HBSE 12th Class Biology Solutions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

Haryana State Board HBSE 12th Class Biology Solutions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Biology Solutions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

प्रश्न 1.
घरेलू वाहित मल के विभिन्न घटक क्या हैं? वाहित मल के नदी में विसर्जन से होने वाले प्रभावों की चर्चा करें।
उत्तर:
घरेलू वाहित मल में मुख्यतः जैव निम्नीकरण कार्बनिक पदार्थ होते हैं जिनका अपघटन जीवाणु व अन्य सूक्ष्म जीवों द्वारा होता है। इसके अतिरिक्त वाहित मल में अनेक प्रकार के निलम्बित ठोस, रेत व सिल्ट कण, अकार्बनिक, कोलाइडी कण (जैसे क्ले), मल, कपड़ा, खाद्य अपशिष्ट, कागज, रेशे आदि एवं घुले हुये पदार्थ (फॉस्फेट, नाइट्रेट, धातु आयन) होते हैं इसी के साथ पाठ्यसामग्री के बिन्दु को देखिये ।

घरेलू वाहित मल और औद्योगिक बहि: स्राव (Domestic sewage and Industrial effluents) नगरों व शहरों में अपने घरों का कार्य करते हुए हम सभी चीजों को नालियों में बहा देते हैं। यह वाहित कचरा तथा घरों से निकलने वाला वाहित मल समीपस्थ नदी में बह जाता है। केवल 0.1 प्रतिशत अपद्रव्यों (Impurities) के कारण ही घरेलू वाहित मल मानव के उपयोग के लायक नहीं रहता है।

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प्रश्न 2.
आप अपने घर, विद्यालय या अपने अन्य स्थानों के भ्रमण के दौरान जो अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं, उनकी सूची बनाएँ। क्या आप उन्हें आसानी से कम कर सकते हैं? कौनसे ऐसे अपशिष्ट हैं जिनको कम करना कठिन या असंभव होगा?
उत्तर:
घर, विद्यालय व अन्य स्थानों पर भ्रमण के दौरान विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट प्राप्त होते हैं। इन अपशिष्टों को जैव अपघटनीय, जैव अनअपघटनीय, विषाक्त अविषाक्त तथा जैव चिकित्सकीय श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं। प्रकृति में बिना किसी उत्प्रेरकों की उपस्थिति में अपघटन होने वाले अपशिष्ट जैव अपघटनीय अपशिष्ट (Biodegradable waste) होते हैं। इन्हें भी सरल व जटिल दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है-
(i) सरल जैव अपघटनीय अपशिष्ट इन अपशिष्ट पदार्थों को सूक्ष्म जीवों द्वारा प्रकृति में अत्यंत सरलता व तीव्रता से अपघटित किया जाता है। उदाहरण पादप व जंतुओं के मृत एवं उत्सर्जी अवशिष्ट, मल एवं विष्ठा, अपशिष्ट जल आदि ।

(ii) जटिल जैव अपघटनीय अपशिष्टये अपशिष्ट प्रकृति में लंबे समय तक रहते हैं, इनका विघटन धीरे-धीरे होता है व प्रकृति में हानिकारक होते हैं, क्योंकि ये प्रकृति में लंबे समय तक अनअपघटित अवस्था में रहते हैं। उदाहरण पीड़कनाशी Simazine व PCP, कागज, चमड़ा, प्लास्टिक थैलियाँ, ऊन, प्लास्टिक की बोतलें आदि । जैव अनअपघटनीय अवशिष्ट- ये जीवाणु व कवक आदि से अपघटित नहीं होते। इसमें कार्बनिक यौगिक, धात्विक ऑक्साइड, पारा, लैंड, आर्सिनिक, पीड़कनाशी DDT, रेडियोधर्मी पदार्थ आदि होते हैं।

प्रश्न 3.
वैश्विक उष्णता में वृद्धि के कारणों और प्रभावों की चर्चा करें। वैश्विक उष्णता वृद्धि को नियंत्रित करने वाले उपाय क्या हैं?
उत्तर:
वैश्विक उष्णता को निम्नलिखित उपायों द्वारा नियन्त्रित किया जा सकता है-
1. जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को कम करना
2. ऊर्जा दक्षता में सुधार करना
3. वनोन्मूलन को कम करना
4. मनुष्य की बढ़ती हुई जनसंख्या को कम करना
5. जानवरों की विलुप्त हो रही प्रजातियों को संरक्षित करना
6. वनों का विस्तार करना
7. वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।

