HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

HBSE 12th Class History महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
महात्मा गाँधी ने खुद को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए क्या किया?
उत्तर:
गाँधी जी ने स्वयं को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए अनेक बातें अपने जीवन में अपनाईं-सर्वप्रथम सामान्य जन की दशा को जानने के लिए 1915 में (अफ्रीका से आगे के बाद) सारे देश का भ्रमण किया। उन्होंने भारत में अपना सार्वजनिक फरवरी, 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में दिया। इस भाषण से स्पष्ट होता है कि वे आम जनता से जुड़ना चाहते थे। समारोह में बोलते हुए उन्होंने भारत के गरीबों, किसानों, मजदूरों की ओर ध्यान न देने पर भारतीय धनी और विशिष्ट वर्ग को लताड़ा। उन्होंने समारोह में धनी और सजे-सँवरे भद्रजनों की उपस्थिति और गरीब भारतीयों की अनुपस्थिति को लेकर चिंता प्रकट की।

गाँधी जी ने कहा कि, “हमारे लिए स्वशासन का तब तक कोई अभिप्राय नहीं है जब तक हम किसानों से उनके श्रम का लगभग संपूर्ण लाभ स्वयं या अन्य लोगों को ले लेने की अनुमति देते रहेंगे। हमारी मुक्ति केवल किसानों के माध्यम से ही हो सकती है। न तो वकील, न डॉक्टर, न जमींदार इसे सुरक्षित रख सकते हैं।” इस प्रकार गाँधी जी ने इस अवसर पर भारत के किसानों और मजदूरों को याद किया। असहयोग आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक जन-आंदोलन बना दिया था। किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने इसमें भाग लेना शुरू कर दिया था। गाँधी जी उनके प्रिय नेता बन गए थे। गाँधी जी के प्रति आदर व्यक्त करते हुए लोग उन्हें अपना ‘महात्मा’ कहने लगे।

गाँधी जी ने अपनी जीवन-शैली में भी बदलाव किया। गाँधी जी आम लोगों की तरह वस्त्र पहनते थे वे उन्हीं की तरह रहते थे। वे जन-सामान्य की भाषा बोलते थे। गाँधी जी दूसरे नेताओं की तरह जनसमूह से अलग खड़े नहीं होते थे, बल्कि वे उनसे गहरी सहानुभूति रखते थे और उनसे घनिष्ठ संबंध भी बनाते थे। उल्लेखनीय है कि 1921 में दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान गाँधी जी ने अपना सिर मुंडवा लिया था और गरीबों के साथ अपना तादात्म्य (Identity) स्थापित करने के लिए सूती वस्त्र पहनने शुरू कर दिए थे। इस प्रकार उनके वस्त्रों से जनता के साथ उनका नाता झलकता था।

प्रश्न 2.
किसान महात्मा गाँधी जी को किस तरह देखते थे?
उत्तर:
भारत कृषि प्रधान देश होने के कारण यहाँ की जनसंख्या के अधिकांश लोग किसान थे। किसानों में असहयोग आंदोलन के बाद गाँधी जी, ‘गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराजा’ अथवा सामान्य ‘महात्मा जी’ जैसे नामों से लोकप्रिय हुए। किसान उन्हें अपने उद्धारक के रूप में देखते थे। किसानों का मानना था कि महात्मा गाँधी उन्हें लगान की कठोर दरों और अंग्रेज़ अधिकारियों के जुल्मों से बचा सकते हैं। वे उनके मान-सम्मान की रक्षा कर सकते हैं और उन्हें उनकी स्वायत्तता दिला सकते हैं।

भारत की गरीब जनता विशेष तौर पर किसान गाँधी जी की सात्विक जीवन-शैली और उनके द्वारा अपनाई गई धोती तथा चरखा जैसी चीजों से अत्यधिक प्रभावित थे। गाँधी जी ने स्वयं एक व्यापारी और पेशे से वकील होने पर भी यह सादी जीवन-शैली अपनाई थी तथा नित्य चरखा कातने जैसे हाथ के काम के प्रति उनका लगाव था। उनमें गरीब श्रमिकों के प्रति गहरी सहानुभूति थी। वे उनके जीवन की दशा को बदलना चाहते थे।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि गरीब लोग भी गाँधी जी में आस्था व सहानुभूति रखते थे व दूसरे नेता गरीबों को कृपा की दृष्टि से देखते थे। गाँधी जी न केवल उनके जैसा दिखते थे, बल्कि वे गरीब किसानों, मजदूरों को अच्छी प्रकार से समझना चाहते थे तथा स्वयं को उनके जीवन के साथ जोड़कर उनका उत्थान करना चाहते थे।

वस्तुतः किसानों में गाँधी जी की जनछवियों में यह मान्यता बन रही थी कि राजा ने उन्हें किसानों के कष्टों को दूर करने तथा उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए भेजा है और उनके पास इतनी शक्ति थी कि वे सभी अधिकारियों के निर्देशों को अस्वीकृत कर सकते थे।

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प्रश्न 3.
नमक कानून स्वतंत्रता संघर्ष का महत्त्वपूर्ण मुद्दा क्यों बन गया था?
उत्तर:
नमक हमारे राष्ट्र की संपदा थी जिस पर विदेशी सरकार ने शोषण करने के लिए एकाधिकार जमा लिया था। यह कानून द्वारा स्थापित एकाधिकार भारतीय जनता के लिए एक अभिशाप के समान था। जन-सामान्य तथा प्रत्येक भारतीय से जुड़े हुए इस कानून को गाँधी जी ने अंग्रेज़ शासन के विरोध प्रतीक के रूप में चुना। शीघ्र ही यह मुद्दा, नमक कानून, स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन गया। . नमक कानून के चुनाव के निम्नलिखित कारण थे

1. यह कानून भारत में सर्वाधिक घृणित कानून था। इसके अनुसार हमारे देश में नमक के उत्पादन और बेचने पर राज्य का एकाधिकार था।

2. भारतीय विशेषतः जन-साधारण इस कानून को घृणा की नजर से देखते थे। प्रत्येक घर में नमक भोजन में अनिवार्य रूप से प्रयोग किया जाता था, परंतु सरकार ने लोगों के घरेलू प्रयोग के लिए भी नमक बनाने पर प्रतिबंध लगा रखा था। इस कारण सभी को ऊँचे मूल्यों पर दुकानों से नमक खरीदना पड़ता था।

3. जहाँ एक ओर सरकार जनता को नमक उत्पादन से रोकती, वहीं नमक अनेक स्थानों पर बिना श्रम के प्राकृतिक रूप से तैयार होता था। उसे सरकार नष्ट कर देती थी। यह एक प्रकार से राष्ट्र की संपत्ति को नष्ट करना था। इस बात से गाँवों के लोग भी परिचित थे।

4. नमक उत्पादन पर राज्य का एकाधिकार लोगों को बहुमूल्य सुलभ ग्राम उद्योग से वंचित करना था।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन के लिए अखबार महत्त्वपूर्ण स्रोत क्यों हैं?
उत्तर:
19वीं सदी के अंत तथा 20वीं सदी के प्रारंभ तक भारत में अनेक भाषाओं में अखबार प्रकाशित होने लगे थे। इनमें से बहुत से समाचार-पत्र अब भी पुस्तकालयों व अभिलेखागारों में सुरक्षित हैं। इन अखबारों में राष्ट्रीय घटनाओं, राष्ट्रीय नेताओं के भाषणों, सरकार की नीतियों तथा जन-सामान्य की दशा पर टिप्पणियाँ और लेख प्रकाशित होते थे। इस रूप में ये अखबार राष्ट्रीय आंदोलन को समझने तथा इसका अध्ययन करने के लिए इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इस संदर्भ में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं

1. इनमें राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी सभी घटनाओं का विवरण मिल जाता है।

2. इन समाचार-पत्रों में राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं (राष्ट्रीय, प्रांतीय, स्थानीय स्तर के) के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

3. इन अखबारों से राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति ब्रिटिश सरकार के रुख का भी पता लगता है।

4. ये अखबार महात्मा गाँधी की गतिविधियों पर नजर रखते थे तथा उनसे संबंधित समाचारों को विशेषतः जन-आंदोलनों से जुड़े समाचारों को प्रमुखता से छापते थे। इनसे गाँधी जी व उनके जन-आंदोलन के स्वरूप का पता चलता है।

5. जनता की राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी के अध्ययन के लिए भी यह महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। लेकिन इनके अध्ययन में भी सावधानी की जरूरत होती है। इसके लिए विशेषतः हमें दो बातों का ध्यान रखना चाहिए

