न वयस्क मताधिकार का गुण है
(A) यह समानता पर आधारित है ।
(B) नागरिकों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है
(C) सभी के अधिकार सुरक्षित रहते हैं
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

10. भारत में लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु होनी चाहिए
(A) 21 वर्ष
(B) 30 वर्ष
(C) 18 वर्ष
(D) 25 वर्ष
उत्तर:
(D) 25 वर्ष

11. निम्न में से कौन-सा प्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली का गुण है?
(A) अधिक लोकतांत्रिक है
(B) योग्य तथा बुद्धिमान व्यक्तियों का चुनाव
(C) खर्च कम होता है
(D) राजनीतिक दलों का प्रभाव कम होता है।
उत्तर:
(A) अधिक लोकतांत्रिक है

12. भारत में निम्न का चुनाव अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली से किया जाता है
(A) लोकसभा के सदस्य
(B) राज्य विधानसभा के सदस्य
(C) राष्ट्रपति
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) राष्ट्रपति

13. भारत में पहला आम चनाव निम्न वर्ष में हआ था
(A) सन् 1947
(B) सन् 1950
(C) सन् 1952
(D) सन् 1955
उत्तर:
(C) सन् 1952

14. निम्न प्रादेशिक प्रतिनिधित्व का गुण है
(A) सरल चुनावे-प्रणाली
(B) मतदाताओं की सीमित पसंद
(C) अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) सरल चुनाव-प्रणाली

15. देश में चुनाव करवाने संबंधी निर्णय लेने का अधिकार है
(A) राष्ट्रपति के पास
(B) प्रधानमंत्री के पास
(C) चुनाव आयोग के पास
(D) उप-राष्ट्रपति के पास
उत्तर:
(C) चुनाव आयोग के पास

16. चुनाव आयोग में आजकल कितने सदस्य (मुख्य चुनाव आयुक्त सहित) हैं
(A) 4
(B) 3
(C) 2
(D) 5
उत्तर:
(B) 3

17. निम्न चुनाव आयोग का कार्य नहीं है
(A) चुनाव कराना
(B) राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना
(C) मतदाता सूचियाँ तैयार करना
(D) चुनाव के लिए उम्मीदवार खड़े करना
उत्तर:
(D) चुनाव के लिए उम्मीदवार खड़े करना

HBSE 11th Class Political Science Important Questions Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व

18. भारत में सांप्रदायिक चुनाव-प्रणाली निम्न वर्ष में लागू हुई
(A) सन् 1906
(B) सन् 1909
(C) सन् 1935
(D) सन् 1952
उत्तर:
(B) सन् 1909

19. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को मासिक वेतन मिलता है
(A) 1,50,000
(B) 2,00,000
(C) 1,00,000
(D) 2,50,000
उत्तर:
(D) 2,50,000

20. आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एक शर्त है
(A) एक-सदस्य निर्वाचन-क्षेत्र
(B) बहु-सदस्य निर्वाचन-क्षेत्र
(C) शहरी निर्वाचन-क्षेत्र
(D) ग्रामीण निर्वाचन-क्षेत्र
उत्तर:
(B) बहु-सदस्य निर्वाचन-क्षेत्र

21. भारत में अब तक लोकसभा के कितने चुनाव हो चुके हैं?
(A) 10
(B) 12
(C) 15
(D) 17
उत्तर:
(D) 17

22. भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त हैं
(A) श्री नवीन चावला
(B) हरिशंकर ब्रह्मा
(C) श्री सुशील चंद्रा
(D) श्री ओमप्रकाश रावत
उत्तर:
(C) श्री सुशील चंद्रा

23. निम्न भारतीय चुनाव-प्रणाली का दोष है
(A) चुनावों में धन की बढ़ती हुई भूमिका
(B) सरकारी तंत्र का दुरुपयोग
(C) जाति तथा धर्म के नाम पर मतदान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. निम्न निर्वाचन आयोग का कार्य है
(A) चुनावों का प्रबंध करना
(B) मतदाता सूचियां तैयार करना
(C) चुनाव तिथि की घोषणा करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द में दें

1. 17वीं लोकसभा के चुनाव कब हुए?
उत्तर:
अप्रैल-मई, 2019 में।

2. 17वीं लोकसभा चुनाव में कितनी महिला सांसद निर्वाचित हुईं?
उत्तर:
78 महिलाएँ।

3. 17वीं लोकसभा चुनाव में मतदाताओं की कुल संख्या कितनी थी?
उत्तर:
लगभग 89.78 करोड़।

4. 17वीं लोकसभा चुनाव में कुल मतदान प्रतिशत कितना रहा?
उत्तर:
67.11 प्रतिशत।

5. 17वीं लोकसभा चुनाव के बाद महिला सांसदों का प्रतिशत कितना हो गया?
उत्तर:
17वीं लोकसभा चुनाव के बाद महिला सांसदों का 14.4 प्रतिशत हो गया है।

6. 17वीं लोकसभा में सर्वाधिक महिला सांसद किस राजनीतिक दल से हैं एवं कितनी हैं?
उत्तर:
सर्वाधिक महिला सांसद भाजपा से हैं जिनकी संख्या 42 है।

7. वर्तमान में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त कौन हैं?
उत्तर:
श्री सुशील चंद्रा।

8. मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों को कितना मासिक वेतन मिलता है?
उत्तर:
2,50,000 रुपए मासिक।

9. भारत में मतदान के अधिकार के लिए न्यूनतम आयु कितनी निश्चित की गई है?
उत्तर:
18 वर्ष।

रिक्त स्थान भरें

1. भारत में अब तक ……………. लोकसभा के चुनाव सम्पन्न हो चुके है।
उत्तर:
17

2. ……… को भारत में 17वीं लोकसभा के चुनाव सम्पन्न हुए।
उत्तर:
अप्रैल-मई, 2019

3. ………… भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त हैं।
उत्तर:
श्री सुशील चंद्रा

4. भारत में 61वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार मताधिकार की आयु वर्ष निचित की गई।
उत्तर:
18

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5. भारत में प्रथम आम चुनाव सन् ……………. में हुआ।
उत्तर:
1952

6. भारतीय चुनाव आयोग में कुल …………… सदस्य हैं।
उत्तर:
3

7. 17वीं लोकसभा चुनाव में …………… प्रतिशत मतदान हुआ।
उत्तर:
67.11

8. 16वीं लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के नए विकल्प के रूप ……………. का प्रयोग प्रारम्भ हुआ था।
उत्तर:
नोटा (Nota)

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