प्रश्न 4.
कॉलम अ और ब में दिए गए मदों का मिलान करें-

कॉलम ‘अ’ कॉलम ‘ब’
(क) उत्त्रेरक परिवर्तक 1. कणकीय पदार्थ
(ख) स्थिर वैद्युत अपक्षेपित्न (इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर) 2. कार्बन मोनो ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड
(ग) कर्ण मफ (इयर मफ्स) 3. उच्च शोर स्तर
(घ) लैंडफिल 4. ठोस अपशिष्ट

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित पर आलोचनात्मक टिप्पणी लिखें-
(क) सुपोषण (यूट्रोफिकेशन )
(ख) जैव आवर्धन (बायोलॉजिकल मैग्निफिकेशन)
(ग) भौमजल (भूजल ) का अवक्षय और इसकी पुनपूर्ति के तरीके।
उत्तर:
(क) सुपोषण (यूट्रोफिकेशन )
सुपोषण (Eutrophication)-सुपोषणता किसी जलाशय या झील का प्राकृतिक काल प्रभावन (Ageing) को दर्शाता है अर्थात् सुपोषणीय झील अधिक उम्र की (पुरानी) हो जाती है। यह सब इसके जल की जैव समृद्धि (Biological enrichment) के कारण होता है।

नई या कम उम्र की झील का जल शीतल व स्वच्छ होता है। समय के साथ-साथ अपशिष्ट जलों के बहाव के साथ अकार्बनिक पोषक तत्वों (नाइट्रोजन और फॉस्फोरस) के आने के अतिरिक्त, कार्बनिक अपशिष्टों का जमाव भी जलाशयों की पोषक मात्रा को बढ़ा देता है। इसके कारण जलीय जीवों में वृद्धि होती रहती है। जैसेजैसे झील की उर्वरता बढ़ती है वैसे-वैसे पादप और प्राणी जीवन बढ़ने लगता है।

विशेषतः शैवालों की अधिक वृद्धि होने से पूर्ण जलाशय शैवाल युक्त (खासकर नील हरित शैवाल अधिक होती है) होकर शैवाल ब्लूम (Algal bloom) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इससे जल में जहर का निष्कासन होता है व जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। शैवाल ब्लूम से जलाशयों में अन्य शैवालों का विकास जहरीलेपन के कारण अवरुद्ध हो जाता है व जलीय प्राणी जहरीलेपन व ऑक्सीजन की कमी से मरने लगते हैं। जल में पोषण की वृद्धि की प्रक्रिया से प्रजातियों की विविधताओं का नष्ट होना सुपोषण कहलाता है। इस प्रक्रिया के कारण मृत पादप व प्राणी तथा कार्बनिक अवशेष झील के तल में बैठने लगते हैं।

सैकड़ों वर्षों में इसमें जैसे-जैसे गाद (Silt) और जैव मलबे (organic debris) का ढेर लगता जाता है वैसेवैसे झील कम गहरी या उथली (shallower) और गर्म होती जाती है झील के ठंडे पर्यावरण वाले जीव के स्थान पर उष्ण जलजीव रहने लगते हैं। कच्छ पादप (marsh plants) उथली जगह पर जड़ जमा लेते हैं और झील की मूल द्रोणी (Basin) को भरने लगते हैं। उथले झील में अब कच्छ (Marsh) पादप उग जाते हैं और मूल झील बेसिन उनसे भर जाता है ।

कालांतर में झील काफी संख्या में प्लावी पादपों Bog से भर जाता है और अंत में यह भूमि में परिवर्तित हो जाता है। जलवायु, झील का आकार और अन्य कारकों के अनुसार झील का यह प्राकृतिक काल-प्रभावन हजारों वर्षों में होता है। फिर भी मनुष्य के क्रियाकलाप, जैसे उद्योगों और घरों के बहिःस्राव (effluents) कालप्रभावन प्रक्रम में मूलतः तेजी ला सकते हैं।

इस प्रक्रिया को त्वरित सुपोषण (Accelerated Eutrophication) कहा जाता है। गत शताब्दी में पृथ्वी के कई भागों के झील का वाहित मल और कृषि तथा औद्योगिक अपशिष्ट के कारण तीव्र सुपोषण हुआ है। विद्युत उत्पादन करने वाले यानी तापीय विद्युत् संयंत्रों से बाहर निकलने वाला गर्म अपशिष्ट जल भी एक प्रदूषक ही है।

गर्म अपशिष्ट जल में अधिक ताप के प्रति संवेदनशील जीव जीवित नहीं रह पाते या इसमें जीवों की संख्या कम हो जाती है। तापमान के बढ़ने से जल में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा भी कम हो जाती है व इससे अन्य रासायनिक प्रकियायें बढ़ जाती हैं। कुल मिलाकर जल पारितंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है।