समाचारों का संकलन एवं रिपोर्टिंग किसी अखबार के लिए, उसके संवाददाता करते हैं। इसलिए संवाददाता की भाषा, उसकी समझ व विचार से यह निर्धारित हुआ है कि उसे गाँधी जी की कौन-सी बात सबसे अहम् लगी, जिसे उसने अखबार में छपने के लिए भेजा होगा।

संकलित समाचारों को संपादक फिर काट-छाँट करके (यानी संपादित करके) प्रकाशित करता है। यहाँ संपादक की समझ और दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण था। उदाहरण के लिए गाँधी जी के विचारों से सहमति और मतभेद रखने वाले संपादकों ने गाँधी जी के भाषणों/वक्तव्यों को अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत किया। किसी ने निंदा करते हुए छापा तो किसी ने प्रशंसा करते हुए सरकार समर्थक व सरकार विरोधी समाचार-पत्रों की रिपोर्टिंग एक-जैसी नहीं थी। लंदन से निकलने वाले समाचार-पत्रों के विवरण भारतीय राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों के छपने वाले विवरणों से अलग हैं।

प्रश्न 5.
चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक क्यों चुना गया?
उत्तर:
चरखा जन-सामान्य से संबंधित था और स्वदेशी व आर्थिक प्रगति का प्रतीक था। अतः गाँधी जी ने इसे राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में चुना। गाँधी जी स्वयं प्रतिदिन अपना कुछ समय चरखा चलाने में व्यतीत करते थे। वे अन्य सहयोगियों को भी चरखा चलाने के लिए प्रोत्साहित करते थे। वे आधुनिक युग के आलोचक थे, जिसमें मशीनों ने मानव को गुलाम बनाकर श्रम को हटा दिया था। गाँधी जी का मानना था कि चरखा गरीबों को पूरक आमदनी प्रदान कर सकता था तथा उन्हें स्वावलंबी बना सकता था। वे मशीनों के प्रति सनक के आलोचक थे।
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वस्तुतः चरखा स्वदेशी तथा राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया। पारंपरिक भारतीय समाज में सूत कातने के काम को अच्छा नहीं समझा जाता था। गाँधी जी द्वारा सूत कातने के काम ने मानसिक श्रम एवं शारीरिक श्रम की खाई को कम करने में भी सहायता की। * निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
असहयोग आंदोलन एक तरह का प्रतिरोध कैसे था?
उत्तर:
असहयोग आंदोलन एक तरह का प्रतिरोध था यह बात दो तरह से स्पष्ट होती है। प्रथम, अगर हम इसके कारणों पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि यह औपनिवेशिक सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ संघर्ष था। दूसरा, आंदोलन के स्वरूप तथा जन-सामान्य की भागीदारी से भी यह स्पष्ट है कि आंदोलन लोगों के प्रतिरोध को भी अभिव्यक्त कर रहा था। आंदोलन के कारणों तथा जनभागीदारी का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

A. कारण :
1. प्रथम विश्वयुद्ध के प्रभाव (Effects of the First World War)-प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीयों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया था। युद्धकाल में भारत का कर्ज 411 करोड़ से 781 करोड़ हो गया। अनाज महँगा हो गया। वस्तुओं के दाम बढ़ गए। अनाज व कपड़े में कमी आ गई। युद्ध के बाद सरकार ने सैनिकों व मजदूरों की छंटनी कर दी। साथ ही अकाल-प्लेग से लगभग 120-130 लाख लोग मारे गए। इन सब परिस्थितियों से जन-असंतोष पनपा।

2. रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act)-विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिए थे और किसी भी व्यक्ति को शक के आधार पर जेल में डाला जा सकता था। युद्ध के बाद भी सरकार ने रॉलेट एक्ट पास किया। भारतीयों ने इसका विरोध किया। इसे काला कानून (Black Act) करार दिया गया। साधारण लोगों के लिए इस एक्ट का अर्थ था, “कोई वकील नहीं, कोई दलील नहीं, कोई अपील नहीं।” गाँधी जी ने देशभर में एक्ट के खिलाफ अभियान चलाने का निश्चय किया। एक्ट के विरोध में पहले 30 मार्च तथा बाद में 6 अप्रैल, 1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।

3. जलियाँवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Massacre)-गाँधी जी के सत्याग्रह शुरू करने पर पंजाब से भारी समर्थन मिला। 30 मार्च व 6 अप्रैल को अमृतसर में हड़ताल हुई। सरकार ने दमन का सहारा लिया। स्थानीय नेताओं-डॉ० सत्यपाल और डॉ० किचलू को गिरफ्तार कर लिया। लोग उत्तेजित हो गए। 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग में 20 हज़ार लोग एकत्रित हुए। इस पर जनरल डायर ने बिना चेतावनी के (रास्ता रोककर) गोली चलाने के आदेश दे दिए। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 379 लोग मारे गए। जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया।

4. खिलाफत आंदोलन–प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की का खलीफा हार गया तथा 1920 में उसके साथ अपमानजनक संधि की गई। भारतीय मुसलमानों में इससे असंतोष था। उन्होंने मुहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में अंग्रेज सरकार विरोधी और खलीफा के समर्थन में आंदोलन चलाया। गाँधी जी ने खिलाफ़त मुद्दे पर अपना सहयोग दिया। गाँधी जी हिंदू-मुस्लिम एकता को स्वराज की प्राप्ति के लिए आवश्यक मानते थे।

B. आंदोलन की प्रगति (Progress of Mass-Movement)-असहयोग आंदोलन ने शीघ्र ही जन-आंदोलन का रूप धारण कर लिया। आंदोलन शुरू करते हुए गाँधी जी ने स्वयं ‘केसरी-ए-हिंद’ की उपाधि तथा अन्य पदों का परित्याग कर दिया। टैगोर ने ‘नाइट हुड’ की उपाधि त्याग दी। अनेक अन्य लोगों ने भी अपनी उपाधियाँ और पदवियाँ त्याग दी। विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालतों में जाना छोड़कर आंदोलन में भाग लिया।

सरकारी कोर्ट के स्थान पर राष्ट्रीय पंचायती अदालतों की स्थापना हुई। राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान; जैसे काशी विद्यापीठ, तिलक विद्यापीठ, अलीगढ़ विद्यापीठ, जामिया मिलिया आदि स्थापित हुईं। कई कस्बों और नगरों में मजदूरों ने हड़तालें कीं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सन् 1921 में 396 हड़तालें हुईं जिनमें 6 लाख मज़दूर शामिल हुए तथा 70 लाख कार्य दिवसों (Working Days) का नुकसान हुआ। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार काफी उत्साहवर्धक रहा। हिंदू-मुस्लिम एकता का व्यापक प्रदर्शन हुआ। चुनावों का बहिष्कार हुआ।

देहातों में आंदोलन फैलने लगा। आंध्र प्रदेश में जनजातियों ने वन कानून की अवहेलना कर दी। राजस्थान में किसानों और जनजातियों ने आंदोलन किया। अवध में किसानों ने कर नहीं चुकाया। आसाम-बंगाल रेलवे के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। पंजाब में गुरुद्वारा आंदोलन शुरू हुआ। यद्यपि नवंबर, 1921 में बंबई में प्रिंस ऑफ वेल्स के बहिष्कार के समय हिंसा हुई थी तथापि दिसंबर, 1921 में (आंदोलन में उत्साह को देखते हुए) गाँधी जी को अधिकार दिया गया कि वे सविनय अवज्ञा आंदोलन छेडे, परंतु फरवरी, 1922 में चौरी-चौरा घटना के बाद आंदोलन स्थगित कर दिया गया। इस प्रकार स्पष्ट है कि आंदोलन का प्रमुख लक्ष्य औपनिवेशिक शासन का प्रतिरोध करना था। इस प्रतिरोध में जन-सामान्य ने पहली बार व्यापक पैमाने पर भाग लिया।

प्रश्न 7.
गोलमेज सम्मेलन में हुई वार्ता से कोई नतीजा क्यों नहीं निकल पाया?
उत्तर:
1930 से 1932 की अवधि में ब्रिटिश सरकार ने भारत की समस्या पर बातचीत करने तथा नया एक्ट पास करने के लिए लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन बुलाए, परंतु इन सम्मेलनों में किसी मुद्दे पर आम राय नहीं बन पाई। फलतः इन सम्मेलनों में कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय न हो सका। तीनों सम्मेलनों की कार्रवाई का संक्षिप्त ब्यौरा अग्रलिखित प्रकार से है