(ख) जैव आवर्धन (बायोलॉजिकल मैग्निफिकेशन)
जैव आवध्धन (Biological Magnification or Biomagnification)-उद्योगों के अपशिष्ट जल में उपस्थित कुछ विषैले पदार्थ जलीय खाद्य शृंखला में जैव आवर्धन कर सकते हैं। तात्पर्य यह है कि वह परिघटना, जिसके अंतर्गत कुछ विशेष प्रदूषक आहार शृंखला के साथ सांद्रता में बढ़ते हुए ऊतकों में जमा हो जाते हैं, उसे जैव आवर्धन (Biomagnification) कहते हैं।

कुछ प्रदूषक जैव अनिम्नीकरणीय होते हैं, उदाहरण के लिए एक बार अवशोषित होने पर उनका जीवों के द्वारा विघटन होना या मलमूत्र के द्वारा बाहर निकलना असंभव हो जाता है। ये प्रदूषक साधारणत: जीवों के वसा वाले ऊतकों में जमा होते हैं। जैव आवर्धन का मुख्य कारण है कि जीव द्वारा संग्रहित आविषालु पदार्थ उपापचयित या उत्सर्जित नहीं हो पाते हैं और इस प्रकार ये अगले उच्चतर पोषण स्तर पर पहुँच जाते हैं।

इसका उचित उदाहरण पारा व DDT ।का है जिसे चित्र 16.4 की सहायता से जलीय खाद्य शृंखला में DDT का जैव आवर्धन बताया गया है। इस प्रकार क्रमिक पोषण स्तरों पर DDT की सांद्रता बढ़ जाती है। यदि जल में यह सांद्रता 0.003 ppb (parts per billion) से आरंभ होती है तो अंत में जैव आवर्धन के द्वारा मत्स्यभक्षी पक्षियों में बढ़कर 25 ppm हो जाती है। पक्षियों में DDT की उच्च सांद्रता कैल्सियम उपापचय को हानि पहुँचाती है जिसके कारण अंड कवच (Egg shell) पतला हो जाता है और यह समय से पूर्व फट जाता है जिसके कारण पक्षी समष्टि (Bird population) अर्थात् इनकी संख्या में कमी हो जाती है।
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(ग) भौमजल (भूजल ) का अवक्षय और इसकी पुनपूर्ति के तरीके (Groundwater depletion and ways for its replenishment ) जल ही जीवन है। पृथ्वी पर जल की 71 प्रतिशत उपलब्धता से ही इसे नीला ग्रह भी कहा जाता है। अलवणीय उपलब्ध जल मात्रा 1 प्रतिशत है। वर्तमान समय में जल संकट उत्पन्न हो गया है। इसका कारण जल स्रोतों का प्रदूषण, भू-जल का अतिदोहन, जल की अधिक मांग, जनसंख्या विस्फोट, मानसून की अनिश्चितता तथा पारंपरिक स्रोतों की उपेक्षा आदि हैं। जल अभाव की समस्या ने राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव पैदा कर दिया है।

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भारत में लगभग सभी नदियों के जल के बंटवारे को लेकर पड़ौसी राज्यों में तनाव की स्थिति बनी हुई है। जल एक चक्रीय संसाधन है। यदि इसका युक्तियुक्त उपयोग किया जाए तो इसकी कमी नहीं होगी। जल के संरक्षण तथा पुनर्पूर्ति हेतु निम्न उपाय किये जाने चाहिये
(1) जल को बहुमूल्य राष्ट्रीय संपदा समझकर इसका समुचित नियोजन किया जाना चाहिये।

(2) वर्षा जल संग्रहण विधियों द्वारा जल का संग्रहण किया जाना चाहिए। तात्पर्य यह है कि भूमि सतह पर प्रवाहित वर्षा जल को भूमिगत करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

(3) नदियों पर छोटे-बड़े बांध बनाये जाने चाहिए जिससे बाढ़ नियंत्रण के साथ एकत्रित जल को सिंचाई, पेयजल, बिजली उत्पादन आदि में उपयोग किया जा सके। गाँवों में तालाबों का निर्माण करना चाहिए।

(4) सिंचाई में जल को अधिक नष्ट न कर फव्वारा विधि या टपकन विधि, घरेलू उपयोग में समुचित उपयोग व हमें अधिकाधिक वृक्षारोपण करना चाहिए। अच्छे वन जल का सर्वोत्तम संचय करते हैं। वन ऐसे जलाशय हैं जिनमें कभी भी अवसादन होने की संभावना नहीं होती है।