1. प्रथम गोलमेज सम्मेलन इसका आयोजन 12 नवंबर, 1930 को हुआ। इसका उद्देश्य साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार-विमर्श करना था। इस समय काँग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया हुआ था। अतः उसने इसका बॉयकाट किया। इसके प्रमुख नेताओं को सरकार ने पहले ही जेलों में डाला हुआ था। सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई। फलतः यह सम्मेलन असफल रहा।

2. दूसरा गोलमेज सम्मेलन–प्रथम गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद सरकार ने काँग्रेस को अगले सम्मेलन में शामिल करने का प्रयास किया। फलतः गाँधी-इर्विन समझौता हुआ। काँग्रेस ने सम्मेलन में भाग लेने का फैसला किया।
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काँग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सितंबर, 1931 में लंदन पहुँचे। मुहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि के तौर पर सम्मेलन में शामिल हुए। सम्मेलन में गाँधी जी ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी बताया, परंतु गाँधी जी के इस दावे को तीनों तरफ से चुनौती दी गई। मुस्लिम लीग ने दावा किया कि वह भारत में मुस्लिम हितों के लिए काम करने वाली एकमात्र पार्टी है।

भारतीय राज्यों (Indian States) के शासकों का कहना था कि उनके क्षेत्रों पर काँग्रेस का कोई अधिकार नहीं है और न ही वह इन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती है। महान् विद्वान और विधिवेत्ता डॉ० बी०आर० अंबेडकर ने भी गाँधी जी के दावे को चुनौती देते हुए जोर देकर कहा कि काँग्रेस निचली जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। डॉ० अम्बेडकर ने हरिजन वर्ग के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व की माँग रखी। गाँधी जी ने इस माँग का विरोध किया। सांप्रदायिक समस्या को लेकर सम्मेलन में एक राय नहीं बन पाई। इस कारण दूसरा गोलमेज सम्मेलन बिना किसी नतीजे पर पहुँचे ही समाप्त हो गया।

3. 17 नवंबर, 1932 को तीसरा सम्मेलन आयोजित किया गया। इसका इंग्लैंड के ही मज़दूर दल ने बहिष्कार किया। भारत में काँग्रेस ने पुनः आंदोलन छेड़ दिया था। अतः काँग्रेस ने भी इसका बहिष्कार किया। इसमें केवल 46 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें से अधिकतर ब्रिटिश सरकार की हाँ में हाँ मिलाने वाले थे। इस प्रकार स्पष्ट है कि इन सम्मेलनों की वार्ताओं से कोई महत्त्वपूर्ण नतीजा नहीं निकला। हाँ, ब्रिटिश सरकार ने स्वयं ही कुछ निर्णय लिए। सम्मेलनों पर श्वेत-पत्र छापा तथा 1935 में भारत सरकार अधिनियम पास किया।

प्रश्न 8.
महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को किस तरह बदल डाला?
उत्तर:
भारतीय राजनीति में प्रवेश से पूर्व गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में जातीय भेदभाव के विरुद्ध लंबी लड़ाई लड़ी थी। दक्षिण अफ्रीका के आंदोलनों में ही उन्होंने अपने सत्याग्रह के अनूठे राजनीतिक शस्त्र का सफल प्रयोग किया। दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष में यह भी जाना कि जन-सामान्य में संघर्ष तथा बलिदान की अदम्य क्षमता होती है। 1915 में भारत आने पर उन्होंने सारे भारत का दौरा किया।

1917-18 में उन्होंने स्थानीय आंदोलनों-चंपारन, अहमदाबाद व खेड़ा में सत्याग्रह का सफल परीक्षण किया। 1920 से काँग्रेस का नेतृत्व गाँधी जी के हाथों में आ गया। अपने नेतृत्व में गाँधी जी ने अपनी नीतियों, विचारों, कार्यक्रमों और जन-आंदोलनों द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को बहुत हद तक बदल दिया। अब इसे वास्तव में जन-आंदोलन का स्वरूप प्राप्त हुआ।

A. गाँधी जी का तरीका और विचार

1. सत्याग्रह (Satyagraha)-गाँधी जी के राजनीतिक विचारों और उनके दर्शन का केंद्र बिंदु सत्याग्रह है। सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है-सत्य पर दृढ़तापूर्वक अड़े रहना। यह विरोध करने का अहिंसात्मक मार्ग था। जन-आंदोलन के लिए इसके कई रूप हो सकते थे; जैसे हड़ताल, प्रार्थना सभा, उपवास, धरना, असहयोग, कानून की अवज्ञा (नागरिक अवज्ञा), पद-यात्रा आदि।

2. अहिंसा (Ahimsa)-सत्याग्रह दो प्रमुख सिद्धांतों पर टिका था- सत्य और अहिंसा। इसलिए गाँधी जी ने संघर्ष में सत्य के साथ-साथ अहिंसा और अहिंसात्मक तरीकों पर बल दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि सशस्त्र हमले का भी सत्याग्रह द्वारा विरोध किया जा सकता है।

3. लोक शक्ति में विश्वास (Faith in the Masses)-गाँधी जी की जन-शक्ति में अटूट श्रद्धा थी। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन बन गया। वस्तुतः दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष ने गाँधी जी को जन-शक्ति में विश्वास करना सिखाया। उन्हें वहाँ पर गरीब मजदूरों का नेतृत्व करने का मौका मिला। वे उन लोगों की बलिदान करने की क्षमता व साहस को देखकर अचंभित हुए। यह अति महत्त्वपूर्ण बात थी कि उन्होंने गरीब और अनपढ़ लोगों को सत्याग्रह और अहिंसा का पाठ पढ़ाया और अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन चलाया।

4. साधन और साध्य की श्रेष्ठता में विश्वास (Faith in the Purity of Means and Objects)-गाँधी जी साधन और साध्य की श्रेष्ठता में विश्वास रखते थे। देश में स्वराज की स्थापना ही उनका लक्ष्य था और इस पवित्र लक्ष्य की प्राप्ति को वह सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर प्राप्त करना चाहते थे।

B. गाँधी जी और काँग्रेस का विस्तार (Gandhiji and Expansion of the Congress)-गाँधी जी ने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को सच्चे मायनों में जन आधार वाला संगठन बनाया। उन्होंने इसके लिए सावधानीपूर्वक काँग्रेस का पुनर्गठन किया। भारत के विभिन्न भागों में काँग्रेस की नई शाखाएँ खोली गईं। ग्राम स्तर की काँग्रेस कमेटियाँ भी बनाई गईं। राष्ट्रवादी संदेश को फैलाने के लिए मातृभाषा का प्रयोग करना तय किया गया। इसके साथ ही काँग्रेस की प्रांतीय समितियों का भाषायी क्षेत्रों के आधार पर पुनर्गठन किया गया। काँग्रेस का दिन-प्रतिदिन का कार्य देखने के लिए काँग्रेस कार्य समिति (CWC) का गठन किया गया।

B. रचनात्मक कार्य (Constructive Work)-जन-सामान्य को राष्ट्रीय आंदोलन में लाने में उनके रचनात्मक कार्य की अहम् भूमिका है। रचनात्मक कार्यों को मुख्यतः खादी व चरखा कातना, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदू-मुस्लिम एकता, हरिजन कल्याण, महिला उत्थान जैसे कार्यक्रमों के रूप में संगठित किया। फरवरी, 1924 में जेल से रिहा होने पर गाँधी जी ने अपना सारा ध्यान रचनात्मक कार्यों पर लगाया। उन्होंने खादी को बढ़ावा देने तथा छुआछूत को समाप्त करने पर ध्यान दिया। वे भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। वस्तुतः रचनात्मक कार्यक्रम उनकी व्यापक रणनीति का हिस्सा थे। सक्रिय आंदोलन के अभाव में कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रखने तथा सत्याग्रह में समर्पण के भाव पैदा करने में ये कार्यक्रम अति महत्त्व के थे। इससे भविष्य के आंदोलन को बड़ी संख्या में सत्याग्रही मिले थे।