(5) बाढ़ नियंत्रण व जल के समुचित उपयोग के लिए नदियो को परस्पर जोड़ा जाना चाहिए ।

(6) भवनों में खाली स्थान होने चाहिए जिससे छतों के जल को भूमिगत करने के लिए टैंक का प्रावधान कर सके । इस दिशा में प्रथम कदम है समाकलित जल संभर प्रबंधन (Integrated Watershed Management ) द्वारा जल संसाधनों क वैज्ञानिक प्रबंधन, दूसरा कदम वर्षा जल संग्रहण का है तथा तीसरा कदम् जल को अप्रदूषित रखने का है। इन सब में वर्षा जल संग्रहण, भूजल पुनर्भरण का एक महत्वपूर्ण उपाय है।

प्रश्न 6.
ऐंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र क्यों बनते हैं- पराबैंगनी विकिरण के बढ़ने से हमारे ऊपर किस प्रकार प्रभाव पड़ेंगे?
उत्तर:
वायुमंडल के समतापमंडल (Stratosphere) में ओजोन की परत होती है। समतापमंडल में पराबैंगनी विकिरण ओजोन का प्रकाश विच्छेदन कर O2 एवं आण्विक ऑक्सीजन (O) बना देता है जो शीघ्र ही फिर से जुड़कर O3 बना देता है।
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इस क्रिया में पराबैंगनी किरणों से ताप के रूप में ऊर्जा निकलती है । इस प्रकार ओजोन के निर्माण एवं विघटन में एक संतुलन स्थापित हो जाता है जिससे समुद्र तल से 20 से 26 कि.मी. ऊपर समतापमंडल में ओजोन की सांद्रता स्थिर हो जाती है। मानक ताप एवं दाब में समतापमंडल ओजोन परत भूमध्य रेखा 0.29 सेमी. एवं ध्रुवों के नजदीक 0.40 सेमी. मोटी हो जाती है।

यह ओजोन परत पृथ्वी के जीव जगत् को तेज पराबैंगनी विकिरण के हानिकारक प्रभाव से बचाती है। ओजोन परत की मोटाई मौसम के हिसाब से बदलती है। बसंत ऋतु ( फरवरी- अप्रेल) में सबसे ज्यादा एवं वर्षा ऋतु (जुलाई- अक्टूबर) में सबसे कम रहती है। ओजोन परत की मोटाई को डॉबसन इकाई (Dobson Unit) में मापा जाता है।

समतापमण्डल में ओजोन के उत्पादन और अवक्षय निम्नीकरण में संतुलन होना चाहिए। वर्तमान में, क्लोरोफ्लुरोकार्बन (CFCs) के द्वारा ओजोन निम्नीकरण बढ़ जाने से इसका संतुलन बिगड़ गया है। वायुमण्डल के निचले भाग में उत्सर्जित CFCs ऊपर की ओर उठता है और यह समतापमंडल में पहुँचता है । समतापमंडल में पराबैंगनी किरणें उस पर कार्य करती हैं जिसके कारण क्लोरीन (CI) परमाणु का मोचन ( release) होता है, जो अत्यधिक क्रियाशील होती है ।

CFCl3 + light → CFCL2 + Cl
यह क्लोरीन उत्प्रेरक का कार्य करती हुई ओजोन को विघटित कर देती है तथा स्वयं अपरिवर्तित रहती है।
Cl + O3 → ClO + O2
CIO + O → Cl + O2
इस प्रकार उत्प्रेरक का कार्य करते हुए CFC का प्रत्येक अणु ओजोन के लाखों अणुओं को विघटित कर सकता है। इसलिए समतापमंडल में जो भी क्लोरोफ्लुरोकार्बन जुड़ते जाते हैं उनका ओजोन स्तर पर स्थायी और सतत प्रभाव पड़ता है। यद्यपि समतापमंडल में ओजोन का अवक्षय विस्तृत रूप से होता रहता है लेकिन यह अवक्षय ऐंटार्कटिक क्षेत्र में खासकर विशेषरूप से अधिक होता है। इसके फलस्वरूप यहाँ काफी बड़े क्षेत्र में ओजोन की परत अधिक पतली हो गई है जिसे सामान्यतः ओजोन छिद्र (Ozone Hole) कहा जाता है (चित्र 16.7 ) ।
सजीवों में DNA व प्रोटीन विशेषकर पराबैंगनी (UV) किरणों को अवशोषित करते हैं और इसकी उच्च ऊर्जा इन अणुओं के रासायनिक आबंध (chemical bonds) को भंग करते हैं। इस प्रकार पराबैंगनी
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विकिरण सजीवों के लिए अत्यधिक हानिकारक हैं। पराबैंगनी – बी (UV- -B) की अपेक्षा छोटे तरंगदैर्घ्य (wavelength) युक्त पराबैंगनी (UV) विकिरण पृथ्वी के वायुमंडल द्वारा लगभग पूरा का पूरा अवशोषित हो जाता है बशर्ते कि ओजोन स्तर ज्यों का त्यों रहे। लेकिन UV-B, DNA को क्षतिग्रस्त करता है और उत्परिवर्तन करता है। इसके कारण त्वचा में बुढ़ापे के लक्षण दिखते हैं, इसकी कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और विविध प्रकार के त्वचा कैंसर हो जाते हैं।