C. तीन बड़े जन-आंदोलन-गाँधी जी ने 1920 से 1945 के मध्य तीन बड़े आंदोलन अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ चलाए। इन आंदोलनों में भारतीय जनता के सभी वर्गों ने भाग लिया। इन जन-आंदोलनों ने ही राष्ट्रीय आंदोलन को सही मायने में राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। इन आंदोलनों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. असहयोग आंदोलन-अगस्त, 1920 में आंदोलन शुरू करते हुए गाँधी जी ने स्वयं ‘केसरी-ए हिंद’ की उपाधि तथा अन्य पदों का परित्याग कर दिया। विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालतों में जाना छोड़कर आंदोलन में भाग लिया। इनमें प्रमुख थे सी०आर०दास, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, पटेल राजा जी, राजेन्द्र प्रसाद, आसफ अली आदि।

सरकारी कोर्ट के स्थान पर राष्ट्रीय पंचायती अदालतों की स्थापना हुई। राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान जैसे काशी विद्यापीठ, तिलक विद्यापीठ, अलीगढ़ विद्यापीठ, जामिया मिलिया आदि स्थापित हुए। कई कस्बों और नगरों में मजदूरों ने हड़तालें कीं। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार काफी उत्साहवर्धक रहा। हिंदू-मुस्लिम एकता का व्यापक प्रदर्शन हुआ। चुनावों का बहिष्कार हुआ। देहातों में आंदोलन फैलने लगा। आंध्र प्रदेश में जनजातियों ने वन कानून की अवहेलना कर दी।

राजस्थान में किसानों और जनजातियों ने आंदोलन किया। अवध में किसानों ने कर नहीं चुकाया। आसाम-बंगाल रेलवे के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। पंजाब में गुरुद्वारा आंदोलन चला। नवंबर, 1921 में बंबई में प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार हुआ, परंतु 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद आंदोलन स्थगित कर दिया गया। इस आंदोलन ने 1857 के बाद पहली बार अंग्रेज़ी राज की नींव को हिलाया।

2. सविनय अवज्ञा आंदोलन-12 मार्च, 1930 को आंदोलन की शुरूआत गाँधी जी ने दांडी मार्च से की। उनके द्वारा नमक कानून तोड़ने के साथ ही यह आंदोलन सारे देश में फैल गया। राजगोपालाचारी ने त्रिचिनापल्ली से तंजौर तक यात्रा करके नमक सत्याग्रह किया। सरोजिनी नायडू ने 2000 सत्याग्रहियों के साथ धरासान में आंदोलन किया। मालाबार व सिलहट में भी ऐसे आंदोलन हुए। उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान ने अपने अनुयायी खुदाई खिदमतगार (Servant of God) के साथ आंदोलन की अगुवाई की। पेशावर में सत्याग्रहियों पर गढ़वाल सैनिकों ने गोली चलाने से मना कर दिया।

मध्य प्रांत, कर्नाटक व महाराष्ट्र में लोगों ने ‘जंगल कानून’ का उल्लंघन किया। उत्तर प्रदेश में किसानों ने लगान देने से मना किया। शोलापुर में मजदूरों ने जोरदार हड़ताल की। वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया। विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में सरकारी शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार किया। बड़े पैमाने पर विदेशी वस्त्रों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन आयोजित हुए। महिलाओं ने आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।

सरकारी दमन इस आंदोलन के जवाब में सरकार ने दमन चक्र चलाया। नमक सत्याग्रह के सिलसिले में लगभग 60,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। गाँधी जी को भी हिरासत में ले लिया गया। 1930 ई० तक लगभग 90 हज़ार लोग जेलों में थे। काँग्रेस को गैर-कानूनी संगठन घोषित कर दिया गया। अखबारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पुलिस द्वारा निहत्थे सत्याग्रहियों और औरतों पर लाठियाँ बरसाना, गोली चलाना तथा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करना आम बात थी।

1931 में गाँधी-इर्विन समझौते के बाद आंदोलन स्थगित किया गया तथा गाँधी जी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया परंतु इसका कोई नतीजा नहीं निकला। अतः आंदोलन पुनः शुरू किया गया। आंदोलन 1934 में स्थगित कर दिया गया।

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3. भारत छोड़ो आंदोलन-दूसरे विश्वयुद्ध के मुद्दे पर सरकार व काँग्रेस में गतिरोध पैदा हो गया था। अंग्रेज़ सरकार युद्ध के बाद भी भारत को स्वतंत्रता नहीं देना चाहती थी। अंततः 8 अगस्त, 1942 को गाँधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। उन्होंने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। सरकार ने गाँधी जी व अन्य बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। 9 अगस्त से 13 अगस्त तक सारे देश में प्रमुख नगरों; जैसे बंबई, अहमदाबाद, दिल्ली, पुणे, इलाहाबाद, लखनऊ, वाराणसी, पटना आदि पर व्यापक उपद्रव हुए, हड़तालें हुईं एवं प्रदर्शन हुए। सरकारी प्रतीकों पर हमले हुए।

संचार साधनों, सेना और पुलिस के खिलाफ तोड़-फोड़ और विध्वंस किए गए। छात्रों ने शहरों से आकर कृषक विद्रोहों को नेतृत्व प्रदान किया। इस दौर में अनेक स्थानों पर अंग्रेजी राज समाप्त हो गया तथा उन स्थानों पर समानांतर राष्ट्रीय सरकारों की स्थापना हुई। इनमें तमलुक (मिदनापुर), तलचर (उड़ीसा), सतारा (महाराष्ट्र), बलिया (पूर्वी संयुक्त प्रांत) की राष्ट्रीय सरकारें प्रमुख थीं। इसके बाद भूमिगत आंदोलन चला। इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे–जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अचुत्य प्रवर्धन, अरुणा आसफ अली आदि। आंदोलन आतंकवादी गतिविधियों और छापामार संघर्षों से चलाया गया।

सरकारी दमन-आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार ने क्रूरता और जंगलीपन की सभी सीमाओं को तोड़ दिया। निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाई गईं। सेना ने हवाई जहाजों से गोलियाँ बरसाईं। मशीनगनों का प्रयोग किया गया। अनेक गाँवों को जलाकर राख कर दिया गया।

निष्कर्ष-स्पष्ट है कि गाँधी जी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन विश्व का सबसे बड़ा आंदोलन बन गया। उन्होंने अहिंसात्मक तरीके से आंदोलन चलाया जो विश्व में अपने प्रकार का अनूठा आंदोलन था। उन्होंने अपने विचारों, कार्यक्रमों व आंदोलनों से राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को नई दिशा प्रदान की।

प्रश्न 9.
निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में पता चलता है? ये स्रोत सरकारी ब्यौरों से किस तरह भिन्न होते हैं?
उत्तर:
1. निजी पत्र (Private Letterts)-निजी पत्र में व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार तथा दैनिक डायरी इत्यादि से महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इसमें प्रायः वे बातें भी मिल जाती हैं जिन्हें सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त नहीं किया गया होता। निजी पत्रों में बहुत-सी अन्य बातों के अतिरिक्त लिखने वाले की पीड़ा, आक्रोश, बेचैनी और असंतोष, आशा और हताशा इत्यादि की झलक भी मिल जाती है। राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में निजी पत्राचार में ऐसे कितने ही उदाहरण मिल जाएँगे। उदाहरण के लिए 1936 के वर्ष के कुछ पत्रों को ले सकते हैं जो राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू और गाँधी जी द्वारा लिखे गए।

इन पत्रों से स्पष्ट होता है कि काँग्रेस में रूढ़िवादियों और समाजवादियों के बीच एक खाई पैदा हो गई थी। नेहरू जी 1928 में यूरोप से लौटने के बाद से ही समाजवादी विचारों से प्रभावित थे। 1936 में काँग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद वे किसान-मजदूरों के समर्थन में तथा विश्व में पैदा हो रहे फासीवाद के खिलाफ जमकर बोले। नेहरू जी का यह व्यवहार रूढ़िवादियों के लिए असहनीय हो गया।

यहाँ तक कि राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल सहित काँग्रेस वर्किंग कमेटी के सात सदस्यों ने त्याग-पत्र की धमकी तक दे डाली थी। इसके बाद सरदार पटेल और नेहरू जी दोनों वर्धा में गाँधी जी से मिले। गाँधी जी ने अंततः बीच-बचाव करते हुए राष्ट्रीय आंदोलन को पहले की तरह एक बार फिर बिखरने से बचा लिया।

निजी लेखन की सीमाएँ (Limits of Private Writing) –निजी लेखन की भी अपनी कुछ सीमाएँ होती हैं। यद्यपि यह व्यक्तिगत लेखन होता है लेकिन कई बार इसमें भी निजी और सार्वजनिक की सीमा खत्म हो जाती है। निजी पत्र या डायरी लिखते समय भी लोगों को यह अहसास रहता है कि संभवतः यह भी प्रकाशित हो सकते हैं। इसी अहसास से बहुत बार इन पत्रों की भाषा और विचारों की सीमाएँ तय होती हैं।