हमारे आँख का स्वच्छमण्डल (Cornea ) UV-B विकिरण का अवशोषण करता है। इसकी उच्च मात्रा के कारण कॉर्निया का शोथ हो जाता है जिसे हिम अंधता (Snow-blindness), मोतियाबिंद आदि कहा जाता है। इसके उद्भासन ( exposure) से कॉर्निया स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता है।ओजोन के अवक्षय ( ह्रास) के हानिकारक प्रभाव को देखते हुए सन् 1987 में माँट्रियल (कनाडा) में अंतर्राष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसे माँट्रियल प्रोटोकॉल कहा जाता है।

यह संधि 1989 से प्रभावी हुई। इसके अन्तर्गत ओजोन अवक्षयकारी गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण हेतु प्रतिबंध लगाया गया तथा और अधिक अन्य प्रयास किये गये। प्रोटोकॉल में विकसित व विकासशील देशों के लिये अलग-अलग निश्चित दिशा- निर्देश दिये गये जिससे CFCs व अन्य ओजोन अवक्षयकारी रसायनों के उत्सर्जनों को कम किया जा सके।

प्रश्न 7.
वनों के संरक्षण और सुरक्षा में महिलाओं और समुदायो की भूमिका की चर्चा करें।
उत्तर:
इसी प्रकार का आंदोलन कर्नाटक में भी चला जिसका नाम ‘एप्पिको’ था। इसी क्रम में देखें तो एक अश्वेत अफ्रीकी महिला वांगरी मधाई को वर्ष 2004 में पर्यावरण संरक्षण के प्रचार-प्रसार हेतु 2004 का नोबल शांति पुरस्कार दिया गया। वांगरी मथाई 1977 से केन्या में ग्रीन बेल्ट आंदोलन चला रही थीं।

उन्होंने आंदोलन के द्वारा वहां की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण तथा सांस्कृतिक विकास को प्रोत्साहित किया। मथाई की धारणा थी कि धरती का अमन, शांति तथा सद्भाव तब तक कायम नहीं किया जा सकता, जब तक पर्यावरण को सुरक्षित करने का संकल्प न ले लिया जाए।

मथाई के प्रयास से ही केन्या की ऊबड़-खाबड़ धरती को हरा-भरा किया गया है। इस प्रकार उन्होंने धरती को हरा-भरा करने के लिए अपने सहयोगियों के साथ पूरे केन्या में 3 करोड़ से अधिक पौधे लगवाये इस प्रकार उन्होंने जंगल एवं जमीन की धरोहर को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

प्रश्न 8.
पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने के लिए एक व्यक्ति के रूप में आप क्या उपाय करेंगे?
उत्तर:
प्रदूषण वायु, भूमि, जल या मृदा के भौतिक, रासायनिक या जैवीय अभिलक्षणों का एक अवांछनीय परिवर्तन है अवांछनीय परिवर्तन उत्पन्न करने वाले कारकों को प्रदूषक (Pollutant) कहते हैं। पर्यावरण सुधार हेतु सरकार के द्वारा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया गया है। जीव श्वसन संबंधी आवश्यकताओं के लिए वायु पर निर्भर रहते हैं।

वायु प्रदूषक गैस या कणकीय पदार्थ होते हैं ताप विद्युत संयंत्रों के धूम्र स्तंभ (Smokestacks), कणिकीय धूम्र व अन्य उद्योगों से हानिकर गैसें, जैसे- नाइट्रोजन, ऑक्सीजन आदि के साथ (Particulate) तथा गैसीय वायु प्रदूषक भी निकलते हैं। वायुमंडल में इन हानिकारक गैसों को छोड़ने से पूर्व इन प्रदूषकों को पृथक् करके या नियंदित (Filtered ) कर बाहर निकाल देना चाहिए।

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कणिकीय पदार्थों को निकालने के लिए स्थिर वैद्युत अवक्षेपित्र (Electrostatic Precipitator ) का उपयोग किया जाना चाहिये। किसी भी उद्योग को स्थापित करने से पूर्व वहाँ वृक्ष लगाने तथा कचरे के निष्पादन की गारंटी होनी चाहिए। वाहनों की देखभाल तथा इसमें CNG ईंधन का उपयोग किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार जलीय प्रदूषण हेतु नगरों से निकला गंदा पानी, वाहित मल-मूत्र तथा उद्योगों से निकले अपशिष्ट की व्यवस्था होनी चाहिए। घरेलू अपशिष्टों के निपटाने हेतु समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। अपशिष्टों से वाष्पशील व विलयशील यौगिकों को पृथक् करना चाहिए। इन्हें जला देना चाहिए। पोलीथीन की थैलियों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। ठोस कचरा निष्पादन के लिए उच्च तकनीकों का प्रयोग व सुनियोजित भूमि भराव करना चाहिए। ठोस अपशिष्टों का पुनः चक्रण व पुन: उपयोग करना तथा पर्यावरण, स्नेही कृषि तकनीकों का उपयोग आवश्यक है।