उल्लेखनीय है कि गाँधी जी के पास जो पत्र आते थे उन्हें वह अपने हरिजन समाचार-पत्र में प्रकाशित करते रहते थे। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि नेहरू जी ने भी अपने पुराने पत्रों को पुस्तक के रूप में सार्वजनिक किया। अतः निजी लेखन का भी अध्ययन सावधानीपूर्वक करना चाहिए। उनके महत्त्व और सीमाओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

2. आत्मकथाएँ (Autobiographies)-एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत है आत्मकथाएँ जिनमें मानवीय गतिविधियों का विविध विवरण मिलता है। वस्तुतः यह व्यक्ति के संपूर्ण जीवनकाल, जन्मस्थान, परिवार की पृष्ठभूमि, शिक्षा, वैचारिक प्रभाव, जीवन में कठिनाइयों का उतार-चढ़ाव, प्रमुख घटनाओं आदि से जुड़ी होती हैं। आत्मकथाओं में व्यक्ति की रुचियों और प्राथमिकताओं का भी पता लगता है। इससे व्यक्ति के बौद्धिक स्तर तथा जीवन में सत्यनिष्ठ होने का भी पता लगता है। गाँधी जी ने अपनी आत्मकथा का नाम ही ‘सत्य के साथ मेरे अनुभव’ रखा।
लेकिन आत्मकथा के लेखन को भी आँख मूंद कर स्वीकार नहीं किया जा सकता। विशेषतः इन्हें पढ़ते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

  1. आत्मकथाएँ प्रायः स्मृति के आधार पर लिखी जाती हैं। अतः इनसे पता चलता है कि लेखक को क्या याद रहा था या फिर उसने क्या याद रखा।
  2. आत्मकथा में प्रायः लेखक वह ही लिखता है जिससे वह स्वयं को दूसरों की नज़रों में दिखाना चाहता है।
  3. आत्मकथा वस्तुतः एक तरह से अपनी छवि गढ़ने (पिक्चर बनाने) के समान होती है। इसमें अकसर लोग अपनी कमियों को इच्छा या अनिच्छा से छुपाने का प्रयास करते हैं।
  4. आत्मकथा पढ़ते समय हमें उन बातों या चुप्पियों को ढूँढना चाहिए जिन्हें लेखक ने इच्छा या अनिच्छा से अभिव्यक्त नहीं किया होता।

3. सरकारी ब्यौरे से भिन्नता-निजी पत्र और आत्मकथाएँ इतिहास के स्रोत के रूप में सरकारी ब्यौरों से पूरी तरह से भिन्न हैं। सरकार राष्ट्रीय आंदोलन और इसके नेताओं पर कड़ी नजर रखती थी। पुलिस और सी०आई०डी० के द्वारा इन पर पाक्षिक रिपोर्ट तैयार की जाती थी।

यह ब्यौरा गुप्त रखा जाता था। इन रिपोर्टों को तैयार करने वाले सरकार और स्वयं अपने पूर्वाग्रहों, नीतियों दृष्टिकोण आदि से प्रभावित होते थे। इसके विपरीत निजी पत्रों में दो व्यक्तियों के मध्य आपसी विचारों का आदान-प्रदान और निजी स्तर पर जुड़ी बातों का विवरण होता था। स्पष्ट है कि इन दोनों प्रकार के स्रोतों के विवरण की विशेषता तथा प्रकृति भिन्न होती है।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
दांडी मार्च के मार्ग का पता लगाइए। गुजरात के नक्शे पर इस यात्रा के मार्ग को चिह्नित कीजिए और उस पर पड़ने वाले मुख्य शहरों व गाँवों को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
संकेत-दांडी मार्च; साबरमती आश्रम अहमदाबाद से शुरू हुआ तथा बड़ोदरा, सूरत आदि से होता हुआ समुद्र तट पर स्थित दांडी पहुँचा।

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
दो राष्ट्रवादी नेताओं की आत्मकथाएँ पढ़िए। देखिए कि उन दोनों में लेखकों ने अपने जीवन और समय को किस तरह अलग-अलग प्रस्तुत किया है और राष्ट्रीय आंदोलन की किस प्रकार व्याख्या की है। देखिए कि उनके विचारों में क्या भिन्नता है। अपने अध्ययन के आधार पर एक रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर:
संकेत-अपने प्राध्यापक से गाँधी जी व नेहरू जी की आत्मकथा के संबंध में जानकारी प्राप्त कर स्वयं रिपोर्ट लिखें।

प्रश्न 12.
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान घटी कोई एक घटना चुनिए। उसके विषय में तत्कालीन नेताओं द्वारा लिखे गए पत्रों और भाषणों को खोज कर पढ़िए। उनमें से कुछ अब प्रकाशित हो चुके हैं। आप जिन नेताओं को चुनते हैं उनमें से कुछ आपके इलाके के भी हो सकते हैं। उच्च स्तर पर राष्ट्रीय नेतृत्व की गतिविधियों को स्थानीय नेता किस तरह देखते थे इसके बारे में जानने की कोशिश कीजिए। अपने अध्ययन के आधार पर आंदोलन के बारे में लिखिए।
उत्तर:
सविनय अवज्ञा आंदोलन की दांडी मार्च से जुड़ी घटना पर सरकार की गोपनीय रिपोर्ट से स्थानीय नेताओं के विचारों को जाना जा सकता है। कुछ रिपोर्टों के अंश प्रस्तुत हैं मार्च, 1930 के पहले पखवाड़े की रिपोर्ट के कुछ अंश पढ़ें-गुजरात-इस प्रांत की राजनीतिक परिस्थितियों पर किस हद तक और क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका अभी अंदाजा लगाना मुश्किल है। रबी की फसल अच्छी हुई है इसलिए फिलहाल किसान फसलों की कटाई में व्यस्त हैं। विद्याथी आने वाली परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं।

मद्रास-गाँधी जी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने से बाकी मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं। आम लोग उनकी यात्रा को नाटकीय और उनके कार्यक्रम को अव्यावहारिक मानते हैं क्योंकि हिंदू जनता उन्हें अगाध श्रद्धा की दृष्टि से देखती है, इसलिए गिरफ्तारी की संभावना, जिसके बारे में वे खुद बहुत उत्सुक हैं और उसके राजनीतिक प्रभावों के बारे में बहुत-सी गलतफहमियाँ हैं।

बंगाल-गाँधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत विगत पखवाड़े की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना रही। श्री जे०एम० सेनगुप्ता ने अखिल बंगाल सविनय अवज्ञा परिषद् का गठन किया है। बंगाल प्रांतीय काँग्रेस कमेटी ने अखिल बंगाल अवज्ञा परिषद् बनाई है। इन परिषदों के गठन के अलावा बंगाल में सविनय अवज्ञा के प्रश्न पर और कोई सक्रिय कदम अभी नहीं उठाया गया है। जिलों से मिली रिपोर्टों से पता चलता है कि जो बैठकें आयोजित की गईं उनमें लोगों ने कोई विशेष उत्साह नहीं दिखाया और आम जनता पर कोई गहरा असर नहीं छोड़ा है। गौरतलब बात यह है कि इन बैठकों में महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।

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बंबई-केसरी प्रेस ने आक्रामक भाषा और हमेशा की तरह आग उगलने के अंदाज में लिखा है “अगर सरकार सत्याग्रह की ताकत परखना चाहती है तो उसे पता होना चाहिए कि सत्याग्रह की सक्रियता और निष्क्रियता, दोनों से सरकार को ही नुकसान पहुँचेगा। यदि सरकार गाँधी जी को गिरफ्तार करती है तो उसे राष्ट्र के कोप का भाजन बनना पड़ेगा और यदि सरकार ऐसा नहीं करती है तो सविनय अवज्ञा आंदोलन फैलता जाएगा। इसलिए हमारा मानना है कि अगर सरकार श्री गाँधी को दंडित करती है तो भी राष्ट्र की विजय होगी और अगर सरकार उन्हें अपने रास्ते पर चलने देती है तो राष्ट्र की और भी बड़ी विजय होगी।”