शोर प्रदूषण नियंत्रण के लिए शोर की तीव्रता के स्रोत पर ही कम करके, ध्वनि के प्रसार माध्यम में गतिरोध उत्पन्न करके, ग्राही को ध्वनि के उत्पन्न होने के स्थान से दूर रखकर, औद्योगिक इकाइयों को आवासीय स्थलों से दूर स्थापित करने से हरित पट्टी का विकास करके, ध्वनि की तीव्रता को ग्रहण करने वाले अवशोषकों का इस्तेमाल करके, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों आदि को रिहायशी क्षेत्रों से दूर स्थापित करके तथा विभिन्न स्थलों हेतु ध्वनि स्तर निश्चित करके किया जा सकता है। ” इसी के साथ-साथ हमें CFCs के उत्सर्जन को कम करना चाहिए।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित के बारे में संक्षेप में चर्चा करें-
(क) रेडियो-सक्रिय अपशिष्ट
(ख) पुराने बेकार जहाज और ई- अपशिष्ट
(ग) नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट ।
उत्तर:
(क) रेडियो सक्रिय अपशिष्ट ( Radio-active Wastes ) – पूर्व में न्यूक्लीय ऊर्जा को विद्युत उत्पादन हेतु गैर-प्रदूषक (Non-polluting) विधि मानी जाती थी। परंतु बाद में यह ज्ञात हुआ कि न्यूक्लीय ऊर्जा के प्रयोग से दो सर्वाधिक खतरनाक अंतर्निहित (Inherent) समस्याएँ हैं। पहली समस्या इनके आकस्मिक रिसाव से है जैसा कि श्री माइल द्वीप (Three Mile Island) और चेनोंबिल (Chernobly) की घटनाओं में हुआ था रेडियो-सक्रिय अपशिष्ट से दूसरी समस्या इन अपशिष्टों के सुरक्षित निपटान (Disposal) की है।

रेडियो-सक्रिय पदार्थों से निकलने वाला विकिरण जीवों के लिए अत्यधिक नुकसानदेह होता है क्योंकि इसके कारण अति उच्चदर से उत्परिवर्तन (Mutation) होते हैं। रेडियो-सक्रिय अपशिष्ट विकिरण की अधिक मात्रा (doses) घातक यानी जानलेवा (Lethal ) होती है परंतु इसकी कम मात्रा से भी अनेक विकार उत्पन्न होते हैं। इनसे सबसे अधिक बार-बार होने वाला विकार कैंसर है।

इस प्रकार ये अपशिष्ट अत्यंत प्रभावकारी प्रदूषक हैं तथा इनके उपचार में अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। वैज्ञानिकों ने इसके निपटान के लिए सुझाया है कि इनका समुचित पूर्व में उपचारित (Pre-treatment) कर कवचित पात्रों (Shielded Containers) में भंडारण करके चट्टानों के नीचे लगभग 500 मीटर की गहराई में पृथ्वी में गाड़कर करना चाहिए।

(ख) पुराने बेकार जहाज और ई अपशिष्ट (Old useless Ships and E-Wastes) – पुराने बेकार जहाज जिनका निर्माण धातुओं से होता है, इनको फेंकने के बजाय इसमें से धातु भाग को पृथक् कर पुनः चक्रण में उपयोग में लेकर पुनः धातु का निर्माण कर नये जहाज बनाने के उपयोग में लाया जा सकता है। ऐसे कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक सामान जो मरम्मत के लायक नहीं रह जाते हैं इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (E-Wastes) कहलाते हैं। ई-अपशिष्ट को लैंडफिल्स (Landfills) में गाड़ दिया जाता है या जलाकर भस्म कर दिया जाता है।

विकसित देशों में उत्पादित ई- अपशिष्ट का आधे से अधिक भाग विकासशील देशों, विशेषकर चीन, भारत तथा पाकिस्तान में निर्यात किया जाता है जबकि ताँबा, लोहा, सिलिकॉन, निकल और स्वर्ण जैसे धातु पुनश्चक्रण (Recycling) प्रक्रियाओं द्वारा प्राप्त किए जाते हैं। विकसित देशों में ई- अपशिष्ट के पुनश्चक्रण की सुविधाएँ तो उपलब्ध हैं, लेकिन विकासशील देशों में यह कार्य प्रायः हाथ से किया जाता है।