दूसरी ओर विविध वृत्त नामक मध्यमार्गी अखबार ने इस आंदोलन की व्यर्थता की ओर संकेत किया है और कहा है कि यह आंदोलन अपना घोषित उद्देश्य प्राप्त नहीं कर पाया है लेकिन उसने सरकार को भी चेतावनी दी है कि दमन का रास्ता उसके उद्देश्य को कमजोर कर देगा। मार्च 1930 में दूसरे पखवाड़े की रिपोर्ट के कुछ अंश बंगाल-सबका ध्यान समुद्र तट तक गाँधी जी की यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के लिए उनकी तैयारी पर केंद्रित है।

चरमपंथी अखबार उनकी गतिविधियों और भाषणों के बारे में विस्तार से लिख रहे हैं और पूरे बंगाल में हो रही बैठकों तथा उनमें पारित होने वाले प्रस्तावों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है परंतु गाँधी जिस सविनय अवज्ञा की वकालत कर रहे हैं उसके प्रति विशेष उत्साह नहीं दिखाई देता…. ।

सामान्य रूप से लोग इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि गाँधी जी के साथ क्या किया जाता है और संभावना यही है कि अगर उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई की गई तो बंगाल के ज्वलनशील हालात में चिंगारी भड़क उठेगी। लेकिन फिलहाल ऐसी आग भड़कने के कोई गंभीर आसार दिखाई नहीं देते।

इन रिपोर्टों से विभिन्न क्षेत्रों में मार्च के बारे में जानकारी मिलती है परंतु इन्हें सावधानी से अध्ययन करना चाहिए। इनमें कई बार आशंकाएँ और गलत विचार भी दिए होते हैं। ये रिपोर्ट पूर्वाग्रह युक्त भी हैं। फिर भी इनमें उपयोगी जानकारी है।

महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे HBSE 12th Class History Notes

→ राष्ट्रपिता-भारतीयों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने तथा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सर्वाधिक योगदान के कारण महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कहा जाता है।

→ जातीय भेदभाव-दक्षिण अफ्रीका में रंग के आधार पर भारतीयों से नसली भेदभाव किया जाता था। उन पर अनेक प्रतिबंध थे। गाँधी जी ने वहाँ पर जातीय-भेद विरोधी आंदोलन चलाया।

→ सत्याग्रह इसका शाब्दिक अर्थ है-सत्य पर दृढ़तापूर्वक अड़े रहना। अहिंसात्मक तरीके से विरोध करना। गाँधी जी के अनुसार सत्य पर अटल रहना ही सत्याग्रह है।

→ अहिंसा किसी भी प्रकार (मन, कर्म, वचन) से विरोधी को आहत न करना या हानि न पहुँचाना अहिंसा है। अहिंसा वीर और निडर का शस्त्र है न कि कायर और दुर्बल का। सत्याग्रह का आधार सत्य और अहिंसा थे।

→ लोकशक्ति-सामान्य लोगों (किसानों, मज़दूरों, गरीब अनपढ़ लोगों) की असीम बलिदान करने की क्षमता में विश्वास होना। गाँधी जी की लोकशक्ति से अटूट श्रद्धा थी।

→ साधन और साध्य-साध्य वह है जिसे प्राप्त करना होता है; जैसे भारत की स्वतंत्रता साध्य थी। साधन अर्थात् वह तरीका जिसके द्वारा साध्य (object) को प्राप्त किया जाए। गाँधी जी साधन और साध्य दोनों की पवित्रता में विश्वास रखते थे।

→ उदारवादी काँग्रेस के प्रथम दौर (1885 से 1905) के आंदोलन और नेताओं को उदारवादी कहा जाता है। वे सवैधानिक और क्रमिक सुधारों की माँग तथा प्रार्थना की नीति/तरीके पर चल रहे थे।

→ उग्रराष्ट्रवादी-1905 के आस-पास काँग्रेस में उग्रराष्ट्रवादी आंदोलन और नेता प्रभावशाली होने लगे। वे स्वराज्य की माँग में विश्वास रखते थे तथा स्वदेशी और बॉयकाट को शस्त्र के रूप में अपनाना चाहते थे।

→ चंपारन सत्याग्रह-1917 में गाँधी जी द्वारा चंपारण (बिहार) में किसानों की मांगों को लेकर चलाया गया आंदोलन।

→ खेड़ा सत्याग्रह-1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों से लगान वसूली के विरुद्ध गाँधी जी द्वारा चलाया गया सत्याग्रह। खेड़ा में किसानों की फसल बर्बाद हो गई थी, तब भी सरकार लगान की माँग कर रही थी।

→ रॉलेट विरोधी सत्याग्रह-1919 में रॉलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह सभा का गठन कर देशव्यापी अभियान गाँधी जी ने चलाया।

→ असहयोग आंदोलन-ब्रिटिश साम्राज्य की शैतानियत के खिलाफ अहिंसात्मक रूप से असहयोग आंदोलन अर्थात् सरकार से सहयोग न करना। गाँधी जी ने 1920 में असहयोग आंदोलन चलाया।

→ खिलाफत आंदोलन-1920 में अंग्रेज़ सरकार ने (इंग्लैंड की) तुर्की के खलीफा को अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया। इसके विरुद्ध भारतीय मुसलमानों में असंतोष था। मुहम्मद अली और शौकत अली ने अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध इस मुद्दे पर आंदोलन चलाया जो खिलाफत आंदोलन कहलाता है।

→ चौरी-चौरा की घटना-5 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा (गोरखपुर) में लोगों की भीड़ ने एक थाने पर हमला कर आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इसके तत्काल बाद गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया।

→ चरखा-हाथ से सूत कातने का एक यंत्र। गाँधी जी प्रतिदिन कुछ समय चरखा कातते थे। चरखा स्वदेशी और राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया था।

→ रचनात्मक कार्य-जनता की सेवा करने, जनता को जगाने तथा कार्यकत्ताओं में उत्साह पैदा करने के लिए गाँधी जी ने रचनात्मक कार्य चलाए। इसमें मुख्यतः खादी व चरखा कातना, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदू-मुस्लिम एकता, हरिजन कल्याण, महिला उत्थान जैसे कार्यक्रम शामिल थे।

→ साइमन कमीशन-1919 के अधिनियम की समीक्षा के लिए इंग्लैंड सरकार द्वारा 1928 में साइमन के नेतृत्व में साइमन कमीशन भेजा गया। कमीशन में सभी सदस्य श्वेत थे। भारत में इसका जोरदार विरोध हुआ। ‘Simon go back’ के नारे लगे थे।

→ दांडी यात्रा-नमक कानून तोड़ने के लिए 12 मार्च, 1930 से 5 अप्रैल, 1930 के मध्य साबरमती आश्रम से दांडी तक गाँधी जी द्वारा आयोजित यात्रा।

→ खुदाई खिदमतगार-उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा बनाया गया संगठन, जिसने गाँधी जी के अहिंसात्मक आंदोलनों में भाग लिया।

→ गाँधी-इर्विन समझौता-गाँधी-इर्विन समझौता या दिल्ली समझौता भारत के वायसराय इर्विन तथा गाँधी जी के मध्य 5 मार्च, 1931 को हुआ।

→ गोलमेज सम्मेलन-भारत की समस्या पर बातचीत करने तथा नया सुधार कानून पास करने के लिए लंदन में इंग्लैंड की सरकार ने 1930, 1931 व 1932 में तीन गोलमेज सम्मेलन बुलाए। गाँधी जी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया।

→ प्रांतीय स्वायत्तता-1935 के एक्ट के अनुसार प्रांतों का शासन भारतीयों के हाथों में दे दिया गया। यह प्रांतीय स्वायत्तता’ के नाम से जाना जाता है।

→ पाकिस्तान प्रस्ताव-लीग द्वारा 1940 के लाहौर अधिवेशन में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ पास किया गया, जिसमें मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों की स्वतंत्र’ इकाई गठित करने के लिए कहा गया।

→ व्यक्तिगत सत्याग्रह-द्वितीय विश्वयुद्ध के मुद्दे पर सरकार के विरुद्ध काँग्रेस ने 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया।

→ भारत छोड़ो आंदोलन-क्रिप्स मिशन (1942) की असफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश राज के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया तथा अंग्रेज़ों को तत्काल भारत छोड़कर चले जाने को कहा। अगस्त, 1942 में छेड़े गए इस आंदोलन को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है।

→ निजी लेखन-निजी लेखन में व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार तथा दैनिक डायरी इत्यादि शामिल होते हैं। इसमें प्रायः वे बातें भी मिल जाती हैं जिन्हें सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त नहीं किया गया होता।

→ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं में महात्मा गाँधी का शीर्ष स्थान है। भारतीयों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने में उन्होंने सबसे अधिक योगदान दिया, इस कारण उन्हें “राष्ट्र-पिता’ माना गया है। राष्ट्र-निर्माण के इस कार्य में हम उन्हें इटली के गैरीबाल्डी, अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के नेता जार्ज वाशिंगटन और वियतनाम के मुक्ति संघर्ष के नेता हो ची मिन्ह के समकक्ष रख सकते हैं।

→ महात्मा गाँधी का जन्म गुजरात के काठियावाड़ जिले में स्थित पोरबंदर नामक स्थान पर 1869 ई० में हुआ। उनके पिता राजकोट रियासत के दीवान थे। 1888 ई० में कानून की पढ़ाई करने के लिए गाँधी जी इंग्लैंड गए। जल्दी ही वह गुजराती व्यापारी दादा अब्दुला (Dada Abudlla) के कानूनी प्रतिनिधि बनकर 1893 में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। यहाँ पर गाँधी को जातीय (नसली) भेदभाव का सामना करना पड़ा।

→ गोरे लोगों के हाथों अपमानित होने पर गाँधी जी ने अन्याय के विरुद्ध लड़ना तय किया। यद्यपि गाँधी जी वहाँ पर अपने कार्य के लिए एक वर्ष के लिए गए थे तथापि जातीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए उन्हें 20 वर्ष रुकना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के विरुद्ध भेदभाव वाले कानूनों के खिलाफ ‘सत्याग्रह’ चलाया। लंबे संघर्ष के दौरान गाँधी जी और उनके साथियों को अनेक बार जेल जाना पड़ा।

अंततः आंदोलन से मजबूर होकर सरकार को गाँधी जी से वार्ता करनी पड़ी। सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन करना पड़ा तथा दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर से अनेक प्रतिबंध समाप्त करने पड़े।

→ गाँधी के राजनीतिक विचारों और उनके दर्शन का केंद्र-बिंदु सत्याग्रह है। सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है-सत्य पर दृढ़तापूर्वक अड़े रहना। यह विरोध करने का अहिंसात्मक मार्ग था। गाँधी जी के अनुसार, “सत्य पर अटल रहना ही सत्याग्रह है। सत्याग्रह असत्य को सत्य से और हिंसा को अहिंसा से जीतने का एक नैतिक शस्त्र है।” सत्याग्रह दो प्रमुख सिद्धांतों पर टिका था-सत्य और अहिंसा। इसलिए गाँधी जी ने संघर्ष में सत्य के साथ-साथ सत्य और अहिंसात्मक तरीकों पर बल दिया।

गाँधी जी का जन-शक्ति संगठन में अटूट श्रद्धा थी। उनके नेतृत्व में यह राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन बन गया। भारत में आने पर गोखले ने गाँधी जी को भारत की यात्रा करने की सलाह दी। गाँधी जी जहाँ भी जाते थे, उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट जाती थी। भारत में गाँधी जी ने अपने ‘सत्याग्रह’ के तरीके का प्रथम अनुभव 1917 में चंपारन (बिहार) में किया। दूसरी बार सत्याग्रह का प्रयोग 1918 में अहमदाबाद (गुजरात) तथा उसी वर्ष तीसरी बार खेड़ा (गुजरात) में ‘सत्याग्रह’ आयोजित किया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

→ ये तीनों ही स्थानीय समस्याओं से जुड़े आंदोलन थे। प्रथम विश्वयुद्ध से पैदा हुई आर्थिक कठिनाइयों, रॉलेट एक्ट, खिलाफत आंदोलन तथा जलियाँवाला बाग हत्याकांड जैसे कारणों ने गाँधी जी को अंग्रेजों के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर सत्याग्रह चलाने के लिए मजबूर कर दिया। उन्हें विश्वास हो गया था कि “ब्रिटिश साम्राज्य आज शैतानियत का प्रतीक है।” परिणामस्वरूप गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन के रूप में देशव्यापी आंदोलन चलाया। असहयोग आंदोलन ने शीघ्र ही जन-आंदोलन का रूप धारण कर लिया। इस आंदोलन ने जन कार्रवाइयों के लिए रास्ता खोल दिया और यह ब्रिटिश भारत में अभूतपूर्व बात थी।

इस आंदोलन से देशभर में उत्साह था। सभी वर्गों ने इसमें भाग लिया था। परंतु इसी बीच 5 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा में एक हिंसक घटना घटी। इस घटना में 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गाँधी जी को इस घटना से गहरा आघात लगा। उन्होंने तत्काल आंदोलन वापिस ले लिया। असहयोग आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक जन-आंदोलन बना दिया था। अब यह सारे देश के सभी भागों में तथा देश के सभी वर्गों व तबकों का आंदोलन बन चुका था। किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने भी इसमें भाग लेना शुरू कर दिया था।

→ गाँधी जी उनके प्रिय नेता बन गए थे। गाँधी जी की जीवन-शैली से लोगों को लगता था कि वे उनके स्वाभाविक नेता हैं। गाँधी जी उन्हीं की तरह वस्त्र पहनते थे व उन्हीं की तरह रहते थे। वे जन-सामान्य की भाषा बोलते थे। गाँधी जी दूसरे नेताओं की तरह जनसमूह से अलग खड़े नहीं होते थे, बल्कि वे उनसे गहरी सहानुभूति रखते थे। गाँधी जी प्रतिदिन अपना कुछ समय चरखा चलाने में व्यतीत करते थे। वे अन्य सहयोगियों को भी चरखा चलाने के लिए प्रोत्साहित करते थे। भारत एक कृषि प्रधान देश होने के कारण यहाँ की जनसंख्या के अधिकांश लोग किसान थे।

→ किसानों में असहयोग आंदोलन के बाद गाँधी जी, ‘गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराजा’ अथवा सामान्य ‘महात्मा जी’ जैसे नामों से लोकप्रिय हुए। किसानों में उनकी छवि एक उद्धारक के समान थी। गाँधी जी को जन-सामान्य के समीप ले जाने में उनके रचनात्मक कार्य की अहम् भूमिका है। रचनात्मक कार्यों को मुख्यतः खादी व चरखा कातना, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदू-मुस्लिम एकता, हरिजन कल्याण, महिला उत्थान; जैसे कार्यक्रमों के रूप में संगठित किया। साइमन कमीशन को इंग्लैंड की सरकार ने भारत में 1919 के अधिनियम की कार्य-प्रणाली की समीक्षा करने के लिए भेजा था ताकि आगे सुधारों पर विचार किया जा सके, परंतु इस कमीशन के सभी सदस्य श्वेत थे।

→ भारत के सभी दलों ने इसका जोरदार विरोध किया। 1929 में दिसंबर के अंत में काँग्रेस ने अपना वार्षिक अधिवेशन लाहौर में किया। इसका अध्यक्ष युवा नेता जवाहरलाल नेहरू को बनाया गया। काँग्रेस ने अपना लक्ष्य ‘पूर्ण स्वराज्य’ अथवा ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ को घोषित किया। दांडी यात्रा तथा नमक कानून तोड़ने की योजना गाँधी जी ने बहुत सोच-विचार करके बनाई थी। इस योजना के अनुसार 12 मार्च, 1930 को प्रातः 6 बजकर 30 मिनट पर साबरमती आश्रम से गाँधी जी ने अपने 78 अनुयायियों के साथ 241 मील दूर दांडी नामक स्थान के लिए पद यात्रा शुरू की।

→  24 दिनों में यात्रा पूरी करके गाँधी जी व उनके सहयोगी 5 अप्रैल को दांडी पहुँचे व 6 अप्रैल को प्रातःकाल में गाँधी जी समुद्र तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने नमक एकत्र कर नमक कानून को भंग कर दिया और इस प्रकार 6 अप्रैल, 1930 को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया। गाँधी जी द्वारा नमक कानून तोड़ने के साथ ही यह आंदोलन देश के सभी भागों में फैल गया। इस आंदोलन के जवाब में सरकार ने दमन चक्र चलाया।

→ नमक सत्याग्रह के सिलसिले में लगभग 60,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। गाँधी जी को भी हिरासत में ले लिया गया। सर तेज बहादुर सञ्जु तथा डॉ० जयकर की मध्यस्थता से गाँधी जी और वायसराय इर्विन के बीच फरवरी-मार्च 1931 में लंबी बैठकें हुईं। अंत में दोनों में 5 मार्च, 1931 को एक समझौता हुआ जो ‘गाँधी-इर्विन’ समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

→ काँग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सितंबर, 1931 में लंदन पहुँचे। साइमन कमीशन रिपोर्ट तथा गोलमेज सम्मेलनों के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को प्रशासन में भागीदारी के लिए 1935 का अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम के तहत प्रांतों में स्वायत्त शासन की स्थापना की गई थी। भारतीय दल 1935 के एक्ट से संतुष्ट नहीं थे तथापि उन्होंने इस एक्ट के तहत 1937 में प्रांतीय सभाओं के लिए चुनाव हुए तो इनमें भाग लिया। इन चुनावों में काँग्रेस को भारी सफलता प्राप्त हुई। 1937 के चुनावों में मुस्लिम लीग को भारी असफलता हाथ लगी थी।

→ वह संयुक्त प्रांत में सांझी सरकार भी नहीं बना पाई। अब उसे लग रहा था कि पृथक् निर्वाचिका से भी उसे सत्ता नहीं मिलने वाली है तो उसने उग्र रूप अपना लिया। इसके साथ ही मार्च, 1940 में अपने लाहौर अधिवेशन में लीग ने ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ को पारित किया, जिसमें मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों की ‘स्वतंत्र’ इकाई गठित करने के लिए कहा गया। 1942 ई० में ब्रिटेन ने भारतीय नेताओं से बातचीत करने तथा भारतीय समस्या को हल करने के लिए क्रिप्स मिशन भारत भेजा।

→  स्टैफर्ड क्रिप्स 22 मार्च, 1942 को भारत पहुँचे तथा अपने प्रस्ताव भारतीयों के समक्ष रखे। क्रिप्स प्रस्ताव अपर्याप्त और असंतोषजनक थे। इसमें सभी दलों को खुश करने का प्रयास किया गया, परंतु सभी भारतीय दलों ने इन प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया।

→ क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश राज के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। अगस्त, 1942 में छेड़े गए इस आंदोलन को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। 7 अगस्त, 1942 को बंबई में अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी (AICC) की बैठक शुरू हुई। इस बैठक में वर्धा में पास किए ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ का अनुमोदन कर दिया गया। साथ ही गाँधी जी को अहिंसक संघर्ष छोड़ने की मंजूरी दी।

→  8 अगस्त को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के बाद अपने भाषण में महात्मा गाँधी ने कहा, “आप लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति को अब से स्वयं को स्वतंत्र व्यक्ति समझना चाहिए तथा इस प्रकार का कार्य करना चाहिए कि मानो आप स्वतंत्र हो….. मैं स्वतंत्रता से कम किसी भी वस्तु से संतुष्ट नहीं होऊँगा। हम करेंगे या मरेंगे। हम या तो भारत को स्वतंत्र कराएँगे या इस प्रयास में मर मिटेंगे।” भारत छोड़ो आंदोलन सही मायनों में एक जनांदोलन था। इसमें लाखों आम लोगों ने स्वयं की प्रेरणा से भाग लिया। इतिहासकार बिपिन चंद्र का मानना है कि, “भारत छोड़ो आंदोलन में आम जनता की हिस्सेदारी तथा समर्थन एक नई सीमा तक पहुँचा।”

→ 1945-47 के मध्य तेजी से वार्ताओं का दौर शुरू हुआ। गाँधी जी सत्ता की इन वार्ताओं से लगभग दूर रहे। उन्होंने आखिर तक विभाजन का विरोध किया। गाँधी जी 15 अगस्त को दिल्ली में उपस्थित नहीं थे। वे कलकत्ता में सांप्रदायिक सद्भाव को बहाल करने के दुष्कर कार्य में लगे हुए थे। उन्होंने 24 घंटे का उपवास रखा। वे अकेले ही स्थान-स्थान पर जाकर हिंदू-मुस्लिमों के आपसी वैर-भाव को समाप्त करने में लगे थे। गाँधी जी की धर्म में गहरी आस्था थी, किंतु साथ ही वे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत में भी दृढ़ आस्था रखते थे।

→ नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी, 1948 की शाम को दैनिक प्रार्थना के समय गाँधी जी पर गोली चलाकर उन्हें मौत की नींद सुला दिया। गाँधी जी एक धर्मांध के हाथों शहीद हो गए। गाँधी जी की शहादत से सारे देश में गहरे शोक की लहर दौड़ गई। उनकी शहादत पर भारत में ही नहीं, विश्वभर में उन्हें भाव-भीनी श्रद्धांजलि दी गई।

→ इतिहासकार समस्त स्रोतों का अध्ययन और विवेचन करते हुए गाँधी जी के राजनीतिक सफर और राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं। इतिहासकार के लिए यह भाषण बड़े महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं क्योंकि इनसे उनकी नीतियों, कार्यक्रमों तथा लोगों को संगठित करने के तरीकों की झलक मिलती है। निजी लेखन में व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार तथा दैनिक डायरी इत्यादि शामिल होते हैं।

→ इसमें प्रायः वे बातें भी मिल जाती हैं जिन्हें सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त नहीं किया गया होता। आत्मकथाएँ एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। आत्मकथाओं में मानवीय गतिविधियों का विविध विवरण मिलता है। भारतीयों की राजनीतिक गतिविधियों के बारे में अंग्रेज़ सरकार कड़ी नज़र रखती थी। इन गतिविधियों के बारे में पुलिस व अन्य अधिकारी अपनी रिपोर्टों और पत्रों से सरकार को अवगत करवाते थे।

→ इन दस्तावेजों को पढ़कर हम जान पाते हैं कि पुलिस व अधिकारियों की नजर में गाँधी जी और उसके सहयोगियों की गतिविधियाँ कैसी थीं। 20वीं सदी के दूसरे दशक के अंत में गाँधी जी राष्ट्रीय नेता बनकर उभरे। इस समय बड़ी संख्या में अंग्रेजी और हिंदी में समाचार-पत्र प्रकाशित हो रहे थे जिन्होंने गाँधी जी की गतिविधियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया। गाँधी जी को समझने के लिए ये महत्त्वपूर्ण साधन हैं।

काल-रेखा

काल घटना का विवरण
2 अक्तूबर, 1869 ई० गाँधी जी का जन्म।
1893 ई० गाँधी जी का दक्षिण अफ्रीका जाना।
जनवरी, 1915 गाँधी जी का भारत आगमन।
1916 ई० प० मदन मोहन मालवीय द्वारा बनारस विश्वविद्यालय की स्थापना तथा गाँधी जी द्वारा समारोह में भाषण।
अप्रैल, 1917 चंपारन सत्याग्रह का प्रारंभ ।
1918 ई० अहमदाबाद और खेड़ा (गुजरात में सत्याग्रह)
6 अप्रैल, 1919 रॉलेट एक्ट पर अखिल भारतीय
13 अप्रैल, 1919 जलियाँवाला बाग हत्याकांड।
1918 ई० खिलाफ़त कमेटी का गठन।
1 अगस्त, 1920 गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया।
5 फरवरी, 1922 चौरी-चौरा की घटना
12 फरवरी, 1922 असहयोग आंदोलन का संगठन।
1928 ई० साइमन कमीशन का भारत आना।
31 दिसंबर, 1929 लाहौर अधिवेशन में पूर्व स्वतंत्रता प्रस्ताव पास
26 जनवरी, 1930 प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
12 मार्च, 1930 गाँधी जी द्वारा दांडी यात्रा का प्रारंभ
6 अप्रैल, 1930 गाँधी जी ने नमक कानून तोड़ा।
5 मार्च, 1931 गाँधी-इर्विन पैक्ट हुआ।
1931 ई० दूसरा गोलमेज सम्मेलन तथा गाँधी का लंदन जाना।
1937 ई० प्रांतीय सभाओं के चुनाव
3. सितंबर, 1939 वायसराय द्वारा भारत को द्वितीय विश्वयुद्ध में झोंकना
22 अक्तूबर, 1939 काँग्रेस सरकारों का त्याग-पत्र देना।
22 दिसंबर, 1939 लीग द्वारा ‘मुक्ति दिवस मनाना’।
मार्च, 1940 लीग का पाकिस्तान प्रस्ताव।
8 अगस्त, 1940 लिनलिथगों द्वारा ‘अगस्त प्रस्ताव’ रखना।
8 अगस्त, 1942 भारत छोड़ो प्रस्ताव पास किया।
9 अगस्त, 1942 भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ।
14 जून, 1945 ‘वेवल योजना’ प्रस्ताव प्रस्तुत।
16 अगस्त, 1946 लीग द्वारा कार्रवाई दिवस मनाना।
15 अगस्त, 1947 भारत का स्वतंत्र होना।

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