इस प्रकार इस कार्य से जुड़े कर्मियों पर ई- अपशिष्ट में मौजूद विषैले पदार्थों का प्रभाव पड़ता है। ई अपशिष्ट के उपचार का एकमात्र हल पुनश्चक्रण है, परंतु इसे पर्यावरण अनुकूल या अच्छे तरीके से किया जाना चाहिए।

(ग) नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट [संकेत – पाठ्यसामग्री के बिंदु 16.3 को देखिये। ]

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प्रश्न 10.
दिल्ली में वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिए क्या प्रयास किये गये? क्या दिल्ली में वायु की गुणवत्ता में सुधार हुआ?
उत्तर:
एक अध्ययन (Controlling vehicular air pollution A case study of Delhi)
वाहनों की संख्या अधिक होने के कारण दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर देश में सबसे अधिक है। यहाँ पर वाहनों की संख्या गुजरात और पश्चिम खंगाल में कुल मिलाकर जितने वाहन हैं या उससे अधिक है। सन् 1990 के आकड़ों के अनुसार दिल्ली का स्थान विश्व के 41 सर्वाधिक प्रदूषित नगरों में चौथा है। दिल्ली में वायु प्रदूपण की स्थिति इतनी खतरनाक हो गई कि भारत के सर्षोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पी आई एल) दायर की गई।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसकी कड़ी निंदा की गई और न्यायालय ने भारत सरकार से एक निश्चित अर्वधि में उचित उपाय करने का आदेश दिया साथ ही, यह भी आदेश दिया कि सभी सरकारी वाहनों व बसों में डीजल के ₹धान पर संपीडित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) का प्रयोग किया जाए। वर्ष 2002 के अंत तक दिल्ली की सभी बसों को सीएनजी में परिवरित कर दिया गया सीएनजी डीजल से बेहतर होता है क्योंकि वाहन में सीएनजी सबसे अच्छी तरह जलता (Burn) है और यहुत ही कम मात्रा में जलने के उपरांत बचता है जब्बकि डीजल या पेट्रोल के मामले में ऐसा नहीं है। इसके अतिरित्त यह पेट्रोल या दीजल से सस्ता होता है।

पेट्रोल तथा डीजल की तरह इसे अपमिश्रित नहीं किया जा सक्ता। सीएनजी में परिवर्तित करने में मुख्य समस्या इसे वितरण स्थल/पंप तक ले जाने के लिए पाइप लाइन विछाने की कठिनाई को लेकर और इसकी अबाधित सप्लाई करने की है। साथ ही साथ दिल्ली में वाहन प्रदृषण को कम करने के अन्य उपाय भी किए गए हैं जैसे-पुरानी गाड़ियों को धीरेधीरे हृटा देना, सीसा रहित पेट्रोल और डीजल का प्रयोग, कम गंधक (सल्फर) युक्ठ पेट्रोल और डीजल का प्रयोग, वाहनों में उत्प्रेरक परिवर्तकों का प्रयोग, वाहनों के लिए कठोर प्रदूषण स्तर लागू करना आदि।

भारत सरकार ने एक नयी वाहन नीति के वहत यहाँ के शहरों में वाहन प्रदूषण को कम करने के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत निर्धारित किया है। ईंधन के लिए अधिक कठोर मानक बनाए गए हैं ताकि पेट्रोल और डीजल ईंधनों में धीरे-धीरे गंधक और एरोमेटिक की माभा कम की जाए। उदाहरण के लिए, बूरो II मानक के अनुसार डीजल और पेट्रोल में गंधक भी निर्यंत्रित कर क्रमशः 305 और 150 पार्ट्स प्रति मिलियन (पी पी एम) करना चाहिए। संबंधित इंधन में एरोमैंटिक हाइड्रोकार्बन 42 प्रतिशत पर सीमित करना चाहिए।

मार्गदर्शी के अनुसार पेट्रोल और डीजल में गंधक को कम कर 50 पी पी एम पर लाकर लध्ष्य को 35 प्रतिशत के स्तर पर लाना चाहिए। ईंधन के अनुरूप वाहन के इंजनों में भी सुधार करना होगा। भारत स्टेज II, जो यूरो-II मानक के तुल्य है, और जो अभी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बंगलौर, हैदराबाद, अहमदाबाद, पुणे, सूरत, कानपुर और आगरा में लागू है।

वह 1 अप्रेल, 2005 से पूरे देश में सभी स्वचालित वाहनों में लागू किया जाना चाहिए। 1 अप्रेल, 2005 से ऊपर वर्णित सभी ग्यारह शहरों में सभी स्वचालित वाहनों और ईंधन, पेट्रोल और डीजल के उत्सर्जन मानक यूरो-III होना चाहिए था और 1 अप्रेल, 2010 के लिए यह यूरो-IV निर्धारित किया गया है। देश अन्य सभी भागों में 2010 तक यूरो-III मानक लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। दिल्ली में किए गए इन प्रयासों के कारण यहाँ की वायु की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित के बारे में संक्षेप में चर्चा करें- (क) ग्रीन हाउस गैसें (Green House Gases )
(ख) उत्प्रेरक परिवर्तक (Clatalytic Converter )
(ग) पराबैंगनी – बी (Ultraviolet-B)
उत्तर:
(क) ग्रीन हाउस गैसें (Green House Gases ) वातावरण में उपस्थित CO2, मीथेन (CH4), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्स ऑक्साइड (N2O), क्लोरो फ्लोरो कार्बन्स (CFCs) गैसें ग्रीन हाउस गैसें कहलाती हैं। इन गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन से पृथ्वी के तापक्रम में वृद्धि होती जाती है।

(ख) उत्प्रेरक परिवर्तक (Clatalytic Converter) – महानगरों में स्वचालित वाहन वायुमंडल प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। जैसे-जैसे सड़कों पर वाहनों की संख्या बढ़ती है यह समस्या अन्य शहरों में भी पहुँच रही है। स्वचालित वाहनों का रखरखाव उचित होना चाहिए। उनमें सीसा रहित पेट्रोल या डीजल का प्रयोग होने से उत्सर्जित प्रदूषकों की मात्रा कम हो सकती है। उत्प्रेरक परिवर्तक ( Clatalytic converter ) में कीमती धातु, प्लैटिनम- पैलेडियम और रोडियम लगे होते हैं जो उत्प्रेरक (Catalyst) का कार्य करते हैं । ये परिवर्तक स्वचालित वाहनों में लगे होते हैं जो विषैले गैसों के उत्सर्जन को कम करते हैं।

जैसे ही निर्वात उत्प्रेरक परिवर्तक से होकर गुजरता है अदग्ध हाइड्रोकार्बनडाइऑक्साइड और जल में बदल जाता है और कार्बन मोनोऑक्साइड तथा नाइट्रिक ऑक्साइड क्रमश: कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन गैस में परिवर्तित हो जाती है। उत्प्रेरक परिवर्तक युक्त मोटर वाहनों में सीसा रहित (Unleaded) पेट्रोल का उपयोग करना चाहिए क्योंकि सीसा युक्त पेट्रोल उत्प्रेरक को अक्रिय करता है।

HBSE 12th Class Biology Solutions Chapter 16 पर्यावरण के मुद्दे

(ग) पराबैंगनी – बी (Ultraviolet B)
विकिरण सजीवों के लिए अत्यधिक हानिकारक हैं। पराबैंगनी-बी (UV- B) की अपेक्षा छोटे तरंगदैर्घ्य (wavelength) युक्त पराबैंगनी (UV) विकिरण पृथ्वी के वायुमंडल द्वारा लगभग पूरा का पूरा अवशोषित हो जाता है बशर्ते कि ओजोन स्तर ज्यों का त्यों रहे । लेकिन UV-B, DNA को क्षतिग्रस्त करता है और उत्परिवर्तन करता है। इसके कारण त्वचा में बुढ़ापे के लक्षण दिखते हैं, इसकी कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और विविध प्रकार के त्वचा कैंसर हो जाते हैं।

हमारे आँख का स्वच्छमण्डल (Cornea) UV-B विकिरण का अवशोषण करता है। इसकी उच्च मात्रा के कारण कॉर्निया का शोथ हो जाता है जिसे हिम अंधंता (Snow-blindness), मोतियाबिंद आदि कहा जाता है। इसके उद्भासन (exposure) से कॉर्निया स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता है। ओजोन के अवक्षय (ह्रसस) के हानिकारक प्रभाव को देखते हुए सन् 1987 में माँट्रियल (कनाडा) में अंतर्राष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसे माँट्रियल प्रोटोकॉल कहा जाता है। यह संधि 1989 से प्रभावी हुई।

इसके अन्तर्गत ओजोन अवक्षयकारी गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण हेतु प्रतिबंध लगाया गया तथा और अधिक अन्य प्रयास किये गये। प्रोटोकॉल में विकसित व विकासशील देशों के लिये अलग-अलग निश्चित दिशानिर्देश दिये गये जिससे CFCs व अन्य ओजोन अवक्षयकारी रसायनों के उत्सर्जनों को कम किया जा सके।

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